MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 12 Yachak Aur Data Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 12 Yachak Aur Data Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 12 Yachak Aur Data Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 12 याचक और दाता प्रश्न उत्तर

याचक और दाता बोध प्रश्न

Class 8 Hindi Chapter 12 Yachak Aur Data प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए।
उत्तर
याचक-माँगने वाला; धरोहर = वह वस्तु या द्रव्य जो कुछ समय के लिए दूसरे के पास इस विश्वास से रखी जाए कि माँगने पर उसी रूप में मिल जाए;  वात्सल्य = बच्चों के प्रति प्रेम हतप्रभ = निस्तेज, शिथिल, आश्चर्यचकित; गुहार = पुकार; शंका= सन्देह जिजीविषा-जीवित रहने की इच्छा; निस्तब्ध + बिना हिले-डुले; सानुभूति = हमदर्दी, संवेदना।

Class 8 Hindi Chapter 12 Mp Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए.

(क) वृद्धा मन्दिर के पास क्या काम करती थी?
उत्तर
वह बूढ़ी औरत मन्दिर के पास उसके दरवाजे पर फूलों की माला बेचा करती थी।

(ख) सेठ बनारसीदास के यहाँ किन लोगों की भीड़ लगी रहती थी?
उत्तर
सेठ बनारसीदास के यहाँ जरूरतमन्दों की भीड़ लगी रहती थी।

(ग) वृद्धा सेठजी से क्या माँगने गई थी?
उत्तर
वृद्धा सेठजी से अपनी जमा की गई हौड़ी से कुछ रुपये मांगने के लिए गई थी। वह अपने बीमार बच्चे का इलाज डॉक्टर को दिखाकर करा लेना चाहती थी।

(घ) सेठजी ने अपने बच्चे की पहचान कैसे की?
उत्तर
वृद्धा ने बच्चे को बहुत गम्भीर दशा में देखा। उसने पता नहीं, क्या सोचा ? अचानक वह उठी और बच्चे को अपनी गोद में उठाकर सेठ के घर की ओर चल पड़ी। बच्चे का शरीर ज्वर से तप रहा था। उधर वृद्धा का कलेजा भी क्रोध से जल रहा था। वह बच्चे को लेकर सेठजी के घर पहुँची और धरना देकर बैठ गई। नौकर ने सेठजी के आदेश पर भगा देना चाहा। लेकिन, वह टस-से-मस नहीं हुई। सेठजी स्वयं आए, उन्हें क्रोध आ रहा था लेकिन जैसे ही बच्चे को देखा तो उनका चेहरा निस्तेज हो गया। बच्चे का चेहरा, उनके पुत्र मोहन से मिलता-जुलता था। मोहन खो गया था। सात वर्ष पहले खोये हुए मोहन की जाँघ पर लाल चिन्ह को देखकर सेठजी ने अपने पुत्र मोहन को पहचान लिया।

(ङ) बच्चा फिर से बीमार क्यों पड़ गया ?
उत्तर
वृद्धा उस बच्चे को सेठजी को न चाहते हुए देकर अपनी झोपड़ी में आकर शान्त लेटी हुई थी। उसके आँसू बह रहे थे। उधर वह बच्चा दवाओं के प्रभाव से होश में आने लगा। उसने अपनी आँखें खोली और बोला-‘मौ’। माँ, उसके पास नहीं थी। वह रोने लगा। उसकी हालत फिर से बिगड़ने लगी। ममतामयी वृद्धा माँ के बिना वह बच्चा फिर से बीमार पड़ गया।

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भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 12 प्रश्न 3.
उपयुक्त शब्दों का चयन कर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए
जिजीविषा, ममत्व, निस्तब्ध, हतप्रभ, मकरन्द
(क) वृद्धा …………… टाट पर लेटी हुई आँसू बहा रही थी।
(ख) असहाय बच्चे को देख माँ का ………..जाग उया।
(ग) आँसुओं में फूलों का …………… और ममता की गंध थी।
(घ) सेठजी बच्चे को देखकर …………….. रह गए।
(ङ) वात्सल्य की तड़प ने वृद्धा की …………….. बढ़ा दी थी।
उत्तर
(क) निस्तब्ध
(ख) ममत्व
(ग) मकरन्द
(घ) हतभ
(छ) जिजीविषा।

MP Board Class 8 Hindi Chapter 12 प्रश्न 4.
सही जोड़ी बनाइए.
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 12 याचक और दाता 1
उत्तर
(क) + (3), (ख) → (1), (ग) + (2), (घ) → (5), (छ)→ (4).

Class 8 Hindi Chapter 12 Yachak Or Data प्रश्न 5.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए
(क) वृद्धा को उसकी मंजिल किस तरह मिल गई थी?
उत्तर
कोई बच्चा अपने माता-पिता से भटक गया। उसने देखा कि वह बच्चा असहाय था और रो रहा था। उस वृद्धा ने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठाया और उस रोते बच्चे को शान्त करने की कोशिश करने लगी। बच्चे को माँ की ममता मिल गई। उसे माँ का आँचल मिला, वह अब सब कुछ भूल चुका था। वह वृद्धा के पास रहने लगा। उस वृद्धा में वात्सल्य की तड़प बढ़ने लगी। इस तरह वह चाहने लगी कि वह काफी लम्बे समय तक जीवित रहे। अब वह पहले से अधिक मेहनत करती थी। बच्चे की वजह से वह अपने घर शीघ्र लौटने लगी। बच्चा माँ के प्यार को प्राप्त करके बहुत ही प्रसन्न था। वृद्धा अपनी झोपड़ी में गाड़कर रखी हाँडी में दिनभर की मेहनत से कमाये पैसे बचत करके रखती थी, क्योंकि उसे उस बच्चे के भविष्य की चिन्ता थी। उसकी चिन्ता में एक सुखद भविष्य की चिन्ता छिपी थी। वह उस बच्चे को अच्छे-से-अच्छा खिलाती, पिलाती और पहनाती थी। वह उसे हर तरह खुश रखना चाहती थी। इससे उसे लग रहा था कि मानो उसे उसकी मंजिल मिल गई हो। दिन भर मन्दिर के दरवाजे पर फूल बेचती और शाम को घर आकर बच्चे को अपने हृदय से लगा लेती थी। यह बच्चा मानो उसकी फुलवारी थी जिसे पोषित करके प्रेम के जल से सींचकर सेवा कर रही थी।

(ख) मोहन कौन था ? वह वृद्धा के पास कैसे आया?
उत्तर
मोहन किसी नगर के सेठ बनारसीदास का बेटा था। वह छोटी उम्र में ही अपने घर से बिछुड़ गया। उसे वृद्धा ने अपने पास रख लिया। वृद्धा का सहारा पाकर, दुलार से वह रहने लगा। माँ की ममता पाकर वह अपने माता-पिता को भूल गया। उस वृद्धा ने बड़े वात्सल्य से उसका पालन-पोषण और परवरिश की। वृद्धा भी अब बच्चे के बिना एक क्षण नहीं रह पाती थी। इस तरह वृद्धा के पास वह बच्चा आया और रहने लगा।

(ग) मोहन ज्वर से कैसे मुक्त हुआ?
उत्तर
मोहन को एक दिन ज्वर ने आ दबोचा। उसके बढ़ते प्यर को भौंपकर वृद्धा बेचैन हो गई। वृद्धा माँ ने वैध को दिखाया। उसकी दवा से कोई लाभ नहीं हुआ। वह वृद्धा सेठ बनारसीदास के पास अपनी हांडी में से कुछ धन माँगने के लिए गयी जिससे वह बच्चे का इलाज किसी डॉक्टर से करा सके, लेकिन सेठजी ने उसे यह कहते हुए लौटा दिया कि उसके पास उसने कोई धन जमा नहीं कराया है। क्रोधित वृद्धा लौट आई। बच्चे का ज्वर तेज होता देखकर वह एक दिन जाने क्या सोचते हुए. बच्चे को गोद में उठाकर सेठजी के पास पहुँची। उसने कुछ धन फिर से मांगा। मुनीम ने उसे फटकार दिया। सेठजी स्वयं उसके पास आये और उस बच्चे के पैर पर लाल चिह्न देखकर पहचाना कि वह बच्चा तो उसी का है जो आज से सात वर्ष पहले खो गया था। वृद्धा ने उस बच्चे को देने से ना-नुकर किया लेकिन सेठजी ने बच्चे को प्राप्त कर लिया। वृद्धा वहाँ से चली गई। उसका अच्छे डॉक्टर से इलाज कराया। दवा के प्रभाव से कुछ होश आने पर बच्चे ने ‘माँ’ को पुकारा। बच्चे की हालत फिर से खराब हो गई। सेठजी वृद्धा के घर पहुँचे, वृद्धा को अनुनय-विनय से लाये। माँ के ममता भरे हाथ का स्पर्श पाकर बालक सचेत हुआ और उस बालक को ज्वर से मुक्ति मिली।

(घ) ‘सेठ याचक था और वह दाता’, इस वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
वृद्धा ने सेठजी के घर जाकर मोहन के माथे पर हाथ फेरा। मोहन ने हाथ को पहचान लिया; उसने अपनी आँखें तुरन्त खोल दी। कहने लगा,’माँ’, तुम आ गई। वृद्धा कहने लगी, “हाँ बेटा, तुम्हें छोड़कर कहाँ जा सकती हूँ। उसने मोहन का सिर गोद में रखा, थपथपाया। मोहन की नींद आ गईं। कुछ दिन बाद मोहन
स्वस्थ हो गया। जो काम दवाइयाँ, डॉक्टर और हकीम नहीं कर सके, वह काम वृद्धा माँ की ममता ने कर दिखाया।” – अब वह वृद्धा माँ वापस लौटने लगी तो सेठजी ने उससे कहा कि वे मोहन के ही पास रुक जाएँ, लेकिन वे नहीं मानी। सेठजी हाँडी के रुपये न देने के लिए क्षमा माँगने लगे और वह हाँडी लौटाने लगे तो वृद्धा ने कहा कि यह तो मैंने मोहन के लिए जमा किये थे। उसी को दे देना।

वृद्धा ने सेठजी की धरोहर (मोहन) ईमानदारी से लौटा दो। अब वह उसे यहाँ छोड़कर अपनी लाठी का सहारा लेकर चलती हुई अपनी झोपड़ी में लौट गई। उसके नेत्रों से आँसू बह रहे थे, परन्तु यह आँसू फूलों के पराग से, ममता की महक से महक रहे थे। वृद्धा माँ का ममत्व सेठ बनारसीदास के धन से अधिक गरिमावान सिद्ध हुआ। इस तरह सेठजी याचक थे और वृद्धा माँ दाता के रूप में महान और उदारता की साक्षात् मूर्ति सिद्ध हुई।

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(छ) सेठजी और वृद्धा के चरित्र में से किसका चरित्र आपको अच्छा लगा ? उसकी कोई तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
सेठजी और वृद्धा के चरित्र में से वृद्धा का चरित्र प्रशंसनीय है, महान् है। वृद्धा के चरित्र में जो गम्भीरता, ममता का भाव, किसी भी भेदभाव से रहित दीखता है, उसका सेठजी के चरित्र में पूर्णतः अभाव ही है। वृद्धा बच्चे का पालन-पोषण बिना किसी स्वार्थ से करती है, वह बच्चे में अपनी ममता उड़ेल देती है। उसे अपने आँचल की छाया प्रदान करती है। वह उस बच्चे के पालन-पोषण के लिए जीवित रहने की इच्छा करती है। वृद्धा के चरित्र की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं जो सभी पाठकों को प्रभावित करती हैं। उनमें उत्साह और त्याग का भाव भर देती हैं।

  1. वात्सल्यमयी माँ का ममत्व-वृद्धा में बच्चे के प्रति प्रेम और उसकी ममता भरी हुई है।
  2. सेवा परायणता-वृद्धा बच्चे की हर तरह से परवरिश करती है। विपरीत परिस्थिति में भी अपने ध्येय में लीन होकर उत्तरदायित्व को निभाती है।
  3. त्याग और भेदभाव से रहित-वृद्धा त्याग की साक्षात् मूर्ति है। इकट्ठे किये गये हौड़ी के धन को सेठ को ही सौंपकर धन्य होती है। सेठजी के बच्चे का पालन-पोषण अपने-तेरे को भावना से ऊपर उठकर करती है।

याचक और दाता भाषा-अध्ययन

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 12 प्रश्न 1.
इस कहानी में ऐसे पाँच वाक्य लिखिए जहाँ अवतरण चिह्न का प्रयोग किया गया है।
उत्तर

  1. दर्शन करने वालों को वृद्धा पुकारती, और कहती-“ये फूल चढ़ावा तो लेते जाओ।”
  2. वृद्धा ने हाँडी सेठजी को सरकाते हुए कहा-“सेठजी, इसे जमा कर लें। मैं इसे कहाँ रखती फिरूंगी।”
  3. सेठजी ने मुनीम से कहा-“इसे बहीखाते में इसके नाम में जमा कर लो।”
  4. वृद्धा ने विनम्र भाव से कहा-“मेरा बच्चा बहुत बीमार है। मेरी जमा हाँडी से मुझे कुछ रुपये मिल जाएँ तो मैं डॉक्टर को दिखाकर उसका इलाज करा लूँ।”
  5. वृद्धा ने कहा-“सेठजी अभी दो वर्ष पहले ही तो मैंने हाँडी में जमा पूँजी आपके यहाँ जमा की थी।”

Bhasha Bharti Class 8 Chapter 12 प्रश्न 2.
निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए
टस से मस न होना, हाथ-पाँव फूल जाना, चंगुल में दबाना, ताँता बाँधना, जान में जान आना।
उत्तर

  1. टस-से-मस न होना-एक स्थान से न हटना।
    वाक्य-प्रयोग-धरने पर बैठे शिक्षक, धरना स्थल से टस से मस नहीं हुए। .
  2. हाथ-पांव फूल जाना-घबरा जाना।
    वाक्य-प्रयोग-पिताजी के मूलित हो जाने पर, हमारे हाथ-पाँव फूल गये।
  3. चंगुल में दबाना-वश में (कब्जे में) कर लेना।
    वाक्य-प्रयोग-शत्रु सैनिकों को चंगुल में दबाने के लिए। पूरा-पूरा जोर लगाना पड़ा।
  4. तांता बाँधना-लगातार बढ़ते जाना।
    वाक्य-प्रयोग-शत्रुओं पर आक्रमण करने के लिए। भारतीय सैनिक ताँता बाँधकर आगे ही आगे बढ़ते गये।
  5. जान में जान आना-चैन पड़ना।
    वाक्य-प्रयोग-ऑपरेशन के बाद मरीज जैसे ही होश में आया तो उसके घर वालों की जान में जान आई।

MP Board Class 8th Hindi Chapter 12 प्रश्न 3.
‘याचक’ एवं ‘दाता’ शब्दों के क्रिया रूप लिखकर संज्ञा और क्रिया रूपों के वाक्य बनाइए।
उत्तर
याचक और दाता शब्दों के क्रिया रूप याचना तथा दान देना होता है।
संज्ञा रूप में वाक्य प्रयोग –

  1. याचकों का तांता लग जाता है।
  2. याचक याचना करते हैं।
  3. दाता याचकों में भेद नहीं करता।
  4. दानी लोग प्रतिदिन दान देते हैं।

Hindi Chapter 12 Class 8 Mp Board प्रश्न 4.
‘दुखिया’ शब्द के दुख शब्द में ‘इया’ प्रत्यय लगा है-दुख + इया = दुखिया। इसी प्रकार ‘इया’ एवं ‘वाला’ प्रत्यय लगाकर शब्द बनाइए।
उत्तर

  1. दुख + इया-दुखिया सुख+इया – सुखिया; बन + इया – बनिया; लख + इया – लखिया; लिख + इया – लिखिया, धन + इया – धनिया।
  2. दूध + वाला-दूधवाला, फल + वाला – फलवाला, पान + वाला = पानवाला, दुकान + वाला = दुकानवाला, घर + वाला-घरवाला।

Class 8 Chapter 12 Hindi Mp Board प्रश्न 5.
‘अ’ और ‘वि’ उपसर्ग लगाकर शब्द बनाइए।
उत्तर

  1. अ+शुभ-अशुभ;अ+शुद्ध-अशुद्ध;अ+ पवित्र = अपवित्र अ + पावन = अपावन अ+ चल-अचल।
  2. वि+कार-विकार; वि+नाश = विनाश वि+लीन -विलीन; वि+लाप – विलाप; वि + लेप- विलेप।

Class 8 Mp Board Hindi Chapter 12 प्रश्न 6.
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए
एक दिन सिद्धार्थ बगीचे में बैठे हुए थे। अचानक उनके सामने एक घायल, एक तीर से बिंधा हुआ हंस आ गिरा। सिद्धार्थ ने उसे प्यार से उठाया, घाव पर मलहम लगाया। तभी उनका चचेरा भाई देवदत्त आ पहुँचा। उसने हंस मांगा। सिद्धार्थ ने हंस देने से मना कर दिया। विवाद राजा के दरबार तक जा पहुंचा। देवदत्त का कहना था कि उसने हंस का शिकार किया है, इसलिए हंस उसका है। सिद्धार्थ ने कहा कि मैंने हंस के प्राणों की रक्षा की है, इसलिए हंस पर मेरा अधिकार है। राजा ने न्याय करते हुए कहा कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। अतः हंस पर सिद्धार्थ का अधिकार बनता है। राजा ने सिद्धार्थ को हंस दे दिया।
(अ) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए
(आ) घायल हंस को किसने उठा लिया था ?
(क) देवदत्त हंस को क्यों मांग रहा था?
(ई) राजा ने क्या कहते हुए हंस सिद्धार्थ को सौंप दिया ?
(उ) राजा, दिन, तीर, प्यार के दो-दो समानार्थी शब्द लिखिए।
उत्तर
(अ) उपयुक्त शीर्षक-‘हंस और सिद्धार्थ
(आ) घायल हंस को सिद्धार्थ ने उठा लिया था।
(इ) देवदत्त हंस को इसलिए मांग रहा था क्योंकि उसने हंस को तीर से घायल कर दिया था। उसका कहना था कि घायल किये जाने से हंस पर उसका अधिकार है।
(ड) राजा ने हंस सिद्धार्थ को सौंप दिया। राजा का कहना था कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।
(ज) समानार्थी

  1. राजा = नृप, भूप।
  2. दिन = दिवस, वासर।
  3. तीर = बाण, सायक।
  4. प्यार = प्रेम, स्नेह।

याचक और दाता परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) सुबह से शाम तक वह उसी तरह सबका जीवन महकाती
और रात्रि को मन ही मन भगवान को प्रणाम कर लाठी टेकती, झोंपड़ी की राह पकड़ती। झोंपड़ी के समीप आते ही दस वर्षीय बालक उछलता-कूदता उससे लिपट जाता। वृद्धा उसे टटोलती, दुलारती और माथे को चूमकर जैसे पूरा प्यार उड़ेलने का प्रयास करती।

शब्दार्थ-महकाती = सुगन्ध से भर देती; राह = मार्ग, रास्ता; पकड़ती = चली जाती; समीप = पास; वर्षीय = वर्ष का; वृद्धा – बूढ़ी औरत; दुलारती = प्रेम करती; चूमकर = पुचकारते हुए।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक भाषा-भारती” के पाठ ‘याचक और दाता से अवतरित है। इसके लेखक रवीन्द्रनाथ ठकुर है।

प्रसंग-एक बूढ़ी औरत की ममता और उसके प्रतिदिन के कार्य का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-वह बूढ़ी औरत रोजाना सन्दिर के दरवाजे पर प्रात:काल से लेकर सायंकाल तक आने वाले दर्शनार्थी लोगों के जीवन को खुशबू से भर देती थी। रात्रि होने पर मन ही मन भगवान को नमस्कार करके मन्दिर के दरवाजे से लौट पड़ती। उसके हाथ में लाठी होती थी। उसका सहारा लिए हुए, अपने निवास, उस झोंपड़ी की ओर जाने वाले मार्ग पर लौट पड़ती। जैसे ही वह अपनी झोपड़ी के पास आती, तो एक दस वर्ष का बालक उछल-कूद करता हुआ उसके पास आता और प्रेमपूर्वक उससे लिपट पड़ता था। उस समय वह बूढ़ी औरत उस बालक के शरीर पर हाथ फेरती हुई उसके पूरे अंगों को टटोलती, देखती कि कहीं कुछ कमजोरी तो नहीं आ गई है। इस प्रकार, वह उससे बहुत-सा प्यार करती। उसके मस्तक पर बार-बार चुम्बन लेती। इस तरह वह उसके ऊपर अपने अन्दर के असीम अतौल प्यार को उड़ेल देती थी।

(2) असहाय और रोते बच्चे को वृद्धा ने अपनी गोद में बिठाया और उसे चुप कराने का प्रयास करने लगी। ममता का आँचल पाकर बच्चा सब कुछ भूल गया था। इस तरह वह वृद्धा के पास रहने लगा। वात्सल्य की तड़प ने वृद्धा की जिजीविषा बढ़ा दी। अब वह पहले से ज्यादा श्रम करती और शीघ्र लौटने की कोशिश करती। बच्चा माँ के स्नेह को पाकर प्रसन्न था।

शब्दार्थ-असहाय =बिना सहारे वाला; वृद्धा = बढ़ी औरत ने; चुप कराने का शान्त कराने का प्रयास = कोशिश; ममता का आँचल = प्यार और लगाव की शरण या आश्रय; वात्सल्य = सन्तान के प्रति प्रेम तड़प = खिंचाव, आकर्षण; जिजीविषा = जीवित रहने की इच्छा; श्रम = मेहनत; स्नेहप्रेम प्रसन्न = खुश।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-बालक उस बूढ़ी औरत के प्रेम को प्राप्त करके बहुत खुश था।

व्याख्या-यह बालक अपने माता-पिता से बिछुड़ा हुआ बालक था। उस बालक से सभी अपरिचित थे। सन्ध्या का समय था। उस बूढी औरत ने उस बिछुड़े बालक को अपनी गोद में बिछाया। उस रोते बालक को शान्त कराने की, उस बूढ़ी औरत ने बड़ी कोशिश की। बच्चा रोने से शान्त हुआ। उसे प्यार और माँ के प्रेम का आँचल (छाया, शरण) मिल चुकी थी। वह, अब, अपने वास्तविक माता-पिता को भूल गया था। यह सब उस बूढ़ी औरत के प्यार और आकर्षण के कारण ही सम्भव हो सका। वह बूढ़ी औरत ही उसके लिए सब कुछ थी। उसके पास रहकर सब कुछ भूल गया। इधर, उस बूढ़ी औरत के अन्दर सन्तान के प्रति प्रेम के खिचाव ने जीवित रहने की इच्छा प्रबल कर दी। वह यह समय था जब उसे पहले से भी अधिक मेहनत करनी पड़ रही थी क्योंकि उसे पाये हुए उस बालक के पालन का उत्तरदायित्व निभाना था। अब वह मन्दिर के दरवाजे से पहले की अपेक्षा जल्दी लौटकर आने की कोशिश करती थी। माँ का प्यार इस बच्चे को मिला, इस कारण वह बहुत ही खुश था।

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(3) सेठजी वृद्धा के पाँवों में गिरकर बच्चे की जान बचाने वी याचना करने लगे। वे बोले-“ममता की लाज रख लो।” माँ का ममाव जाग उठा। वह बीता हुआ सब कुछ भूल गई और सेठजी के साथ चल पड़ी। घर पहुँचते ही वृद्धा ने मोहन के माथे पर हाथ फेरा । हाश्व पहचानते ही मोहन ने तुरन्स आँखें खोल दीं। माँ, तुम आ गई। वृद्धा ने कहा, “हाँ बेटा, तुम्हें छोड़कर कहाँ जा सकती हूँ।” उसने मोहन का सिर अपनी गोद में रखकर थपथपाया और मोहन को नींद आ गई। कुछ दिन बाद मोहन बिल्कुल स्वस्थ हो गया। जो बाम दवाइयों, डॉक्टरों और हकीमों से न हो पाया वह वृद्धा माँ की ममता ने ममता- माँ के प्यार की; ममत्व-माँ के प्यार की भावना; बीता हुआ-जो घटना घटी उस सबको; बिल्कुल- पूर्ण रूप

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-माँ की ममता के महत्त्व को बताया गया है।

व्याख्या-सेठजी वृद्धा की झोंपड़ी पर आये। उसके पैरों पर गिर गये, वे प्रार्थना करने लगे कि उसके पुत्र के प्राणों की रक्षा तुम ही कर सकती हो। सेठ ने आगे कहा कि तुम्हें एक माँ के प्यार की, ममता की लाज रखनी है। माँ की ममता जागृत हो उठी। वह यूढ़ी औरत अब वह सब कुछ भूल गई,जो भी कुछ अभी तक घटित हुआ। वह तुरन्त ही सेठजी के साथ चल पड़ी। वह बूढ़ी औरत सेठजी के घर पहुँच गई। वहाँ पहुँचते ही मोहन के सिर और माथे पर अपना हाथ फेरने लगी। मोहन ने उसके (बड़ी औरत के) हाथ को पहचान लिया और एकदम से अपनी आँखें खोल दी। मोहन ने पुकारते हुए कहा कि माँ, तुम आ गई। उस | बूढ़ी औरत ने कहा-बेटा, मैं आ गयी हूँ। मैं तुम्हें छेड़कर कहाँ । जा सकती हूँ। अर्थात् मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकती। उस बूढ़ी औरत ने मोहन के सिर को अपनी गोद में रख लिया। उसे धपकियाँ देने लगी, इस प्रकार मोहन सो गया। अब धीरे-धीरे मोहन के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। किसी भी डॉक्टर और हकीम की दवाइयों ने । कोई भी लाभ उसे नहीं पहुँचाया परन्तु बूढी माँ के प्यार ने, उसकी – ममता ने इसे पूर्णतः स्वस्थ कर दिया।

(4) “वृद्धा, सेठजी की धरोहर ‘मोहन’ को सेठजी के यहाँ छोड़कर, लाठी टेकती हुई, झोंपड़ी में लौट आई। उसके नेत्रों से आँसू बह रहे थे, पर आज इन आँसुओं में फूलों का मकरन्द और ममता की गंध थी। वह आज सेठ बनारसीदास से महान् हो गई थी। सेठ याचक था और वह दाता।”

शब्दार्थ-धरोहर = वह वस्तु या द्रव्य जो कुछ समय के लिए दूसरे के पास इस विश्वास से रखी जाए कि मांगने पर उसी रूप में वापस मिल जायेगी; मकरन्द = पराग; गंध-महक; महान् = बड़ी हो गई थी बन गई थी; याचक-भिखारी दाता= दान देने वाली।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह। प्रसंग-बूढ़ी औरत की विशेषताओं का उल्लेख किया गया

व्याख्या-उस ममता भरौ बूढ़ी औरत ने सेठ बनारसीदास के पुत्र मोहन को उसके वास्तविक माता-पिता के पास छोड़ दिया। मोहन वास्तव में सेठजी की धरोहर थी, उसे तो लौटाना ही था। वह अपनी लाठी के सहारे, वहाँ से (सेठजी के घर से) लाठी टेकते-टेकते अपनी झोपड़ी में लौटकर आ गई। उसकी आँखों में फूलों का पराग था। उन आँसुओं में माँ के गहरे प्रेम की महक थी। आज वह अपने ममत्व और सेवाभाव के साथ त्याग की महिमामयी मूर्ति थी। सेठ बनारसीदास को भी अपने महान् व्यक्तित्व से पीछे छोड़ दिया। उस दशा में सेठ बनारसीदास एक भिखारी थे जबकि वह एक उदार दानदाता के समान थी।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 9 Birsa Munda Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 9 Birsa Munda Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 9 Birsa Munda Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 9 बिरसा मुण्डा प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

Class 8 Hindi Chapter 9 Birsa Munda प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
जीवन-वृत्त =जीवनी या जीवन परिचय; जागृति = चेतना; उद्धारक = उद्धार करने वाला, तारने वाला; चौपट : होना = बरबाद हो जाना; कारागार = कैदखाना, जेल; पथ = मार्ग, रास्ता; मुग्ध = मोहित हो जाना; प्रारम्भिक = शुरू की; बियावान = निर्जन; धूमिल = धूल में लिपट जाना, धूलधूसरित हो जाना; पीड़ादायी = कष्ट देने वाली; उपासना = पूजा; तत्कालीन = उस समय की; शोषण = काम करने पर मजदूरी न दिया जाना; उपचार = इलाज; दासता = गुलामी; नाद = स्वर; सामान्य = साधारण; सदी = शताब्दी; कथन = कहावत, कहना; बर्बरता = निर्दयता, क्रूरता।

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 9 प्रश्न 2.
दिए गये विकल्पों में से सही विकल्प चुनकर लिखिए
(क) बिरसा मुण्डा का सम्बन्ध निम्नलिखित में से वर्तमान के किस राज्य से था ?
(1) झारखण्ड
(2) बिहार
(3) छत्तीसगढ़।
उत्तर
(1) झारखण्ड

(ख) मुण्डा समाज के आराध्य देव ‘सिंग’ का अर्थ है
(1) सिंह
(2) सींग
(3) सूर्य।
उत्तर
(3) सूर्य।

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Class 8 Hindi Chapter 9 Mp Board प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए
(क) बिरसा मुण्डा को लूथरन मिशन स्कूल क्यों छोड़ना पड़ा?
उत्तर
बिरसा मुण्डा को लूथरन मिशन स्कूल इसलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि वहाँ उन्हें दासता का अनुभव हो रहा था। उन्होंने ऐसे दृश्य देखे जिनमें मुण्डा लोगों का शोषण किया जा रहा था। इससे उन्हें बहुत कष्ट हुआ और बिरसा ने अंग्रेजों के कारनामों पर टीका-टिप्पणी करना शुरू कर दिया।

(ख) बिरसा रोगियों का उपचार कैसे करते थे ?
उत्तर
बिरसा रोगियों का उपचार जड़ी-बूटियों से करते

(ग) मुण्डा जनजाति के लोग बिरसा को क्यों मानते थे?
उत्तर
बिरसा ने गाँववासियों और आसपास के लोग जो उनके पास आये, उनका जड़ी-बूटियों से इलाज किया। उन्हें स्वस्थ रहने के उपाय बताए। इस तरह वे उपदेशक भी बन गये। उन्हें लोग अवतारी पुरुष मानने लगे और उनका आदर भाव बढ़ता गया।

(घ) अंग्रेजों ने बिरसा का दाह-संस्कार सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं किया ?
उत्तर
स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी के रूप में बिरसा को अंग्रेजों ने पकड़ लिया। वे स्वतन्त्रता की ज्योति लोगों में जगा चुके थे। बन्दी बनाये जाने से पूर्व बिरसा बीमार चल रहे थे। अदालत में पेश करने पर उनकी दशा बिगड़ गयी। उन्हें खून की उल्टियाँ होने लगी। बिरसा जो मुण्डा समाज का उद्धारक था, सदा के लिए सो गया। इसलिए उपद्रव के भय से अंग्रेजों ने बिरसा का दाह-संस्कार सार्वजनिक रूप से नहीं किया।

(ङ) बिरसा मुण्डा ने किस उद्देश्य से अपना आन्दोलन प्रारम्भ किया?
उत्तर
बिरसा मुण्डा ने मुण्डाओं को अंग्रेजों के अत्याचारों से तथा शोषण से मुक्ति दिलाने और भारत को आजाद कराने के उद्देश्य से अपना आन्दोलन प्रारम्भ किया।

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MP Board Class 8 Hindi Chapter 9 प्रश्न 4.
खाली स्थान भरिए
(क) …………….. के कारण ओझा लोगों का काम चौपट हो रहा था।
(ख) मुण्डा लोगों के प्रमुख अस्त्र-शस्त्र ………… और
(ग) पुरस्कार के ………… में कुछ लोगों ने बिरसा को पकड़वा दिया।
उत्तर
(क) बिरसा मुण्डा
(ख) भाले, तीर-कमान
(ग) लालच।

Bhasha Bharti Class 8 Chapter 9 प्रश्न 5.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए
(क) प्रस्तुत पाठ से हमें आज से सौ वर्ष पूर्व के आदिवासियों के जीवन की क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर
आज से सौ वर्ष पूर्व के आदिवासियों ने भी भारत की आजादी के लिए अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई और इनमें आजादी की भावनाओं को स्वर देने का काम बिरसा मुण्डा ने किया। मुण्डा भारत की प्रमुख जनजाति है जो राँची और उसके आस-पास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में निवास करती है। मुण्डा जाति बहुत ही सरल जीवन बिताने वाली जाति है। वह अपने जीवनयापन के लिए पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर करती है।

मुण्डा समाज ‘सिंग’ और ‘बोंगा’ की उपासना करते हैं। ‘सिंग’ का अर्थ सूर्य होता है तथा ‘बोंगा’ मुण्डा समाज की देवी है। अन्य जनजातियों की भाँति मुण्डा समाज में भी काफी जागृति आ गई है। विदेशी दासता की जंजीरों से मुक्त होने के लिए तत्कालीन उरांव, मुण्डा और खड़िया जनजातियों ने बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिए थे।

मुण्डा जाति के लोग निर्धन और अशिक्षित थे। उनकी शिक्षा के लिए कुछ मिशनरी विद्यालय थे। जहाँ उन्हें ईसाई धर्म में दीक्षित करने की कोशिश होती थी। वे ओझाओं के झाड़-फूंक में विश्वास करते थे। उन्हें अपनी जमीन से बेदखल कर दिया गया था। पंच-पंचायतें समाप्त कर दी गई थीं। इस तरह वे भूख और दमन के कारण असहाय थे।

(ख) बिरसा मुण्डा के आन्दोलन के क्या कारण थे ?
उत्तर
बिरसा मुण्डा के आन्दोलन के निम्नलिखित कारण

  1. मुण्डा जाति को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया था।
  2. उनके पंच-पंचायत समाप्त कर दिये गये।
  3. उनकी जमीन पर जींदार और दलाल थोप दिये गये।
  4. मुण्डा जाति के लोगों के जंगलों पर अंग्रेजी शासन ने अपने दलालों और लोगों को मालिक बना दिया। वे मालिक से नौकर हो गये।
  5. उन्हें बेगार में घसीटा जाता। उनका शोषण होता था।
  6. आर्थिक तंगी का मामला बिरसा मुण्डा के आन्दोलन का सबसे बड़ा कारण था। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी।

(ग) “भारतीय इतिहास का एक सत्य यह भी है कि भारत जब भी विदेशियों से पराजित हुआ, तो देशद्रोहियों के कारण,” प्रस्तुत पाठ के सन्दर्भ में इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर
बिरसा मुण्डा ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीव्र आन्दोलन शुरू कर दिया। उनका यह आन्दोलन अन्याय और शोषण के विरुद्ध था। यह आन्दोलन मानवता की रक्षा के लिए था। उन दिनों प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानियों में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब, कुंवर सिंह आदि की वीरता की कहानियाँ लोगों के मुँह पर थीं।

जनमत अंग्रेज शासकों के विरुद्ध था। सामाजिक आन्दोलन ने राजनैतिक रूप धारण कर लिया था। बिरसा मुण्डा ने इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया। मुण्डा और दूसरी जनजातियाँ भाले और तीर कमान लेकर चारकाड़ गाँव में एकत्र हो गये। बिरसा की क्रान्तिकारी गतिविधियों से डिप्टी कमिश्नर और जिला पुलिस अधीक्षक बहुत परेशान हो गये। बिरसा को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। राँची जेल में डाल दिया गया। सजा पूरी होने के बाद सामाजिक जागरण को स्वतन्त्रता-संग्राम का नाम दे दिया गया। बिरसा ने बैठकें शुरू की जिसकी सूचना शासन को लग गई और इनके विरुद्ध वारंट कट गया। इन्हें पकड़ने के लिए इनाम घोषित हुए। इनाम के लालच में किसी ने सोते हुए बिरसा को पकड़वा दिया। इन सभी घटनाओं से सिद्ध होता है कि भारत की पराजय का मुख्य कारण यहाँ के देशद्रोही ही रहे हैं।

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(घ) बिरसा मुण्डा ने किस उद्देश्य से अपना आन्दोलन प्रारम्भ किया ?
उत्तर
बिरसा मुण्डा ने देखा कि मुण्डा और जनजातियों की आर्थिक दशा बहुत ही दयनीय हो चुकी है। इसका मुख्य कारण था कि अंग्रेजों ने उन्हें उनके खेतों से बेदखल कर दिया। वे इन खेतों के मालिक थे। वे फसलें उगाते थे। उनकी ग्राम व्यवस्था थी। पंच-पंचायतें थीं। उनका रहन-सहन परम्परागत था। अंग्रेजों ने उन सबको नष्ट करके जींदार, जागीरदार, जंगल के ठेकेदार और दलाल उन पर लाद दिए। वनवासी अपनी ही जमीन पर मालिक से नौकर हो गये। वे भूख और दमन से स्वयं को असहाय समझने लगे। ऐसी स्थिति में बिरसा मुण्डा ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीव्र आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। यह आन्दोलन अन्याय और शोषण के विरुद्ध था, मानवता की रक्षा के लिए था। मुण्डा समाज की दबी भावनाएँ उभरकर आ गई। सामाजिक आन्दोलन ने राजनैतिक रूप धारण कर लिया था। बिरसा मुण्डा इन गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प ले लिया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने हमें बहुत लूटा है, अब हम इन्हें सहन नहीं करेंगे।

(ङ) प्रस्तुत पाठ के आधार पर बिरसा मुण्डा के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
(1) स्वतन्त्रता की भावना – बिरसा अपने बचपन से ही एक होनहार देशभक्त बालक था। उसमें अपने समाज के उत्थान के लिए सब कुछ कर गुजरने की तीव्र इच्छा थी। वह अपने विद्यार्थी जीवन से ही स्वतन्त्र प्रकृति का व्यक्ति था। वह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध था। उसने लोगों को स्वतन्त्रता और अपने जीवन मूल्यों को समझने की बात बतायी। जड़ी-बूटियों के द्वारा बीमारियों का इलाज करना सीखा, इससे उनमें स्वदेशी की भावनाओं की तीव्रता का पता चलता है।

(2) संगठनकर्ता – उन्होंने अपने समाज के लोगों को एकत्र किया, उनको संगठित करके अपनी भावना बतायी। उन लोगों में अपने सम्मान, देश के सम्मान की रक्षा करने की भावना जाग्रत कर दी।

(3) मातृभूमि की आजादी-देश की आजादी के लिए उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया। अंग्रेज सरकार के जुल्मों को सहा। देश की आजादी का सपना पूरा तो नहीं हो सका, परन्तु समाज में आजादी की चेतना जागृत कर दी। स्वतन्त्रता संग्राम में उनका नाम अमर रहेगा।

भाषा-अध्ययन

Hindi Chapter 9 Class 8 Mp Board प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के मानक हिन्दी शब्द लिखिए
हुक्म, जवान, सजा, इनाम, पेश, तबीयत।
उत्तर

  1. आदेश
  2. युवक
  3. दण्ड
  4. पुरस्कार
  5. प्रस्तुत
  6. स्वास्थ्य।

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 9 प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास विग्रह करके समास का नाम लिखिए।
जीवनवृत्त, शैशवकाल, शंखनाद, टीका-टिप्पणी, जड़ी-बूटी, बहला-फुसला, गाँववासी।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 9 बिरसा मुण्डा 1

MP Board Class 8th Hindi Chapter 9 प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करके सन्धि का नाम बतलाइए
तत्कालीन, उद्धारक, तन्मय, सत्याग्रह, युवावस्था।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 9 बिरसा मुण्डा 2

Class 8 Chapter 9 Hindi Mp Board प्रश्न 4.
सही विकल्प चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए
(अ) तन्मयता’ शब्द में ……… प्रत्यय है। (यता, ता, मयता)
(आ) ‘बेबस’ शब्द में ……. उपसर्ग है। (बेव, बे, स)
(इ) ‘दयनीय’ शब्द में ……..प्रत्यय है। (इय, नीय, य)
(ई) ‘राजनैतिक’ शब्द में …… प्रत्यय है। (तिक, इक, क)
उत्तर
(अ) ता, (आ) बे, (इ) नीय, (ई) इक। .

Class 8th Hindi Chapter 9 Mp Board प्रश्न 5.
निम्नलिखित पर्यायवाची शब्दों में से जो शब्द सही पर्यायवाची नहीं है, उन्हें अलग करके लिखिए।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 9 बिरसा मुण्डा 3

बिरसा मुण्डा परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या

(1) इस समय वे युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे। निष्कासन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। बिरसा मुण्डा पीडित लोगों की सेवा में जुट गए हैं। वे बीमार व्यक्तियों का उपचार जड़ी-बूटी की सहायता से करने लगे। बीमार लोगों की भीड़ उनके यहाँ एकत्र होने लगी। उपचार के लिए वे दूसरे गाँवों में भी जाते थे। लोगों का विश्वास था कि बिरसा को कोई सिद्धि प्राप्त है। बिरसा के कारण ओझा लोगों का काम चौपट हो रहा था।

शब्दार्थ-युवावस्था = जवानी; निष्कासन = निकालने से, अलग कर देने से, हटा देने से पीड़ित = दुःखी; जुट गए = लग गए; उपचार = इलाज; एकत्र = इकट्ठे, विश्वास = भरोसा; सिद्धि – सफलता; चौपट हो रहा था = नष्ट हो रहा था, समाप्त हो रहा था।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती’के पाठ ‘बिरसा मुण्डा से अवतरित हैं।

प्रसंग-बिरसा मुण्डा की समाज और देश-सेवा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-बिरसा को चाईबासा के लूथरन मिशन स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। वहाँ पर वे अंग्रेजों के कष्टदायक कारनामों पर टीका-टिप्पणी करते थे। इसके लिए विद्यालय के प्रबन्धकों ने बिरसा पर दबाव डाला कि वे अंग्रेजों के विषय में कुछ भी न कहें लेकिन उन्होंने वैसा करने से इन्कार कर दिया।
उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया। पढ़ाई छूट गई। यह उनकी युवावस्था में प्रवेश का समय था। विद्यालय से निकाल दिये जाने से, उनके जीवन की दिशा में बदलाव आ गया। बिरसा ने दुःखी लोगों की (बीमारियों से पीड़ित लोगों की सेवा करना शुरू कर दिया। इन रोगियों का इलाज उन्होंने जड़ी-बूटियों की मदद से शुरू कर दिया। उनके द्वारा इस इलाज में जड़ी-बूटियों की सहायता ली जाती थी। अब बीमार लोगों की भीड़ उनके निवास पर लगना शुरू हो गई। लोगों के रोगों के इलाज के लिए, वे दूसरे गाँवों को भी जाया करते थे। अब लोगों में बिरसा मुण्डा के प्रति विश्वास पैदा हो गया था। वे कहने लगे कि बिरसा ने कोई सिद्धि प्राप्त कर ली है। इस प्रकार, झाड़-फूंक करने वाले ओझाओं का काम ठप्प हो गया। उनकी रोजी-रोटी में बाधा पड़ गयी।

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(2) बिरसा के प्रति लोगों का आदर भाव उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा था। बिरसा के पास दूर-दूर के गांवों से लोग आने लगे। उन दिनों जनजातियों की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। इसके पूर्व वे अपनी जमीन के मालिक थे। वे फसलें उगाते थे। उनकी अपनी ग्राम-व्यवस्था थी। पंच-पंचायतें थीं और रहन-सहन का अपना परम्परागत ढंग था। पर अंग्रेजों ने उन सबको नष्ट करके जमींदार, जागीरदार, जंगल के ठेकेदार और दलाल उन पर लाद दिए। वनवासी अपनी ही जमीन पर मालिक से नौकर हो गए। विवशतावश, भूख और दमन के कारण वे अपने आपको और असहाय समझने लगे।

शब्दार्थ-उत्तरोत्तर =अधिक से अधिक आर्थिक स्थिति = धन सम्बन्धी दशा; दयनीय = सोचनीय, दीन; मालिक = स्वामी; व्यवस्था = इन्तजाम, प्रबन्ध; परम्परागत – पहले से चला आने वाला; ढंग = तरीका; नष्ट करके = समाप्त करके लाद दिए = थोप दिए गए; वनवासी = जंगलों में रहने वाले; विवशतावश – विवश होकर, लाचारी के कारण दमन के कारण = कुचले जाने से; असहाय = किसी भी प्रकार की सहायता से रहित।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-बिरसा मुण्डा के प्रति लोगों का सम्मान बढ़ता जा रहा था। दूसरी ओर उन्हें मालिक से मजदूर बना दिया गया, इन अंग्रेजों की नीति से इस बात का वर्णन किया जा रहा है।

व्याख्या-बिरसा ने लोगों के रोगों का इलाज जड़ी-बूटियों की सहायता से करना शुरू रखा। इससे लोगों में बिरसा का आदर-सम्मान अधिक से अधिक बढ़ता चला गया। अपने इलाज के लिए दूर-दूर गाँवों से लोग बिरसा के पास आने लगे। ये जनजातियाँ जंगलों में रहती थीं। इनकी आर्थिक दशा बहुत ही सोचनीय थी। वे लोग बहुत ही गरीब थे। इस स्थिति से पहले वे लोग अपनी-अपनी जमीन-जायदाद के स्वयं मालिक थे, वे अपने खेतों में स्वयं खेती करते थे। उनमें फसल उगाते थे। वे अपने ही तरीके से गाँव का इन्तजाम करते थे। वहाँ के पंच फैसला करते थे। इनकी पंचायतें होती थीं। इन जनजातियों के लोग अपने ही ढंग से-तौर-तरीके से रहते थे। उनके रहन-सहन की व्यवस्था

पुरानी रीतियों के आधार पर चली आ रही थी, परन्तु अंग्रेजों ने यहाँ आकर उन परम्पराओं, रीति-रिवाजों, पंच-पंचायतों को नष्ट कर दिया। उन लोगों के ऊपर जमींदार बैठा दिए। जंगलों को ठेके । पर ठेकेदार को दे दिया गया। बीच में अनेक तरह के दलाल उन – लोगों के ऊपर नियुक्त कर दिए। इस प्रकार वनवासी लोग, जो : अपनी जमीन के मालिक थे, अब नौकर हो गये। उनकी लाचारी थी। वे भूख से पीड़ित थे। उनके ऊपर दमन चक्र चलाया जा रहा था। इस तरह वे अपने आपको असहाय दीन समझने लगे।

(3) ऐसी स्थिति में बिरसा मुण्डा ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीव्र आन्दोलन प्रारम्भ किया। यह आन्दोलन अन्याय और शोषण के विरुद्ध था। यह आन्दोलन मानवता की रक्षा के लिए था। उन दिनों प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के महान् सेनानियों में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब, कुंवर सिंह आदि की वीरता की कहानियाँ लोगों के मुंह पर थीं। जनमत अंग्रेज शासकों के विरुद्ध था। मुण्डा समाज में दबी भावनाएँ अब व्यापक सामाजिक आन्दोलन और राजनैतिक रूप में उभरने ली। गाँव इन गतिविधियों का केन्द्र था और बिरसा इन गतिविधियों के केन्द्र-बिन्दु थे। विदेशी राज का जुआ अपने कंधों से उतारने के लिए वे कृतसंकल्प थे। वे गाँव-गाँव में जाकर सभाएं करते थे।

शब्दार्थ-स्थिति = दशा में; विरुद्ध = खिलाफ; तीव्र = तेज; प्रारम्भ = शुरू; शोषण- मजदूरी करने के बाद मजदूरी न देना; मानवता = मनुष्यता; स्वतन्त्रता-संग्राम = आजादी की लड़ाई के लिए; सेनानियों में लड़ाकाओं में। जनमत = लोगों की राय; भावनाएँ = इच्छाएँ; व्यापक-बड़े क्षेत्र में फैला हुआ; उभरने लगी प्रकट रूप में दीखने लगी; गतिविधियों का क्रियाकलापों का; केन्द्र-बिन्दु = मुख्य केन्द्र; विदेशी राज का जुआ = दूसरे देश का नियम कानून; कंधों से उतारने के लिए का पालन न करने के लिए; कृत संकल्प = पक्की प्रतिज्ञा किए हुए।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-बिरसा मुण्डा ने विदेशी शासन के विरुद्ध खड़े होकर आजादी प्राप्त करने का बिगुल बजा दिया।

व्याख्या-जनजातियों की दशा खराब होने लगी। वे पराधीनता के कारण भूख और दमन के कुचक्र में फंस गये।ऐसी दशा देखकर बिरसा मुण्डा अंग्रेजी शासन के खिलाफ हो गये, उन्होंने उन अंग्रेज शासकों के शासन के खिलाफ आन्दोलन बहुत तेज कर दिया। उनका यह आन्दोलन शासकों के द्वारा किये गये अन्याय और शोषण के विरोध में था।

उन्होंने इस आन्दोलन को मनुष्यता की रक्षा करने के उद्देश्य से चलाया। उस समय की इस स्वतन्त्रता की लड़ाई के महान् लड़ाकों में शामिल थे-झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब तथा कुँवर सिंह। लोगों को इन वीर सेनानियों की वीरता के गीत और कहानियाँ कंठान थीं। अधिक संख्या में लोग इन अंग्रेज शासकों के खिलाफ थे। सम्पूर्ण मुण्डा समाज की इच्छाएँ जो दबी हुई थी, वे विस्तृत रूप में समाज के अन्दर आन्दोलन का रूप लेने लगी। उनका राजनैतिक रूप सामने स्पष्ट दीखने लगा। विरसा का गाँव इन सभी क्रियाकलापों का केन्द्र बन चुका था। सभी ग्रामीण लोग अंग्रेजों के शासन के नियम कानून को हटा देने के लिए पक्की प्रतिज्ञा किये हुए थे। इस उद्देश्य के लिए बिरसा सभी गाँवों में घूमते थे। लोगों के बीच सभा करके अपने उद्देश्य को बताते थे।

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(4) उन्होंने कहा, “मेरे न रहने पर भी, मेरे द्वारा दिखाया गया रास्ता बन्द नहीं होगा।” उन्हें ले जाकर राँची जेल में डाल दिया गया। न्यायालय ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध दंगा भड़काने का आरोप लगाकर बिरसा और उनके कुछ साथियों को दो वर्ष की कठोर सजा सुनाई। सजा पूरी हो जाने पर सरकार ने उन्हें मुक्त कर दिया। साथ ही चेतावनी दी कि वे पूर्णत: शान्ति से जीवनयापन करेंगे। कुछ दिनों के बाद, उन्होंने फिर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध शंखनाद कर दिया जिसमें पूरा समाज उनके साथ था।

शब्दार्थ-आरोप = दोष; मुक्त = छोड़ दिया; जीवनयापन = जीवन व्यतीत करें; साम्राज्यवाद = अपने राज्य स्थापित करने की नीति । शंखनाद = ऊँची आवाज में विरोध किया।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-अंग्रेज शासकों ने बिरसा को कठोर सजा देकर लोगों का रोष अपने विरुद्ध उत्पन्न करा लिया।

व्याख्या-बिरसा मुण्डा को जब अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया तो उन्होंने कहा कि वे लोगों के बीच रहें या न रहें लेकिन उन्होंने लोगों को आजादी प्राप्त करने का रास्ता बता दिया है। लोग आजोदी प्राप्त करने के लिए आगे ही आगे बढ़ते जायें। उनका रास्ता कोई रोक नहीं पायेगा। बिरसा को राँची की जेल – में डाल दिया गया। उनके ऊपर दोष लगाया गया कि उन्होंने : अंग्रेज सरकार के विरोध में दंगा भड़काया है। इसलिए उन्हें और : उनके कुछ साथियों को दो वर्ष की कठोर सजा सुनाई गई। सजा का समय पूरी हो जाने पर सरकार ने उन्हें मुक्त कर दिया और चेतावनी दी कि वे शान्तिपूर्वक अपना जीवन बिताएँ, परन्तु थोड़ा समय बीता होगा कि फिर उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आन्दोलन का बिगुल बजा दिया। इस आन्दोलन में पूरा समाज अब उनके साथ था। वे अकेले नहीं थे।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 11 Girdhar Ki Kundaliya Question and Answer

In this article, we will share MP Board Class 8th Hindi Solutions Chapter 11 गिरधर की कुण्डलियाँ PDF download, Hindi Class 8 Chapter 11 Mp Board, these solutions are solved subject experts from the latest edition books.

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 11 Girdhar Ki Kundaliya Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 11 Girdhar Ki Kundaliya Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 11 गिरधर की कुण्डलियाँ प्रश्न उत्तर

 गिरधर की कुण्डलियाँ बोध प्रश्न

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 11 प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर

  1. दौलत-सम्पत्ति; ठाँऊस्थान, स्थिर; पाहुनअतिथि, मेहमान; निदान = अन्त में, कारण, उपचार; निस= रात; अभिमान : घमण्ड; जस= यश; जग संसार, दुनिया; जियत = जीवित रहना, जीते रहना।।
  2. गाहक = ग्राहक, ग्रहण करने वाला; कोकिला = कोयल; सहस = हजार; बिनु = बिना; लहै = प्राप्त कर सकना; ठाकुर मन के = मन के मालिक, मन के स्वामी।
  3. ताहि उसको; खता= चूक, गलती, कमी; परतीती = विश्वास, भरोसा; सुधि लेइ = खोज खबर लेनी चाहिए, सोच-समझकर आचरण करना चाहिए; बिसारि दे= भुला दे।

Class 8 Hindi Chapter 11 Mp Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए
(क) हमें दूसरे व्यक्तियों से किस प्रकार के वचन बोलना चाहिए?
उत्तर
हमें दूसरे व्यक्तियों से विनयपूर्वक मीठे वचन बोलने चाहिए।

(ख) कोयल सबको अच्छी क्यों लगती है ?
उत्तर
कोयल सबको अच्छी लगती है क्योंकि वह मिठास भरी बोली बोलती है।

(ग) धनी व्यक्ति को क्या नहीं करने को कहा है ?
उत्तर
धनी व्यक्ति को अपने धन का घमण्ड नहीं करना चाहिए।

(घ) ‘गुन के गाहक’ से क्या आशय है ?
उत्तर
गुण (अच्छी बात या लाभकारी वस्तु) के ग्रहण करने वाली सभी होते हैं। गुण रहित (खराब और अलाभकारी) वस्तु को कोई भी स्वीकार नहीं करता है।

(ङ) बीति ताहि …… कहकर कवि ने कौन सी सलाह दी है?
उत्तर
कवि ने सलाह दी है कि जो बात (घटना) घट चुकी है, उसे भुला देना ही उचित है। इससे आगे सोच-समझकर व्यवहार करना चाहिए।

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Class 8 Hindi Chapter 11 Girdhar Ki Kundaliya प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए

(क) धन पाकर हमें अभिमान क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर
धन पाकर हमें अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि धन तो चंचल है, कभी धन आ जाता है, तो कभी चला जाता है। सम्पत्ति किसी पर भी सदा के लिए नहीं रहती। यह तो बहते हुए जल के समान होती है जिस प्रकार जल एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता उसी तरह धन कभी भी एक व्यक्ति के पास सदा स्थिर बनकर नहीं रहता। इसे स्थिर बनाकर रखने का कोई उपचार भी नहीं है। यह धन तो चार दिन-रात का मेहमान होता है। इसलिए मीठा बोलकर, विनयपूर्वक सबके साथ व्यवहार करना चाहिए।हमें प्रेमपूर्वक सन्तुलित बात करनी चाहिए। धन पर घमण्ड करना घाटे का (हानि का) सौदा है।

(ख) कोयल और कौए की वाणी में क्या अन्तर है?
उत्तर
कोयल और कौआ दोनों ही काले रंग के पक्षी हैं। इनकी वाणी को सभी लोग सुनते हैं लेकिन कोयल की वाणी सभी को अच्छी लगती है, सुहाती है। अपनी कर्कश बोली के कारण कौए सबके द्वारा अपवित्र और त्याज्य माने गये हैं। कोयल की वाणी मीठी होने से सब लोगों द्वारा उसकी मिठास की प्रशंसा की जाती है। सभी लोग उसके ग्राहक हैं। कोयल की मधुर वाणी हजारों लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।

(ग) बीती बातों को भुलाने से क्या लाभ तथा क्या हानि है ?
उत्तर
बीती बातों को भुलाने से ही लाभ है क्योंकि भविष्य में लाभ होने की बात को ठीक तरह से सोच-समझ लेने से घटित घटना को भुला देने में ही भलाई है। घटित घटना से हमें निराश और हतोत्साहित नहीं हो जाना चाहिए। आगे के कार्य को सोच-समझकर कर, मन लगाकर करना चाहिए। फिर जो आसानी से हो सके उसे करना चाहिए। मन लगाकर काम करने से उसमें सफलता मिलती है। दुष्ट व्यक्ति भी फिर हँसी नहीं उड़ा पाते। मन में कोई चूक (कभी गलती) न होने से, मन में पक्का विश्वास करके अपने काम में जुट जाना चाहिए। इससे भविष्य में सफलता मिलती है। भविष्य में सुख प्राप्ति की आशा होती है। अतः जो घटना (बात) बीत गई (घटित हो गई) उसे भुला देने में ही लाभ है।

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MP Board Class 8 Hindi Chapter 11 प्रश्न 4.
‘लोक व्यवहार की बातें’ इन कुण्डलियों में हैं। उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
(1) किसी भी व्यक्ति को अपने धन का घमण्ड सपने में भी नहीं करना चाहिए। यह धन कभी आ जाता है तो कभी चला जाता है।
(2) हमें मीठे वचन बोलने चाहिए। मधुर व्यवहार से और विनयपूर्वक बोलने से हमें संसार में यश की प्राप्ति होती है। जो लोग घमण्ड रहित होकर, मधुर वाणी बोलकर व्यवहार नहीं करते, वे निश्चय ही घाटे का सौदा प्राप्त करते हैं।
(3) धन का घमण्ड उचित नहीं क्योंकि धन सदा किसी के पास नहीं रहता।

द्रष्टव्य है

  • दौलत पाय न कीजिए सपने में अभिमान।
  • मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही सौं कीजै।
  • पाहुन निस दिन चारि, रहत सब ही के दौलत।

(4) मधुर और मीठे बोल सभी को अच्छे लगते हैं। ‘सबद सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।’
(5) घटित घटना को भुला देना ही लाभकारी है। भविष्य में सबका भला हो, इस भावना से उचित व्यवहार की बात को सोच समझकर बीती बात भुला देनी चाहिए। मन में किसी भी प्रकार चूक न रखते हुए मन पर पूरा विश्वास रखते हुए आगे का उचित व्यवहार अपनाना चाहिए। इसी में भलाई है, सुख है। ‘बीती ताहि बिसारे दे, आगे की सुधि लेइ।

Bhasha Bharti Class 8 Chapter 11 प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों का सन्दर्भ सहित भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) सबद सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।
दोऊ को रंग एक, काग सब भए अपावन।।

(ख) बीति ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेड़।
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित्त देई।।
उत्तर
महाकवि गिरधर कहते हैं कि गुणों के (अच्छी बात के) ग्रहण करने वाले लोग तो हजारों की संख्या में होते हैं। बिना गुण की वस्तु को (जो वस्तु अच्छी नहीं है, उसे) कोई भी नहीं लेता। जिस तरह कौआ और कोयल के शब्द को (वाणी को) तो सभी सुनते ही हैं लेकिन कोयल की वाणी सभी को अच्छी लगती है। इन दोनों-कौआ और कोयल का रंग एक-सा होता है, परन्तु सभी कौए अपवित्र हो गये। हे मन के स्वामी (मनमौजी) ! कवि गिरधर कहते हैं कि आप सभी इस एक बात को सुन लीजिए कि कोई भी व्यक्ति – बिना गुण वाली (खराब) वस्तु को ग्रहण नहीं करेगा। गुणकारी (अच्छी) वस्तु के ग्राहक तो हजारों लोग होते हैं।

जो बात हो चुकी उसे भुला देना चाहिए, हमें, फिर, भविष्य के बारे में सोच-विचार (खोज खबर लेनी चाहिए) करना चाहिए। जो बात (काम) आसानी से हो सके, उसमें ही अपने मन को लगाना चाहिए। जो भी बात (काम) बन सके (हो सके) तो उसे ही मन लगाकर करना चाहिए। इस तरह कोई भी दुष्ट व्यक्ति हमारी हँसी भी नहीं उड़ा सकेगा और मन में कोई भी चूक अथवा दोष भी नहीं आ सकेगा। कविवर गिरधर कहते हैं कि उस काम को मन में विश्वास के साथ कीजिए। भविष्य में होने वाले सुख की बात को समझकर उस बात को भुला दीजिए, जो बीत चुकी है, घट चुकी है।

गिरधर की कुण्डलियाँ भाषा-अध्ययन

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 11 प्रश्न 1.
‘जस’ शब्द का मानक रूप ‘यश’ है। इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों के मानक रूप लिखिए
सपने, सहस, सबद, गुन, परतीती, जियत, ग्राहक।
उत्तर

  1. स्वप्न
  2. सहस्र
  3. शब्द
  4. गुण
  5. प्रतीति
  6. जीवित
  7. ग्रहणकर्ता।

Hindi Chapter 11 Class 8 Mp Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए
“सबद सुनै सब कोइ, कोकिला सबै सुहावन” में अलंकार है (यमक, अनुप्रास, श्लेष)
उत्तर
‘अनुप्रास’

MP Board Class 8th Hindi Chapter 11 प्रश्न 3.
इस पाठ की कुण्डलियों में अभिमान’ शब्द के समान ‘निदान’ तुकान्त शब्द आया है।
इसी प्रकार निम्नलिखित तालिका में से तुकान्त शब्द चुनिए और सही क्रम में लिखिए लीजै
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 11 गिरधर की कुण्डलियाँ 1
उत्तर

  1. लीजै-कीजै
  2. तौलत-दौलत
  3. सुहावनअपावन
  4. देइ-लेइ
  5. पावै-आवै।

Class 8 Chapter 11 Hindi Mp Board प्रश्न 4.
अनुस्वार और आनुनासिक के प्रयोग वाले पाँच-पाँच शब्द लिखिए।
उत्तर
अनुस्वार के प्रयोग वाले शब्द-पंच, गंज, पंक, पंत, कंस, कोंपल, चौंच।
आनुनासिक के प्रयोग वाले शब्द-जाँच, आँच, आँख, नदियाँ, फलियाँ।

Paath 11 Girdhar Ki Kundaliya प्रश्न 5.
कुण्डलियाँ छन्द के अन्य उदाहरण छाँटकर उसकी मात्राओं की गणना कीजिए।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 11 गिरधर की कुण्डलियाँ 2
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 11 गिरधर की कुण्डलियाँ 3
लक्षण – कुण्डलियाँ के छ: चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। इस छन्द के आरम्भ में दोहा और अन्त में रोला छन्द होता है। इस छन्द की एक विशेषता यह भी है कि जो शब्द इसके आरम्भ में आता है, वही इसके अन्त में भी आता है।

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Class 8 Mp Board Hindi Chapter 11 प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द वर्ग पहेली से छाँटकर लिखिए
दौलत, संसार, अभिमान, पाहुन।
उत्तर-
शब्द – पर्यायवाची शब्द
दौलत = सम्पदा, धन।
संसार = लोक, जग।
अभिमान = गर्व, दर्प।
पाहुन = अतिथि, मेहमान।

गिरधर की कुण्डलियाँ सम्पूर्ण पद्यांशों की व्याख्या

1. दौलत पाय न कीजिए सपने में अभिमान।
चंचल जल दिन चारि को, ठाँउ न रहत निदान।।
ठाँउ न रहत निदान, जियत अग में जस लीजै।
मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही सौं कीजै।।
कह गिरधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत।
पाहुन न निस दिन चारि, रहत सब ही के दौलत।

शब्दार्थ-दौलत सम्पत्ति:पाय प्राप्त करके अभिमान घमण्ड; ठाँउ = स्थिर; निदान = अन्त में; जीयत = जीवित रहते हुए; जग = संसार; जस = यश; लीजै = प्राप्त कर लीजिए; सुनाय = सुनाकर; सौं = से; कीजै = कीजिए; घट = कम; तौलत = तोलते हैं; पाहुन = मेहमान, अतिथि; निसिदिन चारि = चार रात-दिन की, थोड़े समय की; सब ही के सभी के पास।

सन्दर्भ-प्रस्तुत कुण्डलियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषाभारती’ के पाठ ‘ गिरधर की कुण्डलियाँ से अवतरित हैं। इसके रचयिता कविवर गिरधर हैं।

प्रसंग-कवि गिरधर ने इन कुण्डलियों के माध्यम से बताया है कि धन सम्पत्ति का मनुष्य को घमण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि यह तो थोड़े समय की ही होती है।

व्याख्या-हमें धन-सम्पत्ति प्राप्त करके स्वप्न में भी घमण्ड नहीं करना चाहिए। यह सम्पत्ति तो जल के समान चंचल है, बहुत थोड़े समय रहती है। अन्त में यह एक स्थान पर (किसी एक व्यक्ति के पास) नहीं रहती है। क्योंकि सम्पत्ति स्थिर नहीं रहती, इसलिए इस संसार में अपने जीवनकाल में यश प्राप्त करो। सभी से मधुर वचन बोलिए और सभी के साथ विनयपूर्वक व्यवहार कीजिए। महाकवि गिरधर कहते हैं कि धन-सम्पत्ति प्राप्त करके जो कम तौलते हैं अर्थात् कपट का व्यवहार करते हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सम्पत्ति तो चार दिन रात (थोड़े समय) की मेहमान (अतिथि) है; यह सभी के पास सदा नहीं रहती है।

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(2) गुन के गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा कोकिला, सबद सुनै सब कोय।।
सब सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।
दोऊ को रंग एक, काग सब भए अपावन।।
कह गिरधर कविराय, सुनो हो ठाकुर मन के।
बिनु गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के।।

शब्दार्थ-गुन = गुण; गाहक = ग्रहण करने वाले; सहसहजारों; लहै = ग्रहण करते हैं; न कोय = कोई भी नहीं; कागाकौआकोकिला = कोयल; सबद = वाणी, बोली; सब कोयसभी लोग: सबै सभी को सुहावन = अच्छी लगती है; अपावन = अपवित्र; ठाकुर मन के = मन के स्वामी; गुन = गुणों के, लाभकारी होने से; गुण के अच्छे के।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-कवि बताते हैं कि गुणकारी (लाभदायक) अथवा अच्छी वस्तु (बात) के हजारों लोग ग्राहक होते हैं।

व्याख्या-महाकवि गिरधर कहते हैं कि गुणों के (अच्छी बात के) ग्रहण करने वाले लोग तो हजारों की संख्या में होते हैं। बिना गुण की वस्तु को (जो वस्तु अच्छी नहीं है, उसे) कोई भी नहीं लेता। जिस तरह कौआ और कोयल के शब्द को (वाणी को) तो सभी सुनते ही हैं लेकिन कोयल की वाणी सभी को अच्छी लगती है। इन दोनों-कौआ और कोयल का रंग एक-सा होता है, परन्तु सभी कौए अपवित्र हो गये। हे मन के स्वामी (मनमौजी) ! कवि गिरधर कहते हैं कि आप सभी इस एक बात को सुन लीजिए कि कोई भी व्यक्ति – बिना गुण वाली (खराब) वस्तु को ग्रहण नहीं करेगा। गुणकारी (अच्छी) वस्तु के ग्राहक तो हजारों लोग होते हैं।

3. बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेड।
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित्त देइ।।
साही में चित्त देइ, बात जोई बनि आवै।
दुर्जन हँसे न कोय, चित्त में खता न पावै।।
कह गिरधर कविराय, यह करू मन परतीती।
आगे को सुख समुझि, होय बीती सो बीती।।

शब्दार्थ-बीती ताहि = जो बात (घटना) समाप्त हो गई, घट गई उसे; बिसारि दे = भुला दे; आगे की सुधि लेइ = इसमें आगे विचार करके आचरण (व्यवहार) करना चाहिए, खोज खबर लेनी चाहिए; जो बनि आवै = जो भी कुछ हो सके उसे; सहज में = सरलता से, आसानी से; ताही में = उसी में; चित्त देइ = मन लगाना चाहिए; बात जोई बनि आवै = जो भी बात बन सके दुर्जन = दुष्ट व्यक्ति; कोय = कोई भी; हँसे न = हँसी न ठड़ा सके; खता = दोष या चूक; पावै = प्राप्त होने दो; यहै = वही; मन परतीती = मन में विश्वास के साथ; करू = कीजिए; आगे को = भविष्य में (आने वाले समय में); समुझि = समझकर; बीती सो बीती = जो बात (घटना) बीत गई (हो गई), सो हो गई।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-जो बात (घटना) घट चुकी, उसके ऊपर अधिक सोच-विचार नहीं करना चाहिए, कवि को ऐसी सलाह है।

व्याख्या-जो बात हो चुकी उसे भुला देना चाहिए, हमें, फिर, भविष्य के बारे में सोच-विचार (खोज खबर लेनी चाहिए) करना चाहिए। जो बात (काम) आसानी से हो सके, उसमें ही अपने मन को लगाना चाहिए। जो भी बात (काम) बन सके (हो सके) तो उसे ही मन लगाकर करना चाहिए। इस तरह कोई भी दुष्ट व्यक्ति हमारी हँसी भी नहीं उड़ा सकेगा और मन में कोई भी चूक अथवा दोष भी नहीं आ सकेगा। कविवर गिरधर कहते हैं कि उस काम को मन में विश्वास के साथ कीजिए। भविष्य में होने वाले सुख की बात को समझकर उस बात को भुला दीजिए, जो बीत चुकी है, घट चुकी है।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 2 Atmavishwas Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 2 Atmavishwas Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 2 Atmavishwas Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 2 आत्मविश्वास प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

Class 8 Hindi Chapter 2 Atmavishwas प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
दुर्भाग्य = बुरा भाग्य; आत्महीनता = मन की हीन भावना; एकाग्रता = तल्लीनता; क्षमता = योग्यता, सामर्थ्य विश्वविख्यात = संसार में प्रसिद्ध;  तल्लीनता = किसी काम में दत्तचित्त हो जाना; अभंग = अटूट, अखण्ड; सुगमता = आसानी; दुविधा = असमंजस; यथापूर्व = पहले की तरह अविचल = स्थिर, दृढ़ः सूक्ति = अच्छा कथन, सुभाषित; अखण्ड = जिसके टुकड़े न हो सकें, अटूट, समग्र रूप से; मर्सिया = शोक गीत।

Bhasha Bharti Class 8 Chapter 2 प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए

(क) बाली को क्या वरदान प्राप्त था ?
उत्तर
बाली को ऐसा वरदान प्राप्त था कि जो भी उसके सामने आता, उसकी आधी ताकत उसमें आ जाती थी। इस कारण बाली अपने सामने आये हुए व्यक्ति को आसानी से पछाड़ देता था।

(ख) राम बाली के सामने आकर क्यों नहीं लड़े?
उत्तर
बाली को अपने शत्रु (विरोधी) के आधे बल को खींच लेने का वरदान प्राप्त था। अत: राम उसके सामने आकर नहीं लड़े। यह वरदान बाली को शंकर भगवान ने दिया था। राम भगवान शंकर के वरदान का सम्मान करते थे।

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(ग) कृष्ण ने महाभारत में सर्वोत्तम काम क्या किया?
उत्तर
महाभारत में कृष्ण ने न्याय के साथ पाण्डव पक्ष का सहयोग करते हुए निर्वासित पाण्डवों को उनका अधिकार प्राप्त करवाया। उनमें आत्मविश्वास पैदा किया।

MP Board Class 8 Hindi Chapter 2 प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए

(क) सामने वाले की आधी ताकत अपने में खींच लेने की शक्ति हमें सबमें हैं। कैसे?
उत्तर
सामने वाले की आधी ताकत अपने में खींच लेने की शक्ति हम सब में है। यह शक्ति आत्मविश्वास की है। यह शक्ति हम सबको प्राप्त है, परन्तु हम सबको अपनी इस आत्मशक्ति की पहचान नहीं है और न उसका उपयोग ही किया है। इस आत्मशक्ति का विकास विश्वास से होता है। हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी सामर्थ्य में विश्वास पैदा करना होगा। हम अपने विरोधियों से सदा पिटते रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा पीटे जाने को हमने अपने लिए अनिवार्य मान लिया। यह सब इसलिए हुआ कि हमारे अन्दर कायरता और आत्महीनता ने स्थान बना लिया है जिससे हम डरपोक हो गये। अच्छे संस्कार हमसे दूर हो गये। बुरे संस्कारों का प्रभाव ऐसा पड़ा कि हम अपने बल की सही नापतौल नहीं कर सके। परिणाम यह हुआ कि विरोधियों को हमने अपनी अपेक्षा ताकतवर मान लिया, परन्तु आत्महीनता और कुसंस्कारों से छुटकारा प्राप्त करें और आत्मविश्वास से भरे आत्मबल के द्वारा हम अपनी विरोधी की आधी शक्ति अपने में खींच सकते हैं।

(ख) लेखक ने ‘हेलन केलर’ का उदाहरण देकर हमें क्या समझाना चाहा है ?
उत्तर
हेलन केलर एक प्रसिद्ध और उच्च कोटि की विचारक थीं। उन्होंने अपनी एक सूक्ति में कहा था कि हमें जब सफलता प्राप्त होती है तो उससे हमें सुख मिलता है, परन्तु लक्ष्य प्राप्ति में विफल होना निश्चय ही सुख के द्वार के बन्द होने के समान है। हम उस सफलता के न मिलने पर निराश और हतोत्साहित हो उठते हैं परन्तु उस निराशा की दशा में हम उत्साह से रहित हो जाते हैं। आत्मशक्ति और लक्ष्य प्राप्ति की सामर्थ्य से अपने विश्वास को खो बैठते हैं जबकि होना यह चाहिए कि उद्देश्य प्राप्ति हेतु अपने अन्दर की शक्ति को विकसित करना चाहिए और उसके प्रति मजबूत श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए। एक बार विफल होने पर हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। सफलता पाने तक अपने प्रयास (कोशिश) चालू रखने चाहिए।

(ग) “आत्मविश्वास के बूते पर जीवन में सब कुछ करना संभव है,” किसी एक महापुरुष का उदाहरण देते हुए उक्त कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आत्मविश्वास की ताकत कठिनाई पर विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य देती है। आत्मबल के विकास से हम सफलता के मार्ग पर आगे ही आगे बढ़ते जाते हैं। अपने आत्मबल के द्वारा मनुष्य अवश्य ही भाग्यवान बन जाता है। अतः भाग्यवान वही है जो उचित दिशा में अपने कर्तव्य का पालन करता है और अपने लक्ष्य की साधना में अपनी सामर्थ्य और क्षमता में पूरा विश्वास रखता है। मन में सदा अच्छे शुभ विचारों को स्थान दीजिए। हमें सफलता और सौभाग्य दोनों ही प्राप्त होंगे।

निराशा और उत्साहहीनता मनुष्य को आत्मबल से हीन बनाती है। जीवन सुख-दुःख के उतार-चढ़ाव से युक्त है। हम सदा उतार (दु:ख) की बातें ही नहीं सोचते रहें। इन दुःखों का क्या कारण है, जीवन में उतार क्यों आया-इस पर विचार करना होगा और चढ़ाव (उन्नति) के उपाय करते हुए ऊँचे भावों से युक्त मन को मजबूती देते रहना चाहिए। अन्त में सुख का द्वार अवश्य खुलेगा-जो जीवन की सफलता में छिपा हुआ है। विजयमाला उन्हें अर्पित की जाती है जो चुनौतियों का मुकाबला करते हैं और सफल होते हैं।

हमारे समक्ष नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का उदाहरण है, जिन्होंने अपने जीवन में सिर्फ चुनौतियों को ही चुना और सफलताओं के शिखर पर पहुँचते रहे। उनमें अटूट आत्मविश्वास था। इसके बल पर उन्होंने अपने विरोधियों की प्रत्येक कुचाल और कुचक्र को नष्ट किया। जीवन संघर्ष में सफलता के लिए अपनी क्षमता और सामर्थ्य में अखण्ड विश्वास होना चाहिए। इसके कारण जीवन में सब कुछ किया जाना सम्भव होता है।

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भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 2 प्रश्न 4.
नीचे लिखे गद्यांशों की प्रसंग देते हुए व्याख्या कीजिए

(क) जो लोग हमेशा उतार की ही बातें सोचते हैं, वे उन लोगों की तरह है। जो कूड़ाघरों के पास कुर्सी बिछाकर बैठ जाते हैं और शहर की गन्दगी को गाली देते हैं।
उत्तर
जिन लोगों में किसी उद्देश्य को प्राप्त करने का उत्साह नहीं होता और सदा निराशापूर्ण भावनाओं में ही डूबे रहते हैं, वे जीवन में उतार (अवनति) से प्राप्त दुःख की ही बातें करते रहते हैं। वे कभी भी उन्नति (चढ़ाव) के सुख की बात सोचते ही नहीं। अपने अन्दर की शक्ति और जीवन के लक्ष्य के प्रति श्रद्धा समाप्त कर बैठते हैं। वे कूड़ाघर के अन्दर पड़े कूड़े के समान निम्नकोटि की विचारधारा से युक्त होते हैं। वे अपनी दूषित विचारधारा को संस्कारित नहीं कर सकते। कूड़ेघर की गन्दगी उस समय ही हटेगी जब गन्दगी को एकत्र करने वाले उसे वहाँ से हटायेंगे। आलसी और कुसंस्कारित व्यक्तियों की निठल्ली बातें (गालियाँ) उनके लिए कभी भी लाभकारी नहीं हो सकेंगी।

(ख) जब कोई विरोधी हमारे सामने आता है तो हम अपनी आत्महीनता से, कायरता से, कुसंस्कार से, आत्मविश्वास की कमी से विरोधी का और अपना बल तौले बिना ही उसे अपने से शक्तिशाली मान लेते हैं।
उत्तर
लेखक का मत सत्य लगता है कि जब कोई विरोधी व्यक्ति अपने सामने आता है, तो हमारे मन में एक हीनभावना पैदा हो जाती है। इस हीनता की भावना का कारण होता है, हमारे अन्दर भरोसे की कमी; जिससे हम कायर बनने लगते हैं। यह सब बुरे संस्कारों के कारण होता है। अपनी क्षमताओं पर विश्वास न होने से हम अपने विरोधी को अपने आप से अधिक शक्तिशाली मान लेते हैं। हम अपने बल की नापतौल भी नहीं करते हैं। तात्पर्य यह है कि हम स्वयं अपने आप पर विश्वास खो बैठते हैं।

Class 8 Hindi Chapter 2 Mp Board प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों का भाव स्पष्ट कीजिए
उत्तर
(क) सफलता की, विजय की, उन्नति की कुंजी अविचल श्रद्धा ही है।
भाव-हमारे अन्दर उद्देश्य (लक्ष्य) के प्रति अटूट विश्वास है तो निश्चय ही हम अपने उद्देश्य में सफल होते हैं। किसी भी चुनौती पर विजय प्राप्त करते हैं तथा लगातार उन्नति प्राप्त करते जाते हैं। अतः अटूट श्रद्धा (विश्वास) ही उपाय है-सफलता का, संघर्ष में विजय का; जीवन में उन्नति प्राप्त करने का।

(ख) हम अपनी सोच के कारण ही सफल, असफल होते हैं।
भाव-हम अपनी सोच के कारण ही सफलता के सुख का और असफलता के दु:ख का भोग करते हैं। सफलता की सोच आशावादी और असफलता की सोच निराशावादी होती है। अपने उद्देश्य के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास हमें सफल बनाता है जबकि इसके विपरीत हम हतोत्साहित होकर असफल ही होते हैं। यह सब हमारी सोच पर ही आश्रित है।

(ग) हममें आत्मविश्वास हो तो इससे हम विरोधी को आत्महीन कर सकते हैं।
भाव-आत्मविश्वास होने से मनुष्य उत्साहपूर्वक अपने लक्ष्य में सफल होता है, जिसके द्वारा वह अपने दुश्मनों को आत्मबल से रहित बना देता है। साधनहीन पाण्डवों ने अपने आत्मबल से कौरवों को निराश और बलहीन कर दिया।

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 2 प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए
दुर्भाग्य, शक्तिशाली, आत्महीन, सर्वोत्तम, निश्चित, हतोत्साहियों।
उत्तर
विद्यार्थी उपर्युक्त शब्दों को ठीक-ठीक पढ़कर उनका शुद्ध उच्चारण करने का अभ्यास करें।

MP Board Class 8th Hindi Chapter 2 प्रश्न 2.
‘जीवन में उतार भी हैं और चढ़ाव भी’-इस वाक्य में उतार’ और ‘चढ़ाव’ परस्पर विलोम शब्द प्रयुक्त हुए हैं। इसी प्रकार एक ही वाक्य में निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग कीजिए
भला बुरा, दाता-याचक, सपूत-कपूत, निश्चित| अनिश्चित, भाग्यवानं-भाग्यहीन, पाप-पुण्य, सुख-दु:ख।
उत्तर

  1. व्यक्ति को अपना भला-बुरा समझकर किसी काम को करना चाहिए।
  2. ईश्वर और भक्त की स्थिति दाता और याचक के समान होती है।
  3. सपूत और कपूत के लिए धन संचय करना व्यर्थ है।
  4. निश्चित और अनिश्चित की दशा मनुष्य में दुविधा पैदा करती है।
  5. मनुष्य अपनी सोच से स्वयं को भाग्यवान और भाग्यहीन समझ बैठता है।
  6. पाप-पुण्य की परिभाषा परिस्थितिगत होती है।
  7. सुख-दुःख मन के विकल्प होते हैं।

Hindi Chapter 2 Class 8 Mp Board प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के स्थान पर हिन्दी मानक शब्द लिखिए
ताकत, विजिटिंग कार्ड, इशारा, मर्सिया।
उत्तर
ताकत = बल; विजिटिंग कार्ड = पहचान पत्र; वह कार्ड (पत्र) जिसमें स्वयं का परिचय रहता है; इशारा = संकेत; मर्सिया = शोक-गीत।

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भाषा भारती कक्षा आठवीं पाठ 2 आत्मविश्वास प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्यय और उपसर्ग पहचान करके अलग-अलग कीजिए
तल्लीन, दुर्भाग्य, शक्तिशाली, कायरता, एकाग्रता, खण्डित, अभागा।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 2 आत्मविश्वास 1

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 2 प्रश्न 5.
निम्नलिखित सामासिक पदों का समास विग्रह करते हुए उनमें निहित समास पहचान कर लिखिए
आत्मविश्वास, कूड़ाघर, खन्दक-खाइयों, शक्तिहीन, यथापूर्व, विश्वविख्यात।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 2 आत्मविश्वास 2
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 2 आत्मविश्वास 3

Bhasha Bharti Class 8 प्रश्न 6.
नीचे लिखे गद्यांशों को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर लिखिए
काँच के एक विशाल महल में एक भटका हुआ कुत्ता घुस गया। इस महल में वह जिधर भी देखता, उधर ही उसे कुत्ते दिखाई देते थे। उसने उन कुत्तों को देखकर सोचा कि ये सभी कुत्ते उस पर टूट पड़ेंगे और उसे मार डालेंगे। अपनी शान दिखाने के लिए जब उसने भौंकना शुरू किया तब उसे चारों ओर कुत्ते
भौंकते सुनाई दिये। उसका दिल धड़कने लगा और बुरी तरह । घबरा गया। वह उन कुत्तों पर झपटा। तब उसने देखा कि वे कुत्ते
भी उस पर झपट रहे हैं। वह जोर-जोर से भीका, कूदा किन्तु शीन ही बेहोश होकर गिर पड़ा।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।
(ख) इस गद्यांश में प्रयुक्त मुहावरे छाँटिए और अपने – वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
(ग) महल में कुत्ते को अपने चारों ओर कुत्ते क्यों दिखाई दे रहे थे ?
(घ) कुत्ते ने भौंकना क्यों शुरू किया ?
(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में से साधारण वाक्य, मिश्रित वाक्य और संयुक्त वाक्य छॉटकर लिखिए।
उत्तर
(क) काँच का महल या मूर्ख कुत्ता।
(ख) प्रयुक्त मुहावरे-

  1. भटका हुआ
  2. टूट पड़ना
  3. शान दिखाना
  4. दिल धड़कना
  5. घबरा जाना
  6. झपट पड़ना।

वाक्य प्रयोग-

  1. मार्ग से भटका हुआ व्यक्ति देर में अपने स्थान पर पहुँचता है।
  2. राणा की सेना अपने शत्रुओं पर टूट पड़ी।
  3. अपनी झूठी शान दिखाना महंगा पड़ता है।
  4. परीक्षा के दिनों में मेरा दिल धड़कने लगता है।
  5. अचानक आये समुद्री तूफान से नाविक घबरा गये।
  6. भूखे भेड़िये की तरह सैनिक अपने शत्रुओं पर झपट

(ग) महल काँच से बना हुआ था, काँच की दीवारों पर उस । कुत्ते को अपना प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा था।
(घ) अपने प्रतिबिम्ब को ही दूसरे कुत्ते समझकर उसने भौंकना शुरू कर दिया।

(ङ) साधारण वाक्य

  1. काँच के एक विशाल महल में एक भटका हुआ कुत्ता घुस गया।
  2. वह उन कुत्तों पर झपटा।

मिश्रित वाक्य

  1. इस महल में वह जिधर भी देखता, उधर ही उसे कुत्ते दिखाई देते थे।
  2. अपनी शान दिखाने के लिए जब उसने भौंकना शुरू किया तब उसे चारों ओर कुत्ते भौंकते सुनाई दिये।
  3. तब उसने देखा कि वे कुत्ते भी उस पर झपट रहे हैं।

संयुक्त वाक्य

  1. उसका दिल धड़कने लगा और वह बुरी तरह घबरा गया।
  2. वह जोर-जोर से भौंका, कूदा किन्तु शीघ्र ही बेहोश होकर गिर पड़ा।

आत्मविश्वास परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) सच बात यह है कि जब कोई विरोधी हमारे सामने आता है, तो हम अपनी आत्महीनता से, कायरता से, कुसंस्कार से, आत्मविश्वास की कमी से, विरोधी का और अपना बल तोले बिना ही उसे अपने से शक्तिशाली मान लेते हैं।

शब्दार्थ-आत्महीनता = मन की हीन भावना; कायरता = डरपोकपन; कुसंस्कार = बुरे संस्कार; आत्मविश्वास = अपने आप पर भरोसा; शक्तिशाली = ताकतवर ।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती’ के ‘आत्मविश्वास’ नामक पाठ से अवतरित है। इसके लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि आत्मविश्वास की कमी के कारण मनुष्य विरोधी को अपनी अपेक्षा अधिक ताकतवर मान लेता है।

व्याख्या-लेखक का मत सत्य लगता है कि जब कोई विरोधी व्यक्ति अपने सामने आता है, तो हमारे मन में एक हीनभावना पैदा हो जाती है। इस हीनता की भावना का कारण होता है, हमारे अन्दर भरोसे की कमी; जिससे हम कायर बनने लगते हैं। यह सब बुरे संस्कारों के कारण होता है। अपनी क्षमताओं पर विश्वास न होने से हम अपने विरोधी को अपने आप से अधिक शक्तिशाली मान लेते हैं। हम अपने बल की नापतौल भी नहीं करते हैं। तात्पर्य यह है कि हम स्वयं अपने आप पर विश्वास खो बैठते हैं।

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(2) आत्मविश्वास की सबसे बड़ी दुश्मन है दुविधा। दुविधा एकाग्रता को नष्ट कर देती है। आदमी की शक्ति को बाँट देती है। आधा इधर और आधा उधर । बस, इस तरह आदमी खण्डित हो जाता है।

शब्दार्थ-दुश्मन शत्रु दुविधा=असमंजस; एकाग्रता = तल्लीनता; बाँट = विभाजन।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखक ने दुविधा को ही आत्मविश्वास का सबसे बड़ा दुश्मन बताया है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि मनुष्य के अन्दर यदि असमंजस अथवा सन्देह का भाव पैदा हो जाता है, तो आत्मविश्वास की भावना समाप्त होने लगती है। अत: असमंजस की अवस्था मनुष्य में अपने ऊपर भरोसे को उत्पन्न नहीं होने देती। यह अवस्था ही उसकी दुश्मन (शत्रु) बन जाती है। मनुष्य में आत्मविश्वास की शक्ति को बाँट देती है जिससे वह सोचने लगता है कि वह अमुक कार्य को करने में सफल होगा अथवा असफल। उसके अन्दर पक्का निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो जाती है। यह किंकर्तव्यविमूढ़ (दुविधाग्रस्त) हो जाता है। कार्य में सफल अथवा असफल होने सम्बन्धी दो चित्तता (दुविधा) मनुष्य के अन्दर से तल्लीनता की भावना को नष्ट कर देती है और वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता।

(3) दूसरे हमारी क्षमता पर विश्वास करें और हमारी सफलता को निश्चित मानें, इसके लिए आवश्यक शर्त यही है कि हमारा अपनी क्षमता और सफलता में अखण्ड विश्वास हो। हमारे भीतर उगा भय, शंका और अधैर्य ऐसे डायनामाइट हैं, जो हमारे प्रति दूसरों के विश्वास को खण्डित कर देते हैं।

शब्दार्थ-क्षमता = योग्यता, सामर्थ्य अखण्ड = जिसके टकड़े न हो सके उगा= उत्पन्न हुआ, पैदा हुआ शंकासशय, सन्देह; अधैर्य = अधीरता; डायनामाइट = विस्फोटक पदार्थ खण्डित कर देते हैं = तोड़ देते हैं, विभाजित कर देते हैं।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखक सलाह देता है कि सफलता को प्राप्त करने के लिए हमें अपनी क्षमताओं पर विश्वास करना चाहिए।

व्याख्या-अन्य लोगों के मन में भी यह बात पैदा हो जानी चाहिए कि वे निश्चित रूप से मानने लगें कि हमें अपने उद्देश्य में अवश्य सफलता मिलेगी क्योंकि उन लोगों को भी हमारी क्षमताओं पर पूरा-पूरा विश्वास है। इस सबके लिए एक अनिवार्य शर्त है कि हम अपनी योग्यताओं तथा सफलताओं में पूर्णतः विश्वास करें। परन्तु लेखक का मत है कि हमारे अन्दर पैदा हुआ भय, सन्देह और अधीरता तो अन्य लोगों के विश्वास को तोड़ देती है। ठीक उसी तरह जैसे डायनामाइट किसी भी खान के अन्दर पाये गये खनिज को खण्ड-खण्ड कर डालता है।

(4) “हतोत्साहियों, निराशावादियों, डरपोकों और सदा असफलता का ही मर्सिया पढ़ने वालों के सम्पर्क से दूर रहो।” नीति का वचन है कि जहाँ अपनी, अपने कुल की और अपने देश की निन्दा हो और उसका मुँह तोड़ उत्तर देना सम्भव न हो, तो वहाँ से उठ जाना चाहिए। क्यों ? क्योंकि इसमें आत्मगौरव और आत्मविश्वास की भावना खण्डित होने का भय रहता है।

शब्दार्थ-हतोत्साहियों = जिनका उत्साह समाप्त हो गया है; निराशावादियों = किसी भी आशा से रहित; मर्सिया = शोक गीत; सम्पर्क से संगति से कुल वंश; निन्दा = बुराई; मुँहतोड़ = प्रश्न करने वाले को ऐसा उत्तर देना जिससे उसकी बोलती बन्द हो जाये; आत्मगौरव = अपने बड़प्पन; भावना = विचार;
खण्डित = समाप्त; भय = डर।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखक सलाह देता है कि हमें उन लोगों की संगति से बचना चाहिए जो उत्साह से हीन और सब तरह से निराशावादी

व्याख्या-हमें उन लोगों की संगति नहीं करनी चाहिए जो सभी प्रकार से उत्साह से हीन हैं और सभी प्रकार से आशा छोड़ चुके हैं। साथ ही उन लोगों से भी दूर रहना चाहिए जो भयभीत हैं तथा हमेशा असफल होने के अपने शोक गीत का गान करते रहते हैं अर्थात् बार-बार अपनी असफलताओं का ही जिक्र करते रहते हैं। यह नीतिगत बात है कि हमें वहाँ से चले जाना चाहिए जहाँ पर हमारी स्वयं की, अपने वंश की अथवा अपने राष्ट्र की बुराई की जा रही हो तथा उनके द्वारा कहे जाने वाली किसी भी बात का अथवा पूछे गये प्रश्न का उत्तर हम नहीं देना चाह रहे हों। इसका कारण यह है कि ऐसा करने से (इसका उत्तर देने से) तो हमारे स्वयं के बड़प्पन तथा स्वयं पर किये गये भरोसे की भावना समाप्त हो जाने का डर पैदा हो जाता है।

(5) बहुत से मनुष्य यह सोच-सोचकर कि हमें कभी सफलता नहीं मिलेगी, दैव हमारे विपरीत हैं, अपनी सफलता को अपने ही हाथों पीछे धकेल देते हैं। उनका मानसिक भाव सफलता और विजय के अनुकूल बनता ही नहीं, तो सफलता और विजय कहाँ ? यदि हमारा मन शंका और निराशा से भरा है, तो हमारे कामों का परिचय भी निराशाजनक ही होगा, क्योंकि सफलता की, विजय की, उन्नति की कुंजी तो अविचल श्रद्धा ही है।

शब्दार्थ-दैव = भाग्य; विपरीत खिलाफ, विरुद्ध पीछे धकेल देते हैं = पिछड़ जाते हैं; मानसिक भाव = मन की इच्छा; अनुकूल = अनुसार शंका-संशय या सन्देह; निराशा आशाहीनता; कुंजी = चाबी या उपाय; अविचलन = स्थिर, अडिग; श्रद्धा-विश्वास।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखक का मत है कि सफलता तब ही प्राप्त होती है, जब हमारे अन्दर किसी भी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपनी क्षमता में अडिग विश्वास होता है।

व्याख्या-लेखक इस सच्चाई को भी स्पष्ट करते हैं कि कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो यह सोचते हैं कि वे सफलता प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि भाग्य उनके विरुद्ध है। इस तरह की उनकी विचारधारा भी उन्हें सफलता प्राप्त करने में रुकावट डालती है, और वे असफल हो जाते हैं। वे अपनी भावनाओं में भी सफल नहीं हो पाते। उन्हें विजय का मार्ग दीखता ही नहीं। इसका कारण यह है कि वे अपनी सफलता और विजय के विषय में पूर्णत: निराश हो चुके होते हैं। उन्हें अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं पर भरोसा होता ही नहीं। जब उन व्यक्तियों में स्वयं की सामर्थ्य पर सन्देह और संशय होगा, तो उन्हें अपने उद्देश्यों और कामों में भी संशय तथा निराशा की स्थिति ही दीख पड़ेगी। इसका कारण यही है कि जब तक मनुष्य में अपनी सामर्थ्य और शक्तियों के प्रति पक्की श्रद्धा और विश्वास नहीं होगा, तब तक सफलता उससे दूर ही रहेगी। यह स्थिर श्रद्धा (विश्वास) ही सफलता प्राप्त करने का, विपरीत परिस्थितियों पर जीत पाने का तथा उन्नति करने का अचूक उपाय है।

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(6) जो लोग हमेशा उतार की ही बात सोचते हैं, वे उन लोगों की तरह हैं जो कूड़ाघरों के पास कुर्सी बिछाकर बैठ जाते हैं और शहर की गन्दगी को गाली देते हैं।

शब्दार्थ-हमेशा = सदा; उतार = गिरावट; गाली = अपशब्द।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखक के अनुसार हतोत्साहित और निराश व्यक्ति ही सदा अवनति (कष्ट) की बातें सोचा करते हैं।

व्याख्या-जिन लोगों में किसी उद्देश्य को प्राप्त करने का उत्साह नहीं होता और सदा निराशापूर्ण भावनाओं में ही डूबे रहते हैं, वे जीवन में उतार (अवनति) से प्राप्त दुःख की ही बातें करते रहते हैं। वे कभी भी उन्नति (चढ़ाव) के सुख की बात सोचते ही नहीं। अपने अन्दर की शक्ति और जीवन के लक्ष्य के प्रति श्रद्धा समाप्त कर बैठते हैं। वे कूड़ाघर के अन्दर पड़े कूड़े के समान निम्नकोटि की विचारधारा से युक्त होते हैं। वे अपनी दूषित विचारधारा को संस्कारित नहीं कर सकते। कूड़ेघर की गन्दगी उस समय ही हटेगी जब गन्दगी को एकत्र करने वाले उसे वहाँ से हटायेंगे। आलसी और कुसंस्कारित व्यक्तियों की निठल्ली बातें (गालियाँ) उनके लिए कभी भी लाभकारी नहीं हो सकेंगी।

(7) “सुख का एक द्वार बन्द होने पर तुरन्त दूसरा द्वार खुल जाता है, लेकिन कई बार हम उस बन्द द्वार की ओर इतनी तल्लीनता से ताकते रहते हैं कि हमारे लिये जो द्वार खोल दिया गया है, हम उसे देख नहीं पाते।”

शब्दार्थ-द्वार-दरवाजा; तल्लीनता = (एकाग्र) भाव से; ताकते रहते हैं = देखते रहते हैं।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है कि हम अपनी निराशावादी भावना के कारण अपनी क्षमताओं में विश्वास खो बैठते हैं।

व्याख्या-हेलन केलर की इस सूक्ति का तात्पर्य यह है कि जब सुख देने वाली सफलता हमें एक ही प्रयास में प्राप्त नहीं होती तो हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम दुबारा भी अपने प्रयास को चालू रखें, परन्तु असफलता के प्रभाव से हम इतने. अधिक प्रभावित हो जाते हैं और एकाग्रचित होकर उस विफलता से मानसिक भाव क्षेत्र में भी निराश हो जाते हैं। हमारा उत्साह नष्ट हो जाता है। परन्तु अपने ध्येय के प्रति समर्पित अपनी शक्तियों का विश्वास स्थिर तौर पर बनाये रखें, तो हमें सफलता अवश्य मिल जायेगी। परन्तु अपने उद्देश्य और अपनी क्षमताओं के प्रति दृढ़ श्रद्धा (विश्वास) की कमी के कारण हमें विफलताओं का सामना करना पड़ता है। सफलता हमसे दूर बनी रहती है।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 8 Ganitagya Jyotish Aryabhatta Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 8 Ganitagya Jyotish Aryabhatta Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 8 Ganitagya Jyotish Aryabhatta Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 8 गणितज्ञ, ज्योतिषी आर्यभट्ट प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 8 प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
कीर्ति = यश; संगम = मिलना, समागत, दो या अधिक नदियों के मिलने का स्थान; प्रलय = सर्वनाश, बर्बादी; शंकु = शंकु के आकार में; वेधशाला = तारों और नक्षत्रों के अध्ययन के लिए बनी शोधशाला; धारणा = मत; प्रख्यात = प्रसिद्ध हेय-घृणित, घृणा करने योग्य पद्धति = ढंग; सूत्रबद्धधागे में बँधा हुआ, अथवा संक्षेप में आसन्न = समीप, पास।

MP Board Class 8 Hindi Chapter 8 प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए

(क) पटना शहर का पुराना नाम क्या है ?
उत्तर
पटना शहर का पुराना नाम पाटलिपुत्र है।

(ख) पटना के पास कौन-सा प्रख्यात विश्वविद्यालय था?
उत्तर
पटना के पास नालन्दा विश्वविद्यालय था जो अपने समय का बहुत ही प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था।

(ग) पटना के पास किन-किन नदियों का संगम हुआ
उत्तर
पटना के पास गंगा, सोन और गंडक नदियों का संगम हुआ है।

(घ) वेधशाला किसे कहते हैं?
उत्तर
वेधशाला में तारामण्डल और नक्षत्रों की गति का अध्ययन किया जाता है। यह एक प्रयोगशाला ही होती है जिसमें ज्योतिषी ग्रहण आदि के लगने और समाप्त होने के समय की भविष्यवाणी करते हैं।

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(ङ) ‘भट’ शब्द का क्या आशय है ?
उत्तर
‘भट’ शब्द का आशय ‘योद्धा’ होता है।

(च) ‘आर्यभटीय’ पुस्तक के कौन-कौन से चार भाग
उत्तर
आर्यभटीय पुस्तक के निम्नलिखित चार भाग हैं

  1. दशगीतिका
  2. गणित
  3. कालक्रिया
  4. गोल।

आर्यभटीय पुस्तक संस्कृत भाषा में रचित है और इसकी रचना पद्मात्मक है।

(छ) ‘आर्यभटीय’ की ताड़पत्र पोथियों की खोज किस विद्वान ने की थी ?
उत्तर
‘आर्यभटीय’ ताड़पत्र पोथियों की खोज महाराष्ट्र के विद्वान डॉ. भाऊ दाजी ने सन् 1864 ई. में की थी। यह मलयालम लिपि में लिखी हुई थी। उन्होंने ही इनका विवरण प्रकाशित किया था।

Class 8 Hindi Chapter 8 Mp Board प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए
(क) पाटलिपुत्र नगर से दूर आश्रम में ज्योतिषी और विद्यार्थी क्यों एकत्रित होते थे? .
उत्तर
पाटलिपुत्र नगर से दूर आश्रम में ज्योतिषी और विद्यार्थी एकत्रित होते थे। यह आश्रम टीले पर था। वहाँ बड़ी चहल-पहल थी। यह आश्रम भी कुछ भिन्न प्रकार का था। टीले पर बसे इस आश्रम का लम्बा-चौड़ा आँगन था। उस आँगन में ताँबे, पीतल और लकड़ी से निर्मित अनेक तरह के यन्त्र रखे हुए थे। उनमें से कुछ यन्त्र गोल आकार के थे, कुछ कटोरे जैसे तथा कुछ वर्तुलाकार थे तथा कुछ शंकु की तरह के थे। वास्तव में, यह एक वेधशाला थी। इन यन्त्रों के आस-पास कितने ही ज्योतिषी बैठे हुए थे। वे सभी बहुत प्रसिद्ध थे। साथ ही वहाँ अनेक विद्यार्थी भी बैठे हुए थे। वे वहाँ इकट्ठे होकर हिसाब लगाकर भविष्यवाणी किया करते थे कि ग्रहण किस समय लगेगा, कहाँ दिखाई देगा तथा इस ग्रहण का समय क्या होगा। वे अपनी गणना के अनुसार की गई भविष्यवाणियों की सत्यता की परख करने के लिए वहाँ एकत्र हुआ करते थे।

(ख) ‘पृथ्वी अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है’, इस कथन को आर्यभट्ट ने किस तरह लोगों को समझाया? .
उत्तर
आर्यभट्ट ने कभी भी आँखें मूंदकर पुरानी गलत धारणाओं को स्वीकार नहीं किया। वे अपने विचारों को बिना झिझक और भय के प्रस्तुत कर दिया करते थे। उन्होंने ग्रहणों और आकाश की अन्य अनेक घटनओं के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से अपने विचार रखे। उन्होंने लोगों को खुलकर बताया कि हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है। वह स्थिर नहीं है। आकाश का तारामण्डल स्थिर है। आर्यभट्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है और इसके साथ हम भी घूमते रहते हैं। इसलिए आकाश का स्थिर तारामण्डल हमें पूर्व से पश्चिम की ओर जाता हुआ जान पड़ता है।

(ग) आर्यभट्ट ने सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण के विषय में क्या विचार व्यक्त किए थे ?
उत्तर
कुछ आचार्य और विद्यार्थी पाटलिपुत्र के आश्रम की वेधशाला में बैठकर आपस में चर्चा कर रहे थे कि ग्रहण क्यों लगता है। उनमें से कुछ कह रहे थे कि धर्मग्रन्थों में लिखा हुआ है कि ग्रहण के समय राहु नाम का राक्षस सूर्य और चन्द्रमा को निगल लेता है। हमें चाहिए कि इन ग्रन्थों की बातों पर हमें विश्वास करना चाहिए। परन्तु वहाँ उपस्थित विद्यार्थी मण्डल में एक तरुण विद्यार्थी बैठा हुआ था। वह अपने साथी विद्यार्थियों को समझा रहा था कि पृथ्वी की बड़ी छाया जब चन्द्रमा पर पड़ती है तो चन्द्रग्रहण लगता है और इसी तरह जब चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच आता है तथा वह सूर्य को ढक लेता है, तब सूर्यग्रहण होता है। राहु नामक राक्षस सूर्य अथवा चन्द्रमा को निगल जाता है, यह सब कपोल कल्पित धारणा है। हमें इनमें विश्वास नहीं करना चाहिए।

(घ) ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में संसार को प्राचीन भारत की क्या देन है ?
उत्तर
ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में संसार को प्राचीन भारत की सबसे बड़ी देन है-शून्य सहित केवल दस अंक संकेतों से भी संख्याओं को व्यक्त करना। इस दाशमिक स्थान मान अंक पद्धति की खोज आर्यभट्ट से तीन-चार सौ वर्ष पहले हो चुकी थी। आर्यभट्ट इस नई अंक पद्धति से परिचित थे। उन्होंने अपने ग्रन्थ के शुरू में वृन्द (1000000000) अर्थात् अरब तक की दस गुणोत्तर संख्या संज्ञाएँ देकर लिखा है कि इनमें प्रत्येक स्थान अपने पिछले स्थान से दस गुना है। आर्यभट्ट ने हमारे देश में गणित-ज्योतिष के अध्ययन की एक नई स्वस्थ परम्परा शुरू की। इस तरह यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत ने ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में संसार को बहुत बड़ी उपलब्धि कराई।

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(ङ) आर्यभट्ट को प्राचीन भारतीय विज्ञान का सबसे चमकीला सितारा क्यों कहा जाता है ?
उत्तर
आर्यभट्ट दक्षिणापथ में गोदावरी तट क्षेत्र में अश्मक जनपद के रहने वाले थे, बाद में ये अश्मकाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। आर्यभट्ट बचपन से ही तेजबुद्धि थे। वे गणित और ज्योतिष. के अध्ययन में गहरी रुचि लेते थे। वे इन दोनों विषयों-गणित और ज्योतिष के अध्ययन के लिए अश्मक जनपद से पाटलिपुत्र पहुँचे। इन दोनों स्थानों के मध्य की दूरी हजारों मील थी। आर्यभट्टआँख मूंदकर पुरानी गलत बातें नहीं मानते थे। वे सदा ही अपनी विचारधारा को बिना किसी डर के और बिना झिझक के प्रस्तुत कर देते थे। ग्रहण सम्बन्धी बात ही नहीं, दूसरी भी आकाशीय घटनाओं के सम्बन्ध में स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचार रखते थे। वे एक साहसी ज्योतिषी वैज्ञानिक थे। उन्होंने पृथ्वी की गति के बारे में अपने विचार खुलकर सबके सामने रखे थे। वे सबसे पहले ज्योतिषी थे जिन्होंने स्पष्ट रूप से अपने शब्दों में कहा कि पृथ्वी स्थिर नहीं है। यह अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है। स्थिर तो आकाश का तारामण्डल है। इसके अतिरिक्त आर्यभट्ट ने हमारे देश में गणित और ज्योतिष के अध्ययन की एक नई स्वस्थ परम्परा शुरू की। इसलिए आर्यभट्ट को प्राचीन भारतीय विज्ञान का सबसे चमकीला सितारा कहा जाता है।

Bhasha Bharti Class 8 Chapter 8 प्रश्न 4.
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति वाक्य के सामने कोष्ठक में दिए शब्दों से छाँटकर कीजिए
(क) पृथ्वी अपनी धुरी पर ……….. से …………. की ओर घूमती है। (पूर्व, उत्तर, दक्षिण, पश्चिम)
(ख) ग्रहणों की वैज्ञानिक व्याख्या करने वाले तरुण पण्डित का नाम ……… था। (चरक, आर्यभट्ट, सुश्रुत)
(ग) आर्यभट्ट की पुस्तक का नाम ………………. था। (ज्योतिष शास्त्र, गणितशास्त्र, आर्यभटीय)
उत्तर
(क) पश्चिम, पूर्व
(ख) आर्यभट्ट
(ग) आर्यभटीय।

भाषा-अध्ययन

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 8 प्रश्न 1.
निम्नलिखित तालिका के ‘अ’भाग में कुछ शब्द दिये गये हैं। ‘ब’ तालिका में उनके विलोम शब्द मनमाने क्रम से दिये गए हैं, उन्हें सही क्रम में लिखिए
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 8 गणितज्ञ, ज्योतिषी आर्यभट्ट 1
उत्तर
सही क्रम-परतन्त्र, अस्थिर, पाताल, भय, प्रकाश, पूर्वान्ह।

Hindi Chapter 8 Class 8 Mp Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों में से उद्देश्य और विधेय अलग-अलग कीजिए-.
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 8 गणितज्ञ, ज्योतिषी आर्यभट्ट 2

MP Board Class 8th Hindi Chapter 8 प्रश्न 3.
‘विशेष’ शब्द में ‘वि’ उपसर्ग जुड़ा हुआ है। ‘प्रख्यात’ शब्द में ‘प्र’ उपसर्ग जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार ‘वि’, ‘प्र’,’अधि’ और ‘अति’ उपसर्ग जोड़कर नए शब्द बनाइए
उत्तर

  1. वि = विज्ञान, विशिष्ट, विभूति, विशेष।
  2. प्र = प्रस्तुत, प्रमुख, प्रधान, प्रख्यात।
  3. अधि = अधिसंख्य, अधिपत्र, अधिक्रम ।
  4. अति = अतिदाह, अतिदीन, अतिदोष।

Class 8th Hindi Chapter 8 Mp Board प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रत्यय जोड़कर प्रत्येक के दो-दो शब्द बनाइए
ता, आई, आवट, वाला, त्व।
उत्तर

  1. ता-सुन्दरता, कुरूपता, वीरता।
  2. आई-पढ़ाई, लिखाई, पुताई, मढ़ाई, मिठाई।
  3. आवट-लिखावट, दिखावट, रंगावट।
  4. वाला-दूधवाला, धनवाला, फलवाला, मिठाईवाला।
  5. त्व-घनत्व, विद्वत्व, शीतत्व, ग्रीष्मत्व।

Class 8 Chapter 8 Hindi Mp Board प्रश्न 5.
इस पाठ के समानार्थी, विरोधार्थी और पुनरुक्त शब्द अलग-अलग तालिका में लिखिए।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 8 गणितज्ञ, ज्योतिषी आर्यभट्ट 3

गणितज्ञ, ज्योतिषी आर्यभट्ट परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या

(1) पाटलिपुत्र नगर नंद, मौर्य और गुप्त सम्राटों की राजधानी रहा है। दूर-दूर तक इस नगर की कीर्ति फैली हुई थी। राजधानी होने से देशभर के प्रतिष्ठित पण्डित यहाँ एकत्र होते थे। प्रख्यात नालंदा विश्वविद्यालय भी पटना से ज्यादा दूर नहीं था। देश के ही नहीं, दूसरे देशों के विद्यार्थी भी विशेष अध्ययन के लिए नालंदा और पाटलिपुत्र आते थे। उस समय पाटलिपुत्र नगर ज्योतिष के अध्ययन के लिए मशहूर था।

शब्दार्थ-सम्राटों – बड़े राजाओं कीर्ति – यश; प्रतिदिन = प्रतिष्ठा प्राप्त; एकत्र = इकट्ठः प्रख्यात = प्रसिद्ध; मशहूर = प्रसिद्ध।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक “भाषा भारती के पाठ गणितज्ञ ज्योतिषी आर्यभट्ट’ से अवतरित हैं। इसके लेखक ‘गुणाकर मुले’ हैं।

प्रसंग-इन पंक्तियों में बताया है कि पाटलिपुत्र नगर शिक्षा और ज्योतिष के अध्ययन का केन्द्र था। इसे नंद वंश, मौर्य वंश और गुप्त वंश के राजाओं ने अपनी राजधानी बनाया था।

व्याख्या-पाटलिपुत्र प्राचीन भारत का प्रसिद्ध नगर था। इस नगर को नंद वंश, मौर्य वंश और गुप्त वंश के प्रसिद्ध शासकों ने अपने राज्य की राजधानी बनाया। उस जमाने का पाटलिपुत्र आज का पटना शहर है। यह नगर दूर-दूर तक प्रसिद्ध था अपनी कीर्ति के लिए। यह नगर क्योंकि राजधानी था; इसलिए यहाँ पर देशभर के प्रसिद्ध और प्रतिष्ठा प्राप्त विद्वान लोग इकट्ठे होते थे। उस युग का प्रसिद्धि प्राप्त नालन्दा विश्वविद्यालय पाटलिपुत्र (पटना) से अधिक दूर नहीं था। इस विश्वविद्यालय में अपने देश के ही नहीं दूसरे देशों के भी विद्यार्थी अपनी विशेष पढ़ाई-लिखाई के लिए नालन्दा और पाटलिपुत्र आया करते थे। उस समय पाटलिपुत्र ज्योतिष विज्ञान के अध्ययन के लिए बहुत ही प्रसिद्ध था।

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(2) आर्यभट्ट आँख मूंदकर पुरानी गलत बातें मानने को तैयार नहीं थे और अपने विचार बेहिचक प्रस्तुत कर देते थे। ग्रहणों के बारे में ही नहीं, आकाश की दूसरी अनेक घटनाओं के बारे में उनके अपने स्वतन्त्र विचार थे। उस जमाने के प्रायः सभी लोग, ज्योतिषी भी, यही समझते थे कि हमारी पृथ्वी आकाश में स्थिर है। किसी ज्योतिषी के मन में इस सवाल को लेकर कोई नई बात उठी भी होगी तो भी धर्मग्रन्थों के वचनों के खिलाफ आवाज उठाने का साहस उनमें नहीं था।

शब्दार्थ-आँख मूंदकर = बिना विचार किये हुए ही; बेहिचक = बिना किसी झिझक या भय के प्रस्तुत कर देते थे = सामने रख देते थे; घटनाओं = गतिविधियों; स्वतन्त्र = बिना दबाव के जमाने के = युग के, समय के स्थिर है- ठहरी हुई; सवाल = प्रश्न; धर्मग्रन्थों = धार्मिक पुस्तकों; खिलाफ = विरुद्ध; साहस = हिम्मत।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-आर्यभट्ट महान् विज्ञान वेत्ता थे। वे सदैव बिना किसी दबाव के अपनी सीधी सच्ची बात को स्वतन्त्र रूप से सबके सामने रख देते थे।

व्याख्या-आर्यभट्ट बड़े विज्ञानी और ज्योतिष के ज्ञाता थे। वे पुरानी गलत बातों को मानने के लिए कभी भी तैयार नहीं होते थे। किसी भी समस्या के समाधान सम्बन्धी अपने विचारों को बिना झिझक और संकोच के सबके सामने रखने से भी नहीं डरते थे। ग्रहणों और आकाश की दूसरी बहुत-सी घटनाओं के बारे में उनके विचार बहुत स्वतन्त्र थे। उस युग के जितने भी विचारक और विद्वान ज्योतिषी थे, वे सभी इस विचारधारा के मानने वाले थे कि हमारी यह पृथ्वी आकाश के बीचोंबीच ठहरी हुई है, परन्तु यदि उस समय के विद्वानों और ज्योतिषियों के मन में इसी प्रश्न पर कि पृथ्वी स्थिर है अथवा चलायमान है, कोई विचार उठा हो, तो भी उन्होंने अपनी विचारधारा को रखने के लिए हिम्मत नहीं जुटाई होगी। इसका एक कारण भी रहा होगा कि धर्मग्रन्थों के अन्दर जो भी लिखा गया था, उसके विरुद्धं किसी भी विद्वान द्वारा आवाज उठाने की हिम्मत नहीं थी।

(3) मगर आर्यभट्ट में ऐसा साहस था। उन्होंने पृथ्वी की गति के बारे में अपने विचार खुलकर जाहिर किए। आर्यभट्ट हमारे देश के पहले ज्योतिषी थे जिन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पृथ्वी स्थिर नहीं है। यह अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है। स्थिर तो आकाश का तारामण्डल है।

शब्दार्थ-साहस = हिम्मत; गति = चाल; खुलकर = स्पष्ट रूप से; जाहिर किए = प्रकट किए; साफ शब्दों में = स्पष्ट रूप से; स्थिर ठहरी हुई; धुरी-कीली; चक्कर लगाती है = घूमती है।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-आर्यभट्ट ने स्पष्ट रूप से बताया कि पृथ्वी अपनी कीली पर घूमती है।

व्याख्या-आर्यभट्ट में गजब का आत्मविश्वास और हिम्मत थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने विचारों को लोगों के सामने रखा कि पृथ्वी गतिमान है, यह अपनी धुरी पर (कीली पर) लगातार घूमती रहती है। यह ठहरी हुई अथवा स्थिर नहीं है। इस तरह का कथन आर्यभट्ट का था। ऐसा कहने वाले आर्यभट्ट पहले भारतीय थे। वे पहले भारतीय ज्योतिषी थे जिन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह आकाश जिसमें तारामण्डल दिखता है, स्थिर है, एक स्थान पर ठहरा हुआ है।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 5 Shri Muftanand Ji Se Miliye Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 5 Shri Muftanand Ji Se Miliye Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 5 Shri Muftanand Ji Se Miliye Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 5 श्री मुफ्तानन्दजी से मिलिए प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

MP Board Class 8 Hindi Chapter 5 प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
निसंकोच = बिना संकोच के, बेझिझक; जीवनयापन जीवन बिताना;खुशामद चापलूसी; मुफ़्तानन्दबिना खर्च किए ही प्राप्त वस्तु का आनन्द कृतकृत्य- धन्य; तिकड़म-जुगाड़ = चतुराई; इहलोक = मृत्युलोक;
साष्टांग = आठ अंगों (सिर, आँख, हृदय, पैर, हाथ, मन, कर्म और वचन) से प्रणाम करना।

Class 8 Hindi Chapter 5 Mp Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए
(क) लेखक ने इस पाठ का नाम मुख्य पात्र के नाम पर क्यों रखा?
उत्तर
लेखक ने इस पाठ का नाम ‘श्री मुफ़्तानन्द जी’ रखा, क्योंकि कुछ लोग अपने जीवन भर मुफ्त में कुछ न कुछ प्राप्त करने की जुगाड़ में लगे रहते हैं। अत: व्यंग्य के माध्यम से लेखक ने समाज में फैली बुराइयों को उजागर किया है।

(ख) ‘मुफ़्तखोरों के सरताज’ किसे कहा गया है ?
उत्तर
‘मुफ्तखोरों के सरताज’ मुफ़्तानन्द को कहा गया है, जो किसी भी वस्तु को प्राप्त करने के लिए पैसा खर्च करना नहीं चाहते। वे मुफ्त में प्राप्त वस्तुओं का आनन्द उठाते हैं।

(ग) लेखक से मुफ्तानन्द ने कौन-सी ग्रंथावली माँगी?
उत्तर
लेखक से मुफ्तानन्द ने कालिदास ग्रन्थावली माँगी।

(घ) मुफ्तानन्द जी की कमीज कहाँ और क्यों फटी?
उत्तर
मुफ़्तानन्द जी की कमीज मुफ्त में बर्फ प्राप्त करने के लिए लगी हुई कतार (क्यू) में लगने पर फट गयी। मुफ्तखोरों द्वारा की गई खींचतान में उन महोदय की कमीज फट गई।

(ङ) लेखक मुफ्तानन्द जी को साष्टांग प्रणाम क्यों करता है?
उत्तर
लेखक मुफ़्तानन्द जी को साष्टांग प्रणाम करता है क्योंकि लेखक ने उन जैसा मुफ्तखोर नहीं पाया, न देखा। वे इस मृत्युलोक को भी मुफ्त में सुधार गये तथा अब परलोक की टिकट भी मुफ्त में प्राप्त करने की जुगाड़ में हैं।

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Bhasha Bharti Class 8 Chapter 5 प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए

(क) मुफ़्तानन्द महोदय की मुफ्तखोरी की घटनाओं में से आपको सबसे अधिक प्रभावित किस घटना ने किया ? लिखिए।
उत्तर
मुफ्तानन्द महोदय मुफ्त में ही पान खाने का शौक, कटी पतंग को लूटना, मुफ्त में ही दैनिक पत्रों को पढ़ना, अपने दस पुत्र और पुत्रियों को मुफ्त में ही शिक्षा प्राप्त करा लेने की जुगाड़, मुफ्त में पुस्तकें प्राप्त करके अपना लाभ कमाना, फ्री पास लेकर रद्दी से रद्दी थियेटर देखना, मुफ्त में बर्फ प्राप्त करना, मुफ्त में औषधि प्राप्त करना तथा मुफ्त में ही परलोक सुधार लेने सम्बन्धी सभी घटना हास्य प्रधान हैं परन्तु मुफ़्तानन्द जी द्वारा अपनी उम्र के इस पड़ाव पर भी कटी पतंग को लूटने की घटना बहुत ही प्रभावित करती है। मुफ़्तानन्द जी बेतहाशा दौड़ लगाते हुए कटी पतंग को लूटना चाहते हैं। उन्हें अपने शरीर में चोट लगने और दूसरे व्यक्तियों के द्वारा मजाक उड़ाये जाने की भी कोई चिन्ता नहीं है।

(ख) मुफ्तानन्द जी पढ़ने के लिए समाचार-पत्र कैसे प्राप्त करते थे?
उत्तर
लेखक महोदय के घर प्रतिदिन प्रकाशित होने वाले दो समाचार-पत्र आते हैं। उन अखबारों को सबसे पहले मुफ़्तानन्द जी पढ़ते हैं। उनका पढ़ना ही किसी धार्मिक अनुष्ठान में लगाये गये भोग के समान है। उनके पढ़ लेने के बाद ही लेखक महोदय अपने अखबार को ‘प्रसाद’ रूप में प्राप्त करते हैं। वैसे उन्हें अपने मुहल्ले के उन सभी आदमियों के नाम याद हैं जिनके घर प्रतिदिन अखबार खरीदा जाता है। इस तरह कभी-कभी उन सभी के घरों पर समाचार-पत्र पढ़ने के लिए वे चले जाते हैं। उनका यह कहना भी उचित ही लगता है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने ज्ञानवर्द्धन के लिए अधिक से अधिक समाचार-पत्र पढ़ने चाहिए परन्त वे मफ्त में ही समाचार-पत्र पढ़ लेते हैं और समाचार-पत्रों के खरीदने पर पैसा खर्च करना उनके लिए पाप ही है।

(ग) मुफ़्तानन्द जी दूसरों से पुस्तकें मांगकर उनका क्या करते थे ?
उत्तर
मुफ्तानन्द जी दूसरों से पुस्तकें मैंगाकर, उन पुस्तकों को वे उस व्यक्ति को देते थे, जिससे मुफ्तानन्द जी अपना लाभ प्राप्त करते थे। देखिये उन मुफ़्तानन्द जी की चतुराई कि वे दूसरों की पुस्तकों के माध्यम से अपना लाभ कमाते हैं। लेखक महोदय ने उन मुफ्तखोर महोदय को यह भी बताया कि पुस्तकें दे दिये जाने के बाद लौटकर कभी नहीं आती हैं। दो दिन में लौटा कर देने के वायदे पर लेखक ने अपनी पुस्तकें दे र्दी, लेकिन दो वर्ष बीत जाने पर भी पुस्तकें लौटाई नहीं गई। इस तरह मुफ्त में माँगकर लाई गयी पुस्तकों से उन्होंने अपनी अलमारी को भर रखा है। अपनी अलमारी पर किसी भी व्यक्ति की निगाह भी नहीं पड़ने देते। वास्तव में, उनके पास सभी पुस्तकें बिना मूल्य के दिए ही प्राप्त कर ली गई हैं।

(घ) लेखक ने ‘कबीर का रहस्यवाद’ किस सन्दर्भ में कहा है?
उत्तर
लेखक ने कबीर के रहस्यवाद का सन्दर्भ इस रूप में कहा कि मुफ्तानन्द जी जब भी बीमार हुए, तब उन्होंने अपने इलाज पर कुछ भी खर्च नहीं किया। उन्होंने ‘दवा’ तो क्या उस शीशी के पैसे भी कभी भी अपने जेब से नहीं दिये। डॉक्टर, वैद्य और हकीम कहने को तो सबके दोस्त होते हैं, परन्तु अपनी फीस, औषधि की कीमत किसी पर भी नहीं छेड़ते। इस तरह आखिर में उन्हें औषधि भी सरकारी अस्पताल से ही मिल जाती है। यही तो कबीर का रहस्यवाद है अर्थात् रहस्य की बात तो यह है कि मुफ्तानन्द जी को सभी औषधियाँ मुफ्त में ही प्राप्त हो जाती हैं। डॉक्टर तो दुनिया की नब्ज टटोलते हैं और मुफ़्तानन्द जी डॉक्टरों की अर्थात् डॉक्टरों से निःशुल्क औषधि प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। इस तरह यही कबीर के रहस्यवाद के समान बात है।

(ङ) परलोक के सम्बन्ध में मुफ़्तानन्द जी की क्या धारणा है ?
उत्तर
इहलोक की भाँति ही मुफ्तानन्द जी परलोक में भी मुफ्त जीवनयापन के सपने संजोए हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि जब भगवान ने इहलोक में आनन्दपूर्वक निभा दी तो परलोक में भी भगवान मुफ्त में ही उनकी मुक्ति कर देंगे।

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 5 प्रश्न 4.
रिक्त स्थान भरिए
(1) …………….. का चन्दन घिस मेरे ……….
(2) माले ……… दिले ……..
उत्तर
(1) मुफ्त, नन्दन
(2) मुफ्त बेरहम।

भाषा-अध्ययन

MP Board Class 8th Hindi Chapter 5 प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए और उन्हें अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
निमन्त्रण, सिद्धान्त, अनुष्ठान, तिलार्जलि, कृतकृत्य, कण्ठस्थ, साष्टांग, कृतार्थ।
उत्तर
विद्यार्थी उपर्युक्त शब्दों को ठीक-ठीक पढ़कर उनका शुद्ध उच्चारण करने का अभ्यास करें और फिर लिखें। वाक्य-प्रयोग

  1. निमन्त्रण-मेरी पुत्री के जन्मोत्सव के अवसर पर आपका निमन्त्रण है।
  2. सिद्धान्त-प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने अनेक बार प्रयोग करके सिद्धान्तों का निरूपण किया।
  3. अनुष्ठान-आज मेरे परिवार में कुछ विशेष अनुष्ठानों का आयोजन किया जा रहा है।
  4. तिलांजलि-अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित रीति-रिवाजों को तिलांजलि देकर परम्पराएँ कायम नहीं रह सकी।
  5. कृतकृत्य-देव-दर्शन करके हम सभी कृतकृत्य हो गये।
  6. कण्ठस्थ-बालकों को अपनी कक्षा की कविताएँ कण्ठस्थ कर लेनी चाहिए।
  7. साष्टांग-हमारे देश में संन्यासियों को आज भी साष्टांग प्रणाम किया जाता है।
  8. कृतार्थ-गंगाजल के स्पर्श मात्र से प्राणी कृतार्थ हो जाता है।

Hindi Chapter 5 Class 8 Mp Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित समानोच्चारित भिन्नार्थक शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए
1. अन्न-अन्य, 2. आदि-आदी, 3. अनल-अनिल, 4. अकश्च-अथक, 5. उपकार-अपकार।
उत्तर
1. अन्न = अनाज; अन्य दूसरा।
प्रयोग-

  1. अन्न उत्पादन में भारत उन्नति कर रहा है।
  2. आजादी के समय भारत अन्य देशों से अन्न मँगाता था।

2. आदि = प्रारम्भ के आदी = आदत पड़ जाना।
प्रयोग-

  1. द्रोणाचार्य पाण्डवों के आदि गुरु थे।
  2. वह सिगरेट पीने का आदी है।

3. अनल-आग; अनिल = हवा।
प्रयोग-

  1. अनल सबको भस्म कर देती है।
  2. अनिल के सहारे जीवन बना रहता है।

4. अकथ = न कहने योग्य; अथक न थके हुए।
प्रयोग-

  1. उसकी अकथ कहानी है।
  2. अथक परिश्रम से सफलता मिल सकती है।

5. उपकार = भलाई; अपकार = बुराई।
प्रयोग-

  1. भारतीय मनीषियों ने संसार में अनेक उपकार किए हैं।
  2. अपकारी जन निन्दा का पात्र होता है।

Class 8 Bhasha Bharti Chapter 5 प्रश्न 3.
निम्नलिखित मुहावरों/कहावतों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
यथा नाम तथा गुण; माले मुफ्त दिले बेरहम; मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नन्दन धरना देना नब्ज टटोलना; टोह में रहना।
उत्तर

  1. भीम ने अनेक योद्धाओं को धराशायी करके ‘यथा नाम तथा गुण’ सिद्ध कर दिया था।
  2. आजकल के नेताओं पर यह कहावत कि ‘माले मुफ्त दिले बेरहम’ चरितार्थ होती है।
  3. बिना धन खर्च किए खाद्य वस्तु प्राप्त करने वाले लोग ‘मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नन्दन’ के अनुसार खूब खाते हैं।
  4. किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में तहसील पर धरना दिया।
  5. विधानसभा के चुनावों में मतदाताओं की नब्ज टटोलना नेताओं के लिए आसान नहीं है।
  6. जंगली जानवर दिन छिपते ही अपनी शिकार की टोह में रहते हैं।

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Class 8th Hindi Chapter 5 Mp Board प्रश्न 4.
निम्नलिखित अनुच्छेद में यथास्थान विरामचिह्नों का प्रयोग कीजिए
भगवान ने इस संसार रूपी अजायबघर में भाँति-भाँति के जीव जन्तु छोड़े है कुछ काले कुछ गोरे कुछ सुन्दर कुछ असुन्दर भोले और जल्लाद अलग-अलग स्वभाव अलग-अलग चाल ढाल मेरे पड़ौस में एक सज्जन रहते हैं नाम है मुफ़्तानन्द जी।
उत्तर
भगवान ने इस संसार रूपी अजायबघर में भाँति-भाँति के जीव-जन्तु छोड़े हैं। कुछ काले, कुछ गोरे, कुछ सुन्दर, कुछ असुन्दर, भोले और जल्लाद। अलग-अलग स्वभाव, अलग-अलग चाल-ढाल। मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते हैं, नाम है मुफ्तानन्द जी।

Chapter 5 Hindi Class 8 Mp Board प्रश्न 5.
‘अजनबी’ शब्द का हिन्दी में रूप अपरिचित’ है। इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए
खुशामद, नब्ज, सलामत, दावत, बेरहम, अखबार, रोजाना, नुकसान।
उत्तर
खुशामद = चापलूसी, चाटुकारी; नब्ज = नाड़ी; सलामत ठीक, स्वस्थ दावत = भोज; बेरहम = निर्दयी अखबार = समाचार-पत्र; रोजाना = प्रतिदिन; नुकसान = हानि।

Class 8 Hindi Chapter 5 Bhasha Bharti प्रश्न 6.
(क) इस पाठ से कुछ ऐसे वाक्य छाँटकर लिखिए,
जिनमें सर्वनाम का प्रयोग विशेषण की तरह किया गया है।
उत्तर

  1. मुहल्ले में कौन-कौन लोग अखबार मैंगाते
  2. प्रत्येक मनुष्य को अपने ज्ञान-वर्द्धन के लिए समाचार-पत्र पढ़ना चाहिए।
  3. ईश्वर की कृपा से उनके छह लड़के और चार लड़कियाँ

(ख) ऐसे वाक्य बनाइए जिनमें ‘वह’, ‘यह’, ‘जो’, ‘क्या’ और ‘कोई’ शब्द सर्वनाम के रूप में प्रयुक्त हुए हों।
उत्तर

  1. वह पत्र लिखता है।
  2. यह मेरी पुस्तक है।
  3. यह वही है जो मेरे घर आया था।
  4. वह क्या कर रहा है ?
  5. कोई आया है।

Class 8 Hindi Chapter 5 Muftanand प्रश्न 7.
विशेषणों के पुनरुक्ति वाले विभिन्न अर्थ (भाव) के दो-दो वाक्य लिखिए।
उत्तर

  1. प्रत्येक टोली में पाँच-पाँच बालक होंगे।
  2. पके-पके आम इकट्ठे करो।
  3. अच्छे-से-अच्छा फल लाओ।
  4. लाल-लाल सेब मीठे होते हैं।

श्री मुफ्तानन्दजी से मिलिए परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

1. ‘मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नन्दन’, ब्रजभाषा की लोकोक्ति है। श्री मुफ़्तानन्द जी इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। शौक सब करेंगे। पान का भी शौक जान-पहचान वालों की जेब से ही होता है। आप पान खा रहे हैं, आप से नमस्कार किया और पान पर हाथ बढ़ाया। यदि आप ट्रेन में सफर कर रहे हैं, तो किसी अजनबी से भी निसंकोच रूप से, अपने आवश्यक शौक पूरा कर लेते हैं।

शब्दार्थ-मुफ्त बिना मूल्य दिए प्राप्त करना; मुफ़्तानन्दमुफ्त का आनन्द लेने वाले; ज्वलन्त = महत्त्वपूर्ण, स्पष्ट; जान-पहचान वाले – परिचित लोग; हाथ बढ़ाया = ले लिया; ट्रेन = रेलगाड़ी; सफर = यात्रा, अजनबी = अपरिचित; निसंकोच = बिना किसी संकोच के, बेझिझक।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ “श्री मुफ़्तानन्द जी से मिलिए” नामक पाठ से अवतरित है। इसके लेखक डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी हैं।

प्रसंग-इन पंक्तियों में व्यंग्यकार चतुर्वेदी ने ऐसे व्यक्तियों पर व्यंग्य किया है, जो बिना मूल्य दिए ही उपभोग की विभिन्न वस्तुओं का आनन्द लेते हैं।

व्याख्या-ब्रजभाषा में ब्रज के लोगों के द्वारा एक कहावत कही जाती है, जिसका अर्थ है धन के खर्च बिना किए ही यदि चन्दन प्राप्त हो रहा हो, तो उसे मेरे पुत्र जोरदारी से घिसता चल। इस प्रसिद्ध उदाहरण के लिए श्री मुफ्तानन्द जी का नाम लिया जा सकता है। ये महानुभाव सभी प्रकार के शौक पूरे करते हैं परन्तु उनके लिए एक भी पैसा खर्च नहीं करते हैं। वे पान खाने के शौकीन हैं, परन्तु इसकी पूर्ति परिचित लोगों की जेब से ही करते हैं। आपको पान खाते हुए देखकर वे अवश्य ही अपको नमस्कार करेंगे और इसके साथ ही अपने हाथ को बढ़ाकर पान को खींच लेंगे। यदि किसी अवसर पर मुफ्तानन्द जी रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे हैं, उस रेलगाड़ी में कोई अपरिचित व्यक्ति भले ही सहयात्री हो, तब भी बिना किसी संकोच के (हिचकिचाहट के) आप अपने उस शौक को पूरा कर लेंगे ही जिसे वे आवश्यक समझते हैं।

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(2) मेरे घर दो दैनिक पत्र रोजाना आते हैं, मुझे उनकी प्रसादी तभी मिल पाती है, जब श्रीमान मुफ़्तानन्द भोग लगा लेते हैं। मोहल्ले में कौन-कौन लोग अखबार मँगाते हैं, उनकी नामावली उन्हें कण्ठस्थ है।

समय-समय पर सब पर कृपा करते हैं। उनका कथन है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने ज्ञानवर्द्धन के लिए, अधिक-से-अधिक समाचार-पत्र पढ़ने चाहिए किन्तु पैसा खर्च करके समाचार पत्र पढ़ना वे पाप समझते हैं।

शब्दार्थ-दैनिक पत्र = प्रतिदिन छपकर निकलने वाला समाचार-पत्र; रोजाना = प्रतिदिन प्रसादी = देवता को भोग लगा देने के बाद प्राप्त प्रसाद; नामावली = क्रमबद्ध नामों का विवरण; कण्ठस्थ है = मौखिक रूप से स्मरण है; ज्ञानवर्द्धन = ज्ञान की बढ़ोत्तरी के लिए; पाप समझते हैं = उचित नहीं मानते

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-पूर्व की तरह।

व्याख्या-धन खर्च किए बिना वस्तु प्राप्त करके, उसके आनन्द को लेने वाले व्यक्ति पर व्यंग्य कसते हुए व्यंग्यकार बरसाने लाल चतुर्वेदी बताते हैं कि उनके घर प्रतिदिन निकलने वाले दो समाचार-पत्र रोजाना ही आते हैं परन्तु मैं उन्हें तब तक नहीं पढ़ पाता जब तक श्री मुफ्तानन्द जी सबसे पहले नहीं पढ़ लेते (भोग लगा लेते)। उनके पढ़ लेने के बाद ही मुझे समाचार-पत्र पढ़ने का अवसर (प्रसादी) मिल पाता है। श्री मुफ़्तानन्द जी को मुहल्ले भर के उन सभी लोगों के नाम मालूम हैं जिनके घर पर अखबार आता है क्योंकि वे सभी के यहाँ से समाचार-पत्र माँग कर पढ़ लेते हैं। उनका यह कथन है कि मनुष्य को अधिक से अधिक अखबार पढ़ने चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य के ज्ञान की वृद्धि होती है परन्तु समाचार-पत्र पैसे से – खरीद कर पढ़ने को उचित नहीं मानते। वस्तु की खरीद पर पैसा खर्च करना उनके लिए पाप है।

3.’इहलोक को मुफ्त में सुधारकर मुफ़्तानन्द जी, अब परलोक में भी मुफ्त जीवनयापन करने की टोह में रहते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि जब भगवान ने यहीं इस प्रकार आनन्द से निभा दी, तो स्वर्ग का टिकट खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। भगवान मुफ्त में उनकी मुक्ति कर दें, यह प्रार्थना करते हुए मुफ़्तानन्द जी को हम साष्टांग दण्डवत् करते हैं।’

शब्दार्थ-इहलोक = मृत्युलोक; मुफ्त = बिना कुछ खर्च किए ही; परलोक- दूसरे लोक; जीवनयापन = जीवन बिताने के लिए; टोह में – तलाश में दृढ़ = पक्का; विश्वास = मानना; आनन्द से सुखपूर्वक; निभा दी = निर्वाह कर दिया; मुक्ति = मोक्ष; साष्टांग = पूरे शरीर को जमीन पर लिटा कर; दण्डवत् = प्रणाम, नमस्कार।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-मुफ़्तानन्द जी पूरे जीवन भर किसी तरह भी खर्च न करते हुए अपना जीवनयापन करते हैं और अन्त में भी मुफ्त में स्वर्ग जाने की कामना पूरी करते हैं।

व्याख्या-व्यंग्यकार चतुर्वेदी जी व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि मुफ़्तानन्द जी ने इस मृत्युलोक को तो बिना कुछ खर्च किये ही सुधार लिया अर्थात् जीवन व्यतीत कर लिया। वृद्धावस्था में आकर वे अपने अन्तिम पड़ाव परलोक को भी बिना खर्च किये ही (परोपकार आदि के काम न करते हुए ही) सुधार लेना चाहते हैं। वे अभी भी इस बात की तलाश में रहते हैं कि मृत्युपर्यन्त जब किसी भी तरह कोई खर्च नहीं किया है, तो परलोक की यात्रा करने पर भी खर्च न करना पड़े। वे यह पक्के विश्वास के साथ कहते हैं कि ईश्वर ने अब तक आनन्दपूर्वक निर्वाह किया है, तो उन्हें स्वर्ग जाने के लिए भी कोई खर्च नहीं करना पड़ेगा और उन्हें बिना कोई खर्च किए ही मुक्ति प्राप्त हो जायेगी। इस तरह के आचरण वाले मुफ़्तानन्द को सभी साष्टांग प्रणाम करते हैं जो अपने पूरे जीवन भर किसी भी तरह का खर्च किए बिना ही जिन्दगी काट देने के अपने कौशल के लिए प्रसिद्ध हैं।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 1 Var de Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 1 Var  de Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 1 Var de Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 1 वर दे प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

MP Board Class 8 Hindi Chapter 1 प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
वीणावादिनी = सरस्वती देवी; मन्द रव = धीमा और गम्भीर स्वर; नव = नया; उर = हृदय; अंध-उर = अज्ञान के अन्धकार से युक्त हृदय;  जननि-माँ बन्धन-स्तर = दासता या बंधन का स्वरूप; तम = अज्ञान का अन्धकार; विहग वृन्द = पक्षियों का समूह; पर = पंखा; कलुष मन के विकार या मलिन भाव; तम हर अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करके कलुषभेदमन के मलिनभाव को काट करके जगमग जग कर दे = संसार को जगमगा दे, प्रकाश = उजाला; ज्योतिर्मय निर्झर = प्रकाश से युक्त झरना; नवल = कोमलता लिए हुए नवीन।

Bhasha Bharti Class 8 प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए
(क) ‘नव नभ’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर
‘नव नभ’ के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि सभी प्राणी नए भारतवर्ष की रचना करें और उन्हें इस निर्माण में सभी नए साधन प्राप्त हों।

(ख) इस कविता में कवि किससे वरदान मांग रहा है ?
उत्तर
इस कविता में कवि ज्ञान की देवी माँ सरस्वती से वरदान माँग रहा है।

(ग) कवि भारत में कौन-सा मन्त्र भरने की बात कह
उत्तर
कवि भारत में नव अमृत मन्त्र भरने की बात कह रहा है।

Class 8 Hindi Chapter 1 Var De प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए

(क) कवि माँ सरस्वती से क्या वरदान चाह रहा है?
उत्तर
कवि माँ सरस्वती से वरदान चाहता है कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वतन्त्रता की नई भावना का अमर मंत्र भर जाये। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय से विभिन्न स्तर से अज्ञान का अन्धकार दूर हो जाए तथा सर्वत्र ज्ञान की ज्योति का झरना बहने लगे। मन के विकार दूर हो जायें, अजान का अन्धकार नष्ट हो जाए तथा समस्त संसार ज्ञान के प्रकाश से चमक उठे। सम्पूर्ण भारत नई गति प्राप्त करके गीत और छन्द के क्षेत्र में नवीनता प्राप्त करे।

प्रत्येक कंठ में मधुर स्वर नए बादल की गम्भीर और कल्याणकारी गर्जना के समान उठने लगे। कविता और गीत के आकाश के स्वतन्त्र वातावरण में नये जन्मे पक्षियों के समान नए कवि और गीतकार अपनी कल्पना के नये पंखों (गीतों) के सहारे उड़ान भरने में समर्थ हो जायें। इस तरह, हे सरस्वती देवी । ऐसे उन नए कवियों को स्वतन्त्रता का नया स्वर प्रदान कर दे।

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(ख) कवि प्रकृति की हर वस्तु में नया रूप क्यों देखना चाह रहा है?
उत्तर
कवि ‘निराला’ जी ने अपनी कविता में प्रकृति की ही वस्तु का चित्रण नये रूप में किया है। वे चाहते हैं कि प्रकृति में कोई भी वस्तु अपने पुराने अथवा अतीत के स्वरूप में न बनी रहे। वे चाहते हैं कि वहाँ मधुरता हो, भावुकता हो, सजीवता हो क्योंकि प्रकृति अपने गतिप्रधान स्वरूप में मनुष्य मन को शुद्धता, पवित्रता और कोमलता प्रदान करती है।

प्रकृति अपने प्रत्येक बदले हुए स्वरूप में प्रेम और सौन्दर्य का उपदेश देती है। प्रकृति के स्वतन्त्र विकास से उसकी निर्भीकता तथा सभी के कल्याण की भावना मनुष्य में विकास पाती है। प्रकृति के मुक्त चित्रण में कवि ने रूढ़ियों की अन्धेरी काया को तोड़ कर मानव मुक्ति का सन्देश दिया है। नये बादल की मधुर गम्भीर गर्जना लोगों के मन के विकारों को दूर करके अपनी सुखद वर्षा से पृथ्वी को शस्य श्यामला बना देती है। कवि ने अपनी कविता में सर्वत्र ही अज्ञान के अन्धकार को मिटाने तथा ज्ञान के प्रकाश से सम्पूर्ण जगत् को लाभ देने के लिए ‘शारदा’ से नम्र निवेदन किया है कि सम्पूर्ण समाज सत्य, शिव और सुन्दर बन जाये।

Bhasha Bharti Class 8 Chapter 1 प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों की उचित शब्दों से पूर्ति कीजिए
(क) कलुष भेद, तम हर …………. भर।
(ख) काट अन्ध उर …………….. स्तर।
(ग) बहा ……………….. ज्योतिर्मय निर्झर।
(घ) नव …………… स्वर दे।
उत्तर
(क) प्रकाश
(ख) के बन्धन
(ग) जननि
(घ) पर, नव।

Class 8 Hindi Bhasha Bharti प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों के भाव स्पष्ट कीजिए
(क) काट अन्ध उर के बन्धन स्तर,
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर।
उत्तर
हे माँ ! मनुष्यमात्र के हृदय में जो अज्ञान के भिन्न-भिन्न स्तरों के बन्धन हैं, उन्हें काट दे और उन्हें हर प्रकार के अज्ञान से मुक्त कर दे। उनके हृदयों में ज्ञान का ज्योति रूपी झरना बहा दे। मन के विकारों (बुरे भाव) को दूर कर दे। अज्ञान के अन्धकार को मिटा दे। ज्ञान का प्रकाश भर दे। सम्पर्ण संसार को जगमगा दे।

(ख) नव नभ के नव विहग वृन्द को,
नव पर, नव स्वर दे।
उत्तर
हे माँ सरस्वती ! आकाश के समान यह नया समाज सर्वत्र फैला हुआ है। इसमें नए-नए कवि नवीन पक्षियों (अभी जन्म लेने वाले पक्षियों) के समान चहकते हुए कल्पना की उड़ान भरने के लिए आकुल हैं। तू, इन नए कवि रूपी पक्षियों को नई गति प्रदान कर। नवीन लय और ताल से युक्त छन्द प्रदान कर, इन्हें नए-नए पंख (कल्पनाशक्ति) देकर ऊँची उड़ान भरने योग्य बना दे। इनके कण्ठ को कोमल और नवीन बादल के समान धीमा और गम्भीर स्वर प्रदान कर दे ताकि ये नए-नए गीत (कविताएँ) गा सकें।

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 1 प्रश्न 6.
सही विकल्प चुनकर लिखिए
(क) ‘नव नभ के नव विहग वृन्द को पंक्ति में अलंकार
(अ) यमक
(आ) अनुप्रास
(इ) श्लेष।
उत्तर
(आ) अनुप्रास

(ख) ‘वर दे’ कविता के रचयिता हैं
(अ) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’
(आ) जयशंकर प्रसाद
(इ) गिरधर।
उत्तर
(अ) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

(ग) विहग वृन्द का आशय है
(अ) पशुओं का समूह
(आ) मनुष्यों का समूह
(इ) पक्षियों का समूह।
उत्तर
(इ) पक्षियों का समूह।

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भाषा-अध्ययन

Class 8 Hindi Chapter 1 Mp Board प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए
वीणावादिनी, स्वतन्त्र, अमृत, ज्योतिर्मय, विहग वृन्द, बन्धन, निर्झर, जननि।
उत्तर
विद्यार्थी उपर्युक्त शब्दों को ठीक-ठीक पढ़कर उनका शुद्ध उच्चारण करने का अभ्यास करें।

MP Board Class 8th Hindi Chapter 1 प्रश्न 2.
‘वर दे’, पाठ में आए ‘र’ के विभिन्न रूप (..और र) वाले शब्द छाँटकर लिखिए।
उत्तर
रव, भर, उर, स्तर, ज्योतिर्मय, निर्झर, अमृत, प्रिय, हर, वृन्द।

Class 8th Hindi Bhasha Bharti प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के नीचे बनी वर्ग पहेली से दो-दो पर्यायवाची शब्द खोजकर लिखिए
अमृत, जननि, रात, जग, आकाश, विहग।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 1 वर दे 1

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 1 प्रश्न 4.
‘तम हर’, ‘प्रकाश भर में एक-दूसरे के विपरीत अर्थ वाले शब्द प्रयुक्त हुए हैं। इस प्रकार के पाँच शब्द लिखिए, जिनसे विपरीत अर्थ (विलोम) प्रकट होता है।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 1 वर दे 2

Class 8th Hindi Chapter 1 Var De प्रश्न 5.
निम्नलिखित उदाहरणों में से उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द छाँटकर तालिका में लिखिए
(1) सीता का मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है।
(2) पीपर पात सरिस मन डोला।
(3) हरिपद कोमल कमल से।
(4)”नन्दन वन-सी फूल उठी वह छोटी-सी कुटिया मेरी।”
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 1 वर दे 3

वर दे सम्पूर्ण पद्यांशों की व्याख्या

1. वर दे, वीणावादिनी वर दे।
प्रिय स्वतन्त्र रव अमृत मन्त्र नव
भारत में भर दे!

शब्दार्थ-वीणावादिनी = वीणा बजाने वाली सरस्वती देवी; वा दे = वरदान दे; प्रिय = सुनने में मधुर लगने वाला, स्वतन्त्र रव = आजादी की ध्वनि; अमृत = अमर या सदा रहने वाला; नव = नया।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक भाषा-भारती’ के ‘ वर दें’ नामक पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने सरस्वती देवी से सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वतन्त्रता की आवाज भर देने की कामना की है।

व्याख्या-वीणा बजाने वाली हे माँ सरस्वती ! तू मुझे वरदान दे। मेरे इस भारत देश को तू प्रिय और स्वतन्त्र वाणी प्रदान कर तथा इसमें अमरता का नवीन मन्त्र भर दे अर्थात् भारत को स्वतन्त्रता और अमरता की भावना प्रदान कर दे।

(2) काट अन्ध-उर के बन्धन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्धार
कलुष-भेद तम हर, प्रकाश भर
जगमग जग कर दे !

शब्दार्थ-अन्ध-उर = अज्ञान के अन्धकार से भरे हुए हृदय के ज्योतिर्मय = ज्योति या प्रकाश से युक्त निर्झर-झरना; कलुष मन के विकार, मलिन भाव; भेद = काटकर या समाप्त करके तमहर अज्ञान के अन्धकार को दूर करके प्रकाश भरज्ञान के प्रकाश से भर दे: जग-संसार: जगमग चमका दे।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने ज्ञान की ज्योति से पूरे संसार को चमकाने की कामना की है।

व्याख्या-हे माँ ! मनुष्यमात्र के हृदय में जो अज्ञान के भिन्न-भिन्न स्तरों के बन्धन हैं, उन्हें काट दे और उन्हें हर प्रकार के अज्ञान से मुक्त कर दे। उनके हृदयों में ज्ञान का ज्योति रूपी झरना बहा दे। मन के विकारों (बुरे भाव) को दूर कर दे। अज्ञान के अन्धकार को मिटा दे। ज्ञान का प्रकाश भर दे। सम्पर्ण संसार को जगमगा दे।

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3. नव गति, नव लय, ताल-छन्द नव,
नवल कण्ठ, नव जलद-मन्द रव,
नव नभ के नव विहग वृन्द को,
नव पर, नव स्वर दे !

शब्दार्थ-नव = नई गति = चाल; नवल = कोमल और नवीन; कंठ- गला या स्वर; जलद = बादल; मन्द = धीमी और गम्भीर; रव = ध्वनि या गर्जना; नभ- आकाश; विहग = पक्षी; वृन्द = समूह; पर = पंख।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-कवि ने समाज, साहित्य और सम्पूर्ण परिवेश में नयापन लाने की कामना की है।

व्याख्या-हे माँ सरस्वती ! आकाश के समान यह नया समाज सर्वत्र फैला हुआ है। इसमें नए-नए कवि नवीन पक्षियों (अभी जन्म लेने वाले पक्षियों) के समान चहकते हुए कल्पना की उड़ान भरने के लिए आकुल हैं। तू, इन नए कवि रूपी पक्षियों को नई गति प्रदान कर। नवीन लय और ताल से युक्त छन्द प्रदान
कर, इन्हें नए-नए पंख (कल्पनाशक्ति) देकर ऊँची उड़ान भरने योग्य बना दे। इनके कण्ठ को कोमल और नवीन बादल के समान धीमा और गम्भीर स्वर प्रदान कर दे ताकि ये नए-नए गीत (कविताएँ) गा सकें।

विशेष-कवि ने माँ शारदा (सरस्वती) से भारत के लिए स्वतन्त्रता का मन्त्र, संसार के लिए ज्ञान और कवियों के लिए नई कल्पना तथा काव्यकला की माँग की है। ‘निराला’ जी की महानता है कि उन्होंने अपने लिए कुछ भी नहीं माँगा है।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 3 MadhyaPradesh ki Sangeet Virasat Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 3 MadhyaPradesh ki Sangeet Virasat Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 3 MadhyaPradesh ki Sangeet Virasat Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 3 मध्य प्रदेश की संगीत विरासत प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

Class 8 Hindi Chapter 3 Madhya Pradesh Ki Sangeet Virasat प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
ध्रुपद = गायन की एक विशेष शैली; विरासत = उत्तराधिकार में प्राप्त; प्रणेता = रचनाकार; गुरुभाई = एक ही गुरु के शिष्य आपस में गुरुभाई कहलाते हैं; जीवन्त सजीव, जीवित।

MP Board Class 8 Hindi Chapter 3 प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए
(क) मध्य प्रदेश में कौन-कौन से प्रमुख संगीतकारों ने संगीत की साधना की?
उत्तर
मध्य प्रदेश में सोलहवीं सदी के महान् गायक तानसेन, ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर, सन्तूर वादक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ, कुमार गन्धर्व (वास्तविक नाम सिद्राम कोयकली) एवं स्वर कोकिला लता मंगेशकर आदि प्रमुख संगीतकारों ने संगीत की साधना की।

(ख) मध्य प्रदेश में संगीत की राज्य अकादमी किस महान् संगीतकारों के नाम से कहाँ स्थापित की गई है?
उत्तर
प्रख्यात सन्तूर वादक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की स्मृति में अलाउद्दीन खाँ अकादमी’ के नाम से मैहर में स्थापित की गई।

(ग) भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान संगीत के क्षेत्र में किसे दिया गया था?
उत्तर
भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ संगीत के क्षेत्र में लता मंगेशकर को दिया गया था।

(घ) कुमार गन्धर्व का वास्तविक नाम क्या था?
उत्तर
कुमार गन्धर्व का वास्तविक नाम सिद्राम कोयकली

(ङ) सरस्वती किस संगीतज्ञ के गले में विराजमान मानी जाती हैं?
उत्तर
संगीतज्ञ लता मंगेशकर के गले में सरस्वती स्वयं विराजमान मानी जाती हैं।

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Bhasha Bharti Class 8 Chapter 3 प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए

(क) संगीत का वास्तविक महत्त्व कब होता है ?
उत्तर
संगीत का वास्तविक महत्त्व तब होता है, जब संगीत की शास्त्रीयता साधना को महत्त्व देती है। संगीत की मिठास आत्मिक शान्ति देती है एवं जीवन को जीने की उमंग पैदा करती है। संगीत से सने गीतों को सुनकर आदमी अपने आप में थिरक उठता है। उसके हृदय में करुणा का भाव जाग उठता है और करुणा का भाव आँसुओं के रूप में बह निकलता है। इससे साधारण लोग प्रभावित हो उठते हैं। यही कारण है कि संगीत को सम्पूर्ण समाज महत्त्व देता है।

(ख) कुमार गन्धर्व ने कौन-कौन से रागों की रचना की?
उत्तर
कुमार गन्धर्व ने मालवी गीतों को राग दरबारी ढंग से गाकर नए आयाम दिए। उन्होंने महाकवि सूरदास, तुलसीदास, कबीर तथा मीरा के पदों को भी गाकर जनसामान्य तक स्वर-सरिता के माध्यम से प्रेषित किया। उन्होंने राग-मालवती, लग्न गंधार सहेली तोडी और गाँधी मल्हार रागों की रचना की। उन्होंने संगीत सम्बन्धी एक पुस्तक की रचना की जिसका नाम “असूप राग-विलास’ है। इसके माध्यम से संगीत प्रेमियों को संगीत की शिक्षा भी प्रदान की।

(ग) बादशाह अकबर के दरबार में तानसेन ने क्या चमत्कार कर दिखाया था ?
उत्तर
सोलहवीं सदी के संगीत सम्राट तानसेन से, बादशाह अकबर ने अपने दरबार में संगीत का प्रभाव दिखाने का हठ किया। तानसेन संगीत साधना में तन्मय हो गये। उन्होंने दीपक राग की साधना की। स्वर के आलाप धीरे-धीरे सिद्ध होते गये। इसका प्रभाव यह हुआ कि दरबार में रखे दीप जल उठे। इस प्रकार वहाँ मौजूद दरबारी लोग चमत्कृत हो उठे।

(घ) लता मंगेशकर को कौन-कौन से सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हुए हैं ?
उत्तर
लता मंगेशकर ने हर भाव, धर्म और भाषा के गीतों में अपने स्वरों को सँजोया है। इसलिए उन्हें समूचे राष्ट्र की गायिका कहा जाता है। उनके गले में सरस्वती विद्यमान हैं। उनके गायन में अभी भी आकर्षण है। वे संगीत साधना में निरन्तर ही लीन रहती हैं। इसके कारण लता मंगेशकर को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें ‘दादा,साहब फालके’, ‘पद्मभूषण’, ‘पद्मविभूषण’ आदि पुरस्कार प्रदान किये गये।

(ङ) संगीत की महिमा अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।
उत्तर
संगीत की महिमा अनन्त है। संगीत में मौजूद शास्त्रीयता से साधना को महत्त्व दिया जाता है। संगीत में विद्यमान मधुरता से हमें आत्मिक शान्ति मिलती है तथा जीवन को जीने की उमंग व उत्साह भी उत्पन्न होता है। गीतों को संगीत में डालकर मनुष्य के पैर अपने आप ही थिरक उठते हैं। मनुष्य में करुणा का भाव पैदा हो जाता है जिससे उसकी आँखों से अनायास ही आँसू बह उठते हैं। यही संगीत का सामाजिक महत्त्व व प्रभाव है।

(च) पाठ में आए संगीतकारों में से आपको कौन-सा संगीतकार सबसे अच्छा लगा और क्यों ?
उत्तर
प्रस्तुत पाठ में आए संगीतकारों में से सबसे अच्छी संगीतकार लता मंगेशकर हैं। उनके गीतों में स्वर इस तरह पिरोया हुआ है कि हर भाव, धर्म और भाषा अपने स्वरूप में व्यंजित हो उठते हैं। इसी कारण वे समूचे राष्ट्र की गायिका हैं क्योंकि उनके गले में स्वयं सरस्वती विद्यमान हैं। लताजी की आयु बढ़ रही है, परन्तु इस मुकाम पर भी उनके गायन में आकर्षण है। इन सभी कारणों से मुझे लता मंगेशकर सबसे अच्छे संगीतकार के रूप में लगती हैं।

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भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 3 प्रश्न 4.
सही विकल्प चुनकर लिखिए
(क) तानसेन के गुरु थे
(1) बैजू बावरा
(2) स्वामी हरिदास
(3) राजा मानसिंह तोमर,
(4) पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर।
उत्तर
(2) स्वामी हरिदास

(ख) प्रख्यात संतूर वादक थे
(1) अलाउद्दीन खाँ
(2) कुमार गन्धर्व,
(3) तानसेन
(4) बिस्मिल्लाह खाँ।
उत्तर
(1) अलाउद्दीन खाँ।

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 3 प्रश्न 5.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए
(अ) बाल गायक के रूप में ……………. अल्पायु में विख्यात हो गये थे।
(आ) …………….. संगीत सम्राट कहे जाते हैं।
(इ) संगीत नृत्य का अखिल भारतीय कार्यक्रम संगीतकार ……… की स्मृति में होता है।
(ई) जिस समाज में कला का स्थान नहीं, वह ………….. हो जाता है।
उत्तर
(अ) कुमार गन्धर्व
(आ) तानसेन
(इ) तानसेन,
(ई) प्राणहीन।

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भाषा-अध्ययन

Class 8 Hindi Chapter 3 Mp Board प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए और लिखिए
झंकृत, समृद्ध, अन्वेषण, ध्रुपद, अन्तर्राष्ट्रीय, शास्त्रीय,अक्षुण्ण, वैशिष्ट्य, श्रद्धांजलि।
उत्तर
विद्यार्थी उपर्युक्त शब्दों को ठीक-ठीक पढ़कर उनका शुद्ध उच्चारण करने का अभ्यास करें और फिर लिखें।

Madhya Pradesh Ki Sangeet Virasat प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से सामासिक शब्द छाँटकर, उनके समास का नाम लिखिए
(क) राजपुत्र प्रतिदिन माता-पिता को प्रणाम करता था।
(ख) पीताम्बर धारण किए कमलनयन भगवान प्रकट हुए।
(ग) राजभवन के रसोईघर एवं शयनकक्ष बहुत विशाल
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 3 मध्य प्रदेश की संगीत विरासत 1
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 3 मध्य प्रदेश की संगीत विरासत 2

MP Board Class 8th Hindi Chapter 3 प्रश्न 3.
पाठ के आधार पर निम्नलिखित शब्दों की सही जोड़ियाँ बनाइए
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 3 मध्य प्रदेश की संगीत विरासत 3
उत्तर
(क) → (3), (ख) + (4), (ग) → (1), (घ)→ (5), (ङ)→ (2)

Hindi Chapter 3 Class 8 Mp Board प्रश्न 4.
‘प्राण’ शब्द में ‘हीन’ जोड़कर ‘प्राणहीन’ शब्द बना है। इसी प्रकार ‘हीन’ जोड़कर पाँच अन्य शब्द बनाइये।
उत्तर
धन + हीन = धनहीन; रक्त + हीन = रक्तहीन; ज्ञान + हीन = ज्ञानहीन; जल + हीन = जलहीन; मान + हीन = मानहीन।

Class 8 Bhasha Bharti Chapter 3 प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद कीजिए और सन्धि का प्रकार भी लिखिए
दिसम्बर, उल्लास, सम्मान, इत्यादि।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 3 मध्य प्रदेश की संगीत विरासत 4
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Mp Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 3 प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों के रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए शब्दों में से उचित शब्द छाँटकर कीजिए
(संगीत सम्राट, दीपक राग, स्वामी हरिदास, बाल गायक, भारत रत्न)
(अ) तानसेन ने तन्मय होकर ………. की साधना की।
(आ) लता मंगेशकर जी ने भारत का सर्वोच्च पुरस्कार …………….प्राप्त किया।
(इ) ………. तानसेन को कौन नहीं जानता है ?
(ई) तानसेन के गुरु …………… थे।
(उ) कुमार गन्धर्व सात वर्ष की आयु में ………… केरूप में विख्यात हुए।
उत्तर
(अ) दीपक राग
(आ) भारत रत्न
(इ) संगीत सम्राट
(ई) स्वामी हरिदास
(उ) बाल गायक।

मध्य प्रदेश की संगीत विरासत परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) आराधना साधना और प्रार्थना ने संगीत को संजीवनी बनाया। अतीत से वर्तमान तक मध्य प्रदेश अपने इतिहास में संगीत के कीर्तिमान स्थापित करता चला आ रहा है। संगीत की शक्ति ‘से दीप जलाना और वर्षा कराना संगीत की साधना की विजय है।

शब्दार्थ-संजीवनी = जीवन देने वाली; अतीत =बीते हुए युग से; वर्तमान = मौजूदा युग; कीर्तिमान = प्रशंसनीय स्थान विजय = जीत; आराधना = स्तुति।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक भाषा-भारती के मध्य प्रदेश की संगीत विरासत’ नामक पाठ से अवतरित है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखकों ने संगीत के महत्त्व को. बताया है।

व्याख्या-संगीत जीवन देने वाली औषधि के समान है। इसका प्रयोग भक्तों ने आराधना (स्तुति) करने में, साधना करने में तथा अपने देव की प्रार्थना करने में लगातार किया है, जिससे संगीत का विकास और विस्तार हुआ। मध्य प्रदेश भारतवर्ष का एक महत्त्वपूर्ण प्रदेश है। यहाँ पर बीते हुए युग से लेकर मौजूदा समय तक संगीत की साधना की गई। मध्य प्रदेश के इतिहास में संगीत की साधना एक महत्त्वपूर्ण घटना है और इसे संगीत की प्रशंसा का सर्वोच्च स्थान प्राप्त करवाया। आज भी इस क्षेत्र में संगीत को उन्नत बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं। संगीत की साधना सम्बन्धी पराकाष्ठा, दीप जला देने और बादलों के घुमड़ आने तथा वर्षा कराने में निहित है। इस सब से लगता है कि संगीत की साधना से सर्वत्र विजय प्राप्त की जा सकती है।

(2) ऋषि, मुनियों और साधकों की हजारों वर्षों की तपस्या एवं परिश्रम का प्रतिफल है-संगीत। कहा जाता है कि जिस समाज में कला का स्थान नहीं होता, वह समाज भी प्राणहीन हो जाता है।

शब्दार्थ-साधकों की = साधना करने वालों की; परिश्रम = मेहनत; प्रतिफल = नतीजा, परिणाम;
स्थान = महत्त्व, जगह; प्राणहीन = मृत, मरा हुआ।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-संगीत आदि ललित कलाओं को महत्त्व न देने वाला समाज मरा हुआ होता है।

व्याख्या-संगीत के विकास और उन्नति के लिए हमारे ऋषियों, मुनियों तथा संगीत कला की साधना करने वाले संगीतकारों ने तपस्या की। वे सभी एकचित्त होकर संगीत की साधना में लगे रहे। आज संगीत कला जिस मुकाम को प्राप्त हो गयी है, वह मुकाम उन सभी साधकों की तपस्या और उनकी मेहनत का नतीजा है, परिणाम है। यह कहावत सत्य है कि वह समाज मरा हुआ (मृत) होता है जिसमें संगीत आदि अनेक कलाओं को महत्त्व नहीं दिया जाता। अतः समाज की जीवन्तता के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है कि समाज के लोगों को कला के महत्त्व को समझना चाहिए और इसके विकास और उन्नति के लिए निरन्तर सहयोग देकर साधकों को उत्साहित करना चाहिए।

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(3) संगीत की महिमा अनंत है। संगीत की शास्त्रीयता जहाँ साधना को महत्त्व देती है, वहीं उसकी मधुरता, आत्मिक शान्ति और जीवन जीने की उमंग उत्पन्न करती है। संगीत में पगे गीतों को सुनकर जहाँ आदमी थिरक उठता है, वहीं करुणा में डूबकर आँसू बहाने पर विवश हो जाता है।

संगीत जब – जन-साधारण को प्रभावित करने लगता है, तब उसका सामाजिक महत्त्व बढ़ जाता है।

शब्दार्थ-महिमा = महत्त्व अनन्त = अन्तहीन; मधुरता = मिठास; आत्मिक शान्ति = आत्मा सम्बन्धी शान्ति; जीने = जीवित रहने उमंग = उत्साह; उत्पन्न = पैदा; पगे = सने हुए या युक्त; थिरक उठता है नाच उठता है; करुणा = दया; विवश = लाचार; जनसाधारण = साधारण लोगों को ; सामाजिक = समाज के रूप में।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-संगीत का सामाजिक महत्त्व बहुत अधिक है। इससे मनुष्य में जीवन को जीने का उत्साह पैदा होता है।

व्याख्या-संगीत के महत्त्व को बताते हुए लेखकों का मत है कि संगीत से, उसकी शास्त्रीयता से, साधना से और उसकी मिठास से आत्मा में शान्ति मिलती है। जीवन को किस तरह जीवित रखा जाय, इसके लिए भी उत्साह मिलता है। संगीत से सने गीत मनुष्यों में थिरकनें उत्पन्न करते हैं। मनुष्य में करुणा और सहानुभूति के भाव पैदा हो जाते हैं और आँसुओं की झड़ी लग जाती है। यह करुणा के भावावेश से भर उठता है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति संगहीत से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इससे संगीत के महत्त्व में बढ़ोत्तरी हो जाती है।

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MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 7 Bhedaghat Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 7 Bhedaghat Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 7 Bhedaghat Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 7 भेड़ाघाट प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

Class 8 Hindi Chapter 7 Bhedaghat प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
बंदिनी = महिला कैदी; निष्काम = बिना स्वार्थ के, बिना किसी कामना के कृष्णत्व-कालापन, श्याम रंग; घर्षणघिसावट, रगड़, घिसना; नगण्य = तुच्छ। किसी गणना में न आने योग्य नुस्खा = वैद्य या हकीम द्वारा रोग दूर करने के लिए लिखी गई औषधि का पर्चा; कूता = संख्या जानना, तौल आदि का अन्दाजा लगाना; तृण-तिनका, कोमल घास।

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 7 प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए
(क) भेड़ाघाट जबलपुर से कितने मील दूर है ?
उत्तर
भेड़ाघाट जबलपुर से तेरह मील दूर है।

(ख) गौरीशंकर मन्दिर किसने बनवाया था ?
उत्तर
गौरीशंकर मन्दिर त्रिपुरी राजघराने के महाराज करण देव की महारानी अल्हणा देवी ने संवत् 1155-56 विक्रमी में बनवाया। इस प्रकार इसका निर्माण साढ़े आठ सौ वर्ष पूर्व किया गया।

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(ग) दूध धारा किसे कहते हैं ?
उत्तर
‘दूध धारा’ संगमरमरी चट्टानों पर से नर्मदा का बहता जल है। वह जब घर्षण के साथ धुआँधार झरने से पानी गिरता है, तो वह दूध जैसा दीख पड़ता है। इसलिए इसे दूधधारा कहते हैं।

(घ) भेड़ाघाट घूमने कौन गया था ?
उत्तर
भेड़ाघाट घूमने के लिए लेखक स्वयं गया हुआ था। सौन्दर्य के क्षण-क्षण पर बदलती-सी लगती है। इसके किनारे मन्दिर और धर्मशालाएँ हैं। भेड़ाघाट की छोटी-सी पहाड़ी पर गौरीशंकर मन्दिर है। रात्रि के सन्नाटे में दूध-धारा का घर-घर शब्द गौरी शंकर मन्दिर में सुनाई पड़ता है। यहाँ सर्वत्र ही प्रकृति की सुन्दरता का साम्राज्य है।

(ख) जबलपुर में भेड़ाघाट के अतिरिक्त कौन-कौन से घाट हैं ? वे भेड़ाघाट की तरह आकर्षक क्यों नहीं लगते ?
उत्तर
लेखक ने भेड़ाघाट देखा। वहाँ की सुन्दरता का प्रभाव लेखक के मन पर बहुत ही अधिक था। उसने सबसे पहले ग्वारीघाट तथा तिलवाड़ा देख लिया था। इन स्थानों की प्रकृति भी कम सौन्दर्यमयी नहीं थी। यहाँ की चट्टानें भी सतपुड़ा के शिखरों की गौरव थीं। इन प्राकृतिक उपादानों में उनकी विशालता ही शोभा थी जिसके महत्व को नहीं आंका जा सकता। दूध-धारा और धुआँधार भी अपने प्राकृतिक सौन्दर्य की आभा को बिखेर रही थीं। इन्हीं शिखरों के मध्य गौरीशंकर और चौंसठ योगिनी का मन्दिर है। नर्मदा के किनारों वाले बीहड़ जंगलों के मध्य इन मन्दिरों का निर्माण करना भी अपने आप में एक ऐतिहासिक सच्चाई है। लेखक को इन सभी स्थलों की सुन्दरता ने प्रभावित तो किया परन्तु उसके ऊपर भेड़ाघाट की सुन्दरता का मुग्धकारीप्रभाव चमत्कारिक है।

(ग) लेखक द्वारा की गई भेड़ाघाट यात्रा का वर्णन कम-से-कम 100 (सौ) शब्दों में कीजिए।
उत्तर
लेखक को सन् 1914 ई. में भेड़ाघाट देखने का अवसर मिला। भेड़ाघाट जबलपुर से तेरह मील दूर है। वह आधा घण्टे में मीरगंज स्टेशन पर पहुँच गया। उस समय रेलगाड़ी की यह गति बहुत तेज समझी जाती थी। दो-तीन अंग्रेज अपने खानसामे के साथ भेड़ाघाट जाने के लिए मीरगंज स्टेशन पर उतरे थे। नर्मदा नदी के भेड़ाघाट तक वहाँ सड़क कच्ची थी। नर्मदा नदी अमरकंटक से निकली है। नर्मदा का प्रवाह आठ सौ मील तक बहता है परन्तु भेड़ाघाट इसके उद्गम अमरकण्टक से एक सौ चौवामील की दूरी पर है। मुर्की और लोकेश्वर के बीचोंबीच भेड़ाघाट स्थित है। यह वह स्थल है जहाँ किसी युग में भृगु ऋषि ने तपस्या की थी।

यहाँ की संगमरमरी चट्टानें निर्मल और सुन्दर हैं। वहाँ की गम्भीरता प्रदर्शित करती है कि मानो वह ऋषि आज भी वहाँ अपनी तपस्या में लीन है। इन चट्टानों के ऊपर कोमल घास उगी हुई। चन्द्रमा की चाँदनी में चाँदी की तरह चमक उठती है और सूरज की तपिश में तप उठती हैं। बरसात में घना अंधकार सब ओर छा जाता है। लेखक को यहाँ के सौन्दर्य ने बहुत अधिक प्रभावित किया है। लेखक ने गौरीशंकर और चौंसठ योगिनियों के मन्दिर को भी देखा। इसके समीप ही दूध-धारा को देख लेखक चमत्कृत हो उठा। इस सब की घर-घर और मर-मर की आवाज अभी भी लेखक को अपने कानों में गूंजती प्रतीत होती है।

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MP Board Class 8 Hindi Chapter 7 प्रश्न 4.
सही विकल्प चुनकर लिखिए
(1) सतपुड़ा का जंगल कहाँ स्थित है ?
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) आन्ध्र प्रदेश
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) बिहार।
उत्तर
(ग) मध्य प्रदेश

(2) धुआँधार प्रपात किस नदी के जल के गिरने से बनता है?
(क) नर्मदा
(ख) गंगा
(ग) यमुना
(घ) ताप्ती।
उत्तर
(क) नर्मदा

(3) भेड़ाघाट की पहाड़ी पर कौन-सा मन्दिर बना है ?
(क) गणेश
(ख) महादेव
(ग) गौरीशंकर
(घ) सीता-राम।
उत्तर
(ग) गौरीशंकर

(4). पल-पल पलटति भेष, छलकि छन-छन छवि धारति’ ये पंक्तियाँ किस कवि की हैं?
(क) माखन लाल चतुर्वेदी
(ख) श्रीधर पाठक
(ग) शिवमंगाल सिंह ‘सुमन’
(घ) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।
उत्तर
(ख) श्रीधर पाठक

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भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 7 प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए
(1) “बैल को अपने खूटे पर ही अच्छा लगता है।”
(2) नर्मदा चाहे कितनी मर-मर करे, वह मरती नहीं है।
(3) जो जनसेवा के लिए नीचे गिरना स्वीकृत करते हैं, उन्हें शोभाधाम के ऐसे ही हाथ सँभाल लिया करते हैं।
उत्तर

  1. एक पुरानी कहावत है कि बैल जो अपने निश्चित स्थान पर बैधता रहा हो, उसे वही स्थान अच्छा (प्रिय) लगेगा।
  2. नर्मदा नदी अपने जल के प्रवाह से मर-मर की ध्वनि उत्पन्न करती हुई बहती रहती है, किन्तु इसके दोनों किनारों की ऊँची चट्टानों की श्वेतता कभी भी मर नहीं सकती।
  3. नर्मदा नदी जब भेड़ाघाट पर अत्यधिक ऊँचाई से नीचे गिरती है तो उसके दोनों किनारों पर खड़ी संगमरमरी चट्टानें उसे मानो अपनी भुजाओं में स्थान देती प्रतीत होती हैं। इसी प्रकार जब भी कोई व्यक्ति अथवा व्यक्तित्व जनसेवार्थ झुककर अथवा नत होकर कोई कार्य सम्पन्न करने हेतु चल पड़ता है, तो उसे समाज रूपी सुन्दर एवं मजबूत हाथ अपना सहारा एवं संबल

भाषा-अध्ययन

Bhasha Bharti Class 8 Chapter 7 प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए और लिखिए
डॉक्टर, ड्रॉप, कॉलेज, बॉल, बॉस, कॉल, लॉकर, ऑफिस।
उत्तर
विद्यार्थी उपर्युक्त शब्दों को ठीक-ठीक पढ़कर उनका शुद्ध उच्चारण करने का अभ्यास करें और लिखें।

Class 8 Hindi Chapter 7 Mp Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों को वर्णमाला के क्रम में लिखिए
‘संन्यासी, नवरत्न, भेड़ाघाट, खूटा, बरसात, उज्ज्वलता, नर्मदा, मुलायम, रेती, किनारा, दर्शन, ग्वारीघाट।
उत्तर
उज्ज्वलता, किनारा, खूटा, ग्वारी घाट, दर्शन, नर्मदा, नवरत्न, बरसात, भेड़ाघाट, मुलायम, रेती, संन्यासी।।

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 7 प्रश्न 3.
निम्नलिखित उदाहरण के अनुरूप दिए गए शब्दों का प्रयोग एक-एक वाक्य में कीजिए
उदाहरण-कालिदास, विक्रमादित्य, नवरत्न।
वाक्य-कालिदास विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से एक थे।

1. नगण्य, मूल्य, ईमानदारी।
उत्तर
ईमानदारी से देखा जाय तो इन संगमरमरी चट्टानों की अपेक्षा चाँदी का मूल्य नगण्य है।

2. नर्मदा, जबलपुर, भेड़ाघाट, प्रकृति चित्रण, मनोरम।
उत्तर
जबलपुर के समीप नर्मदा नदी के भेड़ाघाट का प्रकृति चित्रण लेखक ने बहुत ही मनोरम शैली में किया है।

3. रात, पक्षी, घोंसला।
उत्तर
रात को पक्षी अपने घोंसलों में छिपकर धुआँधार . के झरने की ‘घर-घर’ की आवाज सुनते हैं।

MP Board Class 8th Hindi Chapter 7 प्रश्न 4.
शुद्ध शब्द छाँटकर सामने के खाने में लिखिएशब्द
(1) परवत, पर्वत, पर्वत
(2) नर्मदा, नरमदा, नरबदा
(3) श्रेणी, शैणी, शरैणी
(4) पूरवी, पूर्वी, पूर्वि
(5) प्रपात, परपात, पात
(6) पशचिम, पश्चिम, पर्शचम
उत्तर

  1. पर्वत
  2. नर्मदा
  3. श्रेणी
  4. पूर्वी
  5. प्रपात
  6. पश्चिम

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Hindi Chapter 7 Class 8 Mp Board प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के कम से कम दो-दो अर्थ लिखकर, उन्हें अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
आम, काल, गति, अर्थ, तात।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 7 भेड़ाघाट 1
Class 8th Hindi Chapter 7 Mp Board प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए उनके सामने लिखे शब्दों में से उचित शब्द छाँटकर लिखिए
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 7 भेड़ाघाट 2
उत्तर
(अ)→(3),(आ)-(1),(इ)→(4),(ई)→(2), (1)→(7), (ऊ)→ (6),(ए)→ (5).

भेड़ाघाट परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या

(1) भेड़ाघाट में नर्मदा के दोनों किनारे संगमरमर के हैं, किन्तु मैं सौन्दर्य-बोध के कारण ही वहाँ जा रहा था, यह कहना अत्यन्त कठिन है। जिस तरह वैद्य या डॉक्टर के नुस्खे कई वस्तुओं का मिश्रण ही हैं, उसी तरह मेरे मन में भेड़ाघाट के दर्शन की लालसा में कई भावनाओं का मिश्रण था।

शब्दार्थ-सौन्दर्य = बोध के कारण सुन्दरता को समझने के लिए अत्यन्त = बहुत अधिक; नुस्खे = वैद्य या हकीम के द्वारा रोग दूर करने के लिए लिखी गई औषधि के पर्चे मिश्रण = मिलावट; लालसा = इच्छा, कामना।।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती के पाठ ‘भेड़ाघाट’ से अवतरित है। इसके लेखक ‘पं. माखनलाल चतुर्वेदी हैं।

प्रसंग-भेड़ाघाट को देखने की अपनी इच्छा का वर्णन किया है।

व्याख्या-भेड़ाघाट जबलपुर से कुल तेरह मील की दूरी पर है। यह नर्मदा नदी का घाट है जहाँ इसके दोनों किनारे संगमरमर के हैं। मैं वहाँ भेड़ाघाट देखने के लिए जा रहा था। मेरा उद्देश्य भेड़ाघाट के क्षेत्र की सुन्दरता को समझने के लिए और उस सौन्दर्य के पर्यावरण की जानकारी करने का था। अकेले सौन्दर्य को देखने भर का ही उद्देश्य नहीं था। कुछ अन्य बातें भी थीं। ये सभी बातें वैद्य या डॉक्टर के उस नुस्खे के समान थी जिसमें कई औषधियों का मिश्रण लिखा हुआ होता है। मेरी विविध भावनाएँ और इच्छाएँ मेरे अन्दर सहभागी थीं, जिनके कारण मैं (लेखक) भेड़ाघाट देखने के लिए चल पड़ा। भेड़ाघाट देखने की प्रबल इच्छा, इसके प्रागैतिहासिक स्वरूप को ऐतिहासिक बना देने की है।

(2) वायुमण्डल खुला है-पुण्यस्थल है, स्नानार्थी आते-जाते रहते हैं, श्लोक का पाठ होता है। बड़े-बड़े स्टेशन हैं, बहुत रेलें आती हैं, यह सब ठीक है, किन्तु किनारे जो रुके हुए हैं। कहते हैं, बैल को अपने खूटे पर ही अच्छा लगता है, सो मुझे तो बीहड़, नर्मदा, उसके प्रपात और उसका घर्षण ही प्यारा लगता है।

शब्दार्थ-पुण्यस्थल = पवित्र जगह; स्नानार्थी = स्नान (नहाने) की इच्छा वाले; झूटा = लकड़ी का वह टुकड़ा जो जमीन में ठोककर गाड़ दिया जाता है जिससे पशु (बैल आदि) बाँधा जाता है। बीहड़ = सूने जंगल; प्रपात = झरने; घर्षण = जल के गिरने से उठने वाली आवाज; प्यारा = अच्छा।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह। प्रसंग-भेड़ाघाट का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-भेड़ाघाट के चारों ओर का वातावरण (पर्यावरण) बिल्कुल खुला हुआ है। यह स्थान बहुत ही पवित्र है। यहाँ के पवित्र जल में स्नान करने की इच्छा वाले लोग काफी संख्या में यहाँ आते हैं और स्नान करके लौट जाते हैं। वे स्नान करने के समय के श्लोक का उच्चारण सस्वर करते हैं। यहाँ रेलवे विभाग के स्टेशन भी हैं। इन स्टेशनों से अनेक रेलगाड़ियाँ गुजरती हैं। यह सब तो बहुत ही ठीक है किन्तु इस नर्मदा नदी के बहते हुए जल को रोककर इसके किनारे स्थिर (अचल) होकर खड़े हैं।पर एक कहावत यह है कि एक बैल जो अपने निश्चित स्थान पर बैंधता रहा है, उसे वही स्थान अच्छा (प्रिय) लगेगा। यही कहावत मेरे विषय में भी उचित बैठती है। नर्मदा की घाटी, उसके बीहड़ भूमि, स्वयं नर्मदा नदी, उसके झरने तथा उन झरनों से गिरने वाले पानी के घर्षण से उत्पन्न आवाज (ध्वनि) बहुत ही प्रिय लगती है।

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(3) कहते हैं, 800 मील बहने वाली नर्मदा अमर कण्टक से एक सौ चौवन मील ही चल पायी थी कि भेड़ाघाट आ गया। मुर्की से नर्मदा चली और लोकेश्वर की ओर बही। यहीं, बीचोंबीच भेड़ाघाट है। कहते हैं, यहाँ किसी युग में भृगु ऋषि तपस्या करते थे। चट्टानों के निर्मल और सुन्दर स्वरूप को देखकर ऐसा लगता है, मानो, आज भी वे तपस्या कर रहे हैं।

शब्दार्थ-निर्मल = स्वच्छ, उज्ज्वल; बीचोंबीच = मध्य। सन्दर्भ-पूर्व की तरह। प्रसंग-भेड़ाघाट की स्थिति का वर्णन किया है।

व्याख्या-अमरकण्टक से निकलकर नदी का विस्तार आठ सौ मील का है। लेकिन अमरकण्टक से भेड़ाघाट की दूरी एक सौ चौवन मील है। मुर्की और लोकेश्वर के मध्य में ही भेड़ाघाट स्थित है। मुर्की से नर्मदा बहती है तो लोकेश्वर तक बहती जाती है । यह कहा जाता है कि यह वह स्थल है जहाँ ऋषि भृगु ने तपस्या की थी। यहाँ की चट्टानें बहुत ही स्वच्छ हैं, पवित्र हैं। उनका स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है। वहाँ का शान्त और सुन्दर परिवेश है जिससे अभी भी यह लगता है कि मानो भृगु ऋषि वहाँ तपस्या कर रहे हैं। नदी के पानी में खड़ी विशाल चट्टानें छोटे तृणों के लिए सर्दी, गर्मी और बरसात को सह रही हैं। काटने से कट भले ही जाएँ किन्तु झुकना नहीं जानतीं। अपना क्रम नहीं रुकने देतीं, अपनी उज्ज्वलता मन्द नहीं होने देतीं। चाँद आता है तो चाँदी जैसी चमक उठती हैं। सूरज आता है तो उस जैसी तप उठती हैं। हाँ,जब बरसात आती है अथवा जब घना अन्धकार आता है, तब भी वे अपनी ‘उज्ज्वलता, अपनी पवित्रता खोने को तैयार नहीं हैं। इन सबको तपस्या न कहा जाय, तो क्या कहा जाय?

शब्दार्थ-तृणों = तिनके, या घास के कोमल अंकुर; उज्ज्वलता = पवित्रता, स्वच्छता; मन्द = धीमी, कम; घना = गहरा।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखक ने नर्मदा के किनारों की शोभा का वर्णन किया है।

व्याख्या-नदी का जल बड़े आकार वाली चट्टानों को डुबाता हुआ बहता है। जल के नीचे डूबी हुई चट्टानों के ऊपर छोटी-छोटी घास उग रही है। जाड़ा, गर्मी और बरसात के मौसम को निरन्तर सहती रहती हैं। इन चट्टानों को यदि काटने का प्रयास किया जाय, तो वे कट तो अवश्य जायेंगी परन्तु झुकती नहीं हैं। ये चट्टानें लगातार ही आगे तक बढ़ती जाती हैं अर्थात् बहुत दूरी तक ये चट्टानें नदी के अथाह तल के नीचे और किनारों पर लगातार अपने मस्तक को उठाये हुए आगे तक बहते जल के साथ बढ़ती हुई जाती हैं। उनकी पवित्रता धीमी नहीं होती, मन्द नहीं पड़ती। चन्द्रमा की चाँदनी में चाँदी की तरह ही चमचमाती रहती हैं। सूर्य के उदय होते ही, उसके तेज से एकदम तपने लगती हैं, परन्तु जब वर्षा ऋतु का आगमन होता है, तब यहाँ घना अन्धकार छा जाता है, फिर भी इनकी धवलता लिए हुए चमक, निर्मलता, उनकी पवित्रता समाप्त नहीं होती। यह वास्तव में तपस्या ही है। अन्य कुछ भी नहीं।

(5) नर्मदा मानो यहाँ चाँदी के कारामार की बन्दिनी है। यहाँ से मील भर ऊपर बहती हुई नर्मदा, धुआँधार प्रपात बनाती हुई नीचे गिरी थी, तब उसने, उसकी मछलियों और मगरमच्छों ने यह सोचा ही न होगा कि इसके उस मधुर और सुन्दर पतन के पश्चात् ही संगमरमर की दो विशाल भुजाएँ उसे गोद में लेकर खड़ी हो जायेंगी और जो दुलार उसने अपने जन्मदाता अमरकण्टक से न पाया होगा और जो सुन्दरता से भरा प्यार भूमि पर नीचे-नीचे सरकते उसे प्राप्त न हुआ होगा, वह स्नेह, वह दुलार उसे सतपुड़ा की संगमरमर की चट्टानें देने वाली

शब्दार्थ-कारागार = जेल, कारागृह; बन्दिनी = जेल में बन्द की हुई महिला, महिला कैदी; प्रपात = झरना; मधुर = आकर्षक, अच्छा, मीठा; पतन = गिरावट; दुलार = प्रेम, लाड़-प्यार; जन्मदाता = जन्म देने वाला।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-नर्मदा नदी के उद्गम का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-इस स्थान पर (भेड़ाघाट पर) नर्मदा नदी चाँदी जैसी श्वेत संगमरमरी जेल के कारागार के अन्दर बन्द की गई किसी बन्दिनी की भाँति है। श्वेत चमकीली संगमरमर की चट्टानों का किनारा मानो जेलखाने की ऊँची-ऊँची दीवारें हैं। इस स्थान से मील भर की दूरी तक बहती हुई नर्मदा नदी अपने तेज प्रवाह से नीचे की ओर गिरती हुई एक झरने का निर्माण करती है। इस झरने का नाम धुआँधार है। यहाँ नर्मदा के प्रवाह का जल बहुत ऊँचाई से गिरता है और लगातार जल के गिरने से घना धुआँ छाया रहता है। इसलिए इसका नाम धुआँधार उचित ही रख दिया गया है।

इस झरने के पतन के स्थान पर बहुत-सी मछलियाँ और मगरमच्छ हैं। नर्मदा का झरना बहुत ही सुन्दर और आकर्षक है। नर्मदा अपने किनारे की संगमरमरी चट्टानों की दो भुजाओं की गोद में जाकर झरने के पतन के रूप में खड़ी हो जाएगी, ऐसा उसने कभी सोचा भी नहीं था। वहाँ उसे अपने जन्म देने वाले अमरकण्टक से भी उतना लाड़-प्यार नहीं मिला जितना उसे यहाँ संगमरमर की चट्टानी गोद में मिला। नर्मदा इस झरने के रूप में पठारी भूमि से उतरकर नीचे भूमि पर गिरती है तो उसे वह दुलार नहीं प्राप्त हुआ जो सतपुड़ा की पहाड़ी चट्टानों में प्राप्त हुआ।

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(6) हिमालय की बर्फीली चोटियों पर नजर डालिए, वे छल रही हैं, गल रही हैं, एक सफेदी यहाँ भी है, जो गलती नहीं है, ढलती नहीं है। नर्मदा चाहे कितनी मर-मर करे किन्तु वह मरती नहीं है। शताब्दियों ने इसे अमर ही देखा है, इसे अमर ही देखेंगी।

शब्दार्थ-नज़र = निगाह, दृष्टि; छल रही हैं = धोखा दे रही हैं; गल रही हैं = पिघल रही हैं। ढलती नहीं = समाप्त नहीं होती; शताब्दियों ने = सैकड़ों वर्षों ने।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखक हिमालय की चोटियों की और सतपुड़ा की पर्वत चोटियों से तुलना कर रहा है।

व्याख्या-हिमालय पर्वत की चोटियाँ भी हैं। उन पर हम यदि नजर डालें तो (उनको देखें तो) वे हमारी आँखों को धोखा देती हुई लगती हैं। वे गल (पिघल) रही हैं। इन चोटियों की सी धवलता श्वेतता (सफेदपन) सतपुड़ा की इन संगमरमरी चट्टानों की चोटियों में भी है। यह धवलता हिमालय की बर्फीली चट्टानों की भाँति गल जाने वाली नहीं है। वह कभी समाप्त भी नहीं हो रही है। नर्मदा अपने जल के प्रवाह से मर-मर की ध्वनि उठाती हुई बहती रहती है, परन्तु इसके दोनों किनारों की ऊँची चट्टानों की श्वेतता कभी भी मर नहीं सकती। सैकड़ों वर्षों से वह धवलता कभी भी मिटी नहीं, लुप्त नहीं हुई। आगे भी वह इसी तरह धवल ही बनी रहेगी। उसकी चट्टानी स्वच्छता व श्वेतता अमर है।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 4 Aprajita Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 4 Aprajita Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 4 Aprajita Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 4 अपराजिता प्रश्न उत्तर

बोध प्रश्न

Class 8 Hindi Chapter 4 Aprajita प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
विलक्षण = अनोखा; अकस्मात् = अचानक; विच्छिन्न = अलग किया हुआ, काटा हुआ; अभिशप्त शापित, शाप लगा हुआ; उत्फुल्ल = प्रसन्न; विषाद = दुःख, उदासी; बुद्धि दीप्ति = मेधावी, तेज बुद्धि वाला; जिजीविषा = जीने की इच्छा; कंठगत = गले में आना; उत्कट = प्रबल, तीव्र नियति = भाग्य; क्षत-विक्षत = घायल; आभामण्डित = तेज से युक्त; पटुता = चतुराई; ख्याति = प्रसिद्धि; आघात = प्रहार, चोट; व्यथा = कष्ट, रोग; नूरमंजिल = लखनऊ में स्थित मानसिक रोगियों का अस्पताल।

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 4 प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए

(क) अपराजिता संस्मरण की लेखिका कौन हैं?
उत्तर
अपराजिता संस्मरण की लेखिका गौरा पन्त ‘शिवानी’ हैं। वे हिन्दी की लोकप्रिय कथा-लेखिका हैं।

(ख) डॉ. चन्द्रा की माता जी का क्या नाम है ?
उत्तर
डॉ. चन्द्रा की माताजी का नाम श्रीमती टी. सुब्रह्मण्यम है।

(ग) डॉ. चन्द्रा को सामान्य ज्वर के बाद कौन-सी बीमारी हो गई थी?
उत्तर
डॉ. चन्द्रा को सामान्य ज्वर के बाद पक्षाघात की बीमारी हो गई जिससे गरदन के नीचे उनका सांग अचल हो गया।

(घ) ‘वीर जननी’ का पुरस्कार किसे मिला ?
उत्तर
‘वीर जननी’ का पुरस्कार अद्भुत साहसी जननी श्रीमती टी. सुब्रह्मण्यम को मिला। श्रीमती सुब्रह्मण्यम ने लगातार पच्चीस वर्ष तक सहिष्णुता के साथ अपनी पुत्री के साथ-साथ कठिन साधना की।

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Bhasha Bharti Class 8 Chapter 4 प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए

(क) लेखिका की दृष्टि में डॉ. चन्दा सामान्य जनों से किन बातों में भिन्न थी ?
उत्तर
डॉ. चन्द्रा सामान्य जनों से अनेक बातों में भिन्न थीं। वे असामान्य रूप से शारीरिक अक्षमता व रोग से पीड़ित थीं। उनके शरीर का निचला धड़ निष्प्राण मांस पिण्ड मात्र था फिर भी वे सदा उत्फुल्ल रहती थीं। उनके चेहरे पर विषाद की कोई रेखा भी नहीं दिखती थी। उनमें अदम्य साहस और उत्कट जिजीविषा थी। उनके मुखमण्डल पर बुद्धि की दीप्तता झलकती थी। उनका व्यक्तित्व अनेक महत्त्वाकांक्षाओं से परिपूर्ण था। उन्हें अपने शरीर की अपंगता से बेचैनी नहीं थी।

उनमें अद्भुत साहस भरा था। उन्होंने अपनी थीसिस पर डॉक्टरेट की उपाधि ग्रहण की। वे कभी भी किसी से सामान्य-सा सहारा नहीं चाहती थीं। उन्होंने अपनी विलक्षणता से एम. एस-सी. में प्रथम स्थान प्राप्त करके बंगलौर (बंगलूरु) के प्रसिद्ध इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में अपने लिए स्पेशल सीट अर्जित की और बाद में शोधकार्य भी किया। राष्ट्रपति से गर्ल गाइड में स्वर्ण कार्ड पाने वाली प्रथम अपंग बालिका थी। उसमें संगीत के प्रति भी रुचि थी।

(ख) लेखिका ने जब चन्द्रा को कार से उतरते देखा तो वे आश्चर्यचकित क्यों रह गईं ?
उत्तर
लेखिका ने जब चन्द्रा को कार से उतरते देखा तो वे अचम्भित रह गईं। कार का द्वार खुला। एक प्रौढ़ा ने उतरकर पिछली सीट से ह्वील चेयर निकालकर सामने रख दी। कार में से एक युवती ने धीरे-धीरे अपने निर्जीव धड़ को बड़ी सावधानी से नीचे उतारा और बैसाखियों का सहारा लिया और ह्वील चेयर तक पहुँची तथा उसमें बैठ गई। अपनी हील चेयर को बड़ी तटस्थता से चलाती हुई कोठी के अन्दर चली गई। डॉ. चन्द्रा को नित्य नियत समय पर अपने कार्य करते देख चकित होती जब वह मशीन की तरह बटन खटखटाती अपना काम किये चली आती थी। डॉ. चन्द्रा अपनी अपंगता से बिल्कुल भी बेचैन नहीं लगती थीं। उनकी आँखों में अदम्य उत्साह और उत्कट जिजीविषा थी। उनमें महत्त्वाकांक्षाएँ भरपूर थीं। अत: उन्हें देखकर लेखिका अचम्भित रह गई।

MP Board Class 8 Hindi Chapter 4 प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(क) बित्ते भर की लड़की मुझे किसी देवांगना से कम नहीं लगी।
आशय-लेखिका को अपंगता से ग्रसित लड़की देवांगना से कम नहीं लग रही थी। उसके चेहरे पर अद्भुत कान्ति थी। उसमें बुद्धिबल और आत्मनिर्भरता थी, यद्यपि वह शरीर से बहुत छोटी थी।

(ख) मैडम, मैं चाहती हूँ कि कोई मुझे सामान्य-सा भी सहारा न दे।
आशय-उस छोटे से आकार की अपंगता से ग्रस्त बालिका ने लेखिका से कहा कि वह नहीं चाहती है कि कोई भी व्यक्ति उसको थोड़ा भी सहारा दे। वह स्वावलम्बी बनकर रहना चाहती

(ग) चिकित्सा ने जो खोया, वह विज्ञान ने पाया।
आशय-लेखिका का कथन सही है क्योंकि चिकित्सा ने डॉ. चन्द्रा की अपंगता को ठीक नहीं किया जबकि विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. चन्द्रा ने अनेक सफलताएँ प्राप्त की। डॉ. चन्द्रा ने बी.एस-सी. और एम. एस-सी. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण और डॉ. सेठना के निर्देशन में पाँच वर्ष कार्य करते हुए पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त करके, विज्ञान के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया।

(घ) बुद्धिदीप्त आँखों में अदम्य उत्साह, प्रतिफलप्रतिक्षण भरपूर उत्कट जिजीविषा और फिर कैसी-कैसी महत्त्वाकांक्षाएँ।
आशय-लेखिका के अनुसार, डॉ. चन्द्रा की आँखों से ही । उनकी बुद्धि का तेज झलकता था। उनमें कभी न रुकने वाला उत्साह था। उन्हें किये गये कर्म के फल की प्राप्ति में विश्वास था। प्रत्येक क्षण अत्यन्त तीव्र एवं उत्कट रूप में जीवित रहने की इच्छा थी। इस पर भी उनमें अनेक महत्त्वाकांक्षाएँ थीं।

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भाषा-अध्ययन

Class 8 Hindi Chapter 4 Mp Board प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का उच्चारण कीजिएडॉक्टर, कॉलेज, बॉल, ऑफ, ऑफिस, कॉनवेन्ट।
उत्तर
अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी में प्रयोग करने से ‘ऑ’ ध्वनि का उच्चारण होता है। ऑ ध्वनि का आगम अंग्रेजी से हुआ है। अत: विद्यार्थी उपर्युक्त शब्दों को ठीक-ठीक पढ़कर उनका शुद्ध उच्चारण करने का अभ्यास करें।

Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 4 प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए और उन्हें लिखिए
व्यक्तित्व, रिक्तता, अभिशप्त, विच्छिन्न, निष्प्राण, जिजीविषा, बुद्धिदीप्त, सुब्रह्मण्यम।
उत्तर
विद्यार्थी उपर्युक्त शब्दों को ठीक-ठीक पढ़कर उनका शुद्ध उच्चारण करने का अभ्यास करें। फिर उन्हें लिखें।

MP Board Class 8th Hindi Chapter 4 प्रश्न 3.
सही विकल्प चुनिए
(क) ‘अपराजिता’ शब्द में उपसर्ग है
(1) अ
(2) अप
(3) अपरा
उत्तर
(3) अपरा

(ख) ‘विकलांगता’ शब्द में प्रत्यय है
(1) गता
(2) ता
(3) आगत
उत्तर
(2) ता

(ग) ‘अभिमान’ में उपसर्ग है
(1) अभि
(2) अ
(3) मान
उत्तर
(1) अभि

(घ) ‘अपराजिता’ का विलोम है
(1) जीता
(2) जिता
(3) पराजिता।
उत्तर
(3) पराजिता।

Class 8th Hindi Chapter 4 Aprajita प्रश्न 4.
‘अपराजिता’ पाठ से साधारण वाक्य, मिश्रित वाक्य और संयुक्त वाक्य के दो-दो उदाहरण छाँटकर लिखिए।
उत्तर
साधारण वाक्य

  1. उस कोठी का अहाता एकदम हमारे बँगले के अहाते से जुड़ा था।
  2. आजकल वह आई.आई.टी. मद्रास (चेन्नई) में काम कर रही हैं।

मिश्रित वाक्य

  1. हमें लगता है कि भले ही उस अन्तर्यामी ने हमें जीवन में कभी अकस्मात् अकारण ही दण्डित कर दिया हो।
  2. लौटते समय किसी स्टेशन पर चाय लेने उतरा कि गाड़ी चल पड़ी।

संयुक्त वाक्य

  1. हमने आज तक दो व्यक्तियों द्वारा सम्मिलित रूप में नोबेल पुरस्कार पाते अपने ही विषय में सुना था, किन्तु आज हम शायद पहली बार इस पी-एच. डी. के विषय में भी कह सकते हैं।
  2. एक वर्ष तक कष्टसाध्य उपचार चला और एक दिन स्वयं ही इसके ऊपरी धड़ में गति आ गई, हाथ हिलने लगे, नहीं उँगलियाँ मुझे बुलाने लगी।

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Hindi Chapter 4 Class 8 MP Board प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए मैंने शारीरिक रूप से विशेष आवश्यकता वाले एक बालक को पैर से लिखते देखा तो मैं दंग रह गया। भगवान की लीला भी विचित्र है। साहसी, आत्मविश्वासी और जीवट स्वभाव के ऐसे विशेष आवश्यकता वाले कुछ व्यक्ति तो हमें हतप्रभ बना देते हैं। समाज में इस प्रकार के कुछ व्यक्ति तो अपने हथियार डाल देते हैं तथा दूसरों के आश्रित रहकर जीवन जीते हैं। कभी वे मन्दिर के सामने, कभी स्टेशन के पास या किसी सार्वजनिक स्थान पर माँगने के लिए धरना दिये बैठे रहते हैं। हमें चाहिए कि हम उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित करें।
उन्हें स्वावलम्बी बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास करें और उन्हें अच्छा जीवन जीने का मार्ग सुझाएँ।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(ख) हम विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों के लिए क्या-क्या काम कर सकते हैं ?
(ग) इस गद्यांश से मुहावरे छाँटकर उनके अर्थ और वाक्य-प्रयोग कीजिए।
(घ) इस गद्यांश में से एक-एक सरल, मिश्रित और संयुक्त वाक्य छाँटकर लिखिए।
उत्तर
(क) ‘शारीरिक रूप से विशेष आवश्यकता वाले व्यक्ति’।
(ख) हम उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। उन्हें स्वावलम्बी बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास कर सकते हैं तथा उन्हें अच्छा जीवन जीने का मार्ग सुझा सकते हैं।
(ग) मुहावरे

  1. दंग रह जाना-अचम्भे में पड़ जाना।
    वाक्य प्रयोग-आठ वर्ष की बालिका ने जब गीता के श्लोक मौखिक सुनाए, तो वहाँ उपस्थित लोग दंग रह गये।
  2. हतप्रभ-चकित हो जाना।
    वाक्य प्रयोग-हमारे विद्यालय की विकलांग बालिका ने जब 100 मीटर की दौड़ में प्रथम स्थान पाया, तो उपस्थित लोग हतप्रभ हो गये।
  3. हथियार डालना-हार मान लेना।
    वाक्य प्रयोग-भारतीय सेना के समक्ष हमारे दुश्मनों ने अपने हथियार डाल दिये।
  4. धरना देना-एक स्थान पर जमकर बैठ जाना।
    वाक्य प्रयोग-छात्रों ने अपनी मांगों के समर्थन में प्रधानाचार्य के कार्यालय के सामने धरना दे दिया।
  5. अपने पैरों पर खड़ा होना-स्वावलम्बी हो जाना।
    वाक्य प्रयोग-प्रत्येक युवक को अपने पैरों पर खड़ा होने के सद्प्रयास करने चाहिए।
  6. मार्ग सुझाना-उपाय बताना।
    वाक्य प्रयोग-बेरोजगारी मिटाने के लिए विद्वानों को मार्ग सुझाना चाहिए।

(घ) सरल वाक्य-भगवान की लीला विचित्र है।
मिश्रित वाक्य-हमें चाहिए कि हम उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित करें।
संयुक्त वाक्य-उन्हें स्वावलम्बी बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास करें और उन्हें अच्छा जीवन जीने का मार्ग सुझाएँ।

Class 8 Bhasha Bharti Chapter 4 प्रश्न 6.
निम्नलिखित गद्यांश को उपयुक्त विराम चिह्न लगाकर पुनः लिखिए
नहीं मिसेज सुब्रह्मण्यम मदर ने कहा कि हमें आपसे पूरी सहानुभूति है पर आप ही सोचिए कि आपकी पुत्री की हील चेयर कौन पूरे क्लास में घुमाता फिरेगा। आप चिन्ता न करें मदर मैं हमेशा उसके साथ रहूँगी और फिर पूरी कक्षाओं में अपंग पुत्री की कुर्सी की परिक्रमा मैं स्वयं कराती।
उत्तर
“नहीं, मिसेज सुब्रह्मण्यम”, मदर ने कहा। हमें आपसे पूरी सहानुभूति है, पर आप ही सोचिए, आपकी पुत्री की ह्वील चेयर कौन पूरे क्लास में घुमाता फिरेगा।
“आप चिन्ता न करें, मदर, मैं हमेशा उसके साथ रहूँगी” और फिर पूरी कक्षाओं में अपंग पुत्री की कुर्सी की परिक्रमा मैं स्वयं कराती।

Class 8 Hindi Chapter 4 Aparajita प्रश्न 7.
‘सुगम’ शब्द में ‘ता’ प्रत्यय जोड़कर ‘सुगमता’ नया शब्द बना है। इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों में निर्धारित प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाइए
उत्तर
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Class 8 Hindi Chapter 4 Bhasha Bharti प्रश्न 8.
प्रतिफल’ शब्द में ‘प्रति’ उपसर्ग जुड़ा है। इसी प्रकार प्रति’, ‘परा’ और ‘अभि’ उपसर्ग जोड़कर नए शब्द बनाइए और लिखिए।
उत्तर
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अपराजिता परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) कभी-कभी अचानक ही विधाता हमें ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व से मिला देता है, जिसे देख स्वयं अपने जीवन की रिक्तता बहुत छोटी लगने लगती है। हमें तब लगता है कि भले ही उस अन्तर्यामी ने हमें जीवन में कभी अकस्मात् अकारण ही दण्डित कर दिया हो किन्तु हमारे किसी अंग को हम से विच्छिन्न कर, हमें उससे वंचित तो नहीं किया।

शब्दार्थ-विधाता = ईश्वर; विलक्षण = अनोखे; रिक्तता = खालीपन, अन्तर्यामी = हृदय में समाये हुए ईश्वर; अकस्मात् = अचानक; अकारण = बिना कारण के विच्छिन्न = अलग कर देना, काट देना; दण्डित कर दिया हो = दण्ड दिया गया हो; वंचित = अलग।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक’ भाषा-भारती’ के पाठ ‘अपराजिता’ से अवतरित है। इस पाठ की लेखिका ‘शिवानी हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखिका बताती हैं कि जीवन में कभी-कभी ऐसे व्यक्तियों से मिलना हो जाता है जिनको देखकर हमारे जीवन में किसी बात की कमी बहुत छोटी लगती है।

व्याख्या-कभी-कभी ऐसा अकस्मात् होता है कि हमारी मुलाकात किसी ऐसे अनोखे व्यक्ति से हो जाती है जिसे देखने मात्र से ही हमारे जीवन में किसी बात की कमी होते हुए भी बहुत छोटी लग उठती है। जिनसे मुलाकात हुई है, उन्हें कोई भी बड़ा कष्ट हो सकता है जिसके विषय में हमने कभी सोचा भी नहीं होगा और हमारे कष्ट उस व्यक्ति की तुलना में बहुत ही छोटे हो सकते हैं। ईश्वर हमें अचानक ही किसी भी प्रकार का कष्ट देकर हमें कभी भी दण्ड दे सकते हैं जिसका कोई कारण नहीं भी हो सकता हो। तब ईश्वर की फिर भी हम बड़ी कृपा समझते हैं जिन्होंने हमारे शरीर के किसी अंग को काट करके हमें उससे रहित नहीं किया।

(2) यहाँ कभी सामान्य-सी हड्डी टूटने पर या पैर में मोच आ जाने पर ही प्राण ऐसे कण्ठगत हो जाते हैं जैसे विपत्ति का आकाश ही सिर पर टूट पड़ा है, और इधर यह लड़की है कि पूरा निचला धड़ सुन्न है, फिर भी बोटी-बोटी फड़क रही है। आजकल वह आई.आई.टी. चेन्नई में काम कर रही है।

शब्दार्थ-सामान्य-सी = साधारण-सी, कम महत्त्व की; कण्ठगत = गले में अटके; आकाश ही सिर पर टूट पड़ा है = बहुत बड़ी विपत्ति एकदम आ गई है; सुन = संवेदनहीन; बोटी-बोटी = शरीर का प्रत्येक अंग; फड़क रही है- स्पन्दित या गतिमान हो रहा है।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखिका के अनुसार शरीर के किसी भी अंग में थोड़ी-सी चोट लगने पर हम सोचने लगते हैं कि मानो हमारे प्राण ही निकल जायेंगे।

व्याख्या-कभी-कभी हम ऐसा समझते हैं कि कभी हमारे शरीर की साधारण-सी हड्डी टूट गईं हो अथवा हमारे पैर में मोच आ गई हो तो हमें ऐसा लगता है कि मानो कष्ट से हमारे प्राण ही गले में आ जायेंगे अर्थात् हमारी मौत ही हो जायेगी। हम सोचने लगते हैं कि हमारे ऊपर कठिनाइयों का आसमान ही टूट पड़ा है। परन्तु इधर देखिये इस छोटी-सी लड़की को, जिसके शरीर का निचला भाग किसी भी संवेदना से रहित है। उसमें किसी भी तरह की गति नहीं है। फिर भी उसके शरीर का प्रत्येक अंग स्पन्दित हो रहा है। यह वह लड़की है जो आई. आई. टी. मद्रास (चेन्नई) में आजकल काम कर रही है।

(3) मैडम, मैं चाहती हूँ कि कोई मुझे सामान्य-सा सहारा भी न दे। आप तो देखती हैं, मेरी माँ को मेरी कार चलानी पड़ती है। मैंने इसीलिए एक ऐसी कार का नक्शा बनाकर दिया है, जिससे मैं अपने पैरों के निर्जीव अस्तित्व को भी सजीव बना दूंगी।

शब्दार्थ-मैडम = श्रीमती जी; सामान्य-सा-थोड़ा भी, साधारण-सा; सहारा = मदद; निर्जीव = बिना प्राणों के, अथवा चेतनाहीन; अस्तित्व = बने रहने को; सजीव = सचेतन।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-लेखिका द्वारा छोटी-सी अपंग लड़की के साहस का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-वह छोटी-सी लड़की लेखिका से कहने लगी है कि मैडम (श्रीमती जी) मेरी इच्छा है कि कोई भी व्यक्ति मेरी थोड़ी भी मदद करने के लिए तैयार न हो। मैं नहीं चाहती कि कोई भी आदमी रंचमात्र भी मुझे सहारा दे। वह बालिका स्पष्ट करती है कि उसकी माँ को उसके लिए कार चलानी पड़ती है। इस तरह किसी पर आश्रित रहने को दूर करने के लिए उस बालिका ने एक इस तरह की कार का नक्शा बनाया है, जिसे वह स्वयं चला सके और अपने निर्जीव पैरों को सजीव बना सके अर्थात् वह स्वयं – उस कार को अपने उन पैरों से चला सकेगी, जो निश्चेष्ट हैं और उनमें किसी भी तरह की चेतना नहीं है। इसका नतीजा यह होगा कि उनमें फिर से सजीवता आ जायेगी।

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(4) “इसके भयानक अभिशाप के बावजूद मैंने कभी विधाता से यह नहीं कहा कि प्रभो, इसे उठा लो। इसके इस जीवन से तो मौत भली है। मैं निरन्तर इसके जीवन की भीख माँगती रही। केवल सिर हिलाकर यह इधर-उधर देख भर सकती थी। न हाथों में गति थी, न पैरों में फिर भी मैंने आशा नहीं छोड़ी। एक आर्थोपैडिक सर्जन की बड़ी ख्याति सनी थी, वहीं ले गई।”

शब्दार्थ-भयानक = खतरनाक; अभिशाप = शाप: । बावजूद = (इसके) होने पर भी; विधाता ईश्वर से उठा लो= मृत्यु दे दो; मौत = मृत्यु; भली = अच्छी; निरन्तर = लगातार, रोजाना; भीख माँगती रही = दीन भाव से माँग करती रही; गति = चेतना; आर्थोपैडिक- हड्डियों से सम्बन्धित; सर्जन = चीर-फाड़ करने वाला;
ख्याति = प्रसिद्धि।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-उस छोटी-सी बालिका के रोगग्रस्त होने की दशा में भी उसकी माँ के धैर्य और उसके प्रति माँ की ममता का वर्णन लेखिका ने बहुत ही भावपूर्ण ढंग से किया है।

व्याख्या-उस अपंग बालिका के शुरू के जीवन के विषय में उसकी माँ कहती है कि उसे अपंगता का भयानक शाप लगा हुआ होने पर भी उसने (बालिका की माँ ने) ईश्वर से कभी भी यह नहीं कहा कि हे परमात्मा, तुम इस बालिका को मृत्यु दे दो। ममता भरे हृदय वाली माँ ने कभी भी यह नहीं सोचा कि उसकी उस पुत्री के रोग पीड़ित होने की दशा से तो उसका मरना ही ठीक है। वह माँ तो सदैव यही प्रार्थना करती रही कि हे प्रभो उसे जीवन दो। अर्थात् उसको रोग से मुक्ति मिले। वह माँ निश्चित ही कितनी दु:खी होती होगी, जब वह अपनी पुत्री को निश्चेष्ट शरीर से हिल-डुलने में असमर्थ पाती थी, क्योंकि वह तो केवल अपने सिर को ही हिला पाती थी और केवल सिर हिलाकर इधर-उधर देख पाती थी। उसके हाथ और पैरों में कोई गति नहीं थी। इतना भयानक कष्ट होने और जीवन के प्रति निराशा के भर जाने पर भी उस बालिका की माँ निराश नहीं हुई। वह जिस किसी भी चिकित्सक (हड्डियों से सम्बन्धित) की प्रसिद्धि और नाम सुनती तो वह उस रोग से पीड़ित बालिका को उसके पास लेकर पहुंचती थी।

(5) लैदर जैकेट के कठिन जिरह-बख्तर में कसी उस हँसमुख लड़की को देख मुझे युद्ध क्षेत्र में डटे राणा साँगा का ही स्मरण हो आता था। क्षतविक्षत शरीर में असंख्य घाव, आभामंडित भव्य मुद्रा।

शब्दार्थ-लैदर जैकेट = चमड़े से बनी जैकेट; बख्तर = कवच; कसी = कस कर बाँधी हुई; राणा साँगा = मेवाड़ के वीर राजपूत राजा का नाम जो महाराणा प्रताप के पूर्वज थे; स्मरण = याद आ जाती थी; क्षत-विक्षत = बहुत अधिक घायल; असंख्य = अनेक; आभामण्डित = कान्ति से शोभायमान; भव्य = सुन्दर;मुद्रा = आकृति।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-अपंगता से पीड़ित बालिका ने अपनी माँ के परिश्रम और धैर्य से उच्च शिक्षा प्राप्त की। एक श्रेष्ठ माँ के कर्तब का पालन करते हुए माँ ने अपने धर्म में सफलता प्राप्त की।

व्याख्या-अपंगता के रोग से ग्रसित उस बालिका ने एम. एस-सी. (प्राणिशास्त्र) की उपाधि प्राप्त करके पाँच वर्ष तक शोधकार्य कर लिया। वह बालिका अपनी प्रयोगशाला में आसानी से अपनी चेयर से घूम सकती थी। अपनी चेयर में जब वह बालिका बैठती थी, तो उसे चमड़े की बनी जैकेट पहननी पड़ती थी; जिससे उसका शरीर कठोर रूप से जकड़ दिया जाता था। वह लड़की बहुत हँसमुख थी। अपने कर्त्तव्य में डटी हुई वह लड़की अपनी माँ श्रीमती टी. सुब्रह्मण्यम को ऐसी लगती थी, जैसे राणा साँगा अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने दुश्मनों के विरुद्ध युद्धक्षेत्र में लड़ रहे हों। यद्यपि उनके शरीर में अनेक घाव हो चुके थे। उनका शरीर युद्ध में दुश्मनों के प्रहारों से बहुत अधिक घायल हो गया था। उस लड़की के मुखमण्डल पर अपनी अपंगता के कष्ट की कोई सिकुड़न नहीं थी। उसके चेहरे पर सौन्दर्य तथा उसकी आकृति बहुत ही सुन्दर थी।

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