MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

गुरुत्वाकर्षण अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 8.1.
निम्नलिखित के उत्तर दीजिए:
(a) आप किसी आवेश का वैद्युत बलों से परिरक्षण उस आवेश को किसी खोखले चालक के भीतर रखकर कर सकते हैं। क्या आप किसी पिंड का परिरक्षण, निकट में रखे पदार्थ के गुरुत्वीय प्रभाव से, उसे खोखले गोले में रखकर अथवा किसी अन्य साधनों द्वारा कर सकते हैं?

(b) पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाले छोटे अन्तरिक्षयान में बैठा कोई अन्तरिक्ष यात्री गुरुत्व बल का संसूचन नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाला अन्तरिक्ष स्टेशन आकार में बड़ा है, तब क्या वह गुरुत्व बल के संसूचन की आशा कर सकता है?

(c) यदि आप पृथ्वी पर सूर्य के कारण गुरुत्वीय बल की तुलना पृथ्वी पर चन्द्रमा के कारण गुरुत्व बल से करें, तो आप यह पाएँगे कि सूर्य का खिंचाव चन्द्रमा के खिंचाव की तुलना में अधिक है (इसकी जाँच आप स्वयं आगामी अभ्यासों में दिए गए आँकड़ों की सहायता से कर सकते हैं।) तथापि चन्द्रमा के खिंचाव का ज्वारीय प्रभाव सूर्य के ज्वारीय प्रभाव से अधिक है। क्यों?
उत्तर:
(a) नहीं।
(b) हाँ, यदि अंतरिक्ष यान का आकार उसके लिए इतना अधिक हो कि वह गुरुत्वीय त्वरण (g) के परिवर्तन का संसूचण कर सके।
(c) ज्वारीय प्रभाव दूरी के घन के व्युत्क्रमानुपाती होता है तथा इस अर्थ में यह उन बलों से भिन्न है जो दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 8.2.
सही विकल्प का चयन कीजिए:

  1. बढ़ती तुंगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता
  2. बढ़ती गहराई के साथ (पृथ्वी को एकसमान घनत्व को गोला मानकर) गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है।
  3. गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान/पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।
  4. पृथ्वी के केन्द्र से r 2 तथा r 1 दूरियों के दो बिन्दुओं के बीच स्थितिज ऊर्जा – अन्तर के लिए सूत्र – GMm (1/r2 – 1/r2 ) सूत्र mg(r2 – r1 ) से अधिक/कम यथार्थ है।

उत्तर:

  1. घटता है।
  2. घटता है।
  3. पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
  4. अधिक।

प्रश्न 8.3.
मान लीजिए एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के परितः पृथ्वी की तुलना में दो गुनी चाल से गति करता है, तब पृथ्वी की कक्षा की तुलना में इसका कक्षीय आमाप क्या है?
उत्तर:
माना कक्षीय आमाप क्रमशः TE व Tp हैं।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 1
अर्थात् ग्रह का आमाप पृथ्वी से 0.63 गुना छोटा है।

प्रश्न 8.4.
बृहस्पति के एक उपग्रह, आयो (lo), की कक्षीय अवधि 1.769 दिन तथा कक्षा की त्रिज्या 4.22 x 108 m है। यह दर्शाइए कि बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।
उत्तर:
दिया है –
सूर्य का द्रव्यमान = Ms = 2 x 1030 kg
बृहस्पति के उपग्रह का आवर्त काल = T = 1.769 दिन
= 1.769 × 24 × 3600s
= 15.2841 × 104s बृहस्पति के चारों ओर उपग्रह की त्रिज्या
= r = 4.22 × 108m
G = 6.67 × 10-11 Nm2kg-2
माना बृहस्पति का द्रव्यमान MJ, है।
MJ = \(\frac{1}{1000}\) Ms सिद्ध करने के लिए
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 2
अतः बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग (1/1000) गुना है।

प्रश्न 8.5.
मान लीजिए कि हमारी आकाशगंगा में एक सौर द्रव्यमान के 2.5 x 1011 तारे हैं। मंदाकिनीय केन्द्र से 50,000 1y दूरी पर स्थित कोई तारा अपनी एक परिक्रमा पूरी करने में कितना समय लेगा? आकाशगंगा का व्यास 105 ly लीजिए।
उत्तर:
एक सौर द्रव्यमान = 2 × 1030kg
एक प्रकाश वर्ष = 9.46 × 1015 m
माना M = आकाश गंगा में तारे का द्रव्यमान
= 2.5 × 1011 × 2 × 1030kg
= 5 × 1041kg
तारे की कक्षा की त्रिज्या = r = मंदाकिनी के केन्द्र से तारे की दूरी
= 50,000 प्रकाश वर्ष
= 50,000 × 9.46 × 1015m
G = 6.67 × 10-11Nm2kg-2
एक आवृत्ति काल = T
आकाशगंगा का व्यास = 105 प्रकाश वर्ष
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 3
= 3.55 × 108 yrs.

प्रश्न 8.6.
सही विकल्प का चयन कीजिए:

  1. यदि स्थितिज ऊर्जा का शून्य अनन्त पर है,तो कक्षा में परिक्रमा करते किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक है।
  2. कक्षा में परिक्रमा करने वाले किसी उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान ऊँचाई (जितनी उपग्रह की है) के किसी स्थिर पिंड को पृथ्वी के प्रभाव से बाहर प्रक्षेपित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा से अधिक/कम होती है।

उत्तर:

  1. गतिज ऊर्जा
  2. कम होती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 8.7.
क्या किसी पिंड की पृथ्वी से पलायन चाल –

  1. पिंड के द्रव्यमान
  2. प्रक्षेपण बिन्दु की अवस्थिति
  3. प्रक्षेपण की दिशा
  4. पिंड के प्रमोचन की अवस्थिति की ऊँचाई पर निर्भर करती है।

उत्तर:

  1. नहीं
  2. नहीं
  3. नहीं
  4. हाँ।

प्रश्न 8.8.
कोई धूमकेत सूर्य की परिक्रमा अत्यधिक दीर्घवृत्तीय कक्षा में कर रहा है। क्या अपनी कक्षा में धूमकेतु की शुरू से अन्त तक –

  1. रैखिक चाल
  2. कोणीय चाल
  3. कोणीय संवेग
  4. गतिज ऊर्जा
  5. स्थितिज ऊर्जा
  6. कुल ऊर्जा नियत रहती है। सूर्य के अति निकट आने पर धूमकेतु के द्रव्यमान में हास को नगण्य मानिये।

उत्तर:

  1. नहीं
  2. नहीं
  3. हाँ
  4. नहीं
  5. नहीं
  6. हाँ।

MP Board Solutions

प्रश्न 8.9.
निम्नलिखित में से कौन से लक्षण अन्तरिक्ष में अन्तरिक्ष यात्री के लिए दुःखदायी हो सकते हैं?
(a) पैरों में सूजन
(b) चेहरे पर सूजन
(c) सिरदर्द
(d) दिक्विन्यास समस्या।
उत्तर:
(b), (c) व (d):

प्रश्न 8.10.
एक समान द्रव्यमान घनत्व की अर्धगोलीय खोलों द्वारा परिभाषित ढोल के पृष्ठ के केन्द्र पर गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा [देखिए चित्र]

  1. a
  2. b
  3. c
  4. 0 में किस तीर द्वारा दर्शायी जाएगी?

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 4
उत्तर:
गोलों को पूरा करने पर, केन्द्र C पर नेट तीव्रता शून्य होगी। इसका तात्पर्य है कि केन्द्र C पर दोनों अर्धगोलों के कारण तीव्रताएँ परस्पर विपरीत व बराबर होंगी। अर्थात् दिशा (iii)C द्वारा व्यक्त होगी।

प्रश्न 8.11.
उपरोक्त समस्या में किसी यादृच्छिक बिन्दु P पर गुरुत्वीय तीव्रता किस तीर –

  1. d
  2. e
  3. f
  4. g द्वारा व्यक्त की जाएगी?

उत्तर:
2. (e) द्वारा व्यक्त होगी।

प्रश्न 8.12.
पृथ्वी से किसी रॉकेट को सूर्य की ओर दागा गया है। पृथ्वी के केन्द्र से किस दूरी पर रॉकेट पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है? सूर्य का द्रव्यमान = 2 × 1030 kg, पृथ्वी का द्रव्यमान = 6 x 1024 kg। अन्य ग्रहों आदि के प्रभावों की उपेक्षा कीजिए (कक्षीय त्रिज्या = 1.5 × 1011 m)
उत्तर:
माना पृथ्वी के केन्द्र से r दूरी पर सूर्य व पृथ्वी के कारण गुरुत्वाकर्षण बल बिन्दु P पर है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 5
अतः रॉकेट पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है।
माना सूर्य से पृथ्वी से बीच की दूरी = पृथ्वी की त्रिज्या
सूर्य का द्रव्यमान, Ms = 2 × 1030 किग्रा
पृथ्वी का द्रव्यमान Me = 6 × 1024 किग्रा
x = 1.5 × 1011मीटर
माना रॉकेट का द्रव्यमान m है।
बिन्दु P पर, सूर्य व रॉकेट के मध्य गुरुत्वाकर्षण बल = पृथ्वी व रॉकेट के मध्य गुरुत्वाकर्षण बल।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 6
या = 2.6 x 108 m पृथ्वी से

प्रश्न 8.13.
आप सूर्य को कैसे तोलेंगे, अर्थात् उसके द्रव्यमान का आंकलन कैसे करेंगे? सूर्य के परितः पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिज्या 15 x 108 km है।
उत्तर:
हम जानते हैं कि पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर 1.5 1011 मीटर त्रिज्या की कक्षा में घूमती है। पृथ्वी एक चक्कर 365 दिनों में पूरा करती है।
दिया है : पृथ्वी की त्रिज्या = R = 1.5 × 1011मीटर
सूर्य के चारों ओर पृथ्वी और पृथ्वी का आवर्तकाल, T = 365 दिन = 365 × 24 × 60 × 60 से०,
G = 6.67 × 1011 न्यूटन – मीटर2 प्रति किग्रा2
जहाँ M = सूर्य का द्रव्यमान है = ?
हम जानते हैं कि
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 7
जहाँ. Ms = सूर्य का द्रव्यमान है।

प्रश्न 8.14.
एक शनि वर्ष एक पृथ्वी – वर्ष का 29.5 गुना है। यदि पृथ्वी सूर्य से 15 × 108 km दूरी पर है, तो शनि सूर्य से कितनी दूरी पर है?
उत्तर:
केप्लर के नियम से,
i.e., T2 ∞ R3
∴शनि के लिए T2s ∝ R3s
समी० (i) को (ii) से भाग देने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 8
दिया है:
Ts = 29.5Te या \(\frac { T_{ s } }{ T_{ e } } \) = 29.5
सूर्य से पृथ्वी की दूरी = Re = 1.5 × 108 km
सूर्य से शनि की दूरी = Rs
∴ समी० (iii) व (iv) से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 9
= 1.43 × 109 किमी

प्रश्न 8.15.
पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 63N है। पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊँचाई पर पृथ्वी के कारण इस वस्तु पर गुरुत्वीय बल कितना है?
उत्तर:
पृथ्वी के पृष्ठ से ऊँचाई = h = \(\frac{R}{2}\)
जहाँ R = पृथ्वी की त्रिज्या है।
हम जानते हैं कि gh = g (1 + \(\frac{h}{R}\))2
दिया है: h = \(\frac{R}{2}\)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 10
माना m = वस्तु का द्रव्यमान है
माना पृथ्वी के पृष्ठ व hऊँचाई पर भार क्रमश: W व Wh हैं।
अतः w = mg = 63 N दिया है।
तथा
Wh = mgh
= m × \(\frac{4}{9}\)g = \(\frac{4}{9}\)mg
= \(\frac{4}{9}\) × 63 = 28N
∴Wh = 28N

प्रश्न 8.16.
यह मानते हुए कि पृथ्वी एकसमान घनत्व का एक गोला है तथा इसके पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 250 N है, यह ज्ञात कीजिए कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर आधी दूरी पर इस वस्तु का भार क्या होगा?
उत्तर:
माना कि पृथ्वी के पृष्ठ तथा पृथ्वी के पृष्ठ से d दूरी पर गुरुत्व के कारण त्वरण क्रमशः g व gd हैं।
माना कि पृथ्वी के पृष्ठ तथा पृथ्वी के पृष्ठ से d दूरी पर भार क्रमश: W व Wd है।
∴W = mg = 250 N … (i)
तथा Wd = mgd …. (ii)
हम जानते हैं कि gd = g (1 – \(\frac{d}{R}\)) … (iii)
दिया है: d = \(\frac{R}{2}\)
जहाँ R = पृथ्वी की त्रिज्या … (iv)
∴समी० (iii) व (iv) से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 11
∴पृथ्वी के केन्द्र से आधी दूरी पर वस्तु पर वस्तु का भार
= 125 N

प्रश्न 8.17.
पृथ्वी के पृष्ठ से ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर कोई रॉकेट 5 kms-1 की चाल से दागा जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट पृथ्वी से कितनी दूरी तक जाएगा? पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0 × 1024 kg पृथ्वी की माध्य त्रिज्या = 6.4 x 106 m तथा
G = 6.67 x 10-11 Nm2kg-22
उत्तर:
माना रॉकेट की प्रारम्भिक चाल v है रॉकेट की पृथ्वी से h ऊँचाई पर वेग शून्य है।
माना रॉकेट का द्रव्यमान m है तथा पृथ्वी के पृष्ठ पर इसकी सम्पूर्ण ऊर्जा .
K.E. + P.E. = \(\frac{1}{2}\)mv2 – \(\frac{GMm}{R}\)
जहाँ M = पृथ्वी का द्रव्यमान
R = पृथ्वी की त्रिज्या
G = सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक उच्चतम बिन्दु पर K.E. =0
तथा P.E = \(\frac{- GMm}{R + h}\)
h ऊँचाई पर रॉकेट की सम्पूर्ण ऊर्जा
= K.E. + P.E. = 0 + P.E. = P.E.
= \(\frac { GM_{ m } }{ R+h } \)
ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 12
दिया है:
v = 5 kms-1 = 5000 ms-1
दिया है: R = 6.4 x 106 m
समी० (iv) में दिया मान रखने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 13
∴पृथ्वी के केन्द्र से दूरी
= R + h = 6.4 x 106 + 1.6 x 106
= 8.0 x 106 मीटर।

MP Board Solutions

प्रश्न 8.18.
पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी प्रक्षेप्य की पलायन चाल 11.2 kms-1 है। किसी वस्तु को इस चाल की तीन गुनी चाल से प्रक्षेपित किया जाता है। पृथ्वीसे अत्यधिक दूर जाने पर इस वस्तु की चाल क्या होगी? सूर्य तथा अन्य ग्रहों की उपस्थिति की उपेक्षा कीजिए।
उत्तर:
माना वस्तु की प्रारम्भिक व अन्तिम चाल v व v है।
माना वस्तु का द्रव्यमान m है।
वस्तु की प्रारम्भिक गतिज ऊर्जा
= \(\frac{1}{2}\) mv2
वस्तु की स्थितिज ऊर्जा (पृथ्वी की सतह पर)
= \(\frac{-GMm}{R}\)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 14
जहाँ M व R क्रमशः पृथ्वी के द्रव्यमान व त्रिज्या हैं। वस्तु की अन्तिम स्थितिज ऊर्जा (अनन्त पर) = 0
वस्तु की अन्तिम गतिज ऊर्जा (अनन्त पर) = \(\frac{1}{2}\) mv2
ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
प्रा० गतिज ऊर्जा + प्रा० PE = अन्तिम (KE + PE)
या \(\frac{1}{2}\) mv2 – \(\frac{GMm}{R}\) = \(\frac{1}{2}\) mv2 + 0
या \(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{2}\)mv2 – \(\frac{-GMm}{R}\)
Also Let ve = escape velocity
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 15
= 31.7 kms-1

प्रश्न 8.19.
कोई उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से 400 km ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। इस उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने में कितनी ऊर्जा खर्च होगी? उपग्रह का द्रव्यमान = 200 kg; पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0 × 1024 kg; पृथ्वी की त्रिज्या = 6.4 x 106m तथा G = 6.67 x 10-11 Nm2kg-2
उत्तर:
माना पृथ्वी का द्रव्यमान व त्रिज्या क्रमश: M व R
माना पृथ्वी पृष्ठ से Lऊँचाई पर उपग्रह का द्रव्यमान है।
h ऊँचाई पर कक्ष में वेग = कक्षीय वेग = y
कक्ष में उपग्रह की KE = \(\frac{1}{2}\) mv2 ऊँचाई पर उपग्रह की स्थितिज ऊर्जा
= \(\frac { GM_{ m } }{ R+h } \)
अतः चक्रण करते उपग्रह की सम्पूर्ण ऊर्जा (KE + PE)
= \(\frac{1}{2}\) mv2 – \(\frac { GM_{ m } }{ R+h } \)
= \(\frac{1}{2}\) m (\(\frac{GM}{R + h}\))
(∴h ऊँचाई पर कक्षीय वेग = \(\sqrt { \frac { GM }{ R+h } } \))
= – \(\frac{1}{2}\) \(\frac{GMm}{R + h}\)
उपग्रह को पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण से बाहर भेजने के लिए इसकी गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा शून्य होगी तथा इसकी गतिज ऊर्जा भी शून्य होगी।
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर भेजने पर उपग्रह की अन्तिम ऊर्जा = 0
Rऊँचाई पर चक्रण करती वस्तु की ऊर्जा + दी गई ऊर्जा = 0 (ऊर्जा संरक्षण के नियम से)
उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर भेजने के लिए दी गई ऊर्जा
= E = – चक्रण करते उपग्रह की ऊर्जा
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 16
दिया है h = 400 km
= 400 × 103 m, R = 6400 × 103m,
G = 6.67 × 1024 Nm2kg-2
M = 6 × 1024 kg. m = 200 kg
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 17
= 5.885 × 109J

प्रश्न 8.20.
दो तारे, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान (2 × 1030 kg) के बराबर है, एक दूसरे की ओर सम्मुख टक्कर के लिए आ रहे हैं। जब वे 109 km की दूरी पर हैं तब इनकी चाल उपेक्षणीय है। ये तारे किस चाल से टकराएंगे? प्रत्येक तारे की त्रिज्या 104 km है। यह मानिए कि टकराने के पूर्व तक तारों में कोई विरूपण नहीं होता (G के ज्ञात मान का उपयोग कीजिए)।
उत्तर:
दिया है: प्रत्येक तारे का द्रव्यमान
M = 2 × 1030 किग्रा
दोनों तारों के मध्य प्रा० दूरी,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 18
r = 109 किमी = 1012 मीटर
प्रत्येक तारे का आकार = त्रिज्या
= r = 104 किमी = 107 मीटर
माना दोनों तारे एक दूसरे से टकराते हैं। माना दोनों तारे की प्रा० चाल u है।
r दूरी पर रखे एक तारे की दूसरे के सापेक्ष स्थितिज ऊर्जा
PE = \(-\frac { Gm_{ 1 }m_{ 2 } }{ r } \) = – \(\frac { GM_{ m } }{ r } \)
7 दूरी पर KE = 0 [∴u = 0]
सम्पूर्ण प्रा० ऊर्जा
KE + PE = 0 – \(\frac { GM^{ 2 } }{ r } \) = \(\frac { – GM^{ 2 } }{ r } \) … (i)
माना दोनों तारों के केन्द्र ।’ दूरी पर जब दोनों तारे एकदम टकराने वाले होते हैं = 2R
संघट्ट के बाद दोनों तारों की KE
= \(\frac{1}{2}\) Mv2 + \(\frac{1}{2}\) Mv2
= Mv2
संघट्ट के समय दोनों तारों की
PE = \([latex]\frac { -GMM }{ r^{ ‘ } } \) = \(\frac { -GM^{ 2 } }{ 2R } \)
ऊर्जा संरक्षण के नियम से
सम्पूर्ण प्रा० ऊर्जा = अन्तिम (ICE + IPE) या
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 19

प्रश्न 8.21.
दो भारी गोले जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 100 kg, त्रिज्या 0.10 m है किसी क्षैतिज मेज पर एक दूसरे से 1.0 m दूरी पर स्थित हैं। दोनों गोलों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिन्दु पर गुरुत्वीय बल तथा विभव क्या है? क्या इस बिन्दु पर रखा कोई पिंड संतुलन में होगा? यदि हाँ, तो यह सन्तुलन स्थायी होगा अथवा अस्थायी?
उत्तर:
माना दोनों गोले क्रमश: A व B बिन्दु पर रखे गए हैं। दोनों गोलों के बीच की दूरी = r = AB = 1 मीटर
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 20
AB का मध्य बिन्दु 0 = AB × \(\frac{1}{2}\)
= \(\frac{1}{2}\) × 1m = 0.5m
AO = OB
= \(\frac{1}{2}\) × 1m = 0.5m
प्रत्येक गोले का द्रव्यमान = M = 100 kg
माना कि 0 बिन्दु पर रखी प्रत्येक वस्तु का द्रव्यमान = m हम जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण बल,
F = \(\frac { GMm }{ d^{ 2 } } \)
माना A व b के कारण 0 पर बल क्रमश: FA व FB हैं। अतः
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 21
ये दोनों विपरीत दिशा में लगते हैं।
अतः 0 पर परिणामी बल = 0
इसका तात्पर्य यह है कि बिन्दु पर रखी वस्तु पर कोई बल नहीं लगता है। अतः यह वस्तु सन्तुलन में है। लेकिन यह सन्तुलन अस्थिर है चूँकि A व B में सूक्ष्म विस्थापन से भी सन्तुलन बदला जाता है।
पुनः हम जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण विभव,
= \(-\frac { GM }{ d } \)
माना A व B बिन्दुओं पर रखे गोलों पर 0 के कारण गुरुत्वाकर्षण विभव क्रमश: VA व VB है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 22
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 22a

अतः मध्यबिन्दु पर रखी वस्तु अस्थिर सन्तुलन में होती है।

गुरुत्वाकर्षण अतिरिक्त अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 8.22.
जैसा कि आपने इस अध्याय में सीखा है कि कोई तुल्यकाली उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से लगभग 36,000 km ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस उपग्रह के निर्धारित स्थल पर पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण विभव क्या है? (अनन्त पर स्थितिज ऊर्जा शुन्य लीजिए।) पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0 × 1024 k; पृथ्वी की त्रिज्या = 6400 km.
उत्तर:
दिया है: ME = 6 × 1024 किग्रा
RE = 6400 किमी = 6.4 x 106 मीटर
हम जानते हैं कि गुरुत्वीय विभव
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 23
= – 9.4 x 106 जूल प्रति किग्रा

MP Board Solutions

प्रश्न 8.23.
सूर्य के द्रव्यमान से 2.5 गुने द्रव्यमान का कोई तारा 12 km आमाप से निपात होकर 1.2 परिक्रमण प्रति सेकण्ड से घूर्णन कर रहा है। (इसी प्रकार के संहत तारे को न्यूट्रॉन तारा कहते हैं कुछ प्रेक्षित तारकीय पिंड, जिन्हें पल्सार कहते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं।) इसके विषुवत् वृत्त पर रखा कोई पिंड, गुरुत्व बल के कारण, क्या इसके पृष्ठ से चिपका रहेगा? (सूर्य का द्रव्यमान = 2 x 1030 kg)
उत्तर:
तारे से चिपके तारकीय पिंड के लिए, तीर का गुरुत्वाकर्षण बल अभिकेन्द्र बल के बराबर या अधिक होगा। इस दशा में अभिकेन्द्र बल, गुरुत्वाकर्षण बल से अधिक नहीं होगा तथा पिंड नहीं उड़ेगा।
mg ≥ m \(\frac { v^{ 2 } }{ r } \)
या
g > \(\frac { v^{ 2 } }{ r } \)
या g ≥ ac
जहाँ ac = \(\frac { v^{ 2 } }{ r } \) अभिकेन्द्रीय त्वरण
अतः तारे से तारकीय पिंड से चिपकने के लिये, गुरुत्व के कारण तारे पर त्वरण 2 अभिकेन्द्रीय त्वरण
दिया है:
r = 12 km = 12 x 103 m
आवृत्ति v = 1.5 rps
w = 2πv = 21 x 1.5 = 3π rads-1 अभिकेन्द्रीय त्वरण,
ac = \(\frac { v^{ 2 } }{ r } \) = rω2
= 12 × 103 × (3π)2
= 12 × 103 × 9 × 9.87
= 1065.96 × 103 ms-2
= 1.1 × 106

पुनः हम जानते हैं कि तारे पर गुरुत्व के कारण त्वरण निम्नवत् है –
g = \(\frac { GM }{ r^{ 2 } } \)
दिया है: M = सूर्य के द्वयमान का 2.5 गुना
= 2.5 × 2 × 1030 kg
(∴ सूर्य के द्वयमान = 2 × 1030 kg
= 5 × 1030
r = 12km
G = 6.67 × 10-11 Nm2 kg-2
g = \(\frac { 6.67\times 10^{ -11 }\times 5\times 10^{ 30 } }{ (12000)^{ 2 } } \)
= 0.2316 × 1013 ms-2
= 23.16 × 1011 ms-2
= 2.3 × 1012 ms-2
समीकरण (i)  व  (iv) से
अतः पिंड तारे से चिपका रहेगा। … (iv)

प्रश्न 8.24.
कोई अन्तरिक्षयान मंगल पर ठहरा हुआ है। इस अन्तरिक्षयान पर कितनी ऊर्जा खर्च की जाए कि इसे सौरमण्डल से बाहर धकेला जा सके। अन्तरिक्षयान का द्रव्यमान = 1000 kg; सूर्य का द्रव्यमान = 2 x 1030 मंगल का द्रव्यमान = 6.4 x 1023 kg; मंगल की त्रिज्या = 3395 km; मंगल की कक्षा की त्रिज्या = 2.28 x 108 km तथा G = 6.67 x 10-11 Nm2kg-2
उत्तर:
G = 6.67 x 10-11 Nm2 kg-2
माना कि सूर्य के सापेक्ष मंगल का द्रव्यमान व त्रिज्या क्रमश: M व R है।
दिया है: सूर्य का द्रव्यमान M = 2 x 1030 kg
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 26
व्यक्ति की सूर्य के चारों ओर त्रिज्या,
= R = 2.28 x 108 km
मंगल की त्रिज्या = R’ = 3395 km
मंगल का द्रव्यमान = M’ = 6.4 x 1023 kg
सौरमण्डल का द्रव्यमान m = 1000 किग्रा
सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण अन्तरिक्षयान की स्थितिज ऊर्जा
= \(\frac{-GMm}{R}\)
मंगल के गुरुत्वाकर्षण के कारण सौरमण्डल की स्थितिज ऊर्जा
= \(\frac { -GM^{ ‘ }m }{ R^{ ‘ } } \)
मंगल के पृष्ठ पर अन्तरिक्षयान की सम्पूर्ण स्थितिज ऊर्जा
= \(\frac{-GMm}{R}\) – \(\frac{-GMm}{R}\)
चूँकि अन्तरिक्षयान की KE शून्य है
∴अन्तरिक्षयान की सम्पूर्ण ऊर्जा
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 27
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 27a

अन्तरिक्षयान को सौरमण्डल से बाहर करने के लिए, इसकी गतिज ऊर्जा इतनी बढ़ानी चाहिए जिससे इस ऊर्जा का मान, मंगल के पृष्ठ पर ऊर्जा के समान हो जाए।
अभीष्ट ऊर्जा = — (अन्तरिक्षयान की सम्पूर्ण ऊर्जा)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 28

प्रश्न 8.25.
किसी रॉकेट को मंगल के पृष्ठ से 2 kms-1 की चाल से ऊर्ध्वाधर ऊपर दागा जाता है। यदि मंगल के वातावरणीय प्रतिरोध के कारण इसकी 20% आरंभिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है, तो मंगल के पृष्ठ पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट मंगल से कितनी दूरी तक जाएगा? मंगल का द्रव्यमान = 6.4 x 1023 kg; मंगल की त्रिज्या = 3395 km तथा G = 6.67 x 10-11 Nm2kg-2
उत्तर:
माना रॉकेट का द्रव्यमान m है।
दिया है:
मंगल का द्रव्यमान, M = 6.4 x 1023 किग्रा
मंगल की त्रिज्या, R = 3395 किमी
गुरुत्वाकर्षण नियतांक G = 6.67 x 10-11 न्यूटन – मीटर2 प्रति किग्रा2
माना कि रॉकेट मंगल से h ऊँचाई तक पहुँचता है।
माना कि मंगल के पृष्ठ से रॉकेट को प्रारम्भिक चाल v से छोड़ा जाता है।
रॉकेट की प्रारम्भिक गतिज ऊर्जा = \(\frac{1}{2}\) mv2
व रॉकेट की प्रारम्भिक स्थितिज ऊर्जा = \(\frac { -GMm }{ R } \)
रॉकेट की सम्पूर्ण प्रा० ऊर्जा = K.E. + P.E.
= \(\frac{1}{2}\) mv2 – \(\frac { -GMm }{ R } \)
चूँकि h ऊँचाई पर 20% ऊर्जा नष्ट हो जाती है जबकि 80% ऊर्जा संचित रहती है।
संचित ऊर्जा = \(\frac{80}{100}\) x \(\frac{1}{2}\)mv2
सम्पूर्ण उपलब्ध प्रा० ऊर्जा,
= \(\frac{4}{5}\)\(\frac{1}{2}\)mv2 – \(\frac { -GMm }{ R } \)
= 0.4 mv2 – \(\frac { -GMm }{ R + h} \)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण img 29

MP Board Class 11th Physics Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 12 बिहारी के दोहे

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 12 बिहारी के दोहे (कविता, बिहारी)

बिहारी के दोहे पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

बिहारी के दोहेलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सर्प, मोर, हिरण और सिंह कहाँ एक साथ रहते हैं?
उत्तर:
सर्प, मोर, हिरण और सिंह एक साथ तपोवन में रहते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
किस तिथि को सूर्य और चन्द्र एक साथ होते हैं?
उत्तर:
अमावस्या तिथि को सूर्य और चन्द्र एक साथ होते हैं।

प्रश्न 3.
पाप का बोध किसको अधिक होता है?
उत्तर:
पाप का बोध शक्तिहीन को अधिक होता है।

बिहारी के दोहे दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बाज के माध्यम से कवि ने किसके आचरण को लक्षित किया है, और क्यों?
उत्तर:
बाज के माध्यम से कवि ने अपने आश्रयदाता महाराजा जयसिंह के आचरण । को लक्षित किया है कि उन्हें औरंगजेब के इशारे पर महाराजा शिवाजी पर आक्रमण नहीं करना चाहिए। यह इसलिए कि इसमें उनका अपना कोई लाभ नहीं है। दूसरी बात यह कि एक हिन्दू राजा द्वारा दूसरे हिन्दू राजा पर आक्रमण करना भी सजातीयता के बिल्कुल विपरीत और अनुचित है।

प्रश्न 2.
सज्जन के प्रेम की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
सज्जन के प्रेम की कई विशेषताएँ हैं –

  1. वह सदैव बना रहता है।
  2. वह अपने प्रेमी के बुरे दिन आने पर भी उसके प्रति पहले की तरह ही प्रेम करता है।
  3. वह लाभ-हानि की चिन्ता नहीं करता है।
  4. वह शुद्ध और अच्छे भावों से भरा होता है।
  5. वह चोल के रंग के समान जीवन भर प्रेम का निर्वाह करता रहता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
मित्रता सदैव चलती रहे, इस हेतु क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
उत्तर:
मित्रता सदैव चलती रहे, इस हेतु निम्नलिखित सावधानी बरतनी चाहिए –

  1. अपने हृदय को शुद्ध और खुला रखना चाहिए।
  2. लाभ-हानि का ध्यान नहीं देना चाहिए।
  3. संकट के समय भी मित्रता की भावना को फीका नहीं पड़ने देना चाहिए।
  4. किसी प्रकार के अहंकार के ताप से मित्रता को मुरझाने से बचाना चाहिए।
  5. मित्रता को एक आदर्श के रूप में बनाए रखने की भावना सदैव रखनी चाहिए।

प्रश्न 4.
श्रीकृष्ण की वंशी इन्द्रधनुष के समान क्यों लगती है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण की वंशी इन्द्रधनुप के समान लगती है। यह इसलिए कि श्रीकृष्ण के ओठों का रंग लाल है, आँखों का रंग सफेद और काला है, और उनका वस्त्र पीला है। इन सबके प्रभाव से हरे रंग वाली वंशी रंग का इन्द्रधनुष के समान हो उटना स्वाभाविक ही लगता है।

बिहारी के दोहे भाव विस्तार/पल्लवन

प्रश्न.

  1. बढ़त-बढ़त सम्पति, सलिलु, मन सरोज बढ़ि जाइ।
  2. दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यों न बढ़े दुःख-दंदु!
  3. बैठि रही अति सघन वन, पैठि सदन-तन माँहि।
    देखि दुपहरी जेठ की, छाँही चाहति छाँह।

उत्तर:

1. जिस प्रकार पानी के हमेशा बढ़ते रहने पर कमल की नाल भी हमेशा बढ़ती रहती है, पानी के घटने पर वह नाल घटती तो नहीं, लेकिन कुम्हलाकर नष्ट हो जाती है। टीक इसी प्रकार जब किसी व्यक्ति की सम्पत्ति बढ़ती रहती है, तो उसके मन में अनेक प्रकार की इच्छाएँ जोर मारने लगती हैं, लेकिन जब उसकी सम्पत्ति घटने लगती है, तो केवल घटती ही नहीं, बल्कि मूलधन सहित वह नष्ट हो जाती है, अर्थात् उस व्यक्ति के पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता है।

2. दो राजाओं के राज्य में, अर्थात् जिस राज्य के एक ही समय में दो राजा हों, उस राज्य की प्रजा को अनेक प्रकार के दुःख झेलने पड़ते हैं। कहने का भाव यह है कि सबल और शक्तिसम्पन्न लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए निर्बलों के सुख-दुःख को बिल्कुल ही भूल जाते हैं। शक्ति-सम्पन्न लोग अपनी शक्ति के प्रदर्शन अपने बराबर वालों से जहाँ करते हैं, वहाँ तक तो वे प्रशंसनीय हैं। लेकिन उनके इस शक्ति के प्रदर्शन से आम जनता को जो कष्ट होता है, वह निश्चय ही निन्दनीय है। अतएव अपने सुख-स्वार्थ के लिए हमें दूसरों के हितों को अनदेखा नहीं करना चाहिए।

3. चूँकि गर्मी की ऋतु में भारत में सूर्य की किरणें तिरछी नहीं पड़ती हैं, बल्कि सीधी पड़ती हैं। उस समय सूर्य भूमध्य रेखा पर आ जाता है। उससे भारत के अनेक स्थान तपने लगते हैं। फलस्वरूप गर्मी का प्रकोप बहुत भयंकर हो जाता है। यह जेठ के माह में चरम सीमा पर होता है। यहाँ उपर्युक्त दोहे में जेठ माह की इसी भीषण गर्मी के उल्लेख से उसके असाधारण प्रभाव को बतलाया गया है कि उससे न केवल जीव-जन्तु ही, अपितु पेड़-पौधे भी समाप्त होने लगते हैं। फलस्वरूप कहीं भी किसी की छाया तक भी नहीं दिखाई देती है। इसी दशा से कवि ने यह संभावना व्यक्त करने का प्रयास किया है कि छाया को भी छाया की जरूरत है। इसलिए वह या . तो घने जंगलों में जाकर छिप गई है या घरों के अंदर।

बिहारी के दोहे भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
पदु, दुराज, स्याम, जगत, दीरघ, छाँड़तु, रंग्यौ, मावस, सुम्रत्यौ शब्दों के शुद्ध हिन्दी मानक रूप लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 12 बिहारी के दोहे img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के समास विग्रह कर समास का नाम लिखिए-नीलमणि, सज्जन, दुपहरी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 12 बिहारी के दोहे img-2

बिहारी के दोहे योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
रहीम के तीन नीतिपरक दोहे खोजकर लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
ग्रीष्म की दोपहरी का अनुभव आप अपने शब्दों में लिखिए। कक्षा में बताइए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

प्रश्न 3.
आपने कभी किसी असहाय/निर्धन व्यक्ति की मदद की है, यदि हाँ तो आप उसकी सहायता के अनुभव की चर्चा अपने साथियों से कीजिए तथा ऐसे किसी विषय पर एकांकी को खोजकर उसका अभिनय कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

बिहारी के दोहे परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बिहारी के दोहे लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सर्प, मोर, हिरण और बाघ कब एक साथ रहते हैं?
उत्तर:
सर्प, मोर, हिरण और बाघ उस समय एक साथ रहते हैं जब चारों ओर जानलेवा गर्मी फैल जाती है। उससे सारा संसार एक तपोवन की तरह हो जाता है। उस समय अपनी जान बचाने के लिए सर्प, मोर, हिरण और बाघ परस्पर वैरभाव भूलकर एक साथ रहते हैं।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण की शोभा कब और अधिक बढ़ जाती है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण की शोभा तब और अधिक बढ़ जाती है जब वे पीताम्बर धारण करते हैं।

प्रश्न 3.
दो राजाओं के एक ही राज्य में क्या होता है?
उत्तर:
दो राजाओं के एक ही राज्य में प्रजा को बेहद दुःख होता है।

बिहारी के दोहे दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अधर धरत हरि कै परत, ओठ-दीठि-पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष रंग होति।।
उपर्युक्त दोहे में किन भावों की व्यंजना हुई है।
उत्तर:
उपर्युक्त दोहे में एक गोपी की अपनी एक प्रिय सखी से श्रीकृष्ण के रूप-सौन्दर्य के सम्बन्ध में कही गई बातों की व्यंजना हुई है। वह गोपी अपनी सखी से श्रीकृष्ण की साधारण वंशी की इन्द्रधनुष के रंग का होना कहकर यह व्यंजित करना चाहती है कि यदि वह उनके पास चलेगी, तो उसकी भी सुन्दरता रँगीली हो जाएगी। वह ओठ, आँख और वस्त्र की ज्योति से वंशी को इन्द्रधनुष के समान रंग वाली कहकर श्रीकृष्ण के ओठों की ललाई, आँखों की श्यामलता और वस्त्रों के पीलापन का अधिक चटक और प्रभा देने वाली होना भी व्यंजित करती है।

प्रश्न 2.
कहलाने एक बसत, अहि, मयूर, मृग बाघ।
जगत तपोवन सो कियौ, दीरघ-दाघ-निदाघ।।
उपर्युक्त दोहे का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त दोहे के द्वारा कवि ने यह भाव स्पष्ट करना चाहा है कि चारों ओर बेहद गर्मी पड़ रही है। उसके कारण यह सारा संसार एक तपोवन का रूप ले चुका है। जिस प्रकार तपोवन में हिंसक पशु अपने हिंसक भाव को छोड़कर मित्रभाव से रहने लगते हैं उसी प्रकार साँप, मोर, हिरण और बाघ रह रहे हैं। अर्थात् साँप ने मोर के प्रति और बाघ ने हिरण के प्रति अपने हिंसक भाव का परित्याग कर मित्र-भाव को अपना लिया है।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
‘बिहारी के दोहे’ के केन्द्रीय भाव पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
केन्द्रीय भाव के अन्तर्गत बिहारी ने कृष्ण के स्वरूप का वर्णन उत्प्रेक्षा के माध्यम से किया है। कृष्ण एवं उनकी बाँसुरी का वर्णन करते हुए कवि ने वर्ण परिवर्तन को चमत्कारिक ढंग से प्रस्तुत किया है। प्रकृतिपरक वर्णन में कवि का ग्रीष्म वर्णन महत्त्वपूर्ण है। ग्रीष्म के आतप से तापित वे पशु-पक्षी जो आपस में शत्रुभाव रखते हैं, एक-दूसरे के साथ मित्र-भाव से रह रहे हैं-यह तपोवन के रहवास का गुण है। ज्येष्ठ महीने की इतनी अधिक तपन है कि दोपहर में छाया भी छाया ढूँढ़ती फिरती है। नीतिपरक दोहों में बिहारी ने सज्जनों के अमिट प्रेम का, द्विराज में प्रजा के दुःख-दर्दो का, सम्पत्ति की क्षण-भंगुरता का, मित्र-धर्म की गहनता का, दुर्बल को दबाने वाली शक्तियों का तथा अपने सजातीय बन्धुओं पर अन्यथा प्रेरणा से प्रहार करने की मनाही का वर्णन किया है।

बिहारी के दोहे कवि परिचय

प्रश्न 1.
कविवर बिहारी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
कविवर बिहारी का जन्म ग्वालियर के पास बसुआ गोविन्द पुर गाँव में माना जाता है। इनके जीवन परिचय से संबंधित निम्नलिखित दोहा बहुत प्रसिद्ध है –

‘जनम ग्वालियर जानिए, खंड बुंदेल बाल।
तरुनाई आई सुघर, मथुरा बसि ससुराल।।’

(अर्थात् उनका जन्म ग्वालियर में, बचपन बुंदेलखंड में और युवावस्था ससुराल मथुरा में बीती थी।) उनका जन्म मथुरा के चौबे परिवार में हुआ था। उनके पिता केशवराय थे। वे ग्वालियर छोड़कर ओरछा चले गए थे। वहीं रहकर उन्होंने कवि केशवदास से काव्य-शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने कविवर केशवदास के साहित्य का विस्तृत अध्ययन-मनन किया। इसकी छाप उनके दोहों में दिखाई देती है। इनके जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। वह यह कि वे जिस समय अपनी वृत्ति लेने के लिए जयपुर के राजा के दरबार में गए, उस समय वहाँ के राजा जयसिंह अपनी नई रानी के प्रेम में इतना फँसे हुए थे कि राजकाज देखने के लिए तनिक भी समय नहीं निकाल पाते थे। बिहारी ने उनकी आँखें खोलने के लिए यह दोहा लिखकर भेजा –

“नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल।
अली कली ही सों कस्यो, आगे कौन हवा।।”

इस दोहा का राजा जयसिंह पर जादू-सा असर पड़ा। उन्होंने प्रसन्न होकर बिहारी को इसी प्रकार के सरस दोहे रचने के लिए आदेश दिया। उन्होंने उनके द्वारा रचे गए प्रत्येक दोहे पर एक-एक अशरफी देने का वचन दिया। बिहारी ने ऐसे सात सौ दोहों की रचना की, जो ‘बिहारी सतसई’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनकी मृत्यु 1663 में हुई।

रचना:
बिहारी ने ‘सतसई’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इसमें सात सौ दोहे संकलित हैं।

साहित्य का महत्त्व:
बिहारी रीतिकाल के महाकवि हैं। उनकी रचना ‘सतसई’ मुक्तक काव्य की सुप्रसिद्ध रचना है। इनके दोहे शृंगार रस से लबालब भरे हुए हैं तो उनमें अलंकारों का चमत्कार देखते ही बनता हैं। उन्होंने ब्रजभाषा में शब्द-योजना और वाक्य-रचना बड़े व्यवस्थित रूप में की है। इस प्रकार उन्होंने अपने दोहों में ‘गागर में सागर’ भर दिया है।

बिहारी के दोहे पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
कविवर बिहारी विरचित दोहों का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
बिहारी के दोहों के इस संकलन में तीन प्रकार के दोहे हैं-भक्तिपरक, प्रकृतिपरक और नीतिपरक। भक्ति संबंधित दोहों में कवि ने श्रीकृष्ण के मनमोहक स्वरूप का चित्रांकन किया है। श्रीकृष्ण के वस्त्र और उनकी मुरली, उनकी शारीरिक सुन्दरता को बड़ा ही अनूठा बनाकर मन को मोहने वाले हैं। प्रकृति संबंधी दोहों में ग्रीष्मकाल की भीषण तपन गहरे रूप में चित्रित है। नीति से संबंधित दोहों में सज्जनों के अमिट प्रेम का, द्विराज में प्रजा के दुखों का, संपत्ति की अस्थिरता का, मित्र-धर्म की गंभीरता का, दुर्बलों को कमजोर करने वाली शक्तियों का और अपने सजातीय बंधुओं पर अन्यथा प्रेरणा से प्रहार करने की अवरोध का वर्णन है।

बिहारी के दोहे संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

भक्ति:

प्रश्न 1.
सोहत ओटै पीतु पटु, स्याम सलौनैं गात।
मनौं नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात।।

शब्दार्थ:

  • सोहत – शोभायमान।
  • ओढ़े – धारण करने पर।
  • पीतु – पीला।
  • पटु – वस्त्र।
  • मनौं – मानो।
  • आतप – धूप।
  • पर्यो – पड़ा।

प्रसंग:
यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी सामान्य भाग-1 में संकलित तथा कविवर बिहारी द्वारा विरचित ‘सतसई’ के ‘भक्ति’ शीर्षक से उद्धत है। इसमें कवि ने श्रीकृष्ण के शारीरिक सौन्दर्य का चित्रण करते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
श्रीकृष्ण सांवले हैं। उन्होंने पीताम्बर धारण किया है। उनको इस तरह देखकर ऐसा लगता है, मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह-सुबह सूर्य की किरणें पड़ रही हैं। दूसरे शब्दों में पीताम्बर धारण किए हुए सांवले श्री कृष्ण सुबह की पड़ती हुई सूर्य की किरणों से सुशोभित नीलमणि पर्वत के समान बहुत ही सुन्दर लग रहे हैं।

विशेष:

  1. चित्रात्मक शैली है।
  2. ब्रजभाषा की शब्दावली है।
  3. श्रीकृष्ण के अद्भुत सौन्दर्य का चित्रण है।
  4. श्रृंगार रस है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
अधर धरत हरि कै परत, ओठ-ढीठि-पट-जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष-रंग होति।।

शब्दार्थ:

  • अधर – होंठ।
  • परत – पड़ती।
  • हरित – हरी।
  • ढीठि – नेत्र।
  • पट – वस्त्र।
  • ज्योति – चमक।

प्रसंग:
पूर्ववत। इसमें कवि ने यह चित्रित करना चाहा है कि एक गोपी श्रीकृष्ण को बाँसुरी बजाते हुए देख आई है। वह राधिका जी से उनकी प्रशंसा कर उनको उन्हें दिखाने के बहाने से ले जाना चाहती है।

व्याख्या:
जब श्रीकृष्ण बाँसुरी को होंठों पर रखते हैं, तब उस पर उनके होंठों की, आँखों की और पीले वस्त्र की चमक पड़ती है। उससे वह हरे रंग की बाँसुरी इन्द्रधनुप की तरह रंग-बिरंगी (सतरंगी) हो उठती है। कहने का भाव यह है कि कृष्ण के होंठों का रंग लाल है, आँखों का रंग सफेद और काला है, और कपड़े का रंग पीला है। इन सबके प्रभाव से हरे रंग वाली बाँसुरी का रंग-बिरंगी (सतरंगी) हो उठना स्वाभाविक है।

विशेष:

  1. ब्रजभाषा की शब्दावली है।
  2. अनुप्रास अलंकार है।
  3. दोहा छंद है।
  4. श्रीकृष्ण के अनूठे सौन्दर्य का भावपूर्ण चित्रण है।
  5. शैली चित्रमयी है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्यबोध संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. पीताम्बर धारण करने पर श्रीकृष्ण की शोभा कैसी हो जाती है?
  2. बाँसुरी श्रीकृष्ण के होंठों पर रखने पर कैसी दिखाई देती है?
  3. उपर्युक्त दोहों के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

  1. पीताम्बर धारण करने पर श्रीकृष्ण की शोभा सुबह की पड़ती हुई सूर्य की किरणों से सुशोभित नीलमणि पर्वत के समान मन को मोह लेने वाली हो जाती है।
  2. बाँसुरी श्रीकृष्ण के होंठों पर रखने से रंग-बिरंगी (सतरंगी) दिखाई देती है।
  3. उपर्युक्त दोहों का काव्य-सौन्दर्य अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों से आकर्षक है। भाव, भाषा, प्रतीक-योजना, बिम्ब आदि प्रभावशाली हैं, शैली चित्रमयी है।

पद्यांश पर आधारित विषयवस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. उपर्युक्त पद्यांशों का मुख्य भाव बताइए।

उत्तर:

  1. कवि-कविवर बिहारी, कविता-भक्ति।
  2. उपर्युक्त पद्यांशों का मुख्य भाव-श्रीकृष्ण के अद्भुत और मनमोहक रूप-सौन्दर्य का चित्रण करना है।

प्रकृति:

प्रश्न 3.
कहलाने एकत बसत, अहि, मयूर, मृग, बाघ।
जगतु तपोवन सो कियौ, दीरघ दाघ निदाघ।।

शब्दार्थ:

  • कहलाने – किस कारण से।
  • एकत बसत – इकट्ठा रहते हैं।
  • अहि – साँप।
  • मयूर – मोर।
  • मृग – हिरण।
  • बाघ – शेर।
  • दीरघ – लम्बी।
  • दाघ – आग।
  • निदाघ-गर्मी की ऋतु।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ में संकलित तथा कविवर बिहारी विरचित ‘सतसई’ के ‘प्रकृति’ शीर्षक से उद्धृत है। प्रस्तुत दोहा में कवि ने ग्रीष्म ऋतु की अत्यधिक बढ़ती गर्मी का वर्णन किया है कि इससे परस्पर शत्रुभाव रखने वाले प्राणी भी इस संकट की घड़ी में साथ रहने लगे हैं।

व्याख्या:
अत्यधिक गर्मी में साँप और मोर तथा हिरण और बाघ को अपनी दुश्मनी भुलाकर एक ही स्थान पर रहते हुए देखकर एक पथिक दूसरे से पूछ रहा है-क्या कारण है कि जन्म से ही एक-दूसरे के प्रति शत्रुभाव रखने वाले साँप और मोर तथा हिरण और बाघ एक ही साथ दिखाई दे रहे हैं। उसकी जिज्ञासा को शान्त करते हुए दूसरा पथिक कह रहा है कि भयंकर गर्मी पड़ रही है। उसके कारण यह संसार एक तपोवन की तरह दिखाई दे रहा है। जैसे तपोयन में हिंसक पशु अपनी हिंसा की भावना को छोड़कर मित्रभाव से रहने लगते हैं। ठीक उसी प्रकार साँप ने मोर के प्रति और बाघ ने हिरण के प्रति अपनी हिंसा की दुर्भावना को त्याग दिया है।

विशेष:

  1. उपमा और अनुप्रास अलंकार है।
  2. दोहा छन्द है।
  3. भीषण गर्मी का उल्लेख है।
  4. संकट के समय शत्रुता मित्रता में बदल जाती है-इसे सुस्पष्ट करने का प्रयास है।
  5. शैली चित्रमयी है।

प्रश्न 4.
बैठि रही अति सघन वन, पैठि सदन-तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की, छाँहौ चाहति छाँह।।

शब्दार्थ:

  • पैठि – प्रवेश करके।
  • सदन – घर।
  • निरखि – देखकर।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इस दोहे में कवि ने जेठ माह की गर्मी की ऋतु के अत्यधिक भयंकर प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
गर्मी की ऋतु के भयंकर रूप को देखकर कोई परेशान होकर कह रहा है कि जेठ माह की गर्मी की अधिकता इतनी बढ़ गई है कि कहीं कोई छाया भी नहीं दिखाई दे रही है, जिसका सहारा लेकर कोई इस जानलेवा गर्मी से छुटकारा पा सके। ऐसा इसलिए कि स्वयं छाया भी इस भयंकर गर्मी से आकुल-व्याकुल होकर छाया की खोज में या तो घने जंगलों में जाकर छिप गई है या घरों के ही भीतर जाकर बैठ गई है; अर्थात् घरों के कमरों के अंदर छिपकर अपनी जान बचा रही है।

विशेष:

  1. भाषा-ब्रजभाषा है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।
  3. छाया को मनुष्य के रूप में चित्रित किया गया है। इसलिए इसमें मानवीकरण अलंकार है।
  4. उत्प्रेक्षा अलंकार है।
  5. जानलेवा गर्मी का सटीक चित्रण है।

पद्यांशों पर आधारित सौन्दर्य बोध संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. परस्पर हिंसा की दुर्भावना रखने वाले पशु हिंसा क्यों छोड़ दिए हैं?
  2. तपोवन से किसकी उपमा और क्यों दी गई है?
  3. छाँह-छाँह को क्यों चाह रही है?
  4. ‘प्रकृति’ शीर्षक दोहों के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

1. परस्पर हिंसा की दुर्भावना रखने वाले पशु हिंसा छोड़ दिए हैं। यह इसलिए कि जेठ माह की भीषण गर्मी के बढ़ते संकट के कारण उनमें स्वयं के बचाव की भावना ने किसी को हानि पहुँचाने की भावना को भुलाकर मित्रता की भावना को उत्पन्न कर दिया है।

2. तपोवन से संसार की उपमा दी गई है। यह इसलिए कि ऋषि-मुनियों के तपोवनों में हिंसक पशु भी अपनी हिंसा की दुर्भावना का परित्याग कर देते हैं।

3. छाँह-छाँह को चाह रही है। यह इसलिए कि स्वयं छाँह भी बढ़ती हुई जानलेवा गर्मी से कहीं नहीं दिखाई देती हैं। वह तो अपने बचाव के किसी सुरक्षित स्थान में जाकर छिप गई है।

4. प्रकृति शीर्षक दोहों में गर्मी के भीषण स्वरूप को उपमा, अनुप्रास, रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकारों से अलंकृत करके उन्हें भावात्मक और चित्रात्मक शैलियों में प्रस्तुत किया गया है। भाव-भाषा, प्रतीक और योजना आकर्षक है।

पद्यांशों पर आधारित विषय वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. उपर्युक्त दोहों का मुख्य भाव लिखिए।

उत्तर:

1. कवि-कविवर बिहारी। कविता-‘प्रकृति’।

2. उपर्युक्त दोहों में गर्मी की ऋतु के भयंकर प्रभाव का उल्लेख कर उससे प्रभावित जीव-जन्तुओं की दुखद दशा को स्पष्ट किया गया है। गर्मी की अधिकता इतनी है कि सारा संसार तपोवन में बदल. गया है। फलस्वरूप शत्रुभाव रखने वाले पशु मित्रभाव से एक साथ रह रहे हैं। दोपहर की गर्मी से परेशान होकर तो छाया भी छाया की तलाश कर रही है।

MP Board Solutions

नीति:

प्रश्न 5.
चटक न छाँड़तु घटत हूँ, सज्जन-नेहँ गंभीरू।
फीकौ परै न, बरु फटै, रँग्यौ चोल-रंग चीरू।।

शब्दार्थ:

  • चटक – चटकीलापन।
  • घटक हूँ – घटते हुए (प्रेम पात्र न होते हुए भी)।
  • बरु – चाहे।
  • चोल रंग – चोल, एक प्रकार की वह लकड़ी, जिसे औटाकर (खौलाकर) रंग निकाला जाता है। यह रंग बहुत पक्का होता है और कपड़े के फट जाने पर भी नहीं छूटता।

प्रसंग:
यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ में संकलित तथा कविवर बिहारी विरचित ‘सतसई’ के ‘नीति’ शीर्षक से उद्धृत है। इसमें कवि ने सज्जनों के प्रेम की अटलता और स्थिरता का उल्लेख किया है। इस विषय में कवि का कहना है कि

व्याख्या:
सज्जनों का अटल प्रेम प्रेमपात्र के घटने पर भी अपनी अटलता नहीं छोड़ता है; अर्थात् सज्जन जिससे प्रेम करते हैं, वह चाहे अपनी भावना कम करने लगे या दुर्भावना करते हुए नीचे गिरने लगे। दूसरे शब्दों में प्रेम का निर्वाह करना छोड़ दे, तो भी सज्जनों के प्रेम में कोई कमी या अन्तर नहीं आता है। सज्जनों का प्रेम तो वैसे ही हमेशा बना रहता है, जैसे चोल के रंग में रंगा हुआ कपड़ा, भले ही फट जाए, लेकिन उसका रंग कभी भी फीका नहीं पड़ता है।

विशेष:

  1. ब्रजभापा की शब्दावली है।
  2. दोहा छन्द है।
  3. उपमा अलंकार।
  4. उपदेशात्मक शैली है।
  5. यह अंश भाववर्द्धक है।

प्रश्न 6.
दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यों न बढ़े दुख-दंद।
अधिक अँधेरौ जग करत, मिलि मावस रवि-चंदु।।

शब्दार्थ:

  • दुसह – दुसह्य, जो सहा न जा सके।
  • दुराज – दो राजाओं का राज।
  • दुख-दंदु – दुखों का द्वंद्व, विविध प्रकार के दुख।
  • मावस – अमावस्या।
  • रवि-चंदु – सूर्य और चन्द्रमा।

प्रसंग:
पूर्ववत्। दो राजाओं के राज में अर्थात् जिस राज्य के एक ही समय ‘ में दो राजा हों, अनेक प्रकार के दुःख होते हैं। इस बात को कवि ने इस दोहे में .. व्यक्त करने का प्रयास किया है। इस विषय में कवि का कहना है कि –

व्याख्या:
किसी प्रकार से असहनीय, (न सहन किए जाने योग्य) दो राजाओं के राज्य में प्रजा को अनेक प्रकार के दुःख क्यों न होवे। अर्थात् जिस राज्य में एक समय में दो राजा होते हैं, वहाँ की प्रजा को अनेक प्रकार के भयंकर दुःख झेलने पड़ते हैं। यह ठीक उसी प्रकार से है, जैसे अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्रमा मिलकर एक साथ होने से संसार में बहुत अधिक (सबसे अधिक) अंधकार को बढ़ा देते हैं।

विशेष:

  1. दोहा छन्द है।
  2. भाषा ब्रजभाषा है।
  3. उपमा अलंकार है।
  4. यह अंश ज्ञानवर्द्धक है।
  5. दृष्टान्त शैली है।

प्रश्न 7.
बढ़त-बढ़त संपति-सलिलु, मन-ससेजु बढ़ि जाइ।
घटत-घटत सुन फिर घटै, बरु समूल कुम्हिलाइ।।

शब्दार्थ:

  • संपत्ति-सलिलु – संपत्ति रूपी पानी।
  • मन-सरोज – मनरूपी कमल।
  • बरु – बल्कि, परन्तु।
  • समूल – जड़ सहित, मूलधन सहित।
  • कुम्हिलाइ – मुरझा जाता है, नष्ट हो जाता है।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इसमें कवि ने धन की चंचलता और नश्वरता का वर्णन करते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
सम्पत्ति रूपी पानी के निरन्तर बढ़ते रहने से मन रूपी कमल भी बढ़ता जाता है। दूसरे शब्दों में संपत्ति आने-जाने से मन में अनेक प्रकार की लालसाएँ उत्पन्न होती जाती हैं। लेकिन सम्पत्ति रूपी पानी के घटने पर मन रूपी कमलं घटता ही नहीं, अपितु समूल (जड़ सहित) ही नष्ट हो जाता है। कहने का भाव यह है कि जिस प्रकार पानी के हमेशा बढ़ते रहने पर कमल की नाल भी निरन्तर बढ़ती रहती है। और पानी के घटने पर वह नाल घटती तो नहीं, लेकिन कुम्हलाकर नष्ट हो जाती है। ठीक इसी प्रकार जब किसी व्यक्ति की सम्पत्ति बढ़ती रहती है तो उसके मन में अनेक प्रकार की इच्छाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। लेकिन जब उसकी सम्पत्ति घटने लगती है तो उसकी इच्छाएँ भी बिल्कुल समाप्त हो जाती हैं।

विशेष:

  1. ‘बढ़त-बढ़त’ और ‘घटत-घटत’ में पुनरुक्ति अलंकार है।
  2. ‘सम्पत्ति-सलिल’ और ‘मन-सरोज’ में रूपक अलंकार है।
  3. दोहा छन्द है।
  4. उपर्युक्त कथन यथार्थपूर्ण है।

प्रश्न 8.
जो चाहत, चटक न घटे, मैलो होई न चित्त।
रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह चीकने चित्त।।

शब्दार्थ:

  • चाहत – चाहते हैं।
  • चटक – चटकीलापन।
  • मैलो – मलिन।
  • नेह – प्रेम।
  • चीकने – पवित्र।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इसमें कवि ने प्रेम को पवित्र और निरन्तर बने रहने की युक्ति को बतलाते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
एक सच्चा व्यक्ति यदि अपने प्रेम को निरंतर बनाए रखना चाहता है। इसके साथ ही यदि वह अपने प्रेम की पवित्रता के लिए अपने चित्त को और किसी प्रेम के लिए स्थान नहीं देना चाहता है, उसे चाहिए कि वह अपने अंदर किसी प्रकार का अहंकार न करे। ऐसा करने से उसका प्रेम उसके पवित्र चित्त में स्थायी रूप से रह सकेगा, अन्यथा नहीं।

विशेष:

  1. ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली है।
  2. शैली उपदेशात्मक है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. दोहा छन्द है।
  5. यह दोहा प्रेरक रूप में है।

प्रश्न 9.
कहै यहै श्रुति सुम्रत्यौ, यहै सयाने लोग।
तीन दबावत निस कही, पातक, राजा, रोग।।

शब्दार्थ:

  • श्रुति – वेद।
  • सुम्रत्यौ – स्मृति भी।
  • सयाने – चतुर।
  • निस कही – शक्तिहीन को।
  • पातक – पाप।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इस दोहे में कवि ने शक्तिहीनता के दोष पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
पाप, राजा और रोग-ये तीनों ही शक्तिहीनों को दबाते हैं। इस बात को बार-बार वेद, स्मृतियाँ और चतर लोग कहते हैं।

विशेष:

  1. पातक, राजा और रोग की ‘दंबावत’ एक क्रिया होने से दीपक अलंकार है।
  2. कथ्य को प्रमाण सहित कहने से प्रमाणालंकार है।
  3. दोहा छंद है।
  4. यह दोहा ज्ञानवर्द्धक है।
  5. दृष्टान्त शैली है।

MP Board Solutions

प्रश्न 10.
स्वारथ, सुकृत, न श्रम वृथा, देखि बिहंग, बिचारि।
बाज पराए पानि परि तू पच्छीनु न मारि।।

शब्दार्थ:

  • स्वारथ – निजी लाभ, मतलब।
  • सुकृतु – अच्छा काम।
  • श्रमु – परिश्रम।
  • बृथा – बेकार।
  • बिहंग – पक्षी।
  • पराएँ पानि परि – दूसरों के इशारे पर।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इस दोहे को कवि ने अन्योक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। इसमें कवि ने अपने आश्रयदाता जयसिंह को यह समझाने का प्रयास किया है कि उन्हें औरंगजेब के इशारे पर महाराज शिवाजी पर आक्रमण नहीं करना चाहिए। ऐसा इसलिए कि उसमें उनका कोई निजी लाभ तो है ही नहीं। एक हिन्दू राजा द्वारा दूसरे हिन्दू राजा पर आक्रमण करना उचित भी नहीं है। इस बात को कवि ने किसी वाज को संबोधित करते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
अरे बाज! (महाराजा जयसिंह) तुम दूसरों (औरंगजेब) के इशारे पर जिस पक्षी (महाराज शिवाजी) को मारने जा रहे हो, उससे तुम्हारे किसी निजी लाभ की पूर्ति नहीं होगी। ऐसा इसलिए कि शिकार (शिवाजी) को तो वह शिकारी (औरंगजेब) ही लेगा, जिसके इशारे पर उस पक्षी को मारने जा रहे हो। कहने का भाव यह कि किसी दूसरे के इशारे पर और दूसरों की भलाई के लिए अपने सजातीय को मारना (हानि पहुँचाना) किसी प्रकार से ठीक नहीं है। इस दृष्टि से इससे होने वाला परिश्रम भी व्यर्थ ही होगा।

विशेष:

  1. ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली है।
  2. दोहा छंद है।
  3. अन्योक्ति अलंकार है।
  4. उपदेशात्मक शैली है।
  5. यह दोहा प्रेरणादायक रूप में है।

पद्यांशों पर आधारित सौन्दर्यबोध संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. सज्जनों का प्रेम कैसा होता है?
  2. नीति के दोहों का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
  3. नीति के दोहों के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।

उत्तर:

1. सज्जनों का प्रेम बड़ा ही स्थायी और अमिट होता है। वह चोल के रंग के समान हमेशा ही बना रहता है।

2. नीति के दोहों में व्यक्त भावों की सस्लता, उपयुक्त, यथार्थता और स्पष्टता सराहनीय है। इन दोनों में कही गई बातें बिल्कुल सारपूर्ण और जीवन की सफलता के लिए अपेक्षित व समुचित कही जा सकती हैं। इस आधार पर ये अधिक विश्वसनीय और सार्थक सिद्ध होती हुई दिखाई दे रही हैं।

3. नीति के दोहों का काव्य-सौन्दर्य हृदयस्पर्शी और रोचक है। जीवन को हद तक सार्थक बनाने में जीवन-नीति का महत्त्व कितना अधिक होता है, इसे दर्शाने के लिए कवि ने प्रस्तुत दोहों को अनुप्रास, रूपक, उत्प्रेक्षा, उपमा आदि अलंकारों से अलंकृत किया है। फिर उन्हें वीर रस और शान्त रस में डुबोकर ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली को आकर्षक बनाया है। भावों में सरसता और प्रतीक-बिम्बों की सटीकता के द्वारा उन्हें हृदय-स्पर्शी बनाने में अद्भुत सफलता कायम की है।

पद्यांशों पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. दो राजाओं का राज्य कैसा होता है?
  3. सम्पत्ति के बढ़ने-घटने से क्या प्रभाव पड़ता है?
  4. स्मृतियाँ और चतुर लोग क्या मानते हैं?।
  5. बाज के माध्यम से कवि ने क्या सीख दी है?

उत्तर:

  1. कवि-कविवर बिहारी, कविता-नीति।
  2. दो राजाओं का राज्य प्रजा के लिए हर प्रकार से दुःखद और विपत्तिकारक होता है।
  3. सम्पत्ति के बढ़ने से मन में अनेक प्रकार की इच्छाएँ जोर मारने लगती हैं। इसके विपरीत सम्पत्ति के घटने से मन की इच्छाएँ लगभग समाप्त हो जाती हैं।
  4. स्मृतियाँ और चतुर लोग यह मानते हैं कि पाप, राजा और रोग, ये तीनों ही शक्तिहीनों को दबाते हैं।
  5. बाज के माध्यम से कवि ने यह सीख दी है कि हमें किसी दूसरे के बहकावे में आकर और दूसरों की भलाई के लिए अपने सजातीय को कोई दुःख या हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 4 ग्राम-श्री

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 4 ग्राम-श्री (कविता, सुमित्रानन्दन पन्त)

ग्राम-श्री पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

ग्राम-श्री लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पाठ में आई पंक्तियों के आधार पर सही जोड़ी बनाइए
(क) हरियाली – बालू के साँपों-सी
(ख) रवि के किरणें – मोती के दानों-से
(ग) आम्र-तरु – मखमल-सी
(घ) गंगा की रेती – चाँदी की-सी.
(ङ) हिमकन – रजत स्वर्ण मंजरियों-से
उत्तर:
(क) हरियाली – मखमल-सी
(ख) रवि की किरणें – चाँदी की-सी
(ग) आम्र-तरु – रजत स्वर्ण मंजरियों-से
(घ) गंगा की रेती – बालू के साँपों-सी
(ङ) हिमकन – मोती के दानों-से।

प्रश्न 2.
खेतों पर पड़ती हुई सूर्य की किरणें कैसी प्रतीत हो रही हैं?
उत्तर:
खेतों पर पड़ती हुई सूर्य की किरणें चाँदी की उजली जाली-सी प्रतीत हो रही हैं।

प्रश्न 3.
कवि ने सोने की किंकणियाँ किसको कहा है?
उत्तर:
कवि ने सोने की किंकणियाँ अरहर और सनई की पकी हुई फलियों को कहा है।

प्रश्न 4.
हरे-हरे तिनके कैसे दिखाई दे रहे हैं?
उत्तर:
हरे-हरे तिनके हरे खून की तरह दिखाई दे रहे हैं।

MP Board Solutions

ग्राम-श्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कविता में वर्णित खेतों के सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
खेतों का सौन्दर्य बड़ा ही अनूठा दिखाई दे रहा है। खेतों में दूर-दूर तक मखमल के समान कोमल हरियाली फैली हुई दिखाई दे रही है। उस पर जब सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तब वह चाँदी के समान चमक उठती है। हरे-हरे तिनकों पर जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तब हरे खून की तरह झलकते हुए दिखाई देते हैं। अरहर और सनई की पकी हुई फलियाँ घुघरू की तरह सुन्दर ध्वनि करती हैं। सरसों के पीले-पीले फूलों से तेल से युक्त सुगन्ध उड़ रही है। तीसी (अलसी) की कली हरी-भरी धरती पर झाँकती हुई दिखाई दे रही है। उधर खेतों में दूर-दूर तक पालक लहलहा रहे हैं, धनिया महक रही है, लौकी और सेम की फली मखमल की तरह लाल टमाटर और मिरचों की बड़ी हरी थैली दिखाई दे रही है।

प्रश्न 2.
भू पर आकाश उतरने का अनुभव कब होता है?
उत्तर:
भू पर आकाश उतरने का अनुभव उस समय होता है, जब चारों ओर घना कोहरा छा जाता है। सूर्य की किरणें कुहरे में उछलकर रह जाती हैं। फलस्वरूप अँधेरा और धुन्ध फैल जाता है। इससे कोई दूर की वस्तु साफ-साफ नहीं दिखाई देती है। सारा वातावरण झिलमिलाते हुए सुबह से शाम तक बना रहता है। इस प्रकार का दृश्य सचमुच बड़ा ही रोचक और अद्भुत लगता है।

प्रश्न 3.
कवि ने ग्राम की तुलना मरकत डिब्बे से क्यों की है?
उत्तर:
कवि ग्राम की तुलना मरकत डिब्बे से की है। यह इसलिए कि गाँव के चारों ओर कुहरे का साम्राज्य फैला हुआ है। इससे धुन्धमय सारा वातावरण हो जाता है। इस प्रकार के धुन्धमय वातावरण पर सूरज का जब प्रकाश पड़ता है, और उलझकर रह जाता है, तव वह धुन्धमय वातावरण नीलमणि के समान चमक उठता है। इसे ही लक्ष्य करके कवि ने ग्राम की तुलना मरकत डिब्बे से की है।

ग्राम-श्री भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पद्यांश की व्याख्या कीजिए-
(क) रोमांचित-सी लगती वसुधा ………… शोभाशाली॥
(ख) अब रजत स्वर्ण-मंजरियों से …………. मतवाली॥
उत्तर:
(क) शब्दार्थ :
तलक-तक। रवि-सूर्य, सूरज। हरित्-हरा। रुधिर-खून। श्यामल-सविला। भूतल-धरती। फलक-विस्तृत (फैला हुआ) भाग। रोमांचित-प्रसन्न। वसुधा-धरती। किंकिणियाँ-छोटे-छोटे घुघरू।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ में संकलित तथा महाकवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा विरचित काव्य-रचना ‘ग्राम श्री’ से ली गई है। इसमें महाकवि पन्त ने गाँव की शोभा बढ़ाने वाली खेतों की हरियाली का आकर्षक चित्र खींचा है। इस विषय में महाकवि पन्त का कहना है कि

व्याख्या :
खेतों में दूर-दूर तक फैली हुई हरियाली मखमल के समान कोमल और सुन्दर लग रही है। उस पर सूर्य का प्रकाश जब पड़ता है, तब वह चाँदी के समान सफेद होकर मन को अपनी ओर खींच लेती है। हवा से हिलते हुए हरे-भरे तिनकों पर जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तब ऐसा लगता है कि मानो हरा खून झलक रहा है। इस प्रकार की धरती को देखकर ऐसा लगता है कि नीला आकाश आकर धरती पर झुक गया है। वह अपने सफेद और नीलिमा का विस्तार पूरी धरती पर करते। हुए अधिक सुन्दर लग रहा है। इस प्रकार खेतों में जौ, गेहूँ की जब बालियाँ आती हैं, तब उनसे सजकर सारी धरती अधिक. सुन्दर दिखाई देने लगती है। सोने की चमक-दमक के समान अरहर और सनई की फलियाँ घुघरू की तरह आवाज करती हुई बहुत अधिक अच्छी लगती हैं।

विशेष :

  1. खेतों में दूर-दूर तक फैली हरियाली का आकर्षक चित्र खींचा गया है।
  2. ‘मखमल-सी’ चाँदी की-सी और रोमांचित-सी में उपमा अलंकार है।
  3. भाषा तत्सम शब्दों की है।
  4. शृंगार रस का प्रवाह है।

(ख) शब्दार्थ :
भीनी-भीगी हुई। हरित-हरा। धरा-धरती। नीलम-नीला। रजत-चाँदी। आम्र-आम। मंजरियों-बौरों। तरु-पेड़। ढाक-पलाश। कोकिला-कोयल। मुकुलित-खिले हुए। दाडिम-अनार।

प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
अब खेतों में तेल की सुगन्ध से भीगी हई सरसों पीले-पीले रंगों में फूल गई है। दूसरे शब्दों में अब खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल दिखाई देने लगे हैं। उनकी सुगन्ध तेल से भीगी हुई होकर चारों ओर फैल रही है। हरी-भरी धरती पर तीसी (अलसी) के नीली-नीली कली खिल रही है। उसे देखने से ऐसा लगता है, मानो वह चुपचाप कुछ देख रही है। इसी प्रकार अब आम की डालियाँ सोने-चाँदी की तरह बौरों से लद गई हैं। ढाक और पीपल के पत्ते झड़ रहे हैं। प्रकृति की इस चंचलता और सुन्दरता से मदमस्त होकर कोयल इधर-उधर कूकने लगी है। बागों में कटहल की सुगन्ध फैल रही है, तो जामुन खिली हुई सुन्दर लग रही है। झरबेरी झूलती हुई दिखाई दे रही है। इस प्रकार आड़, नीबू, अनार, आलू, गोभी, बैंगन और मूली खिलते हुए मन को छू रहे हैं।

विशेष :

  1. भाषा मिश्रित शब्दों की है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।
  3. प्रकृति का सुखद चित्र उपस्थित किया गया है।
  4. वसन्त ऋतु का स्वाभाविक उल्लेख है।
  5. ‘पीली-पीली’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

MP Board Solutions

ग्राम-श्री भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखो।।
रवि, धरती, जंगल, वृक्ष, आकाश।
उत्तर:
पर्यायवाची शब्द
रवि – सूर्य, सूरज, दिनकर, दिवाकर।
धरती – धरा, भू, पृथ्वी, अवनि।
जंगल – वन, विपिन।
वृक्ष – पेड़, पादप, तरु।
आकाश – नभ, गगन, आसमान।

प्रश्न 2.
कविता में आए हुए देशज शब्द छाँटकर उनके मानक हिन्दी शब्द लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 4 ग्राम-श्री img-1

ग्राम-श्री योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
प्राकृतिक सौन्दर्य से सम्बन्धिते चित्रों को खोजकर उसका अलबम तैयार कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।!

प्रश्न 2.
नदियाँ निरन्तर प्रदूषित हो रहीं हैं, नदियों के प्रदूषण के कारण और निदान को चित्रों के माध्यम से बनाइए तथा उसका प्रदर्शन कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।!

प्रश्न 3.
आपको शहर अच्छा लगता है या गाँव, इस विषय पर कारण सहित अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।!

ग्राम-श्री परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

ग्राम-श्री लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
धरती पर कौन झुका हुआ लग रहा है?
उत्तर:
धरती पर आकाश का स्वच्छ नीला फलक झुका हुआ लग रहा है।

प्रश्न 2.
भीनी तैलाक्त गन्ध किसकी उड़ रही है?
उत्तर:
भीनी तैलाक्त गन्ध सरसों के पीले-पीले फूलों से उड़ रही है।

प्रश्न 3.
नदी के किनारे पर कौन सोई रहती है?
उत्तर:
नदी के किनारे पर मगरौठी (एक चिड़िया विशेष) सोई रहती है।

MP Board Solutions

ग्राम-श्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कविता में वर्णित बागों के सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कविवर सुमित्रानन्दन विरचित कविता ‘ग्राम श्री’ में बागों के सौन्दर्य का वर्णन स्वाभाविक होने के साथ-साथ अधिक रोचक है। कवि के अनुसार वागों में आम के पेड़ की डालें वीरों से लद गए हैं। वे सोने-चाँदी की तरह चमकती हुई सुन्दर लग रही हैं। पलाश और पीपल के पके हुए पत्ते झर रहे हैं। इस प्रकार के दृश्य से कोयल मतवाली होकर कू-कू की मधुर ध्वनि करने लगी है। दूसरी ओर कटहल की सुगन्ध फैल रही है। पकी हुई जामुन मन को छू रही है। जंगली झरवेरी झूलती हुई दिखाई दे रही है। आड़ फूल रहे हैं। इसी प्रकार नीबू, अनार, आलू, गोभी, बैगन और मूली भी। पीले-पीले मीठे अमरूदों पर पड़ी हुई लाल-लाल चित्तियाँ खूब सुन्दर लग रही हैं। पके हुए बेर सुनहरे और मधुर लग रहे हैं। इस प्रकार बगिया के छोटे-छोटे पेड़ों पर छोटे-छोटे छाजन मन को अपनी ओर खींच रहे हैं।

प्रश्न 2.
कोयल कब मतवाली हो उठती है?
उत्तर:
कोयल तब मतवाली हो उठती है, जब वसन्त ऋतु का आगमन होने लगता है। बागों में आमों की डालियाँ चाँदी-सोने जैसी चमक वाली मंजरियों (बौरों) से लद जाती हैं। ढाक और पीपल के पेड़ अपने-अपने पुराने पत्ते रूपी कपड़े उतार-उतार कर नए पत्ते रूपी कपड़ों को पहनने लगते हैं। इस प्रकार का. मदमस्त कर देने वाले वातावरण में कोयल मतवाली होकर कू-कू की अपनी मधुर तान छोड़ने लगती है।

प्रश्न 3.
कुहरे में कौन-कौन सुन्दर लगते हैं और क्यों?
उत्तर:
कुहरे में खेत, बाग, घर और वन बहुत सुन्दर लगते हैं। ऐसा इसलिए कि कुहरे से जब खेत, बाग, घर और वन ढक जाते हैं, तब उन पर सूरज की रोशनी सीधी नहीं पड़ती है। वह तो कुहरे से उलझकर रह जाती है। इससे खेत, बाग, घर और वन पर पड़ा हुआ कुहरा सतरंगी होकर बहुत सुन्दर लगने लगता है। इसे ही लक्ष्य करके कवि ने कहा है कि कुहरे में खेल, बाग, घर और वन बहुत ही सुन्दर लगते हैं।

ग्राम-श्री कवि-परिचय

प्रश्न.
श्री सुमित्रानन्दन पन्त का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय :
श्री सुमित्रानन्दन पन्त प्रकृति के सुकुमार और मानवतावाद के प्रमुख कवि हैं। पन्त जी का जन्म उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा जिले के कौसानी गाँव में 20 मई, 1910 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव में हुई। इसके बाद की शिक्षा राजकीय स्कूल, अल्मोड़ा में हुई। इसके बाद उनकी शिक्षा काशी के जयनारायण स्कूल में हुई। आपने उच्चशिक्षा के लिए प्रयाग के म्योर सेन्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया लेकिन गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने के कारण 1921 में कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी और स्वतन्त्र रूप से विभिन्न भाषा-साहित्य का अध्ययन किया। पन्तजी पर महात्मा गाँधी, कार्लमार्क्स, अरविन्द और विवेकानन्द के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। सन् 1950 में आप आकाशवाणी के निदेशक नियुक्त हुए। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकने करके आपको ‘सहित्य-वाचस्पति’, ‘ज्ञानपीठ’, ‘पद्मभूषण’ आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 28 दिसम्बर, 1977 में 65 वर्ष की अल्पायु में ही पन्त जी इस संसार से सदा के लिए विदा होकर अमर हो गए।

काव्य :
i. महाकाव्य-लोकायतन।
ii. खण्ड-काव्य-ग्रन्थि।
iii.काव्य-संग्रह :
1. युगपथ, 2. उत्तरा, 3-वीणा, 4. पल्लव, 5. गुंजन, 6. उच्छ्वास, 7. युगान्त, 8. ग्राम्या, 9. रजत-रश्मि, 10. शिल्पी, 11. कला और बूढ़ा चाँद, 12. ऋता, 13. युगवाणी, 14. स्वर्ण-किरण, 15. स्वर्ण-धूलि, 16. अमिता, 17. वाणी, 18. सौ वर्ण, 19. चिदम्बरा और 20. पल्लविनी।

उपन्यास :
हार
कहानी :
संग्रह-पाँच कहानियाँ
अनुवाद :
मधुज्वाल
नाटक :
ज्योत्सना, परी, क्रीड़ा और रानी!
इनके अतिरिक्त पन्त जी ने गद्य-लेखन की आलोचना भी की है।

भाषा-शैली :
पन्त जी की भाषा सरल, सुस्पष्ट और मधुर है। उनकी भाषा की सर्वप्रधान विशेषता है-सरसता और प्रवाहमयता। इस प्रकार की भाषा में सामान्य और विशिष्ट शब्दों के मेल हुए हैं। कविवर जयशंकर प्रसाद की तरह आपकी भाषा अत्यन्त प्रौढ़ और गम्भीर न होकर सुकुमार, स्वाभाविक, ललित और भावप्रद है।

पन्तजी की शैली छायावादी शैली है। वह अलंकृत, गेय और बोधगम्य है। संगीत और नाद के अद्भुत मेल से वह झंकृत और मुखर हो उठी है। इस तरह कविवर पन्त की भाषा-शैली रोचक और अर्थपूर्ण सिद्ध होती है।

व्यक्तित्व :
पन्त जी मूलरूप से कवि रहे। उनका व्यक्तित्व इसीलिए काव्यात्मक कहा जा सकता है। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को ‘ज्ञानपीठ’, ‘साहित्य-वाचस्पति’ और ‘पद्मभूपण’ उपाधियों से अलंकृत किया गया। पन्तजी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष है-‘सौभाग्यता’ और सौन्दर्य। पन्त अत्यन्त सरल और सहज स्वभाव के थे। उनका ‘बाहरी और भीतरी व्यक्तित्व अत्यधिक आकर्षक और मोहक रहा। वे सुदर्शन व्यक्तित्व वाले हिन्दी के अनोखे कवि के रूप में जाने गए।

महत्त्व :
पन्तं जी का साहित्यिक महत्त्व तब भी था और आज भी है। छायावादी स्तम्भों के वे एक महान स्तम्भ के रूप में युग-युग तक याद किए जाते रहेंगे। उनकी काव्य-चेतना की दार्शनिक उपलब्धियाँ भी एक महत्त्वपूर्ण देन के रूप में स्वीकार की जाती रहेंगी।

MP Board Solutions

ग्राम-श्री भाव सारांश

प्रश्न.
कविवर सुमित्रानन्दन पन्त विरचित कविता ‘ग्राम श्री’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
कविवर सुमित्रानन्दन पन्त विरचित कविता ‘ग्राम श्री’ एक रोचक और हृदयस्पर्शी है। इसमें प्रकृति की सुन्दरता का कई रूपों में चित्रण किया गया है। खेतों में दूर-दूर तक मखमल की तरह हरियाली फैली हुई है। उस पर सूर्य की किरणें पड़कर चाँदी की तरह दिखाई देती हैं। हरे-हरे तिनके की झलक अधिक सुन्दर लगती है। अरहर, सनई, जौ और गेहूँ की बालियों से लदी हुई यह धरती अधिक प्रसन्न हो रही है। चारों ओर तेल से युक्त गन्ध उड़ रही है। पीले रंग का फूल सरसों और नीले रंग की तीसी भी अपनी सुन्दरता को फैला रही है। चाँदी और सोने की तरह आम में बौर आ चुके हैं, ढाक और पीपल के पत्तों को झरते हुए देखकर मतवाली कोयल बोल रही है, कटहल, जामुन, झरबेरी, आड़, नीबू, अनार, आलू, गोभी, बैगन, मूली, अमरूद, बेर, पालक, धनिया, लौकी, सेम, टमाटर और मिर्ची खेतों में बढ़ते, फूलते और फलते हुए मन को अपनी ओर खींच रहे हैं। सुबह-सुबह ऐसी ओस पड़ती है कि मानो धरती पर आसमान आ गया है। इस प्रकार सारा ग्रामीण अंचल नीलमणि के डिब्बे में बन्द हुआ दिखाई देता है। उसकी यह अद्भुत सुन्दरता सबको बाग-बाग कर देती है।

ग्राम-श्री संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

1. फैली खेतों में दूर तलक,
मखमल-सी कोमल हरियाली।
लिपटी जिससे रवि की किरणें,
चाँदी की-सी उजली जाली ॥1॥

तिनके के हरे-हरे नन’ पर,
हिल हरित् रुधिर है रहा झलक।
श्यामत भूतल पर झुका हुआ,
नभ का चिर निर्मल नील फलका ॥2॥

रोमांचित-सी लगती वसुधा,
आई जौ-गेहूँ में बाली,
अरहर सनई की सोने की,
किंकिणियाँ है शोभाशाली ॥3॥

शब्दार्थ :
तलक-तक। रवि-सूर्य, सूरज। हरित्-हरा। रुधिर-खून। श्यामल-सविला। भूतल-धरती। फलक-विस्तृत (फैला हुआ) भाग। रोमांचित-प्रसन्न। वसुधा-धरती। किंकिणियाँ-छोटे-छोटे घुघरू।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ में संकलित तथा महाकवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा विरचित काव्य-रचना ‘ग्राम श्री’ से ली गई है। इसमें महाकवि पन्त ने गाँव की शोभा बढ़ाने वाली खेतों की हरियाली का आकर्षक चित्र खींचा है। इस विषय में महाकवि पन्त का कहना है कि

व्याख्या :
खेतों में दूर-दूर तक फैली हुई हरियाली मखमल के समान कोमल और सुन्दर लग रही है। उस पर सूर्य का प्रकाश जब पड़ता है, तब वह चाँदी के समान सफेद होकर मन को अपनी ओर खींच लेती है। हवा से हिलते हुए हरे-भरे तिनकों पर जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तब ऐसा लगता है कि मानो हरा खून झलक रहा है। इस प्रकार की धरती को देखकर ऐसा लगता है कि नीला आकाश आकर धरती पर झुक गया है। वह अपने सफेद और नीलिमा का विस्तार पूरी धरती पर करते । हुए अधिक सुन्दर लग रहा है। इस प्रकार खेतों में जौ, गेहूँ की जब बालियाँ आती हैं, तब उनसे सजकर सारी धरती अधिक. सुन्दर दिखाई देने लगती है। सोने की चमक-दमक के समान अरहर और सनई की फलियाँ घुघरू की तरह आवाज करती हुई बहुत अधिक अच्छी लगती हैं।

विशेष :

  1. खेतों में दूर-दूर तक फैली हरियाली का आकर्षक चित्र खींचा गया है।
  2. ‘मखमल-सी’ चाँदी की-सी और रोमांचित-सी में उपमा अलंकार है।
  3. भाषा तत्सम शब्दों की है।
  4. शृंगार रस का प्रवाह है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्य-बोध सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.
(i) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।।
(iii) ‘नभ का चिर निर्मल नील फलक’ का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश में महाकवि पन्त ने खेतों में दूर-दूर तक फैली हरियाली का रोचक चित्रण किया है। मखमल की तरह कोमल दूर-दूर तक फैली हरियाली के रूप बड़े ही आकर्षक हैं। उस पर पड़ता हुआ सूर्य का प्रकाश उसे कई आकर्षक रूपों में ढाल देता है। इससे वह कभी चाँदी के समान दिखाई देता है, तो कभी झलकते हुए हरे खून के समान दिखाई देती है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा तत्सम शब्दों की है। ‘मखमल-सी’, ‘चाँदी की-सी’ और रोमांचित-सी’ में उपमा अलंकार है। ‘हरे-हरे’ में पुनरुक्ति अलंकार है। शृंगार रस के प्रवाह में बिम्ब-प्रतीक संजीव हो उठे हैं। चित्रात्मक शैली अधिक हृदयस्पर्शी बन गई है।

(iii) ‘नभ का चिर निर्मल नील फलक’ में कवि ने प्रकृति का भाववर्द्धक चित्रण किया है। इससे आकाश का मनमोहक स्वरूप उजागर हुआ है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर-
प्रश्न:
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) ‘हरित रुधिर है रहा झलक’ पद्यांश में किसका रुधिर झलक रहा है और क्यों?
(iii) ‘मखमल-सी कोमल हरियाली’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) कवि-सुमित्रानन्द पन्त, कविता-‘ग्राम श्री’!
(ii) ‘हरित रुधिर है रहा झलक’ में हरे-हरे तन अर्थात् हरियाली का रुधिर झलक रहा है। यह इसलिए कि सूर्य की किरणें जब ओस पड़ी हुई हरियाली पर सुबह-सुबह पड़ती हैं, तब वह खून की तरह झलकने लगती है।
(iii) ‘मखमल-सी कोमल हरियाली’ का भाव-सौन्दर्य अधिक आकर्षक है। हरियाली को मखमल के समान कोमल कहकर कवि ने प्रकृति की सुकुमारता और सुन्दरता को प्रस्तुत किया है। इससे कवि का प्रकृति के प्रति अधिक लगाव स्पष्ट हो रहा है।

MP Board Solutions

2. उड़ती भीनी तैलाक्त गन्ध,
फूली सरसों पीली-पीली। जो,
हरित धरा से झाँक रही,
नीलम की कलि तीसी नीली ॥4॥

अब रजत स्वर्ण-मंजरियों से,
लद गई आम्र तरु की डाली।
झर रहे ढाक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला, मतवाली ॥5॥

महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेली झूली।
फूले आडू, नीबू, दाडिम,
आलू, गोभी, बैगन, मूली ॥6॥

शब्दार्थ :
भीनी-भीगी हुई। हरित-हरा। धरा-धरती। नीलम-नीला। रजत-चाँदी। आम्र-आम। मंजरियों-बौरों। तरु-पेड़। ढाक-पलाश। कोकिला-कोयल। मुकुलित-खिले हुए। दाडिम-अनार।

प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
अब खेतों में तेल की सुगन्ध से भीगी हई सरसों पीले-पीले रंगों में फूल गई है। दूसरे शब्दों में अब खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल दिखाई देने लगे हैं। उनकी सुगन्ध तेल से भीगी हुई होकर चारों ओर फैल रही है। हरी-भरी धरती पर तीसी (अलसी) के नीली-नीली कली खिल रही है। उसे देखने से ऐसा लगता है, मानो वह चुपचाप कुछ देख रही है। इसी प्रकार अब आम की डालियाँ सोने-चाँदी की तरह बौरों से लद गई हैं। ढाक और पीपल के पत्ते झड़ रहे हैं। प्रकृति की इस चंचलता और सुन्दरता से मदमस्त होकर कोयल इधर-उधर कूकने लगी है। बागों में कटहल की सुगन्ध फैल रही है, तो जामुन खिली हुई सुन्दर लग रही है। झरबेरी झूलती हुई दिखाई दे रही है। इस प्रकार आड़, नीबू, अनार, आलू, गोभी, बैंगन और मूली खिलते हुए मन को छू रहे हैं।

विशेष :

  1. भाषा मिश्रित शब्दों की है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।
  3. प्रकृति का सुखद चित्र उपस्थित किया गया है।
  4. वसन्त ऋतु का स्वाभाविक उल्लेख है।
  5. ‘पीली-पीली’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्य-बोध सम्बन्धी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) ‘हो उठी कोकिला मतवाली’ का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश की भावयोजना सरल और साधारण है। उससे अर्थ सहज में ही स्पष्ट हो रहा है। चूंकि वसन्त ऋतु का आगमन हो चुका है। फलस्वरूप प्रकृति अपने रूप-प्रतिरूप को सँवारती हुई नई दुल्हन के समान अपने प्रियतम वसन्त के आने की प्रतीक्षा कर रही है। इससे उसका अंग-प्रत्यंग अधिक सुन्दर और आकर्षक दिखाई दे रहा है। विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों की सजावट को इसी अर्थ में देखा जा सकता है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा सरल और सुबोध है। इसको प्रभावशाली बनाने के लिए कवि ने उपमा, रूपक और पुनरुक्ति अलंकारों का यथोचित प्रयोग किया है। ‘हरित धरा से झाँक रही, नीलम की कलि तीसी नीली।’ में प्रकृति का मानवीकरण करके कवि ने इस पद्यांश को और अधिक सजीव बना रहा है। श्रृंगार इसका सुन्दर प्रवाह है।

(iii) ‘हो उठी. कोकिला मतवाली’ में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। इससे प्रकृति में आए हुए वसन्त ऋतु के असाधारण प्रभाव का सहज ही अनुमान हो जाता है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) तेल से युक्त किसकी सुगन्ध उड़ रही है?
(iii) इस पद्यांश में किस ऋतु का चित्रण हुआ है?
उत्तर:
(i) कवि-सुमित्रानन्द पन्त, कविता-‘ग्राम श्री’।
(ii) तेल से युक्त सुगन्ध सरसों के पीले-पीले फूलों से चारों ओर उड़ रही है।
(iii) इस पद्यांश में वसन्त ऋतु का चित्रण हुआ है।

3. पीले मीठे अमरूदों में अब,
लाल-लाल चित्तियाँ पड़ी।
पक गए सुनहरे मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ी ॥7॥

लहलह पालक, महमह धनिया,
लौकी और सेमफली फैली।
मखमली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली ॥8॥

बगिया के छोटे पेड़ों पर,
सुन्दर लगते छोटे छाजन।
सुन्दर गेहूँ की बालों पर,
मोती के दानों-से हिमकन ॥9॥

शब्दार्थ :
बगिया-वाग। हिमकन-बर्फ के ओस की बूंदें।

प्रसंग :
पूर्ववत्। इसमें कवि ने वसन्तकालीन वागों की सुन्दरता का उल्लेख करते हुए कहा है कि

व्याख्या :
इस समय बागों में लाल-लाल चित्तियों वाले पीले-मीठे अमरूद खिल रहे हैं। उधर सुनहले रंग वाली हुई बेर बहुत ही मधुर हो रही है और अँवली से पेड़ की डाल जड़ी हुई है। अब खेतों में पालक लहलहा रहे हैं, धनिया की महक चारों ओर फैल रही है। इसी प्रकार लौकी और सेमफली फैल रही है। लाल-लाल टमाटर मखमल की तरह सुन्दर लग रहे हैं तो मिरचों की सुन्दरता बड़ी हरी थैली की तरह दिखाई देती है। कवि का पुनः कहना है कि बागों के छोटे-छोटे पेड़ों पर जो छोटे-छोटे छाजन हैं, वे मन को छू रहे हैं। खेतों में फैली हुई गेहूँ की बालों पर पड़ी हुई ओस की बूंदें मोती के दानों के समान चमक रहे हैं।

विशेष :

  1. वसन्तकालीन खेतों और बागों की सजावट का चित्रण है।
  2. सरल शब्द हैं।
  3. चित्रात्मक शैली है।
  4. ‘मोती के दानों-से हिमकन’ में उपमा अलंकार है और लाल-लाल में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्य-बोध सम्बन्धित प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिये।
(iii) ‘मखमली टमाटर हुए लाल’ का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश में वसन्तकालीन प्रकृति का स्वाभाविक चित्रण किया गया है। इसके लिए कवि ने बागों में पक रहे फलों और खेतों में पक रही फसलों का यथार्थपूर्ण चित्रांकन किया है। इस प्रकार के ये दोनों चित्र कल्पना से रंगीन होकर यथार्थ से दूर नहीं हैं। इनसे उत्पन्न हुई सजीवता और बोधगम्यता इस पद्यांश को सार्थक बना रही है। इससे कवि का गहरा प्रकृति-प्रेम साफ-साफ प्रकट हो रहा है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य भाषा, शैली, अलंकार, बिम्ब, प्रतीक योजना आदि से सज्जित है। इस पद्यांश की भाषा सरल है, तो इसमें अनुप्रास, रूपक, उपमा आदि अलंकार हैं। तुकान्त शब्दावली का प्रयोग भावों को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए हैं।

(iii) ‘टमाटर’ की कोमलता और सुन्दरता को दर्शाने के लिए उन्हें मखमली कहना बड़ा ही सटीक लगता है। हरा से लाल होने पर भी टमाटर की कोमलता और सुन्दरता ज्यों-की-त्यों बनी रहती है, यह कवि का अनुभव बड़ा गहरा और सराहनीय है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में प्रकृति के किस विशेष रूप को चित्रित किया गया. है और क्यों?
उत्तर:
(i) कवि-सुमित्रानन्द पन्त, कविता-‘ग्राम श्री’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में कवि ने प्रकृति के वसन्तकालीन विशेष रूप को चित्रित किया है। प्रकृति का यह विशेष रूप सर्वाधिक आकर्पक, सरस और हृदयस्पर्शी है। ‘कवि ने इसे ही ध्यान में रखा है।

MP Board Solutions

4. प्रातः ओझल हो जाता जग,
भू पर आता ज्यों उतर गगन।
सुन्दर लगते फिर कुहरे,
उठते से खेत, बाग, गृह, वन ॥10॥

बालू के साँपों से अंकित,
गंगा की संतरंगी रेती।
सुन्दर लगती सरपत छाई,
तट पर तरबूजों की खेती ॥11॥

अँगुली की कंघी से बगुले,
कलंगी सँवारते हैं कोई।
तिरते जल में सरखाव,
पुलिन पर मगरौठी रहती सोई ॥12॥

मरकत-डिब्बे-सा खुला ग्राम,
जिस पर नीलम नभ आच्छादन।
निरुपम हिमांत में स्निग्ध-शान्त,
निज शोभा से हरता जन-मन ॥13॥

शब्दार्थ :
प्रातः-सुबह ओझल-छिप जाना, साफ न दिखाई देना। गगन-आसमान। कुहरे-ओस। सरपत-एक प्रकार का पौधा, झाड़ी। तट-किनारा। सुरखाव-एक पक्षी। मगरौठी-एक पक्षी। मरकत-नीलमणि। नभ-आकाश। आच्छादन-ढक्कन।

प्रसंग :
पूर्ववत्। इसमें कवि ने जाड़े के प्रातःकालीन दृश्य का चित्रांकन करते हुए कहा है कि

व्याख्या :
जाड़े की सुबह पड़ी हुई ओस से सारा ढका हुआ ऐसा लगता है, मानो धरती पर आसमान उतर आया है। कुहरे में खेत, बाग, घर और जंगल जगकर उठते हुए बहुत सुन्दर दिखाई देते हैं। गंगा नदी की रेत सात रंगों में सांपों से चिह्नित दिखाई देती है। उसके किनारे-किनारे तरबूजों की खेती सरपत से छाई हुई मन को अपनी ओर खींच लेती है।

कवि का पुनः कहना है कि सुबह-सुबह कहीं बगुले अपनी कलंगी सँवारते हुए ऐसे दिखाई देते हैं, मानो वे अपनी अंगुलियों से कंघी कर रहे हैं। कहीं सुरखाब पक्षी जल में तैर रहे हैं, तो कहीं किनारे पर मगरौठी पक्षी सोया हुआ दिखाई देता है। सुबह-सुबह नीलमणि के डिब्बे के समान गाँव खुला हुआ दिखाई देता है, अर्थात् सुबह-सुबह गाँवों की चंचलता दिखाई देती है। चूंकि पूरे गाँव को ओस ढके रहता है, जिससे उस पर आसमान का नीलापन बड़ा ही आकर्षक लगता है। उस समय उसकी जो शान्तिमय शोभा होती है, उस पर सारा जन-मन निछावर हो जाता है।

विशेष :

  1. प्रातःकालीन ओस से लिपटे गाँवों का चित्रांकन किया गया है।
  2. शैली वर्णनात्मक और चित्रात्मक दोनों है।
  3. उच्चस्तरीय शब्दों के प्रयोग हैं।
  4. मुख्य रूप से उपमा अलंकार है।
  5. अभिधा शब्द-शक्ति है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्य-बोध सम्बन्धित प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य लिखिए।
(iii) अँगुली की कंधी से बगुले, कलंगी सँवारते हैं कोई।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश में शीतकालीन सुबह का भावपूर्ण चित्रण है। रात की पड़ी हुई ओस से सारा ग्रामीण अंचल किस प्रकार सतरंगी होकर मन को छू रहा है, इसका आलंकारिक चित्र प्रस्तुत किया गया है। इससे आकाश का नीलापन धरती पर मानो उतर आया है। बगुले, सुरखाब और मंगरौठी का नदी के किनारे अलग-अलग दिखाई देना भी कम आकर्षक नहीं है। इस प्रकार सारा ग्रामीण अंचल ओस की बूंदों से ढका हुआ अपनी अद्भुत शोभा को बढ़ा रहा है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा मिश्रित शब्दों की है। उपमा, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, रूपक और मानवीकरण अलंकारों का चयन बड़े ही सटीक हैं । चित्रात्मक और वर्णनात्मक शैली के द्वारा शृंगार रस का प्रवाह अधिक सरस हो गया है। बिम्ब और प्रतीक यथास्थान प्रयुक्त हुए हैं।

(iii) अँगुली की कंघी से बगुले कलंगी सँवारते हैं कोई।’ का भाव-सौन्दर्य हृदयस्पर्शी है। बगुले का अपनी कलंगी को अपनी अंगुली रूपी कंघी से सँवारना मानवीय व्यापार की ओर संकेत कर रहा है। इसमें प्रयुक्त हुआ यह बिम्ब बड़ा ही सजीव और रोचक है। भावों को प्रस्तुत करने वाली भाषा की सहजता सराहनीय हैं।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का प्रमुख विषय क्या है?
(iii) प्रातः कौन किससे ओझल हो जाता है?
उत्तर:
(i) कवि-सुमित्रानन्द पन्त, कविता-‘ग्राम श्री’।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का प्रमुख विषय है-शीतकालीन सुवह का भावपूर्ण प्रकृति का चित्रांकन करना। इसको कवि ने विभिन्न प्रकार से आकर्षक बनाने का प्रयास किया है।
(iii) प्रातः संसार कहरे से ओझल हो जाता है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा (एकांकी, जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’)

प्रताप-प्रतिज्ञा पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रताप-प्रतिज्ञा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
महाराणा प्रताप का युद्ध किसके साथ और कहाँ हुआ?
उत्तर:
महाराणा प्रताप का युद्ध मुगल सम्राट अकबर के साथ हल्दी घाटी में हुआ था।

प्रश्न 2.
युद्ध-भूमि में महाराणा प्रताप को किस विकट स्थिति का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
युद्ध-भूमि में महाराणा प्रताप मुगल सेना से चारों ओर से घिर गए। उनके वास्से वे घायल हो गए। उनके शरीर से खून की धारा बहने लगी। तलवार चलाते-चलाते उनके दोनों हाथ थक गए। चेतक घोड़ा मृतप्राय हो गया। फिर भी उन्हें पागलों की तरह लड़ना पड़ा था।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
चन्द्रावत ने महाराणा को बचाने का क्या उपाय किया?
उत्तर:
चन्द्रावत ने महाराणा को बचाने के लिए उनकी तेजस्वी तलवार अपने हाथ में ले ली। फिर उनसे राजमुकुट लेकर अपने सिर पर धारण कर लिया। चन्द्रावत ने यह उपाय इसलिए किया ताकि अकबर की सेना उसे ही महाराणा प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े और राणा प्रताप युद्ध-भूमि से निकल जाने में सफल हो सकें।

प्रश्न 4.
शक्ति सिंह ने महाराणा प्रताप को मुगल सैनिकों से किस तरह बचाया?
उत्तर:
शक्ति सिंह ने महाराणा प्रताप को मुगल सैनिकों से बड़ी सावधानी से बचाया। उसने महाराणा प्रताप के घातक दोनों मुगल सैनिकों को मार डाला।

प्रताप-प्रतिज्ञा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
महाराणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए
उत्तर:
महाराणा प्रताप की निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताएँ हैं –

  1. जनता के प्रतिनिधि
  2. चित्तौड़ का उद्धारक
  3. संजीवनी शक्तिदाता
  4. प्रजा का विधाता
  5. स्वदेश की आशा
  6. महान वीर
  7. असाधारण योद्धा
  8. स्वाभिमानी और
  9. महान देश-भक्त।

प्रश्न 2.
शक्ति सिंह स्वयं को क्यों धिक्कारता है?
उत्तर:
शक्ति सिंह स्वयं को धिक्कारता है। यह इसलिए कि वह महाराणा प्रताप जैसे असाधारण योद्धा, देशभक्त, स्वाभिमानी और कर्तव्यनिष्ठ का भाई होकर देश का गद्दार है, स्वार्थी और पदलोलुप है।

प्रश्न 3.
महाराणा प्रताप ने चेतक के प्रति अपनी संवेदना किस प्रकार व्यक्त की?
उत्तर:
महराणा प्रताप ने चेतक के प्रति अपनी संवेदना इस प्रकार व्यक्त की-“चेतक! प्यारे चेतक! तुम राह ही में चल बसे। तुम्हारी अकाल मृत्यु देखने के पहले ही ये आँखें क्यों न सदा को मुँद गईं। मेरे प्यारे सुख-दुःख के साथी, तुम्हें छोड़कर मेवाड़ में पैर रखने को जी नहीं करता। शरीर का रोम-रोम घायल हो गया है, प्राण कण्ठ में आ रहे हैं, एक कदम भी चलना दूभर है, फिर भी इच्छा होती है कि तुम्हारे शव के पास दौड़ता हुआ लौट आऊँ, तुमसे लिपटकर जी भरकर रो लूँ और वहीं चट्टानों से सर टकरा-टकराकर प्राण दे दूँ। अपने प्राण देकर प्रताप के प्राण बचाने वाले मूक प्राणी! तुम अपना कर्तव्य पूरा कर गए, पर मैं संसार से मुँह दिखाने योग्य न रहा। हाय, मेरे पापी प्राणों से तुमने किस दुर्दिन में प्रेम करना सीखा था। चेतक, चेतक प्यारे चेतक!

प्रश्न 4.
शक्ति सिंह के स्वभाव में परिवर्तन क्यों आया?
उत्तर:
शक्ति सिंह के स्वभाव में परिवर्तन आया। उसने आँखें खोलकर मेवाड़ के वीरों का बलिदान देखा। उससे समझ लिया कि उसका अहंकार व्यर्थ है। उससे कई गुना वीरता, कई गुनी देशभक्ति और कई गुना त्याग मेवाड़ के एक-एक सैनिक के हृदय में हिलोरें ले रहा है।

प्रश्न 5.
एकांकी के आधार पर सच्चा सैनिक किसे कहेंगे?
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी के आधार पर सच्चा सैनिक हम चन्द्रावत को कहेंगे। ऐसा इसलिए कि उसने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। उसके इस त्याग-समर्पण से देश-भक्ति की सच्ची प्रेरणा मिलती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
प्रताप की बातें शक्ति सिंह को हृदयवेधक क्यों लगीं?
उत्तर:
प्रताप की बातें शक्ति सिंह को हृदयवेधक लगीं। यह इसलिए कि उसने स्वयं को पापी, कायर, पथ के भिखारी, रण से विमुख आदि कहा था।

प्रश्न 8.
एकांकी के विकास-क्रम को समझाते हुए उसकी परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
संस्कृत रूपक के दस भेदों में से पाँच (भाषा, व्यायोग, अंक, वीथी और प्रहसन) एक-एक अंक वाले रूपक हैं। पर संस्कृत के एकांकी रूपक आधुनिक एकांकी की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। शिल्प की दृष्टि से आधुनिक एकांकी पश्चिम की देन है। आधुनिक शैली का प्रथम एकांकी जयशंकर प्रसाद का ‘एक चूंट’ माना जाता है। यद्यपि प्रसाद से पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी विषय विषमौषधम्’, ‘धनंजय विजय’, ‘वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति’, ‘अन्धेर नगरी’ एकांकी लिखे हैं। परन्तु शिल्प की दृष्टि से वे संस्कृत के भाण, वीथी आदि एक अंक वाले रूपकों के अधिक समीप हैं। वर्तमान एकांकी-कला की कसौटी पर वे पूरे नहीं उतर सके। भुवनेश्वर तथा डॉ. रामकुमार वर्मा के एकांकी-क्षेत्र में उतरने से इनका विकास तथा विस्तार हुआ।

हिन्दी में आधुनिक ढंग के पहले एकांकीकार भुवनेश्वर हैं। उनका ‘कारवाँ’ एकांकी संग्रह 1935 में प्रकाशित हुआ। ‘कारवां’ में छः एकांकी हैं। इसका विषय प्रेम का त्रिकोण है। भुवनेश्वर के एकांकी पश्चिम से प्रभावित हैं। बर्नाड शॉ का उन पर प्रभाव है। एकांकीकार अपने एकांकियों में समस्याएँ उठाना जानता है, पर उनका समाधान वह प्रस्तुत नहीं कर सका। भुवनेश्वर में बौद्धिकता की प्रधानता है, भावुकता को वह विष मानते हैं। उनके एकांकियों में यथार्थ के नग्न चित्र हैं।

भुवनेश्वर के बाद हिन्दी एकांकीकारों में डॉ. रामकुमार वर्मा का नाम आता है। उनका पहला एकांकी है-‘बादल की मृत्यु’ इस एकांकी में कल्पना और काव्यमयता की अधिकता है। इसे ‘फेन्टेसी’ कहा जा सकता है। डॉ. वर्मा के एकांकियों की संख्या 100 के लगभग है, जो अलग-अलग एकांकी-संग्रहों में संकलित हैं। ‘पृथ्वीराज की आँखें’, ‘चारुमित्रा’, रेशमी टाई’, ‘सप्तकिरण’, ‘विभूति’, ‘दीपदान’, ‘रूपरंग’, ‘इन्द्रधनुष’, ‘ध्रुवतारिका’ आदि उनके एकांकी-संग्रह हैं। डॉ. वर्मा ने अधिकतर ऐतिहासिक और सामाजिक एकांकी लिखे हैं। ऐतिहासिक एकोकीकार के रूप में वह सबसे बड़े एकांकीकार हैं।

उदयशंकर भट्ट हिन्दी के एकांकीकारों में एकांकी-कला के प्रारम्भिक उन्नायकों में हैं। उनका पहला एकांकी-संग्रह ‘अभिनव एकांकी’ नाम से 1940 में प्रकाशित हुआ। भट्टजी के एकांकी मुख्य रूप से पौराणिक व सामाजिक हैं। ‘कालिदास’ आदि युग के एकांकी पौराणिक हैं तथा ‘स्त्री का हृदय’, ‘समस्या का अन्त’ आदि में सामाजिक एकांकी संगृहीत है। अपने पौराणिक एकांकियों में भट्टजी ने सामयिक समस्याओं की ओर भी संकेत किया है।

सेठ गोविन्ददास ने सामाजिक, राजनीतिक, पौराणिक, ऐतिहासिक आदि सभी प्रकार के एकांकी लिखे हैं। उनके एकांकी-संग्रह हैं- ‘स्पर्धा’, ‘सप्तरश्मि’, ‘एकादशी’, ‘पंचभूत’, ‘अष्टदल’ आदि। शिल्प की दृष्टि से सेठ जी ‘उपक्रम’ और उपसंहार’ आदि अपने एकांकियों में प्रयोग करते हैं। उन्होंने ‘मोनो-ड्रामा’ भी लिखे हैं। ‘चतुरपथ’ में ऐसे एकांकी हैं। ‘शाप और वर’, ‘अलबेला’ इनके प्रसिद्ध (मोनोड्रामा) नाटक हैं।

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के एकांकियों में मध्यवर्गीय समाज की समस्याएँ हैं। ‘लक्ष्मी का स्वागत’, ‘जोंक’, ‘अधिकार का रक्षक’ और ‘तौलिए’ इनके प्रसिद्ध एकांकी हैं। रंगमंच का सान ‘अश्क’ को हिन्दी एकांकीकारों में सबसे अधिक ख्याति प्राप्त है। उनके एकांकी गठन, प्रभाव तीव्रता और प्रवाह की दृष्टि से सफल हैं। विष्णु ‘प्रभाकर’ आधुनिक एकांकीकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। सामाजिक, राजनीतिक, हास्य-व्यंग्य प्रधान तथा मनोवैज्ञानिक सभी प्रकार के एकांकी विष्णु जी ने लिखे हैं, जिनमें ‘माँ’, ‘भाई’, ‘रहमान का बेटा’, ‘नया कश्मीर’, ‘मीना कहाँ है’ आदि प्रसिद्ध हैं।

जगदीश चन्द्र माथुर सामाजिक समस्याओं को लेकर एकांकी कला को सम्पन्न बनाने वाले कलाकार हैं। एकांकी-कला और रंगमंच का अध्ययन उनका गहरा है। ‘भोर का तारा’, ‘रीढ़ की हड्डी’, ‘उनके प्रसिद्ध एकांकी हैं। लक्ष्मीनारायण मिश्र के एकांकियों में बुद्धिवादिता, भारतीय-संस्कृति तथा समस्याएँ इन सभी का समावेश है। हरिकृष्ण प्रेमी के ‘मन-मन्दिर’ संग्रह के एकांकियों में गाँधीवादी आदर्श है। वृन्दावन लाल वर्मा के एकांकियों में यथार्थ और आदर्श का समन्वय है। इनके अतिरिक्त हिन्दी एकांकी कला की विकसित करने वाले रचनाकार हैं-सदगुरुशरण अवस्थी, गोविन्द बल्लभ पन्त, भगवती चरण वर्मा, लक्ष्मी नारायण लाल, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, प्रभाकर माचवे, नरेश मेहता, चिरंजीत आदि। इस प्रकार विकसित होती हुई आज रेडियो-रूपक, फेन्टेसी, मोनोड्रामा आदि रूपों में आगे बढ़ रही है।

एकांकी की परिभाषा:
कुछ आलोचक एकांकी को नाटक का लघु रूप मानते हैं। लेकिन यह बहुत हद तक सही नहीं है। वास्तव में नाटक और एकांकी दो भिन्न गद्य विधाएँ हैं। जिस नाटक की कथावस्तु केवल एक ही अंक में होती है, वह एकांकी नाटक कहलाता है।

प्रताप-प्रतिज्ञा भाव-विस्तार/पल्लवन

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
“भातप्रेम का निर्मल झरना, विद्वेष की शिला से नहीं रुकता।” इस पंक्ति का पल्लवन करें।
उत्तर:
भातृप्रेम का प्रवाह बड़ा ही पवित्र और स्वच्छ होता है। जब वह हृदय के उच्च शिखर से प्रवाहित होता है, तब उसमें बहुत बड़ा वेग होता है। वह वेग बड़ा ही स्वतन्त्र और अद्भुत रूप से आगे बढ़ने लगता है। वह अपने सामने आने वाले किसी विद्वेष रूपी चट्टान को छिन्न-भिन्न करके अपना रास्ता बना लेता है। चूंकि उसमें इतना ओज, उत्साह और प्रबल भाव भरा होता है, उसे किसी प्रकार हीन और तुच्छ भाव रूपी बाधाएँ सेकने में असमर्थ हो जाती हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि भातृप्रेम का निर्मल झरना, विद्वेष की शिला से कभी नहीं रुकता है।

प्रताप-प्रतिज्ञा भाषा – अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
प्राणों की बाजी लगाना, पीठ दिखाना, आँखें फाड़कर देखना; काँटों का ताज पहनना, नजर करना, दो के चार होना।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित सामासिक शब्दों के विग्रह कर समास का नाम लिखिए।
राजमार्ग, राजमुकुट, मुक्तिद्वार, प्रतिहिंसा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों की सन्धि विच्छेद कीजिए।
आहुति, नराधम, उत्सर्ग, निश्चय, शोकाकुल, स्वाधीनता, रणोन्मत्त, समरांगण।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा img3

प्रश्न 4.
निम्नलिखित विदेशी शब्दों के मानक हिन्दी शब्द लिखिए।
मगरूर, दोजख, यार, कैद, ईनाम, बुजदिल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा img 4

चालान क्र………………. – तृतीय प्रति
(बैंक हेतु)

माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश

यूको बैंक हबीबगंज, भोपाल – शाखा-मधुकुल परिसर
1. संख्या का मान्यता क्रमांक (कोड नं.) ………………………………………………………………………………………………………………………………
संख्या का नाम, स्थान एवं जिला ……………………………………………………………………………………………………………………………………….
………………………………………………………………………………………………………………………………..
2. छात्र का नाम………………………………………….. परीक्षा का नाम ………………………………………….. वर्ग ……………………………………….
अनुक्रमांक …………………………………………………….केन्द्र क्रमांक ……………………………………………………………………………………………..
……………………………………………………………………………………………………………………………….

परीक्षा का नाम – (संबंधित परीक्षा के नाम पर सही का चिह्न लगाएं)

  1. हाईस्कूल/हायर सेकेण्डरी/हा.सं. व्यावसायिक पाठ्यक्रम नियमित/स्वाध्यायी मुख्य पूरक परीक्षा
  2. हाईस्कूल/हायर सेकेण्डरी/पत्राचार पाठ्यक्रम/मुख्य/पूरक परीक्षा
  3. डिप्लोमा इन एजूकेशन (नियमित/पत्राचार, प्रथम/द्वितीय वर्ग) मुख्य/पूरक परीक्षा
  4. पूर्व प्राथमिक प्रशिक्षण नियमित/स्वाध्यायी मुख्य/पूरक परीक्षा
  5. शारीरिक प्रशिक्षण (नियमित/स्वाध्याय) मुख्य/पूरक परीक्षा
  6. अन्य ……………………………………………………………………………………………………………..

शुल्क का विवरण मद विवरण

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा img4
छात्रों द्वारा फीस भरने हेतु शीर्ष:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा img5
योग –
राशि शब्दों में ………………………………………………………………………………………………………………………………
(जमाकर्ता के हस्ताक्षर)
………………………………………………………………………………………………………..
(बैंक उपयोग हेतु)
बैंक कोड……………………….. – दिनांक ………………..
माध्यमिक शिक्षा मंडल के खाते में राशि रु ……………. जमा की।

प्रताप-प्रतिज्ञा योग्यता विस्तार – हस्ताक्षर/सील।

प्रश्न 1.
‘प्रताप प्रतिज्ञा’ एकांकी को कहानी रूप में लिखिए?
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 2.
अपने आस-पास के उन वीरों के नामों की सूची बनाइए जिन्होंने देशभक्ति हेतु प्राणोत्सर्ग किया है।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले एकांकी/नाटक तथा रेडियो पर प्रसारित रूपक में क्या अन्तर परिलक्षित होता है? दोनों की प्रभावशीलता का विश्लेषण कर अपनी लिखित प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 4.
चालान फार्म को चार प्रतियों में भरा जाता है यहाँ चालान की तृतीय प्रति (बैंक हेतु) भरने को दी जा रही है। शेष तीन प्रतियाँ किस-किस के लिए होती हैं बैंक जाकर मालूम कीजिए तथा चालान आवेदन-पत्र एकत्रित कीजिए।
चलान फार्म-
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रताप-प्रतिज्ञा परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रताप-प्रतिज्ञा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ एकांकी में प्रस्तुत पात्रों और गौण पात्रों को बताइए।
उत्तर:
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ एकांकी में प्रस्तुत प्रमुख पात्र हैं-चन्द्रावत, महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह। – गौण पात्र हैं-दो मुगल सरदार।

प्रश्न 2.
चन्द्रावत ने महाराणा प्रताप से क्या माँगा?
उत्तर:
चन्द्रावत महाराणा प्रताप से राजमुकुट और तलवार माँगा।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
महाराणा प्रताप ने क्या कहकर शक्ति सिंह को क्षमा किया?
उत्तर:
जब शक्ति सिंह ने महाराणा प्रताप से क्षमा माँगी तो प्रताप ने यह कह कर उसे क्षमा कर दिया-“क्षमा! क्षमा कैसी भाई! भ्रातृप्रेम का निर्मल झरना विद्वेष की शिला से नहीं रुक सकता। तुम्हारे एक ‘भैया’ सम्बोधन पर लाखों क्षमा निछावर हैं। भाई पुकारो तो शक्ति, पुकारो तो ‘भैया’, एक बार मुझे फिर प्यार से भैया कहकर पुकारो तो।

प्रताप-प्रतिज्ञा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेवाड़ का सर्वनाश किस प्रकार निकट आ गया था?
उत्तर:
मेवाड़ का सर्वनाश निकट आ गया था। स्वतन्त्र मेवाड़ का सौभाग्य सूर्य अस्त होने लगा था। ऐसा इसलिए कि मुगल सेना मेवाड़ के चारों ओर छा गई थी। बीच में अकेले बलिदानी वीर महाराणा प्रताप प्राणों की बाजी लगाकर दोनों हाथों से तलवार चला रहे थे। वे घायल हो गए थे। उनके शरीर से खून की धारा निकल रही थी। तलवार चलाते-चलाते वे बुरी तरह से थक गए थे। उनका घोड़ा चेतक मृतप्राय हो गया था। हजारों नरमुण्डों से हल्दीघाटी पाट देने पर भी विजय की आशा व्यर्थ हो गई थी।

प्रश्न 2.
चन्द्रावत ने अपनी मातृभूमि मेवाड़ के प्रति अपना सच्चा और पवित्र प्रेमभाव किस प्रकार व्यक्त किया?
उत्तर:
चन्द्रावत ने अपनी मातृभूमि मेवाड़ के प्रति इस प्रकार अपना सच्चा और पवित्र प्रेमभाव व्यक्त किया-“चित्तौड़! जन्मभूमि! प्रणाम! तुम्हारा यह तुच्छ सेवक आज विदा लेता है। माँ, जीते जी तुम्हें स्वतन्त्र न देख सका, अब मरकर देखने की अभिलाषा है। अपने भग्नावशेषों के हाहाकारमय स्वर से एक बार आशीर्वाद दो, माँ हँसते-हँसते मरने की शक्ति प्रदान करो। जीवन के अन्तिम क्षणों में कर्त्तव्य-पालन करने का अवसर दो। जिस राजमुकुट को इन हाथों ने तुम्हारे हित के लिए, विलासी जगमल के सिर से उतारा था, उसी को ये फिर, तुम्हारे ही हित के लिए वीरवर प्रताप के मस्तक से उतारेंगे। तुम्हारे सम्मान की रक्षा के लिए आशालता को कुचलने से बचाने के लिए-आज महाराणा प्रताप के बदले यह चन्द्रावत प्राणों की आहुति देगा।”

प्रश्न 3.
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ एकांकी के मुख्य भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ महान एकांकीकार जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ की एक आदर्शवादी एकांकी है। इसमें महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच हल्दी घाटी के भयंकर युद्ध का उल्लेख किया गया है। इसके लिए एकांकीकार ने चन्द्रावत, महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह इन तीन प्रमुख पुरुष पात्रों का चयन किया है, तो दो मुगल सैनिकों को गौण पुरुष पात्रों के रूप में लिया है। इन पात्रों के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष को मार्मिक रूप में चित्रित करने का सुन्दर प्रयास किया है।

इसमें बाहरी द्वन्द्व को मुख्य स्वर देकर उससे मानसिक विक्षोभ को सामने लाने की पूरी कोशिश की है। हम देखते हैं कि चन्द्रावत का अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देना देश-भक्ति की प्रेरणा देता है। यह भी हम देखते हैं कि महाराणा प्रताप की अटल देश-भक्ति के लिए मरते दम तक वीरतापूर्ण कदम उठाने से शक्तिसिंह की प्रतिशोध की दुर्भावना भातृत्व प्रेम में बदल कर देश-भक्ति का गान।

प्रताप – प्रतिज्ञा लेखक – परिचय

प्रश्न 1.
श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
हिन्दी के एकांकीकारों में श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ का स्थान प्रमुख है। उनका जन्म सन् 1907 ई. में मध्य-प्रदेश के मुरार ग्वालियर में हुआ था। उनकी आरम्भिक शिक्षा स्थानीय विद्यालयों में हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के लिए काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया। वहाँ से आपने साहित्य, इतिहास, राजनीति और अर्थशास्त्र का गहरा अध्ययन-मनन किया।

‘मिलिन्द’ जी ने अपने स्वाध्याय से भी अनेक भाषाओं का अध्ययन-मनन किया। उन्होंने अपने स्वाध्याय से जिन भाषाओं का अध्ययन-मनन किया, उनमें हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी के अतिरिक्त उर्दू, मराठी, बंगला और गुजराती प्रमुख हैं। इन भाषाओं के अध्ययन-मनन के पश्चात उन्होंने विश्वभारती, शान्ति निकेतन और महिला आश्रम, वर्धा में अध्यापन का कार्य किया।

रचनाएँ:
‘मिलिन्द’ जी की रचनाओं में विविधता है। उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं –

  1. काव्य-संग्रह-‘जीवन-संगीत’, ‘नवयुग के गान’, ‘बलिपथ’ के गीत, ‘भूमि की अनुभूति’ और ‘मुक्तिका’।
  2. निबन्ध संग्रह-‘चिन्तन कण’ और ‘सांस्कृतिक प्रश्न’।
  3. व्यंग्य विनोद कथा-संग्रह-‘बिल्लो का नखछेदन’।
  4. नाट्य-कृतियाँ-‘समर्पण’, ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ और ‘गौतम नन्द’।

महत्त्व:
चूंकि ‘मिलिन्द’ जी बहुमुखी प्रतिमा-सम्पन्न साहित्यकार हैं, इसलिए उनका साहित्यिक योगदान उल्लेखनीय है। उनके साहित्य का प्रमुख स्वर देश-भक्ति और देश-प्रेम है। इस दृष्टि से भी आपका स्थान प्रतिष्ठित साहित्यकारों में से एक है। फलस्वरूप आने वाली साहित्यिक अभिरुचि की पीढ़ी आपसे दिशाबोध प्राप्त करती रहेगी।

प्रताप-प्रतिज्ञा पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ लिखित एकांकी ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ लिखित एकांकी ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच हल्दीघाटी युद्ध पर आधारित है। इसमें तीन प्रमुख पात्रों चन्द्रावत, प्रताप और शक्ति सिंह एवं दो गौण पुरुष पात्रों (दो मुगल सरदारों) के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष को चित्रित किया गया है। चन्द्रावत प्रताप सिंह की वीरता का उल्लेख तो कर रहा है, लेकिन उसे मेवाड़ का सौभाग्य सूर्य अस्त होता हुआ दिखाई दे रहा है। उसी समय एक सभासद आकर महाराणा प्रताप के घायल होने का समाचार सुनाता है। चन्द्रावत उसे राजा के साथ मर-मिटने का आदेश देकर चित्तौड़ के प्रति अपनी देश-भक्ति की भावना को प्रकट करता है।

वह उससे आशीर्वाद माँगता है कि वह उसे हँसते-हँसते उसकी सेवा में मर-मिटने की शक्ति प्रदान करे। यह भी कि वह उसे ऐसा साहस दे कि वह महाराणा प्रताप के बदले अपने प्राणों की आहुति दे सके। उसी समय प्रताप आकर अपने प्राणों के बलिदान करने की घोषणा करता है। चन्द्रावत उसे समझाता है कि उसके प्राण इतने सस्ते नहीं हैं। उनमें संजीवनी शक्ति है। वह प्राणों का बलिदान न करें। उसके स्थान पर वह और सरदारों के साथ मर-मिटेगा। प्रताप उसे समझाता है कि वह उसे ऐसा नहीं करने देगा। वह युद्ध में पीठ दिखाकर कलंक का टीका नहीं लगने देगा। चन्द्रावत अपनी बात को दोहराता है कि वह उससे हठ न करें। उसके हठ से अखण्ड मेवाड़ पराधीन हो जाएगा।

लेकिन प्रताप उसकी एक नहीं सुनता है। वह वहाँ से बड़ी तेजी से निकल जाता है। चन्द्रावत ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसको रक्षा करे। शक्ति सिंह आकर घोर युद्ध का उल्लेख करता है कि किस प्रकार से मुगलों ने चन्द्रावत को महाराणा समझकर चारों ओर से घेर लिया है। फिर उसे मार डाला है। उसे स्वयं पर अफसोस है कि वह मेवाड़ के काम नहीं आया। उसी समय दो मुगलों का प्रवेश होता है। दोनों परस्पर बातें करते हैं। फिर प्रताप को मारकर अपने शाहजादा साहब से इनाम लेने की बात करते हुए वहाँ से प्रस्थान करते हैं। उसके बाद शक्ति सिंह आकर स्वयं से कुछ कर गुजरने की बात कहता है।

पट परिवर्तन होता है। प्रताप अकेले शोकाकुल बैठे हैं। चेतक के चले जाने पर अफसोस प्रकट करते हैं। विकल होकर आँखें मूंद लेते हैं। इसके बाद दोनों मुगलों का प्रवेश होता है। दोनों परस्पर बातें करते हैं। दोनों पर प्रताप अपने वार की नाकामी पर अफसोस प्रकट करते हैं। उसी समय शक्ति सिंह आकर उन दोनों का काम तमाम कर देता है। फिर वह प्रताप को ‘महाराणा प्रताप सिंह’ शब्द से सम्मानपूर्वक पुकारता है। प्रताप आँखें खोलते हैं। शक्ति सिंह को देखकर चकित होते हैं। उससे वह पूछते हैं कि क्या वह बदला लेना ही चाहता है, तो ठीक है। आओ, और इस अन्त समय प्यारी मेवाड़ी कटारी भोंक दो। बड़ी शान्ति से मरूँगा, जल्दी करो। देर हो रही है। इसे सुनकर शक्ति सिंह कहता है-बज्रपात है भैया! कौन कहता है प्रताप कायर है। प्रताप तो वीरों का आदर्श है। भारत का अभिमान है। राजस्थान की शान है।

इसे सुनकर प्रताप चकित होता है। शक्ति सिंह अपने दुर्भाग्य पर अफसोस करता है कि वह मेवाड़ को भूलकर भारतीयता को खो बैठा था। उसे अब उसके अपराधों का फल अवश्य मिलना चाहिए। इससे ही उसकी आत्मा को शान्ति मिलेगी। वह उसके लिए देवता है। वह प्रताप को भैया कहते हुए पुनः कहता है-“भैया! क्या तुम मुझे क्षमा न करोगे? मेवाड़ को फिर एक बार बड़े प्यार से माँ कहने का अधिकार न दोगे?” इसे सुनकर प्रताप का भातृप्रेम का झरना फूट पड़ता है। वह कहता है कि उसके ‘भैया’ सम्बोधन पर लाखों क्षमा निछावर हैं। एक बार मुझे फिर प्यार से भैया कहकर पुकारो तो। शक्ति उसके पैरों पर ‘भैया, भैया मेरे’ कहकर गिर पड़ता है। बरसों बाद दोनों गले मिलते हैं।

MP Board Solutions

प्रताप-प्रतिज्ञा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
आ! काँटों के ताज! संकट के स्नेही! मेवाड़ के राजमुकुट ! आ! तुझे आज एक तुच्छ सैनिक धारण कर रहा है। इसलिए नहीं कि तू वैभव का राजमार्ग है बल्कि इसलिए कि आज तू देश पर मर मिटने वालों का मुक्तिद्वार है। आ! मेरी साधना के अन्तिम साधन! इस अवनत मस्तक को माँ के लिए कट-मरने का गौरव प्रदान कर।

शब्दार्थ:

  • तुच्छ – छोटा।
  • वैभव – सम्पत्ति, धन।
  • राजमार्ग – सड़क।
  • अवनत – झुकाव हुआ।
  • गौरव – मर्यादा, महत्त्व, प्रतिष्ठा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिन्दी समान्य भाग-1’ में संकलित तथा जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ द्वारा लिखित एकांकी ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ शीर्षक से है। इसमें लेखक ने चन्द्रावत् के द्वारा राजमुकुट हाथ में लेते हुए कथन पर प्रकाश डालना चाहा है।

व्याख्या:
लेखक का कहना है कि जब प्रताप कुर्ती से तलवार मुकुट रखकर चला जाता है, तब उसे चन्द्रावत बड़े प्रेम और आदर के साथ हाथ में ले लेता है। फिर वह कहता है–हे राजमुकुट! वैसे तो तुम काँटों के ताज हो, फिर भी संकट के समय एक सच्चे प्रेमी की तरह साथ निभाते हो। वास्तव में तुम मेवाड़ के राजमुकुट हो। इसलिए तुम्हारा महत्त्व असाधारण है। तुम्हें धारण करने की योग्यता मुझ जैसे तुच्छ सैनिक में नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें धारण कर रहा हूँ। मैं तुम्हें इसलिए नहीं धारण कर रहा हूँ कि तुम वैभव का राजमार्ग हैं।

मैं तो तुम्हें इसलिए धारण कर रहा हूँ कि तुम्हीं देश की आन-बान पर अपने प्राणों को न्यौछावर कर देने वालों के लिए मुक्तिदाता स्वरूप हो। इसलिए अब तुम मुझे अपना लो। मेरी युद्ध-साधना के तुम्ही एकमात्र आधार हो। तुम्ही एकमात्रं साधन हो। अब तुम मेरे इस झुके हुए मस्तक को मेरी मातृभूमि मेवाड़ की रक्षा के लिए मर-मिटने का महत्त्व प्रदान कर दो। तुमसे मेरी यही प्रार्थना है और यही उम्मीद है।

विशेष:

  1. मेवाड़ के राजमुकुट का असाधारण महत्त्व बतलाया गया है।
  2. मातृभूमि की महिमा को अधिक सम्मान दिया गया है।
  3. वीर रस की प्रभावशाली धारा प्रवाहित हुई है।
  4. भाषा-शैली में ओज और प्रभाव है।
  5. वर्णनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में किसका कथन किसके प्रति है?
  2. चन्द्रावत के मनोभाव किस प्रकार के हैं?

उत्तर:

  1. प्रस्तुत गद्यांश में मेवाड़ के वीर सैनिक चन्द्रावत का मेवाड़ के राजमुकुट के प्रति है।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रावत के मनोभाव बड़े ही आकर्षक और असाधारण हैं। उसके मनोभाव निरभिमानी, उदात्त, शिष्ट, विनम्र, आत्मीय और पवित्र हैं। इसलिए वे प्रेरक, हृदयस्पर्शी और भाववर्द्धक हैं।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में मेवाड़ के राजमुकुट की कौन-कौन-सी विशेषताएँ बतलायी गई हैं।
  2. प्रस्तुत गद्यांश से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर:

1. प्रस्तुत गद्यांश में मेवाड़ के राजमुकुट की कई आकर्षक विशेषताएँ बतलायी, गई हैं –

  • काँटों का ताज
  • देश पर मर-मिटने वालों का मुक्तिद्वार, और
  • साधना का अन्तिम साधन।

2. प्रस्तुत गद्यांश से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। देश की आजादी के खतरे में पड़ने पर हमें उसकी रक्षा के लिए बिना किसी संकोच के अपने तन, मन और धन को तुरन्त न्यौछावर कर देना चाहिए।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
तुम्हारी अकाल मृत्यु देखने के पहले ही ये आँखें क्यों न सदा को मुँद गईं। मेरे प्यारे सुख-दुःख के साथी, तुम्हें छोड़कर मेवाड़ में पैर रखने को जी नहीं करता। शरीर का रोम-रोम घायल हो गया है, प्राण कण्ठ में आ रहे हैं, एक कदम भी चलना भर है, फिर भी इच्छा होती है कि तुम्हारे शव के पास दौड़ता हुआ लौट आऊँ, तुमसे लिपटकर जी भरकर रो लूँ और वहीं चट्टानों से सर टकराकर प्राण दे दूँ। अपने प्राण देकर प्रताप के प्राण बचाने वाले मूक प्राणी! तुम अपना कर्त्तव्य पूरा कर गए, पर मैं संसार से मुँह दिखाने योग्य न रहा! हाय, मेरे पापी प्राणों से तुमने किस दुर्दिन में प्रेम करना सीखा था। चेतक, चेतक, प्यारे चेतक! (विकल हाकर आँखें मूंद लेते

शब्दार्थ:

  • अकाल मृत्यु – असमय मृत्यु।
  • मुँद गईं – बन्द हो गईं।
  • जी – मन।
  • रोम-रोम – प्रत्येक अंग।
  • कण्ठ में आना – निकल जाना।
  • दूभर – कठिन।
  • मूक – बेजबान।
  • दुर्दिन – बुरे दिन।

प्रसंग:
पूर्ववत् । इसमें लेखक ने राणा प्रताप के द्वारा अपने प्राणप्रिय चेतक के मर-मिटने पर विलाप किए जाने का उल्लेख किया है।

व्याख्या:
चेतक के मर-मिटने पर राणा प्रताप अपने को असहाय और अकेला समझकर विलाप कर रहा है। वह चेतक को सम्बोधित करते हुए कह रहा है कि तुम्हारे असमय चले जाने पर मेरी आँखें पहले ही क्यों नहीं बन्द हो गईं। अगर वे पहले ही बन्द हो गई होती तो मैं इतना दुःखी और विकल नहीं होता। इसलिए हे मेरे प्राण प्यारे चेतक! तुम्हीं तो मेरे हर दुःख-सुख के साथी और सहभागी थे। अब तुम्हारे सिवा मेरा और कोई नहीं है। इसलिए अब मैं मेवाड़ में नहीं जाना चाहता हूँ। तुम्हारे जाने के बाद मेरा पूरा शरीर थककर चूर हो गया है।

वह किसी प्रकार से कोई भी दुःख सहने योग्य नहीं रह गया है। लगता है कि अब मैं और नहीं जी पाऊँगा। अब तो मैं चलने-फिरने में भी असमर्थ हूँ। ऐसा होने के बावजूद अभी मेरे अन्दर तुम्हारे शव को देखने की ललक है। इसके लिए भीतर-ही-भीतर मेरी इच्छा उमड़ रही है। मेरा जी चाहता है कि तुम्हारे शव से लिपटकर जी भर आँसू बहाऊँ। रो-रोकर अपने पाश्चात्ताप को प्रकट करूँ। यही नहीं, यह भी जी करता है कि अपने सिर को किसी चट्टान से फोड़ डालूँ ताकि कुछ समय तक तो शान्ति मिल सके। प्रताप का पुनः कहना है-हे चेतक! तुमने प्राणों की बलि देकर अपने कर्तव्य को पूरा कर लिया है, लेकिन मैं तो इस संसार में किसी के सामने अपना मुँह दिखलाने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ।

यह इसलिए कि तुमने अपनी वीरता दिखाते हुए सदैव याद करने योग्य मृत्यु को प्राप्त कर लिया है। दूसरी ओर मैं बुजदिल बनकर अपने किए पर लज्जित हूँ। इसलिए अपने को छिपाकर रखना ही एकमात्र विकल्प समझ रहा हूँ। वास्तव में मैं पापी और अधम कोटि का हूँ। फिर भी मुझे यह नहीं समझ में आ रहा है कि तुमने मुझे क्यों महत्त्व दिया। मुझमें तुझे कौन-सी अच्छाई दिखाई दी थी। यह मैं सच्चे मन से कह रहा हूँ। इसे तुम जहाँ भी हो, मेरे प्राण चेतक सुन लो।

विशेष:

  1. प्रताप का अपने प्राण प्यारे चेतक के प्रति अनन्य भाव व्यक्त हुए हैं।
  2. प्रताप का आत्मकथन में सच्चाई और विश्वसनीयता है।
  3. भाव हृदयस्पर्शी है।
  4. भाषा सरल है।
  5. काव्य रस का संचार है।
  6. शैली भावात्मक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में किसका कथन किसके प्रति है और क्यों?
  2. चेतक की विशेषताओं को लिखिए।
  3. प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?

उत्तर:

1. प्रस्तुत गद्यांश में राणा प्रताप का कथन चेतक के प्रति है। यह इसलिए कि चेतक उनका प्राणप्रिय घोड़ा था। उसके समाप्त होने पर राणा प्रताप अपनी व्यथा को प्रकट किए बिना नहीं रह सके थे।

2. चेतक की कई विशेषताएँ थीं, जैसे

  • सुख-दुख का साथी
  • महान वीर
  • देशभक्त और स्वामिभक्त
  • कर्त्तव्यनिष्ठ, और
  • महान प्रेमी व आत्मीय।

3. प्रस्तुत गद्यांश का मुख्य भाव है-राणा प्रताप के प्राणप्रिय घोड़ा चेतक की अच्छाइयों पर प्रकाश डालना।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. मेवाड़ में किसका क्या नहीं करने का जी करता?
  2. चेतक के चले जाने पर राणा प्रताप की दशा कैसी हो गई है?
  3. राणा प्रताप की क्या इच्छा होती है?

उत्तर:

  1. मेवाड़ में राणा प्रताप का पैर रखने को जी नहीं करता।
  2. चेतक के चले जाने पर राणा प्रताप की दशा बड़ी दयनीय और निराशाजनक हो गई है। उनका रोम-रोम घायल हो गया है। उनके प्राण कण्ठ में आ रहे हैं। उन्हें एक कदम चलना कठिन हो गया है।
  3. राणा प्रताप की इच्छा होती है कि वह अपने प्राणप्रिय घोड़े चेतक के शव के पास दौड़ते हुए लौट आवें। उससे लिपटकर जी भरकर आँसू बहाएं। वहीं पर किसी चट्टान से अपने सिर को टक्कर मारकर मर जाएँ।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
आँखें खोलकर मेवाड़ी वीरों का बलिदान देखने से इस युद्ध ने कान मलकर मुझे बता दिया कि मेरा अहंकार व्यर्थ है। मुझसे कई गुनी वीरता, कई गुनी देशभक्ति और कई गुना त्याग मेवाड़ के एक-एक सैनिक के हृदय में हिलोरें ले रहा है। और आप! आप तो देव हैं भैया। मेवाड़ के सौभाग्य से यहाँ जन्म लेने आए हैं। आपकी यह क्षत-विक्षत देह और प्राणों की ममता छोड़कर भीषण संग्राम। आश्चर्य होता है भैया, और श्रद्धा उमड़ पड़ती थी। इच्छा होती थी कि तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर समरांगण में सदा के लिए वीरों की नींद सोया जाए। भैया, क्या तुम मुझे क्षमा न करोगे? मेवाड़ को फिर एक बार बड़े प्यार से माँ कहने का अधिकार न दोगे? भैया, मुझे क्षमा करो।

शब्दार्थ:

  • बलिदान – त्याग।
  • कान मलकर बताना – बिल्कुल साफ-साफ कहना।
  • अहंकार – घमण्ड।
  • व्यर्थ – बेकार।
  • देव – देवता।
  • क्षत – विक्षत – घायल।
  • देह – शरीर।
  • ममता – लगाव।
  • भीषण – भयंकर।
  • संग्राम – युद्ध।
  • समरांगण – युद्धभूमि।

प्रसंग:
पूर्ववत्। प्रस्तुत गद्यांश में महाराणा प्रताप के शक्ति सिंह के आत्मपश्चात्ताप का उल्लेख किया गया है। शक्ति सिंह घायल राणा प्रताप के सामने आत्मपश्चात्ताप प्रकट करते हुए कह रहा है कि –

व्याख्या:
इस हल्दीघाटी के युद्ध में मुझे यह बड़ा ही स्पष्ट ज्ञान हो गया है कि मेरा घमण्ड निराधार है। मैं कुछ भी नहीं हूँ। मुझसे मेवाड़ का एक-एक सैनिक बहुत बड़ा वीर, देश-भक्त और त्यागी है। मुझमें तो कुछ भी वीरता, देश-भक्ति और प्राणों को न्यौछावर करने की भावना नहीं है, जबकि मेवाड़ के एक-एक सैनिक का हृदय इस प्रकार के पवित्र और महान भावों से भरा हुआ है।

शक्ति सिंह ने राणा प्रताप के प्रति अपने आत्मीय, पवित्र और उच्च भावों को रखते हुए कहा-भैया! आप तो हमारे लिए देवता समान हैं। आपका मेवाड़ में जन्म लेना मेवाड़ के लिए बड़े ही सौभाग्य और गौरव की बात है। जब-जब मैं आपको घायल होते हुए घनघोर युद्ध में अपने प्राणों की तनिक परवाह किए बिना देखता था, तब-तब मुझे घोर आश्चर्य होता। उससे मुझे अपार श्रद्धा की भावना आपके प्रति बढ़ जाती थी। फिर मेरी यही हार्दिक इच्छा होती थी कि काश! आपके चरणों पर अपने सिर को रखकर इस युद्ध-भूमि में एक सच्चे वीर की तरह अपने प्राणों का बलिदान कर दूं। इसलिए अब मुझे एक ही ललक और जिज्ञासा है कि क्या आप मुझे अपनी जन्मभूमि मेवाड़ को. माँ कह लेने को एक बार मौका नहीं देंगे। इसी प्रकार क्या आप मुझे अपना छोटा समझकर मेरी गलतियों को क्षमा नहीं कर देंगे।

विशेष:

  1. शक्ति सिंह का आत्मपश्चात्ताप प्रेरक रूप में है।
  2. देश-भक्ति की प्रबलधारा है।
  3. वीर रस का सुन्दर प्रवाह है।
  4. शैली सुबोध है।
  5. वाक्य-गठन भाववर्द्धक रूप में है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में किसका कथन किसके प्रति ही?
  2. प्रस्तुत गद्यांश के मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
  3. शक्ति के कथन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर:

  1. प्रस्तुत गद्यांश में शक्ति सिंह का कथन राणा प्रताप के प्रति है।
  2. प्रस्तुत गद्यांश का मुख्य भाव है-शक्ति सिंह का राणा प्रताप के प्रति भातृत्व प्रेम को प्रकट करना।
  3. शक्ति सिंह के कथन का मुख्य उद्देश्य यही है कि राणा प्रताप उसे अपने भाई के रूप में पहले की तरह अपनाकर उसकी गलतियों को क्षमा कर दें।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी  (कहानी, मुंशी प्रेमचन्द)

दो बैलों की कथा-कहानी पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

दो बैलों की कथा-कहानी लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
झूरी के बैल किस नस्ल के थे?
उत्तर:
झूरी के बैल पछाई नस्ल के थे।

प्रश्न 2.
झूरी ने गोई को कहाँ भेज दिया?
उत्तर:
झूरी ने गोई को ससुराल भेज दिया।

प्रश्न 3.
झूरी की ससुराल जाते समय बैलों ने क्या समझा?
उत्तर:
झूरी की ससुराल जाते समय बैलों ने यह समझा कि मालिक ने उन्हें बेच दिया है।

प्रश्न 4.
गोई को ले जाते समय गया को पसीना क्यों आ गया?
उत्तर:
गोई को ले जाते समय गया को पसीना आ गया। यह इसलिए कि वे वहाँ जाना नहीं चाहते थे। अगर गया उन्हें पीछे से हाँकता तो वे दोनों इधर-उधर, भागने लगते थे। पगहिया पकड़कर आगे खींचने पर पीछे की ओर जाने लगते थे। मारने पर वे दोनों मुंह नीचे करके हँकारने लगते थे।

प्रश्न 5.
गया के घर जाकर दोनों बैलों ने नाँद में मुँह क्यों नहीं डाला?
उत्तर:
गया के घर जाकर दोनों बैलों ने नाँद में मुँह नहीं डाला। यह इसलिए कि उनका अपना घर छूट गया था। यह तो पराया घर था। वहाँ के लोग उन्हें बेगाने लग रहे थे। उन्हें वहाँ का खाना-पीना और रहना तनिक भी रास नहीं आया।

प्रश्न 6.
‘क’ स्तम्भ में पात्रों के नाम और ‘ख’ स्तम्भ में कथन दिए गए हैं-पात्रों के साथ सही कथन जोडिए?
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी img-1
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी img-2

MP Board Solutions

दो बैलों की कथा-कहानी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
झूरी के घर प्रातःकाल लौटे-बैलों का किसने स्वागत किया? और कैसे प्रातःकाल झूरी के घर वापस आने पर बैलों का स्वागत किस प्रकार किया गया?
उत्तर:
प्रातःकाल लौटे बैलों को देखकर झूरी गद्गद हो गया। दौड़कर उसने उन्हें गले लगा लिया। फिर वह उन्हें चूमने लगा। झूरी के घर प्रातःकाल लौटे बैलों का घर और गाँवों के लड़कों ने तालियाँ बजा-बजाकर स्वागत किया। उनमें से किसी ने अपने घरों से रोटियाँ लाकर खिलाया तो किसी ने गुड़। इसी प्रकार किसी ने चोकर लाकर दिया तो किसी ने भूसी। इस प्रकार उन्होंने उन दोनों बैलों का बड़े ही स्नेहपूर्वक स्वागत किया।

प्रश्न 2.
गया के घर से भाग आने पर बैलों के साथ कैसा व्यवहार किया गया?
उत्तर:
गया के घर से भाग आने पर बैलों के साथ झूरी की पत्नी ने बड़ा ही दुर्व्यवहार किया। उसने उन्हें खली और चोकर देना बन्द कर दिया। उसने यह निश्चय कर लिया कि वह अब उन्हें सूखे भूसे के सिवा और कुछ नहीं देगी। वे खाएँ या मरें। उसने मजूर को बड़ी ताकीद कर दी कि वह बैलों को खाली सूखा भूसा ही दे। इस प्रकार उनके प्रति बड़ी बेरहमी की गई।

प्रश्न 3.
दोनों बैलों ने आजादी के लिए क्या-क्या प्रयास किए?
उत्तर:
दोनों बैलों ने आजादी के लिए निम्नलिखित प्रयास किए-

  1. दो-चार बार गाड़ी को सड़क की ख़ाई में गिराना चाहा।
  2. हल में जोतने पर जैसे पाँव उठाने की कसम खा ली थी। गया मारते-मारते थक गया, लेकिन उन्होंने पाँव न उठाया।
  3. हीरा की नाक पर जब गया ने खूब डण्डे बरसाए तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। वह हल लेकर ऐसा भागा कि उससे हल, रस्सी, जुआ, जोत सब टूट-टाटकर बरावर हो गया।
  4. एक दिन चुपके से भैरो की लड़की के द्वारा रस्सी खोल दिए जाने पर वहाँ से ऐसे भाग निकले कि गया की पकड़ में नहीं आ पाए।

प्रश्न 4.
हीरा-मोती के पारस्परिक प्रेम का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
झरी के दोनों बैलों हीरा और मोती में बहुत ही अधिक पारस्परिक प्रेम था। बहुत दिनों से दोनों एक ही साथ रहते थे। इसलिए दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों एक-दूसरे की मौन-भाषा समझ लेते थे। इसी में वे परस्पर विचार-विनिमय भी किया करते थे। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूंघकर अपना प्रेम प्रकट करते थे। कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे। वे इसे किसी प्रकार के विरोध भाव से नहीं करते थे, अपितु विनोद और आत्मीयता के भाव से किया करते थे। इससे उनका पारस्परिक प्रेम और मजबूत दिखाई देता था।

प्रश्न 5.
भैरो की लड़की की बैलों से आत्मीयता क्यों हो गई थी?
उत्तर:
भैरो की लड़की की माँ मर चुकी थी। उसकी सौतेली माँ उसें मारती रहती थी। इस प्रकार उसको अपना ऐसा कोई नहीं दिखाई देता था, जिससे वह अपनी भावना को प्रकट कर सके। इसके लिए उसने अपने बैलों को ही चुना। वह उन्हें रातःको चुपके से रोटी खिलाती थी। उनके प्रति सहानुभूति दिखाती थी। इसलिए उन बैलों से उसे बड़ी आत्मीयता हो गई थी।

प्रश्न 6.
दोनों बैल दढ़ियल आदमी को देखकर क्यों काँप उठे?
उत्तर:
दोनों बैल दढ़ियल आदमी को देखकर काँप उठे। यह इसलिए कि-

  1. उसकी आँखें लाल-लाल की।
  2. उसकी मुद्रा बहुत ही कठोर थी।
  3. उसने उन दोनों बैलों के कूल्हों में अपनी उँगली गोद दी।
  4. उसका चेहरा बड़ा ही भयानक था।
  5. वह बड़ा ही जुल्मी और कसाई दिखाई दे रहा था।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि कहानी अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल है।
उत्तर:
मुंशी प्रेमचन्द लिखित कहानी ‘दो बैलों की कथा’ में मनुष्य और पशु के परस्पर व्यवहार को दर्शाया गया है। इस कहानी में झूरी के दोनों बैलों के भीतर जागृत होने वाले कई प्रकार के भावों को व्यक्त किया गया है। इस प्रकार पशुओं के साथ मनुष्य द्वारा किए जाने वाले आत्मीय और भाईचारा के व्यवहार का जहाँ उल्लेख हुआ है, वहीं दूसरी ओर उनके प्रति की जाने वाली क्रूरता और स्वार्थपरता का भी चित्रण हुआ है। इस प्रकार. यह कहानी मनुष्य की तरह पशुओं के भी सुख-दुख और अपने-पराए के बोध को प्रकट करती है। इस प्रकार की विशेषताओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मुंशी प्रेमचन्द लिखित प्रस्तुत कहानी ‘दो बैलों की कथा’ अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल है।

प्रश्न 8.
कहानी के विकास क्रम पर प्रकाश डालते हुए कहानी की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी कहानी के विकास क्रम को छः भागों में इस प्रकार बाँटा जा सकता है-

  1. पहला उत्थान काल (सन् 1900 से 1910 तक)
  2. दूसरा उत्थान काल (सन् 1911 से 1919 तक)
  3. तीसरा उत्थान काल (सन् 1920 से 1935 तक)
  4. चौथा उत्थान काल (सन् 1936 से 1949 तक)
  5. पाँचवाँ उत्थान काल (सन् 1950 से 1960 तक)
  6. छठवाँ उत्थान काल (सन् 1960 से अब तक)।

1. पहला उत्थान काल (सन् 1900 से 1910 तक) :
चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’। यह काल हिन्दी कहानी का आरम्भिक काल कहा जाता है। इसके बाद चन्द्रधर शर्मा की ‘इन्दुमती’, बंग महिला की ‘दुलाईवाली’, रामचन्द्र शुक्ल की ‘ग्यारह वर्ष का समय’ आदि कहानियाँ हिन्दी की आरम्भिक कहानियाँ मानी जाती हैं।

2. दूसरा उत्थान काल (सन् 1911 से 1919 तक) :
इस काल में जयशंकर प्रसाद महाकथाकार के रूप में उभड़कर आए। सन् 1911 में उनकी ‘ग्राम’ कहानी ‘इन्दु’ नामक.मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई। उनकी ‘छाया’, ‘प्रतिध्वनि’, ‘आकाशदीप’, ‘इन्द्रजाल’ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशितः हुए। उनके अतिरिक्त विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, ज्वालादत्त शर्मा, चतुरसेन शास्त्री, जे.पी. श्रीवास्तव, राधिकारमण प्रसाद सिंह आदि उल्लेखनीय कथाकार इसी काल की देन हैं।

3. तीसरा उत्थान काल (सन् 1920 से 1935 तक) :
इस काल को महत्त्व कथा साहित्य की दृष्टि से बहुत ही अधिक है। यह इसलिए कि इसी काल में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का आगमन हुआ। उन्होंने अपनी कहानियों में भारतीय समाज की ऐसी सच्ची तस्वीर खींची जो किसी काल के किसी भी कथाकार के द्वारा सम्भव नहीं हुआ। ‘ईदगाह’, ‘पंच-परमेश्वर’, बूढ़ी काकी’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘मन्त्र’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘दो बैलों की कथा’ आदि उनकी बहुत प्रसिद्ध कहानियाँ हैं। इस काल के अन्य महत्त्वपूर्ण कथाकारों में सुदर्शन, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, शिवपूजन सहाय, सुमित्रानन्दन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामकृष्ण दास, वृन्दावन लाल वर्मा, भगवती प्रसाद बाजपेयी आदि हैं।

4. चौथा उत्थान काल (सन् 1936 से 1949 तक) :
कहानी कला की दृष्टि से इस काल का महत्त्व इस दृष्टि से है कि इस काल की कहानियों ने विभिन्न प्रकार की विचारधाराओं को जन्म दिया। मनोवैज्ञानिक और प्रगतिवादी कथाकार इस काल में अधिक हुए। मनोवैज्ञानिक कथाकारों में इलाचन्द्र जोशी, अज्ञेय, जैनेन्द्र कुमार, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र आदि हुए।

प्रगतिवादी कथाकारों में यशपाल, राहुल सांकृत्यायन; रांगेय राघव, अमृत लाल नागर, राजेन्द्र यादव आदि उल्लेखनीय हैं। विचार प्रधान कथाकारों में धर्मवीर भारती, कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। महिला कथाकारों में सुभद्राकुमारी चौहान, शिवरानी देवी, मन्नू भण्डारी, शिवानी आदि अधिक प्रसिद्ध हैं।

5. पाँचवाँ उत्थान काल (सन् 1950 से 1960 तक) :
इस काल की कहानी को कई उपनाम मिले, जैसे-‘नई कहानी’, ‘आज की कहानी’, ‘अकहानी’ आदि। इस काल की कहानियों में वर्तमान युग-बोध, सामाजिक विभिन्नता, वैयक्तिकता, अहमन्यता : आदि की अभिव्यंजना ही मुख्य रूप से सामने आई। इस काल के कमलेश्वर, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, अमरकान्त, निर्मल वर्मा, मार्कण्डेय, शिव प्रसाद सिंह, भीष्म साहनी. मोहन राकेश, कृष्णा सोबती, रघुवीर सहाय, शैलेश मटियानी, हरिशंकर पारसाई, लक्ष्मीनारायण लाल, राजेन्द्र अवस्थी आदि कथाकारों के नाम बहुत प्रसिद्ध हैं।

6. छठवाँ उत्थान काल (सन् 1960 से अव तक) :
इस काल को साठोत्तरी हिन्दी कहानी के नाम से जाना जाता है। इस काल के कहानीकार पूर्वापेक्षा नवी चंतना और शिल्प के साथ रचना-प्रक्रिया में जुटे हुए दिखाई देते हैं। इस काल की कहानी की यात्रा विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों से जुड़ी हुई है, जैसे-नयी कहानी (कमलेश्वर, अमरकान्त, मार्कण्डेय, फणीश्वर नाथ ‘रेणु’, राजेन्द्र यादव, मन्नू भण्डारी, मोहन राकेश, शिव प्रसाद सिंह, निर्मल वर्मा, उषा प्रियंवदा आदि), अकहानी (रमेश बख्शी, गंगा प्रसाद ‘विमल, जगदीश चतुर्वेदी, प्रयाग शुक्ल, दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन आदि), सचेतन कहानी (महीप सिंह, योगेश गुप्त, मनहर चौहान, रामकुमार ‘भ्रमर’ आदि), समानान्तर कहानी (कामतानाथ, से.रा. यात्री, जितेन्द्र भाटिया, इब्राहिम शरीक, हिमांशु जोशी आदि), सक्रिय कहानी (रमेश बत्रा, चित्रा मुद्गल, राकेश वत्स, धीरेन्द्र अस्थाना आदि)। इनके अतिरिक्त इस काल के ऐसे भी कथाकार हैं, जो उपर्युक्त आन्दोलनों से अलग होकर कथा-प्रक्रिया में समर्पित रहे हैं, जैसे-रामदरश मिश्र, विवेकी राय, मृणाल पाण्डेय, मृदुला गर्ग, निरूपमा सेवती, शैलेश मटियानी, ज्ञान प्रकाश विवेक, सूर्यबाला, मेहरून्निसा परवेज, मंगलेश डबराल आदि।

आज की कहानी शहरी-सभ्यता, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की नई अवधारणा, आपसी . सम्बन्धों के बिखराव, भय और असुरक्षा की भावना, चारित्रिक ह्रास, यौन कुण्ठा, घिनौनी मानसिकता, अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष, औद्योगिकीकरण के दुष्प्रभाव से दम तोड़ती मानवता आदि को चित्रित करने में सक्रिय दिखाई दे रही हैं। इसकी भाषा-शैली दोनों ही तराशती हुई और नए-नए तेवरों को प्रस्तुत करने की क्षमता प्रशंसनीय है।

दो बैलों की कथा-कहानी की परिभाषा

कहानी की परिभाषा पश्चिमी और भारतीय समीक्षकों ने अलग-अलग रूप में दी है
I. पाश्चात्य समीक्षक

  1. पश्चिमी विद्वान एडगर रलन पो ने कहानी को रसोद्रेक करने वाला. एक ऐसा आख्यान माना है, जो एक ही बैठक में पढ़ा जा सके।
  2. एच.जी. वेल्स का कहना है कि कहानी तो बस वही है, जो लगभग बीस मिनट में साहस और कल्पना के साथ पढ़ी जाए।
  3. हडसन कहानी में चरित्र की अभिव्यक्ति मानते हैं।

II. भारतीय समीक्षक

  1. डा. श्याम सुन्दर दास के अनुसार-“आख्यायिका एक निश्चित लक्ष्य या प्रभाव को लक्षित करके लिखा गया नाटकीय आख्यान है।”
  2. मुंशी प्रेमचन्द के अनुसार-“कहानी एक रचना है, जिसमें जीवन के किसी अंश या किसी मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास सब उसी एक भाव की पुष्टि करते हैं। यह एक गमला है, जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है।”
  3. इलाचन्द जोशी के अनुसार-“जीवन का एक चक्र नाना परिस्थितियों के संघर्ष में उल्टा-सीधा चलता रहता है। इस सुवृहत् चक्र की विशेष परिस्थितियों का प्रदर्शन ही कहानी होती है।”
  4. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय के अनुसार-“छोटी कहानी एक सूक्ष्मदर्शक यन्त्र है, जिसमें मानवीय अस्तित्व के मर्मस्पर्शी दृश्य खुलते हैं।”

दी गई उपर्युक्त मान्यताओं के आधार पर यह कहा जा सकता है-
कहानी, जीवन के किसी एक विशेष मनोभाव या अंश का एक ऐसा प्रतिबिम्ब है, जो सम्भवतया संक्षिप्त नाटकीय शैली में विश्वसनीय कथा के रूप में प्रस्तुत होता है।

MP Board Solutions

दो बैलों की कथा-कहानी भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित गद्यांशों की व्याख्या कीजिए
(क) “भागे इसलिए कि……..खाएँ चाहे मरें।”
(ख) “दोनों दिन भर जोते जाते……..विद्रोह भरा हुआ।”
(ग) “हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था।”
(घ) “दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहाँ भी किसी सज्जन का वास है।”
(ङ) “बैल का जन्म लिया है तो मार से कहाँ तक बचेंगे।”
उत्तर:
गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या :
(क) भागे इसलिए कि वे लोग तुम्हारी तरह बैलों को सहलाते नहीं। खिलाते हैं, तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखू? कहाँ से खली और चोकर मिलता है। सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूंगी, खाएँ चाहे मरें।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ में संकलित तथा मुंशी प्रेमचन्द लिखित कहानी ‘दो बैलों की कथा’ से अवतरित है। इसमें कहानीकार ने झरी को अपनी ससुराल से अपने दोनों बैलों हीरा और मोती के भागकर आने पर उन्हें सही ठहराया, तो उसकी पत्नी ने उसका विरोध करते हुए कहा कि

व्याख्या :
गया ‘के यहाँ वे दोनों बैल नहीं टिक सके। इसका मुख्य कारण यह है कि वह बैलों को खिलाता है डटकर काम लेने के लिए, उन्हें उसकी तरह आराम देने के लिए नहीं। वह उन्हें खिलाता है, तो वह उनसे काम लेना भी जानता है। उन्हें खिलाकर उन्हें बड़े ही कड़ाई से हल में सुबह से शाम तक जोतता है। इन्हें तो बैठकर खाना चाहिए। ये काम करने से भागते हैं। इसलिए उसने जब इनसे डटकर काम लेना शुरू किया तो ये भागकर यहाँ चले आए। अब देखना है कि इन्हें खली और चोकर कौन खिलाता है। मैं इन्हें सूखा ही भूसा-चारा दूंगी। उसे ये खाएं या न खाएं, मेरी बला से।

विशेष :

  1. झूरी की पत्नी का आक्रोश उसकी कठोरता को प्रकट कर रहा है।
  2. भाव बड़े ही निष्ठुर हैं।
  3. शैली प्रवाहमयी है।
  4. यह अंश स्वाभाविक है।

(ख) “दोनों दिन भर जोते जाते……..विद्रोह भरा हुआ।”
प्रसंग :
पूर्ववत्! इसमें कहानीकार ने झूरी के दोनों बैलों हीरा और मोती की मेहनत और सहनशीलता को बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि झूरी के दोनों बैल हीरा और मोती उसके साले के यहाँ कड़ी मेहनत करने लगे। उसका साला गया उनसे खूब डटकर काम लेता था। वह उन्हें सुबह से शाम तक हल में जोतता था। उन पर जोर-जोर से डण्डे . बरसाता था। इससे वे दोनों क्रोधित होकर उसका बार-बार विरोध करते थे। फिर भी वह उनके प्रति जरा भी नरमी नहीं दिखाता था। इस प्रकार उनसे डटकर काम लेने के बाद वह उन्हें उनके रहने-बैठने की जगह पर बाँध देता था। रात होने पर पहले की तरह उसकी लड़की उन्हें चुपके से दो रोटियाँ खिलाकर चली जाती थी। दोनों उसके द्वारा दी हुई उन रोटियों को प्रसाद की तरह बड़े ही प्रेमभाव से लेते थे। उससे उन्हें एक ऐसी अद्भुत सहनशक्ति मिलती थी कि वे रूखा-सूखा भूसा-चारा खाकर भी अपनी कमजोरी कुछ भी अनुभव नहीं करते थे। ऐसा होने पर भी गया के प्रति उनके मन में अधिक घृणा और विरोध भरा हुआ था।

विशेष :

  1. बैल जैसे कड़ी मेहनत करने वाले पशुओं के प्रति मनुष्य की कठोरता का उल्लेख है।
  2. बाल स्वभाव पशु-प्रेम का उल्लेख रोचक रूप में है।
  3. उर्दू-हिन्दी की शब्दावली है।
  4. शैली भावात्मक है।
  5. भाषा मुहावरेदार है।

(ग) “हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था।”
प्रसंग :
पूर्ववत! इसमें कहानीकार ने हीरा और मोती के अपने मालिक झूरी के प्रति शिकायत के भावों को व्यक्त करते हुए कहना चाहा है कि

व्याख्या :
हीरा और मोती को लगा कि उनके मालिक झूरी ने अपने साले गया को उन्हें बेच दिया। उन्हें यह नागवार लगा। वे तो अपने मालिक झूरी की सच्चे तन-मन से सेवा कर रहे थे, फिर उसने उन्हें उसे क्यों बेच दिया। वे तो उसकी सेवा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़े थे। वे तो यह निश्चय कर लिये थे कि उन्हें उसके यहाँ ही जीना है और उसके यहाँ ही मर जाना है।

विशेष :

  1. बैलों की स्वामिभक्ति प्रकट की गई है।
  2. यह अंश प्रेरक रूप में है।
  3. भाषा सजीव है।

(घ) “दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहाँ भी किसी सज्जन का वास है।”
प्रसंग :
पूर्ववत्! इसमें कहानीकार ने गया की लड़की के द्वारा दोनों बैलों को रात के समय चुपके से रोटियों के खिलाने से प्रभाव उन दोनों बैलों के एहसानमन्द होने का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि जब रात के समय चुपके से झूरी के साले गया की लड़की दोनों बैलों को रोटियाँ खिलाती थी, तब उन दोनों को बड़ी शान्ति और तसल्ली होती थी कि इस गया नामक जालिम के यहाँ भी कोई उनके दुख को समझने वाला और उसमें हाथ बँटाने वाला है। इस प्रकार उन्हें मन-ही-मन कुछ ही देर के लिए सही यह अवश्य खुशी होती थी कि किसी दुर्जन के यहाँ भी कोई सज्जन रहता है।

विशेष :

  1. भाषा सरल है।
  2. कथन मार्मिक है।
  3. शैली सुबोध है।

(ङ) “बैल का जन्म लिया है, तो मार से कहाँ तक बचेंगे।”
प्रसंग :
पूर्ववत्! इसमें कहानीकार ने झूरी के दोनों बैलों हीरा और मोती में से हीरा की सहनशीलता और अपनी जाति-धर्म की समझ का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि हीरा और मोती झूरी की कठोरता से तंग आकर उसका विरोध करने लगे थे। एक दिन दोनों गया द्वारा हल में जोतने का कड़ा विरोध किया। वे जब टसमस न हुए तो उसने उनको खूब मारा। वह मारते-मारते थक गया। फिर उसने हीरा की नाक पर जमकर डण्डे जमाए। इससे मोती बेकाबू होकर ऐसा भागा कि हल, रस्सी, जुआ, जोत सब टूट-टाटकर बराबर हो गया। उसे हीरा ने समझाया तो मोती ने कहा कि अब की बड़ी मार पड़ेगी। हीरा ने उससे कहा कि उन्हें मार पड़ने से नहीं डरना चाहिए। ऐसा इसलिए कि बैल का जन्म मार खाने के लिए होता है। इसे समझकर उसे मार से बचने या डरने की बात न सोचकर उसको डटकर सहना चाहिए, उससे भागना नहीं चाहिए।

विशेष :

  1. हीरा के स्वधर्म और स्वजाति की समझ प्रेरक रूप में है।
  2. यह वाक्य प्रभावशाली है।
  3. भाषा सजीव है।

MP Board Solutions

दो बैलों की कथा-कहानी भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों से वाक्य बनाइए-
मारता-पीटता, भूखा-प्यासा, जल-भुन गई, रूखा-सूखा, आगे-पीछे।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी img-3
प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग छाँटिए-
विश्वास, अभिनन्दन, निर्दयी, अनुमान, दुर्बल, अनाथ।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी img-4

प्रश्न 3.
निम्नलिखित सामासिक पदों का समास विग्रह करते हुए समास का नाम लिखिए
संध्या-समय, प्रातःकाल, बाल-सभा, पशुवीर, दोपहर, गाय-बैल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी img-5

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद कर सन्धि का नाम लिखिए-
मनोहर, स्वागत, सज्जन, अन्तान।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 दो बैलों की कथा-कहानी img-6

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए

  1. संध्याकाल के समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे।
  2. गाँव के इतिहास में ऐसी अभूतपूर्व घटना कभी नहीं पाई थी।
  3. दो बैल का ऐसा अपमान कभी नहीं हुआ।
  4. पहाड़ से उतरते हुए उसका पैर रपट गया।

उत्तर:

  1. संध्या-समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे।
  2. गाँव के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना थी।
  3. दोनों बैलों का एसा अपमान कभी न हुआ था।
  4. पहाड़ से उतरते समय उसका पैर रपट गया।

दो बैलों की कथा-कहानी योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
यह कहानी आपको कैसी लगी? अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
छात्र/छात्रा इसे अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 2.
दो बैलों की कहानी नामक चलचित्र का अवलोकन कर उसकी समीक्षा लिखिए।
उत्तर:
छात्र/छात्रा इसे अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 3.
हल में जोते जाने के अतिरिक्त बैलों से कौन-कौन से कार्य लिए जा सकते हैं। सचित्र कथा तैयार कीजिए।
उत्तर:
छात्र/छात्रा इसे अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 4.
आपके घर में यदि कोई पालतू जानवर है तो उसके प्रति आपका व्यवहार कैसा रहता है, लिखिए।
उत्तर:
छात्र/छात्रा इसे अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

MP Board Solutions

दो बैलों की कथा-कहानी परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

दो बैलों की कथा-कहानी लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
झूरी के बैलों के क्या नाम थे?
उत्तर:
झूरी के बैलों के नाम हीरा और मोती थे।

प्रश्न 2.
दोनों बैलों ने अपनी मूक भाषा में क्या सलाह की?
उत्तर:
दोनों बैलों ने अपनी मूक भाषा में यह सलाह की कि गाँव में सोता पड़ जाने पर पगहे तुड़ाकर अपने घर की ओर भाग चलेंगे।

प्रश्न 3.
मजूर को क्या ताकीद कर दी गई?
उत्तर:
मजूर को यह ताकीद कर दी गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए।

प्रश्न 4.
बैलों का कैसा अपमान कभी न हुआ था?
उत्तर:
बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था कि मार खाने के बाद भी उन्हें सूखा ही भूसा दिया गया।

प्रश्न 5.
झूरी ने कौन-सा सबूत दिया की वे बैल उसके ही हैं? –
उत्तर:
झूरी ने यह सबूत दिया कि वे बैल उसके ही द्वार पर खड़े हैं। इसलिए वे उसके ही हैं।

दो बैलों की कथा-कहानी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
झूरी के दोनों बैलों में किस प्रकार घनी दोस्ती हो गई थी?
उत्तर:
झूरी के दोनों बैलों में बहुत अधिक भाईचारा हो गया था। दोनों बहुत दिनों से एक ही साथ रहते थे। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूंघकर अपना प्रेम-भाव प्रकट, किया करते थे। कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे-विरोध के भाव से नहीं, अपितु मनोरंजन और आत्मीयता के ही भाव से।

जब वे दोनों हल या गाड़ी में जोते जाते और गर्दन हिला-हिलाकर चलते तो उस समय दोनों की यही कोशिश होती थी कि अधिक-से-अधिक भार मेरी ही गर्दन पर रहे। दिन-भर के वाद दोपहर या शाम को खुलते तो एक-दूसरे को चाट-चाटकर अपनी थकान दूर किया करते थे। नाँद में खली-भूसा पड़ जाने पर दोनों एक ही साथ उठते। एक ही साथ नाँद में मुँह डालते। अगर एक मुँह हटा लेता तो दूसरा भी हटा लेता था।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
झूरी के प्रति बैलों की कौन-कौन-सी आत्मीयता के भाव प्रकट किए थे?
उत्तर:
झूरी के प्रति उसके बैलों ने निम्नलिखित आत्मीयता के भाव प्रकट किए थे-

  1. वह उन गरीबों को अपने घर से क्यों निकाल रहा है?
  2. क्या उन्होंने उसकी सेवा करने में कोई कमी की?
  3. अगर वे कम मेहनत करते थे, तो वह और उन से काम ले लेता।
  4. उन्हें तो उसकी ही सेवा में मरना-जीना कबूल था।
  5. उन्होंने तो उससे कभी भी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। उसने उन्हें जो कुछ भी खिलाया उसे इन्होंने चुपचाप खा लिया। ऐसा होने के बावजूद वह उन्हें गया नामक इस जालिम के हाथ क्यों बेच दिया है।

प्रश्न 3.
लड़की द्वारा गराँव खोल दिए जाने पर बैलों ने क्या किया?
उत्तर:
लड़की द्वारा गराँव खोल दिए जाने पर बैलों ने तेजी से झूरी के घर की ओर भागना शुरू किया। वे सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक उन्हें रास्ते का कुछ भी पता नहीं चला। वे जिस परिचित रास्ते से आए थे, उसे भूल गए। अब उनके सामने नया रास्ता और नए-नए स्थान आने लगे। तब वे एक खेत के किनारे खड़े हो गए। खेत में मटर थी। उससे अपनी भूख मिटाने लगे थे। रह-रहकर आहट लेते थे कि कोई आता तो नहीं। जब पेट भर गया तो दोनों मस्त होकर उछलने लगे।

प्रश्न 4.
दढ़ियल आदमी से छुटकारा पाने के लिए बैलों ने क्या किया?
उत्तर:
दढ़ियल आदमी से छुटकारा पाने के लिए बैलों ने भागना शुरू किया। रास्ते में ही वे अपने मालिक झूरी के खेत-कुएँ आदि को भली-भाँति पहचान गए थे, इससे उनमें और तेजी आ गई। दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की तरह ल्ले ले करते हुए अपने मालिक झूरी के घर आ गए। फिर अपने थान पर आकर खड़े हो गए।

प्रश्न 5.
झूरी के सामने जब दढ़ियल बैलों को पकड़ने चला तो मोती ने क्या किया?
उत्तर:
झूरी के सामने जब दढ़ियल बैलों को पकड़ने चला तो मोती ने सींग चलाया। दढ़ियल अपने बचाव के लिए पीछे हटा। मोती ने उसका पीछा किया तो वह भागने लगा। वह गाँव से बाहर ही जाकर खड़ा हो गया। उसे इस तरह देखकर मोती उसको देखता रहा। दढ़ियल इस समय धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ दे रहा था और पत्थर फेंक रहा था। मोती शूरवीर की तरह उसका रास्ता रोके खड़ा था। जब वह दढ़ियल चला गया तो मोती अकड़ता हुआ लौट आया।

दो बैलों की कथा-कहानी लेखक-परिचय

प्रश्न.
मुंशी प्रेमचन्दं का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय-कथा साहित्य के युग-निर्माता के रूप में मुंशी प्रेमचन्द अत्यन्त लोकप्रिय हैं।

जन्म एवं शिक्षा :
मुंशी प्रेमचन्दजी का जन्म सन् 1880 ई. में काशी के पास पाण्डेयपुर नामक गाँव में हुआ था। आपका असली नाम धनपतराय था। मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरान्त आप एक विद्यालय में अध्यापक हो गए। कुछ समय बाद आपने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की और सब डिप्टी इन्सपेक्टर बन गए। आपने अपने विद्यार्थी जीवन-काल से ही कहानियाँ लिखनी शुरू कर दी थीं। आपका निधन सन् 1936 ई. में हो गया।

रचनाएँ :
मुंशी प्रेमचन्द जी ने मुख्य रूप से कथा-साहित्य की रचना की है। इसके अतिरिक्त भी आपने नाटक, निबन्ध और आलोचना साहित्य की संवृद्धि.की. है। आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

उपन्यास :
सेवासदन, कायाकल्प, रंगभूमि, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन, निर्मला और गोदान। आपने ‘मंगलसूत्र’ नामक उपन्यास भी लिखना शुरू किया था।

कहानी :
संग्रह-प्रेम-पचीसी, प्रेम-पूर्णिमा, प्रेम-प्रसून, सन्त-सरोज, मानसरोवर आदि। नाटक-कर्बला, संग्राम और प्रेम की बेदी।

भाषा-शैली :
मुंशी प्रेमचन्द की भाषा-शैली सम्बन्धित निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
1. भाषा :
मुंशी प्रेमचन्द जी की भाषा सरल, सपाट और धाराप्रवाह है। उसमें उर्दू के शब्दों की प्रधानता है। कहीं अंग्रेजी और अरबी-फारसी के भी शब्द हैं।
2. शैली :
मुंशी प्रेमचन्द जी की शैली विविध है। वह कहीं वर्णनात्मक है. और! कहीं चित्रात्मक है। बोधगम्यता आपकी शैलीगत सर्वप्रधान विशेषता है। कहावतों और मुहावरों के अधिक प्रयोग से शैली सशक्त, बोधगम्य और प्रवाहमयी हो गई है।

महत्त्व :
मुंशी प्रेमचंदजी का हिन्दी कथा-साहित्य में बेजोड़ स्थान है। आपने इस क्षेत्र में अपनी लेखनी से भारतीय समाज का आदर्शमय और अत्यन्त प्रभावशाली चित्र खींचकर इसको प्रेरणादायक बना दिया है।

MP Board Solutions

दो बैलों की कथा-कहानी पाठ का सारांश

प्रश्न.
प्रेमचन्द लिखित कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का सारांश अपने शब्दों! में लिखिए।
उत्तर:
मुंशी प्रेमचन्द लिखित कहानी ‘दों बैलों की कथा” में पशुओं के प्रति मनुष्य द्वारा किए जाने वाले आत्मीय और कठोर व्यवहार का रोचक चित्र प्रस्तुत किया गया है। कहानी के अनुसार झूरी के हीरा और मोती दो बैल थे। दोनों सुन्दर और चौकस थे। उनमें परस्पर बहुत प्रेम था। दोनों एक-दूसरे की बात समझ लेते थे। उनमें इतनी घनिष्ठ दोस्ती थी कि वे दो शरीर एक प्राण थे। वे दिनभर काम करने के बाद नाँद में एक ही साथ मुँह डालते थे और एक ही साथ मुँह हटा लेते थे। दोनों एक-दूसरे को चाट-चाटकर अपनी थकान मिटाते थे। एक दिन झूरी ने उन दोनों को अपनी ससुराल भेज दिया। उन्होंने समझ लिया कि वे बेच दिए गए हैं।

इसलिए उन्होंने उन्हें ले जाने वाले झूरी के साले गया का विरोध किया। उन्हें घर तक ले जाने में उसे दाँतों पसीना आ गया। दिन-भर के भूखे रहने पर भी उन्होंने वहाँ कुछ भी खाया-पीया नहीं। रात को सबके सो जाने पर वे पगहे तुड़ाकर भागते हुए झूरी के घर वापस आ गए। झूरी ने दौड़कर उन्हें गले लगाया। गाँव के लोगों ने तालियाँ बजा बजाकर उनका स्वागत किया। लेकिन झूरी की पत्नी से. यह नहीं देखा गया। उसने क्रोध में आकर कहा कि वे दोनों बैल नमकहराम हैं कि बिना काम किए ही भाग आए हैं। इन्हें अब सूखे भूसे ही खाने को दिया जाएगा। झूरी ने इसका विरोध तो किया, लेकिन उसकी एक न चली।

दूसरे दिन आकर झूरी का साला बैलों को ले गया। उन्हें गाड़ी में जोता। मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा तो हीरा ने उसे सँभाल लिया। शाम को झूरी ने बदले की भावना से उन्हें मोटी रस्सियों से बाँधकर उनके सामने सूखा भूसा डाल दिया। उन दोनों ने उसे सूंघा तक नहीं। उसने अपने बैलों को खली-चूनी सब कुछ दी। दूसरे दिन उसने उन्हें हल में जोता तो उन्होंने अपने पाँव नहीं बढ़ाए। उसे देखकर गया क्रोध से पागल हो उठा। उसने उन दोनों पर जमकर डण्डे बरसाए। दोनों हल सहित सब कुछ तोड़कर भाग उठे। गया को दो आदमियों के साथ दौड़कर आते हुए देखकर हीरा ने मोती को समझाया कि अब भागना व्यर्थ है। हीरा मोती की बात मानकर चुपचाप खड़ा हो गया। गया उन दोनों को पकड़कर घर ले गया। उसने फिर वही सूखा भूसा उन दोनों के सामने रख दिया। दोनों ने उसे देखा तक नहीं। रात को एक छोटी-सी लड़की उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती थी।

वे प्रसाद की तरह उन्हें खाकर चुपचाप पड़े रहते थे। एक दिन उस लड़की ने उन दोनों की मोटी-मोटी रस्सियों को खोलकर उन्हें भाग जाने का मौका दिया। फिर उसने जोर से चिल्लाते हए कहा-“ओ दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौड़ो” इसे सुनकर गया उनको पकड़ने चला। वे दोनों और भागने लगे तो गया भी उनके पीछे तेजी से दौड़ने लगा। यह देख वह गाँव के कुछ लोगों को साथ लेने के लिए लौटा तो वे दोनों और सरपट भागने लगे। इससे उन्हें अपने परिचित रास्ते का कुछ भी ज्ञान नहीं रहा। वे रास्ता भूल भटककर किसी के मटर के खेत में चरने लगे। भरपेट मटर चर लेने के बाद वे इठलाने लगे। उन्हें वहाँ देखकर काजी हाउस में बन्द कर दिया गया। एक सप्ताह तक वे वहाँ विना चारे के बन्द रहे। उन्हें दिन भर में एक बार पानी पिलाया जाता था। इससे वे जिन्दा तो रहे, लेकिन उनसे उठा तक न जाता था।

एक सप्ताह के बाद उनको नीलाम कर दिया गया। एक दढ़ियल आदमी ने उन्हें खरीद लिया। वह बहुत कठोर था। नीलाम होने के बाद दोनों (हीरा और मोती) को वह दढ़ियल लेकर चला। उस समय दोनों भय से थर-थर काँप रहे थे, लेकिन वे मजबूर थे। अचानक उन्हें लगा कि वे परिचित रास्ते पर ही चल रहे हैं। गया उन्हें इसी रास्ते से ले गया था। इसी कुएँ पर वे पुर चलाने आया करते थे। अब हमारा घर पास ही आ गया है। इससे दोनों छलाँग लगाते हुए झूरी के घर की ओर दौड़ने लगे। वहाँ पहुँचकर वे अपने-अपने थान पर खड़े हो गए। उनके पीछे-पीछे दौड़ते हुए वह दढ़ियल भी वहाँ पहुँच गया। झूरी उन दोनों को देखकर प्रसन्नता से झूम उठा। उसने उन्हें गले लगाया। उस दढ़ियल ने कहा-‘मैंने इन्हें मवेशीखाने से नीलाम लिया है।

इसलिए ये मेरे बैल हैं। झूरी ने कहा -‘ये मेरे बैल हैं, क्योंकि ये मेरे द्वार पर खड़े हैं। किसी को मेरे बैलों को नीलाम करने का कोई भी हक नहीं है। लेकिन उस दढ़ियल ने झूरी की एक न सुनी। उसने उन्हें बलपूर्वक पकड़ना चाहा तो मोती ने उसे सींग चलाकर गाँव से बाहर कर दिया। इससे वह हारकर चला गया। मोती अकड़ता हुआ लौट आया। गाँव के लोग यह देखकर बाग-बाग हो गए। झूरी ने उन दोनों के नाँदों में खली, भूसा, चोकर और दाना भर दिया। उन्हें दोनों प्रसन्नतापूर्वक खाने लगे। झूरी उन्हें सहला रहा था।

MP Board Solutions

दो बैलों की कथा-कहानी संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

1. झरी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाई जाति के थे। देखने में सुन्दर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक-दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूंघकर अपना प्रेम प्रकट करते। कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे-विग्रह के नाते में नहीं। केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्टता होते ही धोल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता।

शब्दार्थ :
पछाई-पश्चिम प्रदेश का। चौकस-चौकन्ना। विनिमय-लेन-देन, आदान-प्रदान। मूक-मौन। गुप्त-छिपी हुई। वंचित-न पाना, असमर्थ। विग्रह-झंगड़ा, तकरार। विनोद-मनोरंजन। आत्मीयता-लगाव, अपनापन। घनिष्ठता-निकटता। धोल-धप्पा-खुलापन। फुसफुसी-अस्थिर, कामचलाऊ।’

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिन्दी समान्य भाग-1′ में संकलित तथा मुंशी प्रेमचन्द लिखित कहानी ‘दो बैलों की कथा’ से अवतरित है। इसमें कहानीकार ने पछाई जाति के दो बैलों की अद्भुत विशेषताओं को बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि झूरी नामक किसी आदमी के पास पछाई जाति के दो विशेष बैल थे। एक का नाम था हीरा तो दूसरे का नाम था मोती। दोनों की सुन्दरता बहुत अधिक थी। उनका शारीरिक गठन और रूप मन को बार-बार छू लेने वाला था। वे देखने में सुन्दर तो थे ही, अपने काम को पूरा करने में तत्पर रहते थे। वे काम करते समय तनिक भी जी नहीं चुराते थे। वे एक-साथ कई सालों से रह रहे थे। इससे दोनों में बहुत गहरा प्रेम हो गया था। वे अपनी मौन भाषा में परस्पर अपना विचार व्यक्त करते रहते थे। इससे दोनों एक-दूसरे की बातों को खूब अच्छी तरह से समझ जाते थे। उन्हें इस तरह देखकर सबको हैरानी होती थी कि वे कैसे आपस की बातों को समझ लेते हैं। यह अनुमान ही लगाया जा सकता है कि मनुष्य दुर्लभ उनमें कोई अवश्य ही गुप्त शक्ति थी।

कहानीकार का पुनः कहना है हीरा और मोती का परस्पर प्रेम-व्यवहार खुला हुआ था। वे एक-दूसरे के पास बैठते-रहते। एक-दूसरे को चाटते-सूंघते थे। एक-दूसरे को सींग मिलाते थे। उनका यह परस्पर व्यवहार किसी भी दशा में परस्पर लड़ने-झगड़ने की मंशा से नहीं होता था। यह तो उनके परस्पर लगाव को मनोरंजन के रूप में बढ़ाने के लिए ही होता था। इस प्रकार उनकी दोस्ती बहुत घनी हो गई थी। उसमें खुलापन आ गया। उससे वह और टिकाऊ होने लगी थी। सच-मुच में इसके बिना दोस्ती ऐसी हल्की-हल्की-सी बनी रहती है, जिसके समाप्त होने की शंका बनी रहती है।

विशेष :

  1. पछाई जाति के बैलों का रोचक उल्लेख है।
  2. सच्ची दोस्ती की विशेषताओं को बतलाया गया है।
  3. ‘कुछ हल्की -सी’ में उपमा अलंकार है।
  4. सामाजिक शब्दावली है।
  5. वर्णनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) लेखक और रचना का नाम लिखिए।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय क्या है?
(iii) पछाई जाति के बैलों की क्या विशेषताएँ होती हैं?
(iv) किस दोस्ती पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता?
उत्तर:
(i) लेखक का नाम-मुंशी प्रेमचन्द, रचना का नाम-‘दो बैलों की कथा’।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय है-पछाई जाति के बैलों की विशेषताएँ बतलाना। लेखक ने इसे बड़े ही रोचक और सरस रूप में व्यक्त किया है। इससे आकर्षक जानकारी मिलती है।
(iii) पछाई जाति के बैलों की अनेक रोचक विशेषताएँ होती हैं. जैसे-देखने में सुन्दर, काम में चौकस, ऊँचे डीलडौल, परस्पर भाईचारा, घनी दोस्ती आदि।
(iv) जिस दोस्ती में आत्मीयता की कमी और भेदभाव हो, उस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) दोनों बैलों में भाईचारा क्यों हो गया था?
(ii) मनुष्य से वे दोनों वैल क्यों श्रेष्ठ थे?
(iii) दोनों बैलों में किस प्रकार की दोस्ती थी?
उत्तर:
(i) दोनों बैल बहुत दिनों से एक ही साथ रहते थे। इसलिए उनमें भाईचारा हो गया था।
(ii) दोनों बैल मूक भाषा में एक-दूसरे से विचार-विनिमय किया करते थे। ऐसी अद्भुत शक्ति जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाले मनुष्य में नहीं थी। इस दृष्टि से वे दोनों बैल मनुष्यों में श्रेष्ठ थे।
(iii) दोनों बैलों में घनी और पक्की दोस्ती थी।

MP Board Solutions

2. संयोग की बात, झूरी ने एक बार मोई को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूम, वे क्यों भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों – बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने, पर झूरी के साले गया को घर तक गोई ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते, पगहिया पकड़कर आगे से खींचता तो दोनों पीछे को जाने लगते। मारता तो दोनों नीचे करके हँकारते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते-तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं . उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था तो और काम ले लेते। हमें . तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथों क्यों बेच दिया।

शब्दार्थ :
संयोग-अचानक। गोई-दो बैलों की जोड़ी। दाँतों पसीना आना-(मुहावरा)-अत्यधिक मेहनत करना। दाएँ-बाएँ-इधर-उधर। पगहिया-पशुओं के गले में बाँधनेवाली रस्सी। हँकारते-हुँकारते, जोर की आवाज करते। वाणी-जबान। कसर-कमी। चाकरी-नौकरी। कबूल-मंजूर, स्वीकार। जालिम-अत्याचारी, जुल्मी, निर्दयी।

प्रसंग :
पूर्ववत्! इसमें कहानीकार ने पछाई जाति के दो बैलों की सच्ची भावनाओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि एक दिन अचानक झूरी ने अपने उन प्यारे दोनों बैलों हीरा और मोती को अपनी ससुराल भेज दिया। उसका साला गया जब उन दोनों को लेकर चला, तो वे दोनों यह बिलकुल ही नहीं समझ पा रहे थे कि वे अपने मालिक झूरी के पास से क्यों दूसरे मालिक के पास भेजे जा रहे हैं? क्या उनके मालिक ने उन्हें बेच दिया है या और कोई बात है। अगर उनके मालिक ने उन्हें बेच दिया है तो यह उनके लिए बहुत ही अफसोस की बात है। उन्हें इस बात का बेहद दुख है। इस प्रकार सोच-समझ कर वे अपने मालिक के साले गया के साथ जाना अनुचित समझ लिये। फलस्वरूप वे उसके साथ जाने से कतराने लगे। जब वह उन्हें आगे बढ़ाने के लिए पीछे से हाँकता तो वे इधर-उधर होने लगते। पगहिया पकड़कर आगे खींचता तो वे पीछे की ओर भागने लगते। उसके मारने पर वे दोनों जोर-जोर से हुँकारते। इस तरह उसे उन दोनों को अपने घर ले आने में नाकों चने चबाना पड़ा।

कहानीकार का पुनः कहना है कि झूरी के वे दोनों बैल हीरा और मोती अपने मालिक की इस अचानक बेरहमी को बिल्कुल ही नहीं समझ पा रहे थे कि वह अब उन्हें बेसहारा क्यों बना रहा है? अगर वे कुछ बोल पाते, तो वे उससे यह अवश्य पूछते कि क्या उन्होंने उसके काम सच्चाई से नहीं किए। अगर नहीं तो वह उनसे फिर से और सारे काम लेता। वे तो उसका ही काम सच्चाई से करते हुए अपनी पूरी-की-पूरी जिन्दगी बिता देना चाहते थे। उन्होंने तो उससे कभी भी खाने-पीने की कुछ भी शिकायत नहीं की। उन्हें जो कुछ मिला, चुपचाप स्वीकार कर लिया। फिर उनसे ऐसी कौन-सी गलती हुई कि उसने इस बेरहम के गले लगा दिया।

विशेष :

  1. पछाई जाति के बैलों की सच्चाई पर प्रकाश डाला गया है।
  2. भाषा सरल है।
  3. मार्मिक कथन है।
  4. मुहावरों के सटीक प्रयोग हैं।
  5. यह अंश अधिक रोचक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) लेखक और रचना का नाम लिखिए।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय क्या है?
(iii) किसने किसे और क्यों ससुराल भेज दिया?
(iv) गया को घर तक गोई को ले जाने में दाँतों पसीना क्यों आ गया?
(v) दोनों बैलों को अपने मालिक से क्या शिकायत थी?
उत्तर:
(i) लेखक का नाम-मुंशी प्रेमचन्द, रचना का नाम-‘दो बैलों की कथा’।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय है-पछाई जाति के दो बैलों का अपनी स्वामि-भक्ति के भावों को प्रकट करना।
(iii) झूरी ने अपने दोनों बैल हीरा और मोती को अपनी ससुराल अपने साला गया के कहने पर भेज दिया।
(iv) गया को घर तक गोई को ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। ऐसा इसलिए कि गोई किसी प्रकार से वहाँ जाने में राजी नहीं थे। वे इधर-उधर या आगे-पीछे भाग-भागकर गया को काफी परेशान कर डाले थे।
(iv) दोनों बैलों को अपने मालिक झूरी से कई शिकायत थीं-क्या उन दोनों ने उसके काम ईमानदारी से नहीं किए। अगर कोई कमी थी तो और काम लेते। उन्होंने उससे कभी कोई शिकायत नहीं की। वे तो जीवनभर उसी के यहाँ काम करते हुए मर जाना अच्छा समझते थे। उसने जो कुछ खिलाया, वे चुपचाप खा लिये। फिर उसने इस निर्दयी के गले में क्यों डाल दिया।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) बैलों ने क्या समझा?
(ii) बैलों ने गया का विरोध क्यों किया?
(iii) बैलों की झूरी से शिकायत में कौन-से भाव थे?
उत्तर:
(i) बैलों ने यह समझा कि उनके मालिक ने उन्हें किसी जालिम के हाथ बेच दिया है।
(ii) बैलों ने गया का विरोध किया। ऐसा इसलिए कि वे उसके साथ बिलकल ही नहीं जाना चाहते थे।
(iii) बैलों की अपने मालिक झूरी से शिकायत में सच्ची स्वामि-भक्ति के भाव भरे थे। उनके वे भाव बड़े ही आत्मीय, सरस और मेल-मिलाप के थे।

3. दोनों दिन-भर जोते जाते, डण्डे खाते, अड़ते। शाम को थान पर बाँध दिए। जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल भूसा खाकर भी दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।

शब्दार्थ :
अड़ते-विरोध करते। थान-बूँटा, बैलों के रहने या बैठने का स्थान।। प्रसाद-भेंट। बरकत-शक्ति। दुर्बल-कमजोर। विद्रोह-विरोध।

प्रसंग :
पूर्ववत्! इसमें कहानीकार ने झूरी के दोनों बैलों हीरा और मोती की मेहनत और सहनशीलता को बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि झूरी के दोनों बैल हीरा और मोती उसके साले के यहाँ कड़ी मेहनत करने लगे। उसका साला गया उनसे खूब डटकर काम लेता था। वह उन्हें सुबह से शाम तक हल में जोतता था। उन पर जोर-जोर से डण्डे बरसाता था। इससे वे दोनों क्रोधित होकर उसका बार-बार विरोध करते थे। फिर भी वह उनके प्रति जरा भी नरमी नहीं दिखाता था। इस प्रकार उनसे डटकर काम लेने के बाद वह उन्हें उनके रहने-बैठने की जगह पर बाँध देता था। रात होने पर पहले की तरह उसकी लड़की उन्हें चुपके से दो रोटियाँ खिलाकर चली जाती थी। दोनों उसके द्वारा दी हुई उन रोटियों को प्रसाद की तरह बड़े ही प्रेमभाव से लेते थे। उससे उन्हें एक ऐसी अद्भुत सहनशक्ति मिलती थी कि वे रूखा-सूखा भूसा-चारा खाकर भी अपनी कमजोरी कुछ भी अनुभव नहीं करते थे। ऐसा होने पर भी गया के प्रति उनके मन में अधिक घृणा और विरोध भरा हुआ था।

विशेष :

  1. बैल जैसे कड़ी मेहनत करने वाले पशुओं के प्रति मनुष्य की कठोरता का उल्लेख है।
  2. बाल स्वभाव पशु-प्रेम का उल्लेख रोचक रूप में है।
  3. उर्दू-हिन्दी की शब्दावली है।
  4. शैली भावात्मक है।
  5. भाषा मुहावरेदार है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) लेखक और रचना का नाम लिखिए।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
(iii) ‘प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी’ ऐसा लेखक ने क्यों कहा है?
उत्तर:
(i) लेखक का नाम-मुंशी प्रेमचन्द, रचना का नाम-‘दो बैलों की कथा’।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य बैल जैसे बेजुबान पशुओं के प्रति अपने स्वार्थ में अंधा होकर उनकी स्वामि-भक्ति को नहीं देख पाता है। उसे तो बच्चों की निःस्वार्थमयी आँखें देख और समझकर उनसे सहानुभूति रहती है।
(iii) प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी’ ऐसा लेखक ने इसलिए कहा। है कि बालिका द्वारा खिलाई गई उन दो रोटियों से उन दोनों बैलों को अद्भुत आत्मीयता का अनुभव होता था। उससे उनमें गया की कठोरता को सह लेने की पूरी-पूरी ताकत आ जाती थी।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) दोनों बैलों पर गया किस प्रकार जुल्म करता था?
(ii) दोनों बैलों के प्रति कौन तथा कैसे सहानुभूति प्रकट करता था?
(iii) दोनों बैलों की आँखों में किसके प्रति विद्रोह भरा था?
उत्तर:
(i) दोनों बैलों पर झूरी का साला गया खूब जुल्म करता था। वह उन्हें सुबह से शाम तक हल में जोतता था। इसके बावजूद वह उन पर जोरों से डण्डे बरसाता था। शाम होने पर वह उनको रूखा-सूखा चौरा-भूसा डाल देता था।
(ii) दोनों बैलों के प्रति गया की लड़की चुपके से रात को दो रोटियाँ खिलाकर अपनी सहानुभूति प्रकट करती थी।
(iii) दोनों बैलों की आँखों में गया के प्रति अधिक विद्रोह भरा हुआ था।

MP Board Solutions

4. गया हड़बड़ाकर भीतर से निकला और बैलों को पकड़ने चला। वे दोनों भागे। गया ने पीछा किया। और भी तेज हुए। गया ने शोर मचाया। फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए।

शब्दार्थ :
हड़बड़ाकर-घबड़ाकर। ज्ञान-पता। परिचित-जाना-पहचाना

प्रसंग :
पूर्ववत्! इसमें कहानीकार ने गया के घर हीरा और मोती के भागने और उनके भटक जाने का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि गया की लड़की ने रात को हीरा और मोती के गले में बँधी हुई रस्सियों को खोलकर उन्हें चुपके से भाग जाने के लिए कहा। इसे सुनते ही दोनों वहाँ से भाग खड़े हुए। इसके बाद उस लड़की ने जोर से चिल्लाते हुए कहा कि दोनों बैल भागे जा रहे हैं। इसे सुनकर गया हड़बड़ाकर भीतर से दौड़ा। उसने उन दोनों बैलों को पकड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे उससे दूर निकलने लगे। गया ने थोड़ा और जोर लगाया तो वे और तेजी से भागने लगे।

अपनी पकड़ से उन दोनों को बाहर होते हुए देखकर उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू किया। उसकी आवाज सुनकर लोग दौड़े-दौड़े उसके पास आ गए। उसने कुछ आदमियों को अपने साथ लेकर उन दोनों बैलों का पीछा किया। इतने समय में वे दोनों काफी दूर निकल गए। वे इतनी तेजी से भाग रहे थे कि वह सही-गलत रास्ते का चुनाव नहीं कर पाए। यहाँ तक कि वे झूरी के घर से जिस रास्ते से होकर आए थे, उससे भी भटक गए। अब उनके सामने सब कुछ नया-नया और अनजान था। इससे वे घबड़ा गए। आगे अब क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए, इस सोच-विचार में वे एक खेत के किनारे खड़े हो गए।

विशेष :

  1. सारा वर्णन स्वाभाविक रूप में है।
  2. भाषा सरल है।
  3. बोधगम्य शैली है।
  4. अभिधा शब्द-शक्ति है।
  5. वाक्य-गठन छोटे-छोटे हैं।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) लेखक और रचना का नाम लिखिए।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय क्या है?
(iii) दोनों बैल किस सोच-विचार में पड़ गए?
उत्तर:
(i) लेखक का नाम-मुंशी प्रेमचन्द, रचना का नाम- ‘दो बैलों की कथा’।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय है-झूरी के दोनों बैलों की खटाई में पड़ी हुई आजादी का उल्लेख।
(iii) दोनों बैंल अपने जाने-पहचाने रास्ते से भटक गए थे। अब वे इस सोच-विचार में पड़ गए कि वे अब किधर जाएँ और. क्या करें।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.
(i) गया दोनों बैलों को क्यों नहीं पकड़ पाया?
(ii) दोनों बैल अपने परिचित रास्ते से क्यों भटक गए?
(iii) दोनों बैल किस निष्कर्ष पर पहुँचे?
उत्तर:
(i) गया दोनों बैलों को नहीं पकड़ पाया। यह इसलिए कि वे दोनों झांनी तेजी से भाग गए कि वे उसकी पकड़ से बाहर हो गए।
(i) दोनों बैल परिचित रास्ते से इसलिए भटक गए कि झूरी का साला गया। उन्हें पकड़ने के लिए शोर मचाने लगा जिससे गाँव के कई लोग इकट्ठा होकर उन्हें पकड़ने के लिए दौड़े। जल्दी भागने के चक्कर में वे रास्ता भटक गए।
(iii) दोनों बैल इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अब उन्हें अच्छी तरह से सोच-विचार कर ही कदम बढ़ाने चाहिए।

MP Board Solutions

5. सहसा एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और मुद्रा अत्यन्त कठोर, आया और दोनों मित्रों के कूल्हों में उँगली गोदकर मुंशी जी से बातें करने लगा। उसका चेहरा देखकर अन्तर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे। वह कौन है और उन्हें क्यों टटोल रहा है, इस विषय में उन्हें कोई सन्देह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया।

शब्दार्थ :
सहसा-अचानक। मुद्रा-भाव। गोदकर-घुसाकर। अन्तर्ज्ञान-आत्मज्ञान, भीतरी ज्ञान। भीत-डरे हुए।

प्रसंग :
पूर्ववत्! इसमें कहानीकार ने मवेशीखाने से दोनों बैलों के नीलाम होने के समय का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
कहानीकार का कहना है कि मवेशीखाना में पड़े हुए झूरी के दोनों बैलों हीरा और मोती को एक सप्ताह हो गया। एक दिन उनकी नीलामी होने लगी। यों तो उन्हें खरीदने के लिए कई लोग आए। उन्हें कमजोर और मरियल देखकर किसी की हिम्मत उन्हें खरीदने की नहीं होती थी। उनमें से एक दाढ़ीवाला आदमी आया। उसकी आँखें लाल-लाल थीं। उसकी मुद्रा बड़ी कठोर और डरावनी थी। आते ही उसने उन दोनों के कूल्हों में अपनी उँगली को घुसा दिया। फिर वह उनको ख़रीदने के लिए मवेशीखाने के मुंशी से बातें करने लगा। वे दोनों उस दाढ़ीवाले आदमी को देखकर डर गएं। उन्होंने अपने आत्मज्ञान से उसकी बेरहमी को समझ लिया। वे यह भी समझ गए कि वह उनका क्या करेंगा? उसकी मंशा क्या है? अपने ऊपर आने वाली किसी विपदा का अनुमान कर दोनों एक-दूसरे को डरी-डरी आँखों से देखा। फिर इशारों-इशारों में उसे भगवान भरोसे छोड़कर सिर को झुका लिया।

विशेष :

  1. बैलों की बेबसी का उल्लेख है।
  2. भयानक रस का प्रवाह है
  3. भावात्मक शैली है।
  4. देशज शब्दों के प्रयोग हैं।
  5. शब्द-प्रयोग सरल है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) लेखक और रचना का नाम लिखिए।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय प्रया है?
(iii) दढ़ियल आदमी कैसा था?
(iv) दोनों बैलों ने दढ़ियल आदमी को क्या समझा?
उत्तर:
(i) लेखक का नाम-मुंशी प्रेमचन्द, रचना का नाम-‘दो बैलों की कथा’।
(ii) प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख विषय. किसी जुल्मी द्वारा झूरी के दोनों बैलों की नीलामी किए जाने के कारणं दोनों की मजबूरी का उल्लेख करना है।
(iii) दढ़ियल आदमी बड़ा ही भयानक और कठोर था।
(iv) दोनों बैलों ने दढ़ियल आदमी को कसाई समझा।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर-
प्रश्न.
(i) दढ़ियल आदमी ने हीरा और मोती को किस प्रकार टटोला?
(ii) दोनों मित्रों के दिल क्यों काँप उठे?
(iii) किस बात का दोनों मित्रों को कोई सन्देह नहीं हुआ?
उत्तर :
(i) दढ़ियल आदमी ने हीरा और मोती को उनके कूल्हों में उँगली गोदकर टटोला।
(ii) दोनों मित्रों ने अपने अन्तर्ज्ञान से यह समझ लिया कि वह दढ़ियल आदमी बहुत ही कठोर है।
(iii) दोनों मित्रों को इस बात का कोई सन्देह नहीं हुआ कि वह दढ़ियल आदमी उन्हें मार डालेगा।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 हिम-प्रलय

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 हिम-प्रलय (विज्ञान कथा, डॉ. जयन्त नार्लीकर)

हिम-प्रलय पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

हिम-प्रलय लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1:
हिमपात का मुकाबला कौन-कौन से देश नहीं कर सके थे?
उत्तर:
हिमपात का मुकाबला जापान, यूरोप, रूस, कनाडा जैसे प्रगत राष्ट्र नहीं कर सके।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
डॉ. वसंत चिटणीस का कौन-सा सिद्धान्त विश्वविख्यात हुआ?
उत्तर:
डॉ. वसंत चिटणीस का यह सिद्धान्त विश्वविख्यात हुआ-“हिम प्रलय का आगमन-भारतीय वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी!”

प्रश्न 3.
राजीव शाह ने अपनी डायरी में क्या लिखा?
उत्तर:
राजीव शाह ने अपनी डायरी में लिखा:
हिम-प्रलय के आगमन की आशंका किसी को चिंतित नहीं कर रही थी। बंबई को भारत की अस्थायी राजधानी बनाने की बात सरकारी लाल फीताशाही में सिमट कर रह गई थी। “कुछ पराक्रमी राजाओं ने इन्द्र पर चढ़ाई की थी। ऐसी हमारी पौराणिक कथाओं में लिखा है। वही बात आज के आक्रमण को देखकर याद आ रही है। लेकिन क्या आज यह चढ़ाई सफल होगी?”

प्रश्न 4.
आकाश में ऊर्जा का वातावरण बनाना क्यों आवश्यक था?
उत्तर:
आकाश में ऊर्जा का वातावरण बनाना आवश्यक था। यह इसलिए कि प्रक्षेपण अस्त्रों के द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों का उपयोग किया जा सके।

प्रश्न 5.
आकाश में अग्निबाणों की सफलता का पता कैसे चला?
उत्तर:
बटन दबाते ही एक के बाद एक अग्निबाण अंतरिक्ष की ओर लपक पड़े। इस बार इन अग्निबाणों का उद्देश्य तापमान पर नियंत्रण पाना था, न कि तापमान या मौसम का पूर्वानुमान बताना। इससे आकाश में अग्निदाणों की सफलता का पता चला।

हिम-प्रलय दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हिमपात से बचने की डॉ. चिटणीस की क्या योजना थी?
उत्तर:
हिमपात से बचने की डॉ. चिटणीस की यह योजना थी कि हिम-प्रलय प्रतिबंधक उपाय है, वह महंगा है, लेकिन फिर भी उस पर अभी से अमल किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
डॉ. वसंत चिटणीस ने क्या चेतावनी दी थी?
“अबकी गर्मियों में इस बर्फ को भूलिए नहीं क्योंकि अगली सर्दियाँ इतनी भयंकर होंगी कि बर्फ पिघलने का नाम ही नहीं लेगी। हिम-प्रलय प्रतिबंधक उपाय है, वह महंगा है, लेकिन फिर भी उस पर अभी से अमल कीजिए।”

प्रश्न 3. अन्य वैज्ञानिकों ने डॉ. बसंत की बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया?
उत्तर:
कुछ ऐसे वैज्ञानिक भी थे, जो अब भी यह मानते थे कि न तो यह हिम-प्रलय है और न ही उसका प्रारंभ । वसंत चिटणीस का सिद्धान्त उन्हें मान्य नहीं था। उनकी यही धारणा थी कि शीत लहर जैसे आई वैसी चली जाएगी और तापमान सामान्य हो जाएगा। किंतु ठंड की चपेट में आए देशों के गले यह बात उतारना कठिन था।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
डॉ. वसंत को टैलेक्स द्वारा क्या संदेश मिला?
उत्तर:
डॉ. वसंत को टेलैक्स द्वारा यह संदेश मिला:
“आपके कथनानुसार अंटार्कटिक में बर्फ के फैलाव में वृद्धि हुई है और वहाँ के पानी की परत का तापमान भी दो अंश कम पाया गया है। अपने सर्वेक्षण के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि यह परिवर्तन पिछले दो वर्षों में हुआ है।”

प्रश्न 5.
डॉ. वसंत ने राजीव शाह को कहाँ और क्यों जाने की सलाह दी?
उत्तर:
डॉ. वसंत ने राजीव शाह को अगले साल इंडोनेशिया चले जाने की सलाह दी। यह इसलिए कि भूमध्य रेखा के पास ही बचने की कुछ गुंजाइश है।

हिम-प्रलय भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
इस बार की गर्मियाँ उस दीपक की भांति थीं, जो बुझने से पहले एक बार अधिक रोशनी देता है।
उत्तर:
उपर्युक्त वाक्य के द्वारा लेखक ने यह भाव प्रकट करना चाहा है कि अत्यंत भयंकर गर्मी के कारण सारा वातावरण अग्निमय हो जाता है। पृथ्वी की तपन को सूरज का प्रकाश अपनी चरम सीमा पर बढ़ाकर आग की लौ की तरह वातावरण को असह्य बना देता है। इस प्रकार के वातावरण को देखकर ऐसा लगने लगता है कि पूरा वातावरण एक ऐसे दीपक के समान है, जो रोशनी करते-करते बुझ रहा है। लेकिन वह बुझने से पहले अपनी पूरी शक्ति को एक बड़ी लौ के रूप में लगा देता है।

हिम-प्रलय भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ बताते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
चार-चाँद लगाना, नाक रगड़ना, कलेजा काँपना, पसीना छूटना, पाँव पसारना।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 हिम-प्रलय img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित सामासिक शब्दों का विग्रह कर समास का नाम लिखिए।
हिम-प्रलय, समुद्र-विज्ञान, विश्वविख्यात, दुष्चक्र, वसंत ऋतु, हिमयुग।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 हिम-प्रलय img-2

प्रश्न 3.
‘सत्य’ के पूर्व ‘अ’ उपसर्ग जोड़ने से ‘असत्य’ शब्द बनता है। ‘अ’ उपसर्ग से बनने वाले पाँच शब्द पाठ में से छाँटकर लिखिए?
उत्तर:
‘अ’ उपसर्ग से बनने वाले पाँच शब्द –

  1. अमल
  2. अस्थायी
  3. अप्रिय
  4. अमान्य
  5. अदावत।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्यय अलग कीजिए।
वैज्ञानिक, कीर्तिमान, तकनीकी, नैतिकता, भारतीय।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 हिम-प्रलय img-3

प्रश्न 5.
पाठ में आए आगत (विदेशी) शब्दों को छाँटकर उनके मानक हिन्दी शब्द रूप लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 हिम-प्रलय img-4

हिम-प्रलय अपठित गद्यांश

विज्ञान एक दोधारी तलवार है। इसके अनगिनत लाभ हैं तो अनचाही हानियाँ भी। विज्ञान ने एक ओर मनुष्य को तमाम सुविधाएँ दी हैं तो दूसरी ओर उसके मन की शांति छीन ली है। यदि उत्पादन में वृद्धि हुई है तो वहीं मनुष्य के हाथ से काम छीनकर बेरोजगारी भी बढ़ाई है। संसार के निर्माण और ध्वंस की अपार शक्ति विज्ञान के पास है। विज्ञान ने मनुष्य के विवेक पर पर्दा डाल दिया है पर गहराई से देखा जाए तो इसमें दोष विज्ञान का नहीं है। दोप वस्तुतः मनुष्य की बुद्धि का है जो उसकी तृष्णाओं और इच्छाओं को विस्तार देकर विज्ञान का सदुपयोग करने के स्थान पर दुरुपयोग सिखा रही है। यदि विज्ञान विभीषिका से बचाता है तो मनुष्य को अपनी सोच में व्यापक परिवर्तन करना पड़ेगा।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

  1. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
  2. गद्यांश का सार-संक्षेप अपने शब्दों में लिखिए?
  3. विज्ञान से होने वाली हानियों के लिए कौन दोषी है?
  4. वैज्ञानिक विभीषिकाओं से कैसे बचा जा सकता है?

उत्तर:

1. ‘विज्ञान और मनुष्य’।

2. विज्ञान के दो पहलू हैं-लाभ और हानि। विज्ञान से मनुष्य को अनेक लाभ हैं तो अनेक हानियाँ भी हैं। असल बात यह है कि विज्ञान ने मनुष्य के विवेक पर पर्दा डाल दिया है। इससे मनुष्य विज्ञान का सदुपयोग नहीं, अपितु दुरुपयोग करने लगा है। इससे बचने के लिए उसे अपनी सोच-समझ में बदलाव लाना ही होगा।

3. विज्ञान से होने वाली हानियों के लिए मनुष्य दोषी है।

4. वैज्ञानिक विभीषिका से बचने के लिए मनुष्य को अपनी सोच-समझ में व्यापक बदलाव लाना होगा।

हिम-प्रलय योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ के कारण और निदान विषय पर एक चार्ट तैयार कीजिए तथा कक्षा में उसका प्रदर्शन कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/ अध्यापिका की सहायता से हल करें।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
हिम-प्रलय की तरह जल-प्रलय भी एक वैज्ञानिक संभावना या पृथ्वी पर एक आसन्न संकट है। जल-प्रलय की स्थिति में उसका सामना कैसे किया जा सकता है? इस पृष्ठभूमि पर एक विज्ञान-कथा या फंतासी लिखने का प्रयास कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/ अध्यापिका की सहायता से हल करें।

प्रश्न 3.
पिछले दस वर्षों में भारत में कौन-कौन-सी बड़ी प्राकृतिक आपदाएँ आई हैं उनको वर्ष के क्रमानुसार सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/ अध्यापिका की सहायता से हल करें।

हिम-प्रलय परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

हिम-प्रलय लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
डॉ. वसंत चिटणीस के हर वक्तव्य, हर टिप्पणी को महत्त्व क्यों प्राप्त हो गया?
उत्तर:
डॉ. वसंत चिटणीस के हर वक्तव्य, हर टिप्पणी को महत्त्व प्राप्त हो गया। यह इसलिए कि सभी ने उनकी बात मान ली। सामान्य आदमी भी उनकी बातों का महत्त्व समझ रहा था।

प्रश्न 2.
डॉ. वसंत की चेतावनी लोगों को खोखली क्यों लगी?
उत्तर:
डॉ. वसंत की यह चेतावनी लोगों को खोखली लगी क्योंकि अप्रैल में वसंत ऋतु का आगमन ठीक समय पर हुआ था और जून-जुलाई में पृथ्वी की तपन बढ़ाने के लिए सूर्य-प्रकाश अपनी चरम सीमा पर था। सभी लोग मानकर चल रहे थे कि पिछली सर्दियाँ भले ही भयानक रही हों, लेकिन अब फिर वही हाल नहीं होगा।

प्रश्न 3.
डॉ. चिटणीस ने अपनी दराज से क्या निकाला?
उत्तर:
डॉ. चिटणीस ने अपनी दराज से एक टंकलिखित लेख निकाला, जिसका शीर्षक था-‘अभियान : इन्द्र पर आक्रमण’।

प्रश्न 4.
क्या इन्द्र पर आक्रमण सफल होगा? इस प्रश्न का उत्तर कब मिलने लगा था?
उत्तर:
सितम्बर में इस प्रश्न का उत्तर मिलने लगा था। उत्तरी हिन्दुस्तान में जमीन की बर्फ पिघलने लगी। फ्लोरिडा से कैलिफोर्निया के बीच की जमीन बर्फ के सफेद बुरखे से धीरे-धीरे झाँक रही थी। आखिर बर्फ पिघलने लगी थी।

हिम-प्रलय दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नवंबर माह में क्या घटना घटी?
उत्तर:
बंबईवालों ने 2 नवंबर को एक बहुत बड़ा अभूतपूर्व दृश्य देखा। वह यह कि आकाश में पूरे दिन पक्षी उड़ते रहे। वे वायुसेना की किसी कवायद की तरह बहुत ही अनुशासन में उड़ रहे थे। हर रोज की तरह उस दिन कौए गायब हो रहे थे। वे सभी पक्षी दक्षिण की ओर जा रहे थे। 4 नवंबर को अंतरिक्ष में स्थिर अनेक उपग्रहों ने संदेश देने शुरू कर दिए थे कि पृथ्वी के आस-पास वायुमंडल में हिमपात के आसार नजर आ रहे हैं। अगले चौबीस घंटों में जगह-जगह बर्फ गिरने की संभावना है। इससे पहले पक्षियों को खतरे का अंदाज हो चुका था। वे भूमध्य रेखा तक सुरक्षित पहुँच चुके थे।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
हिमपात ने होम्स के विचार किस प्रकार बदल डाले थे?
उत्तर:
हिमपात ने होम्स के विचार भी बदल डाले थे। वरना राजीव की इस सूचना को वे तुरन्त अमान्य कर देते। वसंत चिटणीस तीन-चार सालों से जिस हिमप्रलय की पूर्व सूचना दे रहे थे, वह तो आन खड़ा था। इसलिए इससे बचने का उनके पास यदि उपाय है तो उस पर विचार होना ही चाहिए। होम्स ने बात मान ली और दो ही दिन बाद राजीव शाह को लेकर होम्स बांडुंग गए। लेकिन क्या हम वास्तव में इस विपदा पर विजय पा सकेंगे? उनके मन में अभी भी थोड़ी शंका थी।

प्रश्न 3.
डॉ. वसंत चिटणीस की दूसरी क्या सताने लगी थी?
उत्तर:
प्रकृति और इंसान के बीच छिड़े युद्ध में इंसान की जीत हुई थी, लेकिन अब उसे अनेक समस्याओं का सामना करना था। बर्फ पिघलने से ‘न भूतो न भविष्यति’ बाढ़ आने वाली थी। पृथ्वी की जनसंख्या आधी हो चुकी थी। अनेक बहुमूल्य चीजें इसी आक्रमण में नष्ट हो गई थीं। इस एकता का परिचय इंसान ने इंद्र पर आक्रमण के दौरान दिया था, क्या?

प्रश्न 4.
‘हिम-प्रलय’ विज्ञान-कथा के द्वारा लेखक क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर:
इस विज्ञान कथा में प्रकृति असन्तुलन से उत्पन्न समस्या को आधार बनाया गया है। प्राकृतिक आपदाएँ कभी भी, किसी भी देश पर आ सकती हैं। ऐसी स्थित में यदि यथासमय उचित प्रयास नहीं किए गए तो महाविनाश की स्थिति निर्मित हो सकती हैं। विकसित कहे जाने वाले राष्ट्र भी इन आपदाओं से संघर्प करम में विफल हो सकते हैं। मानव जाति का अस्तित्व बचाए रखने के लिए सभी राष्ट्रों को आपसी मतभेद भुलाकर सामूहिक रूप से प्रयास करना चाहिए। इस पाठ के माध्यम से लेखक हमें यही संदेश देना चाहता है।

हिम-प्रलय लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
डॉ. जयन्त नार्लीकर का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके महत्त्व पर प्रकाश डालिए?
उत्तर:
जीवन-परिचय:
वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में डॉ. जयन्त नार्लीकर का स्थान प्रमुख है। उनका जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 1938 में हुआ था। उनकी आरम्भिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय में हुई। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेड होयल के साथ खगोल सम्बन्धित क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण शोध कार्य किया। इसके कुछ समय बाद उन्होंने भारत की शोध संस्था ‘टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फण्डामेन्टल रिसर्च’ में भी अनेक शोध कार्य किए।

रचनाएँ:
डॉ. जयन्त नार्लीकर ने अपने अनुसंधान कार्य के साथ-साथ हिन्दी और मराठी में अनेक विज्ञान कथाएँ और उपन्यास लिखे हैं। उनकी ‘आगन्तुक’ ‘धूमकेतु’ ‘विज्ञान’ : ‘मानव’, ब्रह्माण्ड’ आदि प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ हैं।

महत्त्व:
डॉ. जयन्त नार्लीकर को वैज्ञानिक खोजों के लिए ‘स्मिथ पुरस्कार’, ‘एडम्स पुरस्कार’ तथा ‘शान्ति स्वरूप भटनागर पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। भारत सरकार द्वारा उनको ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया गया है।

हिम-प्रलय पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
डॉ. जयन्त नार्लीकर लिखित ‘हिम-प्रलय’ विज्ञान-कथा का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
डॉ. जयन्त नार्लीकर लिखित ‘हिम-प्रलय’ एक विज्ञान-कथा है। इसमें लेखक ने ‘हिम-प्रलय’ से होने वाले महाविनाश को रेखांकित करने का प्रयास किया है। इस विषय में लेखक का कहना है कि ‘हिम-प्रलय का आगमन-भारतीय वैज्ञानिक की भविष्यवाणी’ राजीव शाह के इस लेख की अधिक चर्चा हो रही थी। लेकिन कुछ वैज्ञानिक इसे हिम-प्रलय मानने को तैयार नहीं थे।

विदेशी पत्रकारों से एक भेटवार्ता में डॉ. वसंत चिटणीस ने चेतावनी दी थी-“अब की गर्मियों में इस बर्फ को भूलिए नहीं! क्योंकि अगली सर्दियाँ इतनी भयंकर होंगी कि बर्फ पिघलने का नाम ही नहीं लेगी। हिम-प्रलय प्रतिबंधक उपाय है, वह महंगा है, लेकिन फिर भी उस पर अभी से अमल कीजिए।” लेकिन डॉ. वसंत की इस चेतावनी पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

इसका मुख्य कारण था कि उस समय मौसम सुहावना था। हमेशा की तरह भारत में मानसून पूरे जोरों पर था। फिर भी डॉ. वसंत बार-बार चेतावनी दे रहे थे जिसे कोई नहीं सुन रहा था। केवल राजीव शाह ही उनके विश्लेषण से सहमत थे। जब डॉ. वसंत ने अपने नाम समुद्र-विज्ञान के एक विश्वविख्यात संस्थान के संचालक द्वारा भेजे गए संदेश को राजीव शाह को पढ़कर सुनाया। राजीव शाह उसे सुनकर हैरान हो गए। डॉ. वसंत ने राजीव शाह को सलाह दी कि वह आने वाले साल इंडोनेशिया चला जाए। ऐसा इसलिए कि भूमध्य रेखा के पास ही बचने की कुछ गुंजाइश है। वह तो बांडुंग जाने ही वाला है।

बम्बई वालों ने 2 नवंबर को आकाश का एक अपूर्व दृश्य देखा कि पूरे दिन आकाश में पक्षी उड़ते रहे। सभी पक्षी दक्षिण की ओर जा रहे थे। 4 नवंबर को अंतरिक्ष में स्थित उपग्रहों ने संदेश दिया- “पृथ्वी के इर्द-गिर्द वायुमंडल में हिमपात के आसार नजर आ रहे हैं। अगले चौबीस घंटों में जगह-जगह बर्फ गिरने की संभावना है।” इससे पहले पक्षी खतरे का अनुमान लगाकर भूमध्य रेखा तक सुरक्षित पहुँच चुके थे।

अनेक शहरों में हुए भीषण हिमपात ने चारों ओर तबाही मचा दी। जापान, रूस, यूरोप, कनाडा जैसे विकसित देश भी इस तबाही से नहीं बच सके थे। अमेरिकी ऊर्जा समिति के सदस्य रिचर्ड होम्स ने राजीव शाह से डॉ. बसंत से मुलाकात की इच्छा व्यक्त करते हुए उनकी प्रशंसा की। दो दिन बाद वे राजीव शाह को लेकर डॉ. वसंत के पास बांडुंग पहुंचकर अपनी शंका बताए।

राजीव शाह ने डॉ. वसंत को कुछ टैलेक्स दिए। डॉ. वसंत ने पढ़ा-…”ब्रिटिश सरकार ने अपनी बची हुई जनता के 40 प्रतिशत लोगों को केनिया में स्थानान्तरित किया है। स्थानान्तरित करने का यह काम दो महीने में पूरा हो जाएगा।” “मास्को तथा लेनिनग्राद खाली किए जा चुके हैं-सोवियत प्रधानमंत्री की घोषणा”, “जमीन के नीचे बनाई बस्तियों में हम एक साल रह सकते हैं-इजरायली अध्यक्ष का विश्वास।”

“उत्तर भारत की सभी नदियाँ जम चुकी हैं।” डॉ. वसंत ने कहा- “यह तो केवल शुरुआत है। पिछले वर्ष सिर्फ इसकी झलक मिली थी। किंतु अगले साल पृथ्वी मनुष्यहीन हो जाएगी।” होम्स के यह पूछने पर कि क्या इससे बचाव का कोई उपाय है? डॉ. वसंत ने कहा कि “अब बहुत देर हो चुकी है। इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता।” इतना कहकर उन्होंने अपनी दराज से एक टंकलिखित लेख निकाला। उसका शीर्षक था-‘अभियान : इन्द्र पर आक्रमण।’

कन्या कुमारी से कुछ दूर स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र का अग्निबाण प्रक्षेपण स्थल पर अनेक वैज्ञानिक-विशेषज्ञ एकत्रित हुए थे। प्रकल्प के प्रमुख तंत्रज्ञ ने बटन दबाया। उससे अनेक अग्निबाण अंतरिक्ष की ओर गए। उनका उद्देश्य तापमान पर नियंत्रण पाना था। अनेक देशों से इस प्रकार के उपग्रह छोड़े जाने वाले थे लेकिन डॉ. वसंत ने सबसे पहले वातावरण पर हमला बोला था। भूमध्य रेखा पर स्थित कई देशों से छोड़े गए विशालकाय गुब्बारे और उपग्रह अंतरिक्ष में लपक रहे थे। इसके साथ ही ऊँची उड़ानें भरने वाले हवाई जहाजों ने भी उड़ानें भरीं। इस प्रकार चतुरंगी सेना ने वायुमंडल पर जबरदस्त हमला बोल दिया था।

अब प्रक्षेपण अस्त्रों से किए जाने वाले विस्फोटों के उपयोग ने उनकी विधायक शक्ति का स्थान धीमी गति से आग उगलने वाले विस्फोटों ने ले लिया था। अपनी सभी प्रकार की साधन-सामग्री को परस्पर तनाव को भूलकर सभी देशों ने दाँव पर लगा दिया था। फिर इस आक्रमण की सफलता के प्रति सभी सशंकित थे। इसका उत्तर मिलने लगा कि आखिर बर्फ पिघलने लगी थी। इसे देखकर मियासी से होम्स ने डॉ. वसंत को फोन करके बधाई दी। फिर भी डॉ. वसंत को चिन्ता यह होने लगी थी कि प्रकृति और इंसान की इस जीत के बावजूद इंसान को अनेक समस्याओं का सामना तो करना ही होगा। बर्फ पिघलने से बाढ़ आएगी। पृथ्वी की जनसंख्या आधी हो चुकी थी।

हिम-प्रलय संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
4 नवंबर को अंतरिक्ष में स्थिर अनेक उपग्रहों से खतरे के संदेश आने लगे। “पृथ्वी के इर्द-गिर्द वायुमण्डल में हिमपात के आसार नजर आ रहे हैं। अगले चौबीस घंटों में जगह-जगह बर्फ गिरने की संभावना है।” एक तरफ देश-विदेश के मौसम विभाग अपनी इस पूर्व सूचना पर गर्व अनुभव कर रहे थे, लेकिन उनकी सूचना से पहले ही पक्षियों को खतरे का अंदाज आ चुका था और वे भूमध्य रेखा तक सुरक्षित पहुँच चुके थे।

शब्दार्थ:

  • अंतरिक्ष – आकाश।
  • इर्द-गिर्द – आस-पास।
  • हिमपात – बर्फ का गिरना।
  • आसार – आशा।
  • अंदाज-अनुमान।

प्रसंग:
यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ में संकलित तथा डॉ. जयन्त नार्लीकर द्वारा लिखित विज्ञान-कथा ‘हिम-प्रलय’ शीर्षक से उद्धृत है। इसमें लेखक ने हिमपात होने के पहले की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
हिमपात होने की जानकारी संबंधित वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता ली जा रही थी। इस दिशा में संसार के सभी वैज्ञानिक चौकन्ने हो गए थे। इससे पहले ही सभी दक्षिण दिशा की ओर बड़ी तेजी से भागते हुए दिखाई देने लगे थे। जैसे-जैसे हिमपात का समय आने लगा, वैसे-वैसे अंतरिक्ष में स्थिर उपग्रह संदेश भेजने लगे थे। 4 नवंबर को अंतरिक्ष में स्थित उपग्रहों ने हिमपात से होने वाले खतरों के विषय में संदेश भेजने शुरू कर दिए थे। उनका मुख्य रूप से यही संदेश था कि पृथ्वी के आस-पास के वायुमंडल में हिमपात होने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता है।

इस प्रकार आने वाले 24 घंटे और खतरनाक साबित हो सकते हैं। ऐसा इसलिए कि इन 24 घंटों में कई जगह भीषण हिमपात होने की पूरी-पूरी संभावना है। इस तरह की सूचना देश के मौसम-विभाग ने पहले से ही देनी शुरू कर दी थी और इससे वह बहुत गर्व का अनुभव भी कर रहा था। लेकिन यह एक बड़ी अद्भुत बात थी कि मौसम विभाग की इस प्रकार की सूचना से पहले ही सभी पक्षियों को हिमपात से होने वाले खतरों का अनुमान हो चुका था। इसलिए वे भूमध्य रेखा के पास अच्छी तरह से जा चुके थे।

विशेष:

  1. हिमपात की भयंकरता पर प्रकाश डाला गया है।
  2. भयानक रस का प्रवाह है।
  3. भाषा के शब्द मिश्रित हैं.।
  4. शैली वर्णनात्मक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. हिमपात से पहले की स्थिति क्या थी?
  2. पक्षियों को हिमपात के खतरे का अंदाज सबसे पहले होने का क्या आशय है?

उत्तर:

  1. हिमपात से पहले की स्थिति यह थी कि पृथ्वी के आस-पास वायुमंडल में हिमपात होने के आसार दिखाई देने लगे थे।
  2. पक्षियों को हिमपात के खतरे का अंदाजा सबसे पहले होने का आशय यह है कि मनुष्य से कहीं अधिक ज्ञान पक्षियों को होता है।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. उपग्रहों से क्या-क्या संदेश आने लगे थे?
  2. पहले ही पक्षियों को क्या हो गया था?

उत्तर:

1. उपग्रहों से संदेश आने लगे थे कि –

  • पृथ्वी के आस-पास वायुमंडल में हिमपात के आसार नजर आ रहे हैं।
  • अगले चौबीस घंटों में जगह-जगह बर्फ गिरने की संभावना है।

2. पहले ही पक्षियों को हिमपात के खतरों का अनुमान हो चुका था।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
उनकी एकता और अनुशासन यदि मानव जाति में होती तो विभिन्न देशों में भारी भगदड़ न मची होती। तकनीकी लिहाज से जापान, यूरोप, रूस, कनाडा जैसे प्रगत राष्ट्र भी इस हिमपात का मुकाबला नहीं कर सके। अनेक शहरों में पाँच से छह मीटर तक बर्फ गिरी थी। इतने भीषण हिमपात ने चारों तरफ तबाची मचा दी। सिर्फ कुछ ही लोग इस तबाही से अपने आप को बचा सके थे। ये सभी लोग उन शेल्टरों में थे जो अणु-युद्ध से बचने के लिए बनाए गए थे। मध्य पूर्व एशिया, मैक्सिको जैसे देशों में ठंड का आघात कम था। लेकिन चूंकि उनके पास बचाव का कोई जरिया नहीं था इसलिए वहाँ भी जान-माल की भयंकर हानि हुई थी।

शब्दार्थ:

  • भगदड़ – अस्थिरता।
  • लिहाज – दृष्टि से।
  • प्रगत – प्रगतिशील, विकसित।
  • भीषण – भयंकर।
  • तबाही – बर्बादी।
  • सिर्फ – केवल।
  • शेल्टर – रक्षास्थान।
  • आघात – प्रहार।
  • जरिया – माध्यम, साधन।

प्रसंग:
पूर्ववत्! इसमें लेखक ने मानव जाति के परस्परं भेदभाव और दूरी को हानिकारक बतलाते हुए उसे पक्षियों से एकता और अनुशासन सीखने की सीख दी. है। इस विषय में लेखक का कहना है कि –

व्याख्या:
पक्षियों में एकता और अनुशासन होता है। इसी से वे आने वाले खतरों का अनुमान कर किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाते हैं, जबकि मनुष्य ऐसा कुछ भी नहीं कर पाता है। यही कारण है कि यदि पक्षियों की तरह मनुष्य में एकता और अनुशासन का जीवन होता तो हिमपात के खतरों का अनुमान कर अलग-अलग देशों में भगदड़ नहीं मची होती। तकनीकी साधनों के बावजूद जापान, यूरोप, रूस, कनाडा, आदि संसार के अनेक विकसित देश भी हिमपात से हुए खतरों का सामना करने में असफल रहे। चूँकि हिमपात असाधारण और अभूतपूर्व हुआ था। उससे संसार के कई देशों के नगरों-महानगरों में पाँच से छः मीटर तक वर्क की ऊँची-ऊँची परतें पड़ी थीं।

इस प्रकार के भयंकर हिमपात के पड़ने से चारों ओर हाहाकार मच गया था। जान-माल के भारी नुकसान ने भयंकर तबाही मचा दी थी। इस तबाही से बहुत कम लोग ही बच पाए थे। अधिक-से-अधिक बर्बादी ने चारों ओर भयंकर दृश्य उपस्थित कर दिया था। जो लोग इस तबाही से बचे थे, वे अणु-युद्ध से बचने के लिए बनाए गए रक्षा-स्थान में रहने के कारण सुरक्षित रह सके थे।

लेखक-का पुनः कहना है कि हिमपात से होने वाली हानि से अनेक देश प्रभावित हुए थे। लेकिन वे समान रूप से नहीं प्रभावित हुए थे। किसी-किसी देश में तो इसका आघात बहुत अधिक था, तो किसी-किसी देश में बहुत कम था। मध्य-पूर्व एशिया, मैक्सिको जैसे देशों में इस हिमपात का आघात कम था तो और देशों में इसका आघात बहुत अधिक था। इस प्रकार जिन देशों के पास इससे बचाव के साधन अधिक और बड़े थे, वहाँ इसका आघात कम था। इसके विपरीत जिन देशों में इससे बचाव के साधन कम और छोटे थे, वहाँ इसका आघात बहुत था, इससे वहाँ जान-माल की बहुत बड़ी हानि हुई थी।

विशेष:

  1. हिमपात से होने वाली हानियों का उल्लेख है।
  2. हिमपात से बचने के लिए सुरक्षित स्थानों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
  3. भाषा तत्सम प्रधान शब्दों की है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।
  5. यह अंश ज्ञानवर्द्धक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. विभिन्न देशों में भगदड़ क्यों मच गई?
  2. कौन लोग भीषण हिमपात से अपने आपको बचा सके थे?

उत्तर:

  1. विभिन्न देशों में भगदड़ मच गई। ऐसा इसलिए कि मानव जाति में पक्षियों की तरह एकता और अनुशासन की बहुत बड़ी कमी है।
  2. जो लोग अणु-युद्ध से बचने के लिए बनाए गए शेल्टरों (सुरक्षा-घरों) में चले गए थे, वे ही भीषण हिमपात से अपने आपको बचा सके थे।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. चारों ओर तबाही क्यों मच गई?
  2. जान-माल की भयंकर हानि कहाँ और क्यों हुई थी?

उत्तर:

  1. चारों ओर तबाही मच गई। यह इसलिए कि अनेक देशों में पाँच-छ: मीटर तक भीषण हिमपात हुआ था।
  2. जान-माल की भयंकर हानि मध्यपूर्व एशिया, मैक्सिको आदि देशों में हई थी। यह इसलिए कि उनके पास बचाव के कोई साधन नहीं थे।

प्रश्न 3.
यही सवाल दुनिया के विशेषज्ञों तथा वैज्ञानिकों को भी सता रहा था। इस योजना के तहत सूर्य की उष्णता को अपने में समाकर पृथ्वी तक पहुँचाने वाले असंख्य धातुकण वायुमण्डल में बिखरने वाले थे। वसंत का विचार था कि ज्वालामुखी द्वारा फैले उष्णता प्रतिबंधक कण नीचे आ जाएँगे, और ये धातु कण उनका स्थान ले लेंगे। लेकिन यह काफी नहीं था। वातावरण में ऊर्जा-निर्मिति आवश्यक थी। ‘हीरे की धूल’ कम करने के लिए वातावरण का अस्थायी तौर पर गर्म होना भी जरूरी था।

इसलिए प्रक्षेपण अस्त्रों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों का उपयोग किया गया। उनकी विघातक शक्ति का स्थान धीमी गति से आग उगलने वाले विस्फोटों ने ले लिया। वैसे तो ये अस्त्र एक-दूसरे का नाश ही करते। लेकिन परिप्रेक्ष्य बदलते ही उनकी उपयोगिता भी बदल गई। अपनी सारी साधन-सामग्री दाँव पर लगाकर, आपसी अदावत भुलाकर सभी देशों ने इस कार्य में मदद की थी। लेकिन फिर भी सभी इस कशमकश में उलझे थे कि क्या यह आक्रमण सफल होगा?

शब्दार्थ:

  • सता – चिन्तित कर।
  • प्रतिबंधक – रुकावट।
  • परिप्रेक्ष्य – संदर्भ।
  • अदावत – तनाव, ईर्ष्या, द्वेष।
  • कशमकश – खींचातानी, असमंजस।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इसमें लेखक ने हिमपात को रोकने या नियंत्रित करने की कठिनाई को वैज्ञानिकों की चिन्ता का एक विषय बतलाते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
हिमपात कैसे और किस प्रकार रोका जाए, इसकी चिन्ता संसार के सभी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को बार-बार हो रही थी। हिमपात पर नियंत्रण रखने के लिए वैज्ञानिकों-विशेषज्ञों ने जो योजना बनाई, वह सूर्य की गर्मी को अपने में रखकर पृथ्वी तक आने वाले अनेक धातुकण वायुमंडल में फैलने वाले थे। इस विपय में डॉ. वसंत का यह मानना था कि ज्वालामुखी की फैलती हुई जो गर्मी होगी उससे प्रतिबंधक कण नीचे तक आ जाएँगे। उनके स्थान पर धातुकण आ जाएँगे। फिर भी यह पर्याप्त नहीं कहा जा सकता था। ऐसा इसलिए कि वातावरण में ऊर्जा का निर्मित होना बेहद जरूरी था। दूसरी बात यह कि ‘हीरे की धूल को कम करने के लिए वातावरण का अस्थायी तौर पर गर्म होना भी बेहद जरूरी था।

लेखक का पुनः कहना है कि हिमपात को नियंत्रित करने के लिए संसार के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष में प्रक्षेपण अस्त्रों के द्वारा विस्फोटों का उपयोग किया। लेकिन कुछ समय बाद उन विस्फोटों की एक विघातक शक्ति उत्पन्न हुई। फिर कुछ समय बाद उस शक्ति की जगह धीरे-धीरे आग को फेंकने वाले विस्फोटों ने ले लिया था। ये सभी अस्त्र एक-दूसरे के लिए उपयोगी न होकर घातक और विध्वंसक होते हैं।

लेकिन यह ध्यान देने की बात है कि संदर्भ और समय बदलते ही उनका महत्त्व और उनकी उपयोगिता भी वही नहीं रही। इसे सभी देशों के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने अपनी सोच और समझ को एकता का रूप देने का प्रयास किया। इससे पहले उन्होंने आपसी भेदभाव और अदावत को भुला दिया। फिर भी वे इस असमंजस में थे कि उनके द्वारा किए गए प्रयास सफल होंगे या असफल।

विशेष:

  1. वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का परस्पर एकमत होने के उल्लेख प्रेरक रूप में हैं।
  2. वैज्ञानिक शब्दावली है।
  3. नए-नए वैज्ञानिक खोजों के विषय में प्रकाश डाला गया है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।
  5. वाक्य-गठन गंभीर अर्थमय है।
  6. यह अंश ज्ञानवर्द्धक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. किसको क्या सता रहा था?
  2. वसंत का क्या मानना था?
  3. प्रक्षेपण अस्त्रों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों का क्यों उपयोग किया गया?

उत्तर:

1. दुनिया के सभी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को यह सवाल सता रहा था कि क्या इन्द्र पर वैज्ञानिक सफल होंगे?

2. डॉ. वसंत का यह मानना था कि ज्वालामुखी द्वारा कैसे उष्णता प्रतिबंधक कण नीचे आ जाएँगे और धातुकण उनका स्थान ले लेंगे।

3. प्रक्षेपण अस्त्रों के द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों का उपयोग इसलिए किया गया कि वातावरण में ऊर्जा बिल्कुल जरूरी थी। इसके साथ ही ‘हीरे की धूल’ कम करने के लिए भी वातावरण का अस्थायी रूप से गर्म होना भी बेहद जरूरी था। बहुत अधिक था। इस प्रकार जिन देशों के पास इससे बचाव के साधन अधिक और बड़े थे, वहाँ इसका आघात कम था। इसके विपरीत जिन देशों में इससे बचाव के साधन कम और छोटे थे, वहाँ इसका आघात बहुत था, इससे वहाँ जान-माल की बहुत बड़ी हानि हुई थी।

विशेष:

  1. हिमपात से होने वाली हानियों का उल्लेख है।
  2. हिमपात से बचने के लिए सुरक्षित स्थानों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
  3. भाषा तत्सम प्रधान शब्दों की है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।
  5. यह अंश ज्ञानवर्द्धक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. विभिन्न देशों में भगदड़ क्यों मच गई?
  2. कौन लोग भीषण हिमपात से अपने आपको बचा सके थे?

उत्तर:

  1. विभिन्न देशों में भगदड़ मच गई। ऐसा इसलिए कि मानव जाति में पक्षियों की तरह एकता और अनुशासन की बहुत बड़ी कमी है।
  2. जो लोग अणु-युद्ध से बचने के लिए बनाए गए शेल्टरों (सुरक्षा-घरों) में चले गए थे, वे ही भीषण हिमपात से अपने आपको बचा सके थे।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. चारों ओर तबाही क्यों मच गई?
  2. जान-माल की भयंकर हानि कहाँ और क्यों हई थी?

उत्तर:

  1. चारों ओर तबाही मच गई। यह इसलिए कि अनेक देशों में पाँच-छः मीटर तक भीषण हिमपात हुआ था।
  2. जान-माल की भयंकर हानि मध्यपूर्व एशिया, मैक्सिको आदि देशों में हुई । थी। यह इसलिए कि उनके पास बचाव के कोई साधन नहीं थे।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
यही सवाल दुनिया के विशेषज्ञों तथा वैज्ञानिकों को भी सता रहा था। इस योजना के तहत सूर्य की उष्णता को अपने में समाकर पृथ्वी तक पहुँचाने वाले असंख्य धातुकण वायुमण्डल में बिखरने वाले थे। वसंत का विचार था कि ज्वालामुखी द्वारा फैले उष्णता प्रतिबंधक कण नीचे आ जाएँगे, और ये धातु कण उनका स्थान ले लेंगे। लेकिन यह काफी नहीं था। वातावरण में ऊर्जा-निर्मिति आवश्यक थी। ‘हीरे की धूल’ कम करने के लिए वातावरण का अस्थायी तौर पर गर्म होना भी जरूरी था।

इसलिए प्रक्षेपण अस्त्रों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों का उपयोग किया गया। उनकी विघातक शक्ति का स्थान धीमी गति से आग उगलने वाले विस्फोटों ने ले लिया। वैसे तो ये अस्त्र एक-दूसरे का नाश ही करते। लेकिन परिप्रेक्ष्य बदलते ही उनकी उपयोगिता भी बदल गई। अपनी सारी साधन-सामग्री दाँव पर लगाकर, आपसी अदावत भुलाकर सभी देशों ने इस कार्य में मदद की थी। लेकिन फिर भी सभी इस कशमकश में उलझे थे कि क्या यह आक्रमण सफल होगा?

शब्दार्थ:

  • सता – चिन्तित कर।
  • प्रतिबंधक – रुकावट।
  • परिप्रेक्ष्य – संदर्भ।
  • अदावत – तनाव, ईर्ष्या, द्वेष।
  • कशमकश – खींचातानी, असमंजस।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इसमें लेखक ने हिमपात को रोकने या नियंत्रित करने की कठिनाई को वैज्ञानिकों की चिन्ता का एक विषय बतलाते हुए कहा है कि व्याख्या-हिमपात कैसे और किस प्रकार रोका जाए, इसकी चिन्ता संसार के सभी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को बार-बार हो रही थी। हिमपात पर नियंत्रण रखने के लिए वैज्ञानिकों-विशेषज्ञों ने जो योजना बनाई, वह सूर्य की गर्मी को अपने में रखकर पृथ्वी तक आने वाले अनेक धातुकण वायुमंडल में फैलने वाले थे।

इस विषय में डॉ. वसंत का यह मानना था कि ज्वालामुखी की फैलती हुई जो गर्मी होगी उससे प्रतिबंधक कण नीचे तक आ जाएँगे। उनके स्थान पर धातुकण आ जाएँगे। फिर भी यह पर्याप्त नहीं कहा जा सकता था। ऐसा इसलिए कि वातावरण में ऊर्जा का निर्मित होना बेहद जरूरी था। दूसरी बात यह कि ‘हीरे की धूल’ को कम करने के लिए वातावरण का अस्थायी तौर पर गर्म होना भी बेहद जरूरी था।

लेखक का पुनः कहना है कि हिमपात को नियंत्रित करने के लिए संसार के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष में प्रक्षेपण अस्त्रों के द्वारा विस्फोटों का उपयोग किया। लेकिन कुछ समय बाद उन विस्फोटों की एक विघातक शक्ति उत्पन्न हुई। फिर कुछ समय बाद उस शक्ति की जगह धीरे-धीरे आग को फेंकने वाले विस्फोटों ने ले लिया था। ये सभी अस्त्र एक-दूसरे के लिए उपयोगी न होकर घातक और विध्वंसक होते हैं।

लेकिन यह ध्यान देने की बात है कि संदर्भ और समय बदलते ही उनका महत्त्व और उनकी उपयोगिता भी वही नहीं रही। इसे सभी देशों के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने अपनी सोच और समझ को एकता का रूप देने का प्रयास किया। इससे पहले उन्होंने आपसी भेदभाव और अदावत को भुला दिया। फिर भी वे इस असमंजस में थे कि उनके द्वारा किए गए प्रयास सफल होंगे या असफल।

विशेष:

  1. वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का परस्पर एकमत होने के उल्लेख प्रेरक रूप में हैं।
  2. वैज्ञानिक शब्दावली है।
  3. नए-नए वैज्ञानिक खोजों के विषय में प्रकाश डाला गया है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।
  5. वाक्य-गठन गंभीर अर्थमय है।
  6. यह अंश ज्ञानवर्द्धक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. किसको क्या सता रहा था?
  2. वसंत का क्या मानना था?
  3. प्रक्षेपण अस्त्रों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों का क्यों उपयोग किया गया?

उत्तर:

1. दुनिया के सभी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को यह सवाल सता रहा था कि क्या इन्द्र पर वैज्ञानिक सफल होंगे?

2. डॉ. वसंत का यह मानना था कि ज्वालामुखी द्वारा कैसे उष्णता प्रतिबंधक कण नीचे आ जाएँगे और धातुकण उनका स्थान ले लेंगे।

3. प्रक्षेपण अस्त्रों के द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों का उपयोग इसलिए किया गया कि वातावरण में ऊर्जा बिल्कुल जरूरी थी। इसके साथ ही ‘हीरे की धूल’ कम करने के लिए भी वातावरण का अस्थायी रूप से गर्म होना भी बेहद जरूरी था।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. एक अस्त्र दूसरे का विनाशक होने पर भी क्यों उपयोगी हो गए?
  2. सभी देशों की उलझन क्या थी?

उत्तर:

  1. एक अस्त्र दूसरे का विनाशक होने पर भी उपयोगी हो गए। यह इसलिए कि परिप्रेक्ष्य बदलते ही उनकी उपयोगिता भी बदल गई थी।
  2. सभी देशों की यही उलझन थी कि क्या इन्द्र पर आक्रमण सफल होगा?

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 उलाहना

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 उलाहना (कविता, माखनलाल चतुर्वेदी)

उलाहना पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

उलाहना लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मधुदान का मेहमान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मधुदान का मेहमान से तात्पर्य है-देशप्रेमी का महत्त्व रखना।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार सलामत कौन रह जाता है?
उत्तर:
कवि के अनुसार सलामत आम आदमी रह जाता है।

प्रश्न 3.
रमलू भगत किसका प्रतीक है?
उत्तर:
रमलू भगत सर्वहारा वर्ग का प्रतीक है।

उलाहना दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
छोटे अपने किन गुणों के कारण सलामत रह जाते हैं?
उत्तर:
जीवन में हर प्रकार के अभावों और कठिनाइयों को झेलते रहना, दुखों को सहन करते रहना, हमेशा मर-मरकर घोर और कठोर श्रम साधना करते रहना और परस्पर घुल-मिलकर रहना। इन गुणों के कारण छोटे सलामत रह जाते हैं।

प्रश्न 2.
कवि अमीरों से उनके जीवन में किस तरह के परिर्वन की आकांक्षा करता है?
उत्तर:
कवि अमीरों से उनके जीवन में अनेक तरह के परिवर्तन की आकांक्षा करता है। हमेशा छोटों से घुल-मिलकर रहना, उनके दुःखों को समय निकालकर समझना और उन्हें दूर करने की कोशिश करना, अमीरी की ऊँचाई से नीचे उतर गरीबी की जमीन पर आना और कुटिया निवासी आम आदमी के आदर-भाव को महत्त्व देना। इस प्रकार के अपने जीवन में परिवर्तन लाने की कवि अमीरों से चाहता है।

प्रश्न 3.
कविता में ‘कुटिया निवासी’ वनने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कविता में ‘कुटिया निवासी’ बनाने का तात्पर्य है-अमीर अपनी निर्माणपरक शक्तियों का उपयोग कुटिया में रहने वालों के लिए करें और अपनी एकांतिक अमीरों की ऊँचाई से नीचे उतरकर समाज के विकास में सहयोग करें।

उलाहना भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न.

  1. “सदा सहना ……… छोटे सलामत हैं”
  2. “अमीरी से जरा नीचे उतर आओ।”
  3. “उठो, कारा ……… के सहलाओ।”

उत्तर:

1 ‘सदा सहना ………छोटे सलामत हैं’:
उपर्युक्त पद्यांश में आम आदमी खास तौर मजदूर वर्ग के जीवन-स्वरूप को रेखांकित किया गया है। इसके माध्यम से यह बतलाने का प्रयास किया गया है कि मजदूर अनेक प्रकार के अभावों और कठिनाइयों को जीवन-भर झेलता रहता है। फिर भी वह उससे हिम्मत नहीं हारता है। घोर परिश्रम करके वह मर-मरकर अपनी जीविका चलाता है। इस प्रकार वह जीवन जीते हुए पर हितार्थ लगा रहता है। वह समाज को हमेशा सही दिशा देते हुए आगे बढ़ाता रहता है। इसके विपरीत अमीर वर्ग ऐसा कुछ नहीं कर पाता है। इसलिए मजदूरों के सामने उसका कोई सामाजिक मूल्य नहीं रह जाता है।

2. ‘अमीरी से जरा नीचे उतर आओ’:
काव्य पंक्तियों के माध्यम से कवि ने यह भाव व्यक्त करना चाहता है कि जन-सामान्य खास तौर से मजदूर को हर प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, फिर भी वह अपने उद्देश्य से नहीं भटकता है। वह समाज-सेवा और समाज-कल्याण के लिए निरंतर लगा रहता है। उसके लिए वह कठोर-से-कठोर श्रम करता है। अनेक प्रकार के अभावों को झेलता है। समय आने पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है।

उसके इस देन से अमीर वर्ग प्रभावित होता है। इससे वह खूब फूलता-फलता रहता है। उसे इस प्रकार देखकर मजदूर की उससे अपेक्षा होती है कि वह कभी समय निकालकर अपनी अमीरी की ऊँचाई से उतर वह गरीबी की जमीन पर आता तो उसकी निराशा, हताशा, आशा और उत्साह की किरणों से जगमगा उठती है।

3. ‘उठो कारा……..के सहलाओ’:
उपर्युक्त काव्यांश का भाव यह है कि मजदूर वर्ग अपने अभावों की जिन्दगी से ऊब चुका है। उसे अपनी गरीबी को दूर करने के लिए और कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है। उसे अगर कोई रास्ता दिखाई दे रहा है तो वह है अमीर वर्ग। उससे उसे वही उम्मीदें हैं। ऐसा इसलिए कि उसने अनेक बड़े-बड़े काम किए हैं। उससे देश-समाज के रूप-रंग बदले हैं। उसे उससे बड़े यश प्राप्त हुए हैं। इसलिए वह अब मजदूर वर्ग के पास आए।

उसके दुखों-अभावों को समझे, उसकी गरीबी की कारा बना दे, अर्थात गरीबी को नियंत्रित करके उसे दूर कर दे। इस प्रकार वह मजदूर वर्ग के बलबूते पर रहते हुए उन्हें न भूलें। उन्हें अपना समझकर उनके दुःख-सुख में हाथ बँटाए। मजदूर वर्ग की उससे अपेक्षा है कि वह एक मसीहा के रूप में आकर सदियों से चले आ रहे उनके दुखों और अभावों के गहरे घावों पर ममता का मरहम लगाकर उन्हें सहला दे।

उलाहना भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
इबादत, मसीहा, अमीरी, मेहमान, जमाना, सलामत विदेशी शब्द हैं, इनके मानक अर्थ लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 उलाहना img-1

प्रश्न 2.
बाढ़ोमयी, बड़ापन, न्यौतता, बलिदान, इन शब्दों में लगाये गये प्रत्यय बताएं?
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 उलाहना img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
श्रम, मुत्यु, प्यार, स्मृति।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 उलाहना img-3

प्रश्न 4.
निम्नांकित अपठित पद्यांश को ध्यान से पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

हर कदम-कदम पे सबको साथ ले,
एकता अखंडता की बात ले,
शुभ-पवित्र लक्ष्य के लिए जिओ
देश और धर्म के लिए जिओ ॥1॥

मातृभूमि पर भी हमको गर्व हो,
मातृभूमि रक्षा एक पर्व हो,
ऐसे राष्ट्र पर्व के लिए जिओ
देश और धर्म के लिए जिओ ॥2॥

श्रम सभी का एक मूलमंत्र हो
श्रम के लिए हर मनुज स्वतंत्र हो
लोक-लाज शर्म छोड़कर जिओ
देश और धर्म के लिए जिओ ॥3॥

हो अनाथ दुखिया अगर राह में
हो समानुभूति हर निगाह में,
करुणा-और प्रेम के लिए जिओ,
देश और धर्म के लिए जिओ ॥4॥

भाईचारा सबके दिल में हो सदा
कटुता घृणा बैर भाव हो विदा,
जीना, श्रेष्ठ कर्म के लिए जिओ
देश और धर्म के लिए जिओ॥5॥ -मुनि विमर्शसागर

प्रश्न – (क) इस पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
प्रश्न – (ख) इस पद्यांश का भाव संक्षेप में लिखिए।
प्रश्न – (ग) इन प्रश्नों के उत्तर लिखिए।

  1. इन पंक्तियों के रचयिता कौन हैं?
  2. हमें किस पर गर्व होना चाहिए?
  3. हमारा मूलमंत्र क्या होना चाहिए?

उत्तर:
(क) देश और धर्म

(ख) उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा कवि ने परस्पर एकता, अखंडता और भाईचारा को बनाए रखने का भाव भरा है। अपनी मातृभूमि के प्रति गर्व रखते हुए उसकी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहने का मूल मंत्र दिया है। सबमें करुणा और प्रेम जगाने के लिए सहानुभूति की आँखें सोखने की आवश्यकता पर भी कवि ने बल दिया है।

(ग)

  1. रचयिता-मुनि विमर्श सागर।
  2. हमें अपनी मात्रभूमि पर गर्व होना चाहिए।
  3. हमारा मूलमंत्र श्रम होना चाहिए।

उलाहना योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
आप अपने गाँव या शहर के नजदीक किसी बाँध का भ्रमण कीजिए तथा बाँध से होने वाले लाभ-हानि पर चार्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
उपयुक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

प्रश्न 2.
घरों में पकाए जाने वाले पारंपरिक व्यंजनों की सूची बनाइए।
उत्तर:
उपयुक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
कवि ने कविता में ‘बड़े रास्ते, बड़े पुल, बाँध क्या कहने। बड़े ही कारखाने हैं, इमारत हैं।’ के माध्यम से विकास की बात कही है। आप अपने आस-पास की किसी खदान/कारखाना/लघुउद्योग आदि में जाकर उसके बारे में जानकरी प्राप्त कर उसे सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
उपयुक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

उलाहना परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

उलाहना लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बलिदान के मंदिर गिराने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
बलिदान के मंदिर गिराने से तात्पर्य है-बलिदान करने वालों की घोर उपेक्षा करना।

प्रश्न 2.
जमाने में कौन तालियों से सब कुछ पा लेता है?
उत्तर:
जमाने में अमीर वर्ग तालियों से सब कुछ पर लेता है।

प्रश्न 3.
‘कुटिया निवासी’ किसका प्रतीक है?
उत्तर:
‘कुटिया निवासी’ गरीबी का प्रतीक है।

उलाहना दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बड़ों में कौन-कौन से दोष होते हैं?
उत्तर:
बड़ों में निम्नलिखित दोष होते हैं –

वे याद की टीसें भुला देते हैं। वे बलिदान के मंदिर गिराते हैं। वे शहीदों के बलिदान को भुला देते हैं। वे अपने आप ही बिना किसी के कहे-सुने बहके-बहके काम करने लगते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
बड़ों से गरीब क्या अपेक्षा करता है और क्यों?
उत्तर:
बड़ों से गरीब अपने साथ भाईचारा और अपने दुख-सुख का साथी बने रहने की अपेक्षा करता है। वह उससे यह भी अपेक्षा करता है कि वह कभी कुटिया निवासी बनकर उनके दुखों को समझे। इस तरह वह उनकी गरीबी को दूर करने के लिए अपनी शक्तियों और क्षमताओं को लगा दे। यह इसलिए कि वह इसके लिए हर प्रकार से सक्षम और समर्थ है।

प्रश्न 3.
‘उलाहना’ कविता के मुख्य भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने इस कविता में जन सामान्य से अलग-थलग पड़ जाने वाले अमीर वर्ग को उलाहना देते हुए स्पष्ट किया है कि क्रांतिकारियों के बलिदान को भूलकर इस वर्ग ने अपने हित में जय-जयकार कराके अपने समाज को कोई सही दिशा नहीं दी है। जन सामान्य के दुःख-दर्द का अनुभव करना भी पूजाभाव से परिपूर्ण होना है। छोटों के साथ घुल-मिलकर जीने में ही जीवन की सार्थकता है। कवि को अमीरों से अपेक्षा है कि वे अपनी निर्माणपरक शक्तियों का उपयोग कुटिया में रहने वालों के लिए करें और अपनी एकांतिक अमीरी की ऊँचाई से नीचे उतरकर समाज के विकास में सहयोग करें। प्रस्तुत कविता में कवि ने बड़े-बड़े कारखानों, पुलों और बाँधों के निर्माणों के साथ-साथ मानवीय संवेदना के विस्तार को भी जरूरी माना है।

उलाहना कवि-परिचय

प्रश्न 1.
माखललाल चतुर्वेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, सन् 1889 में होशंगाबाद जिले के बाबई नामक स्थान में हुआ था। अपनी शिक्षा समाप्त करके उन्होंने अध्यापन शुरू किया। अध्यापन के दौरान उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती और बंगला का गहरा ज्ञान प्राप्त किया। उनकी रचनाएँ गांधीवादी दर्शन, चिन्तन और विचारधारा से प्रभावित हैं। उनका निधन 30 जनवरी, 1968 को हुआ।

रचनाएँ:
माखनलाल चतुर्वेदी जी की प्रमुख रचनाएँ ‘हिमकिरीटिनी’, ‘हिमतरंगिनी’. ‘माता’, ‘युगचरण’, ‘समर्पण’, ‘वेणु’, ‘लो गूंजे धरा’ (काव्य) ‘साहित्य देवता’ (गद्यकाव्य) वनवासी और कला का अनुवाद (कहानी), ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ (नाटक) हैं।

भाषा-शैली:
चतुर्वेदी जी की भाषा-शैली में प्रवाह है। इनकी भाषा में बोलचाल के शब्दों के साथ-साथ उर्दू-फारसी के शब्द भी हैं जो भाषा को गति प्रदान करते हैं।

महत्त्व:
माखनलाल चतुर्वेदी ‘हिन्दी साहित्य जगत’ में ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण इन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। माखनलाल चतुर्वेदी जी की प्रसिद्धि का आधार कविता ही है, किन्तु वे एक सक्रिय पत्रकार, समर्थ निबंधकार और सिद्धहस्त संपादक भी थे। भारत सरकार ने आपको पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया। चतुर्वेदी जी के काव्य का मूल स्वर राष्ट्रीयतावादी है, जिसमें समर्पण, त्याग, बलिदान, सेवा और कर्त्तव्य की भावना सन्निहित है।।

उलाहना पाठ का सारांश

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
माखनलाल चतुर्वेदी-विरचित कविता ‘उलाहना’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
माखनलाल चतुर्वेदी-विरचित कविता ‘उलाहना’ एक शिक्षाप्रद कविता है। कवि ने प्रस्तुत कविता के माध्यम से जन-सामान्य से हटकर सुख-सुविधा की जिन्दगी जीनेवाले सुविधाभोगियों को उलाहना देने का प्रयत्न किया है। कवि को साधन सम्पन्न और सुविधाभोगियों से शिकायत है कि वे ही जब देश-भक्तों के बलिदानों को भुला दिए हैं, तो फिर साधारण लोगों को उनसे क्या उम्मीदें हो सकती हैं? कवि का पुनः साधनसम्पन्न और सुविधाभोगी वर्ग से शिकायत है कि वह नहीं बदल पाया है।

उसने देश के लिए कुर्बान होनेवाले को भुला दिया है। वह लोगों से अपनी प्रशंसा की तालियाँ बजवाकर भी देश-समाज के दिल को नहीं जीत पाया। बड़ी-बड़ी सड़कें, बड़े-बड़े पुल, बड़े-बड़े बाँध, बड़े-बड़े कारखाने, और बड़ी-बड़ी इमारत तो उसने बनवाई, लेकिन इन्हें बनाने वाले मजदूरों के अभाव के आँसुओं को वह नहीं पोंछ पाया। छोटों का तो जीवन हमेशा सहन करना, श्रम-साधना करना होता है। इसलिए तुम भी उनसे घुल-मिलकर रहना सीखो। यह भी समझो कि बड़े-बड़े ऐसे मिट गए कि उनका कोई नाम-निशान भी शेष नहीं है, लेकिन छोटे आज भी सलामत हैं।

वे तो तुम्हारी चरण-रेखा देखते हैं, लेकिन तुम्हें तो उनके दुःख-दर्द को समझने का समय नहीं होता है। वे तो तुम्हारे मान-सम्मान के लिए मर-मिटते हैं। इसे समझकर तुम अपनी अमीरी से हटकर गरीबी की ओर आ जाओ। तुम्हारी आँचाज संसार का जादू है, तुम्हारी बाँहों में संसार की ताकत है। कभी कुटिया निवासी बनकर तो देखो। तुमने असंभव जैसे कई काम किए हैं। इसलिए अब तुम अपनों के पास आओ। युग का मसीहा बनकर सदियों के लगे गहरे घाव पर ममता के मलहम लगाकर सहला दो।

उलाहना संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
तुम्हीं जब याद की टीसें भुलाते हो,
भला फिर प्यार का अभिमान क्यों जीवे?
तुम्हीं जब बलिदान के मन्दिर गिराते हो,
भला मधुदान का मेहमान क्यों ‘जीवे?
भुला दीं सूलियाँ? जैसे सभी कुछ,
जमाने में तालियों से पा लिया तुमने,
न तुम बहले, न युग बहला, भले साथी,
बताओ तो किसे बहला लिया तुमने!

शब्दार्थ:

  • टीसें – दर्द की अनुभूति।
  • जीवे – जीवित रहे।
  • मधुदान – प्रेम का दान।
  • सूलियाँ – बलिदान।
  • बहला – फुसला।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ से संकलित तथा माखनलाल चतुर्वेदी-विरचित ‘उलाहना’ शीर्षक कविता से उद्धत है। इसमें कवि ने अमीर वर्ग के प्रति जन-सामान्य के उलाहना को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। अमीर वर्ग को उलाहना देते हुए जन-सामान्य कह रहा है –

व्याख्या:
देश के नेता और कर्णधार कहे जाने वाले अमीर वर्ग! जब तुम्हीं देश के आन-मान की रक्षा के लिए अपने प्राणों के बलिदान करने वालों के दर्द की अनुभूति को अनसुना कर रहे हो, तो फिर कैसे प्रेम का अभिमान जीवित रह सकता है? तुम्हीं जब त्याग और बलिदान को महत्त्व नहीं दे रहे हो, तो प्रेम का दान करने वाले का हौसला बढ़ सकता है, अर्थात् नहीं बढ़ सकता है। यह भी बड़े दुःख और अफ़सोस की बात है कि तुमने तो देश के आन-मान पर मर मिटने वाले अमर देशभक्तों की पवित्र यादों को भुला दिया है। अपने चापलूसों और पिछलग्गुओं द्वारा वाहवाही की तालियों को बजवाकर मानो तुमने सब कुछ पा लिया है। इस प्रकार की सोच रखने वाले क्या तुम यह बतलाओगे कि अगर तुम बहके नहीं हो और न जमाना ही बहका है, तो फिर तुम्हें किसने बहका दिया है?

विशेष:

  1. अमीर वर्ग से खासतौर से देश के गद्दारों का उल्लेख है।
  2. व्यंग्यात्मक शैली है।
  3. तुकान्त शब्दावली है।
  4. यह अंश मार्मिक है।
  5. ‘बलिदान का मंदिर’ में रूपक अलंकार है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्यबोध संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
  2. प्रस्तुत पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
  3. ‘तुम्हीं जब बलिदान के मंदिर गिराते हो’ काव्य-पंक्ति का मुख्य भाव लिखिए।

उत्तर:

1. प्रस्तुत पद्यांश में अमीर वर्ग के प्रति जन-सामान्य की शिकायत है। अमीर वर्ग द्वारा अपने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले देशभक्तों को भुला देना जन-सामान्य को मान्य नहीं है। इसे कवि ने मुहावरेदार भाषा के द्वारा प्रस्तुत किया है। शब्द-चयन सामान्य स्तर के हैं लेकिन बड़े सजीव हैं। शैली-विधान भावपूर्ण है। रूपक अलंकार से कथन को आकर्षक बनाने का प्रयास किया है।

2. प्रस्तुत पद्यांश का भाव रोचक किन्तु मर्मस्पर्शी है। देश के बलिदानियों को सहज ढंग से भुलाकर बहके-बहके भाषणों की बौछार लगाकर वाहवाही लूटना आज के राजनेताओं का राजनीतिक कुचक्र.है। इसके नीचे आम जनता पिस जाती है। लेकिन राजनेता उसी ढर्रे पर अपनी राजनीति का पहिया चलाते रहते हैं। उसे आम जनता तनिक भी नहीं समझ पाती है। वह भौचक्की बनी रहकर कुछ भी नहीं कर पाते हैं। इस प्रकार के तथ्य इस पद्यांश में भावपूर्ण शब्दों के द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं।

3. ‘तुम्हीं जब बलिदान के मंदिर गिराते हो।’ काव्य-पंक्ति का भाव है-राजनेताओं के द्वारा अंगरशहीदों की उपेक्षा कर वर्तमान देश-भक्तों को हतोत्साहित करना। इससे राजनेताओं के देश-द्रोही भावों का संकेत हो रहा है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. ‘भुला दी सूलियाँ’ का आशय क्या है?

उत्तर:

  1. कवि-माखन लाल चतुर्वेदी। कविता-‘उलाहना’।
  2. ‘भुला दी सूलियाँ’ का आशय है-देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले देश-भक्तों और अमीर शहीदों की राजनेताओं द्वारा उपेक्षा करना।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
बड़े रस्ते, बड़े पुल, बाँध, क्या कहने!
बड़े ही कारखाने हैं, इमारत हैं,
जरा पोर्चे इन्हें आँस उभर आये,
बड़ापन यह न छोटों की इबादत है।

सदा सहना, सदा श्रम साधना मर-मर,
वही हैं जो लिये छोटों का मृत-वृत हैं,
तनिक छोटों से घुल-मिलकर रहो जीवन,
बड़े सब मिट गये, छोटे सलामत हैं!

शब्दार्थ:

  • रस्ते – रास्ता, सड़क।
  • इमारत – भवन, मकान।
  • इबादत – पूजा।
  • श्रम – सौधनामेहनत।
  • सलामत – सुरक्षित।

प्रसंग:
पूर्ववत। इसमें अमीरों और गरीबों के जीवन की भिन्नता पर प्रकाश डाला गया है। अमीर वर्ग के प्रति सामान्य-जन शिकायत करते हुए कह रहा है –

व्याख्या:
हे अमीर वर्ग! यह बड़ी ही अच्छी बात है कि तुम्हारे प्रयासों से देश को बड़ी सुविधाएँ मिली हैं। पगडंडियाँ चौड़ी-चौड़ी और लम्बी-लम्बी सड़कों के रूप ले लिये हैं। नदियों की छाती पर बड़े-बड़े पुल और बाँध खड़े हो गए हैं। जगह-जगह बड़े-बड़े कारखाने बन गए हैं। ऊँची-ऊँची इमारतें आकाश से बातें करने लगी हैं। फिर भी सामान्य जन को दो जून की रोटी नहीं नसीब हो रही है। उनके आँखों में दुख और अभावों के आँसू छलकते रहते हैं। उन्हें पोंछना सच्ची मानवता है। यह बड़प्पन नहीं है, बल्कि यह तो छोटों की पूजा करना है।

ऐसा इसलिए कि ये जीवन भर सभी प्रकार की विपत्तियां सहते रहते हैं। मरते दम तक घोर परिश्रम से मुँह नहीं फेरते हैं। इस प्रकार के जीवन जीनेवाले ही आज सलामत हैं, जबकि सभी बड़े मिट गए। यह समझकर तुम इनसे कुछ देर के लिए घुलमिल कर रहते, तो इनके जीवन के गम का बोझ हल्का हो जाता। इनके मुरझाए चेहरे थोड़ी देर के लिए ही सही, खिल उठता। फिर ये अपने जीवन के बोझ को उठाकर और आगे ले जाने की हिम्मत जुटा पाते।

विशेष:

  1. भाषा में प्रवाह है।
  2. शैली व्यंग्यात्मक है।
  3. सम्पूर्ण कथन मार्मिक है।
  4. ‘मर-मर’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. करुण रस का संचार है।

पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
  2. प्रस्तुत पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
  3. ‘बड़े रस्ते, बड़े पुल, बाँध, क्या कहने!’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

1. प्रस्तुत पद्यांश में देश के कर्णधार कहे जाने वाले राजनेताओं द्वारा अनेक प्रकार के साधनों-सुविधाओं को देने का उल्लेख है। इसके साथ ही सामान्य जन के प्रति उनकी उपेक्षा और दूरी का भी उल्लेख है। इस प्रकार इस पद्यांश में परस्पर विरोधी बातों को बड़े ही रोचक रूप में प्रस्तुत किया गया है। फलस्वरूप प्रस्तुत हुए विरोधाभास अलंकार का चमत्कार तब और हृदयस्पर्शी दिखाई देता है जब उसके सहयोगी अलंकार पुनरुक्ति प्रकाश ‘मर-मर’ और अनुप्रास अलंकार ‘सदा सहना’ पर हमारा ध्यान जाता है। इसकी भाव और भाषा भी कम प्रभावशाली नहीं है।

2. उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य आकर्षक है। देश में विकास के बढ़ते चरण के बावजूद सामान्यजन की बदहवाली के चित्र स्वाभाविक होने के साथ-साथ मार्मिक और विचारणीय हैं। इस प्रकार के तथ्य को विश्वसनीय रूप में प्रस्तुत करने का ढंग सचमुच बड़ा ही अनूठा है। इस तरह उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य हृदयस्पर्शी और उद्धरणीय बन गया है।

3. ‘बड़े रस्ते, बड़े पुल, बाँध, क्या कहने!’ का मुख्य भाव यह है कि देश में चहुंमुखी विकास हो रहे हैं। इसे देखकर सबका मन बाग-बाग हो रहा है।

पद्यांश पर आधारित विषयवस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. ‘छोटों से घुल-मिलकर रहो’ ऐसा कवि ने क्यों कहा है?

उत्तर:

  1. कवि-माखललाल चतुर्वेदी कविता-उलाहना।
  2. ‘छोटों से घुल-मिलकर रहो’ ऐसा कवि ने कहा है। यह इसलिए कि इसमें ही जीवन की सार्थकता है।

प्रश्न 3.
‘तुम्हारी चरण-रेखा देखते हैं वे,
उन्हें भी देखने का तुम समय पाओ,
तुम्हारी आन पर कुर्बान जाते हैं,
अमीरी से जरा नीचे उतर आओ!

तुम्हारी बाँह में बल है, जमाने का,
तुम्हारे बोल में जादू जगत का है,
कभी कुटिया निवासी बन जरा देखो,
कि दलिया न्यौतता रमलू भगत का है!

शब्दार्थ:

  • कुर्बान – बलिदान।
  • बाँह – भुजा।

प्रसंग: पूर्ववत्।

व्याख्या:
हे अमीर वर्ग! सामान्य जन जो हर प्रकार से अपने जीवन में दुखी और अभावग्रस्त हैं, वे तुमसे सहायता के लिए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसके लिए तुम्हें कुछ अवश्य समय निकालना होगा। ऐसा इसलिए कि तुम्हारी आन-मान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। इसे तुम गंभीरतापूर्वक समझो, फिर अपनी अमीरी की ऊँचाई से गरीबी की जमीन पर आ जाओ। तुम्हें स्वयं को यह जानना चाहिए कि तुम्हारी भुजाओं के अंदर बहुत बड़ी शक्ति है। वह शक्ति है-जमाने की। तुम्हारे भाषण में दुनिया की जादुई शक्ति है। इसलिए तुम कभी समय निकालकर अभावों को झेल रहे कटिया निवासी रमलू भगत के पास आकर रहो। फिर देखो कि वह तुम्हें कितना अपनापन लिए बुला रहा है। इसे समझने पर तुम्हें अपार सुख का अनुभव होगा।

विशेष:

  1. भाषा में प्रवाह है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. उर्दू की प्रचलित शब्दावली है।
  4. अमीरों को अपनी अमीरी को भुलाकर सामान्य जन के लिए सहयोग करने की शिक्षा दी गई है।

पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत पयांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
  2. प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
  3. ‘अमीरी से जरा नीचे उतर आओ’ का मुख्य भाव बताइए।

उत्तर:
1. प्रस्तुत पद्यांश में आम जनता का आह्वान साधन-सम्पन्न अर्थात् अमीर वर्ग के प्रति है। आमजन अमीर वर्ग से उसका महत्त्वांकन करते हुए उसे उसके साथ अपनापन के भावों को रखने की अपेक्षा करता है। इसे सरल आर सपाट भाषा के द्वारा अतिशयोक्ति अलंकार के साथ रूपक अलंकार (चरण-रेखा) से अलंकृत करके चमत्कृत किया है। बिम्ब, प्रतीक और योजना वीर रस और करुण रस के मिश्रण से अधिक प्रभावशाली रूप में है।

2. प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य आकर्षक रूप में है। इसमें भावों की तारतम्यता और क्रमबद्धता सुनियोजित रूप में है। इससे मार्मिकता का जो पुट प्रस्तुत हो रहा है, वह न केवल भाववर्द्धक है, अपितु प्रेरक है। सरलता से प्रयुक्त हुए भाव सहज ही ग्रहणीय और हृदयस्पर्शी बन गए हैं।

3. ‘अमीरी से जरा नीचे उतर आओ’ का मुख्य भाव परस्पर समानता और सहयोग का वातावरण उत्पन्न करता है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. ‘उन्हें भी देखने का तुम समय पाओ’ का व्यंग्यार्थ क्या है?

उत्तर:

1. कवि-माखनलाल चतुर्वेदी कविता-‘उलाहना’।

2. ‘उन्हें भी देखने का तुम समय पाओ’ का व्यंग्यार्थ है-अमीर वर्ग आम आदमी के दुखों और अभावों को समझने से कतराता रहता है। उसे तो अपने सुख-विलास से ही फुरसत नहीं मिलती है। फिर वह आम आदमी के लिए कहाँ समय निकाल पाएगा। दूसरी ओर आम आदमी उससे सहयोग प्राप्त करने की हमेशा आशा लगाए रहता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
गयी सदियाँ कि यह बहती रही गंगा,
गनीमत है कि तुमने मोड़ दी धारा,
बड़ी बाढ़ोमयी उद्दण्ड नदियों को,
बना दी पत्थरों वाला नयी कारा।

उठो, कारा बनाओ इस गरीबी की,
रहो मत दूर अपनों के निकट आओ,
बड़े गहरे लगे हैं घाव सदियों के,
मसीहा इनको ममता भर के सहलाओ।

शब्दार्थ:

  • सदियाँ – शताब्दियाँ।
  • गनीमत – अच्छी बात।
  • उद्दण्ड – बेकाबू।
  • कारा – जेल।
  • मसीहा – अवतारी पुरुष।
  • ममता – अपनापन।

प्रसंग: पूर्ववत्।

व्याख्या:
हे अमीर वर्ग! अनेक सदियों के बाद तम अपने शक्ति से गंगा के बहते पानी को व्यर्थ बहने के बारे में चिंतन-मनन किया। फिर उसे जनोपयोगी बनाने के लिए उसकी धारा को मोड़कर उसके ऊपर बाँध बनवाकर अनेक प्रकार से सिंचाई के रूप तैयार किए। इस प्रकार बाढ़ से उफनती हुई उद्दण्ड नदियों को पत्थर वाले जेल की अपने काबू में कर लिये। इस प्रकार के महान जीवनोपयोगी कार्य करने के बाद अब तुमसे यही कहना है कि अब तुम उठो। इस गरीबी को जेल में बदलकर उस पर अपना नियंत्रण रखो। सदियों से गरीबी की मार सह रहे गरीबों का मसीहा बनकर तुम उनके दुखों-अभावों रूपी घावों पर अपनी ममता का मरहम सहलाते रहो।

विशेष:

  1. अमीर वर्ग से गरीब वर्ग की अपेक्षाओं को चित्रित किया गया है।
  2. अमीरों का महत्त्वांकन,प्रस्तुत है।
  3. रूपकालंकार है।
  4. वीर रस का संचार है।
  5. तुकान्त शब्दावली है।

पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को लिखिए।
  2. प्रस्तुत पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
  3. ‘गरीबी को कारा’ बनाने से क्या तात्पर्य है?

उत्तर:
1. प्रस्तुत पद्यांश में अमीर वर्ग के प्रति आमजन के भावों को व्यक्त किया गया है। ये भाव उसके हौसले को बढ़ाते हुए उससे कुछ पाने की उम्मीदों के हैं। इसे स्मरण अलंकार, रूपक और अनुप्रास अलंकारों से अलंकृत करके चमत्कृत किया गया है। भाषा की सरलता में प्रवाहमयता है तो वर्णनात्मक शैली विधान में रोचकता है। प्रचलित उर्दू और तत्सम शब्दों के साथ-साथ देशज शब्दों का मेल उपयुक्त रूप में है। बिम्ब और प्रतीक यथास्थान हैं।

2. प्रस्तुत पद्यांश की भाव योजना में क्रमबद्धता और अनुरूपता है। अमीर वर्ग को समुत्साहित करते हुए आमजन को अपने कल्याणार्थ प्रेरित करने का प्रयास सचमुच में काबिलेतारीफ़ है। इसके लिए दिए गए उल्लेखों को दृष्टान्तों के माध्यम से प्रस्तुत करने का भी प्रयास कम कलात्मक नहीं है। फलस्वरूप यह पद्यांश भाववर्द्धक बन गया है।

3. ‘गरीबी को कारा’ बनाने से तात्पर्य अभावों पर पूरी तरह नियंत्रण रखने से है।

पद्यांश पर आधारित विषयवस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. ‘बड़े गहरे लगे हैं घाव सदियों के’ का मुख्य भाव बताइए।

उत्तर:

  1. कवि-माखनलाल चतुर्वेदी। – कविता-‘उलाहना’।
  2. ‘बड़े गहरे लगे हैं घाव सदियों के’ का मुख्य भाव है-बहुत समय से आमजन अभावों में अपना जीवन सफर कर रहा है। वह इससे ऊब चुका है। उसे इससे मुक्ति चाहिए। अमीर वर्ग ही उसे इससे मुक्ति मसीहा बनकर दिला सकता है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 6 अपना देश सँवारें हम

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 6 अपना देश सँवारें हम (कविता, श्रीकृष्ण ‘सरल’)

अपना देश सँवारें हम पाठ्य – पुस्तक के प्रश्नोत्तर

अपना देश सँवारें हम लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि ने सूरज को किसका प्रतीक बताया है?
उत्तर:
कवि ने सूरज को नई क्षमता का प्रतीक बताया है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
कविता हमें किसका पोषक बनने का संकेत करती है?
उत्तर:
कविता हमें जन – समता का पोषक बनने का संकेत करती है।

प्रश्न 3.
प्रतिकूल हवाओं से हमें किसकी रक्षा करनी है?
उत्तर:
प्रतिकूल हवाओं से हमें अपने देश की रक्षा करनी है।

अपना देश सँवारें हम दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सृजन के संवाहक से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सृजन के संवाहक से तात्पर्य है – नई – नई आशाओं के अनुसार कार्य करते हुए आनेवाली पीढ़ी को मार्ग – दर्शन प्रदान करना। प्रस्तुत कविता में सृजन के संवाहक भारतीय’नवयुवकों को कहा गया है। उनसे ही कवि को ऐसी अनेक उम्मीदें हैं। जिनसे हमारे देश का नव – निर्माण सम्भव है।

प्रश्न 2.
चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए हमारी कैसी तैयारी हो?
उत्तर:
चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए हमारी तैयारी अधिक व्यापक होनी चाहिए। वह छोटी – बड़ी हर स्तर की होनी चाहिए। उसमें अपेक्षित ओज, शक्ति और क्षमता के भाव होने चाहिए। यही नहीं, उसमें भावों की सजगता, रोचकता और तत्परता भी होनी चाहिए।

प्रश्न 3.
कर्म को कवि ने किन रूपों में व्यक्त किया है?
उत्तर:
कर्म को कवि ने विविध रूपों में व्यक्त किया है –

  1. कुदाल के रूप में
  2. हलों के फाल के रूप में
  3. तलवार के रूप में और देश की ढाल के रूप में।

प्रश्न 4.
कविता में निहित सन्देश को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में कवि ने राष्ट्र:निर्माण के लिए भारतीय नवयुवकों को संकल्पबद्ध होकर कर्त्तव्य मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा दी है। इसके लिए कवि ने नवयुवकों को निर्माण और विकास का संवाहक कहा है। कवि का यह मानना है कि आज नवयुवकों को अपने कर्म:पथ पर निरन्तर चलने का व्रत लेकर चुनौतियों का सामना करने की आवश्यकता है। नवयुवक जन:समता को पोषित करते हुएं मानवता का मार्ग बाधारहित बनाते हुए अपने देश को सम्पन्न बना सकते हैं।

अपना देश सँवारें हम भाव – विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
“हमें देश की …….. गली:गली उजियारे हम।” का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त पद्यांश में कवि ने देश के नवयुवकों को संकल्पबद्ध होकर नव:निर्माण में तन – मन से लग जाने का आहवान किया है। इसके लिए कवि देश के नवयुवकों को समुत्साहित करते हुए यह कहना चाहा है कि उन्हें संकल्पबद्ध होना चाहिए। उनका संकल्प होना चाहिए कि उन्हें हर प्रकार से कठिनाइयों का सामना करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उनका यही ध्येय होना चाहिए कि उनसे देश का हर नगर, गाँव और गली अभावों से मुक्त होकर सम्पन्न और खुशहाल बन सके।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
“नए भगीरय बन वैचारिक गंगा नई उतारें हम” के भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
“नए भगीरथ बन वैचारिक गंगा नई उतारें हम’ का भाव नए युग की माँग के अनुसार देश – समाज का कायाकल्प करना है। कवि का यह कहना है कि हमें देश और समाज के नव – निर्माण के लिए नए भाव, विचार और नए प्रयास करने चाहिए। इसे सभी देशवासियों को अपना पुनीत कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए।

प्रश्न 3.
“हम प्रतिरूप नए युग के हैं।” का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
“हम प्रतिरूप नए युग के हैं।” का आशय है – युग की आवश्यकतानुसार स्वयं को ढाल लेना। ऐसा करके ही नए युग की आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। सभी देश – समाज का भला होगा। फिर देश:समाज के प्रति हमारी कर्तव्यपरायणता सफल और सार्थक होगी। तभी हम सच्चे देश – समाज:के सेवक, पोषक और पालक कहे जाएँगे।

अपना देश सँवारें हम भाषा – अध्ययन

प्रश्न:1.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
सृजन, संवाहक, प्रतिबद्ध, सन्नद्ध, चुनौती।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 6 अपना देश सँवारें हम img-1

प्रश्न:2.
निम्नलिखित शब्दों के तीन – तीन पर्यायवाची शब्द लिखिए –
हवा, सूरज, पंथ, जन, गंगा
उत्तर:
हवा – वायु, समीर, पवन।
सूरज – सूर्य, रवि, दिनकर।
पंथ – पथ, राह, मार्ग।
जन – मनुष्य, मानव, मनुज।
गंगा – भागीरथी, सुरसरि, जाह्नवी।

अपना देश सँवारें हम योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
देश:भक्ति से सम्बन्धित एक नाटिका स्वयं बनाइए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 2.
आप अपने देश की प्रगति के लिए क्या – क्या करना चाहेंगे? दस वाक्यों में लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 3.
आप अपने विद्यालय/गाँव/शहर को सँवारने के लिए क्या – क्या प्रयास कर रहे हैं, लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

अपना देश सँवारें हम परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अपना देश सँवारें हम लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि ने अपने देश की धरती को क्या कहा है?
उत्तर:
कवि ने अपने देश की धरती को पावन कहा है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
कवि ने अपने देश के नवयुवकों को किन – किन विशेषणों से विश्लेषित किया है?
उत्तर:
कवि ने अपने देश के नवयुवकों को निम्नलिखित विशेषणों से विश्लेपित किया है –

  1. नए सृजन के संवाहक
  2. प्रगति पंथ के राही
  3. युग के प्रतिवद्ध पहरुए और
  4. सन्नद्ध सिपाही।

प्रश्न 3.
कवि ने देश के नवयुवकों को क्या साफ:सुथरा रखने की प्रेरणा दी है?
उत्तर:
कवि ने देश के नवयुवकों को अपना, सबका और मानवता का रास्ता साफ:सुथरा रखने की प्रेरणा दी है।

अपना देश सँवारें हम दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि ने देश के नवयुवकों में किन – किन कर्मों का होना आवश्यक बतलाया है और क्यों?
उत्तर:
कवि ने देश के नवयुवकों में निम्नलिखित कर्मों का होना आवश्यक बतलाया है –

  1. कुदाली
  2. हलों के फाल
  3. शत्रु के लिए तलवार
  4. देश की ढाल

उपर्युक्त कर्मों से नया भगीरथ बनकर देश की पवित्र धरती पर वैचारिक गंगा को उतारा जा सकता है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत कविता के केन्द्रीय भाव पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में कवि ने राष्ट्र – निर्माण की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने की प्रेरणा दी है। कवि ने नवयुवकों का आह्वान करते हुए सृजन और प्रगति का वाहक निरूपित किया है। आज नवयुवकों को कर्म:पथ पर सतत चलने का व्रत लेकर चुनौतियों का सामना करने की आवश्यकता है। नौजवान जन समता को पोषित करते हुए मानवता का मार्ग बाधारहित बनाते हुए अपने देश को समृद्ध कर सकते हैं।

अपना देश सँवारें हम कवि-परिचय

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण ‘सरल’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारतीय स्वाधीनता सेनानियों और क्रान्तिकारियों का यशगान करने वाले कवियों में श्रीकृष्ण ‘सरल’ का नाम अत्यन्त लोकप्रिय है। शहीदों के प्रति श्रद्धा-भाव रखने और प्राचीन भारतीय सभ्यता के अमर-गायक श्रीकृष्ण ‘सरल’ अत्यधिक प्रसिद्ध कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

जीवन-परिचय:
कविवर श्रीकृष्ण ‘सरल’ का जन्म मध्य-प्रदेश के गुना जिलान्तर्गत अशोक नगर में 1 जनवरी, 1919 को हुआ था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में ही हुई। आपका बालस्वरूप अत्यन्त स्वाभिमानी और स्वाध्यायी था। आपने अपने स्वाध्याय के द्वारा कई परीक्षाओं को अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर लिया। शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त आपने अध्यापन क्षेत्र में प्रवेश लिया। इस अध्यापन-वृत्ति से आप आजीवन सम्बद्ध रहे। इसे आपने अत्यन्त सफलतापूर्वक निभाया। सन् 1976 में आप शिक्षा महाविद्यालय, उज्जैन से सेवा-निवृत्त हुए। तब से लेकर अब तक आप स्वतन्त्र रूप से लेखन-कार्य में व्यस्त हैं –

रचनाएँ:
श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने काव्य और गद्य दोनों पर ही अपना समानाधिकार दिखाया है। आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं –

1. महाकाव्य:

  • भगत सिंह
  • चन्द्रशेखर आजाद
  • सुभाषचन्द्र बोस

2. काव्य-संकलन:

  • मुक्तिगान
  • स्मृति-पूजा।

3. बाल-साहित्य:

  • बच्चों की फुलवारी।

4. गद्य ग्रन्थ:

  • संसार की प्राचीन समस्याएँ
  • सुभाष-दर्शन आदि।

भाषा-शैली:
श्रीकृष्ण ‘सरल’ की भाषा उनके नाम के अनुरूप ही है। दूसरे शब्दों में उनकी भाषा सरल, सुबोध और सुस्पष्ट है। उसमें तद्भव और देशज शब्दावली की प्रधानता है। इस प्रकार की भाषा से भावाभिव्यक्ति को स्पष्ट होने में कठिनाई नहीं दिखाई देती। श्रीकृष्ण ‘सरल’ की शैली ओजमयी और प्रौढ़मयी है। वह अधिक सशक्त, पुष्ट और सबल है। गम्भीर-से-गम्भीर विषयों को अलंकृत शैली में प्रस्तुत करने की विशेषता प्रकट करने वाले श्रीकृष्ण ‘सरल’ में भाषा-शैली की प्रचुर क्षमता और योग्यता है।

व्यक्तित्व:
श्रीकृष्ण ‘सरल’ का व्यक्तित्व देशभक्त और क्रान्तिकारी व्यक्तित्व का है। उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष है-भारतीय अतीत के प्रति आस्थावान और श्रद्धावान होना। इन दोनों प्रकार के व्यक्तित्व को जोड़कर एक पूरा और सफल व्यक्तित्व बना है – सफल और परिपक्व रचनाशील व्यक्तित्व। इस तरह से श्रीकृष्ण ‘सरल’ का व्यक्तित्व एक युगीन व्यक्तित्व सिद्ध होता है।

महत्त्व:
श्रीकृष्ण ‘सरल’ का राष्ट्रीय विचार-प्रधान रचनाकारों में विशिष्ट स्थान है। अतीत के सत्प्रेरक रूप में प्रस्तुत करने वाले साहित्यकारों में भी उनका स्थान सर्वोच्च है। भारतीय संस्कृति का महत्त्वांकन करने में जितनी बड़ी सफलता आपको मिली है, उतनी अन्यत्र कम ही दिखाई देती है।

MP Board Solutions

अपना देश सँवारें हम पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण ‘सरल’ रचित ‘अपना देश सँवारें हम’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
श्रीकृष्ण ‘सरल’ रचित ‘अपना देश सँवारें हम’ कविता राष्ट्र-निर्माण के संकल्प को पूरा करने की प्रेरणादायक कविता है। इसमें कवि ने युवकों को ललकारते और उत्साहित करते हुए उन्हें आने वाली कठिनाइयों से सावधान किया है। इस विषय में कवि ने नवयुवकों को उनकी पहचान बतलाते हुए कहा है कि वे नए युग के प्रतिरूप हैं। वे सूरज की तरह नयी क्षमता और नए क्षितिज के खोजी हैं। यही नहीं, वे तो जन समता को पोषित करते हुए और मानवता का रास्ता सरल बनाते हुए अपने देश को खुशहाल और सम्पन्न बना सकते हैं।

अपना देश सँवारें हम संदर्भ – प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
अपना देश सँवारें हम।
अपनी इस पावन धरती का आओ रूप निखारें हम।
अपना देश सँवारें हम………………….।
नए सृजन के संवाहक हम
प्रगति-पंथ के राही हैं,
हम प्रतिबद्ध पहरुए युग के
हम सन्नद्ध सिपाही हैं
जो भी मिले चुनौती, उत्तर दें उसको स्वीकारें हम।
अपना देश सँवारें हम ……………..।
कर्म हमारे बनें कुदाली
कर्म हलों के फाल बनें,
कर्म बनें तलवार शत्रु को
कर्म देश की ढाल बनें।
नए भगीरथ बन, वैचारिक गंगा नई उतारें हम।
अपना देश सँवारें हम ……………….।

शब्दार्थ:

  • पावन – पवित्र
  • सृजन – निर्माण
  • संवाहक – ढोने वाला (वहन करने वाला)।
  • प्रगति – विकास।
  • पंथ – रास्ता।
  • राही – मुसाफिर।
  • पहरुए – पहरेदार।
  • सन्नद्ध – तत्पर।
  • भागीरथ – अथक परिश्रम करने वाला (राजा दिलीप के सुपुत्र जो गंगा को पृथ्वी पर लाए थे)।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग – 1’ में संकलित तथा श्रीकृष्ण ‘सरल’ द्वारा रचित ‘अपना देश सँवारें हम’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसमें कवि ने अपने देश के नवयुवकों को अपने देश के विकास के लिए पुकारते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
हे मेरे देश के नवयुवको! आओ, हम सब मिल-जुलकर अपने देश को विकसित करें। इस देश की धरती को और अधिक खुशहाल और उपजाऊ बनाएँ। कवि का पुनः कहना है कि हे मेरे देश के नवयुवको! हमें यह हमेशा याद रहना चाहिए कि हम सब नव-निर्माण के संवाहक हैं। प्रगति के रास्ते पर चलने वाले हैं। हम इस युग के प्रतिबद्ध पहरेदार सिपाही हैं। इसलिए हमें जो चुनौती मिले, हम उसे स्वीकार करके आगे बढ़ते रहेंगे।

कवि देश के नवयुवकों को ललकारते हुए कह रहा है कि हमें अपने कर्म को कुदाली, हल के फाल, तल और देश की ढाल के रूप में आगे बढ़ाते जाना चाहिए। इस प्रकार हमें युग की माँग के अनुसार नए भगीरथ बन करके वैचारिक गंगा को इस धरती पर प्रवाहित करना चाहिए। इस प्रकार हमें अपने देश को विकास के रास्ते पर हमेशा आगे बढ़ाते जाना चाहिए।

विशेष:

  1. कवि ने देश के नवयुवकों को देश के नव-निर्माण के उत्तरदायित्व की ओर ध्यान दिलाया है।
  2. वीर रस का प्रवाह है।
  3. भाषा में ओज है।
  4. उच्चस्तरीय तत्सम शब्द है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्य-बोध सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
  2. प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
  3. प्रस्तुत पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य बड़ा ही आकर्षक है। इसमें कवि ने देश के नवयुवकों को समुत्साहित करने का प्रशंसनीय कार्य किया है। उसने देश के नवयुवकों को सृजन के संवाहक, प्रगति पथ के राही, प्रतिबद्ध पहरुए, युग के सन्नद्ध सिपाही आदि विशेषणों से ललकारने का सुन्दर प्रयास किया है। उसने देश के नवयुवकों के कर्म को असाधारण बतलाते हुए उसे हर प्रकार से देश-हित और प्रगति का एकमात्र साधन माना है। उसने देश के युवकों को नए भगीरथ बनकर वैचारिक गंगा प्रवाहित करने की जो पुकार लगाई है, वह वास्तव में अत्यधिक प्रेरक है।

2. प्रस्तुत काव्यांश की भाषा उच्चस्तरीय तत्सम शब्दों की है। देश के नवयुवकों का अनेक विशेषणों से विभूषित करने का प्रयास प्रशंसनीय है। तुकान्त शब्दावली से युक्त प्रस्तुत पद्यांश गीतात्मक शैली में है। पूरा पद्यांश वीर रस से ओत-प्रोत है। शब्द और भाव-योजना अधिक आकर्षक रूप में है।

3. प्रस्तुत् पद्यांश का मुख्य भाव है-देश के नवयुवकों को देश को खुशहाल और सम्पन्न बनाने के लिए संकल्पवद्ध होकर उसे पूरा करने की प्रेरणा देना है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. किसने किसको क्या कहा है?
  3. देश का कायाकल्प करने के लिए कवि ने सबसे बड़ी कौन-सी आवश्यकता बताई है?

उत्तर:

  1. कवि-श्रीकृष्ण ‘सरल’, कविता-‘अपना देश सँवारें हम’।
  2. कवि ने देश के नवयुवकों से देश के नव-निर्माण के लिए कमर कसकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।।
  3. देश का कायाकल्प करने के लिए कवि ने देश के नवयुवकों को यह आवश्यकता बताई है कि वे नए भगीरथ बनकर इस देश की धरती पर वैचारिक गंगा को प्रवाहित करें।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
हमें देश की रक्षा करनी
है प्रतिकूल हवाओं से,
हमको है घर – द्वार सजाने
नई – नई आशाओं से।
अन्धकार से जूझ, देश की गली-गली उजियारें हम।
अपना देश सँवारें हम …………….।
हम प्रतिरूप नए युग के हैं।
सूरज नूतन क्षमता के
नए क्षितिज के अन्वेषी हम
पोषक हम जन – समता को
अपना, सबका, मानवता का मिलजुल पंथ बुहारें हम।
अपना देश सँवारें हम ………………।

शब्दार्थ:

  • प्रतिकूल – विपरीत।
  • प्रतिरूप – समान रूप।
  • क्षितिज – वह काल्पनिक मिलन रेखा, जहाँ आकाश और पृथ्वी मिलते हुए दिखाई देते हैं।
  • अन्वेषी – खोजने वाला।
  • नूतन – नयी।
  • क्षमता – शक्ति।
  • पोषक – रक्षा करने वाला।
  • समता – समानता।
  • बुहारें – साफ करें।

प्रसंग – पूर्ववत्।

व्याख्या:
हे मेरे देश के नवयुवको! आओ, आज हम यह दृढ़ सकंल्प लें कि हमें अपने देश की रक्षा करनी है। इसके लिए हमें देश की रक्षा में विघ्न डालने वाली विपरीत हवाओं से टक्कर लेनी होगी। ऐसा करके ही हम अपने देश के प्रत्येक घर-द्वारं को सजा सकते हैं। फिर उसमें नई-नई उम्मीद की झड़ी लगा सकते हैं। इस पर हमें विघ्न-बाधाओं रूपी अन्धकार से जूझकर अर्थात् दूर करके अपने देश की हर सड़क, हर गाँव और गली में प्रकाश फैला सकते हैं। इस तरह आज हम यह दृढ़संकल्प लें कि अपने देश को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाते जाना है।

कवि अपने देश के नवयुवकों को उनकी महानता और विशिष्टता की याद दिलाते हुए उनसे यह कह रहा है कि हमें यह भलीभाँति जानना चाहिए कि हम आज के युग के प्रतिरूप हैं। नयी-नयी क्षमताओं के हम सूरज हैं। नए-नए क्षितिज के हम खोजी हैं। जन-समता के हम पालक-पोषक हैं। इस प्रकार हमें अपना ही नहीं, अपितु सभी का और पूरी मानवता का मिल-जुलकर देश के विकास के रास्ते पर आने वाली कठिनाइयों को दूर करते हुए आगे बढ़ते जाना है।

विशेष:

  1. कवि ने देश के नवयुवकों में स्वदेश के विकास के लिए दृढ़संकल्प करने का उत्साह दिया है।
  2. वीर रस का प्रवाह है।
  3. ‘नई-नई’ और ‘गली-गली’ में पुररुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. ‘सूरज नूतन क्षमता के’ में मानवीकरण अलंकार है।
  5. उच्चस्तरीय तत्सम शब्द हैं।
  6. शैली गीतात्मक है।

पद्यांश पर आधारित सौन्दर्य-बोध सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
  2. प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
  3. प्रस्तुत पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य ओजपूर्ण है। इसमें भारतीय नवयुवकों में दृढ़संकल्प भाव भरने का प्रयास बड़ा ही रोचक और उत्साहपूर्ण है। इसमें नवयुवकों में कुछ कर गुजरने का जोश आना स्वाभाविक लगता है। भावों की क्रमबद्धता और प्रभावमयता देखते ही बनती है। पूरा पद्यांश देश-हित के अनुकूल होकर कर्तव्यबोध को लाने में अनुकूल सिद्ध हो रहा है। नए-नए भावों को उत्साहवर्द्धक रूप में प्रस्तुत करने का कवि-प्रयास सचमुच में काबिलेतारीफ है।

2. प्रस्तुत पद्यांश भाव और भाषा-शैली की दृष्टि से अधिक सार्थक है। भारतीय नवयुवकों को संकल्पबद्ध हो देश के निर्माण के लिए कवि के प्रेरित भाव वीर रस के प्रवाह से प्रवाहित है। तत्सम शब्द उच्चस्तरीय होकर भी भावों के अनुसार है। विभिन्न प्रकार के अलंकारों से यह पद्यांश अलंकृत होकर चमत्कृत हो उठा है।

3. प्रस्तुत पद्यांश का मुख्य भाव है-भारतीय नवयुवकों को युग के अनुसार सचेत होकर बड़ी दृढ़तापूर्वक देश के नव-निर्माण के लिए प्रेरित करना।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. कवि और कविता का नाम लिखिए।
  2. देश की रक्षा करने में कौन-कौन-सी बाधाएँ हैं?
  3. भारतीय नवयुवकों की कौन-कौन विशेषताएँ हैं?

उत्तर:

  1. कवि-श्रीकृष्ण ‘सरल’, कविता-‘अपना देश सँवारें हम’।
  2. देश की रक्षा करने में कई बाधाएँ हैं, जैसे-प्रतिकूल परिस्थितियाँ, गरीबी, आबादी, अज्ञान, निराशा, असमानता आदि।
  3. भारतीय नवयुवकों की कई विशेषताएँ हैं, जैसे-नए युग के प्रतिरूप, नई क्षमता के सूरज, नए क्षितिज के खोजी, जन-समता के पोषक आदि।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू (संस्मरण, महादेवी वर्मा)

राजेन्द्र बाबू पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

राजेन्द्र बाबू लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजेन्द्र बाबू को लेखिका ने प्रथम बार कहाँ देखा?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू को लेखिका ने प्रथम बार पटना के रेलवे स्टेशन पर देखा।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
राजेन्द्र बाबू पौत्रियों को प्रयाग क्यों लाए थे?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू अपनी पौत्रियों को प्रयाग लाए थे। यह इसलिए कि उनकी पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हो पाई थी। वे लेखिका महादेवी वर्मा के प्रयाग महिला विद्यापीठ महाविद्यालय के छात्रावास में रहकर विद्यापीठ की परीक्षाएँ दे सकें। इससे उन्हें शीघ्र कुछ विद्या प्राप्त हो सकेगी।

प्रश्न 3.
राजेन्द्र बाबू के निकट सम्पर्क में आने का अवसर लेखिका को किस प्रकार मिला?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू के निकट सम्पर्क में आने का अवसर लेखिका को सन 1937 में मिला। उस समय के कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में लेखिका के प्रयाग महिला विद्यापीठ महाविद्यालय भवन का शिलान्यास करने प्रयाग आए। उनसे ज्ञात हुआ कि उनकी 15-16 पौत्रियाँ हैं, जिनकी पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हो पाई है। यदि वह अपने छात्रावास में रखकर उन्हें विद्यापीठ की परीक्षाओं में बैठा सकें तो उन्हें शीघ्र कुछ विद्या प्राप्त हो सकेगी।

प्रश्न 4.
महादेवी वर्मा, राजेन्द्र बाबू के साथ बिताई संध्या क्यों नहीं भूल पातीं?
उत्तर:
महादेवी वर्मा, राजेन्द्र बाबू के साथ बिताई संध्या को नहीं भूल पातीं। यह इसलिए कि उसने उन्हें अर्थात् भारत के प्रथम राष्ट्रपति को सामान्य आसन पर बैठकर दिन भर के उपवास के बाद केवल कुछ उबले आलू खाकर पारायण करते देखा था। उसे भी वही खाते हुए देखकर उनकी दृष्टि से संतोष और होंठों पर बालकों जैसी सरल हँसी छलक उठी थी।

राजेन्द्र बाबू दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजेन्द्र बाबू के व्यक्तित्व के उन कतिपय पहचान चिह्नों का उल्लेख कीजिए जो भारतीय जन की आकृति को व्यक्त करते हैं?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू की मुखाकृति ही नहीं, उनके शरीर के सारे गठन में एक साधारण भारतीय जन की आकृति और गठन की छाया थी। इसलिए उन्हें देखने वाले को कोई-न-कोई आकृति या व्यक्ति स्मरण हो आता था। वह अनुभव करने लगता था कि इस प्रकार के व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है। आकृति और वेशभूषा के समान ही वे अपने स्वभाव और रहन-सहन में भी साधारण भारतीय या भारतीय किसान का ही प्रतिनिधित्व करते थे। प्रतिभा और बुद्धि की विशेषता के साथ-साथ उन्हें जो गम्भीर संवेदना प्राप्त हुई थी, वही उनकी सामान्यता को गरिमा प्रदान करती थी।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
राजेन्द्र बाबू की सहधर्मिणी के गुणों का उल्लेख कीजिए?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू की सहधर्मिणी के निम्नलिखित गुण थे –

  1. बिहार के जमींदार परिवार की वधू और स्वातंत्र्य युद्ध के अपराजेय सेनानी की पत्नी होने का उन्हें कभी न घमण्ड हुआ और न कोई मानसिक ग्रन्थि ही हुई।
  2. सबके प्रति वे समान ध्यान रखती थीं।
  3. राष्ट्रपति भवन में भी वे स्वयं भोजन बनाती थीं। पति, परिवार और परिजनों को खिलाने के बाद ही स्वयं भोजन करती थीं। इस प्रकार वह एक सामान्य भारतीय गृहिणी के समान ही रहती थीं।
  4. वह अपने पति के साथ सप्ताह में एक दिन उपवास किया करती थीं।

प्रश्न 3.
पाठ के आधार पर राजेन्द्र बाबू की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
पाठ के आधार पर राजेन्द्र बाबू की निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताएँ हैं –

  1. उनकी शारीरिक बनावट बड़ी ही अदभुत थी। वह ऐसी विशेषता थी, जो पहली ही नजर में किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। उन्हें देखने वाला हर कोई यही मान लेता था कि उसने इस आकृति को अवश्य कहीं-न-कहीं देखा है।
  2. उनकी वेशभूषा ग्रामीणों की थी। उसमें भारतीयता की साफ झलक दिखाई देती थी।
  3. उनकी आकृति, वेशभूषा तो आकर्षक थी ही, उनका स्वभाव और रहन-सहन भी सामान्य भारतीय या भारतीय किसान की ही तरह था।
  4. उनकी प्रतिभा और बुद्धि उनकी सामान्यता को महत्त्व प्रदान करती थी।
  5. उनमें जीवन-मूल्यों को परखने की अद्भुत दृष्टि थी। इसी से उन्हें ‘देशरत्न’ का सम्मान दिया गया।
  6. उनके मन की सरल स्वच्छता ऐसी थी कि वे इन्हीं के आधार पर ‘अजातशत्रु’ के रूप सम्मानित होते रहे।
  7. उनके समान कठिन लेकिन कोमल चरित्र आज नहीं है।

प्रश्न 4.
राजेन्द्र बाबू को अजातशत्रु किस सन्दर्भ में कहा जाता है?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू को अजातशत्रु उस सन्दर्भ में कहा जाता है कि उनका मन बहुत ही सरल और स्वच्छ था। उनके इन गुणों से अत्यधिक प्रभावित होकर उनके सम्पर्क में आने वाला हर कोई उनका लोहा मान लेता था।

प्रश्न 5.
सामान्यतः हमारा उपवास कैसा होता है?
उत्तर:
सामान्यतः हमारा उपवास अधिक सस्ता और कामचलाऊ होता है। कम-से-कम खर्च से अल्पाहार करके हम उपवास करते हैं।

राजेन्द्र बाबू भाव विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.

  1. क्या वह साँचा टूट गया जिसमें ऐसे कठिन कोमल चरित्र ढलते थे।
  2. कर्तव्य विलास नहीं कर्मनिष्ठा है।
  3. सत्य में से कुछ घटाना या जोड़ना सम्भव नहीं रहता।

उत्तर:
1. ‘क्या वह साँचा टूट गया, जिसमें ऐसे कठिन कोमल चरित्र ढलते थे’:
उपर्युक्त वाक्य के द्वारा लेखिका ने यह कहना चाहा है कि राजेन्द्र बाबू जैसे कठिन किन्तु कोमल चरित्रों का आज बिलकुल अभाव हो गया है। यों तो आज भी अनेक महान पुरुष हैं, लेकिन उनके जैसे बेजोड़ और अद्भुत चरित्रों का आज अकाल पड़ा हुआ दिखाई देता है। इससे यह सहज ही प्रश्न उठ खड़ा हो रहा है कि राजेन्द्र बाबू जैसे बेजोड़ चरित्रों को तैयार करने वाला समय का साँचा आज नहीं दिखाई दें रहा है। वास्तव में यह एक बहुत बड़ी ही दुखद और अफसोस की बात है।

2. ‘कर्तव्य विलास नहीं, कर्मनिष्ठा है’:
उपर्युक्त वाक्य के द्वारा लेखिका ने यह कहना चाहा है कि जीवन में महानता हासिल करने के लिए सुख-सुविधाओं को महत्त्क नहीं देना चाहिए। अगर ऐसा कोई करता है तो वह जीवन में आगे नहीं बढ़ सकता है। वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है। इससे वह अपना महत्त्व खोने लगता है। इसके विपरीत जो परिश्रमी होकर उद्देश्यमय जीवन जीना चाहते हैं, वे अपने कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटते हैं। वे उसे विलास के रूप में नहीं देखते हैं। वे तो उसे कर्मनिष्ठा ही समझकर आगे बढ़ते जाते हैं। ऐसे ही लोग युग-पुरुष के रूप में सम्मानित होकर सदैव याद किए जाते रहते हैं।

3. ‘सत्य में से कुछ घटाना या जोड़ना सम्भव नहीं रहता’:
उपर्युक्त वाक्य के द्वारा लेखिका ने यह कहना चाहा है कि सत्य अटल होता है। वह किसी दिशा में नहीं बदलता है। वह हमेशा अपने ही रूप में रहता है। इसलिए बदलने या इसे कुछ और रूप देने की कोशिश बिल्कुल व्यर्थ होती है। सत्य का यह अटल रूप परिश्रम, स्वभाव, चरित्र, सोच, विचार आदि कहीं और कभी देखा जा सकता है। इस प्रकार सत्य काल का अमर चिह्न और अमर पहचान कहा जा सकता है।

राजेन्द्र बाबू भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए –
पुरातन, सीमित, अनुपस्थित, संयम, अपेक्षा, विचलित, संकुचित
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग एवं प्रत्यय युक्त शब्दों को छाँटकर पृथक-पृथक लिखिए –
प्रसारित, विचित्र, प्रतिनिधित्व, विशिष्टता, सहधर्मिणी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए –
आँख, धरती, स्मृति, कृषक, सहधर्मिणी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू img-3

प्रश्न 4.
पाठ में आए निम्नलिखित शब्द अनेकार्थी हैं। इन शब्दों का पृथक-पृथक . अर्थों में प्रयोग कीजिए –
कोट, जान, भेंट, फल, सूप।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू img-4

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के भिन्नार्थक समोच्चरित शब्द लिखकर वाक्य बनाइए –
निर्वाण, चर्म, कच्छा, तुरंग, प्रासाद, वास, द्वीप, तरिण, आसन्न, परिधान, अनु, वाला।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू img-5

राजेन्द्र बाबू योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
आप किन महापुरुषों के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं, कारण सहित लिखिए?
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें (रेलवे आरक्षण फार्म का प्रतिरूप अगले पृष्ठ पर देखें)।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
क्या आपके जीवन में कभी कोई ऐसा संस्मरण घटित हुआ जिसे आप अपने साथियों के साथ बाँटना चाहेंगे। यदि हाँ, तो संस्मरण को लिखकर कक्षा में सुनाइए?
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें (रेलवे आरक्षण फार्म का प्रतिरूप अगले पृष्ठ पर देखें)।

प्रश्न 3.
रेल-यात्रा के लिए पूर्व में आरक्षण कराया जा सकता है। रेल यात्रा के आरक्षण तथा रद्दकरण हेतु आवेदन पत्र देना होता है। यहाँ दिए आरक्षण पत्र को भरिए तथा रेलवे की अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए?
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें (रेलवे आरक्षण फार्म का प्रतिरूप अगले पृष्ठ पर देखें)।

राजेन्द्र बाबू परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

राजेन्द्र बाबू लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजेन्द्र बाबू के बारे में लेखिका को किसने बताया?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू के बारे में लेखिका को उसके भाई ने बताया।

प्रश्न 2.
राजेन्द्र बाबू की मुखाकृति देखकर ऐसा अनुभव होता था?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू की मुखाकृति देखकर ऐसा अनुभव होता था, मानो उन्हें पहले कहीं देखा है।
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 राजेन्द्र बाबू img-6

प्रश्न 3.
राजेन्द्र बाबू को ‘देशरत्न’ की उपाधि क्यों मिली?
उत्तर:
जीवन-मूल्यों की परख करने वाली दृष्टि के कारण राजेन्द्र बाबू को ‘देशरत्न’ की उपाधि मिली।

राजेन्द्र बाबू दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजेन्द्र बाबू की वेशभूषा कैसी थी?
उत्तर:
उनकी वेशभूषा की ग्रामीणता तो दृष्टि को और भी उलझा लेती थी। खादी की मोटी धोती ऐसा फेंटा देकर बाँधी गई थी कि एक ओर दाहिने पैर पर घुटना छूती थी और दूसरी ओर बाएँ पैर की पिण्डली। मोटे, खुरदरे, काले बंद गले के कोट में ऊपर का भाग बटन टूट जाने के कारण खुला था और घुटने के नीचे का बटनों से बंद था। सरदी के कारण पैरों में मोजे-जूते तो थे, परन्तु कोट और धोती के समान उनमें भी विचित्र स्वच्छंदतावाद था। एक मोजा जूते पर उतर आया था और दूसरा टखने पर घेरा बना रहा था।

मिट्टी की पर्त से न जूतों के रंग का पता चलता था, न रूप का। गाँधी टोपी की स्थिति तो और भी विचित्र थी। उसकी आगे की नोक बाईं भौंह पर खिसक आई थी और टोपी की कोर माथे पर पट्टी की तरह लिपटी हुई थी। देखकर लगता था मानो वे किसी हड़बड़ी में चलते-चलते कपड़े पहनते आए हैं, अतः जो जहाँ जिस स्थिति में अटक गया, वह वहीं उसी स्थिति में अटका रह गया।

प्रश्न 2.
जवाहरलाल और राजेन्द्र बाबू की अस्त-व्यस्तता में क्या अन्तर था?
उत्तर:
जवाहरलाल जी की अस्त-व्यस्तता भी व्यवस्था से निर्मित होती थी किन्तु राजेन्द्र बाबू की सारी व्यवस्था ही अस्त-व्यस्तता का पर्याय थी। दूसरे, यदि जवाहरलाल जी की अस्त-व्यस्तता देख लें तो उन्हें बुरा नहीं लगता था, परन्तु अपनी अस्त-व्यस्तता के प्रकट होने पर राजेन्द्र बाबू भूल करने वाले बालक के समान संकुचित हो जाते थे। एक दिन यदि दोनों पैरों में दो भिन्न रंग के मोजे पहने किसी ने उन्हें देख लिया तो उनका संकुचित हो उठना अनिवार्य था। परन्तु दूसरे दिन जब वे स्वयं सावधानी से रंग का मिलान करके पहनते तो पहले से भी अधिक बेमेल रंगों को पहन लेते।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
लेखिका राजेन्द्र बाबू की सहधर्मिणी के सम्पर्क में कव आयी? वह कैसी थीं?
उत्तर:
पहले बड़ी, फिर छोटी, फिर उनसे छोटी के क्रम से बालिकाएँ मेरे संरक्षण में आ गईं और उन्हें देखने प्रायः उनकी दादी और कभी-कभी दादा भी प्रयाग आते रहे। तभी राजेन्द्र बाबू की सहधर्मिणी के निकट सम्पर्क में आने का अवसर मिला। वे सच्चे अर्थ में धरती की पुत्री थीं साध्वी, सरल, क्षमामयी, सबके प्रति ममतालु और असंख्य सम्बन्धों की सूत्रधारिणी। ससुराल में उन्होंने बालिका-वधू रूप में पदार्पण किया था। संभ्रांत जमींदार परिवार की परम्परा के अनुसार उन्हें घण्टों सिर नीचा करके एकासन में बैठना पड़ता था, परिणामतः उनकी रीढ़ की हड्डी इस प्रकार झुक गई कि युवती होकर भी वे सीधी खड़ी नहीं हो पाईं।

राजेन्द्र बाबू लेखिका परिचय

प्रश्न 1.
श्रीमती महादेवी वर्मा का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए?
उत्तर:
जीवन-परिचय:
श्रीमती महादेवी वर्मा का जन्म उत्तरप्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में 26 मार्च, 1907 को हुआ था। उनकी आरम्भिक शिक्षा इन्दौर में हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा प्रयाग से प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्रीय और सामाजिक गतिविधियों से वह बहुत अधिक परिचित और प्रभावित होने लगीं। उन पर वह लगातार कविताएँ भी लिखने लगी थीं। अपने जीवन में आने वाले सामान्य और विशिष्ट दोनों लोगों के प्रति उनमें आत्मीयता और सहानुभूति की भावधारा आने लगी थी। उन्होंने राष्ट्रीय संकट के समय में अपनी व्यापक मानवीय संवेदना से भरी हुई साहित्यिक रचनाएँ राष्ट्र को दी। कुछ समय बाद वह प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या और फिर उपकुलपति रहीं। उनका निधन 11 सितम्बर, 1987 को हुआ।

रचनाएँ:
‘नीहार’, ‘नीरजा’, दीपशिखा, ‘यामा’ आदि महादेवी वर्मा की प्रमुख रचनाएँ हैं। उन्हें ‘यामा’ काव्य-संग्रह पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साहित्य की विशेषताएँ:
महादेवी वर्मा छायावाद की प्रमुख कवयित्री हैं। आपने द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता, नैतिकता, पौराणिकता और उपदेशात्मकता के अतिरिक्त भावुक मन की सूक्ष्मातिसूक्ष्म अनुभूतियों को संगीतात्मक लय के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की है। भावुकता की अतिशयता के कारण उन्हें ‘वेदना की कवयित्री’ भी कहा • जाता है। आपके व्यक्तित्व पर बौद्ध दर्शन का प्रभाव भी परिलक्षित होता है।

राजेन्द्र बाबू पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
श्रीमती महादेवी वर्मा लिखित संस्मरण ‘राजेन्द्र बाबू’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए?
उत्तर:
श्रीमती महादेवी वर्मा लिखित संस्मरण ‘राजेन्द्र बाबू’ एक हृदयस्पर्शी संस्मरण है। इसमें लेखिका ने राजेन्द्र बाबू के व्यक्तित्व के प्रेरणादायक स्वरूपों पर प्रकाश डाला है। लेखिका के अनुसार-उसने एक गद्यात्मक वातावरण में जष राजेन्द्र बाबू को पहली बार देखा तो उनमें अकथनीय भावात्मक क्षणों के अनेक रूप झलकते हुए दिखाई दे रहे थे। उस समय वह प्रयाग में बी.ए. की छात्रा थी। शीतकाल में उसने अपने घर जब भागलपुर जाते समय अपने भाई से मिलने की प्रतीक्षा में पटना स्टेशन पर राजेन्द्र बाबू को देखा था। उनका व्यक्तित्व बहुत सहज होते हुए भी बड़ा असहज था। उनकी वेशभूषा बिलकुल देहाती थी। उन्हें देखकर लगता था, मानो वे किसी हड़बड़ी में चलते-चलते कपड़े पहनते आए हैं।

उनकी मुखाकृति को देखकर लगता था, मानो उन्हें कहीं देखा है। उनके शरीर के सारे गठन में एक साधारण भारतीय की आकृति और गठन की झलक थी। इसी प्रकार उनकी प्रतिभा, बुद्धि, स्वभाव और रहन-सहन भी थी। कुल मिलाकर वे भारतीय होने का ही प्रतिनिधित्व करते थे। उनकी अस्त-व्यस्तता जवाहर लाल जी की अस्त-व्यस्तता से अलग थी। जवाहर लाल जी की अस्त-व्यस्तता भी व्यवस्था से निर्मित होती थी, तो राजेन्द्र बाबू की सारी व्यवस्था ही अस्त-व्यस्तता का पर्याय थी। उनकी वेशभूषा की अस्त-व्यस्तता को ठीक करने में उनके निजी सचिव और सहचर भाई चक्रधर का योगदान सराहनीय रहा। उन्होंने वर्षों तक राजेन्द्र बाबू के पुराने कपड़े से अपने आपको प्रसाधित कर कृतार्थता का अनुभव किया था। इस प्रकार के गुरु-शिष्य या स्वामी-सेवक आज सचमुच में दुर्लभ हैं।

लेखिका का कहना है कि राजेन्द्र बाबू के सम्पर्क में आने का सुअवसर उसे सन् 1937 में प्राप्त हुआ। उस समय वे कांग्रेस के अध्यक्ष थे और प्रयाग महिला विद्यापीठ महाविद्यालय के भवन का शिलान्यास करने प्रयाग आए थे। उन्होंने उसे बताया कि उनकी 15-16 पौत्रियाँ हैं। उनकी पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हो पाई है। यदि वह उन्हें अपने छात्रावास में रखकर विद्यापीठ की परीक्षाएँ दिलवा सके, तो वे कुछ शिक्षित हो सकेंगी। इसे सहर्ष स्वीकार कर उसने उन्हें अपने संरक्षण में रख लिया। उसी समय उसे राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी से परिचय प्राप्त हुआ। वह सचमुच में धरती की पुत्री थीं। एक सरल, क्षमामयी, ममतामयी, साध्वी और उदार। सम्भ्रान्त जमींदार परिवार की परम्परा के अनुसार वह घण्टों सिर नीचा करके एकासन में बैठी रहती थीं। इससे

उनकी रीढ़ की हड्डी इतनी झुक गई थी कि वह युवती होने पर भी सीधी खड़ी नहीं हो पाती थीं। फिर भी उन्हें कोई अहंकार नहीं था। सबके प्रति उनकी आत्मीयता थी। संगम में वह स्नान-ध्यान करके बड़ी श्रद्धा से अधिक-से-अधिक दूध-फूल संगम को भेंट कर देती थीं। पंडों. को वह यथोचित दान-दक्षिणा दिया करती थीं। लेखिका का पुनः कहना है कि बालिकाओं के प्रति राजेन्द्र बाबू का स्पष्ट निर्देश था कि वे सामान्य बालिकाओं के साथ संयम और सादगी से रहें। इससे वे एक स्वयंसेविका की तरह सब कुछ कर लेती थीं। जब वे भारत के पहले राष्ट्रपति हुए तब उन्होंने लेखिका को लिखा था-“महादेवी बहन, दिल्ली मेरी नहीं है, राष्ट्रपति भवन मेरा नहीं है।

अहंकार से मेरी पोतियों का दिमाग खराब न हो जाए, तुम केवल इसकी चिन्ता करो। वे जैसी रहती आई हैं, उसी प्रकार रहेंगी। कर्त्तव्य-विलास नहीं, कर्मनिष्ठा है।” उनकी धर्मपत्नी में भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वे अन्त तक भारतीय गृहिणी के समान पति, परिवार और परिजनों को खिलाने के बाद ही भोजन करती थीं। उन्होंने लेखिका को एक दर्जन सिरके के बने सूप दिल्ली लाने का आदेश दिया। प्रयाग से प्रथम श्रेणी के डिब्बे में टंग कर दिल्ली स्टेशन आए। फिर उन्हें बड़ी कार में लादा गया। राष्ट्रपति भवन के हर द्वार पर सलाम ठोकने वाले सिपाहियों की आँखें इसे देखकर हैरान हो गईं। सचमुच में ऐसी भेंट लेकर कोई अतिथि न वहाँ पहुँचा था और न पहुँचेगा।

लेखिका का अंत में कहना है कि राजेन्द्र बाबू और उनकी धर्मपत्नी सप्ताह में एक दिन उपवास करते थे। संयोग से वह उनके उपवास के दिन पहुँची तो उन्होंने उनका अतिथि-सत्कार किया। लेखिका भी उनके उपवास में शामिल हो गई। वह आज भी वह शाम नहीं भूल पाई कि किस प्रकार भारत के पहले राष्ट्रपति ने सामान्य आसन पर बैठकर उपवास के बाद कुछ उबले हुए आलू खाकर, पारायण किया था। उसे वही खाते हुए देखकर वे किस प्रकार संतोषकर बच्चों की सरल हँसी से खिल उठे थे। जीवन-मूल्यों की परख करने वाली दृष्टि के कारण उन्हें ‘देशरत्न’ की उपाधि मिली थी। उनके मन की सरल स्वच्छता ने उन्हें अजातशत्रु बना दिया। जिज्ञासा होती है कि क्या वह साँचा टूट गया, जिसमें ऐसे कठिन-कोमल चरित्र ढलते थे।

राजेन्द्र बाबू संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
काले घने पर छोटे कटे हुए बाल, चौड़ा मुख, चौड़ा माथा, घनी भृकुटियों के नीचे बड़ी आँखें, मुख के अनुपात में कुछ भारी नाक, कुछ गोलाई लिए चौड़ी ठुड्डी, कुछ मोटे पर सुडौल होंठ, श्यामल झाँई देता हुआ गेहुआँ वर्ण, ग्रामीणों जैसी बड़ी-बड़ी मूंछे जो ऊपर के होंठ पर ही नहीं नीचे के होंठ पर भी रोमिल आवरण डाले हुए थीं। हाथ, पैर; शरीर सबमें लम्बाई की ऐसी विशेषता थी, जो दृष्टि को अनायास आकर्षित कर लेती थी।

शब्दार्थ:

  • भृकुटियों – भौंहों।
  • श्यामल – साँवला।
  • गेहुआ – गेहूँ के।
  • ग्रामीण – देहाती।
  • रोमिल – रोएँ।
  • आवरण – पर्दा।
  • दृष्टि – नज़र।
  • अनायास – अचानक।
  • आकर्षित – खींच लेती।

प्रसंग:
प्रस्तत गंद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘सामान्य हिन्दी भाग-1’ में संकलित तथा श्रीमती महादेवी वर्मा लिखित संस्मरण ‘राजेन्द्र बाबू’ शीर्षक से उद्धृत है। इसमें लेखिका ने राजेन्द्र बाबू की शारीरिक रूपरेखा का चित्रण करते हुए कहा है कि व्याख्या-राजेन्द्र बाबू की शारीरिक रूपरेखा बड़ी ही अद्भुत थी। उनके सिर के बाल बहुत काले और घने थे। वे कटे हुए थे। इसलिए बहुत छोटे-छोटे थे। उनका मुँह और माथा चौड़ा था। उनकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं। वे भौंहों के बीच दिखाई देती थीं। उनके मुँह की तुलना में उनकी नाक बड़ी लगती थी। उनकी ठुड्डी गोल थी लेकिन चौड़ी थी। उनके मुँह की आकृति कुछ ऐसी थी कि उनके होंठ सुडौल तो थे, लेकिन भारी और मोटे थे। उनका पूरा शरीर गेहुएँ रंग का तो था, लेकिन वह पूरी तरह ऐसा नहीं था।

उसमें साँवलेपन की कुछ झलक अवश्य थी। उनकी मूंछे भी असाधारण थीं। वे छोटी-छोटी नहीं, बल्कि बड़ी-बड़ी थीं। उन्हें देखने से ऐसा लगता था कि वे किसी देहाती की मूंछों के समान थीं। वे ऊपर के होंठ पर होने के साथ-ही-साथ नीचे के भी होंठ पर रोएँ के पर्दा डाले हुए दिखाई देती थीं। उनके हाथ और पैर भी अद्भुत ही थे। वे लम्बे-लम्बे थे। इससे भी वे देखने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते थे। कहने का भाव यह कि उनकी शारीरिक बनावट को देखकर हर कोई उनकी ओर अपने आप खिंचा चला जाता था।

विशेष:

  1. राजेन्द्र बाबू के अद्भुत शारीरिक स्वरूप का चित्रण किया गया है।
  2. शैली चित्रमयी है।
  3. शब्द-योजना बिम्बात्मक।
  4. यह गद्यांश रोचक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में किसका उल्लेख हुआ है?
  2. प्रस्तुत गद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए?

उत्तर:

1. प्रस्तुत गद्यांश में राजेन्द्र बांबू का शारीरिक रूप-ढाँचा का चित्रांकन हुआ है।

2. प्रस्तुत गद्यांश के द्वारा लेखिका ने यह भाव स्पष्ट करना चाहा है कि राजेन्द्र बाबू का बाहरी व्यक्तित्व बड़ा ही सरल और आकर्षक था। वह सबको चकित करने वाला था। यों तो वह बहुत ही सरल और सहज था लेकिन उसका प्रभाव निश्चय ही अमिट और बेजोड़ था। कुल मिलाकर वह एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व था।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. राजेन्द्र बाबू का बाहरी व्यक्तित्व मुख्य रूप से कैसा था?
  2. राजेन्द्र बाबू की शारीरिक रूप-रचना की कौन-सी विशेषता थी?

उत्तर:

  1. राजेन्द्र बाबू का बाहरी व्यक्तित्व मुख्य रूप से देहाती था।
  2. राजेन्द्र बाबू की शारीरिक रूप-रचना की मुख्य विशेषता वह थी, जो किसी को अनायास ही आकर्षित कर लेती थी।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
राजेन्द्र बाबू की मुखाकृति ही नहीं, उनके शरीर के सम्पूर्ण गठन में एक सामान्य भारतीय जन की आकृति और गटन की छाया थी, अतः उन्हें देखने वाले को कोई-न-कोई आकृति या व्यक्ति स्मरण हो आता था और वह अनुभव करने लगता था कि इस प्रकार के व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है। आकृति तथा वेशभूषा के समान ही वे अपने स्वभाव और रहन-सहन में सामान्य भारतीय या भारतीय कृषक का ही प्रतिनिधित्व करते थे। प्रतिभा और बुद्धि की विशिष्टता के साथ-साथ उन्हें जो गम्भीर संवेदना प्राप्त हुई थी, वही उनकी सामान्यता को गरिमा प्रदान करती थी।

शब्दार्थ:

  • मुखाकृति – मुँह की बनावट।
  • जन – मनुष्य।
  • आकृति – बनावट।
  • स्मरण – याद।
  • कृषक – किसान।
  • प्रतिभा – तेज।
  • विशिष्टता – विशेषता।
  • संवेदना – गहरा प्रभाव।
  • गरिमा – महत्त्व।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इसमें लेखिका ने राजेन्द्र बाबू के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का महत्त्वांकन करते हुए कहा है कि… व्याख्या-राजेन्द्र बाबू की मुख की बनावट बिलकुल साधारण थी। उसमें भारतीयता की पूरी रूपरेखा दिखाई देती थी। इसी प्रकार उनका शारीरिक गठन भी था। यही कारण था कि उन्हें जो कोई देखता था, उसे यही लगता था कि उसने उन्हें कहीं-न-कहीं या कभी-न-कभी अवश्य देखा है। इस प्रकार अनुभव करने वाला उनसे अपनापन का भाव रखने का प्रयत्न करने लगता था। लेखिका का पुनः कहना है कि वे अपनी शारीरिक रचना और अपनी वेशभूषा के अनुसार ही अपने स्वभाव और जीवन-स्तर को भी ढाल चुके थे।

यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने स्वभाव और जीवन-स्तर के अनुकूल ही अपनी वेशभूषा को अपना लिया था। इस प्रकार वे अपने स्वभाव, शारीरिक गठन और रहन-सहन के आधार पर एक साधारण भारतीय लगते थे। दूसरे शब्दों में वे एक सच्चे भारतीय किसान के प्रमाण थे। इसी तरह वे अपनी तेज समझ और तीव्र बुद्धि की बहुत बड़ी विशेषता से सम्पन्न थे। इसके साथ-ही-साथ उनमें बहुत अधिक गम्भीरता थी। उस गम्भीरता से वे किसी बात की तह तक पहुँच जाते थे। उनकी इस प्रकार की साधारण विशेषता का महत्त्व सहज ही स्पष्ट हो जाता था।

विशेष:

  1. राजेन्द्र बाबू के बाहरी और आन्तरिक व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है।
  2. यह गद्यांश प्रेरक रूप में है।
  3. भाषा उच्च स्तरीय है।
  4. शैली भावात्मक और वर्णनात्मक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में राजेन्द्र बाबू के व्यक्तित्व के किन पक्षों पर प्रकाश डाला गया है?
  2. इस गद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।

उत्तर:

  1. प्रस्तुत गद्यांश में राजेन्द्र बाबू के बाहरी और आन्तरिक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है।
  2. इस गद्यांश का मुख्य भाव है-राजेन्द्र बाबू के आन्तरिक और बाहरी पक्षों का चित्रण कर प्रेरक रूप में प्रस्तुत करना।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. राजेन्द्र बाबू को देखकर कोई उन्हें क्या समझता था?
  2. राजेन्द्र बाबू किसके द्वारा किसका प्रतिनिधित्व करते थे?

उत्तर:

  1. राजेन्द्र बाबू को देखकर हर कोई यही समझता था कि उसने उन्हें कहीं-न-कहीं अवश्य देखा है।
  2. राजेन्द्र बाबू अपने स्वभाव और अपने रहन-सहन के द्वारा भारतीय या भारतीय किसान का ही प्रतिनिधित्व करते थे।

प्रश्न 3.
बिहार के जमींदार परिवार की वधू और स्वातंत्र्य युद्ध के अपराजेय सेनानी की पत्नी होने का न उन्हें कभी अहंकार हुभा और न उनमें कोई मानसिक ग्रन्थि ही बनी। छात्रावास की सभी बालिकाओं तथा नौकर-चाकरों का उन्हें समान रूप से ध्यान रहता था। एक दिन या कुछ घण्टों ठहरने पर भी वे सबको बुला-बुलाकर उनका तथा उनके परिवार का कुशल-मंगल पूछना न भूलती थीं। घर से अपनी पौत्रियों के लिए लाए मिष्ठान्न में से प्रायः सभी बँट जाता था। देखने वाला यह जान ही नहीं सकता था कि वह सबकी इया, अइया अर्थात् दादी नहीं है।

शब्दार्थ:

  • स्वातंत्र्य – स्वतन्त्र।
  • अपराजेय – पराजित नहीं होने वाला।
  • अहंकार – घमण्ड।
  • मानसिक ग्रन्थि – मन सम्बन्धी दोष।
  • पौत्रियों – पोतियों।
  • मिष्ठान्न – मिठाई।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इसमें लेखिका ने राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी के आकर्षक व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि व्याख्या-राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी साधारण भारतीय महिला होने के बावजूद असाधारण थीं। वे बिहार के एक उच्च जमींदार परिवार की वधू थीं। इसके साथ ही वे स्वतन्त्र युद्ध के अपराजेय सेनानी राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी भी थीं। लेकिन अपनी इन अद्भुत विशेषताओं का न उन्हें कोई अनुभव था और न कोई घमण्ड ही था। इसके लिए उनके मन में कभी कोई विकार या दोष भी नहीं आया। दूसरी बात यह कि उनमें सबके प्रति समानता और अभेद की भावना थी। इसका प्रमाण एक यह भी था कि छात्रावास की सभी छात्राएँ और नौकर-चाकरों से उनका समान व्यवहार होता था।

वे उनके प्रति हमेशा समान व्यवहार करने को पहला महत्त्व दिया करती थीं। इस सन्दर्भ में यह कहना समुचित ही होगा कि जब कभी वे छात्रावास में आती थीं, तब वे सभी छात्राओं और नौकरों-चाकरों को अपने पास बुला लेती थीं। फिर उनका और उनके परिवार सहित उनके सगे-सम्बन्धियों का भी समाचार बड़े प्रेमपूर्वक अवश्य पूछती थीं। वे अपने पोतियों के लिए जो भी मिठाइयाँ लाती थीं, उन्हें सबके बीच उसी समय बाँट देती थीं। उस समय यहाँ जो कोई भी रहता, वह उनकी इस समानता की सोच-समझ और व्यवहार से चकित हो जाता था। फिर वह नहीं समझ पाता कि वह किसकी अपनी दादी हैं और किसकी नहीं।

विशेष:

  1. राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी की असाधारण विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है।
  2. वाक्य-गठन उच्चस्तरीय हैं।
  3. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  4. यह अंश रोचक और हृदयस्पर्शी है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी का स्वभाव कैसा था?
  2. प्रस्तुत गद्यांश के मूल भाव को स्पष्ट कीजिए?

उत्तर:

1. राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी का स्वभाव बहुत ही सरल, सहज और उदार था। वह किसी को अपरिचित और पराया नहीं समझती थीं। वह सबके प्रति अपनापन का. भाव रखती थीं। इस प्रकार वह एक आदर्श भारतीय नारी थीं।

2. प्रस्तुत गद्यांश के द्वारा लेखिका ने यह भाव व्यक्त करना चाहा है कि राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी एक ऐसी आदर्श भारतीय नारी थीं, जिनके लिए अपने-पराये का कोई भेदभाव नहीं था। वह बहुत सरल, स्पष्ट, उदार और विनम्र थीं। उनकी समानता की विशेषता सबको प्रभावित कर मोह लेती थी।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न

  1. राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी किस प्रकार के अहंकार और मानसिक ग्रन्थि से दूर थीं?
  2. राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी किस प्रकार समानता का व्यवहार करती थीं?

उत्तर:

  1. राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी बिहार के जमींदार परिवार की वधू और स्वातंत्र्य युद्ध के अपराजेय सेनानी की पत्नी होने के अहंकार और मानसिक ग्रन्थि से दूर थीं।
  2. राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी सबका कुशल-मंगल पूछा करती थीं। अपनी कोई भी चीज वह सबको बाँट देती थीं। इस प्रकार वह समानता का व्यवहार करना कभी भी नहीं भूलती थीं।

प्रश्न 4.
जीवन मूल्यों की परख करने वाली दृष्टि के कारण उन्हें ‘देशरत्न’ की उपाधि मिली और मन की सरल स्वच्छता ने उन्हें अजातशत्रु बना दिया। अनेक बार प्रश्न उठता है, क्या वह साँचा टूट गया जिसमें ऐसे कठिन कोमल चरित्र ढलते थे।

शब्दार्थ:

  • परख – पहचान।
  • उपाधि – सम्मान।
  • अजातशत्रु – शविहीन, जिसका कोई शत्रु न हो!
  • साँचा – वह साधन, जिसमें गीली वस्तु डालकर उसी के आकार की दूसरी और वस्तुएँ ढाली जाती हैं।

प्रसंग:
पूर्ववत्! इसमें लेखिका ने राजेन्द्र बाबू की महानता को स्पष्ट करते हुए कहा है कि व्याख्या-राजेन्द्र बाबू की सबसे बड़ी महानता यह थी कि उन्हें जीवन-मूल्यों की बहुत बड़ी पहचान थी। इसी कारण उन्हें ‘देशरत्न’ की उपाधि देकर उनका बहुत बड़ा मूल्यांकन किया गया था। उनके व्यक्तित्व की दूसरी बहुत बड़ी विशेषता थी उनके मन की सरलता, सहजता, स्पष्टता और स्वच्छता। इसी विशेषता के बलबूते पर वे अजातशत्रु के रूप में याद किए जाते हैं। उनकी इस प्रकार की महानता और विशेषता की कमी आज के महापुरुषों में दिखाई देती है। इससे यह स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा होती है कि इस प्रकार की विशेषता को तैयार करने वाला साँचा क्या आज नहीं है, जो राजेन्द्र बाबू जैसे कठिन किन्तु सरल और सरस चरित्रों को ढाल सके।

विशेष:

  • राजेन्द्र बाबू की बेजोड़ व्यक्तित्व को स्पष्ट करने पर प्रयास किया गया है।
  • भाषा की शब्दावली तत्सम शब्दों की है।
  • भावात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोतर
प्रश्न 1.
राजेन्द्र बाबू को ‘देश रत्न’ को उपाधि क्यों मिली?
उत्तर:
राजेन्द्र बाबू में जीवन-मूल्यों की पहचान करने की अद्भुत दृष्टि थी। इसीलिए उन्हें देशरत्न’ की उणधि दी गई।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
आज किस साँचे का. अभाव दिखाई देता है?
उत्तर:
आज उस साँचे का अभाव दिखाई देता है, जिसमें राजेन्द्र बाबू जैसे कठिन और कोमल दोनों ही प्रकार के चरित्र ढलते थे।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 14 रुपया तुम्हें खा गया

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 14 रुपया तुम्हें खा गया (एकांकी, भगवतीचरण वर्मा)

रुपया तुम्हें खा गया पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

रुपया तुम्हें खा गया लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किशोरीलाल की सुख-शान्ति क्यों भंग हो गई?
उत्तर:
किशोरीलाल को रुपए चुराने के जुर्म में तीन साल की जेल की सजा हो गई। इसलिए उसकी सुख-शान्ति भंग हो गई।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
जयलाल कौन था? वह कौन-सा व्यवसाय करता था?
उत्तर:
जयलाल मानिकचंद का पुत्र था। वह डॉक्टरी करता था।

प्रश्न 3.
मदन को सम्पत्ति का मालिक बनाने की बात पर मानिकचंद ने क्या कहा?
उत्तर:
मदन को सम्पत्ति का मालिक बनाने की बात पर मानिकचंद ने यह कहा-“मेरे मरने के बाद ही उसके पहले नहीं। और मेरे मरने के लिए तुम दोनों माला फेरो, पूजा-पाठ कराओ…..यहाँ से…..जाओ तुम दोनों।”

रुपया तुम्हें खा गया दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किशोरीलाल के जेल जाने पर परिवार ने अपना जीवन-निर्वाह किस प्रकार किया?
उत्तर:
किशोरीलाल के जेल जाने पर उसके परिवार ने अपना जीवन-निर्वाह बड़ी कठिनाई से किया। उसकी पत्नी ने अपने जेवर बेचे। उसकी लड़की ने चक्की चलाई और पड़ोस के कपड़े सिले। इससे उसके बेटे जयलाल की डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की।

प्रश्न 2.
सजा काटने के पश्चात् किशोरीलाल की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सजा काटने के पश्चात किशोरीलाल की मनोदशा काफी बिगड़ चकी थी। वह अपने उजड़े हुए घर-परिवार को देखकर अशान्त हो गया था। उसने अपनी बाबी, अपने बच्चों के कुपोषण को देखा। इससे वह एकदम घबड़ा गया। उसने लोगों से होने वाले अनादर और उपेक्षा को देखा। घर के घोर अभाव को देखा। इन सब दुखों को देखकर वह काँप गया। उसके बाप-दादा को पुराना मकान कर्ज से दब चुका था। उसे बेचकर वह वहाँ से भाग खड़ा हुआ और दूसरे शहर को चला गया।

प्रश्न 3.
मानिकचंद अपनी सेफ (तिजौरी) की चाबी अपने पुत्र मदन को क्यों नहीं देना चाहता था?
उत्तर:
मानिकचंद अपनी सेफ (तिजौरी) की चाबी अपने पुत्र मदन को नहीं देना चाहता था यह इसलिए कि वह अपनी सम्पत्ति का मालिक अपने जीते जी नहीं बनाना चाहता था। अपनी सेफ (तिजौरी) की चाबी देकर वह अपनी पत्नी और बेटे के अधीन होकर नहीं जीना चाहता था।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
मानिकचंद को अपनी भूल का अहसास कैसे होता है?
उत्तर:
मानिकचंद को अपनी भूल का अहसास तब होता है, जब किशोरीलाल उससे उसके जीवन का सबसे बड़ा सत्य कह गया कि रुपया उसे खा गया है। इसलिए उसमें ममता नहीं है, दया नहीं है, प्रेम नहीं है और भावना नहीं है। उसके अन्दर वाला मानव मर चुका है। उसकी जगह अर्थ का पिशाच घुस गया है।

प्रश्न 5.
‘रुपया तुम्हें खा गया’ एकांकी का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी में मनुष्य की उस लोभवृत्ति का चित्रण किया गया है जिसके अधीन होकर वह सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को भूलकर मात्र धन-लिप्सा के मोहजाल में आकण्ठ डूबा रहता है और अपनी मानसिक शान्ति खो बैठता है। पैसे की तुलना में मनुष्य के उदात्त मानवीय गुण यथा महत्त्वपूर्ण है। ये गुण ही मनुष्य को जीवन में सच्चा सुख और शान्ति प्रदान करते हैं। पैसों की ताकत इन मानवीय गुणों की तुलना में हेय है।

प्रश्न 6.
एकांकी के आधार पर मानिकचंद का चरित्र-चित्रण कीजिए?
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी ‘रुपया तुम्हें खा गया’ एक यथार्थपूर्ण एकांकी है। इसका मुख्य पात्र मानिकचंद का चरित्र बड़ा ही रोचक और विश्वसनीय है। वह धनपशु है। उसमें धन की पिशाच पूरी तरह मौजूद है। इससे वह हर प्रकार के अनैतिक विचारों को पालता है। हर प्रकार के अनैतिक कार्यों को करता है। धन ही उसका जीवन, उसकी चाह है। और तो और, धन ही उसका सब कुछ है। इसके सामने वह किसी को कुछ नहीं समझता है। सबको ठोकर मार देने में वह नहीं हिचकता है। अपनी बीवी-बच्चों को भी वह धन के सामने भूल जाता है।

इसी धनलिप्सा के मोहजाल में वह इतना फँस चुका है कि किशोरीलाल के बार-बार यह सावधान किए जाने पर “रुपया तुम्हें खा गया” वह नहीं सावधान होता है। बीमार होने पर भी वह अपने बेटे मदन को अपनी सेफ (तिजौरी) की चाबी नहीं देता है। अपनी बीवी रानी को फटकारते हुए वह कहता भी है_ “हा…..हा….हा। नहीं मिलेगी, सेफ की चाबी नहीं मिलेगी, जब तक मैं जिन्दा हूँ। जानती हो, इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। बीवी, नातेदार, पड़ोसी, नौकर ये सब के सब मेरे नहीं हैं, ये मेरे रुपए के हैं। अभी किशोरीलाल मुझे बतला गया है कि मैं मर चुका हूँ। वह मुझसे कह गया है कि रुपया तुम्हें खा गया।”

प्रश्न 7.
एकांकी के तत्त्वों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए?
उत्तर:
एकांकी नाटक सामान्य रूप से नाटक के उस स्वरूप को कहते हैं जिसमें एक ही अंक में सारा नाटक समाप्त हो जाता है। एकांकी के छह तत्त्व माने जाते हैं।

  1. कथानक या कथावस्तु
  2. पात्र और चरिघ्र-चित्रण
  3. कथोपकथन
  4. देशकाल तथा संकलनत्रय
  5. भाषा-शैली, और
  6. उद्देश्य।

1. कथानक और कथावस्तु:
यह एकांकी की कहानी है। कहानी को इस प्रकार से नियन्त्रित करके रखा जाए कि वह बहुत कम में समाप्त होकर श्रोता और दर्शक के मन को अपनी ओर रमा सके।

2. पात्र और चरित्र-चित्रण:
श्रोता और दर्शक के हृदय पर सबसे अधिक. प्रभाव पात्रों के द्वारा ही डाला जाता है। यह एकांकी का प्राण होता है। पात्र ही कथावस्तु को आगे बढ़ाते हैं। मुख्य पात्र को नायक कहते हैं। वह नाटक के फल को प्राप्त करता है। वह अनेकानेक उदात्त गुणों का खजाना होता है।

3. कथोपकथन:
कथोपकथन कथावस्तु को आगे बढ़ाते हैं और पात्रों के चरित्र का उद्घाटन करते हैं। कथोपकथन के आधार पर ही नाटकीयता का मूल्यांकन किया जाता है। ये संक्षिप्त, चुटीले, पात्रानुकूल तथा स्वाभाविक होने चाहिए।

4. देश-काल तथा संकलनत्रय:
एकांकी कथावस्तु से सम्बन्धित देश-काल (परिस्थितियों) का स्वाभाविक वर्णन एकांकी को सजीवता एवं वास्तविकता प्रदान करता है। कम-से-कम स्थानों एवं कम अन्तराल की घटनाओं का वर्णन संकलनत्रय के तत्त्व के निर्वाह में सहायक होता है।

5. भाषा-शैली:
एकांकी को प्रस्तुत करने के ढंग को शैली कहते हैं। इसे ही एकांकी का परिधान कह सकते हैं। इसके अन्तर्गत पात्रों की भाषा, रंगमंच की व्यवस्था, नाटककार का व्यक्तित्व आदि बातें आती हैं।

6. उद्देश्य:
एकांकी का मुख्य उद्देश्य मनोरंजक ढंग पर जीवन की व्याख्या करना है। एकांकी का महत्त्व मुख्य रूप से नैतिक है। समाज के कल्याण के साथ काव्य का जो सम्बन्ध है, वह सबसे अधिक एकांकी में ही प्रकट किया जाता है।

रुपया तुम्हें खा गया भाव विस्तार/पल्लवन

  1. रुपया तुमने नहीं खाया, रुपया तुम्हें खा गया।
  2. तुमने जो चोरी की थी उसकी सजा मैं भुगत चुका हूँ। तुम्हारे पाप का प्रायश्चित मैं कर चुका हूँ।

उत्तर:
1. उपर्युक्त कथन किशोरीलाल का मानिकचंद के प्रति है। इस कथन में यह भाव छिपा हुआ है कि धन का लोभी व्यक्ति का चरित्र गिर जाता है। धन को ही वह सबकुछ समझ लेता है। इससे उसके अंदर का मनुष्य मर जाता है। उसकी जगह पिशाच का प्रवेश हो जाता है। उससे उसमें प्रेम नहीं होता है। कोई सद्भावना नहीं होती है। कोई दया नहीं है। इस प्रकार रुपया को चाहने वाले या रुपया को ही सबकुछ समझने वाले को रुपया इस तरह से खा लेता है कि उसके पास केवल पशुतापन और राक्षसीपन ही रह जाता है। उससे उसके परिवार और समाज का नुकसान ही होता रहता है।

2. उपर्युक्त कथन किशोरीलाल का मानिकचन्द के प्रति है। इस कथन का यह भाव है कि आज के समाज में कानून कमजोर पड़ गया है। वह धनवान और साधन-सम्पन्न मुजरिम को पकड़ने में आनाकानी करता है, बहाना बनाता है। घूस पाकर कमजोर, गरीब और लाचार आदमी को गिरफ्तार कर उसे जेल में बन्द कर उसे सजा दे डालता है। इस प्रकार आज का कानून है-करे कोई, भरै कोई।

रुपया तुम्हें खा गया भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
दिए गए शब्दों में से उपसर्ग छाँटकर अलग कीजिए। कुरूप, अभाव, कुप्रबंध, सुडौल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 14 रुपया तुम्हें खा गया img-1

प्रश्न 2.
निम्ननिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखिए –
अभिशाप, तिरस्कार, असभ्य, कठोर।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 14 रुपया तुम्हें खा गया img-2

प्रश्न 3. दिए गए निर्देशानुसार वाक्य परिवर्तन कीजिए –
उदा:

  1. रुपया तुम्हें खा गया। (प्रश्वाचक वाक्य)
  2. वह कल दिल्ली जाएगा (निषेधात्मक वाक्य)
  3. कितना सुन्दर दृश्य है(विस्मयादि बोधक)
  4. आज पानी बरस रहा है(संदेहार्थ वाक्य)
  5. आपने भोजन कर लिया है। (प्रश्नार्थक वाक्य)

उत्तर:

  1. क्या रुपया तम्हें खा गया है?
  2. वह कल दिल्ली नहीं जाएगा।
  3. अहा! कितना सुन्दर दृश्य है।
  4. शायद आज पानी बरसे।
  5. क्या आपने भोजन कर लिया है?

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
इस एकांकी में आए आगत (विदेशी) शब्दों को लिखिए।
उत्तर:
इस एकांकी में आए आगत (विदेशी) शब्द इस प्रकार हैं –
करीब-करीब, हफ्ते, दफ्तर, डाइंग रूम, डॉक्टर, ताकत, ईमान, इज्जत, आबरू, दुनिया, बीमार, सबूत, साल, जेल, इशारा, सजायाफ्ता, आदमी, मकान, कर्ज, मुआवजा, सिर्फ, जिंदगी, कागज, इन्कमटैक्स, नोटिस, हिसाब-किताब, अजीब, मुसीबत, मतलब, सेफ़, आखिर, गलत, ऑफिस।

रुपया तुम्हें खा गया योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
‘रुपया तुम्हें खा गया’ एकांकी को कहानी के रूप में लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक /अध्यापिका की सहायता से हल करें। (भारतीय डाक-मनीआर्डर का प्रारूप अगले पृष्ठ पर देखें)

प्रश्न 2.
इस एकांकी को अभिनीत कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक /अध्यापिका की सहायता से हल करें। (भारतीय डाक-मनीआर्डर का प्रारूप अगले पृष्ठ पर देखें)

प्रश्न 3.
ईमानदारी विषय पर केन्द्रित अन्य प्रेरणा देने वाले प्रसंगों को संकलित कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक /अध्यापिका की सहायता से हल करें। (भारतीय डाक-मनीआर्डर का प्रारूप अगले पृष्ठ पर देखें)

प्रश्न 4.
रुपये को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने हेतु डाकखाने में मनी आर्डर द्वारा सुविधा प्रदान की जाती है। यहाँ मनी ऑर्डर का प्रारूप दिया जा रहा है जिसमें आप आवेदक का नाम पता तथा पाने वाले का नाम, पता भरिए तथा मनी ऑर्डर के बारे में विस्तृत जानकरी डाकखाने से प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक /अध्यापिका की सहायता से हल करें। (भारतीय डाक-मनीआर्डर का प्रारूप अगले पृष्ठ पर देखें)

रुपया तुम्हें खा गया परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

रुपया तुम्हें खा गया लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बीमारी में क्या होता है और क्या नहीं होता है?
उत्तर:
बीमारी में उतार-चढ़ाव होता है। उसमें सुधार नहीं होता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
किशोरीलाल अपने बुरे समय में मानिकचन्द से सहायता क्यों नहीं माँगी?
उत्तर:
किशोरीलाल अपने बुरे समय में मानिकचन्द से सहायता नहीं माँगी। वह इसलिए कि –

  1. उसे उसका पता नहीं मालूम था।
  2. उसे इस बात का पूरा विश्वास नहीं था कि वे रुपये उसने ही चुराए थे।

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 14 रुपया तुम्हें खा गया img-3

प्रश्न 3.
किशोरीलाल ने मानिकचन्द से क्यों कहा कि रुपया उसे खा गया?
उत्तर:
किशोरीलाल ने मानिकचन्द से कहा कि रुपया उसे खा गया। यह इसलिए कि उसमें कोई ममता नहीं, दया नहीं, प्रेम नहीं और कोई भावना नहीं रह गई थी। उसके अन्दर का मानव मर चुका था और धन का पिशाच घुस गया था।

रुपया तुम्हें खा गया दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किशोरीलाल मानिकचन्द को आपबीती क्या सुनाई?
उत्तर:
किशोरीलाल ने मानिकचन्द को आपबीती सुनाई। उसने उसे सुनाया कि जब वह जेल की सजा काटकर घर लौटा तो उसने जो देखा, उससे वह काँप उठा। उस समय तक यह जयलाल डॉक्टरी पास कर चुका था। लेकिन इसकी डॉक्टर नहीं चली। एक सजायाफ्ता आदमी का लड़का था न यह! बाप-दादा का पुराना मकान कर्ज से लद चुका था। उसे बेचकर मैं वहाँ से भाग खड़ा हुआ, और उसने इस नगर की शरण ली।

प्रश्न 2.
मानिकचन्द द्वारा. क्षमा माँगने पर किशोरीलाल ने क्या कहा?
उत्तर:
मानिकचन्द के क्षमा माँगने पर किशोरीलाल ने कहा –

“तुमने कोई अपराध नहीं किया। मानिकचन्द मुझसे क्षमा बेकार मांग रहे हो। कोई बहुत बड़ा पाप किया होगा मैंने कभी, उसी का दंड मुझे मिला। वह दंड मैंने भुगत लिया है,और आज मेरे मन में कोई ग्लानि नहीं, कोई संतापं नहीं। मेरे लड़के की डॉक्टरी अच्छी चलती है और वह ईमानदार तथा कर्तव्यपरायण आदमी है। मेरे पास कोई अभाव नहीं। मेरा जीवन, मेरी पत्नी की, मेरे पुत्र की, मेरे पौत्रों की ममता है, मेरा सुख-दुख उनका सुख-दुख है। यह क्या कम है? मैं भगवत भजन करता हूँ। मैं तुमसे कहीं अधिक सखी हूँ।”

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
मानिकचन्द द्वारा झूठ बोलने और धोखा देने का आरोप लगाने पर किशोरीलाल ने उससे क्या कहा?
उत्तर:
मानिकचन्द द्वारा झूठ बोलने और धोखा देने का आरोप लगाने पर किशोरी लाल ने उससे इस प्रकार कहा –

“मानिकचन्द धोखा मैं तुम्हें नहीं दे रहा हूँ, धोखा तुम अपने को दे रहे हो। तुम्हारी सुख-शांति अर्थ के पिशाच ने तुमसे छीन ली, तुम्हारा संतोष उसने नष्ट कर दिया। उस दिन जब तुम दस हजार रुपया चुराकर लाए थे, तब तुमने समझा था कि तुम रुपया खा गए लेकिन तुमने बहुत गलत समझा था।”

प्रश्न 4.
“आखिर तुम सेफ की चाबी उन्हें क्यों नहीं दे देते?” किशोरीलाल के इस प्रश्न के उत्तर में मानिकचन्द ने क्या कहा?
उत्तर:
“आखिर तुम सेफ की चाबी इन्हें क्यों नहीं दे देते?” किशोरीलाल के इस प्रश्न के उत्तर में मानिक चन्द ने कहा –

किशोरीलाल तीन साल जेल में रहकर भी तुम यह नहीं जान पाए कि सेफ की चाबी जिन्दगी की चाबी है। उसे अपने पास से अलग कर देने के माने हैं विनाश। देख रहे हो मेरे गले में सोने की जंजीर में बंधी हुई यह चाभी?

प्रश्न 5.
रानी द्वारा सेफ की चाबी माँगने पर मानिकचन्द ने क्या कहा?
उत्तर:
रानी द्वारा सेफ की चाबी माँगने पर मानिकचन्द ने इस प्रकार कहा –

हा…हा…हा। नहीं मिलेगी, सेफ की चाबी नहीं मिलेगी, जब तक मैं जिंदा हूँ। जानती हो, इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। बीवी, बच्चे, नातेदार, पड़ोसी, नौकर. …ये सब के सब मेरे नहीं हैं, ये मेरे रुपये के हैं। अभी किशोरीलाल मुझे बतला गया है कि मैं मर चुका हूँ। वह मुझसे कह गया है कि रुपया तुम्हें खा गया।”

रुपया तुम्हें खा गया लेखक का परिचय

प्रश्न 1.
भगवतीचरण वर्मा का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भगवतीचरण वर्मा का जन्म उत्तर-प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गांव में सन् 1903 में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा इलाहाबाद में प्राप्त की। उनके साहित्य के लेखन का आरंभ कविता से हुआ, जो धीरे-धीरे बाद में कहानी-लेखन और नाटक-लेखन में बदलता गया।

रचनाएँ:
भगवतीचरण वर्मा मुख्य रूप से कहानीकार और उपन्यासकार हैं। उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं –

  • कहानी-संग्रह – ‘इंस्टालमेंट’, ‘दो बाँके तथा राख’ और ‘चिनगारी’।
  • काव्य-संग्रह – ‘मधुकण’, ‘प्रेम-संगीत’ और ‘मानव’।
  • उपन्यास – ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’, ‘चित्रलेखा’, ‘भूले-बिसरे चित्र’।

महत्त्व:
भगवतीचरण वर्मा उपदेशक नहीं हैं, न विचारक के आसन पर बैठने की आकांक्षा ही कभी उनके मन में उठी। वे जीवन भर सहजता के प्रति आस्थावान रहे। आज के भारतीय गांव और शहर के परिवेश तथा उनकी समस्याओं का ज्ञान और उनके निराकरण के संकेत लेखक की सूक्ष्म और अंतर्भेदनी दृष्टि में मिलते हैं। आज के युग की पहचान करने में उनका लेखन समर्थ है।

रुपया तुम्हें खा गया पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
भगवतीचरण वर्मा लिखित एकांकी ‘रुपया तुम्हें खा गया’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
भगवतीचरण वर्मा-लिखित एकांकी ‘रुपया तुम्हें खा गया’ में मनुष्य के लोभ और उससे होने वाली हानियों का चित्रण किया गया है। इस एकांकी का सारांश इस प्रकार है –

डॉ. जयपाल मानिकचन्द का कई दिनों से इलाज कर रहे हैं। मानिकचन्द के पूछने पर डॉक्टर जयपाल बताता है कि उसको सुधार धीरे-धीरे हो रहा है। बीमारी के दौरान उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। अगर सुधार हो, तब तो बीमारी अच्छी ही हो गई। इसे सुनते ही मानिकचंद का चेहरा उतर गया। उसे इस तरह देखकर डॉक्टर ने कहा कि डरने की कोई बात नहीं। बीमारी करीब-करीब ठीक हो चुकी है। इसे सुनकर मानिकचंद ने डॉक्टर को धन्यवाद दिया। फिर कहा कि वह मदन से उसके ड्राइंगरूम में अवश्य मिल ले। वह अस्पताल के खर्चे का सारा प्रबंध कर देगा। डॉक्टर ने उसके प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि क्या वह पैसे से ही धर्म, इंसान, इज्जत आदि को खरीद सकता है।

अब वह जिन्दगी भर बीमार ही रहेगा। उसे कोई भी ठीक नहीं कर सकता है। उसी समय किशोरीलाल वहां आ जाता है। उसे देखकर मानिकचंद हैरान होता है। उसकी हैरानी को देखकर उसने कहा कि वह डरे नहीं। उसने जो चोरी की थी, उसकी सजा वह भुगत चुका है। वह उसके पाप का प्रायश्चित्त कर चुका है। इस सिलसिले में तीन साल जेल में बंद था। वे दिन मेरी घोर विपत्ति और बर्बादी के दिन थे। जेल से छूटकर घर जाने पर उसने देखा कि वह बुरी तरह से उजड़ चुका है। लोग उससे बात न करके उस पर हँसते थे। उसका तिरस्कार और अपमान करते थे। उसके फूल-से बच्चे कुम्हला गए। उसकी पत्नी बूढ़ी हो गई। घर भयानक अभाव में था। यह डॉक्टर जयलाल उसका ही लड़का है।

यह उस समय डॉक्टरी पास कर चुका था। लेकिन एक सजायाफ्ता आदमी का लड़का होने से इसकी डॉक्टरी नहीं चली। बाप-दादा का पुराना सकान कर्ज में था। उसे बेचकर ही उसने इस शहर में शरण ली। इस समय वह उससे रुपए नहीं लेने आया है। वह तो यह देखने आया है कि वह किस प्रकार करोड़पति की जिंदगी जी रहा है। – उसी समय मानिकचंद के लड़के मदन ने कहा कि बाबूजी को इन्कमटैक्सवालों ने चालीस लाख रुपए का नोटिस दिया है। उन्हें हमारे पुराने हिसाब-किताब का पता चल गया है। उसकी पत्नी रानी ने कहा कि इन रुपयों का प्रबंध करना ही होगा। मिल छुड़ाना है। इसलिए वह सेफ की चाबी मदन को दे दे।

इसे सुनकर उसने उन दोनों को फटकारते हुए कहा कि वह सेफ की चाबियाँ मदन को देकर अपना हाथ नहीं कटवाएगा। इसलिए वे दोनों वहाँ से चले जाएँ। इसे देखकर डॉक्टर जयपाल उन दोनों माँ-बेटे (रानी और मदन) को समझाता है कि वे दोनों वहाँ से तुरन्त चले जाएँ। जब मानिकचंद शान्त हो जाएगा, तब वह उसे समझा-बुझाकर सब कुछ तय कर लेगा। किशोरीलाल को देखकर मदन ठिठक जाता है।

किशोरीलाल से सहानुभूति की आशा से मानिकचंद अपनी पत्नी-बेटे की शिकायत करता है। किशोरीलाल उसे अपने पत्नी-बेटे को सेंफ की चाबी दे देने की सलाह देता है। उसे सुनकर मानिकचंद उसे समझाते हुए केहता है कि वह उन्हें सेफ की चाबी हरगिज नहीं देगा। अगर देगा तो उसका अर्थ होगा अपने गले में फंदा डालना।

मानिकचंद किशोरीलाल से अपना रुपया वापस लेकर उसे उस अभिशाप से मुक्त करने का निवेदन करता है। वह उससे क्षमा माँगता है तो किशोरीलाल उसे समझाते हुए कहता है कि उसने कोई अपराध नहीं किया है। उसने ही कोई बड़ा पाप किया होगा, जिसका उसे दंड के रूप में जेल की सजा मिली। अब उसे कोई दुःख-अभाव नहीं है। उसका सारा परिवार सुखी और सम्पन्न है। इसे सुनकर मानिकचंद ने कहा कि वह उसे धोखा दे रहा है। किशोरीलाल ने उसे फटकारते हुए कहा कि वह उसे धोखा नहीं दे रहा है बल्कि वह अपने आपको ही धोखा दे रहा है। ऐसा इसलिए कि उसकी सुख-शान्ति और संतोष को अर्थ के पिशाच ने छीनकर नष्ट कर दिया है।

उस दिन जब उसने दस हजार रुपए चुराए थे, तब उसने यह समझा था कि वह रुपया खा गया, लेकिन ऐसी बात नहीं है। उसने रुपया नहीं खाया था, बल्कि रुपया उसे खा गया। इसका प्रमाण है कि उसमें प्रेम, दया आदि की कोई भावना नहीं है। उसके अंदर का मनुष्य मर चुका है। उसकी जगह पिशाच घुस गया है। अपनी पत्नी रानी को देखकर मानिक चंद विक्षिप्त की तरह कहता है कि अगर वह सेफ की चाबी लेने आई है, तो वह उसे नहीं मिलेगी।

उसका इस संसार में कोई भी नहीं है। उसके सभी नाते, संबंधी, पड़ोसी, नौकर रुपए के हैं, उसके नहीं हैं। किशोरीलाल अभी कह गया है कि वह मर चुका है। उसे रुपया खा गया है। रानी के पूछने पर मानिकचंद ने कहा कि उसकी तबियत बिल्कुल ठीक है। केवल एक सत्य उस पर प्रकट हुआ है कि उसकी प्रेत आत्मा को किशोरीलाल ने पकड़कर उसके सिरहाने छोड़ दिया है। वह कह रही है रुपया उसे खा गया। रुपया उसे खा गया। रुपया उसे खा गया।

रुपया तुम्हें खा गया संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
सेठजी, बीमारी का अन्त होता है, बीमारी में सुधार नहीं हुआ करता। जितने दिन तक बीमारी चलती है वह बीमारी की अवधि कहलाती है। उस अवधि में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं, अगर सुधार हो तब तो बीमारी अच्छी ही हो गई।

शब्दार्थ:

  • अवधि – समय।
  • उतार-चढ़ाव – कम-अधिक।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी सामान्य भाग-1’ में संकलित तथा भगवतीचरण वर्मा लिखित एकांकी ‘रुपया तुम्हें खा गया’ शीर्षक से उद्धृत है। इसमें लेखक ने डॉक्टर जयलाल के कथन के माध्यम से बीमारी क्या होती है, यह बतलाने का प्रयास किया है। डॉक्टर जयलाल बीमार मानिकचंद को समझाते हुए कह रहा है –

व्याख्या:
सेठजी! बीमार के सही इलाज होने से बीमारी में सुधार या कमी नहीं होती है, बल्कि बीमारी की समाप्ति ही हो जाती है। इस प्रकार बीमारी का इलाज लगातार होता रहता है। इसे ही बीमारी का समय कहा जाता है। इस समय में बीमारी में कभी कमी होती है तो कभी अधिकता। दूसरे शब्दों में यह कि इलाज के बावजूद बीमारी कभी घट जाती है तो कभी बढ़ जाती है। इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि बीमार का सही इलाज होने से कुछ सुधार होने लगता है। ऐसा होने पर यह मान लिया जाता है कि बीमारी का अंत हो गया।

विशेष:

  1. बीमारी के स्वरूप को स्पष्ट किया गया है।
  2. भाषा में प्रवाह है।
  3. शैली बोधगम्य है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. बीमार के इलाज से क्या होता है?
  2. बीमारी की अवधि किसे कहते हैं?

उत्तर:

  1. बीमारी के इलाज से बीमारी का अंत होता है।
  2. जितने दिन बीमारी चलती है, वह बीमारी की अवधि कहलाती है।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न (i)
बीमारी की अवधि में क्या होता है?
उत्तर
बीमारी की अवधि में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं।

प्रश्न 2.
मैं जेल में बंद था। कभी रोता था, कभी हँसता था। कभी पागलपन में बकने लगता था। तीन साल बाद छूटकर मैं अपने घर पहुंचा, और मैंने देखा कि मैं बुरी तरह उजड़ गया हूँ। लोग मुझसे बात नहीं करते थे। मुझ पर तिरस्कार और उपेक्षा की वर्षा होती थी। मेरे फूल से बच्चे कुम्हला गए थे। मेरी पत्नी इन तीन वर्षों में बूढ़ी हो गई थी। घर में भयानक अभाव था।

शब्दार्थ:

  • उजड़ – बर्बाद।
  • तिरस्कार – अपमान।
  • उपेक्षा – अनादर।
  • कुम्हला – मुरझा।
  • अभाव – कमी।

प्रसंग:
पूर्ववत। इसमें मानिकचंद से किशोरीलाल की आपबीती दुखद जिंदगी का उल्लेख किया गया है। किशोरीलाल ने मानिकचंद से कहा।

व्याख्या:
मानिकचंद तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि उसने कई साल जेल की सजा काटी है। जेल की सजा काटते हुए वह कभी शान्त नहीं था। वह अपने दुःखमय जीवन को सोच-सोचकर कभी रोता था और कभी सुखों को याद करके हँसता भी था। इसी तरह कभी-कभी पागल होकर बेचैन हो उठता था। फिर ऊटपटांग बातें करने लगता था। इस तरह से उसने तीन साल जेल में बिताए। जेल से छूटने पर जब वह अपने घर आया तो उसने देखा कि उसका घर पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है। उसकी गरीबी और तंग हालात को देखकर उसके आस-पास के लोग और सगे-संबंधी उससे मुँह फेर लिये थे।

उससे मिलना-जुलना और बात करना बंद कर दिए थे। इस प्रकार उसकी चारों ओर से अनादर और अपमान होने लगा था। उसकी इस प्रकार की दुर्दशा का यह भी असर पड़ा कि उसके सुखी और सुन्दर बच्चे कुपोषण का शिकार हो गए। उनका जीवन अंधकार में डूब गया। इसी तरह उसकी पत्नी भी गरीबी का शिकार होने के कारण इतनी कमजोर हो गई थी कि वह झुक गई। सीधी न खड़ी हो सकती थी और न बैठ ही सकती थी। सचमुच में उसके घर में बुरी तरह कंगाली छा गई थी।

विशेष:

  1. भाषा मार्मिक है।
  2. शैली हृदयस्पर्शी है।
  3. गरीबी का सटीक चित्रण है।
  4. सम्पूर्ण कथन स्वाभाविक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. उपर्युक्त कथन में किस तथ्य का उल्लेख है?
  2. उपर्युक्त कथन का संक्षिप्त भाव लिखिए।

उत्तर:

1. उपर्युक्त कथन में जेल-जीवन के दुखद पहलुओं का उल्लेख है।

2. उपर्युक्त कथन के द्वारा यह भाव स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। कि गरीबी और अभावपूर्ण जीवन हर प्रकार से दुखद और उपेक्षित होता है। उसे कहीं से कोई सुख की किरण नहीं दिखाई देती है। इस प्रकार का जीवन जीनेवाला हताशा और निराशा के घने अंधकार में डूब जाता है।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. जेल-जीवन कैसा होता है?
  2. उजड़े हुए व्यक्ति का घर-परिवार किस तरह का हो जाता है?

उत्तर:

  1. जेल-जीवन बड़ा ही दुखद होता है। जेल में बंद व्यक्ति पागल की तरह बड़ा ही अशान्त रहता है।
  2. उजड़े हुए व्यक्ति से लोग बात नहीं करते और उस पर तिरस्कार और उपेक्षा की वर्षा करते हैं। बच्चों पर मुसीबत आ जाती है। घर में भयानक अभाव आ जाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
मानिकचंद्र, धोखा मैं तुम्हें नहीं दे रहा हूँ, धोखा तुम अपने को दे रहे हो। तुम्हारी सुख-शाति अर्थ के पिशाच ने तुमसे छीन ली, तुम्हारा संतोष उसने नष्ट कर दिया। उस दिन जब तुम दस हजार रुपया चुराकर लाए थे। तब तुमने समझा था. कि तुम रुपया खा गए….लेकिन तुमने बहुत गलत समझा था।

शब्दार्थ:

  • पिशाच – भूत-प्रेत।

प्रसंग:
पूर्ववत्। इसमें किशोरीलाल ने मानिकचंद की अज्ञानता को उसे स्पष्ट करते हुए कहा है कि –

व्याख्या:
वह उसे धोखा नहीं दे रहा है। यह भी कि वह किसी प्रकार के अँधेरे में भी नहीं रख रहा है। उसे तो यह बहुत अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि वह ही अपने आपको धोखा दे रहा है। अपने आपको अँधेरे में रख रहा है। यह इसलिए कि वह अपने आपको बहुत सुखी और शान्ति का जीवन जीने की बात सोचकर फूले नहीं समा रहा है तो वह गलतफहमी है। उसे तो यह बिलकुल ही साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि उसके सुख और उसकी शान्ति को उसके लोभ और असंतोष ने समाप्त कर दिया है।

उसमें अर्थ की प्रेतात्मा आ गई है, जिसने उसके सुख-चैन और संतोष को निगल लिया है। उसे उस दिन को नहीं भूलना चाहिए, जिस दिन उसने दस हजार रुपये की चोरी की थी। उस दिन उसने यह समझने में गलती की थी कि उसने रुपया खा लिया है। अब उसे इस सच्चाई को स्वीकारना होगा कि उसने रुपये नहीं खा लिये हैं, बल्कि रुपया ने उसे खा लिया है।

विशेष:

  1. अर्थ को पिशाच के रूप में कहकर अर्थ के दुष्परिणाम को बतलया गया है।
  2. भाषा में सजीवता है।
  3. कथन में यथार्थ की पूर्णता है।
  4. शैली व्यंग्यात्मक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न (i)
अर्थ के दुष्प्रभाव को बताइए।
उत्तर:
अर्थ के कई दुष्प्रभाव होते हैं; जैसे-सुख शान्ति और कष्ट हो जाते हैं। स्वयं को सही और दूसरे को गलत समझना आदि।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न (i)
उपर्युक्त गद्यांश का संक्षिप्त भाव लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त गद्यांश का भाव यह है कि अर्थ पिशाच की तरह होता है। वह जिसके पास होता है, उसके सुख, शान्ति और संतोष को नष्ट कर देता है। वह उसे कहीं का नहीं छोड़ता है। वह उसके ज्ञान और विवेक को भूलभूलैया में डालकर उसमें अनेक प्रकार के दुर्भावों को पैदा कर देता है। इससे वह घर-समाज की आँखों से गिरकर अकेला पड़ जाता है।

प्रश्न 4.
बिल्कुल ठीक है रानी, केवल एक सत्य मुझ पर प्रकट हुआ है। मेरी प्रेतात्मा को किशोरीलाल न जाने कहाँ से पकड़ लाया और वह उस प्रेतात्मा को मेरे सिरहाने छोड़ गया। सुन रही हो, वह प्रेतात्मा क्या कह रही है? वह कह रही है… रुपया तुम्हें खा गया। रुपया तुम्हें खा गया…रुपया तुम्हें खा गया।

शब्दार्थ:

  • सिरहाने – सिर के पास।

प्रसंग:
पूर्ववत। इसमें मानिकचंद के सत्यज्ञान पर प्रकाश डाला गया है। मानिकचंद की धर्मपत्नी ने घबराकर डॉक्टर जयलाल से अपने पति (मानिकचंद) की तबियत के विषय में पूछा तो मानिकचंद ने उसे बड़े प्यार से अपने सत्यज्ञान को बतलाते हुए कहा कि –

व्याख्या:
मेरी प्यारी रानी! तुमने मेरे स्वास्थ्य के बारे में चिन्ता की, इससे मैं बहुत खुश हूँ। लेकिन इस समय मुझे ऐसा आत्मज्ञान हो रहा है, जो मेरे ऊपर छाए हुए असत्य के अन्धकार को हटाकर सत्य का प्रकाश फैला रहा है। किशोरी लाल ने मेरे लिए एक दुखद स्थिति पैदा कर दी है। वह यह कि उसने उसकी प्रेतात्मा को कहीं से पकड़ लिया है। उसने उसे उसके सिरहाने लाकर रख दिया है। वह प्रेतात्मा हमेशा उसे बेचैन किए रहती है। वह हमेशा बड़बड़ाती रहती है। तुम उसे इस प्रकार बड़बड़ाते हुए सुन सकती हो। सुनो, सुनो वह यह कह रही है-“रुपया उसे खा गया। रुपया उसे खा गया। रुपया उसे खा गया।”

विशेष:

  1. रुपया के दुष्प्रभाव को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।
  2. भाषा सरल और सपाट है।
  3. शैली व्यंग्यात्मक है।
  4. 4. यह अंश मर्मस्पर्शी है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न (i)
मानिकचंद पर कौन-सा सत्य प्रकट हुआ?
उत्तर:
मानिकचंद पर रुपया. रूपी प्रेतात्मा का सत्य प्रकट हुआ।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न (i)
‘रुपया तुम्हें खा गया।’ का भावार्थ क्या है?
उत्तर:
‘रुपया तुम्हें खा गया।’ का भाव यह है-धनवान व्यक्ति के अन्दर का मानव पिशाच बन जाता है। फलस्वरूप उसमें ममता नहीं होती है। दया नहीं होती है। प्रेम नहीं होता है। वह तो अपने सुख और आनन्द के लिए किसी की भी बलि चढ़ा देता है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions