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MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा

MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा (एकांकी, जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’)

प्रताप-प्रतिज्ञा पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रताप-प्रतिज्ञा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
महाराणा प्रताप का युद्ध किसके साथ और कहाँ हुआ?
उत्तर:
महाराणा प्रताप का युद्ध मुगल सम्राट अकबर के साथ हल्दी घाटी में हुआ था।

प्रश्न 2.
युद्ध-भूमि में महाराणा प्रताप को किस विकट स्थिति का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
युद्ध-भूमि में महाराणा प्रताप मुगल सेना से चारों ओर से घिर गए। उनके वास्से वे घायल हो गए। उनके शरीर से खून की धारा बहने लगी। तलवार चलाते-चलाते उनके दोनों हाथ थक गए। चेतक घोड़ा मृतप्राय हो गया। फिर भी उन्हें पागलों की तरह लड़ना पड़ा था।

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प्रश्न 3.
चन्द्रावत ने महाराणा को बचाने का क्या उपाय किया?
उत्तर:
चन्द्रावत ने महाराणा को बचाने के लिए उनकी तेजस्वी तलवार अपने हाथ में ले ली। फिर उनसे राजमुकुट लेकर अपने सिर पर धारण कर लिया। चन्द्रावत ने यह उपाय इसलिए किया ताकि अकबर की सेना उसे ही महाराणा प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े और राणा प्रताप युद्ध-भूमि से निकल जाने में सफल हो सकें।

प्रश्न 4.
शक्ति सिंह ने महाराणा प्रताप को मुगल सैनिकों से किस तरह बचाया?
उत्तर:
शक्ति सिंह ने महाराणा प्रताप को मुगल सैनिकों से बड़ी सावधानी से बचाया। उसने महाराणा प्रताप के घातक दोनों मुगल सैनिकों को मार डाला।

प्रताप-प्रतिज्ञा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
महाराणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए
उत्तर:
महाराणा प्रताप की निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताएँ हैं –

  1. जनता के प्रतिनिधि
  2. चित्तौड़ का उद्धारक
  3. संजीवनी शक्तिदाता
  4. प्रजा का विधाता
  5. स्वदेश की आशा
  6. महान वीर
  7. असाधारण योद्धा
  8. स्वाभिमानी और
  9. महान देश-भक्त।

प्रश्न 2.
शक्ति सिंह स्वयं को क्यों धिक्कारता है?
उत्तर:
शक्ति सिंह स्वयं को धिक्कारता है। यह इसलिए कि वह महाराणा प्रताप जैसे असाधारण योद्धा, देशभक्त, स्वाभिमानी और कर्तव्यनिष्ठ का भाई होकर देश का गद्दार है, स्वार्थी और पदलोलुप है।

प्रश्न 3.
महाराणा प्रताप ने चेतक के प्रति अपनी संवेदना किस प्रकार व्यक्त की?
उत्तर:
महराणा प्रताप ने चेतक के प्रति अपनी संवेदना इस प्रकार व्यक्त की-“चेतक! प्यारे चेतक! तुम राह ही में चल बसे। तुम्हारी अकाल मृत्यु देखने के पहले ही ये आँखें क्यों न सदा को मुँद गईं। मेरे प्यारे सुख-दुःख के साथी, तुम्हें छोड़कर मेवाड़ में पैर रखने को जी नहीं करता। शरीर का रोम-रोम घायल हो गया है, प्राण कण्ठ में आ रहे हैं, एक कदम भी चलना दूभर है, फिर भी इच्छा होती है कि तुम्हारे शव के पास दौड़ता हुआ लौट आऊँ, तुमसे लिपटकर जी भरकर रो लूँ और वहीं चट्टानों से सर टकरा-टकराकर प्राण दे दूँ। अपने प्राण देकर प्रताप के प्राण बचाने वाले मूक प्राणी! तुम अपना कर्तव्य पूरा कर गए, पर मैं संसार से मुँह दिखाने योग्य न रहा। हाय, मेरे पापी प्राणों से तुमने किस दुर्दिन में प्रेम करना सीखा था। चेतक, चेतक प्यारे चेतक!

प्रश्न 4.
शक्ति सिंह के स्वभाव में परिवर्तन क्यों आया?
उत्तर:
शक्ति सिंह के स्वभाव में परिवर्तन आया। उसने आँखें खोलकर मेवाड़ के वीरों का बलिदान देखा। उससे समझ लिया कि उसका अहंकार व्यर्थ है। उससे कई गुना वीरता, कई गुनी देशभक्ति और कई गुना त्याग मेवाड़ के एक-एक सैनिक के हृदय में हिलोरें ले रहा है।

प्रश्न 5.
एकांकी के आधार पर सच्चा सैनिक किसे कहेंगे?
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी के आधार पर सच्चा सैनिक हम चन्द्रावत को कहेंगे। ऐसा इसलिए कि उसने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। उसके इस त्याग-समर्पण से देश-भक्ति की सच्ची प्रेरणा मिलती है।

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प्रश्न 6.
प्रताप की बातें शक्ति सिंह को हृदयवेधक क्यों लगीं?
उत्तर:
प्रताप की बातें शक्ति सिंह को हृदयवेधक लगीं। यह इसलिए कि उसने स्वयं को पापी, कायर, पथ के भिखारी, रण से विमुख आदि कहा था।

प्रश्न 8.
एकांकी के विकास-क्रम को समझाते हुए उसकी परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
संस्कृत रूपक के दस भेदों में से पाँच (भाषा, व्यायोग, अंक, वीथी और प्रहसन) एक-एक अंक वाले रूपक हैं। पर संस्कृत के एकांकी रूपक आधुनिक एकांकी की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। शिल्प की दृष्टि से आधुनिक एकांकी पश्चिम की देन है। आधुनिक शैली का प्रथम एकांकी जयशंकर प्रसाद का ‘एक चूंट’ माना जाता है। यद्यपि प्रसाद से पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी विषय विषमौषधम्’, ‘धनंजय विजय’, ‘वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति’, ‘अन्धेर नगरी’ एकांकी लिखे हैं। परन्तु शिल्प की दृष्टि से वे संस्कृत के भाण, वीथी आदि एक अंक वाले रूपकों के अधिक समीप हैं। वर्तमान एकांकी-कला की कसौटी पर वे पूरे नहीं उतर सके। भुवनेश्वर तथा डॉ. रामकुमार वर्मा के एकांकी-क्षेत्र में उतरने से इनका विकास तथा विस्तार हुआ।

हिन्दी में आधुनिक ढंग के पहले एकांकीकार भुवनेश्वर हैं। उनका ‘कारवाँ’ एकांकी संग्रह 1935 में प्रकाशित हुआ। ‘कारवां’ में छः एकांकी हैं। इसका विषय प्रेम का त्रिकोण है। भुवनेश्वर के एकांकी पश्चिम से प्रभावित हैं। बर्नाड शॉ का उन पर प्रभाव है। एकांकीकार अपने एकांकियों में समस्याएँ उठाना जानता है, पर उनका समाधान वह प्रस्तुत नहीं कर सका। भुवनेश्वर में बौद्धिकता की प्रधानता है, भावुकता को वह विष मानते हैं। उनके एकांकियों में यथार्थ के नग्न चित्र हैं।

भुवनेश्वर के बाद हिन्दी एकांकीकारों में डॉ. रामकुमार वर्मा का नाम आता है। उनका पहला एकांकी है-‘बादल की मृत्यु’ इस एकांकी में कल्पना और काव्यमयता की अधिकता है। इसे ‘फेन्टेसी’ कहा जा सकता है। डॉ. वर्मा के एकांकियों की संख्या 100 के लगभग है, जो अलग-अलग एकांकी-संग्रहों में संकलित हैं। ‘पृथ्वीराज की आँखें’, ‘चारुमित्रा’, रेशमी टाई’, ‘सप्तकिरण’, ‘विभूति’, ‘दीपदान’, ‘रूपरंग’, ‘इन्द्रधनुष’, ‘ध्रुवतारिका’ आदि उनके एकांकी-संग्रह हैं। डॉ. वर्मा ने अधिकतर ऐतिहासिक और सामाजिक एकांकी लिखे हैं। ऐतिहासिक एकोकीकार के रूप में वह सबसे बड़े एकांकीकार हैं।

उदयशंकर भट्ट हिन्दी के एकांकीकारों में एकांकी-कला के प्रारम्भिक उन्नायकों में हैं। उनका पहला एकांकी-संग्रह ‘अभिनव एकांकी’ नाम से 1940 में प्रकाशित हुआ। भट्टजी के एकांकी मुख्य रूप से पौराणिक व सामाजिक हैं। ‘कालिदास’ आदि युग के एकांकी पौराणिक हैं तथा ‘स्त्री का हृदय’, ‘समस्या का अन्त’ आदि में सामाजिक एकांकी संगृहीत है। अपने पौराणिक एकांकियों में भट्टजी ने सामयिक समस्याओं की ओर भी संकेत किया है।

सेठ गोविन्ददास ने सामाजिक, राजनीतिक, पौराणिक, ऐतिहासिक आदि सभी प्रकार के एकांकी लिखे हैं। उनके एकांकी-संग्रह हैं- ‘स्पर्धा’, ‘सप्तरश्मि’, ‘एकादशी’, ‘पंचभूत’, ‘अष्टदल’ आदि। शिल्प की दृष्टि से सेठ जी ‘उपक्रम’ और उपसंहार’ आदि अपने एकांकियों में प्रयोग करते हैं। उन्होंने ‘मोनो-ड्रामा’ भी लिखे हैं। ‘चतुरपथ’ में ऐसे एकांकी हैं। ‘शाप और वर’, ‘अलबेला’ इनके प्रसिद्ध (मोनोड्रामा) नाटक हैं।

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के एकांकियों में मध्यवर्गीय समाज की समस्याएँ हैं। ‘लक्ष्मी का स्वागत’, ‘जोंक’, ‘अधिकार का रक्षक’ और ‘तौलिए’ इनके प्रसिद्ध एकांकी हैं। रंगमंच का सान ‘अश्क’ को हिन्दी एकांकीकारों में सबसे अधिक ख्याति प्राप्त है। उनके एकांकी गठन, प्रभाव तीव्रता और प्रवाह की दृष्टि से सफल हैं। विष्णु ‘प्रभाकर’ आधुनिक एकांकीकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। सामाजिक, राजनीतिक, हास्य-व्यंग्य प्रधान तथा मनोवैज्ञानिक सभी प्रकार के एकांकी विष्णु जी ने लिखे हैं, जिनमें ‘माँ’, ‘भाई’, ‘रहमान का बेटा’, ‘नया कश्मीर’, ‘मीना कहाँ है’ आदि प्रसिद्ध हैं।

जगदीश चन्द्र माथुर सामाजिक समस्याओं को लेकर एकांकी कला को सम्पन्न बनाने वाले कलाकार हैं। एकांकी-कला और रंगमंच का अध्ययन उनका गहरा है। ‘भोर का तारा’, ‘रीढ़ की हड्डी’, ‘उनके प्रसिद्ध एकांकी हैं। लक्ष्मीनारायण मिश्र के एकांकियों में बुद्धिवादिता, भारतीय-संस्कृति तथा समस्याएँ इन सभी का समावेश है। हरिकृष्ण प्रेमी के ‘मन-मन्दिर’ संग्रह के एकांकियों में गाँधीवादी आदर्श है। वृन्दावन लाल वर्मा के एकांकियों में यथार्थ और आदर्श का समन्वय है। इनके अतिरिक्त हिन्दी एकांकी कला की विकसित करने वाले रचनाकार हैं-सदगुरुशरण अवस्थी, गोविन्द बल्लभ पन्त, भगवती चरण वर्मा, लक्ष्मी नारायण लाल, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, प्रभाकर माचवे, नरेश मेहता, चिरंजीत आदि। इस प्रकार विकसित होती हुई आज रेडियो-रूपक, फेन्टेसी, मोनोड्रामा आदि रूपों में आगे बढ़ रही है।

एकांकी की परिभाषा:
कुछ आलोचक एकांकी को नाटक का लघु रूप मानते हैं। लेकिन यह बहुत हद तक सही नहीं है। वास्तव में नाटक और एकांकी दो भिन्न गद्य विधाएँ हैं। जिस नाटक की कथावस्तु केवल एक ही अंक में होती है, वह एकांकी नाटक कहलाता है।

प्रताप-प्रतिज्ञा भाव-विस्तार/पल्लवन

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प्रश्न 1.
“भातप्रेम का निर्मल झरना, विद्वेष की शिला से नहीं रुकता।” इस पंक्ति का पल्लवन करें।
उत्तर:
भातृप्रेम का प्रवाह बड़ा ही पवित्र और स्वच्छ होता है। जब वह हृदय के उच्च शिखर से प्रवाहित होता है, तब उसमें बहुत बड़ा वेग होता है। वह वेग बड़ा ही स्वतन्त्र और अद्भुत रूप से आगे बढ़ने लगता है। वह अपने सामने आने वाले किसी विद्वेष रूपी चट्टान को छिन्न-भिन्न करके अपना रास्ता बना लेता है। चूंकि उसमें इतना ओज, उत्साह और प्रबल भाव भरा होता है, उसे किसी प्रकार हीन और तुच्छ भाव रूपी बाधाएँ सेकने में असमर्थ हो जाती हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि भातृप्रेम का निर्मल झरना, विद्वेष की शिला से कभी नहीं रुकता है।

प्रताप-प्रतिज्ञा भाषा – अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
प्राणों की बाजी लगाना, पीठ दिखाना, आँखें फाड़कर देखना; काँटों का ताज पहनना, नजर करना, दो के चार होना।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित सामासिक शब्दों के विग्रह कर समास का नाम लिखिए।
राजमार्ग, राजमुकुट, मुक्तिद्वार, प्रतिहिंसा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा 2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों की सन्धि विच्छेद कीजिए।
आहुति, नराधम, उत्सर्ग, निश्चय, शोकाकुल, स्वाधीनता, रणोन्मत्त, समरांगण।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा 3

प्रश्न 4.
निम्नलिखित विदेशी शब्दों के मानक हिन्दी शब्द लिखिए।
मगरूर, दोजख, यार, कैद, ईनाम, बुजदिल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 प्रताप-प्रतिज्ञा 4

चालान क्र………………. – तृतीय प्रति
(बैंक हेतु)

माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश

यूको बैंक हबीबगंज, भोपाल – शाखा-मधुकुल परिसर
1. संख्या का मान्यता क्रमांक (कोड नं.) ………………………………………………………………………………………………………………………………
संख्या का नाम, स्थान एवं जिला ……………………………………………………………………………………………………………………………………….
………………………………………………………………………………………………………………………………..
2. छात्र का नाम………………………………………….. परीक्षा का नाम ………………………………………….. वर्ग ……………………………………….
अनुक्रमांक …………………………………………………….केन्द्र क्रमांक ……………………………………………………………………………………………..
……………………………………………………………………………………………………………………………….

परीक्षा का नाम – (संबंधित परीक्षा के नाम पर सही का चिह्न लगाएं)

  1. हाईस्कूल/हायर सेकेण्डरी/हा.सं. व्यावसायिक पाठ्यक्रम नियमित/स्वाध्यायी मुख्य पूरक परीक्षा
  2. हाईस्कूल/हायर सेकेण्डरी/पत्राचार पाठ्यक्रम/मुख्य/पूरक परीक्षा
  3. डिप्लोमा इन एजूकेशन (नियमित/पत्राचार, प्रथम/द्वितीय वर्ग) मुख्य/पूरक परीक्षा
  4. पूर्व प्राथमिक प्रशिक्षण नियमित/स्वाध्यायी मुख्य/पूरक परीक्षा
  5. शारीरिक प्रशिक्षण (नियमित/स्वाध्याय) मुख्य/पूरक परीक्षा
  6. अन्य ……………………………………………………………………………………………………………..

शुल्क का विवरण मद विवरण

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छात्रों द्वारा फीस भरने हेतु शीर्ष:
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योग –
राशि शब्दों में ………………………………………………………………………………………………………………………………
(जमाकर्ता के हस्ताक्षर)
………………………………………………………………………………………………………..
(बैंक उपयोग हेतु)
बैंक कोड……………………….. – दिनांक ………………..
माध्यमिक शिक्षा मंडल के खाते में राशि रु ……………. जमा की।

प्रताप-प्रतिज्ञा योग्यता विस्तार – हस्ताक्षर/सील।

प्रश्न 1.
‘प्रताप प्रतिज्ञा’ एकांकी को कहानी रूप में लिखिए?
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 2.
अपने आस-पास के उन वीरों के नामों की सूची बनाइए जिन्होंने देशभक्ति हेतु प्राणोत्सर्ग किया है।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

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प्रश्न 3.
दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले एकांकी/नाटक तथा रेडियो पर प्रसारित रूपक में क्या अन्तर परिलक्षित होता है? दोनों की प्रभावशीलता का विश्लेषण कर अपनी लिखित प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रश्न 4.
चालान फार्म को चार प्रतियों में भरा जाता है यहाँ चालान की तृतीय प्रति (बैंक हेतु) भरने को दी जा रही है। शेष तीन प्रतियाँ किस-किस के लिए होती हैं बैंक जाकर मालूम कीजिए तथा चालान आवेदन-पत्र एकत्रित कीजिए।
चलान फार्म-
उत्तर:
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक की सहायता से हल करें।

प्रताप-प्रतिज्ञा परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रताप-प्रतिज्ञा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ एकांकी में प्रस्तुत पात्रों और गौण पात्रों को बताइए।
उत्तर:
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ एकांकी में प्रस्तुत प्रमुख पात्र हैं-चन्द्रावत, महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह। – गौण पात्र हैं-दो मुगल सरदार।

प्रश्न 2.
चन्द्रावत ने महाराणा प्रताप से क्या माँगा?
उत्तर:
चन्द्रावत महाराणा प्रताप से राजमुकुट और तलवार माँगा।

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प्रश्न 3.
महाराणा प्रताप ने क्या कहकर शक्ति सिंह को क्षमा किया?
उत्तर:
जब शक्ति सिंह ने महाराणा प्रताप से क्षमा माँगी तो प्रताप ने यह कह कर उसे क्षमा कर दिया-“क्षमा! क्षमा कैसी भाई! भ्रातृप्रेम का निर्मल झरना विद्वेष की शिला से नहीं रुक सकता। तुम्हारे एक ‘भैया’ सम्बोधन पर लाखों क्षमा निछावर हैं। भाई पुकारो तो शक्ति, पुकारो तो ‘भैया’, एक बार मुझे फिर प्यार से भैया कहकर पुकारो तो।

प्रताप-प्रतिज्ञा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेवाड़ का सर्वनाश किस प्रकार निकट आ गया था?
उत्तर:
मेवाड़ का सर्वनाश निकट आ गया था। स्वतन्त्र मेवाड़ का सौभाग्य सूर्य अस्त होने लगा था। ऐसा इसलिए कि मुगल सेना मेवाड़ के चारों ओर छा गई थी। बीच में अकेले बलिदानी वीर महाराणा प्रताप प्राणों की बाजी लगाकर दोनों हाथों से तलवार चला रहे थे। वे घायल हो गए थे। उनके शरीर से खून की धारा निकल रही थी। तलवार चलाते-चलाते वे बुरी तरह से थक गए थे। उनका घोड़ा चेतक मृतप्राय हो गया था। हजारों नरमुण्डों से हल्दीघाटी पाट देने पर भी विजय की आशा व्यर्थ हो गई थी।

प्रश्न 2.
चन्द्रावत ने अपनी मातृभूमि मेवाड़ के प्रति अपना सच्चा और पवित्र प्रेमभाव किस प्रकार व्यक्त किया?
उत्तर:
चन्द्रावत ने अपनी मातृभूमि मेवाड़ के प्रति इस प्रकार अपना सच्चा और पवित्र प्रेमभाव व्यक्त किया-“चित्तौड़! जन्मभूमि! प्रणाम! तुम्हारा यह तुच्छ सेवक आज विदा लेता है। माँ, जीते जी तुम्हें स्वतन्त्र न देख सका, अब मरकर देखने की अभिलाषा है। अपने भग्नावशेषों के हाहाकारमय स्वर से एक बार आशीर्वाद दो, माँ हँसते-हँसते मरने की शक्ति प्रदान करो। जीवन के अन्तिम क्षणों में कर्त्तव्य-पालन करने का अवसर दो। जिस राजमुकुट को इन हाथों ने तुम्हारे हित के लिए, विलासी जगमल के सिर से उतारा था, उसी को ये फिर, तुम्हारे ही हित के लिए वीरवर प्रताप के मस्तक से उतारेंगे। तुम्हारे सम्मान की रक्षा के लिए आशालता को कुचलने से बचाने के लिए-आज महाराणा प्रताप के बदले यह चन्द्रावत प्राणों की आहुति देगा।”

प्रश्न 3.
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ एकांकी के मुख्य भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ महान एकांकीकार जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ की एक आदर्शवादी एकांकी है। इसमें महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच हल्दी घाटी के भयंकर युद्ध का उल्लेख किया गया है। इसके लिए एकांकीकार ने चन्द्रावत, महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह इन तीन प्रमुख पुरुष पात्रों का चयन किया है, तो दो मुगल सैनिकों को गौण पुरुष पात्रों के रूप में लिया है। इन पात्रों के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष को मार्मिक रूप में चित्रित करने का सुन्दर प्रयास किया है।

इसमें बाहरी द्वन्द्व को मुख्य स्वर देकर उससे मानसिक विक्षोभ को सामने लाने की पूरी कोशिश की है। हम देखते हैं कि चन्द्रावत का अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देना देश-भक्ति की प्रेरणा देता है। यह भी हम देखते हैं कि महाराणा प्रताप की अटल देश-भक्ति के लिए मरते दम तक वीरतापूर्ण कदम उठाने से शक्तिसिंह की प्रतिशोध की दुर्भावना भातृत्व प्रेम में बदल कर देश-भक्ति का गान।

प्रताप – प्रतिज्ञा लेखक – परिचय

प्रश्न 1.
श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
हिन्दी के एकांकीकारों में श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ का स्थान प्रमुख है। उनका जन्म सन् 1907 ई. में मध्य-प्रदेश के मुरार ग्वालियर में हुआ था। उनकी आरम्भिक शिक्षा स्थानीय विद्यालयों में हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के लिए काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया। वहाँ से आपने साहित्य, इतिहास, राजनीति और अर्थशास्त्र का गहरा अध्ययन-मनन किया।

‘मिलिन्द’ जी ने अपने स्वाध्याय से भी अनेक भाषाओं का अध्ययन-मनन किया। उन्होंने अपने स्वाध्याय से जिन भाषाओं का अध्ययन-मनन किया, उनमें हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी के अतिरिक्त उर्दू, मराठी, बंगला और गुजराती प्रमुख हैं। इन भाषाओं के अध्ययन-मनन के पश्चात उन्होंने विश्वभारती, शान्ति निकेतन और महिला आश्रम, वर्धा में अध्यापन का कार्य किया।

रचनाएँ:
‘मिलिन्द’ जी की रचनाओं में विविधता है। उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं –

  1. काव्य-संग्रह-‘जीवन-संगीत’, ‘नवयुग के गान’, ‘बलिपथ’ के गीत, ‘भूमि की अनुभूति’ और ‘मुक्तिका’।
  2. निबन्ध संग्रह-‘चिन्तन कण’ और ‘सांस्कृतिक प्रश्न’।
  3. व्यंग्य विनोद कथा-संग्रह-‘बिल्लो का नखछेदन’।
  4. नाट्य-कृतियाँ-‘समर्पण’, ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ और ‘गौतम नन्द’।

महत्त्व:
चूंकि ‘मिलिन्द’ जी बहुमुखी प्रतिमा-सम्पन्न साहित्यकार हैं, इसलिए उनका साहित्यिक योगदान उल्लेखनीय है। उनके साहित्य का प्रमुख स्वर देश-भक्ति और देश-प्रेम है। इस दृष्टि से भी आपका स्थान प्रतिष्ठित साहित्यकारों में से एक है। फलस्वरूप आने वाली साहित्यिक अभिरुचि की पीढ़ी आपसे दिशाबोध प्राप्त करती रहेगी।

प्रताप-प्रतिज्ञा पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ लिखित एकांकी ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ लिखित एकांकी ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच हल्दीघाटी युद्ध पर आधारित है। इसमें तीन प्रमुख पात्रों चन्द्रावत, प्रताप और शक्ति सिंह एवं दो गौण पुरुष पात्रों (दो मुगल सरदारों) के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष को चित्रित किया गया है। चन्द्रावत प्रताप सिंह की वीरता का उल्लेख तो कर रहा है, लेकिन उसे मेवाड़ का सौभाग्य सूर्य अस्त होता हुआ दिखाई दे रहा है। उसी समय एक सभासद आकर महाराणा प्रताप के घायल होने का समाचार सुनाता है। चन्द्रावत उसे राजा के साथ मर-मिटने का आदेश देकर चित्तौड़ के प्रति अपनी देश-भक्ति की भावना को प्रकट करता है।

वह उससे आशीर्वाद माँगता है कि वह उसे हँसते-हँसते उसकी सेवा में मर-मिटने की शक्ति प्रदान करे। यह भी कि वह उसे ऐसा साहस दे कि वह महाराणा प्रताप के बदले अपने प्राणों की आहुति दे सके। उसी समय प्रताप आकर अपने प्राणों के बलिदान करने की घोषणा करता है। चन्द्रावत उसे समझाता है कि उसके प्राण इतने सस्ते नहीं हैं। उनमें संजीवनी शक्ति है। वह प्राणों का बलिदान न करें। उसके स्थान पर वह और सरदारों के साथ मर-मिटेगा। प्रताप उसे समझाता है कि वह उसे ऐसा नहीं करने देगा। वह युद्ध में पीठ दिखाकर कलंक का टीका नहीं लगने देगा। चन्द्रावत अपनी बात को दोहराता है कि वह उससे हठ न करें। उसके हठ से अखण्ड मेवाड़ पराधीन हो जाएगा।

लेकिन प्रताप उसकी एक नहीं सुनता है। वह वहाँ से बड़ी तेजी से निकल जाता है। चन्द्रावत ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसको रक्षा करे। शक्ति सिंह आकर घोर युद्ध का उल्लेख करता है कि किस प्रकार से मुगलों ने चन्द्रावत को महाराणा समझकर चारों ओर से घेर लिया है। फिर उसे मार डाला है। उसे स्वयं पर अफसोस है कि वह मेवाड़ के काम नहीं आया। उसी समय दो मुगलों का प्रवेश होता है। दोनों परस्पर बातें करते हैं। फिर प्रताप को मारकर अपने शाहजादा साहब से इनाम लेने की बात करते हुए वहाँ से प्रस्थान करते हैं। उसके बाद शक्ति सिंह आकर स्वयं से कुछ कर गुजरने की बात कहता है।

पट परिवर्तन होता है। प्रताप अकेले शोकाकुल बैठे हैं। चेतक के चले जाने पर अफसोस प्रकट करते हैं। विकल होकर आँखें मूंद लेते हैं। इसके बाद दोनों मुगलों का प्रवेश होता है। दोनों परस्पर बातें करते हैं। दोनों पर प्रताप अपने वार की नाकामी पर अफसोस प्रकट करते हैं। उसी समय शक्ति सिंह आकर उन दोनों का काम तमाम कर देता है। फिर वह प्रताप को ‘महाराणा प्रताप सिंह’ शब्द से सम्मानपूर्वक पुकारता है। प्रताप आँखें खोलते हैं। शक्ति सिंह को देखकर चकित होते हैं। उससे वह पूछते हैं कि क्या वह बदला लेना ही चाहता है, तो ठीक है। आओ, और इस अन्त समय प्यारी मेवाड़ी कटारी भोंक दो। बड़ी शान्ति से मरूँगा, जल्दी करो। देर हो रही है। इसे सुनकर शक्ति सिंह कहता है-बज्रपात है भैया! कौन कहता है प्रताप कायर है। प्रताप तो वीरों का आदर्श है। भारत का अभिमान है। राजस्थान की शान है।

इसे सुनकर प्रताप चकित होता है। शक्ति सिंह अपने दुर्भाग्य पर अफसोस करता है कि वह मेवाड़ को भूलकर भारतीयता को खो बैठा था। उसे अब उसके अपराधों का फल अवश्य मिलना चाहिए। इससे ही उसकी आत्मा को शान्ति मिलेगी। वह उसके लिए देवता है। वह प्रताप को भैया कहते हुए पुनः कहता है-“भैया! क्या तुम मुझे क्षमा न करोगे? मेवाड़ को फिर एक बार बड़े प्यार से माँ कहने का अधिकार न दोगे?” इसे सुनकर प्रताप का भातृप्रेम का झरना फूट पड़ता है। वह कहता है कि उसके ‘भैया’ सम्बोधन पर लाखों क्षमा निछावर हैं। एक बार मुझे फिर प्यार से भैया कहकर पुकारो तो। शक्ति उसके पैरों पर ‘भैया, भैया मेरे’ कहकर गिर पड़ता है। बरसों बाद दोनों गले मिलते हैं।

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प्रताप-प्रतिज्ञा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
आ! काँटों के ताज! संकट के स्नेही! मेवाड़ के राजमुकुट ! आ! तुझे आज एक तुच्छ सैनिक धारण कर रहा है। इसलिए नहीं कि तू वैभव का राजमार्ग है बल्कि इसलिए कि आज तू देश पर मर मिटने वालों का मुक्तिद्वार है। आ! मेरी साधना के अन्तिम साधन! इस अवनत मस्तक को माँ के लिए कट-मरने का गौरव प्रदान कर।

शब्दार्थ:

  • तुच्छ – छोटा।
  • वैभव – सम्पत्ति, धन।
  • राजमार्ग – सड़क।
  • अवनत – झुकाव हुआ।
  • गौरव – मर्यादा, महत्त्व, प्रतिष्ठा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिन्दी समान्य भाग-1’ में संकलित तथा जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ द्वारा लिखित एकांकी ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ शीर्षक से है। इसमें लेखक ने चन्द्रावत् के द्वारा राजमुकुट हाथ में लेते हुए कथन पर प्रकाश डालना चाहा है।

व्याख्या:
लेखक का कहना है कि जब प्रताप कुर्ती से तलवार मुकुट रखकर चला जाता है, तब उसे चन्द्रावत बड़े प्रेम और आदर के साथ हाथ में ले लेता है। फिर वह कहता है–हे राजमुकुट! वैसे तो तुम काँटों के ताज हो, फिर भी संकट के समय एक सच्चे प्रेमी की तरह साथ निभाते हो। वास्तव में तुम मेवाड़ के राजमुकुट हो। इसलिए तुम्हारा महत्त्व असाधारण है। तुम्हें धारण करने की योग्यता मुझ जैसे तुच्छ सैनिक में नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें धारण कर रहा हूँ। मैं तुम्हें इसलिए नहीं धारण कर रहा हूँ कि तुम वैभव का राजमार्ग हैं।

मैं तो तुम्हें इसलिए धारण कर रहा हूँ कि तुम्हीं देश की आन-बान पर अपने प्राणों को न्यौछावर कर देने वालों के लिए मुक्तिदाता स्वरूप हो। इसलिए अब तुम मुझे अपना लो। मेरी युद्ध-साधना के तुम्ही एकमात्र आधार हो। तुम्ही एकमात्रं साधन हो। अब तुम मेरे इस झुके हुए मस्तक को मेरी मातृभूमि मेवाड़ की रक्षा के लिए मर-मिटने का महत्त्व प्रदान कर दो। तुमसे मेरी यही प्रार्थना है और यही उम्मीद है।

विशेष:

  1. मेवाड़ के राजमुकुट का असाधारण महत्त्व बतलाया गया है।
  2. मातृभूमि की महिमा को अधिक सम्मान दिया गया है।
  3. वीर रस की प्रभावशाली धारा प्रवाहित हुई है।
  4. भाषा-शैली में ओज और प्रभाव है।
  5. वर्णनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में किसका कथन किसके प्रति है?
  2. चन्द्रावत के मनोभाव किस प्रकार के हैं?

उत्तर:

  1. प्रस्तुत गद्यांश में मेवाड़ के वीर सैनिक चन्द्रावत का मेवाड़ के राजमुकुट के प्रति है।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रावत के मनोभाव बड़े ही आकर्षक और असाधारण हैं। उसके मनोभाव निरभिमानी, उदात्त, शिष्ट, विनम्र, आत्मीय और पवित्र हैं। इसलिए वे प्रेरक, हृदयस्पर्शी और भाववर्द्धक हैं।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में मेवाड़ के राजमुकुट की कौन-कौन-सी विशेषताएँ बतलायी गई हैं।
  2. प्रस्तुत गद्यांश से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर:

1. प्रस्तुत गद्यांश में मेवाड़ के राजमुकुट की कई आकर्षक विशेषताएँ बतलायी, गई हैं –

  • काँटों का ताज
  • देश पर मर-मिटने वालों का मुक्तिद्वार, और
  • साधना का अन्तिम साधन।

2. प्रस्तुत गद्यांश से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। देश की आजादी के खतरे में पड़ने पर हमें उसकी रक्षा के लिए बिना किसी संकोच के अपने तन, मन और धन को तुरन्त न्यौछावर कर देना चाहिए।

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प्रश्न 2.
तुम्हारी अकाल मृत्यु देखने के पहले ही ये आँखें क्यों न सदा को मुँद गईं। मेरे प्यारे सुख-दुःख के साथी, तुम्हें छोड़कर मेवाड़ में पैर रखने को जी नहीं करता। शरीर का रोम-रोम घायल हो गया है, प्राण कण्ठ में आ रहे हैं, एक कदम भी चलना भर है, फिर भी इच्छा होती है कि तुम्हारे शव के पास दौड़ता हुआ लौट आऊँ, तुमसे लिपटकर जी भरकर रो लूँ और वहीं चट्टानों से सर टकराकर प्राण दे दूँ। अपने प्राण देकर प्रताप के प्राण बचाने वाले मूक प्राणी! तुम अपना कर्त्तव्य पूरा कर गए, पर मैं संसार से मुँह दिखाने योग्य न रहा! हाय, मेरे पापी प्राणों से तुमने किस दुर्दिन में प्रेम करना सीखा था। चेतक, चेतक, प्यारे चेतक! (विकल हाकर आँखें मूंद लेते

शब्दार्थ:

  • अकाल मृत्यु – असमय मृत्यु।
  • मुँद गईं – बन्द हो गईं।
  • जी – मन।
  • रोम-रोम – प्रत्येक अंग।
  • कण्ठ में आना – निकल जाना।
  • दूभर – कठिन।
  • मूक – बेजबान।
  • दुर्दिन – बुरे दिन।

प्रसंग:
पूर्ववत् । इसमें लेखक ने राणा प्रताप के द्वारा अपने प्राणप्रिय चेतक के मर-मिटने पर विलाप किए जाने का उल्लेख किया है।

व्याख्या:
चेतक के मर-मिटने पर राणा प्रताप अपने को असहाय और अकेला समझकर विलाप कर रहा है। वह चेतक को सम्बोधित करते हुए कह रहा है कि तुम्हारे असमय चले जाने पर मेरी आँखें पहले ही क्यों नहीं बन्द हो गईं। अगर वे पहले ही बन्द हो गई होती तो मैं इतना दुःखी और विकल नहीं होता। इसलिए हे मेरे प्राण प्यारे चेतक! तुम्हीं तो मेरे हर दुःख-सुख के साथी और सहभागी थे। अब तुम्हारे सिवा मेरा और कोई नहीं है। इसलिए अब मैं मेवाड़ में नहीं जाना चाहता हूँ। तुम्हारे जाने के बाद मेरा पूरा शरीर थककर चूर हो गया है।

वह किसी प्रकार से कोई भी दुःख सहने योग्य नहीं रह गया है। लगता है कि अब मैं और नहीं जी पाऊँगा। अब तो मैं चलने-फिरने में भी असमर्थ हूँ। ऐसा होने के बावजूद अभी मेरे अन्दर तुम्हारे शव को देखने की ललक है। इसके लिए भीतर-ही-भीतर मेरी इच्छा उमड़ रही है। मेरा जी चाहता है कि तुम्हारे शव से लिपटकर जी भर आँसू बहाऊँ। रो-रोकर अपने पाश्चात्ताप को प्रकट करूँ। यही नहीं, यह भी जी करता है कि अपने सिर को किसी चट्टान से फोड़ डालूँ ताकि कुछ समय तक तो शान्ति मिल सके। प्रताप का पुनः कहना है-हे चेतक! तुमने प्राणों की बलि देकर अपने कर्तव्य को पूरा कर लिया है, लेकिन मैं तो इस संसार में किसी के सामने अपना मुँह दिखलाने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ।

यह इसलिए कि तुमने अपनी वीरता दिखाते हुए सदैव याद करने योग्य मृत्यु को प्राप्त कर लिया है। दूसरी ओर मैं बुजदिल बनकर अपने किए पर लज्जित हूँ। इसलिए अपने को छिपाकर रखना ही एकमात्र विकल्प समझ रहा हूँ। वास्तव में मैं पापी और अधम कोटि का हूँ। फिर भी मुझे यह नहीं समझ में आ रहा है कि तुमने मुझे क्यों महत्त्व दिया। मुझमें तुझे कौन-सी अच्छाई दिखाई दी थी। यह मैं सच्चे मन से कह रहा हूँ। इसे तुम जहाँ भी हो, मेरे प्राण चेतक सुन लो।

विशेष:

  1. प्रताप का अपने प्राण प्यारे चेतक के प्रति अनन्य भाव व्यक्त हुए हैं।
  2. प्रताप का आत्मकथन में सच्चाई और विश्वसनीयता है।
  3. भाव हृदयस्पर्शी है।
  4. भाषा सरल है।
  5. काव्य रस का संचार है।
  6. शैली भावात्मक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में किसका कथन किसके प्रति है और क्यों?
  2. चेतक की विशेषताओं को लिखिए।
  3. प्रस्तुत गद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?

उत्तर:

1. प्रस्तुत गद्यांश में राणा प्रताप का कथन चेतक के प्रति है। यह इसलिए कि चेतक उनका प्राणप्रिय घोड़ा था। उसके समाप्त होने पर राणा प्रताप अपनी व्यथा को प्रकट किए बिना नहीं रह सके थे।

2. चेतक की कई विशेषताएँ थीं, जैसे

  • सुख-दुख का साथी
  • महान वीर
  • देशभक्त और स्वामिभक्त
  • कर्त्तव्यनिष्ठ, और
  • महान प्रेमी व आत्मीय।

3. प्रस्तुत गद्यांश का मुख्य भाव है-राणा प्रताप के प्राणप्रिय घोड़ा चेतक की अच्छाइयों पर प्रकाश डालना।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. मेवाड़ में किसका क्या नहीं करने का जी करता?
  2. चेतक के चले जाने पर राणा प्रताप की दशा कैसी हो गई है?
  3. राणा प्रताप की क्या इच्छा होती है?

उत्तर:

  1. मेवाड़ में राणा प्रताप का पैर रखने को जी नहीं करता।
  2. चेतक के चले जाने पर राणा प्रताप की दशा बड़ी दयनीय और निराशाजनक हो गई है। उनका रोम-रोम घायल हो गया है। उनके प्राण कण्ठ में आ रहे हैं। उन्हें एक कदम चलना कठिन हो गया है।
  3. राणा प्रताप की इच्छा होती है कि वह अपने प्राणप्रिय घोड़े चेतक के शव के पास दौड़ते हुए लौट आवें। उससे लिपटकर जी भरकर आँसू बहाएं। वहीं पर किसी चट्टान से अपने सिर को टक्कर मारकर मर जाएँ।

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प्रश्न 3.
आँखें खोलकर मेवाड़ी वीरों का बलिदान देखने से इस युद्ध ने कान मलकर मुझे बता दिया कि मेरा अहंकार व्यर्थ है। मुझसे कई गुनी वीरता, कई गुनी देशभक्ति और कई गुना त्याग मेवाड़ के एक-एक सैनिक के हृदय में हिलोरें ले रहा है। और आप! आप तो देव हैं भैया। मेवाड़ के सौभाग्य से यहाँ जन्म लेने आए हैं। आपकी यह क्षत-विक्षत देह और प्राणों की ममता छोड़कर भीषण संग्राम। आश्चर्य होता है भैया, और श्रद्धा उमड़ पड़ती थी। इच्छा होती थी कि तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर समरांगण में सदा के लिए वीरों की नींद सोया जाए। भैया, क्या तुम मुझे क्षमा न करोगे? मेवाड़ को फिर एक बार बड़े प्यार से माँ कहने का अधिकार न दोगे? भैया, मुझे क्षमा करो।

शब्दार्थ:

  • बलिदान – त्याग।
  • कान मलकर बताना – बिल्कुल साफ-साफ कहना।
  • अहंकार – घमण्ड।
  • व्यर्थ – बेकार।
  • देव – देवता।
  • क्षत – विक्षत – घायल।
  • देह – शरीर।
  • ममता – लगाव।
  • भीषण – भयंकर।
  • संग्राम – युद्ध।
  • समरांगण – युद्धभूमि।

प्रसंग:
पूर्ववत्। प्रस्तुत गद्यांश में महाराणा प्रताप के शक्ति सिंह के आत्मपश्चात्ताप का उल्लेख किया गया है। शक्ति सिंह घायल राणा प्रताप के सामने आत्मपश्चात्ताप प्रकट करते हुए कह रहा है कि –

व्याख्या:
इस हल्दीघाटी के युद्ध में मुझे यह बड़ा ही स्पष्ट ज्ञान हो गया है कि मेरा घमण्ड निराधार है। मैं कुछ भी नहीं हूँ। मुझसे मेवाड़ का एक-एक सैनिक बहुत बड़ा वीर, देश-भक्त और त्यागी है। मुझमें तो कुछ भी वीरता, देश-भक्ति और प्राणों को न्यौछावर करने की भावना नहीं है, जबकि मेवाड़ के एक-एक सैनिक का हृदय इस प्रकार के पवित्र और महान भावों से भरा हुआ है।

शक्ति सिंह ने राणा प्रताप के प्रति अपने आत्मीय, पवित्र और उच्च भावों को रखते हुए कहा-भैया! आप तो हमारे लिए देवता समान हैं। आपका मेवाड़ में जन्म लेना मेवाड़ के लिए बड़े ही सौभाग्य और गौरव की बात है। जब-जब मैं आपको घायल होते हुए घनघोर युद्ध में अपने प्राणों की तनिक परवाह किए बिना देखता था, तब-तब मुझे घोर आश्चर्य होता। उससे मुझे अपार श्रद्धा की भावना आपके प्रति बढ़ जाती थी। फिर मेरी यही हार्दिक इच्छा होती थी कि काश! आपके चरणों पर अपने सिर को रखकर इस युद्ध-भूमि में एक सच्चे वीर की तरह अपने प्राणों का बलिदान कर दूं। इसलिए अब मुझे एक ही ललक और जिज्ञासा है कि क्या आप मुझे अपनी जन्मभूमि मेवाड़ को. माँ कह लेने को एक बार मौका नहीं देंगे। इसी प्रकार क्या आप मुझे अपना छोटा समझकर मेरी गलतियों को क्षमा नहीं कर देंगे।

विशेष:

  1. शक्ति सिंह का आत्मपश्चात्ताप प्रेरक रूप में है।
  2. देश-भक्ति की प्रबलधारा है।
  3. वीर रस का सुन्दर प्रवाह है।
  4. शैली सुबोध है।
  5. वाक्य-गठन भाववर्द्धक रूप में है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ-ग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न.

  1. प्रस्तुत गद्यांश में किसका कथन किसके प्रति ही?
  2. प्रस्तुत गद्यांश के मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
  3. शक्ति के कथन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर:

  1. प्रस्तुत गद्यांश में शक्ति सिंह का कथन राणा प्रताप के प्रति है।
  2. प्रस्तुत गद्यांश का मुख्य भाव है-शक्ति सिंह का राणा प्रताप के प्रति भातृत्व प्रेम को प्रकट करना।
  3. शक्ति सिंह के कथन का मुख्य उद्देश्य यही है कि राणा प्रताप उसे अपने भाई के रूप में पहले की तरह अपनाकर उसकी गलतियों को क्षमा कर दें।

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