MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 3 जननी जन्मभूमिश्च

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 3 जननी जन्मभूमिश्च

जननी जन्मभूमिश्च अभ्यास

जननी जन्मभूमिश्च अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“गंगा और गंगा के कछार को मेरा सलाम कहें” यह कथन लेखक से किसने कहा?
उत्तर:
गंगा और गंगा के कछार को मेरा सलाम कहें; यह कथन लेखक से बनारस के रहने वाले एक व्यक्ति ने कराची में कहा।

प्रश्न 2.
जननी और जन्मभूमि किससे अधिक श्रेष्ठ है? (2009, 6)
उत्तर:
जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है।

प्रश्न 3.
आजादी की लड़ाई में ‘बड़े घर’ से आशय था? सही उत्तर लिखिए।
(अ) महल
(ब) जेलखाना
(स) बहुत बड़ी हवेली
(द) विशाल मकान।
उत्तर:
(ब) जेलखाना।

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जननी जन्मभूमिश्च लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मातृभूमि और स्वर्ग में क्या अन्तर है?
उत्तर:
मातृभूमि स्वर्ग से श्रेष्ठ होती है। मातृभूमि की गोद में हमारा लालन-पालन होता है। जिस प्रकार मानव अपनी माँ के कर्ज से उऋण नहीं हो सकता, तद्नुरूप अपनी मातृभूमि से भी उऋण नहीं हो सकता।

प्रश्न 2.
फूल की कामना क्या है?
उत्तर:
फूल की एक प्रबल कामना थी कि हे माली ! तुम मुझे तोड़ने के पश्चात् उस पथ पर फेंक देना जिस पथ से मातृभूमि के हितार्थ अपने प्राण प्रसूनों को अर्पित करने वाले शहीद गुजरते हैं।

प्रश्न 3.
गाय के दूध से माँ के दूध की तुलना क्यों नहीं की जा सकती? (2014, 17)
उत्तर:
गाय के दूध की तुलना माँ के दूध से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि गाय का दूध यत्र-तत्र सर्वत्र बाजार-हाट में उपलब्ध होता है। इसको व्यक्ति धन देकर खरीद सकता है। लेकिन माँ का दूध मूल्यवान है, कोई भी इसका मूल्य चुकता नहीं कर सकता।

प्रश्न 4.
लेखक ने अपने भारतीय हमवतन के चार सौ साल स्वर्ग को किस सुख पर हजार बार न्यौछावर किया है?
उत्तर:
लेखक ने अपने भारतीय हमवतन के चार सौ साल के स्वर्ग को मातृभूमि के सुख पर हजार बार न्यौछावर किया है, क्योंकि मातृभूमि के समान सुख एवं अपनत्व अन्यत्र प्राप्त होना दुर्लभ है।

जननी जन्मभूमिश्च दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जन्मभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्र प्रेम में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर:
जन्मभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्र प्रेम में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। उसका प्रमुख कारण है कि जो व्यक्ति जन्मभूमि के प्रति प्रेम व आस्था रखता है तथा मानव मूल्यों को समझता है वही व्यक्ति राष्ट्रीय दायित्व का भली प्रकार निर्वाह कर सकता है। मानव को अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है और तभी देशभक्ति का सही अर्थ चरितार्थ होता है। राष्ट्र के प्रति व्यक्ति तभी प्रेम कर सकता है, जबकि उसको अपनी जन्मभूमि से स्नेह हो।

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प्रश्न 2.
लेखक के नीग्रो कवि मित्र ने अमेरिका के सम्बन्ध में क्या विचार व्यक्त किए?
उत्तर:
लेखक के नीग्रो कवि मित्र ने अमेरिका के सम्बन्ध में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं कि यह कचरा फेंक उपभोक्ता का देश एवं यह आदमी और आदमी के बीच अदृश्य झिल्ली की दीवार बनाने वाली संस्कृति का देश है।

यह खरीदो-वह खरीदो के पागलपन वाला देश अगर वह स्थान स्वर्ग है तो फिर नरक कहाँ है? मन देश की छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए तरसता रहता है। तब भी स्वर्ग इसको नहीं छोड़ पाता। यद्यपि स्वर्ग के प्राणी उसे दुतकारते हैं, विभिन्न प्रकार से अपमानित करते हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि स्वर्ग में द्वितीय श्रेणी के नागरिक का अधिकार प्राप्त करने के लिए उसे अपने देश की सरकार की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। वह अपनी सरकार से अपेक्षा रखता है क्योंकि वह अपनी सरकार को विदेशी मुद्रा देता है।

लेकिन व्यक्ति उस समय इस बात को भूल जाता है कि मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। अतः अन्त में यह कहा जा सकता है कि नीग्रो कवि ने भी विदेश के महत्व को नकारते हुए मातृभूमि को श्रेष्ठ ठहराया है।

प्रश्न 3.
अपभ्रंश के पुराने दोहे में देश का सबसे बड़ा घर किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
अपभ्रंश के पुराने दोहे में देश का सबसे बड़ा घर वह है जहाँ प्यारे बन्धु रहते हैं। जो प्रत्येक व्यक्ति को दुःखों को सहने की क्षमता प्रदान करते हैं। वे दुःखी व्यक्ति के घावों पर मरहम अपने मधुर वचनों से लगाते हैं।

अत: देश का सबसे बड़ा घर यदि एक साधारण झोंपड़ी को कहा जाये तो उचित ही है। श्रीराम ने चित्रकूट में स्वयं पर्णकुटी बनायी तथा सुखपूर्वक निवास किया।

अन्य सुरम्य स्थान राधा की गौशाला है जहाँ श्रीकृष्णजी स्वयं गायों का दूध दुहने के लिए जाते थे। इसके अतिरिक्त भगवान बुद्ध की साधारण-सी आम की बगिया जहाँ पर उन्होंने महल त्यागने के पश्चात् अपना निवास स्थान बनाया और वैशाली की नगर वधू आम्रपाली को भिक्षा में लिया।

इसके अतिरिक्त जनसाधारण को सत्य, अहिंसा एवं प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गाँधी भी साबरमती आश्रम में साधारण सी कुटिया में रहे। गाँधी जी सच्चे अर्थों में आज भी जनसाधारण के हृदय में विद्यमान हैं।

अतः निष्कर्ष में कह सकते हैं कि वह स्थान ही बड़ा घर है जहाँ कि सच्चरित्र व्यक्ति रहते हैं।

प्रश्न 4.
सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) देश का वरण……………बस हो जाता है।
(ब) वह अपनी निजता……………..”प्राप्त नहीं होता।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘जननी जन्मभूमिश्च से उद्धत किया गया है। इसके लेखक ‘विद्यानिवास मिश्र’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में मिश्र जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि मातृभूमि का अन्य विकल्प नहीं है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि जब लोग अपने देश की धरती को छोड़कर विदेशों में गमन करते हैं, तो वहाँ रहकर विवशता एवं आवश्यकतावश उन्हें उस देश के वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयास करना पड़ता है। लेकिन अपनी धरती माँ के सदृश पूज्यनीय एवं वन्दनीय है, उसको अंगीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो मानव के हृदय पटल पर जन्म से ही अंकित रहती है। जिस प्रकार पुत्र का अपनी माँ के प्रति असीम अनुराग होता है, तदनुरूप व्यक्ति का मातृभूमि की मिट्टी के प्रति असीम लगाव होता है। विदेशों में भी जब उसके देश की चर्चा होती है तब भावनाओं का कोमल सागर हृदय में तरंगें लेने लगता है।

(ब) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी का कथन है प्रवासी भारतीय विदेशों में रहकर भी अपने देश के प्रति प्रेम से जुड़े रहना चाहते हैं।

व्याख्या :
मिश्र जी विदेश यात्रा पर गये। वहाँ प्रवासी भारतीयों की बातचीत से उनकी दुविधा उजागर हुई कि विदेशों में रहते हुए भी वे अपनी निजता या मातृभूमि के प्यार को किसी भी दशा में त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यद्यपि उन्हें विदेशी भाषाओं का ज्ञान नहीं था लेकिन भोजपुरी एवं थाई भाषा बोलने में पूरी तरह सक्षम थे। उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी कि वृद्धावस्था के आगमन पर वह अपनी मातृभूमि के प्रांगण में ही जीवनयापन करें।

मृत्यु की गोद में सोने से पूर्व तुलसी दल तथा गंगा के पवित्र जल की एक बूंद उसके गले में अवश्य डाली जाये। मानव मातृभूमि के प्रति अपने अपनत्व को इतना महत्व देता है जितना कंठगत प्राण को वह येन-केन प्रकारेण बचाने का भरसक प्रयास करता है। ये अपनी जड़ से अथवा मातृभूमि से जुड़े रहने का जीवन्त प्रमाण है। मातृभूमि की मिट्टी में जो प्यार निहित है, वह सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसा अनुराग अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

प्रश्न 5.
भाव पल्लवन कीजिए
(अ) मुल्क बदल जाये, वतन तो वतन होता है।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन में मिश्र जी ने विदेशों की धरती पर रहने वाले व्यक्ति का अपने देश के प्रति लगाव एवं प्यार को व्यक्त किया है।

मुझे मेरे देश का ही एक व्यक्ति करांची की सैर कराने में सहायक हुआ। उसने मेरा इतना स्वागत किया कि मेरे हृदय-तन्त्री के तारों को झंकृत कर दिया। मेरी वायुयान से दूसरी उड़ान का समुचित प्रबन्ध कर दिया। जब लेखक ने उससे विदा माँगी तो उसके नेत्रों में आँसू झलकनोलगे। उसने कहा कि अपना वतन अपना ही होता है। देशों के परिवर्तन से व्यक्ति के अपने देश के प्रति अनुराग में तनिक भी कमी नहीं आती।

(ब) जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन का भाव है कि जननी एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है। इस तथ्य को राम ने लंका के सत्कार को ठुकराकर मातृभूमि के प्रति अपने स्नेह को व्यक्त किया है। इस युक्ति की सार्थकता अचानक पाकिस्तानी की आँखों में छलछलाने वाले अश्रु बिन्दुओं में साकार रूप से दृष्टिगोचर हो रही थी। मनुष्य को मातृभूमि की महत्ता का ज्ञान विदेशों में रहने पर ही ज्ञात होता है, जहाँ आडम्बर एवं बाह्य प्रदर्शन का बोलबाला है।

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प्रश्न 6.
‘जननी जन्मभूमिश्च’ पाठ के आधार पर ‘मातृभूमि स्वर्ग के समान है’ विषय के पक्ष में तीन उदाहरण देकर अपनी बात समझाइए। (2010)
उत्तर:
मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है। इसका कारण है कि हम जन्म लेते ही मातृभूमि पर पैर रखते हैं। वह हमारा भार सहन करती है, हमारी लात सहती है। मातृभूमि ही हमें भोजन, पानी, फल आदि देती है और बड़ा करती है। मातृभूमि हमें अनायास ही सब कुछ देती है। इस तरह मातृभूमि स्वर्ग के समान ही नहीं उससे भी अधिक महत्व की है। यही कारण है कि मातृभूमि को भूल पाना असम्भव है।

जननी जन्मभूमिश्च भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए-
वतन, मुल्क, सलाम, जाहिल, हकीकत, कैदखाना।
उत्तर:
देश, राष्ट्र, प्रणाम, अशिक्षित, वास्तविक, बन्दीगृह।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
(क) राष्ट्र से सम्बन्धित भाव
(ख) आध्यात्म से सम्बन्धित
(ग) व्यवसाय से सम्बन्धित
(घ) बूढ़ा होने की अवस्था।
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय
(ख) आध्यात्मिक
(ग) व्यावसायिक
(घ) वृद्धावस्था।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
उत्तर:
(अ) अशुद्ध-मोहन कुत्ते को डण्डे से मारा।
शुद्ध-मोहन ने कुत्ते को डण्डे से मारा।

(आ) अशुद्ध-क्या आप खाना खा लिए हैं?
शुद्ध-क्या आपने खाना खा लिया है?

(इ) अशुद्ध-दरवाजे पर कौन आई है?
शुद्ध-दरवाजे पर कौन आया है?

(ई) अशुद्ध- मेरा बेटा और बेटी बाजार गई हैं।
शुद्ध-मेरा बेटा और बेटी बाजार गये हैं।

(उ) अशुद्ध- इतना मीठा चाय मैं नहीं पी सकती हूँ।
शुद्ध-इतनी मीठी चाय मैं नहीं पी सकती हूँ।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
पसरा होना, घेरे में डालना, आँखें छलछला आना, स्वर्ग बना रहना, लात सहना, भारी पड़ना।
उत्तर:

  1. पसरा होना-प्लेटफार्म पर यात्री रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में यत्र-तत्र पसरे हुए थे।
  2. घेरे में डालना-पुलिस ने अपराधियों को घेरे में डालकर बन्दी बना लिया।
  3. आँखें छलछला आना-विदेश में अपनी मातृभूमि का प्रकरण आते ही मेरी आँखें छलछला उठीं।
  4. स्वर्ग बना रहना-आत्मीयता के माध्यम से ही धरती पर स्वर्ग बना रहेगा।
  5. लात सहना-विदेशी शासन में भारतीयों को अंग्रेजों को लात सहनी पड़ी।
  6. भारी पड़ना-भारतीय क्रिकेट टीम इस बार कंगारुओं (ऑस्ट्रेलिया) पर भारी पड़ी।

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जननी जन्मभूमिश्च पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध के लेखक श्री विद्यानिवास मिश्र हैं। ललित निबन्ध लेखन के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने ऐतिहासिक प्रसंगों एवं विभिन्न संस्मरणों के माध्यम से जन्मभूमि के महत्त्व का दिग्दर्शन कराया है। जन्मभूमि का कोई भी विकल्प नहीं है। पौराणिक उदाहरणों एवं लोकगीत के माध्यम से जन्मभूमि की महिमा का बखान किया है। प्रवासी भारतीयों की भावनाओं को भी व्यक्त किया है जो अपनी मातृभूमि के प्रति लगाव रखते हैं। फूल भी मौन रूप से अपनी यह इच्छा व्यक्त करता है कि उसे देश की बलि वेदी पर प्राण-प्रसून अर्पित करने वाले वीरों के मार्ग पर बिखेर दिया जाये। लेखक के मतानुसार मानवीय मूल्यों पर प्रतिष्ठित भावना, मातृभूमि के प्रेम में बाधक नहीं है।

जननी जन्मभूमिश्च कठिन शब्दार्थ

प्रवास = विदेश में रहने वाला। उत्कण्ठा = आकांक्षा। कोफ्त = खीझ। कानून की कैद – कानून का बन्धन। मुल्क = देश। वतन = मातृभूमि, जन्मभूमि। अपि = भी। रोचते = अच्छी लगती। स्वर्गादपि गरीयसी = स्वर्ग से बढ़कर। सार्थकता वास्तविकता। बेकाबू = काबू से बाहर। दायित्व = जिम्मेदारी। निष्ठा = आस्था। सुधि = याद। लोकाचार = सामाजिक रीति-रिवाज। सुलक्षण कन्या = अच्छे गुणों वाली लड़की। नीग्रो = अश्वेत अमेरिकन नागरिक। जाहिल = अशिष्ट। भौतिक सुख-सुविधा = सांसारिक सुख-सुविधा। आध्यात्मिक = आत्मा सम्बन्धी, ब्रह्म और जीव से सम्बन्धित। उपभोक्ता = उपभोग करने वाला। अदृश्य झिल्ली = जो झिल्ली दिखायी न दे। उद्वेलित = उद्विग्न। विरक्ति = अलगाव, विराग। अनबूझ पहेली = अनसुलझी पहेली। दुतकारते = प्रताड़ित करना। विडम्बना = विसंगति। अपेक्षा = आशा करना। अलाव = आग जलाने का वह स्थान जिसके चारों ओर लोग बैठकर आग तापते हैं। निरुपायता = कोई उपाय न होना। उत्सुकता = जिज्ञासा। बहिश्त = स्वर्ग। रूमानी = रसिक, रस से युक्त। लुभावना = मन को अच्छा लगना। प्रवासी भारतीय = अन्य देश में रहने वाले भारतीय। विवशता = मजबूरी, लाचारी। आत्मीयता = अपनत्व, स्नेह के साथ। मार्गदर्शक = मार्ग दिखाने वाला। परिमार्जित = परिष्कृत। प्रतिबिम्ब = परछाईं। तृप्त = सन्तुष्ट। निजता = अपनापन। कण्ठगत प्राण = गले तक आ चुके प्राण, प्राण निकलने की स्थिति। अपभ्रंश = एक भाषा। बड़प्पन = श्रेष्ठता, बड़ाई। आराध्य = इष्ट देव, जिसकी आराधना की जाये। मुमूर्ष = मरणासन्न, मरण का इच्छुक। पेरियार = केरल प्रान्त का एक क्षेत्र। नवनीत = मक्खन। न्यौछावर = निछावर, समर्पण।

जननी जन्मभूमिश्च संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. देश का वरण न जाने किन-किन दबावों और जरूरतों से आदमी करता है पर माँ का कोई वरण नहीं करता, न कोई जन्मभूमि का वरण करता है। वह माँ का बस बेटा होता है, जन्मभूमि का, माटी का बस हो जाता है। (2008, 14, 17)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘जननी जन्मभूमिश्च से उद्धत किया गया है। इसके लेखक ‘विद्यानिवास मिश्र’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में मिश्र जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि मातृभूमि का अन्य विकल्प नहीं है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि जब लोग अपने देश की धरती को छोड़कर विदेशों में गमन करते हैं, तो वहाँ रहकर विवशता एवं आवश्यकतावश उन्हें उस देश के वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयास करना पड़ता है। लेकिन अपनी धरती माँ के सदृश पूज्यनीय एवं वन्दनीय है, उसको अंगीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो मानव के हृदय पटल पर जन्म से ही अंकित रहती है। जिस प्रकार पुत्र का अपनी माँ के प्रति असीम अनुराग होता है, तदनुरूप व्यक्ति का मातृभूमि की मिट्टी के प्रति असीम लगाव होता है। विदेशों में भी जब उसके देश की चर्चा होती है तब भावनाओं का कोमल सागर हृदय में तरंगें लेने लगता है।

विशेष :

  1. प्रवासी भारतीयों का अपने देश के प्रति अगाध स्नेह को दर्शाया है।
  2. मानवीय भावनाओं का अंकन है।
  3. शैली प्रांजल एवं प्रभावपूर्ण है।

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2. इस आदमी की दुविधा एक मानवीय दुविधा है, वह अपनी निजता का प्रतिबिम्ब तो पाना चाहता है, पाकर तृप्त भी होता है, पर अपनी निजता को खोना नहीं चाहता, कंठगत प्राण की तरह उसे बचाये रखना चाहता है। शायद अपनी जड़ से इतना लगाव न होता तो इतना प्यार, अनायास दूसरे से पाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। (2009, 11)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी का कथन है प्रवासी भारतीय विदेशों में रहकर भी अपने देश के प्रति प्रेम से जुड़े रहना चाहते हैं।

व्याख्या :
मिश्र जी विदेश यात्रा पर गये। वहाँ प्रवासी भारतीयों की बातचीत से उनकी दुविधा उजागर हुई कि विदेशों में रहते हुए भी वे अपनी निजता या मातृभूमि के प्यार को किसी भी दशा में त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यद्यपि उन्हें विदेशी भाषाओं का ज्ञान नहीं था लेकिन भोजपुरी एवं थाई भाषा बोलने में पूरी तरह सक्षम थे। उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी कि वृद्धावस्था के आगमन पर वह अपनी मातृभूमि के प्रांगण में ही जीवनयापन करें।

मृत्यु की गोद में सोने से पूर्व तुलसी दल तथा गंगा के पवित्र जल की एक बूंद उसके गले में अवश्य डाली जाये। मानव मातृभूमि के प्रति अपने अपनत्व को इतना महत्व देता है जितना कंठगत प्राण को वह येन-केन प्रकारेण बचाने का भरसक प्रयास करता है। ये अपनी जड़ से अथवा मातृभूमि से जुड़े रहने का जीवन्त प्रमाण है। मातृभूमि की मिट्टी में जो प्यार निहित है, वह सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसा अनुराग अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

विशेष :

  1. लेखक की गहन अनुभूति विद्यमान है।
  2. भाषा में कोमल कमनीयता का समावेश है।
  3. शैली सरस, सरल एवं सुबोध है।

3. स्वर्ग से मातृभूमि इसलिए ही शायद बड़ी है कि स्वर्ग का भोग करने वाला अपने को ऊँचा समझने लगता है, मातृभूमि से प्यार करने वाला विनम्र बना रहता है, यह समझने के लिए कि जैसे अपनी भूमि के लिए तड़पता है, वैसे ही दूसरा भी तड़पता होगा। बड़प्पन कहीं रहने से या कहीं न रहने से नहीं आता है, आता है दूसरे को बड़प्पन देने से, दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानने से। (2013)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी ने इस गद्यांश में मानवीय विनम्रता की महत्ता को उजागर किया गया है।

व्याख्या :
सामान्यतः स्वर्ग को सबसे उत्तम माना गया है, किन्तु जन्मभूमि से भी बढ़कर जो स्वर्ग का उपभोग करता है, वह स्वयं को अन्य से ऊँचा समझता है, परन्तु मातृभूमि को प्रेम करने वाला शिष्ट एवं नम्र बना रहता है। उसमें बड़े होने का गर्व नहीं आता है। वह जानता है कि जैसे मेरे मन में अपनी जन्मभूमि के लिए तड़पन है, वैसी ही तड़पन औरों में भी अपनी मातृभूमि के लिए अवश्य होगी। श्रेष्ठता किसी विशेष स्थान पर रहने अथवा नहीं रहने से नहीं आती है। यह तो दूसरे को श्रेष्ठ मानने से प्राप्त होती है, औरों के कष्ट को अपना कष्ट मानने से बड़प्पन आता है।

विशेष :

  1. जन्मभूमि के प्रति प्यार हृदय में विनम्रता का संचार करता है।
  2. सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. तर्कपूर्ण विवेचनात्मक शैली में विषय को स्पष्ट किया गया है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 4 नीति

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नीति अभ्यास

नीति अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बिना उपयुक्त अवसर के कही गई बात कैसी लगती है? (2015)
उत्तर:
बात करते समय अवसर के अनुरूप बात करनी चाहिए जैसे विवाह के समय दी हुई गालियाँ भी मन को प्रसन्न करती हैं। इसी प्रकार युद्ध के प्रसंग में श्रृंगार रस की बात अच्छी नहीं लगती है। अतः प्रसंगानुकूल ही बात करनी चाहिए।

प्रश्न 2.
ऐसी कौन-सी सम्पत्ति है जो व्यय करने पर बड़ती है? (2009)
उत्तर:
सरस्वती का कोश (विद्या धन) ऐसी सम्पत्ति है जो व्यय करने पर सदैव बढ़ती है।

प्रश्न 3.
सुख और दुःख को किस प्रकार ग्रहण करना चाहिए?
उत्तर:
सुख और दुःख को बड़ी शान्ति से ग्रहण करना चाहिए जिस प्रकार कि उदय होता हुआ चन्द्रमा और अस्त होता हुआ चन्द्रमा एक-सा होता है।

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नीति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किस उदाहरण के द्वारा कवि ने यह बताया है कि कोई बुरी चीज यदि भले स्थान पर स्थित हो, तो भली लगती है?
उत्तर:
कवि ने काजल के माध्यम से बताया है कि यद्यपि काजल में मलिनता होती है। परन्तु उचित स्थान पर प्रयोग करने से उसका महत्त्व बढ़ जाता है।

प्रश्न 2.
वृक्ष के माध्यम से कवि क्या संदेश देता है? (2015, 17)
उत्तर:
वृक्ष के माध्यम से कवि ने संदेश दिया है कि सज्जन व्यक्ति दूसरों की भलाई के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं।

प्रश्न 3.
रहीम ने ‘विपदा’ को भला क्यों कहा है? (2011, 14)
उत्तर:
रहीम ने ‘विपदा’ को इसलिए भला कहा है क्योंकि विपत्ति आने पर ही संसार में अच्छे और बुरे व्यक्ति की पहचान हो पाती है। सुख में तो सभी साथ देते हैं परन्तु विपत्ति पड़ने पर जो साथ दे वही सच्चा मित्र या व्यक्ति होता है।

प्रश्न 4.
अच्छे लोग सम्पत्ति का संचय किसलिए करते हैं?(2016)
उत्तर:
अच्छे लोग सम्पत्ति का संचय दूसरों के लिए करते हैं। जिस प्रकार वृक्ष अपने फल नहीं खाते हैं, तालाब अपना जल स्वयं नहीं पीते हैं, उसी प्रकार सज्जन भी सम्पत्ति का संचय परहित (दूसरों के हित) के लिए ही करते हैं।

नीति दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वृन्द के संकलित दोहों के आधार पर उनके ‘नीति’ सम्बन्धी विचार दीजिए। (2012)
उत्तर:
महाकवि वृन्द ने जीवन के सम्बन्ध में गहन अनुभव किये हैं। उसी के अनुसार उन्होंने अपने दोहे में कहा है कि अवसर के अनुरूप ही सोच-समक्ष कर बात करनी चाहिए। किस अवसर पर किस प्रकार की बात करें यह अधोलिखित दोहे से स्पष्ट होता है-
फीकी पैनीकी लगै, कहिये समय विचारि।
सबको मन हर्षित करै, ज्यों विवाह में गारि ।।
नीकी पै फीकी लगै, बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत युद्ध में, रस शृंगार न सुहात ।।

अन्य दोहे में कवि ने कपट युक्त व्यवहार के विषय में कहा है कि-
जैसे हांडी काठ की चढ़े न दूजी बार।

कपट करने से व्यक्ति का विश्वास नष्ट हो जाता है, फिर चाहे वह कितना भी अच्छा व्यवहार करे, कोई भी उसकी बात का विश्वास नहीं करेगा।
कवि वृन्द ने कहा है कि मूर्ख व्यक्ति को धैर्यवान होना चाहिए। समयानुसार कार्य पूर्ण होता है जिस प्रकार-
कारज धीरै होतु है, काहै होत अधीर।
समय पाय तरुवर फलै. केतक सींचो नीर।।

इसी प्रकार कवि ने कहा है कि मूर्ख व्यक्ति को सम्पत्ति देना व्यर्थ है क्योंकि मूर्ख व्यक्ति सम्पत्ति के महत्त्व को नहीं जानता है। उदाहरण देखें-
कहा कहाँ विधि को अविधि, भूले परे प्रबीन।
मूरख को सम्पत्ति दई, पंडित सम्पत्ति हीन।।

कवि ने सरस्वती के कोश को अपूर्व बताया है और कहा है कि एकमात्र यही धन ऐसा है जो खर्च करने से बढ़ता है और संचय करने से घटता है। उदाहरण देखें-
सरस्वति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात।
ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़े, बिन खरचै घट जात।।

कवि ने एक अन्य दोहे में यह नीति की बात समझायी है। व्यक्ति के नेत्रों को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह आपका हितैषी है या नहीं है जिस प्रकार दर्पण में व्यक्ति की अच्छाई-बुराई स्पष्ट दिखाई देती है, उसी प्रकार नेत्र भी अच्छे-बुरे का भाव प्रकार करते हैं। उदाहरण में देखें-
“नयना देत बताय सब, हिय को हेत अहेत।
जैसे निर्मल आरसी, भली बुरी कहि देत।।”

इस प्रकार कवि वृन्द ने व्यक्ति, समाज, परिवार अच्छे-बुरे व्यवहार सम्बन्धी बातें नीति सम्बन्धी दोहों में कही हैं। ओछे व्यक्ति के सम्बन्ध में वृन्द कवि के विचार देखें-
“ओछे नर के पेट में, रहै न मोटी बात” इस प्रकार कवि ने विभिन्न नीतिपरक दोहों द्वारा मानव को शिक्षा दी हैं।

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प्रश्न 2.
वृन्द की किन शिक्षाओं को आप जीवन में अपनाना चाहेंगे?
उत्तर:
महाकवि वृन्द के दोहे जीवन-शिक्षा के लिए अपूर्व भंडार हैं। उनके द्वारा लिखा गया प्रत्येक दोहा मानव जीवन के किसी न किसी लक्ष्य को परिलक्षित करता है। कभी-कभी कवियों के द्वारा कही गयी शिक्षाप्रद बातें मानव को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देती हैं।

नीतिपरक दोहों के माध्यम से मानव को समयानुरूप बात करने की प्रेरणा मिलती है। वाणी का उचित अवसर का प्रयोग करके व्यक्ति सफलता प्राप्त कर सकता है।

कार्य करते समय धैर्य धारण करके ही कार्य करना चाहिए। क्योंकि कार्य करते समय जल्दबाजी उचित नहीं होती है। मूर्ख या अज्ञानी व्यक्ति को कभी भी उसके हित की बात नहीं समझानी चाहिए। क्योंकि वह व्यक्ति अर्थ का अनर्थ कर देता है।
उदाहरण देखें-
हितहू की कहिये न तिहि, जो नर होय अबोध।
ज्यों नकटे को आरसी, होत दिखाये क्रोध।।

इसी प्रकार कवि ने सरस्वती के कोश के विषय में बताया है कि यह सरस्वती का खजाना अनूठा है जो कि व्यय करने पर बढ़ता है। इस अपूर्व धन को मानव को निरन्तर व्यय करते रहना चाहिए।

इसके अतिरिक्त कवि ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन की बात नहीं बतानी चाहिए क्योंकि ओछे व्यक्ति के मन में कभी भी बात पचती नहीं है। उदाहरण देखें-
“ओछे नर के पेट में, रहै न मोटी बात।
आध सेर के पात्र में, कैसे सेर समात।।

इस प्रकार के सुन्दर दोहों के द्वारा कवि वृन्द ने मानव को उन्नति के पथ पर बढ़ने के लिए प्रेरित किया है।

प्रश्न 3.
‘जो रहीम ओछौ बढ़े तो अति ही इतराय’ इस पंक्ति के द्वारा रहीम क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर:
इस पंक्ति के द्वारा रहीम कवि ने निम्न श्रेणी के व्यक्ति के विषय में बताया है कि व्यक्ति यदि छोटे पद से अचानक ही बड़े पद पर प्रतिष्ठित हो जाता है तो वह इठलाता है। ऐसी प्रवृत्ति केवल उन व्यक्तियों में होती है जिनके पास कुछ भी न हो और अचानक बहुत-सा धन सम्पत्ति या सम्मानित पद मिल जाये तो वे घमण्ड का अनुभव करते हैं। अपने गर्व से चूर होकर वे किसी से बात करना भी पसन्द नहीं करते। ऐसी प्रवृत्ति ओछे व्यक्तियों में ही होती है। अपने इस दोहे के माध्यम से कवि ने ओछे व्यक्ति की मानसिकता को इस प्रकार व्यक्त किया है-
“प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय।”

कवि ने मानव को इस पंक्ति के माध्यम से बताया है कि व्यक्ति को उच्च पद पर प्रतिष्ठित होने पर इतराना नहीं चाहिए। इससे व्यक्ति का ओछापन प्रतीत होता है।

व्यक्ति को सम्पत्ति अथवा सत्ता प्राप्त हो जाने पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। यदि मानव घमण्ड करता है तो यह प्रवृत्ति अच्छी नहीं कही जायेगी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए-
(अ) कौन बड़ाई जलधि मिलि गंग नाम भौं धीम।
केहि की प्रभुता नहि घटी, पर घर गये रहीम।।
(आ) सरस्वति के भण्डार की बड़ी अपूरब बात।
ज्यों खरचै त्यौं त्यौं बदै, बिन खरचै घट जात।।
उत्तर:
उपर्युक्त पंक्तियों की व्याख्या सन्दर्भ सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग में देखिए।

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नीति काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिएसरवर, आंगुर, गुनी, अपूरब, खरचै, ओड़े।
उत्तर:
तत्सम शब्द-सरोवर, आंगुल, गुणी, अपूर्व, खर्चे, ओढ़े।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों के अलंकार पहचानिए
(अ) ज्यों खरचै त्यों त्यों बढ़े, बिन खरचे घट जात।
(आ) दीन सबन को लखत हैं, दीनहि लखै न कोय।
(इ) साँचे से तो जग नहीं, झूठे मिले न राम।
(ई) कहि रहीम परकाज हित, सम्पत्ति संचहि सुजान।
उत्तर:
(अ) विरोधाभास अलंकार।
(आ) पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।
(इ) स्वभावोक्ति अलंकार।
(ई) अनुप्रास अलंकार।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित छंदों में मात्राएँ गिनकर छन्द की पहचान कीजिए
(अ) कारज धीरै होतु है, काहे होत अधीर।
समय पाय तरुवर फलै, केतक सींचौ नीर।।
(आ) नयना देत बताय सब, हिय को हेत अहेत।
जैसे निर्मल आरसी, भली बुरी कहि देत।।
उत्तर:
(अ) ऽ।। ऽऽ ऽ। ऽ ऽ ऽ ऽ।।ऽ । (13-11)
कारज धीरे होतु है, काहे होत अधीर।
।।। ऽ ।।।।। । ऽ ऽ ।। ऽ ऽ ऽ । (13-11)
समय पाय तरुवर फलै, केतक सींचौ नीर।।

(आ) ।। ऽ ऽ।।ऽ।।। ।। ऽ ऽ। । ऽ । (13-11)
नयना देत बताय सब, हिय को हेत अहेत।
ऽ ऽ ऽ ।। ऽ । ऽ । ऽ । ऽ ।। ऽ । (13-11)
जैसे निर्मल आरसी, भली बुरी कहि देत।।

उपर्युक्त दोनों छन्दों के प्रथम व तृतीय छन्द में 13-13 तथा द्वितीय व चतुर्थ छन्द में 11-11 मात्राएँ हैं जोकि दोहा छन्द की विशेषता है। अतः दोनों दोहा छन्द हैं।

प्रश्न 4.
रहीम के संकलित दोहों में से प्रसाद गुण सम्पन्न दोहे छाँटकर लिखिए
उत्तर:
(1) तरुवर फल नहीं खात है, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान।।
(2) रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट्र बै जात।
नारायण हूँ को भयो, बावन आँगुर गात।।
(3) रहिमन मनहिं लगाइ के, देखि लेहु किन कोय।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय।।
(4) भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघु भूप।
रहिमन गिरि ते भूमि लौं, लखौ तो एकै रूप।।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्यांश में अलंकार पहचानिए
(क) सुनहू देव रघुवीर कृपाला, बन्धु न होइ मोरि यह काला।
(ख) या अनुरागी चित्त की, गति समझे नहिं कोई।
ज्यों ज्यों बूढे स्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होई।।
उत्तर:
(क) अपहृति।
(ख) विरोधाभास।

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वृन्द के दोहे भाव सारांश

कवि वृन्द ने अपने दोहों के माध्यम से मनुष्य को नीति की शिक्षा दी है। उन्होंने इन दोहों में बताया है कि मनुष्य को किसी से भी बात करने से पूर्व उचित अवसर देखना चाहिए। किसी को धोखा नहीं देना चाहिए। ऐसा करके व्यक्ति एक बार तो सफलता पा लेगा, किन्तु फिर कभी जीवन में सफल नहीं हो सकता। मूढ़ व्यक्ति से यदि उसके हित की बात करो तो वह भी उसे विष समान लगती है। इसलिए जो सुनने को तैयार न हो उससे उसके हित की बात नहीं करनी चाहिए। सरस्वती का ज्ञान कोष अपूर्व है। इसे जितना ही व्यय किया जाए वह उतना ही वृद्धि करता है। उचित स्थान पर तुच्छ और मलिन वस्तु भी शोभा देती है। जैसे नारी के नेत्रों में लगा हुआ काजल मलिन होते हुए भी अत्यन्त सुशोभित होता है।

वृन्द के दोहे संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

फीकी पै नीकी लगै, कहिये समय विचारि।
सबको मन हर्षित करै, ज्यों विवाह में गारि।। (1)

शब्दार्थ :
फीकी = स्वादहीन; नीकी = अच्छी; विचारि = सोच, समझकर; हर्षित = प्रसन्न; विवाह = एक संस्कार; गारि = गाली।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत दोहा ‘नीति’ पाठ के अन्तर्गत ‘वृन्द के दोहे’ शीर्षक से अवतरित है, इसके रचनाकार ‘वृन्द’ हैं।

प्रसंग :
इस दोहे में वृन्द ने यह बताया है कि किसी भी बात को समय देखकर कहना चाहिए। इससे उस बात का महत्व बढ़ जाता है।

व्याख्या :
वृन्द कवि का कथन है कि बात चाहे नीरस या कड़वी हो उसे उचित समय पर ही बोलना चाहिए इससे सुनने वाले को बात अच्छी लगेगी। जैसे विवाह के अवसर पर जो गाली गाई जाती हैं वे उसका आनन्द बढ़ा देती हैं। जबकि यदि क्रोध में कोई गाली दे तो विवाद उत्पन्न हो जाता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ कवि ने लोक-व्यवहार बताया है। उचित अवसर पर कई बार खराब बात भी अच्छी लगती है।
  2. फीकी नीकी ………. में अनुप्रास अलंकार है।
  3. दोहे में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

नीकी पै फीकी लगै, बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत युद्ध में, रस शृंगार न सुहात।। (2)

शब्दार्थ :
अवसर = मौका; युद्ध = लड़ाई; सुहात = अच्छा लगता है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि अच्छी बात को भी समय देखकर बोलने का सुझाव देता है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि अच्छी बात भी समय को देखकर ही करनी चाहिए अथवा उस बात का कोई महत्व नहीं रह जाता। जैसे रणभूमि में वीर रस के गीत छोड़कर शृंगार रस के गीत गाए जाएँ तो वह महत्वहीन ही सिद्ध होंगे।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लोक-व्यवहार के सत्य को उद्घाटित किया है।
  2. अनुप्रास और उपमा अलंकार का प्रयोग द्रष्टव्य है।

जो जेहि भावे सौ भलौ, गुन को कछु न विचार।
तज गजमुक्ता भीलनी, पहिरिति गुजाहार।। (3)

शब्दार्थ :
भावे = अच्छा लगना; गुन = गुण; तज= छोड़ना; गजमुक्ता = हाथी के मस्तक से निकलने वाला मोती।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ कवि ने बताया है कि जो वस्तु जिसे पसन्द होती है वही उसके लिए श्रेष्ठ होती है चाहे वह कितनी ही कम मूल्य की वस्तु क्यों न हो।

व्याख्या :
जो जिसको रुचिकर लगे वही अच्छा है। इसमें उस वस्तु के गुण-अवगुण अथवा मूल्य का कोई विचार नहीं होता है क्योंकि भीलनी गजमुक्ता को त्यागकर गुजाफल का हार पहनना ही पसन्द करती है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. दोहा छन्द है।
  2. ब्रजभाषा में सरल, सरस भाषा शैली है।

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फेर न हवै है कपट सो, जो कीजै व्यौपार।
जैसे हांडी काठ की चढ़े न दूजी बार।। (4)

शब्दार्थ :
कपट = छल; हांडी = बरतन; दूजी = दूसरी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने व्यापार में कपट नीति का परित्याग करने को बताया है।

व्याख्या :
यदि व्यापार करना है तो कपट व्यवहार त्याग देना चाहिए। क्योंकि यदि कपट व्यवहार किया जाता है तो उसका व्यापार पुनः उसी प्रकार नहीं चल सकता; जिस प्रकार काठ की हँडिया चूल्हे पर पुनः नहीं चढ़ाई जा सकती।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लोक-व्यवहार का सत्य उद्घाटित किया गया है।
  2. ब्रजभाषा में सरस, सरल और प्रवाहमयी शैली है।
  3. काठ की हांडी चढे न दूजी बार-लोकोक्ति का प्रयोग है।

नयना देय बताय सब, हिय को हेत अहेत।
जैसे निर्मल आरसी, भली बुरी कहि देत।। (5)

शब्दार्थ :
नयना = नेत्र; हिय = भलाई; अहेत = बुराई; निर्मल पवित्र; आरसी = दर्पण।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने बताया है कि मनुष्य के नेत्र उसके हृदय की बात को दूसरे के सम्मुख प्रकट कर देते हैं।

व्याख्या :
नेत्र हृदय के हित अथवा अनहित सभी प्रकार के भावों को व्यक्त कर देते हैं जिस प्रकार से स्वच्छ दर्पण हमारे चेहरे के सुन्दर अथवा कुरूपत्व सभी प्रकार के स्वरूप को व्यक्त कर देता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लोक-व्यवहार की सच्चाई का उद्घाटन है।
  2. ब्रजभाषा में दोहा छन्द है।
  3. हेत अहेत देत में अनुप्रास अलंकार है।

हितह की कहिये न तिहि, जो नर होय अबोध।
ज्यों नकटे को आरसी, होत दिखाये क्रोध।। (6)

शब्दार्थ :
तिहि = उससे; नर = मनुष्य; अबोध = नासमझ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने कहा है कि जो व्यक्ति अपने हित की बात नहीं सुनना चाहता उससे वह बात नहीं कहनी चाहिए।

व्याख्या :
यदि मनुष्य अबोध, अज्ञानी अथवा समझने वाला न हो तो उससे उसके हित की बात नहीं कहनी चाहिए। क्योंकि नाक कटे हुए व्यक्ति को दर्पण दिखाकर यदि उसका वास्तविक स्वरूप दिखाया जाए तो वह क्रोधित ही हो उठेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन के लिए आवश्यक नीति वचन है।
  2. ब्रजभाषा में दोहा छन्द है। उत्प्रेक्षा अलंकार है।

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कारज धीरै होतु है, काहे होत अधीर।
समय पाय तरुवर फलै, केतक सींचो नीर।। (7) (2011, 16)

शब्दार्थ :
कारज = कार्य; तरुवर = वृक्ष; केतक = कितना; नीर = जल।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ कवि ने बताया है कि मनुष्य को उसके कार्य का फल तुरन्त नहीं मिल जाता, इसके लिए उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

व्याख्या :
कवि का कथन है कि संसार में कार्य धीरे-धीरे ही फलीभूत होते हैं। इसलिए धैर्य न खोकर समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए क्योंकि मौसम आने पर ही वृक्ष फल देते हैं। इससे पूर्व चाहे उन्हें कितना ही पानी देकर सींच लो, समय से पूर्व वे फल नहीं देते।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ब्रजभाषा में सरस, सरल भाषा शैली है।
  2. दृष्टान्त अलंकार है।

ओछे नर के पेट में रहे न मोटी बात।
आध सेर के पात्र में कैसे सेर समात।। (8)

शब्दार्थ :
ओछे = नीच; मोटी बात = गम्भीर बात; सेर = पुराने जमाने का एक तौल (एक किलो)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने तुच्छ मनुष्यों के स्वभाव के विषय में बतलाया है।

व्याख्या :
तुच्छ मनुष्य के पेट में गम्भीर बात नहीं पचती अर्थात् वह किसी रहस्य को रहस्य बनाकर नहीं रख सकता, तुरन्त दूसरों से उस बात को उगल देता है। कवि कहता है कि भला आधा सेर (किलो) के बरतन में एक सेर सामान कैसे आ सकता है अर्थात् जैसा पात्र होता है उसी प्रकार की बात उसके स्तर की होती है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. दृष्टान्त अलंकार, ब्रजभाषा, प्रसाद गुण, सहज, सरल शैली का प्रयोग है।
  2. लोक-व्यवहार के सत्य का उद्घाटन है।

कहा कहौं विधि की अविधि, भूले परे प्रवीन।
मूरख को सम्पत्ति दई, पंडित सम्पत्ति हीन।। (9)

शब्दार्थ :
विधि = विधाता; अविधि = उल्टा, विधि रहित; प्रवीन = विद्वान। सन्दर्भ-पूर्ववत्। प्रसंग-यहाँ पर कवि ने विधि की विडम्बना का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि विधाता की विधिरहित भाग्य रचना को क्या कहा जाए? वह प्रवीणों (बुद्धिमानों) को भूल गया है क्योंकि उसने मूरों को तो सम्पत्ति दी है और ज्ञानियों को सम्पत्तिहीन रखा है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ब्रजभाषा में दोहा छन्द है।
  2. प्रतीप अलंकार है।

सरस्वति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात।।
ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़े, बिन खरचै घट जात।। (10) (2011)

शब्दार्थ :
अपूरब = अपूर्व, अनोखी; घट जात = कम हो जाता है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने सरस्वती के भंडार की विशेषताएँ बताई हैं।

व्याख्या :
सरस्वती (ज्ञान) के भण्डार की तो बड़ी अनोखी बात है कि इस भण्डार को तो जैसे-जैसे खर्च करो वैसे-वैसे बढ़ता है और यदि नहीं खर्च करो तो कम होता जाता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. दोहा छन्द है।
  2. ब्रजभाषा है, भाषा शैली सरल, सहज व बोधगम्य है।
  3. विरोधाभास अलंकार है।

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छमा खड्ग लीने रहे, खल को कहा बसाय।
अगिन परी तृनरहित थल, आपहिं ते बुझि जाय।। (11)

शब्दार्थ :
खड्ग = तलवार; खल = दुष्ट; बसाय = वश; तृन = तिनका, घास; थल = पृथ्वी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने क्षमा की विशेषताएँ बताई हैं।

व्याख्या :
मनुष्य को सदैव क्षमा रूपी तलवार को लिए रहना चाहिए इस पर दुष्ट का कोई वश नहीं चलता। जैसे तिनका रहित भूमि पर यदि आग लग जाए तो वह स्वयं ही बुझ जाती है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. छमा खड्ग में रूपक अलंकार है।
  2. द्वितीय पंक्ति में दृष्टान्त अलंकार है।

बुरौ तऊ लागत भलो, भली ठौर परलीन।
तिय नैननि नीको लगै, काजर जदपि मलीन।। (12)

शब्दार्थ :
तऊ = तब भी; तिय = स्त्री; नीको = अच्छा; जदपि = यद्यपि; मलीन = काला।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने बताया है कि सही स्थान पर तुच्छ वस्तु भी भली लगती है।

व्याख्या :
यदि कोई वस्तु बुरी अथवा महत्वहीन हो किन्तु यदि वह उचित स्थान पर है तो वह भली लगती है जैसे काजल यद्यपि मलिन होता है किन्तु स्त्री के नेत्रों में वह अत्यन्त सुन्दर लगता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ब्रजभाषा में रचित दोहा छन्द है।
  2. नैननि नीको अनुप्रास अलंकार है।

रहीम के दोहे भाव सारांश

प्रस्तुत दोहों में रहीम ने बताया है कि सुख और दुःख में मनुष्य को समान भाव रखना चाहिए। सज्जन परोपकार के लिए सम्पत्ति का संचय करते हैं। धन कम हो अथवा अधिक हो इसका प्रभाव केवल धनिक वर्ग पर पड़ता है। घास पत्ते बेचने वाले तो सदैव एक जैसे ही रहते हैं। दीनबन्धु जैसा बनने के लिए दीनों की ओर देखना भी आवश्यक है, दूसरों के घर में रहने वाला अपनी गरिमा खो बैठता है। यदि थोड़े दिन विपदा के हों तो ठीक है। इससे कौन हमारा हितैषी है और कौन शत्रु, इसकी पहचान हो जाती है। इस प्रकार, रहीम के दोहे जीवन के अमूल्य रत्न हैं। ये जीवन में पग-पग पर मनुष्य का मार्ग निर्देशित करते हैं।

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रहीम के दोहे संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

यों रहीम सुख दुख सहत, बड़े लोग सह साँति।
उदत चन्द जेहि भाँति सो, अथवत ताही भाँति।। (1)

शब्दार्थ :
साँति = शान्ति; उदत = उदित होता हुआ; अथवत = अस्त होता हुआ।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत दोहा ‘नीति’ पाठ के अन्तर्गत ‘रहीम के दोहे’ से उद्धृत किया गया है। इसके रचयिता रहीम हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने बताया है कि महान् लोग सुख और दुःख दोनों में समान भाव से शान्तिपूर्वक रहते हैं।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि महान् लोग सुख और दुःख को शान्तिपूर्वक उसी प्रकार से सहन करते हैं। जिस प्रकार से चन्द्रमा उदय होने पर जैसा रहता है, अस्त होने पर भी वह वैसा ही रहता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ कवि ने दुःख-सुख में शान्त रहने का उपदेश दिया है। गीता में भी कहा है ‘सुखे दुःखे समे कृत्वा।’
  2. प्रस्तुत दोहे में चन्द्रमा के उदय और अस्त होने की एकरूपता बताई गई है। इसी प्रकार अन्यत्र महापुरुषों को सूर्य की भाँति बताया है-
    उदयति सविता ताम्रो ताम्रोएव अस्तमेति।
    सम्पत्तौ च विपत्तौ महतां एकरूपताम्।।

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पिवहिं न पान।
कहि रहीम परकाज हित संपति संचहि सुजान।। (2) (2008)

शब्दार्थ :
तरुवर = वृक्ष; सरवर = सरोवर, नदी; पान = पानी; परकाज- दूसरों के हित के लिए; संचहि = एकत्र करते हैं; सुजान = सज्जन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस दोहे में रहीम ने परोपकार के महत्त्व को बताया है।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार वृक्ष कभी अपने फल स्वयं नहीं खाते, सरोवर अपना जल नहीं पीता। उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति भी दूसरों की भलाई के लिए ही सम्पचि का संचय करते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. भावसाम्य-“वृक्ष कबहूँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर
    परमारथ के कारने साधुन धरा सरीर।”
  2. दृष्टान्त अलंकार है। ब्रजभाषा का प्रयोग है।
  3. दोहा छन्द है।

कहि रहीम धन बढ़ि घटे, जात धनिन की बात।
घटै बट्टै उनको कहा घास बेचि जो खात।। (3)

शब्दार्थ :
धनिन = धनिको; कहा = क्या मतलब।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने बताया है कि धन बढ़कर कम होने का प्रभाव केवल धनिक वर्ग पर पड़ता है, निर्धन वर्ग पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि धन बढ़कर कम हो जाए तो इसका प्रभाव धनिक वर्ग पर पड़ता है। धन घटे या बढ़े इसका उन लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा जो घास बेचकर अपनी रोजीरोटी कमाते हैं अर्थात् उनके लिए सभी दिन एक समान हैं वे तो सदा निर्धन के निर्धन ही हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लोक व्यवहार के सत्य का उद्घाटन।
  2. ब्रजभाषा है। दोहा छन्द है।

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बड़ माया को दोष यह, जो कबहू घटि जाय।
तो रहीम मरिबो भलो, दुख सहि जिये बलाय।। (4)

शब्दार्थ :
माया = धनसम्पत्ति, भौतिक पदार्थ; मरिबो = मरना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने धन सम्पत्ति रूपी गया के दोष को बताया है।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि माया का यह सबसे बड़ा दोष है कि यदि वह कम हो जाए तो लोग मरना पसन्द करते हैं; दुख सहकर वे जीना नहीं चाहते।

काव्य सौन्दर्य:

  1. दोहा छन्द है। ब्रजभाषा का प्रयोग है।
  2. लोक सत्य का उद्घाटन।

रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट बै जाति।
नारायण हू को भयो बावन आँगुर गात।। (5)

शब्दार्थ :
याचकता = माँगने की प्रवृत्ति; गहे = ग्रहण करने से; गात = शरीर। सन्दर्भ-पूर्ववत्। प्रसंग-रहीम ने यहाँ पर माँगने के अवगुण के प्रभाव को बताया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि माँगने की प्रवृत्ति को ग्रहण करने से बड़े लोग भी छोटे हो जाते हैं। जैसे नारायण ने जब बलि से भिक्षा माँगी तो उनका शरीर भी बावन अंगुल का हो गया था।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लोक सत्य का उद्घाटन।
  2. दोहा छन्द, ब्रजभाषा का प्रयोग।
  3. दृष्टान्त अलंकार है।

दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।। (6)

शब्दार्थ :
दीन = दीन हीन; लखत – देखते हैं; दीनबन्धु = भगवान, परमात्मा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने कहा है कि दीन दुखियों के दुःख को समझने वाला मनुष्य ईश्वर के समान हो जाता है।

व्याख्या :
दीन मनुष्य अपनी दीनता भरी दृष्टि से सबको देखता रहता है (कि कोई उसकी सहायता कर दे) किन्तु दीन व्यक्ति को कोई नहीं देखता। रहीम कहते हैं कि जो मनुष्य दीनों को देखता है, वह दीनबन्धु परमेश्वर के समान हो जाता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. संसार के सत्य का उद्घाटन।
  2. दीनों पर दया करने का संदेश दिया गया है।

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जो रहीम ओछो बढै, तो अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढो-टेढो जाय।। (7)

शब्दार्थ :
ओछो = तुच्छ, नीच; इतराय = घमंड में अकड़ना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर रहीम ने तुच्छ व्यक्ति के स्वभाव के विषय में बताया है।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि यदि तुच्छ प्रवृत्ति वाला व्यक्ति ऊँची पदवी प्राप्त कर ले तो वह बहुत घमंडी हो जाता है। पैदल चलने वाला व्यक्ति यदि फरजी हो जाए तो वह टेढ़ी-टेढ़ी चाल ही चलता है। जैसाकि शतरंज के खेल में फरजी हमेशा टेढ़ी-टेढ़ी चाल चलता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. नीच व्यक्ति की मानसिकता का वर्णन है।
  2. दृष्टान्त अलंकार और दोहा छन्द है।

कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भौं धीम।
केहि की प्रभुता नहि घटी, पर घर गये रहीम।। (8)

शब्दार्थ :
बढ़ाई = प्रशंसा; जलधि = समुद्र; धीम = धीमा; प्रभुता = सम्मान, गरिमा; पर घर = दूसरे के घर में।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने बताया है कि दूसरे के घर में रहने से मनुष्य की गरिमा समाप्त हो जाती है।

व्याख्या :
समुद्र में मिलकर गंगा को क्या श्रेष्ठता प्राप्त हुई अर्थात् कुछ नहीं। अपितु उसका नाम भी समाप्त हो गया। इसी प्रकार से दूसरे के घर में रहने पर किस मनुष्य की प्रभुता नहीं घटी अर्थात् सबकी घट जाती है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ के लोक व्यवहार का वर्णन किया गया है।
  2. दृष्टान्त अलंकार है।

दुरदिन परे रहीम कहि भूलत सब पहिचानि।
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि।। (9)

शब्दार्थ :
दुरदिन = बुरे दिन; वित = धन; हित = मान-सम्मान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने बताया है कि मनुष्य के बुरे दिन आने पर लोग उसे पहचानना भी बन्द कर देते हैं।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि अच्छे दिनों के साथी उसके बुरे दिन आने पर उसे पहचानते भी नहीं है। यह अत्यन्त कष्ट की बात है। धन की हानि होती है, तो कोई दुःख नहीं है। यदि हित (अथवा मान-सम्मान) की हानि होती है तो यह अत्यन्त कष्टदायी है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रायः अच्छे दिनों के स्वार्थी मित्र बुरे समय पर साथ छोड़ देते हैं, इसलिए ऐसे लोगों का साथ छोड़ देना चाहिए।
  2. दोहा छन्द ब्रजभाषा में निबद्ध है।

रहिमन मनहिं लगाय के देखि लहु किन कोय।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय।। (10)

शब्दार्थ :
मनहिं लगाय के = एकाग्र चित्त करके; किन = क्यों न; नर = मनुष्य।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने बताया है कि संसार के सभी कार्य ईश्वर के अधीन हैं, मनुष्य का उन पर कोई वश नहीं चलता।

व्याख्या :
रहीमदास जी कहते हैं कि अपने मन को भली-भाँति एकाग्र करके चिन्तन कर लीजिए कि किसी भी कार्य में मनुष्य का कोई वश नहीं है, सब कुछ नारायण के वश में ही है।

काव्य सौन्दर्य :
प्रस्तुत दोहे में जीवन की वास्तविकता को व्यक्त किया गया है। तुलसीदास जी ने भी ऐसा ही कुछ कहा है-
उमा दारू जोषित की नाईं।
सबहि नचावत राम गोसाईं।।

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भूप गनत लघु गुणिन को, गुनी गनत लघु भूप।
रहिमन गिरि ते भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।। (11)

शब्दार्थ :
भूप = राजा; गनत = गिनते हैं; लघु = छोटा; गुणिन = विद्वानों को; गिरि = पर्वत; लखो = देखो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने बताया है कि संसार में कोई भी छोटा बड़ा नहीं है, सभी एक समान

व्याख्या :
राजा गुणियों (विद्वानों) को छोटा समझते हैं और विद्वान् राजाओं को छोटा गिनते हैं। रहीमदास जी कहते हैं कि यह उनका भ्रम है क्योंकि पर्वतों से लेकर समतल स्थान तक सारी पृथ्वी एक ही है, अलग-अलग नहीं है।

काव्य सौन्दर्य :
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने जीवन का दार्शनिक पक्ष प्रस्तुत किया है। यहाँ कोई छोटा बड़ा नहीं, अपितु सभी समान हैं।

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।। (12) (2008)

शब्दार्थ :
विपदा = विपत्ति; हित-अनहित = हितैषी और शत्रु; जगत = संसार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि कहता है कि बुरे और भले की पहचान के लिए यदि थोड़े दिन के कष्ट हों, तो वह भी श्रेयस्कर हैं।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि ऐसी विपत्ति भी अच्छी है जो थोड़े दिन के लिए आई हो, क्योंकि ऐसे में कौन हमारा हितैषी है और बुरा चाहने वाला है, उन सबकी पहचान हो जाती है।

काव्य सौन्दर्य :
जीवन के सत्य का उद्घाटन है। सच्चे मित्र की परख विपत्ति में ही होती है। अंग्रेजी में कहावत है-
A friend in need,
is a friend indeed.

अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
साँचे से तो जग नहीं, झूठे मिलै न राम।। (13)

शब्दार्थ :
मुश्किल = कठिनाई; गाढ़े = कठिन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर रहीम ने मनुष्य की कठिनाई के विषय में बताया है कि उसके जीवन के दो रास्ते हैं, किन्तु दोनों में ही कठिनाई है।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि यह बड़ी मुश्किल की घड़ी है जब उसके पास दो काम है और मनुष्य के लिए दोनों कार्य एक साथ करना कठिन हो जाता है। यदि वह सच बोलता है तो संसार में उसकी स्थिति अच्छी नहीं हो पाती और यदि झूठ बोलता है तो परमात्मा से वंचित हो जाता है।

काव्य सौन्दर्य :
यहाँ कवि ने दोहे के माध्यम से बताया है कि मनुष्य को संसार में जीने के लिए छल-प्रपंच और झूठ का सहारा लेना पड़ता है। किन्तु ऐसा करके वह परमात्मा से दूर हो जाता है। क्योंकि परमात्मा उन्हें प्राप्त होता है जिनका हृदय निर्मल और शुद्ध होता है और जो सदैव सत्य के मार्ग पर चलते हैं।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 8 काठमाण्डू दर्शन

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 8 काठमाण्डू दर्शन

काठमाण्डू दर्शन अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
हिमालय के विषय में लेखक के विचार लिखिए।
उत्तर:
भारत से नेपाल की हवाई यात्रा गोरखपुर से सीमा पार करके हिमालय की तराई का प्रदेश शुरू होता है। यह प्रदेश वृक्षों का घना प्रदेश है। वृक्षों से ढंके वन लहराते समुद्र का दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

हिमालय की श्रेणियाँ प्रबल आकर्षण की बिन्दु थीं। हिमालय को नगाधिराज हिमालय भी कहा जाता है। इससे भारत की अनेक पुराकथाएँ और उदात्त कल्पनाएँ जुड़ी हुई हैं। कालिदास, प्रसाद, पन्त और दिनकर के अनेक काव्य-विम्ब लेखक की चेतना में अनायास ही उद्बुद्ध होने लगे।

कालिदास ने तो हिमालय को पृथ्वी का मानदण्ड कह दिया। जो उनकी कल्पना के विराट स्वरूप का दिग्दर्शन है। हिमालय का सम्बन्ध शंकर भगवान से है, अतः इन प्रसंगों को कालिदास ने आनन्द-कल्पना के अंग बनाकर भव्य प्रस्तुति की है अपने ग्रन्थों में। कवि ने अपनी भक्ति के फूल इस हिमालय के सैकड़ों-हजारों बिम्बों के प्रति अर्पित किए हैं। परमश्रद्धेय जयशंकर प्रसाद जी ने तो हिमालय को प्रलय के बाद आर्विभूत प्रथम रचना के रूप में चित्रित किया है। हिमालय अपने उत्तुंग शिखरों से सुमण्डित दिगन्तव्यापी कलेवर से संयुक्त होने से उसकी प्रलय समाधि अभी भी भंग नहीं हुई है।

प्रकृति के कोमल चित्रों को उभारने वाले पंत जैसे महान् प्रकृति कवि के भव्य चित्र लेखक के मानस पटल पर अंकित होने लगे। कालिदास की अमर कृति ‘कुमार सम्भव’ के उदात्त कोमल प्रसंग चलचित्र के समान लेखक के मन में फेरी लगाने लगे। इस हिमालय के किसी प्रान्तर की निमृत गुफाओं में उमा ने शंकर को वरण करने की अभिलाषा से तपस्या की होगी। सम्भवतः यहीं कहीं निकटवर्ती कैलाश पर्वत के किसी शिखर पर त्रिनेत्र (शंकर) ने अपने तीसरे नेत्र की प्रचण्ड अग्नि शिखाओं से कामदेव को भस्म किया होगा।

इसी बीच लेखक को अपनी मातृभूमि, भारत के सीमा सम्बन्धी संकटों की स्मृति कौंधने लगी और महाकवि ‘दिनकर’ की ओजस्वी वाणी उसके कानों में इस प्रकार गूंजने लगी-

“जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त,
सीमापति! तूने की पुकार,
पद दलित इसे करना पीछे,
पहले ले मेरा सिर उतार।”

हिमालय पर्वत को पर्वतों का राजा कहते हैं। नग का अर्थ पर्वत होता है, अतः इसे नगाधिराज भी सम्बोधित करते हैं। लेखक अपने नाम के साथ भी हिमालय का सम्बन्ध जोड़ता है-नगेन्द्र-नग + इन्द्र = पर्वतों का राजा। लेखक की कल्पना में हिमालय देवभूमि, देवात्मा, नगाधिराज, पृथ्वी का मानदण्ड न जाने कितने रूपों और नामों से सम्बोधित किए जाते हुए विराजमान हैं।

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प्रश्न 2.
नेपाल में लेखक के ठहरने की क्या व्यवस्था थी? संक्षिप्त में लिखिए।
उत्तर:
नेपाल में ठहरने की व्यवस्था विश्वविद्यालय की ओर से होटल में की गई थी। किन्तु लेखक के मित्र ने इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। लेखक से उसके मित्र महोदय ने आग्रह किया कि वे उसके (मित्र के) घर पर ही चलें। वहाँ ठहरें। मित्र के आग्रह से लेखक ने उसके घर पर ही ठहरना स्वीकार किया। लेखक महोदय मित्र के घर पहुँच गए। चाय पीते-पीते सन्ध्या हो गई। अतः शहर में ही घूमने का कार्यक्रम बनाया। काठमाण्डू-नया शहर और पुराना शहर-दो भागों में अवस्थित है। इस तरह अन्य बहुत सी बातें करते हुए रात्रिकाल को विश्राम किया। दूसरे दिन दर्शनीय स्थलों के देखने के लिए निश्चित किया। मित्र के आवास पर निवास चित्ताकर्षक और प्रसन्नता देने वाला रहा।

प्रश्न 3.
काठमाण्डू भ्रमण के बाद लेखक के अनुभव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
काठमाण्डू में काष्ठमण्डप शहर के मध्यभाग में स्थित है। यह काष्ठमण्डप महावृक्ष के काष्ठ से निर्मित है। शुरू में यह यात्रियों का विश्राम गृह था। धीरे-धीरे देव भावना का समावेश हो जाने पर देवस्थान बन गया। इसमें कोई भी शिल्प सौन्दर्य नहीं है। कृष्ण मंदिर बागमती नदी के पास नगर से कुछ मील की दूरी पर है। यह मंदिर दो हजार वर्ष पुराना है। इसके निर्माण में चूने का प्रयोग नहीं किया गया है। वास्तुकला का अद्भुत चमत्कार है। स्वयंभूनाथ का मंदिर पर्वत खण्ड के विराट् भूभाग पर स्थित है। इसके विग्रह में चारों ओर आँखें लगी हैं जो चतुर्दिक दृकपात करती हैं और नगर को सुरक्षा देती हैं।

काठमाण्डू दर्शन और भ्रमण के बाद लेखक का अनुभव है कि भारत और नेपाल दोनों देश सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से अति समृद्ध देश हैं। यह शैव, शाक्त और बौद्ध धर्मों का केन्द्र रहा है। बौद्ध, शाक्त और शैव-हिन्दू धर्म के विशिष्ट सम्प्रदाय हैं। नेपाल विश्व में एक ही हिन्दू राज्य है। यह न तो भारत की तरह धर्मनिरपेक्ष हैं और न पाकिस्तान की तरह धर्म प्रतिबद्ध। नेपाल इस बात का प्रमाण है कि हिन्दू धर्म को उसके सहज उदार रूप में स्वीकार कर लेने के बाद धर्म निरपेक्षता उतनी अनिवार्य नहीं रहती। अनेक हिन्दू-प्रथाएँ जो आज भारत में विलुप्त हैं, वे आज भी वहाँ की व्यावहारिक संस्कृति का अंग हैं। नेपाल और भारत के सम्बन्ध अत्यन्त आत्मीय तथा सौहार्द्रपूर्ण हैं-संस्कृति और धर्म की समानता चिरकाल से दोनों राष्ट्रों को स्नेहबन्ध पान में बाँधे हुए है।

प्रश्न 4.
भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन के समय लेखक ने क्या-क्या देखा? लिखिए।
उत्तर:
सन् 1967 ई. के मार्च की नौवीं तारीख थी। उस दिन लेखक का जन्मदिन था तथा महाशिव रात्रि का पर्व भी था। अतः रात्रि को भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन का कार्यक्रम बनाया गया। लेखक अपने मित्र के सहयोग से मन्दिर परिसर में गाड़ी से पहुँच सका। मंदिर के प्रांगण में नंगे पैर ही प्रवेश करना था, वहाँ कीचड़ थी, अतः मोजे पहनने की सुविधा नहीं थी। साधारण रूप से लेखक को जाड़े की रात्रि में यह सब कष्ट साध्य तो था ही लेकिन अब तो वहाँ लेखक के लिए कोई अन्य गति भी नहीं थी। लेखक से मित्र श्रद्धालु बोला-भगवान पशुपतिनाथ के मंदिर में किसी बात का भी डर नहीं है। लेखक और उनके मित्र महोदय धक्के-मुक्के खाते देव-विग्रह के पास पहुँच ही गए। वहाँ प्रत्येक श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव से भगवान को प्रणाम कर रहा था और आगे बढ़ रहा था। वहाँ अधिक समय तक रुकने की कोई सम्भावना नहीं थी।

लेखक ने देखा कि भगवान पशुपतिनाथ के मन्दिर के परिसर में भक्तों की अपार भीड़ सभी दिशाओं से उमड़ पड़ रही थी। मन्दिर के चारों ओर दूर-दूर तक तीर्थयात्रियों के तम्बू लगे हुए थे। यात्रियों की सुविधा के लिए दुकाने भी सजी हुई थीं जिनसे यात्रीजन अपनी आवश्यक वस्तुएँ खरीद सकते थे।

प्रश्न 5.
नेपाल के ‘त्रिभुवन विश्वविद्यालय’ का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
नेपाल का त्रिभुवन विश्वविद्यालय काठमांडू से कई मील दूर कीर्तिपुर नामक उपनगर में बन रहा है। इसका केवल प्रशासनिक खंड व दीक्षांत भवन बन चुके थे। विज्ञान विभाग की इमारतें बन रही थीं। विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर नागर अक्षरों में त्रिभुवन विश्वविद्यालय लिखा हुआ है और दीर्घा के भीतर सामने की दीवार पर नेपाली भाषा में उसकी स्थापना का संक्षिप्त इतिवृत्त दिया हुआ है। विश्वविद्यालय परिदृश्य अत्यन्त भव्य है। वह विशाल भूखण्ड, जिस पर विश्वविद्यालय स्थित है, पर्वतमाला से घिरा हुआ अर्द्धचन्द्राकार है।

निर्माण कार्य पूरा होने पर त्रिभुवन विश्वविद्यालय का परिवेश प्राकृतिक और मानवीय कला के संयोग से एक अपूर्व गरिमा से मण्डित हो जाएगा। विश्वविद्यालय की स्थापना सन् 1960 ई. में हुई थी। इसके अन्तर्गत कला, सामाजिक विज्ञान और भौतिक विज्ञान के प्रायः सभी प्रमुख विभाग और देश के विभिन्न भागों में स्थापित 35-36 स्नातक विद्यालय हैं। विभिन्न विषयों के लिए नेपाल के सुयोग्य नागरिकों के अतिरिक्त, भारत और अमरीका आदि के विशेषज्ञ विद्वानों की नियुक्ति की जाती है।

भारत सहयोग-संस्थान की ओर से 20-25 भारतीय प्राध्यापक वहाँ भिन्न-भिन्न विभागों में कार्य कर रहे हैं। हिन्दी विभाग में एक आचार्य (प्रोफेसर) एक उपाचार्य (रीडर) तथा कई प्राध्यापक हैं। नेपाल के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण हिन्दी और संस्कृत में वहाँ के छात्रों की विशेष रुचि है। कुलपति महादेय के अनुरोध पर मैंने पाठ्यक्रम और शोध व्यवस्था आदि के विषय में हिन्दी विभाग के सहयोगी-बन्धुओं से विचार-विनिमय किया और तुलनात्मक अनुसंधान पर विशेष बल देने पर परामर्श किया। नेपाल के प्राचीन ग्रंथागारों में अपार सामग्री भरी पड़ी है। वह प्रायः संस्कृत और पालि भाषा में है। परन्तु मैथिली हिन्दी के ग्रंथों का भी संग्रह काफी है। उनका सम्पादन और प्रकाशन निश्चय ही उपयोगी होगा।

काठमाण्डू दर्शन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नेपाल किन-किन धर्मों का केन्द्र रहा है?
उत्तर:
नेपाल शैव, शाक्त और बौद्ध धर्मों का केन्द्र रहा है।

प्रश्न 2.
नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई थी?
उत्तर:
नेपाल के कीर्तिपुर नामक उपनगर में बने त्रिभुवन विश्वविद्यालय की स्थापना सन् 1960 में हुई थी।

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काठमाण्डू दर्शन पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
भारत की राजधानी दिल्ली से नेपाल की यात्रा मुश्किल से तीन घण्टे की है। यह यात्रा फॉकर फ्रेण्डशिप विमान से करनी थी। लेखक के परिवार और अन्तरंग वृत्त में थोड़ी सी हलचल मच गई। थोड़ी सी उत्तेजना भी उत्पन्न हुई।

व्यवस्था :
नेपाल में उस समय शीत ऋतु होने के कारण गर्म कपड़ों के विषय में परिवार के सदस्यों ने बहुत चर्चा की। मेरा ओवरकोट पुराना था। लोगों ने नए ओवरकोट को खरीदने का प्रस्ताव रखा। समय का अभाव था, अतः फिर अगले मौसम तक इसकी खरीद टल गई।

पासपोर्ट आदि का बन्धन नेपाल यात्रा के लिए बाधक नहीं था। भारत और नेपाल की निकटता परस्पर सद्भाव और सहयोग के कारण दोनों देशों के नागरिकों को यह सुविधाएँ प्राप्त हैं।सीमा शुल्क विभाग बहुत सतर्क है। इसकी ओर से तलाशी पूरी-पूरी तरह ली जाती है। सीमा शुल्क के लिए अधिकारी महोदय के सौजन्य से वापस आने और जाने में सुविधा मिल गई क्योंकि वे अधिकारी महोदय मेरे पूर्व छात्र थे।

नेपाल के लिए उड़ान-फॉकर फ्रण्डशिप विमान से पूर्वाह्न 11:30 बजे यह उड़ान शुरू हुई। लगभग डेढ़ घण्टे में हम लोग गोरखपुर की सीमा पार कर हिमालय की तराई में पहुँच गए। सारा वन प्रदेश था जो घने वृक्षों से ढंका हुआ था। चारों ओर हरीतिमा का समुद्र हिलोरें मार रहा था। घने होने से अन्धकारमय वन प्रदेश लेखक ने जीवन में पहली बार देखा। हिमालय के दर्शन हुए। कालिदास, जयशंकर प्रसाद, पन्त और दिनकर द्वारा निर्मित इसके विविध बिम्ब मेरी चेतना में उभरने लगे। दिनकर ने तो सीमा संकट को समाप्त करने के लिए ओजस्वी वाणी में कहा-

“जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त,
सीमापति! तूने की पुकार,
पद दलित इसे करना पीछे,
पहले ले मेरा सिर उतार …।”

लेखक का नामकरण :
लेखक का नाम इनके पितामह ने नागों के उपासक नगाइच वंश से सम्बन्धित होने के कारण नागेन्द्र रखा जो बाद में नगेन्द्र (पर्वतों का राजा) हो गया। मेरे अन्दर शब्द-अर्थ का सौन्दर्य जागृत हो गया। अत: नगेन्द्र ही अधिक उपयुक्त लगा। अब हमारे विमान की परछाईं पर्वत पर इस तरह लग रही थी मानो किसी देवमन्दिर के रजत-शिखर पर छोटा सा पतंगा मंडरा रहा है। कल्पना और यथार्थ का भेद इस तरह ज्ञात हो रहा था।

काठमाण्डू :
एक अर्द्धवृत्ताकार घाटी-नेपाल राज्य में प्रवेश कर पर्वत श्रेणियों को पार करते ही विमान काठमाण्डू घाटी में उतरने लगा। लेखक कुर्सी पेटी बाँधकर हवाई अड्डे पर उतरने को तैयार हो गया। यह हवाई अड्डा मध्यम श्रेणी का है। हिमालय के पर्वत शिखरों की पृष्ठभूमि में उड़ते हुए विमान को देखकर पुराणों में वर्णित देव-गन्धर्वो के विमानों का स्मरण हो आया। इसी तरह उड़ते होंगे। काठमाण्डू शहर एक अर्द्धवृत्ताकार घाटी में स्थित है। विश्वविद्यालय की ओर से होटल में ठहरने की व्यवस्था को मेरे मित्र ने रद्द कर दिया और मैं उन मित्र महोदय के आग्रह पर उनके घर चला गया। नेपाल पर्यटकों का स्वर्ग कहा जाता है। मित्र महोदय ने वहाँ के दर्शनीय स्थलों के देखने की तालिका तैयार कर ली।

काठमाण्डू :
एक रंगीन पहाड़ी शहर-काठमाण्डू एक रंगीन पहाड़ी शहर है जिसमें नए और पुराने का अनमोल मिश्रण है। शहर का नया भाग आधुनिक ढंग का बना हुआ है। इसमें दूतावास की एवं पाश्चात्य उपयोगी वास्तुकला की इमारते हैं। सड़कें पक्की और साफ हैं। काठमाण्डू के पुराने हिस्से में स्थानीय लोगों के मकान हैं जिनका निर्माण लकड़ी और मिट्टी से किया गया है। पत्थर का प्रयोग बहुत कम किया गया है। सम्पन्न व्यक्तियों के विशेषकर राणा परिवार के सदस्यों के भवन सामन्तीय ढंग के हैं। उनके चारों ओर प्राचीर है और भीतर पहाड़ी शैली के गढ़ीनुमा मकान हैं। इनमें एक प्रकार के अनगढ़ पौरुष का आभास मिलता है। राजमहल में नई और पुरानी वास्तु शैली का मिश्रण है। बाहर की प्राचीर जहाँ पुराने ढंग की है, वहीं भीतर के भवन नए ढंग के नये साज सामान से लैस हैं।

सरकारी भवन :
सरकारी भवनों का निर्माण नए ढंग से किया गया है। परन्तु प्रधानमंत्री तथा मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य वहाँ नहीं रहते। वे अपने खानदानी मकानों में ही रहते हैं।

शहर का पुराना भाग बहुत साफ-सुथरा नहीं है। वहाँ का वातावरण और परिवेश उत्तर प्रदेश के उत्तर-पूर्वी शहरों का सा है।

काठमाण्डू के बाजार :
काठमांडू के बाजार में विचित्रता है, रंगीनगी है। सुदूर पूर्व एशिया, चीन भारत और अब अमेरिका का माल यहाँ विदेशी कीमत पर मिलता है। नेपाल की रंग-बिरंगी चीजें बाजार के आकर्षण को बढ़ा देती हैं। खाने-पीने की चीजें वहाँ बहुत महँगी हैं।

नगर के विशेष स्थान पर चौक और चौराहों पर-महाराजाधिराज महेन्द्र व महारानी के चित्र लगे हुए हैं। इन चित्रों के नीचे संस्कृतनिष्ठ नेपाली भाषा में देवनागरी अक्षरों में हिन्दू राजभक्ति परम्परानुसार राजदम्पत्ति की मंगल प्रशस्तियाँ अंकित हैं। वहाँ सभी जगह-मार्गों, हाटों, प्रशासनिक इमारतों पर नेपाली भाषा का ही प्रयोग किया गया है। कहीं पर भी ‘अन्तर्राष्ट्रीय भाषा’ का प्रयोग नहीं किया गया है।

नेपाल के प्रमुख स्थान :
समय का अभाव होने के कारण मुख्य रूप से तीन प्रमुख स्थानों को देखने का कार्यक्रम बन सका-(1) नगर में स्थित काष्ठमंडप, (2) स्वयंभूनाथ और (3) पाटन का कृष्ण मंदिर।

काष्ठमंडप शहर के मध्यभाग में अवस्थित है। इसका रूप और आकार पगोडा के समान है। सम्पूर्ण मण्डप एक ही महावृक्ष के काष्ठ से निर्मित है। काठमांडू काष्ठ मंडप का ही तद्भव है।

स्वयंभूनाथ का मंदिर एक पर्वत खण्ड के ऊपर विराट् भूमिका पर स्थित है। इस मंदिर का प्रमुख आकर्षण है–स्वर्णपत्र से मंडित भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा। इस प्रतिमा में चारों ओर दो-दो आँखें लगी हैं जो मानो एक चिर सजग प्रहरी हो और चतुर्दिक दृक्पात करता हुआ नगर की रक्षा कर रहा हो।

पाटन के कृष्ण मंदिर को देखने के लिए बागमती नदी पार करके कुछ मील दूर जाना पड़ता है। पाटन नगर एक छोटा सा उपनगर है। जहाँ हर जगह छोटे-छोटे मन्दिर या मूर्ति गृह बने हैं। यह कृष्ण मंदिर प्रायः दो हजार वर्ष पुराना है। इसके निर्माण में चूने का प्रयोग नहीं हुआ है। वास्तुकला का यह अद्भुत चमत्कार है जो बिना चूने के इतना मजबूत बना है।

नेपाल-विश्व में एकमात्र हिन्दू राज्य :
नेपाल विश्व में एकमात्र हिन्दू राज्य है। वह भारत वर्ष की भाँति धर्म निरपेक्ष राज्य नहीं है और न पाकिस्तान की तरह धर्म प्रतिबद्ध। नेपाल सदा से ही शैव, शाक्त और बौद्ध धर्मों का केन्द्र रहा है।

भारत और नेपाल के सम्बन्ध :
भारत में विलुप्त अनेक हिन्दू-प्रथाएँ, आज भी वहाँ की व्यावहारिक संस्कृति का अंग हैं। नेपाल और भारत के सम्बन्ध अत्यन्त आत्मीय तथा सौहार्द्रपूर्ण हैं-संस्कृति और धर्म की समानता चिरकाल से दोनों राष्ट्रों को स्नेह बन्धन में बाँधे हुए है।

भगवान पशुपति नाथ के दर्शन :
रात्रि में भगवान पशुपति नाथ के दर्शन के लिए गए। यह शिवरात्रि का पर्व था। संयोग से उस दिन 09 मार्च थी जो लेखक का जन्मदिन था। भक्तों की अपार भीड़ उमड़ रही थी। मंदिर के प्रांगण में नंगे पाँव प्रवेश किया। थोड़ा कष्ट उठाते हुए देव विग्रह के समीप पहुँचे। भगवान को प्रणाम किया।

दस मार्च :
लेखक को 10 मार्च के दिन नेपाल में भारतीय राजदूत श्री श्रीमन्नारायण से मिलना था। वैदेशिक शिष्टाचार के अनुसार उनसे मिला।

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त्रिभुवन विश्वविद्यालय :
वहाँ से विश्वविद्यालय की नई इमारत की ओर चल दिया। यह इमारत काठमाण्डू से कई मील दूर कीर्तिपुर नामक उपनगर में है। विश्वविद्यालय का नाम ‘त्रिभुवन विश्वविद्यालय’ है। इसकी दीर्घा में इसका संक्षिप्त इतिवृत्त दिया हुआ है। जो नेपाली 389 भाषा में है। यह विश्वविद्यालय भव्य आकर्षक विशाल भूमि खण्ड पर स्थित है। पर्वतमाला से घिरा हुआ अर्धचन्द्राकार है। यहाँ प्रकृति और मानव कृति का अद्भुत संयोग है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1960 ई. में हुई थी।

विश्वविद्यालय का विस्तार :
इस विश्वविद्यालय में-कला, सामाजिक विज्ञान और भौतिक विज्ञान के प्रायः सभी प्रमुख विभाग हैं और देश के विभिन्न भागों में स्थापित 35-36 स्नातक विद्यालय हैं।

विभिन्न विषयों के अध्यापक :
विभिन्न विषयों के अध्यापन के लिए नेपाल के सुयोग्य नागरिकों के अतिरिक्त भारत और अमेरिका आदि के विशेषज्ञ विद्वानों की नियुक्ति की जाती है। भारत सहयोग संस्थान की ओर से 20-25 भारतीय प्राध्यापक वहाँ विभिन्न विभागों में कार्य कर रहे हैं। हिन्दी विभागों में एक आचार्य (प्रोफेसर), एक उपाचार्य (रीडर) तथा कई प्राध्यापक हैं। नेपाली भाषा के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण हिन्दी और संस्कृत में वहाँ के छात्रों में विशेष रुचि है।

प्राचीन ग्रंथागारों में अपार सामग्री भरी पड़ी है। वह सामग्री प्रायः संस्कृत और पालि भाषा में है। इसके साथ ही मैथिली हिन्दी का काफी संग्रह है। इन सबका सम्पादन और प्रकाशन निश्चय ही बहुत उपयोगी होगा।

उपसंहार :
अब लेखक के लौटने का दिन 11 मार्च, 1967 था। मध्याह्न में नेपाल-विमान-सेवा से हवाई जहाज से दिल्ली लौटना था। अतः 10.30 बजे हम लोग हवाई अड्डे के लिए चल दिए। यूरोप से कोई विशेष अतिथि नेपाल आ रहे थे। अतः हवाई अड्डे के मार्ग जल्दी बंद हो गए। हमारे विमान में अभी दो-तीन घण्टे का विलम्ब था। हवाई जहाज के आने पर मैंने अपने अतिथेय बन्धुओं से विदा ली। अपरिचित प्रदेश में उनके कारण सभी तरह की सुख-सुविधा रही। यह विमान भी फॉकर फ्रेण्डशिप था। यहाँ सारी सूचनाएँ नेपाली भाषा में दी जाती हैं। समय से लेखक पालम पर उतर गया। उन्हें लेने के लिए बच्चे और परिवार के सदस्य वहाँ पहले से ही खड़े हुए थे। दिल्ली जनपथ से ही उनकी अभिलषित चीजें खरीदकर र्दी क्योंकि नेपाल से कोई भी वस्तु खरीदकर लाई नहीं जा सकती थी।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 9 इत्यादि

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 9 इत्यादि

इत्यादि अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
‘इत्यादि’ शब्द का जन्म कब हुआ था? इसके माता-पिता के विषय में भी जानकारी दीजिए। (2017)
उत्तर:
‘इत्यादि’ के जन्म का सन्, संवत्, दिन की जानकारी ‘इत्यादि’ को भी नहीं है। लेकिन यह तो कहा जा सकता है कि जब शब्द का महा अकाल पड़ा था, तो उस समय ‘इत्यादि’ का जन्म हुआ था। इसकी माता का नाम ‘इति’ और पिता का नाम ‘आदि’ है। इसकी माता अविकृत ‘अव्यय’ घराने की है। इसके लिए यह थोड़े गौरव की बात नहीं है क्योंकि भगवान् फणीन्द्र की कृपा से ‘अव्यय’ वंश वाले प्रतापी महाराज ‘प्रत्यय’ के कभी आधीन नहीं हुए। वे सदा स्वाधीनता से विचरते आये हैं।

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प्रश्न 2.
ज्योतिषियों ने ‘इत्यादि’ के विषय में क्या भविष्य फल बतलाया था?
उत्तर :
जब ‘इत्यादि’ एक बालक था, तब इसके माँ-बाप ने एक ज्योतिषी से इसके अदृष्ट ‘भविष्य’ का फल पूछा। उन्होंने कहा था कि यह लड़का (इत्यादि) विख्यात और परोपकारी होगा। अपने समाज में यह सबका प्यारा बनेगा। परन्तु इसमें दोष है तो बस इतना ही कि यह कुँवारा ही रहेगा। विवाह न होने से इसके बाल-बच्चे नहीं होंगे। यह सुनकर माँ-बाप को पहले तो थोड़ा दुःख हुआ। पर क्या किया जाय ? होनहार ही यह था।

प्रश्न 3.
‘इत्यादि’ में सबसे अच्छा गुण क्या है? स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
‘इत्यादि’ में सबसे अच्छा गुण है कि क्या राजा, क्या रंक, क्या पण्डित, क्या मूर्ख, किसी के भी घर आने-जाने में ‘इत्यादि’ को कोई संकोच नहीं होता है और अपनी मानहानि नहीं समझता। अन्य शब्दों में यह गुण नहीं है। वे बुलाने पर भी कहीं जाने-आने में बड़ा गर्व करते हैं। बहुत आदर चाहते हैं जाने पर सम्मान का स्थान न पाने पर रूठकर उठ भागते हैं। इत्यादि में यह बात नहीं है। इसी से यह शब्द सबका प्यारा है।।

प्रश्न 4.
कठिनाई के समय इत्यादि’ शब्द वक्ता की किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर:
कठिनाई का समय वक्ता पर उस समय होता है जब वे किसी विषय को जानते नहीं, या भाषण के मध्य किसी बात को भूल जाते हैं। ऐसी दशा में उनकी सहायता करना या उनके मान की रक्षा करना ‘इत्यादि’ का ही काम होता है। वे उस दशा में भूली हुई शब्दावली को अपनी स्मृति में पुनः लाने का प्रयास करते हैं परन्तु उसे स्मरण नहीं कर पा रहे, तो उस दशा में वे महोदय पसीना-पसीना हो जाते हैं, चिन्ता के समुद्र में डूबने की नौबत आ जाती है, तब ‘इत्यादि’ शब्द ही उनकी नैया पार कराने को आगे आता है। ‘इत्यादि’ का यह परोपकारी स्वरूप है। इस शब्द को बुलाने की जरूरत नहीं, वह बिना बुलाए, उन महोदय की सहायता के लिए तैयार रहता है।

प्रश्न 5.
“भिन्न-भिन्न भाषाओं के शब्द भण्डार में ‘इत्यादि’ का नाम भिन्न-भिन्न है।” उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
आजकल ‘इत्यादि’ का महत्त्व बढ़ता जा रहा है, क्योंकि लोगों के पास शब्द की दरिद्रता बढ़ गयी है। अतः ‘इत्यादि’ का सम्मान बढ़ जाना स्वाभाविक है। अतः आजकल ‘इत्यादि’ ही इत्यादि है। इत्यादि का सम्मान, शब्द समाज में किसी शब्द का नहीं है। होगा भी तो कोई विरला ही। सम्मान और आदर जो बढ़ा है उसके साथ इत्यादि’ के नामों की संख्या भी बढ़ रही है। आजकल ऐसे अनेक नाम हैं-भिन्न-भिन्न भाषाओं के ‘शब्द समाज’ में इत्यादि का नाम भी भिन्न-भिन्न है। ‘इत्यादि’ का पहनावा भी भिन्न-भिन्न है-अत: जैसा देश वैसा ही वेश बनाकर इत्यादि सभी जगह विचरण करता है। स्थान कोई भी हो ‘इत्यादि’ शब्द विलायत के पार्लियामेन्ट में, महासभा में भी यह शब्द ‘इत्यादि’ भिन्न रूप में लोगों की सहायता के लिए बैठा है। भिन्न रूप में इत्यादि का बगैरह-बगैरह, इत्यलम् (संस्कृत में) आदि इसके अन्य रूप और उदाहरण हैं।

इत्यादि अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘इत्यादि’ शब्द इत्यादि क्यों कहलाया?
उत्तर:
‘इत्यादि’ शब्द इसके दो जनक शब्दों ‘इति’ और ‘आदि’ से मिलकर बना है। अतः इसे इत्यादि कहा जाता है।

प्रश्न 2.
‘इत्यादि’ शब्द क्या-क्या कार्य करता है?
उत्तर:
‘इत्यादि’ शब्द मूर्ख को पंडित बनाता है, जिसे युक्ति नहीं सूझती उसे युक्ति सुझाता है। लेखक को यदि भाव प्रकट करने की भाषा नहीं जुटती तो भाषा जुटाता है। कवि को उपमा बताता है, इत्यादि-इत्यादि।

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इत्यादि पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
‘इत्यादि’ शब्द का प्रयोग बड़े सम्मान के साथ वक्ता (भाषण देने वाले) और लेखक दोनों ही करते रहे हैं। सभा का आयोजन किया जा रहा हो, अथवा किसी सोसाइटी में किसी विषय पर भाषण दिया जा रहा हो या वार्ता का आयोजन किया जा रहा हो, तो वहाँ वक्ता महोदय ‘इत्यादि’ का प्रयोग करने से नहीं चूकते।

लेखक अनेक पुस्तकों का सृजन करता है, वक्ता अनेक तरह के भाषण देता है लेकिन इन दोनों में से कोई भी ‘इत्यादि’ शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई, इस पर कोई भी वार्ता या सूत्र लिखना नहीं चाहता। वक्ता भी अपने वार्तालाप के दौरान ‘इत्यादि’ का प्रयोग तो करता है लेकिन उसकी निष्पत्ति और सृजन के ऊपर कुछ भी बताने से बचता है। ‘इत्यादि’ शब्द अपने आप ही अपनी प्रशंसा करने से हिचकता है और यह बात स्पष्ट होती है कि ‘इत्यादि’ का प्रयोग वे ही लोग ज्यादातर करते हैं जिनके पास अपनी बात स्पष्ट करने के लिए शब्दों की कमी होती है या उन्हें शाब्दिक दुनिया की दरिद्रता भोगनी पड़ रही है।

‘इत्यादि की व्युत्पत्ति :
‘इत्यादि’ शब्द की व्युत्पत्ति किस समय हुई इसकी जानकारी किसी को भी नहीं है। वक्ता या लेखक अपनी भावना या अपने विचार व्यक्त करना चाहता है, लेकिन उस भाव को व्यक्त करने को उसके पास कोई शब्द न हो, तो उस स्थिति में ‘इत्यादि’ शब्द का प्रयोग करता है, बस, यही वह अवसर या क्षण होता है, तब ‘इत्यादि’ शब्द का जन्म होता है। इत्यादि का विग्रह-इति और आदि होता है। ‘इति’ अव्यय है और ‘आदि’ प्रत्यय । अतः इत्यादि में अव्यय और प्रत्यय का योग है जो अपने प्राकृत रूप में मिलकर अपना नया शब्द व्युत्पन्न करते हैं और उसका अर्थ भी फिर एक ही होता है। ‘इत्यादि’ शब्द का अर्थ इति और आदि दोनों के मेल से है। प्रत्येक के अलग-अलग रूप से नहीं। इत्यादि से आगे और भी फिर कुछ भी नहीं कहा जाता। तात्पर्य यह है कि इति और आदि दोनों मिलकर ‘इत्यादि’ बनते हैं लेकिन फिर इससे आगे बढ़कर कुछ भी नहीं।

प्राचीनकाल में इत्यादि का प्रयोग :
पुराने जमाने में इत्यादि का प्रयोग बहुत कम होता था, अतः ‘इत्यादि’ इतना प्रचलित नहीं था, जितना आजकल। इसका कारण था कि लोगों के पास शब्द भण्डार की कमी नहीं थी। वे लोग बुद्धिमान थे, उनके पास शब्दों की दरिद्रता नहीं थी। अब लोग चाहे विदेशों की पार्लियामेन्ट हो, या अपने ही देश की कोई भी पार्टी हो-राजनैतिक, सामाजिक अथवा अन्य कोई। उसके जितने भी सदस्य होते हैं, वे धड़ाधड़ इत्यादि का प्रयोग बेहिचक करते हैं क्योंकि उनके पास तत्सम्बन्धी शब्दावली का अभाव है। विद्वान हो, मूर्ख हो, सभी की जीभ पर ‘इत्यादि’ विराजमान हो रहा है। गरीब हो धनवान् हो-सबकी यही दशा है। इसका अर्थ है लोग इत्यादि से प्यार करते हैं।

‘इत्यादि’ बड़ा सहायक :
‘इत्यादि’ शब्द का प्रयोग करते ही आगे कुछ भी बोलने, स्पष्टता देने या लिखने की आवश्यकता नहीं होती है। लेखक या वक्ता प्राचीन ग्रन्थकारों, विद्वानों, धर्मवेत्ता और दार्शनिकों के नाम यदि भूल जाता है तो कुछ के आगे ‘इत्यादि’ प्रयोग करके थोड़े समय में अपनी बात कहकर समाप्त कर देता है। इसके पीछे यदि बात है, तो उन लेखकों की विद्वानों की या वक्ताओं की अल्पज्ञता।

आलोचक-समालोचक :
किसी भी कृति में यदि कोई थोड़ा भी दोष हो तो आलोचक उस रचना की धज्जियाँ उड़ाकर उसको प्रचलन से अदृश्य करा सकता है। परन्तु एक समालोचक बुराइयों और अच्छाइयों के दौर में बीच का रास्ता निकालकर उस कृति को लोगों में प्रसिद्धि दिला सकता है। समालोचक या आलोचक अपनी स्वार्थपरता के वशीभूत होकर किसी भी कृति को श्रेष्ठ घोषित कर देते हैं।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2

विविधा-2 अभ्यास

विविधा-2 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि के लिए कब तक विराम नहीं है?
उत्तर:
कवि को जीवन की अन्तिम साँस तक विराम नहीं है।

प्रश्न 2.
जीवन को अपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर:
मानव जीवन में कोई न कोई अभाव रहता ही है। इसलिए जीवन को अपूर्ण कहा गया है।

प्रश्न 3.
कजरी कब गाई जाती है?
उत्तर:
कजरी वर्षा ऋतु में गाई जाती है।

प्रश्न 4.
बादलों से मिलने के लिए कौन-कौन से प्राणी आतुर रहते हैं?
उत्तर:
बादलों से मिलने के लिए मानव, कोयल, मयूर, दादुर आदि समस्त प्राणीमात्र आतुर रहते हैं।

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विविधा-2 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘विशद विश्व प्रवाह में बहने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
मानव इस विशाल संसार में जन्म लेता है। वह यहाँ के रहन-सहन, चाल-चलन, कार्य-व्यवहार आदि के क्रम में बचपन से ही सक्रिय होने लगता है। धीरे-धीरे वह इस जगत में पूरी तरह फंस जाता है। वह अन्यान्य कार्य अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर करता है, जिनमें उसे विभिन्न प्रकार की स्थितियों से गुजरना पड़ता है। कार्य में सफलता मिलते जाने पर उसे सुख होता है और जब काम में बाधाएँ आती हैं तो वह दुखी होता है। यह सुख-दुःख की अनुभूति करते हुए हर मानव जीवनयापन करता है। यही इस विशद संसार के प्रवाह का आशय है।

प्रश्न 2.
सफलता प्राप्त करने का मूल मंत्र क्या है? (2011)
उत्तर:
संसार में अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य प्रयास करता है। उसे विविध बाधाओं को पार करना पड़ता है। कुछ व्यक्ति बाधाएँ आने पर निराश हो जाते हैं, और कार्य को त्याग देते हैं। किन्तु कुछ ऐसे होते हैं जो अन्यान्य संकटों का सामना करते हैं उन संकटों से छुटकारा पाते हैं और लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। अन्त में सफलता उन्हीं को मिलती है जो निरन्तर चलते ही रहते हैं। जो रुक जाते हैं वे असफल रहते हैं। अतः सफलता प्राप्त करने का मूल मंत्र निरन्तर काम करते रहना है।

प्रश्न 3.
कवि मेघों से पृथ्वी पर उतरने के लिए आह्वान क्यों कर रहा है? (2008)
उत्तर:
कवि आकाश की चोटियों पर विराजमान बादलों से धरती पर उतरने का आह्वान इसलिए करता है कि वे जीवन की प्रत्येक राह से जल की धारा बहाकर जीवन के प्रवाह को जीवंत बना दें। वे गागर से लेकर सागर तक को पानी से सराबोर कर दें। वर्षा आने से पुरवाई हवा का मान बढ़ेगा तथा उल्लास से भर कर लोग कजरी की तान छेड़ेंगे। आकाश में बादलों के छा जाने से काम नहीं चलता। जब वे जल वर्षा करते हैं, तभी जीवन में आनन्द का संचार होता है। इसीलिए कवि मेघों से पृथ्वी पर उतरने के लिए आह्वान करता है।

प्रश्न 4.
‘कवि ने सूरज के रथ को धीमा-धीमा’ क्यों बताया है? (2014, 16)
उत्तर:
यह सत्य है कि सूर्य अपने रथ पर सवार होकर निरन्तर गतिमान रहता है। किन्तु जब वर्षा ऋतु में आकाश में बादल छाए रहते हैं तब वह ढक जाता है तथा दिखाई नहीं पड़ता है। उसका तीव्र ताप भी कम हो जाता है। जब तेज हवा चलती है तो आकाश में बादल भी बड़ी तेजी से दौड़ते हैं। उनकी तेज गति की तुलना से सूर्य की गति बहुत धीमी प्रतीत होती है। इसीलिए कवि ने तीव्र गति वाले बादलों का हौसला बढ़ाते हुए शीघ्र पृथ्वी पर जल वर्षा करने का आग्रह किया है।

विविधा-2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘गति-मति न हो अवरुद्ध’ इसके लिए कवि ने क्या-क्या प्रयास किए हैं?
उत्तर:
कवि मानते हैं कि मनुष्य का काम निरन्तर सफलता की ओर चलते रहना है। संभव है मार्ग में बाधाएँ आएँ, चलते हुए कभी कुछ मिल सकता तो कभी कुछ गँवाना भी पड़ सकता है। सफलता-असफलता के फलस्वरूप आशा-निराशा के भाव भी हो सकते हैं। परन्तु सुख-दुःखात्मक स्थितियों में मनुष्य को अपने बढ़ते कदम नहीं रोकने चाहिए और न अपने चिन्तन को सही बात सोचने से हटाना चाहिए। जीवन नाम चलते रहना है। यदि गति और मति अवरुद्ध हो जाएगी, तो मानव मृतवत् हो जाएगा। चलते रहने पर यह निश्चित है कि सही प्रयास रहे तो एक न एक दिन अवश्य सफलता मिलेगी। इसलिए कवि हर स्थिति में गति-मति को सचल रखने हेतु प्रयासरत हैं। वे हर प्रकार का सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि मानव जीवन पथ पर निरन्तर बढ़ता ही रहे।

प्रश्न 2.
‘चलना हमारा काम है’ कविता के मूलभाव का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। (2008, 09, 13)
अथवा
‘चलना हमारा काम है।’ शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की इस कविता के मूलभाव का चार बिन्दुओं में विस्तार कीजिए। (2012)
उत्तर:
इसका उत्तर ‘चलना हमारा काम है’ कविता के भाव-सारांश से पढ़िए।

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प्रश्न 3.
कवि बादलों को हँसते-गाते आने के लिए क्यों कहता है? (2009)
उत्तर:
वर्षा जनमानस में हर्ष और उल्लास का भाव पैदा करती है। मनुष्य ही नहीं जानवर, पक्षी, वनस्पतियों में भी एक स्फूर्ति की लहर वर्षा से दौड़ जाती है। वर्षा में बड़े-छोटे, ऊँच-नीच, धनी-निर्धन का भेद भी नहीं होता है। वह तो गागर से लेकर सागर तक को जल से सराबोर कर देती है। यह तभी सम्भव है जब बादल हँसते-गाते, उल्लास भरे होकर वर्षा करें। छुट-पुट वर्षा से काम नहीं चलेगा। बादल प्रसन्न होकर झूम के बरसेंगे, तभी आनन्द का भाव व्याप्त होगा। इसीलिए कवि बादलों को हँसते-गाते अठखेलियाँ करते हुए आने तथा मुक्त भाव से वर्षा करने की आग्रह करते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) ऊँची नीची जीवन घाटी ……………..”बाहों में।
(आ) आओ तुम ……………..अफवाहों में।
(इ) जीवन अपूर्ण ………………काम है।
(ई) मैं पूर्णतः ………………..काम है।
उत्तर:
(अ) शब्दार्थ :
अम्बर = आकाश; शिखरों = चोटियों; जीवन = जल, जिन्दगी; राहों = रास्तों; प्रतिध्वनि = अनुगूंज।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘विविधा-2’ पाठ के ‘बरसो रे’ गीत से अवतरित है। इसके रचयिता वीरेन्द्र मिश्र हैं।

प्रसंग :
भावों के कुशल चितेरे वीरेन्द्र मिश्र ने आकाश में छाए बादलों से बिना भेदभाव के सर्वत्र वर्षा करने का आग्रह किया है।

व्याख्या :
बादलों को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादल ! तुम जगत भर में जल की वर्षा कर दो। तुम आकाश की चोटियों से उतरकर मानव-जीवन के रास्तों पर उतरकर तीव्र वर्षा कर दो। जीवन की विकट-गहन, ऊँची-नीची घाटियों से तथा धरती की मिट्टी से यही अनुगूंज आ रही है कि तुम बिना भेदभाव के गागर से लेकर सागर तक को जल से परिपूर्ण कर दो अर्थात् सभी के प्रति समान व्यवहार करते हुए जीवन का दान करके हर्ष व्याप्त कर दो।

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में बादलों के घिरने तथा वर्षा की मदमस्त फुहारों के मध्य गाये जाने वाले गीतों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
वर्षा होते ही जो उल्लासमय वातावरण हो जाता है उसकी ओर इंगित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादलो! तुम वर्षा कर दो ताकि आनन्दोल्लास के गीत कजरी की तान छिड़ जाय। तुम्हारे वर्षा के जल से वाणी की मधुरता का वरदान मिल जायेगा अर्थात् मधुर स्वर में कजरी गीतों का गायन प्रारम्भ हो जायेगा। हे बादलो! अभी कल तक तो तुम घिर करके आकाश में चारों ओर छाए हुए थे और कुछ दिन पूर्व तो तुम वर्षा आई-वर्षा आई; इस प्रकार अफवाहों में आये थे अर्थात् तुम्हारे आने की चर्चा आकाश में आच्छादित होने से ही होने लगी थी। किन्तु आज तुम वास्तव में वर्षा कर दो ताकि वह अफवाह सत्य सिद्ध हो जाय।

(इ) शब्दार्थ :
अपूर्ण = अधूरा; अवरुद्ध = बाधित, रुके आठों याम= हर समय (दिन और रात दोनों आठ याम (प्रहर) के होते हैं)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि व्यक्ति अधूरा जीवन जीते हुए कभी कुछ प्राप्त कर लेता है, तो कभी कुछ खो भी देता है।

व्याख्या :
मानव के अधूरे जीवन की पूर्णता के प्रयास में कभी कुछ मिल जाता है तो कभी कुछ खो भी जाता है अर्थात् इस जीवन में लाभ-हानि, उत्थान-पतन, ऊँच-नीच चलती ही रहती है। इसी के अनुसार आशा-निराशा के भाव जगते ही रहते हैं। सफलता से आशा और असफलता से कुछ निराशा होती ही है। फलस्वरूप व्यक्ति हँसता-रोता हुआ जीवन पथ पर चलता ही जाता है। उसका ध्यान दिन-रात इस बात पर रहता है कि उसके जीवन की चाल कहीं बाधित न हो जाय। क्योंकि व्यक्ति का काम निरन्तर चलते रहना ही है।

(ई) शब्दार्थ :
दर-दर = द्वार-द्वार; पग = कदम; रोड़ा अटकता = बाधा आती रही; निराश = हताश।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन में आने वाली बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए।

व्याख्या :
मनुष्य जीवन में समग्र सफलता पाने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयास करता है। उसे द्वार-द्वार चक्कर काटने पड़ते हैं। जहाँ भी वहे प्रयास करता है वहाँ कुछ न कुछ बाधाएँ भी आती रहती हैं। व्यक्ति को उन बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए। आशा-निराशा तो जीवन में अपरिहार्य हैं। उनसे डरकर रुकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जीवन पथ पर चलते रहना ही व्यक्ति का कार्य है।

विविधा-2 काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिएसागर, आकाश, सूर्य, पानी, बादल, हाथी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2 img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिएछाँह, बरखा, नैया, माटी, बानी, अचम्भा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2 img-2

बरसो रे भाव सारांश

वर्तमान हिन्दी कविता को नवीन संवेदनाएँ प्रदान करने वाले गीतकार वीरेन्द्र मिश्र के गीतों ने विशेष पहचान बनाई है। ‘बरसो रे’ गीत में कवि ने वर्षा ऋतु के बादलों का आह्वान किया है। गीत आधुनिक जीवन के संदर्भ को भी व्यंजित करता है। कवि बादलों से वर्षा करने का आग्रह करते हुए कहते हैं कि तुम आकाश के शिखरों से उतरकर जगत की राहों में जल वर्षा कर जीवंतता का संचार कर दो। जीवन की ऊँची-नीची घाटियों से धरती के कोने-कोने से आवाज आ रही है कि तुम अपनी गागर से सागर के समान जल वर्षा कर गागर से सागर तक परिपूर्ण जल व्याप्त कर दो।

हे बादलो! तुम हँसते-गाते हुए खुशी से मदमस्त होकर आओ और मिलने को आतुर धरती की बाहों में समा जाओ। तुम्हारे आने से पुरवाई की मानवृद्धि होगी तथा आनन्द व्याप्त करने वाली कजरी की तान छिड़ जायेगी। तुम सघन रूप से आकाश में छा जाओगे तो सूर्य का रथ भी धीमा प्रतीत होगा और मन में विविध कल्पनाएँ उमड़ पड़ेंगी। तुम आम के बागों को वर्षा की बौछारों से जलमग्न कर दो ताकि वनस्पतियों में जीवंतता आ जाए। कल जब तुम आकाश में छाए हुए थे तो वर्षा के आगमन की अफवाहें प्रारम्भ हो गयी थीं। किन्तु आज तुम वर्षा करके जीवन में हर्ष व्याप्त कर दो।

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बरसो रे संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] बरसो रे, बरसो रे, बरसो रे,
अम्बर के शिखरों से उतरो रे
जीवन देने राहों में
ऊँची नीची जीवन घाटी से
प्रतिध्वनियाँ आती हैं माटी से
गागर से सागर दुलकाओ, धन! (2012)

शब्दार्थ :
अम्बर = आकाश; शिखरों = चोटियों; जीवन = जल, जिन्दगी; राहों = रास्तों; प्रतिध्वनि = अनुगूंज।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘विविधा-2’ पाठ के ‘बरसो रे’ गीत से अवतरित है। इसके रचयिता वीरेन्द्र मिश्र हैं।

प्रसंग :
भावों के कुशल चितेरे वीरेन्द्र मिश्र ने आकाश में छाए बादलों से बिना भेदभाव के सर्वत्र वर्षा करने का आग्रह किया है।

व्याख्या :
बादलों को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादल ! तुम जगत भर में जल की वर्षा कर दो। तुम आकाश की चोटियों से उतरकर मानव-जीवन के रास्तों पर उतरकर तीव्र वर्षा कर दो। जीवन की विकट-गहन, ऊँची-नीची घाटियों से तथा धरती की मिट्टी से यही अनुगूंज आ रही है कि तुम बिना भेदभाव के गागर से लेकर सागर तक को जल से परिपूर्ण कर दो अर्थात् सभी के प्रति समान व्यवहार करते हुए जीवन का दान करके हर्ष व्याप्त कर दो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. वर्षा ऋतु के बादलों से बरसने का आग्रह किया गया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. शुद्ध-साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

[2] अब तो हँसते गाते आओ, घन।
इन मिलनातुर बाहों में
पुरवैया नैया के पालों में
नभ के नारंगी रुमालों में
सूरज का रथ धीमा धीमा है।
सपनों की क्या कोई सीमा है
अमराई की छाँओ में।

शब्दार्थ :
मिलनातुर = मिलने के लिए बैचेन; नैया = नाव; पाल = नाव के मस्तूल के सहारे ताना जाने वाला एक कपड़ा जिसमें हवा भरने पर नाव चलती है; नभ = आकाश; अमराई = आम का बाग, उद्यान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में वर्षा ऋतु के बादलों से मुस्कराते हुए वर्षा करने के लिए आने का आग्रह किया गया है।

व्याख्या :
कवि बादलों को आमन्त्रित करते हुए कहते हैं कि हे बादलो ! तुम अब मुस्कराते और गायन करते हुए मिलन के लिए बेचैन धरती की इन बाँहों में आ जाओ, तुम पुरवाई पवन के पालों में आकर सम्मान बढ़ा दो तथा आकाश में रंगीन रुमालों (बदलियों) के रूप में छा जाओ। तुम्हारी गति इतनी तीव्र है कि सूर्य का रथ भी धीमा हो गया है। पुरवाई हवा के तेज झोंकों से बादल इतनी तीव्र गति से उड़ रहे हैं तथा सूर्य को ढक रहे हैं तो ऐसा लगता है कि सूर्य के रथ की गति धीमी हो गयी है। बादलों से होने वाली वर्षा के वातावरण में जो कल्पनाएँ उठती हैं, उनकी कोई सीमा नहीं है अर्थात् नाना प्रकार के मनोरम स्वप्न इस समय जागते हैं। इसलिए हे बादल! तुम आम के बागों की छाया में वर्षा करने आ जाओ ताकि वनस्पतियों को जल रूपी जीवन मिल जाए।

काव्य सौन्दर्य :

  1. आनन्द व्याप्त करने वाले बादलों से हर्षपूर्वक बरसने को कहा गया है।
  2. रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार। शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

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[3] आओ तुम कजरी को स्वर देने
वाणी को पानी के वर देने।
कल तक तुम घिर-घिर कर छाए थे
कल तक तो तुम केवल आए थे।
बरखा की अफवाहों में।

शब्दार्थ :
कजरी वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला गीत; वर = वरदान; बरखा = वर्षा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में बादलों के घिरने तथा वर्षा की मदमस्त फुहारों के मध्य गाये जाने वाले गीतों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
वर्षा होते ही जो उल्लासमय वातावरण हो जाता है उसकी ओर इंगित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादलो! तुम वर्षा कर दो ताकि आनन्दोल्लास के गीत कजरी की तान छिड़ जाय। तुम्हारे वर्षा के जल से वाणी की मधुरता का वरदान मिल जायेगा अर्थात् मधुर स्वर में कजरी गीतों का गायन प्रारम्भ हो जायेगा। हे बादलो! अभी कल तक तो तुम घिर करके आकाश में चारों ओर छाए हुए थे और कुछ दिन पूर्व तो तुम वर्षा आई-वर्षा आई; इस प्रकार अफवाहों में आये थे अर्थात् तुम्हारे आने की चर्चा आकाश में आच्छादित होने से ही होने लगी थी। किन्तु आज तुम वास्तव में वर्षा कर दो ताकि वह अफवाह सत्य सिद्ध हो जाय।

काव्य सौन्दर्य :

  1. उल्लास फैलाने वाली वर्षा के आगमन से पूर्व की उत्सुकता का वर्णन हुआ है।
  2. वर्षा काल में कजरी गीत गाये जाते हैं।
  3. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा दर्शनीय है।
  4. भावानुरूप भाषा का प्रयोग हुआ है।

चलना हमारा काम है भाव सारांश

अथक ऊर्जा, तेज और प्रेरणा के कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ द्वारा रचित ‘चलना हमारा काम है’ कविता मानव को जीवन पथ पर गतिशील रहने के प्रति सचेष्ट करती है। जब जीवन का विस्तृत विकास मार्ग खुला पड़ा है और मेरे पग अपार शक्ति तथा गति से परिपूर्ण हैं, तो मुझे लक्ष्य प्राप्ति तक विश्राम नहीं करना है। सांसारिक सम्पर्कों में कुछ कहना-सुनना होने से परस्पर का दुःख-सुख बँट जाता है और मन हल्का हो जाता है। साथ ही जीवन भी सरल बन जाता है। जब जीवन पथ पर बढ़ते हैं तो सफलता-असफलता जन्य सुख-दुःख, आशा-निराशा का आना स्वाभाविक है। उसको हँसते-रोते हुए पार करके आगे चलते रहना ही मानव का मन्तव्य होना चाहिए। उसे हर पल आगे बढ़ने के प्रति जागरूक रहना चाहिए।

संसार के इस विशाल प्रवाह में सभी को किसी न किसी रूप में सुख-दुःख तो सहने ही होते हैं, इसको भाग्य का दोष या गुण मानना संगत नहीं है। जब मनुष्य लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास करता है तो बाधाओं का आना भी निश्चित है। किन्तु इन बाधाओं से विचलित होने की आवश्यकता नहीं क्योंकि इन बाधाओं को पार करते हुए आगे का मार्ग प्रशस्त करना ही जीवन है। संसार में बढ़ते हुए अन्यान्य साथी मिलते हैं, उनमें से कुछ छूट जाते हैं और कुछ चलते रहते हैं। जो सतत् गतिशील रहते हैं, उनको सफलता का मिलना निश्चित है। लक्ष्य के प्रति सजग रहकर हर स्थिति में चलते रहना ही मानव की जीवन्तता का लक्षण है। इसलिए उसकी गति कभी भी अवरुद्ध नहीं होने देनी चाहिए।

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चलना हमारा काम है संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है। (2015, 16)

शब्दार्थ :
गति = चाल; प्रबल = तीव्र; दर-दर = द्वार-द्वार; मंजिल = लक्ष्य; विराम = आगम, रुकना।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित विविधा-2′ के ‘चलना हमारा काम है’ कविता से अवतरित है। इसके रचयिता शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हैं।

प्रसंग :
यहाँ कवि ने प्रेरित किया है कि क्षमता के रहते हुए व्यक्ति को लक्ष्य की ओर अविराम कदम बढ़ाने चाहिए।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि मेरे कदमों में चलने की तीव्र सामर्थ्य भरी हुई है इसलिए मैं द्वार-द्वार पर क्यों रुककर खड़ा रहूँ। जब आज मेरे सामने बहुत बड़ा प्रगति का मार्ग खुला पड़ा है तब मुझे खड़ा होने की क्या आवश्यकता है। मैं जब तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचता हूँ, तब तक मुझे रुकना स्वीकार नहीं है। क्योंकि हमारा वास्तविक कार्य तो जीवन में गतिशील रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत् सचेष्ट रहने की प्रेरणा दी गई है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है।
  3. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है।

[2] कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ तुम मिल गए
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है। (2010)

शब्दार्थ :
बोझ = भार; राह = मार्ग; राही = राहगीर, पंथी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि हिल-मिलकर चलने से जीवन की राह बड़ी सरलता से कट जाती है।

व्याख्या :
संसार में जीवन की राह पर जब साथ-साथ चलते हैं तो कुछ कहन-सुनन होना स्वाभाविक है। आपस में दुःख-दर्द की बातें कहने-सुनने से मानव के हृदय का भार तो कम हो ही जाता है। यह भी अच्छा रहा कि साथी मिल जाने से बातों ही बातों में जीवन का कुछ रास्ता कट गया। अब मैं अपने नाम आदि का क्या परिचय बताऊँ वास्तव में तो हम सभी इस जीवन पथ के पंथी हैं क्योंकि हमारा काम चलते रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. साथी से दुःख-दर्द बाँटकर जीवन की राह कुछ सहज कट जाती है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सुन्दर संयोग देखा जा सकता है।
  3. सरल, सुबोध तथा साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

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[3] जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी,
आशा निराशा से घिरा
हँसता कभी रोता कभी,
गति मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
अपूर्ण = अधूरा; अवरुद्ध = बाधित, रुके आठों याम= हर समय (दिन और रात दोनों आठ याम (प्रहर) के होते हैं)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि व्यक्ति अधूरा जीवन जीते हुए कभी कुछ प्राप्त कर लेता है, तो कभी कुछ खो भी देता है।

व्याख्या :
मानव के अधूरे जीवन की पूर्णता के प्रयास में कभी कुछ मिल जाता है तो कभी कुछ खो भी जाता है अर्थात् इस जीवन में लाभ-हानि, उत्थान-पतन, ऊँच-नीच चलती ही रहती है। इसी के अनुसार आशा-निराशा के भाव जगते ही रहते हैं। सफलता से आशा और असफलता से कुछ निराशा होती ही है। फलस्वरूप व्यक्ति हँसता-रोता हुआ जीवन पथ पर चलता ही जाता है। उसका ध्यान दिन-रात इस बात पर रहता है कि उसके जीवन की चाल कहीं बाधित न हो जाय। क्योंकि व्यक्ति का काम निरन्तर चलते रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सुख-दुःखमय जीवन की गति निरन्तर सचल रहनी चाहिए।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार।
  3. शुद्ध, साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

[4] इस विशद विश्व प्रवाह में
किसको नहीं बहना पड़ा,
सुख दुःख हमारी ही तरह
किसको नहीं सहना पड़ा,
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है। (2009)

शब्दार्थ :
विशद विशाल; विश्व-प्रवाह संसार का श्रम; व्यर्थ = बेकार, अनावश्यक रूप से; विधाता = भाग्य, ब्रह्मा; वाम = विपरीत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि संसार में सुख-दुःख तो सभी को सहने होते हैं। उनका बखान करना अनावश्यक है।

व्याख्या :
ऐसा कौन है जिसे संसार के इस विशाल क्रम की धारा में प्रवाहित न होना पड़ा हो अर्थात् सभी को इस संसार रूपी सरिता में बहना ही पड़ता है। संसार में सभी को जीवन में सुख और दुःख सहन करने ही पड़ते हैं। इनसे कोई नहीं बच पाता है। फिर दुःख आने पर यह कहना अनावश्यक है कि भाग्य मेरे विपरीत है। हमें तो दुःख की चिन्ता छोड़कर जीवन की राह पर चलते रहना चाहिए क्योंकि चलना ही हमारा कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. दु:ख आने पर भाग्य को दोष देना उचित नहीं है।
  2. सुख-दुःख तो आते-जाते ही रहते हैं।
  3. रूपक, अनुप्रास अलंकार।
  4. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

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[5] मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
दर-दर = द्वार-द्वार; पग = कदम; रोड़ा अटकता = बाधा आती रही; निराश = हताश।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन में आने वाली बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए।

व्याख्या :
मनुष्य जीवन में समग्र सफलता पाने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयास करता है। उसे द्वार-द्वार चक्कर काटने पड़ते हैं। जहाँ भी वहे प्रयास करता है वहाँ कुछ न कुछ बाधाएँ भी आती रहती हैं। व्यक्ति को उन बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए। आशा-निराशा तो जीवन में अपरिहार्य हैं। उनसे डरकर रुकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जीवन पथ पर चलते रहना ही व्यक्ति का कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन पथ में आने वाली बाधाओं से निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री।
  3. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

[6] कुछ साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
पर गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए,
चलता रहे हमदम, उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
फिर गए = वापस लौट गए; हमदम = साथी; अभिराम = सुन्दर, श्रेष्ठ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन के क्रम में कुछ साथ चलते रहते हैं, कुछ छूट जीते हैं किन्तु जो चलता रहता है उसे सफलता अवश्य मिलती है।

व्याख्या :
इस जीवन की राह के कुछ साथी तो साथ चलते ही रहे परन्तु कुछ मध्य मार्ग से ही लौट गये; किन्तु जीवन की चाल में ठहराव नहीं आया। वह तो चलता ही रहा, जो लौट गये सौ लौट गये। किन्तु जो साथी अथक रूप से निरन्तर साथ चलते रहते हैं, उन्हें श्रेष्ठ सफलता प्राप्त होती है। अतः मानव को निरन्तर चलते ही रहना चाहिए क्योंकि चलना ही हमारा कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन में श्रेष्ठ सफलता उसे मिलती है जो निरन्तर चलता ही रहता है।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार।
  3. सरल सुबोध तथा भाव के अनुरूप भाषा का प्रयोग हुआ है।

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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें

तरंगें अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उतर

प्रश्न 15.1.
2.50 kg द्रव्यमान की 20 cm लंबी तानित डोरी पर 200 N बल का तनाव है। यदि इस डोरी के एक सिरे को अनुप्रस्थ झटका दिया जाए तो उत्पन्न विक्षोभ कितने समय में दूसरे सिरे तक पहुँचेगा?
उत्तर:
दिया है: तनाव T = 200 N, डोरी की लम्बाई, l – 20 मी,
∴ डोरी का द्रव्यमान प्रति एकांक लम्बाई
m = \(\frac{M}{l}\) = \(\frac{2.50}{20.0}\) = 0.125 kg m-1
हम जानते हैं कि अनुप्रस्थ तरंगों का वेग,
v = \(\sqrt { \frac { T }{ m } } \) = \(\sqrt { \frac { 200 }{ 0.125 } } \)
= 40 ms-1
माना अनुप्रस्थ तरंगों द्वारा एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने में लिया गया समय t है।
∴ सूत्र t = डोरी की ल०/डोरी का वेग,
∴ t = \(\frac{1}{v}\) = \(\frac{20}{40}\) = 0.5 s

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प्रश्न 15.2.
300 m ऊँची मीनार के शीर्ष से गिराया गया पत्थर मीनार के आधार पर बने तालाब के पानी से टकराता है। यदि वाय में ध्वनि की चाल 340 ms-1 है तो पत्थर के टकराने की ध्वनि मीनार के शीर्ष पर पत्थर गिराने के कितनी देर बाद सुनाई देगी? (g = 9.8 ms-2)
उत्तर:
दिया है: पत्थर का प्रारम्भिक वेग u = 0
त्वरण a = g = 9.8 मीटर/से०2
मीनार की ऊँचाई h = 300 m
वायु में ध्वनि की चाल v = 340 ms-1
माना t1 = पत्थर द्वारा गिरने में लिया गया समय
व t2 = ध्वनि द्वारा मीनार के आधार से शीर्ष तक पहुँचने में लिया गया समय
माना t = शीर्ष पर ध्वनि सुनाई देने का समय है।
अतः t = t1 + t2 ………. (i)
गति के समी० से
s = ut + \(\frac{1}{2}\) at2
दिया है: s = h, u = 0, a = g, t = t1
∴ h = 0 + \(\frac{1}{2}\) gt12
या t1 = \(\sqrt { \frac { 2h }{ g } } \)
या t1 = \(\sqrt { \frac { 2\times 300 }{ 9.8 } } \) = 7.82 s …….. (ii)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें image 1
या t2 = \(\frac{300}{340}\) = \(\frac{15}{7}\) = 0.88s …….. (iii)
∴ समी० (i), (ii) व (iii) से,
t = 7.82 + 0.88 = 8.7s

प्रश्न 15.3.
12.0 m लंबे स्टील के तार का द्रव्यमान 2.10 kg है। तार में तनाव कितना होना चाहिए ताकि उस तार पर किसी अनुप्रस्थ तरंग की चाल 20°C पर शुष्क वायु में ध्वनि की चाल (343 ms-1) के बराबर हो।
उत्तर:
दिया है: t = 12 मीटर, M = 2.10 किग्रा
माना कि तार में तनाव = T
तथा तार की द्रव्यमान प्रति एकांक लम्बाई m है।
∴ m = \(\frac { M_{ s } }{ l } \) = \(\frac{2.10}{12}\)
= 0.175 किग्रा प्रति मीटर
तार में अनुप्रस्थ तरंग की चाल = 20°C 0
शुष्क वायु में ध्वनि की चाल = 343 मीटर/सेकण्ड
हम जानते हैं कि तार में अनुप्रस्थ तरंग की चाल
v = \(\sqrt { \frac { T }{ m } } \)
या v2 = \(\frac{T}{m}\)
∴ T = mv2 = 0.175 × (343)2
= 20588.6 किग्रा मीटर/सेकण्ड2
= 2.06 × 104 न्यूटन।

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प्रश्न 15.4.
सूत्र v = \(\sqrt { \frac { \gamma P }{ \rho } } \) का उपयोग करके स्पष्ट कीजिए कि वायु में ध्वनि की चाल क्यों
(a) दाब पर निर्भर नहीं करती।
(b) ताप के साथ बढ़ जाती है, तथा।
(c) आर्द्रता के साथ बढ़ जाती है?
उत्तर:
(a) वायु में ध्वनि की चाल पर दाब का प्रभाव:
वायु में ध्वनि की चाल सूत्र v = \(\sqrt { \frac { vP }{ d } } \), से प्रतीत होता है कि दाब P के बदलने पर ध्वनि की चाल (v) का मान भी बदल जाता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है। माना कि परमताप T पर किसी गैस के 1 ग्राम – अणु द्रव्यमान का आयतन V व दाब P है। माना कि गैस का अणुभार तथा घनत्व क्रमश: M व d है।
∴ गैस का आयतन, V = MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें image 2 = \(\frac{M}{d}\)
∴ गैस समीकरण PV = RT से,
\(\frac{Pm}{d}\) = RT
या \(\frac{P}{d}\) = \(\frac{RT}{m}\) = (ताप के नियत होने पर)
अतः ताप (T) के नियत रहने पर, यदि दाब P का मान बदलेगा तब उसके साथ घनत्व (d) का मान भी बदलेगा लेकिन P/d का मान नियत रहेगा। इससे ध्वनि की चाल का मान समान रहेगा। अतः वायु या गैस का ताप नियत रहे तो ध्वनि की चाल पर दाब परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

(b) वायु में ध्वनि की चाल पर ताप का प्रभाव:
किसी गैस के लिए P/d का मान गैस के ताप पर निर्भर करता है। किसी गैस को गर्म करने पर,
(i) ताप बढ़ने पर यदि गैस फैलने के लिए स्वतन्त्र है, तो उसका घनत्व कम हो जाता है। जिससे P/d का मान बढ़ेगा।
(ii) यदि गैस किसी.बर्तन में बंद है तो उसका घनत्व (d) वही रहेगा लेकिन दाब बढ़ जायेगा जिससे P/d का मान बढ़ेगा।
अर्थात् गैस का ताप बढ़ने पर उसमें ध्वनि की चाल बढ़ती है। जब किसी गैस के एक ग्राम अणु, घनत्व व आयतन क्रमश: M, d व v है तब V = \(\frac{M}{d}\)
यदि गैस का दाब P व परमताप T हो तो गैस समीकरण PV = RT से,
\(\frac{Pm}{d}\) = RT
या \(\frac{P}{m}\) = \(\frac{RT}{m}\)
∴ गैस में ध्वनि की चाल v = \(\sqrt { \frac { vP }{ d } } \)
= \(\sqrt { \frac { \gamma RT }{ M } } \)
अतः किसी गैस में ध्वनि की चाल उसके परमताप के वर्गमूल के समानुपाती होती है।
v ∝\(\sqrt { T } \)

(c) वायु में ध्वनि की चाल पर आवृत्ति का प्रभाव:
आर्द्र वायु का घनत्व शुष्क वायु के घनत्व की तुलना में कम होता है। अतः आर्द्र वायु में ध्वनि की चाल शुष्क वायु की तुलना में बढ़ जाती है।

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प्रश्न 15.5.
आपने यह सीखा है कि एक विमा में कोई प्रगामी तरंग फलन y = f (x,t) द्वारा निरूपित की जाती है जिसमें x तथा t को x – vt अथवा x + vt अर्थात् y = f (x ± vt) संयोजन में प्रकट होना चाहिए। क्या इसका प्रतिलोम भी सत्य है? नीचे दिए गए y के प्रत्येक फलन का परीक्षण करके यह बताइए कि वह किसी प्रगामी तरंग को निरूपित कर सकता है:

  1. (x – vt)2
  2. log (x + vt) x0
  3. 1/(x + vt)

उत्तर:
इसका विलोम असत्य है। चूंकि किसी प्रगामी तरंग के स्वीकार करने योग्य फलन के लिए एक प्रत्यक्ष आवश्यकता यह है कि यह हर समय व हर स्थान पर परिमित होनी चाहिए। दिए गए फलनों में से सिर्फ फलन (3) ही इस प्रतिबन्ध को सन्तुष्ट करता है। शेष फलन सम्भवतया किसी प्रगामी तरंग को व्यक्त नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न 15.6.
कोई चमगादड़ वायु में 1000 kHz आवृत्ति की पराश्रव्य ध्वनि उत्सर्जित करता है। यदि यह ध्वनि जल के पृष्ठ से टकराती है, तो (a) परावर्तित ध्वनि तथा (b) पारगमित ध्वनि की तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए। वायु तथा जल में ध्वनि की चाल क्रमशः 340 ms-1 तथा 1486 ms-1 है।
उत्तर:
दिया है: v = 1000 kHz = 106 Hz
वायु में ध्वनि की चाल v1 = 340 ms-1
व जल में ध्वनि की चाल V2 = 1486 ms-1
सूत्र, λ = \(\frac{v}{v}\) से
(a) परावर्तित ध्वनि की तरंगदैर्ध्य
λ1 = \(\frac { v_{ 1 } }{ v } \) = \(\frac { 340 }{ 10^{ 6 } } \)
= 0.34 मिमी।

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प्रश्न 15.7.
किसी अस्पताल में ऊतकों में ट्यूमरों का पता लगाने के लिए पराश्रव्य स्कैनर का प्रयोग किया जाता है। उस ऊतक में ध्वनि की तरंगदैर्ध्य कितनी है जिसमें ध्वनि की चाल 1.7 kms-1 है? स्कैनर की प्रचालन आवृत्ति 4.2 MHz है।
उत्तर:
दिया है: आवृत्ति
v = 4.2 MHz = 4.2 × 106 Hz
चाल v = 1.7 kms-1 = 1700 मीटर/सेकण्ड
सूत्र तरंगदैर्ध्य λ = \(\frac{v}{v}\) से
ध्वनि की तरंगदैर्ध्य,
λ = \(\frac { 1700 }{ 4.2\times 10^{ 6 } } \)
= 0.405 मिमी।

प्रश्न 15.8.
किसी डोरी पर कोई अनुप्रस्थ गुणावृत्ति तरंग का वर्णन y (x,t)= 3.0 sin (36t + 0.018x + π/4)
द्वारा किया जाता है। यहाँ x तथा y सेंटीमीटर में तथा t सेकण्ड में है। x की धनात्मक दिशा बाएँ से दाएँ है।

  1. क्या यह प्रगामी तरंग है अथवा अप्रगामी? यदि यह प्रगामी तरंग है तो इसकी चाल तथा संचरण की दिशा क्या है?
  2. इसका आयाम तथा आवृत्ति क्या है?
  3. उद्गम के समय इसकी आरंभिक कला क्या है?
  4. इस तरंग में दो क्रमागत शिखरों के बीच की न्यूनतम दूरी क्या है?

उत्तर:
दी हुई अनुप्रस्थ गुणावृत्ति तरंग का समीकरण है –
y(x,t) = 3.0 (sin 36 + 0.018x + \(\frac { \pi }{ 4 } \)) …… (i)
संचरित तरंग का सामान्य समीकरण निम्न है –
y (x,t) = A sin [\(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) (vt – x) + ϕ0]
A sin [\(\frac { 2\pi }{ T } \) t – \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) + ϕfie0] (∴ \(\frac{1}{T}\) = \(\frac{v}{λ}\)) ….. (ii)

1. समी० () व (ii) की तुलना करने पर स्पष्ट है कि समी० (i) संचरित तरंग को व्यक्त करती है। तथा
\(\frac { 2\pi }{ T } \) = 36, …….. (iii)
\(\frac { -2\pi }{ \lambda } \) = 0.018 ………. (iv)
या λ = – \(\frac { 2\pi }{ 0.018 } \)
समी० (iii) तथा (iv) की गुणा करने पर,
2πvλ = \(\frac { 2\pi \times 26 }{ 0.018 } \)
vλ = -2000
या v = -2000 cms-1 = -20ms-1
जहाँ v = vλ तरंग का वेग है। यहाँ ऋणात्मक चिह्न प्रदर्शित करता है कि तरंग बाएँ से दायीं ओर चलती है।
∴ वेग = 20 sm-1

2. A = 3.0 cm = 3.0 × 10-2 m
\(\frac { 2\pi }{ T } \) = 36
v = \(\frac { 36 }{ 2\pi } \) = \(\frac { 36 }{ 2\times 3.14 } \) = 5.73 Hz

3. प्रारम्भिक कला ϕ = \(\frac { \pi }{ 4 } \) rad

4. तरंग में दो गर्मों के बीच न्यूनतम दूरी = तरंगदैर्ध्य
= λ = \(\frac { 2\pi }{ 0.018 } \)
= \(\frac { 2\times 3.14 }{ 0.018 } \) = 348.9 cm
= 3.489 m

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प्रश्न 15.9.
प्रश्न 15.8 में वर्णित तरंग के लिए x = 0 cm, 2 cm तथा 4 cm के लिए विस्थापन (y) और समय (t) के बीच ग्राफ आलेखित कीजिए। इन ग्राफों की आकृति क्या है? आयाम, आवृत्ति अथवा कला में से किन पहलुओं में प्रगामी तरंग में दोलनी गति एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु पर भिन्न है?
उत्तर:
दी हुई तरंग समीकरण है –
y (x,t) = 3.0 sin (36t + 0.018x + \(\frac { \pi }{ 4 } \)) …… (i)
माना x = 0, 2 व 4 सेमी के लिए तरंग के विस्थापन क्रमश: y1, y2 व y3 हैं।
∴ y1 = (0,t) = 3.0 sin (36t + \(\frac { \pi }{ 4 } \)) ……….. (ii)
y2(2,t) = 3.0 sin (36t + 0.036 + \(\frac { \pi }{ 4 } \)) ……….. (iii)
तथा y3(4,t) = 3.0 sin (36t + 0.072 + \(\frac { \pi }{ 4 } \)) ……… (iv)
image 3
समी० (ii), (iii) व (iv) से स्पष्ट है कि ये वक्र ज्यावक्रीय हैं। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। तरंग संचरण में दोलनी गति, एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक केवल कला में भिन्न है, जैसा कि क्रमश: (i), (iii) व (iv) से दिखाया गया है।
इन तरंगों के आयाम व आवृत्ति क्रमश: 3 सेमी० व \(\frac { 36 }{ 2\pi } \) s-1समान हैं।

प्रश्न 15.10.
प्रगामी गुणावृत्ति तरंग y (x,t) = 2.0 cos 2π (10t – 0.0080x + 0.35)
जिसमें x तथा yको m में तथाt को s में लिया गया है,के लिए उन दो दोलनी बिन्दुओं के बीच कलांतर कितना है जिनके बीच की दूरी है –
(a) 4m
(b) 0.5 m
(c) λ/2
(d) \(\frac { 3\lambda }{ 4 } \)
उत्तर:
दी हुई प्रगामी गुणावृत्ति तरंग का समीकरण निम्न है –
y (x,t) = 2.0 cos 2π (10t – 0.0080x + 0.35) …… (i)
अतः संचरित गुणावृत्ति तरंग की सामान्य समीकरण निम्न है –
y(x,t) = A cos [\(\frac { 2\pi }{ T } \) t – \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) x + ϕ0] …. (ii)
(ii) समी० (i) व (ii) की तुलना से
\(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) = 2π × 0.0080 cm-1 ….. (iii)
\(\frac { 2\pi }{ T } \) = 2π × 10
ϕ0 = 0.35
हम जानते हैं कि कलान्तर = \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) × पथान्तर ………… (iv)

(a) पथान्तर = 4m = 400m, (iv) से,
समी० (iv) से, कलान्तर = \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) × 400
= 2π × 0.0080 × 50
= 0.8π rad
(b) पथान्तर = 0.5 m = 50 cm पर
कलान्तर = 2π × 0.0080 × 50
= 0.8π rad

(c) पथान्तर = \(\frac { \pi }{ 2 } \) पर,
कलान्तर = \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) × \(\frac { 3\lambda }{ 4 } \)
= \(\frac { 3\pi }{ 2 } \) rad = (π + \(\frac { \pi }{ 2 } \))
∴ cos (π + θ) = -cos θ
प्रभावी कलान्तर = \(\frac { \pi }{ 2 } \)

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प्रश्न 15.11.
दोनों सिरों पर परिबद्ध किसी तानित डोरी पर अनुप्रस्थ विस्थापन को इस प्रकार व्यक्त किया गया है –
y(x,t) = 0.06 sin( \(\frac { 2\pi }{ 3 } \) x) cos (120 πt) जिसमें x तथा y को m तथा t को s में लिया गया है। इसमें – डोरी की लम्बाई 1.5 m है जिसकी संहति 3.0 × 10-2kg है। निम्नलिखित का उत्तर दीजिए:
(a) यह फलन प्रगामी तरंग अथवा अप्रगामी तरंग में से किसे निरूपित करता है?
(b) इसकी व्याख्या विपरीत दिशाओं में गमन करती दो तरंगों के अध्यारोपण के रूप में करते हुए प्रत्येक तरंग की तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति तथा चाल ज्ञात कीजिए।
(c) डोरी में तनाव ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया हुआ फलन है –
y (x,t) = 0.06 sin (\(\frac { 2\pi x }{ 3 } \)) cos (120πt) ……… (i)
संचरित तरंग को निम्न रूप में व्यक्त कर सकते हैं –
y (x,t) = A sin \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) (vt – x) …………… (ii)

(a) चूँकि दिया गया फलन प्रगामी तरंग की भाँति है। अतः दिया गया फलन प्रगामी तरंग को व्यक्त करता है।

(b) हम जानते हैं कि यदि तरंग
y1 = A sin \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) (vt + x)
x – अक्ष की धनात्मक दिशा में संचरित होती है,
तो यह तरंग निम्न परावर्तित तरंग द्वारा अध्यारोपित होती है।
अतः y2 = -A sin \(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) (vt + x)
अतः अध्यारोपण सिद्धांत से, y = y1 + Y2
= -2A sin (\(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) x) cos (\(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) vt) …… (iii)
समीकरण (i) तथा (ii) की तुलना करने पर,
\(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) = \(\frac { 2\pi }{ 3 } \) or λ = 3m
\(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) v = 120π
या v = 60λ = 60 × 3 = 180 ms-1
∴ आवृत्ति v = \(\frac { v }{ \lambda } \) = \(\frac{108}{3}\) = 60 Hz
अनुप्रस्थ तरंग का वेग
v = \(\sqrt { \frac { T }{ m } } \) or v2 = \(\frac{T}{m}\)
∴ T = v2 × m ……….. (iv)
दिया है: द्रव्यमान प्रति एकांक लम्बाई = image 3
= \(\frac { 3\times 10^{ -2 }kg }{ 1.5m } \) = 2 × 10-2 kg m-1 ……… (v)
v = 180 ms-1 प्रति तरंग

(c) माना डोरी में तनाव T है।
∴ समीकरण (iv) व (v) से,
T = (180)2 × (2 × 10-2)
= 32400 × 2 × 10-2 = 648 N

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प्रश्न 15.12.
(i) प्रश्न 15.11 में वर्णित डोरी पर तरंग के (b) कला, (c) आयाम से कंपन करते हैं? अपने उत्तरों को स्पष्ट कीजिए।
(ii) एक सिरे से 0.375 m दूर के बिन्दु का आयाम कितना हैं।
उत्तर:
(a) डोरी के समस्त बिन्दु समान आवृत्ति से कंपन करते हैं।

(b) चूँकि λ = 3 मीटर व डोरी की लम्बाई, l = 1.5 मीटर = \(\frac{1}{2}\)
अर्थात् डोरी को दोनों सिरों पर निस्पंद व मध्य में एक प्रस्पंद बनेगा।
चूँकि अप्रगामी तरंगों में दो क्रमागत निस्पंदों के मध्य के सभी बिन्दु समान कला में कम्पन करते हैं। अतः डोरी के सभी बिन्दु समान कला में कम्पन करेंगे।

(c) दी गई समीकरण निम्न है –
y (x,t) = 0.06 sin (\(\frac { 2\pi }{ 3 } \) x) cos (12πt)
इस समीकरण का आयाम,
A = 0.06 sin (\(\frac { 2\pi }{ 3 } \) x)
x = 0.375 m पर,
A = 0.06 sin (\(\frac { 2\pi }{ 3 } \) × 0.375)
= 0.06 × sin (0.250π)
= 0.06 sin (\(\frac { \pi }{ 4 } \)) = 0.06 × \(\frac { 1 }{ \sqrt { 2 } } \)
= 0.06 \(\sqrt { \frac { 2 }{ 2 } } \) 102 = 0.3 \(\sqrt { 2 } \)
= 0.03 × 1.414
= 0.04242 m = 0.042 m

प्रश्न 15.13.
नीचे किसी प्रत्यास्थ तरंग (अनुप्रस्थ अथवा अनुदैर्ध्य ) के विस्थापन को निरूपित करने वाले x तथा t के फलन दिए गए हैं। यह बताइए कि इनमें से कौन (i) प्रगामी तरंग को, (ii) अप्रगामी तरंग को, (iii) इनमें से किसी भी तरंग को निरूपित नहीं करता है –

  1. y = 2cos (3x) sin 10t
  2. y = 2\(\sqrt { x-vt } \)
  3. y = 3 sin (5x – 0.5t) + 4 cos (5x – 0.5t)
  4. y = cos x sin t + cos 2x sin 2t

उत्तर:

  1. महत्व फलन अप्रगामी तरंग को व्यक्त करता है।
  2. किसी भी तरंग के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं है।
  3. प्रगामी गुणावृत्ति तरंग को प्रदर्शित करता है।
  4. दो प्रगामी तरंगों के अध्यारोपण प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 15.14.
दो दृढ़ टेकों के बीच तानित तार अपनी मूल विधा में 45 Hz आवृत्ति से कंपन करता है। इस तार का द्रव्यमान 3.5 × 10-2 kg तथा रैखिक द्रव्यमान घनत्व 4.0 × 10-2 kg m-1 है। (a) तार पर अनुप्रस्थ तरंग की चाल क्या है, तथा (b) तार में तनाव कितना है?
उत्तर:
दिया है: m = 3.5 × 10-2 kg
रैखिक द्रव्यमान घनत्व µ = 4 × 10-2 kg m-1
सूत्र µ = \(\frac{m}{l}\) से,
तार की लम्बाई l = \(\frac{m}{µ}\)
= \(\frac { 3.5\times 10^{ -2 } }{ 4\times 10^{ -2 } } \) = \(\frac{7}{8}\) मीटर
माना तार में उत्पन्न तरंग की तरंगदैर्ध्य λ है। चूँकि तार मूल विधा में कम्पन कर रहा है। अतः \(\frac { \lambda }{ 2 } \) = l
∴ λ = 2l = \(\frac{7}{4}\) मीटर
सूत्र v = vλ से, तार में तरंग की चाल
v = 45 × 7 = 79 ms-1
माना कि तार का तनाव t है।
∴ v = \(\sqrt { \frac { T }{ \mu } } \)
∴ T = v2µ = (79)2 × 10-2
= 248 न्यूटन

प्रश्न 15.15.
एक सिरे पर खुली तथा दूसरे सिरे पर चलायमान पिस्टन लगी 1 m लंबी नलिका, किसी नियत आवृत्ति के स्त्रोत (340 Hz आवृत्ति का स्वरित्र द्विभुज) के साथ, जब नलिका में वायु कॉलम 25.5 cm अथवा 79.3 cm होता है तब अनुनाद दर्शाती है। प्रयोगशाला के ताप पर वायु में ध्वनि की चाल का आंकलन कीजिए। कोर-प्रभाव को नगण्य मान सकते हैं।
उत्तर:
नलिका में पिस्टन लगाने से यह बंद आर्गन नलिका की भाँति व्यवहार करेगा।
माना बंद नलिका में nवें तथा (n + 1) वें कम्पन के लिए अनुनादित वायु स्तम्भों की लम्बाइयाँ l1 व l2 हैं।
∴ l1 = 25.5 सेमी
l2 = 79.3 सेमी
माना ध्वनि तरंग का वेग v है। अतः इन कम्पनों के लिए आवृत्ति v1 व’ v2 निम्नवत् होगी।
v1 = (2n -1) \(\frac { v }{ 4l_{ 1 } } \) ………. (i)
तथा v2 = [2(n + 1) -1] \(\frac { v }{ 4l_{ 2 } } \) ………. (ii)
दोनों विधाओं में 340 Hz की आवृत्ति से अनुनाद होगा।
∴ V1 = V2 = 340 …………. (iii)
या (2n – l) – \(\frac { v }{ 4l_{ 1 } } \) = (2n +1) \(\frac { v }{ 4l_{ 2 } } \)
या \(\frac { (2n-1) }{ l_{ 1 } } \) – \(\frac { v }{ 4l_{ 1 } } \) = (2n + 1) \(\frac { v }{ 4l_{ 2 } } \)
या \(\frac { (2n-1) }{ l_{ 1 } } \) = \(\frac { (2n-1) }{ l_{ 2 } } \)
या \(\frac { 2n-1 }{ 2n+1 } \) = \(\frac { l_{ 2 } }{ l_{ 1 } } \) = \(\frac { 22.5 }{ 79.3 } \) ~ \(\frac{1}{3}\)
या 3(2n -1) = 2n +1
या 6n -3 = 2n + 1
या 6n – 2n = 3 + 1
4n = 4
∴ n = 1
समी० (2n -1) \(\frac { v }{ 4l_{ 2 } } \) = 340 में n = 1 रखने पर
(2 × 1 – 1) \(\frac { v }{ 4l_{ 2 } } \) = 340
या (2 – 1) × \(\frac { v }{ 4\times 25.5 } \) = 340
या \(\frac { v }{ 4\times 25.5 } \) = 340
या v = 340 × 4 × 25.5
या v = 340 × 102 = 34680 cms -1
= 346.8 ms -1 = 347 ms-1

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प्रश्न 15.16.
100 cm लंबी स्टील-छड़ अपने मध्य बिन्दु पर परिबद्ध है। इसके अनुदैर्ध्य कंपनों की मूल आवृत्ति 2.53 kHz है। स्टील में ध्वनि की चाल क्या है?
उत्तर:
चूँकि छड़ मध्य बिन्दु पर परिबद्ध है अतः यहाँ एक निस्पंद (A) तथा मूल विधा के लिए सिरों पर दो प्रस्पंद बनेंगे। अतः छड़ की मूल लम्बाई निम्नवत् होगी –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें image 3
जहाँ l = छड़ की लम्बाई
तथा λ = तरंग की तरंगदैर्ध्य
दिया है =
l = 100 cm, v = 2.53 kHz = 2.53 × 103 Hz
∴ λ = 2 × 100 = 200 cm
माना स्टील में ध्वनि का वेग v है।
अत: v = vλ = 2.53 × 103 × 200
= 506 × 103 cms-1 = 5.06 × 103 ms-1
∴ v = 5.06 kms-1

प्रश्न 15.17.
20 cm लंबाई के पाइप का एक सिरा बंद है। 430 Hz आवृत्ति के स्त्रोत द्वारा इस पाइप की कौन-सी गुणावृत्ति विधा अनुनाद द्वारा उत्तेजित की जाती है? यदि इस पाइप के दोनों सिरे खुले हों, तो भी क्या यह स्त्रोत इस पाइप के साथ अनुनाद करेगा? वायु में ध्वनि की चाल 340 ms-1 है।
उत्तर:
दिया है:
l = 20 cm = 0.2 m, v = 340 ms-1
उत्तेजित स्त्रोत की आवृत्ति vn = 430 Hz
हम जानते हैं कि बंद नली के कम्पनों की आवृत्ति निम्न होती है –
vn = (2n – 1) \(\frac { v }{ 4l } \)
या 430 = (2n -1) \(\frac { 340 }{ 4\times 0.20 } \)
2n -1 = 430 × \(\frac { 0.80 }{ 340 } \) = 1.02
या n = 1.01
अत: आर्गन नली प्रथम सन्नादी या दोलन की मूल आवृत्ति में है।
खुली नली में, कम्पन की nवीं विधा की आवृत्ति v’n = n\(\frac { v }{ 2l } \)
जहाँ मूल विधा में लम्बाई l = \(\frac { \lambda }{ 2 } \) 0r λ = 2l
या 430 = \(\frac { n\times 340 }{ 2\times 0.2 } \)
या n = \(\frac { 430\times 0.4 }{ 340 } \) = \(\frac{172}{340}\) = 0.5
चूँकि n एक पूर्णांक है। अतः n = 0.5 सम्भव नहीं है। अतः समान स्त्रोत खुली नली में अनुनादित नहीं होगा।

प्रश्न 15.18.
सितार की दो डोरियाँ A तथा B एक साथ ‘गा’ स्वर बजा रही हैं तथा थोड़ी-सी बेसुरी होने के कारण 6 Hz आवृत्ति के विस्पंद उत्पन्न कर रही हैं। डोरी A का तनाव कुछ घटाने पर विस्पंद की आवृत्ति घटकर 3 Hz रह जाती है। यदि की मूल आवृत्ति 324 Hz है तो Bकी आवृत्ति क्या है?
उत्तर:
हम जानते हैं कि आवृत्ति ∝ image 4
अत: डोरी में तनाव कम होने से इसकी आवृत्ति भी घटती है। माना A की वास्तविक आवृत्ति VA व B की VB है।
∴ VA – VB = 6 Hz
परन्तु VA = 324 Hz
∴ VB = 324 – 6 =318 Hz
A में तनाव कम करने पर,
∆v = 3 Hz
A की आवृत्ति = 324 – 3 = 321 Hz
∴ B की आवृत्ति = 318 Hz

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प्रश्न 15.19.
स्पष्ट कीजिए क्यों (अथवा कैसे)?

  1. किसी ध्वनि तरंग में विस्थापन निस्पंद दाब प्रस्पंद होता है और विस्थापन प्रस्पंद दाब निस्पंद होता है।
  2. आँख न होने पर भी चमगादड़ अवरोधकों की दूरी, दिशा, प्रकृति तथा आकार सुनिश्चित कर लेते हैं।
  3. वायलिन तथा सितार के स्वरों की आवृत्तियाँ समान होने पर भी हम दोनों से उत्पन्न स्वरों में भेद कर लेते हैं।
  4. ठोस अनुदैर्ध्य तथा अनुप्रस्थ दोनों प्रकार की तरंगों का पोषण कर सकते हैं जबकि गैसों में केवल अनुदैर्ध्य तरंगें ही संचरित हो सकती हैं, तथा
  5. परिक्षेपी माध्यम में संचरण के समय स्पंद की आकृति विकृत हो जाती है।

उत्तर:
1. ध्वनि तरंगों में जहाँ माध्यम के कणों का विस्थापन न्यूनतम होता है वहाँ कण अत्यधिक पास-पास होते हैं। अतः वहाँ दाब अधिकतम होता है। (i.e., दाब प्रस्पंद बनता है) एवं जहाँ विस्थापन महत्तम होता है वहाँ कण दूर-दूर होते हैं, । अतः वहाँ दाब न्यूनतम होता है (i.e., दाब निस्पंद बनता है।)

2. चमगादड़ उच्च आवृत्ति की पराश्रव्य तरंगें उत्सर्जित करती है। ये तरंगें अवरोधकों से टकराकर वापस लौटती हैं तो चमगादड़ इन्हें अवशोषित कर लेते हैं। परावर्तित तरंगों की आवृत्ति व तीव्रता की प्रेषित तरंगों से तुलना करके चमगादड़ अवरोधकों की दूरी, प्रकृति, दिशा व आकार सुनिश्चित कर लेते हैं।

3. प्रत्येक स्वर में एक मूल स्वरक के साथ कुछ अधिस्वरक भी उत्पन्न होते हैं। परन्तु वायलिन व सितार से उत्पन्न स्वरों में मूल स्वरकों की आवृत्तियाँ समान रहती हैं लेकिन उनके साथ उत्पन्न होने वाले अधिस्वरकों की संख्या, आवृत्तियों व अपेक्षिक तीव्रताओं में भिन्नता होती है। इसी भिन्नता के आधार पर इन्हें विभेद किया जाता है।

4. ठोसों में आयतन प्रत्यास्थता के साथ-साथ अपरूपण प्रत्यास्थता भी पाई जाती है। अतः ठोसों में दोनों प्रकार की तरंगें संचरित होती हैं। जबकि गैसों में केवल आयतन प्रत्यास्थता ही पाई जाती है। अतः गैसों में केवल अनुदैर्ध्य तरंगें ही संचरित हो पाती हैं।

5. प्रत्येक ध्वनि स्पंद कई विभिन्न तरंगदैर्ध्य की तरंगों का मिश्रण होता है। जब यह स्पंद परिक्षेपी माध्यम में प्रवेश करता है तब ये तरंगें अलग-अलग वेगों से गतिमान रहती हैं। अतः स्पंद की आकृति विकृत हो जाती है।

प्रश्न 15.20.
रेलवे स्टेशन के बाह्य सिग्नल पर खड़ी कोई रेलगाड़ी शांत वायु में 400 Hz आवृत्ति की सीटी बजाती है। (i) प्लेटफॉर्म पर खड़े प्रेक्षक के लिए सीटी की आवृत्ति क्या होगी जबकि रेलगाड़ी (a) 10 ms-1 चाल से प्लेटफॉर्म की ओर गतिशील है, तथा (b) 10 ms-1 चाल से प्लेटफॉर्म से दूर जा रही है? (ii) दोनों ही प्रकरणों में ध्वनि की चाल क्या है? शांत वायु में ध्वनि की चाल 340 ms-1 लीजिए।
उत्तर:
दिया है: v = 400 Hz, Vt = 10 ms-1
शांत वायु में ध्वनि की चाल
v = 340 ms-1
(i) (a) जब रेलगाड़ी (ध्वनि स्त्रोत) स्थिर प्रेक्षक की ओर गतिमान है, तब प्रेक्षक द्वारा सुनी गई ध्वनि की आवृत्ति,
v’ = v(\(\frac { v }{ v-v_{ t } } \))
= 400(\(\frac { 340 }{ 340-10 } \))
= 412 Hz

(b) जब रेलगाड़ी स्थिर प्रेक्षक से दूर जा रही है तब प्रेक्षक द्वारा सुनी गई ध्वनि की आवृत्ति,
v’ = v (\(\frac { v }{ v+v_{ t } } \))
= 400 (\(\frac { 340 }{ 340+10 } \)) = 389 Hz
(ii) दोनों स्थितियों में ध्वनि की चाल (340 ms-1) समान है।

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प्रश्न 15.21.
स्टेशन यार्ड में खड़ी कोई रेलगाड़ी शांत वायु में 400 Hz आवृत्ति की सीटी बजा रही है। तभी 10 ms-1 की चाल से यार्ड से स्टेशन की ओर वायु बहने लगती है। । स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े किसी प्रेक्षक के लिए ध्वनि की आवृत्ति, तरंगदैर्ध्य तथा चाल क्या है? क्या यह स्थिति तथ्यतः उस स्थिति के समरूप है जिसमें वायु शांत हो तथा प्रेक्षक 10 ms-1 चाल से यार्ड की ओर दौड़ रहा हो? शांत वायु में ध्वनि की चाल 340 ms-1 ले सकते हैं।
उत्तर:
दिया है: v = 400 Hz
वायु की प्रेक्षक की ओर चाल vw = 10 ms-1
शांत वायु में ध्वनि की चाल vs = 340 ms-1
चूँकि रेलगाड़ी व प्रेक्षक दोनों स्थिर हैं। अतः V0 = 0 व v’s = 0
अतः प्रेक्षक द्वारा सुनी गई ध्वनि की आवृत्ति
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें image 4
चूँकि वायु प्रेक्षक की ओर चलती है।
अतः प्रेक्षक के लिए वायु की चाल
= vs + vw = 350 ms-1
प्रेक्षक के लिए सीटी की आवृत्ति = 400 Hz
∴ ध्वनि की तरंगदैर्ध्य x = λ’ = \(\frac { v_{ t }+v_{ s } }{ v’ } \)
= \(\frac { 340+10 }{ 400 } \) = \(\frac{7}{8}\) Hz = 0.875 m

प्रश्न 15.22.
किसी डोरी पर कोई प्रगामी गुणावृत्ति तरंग इस प्रकार व्यक्त की गई है y(x,t) = 7.5 sin (0.0050x + 12t + π/4)
(a) x = 1cm तथा t = 1s पर किसी बिन्दु का विस्थापन तथा दोलन की चाल ज्ञात कीजिए। क्या यह चाल तरंग संचरण की चाल के बराबर है?
(b) डोरी के उन बिन्दुओं की अवस्थिति ज्ञात कीजिए जिनका अनुप्रस्थ विस्थापन तथा चाल उतनी ही है जितनी x=1cm पर स्थित बिन्दु की समय t = 25, 5 s तथा 11s पर
उत्तर:
दिया है:
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें image 5

(a) समीकरण (i) की तुलना संचरित तरंग के सामान्य समीकरण से करने पर
y = a sin [\(\frac { 2\pi }{ \lambda } \) (vt +x ) + \(\frac { \pi }{ 4 } \)] we get,
v = velocity of wave
= \(\frac{12}{0.0050}\) = \(\frac { 12\times 10^{ 4 } }{ 50 } \)
= 12 × 200 cm s-1
= 24 ms-1
x = 1 सेमी० पर t = 1 सेकण्ड,
अतः विस्थापन,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें image 6
बिन्दु के दोलन का वेग
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 15 तरंगें image 7
x = 1 सेमी० पर t = 1 सेकण्ड
v = 90 c0s (0.05 × 1 + 12 × 1 + 0.785)
= 90 cos 732.83° = 90 cos 12.83°
= 90 × 0.9751 cms -1 = 87.76 cms-1
= 88 cms-1
परन्तु तरंग संचरण का वेग 24 मीटर/सेकण्ड है।
स्पष्ट है कि बिन्दु का दोलन वेग तरंग संचरण के वेग के समान नहीं है।
∴नहीं, यह वेग तरंग संचरण के वेग (24 मीटर/से०) के समान नहीं है।

(b) दी हुई समीकरण है,
y (x,t) = 7.5 sin 0.005x + 12 +\(\frac { \pi }{ 4 } \))
इस समीकरण की तुलना समीकरण,
y = A sin (ωt + kx + ϕ) से करने पर,
∴ k = 0.005 रेडियन 1 सेमी०
∴ λ = \(\frac { 2\pi }{ k } \)
= \(\frac { 2\times 3.14 }{ 0.005 } \) = 12.57 मीटर
तरंग में सभी बिन्दुओं का समान अनुप्रस्थ विस्थापन होता है। यह विस्थापन λ, 2λ, 3λ, … इत्यादि होता है। अतः 12.57 मीटर, 25.14 मीटर, 37.71 मीटर इत्यादि दूरी पर स्थित बिन्दु x = 1 सेमी से समान विस्थापन पर होंगे। अतः सभी बिन्दुओं जिनका विस्थापन nλ है। जहाँ n = ± 1, ± 2, ± 3, ± 4, … है, x = 1 सेमी से 12.57 मोटर, 25.14 मीटर … दूरी हैं।

प्रश्न 15.23.
ध्वनि का कोई सीमित स्पंद (उदाहरणार्थ सीटी की पिप) माध्यम में भेजा जाता है। (a) क्या इस स्पंद की कोई निश्चित (i) आवृत्ति, (ii) तरंगदैर्ध्य, (iii) संचरण की चाल है? (b) यदि स्पन्द दर 1 स्पंद प्रति 20 सेकण्ड है अर्थात् सीटी प्रत्येक 20 s के पश्चात् सेकंड के कुछ अंश के लिए बजती है, तो सीटी द्वारा उत्पन्न स्वर की आवृत्ति (1/20) Hz अथवा 0.05 Hz है?
उत्तर:
(a) नहीं, इस स्पंद की कोई निश्चित आवृत्ति या तरंगदैर्ध्य नहीं होती है। स्पन्द के संचरण की चाल निश्चित होती है, जो माध्यम में ध्वनि की चाल के समान है।
(b) नहीं, स्पंद की आवृत्ति (\(\frac{1}{20}\)) Hz
या 0.05 Hz नहीं है।

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प्रश्न 15.24.
8.0 × 10-3 kg m-1 रैखिक द्रव्यमान घनत्व की किसी लंबी डोरी का एक सिरा 256 Hz आवृत्ति के विद्युत चालित स्वरित्र द्विभुज से जुड़ा है। डोरी का दूसरा सिरा किसी स्थिर घिरनी के ऊपर गुजरता हुआ किसी तुला के पलड़े से बँधा है जिस पर 90 kg के बाट लटके हैं। घिरनी वाला सिरा सारी आवक ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है जिसके कारण इस सिरे से परावर्तित तरंगों का आयाम नगण्य होता है। t = 0 पर डोरी के बाएँ सिरे (द्विभुज वाले सिरे) y = 0 पर अनुप्रस्थ विस्थापन शून्य है (y = 0) तथा वह y की धनात्मक दिशा के अनुदिश गतिशील है। तरंग का आयाम 5.0 cm है। डोरी पर इस तरंग का वर्णन करने वाले अनुप्रस्थ विस्थापन को तथा के फलन के रूप में लिखिए।
उत्तर:
हम जानते हैं कि तरंग वेग
V = \(\sqrt { \frac { T }{ m } } \) ……… (i)
पलड़े में द्रव्यमान = M = 90 kg
दिया है: T = Mg = 90 × 9.8 = 882.0 N
रेखीय द्रव्यमान घनत्व m = 8 × 10-3 kg m-1
∴ v = \(\sqrt { \frac { 882 }{ 8\times 10^{ -3 } } } \) = 3.32 × 102 ms-1
= 332 ms -1
धनात्मक x – दिशा में y विस्थापन वाली संचारित तरंग का समीकरण
y = A sin (ωt – kx) …………. (ii)
जहाँ ω = 2πv तथा
A = 5.0 cm = 0.05 m, v = 256 Hz
∴ ω = 2π × 256 s-1
= 16.1 × 102 = 1.61 × 103 s-1
=16.1 x 102 =1.61×103 5-1
पुनः
k = \(\frac { \omega }{ v } \) = \(\frac { 2\pi \times 256 }{ 3.32\times 10^{ 2 } } \)
= \(\frac { 1607.7 }{ 3.32\times 10^{ 2 } } \)
= \(\frac { 16.1\times 10^{ 2 }radm^{ -1 } }{ 3.32\times 10^{ 2 } } \)
= 4.84 m-1
समी० (ii) में ω1A तथा k के मान रखने पर,
y = 0.05 sin (1.6 × 103t – 4.84)

प्रश्न 15.25.
किसी पनडुब्बी से आबद्ध कोई ‘सोनार’ निकाय 40.0 KHz आवृत्ति पर प्रचालन करता है। कोई शत्रु-पनडुब्बी 360 kmh-1 चाल से इस सोनार की ओर गति करती है। पनडुब्बी से परावर्तित ध्वनि की आवृत्ति क्या है? जल में ध्वनि की चाल 1450 ms-1 लीजिए।
उत्तर:
दिया है: जल में ध्वनि की चाल v = 1450 ms-1
शत्रु पनडुब्बी की चाल v1 = 1360 kmh-1
= 360 × \(\frac{5}{18}\) = 100 ms-1
सोनार द्वारा प्रेषित तरंग की आवृत्ति
ω = 40 kHz
माना शत्रु पनडुब्बी द्वारा ग्रहण आवृत्ति v1 है।
स्पष्ट है: श्रोता का वेग v0 = v1 = 100 ms-1
∴ आवृत्ति v1 = v(\(\frac { v+v_{ 0 } }{ v } \))
= 40 (\(\frac { 140+100 }{ 1450 } \))
= 42.75 kHz = 43 kHz
शत्रु पगडुब्दी इस आवृत्ति की तरंगों को परावर्तित करती है। माना सोनार द्वारा ग्रहण आवृत्ति n2 है।
इस स्थिति में, स्त्रोत सोनार की ओर vs = 100 ms-1 के वेग से गति करता है।
∴ v2 = v1(\(\frac { v }{ v-v_{ s } } \))
= 42.75 (\(\frac { 1450 }{ 1450-100 } \)) = 46 kHz

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प्रश्न 15.26.
भूकम्प पृथ्वी के भीतर तरंगें उत्पन्न करते हैं। गैसों के विपरीत, पृथ्वी अनुप्रस्थ (S) तथा अनुदैर्ध्य (P) दोनों प्रकार की तरंगों की अनुभूति कर सकती है। S तरंगों की प्रतिरूपी चाल लगभग 4.0 kms-1तथा P तरंगों की प्रतिरूपी चाल लगभग 8.0 kms-1 है। कोई भूकंप-लेखी किसी भकंप की P तथा S तरंगों को रिकॉर्ड करता है। पहली P तरंग पहली S तरंग की तुलना में 4 मिनट पहले पहुँचती है। यह मानते हुए कि तरंगें सरल रेखा में गमन करती हैं यह ज्ञात कीजिए कि भूकंप घटित होने वाले स्थान की दूरी क्या है?
उत्तर:
दिया है: S तरंगों की चाल
v1 = 4 km s-1
= 4 × 60 = 240 km/min
P तरंगों की चाल V2 = 8 kms-1
= 480 km/min
अत: S तरंगों का भूकंप लेखी तक पहुँचने में लगा समय
t1 = \(\frac { x }{ u_{ 1 } } \) = \(\frac{n}{240}\) मिनट व P तरंगों का भूकंप लेखी तक पहुँचने में लगा समय
t2 = \(\frac { x }{ v_{ 2 } } \) = \(\frac{x}{480}\) मिनट
अतः t1 = 2t2
प्रश्नानुसार P तरंगें, Q तरंगों से भूकंप लेखी तक 4 मिनट पहले पहुँचती हैं।
t1 – t2 = 4 मिनट
या 2t2 – t2 = 4
∴ t2 = 4 मिनट
∴ दूरी x = 480 × 4
= 1920 km

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प्रश्न 15.27.
कोई चमगादड़ किसी गुफा में फड़फड़ाते हुए पराश्रव्य ध्वनि उत्पन्न करते हुए उड़ रहा है। मान लीजिए चमगादड़ द्वारा उत्सर्जित पराश्रव्य ध्वनि की आवृत्ति 40 kHz है। किसी दीवार की ओर सीधा तीव्र झपट्टा मारते समय चमगादड़ की चाल ध्वनि की चाल की 0.03 गुनी है। चमगादड़ द्वारा सुनी गई दीवार से परावर्तित ध्वनि की आवृत्ति क्या है?
उत्तर:
दिया है:
उत्सर्जित तरंग की आवृत्ति v = 40 kHz
माना ध्वनि की चाल = v
चमगादड़ की चाल v1 = 0.03v माना दीवार द्वारा ग्रहण की गई तरंग की आगामी आवृत्ति v1 है।
इस स्थिति में श्रोता की ओर गतिमान है तथा श्रोता स्थिर है।
∴ v1 = v (\(\frac { v }{ v-v_{ s } } \))
= 40 (\(\frac { v }{ v-0.03v } \)) kHz
= 41.24 kHz
v1 = 41.24 kHz आवृत्ति की तरंगें दीवारसे टकराकर चमगादड़ की ओर वापस लौटती हैं।
माना चमगादड़ द्वारा ग्रहण की गई तरंगो की आवृत्ति v2 इस स्थिति में, श्रोता, स्थिर स्त्रोत की ओर गतिमान है।
∴ v2 = v1 (\(\frac { v+v_{ 0 } }{ v } \))
= 41.24 (\(\frac { v+0.03v }{ v } \))
= 42.47 kHz
इस प्रकार चमगादड़ द्वारा ग्रहण की गई परावर्तित ध्वनि की आवृत्ति 42.47 kHz है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम

शौर्य और देश प्रेम अभ्यास

शौर्य और देश प्रेम अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भूषण ने अपने छन्दों में किन-किन राजाओं की प्रशंसा की है? (2017)
उत्तर:
भूषण ने अपने छन्दों में छत्रपति शिवाजी तथा महाराज छत्रसाल की प्रशंसा की है।

प्रश्न 2.
शिवाजी के नगाड़ों की आवाज सुनकर राजाओं की क्या दशा होती है?
उत्तर:
शिवाजी के युद्ध के नगाड़ों की आवाज से भयभीत राजा थर-थर काँपने लगते हैं, तथा उनका हृदय दहल जाता है।

प्रश्न 3.
दिनकर जी ने जनता को जगाने के लिए किसका आह्वान किया है? (2016)
उत्तर:
दिनकर जी ने जनता को जगाने के लिए क्रान्तिकारी कविता का आह्वान किया है।

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शौर्य और देश प्रेम लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“तीन बेर खाती थीं, वेतीन बेरखाती हैं।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
शिवाजी के शौर्य तथा युद्ध कौशल से भयभीत मुगल शासकों की रानियाँ महल छोड़कर वनों में रहने के लिए विवश हैं। वहाँ वे विविध प्रकार के कष्ट सहन कर रही हैं। जब वे महलों में रहती थीं तो प्रतिदिन तीन समय प्रातः, दोपहर एवं सायंकाल विविध प्रकार के व्यंजन, फल, मेवा आदि का आस्वादन किया करती थीं। अब वे ही रानियाँ जंगलों में भटकते हुए पूरे दिन में मात्र तीन बेर (बेर का फल) खाकर ही गुजारा करती हैं।

प्रश्न 2.
‘दिनकर’ जी कैसे समाज की रचना करना चाहते हैं ? उनके द्वारा कथित समाज की तीन विशेषताएँ लिखिए। (2011, 12)
उत्तर:
प्रगतिवादी विचारधारा से प्रेरित दिनकर जी को इस समय की वर्ग विषमता से कष्ट होता है। वे देखते हैं कि निर्धन किसानों, दलितों, मजदूरों के बलिदान से विशाल भवन, उद्योग आदि खड़े हो रहे हैं और वे बेचारे दो समय की सूखी रोटी के लिए मोहताज हैं। इसलिए वे ऐसे समाज की रचना चाहते हैं जहाँ पर धनी-निर्धन, ऊँच-नीच, धर्म या सम्प्रदाय का भेद न हो, सभी प्रेमभाव से हिलमिल कर रहें, किसी प्रकार के कटुता, द्वेष आदि का विकार न हों।

‘दिनकर’ जी द्वारा कथित समाज की तीन विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. नदी किनारे या कहीं भी झोंपड़ी हो या घर हो किन्तु वहाँ पर सरसता विराजमान होनी चाहिए।
  2. इस समाज के सभी लोग प्रेम भाव के साथ मिल-जुलकर रहें।
  3. इस समाज के लोगों में धार्मिक भेदभाव न हो।

प्रश्न 3.
‘लाखों क्रोंच कराह रहे हैं’ से कवि का क्या आशय है? (2008, 09)
उत्तर:
अपनी प्रिय क्रोंची के वध से आहत क्रोंच पक्षी के करुण क्रन्दन की मर्मांतक पीड़ा से उद्वेलित कवि वाल्मीकि की वाणी कविता के रूप में फूट पड़ी थी। ‘दिनकर’ जी कहना चाहते हैं कि वाल्मीकि ने तो मात्र एक क्रच पक्षी की वेदना को काव्य का रूप दिया था किन्तु आज धन, वर्ग आदि-आदि की विषमता ने समाज में अनेक क्रोंच आहत कर दिए हैं। अनेक मनुष्य असह्य पीड़ा से कराह रहे हैं। अतः इन पीड़ा से कराहते निरीह जनों की आवाज कविता के द्वारा जन-जन तक पहुँचनी चाहिए।

शौर्य और देश प्रेम दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिवाजी के भय से मुगल रानियों की दशा का वर्णन भूषण ने किस प्रकार किया है? (2009)
उत्तर:
शिवाजी के शौर्य का भय सर्वत्र व्याप्त है। यहाँ तक कि मुगल शासकों की जो रानियाँ विशाल महलों में आनन्दपूर्वक रहती थीं अब वे भयभीत होकर पर्वतों की गुफाओं में छिपती फिर रही हैं। जो रानियाँ मिष्ठान, मेवा, फल आदि का आस्वादन करती थीं, अब वे जंगल में वृक्षों की जड़ें खाकर ही गुजारा कर रही हैं। प्रतिदिन प्रातः, दोपहर एवं सांय तीन समय भोजन करने वाली रानियाँ अब वन में भटकते हुए मात्र तीन बेर (एक फल) खाकर ही दिन काटती हैं। रत्नजड़ित गहनों के भार से जिनके अंग थक जाया करते थे, वे रानियाँ भूख के कारण सुस्त रहती हैं। अनेक दासियाँ जिनके पंखे झलती रहती थीं अब वे ही मुगल रानियाँ वन में अकेली फिर रही हैं। शिवाजी के भय के संत्रास के कारण जो रानियाँ गहनों में रत्न जड़वाती थीं, अब वे वस्त्रों के अभाव में सर्दी से ठिठुर रही हैं। उनकी दशा बड़ी दयनीय हो गयी है।

प्रश्न 2.
छत्रसाल की बरछी का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। (2011)
उत्तर:
कविवर भूषण महाराज छत्रसाल के युद्ध कौशल के बड़े प्रशंसक रहे हैं। उन्होंने उनकी बरछी के कौशल का अद्भुत वर्णन किया है। छत्रसाल की बरछी उनकी भुजा में हर समय सुशोभित रहती है। नागिन के समान लहराती यह बरछी बड़े से बड़े शत्रु दल को खदेड़ने में समर्थ है। वह कवच और पाखरन के बीच तेजी से प्रवेश कर शत्रु को आहत कर देती है। लोहे तक को काटने में समर्थ उनकी बरछी से कटे शत्रु पक्ष के सैनिक परकटे पक्षियों की तरह पंगु बने पड़े रहते हैं। उस बरछी के सामने दुष्ट तो टिक ही नहीं पाते हैं। वे शक्तिहीन, निरीह हो जाते हैं। इस प्रकार महाराज छत्रसाल की बरछी का कौशल भयंकर है।

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प्रश्न 3.
कवि ने कविता के क्रान्तिकारी रूप का आह्वान क्यों किया है? (2013)
अथवा
‘कविता का आह्वान’ के माध्यम से दिनकर समाज की किन स्थितियों का चित्रण कर रहे हैं और क्यों? (2008, 09)
उत्तर:
आज समाज में ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, छोटे-बड़े आदि की विषमता व्याप्त है। निर्धनों, किसानों, मजदूरों के बलिदान से विशाल महल खड़े हो गये हैं, बड़े-बड़े उद्योग निरन्तर बढ़ रहे हैं। धनी बिना काम किये ही धनवान होते जा रहे हैं; निर्धन लगातार श्रम करते हुए भी और गरीब होते जा रहा है। शोषित और शोषक की खाई निरन्तर गहरी होती जा रही है। लाखों लोग असह्य पीड़ा से कराह रहे हैं। उनकी कोई आवाज नहीं है।

अत: कवि ने कविता का आह्वान किया है कि वह क्रान्तिकारी बनकर निरीह, असहायों की आवाज को जन-जन तक पहुँचाए ताकि समाज विषमता से मुक्त होकर समरसता से ओत-प्रोत हो जाय। सभी हिल-मिलकर प्रेमपूर्वक रहें। ‘दिनकर’ मानते हैं कि संवेदनशील कवि ही कविता के द्वारा क्रान्ति का बिगुल बजा सकता है और समाज में अपेक्षित परिवर्तन ला सकता है। बिना क्रान्तिकारी कविता के यह विकट समस्या हल नहीं हो पायेगी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पद्यांशों की प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(क) दावा दुम दण्ड पर …………… सेर शिवराज हैं।
(ख) भूषण सिथिल अंग…………….. नगन जड़ाती हैं।
(ग) क्रान्तिधात्री ! कविते………… बलि होती है।
(घ) छ भूषण की भाव…………… निज युग की वाणी।
उत्तर:
(क) सन्दर्भ :
यह पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘छत्रसाल का शौर्य वर्णन’ पाठ से लिया गया है। इसके रचियता महाकवि भूषण हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में शिवाजी के वीरतापूर्ण व्यक्तित्व की विविध प्रकार से प्रशंसा की गई हैं।

व्याख्या :
कविवर भूषण कहते हैं कि जिस प्रकार इन्द्र का जम्भासुर पर अधिकार है, सागर के जल पर बड़वाग्नि का अधिकार है, अहंकारी रावण पर श्रीराम का शासन है, बादलों पर वायु का अधिकार है, कामदेव पर शिव का शासन है, सहस्रबाहु नामक राजा पर परशुराम का अधिकार है, वन के पेड़ों पर दावानलं का अधिकार है, हिरणों के समूह पर चीते का अधिकार है, सिंह का हाथी पर अधिकार है, अन्धकार पर तेजवान सूर्य का अधिकार है, कंस पर श्रीकृष्ण का शासन है; उसी प्रकार म्लेक्ष वंश के मुगल शासक (औरंगजेब) पर वीरवर शिवाजी का शासन है।

(ख) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में शिवाजी के शौर्य से भयाक्रांति रानियों का प्रभावी वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
भूषण कवि कहते हैं कि वीर शिवाजी का इतना त्रास व्याप्त है कि ऊँचे विशाल महलों में निवास करने वाली मुगल शासकों की रानियाँ भय के कारण ऊँचे-ऊँचे पर्वतों की गुफाओं में रह रही हैं। जो फल, मिष्ठान आदि का उपभोग किया करती थीं अब उन्हें पेड़ों की जड़ें खाने को मिल पाती हैं। जो रानियाँ दिन में तीन समय मिष्ठान, मेवा आदि खाया करती थीं अब वे मात्र तीन जंगली बेर खाकर ही दिन गुजारा करती हैं। जिनके अंग सुन्दर आभूषणों के भार से थक जाते थे अब उनके अंग भूख के कारण सुस्त हो रहे हैं। जिनके लिए अनेक सेविकाएँ हर समय पंखा झलती रहती थीं अब वे रानियाँ निर्जन वनों में अकेली मारी-मारी फिर रही हैं। जो अपने गहनों में नग, रत्न जड़वाती थीं वे रानियाँ वस्त्रों के बिना सर्दी में ठिठुर रही हैं।

(ग) सन्दर्भ :
यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में कविता का आह्वान’ नामक पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।

प्रसंग :
क्रान्तिदृष्टा कवि ने इस पद्यांश में समाज की विषमता, शोषण, अन्याय आदि विकृतियों का अंकन करते हुए कविता से परिवर्तन का आह्वान किया है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि हे क्रान्ति की जननी कविते! तू आज की विषम परिस्थितियों को देखकर जाग्रत हो जा। तुझमें जो दिखावटीपन है उसको नष्ट करके दूर हटा दे तथा संसार में तू चेतना की ऐसी आग लगा दे कि समाज को पतन की ओर ले जाने वाली सभी पापी एवं पाखण्डी जलकर भस्म हो जाएँ। आज धनवानों की बिजली की चकाचौंध इतनी बढ़ गयी है कि निर्धन के घर में जलने वाला दीपक उस चकाचौंध के कारण आँसू बहाने को विवश है। हे कविते! तू अपने हृदय को स्थिर करके इस रहस्य को उजागर कर दे कि विशालकाय महलों के लिए निर्धनों की झोंपड़ियों का बलिदान हो रहा है अर्थात् बिजली की चकाचौंध वाले बड़े-बड़े महल निर्धनों के शोषण से बन रहे हैं।

दिन-रात धूप-ताप और धूल में काम करने वाले किसान खेती की उपज के रूप में अपने हृदय का रक्त दे रहे हैं। उनके श्रम के बल पर शोषकों की समृद्धि की दीवारें निरन्तर बढ़ती जा रही हैं अर्थात् किसान गरीब होता जा रहा है; शोषक सम्पन्न होते जा रहे हैं। किसान के सामने पशु प्रवृत्ति वाले दानव मदमस्त होकर नंगानाच नाच रहे हैं। बाहर से आने वाले इस देश के वासियों के खून-पसीने की कमाई पर ऐश करते हैं। शोषक वर्ग निम्न वर्ग का शोषण कर रहा है।

(घ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में क्रान्ति दूतों के उद्धरण देकर क्रान्तिकारी भावों की अभिव्यक्ति के लिए कविता का आह्वान किया गया है।

व्याख्या :
वीर रस के प्रख्यात कवि भूषण में विविध भाव भंगिमाओं का संचार करने हेतु कविते तू जाग उठ। फ्रांस की क्रान्ति के जनक रूसो तथा रूसी क्रान्तिकारी लेनिन के हृदय में जल उठने वाली विद्रोह की आग के रूप में तू जाग्रत हो उठ अर्थात् जैसे रूसो और लेनिन ने क्रान्ति का बिगुल फूंका था उसी प्रकार हे कविते! तू आग के रूप में तुरन्त जाग्रत हो जा। अथवा तपोवन के सुखद कुञ्जों में एक फूस की झोंपड़ी का आवास मिल जाये। जिस झोंपड़ी के तिनकों में तमसा नदी की धारा में कविता इठलाकर संचरित होती हो और प्रत्येक वृक्ष पर पक्षियों के सुमधुर स्वर में गीत गाकर पर्व मनाती कविता ध्वनित हो रही हो, वहीं मेरा घर हो। के पास में हिंगोट के पेड़ के तेल से दीपक जलाकर, वृक्षों की जड़ें, फल-फूल, धान आदि खाकर आनन्दपूर्वक रहना चाहते हैं। कवि चाहते हैं कि मनुष्यों में धर्म आदि की भिन्नता के बावजूद भी कटुता न हो। पर्वत की तलहटी में उषा काल के सुनहरे प्रकाश में सभी मिल-जुलकर भावुक भक्ति के आनन्द में लीन होकर प्रेम एवं समरसता के गीत गायें।

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शौर्य और देश प्रेम काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
पौन, सम्भू, कान्ह, मलिच्छ, सिब, सिथिल, आग।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित समोच्चरित भिन्नार्थक शब्दों को इस प्रकार वाक्यों में प्रयोग कीजिए कि उनका अर्थ स्पष्ट हो जाए
अंश-अंस, बंस वंश, शे-सेर, ग्रह गृह, छात्र क्षात्र, बात वात।
उत्तर:
(i) अंश-आमदनी का एक अंश (भाग) अपंगों को दान दे देना चाहिए।
अंस-उठे हुए अंसों (कन्धों) वाला पुरुष बहादुर होता है।

(ii) बंस-बंस (बाँस) से बाँसुरी बनती है।
वंश-कुपुत्र वंश (कुल) के यश को नष्ट कर देता है।

(iii) शेर-शेर (सिंह) जंगल का राजा होता है।
सेर-घर में प्रतिमाह चार सेर (किलो) चीनी लग जाती है।

(iv) ग्रह-प्रकाश के ग्रह (नक्षत्र) बहुत अच्छे चल रहे हैं।
गृह-मेरे गृह (घर) में चार प्राणी निवास करते हैं।

(v) छात्र-निरन्तर अध्ययनशील छात्र (विद्यार्थी) ही सफल होते हैं।
क्षात्र-शिवाजी ने औरंगजेब का विरोध कर क्षात्र (क्षत्रिय) धर्म का पालन किया था।

(vi) बात-बात (अधिक बोलना) बनाना तो कोई मोहन से सीखे।
वात-वात (वायु) विकार से शरीर में दर्द हो जाता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में अलंकार पहचानकर लिखिए
(अ) ‘क्रान्तिधात्रि ! कविते जाग उठ आडम्बर में आग लगा दे।’
(आ) तीन बेर खाती सो तो तीन बेर खाती हैं।
(इ) फूट फूट तू कवि कण्ठों से बन व्यापक निज युग की वाणी।
(ई) बरस सुधामय कनक वृष्टि बन ताप तप्त जन वक्षस्थल में।
उत्तर:
इन पंक्तियों में अलंकार इस प्रकार हैं-
(अ) रूपक
(आ) यमक
(इ) पुनरुक्ति प्रकाश
(ई) रूपक।

प्रश्न 4.
भूषण के संकलित अंश में से वीर रस का एक उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
भूषण के संकलित अंश में से वीर रस का उदाहरण है-
‘राजा शिवराज के नगारन की धाक
सुनि कैते बादसाहन की छाती दरकति है।’

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में शब्द गुण लिखिए
राजा शिवराज के नगारन की धाक
सुनि कैते बादसाहन की छाती दरकति है।
उत्तर:
इन पंक्तियों में ओज गुण है।

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छत्रसाल का शौर्य वर्णन भाव सारांश

रीतिकाल के श्रृंगार प्रधान वातावरण में अपने काव्य के द्वारा वीर रस को साकार करने का श्रेय कविवर भूषण को जाता है। उन्होंने अपने काव्य के नायक वीर शिवाजी और छत्रसालं जैसी विभूतियों को बनाया। इन छन्दों में कवि ने शिवाजी के शौर्य, युद्ध कौशल, निर्भीकता, तेज आदि का प्रभावी वर्णन किया है। शिवाजी म्लेक्षों पर वैसे ही शेर की सी गर्जना कर शासन करते हैं जैसे अहंकारी रावण पर श्रीराम, कामदेव पर शिव, सहस्रबाहु पर परशुराम और कंस पर श्रीकृष्ण का अधिकार है। उनके युद्ध नगाड़ों की धाक से बड़े-बड़े बादशाह भयभीत हो उठते हैं। विजयपुर, गोलकुण्डा आदि के शासक शिवाजी के भय से काँपते हैं। उनके भय से डरकर महलों में रहने वाली बेगमें भी विलासी जीवन त्यागकर कष्टमय जीवन बिता रही हैं। महाराजा छत्रसाल की वीरता एवं उनका शौर्य अद्भुत है। उनकी बरछी के करतब इतने प्रभावी हैं कि शत्रु पक्ष हताश हो उठता है, दुष्ट लोग शक्तिहीन हो जाते हैं।

छत्रसाल का शौर्य वर्णन संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] इन्द्र जिमि जम्भ पर बाड़व सुअम्भ पर,
रावन सदम्भ पर रघुकल राज हैं।
पौन वारिवाह पर सम्भु रनिनाह पर,
ज्यों सहस्त्रबाहु पर राम द्विजराज हैं।
दावा दुम दंड पर चीता मृगझुण्ड पर,
भूषण वितुण्ड पर जैसे मुगराज हैं।
तेज तम अंस पर कान्ह जिमि कंस पर,
त्यौं मलिच्छ बंस पर सेर शिवराज हैं।।

शब्दार्थ :
जिमि = जिस प्रकार; जम्भ = जम्भासुर, जम्भ नाम का राक्षस; बाड़व = बड़वाग्नि, पानी में लगने वाली आग; सुअम्भ = उत्तम जल; सदम्भ = अहंकारी; रघकुल राज = श्रीराम पौन = पवन, वायु; वारिवाह = बादल; सम्भु = शिव; रनिनाह = रति के पति, कामदेव; राम द्विजराज = परशुराम; दावा = दावानल, वन में लगने वाली आग; दुम दंड = पेड़ों के तने; मृगझुण्ड = हिरणों का समूह; वितुण्ड = हाथी; मृगराज = शेर; तम अंस= अंधकार का भाग; कान्ह = श्रीकृष्ण; मलिच्छ = म्लेक्ष, यवन।

सन्दर्भ :
यह पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘छत्रसाल का शौर्य वर्णन’ पाठ से लिया गया है। इसके रचियता महाकवि भूषण हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में शिवाजी के वीरतापूर्ण व्यक्तित्व की विविध प्रकार से प्रशंसा की गई हैं।

व्याख्या :
कविवर भूषण कहते हैं कि जिस प्रकार इन्द्र का जम्भासुर पर अधिकार है, सागर के जल पर बड़वाग्नि का अधिकार है, अहंकारी रावण पर श्रीराम का शासन है, बादलों पर वायु का अधिकार है, कामदेव पर शिव का शासन है, सहस्रबाहु नामक राजा पर परशुराम का अधिकार है, वन के पेड़ों पर दावानलं का अधिकार है, हिरणों के समूह पर चीते का अधिकार है, सिंह का हाथी पर अधिकार है, अन्धकार पर तेजवान सूर्य का अधिकार है, कंस पर श्रीकृष्ण का शासन है; उसी प्रकार म्लेक्ष वंश के मुगल शासक (औरंगजेब) पर वीरवर शिवाजी का शासन है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इस छंद में भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ पुरुषों, प्राकृतिक तथ्यों के माध्यम से शिवाजी के प्रभाव का वर्णन किया गया है।
  2. यह छन्द शिवाजी को बहुत पसंद आयो था। उन्होंने इसे 52 बार सुना था और प्रसन्न होकर कवि भूषण को 52 गाँव, 52 लाख रुपये तथा 52 हाथी उपहार में दिए थे।
  3. मालोपमा, अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य दृष्टव्य है। (4) भावानुरूप ब्रजभाषा में सशक्त भावाभिव्यक्ति हुई है।

[2] चकित चकता चौंकि चौकि छै,
बार-बार दिल्ली दहसति चितै चाह करसति है।
बिलखि बदन बिलखात बिजैपुर पति,
फिरत फिरंगिन की नारी फरकति है।।
थर थर काँपत कुतुबशाह गोलकुण्डा,
हहरि हबम भूप भीर भरकति है।
राजा शिवराज के नगारन की धाक,
सुनि कैते बादसाहन की छाती दरकति है।।

शब्दार्थ :
चकित = भौंचक्के; दहसति = भयभीत; चाह = खबर; करसति = कर्षित होती है, निकलती है; बिलखि = व्याकुल; बदन = मुख, शरीर; बिलखात = दुःखी होता है; नारी = नाड़ी; हहरि = डरकर; भरकति = भड़कती है; धाक = प्रभाव; दरकति = फट जाती है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में शिवाजी के युद्ध के नक्कारों से भयभीत करने वाले रूप का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
शिवाजी की वीरता एवं युद्ध कौशल का इतना प्रभाव है कि उसके युद्ध के नक्कारों की आवाज सुनकर ही भय व्याप्त हो जाता है। बड़े-बड़े शासक उनके युद्ध कौशल को देखकर बार-बार आश्चर्यचकित हो उठते हैं। शिवाजी के युद्ध की खबर सुनकर ही शिवाजी के भय से दिल्ली के शासक भी भयभीत हैं। व्याकुल मुख विजयपुर के राजा अत्यन्त दु:खी हैं। उनके भय के कारण फिरंगी (विदेशी) शासकों की नाड़ी फड़कने लगती हैं। शिवाजी के शौर्य से डरकर गोलकुण्डा के कुतुबशाह थर-थर काँपते हैं। उनके डर से विलासी शासकों की भीड़ भय से भड़क उठती है। महाराज शिवाजी के युद्ध के नक्कारों की घनघोर ध्वनि सुनकर कितने ही बादशाहों की छाती फटने लगती है अर्थात् वे शिवाजी के युद्ध का संकेत सुनकर ही भयंकर रूप से डर जाते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. शिवाजी के युद्ध की भयप्रद स्थिति की प्रभावशीलता का वर्णन हुआ है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों तथा पद-मैत्री की छटा अवलोकनीय है।
  3. भावानुरूप ब्रजभाषा की लाक्षणिकता ने विषय की अभिव्यक्ति को प्रभावी बना दिया है।

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[3] ऊँचे घोर मन्दिर के अन्दर रहनवारी,
ऊँचे घोर मंदिर के अन्दर रहाती हैं।
कन्दमूल भोग करें कन्दमूल भोग करें,
तीन बेर खाती सो तो तीन बेर खाती हैं।
भूषन सिथिल अंग भूखन सिथिल अंग,
बिजन डुलाती ते वे बिजन डुलाती हैं।
भूषन भनत सिवराज वीर तेरे त्रास,
नगन जड़ाती ते बे नगन जड़ाती हैं।। (2017)

शब्दार्थ :
घोर = बहुत भयानक; मन्दिर = महल, पर्वत; कन्दमूल = फल-फूल, पेड़ों की जड़ें; तीन बेर = तीन बार, तीन बेर (फल) मात्र; भूषन = आभूषण; भूखन = भूख से; सिथिल = थका हुआ, सुस्त; बिजन = पंखा, निर्जन, एकाकी; मनत= कहते हैं; त्रास = भय; नगन = रत्नों से, नग्न; जड़ाती = जड़वाती, ठिठुरती हैं।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में शिवाजी के शौर्य से भयाक्रांति रानियों का प्रभावी वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
भूषण कवि कहते हैं कि वीर शिवाजी का इतना त्रास व्याप्त है कि ऊँचे विशाल महलों में निवास करने वाली मुगल शासकों की रानियाँ भय के कारण ऊँचे-ऊँचे पर्वतों की गुफाओं में रह रही हैं। जो फल, मिष्ठान आदि का उपभोग किया करती थीं अब उन्हें पेड़ों की जड़ें खाने को मिल पाती हैं। जो रानियाँ दिन में तीन समय मिष्ठान, मेवा आदि खाया करती थीं अब वे मात्र तीन जंगली बेर खाकर ही दिन गुजारा करती हैं। जिनके अंग सुन्दर आभूषणों के भार से थक जाते थे अब उनके अंग भूख के कारण सुस्त हो रहे हैं। जिनके लिए अनेक सेविकाएँ हर समय पंखा झलती रहती थीं अब वे रानियाँ निर्जन वनों में अकेली मारी-मारी फिर रही हैं। जो अपने गहनों में नग, रत्न जड़वाती थीं वे रानियाँ वस्त्रों के बिना सर्दी में ठिठुर रही हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. मुगल शासकों की रानियों की दयनीय दशा का वर्णन करके शिवाजी के आतंक की भयावह स्थिति का अभ्यास कराया है।
  2. यमक, पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. प्रवाहमयी ब्रजभाषा में प्रवाह गुण का पुट विद्यमान है।

[4] भुज भुजगेस की बैसंगिनी भुगिनी सी,
खेदि खेदि खाती दीह दारूने दलन के।
बखतर-पाखरन बीच सि जाति मीन,
पैरि पार जात परवाह ज्यों जलन के।
रैयाराव चंपति के छत्रसाल महाराज,
भूषन सकै करि बखान को बलन के।
पच्छी परछीने ऐसे परे पर छीने बीर,
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।।

शब्दार्थ :
भुज = भुजा; भुजगेस = शेषनाग; बैसंगिनी = आयु भर साथ देने वाली; भुजंगिनी = नागिन; खेदि = खदेड़कर; पाखरन = झूलें; परछीने = पक्ष छिन्न, परकटे; पर = शत्रु; छीने = क्षीण, कमजोर; वर = बल, शक्ति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्य में भूषण ने महाराज छत्रसाल की बरछी के कौशल की प्रशंसा तथा उसकी शत्रुओं को नष्ट करने की भयानकता का चमत्कारी वर्णन किया है।

व्याख्या :
कवि भूषण कहते हैं कि हे रैयावराव चम्पतिराय के सुपुत्र महाराज छत्रसाल! आपकी बरछी आपके साथ सदा बाहुरूपी शेषनाग की तरह रहने वाली नागिन के समान है। यह भयंकर शत्रु दल को खदेड़कर नष्ट करती है। यह कवच और लोहे की झूलों में उसी प्रकार प्रवेश कर जाती है, जैसे मछली पानी की धारा को तैरकर पार कर जाती है। भाव यह है कि यह बरछी इतनी तेज है लोहे को भी सरलता से काट देती है। भूषण कहते हैं कि आपके बल का वर्णन कौन कर सकता है। बरछी के कटने से शत्रु की सेना के वीर परकटे पक्षी की तरह निर्बल होकर क्षीण पड़ गये हैं। हे वीर! आपकी बरछी ने दुष्टों के बल ही छीन लिये हैं अर्थात् तेरी बरछी के कौशल को देखकर शत्रु शक्तिहीन हो गये हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ छत्रसाल महाराज की बरछी के कला-कौशल तथा युद्ध-कौशल का सरस अंकन हुआ है।
  2. रूपक, उपमा, उदाहरण, यमक, पुनरुक्तिप्रकाश तथा अनुप्रास आदि अलंकारों की छटा दर्शनीय है।
  3. गत्यात्मक तथा चमत्कारिक भाषा के प्रयोग से प्रभावशीलता में वृद्धि हुई है।

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कविता का आह्वान भाव सारांश

क्रांतिदर्शी कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘कविता का आह्वान’ में क्रान्तिकारी परिवर्तन का आह्वान किया है। वे चाहते हैं आज के विषमता की पराकाष्ठा के युग में, कविता क्रान्ति जाग्रत कर दे। कविता को सम्बोधित करते हुए वे कहते हैं कि तू क्रान्ति की जननी बनकर जाग उठ और दिखावटी आडम्बरों का त्याग कर दे। पुनः उत्थान और विकास का मार्ग प्रशस्त कर, दीन-हीन किसानों और मजदूरों का बलिदान कर खड़े होने वाले ऊँचे भवनों, उद्योगों का जो विकास हो रहा है, वह बड़ा कष्टदायी है। शोषितों के खून-पसीने से बड़े-बड़े वैभव सम्पन्न लोग विलास कर रहे हैं। शोषक दानव बनकर मजदूर-किसानों का खून चूस रहे हैं। निर्धन निरन्तर पिस रहा है। यह विषमता की चरमावस्था है।

इसलिए हे कविता! तू इसके विरुद्ध क्रान्ति का बिगुल बजा दे। हे क्रान्तिकारी कविता! तू अपने युग की वाणी बनकर कवियों के कण्ठों से प्रस्फुटित हो उठ। निराशा के गहन अन्धकार में पड़े असहाय और मूक प्राणियों की भाषा बनकर उनमें आशा का संचार कर दे। आज अनेक दीन-हीन मर्मान्तक पीड़ा से कराह रहे हैं तू उनकी वाणी बनकर आज की आपाधापी तथा कोलाहलमय जिन्दगी को सुख और शान्तिमय बनाने का सूत्रपात कर। जहाँ तेरा वास है वही समरसता और एकता का प्रेममय वातावरण होगा। वही वातावरण धर्म आदि की भिन्नता से मुक्त एकता और प्रेम का गायन कराने वाला होगा। यह कार्य कविता ही कर सकती है।

कविता का आह्वान संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] क्रांतिधात्रि ! कविते जाग उठ आडम्बर में आग लगा दे।
पतन पाप पाखण्ड जले, जग में ऐसी ज्वाला सुलगा दे।
विद्युत् की इस चकाचौंध में देख, दीप की लौ रोती है।
अरी ! हृदय को थाम महल के लिए झोंपड़ी बलि होती है।
देख कलेजा फाड़ कृषक, दे रहे हृदय शोणित की धारें।
और उठी जातीं उन पर ही वैभव की ऊँची दीवारें।
बन पिशाच के कृषक मेघ में नाच रही पशुता मतवाली।
आगन्तुक पीते जाते हैं, दीनों के शोणित की प्याली।

शब्दार्थ :
क्रान्तिधात्री = क्रान्ति की जननी; आडम्बर = दिखावटीपन; ज्वाला आग; विद्युत् = बिजली; कृषक = किसान; शोणित = रक्त; वैभव = समृद्धि; पिशाच = राक्षस; मतवाली= मदमस्त, उन्मत्त।।

सन्दर्भ :
यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में कविता का आह्वान’ नामक पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।

प्रसंग :
क्रान्तिदृष्टा कवि ने इस पद्यांश में समाज की विषमता, शोषण, अन्याय आदि विकृतियों का अंकन करते हुए कविता से परिवर्तन का आह्वान किया है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि हे क्रान्ति की जननी कविते! तू आज की विषम परिस्थितियों को देखकर जाग्रत हो जा। तुझमें जो दिखावटीपन है उसको नष्ट करके दूर हटा दे तथा संसार में तू चेतना की ऐसी आग लगा दे कि समाज को पतन की ओर ले जाने वाली सभी पापी एवं पाखण्डी जलकर भस्म हो जाएँ। आज धनवानों की बिजली की चकाचौंध इतनी बढ़ गयी है कि निर्धन के घर में जलने वाला दीपक उस चकाचौंध के कारण आँसू बहाने को विवश है। हे कविते! तू अपने हृदय को स्थिर करके इस रहस्य को उजागर कर दे कि विशालकाय महलों के लिए निर्धनों की झोंपड़ियों का बलिदान हो रहा है अर्थात् बिजली की चकाचौंध वाले बड़े-बड़े महल निर्धनों के शोषण से बन रहे हैं।

दिन-रात धूप-ताप और धूल में काम करने वाले किसान खेती की उपज के रूप में अपने हृदय का रक्त दे रहे हैं। उनके श्रम के बल पर शोषकों की समृद्धि की दीवारें निरन्तर बढ़ती जा रही हैं अर्थात् किसान गरीब होता जा रहा है; शोषक सम्पन्न होते जा रहे हैं। किसान के सामने पशु प्रवृत्ति वाले दानव मदमस्त होकर नंगानाच नाच रहे हैं। बाहर से आने वाले इस देश के वासियों के खून-पसीने की कमाई पर ऐश करते हैं। शोषक वर्ग निम्न वर्ग का शोषण कर रहा है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. वर्ग वैषम्य जनित विकृतियों के प्रति रोष व्यक्त हुआ है।
  2. दिनकर’ जी की प्रगतिवादी विचारधारा व्यक्त है।
  3. रूपक, अनुप्रास अलंकारों तथा लाक्षणिकता के पुट से अभिव्यक्ति प्रभावी बन गयी है।
  4. विषयानुरूप खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

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[2] उठ भूषण की भाव रंगिणी ! रूसो के दिल की चिनगारी।
लेनिन के जीवन की ज्वाला जाग जागरी क्रांतिकुमारी।
लाखों क्रोंच कराह रहे हैं जाग आदि कवि की कल्याणी।
फूट-फूट तू कवि कंठों से, बन व्यापक निज युग की वाणी।
बरस ज्योति बन गहन तिमिर में फूट मूक की बनकर भाषा।
चमक अन्ध की प्रखर दृष्टि बन, उमड़ गरीबी की बन आशा।
गूंज शान्ति की सुखद साँस सी, कलुष पूर्ण युग कोलाहल में।
बरस सुधामय कनक वृष्टि बन, ताप तप्त जन के वक्षस्थल में।
खींच स्वर्ग संगीत मधुर से जगती को जड़ता से ऊपर।
सुख की स्वर्ण कल्पना सी तू छा जाए कण-कण में भूपर।

शब्दार्थ :
रूसो = फ्रांस की राज्य क्रांति का जनक; लेनिन – सुप्रसिद्ध रूसी क्रान्तिकारी; क्रोंच – क्रोंच पक्षी के करुण क्रंदन से ही वाल्मीकि की कविता प्रस्फुटित हुई थी; आदिकविवाल्मीकि; गहन = गहरे; तिमिर = अन्धकार; कलुष = दोषमय; कोलाहल = शोर-शराबा; वृष्टि= वर्षा; ताप तप्त = ताप तपा हुआ; वक्षस्थल = हृदय; भूपर = धरती पर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में क्रान्ति दूतों के उद्धरण देकर क्रान्तिकारी भावों की अभिव्यक्ति के लिए कविता का आह्वान किया गया है।

व्याख्या :
वीर रस के प्रख्यात कवि भूषण में विविध भाव भंगिमाओं का संचार करने हेतु कविते तू जाग उठ। फ्रांस की क्रान्ति के जनक रूसो तथा रूसी क्रान्तिकारी लेनिन के हृदय में जल उठने वाली विद्रोह की आग के रूप में तू जाग्रत हो उठ अर्थात् जैसे रूसो और लेनिन ने क्रान्ति का बिगुल फूंका था उसी प्रकार हे कविते! तू आग के रूप में तुरन्त जाग्रत हो जा। अथवा तपोवन के सुखद कुञ्जों में एक फूस की झोंपड़ी का आवास मिल जाये। जिस झोंपड़ी के तिनकों में तमसा नदी की धारा में कविता इठलाकर संचरित होती हो और प्रत्येक वृक्ष पर पक्षियों के सुमधुर स्वर में गीत गाकर पर्व मनाती कविता ध्वनित हो रही हो, वहीं मेरा घर हो। के पास में हिंगोट के पेड़ के तेल से दीपक जलाकर, वृक्षों की जड़ें, फल-फूल, धान आदि खाकर आनन्दपूर्वक रहना चाहते हैं। कवि चाहते हैं कि मनुष्यों में धर्म आदि की भिन्नता के बावजूद भी कटुता न हो। पर्वत की तलहटी में उषा काल के सुनहरे प्रकाश में सभी मिल-जुलकर भावुक भक्ति के आनन्द में लीन होकर प्रेम एवं समरसता के गीत गायें।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ आडम्बररहित सहज जीवन का समर्थन किया गया है।
  2. सरल, सुबोध तथा भावानुरूप भाषा में भाव को अभिव्यक्त किया गया है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकमंगल की भावना जिनके काव्य में व्यक्त हुई है (2008,09)
(i) सूरदास,
(ii) बिहारी
(iii) तुलसीदास,
(iv) रसखान।
उत्तर:
(iv) रसखान।

प्रश्न 2.
मीरा भक्त थीं (2009)
(i) राम की
(ii) कृष्ण की
(iii) ब्रह्म की
(iv) शिव की।
उत्तर:
(ii) कृष्ण की

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प्रश्न 3.
सूर ने मनोहारी वर्णन किया है
(i) बालक राम का
(ii) श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का
(iii) शिव के नृत्य का
(iv) नारद के भ्रमण का।
उत्तर:
(ii) श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का

प्रश्न 4.
गोपिका की आँख में दो तत्त्व भर गये थे नंदलाल और (2016)
(i) धूल
(ii) गुलाल
(iii) मिर्च
(iv) मिट्टी।
उत्तर:
(ii) गुलाल

प्रश्न 5.
वृक्ष फल देते हैं
(i) स्वयं के लिए
(ii) किसी के लिए नहीं
(iii) अहसान के लिए
(iv) दूसरों के लिए।
उत्तर:
(iv) दूसरों के लिए।

प्रश्न 6.
सेनापति के संकलित पदों में हुआ है
(i) ऋतु वर्णन
(ii) नगर वर्णन
(ii) दृश्य वर्णन
(iv) नख-शिव वर्णन।
उत्तर:
(i) ऋतु वर्णन

प्रश्न 7.
पन्तजी नौका विहार करने गये (2010, 14)
(i) प्रातःकाल
(ii) सायंकाल
(iii) दोपहर में
(iv) चाँदनी रात में।
उत्तर:
(iv) चाँदनी रात में।

प्रश्न 8.
भूषण के काव्य में वर्णन हुआ है
(i) शौर्य का
(ii) श्रृंखला का
(iii) वात्सल्य का
(iv) भक्ति का।
उत्तर:
(i) शौर्य का

प्रश्न 9.
‘दिनकर’ कविता का आह्वान किसलिए करते हैं?
(i) मनोरंजन के लिए
(ii) दया के लिए
(iii) जनता को जगाने के लिए
(iv) युद्ध के लिए।
उत्तर:
(iii) जनता को जगाने के लिए

प्रश्न 10.
साये में धूप महसूस की (2008)
(i) दिनकर ने
(ii) दुष्यन्त कुमार ने
(iii) गिरिजाकुमार माथुर ने
(iv) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने।
उत्तर:
(ii) दुष्यन्त कुमार ने

प्रश्न 11.
बालक कृष्ण का रुचिकर व्यंजन है (2015)
(i) माखन-मिश्री
(ii) दूध-रोटी
(iii) दाल-चावल
(iv) माखन-मलाई।
उत्तर:
(i) माखन-मिश्री

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प्रश्न 12.
कवच-कुण्डल किसने दान किए? (2017)
(i) अर्जुन ने
(ii) श्रीकृष्ण ने
(iii) कर्ण ने
(iv) दुर्योधन ने।
उत्तर:
(iii) कर्ण ने

रिक्त स्थान पूर्ति

  1. ………… ने राम के लोकमंगल व लोककल्याणकारी रूप को जनता के सामने प्रतिष्ठित किया। (2008)
  2. तुलसीदास के पदों में ………………… रस की प्रधानता है। (2008)
  3. …………………. को कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है। (2008)
  4. सेनापति ने …………… को ऋतुराज कहा है। (2015)
  5. कबीर ने ……………….. ज्ञान को उपयोगी माना है।
  6. ………………. के चले जाने के कारण ब्रजवासी दु:खी थे।
  7. अंगद ………………… का पुत्र था।
  8. कवियों ने …………….. की बोली का बखान किया है।
  9. ………………… ऋतु में सूर्य चन्द्रमा के समान लगता है। (2009, 16)
  10. ……………के तीन भाग हैं-साखी, सबद और रमैनी। (2008)
  11. ……………… ने कवच-कुंडल दान किए थे।
  12. बालि ने काँख में …………………. को छुपा लिया था। (2009)
  13. खंजन पक्षी का दुःख……………… ऋतु में मिट जाता है। (2009)
  14. महल बनाने के लिए ………………… का बलिदान होता है। (2012)
  15. मीरा ने …………….. को अपना आराध्य बताया है। (2017)

उत्तर:

  1. तुलसी
  2. शान्त
  3. केशव
  4. बसंत
  5. व्यावहारिक
  6. श्रीकृष्ण
  7. बालि,
  8. कोयल
  9. शिशिर
  10. बीजक
  11. कर्ण
  12. रावण
  13. शरद
  14. झोंपड़ी
  15. श्रीकृष्ण।

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सत्य/असत्य

  1. तुलसीदास प्रण करके राम के चरण-कमलों में बसना चाहते हैं। (2009)
  2. राधा विरह का दुःख भुलाने के लिए समाज सेवा करती हैं।
  3. शिवाजी के नगाड़ों की घोर से बादशाहों की छाती धड़कती थी।
  4. श्री राम भद्राचार्य ने श्रीकृष्ण का वर्णन किया है। (2010)
  5. बिना अवसर के कही गई अच्छी बात अच्छी लगती है। (2009)
  6. गोपियों की आँखों में दो तत्त्व भर गये थे। (2015)
  7. भूषण ने छत्रसाल के शौर्य का वर्णन किया है।
  8. दुष्यन्त कुमार ने उर्दू में ही गजलें लिखी हैं।
  9. कबीर अनुभूत ज्ञान को ज्यादा महत्व देते थे। (2009)
  10. कजरी ग्रीष्म ऋतु में गाई जाती है। (2016)

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य
  6. सत्य
  7. सत्य
  8. असत्य
  9. सत्य
  10. असत्य।

जोड़ी मिलाइए

I.
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (क)
3. → (घ)
4. → (ङ)
5. → (ग)
6. → (च)

II.
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न img-2
उत्तर:
1. → (च)
2. → (ग)
3. → (क)
4. → (ङ)
5. → (घ)
6. → (ख)

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एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
कौआ और कोयल में क्या समानता होती है? (2009)
उत्तर:
काले रंग की

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण ने किसका गर्व चूर करने को गोवर्धन पर्वत धारण किया था?
उत्तर:
इन्द्र का

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण के मुकुट में कौन-सी वस्तु लगी है? (2017)
उत्तर:
मोर पंख

प्रश्न 4.
सज्जन पुरुष किसलिए धन संचय करते हैं?
उत्तर:
परहित के लिए

प्रश्न 5.
‘तुम पै धनुरेख गई न तरी’ किससे कहा गया है? (2009)
उत्तर:
रावण के लिए

प्रश्न 6.
जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र क्या है? (2014)
उत्तर:
कर्मशील रहना

प्रश्न 7.
‘यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे बसते हैं’ से क्या आशय है?
उत्तर:
संवेदनशीलता का

प्रश्न 8.
कोई न कोई अभाव रहने के कारण जीवन को क्या कहा गया है?
उत्तर:
अपूर्ण

प्रश्न 9.
छत्रसाल की बरछी ने किनके बल खींच लिए हैं?
उत्तर:
दुष्ट मुगलों के

प्रश्न 10.
‘लाखों क्रोंच कराह रहे हैं’ से दिनकर क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर:
अनेक पीड़ित प्राणी

प्रश्न 11.
‘नौका विहार’ कविता में चंचल किरणों की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
चाँदी के साँपों से

प्रश्न 12.
वह कौन-सी सम्पत्ति है जो व्यय करने पर बढ़ती है? (2009)
उत्तर:
विद्या

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प्रश्न 13.
कजरी कब गाई जाती है? (2009)
उत्तर:
वर्षा ऋतु में

प्रश्न 14.
कवच-कुण्डल दान किसने किये थे? (2009)
उत्तर:
कर्ण ने

प्रश्न 15.
पंतजी की कविता ‘नौका विहार’ किस नदी पर विहार की अनुभूति है? (2012)
उत्तर:
गंगा नदी पर

प्रश्न 16.
तुलसीदास किसके चरण छोड़कर जाना नहीं चाहते? (2015)
उत्तर:
श्रीराम के।

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MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations

Relations and Functions Important Questions

Relations and Functions Objective Type Questions

(A) Choose the correct option :

Question 1.
If x + iy = 2 + 3i, then (x, y) will be :
(a) (3, 2)
(b) (2, 3)
(c) (- 2,- 3)
(d) (3, 3)
Answer:
(b) (2, 3)

Question 2.
The simplest form of \(\frac { 1 + i }{ 1 – i }\) :
(a) – i
(b) i
(c) ± i
(d) None of these.
Answer:
(b) i

Question 3.
If z is a complex number, then z + z is :
(a) Real number
(b) Imaginary number
(c) Nothing can be said
(d) None of these.
Answer:
(a) Real number

Question 4.
The value of \(\sqrt {i}\) = ……………..
(a) ± \(\frac { 1 – i }{ \sqrt { 2 } }\)
(b) ± \(\frac { 1 + i }{ \sqrt { 2 } }\)
(c) ± (1 + i)
(d) ± (1 – i)
Answer:
(b) ± \(\frac { 1 + i }{ \sqrt { 2 } }\)

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations

Question 5.
Number of solution of the equation z + z = 0 is :
(a) 1
(b) 2
(c) 3
(d) 4
Answer:
(d) 4

Question 6.
Argument of complex number 0 is :
(a) 0
(b) π
(c) 2π
(d) Not defined
Answer:
(d) Not defined

Question 7.
Conjugate of \(\frac { 1 – i }{ 1 + i }\) is :
(a) \(\frac { 1 – i }{ 1 + i }\)
(b) \(\frac { 1 – i }{ 1 – i }\)
(c) i
(d) – i
Answer:
(c) i

Question 8.
Argument (z1.z2) = ………………
(a) arg (z1) – arg (z2)
(b) arg (z1) + arg (z2)
(c) arg (z1). arg (z2)
(d) None of these
Answer:
(b) arg (z1) + arg (z2)

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations

Question 9.
The least positive integer n for which \(\frac { 1 – i }{ 1 + i }\)n = 1 is :
(a) 2
(b) 4
(c) 8
(d) 12
Answer:
(b) 4

Question 10.
If |z – \(\frac { 4}{ z}\)| = 2, then |z| has maximum value:
(a) \(\sqrt {3}\) + 1
(b) \(\sqrt {5}\) + 1
(c) 2
(d) 2 + \(\sqrt {2}\)
Answer:
(b) \(\sqrt {5}\) + 1

(B) Match the following :

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 1

Answer:

  1. (d)
  2. (a)
  3. (f)
  4. (b)
  5. (c)
  6. (e)

(c) Fill in the blanks :

  1. The value of (1 + i)4 (1 + \(\frac {1}{i}\))4 is ……………….
  2. The value of \(\frac {1}{i}\) is ……………….
  3. The value of z – \(\bar { z }\) is ……………….
  4. Argument of – 1 – i is ……………….
  5. polar form of i3 is ……………….
  6. Argument of complex number is \(\frac { 1+\sqrt { 3i } }{ \sqrt { 3 } +i }\) is ……………….
  7. If |\(\frac { z – i }{ z + i }\)| = 1, then locus of z will be ……………….
  8. If x + \(\frac {1}{x}\) = 2cosθ, then the value of xn = \(\frac { 1 }{ { x }^{ n } }\) will be ……………….
  9. If z = 2 – 3i, then the value of z. \(\bar { z }\) is ……………….
  10. If 2 + (x + yi) = 3 – i, the x = ……………… and y = ……………….

Answer:

  1. 16
  2. – i
  3. Imaginary number
  4. \(\frac {5π}{4}\)
  5. cos\(\frac {π}{2}\) – i sin\(\frac {π}{2}\)
  6. \(\frac {π}{6}\)
  7. X – axis
  8. 2cos nθ
  9. 13
  10. 1, – 1

(D) Write true / false :

  1. Additive inverse of complex number – 2 + 5i is 2 – 5 i.
  2. If | z2 – 1 |= z2 + 1, then z lies on a circle.
  3. If | z1 | = 12 and | z2 – 3 – 4i | = 5, then the least value of | z1 – z2 | is 7.
  4. If arg(z) < 0, then arg(- z) – arg(z) = π.
  5. Polar form of 1 + \(\sqrt {- 1}\) is \(\sqrt {2}\)(cos\(\frac {π}{4}\) + isin\(\frac {π}{4}\)).
  6. If z is a complex number such that | z | ≥ 2, then the minimum value of |z + \(\frac { 1 }{ 2 }\) | equal \(\frac { 5 }{ 2 }\)

Answer:

  1. True
  2. False
  3. False
  4. True
  5. True
  6. False.

(E) Write answer in one word / sentence :

  1. If Z1 = 2 – i, z2 = 1 + i, them find the value \(\frac { { { z }_{ 1 }+{ z }_{ 2 }+1 } }{ { z }_{ 1 }-{ z }_{ 2 }+1 }\)
  2. Modulus of \(\frac {1 – i }{ 1 + i }\) – \(\frac { 1 – i }{ 1 + i }\) will be.
  3. Polar form of complex number \(\sqrt {3}\) + i will be.
  4. If Z1 = 2 – i and z2 = – 2 + i, then Re(\(\frac { { { z }_{ 1 }{ z }_{ 2 } } }{ { z }_{ 1 } }\)) will be
  5. If the number \(\frac { z – 1 }{ z + 1 }\) is purly imaginary, then the value of |z| will be.

Answer:

  1. \(\sqrt {2}\)
  2. 2
  3. 2(cos\(\frac {π}{6}\) + isin\(\frac {π}{6}\))
  4. \(\frac { – 2 }{ 5 }\)
  5. 1

Complex Numbers and Quadratic Equations Very Short Answer Type Questions

Question 1.
If 1, ω, ω2 are the cube root of unity then find the value of ω3n.
Solution:
Since ω3 = 1
ω3n = (ω3)n = (1)n = 1.

Question 2.
Find the value of i4n.
Solution:
i4n = (i4)n = (i2.i2)n = [(- 1)(- 1)]n = (1)n = 1.

Question 3.
Find the condition of two complex numbers x + iy and a + ib are compaired.
Solution:
If x + iy = a + ib
Then, x = a, y = b.

Question 4.
Write conjugate of a complex number z = a – ib.
Solution:
z = conjugate of a – ib = a – (- ib)
= a + ib.

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations

Question 5.
Write the complex number – 63 in ordered form.
Solution:
Ordered form of z = a + ib is (a, b).
Given: z = 0 – 6i
Ordered pair (0, – 6).

Question 6.
Write the complex number 3 – \(\sqrt { 7i }\) in ordered form.
Solution:
Ordered pair of z = a + ib is (a, b).
∴Ordered pair of 3 – \(\sqrt { 7i }\) = (3, – \(\sqrt { 7i }\))

Question 7.
Find the value of i + \(\frac { 1 }{ i }\).
Solution:
i + \(\frac { 1 }{ i }\) = \(\frac { { i }^{ 2 }+1 }{ i }\) = \(\frac { – 1 + i }{ i }\) = 0.

Question 8.
Find the value of i-19.
Solution:
i-19 = \(\frac { 1 }{ { i }^{ 19 } }\) = \(\frac { 1 }{ { i }^{ 18 }i } \) = \(\frac { 1 }{ (i^{ 2 })^{ 9 }.i }\)
= \(\frac { 1 }{ -1.i }\) = \(\frac { – 1 }{ i }\)
= \(\frac { – 1.i }{ { i }^{ 2 } }\) = i.

Question 9.
Write (1 – i)4 in form of a + ib.
Solution:
(1 – i)4 = [ (1 – i)2 ]2 (NCERT)
= [1 + i2 – 2i]2 = [1 – 1 – 2i]2, [∵ i2 = – 1]
= (- 2i)2 = 4i2 = 4(- 1) = – 4
= – 4 + 0i.

Question 10.
Find the modulus of complex number z = – 1 – i \(\sqrt {3}\) .
Solution:
Z = – 1 – i\(\sqrt {3}\)
a = – 1, b = \(\sqrt {3}\)
Modulus = \(\sqrt { { a }^{ 2 }+{ b }^{ 2 } }\) = \(\sqrt {1 + 3}\) = \(\sqrt {2}\)

Question 11.
Find the modulus of complex number 1 – i.
Solution:
z = 1 – i
a = 1, b = – 1
Modulus = \(\sqrt { { a }^{ 2 }+{ b }^{ 2 } }\) = \(\sqrt {1 + 1}\) = \(\sqrt {2}\)

Question 12.
Find the sum of 2 – 3i and its conjugate.
Solution:
z = 2 – 3i and \(\bar { z }\) = 2 + 3i
z + \(\bar { z }\) = 2 – 3i + 2 + 3i = 4.

Question 13.
Solve the quadratic equation x2 + 2 = 0. (NCERT)
Solution:
x2 + 2 = 0
⇒ x2 = – 2
⇒ x2 = – 1 x 2
= 2i2 [∵ i2 = – 1]
x = ± \(\sqrt {2i}\) or + \(\sqrt {2}\)i, – \(\sqrt {2}\)i

Question 14.
Solve the quadratic equation x2 + 3 = 0. (NCERT)
Solution:
x2 + 3 = 0
⇒ x2 = – 3 = – 1 x 3
⇒ x2 = 3i2, [∵ i2 = – 1]
x2 = ± \(\sqrt {3i}\) or + \(\sqrt {3}\)i, – \(\sqrt {3}\)i

Question 15.
Write the triangle inequality for the two complex number Z1 and z2.
Solution:
| Z1| and | z2| are the two sides of any triangle
Then, | z0 + z2| ≤ | z1| +| z2|

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations

Question 16.
If T and 9 are the modulus and argument of the complex number a + ib, then write its polar form.
Solution:
Polar form of a + ib is r(cosθ + i sinθ).

Question 17.
If z = cosθ + i sinθ where |z| = 1, then find \(\frac { 1 }{ z }\).
Solution:
\(\frac { 1 }{ z }\) = cosθ – isinθ.

Question 18.
Write the statement of De – moivre’s theorem.
Solution:
If polar form of z = a + ib is r(cosθ + isinθ), then De – moivre’s theorem is
(cosθ + isinθ)n = cos nθ + i sin nθ.

Question 19.
Write polar form of i.
Solution:
a + ib = 0 + i. 1
r = \(\sqrt { { a }^{ 2 }+{ b }^{ 2 } }\) =1, θ = tan-1\(\frac { b }{ a}\) = tan-1∞ = \(\frac { π }{ 2}\)
Polar form of i = (cos\(\frac { π }{ 2}\) + i sin \(\frac { π }{ 2}\)).

Question 20.
Find the polar form of (- 2 + 2i).
Solution:
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 2

Complex Numbers and Quadratic Equations Long Answer Type Questions

Question 1.
Convert (\(\frac { 1 }{ 3}\) + 3i)3 in form of a + ib. (NCERT)
Solution:
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 3

Question 2.
Write ( – 2 – \(\frac { 1 }{ 3}\)i)3 in form of a + ib. (NCERT)
Solution:
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 4

Question 3.
Write (5 – 3i)3 in the form of a + ib.
Solution:
(5 – 3i)3 = (5)3 – (3i)3 – 3(52.3i) + 3.5(3i)2
= 125 – 27.i3 – 75.3i + 15.9i2
= 125 – 27i.i2 – 225i + 15(- 9)
= 125 + 27i – 225i – 135
= – 10 – 198i.

Find the multiplicative inverse of following complex number :

Question 4.
4 – 3i
Solution:
Let the multiplicative inverse of 4 – 3i is a + ib.
Then, (4 – 3i) x (a + ib) = 1
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 5

Question 5.
\(\sqrt {5}\) + 3i
Solution:
Let z = \(\sqrt {5}\) + 3i
Be multiplicative inverse
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 6

Question 6.
Find the polar form of the following :
(i) \(\frac { 1 + 7i }{ { 2 – i }^{ 2 } }\), (ii) \(\frac { 1 + 3i }{ 1 – 2i }\)
Solution:
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 7
Now, let – 1 + i = r(cosθ + i sinθ),
Then, r cosθ = – 1 …. (1)
and r sinθ = 1 …. (2)
Squaring and adding equation (1) and (2),
r2 = 1 + 1 = 2
⇒ r = \(\sqrt {2}\)
Put value of r in equation (1) and (2),
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 8
Comparing the real and imaginary parts,
r cosθ = – 1
r sinθ = 1
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 9
Squaring and adding equation (1) and (2),
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 10
∵ Real part is negative and imaginary part is positive of z, hence θ will lie in 4th quadrant
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 11

Question 7.
Find modulus and argument of complex number z = – 1 – i\(\sqrt {3}\) (NCERT)
Solution:
Let z = – 1 – i\(\sqrt {3}\) = rcosθ + ir sinθ

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 12
Comparing the real and imaginary parts,
rcosθ = – 1 …. (1)
rsinθ = – \(\sqrt {3}\) …. (2)
Squaring and adding equation (1) and (2),
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 13
Since both the real and imaginary part of z are negative.
∴ θ lies in third quadrant
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 14

Question 8.
Find the modulus and argument of z = – \(\sqrt {3}\)+ i.
Solution:
Let z = – \(\sqrt {3}\)+ i = rcosθ + ir sinθ

MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 15
Comparing the real and imaginary parts,
r cosθ = – \(\sqrt {3}\)
rsinθ = 1
Squaring and adding eqns. (1) and (2),
rcosθ = – \(\sqrt {3}\) …. (1)
rsinθ = 1 …. (2)
Squaring and adding equation (1) and (2),
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 16
Since both the real and imaginary part of z are negative and positive respectively.
∴ θ lies in 22nd quadrant
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 17

Question 9.
Find the modulus and argument of 1 – i.
Solution:
Let z = 1 – i = rcosθ + ir smθ
Comparing the real and imaginary parts,
1 = r cosθ
and – 1 = rsinθ
Squaring and adding equation (1) and (2),
(1)2 + (- 1)2 = r2 cos20 + r2 sin20
⇒ r2(cos20 + sin20) = 1 + 1,
⇒ r2= 2 ⇒ r = \(\sqrt {2}\) (modulus)
Dividing equation (2) by equation (1),
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 17

Question 10.
Find square root of complex number 3 + 4i.
Solution:
Let \(\sqrt {3 + 4i}\) = x + iy
On squaring,
3 + 4 i = (x + iy)2
⇒ 3 + 4i = x2 + 2ixy + i2y2
⇒ 3 + 4i = x2 + 2ixy – y2
⇒ 3 + 4i = (x2 – y2) + i(2xy)
x2 – y2 = 3 …. (1)
2xy = 4 …. (2)
(x2 + y2)2 = (x2 – y2)2 + 4x2y2
= (3)2 + (4)2
= 25
∴ x2 + y2 = 5 …. (3)
Now adding eqns. (1) and (3),
2x2 = 8
⇒ x2 = 4
⇒ x = ± 2
From equation (2), 2(± 2)y = 4
∴ y = ± 1
\(\sqrt { x + iy }\) = ± 2 ± i.

Question 11.
Find square root of complex number 8 – 6i.
Solution:
Let \(\sqrt { 8 – 6i }\) = x + iy
On squaring,
8 – 6i = (x + iy)2
⇒ 8 – 6i = x2 + 2ixy + i2y2 .
⇒ 8 – 6i = (x2 – y2) + 2ixy
∴ 8 = x2 – y2 …. (1)
and – 6 = 2 xy …. (2)
(x2 + y2)2 = (x2 – y2)2 + 4x2y2
(x2+y2)2 = (8)2 + (- 6)2
= 64 + 36 = 100
∴ x2 + y2 = 10 …. (3)
Now adding equation (1) and (3),
2x2 = 18
⇒ x2 = 9
⇒ x = ±3
From equation (3), y2 = 10 – 9 = 1
∴ y = ± 1
\(\sqrt { 8 – 6i}\) = ± 3 ± i.

Question 12.
x2 + 3x + 9 = 0.
Solution:
Given : x2 + 3x + 9 = 0
Comparing the above equation by ax2 + bx + c = 0,
a = 1, b = 3, c = 9
Now, D = b2 – 4ac
= 32 – 4 x 1 x 9 = 9 – 36 = – 27 < 0
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 19

Question 13.
– x2 + x – 2 = 0.
Solution:
Given : – x2 + x – 2 = 0
Comparing the above equation by ax2 + bx + c = 0,
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 20

Question 14.
x2 + 3x + 5 = 0.
Solution:
Given : x2 + 3x + 5 = 0
Comparing the above equation by ax2 + bx+c = 0,
a = 1, b = 3, c = 5
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 21

Question 15.
x2 – x + 2 = 0
Solution:
Given : x2 – x + 2 = 0
Comparing the above equation by ax2 + bx + c = 0,
a = 1, b = – 1, c = 2
Now, D = b2 – 4ac
= (- 1)2 – 4 x 1 x 2 = 1 – 8 = – 7 < 0
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 22

Question 16.
If (\(\frac { 1 + i }{ 1 – i }\)) = 1, then And the minimum positive integer number of m. (NCERT)
Solution:
MP Board Class 11th Maths Important Questions Chapter 5 Complex Numbers and Quadratic Equations 23

MP Board Class 11th Maths Important Questions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 1 भक्ति

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 1 भक्ति

भक्ति अभ्यास

भक्ति अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनिए
(क) तुलसीदास के पद संकलित हैं (2009)
(अ) कवितावली में
(ब) गीतावली में
(स) विनय पत्रिका में
(द) रामचरितमानस में।
उत्तर:
(स) विनय पत्रिका में।

(ख) तुलसीदास के पदों में रस प्रधान है
(अ) शान्त
(ब) श्रृंगार
(स) वीर
(द) वात्सल्य।
उत्तर:
(अ) शान्त रस।

(ग) मीराबाई भक्त थीं (2009)
(अ) राम की
(ब) कृष्ण की
(स) शिव की
(द) विष्णु की।
उत्तर:
(ब) कृष्ण की।

प्रश्न 2.
तुलसीदास किसके चरण छोड़कर नहीं जाना चाहते? (2015, 17)
उत्तर:
तुलसीदास श्रीराम के चरण छोड़कर नहीं जाना चाहते।

प्रश्न 3.
तुलसीदास प्रण करके कहाँ बसना चाहते हैं?
उत्तर:
तुलसीदास प्रण करके श्रीराम के चरण कमलों में बसना चाहते हैं।

प्रश्न 4.
कृष्ण ने किसका घमण्ड चूर करने के लिये गोवर्धन पर्वत धारण किया था? (2016)
उत्तर:
कृष्ण ने इन्द्र का घमण्ड चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था।

प्रश्न 5.
किसी रोगी की पीड़ा को सबसे अधिक कौन अनुभव कर सकता है?
उत्तर:
किसी रोगी की पीड़ा को सबसे अधिक श्रीराम ही अनुभव कर सकते हैं।

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भक्ति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि के अनुसार राम के चरणों से किन-किनका उद्धार हुआ है?
उत्तर:
कवि के अनुसार राम के चरणों द्वारा पत्थर (अहिल्या), जटायु (पक्षी), मारीच (हिरण) आदि का उद्धार हुआ है।

प्रश्न 2.
‘करहलाज निजपन’ पंक्ति में निजपन’ से कवि का क्या आशय है?(2014)
उत्तर:
‘करहु लाज निजपन’ पंक्ति से कवि का अभिप्राय है कि मैं अपने इस मन के दोषपूर्ण एवं तुच्छ कार्यों का कहाँ तक वर्णन करूँ। आप तो अन्तर्यामी हैं अतः सेवक के मन की प्रत्येक अच्छी-बुरी बात को जानते हैं। मैं अपनी दोषयुक्त बातों को कहाँ तक बताऊँ?

प्रश्न 3.
मीरा ने अपने प्रियतम से मिलने में क्या कठिनाई बताई है? (2008)
उत्तर:
मीरा के प्रियतम श्रीकृष्ण की सेज गगन मण्डल में है, उस स्थान पर पहुँचना कठिन है। इसी कारण मीरा प्रियतम कृष्ण से मिलने में कठिनाई का अनुभव करती हैं।

प्रश्न 4.
मीरा के हृदय की पीड़ा को कौन-सा वैद्य दूर कर सकेगा? (2015)
उत्तर:
मीरा के हृदय की पीड़ा को दूर करने वाला एकमात्र वैद्य साँवला सलोना कृष्ण है।

भक्ति दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तुलसीदास के अनुसार मानव मन की मूढ़ता क्या है? (2008, 13)
उत्तर:
तुलसीदास जी के अनुसार मानव मूर्ख है। वह प्रभु राम की भक्ति रूपी गंगा को त्यागकर विषय-वासना रूपी ओस के कणों से प्यास बुझाने की अभिलाषा रखता है। जिस प्रकार से धुएँ के समूह को देखकर प्यासा चातक उसे बादल समझकर अपनी प्यास बुझाना चाहता है, लेकिन उसको वहाँ से न तो शीतलता प्राप्त होती है और न ही उसकी प्यास बुझती है, लेकिन उसके नेत्रों को हानि अवश्य पहुँचती है। इसी प्रकार मनुष्य विषय-वासना में मग्न होकर आनन्द की प्राप्ति करना चाहता है, लेकिन उसको आनन्द के स्थान पर अशान्ति की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार से मुर्ख बाज दर्पण में अपनी परछाईं को देखकर अन्य बाज समझकर उस पर झपटता है, लेकिन उसको आहार तो नहीं प्राप्त होता है परन्तु उसका मुख अवश्य क्षतिग्रस्त हो जाता है। इसी प्रकार मनुष्य भी मूर्खतावश सांसारिक विषय-वासनाओं में लिप्त रहना चाहता है। यदि मानव ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति करे तो निश्चय ही उसे सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिल सकती है, क्योंकि प्रभु राम ही सब के कष्टों को दूर करके तारने वाले हैं।

प्रश्न 2.
तुलसीदास अपना भावी जीवन किस प्रकार बिताने का संकल्प लेते हैं? (2009, 10)
उत्तर:
तुलसीदास जी ने अपने भावी जीवन को श्रीराम की भक्ति में लगाने का संकल्प लिया है, क्योंकि उनका अनुभव है कि मानव जीवन की सार्थकता व मुक्ति का मार्ग राम भक्ति द्वारा ही सम्भव है। तुलसीदास जी का कथन है कि यह संसार मिथ्या है तथा संसार में अनुरक्त व्यक्ति कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। अतः भगवान श्रीराम के चरणों में अपने मन को पूर्ण रूप से समर्पित करके ही जीवन को सफल बनाया जा सकता है।

जिस प्रकार मीरा ने कृष्ण को अपना आराध्य भाग था, उसी प्रकार तुलसीदास जी ने अपना भावी जीवन श्रीराम के चरणों में बिताने का संकल्प ले लिया।.

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प्रश्न 3.
मीरा ने हरि के चरणों की कौन-कौन सी विशेषताएँ बताई हैं? (2009)
उत्तर:
मीरा ने हरि के चरणों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए बताया है कि जिन हरि के चरणों ने राजा बलि की दान स्वरूप प्रदान की हुई धरती को तीन पग में नाप लिया था, जिन चरणों का स्पर्श करके गौतम की पत्नी अहिल्या का उद्धार हो गया।

गोपलीला करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का नाश कर भय मुक्त किया था। इन्द्र के अभिमान को नष्ट करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उँगली पर धारण कर लिया था। ऐसे भगवान के चरण कमल ही मीरा दासी का उद्धार करने में सक्षम हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) ऐसी मूढ़ता या …………..आपने तन की।
(ख) अबलौं नसानी ………… कंचनहिं कसैहों।
(ग) बढ़त पल-पल …………पुनि डार।
(घ) गगन मंडल पै ………..की जिन लाई होय।
उत्तर:
(क) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में भक्त तुलसीदास अपने अवगुणों को प्रभु के समक्ष प्रदर्शित करते हुए अवगुणों एवं अज्ञान से मुक्त होने की कामना व्यक्त करते हैं।

व्याख्या :
तुलसीदास जी कहते हैं कि मेरे इस मन की ऐसी मूर्खता है कि यह राम की भक्ति रूपी पवित्र गंगा को त्यागकर सांसारिक सुख रूपी ओस की इच्छा करता है। कहने का आशय है कि जिस भाँति कोई प्यासा चातक पक्षी धुएँ के समूह को देखकर उसे बादल समझ ले और जल पीने के लिए दौड़े परन्तु न उसमें शीतलता होती है न जल, अपितु नेत्रों की हानि होती है। इसी भाँति मेरा मन राम की भक्ति को त्यागकर सांसारिक विषयों में सुख समझकर उनकी ओर आकर्षित होता है।

तुलसीदास का कथन है कि मेरे मन की ऐसी स्थिति है कि जैसे फर्श में जड़े हुए काँच में कोई बाज पक्षी अपने शरीर की परछाईं को निहारे और उसे अन्य पक्षी अर्थात् अपना शिकार समझकर उस पक्षी पर भोजन के लिए झपटे। उसे यह ज्ञान नहीं है कि इस प्रकार फर्श पर टकराने से उसके मुँह की ही हानि होगी।

हे कृपालु प्रभु राम ! मैं अपने मन की कुचाल (वाचालता) का कहाँ तक वर्णन करूँ? आप तो मेरी गति को भली-भाँति समझते हैं। हे प्रभु! आप पतित पावन हैं। पतितों एवं दीन-दुःखियों की रक्षा करना आपका प्रण अथवा स्वभाव है, इसीलिए आप इस तुलसीदास के असहनीय कष्टों को हरकर अपने प्राण की लज्जा रखो।
उपर्युक्त पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग में देखिये।

(ख) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में तुलसीदास ने विगत जीवन के प्रति पश्चाताप का भाव व्यक्त किया है। अब उन्हें विवेक की प्राप्ति हो गई; अत: उन्होंने सुपथ पर चलने का दृढ़ निश्चय किया है।

व्याख्या :
हे नाथ! मेरी अब तक की आयु व्यर्थ में ही नष्ट हो गई, मैं उसका कोई भी सदुपयोग नहीं कर सका। लेकिन अब जो आयु शेष है, उसे मैं व्यर्थ में नष्ट न होने दूंगा, उसका सदुपयोग करूँगा। राम की कृपा से संसार रूपी रात्रि नष्ट हो गयी है, अब में जाग गया हूँ अर्थात् अब मैं इतना मूर्ख नहीं कि जागने के बाद पुनः सोने के लिये बिस्तर बिछा लूँ। मुझे अज्ञान और मोह के बन्धन का बोध हो गया है। अत: मैं इसकी वास्तविकता से परिचित हो गया हूँ। अब पुनः मैं सांसारिक माया में नहीं फसँगा।

मुझे तो राम नाम रूपी सुन्दर चिन्तामणि प्राप्त हो गई है जिसे मैं हृदयरूपी हाथ से खिसकने नहीं दूंगा और राम के सुन्दर श्याम रूप को कसौटी बनाकर उस पर अपने चित्त रूपी कंचन को करूँगा अर्थात् परीक्षा करूँगा कि मेरा मन राम के स्वरूप में लगता है अथवा नहीं। यदि लगता है तो वह शुद्ध स्वर्ण है और यदि नहीं लगता तो उसमें खोट निहित है।

अभी तक मेरा मन इन्द्रियों के वश में था। अतः इन्द्रियों ने मेरा खूब उपहास किया, लेकिन अब मैंने अपने मन को वश में कर लिया है, इसलिए इन्द्रियों को हँसने का अवसर अब नहीं दूंगा। मैं दृढ़ निश्चय करके अपने इस मन रूपी भ्रमर को राम के चरण कमलों में बसाऊँगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरा मन अपनी चंचलता को त्यागकर राम के चरणों में लग जायेगा।

(ग) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में मीराबाई ने मानव शरीर को पुण्य स्वरूप ठहराकर ईश्वर के प्रति समर्पित होने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता है। जीव को पुण्य कर्मों के कारण ही मानव शरीर प्राप्त होता है। यह शरीर पल-पल एवं प्रतिक्षण क्षीण होता जा रहा है, अर्थात् मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। जीवन का अन्त होने में तनिक भी विलम्ब नहीं होगा। जिस प्रकार वृक्ष से झड़े हुए पत्ते पुनः डाल पर नहीं लग सकते; तद्नुकूल मानव का अन्त होने पर यह निश्चय नहीं है कि उसे पुनः मानव शरीर प्राप्त होगा। संसार रूपी सागर में विषय-वासनाओं की अत्यन्त तीक्ष्ण धारा है। यदि मनुष्य सुरत अथवा प्रभु में अपना ध्यान लगाये तो शीघ्र ही संसार रूपी सागर से पार हो जायेगा अर्थात् सांसारिक विषय-वासनाओं से उसे छुटकारा मिल जायेगा।

साधु सन्त एवं महन्तों की मण्डली पुकार-पुकार कर कह रही है कि मानव जीवन चार दिनों का मेला है। अत: हे मानव! तू श्रीकृष्ण का आश्रय ग्रहण कर ले, इसी में तेरा हित है।

(घ) सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के पाठ ‘मीराबाई’ द्वारा रचित ‘पदावली’ शीर्षक से अवतरित है।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में मीराबाई की विरह जनित पीड़ा को बड़ा ही मार्मिक वर्णन है। मीराबाई का श्रीकृष्ण से मिलन नहीं हो पा रहा है। अतः उनको असहनीय पीड़ा हो रही है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि हे सखि! मैं तो श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी हूँ। उनके प्रति मेरे प्रेम की पीड़ा को मेरे अतिरिक्त दूसरा नहीं जान सकता है। मेरी सेज (सूली) (शय्या) ऐसे दुर्गम स्थान (प्राण दण्ड देने के स्थल) पर है जहाँ मेरे समान सांसारिक प्राणी पहुँच ही नहीं सकता है। श्रीकृष्ण की शैया तो आकाश में है। अत: उनसे मिलना असम्भव है। व्यथा से व्यथित मानव ही व्यथा की पीड़ा का मूल्यांकन कर सकता है। घायल व्यक्ति की पीड़ा को घायल ही जान सकता है। मेरी वियोग की पीड़ा को केवल वही व्यक्ति जान सकता है जिसने वियोग जनित पीड़ा को भी कभी सहन किया हो।

जौहर की पीड़ा को जौहरी (स्वयं को अग्नि की गोद में समर्पित करने वाला) ही जान सकता है। वियोग की पीड़ा से मैं इतनी दुःखी हूँ कि वन-वन भटकती फिर रही हूँ। लेकिन मेरी इस पीड़ा को दूर करने वाला कोई वैद्य आज तक नहीं मिला। मेरे विरह की पीड़ा तो तभी समाप्त होगी, जब श्रीकृष्ण वैद्य के रूप में प्रस्तुत होकर इसका उपचार करें अर्थात् उनके दर्शन से ही मेरा दुःख दूर हो सकता है।

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भक्ति काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिएनिसा, आस, पषान, चरन, सुचि, पुन्य, गरव, भौसागर।
उत्तर:
तत्सम रूप-निशा, आशा, पाषाण, चरण, शुचि, पुण्य, गर्व, भवसागर।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में अलंकार पहचान कर लिखिए
(अ) मन मधुकर पन कै तुलसी रघुपति पद कमल बसैहौं।
(ब) ज्यों गज काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की।
(स) बढ़त पल पल घटत छिन छिन चलत न लागे बार।
(द) जौहरी की गति जौहरी जाने, की जिन जौहर होय।
(इ) स्याम रूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।
उत्तर:
(अ) रूपक अलंकार
(ब) दृष्टान्त अलंकार
(स) पुनरुक्ति, अनुप्रास अलंकार
(द) पुनरुक्ति अलंकार
(इ) रूपक अलंकार।

प्रश्न 3.
मीरा के पदों में किन-किन बोली अथवा भाषाओं के शब्दों का प्रयोग हुआ है? संकलित अंश से छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
मीरा के पदों में ब्रजभाषा के अतिरिक्त राजस्थानी, गुजराती एवं पंजाबी शब्दों का प्रयोग हुआ है।

उदाहरण के लिए राजस्थानी भाषा के शब्द देखें-दीवाणी, जाणे, सोणा, मिलणा, मिल्या।
ब्रजभाषा के उदाहरण- नहिं ऐसो जनम बारम्बार……….
मन रे परसि हरि के चरन……….
जिन चरन प्रभु परसि लीने तरी गौतम धरन………..

प्रश्न 4.
माधुर्य गुण में कोमलकान्त पदावली का प्रयोग किया जाता है। यह गुण प्रायः श्रृंगार, वात्सल्य और शान्त रस में होता है। संकलित अंश से उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
संकलित अंश के आधार पर रस के उदाहरण इस प्रकार हैं-श्रृंगार रस-शृंगार रस के दो भेद होते हैं-
(1) संयोग शृंगार,
(2) वियोग शृंगार। स्थायी भाव रति होता है।

वियोग श्रृंगार का उदाहरण :
हे री मैं तो प्रेम दिवाणी मेरा दरद न जाने कोय। उपर्युक्त पंक्ति में वियोग शृंगार है।
अन्य उदाहरण :
दरद की मारी वन-वन डोलूँ, वैद मिल्या नहिं कोय।
मीरा की प्रभु पीर मिटैगी, जब वैद सँवलिया होय।।

वात्सल्य रस :
सोभित कर नवनीत लिए।
मैया मैं तो चंद खिलौना लैहौं।
शान्त रस का स्थायी भाव निर्वेद है।.

उदाहरण देखें :
ऐसी मूढ़ता या मन की …………
…………. करहु लाज निज पन की।
अबलौं नसानी ………… पद कमल बसैहौं।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में कौन-सा रस है? उसका स्थायी भाव लिखिए।
(अ) अबलौं नसानी, अब न नसैहों।
(ब) हेरी मैं तो प्रेम दिवाणी, मेरा दरद न जाने कोय।
उत्तर:
(अ) शान्त रस-स्थायी भाव निर्वेद।
(ब) वियोग शृंगार-स्थायी भाव रति।

प्रश्न 6.
“गगन मंडल पै सेज पिया की किस विध मिलणा होय।” पंक्ति में कौन-सी शब्द शक्ति है ?
उत्तर:
शब्द शक्ति लक्षणा है।

प्रश्न 7.
“ऐसी मूढ़ता या मन की परिहरि राम भक्ति सुर सरिता,
आस करत ओसकन की।”
में प्रयुक्त रस और उसका स्थायी भाव लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त पंक्ति में शान्त रस है तथा स्थायी भाव निर्वेद है।

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विनय के पद भाव सारांश

तुलसीदास अपने इष्टदेव श्रीराम से कहते हैं कि आपके चरणों का आश्रय छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाऊँ? आप पतितों का उद्धार करने वाले तथा दीनों से अनुराग करने वाले हैं। देवता, राक्षस, मुनि, नाग तथा मनुष्य सभी माया के वशीभूत हैं। अग्रिम पद में अपने को मूर्ख ठहराया है जो राम भक्ति रूपी गंगाजी को त्यागकर ओस कणों से अपनी प्यास बुझाना चाहता है।

अब तुलसी संसार के माया जनित सम्बन्धों को मिथ्या ठहराकर उनके बन्धनों से मुक्त होकर, अपने जीवन को नष्ट नहीं करना चाहते हैं। वे अपने मन रूपी भौरे को श्रीराम के चरण कमलों में अर्पित करना चाहते हैं।

विनय के पद संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।
काको नाम पतित पावन जग, केहि अति दीन पियारे ।।1।।
कौने देव बराइ बिरद-हित, हठिहठि अधम उधारे।
खग, मृग, ब्याध, पषान, विटप जड़, जवन कवन सुर तारे ।।2।।
देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज, सब माया बिबस विचारे।
तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ।।3।।

शब्दार्थ :
तजि = त्यागकर, छोड़कर; काको = किसका; पावन = पवित्र; जग = संसार; केहि = किसको; बराइ = चुन-चुन कर; बिरद = भक्ति; हठिहठि = हठपूर्वक; अधम = नीच, पापी; उधारे = उद्धार किया; खग = जटायु पक्षी; मृग = हिरण, मारीचि; ब्याध = बहेलिया; पषान = पत्थर, अहिल्या; विटप = वृक्ष; सुर = देवता; दनुज = राक्षस; मनुज = मनुष्य; बिबस = विवश, लाचार; तिनके = उनके।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के पाठ भक्ति’ के शीर्षक विनय के पद’ से अवतरित है। इसके रचयिता तुलसीदास हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में तुलसीदास ने भगवान् राम के चरणों के प्रति अपनी अनन्य भक्ति का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
तुलसीदास जी कहते हैं कि हे प्रभु ! मैं आपके चरणों को त्यागकर अन्यत्र कहाँ जाऊँ ? कहीं भी मुझे आश्रय दृष्टिगोचर नहीं होता। आपके समान पापियों को पवित्र करने वाला संसार में अन्य कोई नहीं है, निर्धनों से स्नेह करने वाला कोई दूसरा नहीं है। ऐसा कौन-सा देवता है जिसने हठपूर्वक अपने पतित भक्तों का उद्धार किया है। पक्षी, हिरन, बहेलिया, पत्थर, वृक्ष, जड़, देवता, राक्षस, ऋषि, नाग, मनुष्य सब माया के वशीभूत हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसे प्रभु राम के सामने मैं अपना सर्वस्व समर्पण करता हूँ।

काव्य सौन्दर्य :

  1. हित, हठिहठि, पतित-पावन में अनुप्रास अलंकार है।
  2. भाषा में तद्भव शब्दों का प्रयोग है, जैसे-पषान, बिबस, मनुज।
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग है।

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[2] ऐसी मूढ़ता या मन की।
परिहरि राम भक्ति सुर सरिता आस करत ओसकन की।।1।।
धूम समूह निरखि जातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की।
नहि तहँ शीतलता न बारि, पुनि हानि होत लोचन की ।।2।। (2012)
ज्यों गच काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की।
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ।।3।।
कहँ लौ कहाँ कुचाल कृपानिधि, जानत हौं गति जन की।
तुलसीदास प्रभु हरहु दुसह दुखः, करहु लाज निज पन की ।।4।।

शब्दार्थ :
मूढ़ता = मूर्खता; परिहरि = त्यागकर, छोड़कर; ओसकन = ओस की बूंदें; धूम = धुआँ; निरखि = देखकर; सुर-सरिता = गंगा हो; तृषित = प्यास से व्याकुल; गच= भूमि, दीवार; वारि = जल; लोचन = नेत्र; काँच = दर्पण; बिलोकि = देखकर; सेन = बाज, श्येन; जड़ = मूर्ख; तन = शरीर; छति = क्षति, हानि; आनन = मुँह, चोंच; टूटत = झपटकर गिरता है; आतुर = दुःखी; कुचाल = कुचक्र; लाज = लज्जा; निज = अपना; पन = प्रण, प्रतिज्ञा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में भक्त तुलसीदास अपने अवगुणों को प्रभु के समक्ष प्रदर्शित करते हुए अवगुणों एवं अज्ञान से मुक्त होने की कामना व्यक्त करते हैं।

व्याख्या :
तुलसीदास जी कहते हैं कि मेरे इस मन की ऐसी मूर्खता है कि यह राम की भक्ति रूपी पवित्र गंगा को त्यागकर सांसारिक सुख रूपी ओस की इच्छा करता है। कहने का आशय है कि जिस भाँति कोई प्यासा चातक पक्षी धुएँ के समूह को देखकर उसे बादल समझ ले और जल पीने के लिए दौड़े परन्तु न उसमें शीतलता होती है न जल, अपितु नेत्रों की हानि होती है। इसी भाँति मेरा मन राम की भक्ति को त्यागकर सांसारिक विषयों में सुख समझकर उनकी ओर आकर्षित होता है।

तुलसीदास का कथन है कि मेरे मन की ऐसी स्थिति है कि जैसे फर्श में जड़े हुए काँच में कोई बाज पक्षी अपने शरीर की परछाईं को निहारे और उसे अन्य पक्षी अर्थात् अपना शिकार समझकर उस पक्षी पर भोजन के लिए झपटे। उसे यह ज्ञान नहीं है कि इस प्रकार फर्श पर टकराने से उसके मुँह की ही हानि होगी।

हे कृपालु प्रभु राम ! मैं अपने मन की कुचाल (वाचालता) का कहाँ तक वर्णन करूँ? आप तो मेरी गति को भली-भाँति समझते हैं। हे प्रभु! आप पतित पावन हैं। पतितों एवं दीन-दुःखियों की रक्षा करना आपका प्रण अथवा स्वभाव है, इसीलिए आप इस तुलसीदास के असहनीय कष्टों को हरकर अपने प्राण की लज्जा रखो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. शान्त रस।
  2. भक्त अपने अवगुणों को प्रभु के समक्ष व्यक्त कर अपनी दीनता का प्रदर्शन कर रहा है।
  3. ब्रजभाषा तथा गेय मुक्तक शैली का प्रयोग है।
  4. भ्रान्तिमान रूपक एवं उपमा अलंकार की छटा दर्शनीय है।

[3] अबलौं नसानी, अब न नसैहों।
राम कृपा भक निसा सिरानी, जागे पुनि न डसैहौं।।1।।
पायो नाम चारु चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहौं।
स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।।2।।
परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन, निज बसहै न हँसैहों।
मन मधुकर पन कै तुलसी रघुपति पद कमल बसैहौं।।3।। (2008, 09)

शब्दार्थ :
अबलौं = अब तक; नसानी = नष्ट की, बिगाड़ी; भव = संसार; निसा = रात्रि; सिरानी = शान्त हो गई, बीत गई; डसैहों = स्वयं को डसाऊँगा; उर = हृदय; चारु = सुन्दर; खसैहौं = गिराऊँगा; सुचि = पवित्र; चित = मन; कंचनहिं = सोने को; परबस = दूसरे के अधीन; पन कै= प्रण करके, प्रतिज्ञा करके बसैहौं = निवास करूँगा, बसाऊँगा; मन-मधुकर = मन रूपी भौंरा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में तुलसीदास ने विगत जीवन के प्रति पश्चाताप का भाव व्यक्त किया है। अब उन्हें विवेक की प्राप्ति हो गई; अत: उन्होंने सुपथ पर चलने का दृढ़ निश्चय किया है।

व्याख्या :
हे नाथ! मेरी अब तक की आयु व्यर्थ में ही नष्ट हो गई, मैं उसका कोई भी सदुपयोग नहीं कर सका। लेकिन अब जो आयु शेष है, उसे मैं व्यर्थ में नष्ट न होने दूंगा, उसका सदुपयोग करूँगा। राम की कृपा से संसार रूपी रात्रि नष्ट हो गयी है, अब में जाग गया हूँ अर्थात् अब मैं इतना मूर्ख नहीं कि जागने के बाद पुनः सोने के लिये बिस्तर बिछा लूँ। मुझे अज्ञान और मोह के बन्धन का बोध हो गया है। अत: मैं इसकी वास्तविकता से परिचित हो गया हूँ। अब पुनः मैं सांसारिक माया में नहीं फसँगा।

मुझे तो राम नाम रूपी सुन्दर चिन्तामणि प्राप्त हो गई है जिसे मैं हृदयरूपी हाथ से खिसकने नहीं दूंगा और राम के सुन्दर श्याम रूप को कसौटी बनाकर उस पर अपने चित्त रूपी कंचन को करूँगा अर्थात् परीक्षा करूँगा कि मेरा मन राम के स्वरूप में लगता है अथवा नहीं। यदि लगता है तो वह शुद्ध स्वर्ण है और यदि नहीं लगता तो उसमें खोट निहित है।

अभी तक मेरा मन इन्द्रियों के वश में था। अतः इन्द्रियों ने मेरा खूब उपहास किया, लेकिन अब मैंने अपने मन को वश में कर लिया है, इसलिए इन्द्रियों को हँसने का अवसर अब नहीं दूंगा। मैं दृढ़ निश्चय करके अपने इस मन रूपी भ्रमर को राम के चरण कमलों में बसाऊँगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरा मन अपनी चंचलता को त्यागकर राम के चरणों में लग जायेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ तुलसीदास जी ने मानव को अज्ञानता छोड़कर सुपथ पर चलने की प्रेरणा दी है।
  2. शान्त रस का परिपाक है।
  3. भाषा अलंकारिक गुणों से युक्त है। रूपक अलंकार है।
  4. ब्रजभाषा का प्रयोग है।
  5. पद्यांशों में प्रसाद गुण है।

पदावली भाव सारांश

मीरा ने अपनी पदावली में अपनी विरह जनित पीड़ा को व्यक्त किया है। उनका कथन है कि वह श्रीकृष्ण के विरह में अत्यन्त व्याकुल हैं। उनके प्रियतम की सेज आकाश मण्डल में शूली ऊपर है जहाँ पहुँचना अत्यन्त दुर्लभ है। वे यत्र-तत्र भटक रही हैं लेकिन उनकी विरह पीड़ा का शमन करने वाला कोई भी नहीं दिखाई देता। उनकी पीड़ा को तो श्रीकृष्ण ही मिटा सकते हैं।

मीरा मानव जीवन को अमूल्य ठहराती हुई कहती हैं कि संसार से पार होने के लिये प्रभु के चरणों का सहारा ही एकमात्र आश्रय है। इन्हीं चरणों ने अनेक पतितों तथा भक्तों का उद्धार किया है।

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पदावली संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] हेरी मैं तो प्रेम दिवाणी, मेरा दरद न जाणे कोय।
सूली ऊपर सेज हमारी, किस विधि सोणा होय।।
गगन मण्डल पै सेज पिया की, किस विध मिलणा होय।
घायल की गति घायल जानै, की जिन लाई होय।।
जौहरी की गति जौहरी जानै, की किन जौहर होय।
दरद की मारी वन वन डोलूँ, वैद मिल्या नहिं कोय।।
मीरा की प्रभु पीर मिटैगी, जब वैद सँवलिया होय।

शब्दार्थ :
दरद = पीड़ा; सेज = शैया; गगन = आकाश; पिया = प्रियतम; विध = विधि; जौहरी = जौहर करने वाला; वैद = वैद्य; वन-वन = जंगल-जंगल; डोलूँ = विचरण करूँ; प्रभु = ईश्वर; पीर = पीड़ा; मिटैगी = समाप्त होगी; सँवलिया = श्रीकृष्ण का उपनाम।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के पाठ ‘मीराबाई’ द्वारा रचित ‘पदावली’ शीर्षक से अवतरित है।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में मीराबाई की विरह जनित पीड़ा को बड़ा ही मार्मिक वर्णन है। मीराबाई का श्रीकृष्ण से मिलन नहीं हो पा रहा है। अतः उनको असहनीय पीड़ा हो रही है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि हे सखि! मैं तो श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी हूँ। उनके प्रति मेरे प्रेम की पीड़ा को मेरे अतिरिक्त दूसरा नहीं जान सकता है। मेरी सेज (सूली) (शय्या) ऐसे दुर्गम स्थान (प्राण दण्ड देने के स्थल) पर है जहाँ मेरे समान सांसारिक प्राणी पहुँच ही नहीं सकता है। श्रीकृष्ण की शैया तो आकाश में है। अत: उनसे मिलना असम्भव है। व्यथा से व्यथित मानव ही व्यथा की पीड़ा का मूल्यांकन कर सकता है। घायल व्यक्ति की पीड़ा को घायल ही जान सकता है। मेरी वियोग की पीड़ा को केवल वही व्यक्ति जान सकता है जिसने वियोग जनित पीड़ा को भी कभी सहन किया हो।

जौहर की पीड़ा को जौहरी (स्वयं को अग्नि की गोद में समर्पित करने वाला) ही जान सकता है। वियोग की पीड़ा से मैं इतनी दुःखी हूँ कि वन-वन भटकती फिर रही हूँ। लेकिन मेरी इस पीड़ा को दूर करने वाला कोई वैद्य आज तक नहीं मिला। मेरे विरह की पीड़ा तो तभी समाप्त होगी, जब श्रीकृष्ण वैद्य के रूप में प्रस्तुत होकर इसका उपचार करें अर्थात् उनके दर्शन से ही मेरा दुःख दूर हो सकता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. विरह की वेदना का मार्मिक चित्रण मुहावरों द्वारा किया गया है।
  2. भाषा-राजस्थानी एवं ब्रजभाषा है।
  3. रस-वियोग शृंगार।
  4. अनुप्रास-दृष्टान्त, पुनरुक्तिप्रकाश है।
  5. गुण-माधुर्य।
  6. शब्द-शक्ति-लक्षणा एवं अभिधा है।’

[2] नहिं ऐसो जन्म बारम्बार।
क्या जानूँ कछु पुन्य प्रकटे, मानुसा अवतार।।
बढ़त पल पल घटत छिन छिन, चलत न लागे बार।
बिरछ के ज्यों पाँत टूटे, लागे नहिं पुनि डार।।
भौ सागर अति जोर कहिये, विषय ओखी धार।
सुरत का नर बाँधे बेंडा, बेगि उतरे पार।।
साधु सन्ता ते महन्ता, चलत करत पुकार।
‘दास मीरा’ लाल गिरिधर, जीवना दिन चार।। (2008)

शब्दार्थ :
बारम्बार = बार-बार; पुन्य = पुण्य; पल-पल = हर क्षण; घटत = कम होना, क्षीण होना; बिरछ = वृक्ष; पात = पत्ते; बार = देरी; पुनि = पुनः; डार = डाल; भौ सागर = भवसागर, संसार रूपी समुद्र; ओखी कठिन; सुरत = ध्यान लगाना, भगवान प्रेम; नर = मनुष्य; बेगि = शीघ्रता; बेंडा = आड़ा-तिरछा, कठिन; महन्ता – साधु मण्डली।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में मीराबाई ने मानव शरीर को पुण्य स्वरूप ठहराकर ईश्वर के प्रति समर्पित होने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता है। जीव को पुण्य कर्मों के कारण ही मानव शरीर प्राप्त होता है। यह शरीर पल-पल एवं प्रतिक्षण क्षीण होता जा रहा है, अर्थात् मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। जीवन का अन्त होने में तनिक भी विलम्ब नहीं होगा। जिस प्रकार वृक्ष से झड़े हुए पत्ते पुनः डाल पर नहीं लग सकते; तद्नुकूल मानव का अन्त होने पर यह निश्चय नहीं है कि उसे पुनः मानव शरीर प्राप्त होगा। संसार रूपी सागर में विषय-वासनाओं की अत्यन्त तीक्ष्ण धारा है। यदि मनुष्य सुरत अथवा प्रभु में अपना ध्यान लगाये तो शीघ्र ही संसार रूपी सागर से पार हो जायेगा अर्थात् सांसारिक विषय-वासनाओं से उसे छुटकारा मिल जायेगा।

साधु सन्त एवं महन्तों की मण्डली पुकार-पुकार कर कह रही है कि मानव जीवन चार दिनों का मेला है। अत: हे मानव! तू श्रीकृष्ण का आश्रय ग्रहण कर ले, इसी में तेरा हित है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राजस्थानी एवं ब्रजभाषा का प्रयोग है।
  2. उपमा, रूपक एवं पुनरुक्ति अलंकार हैं।
  3. शब्द गुण माधुर्य से परिपूर्ण है।
  4. शान्त-रस का प्रयोग है।
  5. कवयित्री ने जीवन को क्षण-भंगुर बताया है।

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[3] मन रे परसि हरि के चरन।
सुभग शीतल कमल कोमल, त्रिविध ज्वाला हरन।।
जे चरन प्रह्वाद परसे, इन्द्र पदवी धरन।
जिन चरन ध्रुव अटल कीन्हों, राखि अपने सरन।।
जिन चरन ब्रह्माण्ड भेट्यो, नख सिखौ श्री भरन।
जिन चरन प्रभु परसि लीने, तरी गौतम धरन।।
जिन चरन कालीहि नाश्यो, गोप लीला करन।
जिन चरन धारयो गोवर्धन, गरब मघवा हरन।।
‘दास मीरा’ लाल गिरधर, अगम तारन तरन।

शब्दार्थ :
परसि = स्पर्श, छूना; हरि = भगवान; चरण = चरन, पग; सुभग = सुन्दर; शीतल = ठण्डा; त्रिविध ज्वाला = तीन प्रकार के ताप दैहिक, दैविक, भौतिक; हरन = नष्ट करना; ध्रुव = एक तारा; सरन = शरण; भेट्यो = भेंट करना; नख सिखौ = सिर से पाँव तक; तरी = तारना, मुक्त करना; धरन = स्त्री, पत्नी; कालीहि = कालिया नाग का; नाश्यो = नष्ट करना; गोप = ग्वाल; धारयो = धारण करना; गरब : गर्व, घमण्ड, अभिमान; मघवा = इन्द्र; हरन = हर लेना, छीन लेना; अगम = कठिन, जहाँ पहुँचा न जा सके।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद में मीरा उद्धार करने वाले प्रभु के चरणों में आश्रय लेने के लिए अपने मन को सम्बोधित करती हुई कह रही हैं।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं, हे मन! तू भगवान श्रीकृष्ण के कमल के समान कोमल, सुन्दर एवं शीतल चरणों का स्पर्श कर। ईश्वर के चरणों का स्पर्श तीनों प्रकार के तापों की अग्नि को शान्त करने वाला है (तीन प्रकार के ताप दैहिक, दैविक एवं भौतिक)। जिन भगवान के चरण कमलों के द्वारा प्रह्लाद का उद्धार हुआ, इन्द्र के पद को धारण किया।

जिन चरणों ने अपना आश्रय लेने वाले ध्रुव को अटल एवं अमर पद प्रदान किया। भगवान के चरणों ने समस्त भू-मण्डल को माप लिया तथा सिर से लेकर पाँव तक जिन चरणों का स्पर्श करके गौतम की पत्नी अहिल्या का उद्धार हो गया। ग्वाल लीला करते समय जिन चरणों ने विषधर काली नाग का नाश किया, जिन चरणों ने इन्द्र का गर्व नष्ट करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उँगली पर धारण किया। मीराबाई कहती हैं कि मैं तो श्रीकृष्ण की दासी हूँ जो कि कठिन से कठिन कार्य अथवा घोर पापों का भी उद्धार करने वाले हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ब्रजभाषा है, पद गेय एवं लालित्यपूर्ण हैं।
  2. अनुप्रास तथा उपमा अलंकार हैं।
  3. गुण-माधुर्य।
  4. शान्त रस है।

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