MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व

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MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व

d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व NCERT पाठ्यनिहित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आद्य अवस्था में सिल्वर परमाणु में पूर्ण भरे d-कक्षक (4d10) होते हैं। इसे आप कैसे कह सकते हैं कि यह संक्रमण तत्व है?
उत्तर
सिल्वर +2 ऑक्सीकरण अवस्था रखता है। 4d-उपकक्ष में नौ इलेक्ट्रॉन होते हैं, जैसे 4dकक्षकों का एक कक्ष आंशिक भरा होता है। अतः इसे संक्रमण तत्व नहीं मान सकते।

प्रश्न 2.
श्रेणी Sc(Z = 21) से Zn(Z = 30) में, Zn की परमाणुकरण की एन्थैल्पी कम होती है, 126 kJmol-1 क्यों?
उत्तर
जिंक में 3d-इलेक्ट्रॉन धात्विक बन्ध में भाग नहीं लेते क्योंकि d10 विन्यास होता है। दुर्बल धात्विक बंध के कारण जिंक की परमाणुकरण की एन्थैल्पी निम्न होती है।

प्रश्न 3.
संक्रमण धातुओं की 3d श्रेणी में किसकी अधिकतम संख्या में ऑक्सीकरण अवस्था होती है एवं क्यों ?
उत्तर
Mn(Z = 25) अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थायें रखते हैं, क्योंकि इसमें अधिकतम संख्या में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। अत: यह +2 से +7 तक ऑक्सीकरण अवस्थायें दर्शाता है।

प्रश्न 4.
E°(M2+/M) का मान कॉपर के लिए धनात्मक (+034V) है। इसका संभावित कारण क्या है ? (संकेत : इसकी उच्च ΔaH एवं निम्न ΔhydH मानने पर) –
उत्तर
किसी धातु की E° (M2+/M) पूर्ण परमाणुकरण की एन्थैल्पी, आयनन एन्थैल्पी एवं जलयोजन एन्थैल्पी पर निर्भर होती है। कॉपर की उच्च परमाणुकरण एन्थैल्पी एवं निम्न आयनन एन्थैल्पी होती है। अतः E° (Cu2+ /Cu) धनात्मक है।

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प्रशन 5.
संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी में (प्रथम एवं द्वितीय) आयनन एन्थैल्पियों में अनियमित क्रमिकता को किस प्रकार देखते हो? ।
उत्तर
आयनन एन्थैल्पी में अनियमित क्रम (प्रथम एवं द्वितीय) का कारण मुख्यतः विभिन्न 3dविन्यासों के भिन्न स्थायित्व की मात्रा के कारण होता है। d0, d5 एवं d10 विन्यास अतिरिक्त स्थायित्व रखता है एवं ऐसे प्रकरणों में आयनन एन्थैल्पी के मान सामान्यत: उच्च होते हैं। उदाहरण, Cr के प्रथम आयनन एन्थैल्पी के नाम निम्न होते हैं, क्योंकि 4s- कक्षक से इलेक्ट्रॉन को निकाला जा सकता है, किन्तु द्वितीय आयनन एन्थैल्पी अति उच्च होती है, अत: Cr+ में स्थायी d5 विन्यास होता है। Zn की प्रथम आयनन एन्थैल्पी अति उच्च होती है, क्योंकि स्थायी विन्यास 3d10,4s2 से इलेक्ट्रॉन हटाया जाता है।

प्रश्न 6.
धातु अपने उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था में केवल ऑक्साइड अथवा फ्लोराइड में रहते हैं, क्यों?
उत्तर
क्योंकि ऑक्सीजन एवं फ्लुओरीन का आकार छोटा एवं ऋण-विद्युतता उच्च होती है, इस प्रकार ये सरलता से धातु को उसकी उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत करता है।

प्रश्न 7.
Cr2+ अथवा Fe2+ में से कौन-सा प्रबल अपचायक अभिकर्मक है एवं क्यों ?
उत्तर
Fe2+ से Cr2+ प्रबल अपचायक अभिकर्मक है। इसका कारण है कि Cr2+ का विन्यास d4 ‘से d3 एवं d3 विन्यास में परिवर्तित होता है, जो स्थायी t32(g)(138) अर्द्धपूर्ण t2) स्तर है।

प्रश्न 8.
M2+(aq) आयन (Z = 27) के लिए ‘चक्रण खेल’ चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
उत्तर
M2+(aq) आयन (Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है :
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इस प्रकार तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। ‘चक्रण केवल’ चुम्बकीय आघूर्ण
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प्रश्न 9.
Cu+ आयन जलीय विलयनों में क्यों स्थायी नहीं हैं, समझाइये?
उत्तर
Cu+(aq) जलीय विलयन में स्थायी नहीं है, क्योंकि इसकी Cu+(aq) की तुलना में निम्न ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी है।

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प्रश्न 10.
लैन्थेनॉइड संकुचन की तुलना में तत्वों से तत्वों में एक्टीनॉइड संकुचन अधिक है, क्यों ?
उत्तर
लैन्थेनॉयड के 4f इलेक्ट्रॉनों की तुलना में एक्टीनॉयड्स में 5f इलेक्ट्रॉनों का कमजोर परिरक्षण प्रभाव के कारण होता है।

d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व NCERT पाठ्य-पुस्तक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए –
(i) Cr3+
(ii) Cu+
(i) CO2+
(iv) Mn2+
(v) Pm3+
(vi) Ce4+
(vii) Lu2+
(viii) Th4+
उत्तर
(i) Cr+3 : [Ar]3d3
(ii) Cu+1 : [Ar]3d10
(iii) CO+2 : [Ar]3d7
(iv) Mn+2 : [Ar]3d5
(v) Pm+3 : [Xe]4f4
(vi) Ce+4 : [Xe]54 .
(vii) Lu+2 : [Xe]4 f145d1
(vii) Th+4: [Rn].

प्रश्न 2.
+3 अवस्था में Mn+2 यौगिक Fe+2 से ऑक्सीकरण में अधिक स्थायी है, क्यों?
उत्तर
Mn+2 का स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar]4s0,3d5 होता हैं एवं यह सरलता से Mn+3 में परिवर्तित नहीं होता, Fe+2[Ar] 4s0,3d6 ऑक्सीकरण पर Fe+3[Ar] 4s0,3d5 बनाता है जो अधिक स्थायी विन्यास है।

प्रश्न 3.
परमाणु क्रमांक में वृद्धि से संक्रमण तत्वों के प्रथम श्रेणी के पहले आधे की +2 अवस्था अधिक एवं अधिक स्थायी होती हैं, विस्तृत विवेचना कीजिए।
उत्तर
स्कैण्डियम (जो +3 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है) को छोड़कर, प्रथम श्रेणी के सभी संक्रमण तत्व +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं । यह 4s के दो इलेक्ट्रॉनों के त्यागने के कारण होता है। प्रथम चरण में, जब हम Ti+2 से Mn+2 की तरफ चलते हैं, तो इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d2 से 3d5 में परिवर्तित होता है, जिसका अर्थ है अधिक-से-अधिक d-कक्षकों का अर्द्धपूर्ण भरना है, जो +2 अवस्था को अधिक स्थायित्व प्रदान करते हैं।

प्रश्न 4.
संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी में ऑक्सीकरण अवस्थाओं के स्थायित्व का निर्धारण इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों से कितना किया जा सकता है ? अपने उत्तर को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
संक्रमण श्रेणी में, ऑक्सीकरण अवस्थायें अर्द्धपूर्ण अथवा पूर्ण भरे हुए d-कक्षक अधिक स्थायी है। उदाहरण के लिए, Fe(Z = 26) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar]3d64s2 है। यह दर्शाता है कि विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं में Fe(III) अधिक स्थायी है, क्योंकि यह विन्यास [Ar]3d5 रखता है।

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प्रश्न 5.
संक्रमण तत्व के स्थायी ऑक्सीकरण अवस्था, आद्य अवस्था में इनके परमाणुओं के d इलेक्ट्रॉन विन्यासों : 3d3,3d5,3d8 एवं 3d4 में से क्या होगी? ।
उत्तर
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3d4 आद्य अवस्था में कोई d4 विन्यास नहीं होता।

प्रश्न 6.
प्रथम श्रेणी के संक्रमण धातुओं के ऑक्सो धातु ऋणायनों के नाम बताइये, जिसमें धातु की ऑक्सीकरण अवस्था समूह संख्या के बराबर होती है।
उत्तर
CrO2-7 एवं CrO2-4 (समूह संख्या = Cr की ऑक्सीकरण अवस्था = 6) MnO4 (समूह संख्या = Mn की ऑक्सीकरण अवस्था = 7)

प्रश्न 7.
लैन्थेनॉयड संकुचन क्या है ? लैन्थेनॉयड संकुचन के प्रभाव क्या होंगे?
उत्तर
लैन्थेनाइड संकुचन-लैन्थेनाइडों के परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ-साथ उनके परमाणुओं एवं आयनों के आकार में कमी होती है, इसे लैन्थेनाइड संकुचन कहते हैं।।
कारण-लैन्थेनाइडों में आने वाला नया इलेक्ट्रॉन बाह्यतम कक्ष में न जाकर (n-2)f- उपकोश में प्रवेश करता है, फलतः इलेक्ट्रॉन और नाभिक के मध्य आकर्षण बल में वृद्धि होती है, जिससे परमाणु अथवा आयन संकुचित हो जाता है।

लैन्थेनाइड संकुचन का प्रभाव :
(i) लैन्थेनाइडों के गुणों में परिवर्तन-लैन्थेनाइड संकुचन के कारण इनके रासायनिक गुणों में बहुत कम परिवर्तन होता है। अतः इन्हें शुद्ध अवस्था में प्राप्त करना अत्यन्त कठिन होता है।
(ii) अन्य तत्वों के गुणों पर प्रभाव-लैन्थेनाइड संकुचन का लैन्थेनाइडों से पूर्व आने वाले तथा इनके बाद आने वाले तत्वों के आपेक्षिक गुणों पर बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, Ti और Zr के गुणों में भिन्नता होती है, जबकि Zr और Hf गुणों में काफी समानता रखते हैं।

प्रश्न 8.
संक्रमण तत्वों के अभिलक्षण क्या हैं एवं इन्हें संक्रमण तत्व क्यों कहते हैं ? कौन से dब्लॉक तत्वों को संक्रमण तत्व नहीं माना जा सकता?
उत्तर
संक्रमण तत्व वे तत्व हैं जिसके अणुओं में (स्थायी ऑक्सीकरण अवस्था में) आंशिक रूप से पूर्ण d-ऑर्बिटल विद्यमान होते हैं। इन तत्वों को d-ब्लॉक के तत्व भी कहते हैं, ये 5-ब्लॉक तथा p-ब्लॉक के तत्वों के गुणों में संक्रमण प्रदर्शित करते हैं। इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व कहा जाता है। Zn, Cd एवं Hg जैसे तत्वों को संक्रमण तत्वों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि इनमें पूर्ण पूरित d-उपकक्षक पाये जाते हैं।

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प्रश्न 9.
नॉन-संक्रमण तत्वों से संक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस प्रकार भिन्न हैं ?
उत्तर
संक्रमण तत्वों में d-कक्षकों को भरते हैं, जबकि प्रतिनिधि तत्वों में 5-एवं p-कक्षकों को भरते हैं। संक्रमण तत्वों के सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-1)d1-10ns1-2 है, जबकि प्रतिनिधि तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns1-2 अथवा ns2np1-6 होता है। प्रतिनिधि तत्वों में केवल अंतिम कक्ष अपूर्ण होता है जबकि संक्रमण तत्वों में उपात्य कक्ष अपूर्ण होता है।

प्रश्न 10.
लैन्थेनॉयड्स कौन-सी विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थायें रखते हैं ?
उत्तर
लैन्थेनॉयड्स का मुख्य ऑक्सीकरण अवस्था + 3 है। इसके अतिरिक्त ये + 2 एवं + 4 ऑक्सीकरण अवस्थायें रखते हैं।

प्रश्न 11.
कारण सहित समझाइए-
(i) संक्रमण धातुओं एवं इनके अनेक यौगिक अनुचुम्बकीय व्यवहार दर्शाते हैं।
(ii) संक्रमण धातुओं के परमाण्वीयकरण की एन्थैल्पी उच्च होती है।
(iii) संक्रमण धातुएँ सामान्यतः रंगीन यौगिक बनाते हैं।
(iv) संक्रमण धातुएँ एवं इसके अनेक यौगिक अच्छे उत्प्रेरक होते हैं।
उत्तर
(i) जब किसी यौगिक को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो यौगिक के भीतर का चुम्बकत्व बाहरी चुम्बकीय क्षेत्र से प्रभावित होता है। यदि भीतर का चुम्बकत्व बाहरी चुम्बकीय क्षेत्र का साथ देता है तो उसे अनुचुम्बकीय गुण कहते हैं। यदि यौगिक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हो तो अनुचुम्बकत्व प्रबल हो जाता है अर्थात् किसी यौगिक के अनुचुम्बकत्व की मात्रा उसमें उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों पर निर्भर होती है। संक्रमण तत्वों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, अतः वे अनुचुम्बकीय होते हैं। .

(ii) संक्रमण धातुओं में उच्च प्रभावी न्यूक्लियर आवेश तथा संयोजी इलेक्ट्रॉनों की अधिक संख्या होती है इसलिए ये बहुत मजबूत धात्विक बंध बनाते हैं। परिणामस्वरूप संक्रमण धातुओं के परमाण्विकरण की एन्थैल्पी उच्च होती है।

(iii) संक्रमण धातु आयनों का रंग अपूर्ण रूप से भरे हुए (n-1)d कक्षकों के कारण होता है। संक्रमण धातु आयनों में जिनमें अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉन हैं, इस इलेक्ट्रॉन का एक d-कक्षक से दूसरे d-कक्षक में संक्रमण होता है। इस संक्रमण के समय वे दृश्य प्रकाश के कुछ विकिरणों का अवशोषण करते हैं तथा शेष विकिरणों को रंगीन प्रकाश के रूप में उत्सर्जित कर देते हैं। अत: आयन का रंग उसके द्वारा अवशोषित रंग का पूरक (Complementary) होता है। उदाहरणार्थ, [Cu(H2O)6]+2 आयन नीला दिखता है, क्योंकि यह दृश्य प्रकाश के लाल रंग को इलेक्ट्रॉन के उत्तेजना के लिए अवशोषित करता है तथा उसके पूरक (नीले) रंग को उत्सर्जित कर देता है।

कुछ आयनों के रंग –
Cr4+ नीला : Cr3+ बैंगनी
Mn2+ बैंगनी : Mn3+ गुलाबी
Fe2+ हरा : Fe3+ पीला

(iv) संक्रमण तत्व परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि (n-1)d-कक्षक तथा ns-कक्षक के इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा में बहुत अधिक अन्तर नहीं होता है, जिससे d-कक्षक के इलेक्ट्रॉन भी संयोजी इलेक्ट्रॉन का कार्य करते हैं। इन तत्वों में Mn अधिकतम परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 12.
अन्तराकाशी यौगिक क्या है ? संक्रमण धातुओं के ऐसे यौगिक क्यों ज्ञात हैं ?
उत्तर
अधिकांश संक्रमण तत्व उच्च ताप पर अधात्विक तत्वों के परमाणुओं जैसे-H, B,C, Ni, Si आदि के साथ अन्तराकाशी यौगिक बनाते हैं। संक्रमण धातु के क्रिस्टल जालक के अन्तराकाशी रिक्तियों में ये अधात्विक तत्वों के छोटे परमाणु ठीक-ठीक फिट हो जाते हैं। ये अन्तराकाशी यौगिक कहलाते हैं।

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प्रश्न 13.
नॉन-संक्रमण धातुओं से संक्रमण धातुओं की परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थायें भिन्न कैसे होती हैं ? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
संक्रमण तत्वों में उत्तरोत्तर ऑक्सीकरण अवस्थाओं में इकाई का अन्तर आता है। उदाहरण के लिए, Mn सभी ऑक्सीकरण अवस्थायें +2 से +7 दर्शाता है। जबकि नॉन-संक्रमण धातुएँ परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ रखती हैं, जिनमें दो इकाई का अन्तर होता है, उदाहरण के लिए Pb(II), Pb(IV), Sn(II), Sn(IV).

प्रश्न 14.
आयरन क्रोमाइट अयस्क से पोटैशियम डाइक्रोमेट के बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। पोटैशियम डाइक्रोमेट विलयन की pH बढ़ाने पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर
बनाने की विधि-

बनाने की विधि-K2Cr2O7 को क्रोमाइट अयस्क (Fe2Cr2O4) या क्रोम आयरन (FeO.Cr203) से बनाया जाता है, जो निम्नलिखित पदों में होते हैं।

(1) क्रोमाइट अयस्क का सोडियम क्रोमेट में परिवर्तन-क्रोमाइट अयस्क को NaOH या Na2CO3 के साथ वायु की उपस्थिति में एक परावर्तनी भट्टी में गर्म करने पर सोडियम क्रोमेट (पीला रंग) बनता है।
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पदार्थ को छिद्रमय रखने हेतु कुछ मात्रा में शुष्क चूने को मिलाते हैं । जल के साथ निष्कर्षण करने पर Na2Cr2O3 विलयन में चला जाता है। जबकि Fe2O3 रह जाता है जिसे छानकर पृथक् कर लेते हैं।

(2) सोडियम क्रोमेट (Na2CrO4) का सोडियम डाइक्रोमेट (Na2Cr2O7) में परिवर्तन-सोडियम क्रोमेट विलयन सान्द्र H2SO4 के साथ अपचयित करके सोडियम डाइक्रोमेट बनाते हैं।
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2Na2CrO4 कम विलेय होता है जिसका वाष्पन करने पर Na2SO410H2O के रूप में क्रिस्टलीकृत हो जाता है जिसे पृथक् कर लिया जाता है।

(3) Na2Cr2O7 का K2Cr2O7 में परिवर्तन-सोडियम डाइक्रोमेट के जलीय विलयन का उपचार KCI के साथ किये जाने पर पोटैशियम डाइ क्रोमेट प्राप्त होता है। K2Cr2O7 के अल्प विलेय प्रकृति के कारण इसके क्रिस्टल ठण्डे में प्राप्त किये जाते हैं।

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K2Cr2O7 की निम्न के साथ होने वाली रासायनिक अभिक्रिया –

(1) अम्लीय फेरस सल्फेट के साथ-K2Cr207 अम्लीय माध्यम में यह फेरस सल्फेट को फेरिक सल्फेट में ऑक्सीकृत कर देता है। K2Cr2O7 पहले H2SO4 से क्रिया करके नवजात ऑक्सीजन का तीन परमाणु देता है जो Fe2+ को Fe3+ आयन में ऑक्सीकृत कर देता है।
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pH बढ़ाने पर प्रभाव-पोटैशियम क्लोराइड सोडियम क्लोराइड से कम विलेयशील होता है। ये ऑरेंज क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होते है तथा इन्हें फिल्ट्रेशन से हटाया जा सकता है। pH 4 पर डाइक्रोमेट आयन (CrO72-) क्रोमेट आयन CrO4 2-के रूप में उपस्थित होते हैं । ये pH के मान में परिवर्तन के अनुसार एक-दूसरे में परिवर्तनशील होते हैं।
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प्रश्न 15.
पोटैशियम डाइक्रोमेट की ऑक्सीकरण क्रियायें समझाइये एवं इनकी निम्न के साथ आयनिक अभिक्रियायें लिखिए
(i) आयोडाइड, (ii) आयरन (II) विलयन एवं (ii) H2S.
उत्तर
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 (K2Cr2O7 की निम्न के साथ होने वाली रासायनिक अभिक्रिया) देखें।

प्रश्न 16.
पोटैशियम परमैंगनेट के बनाने की विधि का वर्णन कीजिए।अम्लीकृत परमैंगनेट विलयन निम्न से कैसे क्रिया करता है
(i) आयरन (II) आयनों से, (ii) SO2 एवं (ii) ऑक्सेलिक अम्ल ? अभिक्रियाओं की आयनिक समीकरणों को लिखिए।
उत्तर
KMnO4, पायरोलुसाइट से बनाया जा सकता है, अयस्क को KOH के साथ वायुमण्डलीय ऑक्सीजन या ऑक्सीकृत एजेन्ट जैसे- KNO3 या KClO4 की उपस्थिति में क्रिया कराकर K2MnO4 प्राप्त किया जाता है।
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प्राप्त 2K2MnO4 (ग्रीन) को जल द्वारा छाना जा सकता है। फिर विद्युत्-अपघटन या क्लोरीन/ओजोन को विलयन मे प्रवाहित कर ऑक्सीकृत किया जाता है।

विद्युत्-अपघटनी ऑक्सीकरण –
2K2MnO4 ⇌ 2K+ + MnO42-
H2O → H+ + OH
एनोड में मैंग्नेट आयन, पर मैंग्नेट आयन में ऑक्सीकृत होता है।
MnO42- → MnO4 + e

क्लोरीन द्वारा ऑक्सीकरण –
2K2MnO4 + Cl2 → 2KMnO4 + 2KCl
2MnO42- + Cl2 → 2MnO4 + 2Cl

ओजोन द्वारा ऑक्सीकरण –
2K2MnO4 + O3 + H4O → 2KMnO4 + 2KOH + O2
2MnO42- + O3 +H2O → 2MnO42- + 2OH + O2
अम्लीकृत KMnO4 विलयन Fe(II) आयन को Fe(III) आयन में ऑक्सीकृत करना है अर्थात् फेरस आयन से फेरिक आयन
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अम्लीकृत पोटैशियम परमैंग्नेट SO2 को H2SO4 में ऑक्सीकृत करता है।
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अम्लीकृत पोटैशियम परमैंग्नेट ऑक्सेलिक अम्ल को कार्बन डाइ-ऑक्साइड में ऑक्सीकृत करता है।
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प्रश्न 17.
M22+M एवं M3+/M2+ तंत्रों के लिए कुछ धातुओं के E° मान निम्न है –
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उपर्युक्त आँकड़ों का उपयोग कर निम्न पर टिप्पणी कीजिए –
(i) Cr3+ अथवा Mn3+ की तुलना में Fe3+ का अम्लीय विलयन में स्थायित्व एवं
(ii) वो कौन-सी स्थितियाँ हैं, जहाँ आयरन, समान विधियों में क्रोमियम अथवा मैंगनीज धातु की तुलना में ऑक्सीकृत होता है।
उत्तर
(i) जैसे- \(\mathrm{E}_{\mathrm{Cr}}^{\circ} / \mathrm{Cr}^{+2}\) ऋणात्मक (-04V) है, जिसका अर्थ है cr+3 आयन विलयन में सरलता से Cr+2 में अपचयित नहीं होता, अत: Cr+3 आयन अधिक स्थायी है। इसी प्रकार \(\mathrm{E}^{\circ}_{\mathrm{Mn}^{+} 3} / \mathrm{Mn}^{+2}\) धनात्मक (+1:5V) है, Mn+3 आयन सरलता से Mn+2 आयन में Fe+3 आयन की तुलना में अपचयित होता है अत: इन आयनों की आपेक्षिक स्थायित्व निम्न है –
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(ii) दिए गए जोड़ों का ऑक्सीकरण विभव +09V, +1-2V एवं 0-4V है। अत: इनके ऑक्सीकरण का क्रम निम्न है –

Mn>Cr>Fe

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प्रश्न 18.
पहचानिए, निम्न में कौन जलीय विलयन में रंग देते हैं? Ti3+,V3+, Cu+,Sc3+,Mn2+, Fe3+ एवं CO2+ प्रत्येक का कारण दीजिए।
उत्तर
ऐसे आयन जिनमें एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, जलीय विलयन में d – d संक्रमण के कारण रंगीन होते हैं।
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प्रश्न 19.
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों की +2 ऑक्सीकरण अवस्था को स्थायित्व की तुलना कीजिए।
उत्तर
Mn एवं Zn को छोड़कर + 2 अवस्था का स्थायित्व बायें से दायें चलने पर घटता है। मानव अपचयन विभव के ऋणात्मक मान के घटने के कारण दाँयी तरफ स्थायित्व घटता है। कुल ∆1H1 + ∆1H2 (प्रथम एवं द्वितीय आयनन एन्थैल्पी में वृद्धि के कारण E° के ऋणात्मक मान कम होते हैं।)

प्रश्न 20.
निम्न को ध्यान में रखकर एक्टीनॉयड्स के रसायन की तुलना लैन्थेनॉयड्स के साथ कीजिए
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
(ii) परमाणु एवं आयनिक आकार एवं
(iii) ऑक्सीकरण अवस्था
(iv) रासायनिक क्रियाशीलता।
उत्तर
लैंथेनाइडों एवं एक्टिनाइडों के मध्य भिन्नताएँ
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प्रश्न 21.
निम्न से क्या समझते हो –
(i) d4 श्रेणी में, Cr2+ प्रबल अपचायक है जबकि मैंगनीज (III) प्रबल ऑक्सीकारक है।
(ii) कोबाल्ट (II) जलीय विलयन में स्थायी है, जबकि जटिल अभिकर्मकों की उपस्थिति में यह आसानी से ऑक्सीकृत हो जाता है।
(iii) आयनों में d विन्यास अत्यधिक अस्थायी है।
उत्तर
(i) Cr2+ अपचायक प्रकृति का है, इसका विन्यास d4 से d3 (अर्द्धपूर्ण t.कक्षकों का स्थायी विन्यास) परिवर्तन होता है। अन्य शब्दों में Mn3+ ऑक्सीकारक प्रकृति का है, जिसका विन्यास d4 से d5 (अर्द्धपूर्ण t2g से 2g कक्षकों के स्थायी विन्यास) में परिवर्तन होता है।
(ii) प्रबल लिगेण्ड कोबाल्ट (II) को बल द्वारा 3d- उपकक्ष से एक अथवा अधिक इलेक्ट्रॉन को हटाता है, जिससे d2sp3 संकरण होता है।
(iii) d1-विन्यास वाला आयन प्रयास करता है कि d-उपकक्ष से एक इलेक्ट्रॉन निकालकर स्थायी अकिय गैस विन्यास प्राप्त कर लेवें।।

प्रश्न 22.
विषमसमानुपाती से क्या तात्पर्य है ? जलीय विलयन में विषमसमानुपाती अभिक्रिया के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर
विषमसमानुपाती अभिक्रियायें वे होती हैं, जिनमें समान पदार्थ ऑक्सीकृत एवं अपचयित होता है। उदाहरण के लिए –
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प्रश्न 23.
संक्रमण धातुओं की प्रथम श्रेणी की कौन-सी धातु सामान्य +1 ऑक्सीकरण अवस्था रखते हैं एवं क्यों ?
उत्तर
कॉपर का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar]3d104s1 है। जो एक इलेक्ट्रॉन (4s1) सरलता से त्याग कर स्थायी विन्यास 3d10 देता है।

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प्रश्न 24.
निम्न गैसीय आयनों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की गणना कीजिए- Mn3+, Cr3+,v3+ एवं Ti3+ इनमें से कोई एक जलीय विलयन में अधिक स्थायी है ?
उत्तर
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Cr2+ अत्यधिक स्थायी है, इसमें अर्द्धपूर्ण t2gस्तर होते हैं।

प्रश्न 25.
संक्रमण धातु रसायन के निम्न के उदाहरण एवं कारणों को दीजिए –
(i) संक्रमण धातु के निम्न ऑक्साइड क्षारीय हैं, उच्च उभयधर्मी/अम्लीय हैं।
(ii) संक्रमण धातु ऑक्साइडों एवं फ्लुओराइडों में उच्च ऑक्सीकरण अवस्था रखते हैं।
(iii) धातु ऑक्सो ऋणायनों में उच्च ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
उत्तर
(i) संक्रमण तत्व के निम्न ऑक्साइड क्षारीय होते हैं, क्योंकि धातु परमाणुओं की निम्न
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 20

धातु की निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में, धातु परमाणु के कुछ संयोजी इलेक्ट्रॉन बन्धन में भाग नहीं लेते। अत: ये इलेक्ट्रॉन को दानकर क्षार की भाँति व्यवहार करते हैं। उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में, संयोजी इलेक्ट्रॉन बन्धन में भाग लेते हैं एवं जो उपलब्ध नहीं होते। इसके अतिरिक्त प्रभावी नाभिकीय आवेश अधिक होने पर यह इलेक्ट्रॉन स्वीकार करता है एवं अम्ल की भाँति व्यवहार दर्शाते हैं।

(ii) संक्रमण धातु ऑक्साइडों एवं फ्लुओराइडों में उच्च ऑक्सीकरण अवस्थायें रखते हैं, क्योंकि ऑक्सीजन एवं फ्लुओरीन का आकार छोटा एवं उच्च ऋणविद्युतता है एवं ये धातुओं को सरलता से ऑक्सीकृत करते हैं। उदाहरण के लिए- O5F6 [O5(VI)],V2O5 [v(v)] .

(iii) धातुओं के ऑक्सो ऋणायन उच्च ऑक्सीकरण अवस्थायें रखते हैं। उदाहरण के लिए, Cr2O72- में Cr की ऑक्सी-करण अवस्था + 6 है, जबकि MnO4 में Mn की ऑक्सी-करण अवस्था +7 है। क्योंकि ऑक्सीजन की उच्च ऋणविद्युतता एवं उच्च ऑक्सीकारक गुण है।

प्रश्न 26.
बनाने के पदों को दर्शाइये –
(i) क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7
(ii) पायरोलुसाइट अयस्क से KMnO4.
उत्तर
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न क्र. 2 एवं 4 देखें।

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प्रश्न 27.
मिश्रधातुएँ क्या हैं ? प्रमुख मिश्रधातु के नाम लिखते हुए उसके उपयोग लिखिए, जिनमें कुछ लैन्थेनॉयड्स धातुएँ होती हैं।
उत्तर
दो अथवा अधिक धातुओं अथवा धातुओं एवं अधातुओं के समांगी मिश्रण मिश्रधातु है । प्रमुख मिश्रधातु जिसमें लैन्थेनॉयड होता है, मिश्रधातु है, जिसमें 95% लैन्थेनॉयड धातुएँ एवं 5% आयरन के साथ थोड़ी मात्रा में S, C, Ca एवं Al होते हैं । इसका उपयोग Mg-आधारित मिश्रधातु में करते हैं। जो गोली के आवरण एवं लाइटर में उपयोग होती है।

प्रश्न 28.
अन्तर संक्रमण तत्व क्या हैं ? दिए गए निम्न परमाणु संख्याओं में से अन्तर संक्रमण तत्वों की परमाणु संख्याओं का निर्धारण कीजिए- 29,59, 74, 95, 102, 104.
उत्तर
f-ब्लॉक तत्वों में, अन्तिम इलेक्ट्रॉन अन्तर उपात्यकक्ष – उपकक्ष में प्रवेश करते हैं, अतः इन्हें अन्तर संक्रमण तत्व कहते हैं। इनमें लैन्थेनॉयड्स (58-71) एवं एक्टीनॉयड्स (90-103) होते हैं । अतः परमाणु क्रमांक 59, 95 एवं 102 वाले तत्व अन्तर संक्रमण तत्व हैं।

प्रश्न 29.
लैन्थेनॉयड्स की तुलना में एक्टीनॉयड्स तत्वों का रसायन अधिक सरल नहीं है। इस वाक्य को इन तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्था के कुछ उदाहरणों द्वारा न्यायोचित सिद्ध कीजिए।
उतर
लैन्थेनॉयड्स निश्चित संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थायें दर्शाते हैं, जैसे +2, +3 एवं +4 (+3 मुख्य ऑक्सीकरण अवस्था है)। क्योंकि 5d एवं 4f उपकक्षों के मध्य अधिक ऊर्जा अन्तर होता है। एक्टीनॉयड्स भी प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था +3 दर्शाते हैं, किन्तु अन्य ऑक्सीकरण अवस्था भी दर्शाते हैं । उदाहरण के लिए, यूरेनियम (Z= 92) +3, +4, +5, +6 ऑक्सीकरण अवस्थायें रखता है, एवं नेप्चूनियम (Z= 94) +3, +4, +5, +6 एवं +7 ऑक्सीकरण अवस्थायें दर्शाता है। क्योंकि 4f एवं 6d कक्षकों के मध्य ऊर्जा अन्तर कम होता है।

प्रश्न 30.
एक्टीनॉयड्स श्रेणी का अंतिम तत्व कौन-सा है ? इस तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। इस तत्व की संभावित ऑक्सीकरण अवस्था पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
एक्टीनॉयड श्रेणी का अंतिम तत्व= लॉरेन्सियम (Z = 103)
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Rn]5f146d17s2
संभावित ऑक्सीकरण अवस्था = +3

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प्रश्न 31.
हुण्ड नियम का उपयोग करते हुए Ce* आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए एवं ‘चक्रण केवल’ सूत्र के आधार पर इसके चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
उत्तर
सीरियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Xe] 4f15d16s2
Ce3+ 344 = [Xe]4f1
जिसका अर्थ है कि एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित है।
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प्रश्न 32.
लैन्थेनॉयड श्रेणी के उन सदस्यों के नाम दीजिए, जो +4 ऑक्सीकरण अवस्था में एवं +2 ऑक्सीकरण अवस्थायें रखते हैं। इस प्रकार के व्यवहार को इन तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों से संबंध स्थापित कीजिए।
उत्तर
+4= 58Ce, 59Pr, 60Nd, 65Tb, 66Dy
+2 = 60Nd, 62Sm, 63Eu, 69Tm, 70Yb
+4 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती है, जब विन्यास बाँयी तरफ के समीप 4f° (अर्थात् 4f04f14f2) अथवा 4f7 के समीप (अर्थात् 4f7 अथवा 4f8) होता है।
+2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती है, जब विन्यास 5d0 6s2 है तथा दो इलेक्ट्रॉन सरलता से त्याग देता है।

प्रश्न 33.
निम्न के सापेक्ष एक्टीनॉयड्स एवं लैन्थेनॉयड्स के रसायन की तुलना कीजिए –
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
(ii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
(iii) आयनन एन्थैल्पी एवं
(iv) परमाण्विक आकार।
उत्तर
लैंथेनाइडों एवं एक्टिनाइडों के मध्य भिन्नताएँ
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प्रश्न 34.
परमाणु क्रमांक 61,91, 101 एवं 109 वाले तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
(i) z = 61: [Xe]4f5f506s2
(ii) Z = 91: [Rn]5f26d17s2
(iii) Z = 101: [Rn]5f136d07s2
(iv) Z = 109: [Rn]5f146d7s2

प्रश्न 35.
ऊर्ध्वाधर कॉलम के सापेक्ष प्रथम संक्रमण धातुओं की श्रेणी के सामान्य गुणों की तुलना द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के धातुओं से कीजिए। निम्न बिन्दुओं को विशिष्टता प्रदान कीजिए –
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास,
(ii) ऑक्सीकरण अवस्थायें
(iii) आयनन एन्थैल्पी एवं
(iv) परमाण्विक आकार।
उत्तर
प्रथम संक्रमण धातुओं की श्रेणी के सामान्य गुणों की तुलना –
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प्रश्न 36.
निम्न आयनों में प्रत्येक के 3d इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखिए –
Ti2+,v2+, Cr3+,Mn2+, Fe2+, Fe3+,Co2+,Ni2+ एवं Cu2+ दर्शाइये कि पाँच 31 कक्षकों को इन हाइड्रेट आयनों (अष्टफलकीय) द्वारा भरा जा सकता है।
उत्तर
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 24

प्रश्न 37.
इस वाक्य पर टिप्पणी कीजिए कि प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों में अनेक गुण भारी संक्रमण तत्वों से भिन्न होते हैं।
उत्तर
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 25

प्रश्न 38.
निम्न संकुल स्पीशीज के चुम्बकीय आघूर्ण के मानों से क्या दर्शाया जाता है ?
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 26
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 27
उत्तर
K4[Mn(CN)6]
Mn+2 . 3d5 , चुम्बकीय आघूर्ण 2.2 दर्शाता है कि इसमें एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है एवं अन्तर कक्षक संकुल अथवा निम्न चक्रण संकुल बनाता है। इसका विन्यास है –
t22g[Fe(H2 O)6 ]2+

Fe+2: 3d6 चुम्बकीय आघूर्ण का मान 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों के समीप है, अत: यह बाह्य कक्षक संकुल अथवा उच्च चक्रण संकुल बनाता है। इसका विन्यास है  – t42g e2g K2[MnCl4]

Mn+2 : 3d5 चुम्बकीय आघूर्ण का मान 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों के सापेक्ष है। d-कक्षक प्रभावित नहीं होते। अतः यह चतुष्फलकीय संकुल बनाता है। इसका विन्यास है – t32g e2g

d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. सही विकल्प चुनकर लिखिए-

प्रश्न 1.
मैंगनीज किसमें उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है
(a) K2MnO4
(b) KMnO4
(c) MnO2
(d) MngO4
उत्तर
(b) KMnO4
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प्रश्न 2.
कौन अन्तराली यौगिक बनाता है
(a) Fe
(b) Ca
(c) Ni
(d) सभी।
उत्तर
(b) Ca

प्रश्न 3.
जब KMnO4 को उदासीन माध्यम में प्रयुक्त करते हैं, तब उनका तुल्यांक भार होगा –
(a) M
(b) M/2
(c) M/3
(d) M/5.
उत्तर
(c) M/3

प्रश्न 4.
कौन-सी लैन्थेनाइड सर्वाधिक प्रयुक्त की जाती है –
(a) लैन्थेनम
(b) नोबेलियम
(c) थोरियम
(d) सीरियम।
उत्तर
(d) सीरियम।

प्रश्न 5.
गैडोलिनियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है –
(a) [Xc]4f65d9,6s2
(b) [Xe]4f7,5d1,6s2
(C) [Xe] f3,5d5,6s2
(d) [Xe]4f6,5d2,6s2.
उत्तर
(b) [Xe]4f7,5d1,6s2

प्रश्न 6.
लैन्थेनाइड संकुचन निम्न कारक के लिए उत्तरदायी होता है –
(a) Zr एवं Y की त्रिज्या लगभग समान होती है
(b) Zr एवं Nb की ऑक्सीकरण अवस्था समान होती है
(c) Zr एवं Hf की त्रिज्या लगभग समान होती है
(d)zr एवं Zn की ऑक्सीकरण अवस्था समान होती है।
उत्तर
(c) Zr एवं Hf की त्रिज्या लगभग समान होती है

प्रश्न 7.
3d श्रेणी में उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था किसके द्वारा प्रदर्शित की जाती है –
(a) Mn
(b) Fe2+
(c) Ni
(d) Cr
उत्तर
(a) Mn

प्रश्न 8.
कौन-सा संक्रमण धातु आयन रंगीन है –
(a) Cu+
(b) v2+
(c) Sc+3
(d) Ti+4
उत्तर
(b) v2+

प्रश्न 9.
एक संक्रमण धातु जो +3 ऑक्सीकरण अवस्था में हरा किन्तु +6 ऑक्सीकरण अवस्था में नारंगी होता है –
(a) Mn.
(b) Cr
(c) Os
(d) Fe.
उत्तर
(b) Cr

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प्रश्न 10.
लैन्थेनाइड श्रेणी में, लैन्थेनाइड हाइड्रॉक्साइडों की क्षारकता –
(a) बढ़ती है
(b) घटती है
(c) पहले बढ़ती है फिर घटती है
(d) पहले घटती है और फिर बढ़ती है।
उत्तर
(b) घटती है

प्रश्न 11.
Fe, Co, Ni किस प्रकार के चुम्बकीय पदार्थ हैं –
(a) अनुचुम्बकीय
(b) लौह चुम्बकीय
(c) प्रति चुम्बकीय
(d) प्रति लौह चुम्बकीय।
उत्तर
(b) लौह चुम्बकीय

प्रश्न 12.
Fe+2 आयन के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या है –
(a) 0
(b) 4
(c) 6
(d) 3.
उत्तर
(b) 4

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2. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए – 

  1. Fe, Co, Ni धातुओं को …………. कहते हैं।
  2. परमाणु क्रमांक में वृद्धि के साथ त्रिसंयोजी धनायनों का आकार क्रमशः….,.. जाता है।
  3. निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने वाले संक्रमण धातु …….. प्रकृति के होते हैं।
  4. K2Cr207 एक प्रबल ……….. है जो केवल अम्लीय माध्यम में नवजात ऑक्सीजन का ……… परमाणु मुक्त करता है।
  5. Zn केवल …………. ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
  6. f-ब्लॉक तत्व …………. तत्व कहलाते हैं।
  7. संक्रमण तत्व और उनके यौगिक ……….. का कार्य करते हैं।
  8. अंतः संक्रमण तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास …………..
  9. पोटैशियम मैंगनेट का रासायनिक सूत्र ……….. है।
  10. d-ब्लॉक तत्वों को …………. भी कहा जाता है।

उत्तर

  1. फेरस धातुएँ
  2.  घटता
  3. क्षारीय
  4. ऑक्सीकारक, तीन
  5. +2
  6. आन्तर संक्रमण
  7. उत्प्रेरक
  8. (n-2)f1-14, (n-1)d1-2,ns2
  9. K2MnO4,
  10. संक्रमण तत्व।

3. सत्य/असत्य बताइए –

  1. पारा द्रव अवस्था में होता है तथा इसकी ऑक्सीकरण अवस्था +1 व + 2 होती है।
  2. संक्रमण धातुओं की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था अम्लीय प्रकृति की होती है।
  3. लैन्थेनाइड और एक्टीनाइड दोनों संक्रमण तत्व कहलाते हैं।
  4. सभी संक्रमण तत्वों में +2 ऑक्सीकरण अवस्था सामान्यत: अधिक पायी जाती है अथवा सामान्य होती है।
  5. Zn, Cd एवं Hg परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करती है।
  6. Cu+2 आयन रंगहीन और प्रतिचुम्बकीय होता है।
  7. प्लूटोनियम का उपयोग परमाणु बम बनाने में तथा परमाणु रियेक्टर में ईंधन के रूप में किया जाता है।
  8. संक्रमण तत्व अन्तराली यौगिक बनाते हैं।

उत्तर

  1. सत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. असत्य,
  6. असत्य,
  7. सत्य,
  8. सत्य।

4. उचित संबंध जोडिए –
I.
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 28
उत्तर
1. (1), 2. (g), 3. (e), 4. (c), 5. (b), 6, (d), 7. (a).

5. एक शब्द/वाक्य में उत्तर दीजिए – 

  1. Cu+ तथा Cu2+ में कौन-सा आयन रंगहीन है ?
  2. एक अभिक्रिया में KMnO4 को K2MnO4 में परिवर्तित किया जाता है तो Mn की ऑक्सी
    करण संख्या में कितना परिवर्तन होगा?
  3. लैन्थेनाइड और एक्टीनाइड में कौन-सी श्रेणी उच्च ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती है ?
  4. लैन्थेनम की कौन-सी ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी होती है ?
  5. K3Cr3O7 का अम्लीय विलयन में तुल्यांकी भार कितना होता है ?
  6. Fe+3 में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या होती है।
  7. क्रोमिलं क्लोराइड परीक्षण में प्रयुक्त ऑक्सीकरण का नाम लिखिए।
  8. d- ब्लॉक के तत्वों में Zn परिवर्तित संयोजकता प्रदर्शित नहीं करता, क्योंकि।
  9. Cu की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऑक्सीकरण अवस्था है।
  10. f- ब्लॉक के तत्वों को कितने श्रेणी में बाँटा गया है ?
  11. लूनर कॉस्टिक किसे कहते हैं ?
  12. d-ब्लॉक के तत्वों में Zn परिवर्ती ऑक्सीकरण संख्या नहीं दर्शाता है, क्यों ?
  13. HgCl2 तथा KI का क्षारीय विलयन क्या कहलाता है ?

उत्तर-

  1. Cu+
  2. 1,
  3. एक्टीनाइड,
  4. +3,
  5. 49,
  6. 5,
  7. K2Cr2O7,
  8. पूर्ण-पूरित d-कक्षक,
  9. +2,
  10. दो,
  11. AgNO3,
  12. d-कक्षक के पूर्ण भरे होने की वजह से,
  13. नेसलर अभिकर्मक।

d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिल्वर परमाणु की मूल अवस्था में पूर्ण-पूरित d-कक्षक है।आप कैसे कह सकते हैं कि यह एक संक्रमण तत्व है ?
उत्तर
सिल्वर +1 ऑक्सीकरण अवस्था में 4d10 5s0 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दर्शाता है। परन्तु कुछ यौगिकों में यह +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है। इस अवस्था में यह 4d95s0 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दर्शाता है। अतः 4d- से कक्षक के अपूर्ण होने के कारण इसे संक्रमण तत्व माना गया है।

प्रश्न 2.
संक्रमण तत्व किसे कहते हैं ? इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। ये धात्विक गुण प्रदर्शित करते हैं, क्यों?
उत्तर
वे तत्व, जिनके परमाणु अथवा साधारण आयनों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में भीतरी d-कक्षक अपूर्ण रूप से भरे होते हैं, संक्रमण तत्व कहलाते हैं । ये समूह 2 और 13 के मध्य स्थित होते हैं।
उदाहरण-Fe, Ni, Co आदि। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास-(n-1)1-10,ns1-2 है।
किसी तत्व द्वारा अपने परमाणु में से एक अथवा अधिक इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाने की क्षमता पर उसका धात्विक गुण निर्भर करता है, सभी संक्रमण तत्व धातुएँ हैं, क्योंकि इनकी बाह्यतम कक्षा में एक या दो इलेक्ट्रॉन होते हैं, जो कि आसानी से त्यागे जा सकते हैं, क्योंकि इनकी आयनन ऊर्जा निम्न होती है। अतः ये धात्विक प्रकृति के होते हैं।

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प्रश्न 3.
संक्रमण तत्व परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करते हैं, क्यों?
उत्तर-
संक्रमण तत्व परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि (n-1)d-कक्षक तथा ns-कक्षक के इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा में बहुत अधिक अन्तर नहीं होता है, जिससे d-कक्षक के इलेक्ट्रॉन भी संयोजी इलेक्ट्रॉन का कार्य करते हैं । इन तत्वों में Mn अधिकतम परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 4.
संक्रमण धातुएँ आसानी से मिश्र धातुएँ क्यों बना लेती हैं ?
उत्तर
संक्रमण धातुएँ पिघली हुई अवस्था में एक-दूसरे में मिश्रणीय हैं तथा विभिन्न संक्रमण धातुओं के मिश्रण को ठण्डा करने पर मिश्र धातुएँ बनती हैं । संक्रमण धातुओं का आकार लगभग समान होता है, अतः क्रिस्टल जालक में एक धातु परमाणु को दूसरे धातु परमाणु से आसानी से विस्थापित किया जा सकता है, इस प्रकार मिश्रधातुएँ बनती हैं । जैसे-Cr को Ni में विलेय कर Cr-Ni मिश्रधातु बनाया जाता है। मिश्र धातुएँ अपनी जनक धातुओं की तुलना में अधिक कठोर, उच्च गलनांक वाली तथा अधिक संक्षारण प्रतिरोधी होती हैं।

प्रश्न 5.
संक्रमण धातुओं के चुम्बकीय गुणों को उसके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर बताइए।
अथवा, अनुचुम्बकत्व और प्रतिचुम्बकत्व को समझाइए।
उत्तर
चुम्बकीय गुण-संक्रमण धातुएँ चुम्बकीय गुण प्रदर्शित करती हैं।
(a) प्रतिचुम्बकत्व-जब किसी पदार्थ में उपस्थित सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हों तो वह प्रतिचुम्बकत्व दर्शाता है। Zn एक प्रतिचुम्बकीय धातु है।
(b) अनुचुम्बकत्व-यह गुण पदार्थ में उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉन युक्त पदार्थ अनुचुम्बकीय होता है । अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ने से चुम्बकीय गुण भी बढ़ता है।
Fe, Co तथा Ni फेरोचुम्बकीय होते हैं, क्योंकि इन्हें चुम्बकित भी किया जा सकता है । अनुचुम्बकत्व को निम्न सूत्र से दर्शाते हैं –
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 29
जिसमें μ = चुम्बकीय आघूर्ण, n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या।

प्रश्न 6.
संक्रमण तत्वों की प्रवृत्ति अक्रिय होती है, क्यों? उत्तर
संक्रमण तत्वों की अक्रिय प्रवृत्ति या कम क्रियाशीलता निम्नलिखित कारणों से होती हैं –

(i) इनके मानक इलेक्ट्रोड विभव का मान कम होता है ।
(ii) इनकी आयनन ऊर्जा उच्च होती है ।
(iii) इनकी वाष्पन या कणिकरण ऊर्जा (Sublimation of Atomization energy) का मान उच्च होता है।
(iv) इनके आयनों की जल योजन ऊर्जा का मान कम होता है ।

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प्रश्न 7.
संक्रमण तत्वों की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
संक्रमण तत्वों की विशेषताएँ-

  • इनकी प्रकृति धात्विक होती है जिनका धन विद्युतीय गुण सीमित (Ti) से उत्कृष्ट (Cu) तक होता है।
  • ये कठोर होते हैं तथा ऊष्मा और विद्युत् के सुचालक हैं।
  • इनके b.p. तथा m.p. उच्च होते हैं ।
  • ये परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं ।
  • ये रंगीन आयन बनाते हैं ।
  • ये समन्वयन यौगिक बनाते हैं।
  • ये सामान्यत: अनुचुम्बकीय होते हैं ।
  • ये अच्छे उत्प्रेरक होते हैं।
  • ये मिश्रधातु बनाते हैं।
  • ये अधातुओं के साथ अन्तराकाशीय यौगिक बनाते हैं।
  • इनमें कार्बधात्विक यौगिक, समाकृतिक यौगिक तथा नॉन-स्टॉइकियोमीट्रिक यौगिक भी पाये जाते हैं। __

प्रश्न 8.
d और f-ब्लॉक तत्वों में कोई पाँच प्रमुख अन्तर दीजिए।
उत्तर
d और ब्लिॉक तत्वों में अन्तर –
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 30
प्रश्न 9.
आन्तरिक संक्रमण तत्व क्या होते हैं ?
उत्तर
वे तत्व जिनमें तीनों बाह्यतम कोश अपूर्ण भरे होते हैं अन्तर संक्रमण तत्व कहलाते हैं। संक्रमण तत्वों के भीतर वर्ग 3 व 4 के मध्य 14-14 तत्व f-ब्लॉक में आते हैं। अतः संक्रमण तत्वों के मध्य स्थित होने के कारण इन्हें अन्तर संक्रमण तत्व कहते हैं। चूँकि इनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन बाह्यतम कोश से दो अन्दर के कोश उपउपान्त्य कोश अर्थात् (n-2)f-ऑर्बिटल में प्रवेश करते हैं। अत: इन तत्वों को f-ब्लॉक तत्व भी कहते हैं। (n-2)f1-14(n-12)d1-10ns2 इन्हें दो श्रेणियों में बाँटा गया है –

(1) लैन्थेनाइड श्रेणी-लैन्थेनम के बाद (La57) आने वाले 14 तत्व (Ce58-Lu71) लैन्थेनाइड कहलाते हैं।
(2) ऐक्टिनाइड श्रेणी-ऐक्टिनम के बाद आने वाले 14 तत्व ऐक्टिनाइड्स कहलाते हैं।

प्रश्न 10.
समूह- 12 के सदस्यों के नाम लिखिए। वे सामान्यतः संक्रमण तत्व क्यों नहीं माने जाते हैं ?
उत्तर
समूह- 12 के सदस्यों के नाम Zn, Cd, Hg हैं जिन्हें संक्रमण तत्वों में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि इनकी परमाणु अवस्था तथा द्विसंयोजी आयन अवस्था दोनों में इलेक्ट्रॉनिक संरचना (n-1)d10 होती है अर्थात् इनके d- कक्षक पूर्णतः भरे होते हैं। इस कारण इन्हें संक्रमण तत्व नहीं माना जाता।

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प्रश्न 11.
लैन्थेनाइडों की पाँच विशेषताएँ लिखिए। उत्तर-लैन्थेनाइडों की विशेषताएँ –
(a) ये f-ब्लॉक के तत्व हैं ।
(b) ये चाँदी के समान चमकदार धातुएँ हैं ।
(c) ये ऊष्मा तथा विद्युत् के अच्छे चालक हैं ।
(d) इनका गलनांक तथा घनत्व उच्च होता है ।
(e) La से Lu तक इनकी परमाणु त्रिज्या में लगातार कमी होती है, इसे लैन्थेनाइड संकुचन कहते हैं ।

प्रश्न 12.
क्या कारण है कि 5d श्रेणी के तत्वों की आयनन ऊर्जा का मान 4d श्रेणी से अधिक होता है?
उत्तर
किसी समूह में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन ऊर्जा का मान घटता है, लेकिन अपेक्षा के विरुद्ध 5d श्रेणी के संक्रमण तत्वों की आयनन ऊर्जा का मान 4d श्रेणी के तत्वों के मान से अधिक होता है, जिसका कारण इन दोनों श्रेणियों के बीच आने वाले 14 लैन्थेनाइड तत्वों का रहना तथा उनके आकार में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाना है। अतः नाभिक का आकर्षण बल बाह्यतम कक्षा के इलेक्ट्रॉन के लिए अधिक हो जाता है यही उनके अधिक आयनन विभव का कारण है।

प्रश्न 13.
(i) संक्रमण धातुओं में संकुल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति होती है। समझाइए।
(ii) Zn, Cd एवं Hg संक्रमण तत्व का गुण व्यक्त क्यों नहीं करते हैं ?
(iii) Ti को आश्चर्यजनक धातु क्यों कहते हैं ?
उत्तर
(i) संक्रमण तत्वों के संकुल यौगिक बन्गने के कारण –
1. इन तत्वों के आयनों का आकार कम तथा नाभिकीय आवेश उच्च होता है, जिसके कारण ये आयन या अणु (लिगण्ड) को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
2. लिगैण्ड द्वारा दिये जाने वाले इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण करने के लिए इन तत्वों के आयनों में रिक्त ऑर्बिटल होते हैं।

(ii) ऐसे तत्व जिनमें (n-1)d- उपकोश आंशिक (Partially) रूप से भरे रहते हैं, उन्हें संक्रपण तत्व कहते हैं।
जबकि Zn में [3d104s2], Cd में [4d10 5s2] एवं Hg में [5d10s2] अवस्था पायी जाती है। इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व नहीं मानते हैं।
(iii) Ti को आश्चर्यजनक धातु कहते हैं क्योंकि – (1) यह कठोर व उच्च गलनांक वाली धातु है। (2) यह ऊष्मा व विद्युत् की सुचालक होती है। (3) संक्षारण प्रतिरोधी होती है।(4) इसका उपयोग टैंक, तोप, बन्दूक व रक्षात्मक कवच बनाने में किया जाता है।

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प्रश्न 14.
Fe2+ आयन की त्रिज्या Mn2+ आयन की त्रिज्या से कम होती है, क्यों?
उत्तर
Fe का परमाणु क्रमांक (26) Mn के परमाणु क्रमांक (25) से अधिक है। अधिक परमाणुक्रमांक होने से नाभिक में प्रोटॉन की संख्या अधिक होती है, फलतः नाभिक और बाह्य कोश के इलेक्ट्रॉन के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल उतना ही प्रबल होता है। प्रबल आकर्षण बल इलेक्ट्रॉन बल इलेक्ट्रान मेघ को भीतर की ओर खींचता है, जिससे आकार में कमी होती है, इसीलिए Fe+ आयन की त्रिज्या Mn2+ आयन से कम होती है।

प्रश्न 15.
लैन्थेनाइड समूह को पृथक् करना क्यों कठिन है ? समझाइए।
उत्तर
लैन्थेनाइड समूह (Ce58 से – 71Lu) तक तत्वों में लैन्थेनाइड संकुचन के कारण रासायनिक गुणों में अत्यधिक समानता होती है। अत: इन्हें शुद्ध अवस्था में प्राप्त करना अत्यधिक कठिन होता है। इन्हें आयन विनिमय विधि द्वारा पृथक् किया जाता है।

प्रश्न 16.
(i) TiO2 श्वेत है, जबकि TiCl3 बैंगनी है। क्यों?
(ii) संक्रमण धातुओं की प्रथम पंक्ति में Cr तक अनुचुम्बकत्व बढ़ता है और फिर घटने लगता है, क्यों?
उत्तर
(i) TiO2 में Ti4+ अवस्था में है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d0 है अतःd-इलेक्ट्रॉन के अभाव में d-d संक्रमण नहीं हो पाने के कारण TiO2 श्वेत है। जबकि TiCl3 में Ti3+ अवस्था में है जिसका विन्यास 3d1 है। अतः अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण TiCl3 बैंगनी रंग का होता है।
(ii) संक्रमण धातुओं की प्रथम पंक्ति में Cr (3d5) तक अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉनों के संख्या में वृद्धि होती है तथा फिर युग्मन प्रारम्भ होने के कारण इनकी संख्या घटती जाती है। अत: इसी के अनुसार पहले Cr तक अनुचुम्बकत्व बढ़ता है और फिर घटने लगता है।

प्रश्न 17.
किन्हीं पाँच बिन्दुओं पर लैन्थेनाइड और ऐक्टिनाइड की तुलना कीजिए।
उत्तर-लैन्थेनाइडों एवं ऐक्टिनाइडों की तुलना –
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प्रश्न 18.
क्रोमिल क्लोराइड परीक्षण समीकरण सहित लिखिए।
उत्तर
जब किसी धातु क्लोराइड को ठोस पोटैशियम डाइक्रोमेट एवं सांद्र H,SO के साथ गर्म किया जाता है तब क्रोमिल क्लोराइड का नारंगी वाष्प बनता है।
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प्राप्त वाष्प को NaOH विलयन में प्रवाहित करने पर सोडियम क्रोमेट का पीले रंग का विलयन प्राप्त होता है, जो CH3COOH की उपस्थिति में लेड ऐसीटेट मिलाने पर, लेड क्रोमेट का पीला अवक्षेप देता है।
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प्रश्न 19.
प्रथम संक्रमण श्रेणी में उपस्थित तत्वों के नाम, संकेत तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
उत्तर
प्रथम संक्रमण श्रेणी में उपस्थित तत्वों के नाम, संकेत तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास –
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 34

प्रश्न 20.
f-ब्लॉक तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। लैन्थेमाइड्स के कोई दो उपयोग लिखिए। ऐक्टिनाइड्स के कोई तीन उपयोग लिखिए।
उत्तर
ब्लॉक तत्वों का सामान्य विन्यास –
(n-2)f1-14, (n-1) s2p6 d0-1,ns2 होता है।
लैन्थेनाइड्स के दो उपयोग –

(i) ज्वलनशील मिश्रधातु बनाने में
(ii) धूप के चश्मों में
(iii) रंगीन काँच व फिल्टर बनाने में।

ऐक्टिनाइड्स के उपयोग –

(i) नाभिकीय रिएक्टर में
(ii) कैंसर के उपचार में थोरियम का उपयोग
(iii) प्लूटोनियम का उपयोग परमाणु बम, परमाणु भट्ठी में होता है।

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प्रश्न 21.
K2Cr2O7 एवं KMnO4 के उपयोग बताइए। .
उत्तर
K2Cr2O7 के उपयोग- (i) ऑक्सीकारक के रूप में, (ii) रंगाई व छपाई में, (iii) आयतनमितीय विश्लेषण में, (iv) क्रोमेटेजिंग में।
KMnO4 के उपयोग-(i) ऑक्सीकारक के रूप में, (ii) आयतनात्मक विश्लेषण में, (iii) कार्बनिक यौगिकों के निर्माण में, (iv) संक्रमणरोधी के रूप में।

प्रश्न 22.
अप्रारूपी संक्रमण तत्व एवं प्रारूपी संक्रमण तत्व किसे कहते हैं ?
उत्तर
Zn, Cd तथा Hg के परमाणुओं में (n-1)d उपकक्ष पूर्ण होते है। अत: इन तत्वों को d- समुदाय तत्व नहीं मानना चाहिए। इसी प्रकार ये तत्व d- समुदाय के तत्वों से गुणों के आधार पर बहुत कम समानता रखते हैं। परन्तु फिर भी ये तत्व d- समुदाय के तत्व कहलाते हैं । अत: Zn, Cd तथा Hg को अप्रारूपी संक्रमण तत्व कहा जाता है। जबकि अन्य संक्रमण तत्वों को प्रारूपी संक्रमण तत्व कहा जाता है।

प्रश्न 23.
Cu+ रंगहीन है परन्तु Cu2+ रंगीन होता है, क्यों?
उत्तर
Cu+ का उपकोश पूर्ण भरा होता है। इस प्रकार इनका d – d संक्रमण नहीं होता और वह सफेद अथवा रंगहीन रहता है। जबकि Cu2+ में अयुग्मित 3d इलेक्ट्रॉन होने के कारण एवं d-d संक्रमण सम्भव होने के कारण वह रंगीन होता है।

प्रश्न 24.
संक्रमण तत्व क्या है ? इन्हें कितनी श्रेणियों में विभाजित किया गया है ?
उत्तर
वे तत्व जिनमें परमाण्विक अवस्था में d-कक्षक आंशिक रूप से भरे हुए हों, संक्रमण तत्व कहलाते हैं, इन्हें 4 श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

1. प्रथम संक्रमण श्रेणी (3d- Series)- इसमें चतुर्थ आवर्त के Sc21 स्कैंडियम से जिंक (Zn = 30) तक 10 तत्व हैं।
2. द्वितीय संक्रमण श्रेणी (4d- Series)- इसमें पंचम आवर्त के इट्रियम Y39 से कैडमियम Cd48 तक 10 तत्व हैं।
3. तृतीय संक्रमण श्रेणी (5d- Series)- इसमें छठे आवर्त के लैन्थेनम (La = 57) तथा (Hf =72) से मर्करी (Hg = 80) तक के 10 तत्व हैं।
4. चतुर्थ संक्रमण श्रेणी(6d- Series)- इसमें सातवें आवर्त ऐक्टीनियम (Ac=89) तथा रदरफोर्डियम (Rf =72) तथा हाड्रियम (Ha = 105) हैं ये श्रेणी अभी अपूर्ण है।

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प्रश्न 25.
संक्षेप में स्पष्ट कीजिए कि प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था कैसे अधिक स्थायी होती जाती है?
उत्तर
(IE1 + IE2) आयनन ऊर्जा का मान बढ़ता है। परिमाणस्वरुप मानक अपचयन विभव E0 कम होता जाता है। अत: M+2 आयन बनने की क्षमता घटती है। Mn+2 के लिए उच्च क्षमता अर्द्धपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के कारण है। इसलिए प्रथम सदस्य के लिए इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d14s2 है, जिनमें तीन इलेक्ट्रॉन दान करने की क्षमता होती है। अतः +2 ऑक्सीकरण अवस्था की तुलना में +3 ऑक्सीकरण अवस्था की प्रबलता अधिक है।

d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लैन्थेनाइड का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास देते हुए इसके ऑक्सीकरण अवस्था को समझाइए।
उत्तर
अन्तर संक्रमण तत्त्वों की दो श्रेणियों में एक है लैन्थेनाइड या 4fश्रेणी । इस श्रेणी के तत्त्वों में 4fकक्षक में क्रमशः इलेक्ट्रॉन भरते हैं । इनका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe] 4f1-145d1-26s2 होता है। इनकी कुल संख्या 14 है जो सीरियम (परमाणु क्रमांक 58) से प्रारम्भ होकर ल्यूटीशियम (परमाणु क्रमांक 71) पर समाप्त होती है ।

ऑक्सीकरण अवस्था – लैन्थेनाइड तत्त्वों की सर्वाधिक ऑक्सीकरण अवस्था (+3) होती है। यह लैन्थेनम से दो और एक d-कक्षक के इलेक्ट्रॉन के खोने से बनती है। La3+ का विन्यास जेनॉन (Xe = 54) जैसा होता है जो कि अत्यधिक स्थायी होता है। कुछ तत्व (+ 2) और (+4) ऑक्सीकरण भी प्रदर्शित करते हैं क्योंकि ये तत्व 2 या 4 इलेक्ट्रॉन खोने के बाद स्थायी f7 या f14 विन्यास प्राप्त करते हैं।

उदाहरणार्थ – Ce4+(4f°), Tb+ (4f7),Eu2+ (4f7), Yb2+ (4f14), परन्तु Sm2+, Tm2+ इसके अपवाद हैं।
सामान्यतः लैन्थेनाइड में +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रबल ऑक्सीकरण का कार्य करती है, जैसे Ce+4 आयन जलीय विलयन का अच्छा ऑक्सीकरक है जो +4 से +3 में परिवर्तित हो जाता है तथा दूसरी ओर लैन्थेनाइड में +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रबल अपचायक की तरह कार्य करती है। जैसे-Sm+2, Eu+2 और Yb+2 आयन अच्छा अपचायक है जो जलीय विलयन में +2 से +3 में ऑक्सीकृत हो जाता है।

प्रश्न 2.
क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7 बनाने की विधि लिखिए तथा K2Cr2O7 की अम्लीय FeSO4 KI एवं H2S के मध्य अभिक्रिया के लिए संतुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर
बनाने की विधि-K2Cr2O7 को क्रोमाइट अयस्क (Fe2Cr2O4) या क्रोम आयरन (FeO.Cr203) से बनाया जाता है, जो निम्नलिखित पदों में होते हैं।

(1) क्रोमाइट अयस्क का सोडियम क्रोमेट में परिवर्तन-क्रोमाइट अयस्क को NaOH या Na2CO3 के साथ वायु की उपस्थिति में एक परावर्तनी भट्टी में गर्म करने पर सोडियम क्रोमेट (पीला रंग) बनता है।
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पदार्थ को छिद्रमय रखने हेतु कुछ मात्रा में शुष्क चूने को मिलाते हैं । जल के साथ निष्कर्षण करने पर Na2Cr2O3 विलयन में चला जाता है। जबकि Fe2O3 रह जाता है जिसे छानकर पृथक् कर लेते हैं।

(2) सोडियम क्रोमेट (Na2CrO4) का सोडियम डाइक्रोमेट (Na2Cr2O7) में परिवर्तन-सोडियम क्रोमेट विलयन सान्द्र H2SO4 के साथ अपचयित करके सोडियम डाइक्रोमेट बनाते हैं।
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2Na2CrO4 कम विलेय होता है जिसका वाष्पन करने पर Na2SO410H2O के रूप में क्रिस्टलीकृत हो जाता है जिसे पृथक् कर लिया जाता है।

(3) Na2Cr2O7 का K2Cr2O7 में परिवर्तन-सोडियम डाइक्रोमेट के जलीय विलयन का उपचार KCI के साथ किये जाने पर पोटैशियम डाइ क्रोमेट प्राप्त होता है। K2Cr207 के अल्प विलेय प्रकृति के कारण इसके क्रिस्टल ठण्डे में प्राप्त किये जाते हैं।

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K2Cr2O7 की निम्न के साथ होने वाली रासायनिक अभिक्रिया –

(1) अम्लीय फेरस सल्फेट के साथ-K2Cr207 अम्लीय माध्यम में यह फेरस सल्फेट को फेरिक सल्फेट में ऑक्सीकृत कर देता है। K2Cr2O7 पहले H2SO4 से क्रिया करके नवजात ऑक्सीजन का तीन परमाणु देता है जो Fe2+ को Fe3+ आयन में ऑक्सीकृत कर देता है।
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प्रश्न 3.
अम्लीय, क्षारीय तथा उदासीन माध्यम में KMnO के ऑक्सीकारक गुण को दो-दो उदाहरण द्वारा समझाइए।
अथवा, पोटैशियम परमैंगनेट के अम्लीय माध्यम में कोई ऑक्सीकारक गुणों को समीकरण द्वारा समझाइए।
उत्तर
KMnO4 का विलयन उदासीन हो, क्षारीय हो या अम्लीय हो, प्रत्येक परिस्थिति में यह तीव्र ऑक्सीकारक का कार्य करता है।
(1) अम्लीय माध्यम में-तनु H2SO4 की उपस्थिति में KMnO4 अपचयित हो जाता है तथा इसके दो अणुओं से ऑक्सीजन के पाँच परमाणु प्राप्त होते हैं।
2KMnO4 + 3H2SO4→K2SO4 + 2MnSO4 + 3H2O + 5[0]

उदाहरण – (i) फेरस लवण का फेरिक लवण में ऑक्सीकरण –
अम्लीय KMnO4 से प्राप्त नवजात ऑक्सीजन फेरस लवण को फेरिक लवण में ऑक्सीकृत करता है।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 39

(ii) ऑक्जेलिक अम्ल का ऑक्सीकरण-अम्लीय माध्यम में KMnO4 ऑक्जेलिक अम्ल को CO2 में ऑक्सीकृत कर देता है।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 40

(iii) आयोडाइड आयन का आयोडीन में परिवर्तन
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 41

(iv) नाइट्राइट का नाइट्रेट में ऑक्सीकरण
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 42

(2) क्षारीय माध्यम में-क्षारीय माध्यम में KMnOa, MnO, में अपचयित होता है तथा 3 नवजात ऑक्सीजन देता है।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 43
उदाहरण-(i) आयोडाइड का आयोडेट में ऑक्सीकरणक्षारीय माध्यम में KI का आयोडेट में ऑक्सीकरण होता है।
2KMnO4 + H2O +KI→KIO3 +2MnO2 + 2KOH

(ii) एथिलीन का ग्लाइकॉल में ऑक्सीकरण –
क्षारीय KMnO4 एथिलीन का एथिलीन ग्लाइकॉल में ऑक्सीकरण करता है।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 44

(3) उदासीन माध्यम में-उदासीन माध्यम में भी KMnO4 ऑक्सीकारक की तरह कार्य करता है। अभिक्रिया में बना KOH विलयन को क्षारीय बना देता है। KMnO4, MnO2 में अपचयित हो जाता है एवं 2 मोल KMnO4 से 2 मोल नवजात ऑक्सीजन मुक्त होते हैं।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 45

प्रश्न 4.
पायरोलुसाइट से KMnO4 बनाने की विधि लिखिए तथा KMnO4 की अम्लीय, क्षारीय तथा उदासीन माध्यम में ऑक्सीकारक गुणों को एक-एक उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
पायरोलुसाइट से KMnO4 का निर्माण
1. पायरोलुसाइट का KMnO4 (हरे पदार्थ) में परिवर्तन-पायरोलुसाइट को वायुमण्डलीय O2 में KOH या K2CO3 के साथ गलित करने पर पोटैशियम मैंगनेट का हरा पदार्थ बनता है।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 46

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2. K2MnO4 का KMnO4 में परिवर्तन-K2MnO4 के हरे पदार्थ को जल के साथ निष्कासित करके रासायनिक ऑक्सीकरण या विद्युत्-अपघटनी ऑक्सीकरण द्वारा KMnO4 में ऑक्सीकृत करते हैं।
(a) रासायनिक ऑक्सीकरण-KMnO4 के हरे विलयन का उपचार Cl2, O2 या CO2 की धारा में प्रवाहित करके KMnO में ऑक्सीकृत किया गया है।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 47

(b) विद्युत्-अपघटनी ऑक्सीकरण-इस विधि में आयरन कैथोड एवं निकिल ऐनोड के मध्य K2MnO4 विलयन का विद्युत्-अपघटन किया जाता है, तो मैंगनेट आयन का ऐनोड पर परमैंगनेट आयन (MnO4) में ऑक्सीकरण हो जाता है तथा कैथोड पर H, मुक्त होती है।
MP Board Class 12th Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व - 49
अम्लीय, क्षारीय तथा उदासीन माध्यम में ऑक्सीकारक गुणों के उदाहरण-दीर्घ उत्तरीय प्रश्न क्र. 3 देखिए।

MP Board Class 12th General Hindi निबंध साहित्य का इतिहास

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MP Board Class 12th General Hindi निबंध साहित्य का इतिहास

निबंध का उदय

आधुनिक युग को गद्य की प्रतिस्थापना का श्रेय जाता है। जिस विश्वास, भावना और आस्था पर हमारे युग की बुनियाद टिकी थी उसमें कहीं न कहीं अनास्था, तर्क और विचार ने अपनी सेंध लगाई। कदाचित् यह सेंध अपने युग की माँग थी जिसका मुख्य साधन गद्य बना। यही कारण है, कवियों ने गद्य साहित्य में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

हिंदी गद्य का आरम्भ भारतेंदु हरिश्चंद्र से माना जाता है। वह कविता के क्षेत्र में चाहे परम्परावादी थे पर गद्य के क्षेत्र में नवीन विचारधारा के पोषक थे। उनका व्यक्तित्व इतना समर्थ था कि उनके इर्द-गिर्द लेखकों का एक मण्डल ही बन गया था। यह वह मण्डल था जो हिंदी गद्य के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। हिंदी गद्य के विकास में दशा और दिशा की आधारशिला रखने वालों में इस मण्डल का अपूर्व योगदान है। इन लेखकों ने अपनी बात कहने के लिए निबंध विधा को चुना।

निबंध की व्युत्पत्ति, स्वरूप एवं परिभाषा

निबंध की व्युत्पत्ति पर विचार करने पर पता चलता है कि ‘नि’ उपसर्ग, ‘बन्ध’ धातु और ‘धर्म प्रत्यय से यह शब्द बना है। इसका अर्थ है बाँधना। निबंध शब्द के पर्याय के रूप में लेख, संदर्भ, रचना, शोध प्रबंध आदि को स्वीकार किया जाता है। निबंध को हिंदी में अंग्रेजी के एसे और फ्रेंच के एसाई के अर्थ में ग्रहण किया जाता है जिसका सामान्य अर्थ प्रयत्न, प्रयोग या परीक्षण कहा गया है।

निबंध की भारतीय व पाश्चात्य परिभाषाएँ कोशीय अर्थ।

‘मानक हिंदी कोश’ में निबंध के संबंध में यह मत प्रकट किया गया है-“वह विचारपूर्ण विवरणात्मक और विस्तृत लेख, जिसमें किसी विषय के सब अंगों का मौलिक और स्वतंत्र रूप से विवेचन किया गया हो।”

हिंदी शब्द सागर’ में निबंध शब्द का यह अर्थ दिया गया है- ‘बन्धन वह व्याख्या है जिसमें अनेक मतों का संग्रह हो।”

पाश्चात्य विचारकों का मत

निबंध शब्द का सबसे पहले प्रयोग फ्रेंच के मांतेन ने किया था, और वह भी एक विशिष्ट काव्य विधा के लिए। इन्हें ही निबंध का जनक माना जाता है। उनकी रचनाएँ आत्मनिष्ठ हैं। उनका मानना था कि “I am myself the subject of my essays because I am the only person whom I know best.”

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अंग्रेजी में सबसे पहले एस्से शब्द का प्रयोग बेकन ने किया था। वह लैटिन । भाषा का ज्ञाता था और उसने इस भाषा में अनेक निबंध लिखे। उसने निबंध कोबिखरावमुक्त चिन्तन कहा है।

सैमुअल जॉनसन ने लिखा, “A loose sally of the mind, an irregular, .. undigested place is not a regular and orderly composition.” “निबंध मानसिक जगत् की विशृंखल विचार तरंग एक असंगठित-अपरिपक्व और अनियमित विचार खण्ड है। निबंध की समस्त विशेषताएँ हमें आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में दी गई इस परिभाषा में मिल जाती है, “सीमित आकार की एक ऐसी रचना जो किसी विषय विशेष या उसकी किसी शाखा पर लिखी गई हो, जिसे शुरू में परिष्कारहीन अनियमित, अपरिपक्व खंड माना जाता था, किंतु अब उससे न्यूनाधिक शैली में लिखित छोटी आकार की संबद्ध रचना का बोध होता है।”

भारतीय विचारकों का मत

आचार्य रामचंद्र शक्ल-आचार्य रामचंद्र शक्ल ने निबंध को व्यवस्थित और मर्यादित प्रधान गद्य रचना माना है जिसमें शैली की विशिष्टता होनी चाहिए, लेखक का निजी चिंतन होना चाहिए और अनुभव की विशेषता होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त लेखक के अपने व्यक्तित्व की विशिष्टता भी निबंध में रहती है। हिंदी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निबंध की परिभाषा देते हुए लिखा, “आधुनिक पाश्चात्य लेखकों के अनुसार निबंध उसी को कहना चाहिए जिसमें व्यक्तित्व अर्थात् व्यक्तिगत विशेषता है। बात तो ठीक है यदि ठीक तरह से समझी जाय। व्यक्तिगत विशेषता का यह मतलब नहीं कि उसके प्रदर्शन के लिए विचारकों की श्रृंखला रखी ही न जाए या जान-बूझकर जगह-जगह से तोड़ दी जाए जो उनकी अनुमति के प्रकृत या लोक सामान्य स्वरूप से कोई संबंध ही न रखे अथवा भाषा से सरकस वालों की सी कसरतें या हठयोगियों के से आसन कराये जाएँ, जिनका लक्ष्य तमाशा दिखाने के सिवाय और कुछ न हो।”

बाबू गुलाब राय-बाबू गुलाबराय ने भी निबंध में व्यक्तित्व और विचार दोनों को आवश्यक माना है। वे लिखते हैं- “निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सौष्ठव, सजीवता तथा अनावश्यक संगति और संबद्धता के साथ किया गया हो।”

निबंध की परिभाषाओं का अध्ययन करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निबंध एक गद्य रचना है। इसका प्रमुख उद्देश्य अपनी वैयक्तिक अनुभूति, भावना या आदर्श को प्रकट करना है। यह एक छोटी-सी रचना है और किसी एक विषय पर लिखी गई क्रमबद्ध रचना है। इसमें विषय की एकरूपता होनी चाहिए और साथ ही तारतम्यता भी। यह गद्य काव्य की ऐसी विधा है जिसमें लेखक सीमित आकार में अपनी भावात्मकता और प्रतिक्रियाओं को प्रकट करता है।

निबंध के तत्त्व

प्राचीन काल से आज तक साहित्य विधाओं में अनेक बदलाव आए हैं। साधारणतः निबंध में निम्नलिखित तत्त्वों का होना अनिवार्य माना गया है
1. उपयुक्त विषय का चुनाव-लेखक जिस विषय पर निबंध लिखना चाहता है उसे सबसे पहले उपयुक्त विषय का चुनाव करना चाहिए। इसके लिए उसे पर्याप्त सोच-विचार करना चाहिए। निबंध का विषय सामाजिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक आर्थिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, साहित्यिक, वस्तु, प्रकृति-वर्णन, चरित्र, संस्मरण, भाव, घटना आदि में से किसी भी विषय पर हो सकता है, किंतु विषय ऐसा होना चाहिए कि जिसमें लेखक अपना निश्चित पक्ष व दृष्टिकोण भली-भाँति व्यक्त कर सके।

2. व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति-निबंध में निबंधकार के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति दिखनी चाहिए। मोन्तेन ने निबंधों पर निजी चर्चा करते हुए लिखा है, “ये मेरी भावनाएँ हैं, इनके द्वारा मैं स्वयं को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता हूँ।” भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही विचारकों ने निबंध लेखक के व्यक्तित्व के महत्त्व को स्वीकार किया है। निबंध लेखक की आत्मीयता और वैयक्तिकता के कारण ही विषय के सम्बन्ध में निबंधकार के विचारों, भावों और अनुभूति के आधार पर पाठक उनके साथ संबद्ध कर पाता है। इस प्रकार निबंधकार के व्यक्तित्व को निबंध का केंद्रीय गुण कहा जाता है।

3. एकसूत्रता-निबंध बँधी हुई एक कलात्मक रचना है। इसमें विषयान्तर की संभावना नहीं होती, इसलिए निबंध के लिए आवश्यक है कि निबंधकार अपने विचारों को एकसूत्रता के गुण से संबद्ध करके प्रस्तुत करता है। निबंध के विषय के मुख्य भाव या विचार पर अपनी दृष्टि डालते हुए निबंधकार तथ्यों को उसके तर्क के रूप में प्रस्तुत करता है। इन तर्कों को प्रस्तुत करते हुए निबंधकार को यह ध्यान रखना पड़ता है कि तथ्यों और तर्कों के बीच अन्विति क्रम बना रहे। कई निबंधकार निबंध लिखते समय अपनी भाव-तरंगों पर नियन्त्रण नहीं रख पाते, ऐसे में वह विषय अलग हो जाता है। वस्तुतः लेखक का कर्तव्य है कि वह विषयान्तर न हो। अगर विषयान्तर हो भी गया तो उसे इधर-उधर विचरण कर पुनः अपने विषय पर आना ही पड़ेगा। निबंधकार को अपने अभिप्रेत का अंत तक बनाए रखना चाहिए।

4. मर्यादित आकार-निबंध आकार की दृष्टि से छोटी रचना है। इस संदर्भ में हर्बट रीड ने कहा है कि निबंध 3500 से 5000 शब्दों तक सीमित किया जाना चाहिए। वास्तव में निबंध के आकार के निर्धारण की कोई आवश्यकता नहीं है। निबंध विषय के अनुरूप और सटीक तर्कों द्वारा लिखा जाता है। लेखक अपने विचार भावावेश के क्षणों में व्यक्त करता है। ऐसे में वह उसके आकार के विषय में सोचकर नहीं चलता। आवेश के क्षण बहुत थोड़ी अवधि के लिए होते हैं, इसलिए निश्चित रूप से निबंध का आकार स्वतः ही लघु हो जाता है। इसमें अनावश्यक सूचनाओं को कोई स्थान नहीं मिलता।

5. स्वतःपूर्णता-निबंध का एक गुण या विशेषता है कि यह अपने-आप में पूर्ण होना चाहिए। निबंधकार का दायित्व पाठकों को निबंध में चुने हुए विषय की समस्त जानकारी देना है। यही कारण है कि उसे विषय के पक्ष और विपक्ष दोनों पर पूर्णतः विचार करना चाहिए। विषय से संबंधित कोई ज्ञान अधूरा नहीं रहना चाहिए। जिस भाव या विचार या बिंदु को लेकर निबंधकार निबंध लिखता है, निबंध के अंत तक पाठक के मन में संतुष्टि का भाव जागृत होना चाहिए। अगर पाठक के मन में किसी तरह का जिज्ञासा भाव रह जाता है तो उस निबंध को अपूर्ण माना जाता है और इसे निबंध के अवगुण के रूप में शुमार कर लिया जाएगा।

6. रोचकता-निबंध क्योंकि एक साहित्यिक विधा है इसलिए इसमें रोचकता का तत्त्व निश्चित रूप से होना चाहिए। यह अलग बात है कि निबंध का सीधा संबंध बुद्धि तत्त्व से रहता है। फिर इसे ज्ञान की विधा न कहकर रस की विधा कहा जाता है, इसलिए इसमें रोचकता होनी चाहिए, ललितता होनी चाहिए और आकर्षण होना चाहिए। निबंध के विषय प्रायः शुष्क होते हैं, गंभीर होते हैं या बौद्धिक होते हैं।

अगर निबंधकार इन विषयों को रोचक रूप में पाठक तक पहुँचाने में समर्थ हो जाता है तो इसे निबंध की पूर्णता और सफलता कहा जाएगा।

निबंध के भेद

निबंध के भेद, इसके लिए अध्ययन किए गए हैं। विषयों की विविधता से देखा जाए तो इन्हें सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। अतः निबंध लेखन का विषय दुनिया के किसी भी कोने का हो सकता है। विद्वानों ने निबंधों का वर्गीकरण तो अवश्य किया है पर यह वर्गीकरण या तो वर्णनीय विषय के आधार पर किया है या फिर उसकी शैली के आधार पर। निबंध का सबसे अधिक प्रचलित वर्गीकरण यह है

1. वर्णनात्मक-वर्णनात्मक निबंध वे कहलाते हैं जिनमें प्रायः भूगोल, यात्रा, ऋतु, तीर्थ, दर्शनीय स्थान, पर्व-त्योहार, सभा- सम्मेलन आदि विषयों का वर्णन किया जाता है। इनमें दृश्यों व स्थानों का वर्णन करते हुए रचनाकार कल्पना का आश्रय लेता है। ऐसे में उसकी भाषा सरल और सुगम हो जाती है। इसमें लेखक निबंध को रोचक बनाने में पूरी कोशिश करता है।

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2. विवरणात्मक-इस प्रकार के निबंधों का विषय स्थिर नहीं रहता अपितु गतिशील रहता है। शिकार वर्णन, पर्वतारोहण, दुर्गम प्रदेश की यात्रा आदि का वर्णन जब कलात्मक रूप से किया जाता है तो वे निबंध विवरणात्मक निबंधों की शैली में स्थान पाते हैं। विवरणात्मक निबंधों में विशेष रूप से घटनाओं का विवरण अधिक होता है।

3. विचारात्मक-इस प्रकार के निबंधों में बौद्धिक चिन्तन होता है। इनमें दर्शन, अध्यात्म, मनोविज्ञान आदि विषयगत पक्षों का विवेचन किया जाता है। लेखक अपने अध्ययन व चिन्तन के अनुरूप तर्क-शितर्क और खण्डन का आश्रय लेते हुए विषय का प्रभावशाली विवेचन करता है। इनमें बौद्धिकता तो होती ही है साथ ही भावना और कला कल्पना का समन्वय भी होता है। ऐसे निबंधों में लेखक आमतौर पर तत्सम शैली अपनाता है। समासिकता की प्रधानता भी होती है।

4. भावात्मक-इस श्रेणी में उन निबंधों को स्थान मिलता है जो भावात्मक विषयों पर लिखे जाते हैं। इन निबंधों का निस्सरण हृदय से होता है। इनमें रागात्मकता होती है इसलिए लेखक कवित्व का भी प्रयोग कर लेता है। अनुभूतियाँ और उनके उद्घाटन की रसमय क्षमता इस प्रकार के निबंध लेखकों की संपत्ति मानी जाती हैं। वस्तुतः कल्पना के साथ काव्यात्मकता का पुट इन निबंधों में दृश्यमान होता है।

वर्गीकरण अनावश्यक

गौर से देखा जाए तो इन चारों भेदों की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि ये निबंध लेखन की शैली हैं। इन्हें वर्गीकरण नहीं कहा जाना चाहिए। अगर कोई कहता है कि वर्णनात्मक निबंध है या दूसरा कोई कहता है कि विवरणात्मक निबंध है तो यह शैली नहीं है तो और क्या है?

वस्तुतः इन्हें विचारात्मक निबंध की श्रेणी में रखा जा सकता है। विचारात्मक निबंधों का विषय मानव जीवन का व्यापक कार्य क्षेत्र है और असीम चिंतन लोक है। इसमें धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान आदि विषयों का गंभीर विश्लेषण होता है। इसे निबंध का आदर्श भी कहा जा सकता है। इसमें निबंधकार के गहन चिंतन, मनन, सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि और विशद ज्ञान का स्पष्ट रूप देखने को मिलता है। इस संबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है, “शुद्ध विचारात्मक निबंधों का वहाँ चरम उत्कर्ष नहीं कहा जा सकता है जहाँ एक-एक पैराग्राफ में विचार दबा-दबाकर.टूंसे गए हों, और एक-एक वाक्य किसी विचार खण्ड को लिए हुए हो।’

आचार्य शुक्ल ने अपने निबंधों में स्वयं इस शैली का बखूबी प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी इस प्रकार के अनेक निबंध लिखे हैं जिनमें उनके मन की मुक्त उड़ान को अनुभव किया जा सकता है। इन निबंधों में उनकी व्यक्तिगत रुचि और अरुचि का प्रकाशन है। नित्य प्रति के सामान्य शब्दों को अपनाते हुए बड़ी-बड़ी बातें कह देना द्विवेदीजी की अपनी विशेषता है। व्यक्तिगत निबंध जब लेखक लिखता है तो उसका संबंध उसके संपूर्ण निबंध से होता है। आचार्यजी के इसी प्रकार के निबंध ललित निबंध कहलाते रहे हैं। आचार्यजी ने स्वयं कहा है, “व्यक्तिगत निबंधों का लेखन किसी एक विषय को छेड़ता है किंतु जिस प्रकार वीणा के एक तार को छेड़ने से बाकी सभी तार झंकृत हो उठते हैं उसी प्रकार उस एक विषय को छुते ही लेखक की चित्तभूमि पर बँधे सैकड़ों विचार बज उठते हैं।”

आचार्य रामचंद्र शुक्ल व्यक्तित्व व्यंजना को निबंधों का आवश्यक गुण मानते हैं। उन्होंने वैचारिक गंभीरता और क्रमबद्धता का समर्थन किया है। आज हिंदी में दो ही प्रकार के प्रमुख निबंध लिखे जा रहे हैं, “व्यक्तिनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ। यों निबंध का कोई भी विषय हो सकता है। साहित्यिक भी हो सकता है और सांस्कृतिक भी। सामाजिक भी और ऐतिहासिक आदि भी। वस्तुतः कोई भी निबंध केवल वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता और न ही व्यक्तिनिष्ठ हो सकता है। निबंध में कभी चिंतन की प्रधानता होती है और कभी लेखक का व्यक्तित्व उभर आता है।”

निबंध शैली

वस्तुतः निबंध शैली को अलग रूप में देखने की परम्परा-सी चल निकली है अन्यथा निबंधों का व करण निबंध शैली ही है। लेखक की रचना ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है। शैली ही उसके व्यक्तित्व की पहचान होती है। एक आलोचक ने शैली के बारे में कहा है कि जितने निबंध हैं, उतनी शैलियाँ हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि निबंध लेखन में लेखक के निजीपन का पूरा असर पड़ता है। निबंध की शैली से ही किसी निबंधकार की पहचान होती है क्योंकि एक निबंधकार की शैली दूसरे निबंधकार से भिन्न होती हैं।

मुख्य रूप से निबंध की निम्न शैलियाँ कही जाती हैं-
1. समास शैली-इस निबंध शैली में निबंधकार कम से कम शब्दों में अधिक-से-अधिक विषय का प्रतिपादन करता है। उसके वाक्य सुगठित और कसे हुए होते हैं। गंभीर विषयों के लिए इस शैली का प्रयोग किया जाता है।

2. व्यास शैली-इस तरह के निबंधों में लेखक तथ्यों को खोलता हुआ चला जाता है। उन्हें विभिन्न तर्कों और उदाहरणों के ज़रिए व्याख्यायित करता चला जाता है। वर्णनात्मक, विवरणात्मक और तुलनात्मक निबंधों में निबंधकार इसी प्रकार की शैली का प्रयोग करता है।

3. तरंग या विक्षेप शैली-इस शैली में निबंधकार में एकान्विति का अभाव रहता है। इसमें निबंधकार अपने मन की मौज़,में आकर बात कहता हुआ चलता है पर विषय पर केंद्रित अवश्य रहता है।

4. विवेचन शैली-इंस निबंध शैली में लेखक तर्क-वितर्क के माध्यम से प्रमाण पुष्टि और व्याख्या के माध्यम से, निर्णय आदि के माध्यम से अपने विषय को बढ़ाता हुआ चलता है। इस शैली में लेखक गहन चिंतन के आधार पर अपना कथ्य प्रस्तुत करता चला जाता है। विचारात्मक निबंधों में लेखक इस शैली का प्रयोग करता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध इसी प्रकार की शैली के अन्तर्गत माने जाते हैं।

5. व्यंग्य शैली-इस शैली में निबंधकार व्यंग्य के माध्यम से अपने विषयों का प्रतिपादन करता चलता है। इसमें उसके विषय धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि भी हो सकते हैं। इसमें रचनाकार किंचित हास्य का पुट देकर विषय को पठनीय बना देता है। शब्द चयन और अर्थ के चमत्कार की दृष्टि से इस शैली का निबंधकारों में विशेष प्रचलन है। व्यंग्यात्मक निबंध इसी शैली में लिखे जाते हैं।

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6. निगमन और आगमन शैली-निबंधकार अपने विषय का प्रतिपादन करने । की दृष्टि से निगमन शैली और आगमन शैली का प्रयोग करता है। इस प्रकार की शैली में लेखक पहले विचारों को सूत्र रूप में प्रस्तुत करता है। तद्उपरांत उस सूत्र के अन्तर्गत पहले अपने विचारों की विस्तार के साथ व्याख्या करता है। बाद में सूत्र रूप में सार लिख देता है। आगमन शैली निनन शैली के विपरीत होती है। इसके अतिरिक्त निबंध की अन्य कई शैलियों को देखा जा सकता है, जैसे प्रलय शैली। इस प्रकार की शैली में निबंधकार कुछ बहके-बहके भावों की अभिव्यंजना करता है। कुछ लेखकों के निबंधों में इस शैली को देखा जा सकता है। भावात्मक निबंधों के लिए कुछ निबंधकार विक्षेप शैली अपनाते हैं। धारा शैली में भी कुछ निबंधकार निबंध लिखते हैं। इसी प्रकार कुछ निबंधकारों ने अलंकरण, चित्रात्मक, सूक्तिपरक, धाराप्रवाह शैली का भी प्रयोग किया है। महादेवी वर्मा की निबंध शैली अलंकरण शैली है।

हिंदी निबंध : विकास की दिशाएँ
हिंदी गद्य का अभाव तो भारतेंदुजी से पूर्व भी नहीं था, पर कुछ अपवादों तक सीमित था। उसकी न तो कोई निश्चित परंपरा थी और न ही प्रधानता। सन् 1850 के बाद गद्य की निश्चित परंपरा स्थापित हुई, महत्त्व भी बढ़ा। पाश्चात्य सभ्यता के संपर्क में आने पर हिंदी साहित्य भी निबंध की ओर उन्मुख हुआ। इसीलिए कहा जाता है कि भारतेंदु युग में सबसे अधिक सफलता निबंध लेखन में मिली। हिंदी निंबध साहित्य को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है

  • भारतेंदुयुगीन निबंध,
  • द्विवेदीयुगीन निबंध,
  • शुक्लयुगीन निबंध
  • शुक्लयुगोत्तर निबंध एवं
  • सामयिक निबंध-1940 से अब तक।

भारतेंदुयुगीन निबंध-भारतेंदु युग में सबसे अधिक सफलता निबंध में प्राप्त हुई। इस युग के लेखकों ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से निबंध साहित्य को संपन्न किया! भारतेंदु हरिश्चंद्र से हिंदी निबंध का आरंभ माना जाना चाहिए। बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र ने इस गद्य विधा को विकसित एवं समृद्ध किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन दोनों लेखकों को स्टील और एडीसन कहा है। ये दोनों हिंदी के आत्म-व्यंजक निबंधकार थे। इस युग के प्रमुख निबंधकार हैं-भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, लाला श्री निवासदास, राधाचरण गोस्वामी, काशीनाथ खत्री आदि। इन सभी निबंधकारों का संबंध किसी-न-किसी पत्र-पत्रिका से था। भारतेंदु ने पुरातत्त्व, इतिहास, धर्म, कला, समाज-सुधार, जीवनी, यात्रा-वृत्तांत, भाषा तथा साहित्य आदि अनेक विषयों पर निबंध लिखे। प्रतापनारायण मिश्र के लिए तो विषय की कोई सीमा ही नहीं थी। ‘धोखा’, ‘खुशामद’, ‘आप’, ‘दाँत’, ‘बात’ आदि पर उन्होंने अत्यंत रोचक निबंध लिखे। बालकृष्ण भट्ट भारतेंदु युग के सर्वाधिक समर्थ निबंधकार हैं। उन्होंने सामयिक विषय जैसे ‘बाल-विवाह’, ‘स्त्रियाँ और उनकी शिक्षा’ पर उपयोगी निबंध लिखे। ‘प्रेमघन’ के निबंध भी सामयिक विषयों पर टिप्पणी के रूप में हैं। अन्य निबंधकारों का महत्त्व इसी में है कि उन्होंने भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र के मार्ग का अनुसरण किया।

द्विवेदीयुगीन निबंध-भारतेंदु युग में निबंध साहित्य की पूर्णतः स्थापना हो गई थी, लेकिन निबंधों का विषय अधिकांशतः व्यक्तिव्यंजक था। द्विवेदीयुगीन निबंधों में व्यक्तिव्यंजक निबंध कम लिखे गए। इस युग के श्रेष्ठ निबंधकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938), गोविंदनारायण मिश्र (1859-1926), बालमुकुंद गुप्त (1865-1907), माधव प्रसाद मिश्र (1871-1907), मिश्र बंधु-श्याम बिहारी मिश्र (1873-1947) और शुकदेव बिहारी मिश्र (1878-1951), सरदार पूर्णसिंह (1881-1939), चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883-1920), जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी (1875-1939), श्यामसुंदर दास (1875-1945), पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ (1876-1932), रामचंद्र शुक्ल (1884-1940), कृष्ण बिहारी मिश्र (1890-1963) आदि उल्लेखनीय हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध परिचयात्मक या आलोचनात्मक हैं। उनमें आत्मव्यंजन तत्त्व नहीं है। गोंविद नारायण मिश्र के निबंध पांडित्यपूर्ण तथा संस्कृतनिष्ठ गद्यशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। बालमुकुंद गुप्त ‘शिवशंभु के चिट्टे’ के लिए विख्यात हैं।

ये चिट्ठे “भारत मित्र’ में छपे थे। माधव प्रसाद मिश्र के निबंध ‘सुदर्शन’ में प्रकाशित हुए। उनके निबंधों का संग्रह ‘माधव मिश्र निबंध माला’ के नाम से प्रकाशित है। सरदार पूर्णसिंह भी इस युग के निबंधकार हैं। इनके निबंध नैतिक विषयों पर हैं। कहीं-कहीं इनकी शैली व्याख्यानात्मक हो गई हैं। चंद्रधर शर्मा गलेरी ने कहानी के अतिरिक्त निबंध भी लिखे। उनके निबंधों में मार्मिक व्यंग्य है। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी के निबंध ‘गद्यमाला’ (1909) और ‘निबंध-निलय’ में प्रकाशित हैं। पद्मसिंह शर्मा कमलेश तुलनात्मक आलोचना के लिए विख्यात हैं। उनकी शैली प्रशंसात्मक और प्रभावपूर्ण है। श्यामसुंदरदास तथा कृष्ण बिहारी मिश्र मूलतः आलोचक थे। इनकी शैली सहज और परिमार्जित है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रारंभिक निबंधों में भाषा संबंधी प्रश्नों और कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों के संबंध में विचार व्यक्त किए गए हैं। उन्होंने कुछ अंग्रेजी निबंधों का अनुवाद भी किया।

इस युग में गणेशशंकर विद्यार्थी, मन्नन द्विवेदी आदि ने भी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। शुक्लयुगीन निबंध-इस युग के प्रमुख निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं आचार्य शुक्ल के निबंध ‘चिंतामणि’ के दोनों खंडों में संकलित हैं। अभी हाल में चिंतामणि का तीसरा खंड प्रकाशित हुआ है। इसका संपादन डॉ. नामवर सिंह ने किया है। इसी युग के निबंधकारों में बाबू गुलाबराय (1888-1963) का उल्लेखनीय स्थान है। ‘ठलुआ क्लब’, ‘फिर निराश क्यों’, ‘मेरी असफलताएँ’ आदि संग्रहों में उनके श्रेष्ठ निबंध संकलित हैं। ल पुन्नालाल बख्शी’ ने कई अच्छे निबंध लिखे। इनके निबंध ‘पंचपात्र’ में संगृहीत हैं। अन्य निबंधकारों में शांति प्रेत द्विवेदी, शिवपूजन सहाय, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, रधुवीर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी आदि मुख्य हैं। इस युग में निबंध तो लिखे गए, पर ललित निबंध कम ही हैं।

शुक्लयुगोत्तर निबंध-शुक्लयुगोत्तर काल में निबंध ने अनेक दिशाओं में सफलता प्राप्त की। इस युग मं समीक्षात्मक निबंध अधिक लिखे गए। यों व्यक्तव्यंजक निबंध भी कम नहीं लिखे गए। शुक्लजी के समीक्षात्मक निबंधों को परंपरा के दूसरे नाम हैं नंददुलारे वाजपेयी। इसी काल के महत्त्वपूर्ण निबंधकार आच हजागे प्रसाद द्विवेदी हैं। उनके ललित निबंधों में नवीन जीवन-बोध है।

शुक्लयुगोत्तर निबंधकारों में जैनेंद्र कुमार का स्थान काफी ऊँचा है। उनके निबंधों में दार्शनिकता है। यह दार्शनिकता निजी है, अतः ऊब पैदा नहीं करती। उनके निबंधों में सरसता है।

हिंदी में प्रभावशाली समीक्षा के अग्रदूत शांतिप्रिय द्विवेदी हैं। इन्होंने समीक्षात्मक निबंध भी लिखे हैं और साहित्येतर भी। इनके समीक्षात्मक निर्बंधों में निर्बध का स्वाद मिलता है। रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने भी इस युग में महत्त्वपूर्ण निबंध लिखे। इनके निबंध विचार-प्रधान हैं। लेकिन कुछ निबंधों में उनका अंतरंग पक्ष भी उद्घाटित हुआ है। समीक्षात्मक निबंधकारों में डॉ. नगेंद्र का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके निबंधों की कल्पना, मनोवैज्ञानिक दृष्टि उनके व्यक्तित्व के अपरिहार्य अंग हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी के निबंध-संग्रह ‘गेहूँ और गुलाब’ तथा ‘वंदे वाणी विनायकौ’ हैं। बेनीपुरी की भाषा में आवेग है, जटिलता नहीं। श्रीराम शर्मा, देवेंद्र सत्यार्थी भी निबंध के क्षेत्र में उल्लेखनीय हैं। वासुदेवशरण अग्रवाल के निबंधों में भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को विद्वतापूर्वक उद्घाटित किया गया है। यशपाल के निबंधों में भी मार्क्सवादी दृष्टिकोण मिलता है। बनारसीदास चतुर्वेदी के निबंध-संग्रह ‘साहित्य और जीवन’, ‘हमारे आराध्य’ नाम में यही प्रवृत्ति है। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर के निबंध में करुणा, व्यंग्य और भावुकता का सन्निवेश है। भगवतशरण उपाध्याय ने ‘ठूठा आम’, और ‘सांस्कृतिक निबंध’ में इतिहास और संस्कृति की पृष्टभूमि पर निबंध लिखे। प्रभाकर माचवे, विद्यानिवास मिश्र, धर्मवीर भारती, शिवप्रसाद सिंह, कुबेरनाथ राय, ठाकुर प्रसाद सिन्हा आदि के ललित निबंध विख्यात हैं।

सामयिक निबंधों में नई चिंतन पद्धति और अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। अज्ञेय, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, निर्मल वर्मा, रमेशचंद्रशाह, शरद जोशी, जानकी वल्लभ शास्त्री, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, नेमिचंद्र जैन, विष्णु प्रभाकर, जगदीश चतुर्वेदी, डॉ. नामवर सिंह और विवेकी राय आदि ने हिंदी गद्य की निबंध परंपरा को न केवल बढ़ाया है, बल्कि उसमें विशिष्ट प्रयोग किए हैं। समीक्षात्मक निबंधों में गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम आता है। उनके निबंधों में बौद्धिकता है और वयस्क वैचारिकता तबोध के ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध’ नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, ‘समीक्षा की समस्याएँ’ और ‘एक साहित्यिक की डायरी’ नामक निबंध विशेष उल्लेखनीय हैं। डॉ. रामविलास शर्मा के निबंध शैली में स्वच्छता, प्रखरता तथा वैचारिक संपन्नता है। हिंदी निबंध में व्यंग्य को रवींद्र कालिया ने बढ़ाया है। नए निबंधकारों में रमेशचंद्र शाह का नाम तेजी से उभरा है।

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महादेवी वर्मा, विजयेंद्र स्नातक, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के निबंधों में प्रौढ़ता है। इसके अतिरिक्त विष्णु प्रभाकर कृत ‘हम जिनके ऋणी हैं’ जानकी वल्लभ शास्त्री कृत ‘मन की बात’, ‘जो बिक न सकी’ आदि निबंधों में क्लासिकल संवेदना का उदात्त रूप मिलता है। नए निबंधकारों में : प्रभाकर श्रोत्रिय, चंद्रकांत वांदिवडेकर, नंदकिशोर आचार्य, बनवारी, कृष्णदत्त पालीवाल, प्रदीप मांडव, कर्णसिंह चौहान और सुधीश पचौरी आदि प्रमुख हैं। आज राजनीतिक-सांस्कृतिक विषयों पर भी निबंध लिखे जा रहे हैं। अतः हिंदी निबंध-साहित्य उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है।

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 निष्ठामूर्ति कस्तूरबा

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 निष्ठामूर्ति कस्तूरबा (संस्मरण, काका कालेलकर)

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक ने राष्ट्रमाता किसे कहा है? (M.P. 2010)
उत्तर:
माँ कस्तूरबा को राष्ट्रमाता कहा गया है।

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प्रश्न 2.
राष्ट्र माँ कस्तूरबा को किस आदर्श की जीवित प्रतिमा मानता है?
उत्तर:
राष्ट्र माँ कस्तूरबा का आर्य सती स्त्री के आदर्श की जीवित प्रतिमा मानता है।

प्रश्न 3.
कस्तूरबा भाषा का सामान्य ज्ञान होने पर भी कैसे अपना काम चला लेती थीं?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा कुछ अंग्रेजी समझ लेती थीं और वे 25-30 शब्द बोल लेती थीं। उन्हीं शब्दों को समझ-बोलकर अपना काम चला लेती थीं।

प्रश्न 4.
कस्तूरबा को किन ग्रंथों पर असाधारण श्रद्धा थी?
उत्तर:
कस्तूरबा को गीता और तुलसी-रामायण पर असाधारण श्रद्धा थी।

प्रश्न 5.
महात्माजी और कस्तूरबा को पहली बार देखकर लेखक ने क्या अनुभव किया?
उत्तर:
लेखक ने अनुभव किया कि मानो उस आध्यात्मिक माँ-बाप मिल गए हैं।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुनिया में कौन-सी दो अमोघ शक्तियाँ मानी गई थीं? कस्तूरबा की निष्ठा किसमें अधिक थी? (M.P. 2009, 2010)
उत्तर:
दुनिया में शब्द और कृति दो अमोघ शक्तियाँ मानी गई हैं। शब्दों ने तो सारी दुनिया को हिला कर रख दिया है।

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प्रश्न 2.
कस्तूरबा को तेजस्वी महिला क्यों कहा गया है? (M.P. 2012)
उत्तर:
जब माँ कस्तूरबा को दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया तो उन्होंने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा और न ही कोई निवेदन प्रकट किया। उन्होंने केवल यही कहा कि मुझे तो वह कानून तोड़ना है जो यह कहता है कि मैं महात्माजी की धर्मपत्नी नहीं हूँ। जेल में उनकी तेजस्विता तोड़ने में सरकार असफल रही और सरकार को घुटने टेकने पड़े इसीलिए माँ कस्तूरबा को तेजस्वी कहा गया है।

प्रश्न 3.
“सभा में जाने का मेरा निश्चय पक्का है मैं जाऊँगी ही” यह कथन किसका है और किस प्रसंग में कहा गया है?
उत्तर:
यह कथन माँ कस्तूरबा का है। यह इस प्रसंग में कहा गया है जब गाँधी जी को सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था और माँ कस्तूरबा पति के कार्य को आगे बढ़ाने के उस सभा में भाषण देने जा रही थीं जिसमें गाँधीजी भाषण देने वाले थे। उस समय सरकारी अधिकारियों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो उन्होंने उक्त कथन द्वारा उन्हें उत्तर दिया।

प्रश्न 4.
“मुझे यहाँ का वैभव कतई नहीं चाहिए। मुझे तो सेवाग्राम की कुटिया ही पसंद है” माँ कस्तूरबा के इस कथन के आशय को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आशय-माँ कस्तूरबा को गाँधीजी के साथ आगा खाँ महल में सरकार ने कैद कर रखा था। वहाँ किसी प्रकार का अभाव नहीं था। सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थीं किंतु उन्हें वहाँ कैद होना असहनीय लग रहा था। उन्हें महल में कैद होना अच्छा नहीं लगता। उन्हें किसी प्रकार सुख-सुविधा, ऐश्वर्य की आवश्यकता नहीं थी, उन्हें तो स्वतंत्रतापूर्वक सेवाग्राम की कुटिया में रहना ही पसंद था।

प्रश्न 5.
कस्तूरबा ने अपनी तेजस्विता और कृतिनिष्ठा से क्या सिद्ध कर दिखाया?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा ने अपनी तेजस्विता और कृतिनिष्ठा से यह सिद्ध कर दिखाया कि उन्हें शब्द-शास्त्र में बेशक निपुणता प्राप्त न हो परंतु कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के निर्णय करने में उन्हें कोई दुविधा नहीं है। उनमें तुरंत निर्णय लेने की क्षमता है।

प्रश्न 6.
बदलते आदर्शों के इस युग में कस्तूरबा के प्रति श्रद्धा प्रकट कर किस बात का प्रमाण दिया गया है?
उत्तर:
बदलते आदर्शों के इस युग में कस्तूरबा के प्रति श्रद्धा प्रकट कर इस बात का प्रमाण दिया कि आज भी हमारे देश में प्राचीन तेजस्वी आदर्श मान्य हैं और हमारी संस्कृति की जड़ें आज भी काफी मजबूत हैं।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथन का भाव-विस्तार कीजिए।
“हमारी संस्कृति की जड़ें आज भी काफी मजबूत हैं।”
उत्तर:
हमारी भारतीय संस्कृति के जीवन-मूल्य और आदर्श आज के बदलते . आदर्शों के युग में भी महत्त्व रखते हैं। भारतीय समाज में आज भी उन आदर्शों को श्रद्धा और विश्वास की दृष्टि से देखा जाता हैं। इससे प्रमाणित होता है कि हमारी संस्कृति की जड़ें भी काफी मजबूत हैं। संस्कृति के आदर्शों और मूल्यों को सरलता से समाप्त नहीं किया जा सकता।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों की संधि-विच्छेद करते हुए संधि का नाम लिखिए –
लोकोत्तर, स्वागत, सत्याग्रह, महत्त्वाकांक्षा, निस्तेज।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 निष्ठामूर्ति कस्तूरबा img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह करते हुए समास का नाम लिखिए –
धर्मनिष्ठा, राष्ट्रमाता, देशसेवा, जीवनसिद्धि, बंधनमुक्त।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 निष्ठामूर्ति कस्तूरबा img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग अलग करके लिखिए –
उपसंहार, प्रत्युत्पन्न, असाधारण, अशिक्षित, अनपढ़।
उत्तर:
उपसर्ग – उप, प्रति, अ, अ, अन।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों से प्रत्यय अलग करके लिखिए –
तेजस्विता, कौटुम्बिक, चरित्रवान, शासकीय, उत्कृष्टता।
उत्तर:
प्रत्यय – ता, इक, वान, ईय, ता।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित विदेशी शब्दों के लिए हिंदी शब्द लिखिए –
अमलदार, हासिल, खुद, कायम, आंबदार, जिद्द।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 निष्ठामूर्ति कस्तूरबा img-3

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
ऐसी नारियों के जीवन-प्रसंगों का संकलन कीजिए जो समाज के लिए प्रेरक व आदर्श साथ ही स्वरूप रही हैं।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
अपने आस-पास की ऐसी महिला के बारे में लिखिए, जो आपके लिए आदर्श हो।
उत्तर:
छात्र स्वयं लिखें।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाली महिलाओं के चित्रों का एलबम बनाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं चित्र एकत्र कर एलबम बनाएँ।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर –

प्रश्न 1.
कस्तूरवा का एकाक्षरी नाम…….था।
(क) माँ
(ख) बा
(ग) तेजस्वी
(घ) दा
उत्तर:
(ख) बा।

प्रश्न 2.
अपने आंतरिक सद्गुणों और निष्ठा के कारण कस्तूरबा…….वन पाईं।
(क) राष्ट्रमाता
(ख) वीरमाता
(ग) वीर पत्नी।
(घ) आदर्श नारी
उत्तर:
(क) राष्ट्रमाता।

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प्रश्न 3.
‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ संस्मरण के लेखक हैं –
(क) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(ख) उदयशंकर भट्ट
(ग) काला कालेलकर
(घ) मैथिलीशरण गुप्त
उत्तर:
(ग) काका कालेलकर।

प्रश्न 4.
लेखक के अनुसार गाँधीजी को भारत में कहाँ गिरफ्तार किया गया था?
(क) विधानसभा हाउस
(ख) आगा खाँ महल
(ग) बिड़ला हाउस
(घ) बिड़ला मंदिर
उत्तर:
(ग) बिड़ला हाउस।

प्रश्न 5.
कस्तूरबा का निधन……….में हुआ।
(क) बिड़ला हाउस
(ख) आगा खाँ महल
(ग) सेवाग्राम
(घ) वायसराय हाउस
उत्तर:
(ख) आगा खाँ महल।

प्रश्न 6.
“अगर आप गिरफ्तार करें, तो भी मैं जाऊँगी।” यह कथन उस समय … का है?”
(क) जब कस्तूरबा को पुलिस ने घेर लिया।
(ख) जब कस्तूरवा पर सरकार ने आरोप लगाया।
(ग) जब महात्माजी को गिरफ्तार कर लिया गया।
(घ) जब कस्तूरबा से पुलिस ने पूछताछ की।
उत्तर:
(ख) जब कस्तूरबा पर सरकार ने आरोप लगाया।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पर कीजिए –

  1. राष्ट्र ने ………. को राष्ट्रपति का सम्मान दिया। (महात्माजी बापूजी)
  2. कस्तूरबा ………. के नाम से राष्ट्रमाता का सम्मान दिया गया। (माँ वा)
  3. दुनिया में दो अमोघ शक्तियाँ हैं ……….। (शब्द और कृति स्मृति और उपासना)
  4. लेखक को कस्तूरवा के प्रथम दर्शन ………. में हुए। (शान्तिनिकेतन/दक्षिण अफ्रीका)
  5. हमारी ………. की जड़ें आज भी काफी मजबूत हैं। (परम्परा/संस्कृति)

उत्तर:

  1. बापूजी
  2. बा
  3. शब्द और कृति
  4. शान्तिनिकेतन
  5. संस्कृति।

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III. निम्नलिखित कथनों में सत्य असत्य छाँटिए –

  1. अपने आंतरिक सद्गुणों और निष्ठा के कारण कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन गईं।
  2. कस्तूरबा का भाषा-ज्ञान सामान्य से अधिक था।
  3. 1915 के आरंभ में महात्माजी शान्तिनिकेतन पधारे।
  4. आश्रम में कस्तूरबा लेखक के लिए देवी के समान थीं।
  5. अध्यक्षीय भाषण किसी से लिखवा लेना आसान है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्या
  4. असत्य
  5. सत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 10 निष्ठामूर्ति कस्तूरबा img-4
उत्तर:

(i) (घ)
(ii) (ग)
(iii) (ख)
(iv) (ङ)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
सत्याग्रहाश्रम क्या था?
उत्तर:
महात्माजी की संस्था।

प्रश्न 2.
स्त्री-जीवन सम्बन्ध के हमारे आदर्श को हमने क्या किए हैं?
उत्तर:
काफी बदल दिए हैं।

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प्रश्न 3.
कस्तूरबा के सामने उनका कर्त्तव्य कैसा था?
उत्तर:
किसी दीये के समान था।

प्रश्न 4.
किन दो वाक्यों में कस्तूरबा अपना फैसला सुना देतीं।
उत्तर:
‘मुझसे यही होगा’ और ‘यह नहीं होगा।

प्रश्न 5.
कस्तूरबा में कौन-से भारतीय गुण थे?
उत्तर:
कौटुम्बिक सत्वगुण।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
माँ कस्तूरबा कौन थीं? (M.P. 2010)
उत्तर:
माँ कस्तूरबा महात्मा गाँधीजी की सहधर्मचारणी थीं।

प्रश्न 2.
माँ कस्तूरबा अंग्रेजी कैसे समझ और बोल लेती थीं?
उत्तर:
दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहने के कारण कस्तूरबा कुछ अंग्रेजी समझ लेती थीं और 25-30 शब्द बोल भी लेती थीं।

प्रश्न 3.
माँ कस्तूरबा ने धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से इनकार क्यों कर दिया?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा एक धर्मनिष्ठ महिला थीं। धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाता इसलिए उन्होंने धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से मना कर दिया।

प्रश्न 4.
लेखक को कस्तूरबा के प्रथम दर्शन कब हुए?
उत्तर:
सन् 1915 में शांतिनिकेतन पधारने पर लेखक को कस्तूरबा के प्रथम दर्शन हुए हैं।

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प्रश्न 5.
माँ कस्तूरबा को भारत में कहाँ कैद रखा गया?
उत्तर:
माँ कस्तूबा को भारत में आगा खाँ महल में कैद रखा गया।

प्रश्न 6.
आज हमारी संस्कृति की जड़ें कैसी हैं?
उत्तर:
आज हमारी संस्कृति की जड़ें काफी मजबूत हैं।

प्रश्न 7.
महात्मा गाँधी की सहधर्मिणी कौन थी?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा, महात्मा गाँधी की संहधर्मिणी थीं।

प्रश्न 8.
माँ कस्तूरबा का किसके प्रति अपार श्रद्धा थी?
उत्तर:
तुलसीदास की रामायण के प्रति माँ कस्तूरबा की अपार श्रद्धा थी।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधीजी ने किन दो शक्तियों की उपासना की?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने विश्व की दो अमोघ शक्तियों-शब्द और कृति-की असाधारण उपासना की। उन्होंने इन दोनों शक्तियों में निपुणता प्राप्त की।

प्रश्न 2.
“मुझे अखाद्य खाकर जीना नहीं है। यह कथन किसका है और किस प्रसंग में कहा गया हैं?
उत्तर:
यह कथन माँ कस्तूरबा का है और यह डॉक्टर द्वारा धर्म के विरुद्ध खुराक लेने की बात के प्रसंग में कहा गया है।

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प्रश्न 3.
पति के गिरफ्तार होने पर मौकस्तूरबा ने उनके कार्य को आगे बढ़ाने के लिए क्या किया?
उत्तर:
पति के गिरफ्तार होने पर माँ कस्तूरबा ने उनके कार्य आगे बढ़ाने के लिए उस सभा में भाषण देने के लिए गईं जिसे गाँधीजी संबोधित करने वाले थे। दो-तीन बार राजकीय परिषदों या शिक्षण सम्मेलनों में अध्यक्ष का पद संभाला और अध्यक्षीय भाषण दिए।

प्रश्न 4.
माँ कस्तूरबा देश में चल रही सूक्ष्म जानकारी.कैसे रखती थीं?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा देश में क्या चल रहा है इसकी सूक्ष्म जानकारी प्रश्न पूछ-पूछकर या अखबारों पर दृष्टि डालकर प्राप्त कर लेती थीं और इस देश में चल रही गतिविधियों की जानकारी रखती थीं।

प्रश्न 5.
“मुझे यहाँ का वैभव कतई नहीं चाहिए। मुझे तो सेवाधाम की कुटिया ही पसंद है।” यह किसने, कब और क्यों कहा?
उत्तर:
“मुझे यहाँ का वैभव कतई नहीं चाहिए। मुझे तो सेवाधाम की कुटिया ही पसंद है।” यह माँ कस्तूरबा ने कहा। यह उस समय कहा, जव माँ कस्तूरबा को गाँधीजी के साथ आगा खाँ महल में सरकार ने कैद कर लिया। माँ कस्तूरबा ने यह इसलिए कहा कि उन्हें वहाँ कैद होना असहनीय हो उठा था। इसका यही कारण था कि उन्हें किसी प्रकार की सुख-सुविधा और ऐश्वर्य की आवश्यकता नहीं थी। उन्हें तो स्वतंत्रता एवं सेवाग्राम कुटिया ही पसंद थी।

प्रश्न 6.
माँ कस्तूरबा ने धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से क्यों मना कर दिया?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा ने धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से मना कर दिया क्योंकि धर्म के प्रति उनकी अपार श्रद्धा थी। इस प्रकार की खुराक उनकी अंतरात्मा के विरुद्ध थी। फलस्वरूप उन्होंने इस प्रकार की खुराक लेने की अपेक्षा मृत्यु को प्राप्त होना उचित समझा था।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
काका कालेलकर का संक्षिप्त-जीवन परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
काका कालेलकर का जन्म 1 दिसंबर, सन् 1885 ई० में महाराष्ट्र प्रांत के सतारा नगर में हुआ था। अहिंदीभाषी होते हुए भी आपने सबसे पहले हिंदी सीखी और कई वर्षों तक दक्षिण सम्मेलन की ओर से हिंदी का प्रचार-कार्य किया। आपने राष्ट्रभाषा प्रचार के कार्य में सक्रिय और सार्थक भूमिका निभाई। अपनी चमत्कारी सूझ-बूझ और व्यापक अध्ययनशीलता के कारण आपकी गणना प्रमुख अध्यापकों और व्यवस्थापकों में होने लगी।

गुजरात में हिंदी प्रचार के लिए. गाँधी जी ने कालेलकर को ही चुना इसलिए उन्होंने गुजराती सीखी और गहन अध्ययन के बाद ही शिक्षण-कार्य प्रारंभ किया। आप गुजरात विद्यापीठ के कुलपति पद पर रहे। आपको दो बार राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया। सन् 1964 ई० में आपको ‘पदम् विभूषण’ सम्मान से सम्मानित किया गया। मराठीभाषी होते हुए भी आपने हिंदी के प्रचार-प्रसार में रुचि दिखाई। आप विज्ञापन और आत्मप्रचार से दूर रहकर हिंदी की सेवा में लगे रहे। आपका निधन 21 अगस्त, 1981 को हुआ।

साहित्यिक विशेषताएँ:
आपके साहित्य में यात्राओं के वर्णन तथा लोक-जीवन के अनुभवों को स्थान मिला है। आपने हिंदी में यात्रा-साहित्य के अभाव को काफी हद तक दूर किया। आपकी रचनाओं में सजीवता के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। अपनी भाषा क्षमता के कारण ही आप साहित्य अकादमी में गुजराती भाषा के प्रतिनिधि चुने गए।

रचनाएँ:
काका कालेलकर ने लगभग तीस पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें स्मरण-यात्रा, धर्मोदय, हिमालय प्रवास, लोकमाता, जीवन और साहित्य, तक्षशिला, अमृत और विष, मुक्ति पथ, स्त्री का हृदय, युगदीप आदि प्रमुख हैं।

भाषा-शैली:
काका कालेलकर की भाषा-शैली बड़ी सजीव और प्रभावशाली है। उन्होंने अपनी रचनाओं में हिंदी खड़ी बोली का प्रयोग किया है। उनकी भाषा आम बोलचाल की है। उन्होंने अपनी भाषा में तद्भव, तत्सम और देशी-विदेशी भाषाओं के शब्दों, मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग किया है।

साहित्य में महत्त्व:
काका कालेलकर को उत्तम निबंध, सजीव यात्रा-वृत्त, प्रभावोत्पादक संस्मरण और भावुकतापूर्ण जीवनी लिखने वालों में उच्च स्थान प्राप्त है। आप अहिंदीभाषी होते हुए भी राष्ट्रभाषा हिंदी के सच्चे सेवकों में गिने जाते हैं।

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निष्ठामूर्ति कस्तूरबा पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
काका कालेलकर के संस्मरण ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरवा’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
लेखक ने इस संस्मरण में कस्तूरबा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है। लेखक का मानना है कि माँ कस्तूरबा का सम्मान गाँधी जी की पत्नी होने के कारण नहीं, अपितु उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के कारण है। राष्ट्र ने बापूजी को राष्ट्रपिता का सम्मान दिया है तो ‘बा’ भी राष्ट्रमाता का सम्मान पा सकीं। वे राष्ट्रमाता अपने आंतरिक सद्गुणों और निष्ठा के कारण बनीं। उन्होंने प्रत्येक स्थान पर अपने चरित्र को उजागर किया है। वे आर्य स्त्री के आदर्श की जीवंत प्रतिमा थीं।

माँ कस्तूरबा का भाषा ज्ञान विशेष नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर कुछ अंग्रेजी के शब्द समझने में समर्थ हो सकी थी और अंग्रेजी के 25-30 शब्द बोलने के लिए भी सीख लिए थे। विदेशी मेहमानों के आने पर उन्हीं शब्दों से अपना काम चलाती थीं। माँ कस्तूरबा की गीता और तुलसी की रामायण पर अपार श्रद्धा थी। आगा खाँ महल में कारावास के दौरान वार-बार गीता का पाठ लेने का प्रयास करती रही थीं।

संसार में दो अमोघ शक्तियाँ हैं-शब्द और कृति, किंतु अंतिम अक्ति ‘कृति’ है। महात्माजी ने शब्द और कृति दोनों शक्तियों की उपासना की तो बा ने कृति शक्ति की ‘नम्रता के साथ उपासना करके संतोष प्राप्त करने के साथ-साथ जीवन-सिद्धि भी प्राप्त की थी। दक्षिण अफ्रीका में जब उन्हें जेल भेजा, तो उन्होंने अपना बचाव नहीं किया। न कोई निवेदन किया और जेल चली गईं। जेल में वहाँ की सरकार ने उनकी तेजस्विता भंग करने का बड़ा प्रयास किया किंतु वह सफल न हो सकी। डॉक्टर ने जब धर्म के विरुद्ध खुराक लेने की बात कही तो केवल इतना कहा- “मुझे अखाद्य खाकर जीना नहीं है। फिर भले ही मुझे मौत का सामना करना पड़े।”

लेखक को सन् 1915 में शांतिनिकेतन में ‘बा’ को देखने का अवसर मिला। रात को आंगन के बीच के एक चबूतरे पर अगल-बगल विस्तर लगाकर वापृ ओर बा सो गए और अन्य लोग आँगन में बिस्तर लगा सो गए। उस समय लेखक को लगा कि हमें आध्यात्मिक मां-बाप मिल गए हैं। लेखक को ‘बा’ के अंतिम दर्शन बिड़ला हाउस में गिरफ्तारी के दौरान हुए। जब गाँधी जी को गिरफ्तार करने के वाद उनसे कहा गया कि आपकी इच्छा हो । तो आप भी चल सकती हैं। ‘बा’ ने कहा अगर आप गिरफ्तार करें तो मैं भी जाऊँगी। पति के गिफ्तार होने के बाद उन्होंने उस सभा में जाने का निश्चय किया, जिसमें बापू बोलने वाले थे। सरकार ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो उन्होंने उत्तर दिया कि ‘सभा में जाने का निश्चय पक्का है, मैं जाऊँगी।’

माँ कस्तूरबा को गिरफ्तार करके आगा खाँ महल में रखा गया है, जहाँ सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ थीं किंतु उन्हें अपना कैद में होना असह्य था। उन्होंने कई बार कहा-‘मुझे यहाँ का वैभव कतई नहीं चाहिए, मुझे तो सेवाग्राम की कुटिया ही पसंद है।” सरकार ने उनके शरीर को कैद रखा, किंतु उनकी आत्मा को वह कैद सहन नहीं हुई। उन्होंने सरकार की कैद में ही अपने प्राण त्यागे और वह स्वतंत्र हुई। माँ कस्तूरबा के सामने उनके कर्तव्य सदा स्पष्ट रहे। उन्होंने ‘मुझसे यही होगा’ और ‘यह नहीं होगा’ वाक्यों में अपना निर्णय सुना देती थीं।

आश्रम में कस्तूरबा लोगों के लिए माँ के समान थीं। आश्रम के नियम उन पर लागू नहीं होते थे। आश्रम में सभी के खाने-पीने की व्यवस्था कस्तूरबा करती थीं। आलस्य उनमें बिलकुल नहीं था। वे रसोईघर में जो भी काम करती थीं, आस्था से करती थीं। उनमें संस्था चलाने की महत्त्वाकांक्षा नहीं थी। परंतु देश में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी वे अवश्य रखती थीं। वापूजी जब जेल में होते थे तो उन्होंने दो-तीन बार राजकीय परिषदों का या शिक्षण सम्मेलनों का अध्यक्ष पद भी सँभालना पड़ा। उनके अध्यक्षीय भाषण लेखक लिखता था। किन्तु उपसंहार माँ कस्तूरबा अपनी प्रतिभा से करती थीं, उनके भाषणों में परिस्थिति की समझ, भाषा की सावधानी और खानदानी की महत्ता आदि गुण उत्कृष्टता से दिखाई देते थे।

माँ कस्तूरबा की मृत्यु पर पूरे देश ने स्वयं स्फूर्ति से उनका स्मारक बनाया। कस्तूरबा अपने संस्कार के बल पर पातिव्रत्य को, कुटुंब-वत्सलता को और तेजस्विता को चिपकाए रहीं और उसी के बल पर बापूजी के माहात्म्य की बराबरी कैर सकीं। स्वातंत्र्य की पूर्व शिवरात्रि के दिन उनका स्मरण कर सभी देशवासी अपनी-अपनी तेजस्विता को और अधिक तेजस्वी बनाते हैं।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधी जैसे महान पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र का आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्माजी को ‘बापूजी’ के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा भी ‘घा’ के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं। किंतु सिर्फ महात्माजी के साथ संबंध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुणों और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पाई हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीकामें हों या हिंदुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारित्र्य का तेज प्रकट करने का मौका आया, कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं। (Page 44)

शब्दार्थ:

  • सहधर्मचारिणी – धर्म या कर्तव्यों के निर्वाह में साथ देने वाली पत्नी।
  • कायम – स्थापित।
  • एकाक्षरी – एक अक्षर वाला।
  • आंतरिक सद्गुण – हृदय के अच्छे गुण।
  • कसौटी – परख, परीक्षा।
  • खिलाफ – विरुद्ध।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश काका कालेलकर द्वारा रचित संस्मरण ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ से लिया गया है। लेखक इन पंक्तियों में कस्तूरबा के राष्ट्रमाता बनने के कारणों को स्पष्ट करने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व पर भी प्रकाश डाल रहा है।

व्याख्या:
महात्मा गाँधी की धर्म अथवा कर्तव्यों के निर्वाह में साथ देने वाली पूजनीय कस्तूरबा के संबंध में राष्ट्र के आदर को देशवासियों को ज्ञान होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा गाँधी को ‘बापूजी’ कहकर सम्मानित किया है। इतना ही नहीं उन्हें राष्ट्रपिता के पद पर स्थापित किया है। सारा राष्ट्र उन्हें राष्ट्रपिता कहकर सम्मान देता है। इसलिए कस्तूरबा भी ‘बा’ एक अक्षर वाले नाम से राष्ट्रमाता बनने में सफल रही हैं।

सारा देश उन्हें राष्ट्रमाता का दर्जा देता है। महात्मा गाँधी की पत्नी होने के कारण ही वे राष्ट्रमाता नहीं बनीं, अपितु अपने सद्गुणों अर्थात् अच्छे गुणों से युक्त होने और विश्वास के कारण बनीं। वे चाहे दक्षिण अफ्रीका में रही हों अथवा भारत में, जब भी उन्हें सरकार के विरुद्ध लड़ाई लड़ते समय अपने चारित्रिक तेज को उजागर करने का अवसर मिला, वे सदा इस दिव्य परीक्षा में पूर्णतः सफल हुईं। भाव यह है कि माँ कस्तूरबा को जब भी अपने चारित्रिक तेज को उजागर करने का अवसर मिला, उन्होंने इसे उजागर किया।

विशेष:

  1. माँ कस्तूरबा का सम्मान उनकै स्वतंत्र व्यक्तित्व के कारण समूचे देश में होता है। लेखक मैं इस तथ्य को उजागर किया है।
  2. माँ कस्तूरबा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है।
  3. भाषा तत्सम, उर्दू शब्दावली से युक्त खड़ी बोली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
माँ कस्तूरबा किस कारण से राष्ट्रमाता बन सकीं?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा महात्मा गाँधी की पत्नी होने के कारण राष्ट्रमाता नहीं बनी, अपितु वे अपने हृदय के सद्गुणों और विश्वास तथा स्वतंत्र व्यक्तित्व के कारण राष्ट्रमाता बनने में सफल रहीं।

प्रश्न (ii)
माँ कस्तूरबा किस कसौटी पर सदा खरी उतरीं?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा को दक्षिण अफ्रीका और हिंदुस्तान में सरकार के विरुद्ध लड़ाई लड़ते समय जब भी चारित्रिक तेज को प्रकट करने का मौका मिला वे सदा इस कसौटी पर खरी उतरीं।

प्रश्न (iii)
माँ कस्तूरबा के दो चारित्रिक गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. माँ कस्तूरबा महात्मा गाँधी के धर्म और कर्तव्यों के निर्वाह में साथ देने वाली पतिव्रता नारी थीं।
  2. उनका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व था। सरकार के विरुद्ध लड़ाई लड़ने में वे कभी पीछे नहीं हटीं।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
माँ कस्तूरबा को महात्मा गाँधी की सहधर्मचारिणी क्यों कहा गया है?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा महात्मा गाँधी की ऐसी पत्नी ही, जो अपने पति के धर्म और कर्तव्यों के निर्वाह में पूर्ण साथ देती थीं इसीलिए उन्हें महात्मा गाधी की सहधर्मचारिणी कहा गया है।

प्रश्न (ii)
राष्ट्र ने महात्मा गाँधी को किस पद पर स्थापित किया है?
उत्तर:
राष्ट्र ने महात्मा गाँधी को ‘बापूजी’ नाम से राष्ट्रपिता के पद पर स्थापित किया।

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प्रश्न 2.
दुनिया में दो अमोध शक्तियाँ हैं-शब्द और कृति। इसमें कोई शक नहीं कि ‘शब्दो’ नै सारी पक्षी को हिला दिया है। किंतु अंतिम शक्ति तो ‘कृति’ की है। महात्माजी ने इन दोनों शक्तियों की असाधारण उपासना की है। कस्तूरबा ने इन दोनों शक्तियों से ही अधिक श्रेष्ठ शक्ति कृति की नम्रता के साथ उपासना करके संतोष माना और जीवनसिद्धि प्राप्त की। (Page 45) (M.P 2011).

शब्दार्थ:

  • दुनिया – संसार, विश्व, जगत्।
  • अमोघ – अचूक।
  • कृति – रचना, कार्य, कर्म।
  • शक – संदेह।
  • स्मृति – स्मरण, चिंतन, इच्छा, पाप।
  • उपासना – आराधना, प्रजा जीवन।
  • असाधारण – जो साधारण नहीं है, विशेष।
  • नम्रता – कोमलता, विनम्रता।
  • जीवनसिद्धि – जीवन में सफलता प्राप्ति।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश काका कालेलकर द्वारा रचित संस्मरण ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ से लिया गया है। लेखक माँ कस्तूरवा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल रहा हैं।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि संसार में दो अचूक ताकते हैं-शब्द और कृति अर्थात् शब्द और उनके माध्यम से रचित रचना। इस बात में विलकुल संदेह नहीं है कि शब्दों की शक्ति में सारे भू-मंडल को हिला दिया है। दूसरे शब्दों में, शब्दों ने अपनी शक्ति से सारे संसार को अस्थिर कर दिया है परंतु आखिरी शक्ति तो स्मरण अथवा चिंतन है। महात्मा गाँधी ने अपने जीवन में शब्द और कृति दोनों शक्तियों की विशेष आधिमा की; अर्थात् उन्होंने शब्दों की शक्ति और उससे होने वाली रचनों पर विशेष दक्षता प्राप्त की। उन्होंने किस अवसर किन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए और रचना में किस प्रकार के शब्दों का चयन करना चाहिए। इसमें विशेष योग्यता प्राप्त की।

कस्तूरबा गांधी ने इसके विपरीत इन दोनों शक्तियों से अधिक श्रेष्ठ सृष्टि की रचना; अर्थात् महात्मा गाँधी की विनम्रता के साथ आराधना करके ही संतुष्टि प्राप्त की और जीवन में सफलता प्राप्त की। दूसरे शब्दों में, कस्तूरबा गांधी ने शब्द शक्ति की अधिक उपासना नहीं की। उनका भाषा ज्ञान अधिक नहीं था किंतु उन्होंने सृष्टि की रचना महात्मा गाँधी की सेवा द्वारा ही अपने जीवन को सफल बनाया।

विशेष:

  1. महात्मा गाँधी और कस्तूरबा के भाषा ज्ञान के अंतर को स्पष्ट किया गया है।
  2. कस्तूरबा की पतिनिष्ठा को उजागर किया गया है।
  3. भाषा तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी वोली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
किस, शक्ति ने सारी दुनिया को हिला दिया है?
उत्तर:
शब्द की अमोघ शक्ति ने सारी दुनिया को हिला दिया है।

प्रश्न (ii)
महात्मा गाँधी ने किन दो शक्तियों की उपासना की है?
उत्तर:
महात्मा गांधी ने शब्द और कृति दोनों अमोघ शक्तियों की असाधारण उपासना की है। उन्होंने इन दोनों शक्तियों पर असाधारण अधिकार प्राप्त कर लिया था।

प्रश्न (iii)
इन दोनों शक्तियों से अधिक श्रेष्ठ कृति’ किसे कहा गया है?
उत्तर:
शब्द और कृति शक्तियों से आधक श्रेष्ठ कृति महात्मा गाँधी को कहा गया है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
इस गयांश में किसके व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है?
उत्तर:
इस गद्यांश में माँ कस्तूरबा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है।

प्रश्न (ii)
माँ कस्तूरबा ने किसकी उपासना करके जीवन-सिद्धि प्राप्त की?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा ने शब्द और कृति जैसी अमोघ शक्तियों से अधिक सृष्टि की श्रेष्ठ रचना महात्मा गाँधी की विनम्रता के साथ आराधना करके ही संतुष्टि और जीवनसिद्धि प्राप्त की।

प्रश्न (iii)
माँ कस्तूरबा ने किस शक्ति की अधिक उपासना नहीं की?
उत्तर:
माँ कस्तूरवा ने शब्द शक्ति की अधिक उपासना नहीं की। उन्हें भाषा ज्ञान अधिक नहीं था।

प्रश्न 3.
दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने जब उन्हें जेल भेज दिया, कस्तूरबा ने अपना बचाव तक नहीं किया। न कोई निवेदन प्रकट किया। “मुझे तो वह कानून तोड़ना ही है जो यह कहता है कि मैं महात्माजी की धर्मपत्नी नहीं हूँ।” इतना कहकर सीधे जेल चली गईं। जेल में उनकी तेजस्विता तोड़ने की कोशिशें वहाँ की सरकार ने बहुत की, किंतु अंत में सरकार की उस समय की जिद्द ही टूट गई। डॉक्टर ने जब उन्हें धर्म विरुद्ध खुराक लेने की बात कही तब भी उन्होंने धर्मनिष्टा पर कोई व्याख्यान नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा-“मुझे अखाद्य खाना खाकर जीना नहीं है। फिर भले ही मुझे पौत का सामना करना पड़े।” (Page 45)

शब्दार्थ:

  • बचाव – बचने का प्रयास।
  • निवेदन – प्रार्थना, याचिका।
  • तेजस्विता – तेजस्वी होने का भाव, प्रभावशाली होने का भाव कोशिश-प्रयास।
  • जिद – हटवादिता।
  • धर्मविरुद्ध – धर्म के विपरीत।
  • खुराक – आहार, भोजन।
  • धर्मनिष्ठा – धर्म के प्रति श्रद्धा।
  • व्याख्यान – भाषण।
  • अखाद्य – जो खाने योग्य न हो।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश काका कालेलकर द्वारा रचित ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ से लिया गया है। लेखक कस्तूरबा के व्यक्तित्व के तेजस्वी स्वरूप और दृढ़ता को उजागर कर रहा है।

व्याख्या:
लेखक दक्षिणी अफ्रीका में घटित घटना के द्वारा माँ कस्तूरबा के व्यक्तित्व की दृढ़ता को उजागर करते हुए आगे कहता है कि जव दक्षिणी अफ्रीका की सरकार ने माँ कस्तूरबा को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया, तो उन्होंने अपने बचाव के संबंध में कुछ नहीं कहा। न कोई तर्क दिया और न ही जेल से छूटने के लिए कोई याचिका दर्ज की। उन्होंने उस समय केवल इतना ही कहा कि मुझे तो वह कानून भंग करना है, जो मुझे महात्मा गाँधी की पत्नी स्वीकार नहीं करता। इतना कहकर वे जेल चली गईं और जेल जाकर यह सिद्ध कर दिया कि वे गांधी जी की पत्नी हैं।

जेल में उनके तेजस्वी होने के भाव और उनकी दृढ़ता तोड़ने के अनेक प्रयास वहाँ की सरकार ने किए, लेकिन वह माँ कस्तूरबा की तेजस्विता तोड़ने में सफल नहीं हो पाईं। उनकी दृढ़ता के सामने तत्कालीन दक्षिण अफ्रीका की सरकार को घुटने टेकने पड़े। जेल में रहते हुए जब उनका स्वास्थ्य गिरने लगा, तो डॉक्टर ने उन्हें हिंदू-धर्म के विरुद्ध भोजन लेने का सुझाव दिया।

उस समय उन्होंने धर्म के प्रति श्रद्धा और आस्था पर कोई भाषण नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना ही कहा कि मुझे अखाद्य (न खाने योग्य) भोजन खाकर जीवित नहीं रहना है। चाहे मुझे मृत्यु का ही सामना करना पड़े। दूसरे शब्दों में, उन्होंने मांस-अंडे आदि खाने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने ऐसा भोजन खाने की अपेक्षा मृत्यु को चुना। यह उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता का ही परिचायक है।

विशेष:

  1. माँ कस्तूरबा के व्यक्तित्व की तेजस्विता, दृढ़ता, धर्मनिष्ठा को उजागर किया गया है।
  2. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
  3. मुहावरों के प्रयोग से भाषा में अर्थवत्ता का समावेश हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
माँ कस्तूरबा ने किस कानून को तोड़ने की बात की है?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा ने दक्षिण अफ्रीका के उस कानून को तोड़ने की बात की है, जो उन्हें महात्मा गाँधी की पत्नी स्वीकार नहीं करता था।

प्रश्न (ii)
माँ कस्तूरबा को दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने बंदी क्यों बनाया?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा ने दक्षिण अफ्रीका के सरकारी कानून को तोड़ा था, इसलिए उन्हें बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया।

प्रश्न (iii)
जेल में डॉक्टर ने उन्हें क्या परामर्श दिया?
उत्तर:
जेल में माँ कस्तूरबा का स्वास्थ्य गिरने लगा, तो डॉक्टर ने उन्हें धर्म के विरुद्ध खाना खाने का परामर्श दिया। दूसरे शब्दों में, डॉक्टर ने उन्हें मांस और अण्डे खाने की सलाह दी।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
दक्षिण अफ्रीका में कस्तूरबा को जब जेल भेज दिया तो उन्होंने अपना बचाव क्यों नहीं किया?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा दक्षिण अफ्रीका के उस कानून को तोड़ना चाहती थीं जो उन्हें. महात्मा गाँधी की धर्मपत्नी नहीं मानता था इसीलिए उन्होंने अपना बचाव नहीं किया और जेल चली गईं।

प्रश्न (ii)
माँ कस्तूरबा ने धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से मना क्यों कर दिया?
उत्तर:
धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से माँ कस्तूरबा की धर्मनिष्ठा खंडित हो जाती इसीलिए उन्होंने धर्म के विरुद्ध खुराक लेने से मना कर दिया।

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प्रश्न 4.
महात्माजी को गिरफ्तार करने के बाद सरकार की ओर से कस्तूरबा को कहा गया, “अगर आपकी इच्छा हो तो आप भी साथ में चल सकती हैं।” बा बोलीं-“अगर आप गिरफ्तार करें तो मैं भी जाऊँगी। वरना आने की मेरी तैयारी नहीं है। महात्माजी जिस सभा में बोलने वाले थे उस सभा में जाने का उन्होंने निश्चय किया था। पति के गिरफ्तार होने के बाद उनका काम आगे चलाने की जिम्मेदारी बा ने कई बार उठाई है।

शाम के समय जब वह व्याख्यान के लिए निकल पड़ीं, सरकारी अमलदारों ने आकर उनसे कहा, ‘माताजी सरकार का कहना है कि आप घर पर ही रहें, सभा में जाने का कष्ट न उठाएँ।” बा ने उस समय उन्हें न देशसेवा का महत्त्व समझाया और न उन्होंने उन्हें ‘देशद्रोह करने वाले हो’ कहकर उनकी निभर्त्सना ही की। उन्होंने एक ही वाक्य में सरकार की सूचना का जवाब दिया। “सभा में जाने का मेरा निश्चय पक्का है, मैं जाऊँगी ही।” (Page 45)

शब्दार्थ:

  • व्याख्यान – भाषण।
  • अमलदारों – अधिकारियों।
  • निभर्त्सना – निंदा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश काका कालेलकर द्वारा लिखित संस्मरण ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ से उद्धृत है। लेखक कस्तूरबा के व्यक्तित्व की दृढ़ता को उजागर कर रहा है।

व्याख्या:
दिल्ली के बिड़ला हाउस में पुलिस द्वारा महात्मा गाँधी को गिरफ्तार करने के बाद सरकार की तरफ़ से बा को संदेश दिया गया कि यदि आपकी इच्छा गाँधी जी के साथ जेल जाने की हो, तो आप भी साथ चल सकती हैं। इस पर बा ने उत्तर दिया कि यदि आप मुझे गिरफ्तार करेंगे तो मैं भी चलूँगी, अन्यथा जेल जाने की मेरी कोई तैयारी नहीं; अर्थात् मैं बिना गिरफ्तार किए जेल जाने के लिए तैयार नहीं हूँ। गिरफ्तार करोगे, तो मुझे जाना ही पड़ेगा। महात्मा गांधी उस दिन जिस सभा में भाषण देने वाले थे, माँ कस्तूरबा ने उस सभा में जाने का निश्चय किया।

पति के जेल जाने के बाद, उनकी अनुपस्थिति में पति के कार्य को आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व ‘बा’ ने कई बार उठाया। शाम के समय वे सभा में भाषण देने के लिए बिड़ला हाउस चल दीं। तो सरकारी अधिकारियों ने आकर उनसे कहा कि माताजी सरकार चाहती है कि आप घर पर ही रहें, अर्थात् आप सभा में भाषण देने जाएँ, यह सरकार नहीं चाहती। ‘बा’ ने उस अवसर पर उन सरकारी अधिकारियों को न तो देश सेवा का महत्त्व समझाया और न ही उन्होंने उन्हें देश के विरुद्ध कार्य करने वाला कहकर उनकी निंदा की। उन्होंने एक ही वाक्य में सरकार की उस सूचना का उत्तर दिया कि सभा में जाने का मेरा निश्चय पक्का है, और में अवश्य जाऊँगी। . इस प्रकार उन्होंने अपनी दृढ़ता का परिचय दिया।

विशेष:

  1. माँ कस्तूरबा की दृढ़ता को उजागर किया गया है। पति के कार्य को आगे बढ़ाने के क्षमता को उद्घाटित किया गया है।
  2. भाषा सरल, सुबोध और आम बोलचाल की खड़ी बोली है।
  3. मुहावरों का सार्थक प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत गद्याशं में माँ कस्तूरबा के चरित्र का कौन-सा पक्ष उजागर हुआ है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में माँ कस्तूरबा के चरित्र की दृढ़ता का पक्ष उजागर हुआ है।

प्रश्न (ii)
महात्मा गाँधी को गिरफ्तार करने के बाद दक्षिण अफ्रीका सरकार ने कस्तूरबा के सामने क्या प्रस्ताव रखा?
उत्तर:
महात्मा गाँधी को गिरफ्तार करने के बाद दक्षिण अफ्रीका सरकार ने माँ कस्तूरबा के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर आपकी इच्छा हो तो आप भी (गाँधीजी के) साथ चल सकती हैं।

प्रश्न (iii)
माँ कस्तूरबा ने पति की गिरफ्तारी के बाद उनके अधूरे कार्य को आगे बढ़ाने के लिए क्या किया?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा ने पति की गिरफ्तारी के बाद उनके अधूरे कार्य को आगे बढ़ाने के लिए उस सभा को सम्बोधित करने का निश्चय किया, जिसमें वे भाषण देने वाले थे। सरकारी अधिकारियों द्वारा रोकने पर भी वे नहीं रुकीं।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
माँ कस्तूरबा ने गाँधी के साथ जेल जाने से क्यों मना कर दिया?
उत्तर:
सरकार माँ कस्तूरबा को गिरफ्तार नहीं कर रही थी अपितु उसने उनकी इच्छा पर छोड़ दिया था इसलिए उन्होंने गाँधीजी के साथ जेल जाने से मना कर दिया था। दूसरे उनकी जेल जाने की तैयारी भी नहीं थी।

प्रश्न (ii)
सरकारी अमलदारों ने क्या कहकर कस्तूरबा को सभा में जाने से रोकने का प्रयास किया?
उत्तर:
सरकारी अमलदारों ने यह कहकर कि ‘माताजी सरकार का कहना है कि आप घर पर ही रहें, सभा में जाने का कप्ट न उठाएँ, यह कहकर कस्तूरबा को सभा में जाने से रोकने का प्रयास किया।

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प्रश्न 5.
आगाखाँ महल में खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। हवा की दृष्टि से भी स्थान अच्छा था। महात्माजी का साथ भी था, किंतु कस्तूरबा के लिए यह विचार ही असह्य हुआ कि ‘मैं कैद में हूँ।’ उन्होंने कई बार कहा-‘मुझे यहाँ का वैभव कतई नहीं चाहिए, मुझे तो सेवाग्राम की कुटिया ही पसंद है।’ सरकार ने उनके शरीर को कैद रखा किंतु उनकी आत्मा को वह कैद सहन नहीं हुई। जिस प्रकार पिंजड़े का पक्षी प्राणों का त्याग करके बंधनमुक्त हो जाता है उसी प्रकार कस्तूरबा ने सरकार की कैद में अपना शरीर छोड़ा और वह स्वतंत्र हुईं। उनके इस मूक किंतु तेजस्वी? बलिदान के कारण अंग्रेजी साम्राज्य की नींव ढीली हुई और हिंदुस्तान पर उनकी हुकूमत कमजोर हुई।

कस्तूरबा ने अपनी कृतिनिष्ठा के द्वारा यह दिखा दिया कि शुद्ध और रोचक साहित्य के पहाड़ों की अपेक्षा कृति का एक क्षण अधिक मूल्यवान और आबदार होता है। शब्द-शास्त्र में जो लोग निपुण होते हैं उनको कर्त्तव्य-अकर्तव्य की हमेशा ही विचिकित्सा करनी पड़ती है। कृतिनिष्ठ लोगों को ऐसी दुविधा कभी परेशान नहीं कर पाती। कस्तूरबा के और सामने उनका कर्तव्य किसी दीये के समान स्पष्ट था। जब कभी कोई चर्चा शुरू हो जाती तब ‘मुझसे पेही होगा’ और ‘यह नहीं होगा’-इन दो वाक्यों में ही अपना फैसला सुना देतीं। (Pages 45-46)

शब्दार्थ:

  • तकलीफ़ – परेशानी।
  • असह्य – असहनीय, सहन न करने योग्य।
  • वैभव – ऐश्वर्य।
  • कतई – बिलकुल, ज़रा भी।
  • बंधनमुक्त – स्वतंत्र।
  • मूक – मौन।
  • नींव ढीली होना – आधार कमजोर होना।
  • हुकूमत-शासन – व्यवस्था।
  • आबदार – स्वाभिमानी, धारदार, चमकदार।
  • निपुण – कुशल।
  • विचिकित्सा – संदेह, शक, दुविधा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश काका कालेलकर द्वारा रचित ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ से उद्धृत किया गया है। लेखक माँ कस्तूरबा की मृत्यु और उससे ब्रिटिश साम्राज्य पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या:
भारत की ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गाँधी और माँ कस्तूरबा को गिरफ्तार करके आगा खाँ महल में रखा। महल में खाने-पीने की व्यवस्था अच्छी थी। उन्हें खाने-पीने की कोई परेशानी नहीं थी। हवा के आने-जाने की भी अच्छी व्यवस्था थी। दूसरे शब्दों में, महल हवादार और आरामदायक था। फिर गाँधीजी भी माँ कस्तूरबा के साथ ही थे किंतु सभी प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी ‘बा’ के लिए यह विचार ही असहनीय था कि वे इस महल में कैद हैं। यह महल कैदखाना है। उन्होंने इस संबंध में कई बार कहा कि मुझे यहाँ का ऐश्वर्य बिलकुल नहीं चाहिए।

मुझे तो इस महल की अपेक्षा सैवाग्राम की कुटिया ही अधिक पसंद है। लेखक कहता है कि सरकार ने उनके शरीर को आगा खाँ महल में कैद कर रखा था किंतु उनकी आत्मा को यह कैद सहन नहीं हुई। जिस प्रकार पिंजरे में बंद पक्षी अपने प्राणों को त्यागकर स्वतंत्र हो जाता है। उसी प्रकार माँ कस्तूरबा सरकार की कैद में अपना शरीर छोड़ा अर्थात् सरकार की कैद में ही माँ कस्तूरबा का देहांत हो गया और वे सरकार की कैद से आजाद हो गईं। उनके इस मौन किंतु तेजस्वी बलिदान के कारण भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के आधार को कमजोर कर दिया। हिंदुस्तान पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई।

माँ कस्तूरबा ने अपने कार्यों से यह दिखा दिया कि अपनी कृतिनिष्ठा अर्थात् महात्मा गाँधी के प्रति उनकी श्रद्धा और आस्था के द्वारा यह प्रमाणित कर दिया कि शुद्ध और रोचक साहित्य के विशाल भंडार की अपेक्षा सृष्टि की रचना का एक क्षण अधिक मूल्यवान और स्वाभिमान होता है। शब्द-शास्त्र अर्थात् शब्द ज्ञान में जो लोग निपुण होते हैं उनको कर्त्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय करने में सदैव दुविधा होती हैं।

लेखक का मत है कि ईश्वर की रचना के प्रति आस्था रखने वाले लोगों को इस प्रकार की दुविधा कभी भी परेशान नहीं कर पाती अर्थात् वे तुरंत निर्णय करने में सक्षम होते हैं। माँ कस्तूरबा के सम्मुख उनका कर्त्तव्य दीये के प्रकाश के सामने बिलकुल स्पष्ट था। जब कभी कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के संबंध में चर्चा आरंभ हो जाती तो :मुझसे यही होगा’ और ‘मुझसे यह नहीं होगा’ कहकर वे अपना स्पष्ट निर्णय दे देती थीं। उन्हें निर्णय लेने में ज़रा भी देर नहीं लगती थी। वे तुरंत निर्णय लेने की क्षमता रखती थीं।

विशेष:

  1. माँ कस्तूरबा की कैद में मृत्यु ओर ब्रिटिश शासन पर उसके प्रभाव का वर्णन किया गया है।
  2. माँ कस्तूरबा की निर्णय क्षमता को उजागर किया गया है।
  3. भाषा तत्सम तथा उर्दू शब्दावली से युक्त खड़ी बोली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
माँ कस्तूरबा आगा खाँ महल में क्यों नहीं रहना चाहती थीं?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा को सरकार ने आगा खाँ महल में कैद में रखा था। यद्यपि उन्हें वहाँ सारी सुविधाएँ उपलब्ध थीं तथापि उन्हें कैद में होने का विचार असह्य था इसलिए वे आगा खाँ महल में नहीं रहना चाहती थीं।

प्रश्न (ii)
माँ कस्तूरबा सरकार की कैद से कैसे स्वतंत्र हुईं?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा जेल में ही अपने प्राणों को त्यागकर सरकार की कैद से मुक्त हो गईं।

प्रश्न (iii)
प्रस्तुत गद्यांश में माँ कस्तूरबा की कौन-सी चारित्रिक विशेषता उभरकर सामने आई है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में माँ कस्तूरबा के चरित्र की कर्तव्य-अकर्त्तव्य के संबंध में निर्णय लेने की क्षमता उजागर हुई है। वे तुरंत निर्णय लेने में समर्थ थीं।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
आगा खाँ महल में सरकारी कैद में माँ कस्तूरबा की मृत्यु होने का ब्रिटिश साम्राज्य पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
कैद में माँ कस्तूरबा की मृत्यु होने से भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव ढीली हुई और हिंदुस्तान पर उनकी हुकूमत कमजोर हुई।

प्रश्न (ii)
माँ कस्तूरबा को आगा खाँ महल के वैभव की अपेक्षा क्या पसंद था?
उत्तर:
माँ कस्तूरबा को आगा खाँ महल के वैभव की अपेक्षा सेवाग्राम की कुटिया का सीधा-सादा जीवन अधिक पसंद था।

MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 13 On His Being Arrived at the Age of Twenty-three

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MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 13 On His Being Arrived at the Age of Twenty-three (John Milton)

On His Being Arrived at the Age of Twenty-three Textbook Exercises

Word Power

A. Give words opposite in meaning to the words mentioned below
subtle, youth, hasting, deceive, mean,
Answer:

  • subtle – obvious
  • youth – old age
  • hasting – delaying
  • deceive – believe
  • mean – dignified
  • inward – outward
  • appear – disappear
  • perhaps – certainly

B. Mark the use of word, ‘strictest’ in the poem. It is an adjective in the superlative degree. The other two forms in the positive and comparative degrees are: ‘strict’ and ‘stricter’, Give the forms of the following adjectives in the comparative and superlative degrees. late, soon, slow, mean, high, much.
Answer:
MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 13 On His Being Arrived at the Age of Twenty-three img 1

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C. Match the words in column ‘A with those in column ‘B’.

Column ‘A’ Column’B’
(i) renaissance
(ii) taskmaster
(iii) deceive
(iv) subtle
(v) blossom
(vi) ripeness
(1)  dupe
(2) reawakening
(3) maturity
(4) one who entrusts work to be done by others
(5) not obvious and so difficult to notice
(6) flower which has not opened its petals

Answer:
(1) 2, (ii) 4, (iii) 1, (iv) 5, (v) 6, (vi) 3.

D. Look up a dictionary and match tile words wit h their meanings. Also use them in sentences of
your own to bring out the difference in their meanings.

  • faith – a set of beliefs
  • credo – trust in somebody’s ability or knowledge
  • belief – a set of beliefs or religious principles
  • motto – a set of beliefs shared by a group or organisation
  • creed – confidence that something or somebody is true
  • dogma –  a sentence or phrase, expressing the aims and beliefs of a person or institution.

For example:

  • faith – (trust in somebody’s ability or knowledge): People had faith in what Mahatma Gandhi did for the nation.
  • credo –  (a set of beliefs): Every religion follows a credo.
  • belief – (confidence that something or somebody is true): I have full belief in you.
  • motto –  (a sentence or phrase expressing the aims and beliefs of a person or institution): What is your motto in life? .
  • creed – (a set of beliefs shared by a group or organisation): There are people of many creeds in India.
  • dogma – (a set of beliefs or religious principles): I have firm belief in the dogmas of the church.

comprehension

A. Answer the following questions in one sentence:

Question 1
Why does the poet call time, the subtle thief of youth?
Answer:
The poet call time, the subtle thief of youth because time has taken away his twenty-three years without notice.

Question 2.
‘But my late spring no bud or blossom sheweth’.
(a) What does ‘spring’ refer to?
(b) How is it late?
Answer:
(a) ‘Spring’ refers to maturity. Maturity that poet has not gained with age.
(b) It is late as he has not seen bud or blossom. There is no sign of maturity that is visible.

Question 3.
All is, if I have grace to use it so,
As ever in my Taskmaster’s eye.
(a) What has grace been spoken of in the above lines?
(b) Who is the Taskmaster?
Answer:
(a) Grace is the extra time that the poet wishes to have to compensate his loss.
(b) God is the Taskmaster.

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B. Answer the following questions in about 60 words:

Question 1.
What has time stolen from the poet?
Answer:
In this poem, the poet makes a complain blaming Time that it has stolen the prime part of his life. The twenty-three years of his life passed away so hastily that the poet failed to mature himself. His career could not be perfect. Although his appearance is now mature, he still requires time for the maturity of his career. There is a lack of inner maturity.

Question 2.
What deceives the truth? (M.P. Board 2009)
Answer:
Here, the poet refers that now he is mature in age. His appearance can deceive one about his inner maturity which is still unripe. Time did not give him an opportunity to attain the ripeness of his poetic talent. He has lost his career. His appearance is deceiving.

Question 3.
What will be in the strictest measure?
Answer:
As this poem is devotional in tone, the poet says that whatever one gets or does, it is the ruling of God. God distributes everything to everyone in the strictest measure. For him, there is no distinction between high or low. He observes everything equally and allots everyone equally.

Question 4.
How does the poet console himself?
Answer:
The poet here feels sorry for he could not make his career properly. His talent is still unripe. Time has stolen the twenty-three years of his life without notice. It has deceived him. However, the poet consoles himself with the plea that whatever he has achieved was the wish of God. God gives anything to anyone without any reservation. God being the Taskmaster controls everything.

Question 5.
What passes by in a hurry in the poet’s life?
Answer:
Here, the poet feels himself at a great loss. He thinks that he has lost the twenty-three years of his life without any concrete achievement. It has passed so hastily that he could not notice the bud or blossom. Now, he has attained maturity of age but he still needs time for attaining the maturity in his career.

Question 6.
What is approaching the poet fast?
Answer:
The poet here reveals a secret of his life. He says that he is now grown up. The state of manhood is approaching fast to him. He has lost his youth the formative period of his life. However, as he is sorry for the loss of youth very rapidly, he feels approaching of manhood at the same time.

Question 7.
Explain the line, “That some more timely happy spirits endueth”.
Answer:
As the poet is sorry for not attaining maturity’ in his career, he requires some more time for it. He feels that his career, that is, the poetic talent is still unripe. Time has passed so hastily that he could not notice the passing of his youth. In this line, he expresses his desire for some more timely happy spirits. He wants some grace time to compensate the lost years and work ahead for his poetic maturity.

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C. Answer the following question in about 75 words:

Question 1.
Briefly describe Milton’s feelings on his having arrived at the age of twenty-three.
(MP. Board 2011)
Answer:
On His Having Arrived at the age of Twenty-three is poet’s reflections on his late maturing. He has attained the age of twenty-three. He takes it as a loss of his life. He feels that it has approached in such a manner that he could not notice it. The prime of his life is lost. He couldn’t mind his career. He couldn’t achieve the height of the poetic talent. He feels being cheated or deceived by the time which has taken away his ripening period without notice. The poet is not at all happy but one thing gives him relief is that it was the will of God.

Question 2.
Give the central idea of the poem.
Answer:
Blaming Time for stealing his youth, the poet says that it has taken away his twenty-three years without notice. It has passed away so fast that he couldn’t mend his career properly. He couldn’t find time to mature himself. His appearance has become mature but he still requires time to get inner maturity. Whatever time he has got, it was the will of God. Whatever one does, what one achieves, when one lives one’s life everything is the wish of God. No one can overrule the ruling of God who is the Taskmaster of the world. No one is spared from His eye.

Question 3.
Critically analyse the poem.
Answer:
The poem On His Having Arrived at the Age of Twenty-three is a devotional sonnet written in an autobiographical tone. It contains Milton’s reflections of late maturing. The dominating passion of his life is to justify the ways of God to man and write in praise of God. Here, he blames Time for stealing away his youth without repairing his poetic talent .He uses the sonnet form of poetry to produce a personal utterance that combines dignity of lone, flexibility of movement and mastery of structure.

Question 4.
Analyse the poem as a Petrarchan Sonnet.
Answer:
Sonnet is a short poem of fourteen lines expressing a single thought or emotion at a time. It owes its popularisation to the 14th century Italian poet Franesco Petrarch who used this poetic form to express his love for his idealised lady love, laura. John Milton uses the original Italian (Petrarchan) form to express his devotion to God or sublime feelings.

In this form, the poem Is divided into two parts the octave (a stanza of eight lines) and the sestet (a stanza of six lines). The first part makes a statement or puts up a question while the second part illustrates or serves the answer to it. On Being Arrived at the Age of Twenty-three is a devotional sonnet in Petrarchan form. It is a striking example of the Renaissance ethos and Reformation zeal. It is an assertion of faith and a wish to be guided by the divine will.

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Speaking Activity

A. Read aloud the poem in groups, observing the stress-pattern. short syllable followed by a long syllable. Consult an English pronunciation dichonary.
Answer:
Do yourself.

B. ‘Practtsing one’s faith is one’s private affair’. Give arguments for or against the motion.
Answer:
Do yourself.

A. Write a letter to your friend, narrating one such even! when your act of faith made you successful in the long run.
Answer:
163. Shivaji Park
Gwalior (M.P.)
Date: 19 Jan. 20xx
Dear Rahul,
As I was very busy last week, I couldn’t reply to your letter. Now I am free and wish to share my experience which is absolutely unbelievable. I was seriously ill. The fever was not coming down. No medicine was working. The doctors were very anxious. They advised to take me to the City Hospital. Next morning, I had to appear for the Maths Olympiad. My father was upset. But my grandmother wasn’t. She had firm belief in God, specially in Lord Hanuman. She began chanting Hanuman Chalis.a. For the whole night, she did My fever began to come down. It finally became normaL Next day, I appeared for my test comfortably. I was amazed how the faith of my grandmother worked so well. Everyone was surprised. I thank God to the core of my heart, He is really the Almighty.
Yours,
Rohit.

B. Expand the idea contained in the statement, ‘Faith mares the mountains’.
Answer:
‘Faith moves the mountains’ is a very old saying. ft is still hue. ‘Faith’ means confidence. If one is confident of one’s capabilities, one can do wonders. it gives courage and a wish to do any type of work. One can win over all difficulties, Sometimes, it happens that one does even an impossible task. So, one must not lose confidence. Nothing is impossible if one has the determination to do. Determination along with the self-motivation helps in attaining the impossible thing but the hard work is required.

Think it Over

A. Faith is the key to success. Think of other qualities which contribute to the development of a successful and happy human personality.
Answer:
Do yourself.

B. Every religion insists on faith. How does it make a person noble and sublime?
Answer:
Do yourself.

Things to Do

A. Prepare a list of John Milton’s important works.
Answer:
Do yourself. Yet may consult your school library

B. Have you read any other 14-line poem in a different rhynze-sclieme? Do you know other sonneteers like Thomas Wyatt, John Donne, William Wordsworth and W.B. Yeats and so on? Read some of their sonnets; examine the rhyme-schemes and themes.
Answer:
Do yourself.

On His Being Arrived at the Age of Twenty-three Summary in English

Blaming Time for stealing his youth, the poet says that it has taken away his twenty-three years without notice. It has passed away so fast that he couldn’t mend his career properly. He couldn’t find time to mature himself. His appearance has become mature but he still requires time to get inner maturity. Whatever time he has got, it was the will of God. Whatever one does, what one achieves, when one lives one’s life everything is the wish of God. No one can overrule the ruling of God who is the Taskmaster of the world. No one is spared from His eye.

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On His Being Arrived at the Age of Twenty-three Summary in Hindi

समय पर अपनी जवानी चुराने का आरोप लगाते हुए कवि कहता है कि इसने उसके तेईस वर्ष बिना सूचना के ले लिए। यह इतनी तेज़ी से बीत गया कि उसे सही ढंग से अपना गुण सँवारने का समय ही नहीं मिला। वह अपनी परिपक्वता के लिए समय नहीं निकाल पाया। उसका शरीर (हाव-भाव) परिपक्व हो गया है, परंतु अभी भी उसकी आंतरिक परिपक्वता के लिए समय की ज़रूरत है। समय ने उसे धोखा दिया है। लेकिन कवि अपने को यह सोचकर सांत्वना देता है कि जो भी उसने पाया है, यह ईश्वर की इच्छा है। जो भी कोई करता है, जो भी कोई पाता है और कब तक कोई जीता है-सब ईश्वर की इच्छा है। कोई भी ईश्वर, जो दुनिया का मालिक है, के आदेश को नकार नहीं सकता। कुछ भी उसकी आँखों से बचा नहीं है।

On His Being Arrived at the Age of Twenty-three Word Meaning

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On His Being Arrived at the Age of Twenty-three Important Pronunciations

MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 13 On His Being Arrived at the Age of Twenty-three img 3

On His Being Arrived at the Age of Twenty-three Stanzas for Comprehension

Read the following stanzas carefully and answer the questions that follow:

1. How soon hath Time, the subtle thief of youth,
Stolen on his wing my three and twentieth year!
My hastign day fly on with full career,
But my late spring no bud or blossom sheweth. (Page 93)

Questions: (M.P. Board 2010)

(i) What has time stolen from the poet?
(ii) Find out the words from the extract which have the same meaning as the words given below:
(a) something not noticeable or obvious.
(b) flower which has not yet opened its petals.
(iii) Give the superlative degree of the word ‘soon’.
Answers:
(i) The time has stolen youth from the poet in the form of twenty-three years.
(ii) (a) subtle
(b) bud.
(iii) ‘Soonest’ is the superlative degree of the word ‘soon’.

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2. Yet be it less-or more, or soon or slow,
It shall be still in strictest measure even
To that same lot however mean or high,

Toward which time leads me and the will of Heaven.
All is, if I have grace to use it so,
As ever in my Taskmaster’s eye. (Page 93)

Questions:
(i) Who is referred to as ‘Heaven’ in the fourth line?
(ii) ……………measure even to that same lot.
(iii) What does the poet wish for?
(iv) Give a word which has the meaning same as ‘balance’.
Answers:
(i) God is referred to as’Heaven’in the fourth line.
(ii) It shall be still in strictest.
(iii) The poet wishes for the grace period to mind his ways and measure his career.
(iv) ‘Measure’ has the same meaning as ‘balance’.

MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 15 To Autumn

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MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 15 To Autumn (John Keats)

To Autumn Textbook Exercises

Word Power

A. Distinguish between the following pairs of words by using them in meaningful sentences. The first word in each pair is from the text:
bless-bliss; vine-wine; shell-cell; sweet-sweat; later-latter; warm-worm; cease-seize; abroad-aboard; granary-greenery; floor-flour; hair-heir; patient-patent; plain-plane;
Answer:

  • Bless-The hermit blessed him with a long life.
    Bliss-Sound sleep is a great bliss to me.
  • Vine-The grapevine scattered all over the roof.
    Wine-Wine is injurious to health.
  • Shell-The shell of the tortoise is very hard.
    Cell-The cell of this calculator is damaged.
  • Sweet-The mango tastes sweet.
    Sweat-Too much sweat is not good. .
  • Later-Later, I thought to shift my plan.
    Latter-Two visitors came this morning, the latter one was a policeman.
  • Warm-Take this pill with warm water.
    Worm-The doctor found a dangerous worm in his body.
  • Cease-The engine of this car suddenly ceased.
    Seize-The police seized all the property of my neighbour.
  • Abroad-I sent my son abroad for higher studies.
    Aboard-I was aboard when you called me.
  • Floor-My friend’s house is on the third floor.
    Flour—I don’t like packed flour.
  • Hair—His hair turned grey prematurely.
    Heir—The heir of the king proved to be unworthy.
  • Patient—This patient suffers from a chronic asthma.
    Patent—Use only patent drug.
  • Plain—I want a plain sheet of paper.
    Plane—The plane crashed this morning due to technical failure.

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B. The following words have sensuous connotations. Fill them in the appropriate columns according to their appeal to the senses:
mist, mellow, ripeness, swell, plump, kernel, flower, clammy, wind, perfume, cider, oozings, songs, music, soft, bloom, stubble-plains, rosy hue, wailful, chou, bleat, whistles, twitter.
Answer:

appeal to the sense of perception appeal to the eye appeal to the ear appeal to the nose appeal to the tongue
soft
stubble-plains
wind
clammy
swell
flower
bloom
mist
swell
rosy hue
oozings
plump
songs
music
wailful
bleat
whistles
twitter
choir
perfume ripeness kernel , cider

Comprehension

A. Answer the following questions in about 60 words each:

Question 1.
What does the autumn plan to do with the cottage trees?
Answer:
The autumn plans to bend the cottage trees with apples and fill all the fruits with ripeness to the core. It wants to swell the ground and plump the hazel shells with a sweet kernel. Here, the poet presents a lively and sensuous picture of the season. The Autumn’and the sun work together for the ripening of all kinds of fruits.

Question 2.
Why does autumn intend to ‘set budding’ the late summer flowers?
Answer:
The autumn is described as a season of fruitfulness. There is mist and mellow fruitfulness all around. Fruits come to their maturity. The season intends to ‘set budding’ the late summer flowers, so that the bees can suck the perfect sweetness. They store fresh honey.

Question 3.
How are the honey-combs after the summer and how do the bees feel?
Answer:
The bees here represent a continuation of summer. For the bees, therefore, the warm days of summer have not ended. The sticky cells of the honey-combs are filled to overflowing with honey and yet autumn provides more flowers in case the bees may like to draw more sweetness from them.

Question 4.
How can Autumn be seen as a harvester?
Answer:
The poet has personified Autumn in various forms. All the forms are perfect and realistic. Autumn is seen as a harvester. He is sitting carelessly in the field during the winnowing operation. Here the poet uses all the images to make the picture clearer. The Autumn is shown sitting carelessly on a granary floor. His hair is soft lifted by the winnowing wind. He is sometimes in sound sleep on a half reaped furrow. He is drowsed with the fume of poppies while his look spares the next swath and all its twined flowers.

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Question 5.
How does the poet describe the crop cutter?
Answer:
While presenting the various occupations of Autumn, the poet depicts him as a reaper. He has fallen asleep in the midst of reaping. He is very tired. Through this the poet makes the poem human and universal because the eternal labour of man is brought before the eyes of the reader.

Question 6.
What is the cider-maker doing?
Answer:
The poet presents the Autumn in a role of a cider-maker who is watching intently the apple juice oozings hours by hours till its end. There is a patient look in his eye. The poet is very realistic in the description of the Autumn.

Question 7.
Describe the scene of the earth at sunset. (M.P. Board 2011)
Answer:
Keats has presented his keen observation with all minute details. The whole poem demonstrates his interest in nature. While describing the scene at sun-set, he says that in the evening when the crimson light of the setting sun falls upon the stable fields, a chorus of natural sound is heard. This picture is very appealing.

Question 8.
Where do the small gnats sing from and how does their music reach the poet?
Answer:
The poet has created a very intense and varied sound effect in the poem. Autumn has its own sounds and songs. In the evening in a wailful choir the small gnats mourn among the river shallow. The sound appears to be born aloft or sinking, as the light winds lift or die. It symbolizes the close of the year.

Question 9.
Do you find remember of sadness at some points in the poem? How does the poet overcome the sad moment and become happy?
Answer:
Keats presents a vivid picture in this poem. Beginning with a very sensuous picture of the season, the poet shows the Autumn as an active agent. However, towards the end of the poem, he becomes sad. The Autumn is shown at its fag end. There are images of death or withdrawal and of song and the songs are funeral dirge for the dying year.

Question 10.
How does the poet address Autumn? (M.P. Board 2015)
Answer:
The poet has presented a lively picture of the autumn. He addresses the autumn as ‘season of mists and mellow fruitfulness’. The autumn is seen as a person in various roles as a reaper, a winnower, a gleaner and a cider-maker.

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B. Answer the following questions in 75-100 words each:

Question 1.
Prove that To Autumn’ is a song of ripeness and abundance.
Answer:
‘Ode to Autumn’ is a typical poem of John Keats. This poem describes the autumn season. The poet personifies the season and presents it with all its sensuousness. Autumn is described as a season of ‘mellow-fruitfulness’. The sun is ripening or ‘maturing’ the earth. It conspires to load the vines and blend the apple trees and ‘to swell the ground and plump the hazel shells’.

The season fills ‘all fruits with ripeness to the core’. These images of full, inward ripeness, and strain suggest that the maturing and the fulfillment has reached its climax. Even the combs of the bees are over brimmed but still the ripening continues as. ‘Budding more and still more later flowers.’ Therefore, this poem can be said a song of ripeness and abundance.

Question 2.
What are the two friends-Autumn and warm sun planning to do with fruits and flowers?
Answer:
‘Ode to Autumn’ presents a sensuous picture of the autumn. Autumn is a season of ripe fruitfulness. It is the time of the ripening of grapes, apples, gourds, hazel nuts etc. It is also the time when the bees suck the sweetness from the later flowers and make honey. The sun plays a major role in maturing or ripening these fruits. It is the main conspirator of the ripening and maturing of the fruits. There are indirect images of ageing. Autumn and the sun are shown as close bosom friends, together conspiring to riper the fruits.

Question 3.
What are the four images of personication through which autumn has been picturized?
Answer:
The poem, ‘Ode to Autumn’ presents autumn’s vivid images. The poet personifies it in fair images of a winnower, a reaper, a gleaner and a cider-presser. Autumn is seen as a woman who performs the task of winnowing, reaping, gleaning, and cider-pressing. One can see the Avoman, i.e., autumn into the fields engaged in the winnowing operations while breeze ruffles her locks of hair.

This is the first image of autumn. Second, one may see autumn in the form of a reaper, who has been engaged in reaping corn but is so overcome by the sleep-inducing smell of poppies, which hampers the next row of corn that remains unreaped. Third, autumn may be seen in the image of a gleaner who is walking along steadily with the weight also of grains upon her head, crossing a stream. Finally, autumn may also be seen in the image of one who is crushing the ripe apples in the warden press to obtain their juice from which cider is to be made. This woman sits by the cider-press and watches patiently the apple juice flowing out of the press drop-by drop.

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Question 4.
In the third stanza, the poet says “thou hast thy music too”. What objects does the poet find Autumn’s music in?
Answer:
In the third stanza of the poem, Keats describes the sound of Autumn. It has its own pattern and music or quality that enhances its charm. The sounds of Autumn are heard in the evenings. When the sun is setting, soft glow irradiates the fields from which the crop has been reaped, leaving the stumps behind. The long-drawn out clouds in the sky look like the bars of a grate. At this time, the melancholy buzzing of the gnats is heard. The gnats fly about among the shrubs growing on the riverside. The gnats are carried upwards when the wind is strong and they come downwards when the wind is feeble.

In addition to the gnats singing in a melancholy chorus, the bleating of full-grown lambs is heard from the hills which bound the landscape. Then there is the chirping of the grasshoppers. Next comes the high, bold and delicate singing of the red-breast which sings from an orchard. Finally there is the twittering of the swallows which are gathering in large numbers to get ready for their winter migration. Through these images, Keats heightens the effect of autumn. The sound generated becomes the music of autumn.

Question 5.
Keats is a master of word-pictures. Explain some of the word-pictures from the poem.
Answer:
Keats’s Ode to Autumn is said to be a fine specimen revealing the qualities of the poet.
Keats was one of the greatest word painters in English poetry. In his poems, picture follows picture in quite succession and each picture is remarkable for its vividness and minuteness of detail. His images are concrete. In Ode to Autumn, Autumn has been represented in the concrete form of a reaper, winnower, gleaner, etc.

In the first stanza, we have a complete and concrete picture of Autumn’the season of mists and mellow fruitfulness.’ In the second stanza, Autumn is a winnower’on a half reaped furrow sound asleep,’ a gleaner, keeping ‘steady they laden head across a brook’ and a spectator, watching ‘the last oozings hour by hour.’ All these pictures of Autumn make the poem human and universal for its use of concrete imagery.

Question 6.
What is an ode? Compare ‘To Autumn’ with Toru Dutt’s ‘Our Casuarina Tree’ in respect to form, address and glorification of the subject of treatment.
Answer:
An Ode is always an address to some noble thought, idea or deity. It is a serious, noble and dignified form of lyrical composition in a regular stanza form. It is exalted in theme, elated in tone and is always refined in language and style.

Ode to Autumn is a typical example of a highly structured ode. It is in the form of an
address in a purely objective manner. The Autumn has been personified with vivid images which seem to be very realistic. On the other Hand, Toru Dutta’s ‘Our Casuarina Tree’ is in lyrical tone with a touch of elegy.

Toru Dutt’s,’Our Casuarina Tree’ is a more personal poem where she glorifies the tree as it reminds her of her beautiful past. Her poem is an effort to make the tree immortal while Keat’s ‘To Autumn’ personifies the different aspect of Autumn in lyrical form.

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Question 7.
Give a critical appreciation of the poem, dealing with Keats’ attitude to the season, and the pictorial quality of the ode.
Answer:
Autumn is a season of ripe fruitfulness. It is the time of the ripening of grapes, apples, gourds, hazelnuts, etc. It is also the time when the bees suck the sweetness from “later flowers” and make honey. Thus, autumn is picturised in the stanza as bringing all the fruits of earth to maturity in readiness for harvesting.

In the second stanza, autumn is seen in the person of a reaper, a winnower, a gleaner, and a cider-presser. Reaping, winnowing, gleaning and cider-pressing are all operations connected with the harvest and are, therefore, carried on during autumn. Autumn is depicted first as a harvester sitting carelessly in the field during a winnowing operation, second, as a tired reaper fallen asleep in the very midst of reaping, third, as a gleaner walking homewards with a load on the head, and fourth, as a cider-presser watching intently the apple-juice flowing out of the cider-press.

Autumn is not altogether devoid of music. If spring has its songs, autumn too has its sounds and songs. In the evening, when the crimson light of the setting sun falls upon the stubble-fields, a chorus of natural sounds is heard. The gnats utter their mournful sounds; the full-growyn lambs bleat loudly, the hedge-crickets chirp; the robin’s high and delicate notes are heard, and the swallows twitter in the sky. In the last stanza, the close of the year is associated with sunset and nightfall.

C. Explain the following expressions with reference to the text:

1. mellow fruitfulness (use of abstract for the concrete)
2. maturing sun.
3. load and bless with fruit the vines
4. winnowing wind.
5. soft dying day.
Answer:

  1. Full of soft and juicy fruits.
  2. Warm sun of Autumn that ripens the fruits.
  3. The thatched roofs loaded with grapes during autumn.
  4. Gently moving Autumn wind that helps in separating grain from chaff
  5. day coming to its close gently.

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D.Explain the following verses:

(i) Who has not seen thee oft amid thy store?
Sometime whoever seeks abroad may find
Thee sitting careless on a granary floor,
Thy hair soft-lifted by the winnowing wind.

(ii) Where are the songs of spring? Ay, where are they?
Think not of them, thou hastes thy music too.

(iii) While barred clouds bloom the soft during day,
And touch the stubble-plains with rosy hue;
Then in a wailful choir the small gnats mourn Among the river sallows, borne aloft,
Or sinking as the light wind lives or dies.
Answer:
(i) Autumn may often be seen in the fields in the midst of her treasures of corn which have been harvested. The wind separates the chaff from the grains. It also means the wind which ruffles and passes the locks of a woman’s hair.

(ii) Here, the poet talks about the sounds of Autumn. Spring is distinguished by its songs which are not heard in Autumn but the poet says that there is no need to feel any regret on that account for the Autumn has its own peculiar music.

(iii) The poet in these lines describes that the long drawn out clouds in the sky look like bars of a grate. At this time, the melancholy buzzing of the gnats is heard. The gnats fly about among the shrubs growing on her river-side. The gnats are carried upwards when the wind is strong and they come downwards when the wind is feeble.

Speaking Activity

Hold a seminar in your class, under the guidance of your English teacher on the topic: ‘Nature and Man’. Individual speakers may choose any of the following topics for deliberation.

  • Educative value of Nature.
  • Nature as a refuge from worldly worries.
  • Nature as a living force.
  • Lessons we can learn from Nature:
  • charit generosity, co-existence, discipline, peace and harmony.
  • Can man survive without Nature?

Answer:
Students can choose any of the given topics as per their choice. One topic is given here as an example: Can Man Survive without Nature?
Man is a gift of God. God has created man and for his all types of comforts, He created Nature. Hence, there is an intricate relationship between Man and Nature. The whole life of a man depends upon Nature. Nature provides us air to breathe, water to drink, grain to eat, cool breeze to soothe, etc. In every sphere of our life, we need Nature. If Nature ceases to cooperate just for a second, we will collapse and the whole human race will be crippled. So, we cannot survive without Nature.

Writing Activity

Compose a paragraph on: “If Winter comes, can spring be far behind”? You can have an idea from the following: P.B. Shelley, closes his Ode to the West Wind with the given line, conveying the message of optimism and hope of regeneration. In the Ode, the poet invokes the tempestuous West Wind as a destroyer of the old and decayed order of things and a preserver of the seeds, so that, when spring comes, they may come to fresh life.
Answer:
Nature has its own way to govern this universe. It follows certain pattern which regulate our life. Morning is followed by day, day by night, and birth by death. There is a pattern of season which changes at a certain period. Nature maintains a balance. fit is not maintained, there would be a tremendous kind of anarchy. Everything will be turned upside down. So, It is sure that if winter comes spring cannot be far behind because it is governed by Nature.

Think it Over

Given below is a poem on spring written by Thomas Nash (1567—1601). Read the poem.

Spring

Spring, the sweet spring, is the year’s pleasant king;
Then blooms each thing, then maids dance in a ring,
Cold doth not sting, the pretty birds do sing,
Cuckoo, jug-jug, pu-we, to-witta-woo!
The palm and may make country houses gay,
Lambs frisk and play, the shepherds pipe all day,
And we hear ay birds tune this merry lay, .
Cuckoo, jug-jug, pu-we, to-witta-woo!
The fields breathe sweet, the daisies kiss our fret,
Young lovers meet, old wives a—sunning sit,
In every Street these tunes our ears to greet,
Cuckoo, jug-jug, pu-we, to-witta-woo!
Spring! the sweet spring!
Now think over the difference between the attitudes of the two poets—Nash and Keats-
towards the two different seasons.
Answer:
Do yourself.

Things to Do

In cold countries, there are four seasons, while in warm countries like India, there are six seasons called ‘RUTUS’.
English seasons are; Spring. Summer, Autumn. and Winter
Indian seasons are: Vasant, Grishnia, Varsha, Sharad, Hemanta and Shishir.
Now gather the following information about both:

  • their months of occurrence.
  • activities like ploughing, reaping etc. associated with each
  • changes in nature in each season.
  • Gregorian calendar months identical to Indian months.

Answer:
Do yourself with the help of your teacher.

To Autumn Summary in English

Autumn is a season of ripe fruitfulness. It is the time of the ripening of grapes, apples, gourds, hazelnuts, etc. It is also the time when the bees suck the sweetness from “later flowers” and make honey. Thus, autumn is picturised in the stanza as bringing all the fruits of earth to maturity in readiness for harvesting.

In the second stanza, autumn is seen in the person of a reaper, a winnower, a gleaner, and a cider-presser. Reaping, winnowing, gleaning and cider-pressing are all operations connected with the harvest and are, therefore, carried on during autumn. Autumn is depicted first as a harvester sitting carelessly in the field during a winnowing operation, second, as a tired reaper fallen asleep in the very midst of reaping, third, as a gleaner walking homewards with a load on the head, and fourth, as a cider-presser watching intently the apple-juice flowing out of the cider-press.

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Autumn is not altogether devoid of music. If spring has its songs, autumn too has its sounds and songs. In the evening, when the crimson light of the setting sun falls upon the stubble-fields, a chorus of natural sounds is heard. The gnats utter their mournful sounds; the full-growyn lambs bleat loudly, the hedge-crickets chirp; the robin’s high and delicate notes are heard, and the swallows twitter in the sky. In the last stanza, the close of the year is associated with sunset and nightfall.

To Autumn Summary in Hindi

पतझड़ पके फलों का मौसम है। यह अंगूर, सेब, कद्दू, पहाड़ी बादाम आदि के पकने का समय है। यही समय है जब मधुमक्खियाँ पिछड़े फूलों की मिठास को चूसती हैं और शहद तैयार करती हैं। इस तरह पतझड़ को एक ऐसे रूप में चित्रित किया गया है जो धरती पर फूलों की परिपक्वता और कटाई के लिए उन्हें तैयार करता है।

दूसरे पद में पतझड़ को एक फसल काटने वाली, फसल से अनाज निकालने वाली और अनाज को तैयार करने वाली के रूप में देखा गया है। कटाई, उड़ाई, बिनाई और छंटाई-सभी फसल से सम्बन्धित प्रक्रियाएँ हैं और इसलिए सभी पतझड़ के समय होते हैं। पतझड को सबसे पहले एक किसान के रूप में चित्रित किया गया है जो अपने खेत में बवाई के समय निश्चिन्त बैठा होता है, उसके बाद एक थके हुए फसल काटने वाले के रूप में जो कटाई के दौरान थककर गहरी नींद में सोया हुआ है और फिर एक बोझा ढोने वाले के रूप में जो अपने सिर पर अनाज का बोझ उठाए घर की ओर जा रहा है और फिर एक पिसाई करने वाले के रूप में जो गौर से सेव को दबाए जाने से निकलने वाले रस को देख रहा है।

पतझड़ बिल्कुल संगीतहीन नहीं है। यदि वसंत का अपना गीत है तो पतझड़ की भी अपनी आवाज़ और अपना गीत है। जब शाम को धुंधलका छा जाता है, सूर्यास्त हो रहा होता है, एक बिल्कुल स्वाभाविक समूह गान का संगीत सुनाई पड़ता है। टिटहरियाँ अपने शोकमय गीत गाती हैं, पूर्ण विकसित मेमने ज़ोर से मिमियाते हैं, झिंगुर गाते हैं, रॉबिन की आवाज़ ऊँची एवं मधुर गीत के रूप में सुनाई देती है और चातक आकाश में गाते हैं। अन्तिम पद में वर्ष की समाप्ति को सूर्यास्त और रात घिरने के रूप में दिखाया गया है।

To Autumn Word Meaning

MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 15 To Autumn img 1

To Autumn Important Pronunciations

MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 15 To Autumn img 2

To Autumn Stanzas for Comprehension

Read the following stanzas carefully and answer the questions that follow:

1. Season,of mists and mellow fruitfulness,
i Close bosom-friend of the maturing sun;
Conspiring with him how to load and bless .
With fruit the vines that round the thatch-eaves run;
To bend with apples the moss’d cottage trees. (Page 108) (M.P. Board 2009)

Questions:
(i) Who does the first line refer to?
(ii) …………. is the bosom friend of the season.
(iii) Find a word which means same as ‘becoming perfect’.
(iv) How does it plan to fill the fruits?
Answers:
(i) The autumn season is referred in the first line.
(ii) The Sun.
(iii) Maturing means same as ‘becoming perfect 1.
(iv) It plans to fill all the fruits with ripeness to their core.

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2. Then in a wailful choir the small gnats mourn
Among the river-sallows, home aloft
Or sinking as the light wind lives or dies;
And full-grown lambs loud bleat from hilly bourn;
Hedge-crickets sing; and now with treble soft
The red-breast whistles from a garden-croft;
And gathering swallows twitter in the skies. (Page 109)

Questions:
(i) What sound of the small gnats is referred to in the first line?
(ii) ……. bleat from hilly bourn.
(iii) Find a word from the lines with similar meaning to ‘shrill voice’.
(iv) What does the red-breast do?
Answers:
(i) The small gnat in the wailful choir mourn and this sound is referred in the first line.
(ii) The full grown, lambs.
(iii) Whistles is similar in meaning to ‘shrill voice’.
(iv) The red breast whistles from a garden croft.

MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 5 संगठन

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MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 5 संगठन

संगठन Important Questions

संगठन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन-सा अंतरण का तत्व नहीं है –
(a) उत्तरदेयता
(b) अधिकार
(c) उत्तरदायित्व
(d) अनौपचारिक संगठन
उत्तर:
(d) अनौपचारिक संगठन

प्रश्न 2.
कार्य करते हुए अंतःक्रिया में अचानक बना सामाजिक संबंध तंत्र कहलाता है –
(a) औपचारिक संगठन
(b) अनौपचारिक संगठन
(c) विकेन्द्रीकरण
(d) अंतरण।
उत्तर:
(b) अनौपचारिक संगठन

प्रश्न 3.
संगठन को देखा नहीं जा सकता –
(a) प्रबंध के एक कार्य के रूप में
(b) संबंधों के एक ढाँचे के रूप में
(c) एक प्रक्रिया के रूप में
(d) उद्यम वृत्ति के रूप में।
उत्तर:
(d) उद्यम वृत्ति के रूप में।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा संगठन प्रक्रिया का एक चरण नहीं है –
(a) क्रियाओं का विभाजन
(b) कार्य सौंपना
(c) कार्यों एवं विभागों का निर्माण
(d) नेतृत्व प्रदान करना।
उत्तर:
(d) नेतृत्व प्रदान करना।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन संदेशवाहन के अधिकारिक मार्ग का प्रयोग नहीं करता –
(a) औपचारिक संगठन
(b) अनौपचारिक संगठन
(c) कार्यात्मक संगठन
(d) प्रभागीय संगठन
उत्तर:
(b) अनौपचारिक संगठन

प्रश्न 6.
किस संगठन में क्रियाओं को उत्पादों के आधार पर समूहों में बाँटा जाता है –
(a) विकेन्द्रित संगठन
(b) प्रभागीय संगठन
(c) कार्यात्मक संगठन
(d) केन्द्रित संगठन।
उत्तर:
(b) प्रभागीय संगठन

प्रश्न 7.
एक लंबा ढाँचा होता है –
(a) प्रबंध की सिकुड़ी हुई शृंखला
(b) प्रबंध की फैली हुई श्रृंखला
(c) प्रबंध की कोई भी श्रृंखला
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(a) प्रबंध की सिकुड़ी हुई शृंखला

प्रश्न 8.
उत्पादन रेखा पर आधारित सामूहिक क्रिया अंग है –
(a) अंतरित संगठन का
(b) प्रभागीय संगठन का
(c) कार्यात्मक संगठन का
(d) स्वायत्त शासित संगठन का।
उत्तर:
(b) प्रभागीय संगठन का

प्रश्न 9.
केन्द्रीयकरण से तात्पर्य है –
(a) निर्णय लेने के अधिकारों को सुरक्षित रखना
(b) निर्णय लेने के अधिकारों का बिखराव करना
(c) प्रभागों का लाभ केन्द्र बनाना
(d) नये केन्द्रों अथवा शाखाओं को खोलना।
उत्तर:
(a) निर्णय लेने के अधिकारों को सुरक्षित रखना

प्रश्न10.
प्रबंध के विस्तार से तात्पर्य है –
(a) प्रबंधकों की संख्या में वृद्धि
(b) एक प्रबंधक की नियुक्ति के समय की सीमा जिसके लिये उसे नियुक्ति दी गई है
(c) एक उच्चाधिकारी के अंतर्गत कार्य करने वाले अधीनस्थों की गणना
(d) शीर्ष प्रबंध के सदस्यों की गणना।
उत्तर:
(c) एक उच्चाधिकारी के अंतर्गत कार्य करने वाले अधीनस्थों की गणना

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. अधिकार अंतरण या भारार्पण का आशय …………. सौंपना है।
  2. विकेन्द्रीकरण में …………. के वितरण पर बल दिया जाता है।
  3. विकेन्द्रीकरण अधिकारियों के कार्यभार में …………. करता है।
  4. कार्यात्मक संगठन संरचना की अवधारणा …………. के मस्तिष्क की उपज है।
  5. बैंक …………. संरचना संगठन का उदाहरण है।
  6. संगठन संरचना से आशय संस्था में …………. संबंधों की व्याख्या करने से है।
  7. संस्था को उसके द्वारा उत्पादित वस्तुओं के आधार पर विभक्त करना ……….. संगठन कहलाता है।
  8.  …………. संगठन में अधिकार तथा कर्तव्यों की स्पष्ट व्याख्या की जाती है।

उत्तर:

  1. अधिकार
  2. सत्ता
  3. कमी
  4. टेलर
  5. भौगोलिक
  6. अधिकार कर्तव्य
  7.  संभागीय
  8. औपचारिक।

प्रश्न 3.
एक शब्द या वाक्य में उत्तर दीजिए –

  1. उच्च अधिकारियों द्वारा अधीनस्थों में अपने कार्यों-अधिकारों का वितरण, सीमित रूप से किया जाना क्या कहलाता है ?
  2. संस्था में शीघ्र निर्णयन को प्रोत्साहित करने हेतु क्या अपनाया जाना चाहिए?
  3. ऐसी संस्था जो विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाती है उसे कौन-सा संगठन अपनाना चाहिए ?
  4. किस स्थिति में अधिकारों का हस्तांतरण होता है परन्तु उत्तरदायित्वों का नहीं?
  5. संगठन का वह स्वरूप जो कर्मचारियों के मध्य पारस्परिक संबंध के कारण स्वतः ही विकसित होता है, उसे क्या कहते हैं ?
  6. उस संगठन का नाम बताइए जो नियमों एवं कार्य विधियों पर आधारित है।
  7. संगठनात्मक ढाँचे में किस प्रकार के संबंध को दिखाया जाता है ?
  8. प्रबंध का संगठन का कार्य प्रबंध के किस कार्य के बाद आता है ?
  9. विभागीय संगठन प्रक्रिया का कौन-सा चरण है ?
  10. अनौपचारिक संगठन में सदस्यों में किस प्रकार का संबंध होता है ?

उत्तर:

  1. भारार्पण
  2. विकेंद्रीयकरण
  3. संभागीय संगठन
  4. भारार्पण
  5. अनौपचारिक संगठन
  6. औपचारिक संगठन
  7. अधिकारी व अधीनस्थ संबंध
  8. नियोजन के बाद
  9. दूसरा चरण
  10. मधुर संबंध।

प्रश्न 4.
सत्य या असत्य बताइये

  1.  संगठन की स्थापना निम्न स्तर के प्रबन्ध द्वारा होती है।
  2. संगठन भ्रष्टाचार को जन्म देता है।
  3. अधिकार का भारार्पण दिया जा सकता है।
  4. जवाबदेही का भारार्पण नहीं किया जा सकता है।
  5. संगठन का प्रबन्ध में वही महत्व है जो मानव शरीर में हड्डियों के ढाँचे का होता है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य।

प्रश्न 5.
सही जोड़ी बनाइये –
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 5 संगठन - 1
उत्तर:

  1. (e)
  2. (a)
  3. (b)
  4. (c)
  5. (d)

संगठन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संगठन के उद्देश्य बतलाइये।
उत्तर:
संगठन के उद्देश्य –

1. उत्पादन में मितव्ययिता – संगठन का प्रमुख उद्देश्य उत्पादन में मितव्ययिता लाना है अर्थात् न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करना प्रत्येक उपक्रम का उद्देश्य होता है।

2. समय तथा श्रम में बचत – संगठन में श्रेष्ठ मशीनें व यंत्र तथा श्रेष्ठ प्रणाली अपनाई जाती है जिससे कार्य के समय व श्रम में काफी बचत की जाती है। संगठन द्वारा बड़े पैमाने में उत्पादन के लाभ भी लिए जा सकते हैं।

3. श्रम तथा पूँजी में मधुर संबंध – श्रमिकों तथा प्रबंध के बीच मधुर संबंध स्थापित करना भी संगठन का एक उद्देश्य है, इस हेतु कुशल संगठनकर्ता की नियुक्ति कर श्रम व पूँजी के हितों की रक्षा की जाती है।

4. सेवा भावना – वर्तमान सामाजिक चेतना एवं जन जागरण के कारण प्रत्येक व्यवसायी का उद्देश्य “प्रथम सेवा फिर लाभ” हो गया है वैसे भी प्रत्येक व्यवसायी को समाज सेवा कर अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिए।

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प्रश्न 2.
संगठन के कोई चार सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संगठन के सिद्धान्त –

1. विशिष्टीकरण का सिद्धान्त प्रत्येक सदस्य की क्रियाएँ विशेष कार्य को पूरा करने तक ही सीमित होनी चाहिए, अर्थात् एक व्यक्ति को एक कार्य सौंपा जाये तो इससे कुशलता में वृद्धि होगी।

2. एकरूपता का सिद्धान्त – प्रत्येक पद से संबंधित अधिकारों तथा उत्तरदायित्वों में एकरूपता होनी चाहिए, परन्तु एक अधिकारी के अधिकार दूसरे से टकराने नहीं चाहिए, इससे संस्था का अनुशासन ढीला होगा और कार्य कुशलतापूर्वक सम्पन्न नहीं हो सकेगा।

3. अपवाद का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रो. टेलर वैज्ञानिक प्रबंध के जन्मदाता ने किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार दिन-प्रतिदिन के कार्यों को करने के लिये अधीनस्थों को अधिकार दे दिये जाने चाहिए तथा अपवादपूर्ण एवं महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय करने के कार्य को उच्च अधिकारियों पर छोड़ देना चाहिये।

4. सरलता का सिद्धान्त – संगठन का ढाँचा सरल होना चाहिये ताकि प्रत्येक कार्य के निष्पादन में कमसे-कम समय एवं व्यय लगे। सरलता के अभाव में संदेशों के आदान-प्रदान में भी कठिनाई सामने आती हैं तथा कार्य शीघ्रता व सरलता से नहीं हो पाएगा।

प्रश्न 3.
कार्यात्मक संगठन संरचना के गुण/लाभ समझाइये।
उत्तर:
कार्यात्मक संगठन ढाँचे के गुण / लाभ निम्नलिखित हैं

  1. कार्यात्मक संगठन में व्यावसायिक क्रियाओं का विभाजन तर्क संगत होता है।
  2. प्रत्येक विभाग के प्रबन्धक अपने विभाग के कार्य के लिए उत्तरदायी होते हैं।
  3. कार्यात्मक संगठन द्वारा सर्वोच्च प्रबन्ध का उपक्रम पर नियंत्रण रखना आसान हो जाता है।
  4. इस ढाँचे का आधार श्रम विभाजन है अर्थात् प्रबन्धकों को कार्य उनकी योग्यता एवं सूची के अनुसार दिये जाते हैं।

प्रश्न 4.
संगठन के कोई चार लाभ लिखिए।
उत्तर:
संगठन वह तंत्र है, जिसकी सहायता से प्रबंध व्यवसाय का संचालन, समन्वय तथा नियंत्रण करता है। यह प्रबंध की आधारशिला है। संगठन का महत्व निम्नलिखित बातों से स्पष्ट हो जाता है

1. उपक्रम के विकास में सहायक-श्रेष्ठ संगठन के माध्यम से उपक्रम का विकास तेज गति से होने लगता है, बड़े पैमाने के उत्पादन की सफलता के पीछे श्रेष्ठ संगठन का हाथ होता है।

2. समन्वय स्थापित होना-संगठन की सहायता से विभिन्न विभागों, उपविभागों, विभिन्न व्यक्तियों एवं क्रियाओं में उचित समन्वय एवं सामंजस्य स्थापित होता है। जिससे प्रशासन द्वारा निर्धारित नीति का पूर्ण परिपालन संभव होता है।

3. भ्रष्टाचार पर नियंत्रक-स्वस्थ एवं कुशल संगठन भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण करने में भी सफल रहता है, जिससे कर्मचारियों की दक्षता बढ़ती है और उनका मनोबल तथा उत्साह बढ़ता रहता है।

4. मनोबल में वृद्धि-कुशल संगठन से कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि होती है। प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकार, दायित्व तथा कर्तव्य से सुपरिचित रहता है तथा वह उपक्रम की नीतियों व उद्देश्यों को भली-भाँति समझ जाता है।

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प्रश्न 5.
श्रेष्ठ संगठन से प्रशासकीय तथा प्रबंधकीय क्षमता में वृद्धि होती है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रशासन द्वारा उपक्रम की नीतियों एवं लक्ष्यों का निर्धारण किया जाता है व इनका क्रियान्वयन प्रबंध द्वारा संगठन के सहयोग से किया जाता है। श्रेष्ठ संगठन में सहयोग, समन्वय, कार्यनिष्ठा व अनुशासन की भावना भरी होती है, जिससे संगठन के मानवीय प्रयासों को एक निश्चित दिशा देकर अधिक सार्थक व प्रभावी बनाया जा सकता है। उपक्रम की क्रियाओं एवं उद्देश्यों को सरलता व शीघ्रता से समय पर पूर्ण कराया जा सकता है। इस प्रकार श्रेष्ठ संगठन से प्रशासकीय व प्रबंधकीय क्षमता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 6.
रेखा एवं कर्मचारी संगठन क्या है ? इसकी तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
रेखा एवं कर्मचारी संगठन में काम का विभाजन स्वतंत्र विभागों में किया जाता है तथा उत्तरदायित्व का विभाजन भी लम्बवत् होता है किन्तु कार्यदक्षता तथा सहकारिता को प्रोत्साहन देने के लिए प्रत्येक विभाग में विशेषज्ञ नियुक्त किये जाते हैं, जो परामर्श का कार्य करते हैं।
रेखा व कर्मचारी संगठन की विशेषताएँ

  1. इस संगठन में अधिकार व उत्तरदायित्व ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होता है।
  2. इस संगठन में योग्य कर्मचारियों को उन्नति के अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं।
  3. इसमें सोचने एवं परामर्श देने व करने के कार्य दोनों पृथक्-पृथक् होते हैं।

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प्रश्न 7. रेखा संगठन के दोष लिखिए।
उत्तर:
रेखा संगठन के दोष :

  1. इस संगठन में पक्षपात की आशंका बनी रहती है। इसमें सर्वोच्च अधिकारी अपने अधीनस्थों की नियुक्ति, पदोन्नति आदि में पक्षपात कर सकता है।
  2. आधुनिक उद्योग इतने जटिल व मिश्रित हैं कि एक ही व्यक्ति सारे कार्य दक्षतापूर्वक सम्पन्न नहीं कर सकता है,
  3. विशिष्टीकरण इसमें संभव नहीं है।
  4. दक्ष अधिकारी के बिना विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित करना कठिन हो जाता है।
  5. अनुशासन पर अधिक ध्यान देने के कारण इस प्रणाली में तानाशाही की बुराइयाँ आ जाती हैं।
  6. उच्चाधिकारी के गलत निर्णय लेने पर उपक्रम विफल हो सकता है।

प्रश्न 8.
रेखा संगठन के लाभों को समझाइये।
उत्तर:
रेखा संगठन के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं

  1. इस संगठन में प्रत्येक सदस्य को अपने उत्तरदायित्व व कर्तव्यों की स्पष्ट जानकारी रहती है।
  2. इस संगठन में निर्णय प्रायः एक व्यक्ति द्वारा लिए जाते हैं, अतः निर्णय सरलतापूर्वक व शीघ्र होते हैं।
  3. विभिन्न विभागों को एक ही व्यक्ति के निर्देशन में कार्य करना होता है, अतः उनमें समन्वय आसानी से किया जा सकता है।
  4. इस संगठन प्रणाली में आवश्यकतानुसार समायोजन भी किया जा सकता है अर्थात् यह लोचपूर्ण है।

प्रश्न 9.
कार्यात्मक संगठन प्रभागीय संगठन से किस प्रकार असमानता रखता है ?
उत्तर:
संगठनात्मक ढाँचा (Organisational structure)- संगठनात्मक ढाँचा संगठन में विभिन्न पदों के बीच अधिकार और उत्तरदायित्व संबंध प्रदर्शित करता है और साथ ही स्पष्ट करता है कि कौन किसको रिपोर्ट करेगा। हर्ले (Hurley) के अनुसार, “संगठन ढाँचे, एक संस्था में विभिन्न पदों एवं उन पदों पर काम करने वाले व्यक्तियों के मध्य संबंधों के स्वरूप होते हैं ।” संगठन ढाँचे को प्रायः संगठन चार्ट पर प्रदर्शित किया जाता है। संगठन ढाँचे के दो रूप हैं-

  1. कार्यात्मक ढाँचा तथा
  2.  प्रभागीय ढाँचा।

प्रश्न 10.
औपचारिक संगठन तथा अनौपचारिक संगठन किस प्रकार आपस में संबंधित हैं?
उत्तर:
अनौपचारिक संगठन और औपचारिक संगठन में संबंध (Relation between formal organization and informal organization)- अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन का एक अंग होता है। औपचारिक संगठन के अंदर सदस्य अपने कार्यों को एक-दूसरे के सहयोग से पूरा करते हैं। वे एक-दूसरे से बातचीत करते हैं। इससे उनमें मैत्रीपूर्ण संबंध बन जाते हैं। मित्रता के आधार पर सामाजिक समूह का एक संजाल (Network) बन जाता है।

इस संजाल को अनौपचारिक संगठन कहते हैं। इस प्रकार औपचारिक संगठन अनौपचारिक संगठनों को जन्म देते हैं। अनौपचारिक संगठन के अंदर काम करने वाले सदस्यों के बीच सामाजिक संबंधों की एक व्यवस्था होती है। औपचारिक ढाँचे के अंदर ही अनौपचारिक संगठन की उत्पत्ति होती है।

औपचारिक संगठन में अनौपचारिक संगठन की उत्पत्ति के कई आधार होते हैं- जैसे समान रूचि, भाषा, संस्कृति आदि। ये संगठन पूर्व-नियोजित नहीं होते। ये लोगों की आवश्यकताओं और संस्था के वातावरण के अनुसार स्वतः ही बन जाते हैं।

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प्रश्न 11.
केंद्रीयकरण और विकेंद्रीयकरण की अवधारणा अधिकार अंतरण की अवधारणा से संबंधित है। कैसे?
उत्तर:
अधिकारों के केंद्रीयकरण से अभिप्राय उच्च प्रबंध स्तरों पर अधिकारों के संकेद्रण (Centralization) से है। यहाँ अधिकांश निर्णय उच्च स्तर के प्रबंधकों के द्वारा लिए जाते हैं। अधीनस्थ प्रबंधको के द्वारा निर्देशों के अनुसार करते हैं। इसके विपरीत अधिकार विकेंद्रीयकरण से अभिप्राय केवल केंद्रीय बिंदुओं पर ही प्रयोग किये जा सकने वाले अधिकारों को छोड़कर शेष सभी अधिकारों को व्यवस्थित रूप से निम्न स्तरों को सौंपने से है।

केंद्रीयकरण और विकेंद्रीकरण की दोनों अवधारणाएँ अधिकार अंतरण की अवधारणा से संबंधित हैं। जब अधिकार अधीनस्थों को हस्तांतरण नहीं हो जाते और सारे अधिकार उच्च प्रबंध पर संकेद्रित हैं, तब केंद्रीयकरण कहलायेगा और जब अधिकारों का अंतरण अधीनस्थों को किया जाता है तब विकेंद्रीयकरण की स्थिति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 12.
अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन की किस प्रकार सहायता करता है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अनौपचारिक संगठन का जन्म औपचारिक संगठन से होता है, जब व्यक्ति अधिकारिक तौर पर बतलाई गई भूमिकाओं से परे आपस में मेल-मिलाप से कार्य करते हैं। जब कर्मचारी सगंठन की ओर नहीं धकेला जा सकता बल्कि वे मैत्रीपूर्ण व सहयोगपूर्ण विचारों से एक ग्रुप बनाने की ओर झुकते हैं। यह उनके आपसी हितों की अनुरूपता को प्रकट करता है।

ऐसे समूहों का प्रयोग संगठन की उन्नति तथा सहयोग के लिए किया जा सकता है। ऐसे समूह उपयोगी तथा कर्मचारियों एवं उच्चाधिकारियों के मध्य झगड़े सुलझाने का कार्य अनौपचारिक संप्रेषण के द्वारा भली-भाँति किया जा सकता है। प्रबंधकों को औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार के संगठनों का युक्ति पूर्ण उपयोग करना चाहिए ताकि संगठन का कार्य सुगमतापूर्वक चल सके। औपचारिक संगठन को यदि भली-भाँति नियंत्रित किया जाए तो औपचारिक संगठन के द्वारा बनाये गये उद्देश्यों की प्राप्ति में अनौपचारिक संगठन अत्यंत उपयोगी है।

प्रश्न 13.
केंद्रीयकरण एवं विकेंद्रीयकरण में अंतर्भेद कीजिए।
उत्तर:
बहुत से संगठनों में सभी निर्णयों को लेने में शीर्ष प्रबंध की मुख्य भूमिका होती है जबकि अन्य संगठनों में यह अधिकार प्रबंध के निम्नतम स्तर को भी दिया जाता है। जिन उपक्रमों में निर्णय लेने का अधिकार केवल शीर्ष स्तरीय प्रबंध को ही होता है वे केंद्रीकृत संगठन कहलाते हैं। जबकि उन संगठनों में जहाँ इस प्रकार के निर्णयों को लेने में निम्न स्तर तक के प्रबंध को भागीदार बनाया जाता है, विकेंद्रीकृत संगठन कहते हैं।

विकेंद्रीयकरण से तात्पर्य उस विधि से है जिसमें निर्णय लेने का उत्तरदायित्व सोपानिक क्रम में विभिन्न स्तरों में विभाजित किया जाता है। सरल शब्दों में विकेंद्रीयकरण का अर्थ संगठन के प्रत्येक स्तर पर अधिकार अंतरण करना होता है। निर्णय लेने का अधिकार निम्नतम स्तर तक के प्रबंध को दिया जाता है जहाँ पर वास्तविक रूप में कार्य होना है। दूसरे शब्दों में निर्णय लेने का अधिकार आदेश की श्रृंखला में नीचे तक दिया जाता है।

केंद्रीयकरण (Centralization) – जिस संगठन में निर्णय लेने का अधिकार केवल उच्चस्तरीय प्रबंधन को ही होता है तो वह संगठन केंद्रीकृत कहलाता है। कोई भी संस्था कभी भी न तो पूर्णरूपेण केंद्रीकृत हो सकती है और न विकेंद्रीकृत। जब कोई संस्था आकार तथा जटिलताओं की ओर अग्रसर होती है तो यह देखा गया है · कि वे संस्थाएँ निर्णयों में विकेंद्रीयकरण को अपनाती हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि बड़ी-बड़ी संस्थाओं में जहाँ कर्मचारियों को प्रत्यक्ष तथा अतिनिकट से कार्य संचालन में आल्पित किया जाता है उनका ज्ञान तथा अनुभव उन उच्चस्तरीय प्रबंधकों से कहीं अधिक होता है जो संस्थान से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए होते हैं।

श्रेष्ठ नियंत्रण (Best control)- विकेंद्रीयकरण से प्रत्येक स्तर पर कार्य निष्पादन के मूल्यांकन का अवसर मिलता है जिससे प्रत्येक विभाग व्यक्तिगत रूप से उसके परिणामों के लिए जवाबदेह बनाया जा सकता है। संगठन के उद्देश्यों की उपलब्धि किस सीमा तक हुई या समस्त उद्देश्यों को प्राप्त करने में प्रत्येक विभाग कितना सफल हो सका इसका भी निर्धारण किया जा सकता है। सभी स्तरों से प्रतिपुष्टि द्वारा भिन्नताओं का विश्लेषण करने तथा सुधारने में सहायता मिलती है। विकेंद्रीयकरण में निष्पादन की जवाबदेही एक बड़ी चुनौती है। इस चुनौती का सामना करने के लिए संतुलन अंक कार्ड तथा प्रबंध सूचना विधि।

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प्रश्न 14.
विकेंद्रीयकरण के महत्व लिखिए।
उत्तर:
एक संगठन निम्न कारणों से विकेंद्रीयकरण होना पसंद करता है

1. उच्च अधिकारियों की अत्यधिक कार्यभार से मुक्ति (More capacity utilization)विकेंद्रीयकरण के अतंर्गत दैनिक प्रबंधकीय कार्यों को अधीनस्थों को सौंप दिया जाता है। इसके फलस्वरूप उच्च प्रबंधकों के पास पर्याप्त समय बचता है जिसका प्रयोग वे नियोजन, समन्वय, नीति निर्धारण, नियंत्रण आदि में कर सकते हैं।

2. विभिन्नीकरण में सुविधा (Ease to expansion)- इस बात से इंकार नहीं किया जाता कि एक व्यक्ति का नियंत्रण सर्वश्रेष्ठ होता है लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है। सीमा का अभिप्राय व्यवसाय के आकार से है अर्थात् जब तक व्यवसाय का आकार छोटा है उच्च स्तर पर सभी अधिकारियों को केंद्रित करके व्यवसाय को कुशलतापूर्वक चलाया जा सकता है लेकिन जब उसमें उत्पादन की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा अधिक हो जाती है तब केंद्रीय नियंत्रण से काम नहीं चल सकता क्योंकि अकेला व्यक्ति सभी वस्तुओं की समस्याओं की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सकता।

3. प्रबंधकीय विकास (Managerial development)- विकेंद्रीयकरण का अभिप्राय है निम्नतम स्तर के प्रबंधकों को भी अपने कार्यों के संबंध में निर्णय लेने के अधिकार होना। इस प्रकार निर्णय लेने के अवसर प्राप्त होने से सभी स्तरों के प्रबंधकों के ज्ञान एवं अनुभव में वृद्धि होती है और इस प्रकार कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था प्रशिक्षण का काम करती है।

4. कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि (Increase in employees morale)- विकेंद्रीयकरण के कारण प्रबंध में कर्मचारियों की भागीदारी बढ़ती है। इससे संस्था में उनकी पहचान बनती है। जब संस्था में किसी व्यक्ति की पहचान बने अथवा उसका महत्व बढ़े तो उसके मनोबल में वृद्धि होना स्वाभाविक है। मनोबल में वृद्धि होने से वे अपनी इकाई की सफलता के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने से भी नहीं घबराते।

प्रश्न 15.
औपचारिक तथा अनौपचारिक संगठन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
औपचारिक संगठन एवं अनौपचारिक संगठन में अन्तर:
औपचारिक संगठन

  1. इसका निर्माण किसी योजना को पूरा करने के लिए विचार-विमर्श करके किया जाता है। होता है।
  2. इसे किसी तकनीकी उद्देश्य को पूरा करने के उद्देश्य से बनाया जाता है।
  3. इसका आकार बड़ा हो सकता है।
  4. इसमें सत्ता का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है।

अनौपचारिक संगठन

  1. इसका निर्माण स्वतः ही सामाजिक संबंधों द्वारा
  2. इसका निर्माण सामाजिक संतोष प्राप्त करने
  3. यह प्रायः छोटे आकार का होता है।
  4. इसमें सत्ता का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर होता है।

प्रश्न 16.
औपचारिक संगठन से क्या आशय है ? इसकी कोई चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
औपचारिक संगठन – इसका आशय एक ऐसे संगठन से है जिसमें प्रत्येक स्तर के प्रबन्धकों के अधिकारों, कर्तव्यों तथा दायित्वों की स्पष्ट सीमा निर्धारित होती है। इस संगठन को संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रबंध द्वारा बनाया जाता है।

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प्रश्न 17.
अनौपचारिक संगठन किसे कहते हैं ? विशेषताओं सहित बताइए।
उत्तर:
अनौपचारिक संगठन से अभिप्राय ऐसे संगठन से है जिसकी स्थापना जानबूझकर नहीं की जाती अपितु, अनायास ही सामान्य हितों, संबंध, रुचियों तथा धर्म के कारण हो जाती है।
अर्ल. पी. स्ट्रांग के अनुसार, “अनौपचारिक संगठन एक ऐसी सामाजिक संरचना है जिसका निर्माण व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है।”
अनौपचारिक संगठन की विशेषताएँ- इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं.

1. निर्माण स्वतः-इसका निर्माण जानबूझकर नहीं किया जाता बल्कि व्यक्तियों के आपसी संबंधों तथा रुचियों के आधार पर स्वयं हो जाता है।

2. व्यक्तिगत संगठन-व्यक्तिगत संगठन से अभिप्राय है कि इसमें व्यक्तियों की भावनाओं को ध्यान में रखा जाता है, उन पर किसी भी बात को थोपा नहीं जाता।

3. अधिकार-इसमें अधिकार व्यक्ति से जुड़े रहते हैं तथा उनका प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर या समतल रूप में चलता है।

4. स्थायित्व का अभाव-इसमें जब तक व्यक्ति एक समूह में है तभी तक वह संगठन है जब व्यक्ति अलग होता है तो संगठन समाप्त हो जाता है। इसमें स्थायित्व का अभाव रहता है।

प्रश्न 18.
अधिकार अन्तरण या भारार्पण से क्या तात्पर्य है ? इसके प्रमुख तत्वों ( प्रक्रिया) को समझाइए।
उत्तर:
अधिकार अंतरण से आशय, अधीनस्थों को निश्चित सीमा के अन्तर्गत कार्य करने का केवल अधिकार देना है। अधिकार अंतरण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसकी आवश्यकता उस समय उत्पन्न होती है जब एक प्रबंधक के पास कार्यभार अधिक होने के कारण वह सभी कार्यों का अधीनस्थों में विभाजन करता है। अतः उसे अधिकार अंतरण का सहारा लेना पड़ता है। जब कुछ कार्यों का निष्पादन करने के लिए दूसरे व्यक्तियों को अधिकृत किया जाता है तो इसे अधिकार अंतरण कहते हैं।
विभिन्न विद्वानों ने अधिकार अंतरण को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है

  1. एफ. जी. मूरे, “अधिकार अंतरण से अभिप्राय दूसरे लोगों को कार्य सौंपना और उसे करने के लिए अधिकार देना है।”
  2. मैस्कॉन, “अधिकार अंतरण किसी व्यक्ति को कार्य तथा सत्ता सौंपना है, जो उनके लिए दायित्व ग्रहण करता है।”

अधिकार अंतरण के तत्व-अधिकार अंतरण के पाँच तत्व हैं

1. कार्यभार सौंपना – अधिकार अंतरण प्रक्रिया का पहला कदम कार्यभार सौंपा जाना है क्योंकि कोई भी अधिकारी इतना सक्षम नहीं होता कि वह अपना सारा कार्य स्वयं पूरा कर ले इसलिए अपने कार्य का सफलतापूर्वक निष्पादन करने के लिए वह अपने कार्य का विभाजन करता है, विभाजन के समय अधीनस्थों कीयोग्यता एवं कुशलता का ध्यान में रखा जाना अत्यंत आवश्यक होता है।

2. अधिकार प्रदान करना-कार्य का सफलतापूर्वक निष्पादन करने हेतु अधिकार सौंपे जाते हैं क्योंकि . जब तक अधीनस्थों को अधिकार प्रदान नहीं किए जाएँगे तब तक कार्यभार सौंपना अर्थहीन होता है। अतः कार्य को पूरा करने के लिए अधिकार सौंपे जाने चाहिए।

3. प्रत्यायोजन की स्वीकृति-जिस व्यक्ति को कार्य दिया गया है वह उस कार्य को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। यदि अधिकार अंतरण स्वीकार नहीं किया जाता तो प्रत्यायोजक प्रबन्धक किसी अन्य अधीनस्थ व्यक्ति को कार्य सौंपने की कार्यवाही करेगा। इसलिए प्रत्यायोजन की स्वीकृति अत्यंत आवश्यक होती है।

4. जवाबदेही निर्धारित करना-जवाबदेही, अधीनस्थों को सही ढंग से कार्य करने के लिए जिम्मेदार ठहराता है, प्रत्येक अधीनस्थ केवल उस अधिकारी के समक्ष ही जवाबदेह होता है जिससे उसे कार्य करने के अधिकार प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 19.
विकेन्द्रीयकरण से क्या तात्पर्य है ? विकेन्द्रीयकरण के कौन-कौन से लाभ होते हैं ?
उत्तर:
विकेन्द्रीयकरण से तात्पर्य है, निर्णय लेने के अधिकार को संगठन के निम्न स्तर पर पहुँचाना है। विकेन्द्रीयकरण, अधिकार अंतरण का ही विस्तृत रूप है। जब किसी उच्च अधिकारी के द्वारा अपने अधीनस्थों को अपेक्षाकृत अधिक भाग में अधिकारों का भारार्पण किया जाता है, तो यह विकेन्द्रीयकरण कहलाता है। इसके अंतर्गत केवल ऐसे अधिकार जो उच्च अधिकारियों के लिए सुरक्षित रखना जरुरी है, को छोड़कर शेष सभी अधिकार अधीनस्थों को स्थाई रूप से सौंप दिए जाते हैं।
विकेन्द्रीयकरण के लाभ-विकेन्द्रीकरण के लाभों को निम्न बातों से स्पष्ट किया जा सकता है

1. उच्च अधिकारियों का कार्य भार कम होना-विकेन्द्रीयकरण की सहायता से उच्च अधिकारियों के कार्यभार में बहुत कमी आ जाती है, वे अपना पूरा ध्यान महत्वपूर्ण कार्यों में लगा सकते हैं उन्हें छोटे-छोटे कार्यों में उलझना नहीं पड़ता है, जिस कारण व्यावसायिक उपक्रम उच्च अधिकारियों की योग्यता, कुशलता तथा विवेक का अधिकारिक लाभ उठा सकते हैं।

2. विविधीकरण की सुविधा-विकेन्द्रीयकरण में विविधीकरण की पर्याप्त सुविधा होती है क्योंकि अलग-अलग क्रियाओं के लिए अलग-अलग अध्यक्षों की नियुक्ति की जा सकती है।

3. अनौपचारिक संबंधों का विकास-विकेन्द्रीयकरण के द्वारा अनौपचारिक संबंधों का विकास होता है।

4. अभिप्रेरण-विकेन्द्रीयकरण के द्वारा कर्मचारियों को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार होता है जिससे वह बेहतर परिणाम लाने के लिए अभिप्रेरित होते हैं।।

प्रश्न 20.
कार्यात्मक संगठन तथा प्रभागीय संगठन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कार्यात्मक संगठन तथा प्रभागीय संगठन में अन्तर –

प्रश्न 21.
औपचारिक संगठन के लाभ तथा दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
औपचारिक संगठन के लाभ (Advantages of Formal Organisation)

1. व्यवस्थित कार्यवाही (Systematic Working)-इस ढाँचे का परिणाम एक संगठन की व्यवस्थित और सरल कार्यवाही होता है।

2. संगठनात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति (Achievement of Organisational Objectives)-इस ढाँचे को संगठनात्मक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए स्थापित किया जाता है।

3. कार्य का दोहराव नहीं (No Overlapping of Work)-औपचारिक संगठनात्मक ढाँचे में विभिन्न विभागों और कर्मचारियों के बीच कार्य व्यवस्थित ढंग से विभाजित होता है। इसलिए कार्य के दोहराव का कोई अवसर नहीं होता है।

4. समन्वय (Coordination)-इस ढाँचे का परिणाम विभिन्न विभागों की क्रियाओं को समन्वित करना होता है।

औपचारिक संगठन के दोष (Disadvantages of Formal Organization)

1. कार्य में देरी (Delay in Action) – सोपान श्रृंखला और आदेश श्रृंखला का अनुसरण करते समय कार्यों में देरी हो जाती है।

2. कर्मचारियों की सामाजिक आवश्यकताओं की अवहेलना करता है (Ignores Social Needs of Employees)-यह ढाँचा कर्मचारियों की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकता को महत्व नहीं देता ‘जिससे कर्मचारियों के अभिप्रेरण में कमी हो सकती है।

3. केवल कार्य पर बल (Emphasis on Work Only) – यह ढाँचा केवल कार्य को महत्व देता है इसमें मानवीय संबंधों, सृजनात्मकता, प्रतिभाओं इत्यादि को महत्व नहीं दिया जाता है।

प्रश्न 22.
विकेंद्रीयकरण एवं भारार्पण में अंतर लिखिए।
उत्तर:
विकेंद्रीयकरण एवं भारार्पण में अंतर
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 5 संगठन - 4

प्रश्न 23.
अधिकार अंतरण तथा विकेन्द्रीयकरण में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अधिकार अंतरण तथा विकेन्द्रीयकरण में अंतर

अधिकार अंतरण

  1. उच्च अधिकारी के द्वारा सत्ता का अधीनस्थों को हस्तांतरण, अधिकार अंतरण कहलाता है। करण कहलाता है।
  2. इसमें अंतिम उत्तरदायित्व अधिकार सौंपने उत्तरदायित्व कावाले का ही होता है अर्थात् इसमें उत्तर भी हस्तांतरण हो जाता है।दायित्व का हस्तांतरण नहीं होता।
  3. यह सभी संस्थाओं के लिए आवश्यक होता है क्योंकि अधीनस्थों से काम लेने के लिए उन्हें अधिकार देना पड़ता है।
  4. अधिकार अंतरण, विकेन्द्रीयकरण पर नहीं होता।

विकेन्द्रीयकरण

  1. पूरे संगठन में सत्ता का फैलाव करना विकेन्द्रीय
  2. इसमें अधिकार के साथ-ही-साथ
  3. विकेन्द्रीयकरण प्रत्येक संस्था के लिए आवश्यक नहीं है।
  4. विकेन्द्रीयकरण, अधिकार अंतरण के बिना संभव आधारित नहीं होता है।

प्रश्न 24.
अधिकार एवं उत्तरदायित्व में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अधिकार एवं उत्तरदायित्व में अन्तर –

अधिकार

  1. अधिकार का अर्थ है, निर्णय लेने की शक्ति।
  2. अधिकार वह शक्ति है जो अधीनस्थों के कर्तव्य को पूरा करने से है।
  3. अधिकार का प्रत्यायोजन किया जा सकता है।
  4. अधिकार, संस्था में औपचारिक पद के कारण उत्पन्न होता है।

उत्तरदायित्व

  1. उत्तरदायित्व का अर्थ है, सौंपे गये कार्य को सही
  2. उत्तरदायित्व का आशय किसी व्यक्ति द्वारा अपने व्यवहार को प्रभावित करती है।
  3. उत्तरदायित्व दूसरों को सौंपे जा सकते हैं।
  4. उत्तरदायित्व, उच्चाधिकारी अधीनस्थ सम्बन्ध से उत्पन्न होता है।

प्रश्न 25.
प्रभावी भारार्पण की अनिवार्य अपेक्षाओं को समझाइए।
उत्तर:
प्रभावी भारार्पण की अनिवार्य अपेक्षाएँ – अधिकार सौंपने की व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए निम्नांकित निर्देशों का पालन करना चाहिए

1. अधिकार और दायित्वों की स्पष्ट सीमा – अधीनस्थों को जो कार्य सौंपे जाएँ तो उन्हें यह पूरी तरह मालूम होना चाहिए कि उनके दायित्व तथा अधिकारों का क्षेत्र क्या है तथा उनकी सीमा कहाँ तक है।

2. अधिकार और दायित्वों की स्पष्ट व्याख्या – अधीनस्थों को स्पष्ट रूप से यह ज्ञान होना चाहिए कि उन्हें क्या करना है तथा सौंपे गए कार्य के लिए कितने अधिकार दिये गये हैं तथा उनसे किस प्रकार के कार्य की आशा की जाती है।

3. उचित नियन्त्रण – अधिकार सौंपने की व्यवस्था के पश्चात् भी वरिष्ठ अधिकारी का उत्तरदायित्व समाप्त नहीं होता। इसलिए उच्च अधिकारियों को अपने अधीनस्थों के कार्यों पर उचित नियंत्रण रखना चाहिए।

4. योग्य व्यक्ति का चयन – अधिकार हमेशा योग्य व्यक्ति को ही सौंपने चाहिए तभी सौंपा गया कार्य सही ढंग से पूर्ण होता है।

प्रश्न 26.
संगठन के उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
किसी भी व्यावसायिक एवं औद्योगिक इकाई में संगठन के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं…

1. उत्पादन में मितव्ययिता (Economy in production) संगठन का प्रमुख उद्देश्य, उत्पादन में मितव्ययिता लाना है, अर्थात् न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करना प्रत्येक उपक्रम का उद्देश्य होता है, यहाँ यह ध्यान रखना है कि न्यूनतम लागत के साथ-साथ वस्तु की गुणवत्ता (Quality) व मात्रा (Quantity) में गिरावट नहीं आनी चाहिये।

2. समय व श्रम में बचत (Saving in time and labour)-संगठन में श्रेष्ठ मशीनें व यंत्र तथा श्रेष्ठ प्रणाली अपनाई जाती है जिससे कार्य के समय व श्रम में काफी बचत हो जाती है, संगठन द्वारा बड़े पैमाने में उत्पादन के लाभ भी लिये जा सकते हैं।

3. श्रम व पूँजी में मधुर सम्बन्ध (Cordial relations between labour and capital)- श्रमिकों व प्रबन्ध के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित करना भी संगठन का एक उद्देश्य है, इस हेतु कुशल संगठनकर्ता की नियुक्ति कर श्रम व पूँजी के हितों की रक्षा की जाती है।

4. सेवा भावना (Spirit of service) वर्तमान सामाजिक चेतना एवं जन-जागरण के कारण प्रत्येक व्यवसायी का उद्देश्य ‘प्रथम सेवा फिर लाभ’ हो गया है वैसे भी प्रत्येक व्यवसायी को समाज सेवा कर अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिये। इसलिये वर्तमान में प्रत्येक संगठन चाहे वह आर्थिक हो या अनार्थिक सभी का उद्देश्य सेवा करना होता है।

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प्रश्न 27.
संगठन प्रक्रिया का संक्षेप में विवेचन कीजिये।
उत्तर:
संगठन के निर्माण के प्रमुख चरण

1. उद्देश्यों की स्थापना-संगठन के साथ उद्देश्यों का होना अति आवश्यक है। संगठन के उद्देश्यों में उन कार्यों की स्पष्ट व्याख्या होनी चाहिए जिनके कारण संगठन की संरचना की जाती है।

2. क्रियाओं का निर्धारण-संगठन का दूसरा कदम क्रियाओं का निर्धारण एवं उनका विभाजन करना होता है। कार्यों को उपकार्यों में विभाजित कर प्रत्येक कार्य की स्पष्ट व्याख्या करनी चाहिए।

3. क्रियाओं का वर्गीकरण-तृतीय चरण में क्रियाओं का वर्गीकरण किया जाता है। इस हेतु विभिन्न क्रियाओं को अलग-अलग समूह में बाँट दिया जाता है। जैसे-क्रय, विक्रय, विज्ञापन, निरीक्षण, उत्पादन, मजदूरी, वेतन आदि।

4. कार्य का विभाजन-इसके अन्तर्गत सही कार्य के लिए सही व्यक्ति के सिद्धान्त के अनुसार कार्य विभाजन किया जाता है। साथ ही कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी निश्चित की जाती है।

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प्रश्न 28.
विकेन्द्रीयकरण के उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
विकेन्द्रीयकरण के निम्न उद्देश्य होते हैं

1.शीर्ष स्तर पर कार्यभार में कमी-सामान्यतः निर्णय उच्च प्रबन्धक या शीर्ष स्तर पर लिये जाते हैं। संगठन का विस्तार होने पर शीर्ष स्तर का कार्य और बढ़ जाता है अतः इस कार्यभार को कम करने के लिये विकेन्द्रीयकरण किया जाता है। इससे शीर्ष अधिकारियों का कार्यभार कम होगा और वे अति महत्वपूर्ण कार्यों के लिये अच्छा निर्णय ले सकते हैं।

2. प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के लाभ प्राप्त करने के लिये-विकेन्द्रीयकरण से अधिकारों का फैलाव छोटे-छोटे स्तर तक हो जाता है इससे प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के समस्त लाभ सभी वर्ग को प्राप्त होते हैं।

3. कार्यों के शीघ्र निष्पादन के लिये-उच्चाधिकारियों के अधिक कार्यों को कम कर दिया जाये तो वे अपने कार्यों को ठीक ढंग से व शीघ्र उसका निपटारा कर सकते हैं इसी के साथ प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिये प्रत्येक स्तर पर अधिकारों का होना आवश्यक है इससे कार्य शीघ्र पूर्ण किये जा सकते हैं।

4.सर्वांगीण विकास-विकेन्द्रीयकरण से शीर्ष स्तर एवं निम्न स्तर के समस्त अधिकारियों को अधिकार प्राप्त होने से उन्हें अपने विकास का पूर्ण अवसर प्राप्त होता है। इसमें पूर्ण कार्यक्षमता से कार्य निष्पादित किये जा सकते हैं। अतः संगठन के सर्वांगीण विकास के लिये भी विकेन्द्रीयकरण आवश्यक है।

प्रश्न 29.
अनौपचारिक संगठन के विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अनौपचारिक संगठन में सामान्यतः निम्न विशेषतायें होती हैं

  1. इन संगठनों को बनाया नहीं जाता अपितु विशेष परिस्थितियों के कारण ये बन जाते हैं।
  2. इन संगठनों के समान उद्देश्य होते हैं।
  3. ये अस्थायी होते हैं कभी भी संगठन समाप्त हो जाते हैं।
  4. इनका अपना कोई चार्ट, विधान या मैन्यूवल नहीं होता अपितु सामान्य परम्परा ही इनके कानून होते हैं।
  5. ये संगठन व्यक्तिगत सम्बन्धों पर आधारित होते हैं।
  6. ये वैध एवं अवैध दोनों हो सकते हैं ।
  7. इसमें अधिकार एवं सत्ता को ऊपर से नीचे समर्पित किया जाता है।

प्रश्न 30.
संगठन की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

1. दो या दो से अधिक व्यक्ति का होना-एक व्यक्ति अपने आपको संगठन नहीं कह सकता। अतः संगठन हेतु कम से कम दो व्यक्तियों का होना अति आवश्यक है। अधिकतम संख्या पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

2. निश्चित उद्देश्य का होना-संगठन में निश्चित उद्देश्य का होना अति आवश्यक है, बिना उद्देश्य के व्यक्तियों का समूह, संगठन नहीं हो सकता। जैसे कि किसी स्थान पर एक हजार लोग बिना उद्देश्य के एकत्र हैं तब वह संगठन न होकर मात्र भीड़ (Crowd) होगी।

3. लक्ष्य का पूर्व निर्धारित होना- संगठन के लिये यह आवश्यक है कि लक्ष्य या उद्देश्य पूर्व निर्धारित हो, लक्ष्य की प्राप्ति के लिये ही संगठन बनाया जाता है। अत: संगठन के पूर्व लक्ष्य (Targets) निर्धारित होना चाहिये।

4. व्यक्तियों का समूह होना-पशु-पक्षी या अन्य प्राणियों का समूह संगठन नहीं हो सकता। संगठन केवल व्यक्तियों का ही हो सकता है। यद्यपि फर्म या कम्पनियों के भी विधान द्वारा व्यक्ति (Person) कहा गया है, किन्तु ये सब कृत्रिम (Artificial) व्यक्ति हैं इसलिये 4 या 14 कम्पनियों का एक साथ कार्य करने को समूह (Group) कहेंगे संगठन नहीं।

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प्रश्न 31.
संगठन के किन्हीं चार सिद्धांतों को संक्षिप्त रूप में समझाइए।
उत्तर:
संगठन के सिद्धांत (Principles of Organization)

1.सोपानिक सिद्धांत (Principle of scalar chain)- कौन व्यक्ति किस प्रबंधक की अधीनस्थता में काम करेगा और किससे आदेश लेगा इस बात का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति इस आदेश श्रृंखला का उल्लंघन न करे।

2.अपवाद का सिद्धांत (Principle of exception)- प्रत्येक अधीनस्थ को इतने अधिकार दिये जायें कि वह दैनिक कार्यों को स्वयं निपटा सके। केवल असाधारण मामले ही अधीक्षक के पास आने चाहिए। इस प्रकार प्रबंधक का समय अधिक महत्वपूर्ण मामलों के लिए सुरक्षित रहता है।

3. लोच का सिद्धांत (Principle of flexibility)- संगठन में पर्याप्त लोच होनी चाहिए ताकि इसमें परिस्थितियों व समय के अनुसार आसानी से परिवर्तन किये जा सकें।

4. अधिकार एवं दायित्व (Rights and responsibility)- संगठन के प्रत्येक सदस्य को उसके अधिकार व दायित्व साथ-साथ दिये जाने चाहिए। अधिकार व दायित्व में तालमेल के बिना कोई भी व्यक्ति कुशलतापूर्वक कार्य नहीं कर पायेगा। अधीनस्थों को पर्याप्त अधिकार सौंपे जाने चाहिए।

प्रश्न 32.
रेखा एवं रेखा तथा कर्मचारी संगठन में अंतर लिखिए।
उत्तर:
रेखा एवं रेखा तथा कर्मचारी संगठन में अन्तर
(Difference between Line and Line and Staff Organization)
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 5 संगठन - 5

प्रश्न 33.
अधिकार, उत्तरदायित्व तथा उत्तरदेयता/जवाबदेही में तुलना करें।
अथवा
अधिकार प्रत्यायोजन के तत्वों में तुलना करें।
उत्तर:
अधिकार, उत्तरदायित्व एवं उत्तरदेयता में अंतर
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 5 संगठन - 2

MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्द

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MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्द

पारिभाषिक शब्द का अर्थ और स्वरूप
उपयोगिता और महत्त्व

भाषा के अनेक पक्ष होते हैं। उनमें एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है : पारिभाषिक और तकनीकी शब्द। विभिन्न विज्ञानों और शास्त्रों में प्रयुक्त होने वाले पारिभाषिक शब्दों का विशेष महत्त्व है। इसके . प्रयोग से विषय – विशेष के संदर्भ में भाषा व्यवहार की प्रयोजनपरकता बढ़ती है। विषय का विशिष्ट ज्ञान उभरता है, किंतु पारिभाषिक शब्द ऐसा तकनीकी विषय है जो स्वयं में कई आयाम लिए हुए

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मानव अपने भावों या विचारों को अथवा संकल्पनाओं को भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है। वह समाज में रहते हुए भाषा सीखता है, समाज में उसका प्रयोग करता है। भाषा सार्थक शब्दों की समूह होती है और इसका कार्य अर्थ की प्रतीति कराना होता है। यह अर्थ बोध भाषा को जानने वालों को होता है। शब्द जहाँ सांकेतिक अर्थ का बोध कराके वाच्यार्थ को व्यक्त करते हैं वहीं लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ के रूप में इससे भिन्न अर्थ का भी बोध कराते हैं। वह अलग – अलग संदर्भो में लक्ष्यार्थ की प्रतीति भी करा सकता है और व्यंग्यार्थ की भी, किंतु मूलतः वह वाचक होता है। इसलिए शब्द में अर्थ बोध कराने की शक्ति होती है। यह भाषा की महत्त्वपूर्ण इकाई है। भाषा विशेष में शब्दों की अधिकता उतने ही अधिक अर्थ क्षेत्रों को व्यक्त करने की क्षमता को सिद्ध करती है।

पारिभाषिक शब्द की व्युत्पत्ति व परिभाषा

साहित्य जगत् – चाहे वह ज्ञानात्मक साहित्य से संबंधित हो अथवा आनंद के साहित्य से – शब्दों के संदर्भ में प्रयुक्त होने वाला पारिभाषिक शब्द अंग्रेजी के Technical Terms शब्द के समान व्यहार में लाया जाता है। पारिभाषिक शब्द एक विश्लेषण है जिसकी रचना परिभाषा शब्द में इक प्रत्यय से हुई है। इस तरह परिभाषिक का अर्थ है परिभाषा संबंधी अर्थात् जिसकी परिभाषा की जा सके अथवा जिसकी परिभाषा देने की आवश्यकता हो। जहाँ तक परिभाषा – शब्द का संबंध है तो इसकी व्युत्पत्ति भाष् धातु में परि उपसर्ग जोड़कर हुई है। भाष धातु कथन का और परि उपसर्ग विशिष्टता (अथवा विशेष अथ) का द्योतक है। इस प्रकार परिभाषा विशिष्ट ” भाष् अर्थात् . किसी पद, शब्द, या कथन की पहचान के स्पष्टीकरण से संबंधित है। इस विशिष्ट कथन का संबंध किसी भी विषय, वस्तु, अर्थ, क्षेत्र अथवा संदर्भ हो सकता है। इस प्रकार पारिभाषिक शब्द विशिष्ट विचारों को व्यक्त करने वाले विशिष्ट शब्द हैं। परिभाषा या विशिष्ट संदर्भ से जुड़े पारिभाषिक शब्दों (अथवा पारिभाषिक शब्दावली) का प्रयोग किसी परिभाषा युक्त कथन के सूत्र में किया जाता है। साथ ही, ये शब्द किसी भी भाषा की विभिन्न प्रयुक्तियों अथवा प्रयोजनमूलक रूपों में विशिष्ट अवधारणाओं के अभिव्यंजक होते हैं और स्वयं में तत्संबंधी व्याख्या समाहित किए हुए होते हैं।

पारिभाषिक शब्दों के अर्थ तत्त्व के बोध के लिए तत्संबंधी परिभाषा अथवा व्याख्या पर समुचित ध्यान दिया जाना अपेक्षित है। रैंडम हाउस ने पारिभाषिक शब्द की परिभाषा इस प्रकार दी है : ‘A word of phrase used in definite or precise sense in some particular subject as a science or art a technical impression (more fully term of art) विशिष्ट विषय जैसे विज्ञान अथवा कला विषय की तकनीकी अभिव्यक्ति के लिए निश्चित अथवा विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त एक शब्द अधिकांशतः कला का शब्द।।

डॉ. रघुवीर ने पारिभाषिक शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया है, “ पारिभाषिक शब्द किसको कहते हैं? जिसकी परिभाषा की गई हो। पारिभाषिक शब्द का अर्थ है : जिसकी सीमा बांध दी गई हो। जिन शब्दों की सीमा बांध दी जाती है वे पारिभाषिक शब्द हो जाते हैं।”

पाठ्यक्रम में निर्धारित पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्द में पारिभाषिक शब्द की परिभाषा इस प्रकार दी है : जो शब्द विभिन्न शास्त्रों और विज्ञानों में ही प्रयुक्त होते हैं तथा संबद्ध शास्त्र या विज्ञान के प्रसंग में जिनकी परिभाषा दी जा सके, पारिभाषिक शब्द कहलाते हैं।

पारिभाषिक शब्दों के प्रकार

भाषा व्यवहार में देखा जाता है कि प्रयोग के आधार पर शब्द के तीन भेद होते हैं : सामान्य शब्द, अर्द्ध पारिभाषिक शब्द और पारिभाषिक शब्द। इसके विपरीत कुछ भाषाविज्ञानी पारिभाषिक शब्दों के दो ही प्रकार मानते हैं।

1. सामान्य शब्द : सामान्य शब्द वे होते हैं जिन शब्दों में कोई तकनीकी पक्ष समाहित नहीं होता। इनके विषय में कुछ भी स्पष्ट कहने की आवश्यकता नहीं होती। जैसे मीठा, कलम, ठोस
आदि।

2. अर्द्ध पारिभाषिक शब्द वे कहलाते हैं जो सामान्य और पारिभाषिक शब्दों के बीच के शब्द होते हैं। अभिप्राय यह है कि ये शब्द अर्द्ध पारिभाषिक शब्द और सामान्य पारिभाषिक शब्दों के रूप में प्रयुक्त होने वाले होते हैं। इनका प्रयोग सामान्य जीवन व्यवहार में तो होता ही है साथ ही किसी भी विशिष्ट ज्ञान के संदर्भ में भी होता है। इन शब्दों की विशेषता यह होती है कि इनका पारिभाषिक अर्थ व्याख्या, लोक प्रयोग, अर्थ विस्तार, अर्थादेश, अर्थ संकोच से सिद्ध होता है। लोक व्यवहार और शास्त्र/विज्ञान विशेष में प्रयुक्त होने के स्तर पर इन शब्दों के रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता। ये केवल नया अर्थ लिए होते हैं

जैसे – आवेश, भिन्न, रस, संधि, पुष्प, हस्ताक्षर आदि। पाठ्यक्रम लेखक ने अर्द्ध पारिभाषिक शब्द के संबंध में यह कहा है, “ऐसे शब्द हैं जो कभी तो पारिभाषिक शब्द के रूप में प्रयुक्त होते हैं और कभी सामान्य रूप में। ऐसे शब्दों को अर्द्ध प्रामाणिक शब्द कहा जाता है। जैसे व्याकरण में क्रिया पारिभाषिक शब्द है। किंतु अन्यत्र इसका सामान्य अर्थ में प्रयोग किया जाता है।” इसी प्रकार अलंकार काव्यशास्त्र में पारिभाषिक शब्द है किंतु सामान्य अर्थ में यह आभूषण के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

3. पारिभाषिक शब्द या पूर्ण पारिभाषिक शब्द : पारिभाषिक या पूर्ण पारिभाषिक शब्द वे कहलाते हैं जो ज्ञान व आनंद के साहित्य में टेक्नीकल टर्म के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। इन्हें पूर्ण पारिभाषिक शब्द भी कहा जाता है। पाठ्यक्रम लेखक ने पारिभाषिक शब्द को पूर्ण पारिभाषिक शब्द कहा है और इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है : “ऐसे शब्द जो पूर्णतः परिभाषा देते हैं। इनका प्रयोग सामान्य अर्थ में नहीं होता। जैसे काव्यशास्त्र में ‘रस निष्पत्ति’ शब्द पूर्णतः पारिभाषिक शब्द है। इसका अर्थ है हृदय में स्थित भाव, रस के रूप में अनुभूत होते हैं।’ इसका सामान्य अर्थ में प्रयोग नहीं होता। इसी प्रकार भाषाविज्ञान का स्वनिम विशेष अर्थ देता है सामान्य अर्थ नहीं। चिकित्सा के राज्यक्ष्मा और शल्य क्रिया, न्यायालय के पेशी और जमानत, वाण्ज्यि के धारक और प्रीमियम शब्द विशेष अर्थ के बोधक हैं।

पारिभाषिक शब्द की विशेषताएँ
(क) पारिभाषिक शब्द का अर्थ सुनिश्चित होता है। जैसे संसद, विधानसभा, मानदेय आदि।
(ख) एक विषय या सिद्धांत में पारिभाषिक शब्द का एक ही अर्थ होता है जैसेः समाजवाद, बहीखाता, द्विआंकन प्रणाली।
(ग) पारिभाषिक शब्द सीमित आकार में होता है जैसे – स्वन, अभिभावक।
(घ) पारिभाषिक शब्द मूल या रूढ़ होता है, व्याख्यात्मक नहीं होता जैसे – दूरदर्शन, निवेशक, श्रमजीवी।
(ङ) पारिभाषिक शब्द मूल या रूढ़ होता है। यह व्याख्यात्मक नहीं होता। जैसे – विधान। इससे अनेक शब्द निर्मित किए जा सकते हैं: जैसे – विधान परिषद्, विधान सभा आदि।

पारिभाषिक शब्द निर्माण पद्धति या प्रणाली :
पारिभाषिक शब्दों का निर्माण कई प्रकार से किया जाता है।
1. उपसर्ग से पारिभाषिक शब्दों का निर्माण : इस तरह के शब्द तद्भव, तत्स आगत शब्दों में उपसर्ग जोड़कर बनाए जाते हैं :

  • अधि + कार – अधिकार
  • अति + क्रमण – अतिक्रमण
  • उप + मंत्रालय – उपमंत्रालय
  • सं + चार – संचार
  • बा + कायदा – बाकायदा
  • ना + लायक – नालायक
  • रि + साइकिल – रिसाइकिल
  • रि + ‘माइण्ड – रिमाइण्ड

2. प्रत्यय द्वारा पारिभाषिक शब्दों का निर्माण :
तत्सम तद्भव, विदेशी/ आगत शब्दों में प्रत्यय जोड़कर पारिभाषिक शब्द बनाए जाते हैं :

  • इतिहास + इक – ऐतिहासिक
  • रूप + इम – रूपिम।
  • दुकान + दार – दुकानदार
  • दम + दार – दमदार।
  • चलन + इया – चलनिया
  • फिर + औती – फिरौती
  • कलेक् + शन – कलेक्शन
  • एक्जामिन + एशन – एक्जामिनेशन

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3. समास से पारिभाषिक शब्दों का निर्माण :
तद्भव, तत्सम और विदेशी/आगत शब्दों के सामासिक प्रयोगों से पारिभाषिक शब्द बनाए जाते हैं :

  • तत्सम + तत्सम : ग्राम पंचायत, आकाशवाणी
  • तत्सम + तद्भव : जलपरी, रक्षा + चौंकी।
  • तत्सम + विदेशी : सहकारी + बैंक।
  • तद्भव + तद्भव : हाथ + घड़ा।
  • तद्भव + विदेशी : किताब + घर।
  • देशज + तद्भव : जच्चा + घर
  • विदेशी + विदेशी : ग्रीन + हॉल।

संधि से पारिभाषिक शब्दों का निर्माण : संधि प्रक्रिया से भी पारिभाषिक शब्दों का निर्माण किया जाता है :

  • अभि + आवेदन : अभ्यावेदन
  • जिला + अधिकारी : जिलाधिकारी
  • कुल + अधिपति : कुलाधिपति

विदेशी भाषा से यथावत ग्रहीत शब्द : पारिभाषिक शब्दों के निर्माण के लिए विदेशी या आगत शब्दों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाता है।
बुलेटिन, बजट, रबर, ग्लूकोज, होमियोग्लोबिन, टेंप्रेचर।
अनुकूलन द्वारा पारिभाषिक शब्द निर्माण : विदेशी या आगत शब्दों में कुछ बदलाव लाकर हिंदी शैली में शब्दों को ढाल लिया जाता है।

  • ट्रेजेडी – त्रासदी
  • एकेडेमी – अकादमी

कुछ ऐसे शब्द भी हैं जो विशेष अर्थ में प्रयुक्त नहीं होते। उन्हें अपरिभाषिक या सामान्य शब्दों की श्रेणी में रखा जाता है जैसे पहाड़ियाँ, तलैया।

पारिभाषिक शब्द बनाने के लिए भारत सरकार के वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग की ओर से प्रकाशित पारिभाषिक शब्दकोश से ही पारिभाषिक शब्दों का निर्माण करना चाहिए। पारिभाषिक शब्दों के निर्माण में जिस भाषा में जो भी शब्द उपलब्ध है उसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना चाहिए।

तकनीकी शब्दावली पारिभाषिक शब्द के लिए तकनीकी शब्द भी : पारिभाषिक शब्द के पर्याय के रूप में तकनीकी शब्द का प्रयोग किया जाता है। जैसे तकनीक शब्द Technical’ ध्वनि – साम्य के आधार पर निर्मित पर्याय है। अंग्रेजी का Technical’ शब्द भी Technique’ शब्द से बना है। यह मूल अंग्रेजी शब्द ग्रीक भाषा के Technician ‘से व्यत्पन्न है, जिसका अर्थ है कला या शिल्प का और इक का अर्थ है, इसका। (इससे संबद्ध) इस प्रकार ‘टेक्नी’ शब्द का अभिप्राय हुआ कला अथवा शिल्प का अथवा इससे संबद्ध। ग्रीक में टेक्टोन ‘Tectonic’ का अर्थ है बढ़ई अथवा निर्माता (Builder)। लेटिन में टैक्सीयर Tex ere’ को बुनना अथवा बनाने या . निर्माण करने के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। इस तरह यह ग्रीक शब्द किसी चीज़ को बनाने अथवा तैयार करने के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। इस तरह या ग्रीक शब्द किसी चीज को बनाने अथवा तैयार करने की कला या शिल्प है। अंग्रेजी के Technique’ शब्द में भी यही अर्थ उजागर होता है। फादर कामिल बुल्के ने इंगलिश हिंदी डिक्शनरी के अनुसार ‘Technical’ शब्द का शाब्दिक अभिप्राय बताया है, ‘of a particular art, science, craft or about art.’ अर्थात् विशेष कला का अथवा विज्ञान का अथवा कला के बारे में’। स्पष्ट है कि ‘Technical’ तकनीकी शब्द बनाने, तैयार करने के अर्थ को वहन करता है। इससे इस अर्थ को शब्द के Terms’ के साथ प्रयोग करने पर अर्थात् Technical Terms’ तकनीकी शब्द लिखने पर इसमें तात्पर्य निहित हो जाता है कि यह मानव द्वारा निर्मित अथवा अभिकल्पित अथवा अन्वेषित भाव विचार अथवा वस्तु को उजागर करने वाला शब्द है।

पाठ्यक्रम में निर्धारित तकनीकी शब्द की परिभाषा इस प्रकार दी गई है: तकनीकी वह शब्द है जो किसी निर्मित अथवा खोजी गई वस्तु अथवा विचार को व्यक्त करता हो। कोश ग्रंथों के अनुसार तकनीक शब्द किसी ज्ञान विज्ञान के विशेष क्षेत्र में एक विशिष्ट तथा निश्चित अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है।

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वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली का संबंध अधिकांश रूप से अंग्रेजी और अंतरराष्ट्रीय शब्दावली से है। सन् 1961 में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली की स्थापना की गई। तब जाकर तकनीकी शब्दावली का विकास हुआ।

पारिभाषिक और तकनीकी शब्दावली में अंतर

पारिभाषिक व तकनीकी शब्दावली में सूक्ष्म अन्तर है। पारिभाषिक शब्द साहित्यिक और गैर – साहित्यिक विज्ञान आदि दोनों विषयों में हो सकते हैं पर तकनीकी शब्द से केवल तकनीकी टेक्निकल सब्जेक्ट के होते हैं। जैसे रस, गुण, अलंकार आदि साहित्यिक शब्द हैं जबकि राडार, नाइट्रोजन आदि तकनीकी विषयों के पारिभाषिक शब्द हैं।

भारत शासन के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने विभिन्न विषयों को लगभग बीस शब्दावलियाँ प्रकाशित की हैं। इन्हीं शब्दावलियों से निम्नलिखित पारिभाषिक/ तकनीकी शब्दों का चयन किया गया है –
MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्द img-1
MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्द img-2

MP Board Class 12th General Hindi Important Questions with Answers

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MP Board Class 12th Samanya Hindi Important Questions with Answers

  1. Chapter 1 सूर के बालकृष्ण Important Questions
  2. Chapter 2 नर से नारायण Important Questions
  3. Chapter 3 ठेस Important Questions
  4. Chapter 4 रहिमन विलास Important Questions
  5. Chapter 5 दूध का मूल्य Important Questions
  6. Chapter 6 शौर्य गाथा Important Questions
  7. Chapter 7 बल-बहादुरी Important Questions
  8. Chapter 8 बीमार का इलाज Important Questions
  9. Chapter 9 जागो फिर एक बार Important Questions
  10. Chapter 10 निष्ठामूर्ति कस्तूरबा Important Questions
  11. Chapter 11 मेरे सपनों का भारत Important Questions
  12. Chapter 12 हिमालय और हम Important Questions
  13. Chapter 13 तीन बच्चे Important Questions
  14. Chapter 14 पत्र जो इतिहास बन गए Important Questions
  15. Chapter 15 यशोधरा की व्यथा Important Questions
  16. Chapter 16 दक्षिण भारत की एक झलक Important Questions
  17. Chapter 17 हंसिनी की भविष्यवाणी Important Questions
  18. Chapter 18 माँ Important Questions
  19. Chapter 19 पुस्तक Important Questions
  20. Chapter 20 ‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’ Important Questions
  21. Chapter 21 मन की एकाग्रता Important Questions
  22. निबंध साहित्य का इतिहास Important Questions
  23. व्याकरण Important Questions
  24. अपठित बोध Important Questions
  25. पत्र लेखन Important Questions
  26. निबंध लेखन Important Questions

MP Board Class 12th Samanya Hindi Syllabus and Marking Scheme

Latest Syllabus and Marks Distribution Samanya Hindi Class XII for the academic year 2020 – 2021 Year Examination.

सामान्य हिन्दी : कक्षा 12
समय : 3 घण्टे
पूर्णांक : 100

1. पद्य खण्ड (25 अंक)
पद्य पाठों पर आधारित किसी एक पद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या, सौन्दर्य बोध पर तीन प्रश्न, कविता की विषय-वस्तु पर आधारित तीन प्रश्न।

2. गद्य खण्ड (25 अंक)
गद्य पाठों पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी तीन प्रश्न, गद्य पाठों की विषय-वस्तु पर आधारित चार बोधात्मक प्रश्न।

3. हिन्दी साहित्य का इतिहास (5 अंक)
निबंध साहित्य के इतिहास पर दो प्रश्न (परिभाषा, भेद एवं विकास)।

4. व्याकरण (20 अंक)
भाषा बोध-समास विग्रह तथा समास के भेद पर एक प्रश्न, संक्षिप्तिकरण पर एक प्रश्न। अनेकार्थी शब्द पर एक प्रश्न, भिन्नार्थक समोच्चारित शब्द पर एक प्रश्न, पारिभाषिक, तकनीकी शब्दों के प्रयोग पर एक प्रश्न, वाक्य भेद (रचना, अर्थ के आधार पर) वाक्य रूपान्तरण पर एक प्रश्न, वाक्यगत अशुद्धि संशोधन पर एक प्रश्न, लोकोक्तियाँ मुहावरे पर एक प्रश्न, भाव पल्लवन/भाव विस्तार पर एक प्रश्न, शब्द युग्म पर एक प्रश्न।

5. अपठित बोध (10 अंक)

  • गद्यांश – शीर्षक, सारांश एवं प्रश्न।
  • पद्यांश – शीर्षक, सारांश एवं प्रश्न।

6. पत्र लेखन एवं प्रपत्र पूर्ति (5 अंक)

  • पत्र – व्यावसायिक पत्र एवं सम्पादक के नाम पत्र।
  • प्रपत्र – (प्रयोजन मूलक) – बैंक, डाकखाने, तार तथा रेलवे आरक्षण आदि के प्रपत्र भरना।

7. निबन्ध लेखन (10 अंक)
विचारात्मक, वर्णनात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक एवं सम-सामयिक समस्याओं पर निबंध लेखन पर एक प्रश्न।

प्रायोजना कार्य

  • क्षेत्रीय बोली-पहेलियाँ, चुटकुले, लोकगीत, लोक कथाओं का परिचय तथा खड़ी बोली में उनका अनुवाद।
  • दूरदर्शन/आकाशवाणी के कार्यक्रम पर प्रतिक्रियाएँ विश्लेषण।
  • हिन्दी साहित्य का स्वतंत्र पठन/टिप्पणी एवं प्रेरणाएँ।
  • हस्त लिखित पत्रिका तैयार करना।
  • म.प्र. से प्रकाशित होने वाली हिन्दी भाषा की पत्र पत्रिकाओं की जानकारी।

टिप्पणी
प्रायोजना कार्य से सम्बन्धित विषय-वस्तु पर (अंक आबंटित न होने के कारण) परीक्षा में प्रश्न पूछे जाना अपेक्षित नहीं है।

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MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 16 Netaji Subhash Chandra Bose

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MP Board Class 12th English A Voyage Solutions Chapter 16 Netaji Subhash Chandra Bose (Col. G.S. Dhillon)

Netaji Subhash Chandra Bose Textbook Exercises

Word Power

A. Many words in their noun and verb forms remain the same. answer (noun) I could not check your answer, answer (verb) Please answer the question in short.
Now use the following words as noun and verb in meaningful sentences: care, honour, question, respect, wonder, praise, offer, hope.
Answer:

  • care [N]—Take care of your health.
    care [V]—Care your child properly.
  • Honour [N]—We feel honour for our nation.
    Honour [V]—Honour your elders properly.
  • Question [N]—This question is out of course.
    Question [V]—The interviewer questioned me typically.
  • Respect [N]—You should pay respect to your teacher.
    Respect [V]—Respect the views of your friends also.
  • Wonder [N]—It is no wonder, he won the race.
    Wonder [V]—I wonder at his success.
  • Praise [N]—He sent me a letter of praise at my result.
    Praise [V]—You should praise the child’s talent.
  • Offer [N]—I have an offer of a good job abroad.
    Offer [V]—He offered me a help.
  • Hope [N]—There is no hope of his survival.
    Hope [V]—I hope, I shall get a good position.

B. Many words are almost similar in pronunciation, but different in meaning or spelling. They are called homophones.
main—(chief): The main clause in the sentence is in the past.
mane—(long hair on the neck of a horse or lion): Mane is a lion’s pride.
Given below are some homophones. The first word in each pair is from the text. Give their meanings and use them in meaningful sentences:
soul, sole; die, dye; course, Coarse; quite, quiet; mail, male; break, brake.
Answer:

  • Soul—(spirit)—Our soul is immortal.
    Sole—(only)—He is the sole owner of this property.
  • Die—(to become lifeless)—He died of cancer.
    Dye—(to colour artificially)—Don’t dye your hair.
  • Course—(syllabus)—This book is not prescribed in course.
    Coarse—(rough)—Mother Teresa used to wear coarse handloom sari.
  • Quite—(up to an extent)—I feel quite nervous at this news.
    Quiet—(peaceful)—Keep quiet in the class.
  • Mail—(postal)—It is a mail coach.
    Male—(muscular)—I have bought a male elephant.
  • Break—(to be in piece)—Break this bundle of sticks.
    Brake—(a stopping device)—The brake of this car is loose.

C. Find the words in the text for the following expressions:

(a) A person in political party having conservative outlook or leaning.
(b) A person who is in favour of bringing a great and generally, violent change.
(c) A person who has had much or long experience, especially as an army man6;
(d) occurring or coming every year.
(e) A statement that orders someone to do something and threatens to punish or attack them if they do not.
(f) Use of a trick or device in the war to deceive the enemy.
Answer:
(a) rightist
(b) revolutionary
(c) seasoned
(d) annual
(e) command
(f) stratagem

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Comprehension

A. Choose the correct alternative:

Question 1.
In the lesson the word ‘East’ has been used for Japan. What is the word used for England and other European countries:
(a) The South
(b) The North-West
(c) The West
(d) The South-East
Answer:
(c) The West

Question 2.
In the sentence “The Old revolutionary quietly replied” the word ‘Old revolutionary’ is used for:
(a) Ne.taji Subhas Chandra Bose
(b) Col. G.S. Dhillon
(c) Prime Minister Tojo
(d) Rash Behari Bose.
Answer:
(d) Rash Behari Bose.

Question 3.
When General Tojo was the Prime Minister of Japan?
(a) During World War I
(b) When the writer visited Japan in 1974
(c) After World War II
(d) Before World War II.
Answer:
(b) When the writer visited Japan in 1974

Question 4.
‘Netaji practised what he preached’ means:
(a) There was perfect co-ordination and uniformity in his words and actions.
(b) First he preached and then he practised.
(c) He was a man of practice and not a preacher.
(d) What he practised, he used to preach.
Answer:
(a) There was perfect co-ordination and uniformity in his words and actions.

Question 5.
In the sentence “The enemy officers used to mock at the statement”, who are referred ‘ to’as “enemy officers”?
(a) The British officers
(b) The Japanese officers
(c) The Burmese officers
(d) The enemy officers in the INA.
Answer:
(a) The British officers

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B. Answer the following questions in one sentence each:

Question 1.
Why did Netaji cross the seas and go to a foreign land? .
Answer:
Netaji crossed the sea and went to a foreign land to find a solution for India’s foreign rule.

Question 2.
When Netaji went to Japan, Indians were subject people. How are we today?
Answer:
Today, we are free arid sovereign people.

Question 3.
Who was second-in-command of the Japanese Imperial Army General Staff?
Answer:
General Seizo Arisue was second-in-command of the Japanese Imperial Army General Staff.

Question 4.
What did Netaji do before dealing with a situation?
Answer:
Before dealing with a situation, Netaji used to read well and do his horriework to observe and understand the task well.

Question 5.
How did Netaji improve his ment by punishing or by counselling them?
(M.P. Board 2015)
Answer:
Netaji improved his men by counselling them both individually and collectively.

Question 6.
What was Netaji’s proposal during the annual session of the Indian National Congress?
Answer:
Netaji proposed that the congress should at once send an ultimatum to the British government demanding independence within six months or prepare immediately for a national struggle.

Question 7.
What did the British rulers think Indian people would do if the I.N.A. Trials were held?
Answer:
The British rulers thought that the Indian people specially the soldiers would appreciate the British action against the INA office. .

Question 8.
What was guaranteed to the people in the proclamation of the Provisional Government of Azad Hind?
Answer:
It guaranteed religious liberty as well as equal rights and equal opportunities to all its citizens.

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C. Answer the following questions in about 60 words each:

Question 1.
What did GeneralSeizo Arisue inform Rash Bihari Bose and what was Rash Bihari’s reaction? (M.P. Board 2016)
Answer:
During the INA crisis, once Rash Bihari Bose was invited by General Seizo Arisue who was second-in-command of the Japanese Imperial Army General Staff. Seizo invited him in order to know his mind about Netaji’s coming. He asked Mr. Bose discreetly, if Netaji was desirous of coming there and he wondered how Mr. Bose would treat Netaji. Rash Bihari Bose, the old revolutionary quietly replied that Netaji was a born leader and he (Bose) would of course, be quite pleased to ask him (Netaji) to take over from him.

Question 2.
Narrate the author’s meeting and conversation with General Fujiwara during his Japan visit in 1947.
Answer:
The author narrates his meeting and conversation with General Fujiwara during his visit
to Japan in the autumn of 1974. They were passing along General Tojo’s house, reminiscing of the war days. The author asked the General about Prime Minister Tojo’s opinion about Netaji. Fujiwara replied that general Tojo was very much impressed with Netaji. He even said, “If there exists a man of the century, he is one whom I met today.” Fujiwara believed that if Netaji had arrived in the East a year earlier, they would have won the war.

Question 3.
How did Netaji give expression to his compassion for his men? Give one example.
Answer:
Netaji was a highly caring leader. He cared not only for the honour, welfare and comfort of his soldiers but also respected their feelings. He had a compassionate nature. His soldiers were overwhelmed with his concerns for them. Some of the examples of his compassionate behaviour were like sending a pair of boots to a sepoy with instructions to Regimental Commander to see personally that it fitted the man and report back to Netaji, helping his own staff officers to wash hands by pouring water and offering his own towel to scrub hands. There are many other examples.

Question 4.
How can you say that Netaji had a gift of judging the character of his men?
Answer:
Netaji was extraordinarily a rare leader. His men felt happy, proud and lucky to do and die under his command. He had a gift of judging the character of the man which served him to put the right man at the right place at the right time and on the right job. He picked up some of the soldiers from the dust and made heroes out of them.

Question 5.
What was Netaji’s way of dealing with defaulters? (M.P. Board 2010)
Answer:
Netaji had a tremendous power of judging a man’s character. So, he always chose the right man for a right job. He never failed to appreciate when appreciation was due. A good word from him made the soldiers to strive to do their job well. He had a very kind heart. He never punished anybody. He always gave a defaulter an advice, in a way that the defaulter may get a chance to improve himself.

Question 6.
How did Netaji’s love and appreciation bring a change in his men?
Answer:
Netaji was an ideal leader. He took care of all his sub-ordinates with compassion. He appreciated when appreciation was due. He never punished anyone. Instead, he advised them to realise their weakness and improve them. His men were so much impressed with him that they were ready to do anything for him’under his command. His appreciation made them feel proud.

Question 7.
Give an example of Netaji’s power of observation and prediction of some future events in war.
Answer:
Netaji had a remarkable power of observation and could predict on the forthcoming situation eventfully and correctly. In order to highlight this quality, the author gives an example. Once, Netaji wrote a small note to the author on the margin of the routine order. It was scribbled in his own hand. He told the author that as the mail was getting ready to be dispatched, he waited to advise him that instead of expecting the enemy at a particular point, he should watch at a certain other point. He gave 6-figured map reference. The note was written about 5,000 kilometers away from the author but it was accurate.

Question 8.
What was Netaji’s firm faith about the freedom of India and what did the British officers think about that?
Answer:
Netaji was very much confident that India would get freedom. He used to say often, “There is no power on earth that can keep India enslaved. India shall be free and before long.” The enemy officers used to mock at the statement. They thought it just illusory and a face’saving device. Actually, Netaji had a plan which was beyond the comprehension of professional soldiers.

Question 9.
How did the high spirits of the INA bring a change in the minds and actions of the Indian soldiers in the British forces?
Answer:
Netaji always worked with far-sightedness. He kept the INA on the field even in the face of defeat. He wanted his soldiers to pay the price of liberty not only when they were on the advance but also during the retreat while going away from India not to win a territory but to continue fighting against the British forces who were holding India in perpetual bondage. These forces consisted of a greater number of the Indian soldiers who paused and pondered as to why the INA with their poor strength and poorer equipment, yet higher spirit were fighting against the British. It created a psychological revolution. The war ended and with it ended the slavish mentality of the Indian soldiers. Such was the vision and plan of action of Netaji.

Question 10.
The author says that “Netaji had a compassionate nature”. Prove the truth of the statement by giving some examples from the lesson.
Answer:
Netaji was a highly caring leader. He cared not only for the honour, welfare and comfort of his soldiers but also respected their feelings. He had a compassionate nature. His soldiers were overwhelmed with his concerns for them. Some of the examples of his compassionate behaviour were like sending a pair of boots to a sepoy with instructions to Regimental Commander to see personally that it fitted the man and report back to Netaji, helping his own staff officers to wash hands by pouring water and offering his own towel to scrub hands. There are many other examples.

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D. Answer the following questions in about 75-100 words each:

(i) How did Netaji act in the following situations and with what result?
(a) When he had to meet somebody.
(b) In making the best use of the abilities of his men.
Answer:
Netaji was a seasoned man. He was polite, courteous and well behaved. He had the capacity to manage every situation in his favour. He had the tremendous power to judge a man. Before dealing with anyone or any situation, he used to read and do homework about that situation. He was always careful about the man to whom he had to meet. He took care of the honour and position of the man.

He had a compassionate nature. He always respected other’s feelings. He had a gift of judging the character of a man which served him to put the right man at the right place, at the right time and on the right track. He never failed to appreciate when appreciation was due.

Question 2.
Narrate the episode which surprised the author at the accuracy of Netaji’s power of judgement regarding an eventuality.
Answer:
Netaji had a tremendous power of judgement regarding an eventuality. He could observe and predict accurately. Once the author was surprised when Nejtaji wrote a small note on – the margin of a routine order. He had advised him that instead of expecting the enemy at the particular point, he should also watch at certain other point. He gave 6 figured map reference. The note was written in Rangoon about 5,000 kilometers away from the author. When the author received Netaji’s note, he was surprised at the accuracy of Netaji’s judgement. The author was already facing the enemy where Netaji had pointed out to watch. This was a measure of Netaji’s skill at generalship.

Question 3.
Write a short note on Netaji’s military foresight.
Answer:
Netaji’s power of observation was remarkable. He had a tremendous military foresight. He was always accurate in his predictions or guess. There are many incidents that the author talks about here in order to prove his military foresight. One such incident was that Netaji during the annual session of the Indian National Congress at Tripuri in Jabalpur in 1939 made a proposal to send an ultimatum to the British government, demanding independence within six months or they would prepare immediately for a national struggle. His proposal, though opposed, was based on his appreciation of the European situation which was something beyond the understanding of the political leaders but the prediction turned to be correct. The war did break out within 6 months on 3rd September, 1939.

Question 4.
How did the Indian people and the Indian soldiers in British army react when the INA Trials of the three great INA heroes began?
Answer:
The INA trial of the three military officers in India was a memorable event which brought about many changes in the Indian mass and the soldiers. When the British started this trial at the Red Fort, they thought that the Indian people especially the soldiers would appreciate the British action against the INA officers. However, just the reverse happened.

As soon as the first INA trial of the three front-line commanders started on 5th November, 1945, within a week disturbances broke out in Lahore followed by that in Lucknow and then Kolkata where hundreds of demonstrators were injured and twenty killed in police firing. Even after the first trial in which the three accused officers were released by the commander-in-chief, the public demand to stop the future INA trials continued. It gave rise to anti-British sentiments culminating in the mutiny in various regiments all over India. The days of the British Raj in India were close to their end.

Question 5.
Write a note on the secular character of Netaji and his Provisional Government of Azad Hind.
Answer:
Netaji was a man of great qualities. He was a great humanist, a seasoned commander, a compassionate leader, a perfect visionary and a staunch secularist. The author had full confidence that they would get absolute justice from him a. id his government the forerunner of our government today. The complete personality and all embracing ideas are distilled in the last but one para of the Proclamation provisional Government of Azad Hind.

In that Proclamation, Netaji said that the Provisional Government is entitled to and hereby claim the allegiance of every Indian. It guarantees religious liberty as well as equal rights and equal opportunities to all its citizens. It declared its firm resolve to pursue the happiness and prosperity of the whole nation and of all its parts, cherishing all the children of the nation equally and transcending all the differences cunningly fostered by alien government in the past. It was a complete vision of Netaji.

Question 6.
There is a contradiction in the statement “Netaji’s power of generalship.,..turned the defeat of the INA into the defeat of the British Raj”. Prove the truth of the statement on the basis of the text.
Answer:
This statement highlights the far-sightedness and military observation of Netaji. As he had a tremendous power of calculating the future situation, his guess and predictions were always accurate. When he proposed for sending an ultimatum to British government demanding independence within six months he was waging the future events. The war broke out within six months. He had a plan which was beyond the comprehension of professional soldiers.

He kept the INA in the field even in the face of defeat. It created a psychological revolution. The war ended and with it ended the slavish mentality of the Indian army. It gave rise to anti-Raj activity all over India even in the military camps of Bombay, Karachi and Jabalpur. Netaji’s plan of action had transformed the British Indian army into the Indian army. His powers of generalship turned the defeat of the INA into the defeat of the British Raj.

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Question 7.
In what respect can Netaji’s Provisional Government of Azad Hind be called the forerunner of our Government today?
Answer:
Netaji was a great visionary. He had the power of accurate analysis of any situation. In order to find a solution to Indian freedom, he crossed the sea and organised his own army. His approach to Indian freedom was not supported by the rightist leaders in India. It was his quality that the author was first confident about to get absolute justice from him and his government the forerunner of the government today. The Indian Constitution after the freedom accepted the high ideal of equality, justice, secularism which were the vision of Netaji.

Question 8.
Make a general assessment of Netaji as:
(a) a man of brave but kind heart, and
(b) a man of keen insight and foresight.
Answer:
(a) Netaji was a complete man. He practised what he preached. He cared not only for the honour, welfare and comfort of his soldiers but also respected their feelings. He had a compassionate nature. His soldiers were overwhelmed with his concerns individually and collectively, like sending a pair of boots to a sepoy with instructions to Regimental Commander to see personally that it fitted the man and report back to Netaji, helping his own staff officers to wash hands by pouring water and offering his own towel to scrub hands, shedding tears with a lump in his throat on hearing about the difficulties of his soldiers and taking immediate steps to supply relief. He was a rare leader of men in war.

(b) He had power of observation. He was gifted with insight and foresight and whatever he did was accurate in result. He did whatever he could for the freedom of India. By putting INA in war, he proved how a defeating soldier can win a greater victory. The defeat in war of the British Indian Army gave a new identity to the Indian Army. It transformed the whole scene. So, what he did was beyond comprehension of a professional soldier.

Question 9.
Explain the spirit of the last but one para of the Proclamation of the Provisional Government of Azad Hind.
Answer:
Netaji’s complete personality is revealed in the distilled form in the last but one para of the Proclamation of Provisional Government of Azad Hind. In this proclamatory para, he talks about the ideas of his government. A political loyalty is claimed on the part of the government, for it guarantees religious liberty as well as equal rights and equal opportunities to all its citizens. It declares its firm resolve to pursue the happiness and prosperity of the whole nation and of all parts, cherishing all the children of the nation equally and transcending all the differences cunningly fostered by alien government in the past. In short, Netaji wished for a welfare and complete democratic government.

Grammar

Note the use of verbs in bold in the following sentences from the text:
(a) I wonder how you would treat him.
(b) May I know how long will it take me to get into touch with the enemy?
(c) They at least will not forget him as long as they live, but I hope those who will come after them will also gratefully remember this magnificent man.

The verbs wonder, know, forget, hope and remember have a typical character. These verbs cannot be used in continuous tense, even when they are describing the real present. It is because of the fact that they are related to a condition, behaviour or action which is not In speaker’s conscious control. They occur or take place whether the speaker likes it or not. Take a very common example:

I see a man outside. He is looking at me. You see if your eyes are open, but you look at
something when attention is added to the action. Other verbs of this category are: hear, have (=to possess), be (except passive), notice, recognize, smell and taste (when used without an object), believe, feel (that), think (that), know, understand, remember, forget, mean, want, wish, forgive, refuse, love, hate, like, dislike, seem, belong to, consist of, own, possess, etc.

But when such verbs are used with ‘always’ or ‘for ever’ in the sense of ‘all the times, especially at present’ they can be used in present continuous tense: He is always seeing dreams of wonderlands. Exception to such verb is: I am seeing the Minister tomorrow (in the sense of meeting).

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A. Now make the correct use of the verb given in brackets. (Present simple or continuous)

1. I ………….. (think) of moving out of this house.
2. I ………… (know) him very well.
3. They …………. (meet) me tomorrow in the office.
4. He ……………. (always, see) ghosts in the dark.
5. You ……………. (suppose) you shall be spared?
6. I ………………. (just, think) that you might come.
7. I ……………… (see) a bird in the tree, It (sing).
8. I ……………… (think) that now I (know) how to use the verbs of perception.
9. My mother …………….. (always, feel) sick when she sees a dirty place.
10. I …………….. (certainly, forget) your face.
Answers:

  1. am thinking
  2. know
  3. are meeting
  4. always sees
  5. Do—suppose
  6. am just thinking
  7. See – is singing
  8. am thinking -Know
  9. always feels
  10. am certainly forgetting

B. Correct the following sentences:

1. She is refusing to go out in the cold.
2. I am not remembering what you said.
3. This boy is now understanding the present continuous tense.
4. The judge now hears the arguments.
5. When do you see him? On Monday?
6. I see him tomorrow morning.
7. I do not feel well today.
8. I am hearing a noise outside.
9. I am having a lot of books.
10. Don’t disturb him. He thinks deeply.
Answers:

  1. She refuses to go out In the cold/She refuse d to go out In the cold.
  2. I don’t remember what you said.
  3. This boy now understands the present continuous tense.
  4. The judge is now hearing the arguments.
  5. When are you seeing him? On Monday? When will you see him? On Monday?
  6. I will see him tomorrow morning.
  7. I am not feeling well today.
  8. I hear a noise outside.
  9. I have a lot of books.
  10. Don’t disturb him. He is thinking deeply

Read the following sentences from the text and mark the uses of ’it’in them.

  • It was this relationship which kept up our morale.
  • It was scribbled in his own hand.
  • How long will it take me to get into touch with the enemy?

In these sentences. ‘it’has different connotations.

  • In the first sentence, it is use is anticipatory which refers to the following words-
    ‘this relationship’.
  • In the second sentence, ‘it’ is used as a pronoun for the words ‘the note’ in the previous sentence in the text.
  • In the third sentence ‘it’ is used as an introductory ‘It’ to know the length of time.

The following are the ways in which one can use ‘it’ in a sentence:

  • As a pronoun for something lifeless or for animals in general sense:
    e.g.: The cat is a domestic animal. It mews.
  • As a pronoun for a baby where gender is not known:
    e.g.: The baby is sleeping. It has been fed.
  • Anticipatory use of it refers to a phrase or a statement in the sentence:
    e.g.: It is better to go home early.
  • In place of a noun clause in a complex sentence:
    e.g.: It is not known who did it (Who did it is not known).
  • To tell the time by watch and to talk about weather or season. It is 9.30 by my watch.
    e.g.: It is very cold today. It is winter now.
  • To tell a distance or length of time:
    e.g.: It will take 6 hours to reach the destination. It Is 6 miles from here. You should hire a taxi.
  • To emphasize a certain part of a sentence (a word or a phrase)
    e.g.: It was at 9.00 pm that he arrived here.
    e.g.: It was Mohan who did it.
  • In some traditional expressions: It does not matter.
    e.g.: it is all right.
    e.g.: it is of no use.
    Who is there? it is me over here.

A. Now reframe the sentences with anticipatory ‘it’.

(i) That the earth and atmosphere are getting warm is clear to all.
(ii) Who stole the book is not clear.
(iii) That we are losing our morals is a matter bf great concern.
(iv) What is the fate of a man is known to God only.
(v) When they wilt come has not been intimated to us.
Answers:
(i) It is clear to all that the earth and atmosphere are getting warm.
(ii) It is not clear who stole the book.
(iii) It is a matter of great concern that we are losing our morals.
(iv) It is known to God only what is the fate of a man.
(v) It has not been intimated to us when they will come.

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B. Begin the sentences with introductory ‘it’.
(i) To die for the nation is a glorious act.
(ii) To yawn before others,is bad manners.
(iii) To travel in a bullock cart is a pleasure.
(iv) To think and ponder upon is essential.
(y) To err is human.
(vi) To forgive is divine.
Answers:
(i) It is a glorious act to die for the nation.
(ii) It is bad manners to yawn before others.
(iii) It is a pleasure to travel in a bullock cart.
(iv) It s essential to think and ponder.
(v) It is human to err.
(vi) It is divine to forgiver

Speaking Activity

After a careful study of the lesson, you must have reached the conclusion that Netaji was a man of action, During the Independence Movement, he favoured Direct action and told, “You give me blood; I shall give you freedom”.

In this background, arrange the class (as in assembly hail) into two groups on the right, “Ayes” who will support the proposal, and on the left, the “Nays” who will sit in the opposition. The teacher will act as the speaker of the House. He will put forward the proposal for discussion and get it passed. The proposal will be:
“Not words but only deeds can make a nation great and strong”.
After the discussion for an hour, the Speaker will arrange for voting in favour of or against the proposal, On the basis of the majority vote, the proposal he declared passed or rejected.
Answer:
Arrange this discussion class under the guidance of your teacher. In the text, there occurs a sentence, “those who will come after then will also grateful remember this management man .who lived and died so that India could be great”.

During the 1857 War of Indian Independence, Rani Lami Bai of Jhansi was the one who
fought for the Suraj’ (Swarajya) and died fighting for her motherland. Given below are some outlines. On the basis of these, compose a short biographical sketch of the
Rani of Jhansi.

  • born 19th November 1835 at Bithoor near Kanpur; childhood name.Manu,
  • father—Moropant; playmates .Tantya Tope, Nana Saheb
  • married to Gangadhar Rao, the king of Jhansi; A son born, died soon.
  • adopted Damodar Rao, son of a near relative; husband died, 21st Nos’. 1853.
  • proposal to British Governor General to recognize the adopted son as Successor to
    the throne; proposal rejected.
  • Jhansi was attacked by Col. Rose on 23rd March, 1857; fierce battle.
  • Rani said, “I shall not give up my Jhansi.”
  • Fort of Jhansj fell. Reached Gwallor, captured Gwallor fort.
  • died fighting on 18th June 1857

Answer:
Rani Laxmi Bai was born 19th November 1835 at Bithoor near Kanpur. Her childhood name was Manu. She was the daughter of Moropant and her playmates were Tantya
Tope and Nana Saheb. She was married o Gangadhar Rao the king of Jhansi. She gave birth to a son who died soon. Later, they adopted Damodar Rao the son of a relative. Her husband died on 21st November. 1853. Her proposal for recognition of her adopted son as a successor was rejected by the British government. It grew in rivalry with the government and she was attacked by Col. Roce on 23rd March 1857. There was a fierce battle, As, she was commit-ted to Jhansi, she was in no way reluctant to give It up. A part of Jhansi fort fell and she reached Gwalior, which was captured by the government. She died fighting on 18th June. 1857. She was a great warrior and a dedicated freedom fighter.

Think it Over

Had Netaji been amongst us today. how had he been a source of inspiration to you? Think over it and discuss among others.
Answer:
Do It yourself.

Things to Do

A. Netaji Subhash Chandra Bose. Rash Bihari Bose, Mahatma Gandhi. Jawaharlal Nehru and many other great freedom fighters inspired thousands of young men and women to take part in the Indian Independence Movement. You might have some freedom fighters in your locality or adjoining town or city. Divide your class into 4 or 5 groups and organize a week-end programme for holding interviews with them.

Record your impressions on the following points:
(i) What or who inspired them?
(ii) What were the conditions prevailing in the society those days?
(iii) How did they protest against the British Rule?
(iv) What tortures had they to suffer?
(v) What were their feelings when India became free?
(vi) Did their hopes of a free India come true?
Answer:
Do it yourself.

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B. Compose an appeal, to be circulated among your fellow-students and others,for voluntary blood donation, focusing on the following points:

  • It is an act of charity.
  • It saves lives.
  • Thousands of new-born and sick die due to lack of blood.
  • Blood donation does not leave any adverse effect on the body.
  • Facilities for donation are available at of district hospitals.
  • Blood-banks preserve it for emergency requirements.
  • Only healthy blood is accepted.
  • Request all people to he God on Earths.

Answer:

Donate Blood Make The World Live
Participate Generously For Pious Reasons:

  • Act of charity
  • Save lives
  • No adverse effect
  • Facilities every where
  • Only healthy blood accepted
  • Be God on earth

Live And Let Live

Netaji Subhash Chandra Bose by Col. G.S. Dhillon Introduction

It is an excerpt of From My Bones—Memoirs of Col. Gurbaksh Singh Dhillon of the Indian Natio nal Army. This essay records some of the unique qualities of Netaji Subhas Chandra Bose.

Netaji Subhash Chandra Bose Summary in English

It is an excerpt of (From my Bones Memoirs of Col. Gurbaksh Singh Dhillon of the Indian National Army.) This essay records some of the unique qualities of Netaji Subhas Chandra Bose. The writer says that Subhas Chandra Bose will always be remembered for his stamina which led him across the sea in search of the answer for India’s freedom. He was a multi faceted personality. Leaders of his time remembered him for his qualities. Rabindra Nath Tagore called him Deshnayak Leader of the Country.

Netaji practised what he preached. He was always deeply concerned with the honour, welfare and comfort of his soldiers and respected their feelings. He had a compassionate nature. He overwhelmed the soldiers with his concern for them individually and collectively. His soldiers were ready to anything for him. It was this relationship that kept their morale high, in spite of all their difficulties and deficiencies.

Netaji was a seasoned army man. He used to read a lot and do his homework on the subject, he had to deal with. He was gifted with a quality of judging the character of the man which served him, to put the right man at the right place at the right time and on the right job. He never failed to appreciate when appreciation was due. He was so kind-hearted that he never punished anybody. He always gave a chance and advice to a defaulter to improve himself. He had a remarkable power of observation and could predict an eventuality correctly. The author remembers many such incidents.

Netaji had a keen military foresight. Once in March, 1939 during the annual session of the Indian National Congress at Tripuri in Jabalpur, he proposed to send an ultimatum to the British government to free India within six months or they should prepare themselves for national struggle. He was opposed by the right wing but what Netaji predicted came true. He had a belief that no power on earth can keep India enslaved. The army officers used to mock at this belief, which they thought was illusory and a face saving device.

Actually, Netaji had a plan which was beyond the comprehension of professional soldiers. Netaji’s stratagem had transformed the British Indian Army into the Indian Army. The days of the British Raj in India were close to their end. Netaji was a staunch secularist. The author believed that they were sure to get absolute justice through him and his government. He was really a great man.

Netaji Subhash Chandra Bose Summary in Hindi

यह पाठ My Bones-Memoirs of Col. Gurbaksh Singh Dhillon of the Indian National Army का एक अंश है। इसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कुछ गुणों की चर्चा की गई है।

लेखक कहता है कि सुभाष चंद्र बोस हमेशा अपने जुझारूपन के लिए याद किए जाएँगे जो उन्हें भारत की आज़ादी का समाधान ढूँढ़ने के लिए समुद्रपार विदेश की धरती पर ले गया। वे एक बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। उनके समय के नेता लोग उनके गुणों को याद करते थे। रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘देशनायक’-देश का नेता कहा था।

नेताजी वही करते थे जो कहते थे। वे हमेशा अपने सिपाहियों की प्रतिष्ठा, उनके कल्याण और सुविधा के प्रति सजग थे और उनकी भावनाओं का आदर करते थे। उनका स्वभाव सद्भावपूर्ण था। वे सिपाहियों को उनके प्रति अपनी सजगता से व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से भाव-विहल कर देते थे। उनके सिपाही उनके लिए कुछ भी करने को तैयार थे। यही संबंध था जो किसी भी कठिनाई और अभाव के बावजूद उनके मनोबल को ऊँचा रखता था।

नेताजी एक अनभवी सेनानायक थे। वे किसी भी परिस्थिति का पहले गहन अध्ययन करते थे। उनमें किसी भी व्यक्ति को परखने की देवी क्षमता थी जो उन्हें सही व्यक्ति को सही जगह, सही समय और सही काम में लगाने में मदद करती थी। जहाँ प्रशंसा की ज़रूरत होती वहाँ कभी भी प्रशंसा करने में वे चूकते नहीं थे। वे इतने दयालु थे कि कभी भी किसी को उन्होंने दण्ड नहीं दिया। ये हमेशा गलती करने वाले को अबसर और सुधरने की सलाह देते थे। उनमें सूक्ष्म अवलोकन की गजब शक्ति थी और वे किसी भी आकस्मिक घटना का बिल्कुल सही आकलन कर लेते थे। लेखक बहुत-सी ऐसी घटनाओं को याद करता
नेताजी में सूक्ष्म सैन्य दूरदर्शिता थी।

एक बार मार्च, 1999 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के दौरान उन्होंने प्रस्ताव रखा कि अंग्रेज सरकार को चेतावनी भेजी जाए। छहः महीने के अंदर वे तुरंत भारत को आजाद करें अन्यथा उन्हें राष्ट्रीय संघर्ष के लिए तैयार होना चाहिए। कट्टरवादियों द्वारा इसका विरोध किया गया लेकिन नेताजी ने जो कहा वह सच हुआ। उनका विश्वास था कि कोई भी ताकत भारत को गुलाम नहीं रख सकती। अंग्रेज अधिकारी इस बात का मज़ाक उड़ाते थे और उन्हें लगता था यह भ्रामक विचार है और मुँह छिपाने का बहाना है। वास्तव में नेताजी के मन में ऐसी योजना थी जो सामान्य सैनिक के समझ से परे थी। नेताजी की नीतियों ने ब्रिटिश शासन की नींद उड़ा दी। नेताजी कट्टर धर्म-निरपेक्ष थे। लेखक को विश्वास था कि उनके या उनकी सरकार में सभी को पूर्ण न्याय मिलेगा। वे निस्संदेह महान व्यक्ति थे।

Netaji Subhash Chandra Bose Word Meanings

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Netaji Subhash Chandra Bose Important Pronunciations

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Read f he following passages carefully and answer the questions that follow:

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‘The question to all of us is then: Will Subhas be remembered by the generations to come? I.think he will. At least it was for this recompense that his restless soul traversed oceans and foreign lands in search of an answer to India’s freedom. It is too horrible to think that he is no longer amongst us. To his colleagues, he will remain ever alive, ever green and immortal.

He imposed on them his vivid personality so well and they at least will not forget him as long as they live, but I hope those who will come after them will also gratefully remember this magnificent man, born to be a ‘grand signeur’ who lived and died, so that India could be great and so that men and women of our race may not have to be born into this world with the stigma of being a subject people and not free and independent as we are today.’ (Page 115)

Questions:
(i) Which question haunted the author?
(ii) Find the word from the above passage which is similar In meaning to ‘terrible’?
(iii) Give noun form of ‘Imposed’.
(iv) Find a word in the passage which is opposite to ‘ordinary’?
Answers:
(i) The question that haunted the author was that if Netaji would be remembered by
the generations to come.
(ii) ‘Horrible’ has similar meaning to ‘terrible’.
(iii) ‘Imposition’ is the noun form of ‘imposed’.
(iv) ‘Magnificent’ is opposite to ‘ordinary’.

2. Netaji cared not only for the honour, welfare and comfort of his soldiers but also respected their feelings. He had a compassionate nature. He overwhelmed us with his concern for us individually and collectively, like sending a pair of boots to a sepoy with instructions to Regimental Commander to see personally that it fitted the man and report back to Netaji, helping his own staff officers to wash hands by pouring water and offering his own towel to scrub hands, shedding tears with a lump in his throat on hearing about our difficulties and taking immediate steps to supply relief.

Such spontaneous feelings coming out of his heart, made him extraordinarily a rare leader of men in war. His men felt happy, proud and lucky to do and die under his command. It was this relationship which kept up our morale in spite of all our difficulties and deficiencies. (Page 116)

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Questions:
(i) What did Netaji care for?
(ii) Find the word similar in meaning to ‘excited’.
(iii) Give noun form of ‘compassionate’.
(iv) Find a word opposite in meaning to ‘deliberate’.
Answers:
(i) Netaji cared for the honour, welfare and comfort of his soldiers but valued their ^ feelings as well.
(ii) ‘Overwhelmed’ has similar meaning to’excited’.
(iii) ‘Compassion’ is the noun form of ‘compassionate’.
(iv) ‘Spontaneous’ has opposite meaning to ‘deliberate’.

3. Netaji’s guess was accurate. I took my command in mid November 1944.1 got to grips with the enemy early in February 1945. Another example of Netaji’s military foresight is when in March 1939, during the annual session of the Indian National Congress at Tripuri in Jabalpur (M.P.), he proposed that the Congress should at once send an ultimatum to the British Government demanding independence within six months and should prepare immediately for a national struggle. The proposal was opposed by the rightist leaders. Netaji’s proposal was based on his appreciation of the European situation which was something beyond the understanding of our political leaders. But Netaji’s prediction turned out to be correct. (Page 117) (M.P. Board 2012)

Questions:
(i) Which proposal was opposed by the rightist leaders?
(ii) The author took command in:
(a) Mid November 1944.
(b) Mid February 1945.
(c) March 1939.
(d) November 1945.
(iii) One word from passage for “telling in advance what is going to happen in future” is:
(a) ultimate.
(b) tuned.
(c) predict.
(d) proposed.
(iv) The annual session of the Indian National Congress was held in 1939 at
Answers:
(i) Netaji’s proposal of sending an ultimatum to British Government demanding independence was opposed by the rightist leaders.
(ii) (a) Mid November 1944.
(iii) (c) predict.
(iv) Tripuri in Jabalpur (M.P.)

4. It created a psychological revolution. The war ended and with it ended the slavish mentality of the Indian soldier. When the British started INA trials in the Red Fort, they thought that the Indian people especially the soldiers would appreciate the British action against the INA officers. Reverse was the case. As soon as the first INA trial of the three front-line commanders started on 5th November 1945, within a week, disturbances broke out in Lahore, then in Lucknow and in Calcutta (now Kolkata) where hundreds of demonstrators were injured and twenty killed in police firing. Even after the first INA trial in which the three accused officers were released by the Commander-in-Chief, the public demand to stop the future INA trials continued. Anti-British Raj feelings kept on ‘ rising unabated. (Page 117)

Questions:
(i) What was the result of the war? What change did it bring to Indian soldiers?
(ii) Give a word opposite in meaning to ‘forward’.
(iii) Give a word similar in meaning to ‘obstacle’.
(iv) Make noun with the word ‘created’.
Answers:
(i) The war resulted in defeat. It ended the slavish mentality of Indian soldiers. It also gave rise to anti-British Raj feelings.
(ii) ‘Reverse’ is opposite to ‘forward’.
(iii) ‘Disturbance’ has similar meaning to ‘obstacle’.
(iv) ‘Creation’ is the noun form of ‘created’.

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5. Having shown Netaji’s powers of generalship which turned the defeat of the INA into the defeat of the British Raj, let me record that another great asset in Netaji’s being was that he was a staunch secularist. Whatever our religion and the area or the station of our birth, we had full confidence that we would get absolute justice from him and his Government the forerunner of our Government today. To show how his mind worked in this direction, his brief but an all embracing idea of independence is shown in distilled form in the last but one para of the proclamation of Provisional Government of Azad Hind. (Page 118)

Questions:
(i) What quality of Netaji is talked about here? What did the author feel about Netaji?
(ii) Give adverb form of ‘absolute’.
(iii) Give a word similar in meaning to ‘complete’.
(iv) Give opposite in meaning to ‘quote’.
Answers:
(i) His quality of being a secularist is talked about here. The author felt sure to get absolute justice from Netaji and his government.
(ii) ‘Absolutely’ is the adverb form of ‘absolute’.
(iii) ‘Absolute’ is similar in meaning.
(iv) ‘Unquote’ is the opposite to ‘quote’ to ‘complete’

MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण

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MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण

प्रकृति चित्रण अभ्यास

प्रकृति चित्रण अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रस्तुत गीत में ‘तारागण’ को किस रूप में चित्रित किया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत गीत में ‘तारागण’ को घट के रूप में चित्रित किया गया है।

प्रश्न 2.
कवि ने पनघट किसे कहा है? (2009)
उत्तर:
कवि ने पनघट आसमान को कहा है।

प्रश्न 3.
बिजली की चमक देखकर कवि सखी को क्या सलाह देता है? (2014, 16)
उत्तर:
बिजली की चमक देखकर कवि सखी को परामर्श देता है कि हे सखी ! तू भाग, बिजली चमक रही है,पानी आने वाला है।

प्रश्न 4.
‘अरी सुहागिन’ सम्बोधन किसके लिए आया है?
उत्तर:
‘अरी सुहागिन’ सम्बोधन वैसे तो विवाहित स्त्री के लिए किया गया है, लेकिन प्रकृति की ओर भी संकेत है।

प्रश्न 5.
सहज रंगीली नायिका किसके रंग में रंगी हुई है ?
उत्तर:
सहज रंगीली नायिका इन्द्रधनुषी रंगों से रंगी हुई है।

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प्रकृति चित्रण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभावरी’ के बीतने पर ‘उषा नागरी’ क्या कर रही है? (2009, 17)
उत्तर:
‘विभावरी’ यानी रात्रि के बीत जाने पर उषा रूपी स्त्री अम्बर रूपी पनघट में तारे रूपी घड़ों को डुबो रही है। इस दृश्य को कवि ने बड़े मनोहारी ढंग से मानवीय भावनाओं और कार्यों से जोड़ा है।

प्रश्न 2.
‘आँखों में भरे विहाग री’ सम्बोधन किसके लिए आया है?
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में ‘आँखों में भरे विहाग री’ सम्बोधन उस स्त्री के लिए आया है जिसकी आँखें अभी उनींदी हैं और प्रभात का गीत उसकी आँखों में भरा हुआ है। दूसरी ओर रजनी रूपी स्त्री की आँखों में अभी तक नींद भरी है और उसके उठते ही खग अपने गीत गाने लगेंगे।

प्रश्न 3.
खगकुल ‘कुल-कुल सा’ क्यों बोलने लगा?
उत्तर:
पक्षियों का समूह प्रभात की किरण के साथ आमोद-प्रमोद में भर जाते हैं और नभमण्डल में उड़ान भरते हुए मधुर गीत गाने लगते हैं। प्रभात ही उनके गीत प्रारम्भ करने का संकेत देता है।

प्रश्न 4.
आसमान में बादलों के आते ही धरती पर क्या प्रतिक्रिया होती है?
उत्तर:
आसमान में बादलों के आते ही धरती पर प्यार के अंकुर फूटने लगते हैं। धरती प्रसन्न हो जाती है। बिजली आकाश में चमकती है और दादुर अपनी बोली से वर्षा का स्वागत करते हैं। मोर वन में नाचने लगता है और गाँवों में स्त्रियों के हिंडोले सज जाते हैं और किसान की पलियाँ ‘कजरी’ नामक गीत गाती हैं। सभी वर्षा का स्वागत करने को तत्पर रहते हैं।

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प्रकृति चित्रण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न पद्यांशों का आशय स्पष्ट कीजिये
(अ) अधरों में राग अमंद…………विहाग री।
(आ) ‘फिसली-सी पगडण्डी…………सरग-नसैनी री !’
(इ) बिजली चमकी भाग………..पानी बरसा री।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
महाकवि जयशंकर प्रसाद का यह गीत हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘प्रकृति चित्रण’ के ‘गीत’ नामक शीर्षक से उद्धृत है जो ‘लहर’ नामक काव्य संकलन में से संकलित है।

प्रसंग :
इस गीत में प्रकृति के प्रातःकालीन सौन्दर्य का नवयौवना नायिका के रूप में चित्रण किया है। एक सखी रात्रि व्यतीत हो जाने पर दूसरी सखी को जगाती है और कहती है।

व्याख्या :
री सखि ! चाँदनी से युक्त रात्रि अब व्यतीत हो रही है। अतः तु अब जाग जा। अपनी आँखों को खोल और देख कि आकाशरूपी पनघट में उषारूपी चतुर नायिका तारारूपी घड़े को डुबो रही है। भाव यह है कि उषाकाल हो गया है, जिससे तारे धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं। जल में घड़ा डुबोने का कुलकुल स्वर पक्षियों की कलरव ध्वनि के रूप में हो रहा है। उषारूपी नायिका का हिलता हुआ आँचल कोमल कोपलों के कम्पन में दिखाई देता है और देखो वह लतिका नाम की सखी भी अपनी गगरी को परागयुक्त पुष्पों के नवीन रस से भर लायी है। अर्थात् लताएँ सरस कलियों से पूर्ण हो गयी हैं।

प्रातःकालीन शोभा का चित्रण करते हुए एक सखी दूसरी सोती हुई सखी से कहती है कि तेरे रक्तिम ओठों से प्रतीत होता है कि तूने रात को प्रेम मदिरा का पान किया है जिससे तेरे ओंठ रक्तिम हो गये हैं। भाव यह है कि तेरे ओठों पर प्रेम दिखायी देता है। तेरे काले केशों में चन्दन जैसी सुगन्ध, स्निग्धता और कोमलता बढ़ गयी है। हे सखी ! तू अब तक सोई हुई है। देख, प्रातःकाल हो गया है और तू अपनी आँखों में विहाग राग की सी खुमारी भरे हुए है, जो तेरे रात्रिकालीन जागरण और आलस्य की सूचना दे रही है।

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि वर्षा के आगमन पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों और पेड़ों पर पड़ने वाले झूलों के बारे में वर्णन कर रहा है।

व्याख्या :
पानी के आने से पगडण्डियों पर फिसलन हो गई है। आँखें लज्जावश झुक गई हैं। प्रकृति मानो इन्द्रधनुषी रंगों से रंग गई हो। ऐसे ही कामिनियाँ रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित होकर इन्द्रधनुष की शोभा को फीका कर रही हैं। स्त्रियों के बीछिया रुनझुन बज रहे हैं और मदित मन से चलने से उनकी बेणी इधर-उधर हिल रही है। हिंडोले पड़े हुए हैं उन पर स्त्रियाँ ऊँचे पेंग बढ़ा रही हैं।

एक सखी दूसरी सखीं से कहती है कि हे सखी ! सुन, ये मोर जो सूने स्थान पर रहते हैं उन्हें भी वह वन घर जैसा प्रतीत हो रहा है,वर्षा के आने पर। वर्षा के आने पर प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं। धरती पर उगते हुए अंकुर भी बड़े प्यारे लगते हैं।

(इ) शब्दार्थ :
पीके = अंकुर; दादुर = मेंढक। सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ पं. भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘मंगल वर्षा’ से उद्धृत हैं।

प्रसंग :
इस कविता में मिश्र जी ने सावन में वर्षा के आने के सुन्दर दृश्य का वर्णन किया है। बादलों के आसमान में आने पर प्रकृति के सभी उपादान और स्त्री-पुरुष प्रसन्न हो जाते हैं।

व्याख्या :
कवि कहता है कि पानी के बरसने से प्रकृति में प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं। चारों तरफ हरियाली छा गई है और सावन हरा-भरा हो गया है। आकाश में बादल छा गये हैं और सम्पूर्ण धरती प्रफुल्लित हो रही है। एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि तेरी माँग भरी हुई है और ऐसा लगता है कि इस मनोरम मौसम में तू कुछ भूली-भूली सी लगती है। आसमान में बिजली चमक रही है और बादलों को देख मेंढक भी हर्षित होकर बोलने लगे। हवा के चलने से सुन्दर पक्षी भी उड़ने लगे। पक्षियों के उड़ने का दृश्य मनोरम है। मन में उमंग उठ रही है,मन मानो पागल जैसा मस्त हो गया हो। पानी के बरसने से आज प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं।

प्रश्न 2.
भोर होते ही प्रकृति में कैसी-कैसी चेतनता आ जाती है? प्रसाद की कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
भोर होते ही सम्पूर्ण प्रकृति चैतन्य दृष्टिगत होती है। एक स्त्री दूसरी स्त्री से कहती है-हे सुन्दरी ! तू जाग रात्रि समाप्त हो गई है और भोर की बेला ने दस्तक दे दी है। ऊषा रूपी सुन्दर स्त्री अम्बर रूपी पनघट में अपने तारे रूपी घड़े को डुबो रही है। यहाँ प्रातः होते ही रमणियों का घड़े लेकर पानी भरने का दृश्य चित्रित किया है। प्रातः होते ही तारे डूबने लगते हैं। पक्षियों के समूह अपनी मधुर बोली में गीत गा रहे हैं और सुगन्धित पवन के चलने से मुलायम पत्तियाँ हिल रही हैं। लता भी अपने पुष्प रूपी घड़े में मधु भर लाई है। तेरे होठों पर राग बन्द है और तेरी अलकों में सुगन्धित वायु भरी हुई है तू अभी तक क्यों सो रही है,जाग।।

प्रश्न 3.
“किसलय का अंचल डोल रहा” कहकर कवि क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
प्रातः के सुहावने मौसम में नमी लिए हुए सुगन्धित समीर बहने लगता है। इसके चलने से धरती के मुलायम किसलय (नयी कोपलें या घास के पत्ते) प्रसन्नता लिए हुए झूमने लगते हैं। प्रातःकाल होते ही प्रकृति के सभी उपादान अपनी प्रमोदता प्रकट करने के लिए मानवीय भावों जैसे दिखाई देते हैं। दिन सुख का प्रतीक है इसलिए प्रकृति भी मानव और अन्य पशु-पक्षियों के साथ अपने सुख बाँटती है। प्रातः समीर के साथ किसलय का इधर-उधर झूमना उसकी प्रसन्नता का प्रतीक है। धरती भी अपने मन के भावों को किसलय के साथ बाँटने लगती है। किसलय का हिलना ऐसे लगता है मानो धरती के हृदय में खुशी की लहर उठ रही हो।

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प्रश्न 4.
सावन में ग्रामवधू के उल्लास का वर्णन कवि के शब्दों में कीजिये।
उत्तर:
सावन के महीने में अति उल्लासपूर्ण वातावरण रहता है। पानी के बरसते ही स्नेह के अंकुर पृथ्वी पर उग आये हैं। चारों तरफ हरियाली छा गई है। ग्रामवधू वर्षा के आगमन पर अति हर्षित दिखाई दे रही है। बिजली आसमान में चमक रही है। वर्षा की आस में मेंढक अपनी बोली में प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं। मन पागल की तरह आसमान में घूम रहा है। पगडण्डी पानी के गिरने से फिसलन भरी हो गई हैं। ग्रामवधू इन्द्रधनुषी रंगों से सजी हुई है। ग्राम में चारों तरफ पेड़ों पर झले पड़ गये हैं। उस स्त्री के बीछिया रुनझन बज रहे हैं और चलने से बेणी इधर-उधर हिल रही है। वन में मोर बोलने लगे हैं। वर्षा के आगमन पर मयूरों की मधुर बोली हमारे मन को आकर्षित कर रही है। खेतों के बीच में खड़ी हुई किसानिन ‘कजरी’ गीत गा रही है। रात रूपी सुहागिन के शरीर को जैसे उसके वर्षारूपी साजन ने स्पर्श करके उसे आल्हादित कर दिया हो। झरने के झरने के साथ हमारा मन श्रीहर्षित हो गया है। पानी के आने से प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं। कहने का तात्पर्य है कि ग्रामवधू प्रकृति की मनोहारी छवि पर मोहित हो गई हैं।

प्रकृति चित्रण काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में से अलंकार पहचान कर लिखिए
बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा-नागरी।
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा।
उत्तर:
(i) अम्बर-पनघट, तारा-घट, ऊषा-नागरी में रूपक अलंकार और प्रकृति का मानवीकरण।
(ii) कुल-कुल में पुनरुक्तिप्रकाश।
(iii) किसलय का अंचल डोल रहा-मानवीकरण।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए
विभावरी, अम्बर, ऊषा, मलयज, खग।
उत्तर:
(i) विभावरी – रात्रि, रजनी, यामिनी।
(ii) अम्बर – आकाश,नभ, आसमान।
(iii) ऊषा – प्रातः बेला, सुबह, अरुणोदय।
(iv) मलयज – मलय,समीर, बयार।
(v) खग – पक्षी,नभचर, पखेरू।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
(1) अधरों में राग अमन्द पिये।
अलकों में मलयज बंद किये।
फिसली-सी पगडण्डी।
खिसली आँख लजीली री।
उत्तर:
(1) भाव सौन्दर्य-
(i) किसी सोती हुई सुन्दरी के अधरों में कोई मधुर गीत बन्द है-इसमें भावों का सुन्दर सामंजस्य है।
(ii) प्रकृति के रूप में मानवीकरण का सुन्दर उदाहरण है।
(iii) अलकों में सुगन्धित हवा बन्द है-कितनी सटीक और अद्भुत कल्पना की उड़ान है।

(2) (i) पगडण्डी की फिसलन का सुन्दर शब्द चित्र संजोया है।
(ii) खिसकने के लिए खिसली शब्द लिखकर ग्रामीण परिवेश का चित्रण किया गया है।
(iii) सुन्दरी की आँख में लज्जा होना उसकी शोभा है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम एवं तद्भव शब्द छाँटकर लिखिए
अम्बर, धरती, दादुर,खग, नवल, अधर, अलक, मोती, सरग।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण img-1

प्रश्न 5.
कविता में आए पुनरुक्तिप्रकाश के उदाहरण छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
(1) खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा।

(2) छन-छन उठी हिलोर,मगन मन पागल दरसा री।
ऊँचे-ऊँचे पेंग, हिंडोला सरग नसैनी री।
फुर-फुर उड़ी फुहार अलक हल मोती छाए रो।
झर-झर झरना झरे, आज मन प्राण सिहाये री।

प्रश्न 6.
कविता में आए मानवीकरण के उदाहरण छाँट कर लिखिये।
उत्तर:
(1) अम्बर-पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा-नागरी।
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी।

(2) हरियाली छा गयी, हमारे सावन सरसा री
बादल आए आसमान में, धरती फूली री।

प्रश्न 7.
कविता में आयी ‘प्रसाद गुण’ सम्पन्न पंक्तियाँ छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
पीके फूटे आज प्यार के, पानी बरसा री।
हरियाली छा गयी,हमारे सावन सरसा री।
बादल आए आसमान में, धरती फूली री,
बिजली चमकी भाग सखी री,दादुर बोले री,
अन्ध प्राण ही बहे,उड़े पंछी अनमोले री॥

प्रश्न 8.
माधुर्य गुण के दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
(1) बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा-नागरी।

(2) पीके फूटे आज प्यार के, पानी बरसा री।
हरियाली छा गयी, हमारे सावन सरसा री।
बादल आए आसमान में, धरती फूली री।
अरी सुहागिन, भरी माँग में भूली-भूली री।
बिजली चमकी भाग सखी री,दादुर बोले री।
अन्द प्राण ही बही, उड़े पंछी अनमोले री।

प्रश्न 9.
पाठ में आए विभिन्न रसों की पंक्तियाँ छाँट कर स्थायी भाव सहित रस का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा-नागरी।

खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो लतिका भी भर लायी
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी।

रस – श्रृंगार रस।
स्थायी भाव – रति।

MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण img-2
रस – श्रृंगार।
स्थायी भाव – रति।

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गीत भाव सारांश

संकलित कविता ‘गीत’ के रचयिता छायावादी कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ हैं। इसमें कवि ने ऊषा रूपी सुन्दरी को तारा रूपी घट को आकाश रूपी सरोवर में डुबोते हुए चित्रित किया है।

मनुष्य के जीवन में प्रकृति की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्रकृति का अनुकरण करके ही मनुष्य ने अपने परिगत भाव-संसार और कला-संसार की सृष्टि की है। काव्य का सम्पूर्ण इतिहास प्रकृति के प्रकाश से जगमगा रहा है। छायावाद के जयशंकर प्रसाद का काव्य प्रकृति को केन्द्र मानकर ही प्रारम्भ होता है। ‘गीत’ नामक रचना में प्रातःकाल के परिवर्तन को मानवीकरण के रूप में चित्रित किया है। इसमें रूपक अलंकार का प्रयोग किया है। रात बीत गई है और ऊषा रूपी कामिनी आकाश रूपी पनघट में तारों रूपी घड़ों को डुबो रही है। तारे अस्त होते जा रहे हैं। सुबह का प्रकाश फैल रहा है। पक्षियों,लताओं और कलिकाओं का बड़ा ही सजीव और सुन्दर वर्णन किया गया है।

गीत संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) बीती विभावरी जाग री
अम्बर-पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा-नागरी।
खगकुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी।
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी। (2010)

अधरों में राग अमन्द पिये,
अलकों में मलयज बन्द किये
तू अब तक सोयी है आली !
आँखों में भरे विहाग री।

शब्दार्थ :
विभावरी = ज्योत्स्नामयी रात्रि अम्बर = गगन, आकाश; घट = घड़ा; उषा = प्रातःकाल; नागरी = चतुर स्त्री; खग = पक्षी; किसलय = कोमल कोपलें; अंचल = आँचल; लतिका = लता; मधु-मुकुल = परागयुक्त पुष्प; नवल रस = नवीन पराग; गागरी = गगरी; अधर = होठ; अमंद = पर्याप्त; अलक = केशराशि; मलयज = शीतल सुगन्धित पवन,चन्दन,सर्प; आली = सखी; विहाग = राग विशेष,जो रात्रि के अन्तिम प्रहर में गाया जाता

सन्दर्भ :
महाकवि जयशंकर प्रसाद का यह गीत हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘प्रकृति चित्रण’ के ‘गीत’ नामक शीर्षक से उद्धृत है जो ‘लहर’ नामक काव्य संकलन में से संकलित है।

प्रसंग :
इस गीत में प्रकृति के प्रातःकालीन सौन्दर्य का नवयौवना नायिका के रूप में चित्रण किया है। एक सखी रात्रि व्यतीत हो जाने पर दूसरी सखी को जगाती है और कहती है।

व्याख्या :
री सखि ! चाँदनी से युक्त रात्रि अब व्यतीत हो रही है। अतः तु अब जाग जा। अपनी आँखों को खोल और देख कि आकाशरूपी पनघट में उषारूपी चतुर नायिका तारारूपी घड़े को डुबो रही है। भाव यह है कि उषाकाल हो गया है, जिससे तारे धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं। जल में घड़ा डुबोने का कुलकुल स्वर पक्षियों की कलरव ध्वनि के रूप में हो रहा है। उषारूपी नायिका का हिलता हुआ आँचल कोमल कोपलों के कम्पन में दिखाई देता है और देखो वह लतिका नाम की सखी भी अपनी गगरी को परागयुक्त पुष्पों के नवीन रस से भर लायी है। अर्थात् लताएँ सरस कलियों से पूर्ण हो गयी हैं।

प्रातःकालीन शोभा का चित्रण करते हुए एक सखी दूसरी सोती हुई सखी से कहती है कि तेरे रक्तिम ओठों से प्रतीत होता है कि तूने रात को प्रेम मदिरा का पान किया है जिससे तेरे ओंठ रक्तिम हो गये हैं। भाव यह है कि तेरे ओठों पर प्रेम दिखायी देता है। तेरे काले केशों में चन्दन जैसी सुगन्ध, स्निग्धता और कोमलता बढ़ गयी है। हे सखी ! तू अब तक सोई हुई है। देख, प्रातःकाल हो गया है और तू अपनी आँखों में विहाग राग की सी खुमारी भरे हुए है, जो तेरे रात्रिकालीन जागरण और आलस्य की सूचना दे रही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इस गीत में प्रकृति का मार्मिक एवं सजीव अंकन हुआ है।
  2. वियोग शृंगार से अनुप्राणित इस गीत में गेयता तथा चित्रोपमता सर्वत्र विद्यमान है।
  3. सांगरूपक, उपमा, मानवीकरण, अनुप्रास तथा रूपकातिशयोक्ति, अलंकारों का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  4. विषयानुरूप परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

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मंगल वर्षा भाव सारांश

संकलित कविता ‘मंगलवर्षा’ के रचयिता ‘भवानी प्रसाद मिश्र’ हैं। इस कविता में कवि ने वर्षा के आगमन पर प्रकृति और मानव की प्रफुल्लता का सजीव वर्णन किया है।

भवानी प्रसाद मिश्र छायावादोत्तर काल के प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति भावों के उद्दीपन का आधार बनती है। प्रस्तुत कविता में उन्होंने वर्षा का मनोहारी वर्णन किया है। बादलों का आसमान में घिरना, बिजली का चमकना,फिसलती पगडण्डियाँ,रंगीला इन्द्रधनुष, झरनों का झरना ये सब मानवीय भावनाओं के अनुरूप दृष्टिगोचर होते हैं। वर्षा के माध्यम से जीवन की प्रसन्नता कविता के माध्यम से प्रकट हो रही है। लोक छबियों और लोक जीवन की अनुभूतियों का सुन्दर वर्णन इस कविता में दिखाई देता है। इस कविता में लयात्मकता है और शब्दों में प्रवाह है। प्रकृति चित्रण के रूप में यह कविता एक अनूठी रचना है।

मंगल वर्षा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. पीके फूटे आज प्यार के, पानी बरसा री,
हरियाली छा गयी हमारे, सावन सरसा री।
बादल आये आसमान में, धरती फूली री,
अरी सुहागिन, भरी माँग में भूली-भूली री,
बिजली चमकी भाग सखी री, दादुर बोले री,
अन्य प्राण ही बही, उड़े पंछी अनमोले री,
छन-छन उठी हिलोर, मगन मन पागल दरसा री।
पीके फूटे आज प्यार के, पानी बरसा री।

शब्दार्थ :
पीके = अंकुर; दादुर = मेंढक। सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ पं. भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘मंगल वर्षा’ से उद्धृत हैं।

प्रसंग :
इस कविता में मिश्र जी ने सावन में वर्षा के आने के सुन्दर दृश्य का वर्णन किया है। बादलों के आसमान में आने पर प्रकृति के सभी उपादान और स्त्री-पुरुष प्रसन्न हो जाते हैं।

व्याख्या :
कवि कहता है कि पानी के बरसने से प्रकृति में प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं। चारों तरफ हरियाली छा गई है और सावन हरा-भरा हो गया है। आकाश में बादल छा गये हैं और सम्पूर्ण धरती प्रफुल्लित हो रही है। एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि तेरी माँग भरी हुई है और ऐसा लगता है कि इस मनोरम मौसम में तू कुछ भूली-भूली सी लगती है। आसमान में बिजली चमक रही है और बादलों को देख मेंढक भी हर्षित होकर बोलने लगे। हवा के चलने से सुन्दर पक्षी भी उड़ने लगे। पक्षियों के उड़ने का दृश्य मनोरम है। मन में उमंग उठ रही है,मन मानो पागल जैसा मस्त हो गया हो। पानी के बरसने से आज प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रकृति चित्रण अनूठा बन पड़ा है।
  2. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग सुन्दर है।
  3. मानवीकरण की छटा सुन्दर है।

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2. फिसली-सी पगडण्डी खिसली आँख लजीली री,
इन्द्रधनुष-रंग-रंगी, आज मैं सहज रंगीली री,
रुनझुन बिछिया आज, हिला-डुल मेरी बेनी री,
ऊँचे-ऊँचे पेंग, हिंडोला, सरग-नसैनी री,
और सखी सुन ! मोर विजन वन दीखे घर-सारी,
पीके फूटे आज प्यार के, पानी बरसा री।

शब्दार्थ :
हिंडोला = झूला; सरग-नसेनी = स्वर्ग की सीढ़ी (बहुत ऊँचे जाना); विजन = जन रहित।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि वर्षा के आगमन पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों और पेड़ों पर पड़ने वाले झूलों के बारे में वर्णन कर रहा है।

व्याख्या :
पानी के आने से पगडण्डियों पर फिसलन हो गई है। आँखें लज्जावश झुक गई हैं। प्रकृति मानो इन्द्रधनुषी रंगों से रंग गई हो। ऐसे ही कामिनियाँ रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित होकर इन्द्रधनुष की शोभा को फीका कर रही हैं। स्त्रियों के बीछिया रुनझुन बज रहे हैं और मदित मन से चलने से उनकी बेणी इधर-उधर हिल रही है। हिंडोले पड़े हुए हैं उन पर स्त्रियाँ ऊँचे पेंग बढ़ा रही हैं।

एक सखी दूसरी सखीं से कहती है कि हे सखी ! सुन, ये मोर जो सूने स्थान पर रहते हैं उन्हें भी वह वन घर जैसा प्रतीत हो रहा है,वर्षा के आने पर। वर्षा के आने पर प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं। धरती पर उगते हुए अंकुर भी बड़े प्यारे लगते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रकृति का मनोहारी वर्णन किया है।
  2. रूपक, उपमा और मानवीकरण की शोभा निराली है।
  3. वर्षा के आगमन से मोर का प्रसन्न होना प्रसिद्ध उक्ति है।

3. फुर-फुर उड़ी फुहार अलक हल मोती छाए री,
खड़ी खेत के बीच किसानिन कजरी गाये री,
झर-झर झरना झरे, आज मन प्राण सिहाये री,
कौन जन्म के पुण्य कि ऐसे शुभ दिन आये री,
रात सुहागिन गात मुदित मन, साजन परसा री।
पीके फूटे आज प्यार के, पानी बरसा री॥ (2009)

शब्दार्थ :
अलक = बाल; परसा = स्पर्श किया,कजरी = गीत; सिहाये = प्रसन्न हुए; गात = शरीर; मुदित = प्रसन्न।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने फुहारों के पड़ने,खेत में किसानिन के कजरी गाने का बड़ा ही सुहावना वर्णन किया है।

व्याख्या :
वर्षा की फुहारों के पड़ने से कामिनी के बालों पर बूंदें मोती जैसी शोभित हो रही हैं। अपने खेत के बीच में खड़ी किसान की पत्नी वर्षा ऋतु में गाये जाने वाला कजरी गीत गा रही है। वर्षा के आने से झरने झर-झर कर नीचे गिर रहे हैं। इस सबको देखकर मन-प्राण हर्षित हो जाते हैं। स्त्रियाँ मन में सोचने लगीं कि किसी जन्म के पुण्य रहे होंगे जो इतने सुहावने दिन आये हैं। सावन के महीने में किसी सुहागिन के शरीर को उसके पति ने स्पर्श किया हो तो वह कितना मंगलमय लगता है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति रूपी सुहागिन के तन को वर्षा रूपी उसके साजन ने स्पर्श किया हो। पानी के बरसने से चारों ओर प्यार के अंकुर फूटने लगे हैं। सभी ओर सम्पूर्ण वातावरण प्रसन्नता से भरा हुआ है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रकृति चित्रण अनूठा है।
  2. कविता में अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  3. किसानिन का कजरी गाने का भाव हृदय में आनन्द भर देता है।

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