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MP Board Class 12th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 10 देवकी

MP Board Class 12th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 10 देवकी (उपन्यास अंश, नरेन्द्र कोहली)

देवकी अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.
देवकी कारागार में बैठी किस प्रकार के आनन्द का अनुभव कर रही थी? (2014)
उत्तर:
कंस की कारागार में कैद देवकी और वसुदेव को कठिन यातनाओं से गुजरना पड़ता था। अचानक देवकी को उस कैद में असीम आनन्द का अनुभव होने लगता है। मानो उसके अन्दर कोई दैवीय शक्ति भर गई हो। उसे लगता है कि वह किसी कैद में नहीं बल्कि किसी सीमाहीन खुले स्थान पर बैठी है। कभी वह स्वयं को बादल,तो कभी स्वयं आकाश और कभी-कभी तो स्वयं को ब्रह्माण्ड समझने लगती है। उसे लगता है कि सूर्य, चन्द्रमा,ग्रह, नक्षत्र तो सभी उसके खिलौने हैं और उसकी प्रसन्नता के लिए एकत्रित किये गये हैं। इस कोठरी में तो वह खेल-खेल में आ बैठी है। अगले ही पल उसे लगता है कि वह सागर की लहरों पर बैठी है। ये लहरें उसको झुला झुला रही हैं। कभी उसे आभास होता है कि वह स्वयं ही सागर है। ये लहरें तो उसके हाथ-पैर हैं। उसे लगता है कि यदि वह चाहे तो अभी चन्द्रमा को अपनी मुट्ठी में बाँधकर धरती पर ला सकती है। ये वन,नदियाँ और पहाड़ सब उसके आनन्द के लिए ही बनाये गये हैं। वह सारी सृष्टि के केन्द्र में है और सारी सृष्टि उसकी इच्छा पर चल रही है। उसे लगता है कि मानो क्षीरसागर उसकी गोद में मचल रहा है और शेषनाग उसे अपनी माँ समझने लगा है। वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है कि देवकी अपनी सुध-बुध खोकर किसी दूसरी दुनिया में अलौकिक दृश्य देख रही है और उनसे आनन्दित हो रही है।

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प्रश्न 2.
कंस देवकी के ‘व्योमातीत’ रूप से क्यों भयभीत था?
उत्तर:
सदैव डरी-सहमी और भयभीत रहने वाली देवकी को अचानक कंस के समक्ष यूँ निर्भीकता के साथ व्यवहार करना,कंस को खासा परेशान करता है। वह देवकी के अन्दर आये इस अद्भुत परिवर्तन से स्तब्ध है। वास्तव में, कंस देवकी के इस व्योमातीत’ रूप से भयभीत हो उठता है। यह कोई चमत्कार है, अभिचार है अथवा कोई तांत्रिक प्रयोग? उसे लगता है, वह पागल हो जायेगा। वह सोचता है कि कहीं देवकी के शरीर में किसी प्रेत का प्रवेश तो नहीं हो गया है जो वह इतनी निर्भीकता के साथ कंस की आँखों में आँखें डालकर बात करने का दुस्साहस कर पा रही है। यह प्रेत किसका है? कहीं वह यह तो नहीं चाहता कि आवेश में आकर कंस देवकी का वध कर दे और फिर अपने सम्भावित हत्यारे को सदा के लिए खो दे। कुल मिलाकर, देवकी को भयभीत करने के उद्देश्य से कारागार में आया कंस उसके आक्रामक दैवीय रूप को देखकर स्वयं भयभीत हो जाता है।

प्रश्न 3.
देवकी की गोद में क्रीड़ा कौन कर रहा था?
अथवा
देवकी की गोद में कौन मचल रहा था? (2017)
उत्तर:
क्रूर कंस की कारागार में कैद देवकी अब भयभीत और परेशान नहीं है। वह तो कल्पना के संसार में विचरण करते हुए स्वयं को आनन्दित महसूस करती है। उसे लगता है कि क्षीरसागर जैसे उसकी गोद में मचल रहा है। शेषनाग को वह अपनी हथेलियों में उठा लेती है और वह विराट-विशाल नाग गौरवर्ण का एक नन्हा-सा बालक बनकर देवकी को ‘माँ’ कहकर पुकारता है।

अचानक देवकी को महसूस होता है उसके गर्भ में पल रहा उसका आठवाँ शिशु भी उसके आस-पास है-साँवला, नटखट, चुलबुला। उसे लगता है कि वह तो स्वयं शेषशायी नारायण हैं,जो बालक बनकर उसकी गोद में अठखेलियाँ कर रहे हैं।।

प्रश्न 4.
वसुदेव-देवकी संवाद को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
कारागार में कष्टों के मध्य दिन बिता रही देवकी के व्यवहार में यकायक आये सुखद परिवर्तनों से प्रसन्न वसुदेव देवकी से उनकी प्रसन्नता का कारण पूछते हैं, “क्या बात है देवकी?” देवकी प्रत्युत्तर में कहती हैं,“आज समझ पाई हूँ स्वामी कि संसार का सारा आनन्द तो मेरे ही भीतर है।” वसुदेव हँस पड़ते हैं। “आनन्द तुम्हारे भीतर; अथवा तुम स्वयं ही आनन्द स्वरूपा हो?” देवकी कहती हैं, मैं आमन्दस्वरूपा हूँ। मैं ही यह सब कुछ हूँ। सर्वत्र हूँ, सर्व-व्यापक हूँ,व्योमातीत हूँ, निरन्तर हूँ।”

कंस सुनेगा तो मारे भय के मर जायेगा”, वसुदेव हँस रहे थे। “कंस को तो मरना ही होगा”, देवकी बोलीं, क्योंकि वह समझता नहीं कि मेरा न कभी जन्म हुआ, न मेरी मृत्यु होगी। मैं कभी भी यह शरीर नहीं थी।” “तो तुम कौन हो देवकी?” वसुदेव पूर्णतः गम्भीर थे। देवकी ने भी गम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया,”मैं अपने स्वभाव से निराकार सर्वव्यापी आत्मा हूँ।”

प्रश्न 5.
बाँसुरी की मीठी टेर सुनकर देवकी ने क्या अनुभव किया? (2009)
उत्तर:
देवकी के कानों ने बाँसुरी की ऐसी मीठी और कर्णप्रिय टेर सुनी, जैसी उन्होंने इससे पूर्व कभी नहीं सुनी थी। उस टेर में एक अजीब-सी मिठास थी। उसे सुनकर उन्हें लग रहा था कि उनके भीतर अलौकिक पुष्पों की बगिया महक रही हो और उसकी सुगन्ध से मानो दसों दिशाएँ भी सुगन्धित हो महक रही हों। उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा कि वे अपनी वाणी पर स्वयं ही मुग्ध हो रही हैं। उन्हें अपने अन्दर विशालता का अनुभव होने लगा सागर,वन,नदियाँ सब उन्हें अपने अन्दर उपस्थित लगीं। उन्हें यह लगने लगा कि उनका अस्तित्व मात्र वह शरीर नहीं है,वह तो बहुत विराट और विशाल है।

प्रश्न 6.
“माया का भ्रम हट जाए तो आनन्द स्वयं ही उद्घाटित हो जाता है।” वसुदेव के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिये। (2009)
उत्तर:
लेखक का स्पष्ट मत है कि संसार में जो भी कुछ दुःख व संकट है वह सब मोह-माया के जाल में फँसने के कारण ही महसूस होता है। व्यक्ति दूसरों से अपेक्षाएँ करता है और उनके पूर्ण न होने पर उत्पन्न हताशा से वह दुःखी हो उठता है। साथ ही, जब व्यक्ति इस भौतिक संसार में वस्तुओं का उपयोग करने के स्थान पर उनसे मोह करने लगता है तथा अधिकसे-अधिक धन जुटाने के प्रयास में लग जाता है तो असफलता हाथ लगने पर उसमें दुःख की भावना बलवती हो उठती है।

इसके विपरीत यदि व्यक्ति मोह-माया से दूर हो परम पिता परमात्मा से अपनी आत्मा के मिलन का मार्ग तलाशता है तो उसे सांसारिक एवं शारीरिक दुःख-दर्द न तो महसूस ही होते हैं और न ही परेशान ही करते हैं। वास्तव में कई बार दुःखों को लम्बे समय तक झेलना भी दुःखों पर पार पा लेना का साहस प्रदान करता है। यह एक प्रकार की तपस्या होती है और तपस्या के बिना माया का भ्रम दूर नहीं होता। एक बार मायारूपी भ्रम यदि दृष्टि के सामने से हट जाये तो दुःख में भी सुख की अनुभूति होती है। स्पष्ट है कि माया का भ्रम हट जाने पर आनन्द चहुँ ओर से स्वयं ही उद्घाटित हो उठता है।

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प्रश्न 7.
देवकी ने कंस को किस प्रकार समझाया?
उत्तर:
देवकी ने कंस को समझाते हुए कहा कि अस्तित्व और अनस्तित्व में कोई विशेष अन्तर नहीं होता है। यह तो मात्र भ्रम है। वास्तव में जो है,वह दिखाई नहीं देता और जो दिखाई देता है, वह है नहीं। देवकी कंस के परेशान चेहरे को देखते हुए उसे पुनः समझाने के उद्देश्य से कहती है कि जो है,उसका अभाव नहीं हो सकता और जो नहीं है,उसका भाव नहीं हो सकता है। अपने ऊपर प्राणघातक आक्रमण की सम्भावना के बीच वह निर्भीक होकर कंस से सहज भाव में कहती है कि उसके पास कंस के प्रति करुणा के अतिरिक्त कुछ नहीं है,क्योंकि शायद वह (कंस) यह नहीं जानता है आततायी,शत्रु के शस्त्र से नहीं, अपने पाप से मारा जाता है। इस प्रकार देवकी ‘कंस को समझाने का असफल प्रयत्न करती है।

प्रश्न 8.
कारागार से लौटने के पश्चात् कंस की मानसिकता का वर्णन कीजिए। (2013)
उत्तर:
कंस कारागार में यह सोचकर गया था कि उसके अत्याचारों से पीड़ित देवकी हैरान-परेशान होगी। किन्तु वहाँ उसका व्योमातीत निर्भीक रूप देखकर कंस स्वयं को असहज महसूस करने लगा और पराजित-सा कारागार से वापस लौट आया। महल में पहुँचकर उस रात कंस शैय्या पर लेटा करवटें बदलता रहा। उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। वह पूरी रात तरह-तरह के कयास लगाता रहा। क्या वास्तव में ही देवकी के गर्भ में कोई अलौकिक सन्तान आ गई है,जो उसका वध करने में सक्षम होगी? नहीं तो देवकी में इतना परिवर्तन कैसे आ गया? कंस के नाम से थर-थर काँपने वाली देवकी, कंस की आँखों में आँख डालकर इतनी निर्भीकता से कैसे बात कर पायी? उसे अपनी मृत्यु यहाँ तक कि अपनी होने वाली सन्तान के वध तक का भय नहीं रहा। कौन है जो उसे इतना निर्भीक बना रहा है? इसी प्रकार के अनन्त प्रश्न पूरी रात कंस के मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते रहे और वह मारे बेचैनी के अपने शयन-कक्ष में कोमल बिस्तर होते हुए भी करवटें बदलता रहा और दूसरी ओर वसुदेव और देवकी उस बन्दीगृह में भी आनन्द की नींद लेते रहे।

देवकी अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘देवकी’ नामक उपन्यास-अंश में लेखक ने किसका वर्णन किया है?
उत्तर:
‘देवकी’ नामक उपन्यास अंश में लेखक ने कृष्ण के प्रसिद्ध कारागार प्रसंग का बड़ा ही सुन्दर व जीवन्त वर्णन किया है।

प्रश्न 2.
‘सत्व’ की वृद्धि होने पर किसकी शक्ति क्षीण होने लगती है?
उत्तर:
गालव ऋषि के अनुसार ‘सत्व’ की वृद्धि होने पर रजोगुण और तमोगुण की शक्ति क्षीण होने लगती है।

देवकी पाठ का सारांश

‘नरेन्द्र कोहली’ द्वारा लिखित प्रस्तुत उपन्यास अंश ‘देवकी’ में लेखक ने कृष्ण के प्रसिद्ध कारागार प्रसंग का बड़ा ही सुन्दर व जीवन्त वर्णन किया है।

मथुरा नरेश क्रूर कंस ने एक देववाणी से भयभीत होकर अपनी बहिन देवकी को कारागार में डाल दिया। देववाणी के अनुसार देवकी के आठवें पुत्र के हाथों कंस का वध निश्चित है। विधि के विधान को झूठा सिद्ध करने के उद्देश्य से कंस अपनी बहिन के सभी बच्चों का वध उनके जन्म के साथ ही करता है। कारागार में बन्द एवं कठोर यातनाएँ झेल रही देवकी पुन: एक बच्चे की माँ बनने वाली है। यह उसका आठवाँ बच्चा है। इस पर कंस की विशेष दृष्टि है, सम्भवतया इसलिए इस बार उसने पहरा और कड़ा कर दिया है। देवकी के साथ-साथ उसके पति वसुदेव पर भी चौकस दृष्टि रखी जा रही है। कारागार में अक्सर डरी-सहमी-सी रहने वाली देवकी के अन्दर अनायास ही एक अजीब-सी दैवीय शक्ति का संचार हो उठा है। वह अब कारागार की यातनाओं-कठिनाइयों को भूलकर एक अद्भुत आनन्द का अनुभव करने लगी है। वसुदेव भी देवकी के यूँ बदले हुए रूप को देखकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। अचानक कारागार में प्रद्योत और प्रलम्ब के साथ कंस का प्रवेश। देवकी की निर्भीकता और उसके व्योमातीत रूप को देखकर कंस अचम्भित एवं भयभीत है। अपनी घबराहट को छुपाने के लिए वह ऊँचे स्वर व आक्रामकता का सहारा लेता है, किन्तु देवकी के मनोबल के आगे वह जल्दी ही निढाल हो, पराजित-सा चला जाता है। मथुरा के महल में अपनी कोमल शैय्या पर लेटा हुआ कंस एक अदद नींद की कामना में करवटें बदल रहा है और इधर कारागार में वसुदेव और देवकी ऊबड़-खाबड़ फर्श पर ही आनन्द की नींद सो रहे हैं।

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