MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

धूपगढ़ की सुबह साँझ अभ्यास

धूपगढ़ की सुबह साँझ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धूपगढ़ कहाँ स्थित है?
उत्तर:
धूपगढ़ प्रसिद्ध पचमढ़ी पर स्थित है।

प्रश्न 2.
प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
लेखक ने प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ मानी हैं-सुबह और साँझ।

प्रश्न 3.
सतपुड़ा का गौरव किसे कहा गया है? (2017)
उत्तर:
धूपगढ़ को सतपुड़ा का गौरव कहा गया है।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने सुबह और साँझ की तुलना माता-पिता के किन गुणों से की है?
उत्तर:
लेखक ने सुबह की तुलना पिता की प्रेरणा और शक्ति सम्पन्नता से की है तथा माता की ममता की तुलना साँझ की सहृदयता से की है।

प्रश्न 2.
साँझ की आँखों में करुणा क्यों उभर आती है?
उत्तर:
वनवासी की पगड़ी पर एवं वनवासी स्त्री की चूनर पर फूल संध्या के समय गिर जाते हैं। इससे साँझ की आँखें करुणा से द्रवित हो जाती हैं।

प्रश्न 3.
सुबह और साँझ की परस्पर तुलना क्यों अनुचित है?
उत्तर:
सुबह और साँझ की तुलना परस्पर अनुचित इसलिए है क्योंकि सुबह और साँझ दोनों की दुनिया अलग-अलग है, दोनों का अपना-अपना महत्व और सम्मोहन है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने प्रातःकालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना किन-किन बातों से की
उत्तर:
लेखक ने प्रात:कालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना विभिन्न प्राकृतिक उपमानों के माध्यम से की है-जिस प्रकार रोली से स्नात कलश को किरण से युक्त अल्पना पर रख दिया हो या किसी बड़े कुम्हार ने लाल मिट्टी का घड़ा अँधेरी सड़क पर प्यास से व्याकुल मानव की प्यास को बुझाने के लिए भर दिया हो। इसके अतिरिक्त जितने भी सेवा में व्यस्त मनुष्य हैं उनकी निस्वार्थ भावना युक्त सोने की कलश की चमक से तुलना की है।

प्रश्न 2.
तमतमाते दिवस की अवसान बेला कैसी है?
उत्तर:
तमतमाते दिवस की अवसान बेला में एक विशेष प्रकार का परिवर्तन आ जाता है। उसका प्रमुख कारण है कि इस बेला में सब कुछ शान्त हो जाता है। वनस्पति शान्त है, पक्षी भी शान्त हैं। सांसारिक झमेले भी शान्त हैं। आसमान की नीलिमा भी शान्त है। कभी न थकने वाले पक्षियों की उड़ान भी शान्त है क्योंकि वे संध्या काल में अपने नीड़ में विश्राम करते हैं। इसी कारण उनकी तीव्रगामी गति शान्त है। प्रकम्पित ध्वनियाँ शान्त हैं। उसका कारण है कि इस बेला में चारों ओर का कोलाहल शान्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
लेखक सुबह और साँझ के माध्यम से क्या कहना चाहता है? (2008, 09)
उत्तर:
लेखक ने सुबह और साँझ के माध्यम से जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन किया है। इसमें जीवन, मृत्यु, सुख, दु:ख और आदि-अंत तथा विभिन्न प्रकार के उतार-चढ़ाव के द्वारा जीवन के काल चक्र को दर्शाया है।।

सुबह और साँझ एक-दूसरे के विपरीत नहीं है अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। पिता की तुलना एवं माता की तुलना लेखक ने सुबह और साँझ से की है और यह बताने का प्रयास किया है कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों को सहृदय व स्नेह द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं तदनुकूल सुबह और साँझ मानव को जीवन पथ पर अग्रसर होने का पाठ पढ़ाते हैं। साथ ही सन्देश देते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति को धैर्य से बढ़ते रहना चाहिए।

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प्रश्न 4.
लेखक की भाषा अलंकारिक तथा शैली ललित है। उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की अलंकारिक भाषा का उदाहरण निम्नवत् है-
(1) वैसे तो कई सुबहों और साँझों का प्रकाश भीगी-पलकों ने उठते-गिरते देखा है परन्तु उन साँझों में एक साँझ यादों के वृक्ष पर फल की तरह लगी हुई है। धूपगढ़ की साँझ का रूप, रंग, आकार, रस सब कुछ निराकार बनकर अंतरिक्ष में फैला हुआ है। पंचमढ़ी, पर्वतों की रानी कही जाती है। सतपुड़ा का सारा निसर्गगत सौन्दर्य पचमढ़ी की गोदी में झूल रहा है।

(2) लेखक की भाषा शैली का अनुपम उदाहरण द्रष्टव्य है-प्राची के हिरण्य गर्भ से बालारूण की जन्म बेला की प्रतीक्षा में विश्व मोहिनी शक्ति जैसे जाग गई हो। क्षितिज पर पतली-सी रेखा उभरती है और बालक की किलकारी दिशाओं तक फैल जाती है। पक्षी उसी किलक को अपने स्वरों में भरकर आकाश को जाते हैं। क्षितिज पर भुवन भास्कर की पहली रेखा जैसे किसी बालक ने पूरब की स्लेट पर स्वर्णिम पेन से लकीर खींच दी हो; जिसका बीच का भाग ऊपर की ओर हल्का-सा उठा हुआ है। जैसे अंधेरे के महासमुद्र में आती हुई ऊषा का जल सतह पर सुनहरे रंग का केशबंध’ (हेयर बैंड) दिखाई दे रहा है।

(3) अन्य उदाहरण देखिए-यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंसक पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येत्तर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। उपर्युक्त उदाहरणों द्वारा भाषा की अलंकारिकता एवं शैली की विशेषता अवलोकनीय है।

प्रश्न 5.
इन गद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) गगन से सूर्योदय ……………. विरला ही पहुँचता है।
(2) धूपगढ़ की साँझ…………….. सुला लेती है।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

(2) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

प्रश्न 6.
(क) प्रकृति सुख-दुःख से परे है। वह नियंता है।
(ख) जन्म और मृत्यु प्रकृति के लिए दो सहज स्थितियाँ हैं।
(ग) सुख के केन्द्र में स्वतन्त्रता और उन्मुक्तता होती है।
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव पल्लवन कीजिए।
उत्तर:
(क) लेखक ने इस पंक्ति द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि प्रकृति पर दुःख हो अथवा सुख, किसी भी प्रकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। प्रकृति नियंता एवं वीतराग है। वह भौतिक सुख-दुःख से परे रहकर विश्व का नियन्त्रण करती है। उसी के निर्देशन में परिवर्तन के दृश्य उपस्थित होते रहते हैं। प्रकृति पर विषम से विषम परिस्थितियाँ तनिक भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकतीं।

(ख) लेखक का कथन है कि इस धरती पर प्रकृति के माध्यम से निरन्तर जन्म और मृत्यु चक्र चलता ही रहता है। इनसे किसी को भी मुक्ति नहीं मिल सकती है। लेखक ने यहाँ गीता के इस तथ्य को उजागर किया है जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु निश्चित है तथा मृत्यु के पश्चात् पुनः जन्म होता है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नवीन वस्त्र धारण करता है। तद्नुरूप आत्मा पुराना काया रूपी वस्त्र उतारकर नया कायारूपी वस्त्र धारण करती है।

(ग) लेखक का कथन है धूपगढ़ वन क्षेत्र में रहने वाले मानव अभावों एवं गरीबी से त्रस्त हैं। वे इन अभावों के अन्तर्गत एक असीम सुख का अनुभव करते हैं। यद्यपि वे सांसारिक दृष्टि से कंगाल हैं लेकिन प्रकृति की गोद में पल कर एक अनिवर्चनीय सुख का अनुभव करते हैं। उनका सुख किसी के माध्यम से प्राप्त न होकर प्रकृति की निकटता का परिणाम है। वे स्वयं को पराधीन न मानकर स्वतन्त्र भाव से वन की धरती पर विचरण करते हैं।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय और उपसर्ग छाँटकर लिखिए
प्रस्थान, मनुष्यता, उन्मुक्तता, उज्ज्वल, तन्मयता, अविजित, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उत्तर:
प्रत्यय-मनुष्यता, उन्मुक्तता, तन्यता, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उपसर्ग : प्रस्थान, उज्ज्वल, अविजित।

प्रश्न 2.
निम्न शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
सुबह, साँझ, गाँव, पाँव, आँच।
उत्तर:
प्रातः, संध्या, ग्राम, पाद, अग्नि।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
उत्तर:

  1. जहाँ जाया न जा सके – अगम्य
  2. जिसकी उपमा न हो – अनुपमेय
  3. जिसे पढ़ा न हो – अपठित
  4. काँटों से भरा हुआ – कंटकाकीर्ण
  5. आकाश को छूने वाला – गगनचुम्बी
  6. सदा हरने वाला – अमर।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्य में विराम चिह्नों का यथास्थान प्रयोग कीजिए-
यह साँझ पृथ्वी को अमृत सोम शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है
उत्तर:
यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ पाठ का सारांश

पंचमढ़ी स्थित धूपगढ़ सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की सर्वाधिक ऊँची चोटी है। सूर्य के निकलने एवं अस्त होने के समय नेत्रों एवं मन को लुभाने वाले दृश्यों की शोभा देखते ही बनती है। पर्यटक इन्हें देखते-देखते अघाते नहीं हैं। डॉ. श्रीराम परिहार ने अपने निबन्ध में धूपगढ़ की -प्रातः एवं साँझ बेला का छायावादी चित्रण अंकित किया है। प्रकृति का मानवीकरण सटीक एवं जीवन्त है। सुबह एवं शाम के प्रतीकों के द्वारा जिन्दगी, मृत्यु, विषाद एवं सुख आदि कालचक्र का ऐसा गतिशील विवेचन किया है जो जीवन की वास्तविकता को हमारे नेत्रों के समक्ष उपस्थित करने में सक्षम है। वनवासियों के संकटग्रस्त जीवन का भी वर्णन किया है। पशुओं एवं वन प्रदेश का भी चित्रण किया है। प्रातः एवं सन्ध्या के माध्यम से जिन्दगी के संघर्ष एवं शान्ति के तालमेल को भी अंकित किया है। निबन्ध में जिन्दगी का राग गुञ्जित है। आत्मा का वैराग्य भी ध्वनित है। सुबह-शाम एक-दूसरे के विरोधी न होकर जीवन के संदेशप्रद हैं।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ कठिन शब्दार्थ

सुगन्ध = खुशबू। साँझ = सायंकाल। वर्ण रंग। अदृश्य = जो दिखायी न दे। दिक्काल = दिशाओं के स्वामी। उद्गम = निकलने का स्थान। क्षितिज = जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले हुए दिखाई देते हैं। पखेरुओं = पक्षियों। कर्मपूर्णता = काम के पूरा होने का भाव। अग्निमय = आग से भरा हुआ। शक्ति सम्पन्नता = शक्ति से युक्त। हृदय रसज्ञता = हृदय के रस को जानने की क्षमता। भोर तक = प्रात:काल तक। भीगी पलकों = आँसुओं से गीली पलकें। अंतरिक्ष = आकाश। निसर्गगत सौन्दर्य = प्राकृतिक सुन्दरता। पाग = पगड़ी। निशिवासर = रात-दिन। सान्निध्य = सम्पर्क। ब्रह्ममुहूर्त = प्रात:काल। वन वल्लरियों = लताओं। प्राची = पूर्व। हिरण्य-गर्भ = स्वर्ण या सोने की कोख। बालारुण = प्रात:कालीन सूर्य। स्वर्णिम = सोने के। ऊषा = प्रात:काल। महानिलय = आकाश। तृषा = तृप्ति, प्यास बुझाने के लिए। निष्कलुष = पवित्र। गोरिक वसना = गेरुए वस्त्र धारण करने वाली। नील-कुसुमित = नीले पुष्प के रूप में खिलना, नीलकलिका। माधवी लता = माधवी पुष्प की लता। प्रातिभ = प्रात:कालीन सूर्य की लाली। देहयष्टि = शरीर सौष्ठव। अल्हड़ ठवनि = चंचलमुद्रा। नूपुरों = घुघरुओं। कर्ण आह्लादन = कानों में खुशी उत्पन्न करने वाली। सारस्वत = ज्ञानमयी, बौद्धिक। पूर्वपीठिका = पहली भूमिका। तिमिर = अन्धकार। अनुताप-पूरित = दुःख से भरा हुआ। दिवस = दिन। प्राण बल्लभा = प्रेयसी, प्रियतमा। मलयज चीर = सुगन्धित वस्त्र, मलय चन्दन गन्ध से सुगंधित। मृग मरीचिका = मृगतृष्णा, मिथ्या प्रतीति। भास्वर = प्रकाशवान। उत्पुल्ल = प्रसन्न। सारसवर्णी = सारस के रंग वाली। साँसोच्छेदन = साँसों को समाप्त करना। अहेतुक = निस्वार्थ, स्वार्थ हीन। वात्सल्य = सन्तान के प्रति माता-पिता का प्रेम। स्लथ = बकी। शुभ्र = श्वेत, स्वच्छ।

धूपगढ़ की सुबह साँझ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. गगन से सूर्योदय के प्रकाश का अमृत झरता है। किरणें फूटती हैं और रश्मि-सेतु सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक बन जाता है। इसे देखना अच्छा लगता है। इस रश्मि सेतु पर चलकर सूर्य तक कोई विरला ही पहुँचता है। (2015)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

विशेष :

  1. प्रकृति का मानवीकरण है।
  2. प्रात: बेला की मनोरम झाँकी है।
  3. शैली अलंकारिक एवं परिमार्जित है।

2. धूपगढ़ की सुबह देखी है, साँझ भी देखी है। दोनों में किसका सौन्दर्य ज्यादा है? किसका रंग घना है? किसका प्रभाव गहरा है? नहीं कह सकते। यह तुलना भी अनुचित है। सुबह, सुबह है। साँझ, साँझ है। दोनों की अपनी दुनिया है। अपनी महिमा है। अपना सम्मोहन है। सामान्यतः सुबह और साँझ अपने प्राकृतिक चक्र के कारण सहज रूप में आती जाती हैं। इनके होने में प्रकृति की इच्छा ही अभिव्यक्त होती है। (2016)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में सुबह और साँझ दोनों के स्वाभाविक महत्व को समझाया गया है।

व्याख्या :
धूपगढ़, प्राकृतिक सौन्दर्य का भण्डार है। यहाँ की सुबह और साँझ बहुत ही रोमांचकारी होती है। यहाँ की सुबह और साँझ दोनों की सुन्दरता को देखा है। दोनों का सौन्दर्य अद्भुत है। यह कहना सम्भव नहीं है कि इनमें किसकी सुन्दरता अधिक है। किसका रंग घना प्रभावी है अथवा किसकी प्रभावशीलता गहन है। इन दोनों की सुन्दरता की तुलना करना भी उचित नहीं है। सुबह का सौन्दर्य सुबह का है और साँझ की सुन्दरता साँझ की है। इन दोनों का संसार अपना-अपना है। इनका गौरव, महत्व एवं मोहकता भी अपनी-अपनी है। वास्तविकता यह है कि सुबह और साँझ प्रकृति के चक्र के कारण स्वाभाविक रूप से आती हैं और चली जाती हैं। ध्यान से देखें तो इन दोनों के सम्पादन में प्रकृति की मनोकामना ही व्यक्त होती प्रतीत होती है।

विशेष :

  1. सुबह और साँझ के आवागमन की स्वाभाविकता का सटीक अंकन हुआ है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. काव्यमयी आलंकारिक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

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3. यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंस्त्र पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येतर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं, तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। (2012)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

विशेष :

  1. संध्या के समय होने वाली गतिविधियों का रोचक वर्णन हुआ है।
  2. लाक्षणिक भाषा तथा रोचक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 1 उत्साह

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उत्साह अभ्यास

उत्साह अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्साह के बीच किनका संचरण होता है?
उत्तर:
उत्साह के बीच धृति (धैर्य) और साहस का संचरण होता है।

प्रश्न 2.
लेखक ने वीरों के कितने प्रकार बताये हैं?
उत्तर:
लेखक ने वीरों के चार प्रकार बताये हैं-

  1. कर्मवीर
  2. युद्धवीर
  3. दानवीर, और
  4. दयावीर।

प्रश्न 3.
प्रयत्न किसे कहते हैं?
उत्तर:
बुद्धि द्वारा पूर्ण रूप से निश्चित की हुई व्यापार-परम्परा का नाम प्रयत्न है।

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उत्साह लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्येक कर्म में किस तत्त्व का योग अवश्य होता है?
उत्तर:
प्रत्येक कर्म में थोड़ा या बहुत बुद्धि का तत्त्व अवश्य होता है। कुछ कर्मों में बुद्धि और शरीर की तत्परता साथ-साथ चलती है। उत्साह की उमंग जिस प्रकार हाथ-पैर चलवाती है उसी प्रकार बुद्धि से भी कार्य करवाती है।

प्रश्न 2.
फलासक्ति का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
फलासक्ति से कर्म के लाघव की वासना उत्पन्न होती है। चित्त में यह आता है कि कर्म बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत-सा मिल जाए। इससे मनुष्य कर्म करने के आनन्द की उपलब्धि से भी वंचित रहता है।

प्रश्न 3.
कौन-सी भावना उत्साह उत्पन्न करती है? उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:
कर्म भावना उत्साह उत्पन्न करती है। किसी वस्तु या व्यक्ति के साथ उत्साह का सीधा लगाव नहीं होता। उदाहरणार्थ, समुद्र लाँघने के लिए उत्साह के साथ हनुमान उठे हैं उसका कारण समुद्र नहीं-समुद्र लाँघने का विकट कर्म है। अतः कर्मभावना ही उत्साह की जननी है।

उत्साह दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भय और उत्साह में क्या अन्तर है? (2009, 11)
उत्तर:
भय का स्थान दुःख वर्ग में आता है और उत्साह का आनन्द वर्ग में अर्थात् यदि किसी कठिन कार्य को हमें भयवश करना होता है तो उससे हमें कष्ट और दुःख का अनुभव होता है क्योंकि उस कार्य को करने में हमारी प्रवृत्ति नहीं होती। मन में उत्साह नहीं होता। हमारा मन चाहता है कि उक्त कार्य हमें न करना पड़े तो अच्छा रहे किन्तु उत्साह में मन के अन्दर सुख, उमंग, साहस और प्रेरणा का समावेश होता है। इसमें हम आने वाली कठिन परिस्थिति के भीतर भी साहस का अवसर ढूँढ़ते हैं और निश्चय करने से मन में प्रस्तुत कार्य को करने के सुख की उमंग का अनुभव करते हैं। अतः हम आनन्दित होकर उस कार्य को करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार भय में दुःख और उत्साह में आनन्द की सृष्टि होती है।

प्रश्न 2.
किसी कर्म के अच्छे या बुरे होने का निश्चय किस आधार पर होता है? उत्साह के सन्दर्भ में सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (2008)
उत्तर:
किसी कार्य के अच्छे या बुरे होने का निश्चय अधिकतर उसकी प्रवृत्ति के शुभ या अशुभ परिणाम के विचार से होता है। वही उत्साह जो कर्त्तव्य कर्मों के प्रति इतना सुन्दर दिखाई पड़ता है, अकर्त्तव्य कर्मों के प्रति होने पर वैसा प्रशंसनीय नहीं प्रतीत होता। आत्म-रक्षा, पर-रक्षा, देश-रक्षा आदि के निमित्त साहस की जो उमंग देखी जाती है और उसमें जो सौन्दर्य निहित है वह पर-पीड़ा, डकैती आदि जैसे साहसिक कार्यों में कभी दिखाई नहीं देता अर्थात् उत्साह में साहस और सौन्दर्य दोनों निहित हैं। अच्छे कर्मों को करने में दोनों होते हैं और उनकी प्रशंसा की जाती है। बुरे कर्मों को करने वाले उत्साह में केवल साहस होता है, सौन्दर्य नहीं होता। अत: ऐसा उत्साह प्रशंसनीय नहीं कहा जाता है।

प्रश्न 3.
उत्साह का अन्य कर्मों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
उत्साह में मनुष्य आनन्दित होता है और उस आनन्द के कारण उसके मन में एक ऐसी स्फूर्ति उत्पन्न होती है जो एक के साथ उसे अनेक कार्यों के लिए अग्रसर करती है। यदि मनुष्य को उत्साह से किए किसी एक कार्य में बहुत-सा लाभ हो जाता है या उसकी कोई बहुत बड़ी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो अन्य जो कार्य उसके सामने आते हैं उन्हें भी वह बड़े हर्ष और तत्परता के साथ करता है। उसके इस हर्ष और तत्परता में कारण उत्साह ही होता है। इसी प्रकार किसी उत्तम फल या सुख प्राप्ति की आशा या निश्चय से उत्पन्न आनन्द, फलोन्मुखी प्रयत्नों के अतिरिक्त अन्य दूसरे कार्यों के साथ संलग्न होकर उत्साह के रूप में दिखाई देता है। यदि हम किसी ऐसे उद्योग में संलग्न हैं जिससे भविष्य में हमें बहुत लाभ या सुख प्राप्त होने की आशा है तो उस उद्योग को हम बहुत उत्साह से करते हैं। इस प्रकार उत्साह का अन्य कर्मों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 4.
इन गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(अ) आसक्ति प्रस्तुत ………. का नाम उत्साह है।
(ब) धर्म और उदारता ………. सच्चा सुख है।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में आचार्य जी ने बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि कर्मफल में। तभी उसे अपने कार्य में आनन्द की उपलब्धि हो सकती है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि मनुष्य को लगाव अथवा आसक्ति अपने संकल्पित कर्म में होनी चाहिए क्योंकि हमारे सामने तो वह कर्म ही प्रस्तुत होता है जिसे हमें करना होता है अथवा वह वस्तु जिसे पाने का लक्ष्य हो, उसमें आसक्ति का होना उचित है क्योंकि तब हम कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित होंगे। इसका कारण है कि कर्म अथवा वह वस्तु तो हमारे सम्मुख उपस्थित है जिसे हमें करना है अथवा पाना है किन्तु उसका फल तो दूर रहता है फिर हम फल में आसक्ति क्यों करे।

फल में आसक्ति करने से कर्म करने का आनन्द जाता रहता है और हम कर्म करने से विरत हो जाते हैं। अतः हमें अपने कर्म का लक्ष्य ही ध्यान में रखना चाहिए। कर्म का लक्ष्य ध्यान रखने पर हमें कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। उससे एक प्रकार की उत्तेजना अथवा उमंग हमारे मन में भी भर जाती है। इससे हमें कार्य करते समय निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती रहती है। कर्म करने की उत्तेजना और आनन्द की अनुभूति इसी को उत्साह मनोभाव के नाम से जाना जाता है।

(ब) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्य खण्ड में लेखक ने बताया है कि जब मनुष्य उच्च और लोकोपकारी कर्म करता है तो उसे कर्म करते हुए ही फल की प्राप्ति के आनन्द की अनुभूति होने लगती है। इससे उसका मन एक दिव्य प्रकार के आनन्द से भर जाता है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि धर्म और उदार दृष्टिकोण से युक्त होकर जो कार्य किए जाते हैं उन कार्यों का आदर्श ऊँचा होता है। इनमें स्वतः ही एक ऐसा अलौकिक आनन्द भरा हुआ होता है कि जब कर्ता इन्हें करने में अग्रसर होता है तो उसे ऐसे आनन्द की प्रतीति होती है जैसे कि उसे उनका फल प्राप्त हो गया हो अर्थात् पर-कल्याण की भावना से युक्त होकर किए जाने वाले कार्य ही कर्ता को फल प्राप्ति जैसे आनन्द की अनुभूति करा देते हैं। ऐसा व्यक्ति अत्याचार और अनाचार को नष्ट करने में अपना पुरुषार्थ मानता है। संसार से कलह और संघर्ष को समाप्त करने में वह कर्त्तव्यनिष्ठ होता है। उसका चित्त एक अलौकिक उल्लास और आनन्द से भर जाता है। उसके मन में अच्छे कार्य करने का परम सन्तोष होता है। ऐसे व्यक्ति को ही कर्मवीर कहा जाता है। ऐसा कर्मवीर मनुष्य अपने कर्मों द्वारा संसार का उपकार करता है। इससे उसे भी परम सुख की प्राप्ति होती है।

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प्रश्न 5.
(अ) साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है।
(ब) कर्म में आनन्द उत्पन्न करने वालों का नाम ही कर्मण्य है। उपर्युक्त वाक्यों का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(अ) साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है-जब हमारे मन में किसी कार्य को करने का उत्साह होता है तो उस उत्साह में आनन्द की उमंग छिपी होती है अर्थात् उत्साह की अवस्था में कठिन स्थिति आने पर उसका सामना हम साहस से करते हैं। उस साहस में कर्म करने का सुख निहित रहता है। यही आनन्द की उमंग होती है, जिससे संकल्पित कार्य को हम पूर्ण तत्परता और मनोयोग से करते हैं। तब हमें कठिन परिस्थिति भी कठिन नहीं प्रतीत होती। इसी को उत्साह कहा जाता है।

(ब) कर्म में आनन्द उत्पन्न करने वालों का नाम ही कर्मण्य है-कर्म करने वाला अथवा कर्मण्य उसी को कहा जाता है जो प्रत्येक कर्म को आनन्दपूर्ण होकर सम्पादित करता है। आनन्दपूर्ण स्थिति उत्साह से प्राप्त होती है। उत्साह में आनन्द और कर्म करने की तत्परता दोनों का समावेश होता है। जो कार्य बिना उत्साह के किए जाते हैं वे एक प्रकार से विवशता अथवा भय ही प्रकट करते हैं। उनका परिणाम प्रायः दुःख ही रहता है। इसीलिए जो कर्म करने के महत्त्व को जानता है, वह कर्म उत्साह से सम्पादित करता है। वह कर्म में एक विशेष प्रकार का आनन्द उत्पन्न कर लेता है। अतः वास्तविक रूप में उसी को कर्मण्य अथवा कार्य करने वाला कहा जाता है।

उत्साह भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी पर्याय लिखिएहाकिम, मिजाज, मुलाकात, अर्दली, सलाम।
उत्तर:
अधिकारी, स्वभाव, मिलन, सेवक, नमस्ते।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिएभय, दु:ख, हानि, शत्रु, उपस्थित।
उत्तर:
निर्भय, सुख, लाभ, मित्र, अनुपस्थित।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग छाँटकर लिखिएविशेष, आघात, उत्कर्ष, अप्राप्ति, विशुद्ध।
उत्तर:
वि, आ, उत्, अ, वि।

प्रश्न 4.
पाठ में आए हुए विभिन्न योजक शब्दों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
आनन्द-वर्ग, साहस-पूर्ण, कर्म-सौन्दर्य, साहित्य-मीमांसकों, दान-वीर, दया-वीर, आनन्द-पूर्ण, हाथ-पैर, पर-पीड़न, प्रसन्न-मुख, आराम-विश्राम, दस-पाँच, इधर-उधर, आते-जाते, साथ-साथ, कर्म-शृंखला, युद्ध-वीर, कर्म-प्रेरक, कर्म-स्वरूप, विजय-विधायक, कीर्ति-लोभ-वश, श्रद्धा-वश, कर्म-भावना, फल-भावना, धन-धान्य, प्रयत्न-कर्म, एक-एक, व्यापार-परम्परा, ला-लाकर, दौड़-धूप, आत्म-ग्लानि, सोच-सोचकर, फल-स्वरूप, कर्म-वीर, थोड़ा-थोड़ा, बहुत-सा, स्थिति-व्याघात, सलाम-साधक।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध रूप में लिखिए
(अ) आप पुस्तक क्या पढ़ेंगे?
(आ) कितना वीभत्स दृश्य है, ओह ! यह !
(इ) बीमार को शुद्ध भैंस का दूध पिलाइए।
(ई) एक फूलों की माला लाओ।
(उ) छब्बीस जनवरी का भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व है।
(ऊ) यह बहुत सुन्दर चित्र है।
उत्तर:
शुद्ध वाक्य-
(अ) क्या आप पुस्तक पढ़ेंगे?
(आ) ओह ! यह कितना वीभत्स दृश्य है?
(इ) बीमार को भैंस का शुद्ध दूध पिलाइए।
(ई) फूलों की एक माला लाओ।
(उ) भारत के इतिहास में छब्बीस जनवरी का बहुत महत्त्व है।
(ऊ) यह चित्र बहुत सुन्दर है।

उत्साह पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित निबन्ध-ग्रन्थ चिन्तामणि-भाग 1 से संकलित है। प्रस्तुत निबन्ध में आचार्य जी ने ‘उत्साह’ मनोभाव की विश्लेषणात्मक विवेचना करते हुए बताया है कि यह एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को कार्य में प्रवृत्त रखने के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। उत्साह कार्य करने की एक आनन्दमय अवस्था है। इससे कठिन से कठिन कार्य सम्पादित करने में भी मन को थकान नहीं होती अपितु कार्य में एक तरह का आनन्द प्राप्त होता है जो मन को प्रफुल्लित बनाये रखता है। किसी कार्य में सफलता तभी मिल पाती है। जब उस कार्य को करने के लिए हमारे मन में उत्साह हो। साहसपूर्ण आनन्द की उमंग उत्साह है। उत्साह से कार्य करने वाले व्यक्ति ही युद्धवीर, दानवीर और दयावीर कहलाते हैं।

उत्साह कठिन शब्दार्थ 

आनन्द वर्ग = आनन्द का वर्गीकरण। कर्म सौन्दर्य = कार्य की सुन्दरता। उपासक = पुजारी, आराधना करने वाले। श्लाध्य = प्रशंसनीय। उत्कण्ठापूर्ण = जिज्ञासायुक्त। साहित्य-मीमांसक = साहित्य की मीमांसा (विवेचन, विश्लेषण आदि) करने वाले। आघात = चोट। परवा = चिन्ता, फिक्र। चरम उत्कर्ष = पराकाष्ठा। स्फुरित = फड़कना। धीरता = धैर्य, मन की स्थिरता। निश्चेष्ट = चेष्टा या प्रयत्न रहित। धुति = धैर्य। संचरण = संचार। अकर्तव्य कर्मों = न करने योग्य कार्यों। परपीड़न = दूसरे को सताना। विशुद्ध = शुद्ध, पूर्णतया। शौर्य = वीरता का भाव। सुभीते = सुविधा, आराम। विजेतव्य = विजय करने योग्य। आलम्बन = आधार। दुस्साध्य = कठिनता से प्राप्त होने वाला। निर्दिष्ट = निर्देशित। यौगिक= मिला-जुला। उन्मुख = उत्साहयुक्त। अनुष्ठान = सम्पादन करना, संकल्पित कार्य पूर्ण करना। आसक्ति = लगाव। लाघव = लघुता, छोटा करना, कौशल। फलासक्ति = फल की इच्छा। वासना = इच्छा। कर्मण्य = कर्म करने वाला। दिव्य = अलौकिक।शमन = शान्त करना। आत्मग्लानि = मन ही मन पछतावा। फलोन्मुख = फल प्राप्ति का इच्छुक। लोकोपकारी = संसार की भलाई करने वाला (कल्याण करने वाला)। क्रुद्ध = क्रोधित। व्याघात = व्यवधान, बाधा। सलाम साधक = दुआ सलाम करने वाले। हाकिमों = अधिकारियों। अर्दलियों = सेवकों। मिजाज = स्वभाव, आदत।

उत्साह संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. उत्साह में हम आने वाली कठिन स्थिति के भीतर साहस के अवसर के निश्चय द्वारा प्रस्तुत कर्म सुख की उमंग से अवश्य प्रयत्नवान् होते हैं। कष्ट या हानि सहने के साथ-साथ कर्म में प्रवृत्त होने के आनन्द का योग रहता है।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘उत्साह’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में शुक्ल जी ने ‘उत्साह’ मनोविकार पर प्रकाश डालते हुए उसकी विशेषताएँ बतलाई हैं।

व्याख्या :
जब हमारे मन के अन्दर उत्साह के भाव का संचार होता है तो हम कठिन से कठिन परिस्थिति की चिन्ता नहीं करते हैं और मन में आनन्द की उमंग के साथ उस कार्य को करने में प्रवृत्त होते हैं। तब हमारे मन में एक नया साहस भरा हुआ होता है। इस साहस और कार्य करने के सुख से कठिनाइयों को सहन करते हुए भी हम अपने संकल्पित कार्य में संलग्न रहते हैं। हमारे मन में इस बात का उत्साह रहता है कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे। कष्ट हो अथवा हानि हो, हम इसकी चिन्ता नहीं करते। अत: यह स्पष्ट है कि उत्साह का भाव हमारे मन में कार्य में संलग्न होने के साथ-साथ एक आनन्दमय अनुभूति भी प्रदान करता है जिससे हम विषम परिस्थिति में भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रहते हैं।

विशेष :

  1. उत्साह मनोभाव का मनोविश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
  2. उत्साह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है, लेखक ने इस बात पर प्रकाश डाला है।
  3. शैली विचारोत्तेजक एवं गवेषणापूर्ण है। भाषा सरल, सुबोध और साहित्यिक हिन्दी है।

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2. आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है। इससे आसक्ति उसी में चाहिए, फल दूर रहता है इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनन्द से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनन्द कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है। (2016)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में आचार्य जी ने बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि कर्मफल में। तभी उसे अपने कार्य में आनन्द की उपलब्धि हो सकती है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि मनुष्य को लगाव अथवा आसक्ति अपने संकल्पित कर्म में होनी चाहिए क्योंकि हमारे सामने तो वह कर्म ही प्रस्तुत होता है जिसे हमें करना होता है अथवा वह वस्तु जिसे पाने का लक्ष्य हो, उसमें आसक्ति का होना उचित है क्योंकि तब हम कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित होंगे। इसका कारण है कि कर्म अथवा वह वस्तु तो हमारे सम्मुख उपस्थित है जिसे हमें करना है अथवा पाना है किन्तु उसका फल तो दूर रहता है फिर हम फल में आसक्ति क्यों करे।

फल में आसक्ति करने से कर्म करने का आनन्द जाता रहता है और हम कर्म करने से विरत हो जाते हैं। अतः हमें अपने कर्म का लक्ष्य ही ध्यान में रखना चाहिए। कर्म का लक्ष्य ध्यान रखने पर हमें कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। उससे एक प्रकार की उत्तेजना अथवा उमंग हमारे मन में भी भर जाती है। इससे हमें कार्य करते समय निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती रहती है। कर्म करने की उत्तेजना और आनन्द की अनुभूति इसी को उत्साह मनोभाव के नाम से जाना जाता है।

विशेष :

  1. लेखक ने गीता में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए उपदेश ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का प्रतिपादन करते हुए बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि फल में। फल में आसक्ति होने से मनुष्य के मन में लोभ आदि वासनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और कर्म करने का आनन्द समाप्त हो जाता है। तब कर्म में उसकी प्रवृत्ति न होने से उसके जीवन में उत्साह नहीं रहता।
  2. शैली विचारोत्तेजक, गवेषणात्मक है।
  3. भाषा सरल, सहज और बोधगम्य है।

3. कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनन्द भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फलस्वरूप लगते हैं। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है वही लोकोपकारी कर्मवीर का सच्चा सुख है। (2008, 09, 14)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्य खण्ड में लेखक ने बताया है कि जब मनुष्य उच्च और लोकोपकारी कर्म करता है तो उसे कर्म करते हुए ही फल की प्राप्ति के आनन्द की अनुभूति होने लगती है। इससे उसका मन एक दिव्य प्रकार के आनन्द से भर जाता है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि धर्म और उदार दृष्टिकोण से युक्त होकर जो कार्य किए जाते हैं उन कार्यों का आदर्श ऊँचा होता है। इनमें स्वतः ही एक ऐसा अलौकिक आनन्द भरा हुआ होता है कि जब कर्ता इन्हें करने में अग्रसर होता है तो उसे ऐसे आनन्द की प्रतीति होती है जैसे कि उसे उनका फल प्राप्त हो गया हो अर्थात् पर-कल्याण की भावना से युक्त होकर किए जाने वाले कार्य ही कर्ता को फल प्राप्ति जैसे आनन्द की अनुभूति करा देते हैं। ऐसा व्यक्ति अत्याचार और अनाचार को नष्ट करने में अपना पुरुषार्थ मानता है। संसार से कलह और संघर्ष को समाप्त करने में वह कर्त्तव्यनिष्ठ होता है। उसका चित्त एक अलौकिक उल्लास और आनन्द से भर जाता है। उसके मन में अच्छे कार्य करने का परम सन्तोष होता है। ऐसे व्यक्ति को ही कर्मवीर कहा जाता है। ऐसा कर्मवीर मनुष्य अपने कर्मों द्वारा संसार का उपकार करता है। इससे उसे भी परम सुख की प्राप्ति होती है।

विशेष :

  1. लेखक के अनुसार जो मनुष्य संसार के हित को ध्यान में रखते हुए उदार दृष्टिकोण से कार्य करता है वही कर्मवीर होता है और वही कर्म करने में सच्चे आनन्द की उपलब्धि पाता है।
  2. शैली विचारपरक और मनोविश्लेषणात्मक है।
  3. भाषा सरल, सहज और बोधगम्य, साहित्यिक हिन्दी है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 5 नीरा

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 5 नीरा

नीरा अभ्यास

नीरा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नीरा के पिता को क्या पढ़ने का शौक था?
उत्तर:
नीरा के पिता को अखबार पढ़ने का शौक था।

प्रश्न 2.
अमरनाथ ने अपना लेख किनके विषय में लिखा था?
उत्तर:
अमरनाथ ने अपना लेख लौटे हुए प्रवासी कुलियों के विषय में लिखा था।

प्रश्न 3.
नीरा के पिता कुली बनकर कहाँ गये थे? (2016)
उत्तर:
नीरा के पिता कुली बनकर मॉरीशस गये थे।

प्रश्न 4.
नीरा की माँ का क्या नाम था?
उत्तर:
नीरा की माँ का नाम ‘कुलसम’ था।

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नीरा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“भगवान यदि हों तो आपका भला करें,” कहने के पीछे नीरा के पिता बूढ़े बाबा के किस भाव का आभास होता है?
उत्तर:
‘भगवान यदि हों तो आपका भला करें’ इस कथन का भाव है कि बूढ़े बाबा को अनायास ही साइकिल के कारण चोट लग गयी। साइकिल वाले ने बूढ़े को एक अठन्नी दी। यह उस व्यक्ति की दया का प्रतीक थी। इसी कारण गद्गद् होकर बूढ़े बाबा ने साइकिल वाले के प्रति यह भाव व्यक्त किया।

प्रश्न 2.
नीरा के पिता को किस बात की चिन्ता थी? (2014, 15)
उत्तर:
नीरा के पिता को यह चिन्ता थी कि उसके मरणोपरान्त नीरा की देखभाल करने वाला कोई भी नहीं था। इसी कारण पिता को भय था कि आज समाज में असामाजिक तत्त्व यत्र-तत्र घूमते रहते हैं। ऐसे नर पिशाचों के हाथ में पड़कर नीरा का जीवन बरबाद हो जायेगा। यही चिन्ता उसे प्रति पल कचोटती रहती थी।

प्रश्न 3.
अपराधों का दण्ड तत्काल न मिलने का क्या परिणाम हुआ?
उत्तर:
अपराधों का दण्ड तत्काल न मिलने के फलस्वरूप आज समाज में दिन-प्रतिदिन अपराधों की संख्या में कई गुनी वृद्धि होती चली जा रही है। व्यक्ति का नैतिक पतन निरन्तर हो रहा है। मानवीय मूल्यों की भी गिरावट अवलोकनीय है। यदि यह कहा जाय कि जीवन में अपराधों का इतना जाल फैला हुआ है कि इससे मुक्त होने में मानव को कितना समय लगेगा यह प्रश्न भविष्य के अन्तराल में तिरोहित है।

नीरा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
देवनिवास नीरा के किन गुणों से प्रभावित है? (2008)
उत्तर:
देवनिवास नीरा के अपूर्व सौन्दर्य, सरलता एवं सहृदयता से प्रभावित है। उसका प्रमुख कारण है कि नीरा यद्यपि निर्धन थी परन्तु उसके पास जो भी रूखा-सूखा पदार्थ सुलभ था उसी को ग्रहण करके अपूर्व सुख तथा आनन्द का अनुभव करती थी। इसके साथ ही उसे अपने बूढ़े बाबा की चिन्ता प्रतिपल सताती रहती थी। उनकी सेवा में वह कोई भी कसर नहीं छोड़ती थी।
बाबा के प्रति कर्त्तव्य निर्वाह को अपने जीवन का सर्वोपरि कर्त्तव्य मानती थी।
नीरा का धनिकों के प्रति कहा गया निम्न कथन देखिए, “जाओ, मेरी दरिद्रता का स्वाद लेने वाले धनी विचारकों और सुख तो तुम्हें मिलते ही हैं, एक न सही।”
देवनिवास नीरा की स्वाभिमानी एवं निश्छल प्रवृत्ति से प्रभावित है।

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प्रश्न 2.
कहानी का शीर्षक ‘नीरा’ कितना सार्थक है?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘नीरा’ कहानी अभावग्रस्त मध्यमवर्गीय परिवार की व्यथा कथा है।

इस कहानी की मुख्य पात्र नीरा है। नीरा मातृविहीन एक बूढ़े की पुत्री है। उसकी माँ का निधन बचपन में ही हो गया था। उसका बूढ़ा पिता अभावग्रस्त होते हुए भी जागरूक है। उसे जीवन के कटु अनुभव हैं। अतः हर पल नीरा के बूढ़े बाबा को अपनी पुत्री की सुरक्षा का भय रहता है। बूढ़े को लगता है कि मेरे मरने के बाद कहीं मेरी पुत्री किसी अत्याचारी के हाथ पड़कर नष्ट न हो जाये।

यद्यपि उसका बूढ़ा बाबा मरणासन्न है लेकिन पुत्री के लिए व्याकुल है। उसकी पुत्री निरन्तर अपने पिता को सांत्वना देती रहती है कि “बाबा, तुम मेरी चिन्ता न करो भगवान मेरी रक्षा करेंगे।”

इसी मध्य देवनिवास ने नीरा के पिता से विवाह का प्रस्ताव रखा और कहा, “यदि तुम्हें ………. इस बात को सुनकर वृद्ध बाबा का हृदय पुलकित हो गया।

उसने अपने दोनों हाथ देवनिवास और नीरा पर फैलाकर रखते हुए कहा-“हे मेरे भगवान।” इस प्रकार हम देखते हैं कि समस्त कहानी का केन्द्र बिन्दु नीरा है। कहानी का ताना-बाना नीरा पर ही आधारित है।

नीरा के प्रणय बँधन में बँधने के पश्चात् कहानी का समापन हो जाता है। कहानी में ऐसा कोई स्थल नहीं है जहाँ नीरा दृष्टिगोचर न होती हो। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि नीरा प्रस्तुत कहानी का शीर्षक सटीक एवं सार्थक है।

प्रश्न 3.
देवनिवास या बूढ़े बाबा नीरा के पिता के चरित्र के आधार पर सिद्ध कीजिए कि यह कहानी अपने पात्रों के चरित्र-चित्रण में सफल रही है?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित ‘नीरा’ नामक कहानी सामाजिक एवं चरित्र-चित्रण की दृष्टि से एक सफल कहानी है। कहानी में पात्रों की संख्या सीमित होते हुए भी कहानीकार ने उनके चरित्र-चित्रण में अभूतपूर्व सफलता पायी है।

कहानी के पात्र जीवन्त एवं यथार्थता के धरातल पर प्रतिष्ठित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक का मुख्य उद्देश्य पाठकों के हृदय में ईश्वर के प्रति आस्था उत्पन्न करना है, क्योंकि कहानी का मुख्य पात्र बूढ़ा बाबा प्रारम्भ में नास्तिक विचारों वाला दिखाया गया है। देवनिवास एवं अमरनाथ दोनों ही उस वृद्ध व्यक्ति को विभिन्न तर्कों द्वारा ईश्वर के प्रति विश्वास करने को कहते हैं। लेकिन बूढ़े के विचार तनिक भी परिवर्तित नहीं होते।

संयोगवश देवनिवास का साधारण कथन बूढ़े व्यक्ति की विचारधारा को बदल देता है और ईश्वर में आस्था जगा देता है। बाबा अपने जीवन के प्रति उदासीन है। कहानी में देवनिवास, बूढ़े बाबा एवं नीरा प्रमुख पात्र हैं। गौण रूप में अमरनाथ हैं। इस कहानी में समस्त पात्रों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कहानीकार ने प्रमुख रूप से यह बताने का प्रयास किया है कि “जो जस करिय तो तस फल चाखा”।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बूढ़ा बाबा नास्तिक था लेकिन कहानीकार ने उसे ईश्वर के प्रति आस्था रखने के लिए प्रेरित किया। कहानीकार अपने इस उद्देश्य में पूर्णतः सफल हुआ है।

आज भी बूढ़े बाबा का चरित्र पाठक के स्मृति पटल पर छा जाता है। देवनिवास ईश्वर के प्रति आस्था रखने वाला व्यक्ति है। वह दूसरों के कष्टों में भाग लेकर अपनी सहृदयता का परिचय देने वाला है।

बूढ़े बाबा की लाचारी को देखकर उसने जो नीरा के साथ विवाह करने का प्रस्ताव रखा वह उसके उज्ज्वल चरित का द्योतक है।

अमरनाथ ईश्वर के प्रति आस्थावान है। लेकिन वह बूढ़े बाबा की नास्तिक विचारधारा को परिवर्तित करने में असमर्थ है। इस कारण वह बूढ़े के प्रति आक्रोश व्यक्त करता है जो उसकी संकुचित मानसिकता का प्रतीक है।

अन्त में कहा जा सकता है कि जयशंकर प्रसाद ने मानव को ईश्वर के प्रति सदैव आस्थावान रहने की प्रेरणा दी है। चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियाँ आयें, व्यक्ति को ईश्वर के प्रति आस्था नहीं त्यागनी चाहिए। इस प्रकार कहानी चरित्र-चित्रण की दृष्टि से सफल एवं प्रेरणादायक है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) सुख और सम्पत्ति ………………….. ठुकराता नहीं।
(2) जैसे एक साधारण ……………….. कराना चाहते हो।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक की ‘नीरा’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक ‘जयशंकर प्रसाद’ हैं।

प्रसंग :
अमरनाथ एवं देवनिवास इस तथ्य को स्पष्ट कर रहे हैं कि अत्यधिक निर्धनता के फलस्वरूप मानव ईश्वर के प्रति अविश्वासी हो जाता है।

व्याख्या :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने इस तथ्य को दर्शाने का प्रयास किया है कि मानव यदि निरन्तर कष्ट भोगता रहे तो उसका ईश्वर के प्रति विश्वास कम होने लगता है। वह अपने समस्त कष्टों को उत्तरदायी ईश्वर को ठहराता है। भगवान सर्वव्यापी हैं, वह प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं, उनकी दृष्टि में मानव-मानव में तनिक भी भेद नहीं है। जब मानव दु:ख के झंझावातों से निराश होने लगता है तो ऐसी दशा में भगवान मानव को कभी दुत्कारता नहीं, ठुकराता नहीं और न प्रताड़ित करता है। मानव को प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर के प्रति अनन्य निष्ठा रखनी चाहिए, जीवन में सुख-दुःख का चक्र तो निरन्तर चलता ही रहता है।

(2) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि विपत्तियों के फलस्वरूप बूढ़े बाबा की ईश्वर के प्रति आस्था नहीं रही।

व्याख्या :
देव निवास ने कहा जिस प्रकार एक आलोचक हर लेखक से अपने मनोनुकूल कहानी कहलवाने का आकांक्षी रहता है तथा इस बात का भरसक प्रयास करता है कि मैं जिस प्रकार की भावना रखता हूँ तदनुरूप अन्य व्यक्ति भी उसी के अनुकूल चलें।

बूढ़े बाबा भी भगवान् से अपने जीवन में घटित होने वाली घटनाओं, सुख-दुःख के झंझावातों एवं अपनी मनोव्यथा को ईश्वर के माध्यम से सुख और शान्ति में परिवर्तित देखने के इच्छुक हैं।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्ति का भाव पल्लवन कीजिएआलोक एक उज्ज्वल सत्य है। (2008)
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति का भाव है कि जीवन की सत्यता उसी प्रकार है जैसे कि प्रकाश में प्रत्येक वस्तु अच्छी हो अथवा बुरी, स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। लेखक ने अपनी इस पंक्ति द्वारा नीरा की दरिद्रता का परिचय दिया है। नीरा अपनी दरिद्रता को किसी भी प्रकार प्रकट नहीं करना चाहती है लेकिन रूखी रोटी मुख में नहीं प्रवेश कर पा रही है फिर भी उसको चबाने का प्रयास कर रही थी। “टीन का गिलास अपने खुरदरे रंग का नीलापन नीरा की आँखों में उड़ेल रहा था।”

अर्थात् उस गिलास में नीरा के जीवन की सत्यता उजागर हो रही थी जिसे नीरा संकोचवश व्यक्त नहीं करना चाहती थी।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आलोक (प्रकाश) जीवन का एक ऐसा सत्य है जिसको व्यक्ति किसी भी भाँति छिपा नहीं सकता है। जैसे प्रकाश के सम्पर्क में आने पर सभी पदार्थ स्पष्टरूपेण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। तद्नुरूप वास्तविकता के ऊपर पड़ा हुआ पर्दा कभी न कभी हट ही जाता है जो वस्तुओं की यथार्थता को स्पष्ट करता है।

प्रश्न 6.
“जो काम देवनिवास अपने तर्कों से नहीं कर सका उसे उसके कर्म ने सम्भव बना दिया।” बूढ़े बाबा के नास्तिक से आस्तिक बनने के घटनाक्रम को दृष्टिगत रखते हुए कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन का भाव है कि निरन्तर प्रयत्न करने के उपरान्त व्यक्ति को कभी न कभी सफलता प्राप्त होती है। अतः व्यक्ति को निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए।

बूढ़ा बाबा नास्तिक था। उसे ईश्वर के प्रति तनिक भी आस्था और विश्वास न था। देवनिवास प्रतिदिन बूढ़े बाबा को विभिन्न प्रकार से ईश्वर के प्रति आस्था रखने के लिए प्रेरित करता रहता था। बूढ़े के मन पर उसके तर्कों का नाममात्र को भी प्रभाव नहीं पड़ता था। लेकिन देवनिवास हताश नहीं हुआ। एक दिन अचानक ही बूढ़े बाबा के समक्ष नीरा से विवाह का प्रस्ताव रखकर देवनिवास ने बूढ़े बाबा के हृदय में ईश्वर के प्रति निष्ठा उत्पन्न कर दी। अन्त में बूढ़े बाबा ईश्वर की सत्ता के प्रति नतमस्तक हो गये। क्योंकि बूढ़े बाबा को पुत्री के विवाह की चिन्ता आकुल-व्याकुल करती रहती थी। उन्हें कदापि देवनिवास से ऐसी उम्मीद न थी। इसी कारण बूढ़े बाबा को देवनिवास के कर्म ने नास्तिक से आस्तिक बना दिया।

नीरा भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों को वाक्य में प्रयोग कीजिएढोंग रचना, बिजली कौंधना, दाँत किटकिटाना, चौंक उठना, सुख की नींद सोना।
उत्तर:

  1. ढोंग रचना-आजकल साधु-सन्त ढोंग रचकर भोली-भाली जनता को मूर्ख बनाते हैं।
  2. बिजली कौंधना-उसका झूठ पकड़े जाने पर उसके शरीर में बिजली कौंध गयी।
  3. दाँत किटकिटाना-व्यर्थ में दाँत किटकिटाने से क्या लाभ है? कुछ करके दिखाओ तो जानें।
  4. चौंक उठना-बोर्ड की परीक्षा में आकाश ने सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया इसको देख सभी चौंक उठे।
  5. सुख की नींद सोना-बेटी के विवाह के पश्चात् माता-पिता सुख की नींद सोते हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों में यथास्थान विराम चिह्नों का प्रयोग कीजिए
(अ) क्षमा मैं करूँ अरे आप क्या कह रहे हैं।
(ब) नहीं-नहीं बाबूजी मुझे यह कहने का अधिकार नहीं। मैं हूँ अभागा हाय रे भाग।
उत्तर:
(अ) क्षमा मैं करूँ? अरे ! आप क्या कह रहे हैं?
(ब) नहीं-नहीं बाबूजी, मुझे यह कहने का अधिकार नहीं, मैं हूँ अभागा ! हाय रे भाग !

प्रश्न 3.
प्रस्तुत पाठ में निम्नलिखित द्विरुक्ति वाले शब्दों का प्रयोग हुआ है। उनमें से यह शब्द किस प्रकार की द्विरुक्ति के अन्तर्गत आते हैं। लिखिए।
गिरते-गिरते, खड़े-खड़े, कुछ न कुछ, कभी-कभी, कौन-कौन, ठीक-ठीक, मन ही मन, दूर-दूर, धीरे-धीरे, कहते-कहते।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 5 नीरा img-1

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए।
उत्तर:
(क) जो ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास न रखता हो – नास्तिक।
(ख) जो विश्वास करने योग्य न हो – अविश्वसनीय।
(ग) किए गये उपकार को मानने वाला – कृतज्ञ।
(घ) तर्क से सम्बन्धित – तार्किक।
(ङ) जो क्षमा करने योग्य न हो – अक्षम्य।

नीरा पाठ का सारांश

प्रस्तुत कहानी अभावग्रस्त जीवन एवं आस्था के मध्य संघर्षों से जूझते हुए पात्र के हृदय में प्रच्छन्न व्यथा की मार्मिक घटना है। जीवन का अभाव व्यक्ति विशेष को ईश्वर के अस्तित्व के प्रति दुविधा में डाल देता है। सब तरफ से निराश होकर मानव ईश्वर को ही कष्टों के लिए सर्वे सर्वा ठहराकर आस्तिकता की ओर कदम बढ़ाता है।

नीरा बूढ़े बाबा की मातृहीन बेटी है। निर्धन होने के फलस्वरूप नीरा के विवाह के लिए बूढ़ा बाबा अत्यन्त ही व्याकुल है। अमरनाथ को बूढ़े बाबा की नास्तिकता से चिढ़ है, लेकिन देवनिवास एवं नीरा को उससे सहानुभूति है। देवनिवास बूढ़े के कष्टों से द्रवीभूत होकर उसके पास जाकर नीरा के साथ विवाह का प्रस्ताव रखता है। देवनिवास का यह साधारण किन्तु यथार्थ कर्म बूढ़े बाबा की मानसिकता को परिवर्तित कर देता है। बूढ़े बाबा के मन में ईश्वर के प्रति अनायास ही आस्था उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार परिस्थितियाँ जगतनियन्ता के समक्ष व्यक्ति को नास्तिक से आस्तिकता की ओर उन्मुख करती हैं।

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नीरा कठिन शब्दार्थ 

विरक्त= वैराग्य। दर्बल = कमजोर। चिथडे = फटे कपड़े। अडियल = हठीला, जिद्दी। मसखरा = मजाकिया, हसोड़। उज्ज्वल आलोक = चमकता हुआ प्रकाश। आत्मविस्मृत = सुध-बुध न रहना, अपने को भूल जाना। स्मरण = याद। अनिच्छापूर्वक = बिना इच्छा के। मनोयोग = मन से। मलिना = मैली। उत्कण्ठा = उत्सुकता। मुखाकृति = मुख की आकृति, रूपरंग, चेहरे के भाव। मॉरिशस = हिन्द महासागर में एक द्वीप। दरिद्रता = निर्धनता। उलाहनों = उपालम्भ। अवलम्बन = सहारा। उत्कण्ठा = इच्छा, लालसा। नास्तिक = ईश्वर को न मानने वाला। तार्किक = तर्क के योग्य। चरायँध = दुर्गन्ध, जलते हुए शरीर से निकलने वाली गन्ध। हताश = निराश। ऐश्वर्यशाली = धनवान, ऐश्वर्य वाला। सर्वत्र = चारों ओर। मनोनुकूल = मन के अनुरूप। सृष्टिकर्ता = सृष्टि का निर्माण करने वाला। तत्काल = शीघ्र। प्रणत = प्रणाम करने को झुकना। आतिथ्य = आवभगत, सत्कार। वैभव = ऐश्वर्य। अच्छी युक्तियाँ = अच्छे तर्क, उचित विचार। जीर्ण = पुराने। पुआल = धान का चारा, डण्ठल। अभिमान = घमण्ड। धारणा = मान्यता। उच्छृखल = बन्धन न मानने वाला। अन्तरात्मा = अन्त:करण। पुलकित = आनन्दित, हर्ष विह्वल, प्रसन्नचित्त। विनीत = विनम्र।

नीरा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. सुख और सम्पत्ति में क्या ईश्वर का विश्वास अधिक होने लगता है? क्या मनुष्य ईश्वर को पहचान लेता है? उसकी व्यापक सत्ता को मलिन वेश में देखकर दुरदुराता ‘ नहीं, ठुकराता नहीं। (2009)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक की ‘नीरा’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक ‘जयशंकर प्रसाद’ हैं।

प्रसंग :
अमरनाथ एवं देवनिवास इस तथ्य को स्पष्ट कर रहे हैं कि अत्यधिक निर्धनता के फलस्वरूप मानव ईश्वर के प्रति अविश्वासी हो जाता है।

व्याख्या :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने इस तथ्य को दर्शाने का प्रयास किया है कि मानव यदि निरन्तर कष्ट भोगता रहे तो उसका ईश्वर के प्रति विश्वास कम होने लगता है। वह अपने समस्त कष्टों को उत्तरदायी ईश्वर को ठहराता है। भगवान सर्वव्यापी हैं, वह प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं, उनकी दृष्टि में मानव-मानव में तनिक भी भेद नहीं है। जब मानव दु:ख के झंझावातों से निराश होने लगता है तो ऐसी दशा में भगवान मानव को कभी दुत्कारता नहीं, ठुकराता नहीं और न प्रताड़ित करता है। मानव को प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर के प्रति अनन्य निष्ठा रखनी चाहिए, जीवन में सुख-दुःख का चक्र तो निरन्तर चलता ही रहता है।

विशेष :

  1. भाषा सरल, बोधगम्य एवं प्रभावपूर्ण है।
  2. साधारण बोलचाल के शब्दों दुरदुराता, ठुकराता आदि का प्रसंगानुकूल प्रयोग है।

2. जैसे एक साधारण आलोचक प्रत्येक लेखक से अपनी मन की कहानी कहलाना चाहता है और हठ करता है कि नहीं यहाँ तो ऐसा नहीं होना चाहिए था, ठीक उसी तरह तुम सृष्टिकर्ता से अपने जीवन की घटनावली अपने मनोनुकूल सही कराना चाहते हो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि विपत्तियों के फलस्वरूप बूढ़े बाबा की ईश्वर के प्रति आस्था नहीं रही।

व्याख्या :
देव निवास ने कहा जिस प्रकार एक आलोचक हर लेखक से अपने मनोनुकूल कहानी कहलवाने का आकांक्षी रहता है तथा इस बात का भरसक प्रयास करता है कि मैं जिस प्रकार की भावना रखता हूँ तदनुरूप अन्य व्यक्ति भी उसी के अनुकूल चलें।

बूढ़े बाबा भी भगवान् से अपने जीवन में घटित होने वाली घटनाओं, सुख-दुःख के झंझावातों एवं अपनी मनोव्यथा को ईश्वर के माध्यम से सुख और शान्ति में परिवर्तित देखने के इच्छुक हैं।

विशेष :

  1. भाषा परिमार्जित, सरल एवं बोधगम्य है।
  2. शैली विषयानुरूप है।

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3. इसके बाद मेरी वह सब उद्दण्डता तो नष्ट हो गई थी, जीवन की पूँजी जो मेरा निज का अभिमान था-वह भी चूर-चूर हो गया था। मैं नीरा को लेकर भारत के लिए चल पड़ा। तब एक तो मैं ईश्वर के सम्बन्ध में एक उदासीन नास्तिक था, किन्तु इस दुःख ने मुझे विद्रोही बना दिया। मैं अपने कष्टों का कारण ईश्वर को ही समझने लगा और मेरे मन में यह बात जम गई कि यह मुझे दण्ड दिया गया है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में जयशंकर प्रसाद ने बूढ़े बाबा की पत्नी ‘कुलसम’ की मृत्यु के पश्चात् उसके जीवन में होने वाले परिवर्तन का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
बूढ़े बाबा का कथन है कि पत्नी की मृत्यु के पूर्व वह एक मस्त-मौला प्रवृत्ति का घमण्डी मानव था। लेकिन पत्नी की मृत्यु ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसके पश्चात् बूढ़े बाबा की उच्छृखलता समाप्त हो गयी। गाढ़ी कमाई तो बरे व्यसनों में नष्ट हो गयी। लेकिन जीवन की वास्तविक पूँजी जो उसकी धर्मपत्नी थी वह भी मौत की गोद में सो गयी। वही मेरे जीवन की यथार्थ पूँजी थी। इसके पश्चात् मेरा घमण्ड नष्ट हो गया। मैं अपनी बेटी नीरा को लेकर भारत आ गया। उस समय तक मैं घोर नास्तिक था, विपत्तियों ने मुझे विद्रोही बना दिया। बूढ़ा बाबा अपने समस्त कष्टों का मूल कारण ईश्वर को ठहराता है और उसके मन में यह बात गहरे रूप से बैठ चुकी है कि शायद मुझे भगवान ने यह सारी मुसीबतें दण्ड स्वरूप प्रदान की हैं।

विशेष :

  1. भाषा, सरल, सहज एवं विषयानुरूप है।
  2. मुहावरों का प्रयोग है-चूर-चूर होना, बात जमाना।
  3. व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्था रखनी चाहिए।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 6 डॉ. चन्द्रशेखर वेंकटरमन

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 6 डॉ. चन्द्रशेखर वेंकटरमन

डॉ. चन्द्रशेखर वेंकटरमन अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
डॉ. रमन छात्रवृत्ति मिलने के बाद भी विदेश क्यों नहीं जा सके?” (2016)
उत्तर:
श्री रमन ने एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। भौतिक विज्ञान में विश्वविद्यालय का रिकॉर्ड तोड़ दिया। सरकार ने इनमें असाधारण प्रतिभा देखी तो विदेश जाने के लिए छात्रवृत्ति देना स्वीकार कर लिया। किन्तु अस्वस्थता के कारण आप विदेश नहीं जा सके। लाचार होकर इन्होंने अर्थ विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा दी और सर्वप्रथम उत्तीर्ण घोषित हुए। तदुपरान्त इनकी नियुक्ति डिप्टी डायरेक्टर-जनरल के पद पर कोलकाता में हो गई।

प्रश्न 2.
ब्रिटेन यात्रा के समय डॉ. रमन ने क्या-क्या देखा?
उत्तर:
ब्रिटेन यात्रा के समय डॉ. रमन ने समुद्र के नीले रंग को बड़े ध्यान से देखा। यह उनका प्रथम अवसर था। जब वे यात्रा से वापस लौटकर आये तो अपनी प्रयोगशाला में अनुसंधान किया और पता लगाया कि लहरों पर प्रकाश के कारण जल नीला दिखाई देता है। आकाश का रंग भी इसी तरह नीला दिखाई पड़ता है। इन प्रयोगों के परिणामों को विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया और चारों ओर अपनी विद्वता के लिए प्रसिद्ध हो गए। विश्व के विद्वान वैज्ञानिकों में इनकी गणना होने लगी।

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प्रश्न 3.
डॉ. रमन ने किन-किन वाद्ययंत्रों के गुणों का अध्ययन किया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कोलकाता में रहते हुए रमन ने वीणा, मृदंग, पियानो आदि वाद्ययंत्रों के शाब्दिक गुणों का अध्ययन किया। इनकी इस खोज से विश्व में तहलका मच गया।

प्रश्न 4.
डॉ. रमन ने किन-किन देशों का भ्रमण किया? (2015)
उत्तर:
डॉ. रमन ने ब्रिटेन के अतिरिक्त अमरीका, रूस तथा यूरोप के अन्य देशों का भी भ्रमण किया। अमरीका के प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर मिलिकन ने स्वयं आकर इनसे भेंट की। सन् 1914 ई. में लन्दन की रॉयल सोसाइटी ने आपको फैलो चुना। आपको कनाडा भी बुलाया और वहाँ आपके प्रकाश सम्बन्धी खोज पर अपना भाषण देने के लिए आमन्त्रित किया।

प्रश्न 5.
“डॉ. रमन का जीवन तत्परता, परिश्रम और एकाग्रता से पूर्ण था।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
डॉ. रमन ने जितने भी अनुसंधान किए, वे सभी मौलिक थे। साथ ही उन्होंने अपने विद्यार्थियों को अनुसंधान की ओर प्रेरित किया। उनकी ही प्रेरणा से डॉ. के. एस. कृष्णन् जैसे वैज्ञानिक भारत को आप की ही देन हैं। रमन का स्वभाव बहुत ही सरल और विनीत था। उनमें अभिमान तो रंचमात्र भी नहीं था।

उनके अन्दर तत्परता ऐसा गुण था कि वे किसी भी विषय पर जिसकी ओर यदि उनमें आकर्षण पैदा हो गया, तो वे उसके सम्बन्ध में पूरी अनुसन्धान विधि से जानकारी लेने में तत्पर रहते थे। साथ ही कोई भी विद्यार्थी अपने शोध अथवा अन्य समाधानों के लिए उनकी सहायता की आकांक्षा रखता तो वे उसकी पूरी-पूरी मदद करते। लेकिन उनमें यह भी एक अन्य विशेषता थी कि वे किसी के भी अनावश्यक हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते थे।

अब आती है बात परिश्रम की। वे वैज्ञानिक अनुसंधानों में दिन-रात जुटकर परिश्रम किया करते थे। अपने बहुमूल्य समय को व्यर्थ नहीं गंवाते थे। एक-एक क्षण में उपयोग से उन्होंने लगातार कितने ही अनुसन्धान और प्रयोग कर डाले। यह उनकी लगन, तत्परता और परिश्रम का ही परिणाम था।

डॉ. रमन एक वैज्ञानिक का अपनी प्रयोगशाला में ही अपना मूल स्थान बताया करते थे, कार्यालयों में नहीं। इसका तात्पर्य यह है वे स्वयं भी किसी प्रयोग को करने में और उस विषय का (समस्या का) समाधान ढूँढ़ने में एकाग्र मन से लगे रहते थे। बर्फ के टुकड़े अथवा साबुन के बुलबुलों तक में अपने अनुसधान करने और जिज्ञासा को शान्त करने के लिए तत्पर रहकर एकाग्रता से अपने निरीक्षणों का परिणाम घोषित करते थे।

इसलिए डॉ. रमन के विषय में यह कथन बिल्कुल सही है और प्रेरणाप्रद भी है कि वे अपने कार्य को तत्परता, परिश्रम और एकाग्रता से किया करते थे। यह उनकी एक बहुत बड़ी विशेषता थी।

प्रश्न 6.
एक महान वैज्ञानिक के रूप में डॉ. रमन की उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर:
यद्यपि रमन ने अर्थ विभाग में कार्य किया, फिर भी उनका ध्यान सदा विज्ञान की ओर लगा रहा। वे भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद् के सदस्य बने। वहाँ के मंत्री को अपने उन पत्रों को दिखाया जो प्रकाशित हो चुके थे। साथ ही उन्होंने अपनी अभिरुचि को व्यक्त किया कि वे अनुसंधान करना चाहते हैं। भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद् के मंत्री महोदय उनके लेखों से बहुत प्रभावित हुए। उनके इन लेखों से उनके वैज्ञानिक अभिरुचि का पता चलता था। मंत्री महोदय ने इन्हें परिषद् का सदस्य भी बना लिया और अनुसंधान करने की पूरी-पूरी सुविधा भी प्रदान कर दी।

कोलकाता से रंगून के लिए इनका स्थानान्तरण सन् 1910 ई. में कर दिया गया। वहाँ भी इन्होंने अपने अनुसंधानों को जारी रखा। इनके पिताजी का देहान्त भी इसी वर्ष हो गया, अत: इन्होंने छ: माह का अवकाश लिया और चेन्नई आ गये। बाद में आपकी नियुक्ति कोलकाता में ही डाकतार विभाग में एकाउन्टेन्ट के पद पर हो गई। डॉ. रमन सदैव वैज्ञानिक अनुसंधानों की ओर विशेष रुझान रखते थे। साथ ही, अपने विभाग के कार्यों को भी समय पर तत्परता से करते थे।

जब सन् 1914 ई. में कोलकाता में साइन्स कॉलेज की स्थापना हुई, तब सर आशुतोष मुखर्जी ने इन्हें विज्ञान कॉलेज में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर के पद पर बुलाया, क्योंकि सर मुखर्जी भौतिक विज्ञान में इनकी प्रतिभा से अच्छी तरह परिचित थे। उन्होंने सर आशुतोष मुखर्जी के कहने पर सरकारी नौकरी छोड़ दिया और आचार्य पद स्वीकार कर लिया।

जब वे विज्ञान कॉलेज के प्रोफेसर नियुक्त हुए उस समय उनकी उम्र केवल 29 वर्ष की थी। इस तरह सन् 1917 ई. में इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय में काम करना स्वीकार कर लिया। विश्वविद्यालय में रहते हुए इन्होंने अनेक अनुसंधान किए. जो बहुत ही महत्त्वपूर्ण थे। बाद में, ब्रिटिश साम्राज्य के सभी विश्वविद्यालयों की एक कॉन्फ्रेंस हुई; तब कोलकाता विश्वविद्यालय ने इन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर इंग्लैण्ड भेजा।

ब्रिटिश यात्रा के दौरान रमन ने समुद्र के नीले रंग को ध्यान से देखा। अपनी यात्रा से लौटकर अपनी प्रयोगशाला में अनुसंधान से इन्होंने ज्ञात किया कि लहरों पर प्रकाश के कारण जल नीला दिखाई देता है। आकाश भी इसी तरह नीला दिखाई देता है। इन प्रयोगों को और उनके निष्कर्षों को विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया और चारों ओर इनकी विद्वता की धूम फैल गई। इन्हें तब से महान वैज्ञानिकों में गिना जाने लगा। इंग्लैण्ड के अलावा इन्होंने अमरीका, रूस और यूरोप के अन्य देशों में अपनी वैज्ञानिक खोजों के प्रपत्रों को विभिन्न वैज्ञानिक समितियों में पढ़ा और उनके निष्कर्षों को उपस्थित लोगों के सम्मुख रखा, तो अमरीका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर मिलिकन ने स्वयं आकर इनसे भेंट की। सन् 1922 ई. में कोलकाता विश्वविद्यालय ने आपकी अमूल्य सेवाओं से प्रसन्न होकर डी. एस-सी. की उपाधि से सम्मानित किया। सन् 1974 ई. में लन्दन की रॉयल सोसाइटी ने इन्हें फैलोशिप के लिए चुन लिया।

प्रकाश सम्बन्धी खोजों पर भाषण देने के लिए इन्हें कनाडा बुलाया गया। ग्लेशियर पर हरे और नीले रंग देखे। इन्होंने अपने प्रयोगों से खोज निकाला कि पारदर्शक और अपारदर्शक पदार्थों पर प्रकाश का परिक्षेपण होता है। सन् 1924 ई. में ‘रमन-प्रभाव’ से सिद्ध किया कि अणु प्रकाश बिखेरते हैं और मूल-प्रकाश में परिवर्तन हो जाता है।

सन् 1929 ई. में चेन्नई में भारतीय विज्ञान काँग्रेस के लिए इन्हें अध्यक्ष चुना गया। अनेक संस्थानों ने इन्हें सम्मानित किया। ब्रिटिश सरकार ने सन् 1930 ई. में इन्हें ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया। ‘रमन-प्रभाव’ के अनुसंधान के लिए ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला। एशिया के पहले व्यक्ति थे जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। स्टॉकहोम में भी पुरस्कार मिला। देश और विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों ने इन्हें डी. एस-सी. की सम्मानित उपाधि दी।

कोलकाता विश्वविद्यालय से मुक्त होकर सरकार के आग्रह पर इन्होंने बंगलूरू के ‘इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ साइन्स’ में अनुसंधान कार्य के संचालक का पद स्वीकार किया और भौतिक विज्ञान की एक प्रयोगशाला स्थापित की। सन् 1941 ई. में इन्हें अमरीका का प्रसिद्ध ‘फ्रेन्कलिन पुरस्कार’ प्रदान किया गया। सन् 1943 ई. में बंगलूरू में ही ‘रमन इन्स्टीट्यूट’ की स्थापना की। सन् 1954 में भारत सरकार ने अपना सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ इन्हें प्रदान किया। सन् 1957 ई. में सोवियत रूस ने ‘लेनिन शान्ति पुरस्कार’ देकर आपको सम्मानित किया।

डॉ. रमन जैसे विज्ञानवेत्ताओं पर भारत माता गर्व करती है।

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प्रश्न 7.
प्रतियोगिता परीक्षा में सफल होने के लिए डॉ. रमन ने किस प्रकार तैयारी की ? लिखिए।
उत्तर:
भौतिक विज्ञान विषय में बी. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और विश्वविद्यालय का रिकार्ड तोड़ दिया क्योंकि अभी तक कोई भी छात्र भौतिक विज्ञान में न तो प्रथम आया और न किसी को इतने अंक ही मिले। इनकी असाधारण प्रतिभा को देखकर छात्रवृत्ति देना स्वीकार कर लिया किन्तु अस्वस्थ हो गए और विदेश नहीं गए।

परवशता में इन्होंने अर्थविभाग की प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होने का निश्चय किया। प्रतियोगिता परीक्षा में बैठने के लिए इन्हें इतिहास और संस्कृत आदि नए विषयों का अध्ययन करना पड़ा। वे इस बात से परिचित थे कि प्रतियोगिता परीक्षा में इन विषयों में अधिक अंक मिलते हैं।

बस, इसी कारण से इन्होंने इन विषयों का (इतिहास और संस्कृत) का विशेष अध्ययन किया और प्रतियोगिता परीक्षा में सर्वप्रथम उत्तीर्ण घोषित हुए। इन विषयों की तैयारी भी उन्होंने अपनी तत्परता, लगनशीलता और परिश्रम से की। इनके इन्हीं गुणों के कारण कभी भी न पढ़े गए इन विषयों में अपनी अलौकिक प्रतिभा का प्रदर्शन कर सर्वप्रथम उत्तीर्ण हुए।

प्रश्न 8.
‘रमन प्रभाव घटना’ एक महत्त्वपूर्ण खोज थी, इसके बारे में विस्तार से बताइए। (2009)
उत्तर:
ब्रिटेन की यात्रा के अवसर पर रमन को समुद्र के नीले रंग को ध्यान से देखने का अवसर मिला। यात्रा से लौटकर अपनी प्रयोगशाला में अनुसंधान किया और बताया कि लहरों पर प्रकाश के कारण जल नीला दिखाई देता है। इसी तरह आकाश का रंग भी नीला दिखाई देता है। इन प्रयोगों को विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया। परिणामतः आपकी विद्वता की धूम चारों ओर मच गई। आपकी गणना संसार के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों में होने लगी।

इसका नतीजा यह हुआ कि आपने ब्रिटिश के अलावा अमरीका, रूस और यूरोप के अन्य देशों की यात्राएँ की। अपनी खोजों और अनुसंधान सम्बन्धी प्रयोगों का निष्कर्ष लोगों के सामने रखा। प्रकाश सम्बन्धी खोजों पर भाषण देने के लिए कनाडा में आप को बुलाया गया। वहाँ के ग्लेशियर को देखते समय इन्होंने हरे और नीले रंग से मिले हुए बर्फ के टुकड़ों को देखा

और उन पर मुग्ध हो गए। उन्होंने एक टुकड़े को काट लिया किन्तु उसमें कोई भी रंग नहीं था। इससे वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि प्रकाश का परिक्षेपण पारदर्शक पदार्थों में ही नहीं होता, अपितु बर्फ जैसे ठोस पदार्थों में भी होता है। साबुन के बुलबुलों के सम्बन्ध में भी रमन ने इसी प्रकार के प्रयोग किए और सन् 1928 ई. में आपने नया आविष्कार कर दिखाया। इसे ‘रमन प्रभाव’ कहते हैं। ‘रमन-प्रभाव’ के द्वारा आपने यह सिद्ध कर दिया कि जब अणु प्रकाश बिखेरते हैं, तो मूल प्रकाश में परिवर्तन हो जाता है और नई किरणों के कारण परिवर्तन दिखाई देता है। ‘रमन-प्रभाव’ के आधार पर आधुनिक वैज्ञानिकों ने बड़े-बड़े आविष्कार किए हैं।

आपने बंगलूरू में सन् 1943 ई. में ‘रमन इन्स्टीट्यूट’ की स्थापना की। इस इन्स्टीट्यूट में भौतिक विज्ञान विषय पर अनुसंधान कार्य होता है।

प्रश्न 9.
डॉ. वेंकटरमन की कार्य प्रणाली से आप किस प्रकार प्रेरणा ग्रहण करेंगे ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
डॉ. वेंकटरमन की कार्य प्रणाली हम सभी को प्रेरणा देने के लिए एक बहुत बड़ा माध्यम सिद्ध होती है। सबसे प्रथम तो बालक रमन पर बाल्यकाल से ही अपने परिवेश का भारी प्रभाव पड़ना शुरू हो गया। जब आप हाईस्कूल तक पहुँचे, तब तक आपने कितनी ही विज्ञान सम्बन्धी पुस्तकों का अध्ययन कर लिया था। इसका सीधा प्रभाव यह हुआ कि उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा सम्मानपूर्वक उत्तीर्ण कर ली। एम. ए. भी प्रथम श्रेणी में पास की। परन्तु आपके अ६ ययन का विषय विज्ञान नहीं था।

उपर्युक्त बातों से हमें प्रेरणा मिलती है कि हम किसी भी विषय का अध्ययन करें, परन्तु उस विषय का अध्ययन लगन और तत्परता से किया जाना चाहिए। अपनी पूरी क्षमताओं का उपयोग परिश्रमपूर्वक करना चाहिए।

अब बात आती है स्नातक स्तर पर अध्ययन करने की प्रक्रिया की। इन्होंने अल्पायु में ही इससे पूर्व की कक्षाओं का अध्ययन कर लिया तो इन्हें बी. ए. में किसी छोटी कक्षा का छात्र माना जाने लगा। अंग्रेजी के प्रोफेसर इलियट तो इन्हें किसी छोटी कक्षा का छात्र मानते रहे। बी. ए. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आपको स्वर्णपदक और पारितोषिक विश्वविद्यालय की ओर से दिए गए। पूरे विद्यालय में अकेले इन्हीं के प्रथम आने पर इन्हें ‘अरणी स्वर्ण पदक’ भी मिला। प्रधानाचार्य को रमन की प्रतिभा पर आश्चर्य था और रमन ने उन्हें प्रभावित भी किया। अतः इन्हें मनचाहे प्रयोग करने के लिए पूरी-पूरी सुविधाएँ दी गईं।

‘गणित’ और ‘यंत्र विज्ञान’ का अध्ययन भी इन्होंने अपनी रुचि से किया। अपने छात्र जीवन में ‘रमन’ अपनी प्रयोगशाला में घण्टों बैठे रहते थे। एम. ए. में प्रवेश लिया। मौलिक अन्वेषण की प्रतिभा का प्रथम परिचय दिया। ‘नाद-शास्त्र’ पर भी नए तरीके का एक प्रयोग किया। इन सभी कार्यों से रमन की प्रतिभा और अलौकिक विद्वता का प्रभाव हम सभी को नई खोजों को और अन्वेषणों को प्रगति देने के लिए प्रेरित करता है।

रमन ने एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इनकी अप्रतिम प्रतिभा के कारण छात्रवृत्ति देकर विदेश भेजने का सरकार ने अवसर दिया। लेकिन अपनी अस्वस्थता के कारण विदेश नहीं गए। अर्थ विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल हुए। प्रथम उत्तीर्ण घोषित हुए और डिप्टी डायरेक्टर-जनरल के पद पर नियुक्त हुए।

विज्ञान क्षेत्र के इन्होंने अनेक अनुसंधान किए, कोलकाता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर नियुक्त हुए, विदेशी यात्राएँ की, अनेक अन्वेषणों के नतीजे विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इनके लिए इन्हें सम्मानित किया गया। अनेक उपाधियाँ और पारितोषिक मिले। नोबेल पुरस्कार मिला, भारत रत्न की उपाधि मिली, ये सब डॉ. रमन की अपनी मेहनत, लगन, तत्परता और बौद्धिक क्षमता का ही प्रभाव था।

इनसे हम सभी को अनुप्राणित होकर अपने-अपने विषयों के प्रति अभिरुचि के अनुसार कार्य प्रणाली अपनाना और मानव हित को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की प्रेरणा हमें मिलती है।

डॉ. चन्द्रशेखर वेंकटरमन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जन्म दक्षिण भारत के त्रिचनापल्ली (तमिलनाडु) नामक नगर में 7 नवंबर, 1888 ई. को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

प्रश्न 2.
चन्द्रशेखर वेंकटरमन को कब और किस कार्य के लिए सर्वोच्च वैज्ञानिक सम्मान’ नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया?
उत्तर:
सन् 1930 ई. में चन्द्रशेखर वेंकटरमन को भौतिक विज्ञान का ‘नोबेल पुरस्कार’ प्रदान किया गया। उन्हें यह पुरस्कार उनके द्वारा सम्पादित रमन प्रभाव के अनुसंधान के लिए दिया गया।

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डॉ. चन्द्रशेखर वेंकटरमन पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
जन्म एवं शिक्षा-चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जन्म दक्षिण भारत के त्रिचनापल्ली (तमिलनाडु) नामक नगर में 07 नवम्बर, 1888 ई. को विद्या के क्षेत्र में विख्यात ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम चन्द्रशेखर अय्यर तथा माता का नाम पार्वती अम्मल था। रमन के जन्म के समय श्री अय्यर त्रिचनापल्ली के हाईस्कूल में अध्यापक थे। बाद में, विजगापट्टम के हिन्दू कालेज में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हो गए। रमन के पिता अपने विषय के प्रकाण्ड विद्वान थे।

रमन पर भी अपने पिता का प्रभाव पड़ा और हाईस्कूल तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने विज्ञान की अनेकों पुस्तकों का अध्ययन कर डाला। इन्होंने कुल 12 वर्ष की उम्र में ही मैट्रिक की परीक्षा सम्मानपूर्वक पास कर ली। सन् 1901 ई. में आपने एफ. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की लेकिन इसका विषय विज्ञान नहीं था। प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से बी. ए. की परीक्षा विज्ञान विषय के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। स्वर्ण पदक और पारितोषिक विश्वविद्यालय की ओर से मिले। उस वर्ष विश्वविद्यालय में रमन ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। भौतिक विज्ञान का ‘अरणी स्वर्ण पदक’ भी आपको मिला। रमन ने गणित और यंत्र विज्ञान का भी अE ययन किया। बी. ए. (भौतिक विज्ञान) की परीक्षा रमन ने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और पिछले रिकार्डों को तोड़ दिया। उस समय तक भौतिक विज्ञान में कोई भी प्रथम श्रेणी में नहीं आया था।

इसके बाद इन्होंने अर्थ विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा उत्तीर्ण की और सर्वप्रथम घोषित हुए तथा डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर कोलकाता (कलकत्ता) में नियुक्त हो गए।

इनका विवाह सामुद्रिक चुंगी विभाग के सुपरिन्टेन्डेन्ट श्री कृष्णस्वामी अय्यर (मद्रास) और श्रीमती रुक्मणी अम्मल की पुत्री से हो गया।

विज्ञान की तरफ झुकाव :
अर्थ विभाग में काम करते हुए भी आप ‘भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद्’ में गए। वहाँ अपने प्रकाशित लेखों को दिखाया और वहाँ से अनुसंधान करने की अनुमति प्राप्त की। कोलकाता से इन्हें रंगून के लिए स्थानान्तरित कर दिया। इन्होंने अपने वैज्ञानिक अनुसंधान जारी रखे। सन् 1910 ई. में इनके पिता का देहावसान हो गया। छ: माह के अवकाश पर भारत आए। इसी बीच इनकी नियुक्ति डाकतार विभाग में एकाउन्टेन्ट के पद पर हो गई। सरकार ने इन्हें सचिवालय में बुलाना चाहा किन्तु इन्होंने स्वीकार नहीं किया।

कोलकाता विश्वविद्यालय :
रमन ने कोलकाता में रहकर वीणा, मृदंग, पियानो आदि वाद्ययंत्रों के शाब्दिक गुणों का अध्ययन किया। सन् 1914 ई. में कोलकाता में साइंस कॉलेज खोला गया। सर आशुतोष मुखर्जी रमन की प्रतिभा से परिचित थे। अतः इन्हें वहाँ भौतिक विज्ञान के पद पर प्रोफेसर नियुक्त कर दिया। इन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और आचार्य पद स्वीकार कर लिया। सन् 1917 ई. में मात्र 29 वर्ष की आयु में इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय में काम करना आरम्भ किया। कोलकाता विश्वविद्यालय ने इन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर विश्वविद्यालयों की कॉन्फ्रेंस में भाग लेने इंग्लैण्ड भेजा।

विदेश यात्रा व रमन :
प्रभाव की नींव-विदेश यात्रा से लौटकर इन्होंने प्रयोगशाला में अनुसंधान किया और पता लगाया कि लहरों पर प्रकाश के कारण जल नीला दिखाई देता है। आकाश का रंग भी नीला दिखता है। इन प्रयोगों के नतीजे विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इन्हें अपनी खोजों के लिए प्रशंसा मिली और प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में गणना होने लगी। इन्होंने अमरीका, रूस और यूरोप के अन्य देशों की भी यात्राएँ की। अमरीका के विख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर मिलिकन ने स्वयं आकर इनसे भेंट की और सन् 1922 ई. में कोलकाता विश्वविद्यालय में इन्हें डी. एस. सी. की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया। सन् 1914 ई. को लन्दन की रॉयल सोसाइटी ने इन्हें फैलो चुना। प्रकाश सम्बन्धी खोजों पर भाषण देने के लिए कनाडा बुलाया गया। वहाँ के ग्लेशियर्स को देखकर निष्कर्ष निकाला कि प्रकाश का परिक्षेपण पारदर्शक पदार्थों में ही नहीं होता अपितु बर्फ जैसे ठोस पदार्थों में भी होता है। सन् 1928 ई. में ‘रमन प्रभाव’ नामक आविष्कार कर दिखाया। इसके अनुसार, सिद्ध कर दिया कि जब अणु प्रकाश बिखेरते हैं, तो मूल प्रकाश में परिवर्तन हो जाता है।

विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता :
सन् 1929 ई. में भारतीय विज्ञान काँग्रेस के आप अध्यक्ष चुने गए। सन् 1929 ई. में ब्रिटिश सरकार ने ‘सर’ की उपाधि दी। सन् 1930 ई. में भौतिक विज्ञान का ‘नोबेल पुरस्कार’ रमन प्रभाव के उपलक्ष्य में मिला। विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों ने इन्हें डी. एस. सी. या पी. एच. डी. की उपाधि देकर सम्मानित किया।

कोलकाता विश्वविद्यालय से मुक्त होकर सरकार के आग्रह पर इन्होंने बंगलूरू के ‘इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ साइन्स’ में अनुसंधान संचालक का पद स्वीकार कर लिया। सन् 1941 ई. में आपको अमरीका का प्रसिद्ध ‘फ्रेन्कलिन पुरस्कार’ प्रदान किया गया। सन् 1953 ई. में भारत सरकार ने अपना सर्वोच्च सम्मान ‘भारत-रत्न’ इन्हें प्रदान किया। सन् 1957 ई. में सोवियत रूस ने ‘लेनिन शान्ति पुरस्कार’ देकर आपको सम्मानित किया।

व्यक्तित्व :
डॉ. रमन ने अपने विद्यार्थियों को अनुसन्धान के लिए प्रेरित किया। डॉ. के. एस. कृष्णन जैसे विज्ञानवेत्ता भारत को आपकी ही देन हैं। वे स्वभाव से नम्र, सरल और विनीत थे। अभिमान उनमें था ही नहीं। उनमें तत्परता, परिश्रम और एकाग्रता जैसे विरल गुण विद्यमान थे। वे सदा लोकहित के ही कार्य करते थे। वे साहित्य, प्रकृति, संगीत, खेल आदि में विशेष रुचि लेते थे। बच्चों से अगाध प्रेम करते थे। रमन की मृत्यु 82 वर्ष की आयु में 21 नवम्बर, 1970 ई. को बंगलूरू में हो गई।

डॉ. रमन जैसे वैज्ञानिकों पर भारत गौरवान्वित महसूस करता है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण

प्रकृति-चित्रण अभ्यास

प्रकृति-चित्रण अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खंजन पक्षी का दुःख किस ऋतु में मिट जाता है? (2016)
उत्तर:
खंजन पक्षी का दु:ख शरद ऋतु में मिट जाता है।

प्रश्न 2.
किस ऋतु में सूर्य चन्द्रमा के समान दिखाई देता है?
उत्तर:
शिशिर ऋतु में सूर्य भी चन्द्रमा के समान दिखाई देता है।

प्रश्न 3.
नौका विहार कविता में किसकी तुलना चाँदी के साँपों से की है? (2015, 17)
उत्तर:
जल में नाचती हुई चन्द्रमा की चंचल किरणों की तुलना चाँदी के साँपों से की गयी है।

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प्रकृति-चित्रण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सेनापति के अनुसार, वर्षा ऋतु में प्रकृति में क्या-क्या परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं? (2014)
उत्तर:
सेनापति के अनुसार वर्षा ऋतु में प्रकृति में अनेक परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। आकाश में बिजली कौंधती है, इन्द्रधनुष चमकता है, काली घटाएँ भयंकर गर्जना करती हैं। कोयल एवं मोर इधर-उधर मधुर कूजन करते हैं। वायु के झोंकों से हृदय शीतल हो जाता है। वर्षा ऋतु के श्रावण माह में चारों ओर जल बरसने लगा है। प्रकृति के ये सभी परिवर्तन बड़े मनभावन होते हैं।

प्रश्न 2.
गंगाजल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के लिए कवि ने क्या कल्पना की है?
उत्तर:
प्रकृति के अनुपम चितेरे सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’ कविता में चन्द्रमा एवं चाँदनी के नाना रूपों का सुन्दर अंकन किया है। कभी गंगाजल की गोल लहरें चन्द्रमा की रेशमी कान्ति पर साड़ी की सिकुड़न जैसी सिमटी दिखाई पड़ती है तो कभी गंगा नायिका के चाँदी जैसे लहराते श्वेत बालों में चमचमाती लहरों से छिपकर ओझल हो जाती है। गंगाजल में पड़ती दशमी के चन्द्रमा की परछाई की कल्पना करते हुए कवि ने कहा है कि दशमी का चन्द्रमा, उसका प्रतिबिम्ब, मुग्धा नायिका के समान लहरों के घूघट में से अपना टेड़ा मुँह थोड़ी-थोड़ी देर में रुक-रुककर दिखाता जाता है।

प्रश्न 3.
गंगा की धार के मध्य स्थित द्वीप कवि को कैसा दिखाई देता है?
उत्तर:
‘नौका विहार’ कविता में कवि ने गंगा की विविध छवियों का भव्य अंकन किया है। एक रूप इस प्रकार है-गंगा की धारा के बीच एक छोटा-सा द्वीप है जो प्रवाह को रोककर उलट देता है। धारा में स्थित वही शान्त द्वीप चाँदनी रात में माँ की छाती पर चिपककर सो गये शिशु जैसा दिखाई दे रहा है।

प्रकृति-चित्रण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सेनापति ने बसन्त को ऋतुराज क्यों कहा है? (2008, 17)
उत्तर:
रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि सेनापति का ऋतु वर्णन अनुपम है। उन्होंने ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर आदि सभी ऋतुओं का मनोरम चित्रण किया है किन्तु बसन्त को उन्होंने ऋतुओं का राजा माना है। वे कहते हैं कि जैसे राजा हाथी, घोड़ा, रथ एवं पैदल की चतुरंगिणी सेना के साथ चलता है वैसे ही बसन्त.रूपी राजा के चहुंओर विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूल वन-उपवन में खिले हैं। जैसे राजा का गुणगान बन्दी, भाट आदि करते हैं वैसे ही भौरे, कोयल आदि ऋतुराज बसन्त का मधुर ध्वनि में यशगान करते हैं। जैसे राजा के आने पर सुगन्ध बिखर जाती है। वैसे ही बसन्त के आगमन पर भीनी-भीनी गन्ध चारों ओर व्याप्त हो जाती है। जैसे राजा की शोभायात्रा सुसज्जित होकर निकलती है वैसे ही ऋतुराज बसन्त सभी प्रकार के साज-सामान से युक्त होकर आते हैं। बसन्त के सभी लक्षण राजाओं जैसे हैं। इसीलिए सेनापति ने बसन्त को ऋतुओं का राजा कहा है।

प्रश्न 2.
सेनापति ने ग्रीष्म की प्रचण्डता का वर्णन किस प्रकार किया है? (2010)
उत्तर:
सेनापति ने ग्रीष्म की भयंकरता का सटीक वर्णन किया है। भीषण गर्मी देने वाली वृष राशि पर विराजमान सूर्य की हजारों किरणों के तेजस्वी समूह, भयंकर ज्वालाओं की लपटों की वर्षा कर रहे हैं। धरती तीव्र ताप से तप रही है। आग के तेज ताप से जगत जला जा रहा है। इस भीषण गर्मी से व्याकुल राहगीर और पक्षी भी छाया में विश्राम कर रहे हैं। थोड़ी-सी दोपहरी ढलते ही जो भयंकर उमस पड़ती है उसके कारण पत्ता भी नहीं खड़कता है। पूरी तरह चारों ओर सुनसान हो जाता है। गर्मी की इस भीषणता से घबराकर शान्ति देने वाली हवा भी ठण्डा सा कोना खोजकर इस ताप के समय को व्यतीत करने पर विवश हो रही है। इस प्रकार सेनापति ने ग्रीष्म की प्रचण्डता का प्रभावी वर्णन किया है।

प्रश्न 3.
तापस बाला के रूप में विश्राम कर रही गंगा के सौन्दर्य का वर्णन कवि ने किस प्रकार किया है? (2008)
उत्तर:
कोमल कल्पना के कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने अपनी नौका विहार’ कविता में गंगा का तापस बाला के रूप में बड़ा ही मनोरम चित्रण किया है। शान्त, प्रिय और स्वच्छ चाँदनी चारों ओर बिखरी है। आकाश अपलक नेत्रों से एवं धरती शान्त भाव से दत्तचित्त होकर गंगा को देख रहे हैं। तपस्वी कन्या जैसी पवित्र एवं क्षीणकाय गंगा बालू की दूध के समान श्वेत सेज पर शान्त, थकी सी स्थिर भाव से लेटी है। उसकी कोमल हथेलियाँ चाँदनी से चमत्कृत हो रही हैं। उस गंगा रूपी तापस बाला के हृदय पर तरंगों की छाया रूपी कोमल केश लहरा रहे हैं, उसके गौर वर्ण वाले जल में प्रतिबिम्बित नीला आकाश तरंगों के कारण उस बाला के आँचल की तरह लहरा रहा है। तापस बाला के स्पर्श से उसका शरीर सिहरन के कारण तरल एवं चंचल बना हुआ है। गंगाजल पर पड़ने वाली आकाश की लहराती परछाईं चन्द्रमा की रेशमी आभा से भरकर साड़ी की सिकुड़नों के समान सिमटी हुई है। इस प्रकार गंगा का तापस बाला के रूप में सजीव चित्रण किया गया है।

प्रश्न 4.
रात्रि के प्रथम प्रहर की चाँदनी में नदी, तट व नाव का सौन्दर्य क्यों बढ़ गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चाँदनी रात्रि का प्रथम प्रहर है। चारों ओर श्वेत चाँदनी छिटक रही है। नदी के किनारों पर बिछी बालू पर चमकती चाँदनी को देखकर ऐसा लगता है मानो मुस्कराती हुई खुली सीपी पर सुन्दर मोती कौंध रहा है। श्वेत चाँदनी तथा शान्त वातावरण ने नाव का सौन्दर्य भी दोगुना कर दिया है। छोटी सी नाव मदमस्त हंसिनी के समान मन्द-मन्द, मन्थर-मन्थर गति से पाल रूपी पंख फैलाकर गंगा की सतह पर तैरने लगी है। गंगा के चाँदनी से चमकते श्वेत तट गंगाजल रूपी स्वच्छ दर्पण में दोगुने ऊँचे प्रतीत हो रहे हैं। इस तरह शान्त वातावरण में फैली श्वेत चाँदनी ने नदी तट तथा नाव के सौन्दर्य को अत्यन्त मनोहारी बना दिया है।

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प्रश्न 5.
सुमित्रानन्दन पन्त ने नौका विहार की तुलना जीवन के शाश्वत रूप से किस प्रकार की है? (2009, 13)
उत्तर:
सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’ कविता में नौका विहार की तुलना जीवन के शाश्वत रूप से की है। जीवन रूपी नौका का विहार नित्य है। गंगा की धारा की तरह उस सृष्टि की रचना सनातन है। इसकी गति भी चिरन्तन है। इस जगत की धारा के साथ जीवन का मिलन भी शाश्वत है। जैसे नीले आकाश की अद्भुत क्रीड़ाएँ, चन्द्रमा की चाँदी से श्वेत हँसी और छोटी-छोटी लहरों का विलास चिरन्तन है वैसे ही जीवन’रूपी नौका विहार शाश्वत है। धारा के रूप में प्राप्त जीवन के चिरन्तन प्रमाण ने आभास करा दिया है कि जन्म और मृत्यु के आर-पार आत्मा अमर है। वह कभी समाप्त नहीं होगी।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए
(i) चाहत चकोर ………………. सकति है।
(ii) मेरे जान पौनों ……………….. वितवत है।
(iii) मद मन्द-मन्द ………………. क्षण भर।
(iv) माँ के उर पर ……………… विपरीत धार।
उत्तर:
(i) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में शीत ऋतु की सजीव झाँकी प्रस्तुत की गयी है। साथ ही शिशिर के प्रभाव का मर्मस्पर्शी चित्रण है।

व्याख्या :
शिशिर ऋतु में ठण्ड बढ़ जाती है और वातावरण में इतनी अधिक शीतलता . होती है कि सूर्य भी चन्द्रमा का रूप धारण कर लेता है अर्थात् चन्द्रमा के समान शीतल लगता है। धूप भी चाँदनी की चमक प्रतीत होती है (धूप भी चाँदनी के समान लगती है)। सेनापति कहते हैं कि ठण्ड हजार गुनी बढ़ जाती है और दिन में भी रात की झलक दिखती है (सूर्य के तेज रहित होने के कारण दिन में रात की झलक दिख पड़ती है। दिन भी रात की तरह शीतल है।)

चकोर पक्षी यद्यपि चाँद का प्रेमी होता है, पर शिशिर में वह भी सूर्य की ओर अपलक दृष्टि से देखे जा रहा है। चक्रवाक पक्षी रातभर अपनी चकवी से बिछुड़ कर रहता है। शिशिर में दिन में जब रात का भ्रम होता है तो चक्रवाक पक्षी का दिल बैठने लगता है कि कहीं रात तो नहीं हो गयी और उसका धीरज छूटने लगता है। चन्द्रमा के भ्रमवश कुमुदिनी अत्यन्त प्रसन्न होती है। (वह दिन में भी सूर्य को शीतलता के कारण चाँद समझ बैठती है।) लेकिन चन्द्रमा की शंका में पड़कर कमलिनी दिन में भी विकसित नहीं हो पा रही है।

(ii) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने प्रस्तुत पद्यांश में ग्रीष्म ऋतु की भयंकरता का सजीव चित्रण किया है। साथ ही साथ जीव एवं दुनिया पर ग्रीष्म के ताप के भयंकर प्रभाव का सजीव चित्रण प्रस्तुत है।

व्याख्या :
यहाँ पर कवि सेनापति ग्रीष्म की प्रचण्ड गर्मी का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृष राशि पर सूर्य स्थित है। (ज्योतिष की मान्यता के अनुसार जब वृष राशि पर सूर्य आ जाता है तो भीषण गर्मी पड़ती है।) उसकी सहस्रों तेजस्वी किरणों के समूह से ऐसी भीषण गर्मी पड़ रही है, मानो भयंकर ज्वालाओं के जाल अर्थात् लपटों के समूह अग्नि की वर्षा कर रहे हों। पृथ्वी भी गर्मी की अधिकता से तप रही है। अग्नि की तीव्रता से संसार जल रहा है। यात्री और पक्षी ठण्डी छाया को ढूँढ़कर विश्राम करते हैं। सेनापति कहते हैं कि तनिक दोपहर ढलते ही विकराल गर्मी के कारण सन्नाटा हो जाता है कि पत्ता तक नहीं खड़कता, अर्थात् सर्वत्र सुनसान हो जाता है। कोई भी बाहर नहीं निकलता। ऐसी गर्मी में हवा भी नहीं चलती है कि कुछ शीतलता मिले। कवि कहते हैं कि मेरी समझ में तो हवा भी गर्मी से घबरा कर कोई ठण्डा-सा कोना ढूँढ़कर छिप गयी है और कहीं ऐसी जगह में गर्मी बिता रही है।

(iii) शब्दार्थ :
सत्वर = शीघ्र; सिकता = रेती, बालू; सस्पित = मुस्कराती; ज्योत्सना = चाँदनी; मन्थर-मन्थर = धीरे-धीरे; तरणि = नौका; पर = पंख; निश्चल = शान्त; रजत = चाँदी; पुलिन = किनारे; प्रमन = प्रसन्न मन; वैभव-स्वप्न = वैभव भरे सपने।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में नौका-विहार के मनोरम दृश्यों का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
चाँदनी रात्रि का प्रथम प्रहर है। हम नौका विहार के लिए नाव लेकर शीघ्र ही चल दिये हैं। गंगा नदी की रेती पर चाँदनी इस प्रकार चमक रही है कि मानो मुस्कराती हुई खुली सीपी पर मोती चमक रहा हो। इस प्रकार की रमणीय बेला में नाव के पाल नौका विहार हेतु चढ़ा दिये गये और लंगर उठा लिया है। फलस्वरूप हमारी छोटी सी नाव एक सुन्दर हंसिनी की तरह मन्द-मन्द, मंथर पालों रूपी पंख खोलकर गंगा की सतह पर तैरने लगी है। गंगा के शान्त तथा निर्मल जल रूपी दर्पण पर प्रतिबिम्बित चाँदनी से चमकते श्वेत तट एक क्षण के लिए दोहरे ऊँचे प्रतीत होते हैं। गंगा के तट पर स्थित कालाकांकर का राजभवन जल में प्रतिबिम्बित होता हुआ इस प्रकार का प्रतीत हो रहा है मानो वैभव के अनेक स्वप्न संजाए निश्चित भाव से सो रहा हो।

शब्दार्थ :
चपला = चंचल नौका; दूरस्थ = दूरी पर स्थित; कृश = दुबला-पतला; विटप-माल – वृक्षों की पंक्ति; भू-रेखा = भौंह; अराल = टेढ़ी; उर्मिल = लहरों से युक्त; प्रतीप = उल्टा; कोक = चकवा।

(iv) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यावतरण में चाँदनी रात में गंगा नदी की बीच धारा में नौका-विहार के समय की प्राकृतिक सुषमा को चित्रित किया गया है।

व्याख्या :
जब चंचल नौका गंगा की बीच धारा में पहुँची तो चाँदनी में चाँद-सा चमकता हुआ रेतीला कगार हमारी दृष्टि से ओझल हो गया। मैंने देखा कि गंगा के दूर-दूर तक स्थित तट फैली हुई दो बाँहों के समान लग रहे हैं, जो गंगा धारा के दुबले-पतले कोमल-कोमल नारी के शरीर का आलिंगन करने (अपने में भरकर कस लेने) के लिए अधीर हैं और उधर, बहुत दूर क्षितिज पर वृक्षों की पंक्ति है। वह पंक्ति धरती के सौन्दर्य को अपलक (बिना पलक झपकाये) निहारते हुए आकाश के नीले-नीले विशाल नयन की तिरछी भौंह के समान प्रतीत हो रही है।

पास की धारा के बीच एक छोटा-सा द्वीप है; जो लहरों वाले प्रवाह को रोककर उलट देता है। धारा में स्थित वही शान्त द्वीप चाँदनी रात में माँ की छाती पर चिपककर सो गये नन्हें बच्चे जैसा लग रहा है। और वह उड़ता हुआ.पक्षी कौन है? क्या वह अपनी प्रिया चकवी से रात्रि में बिछड़ा हुआ व्याकुल चकवा तो नहीं है? शायद वही है, जो जल में पड़े हुए प्रतिबिम्ब को देखकर उसे चकवी समझा बैठा है और विरह दुःख मिटाने के लिए उससे मिलन हेतु उड़ रहा है।.

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प्रकृति-चित्रण काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए. बरन, पंछी, सोभा, सहसौं, पौनों, पाउस, साँप, चाँदी, बरसा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों के सामने अलंकारों के कुछ विकल्प दिए गए हैं। सही विकल्प छाँटकर लिखिए
(अ) बरन-बरन तरु फूले उपवन वन। (उपमा/यमक/अनुप्रास)
(आ) मेरे जान पौनों सीरी ठौर का पकरि कौंनो, घरी एक बैठि कहुँ, घामै वितवत है। (उत्प्रेक्षा/रूपक/उपमा)
(इ) माँ के उर पर शिशु सा, समीप सोया धारा में एक द्वीप। (उत्प्रेक्षा/रूपक/उपमा)
उत्तर:
(अ) अनुप्रास
(आ) उत्प्रेक्षा
(इ) उपमा।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार पहचानकर लिखिए
(क) चन्द के भरम होत मोद है कमोदिनी को।
(ख) ससि संक पंकजिनी फूलि न सकति है।
मेरे जान पौनों, सीरी ठौर कौं पकरि कौंनो।
घरी एक बैठि कहूँ घामै वितवत है।
उत्तर:
(क) तथा
(ख) पंक्तियों में भ्रम से निश्चयात्मक स्थिति होने के कारण भ्रान्तिमान’ अलंकार है।

प्रश्न 4.
कविवर पन्त के संकलित अंश से मानवीकरण के कुछ उदाहरण छाँटकर लिखिए।
उत्तर:

  1. सैकत शैया पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल लेटी है श्रान्त, क्लान्त, निश्चल।
  2. विस्फारित नयनों से निश्चल, कुछ खोज रहे चल तारक दल।
  3. दो बाहों से दूरस्थ तीर, धारा का कृश कोमल शरीर। आलिंगन करने को अधीर।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में शब्द गुण पहचान कर लिखिए
(अ) गुंजत मधुप गान गुण गहियत है।
आवै आस पास पुहुपन की सुवास सोई
सौंधे के सुगन्ध माँझ सने रहियत है।
(आ) मेरे जान पौनों सीरी ठौर कौं पकरि कौंनो,
घरी एक बैठि कहूँ घामै वितवत है।
उत्तर:
(अ) माधुर्य गुण
(आ) प्रसाद गुण।

प्रश्न 6.
इस पाठ से पुनरुक्तिप्रकाश के उदाहरण छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
(i) बरन-बरन तरू फूले उपवन-वन।
(ii) गोरे अंगों पर सिहर-सिहर लहराता तार तरल सुन्दर।
(iii) लहरों के घूघट से झुक-झुक, दशमी की राशि निज तिर्यक मुख। दिखलाता, मुग्धा सा रुक-रुक।
(iv) डांडों के चल करतल पसार, भर-भर मुक्ताफल फेन स्फार, बिखराती जल में तार हार।
(v) लहरों की लतिकाओं में खिल सौ-सौ शशि सौ-सौ उहै झिलमिल।
(vi) ज्यों-ज्यों लगती नाव पार।

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प्रश्न 7.
आवन कहयो है मनभावन सु, लाग्यो तरसावन विरह जुर जोर तें। ………..में कौन-सा रस है?
उत्तर:
इस पद्यांश में वियोग शृंगार रस है।

ऋतु वर्णन भाव सारांश

रीतिकाल की परम्परा से परे काव्य सृजन करने वाले सेनापति ने प्रकृति का अद्वितीय वर्णन किया है। आपने बड़े सूक्ष्म, चमत्कृत एवं कलात्मक ढंग से प्रकृति का वर्णन किया है। आपने ऋतुराज बसन्त के मनोरम सौन्दर्य, ग्रीष्म की भयंकर तपन, वर्षा की आर्द्रता, शरद की निर्मलता, शिशिर की शीतलता का स्वाभाविक एवं हदयस्पर्शी अंकन किया है। आपके काव्य में लाक्षणिकता, प्रौढ़ता, सानुप्रासिकता का सौन्दर्य सर्वत्र देखा जा सकता है। ऋतु वर्णन में उनके उस कौशल का प्रत्यक्ष प्रभाव प्रस्तुत है।

ऋतु वर्णन संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] बरन बरन तरु फूले उपवन वन,
सोई चतुरंग संग दल लहियत है।
बन्दी जिमि बोलत विरद वीर कोकिल है,
गुंजत मधुप गान गुन गहियत है।
आवे आस पास पुहुपन की सुबास सोई,
सौंधे के सुगन्ध माझ सने रहियत है।
सोभा को समाज ‘सेनापति’ सुख साज आजु
आवत बसन्त रितुराज कहियत है ।।1।। (2008)

शब्दार्थ :
बरन-बरन = विभिन्न रंगों के; तरु = वृक्ष ; सोई = वही; चतुरंग = चतुरंगिणी सेना (चार प्राकर की सेना-हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल); दल सेना; लहियत = शोभायमान होना; बन्दी = चारण, भाट; जिमि = जिस प्रकार; विरद = प्रशंसा, बड़ाई; कोकिल = कोयल; मधुप = भीरा; पुहुपन = फूलों की; सुबास = सुगन्ध; माझ = में; सने = सुवासित; रहियत = रहता है; रितुराज = ऋतुओं का राजा, बसन्त; सने = सुगन्धित।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘प्रकृति चित्रण’ पाठ के ‘ऋतु वर्णन’ शीर्षक से उद्धृत है। इसके रचयिता कविवर सेनापति हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में बसन्त के आगमन का मनोहारी अंकन है।

व्याख्या :
बसन्त ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है। इसमें बसन्त ऋतु को राजा मानकर उसका वर्णन किया गया है। जिस प्रकार कोई राजा अपनी चतुरंगिणी सेना (हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल-ये चार प्रकार की चतुरंगिणी सेना) को लेकर प्रस्थान करता है, उसी प्रकार ऋतुराज बसन्त भी अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों को जो वन-उपवन में खिले हैं, लेकर उपस्थित हुआ है। तात्पर्य यह है कि बसन्त ऋतु में वन-उपवन में सर्वाधिक फूल खिलते हैं। जिस प्रकार राजाओं का गुणगान करने बन्दी, भाट, चारण उनकी विरुदावली गाते आगे-आगे चलते हैं, उसी प्रकार भ्रमर और कोकिल [जार और कुहू कुहू की ध्वनि कर रहे हैं, वे ऋतुराज बसन्त की अगवानी में मानो उसका यशोगान कर रहे हैं। जिस प्रकार राजा के आने पर सर्वत्र प्रसन्नता छा जाती है, उसी प्रकार ज्यों-ज्यों बसन्त ऋतु पास आने लगती है फूलों की सौंधी-सौंधी सुगन्ध से ऋतु ओत-प्रोत रहती है। कवि सेनापति कहते हैं कि यह शोभायात्रा सुख को सज्जित करती है अर्थात् सुख को और बढ़ाती है। ऐसी बसन्त रूपी राजा की शोभायात्रा अपने सभी साज-सज्जा से सुसज्जित होकर पृथ्वी पर पदार्पण कर रही है। बसन्त नहीं, वरन् बसन्त रूपी राजा ही मानो आ गया है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इस पद में सांगरूपक अलंकार है। सांगरूपक में उपमान के समस्त अंगों का आरोप उपमेय में होता है। यहाँ पर राजा उपमान है और बसन्त ऋतु उपमेय।
  2. वर्णों की आवृत्ति से छेकानुप्रास है।
  3. ‘स’ वर्ण की आवृत्ति से वृत्यानुप्रास है।
  4. व्यंजन शब्द-शक्ति है।
  5. माधुर्य शब्दगुण है। मनहरण कवित्त छन्द है।
  6. आलम्बन रूप में प्रकृति चित्रण है।
  7. ब्रजभाषा का सुन्दर प्रयोग है।

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[2] वृष कों तरनि तज सहसौं किरन करि,
ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं।
तचति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी
छाँह को पकरि पंथी पंछी बिरमत हैं।
‘सेनापति’ नैकुंदुपहरी के ढरत, होत
धमका विषम, ज्यौं न पात खरकत हैं।
मेरे जान पौनों सीरी ठौर को पकरि कोनों
घरी एक बैठि कहूँघामै बितवत हैं।।2।। (2009)

शब्दार्थ :
वृष राशि का एक नाम, वृषभ राशि; सहसौं = हजारों; तरनि= सूर्य; बिकराल = भयंकर; तचति-धरनि = पृथ्वी तप रही है; झरनि = ताप, गिराने वाली; सीरी = ठण्डी; पंथी = राहगीर; पंछी = पक्षी; बिरमत = विश्राम करना; नैकु = थोड़ी; धमका = उमस; विषम = भयानक; पात = पत्ते; खरकत = खटकना (हिलना); मेरे जान = मेरी समझ से; पौनों = हवा; घरी = क्षण; ठौर = स्थान; घामै = गर्मी; बितवत = बिताना, व्यतीत करना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने प्रस्तुत पद्यांश में ग्रीष्म ऋतु की भयंकरता का सजीव चित्रण किया है। साथ ही साथ जीव एवं दुनिया पर ग्रीष्म के ताप के भयंकर प्रभाव का सजीव चित्रण प्रस्तुत है।

व्याख्या :
यहाँ पर कवि सेनापति ग्रीष्म की प्रचण्ड गर्मी का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृष राशि पर सूर्य स्थित है। (ज्योतिष की मान्यता के अनुसार जब वृष राशि पर सूर्य आ जाता है तो भीषण गर्मी पड़ती है।) उसकी सहस्रों तेजस्वी किरणों के समूह से ऐसी भीषण गर्मी पड़ रही है, मानो भयंकर ज्वालाओं के जाल अर्थात् लपटों के समूह अग्नि की वर्षा कर रहे हों। पृथ्वी भी गर्मी की अधिकता से तप रही है। अग्नि की तीव्रता से संसार जल रहा है। यात्री और पक्षी ठण्डी छाया को ढूँढ़कर विश्राम करते हैं। सेनापति कहते हैं कि तनिक दोपहर ढलते ही विकराल गर्मी के कारण सन्नाटा हो जाता है कि पत्ता तक नहीं खड़कता, अर्थात् सर्वत्र सुनसान हो जाता है। कोई भी बाहर नहीं निकलता। ऐसी गर्मी में हवा भी नहीं चलती है कि कुछ शीतलता मिले। कवि कहते हैं कि मेरी समझ में तो हवा भी गर्मी से घबरा कर कोई ठण्डा-सा कोना ढूँढ़कर छिप गयी है और कहीं ऐसी जगह में गर्मी बिता रही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इस पद में कवि ग्रीष्म ऋतु की गर्मी की विकरालता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब वृष राशि पर सूर्य होता है तो उसकी तेजस्वी हजारों किरणों का समूह आग की लपटों के जाल की तरह भयंकर रूप से गर्मी बरसाता है।
  2. यहाँ अनुप्रास और उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग दृष्टव्य है। हवा का मानवीकरण है। कवित्त छन्द एवं भाषा ब्रजभाषा है।
  3. लक्षणा शब्द शक्ति है।
  4. प्रकृति का आलम्बन वर्णन है।

[3] दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की झमक अति घोर घनघोर तैं।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तैं।
‘सेनापति’ आवन कह्यो है मनभावन, सु।
लाग्यो तरसावन विरह जुर जोर तें।
आयो सखी सावन, मदन सरसावन
लाग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तैं ।।3।।

शब्दार्थ :
दामिनी दमक = बिजली की चमक; सुर = इन्द्रधनुष; कलापी = मयूर; हीतल = हृदय तल; मनभावन = प्रियतम कोकिला= कोयल; जित-तित = जहाँ-तहाँ; सीतल = ठण्डा; समीर = वायु; विरह-जुर = वियोगरूपी ज्वर (रूपक); मदन= कामदेव, काम-वासना को बढ़ाने वाला; बरसावन = बरसना; सलिल = पानी; चहुँ ओर = चारों तरफ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-महाकवि सेनापति ने वर्षा ऋतु का मनभावन चित्रण किया है।

व्याख्या :
यहाँ पर कवि सेनापति वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वर्षा के कारण विरहिणी नायिका अपनी सखी से कह रही है कि इस ऋतु में चारों ओर बिजली चमकने लगी है। इन्द्रधनुष चमक रहे हैं, काली घटाएँ जोर से गर्जन कर रही हैं। घनघोर घटाएँ छाई हैं। कोयल और मयूर इधर-उधर सुन्दर वाणी में कूजन कर रहे हैं। हृदयस्थल हवा के झोंकों से शीतल है। कवि सेनापति नायिका के विरह का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मनभावन प्रियतम वर्षा प्रारम्भ होने के पूर्व आने के लिए कह गये थे, पर अभी तक नहीं आए। अत: उनके न आने से विरह-ताप जोर से बढ़ गया है और मन को व्याकुल करने लगा है। एक सखी दूसरी से कहती है-हे सखि ! विरह के दुःख को और बढ़ाने वाला सावन चारों ओर से जल बरसाने लगा है। प्रकृति में तो वर्षा हो रही है जो मेरी कामवासना को उदीप्त कर रही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इसमें सभंग यमक का प्रयोग हुआ है। ‘सावन’ शब्द पद-भंग से बार-बार भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है।
  2. इसमें प्रकृति को उद्दीपन के रूप में चित्रित किया गया है।

[4] पाउस निकास तारौं पायो अवकास, भयो
जोन्ह कौं प्रकास, सोभा ससि रमनीय कौं।
विमल अकास, होत वारिज विकास, सेना
पति फूले कास, हित हंसन के हीय कौं।
छिति न गरद, मानो रँगे हैं हरद सालि
सोहत जरद, को मिलावै हरि पीय कौं।
मत्त है दुरद, मिट्यौ खंजन दरद, रितु
. आई है सरद सुखदाई सब जीय कौं ।।4।।

शब्दार्थ :
पाउस = पावस, वर्षा ऋतु; अवकाश = छुटकारा; जोन्ह = चाँदनी; ससि = चन्द्रमा (शशि); रमनीय = रमणीय, मनोहर; विमल = निर्मल; वारिज = कमल; हीय = हृदय; छिति = पृथ्वी; गरद = धूल; हरद = हल्दी; सालि = धान; जरद = पीला; मत्त = मस्त, प्रसन्न; दुरद = द्विरद, हाथी; दरद = दर्द, पीड़ा; जीय = जीव।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
वर्षा के बाद शरद ऋतु आती है। वर्षा की गन्दगी, अंधेरापन आदि से मुक्त शरद बड़ी सुखदाई होती है। यहाँ शरद का बड़ा मनोहारी अंकन हुआ है।

व्याख्या :
वर्षा ऋतु निकल गयी है उसके जाने से वर्षा के कारण होने वाले अन्धकार, गन्दगी आदि से छुटकारा मिल गया है। स्वच्छ आकाश में चारों ओर निर्मल चाँदनी प्रकाश फैल गया है और अपनी पूरी आभा से आलोकित मनोहारी चन्द्रमा बड़ा शोभायमान लग रहा है। बादलों के न होने के कारण आकाश निर्मल दिखाई दे रहा है। कमल प्रफुल्लित हो रहे हैं। कविवर सेनापति कहते हैं कि चारों ओर श्वेत पुष्पों वाले कास फूले हुए। इससे हंसों के हृदय में बड़ी प्रसन्नता हो रही है। वर्षा में जो हंस पर्वतों की ओर चले गये थे, अब वे प्रसन्न होते हुए इस मनोरम वातावरण को और सुन्दर बना रहे हैं।

धरती पर धूल नहीं छाई है। चारों ओर पीली-पीली धान पकी फसलों को देखकर ऐसा लगता है मानो उन्हें हल्दी से रंगकर पीला कर दिया हो। विरहिणी नायिका कहती है कि इस प्रकार की उत्तेजक ऋतु में मेरे प्रियतम को कौन बुलाए। मादक बना देने वाली उस शरद ऋतु में हाथी मदमस्त हो रहे हैं। गर्मी से दुःखी होकर पलायन कर गये खंजन पक्षियों की पीड़ा मिट गयी है। अब वे अपने देश में लौट आये हैं। इस प्रकार सभी जीवों को सुख देने वाली शरद ऋतु आ गई है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इसमें शरद ऋतु के सुखद आगमन का चित्रण हुआ है जिसमें धरती, आकाश सभी में निर्मलता, मनोरमता छाई है।
  2. अनुप्रास, उत्प्रेक्षा अलंकारों तथा पद-मैत्री की छटा अवलोकनीय है।
  3. प्रकृति का उद्दीपन रूप में अंकन हुआ है।

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[5] सिसिर में ससि को सरूप पावै सविताऊ,
घाम हूँ में चाँदनी की दुति दमकति है।
सेनापति होत सीतलता है सहस गुनी,
रजनी की झाँई वासर में झलकति है।
चाहत चकोर सूर और दृग छोर करि,
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।
चंद के भरम होय मोद है कुमोदिनी को,
ससि संक पंकजिनी फूलि न सकति है ।।5।।

शब्दार्थ :
सिसिर = (शिशिर) शीत ऋतु; सविताऊ = सूर्य भी; घाम = धूप; दुति = चमक; दमकति = चमकती; सहस गुमी = हजारों गुनी, बहुत अधिक; झाँई = छाया; वासर = दिन; धसकति = दिल बैठ जाना, निराशा, नीचे की ओर धंसना; मोद = आनन्द; संक= सन्देह; पंकजिनी = कमलिनी; ससि = चन्द्रमा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में शीत ऋतु की सजीव झाँकी प्रस्तुत की गयी है। साथ ही शिशिर के प्रभाव का मर्मस्पर्शी चित्रण है।

व्याख्या :
शिशिर ऋतु में ठण्ड बढ़ जाती है और वातावरण में इतनी अधिक शीतलता . होती है कि सूर्य भी चन्द्रमा का रूप धारण कर लेता है अर्थात् चन्द्रमा के समान शीतल लगता है। धूप भी चाँदनी की चमक प्रतीत होती है (धूप भी चाँदनी के समान लगती है)। सेनापति कहते हैं कि ठण्ड हजार गुनी बढ़ जाती है और दिन में भी रात की झलक दिखती है (सूर्य के तेज रहित होने के कारण दिन में रात की झलक दिख पड़ती है। दिन भी रात की तरह शीतल है।)

चकोर पक्षी यद्यपि चाँद का प्रेमी होता है, पर शिशिर में वह भी सूर्य की ओर अपलक दृष्टि से देखे जा रहा है। चक्रवाक पक्षी रातभर अपनी चकवी से बिछुड़ कर रहता है। शिशिर में दिन में जब रात का भ्रम होता है तो चक्रवाक पक्षी का दिल बैठने लगता है कि कहीं रात तो नहीं हो गयी और उसका धीरज छूटने लगता है। चन्द्रमा के भ्रमवश कुमुदिनी अत्यन्त प्रसन्न होती है। (वह दिन में भी सूर्य को शीतलता के कारण चाँद समझ बैठती है।) लेकिन चन्द्रमा की शंका में पड़कर कमलिनी दिन में भी विकसित नहीं हो पा रही है।

काव्य सौन्दर्य :
इस पद में इन कवि सत्यों का प्रयोग किया गया है-

  1. चकोर पक्षी चन्द्रमा को एकटक देखता है।
  2. चक्रवाक पक्षी अपनी चकवी से रात भर मिल नहीं पाता, अतः रोता रहता है। सफेद रंग की कुमुदिनी चन्द्रविकासी है; अतः रात में ही खिलती है।
  3. लाल रंग का पंकज (अरविन्द) सूर्यविकासी होता है, अतएव दिन में खिलता है। अलंकार भ्रान्तिमान, अतिशयोक्ति, सन्देह तथा अनुप्रास अलंकार का प्रयोग सहज ही हो गया है।
  4. रस-शृंगार।

नौका विहार भाव सारांश

छायावाद के प्रतिनिधि कवि सुमित्रानन्दन पन्त की ‘नौका विहार’ कविता में प्रकृति के कोमलकान्त स्वरूप का अंकन हुआ है। काला कांकर के राजभवन में निवास करते समय एक चाँदनी रात में पास ही बह रही गंगा में कवि नौका विहार करते हैं। उसी का भावात्मक अंकन इस कविता में है।

शान्त, प्रिय एवं स्निग्ध, चाँदनी से आलोकित रमणीय वातावरण में आकाश और धरती मग्न होकर सौन्दर्य का अवलोकन कर रहे हैं। इस मनोहारी वातावरण में क्षीणकाय गंगा चाँदनी से दूध के समान श्वेत बालू की सेज पर स्थिर भाव से लेटी है। उसकी हथेलियाँ चमत्कृत हैं। तापस वाला के समान निर्मल गंगा के हृदय पर तरंगों की छायारूपी बाल लहरा रहे हैं। गंगा के जल में आकाश का नीला प्रतिबिम्ब आँचल सा लग रहा है।

इस प्रकार की चाँदनी रात्रि के पहले प्रहर में कवि गंगा में नौका विहार को निकल पड़ते हैं। छोटी नौका गंगा की धारा में तैरने लगती है। काला कांकर का राजभवन गंगा के जल में प्रतिबिम्बित होता हुआ ऐसा जान पड़ता है मानो वह समग्र वैभव को समेटे हुए निश्चित भाव से सो रहा हो। आकाश के तारे पानी की लहरों में हिलते से दिख रहे हैं। तारों और चाँदनी की विविध छटाएँ जल की तरंगों में उभर रही हैं। दशमी का चन्द्रमा लहरों के घूघट से तिरछी दृष्टि से देख रहा है।

तैरती हुई नौका जब गंगा के मध्य में पहुंची तो दोनों किनारों को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा कि मानो वे दो बाँहें हैं जो गंगा को अपने आलिंगन में कस लेना चाहती हैं। धारा के बीच एक छोटा-सा द्वीप है जो लहरों के प्रवाह को रोक रहा है। वह शान्त द्वीप चाँदनी रात में माँ की छाती से चिपककर सोए बच्चे जैसा लगता है। प्रिया चकवी से बिछुड़ा चकवा पानी में अपनी ही परछाईं देखकर चकवी समझ बैठता है और उसे पकड़ने को दौड़ पड़ता है।

पतवार घुमाने पर नाव विपरीत धारा में घूम गई जिससे श्वेत बुलबुले उठने लगे। उन्हें देखकर लगा कि मानो तारों का हार बिखर गया है या तरंगों रूपी लताएँ खिल रही हैं अथवा सैकड़ों-सैकड़ों चन्द्रमा एवं तारे झिलमिला रहे हैं। जैसे-जैसे नाव किनारे पर आने लगी वैसे-वैसे ही रहस्य उजागर होता है कि गंगा की धारा के समान ही यह जीवन शाश्वत है। प्रमाणित हो गया कि जन्म-मृत्यु के आर-पार आत्मा अमर है। इस प्रकार जीवन सम्बन्धी दर्शन के साथ कविता समाप्त होती है।

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नौका विहार संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] शान्त, स्निग्ध, ज्योत्सना, उज्ज्वल।
अपलक अनन्त, नीरव भूतल।
सैकत शैया पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल
लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल
तापस बाला गंगा निर्मल, शशि, मुख से दीपित मृदु करतल,
लहरे उर पर कोमल कुन्तल।
गोरे अंगों पर सिहर सिहर लहराता तार तरल सुन्दर,
चंचल अंचल सा नीलाम्बर
साड़ी की सिकुड़न सी जिस पर, शशि की रेशमा विभा से भर,
सिमटी है वर्तुल, मृदुल लहर। (2013)

शब्दार्थ :
स्निग्ध = चिकनी, स्नेह युक्त; ज्योत्सना = चाँदनी; अपलक = बिना पलक झपके अनन्त = आकाश; नीरव = शान्त; सैकत शैया = बालू की सेज; धवल = सफेद; तन्वंगी= दुबली-पतली; विरल = पतली; श्रान्त = शान्त क्लान्त = थकी हुई; तापस बाला = तपस्वी की कन्या; दीपित = प्रकाशित; कुन्तल = बाल; नीलाम्बर = नीला आकाश; विभा = कान्ति; वर्तुल = गोलाकार, चक्राकार।

सन्दर्भ :
यह पद्यांश प्रकृति के कुशल चितेरे तथा श्रेष्ठ विचारक श्री सुमित्रानन्दन पन्त की ‘नौका विहार’ कविता से अवतरित किया गया है।

प्रसंग :
इस पद्यांश में नौका विहार प्रारम्भ करने से पूर्व श्वेत चाँदनी से चमत्कृत क्षीण धारा वाली गंगा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
शान्त, प्रिय तथा चिकनी, श्वेत चाँदनी चारों ओर फैली है। इस रम्य वातावरण को आकाश बिना पलकें झपके निहार रहा है तथा पृथ्वी शान्त भाव से दत्तचित्त होकर देख रही है।

इस प्रकार के शान्त तथा मनोहारी वातावरण में गर्मी के कारण दुबली-पतली हो, क्षीणकाय गंगा बालू की दूध के समान श्वेत सेज पर शान्त, थकी हुई तथा स्थिर भाव से लेटी हुई है। तपस्वी कन्या जैसी पवित्र गंगा की कोमल हथेलियाँ चन्द्रमा की चाँदनी से चमत्कृत हो रही हैं। उस गौर वर्ण वाली गंगा रूपी बाला के हृदय पर लहरों की छाया रूपी कोमल बाल लहरा रहे हैं। श्वेत जल युक्त गंगा गौर वर्ण वाली सुन्दरी है। उसके श्वेत जल में प्रतिबिम्बित होता हुआ नीला आकाश लहरों के कारण आँचल के समान लहरा रहा है।

वह गंगा के शरीर को छूकर सिहरन का अनुभव करता है और तार-तार की तरह तरल होकर चंचल बना हुआ है। भाव यह है कि आकाश की गंगाजल में पड़ने वाली परछाईं लहरों से चमत्कृत तथा विच्छिन्न-सी दिखायी देने लगी है। यह पानी में लहराता आकाश के प्रतिबिम्ब गंगारूपी नायिका का आँचल जैसा प्रतीत होता है। उस पर गंगाजल की गोल आकाश वाली लहरें चन्द्रमा की रेशमी कान्ति से भर कर साड़ी की सिकुड़नों की तरह सिमटी हुई हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ग्रीष्म ऋतु में पतली धार वाली गंगा का चाँदनी से प्रकाशित रात्रि में सुन्दर दृश्य अंकित किया है।
  2. छायावादी प्रवृत्तियों के अनुपम सौन्दर्य का सूक्ष्म चित्रण हुआ है।
  3. मानवीकरण, उपमा, पुनरुक्तिप्रकाश आदि अलंकारों का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  4. कोमलकान्त पदावली से युक्त भावानुरूप भाषा का प्रयोग किया गया है।

[2] चाँदनी रात का प्रथम प्रहर,
हम चले नाव लेकर सत्वर
सिकता की सस्पित सीपी पर, मोती की ज्योत्सना रही विचर,
लो, पालें चढ़ी, उछा लंगर
मृदु मन्द-मन्द मन्थर-मन्थर, लघु तरणि हंसनि सी सुन्दर,
तिर रही खोल पालों के पर
निश्चल जल के शुचि दर्पण पर, बिंबित हो रजत पुलिन निर्भर,
दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर
कालाकांकर का राजभवन, सोया जल में निश्चित प्रमन,
पलकों पर वैभव स्वप्न सघन।

शब्दार्थ :
सत्वर = शीघ्र; सिकता = रेती, बालू; सस्पित = मुस्कराती; ज्योत्सना = चाँदनी; मन्थर-मन्थर = धीरे-धीरे; तरणि = नौका; पर = पंख; निश्चल = शान्त; रजत = चाँदी; पुलिन = किनारे; प्रमन = प्रसन्न मन; वैभव-स्वप्न = वैभव भरे सपने।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में नौका-विहार के मनोरम दृश्यों का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
चाँदनी रात्रि का प्रथम प्रहर है। हम नौका विहार के लिए नाव लेकर शीघ्र ही चल दिये हैं। गंगा नदी की रेती पर चाँदनी इस प्रकार चमक रही है कि मानो मुस्कराती हुई खुली सीपी पर मोती चमक रहा हो। इस प्रकार की रमणीय बेला में नाव के पाल नौका विहार हेतु चढ़ा दिये गये और लंगर उठा लिया है। फलस्वरूप हमारी छोटी सी नाव एक सुन्दर हंसिनी की तरह मन्द-मन्द, मंथर पालों रूपी पंख खोलकर गंगा की सतह पर तैरने लगी है। गंगा के शान्त तथा निर्मल जल रूपी दर्पण पर प्रतिबिम्बित चाँदनी से चमकते श्वेत तट एक क्षण के लिए दोहरे ऊँचे प्रतीत होते हैं। गंगा के तट पर स्थित कालाकांकर का राजभवन जल में प्रतिबिम्बित होता हुआ इस प्रकार का प्रतीत हो रहा है मानो वैभव के अनेक स्वप्न संजाए निश्चित भाव से सो रहा हो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. नौका विहार के समय जल में प्रतिबिम्बित तटों तथा राजभवन का रमणीय वर्णन हुआ है।
  2. शान्त रस की नियोजना तथा प्रसाद गुण एवं उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास आदि अलंकारों की शोभा अवलोकनीय है।
  3. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

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[3] नौका में उठती जल हिलोर,
हिल पड़ते नभ के ओर- छोर
विस्फारित नयनों से निश्चल, कुछ खोज रहे चल तारक दल,
ज्योतित करनभ का अंतस्तल, जिनके लघु दीपों को चंचल,
अंचल की ओट किए अविरल,
फिरती लहरें लुक छिप पल पल।
सामने शुक्र की छवि झलमल, तैरती परी सी जल में कल,
रुपहरे कचों में हो ओझल।
लहरों के घूघट से झुक झुक, दशमी का शशि निज तिर्यकमुख,
दिखलाता, मुग्धा सा रुक रुक।

शब्दार्थ :
विस्फारित = पूर्णतः खुले अविरल = निरन्तर; शुक्र = शुक्र नाम का तारा; कल=सुन्दर; रुपहरे = चाँदी के कचों = बालों; तिर्यक = तिरछा, टेढा; मुग्धा = प्रेम की प्रथम अनुभूति में मग्न नायिका।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात में गंगा के चंचल जल में प्रतिबिम्बित तारों और चन्द्रमा का सौन्दर्य चित्रित किया है।

व्याख्या :
नौका चलने से हिलोर उठने के कारण गंगा के जल में प्रतिबिम्बित होते हुए तारे हिलने लगते हैं। वे चंचल तारे अपने नेत्र फाड़कर अपलक निहारते हुए, जल में प्रतिबिम्बित आकाश के हृदय को प्रकाशित करके कुछ खोजते से जान पड़ते हैं। उनके साथ ही नन्हें-नन्हें से दीपक लिए हुए निरन्तर उन (तारों) को अपने अंचल की ओट में छिपाये हुए चंचल लहरें हर पल लुकती-छिपतो फिर रही हैं।

सामने ही जल में तेज चमकते हुए शुक्र तारे की झिलमिलाती हुई छवि दिखायी देती है। वह जल में परी के समान तैरती हुई सुन्दर लगती है जो कभी अचानक ही अपने चाँदी जैसे लहराते श्वेत बालों (चाँदनी) में चमचमाती लहरों में छिपकर दृष्टि से ओझल हो जाती है। आज दशमी है। दशमी का चन्द्रमा-उसका प्रतिबिम्ब किसी मुग्धा नायिका के समान लहरों के चूंघट से अपना टेढ़ा मुँह थोड़ी-थोड़ी देर में रुक-रुककर दिखाता जाता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जल में प्रतिबिम्बित तारों, शुक्र की झिलमिलाहट और दशमी के चन्द्रमा के गतिशील चित्र इन पंक्तियों में अंकित हुए हैं।
  2. कोमलकान्त पदावली से युक्त पन्त की भाषा में यहाँ अद्भुत संगीतात्मकता आ गयी
  3. अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, उत्प्रेक्षा, उपमा, मानवीकरण आदि अलंकारों का सौन्दर्य देखते ही बनता है।
  4. अन्तिम पंक्ति में लहरों की ओट से झाँकते चन्द्रमा के लिए ‘यूंघट’ से टेढ़ा मुख दिखलाती ‘मुग्धा नायिका’ का उपमान बड़ा ही सटीक बन पड़ा है।

[4] अब पहुँची चपला बीच धार, छिप गया चाँदनी का कगार।
दो बाहों से दूरस्थ तीर, धारा का कृश कोमल शरीर।
आलिंगन करने को अधीर।
अति दूर क्षितिज पर विटफ् माल, लगती भू-रेखा सी अराल,
अपलक नभ नील नयन विशाल,
माँ के उर पर शिशु सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप,
उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,
वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरल शोक?
छाया की कोकी को विलोक।

शब्दार्थ :
चपला = चंचल नौका; दूरस्थ = दूरी पर स्थित; कृश = दुबला-पतला; विटप-माल – वृक्षों की पंक्ति; भू-रेखा = भौंह; अराल = टेढ़ी; उर्मिल = लहरों से युक्त; प्रतीप = उल्टा; कोक = चकवा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यावतरण में चाँदनी रात में गंगा नदी की बीच धारा में नौका-विहार के समय की प्राकृतिक सुषमा को चित्रित किया गया है।

व्याख्या :
जब चंचल नौका गंगा की बीच धारा में पहुँची तो चाँदनी में चाँद-सा चमकता हुआ रेतीला कगार हमारी दृष्टि से ओझल हो गया। मैंने देखा कि गंगा के दूर-दूर तक स्थित तट फैली हुई दो बाँहों के समान लग रहे हैं, जो गंगा धारा के दुबले-पतले कोमल-कोमल नारी के शरीर का आलिंगन करने (अपने में भरकर कस लेने) के लिए अधीर हैं और उधर, बहुत दूर क्षितिज पर वृक्षों की पंक्ति है। वह पंक्ति धरती के सौन्दर्य को अपलक (बिना पलक झपकाये) निहारते हुए आकाश के नीले-नीले विशाल नयन की तिरछी भौंह के समान प्रतीत हो रही है।

पास की धारा के बीच एक छोटा-सा द्वीप है; जो लहरों वाले प्रवाह को रोककर उलट देता है। धारा में स्थित वही शान्त द्वीप चाँदनी रात में माँ की छाती पर चिपककर सो गये नन्हें बच्चे जैसा लग रहा है। और वह उड़ता हुआ.पक्षी कौन है? क्या वह अपनी प्रिया चकवी से रात्रि में बिछड़ा हुआ व्याकुल चकवा तो नहीं है? शायद वही है, जो जल में पड़े हुए प्रतिबिम्ब को देखकर उसे चकवी समझा बैठा है और विरह दुःख मिटाने के लिए उससे मिलन हेतु उड़ रहा है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. तटों के मध्य क्षीण धारा हुए क्षितिज पर स्थित वृक्ष पंक्ति, गहरे नीले आकाश, द्वीप, उड़ता चकवा आदि का सजीव अंकन हुआ है।
  2. उपमा, रूपक, मानवीकरण, भ्रान्तिमान अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  3. माधुर्य गुण तथा संस्कृतनिष्ठ भाषा।

[5] पतवार घुमा अब प्रतनु भार। नौका घूमी विपरीत धार।
डांडों के चल करतल पसार,
भर-भर मुक्ताफल फेन स्फार, बिखराती जल में तार हार।
चाँदी के साँपों की रलमल, नाचती रश्मियाँ जल में चल,
रेखाओं सी खिंच तरल तरल।
लहरों की लतिकाओं में खिल, सौ-सौ शशि, सौ-सौ उ झिलमिल।
फैले फूले जल में फेनिल।
अब उथला सरिता का प्रवाह, लग्गी से ले ले सहज थाह।
हम बढ़े घाट को सहोत्साह!

शब्दार्थ :
प्रतनु = अत्यन्त क्षीण; करतल = हथेली; मुक्ताफल = मोती; फेन-स्फार = बुलबुले, झाग; रलमल = चमकती; रश्मियाँ = किरणें; उडै = तारे; लग्गी = बाँस; सहोत्साह = उत्साहपूर्वक।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में चाँदनी रात में नौका विहार के समय के मनोरम दृश्यों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
जब हमने पतवार को घुमाया तो हल्की नौका धारा की विपरीत दिशा में घूम गयी और लौटने लगी। ऐसी स्थिति में हमने डाण्डों रूपी हथेलियों को फैलाया तो गंगा के जल में श्वेत बुलबुले उठने लगे। उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो तारों का हार पानी में बिखरकर चारों ओर फैल गया है। गंगा जल में नाचती लहरें व्याप्त चाँदनी में ऐसी प्रतीत हो रही थीं, मानो चाँदी के साँप तैर रहे हों। चारों ओर फैले झागदार गंगा जल में लहरें रूपी लताएँ खिल रही हैं। वे ऐसी लगती थीं मानो सैकड़ों-सैकड़ों चन्द्रमा, सैकड़ों-सैकड़ों तारे झिलमिला रहे हों। अब नदी का प्रवाह कम हो गया है, पानी की गहराई कम हो गयी है, इसलिए हम लग्गी से उसकी थाह लेते हुए उत्साहपूर्वक घाट की ओर बढ़ दिये हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जल में उठते बुलबुले तथा पानी की लहरों का चाँदनी रात्रि में जो सौन्दर्य बढ़ गया है; उसका रमणीय चित्रण यहाँ हुआ है।
  2. नौका विहार के बंदलते विविध रूपों की साकार अभिव्यक्ति हुई है।
  3. उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण तथा अनुप्रास अलंकारों की छटा अवलोकनीय
  4. भाव के अनुरूप साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

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[6] ज्यों ज्यों लगती है नाव पार, उर में आलोकित शत विचार
.इस धारा-सा ही जग का क्रम,
शाश्वत इस जीवन का उद्गम,
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम
शाश्वत नभ का नीला विकास,
शाश्वत शशि का यह रजत हास
शाश्वत लघु लहरों का विलास,
हे जग-जीवन के कर्णधार !
चिर जन्म मरण के आर-पार, शाश्वत जीवन नौका विहार,
मैं भूल गया अस्तित्वज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण,
करता मुझको अमरत्व दान। (2008)

शब्दार्थ :
आलोकित = चमत्कृत; शत = सैकड़ों;शाश्वत = सनातन, चिरन्तन; उद्गम = प्रारम्भ, उत्पत्ति; संगम = मिलन; विलास = क्रीड़ा, विहार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में समस्त संसार की सतत् प्रवाहवान धारा के समान और जीवन को नौका विहार के रूप में अंकित किया गया है।

व्याख्या :
जैसे-जैसे नाव किनारे पर आती जा रही है, वैसे ही वैसे मेरे मन में विविध प्रकार के सैकड़ों विचार उठ रहे हैं। मैं सोच रहा हूँ कि इस जग का निरन्तर गतिवान क्रम भी इस (नदी की) धारा के समान ही चलता रहने वाला है। गंगा की इस धारा के जल (जीवन) की तरह ही इस जीवन की उत्पत्ति सनातन है। इसकी गति भी चिरन्तन है। इस जगत की धारा के साथ जीवन का संयोग (मिलन) भी शाश्वत है। नीले प्रकाश की विविध क्रीड़ाएँ भी कभी समाप्त नहीं होती हैं। चन्द्रमा की चाँदी के समान हँसी भी अनन्त है तथा छोटी-छोटी लहरों की (मनोरम) क्रीड़ाएँ भी नित्य हैं, अनन्त हैं।

हे संसाररूपी जीवन धारा के नाविक (जीवन की नौका खेने वाले) परमात्मा ! मैं तो अनुभव करता हूँ कि इस नित्य जन्म तथा मरण के आर-पार (इस ओर, उस ओर तथा सभी ओर) इस जीवनरूपी नौका का विहार नित्य है। इस विचारशील अवस्था में मैं अपने अस्तित्व (विद्यमानता) का ज्ञान ही भूल गया हूँ। मुझे स्वयं की विद्यमानता का बोध नहीं है। इस धारा के रूप में मैंने जीवन का चिरन्तन प्रमाण प्राप्त कर लिया है। इस प्रमाण ने मुझे अमरता प्रदान कर दी है। मुझे अनुभव हो रहा है कि मृत्यु तथा जन्म के आर-पार मैं अमर हूँ, मैं कभी समाप्त नहीं हूँगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. कवि ने गंगा की धारा तथा नौका विहार के द्वारा जगत तथा जीवन के सतत् संयोग तथा चिरन्तनता का प्रतिपादन किया है।
  2. यहाँ दार्शनिक चिन्तन की प्रधानता है।
  3. भावानुरूप शुद्ध तथा साहित्यिक भाषा अपनायी है।
  4. उपमा, रूपक, अनुप्रास, रूपकातिशयोक्ति अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 2 शिरीष के फूल

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 2 शिरीष के फूल

शिरीष के फूल अभ्यास

शिरीष के फूल अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिरीष किस ऋतु में फूलता है?
उत्तर:
शिरीष जेठ मास की तपती धूप में फलता-फूलता है।

प्रश्न 2.
शिरीष की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
शिरीष की तुलना अद्भुत अवधूत से की गई है।

प्रश्न 3.
शिरीष अपना पोषण कहाँ से प्राप्त करता है? (2017)
उत्तर:
शिरीष अपना पोषण वायुमण्डल से रस खींचकर प्राप्त करता है।

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शिरीष के फूल लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“शिरीष निर्धात फलता रहता है।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा है? (2014)
उत्तर:
शिरीष जेठ मासं की गर्मी में तो फलता-फूलता ही है बसन्त के आगमन के साथ लहक उठता है। आषाढ़ में मस्ती से भरा रहता है। यदि इच्छा हुई एवं मन रम गया तो भरे भादों में भी बेरोक-टोक फूलता रहता है। इसी कारण लेखक ने शिरीष निर्धात फूलता है, कहा है।

प्रश्न 2.
किन परिस्थितियों में शिरीष जीवन जीता है?
उत्तर:
चाहे जेठ की चिलचिलाती धूप हो, चाहे पृथ्वी धुयें से रहित अग्नि कुण्ड बनी हो; शिरीष नीचे से ऊपर तक फूल से लदा रहता है। बहुत ही कम पुष्प इस प्रकार की तपती दुपहरी में फूल सकने का साहस जुटा पाते हैं। अमलतास भी शिरीष की तुलना नहीं कर सकता है। इस प्रकार विषम परिस्थितियों में भी शिरीष जीवन जीता है।

प्रश्न 3.
लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना किससे की है और क्यों ? लेखक के अनुरूप शिरीष के फूलों की क्या प्रकृति है?
उत्तर:
लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना कालजयी अवधूत से की है क्योंकि अवधूत की भाँति ही यह हर परिस्थिति में मस्त रहकर जीवन की अजेयता का सन्देश देता है। शिरीष का फूल एक अवधूत की भाँति दुःख एवं सुख में समान रूप से स्थिर रहकर कभी पराजय स्वीकार नहीं करता है। उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं है। धरती एवं आसमान के जलते रहने पर भी यह अपना रस खींचता ही रहता है।

प्रश्न 4.
शिरीष के फूलों के सम्बन्ध में तुलसीदास जी का क्या कथन है?
उत्तर:
शिरीष के फूलों के सम्बन्ध में तुलसीदास जी ने कहा है-“धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना’ अर्थात् जो फूल फलता है वही अवश्य कुम्हलाकर झड़ जाता है। कुम्हलाने के पश्चात पुनः विकसित हो जाता है।

प्रश्न 5.
लेखक ने शिरीष के सम्बन्ध में किन-किन विद्वानों के नाम बताये हैं?
उत्तर:
लेखक ने शिरीष के सम्बन्ध में कालिदास, कबीरदास, तुलसीदास तथा आधुनिक काल में अनासक्ति सुमित्रानन्दन पंत एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि विद्वानों के नामों का उल्लेख किया है।

प्रश्न 6.
शिरीष और अमलतास में क्या अन्तर है?
उत्तर:
शिरीष का फूल हर मौसम में फलता फूलता है जबकि अमलतास मात्र पन्द्रह-बीस दिन के लिए फूलता है। बसन्त ऋतु के पलाश पुष्प की भाँति शिरीष का फूल कालजयी एवं अजेय है इस कारण इसकी तुलना अमलतास से नहीं की जा सकती है।

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शिरीष के फूल दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं। इस वाक्य पर अपने भाव अभिव्यक्त कीजिए।
उत्तर:
जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु ये दोनों ही संसार के चिरपरिचित एवं कटु सत्य हैं। यह तथ्य पूर्णतः सिद्ध एवं प्रामाणिक है। इसका उल्लेख गीता में भी है। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है। मृत्यु के उपरान्त जीव काया रूपी पुराने वस्त्र को त्याग नवीन शरीर धारण करता है। यह क्रम शाश्वत है। किसी कवि ने इस तथ्य को निम्नवत् व्यक्त किया है, देखिए-
“आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर”
कोई हाथी चढ़ चल रहा कोई बना जंजीर।”

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि जरा एवं मृत्यु ये दोनों ही तथ्य सत्य हैं इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस तथ्य को तुलसीदास ने भी स्वीकारा है।

प्रश्न 2.
लेखक ने कबीर की तुलना शिरीष से क्यों की है? समझाइए। (2009)
उत्तर:
लेखक ने कबीर की तुलना शिरीष से इसलिए की है क्योंकि जिस प्रकार शिरीष का फूल चाहे गर्मी हो, बरसात हो, बसन्त हो अथवा ग्रीष्म ऋतु की लू के भयंकर थपेड़े हों वह हर दशा में फलता-फूलता है तथा झूम-झूम कर अपनी प्रसन्नता को निरन्तर व्यक्त करता है। शिरीष पर सर्दी, गर्मी, धूप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

जिस प्रकार कबीर अनासक्त योगी थे एवं मस्त-मौजा प्रवृत्ति के संत थे। निन्दा, अपमान अथवा प्रशंसा का उन पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। जैसा कि कबीर के निम्न कथन से यह सत्य उजागर होता है-
“कबिरा खड़ा बाजार में लिए लकुटिया हाथ।
जो घर फूंकै आपनो चलै हमारे साथ।।”

लेखक ने शिरीष के फूल को कबीर की भाँति मस्त-मौला एवं मनमौजी प्रवृत्ति का पाया इसी कारण उन्होंने शिरीष की तुलना कबीर से की है और इसे कालजयी एवं अनासक्त अवधूत की संज्ञा प्रदान की।

प्रश्न 3.
कालिदास को अनासक्त योगी क्यों कहा गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कालिदास को अनासक्त योगी इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्हें सम्मान की तनिक भी लालसा नहीं थी। वे सत्ता एवं अधिकार लिप्सा के घोर विरोधी थे। ऐसे व्यक्ति भविष्य में आने वाली पीढ़ी की उपेक्षा को भी सहन कर लेते थे। कालिदास ने अपने शृंगारिक वर्णन में अनासक्त भाव का भली प्रकार विवेचन किया है। वे स्थित प्रज्ञ एवं अनासक्त योगी बनकर कवि सम्राट के आसन पर प्रतिष्ठित हुए। अन्त में कहा जा सकता है जिस प्रकार शिरीष का फूल हर विषम परिस्थिति में फूलता-फलता एवं मुस्कुराता रहता है उसी प्रकार कालिदास भी विषम परिस्थूिति में प्रसन्नतापूर्वक अनासक्त योगी की भाँति अविचल खड़े रहते थे। वास्तव में कालिदास एक सच्चे योगी थे।

प्रश्न 4.
शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। इस वाक्य के सन्दर्भ में अपने भाव लिखिए। (2008, 09)
उत्तर:
शिरीष का फूल एक अवधूत के समान चाहे दुःख की आँधी हो अथवा सुख की चाँदनी हो वह हर परिस्थिति को समान रूप से ग्रहण करता है। दुःख में कभी हताश नहीं होता तथा सुख में कभी इठलाता नहीं है। वह समान रूप से जीवन जीता है। पराजय स्वीकार करना तो वह जानता नहीं है क्योंकि उसकी धारणा है कि “गति ही जीवन है तथा निष्क्रियता घोर मरण है।”

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि शिरीष एक अद्भुत अवधूत की तरह सब कुछ सहन करने के लिए अटल होकर अपने स्थान पर प्रसन्नता से झूमता रहता है। ऋतुओं का क्रम उसको तनिक भी प्रभावित नहीं करता। उसने तो हर परिस्थिति में अवधूत की भाँति मस्त रहना सीखा है। जिस प्रकार अवधूत को सांसारिक भोगों की लिप्सा नहीं रहती है उसी प्रकार शिरीष को भी सर्दी, गर्मी, धूप, छाया की परवाह नहीं रहती है। “प्रसन्नता ही जीवन है”, यही उसके जीवन का मूलमन्त्र है।

प्रश्न 5.
शिरीष जीवन में किस गुण का प्रचार करता है? (2013)
उत्तर:
शिरीष जीवन में इस गुण का प्रचार करता है कि दुनिया के मानव दुःख आने पर क्यों आहें भरता है तथा सुख आने पर गर्व से झूम उठता है। सुख एवं दुःख तो क्रम से आते-जाते रहते हैं। जो मनुष्य आज दुःख की चट्टान के तले दबकर सिसकियाँ ले रहा है कल उसी के कंठ से सुख के स्वर ध्वनित होंगे। इस प्रकार से शिरीष का फूल जीवन में हमें निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सत्ता के मोह और अधिकार के प्रति हम लिप्त न रहें। यह उसका एकमात्र सन्देश है।

जो मानव निरन्तर सत्ता के प्रति लोलुप रहता है, उसका पराभव निश्चित है। धैर्य, साहस एवं तटस्थता जीवन के अपेक्षित गुण हैं जो व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर आरूढ़ करते हैं। शिरीष इन्हीं गुणों का परिचायक है।

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शिरीष के फूल भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों और लोकोक्तियों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
डटे रहना, आँख बचाना, हार न मानना, आँच न आना, न ऊधो का लेना न माधो का देना।
उत्तर:
प्रयोग : (1) डटे रहना – हमें हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य पालन के प्रति डटे रहना चाहिए।
(2) आँख बचाना – नौकरानी ने आँख बचाकर मालिक के सारे आभूषण गायब कर दिये।
(3) हार न मानना – उत्साही पुरुष कैसी भी विषम परिस्थिति हो कभी हार नहीं मानते।
(4) आँच न आना – सज्जन ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिससे उनके चरित्र पर कोई आँच आये।
(5) न ऊधो का लेना न माधो का देना – इस षड्यन्त्र में मधु का कोई हाथ नहीं है उसका तो एकमात्र उद्देश्य है न ऊधो का लेना न माधो का देना।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए-
(अ) अशुद्ध – महक उठता है शिरीष का फूल बसन्त के आगमन के साथ।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष का फूल बसन्त के आगमन के साथ महक उठता है।

(आ) अशुद्ध – हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं शिरीष के पुष्प मेरे मानस में।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष के पुष्प मेरे मानस में हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं।

(इ) अशुद्ध – छायादार हैं होते बड़े वृक्ष शिरीष के।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष के वृक्ष बड़े छायादार होते हैं।

(ई) अशुद्ध – शिरीष का फूल साहित्य में कोमल मानी जाती है।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष का फूल साहित्य में कोमल माना जाता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित गद्यांश में यथास्थान विरामचिह्नों का प्रयोग कीजिए-
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं तुलसीदास ने अफसोस के साथ इसकी गहराई पर मुहर लगाई थी धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना।
उत्तर:
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रमाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफसोस के साथ इसकी गहराई पर मुहर लगाई थी, “धरा को प्रमान यही तुलसी, जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना।”

शिरीष के फूल पाठ का सारांश

शिरीष का फूल, साहित्य मनीषी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक सफल एवं उच्च कोटि का प्रेरणादायक निबन्ध है। विद्वान लेखक ने शिरीष के फूल का विभिन्न रूपों में वर्णन किया है, वह प्रशंसनीय है। शिरीष एक ऐसा फूल है जिसने कालरूपी समय पर विजय प्राप्त कर ली है। वह हर ऋतु में झूमता एवं लहराता रहता है। वह जीवन की अजेय शक्ति का प्रतीक है।

अद्भुत अवधूत की भाँति दुःख एवं सुख को समान रूप से स्वीकार करता है। कबीर तथा आधुनिक काल के सुमित्रानन्दन पन्त एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर भी अनासक्ति भाव से जीवन जीते थे। महात्मा गाँधी भी मार-काट, लूटपाट, रक्त प्रवाह आदि परिस्थितियों में अडिग रहकर धैर्य एवं साहस का परिचय देते थे। अतः उनको भी अवधूत की संज्ञा से विभूषित किया गया है।

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शिरीष के फूल कठिन शब्दार्थ

शिरीष = अति कोमल फूलों वाला एक वृक्ष। धरित्री = धरती। निर्धूम = धुआँ रहित। पलाश = एक प्रकार का लाल रंग का पुष्प। लहक उठता = झूमता। निर्धात अवधूत = सुखदुःख को समान समझने वाला संन्यासी, योगी। कालजयी = जिसने काल पर विजय प्राप्त कर ली हो। मानस = हृदय। हिल्लोल = प्रसन्नता, लहर। अशोक, अरिष्ठ, पुन्नाग और शिरीष = वृक्षों के नाम। मसृण = चिकनी, हरियाली, हरीतिमा। परिवेक्षिष्ठत = घिरी हुई। तुन्दिल = तोंद वाले। पक्षपात = किसी का पक्ष लेना। अधिकार-लिप्सा = अधिकार की लालसा। जीर्ण = पुराने। दुर्बल = कमजोर। परवर्ती = बाद के। ऊर्ध्वमुखी = ऊपर की ओर मुख वाला। ततुंजाल = रेशों का जाल। अनाविल = स्वच्छ, साफ। अनासक्त= आसक्ति रहित। विस्मयविमूढ़ = आश्चर्यचकित। कृषीवल = गन्ने में लगने वाला कीट। कार्पण्य = कंजूस, लोभी। मृणाल = सफेद कमल की डंडी। ईक्षु दण्ड = गन्ना। गन्तव्य = पहुँचने का स्थान। अभ्रभेदी = आकाश को भेदने वाला।

शिरीष के फूल संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. बसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पत्र से मर्मरित होती रहती है। शिरीष के पुराने फूल बुरी तरह लड़खड़ाते रहते हैं। मुझे उनको देखकर उन नेताओं की याद आती है, जो किसी प्रकार जमाने का साथ नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते, तब तक जमे रहते हैं। (2013)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘शिरीष के फूल’ से उद्धृत है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यावतरण में लेखक ने शिरीष के पुराने फूलों के माध्यम से जमे रहने वाले वृद्ध खुर्रार नेताओं पर कटाक्ष किया गया है।

व्याख्या :
ऋतुराज बसंत के आते ही सारा वन प्रदेश फूल और पत्तों से भर उठता है। पत्तों और फूलों की रगड़ से सरसराहट का स्वर निकलता रहता है, परन्तु शिरीष के पुराने फूल अब तक पेड़ों पर लगे रहते हैं और सूख जाने के कारण परस्पर टकराकर खड़खड़ाहट करते रहते हैं। लेखक को इन फूलों को देखकर उन नेताओं का स्मरण हो उठता है, जो किसी भी तरह समय के परिवर्तन को पहचानने को तैयार नहीं होते हैं। वे राजनीति में जमे ही रहना चाहते हैं। जब नवीन पीढ़ी के नेता उन्हें धकियाकर बाहर कर देते हैं तब बेइज्जत होकर राजनीति से बाहर होते हैं।

विशेष :

  1. शिरीष के पुराने फूलों के टिके रहने के आधार बनाकर राजनीति में जमे बेशर्म नेताओं पर तीखा प्रहार हुआ है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
  3. विवेचनात्मक शैली अपनाई गई है।

2. मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने दुःख के साथ इसकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी,”धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा-सो बताना।” मैं शिरीष के फूलों को देखकर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा, कि झड़ना निश्चित है। सुनता कौन है? महाकाल देवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं। जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। (2011)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने वृद्धावस्था एवं मृत्यु को प्रामाणिक सत्य ठहराकर, इस सत्य की तुलना शिरीष के फूल से की है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि वृद्धावस्था एवं मृत्यु दोनों ही अटल सत्य हैं। इसे कोई भी कदापि असत्य नहीं ठहरा सकता। इतने पर भी मानव अधिकारों के प्रति, प्रतिक्षण लालायित रहता है। उसकी यह आकांक्षा रहती है कि वह अधिक से अधिक अधिकार सम्पन्न बने।

महाकवि तुलसीदास ने इस बात पर वेदना व्यक्त की है और इसकी सत्यता को इस कथन से उजागर किया है-जो फलता-फूलता है वह कुम्हलाकर झड़ भी जाता है। लेखक शिरीष के फूल को देखकर इस बात को स्पष्ट कर रहा है कि पल्लवित एवं पुष्पित होने वाला वृक्ष भी अवश्य ही झड़ता है। काल रूपी देवता निरन्तर बेधड़क कोड़े चला रहा है अर्थात् प्राणी निरन्तर काल-कवलित हो रहे हैं। लेकिन मनुष्य इस तथ्य को नहीं स्वीकार कर रहा है। जो समय के थपेड़े से जीर्ण-शीर्ण एवं दुर्बल हो चुके हैं, वे धराशायी हो रहे हैं। परन्तु जिनके प्राणों में ऊर्जा शक्ति विद्यमान है वे ही उन्नत रहने में सक्षम हैं।

विशेष :

  1. जीवन और मृत्यु दोनों ही प्रामाणिक सत्य हैं।
  2. भाषा अलंकारिक, परिमार्जित एवं प्रसंगानुकूल है।

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3. शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी अग्नि जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती है। इस चिलकती धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है? क्या ये बाह्य परिवर्तन-धूप, आँधी, लू अपने आप में सत्य नहीं हैं? हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूटपाट, खून-खच्चर का बवंडर बह गया है उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है । अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों? मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों सम्भव हुआ है? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है और अपने देश का वह बूढ़ा अवधूत था।
(2008)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने शिरीष के वृक्ष को अवधूत की भाँति स्वीकार किया है। इसके अतिरिक्त मानव को उस वृक्ष से प्रेरणा ग्रहण करने का संदेश दिया है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि शिरीष का वृक्ष एक योगी की तरह से हमारे मन-मानस में ऐसी साहस की अग्नि जगा देता है जो हमें सदैव जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। चिलचिलाती, धूप, आँधी एवं लू में भी वह सदैव झूमता एवं लहराता रहता है। ये प्रकृति के विभिन्न उपादान जो कि मानव को व्यथित एवं भयभीत करते रहते हैं, लेकिन शिरीष के फूल पर इन बाह्य परिवर्तनों का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता है। हमारे देश में हिंसा, मार-काट, लूट-पाट एवं रक्त-पात का ज्वार सर्वत्र व्याप्त है। परन्तु इस भयावह वातावरण में भारत देश का एक बूढ़ा राष्ट्र नायक शिरीष के फूल की भाँति जीवन में हमें स्थिर रहने का संदेश दे रहा है। गाँधी एवं शिरीष दोनों ही अवधूत की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

विशेष :

  1. गाँधी की तुलना शिरीष के फूल से की है। दोनों ही योगी हैं।
  2. अग्नि जगाना, खून-खच्चर का बवंडर आदि मुहावरों का प्रयोग है।
  3. भाषा-शैली प्रामाणिक एवं विषयानुरूप है।

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MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें

MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें

कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें NCERT अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन पर संकरण अवस्था ज्ञात कीजिए –
(a) CH2 = C = O
(b) CH3 – CH = CH2
(c) (CH3)2CO
(d) CH2 = CH – CN2
(e) C6H6
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 6

प्रश्न 2.
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 7
(d) CH2 = C = CH2
(e) CH3NO2
(f) HCONHCH3
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 8

प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों के आबन्ध रेखा-सूत्र लिखिए –
(a) Isopropyl alcohol
(b) 2, 3-Dimethylbutanal
(c) Heptan – 4 – one.
OH
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 9

प्रश्न 4.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC में नाम लिखिए –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 10
उत्तर:
(a) Propylbenzene
(b) 3 – Methylpentanenitrile
(c) 2, 5-Dimethylheptane
(d) 3 – Bromo – 3 – chloroheptane
(e) 3 – Chloropropanal
(f) 2, 2 – Dichloroethanol.

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित यौगिकों में से कौन – सा नाम IUPAC के अनुसार सही है –
(a) 2, 2 – Diethylpentane अथवा 2 – Dimethylpentane
(b) 2, 4, 7 – Trimethyloctane अथवा 2, 5, 7 – Trimethy-loctane
(c) 2 – Chloro – 4 – methylpentane अथवा 4 – Chloro – 2,2 – methylpentane
(d) But – 3 – yn – 1 – ol अथवा But – 4 – 0l – 1 – yne.
उत्तर:
टीप-सर्वप्रथम दिये गए नाम से संरचना बना लें, फिर नियमों के अनुसार नाम दें, यदि वही नाम आता है तो सही है अन्यथा गलत है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 11
3-Ethyl-3-methylhexane होना चाहिए, अतः दिया गया नाम गलत है। 2-Dimethylpentane यह गलत है। (यहाँ Dimethyl प्रतिस्थापियों की संख्या दो होनी चाहिए, जो नहीं है।)
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 12
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∴ अंकन दायीं तरफ से होना चाहिए था। अत: But – 3 – yn – 1 – ol सही है।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित दो सजातीय श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथम पाँच सजातों के संरचना सूत्र लिखिए –
(a) कार्बोक्सिलिक अम्ल / एल्केनोइक अम्ल
(b) एस्टर
(c) एल्कीन।
उत्तर:
(a) कार्बोक्सिलिक अम्ल / एल्केनोइक अम्ल (Carboxylic acid/Alkanoic acid) –

  • HCOOH
  • CH3COOH
  • CH3 – CH2 – COOH
  • CH3 – CH2 – CH2 – COOH
  • CH3 – CH2 – CH2 – CH2 – COOH

(b) एस्टर (Esters)

  • CH3COOCH3
  • CH2CH2COOCH3
  • CH2CH2COOCH CH3
  • CH2CH2CH2COOCHCH3
  • CH3CH2CH2COOCH2CH2CH3

(c) एल्कीन (Alkenes)

  • CH2 = CH2
  • CH2CH = CH2
  • CH3CH2CH = CH2
  • CH3CH2CH2CH = CH2
  • CH2CH = CHCH2CH2CH3.

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित के संघनित और आबन्ध रेखा-सूत्र लिखिए तथा उनमें यदि क्रियात्मक समूह हो, तो उसे पहचानिए –
(a) 2, 2, 4 – Trimethylpentane
(b) 2 – Hydroxy – 1, 2, 3 – propanetricarboxylic acid
(c) Hexanedial.
उत्तर:
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प्रश्न 8.
निम्नलिखित यौगिकों में क्रियात्मक समूह पहचानिए –
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उत्तर:
(a) क्रियात्मक समूह –

  • – CHO (Aldehyde)
  • – OMe (Ether)
  • – OH (Phenolic)

(b) क्रियात्मक समूह –

  • Amino
  • N, N-Diethylpropanoate,

(c) क्रियात्मक समूह –

1. COCl (Acid chloride)
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(d) क्रियात्मक समूह – एथिलीनिक द्विबन्ध, नाइट्रो।

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प्रश्न 9.
निम्न में कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों –
O2NCH2CH2O, CH3CH2O
उत्तर:
– CH3 – CH2O की तुलना में O2N – CH2
CH2O अधिक स्थायी होता है क्योंकि – NO2 समूह – I प्रभाव प्रदर्शित करता है। जिसके कारण ऋणावेश विरल होता है। दूसरी ओर – CH3समूह +I प्रभाव प्रदर्शित करता है, जिसके कारण ऋणावेश सघन हो जाता है। आवेश के विरल हो जाने के कारण आयन का स्थायित्व बढ़ता है जबकि, ऋणावेश के सघन हो जाने के कारण आयन का स्थायित्व घटता है।
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प्रश्न 10.
निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित क्यों करते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
ऐल्किल समूह में कोई एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म नहीं होता है परन्तु 7 – इलेक्ट्रॉन तंत्र से जुड़ने पर अतिसंयुग्मन के कारण इलेक्ट्रॉन दाता के समान व्यवहार करता है। हम इसे टॉलुईन द्वारा दिखाते हैं, जिसमें मेथिल (CH3) समूह एकान्तर स्थितियों में तीन पाई (ooo) इलेक्ट्रॉन सहित बेंजीन वलय से जुड़ा होता है। विभिन्न अनुनादी संरचनाएँ निम्न हैं –
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प्रश्न 11.
निम्नलिखित यौगिकों की अनुनादी संरचना लिखिए तथा इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मुड़े तीरों की सहायता से दर्शाइए –
(a) C6H5 \(\stackrel{\ominus}{\mathbf{C}} \mathbf{H}_{2}\)
(b) C6H5OH
(c) C6H5NO2
(d) C6H5CH = O
(e) CH3 – CH = CH – CH = O
(f) CH3 – CH = CH – \(\stackrel{\ominus}{\mathbf{C}} \mathbf{H}_{2}\)
उत्तर:
(a) C6H5\(\stackrel{\ominus}{\mathbf{C}} \mathbf{H}_{2}\) में
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(b) C6H5OH में
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(c) C6H5NO2 में
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(d) C6H5CH = O में
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(e) CH3 – CH = CH – CH=0 में
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(1) CH3 – CH = CH – \(\stackrel{\ominus}{\mathbf{C}} \mathbf{H}_{2}\) में
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प्रश्न 12.
इलेक्ट्रॉन स्नेही तथा नाभिक स्नेही क्या है ? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन स्नेही अभिकर्मक-वे अभिकर्मक जो इलेक्ट्रॉन के प्रति बंधुता रखते हैं, इलेक्ट्रॉन स्नेही अभिकर्मक कहलाते हैं। सभी धनावेशित आयन या ऐसे उदासीन अणु जो एक या एक से अधिक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर सकते हैं। ये उस स्थान पर आक्रमण करते हैं, जहाँ इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च होता है।
धनावेशित इलेक्ट्रॉन स्नेही अभिकर्मक – NH4+H3O+, Br+, Ci+,NO2+
उदासीन इलेक्ट्रॉन स्नेही अभिकर्मक – BF3,AlCl3,FeCl3

नाभिक स्नेही अभिकर्मक:
वे अभिकर्मक जो नाभिक के द्वारा आकर्षित होते हैं या नाभिक के प्रति बंधुता रखते हैं नाभिक स्नेही अभिकर्मक कहलाते हैं। ये सामान्यतः ऋण आवेशित आयन या ऐसे उदासीन अणु होते हैं, जिनके पास एक या एक से अधिक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं। ये उस स्थान पर आक्रमण करते हैं, जहाँ इलेक्ट्रॉन घनत्व कम होता है।

ऋणावेशित नाभिक स्नेही अभिकर्मक –
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उदासीन नाभिक स्नेही अभिकर्मक –
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प्रश्न 13.
निम्नलिखित समीकरणों में रेखांकित अभिकर्मकों को नाभिक स्नेही तथा इलेक्ट्रॉन स्नेही में वर्गीकृत कीजिए –
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उत्तर:

  • HO → नाभिक स्नेही है।
  • CN → नाभिक स्नेही है।
  • CH3 \(^{\oplus} \mathrm{C} \mathrm{O}\) → इलेक्ट्रॉन स्नेही है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए –
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(c) CH3 – CH2 – Br + OH → CH2 = CH2 + H2O + Br
(d) (CH3 )3 C – CH2 OH + HBr → (CH3 )2 CBrCH2 CH3 + H2O.
उत्तर:
(a) नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया।
(b) नाभिक स्नेही योगात्मक अभिक्रिया
(c) विलोपन अभिक्रिया
(d) पुनर्विन्यास के साथ नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित युग्मों में सदस्य-संरचनाओं के मध्य कैसा संबंध है? क्या वे संरचनाएँ संरचनात्मक या ज्यामिति समावयव अथवा अनुनादी संरचनाएँ हैं –
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उत्तर:
(a) संरचनात्मक समावयव (क्रियात्मक समूह की स्थिति में भिन्न)
(b) ज्यामितीय समावयव
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(c) अनुनाद संरचनाएँ (इलेक्ट्रॉनों की स्थिति भिन्न है, परन्तु परमाणुओं की नहीं)।

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प्रश्न 16.
निम्नलिखित आबन्ध विदलनों के लिये इलेक्ट्रॉन विस्थापन को मुड़े तीरों द्वारा दर्शाइए तथा प्रत्येक विदलन को समांश अथवा विषमांश में वर्गीकृत कीजिये। साथ ही निर्मित सक्रिय मध्यवर्ती उत्पादों में मुक्त मूलक, कार्ब-धनायन तथा कार्ब – ऋणायन पहचानिए –
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उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 33आबन्ध विदलन-समांश आबन्ध विदलन। प्राप्त सक्रिय मध्यवर्ती मुक्त मूलक है।
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आबन्ध विदलन-विषमांश आबन्ध विदलन। प्राप्त सक्रिय मध्यवर्ती कार्ब-ऋणायन है।
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आबन्ध विदलन-विषमांश आबन्ध विदलन। प्राप्त सक्रिय मध्यवर्ती कार्ब-धनायन है।
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आबन्ध विदलन-विषमांश आबन्ध विदलन। प्राप्त सक्रिय मध्यवर्ती कार्ब-ऋणायन है।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता का सही क्रम, कौन-सा इलेक्ट्रॉन विस्थापन वर्णित करता है ? प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरिक प्रभावों की व्याख्या कीजिए –
(a) Cl3 CCOOH >CI2 CHCOO > CICH2COOH
(b) CH3 – CH2 – COOH>(CH3 )2 CHCOOH> (CH3)3 C – COOH.
उत्तर:
(a) प्रेरणिक प्रभाव:
संतृप्त कार्बन श्रृंखला के छोर पर इलेक्ट्रॉनग्राही या दाता परमाणु उपस्थित हो तब (σ) सिग्मा इलेक्ट्रॉन का बहाव होता है। संतृप्त कार्बन श्रृंखला में यह σ इलेक्ट्रॉन गति प्रेरणिक प्रभाव कहलाता है। प्रेरणिक प्रभाव शृंखला बढ़ने से पहले घटता है। तीन चार कार्बन परमाणु के बाद प्रेरणिक प्रभाव खत्म हो जाता है। प्रेरणिक प्रभाव दो प्रकार का होता है।

1. यदि श्रृंखला के अंत में इलेक्ट्रॉनग्राही परमाणु जुड़ा होता है तब -I प्रेरणिक प्रभाव उत्पन्न होता है।
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-I प्रेरणिक प्रभाव निम्न क्रम में घटता है –
NO,> – CN > – COOH >- F > – Cl>- Br >- I

2. यदि श्रृंखला के अन्त में इलेक्ट्रॉनदाता परमाणु जुड़ा होता है तथा + I प्रेरणिक प्रभाव उत्पन्न होता है।
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यह प्रभाव निम्न क्रम में घटता है –
(CH3)3C – >(CH3)2CH – >CH3 – CH2 – >CH3 – >D > H
यह प्रभाव स्थायी है इस प्रभाव के कारण अणुओं के उच्च क्वथनांक, गलनांक और द्विआघूर्ण ध्रुवण होता है।

(b) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव-यह एक अस्थायी प्रभाव है। केवल आक्रमणकारी अभिकारकों की उपस्थिति में यह प्रभाव बहुआबंध वाले कार्बनिक यौगिकों में प्रदर्शित होता है, इसमें आक्रमण करने वाले अभिकारक की माँग के कारण बहु-आबंध से बंधित परमाणुओं में एक सहभाजित 7 – इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन होता है यह प्रभाव दो प्रकार का होता है।
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+E और -E प्रभाव – यदि बहुआबंध के -इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बंधित होता है + E प्रभाव कहलाता है, उदाहरणार्थ
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यदि बहुआबंध के π – इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बंधित नहीं होता है, – E प्रभाव कहलाता है।
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प्रश्न 18.
प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रमों के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए –
(a) क्रिस्टलन
(b) आसवन
(c) क्रोमैटोग्राफी।
उत्तर:
(a) क्रिस्टलन:
इस विधि में अशुद्ध यौगिक का शुद्ध क्रिस्टलों में रूपांतरण होता है। यह किसी उचित विलायक में यौगिक तथा अशुद्धि की विलेयताओं में अंतर पर आधारित है। अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं जिससे यौगिक सामान्य ताप पर अल्प विलेय होता है, परन्तु उच्चतर ताप पर यथेस्ट मात्रा में घुल जाता है।

इसके पश्चात् विलयन को इतना सांद्रित करते हैं कि वह लगभग संतृप्त हो जाए। विलयन को ठंडा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टलीय हो जाता है। उदाहरण – आयोडोफॉर्म, एल्कोहॉल के साथ क्रिस्टलित हो जाता है। नैफ्थ्लीन के साथ मिश्रित बेंजोइक अम्ल गर्म जल द्वारा शोधित हो जाता है।

(b) आसवन:
इस विधि में अशुद्ध द्रव को गर्म करके वाष्प में बदलते हैं तथा पुनः वाष्प को ठंडा करके द्रव में बदलते है। यह विधि केवल ऐसे द्रवों के शोधन के लिए उपयुक्त है, जो वायुमण्डलीय दाब पर बिना अपघटित हुए उबलते हैं तथा जिनमें अवाष्पशील अशुद्धियाँ मिली हुई हो। ऐसे दो द्रव, जिनके क्वथनांकों मे पर्याप्त अंतर हो, का पृथक्करण एवं शोधन भी इस विधि द्वारा कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, क्लोरोफॉर्म (क्वथनांक 334 K) तथा ऐनिलीन (क्वथनांक 457 K), आसवन विधि द्वारा सरलतापूर्वक पृथक् किए जाते हैं। उबालने पर, कम क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प पहले बनती है, अतः इसे ठंडा करके पहले ग्राही में एकत्रित कर लिया जाता है।

(c) क्रोमैटोग्राफी (वर्णलेखन):
वर्णलेखन, यह मिश्रण के अवयवों के पृथक्करण, शुद्धिकरण तथा पहचान की विधि है। यह मिश्रण के अवयवों के दो प्रावस्था तथा गतिशील प्रावस्था पर विशिष्ट अधिशोषण के सिद्धांत पर आधारित है। स्थिर प्रावस्था ठोस या द्रव हो सकती है जबकि गतिशील प्रावस्था द्रव या गैस होती है।

अधिशोषण वर्णलेखन के प्रकार:

  • स्तंभ वर्णलेखन
  • पतली परत वर्णलेखन
  • वितरण वर्णलेखन।

स्तंभ वर्णलेखन में, स्थिर प्रावस्था ठोस तथा गतिशील प्रावस्था विभिन्न ध्रुवता के विलायकों का मिश्रण होती है। ठोस अधिशोषण को किसी उचित अध्रुवीय विलायक के साथ उपयुक्त लम्बाई की लंबी काँच की नली में लेते हैं। पृथक् तथा शुद्ध करने वाले कार्बनिक मिश्रण के सान्द्र विलयन की कुछ मात्रा को स्तम्भ के ऊपरी भाग में अधिशोषित कर देते हैं। विभिन्न यौगिकों के अधिशोषण की मात्रा के आधार पर उनका पृथक्करण हो जाता है। मिश्रण के अवयवों को अलग-अलग परतों, जिन्हें बैण्ड (क्रोमैटोग्राम) कहते हैं, के रूप में पृथक् कर लेते हैं।

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प्रश्न 19.
ऐसे दो यौगिक, जिनकी विलेयताएँ विलायक S से भिन्न है, को पृथक् करने की विधि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दो यौगिक जिनकी घुलनशीलता अलग:
अलग होती है, को प्रभाजी आसवन विधि द्वारा अलग किया जाता है। ऐसे द्रवों के वाष्प इसी तप्त परास में बन जाते हैं तथा साथ-साथ संघनित हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में प्रभाजी आसवन का उपयोग किया जाता है। जब गर्म विलयन को ठंडा किया जाता है, तब कम घुलनशील पदार्थ क्रिस्टल के रूप में बाहर आ जाता है, तथा अधिक घुलनशील द्रव में (विलयन) रह जाता है। दोबारा गर्म कर दूसरे का क्रिस्टलन किया जाता है।

प्रश्न 20.
निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अन्तर है ? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
निम्न दाब पर आसवन:
यह विधि उन कार्बनिक द्रवों के लिए उपयुक्त है, जो अपने क्वथनांक से पूर्ण ताप पर ही अपघटित हो जाते हैं। किसी द्रव का वाष्पदाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर होने पर यह उबलने लगता है। ऐसे द्रवों के पृष्ठ पर कम दाब करके उनके क्वथनांक से कम ताप पर उबाला जाता है। दाब कम करने के लिए जल पम्प अथवा निर्वात् पम्प का प्रयोग करते हैं। साबुन उद्योग में सह-उत्पाद, शेष लाई से ग्लिसरॉल को इस विधि द्वारा पृथक् करते हैं।

भाप आसवन:
यह जल के साथ सहसंघनन की विधि है। यह विधि उन पदार्थों के शोधन के लिए उपयुक्त है जो भाप वाष्पशील हो, परन्तु जल में अमिश्रणीय हो। ऐनिलीन को ऐनिलीन जल मिश्रण से इस विधि द्वारा पृथक करते हैं । इस विधि में कार्बनिक द्रव के वाष्प दाब (P1) तथा जल को वाष्प दाब (P2) का योग वायुमण्डलीय दाब (P) के बराबर होने पर द्रव उबलता है (अर्थात् P = P1 + P2) चूँकि P का मान P से कम है। अतः द्रव अपने क्वथनांक से कम ताप पर ही वाष्पित हो जाता है।

प्रश्न 21.
लैसेग्ने-परीक्षण का रसायन-सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर:
लैसेग्ने निष्कर्ष का निर्माण:
सर्वप्रथम कार्बनिक यौगिक को संलयन नलिका में सोडियम धातु के साथ संगलित करते हैं। लाल तप्त नलिका को आसुत जल में तोड़कर गर्म करके, छान लेते हैं। छनित लैसेग्ने निष्कर्ष कहलाता है। यह दिए गए कार्बनिक यौगिक में N, S तथा हैलोजन की पहचान में प्रयुक्त होता है।

नाइट्रोजन का परीक्षण:
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लैसेग्ने निष्कर्ष को फेरस सल्फेट विलयन के साथ गर्म करके सान्द्र H2SO4 के साथ अम्लीकृत करने पर निम्न अभिक्रियाएँ होती हैं –
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गर्म करने पर कुछ Fe2+ आयन Fe3+ आयनों में ऑक्सीकृत हो जाते है।
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प्रशियन ब्लू रंग की उपस्थिति, यौगिक में नाइट्रोजन की उपस्थिति को दर्शाती है।
नाइट्रोजन तथा सल्फर संयुक्त परीक्षण:
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सोडियम थायोसायनेट सोडियम थायोसायनेट रक्त जैसा लाल रंग देता है तथा नाइट्रोजन के परीक्षण की भाँति प्रशियन ब्लू रंग उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि इस क्रिया में मुक्त सायनाइड आयन उपस्थित नहीं होते हैं।
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सल्फर का परीक्षण –
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1. लेड एसीटेड को लैसेग्ने निष्कर्ष में मिलाकर, ऐसीटिक अम्ल के साथ अम्लीकृत करने पर, PbS का काला अवक्षेप प्राप्त होता है।
Na2S + (CH3COO)2 Pb → PbS + 2CH3COONa
2. सोडियम नाइट्रोप्रुसाइड विलयन को जैसेग्ने निष्कर्ष में मिलाने पर, सोडियम थायोनाइट्रोप्रसाइड बनने के कारण बैंगनी रंग उत्पन्न होता है।
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हैलोजनों का परीक्षण:
यदि लैसेग्ने निष्कर्ष में N तथा S उपस्थित हो तो सर्वप्रथम इसे सान्द्र HNO3 के साथ गर्म करके यौगिक में उपस्थित सोडियम सायनाइट या सोडियम सल्फाइट को अपघटित करते हैं, अन्यथा ये आयन हैलोजन के सिल्वर नाइट्रेट परीक्षण में बाधा उत्पन्न करते हैं।
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विलयन को ठंडा करते हैं तथा इसमें AgNO3 विलयन का कुछ मात्रा डालते हैं तथा निम्न प्रेक्षण देखते हैं –
1. यदि सफेद अवक्षेप (AgCl) प्राप्त होता है जो NH3(aq) में विलेय परन्तु HNO3में अविलेय हो तो कार्बनिक यौगिक में क्लोरीन उपस्थित है।
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2. यदि हल्का पीला अवक्षेप (AgBr) प्राप्त होता है जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में अल्पविलेय हो तो कार्बनिक यौगिक में ब्रोमीन की पुष्टि होती है।
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3. यदि पीला अवक्षेप (Agl) प्राप्त हो जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में अविलेय हो तो कार्बनिक यौगिक में आयोडिन की पुष्टि होती है।
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प्रश्न 22.
किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के आकलन की –
1. ड्यूमा विधि तथा
2. जेल्डॉल विधि के सिद्धान्त की रूप-रेखा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
1. ड्यूमा विधि से नाइट्रोजन के आकलन:
इस विधि का उपयोग उन सभी कार्बनिक यौगिकों के लिए होता है जो नाइट्रोजन तत्व रखते हैं। इस विधि में नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक को कार्बन डाइऑक्साइड के साथ गर्म करने पर नाइट्रोजन मुक्त होती है। कार्बन तथा हाइड्रोजन क्रमशः कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल में परिवर्तित हो जाते हैं।
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माना कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान =M gm
नाइट्रोजन का आयतन = V2 ml
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2. जेल्डॉल विधि से नाइट्रोजन के आकलन:
इस विधि में नाइट्रोजन युक्त यौगिक को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है। फलस्वरूप यौगिक नाइट्रोजन अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। तब प्राप्त अम्लीय मिश्रण को सोडियम हाइड्रॉक्साइड के आधिक्य के साथ गर्म करने पर अमोनिया मुक्त होती है।

जिसे मानक सल्फ्यूरिक अम्ल विलयन के ज्ञात आयतन में अवशोषित कर लिया जाता है। इसके बाद अवशिष्ट सल्फ्यूरिक अम्ल को क्षार के मानक विलयन द्वारा अनुमापित कर लिया जाता है। अम्ल की प्रारंभिक मात्रा और अभिक्रिया के बाद शेष मात्रा के बीच अंतर से अमोनिया के साथ अभिकृत अम्ल की मात्रा प्राप्त होती है।
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प्रश्न 23.
किसी यौगिक में हैलोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के आकलन के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1. हैलोजन का आकलन:
कार्बनिक यौगिक की निश्चित मात्रा को केरियस नली में लेकर सिल्वर नाइट्रेट की उपस्थिति में सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ भट्ठी में गर्म किया जाता है। यौगिक में उपस्थित कार्बन तथा हाइड्रोजन इन परिस्थितियों में क्रमशः कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल में ऑक्सीकृत हो जाते हैं, जबकि हैलोजन संगत सिल्वर हैलाइड AgX में परिवर्तित हो जाता है।
1 मोल AgX = 1 मोल X
mg AgX में हैलोजन का द्रव्यमान
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2. सल्फर का आकलन:
इस विधि में सल्फर को H2SO4 में बदलकर अवक्षेप के रूप में बदलते हैं, जो BaCl2 में संभव है।
C+ 2O → CO2
2H + O → H2O
S + H2O + 3O → H2SO4
H2SO4 + BaCl2 → BaSO4 + 2HCl
BaSO4 अवक्षेप को धोकर सुखाते हैं और S का % ज्ञात करते हैं।
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3. फॉस्फोरस का आकलन:
कार्बनिक यौगिक की एक ज्ञात मात्रा को सधुम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर उसमें उपस्थित फॉस्फोरस, फॉस्फोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है। इसे अमोनिया तथा अमोनियम मॉलिब्डेट मिलाकर अमोनियम फॉस्फोमॉलिब्डेट (NH4)3 PO12MoO3 के रूप में अवक्षेपित करते हैं। या फॉस्फोरिक अम्ल में मैग्नीशियम मिश्रण मिलाकर Mg2NH4PO4 के रूप में अवक्षेपित किया जा सकता है। जिसके ज्वलन से Mg2P2O7 प्राप्त होता है।
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प्रश्न 24.
पेपर क्रोमैटोग्राफी के सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर:
किसी भी पदार्थ का वितरण दो अलग-अलग प्रावस्थाओं में, जो एक-दूसरे के संपर्क में होती हैं, अलग-अलग होता है। यह वितरण, वितरण नियम का पालन करते हुए होता है। पेपर क्रोमैटोग्राफी इसका उदाहरण है। फिल्टर पेपर के समान अत्यंत महीन सरंध्र पेपर होता है जिसे क्रोमैटोग्राफी पेपर कहा जाता है। यह पेपर स्थिर प्रावस्था प्रदान करता है।

कार्ड बोर्ड यदि इस पेपर के एक सिरे को किसी उपयुक्त विलायक या विलायक के मिश्रण में डुबो दिया जाये तो केशिका क्रिया द्वारा विलायक ऊपर चढ़ने लगता है, यह चलित प्रावस्था होती है। अब कोई पदार्थ इस चलित द्रव प्रावस्था तथा क्रोमैटोग्राफी पेपर जिसमें 6 जल उपस्थित है तथा स्थिर द्रव प्रावस्था निर्मित करता है, इन दो प्रावस्थाओं में विलायक वितरण नियमानुसार वितरित होता है।

मिश्रण में अलग-अलग घटकों का वितरण अलग-अलग होने के कारण घटक अलग – अलग दूरी तय करते हुए ऊपर चढ़ते हैं, इस प्रकार निरंतरता से होने वाले वितरण के तहत हम घटकों का पृथक्करण कर पाते हैं। पेपर क्रोमैटोग्राफी के लिये क्रोमैटोग्राफी पेपर अलग-अलग आकार में लिया जा सकता है। एक फीते के रूप में तथा बेलनाकार आवरण के रूप में लिये जाने वाले पेपर को चित्र में प्रदर्शित किया गया है।

जिन घटकों का पृथक्करण करना है, उनके मिश्रण का एक धब्बा पेपर के एक सिरे में कुछ ऊपर लगाते हैं तथा उस सिरे को उपयुक्त विलायक में डुबाते हैं। कुछ समय पश्चात् हम देखते हैं कि घटक दो प्रावस्थाओं के बीच वितरण के आधार पर ऊपर चढ़कर अलग-अलग दूरी पर पृथक् हो जाते हैं।
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प्रश्न 25.
सोडियम संगलन निष्कर्ष में हैलोजन के परीक्षण के लिए AgNO3 मिलाने से पूर्व नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है ?
उत्तर:
यदि कार्बनिक यौगिक में हैलोजन के अतिरिक्त S तथा N उपस्थित हैं तो सोडियम निष्कर्ष में उपस्थित NaCN तथा Na2S, सिल्वर नाइट्रेट के साथ अभिक्रिया करके अवक्षेप देते हैं और हैलोजन के परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करते हैं। लेकिन सोडियम निष्कर्ष में सांद्र HNO3 मिलाने से ये NaCN तथा Na2S अपघटित हो जाते हैं और परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करते हैं।
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प्रश्न 26.
N, S तथा P के परीक्षण के लिये Na के साथ कार्बनिक यौगिक का संगलन क्यों किया जाता है ?
उत्तर:
कार्बनिक यौगिक में उपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर तथा हैलोजन सहसंयोजी अवस्था में होते हैं। अत: इनकी पहचान करना सरल नहीं है। धातु के साथ संगलन करने पर ये तत्व यूरिया या थायोयूरिया में बदल जाते हैं अर्थात् आयनिक रूप में बदल जाते हैं। आयनिक अवस्था में ये तत्व सरलता से आयनिक अभिक्रियाओं द्वारा पहचान लिये जाते हैं।

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प्रश्न 27.
CaSO4 तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।
उत्तर:
CaSO4 तथा कपूर के मिश्रण को ऊर्ध्वपातन तकनीक द्वारा पृथक् करते हैं क्योंकि कपूर ऊर्ध्वपातन है, जबकि CaSO4 नहीं। अतः मिश्रण को गर्म करने पर कपूर फनल की दीवारों पर एकत्रित होगा तथा CaSO4 क्रूसिबल में ही रह जायेगा।

प्रश्न 28.
भाप आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीकृत क्यों हो जाता है ?
उत्तर:
भाप आसवन विधि में, कार्बनिक द्रव तथा जल का मिश्रण कार्बनिक द्रव के वाष्प दाब (P1) तथा जल के वाष्प दाब (P2) के योग के वायुमंडलीय दाब (P) के बराबर हो जाने पर उबलता है, अर्थात् P = P1 + P2 चूँकि P की अपेक्षा P1 निम्न रहता है। अतः कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से पूर्व ही निम्न ताप पर उबलने लगता है।

प्रश्न 29.
क्या CCl4 AgNO3 के साथ गर्म करने पर AgCl का सफेद अवक्षेप नहीं देता? कारण सहित समझाइए।
उत्तर:
CCl4, AgNO3 विलयन के साथ सफेद अवक्षेप नहीं देगा क्योंकि CCl4 एक सहसंयोजी यौगिक है। यह आयनित नही होता है, जिनके कारण AgCl का अवक्षेप बनने के लिए Cl आयन प्राप्त नहीं होता है।

प्रश्न 30.
किसी कार्बनिक यौगिक में C का आकलन करते समय उत्पन्न CO2 को अवशोषित करने के लिये KOH विलयन का उपयोग क्यों करते हैं ?
उत्तर:
KOH, CO2 गैस को अवशोषित कर K2CO3 (विलेय पदार्थ) में बदल जाता है।
2KOH + CO2 → K2CO3 + H2O(l)

प्रश्न 31.
लेड ऐसीटेट परीक्षण द्वारा S परीक्षण करते समय अम्ल के स्थान पर H2SO4 प्रयुक्त करना सलाह योग्य नहीं है। कारण बताइए।
उत्तर:
यदि H2SO4 का प्रयोग करते हैं तो लेड ऐसीटेट स्वयं H2SO4 के साथ क्रिया करके लेड सल्फेट का सफेद अवक्षेप देता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 139अत: PbSO4 का सफेद अवक्षेप सल्फर के निम्नलिखित परीक्षण को प्रभावित करेगा –
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परन्तु यदि ऐसिटिक अम्ल का प्रयोग किया जाये तो लेड ऐसीटेट के साथ क्रिया नहीं करता है, जिसके कारण यह परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करता है।

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प्रश्न 32.
एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन एवं 4.8% हाइड्रोजन पाया जाता है तथा शेष ऑक्सीजन होता है। CO2 तथा उत्पादित जल के भारों की गणना कीजिए जब इस यौगिक का 0.20 g पूर्ण दहन में आरोपित किया जाता है।
हल:
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प्रश्न 33.
0. 50 g कार्बनिक यौगिक को जेल्डॉलीकृत किया गया है। उत्पन्न अमोनिया को 1 N H2SO4 के 50 cm3में प्रवाहित किया गया। अवशेषी अम्ल को N/2 NaOH विलयन के 60 cm3 की आवश्यकता होती है। यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशत गणना कीजिए।
हल:
लिए गए अम्ल का आयतन = 50 mL – 0.5 M H2SO4
= 25 mL 1.0 M H2SO4
अम्ल की अधिकता को उदासीन करने में प्रयुक्त क्षार का आयतन
= 60 mL 0.5 M NaOH
= 30 mL 1.0 M NaOH
H2SO4 + 2NaOH + Na2SO4 + 2H2O
1 मोल H2SO 1 मोल NaOH
30 mL 1.0 M NaO H = 15 mL 1.OM H2SO4
अमोनिया द्वारा प्रयुक्त अम्ल का आयतन = 25 – 15 = 10mL
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प्रश्न 34.
केरियस आकलन में 0.3780g कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0-5740g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में Cl की % ज्ञात कीजिए।
हल:
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प्रश्न 35.
केरियस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0.468 g सल्फर युक्त कार्बनिक यौगिक से 0.668g BaSO प्राप्त हुआ। दिये गये कार्बन यौगिक में सल्फर के % की गणना कीजिए।
हल:
प्रश्नानुसार, दिए गए कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = 0.468g
उत्पन्न BasO4 का द्रव्यमान = 0.668g
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प्रश्न 36.
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कार्बनिक यौगिक में C2 – C3आबन्ध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है ?
उत्तर:
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C2 – C3 आबन्ध sp2 – sp3 संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है।

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प्रश्न 37.
किसी कार्बनिक यौगिक में लैसेग्ने परीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रशियन ब्लू रंग किसके कारण प्राप्त होता है ?
उत्तर;
Fe4 [Fe(CN)6]3यौगिक बनने के कारण।

प्रश्न 38.
निम्नलिखित कार्ब-धनायनों में से कौन-सा सबसे अधिक स्थायी है –
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उत्तर:
(b) (CH3)3 \($C$ \) (तृतीयक कार्ब-धनायन होने के कारण)।

प्रश्न 39.
कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है
(a) क्रिस्टलन
(b) आसवन
(c) ऊर्ध्वपातन
(d) क्रोमैटोग्राफी।
उत्तर:
(d) क्रोमैटोग्राफी।

प्रश्न 40.
CH3 – CH2I + KOH(aq) → CH3CH2OH + KI अभिक्रिया को नीचे दिये गये प्रकार में,वर्गीकृत कीजिए –
(a) इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन
(b) नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन
(c) विलोपन
(d) संकलन।
उत्तर:
(b) नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया।

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कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –
1. एलिचक्रीय यौगिक है –
(a) ऐरोमैटिक यौगिक
(b) ऐलिफैटिक यौगिक
(c) विषमचक्रीय यौगिक
(d) ऐलिफैटिक चक्रीय यौगिक।
उत्तर:
(d) ऐलिफैटिक चक्रीय यौगिक।

2. एल्काइन का सामान्य सूत्र है –
(a) CnH2n+2
(b) CnH2n+1
(c)CnH2n
(d) CnH2n-2
उत्तर:
(d) CnH2n-2

3. IUPAC पद्धति से (CHF). CH – CH = CH – CH3 का नाम होगा –
(a) 2 – मेथिल पेन्टा – 3 – ईन
(b) 4 – मेथिल पेन्टा – 2 – ईन
(c) 2 – आइसो प्रोपिल प्रोप -1- ईन
(d) 3 – आइसो प्रोपिल प्रोप – 2 – ईन।
उत्तर:
(b) 4 – मेथिल पेन्टा – 2 – ईन

4. कार्बनिक यौगिकों का मुख्य स्रोत है –
(a) कोलतार
(b) पेट्रोलियम
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

5. ऐल्कोहॉल का सामान्य सूत्र है –
(a) CnH2n+2
(b) CnH2n+1.OH
(c) CnH2n-2
(d) CnH2n
उत्तर:
(b) CnH2n+1OH.

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6. निम्नलिखित यौगिक परस्पर किस प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करते हैं –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 1
(a) केवल क्रियात्मक समूह
(b) केवल श्रृंखला
(c) स्थिति तथा श्रृंखला
(d) केवल स्थिति।
उत्तर:
(b) केवल श्रृंखला

7. निम्नलिखित में से कौन एक कार्बएनायन का उदाहरण है –
(a) CH3
(b) \($$: \mathrm{CH}_{3}$$\)
(c) \($\stackrel{\oplus}{\mathrm{C}} \mathrm{H}_{3}$\)
(d) CH3
उत्तर:
(b) \($$: \mathrm{CH}_{3}$$\)

8. किरेल अणु उनको कहते हैं –
(a) जो अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित नहीं होते हैं
(b) जो अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित होते हैं
(c) जो ज्यामिति समावयवता दर्शाते हैं
(d) जो स्थायी अणु होते हैं।
उत्तर:
(a) जो अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित नहीं होते हैं

9. निम्न में से किसमें तीनों समूह -I प्रभाव प्रदर्शित करते हैं –
(a) -NO2 , -Br, -CH3
(b) -I, -NO2, -C2H5
(c) – Cl, – C2H5, – CH3
(d) -F, -NO2, -C6H5.
उत्तर:
(d) -F, -NO2, -C6H5

10. नाभिकस्नेही का उदाहरण निम्न में से है –
(a) F आयन
(b) H2O+ आयन
(c) Cl परमाणु .
(d) एनीलीन हाइड्रोक्लोराइड।
उत्तर:
(a) F आयन

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11. निम्नलिखित में से कौन-सा यौगिक ज्यामितीय समावयवी रूपों में पाया जा सकता है –
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उत्तर:
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12. एक पदार्थ का एक से अधिक ठोस रूपान्तरों में अस्तित्व रखना ……………. जाना जाता है –
(a) बहुरूपता
(b) समाकृतिकता
(c) अपरूपता
(d) प्रतिबिम्बरूपता।
उत्तर:
(a) बहुरूपता

13. Cl.CH2CH2COOH की संरचना वाले यौगिक का नाम है –
(a) 3 – क्लोरोप्रोपेनोइक अम्ल
(b) 2 – क्लोरोप्रोपेनोइक अम्ल
(c) 2 – क्लोरोएथेनोइक अम्ल
(d) क्लोरोसक्सिनिक अम्ल।
उत्तर:
(a) 3 – क्लोरोप्रोपेनोइक अम्ल

14. आइसोब्यूटिल क्लोराइड का संरचना सूत्र है –
(a) CH3CH2CH2CH2Cl
(b) (CH3)2CH.CH2Cl
(c) CH3CH2CHCl.CH3
(d) (CH3)3C – Cl.
उत्तर:
(c) CH3CH2CHCl.CH3

15. CnH2n सामान्य सूत्र है –
(a) ऐल्केन्स का
(b) ऐल्कीन्स का
(c) ऐल्काइन्स का
(d) ऐरीन्स का।
उत्तर:
(b) ऐल्कीन्स का

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16. कार्बन टेट्राक्लोराइड में बन्ध कोण है लगभग –
(a) 90°
(b) 109°
(c) 120°
(d) 180°
उत्तर:
(b) 109°

17. (CH3)2CH – O – CH2 – CH2 – CH3 का नाम है –
(a) आइसोप्रोपिल प्रोपिल ईथर
(b) डाइप्रोपिल ईथर
(c) डाइआइसो प्रोपिल ईथर
(d) आइसोप्रोपिल प्रोपिलकीटोन।
उत्तर:
(a) आइसोप्रोपिल प्रोपिल ईथर

18. कैल्सियम कार्बाइड पर जल की क्रिया द्वारा यह गैस उत्पन्न होती है –
(a) मेथेन
(b) एथेन
(c) एथिलीन
(d) ऐसीटिलीन।
उत्तर:
(d) ऐसीटिलीन।

19. बेयर अभिकर्मक है –
(a) क्षारीय KMnO4
(b) अमोनियामय AgNO3
(c) अमोनियामय CuSO4
(d) अप्लीय CaSO4
उत्तर:
(a) क्षारीय KMnO4

20. Cl3C.CH2CHO सूत्र वाले यौगिक का IUPAC नाम है –
(a) 3, 3, 3-ट्राइक्लोरोप्रोपेनल
(b) 1,1, 1-ट्राइक्लोरोप्रोपेनल
(c) 2, 2, 2-ट्राइक्लोरोप्रोपेनल
(d) क्लोरल।
उत्तर:
(a) 3, 3, 3-ट्राइक्लोरोप्रोपेनल

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21. त्रिविम समावयवी भिन्न होते हैं –
(a) विन्यास में
(b) संरूपण में
(c) ये भिन्न नहीं होते
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(a) विन्यास में

22. CH3– CH – (OH) – COOH प्रदर्शित करता है –
(a) ज्यामितीय समावयवता
(b) प्रकाशीय समावयवता
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(b) प्रकाशीय समावयवता

23. नाइट्रो एथेन निम्न में से एक प्रकार की समावयवता है –
(a) मध्यावयवता
(b) प्रकाश सक्रियता
(c) चलावयवता
(d) स्थान समावयवता।
उत्तर:
(c) चलावयवता

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. फ्रिऑन कार्बनिक पदार्थ जिसका उपयोग वायु प्रशीतकों तथा रेफ्रीजरेटर्स में होता है का रासायनिक नाम ……………. एवं संरचना सूत्र ……………… होगा।
  2. दो पदार्थों को पृथक् करने की प्रभाजी क्रिस्टलन विधि ……………. के अन्तर पर निर्भर करती है।
  3. कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन की मात्रा ज्ञात करते हैं उसे ……………… में बदलकर।
  4. एक पदार्थ में 80% कार्बन तथा 20% हाइड्रोजन है तो उसका सूत्र ………………. होगा।
  5. मार्श गैस में मुख्यतः ……………. गैस होती है।
  6. ‘भिन्न-भिन्न अवशोषण दर से अलग किए गये पदार्थ का प्रक्रम ……………. कहलाता है।
  7. जेल्डॉल विधि का प्रयोग ……………. तल के आकलन में होता है।
  8. दो पदार्थों के मिश्रण का पृथक्करण ……………. पर निर्भर करता है।
  9. o-नाइट्रोफिनॉल और p-नाइट्रोफिनॉल के मिश्रण का पृथक्करण ……………. से होता है।
  10. ग्लिसरीन के क्वथनांक पर वियोजन होता है, यह शुद्धिकरण ……………. से होता है।

उत्तर:

  1. डाइफ्लुओरो – डाइक्लोरो मेथेन, CF2Cl2
  2. विलायक
  3. सिल्वर हैलाइड
  4. C2H6.
  5. मेथेन
  6. इल्युशन
  7. नाइट्रोजन
  8.  विलेयता
  9. भाप आसवन
  10. निम्न दाब आसवन

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प्रश्न 3.
उचित संबंध जोडिए –
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उत्तर:

    1. (h) CH4
    2. (g) CH3 – COOH
    3. (b) CH3 – CH2 – OH
    4. (c) HCHO
    5. (i) CHI3
    6. (j) CH3 – CN
    7. (d) CH3NC
    8. MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 3

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  1. (a) (CH3)3 – C – OH

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प्रश्न 4.
एक शब्द / वाक्य में उत्तर दीजिए –

  1. CH3 – CH2 CHCl – CH3 का रासायनिक नाम है …………..।
  2. KMnO4 और KOH का मिश्रण कहलाता है।
  3. सिरका का IUPAC नाम है।
  4. अन्न एल्कोहॉल का IUPAC नाम है।
  5. CaSO4 युक्त मिश्रण में कपूर को अलग किया जाता है।
  6. नैफ्थेलीन का शुद्धिकरण होता है।
  7. कॉलम क्रोमैटोग्राफी द्वारा शुद्धिकरण होता है क्योंकि –
  8. पेट्रोलियम का शुद्धिकरण होता है।
  9. बेलस्टाइन परीक्षण का प्रयोग होता है।
  10. मुक्त मूलक आबंधन के किस प्रकार के विदलन से बनते हैं।

उत्तर:

  1. आइसो ब्यूटिल क्लोराइड
  2. बेयर अभिकर्मक
  3. एथेनोइक अम्ल
  4. एथेनॉल
  5. ऊर्ध्वपातन
  6. ऊर्ध्वपातन
  7. अलग-अलग अवशोषण
  8. प्रभाजी आसवन
  9. हैलोजन परीक्षण में
  10. समांश विदलन से।

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कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समावयवता किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
वे यौगिक जिनके अणुसूत्र समान होते हैं लेकिन संरचना सूत्र भिन्न-भिन्न होते हैं ये एक-दूसरे के समावयवी कहलाते हैं तथा इस गुण को समावयवता कहते हैं। उदाहरण – एथिल ऐल्कोहॉल C2H5OH और डाइमेथिल ईथर के अणुसूत्र C2H6O समान हैं, लेकिन इनके संरचना सूत्र में भिन्नता है इसलिये ये एक-दूसरे के समावयवी हैं।

प्रश्न 2.
स्थान समावयवता को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
इस प्रकार की समावयवता तब होती है जब प्रतिस्थापी मूलक या क्रियात्मक समूह या द्विबंध या त्रिबंध की भिन्न-भिन्न स्थितियाँ हों अर्थात् भिन्न-भिन्न C पर जुड़े हों।
उदाहरण:
C3H8O
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प्रश्न 3.
C3H6O अणुसूत्र वाले दो क्रियात्मक समावयवी यौगिकों के संरचना सूत्र और प्रचलित नाम लिखिये।
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 69

प्रश्न 4.
पेण्टेन के समावयवी लिखिये तथा उपस्थित समावयवता का नाम लिखिये।
अथवा
एल्केन में किस प्रकार की समावयवता होती है ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
एल्केन सामान्यतः शृंखला समावयवता दर्शाते हैं, उदाहरण के रूप में – C5H12 में शृंखला समावयवता होती है, इसके तीन समावयवी बनते हैं-
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 70

प्रश्न 5.
एल्काइन में श्रृंखला एवं स्थिति समावयवता को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
एल्काइन शृंखला एवं स्थिति समावयवंता दर्शाते हैं।
1. श्रृंखला समावयवता –
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2. स्थिति समावयवता –
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प्रश्न 6.
एरीन में कौन-सी समावयवता पायी जाती है ? उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
एरीन में स्थान समावयवता होती है।
उदाहरण –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 73

प्रश्न 7.
निम्नलिखित यौगिकों के संरचना सूत्र दिये गये हैं। इनमें पायी जाने वाली समावयवता के नाम लिखिये
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उत्तर:

  1. क्रियात्मक समावयवता
  2. मध्यावयवता
  3. चलावयवता।

प्रश्न 8.
कार्बनिक यौगिकों में C व H के आकलन की विधि का नाम लिखिये।
उत्तर:
कार्बनिक यौगिकों में C व H के आकलन के लिये लीबिग विधि का प्रयोग करते हैं।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित मिश्रणों को शुद्ध करने की विधि का नाम लिखिये –

  1. अशुद्ध नैफ्थेलीन
  2. दो वाष्पशील द्रव
  3. आयोडीन व NaCl
  4. बेंजीन एवं टॉलुईन।

उत्तर:

  1. अशुद्ध नैफ्थेलीन – ऊर्ध्वपातन
  2. दो वाष्पशील द्रव – प्रभाजी आसवन
  3. आयोडीन व NaCl – ऊर्ध्वपातन
  4. बेंजीन एवं टॉलुईन – प्रभाजी आसवन।

प्रश्न 10.
कार्बनिक यौगिकों के शोधन में प्रयुक्त होने वाली विधियों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  • ठोस पदार्थ के लिये प्रयुक्त होने वाली विधि – साधारण क्रिस्टलन, प्रभाजी क्रिस्टलन, ऊर्ध्वपातन तथा विलायकों द्वारा निष्कर्षण।
  • द्रव पदार्थ के लिये प्रयुक्त होने वाली विधि – साधारण आसवन, प्रभाजी आसवन, निर्वात आसवन, भाप आसवन इत्यादि।

प्रश्न 11.
क्रोमैटोग्राफी किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी मिश्रण के विभिन्न अवयवों को किसी अधिशोषक पर अधिशोषित होने की शक्ति में भिन्नता के आधार पर स्थिर व चलायमान प्रावस्थाओं में वितरित कर पृथक करने की प्रक्रिया क्रोमैटोग्राफी कहलाती है।

प्रश्न 12.
यदि कोई कार्बनिक पदार्थ बहुत थोड़ी मात्रा में दिया गया है तो उसकी शुद्धता की जाँच किस प्रकार की जाती है ?
उत्तर:
यदि कोई पदार्थ बहुत कम मात्रा में दिया गया है तो उसकी शुद्धता उसके गलनांक या क्वथनांक को ज्ञात करके की जा सकती है या फिर शुद्धता का परीक्षण स्तम्भ क्रोमैटोग्राफी से करते हैं यदि एक बैण्ड प्राप्त होता है तो यौगिक शुद्ध होगा और यदि एक से अधिक बैण्ड प्राप्त होते हैं तो यौगिक अशुद्ध होगा।

प्रश्न 13.
अधिशोषण वर्णलेखी प्रक्रम का कार्बनिक यौगिकों के शोधन में क्या उपयोग है ? लिखिये।
उत्तर:
अधिशोषण वर्णलेखी प्रक्रम का उपयोग विशेषतः विटामिन और हॉर्मोन्स जैसे – जटिल यौगिकों के पृथक्करण में होता है तथा इसका उपयोग पदार्थों की शुद्धता का परीक्षण करने में होता है।

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प्रश्न 14.
कार्बनिक यौगिक में हैलोजन का सिल्वर नाइट्रेट परीक्षण करते समय HNO3 मिलाते हैं, क्यों?
उत्तर:
यदि कार्बनिक यौगिक में हैलोजन के अतिरिक्त S तथा N उपस्थित हैं तो सोडियम निष्कर्ष में उपस्थित NaCN तथा Na2S, सिल्वर नाइट्रेट के साथ अभिक्रिया करके अवक्षेप देते हैं और हैलोजन के परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करते हैं। लेकिन सोडियम निष्कर्ष में सान्द्र HNO3 मिलाने से ये NaCN तथा Nags अपघटित हो जाते हैं और परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करते हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 75

प्रश्न 15.
नाइट्रोजन का परीक्षण करते समय FeCl3 का विलयन मिलाने पर रक्त लाल रंग का श्वेत अवक्षेप आता है। क्यों?
उत्तर:
नाइट्रोजन का परीक्षण करते समय FeCl3 मिलाने पर लाल रंग का उत्पन्न होना कार्बनिक यौगिक मैं N तथा S दोनों की उपस्थिति को दर्शाता है। क्योंकि सोडियम निष्कर्ष बनाते समय कार्बनिक यौगिक में उपस्थित N एवं S सोडियम के साथ अभिक्रिया करके सोडियम सल्फोसायनाइड बनाते हैं जो FeCl3 के साथ अभिक्रिया करके फैरिक सल्फोसायनाइड का रक्त लाल रंग का विलयन देते हैं।
Na + C + N + S →NaSCN
NaSCN + FeCl3 → Fe(CNS)3 + 3NaCl

प्रश्न 16.
आयतनात्मक विधि द्वारा किस प्रकार के यौगिकों के आण्विक द्रव्यमान को ज्ञात किया जा सकता है ?
उत्तर:
आयतनात्मक विधि द्वारा अम्लीय या क्षारीय गुण दर्शाने वाले यौगिक सूचक की उपस्थिति में मानक क्षार या मानक अम्ल द्वारा अनुमापन किया जाता है तथा अनुमापन द्वारा उनके तुल्यांकी भार को ज्ञात कर लेते हैं। मानक अम्ल या क्षार उनके तुल्यांकी भार को एक लीटर में विलेय करके बनाये जाते हैं। अम्ल या क्षार का आण्विक द्रव्यमान = तुल्यांकी द्रव्यमान × अम्लता या क्षारकता।

प्रश्न 17.
कार्बनिक यौगिकों के तत्वों के परीक्षण हेतु सोडियम निष्कर्ष क्यों बनाया जाता है ?
उत्तर:
कार्बनिक यौगिक सहसंयोजी प्रकृति के होने के कारण सरलता से आयनित नहीं होते हैं। जिसके कारण इनमें उपस्थित तत्वों का परीक्षण सरलता से नहीं किया जा सकता है। सोडियम एक अत्यन्त क्रियाशील धातु है जो कार्बनिक यौगिक में उपस्थित तत्वों के साथ संयोग करके सोडियम यौगिक बनाता है जो प्रबल आयनिक होते हैं और सरलता से आयनित हो जाते हैं इसलिये तत्वों का परीक्षण सरलता से किया जा सकता है।

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प्रश्न 18.
सोडियम निष्कर्ष में ब्रोमीन या आयोडीन का परीक्षण करने के लिये क्लोरोफॉर्म या CCI, क्यों मिलाया जाता है ?
उत्तर:
सोडियम निष्कर्ष को तनु HNO3 से उदासीन करके CHCl3 या CCl4 तथा क्लोरीन जल डालते हैं। क्लोरीन सोडियम निष्कर्ष में उपस्थित ब्रोमीन या आयोडीन को विस्थापित कर देता है, जो CHCl3 या CCl4 में विलेय होकर भूरा या बैंगनी रंग प्रदान करता है।

प्रश्न 19.
कार्बनिक यौगिक में कार्बन तथा हाइड्रोजन का परीक्षण किस प्रकार करते हैं ?
उत्तर:
परखनली में शुष्क CuO के साथ कार्बनिक यौगिक को लेकर गर्म करते हैं निकलने वाली CO2 गैस चूने के पानी को दूधिया कर देती है जबकि जल वाष्प बूंदों के रूप में संघनित हो जाती है। इस निर्जल CuSO4 द्वारा अवशोषित होने के कारण उसे नीला कर देती है।
C + 2 Cuo → CO2 + 2Cu
2H + CuO → H2O + Cu
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 76

प्रश्न 20.
किसी कार्बनिक यौगिकों के शुद्धता परीक्षण की मिश्रित गलनांक विधि से क्या समझते हो?
उत्तर:
पूर्णरूप से मिले हुये दो पदार्थों के मिश्रण को मिश्रित गलनांक कहते हैं। इस विधि में पदार्थ की शुद्धता की जाँच करने के लिये दिये गये पदार्थ को विशुद्ध पदार्थ की समान मात्रा के साथ मिश्रित करके मिश्रण का गलनांक ज्ञात करते हैं। यदि मिश्रण का गलनांक शुद्ध पदार्थ के गलनांक के समान है तो दिया गया पदार्थ शुद्ध है।

प्रश्न 21.
दो भिन्न क्वथनांक वाले द्रवों का पृथक्करण किस प्रकार किया जा सकता है ?
उत्तर:
दो द्रव जिनके क्वथनांक में अंतर हो का पृथक्करण प्रभाजी आसवन विधि द्वारा करते हैं। अधिक वाष्पशील यौगिक पहले वाष्पित होता है तथा इसकी वाष्प प्रभाजी स्तम्भ से आगे बढ़कर संघनित्र में से प्रवाहित होने पर द्रवित होकर ग्राही में एकत्रित हो जाती है जबकि कम वाष्पशील पदार्थ की वाष्प प्रभाजी स्तम्भ में संघनित होकर वापस फ्लास्क में आ जाती है।

प्रश्न 22.
मूलानुपाती सूत्र क्या है ?
उत्तर:
वह रासायनिक सूत्र जो यौगिक में उपस्थित विभिन्न तत्वों के परमाणुओं का सरलतम अनुपात दर्शाता है, मूलानुपाती सूत्र कहलाता है। उदाहरण- ग्लूकोस का मूलानुपाती सूत्र CH2O है।

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प्रश्न 23.
अणुसूत्र क्या है ? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
वह रासायनिक सूत्र जो यौगिक में उपस्थित विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की वास्तविक संख्या को दर्शाता है, अणुसूत्र कहलाता है। उदाहरण- ग्लूकोस का अणुसूत्र C6 o H12O6 है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 77

प्रश्न 24.
विषम चक्रीय यौगिक किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
इस श्रेणी में वे चक्रीय यौगिक होते हैं जिनके चक्र में कार्बन परमाणु के अतिरिक्त एक या एक से अधिक बहु संयोजक परमाणु जैसे-नाइट्रोजन, सल्फर, ऑक्सीजन इत्यादि होते हैं।

  • पिरीडीन C5 H5 N,
  • C4 H4 O प्यूरेन
  • थायोफिन C4 H4 S.

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प्रश्न 25.
समचक्रीय यौगिक किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
इस श्रेणी में कार्बनिक यौगिक होते हैं जिनके चक्र में केवल कार्बन परमाणु होते हैं। समचक्रीय यौगिक दो प्रकार के होते हैं

  • एरोमैटिक यौगिक
  • एलीसाइक्लिक यौगिक।

उदाहरण:
एरोमैटिक यौगिक –
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एलीसाइक्लिक यौगिक –
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प्रश्न 26.
क्रियात्मक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामान्यतः कार्बनिक यौगिक दो भागों से मिलकर बना होता है –

  • मूलक
  • क्रियात्मक समूह।

क्रियात्मक समूह – किसी कार्बनिक यौगिक का वह भाग जो उसके रासायनिक गुणों का निर्धारण करता है, क्रियात्मक समूह कहलाता है।
उदाहरण – C2H2 – OH में OH क्रियात्मक समूह है।

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प्रश्न 27.
एल्डिहाइड श्रेणी का सामान्य सूत्र, अणुसूत्र लिखिये तथा प्रथम सजातों का साधारण नाम व IUPAC नाम लिखिये।
उत्तर:
1. सामान्य सूत्र – R – CHO
2. अणुसूत्र – Cn H2nO
3. H – CHO – फॉर्मेल्डिहाइड – Methanal
CH3 – CHO – एसीटैल्डिहाइड – Ethanal

कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सल्फर के लेड ऐसीटेट द्वारा परीक्षण में सोडियम संगलन निष्कर्ष को ऐसीटिक अम्ल द्वारा उदासीन किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा, क्यों?
उत्तर;
यदि H2SO4 का प्रयोग करते हैं तो लेड ऐसीटेट स्वयं H2SO4 के साथ क्रिया करके लेंड सल्फेट का सफेद अवक्षेप देता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 81
अत: PbSO4 का सफेद अवक्षेप सल्फर के निम्नलिखित परीक्षण को प्रभावित करेगा।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 82
परन्तु यदि ऐसीटिक अम्ल का प्रयोग किया जाये तो लेड ऐसीटेट के साथ क्रिया नहीं करता है, जिसके कारण यह परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करता है।

प्रश्न 2.
किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है ?
उत्तर:
CO2 की प्रकृति थोड़ी अम्लीय होती है। अत: यह प्रबल क्षार KOH के साथ क्रिया करके K2CO3 बनाती है। जिसकी सहायता से प्राप्त CO2 कार्बनिक यौगिक में कार्बन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कर ली जाती है।
2KOH + CO2 →K2CO3 + H2O
KOH वाली U – ट्यूब के भार में वृद्धि के फलस्वरूप उत्पन्न CO2 का भार ज्ञात करते हैं। प्राप्त CO2 के भार से कार्बनिक यौगिक में उपस्थित कार्बन की प्रतिशत मात्रा निम्न प्रकार से ज्ञात करते हैं।
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प्रश्न 3.
इलेक्ट्रॉनस्नेही तथा नाभिकस्नेही अभिकर्मक में अंतर लिखिये।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनस्नेही तथा नाभिकस्नेही अभिकर्मक में अंतर –

इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक:

  • इलेक्ट्रॉन न्यून होता है।
  • सामान्यतः संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉन होते हैं।
  • ये धन विद्युती आयन होते हैं।
  • उदासीन अणु जिनके अष्टक अपूर्ण होते हैं ये इलेक्ट्रॉन युग्म ग्राही होते हैं।
  • लुईस अम्ल होते हैं।
  • ये अणु के उस स्थान पर आक्रमण करते इलेक्ट्रॉन घनत्व न्यूनतम होता है।

नाभिकस्नेही अभिकर्मक:

  • अधिक इलेक्ट्रॉन रखते हैं।
  • सामान्यतः संयोजी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। 109°28
  • ये ऋण विद्युती आयन होते हैं।
  • ये इलेक्ट्रॉन युग्म दाता होते हैं।
  • लुईस क्षार होते हैं।
  • ये उस स्थान पर आक्रमण करते हैं जहाँ हैं जहाँ इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिकतम होता है।

प्रश्न 4.
कार्बन परमाणु की संयोजकता संबंधी वाण्ट हॉफ तथा लेवेल का नियम समझाइये।
उत्तर:
कार्बन का परमाणु क्रमांक 6 है। इसका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 2, 4 है। इस प्रकार इसके संयोजी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन हैं इसलिये इसकी संयोजकता 4 है। वाण्ट हॉफ तथा लेवेल के अनुसार, कार्बन सामान्यत: sp3 संकरित होता है इसलिये इसकी संरचना समचतुष्फलकीय होती है। जिसमें कार्बन केन्द्र में स्थित रहता है तथा इसकी चारों संयोजकता चतुष्फलकीय संरचना के चारों कोनों में स्थित है और दो संयोजकताओं के बीच बंध कोण 109° 28′ होता है।

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प्रश्न 5.
कार्बन केवल सहसंयोजी यौगिक बनाता है, क्यों?
उत्तर:
कार्बन का परमाणु क्रमांक 6 है इसके संयोजी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन हैं। इसे अष्टक पूर्ण करने के लिये4अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन की आवश्यकता है।अतःकार्बन 4 इलेक्ट्रॉन या तो दान कर सकता है या ग्रहण कर सकता है या 4 इलेक्ट्रॉन का साझा कर सकता है लेकिन कार्बन के छोटे आकार के कारण इसकी आयनन ऊर्जा व इलेक्ट्रॉन बंधुता अत्यधिक उच्च होती है। अतः कार्बन का 4 इलेक्ट्रॉन का दान करना या ग्रहण करना संभव नहीं है, अतः कार्बन अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये केवल अन्य परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉन का साझा कर सकता है इसलिये वह केवल सहसंयोजी यौगिक बनाता है।
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प्रश्न 6.
क्या कारण है कि कार्बन बहुत अधिक संख्या में यौगिक बनाता है ?
अथवा
कार्बन की अद्वितीय प्रकृति को समझाइये।
उत्तर:
कार्बनिक यौगिकों के अधिकता में पाये जाने के निम्नलिखित कारण हैं –
1. श्रृंखलन – किसी तत्व के दो या दो से अधिक परमाणुओं का सहसंयोजक बंध द्वारा श्रृंखला बनाने की प्रवृति को श्रृंखलन कहते हैं। कार्बन परमाणु में श्रृंखलन की प्रवृत्ति सबसे अधिक होती है।

2. कार्बन – कार्बन परमाणु के मध्य प्रबल बंध – कार्बन परमाणु का आकार अत्यन्त छोटा है। इससे कार्बन परमाणु के अर्धपूर्ण कक्षकों का अतिव्यापन अत्यधिक सरलता से अधिक सीमा में हो सकता है जिसके फलस्वरूप कार्बन-कार्बन के बीच बना बंध अत्यधिक दृढ़ तथा प्रबल होता है।

3. बहु आबंध बनाने की प्रवृत्ति – कार्बन परमाणु अपने छोटे आकार के कारण अन्य परमाणु जैसे C, H, O, N के साथ सरलता से संयोग कर द्विबंध या त्रिबंध बना सकता है।

4. समावयवता – जब दो या दो से अधिक यौगिकों के अणुसूत्र समान हो लेकिन उनके संरचना सूत्र में भिन्नता हो तो ऐसे यौगिकों को समावयवी कहते हैं तथा इस गुण को समावयवता कहते हैं। यह गुण कार्बन में अधिकतम है। इन्हीं उपर्युक्त गुणों के कारण कार्बन बहुत अधिक संख्या में यौगिकों का निर्माण करती है।

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प्रश्न 7.
कार्बनिक तथा अकार्बनिक यौगिक में अंतर लिखिये।
उत्तर:
कार्बनिक तथा अकार्बनिक यौगिक में अंतर –

कार्बनिक यौगिक:

  • कार्बन तथा कुछ अन्य तत्व जैसे – H, O, N, S, P इत्यादि के संयोग से बनते हैं।
  • ये सहसंयोजी यौगिक होते हैं।
  • ये वैद्युत अपघट्य नहीं हैं।
  • इनके गलनांक और क्वथनांक कम होते हैं
  • ये जल में अविलेय परन्तु कार्बनिक विलायकों में विलेय हैं।
  • ये समावयवता दर्शाते हैं।
  • इनकी अभिक्रियायें आण्विक तथा जटिल होती हैं तथा धीमी गति से होती हैं।

अकार्बनिक यौगिक:.

  • ये यौगिक सभी तत्वों द्वारा बनाये जाते हैं।
  • अधिकांश अकार्बनिक यौगिक वैद्युत संयोजी होते हैं। लेकिन कुछ यौगिक सहसंयोजी तथा उपसहसंयोजी भी होते हैं।
  • ये वैद्युत अपघट्य हैं।
  • इनके गलनांक और क्वथनांक उच्च होते हैं।
  • ये जल में विलेय परन्तु कार्बनिक विलायकों में अविलेय है।
  • ये समावयवता नहीं दर्शाते हैं।
  • इनकी अभिक्रियायें आयनिक होती हैं तथा तीव्र गति से होती हैं।

प्रश्न 8.
सजातीय श्रेणी किसे कहते हैं ? इसकी विशेषतायें लिखिये।
उत्तर:
कार्बनिक यौगिकों की वह श्रेणी जिसमें सदस्यों में समान क्रियात्मक समूह उपस्थित हो तथा जिसके दो क्रमागत सदस्यों के अणुओं में CH2 का अंतर हो, सजातीय श्रेणी कहलाती है।
विशेषतायें –

  • सजातीय श्रेणी के सदस्यों को एक सामान्य सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
  • श्रेणी के दो क्रमागत सदस्यों के अणुसूत्र में CH2 का अंतर होता है।
  • श्रेणी के दो क्रमागत सदस्यों के अणुभार में 14 का अंतर होता है।
  • श्रेणी के सभी सदस्यों को समान रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा बनाया जा सकता है।
  • श्रेणी के सभी सदस्यों के रासायनिक गुणों में समानता होती है।

प्रश्न 9.
कार्बनिक यौगिकों में प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक और चतुर्थक कार्बन क्या होते हैं ?
उत्तर:
प्राथमिक कार्बन – किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वह कार्बन परमाणु जो अधिकतम एक कार्बन परमाणु से जुड़ा है, प्राथमिक कार्बन या 1°C कार्बन कहलाता है। द्वितीयक कार्बन – किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वह कार्बन जो दो कार्बन परमाणु से जुड़ा है। द्वितीयक या 2°C कार्बन कहलाता है। बृतीयक कार्बन – किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वह कार्बन जो तीन अन्य कार्बन परमाणु से जुड़ा हो तृतीयक कार्बन या 3°C कहलाता है। चतुर्थक कार्बन – किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वह कार्बन जो अन्य 4 कार्बन परमाणु से जुड़ा हो चतुर्थक कार्बन कहलाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 84
जहाँ p = प्राथमिक, s = द्वितीयक, t = तृतीयक, q= चतुर्थक।

प्रश्न 10.
अमोनियम क्लोराइड तथा सोडियम क्लोराइड के मिश्रण को पृथक् करने की विधि समझाइये।
अथवा
नैफ्थेलीन तथा नमक के मिश्रण को पृथक् करने की विधि को समझाइये।
उत्तर:
नौसादर (अमोनियम क्लोराइड) या नैफ्थेलीन तथा NaCl के मिश्रण को ऊर्ध्वपातन विधि द्वारा पृथक् करते हैं। इस मिश्रण को एक चीनी की प्याली में लेकर छिद्र युक्त फिल्टर पेपर से ढंक देते हैं तथा फनल की नली में रूई या ऊन भरकर फिल्टर पेपर के ऊपर उल्टा करके रख देते हैं तथा इसे बालू ऊष्मक पर रखकर धीरे-धीरे गर्म करते हैं। NH4Cl या नैफ्थेलीन ऊर्ध्वपातित होकर फिल्टर पेपर के छिद्रों से गुजरकर फनल की दीवारों के ठण्डे भाग में जमा हो जाते हैं जहाँ से इन्हें पृथक कर लेते हैं तथा नमक (NaCl) प्याली में शेष रह जाता है।

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प्रश्न 11.
किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन का परीक्षण लैसग्ने विधि द्वारा कैसे किया जाता है ?
उत्तर:
नाइट्रोजन के परीक्षण की लैसग्ने विधि-कार्बनिक पदार्थ के सोडियम निष्कर्ष में थोड़ा-सा NaOH मिलाकर FeSO4 का ताजा बना विलयन मिलाकर गर्म करने पर Fe (OH)2 का हरा अवक्षेप बनता है। इसे ठण्डा कर सान्द्र HCl मिलाया जाता है। जिसमें हरा अवक्षेप विलेय हो जाता है फिर FeCl3 विलयन मिलाते हैं। नीला या हरा अवक्षेप प्राप्त हो तो यौगिक में नाइट्रोजन उपस्थित है।
Na + C + N → NaCN
Fe (OH)2 + 6 NaCN → Na4 [Fe(CN)6] + 2NaOH
3Na4 [Fe (CN)6] + 4 FeCl3 → Fe4 [ Fe (CN)6 ]3(नीला अवक्षेप) + 12NaCl

प्रश्न 12.
किसी कार्बनिक यौगिक में सल्फर का परीक्षण किस प्रकार किया जाता है ?.
उत्तर:
1. सोडियम नाइट्रोप्रुसाइड:
सोडियम निष्कर्ष में सोडियम नाइट्रो साइड की कुछ बूंदें मिलाने पर यदि बैंगनी रंग प्राप्त हो तो सल्फर उपस्थित होगा।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 86
2. लेड एसीटेट परीक्षण सोडियम निष्कर्ष में एसीटिक अम्ल मिलाकर लेड एसीटेट मिलाने पर यदि काला अवक्षेप प्राप्त होता है तो कार्बनिक यौगिक में सल्फर उपस्थित है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 86

प्रश्न 13.
भाप आसवन किन यौगिकों के लिये उपयोगी है, सचित्र समझाइये।
उत्तर:
वे कार्बनिक यौगिक जो जल में अविलेय लेकिन भाप में वाष्पशील रूप में विलेय होते हैं, उनका शोधन भाप आसवन विधि द्वारा किया जाता है। अशुद्ध पदार्थ को एक गोल पेंदी वाले फ्लास्क में लेकर थोड़ासा जल मिलाते हैं। और इसे बालू ऊष्मक पर रखकर 90°C ताप पर गर्म करते हैं, तथा इसे वाष्प उत्पादक प्लास्क से जोड़कर इसमें वाष्प प्रवाहित करते है।

जो मिश्रण से वाष्पशील पदार्थ को अपने में विलेय करके वाष्प रूप में रहती है। इस वाष्प और वाष्पशील द्रव को संघनित से गुजार कर संघनित्र कर ग्राही में एकत्रित कर लेते हैं। यदि यौगिक अविलेय ठोस है तो उसे छानकर पृथक् कर लेते हैं और अविलेय द्रव है तो पृथक्कारी कीप की सहायता से छानकर पृथक् कर लेते हैं। एनिलीन तथा सुगन्धित तेलों का आसवन इस विधि द्वारा किया जाता है।
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प्रश्न 14.
निर्वात् आसवन या कम दाब पर आसवन का सिद्धांत क्या है ? चित्र सहित समझाइये।
उत्तर:
ऐसे कार्बनिक यौगिक जो अपने क्वथनांक या उसके पूर्व ही गर्म करने पर अपघटित हो जाते हैं उनका शोधन निर्वात् आसवन द्वारा किया जाता है। ग्राही में निर्वात् पम्प द्वारा आंशिक निर्वात उत्पन्न करते हैं जिससे आसवन फ्लास्क में दाब कम हो जाता है। और द्रव अपने क्वथनांक से पूर्व ही उबलने लगता है। ग्लिसरॉल का शोधन इस विधि द्वारा करते हैं।
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प्रश्न 15.
कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन का परीक्षण किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर:
AgNO3 परीक्षण-सोडियम निष्कर्ष में तनु HNO3 तथा AgNO3 मिलाने पर श्वेत अवक्षेप आये जो AgCl का होता है यदि श्वेत अवक्षेप NH4Cl के आधिक्य में विलेय हो तो कार्बनिक यौगिक में Cl उपस्थित होगा। सोडियम निष्कर्ष में तनु HNO3 तथा AgNO3 मिलाने पर हल्का पीला या गाढ़ा पीला अवक्षेप आये तो ब्रोमीन तथा आयोडीन उपस्थित होगा AgBr का हल्का पीला अवक्षेप NH4OH के आधिक्य में अल्प विलेय तथा AgI का गाढ़ा पीला अवक्षेप NH4OH के आधिक्य में अविलेय होगा।
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प्रश्न 16.
कार्बनिक पदार्थ में उपस्थित सल्फर के आकलन की केरियस विधि का चित्र सहित वर्णन कीजिये।
उत्तर:
केरियस विधि:
सल्फर युक्त कार्बनिक यौगिक की निश्चित मात्रा को सधूम HNO3 के साथ गर्म करने पर सल्फर केरियस H3SO4 में ऑक्सीकृत हो जाता है। अभिक्रिया पूर्ण होने पर नली नली को ठण्डा करके H2SO4 को बीकर में लेकर आसुत जल से धोकर लोहे की इसमें BaCl2 विलयन की उचित मात्रा मिलाने पर BaSO4काश्वेत अवक्षेप आता है जिसे छानकर सुखा लेते हैं तथा इसका भार ज्ञात कर लेते हैं।
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प्रश्न 17.
किसी कार्बनिक यौगिक हैलोजन का आकलन किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर:
केरियस विधि;
कार्बनिक यौगिक की – निश्चित मात्रा को सधूम HNO3 तथा AgNO4 के साथ एक। बंद नली में उच्च ताप पर गर्म करते हैं। केरियस नली इस प्रकार हैलोजन सिल्वर हैलाइड में परिवर्तित हो  लोहे की नली जाता है। इस प्रकार प्राप्त Agx अवक्षेप को धोकर सुखाकर तौल लेते हैं। इसद्रव्यमान की सहायता से हैलोजन की प्रतिशत कार्बनिक पदार्थ मात्रा ज्ञात कर लेते हैं।
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प्रश्न 18.
जेल्डॉल विधि द्वारा नाइट्रोजन का आकलन करने का सिद्धांत समझाइये।
उत्तर:
जेल्डॉल विधि का सिद्धांत:
जब नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक पदार्थ की ज्ञात मात्रा लेकर उसे सान्द्र H2SO4 के साथ गर्म करते हैं तो कार्बनिक यौगिक में उपस्थित नाइट्रोजन, अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इसे NaOH के साथ गर्म करने पर NH3 गैस बनती है। इस NH3 गैस को मानक अम्ल जैसे H2SO4 के ज्ञात आयतन में अवशोषित कर लेते हैं । प्रयोग के पश्चात् H2SO4 का मानक क्षार के साथ अनुमापन कर अमोनिया की बची मात्रा का परिकलन कर लेते हैं। इस मात्रा से कार्बनिक पदार्थ में नाइट्रोजन की % मात्रा को ज्ञात किया जा सकता है।
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प्रश्न 19.
यौगिकों के शोधन की आसवन विधि को चित्र सहित समझाइये।
उत्तर:
किसी द्रव या ठोस पदार्थ को वाष्प में बदलकर दूसरे स्थान पर भेजकर उसे फिर से ठण्डा कर ठोस या द्रव अवस्था में प्राप्त करने की क्रिया को आसवन कहते हैं। आसवन अनेक प्रकार के होते हैं

  • साधारण आसवन
  • प्रभाजी आसवन
  • निर्वात आसवन
  • भाप आसवन।

साधारण आसवन:
यदि किसी द्रव में अवाष्पशील पदार्थों की अशुद्धि हो तो इस विधि का उपयोग किया जाता है। इस विधि द्वारा ऐसे द्रवों को पृथक् किया जाता है जिनके क्वथनांक में 30-40°C का अंतर है। मिश्रण को गर्म करने पर शुद्ध द्रव की वाष्प प्राप्त होती है जो संघनित्र द्वारा ठण्डी होकर ग्राही में एकत्रित हो जाती है तथा अशुद्धियाँ आसवन फ्लास्क में रह जाती हैं।
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प्रश्न 20.
अधिशोषण क्रोमैटोग्राफी का सिद्धांत क्या है ? समझाइये।
उत्तर:
किसी मिश्रण के विभिन्न अवयवों की विलायक पथक्करण निरंतर इल्यूजन किसी अधिशोषक पर अधिशोषित होने की शक्ति में भिन्नता। होने के सिद्धांत पर यह विधि आधारित है। इसलिये जब एक काँच की नली में भरे हुये अधिशोषक पर किसी मिश्रण के विलयन कोडालकर नीचे बहने दियाजायेतोअधिशोषक शक्ति में भिन्नता होने के कारण मिश्रण के विभिन्न अवयव अधिशोषक में अलग-अलग स्थान पर अधिशोषित हो जाते हैं । जिनकी अधिशोषित होने की प्रवृत्ति अधिक होती है वे पहले अधिशोषित होते हैं तथा जिनकी अधिशोषित होने – की प्रवृत्ति कम होती है वे बाद में अधिशोषित होते हैं। इसे क्रोमैटोग्राफ कहा जाता है।
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प्रश्न 21.
श्रृंखला समावयवता तथा क्रियात्मक समावयवता को उदाहरण सहित समझाइये। प्रथम घटक
उत्तर:
श्रृंखला समावयवता:
जब दो या दो से अधिक यौगिकों के अणुसूत्र समान हों लेकिन श्रृंखला में कार्बन परमाणुओं के व्यवस्थित होने के क्रम में भिन्नता हो तो इन यौगिकों को श्रृंखला समावयवी तथा इस गुण को श्रृंखला समावयवता कहते हैं।
उदाहरण –
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क्रियात्मक समावयवता:
जब दो या दो से अधिक यौगिकों के अणुसूत्र समान हों लेकिन उनमें उपस्थित क्रियात्मक समूह भिन्न-भिन्न हों तो ऐसे यौगिक क्रियात्मक समावयवी तथा इस समावयवता को क्रियात्मक समावयवता कहते हैं।
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प्रश्न 22.
निम्नलिखित के संघनित और आबंध-रेखा-सूत्र लिखिए तथा उनमें यदि कोई क्रियात्मक समूह हो, तो उसे पहचानिए
(a) 2,2,4-ट्राइमेथिलपेन्टेन
(b) 2,- हाइड्रॉक्सी-1, 2, 3- प्रोपेनट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल
(c) हेक्सेनडाऐल।
उत्तर:
संघनित और आबंध रेखा-सूत्र लिखने के लिए सर्वप्रथम दिए गए यौगिकों का संरचनात्मक सूत्र लिखते हैं –
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प्रश्न 23.
कार्बऋणायन या कार्बेनियन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
कार्बेनियन:
वह ऋणावेशित आयन जिसमें ऋण आवेश C पर होता है, कार्बेनियन आयन कहलाता है। इनमें C के संयोजी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। जिसमें तीन बंधी इलेक्ट्रॉन युग्म के रूप में तथा एक एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म के रूप में होता है।

वर्गीकरण:
प्राथमिक कार्बेनियन आयन – यदि ऋण आवेश प्राथमिक C पर होता है।
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द्वितीयक कार्बेनियन आयन-ऋण आवेश द्वितीयक C पर होता है।
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तृतीयक कार्बेनियन आयन-ऋण आवेश तृतीयक C पर होता है।
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स्थायित्व:
कार्बेनियन आयन में C पर उपस्थित ऋण आवेश में वृद्धि होने पर स्थायित्व में कमी आती है। एल्किल मूलकों की संख्या में वृद्धि करने पर स्थायित्व में कमी आती है।
CH5 > 1° > 2° > 3°
संरचना:
इसमें कार्बन sp3 संकरित अवस्था में होता है, तीन आबंधी इलेक्ट्रॉन युग्म तथा एक एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है।
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प्रश्न 24.
मध्यावयवता तथा चलावयवता समावयवता को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
मध्यावयवता:
जब दो या दो से अधिक यौगिकों के अणुसूत्र समान हों उनमें उपस्थित क्रियात्मक समूह भी समान हो लेकिन उनसे जुड़े एल्किल मूलक में भिन्नता हो तो इस प्रकार उत्पन्न समावयवता को मध्यावयवता कहते हैं।
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चलावयवता:
यह एक विशेष प्रकार की क्रियात्मक समावयवता है जिसमें दोनों समावयवी साम्य अवस्था में होते हैं तथा सरलता से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार की समावयवता तब उत्पन्न होती है। जब हाइड्रोजन या एल्किल समूह द्विबंध या त्रिबंध के दोनों तरफ दोलन करता है।
द्विक प्रणाली:
हाइड्रोजन का दोलन दो बहुसंयोजी परमाणु के मध्य होता है।
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त्रिक प्रणाली – हाइड्रोजन का दोलन तीन बहुसंयोजी परमाणुओं के मध्य होता है।
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प्रश्न 25.
निम्नलिखित यौगिकों के आबंध-रेखा-सूत्र लिखिएआइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2, 3 – डाइमेथिल ब्यूटेनल, हेप्टेन – 4 – ओन।
उत्तर:
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प्रश्न 26.
प्रेरणिक प्रभाव किसे कहते हैं ? इसके क्या उपयोग हैं ?
उत्तर:
जब सहसंयोजी बंध दो भिन्न तत्वों के परमाणुओं के मध्य बनता है तो साझे के इलेक्ट्रॉन दोनों परमाणुओं या नाभिकों के मध्य में न रहकर अत्यधिक ऋण विद्युती तत्व की ओर विस्थापित हो जाता है जिससे अधिक ऋण विद्युती समूह पर आंशिक ऋण आवेश तथा कम ऋण विद्युती समूह पर आंशिक धन आवेश आ जाता है। इस पर σ बंध के इलेक्ट्रॉनों का अधिक ऋण विद्युती समूह की तरफ विस्थापन प्रेरणिक प्रभाव कहलाता है। परमाणुओं की श्रृंखला में ध्रुवीय सहसंयोजक बंध की उपस्थिति के कारण इलेक्ट्रॉन विस्थापन प्रक्रिया प्रेरणिक प्रभाव कहलाता है। प्रेरणिक प्रभाव को बीच में बाणान युक्त डैश से दर्शाते हैं।
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प्रेरणिक प्रभाव के प्रकार –
1.ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव – वे परमाणु या समूह जो हाइड्रोजन की तुलना में अधिक ऋण विद्युती होते हैं इलेक्ट्रॉन आकर्षी या इलेक्ट्रॉन ग्राही समूह होते हैं। इनका प्रेरणिक प्रभाव ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव कहलाता है।
+NR3 > \(\stackrel{+}{\mathrm{N}} \mathrm{R}_{2}\) > – \(\stackrel{+}{\mathrm{N}} \mathrm{H}_{3}\), > – NO3 > – SO2R> – CN > – COOH > – F> – Cl> – Br> – I> – OH> – C6H5.

धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव:
ऐसे परमाणु जिनकी इलेक्ट्रॉन बंधुता हाइड्रोजन की तुलना में कम होती है इलेक्ट्रॉन निर्मोची कहलाता है। ये धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव दर्शाते हैं।
O>COO>(CH3)2C > (CH3)2 CH > CH3 CH2 > CH3H .
अनुप्रयोग:

  • वसीय अम्लों की प्रबलता की तुलना
  • एमीनों के क्षारकीय गुण
  • द्विध्रुव आघूर्ण की उपस्थिति।

प्रश्न 27.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 28.
इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव क्या है ? इस पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
यह एक अस्थायी प्रभाव है जो अभिक्रिया के समय केवल किसी अभिकर्मक की उपस्थिति में कार्य करता है। किसी आक्रमणकारी समूह की उपस्थिति में 1 बंध के इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण रूप से अधिक ऋण विद्युती समूह की ओर होने वाला विस्थापन इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव कहलाता है। लेकिन जैसे ही आक्रमणकारी समूह को हटाया जाता है। अणु वापिस अपनी मूल स्थिति में आ जाता है। इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव को
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एक मुड़े हुये तीर द्वारा व्यक्त करते हैं। जो उस स्थान से शुरू होता है जहाँ से इलेक्ट्रॉन जाते हैं और उस स्थान पर समाप्त होता है जहाँ पर इलेक्ट्रॉन आते हैं।

धनात्मक इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव:
इसमें 7 इलेक्ट्रॉन युग्म का स्थानान्तरण अणु की मुख्य संरचना के किसी एक छोर पर स्थित परमाणु से अणु के मुख्य भाग की ओर होता है।
उदाहरण – F, CI, Br, I,- 0 -, NR2,NR

ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव:
इलेक्ट्रॉन युग्म का स्थानान्तरण अणु की मुख्य संरचना से बाहर की ओर होता है।
उदाहरण – = N, = O = CR2 = S इत्यादि।
अनुप्रयोग –

  • एल्कीन या एल्काइन पर हैलोजन की योगात्मक अभिक्रिया।
  • कार्बोनिक यौगिकों की नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया।

प्रश्न 29.
प्रेरणिक प्रभाव तथा इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में अंतर लिखिए।
उत्तर:
प्रेरणिक प्रभाव तथा इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में अंतर –
प्रेरणिक प्रभाव:

  • यह एक स्थायी प्रभाव है।
  • यह प्रभाव σ बंध के इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन के कारण उत्पन्न होता है।
  • आंशिक धन आवेश तथा आंशिक ऋण आवेश उत्पन्न होता है।
  • इसके कारण प्रतिस्थापन अभिक्रिया होती है।
  • अणु में सदैव उपस्थित रहता है।

इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव:

  • यह एक अस्थायी प्रभाव है।
  • यह प्रभाव π बंध के इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन के कारण उत्पन्न होता है।
  • पूर्ण धन आवेश तथा पूर्ण ऋण आवेश होता है।
  • इसके कारण योगात्मक अभिक्रियायें होती हैं।
  • यह प्रभाव अभिक्रिया के दौरान आक्रमणकारी समूह की उपस्थिति में उत्पन्न होता है।

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प्रश्न 30.
क्रियात्मक समूह उपस्थित होने पर यौगिकों के नामकरण करने के नियम को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
नामकरण के नियम –

  • उस कार्बन श्रृंखला का चयन मुख्य श्रृंखला के रूप में करते हैं जिसमें क्रियात्मक समूह उपस्थित हों।
  • यदि क्रियात्मक समूह में कार्बन उपस्थित हो तो उसे मुख्य श्रृंखला में गिना जाता है।
  • श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से प्रारम्भ करते हैं जहाँ से क्रियात्मक समूह सिरे के ज्यादा पास है।
  • नामकरण करते समय पहले प्रतिस्थापी समूह का नाम लिखा जाता है बाद में मुख्य क्रियात्मक समूह का।
  • यदि शृंखला में एक से अधिक क्रियात्मक समूह उपस्थित हो तो वरीयता के आधार पर क्रियात्मक समूह का चयन किया जाता है। फिर प्रतिस्थापी समूह के नाम से पहले मुख्य क्रियात्मक समूह को छोड़कर अन्य क्रियात्मक समूह की स्थिति दर्शाकर उनके नाम लिखते हैं।

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प्रश्न 31.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम व सूत्र दीजिये

  1. आयोडोफॉर्म
  2. सिरका
  3. फॉर्मिक अम्ल
  4. मार्शगैस
  5. एसीटोन
  6. ग्लाइकॉल
  7. डाईमेथिल ईथर
  8. फॉर्मेल्डिहाइड
  9. मेथिल सायनाइड।

उत्तर:
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प्रश्न 32.
निम्नलिखित यौगिकों के संरचना सूत्र लिखिए –

  1. 3,3,-डाइमिथाइलपेण्टीन
  2. 4-मेथिलहेक्सेन-2ऑल
  3. 1,2डाइब्रोमोएथेन
  4. नाइट्रोमेथेन
  5. 4-मेथिल-3 हाइड्रॉक्सी पेन्टेन।

उत्तर:
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प्रश्न 33.
एलीफैटिक तथा एरोमैटिक यौगिक में अंतर लिखिये।
उत्तर:
एलीफैटिक तथा एरोमैटिक यौगिक में अंतर –

एलीफैटिक यौगिक:

  • ये खुली श्रृंखला वाले यौगिक होते हैं।
  • इनमें प्रायः C – C बंध पाया जाता है।
  • ये अधिक क्रियाशील होते हैं।
  • हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण, सल्फोनीकरण सरलता से नहीं होता।
  • इनकी दहन ऊष्मा अधिक होती है।
  • इनके – OH मूलक उदासीन होते हैं।
  • इनके मूलक क्षारीय होते हैं।

एरोमैटिक यौगिक:

  • ये बंद श्रृंखला वाले यौगिक होते हैं।
  • इनके चक्र में एकान्तर क्रम में एकल व द्विबंध होते हैं।
  • ये कम क्रियाशील होते हैं।
  • हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण, सल्फोनीकरण सरलता से होता है।
  • इनकी दहन ऊष्मा कम होती है।
  • इनके हाइड्रॉक्सी यौगिक अम्लीय गुण दर्शाते हैं।
  • इनके मूलक अम्लीय होते हैं।

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प्रश्न 34.
अनुनाद प्रभाव क्या है ? इसके अनुप्रयोग लिखिये।
उत्तर:
यह प्रभाव संयुग्मी निकाय जिनमें एकल बंध व द्विबंध एकान्तर क्रम में उपस्थित हो उनमें होता है। अनुनाद के कारण निकाय के किसी एक भाग से इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह दूसरे भाग की ओर होता है जिससे अलगअलग इलेक्ट्रॉन घनत्व के केन्द्र बन जाते हैं, इस घटना को अनुनाद प्रभाव या मेसोमेरिक प्रभाव कहते हैं। यह एक स्थायी प्रभाव है।

ऋणात्मक मेसोमेरिक प्रभाव:
इलेक्ट्रॉन युग्म का स्थानान्तरण जब परमाणु या समूह की ओर होता है तो इसे – M प्रभाव कहते हैं।
उदाहरण – – NO2, – CHO, – SO3H, > C = O.
धनात्मक मेसोमेरिक प्रभाव-इलेक्ट्रॉन युग्म का स्थानान्तरण जब परमाणु या समूह से दूर की ओर होता है तो उसे +M प्रभाव कहते हैं।
उदाहरण – – OH – OR, – SH, – SR, – NH2, – Cl, – Br
अनुप्रयोग –

  • बेंजीन की संरचना निर्धारण में।
  • द्विध्रुव आघूर्ण की व्याख्या में।
  • अम्ल व क्षार की सामर्थ्य का स्पष्टीकरण।
  • संयुग्मी योगात्मक अभिक्रिया।

प्रश्न 35.
प्रतिस्थापन अभिक्रिया किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
वे अभिक्रियाएँ जिनमें अभिकारक अणु के किसी परमाणु या समूह का अभिकर्मक के किसी परमाणु या समूह द्वारा प्रतिस्थापन होता है, उसे प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Substitution reaction) कहते हैं।
उदाहरण –
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इसमें मीथेन के H परमाणु का CI परमाणु द्वारा प्रतिस्थापन हुआ है।
(ii) CH3CH2 – OH + PCl5 → CH3CH2Cl + POCl3 + HCl
इस अभिक्रिया में एल्कोहॉल का – OH समूह – Cl के द्वारा प्रतिस्थापित हुआ है।

कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
(a) IUPAC नामकरण संबंधी नियम क्या है ?
(b) IUPAC नाम दिया हो तो संरचना सूत्र किस प्रकार लिखा जाता है ?
उत्तर:
(a) IUPAC नामकरण के नियम – किसी यौगिक का IUPAC नामकरण निम्नलिखित नियमों के अनुसार करते हैं –

  • सर्वाधिक लम्बी कार्बन श्रृंखला का चयन
  • वरीय कार्बन श्रृंखला का चयन
  • श्रृंखला में कार्बन परमाणुओं का क्रमांकन
  • प्रतिस्थापियों की स्थितियों का न्यूनतम योग नियम
  • प्रतिस्थापियों का अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में नामोल्लेख
  • प्रतिस्थापियों के नामों की संख्या सूचक पूर्वलग्न
  • सम-स्थित प्रतिस्थापियों का स्थान क्रमांकन
  • यौगिक में क्रियात्मक समूह, द्विबंध या त्रिबंध उपस्थित है तो प्रतिस्थापियों की तुलना में वरीयता।

(b) संरचना सूत्र लिखना – कार्बनिक यौगिक के IUPAC नाम ज्ञात होने पर संरचना सूत्र लिखते समय निम्न बिन्दुओं का ध्यान में रखा जाना आवश्यक है –

  • सर्वप्रथम कार्बनिक यौगिक के IUPAC नाम से मुख्य श्रृंखला लिखते हैं।
  • श्रृंखला के किसी भी सिरे से कार्बन श्रृंखला का क्रमांकन करते हैं।
  • अनुलग्न के आधार पर मुख्य क्रियात्मक समूह को उसकी स्थिति के अनुसार दर्शाते हैं।
  • यदि ene तथा yne शब्द का प्रयोग हुआ है तो स्थिति के अनुसार द्विबंध और त्रिबंध को दर्शाते हैं।
  • पूर्वलग्न के आधार पर अन्य क्रियात्मक समूह को उनकी स्थिति के आधार पर दर्शाते हैं।
  • कार्बन की संयोजकता को पूर्ण करने के लिये हाइड्रोजन जोड़ते हैं।

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प्रश्न 2.
कार्बनिक यौगिक में उपस्थित नाइट्रोज न के आकलन की जेल्डॉल विधि का वर्णन निम्न शीर्षक में कीजिए –
1. सिद्धांत
2. चित्र
3. रासायनिक समीकरण
4. अवलोकन तथा गणना।
उत्तर:
जेल्डॉल विधि का सिद्धांत:
जब नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक पदार्थ की ज्ञात मात्रा लेकर उसे सान्द्र H2SO4 के साथ गर्म करते हैं तो कार्बनिक यौगिक में उपस्थित नाइट्रोजन, अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इसे NaOH के साथ गर्म करने पर NH3 गैस बनती है। इस NH3 गैस को मानक अम्ल जैसे H2SO4 के ज्ञात आयतन में अवशोषित कर लेते हैं । प्रयोग के पश्चात् H2SO4 का मानक क्षार के साथ अनुमापन कर अमोनिया की बची मात्रा का परिकलन कर लेते हैं। इस मात्रा से कार्बनिक पदार्थ में नाइट्रोजन की % मात्रा को ज्ञात किया जा सकता है।
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अवलोकन एवं गणना – माना कि:

  • कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = W gm
  • अमोनिया द्वारा उदासीन किये गये अम्ल का आयतन = Vml
  • अमोनिया द्वारा उदासीन किये गये अम्ल की नार्मलता = N

N नार्मल अम्ल के Vml = N नार्मल अमोनिया में Vml
∴ IN अमोनिया विलयन के 1000 ml में = 17 gm NH3 है या 14 gm N2 है।
1 ….. “….. Vml में नाइट्रोजन = \(\frac { 14 }{ 1000 }\) × Vgm
∴ N नार्मल अमोनिया विलयन के Vml में नाइट्रोजन = \(\frac { 14 }{ 1000 }\) × V × Ngm
Wgm पदार्थ में =\(\frac { 14 × V × N }{ 1000 }\) gm नाइट्रोजन है।
∴ ….. “….. 100 gm = \(\frac { 14 × V × N }{ 1000 }\) × \(\frac { 100 }{ W }\)
नाइट्रोजन का % = \(\frac { 14 × V × N }{ W }\)

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प्रश्न 3.
यौगिकों के आणविक द्रव्यमान ज्ञात करने की विक्टर मेयर विधि को चित्र सहित समझाइये।
उत्तर:
सिद्धांत:
इस विधि द्वारा वाष्पशील पदार्थों के आणविक द्रव्यमान ज्ञात किये जा सकते हैं। किसी वाष्पशील यौगिक की ज्ञात मात्रा को विक्टर नली में वाष्पित करने पर यौगिक की वाष्प अपने आयतन के बराबर वायु को विस्थापित करती है। वाष्पित वायु का आयतन तथा कमरे के ताप को नोट कर लेते हैं तथा गैस समीकरण की सहायता से इस आयतन को S.T.P. पर शुष्क वायु के आयतन में बदल लेते हैं। इस आयतन तथा यौगिक के द्रव्यमान से यौगिक की वाष्प घनत्व तथा आणविक द्रव्यमान की गणना की जा सकती है।

उपकरण:

  • ताँबे का बना हुआ बाहरी जैकेट
  • विक्टर मेयर नली जिसमें काँच की पार्श्व नली लगी होती है
  • अंशाकित सिलेण्डर
  • हॉफमैन बॉटल।

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गणना:
माना कि कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = Wgm, विस्थापित वायु का आयतन = Vml, वायुमण्डलीय दाब = P mm, कमरे का ताप = t°C या t + 273 K, t°C पर जलीय तनाव = t, शुष्क वायु का दाब = p – f, S. T. P. पर वाष्प का आयतन

प्रायोगिक अवस्था में:
P1 = p – f, V1 = Vml, T1 = t + 273
S. T. P. पर – P2 = 760, V2 = ? T2 = 273 K
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S.T.P. पर V2 ml वाष्प W gm पदार्थ से प्राप्त होती है।
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प्रश्न 4.
कार्बनिक यौगिक के शोधन की स्तम्भ क्रोमैटोग्राफी विधि को समझाइये।
उत्तर:
सिद्धांत:
किसी मिश्रण के विभिन्न अवयवों को किसी अधिशोषक पर अधिशोषित होने की क्षमता या शक्ति में भिन्नता होती है। अधिशोषण के आधार पर किसी मिश्रण में उपस्थित अवयवों को पृथक् करने –

(1) अधिशोषक स्तम्भ बनाना:
ब्यूरेट के समान एक लंबी नली में अधिशोषक पदार्थ जैसे – एलूमिना, जिप्सम, सिलिका जैल में से किसी एक का उचित विलायक में पेस्ट बनाकर नली में भर देते हैं। जब अधिशोषक जम जाता है तब विलायक को थोड़ी देर के लिये बहने दिया जाता है। पेस्ट बनाते समय उसी विलायक का प्रयोग करते हैं जिसमें पृथक्करण किये जाने वाले मिश्रण को विलेय किया जाता है।

(2) अधिशोषण प्रक्रम:
जिस पदार्थ या मिश्रण को अधिशोषित करना होता है उसे विलायक की अल्प मात्रा में विलेय करते हैं। इसके लिये अध्रुवीय विलायक जैसे बेंजीन, ईथर इत्यादि का उपयोग करते हैं। इस विलयन को अधिशोषक स्तम्भ से गुजरने दिया जाता है। मिश्रण का वह अवयव जो अधिक प्रबलता से अधिशोषित होता है वह इस स्तम्भ में सबसे ऊपर एक बैंड बनाता है तथा जो घटक सबसे कम अधिशोषित होता है वह सबसे बाद में बैंड बनाता है। इस प्रकार विभिन्न घटक इस अधिशोषक स्तम्भ में विभिन्न स्थानों पर अधिशोषित होकर भिन्नभिन्न रंगों की पट्टियाँ बनाते हैं।

निक्षालन:
इस पद में पदार्थ का अधिशोषण हो चुकने के बाद निक्षालक विलायक स्तम्भ में डालकर धीरे-धीरे नीचे की ओर बहने देते हैं तथा बहकर निकले हुए द्रव विलयनों को इकट्ठा करते जाते हैं । विलायकों को बढ़ती हुई ध्रुवता के क्रम में प्रयुक्त करते हैं। ये विलायक एक के बाद एक क्रम में डाले जाते हैं।

वह अवयव जो सबसे कम अधिशोषित होता है वह सबसे कम ध्रुवता वाले विलायक द्वारा निक्षालित होता है तथा जो सबसे अधिक अधिशोषित होता है वह अधिक ध्रुवता वाले विलायक द्वारा निक्षालित होता है। फिर इन विलायकों से इन अवयवों को आसवन विधि द्वारा पृथक् कर लिया जाता है।

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प्रश्न 5.
कार्बनिक क्षार के अणुभार ज्ञात करने की क्लोरोप्लेटिनेट विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सिद्धांत:
क्लोरोप्लेटिनिक अम्ल से कार्बनिक क्षार संयोग करके सामान्य सूत्र B2H2PtCl6 के अघुलनशील पदार्थ बनाते हैं। B क्षार के तुल्यांक को दर्शाता है। इस प्लेटिनम लवण में ज्वलन के पश्चात् धात्विक प्लेटीनम प्राप्त होता है।
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प्लेटीनम लवण एवं धात्विक प्लेटीनम दोनों के अलग-अलग भार होने पर क्षार का अणुभार ज्ञात कर लेते हैं।

विधि:
कार्बनिक क्षार को पहले तनु HCl से अभिकृत करके विलेय हाइड्रोक्लोराइड प्राप्त कर लिया जाता है। इसमें प्लेटीनिक क्लोराइड को मिलाकर क्षार के लवण को क्लोरोप्लेटीनेट के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। इसे धोकर सुखा लेते हैं। ज्ञात मात्रा को प्लेटीनम क्रूसीबल में लेकर गर्म करने के पश्चात् प्लेटीनम को क्रूसीबल में शेष पदार्थ के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। इससे क्षार का तुल्यांक भार ज्ञात कर लेते हैं।

गणना:
क्षार का तुल्यांक भार =E
प्लेटीनम लवण का भार = Wgm
प्लेटीनम का भार = xgm
B2H2PtCl6 का अणुभार = 2E + 2 + 195 + 213 = 2 E + 410
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प्रश्न 6.
कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन निर्धारण की ड्यूमा की विधि का सिद्धांत बताकर विवरण दीजिये।
उत्तर:
ड्यूमा विधि:
किसी नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक पदार्थ की निश्चित मात्रा को क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ CO2 के वायुमण्डल में दहन कराने पर C, H, S क्रमश: CO2H2O व SO2 में ऑक्सीकृत हो जाते हैं। नाइट्रोजन मुक्त अवस्था में प्राप्त होती है तथा साथ में नाइट्रोजन के ऑक्साइड कुछ मात्रा में बनते हैं।
C + 2CuO → CO2 + 2Cu
2H + CuO → H2O + Cu
नाइट्रोजन + CuO → N + नाइट्रोजन के ऑक्साइड

गैसीय मिश्रण को Cu की जाली पर प्रवाहित करने पर नाइट्रोजन के ऑक्साइड नाइट्रोजन में अपचयित हो जाते हैं। मुक्त नाइट्रोजन को HOH से भरे नाइट्रोमीटर में एकत्रित कर लेते हैं। HOH विलयन CO2, SO2, व H2O को अवशोषित कर लेती है। नाइट्रोमीटर में वायुमण्डलीय दाब व ताप पर N2 का आयतन ज्ञात कर इसे S.T.P. में परिवर्तित करके उससे नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कर लेते हैं।

अवलोकन व गणना:
कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = Wgm, नाइट्रोजन का आयतन = Vml, कमरे का ताप = t°C, वायुमण्डल का दाब = p mm, t°C ताप पर जलीय तनाव = f.

सामान्य ताप पर:
P1 = (p – f), V1 = Vml, T1 = t + 273
S. T. P. पर – P2 = 760 mm, V2 = ? T2 = 0 + 273,
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायनकुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें - 127

22, 400 ml S.T.P. पर N2 का द्रव्यमान 28gm है।
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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 5 नेताजी का तुलादान

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 5 नेताजी का तुलादान

नेताजी का तुलादान अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
नेताजी के तुलादान के अवसर पर सिंगापुर की सजावट का वर्णन कीजिए। (2012)
उत्तर:
नेताजी (सुभाषचन्द्र बोस) के तुलादान के अवसर पर सिंगापुर की सजावट की सुन्दरता चारों ओर बिखरकर सभी को विमुग्ध कर रही थी। सिंगापुर एक उपवन की रौनक को अपने अन्दर समेटे हुए था। इस दिन अर्थात् 23 जनवरी, सन् 1897 ई. को एक छोटी-सी कली चटककर खिली थी अर्थात् इस दिन सुभाष बाबू का जन्म हुआ था। हर एक व्यक्ति के चेहरे पर एक जोश, ताजगी छाई हुई थी। आज क्योंकि नेताजी का जन्म दिन है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में व्याप्त खुशी और उल्लास भरा वातावरण अपने आप में कहीं पर समा नहीं रहा है। अर्थात् लोगों के मन में खुशी और उल्लास का उफान उमड़ रहा है। इस प्रकार सिंगापुर का कोना-कोना मतवालेपन से भीगा हुआ सा लग रहा है। सिंगापुर की हर एक गली, बाजार और चौराहे जनता ने सजाए हुए थे। प्रत्येक घर में खुशी का मंगलाचार हो रहा था। बधाइयाँ परस्पर दी जा रही थीं। भारत के प्रत्येक प्रान्त के निवासियों ने खासकर युवतियों ने अपने पुराने वस्त्र उतारकर नये वस्त्र धारण किये हुए थे। प्रत्येक व्यक्ति देशभक्ति के और देश की आजादी के तराने गा रहा था।

प्रश्न 2.
‘नेताजी का था जन्म दिवस, उल्लास न आज समाता था’ के अनुसार सिंगापुर के निवासियों के जोश और उल्लास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सिंगापुर में युवक-युवतियाँ ढोलक-मंजीरें की तान पर अपने गीत गा रहे थे। वे सब गोल घेरे में बैठे हुए थे। वे सभी पठानी गीत स्वर और लय में गा रहे थे जिससे सभी के हृदय उत्साह से भर उठते थे। सिंगापुर नगर एक फुलवारी में बदल गया था। फुलवारी में भिन्न-भिन्न रंग और सुगन्ध के फूल एक साथ खिल उठते हैं और उसकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी तरह भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त के लोग किसी भी जाति, धर्म, वर्ण, वेश धारण किये हों, वे सभी आपस में भारत की शोभा बढ़ाने वाले नागरिक हैं। महाराष्ट्र, बंगाल आदि सभी प्रान्तों की विशिष्ट धर्माचरण करती हुईं महिलाएँ इकतारा पर ध्वनि निकाल रही थीं। समर्थ स्वामी रामतीर्थ के प्रेरणादायी शब्दों का गायन किया जा रहा था। उनके मन फूले नहीं समा रहे थे। अपने-अपने इष्ट से मनौती मना रही थीं कि सुभाषचन्द्र बोस चिरंजीवी हों, भारत अपनी आजादी प्राप्त करे। हे कात्यायनी दुर्गे, भारतवर्ष में प्रजातन्त्र फैल जाए। सिंगापुर का प्रत्येक स्त्री-पुरुष, बालक-बालिका, जवान और वृद्ध उल्लसित दीख रहा था।

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प्रश्न 3.
नेताजी के तुलादान में क्या-क्या वस्तुएँ अर्पित की गई थीं? (2015)
उत्तर:
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के तुलादान के लिए एक फूलों से सुसज्जित तुला सामने आई। तुलादान के लिए वहाँ ठोस पदार्थ लाए गये थे। सुभाष बाबू एक महान शक्ति के रूप में उस तुला के एक पलड़े में विराजमान थे। दूसरे पलड़े को सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात से बाजी लगाते हुए भरा जाता था। इस तुलादान के अवसर पर मन्त्रोचार से मण्डप को पवित्र किया गया था। सभी लोग प्रसन्न थे। चारों ओर शंखध्वनि मधुर-मधुर उठ रही थी। ऐसे सुखद और उत्साहवर्द्धक पवित्र बेला में कुन्दन के समान काया वाले सुभाष बाबू उस तुला के एक पलड़े से मुस्कान भर रहे थे।

सर्वप्रथम एक वृद्ध औरत ने स्वर्ण की ईंटों से तुलादान किया। गुजरात की एक माँ भी. पाँच ईंटें सोने की लाई थी। वहाँ उपस्थित सभी महिलाओं ने, युवतियों ने एक-एक करके अपने आभूषण उतारकर तुलादान में दिये। कोई तो अपनी मुदरी, छल्ले, कंगन, बाजूबन्द आदि का दान कर रही थी। किसी-किसी ने हार-मालाएँ, गले की जंजीरें, तलवार की सोने की गूंठें, सोने के सिक्के, कर्ण फूल, ताबीज आदि तुलादान में प्रदान कर दिये।

आज के दिन इतने स्वर्ण आदि का दान भी तुच्छा दिख रहा था क्योंकि हिन्दुस्तान भर में और प्रत्येक हिन्दुस्तानी के मन में बलिदान का जज्बा हावी था।

प्रश्न 4.
नेताजी ने टोपी उतारकर किस महिला का सम्मान किया था और क्यों? लिखिए। (2008, 09, 13)
उत्तर:
तुलादान के स्थल पर कप्तान लक्ष्मी को एक कोने से उसी समय कुछ सिसकियाँ सुनाई देने लगी। यह सिसकियाँ उस तरुणी की थी, जिसका पति कल ही युद्धस्थल पर कठिन काल के द्वारा निगल लिया गया था। उसका जूड़ा खुला हुआ था, उसकी आँखें सूजी हुई और लाल हो रही थीं। वह तरुणी अपने साथ धन सम्पत्ति लिए हुए थी; जिसे वह तुलादान में देने के लिए लेकर आई थी। नेताजी सुभाष बाबू ने जब उस तरुणी को देखा तो उन्होंने अपनी टोपी उतार ली और उस महिला का बहुत सम्मान किया। उसने अपने पति को आजादी की बलि वेदी पर कुर्बान कर दिया था। उस महिला ने अपने काँपते हाथों से तुला के पलड़े में अपना शीशफूल रख दिया। यह उस महिला के सौभाग्य का चिह्न था। जैसे ही उसने उस शीशफूल को पलड़े में रखा तो तुला का काँटा सहम गया और कम्पित होने लगा। (उस तरुणी का तुलादान सबसे गौरवशाली और गुरुतर था)। इसलिए नेताजी ने अपनी टोपी उतारकर उस तरुणी महिला का सम्मान किया था।

प्रश्न 5.
“हे बहन, देवता तरसेंगे, तेरे पुनीत पद वन्दन को।” किसने, किससे और क्यों कहा है? (2008, 14)
उत्तर:
“हे बहन! देवता तरसेंगे, तेरे पुनीत पद वन्दन को” यह कथन नेताजी श्री सुभाष बाबू का है। इन शब्दों को नेताजी ने उस तरुणी महिला से कहा है, जिसके पति का भारत माता की आजादी के लिए लड़ते-लड़ते बलिदान हो गया। उन्होंने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा कि “हम भारतवासी तुम्हारे इस करुण क्रन्दन को याद रखेंगे क्योंकि इससे हमें आजादी की लड़ाई में प्रेरणा मिलेगी।”

प्रश्न 6.
तराजू के पलड़े सम पर कैसे आये?
उत्तर:
तरुणी महिलाओं के सौभाग्यसूचक चिह्नों एवं स्वर्ण राशि को तुला के पलड़े में रखने पर भी पलड़े सम पर नहीं आए, तभी अपने शरीर से जर्जर हुई, काँपती एक वृद्धा अपनी छाती से लगाए हुए छिपाकर एक सुन्दर सा चित्र लेकर आई थी। वह वृद्धा व्याकुल थी। उसने कहा कि मैं अपने इकलौते पुत्र का चित्र लेकर आई हूँ। हे नेताजी ! यह मेरा सर्वस्व है, इसे लीजिए, ऐसा कहते हुए उस वृद्धा ने उस चित्र को पटक दिया तो चरमराकर शीशा टूट गया और चौखटा अलग हो गया। वह चौखटा स्वर्ण से निर्मित था। क्रोध में भरी शेरनी के समान उस वृद्धा ने गर्व से कहा कि मेरे बेटे ने आजादी के लिए फाँसी खाई थी। उसने मेरी कोख को कलंकित नहीं किया था। अब भी मेरा अन्य पुत्र होता तो उसे भी भारतमाता की भेंट चढ़ा देती। इसी बीच उस सोने के चौखटे को तुलादान के पलड़े में चढ़ाया तो तुला का काँटा सम पर आ गया। सुभाष बाबू उठे और उस वृद्धा के चरणों का स्पर्श करते हुए कहा कि “हे माँ ! मैं केवल आप जैसी माताओं के बलबूते पर धन्य हो गया।”

प्रश्न 7.
इस पाठ से हमें क्या प्रेरणा मिलती है ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ से हमें प्रेरणा मिलती है कि हम भारतवासी अपनी आजादी को अपना सर्वस्व निछावर करते हुए भी सुरक्षित रहेंगे। दुनिया में कोई भी हमारा शत्रु होगा तो हम उसे मुँह की खाने के लिए मजबूर कर देंगे तथा उसके मुख पर कालिख पोत देंगे।

‘भारत माता’ हमारी वन्दनीय माता है। हमने इसकी कोख से जन्म लिया है, इसकी मिट्टी, धान्य, जल और वायु से अपने आपको पोषित और पुष्ट किया है। बताओ फिर अपनी इस पुण्य प्रदायी माता की मुक्ति के लिए, उसकी आजादी की रक्षा के लिए हम किस महत्त्वपूर्ण वस्तु का बलिदान करने से मुख मोड़ेंगे? अर्थात् इसकी सुरक्षा के लिए अपने जीवन का दान करना भी कम महत्त्व का होगा, क्योंकि इस मातृभूमि के उपकार कहीं अधिकतर हैं, गुरुतर हैं।

नेताजी का तुलादान अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नेताजी का तुलादान’ कविता में नेताजी का जन्म दिवस किस देश में मनाने की बात कही गई है?
उत्तर:
उपर्युक्त कविता में नेताजी का जन्म दिवस सिंगापुर में बनाने की बात कही गई है।

प्रश्न 2.
इस कविता में नेताजी की किस प्रमुख सहयोगी एवं भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी का ज़िक्र आया है?
उत्तर:
इस कविता में नेताजी की प्रमुख सहयोगी और आजाद हिन्द फौज की महिला सिपाही कप्तान लक्ष्मी का ज़िक्र आया है।

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नेताजी का तुलादान पाठका सारांश

प्रस्तावना :
प्रात:काल का समय है, पूर्व दिशा से सूर्य की किरणें उगती हैं और सभी प्राणियों को आजादी का सन्देश देती हैं। उस सन्देश का अनुपालन सभी भारतीय करते हैं और आजादी के लिए प्रयास करने में जुट जाते हैं। प्रात:काल में खिली कली सभी लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरती है। सभी खुश हैं क्योंकि उस दिन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म दिन था। सिंगापुर की भूमि पर उनके जन्म दिन को मनाने के लिए लोग इकट्ठे हो रहे थे। हर गली, हर चौराहे पर, द्वार पर मंगलाचार हो रहे थे। सभी लोग अपनी-अपनी वेशभूषा में सुसज्जित थे। मदमस्त लोगों की भीड़ ढोलक, मंजीरे बजाकर नेताजी के जन्मोत्सव पर बधाइयाँ गा रही थीं। प्रत्येक प्रान्त के सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे थे। बसन्त का आगमन था।

परिचय :
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, सन् 1897 को कटक में हुआ था। भारतीय जन सुभाष की दीर्घ आयु, भारत की आजादी, भारत में प्रजातन्त्र के फलने-फूलने की कामना माँ कात्यायनी के मन्दिर में कर रहे थे। सुभाष जी ने ध्वज फहराया, तिरंगें फूलों का तुला बनाया गया। देश को आजाद कराने के लिए संकल्पित सैनिकों के संगठन के लिए धन की आवश्यकता को देश के प्रत्येक नागरिक ने अनुभव किया और नेताजी के जन्म दिन पर उनके भार के बराबर धन-सोना, चाँदी आदि सब कुछ एकत्र करने का विचार लोगों ने किया। इस धन से आजाद हिन्द फौज का संगठन किया गया। प्रत्येक महिला-युवती, विवाहिता, वृद्धा ने अपने सभी आभूषण तुलादान में प्रदान किए।

उत्साह :
प्रत्येक माँ ने, पत्नी ने, बहन ने, बाप ने, भाई ने अपने पुत्र, बेटे, पति, भाई को सैनिक रूप में सुभाष बाबू के जन्म दिन पर तुलादान में दे दिया। माँ ने बेटे को वचनबद्ध कराया कि वह मातृभूमि की आजादी की लड़ाई में अपनी माँ की पवित्र कोख को कलंकित नहीं करेगा। कुछ अपूती माँ दुर्गे महारानी से मनौती माँगती हैं कि माँ, मुझे पुत्रवती बना, मैं उसे अपनी भारत माता की भेंट चढ़ाना चाहती हूँ। तुलादान की क्रिया सम्पन्न हुई और नेताजी के वचन से भी अधिक धन तुलादान में प्राप्त हुआ।

उपसंहार :
चारों ओर स्वर गूंजने लगा कि दुश्मन जीवित नहीं रहेगा। भारत आजाद होकर रहेगा !!!

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 9 विविधा-1

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 9 विविधा-1

विविधा-1 अभ्यास

विविधा-1 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कौआ और कोयल में क्या समानता है?
उत्तर:
कौआ और कोयल दोनों में काले रंग की समानता है।

प्रश्न 2.
‘घर अन्धेरा’ से कवि का संकेत किस ओर है?
उत्तर:
‘घर अन्धेरा’ से कवि का संकेत है कि घर में निर्धनता जनित दुःखों का अन्धकार छाया है।

प्रश्न 3.
‘यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे बसते हैं।’ से कवि क्या कहना चाहते हैं? (2010)
उत्तर:
‘यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे बसते हैं।’ से कवि कहना चाहता है समाज इतना संवेदनहीन हो गया है कि किसी के दुःख-दर्द में न बोलना चाहता है और न सुनना चाहता है।

प्रश्न 4.
कवियों ने किसकी बोली का बखान किया है?
उत्तर:
कवियों ने मधुर स्वर वाली कोयल का बखान किया है।

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विविधा-1 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केले के पौधे को देखकर कवि को क्या अचम्भा होता है? (2016)
उत्तर:
दीनदयाल गिरि कवि को यह अचम्भा होता है कि रंभा मात्र एक जन्म के लिए रूप के गर्व से भर कर झूमती फिरती है। एक जीवन बहुत छोटा होता है, उसमें भी रूप का चमत्कार यौवन में ही रहता है। इस प्रकार यह बहुत अस्थायी तथा अल्पकालिक है। कवि मानते हैं कि रूप, धन आदि तो आते-जाते रहते हैं, ये स्थिर नहीं है। अतः इनके कारण व्यक्ति को गर्व नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 2.
‘यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।’ का आशय लिखिए।
उत्तर:
कवि दुष्यन्त कुमार ने संघर्ष भरे जीवन की यातनाओं को सटीक अभिव्यक्ति दी है। ‘यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।’ के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं कि निर्धनता और निर्बलता के दीन-हीन जीवन में दिन-रात यातनाएँ ही भरी रहती हैं। निर्धन का जीवन कष्टों के अन्धेरे में घिरा रहता है, क्योंकि यह पंक्ति रात्रि के बारह बजे के सन्दर्भ में कही है। अत: आशय यह है कि रात में नींद में आने वाले स्वप्नों में भी यातनाओं के मध्य से गुजरना होता है अर्थात् स्वप्न भी दुःख भरे ही आते हैं।

प्रश्न 3.
‘मिट्टी का भी घर होता है।’ इसका क्या अर्थ है? (2014)
उत्तर:
सामान्यतः घर ईंट, सीमेंट, चूना आदि से बनाये जाते हैं किन्तु अति निर्धन वर्ग मिट्टी के घर बनाकर रहता है। यद्यपि यह घर इतना मजबूत और टिकाऊ नहीं होता है जितना ईंट-सीमेंट का बना घर किन्तु घर तो होता ही है। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में एक घर का स्वप्न देखता है। निर्धनता के कारण वह अच्छा नहीं बना सकता है, तो घरौंदा ही सही रहने का सहारा तो होता ही है।

प्रश्न 4.
कौआ और कोयल का भेद कब ज्ञात होता है? (2017)
उत्तर:
सामान्यतः रंग, आकार, प्रकार की दृष्टि से कौआ और कोयल समान प्रकार के प्रतीत होते हैं। इनमें इतनी समानता होती है कि यदि कौआ कोयलों के बीच बैठ जाय तो उसे पहचानना कठिन होगा। दोनों का रंग काला होता है। बनावट, पंख आदि भी एक ही तरह के होते हैं किन्तु जब बोलते हैं तो दोनों का भेद स्पष्ट पता लग जाता है। कोयल की पीऊ-पीऊ बड़ी मधुर और कर्णप्रिय होती है, जबकि कौए की काँऊ-काँऊ बड़ी तीखी और कर्ण कट होती है।

विविधा-1 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुष्यन्त कुमार की गजलों के आधार पर कवि के विचार अधिकतम तीन बिन्दुओं में व्यक्त करें। (2012)
अथवा
“दुष्यन्त कुमार की गजलें आम आदमी की पीड़ा को जनमानस तक पहुँचाने में सफल हुई हैं।” विवेचना कीजिए। (2008, 09)
उत्तर:
इसके उत्तर के लिए ‘दुष्यन्त की गजलें’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

प्रश्न 2.
दीनदयाल गिरि की कुण्डलियों का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
इसके उत्तर के लिए ‘कुण्डलियाँ’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) करनी विधि …………….. अधीने।
(आ) वायस …………… बखानी।
(इ) कोई रहने …………….. घर होता है।
(ई) वे सहारे …………… प्यारे न देख।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में भाग्य के विधान की महिमा को उजागर किया गया है।

व्याख्या :
दीनदयाल कवि कहते हैं कि देखिए, ब्रह्मा के द्वारा रचित भाग्य के कार्य बड़े अद्भुत हैं, उनका वर्णन करना सम्भव नहीं है। हिरणी के बड़े सुन्दर नेत्र होते हैं, वह बड़ी आकर्षक होती है फिर भी वह दिन-रात जंगलों में मारी-मारी फिरती है। वह वन में रहते हुए अनेक बच्चों को जन्म देती है। दूसरी ओर कोयल काले रंग वाली होती है फिर भी सारे कौए उसके वशीभूत होते हैं। कवि बताते हैं कि दिनों की टेक को देखकर धैर्य धारण करना चाहिए। भाग्य के विधान से प्रिय के मध्य रहते हुए भी विरह की अवस्था बनी रहती है। भाग्य बहुत बलवान होता है।

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि नीच व्यक्ति भले ही सज्जनों के मध्य पहुँच जाय किन्तु वह अपने नीच स्वभाव को नहीं छोड़ता है।

व्याख्या :
कवि दीनदयाल कहते हैं कि हे कौए ! तू कोयलों के बीच बैठकर स्वयं पर क्यों गर्व करता है। वंश के स्वभाव से तुम्हारे बोलते ही पहचान हो जाएगी कि तुम मृदुभाषी कोयल नहीं, कौए हो। तुम्हारी वाणी तीखी, कर्ण कटु है जबकि जिनके बीच तुम बैठे हो वे कोयल पंचम स्वर में बड़ी मधुर ध्वनि करती हैं जिसकी प्रशंसा बड़े-बड़े कवियों ने की है। कवि स्पष्ट करते हैं ‘कि कौए के सामने कोई दूध की बनी स्वादिष्ट खीर ही क्यों न परोस दे, पर स्वभाव से नीच ये कौए उसे छोड़कर गन्दी चीजें खाये बिना नहीं मानेंगे। आशय यह है कि नीच स्वभाव का व्यक्ति अपनी स्वाभाविक नीचता को नहीं छोड़ पाता है।

(इ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इन गजलों में यथार्थ जीवन की यातनाओं का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
दिन तो सांसारिक संघर्ष में कटता ही है किन्तु रात भी कष्ट में ही गुजरती है। नित्य प्रति जब रात को बारह बजने के घण्टे बजते हैं। उस समय भी व्यक्ति कष्टों के अन्धकार से गुजर रहा होता है अर्थात् रात में आने वाले स्वप्न भी उसे यातनाएँ ही देते हैं।

मेरे जीवन के जो स्वप्न हैं उनके लिए इस संसार में नया कोई स्थान उपलब्ध है क्या? अर्थात् कोई जगह नहीं है। इसलिए स्वप्नों के लिए घरौंदा ही ठीक है। चाहे वह मिट्टी का ही सही, घर तो है।

जीवन की यातनाओं ने ये हालत कर दी है कि कभी सिर से लेकर छाती तक, कभी पेट से लेकर पाँव तक पीड़ा होती है और वास्तविकता यह है कि एक जगह होता हो तो बताया जाय कि इस स्थान पर दर्द होता है। नीचे से ऊपर तक बाहर से भीतर तक, सब जगह दर्द ही दर्द है।

(ई) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में व्यक्ति को संघर्षशील संसार में अकेले ही सामना करने के लिए प्रेरित किया गया है।

व्याख्या :
कवि व्यक्ति को हिम्मत बँधाते हुए कहते हैं कि अब तक जिन सहारों से इस जगत का सामना कर रहे थे, अब वे भी नहीं रहे हैं। अब तो तुम्हें स्वयं के बल पर जीवन का युद्ध लड़ना है। जो हाथ कट चुके हैं अर्थात् जो सम्बन्ध समाप्त हो चुके हैं अब उन सहारों के सहयोग की अपेक्षा करना व्यर्थ है। अब तो अपने आप ही परिस्थितियों का सामना करना होगा।

संघर्षशील जीवन में मनोरंजन भी आवश्यक है किन्तु इतना मनोरंजन नहीं कि कठोर जगत को भूल कल्पना की उड़ानें भरनी प्रारम्भ कर दी जायें। विकास के लिए भविष्य के स्वप्न देखना आवश्यक है, किन्तु इतने प्यारे स्वप्न नहीं कि उन्हीं में डूबकर रह जायें। स्वप्न को साकार करने के लिए प्रत्यक्ष यथार्थ का सामना करने की क्षमता भी आवश्यक है।

विविधा-1 काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिएकोयल, कौआ, मोर, बादल।
उत्तर:
कोयल – पिक, कोकिला
कौआ – काक, वायस
मोर – मयूर, केकी
बादल – मेघ, जलद।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए
हकीकत, खौफ, इजाजत, सफर, जिस्म, जलसा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 9 विविधा-1 img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित मुहावरों और लोकोक्तियों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
गागर में सागर भरना, का वर्षा जब कृषि सुखाने, टेढ़ी खीर होना, ऊँट के मुँह में जीरा, दाँत खट्टे करना, अधजल गगरी छलकत जाय।
उत्तर:
गागर में सागर भरना – बिहारी ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया है।
का वर्षा जब कृषि सुखाने – मरीज की मृत्यु हो गई तब डॉक्टर आने लगा, तो घर वालों ने कह दिया का वर्षा जब कृषि सुखाने।
टेढ़ी खीर होना – पाकिस्तान के अड़ियल रवैये के कारण कश्मीर समस्या को हल करना टेढ़ी खीर हो गया है।
ऊँट के मुँह में जीरा – दारासिंह के लिए दो सौ ग्राम दूध ऊँट के मुँह में जीरे की तरह है।
दाँत खट्टे करना – 1962 के युद्ध में भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सैनिकों के दाँत खट्टे कर दिये थे।
अधजल गगरी छलकत जाय – राजेश शहर से पढ़कर गाँव में आया तो बड़ी-बड़ी बातें करने लगा। उसकी बातों को सुनकर एक वृद्ध ने कह ही दिया कि अधजल गगरी छलकत जाय।

प्रश्न 4.
‘कुण्डलियाँ’ छन्द किन मात्रिक छन्दों के योग से बनता है? उदाहरण देकर समझाइये।
उत्तर:
कुण्डलियाँ’ छन्द दोहा और रोला मात्रिक छन्दों के योग से बनता है।
करनी विधि की देखिये, अहो न बरनी जाति।
हरनी के नीके नयन बसै बिपिन दिन राति।।
बसै बिपिन दिनराति, बराबर बरही कीने। कारी
छवि कलकंठ किये फिर काक अधीने।।
बरनै दीनदयाल धीर धरते दिन धरनी।
बल्लभ बीच वियोग, विलोकहु विधि की करनी।।

प्रश्न 5.
सही विकल्प छाँटिए
(अ) कोकिला शब्द है-(तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी)
(ब) वायस का अर्थ है-(तोता, कौआ, बाज, कबूतर)
उत्तर:
(अ) तद्भव
(ब) कौआ।

प्रश्न 6.
दुष्यन्त कुमार की गजलों की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान समय के सामाजिक यथार्थ को सशक्त अभिव्यक्ति देने वाले दुष्यन्त कुमार की गजलों में भाव एवं कला पक्ष की विभिन्न विशेषताएँ उपलब्ध हैं।

सामाजिक यथार्थ का चित्रण :
दुष्यन्त कुमार का समाज की विषमताजन्य समस्याओं से पूरा परिचय है। अर्थ, कार्य, भोजन, आवास आदि की भिन्नताएँ उन्हें बैचेन करती हैं। वे कह उठते हैं-
रोज जब रात को बारह बजे का गजर होता है
यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।।

दीन-हीन की पीड़ा का वर्णन :
निम्न वर्ग के प्रति सहानुभूति रखने वाले दुष्यन्त कुमार की गजलों में विविध प्रकार की यातनाओं का सजीव अंकन हुआ है। यातनाओं के कारण दर्द की यह स्थिति होती है-
सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी।
एक जगह हो तो कहें, दर्द इधर होता है।।

संघर्षशील होने की प्रेरणा-दुष्यन्त पलायनवादी नहीं हैं। वे मानते हैं कि समस्याओं का डटकर सामना करना चाहिए। वे कहते हैं-
अब यकीनन ठोस है धरती, हकीकत की तरह।
वह हकीकत देख, लेकिन खौफ के मारे न देख।।

स्वाभाविक अभिव्यक्ति :
दुष्यन्त कुमार सीधी, सरल, सपाट भाषा में प्रभावी ढंग से अपनी बात कहते हैं। चमत्कार या आडम्बरों के लिए उनकी गजलों में कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार दुष्यन्त कुमार का काव्य भाव एवं कला दोनों दृष्टियों से सशक्त अभिव्यक्ति की क्षमता रखता है।

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कुण्डलियाँ भाव सारांश

विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहने में कुशल दीनदयाल गिरि की कुण्डलियों में जीवन के अनुभव का सार समाहित है। उन्होंने नीति पर बड़ी सटीक बातें कही हैं। थोड़े ही दिन के रूप सौन्दर्य पर गर्व न करने की नीति बताते हुए वे कहते हैं कि रूप तथा सौन्दर्य तो अस्थायी तथा क्षणिक है। गुणों के महत्त्व को उजागर करते हुए वे बताते हैं कि कौए का कोयलों के बीच बैठकर गर्व करना व्यर्थ है क्योंकि जैसे ही वह बोलेगा, उसकी पहचान कर्णकटु वाणी से हो जायेगी। कोयल सुमधुर स्वर में पीऊ-पीऊ करेगी तो वह तीखी ध्वनि में काँऊ-काँऊ करेगा। उसे कितनी ही स्वादिष्ट खीर क्यों न खिलाई जाय, वह गन्दी चीज खाये बिना नहीं मानेगा। इसी प्रकार अवगुणी गुणवानों के मध्य अपने दुर्गुणों से शीघ्र प्रकट हो जायेगा। भाग्य की महिमा को उजागर करते हुए कवि ने कहा है कि विधि का विधान बड़ा विचित्र है उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है।

हिरणी बहुत सुन्दर नेत्रों वाली होकर दिन-रात वनों में घूमती-फिरती है। वह वहाँ प्रसूता होकर कष्ट भोगती रहती है जबकि कोयल श्याम वर्ण की होते हुए भी सभी कौओं को अपने वश में रखती है। इस प्रकार कवि ने इन पद्यों से व्यावहारिक अनुभव के आधार पर नीतिपरक ज्ञान बढ़ाने का सफल प्रयास किया है।

कुण्डलियाँ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] रंभा ! झूमत हौं कहा थोरे ही दिन हेत।
तुमसे केते है गए अरु कै हैं इहि खेत।।
अरु कै हैं इहि खेत मूल लघु साखा हीने।
ताहू पै गज रहे दीठि तुमरे प्रति दीने।।
बरनै दीनदयाल हमें लखि होत अचंभा।
एक जन्म के लागि कहा झुकि झूमत रंभा।।

शब्दार्थ :
रंभा – सुन्दरी, रूप सौन्दर्य के लिए विख्यात एक अप्सरा; हेत = प्रेम; केते = कितने; 8 गए = हो गये; इहि = इस; खेत = क्षेत्र, संसार; मूल = जड़; साखा = टहनियाँ; हीने = रहित; दीठिगज = हाथी दिखाई दे रहे; लखि = देखकर; अचम्भा = आश्चर्य; लागि = लिए।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक के विविधा भाग-1′ के ‘कुण्डलियाँ’ शीर्षक से उद्धृत है। इसके रचयिता दीनदयाल गिरि हैं।

प्रसंग :
इस पद्य में अल्पकालीन रूप सौन्दर्य पर गर्व न करने का परामर्श दिया गया है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि रंभा समान रूपवान हे सुन्दरी ! तुम गर्व से युक्त होकर मदमस्त होकर क्यों घूम रही हो? यह प्रेम थोड़े दिन का ही है। रूप स्थायी नहीं होता है। तुम कोई अकेली रूपवान नहीं हो। इस संसार में तुम जैसे पता नहीं कितने हो चुके हैं और भविष्य में कितने ही होंगे। इस संसार में होने वाले ये रूपवान अस्थिर होते हैं। न इनकी जड़ें होतीं न शाखाएँ अर्थात् ये तो अल्पकालीन हैं, स्थिर रहने वाले नहीं हैं। इस पर भी मोहित होने वाले युवक रूपी हाथी भी तुम्हारे प्रति उदास ही दिखाई दे रहे हैं। दीनदयाल कवि बताते हैं कि हमें यह जानकर आश्चर्य होता है कि मात्र एक जन्म के अल्पकाल के लिए प्राप्त रूप सौन्दर्य पर सुन्दरी गर्व से भरकर झूमती हुई घूम रही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. अस्थायी रूप सौन्दर्य पर गर्व न करने का वर्णन है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  3. सरल, सुबोध एवं भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[2] वायस ! तू पिक मध्य खै कहा करै अभिमान।
है हैं बस सुभाव की बोलत ही पहिचान।।
बोलत ही पहिचान कानकटु तेरी बानी।
वे पंचम धुनि मंजु करैं जिहिं कविन बखानी।।
बरनै दीनदयाल कोऊ जौ परसौ पायस।
तऊन न तजै मलीन मलिन खाये बिन वायस।।

शब्दार्थ :
वायस = कौआ; पिक = कोयल; मध्य = बीच; बंस = वंश, कुल; कानकटु = कर्ण कटु, कठोर; बानी = वाणी; मंजु = मनोहर; जिहिं = जिसका; बखानी = प्रशंसा, वर्णन किया है; परसो = परोस दो; पायस = खीर, दूध का बना स्वादिष्ट पदार्थ; तऊन = तो भी; तजै = छोड़ता है; मलीन = नीच; मलिन = गन्दा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि नीच व्यक्ति भले ही सज्जनों के मध्य पहुँच जाय किन्तु वह अपने नीच स्वभाव को नहीं छोड़ता है।

व्याख्या :
कवि दीनदयाल कहते हैं कि हे कौए ! तू कोयलों के बीच बैठकर स्वयं पर क्यों गर्व करता है। वंश के स्वभाव से तुम्हारे बोलते ही पहचान हो जाएगी कि तुम मृदुभाषी कोयल नहीं, कौए हो। तुम्हारी वाणी तीखी, कर्ण कटु है जबकि जिनके बीच तुम बैठे हो वे कोयल पंचम स्वर में बड़ी मधुर ध्वनि करती हैं जिसकी प्रशंसा बड़े-बड़े कवियों ने की है। कवि स्पष्ट करते हैं ‘कि कौए के सामने कोई दूध की बनी स्वादिष्ट खीर ही क्यों न परोस दे, पर स्वभाव से नीच ये कौए उसे छोड़कर गन्दी चीजें खाये बिना नहीं मानेंगे। आशय यह है कि नीच स्वभाव का व्यक्ति अपनी स्वाभाविक नीचता को नहीं छोड़ पाता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. नीच व्यक्ति कितना ही अच्छे लोगों के पास पहुँच जाय, पर स्वाभाविक नीचता उसमें बनी ही रहती है।
  2. कौआ नीच व्यक्तियों का तथा कोयल श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रतीक हैं।
  3. निनोक्ति, अनुप्रास अलंकार।
  4. सरल, सुस्पष्ट ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

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[3] करनी विधि की देखिये, अहो न बरनी जाति।
हरनी के नीके नयन बसै बिपिन दिनराति।।
बसै बिपिन दिनराति बराबर बरही कीने।
कारी छवि कलकण्ठ किये फिर काक अधीने।।
बरनै दीनदयाल धीर धरते दिन धरनी।
बल्लभ बीच वियोग, विलोकहु विधि की करनी।। (2009)

शब्दार्थ :
विधि = भाग्य; बानी = वर्णित करना; हरनी = हिरणी; नीके = सुन्दर, भले; करनी = कार्य; नयन = नेत्र; बिपिन = वन, जंगल; बरही = प्रसूता, बच्चों को जन्म देने वाली; छवि = शोभा; कलकण्ठ= सुन्दर गला, कोयल; काक = कौए; अधीने = वश में; धीर = धैर्य; बल्लभ = प्रिय; विलोकहु = देखिए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में भाग्य के विधान की महिमा को उजागर किया गया है।

व्याख्या :
दीनदयाल कवि कहते हैं कि देखिए, ब्रह्मा के द्वारा रचित भाग्य के कार्य बड़े अद्भुत हैं, उनका वर्णन करना सम्भव नहीं है। हिरणी के बड़े सुन्दर नेत्र होते हैं, वह बड़ी आकर्षक होती है फिर भी वह दिन-रात जंगलों में मारी-मारी फिरती है। वह वन में रहते हुए अनेक बच्चों को जन्म देती है। दूसरी ओर कोयल काले रंग वाली होती है फिर भी सारे कौए उसके वशीभूत होते हैं। कवि बताते हैं कि दिनों की टेक को देखकर धैर्य धारण करना चाहिए। भाग्य के विधान से प्रिय के मध्य रहते हुए भी विरह की अवस्था बनी रहती है। भाग्य बहुत बलवान होता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. विधि के विधान की महिमा का वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रभावी प्रयोग हुआ है।

दुष्यन्त की गजलें भाव सारांश

दुष्यन्त कुमार को हिन्दी में गजल को प्रतिष्ठित कराने का श्रेय प्राप्त है। वे सामाजिक यथार्थ के कुशल चितेरे हैं। अपने समय के समाज की विषमताओं पर करारे प्रहार करते हुए उन्होंने संघर्ष की प्रेरणा दी है।

(1) सामान्य जन को सजग करते हुए वे बताते हैं कि विविध प्रकार के प्रचार-प्रसार आज समाज में चल रहे हैं, तुझे उन सबके झमेले में फंसने से पहले अपने स्वयं के घर-परिवार की कठिनाइयों का समाधान करना है। संसार विशाल है। उसमें स्वयं में करने की जो क्षमता है, उसी अनुसार सचेष्ट होना है। जीवन के यथार्थ संघर्षों से बिना घबराये स्वयं की शक्ति से जूझना है कोरी कल्पनाओं में विचरण नहीं करना है-
दिल को बहला ले इजाजत है, मगर इतना न उड़।
आज सपने देख लेकिन, इस कदर प्यारे न देख।।

(2) संघर्षशील निम्न तबके को दिन-रात कष्टों से ही गुजरना होता है। उनके नींद में आने वाले स्वप्न भी संकटों से भरे होते हैं। जीवन में व्यक्ति की कामना होती है कि उसका भी एक निवास हो, चाहे वह मिट्टी का ही क्यों न हो। यातनाओं की पीड़ा सिर से पाँव तक एक-एक अंश में व्याप्त रहती है। कवि कहते हैं-
सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी।
एक जगह हो तो, कहें दर्द उधर होता है।।

जब किसी हताश व्यक्ति से मिलन हो जाता है तो लगने लगता है कि जीवन में सफल होना सम्भव नहीं । आज तो स्थितियाँ ही भयावह हो गयी हैं। घूमने निकलने पर भी पथराव के शिकार हो सकते हैं।

(3) निर्धनता कमर तोड़ देती है और व्यक्ति नमन की तरह झुक जाता है। विषम व्यवस्था में बँटवारा उचित न होने से एक वर्ग कष्ट ही पाता रहता है। निर्धनता से ग्रस्त को अपने मरण का भी बोध नहीं होता है। जबकि अन्य उसके विषय में जानने के लिए परेशान रहते हैं। शहरों के शोर-शराबे पशुओं के हाँके की तरह लगते हैं। आज की स्वार्थपरता ने मनुष्य को जड़ बना दिया है। उसकी संवेदनाएँ मर चुकी हैं।

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दुष्यन्त की गजलें संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
घर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख, पतवारें न देख
अब यकीनन ठोस है धरती, हकीकत की तरह
वह हकीकत देख, लेकिन खौफ के मारे न देख

शब्दार्थ :
आकाश के तारे देखना = कल्पनाजीवी होना; दरिया = नदी, सागर; बाजुओं = भुजाओं; पतवारें = नाव में पीछे की ओर लगी डण्डी; यकीनन = निःसन्देह; हकीकत = वास्तविकता; खौफ = भय।।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘विविधा भाग-1’ के ‘दुष्यन्त की गजलें’ शीर्षक से अवतरित है। इसके रचयिता दुष्यन्त कुमार हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में व्यक्ति को यथार्थ का सामना करते हुए सचेष्ट होने की प्रेरणा दी गयी है।

व्याख्या :
दुष्यन्त कुमार ने यथार्थपरक होने का उद्बोधन देते हुए कहा कि आज सड़कों पर अनेक प्रकार के नारे लिखे हैं। व्यक्ति को सड़क के नारों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। उसके लिए यह आवश्यक कि वह अपने घर के कष्टों के अन्धकार को दूर करने पर ध्यान दे। वह कल्पनाजीवी न होकर यथार्थवादी बने।

जगत का सागर बड़ा विस्तृत और विशाल है। वह बहुत दूर तक फैला है। उसे पार करने के लिए व्यक्ति को अपनी भुजाओं के बल को देखना है, न कि नाव की पतवारों को अर्थात् व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से संसार रूपी सागर को पार कर पायेगा, पतवारों से नहीं।

प्रत्यक्ष सत्य है कि जगत बहुत ही कठोर है। यहाँ जीवनयापन करना सरल नहीं है। इस सत्य को जानकर संसार से भयभीत न होकर उसका सामना करना है अर्थात् संघर्षशील जगत में घबराने से काम नहीं चलेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ यथार्थ से सामना करने की प्रेरणा दी गयी है।
  2. उपमा, अनुप्रास अलंकार।
  3. विषय के अनुरूप लाक्षणिक भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शैली बहुत प्रभावशाली है।

[2] वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख
दिल को बहला ले, इजाजत है, मगर इतना न उड़
आज सपने देख, लेकिन इस कदर प्यारे न देख

शब्दार्थ :
जंग = युद्ध; इजाजत = अनुमति; मगर = परन्तु; कदर = तरह।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में व्यक्ति को संघर्षशील संसार में अकेले ही सामना करने के लिए प्रेरित किया गया है।

व्याख्या :
कवि व्यक्ति को हिम्मत बँधाते हुए कहते हैं कि अब तक जिन सहारों से इस जगत का सामना कर रहे थे, अब वे भी नहीं रहे हैं। अब तो तुम्हें स्वयं के बल पर जीवन का युद्ध लड़ना है। जो हाथ कट चुके हैं अर्थात् जो सम्बन्ध समाप्त हो चुके हैं अब उन सहारों के सहयोग की अपेक्षा करना व्यर्थ है। अब तो अपने आप ही परिस्थितियों का सामना करना होगा।

संघर्षशील जीवन में मनोरंजन भी आवश्यक है किन्तु इतना मनोरंजन नहीं कि कठोर जगत को भूल कल्पना की उड़ानें भरनी प्रारम्भ कर दी जायें। विकास के लिए भविष्य के स्वप्न देखना आवश्यक है, किन्तु इतने प्यारे स्वप्न नहीं कि उन्हीं में डूबकर रह जायें। स्वप्न को साकार करने के लिए प्रत्यक्ष यथार्थ का सामना करने की क्षमता भी आवश्यक है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यथार्थ जगत में विकास के लिए व्यक्ति को स्वयं की क्षमता का विस्तार करना आवश्यक है।
  2. लाक्षणिकता से युक्त खड़ी बोली में बड़े प्यारे ढंग से विषय को प्रस्तुत किया गया है।

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[3] रोज जब रात को बारह का गजर होता है
यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।
कोई रहने की जगह है मेरे सपनों के लिए
वो घरौंदा सही, मिट्टी का भी घर होता है।
सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी
एक जगह हो तो कहें, दर्द इधर होता है।

शब्दार्थ :
रोज = प्रतिदिन; गजर = हर घण्टे पर बजने वाले घण्टे; यातनाओं = मुसीबतों, कष्टों; सफर = यात्रा; घरौंदा = बच्चों के द्वारा खेलने को बनाया गया मिट्टी का छोटा घर; दर्द = पीड़ा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इन गजलों में यथार्थ जीवन की यातनाओं का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
दिन तो सांसारिक संघर्ष में कटता ही है किन्तु रात भी कष्ट में ही गुजरती है। नित्य प्रति जब रात को बारह बजने के घण्टे बजते हैं। उस समय भी व्यक्ति कष्टों के अन्धकार से गुजर रहा होता है अर्थात् रात में आने वाले स्वप्न भी उसे यातनाएँ ही देते हैं।

मेरे जीवन के जो स्वप्न हैं उनके लिए इस संसार में नया कोई स्थान उपलब्ध है क्या? अर्थात् कोई जगह नहीं है। इसलिए स्वप्नों के लिए घरौंदा ही ठीक है। चाहे वह मिट्टी का ही सही, घर तो है।

जीवन की यातनाओं ने ये हालत कर दी है कि कभी सिर से लेकर छाती तक, कभी पेट से लेकर पाँव तक पीड़ा होती है और वास्तविकता यह है कि एक जगह होता हो तो बताया जाय कि इस स्थान पर दर्द होता है। नीचे से ऊपर तक बाहर से भीतर तक, सब जगह दर्द ही दर्द है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. विपरीत परिस्थितिजन्य यथार्थ यातनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई हैं।
  2. रूपक, अनुप्रास अलंकार।
  3. सशक्त खड़ी बोली में किये गये सटीक कथन सहज ही प्रभावित करते हैं।

[4] ऐसा लगता है कि उड़कर भी कहाँ पहुँचेंगे,
हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है।
सैर के वास्ते सड़कों पे निकलते थे,
अब तो आकाश से पथराव का डर होता है।

शब्दार्थ :
पर = पंख; सैर = भ्रमण; वास्ते = लिए। सन्दर्भ-पूर्ववत्। प्रसंग-इन गजलों में वर्तमान की यथार्थ परिस्थितियों का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जीवन के उत्थान के लिए कल्पना की उड़ानें भी आवश्यक हैं। किन्तु उनका पूरा होना आवश्यक नहीं है। इसलिए कवि कहते हैं कि जब हमारे हाथ कोई टूटा हुआ पंख होता है तो प्रतीत होने लगता है कि हम कल्पना की उड़ान भरकर भी वहाँ पहुँच पायेंगे? टूटा हुआ पंख उड़ान की असफलता का द्योतक है। अत: उड़ान पूरा हो पाना आवश्यक नहीं है।

अराजकतापूर्ण स्थिति की विषमता को उजागर करते हुए कवि कहते हैं कि पहले भ्रमण के लिए सड़कों पर निकला करते थे परन्तु अब तो इतनी भयानक स्थिति हो गयी है कि भ्रमण के लिए निकलें और आसमान से पत्थरों की वर्षा प्रारम्भ हो जाये। अतः भ्रमण को निकलना भी खतरनाक है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. विषम स्थिति का अंकन हुआ है।
  2. विषय को उजागर करने में सक्षम लाक्षणिक एवं व्यंजक भाषा का प्रयोग हुआ है।

[5] ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।
यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशां हैं, वहाँ पर क्या हुआ होगा। (2008)

शब्दार्थ :
जिस्म = शरीर; सजदे = झुककर नमन करना; गजब = परेशानी। सन्दर्भ-पूर्ववत्। प्रसंग-यथार्थ जगत के कष्टों का सटीक अंकन इन गजलों में हुआ है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि आपको धोखा हो गया होगा कि मैं झुककर नमन कर रहा हूँ। मैं सजदे में नहीं था। हो सकता है यथार्थ जगत की नाना प्रकार की यातनाओं के भार के कारण मेरा शरीर झुककर दोहरा हो गया हो।
जगत की विषम व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए कवि कहते हैं कि यहाँ तक पहुँचते-पहुंचते अनेक नदियाँ सूख जाती हैं अर्थात् विभिन्न साधन यहाँ नहीं आ पाते हैं। मुझे पता है कि इन नदियों का पानी अर्थात् दिए गये साधन-सुविधाओं को कहाँ पर रोक लिया गया होगा। आशय यह है कि अव्यवस्था के कारण जहाँ तक कुछ पहुँचना चाहिए वहाँ तक कुछ पहुँचता ही नहीं है, बीच में ही झपट लिया जाता है।

दीन-हीन निर्बल वर्ग निरन्तर मरता जाता है किन्तु परेशानी यह है कि यह वर्ग अपने मरने की आहट को सुन भी नहीं पाता है अर्थात् इस वर्ग के साथ जो अन्याय, अत्याचार हो रहे हैं उनका आभास उन्हें नहीं हो पाता है। दूसरे जो उनके हितों पर आघात करते हैं, उनको मारने के काम करते हैं वे यह जानने को परेशान हैं कि निर्बल वर्ग में क्या प्रतिक्रिया हो रही होगी?

काव्य सौन्दर्य :

  1. यथार्थ जगत की विषमता से उत्पन्न यातनाओं का व्यंग्यात्मक अंकन हुआ है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार।
  3. उर्दू मिश्रित खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

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[6] तुम्हारे शहर में ये शोर सुन सुन कर तो लगता है
कि इन्सानों के, जंगल में कोई हाँका हुआ होगा।
कई फाके बिताकर मर गया, जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा।
यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा। (2008)

शब्दार्थ :
इन्सानों = आदमियों; हाँका = जोर से पुकारना, हुँकार; फाके = भूखे रहकर; गूंगे = बोल न पाने वाले, मूक; बहरे = सुन न पाने वाले; जलसा = अधिवेशन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद्यांश में यथार्थ जीवन की संवेदनहीनता का सटीक अंकन हुआ है।

व्याख्या :
आज के कौलाहल से पूर्ण नगरीय जीवन पर व्यंग्य करते हुए कवि कहते हैं कि तुम्हारे नगर में हो रहे शोर-शराबे को सुनकर तो यह लगता है कि जैसे जंगल में पशुओं का हाँका होता है, ऐसे ही मनुष्यों के जंगल में कोई चिल्ल-पुकार हो रही होगी।

विषम अर्थव्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए कवि ने कहा है कि कई दिनों तक बिना भोजन के रहने के कारण भूख से उसकी मृत्यु हो गयी और लोग उसके बारे में अन्यान्य बातें कह रहे हैं कि इस प्रकार न होकर इस प्रकार उसकी मौत हुई होगी।

संवेदनहीनता पर कटाक्ष करते हुए कवि ने कहा है कि यहाँ पर रहने वाले सभी गूंगे और बहरे हैं। किसी के दुःख-दर्द में न कोई बोलता है न कोई सुनता है। इस प्रकार के माहौल में ईश्वर ही जाने कि किस प्रकार समाज का संचालन हो रहा होगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. आधुनिक जीवन की विविध जड़तामय स्थितियों का सटीक अंकन हुआ है।
  2. उर्दू मिश्रित खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति हुई है।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 4 असफलता दिखाती है नयी राह

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 4 असफलता दिखाती है नयी राह

असफलता दिखाती है नयी राह अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
डॉ. कलाम बचपन में कौन-सी पौराणिक कहानी सुना करते थे? उसका उन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
डॉ. कलाम को उनके पिताजी अबूबेन आदम की एक पौराणिक कथा सुनाया करते थे। एक रात अबू एक सपना देखकर जाग जाता है। सपने में वह देखता है कि एक फरिश्ता सोने की किताब में उन लोगों के नाम लिख रहा है जो ईश्वर से प्यार करते हैं। अबू उस फरिश्ते से पूछता है कि क्या खुद उसका नाम भी इस सूची में है। इस पर फरिश्ता नकारात्मक उत्तर देता है। तब निराश मगर खुशी से अबू कहता है कि मेरा नाम उनमें लिख दो, जो उसके अनुयायियों से प्रेम करते हैं। फरिश्ते ने नाम लिख दिया और गायब हो गया। अगली रात फिर फरिश्ता आया और उन लोगों के नाम दिखाए जिन्हें ईश्वर के प्रेम से आशीर्वाद मिला था। इसमें अबू का नाम सबसे ऊपर था।

इस पौराणिक कहानी का कलाम पर इतना प्रभाव पड़ा कि वे प्रत्येक जगह ईश्वर की उपस्थिति मानते थे और यह मानते थे कि सभी प्राणी ईश्वर की कृति हैं। उन्हें परस्पर सभी से प्रेम करना चाहिए। इन्हें अल्लाह में गहरी आस्था है।

प्रश्न 2.
परिवार में लगातार होने वाली मौतों के बाद, डॉ. कलाम की दिनचर्या में क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर:
डॉ. कलाम के परिवार में लगातार तीन वर्ष तक तीन मौतें हो जाने के बाद, उनमें अपने काम के प्रति पहले से ज्यादा प्रतिबद्धता आ गई। उन्होंने अपने लिए वह सब कुछ तलाश लिया था जिससे उन्हें आगे बढ़ना था, तरक्की करनी थी। एस. एल. वी. डॉ. कलाम के लिए एक ईश्वर द्वारा प्रदत्त मिशन था। इसके क्षेत्र में प्रगति करना उनका उद्देश्य था, ध्येय बन चुका था। इसलिए उन्होंने अपनी सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी। यद्यपि उनकी अन्य गतिविधियाँ अधिक नहीं थीं, फिर भी जो कुछ थीं, उनको भी समाप्त कर दिया। वे शाम को बैडमिन्टन खेला करते थे, उसका खेलना भी बन्द हो गया। उन्हें साप्ताहिक अथवा अन्य अवकाश मिला करते थे, उन्हें भी लेना बन्द कर दिया। वे अपने परिवार अथवा रिश्तेदारी में यदा-कदा आया-जाया करते थे, वह भी बन्द कर दिया। प्रतिदिन मुलाकातें जिनसे हो सकती थीं, प्रायः वे उनसे मिलने जाया भी करते थे, इस श्रेणी में आने वाले दोस्तों और सहयोगियों से मिलने जाना अथवा किसी काम के सन्दर्भ में उनके यहाँ पहुँच जाना हुआ करता था, वह सब बन्द हो गया।

उन्होंने अपने मिशन को सफल बनाने की इच्छा से अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित्त होकर स्वयं को समर्पित कर दिया। डॉ. कलाम सरीखे व्यक्तियों को कार्याधिकता से ग्रसित व्यक्ति कहा जाता है। उन्हें ऐसा कहे जाने के लिए विरोध करना उचित लगता था। इसका एक कारण है। कार्याधिकता से ग्रसित के रूप में पुकारा जाना एक बीमारी (रुग्णता) का प्रतीक बनता है। यह शब्द किसी बीमारी का द्योतक है। जबकि प्रतिबद्धता (वचनबद्धता), एकाग्रचित्तता अपने लक्ष्य (उद्देश्य) को प्राप्त करने का साधन हुआ करता है, किसी रोग का सूचक नहीं। डॉ. कलाम ज्यादा से ज्यादा वही करना चाहते थे, जिससे उन्हें दुनिया में सबसे ज्यादा खुशी प्राप्त हो अर्थात् अधिक से अधिक कार्य करने से उद्देश्य के निकट पहुँचा जा सकता है। सफलता प्राप्त हो सकती है। सफलता हमें प्रसन्नता देती है।

ऐसे व्यक्ति जो अपने पेशे में शीर्ष तक पहुँचना चाहते हैं, उनके अन्दर पूर्ण वचनबद्धता का मूलभूत गुण विकसित कर लेना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण क्षमता के साथ कार्य सम्पादन की इच्छा रखता है, उसमें शायद ही कोई अन्य इच्छा जन्म लेती हो। पुरुष हो अथवा स्त्री उन सबमें वचनबद्धता का गुण अवश्य होना चाहिए।

डॉ. कलाम के अन्दर भी इन तीन वर्षों का दुःखद घटनाओं के बाद शीर्ष पर पहुँचने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता गया।

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प्रश्न 3.
रामेश्वरम् मन्दिर के पास डॉ. कलाम संध्या का समय किस प्रकार व्यतीत करते थे? (2011)
उत्तर:
डॉ. कलाम अपने बचपन की स्मृतियों को पुनः जाग्रत करके स्पष्ट रूप से बतलाते हैं कि रामेश्वरम् मन्दिर के आस-पास ही घूमा करते थे। समुद्र के आस-पास की बलुई मिट्टी चाँदनी रात में चमकती दिखाई देती थी। डॉ. कलाम को सान्ध्यकालीन वातावरण बहुत ही आकर्षित करता था। इसके अतिरिक्त समुद्र की उठती, इठलाती लहरें एक विशेष प्रकार का नृत्य प्रस्तुत करती जान पड़ती थीं। वहाँ का असीम आकाश खुला हुआ आनन्दातिरेक से डॉ. कलाम को आत्मविभोर कर देता था। अनन्त आकाश में बिखरे हुए टिमटिमाते तारे अपनी मद्धिम रोशनी विकीर्ण करते हुए धीमे से उनके कानों में कुछ रहस्यपूर्ण सन्देश देते प्रतीत होते थे। डॉ. कलाम के साथ उनके बहनोई उन्हें सान्ध्यकालीन डूबते क्षितिज को दिखाने के लिए ले जाया करते थे। उनके बहनोई का नाम जलालुद्दीन था।

डॉ. कलाम की अन्तश्चेतना पर बचपन में प्रकृति की गोद में रहने का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उनमें चिन्तन की गहराई परिपक्वता को प्राप्त थी।

प्रश्न 4.
एस. एल. वी.-3 की तैयारी में डॉ. कलाम किस तरह व्यस्त रहते थे? (2017)
उत्तर:
एस. एल. वी.-3 पर अभी काम चल रहा था। साथ ही इसकी उप-प्रणालियों को तैयार करने का काम भी पूरा होने जा रहा था। जून 1974 ई. में कुछ जटिल प्रणालियों के परीक्षण के लिए सैंटोर साउण्डिग रॉकेट छोड़ा। इन उपप्रणालियों में जो सम्मिश्र पदार्थ, कन्ट्रोल इन्जीनियरिंग और सॉफ्टवेयर प्रयोग में लाए गये थे, उनका देश में पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया था, परीक्षण पूरी तरह सफल रहा, तब तक भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम साउण्डिग रॉकेटों से आगे नहीं बढ़ा था और यहाँ तक कि जानकार लोग भी इसकी कोशिशों को देखने-समझने और स्वीकार करने को राजी नहीं थे, पहली बार इन्हें राष्ट्र के विश्वास से प्रेरणा मिली थी। एस. एल. वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट के ऊपरी हिस्से का विकास डायामाण्ट की तरह ही तैयार किया गया। इसका उड़ान परीक्षण फ्रांस में होना था। इसमें कई समस्याएँ आ गई थीं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए डॉ. कलाम को तत्काल फ्रांस जाना था।

एस. एल. वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट के सफल परीक्षण के बाद फ्रांस से लौटने पर एक दिन ब्रह्म प्रकाश ने वनहर फॉन ब्रॉन के पहुँचने के बारे में सूचना दी। रॉकेट विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाला हर व्यक्ति फॉन ब्रॉन के बारे में जानता है। फॉन ब्रॉन को मद्रास से थुम्बा लाने को कहा तो डॉ. कलाम बहुत ही रोमांचित हो उठे, चेन्नई से त्रिवेन्द्रम तक डॉ. कलाम व अन्य एयरक्राफ्ट से गये। इस यात्रा में नब्बे मिनट का समय लगा। फॉन-ब्रॉन ने काम के विषय में पूछा। उन्होंने इस सन्दर्भ में एक छात्र की तरह जानकारी ली। डॉ. कलाम को यह पता नहीं था कि रॉकेट विज्ञान के जन्मदाता इतने विनम्र, ग्रहणशील एवं प्रेरणा देने वाले होंगे। पूरी उड़ान के दौरान बहुत अच्छा महसूस किया। डॉ. कलाम को मिसाइलों के इतने बड़े ज्ञाता से बात करके पता चला कि वे अपनी प्रशंसा के इच्छुक नहीं हैं।

फॉन ब्रॉन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एस. एल. वी.-3 एक विशुद्ध भारतीय डिजाइन है। आपके सामने समस्याएँ भी आ सकती हैं। इसके लिए तुम्हें ध्यान रखना है कि व्यक्ति का सफलताओं से ही नहीं, असफलताओं से भी निर्माण होता है। उन्होंने आगे कहा कि रॉकेट विज्ञान में कठोर परिश्रम और प्रतिबद्धता की जरूरत होती है। साथ ही उस परिश्रम के द्वारा बड़ा सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। इस विज्ञान को पेशा न बनाकर अपना धर्म समझो।

सन् 1979 ई. में छः सदस्यों की टीम नियन्त्रण प्रणाली का रूपान्तर तैयार करने में लगी थी। इस प्रणाली के बारह बाल्वों में से एक को ठीक करते समय नाइट्रिक एसिड का टैंक फट गया। एसिड टीम सदस्यों पर गिरा। वे सभी गम्भीर रूप से घायल हो गये। उन सभी को डॉ. कलाम ने त्रिवेन्द्रम् मेडिकल कॉलेज ले जाकर इलाज के लिए भर्ती कराया। घायल टीम के सदस्य दर्द से कराह रहे थे, लेकिन उपचार उचित होने से उन्हें राहत मिली। डॉ. कलाम इस दौरान बड़े चिन्तित और व्यथित रहे। परीक्षण काम रुक गया और विलम्ब हो गया। इस दुर्घटना से असफलता होने से हमें साहस अधिक मिला और सोचा कि हमारी टीम चट्टान की तरह साथ रहने में मजबूत है। अब एस. एल. वी.-3 का ठोस आकार आने लगा और उसकी परियोजना अब सफल हो रही थी।

एस. एल. वी.-3 का प्रायोगिक उड़ान परीक्षण 10 अगस्त, 1979 को निर्धारित किया गया। श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केन्द्र से समेकित प्रक्षेपण यान विकसित करना था। उड़ान प्रणालियों में-स्टेज मोटर्स, निर्देशन व नियन्त्रण प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली को जाँचना था। चैक आउट, टैकिंग, टेलीमीटरी एवं आँकड़ों से सम्बन्धित सुविधाएँ भी इस केन्द्र में विकसित करनी थीं। इस प्रकार तेईस मीटर लम्बा, चार चरणों वाला एस. एल. वी.-3 रॉकेट सुबह सात बजकर अट्ठावन मिनट पर छोड़ा गया। इसका वजन सत्रह टन था। प्रक्षेपण के तुरन्त बाद ही इसकी प्रणालियों ने अपने काम शुरू कर दिये।

इसकी उड़ान निश्चित हो जाने पर, इसमें अचानक कोई गड़बड़ी आ गई। उम्मीदों पर पानी फिर गया। रॉकेट का दूसरा चरण नियन्त्रण से बाहर हो गया। 317 सेकण्ड के बाद ही उड़ान बन्द हो गई और पूरा यान श्रीहरिकोटा से पाँच सौ साठ किमी दूर समुद्र में जा गिरा।

इस घटना से इनकी टीम को गहरा सदमा लगा। डॉ. कलाम स्वयं अपने पर नाराज हुए और निराशा हाथ लगी। उन्हें लगा कि उनके पैर थक गये हैं। उनमें पीड़ा थी। इस समस्या का असर शरीर की अपेक्षा मस्तिष्क में बहुत अधिक था।

प्रश्न 5.
जो व्यक्ति शीर्ष पर पहुँचना चाहते हैं, उनमें कौन-कौन से गुण होने चाहिए ? इसे डॉ. कलाम के जीवन के आधार पर समझाइए। (2008, 09)
उत्तर:
जो लोग अपने पेशे में शीर्ष पर पहुँचना चाहते हैं। उनमें पूर्ण वचनबद्धता का मूलभूत गुण होना चाहिए। हम अपनी सफलता चाहते हैं तो हमें यह भरोसा करना पड़ेगा कि हम जो भी काम करना चाहते हैं, तो हमें अपनी क्षमताओं पर भरोसा व दृढ़ आस्था होनी चाहिए।

अपनी क्षमताओं को जागृत कर, अपने निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जो इच्छा उठती है, तो बाद में फिर कोई भी इच्छा जन्म नहीं लेती है। डॉ. कलाम के साथ काम करने वाले व्यक्तियों को प्रत्येक सप्ताह में चालीस घण्टे काम करना पड़ता था। इस प्रकार उन्हें चालीस घण्टे तक काम करने का पैसा दिया जाता था। डॉ. कलाम बताते हैं कि वे ऐसे व्यक्तियों से भी परिचित हैं, जो सप्ताह में कम से कम साठ, अस्सी और यहाँ तक है कि वे सौ घण्टे प्रति सप्ताह काम करते थे। इसके अनुसार उन्हें पैसा दिया जाता था। वे जानते थे और समझते भी थे कि उनका काम रोमांच पैदा करने वाला है, साथ ही साथ चुनौतियों से भरा है। इसलिए इस काम से उन्हें सबसे अच्छा प्रतिफल प्राप्त होगा। इस तरह के वे पुरुष या स्त्री जो भी हों वे चुनौती भरे कामों को हाथ में लेते हैं। उन्हें अपने इन कामों में पूर्ण सफलता मिलती है क्योंकि उनमें पूर्ण-रूपेण वचनबद्धता पाई जाती है।

जिन व्यक्तियों में अपने कार्य के पूर्ण करने की वचनबद्धता होती है तो उनमें ऊर्जा अधिक होती है। उनका काम जब चुनौतीपूर्ण होता है, तो उन्हें अपने आप को पूर्ण स्वस्थ बनाए रखना पड़ेगा। पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए विशेष ऊर्जा की जरूरत होती है।

शीर्ष पर पहुँचने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की परम आवश्यकता है। यह काम माउण्ट एवरेस्ट पर चढ़ने का अथवा अपने कार्य क्षेत्र का शीर्ष हो सकता है। परन्तु हर व्यक्ति में ऊर्जा अलग-अलग मात्रा में होती है, जो जन्म के साथ ही मिलती है। अत: जो व्यक्ति सबसे पहले प्रयास करेगा और अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल करेगा, वही सबसे पहले और शीघ्रता से अपने जीवन को सुव्यवस्थित कर पायेगा।

प्रश्न 6.
डॉ. कलाम का जीवन संघर्षों के मध्य उभरती प्रतिभा की कहानी है, उदाहरण देते हुए समझाइए। (2008, 16)
उत्तर:
डॉ. कलाम का सारा जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। उनके मध्य भी उन्होंने निराशा या हार नहीं मानी। अनेक बाधाओं के मध्य अपनी प्रतिभा की ऊर्चस्वलता का प्रदर्शन करते ही रहे। वे अपने जीवन के शुरूआती पक्ष में वायु सेना में भर्ती होकर पायलट बनना चाहते थे। विमान उड़ाने की उनकी चाहत पूर्ण नहीं हो सकी। इसका एक कारण यह था कि चयन बोर्ड ने उन्हें उपयुक्त नहीं समझा। लेकिन देखिये, जो व्यक्ति अपनी युवावस्था में विमान चालक की क्षमताओं से रहित माना गया, वही अपनी वृद्ध अवस्था में ऐसे विमान में उड़ने लगा जो आवाज से भी तेज गति वाला था। इस प्रकार व्यक्ति अपने अन्तःस्थल की गहराई में इच्छा की पूर्ति किसी भी तरह और किसी भी अवस्था में पूर्ण करने की क्षमता विकसित कर लेता है। प्रश्न है केवल अपनी सद् इच्छाओं के प्रति सद्प्रयास करने एवं कथनी की प्रतिबद्धता का होना। इन्हीं बातों को, गुणों को डॉ. कलाम में हम देखते हैं और उन्हें वचनबद्धता और प्रतिबद्धता से शीर्ष तक पहुँचने में सफलता मिली।

प्रतिभा के विकास और उभार में पारिवारिक स्थिति और पैतृक योग कोई खास भूमिका नहीं निभाते। डॉ. कलाम पारिवारिक रूप से बहुत साधारण माता-पिता की सन्तान थे। बस, महत्त्वपूर्ण बात थी तो केवल महान विचारों को जीवन में स्थान देने की और उनके अनुसार कर्म करने की।

डॉ. कलाम के परिवार की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी जो उन्हें उत्तम साधन उपलब्ध करा पाती। उन्हें सही मार्गदर्शन देने वाला भी उनके परिवार में कोई नहीं था। एक महानुभाव जलालुद्दीन महोदय थे भी, लेकिन अल्लाह ने उन्हें असमय ही अपने पास बुला लिया। जलालुद्दीन डॉ. कलाम के बहनोई थे। वे ही इनके लिए पुस्तकों का खर्च जुटाते थे। व्यय करने के लिए रुपये-पैसे भी वही जुटाते थे। यहाँ तक है कि सांताक्रूज हवाई अड्डे पर इनको विदा करने के लिए वे ही आया करते थे।

श्री जलालुद्दीन ही इन्हें रामेश्वरम् के आस-पास घुमाते थे। चाँदनी रात में चमकती मिट्टी, नाचती हुई समुद्री लहरें, आकाश में टिमटिमाते सितारे उन्हें ऊँचा उठने और ऊँची उड़ान भरने के सपने उनमें पैदा करते थे। चमकती मिट्टी उन्हें प्रेरित करती कि अपनी मातृभूमि की सेवा करने से तुम्हें भी वही चमक प्राप्त होगी। अब उन्हें लगने लगा कि वे काल के भंवर में फंस गये हैं।

डॉ. कलाम ने हिम्मत नहीं हारी। वे अपने अन्दर ऊर्जावान बने रहे। उस ऊर्जा ने इनकी प्रतिभा को शक्ति प्रदान की जिसके कारण सांसारिक आपदाओं से, बाधाओं से लड़ने की हिम्मत और हौंसला बना रहा। जो व्यक्ति हौंसला पस्त नहीं होता वह उन्नति के शिखर पर विराजमान होकर ही रहता है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं, “एस. एल. वी.-3 को तैयार करना कष्ट साध्य प्रक्रिया थी।” …..” इसी बीच उनके बहनोई और उन्हें रास्ता दिखाने वाले जनाब अहमद जलालुद्दीन जब इस दुनिया से चले गये थे, तो वे एकदम थम से गये, कुछ भी सोच नहीं पाये, काम करने में ध्यान लगाने की कोशिश की, लेकिन अपने आप में बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। तब उन्हें इस बात की अनुभूति हुई कि “अहमद जलालुद्दीन के साथ मेरा भी एक हिस्सा चला गया है।”

अहमद जलालुद्दीन की मौत के बाद उनके पिता का देहावसान होना और फिर उनकी माँ का भी चला जाना, इस तरह तीन वर्ष में लगातार तीन मौतों के दौर से गुजरना और एस. एल. वी. -3 का निर्माण व परीक्षण व्यवस्था का कार्य सभी विपरीत स्थितियाँ थीं; जिनमें से डॉ. कलाम धैर्य, उद्देश्य के प्रति आस्था और वचनबद्धता तथा ध्येय प्राप्ति की प्रतिबद्धता के गुणों के कारण आगे निकल सकें।

उपर्युक्त वर्णन से सिद्ध है कि डॉ. कलाम का जीवन संघर्षों के मध्य उभरती प्रतिभा की कहानी है।

असफलता दिखाती है नयी राह अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम क्या बनना चाहते थे?
उत्तर:
डॉ. कलाम वायुसेना में भर्ती होना चाहते थे तथा विमान उड़ाना चाहते थे, यद्यपि चयन बोर्ड ने उन्हें इसके उपयुक्त नहीं पाया था।

प्रश्न 2.
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के पिताजी का नाम क्या था ? वह कितने वर्ष तक जीवित रहे?
उत्तर:
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के पिताजी का नाम जैनुल आबदीन था। सन् 1976 में रामेश्वरम् में एक सौ दो वर्ष तक रहने के पश्चात् उनका निधन हो गया।

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असफलता दिखाती है नयी राह पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का नाम कौन नहीं जानता ? वे भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति रहे हैं। वे प्रारम्भ में वायुसेना में भर्ती होना चाहते थे। लेकिन चयन बोर्ड ने उन्हें उपयुक्त नहीं पाया। उस युवक का सपना टूट गया। वह वायु सेना में भर्ती होकर विमान उड़ाना चाहता था। लेकिन उसी युवक ने, जब वह कुछ बूढ़ा हो रहा था, तब आवाज से भी तेज गति वाले विमान उड़ाकर अपने सपने को पूरा किया। डॉ. कलाम का जन्म एक कस्बे के साध पारण से परिवार में हुआ था। कलाम अपने जीवन में बड़े सपने देखते थे। साथ ही, उन्हें पूरा करने की भी जिद करते और सफलता प्राप्त करते थे। ‘अग्नि की उड़ान’ उनकी आत्मकथा है। यहाँ इस उड़ान के कुछ रोमांचक अंश प्रस्तुत हैं-

एस. एल. वी-3 पर अभी काम चल रहा था। इसकी उप-प्रणालियों को तैयार करने का काम भी पूरा होने जा रहा था। सन् 1974 के जून महीने में कुछ जटिल प्रणालियों के परीक्षण के लिए “सैंटोर साउण्डिंग रॉकेट” छोड़ा गया। इन उप-प्रणालियों में जो सम्मिश्र पदार्थ, कन्ट्रोल इन्जीनियरिंग और सॉफ्टवेयर प्रयोग में लाये गये, उनका देश में पहली बार प्रयोग किया गया। परीक्षण सफल रहा। राष्ट्र के विश्वास से प्रेरणा मिली।

कष्टसाध्य प्रक्रिया :
एस. एल. वी.-3 को तैयार करना एक कष्टसाध्य प्रक्रिया थी। एक दिन डॉ. कलाम और उनकी टीम पहले चरण की मोटर परीक्षण के काम में पूरी तरह तल्लीन थी। तभी डॉ. कलाम को सूचना मिली कि उनके बहनोई अहमद जलालुद्दीन अब इस दुनिया में नहीं रहे। इस खबर से कलाम महोदय कुछ समय तक अस्त-व्यस्त रहे। काम में उनका मन नहीं लगा क्योंकि मुः जलालुद्दीन डॉ. कलाम के जीवन का अहम् हिस्सा थे।

बचपन की यादें :
डॉ. कलाम को अपने बचपन की स्मृतियाँ उभर कर आने लगीं। मुहम्मद जलालुद्दीन उन्हें संध्याकाल में रामेश्वर मन्दिर के आस-पास घुमाने ले जाते थे। चाँदनी रात में चमकती समुद्र की रेत और नृत्य करती समुद्री लहरें, अनन्त आकाश से टिमटिमाते तारों का प्रकाश तथा डूबते सूरज के क्षितिज को दिखाने ले जाते थे। वे ही कलाम साहब के लिए पुस्तकों का बन्दोबस्त करते थे। सांताक्रूज हवाई अड्डे पर इन्हें विदा करने के लिए जलालुद्दीन (डॉ. कलाम के बहनोई) ही जाया करते थे।

डॉ. कलाम का अधीर होना :
मुहम्मद जलालुद्दीन का इस दुनिया से चला जाना कलाम को ऐसा लगा मानो समय और काल के भंवर में उन्हें फेंक दिया हो। उनके पिता की उम्र सौ साल से अधिक रही होगी। उनके दामाद का जनाजा उठाना था जो उनकी उम्र से आधी उम्र के थे। कलाम की बहन जोहरा की आत्मा कलप रही थी। उसका चार साल का बेटा भी चल बसा था, उसके चले जाने के घाव अभी भरे भी नहीं थे। ये सभी दृश्य कलाम की धुंधलाई सी आँखों के सामने तैर रहे थे। कलाम ने स्वयं को सम्भाला और परियोजना के उप निदेशक डॉ. एस. श्रीनिवास को अपनी गैरहाजिरी में काम को देख लेने के बारे में निर्देश दिये।

अल्लाह में गहरी आस्था :
बसें बदलते हुए रामेश्वर का सफर तय किया। डॉ. कलाम के पिता इनका हाथ थामे थे। उनकी आँखों में कोई भी आँसू नहीं था। पिता बोले देखो ईश्वर किस प्रकार अन्धेरा कर देता है। जलालुद्दीन तुम्हें रास्ता दिखाने वाला सूरज था, वही गहरी नींद में सो गया। वह पूरी तरह शान्त और अचेतन है। अल्लाह की नियति के आगे कुछ नहीं कर सकते। बेटे कलाम! अल्लाह पर भरोसा रखो।

वैराग्यभाव की जागृति :
डॉ. कलाम थुम्बा लौट आये। उन्हें हर काम निरर्थक लगा। एक वैराग्य जैसा अनुभव हुआ।

पिता की मृत्यु :
सन् 1976 ई. में डॉ. कलाम के पिता का इन्तकाल हो गया। वे रामेश्वरम् की भूमि पर एक सौ दो वर्ष तक रहे। उनका नाम जैनुल आबदीन था।

प्राणिमात्र से प्रेम :
डॉ. कलाम के पिता सभी प्राणियों से प्रेम करते थे। इस दुनिया के प्राणी ईश्वर की प्रतिकृति हैं। इनसे प्रेम करना ईश्वर से प्रेम करना है। ऐसा डॉ.कलाम के पिता का जीवन दर्शन था।

एस. एल.वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट का निर्माण व परीक्षण :
एस. एल. वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट का निर्माण सफलतापूर्वक किया गया और इसका परीक्षण विदेश में फ्रांस की भूमि पर किया गया। इस परीक्षण में आई हुई जटिल समस्याओं का निराकरण करने डॉ. कलाम को फ्रांस तत्काल जाना था। परन्तु उसी दिन इनकी माँ के इन्तकाल की खबर दी गई। डॉ. कलाम नागर कोइल से रामेश्वर पहुँचे। उनका अन्त समय आ गया था। डॉ. कलाम ने उसी मस्जिद में प्रार्थना की जहाँ उनके पिताजी हर शाम इन्हें ले जाया करते थे। कलाम ने ईश्वर से क्षमा माँगी। ईश्वर ने जो उन्हें जिम्मेदारी दी, उसका निर्वाह डॉ. कलाम ने ईमानदारी से किया। कलाम ने स्वयं को समझाते हुए कहा कि शोक क्यों मना रहे हो ? उस काम पर ध्यान दो जो तुम्हारे लिए पड़ा है। अपने कार्यों के करने से ही परमानन्द प्राप्त करो। मस्जिद में कलाम ने इन शब्दों को सुना। मस्जिद से बाहर आकर, अपने घर की ओर देखे बिना ही वहाँ से चल दिये।

अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्धता :
डॉ. कलाम के घर में तीन वर्ष में तीन मौतें हो गईं। फिर भी वे अपने काम में उनकी प्रतिबद्धता बनी रही। एस. एल. वी. उनके लिए ईश्वरीय मिशन है और उसकी प्रगति उनका उद्देश्य बन गया था। उन्होंने बैडमिन्टन खेलना बन्द कर दिया। साप्ताहिक छुट्टियाँ भी नहीं करते। रिश्तेदारी और मित्रों के यहाँ आना-जाना सब छूट गया। डॉ. कलाम के अनुसार वचनबद्धता, एकाग्रचित्तता लक्ष्य प्राप्त करने के साधन हैं।

नियन्त्रण प्रणाली का उड़ान रूपान्तर :
सन् 1979 ई. में छः सदस्यों की टीम दूसरे चरण की जटिल नियन्त्रण प्रणाली की उड़ान रूपान्तर तैयार करने में लगी थी। परन्तु अचानक ही लाल धुएँ वाले नाइट्रिक एसिड (आर. एफ. एन. ए.) का टैंक फट गया और नाइट्रिक एसिड टीम के सदस्यों पर जा गिरा। टीम के सदस्य गम्भीर रूप से जल गये। कलाम सभी को त्रिवेन्द्रम मेडीकल कॉलेज ले गये और उनका इलाज कराया।

इस टीम में कलाम को गहरा विश्वास हो गया कि ये सभी सफलता और असफलता में एक चट्टान की भाँति खड़े रह सकते हैं। जीवन एक प्रवाह है जिसमें काम करते-करते आराम और आनन्द की अनुभूति होती है। सन् 1979 के मध्य तक एस. एल. वी. का सपना पूरा हो गया और श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केन्द्र से एल. एल. वी.-3 का प्रायोगिक उड़ान परीक्षण 10 अगस्त, 1979 को निर्धारित किया गया।

उपसंहार :
पहले चरण का कार्य पूर्ण सफल हुआ परन्तु दूसरे चरण में परिवर्तित करने का कार्य एस. एल. वी.-3 को उड़ते देखना उम्मीदों से पीछे रहा। 317 सेकण्ड के बाद उड़ान बन्द हो गई और चौथे चरण सहित पूरा यान श्रीहरिकोटा से पाँच सौ साठ किमी. दूर समुद्र में आ गिरा। इस घटना से हम सभी निराश हुए। परन्तु डॉ. ब्रह्म प्रकाश के साथ डॉ. कलाम के अन्दर एक विश्वास जगा और इसी विश्वास से नई सफलताओं के क्षितिजों तक पहुँचा जा सकता है।

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