MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार (कविता, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’)

जागो फिर एक बार पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

जागो फिर एक बार लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सवा-सवा लाख पर’ एक को चढ़ाने की घोषणा किसने की थी?
उत्तर:
सवा-सवा लाख पर एक चढ़ाने की घोषणा गुरु गोविन्द सिंह ने की थी।

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प्रश्न 2.
गीता की उक्ति क्या है?
उत्तर:
गीता की उक्ति है कि इस संसार में योग्य व्यक्ति ही जीता है।

प्रश्न 3.
‘ताप-त्रय’. कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
दैहिक, दैविक और भौतिक ताप-त्रय हैं।

प्रश्न 4.
‘सिंधु-नद-तीरवासी’ किसे कहा गया है?
उत्तर:
भारतवासियों को सिंधु-नद-तीरवासी कहा गया है।

जागो फिर एक बार दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेषमाता तप्त आँसू क्यों बहाती है?
उत्तर:
मेषमाता निर्बल होती है। उसकी संतान जब उससे छीनी जाती है, तो वह चुपचाप देखती रह जाती है इस प्रकार वह अपने जन्म पर दुखी होकर अपने तप्त आँसू बहाती है।

प्रश्न 2.
ऋषियों का महामंत्र क्या है?
उत्तर:
ऋषियों का महामंत्र है कि तुम महान् हो, तुम सदा से महान् हो। यह शरीर नाशवान है और इसके साथ ही यह हीनता दिखाना, कायरतापूर्ण व्यवहार करना तथा काम भावना में प्रवृत्तं रहना आदि भी स्थायी नहीं हैं बल्कि शीघ्र ही नष्ट होने वाले हैं। तुम ब्रह्म हो और सारा संसार तुम्हारे चरणों की धूल के बराबर नहीं है। अतः तुम उठो और अपनी शक्ति पहचानो तथा उसके अनुरूप कार्य करो।

प्रश्न 3.
कवि ‘जागो फिर एक बार’ में क्या उद्बोधन देता है? (M.P. 2012)
उत्तर:
कवि ने ‘जागो फिर एक बार’ कविता में भारतीयों को उद्बोधन दिया है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के महासंग्राम में योद्धा की तरह संघर्ष करो। अपनी वीस्वती परंपरा को अक्षुण्ण रखने वाले भारतीय व्यक्ति को अपनी संपूर्ण कायरता को त्यागकर अपने पराक्रमी और पुरुषार्थी स्वरूप को जागृत करो। अपनी दासता के संपूर्ण बंधनों को तोड़ने के लिए उसे जागृत करना आवश्यक है।

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प्रश्न 4.
शिशु के छिनने पर सिंही और मेषमाता के व्यवहार में क्या अंतर है? (M.P. 2010)
उत्तर:
यदि सिंहनी की गोद से कोई उसका शिशु छीनने का प्रयत्न करे, तो वहचुप नहीं रहती। वह इतने जोर से दहाड़ती है कि उसके बच्चे को भयभीत होकर छोड़कर भाग जाता है। दूसरी ओर मेषमाता अपने बच्चे को छीनने वाले को चुपचाप देखती रहती है, क्योंकि वह कमजोर है। इसलिए अपने जन्म पर दुखी होकर आँसू बहाती रह जाती है। इसके विपरीत सिंहनी अपने शिशु की रक्षा के लिए उग्र रूप धारण कर लेती है जबकि मेषमाता अपने बच्चे की रक्षा के लिए कोई भी प्रयास नहीं करती।

जागो फिर एक बार भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-विस्तार कीजिए –

  1. हे नश्वर यह दीन भाव-कायरता, कामपरता।
  2. अभय हो गए हो तुम मृत्युंजय व्योमकेश के समान अमृत संतान।

उत्तर:

1. यह मानव शरीर नाशवान है और इसके साथ ही यह दीनता दिखाना, कायरतापूर्ण व्यवहार करना तथा कामभावना में प्रवृत्त रहना आदि भावनाएँ भी नश्वर हैं। जब शरीर ही नष्ट होने वाला है तो ये भाव भी स्थायी नहीं हैं। बल्कि ये भी शीघ्र नष्ट होने वाले हैं। इसलिए अपनी शक्ति को पहचानकर, उसी के अनुरूप कार्य करो।

2. तीनों प्रकार के गुण सत, रज और तम तथा तीन प्रकार के ताप दैविक, भौतिक तथा आध्यात्मिक अग्नि में जलकर भस्म हो गए थे। हे भारतवासियो! ऐसी स्थिति तुम मृत्यु को जीतने वाले भगवान शिव के समान निडर हो गए थे। तुम्हें मृत्यु का भय नहीं रहा था। अभयदान मिल जाने से तुम अमर हो गए थे।

जागो फिर एक बार भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
‘शप्त-सप्त’ समोच्चारित शब्द-युग्म है। इसी प्रकार के पाँच शब्द-युग्म लिखिए।
उत्तर:

  • अनल – अनिल
  • गुप्त – सुप्त
  • दिन – दीन
  • सुत – सूत
  • कूल – कुल।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह कर उनके नाम लिखिए –
मरणलोक, महासिंधु, तीरवासी, मेषमाता, सप्तावरण।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अनेकार्थी शब्द हैं। प्रत्येक के ऐसे दो-दो वाक्य बनाइए जिससे उनके भिन्न अर्थ स्पष्ट हों –
सैंधव, काल, गुण, पद।
उत्तर:
सैंधव:

  1. सैंधव की थाह कोई नहीं पा सकता।
  2. महाभारत काल में सैंधव नरेश जयद्रथ था।

काल:

  1. विकराल काल से कोई नहीं बच सकता।
  2. संध्या काल पक्षी घर लौट रहे हैं।

गुण:

  1. काव्य के भी गुण-दोष होते हैं।
  2. गुणी का सब जगह आदर होता है।

पद:

  1. मुझे अध्यक्ष का पद मिल गया है।
  2. इस पद की रचना कबीर ने की है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित पारिभाषिक शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
सच्चिदानंद, परमाणु, सहस्रार, माया।
उत्तर:

  • सच्चिदानंद – ईश्वर का दूसरा नाम ही सच्चिदानंद है।
  • परमाणु – आज सभी राष्ट्र परमाणु शक्ति सम्पन्न बनना चाहते हैं।
  • सहस्रार – भक्ति का अंतिम पड़ाव सहस्रार है।
  • माया – माया ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है।

जागो फिर एक बार योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
वीररस के कवियों की रचनाओं का संग्रह करें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
वार्षिक उत्सव में वीररस के कवियों के प्रतिरूप धारण कर कवि सम्मेलन आयोजित करें।
उत्तर:
छात्र अपने भाषाध्यापक की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 3.
निकटवर्ती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से भेंट कर उनसे स्वतंत्रता संग्राम के अनुभवों को सुनिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

जागो फिर एक बार परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘जागो फिर एक बार’ कविता में ……… का भाव निहित है। (M.P. 2012)
(क) राष्ट्रीय नवजागरण
(ख) राष्ट्रीय एकता
(ग) राष्ट्रीय भाषा
(घ) राष्ट्रीय भक्ति
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय नवजागरण।

प्रश्न 2.
‘जागो फिर एक बार’ कविता ……… के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर सजितं है।
(क) सामाजिक समता प्राप्ति
(ख) स्वतंत्रता प्राप्ति
(ग) आर्थिक मुक्ति प्राप्ति
(घ) अंग्रेज भगाओ
उत्तर:
(ख) स्वतंत्रता प्राप्ति।

प्रश्न 3.
गुरु गोविंद सिंह ……. के गुरु थे।
(क) ईसाइयों
(ख) जैनों
(ग) सिखों
(घ) बौद्धों
उत्तर:
(ग) सिखों।

प्रश्न 4.
भारतीयों को किसका रूप माना गया है?
(क) शिव का
(ख) ब्रह्मा का
(ग) इन्द्र का
(घ) विष्णु का
उत्तर:
(ख) ब्रह्मा का।

प्रश्न 5.
‘सत्श्री अकाल’ किस धर्म से संबंधित है?
(क) सिख धर्म से
(ख) इस्लाम धर्म से
(ग) मानव धर्म से
(घ) सनातन धर्म से
उत्तर:
(क) सिख धर्म से।

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प्रश्न 6.
“तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्” यह भारतीयों में किसका ड्का महामंत्र है?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) ऋषियों
(ग) गुरु गोविंद सिंह
(घ) स्वापी दयानंद
उत्तर:
(ख) ऋषियों।

प्रश्न 7.
“मृत्युंजय व्योमवेश के समान’ में ‘मृत्युंजय’ किसे कहा गया है?
(क) भगवान शिव को
(ख) भगवान श्रीकृष्ण को
(ग) भगवान विष्णु को
(घ) रावण को
उत्तर:
(क) भगवान शिव को।

प्रश्न 8.
तीन ताप कौन-कौन से हैं?
(क) दैहिक, दैविक और भौतिक
(ख) लौकिक, अलौकिक और आध्यात्मिक
(ग) समुद्री, आकाशीय और स्थलीय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) दैहिक, दैविक और भौतिक।

प्रश्न 9.
‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता हैं – (M.P. 2010)
(क) श्री सुमित्रानंदन पंत
(ख) श्री सूर्यकांत त्रिपाठी
(ग) बालकवि बैरागी’
(घ) श्री जयशंकर प्रसाद’
उत्तर:
(ख) श्री सूर्यकांत त्रिपाठी

प्रश्न 10.
“सवा लाख पर एक को चढ़ाऊँगा।” की घोषणा की थी –
(क) ऋषियों ने
(ख) सिन्धु-नद-तीरवासी ने
(ग) गुरु गोविन्द सिंह ने
(घ) सत्श्री अकाल ने
उत्तर:
(ग) गुरु गोविन्द सिंह ने।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पर कीजिए –

  1. ‘समन्वय’ पत्रिका का सम्पादन ………. के द्वारा किया गया। (महावीर प्रसाद द्विवेदी ‘निराला’)
  2. ‘निराला’ स्वच्छंदतावादी काव्य-संसार के ………. कवि रहे। (सर्वोत्कृष्ट श्रेष्ठ)
  3. ‘जागो फिर एक बार’. ………. प्रधान कविता है। (सामाजिक चेतना, राष्ट्रीय चेतना)
  4. ‘जागो फिर एक बार’ कविता ………. छन्द में है। (मुक्तक/मात्रिक)
  5. ‘योग्य जन जीता है’ उक्ति है ………. । (पश्चिम की गीता की)

उत्तर:

  1. ‘निराला’
  2. सर्वोत्कृष्ट
  3. राष्ट्रीय चेतना
  4. मुक्तकं
  5. गीता की।

III. निम्नलिखित कथनों में सत्य/असत्य छाँटिए –

  1. कवि ने भारतीयों को शेर और अंग्रेजों को सियार कहा है।
  2. ‘योग्य जन जीता है’ यह उक्ति पश्चिमी है।
  3. गुरु गोविन्द सिंह ईसाइयों के गुरु थे।
  4. ‘सत् श्री अकाल’ सिख धर्म से संबंधित है।
  5. ‘मृत्युंजय व्योमकोश के समान’ में मृत्युंजय भगवान विष्णु को कहा गया है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. असत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार img-2
उत्तर:

(i) (ङ)
(ii) (ग)
(iii) (घ)
(iv) (ख)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
‘तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्’ किसका महामंत्र है?
उत्तर:
ऋषियों का।

प्रश्न 2.
अपना बच्चा छिनता देख सिंहनी क्या करती है?
उत्तर:
सिंहनी अपनी गोद से बच्चा छीनने पर भयंकर दहाड़ करती हुई खाने के लिए दौड़ने लगती है।

प्रश्न 3.
दीन भाव क्या है?
उत्तर:
कायरता और कामपरता।

प्रश्न 4.
तीन गुण कौन-कौन हैं?
उत्तर:
सत्व, रज और तम।

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प्रश्न 5.
तीन ताप कौन-कौन हैं?
उत्तर:
दैविक, दैहिक और भौतिक।

जागो फिर एक बार लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

प्रश्न 2.
‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि किसे जगा रहा है?
उत्तर:
इस कविता में कवि भारतीयों को जगा रहा है।

प्रश्न 3.
‘शेरों की माँद में आया है आज स्यार’ इसमें ‘स्यार’ किसे कहा गयाहै।
उत्तर:
इसमें ‘स्यार’ अंग्रेजों को कहा गया है।

प्रश्न 4.
भारतीयों को पशु तुल्य क्यों कहा गया है?
उत्तर:
यदि भारतीय कृतज्ञ होकर अपने देश को दासता से मुक्ति नहीं दिला सके, तो पशु तुल्य हैं।

प्रश्न 5.
‘जागो फिर एक बार’ कविता में क्या दिया है?
उत्तर:
‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि ने भारतीयों को जागरथ का संदेश दिया है।

प्रश्न 6.
भारत देश की क्या परम्परा रही है?
उत्तर:
भारत देश की परम्परा वीरों की रही है।

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प्रश्न 7.
गुरु गोविन्द सिंह ने क्या कहा था?
उत्तर:
गुरु गोविन्द सिंह ने कहा था –
“सवा-सवा लाख पर
एक को चढ़ाऊँगा,
गोविन्द सिंह निज
नाम तब कहाऊँगा।’

जागो फिर एक बार दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गुरु गोविन्द सिंह ने ‘सवा लाख पर एक चढ़ाऊँगा’ की घोषणा क्यों की थी?
उत्तर:
गुरु गोविन्द सिंह ने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए यह घोषणा की थी कि उसका एक-एक वीर सिपाही शत्रु की सेना के सवा लाख सिपाहियों के बराबर है। यदि वह रणभूमि में मरा तो शत्रुओं की सेना के सवा लाख सिपाहियों को ही मारकर मरेगा। इस नारे से सेना के सिपाही का उत्साह बढ़ता था और वह स्वयं को अजेय समझने लगता था।

प्रश्न 2.
उत्सर्ग की किस परंपरा का उल्लेख किया है?
उत्तर:
कवि ने उत्सर्ग की उस परंपरा का उल्लेख किया है, जिसमें युद्ध के फाग में खून की होली खेलते हुए अनेक वीरों ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दियाथा।

प्रश्न 3.
कवि भारतीयों को क्यों जागत करना चाहता है?
उत्तर:
इस कविता में कवि भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्ति के महासंग्राम में एक योद्धा की तरह भाग लेने के लिए जागृत करना चाहता है।

प्रश्न 4.
कवि ने बलिदान की किस परम्परा का उल्लेख किया है?
उत्तर:
कवि ने बलिदान की उस परम्परा का उल्लेख किया है जिसमें युद्ध के फाग में रंगे रंग की तरह मानकर अनेक भारतीय वीरों ने अपने प्राणों को न्योछावर कर दिए। युद्ध-भूमि में अपने प्राणों का बलिदान करने वाले इन धीरों ने परमपद प्राप्त करके मृत्यु पर मानो विजय प्राप्त कर ली।

प्रश्न 5.
अपनी महान् और वीरतापूर्ण परम्परा को हमेशा बनाए रखने के लिए कवि ने क्या सुझाव दिए हैं?
उत्तर:
अपनी महान् और वीरतापूर्ण परम्परा को हमेशा बनाए रखने के लिए कवि ने ये सुझाव दिए हैं कि हमें अपनी सारी कायरता को भूल जाना चाहिए। अपने पुरुषार्थ और पराक्रम को जगाना चाहिए। अपनी गुलामी के बंधनों को त्यागने के लिए जागना होगा। हमें अपने ऋषियों द्वारा दिए गए महामंत्र ‘तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्’ को हमेशा याद रखना चाहिए।

जागो फिर एक बार कवि-परिचय

प्रश्न 1.
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं का परिचय दीजिए।
उत्तर:
छायावादी कविता के चार स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल प्रांत के अंतर्गत महिपादल के मेदिनीपुर जिले में 1896 ई० में वसंत पंचमी के दिन हुआ था। इनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला स्थान के रहने वाले थे। इनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी नौकरी के सिलसिले में बंगाल के महिषादल राज्य में रहने लगे थे। उनके बंगाल में रहने के कारण ‘निराला’ जी की शिक्षा-दीक्षा वहीं पर हुई। इसीलिए इनका आरंभ में बंगला भाषा और साहित्य से परिचय हो गया। बाद में इन्होंने हिंदी तथा संस्कृत का अध्ययन घर पर रहकर ही किया। इनकी नियमित शिक्षा नौवीं कक्षा से आगे न हो सकी।

प्रकृति प्रेम तथा एकांत में पत्र-पत्रिकाओं के पठन-पाठन से आपकी रुचि साहित्य की ओर बढ़ती गई। युवावस्था में प्रवेश करते-करते इन पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। पहले माँ की मृत्यु हुई। फिर पिताजी की। इसके पश्चात् फ्लू के रोग में परिवार के अन्य प्राणी भी चल बसे। इन घटनाओं से कवि का संवेदनशील मन कराह उठा। आर्थिक अभाव और उदारवादी वृत्ति के कारण इनको जीवन की कठोर विषमताओं से सदैव जूझना पड़ा। इन दैवी और आर्थिक आपदाओं ने इनको दार्शनिक बना दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानन्द के साहित्य और दर्शन का आप पर गहरा प्रभाव पड़ा।

पिता की मृत्यु के बाद इनको पिता के स्थान पर नौकरी मिल गई थी, किंतु ये वहाँ अधिक समय तक न रह सके। कोलकाता से प्रकाशित होने वाले ‘मतवाला’ तथा पत्रिकाओं का उन्होंने सम्पादन किया। कुछ दिन ‘सुधा’ पत्रिका का भी सम्पादन किया। जीवन के अंतिम समय में ये अर्द्धविक्षिप्त हो गए। इसी अवस्था में 15 अक्टूबर, 1961 ई० को इनका देहावसान हुआ।

साहित्यिक विशेषताएँ:
‘निराला’ के काव्य में छायावादी, प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी काव्य प्रवृत्तियों का संगम हुआ है। ‘निराला’ की अनामिका, परिमल, गीतिका तथा तुलसीदास आदि छायावादी रचनाएँ हैं। परिमल, बेला और नए पत्ते इनकी प्रगतिवादी रचनाएँ मानी जाती हैं। ‘अणिमा’ काव्य को विद्वान दार्शनिक रचनाओं में सम्मिलित करते हैं। इनकी रचना ‘तुलसीदास’ प्रबंधात्मक रचना है। इसमें महाकवि तुलसीदास.. के मनोविकास को दर्शाया गया है। ‘राम की शक्ति पूजा’ करुणा की पृष्ठभूमि पर आधारित शृंगार, वात्सल्य और व्यंग्य को समेटे हुए हैं। ‘सरोज-स्मृति’ हिंदी साहित्य का प्रसिद्ध शोकगीत है।

रचनाएँ:
प्रबंधात्मक काव्य-राम की शक्ति पूजा, सरोज-स्मृति और तुलसीदास।

काव्य:
परिमल, गीतिका, अनामिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, . आराधना, गीतगुंज और सांध्यकली।

उपन्यास:
अप्सरा, अलका, निरुपमा, प्रभावती, चोरी की पकड़, काले कारनामे। कहानी-लिली, सखी, सुकुल की बीवी, देवी। रेखाचित्र-कुल्ली भाट, विल्लेसुर बकरिहा, चतुरी चमार।

आलोचना:
प्रबंध-पादप, प्रबंध प्रतिमा, संचय और चाबुक।

निरालाजी के काव्य की भाषा, भाव और छंद में नवीनता के कारण अद्वितीय बन गयी है। इनमें खड़ी बोली के साथ-साथ उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है पर ये प्रयोग कहीं भी खटकते नहीं। ‘निराला’ हिंदी कविता में मुक्त छंद के प्रवर्तक रहे। इनकी विशेषता लयात्मकता के कारण मात्रा, वर्गों में तालमेल के कारण बढ़ गई है। इनके काव्य में पारंपरिक अलंकारों के साथ-साथ छायावादी मानवीकरण तथा विशेषण विपर्यय जैसे अलंकारों का प्रयोग भी मिलता है। .

महत्त्व:
‘निराला’ आधुनिक हिंदी के उन महान् कवियों में से एक हैं, जिन्होंने रूढ़ियों को विध्वंस किया, किंतु भाव, भाषा और छंद को एक नया आयाम प्रदान कर हिंदी कविता का उत्कर्ष किया। ‘निराला’ जी छायावादी कविता के प्रवर्तकों में से एक हैं। स्वच्छंदतावादी काव्य जगत् के भी वे सर्वोत्कृष्ट कवि हैं।

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जागो फिर एक बार पाठ का सारांश

प्रश्न 2.
‘जागो फिर एक बार’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि ने भारत के अतीत का गौरवमय चित्रण किया है। इसी संदर्भ में वह भारतीयों को जागरण का संदेशा दे रहे हैं। भारतीयों ने अतीत काल में युद्ध में मरकर स्वर्ग जाने का लक्ष्य बना रखा था यही उनके जीवन का आदर्श था। उनके इस आदर्श के कारण महासागर से लेकर सिंधु नदी के वासियों ने उनकी प्रशंसा के गीत गाए हैं। गुरु गोविन्द सिंह ने भी कहा कि सवा-सवा लाख शत्रओं को मारकर जब उनका एक सिपाही या योद्धा मरेगा। तभी वह अपना नाम गोविन्द सिंह कहलाना चाहेंगे।

वीरों के मन को मोहित कर लेने वाला यह गीत योद्धाओं को रणभूमि में अजेय बना देता था। आज शेरों! (भारतीयों) की माँद में पुनः सियार (अंग्रेज) घुस आए हैं। इसलिए शेरों जागो और इनको अपनी माँद में से बाहर धकेलो। गुरु गोविंद सिंह जब रणभूमि में सत श्री अकाल का उच्चारण करते हुए पहुँचते थे, तो उनका चेहरा तमतमा जाता था और उससे आग-सी निकला करती थी। इस आग में तीन काल (भूत, भविष्य, वर्तमान), तीनों गुण (सत्, रज, तम) तथा तीनों ताप (दैविक, भौतिक तथा आध्यात्मिक) जलकर भस्म हो जाते थे। ऐसी दशा में तुम शिव के समान मृत्यु को जीतने वाले हो गए।

तुम उस परम योगी के समान हो गए, जो सातों आवरण भेदकर उस स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ. ब्रह्मस्थल है। अरे तुम जागो, तुम वीर हो। भला कोई सिंहनी की गोद से उसका शिशु भी छीन ले और वह चुपचाप देखती रहेगी। ऐसा कभी नहीं हुआ। केवल भेड़ की माता ही अपने शिशु को छिनता हुआ देखती है और अपने जन्म पर आँसू बहाती रह जाती है। इस संसार में जो योग्य जन होता है वही जीता है। यही हमारे यहाँ की गीता का उपदेश है। इस उपदेश को याद करो और एक बार जाग जाओ। अरे तुम पशु नहीं हो, बल्कि वीर योद्धा हो।

यह ठीक है कि तुम कालचक्र में दबे हुए योद्धा के समान हो। पर क्या यह सब माया है। तुम मुक्त छंद की भाँति हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो और आनंद में डूबे हुए ईश्वर का रूप हो। महाऋषियों ने अणुओं और परमाणुओं में सदा यही मंत्र फूंका है कि तुम महान् हो। यह दीनता, कायरता और भोग-विलास की भावना को नष्ट कर दो। अरे तुम ब्रह्म हो। यह सारा संसार तुम्हारे चरणों की धूलि की बराबरी करने योग्य भी नहीं है इसलिए तुम जागो और अपने को पहचानो।

जागो फिर एक बार संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
जागो फिर एक बार!
समर में अमर कर प्राण,
गान गाए महासिंधु से
सिंधु-नद-तीरवासी!
सैन्धव तुरंगों पर
चतुरंग चमू संग,
सवा-सवा लाख पर
एकको चढ़ाऊँगा,
गोविन्दसिंह निज
नाम जब कहाऊँगा।” (Pages 40-41)

शब्दार्थ:

  • समर – युद्ध।
  • सैंधव – सिंधु (समुद्र) संबंधी
  • चतुरंग – चार तरह की।
  • चमू – सेना।
  • महासिंधु – महासागर।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से ली गई हैं। यहाँ कवि ने गुरु गोविन्द सिंह का गुणगान करते हुए भारतवासियों को उद्दीप्त किया है कि वे भी अपने आलस्य भाव को छोड़कर शत्रुओं से भिड़ जाएँ और देश को स्वतंत्र कराएँ।

व्याख्या:
कवि कहता है कि हे भारतवासियो! तुम एक बार फिर जागो। इस देश के वीरों की परम्परा रही है कि युद्ध में शत्रुओं से लड़ते-लड़ते मर जाने पर वीर के प्राण अमर हो जाते हैं। सिंधु प्रांत के घोड़ों पर चढ़कर अपने साथ चतुरंगी सेना-अर्थात् अश्व सेना, गजसेना, रथसेना तथा पैदल सिपाही-के साथ जब वीर युद्ध में जाते थे तो सिंधु नदी के तटवासी और महासागर भी उनका गुणगान गाते थे।

याद करो गुरु गोविन्द सिंहजी जैसे वीर पुरुष ने कहा था कि जब शत्रुओं पर आक्रमण करूँगा तो सवा-सवा लाख शत्रुओं को मारकर ही अपने एक सिपाही को चढ़ाऊँगा। ऐसा होने पर ही मैं अपना नाम गोविंद सिंह कहलाऊँगा। भव यह है कि मेरी सेना का एक-एक वीर सिपाही शत्रु की सेना के सवा लाख सिपाहियों के लिए काफी है। यदि वह रणभूमि में मरा, तो शत्रुओं की सवा लाख सेना का सफाया करके ही मरेगा।

विशेष:

  1. यहाँ गुरु गोविन्द सिंह की सेना की वीरता का वर्णन किया है। गुरु गोविन्द सिंह अपनी सेना का मनोबल किस प्रकार बढ़ाया करते थे, कवि ने उस नारे का उल्लेख किया है।
  2. इसमें वीररस है।
  3. इसकी भाषा में ओजगुण है।
  4. इसमें अनुप्रास तथा पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार हैं।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्त संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
कवि ने भारतीयों को किस प्रकार उदबोधित किया है?
उत्तर:
कवि ने गुरु गोविन्द सिंह का गुणगान करते हुए भारतीयों को उद्बोधित किया है कि वे आलस्य भाव को छोड़कर देश को स्वतंत्र कराने के लिए शत्रुओं से भिड़ जाएँ।

प्रश्न (ii)
गुरु गोविंद सिंह ने क्या नारा लगाया था?
उत्तर:
गुरु गोविन्द सिंह ने नारा लगाया था कि सवा-सवा लाख पर एक को . चढ़ाऊँगा; अर्थात् उन्होंने कहा था कि उनकी सेना का एक-एक सिपाही शत्रु की सेना के संवा लाख सिपाहिया के बराध है। वह शत्रुओं की सेना के सिपाहियों को मारकर ही मरेगा। “सवा लाख से एक लड़ाऊँ तब गोविन्द सिंह नाम कहाऊँ।”

प्रश्न (iii)
किन लोगों की वीरता का गुणगान आज तक किया जाता है?
उत्तर:
सिन्धु नदी के किनारे रहने वाले लोगों की वीरता का गुणगान आज तक किया जाता है।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
कवि ने गुरु गोविन्द सिंह का गुणगान करते हुए भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए तैयार होने के लिए उद्बोधित किया है। देश की परंपरा का उल्लेख करके भारतीयों को जगाने का प्रयास किया है। गोविन्द सिंह अपनी सेना का मनोबल किस प्रकार बढ़ाया करते थे, कवि ने उनके उस नारे का भी उल्लेख किया है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
कवि ने भारत के अतीत का गौरवमय चित्रण किया है। वह भारतीयों को जागरण का संदेशा दे रहे हैं। ‘गान गाए’, ‘चतुरंग चमू’ में अनुप्रास अलंकार है। सवा-सवा में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। भाषा ओजगुण संपन्न और तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। काव्यांश में वीररस है।

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प्रश्न 2.
किसने सुनाया यह
वीर-जन-मोहन अति
मोदन अति दुर्जय संग्राम-राग,
फागका खेला रण
बारहों महीनों में?
शेरों की माँद में
आया है आज स्यार
जागो फिर एक बार! (Page 41)

शब्दार्थ:

  • वीर-जन-मोहन – वीरों को मोहित करना।
  • दुर्जय – जिसे जीतना कठिन है।
  • संग्राम राग – युद्ध का गीत।
  • फाग – होली।
  • माँद – घर।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से उद्धृत है। भारतवासियों को उद्बोधित करते हुए कवि उन्हें अतीत काल के वीरों की शौर्य गाथा को सुना रहा है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि वीर जनों को मोहित कर लेने वाला यह राग किसने सुनाया अर्थात् ‘सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊँगा’ का नारा गोविन्द सिंह का दिया हुआ है जिसे सुनकर वीर उत्साह में झूम उठते थे। वे वीर रणभूमि में इस राग में झूमते हुए दुर्जय हो जाते थे; अर्थात् शत्रु उन पर विजय नहीं पा सकते थे। गुरु गोविन्द सिंह एवं उनके योद्धा इस प्रकार बारह महीने रणभूमि में खून की होली खेला करते थे। गुरु गोविन्द सिंह की परम्परा वाले शेर आज भी हैं, किन्तु आज शेरों की माँद में स्यार (अंग्रेज) घुस आया है। इस स्यार को मारने के लिए हे भारतीय वीरो! तुम जाओ और शत्रु का सफाया करो।

विशेष:

  1. यहाँ पर कवि ने भारतीयों में रणोन्माद भरने की चेष्टा की है, ताकि ये अंग्रेजों के खिलाफ जमकर युद्ध कर सकें।
  2. इसमें अनुप्रास अलंकार है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
वीरजनों को मोहित करने वाले किस राग की ओर कवि का संकेत है?
उत्तर:
वीरजनों को मोहित करने वाले उस राग की ओर कवि का संकेत है जिसे गुरु गोविन्द सिंह ने सुनाया कि ‘सवा लाख पर एक को चढ़ाऊँ’ इसे सुनकर वीर उत्साह में झूम उठते थे।

प्रश्न (ii)
कवि ने किसे शेर और स्यार कहा है?
उत्तर:
कवि ने भारतीयों को शेर और अंग्रेजों को सियार कहा है। इन सियारों को मार भगाने के लिए भारतीय शेरो! तुम जागो और शत्रु का सफाया कर दो।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
कवि भारतीयों को उद्बोधित करने के लिए अतीतकाल के वीरों की वीरता का गुणगान कर रहा है। वह कहता है कि गुरु गोविन्द सिंह बारह महीने रणभूमि में खून की होली खेलते थे। भारतीय वीरो! उनसे प्रेरणा लेकर शत्रुओं को मार भगाओ। स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जाग उठो।

प्रश्न (ii)
प्रस्तुत काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने भारतीयों में रणोन्माद भरने की चेष्टा की है ताकि वे स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध कर सकें। ‘माँद में’ अनुप्रास अलंकार है। भाषा ओजस्वी तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। वीर रस है। शेर भारतीयों का, माँद भारत का और स्यार अंग्रेजों का प्रतीक है। छंदयुक्त कविता में लय-तुक नहीं है।

प्रश्न 3.
सत् श्री अकाल,
भाल-अनल धक-धक् कर जला,
भस्म हो गया था काल
तीनों गुण ताप त्रय,
अभय हो गये थे तुम
मृत्युंजय व्योमकेश के समान,
अमृत सन्तान! तीव्र
भेदकर सप्तावरण-मरण-लोक,
शोकहारी! पहुँचे थे वहाँ
जहाँ आसन है सहस्रार
जागो फिर एक बार! (Page 41)

शब्दार्थ:

  • अनल – आग, तेज।
  • भाल – माथा।
  • ताप त्रय – तीन प्रकार के दुःख-मानसिक, शारीरिक और आत्मिक।
  • अभय – निडर।
  • मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले, भगवान शिव।
  • सप्तावरण – सात आवरण, सात चक्र।
  • मरण-लोक – मृत्यु लोक।
  • शोकहारी – दुख दूर करने वाले।
  • सहस्रार – हठयोग के अनुसार छः चक्रों को पार कर मस्तिष्क में रहने वाला सातवाँ चक्र जहाँ रस टपकता है, ब्रह्मलोक।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से लिया गया है। इन पंक्तियों में कवि ने बताया है कि भारत का अतीत गौरवमय है। इसी सन्दर्भ में वह भारतीयों को जागरण का संदेश दे रहा है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि जब गुरु,गोविन्द सिंह सत श्री अकाल का उच्चारण करते हुए युद्धभूमि में पहुँचते थे तो उनके मस्तक से आग उगलने लगती थी, यह आग सबको जला डालने के लिए धधक उठती थी। इस आग में काल, तीनों प्रकार के गुण (सत, रज और तम) तथा तीन प्रकार के ताप (दैविक, भौतिक तथा आध्यात्मिक कष्ट) जलकर भस्म हो गए। हे भारतवासियो! ऐसी दशा में तुम शिवजी की सन्तान के समान हो गए थे।

अभयदान मिल जाने से तुम अमर हो गए थे। ऐसी अवस्था में तुम संसार के सात आवरणों को भेदकर उस स्थान पर जा पहुँचे थे, जिसे सहन दल कमल का आसन कहा जा सकता है; अर्थात् योग सिद्धि के द्वारा तुमने ब्रह्म . रंध्र की अवस्था को पा लिया है। अब एक बार फिर जागो! और शत्रुओं का सफाया करो।

विशेष:
1. सहन दल कमल का संबंध हठयोग की साधना से है। इसके अनुसार माना जाता है कि कुंडलिनी छः चक्रों में से निकलकर सातवें चक्र में प्रवेश करती है, जिसे सहस्रदल कमल कहा जाता है। कुंडलिनी के इस चक्र में पहुँचकर वहाँ पर एक रस टपकता है जिसे पीकर साधना पूरी हो जाती और उसे मुक्ति मिल जाती है।

2. कवि वीर सेनानी गुरु गोविन्द सिंह और योग साधना के द्वारा सिद्धि पाने वाले भारतीयों को लक्ष्य कर नए मूल्यों को पाने की प्रेरणा दे रहा है।

3. इसमें अनुप्रास तथा पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
तीन गुण और तापत्रय कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सत, रज और तम तीन गुण हैं तथा दैविक, भौतिक और आध्यात्मिक तापत्रय हैं।

प्रश्न (ii)
भारतवासी अमर कैसे हो गए थे?
उत्तर:
जब तीनों गुण और तापत्रय जलकर भस्म हो गए, तो भारतवासी ऐसी स्थिति में शिवजी की संतान के समान हो गए थे और अभयदान मिलने के कारण अमर हो गए थे।

प्रश्न (iii)
भारतीयों ने किस स्थान को प्राप्त कर लिया था?
उत्तर:
भारतीयों ने संसार के सात आवरणों को भेदकर उस आसन को प्राप्त कर लिया था जिसे सहस्र दल कमल का आसन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में भारतीयों ने योगसिद्धि के द्वारा ब्रह्म रन्ध्र की अवस्था को पा लिया है।

प्रश्न 4.
सिंही की गोद से
छीनता रे शिशु कौन?
मौन भी क्या रहती वह
रहते प्राण? रे अजान!
एक मेषमाता ही
रहती है निर्निमेष –
दुर्बल वह –
छिनती संतान जब
जन्मपर अपने अभिशप्त
तप्त आँसू बहाती है –
किन्तु क्या,
योग्य जन जीता है,
पश्चिम की उक्ति नहीं –
गीता है, गीता है –
स्मरण करो बार-बार –
जागो फिर एक बार! (Page 41)

शब्दार्थ:

  • अजान – अनजान।
  • मेषमाता – भेड़ की माता।
  • निर्मिमेष – चुपचाप देखना।
  • दुर्बल – कमजोर।
  • अभिशप्त – शाप से सताए हुए।
  • तप्त – गर्म।
  • जन – आदमी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जामो फिर एक बार’ से उद्धृत है। कवि भारतीयों को उद्बोधित करते हुए कहते हैं कि राष्ट्र विपत्ति में पड़ा हुआ है, तुम उसकी सन्तान हो। अतः उसका निवारण करने के लिए उठो।

व्याख्या:
कवि कहता है कि क्या कभी तुमने सिंह की गोद से उसके बच्चे को छीनते हुए देखा है। यदि कोई उसके बच्चे को छीनने का प्रयत्न करे तो क्या उस बच्चे की माता प्राण रहते चुप रहती है? अर्थात् वह इतनी जोर से दहाड़ती है कि उसके बच्चे को उठाने वाले हाथ अपने आप ही पीछे हट जाते हैं। क्या तुम इस बात से अनजान हो? एक भेड़ की माता ही ऐसी होती है वह अपने बच्चे को उठाने वाले व्यक्ति को चुपचाप देखती रह जाती है क्योंकि वह कमजोर है।

उसकी सन्तान जब उससे छीनी जाती है, तब अपने जन्म पर दुःखी होकर आँसू बहाती रह जाती है। लेकिन क्या कभी कोई अपनी रक्षा में समर्थ व्यक्ति भी इस प्रकार आँसू बहाता रह सकता है। इस संसार में योग्य व्यक्ति ही जीता है यह पश्चिम की ही उक्ति नही हैं, अपितु हमारी गीता का भी यही उपदेश है। इन बातों को बार-बार याद करो और अपना आलस्य भाव को छोड़ देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक बार जाग जाओ और शत्रुओं को मार डालो या मारकर भगा दो।

विशेष:

  1. यहाँ पर कवि ने सिंहनी और मेषमाता का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि यदि अपनी स्वतंत्रता को छिनता देखकर तुम लड़ने-सरने को तैयार हो जाते हो, तो शेर हो अन्यथा भेड़ हो जिसकी नियति में कटना है।
  2. गीता से सतत कर्म करने की शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा दी गई है।
  3. इसमें अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश तथा उदाहरण अलंकार हैं।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
सिंहनी और मेषमाता में क्या अंतर है?
उत्तर:
सिंहनी शक्तिशाली होती है और मेषमाता दुर्बल होती है। सिंहनी के बच्चे को जब कोई छीनने या उठाने का प्रयास करता है, तो वह चुप नहीं रहती, अपितु, क्रोधित होकर इतने जोर से दहाड़ती है कि बच्चे को उठाने वाले हाथ अपने आप पीछे हट जाते हैं जबकि मेषमाता अपने बच्चे को उठाते हुए देखकर भी चुपचाप रहती है। वह कुछ नहीं करती, केवल आँसू बहाती रह जाती है।

प्रश्न (ii)
इस संसार में कैसा व्यक्ति जीता है?
उत्तर:
इस संसार में योग्य, समर्थ व्यक्ति ही जीता है। यह पश्चिम की उक्ति ही नहीं, हमारी गीता का भी यही उपदेश है।

काव्यांश पर सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
यहाँ कवि ने सिंहनी और मेषमाता का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि यदि अपनी स्वतंत्रता को छीनता देखकर भी यदि तुम लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हो तो शेर हो अन्यथा भेड़ हो जिसकी नियति में डरना है। तुम्हें स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना चाहिए।

शिल्प-सौंदर्य:
उदाहरण अलंकार है। ‘मेषमाता’, ‘अपने अभिशप्त’, ‘जन जीता’ में अनुप्रास अलंकार है। गीता है, गीता है और बार-बार में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। ओजमयी भाषा है। वीररस है। प्रयोगवादी कविता है।

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प्रश्न 5.
पशु नहीं, वीर तुम,
समर-शूर कूर नहीं,
काल-चक्र में हो दबे
आज तुम राजकुँवर!
समर सरताज! पर, क्या है,
सब माया है-माया है,
मुक्त हो सदा ही तुम,
बाधा-विहीन-बंध-छंद ज्यों,
डूबे आनंद में सच्चिदानंद रूप। (Page 41)

शब्दार्थ:

  • पशु – जानवर।
  • समर-शूर – योद्धा।
  • क्रूर – अत्याचारी।
  • समर सरताज – युद्ध में विजयी।
  • बाधा विहीन – बिना किसी रुकावट के।
  • सच्चिदानंद – भगवान।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूयकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से लिया गया है। इस कविता में देशवासियों को उद्बोधित करते हुए कवि कहता है कि एक बार जाग जाओ और देश पर घिरी हुई विपत्तियों को दूर करो।

व्याख्या:
कवि कहता है कि यदि तुम कृतज्ञ होकर अपने देश को पराधीनता से मुक्त नहीं कर सके तो तुम पशु के तुल्य हो, वीर नहीं। तुम तो युद्ध वीर या योद्धा हो, अत्याचारी नहीं। यह ठीक है कि हे राजकुमार, तुम कालचक्र में दवे हुए हो, किन्तु यह क्यों भूल जाते हो कि तुमने युद्ध में हमेशा विजय प्राप्त की है। पर वह क्या कहते हो कि यह सब छल या छलावा मात्र है। तुम इसी प्रकार स्वतंत्र हो जैसे आज कविता में छंद मुक्त कविता की स्थिति है। तुम सच्चिदानंद भगवान् के रूप या अंश हो और आज अपने काल्पनिक आनंद में इवे हा हो।

विशेष:

  1. यहाँ कवि भारतवासियों को याद दिलाता है कि उन्होंने अनेक युद्ध जीते हैं और वे युद्धभूमि में विजयी रहे हैं। इसलिए उनको आज भी युद्ध करना चाहिए।
  2. इसमें अनुप्रास तथा पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
कवि ने यह क्यों कहा कि ‘पशु नहीं, वीर तुम’।
उत्तर:
कवि ने यह इसलिए कहा कि तुम भारतीय कृतज्ञ होकर भी अपने देश को पराधीनता से मुक्त नहीं कर सके तो तुम पशु के तुल्य हो, वीर नहीं। कवि ने यह भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने के लिए कहा है।

प्रश्न (ii)
कवि ने भारतीयों को उद्बोधित करने के लिए क्या-क्या कहा है?
उत्तर:
कवि ने भारतीयों को उद्बोधित करने के लिए वीर, समर-शूर, राजकुंवर, समर सरताज, कालचक्र में दबे हुए, स्वतंत्र, सच्चिदानंद आदि कहा है।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काव्य-सौंदर्य:
कवि ने यहाँ भारतीय को उद्बोधित करने के लिए उन्हें याद दिलाया है कि उन्होंने अनेक युद्ध जीते हैं। वे वीर हैं। स्वतंत्र, स्वच्छंद औसच्चिदानंद के अंश हैं। उन्हें आज भी स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए युद्ध करके विजय प्राप्त करनी चाहिए। समर-शूर, समर सरताज, वाधाविहीन वंध में अनुप्रास अलंकार है। ‘माया है, माया है’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। भारतीयों के लिए अनेक विशेषणों का प्रयोग किया गया है। भाषा तत्सम शब्दावली युक्त आजमयी खड़ी बोली है। प्रयोगवादी कविता है।

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प्रश्न 6.
महामंत्र ऋषियों का
अणुओं परमाणुओं में फूंका हुआ –
“तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्”
है नश्वर यह दीन भाव,
कायरता, कामपरता,
ब्रह्म हो तुम,
पद-रज भर भी है नहीं पूरा यह विश्व-भार
जागो फिर एक बार!

शब्दार्थ:

  • नश्वर – नाश हो जाने वाला।
  • दीन भाव – दैन्य भाव।
  • कायरता – डरपोकपन।
  • पद-रज – भर-पैरों की धूल।
  • विश्व-भर – संसार का बोझ।
  • तप्त – गर्म।
  • जन – आदमी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से लिया गया है। कवि भारतवासियों से बार-बार एक ही बात कह रहा है कि उनको जाग जाना चाहिए तथा अपनी सोई हुई वीरता को जगा लेना चाहिए। ताकि वे देश पर आई विपत्ति को दूर कर सकें।

व्याख्या:
कवि कहता है कि हमारे भारतीय ऋषियों से सदा ही यह महामंत्र हर अणु और परमाणु में फूंका है कि तुम महान् हो, तुम सदा से महान् हो । यह शरीर नाशवान् है और इसके साथ ही यह दीनता दिखाना, कायरतापूर्ण व्यवहार करना तथा काम भावना में प्रवृत्त रहना आदि भी स्थायी नहीं हैं, बल्कि शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाले भाव हैं। तुम ब्रह्म के रूप हो। इसलिए तुम भी ब्रह्म हो और सारे संसार का भार तुम्हारे चरणों की धूल के बराबर भी नहीं है। तुम उठो और अपनी शक्ति पहचानो तथा उसके अनुरूप ही कार्य करो। और शत्रुओं को पराजित कर उन्हें अपने घर से बाहर निकालो।

विशेष:

  1. यहाँ पर भारतीय ऋषियों का मंत्र ‘मैं ही ईश्वर हूँ’ के बारे में वह भारतीयों को याद दिलाना चाहता है। वह उनको प्रेरित करता है कि उनके द्वारा किया जाने वाला कोई भी कार्य असंभव नहीं है।
  2. इसमें अनुप्रास अलंकार है।
  3. इसमें भाषा में ओजगुण है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्त संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
ऋषियों ने कौन-सा महामंत्र फूंका है?
उत्तर:
भारतीय ऋषियों ने सदा यह महामंत्र फूंका है कि अणु और परमाणु में ‘तुम भारतीय महान् हो, सदा से महान् हो। यह शरीर नश्वर है, तुम अमर हो।

प्रश्न (ii)
कवि ने भारतीयों का उद्बोधन क्यों किया है?
उत्तर:
कवि ने भारतीयों का उद्बोधन इसलिए किया है ताकि वे आलस्य को त्यागकर उठें और अपनी शक्ति को पहचारकर, स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करें।

काव्यांश पर सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
कवि भारतीयों को जगाने के लिए उद्बोधित करता है कि उन्हें जाग जाना चाहिए तथा. अपनी सोई हुई वीरता को पहचानकर देश पर आई विपत्ति को दूर करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। भारतीय ऋषियों के महामंत्र का उल्लेख करते हुए कवि ने कहा कि यह शरीर नश्वर है, परंतु तुम अमर हो। तुम्हारे लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है।

प्रश्न (ii)
प्रस्तुत काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
महामंत्र, कायरता, कामपरता में अनुप्रास अलंकार है। विश्व-भार में रूपक अलंकार है। तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। भाषा में ओजगुण है। वीररस है। प्रयोगवादी कविता है।

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MP Board Class 12th Biology Solutions Chapter 1 जीवों में जनन

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MP Board Class 12th Biology Solutions Chapter 1 जीवों में जनन

जीवों में जनन NCERT प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवों के लिए जनन क्यों आवश्यक है?
उत्तर
जनन के द्वारा ही जीवों की निरंतरता बनी रहती है। प्रत्येक जीव निश्चित अवधि के पश्चात् मृत हो जाता है किन्तु, इसके पूर्व जनन क्रिया द्वारा नई संतति का निर्माण कर देता है। यही कारण है कि हजारों वर्षों से पृथ्वी पर पादपों एवं पशु-पक्षियों की विभिन्न जातियों की विशाल संख्या बनी हुई है।

प्रश्न 2.
जनन की अच्छी विधि कौन-सी है और क्यों?
उत्तर
जनन की लैंगिक विधि (Sexual method) को अच्छा माना जाता है क्योंकि-लैंगिक जनन के कारण संतति में अधिक विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। ये विभिन्नताएँ युग्मकजनन के समय होने वाले अर्द्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्रों के पृथक्करण, विनिमय तथा युग्मकों के संयोगिक संलयन के कारण उत्पन्न पुनर्संयोजन होते हैं। विभिन्नताएँ जीवों के लिए बदले पर्यावरण में अनुकूलन की संभावना पैदा करते हैं।

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प्रश्न 3.
अलैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न हुई संतति को क्लोन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर
अलैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न हुई सन्तति आकारिकी (Morphological) व आनुवंशिक (Genetic) रूप से एकमात्र जनक के समान होती है, अतः इन्हें क्लोन कहा जाता है।

प्रश्न 4.
लैंगिक जनन के परिणामस्वरूप बनी संतति को जीवित रहने के अच्छे अवसर होते हैं। क्यों? क्या यह कथन हर समय सही रहता है ?
उत्तर
लैंगिक जनन में विभिन्नताएँ उत्पन्न होने के अनेक अवसर होते हैं। जैसे-अर्द्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्रों का यादृच्छिक पृथक्करण (Random segregation), विनिमय (Crossing over) तथा संलयन । अधिक विभिन्नताओं के कारण सन्तति की उत्तरजीविता (Survival) के अधिक अवसर होते हैं। नये पुनर्संयोजन (Recombinations) नयी विभिन्नताएँ पैदा करते हैं जो बदले पर्यावरण में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती हैं। लैंगिक जनन अच्छे अवसर उपलब्ध करवाता है लेकिन पर्यावरण इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संततियों को जीवित रहने के लिए प्रकृति द्वारा चयन किया जाना अत्यंत आवश्यक है।।

प्रश्न 5.
अलैंगिक जनन द्वारा बनी संतति लैंगिक जनन द्वारा बनी संतति से किस प्रकार भिन्न है ?
उत्तर
अलैंगिक जनन से उत्पन्न संतति अपने जनक के एकदम समान होते हैं। आकारिकी तथा आनुवंशिक रूप से जनक के पूर्णतः समान होती हैं। जबकि लैंगिक जनन में अर्द्धसूत्री विभाजन तथा युग्मकों का संलयन दोनों प्रक्रियाएँ शामिल हैं। युग्मकजनन के समय होने वाले अर्द्धसूत्री विभाजन व युग्मकों के यादृच्छिक (Random) संलयन से अनेक नये पुनर्संयोजन (Recombination) बनते हैं, अतः लैंगिक जनन से बनी संतति जनकों से भिन्न होती हैं।

प्रश्न 6.
अलैंगिक तथा लैंगिक जनन के मध्य विभेद स्थापित कीजिए। कायिक जनन को प्रारूपिक अलैंगिक जनन क्यों माना जाता है ?
उत्तर
अलैंगिक प्रजनन एवं लैंगिक प्रजनन में अन्तर
MP Board Class 12th Biology Solutions Chapter 1 जीवों में जनन 1
कायिक जनन को प्रारूपिक अलैंगिक जनन माना जाता है, क्योंकि

  • इसमें एक ही जनक भाग लेता है।
  • सन्तति आकारिकी व आनुवंशिक गुणों में जनक के समान होती है।
  • युग्मक निर्माण व संलयन नहीं होता, अतः अर्द्धसूत्री विभाजन एवं संलयन नहीं होता है।

प्रश्न 7.
कायिक प्रवर्धन से क्या समझते हैं ? कोई दो उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
उत्तर
किसी पौधों के वर्धी भागों जैसे-जड़, तना, पत्ती द्वारा नया पौधा तैयार होना कायिक प्रवर्धन .(Vegetative propagation) कहलाता है। यह अलैंगिक जनन का ही एक रूप है जिसमें पौधे के केवल वर्षी भाग (Vegetative parts) ही भाग लेते हैं।

उदाहरण-अदरक (प्रकंद Rhizome) तथा ब्रायोफिलम (Bryophyllum)। अदरक एक प्रकंद है, यह भूमिगत तना है, इसमें पर्व छोटे होते हैं अत: पर्वसंधियाँ एक-दूसरे के निकट होती हैं। पर्वसंधियों में भूरे रंग के शल्की पर्ण होते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में अन्तस्थ कलिका से वायुवीय प्ररोह परिवर्धित होते हैं तथा कक्षस्थ कलिका भूमिगत शाखा को बनाती है।

प्रकंद की शाखाएँ एक-दूसरे से अलग होकर वृद्धि कर नये पादप का निर्माण करती है। ब्रायोफिलम की पत्ती भी वर्धी प्रजनन या कायिक प्रवर्धन का अच्छा उदाहरण है। इसी पत्ती पर उपस्थित अपस्थानिक कलिकाएँ नये पौधों को जन्म देती हैं।

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प्रश्न 8.
व्याख्या कीजिए-
(1) किशोर चरण
(2) प्रजनक चरण
(3) जीर्णता चरण या जीर्णावस्था।
उत्तर
(1) किशोर चरण (Juvenile phase)-
जब किसी बीज का अंकुरण होता है तो उससे नवजात पौधे का निर्माण होता है । यह नवजात पौधा धीरे-धीरे विकसित होते हुए व वृद्धि करते हुए अपने विभिन्न कायिक भागों को बनाता है। ये सभी किशोर अवस्था के चरण होते हैं । किशोर या कायिक प्रवस्था के अन्त होने पर जनन प्रावस्था का प्रारंभ होता है।

(2) प्रजनक चरण (Reproductive phase)-
पौधों पर पुष्प लगने पर यह ज्ञात होता है कि अब प्रजनक चरण का प्रारंभ हो गया है। कुछ पौधों में एक विशेष ऋतु में पुष्प आते हैं तो अन्य में वर्ष पर्यन्त पुष्प लगे होते हैं। कुछ पौधे अपने जीवन काल में केवल एक बार ही पुष्प उत्पन्न करते हैं । वार्षिक तथा द्विवार्षिक किस्मों में स्पष्टतः कायिक जनन तथा जीर्णता की प्रावस्थाओं को देखा जा सकता है। इस चरण में प्रजनन कार्य होता है। प्राणियों में भी मौसम और हॉर्मोन का प्रभाव पड़ता है।

(3) जीर्णता चरण या जीर्णावस्था (Senescence phase)-
जैसे-जैसे किसी जीव की आयु बढ़ती है वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ता है। वृद्धावस्था के साथ प्रजनन क्षमता समाप्त हो जाती है, उपापचयी क्रिया मंद हो जाती है। इसे जीर्णता चरण या जीर्णावस्था कहते हैं।

प्रश्न 9.
अपनी जटिलता के बावजूद बड़े जीवों में लैंगिक प्रजनन पाया जाता है, क्यों?
उत्तर
लैंगिक जनन में विपरीत लिंग वाले जीव भाग लेते हैं। इन जीवों से नर एवं मादा युग्मक बनते हैं जो संलयन कर युग्मनज तथा बाद में भ्रूण बनाते हैं । लैंगिक जनन से सम्बद्ध संरचनाएँ जीवों में एकदम भिन्न होती हैं। इन संरचनाओं के जटिल होने के बावजूद भी लैंगिक जनन की घटनाएँ एक नियमित अनुक्रम का पालन करती हैं । लैंगिक जनन करने वाले जीवों में युग्मनज अथवा भ्रूण पूर्ण सुरक्षित होता है, इससे उत्तरजीविता के अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 10.
व्याख्या करके बताइए कि अर्द्धसूत्री विभाजन तथा युग्मकजनन सदैव अंतर्संबंधित (अंतर्बद्ध) होते हैं।
उत्तर
युग्मकजनन (Gametogenesis) नर तथा मादा दो प्रकार के युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को दर्शाता है। युग्मक अगुणित होती है, इनका निर्माण द्विगुणित कोशिका में अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन द्वारा हुआ है। इस अर्द्धसूत्री विभाजन के कारण गुणसूत्रों का केवल एक सेट प्रत्येक युग्मक में पहुँचता है। जैसे कि मनुष्यों में द्विगुणित गुणसूत्र संख्या 46 होती है तो उनके नर युग्मक (शुक्राणु) में गुणसूत्रों की संख्या 23 होगी, इसी प्रकार मादा में मादा युग्मक (अण्ड) की गुणसूत्र संख्या 23 होगी। युग्मकों की निर्माण क्रिया को युग्मकजनन कहते हैं तथा इस क्रिया में अर्द्धसूत्री विभाजन भी होता है। इस प्रकार अर्द्धसूत्री विभाजन तथा युग्मकजनन आपस में संबंधित हैं।

प्रश्न 11.
प्रत्येक पुष्पीय पादप के भाग को पहचानें तथा लिखें कि वह अगुणित
(n) है या द्विगुणित (2n)
(i) अण्डाशय,
(ii) परागकोष,
(iii) अण्ड का डिंब (Egg Larva),
(iv) पराग (Pollen),
(v) नर युग्मक (Malegamete),
(vi) युग्मनज ।
उत्तर
(i) अण्डाशय – 2n (द्विगुणित)
(ii) परागकोष – 2n (द्विगुणित)
(iii) अण्ड का डिंब (Egg Larva) – n (अगुणित)
(iv) पराग (Pollen) – n (अगुणित)
(v) नर युग्मक (Male gamete) – n (अगुणित)
(vi) युग्मनज – 2n (द्विगुणित)।

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प्रश्न 12.
बाह्य निषेचन की व्याख्या कीजिए। इसके नुकसान बताइये।
उत्तर
जीवों के शरीर के बाहर होने वाला निषेचन बाह्य निषेचन (External fertilization) कहलाता है। अर्थात् इस प्रकार के निषेचन में नर युग्मक (Male gamete/Sperm) व अण्ड (Egg) का संलयन बाह्य माध्यम में होता है।मछलियों व उभयचर जंतुओं में निषेचन बाह्य होता है। मादा जन्तु द्वारा जल में दिये गये अण्डों पर नर जंतु शुक्राणु मुक्त कर देता है।
बाह्य निषेचन की हानियाँ/कमियाँ (Demerits of external fertilization)

  • युग्मकों की सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं होता। अनेक अण्डे व शुक्राणु जल की धारा में बह जाते हैं अथवा प्रतिकूल ताप, रसायन आदि के कारण नष्ट हो जाते हैं।
  • अण्डों का निषेचन होना निश्चित नहीं होता, केवल संयोगवश यह संभव हो पाता है।
  • कुछ अण्डों को निषेचन होने के पूर्व परभक्षियों द्वारा भक्षण कर लिया जाता है।
  • निषेचन पश्चात् बनने वाली संततियों की संख्या अधिक होती है, लेकिन इनकी सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं होता है।

प्रश्न 13.
जूस्पोर ( अलैंगिक चल बीजाणु) तथा युग्मनज के बीच विभेद कीजिए।
उत्तर
जूस्पोर (अलैंगिक चल बीजाणु) तथा युग्मनज के बीच विभेदजूस्पोर (Zoospore)
MP Board Class 12th Biology Solutions Chapter 1 जीवों में जनन 2

प्रश्न 14.
युग्मकजनन एवं भ्रूणोद्भव के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। .
उत्तर
युग्मकों के निर्माण प्रक्रिया को युग्मकजनन कहते हैं। युग्मकों के निर्माण के समय अर्द्धसूत्री विभाजन होने से ये अगुणित होते हैं। युग्मक नर तथा मादा होते हैं जो आपस में संलयित होकर युग्मनज बनाते हैं। युग्मनज से भ्रूण के विकास की प्रक्रिया को भ्रूणोद्भव (Embryogenesis) कहते हैं । युग्मनज जो कि द्विगुणित होता है, इसके विकास से भ्रूण का निर्माण होता है। भ्रूण प्रायः द्विगुणित होता है तथा इससे नये पादप का निर्माण होता है।

प्रश्न 15.
एक पुष्प में निषेचन पश्च परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
निषेचन के बाद पुष्प के विभिन्न भागों में परिवर्तन-निषेचन के बाद पुष्प के विभिन्न भागों में निम्न परिवर्तन दिखाई देते हैं

  1. द्विगुणित जाइगोट भ्रूण (Embryo) का निर्माण करता है जो बीज में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से मौजूद रहता है। भ्रूण प्रांकुर (Plumule), मूलांकुर (Radicle) और बीजपत्रों (Cotyledons) से मिलकर बनता है।
  2. त्रिक संलयन से बना प्राथमिक एण्डोस्पर्म केन्द्रक विभाजित होकर भ्रूणपोष (Endosperm) बनाता है। यह विकसित होते हुए भ्रूण को खाद्य या पोषण प्रदान करने का कार्य करता है।
  3. भ्रूण के पूर्ण विकसित होने तक, बीजाण्डकाय (Nucellus) पूर्णतः खत्म हो जाता है, किन्तु कुछ पौधों में जैसे, पान आदि में यह भ्रूण निर्माण के बाद भी खाद्य प्रदायी पोषक (Nutritive) ऊतक के रूप में विद्यमान रहता है, तब इसे परिभ्रूणपोष (Perisperm) कहा जाता है।
  4. बाहरी अध्यावरण (Outer integument) बीजकवच या बीजावरण (Testa) और आन्तरिक अध्यावरण टेग्मेन (Tegmen) कहलाता है। ये दोनों मिलकर बीजचोल (Seed coat) बनाते हैं ।
  5. निषेचन के पश्चात् बीजाण्ड बीज बनता है।
  6. निषेचन के बाद अण्डाशय (Ovary), फल (Fruit) में रूपान्तरित होता है । फल की दीवार फलभित्ति (Pericarp) कहलाती है। .
  7. वर्तिका (Style) गिर जाती है और फल पर अपना चिन्ह छोड़ जाती है।
  8. पुष्प के अन्य भाग जैसे-पुंकेसर, दलपुंज (Petals) गिर जाते हैं। कुछ फलों में (सोलेनेसी कुल के) कैलिक्स फल बनने पर भी लगे रहते हैं, जिन्हें चिरलग्न (Perisistent) कहा जाता है।

प्रश्न 16.
एक द्विलिंगी पुष्प क्या है ? अपने आस-पास से पाँच द्विलिंगी पुष्पों को एकत्र कीजिए और अपने शिक्षक की सहायता से इनके सामान्य (स्थानीय) एवं वैज्ञानिक नाम पता कीजिए।
उत्तर
जब किसी एक ही पौधे में दोनों लिंग एक साथ उपस्थित हों तो उसे द्विलिंगी (Bisexual) कहा जाता है। स्थानीय आवास के पाँच द्विलिंगी पुष्पों के सामान्य एवं वैज्ञानिक नाम निम्न प्रकार से हैं
सामान्य नाम – वैज्ञानिक नाम

  • धतूरा – Datura metal
  • सरसों – Brassica campestris
  • गुड़हल – Hibiscus rosa-sinensis
  • अमलताश – Cassia fistula
  • बबूल – Acacia nilotica.

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प्रश्न 17.
किसी भी कुकुरबिटा पादप के कुछ पुष्पों की जाँच कीजिए और पुंकेसरी एवं स्त्रीकेसरी पुष्पों को पहचानने की कोशिश कीजिए। क्या आप अन्य एकलिंगी पौधों के नाम जानते हैं ?
उत्तर
कुकुरबिटेसी कुल के पादपों में पुष्प एकलिंगी होते हैं। पुष्पों का निरीक्षण करने पर यदि उसमें केवल पुंकेसर उपस्थित हो अथवा केवल जायांग उपस्थित हो तो यह एकलिंगी नर अथवा मादा पुष्प होगा। अन्य एकलिंगी पुष्पों के उदाहरण हैं

  • कुकुरबिटा  मैक्सिमा (Cucurbita maxima) – सीताफल
  • रिसिनस कोम्युनिस (Ricinus communis) – अरण्ड
  • सिटुलस वल्गेरिस (Citrullus vulgaris) – तरबूज ।

प्रश्न 18.
अण्डप्रजक प्राणियों का उत्तरजीवन (सरवाइवल ) सजीव प्रजक प्राणियों की तुलना में अधिक जोखिमयुक्त क्यों होता है ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर
यदि युग्मनज (Zygote) का मादा जनक के शरीर के बाहर विकास होता है तो उन्हें अण्डप्रजक ‘ (Oviparous) कहा जाता है। अण्डप्रजक में युग्मनज का विकास बाहर होने के कारण यह पूर्णतः जोखिमपूर्ण होता है तथा इनकी संतानों का उत्तरजीवन (सरवाइल), सजीव प्रजक प्राणियों की तुलना में कम होता है।

जीवों में जनन अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

जीवों में जनन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1.सही विकल्प चुनकर लिखिए

1. निम्नलिखित में से कैलोज की भित्ति पायी जाती है (CBSE PMT 2007)
(a) नर युग्मक में
(b) अण्ड में
(c) परागकण में
(d) गुरुबीजाणु मातृकोशिका में।
उत्तर
(d) गुरुबीजाणु मातृकोशिका में।

प्रश्न 2.
ऐसा कायिक जनन जिसमें नये पौधे पत्ती के अविच्छिन्न शीर्ष पर विकसित होते हैं, पाया जाता (AFMC2012)
(a) एस्पैरेगस में
(b) अगैव में
(c) क्राइसेन्थेमम में
(d) ब्रायोफिलम में।
उत्तर
(d) ब्रायोफिलम में।

प्रश्न 3.
केले में कायिक जनन होता है (AMU 2012)
(a) कंद से
(b) प्रकन्द से
(c) बल्ब से
(d) अंत:भूस्तारी से।
(b) प्रकन्द से

प्रश्न 4.
सजीव प्रजक प्राणी है
(a) कछुआ
(b) अस्थिल मछली
(c) गुंजन पक्षी
(d) व्हेल मछली।
उत्तर
(d) व्हेल मछली।

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प्रश्न 5.
‘क्लोन’ होते हैं
(a) आनुवंशिक लक्षणों में जनक के समान
(b) कायिक जनन से विकसित पादपों की समष्टि
(c) एक ही जनक से विकसित पादप
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर
(d) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 6.
शिशुओं को जन्म देने वाले प्राणी कहलाते हैं
(a) सजीव प्रजकता
(b) उभयचरी
(c) अण्डप्रजक
(d) प्रगुहीय।
उत्तर
(a) सजीव प्रजकता

प्रश्न 7.
युग्मनज में गुणसूत्र के सेट होते हैं
(a) X
(b) 2X
(c)3X
(d)4X.
उत्तर
(b) 2X

प्रश्न 8.
जनक पादपों के समान पादप प्राप्त किये जा सकते हैं
(a) बीज द्वारा
(b) फल द्वारा
(c) तनों के कर्तन द्वारा
(d) संकरण द्वारा।
उत्तर
(c) तनों के कर्तन द्वारा

प्रश्न 9.
आलू का कायिक प्रवर्धन किया जाता है
(a) प्रकंद द्वारा
(b) शल्ककंद द्वारा
(c) तने द्वारा
(d) कंद द्वारा।
उत्तर
(d) कंद द्वारा।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से अण्ड प्रजक प्राणी कौन है
(a) चमगादड़
(b) व्हेल
(c) पेंग्विन
(d) अमीबा।
उत्तर
(c) पेंग्विन

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. पौधों में जननांग ………………. प्रावस्था के अन्त में विकसित होते हैं।
2. एन्जियोस्पर्म की परागनलिका में ……………… केन्द्रक होते हैं।
3. केले तथा गुलाब में …………… नहीं बनते हैं अतः इनमें जनन केवल ………… से होता है।
4. प्राणियों में जननांग ………………. अवस्था में विभेदित हो जाते हैं।
5. तालाबों में आइकोर्निया ……………… की सहायता से वृद्धि करता है।
6. गुणन की दर ………………. जनन की अपेक्षा ………………. जनन में अधिक होती है।
उत्तर

  1. किशोरावस्था
  2. तीन
  3. बीज, कायिक विधियों
  4. भ्रूण
  5. भूस्तारिका
  6. लैंगिक, अलैंगिक।

3. सही जोड़ी बनाइए

MP Board Class 12th Biology Solutions Chapter 1 जीवों में जनन 3
उत्तर
1.(e),2. (d), 3. (1), 4. (a), 5. (c), 6. (b).

4. एक शब्द में उत्तर दीजिए

1. अलैंगिक प्रजनन के फलस्वरूप उत्पन्न एकजनकीय, संरचना एवं आनुवंशिक गुणों में समान सन्तति को क्या कहते हैं ?
2 जूस्पोर्स द्वारा प्रजनन करने वाले एक शैवाल का नाम लिखिए।
3. गेम्यूल द्वारा वर्षी प्रजनन करने वाला जीव कौन-सा है ?
4. कशाभिकायुक्त बीजाणुओं को क्या कहते हैं ?
5. अजूबा की पत्तियों में कौन-सी कलिकाओं के द्वारा वर्धा प्रजनन होता है ?
उत्तर

  1. क्लोन
  2. क्लैमाइडोमोनास
  3. स्पॉनजिला
  4. जूस्पोर्स
  5. अपस्थानिक कलिका।

जीवों में जनन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवन अवधि से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर
प्रत्येक जीव के जन्म से उसकी प्राकृतिक मृत्यु तक का काल उस जीव की जीवन अवधि होती है।

प्रश्न 2.
निषेचन को परिभाषित कीजिये।
उत्तर
वह प्रक्रिया जिसमें नर व मादा युग्मक संलयित होकर द्विगुणित युग्मनज (Zygote) बनाते हैं, निषेचन कहलाती है।

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प्रश्न 3.
क्लोन किसे कहते हैं ?
उत्तर
एक ही जनक से उत्पन्न आकारिकी व आनुवंशिक रूप से समान जीव क्लोन कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
एक ऐसे जीव का नाम लिखिए जिनमें अलैंगिक जनन कोनिडिया द्वारा होता है।
उत्तर
पेनिसीलियम।

प्रश्न 5.
प्रकन्द द्वारा वर्षी प्रजनन किन पौधों में होता है ?
उत्तर
अदरक, हल्दी में।

प्रश्न 6.
एक ऐसे जन्तु का नाम लिखिए जिसमें अनुप्रस्थ द्विविभाजन होता है।
उत्तर
पैरामीशियम।

प्रश्न 7.
वृद्धावस्था का क्या मापदण्ड है ?
उत्तर
प्रजनन की आयु की समाप्ति को जीर्णता या वृद्धावस्था के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
उभयलिंगाश्रयी (Monoecious) पादपों के दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर
कुकुरबिटा एवं नारियल उभयलिंगाश्रयी के उदाहरण हैं।

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MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 5 Continuity and Differentiability Ex 5.3

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MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 5 Continuity and Differentiability Miscellaneous Exercise

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MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 6 Application of Derivatives Ex 6.4

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 बल-बहादुरी

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 बल-बहादुरी (निबन्ध, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

बल-बहादुरी पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

बल-बहादुरी लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बल और सहृदयता में क्या अंतर है?
उत्तर:
बल में पौरुष होने का भाव होता है, जबकि सहृदयता में देवत्व होने का भाव होता है।

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प्रश्न 2.
मानवता के विकास की पुण्य-भूमि किसे कहा गया है?
उत्तर:
अभय और शांति के सुंदर मिलन को मानवता के विकास की पुण्य-भूमि कहा गया है।

प्रश्न 3.
बल का उपयोग विवेक के साथ क्यों करना चाहिए?
उत्तर:
बल का उपयोग विवेक के साथ करने से व्यक्ति स्वर्ग की सीमा तक पहुँच जाता है।

प्रश्न 4.
लेखक ने बल के किन दो रूपों का वर्णन किया है?
उत्तर:
लेखक ने बल के सदुपयोग और दुरुपयोग दो रूपों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 5.
सम्राट अकबर ने किन वीरों का सम्मान किया था?
उत्तर:
सम्राट अकबर ने जयमल और फत्ता नामक वीरों का सम्मान किया था।

प्रश्न 6.
अंग्रेज सेनापति द्वारा झाँसी की रानी की वीरता की प्रशंसा को लेखक ने क्यों महत्त्वपूर्ण माना है?
उत्तर:
लेखक अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज द्वारा झाँसी की रानी की वीरता की प्रशंसा को इसलिए महत्त्वपूर्ण माना है क्योंकि एक प्रतिद्वंद्वी वीर ने उसकी वीरता की प्रशंसा की थी।

बल-बहादुरी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सबल के बल का सदुपयोग ही सफलता की कुंजी है।’ इस कथन को कीजिए। (M.P. 2009, 2012)
उत्तर:
शक्तिशाली व्यक्ति यदि बल का सदुपयोग करे तो सफलता उसके कदम चूमती है। उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है। राम और कृष्ण इसके उदाहरण हैं। उन्होंने बल का सदुपयोग किया था इसीलिए उनकी जयंती मनाई जाती है। रावण और कंस दोनों ने बल का दुरुपयोग किया था। यही कारण है कि उनके स्मरण मात्र से मन में घृणा उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 2.
सात्त्विक सहयोग को राष्ट्रों के निर्माण की मूलशिला क्यों कहा गया है?
उत्तर:
सात्त्विक सहयोग को राष्ट्रों के निर्माण की मूलशिला कहा गया है क्योंकि उसमें बल और प्रेम का सहयोग होता है। सात्त्विक सहयोग में अभिमान एवं कर्मण्यता, त्याग और ईमानदारी आदि मानवीय गुण सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 3.
बल और बुद्धि में पारस्परिक संबंध है-उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
बल और बुद्धि में पारस्परिक संबंध है क्योंकि बुद्धि के बिना बल व्यर्थ है। बल के अभाव में बुद्धि अपंग के समान है। उदाहरणार्थ-राजदूतों में वल था लेकिन बुद्धि का अभाव था। वे युद्ध-भूमि में शत्रुओं से सिंह की भाँति लड़े। उनकी वीरता की शत्रु व मित्र सभी ने प्रशंसा की। इतनी वीरता दिखाने के बाद भी वे पराजित हुए। यदि उनमें बल के साथ बुद्धि होती, तो उनका इतिहास कुछ और ही होता।

प्रश्न 4.
लेखक के बल की चरम सीमा कहाँ तक बतलाई है?
उत्तर:
लेखक ने बल की चरम सीमा शत्रुओं के समूह-गर्जन में, केसरी के साथ खेलने में या फिर देश और धर्म के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों का बलिदान देने में बताई है।

प्रश्न 5.
बल की दृष्टि से पश्चिम और भारत में क्या अंतर है? (M.P. 2010)
उत्तर:
बल की दृष्टि से पश्चिम और भारत की दृष्टि में पर्याप्त अंतर है। पश्चिम शारीरिक बल का उपासक है और भारत आत्मबल अर्थात् बुद्धि के बल को महत्त्व देता है।

प्रश्न 6.
शरीर-बल और आत्म-बल में लेखक ने किसे श्रेष्ठ माना है? आज विश्व कल्याण के लिए दोनों में से कौन-सा अधिक उपयोगी है?
उत्तर:
लेखक ने शरीर-बल और आत्मवल में से आत्मबल को श्रेष्ठ माना है। आज विश्व कल्याण के लिए दोनों में से आत्मबल सर्वाधिक उपयोगी है।

बल-बहादुरी भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
“पुरुषत्व, अभय का जनक है और देवत्व शान्ति का।”
उत्तर:
पुरुषत्व अर्थात् वीरता और पराक्रम का भाव मनुष्य में निडरता का भाव उत्पन्न करता है। इस प्रकार पुरुपत्व निर्भयता का जनक है। इस प्रकार जब व्यक्ति में कल्याण चाहने वाले देवता होने का भाव उत्पन्न होता है, तो उसमें शांति उत्पन्न होती है। इस तरह देवत्व शांति का जनक है। जब अभय ओर शांति दोनों मिल जाते हैं, तो मानवता के विकास की पुण्य भूमि उत्पन्न हो जाती है। निर्भयता और शांति की स्थिति में ही मानवता का विकास होता है।

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प्रश्न 2.
“बल अंधा है और उसकी गति पथ-प्रदर्शक के अधीन है।”
उत्तर:
निश्चय ही बल अंधा होता है। उसमें अच्छा-बुरा सोचने, उचित-अनुचित के संबंध में विचार करने की शक्ति नहीं होती। बल के वशीभूत होकर ही व्यक्ति उसका दुरुपयोग कर अन्याय और अत्याचार करता है। वल को सही दिशा देने का कार्य मार्ग दिखाने वाले का होता है। वह बल को सदुपयोग के मार्ग पर भी चला सकता है और दुरुपयोग के मार्ग पर भी। बल का सदुपयोग उसकी सफलता है और दुरुपयोग उसकी असफलता है।

बल-बहादुरी भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
नीचे कुछ शब्द दिए जा रहे हैं, उनमें से ‘प्रत्यय’ पृथक् कर लिखिए –
पुरुषत्व, मानवता, वीरता, कर्मण्यता, दूधवाला, चरितार्थता।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 बल-बहादुरी img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह कर समास का नाम लिखिए –
इतिहास-उपवन, वीरता-वल्लरी, परागमाला।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 बल-बहादुरी img-2

प्रश्न 3.
दिए गए वाक्यों को निर्देशानुसार रूपांतरित कीजिए –

  1. मोहन पुस्तक खरीदकर पढ़ता है। (मिथ वाक्य में)
  2. समय बहुत खराब है, इसलिए देखभाल कर चलना चाहिए। (सरल वाक्य में)
  3. विद्वानों का सभी आदर करते हैं। (मिश्र वाक्य में)
  4. तुम परिश्रम करो और परीक्षा में सफल हो जाओ। (सरल वाक्य में)
  5. राम पुस्तकें पढ़ता है जिससे उसे ज्ञान प्राप्त होता है। (संयुक्त वाक्य में)

उत्तर:

  1. मोहन ने कहा कि वह पुस्तक खरीदकर पढ़ता है।
    या
    जब मोहन पुस्तक खरीदता है, तब पढ़ता है।
  2. देखभाल कर चलो समय बहुत खराब है।
  3. जो विद्वान हैं, उनका सभी आदर करते हैं।
  4. तुम परिश्रम करके परीक्षा में सफल हो सकते हो।
  5. राम पुस्तकें पढ़ता है और उसे ज्ञान प्राप्त होता हैं।

बल-बहादुरी योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
वीर पुरुषों और वीरांगनाओं के चित्रों का संग्रह कर अलबम बनाइए।
उत्तर:
छात्र राम, कृष्ण, अर्जुन, महाराणा प्रताप, शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई आदि के चित्र एकत्र कर अलबम बना सकते हैं।

प्रश्न 2.
किसी बलिदानी वीर के बारे में 10 पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई, भगतसिंह आदि किसी पर भी छात्र स्वयं दस पंक्तियाँ लिखें।

प्रश्न 3.
किसी देश-भक्त का रेखाचित्र बनाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

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प्रश्न 4.
‘बल और बुद्धि में कौन श्रेष्ठ है’ विषय पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

बल-बहादुरी परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘बल-बहादुरी’ निबंध के लेखक हैं –
(क) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(ख) कन्हैयालाल नंदन
(ग) भगीरथ मिश्र
(घ) यतीन्द्र मिश्र
उत्तर:
(क) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।

प्रश्न 2.
कौन-सी बहादुरी सात्विक और ग्रहणीय है –
(क) अपनी स्वार्थवृत्ति को पूरा करने वाली
(ख) जनकल्याण करने वाली
(ग) लोगों को भयभीत कर कायर बनाने वाली
(घ) निर्दोष जनता को सताने वाली
उत्तर:
(ख) जनकल्याण करने वाली।

प्रश्न 3.
अज्ञान का पुत्र बताया गया है –
(क) लोभ को
(ख) मोहमाया को
(ग) अहंकार को
(घ) क्रूरता को
उत्तर:
(ग) अहंकार को।

प्रश्न 4.
राष्ट्र एवं जातियों के गौरव की स्थिति किसके शिशुओं जैसी है?
(क) कोकिल के
(ख) मनुष्य के
(ग) जानवरों के
(घ) राक्षसों के
उत्तर:
(क) कोकिल के।

प्रश्न 5.
बल और बुद्धि का संबंध वही है जो –
(क) देह और आँख का
(ख) बुद्धि और बल का
(ग) त्याग और तपस्या का
(घ) स्वार्थ और भोग का
उत्तर:
(क) देह और आँख का।

प्रश्न 6.
औरंगजेब कम बल राशि का स्वामी होते हुए भी साम्राज्य का स्वामी किसके प्रभाव से बन सका –
(क) बुद्धि कौशल से
(ख) रण-कौशल से
(ग) इच्छा शक्ति से
(घ) भाग्य-कौशल से
उत्तर:
(क) बुद्धि कौशल से।

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प्रश्न 7.
बल ………….. होता है।
(क) अंधा
(ख) कान का कच्चा
(ग) अभिमानी
(घ) स्वार्थी
उत्तर:
(क) अंधा।

प्रश्न 8.
पश्चिम …… उपासक है।
(क) शरीर बल का
(ख) आत्मबल का
(ग) सैन्य बल का
(घ) धन-बल का
उत्तर:
(क) शरीर बल का।

प्रश्न 9.
भारत ………. उपासक है।
(क) आत्मबल का
(ख) शरीर-बल का
(ग) धन-बल का
(घ) पशु-वल का
उत्तर:
(क) आत्मबल का।

प्रश्न 10.
इतिहास-रत्न जयमल और वीर शिरोमणि फत्ता का हम कितना ही गुणगान करें, पर उसका सच्चा सम्मान तो –
(क) झाँसी की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ही कर सकती थी।
(ख) मुगल सम्राट वीर अकबर ही कर सकता था।
(ग) मुगल सम्राट महान् शाहजहाँ ही कर सकता था।
(घ) उसके होठ जरा बाहर निकल जाते थे।
(ङ) औरंगजेब ही कर सकता था।
उत्तर:
(ख) मुगल सम्राट वीर अकबर ही कर सकता था।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पर करें –

  1. शाहजहाँ का उत्तराधिकारी अत्यन्त ………. था। (चतुर बलवान)
  2. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के निबंध का नाम ………. है। (बल बहादुरी मेरे सपनों का भारत)
  3. भारत ………. का उपासक है। (आत्मवल शक्तिबल)
  4. प्रकृति ने गाँधी की ………. की। (महावृष्टि, महासृष्टि)
  5. वे जहाँ लड़े ………. की भाँति लड़े। (सिंह/शेर)

उत्तर:

  1. बलवान
  2. बल-बहादुरी
  3. आत्मबल
  4. महासृष्टि
  5. सिंह।

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III. निम्नलिखित कथनों में सत्य असत्य छाँटिए –

  1. ‘बल-बहादुरी’ निबंध के लेखक यतीन्द्र मिश्र हैं। (M.P. 2009)
  2. शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दारा था।
  3. बल में देवत्व का निवास है।
  4. बल की चरम सीमा नहीं है।
  5. गुरुनानक के आत्मज दीवार में चुने गए।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. असत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 7 बल-बहादुरी img-3
उत्तर:

(i) शिरोमणि
(ii) ताण्डव
(iii) वल्लरी
(iv) परागमाला
(v) उपवन

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

  1. सौभाग्य-श्री का पुनीत वरदान क्या है?
  2. आकर्षण का केन्द्र क्या है?
  3. वीरता का सार किसमें है?
  4. गाँधी की महासृप्टि किसने की?
  5. स्वर्ग की सीमा में कौन ले जाता है?

उत्तर:

  1. बल के साथ बुद्धि का एकमात्र संयोग।
  2. बल।
  3. न्यौछावर करने में।
  4. प्रकृति ने।
  5. विवेक का साहचर्य।

बल-बहादुरी लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कायरता का पिता और उसकी परी किसे बताया गया है?
उत्तर:
भय को कायरता का पिता और दीनता को उसकी सहचरी बताया गया है।

प्रश्न 2.
पैशाचिकता की सखी कौन है?
उत्तर:
पैशाचिकता की सखी क्रूरता है।

प्रश्न 3.
राम और कृष्ण की जयंती मनाने का कारण क्या बताया गया है?
उत्तर:
राम और कृष्ण की जयंती मनाने का कारण उनके द्वारा बल का सदुपयोग करना बताया गया है।

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प्रश्न 4.
शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दारा, कितने हाथियों की बलराशि का स्वामी था?
उत्तर:
शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दारा, साठ हजार हाथियों से भी अधिक बलराशि का स्वामी था।

प्रश्न 5.
कवि की कविता की सच्ची प्रशंसा करने का अधिकारी किसे बताया गया है?
उत्तर:
एक कवि की कविता की सच्ची प्रशंसा का अधिकारी दूसरे कवि को बताया गया है।

प्रश्न 6.
बल के अभाव में क्या दिखाई देता है?
उत्तर:
बल के अभाव में कायरता का दयनीय दर्शन दिखाई देता है।

प्रश्न 7.
क्रूरता क्या करती है?
उत्तर:
क्रूरता अज्ञान के पुत्र अहंकार का पोषण करती है।

प्रश्न 8.
बल और बुद्धि का संबंध किस तरह का है?
उत्तर:
बल और बुद्धि का संबंध देह और आँख की तरह है।

बल-बहादुरी दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किनका पारस्परिक विरोध विश्व के विशाल राष्ट्रों और जातियों को हृदयबेधी इतिहास में बदल देता है?
उत्तर:
बल और प्रेम का पारस्परिक विरोध विश्व के विशाल राष्ट्रों और जातियों को हृदयबेधी इतिहास में बदल देता है। इनमें परस्पर विरोध के कारण विशाल राष्ट्रों और जातियों को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है।

प्रश्न 2.
बल का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
बल का बड़ा महत्त्व है। जो मनुष्य शक्तिशाली होता है, उसका व्यक्तित्व सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। उसको सभी प्रेम और श्रद्धा के साथ प्रेम का उपहार देते हैं और स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं। शक्तिशाली व्यक्ति सभी में लोकप्रिय हो जाता है।

प्रश्न 3.
किस वरदान को पुनीत कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
बल और बुद्धि के संयोग को सौभाग्य श्री का वरदान कहा गया है; क्योंकि जिस मनुष्य जाति और राष्ट्र के लोगों को यह वरदान प्राप्त हो जाता है, सफलता उनके सामने हाथ वाँधे खड़ी होने में ही अपनी सार्थकता समझती है। वल-बुद्धि के संयोग से ही प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

प्रश्न 4.
एक की जयंती मनाई जाती है और दूसरे की नहीं। क्यों?
उत्तर:
एक की जयंती मनाई जाती है और दूसरे की नहीं। ऐसा इसलिए कि एक ने अपनी शक्ति का उपयोग जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए किया था। उसने अन्यायी, अत्याचारी और दुराचारी प्रवृत्ति के लोगों में फंसी जनता को मुक्ति बीमार का इलाज दिलाने के लिए उनका संहार किया था। दूसरे ने जनता के अधिकारों का बलपूर्वक हनन किया था। उसके अधिकारों को छीना और उसे खूब सताया था।

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प्रश्न 5.
बल की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
बल में आकर्षण होता है। इसलिए वह अपनों को ही नहीं, अपितु दूसरों को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। फलस्वरूप उसे सभी ललचाई हुई दृष्टि से देखते हैं। उसके प्रति प्रेम और श्रद्धा के उपहार समर्पित करते हैं। फिर उसे प्रशंसा के एक-एक वाक्य सुनाने लगते हैं।

बल-बहादुरी लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जन्म सन् 1906 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में देवबंद नामक स्थान में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूलों में हुई। उनकी रुचि प्रारंभ से ही राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यों में थी। उच्च शिक्षा ग्रहण करते समय ही वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। फलस्वरूप उनकी शिक्षा पूर्ण न हो सकी। ‘प्रभाकर’ जी समय-समय पर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने के कारण कई बार जेल गए। छोटी आयु से ही वे अखबारों में लिखने लगे। उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित होने वाले ‘ज्ञानोदय’ नामक पत्र का अनेक वर्षों तक सफल संपादन किया।

सहारनपुर में अपना छापाखाना (प्रेस) स्थापित किया और ‘नया जीवन’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। संरमरण और रेखाचित्र के क्षेत्र में यह पत्रिका बेजोड़ थी। इसके कारण इन्हें विशेष ख्याति मिली। सन् 1990 में हिन्दी सेवाओं के लिए उन्हें ‘पद्मश्री’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। ‘प्रभाकर’ जी.की रचनाओं में गाँधीवादी विचारधारा का स्पष्ट प्रभाव है। उनकी प्रत्येक रचना में समाज एवं परिवार को सुखी बनाने का उद्देश्य दिखाई पड़ता है। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय भावना का भी समावेश है। सन् 1995 में उनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक विशेषताएँ:
‘प्रभाकर’ जी ने अपनी साहित्यिक यात्रा का प्रारंभ एक पत्रकार के रूप में किया। उन्होंने लघु कहानियाँ. संस्मरण, रेखाचित्र तथा निबन्धों की रचना की। वे हिन्दी के रेखाचित्र, संस्मरण एवं ललित निबंधों के श्रेष्ट रचनाकारों में गिने जाते हैं।

रचनाएँ:
नई पीढ़ी नए विचार, जिंदगी मुस्कराई, माटी हो गई सोना, आकाश के तारे, धरती के फूल, दीप जले : शंख बजे, बाजे पायलिया के घुघरू, क्षण बोले : कण मुसकाए, महके आँगन चहके द्वार, जिएँ तो ऐसे जिएँ आदि।

भाषा-शैली:
‘प्रभाकर’ जी की भाषा-शैली सजीव, प्रवाहपूर्ण, आत्मीय एवं मर्मस्पर्शी है। वे छोटी-से-छोटी एवं वड़ी-से-बड़ी बात को सहजता से कह जाने में सिद्धहस्त थे। उनकी समस्त रचनाओं में नवीनता एवं ताजगी है, जो पाठकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। उनकी भाषा-शैली में उदाहरणों व सूक्तियों का पर्याप्त मात्रा में समावेश है। वे अपनी बात की पुष्टि में उदाहरण का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा विषयानुकूल है।

बल-बहादुरी पाठ का सारांश

प्रश्न 2.
‘बल-बहादुरी’ निबंध का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘बल-बहादुरी’ कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित एक विवेचनात्मक निबंध है। इसमें लेखक ने बल के सदुपयोग करने पर बल दिया है। लेखक बल और सहदय में अंतर स्पष्ट करते हुए कहता है कि बल में पौरुष होता है और सहृदयता में देवत्व। बल का अभाव कायरता है और सहृदयता का अभाव पाप और दानवता है। कायरता भय का पिता और हीनता उसकी सहचरी है।

पौरुष से निडरता आती है और सहदयता से शांति। जब निडरता और का समन्वय होता है तो मानवता का विकास होता है। रावण, कंस, राम और कृष्ण सभी बलशाली थे। परंतु दो की ही जयंती मनाई जाती है और दो की नहीं। ग़म और कृष्ण ने अपने बल का सदुपयोग जनता के हित के लिए किए। जबकि रावण और कंस ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए बल का दुरुपयोग किया। सबल के बल का सदुपयोग करना उसकी सफलता की कुंजी है। यद्यपि वल एक होता है किंतु सदुपयोग ओर दुरुपयोग के आधार पर दो रूपों में दिखाई देता है।

वल और विवेक का साहचर्य मनुष्य को स्वर्ग में ले जाता है, तो अविवेक का नरक में ले जाता है। सामान्य रूप से बल अंधा होता है और उसकी गति पथ-प्रदर्शक के अधीन होती है। बल और प्रेम का सात्विक सहयोग राष्ट्रों के निर्माण का आधार है, तो विरोध उनके विनाश का इतिहास। बल आकर्षण का केंद्र होता है। वह सभी को अपनी ओर खींचता है। वीर अपने विरोधी वीर के एक प्रशंसाभरे वाक्य को अधिक महत्त्व देता है। वास्तव में एक वीर ही दूसरे वीर का सच्चा सम्मान कर सकता है। झाँसी की रानी का वास्तविक सम्मान ब्रिटिश सेना के वीर सेनापति ह्यूरोज के शब्दों में ही मिलता है।

बल और बुद्धि का वही संबंध है जो शरीर और आँख का है। बुद्धि कौशल के अभाव में बल निरर्थक है और बल के बिना बुद्धि व्यर्थ है। इसी कारण तो राजपूतों को हार का मुंह देखना पड़ा। दाराशिकोह शक्तिशाली था परन्तु औरंगजेब बुद्धिमान। वह अपने बुद्धि-कौशल से ही शाहजहाँ के साम्राज्य का सम्राट बन बैठा। – जिस मनुष्य, जाति या राष्ट्र में बल और बुद्धि एकत्र हो जाते हैं वहाँ सफलता और विजय निश्चित होती है। बल-बुद्धि का संयोग सुख पर आधारित होने पर सौंदर्य एवं प्रेम के सम्मिलन की भाँति सुंदर, प्रकृति एवं पुरुष के सम्मिलन की तरह पवित्र और काव्य एवं संगीत के सम्मिलन के समान अजेय हो जाता है।

बल की चरम-सीमा वीर की अविचल मुस्कान में है, जो संकटों की स्थिति में भी उसके मुख पर बनी रहती है। विश्व का इतिहास ऐसे वीरों से भरा पड़ा है, जो धर्म देश और मानव के हित में अपने प्राणों को न्यौछावर करने से पीछे नहीं हटे। पाश्चात्य देशों और भारत में यही अंतर है कि पाश्चात्य देश बल को महत्त्व देते हैं और भारत आत्मबल को। महात्मा बुद्ध और महात्मा गाँधी ने संसार में आत्मबल की महासृष्टि की और भारतीय संस्कृति के इतिहास में अहिंसा को प्रतिष्ठित कर एक नया अध्याय जोड़ा। अतः जनकल्याण करने वाली बहादुरी सात्विक और ग्रहणीयहै।

बल-बहादुरी संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
बल में पुरुषत्व का निवास है और सहृदयतो में देवत्व का। बल के अभाव में परिलक्षित होता है क्लीबत्व का दयनीय दर्शन और सहृदयता की शून्यता में तांडव करती है, पापपुंज-प्रोज्ज्वलित पैशाचिकता! क्लीबत्व भय का पिता है और उसकी सहचरी है दीनता, पर पैशाचिकता की सखी है क्रूरता और वह अज्ञान के पुत्र अहंकार का पोषण करती है। पुरुषत्व अभय का जनक है और देवत्व शांति का। अभय और शांति का यह सुंदर सम्मेलन ही मानवता के विकास की पुण्य-भूमि है। (Page 26)

शब्दार्थ:

  • पुरुषत्व – पौरुष, वीरता।
  • क्लीबत्व – नपुंसकता, कायरता, अपुरुषत्व।
  • सहृदयता – दयालुता, करुणा, चित की कोमलता।
  • देवत्व – परमात्मा होने का भाव।
  • परिलक्षित – अच्छी तरह दिखाई देना।
  • सहचरी – साथिन, साथी।
  • पैशाचिकता – राक्षस जैसा व्यवहार।
  • सखी – सहेली।
  • क्रूरता – निर्दयता, कठोरता।
  • अहंकार – अभिमान।
  • पोषण – पालना, बड़ा करना।
  • अभय – निडर, निर्भय।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश कन्हैयाताल मित्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित निबंध ‘वल-बहादुरी’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने बल और सहृदयता के अंतर को स्पष्ट करने के लिए साथ-साथ निडरता और शांति के समन्वय को मानवता के विकास की आधारभूमि बताया है।

व्याख्या:
लेखक बल और सहृदयता का अंतर स्पष्ट करते हुए कह रहा है कि बल अर्थात् शक्ति, पराक्रम में वीरता का निवास होता है, जबकि मन की कोमलता अथवा दयालुता में देवता होने का भाव रहता है। शक्ति अथवा पौरुष के अभाव में अच्छी तरह से कायरता, नपुंसकता के दयनीय दर्शन होते हैं। दूसरे शब्दों में वीरता के अभाव में मनुष्य में कायरता आ जाती है। कायरता के कारण ही उसका व्यवहार दयनीय हो जाता है। शक्ति और दयालुता की कमी के कारण ही पुरुष का उग्र रूप दिखाई देता है। इससे वह निर्दयतापूर्वक अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है। इससे उसमें राक्षसी प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है।

कायरता या नपुंसकता भय से पैदा होती है। इसीलिए कायरता भय (डर) का पिता है और हीनता उसकी साथिन हैं। दूसरे शब्दों में कायरता से मनुष्य के मन में भय उत्पन्न होता है और भय से हीनता आती है। राक्षसी व्यवहार की सहेली निर्दयता है और वह अज्ञान के पुत्र अभिमान को पालती है। दूसरे शब्दों में मनुष्य में अज्ञानता के कारण अभिमान और घमंड आता है और उसी के वशीभूत होकर वह राक्षसों जैसा व्यवहार करता है।

वीरता का भाव निर्भयता को जन्म देता है और दयालुता या श्रद्धा का भाव शांति की भावना उत्पन्न करता है। जब निडरता और शांति मिल जाते हैं, तो यह सुंदर सम्मिलन ही मानवता के विकास की पवित्र भूमि है। दूसरे शब्दों में निडरता और शांति जब मिल जाते. हैं, तो मानवता के विकास की पुण्य भूमि तैयार हो जाती है।

विशेष:

  1. बल और सहृदयता का अंतर स्पष्ट किया गया है। कायरता और भय तथा अज्ञान और अहंकार का संबंध भी स्पष्ट किया गया है।
  2. भाषा कठिन है। समास शैली का प्रयोग किया गया है।
  3. लेखक ने गागर में सागर भरने का प्रयास किया है।
  4. भाषा सूक्ति समान वाक्यों से बोझिल है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
बल और सहृदयता का अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बल और सहृदयता में यह अंतर है कि बल अर्थात् शक्ति और पराक्रम में वीरता का निवास होता जबकि सहृदयता में देवत्व का निवास होता है।

प्रश्न (ii)
मानवता का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
मनुष्य में पौरुष से निडरता उत्पन्न होती है। सहृदयता की कोमलता और दयालुता की भावना आती है। उस समय उसमें शांति उत्पन्न होती है। जब मनुष्य में अभय और शान्ति का सुन्दर और संतुलित सम्मिश्रण हो जाता है तो उसमें मानवता का विकास होता है।

प्रश्न (iii)
मनुष्य में कायरता कैसे उत्पन्न होती है?
उत्तर:
मनुष्य में कायरता भय से उत्पन्न होती है और भय से हीनता की भावना उत्पन्न होती है। इस प्रकार भय और हीनता से कायरता आती है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
मनुष्य राक्षसी व्यवहार क्यों करता है?
उत्तर:
मनुष्य में अज्ञानता के कारण अहंकार उत्पन्न होता है और अहंकार के वशीभूत होकर ही मनुष्य राक्षसी व्यवहार करता है।

प्रश्न (ii)
सहृदयता का अभाव मनुष्य को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
सहदयता के अभाव में पुरुष उग्र रूप धारण कर लेता है। वह निर्दयतापूर्वक वल का दुरुपयोग करता है। उसमें राक्षसी प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। मनुष्य इससे प्रभावित होकर अन्याय व अत्याचार जैसे पाप कर्म करने लगता है।

प्रश्न (iii)
राक्षसी व्यवहार की सखी और अज्ञान का पुत्र किसे कहा गया है?
उत्तर:
राक्षसी व्यवहार की सखी क्रूरता को ओर अज्ञान का पुत्र अहंकार को कहा गया है।

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प्रश्न 2.
रावण भी बली था और राम भी, कृष्ण में भी बल का अधिष्ठान था और कंस में भी, पर एक की आज जयंती मनाई जाती है और दूसरे का स्मरण हमारे हृदयों में घृणा के उद्रेक का कारण होता है। बात क्या है? एक ने अपने बल का उपयोग किया जनता के अधिकारों की रक्षा में और दूसरे ने उनके अपहरण में, एक के बल का पथ-प्रदर्शक था प्रेम और दूसरे का स्वार्थ, बस दोनों का यही अंतर है। इसका अर्थ यह हुआ कि सबल के बल का सदुप्रयोग की उसकी सफलता की एकमात्र कुंजी है। (Page 26) (M.P. 2010)

शब्दार्थ:

  • बली – बलवान, शक्तिशाली।
  • अधिष्ठान – संस्था, वासस्थान।
  • जयंती – जन्मदिन।
  • स्मरण – यादगार।
  • उद्रेक – वृद्धि, अधिकता।
  • पथ-प्रदर्शक – मार्ग दिखाने वाला।
  • अपहरण – छीन लेना, स्वार्थसिद्ध के लिए किसी को बलपूर्वक उठा ले जाना।
  • सबल – सशक्त, बलवान।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित निबंध ‘वल-बहादुरी’ से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक ने वल के सेदुपयोग और दुरुपयोग में अंतर स्पष्ट किया है।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि रावण भी शक्तिशाली था और राम भी शक्तिशाली थे। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भी शक्ति के पुंज थे और कंस भी बलशाली था। जब ये चारों बलशाली और शक्तिशाली थे तो भी इनमें से एक का जन्मदिन बड़ी – धूमधाम से मनाया जाता है जबकि दूसरे की याद आते ही हमारे हृदयों में घृणा की वृद्धि होती है। इसका कारण है एक ने अपनी शक्ति का उपयोग जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए किया था।

उसने अन्याय, अत्याचारी, दुराचारी, राक्षस प्रवृत्ति के लोगों के चंगुल में फँसी जनता को मुक्ति दिलाने के लिए उनका संहार किया। दूसरे ने जनता के अधिकारों का बलपूर्वक हनन किया। उनके अधिकारों को छीना और जनता को सताया। एक ने शक्ति का मार्ग दिखाने का कार्य प्रेम से किया। उसने प्रेम के द्वारा जनता को अपना बनाया जबकि दूसरे ने अपनी ताकत का प्रयोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया। दोनों में अपनी शक्ति के प्रयोग में यही अंतर था।

एक ने दूसरों के हित के लिए प्रेम का मार्ग अपनाकर शक्ति का सदुपयोग किया, तो दूसरे ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया। इसका आशय यह हुआ कि शक्तिशाली की ताकत का सदुपयोग ही उसकी सफलता का आधार है। अपनी शक्ति का सदुपयोग करने वालों का जन्मदिन मनाया जाता है और दुरुपयोग करने वालों के स्मरण मात्र से घृणा उत्पन्न होती है। अतः शक्ति के सदुपयोग में ही जीवन की सफलता है।

विशेष:

  1. लेखक ने शक्ति (बल) के सदुपयोग और दुरुपयोग का अंतर उदाहरण देकर किया है।
  2. भापा तत्सम शब्दावली प्रधान है और शैली सामासिक है।
  3. प्रत्येक वाक्य नपा-तुला सूक्ति समान है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
राम और कृष्ण की जयंती मनाई जाती है, क्यों?
उत्तर:
राम और कृष्ण दोनों ही शक्तिशाली थे। इन दोनों बलशालियों के जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं; क्योंकि इन्होंने अपने बल का सदुपयोग जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए किया था। उन्होंने अन्यायी, अत्याचारी और दुराचारी राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों से मुक्ति दिलाने के लिए उनका संहार किया था।

प्रश्न (ii)
रावण और कंस के स्मरण मात्र से हमारे हृदयों में घृणा क्यों उत्पन्न होती है?
उत्तर:
रावण और कंस शक्तिशाली थे, किन्तु उन्होंने अपनी शक्ति का दुरुपयोग जनता के अधिकारों का हनन करने में, जनता को सताने के लिए, अन्याय, अत्याचार और अपहरण आदि जघन्य कार्यों में किया। अतः उनके स्मरण मात्र से हमारे हृदय में घृणा उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3.
राम और कृष्ण के बल की पथ-प्रदर्शक कौन था?
उत्तर:
राम और कृष्ण के बल का पथ-प्रदर्शक प्रेम था। इसी प्रेम के कारण वे अपने बल का सदुपयोग करने में सफल रहे।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
राम और कृष्ण तथा रावण और कंस के शक्ति प्रयोग में क्या अन्तरथा?
उत्तर:
राम और कृष्ण ने अपनी शक्ति का सदुपयोग प्रेम के द्वारा जनता को अपना बनाने के लिए किया, जबकि रावण और कंस ने अपनी ताकत का दुरुपयोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया। दोनों के अपनी शक्ति के प्रयोग का यही अंतर था।

प्रश्न (ii)
राम व कृष्ण और रावण-कंस के पथ व प्रदर्शक कौन थे?
उत्तर:
राम व कृष्ण का पथ प्रदर्शक प्रेम था। उन्होंने परहित के लिए प्रेम का मार्ग अपनाकर शक्ति का सदुपयोग किया। रावण व कंस का पथ-प्रदर्शक स्वार्थ था। उन दोनों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया।

प्रश्न 3.
राष्ट्र एवं जातियों के गौरव की स्थिति पूर्णतः कोकिल के शिशुओं जैसी है। उसका जन्म होता है, शक्ति की कल्याणमयी गोद में पर वह पलता है प्रेम के पवित्रपालने में। बल उसकी नसों में अभिमान एवं कर्मण्यता के रक्त का संचार करता है और प्रेम उसे त्याग का अमृत पिलाकर अमर करने का प्रयत्न । बल एवं प्रेम का यह सात्त्विक सहयोग ही राष्ट्रों के निर्माण की मूल शिला और इन दोनों का पारस्परिक विरोध ही विश्व के विशाल राष्ट्रों एवं जातियों के खंडहरों का सच्चा एवं हृदयबेधी इतिहास है। (Page 27)

शब्दार्थ:

  • गौरव – गर्व, महत्त्व, प्रतिष्ठा, बड़प्पन।
  • कोकिल – कोयल। कल्याणमयीसौभाग्यशाली, मंगलकारी।
  • पवित्र – शुद्ध, निर्मल, निश्छल।
  • पालना – भरण-पोषण करना, भोजन-वस्त्र आदि देकर बड़ा करना।
  • अभिमान – घमंड, गर्व।
  • नसों – रुधिर वाहिनी नलिकाएँ।
  • कर्मण्यता – कर्तव्यपरायणता, संचार-गमन, मार्गदर्शन, संदेशवाहक साधन का प्रकार।
  • अमृत – सुधा, वह वस्तु जिसके पीने से मुर्दा जी उठे।
  • अमर – अविनाशी, न मरने वाला।
  • सात्त्विक – सत्वगुणयुक्त, ईमानदार, नेक, शक्तिशाली।
  • हृदयबेधी – हृदय को बेधने वाला, हृदय को छलनी करने वाला।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित निबंध ‘बल-बहादुरी’ से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक ने राष्ट्र एवं जातियों के उत्थान तथा पतन को रेखांकित किया है।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि राष्ट्र (देश) और जातियों की प्रतिष्ठा की स्थिति संपूर्ण रूप से कोयल के शिशुओं (बच्चों) की भाँति होती है। राष्ट्र और जातियों का उदय होता है और वे शक्ति की मंगलकारी गोद में प्रेम के निश्छल पालने में उनका भरण-पोषण होता है। यही कारण है कि उसकी खून वाहिनी नलिकाओं में गर्व एवं कर्तव्य पालने का भाव भरा होता है। अर्थात् देश और जातियों के लोगों में अपने देश व जातियों के प्रति गर्व और कर्तव्य की भावना भरी होती है।

वह निश्छल प्रेम उसे अपने देश व जाति के लिए सर्वस्व बलिदान करने का अमृत पिलाकर अमर वना देता है। शक्ति (ताकत) और स्नेह का यह सत्वगुणयुक्त सहयोग ही राष्ट्र के उत्थान की आधारशिला है और यदि बल और प्रेम में परस्पर विरोध हो तो संसार के विशाल (बड़े) राष्ट्रों एवं जातियों का पतन हो जाता है। विश्व में विभिन्न राष्ट्रों एवं जातियों के अवशेष इसी सच्चाई एवं हृदय को बेधने वाला इतिहास इसका साक्षी है।

विशेष:

  1. राष्ट्रों एवं जातियों के उत्थान व पतन के कारणों को स्पष्ट किया गया है। प्रेम एवं बल का सहयोग राष्ट्रों का उत्थान करता है, तो इनका विरोध उनका पतन।
  2. भाषा तत्सम प्रधान एवं दुरूह है किन्तु सुगठित है।
  3. समासयुक्त शैली है।
  4. प्रत्येक वाक्य सूक्ति लगता है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
राष्ट्र एवं जातियों के गौरव की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
राष्ट्र एवं जातियों के गौरव की स्थिति कोकिल के बच्चों जैसी होती है। राष्ट्र और जातियों का जन्म होता है किन्तु उनका पालन-पोषण शक्ति और प्रेम के द्वारा होता है। इससे ही उन्हें गौरव प्राप्त होता है।

प्रश्न (ii)
राष्ट्रों एवं जातियों का उत्थान-पतन कैसे होता है?
उत्तर:
प्रेम और बल का सहयोग राष्ट्रों का उत्थान करता है तो इनका विरोध उनका पतन करता है।

प्रश्न (iii)
विश्व के विशाल राष्ट्रों एवं जातियों का हृदयवेधी इतिहास कैसे बनताहै?
उत्तर:
प्रेम और बल का पारस्परिक विरोध ही विश्व के विशाल राष्ट्रों एवं जातियों का हृदयवेधी इतिहास बनता है। उन दोनों के पारस्परिक विरोध और संघर्ष से राष्ट्र और जातियाँ नष्ट हो जाती हैं और इतिहास का भाग बन जाती हैं।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
राष्ट्रों के निर्माण की आधारशिला क्या है?
उत्तर:
बल और प्रेम का सात्त्विक सहयोग राष्ट्रों के निर्माण की आधारशिला है।

प्रश्न (ii)
राष्ट्रों एवं जातियों के रक्त में बल और त्याग किसका संचार करते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रों एवं जातियों के रक्त में बल अभियान एवं कर्मण्यता का संचार करता है। प्रेम उसमें त्याग की भावना उत्पन्न कर अमर बनाने का प्रयास करता है।

प्रश्न 4.
बल आकर्षण का केंद्र है। बल का उपयुक्त प्रदर्शन अपनों और बिगानों, सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। सबल को सभी मुग्ध दृष्टि से देखते हैं, प्रेम और श्रद्धा का स्नेहोपहार उसके चरणों में समर्पित कर सभी अपने को धन्य समझते हैं, पर वीर अपने प्रतिद्वंद्वी वीर के एक प्रशंसा-वाक्य को जनसाधारण के अतिशयोक्तिपूर्ण अपने भाषणों से अधिक महत्त्व देता है। वास्तव में एक कवि ही दूसरे कवि की सच्ची प्रशंसा करने का अधिकारी है और एक वीर ही दूसरे वीर का सच्चा सम्मान कर सकता है।

इतिहास-रत्न जयमल और वीर शिरोमणि फत्ता का हम कितना ही गुण-गान करें। पर उनका सच्चा सम्मान तो मुगल सम्राट वीर अकबर ही कर सकता था। झाँसी की वीर महारानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में हम कितने ही काव्यों का निर्माण क्यों न करें, उस देवी का वास्तविक सम्मान ब्रिटिश सेना के वीर सेनापति ह्यू रोज के वे शब्द हैं, जो आज भी इतिहास के स्वर्ण-पृष्ठों में अपनी दिव्य-प्रकाश-माला के साथ जगमगा रहे हैं। (Page 27)

शब्दार्थ:

  • आकर्षण – अपनी ओर खींचना।
  • प्रदर्शन – दिखावा।
  • बेगानों – परायों, दूसरों।
  • मुग्ध – मोहित, सुंदर।
  • स्नेहोपहार – प्रेम का उपहार।
  • प्रतिद्वंद्वी – विरोधी, विपक्षी।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित निबंध ‘बल-बहादुरी’ से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक ने बल के महत्व को व्यक्त किया है।

व्याख्या:
बल अर्थात् शक्तिशाली व्यक्ति सभी का ध्यान अपनी ओर खींचता है। वह सभी के आकर्षण का केंद्र होता है। शक्ति का उपयुक्त प्रदर्शन अपने आत्मीयजनों, सगे-संबंधियों एवं मित्रों के साथ-साथ परायों को भी अपनी ओर खींचता है। सशक्त व्यक्ति को सभी मोहित करने वाली दृष्टि से देखते हैं। इतना ही नहीं वे प्रेम (स्नेह) और श्रंद्धा का प्रेममयी उपहार (भेंट) भी उसके चरणों में समर्पित कर स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं। दूसरे शब्दों में, शक्तिशाली, बलशाली व्यक्ति को अपने तथा परायों का स्नेह प्राप्त होता है।

सभी उसके प्रति प्रेम व श्रद्धा रखते हैं। परन्तु जो सच्चा वीर होता है बहादुर होता है, वह अपने प्रबल विरोधी वीर के एक प्रशंसाभरे वाक्य को अधिक महत्त्व देता है। वह जन-सामान्य के द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर की गई प्रशंसा के भाषणों को अधिक महत्त्व नहीं देता। सत्य तो यह है कि एक कवि ही दूसरे कवि की कविताओं की वास्तविक प्रशंसा कर सकता है क्योंकि उसे कविता के गुण-दोषों का ज्ञान होता है।

इसी प्रकार एक सच्चा वीर ही दूसरे वीर की बहादुरी का सच्चा आदर कर सकताहै। इतिहास में रत्न माने जाने वाले वीर जयमल और वीरों में श्रेष्ठ समझे जाने वाले फत्ता का हम लोग कितना ही गुणगान करें, परंतु उनका सच्चा सम्मान तो मुगल सम्राट अकबर ही कर सकता है। यह इसलिए कि उन दोनों ने मुगल सम्राट अकबर की विशाल सेना का सामना किया था। सम्राट ने इनकी बहादुरी को देखा-परखा था।

लेखक कहता है कि इसी प्रकार झाँसी की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में हम कितने ही काव्य-ग्रंथों का निर्माण क्यों न कर लें किंतु उस वीरांगना का उचित सम्मान तो ब्रिटिश सेना के बहादुर सेनापति ह्यूरोज द्वारा रानी के संबंध में कहे वे शब्द हैं जो इतिहास के सुनहरे पृष्ठों में आज भी अपनी दिव्य-प्रकाश-माला के साथ चमक रहे हैं। कहने का भाव यह है कि रानी के संबंध में सेनापति ह्यूरोज द्वारा कहे गए शब्द ही सर्वाधिक रूप में अपना महत्त्व रखते हैं। वही उनकी बहादुरी के प्रमाण हैं। एक वीर ही दूसरे वीर का सर्वोच्च सम्मान कर सकता है।

विशेष:

  1. बल और बहादुरी के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान है। सामासिक शैली है।
  3. प्रत्येक वाक्य सूक्ति का कार्य कर रहा है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
बल आकर्षण का केन्द्र कैसे है?
उत्तर:
बल आकर्षण का केन्द्र होता है। शक्तिशाली व्यक्ति की ओर सभी ध्यान देते हैं। यह इसलिए कि वह अपनी शक्ति-प्रदर्शन के द्वारा अपने आत्मीयजनों, सगे-संबंधियों, मित्रों एवं दूसरों का ध्यान आकर्षित कर लेता है। उसे सभी मुग्ध दृष्टि से देखते हैं।

प्रश्न (ii)
वीर अपने प्रतिद्वंद्वी की बात को अधिक महत्त्व क्यों देते हैं?
उत्तर:
वीर अपने प्रतिद्वंद्वी वीर की बात को इसलिए महत्त्व देते हैं क्योंकि प्रतिद्वंद्वी . वीर ही उसकी वीरता का सच्चा मूल्यांकन कर सकता है। उसके द्वारा की गई प्रशंसा ही उसकी वास्तविक प्रशंसा होती है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
वीर जनसामान्य की प्रशंसा को महत्त्व क्यों नहीं देता?
उत्तर:
वीर जनसामान्य की प्रशंसा को महत्त्व नहीं देता क्योंकि जनसामान्य उसकी प्रशंसा का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करते हैं। एक सच्चा वीर ही दूसरे वीर की बहादुरी की प्रशंसा कर सकता है, जनसामान्य नहीं।

प्रश्न (ii)
वीर जयमल और फत्ता का सच्चा सम्मान कौन कर सकता था औरक्यों?
उत्तर:
वीर जयमल और फत्ता का सच्चा सम्मान अकबर ही कर सकता था; क्योंकि उसने उनकी वीरता को देखा-परखा था।

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प्रश्न 5.
पश्चिम शरीर बल का उपासक है और भारत आत्मबल का। अपने-अपने क्षेत्र और समय में दोनों ही बल खूब फले-फूले और विकास की चरम सीमा तक पहुँचे। प्राचीनतम अतीत के अनंतर भी बुद्ध के रूप में भारत ने एक बार फिर अपने पक्ष की उज्ज्वलता घोषित की, पर अभी विश्व के विशाल प्रांगण में उसके पक्ष की सर्वोत्कृष्टता प्रमाणित होनी अवशिष्ट थी कि प्रकृति ने गाँधी की महासृष्टि की, जो युद्ध की पाशविकता की अहिंसा के साथ सफलतापूर्वक जोड़ एक सांस्कृतिक अनुष्ठान का रूप दे सका और यों भारतीय संस्कृति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने में सफल हुआ। (Page 28)

शब्दार्थ:

  • उपासक – उपासना करने वाला, आराधक।
  • आत्मबल – आत्मा का बल, मन का बल।
  • अनंतर – तुरंत बाद।
  • उज्ज्वलता – कांति, चमकता हुआ।
  • अवशिष्ट – शेष, बचा हुआ।
  • पाशविकता – पशु प्रवृत्ति।
  • अनुष्ठान – धार्मिक कृत्य।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित निबंध ‘बल-बहादुरी’ से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक ने बल के संबंध पश्चिमी और भारतीय दृष्टिकोण के अंतर को स्पष्ट किया है।

व्याख्या:
पश्चिमी सभ्यता अथवा पश्चिम के राष्ट्र शारीरिक-शक्ति की उपासना करने वाले हैं। वे शारीरिक बल को महत्त्व देते हैं जबकि भारतीय सभ्यता के लोग आत्मिक शक्ति को महत्त्व देते हैं। बल के संबंध में भारतीय और पश्चिम के दृष्टिकोण में पर्याप्त अंतर है। पश्चिम में शारीरिक बल और भारत में आत्मिक बल दोनों ही खूब विकसित हुए और अपने विकास की अंतिम सीमा तक पहुँचे। प्राचीनतम काल के तुरंत बाद भी महात्मा बुद्ध के रूप में भारत ने एक बार पुनः अपने आत्मबल की चमक बिखेरी। उनकी कांति चारों ओर फैलायी।

परंतु अभी तक संसार के विस्तृत क्षेत्र में उनके पक्ष की सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होनी बाकी थी कि प्रकृति ने महात्मा गाँधी की महासृष्टि की अर्थात् जब तक संसार महात्मा बुद्ध के आत्मबल को सर्वश्रेष्ठ मानता तब तक संसार में महात्मा गाँधी उत्पन्न नहीं हुए। वे ऐसे समय में उत्पन्न हुए जब संसार युद्धग्रस्त था और हिंसा, अन्याय, अत्वाच्यर के रूप में मनुष्य की पशु प्रवृत्ति उजागर हो रही थी। उन्होंने युद्ध की पाशविकता का अहिंसा के साथ सामना किया। उन्होंने पाशविकता को अहिंसा के साथ सफलतापूर्वक जोड़कर एक सांस्कृतिक अनुष्ठान का रूप दिया। दूसरे शब्दों में उन्होंने हिंसा के स्थान पर अहिंसा को महत्त्व दिया।

वे अहिंसा का सहारा लेकर बिना युद्ध के स्वतंत्रता प्राप्त करने में सफलता अर्जित कर भारतीय संस्कृति के इतिहास में एक नवीन अध्याय को जोड़ने में सफल हुए। महात्मा गाँधी ने अपने आत्मवल के द्वारा संसार में अहिंसा के महत्त्व को स्थापित किया। उन्होंने विशाल शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को भारत को स्वतंत्र करने के लिए विवश कर भारतीय संस्कृति के नए अध्याय का प्रारंभ किया।

विशेष:

  1. बल के संबंध में भारतीय दृष्टिकोण की महत्ता को स्थापित किया है। भारतीय संस्कृति में अहिंसा के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान है। सामासिक शैली है।
  3. प्रत्येक वाक्य सूक्ति प्रतीत होता है। वाक्य सुसंगठित हैं।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
बल के संबंध में पश्चिम और भारत के क्या विचार हैं?
उत्तर:
बल के संबंध में पश्चिम और भारत के विचारों में पर्याप्त अंतर है। पश्चिम शारीरिक बल का उपासक है, तो भारत आत्मबल का उपासक है। भारत ने प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक आत्मबल की श्रेष्ठता सिद्ध की है।

प्रश्न (ii)
महात्मा गाँधी ने आत्मबल के द्वारा किस नए अध्याय का प्रारंभ किया?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने अपने आत्मबल के द्वारा संसार में अहिंसा के महत्त्व को स्थापित किया। उन्होंने इसके द्वारा विशाल शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को भारत को स्वतंत्र करने के लिए विवश कर भारतीय संस्कृति में आत्मबल और अहिंसा के नए अध्याय का प्रारंभ किया।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
कौन-कौन से बल अपने विकास की चरम सीमा तक पहुँचे?
उत्तर:
शारीरिक बल तथा आत्मबल दोनों ही बल अपने-अपने क्षेत्र और समय में खूब, फले-फूले और विकास की चरम सीमा तक पहुँचे। पशिप में शारीरिक बल और भारत में आत्मिक बल विकास की चरम तक पहुँचे।

प्रश्न (ii)
महात्मा गाँधी की प्रवृति ने कैसे समय में महासृष्टि की?
उत्तर:
महात्मा गाँधी की प्रवृत्ति ने ऐसे समय में महासृष्टि की जब पूरा संसार युद्धग्रस्त था। चारों ओर हिंसा, अन्याय और अत्याचार के रूप में मनुष्य की पशु-प्रवृत्ति प्रकट हो रही थी। उन्होंने युद्ध की पाशविकता का आत्मबल और अहिंसा से सामना किया।

MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 6 Application of Derivatives Ex 6.1

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