MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण पर्यायवाची शब्द

MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण पर्यायवाची शब्द

प्रश्न 1.
पर्यायवाची शब्द की परिभाषा सोदाहरण दीजिए।
उत्तर –
पर्यायवाची शब्दों को समानार्थक या प्रतिशब्द भी कहते हैं। जिन शब्दों के अर्थों में समानता हो, उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं।

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जैसे –
अग्नि – आग, पावक, दहन, अनल, हुताशन, कृशानु।
असुर – दानव, दनुज, दैत्य, राक्षस, तमीचर, रजनीचर।

महत्त्वपूर्ण पर्यायवाची शब्द
1. आकाश – व्योम, गगन, नभ, अम्बर, अन्तरिक्ष, आसमान, अनन्त।
2. कमल – पंकज, सरोज, अरविन्द, शतदल, राजीव, जलज, पद्म, कंज, अम्बुज।
3. चन्द्रमा – हिमांशु, शशि, चन्द्र, सोम, सुधाकर, सुंधाशु, इन्दु, राकापति, राकेश।
4. सूर्य – रवि, दिनकर, भास्कर, पतंग, सविता, आदित्य, भानु।
5. समुद्र – उदधि, सागर, सिन्धु, तोयनिधि, रत्नाकर, पारावार।
6. हवा – वायु, समीर, पवन, प्रभंजन, बयार।
7. तालाब – सर, ताल, सरसी, पुष्कर, जलाशय।
8. अग्नि – पावक, हुताशन, दहन, अनल।
9. जल – नीर, पानी, सलिल, वारि, पय।
10. हाथी – गज, कुंजर, द्विरद, करी, द्वीप, हस्ती।।
11. पर्वत – भूधर, गिरि, नग, तुंग, पहाड़, महीधर।
12. पक्षी – विहग, खग, विहंग, पखेरू, अंडज।
13. घोड़ा – अश्व, हय, बाजि, तुरंग, घोटक।
14. रात – रैन, निशि, रात्रि, यामिनी, तमी।
15. आँख – लोचन, नेत्र, नयन, दृग, चक्षु।
16. सर्प – भुजंग, व्याल, साँप, नाग, फणी, अहि, पन्नग, विषधर।
17. राजा – नृप, भूप, महीप, नरेश, सम्राट, भूपति।
18. फूल – सुमन, पुष्प, कुसुम, प्रसून।
19. अमृत – सुधा, अमी, अभिय, पीयूष।
20. स्त्री – नारी, अबला, बनिता, रमणी, अगना।

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21. सोना – स्वर्ण, हेम, कंचन, कनक, कलधौत।
22. विष – गरल, हलाहल, कालकूट।
23. माता – जननी, अम्बिका, अम्बा, धात्री।
24. मयूर – केकी, शिखण्डी, कलापी, मोर, शिखी।
25. पृथ्वी – भू, धरा, भूमि, वसुंधरा, साडी, वसुमती।
26. बिजली – विद्युत, तड़ित, सौदामिनी, शम्पा, चंचला।
27. घर – गृह, गेह, निकेतन, सदन, धाम, मंदिर।
28. सिंह – शेर, नाहर, व्याघ्र, मृगेन्द, मृगराज।
29. भौंरा – भ्रमर, मधुप, मधुकर, अलि, भृग, मलिन्द।
30. जंगल – वन, विपिन, कानन, अरण्य।
31. बन्दर – कपि, मर्कट, शाखामृग, बानर।
32. नदी – सरिता, तरंगिनी, तटनी।
33. पाँव – पद, पैर, चरण, पग।
34. पेड़ – विटप, वृक्ष, पादप, तरु।
35. महादेव – पशुपति, शिव, शंकर, त्रिलोचन, गिरीश, कैलाशपति।
36. आनंद – हर्ष, मोद, प्रमोद, उल्लास।
37. फूल – सुमन, पुष्प, कुसुम, प्रसून।
38. मनुष्य – मानव, नर, मनुज, आदमी।
39. रास्ता – पथ, राह, मार्ग, पन्थ।
40. असुर – दनुज, दानव, राक्षस, दैत्य, निशाचर।
41. गंगा – भागीरथी, सुरसरि, जाह्नवी, मन्दाकिनी।
42. शत्रु – रिपु, बैरी, प्रतिपक्षी।
43. तलवार – कृपाण, करवाल, आलि, खड्ग।
44. गणेश – विनायक, गजानन, गिरजानन्दन।
45. इन्द्र – सुरेश, पुरन्दर, शचीपति।
46. पुत्र – सुत, वत्स, तात, आत्मज, तनय।
47. दुःख – पीड़ा, व्यथा, वेदना, कष्ट, क्लेश।
48. देवता – देव, सुर, अमर, अमर्त्य।
49. कपड़ा – वस्त्र, पट, अम्बर, वसन, चीर, दुकूल।
50. पुत्री – तनया, बेटी, सुता, आत्मजा, दुहिता, नन्दिनी, तनुजा।
51. संसार – जग, जगत, दुनिया, विश्व, लोक।
52. सखा – मित्र, मीत, प्रिय, स्नेही।

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अति महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी पर्यायवाची शब्द
1. पत्थर – पाषाण, प्रस्तर, पाहन।
2. सेना – कटक, दल, फौज, सैन्य।
3. समूह – वृन्द, गण, पुंज, मण्डी, समुदाय।
4. रक्त – लहू, खून, शोणित, रुधिर।
5. सुन्दर – चारू, रम्य, रुचिर, मनोहर।
6. मछली – मीन, झख, मत्स्य, शफरी।
7. पत्नी – भार्या, बधू, बहू, गृहिणी, तिय।
8. बेल – लता, बल्लरी, बेलि।
9. नौका – नाव, तरिणी, तरी, जलयान।
10. धनुष – चाप, शरासन, कोदण्ड, पिनाक।

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MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग

MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग

वे शब्दांश जो किसी शब्द में जुड़कर उसका अर्थ परिवर्तित कर देते हैं। उपसर्गों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता; फिर भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलकर एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। उपसर्ग सदैव शब्द के पहले आता है, जैसे-‘परा’ उपसर्ग को ‘जय’ के पहले रखने से एक नया शब्द ‘पराजय’ बन जाता है। जिसका अर्थ होता है-हार।

उपसर्ग के शब्द में तीन प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

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जैसे-
1. शब्द के अर्थ में विपरीतता आ जाती है।
2. शब्द के अर्थ में नूतनता आ जाती है।
3. शब्द के अर्थ में कोई नया परिवर्तन नहीं होता।
उत्तर-
हिन्दी भाषा में उपसर्ग तीन भाषाओं के हैं
(a) संस्कृत उपसर्ग
(b) हिन्दी उपसर्ग
(c) उर्दू उपसर्ग।

(a) संस्कृत उपसर्ग
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उपसर्ग के समान प्रयुक्त होने वाले कुछ अन्य शब्द
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(b) हिन्दी उपसर्ग
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(c) उर्दू उपसर्ग
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MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व

MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व

गतिमान आवेश और चुम्बकत्व NCERT पाठ्यपुस्तक के अध्याय में पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तार की एक वृत्ताकार कुंडली में 100 फेरे हैं, प्रत्येक की त्रिज्या 8.0 सेमी है और इनमें 0.40 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है?
हल :
दिया है :
फेरों की संख्या N = 100,
कुंडली में धारा i = 0.40 ऐम्पियर
कुंडली की त्रिज्या r = 8.0 × 10-2 मीटर,
केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र B= ?
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 1
= 3.14 × 10-4 टेस्ला ।

प्रश्न 2.
एक लम्बे,सीधे तार में 35 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। तार से 20 सेमी दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है?
हल :
दिया है : सीधे तार में धारा i = 35 ऐम्पियर,
बिन्दु की तार से दूरी r = 0.20 मीटर
∴ लम्बे सीधे तार के कारण चम्बकीय क्षेत्र \(B=\frac{\mu_{0}}{2 \pi} \times \frac{i}{r}=\frac{4 \pi \times 10^{-7}}{2 \pi} \times \frac{35}{0.20}\)
= 3.5 × 10-5 टेस्ला ।

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प्रश्न 3.
क्षैतिज तल में रखे एक लम्बे सीधे तार में 50 ऐम्पियर विद्युत धारा उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के पूर्व में 2.5 मीटर दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र B का परिमाण और उसकी दिशा ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है :
तार में धारा i = 50 ऐम्पियर (उत्तर से दक्षिण),
तार से दूरी = 2.5 मीटर (पूर्व में)
तार के कारण चम्बकीय क्षेत्र B= \(\frac{\mu_{0}}{2 \pi} \times \frac{i}{r}=\frac{4 \pi \times 10^{-7}}{2 \pi} \times \frac{50}{2.5}\)
= 4 × 10-6 टेस्ला ।
चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर होगी।

प्रश्न 4.
व्योमस्थ खिंचे क्षैतिज बिजली के तार में 90 ऐम्पियर विद्युत धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के 1.5 मीटर नीचे विद्युत धारा के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण और दिशा क्या है?
हल :
तार में धारा i = 90 ऐम्पियर (पूर्व से पश्चिम), ..
तार से दूरी = 1.5 मीटर
तार के कारण चुम्बकीय क्षेत्र B= \(\frac{\mu_{0}}{2 \pi} \times \frac{i}{r}=\frac{4 \pi \times 10^{-7}}{2 \pi} \times \frac{90}{1.5}\)
= 1.2 × 10-5 टेस्ला ।
चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा क्षैतिजत: उत्तर से दक्षिण की ओर होगी।

प्रश्न 5.
एक तार जिसमें 8 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, 0.15 टेस्ला के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में, क्षेत्र से 30° का कोण बनाते हुए रखा है। इसकी एकांक लम्बाई पर लगने वाले बल का परिमाण और इसकी दिशा क्या है?
हल :
दिया है :
तार में धारा i = 8 ऐम्पियर,
चुम्बकीय क्षेत्र B = 0.15 टेस्ला,
तार व क्षेत्र के बीच कोण θ = 30°
∴ तार की एकांक लम्बाई पर बल F = ilB sin 30°
= 8 × 1 × 0.15 × \(\frac{1}{2}\)
= 0.6 न्यूटन-मीटर-1
बल की दिशा तार की लम्बाई तथा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा दोनों के लम्बवत होगी।

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प्रश्न 6.
एक 3.0 सेमी लम्बा तार जिसमें 10 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, एक परिनालिका के भीतर उसके अक्ष के लम्बवत् रखा है। परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र का मान 0.27 टेस्ला है। तार पर लगने वाला चुम्बकीय बल क्या है?
हल :
तार की लम्बाई 1 = 3.0 × 10-2 मीटर,
तार में धारा i = 10 ऐम्पियर
परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र B= 0.27 टेस्ला
∵ परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र उसकी अक्ष के अनुदिश होता है, अत: चुम्बकीय क्षेत्र तार की लम्बाई के लम्बवत् है।
∴ तार पर लाने वाला चुम्बकीय बल F = ilB sin 90°
= 10 × 3.0 × 10-2 × 0.27
= 8.1 × 10-2 न्यूटन।

प्रश्न 7.
एक-दूसरे से 4.0 सेमी की दूरी पर रखे दो लम्बे, सीधे, समान्तर तारों A एवं B से क्रमशः 8.0 ऐम्पियर एवं 5.0 ऐम्पियर की विद्युत धाराएँ एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही हैं। तार A के 10 सेमी खण्ड पर बल का आकलन कीजिए।
हल :
तारों के बीच दूरी r= 4.0 × 10-2 मीटर,
धाराएँ i1 = 8.0 ऐम्पियर,
i2 = 5.0 ऐम्पियर,
तार A की लम्बाई l = 0.10 मीटर
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 2
यह बल आकर्षण का होगा।

प्रश्न 8.
पास-पास फेरों वाली एक परिनालिका 80 सेमी लम्बी है और इसमें 5 परतें हैं जिनमें से प्रत्येक में 400 फेरे हैं। परिनालिका का व्यास 1.8 सेमी है। यदि इसमें 8.0 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है तो परिनालिका के भीतर केन्द्र के पास चुम्बकीय क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathbf{B}}\) का परिमाण परिकलित कीजिए।
हल:
परिनालिका की लम्बाई l = 0.80 मीटर,
त्रिज्या r = 0.9 × 10-2 मीटर
प्रवाहित धारा i = 8.0 ऐम्पियर,
कुल फेरे N = 5 × 400 = 2000
∴ एकांक लम्बाई में फेरों की संख्या \(n=\frac{N}{l}=\frac{2000}{0.8}\) = 2500 प्रति मीटर
∴ अक्ष पर केन्द्र के समीप चुम्बकीय क्षेत्र B= μoni = 4π × 10-7 × 2500 × 8.0
= 8π × 10-3 टेस्ला
= 2.5 × 10-2 टेस्ला।

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प्रश्न 9.
एक वर्गाकार कुंडली जिसकी प्रत्येक भुजा 10 सेमी है, में 20 फेरे हैं और उसमें 12 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली ऊर्ध्वाधरतः लटकी हुई है और इसके तल पर खींचा गया अभिलम्ब 0.80 टेस्ला के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से 30°का एक कोण बनाता है। कुंडली पर लगने वाले बलयुग्म आघूर्ण का परिमाण क्या है?
हल :
कुंडली में फेरे N = 20, धारा i = 12 ऐम्पियर, कुंडली की भुजा a = 0.1 मीटर .
B= 0.80 टेस्ला ,
θ = 30° बल-युग्म का आघूर्ण, t = ?
t = NiAB sin 30°
= Ni (a2) B sin 30°
= 20 × 12 x (0.1)2 × 0.8 × \(\frac { 1 }{ 2 }\)
= 0.96 न्यूटन-मीटर।

प्रश्न 10.
दो चल कुंडली गैल्वेनोमीटर M1 एवं M2 के विवरण नीचे दिए गए हैं :
R1 = 10Ω,
N1 = 30,
A1 = 3.6 × 10-3 मीटर2
B1 = 0.25 टेस्ला ,
R2 = 14Ω,
N2 = 42,
A = 1.8 × 10-3 मीटर2
B2 = 0.50 टेस्ला ।
(दोनों मीटरों के लिए स्प्रिंग नियतांक समान है)।
(a) M2 एवं M1 की धारा सुग्राहिताओं
(b) M2 एवं M1 की वोल्टता सुग्राहिताओं का अनुपात ज्ञात कीजिए।
हल :
(a)
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(b)
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प्रश्न 11.
एक प्रकोष्ठ में 6.5 गाउस (1 गाउस= 10-4 टेस्ला) का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र बनाए रखा गया है। इस चुम्बकीय क्षेत्र में एक इलेक्ट्रॉन 4.8 x 106 मीटर-सेकण्ड-1 के वेग से क्षेत्र के लम्बवत् भेजा गया है। व्याख्या कीजिए कि इस इलेक्ट्रॉन का पथ वृत्ताकार क्यों होगा? वृत्ताकार कक्षा की त्रिज्या ज्ञात कीजिए।
(e = 1.6 × 10-19 कूलॉम, me = 9.1 × 10-31 किग्रा)
हल :
दिया है :
B= 6.5 गाउस = 6.5 × 10-4 टेस्ला,
इलेक्ट्रॉन का वेग υ = 4.8 × 106 मीटर-सेकण्ड-1
चूँकि इलेक्ट्रॉन चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् गतिमान है, अत: इलेक्ट्रॉन पर चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल सदैव इलेक्ट्रॉन के वेग के लम्बवत् दिशा में लगता है जो केवल इलेक्ट्रॉन की गति की दिशा में परिवर्तन करता है परन्तु वेग के परिणाम में कोई परिवर्तन उत्पन्न नहीं करता। इस कारण इलेक्ट्रॉन वृत्तीय पथ पर गति करता है।
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प्रश्न 12.
प्रश्न 11 में, वृत्ताकार कक्षा में इलेक्ट्रॉन की परिक्रमण आवृत्ति प्राप्त कीजिए। क्या यह उत्तर इलेक्ट्रॉन के वेग पर निर्भर करता है? व्याख्या कीजिए।
हल :
∵ इलेक्ट्रॉन का वेग υ = 4.8 × 106 मीटर-सेकण्ड-1
तथा . कक्षा की त्रिज्या r = 4.2 × 10-2 मीटर
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∵ आवृत्ति का सूत्र इलेक्ट्रॉन की चाल से मुक्त है, अत: यह उत्तर इलेक्ट्रॉन के वेग पर निर्भर नहीं करता।

प्रश्न 13.
(a) 30 फेरों वाली एक वृत्ताकार कुंडली जिसकी त्रिज्या 8.0 सेमी है और जिसमें 6.0 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, 1.0 टेस्ला के एकसमान क्षैतिज चुम्बकीय क्षेत्र में ऊर्ध्वाधरतः लटकी है। क्षेत्र रेखाएँ कुंडली के अभिलम्ब से 60° का कोण बनाती हैं। कुंडली को घूमने से रोकने के लिए जो प्रति आघूर्ण लगाया जाना चाहिए उसके परिमाण परिकलित कीजिए।
(b) यदि (a) में बतायी गई वृत्ताकार कुंडली को उसी क्षेत्रफल की अनियमित आकृति की समतलीय कुंडली से प्रतिस्थापित कर दिया जाए (शेष सभी विवरण अपरिवर्तित रहें.) तो क्या आपका उत्तर परिवर्तित हो जाएगा?
हल :
(a) कुंडली में फेरे N = 30, त्रिज्या r = 8.0 × 10-2 मीटर, i = 6.0 ऐम्पियर
चुम्बकीय क्षेत्र B= 1.0 टेस्ला, θ = 60°
∴ कुंडली पर चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल-युग्म का आघूर्ण
t = NiAB sin 60°
= Ni (πr2) B sin 60°
= 30 × 6.0 × (3.14 × 64.0 x 10-4) × 1.0 × \(\frac{\sqrt{3}}{2}\)
= 3.13 न्यूटन-मीटर।

स्पष्ट है कि कुंडली को घूमने से रोकने के लिए 3.13 न्यूटन-मीटर का बल-आघूर्ण विपरीत दिशा में लगाना होगा।

(b) नहीं, उत्तर में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इसका कारण यह है कि बल-आघूर्ण (t = NiAB sin θ ) कुंडली के क्षेत्रफल A पर निर्भर करता है न कि उसके आकार पर।

प्रश्न 14.
दो समकेन्द्रिक वृत्ताकार कुंडलियाँ x और Y जिनकी त्रिज्याएँ क्रमशः 16 सेमी एवं 10 सेमी हैं, उत्तर-दक्षिण दिशा में समान ऊर्ध्वाधर तल में अवस्थित हैं। कुंडली X में 20 फेरे हैं और इसमें 16 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, कुंडली Y में 25 फेरे हैं और इसमें 18 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। पश्चिम की ओर मुख करके खड़ा एक प्रेक्षक देखता है कि X में धारा प्रवाह वामावर्त है जबकि Y में दक्षिणावर्त है। कुंडलियों के केन्द्र पर, उनमें प्रवाहित विद्युत धाराओं के कारण उत्पन्न कुल चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण एवं दिशा ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है : कुंडली X के लिए, rX = 0.16 मीटर, NX = 20, iX = 16 ऐम्पियर
कुंडली Y के लिए, rY = 0.10 मीटर, NY = 25, iY = 18 ऐम्पियर
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∵ BX तथा BY परस्पर विपरीत हैं। अत: केन्द्र पर नेट चुम्बकीय क्षेत्र B= By – BX
__= 9π × 10-4 – 4π × 10-4
= 5π × 10-4 टेस्ला
= 1.5 × 10-3 टेस्ला पश्चिम दिशा में। .

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प्रश्न 15.
10 सेमी लम्बाई और 10-3 मीटर2 अनुप्रस्थ काट के एक क्षेत्र में 100 गाउस (1 गाउस= 10-4 टेस्ला) का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र चाहिए, जिस तार से परिनालिका का निर्माण करना है उसमें अधिकतम 15A विद्युत धारा प्रवाहित हो सकती है और क्रोड पर अधिकतम 1000 फेरे प्रति मीटर लपेटे जा सकते हैं। इस उद्देश्य के लिए परिनालिका के निर्माण का विवरण सुझाइए। यह मान लीजिए कि क्रोड लोहचुम्बकीय नहीं है।
हल :
माना परिनालिका की एकांक लम्बाई में फेरों की संख्या n तथा उसमें प्रवाहित धारा i है तब उसकी अक्ष पर केन्द्रीय भाग में
चुम्बकीय क्षेत्र B= μoni ⇒ ni = \(\frac{B}{\mu_{0}}\)
∵ B= 100 × 10-4 टेस्ला नियत है
तथा μo भी नियतांक है।
∴ दी गई परिनालिका के लिए ni = नियतांक
∵ इस प्रतिबन्ध में दो चर राशियाँ हैं, अतः हम किसी एक राशि को दी गई सीमाओं के अनुरूप स्वेच्छ मान देकर दूसरी राशि का चुनाव कर सकते हैं।
इससे स्पष्ट है कि अभीष्ट परिनालिका के बहुत से भिन्न-भिन्न विवरण सम्भव हैं।
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हम जानते हैं कि परिनालिका की अक्ष पर उसके केन्द्रीय भाग में चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एकसमान होता है। अत: दिया गया स्थान (10 सेमी लम्बा व 10-3 मीटर2 अनुप्रस्थ क्षेत्रफल वाला) परिनालिका की अक्ष के अनुदिश तथा केन्द्रीय भाग में होना चाहिए।
अतः परिनालिका की लम्बाई लगभग 50 सेमी से 100 सेमी के बीच (10 सेमी से काफी अधिक) होनी चाहिए तथा परिनालिका का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल 10-3 मीटर2 से अधिक होना चाहिए।
माना परिनालिका की त्रिज्या r है, तब πr2 > 10-3
⇒ r2 > \(\frac{10^{-3}}{3.14}\) = 3.18 x 10-4
⇒ r > 1.78 × 10-2 मीटर
या r > 1.78 सेमी
अत: हम परिनालिका की त्रिज्या 2 सेमी से अधिक (माना 3 सेमी) ले सकते हैं।
अतः परिनालिका का विवरण निम्नलिखित है :
लम्बाई l = 50 सेमी (लगभग),
फेरों की संख्या N = nl = 800 × 0.5 = 400 (लगभग),
त्रिज्या r = 3 सेमी (लगभग),
धारा i = 10 ऐम्पियर।

प्रश्न 16.
I धारावाही, N फेरों और R त्रिज्या वाली वृत्ताकार कुंडली के लिए, इसके अक्ष पर, केन्द्र से दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र के लिए निम्नलिखित व्यंजक है –
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(a) स्पष्ट कीजिए, इससे कुंडली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र के लिए सुपरिचित परिणाम कैसे प्राप्त किया जा . सकता है?
(b) बराबर त्रिज्या R एवं फेरों की संख्या N, वाली दो वृत्ताकार कुंडलियाँ एक-दूसरे से R दूरी पर एक-दूसरे के समान्तर, अक्ष मिलाकर रखी गई हैं। दोनों में समान विद्युत धारा एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही है। दर्शाइए कि कुण्डलियों के अक्ष के लगभग मध्य-बिन्दु पर क्षेत्र, एक बहुत छोटी दूरी के लिए जो कि Rसे कम है, एकसमान है और इस क्षेत्र का लगभग मान निम्नलिखित है –
B = 0.70\(\frac{\mu_{0} N I}{R}\)
हल :
(a) दिए गए सूत्र में x = 0 रखने पर,
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जो कि स्पष्टतया कुंडली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का सूत्र है।
अतः दिए गए सूत्र से कुंडली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करने के लिए x के स्थान पर शून्य रखना होगा।
(b) माना इस प्रकार की दो कुंडलियों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा C1C2 का मध्य-बिन्दु C है तथा इससे d दूरी (दूरी d बहुत छोटी है) पर एक बिन्दु P स्थित है।
तब प्रथम कुंडली के लिए, x1 = \(\frac { R }{ 2 }\) + d
तथा दूसरी कुंडली के लिए, x2 =\(\frac { R }{ 2 }\) – d
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∵ दोनों कुंडली पूर्णतः एक जैसी हैं तथा दोनों में धाराएँ भी एक ही दिशा में हैं, अत: बिन्दु P पर दोनों के कारण चुम्बकीय क्षेत्र एक ही दिशा में होंगे।
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प्रश्न 17.
एक टोरॉइड के (अलौह चुम्बकीय) क्रोड की आन्तरिक त्रिज्या 25 सेमी और बाह्य त्रिज्या 26 सेमी है। इसके ऊपर किसी तार के 3500 फेरे लपेटे गए हैं। यदि तार में प्रवाहित विद्युत धारा 11 ऐम्पियर हो तो चुम्बकीय क्षेत्र का मान क्या होगा? (i) टोरॉइड के बाहर, (ii) टोरॉइड के क्रोड में, (iii) टोरॉइड द्वारा घिरी हुई खाली जगह में। हल :
दिया है : आन्तरिक त्रज्या r1 = 0.25 मीटर,
बाह्य त्रिज्या r2 = 0.26 मीटर
फेरों की संख्या N = 3500, धारा i = 11 ऐम्पियर
(i) टोरॉइड के बाहर चुम्बकीय क्षेत्र B= 0
(ii)
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(iii) टोरॉइड द्वारा घेरे गए रिक्त स्थान में चुम्बकीय क्षेत्र B= 0.

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प्रश्न 18.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(a) किसी प्रकोष्ठ में एक ऐसा चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया गया है जिसका परिमाण तो एक बिन्दु पर बदलता है, पर दिशा निश्चित है ( पूर्व से पश्चिम)। इस प्रकोष्ठ में एक आवेशित कण प्रवेश करता है और अविचलित एक सरल रेखा में अचर वेग से चलता रहता है। आप कण के प्रारम्भिक वेग के बारे में क्या कह सकते हैं?
(b) एक आवेशित कण, एक ऐसे शक्तिशाली असमान चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है जिसका परिमाण एवं दिशा दोनों एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु पर बदलते जाते हैं, एक जटिल पथ पर चलते हुए इसके बाहर आ जाता है। यदि यह मान लें कि चुम्बकीय क्षेत्र में इसका किसी भी दूसरे कण से कोई संघट्ट नहीं होता तो क्या इसकी अन्तिम चाल, प्रारम्भिक चाल के बराबर होगी?
(c) पश्चिम से पूर्व की ओर चलता हुआ एक इलेक्ट्रॉन एक ऐसे प्रकोष्ठ में प्रवेश करता है जिसमें उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर एकसमान एक विद्युत क्षेत्र है। वह दिशा बताइए जिसमें एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया जाए ताकि इलेक्ट्रॉन को अपने सरल रेखीय पथ से विचलित होने से रोका जा सके।
हल :
(a) ∵ आवेशित कण अविचलित सरल रेखीय गति करता है, इसका यह अर्थ है कि कण पर चुम्बकीय क्षेत्र के कारण कोई बल नहीं लगा है। इससे प्रदर्शित होता है कि कण का प्रारम्भिक वेग या तो चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में है अथवा उसके विपरीत है।

(b) हाँ, कण की अन्तिम चाल उसकी प्रारम्भिक चाल के बराबर होगी। इसका कारण यह है कि चुम्बकीय क्षेत्र के कारण गतिमान आवेश पर कार्यरत बल सदैव कण के वेग के लम्बवत् दिशा में लगता है जो केवल गति की दिशा को बदल सकता है परन्तु कण की चाल को नहीं।

(c) ∵ विद्युत क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन पर दक्षिण से उत्तर की ओर विद्युत बल Fe कार्य करेगा, जिसके कारण इलेक्ट्रॉन उत्तर दिशा की ओर विक्षेपित होने की प्रवृत्ति रखेगा। इलेक्ट्रॉन बिना विचलित हुए सरल रेखीय गति करे इसके लिए आवश्यक है कि चुम्बकीय क्षेत्र ऐसी दिशा में लगाया जाए कि चुम्बकीय क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन पर उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर चुम्बकीय बल कार्य करे। इसके लिए फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से चुम्बकीय क्षेत्र ऊर्ध्वाधरत: नीचे की ओर लगाना चाहिए।

प्रश्न 19.
ऊष्मित कैथोड से उत्सर्जित और 2.0 किलोवोल्ट के विभवान्तर पर त्वरित एक इलेक्ट्रॉन 0.15 टेस्ला के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है। इलेक्ट्रॉन का गमन पथ ज्ञात कीजिए यदि चुम्बकीय क्षेत्र (a) प्रारम्भिक वेग के लम्बवत् है, (b) प्रारम्भिक वेग की दिशा से 30° का कोण बनाता है।
हल :
माना इलेक्ट्रॉन का वेग υ है, तब
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(a) ∵ इलेक्ट्रॉन का वेग चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् है, अतः इस दशा में इलेक्ट्रॉन का पथ वृत्ताकार होगा।
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(b) ∵ इलेक्ट्रॉन का वेग चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् नहीं है। अतः इस दशा में इलेक्ट्रॉन का पथ कुंडलिनीय (सर्पिलाकार) होगा। चुम्बकीय क्षेत्र के लम्ब दिशा में इलेक्ट्रॉन के वेग का वियोजित घटक
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प्रश्न 20.
प्रश्न 16 में वर्णित हेल्महोल्ट्ज कुंडलियों का उपयोग करके किसी लघुक्षेत्र में 0.75 टेस्ला का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया है। इसी क्षेत्र में कोई एकसमान स्थिर विद्युत क्षेत्र कुंडलियों के उभयनिष्ठ अक्ष के लम्बवत् लगाया जाता है। (एक ही प्रकार के) आवेशित कणों का 15 किलोवोल्ट विभवान्तर पर त्वरित एक संकीर्ण किरण पुंज इस क्षेत्र में दोनों कुंडलियों के अक्ष तथा स्थिर विद्युत क्षेत्र की लम्बवत् दिशा के अनुदिश प्रवेश करता है। यदि यह किरण पुंज 9.0 x 10-5 वोल्ट मीटर-1, स्थिर विद्युत क्षेत्र में अविक्षेपित रहता है तो यह अनुमान लगाइए कि किरण पुंज में कौन-से कण हैं। यह स्पष्ट कीजिए कि यह उत्तर एकमात्र उत्तर क्यों नहीं है?
हल :
दिया है : B = 0.75 टेस्ला; E = 9.0 × 10-5 वोल्ट/मीटर-1, V = 15 × 103 वोल्ट
माना कण का द्रव्यमान m, वेग v तथा आवेश q है तब कण की
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विद्युत क्षेत्र के कारण कण पर बल Fe = qE
तथा कण पर चुम्बकीय बल Fm = qυB sin 90° = qυ B
∵ दोनों क्षेत्रों से कण अविचलित गुजरता है, अतः कण पर कार्यरत दोनों बल परिमाण में बराबर व दिशा में विपरीत होंगे।
∴ qυB=qE
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हम जानते हैं कि प्रोटॉन के लिए \(\frac{q}{m}\) का मान 9.6 x 107 कूलॉम/किग्रा होता है जबकि दिए गए कणों के लिए \(\frac{q}{m}\) के मान का आधा है। इससे ज्ञात होता है कि इस कण का द्रव्यमान प्रोटॉन के द्रव्यमान का दोगुना होना चाहिए। अत: किरण पुंज में ड्यूटीरियम के आयन उपस्थित हो सकते हैं।

परन्तु ड्यूटीरियम ही एकमात्र ऐसा कण नहीं है जिसके लिए \(\frac{q}{m}\) का मान 4.8 x 10-13 कूलॉम/किग्रा है। द्विआयनित हीलियम परमाणु (x-कण या हीलियम नाभिक He2+) के लिए \(\frac{2e}{2m}\) तथा त्रिआयनित लीथियम परमाणु (Li3+ ) के लिए \(\frac{3e}{3m}\) के लिए भी \(\frac{2e}{2m}\) का मान यही रहता है।

प्रश्न 21.
एक सीधी, क्षैतिज चालक छड़ जिसकी लम्बाई 0.45 मीटर एवं द्रव्यमान 60 ग्राम है इसके सिरों पर जुड़े दो ऊर्ध्वाधर तारों पर लटकी हुई है। तारों से होकर छड़ में 5.0 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है।
(a) चालक के लम्बवत् कितना चुम्बकीय क्षेत्र लगाया जाए कि तारों में तनाव शून्य हो जाए।
(b) चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा यथावत् रखते हुए यदि विद्युत धारा की दिशा उत्क्रमित कर दी जाए तो तारों में कुल आवेश कितना होगा? (तारों के द्रव्यमान की उपेक्षा कीजिए।) (g = 9.8 मीटर सेकण्ड-2)
हल :
छड़ की लम्बाई l = 0.45 मीटर व द्रव्यमान m = 0.06 किग्रा, तार में धारा i = 5.0 ऐम्पियर
(a) तारों में तनाव शून्य करने के लिए आवश्यक है कि चुम्बकीय क्षेत्र के कारण छड़ पर बल उसके भार के बराबर व विपरीत हो।
अतः ilB sin 90° = mg
⇒ \(B=\frac{m g}{i l}=\frac{0.06 \times 9.8}{5.0 \times 0.45}\) = 0.26 टेस्ला ।

(b) यदि धारा की दिशा बदल दी जाए तो चुम्बकीय बल तथा छड़ का भार दोनों एक ही दिशा में हो जाएँगे।
इस स्थिति में, तारों का तनाव = mg + ilB sin 90°
= mg + mg = 2mg (∵ प्रथम दशा से, ilB sin 90° = mg)
= 2 × 0.06 × 9.8= 1.176
= 1.18 न्यूटन।

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प्रश्न 22.
एक स्वचालित वाहन की बैटरी से इसकी चालन मोटर को जोड़ने वाले तारों में 300 ऐम्पियर विद्यत धारा (अल्प काल के लिए) प्रवाहित होती है। तारों के बीच प्रति एकांक लम्बाई पर कितना बल लगता है यदि इनकी लम्बाई 70 सेमी एवं बीच की दूरी 1.5 सेमी हो। यह बल आकर्षण बल है या प्रतिकर्षण बल?
हल :
दिया है : तारों में धारा i1 = i2 = 300 ऐम्पियर,
बीच की दूरी r = 1.5 × 10-2 मीटर
तारों की लम्बाई = 70 सेमी
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 19
= 1.2 न्यूटन-मीटर-1
चूँकि तारों में धारा विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है, अतः यह बल प्रतिकर्षण का होगा।

प्रश्न 23.
1.5 टेस्ला का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र, 10.0 सेमी त्रिज्या के बेलनाकार क्षेत्र में विद्यमान है। इसकी दिशा अक्ष के समान्तर पूर्व से पश्चिम की ओर है। एक तार जिसमें 7.0 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। इस क्षेत्र में होकर उत्तर से दक्षिण की ओर गुजरती है। तार पर लगने वाले बल का परिमाण और दिशा क्या है, यदि
(a) तार अक्ष को काटता हो
(b) तार N-S दिशा से घुमाकर उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम दिशा में कर दिए जाए,
(c) N-S दिशा में रखते हुए ही तार को अक्ष से 6.0 सेमी नीचे उतार दिया जाए।
हल :
दिया है : B= 1.5 टेस्ला ,
क्षेत्र की त्रिज्या = 10.0 सेमी,
तार में धारा i = 7.0 ऐम्पियर

(a) इस दशा में तार की l = 2r = 0.20 मीटर लम्बाई चुम्बकीय क्षेत्र से गुजरेगी।
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चूँकि क्षेत्र तार की लम्बाई के लम्बवत् है,
∴ तार पर बल F = ilB sin 90°
= 7.0 × 0.20 × 1.5 × 1
= 2.1न्यूटन।
बल की दिशा ऊर्ध्वाधरतः नीचे की ओर होगी।

(b) इस दशा में तार की लम्बाई चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से 45° का कोण बनाएगी।
माना,इस दशा में तार की l1 लम्बाई चुम्बकीय क्षेत्र में गुजरती है, तब
sin 45° =\(\frac{2 r}{l_{1}}\) ⇒ l1 =\(\frac{2 r}{\sin 45^{\circ}}=l \sqrt{2}\)
∴ तार पर बल F = il1B sin 45°
\(=i l \sqrt{2} B \times \frac{1}{\sqrt{2}}\) = iBl
= 2.1न्यूटन (ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर )।
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(c) माना इस दशा में तार की l2 (लम्बाई) (l2 = AB) चुम्बकीय क्षेत्र से गुजरती है।
ΔOAC में, ∠OCA = 90°
∴ AC2 = OA2 – OC2
= 102 -62 = 64 ⇒ AC = 8 सेमी
∴ l2 = AB = 2 AC = 16 सेमी
= 0.16 मीटर
∴ तार पर बल F = il2B sin 90°
= 7.0 × 0.16 × 1.5 = 1.68 न्यूटन (ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर)।

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प्रश्न 24.
धनात्मक z-दिशा में 3000 गॉस का एक एकसमान चुम्बकीय-क्षेत्र लगाया गया है। एक आयताकार लूप जिसकी भुजाएँ 10 सेमी एवं 5 सेमी और जिसमें 12 ऐम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है, इस क्षेत्र में रखा है। चित्र-4.5 में दिखायी गई लूप की विभिन्न स्थितियों में इस पर लगने वाला बल-युग्म आघूर्ण क्या है? हर स्थिति में बल क्या है? स्थायी सन्तुलन वाली स्थिति कौन-सी है?
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हल :
दिया है : B= 3000 गाउस = 0.3 टेस्ला, a = 0.1 मीटर, b = 0.05 मीटर, i = 12 ऐम्पियर
कुंडली का क्षेत्रफल A = ab = 0.1 मीटर × 0.05 मीटर = 5 × 10-3 मीटर2
(a), (b), (c), (d) प्रत्येक दशा में कुंडली के तल पर अभिलम्ब, चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् है। अत: प्रत्येक दशा में बल-युग्म का आघूर्ण t = iAB sin 90° .
= 12 × 5 × 10-3 × 0.3 × 1
= 1.8 × 10-2 न्यूटन-मीटर।
प्रत्येक दशा में बल शून्य है क्योंकि एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखे धारा लूप पर बल-युग्म कार्य करता है परन्तु बल नहीं।
(a) t = 1.8 × 10-2 न्यूटन-मीटर ऋण Y-अक्ष की दिशा में तथा बल शून्य है।
(b) t = 1.8 × 10-2 न्यूटन-मीटर ऋण Y-अक्ष की दिशा में तथा बल शून्य है।
(c) t = 1.8 × 10-2 न्यूटन-मीटर ऋण X-अक्ष की दिशा में तथा बल शून्य है।
(d) t= 1.8 × 10-2 न्यूटन-मीटर तथा बल शून्य है।
(e) तथा (f) दोनों स्थितियों में कुंडली के तल पर अभिलम्ब चुम्बकीय क्षेत्र के अनुदिश है अतः
t = iAB sin 0° = 0 .
अत: इन दोनों दशाओं में बल-आघूर्ण व बल दोनों शून्य हैं। यह स्थितियाँ सन्तुलन की स्थायी अवस्था को दर्शाती हैं।

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प्रश्न 25.
एक वृत्ताकार कुंडली जिसमें 20 फेरे हैं और जिसकी त्रिज्या 10 सेमी है, एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखी है जिसका परिमाण 0.10 टेस्ला है और जो कुंडली के तल के लम्बवत् है। यदि कुंडली में 5.0 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही हो, तो
(a) कुंडली पर लगने वाला कुल बलयुग्म आघूर्ण क्या है?
(b) कुंडली पर लगने वाला कुल परिणामी बल क्या है?
(c) चुम्बकीय क्षेत्र के कारण कुंडली के प्रत्येक इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला कुल औसत बल क्या है?
(कुंडली 10-5 मीटर2 अनुप्रस्थ क्षेत्र वाले ताँबे के तार से बनी है, और ताँबे में मुक्त इलेक्ट्रॉन घनत्व 1029 मीटर-3 दिया गया है।)
हल:
फेरे N = 20, i = 5.0 ऐम्पियर, r = 0.10 मीटर, B= 0.10 टेस्ला
इलेक्ट्रॉन घनत्व n = 1029 मीटर-3 ,
तार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A = 10-5 मीटर2

(a) ∵ कुंडली का तल चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् है, अत: कुंडली के तल पर अभिलम्ब व चुम्बकीय क्षेत्र के बीच का कोण शून्य है (θ = 0°)
बल आधूर्ण t = NiAB sin 0° = 0
(b) कुंडली पर नेट बल भी शून्य है।
(c) यदि इलेक्ट्रॉनों का अपवाह वेग υd है तो
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प्रश्न 26.
एक परिनालिका जो 60 सेमी लम्बी है, जिसकी त्रिज्या 4.0 सेमी है और जिसमें 300 फेरों वाली 3 परतें लपेटी गई हैं। इसके भीतर एक 2.0 सेमी लम्बा, 2.5 ग्राम द्रव्यमान का तार इसके ( केन्द्र के निकट) अक्ष के लम्बवत् रखा है। तार एवं परिनालिका का अक्ष दोनों क्षैतिज तल में हैं। तार को परिनालिका के समान्तर दो वाही संयोजकों द्वारा एक बाह्य बैटरी से जोड़ा गया है जो इसमें 6.0 ऐम्पियर विद्युत धारा प्रदान करती है। किस मान की विद्युत धारा (परिवहन की उचित दिशा के साथ) इस परिनालिका के फेरों में प्रवाहित होने वाले तार का भार संभाल सकेगी? (g = 9.8 मीटर सेकण्ड-2)
हल :
परिनालिका की लम्बाई l = 0.6 मीटर,
त्रिज्या = 4.0 सेमी,
फेरे N = 300 × 3,
तार की लम्बाई L = 2.0 × 10-2 मीटर,
द्रव्यमान m = 2.5 × 10-3 किग्रा,
धारा I = 6.0 ऐम्पियर
माना परिनालिका में प्रवाहित धारा =i
तब परिनालिका के अक्ष पर केन्द्रीय भाग में चुम्बकीय क्षेत्र
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∵ तार में धारा की दिशा ज्ञात नहीं है, अत: परिनालिका में धारा की दिशा बता पाना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 27.
किसी गैल्वेनोमीटर की कुंडली का प्रतिरोध 12Ω है। 4 मिलीऐम्पियर की विद्युत धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्ण स्केल विक्षेप दर्शाता है। आप इस गैल्वेनोमीटर को 0 से 18 वोल्ट परास वाले वोल्टमीटर में कैसे रूपान्तरित करेंगे?
हल :
दिया है : G = 12Ω, ig= 4 मिलीऐम्पियर = 4 × 10-3 ऐम्पियर
0 से V (V = 18 वोल्ट) वोल्ट परास के वोल्टमीटर में बदलने के लिए गैल्वेनोमीटर के श्रेणीक्रम में एक उच्च प्रतिरोध R जोड़ना होगा, जहाँ
\(\frac{V}{R+G}=i_{g} R+G = \frac{V}{i_{g}}\)
\(R=\frac{V}{i_{g}}-G=\frac{18}{4 \times 10^{-3}}-12=4488 \Omega\)
अत: गैल्वेनोमीटर के श्रेणीक्रम में 44882 का प्रतिरोध जोड़ना होगा।

प्रश्न 28.
किसी गैल्वेनोमीटर की कुंडली का प्रतिरोध 15 2 है। 4 मिली ऐम्पियर की विद्युत धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्णस्केल विक्षेप दर्शाता है। आप इस गैल्वेनोमीटर को 0 से 6 ऐम्पियर परास वाले अमीटर में कैसे रूपान्तरित करेंगे?
हल : दिया है : G = 15Ω, ig = 4 मिलीऐम्पियर = 4.0 × 10-3 ऐम्पियर, i = 6 ऐम्पियर
गैल्वेनोमीटर को 0 से i ऐम्पियर धारा परास वाले अमीटर में बदलने के लिए इसके पार्श्वक्रम में एक सूक्ष्म प्रतिरोध S (शण्ट) जोड़ना होगा, जहाँ .
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 25
अत: इसके समान्तर क्रम में 10 m2 का प्रतिरोध जोड़ना होगा।

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गतिमान आवेश और चुम्बकत्व NCERT भौतिक विज्ञान प्रश्न प्रदर्शिका (Physics Exemplar Q Problems) पुस्तक से चयनित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के हल

गतिमान आवेश और चुम्बकत्व बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बायो-सेवर्ट नियम इंगित करता है कि । वेग से गतिमान इलेक्ट्रॉनों द्वारा चुम्बकीय क्षेत्र Bइस प्रकार होता है कि –
(a) \(\overrightarrow{\mathrm{B}} \perp \vec{v}\)
(b) \(\overrightarrow{\mathrm{B}} \| \vec{v}\)
(c) यह व्युत्क्रम घन नियम का पालन करता है
(d) यह प्रेक्षण बिन्दु और इलेक्ट्रॉनों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होता है।
उत्तर :
(a) \(\overrightarrow{\mathrm{B}} \perp \vec{v}\)

प्रश्न 2.
R त्रिज्या का कोई धारावाही वृत्ताकार लूप x-y तल में इस प्रकार रखा है कि उसका केन्द्र मूलबिन्दु पर हो। इसका वह अर्द्धभाग जिसके लिए x> 0 है, अब इस प्रकार मोड़ दिया गया है कि यह y-2 तल में रहे –
(a) अब चुम्बकीय-आघूर्ण का परिमाण घट जाता है
(b) चुम्बकीय-आघूर्ण परिवर्तित नहीं होता
(c) (0, 0, Z); Z>> R पर B का परिमाण बढ़ जाता है
(d) (0, 0, Z); Z >> R पर B का परिमाण अपरिवर्तित रहता है।
उत्तर :
(a) अब चुम्बकीय-आघूर्ण का परिमाण घट जाता है

प्रश्न 3.
एक इलेक्ट्रॉन को किसी लम्बी धारावाही परिनलिका के अक्ष के अनुदिश एकसमान वेग से प्रक्षेपित किया जाता है। निम्नलिखित में कौन सा प्रकथन सत्य है
(a) इलेक्ट्रॉन अक्ष के अनुदिश त्वरित होगा
(b) अक्ष के परित: इलेक्ट्रॉन का पथ वृत्ताकार होगा
(c) इलेक्ट्रॉन अक्ष से 45° पर बल अनुभव करेगा और इस प्रकार कुंडलिनी पथ पर गमन करेगा
(d) इलेक्ट्रॉन परिनालिका के अक्ष के अनुदिश एकसमान वेग से गति करता रहेगा।
उत्तर :
(d) इलेक्ट्रॉन परिनालिका के अक्ष के अनुदिश एकसमान वेग से गति करता रहेगा।

प्रश्न 4.
साइक्लोट्रॉन में कोई आवेशित कण –
(a) सदैव त्वरित होता है ।
(b) चुम्बकीय क्षेत्र के कारण दोनों ‘डी’ के बीच के अन्तराल में त्वरित होता है
(c) की चाल ‘डी’ में बढ़ जाती है
(d) की चाल ‘डी’ में मन्द हो जाती तथा दोनों ‘डी’ के बीच बढ़ जाती है।
उत्तर :
(a) सदैव त्वरित होता है ।

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प्रश्न 5.
चुम्बकीय-आघूर्ण M का कोई विद्युतवाही वृत्ताकार लूप, किसी यादृच्छिक दिग्विन्यास में किसी बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित है। लूप को इसके तल के लम्बवत् अक्ष के परितः 30° पर घूर्णन कराने में किया गया कार्य है –
(a) MB :
(b) \(\sqrt{3} \frac{M B}{2}\)
(c) \(\frac{M B}{2}\)
(d) शून्य।
उत्तर :
(d) शून्य।

गतिमान आवेश और चुम्बकत्व अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यह सत्यापित कीजिए कि साइक्लोट्रॉन आवृत्ति \(\omega=\frac{e B}{m}\) की सही विमाएँ [T-1] हैं।
उत्तर :
साइक्लोट्रॉन में चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् गति करते समय आवेशित कण वृत्ताकार पथ पर गति करता है, जिसके लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल, चुम्बकीय बल से प्राप्त होता है। अतः
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प्रश्न 2.
यह दर्शाइए कि ऐसा बल जो कोई प्रभावी कार्य नहीं करता वेग-निर्भर बल होना चाहिए।
उत्तर :
बल कोई प्रभावी कार्य नहीं कर रहा है, अतः
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प्रश्न 3.
साइक्लोट्रॉन में यदि रेडियो आवृत्ति (rf) वैद्युत क्षेत्र की आवृत्ति की दो गुनी हो जाए, तो उसमें किसी आवेशित कण की गति का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
रेडियो आवृत्ति के दो गुनी हो जाने पर कण एकान्तर क्रम में त्वरित एवं मन्दित गति करेगा तथा दोनों डी में कण के पथ की त्रिज्या अपरिवर्तित रहेगी।

गतिमान आवेश और चुम्बकत्व आंकिक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
चित्र में दर्शाए गए गैल्वेनोमीटर परिपथ का उपयोग करके बहुपरिसरीय वोल्टमीटर की रचना की जा सकती है। हम एक ऐसे वोल्टमीटर की रचना करना चाहते हैं, जो 2 वोल्ट, 20 वोल्ट तथा 200 वोल्ट माप सके तथा 10Ω प्रतिरोध के ऐसे गैल्वेनोमीटर से बना हो जिसमें 1 मिलीऐम्पियर धारा से अधिकतम विक्षेप उत्पन्न होता है। इसके लिए उपयोग किए जाने वाले R1, R2 तथा R3 के मान ज्ञात कीजिए।
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हल :
गैल्वोनोमीटर को वोल्टमीटर में परिवर्तित करने के लिए
V = iG (G + R)
जहाँ iG = 1 मिलीऐम्पियर = 10-3 ऐम्पियर
तथा G = 10Ω
(i) 0 से 2 वोल्ट परिसर के लिए, 2 = 10-3 (10 + R1)
या 2000 = 10 + R1.
या R1= 1990Ω

(ii) 0 से 20 वोल्ट परिसर के लिए, 20 = 10-3 (10+ R + Ra)
या 20,000 = 10 + R1 + R2
या 19990 = R1 + R2
या R2 = 19990 – 1990 = 18,000Ω = 18 kΩ

(iii) 0 से 200 वोल्ट परिसर के लिए, 200 = 10-3 (10 + R1 + R2 + R3 )
200000 = 10 + R1 + R2 + R3
199990 = 1990 + 18000+ R3
या R3 = 199990 – 19990
= 180000Ω= 180 kΩ

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प्रश्न 2.
कोई लम्बा सीधा तार जिसमें 25 ऐम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है। चित्र में दर्शाइए अनुसार किसी मेज पर रखा है। 1 मीटर लम्बा 2.5 ग्राम द्रव्यमान का कोई अन्य तार PQ है जिसमें विपरीत दिशा में इतनी ही धारा प्रवाहित हो रही है। तार PQ ऊपर अथवा नीचे सरकने के लिए स्वतन्त्र है। तार PQ किस ऊँचाई तक ऊपर उठेगा?
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 29
हल :
माना तार PQ, h ऊँचाई तक ऊपर उठता है।
मेज पर रखे धारावाही तार के कारण h ऊँचाई पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र,
\(B=\frac{\mu_{0}}{2 \pi} \cdot \frac{I}{h}\)
तार PQ पर कार्यरत चुम्बकीय बल F = BIl sin 90° = BIL
तार PQ पर नीचे की ओर कार्यरत तार का भार = mg
सन्तुलन की स्थिति में, BIl = mg
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 30

प्रश्न 3.
12 a लम्बाई.तथा प्रतिरोध का कोई एकसमान चालक तार एक धारावाही कुंडली के रूप में (i) भुजा a के समबाहु त्रिभुज (ii) भुजा a के वर्ग (iii) भुजा a के नियमित षट्भुज की आकृति में लपेटा गया है। कुंडली विभव स्रोतV से सम्बद्ध है। प्रत्येक प्रकरण में कुंडलियों का चुम्बकीय-आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
हल :
तार की कुल लम्बाई = 12a
प्रतिरोध = R
विभवान्तर = V0
प्रत्येक स्थिति में प्रवाहित धारा I=\(\frac{V_{0}}{R}\)
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 31

(i) a भुजा की समबाहु त्रिभुजाकार कुंडली में फेरों की संख्या (n1) = \(\frac{12 a}{3 a}\) = 4
a भुजा की समबाहु त्रिभुजाकार कुंडली के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफ (A) = \(\frac{\sqrt{3}}{4}\) a2
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 32

(ii) a भुजा की वर्गाकार कुंडली में फेरों की संख्या (n2) = \(\frac{12 a}{4 a}\) = 3
कुंडली की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A2) = a2
कुंडली का चुम्बकीय आघूर्ण (M2) = n2IA2 =3 \(\times \frac{V_{0}}{R} \times a^{2}=\frac{3 V_{0} a^{2}}{R}\)
(iii) a भुजा की नियमित षट्भुजाकार कुंडली में फेरों की संख्या (n3) = \(\frac{12 a}{6 a}\) = 2
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 33

प्रश्न 4.
चित्र में दर्शाए गए गैल्वेनोमीटर परिपथ का उपयोग करके बहपरिसरीय धारामापियों की रचना की जा सकती है। हम 10 mA, 100 mA तथा 1 A की धारा माप सकने वाले ऐसे धारामापी की रचना करना चाहते हैं जो 10Ω प्रतिरोध के ऐसे गैल्वेनोमीटर से बना हो जिसमें 1 mA धारा प्रवाहित होने पर अधिकतम विक्षेप होता है। इसके लिए उपयोग किए जाने वाले प्रतिरोधों S1, S2 तथा S3 के मान ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 34
हल :
IG = 1 mA = 10-3A
तथा गैल्वेनोमीटर का प्रतिरोध (G) = 10Ω
गैल्वेनोमीटर को धारामापी में परिवर्तित करने के लिए उसके समान्तर क्रम में निम्न प्रतिरोध S लगाते हैं। अतः
IG × G = (I – IG) × S
(i) 10 मिली ऐम्पियर परिसर के लिए, IG × G = (I1-IG) (S1+S2 +S3)
अतः 10-3 × 10 = (10 – 1) × 10-3 (S1 + S2 + S3)
अत: S1 + S2 + S3 = \(\frac{10}{9}\) ……………………(1)

(ii) 100 मिलीऐम्पियर परिसर के लिए, IG × G = (I2 – IG) (S2 + S3)
10-3 × 100 = (100 – 1) × 10-3 (S2 + S3)
या  S2 + S3 = \(\frac{10}{99}\)……………………(2)

(iii) 1 ऐम्पियर परिसर के लिए, . IG × G = (I3 – IG) S3
10-3 × 10 = (1 – 1 × 10-3) × S3
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 4 गतिमान आवेश और चुम्बकत्व - 35

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MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 10 भुगतान संतुलन

MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 10 भुगतान संतुलन

भुगतान संतुलन Important Questions

भुगतान संतुलन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न (a)
भुगतान शेष की संरचना में निम्नलिखित में कौन – से खाते सम्मिलित होते हैं –
(a) चालू खाता
(b) पूँजी खाता
(c) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) और (b) दोनों

प्रश्न (b)
व्यापार सन्तुलन का अर्थ होता है –
(a) पूँजी के लेन – देन से
(b) वस्तुओं के आयात व निर्यात से
(c) कुल क्रेडिट तथा डेबिट से
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(b) वस्तुओं के आयात व निर्यात से

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प्रश्न (c)
भुगतान शेष की संरचना में निम्नलिखित में कौन – से खाते सम्मिलित होते हैं –
(a) चालू खाता
(b) पूँजी खाता
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न (d)
प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन में सुधार का उपाय है –
(a) मुद्रा अवमूल्यन
(b) आयात प्रतिस्थापन
(c) विनिमय नियंत्रण
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न (e)
विदेशी विनिमय दर का निर्धारण होता है –
(a) विदेशी करेंसी की माँग द्वारा
(b) विदेशी करेंसी की पूर्ति द्वारा
(c) विदेशी विनिमय बाजार में माँग एवं पूर्ति द्वारा
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) विदेशी विनिमय बाजार में माँग एवं पूर्ति द्वारा

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प्रश्न (f)
विदेशी विनिमय बाजार के रूप हैं –
(a) हाजिर या चालू बाजार
(b) वायदा बाजार
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. ब्रेटन वुड्स प्रणाली को ……………………….. सीमा प्रणाली भी कहा जाता है।
  2. विदेशी विनिमय दर एवं विदेशी विनिमय की पूर्ति में ………………………….. संबंध होता है।
  3. अवमूल्यन से देश की मुद्रा की विनिमय क्रयशक्ति ………………………….. हो जाती है।
  4. व्यापार संतुलन में केवल …………………………… मदों को शामिल किया जाता है।
  5. भुगतान – संतुलन सदैव ………………………….. में रहता है।
  6. एक देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा में व्यक्ति मूल्य ………………………….. कहलाता है।

उत्तर:

  1. समंजनीय
  2. सीधा
  3. कम
  4. दृश्य
  5. संतुलन
  6. विनिमय दर।

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प्रश्न 3.
सत्य /असत्य बताइये –

  1. व्यापार संतुलन में दृश्य मदों तथा अदृश्य मदों दोनों का समावेश किया जाता है।
  2. व्यापार संतुलन भुगतान संतुलन का एक अंग है।
  3. अवमूल्यन की घोषणा सरकार द्वारा की जाती है।
  4. भुगतान संतुलन सदैव सन्तुलित रहता है।
  5. निर्यात प्रोत्साहन हेतु अवमूल्यन का सहारा लिया जाता है।
  6. विकासशील देशों में तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या का आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
  7. भुगतान संतुलन करने का एक उपाय निर्यात प्रोत्साहन भी है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य
  6. असत्य
  7. असत्य।

प्रश्न 4.
सही जोड़ियाँ बनाइये –

उत्तर:

  1. (b)
  2. (c)
  3. (a)
  4. (e)
  5. (d).

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प्रश्न 5.
एक शब्द/वाक्य में उत्तर दीजिये –

  1. नई व्यापार नीति की घोषणा किस सन में की गई?
  2. भारतीय रुपये के अवमूल्यन से भारतीयों के आयात कैसे हो जायेंगे?
  3. दीर्घकाल में आयात किसका भुगतान करते हैं?
  4. पूँजी खाते से किस बात का ज्ञान होता है?
  5. एक देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा में व्यक्त मूल्य क्या कहलाता है?

उत्तर:

  1. 1991
  2. महँगे
  3. निर्यात का
  4. अंतर्राष्ट्रीय विनियोग व ऋणग्रस्तता का
  5. विनिमय दर।

भुगतान संतुलन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थिर विनिमय दर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर से तात्पर्य उस दर से है जो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में स्थिर बनी रहती है। सन् 1944 में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना के साथ एवं विश्वव्यापी मंदी एवं स्वर्णमान, के पतन के परिणामस्वरूप विनिमय दरों में स्थिरता की प्रवृत्ति बढ़ी। इस दर को अधिकीलित दर भी कहा जाता है। इसे निम्न चित्र से स्पष्ट किया जा सकता हैइस विनिमय दर व्यवस्था में दर का निर्धारण सरकार के द्वारा किया जाता है।
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प्रश्न 2.
लोचपूर्ण विनिमय दर क्या है?
उत्तर:
लोचपूर्ण विनिमय दर वह दर है जो केन्द्रीय बैंक के हस्तक्षेप के बिना विदेशी विनिमय की माँग और पूर्ति में साम्य स्थापित करती है। जिस बिन्दु पर विदेशी विनिमय की माँग एवं पूर्ति की शक्तियों के द्वारा दर निर्धारित हो वह साम्य या लोचपूर्ण विनिमय दर कहलाती है।
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प्रश्न 3.
भुगतान संतुलन से क्या आशय है? भारत के भुगतान संतुलन की प्रतिकूलता के तीन कारण लिखिए?
अथवा
भुगतान शेष में असंतुलन का कारण लिखिए?
उत्तर:
भुगतान संतुलन का अर्थ:
भुगतान संतुलन से आशय, किसी देश – विशेष की वस्तुओं के आयातों एवं निर्यातों तथा उनके मूल्यों के संपूर्ण विवरण से होता है। सामान्यतः विभिन्न देशों के बीच विभिन्न वस्तुओं के आयात – निर्यात के अतिरिक्त अन्य प्रकार के भी लेन – देन होते हैं, जैसे – बीमा, जहाजी किराया, बैंकों का शुल्क, ब्याज, लाभ, पूँजी का स्थानांतरण सेवाओं का पुरस्कार इत्यादि। भारत में भुगतान संतुलन की प्रतिकूलता के कारण-भारत में भुगतान संतुलन के प्रतिकूल होने के तीन कारण निम्नलिखित हैं –

1. पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में वृद्धि:
तेल उत्पादक देश अपने पेट्रोलियम पदार्थों के मल्य प्रतिवर्ष बढ़ाते रहते हैं। साथ – ही – साथ देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खपत बढ़ी है जिससे भारी मात्रा में इनका आयात किया गया है।

2. आशा के अनुरूप निर्यातों में वृद्धि न होना:
भारत में भुगतान संतुलन के प्रतिकूल होने का एक कारण निर्यातों का आशानुरूप न बढ़ना है।

3. बढ़ती हुई जनसंख्या:
भारत की जनसंख्या वृद्धि के कारण आयातों में वृद्धि हुई है। तथा घरेलू उपभोग के बढ़ जाने के कारण निर्यातों में कमी आई है जिससे भारत की भुगतान संतुलन में प्रतिकूलता आई है।

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प्रश्न 4.
भारत में भुगतान संतुलन को सुधारने हेतु चार उपाय बताइए?
उत्तर:
भारत में भुगतान संतुलन को सुधारने के उपाय इस प्रकार हैं –

1. निर्यात को प्रोत्साहन:
सरकार को निर्यात को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि निर्यात बढ़ सके इसके लिए –

  1. निर्यात करों में कमी की जानी चाहिए
  2. देश में उद्योगों को आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए
  3. विदेशों में वस्तुओं के लिए प्रचार व विज्ञापन किया जाना चाहिए।

2. आयात में कमी:
भारत को अपने आयात में कमी लानी चाहिए। इसके लिए आयात करों में वृद्धि की जानी चाहिए)जिससे आयातिक वस्तु महँगी हो जाए और माँग में कमी आए।

3. विदेशी ऋणों का प्रयोग:
भुगतान संतुलन की प्रतिकूलता को दूर करने के लिए विदेशी ऋणों का भी प्रयोग किया जा सकता है)। वास्तव में यह कुछ समय के लिए इस समस्या का समाधान तो कर देता है लेकिन बाद में भुगतानों को अदा करते समय कठिनाई होती है।

4. विनिमय नियंत्रण:
भुगतान संतुलन को ठीक करने के लिए विनिमय नियंत्रण भी एक अच्छा मार्ग है। इससे आयात घटते हैं एवं निर्यात बढ़ते हैं।

प्रश्न 5.
स्थिर विनिमय – दर के पक्ष – विपक्ष में दो – दो तर्क दीजिए?
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर से आशय:
जब विनिमय – दर का निर्धारण सरकार के द्वारा किया जाता है तो उसे स्थिर विनिमय दर कहते हैं।

स्थिर विनिमय – दर के पक्ष में तर्क:
स्थिर विनिमय – दर के पक्ष में निम्नांकित तर्क दिये जा सकते हैं –

1. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन:
स्थिर विनिमयदर के अंतर्गत आयातकर्ता एवं निर्यातकर्ता को इस बात की जानकारी रहती है कि कितना भुगतान करना है तथा कितना भुगतान प्राप्त होगा।

2. विनिमय व्यवस्था:
यदि देश में विनिमय – दर स्थिर है तो सट्टेबाजी जैसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन नहीं मिलता है तथा सरकार विनिमय नियंत्रण तथा प्रबंध व्यवस्थाओं से मुक्त हो जाती है।

3. निर्यातक देशों के लिए आवश्यक जिन देशों को राष्ट्रीय आय का अधिकांश भाग निर्यातों से ही प्राप्त होता है उनके लिये विनिमय दर में स्थायित्व अत्यधिक आवश्यक है।

4. पूँजी निर्माण:
विदेशी विनिमय दर में स्थिरता के फलस्वरूप देश में आंतरिक कीमत स्तर पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। पूँजी निर्माण की दर बढ़ती है तथा देश का आर्थिक विकास होता है।

स्थिर विनिमय – दर के विपक्ष में तर्क:
स्थिर विनिमय – दर के विपक्ष में निम्नांकित तर्क दिए जाते हैं –

1. आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव:
स्थिर विनिमय – दर का प्राथमिक उद्देश्य इसमें स्थिरता को बनाये रखना होता है और राष्ट्रीय आय, रोजगार नीति, मूल्य – स्तर जैसे राष्ट्रीय उद्देश्यों को गौण मान लिया जाता है।

2. भ्रष्टाचार:
स्थिर विनिमय – दर को बनाये रखने के लिए देश में अनेक नियंत्रण लगाये जाते हैं। नियंत्रण अधिक होने पर भ्रष्टाचार फैलने के अवसर बढ़ जाते हैं।

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प्रश्न 6.
व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन में अन्तर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन में अन्तर –

व्यापार संतुलन

  1. व्यापार संतुलन में आयात – निर्यात की जाने वाली दृश्य मदों को ही शामिल किया जाता है।
  2. व्यापार संतुलन, भुगतान संतुलन का एक भाग है।
  3. किसी देश का व्यापार संतुलन पक्ष में न होना कोई अधिक चिन्ता का विषय नहीं है।
  4. व्यापार संतुलन अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है।
  5. व्यापार की दृष्टि से व्यापार संतुलन का महत्व कम होता है।

भुगतान संतुलन:

  1. भुगतान संतुलन में दृश्य मदों के साथ – साथ अदृश्य मदों को ही शामिल किया जाता है।
  2. भुगतान संतुलन की धारणा अधिक व्यापक होती है।
  3. यदि भुगतान संतुलन पक्ष में नहीं है तो यह चिन्ता का विषय है।
  4. भुगतान संतुलन सदा ही संतुलित रहता है।
  5. भुगतान संतुलन का महत्व अधिक होता है।

प्रश्न 7.
अवमूल्यन और मूल्यह्रास में अंतर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
अधिकीलित विनिमय प्रणाली में जब सरकार के द्वारा विनिमय दर में वृद्धि की जाती है तो इसे मुद्रा का अवमूल्यन कहा जाता है। अवमूल्यन तब होता है जब देश स्थिर विनिमय दर प्रणाली को ग्रहण करता है। दूसरी ओर, बाजार माँग एवं पूर्ति शक्तियों के प्रभाव से बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के देश की मुद्रा का मूल्य कम हो जाता है तो इसे मूल्यह्रास कहते हैं, मूल्यह्रास तब होता है जब देश नम्य विनिमय दर प्रणाली अथवा तिरती विनियम दर प्रणाली को ग्रहण करता है।

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प्रश्न 8.
जब M = 60 + 0.06 Y हो, तो आयात की सीमांत प्रवृत्ति क्या होगी? आयात की सीमांत प्रवृत्ति और समस्त माँग फलन में क्या संबंध है?
उत्तर:
दिया है,
M = 60 + 0. 60 Y
∵ M = \(\bar { M } \) + mY
∴ m = 0.06
\(\bar { M } \) > 0 स्वायत्त घटक है। 0 < m < 1
यहाँ m आयात की सीमांत प्रवृत्ति है। सीमांत प्रवृत्ति का मान 1 से कम तथा शून्य से अधिक होता है। आय का एक अतिरिक्त रुपया आयात खर्च करने से प्राप्त अनुपात है। यह सीमांत प्रवृत्ति के सादृश्य होता है। आयात की सीमांत प्रवृत्ति और समस्त माँग में धनात्मक संबंध पाया जाता है।

प्रश्न 9.
व्याख्या कीजिए कि – G – T = (Sg – I) – (X – M)?
उत्तर:
G – T = (Sg – I) – (X – M)
यहाँ, G = सरकारी व्यय, T = कर, G – T = निवल सरकारी व्यय, Sg = सरकार की बचत, I = निवेश, Sg – I = निवल बचतें, x = निर्यात, M= आयात, X – M = व्यापार संतुलन। यह दिया गया समीकरण सही है, चूँकि यह स्पष्ट करता है कि निवल सरकारी व्यय, निवल सरकारी बचतों और व्यापार संतुलन के समान है।

प्रश्न 10.
क्या चालू पूँजीगत घाटा खतरे का संकेत होगा? व्याख्या कीजिए?
उत्तर:
चालू पूँजीगत घाटा खतरे का संकेत होगा या नहीं। इस संदर्भ में तर्क दिया जाता है कि जब किसी देश में चालू पूँजीगत घाटा होता है तो बचत कम हो रही होती है, निवेश बढ़ोत्तरी हो रही होती है अथवा बजट घाटे में वृद्धि हो रही होती है। देश के दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य के बारे में चिन्ता का कारण तब होता है जब चालू पूँजीगत घाटे से बचत कम होती है और बजटीय घाटा अधिक होता है। घाटे से उच्च निजी उपभोग अथवा सरकारी उपभोग प्रतिबिंबित होता है।

इन स्थितियों में देश के पूँजी स्टॉक में तेजी से वृद्धि नहीं होगी जिससे पर्याप्त संवृद्धि हो सके और ऋण अदायगी की जा सके। परंतु यदि चालू पूँजीगत घाटे से निवेश में वृद्धि प्रतिबिंबित हो तो चिन्ता का कोई कारण नहीं होता है क्योंकि इससे पूँजी स्टॉक का अधिक तीव्रता से निर्माण होगा और भविष्य में निर्गत में वृद्धि होगी। अतः संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि यदि किसी देश में ऋण की नई निधि से ब्याज दर की अपेक्षा विकास दर अधिक होती है तो चालू पूँजीगत घाटे से किसी प्रकार के खतरे का संकेत नहीं होता।

प्रश्न 11.
संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन में अंतर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
संतुलित व्यापार शेष:

  1. आयात एवं निर्यात के संतुलन को संतुलित व्यापार व्यापार शेष कहा जाता है।
  2. यह एक संकुचित धारणा है।
  3. इमसें केवल भौतिक वस्तुओं के आयात निर्यात को ही शामिल किया जाता है।

चालू खाता संतुलन:

  1. व्यापार शेष, सेवाओं के आयात व निर्यात शेष तथा हस्तांतरण भुगतान शेष के योग को चालू खाता संतुलन कहते हैं।
  2. यह एक संकुचित धारणा है।
  3. भौतिक वस्तुओं के निर्यात – आयात के साथ – साथ सेवाओं व हस्तांतरण भुगतान के लेन – देन को भी इसमें शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 12.
यदि देश B से देश A में मुदा स्फीति ऊँची हो और दोनों देशों में विनिमय दर स्थिर हो, तो दोनों देशों के व्यापार शेष का क्या होगा?
उत्तर:
यदि देश ‘B’ से देश ‘A’ में मुद्रा स्फीति की दर ऊँची हो और दोनों देशों में विनिमय दर स्थिर हो, तो देश ‘A’ में व्यापार शेष घाटा होगा और देश B में व्यापार शेष आधिक्य होगा। ऐसी स्थिति में देश B से देश A को वस्तुओं का आयात करना लाभप्रद होगा। परिणामस्वरूप देश A अधिक वस्तुओं का अधिक मात्रा में आयात करेगा और देश B को कम मात्रा में वस्तुओं का निर्यात करेगा।अत: देश A के सामने व्यापार शेष घाटे की समस्या उत्पन्न होगी। दूसरी ओर देश B देश A से कम मात्रा में वस्तुओं का आयात करेगा। अतः देश B का व्यापार शेष धनात्मक होगा।

भुगतान संतुलन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भुगतान संतुलन की मदों का उल्लेख कीजिए?
उत्तर:
किसी देश का भुगतान संतुलन उसके समस्त विदेशी लेन – देन तथा लेनदारियों – देनदारियों का विवरण होता है। इसके बाँयी ओर सभी लेनदारियाँ तथा दाँयी ओर देनदारियाँ प्रदर्शित की जाती हैं बाँयी ओर की मदों एवं दाँयी ओर के मदों के अंदर के स्वरूप से भुगतान संतुलन का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। भुगतान संतुलन के विवरण में सम्मिलित विभिन्न मदों का वर्गीकरण लीग ऑफ नेशन्स ने दो मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत किया था और अधिकांश देश इसी आधार पर भुगतान संतुलन का विवरण तैयार करते हैं। भुगतान संतुलन का प्रथम शीर्षक चालू खाता होता है और दूसरा शीर्षक पूँजी खाता होता है।

  1. चालू खाता: चालू खाते में दृश्य और अदृश्य मदें सम्मिलित होती हैं।
  2. पूँजी खाता: इसमें विदेशी पूँजी के विनियोग तथा ऋण की राशियों को दिखाया जाता है।

प्रश्न 2.
पूँजी खाते में शामिल मदों को बताइए?
उत्तर:
पूँजी खाते में शामिल प्रमुख मदें निम्नलिखित हैं –

  1. बैंकिंग पूँजी का प्रवाह: बैंकिंग पूँजी का अंतरप्रवाह देश के लिए प्राप्ति पक्ष तथा बाह्य प्रवाह भुगतान पक्ष में गिना जाता है, लेकिन बैंकिंग पूँजी में केन्द्रीय बैंक को शामिल नहीं किया जाता हैं।
  2. निजी ऋण: देश के निजी क्षेत्र द्वारा विदेशों से प्राप्त ऋण, भुगतान संतुलन खाते के लेनदारी पक्ष तथा उनके ऋण भुगतानों को लेनदारी पक्ष में गिना जाता है।
  3. विदेशी निवेश: विदेशी निवेश में दो प्रकार के निवेश आते हैं –
    • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश:
    • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से तात्पर्य विदेशों में परिसम्पत्तियाँ खरीदना है तथा उन पर नियंत्रण रखना है।
    • पोर्टफोलियो निवेश:
  4. इस निवेश में विदेशों में परिसम्पत्तियाँ खरीदी जाती हैं परन्तु उस पर नियंत्रण नहीं होता है।
  5. सरकारी पूँजी का लेन – देन:

इसमें निम्नलिखित मदें शामिल हैं –

  1. ऋण
  2. ऋणों का भुगतान
  3. मिश्रित
  4. कोष एवं मौद्रिक सोना।

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प्रश्न 3.
विदेशी विनिमय – दर को प्रभावित करने वाले तत्वों को लिखिए?(कोई चार)
अथवा
विदेशी विनिमय – दर के उतार – चढ़ाव के पाँच कारण समझाइए?
उत्तर:
विदेशी विनिमय – दर को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व निम्न हैं –

1. आयात एवं निर्यात में परिवर्तन:
यदि देश के निर्यात, आयात से अधिक हैं तो देश की मुद्रा की माँग बढ़ेगी और विदेशी विनिमय:
दर देश के पक्ष में होगा इसके विपरीत देश में आयात, निर्यात की तुलना में अधिक है तो विदेशी मुद्रा की माँग बढ़ेगी और विदेशी विनिमय दर देश के विपक्ष में होगा या प्रतिकूल होगा।

2. बैंकिंग संबंधी प्रभाव:
यदि व्यापारिक बैंक विदेशी बैंक पर बड़ी मात्रा में बैंकर्स ड्रॉफ्ट तथा अन्य प्रकार के साख-पत्र जारी करता है, तो इससे विदेशी विनिमय की मांग बढ़ जायेगी इसके विपरीत अगर विदेशी बैंक देश के बैंकों पर साख – पत्र जारी करती है तो देशी मुद्रा की मांग बढ़ेगी और विनिमय-दर देश के पक्ष में हो जाती है।

3. कीमतों में परिवर्तन:
दो देशों में किसी एक देश में सापेक्षिक दृष्टि से कीमत के परिवर्तन के परिणामस्वरूप विनिमय-दर परिवर्तित हो जाती है। जैसे – भारत में कीमत बढ़ जाती है, जबकि जर्मनी में कीमत में परिवर्तन नहीं होता है। अतः जर्मनी को भारत की वस्तुएँ महँगी पड़ने लगेंगी और वे यहाँ से कम वस्तुएँ मँगायेंगे। इसके विपरीत भारत को जर्मनी की वस्तुएँ सस्ती पड़ेंगी और वहाँ से आयात करने लगेंगी।

4. पूँजी का आगमन:
जिस देश में विदेशी पूँजी आती है उस देश की मुद्रा की मांग बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप विदेशी विनिमय दर उस देश के पक्ष में हो जाती है। इसके विपरीत पूँजी देश से विदेश में जाती है तो विदेशी मुद्रा की माँग बढ़ जाती है। जिससे विनिमय दर देश के विपक्ष में हो जाती है।

प्रश्न 4
दृश्य आयात – निर्यात तथा अदृश्य आयात – निर्यात को समझाइये?
उत्तर:
दृश्य आयात – निर्यात:
दृश्य आयात – निर्यात के अंतर्गत उन वस्तुओं के आयात – निर्यात को शामिल किया जाता है जिनका बंदरगाह में रखे गये रजिस्टर में लेखा – जोखा रखा जाता है। इसे देखकर वर्षभर में किए गए आयातों एवं निर्यातों के मूल्य प्राप्त किये जा सकते हैं। इसलिए इसे दृश्य मदें कहा जाता है। इसमें केवल वस्तुओं के आयात – निर्यात को ही शामिल किया जाता है।

अदृश्य आयात – निर्यात:
अदृश्य आयात – निर्यात के अंतर्गत सेवाओं के आदान – प्रदान को शामिल किया जाता है। ये सेवाएँ हैं – बैंकिंग, बीमा, शिपिंग आदि जिनका बंदरगाहों पर लेखा – जोखा नहीं रखा जाता है। इस प्रकार अदृश्य मदों में सेवाओं एवं पूँजी के आयात – निर्यात को शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 5.
लोचपूर्ण विनिमय – दर किसे कहते हैं? इसके पक्ष – विपक्ष में दो – दो तर्क दीजिए?
उत्तर:
लोचपूर्ण विनिमय – दर का अर्थ:
जब विनिमय दर का निर्धारण विदेशी मुद्रा बाजार में करेंसियों की माँग एवं पूर्ति के द्वारा निर्धारित किया जाता है तो उसे लोचपूर्ण विनिमय – दर कहते हैं।

लोचपूर्ण विनिमय – दर के पक्ष में तर्क:
लोचपूर्ण विनिमय दर के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं –

1. भुगतान संतुलन में साम्य:
लोचपूर्ण विनिमय दर की दशा में अन्य राष्ट्रीय हितों, जैसे-राष्ट्रीय आय, मूल्य स्तर आदि की उपेक्षा किये बिना भुगतान-संतुलन में साम्य स्थापित करना संभव होता है।

2. अधिमूल्यन एवं अवमूल्यन:
लोचपूर्ण विनिमय दर होने पर अपने देश की मुद्रा को विदेशी मुद्रा की तुलना में आसानी से बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे अर्थव्यवस्था में साम्य बनाये रखना संभव होता है।

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प्रश्न 6.
मान लीजिए C = 100 + 0.75 YD, I = 500, G = 750, कर आय का 20 प्रतिशत है, x = 150, M = 100 + 0.2Y तो संतुलन आय, बजट घाटा अथवा आधिक्य और व्यापार घाटा अथवा आधिक्य की गणना कीजिए?
उत्तर:
C = 100 + 0.75 YD जहाँ C = 100, C = 0.75, I = 500, G = 750, X = 150, M = 100 + 0.2Y
कर आय (t) = 20%
आय
(Y) = C + C (1 – 1) Y + l + G + (X – M)
Y = 100 + 0.75 (1 – 0.2) Y + 500 +750 + (150 – 100 – 0 – 2Y)
Y = 100 + 0.75(0.8) Y+ 500 + 750 + 150 – 100 – 0 – 2Y
Y = 100 + 0.6 Y + 1300 – 0.2 Y = 1400 + 0.4 Y
Y – 0.4 Y = 1400
0.6 Y = 1400
Y = \(\frac{1400}{0.6}\)
= 2333
बजट घाटा = सरकारी व्यय कर (G) – कर
= 750 – 2333 का 20% = 750 – 467 = 283
M = 100 + 0.2 Y = 100 + 0.2(2333)
= 100 + 467 = 567
व्यापार घाटा = M – X = 567 – 150 = 417.

MP Board Class 12th Economics Important Questions

MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 12 Consumer Protection

MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 12 Consumer Protection

Consumer Protection Important Questions

Consumer Protection Very Short Answer Type Questions

Question 1.
When is consumer’s right day is celebrated ?
Answer:
On 15th March consumer’s rights day is celebrated.

Question 2.
Ahmad wants to buy a press (iron). As a aw are consumer how can he convince you about the quality of press ?
Answer:
Ahmad should check I.S.I. mark while purchasing press.

Question 3.
Reeta wants to purchase one packet of juice. She is an aware customer. How can she connived ?
Answer:
Reeta should see F.RO. mark.

Question 4.
Amrit has complained against ‘Amrit Volvo Limited’ in state commission. But he was not satisfied with orders of it. Tell where Amrit can complaint against the commission.
Answer:
Amrit can appeal in the National Commission.

Question 5.
Anjana wants to purchase a golden ring, what she should see on the ring to check quality of ring ?
Answer:
She should see Halmark.

Question 6.
What role does “the right to be heard” play for a consumer ?
Answer:
According to this right if any misbehavior or michchief is done with consumer then he can appeal to the court and has right that his complaint to be heard. The consumers right to be heard includes legal hearing to get redress.

Question 7.
Why is consumer protection important for a consumer ? Give one reason.
Answer:
Consumer protection is important for the protection of unfair practices of producers and sellers.

Question 8.
Write the names of two right under the consumer protection act of 1986.
Answer:

  1. Right to safety
  2. Right to be informed.

Question 9.
Where is the international organisation set up for standardization ?
Answer:
At the international level the organisation (ISO) was set up in Geneva.

Question 10.
W’hat is Eco-mark scheme ?
Answer:
This scheme has been introduced by the ministry of environment and forest. It signifies that the products fulfill the environmental norms. This scheme is useful for toilet soap, detergents, paints, packaging material, food products, edible oil, etc.

Question 11.
What do you mean by Lok Adalat ?
Answer:
Lok Adalat are those centers where aggrieved parties can approach directly with their grievances. Lok Adalat give patient hearing discuss the issue and give their decision on spot. It is economical and effective system.

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Question 12.
What do you mean by public support ?
Answer:
Business needs public support, without it no other business can run successfully. Business needs financial support by time to time like financial institution, banks, government employees, customer etc. Business had provide better quality of product to the society. If we exploit the public it means we destroy our self. We need people to purchase our goods.

Question 13.
What sort of precautions should be observed by consumers ?
Answer:
Consumers must take following precautions :

  1. Must acquire all the informations regarding goods purchased or service choosed.
  2. Consumer must know name of article, name of manufacturer, instructions of its use etc.
  3. Consumer must assure himself about the safety of the product.

Question 14.
What do you mean by public relation ?
Answer:
Public relation means to maintain relation among various people. Newspapers, government press are the sources of it.

Question 15.
What do you mean by consumer ?
Answer:
Under the consumer protection Act 1986 consumer means any person who for consumption purpose: .

  1. Buys goods on deferred payment
  2. Hires any service for payment
  3. Hires any service on deferred payment.

Question 16.
State any two problems of consumer.
Answer:
Two Problems of consumers are as follows :

  1. Adulteration of foods (Use of unpermitted colour)
  2. Sales of medicines after expiry date.

Question 17.
What do you mean by redressal forum ?
Answer:
Three tier grievances redressal machinery or forum is established through consumer forum.

  1. District forum
  2. State commission
  3. National commission.

Question 18.
Who can be the president of district forum ?
Answer:
The president of consumer forum can be the officiating or retired judge.

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Question 19.
Who can appeal before the court for complaint ?
Answer:
Following can complaint:

  1. A consumer.
  2. A recognized consumer organisor.
  3. A consumer or more than one consumer.
  4. Central government.
  5. State government.

Consumer Protection Short Answer Type Questions

Question 1.
Explain the importance of consumer protection.
Answer:
Importance of consumer protection :

  1. Providing legal protection to customers
  2. Unorganized consumers
  3. ignorance of consumers
  4. To protect from exploitation
  5. Help in the growth of business
  6. Social responsibility of business to protect the interest of owners and other
  7. Makes aware of consumers about their rights
  8. Speedy disposal of complaints
  9. Protection from pollution.

Question 2.
Explain the different rights of consumers.
Answer:
he rights of consumers are as follows :

  1. Right to safety
  2. Right to be informed
  3. Right to be heard
  4. Right to receive goods at competitive price
  5. Right to be released
  6. Right to consumer education
  7. Right to consideration
  8. Right to healthy environment.

Question 3.
Discuss the ways and means of consumer protection in India.
Answer:
The following ways and means are popular for consumer protection in India :

1. Lok Adalat: Lok Adalat is a place where aggrieved parties can approach directly with their grievances. It gives patient hearing, discuss the issue and give their decision on the spot. It is effective, economic and fast.

2. Public Interest Litigation : It refers to the system which provide legal representation to the poors, consumers, minorities and other weaker groups who are not in a position seek legal remedy of their own public interest litigation can be filled either by aggrieved person or any other person who belongs to weaker group.

3. Consumer Welfare Fund: This fond has been established for promoting the welfare of consumer.

4. Redressal Forums and Consumer Protection Councils: The Consumer Protection Act, 1986; a three tier judicial machinery has been established to settle consumer disputes :

  1. District forum
  2. State commission
  3. National commission.

It provide simple, speedy and economical redressal of consumers disputes.

Question 4.
Explain the importance of non-government organisations (NGOs) for consumer protection.
Answer:
The importance of NGOs in the field of consumer protection are as follows :

  1. Generates consumers awareness and provides education to consumers.
  2. Organises protests against hording and adulteration.
  3. Filing suit on behalf of consumers when needed.
  4. Collecting various information and data related with products and using this for consumer protection.
  5. Helping government in activities related with consumer protection.

Question 5.
Explain the importance of consumer protection on the point of view of business.
Answer:

1. Satisfaction and welfare of consumers: Consumer protection is important because it ensures to satisfy the needs of consumers and their welfare.

2. Key to survival and growth of business : A business can survive and grow only when it aims at safeguarding the interests of shareholders in general and consumers in particular.

3. Goodwill and image : For building favorable image and goodwill a business undertaking is expected to supply right product of right quality in right quantity at right time and right place to the consumers.

4. Creating and retaining consumers : Customer is the soul of business. A business without customer is meaningless like a body without soul. The main motto of a business must be creating and retaining customers. It is possible only when the customers are satisfied in all respects. .

Question 6.
What do you mean by consumer’s right or rights of consumer ?
Answer:
The consumers of America are more attentive and aware than consumers of India. Compared to India the consumers of America are having more rights and their complaints are settled immediately. President Kennedy laid more stress over consumer rights. He supported the following rights :

  1. Right to safety.
  2. Right to choice.
  3. Right to be informed.
  4. Right to be heard.

Other rights have been also given to consumers. For consumer protection International Organization of Consumer Union have been set up.

Question 7.
Who can file a complaint in a consumer court ?
Answer:
A complaint can be made by :

  1. Any consumer.
  2. Any registered consumer’s association.
  3. The Central Government or any State Government.
  4. One or more consumers, on behalf of numerous consumers having the same interest.
  5. A legal heir or representative of a deceased consumer.

Question 8.
What kind of cases can be filed in a state commission ?
Answer:
A complaint can be made to the appropriate state commission when the value of the goods and services, along with compensation claim exceed 20 lakes but does not exceed 1 crore. The appeals against the orders of a district form can also be filed before the state
commission.

Question 9.
Explain the ways of consumer protection.
Answer:
The consumer protect act has provided three tier judicial machinery for redressing the grievances of consumers.
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 12 Consumer Protection
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Question 10.
What is consumer education ? What is the need of consumer education ?
Answer:
It is considered that the consumer is the king of the market. But in the present day consumers are exploited by producers and sellers. They create an illusion in the minds of the consumers through advertisement, publicity and propaganda, so protect the interest of the consumers, consumer education or consumerism has become the need of the hour. Consumerism is an organised social and environmental force which aims at protecting the interest of consumers at large by organizing, writing and awakening the consumers.
Need of consumer educations : The main objectives of consumer education are as under:

  1. Awareness about the quality of the product
  2. Protection of consumers
  3. Information about prices
  4. Restriction on exploitation of consumers
  5. Awareness of rights
  6. Development of consumer organisation
  7. Ability to buy appropriate goods
  8. Abstaining from buying harmful products
  9. To get compensation in case of cheating by sellers
  10. To make complaint about the grievances.

Question 11.
What are the salient features of Consumer Protection Act 1986 ?
Answer:
It is the duty of the government to ensure protection to consumers of the country. The government of India has passed various acts for protecting consumer’s interest. The consumer protection act 1986 is one of the most important acts. The salient features of this act are :

  1. This act covers all goods and services. It is a comprehensive act.
  2. This act does not nullify the provisions of other acts passed for consumer’s protection. It is complementary to all those acts which have been passed in the past.
  3. This act provides for establishing consumer forums, at central as well as state level. The main motto of such forums is to

protect consumer’s interest and extend consumer’s right.

Question 12.
How can you say that the scope of consumer protection in wide ?
Answer:
Following points are in support of the answer :

  1. It gives information to the consumer’s right and responsibility.
  2. It assist consumers to remove their complaint.
  3. It provides legal protection to the consumer.
  4. It is applicable to all the goods and services.
  5. In it all the private and public organisations are

Question 13.
What are the responsibilities of a consumers ?
Answer:
A consumer must be aware about these responsibilities while purchasing, using and consuming goods and services.

  1. Consumer must be aware of all their rights.
  2. Consumer must be careful while purchasing a product.
  3. He should file complaint for the redressal of genuine grievance.
  4. Consumer must buy a standardized goods.
  5. He should ask for a cash memo on purchase of goods and services.

Question 14.
Explain the responsibilities of business towards consumers.
Answer:
The responsibilities of business toward consumers are as follows :

  1. The sell product at reasonable prices
  2. To sell quality products
  3. To settle complaints of consumers
  4. To sell products of high standard and certified by Indian Standards Institute
  5. Not to be misleading advertisements
  6. Proper packaging of products
  7. To collect information about needs, interest, etc. of consumers
  8. To provide after sales services.

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Question 15.
Write the characteristics of district forum.
Answer:
District Consumer Forum:

1. Establishment: According to consumer protection act, state government can set up one or more district fortifier in each district.

2. Composition: It consists of a president and two other members one of which must be a woman.

3. Term : Every member shall hold office for a term of 5 years or up to the age of 65 years, whichever is earlier and shall not be eligible for reappointment.

4. Jurisdiction : It has jurisdiction to entertain complaints where the value of goods and services and compensation does not exceed Rs. 20 lakhs.

Question 16.
What precautions should be taken by consumer while purchasing goods ?
Answer:
Consumers should keep in mind few things while purchasing products. They are as follows:

1. Consumer should be cautious : Consumer should be cautious while purchasing products. He should insist on getting informations like quantity, quality, price of product, etc.

2. Consumer should exercise his rights : Consumer must be aware of all his rights and must use those rights while purchasing the products and services from sellers.

3. Filing complaint for redressal : Consumers should make the complaints to the authority for genuine grievances. The consumer should be prepared to take action to enforce fair and just demands.

4. Consumer must be aware of misleading advertisements : Through advertisements the seller provides various information about product to consumer, consumers should not believe on these advertisements. He should compare the actual product usage with advertisement. If there is anything false than it should be reported to concerned authorities.

5. Consumer should not compromise on quality : He should never compromise on quality. Whenever he is purchasing products he should look for quality marks on products like ISI, Agmark, Woolmark, FPO, etc., printed on them.

Question 17.
What do you mean by standardization of products ?
Answer:
Standardization of products : These are done to assure the quality of products. The ISI stamp on goods is placed by the Bureau of Indian standards. This caters to industrial and consumer goods. These goods can be trusted to confirm to specific standards. Agmark is meant for agricultural products.

At the international level the international organization for standardization (ISO) located in Geneva sets common standards. The FAO and WHO provide food standards.

Question 18.
What do you mean by legislation concerning consumer rights ?
Answer;
Legislation concerning consumer rights : The consumer protection act 1986 provides for consumer disputes redressal at the state and national level. With the help of this law the agencies can solve grievances in a speedy, simple and inexpensive manner. A separate department of consumer affairs was set up at the state and central government. A three tier system of consumer courts at the National, State and District levels were set up. These agencies have done good work by handling lakhs of cases.

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Question 19.
What do you mean by unfair trade practice ? Give some example of it.
Answer:
In unfair means of trade practice a trader adopt the defective and harmful methods to earn profit.
Example :

  1. To provide wrong information about the product.
  2. Not to follow the fixed standards.
  3. Black marketing hording.
  4. Sell products on high rate.

Question 20.
What do you mean by indian standard beauro Write any two activites of it
Answer:
It was established in 1986.
Major activities :

  1. To establish quality of goods and services
  2. To standardize goods under VIS standardization.

Question 21.
What do you mean by Malpractices ?
In order to earn more and more profites the seller perform more profites practices like selling defective and substandard goods, charging exhorbitant prices, negligence as to the safety standard etc. Thus, to protect consumers from these business malpractices consumer protection is essential.

Question 22.
What do you mean by Moral jurisdiction ?
Answer :
Moral Justification: It is the moral duty and responsibility of business to protect the consumers. The sellers should not perform activities like adulteration, black marketing, hoarding, profiteering, etc. By doing so they can discharge their moral responsibility.

Question 23.
Explain the importance of consumer protection from the point of view of business.
Answer:
A business can not survive without paying attention on protection the consumers interest and adequately satisfying them. This is important because of the following reasons:

1. Long term interest of business : Business firms should aim at long term profit maximisation through customer satisfaction, Satisfied customers not only lead to repeat sales but also provide good feedback to prospective customers and thus help in increasing the customer base of business.

2. Business uses Society’s Resources : Business organization uses resources which belong to the society, thus they have .a responsibility to supply such products and render such services which are in public interest.

3. Social responsibility : A business has social responsibility towards various interest groups. Business organizations make money by selling goods and providing services to consumers. Thus, consumers form an important group among the many stakeholders of business and like other stakeholders, their interest has to be well taken care of.

4. Moral justification : The moral duty of any business is to take care of consumer’s interest and securing them from exploitation. Thus, a business must avoid insecure loss, exploitation and unfair trade practices like defective and unsafe products, adulteration, false and misleading advertising hoarding, black marketing etc.

5. Government intervention : A business engaging in any form of exploration time trade practices would invite government intervention or action. Thus, it is advisable that business organization voluntarily resort to such practices, where the customers need and interests will be taken care of.

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Question 24.
“Though laws and acts are there still consumers are exploited.” Why ?
Or
”Why there is need of consumer protection ? Write any four causes.
Answer:
The importance of consumer protection are as follows :

1. Consumer’s Ignorance: Today every person is limited to his own work and services and is not interested in other informations that’s why consumer is ignorant about the products which he consumes. Thus, due to this ignorance they are exploited by the sellers and became a poppet. So it becomes necessary that they should be educated about their rights.

2. Social Responsibility : Every person whether he is a trader or an officer first of all is the member of society. As a member of society he is having some responsibilities and duties but every person runs away from responsibilities and works for earning more profits by any means. Thus, consumer protection is necessary to make them aware of their social responsibility.

3. Unorganised Consumers: In India generally the consumers are unorganised because they belong to different castes, religions and sections of society. Due to lack of unity and organization among consumers the sellers make advantage of it. Thus, consumer protection is necessary to make the consumers organised.

4. Settlement of Consumers Disputes : Due to the continuous exploitation of consumers by the sellers they files the complaints to the concerned departments or forums.

These disputes should be settled speedily so that consumers should have faith on law and order. In order to solve the disputes of consumers various acts specially consumer protection act has been enacted.

5. Makes Consumer Aware: Due to continuous exploitation of consumers, consumer protection act 1986 was passed. Thus, consumer have been granted some rights according to the provisions of this act, consumer protection is necessary to make consumers aware about these rights.

Consumer Protection Long Answer Type Questions

Question 1.
Explain in brief any four responsibilities of consumer to safeguard their intrest.
Answer:
The six responsibilites of consumer to safeguard their interest are as follows :

1. To exercise his right properly : Every customer should be well aware of his rights. The consumer who knows these right properly should also make other consumer aware of these rights who are either less informed or ill informed.

2. Taking precautions : Taking proper precaution without taking shelter of legal action is also a responsibility of consumer. It is also a way of protection.

3. Filling complaint for redressal: The consumer should invariably file complaint to the appropriate authority for redressal of genious grievances. He should raise his voice and protest against all sorts of exploitation by trade and industry.

4. Quality and quantity consciousness : The consumer should always make it a point to buy such product which have always quality certification such as ISI, FPO, ISO etc.

5. Escaping misleading advertisement : The consumer should see that he is not tempted by ingenious and misleading advertisement with overstated claim of product and services.

6. Taking cash memo : In case goods are purchase in cash, the consumer should compel the dealer to give cash memo and if goods are purchased on credit basis their bill of purchase must be demanded.

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Question 2.
What are various ways in which the objective of consumer protection can be achieved ? Explain the role of consumer organizations and NGOs in this regard ?
Answer:
There are various ways in which the objective of consumer protection can be achieved:

(i) Self regulation by business : Socially responsible firms follow ethical standards and practices in dealing with their customers. Many firms have set up their customer service and grievance cells to redress the problems and grievance of their consumers.

(ii) Business associations : The associations of trade, commerce and business like federation of India Chambers of Commerce of India (FICCI) and conference of Indian Industries (CII) have laid their code of conduct which lays down for their members the guidelines in their dealing with the customers.

(iii) Consumer awareness : A consumer, who is well informed about his rights and the reliefs, would be in a position to raise his voice against any unfair trade practices or exploitation:

(iv) Consumer Organization : Consumer originations plays an important protecting role in educating consumers about their rights and them. These organizations can force business firms to avoid malpractices and exploitation of consumers.

(v) Government: The government can protect the interests of the consumers by enacting various legislations. The legal framework in India encompasses various legislation which provide protection to consumer, the most important of these regulations is the Consumer Protection Act, 1986. The Act provided for a three-tier machinery at the District, State and National levels for redressal of consumer grievance.

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Question 3.
Explain the role of consumer organizations and NGO in protecting and promoting consumer’s interest.
Answer:
Consumer organization and NGOs perform several functions for the protection and promotion of interest of consumers. In India, these associations are performing lots of functions some of them are :

  1. Education the general public about consumer rights by organizing training programmers, seminars and workshops.
  2. Publishing periodicals and other publications to impart knowledge about consumer problems, legal reporting, reliefs available and other matters of interest.
  3. Carrying out comparative testing of consumer products in accredited laboratories to test relative qualities of competing brands of publishing the test results for the benefit of consumers.
  4. Encouraging consumers to strongly protest and take an action against unscrupulous, exploitation and unfair trade practices of sellers.
  5. Providing legal assistance to consumers by providing aid, legal advice etc. in seeking legal remedy.
  6. Filling complaints in appropriate consumers courts on behalf of the consumers.
  7. Taking an initiative in filling cases in consumers court in the interest of the general public, not for any individual.

Question 4.
What are the rights of consumer in India ?
Answer:
Following are the rights of the consumer under the act of 1986 :

(1) Right to Safety : The consumer has a right to be protected against goods and services which are hazardous to life, e.g., sometimes we purchased the food items of low quality which causes severe problems. Thus, in this case, we should purchased good quality and FPO labelled products.

(2) Right to be informed : The consumer has a right to have complete information about the product, which he intends to buy including its ingredients, date of manufacture, price, quantity, directions for use etc. Under the legal framework of India manufactures have to provide such information on the package and label of the product.

(3) Right to Choose : The consumer has the freedom to choose from a variety of products. The marketers should offer a wide variety of products and allow the consumer to make a choice and choose the product which is most suitable.

(4) Right to be Heard : The consumer has a right to file a complaint and to be heard in case of dissatisfaction with a good or a service. It is because of this reason that many enlightened business firms have set up their own consumer service and grievance cells.

(5) Right to Seek Redressal: The consumer Protection Act provides a number product, of reliefs to the removal of defect consumer including replacement of the in the product, compensation paid for any loss or injury suffered by the consumer etc.

(6) Right to Consumer Education : The consumer has a right to acquire knowledge about products. He should be aware about his rights and the reliefs available to him in case of a product service falling short of his expectations many consumer organisation and some enlightened businesses are taking an active part in educating consumers in this respect.

Question 5.
Enumerate the various Acts passed by the Government of India which help in protecting the consumer’s interest ?
Answer:
The Indian legal framework consists of a number of regulations which provide protection to consumers. Some of these regulations are as under:

(1) The Consumer Protection Act, 1986 : The Act provides safeguard to consumers against defective goods, deficient services, unfair trade practices etc.

(2) The Contract Act, 1982 : The Act lays down the conditions in which the promises made by parties to a contract will be binding on each other.

(3) The Sale of Goods Act, 1930 : The Act provides some safeguards and reliefs to the buyers of the goods in case, the goods purchased do not comply with express or implied conditions or warranties.

(4) Essential Commodities Act, 1955 : The Act alms at controlling, production, supply, distribution and price of essential commodities.

(5) The Agricultural produce Act, 1937 : The Act prescribes grade standards for agricultural commodities and livestock products.

(6) The Prevention of Food Adulteration Act, 1954 : The Act aims to check adulteration of foods articles and ensure their purity, so as to maintain public health.

(7) The Standards of Weights and Measures act, 1976 : It provides protection to consumers against the malpractice of under-weight or under-measure.

(8) The Trade Marks Act, 1999 : The Act prevents the use of fraudulent marks on products and thus provides protection to the consumers against such products.

(9) The Competition Act, 2002 : The Act provides protection to the consumers in case 01 practices adopted by business firms which hamper competition in the market.

(10) The Bureau of Indian Standard Act, 1986 : The bureau has two major activities : Formulation of quality standards for goods and their certification through the BIS certification scheme. The bureau has also set up a grievance cell, where consumers can make a complaint about quality of products carrying the ISI mark.

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Question 6.
Explain the redressal mechanism available to consumers under the Consumer Protection Act 1986.
Answer:
For the redressal of consumer grievances, the Consumer Protection Act provides for setting up of a three-tier enforcement machinery at the District, State and the National levels.

(i) District Forum: A complaint can be made to the appropriate District Forum when the value of goods or services, along with the compensation claimed, does not exceed 20 lakhs. In case the aggrieved party is not satisfied with the order of the District Forum, he can appeal before the State Commission within 30 days.

(ii) State Commission : A complaint can be made to the appropriate State Commission when the value of the goods or services, along with the compensation claimed, exceeds 20 lakhs but does not exceed 1 crore. The appeals against the orders of District Forum can also be filed before the State Commission. In case the party is not satisfied with the order of the State Commission, he can appeal before the National Commission within 30 days of the passing of the order by State Commission.

(iii) National Commission : A complaint can be made to the National Commission when the value of the goods or services, along with the compensation claimed exceeds 1 crore. The appeals against the orders of a State Commission can also be filed before the National Commission. An order passed by the National Commission in a matter of its original justification is appealable before the supreme court. This means that only those appeals, where the value of goods + services in question, along with the compensation claimed, exceeded I crore and where the aggrieved party was not satisfied with the order of the National Commission, can be taken to the Supreme Court of India.

What are the responsibilities of a consumer ?
Answer:
A consumer should keep in mind the following responsibilities while purchasing, using and consuming goods and services :

  1. (1) Be aware about various goods and services available in the market, so that an intelligent and wise choice can be made.
  2. (2) Buy only standardised goods as they provide quality assurance. Thus, look for ISI mark on electrical goods. FPO mark on food products and Hallmark on jewellary etc.
  3. (3) Learn about the risks associated with products and services.
  4. (4) Read labels carefully, so as to have information about prices, weight, manufacturing and expiry dates etc.
  5. (5) Assert yourself to get a fair deal.
  6. (6) Be honest in your dealings. Choose only from legal goods and services.
  7. (7) Ask for a cash-memo on purchase of goods and services. This would serve as a proof of the purchase made.
  8. (8) File a complaint in an appropriate consumer forum in case of a shortcoming in the quality of goods purchased or services availed.
  9. (9) Form consumer societies which would play an active part in educating consumers and safeguarding their interests.
  10. (10) Respect the environment, avoid waste, littering and contributing to pollution.

Question 8.
Explain how the complaint shall be made to the district forum ?
Answer:
Manner in which complaint shall be to made to the district forum : A complaint in relation to any goods sold or delivered or against services should be filed by the consumer. It can be filed by any recognized consumer association or by the central or state government.

One copy is send to the opposite party, directing him to give his version of the case within a period of 30 days when the opposite party on receipts of the complaint referred to him, denies the allegations contained in the complaint or fails to take any action. He represents his case within the time given by the district forum, the district forum shall proceed to settle the consumers dispute.

After following the procedure, examining the statements of the complaint, the opposite party and witness of both, the district forum passes necessary orders and relief if any. The district forum is authorized to pass order to remove the defect points out to replace the goods with new goods, to pay the compensation.

Any person aggrieved by an order made by the district forum may prefer an appeal against such order to the state commission with the date of 30 days.

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Question 9.
Explanation some measures for the protection of consumer by Indian government.
Answer:
Following are the measures taken by Indian government:

(1) Lok Adalat: Lok Adalat are those centers where aggrieved parties can approach directly with their grievances. Lok Adalat give patient hearing discuss the issue and give their decision on spot. It is economical and effective system.

(2) Filling Petition for the Public Welfare : Under it legal actions are taken for the protection of those people who don’t have any representatives. In this disputes poor, environment, minorities, etc. are included.

(3) Eco friendly products : Environment and forest ministry has started Eco mark plans. Under it a big pot of mud is the mark which is used for such products which are eco friendly. In the beginning some goods like soaps, detergents, packaging material, food materials etc. are included in there products. These goods are not harmful for environment.

(4) Consumer protection council: Under the consumers act 1986 one legal mechanism was formed on 3 tier level under it all the exploitations of consumers are settled. State governments established consumer protection councils for the settlement of disputes.

(5) Giving award for fighting against consumer exploitation : For the encouragement of youths, some awards are given to those who fight against consumer exploitation.

(6) Publicity measures : 15th March is celebrated as world consumer day. In 1955 in New Delhi a function was held in which publicity measures were taken. On television every week programmed are organized. Short films are also made in favor of it.

MP Board Class 12 Business Studies Important Questions

MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market

MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market

Finance market Important Questions

Finance market Objective Type Questions

Question 1.
Choose the correct answer :

Question 1.
Primary and Secondary market:
(a) Compete with each other
(b) Complement to each other
(c) Functions independently
(d) Control each other
Answer:
(b) Complement to each other

Question 2.
The number of stock exchange in India was :
(a) 20
(b) 21
(c) 24
(d) 23
Answer:
(c) 24

Question 3.
REPO is:
(a) Repurchase agreement
(b) Reliance petroleum
(c) Read and process
(d) None of these
Answer:
(a) Repurchase agreement

Question 4.
NSEI commenced future trading in the year:
(a) 1999
(b) 2000
(c) 2001
(d) 2002
Answer:
(b) 2000

Question 5.
The settlement cycle in NSEI is :
(a) T + 5
(b) T + 3
(c) T + 2
(d) T + 1
Answer:
(c) T + 2

Question 6.
Liquidity is formed by :
(a) Organised market
(b) unorganized market
(c) Primary market
(d) Secondary market
Answer:
(c) Primary market

Question 7.
The headquarter of SEBI is :
(a) Delhi
(b) Mumbai
(c) kolkata
(d) Chennai
Answer:
(b) Mumbai

Question 8.
The foremost stock exchange was established in :
(a) Delhi
(b) London
(c) Tokyo
(d) New york
Answer:
(b) London

Question 9.
In India the main organ of unorganised market is :
(a) Desi banker
(b) Mahajan and Sahukar
(c) Both ‘(a)’ and ‘(b)’
(d) None of these.
Answer:
(c) Both ‘(a)’ and ‘(b)’

Question 10.
The axis of central bank is :
(a) Reserve bank
(b) Commercial bank
(c) Co-operative bank
(d) Desi bank.
Answer:
(a) Reserve bank

Question 11.
NSEI was established in :
(a) 1900
(b) 1991
(c) 1992
(d) 1994.
Answer:
(c) 1992

Question 12.
These are not securities of capital market:
(a) Equity share
(b) Preferential shares
(c) Debentures
(d) Commercial bill.
Answer:
(d) Commercial bill.

Question 13.
The first stock exchange of India was established in the year:
(a) 1857
(b) 1877
(c) 1887
(d) 1987.
Answer:
(c) 1887

Question 14.
Treasury bills are :
(a) Instrument of short term borrowings ‘
(b) Long term borrowings
(c) Both (a) and (b)
(d) None of these.
Answer:
(a) Instrument of short term borrowings

Question 15.
For stock exchange the servies of SEBI is :
(a) Volantary
(b) Essential
(c) Not essential
(d) Compulsory.
Answer:
(d) Compulsory.

Question 16.
In 2004 the number of stock exchange in India was :
(a) 25
(b) 21
(c) 23
(d) 24
Answer:
(d) 24

Question 17.
Only buying security takes place in :
(a) Stock exchange
(b) Primary market
(c) Capital market
(d) Money market.
Answer:
(b) Primary market

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Question 2.
Fill in the blanks:

  1. The paid up capital of NSEI is ……………..
  2. OTCEI maintains the liquidity in the securities of…………….. companies.
  3. OTCEI was established in ……………..
  4. NSEI was established in ……………..
  5. Stock exchange which provides nation wide investor base to small companies is ……………..

Answer:

  1. Rs. 3 crores
  2. Small
  3. 1990
  4. 1992
  5. OTCEI.

Question 3.
Write the answer in one word/sentence :

  1. Which market deals with long-term funds ?
  2. Where is the purchase and sale of securities take place ?
  3. In which market dealings of short-term funds take place ?
  4. Which organization is formed to protect and safeguard the interest of investors ?
  5. Write the name of one all India level stock exchange.
  6. Which instrument is issue at discount ?
  7. Which market is regulated and developed by SEBI ?
  8. Which capital market is related with new issues ?
  9. Which Stock Exchange is the greatest stock Exchange of the country ?
  10. What are the two parts of capital market ?

Answer:

  1. Capital market
  2. Stock exchange
  3. Money market
  4. SEBI
  5. NSEI
  6. Treasury bill
  7. Stock exchange
  8. Primary market
  9. Bombay Stock Exchange
  10. Primary, Secondary.

Question 4.
Write true or false :

  1. Sebi is established to protect and safeguard the interest of investors.
  2. In India there are 24 stock exchanges.
  3. Headquarter of SEBI is in Mumbai.
  4. Full form of SEBI is securities and exchange board of India.
  5. In stock exchange transaction of new securities take place.
  6. There is no control of SEBI on Mutual fund.
  7. Money market deals long-term funds.
  8. Money market is controlled by SEBI.
  9. For industrial development healthy capital market is must.
  10. There is difference between the primary market and secondary market.

Answer:

  1. True
  2. True
  3. True
  4. True
  5. True
  6. False
  7. False
  8. False
  9. True
  10. True

Question 5.
Match the columns :
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market 7

Finance Market Very Short Answer Type Questions

Question 1.
Define capital market.
Answer:
“An individual or private firm receiving deposits and dealing in hundies or lending money. Those who do not accept deposits were to be treated as money lenders.”

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Question 2.
Write the names of two parts capital market ?
Answer:
There are two parts of capital market:

  1. Capital market.
  2. Money market.

Question 3.
What do you mean by stock exchange ?
Answer:
A stock exchange is a place for the purchase and sale of its industrial and financial curities Shares, debentures, funds etc.) take place.

Question 4.
What is the full form of SEBI ?
Answer:
Full form of SEBI is : Securities and Exchange board of India.

Question 5.
Mfiatdo you mean by money market ?
Answer:
Money market refers to that market where transaction of lending and borrowing of short term funds take place.

Question 6.
What do you mean by Treasery bill ?
Answer:
A treasury bill is basically an instrument of short-term borrowing by the government of India maturing in less than one year.

Question 7.
Write the elements of money market.
Answer:

  1. Central bank.
  2. Commercial banks.
  3. Co-operative banks.
  4. Saving bank.
  5. Acceptance house.

Question 8.
Write two characteristics of Debentures.
Answer:
The characteristics of Debentures are :
(1) Debenture holder has the right to get interest.
(2) Debenture is merely a written instrument signed by the company under its common seal acknowledging the debt due by it to its holders.

Question 9.
Write three characteristics of capital market.
Answer:
The characteristics of capital market are :

  1. SEBI controls the capital market.
  2. In it, transactions in long-term funds take place.
  3. Capital market arranges capital in large scale.

Question 10.
What do you mean by secondary market ?
Answer:
Under secondary market capital is formed or received, from various sources. Generally it is called Stocks Exchange.

Question 11.
Whatis SEBI.
Answer:
SEBI was constituted by government of India in April 1988 as administrative body. It was aseparate body for orderly functioning of capital market.

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Question 12.
What do you mean by RAPO rate ?
Answer:
The rate at which reserve bank of India. Repurchase the government securities is  RAPO rate.

Question 13.
Write the name of index of NSE ?
Answer:
The name of index is called NIFTY.

Question 14.
“Blue Chip” shares are of which company ?
Answer:
Shares of a big prosperous company is called “Blue chip”.

Question 15.
In India how many stock exchanges are there ? Which is the oldest one ?
Answer:
There are total 24 stock exchanges in India. Mumbai stock exchange is the oldest one.

Question 16.
When preference shareholders can vote ?
Answer:
Preference shareholders generally don’t have the voting rights but the preference shareholders can use voting rights only in matters pertaining to their interest and not other matters.

Question 17.
What is debenture ?
Answer:
Money received as a loan is called ‘Borrowed capital’. The documents issued to the lender for money borrowed from him by the company is called debenture.
Debenture is merely a written instrument signed by the company under its common seal acknowledging in debt due by it to its holders.

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Question 18.
What do you mean by commercial bill ?
Answer:
Commercial bill is a bill of exchange used to finance the working capital requirements of business firms. It is a short term negotiable self liquidating instrument. Which is used to finance the credit sales of firms.

Question 19.
How is value determined in securities in share bazar ?
Answer:
Share market provides a platform for securities here forces of demand and supply work together. Thus value is fixed by securities.

Question 20.
What do you mean by Boli price ?
Answer:
The price which a customer is willing to play for securities is called Boli price.

Question 21.
Write the elements of capital market.
Answer:

  1. Development bank.
  2. Commercial banks
  3. Stock exchange.

Question 22.
Write the objectives of SEBI.
Answer:
The objectives of the establishment of SEBI are as follows :

  1. The main objective of SEBI is to provide security to the investors.
  2. To attract the savings of the people to the capital market.
  3. To keep an eye on activities of the brokers in order to control the capital market.
  4. To promote development of securities market.
  5. To provide efficient services to all the parties operating in the capital market.

Question 23.
What do you mean by Financial assets ?
Answer:
Debentures, Shares, Bills etc. are included into Financial assets.

Finance Market Short Answer Type Questions

Question 1.
Explain the importance of money market.
Answer:
Money market provides important functions and’ services which increases the importance of money market. The importance of money market are as follows :

1. Provides funds: Money market helps financial institutions, business enterprises to meet their short term funds requirement. This ensures smooth operations and functioning of business enterprises.

2. Use of surplus funds: If the capital of any enterprise remains unused that it will lead to business losses. Thus, through capital market the surplus funds are utilised time to time.

3. Helps in financial mobility : By sending the securities from one area to another and by investing money market helps in financial mobility. For the industrial and economical development of a nation financial mobility is essential.

4. Equilibrium between demand and supply : Necessary steps and initiatives are taken by money market time to time for maintaining equilibrium between demand and supply.

5. Economy in the use of cash : The use of cash is properly performed through money market. The procedure of this market is not complex that’s why unnecessary expenses are not incurred for the use of cash funds.

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Question 2.
Write the types of capital market.
Answer:
Capital market is two types :

1. Organized capital market: In organised capital market there remain banks and different financial institutions in Indian capital market, Reserve Bank of India, State Bank of India, different nationalized banks, financial institutions, post office, savings bank, stock exchange etc. are included.

2. Unorganized capital market: In an unorganized capital market, indigenous bankers, merchants, personal investment, institutions as chit funds etc. are included.

Question 3.
What do you mean by Treasury bill ?
Answer:
Treasury Bill: A Treasury bill is basically an instrument  on mg by the Government of India maturing in less than one year. They are also known as Zero Coupon Bonds issued by the Reserve Bank of India on behalf of the Central Government to meet its short-term requirement of funds. Treasury bills are issued in the form of a promissory note. They are highly liquid and have assured yield and negligible risk of default. They are issued at a price which is lower than their face value and repaid at par.

The difference between the price at which the treasury bills are issued and their redemption value is the interest receivable on them and is called discount. Treasury bills are available for a minimum amount of Rs 25,000 and in multiples therefore. Example: Suppose an investor purchases a 91 days Treasury bill with a face value of Rs. 1,00,000 for Rs. 96,000. By holding the bill until the maturity date, the investor receives Rs. 1,00,000. The difference of Rs. 4,000 between the proceeds received at maturity and the amount paid to purchase the bill represents the interest received by him.

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Question 4.
What do you mean by RAPO and Reverse RAPO Rate.
Answer:
RAPO Rate : RAPO rate is that rate at which RBI gives loans to bank for a particular period of time. A bank repurchase go  securities and is exchange receives wealth. Due to discount in RAPO rate the bank gets money at low rate whereas due to increase in RAPO rate the loan from RBI becomes expensive. If it makes loan cheper to bank it reduces the RAPO rate.
Reverse RAPO rate : It is a rate of transaction of short term loan, at which Reserve Bank of India takes loan from commercial bank within our country.

Question 5.
What do you mean by CD ? or certificate of deposit ?
Answer:
Certificate of deposit: Certificates of deposit (CD) are unsecured, negotiable, short-term instruments in bearer form, issued by commercial banks and development financial institutions. They can be issued to individuals, corporations and companies during periods of tight liquidity when the deposit growth of banks is slow but the demand for credit is high. They help to mobilize a large amount of money for short periods.

Question 6.
Differentiate between NSEI and OTCEI.
Answer:
Differences between NSEI and OTCEI:
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market 1

Question 7.
What is the difference between Primary and Secondary Market.
Answer:
Differences between Primary and Secondary Market:
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market 2

Question 8.
How many stock exchanges are there in India ?
Answer:

Recognized Stock Exchange in India :

  1. The Stock Exchange—Bombay (Mumbai)
  2. The Stock Exchange—Ahmedabad
  3. Madras Exchange Ltd.—Madras (Chennai)
  4. The Calcutta Stock Exchange Association Ltd.—Calcutta (Kolkata)
  5. The Delhi Stock Exchange Association Ltd.—New Delhi
  6. The Madhya Pradesh Stock Exchange—Indore
  7. The Hyderabad Stock Exchange Ltd.—Hyderabad
  8. Bangalore Stock Exchange Ltd.—Bangalore
  9. U.P. Stock Exchange Association—Kanpur
  10. Cochin Stock Exchange Ltd.—Cochin
  11. Pune Stock Exchange Ltd.—Pune
  12. The Ludhiana Stock Exchange Ltd.—Ludhiana
  13. Mangalore Stock Exchange Ltd.—Mangalore
  14. The Magadh Stock Exchange Ltd.—Patna (Bihar)
  15. Jaipur Stock Exchange Ltd.—Jaipur (Rajasthan)
  16. The Gohati Stock Exchange Ltd.—Gohati
  17. The Vadodara Stock Exchange Ltd.—Vadodara
  18. Saurashtra Stock Exchange—Rajkot (Gujarat)
  19. Bhubane ishwar Stock Exchange Association Ltd.—Bhubaneshwar
  20. Thiruva nanthapuram Stock Exchange Ltd.—Kerala.

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Question 9.
What do you mean by NSEI ? What are its objectives ?
Answer:
The I National Stock Exchange of India (N.S.E.I.) was established in the form of a public limit’ »d company in 30th November 1992 with a paid up capital of Rs. 25 crore. On its recognition as a stock exchange under the securities contracts act 1956 in April 1993 NSEI comment Jed operations in the wholesale debt market segment in June 1994. The capital market segrpent commenced operations in November 1994 and operations in derivatives segment commenced in June 2000.

It is an e exchange where business is carried on in the securities of the medium and large sized compar lies and the government securities. On the basis of the transactions of securities done on NSJ 31, it can be divided into two parts :

(i)Whole sale debt market

(ii) Capital market segment.
NSE i has removed the short comings of traditional share markets. It has attempted to provide be  facilities to investors.

Objectives of NSEI: NSEI is established for the following objectives :

  1. To reduce the transaction costs.
  2. To promote trading facilities for equities and debt instrument throughout the nation
  3. To reform Indian securities market in terms of market practices.
  4. To establish a stock exchange of international level.
  5. It aims at the settlement of securities, deals within short period through easy and quick process.
  6. To set up the agenda for useful and effective change in the securities market.

Question 10.
Write the importance of capital market ?
Answer:
The various characteristics of market

  1. Here transactions in long-term funds take place.
  2. In capital market, shares, debentures and securities are bought and sold.
  3. Capital market is emerging and well-organized.
  4. Capital market consists of different institutions having their own interest and limits dons.
  5. It is a Barometer of national growth and dynamic economy.

Question 11.
Write the importance of capital market ?
Answer:
Following are the importance of capital market:

  1. Capital market assist in national capital formation and development.
  2. Capital market plays important role in capital investors and money savers.
  3. Capital market provides liquidity to investors to invest securities.
  4. A number of financial intermediaries work in capital market such as banks, merchants exchanges etc.
  5. Capital market helps to generate savings in the country channelizing the same into small investments in different fields.
  6. It helps in the mobilization of capital.
  7. The goods- are found in market in the same way long term, medium term and short term loans can be found in capital market.
  8. It creates saving tendency among the public.
  9. The head of capital market is the Reserve Bank of India which is the Banker’s bank, it helps in controlling the credit.
  10. Capital market helps in the agricultural, industrial and commercial development of the nation.
  11. In various areas of business organisation capital is needed and it is fulfilled through capital market.
  12. Interest rates remain same due to organised capital market.
  13. Directors and managers of company also give loans when need
  14. Capital market fulfills the need of capital.

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Question 12.
Discuss some characteristics of primary market.
Answer:
The features/characteristics are :

  1. New securities : It deals with new securities only.
  2. Direct issue: Securities can be issued directly by issues on through intermediaries.
  3. Direct promotion of capital market: It promotes capital formatic m by use this funds is investment in plants machinery etc.
  4. Price determination : Prices of securities, generally, are determined by the management of the respective company.
  5. Place : There is no fixed place for primary market.

Question 13.

Explain the functions of Share Market or Stock Exchange.
Answer:
The functions of stock exchange are as follows :

1. Establishing fixed market: Stock exchange establishes a fixed place or market for securities because for the purchase and sale of securities a fixed market is necessary which is provided by stock exchanges.

2. Liquidity of capital : Stock exchange is completely a capital market. Different types of securities are purchased and sold here. That’s why an owner of securities can re convert this investment into cash. In this way stock exchange enhances the liquidity of cap

3. Evaluation: Stock exchange is totally a market of shares. Here there are experts to evaluate the shares and other securities. Correct evaluation of all the secretes are do  by the experts is possible through stock exchanges. Thus investors can safely invest with the help of stock exchanges.

4. Helps in capital formation for new companies : All the new companies need capital, which is difficult for these new companies to form. Thus, through stock exchange it becomes easy to form capital for such type of new firms.

5. Provides business information : Stock exchanges provide necessary information on about securities and capital market to all its members. These information are very useful ft or the member in knowing the general business trends.

6. Contribution to economic growth: Stock exchange encourage the people to their money is securities. This money is invested in industries which helps in the economic development of the nation. Stock exchange acts as a barometer of nation’s economic development and progress.

7. Protection of securities: Various types of securities are transacted in stock exchange. Every transaction takes place under securities contracts (Regulation) Act 1956. The interests of the investors are fully protected. The members of the stock exchange must follows the rules and regulation of stock exchange.

8. Publication : Stock exchange publishes different types of information useful in business. It publishes information in magazines, daily news papers, directories etc. related with stock exchange to common people.

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Question 14.
Explain the concepts of primary and secondary markets.
Answer:

1. Primary market : The place from where the public directly receives the capital first time as called primary market. Though this system the company issues new shares and debentures to public and forms capital. The ownership is transferred from company to the buyer. There is no fixed location of primary market. During the establishment of company the shares are issued and capital.is formed which is called primary capital. The capital which is received first time from the public through any medium is called primary capital

2. Secondary market: Under secondary market capital is formed or received from various sources and again it is invested this process is called secondary market. Generally it is known as stocks exchange where shares, securities etc. are bought and sold. Secondary market is located at a specified place. The secondary market creates a cluster of shares and stock brokers, underwriters and other well versed in financial matters.

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Question 15.
What services are provided by SEBI investors ?
Answer:
The following services are provided by SEBI to its investors :

1. Liquidity of Investment: A stock exchange ensures liquidity of investment by ready marketability of securities. Investors can avail of services of expert professionals who operate on the stock exchange.

2. Collateral Security : As the securities dealt in stock exchanges are negotiable they can be pledged as ‘collateral security’ for raising loans.

3. Safe and Fair Dealings : A stock exchange ensures safe and fair dealings in securities. It makes scrutiny before listing.

4. Educate the Public : Wide publicity of working of a stock exchange helps to educate the public. Investors are able to find out the market value of their investment. They can make a rational choice among various securities. Some stock exchanges publish data and reports. They serve as clearing house of business information and provide advice and guidance to investors.

5. Quick Disposal: Facility for quick disposal of securities at the stock exchanges helps to minimize the risk of investment in securities. It becomes possibility to diversify investments and risks.

Question 16.
What are its trading process of NSEI ?
Answer:

1. Placing the order : In this the seller or purchaser gives information about securities like name of company, price, number, time etc.

2. Conveying the message to computer : The terminal operator after receiving the order feeds it in the computer. NSEI established in all parts of our country continuous feeds the orders in computer.

3. Starting of matching process : As soon as the computer receives messages or orders, it starts the matching process. While matching orders, the best matching order is sought to be found.

4. Accepting orders : After selecting the best matching of buying and selling orders, its list is obtained on computer screen immediately. It tells us at what rate, time and to whom order has been transacted.

5. Delivery and Payment: The delivery and payment are made according to the rules of NSEI after the transaction has been settled.

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Question 17
What do you mean by OTCEI ? What are its objectives ?
Answer:
The OTCEI was established under section 25 of the companies act 1956 in October 1990. Industrial Credit and Investment Corporation of India (ICICI), Unit Trust of India (UTI), Industrial Development Bank of India (IDBI), Industrial Finance Corporation of India (IFCI), General Insurance Corporation of India (GIC), Life Insurance Corporation of India (LIC), SBI capital market limited and Canbank financial services limited are the promoters of OTCEI, The need of OTCEI was felt due to the existance of large number of new and small companies which remain unnoticed and consequently their shares remain largely untraded. The OTCEI is a completely computerised in which buying and selling of securities is absolutely transparent.
Control: The functions and activities of OTCEI is under the supervision of government of India and SEBI.
Objectives : The objects of the establishment of the OTCEI are as follows :

  1. To maintain the liquidity in the securities of small companies.
  2. To provide speedy solution to the problems of investors.
  3. To maintain the transparency of transactions.
  4. To bring the stock exchange within the reach of an ordinary man.
  5. To provide facilities for listing of small companies.

Question 18.
Write the special features of secondary market.
Answer:
Following are the characteristics of secondary market:

1. It creates liquidity: It creates liquidity in securities. By liquidity we mean changing of securities in cash very soon. This work is done by secondary market.

2. It comes after primary market: Under secondary market public do not get the capital first time, under secondary market capital is formed or received from various sources and again it is invested this securities are first sold in primary market and then in secondary market.

3. It has a particular place : Secondary market is located at a particular place which is called an exchanges. It is not compulsory that selling and buying of shares should be done through exchange also. Two persons can do it directly.

4. It encourages new investments : In share market the rates of shares goes on changing. To take advantage of this situation new investors enters this market which encourages industrial sectors.

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Question 19.
What is meant by money market ? Discuss its characteristics.
Answer:
Money market refers to that market where transaction of lending and borrowing of short term funds take place. It is divided into two sectors i.e., organised market and unorganised market. Organised market consists of Reserve Bank of India on the other hand unorganised market consist of indigenous bankers and money lender.
The characteristics of money market:

  1. Dealing in short term fund: Money market provides short term funds for use. By short term use means four period up to one year.
  2. Meeting short term financial needs : Money market focuses on meeting the short term financial requirement.
  3. Safety : The securities of money market and normally safe. They have minimum risk of default due to shorter term and financial soundness of the issuers.
  4. High liquidity: These are highly liquid because they can be changed into cash very easily.
  5. Types of Securities : Treasury bills, certificates of deposits, commercial bills etc. are issued for raising capitals.
  6. Control: Reserve Bank of India controls this type of market.

Question 20.
Write the characteristics of Treasury Bill.
Answer:
Following are the characteristics of Treasury Bill :

(1) Treasury bill is basically an instrument of short term borrowing by the government of India maturing in less than one year.

(2) They are also known as zero coupon bonds issued by Reserve Bank of India. On behalf of the central government to meet its short-term requirement of funds.

(3) Treasury bills are issued in the form of promissory note. They are highly liquid and have assured yield and negligible risk of default.

(4) They are issued at a price which is lower than their face value and rapid at par. The difference between the price at which the treasury bills are issued and their redemption value is the interest receivable on them and is called discount.

Question 21.
Write the features of call money.
Answer:
Following are the features of call money :

(1) Call money is short term finance repayable on demand, with a maturity period of
one day to fifteen days, used for inter-bank transactions. .

(2) Commercial banks have to maintain a minimum cash balance known as cash reserve ratio.

(3) The Reserve Bank of India changes the cash reserves ratio from time to time which in turn affects the amount of funds available to be given as loans by commercial bank.

(4) Call money is a method by which banks borrow from each other to maintain the cash reserve ratio. The interest rate paid on call money loans is known as the call rate. It is a highly volatile rate that varies from day to day and sometimes even hour to hour.

(5) There is an inverse relationship between call rates and other short term money market instruments such as certificates of deposits and other commercial papers.

Question 22.
Describe the function of Securities and Exchange Board of India (SEBI).
Answer:
The functions of SEBI are as follows :

  1. To protect the interests of investors in the security market and to properly develops the security market.
  2. 10 regulate the business being done in the security market. .
  3. To check the function of stock brokers, share transfer agents, trustees, sub-brokers etc. and register them.
  4. To register and regulate investment schemes like mutual food.
  5. To carry on research work related with security market.
  6. To restrict and prohibit unfair and fraudster of trade practices related with security market.
  7. To promote and control self regulatory organization.
  8. To provide education to the investors related with securities.
  9. To check insiders trading in securities.

Finance Market Long Answer Type Questions

Question 1.
Discuss the importance of financial management.
Or
“Finance is the life-blood of business.” Explain in any five points.
Answer:

1. Basis of success of enterprise : Irrespective of the size of organization, financial management paves the way for success of any enterprise, as proper management of funds is assured

2. Increases efficiency: Financial management ensures smooth running of enterprise, as it is essential in every stage of business. Finance is not only essential for promotion but marketing and winding-up.

3. Essential for determination of capital sources : Financial management helps identify proper sources of capital and raise appropriate funds required. Hence, it is very essential.

4. Determination of capital structure: Capital structure refers to the combination of various sources, or the ‘mixes’ of various sources of capital. It is the composition of various sources. Financial management helps in deciding the appropriate capital structure.

5. Best utilization of available funds: Financial management ensures best utilization of existing funds. Financial management consists of estimation of capital, raising of capital and use of it in a judicious way. Hence, the available funds are used in the best possible way.

6. Importance to the Shareholders and Investors : Shareholders and other investors always expect the safety of their money. They invest their small savings in shares and other investment channels and they should be informed of the rate of return they will get on their investments. This is possible through financial management only. In the absence proper knowledge about the return on their investments, the investors may suffer loss at the hands of brokers or middlemen.

7. Importance to the Financial Institutes : The fundamental function of financial institutes is finance only. Therefore, these institutes should possess the required knowledge about financial management so that there is a proper balance between the safety of their money (capital) and its liquidity.

8. Importance to the Employees : Finance management leads to growth of an enterprise and it earns more profit. With growth in profit of the enterprise, the employees will be benefited. Therefore, financial management has both direct and indirect importance for the employees.

9. National Importance : Every developed or developing nation must possess the knowledge of proper financial management. This is the reason why a person having financial expertise is chosen as the finance ministry of the country. The importance of financial management becomes even more important in countries like India which have shortage of finance.

10. Importance to other Persons : Knowledge of financial management is also important for other persons like economists, mercantile experts, brokers, middlemen, politicians because every person in a society has to deal with finance. A person may hurt his financial planning in the absence of knowledge of financial management. Therefore, knowledge of financial management is necessary for every member of the society.

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Questions 2.
Write the importance of personnel management.
Answer:
The importance of personnel management can be stated as follows :

1. To achieve targets: Targets of an enterprise can be achieved only if the personnel working in any enterprise are fully satisfied. This is possible if there exists a department to look after the requirements and pacify the grievances of personnel.

2. To face competition : In today’s cut throat competition, it is very hard to be ‘the best’. Mentally satisfied and physically strong personnel ensures that the targets are achieved on time and this work is done by personnel management.

3. Overall personality development: Under the guidance of personnel management, the employees live together and work with full cooperation and under proper discipline. It results in the overall development of the employees.

4. Universal need: For proper development of an enterprise and its success, a personnel management is essential. It is also essential for industries, profession, etc.

5. Increase in efficiency of employees: Proper training, good working environment, appraisals, rewards, etc. done by personnel management increases the efficiency of employees which ultimately helps the organization to achieve its predetermined objects.

Question 3.
Discuss the factors determine working capital requirements of a business enterprises.
Answer:
The capital invested in current assets such as stock of material and finished goods, bills receivable, short-term securities and cash at hand and cash at bank. The two senses of working capital are “Gross Working Capital” and “Net Working Capital”.
The factors which govern the amounts of working capital in a business are :

1. Nature of Business : Public utilities and service organizations require little working capital as sales are on cash basis. There is little time gap between production and sales and these enterprises do not maintain large stock of goods. In trading and manufacturing concerns, on the other hand large amount of working capital is needed to maintain stocks.

2. Size of the Business : The volume of business has a direct influence on working capital requirements. Large firms require greater working capital for investment in current assets and to pay current liabilities.

3. Production Cycle : The length or duration or production process also affects working capital requirement. Where production takes longer time, More working capital is required because more funds are needed for raw material, labour and other expenses. On the other hand, smaller production cycle need less working capital.

4. Turnover of Working Capital: Turnover implies the speed with which the working capital circulates in business. The rate of turnover of working capital is measured by the ratio of sales to current assets. More rapid is the flow of working capital, lesser is the need for working capital.

Question 4.
What is the meaning of financial management ? Give one definition of it. Write the main objectives of it.
Answer:
Meaning : Financial management is a functional activity of business management and it is a part of management. Financial management is responsible for the financial activities of a business. This is a group which deals with the finance, decision-making and formulating policies for the finance related activities of an enterprise. Financial management represents the wider interests of an enterprise and in this sense it is a watchdog of the enterprise. Financial management maintains coordination between sources of finance and their uses so that optimum utilization of the available finance could be made. Financial management includes cash flow, budget, credit, profit and loss, income etc.
Definitions : Different experts have defined financial management as under:

1. E.F.L. Breach says, “Financial management is that aspect of management which makes optimum and effective utilization of financial resources.”
According to a narrow view, the immediate objectives of financial management are to arrange for a suitable system for the organization’s liquidity, and profitability. But in a wider perspective, the objectives of financial management are to arrange for maximum financial facilities for the enterprise so that owners of the enterprise get the maximum benefit. Thus, main objectives of financial management have been proposed as under :

I. Profit Maximization : Traditionally, business is considered to be a profit-earning entity and profit has been considered to be the basis of measuring the efficiency and standard of an enterprise. Therefore, the primary objective every business is to earn the maximum profit. No limit has been demarcated as to what is ‘maximum profit’. Therefore, the following points should be kept in mind :

  1. Profit should be rational and justified;
  2. Social welfare should be kept in mind while earning profit;
  3. There should be a standard or decisive policy for earning profit;
  4. The profit earned should be used for social welfare also;
  5. Higher profit is a motivating factor for better business.

II. Maximization of wealth : It is a novel concept that value of wealth be maximized instead of maximizing profit. This will ensure growth of the business thereby benefiting the shareholders, managers, employees etc. With the increase in the value of the wealth of an enterprise, it will enjoy goodwill and will be stronger. Therefore, the objective of financial management should be to maximize the value of wealth.

III. Mobilizing adequate finance at minimum cost: The main objective of financial management is to arrange finance at minimum cost for the business because if cost increases than profit margin will reduce in business.

IV. Maximum rate of return : The objective of financial management is to get maxi¬mum returns on the invested capital so that shareholders can get maximum dividend and more interest can be given on debentures and apart from that various allowances can be given to employees.

Question 5.
What are the steps involves in trading procedure ?
Answer:
The Trading procedure involves the following steps :

1. Selection of a broker : The buying and selling of securities can only be done through SEBI registered brokers who are members of the Stock Exchange. The broker can be an individual, partnership firms or corporate bodies. So the first step is to select a broker who will buy/sell securities on behalf of the investor or speculator.

2. Opening D’mat Account with Depository : D’ mat (Dermaterialized) account refer to an account which an Indian citizen must open with the depository participant (banks or stock brokers) to trade in listed securities in electronic form. Second step in trading procedure is to open a D’mat account.

The securities are held in the electronic form by a depository. Depository is an institution or an organization which holds securities (e.g., Shares, Debentures, Bonds, Mutual Funds etc.). At present in India there are two depositories : NSDL (National securities Depository Ltd.) and CDSL (Central Depository Services Ltd.). There is no direct contact between depository and investor. Depository interacts with investors through depository participants only.
Depository participant will maintain securities account balances of investor and intimate investor about the status of their holdings from time to time.

3. Placing the Order : After opening the D’mat Account, the investor can place the order. The order can be placed to the broker either (DP) personally or through phone, email, etc. Investor must place the order very clearly specifying the range of price at which securities can be bought or sold, e.g., “Buy 100 equity shares of Reliance for not more than Rs 500 per share.

4. Executing the Order : As per the Instructions of the investor, the broker executes the order, i.e., he buys or sells the securities. Broker prepares a contract note for the order executed. The contract note contains the name and the price of securities, name of parties and brokerage (commission) charged by him. Contract note is signed by the broker.

5. Settlement: This means actual transfer of securities. This is the last stage in the trading of securities done by the broker on behalf of their clients. There can be two types of settlement.

(a) On the spot settlement : It means settlement is done immediately and on spot settlement follows. T + 2 rolling settlement’ This means any trade taking place on Monday gets settled by Wednesday :

(b) Forward settlement: It means settlement will take place on some future date. It can be T 5 or T + 7 etc. All trading in stock exchanges takes place between 9-55 am. and 3-30 pm. Monday to Friday.

Question 6.
Explain the various documents or instruments of money market.
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market 3

1. Treasury BUI: Treasury Bill: A Treasury bill is basically an instrument  on mg by the Government of India maturing in less than one year. They are also known as Zero Coupon Bonds issued by the Reserve Bank of India on behalf of the Central Government to meet its short-term requirement of funds. Treasury bills are issued in the form of a promissory note. They are highly liquid and have assured yield and negligible risk of default. They are issued at a price which is lower than their face value and repaid at par. The difference between the price at which the treasury bills are issued and their redemption value is the interest receivable on them and is called discount.

Treasury bills are available for a minimum amount of Rs 25,000 and in multiples therefore. Example: Suppose an investor purchases a 91 days Treasury bill with a face value of Rs. 1,00,000 for Rs. 96,000. By holding the bill until the maturity date, the investor receives Rs. 1,00,000. The difference of Rs. 4,000 between the proceeds received at maturity and the amount paid to purchase the bill represents the interest received by him. ,

2. Commercial paper: Commercial paper is a short-term unsecured promissory note, negotiable and transferable by endorsement and delivery with a fixed maturity period. It is issued by large and creditworthy companies to raise short-term funds at lower rates of interest than market rates. It usually has a maturity period of 15 days to one year. The issuance of commercial paper is an alternative to bank borrowing for large companies that are generally considered to be financially strong. It is sold at a discount and redeemed at par. The original purpose of commercial paper was to provide short-terms funds for seasonal and working capital needs.

For example, companies use this instrument for purposes such as bridge financing. Example : Suppose a company needs long-term finance to buy some machinery. In order to raise the long term funds in the capital market the company will have to incur flotation costs (costs associated with floating of an issue are brokerage, commission, printing of applications and advertising etc.). Funds raised through commercial paper are used to meet the flotation costs. This is known as Bridge Financing.

3. Call money : Call money is short term finance repayable on demand, with a maturity period of one day to fifteen days, used for inter-bank transactions. Commercial banks have to maintain a minimum cash balance known as cash reserve ratio. The Reserve Bank of India changes the cash reserve ratio from time to time which in turn affects the amount of funds available to be given as loans by commercial banks. Call money is a method by which banks borrow from each other to be able to maintain the cash reserve ratio. The interest rate paid on call money loans is known as the call rate. It is a highly volatile rate that varies from day-to-day and sometimes even from hour-to-hour.

There is an inverse relationship between call rates and other short-term money market instruments such as certificates of deposit and commercial paper. A rise in call money rates makes other sources of finance such as commercial paper and certificates of deposit cheaper in comparison for banks raise funds from these sources.

4. Certificate of deposit:Certificate of deposit: Certificates of deposit (CD) are unsecured, negotiable, short-term instruments in bearer form, issued by commercial banks and development financial institutions. They can be issued to individuals, corporations and companies during periods of tight liquidity when the deposit growth of banks is slow but the demand for credit is high. They help to mobilize a large amount of money for short periods.

5. Commercial bill : A commercial bill is a bill of exchange used to finance the working capital requirements of business firms. It is a short-term, negotiable, self-liquidating instrument-which is used to finance the credit sales of firms. When goods are sold on credit, the buyer becomes liable to make payment on a specific date in future. The seller could wait till the specified date or make use of a bill of exchange. The seller (drawer) of the goods draws the bill and the buyer (drawer) accepts it.

On being accepted, the bill becomes a marketable instrument and is called a trade bill. These bills can be discounted with a bank if the seller needs funds before the bill matures. When a trade bill is accepted by a commercial bank, it is known as a commercial bill.

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Question 7.
Write the objectives and functions of SEBI.
Answer:
Objectives : The objectives of the establishment of SEBI are as follows:

  1. The main objective of SEBI is to provide security to the investors.
  2. To attract the savings of the people to the capital market.
  3. To keep an eye on activities of the brokers in order to control the capital market.
  4. To promote development of securities market.
  5. To provide efficient services to all the parties operating in the capital market.

Functions of SEBI: The functions of SEBI are as follows :

  1. To protect the interests of investors in the security market and to properly develops the security market.
  2. To regulate the business being done in the security market.
  3. To check the function of stock brokers, share transfer agents, trustees, sub-brokers etc. and register them.
  4. To register and regulate investment schemes like mutual food.
  5. To carry on research work related with security market.
  6. To restrict and prohibit unfair and fraudster of trade practises related with security market.
  7. To promote and control self regulatory organization.
  8. To provide education to the investors related with securities.
  9. To check insiders trading in securities.

Question 8.
Differentiate between money market and capital market.
Answer;
Differences between Money Market and Capital Market:

MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market 4

Question 9.
What are the factors affecting fixed capital ?
Answer:
The various factors affecting fixed capital are :

1. Nature of industry : Fixed capital requirement largely depends on the nature of industry. When there is a need of land, building, machinery etc. in industry, the need of capital increases.

2. Nature of production : The requirement of fixed capital also depends on the nature of production, whether it is capital based or labour based.

3. Scope of business : If business is only a buyer or only a seller the capital requirement is less and if it is both the capital needed is comparatively more.

4. Expansion of business : If business is to be expanded in future then fixed capital is required in great sum. Due to modem machines and management the expenses increases. So capital requirement increases.

5. Preliminary expenses : The need of fixed capital will increase if the promoters at the time of establishment of company speed more on salary of promoters, establishment expenses, purchase of patent etc.

6. Attitude of management: If the manger wants to enter in the market as a major producer from. The very beginning than more fixed capital will be needed.

Question 10.
Describe the establishment, objects and advantages of Unit Trust of
India (UTI)
Answer:
Unit Trust of India (UTI):
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 10 Finance Market 5

The basic idea underlying the creation of the unit trust, as with similar trusts in other [ countries is to afford the small savers, a means of acquiring a share in the widening prosperity
based on steady industrial growth of the country through providing facilities for investment j which combines the benefit of wide diversification, a reasonable return and expert services I of management talent. The trust commenced its operations with affect from July, 1964.
Objectives of UTI

(i) It mobilizes savings of the community and channelizes them into productive investment. By promising savers triple benefits of safety, liquidity and profitability of investments, the trust encourages individual savings.

(ii) It gives everyone a chance to indirectly own shares and debentures in a large number of select companies and thus enables the investor to share in the widening prosperity of industrial growth.

Management

The trust is managed by a board of trustees consisting of 11 persons including some of the distinguished men in finance and business. The chairman of the board is appointed by the central Govt, in consultation with IDBI. The executive trustee and four other members : are appointed by IDBI. The remaining members are appointed by Reserve bank of India,Life Insurance Corporation and Commercial Banks.

Performance of Unit Trust in the Field of Investment of Funds

Investment of funds constitutes another aspect of operations of UTI. During the past 33 years of its life, the trust has been able to build up sizeable funds. As on 30th June, 1984 aggregating Rs. 1261-33 crores is collected. During the year 1983-84, the investable funds recorded funds recorded a marked rise of Rs. 391 -09 crore.

The cardinal feature of the trust’s investment activity has been to build a balanced flexible investment portfolio composed of corporate securities, Govt, securities and other investments representing fixed deposits with companies, advance deposits for shares and debentures, bridging finance, application money and money at call and short notice so as to ensure reasonable return with safety of capital and capital appreciation.

Units are gaining popularity because they are highly liquid in the sense that an investor can sell them whenever he wants.
Uses of resource : The fund of UTI has been invested in so many ways.
The percentage of investment is as follows :

  1. On shares and debentures of companies 55%
  2. On fixed deposits and other deposits in the bank 45%

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Question 11
What is the functions of finance management ?
Answer:
Finance is required in every field like business, industry, commerce, professional service etc. All persons working in these fields need knowledge of financial management. In each field, the person who manages and plans the financial resources is called the finance manager. A finance manager performs the following functions :

(A) Administrative Functions : All these functions relate to decision-making and the finance manager has to perform all these functions as the general functions. These are :

  1. To make prior financial estimates;
  2. To make financial planning;
  3. To organize the financial activities;
  4. To maintain coordination between different departments.

(B) Executive Functions: “The finance manager performs certain executive functions which are as under:

1. Arrange/Organize Finance: A finance manager has to find and arrange the various sources of finance required for the enterprise sd that, on the basis of the finance available, the operations of the enterprise may be carried on.

2. Allotment of Available Funds : The funds available with the finance manager are meant for requirements of the entire enterprise. Therefore, it is the responsibility of the finance manager to allot funds as and where needed in the enterprise.

3. Management of Assets : Under these are covered activities like purchase of current and fixed assets, arrangements for their safety, maintenance etc. Which are carried on under the instructions of the finance manager. The finance manager has also to consider, before allotting funds, the use and justification for the funds in different departments.

4. To Organize Expenditure : The finance manager should prepare budget estimates for expenditure required in the entire enterprise and invest the same in a planned manner. For this, the finance manager has to consider the expenditure on pay, interest, taxes, development activities etc.

5. Profit Planning : The finance manager makes proper planning for increasing the profits. He takes necessary steps to increase the profitability e.g., to fix proper prices, to control the costs, to control the expenditure, to exercise control on unproductive expenditure.

6. To Submit Reports: The finance managers submits various a few important reports from time to time which include report on availability of funds, monthly income and expenditure statement, position of balance of cash, a note indicating the financial position of the enterprise etc.

7. To Maintain Records : The finance manage has to prepare records of the various documents relating to finance and preserve them so that they may be used for future planning.

MP Board Class 12 Business Studies Important Questions

MP Board Class 12th Accountancy Important Questions Chapter 4 Reconstitution of Partnership Firm: Retirement / Death of a Partner

MP Board Class 12th Accountancy Important Questions Chapter 4 Reconstitution of Partnership Firm: Retirement / Death of a Partner

Reconstitution of Partnership Firm: Retirement / Death of a Partner Important Questions

Reconstitution of Partnership Firm: Retirement / Death of a Partner Objective Type Questions

Question 1.
Choose the correct answer:

Question 1.
Abhishek, Rajat and Vivek share profit and loss in the ratio 5 : 3 : 2. If Vivek retires from the firm, new profit sharing ratio between Abhishek and Rajat will be:
(a) 3 : 2
(b) 5 : 3
(c) 5 : 2
(d) None of these.
Answer:
(b) 5 : 3

Question 2.
Rajendra, Satish and Tejpal share profit and loss in the ratio 2:2:1. After Satish’s retirement, new profit sharing ratio between Rajendra and Tejpal is 3:2, then their gaining ratio will be:
(a) 3 :.2
(b) 2 : 1
(c) 1 : 1
(d) 2:2.
Answer:
(c) 1 : 1

Question 3.
Anand, Bahadur and Chander share profits equally. After Chander’s retirement Anand and Bahadur acquire chander’s share in the ratio 3 : 2. New ratio of Anand and Bahadur will be:
(a) 8 : 7
(b) 4: 5
(c) 3 : 2
(d) 2 : 3.
Answer:
(b) 4: 5

Question 4.
In the absence of any provision, the remaining partners acquire the share of retiring / deceased partner in:
(a) Old profit Sharing ratio
(b) New profit sharing ratio
(c) Equally
(d) None of these..
Answer:
(a) Old profit Sharing ratio

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Question 5.
On retirement / death of any partner, his capital A/c will be credited with :
(a) His share of Goodwill
(b) Firm’s Share of Goodwill
(c) Remaining partner’s share of Goodwill
(d) None of these.
Answer:
(a) His share of Goodwill

Question 6.
Govind, Hari and Pratap are partners. On retirement of Govind, Goodwill account appears in the books of the firm worth Rs. 24,000. Goodwill will be writen off by:
(a) Crediting all partner’s capital account in old ratio
(b) Crediting remaining partner’s capital account in new ratio
(c) Crediting retiring partner’s capital account with his share
(d) None of these.
Answer:
(a) Crediting all partner’s capital account in old ratio

Question 7.
On retirement of a Partner, share of other partner:
(a) Increase
(b) Decrease
(c) Increase or decrease both
(d) None of these.
Answer:
(a) Increase

Question 8.
Share of retiring partner includes :
(a) Goodwill and Share in profit
(b) Capital, Goodwill and Salary
(c) Capital, Goodwill and Share of profit
(d) Capital, Goodwill, Salary, Share in profit and Revaluation profit.
Answer:
(d) Capital, Goodwill, Salary, Share in profit and Revaluation profit.

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Question 9.
Which account is opened to give share of Assets and Liabilities of the firm to the retiring partner:
(a) Revaluation A/c
(b) Realization A/c
(c) Profit and Loss A/c
(d) Profit and Loss Adjustment A/c.
Answer:
(a) Revaluation A/c

Question 10.
If a partner leaves the firm, then profit is divided among remaining partners in the ratio of:
(a) Equally
(b) Gain
(c) No change.
(d) None of these.
Answer:
(b) Gain

Question 11.
When old ratio is deducted from new ratio it is called :
(a) Sacrificing ratio
(b) Equal ratio
(c) Gaining ratio
(d) None of these.
Answer:
(c) Gaining ratio

Question 12.
After the retirement of partner the profit and loss of revaluation is distributed to:
(a) Remaining partners
(b) Retired partner
(c) All partners
(d) None of these.
Answer:
(a) Remaining partners

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Question 13.
If the amount is not paid to the representative of deceased partner then what % per annum is to be given as interest: (MP 2017)
(a) 10%
(b) 5%
(c) 6%
(d) None of these.
Answer:
(c) 6%

Question 2.
Fill in the blanks:

  1. By gaining ratio there is an ……………. in the ratio of remaining partners. (MP 2010)
  2. When retired partner is paid the amount payable in annual installments, then the ac-count maintained is ……………
  3. In ………….. a partner can leave the firm by giving a written intimation.
  4. On the death of partner claim amount is given to ………………
  5. Life insurance reserve fund is transferred to ……………. capital account. (MP 2011)

Answer:

  1. Increase
  2. Annuity account
  3. Partnership at will
  4. Representative
  5. Partner’s.

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Question 3.
Match the columns:
MP Board Class 12th Accountancy Important Questions Chapter 4 Reconstitution of Partnership Firm Retirement Death of a Partner - 1
Answer:

  1. (b) In revaluation account
  2. (a) In debit side of capital account
  3. (c) In liabilities side of balance sheet of remaining partners
  4. (e) @ 6 % per annum
  5. (d) In debit side of partner’s capital account
  6. (g) Legal representative.
  7. (f) Retirement

Question 4.
Write true or false:

  1. Retired partner can also be paid by annuity.
  2. Retiring partner has no right over the amount of goodwill.
  3. Gaining ratio is calculated when a partner is retired or dead.
  4. When goodwill account is opened with its full halve then goodwill account is credited.
  5. Increase in the value of assets is shown in credit side of revaluation account.
  6. A, B and C are partners in the ratio of respectively. B retires from the firm.
  7. Joint life policy has no surrender value.

Answer:

  1. True
  2. False
  3. True
  4. False
  5. True
  6. True
  7. False.

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Question 5.
Write the answer in one word / sentence:

  1. Write one reason for the retirement of a partner. (MP 2010)
  2. Give me base for the calculation of profit on the death of a partner.
  3. In case of retirement of partner, general reserve of balance sheet should be distributed among partners in which ratio ?
  4. New ratio – old ratio = ?
  5. When does a partner retire from a firm ? (MP 2011)
  6. To whom the amount is paid on the death of a partner ? (MP 2012)
  7. Which account is opened when payment is given to a partner by annuity method ? (MP 2012)
  8. In whom the amount payable to deceased partner is paid. (MP 2017)

Answer:

  1. Old age
  2. Time
  3. Old ratio
  4. Gaining ratio
  5. Old age/expiry of term mutual agreement between partners
  6. Legal representative
  7. Annuity suspense Account
  8. Executor.

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Reconstitution of Partnership Firm: Retirement / Death of a Partner Very Short Answer Type Questions

Question 1.
What do you mean by retirement of a partner ?
Answer:
Due to some circumstances, any partner of the firm doesn’t want to continue as a partner in the firm it is called retirement of a partner, under retirement the partner discontinued his relations from the firm.

Question 2.
Give two reasons for the retirement of a partner.
Answer:
In the following two circumstances a partner can retire:

1. Due to old age:
When a partner attains old age and he finds himself unable to do work of the partnership business, he may retire from the firm.

2. Due to ill health:
When a partner becomes the victim of such a disease that he cannot take active part in the conduct of business, he gets retirement from the firm.

Question 3.
What is gaining ratio ?
Answer:
After the retirement of a partner, the future profit-sharing ratios of the remaining partners increases automatically, since, they acquire the left out share of profit in some agreed ratio or in their old ratios. Thus, the ratio in which the remaining partners gain over their old profit-sharing is called gaining ratio.

MP Board Class 12th Accountancy Important Questions Chapter 4 Reconstitution of Partnership Firm Retirement Death of a Partner - 2

Question 4.
What journal entries are passed when goodwill is opened and written-off?
Solution:
MP Board Class 12th Accountancy Important Questions Chapter 4 Reconstitution of Partnership Firm Retirement Death of a Partner - 3

Question 5.
What do you mean by Legal representative ?
Answer:
Legal representative is the person for which the partner will be held responsible for the action done by him/ her. In the case of death of the partner, his executor / successor will become his legal representative and has all the rights to get the amount due to the deceased partner.

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Reconstitution of Partnership Firm: Retirement / Death of a Partner Short Answer Type Questions

Question 1.
Write five circumstances that any partner can retire from the firm.
Or
In what conditions a partner can retire from the firm ?
Answer:
In the following circumstances, a partner can retire from the firm :

  • Due to old age
  • Due to inability
  • If any partner shows personal interest
  • If any partner does his duty against the contents of deed
  • If the firm makes continuous loss.

Question 2.
Differentiate between sacrificing and gaining ratio.
Answer:
Differences between sacrificing and gaining ratio:
MP Board Class 12th Accountancy Important Questions Chapter 4 Reconstitution of Partnership Firm Retirement Death of a Partner - 4

Question 3.
Explain the rights of a retiring partner regarding the various amounts pay¬able to him.
Answer:
A retiring partner has the right to claim the following amounts till the date of his retirement:

  • The balance of am-bunt shown by the capital account on current account in the last balance sheet
  • Share of profit
  • Share of profit on revaluation of assets and liabilities
  • hare of L.I.C. Premium
  • Interest on capital if any
  • Share of goodwill
  • Share of reserve, if any
  • After entering all the above items, the balance amount is treated as the amount payable to the representative of the dead partner.

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Question 4.
What are the methods prevailing to pay off the outgoing partner from the firm ?
Answer:
Following methods are generally adopted to pay off the outgoing partner:

  • Payment in lump sum: When the firm has sufficient cash then the retiring partner is paid in lump sum.
  • Payment through bills payable: A bills payable is issued to the partner for a specific term and when the time expires then payment is done to him.
  • Payment in installment: The amount payable to the outgoing partner is treated as loan and kept in the firm. This loan is paid off in installments together with a specific rate of interest.
  • Payment through annuity: The amount due to the retiring partner can be paid through annuity for certain years.

Reconstitution of Partnership Firm: Retirement / Death of a Partner Long Answer Type Questions

Question 1.
How the amount is calculated for a partner, who is retiring from the firm?
Or
How is the amount due to retiring partner determined ?
Answer:
The share of retiring partner or the amount payable to a retiring partner is calcu-lated according to the method mentioned in the partnership deed:
(1) Amount receivable by a retiring partner from the firm:

  • Balance of his capital as per the last closing balance sheet.
  • Interest on capital and share of profit up to the date of retirement, provided in partnership deed.
  • Salary, bonus, commission etc, if provided in the partnership deed.
  • Profit on revaluation of assets and liabilities of the firm.
  • Share of goodwill.
  • Share of undistributed profits, reserves, funds etc.
  • Any other amount receivable from the firm as per the partnership deed.

(2) Amounts payable by a retiring partner to the firm:

  • Debit balance of his capital account as per the last balance sheet, if any.
  • Drawings and interest on drawings.
  • Share of loss on revaluation of assets and liabilities.
  • Share of loss up to the date of retirement, if any.
  • Any other amount payable by the retiring partner to the firm

(3) After crediting and debiting the above amounts in the capital account of retiring partner, the balance is drawn which represents the final amount payable to the retiring partner.

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Question 2.
Explain the method for opening goodwill account on retirement of partner and write the journal entries.
Answer:
Method for opening goodwill account on retirement of partner and the journal entries are as under :

(a) When goodwill account does not exist in the books : After calculating the share of the deceased partner, the following journal entry is passed:
Remaining partner’s Capital A/c                   Dr.
To retiring partner’s Capital A/c
(Being adjustment of goodwill done)

(b) When Goodwill already appears in the book:
(i) For writing off the old goodwill               Dr.
All partner’s capital A/c
To goodwill A/c
(Being goodwill written off in old ratio)

(ii) For recording the deceased partner’s share of goodwill
Remaining partner’s capital A/c Dr.
To retiring partner’s capital A/c
(Being adjustment of goodwill made).

Question 3.
How will you calculate the amount payable to his legal representative on the death of a partner ?
Answer:
Following steps are taken to determine the share of a deceased partner payable to his legal heir:
1. Preparing memorandum final accounts until the date of death of the partner.
2. Preparing deceased partner’s capital account.

3. Posting of following amounts to the credit of his capital account:

  • Balance of capital
  • Interest on capital up to the date of death, if provided in partnership deed
  • Bonus, commission, salary etc. if provided in partnership deed
  • Share of current year’s profit up to the date of his death
  • Share of undistributed profits, reserve fund and goodwill
  • Share of profit on revaluation.

4. Posting of following amounts to the debit side of his capital account:

  • Amount of drawings
  • Interest on drawing if any
  • Loan and interest on loan, if any
  • Share of loss on revaluation of assets and liabilities
  • Undistributed losses of the firm.

5. Transfer of deceased partner’s current account balance to his capital account, if any.

6. Share of amount of life policy if the firm has taken a joint life policy

MP Board Class 12 Accountancy Important Questions

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 22 रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 22 रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण NCERT प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित की परिभाषा लिखिए –
(1) बहिःस्रावी ग्रंथियाँ
(2) अंतःस्रावी ग्रंथियाँ
(3) हॉर्मोन।
उत्तर:
(1) बहिःस्रावी ग्रंथियाँ (Exocrine glands):
ऐसी ग्रंथियाँ, जिनमें एपीथिलियल कोशाओं का स्तर हो तथा नलिकाएँ पायी जाती हों बहिःस्रावी ग्रंथियाँ कहलाती हैं। इन ग्रंथियों के द्वारा एन्जाइम का स्रावण होता है।

(2) अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (Endocrine glands):
ऐसी ग्रंथियाँ जिनमें नलिकाओं का अभाव हो तथा वे अपने स्राव (हार्मोन) सीधे रक्त में मुक्त करते हो, अंत:स्त्रावी ग्रंथियाँ कहलाती है।

(3) हॉर्मोन (Hormones):
हार्मोन एक अपोषकीय (non-nutrient) रासायनिक पदार्थ है, जो थोड़ी मात्रा में उत्पन्न होकर कोशिकाओं के बीच मैसेंजर का कार्य करता है।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर में पाई जाने वाली अन्तःस्रावी ग्रंथियों की स्थिति चित्र बनाकर प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 22 रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण - 3

प्रश्न 3.
निम्न द्वारा स्रावित हॉर्मोन का नाम लिखिए –

  1. हाइपोथैलेमस
  2. पीयूष ग्रंथि
  3. थायरॉइड
  4. पैराथायरॉइड
  5. अधिवृक्क ग्रंथि
  6. अग्नाशय
  7. वृषण
  8.  अण्डाशय
  9. थायमस
  10.  एट्रियम
  11. वृक्क
  12. जठर-आंत्रीय पथ।

उत्तर:

  1. हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) – थाइरोट्रॉपिन रिलीजिंग हॉर्मोन (TRH), एड्रीनोकॉर्टिकाट्रॉपिन रिलीजिंग हॉर्मोन (ARH), गोनेडोट्रोपिन रिलीजिंग हॉर्मोन (GnRH), मिलेनोसाइट रिलीजिंग हॉर्मोन (MRH), प्रोलैक्टिन रिलीजिंग हॉर्मोन (PRH).
  2. पीयूष ग्रंथि (Pituitary gland) – थायरॉइड स्टीमुलेटिंग हॉर्मोन (TSH), ग्रोथ हॉर्मोन (GH), एड्रीनो कॉर्टिको ट्रॉपिक हॉर्मोन (ACTH), गोनेडोट्रॉपिन (FSH, ICSH and LH). ऑक्सीटोसिन, वैसोप्रेसीन।
  3. थायरॉइड (Thyroid) – थायरॉक्सिन, कैल्सीटोनिन।
  4. पैराथायरॉइड (Parathyroid) – पैराथॉर्मोन (PTH).
  5. अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal gland) – एड्रीनेलीन, नोरएड्रीनेलीन, मिनरेलोकॉर्टिकॉइड, ग्लूकोकॉर्टिकॉइड।
  6. अग्नाशय (Pancrease) – इन्सुलिन, ग्लूकेगॉन।
  7. वृषण (Testes) – एन्ड्रोजन (टेस्टोस्टेरॉन)।
  8. अण्डाशय (Ovary) – एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टीरॉन।
  9. थायमस (Thymus) – थायमोसीन।
  10. एट्रियम (Atrium) – एट्रियल नेट्रीयूरेटिक फैक्टर (ANF)।
  11. वृक्क (Kidney) – ऐरेथ्रोप्वाइटीन।
  12. जठर-आंत्रीय पथ (G.I. Tract) – गैस्ट्रीन, सेक्रेटीन, कोलीसिस्टोकाइनिन।

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प्रश्न 4.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिये –

हॉर्मोन – लक्ष्य ग्रन्थि

  1. हाइपोथैलैमिक हॉर्मोन – …………..,……………..
  2. थाइरोट्रॉपीन (टी.एस.एच.) – …………………….
  3. कार्टिकोट्रापीन (ए.सी.टी.एच.) – ………………….
  4. गोनैडोट्रॉपिन (एल.एच.एफ.एस.एच.) – ………………..
  5. मेलानोट्रॉफिन (एम.एस.एच.) – ………………………..

उत्तर:

  1. पीयूष ग्रन्थि
  2. थायरॉइड ग्रंथि
  3. एड्रीनल ग्रंथि
  4. वृषण एवं अण्डाशय
  5. हाइपोथैलेमस।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित हॉर्मोन के कार्यों के बारे में टिप्पणी लिखिए –

  1. पैराथाइरॉइड हॉर्मोन (पी.टी.एच.)
  2. थायरॉइड हॉर्मोन
  3. थाइमोसिन
  4. एंड्रोजेन
  5. एस्ट्रोजेन
  6. इन्सुलिन एवं ग्लूकेगॉन।

उत्तर:
(1) पैराथाइरॉइड हॉर्मोन- पैराथायरॉइड ग्रन्थि से पैराथॉर्मोन नामक हॉर्मोन स्रावित होता है।
कार्य:
यह आँत की दीवार और वृक्क नलिकाओं में Ca अवशोषण की गति को बढ़ाता है। पेशी संकुचन, हृदय स्पन्दन, अस्थि निर्माण इत्यादि में सहयोग करता है । इसके अल्पस्रावण से टिटनस रोग होता है। बाल्यावस्था में कमी होने पर दाँत, हड्डियाँ व मस्तिष्क कम विकसित रह जाते हैं। हॉर्मोन के अतिस्रावण से ऑस्टियोपोरोसिस, हाइपर कैल्सिमिया एवं गुर्दे की पथरी जैसे रोग हो जाते हैं।

(2) थायरॉइड हॉर्मोन:

(1) थायरॉक्सिन या टेट्राआयोडोथायरोनिन या T. (Thyroxine or Tetraiodothyronine or T.) – केण्डॉल (1914) ने सबसे पहले इस हॉर्मोन के रवे प्राप्त किये। इस हॉर्मोन का लगभग 65% भाग आयोडीन होता है। यह हमारे शरीर तथा उनकी कोशिकाओं में निम्नलिखित कार्यों को करता

  • यह उपापचयी क्रियाओं पर नियन्त्रण करता है। थायरॉक्सिन मुख्यतः कोशिकाओं की माइटोकॉण्ड्रिया की संख्या तथा माप को नियन्त्रित कर ऑक्सीकरण उपापचयी क्रियाओं को नियन्त्रित करता है।
  • यह शरीर की वृद्धि एवं भिन्नन के लिए आवश्यक है। यदि मेढक के भेक शिशु की थायरॉइड ग्रन्थि को निकाल दिया जाये तो यह मेढक में रूपान्तरित नहीं हो पाता।
  •  उपापचयी नियन्त्रण के कारण यह शरीर के ताप का भी नियन्त्रण करता है।
  • यह सामान्य वृद्धि को नियन्त्रित करता है।
  • यह ऊतक में पाये जाने वाले अन्तरकोशिकीय पदार्थों की मात्रा को नियन्त्रित करता है।

(2) ट्राइआयोडोथायरोनिन (Tri-iodothyronine):
इसे T, भी कहते हैं। यह भी टायरोसीन अमीनो अम्ल और आयोडीन के मिलने से बनता है। इसका लगभग 10% भाग टायरोसीन अमीनो अम्ल का बना होता है, यह थायरॉक्सिन के समान ही है, लेकिन थायरॉक्सिन की अपेक्षा चार गुना अधिक प्रभावी होता है। कोशिकाओं में जाकर थायरॉक्सिन भी T, में बदल जाता है।

(3) थायरोकैल्सिटोनिन (Thyrocalcitonine):
यह हॉर्मोन प्रोटीन होता है और थायरॉइड के स्ट्रोमा में पायी जाने वाली पैरापुटिका कोशिकाओं द्वारा स्रावित होता है। यह हॉर्मोन रुधिर तथा मूत्र में Ca की मात्रा को नियन्त्रित करता है।

(3) थाइमोसिन-ये T:
लिम्फोसाइट के विभेदीकरण में मुख्य भूमिका निभाते हैं, जो कोशिका माध्य प्रतिरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है । इसके अतिरिक्त थाइमोसिन तरल प्रतिरक्षा के लिए प्रतिजैविक के उत्पादन को भी प्रेरित करते हैं। जिसके फलस्वरूप वृद्धों की प्रतिरक्षा कमजोर पड़ जाती है।

(4) एंड्रोजेन (टेस्टोस्टीरॉन) के प्रमुख कार्य:

  • यह नर में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के विकास को प्रेरित करता है।
  • यह नर में बाह्य लैंगिक लक्षणों जैसे-हाथ-पैर में बाल उत्पन्न होने, मूंछों को उगाने, आवाज के भारी होने आदि को प्रेरित करता है।
  • यह वृषण में शुक्राणु के निर्माण को उत्तेजित करता है।
  • यह शरीर में ऊतकों के निर्माण को प्रभावित करता है।

(5) एस्ट्रोजेन-यह मुख्यतः
अण्डाशय द्वारा स्रावित होता है। इसके अलावा यह ऐड्रीनल ग्रन्थि एवं प्लैसेण्टा द्वारा भी अल्पमात्रा में स्रावित होता है। यह हॉर्मोन्स मादा के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों को नियन्त्रित करता है। इसके प्रभाव से लड़कियों में गर्भाशय, योनि, भग तथा स्तनों का विकास एवं बगल तथा जघन क्षेत्रों में बालों का उगना, शरीर में वसा के जमाव के कारण चिकनाहट, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण, रजोधर्म के प्रारम्भ होने इत्यादि क्रियाओं का नियन्त्रण किया जाता है। इसकी कमी से लैंगिक परिपक्वता देर से, तथा अधिकता से जल्दी आती है।

(6) इन्सुलिन एवं ग्लूकेगॉन:
इन्सुलिन एक प्रोटीन युक्त हॉर्मोन है जो ग्लूकोज समस्थापन के नियमन में मुख्य भूमिका निभाता है। इन्सुलिन लक्ष्य कोशिकाओं में ग्लूकोज से ग्लाइकोजन बनने की प्रक्रिया को प्रेरित करता है। ग्लूकेगॉन एक पेप्टाइड हॉर्मोन है जो सामान्य रक्त शर्करा के स्तर के नियमन में मुख्य भूमिका निभाता है। ग्लूकेगॉन मुख्य रूप से यकृत कोशिकाओं पर कार्य कर ग्लाइकोजन अपघटन को प्रेरित करता है जिसके फलस्वरूप रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है।

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प्रश्न 6.
निम्न के उदाहरण दीजिए –

  1. हाइपरग्लाइसीमिक हॉर्मोन एवं हाइपोग्लाइसीमिक हॉर्मोन
  2. हाइपर कैल्सिमिक हॉर्मोन
  3. गोनेडोट्रॉपिक हॉर्मोन
  4. प्रोजेस्टीरॉन हॉर्मोन
  5. रक्तदाब निम्नकारी हॉर्मोन
  6. एंड्रोजेन एवं एस्ट्रोजेन।

उत्तर:

  1. ग्लूकेगॉन एवं इन्सुलिन
  2. पैराथायराइड हॉर्मोन
  3. ल्यूटिनाइजिंग हॉर्मोन (LH) और पुटिका प्रेरक हॉर्मोन (FSH)
  4. प्रोजेस्टीरॉन
  5. एट्रीयल नेट्रियूरेटिक कारक (ANF)
  6. एंड्रोजन मुख्य रूप से टेस्टेस्टीरॉन है तथा एस्ट्रोजेन का स्रावण अण्डाशय द्वारा होता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित विकार किस हॉर्मोन की कमी के कारण होते हैं –

  1. मधुमेह
  2. ग्वॉयटर
  3.  क्रीटिनिज्म।

उत्तर:

  1. मधुमेह, इन्सुलिन हॉर्मोन की कमी से होती है।
  2. ग्वॉयटर, थायरॉक्सिन हॉर्मोन की कमी से होती है।
  3. क्रीटिनिज्म, थायरॉक्सिन हॉर्मोन की कमी से होता है।

प्रश्न 8.
एफ. एस. एच. (E.S.H.) की कार्यविधि को संक्षिप्त में समझाइये।
उत्तर:
फॉलिकल स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (ES.H.) मादाओं के अण्डाशय में पुटकों (Follicles) के परिपक्वन तथा अण्डाशय द्वारा एस्ट्रोजन के स्रवण को उत्तेजित करता है। पुरुषों में यह हॉर्मोन शुक्राणुजनन की क्रिया को प्रेरित करता है।

प्रश्न 9.
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 22 रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण - 4
उत्तर:

  1. (b) थायरॉइड
  2. (d) पैराथायरॉइड
  3. (a) हाइपोथैलेमस
  4. (c) पीयूष ग्रंथि

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रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –
1. डायबिटीज मैलीट्स किसके न बनने के कारण होता है –
(a) ग्लूकेगॉन
(b) इन्सुलिन
(c) कैल्सीटोनिन
(d) वैसोप्रेसिन।
उत्तर:
(b) इन्सुलिन

2. नर में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के लिए आवश्यक हॉर्मोन है –
(a) टेस्टोस्टीरॉन
(b) प्रोजेस्टीरॉन
(c) एस्ट्रोजेन
(d) रिलैक्सिन।
उत्तर:
(a) टेस्टोस्टीरॉन

3. मादा में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के लिए आवश्यक हॉर्मोन है –
(a) टेस्टोस्टीरॉन
(b) प्रोजेस्टीरॉन
(c) एस्ट्रोजेन
(d) रिलैक्सिन।
उत्तर:
(c) एस्ट्रोजेन

4. E.S.H. और L.H. दोनों हॉर्मोन को मिलाकर कहते हैं –
(a) आपातकालीन हॉर्मोन
(b)G.TH.
(c) न्यूरो हॉर्मोन
(d) दाबरोधी हॉर्मोन।
उत्तर:
(b)G.TH.

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5. निम्न में कौन-सी कोशिकाएँ प्रतिरक्षियों का निर्माण करती हैं –
(a)C – कोशिकाएँ
(b) T-कोशिकाएँ
(c) B-कोशिकाएँ
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) B-कोशिकाएँ

6. हिस्टेमीन किसके द्वारा स्रावित होता है –
(a)R.B.Cs
(b) W.B.Cs
(c)(a) तथा (b) दोनों से
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(b) W.B.Cs

7. एण्टीजन पर सीधे आक्रमण करती है –
(a) B-कोशिकाएँ
(b) C-कोशिकाएँ
(c)T- कोशिकाएँ
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(c)T- कोशिकाएँ

8. B-लिम्फोसाइट कहाँ परिपक्व होती है –
(a) अस्थिमज्जा
(b) प्लीहा
(c) वृक्क
(d) थाइमस।
उत्तर:
(a) अस्थिमज्जा

9. किस रोगाणु के कारण इण्टरफेरॉन का स्त्रावण होता है –
(a) वायरस
(b) बैक्टीरिया
(c) प्रोटोजोआ
(d) फफूंद।
उत्तर:
(b) बैक्टीरिया

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10. हॉर्मोन्स होते हैं –
(a) अमीनो अम्ल के व्युत्पन्न
(b) पेप्टाइड्स
(c) स्टीराइड्स
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी।

11. अंधेरे में कौन-सा हॉर्मोन ज्यादा स्त्रावित होता है –
(a) इन्सुलिन
(b) एड्रीनेलिन
(c) थायरॉक्सिन
(d) मिलैटोनिन।
उत्तर:
(d) मिलैटोनिन।

12. कुफ्फर कोशिकाएँ पाई जाती हैं –
(a) अग्न्याशय में
(b) यकृत में
(c) अण्डाशय में
(d) वृषण में।
उत्तर:
(b) यकृत में

13. इन्सुलिन उत्पन्न होता है –
(a) अल्फा कोशाओं से
(b) बीटा कोशाओं से
(c) एड्रीनल कॉर्टेक्स से
(d) वृषण से।
उत्तर:
(b) बीटा कोशाओं से

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिये –

  1. मेलेटोनिन हॉर्मोन ……………….. द्वारा स्रावित होता है।
  2. प्रोजेस्टीरॉन हॉर्मोन ……………….. द्वारा स्रावित किया जाता है।
  3. ………………… की कमी से घेघा रोग होता है।
  4. इन्सुलिन की कमी से ………………. रोग हो जाता है।
  5. सोमैटोट्रॉपिन के अल्पस्राव से ………………. होता है।
  6. ……………….. एक एण्टीडाइयूरेटिक।
  7. लैंगरहैन्स के द्वीप ……………….. में पाये जाते हैं।
  8. संकटावस्था में जीवन रक्षी हॉर्मोन ……………….. ग्रन्थि से स्रावित होते हैं।
  9. आमाशय द्वारा जठर रस के स्रावण का प्रेरक हॉर्मोन ……………… है।
  10. ……………….. हॉर्मोन की कमी से मानव बौना रह जाता है।
  11. T-लिम्फोसाइट का निर्माण …………….. में होता है।
  12. ……………….. सुरक्षा की द्वितीय पंक्ति बनाती है।
  13. ……………….. कोशिकाएँ हिस्टामीन का स्रावण करती हैं।
  14. एण्टीबॉडीज का निर्माण ……………….. में होता है।
  15. ……………….. प्रति विषाणु प्रोटीन है।

उत्तर:

  1. पीयूष ग्रन्थि
  2. कार्पस ल्यूटियम
  3. आयोडीन
  4. मधुमेह
  5. बौनापन
  6. वैसोप्रेसिन
  7. अग्नाशय
  8. अधिवृक्क
  9. गैस्ट्रिन
  10. सोमैटोट्रॉपिन हॉर्मोन
  11. बोन मैरो
  12. न्यूट्रोफिल्स
  13. मास्ट
  14. लिम्फोसाइट
  15. इण्टरफेरॉन।

प्रश्न 3.
उचित संबंध जोडिए –
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 22 रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण - 1
उत्तर:

  1. (c) थायरॉक्सिन
  2. (d) दुग्ध स्राव
  3. (e) प्रोजेस्टीरॉन
  4. (a) टेस्टोस्टीरॉन
  5. (b) सोमैटोट्रॉपिन

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 22 रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण - 2

उत्तर:

  1. (d) B-कोशिकाएँ
  2. (f) लिम्फोसाइट।
  3. (a) इसाक्स तथा लिण्डरमैन
  4. (b) हेल्पर
  5. (c) एण्टीबॉडी का संश्लेषण
  6. (e) जन्मजात

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प्रश्न 4.
एक शब्द में उत्तर दीजिए –
पश्च पीयूष ग्रन्थि के हॉर्मोन कहाँ संश्लेषित होते हैं ?

रुधिर के अन्दर Ca की मात्रा को नियन्त्रित करने वाले हॉर्मोन का नाम लिखिए।

  1. हमारे शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि कौन-सी है ?
  2. पीयूष ग्रन्थि की अग्रपाली में बनने वाले दो हॉर्मोनों के नाम लिखिए।
  3. किस हॉर्मोन को प्रसव हॉर्मोन कहते हैं ?
  4. अग्न्याशय के अन्तःस्रावी भाग तथा उससे संबंधित हॉर्मोन के नाम लिखिए।
  5. टेस्टोस्टीरॉन स्रावित करने वाली कोशाओं के नाम लिखिए।
  6. उस हॉर्मोन का नाम तथा स्रोत बताइए, जो स्त्रियों के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों एवं अंगों में परिवर्तन लाता है।
  7. मनुष्य की उस ग्रन्थि का नाम बताइए, जो पाचक प्रकोण्व और हॉर्मोन दोनों का स्राव करती है।
  8. उस हॉर्मोन का नाम बताइये जो दुग्ध स्रावण को प्रेरित करता है।
  9. न्यूरोहाइपोफाइसिस से क्या उत्पन्न होता है ?
  10. सीक्रिटिन हॉर्मोन किसके स्रावण को प्रेरित करता है ?
  11. किस ऊतक के कारण पशुओं की आँखें रात्रि में चमकती हैं ?
  12. यकृत में पायी जाने वाली भक्षी कोशिका का नाम क्या है ?
  13. एण्टीबॉडी का निर्माण किसकी उपस्थिति के कारण होता है ?
  14. किसी अस्थायी अन्तःस्रावी ग्रन्थि का नाम लिखिए।

उत्तर:

  1. थैलेमस की तंत्रिकीय संवेदी कोशिकाओं में
  2. पैराथॉर्मोन
  3. यकृत
  4. T.S.H. और S.T.H.,
  5. ऑक्सीटोसिन
  6. आइसलैट्स ऑफ लैंगरहैन्स, इन्सुलिन, ग्लूकेगॉन
  7. वृषण की अंतराली कोशिका
  8. एस्ट्रोजन
  9. अग्न्याशय
  10. प्रोलैक्टिन हॉर्मोन
  11. वैसोप्रेसिन और ऑक्सीटोसिन
  12. अग्न्याशय रस
  13. टैपीटम
  14. कुफ्फर कोशिकाएँ
  15. एण्टीजन
  16. प्लेसेण्टा।

रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संकटकालीन हॉर्मोन किसे कहते हैं ? यह किस ग्रंथि से स्त्रावित होता है ?
उत्तर:
संकटकालीन हॉर्मोन एड्रीनेलीन हॉर्मोन को कहते हैं। यह अधिवृक्क ग्रंथि के मज्जा भाग से . स्रावित होता है।

प्रश्न 2.
थायरॉक्सिन के अल्पस्रावण से होने वाले दो रोगों के नाम लिखिये।
उत्तर:
थायरॉक्सिन के अल्पस्रावण से होने वाले दो रोग निम्न हैं –

  • जड़वामनता (Cretinism)
  • घेघा
  • हाशीमोटो
  • मिक्सीडीमा।

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प्रश्न 3.
अग्न्याशय के अंतःस्रावी भाग तथा उससे संबंधित हॉर्मोन का नाम बताइये।
उत्तर:
अग्न्याशय के अंतःस्रावी भाग हैं लैंगरहँस की द्वीप इनसे संबंधित हॉर्मोन हैं –

  • इंसुलिन
  • ग्लूकेगॉन
  • सामेटोस्टैटिन।

प्रश्न 4.
पीयूष की अग्रपालि में बनने वाले दो हॉर्मोन्स के नाम बताइए।
उत्तर:

  • थायरॉइड उत्प्रेरक हॉर्मोन (T.S.H.)
  • वृद्धि उत्प्रेरक हॉर्मोन (S.TH.)।

प्रश्न 5.
किस हॉर्मोन को प्रसव हॉर्मोन कहते हैं ?
उत्तर:
ऑक्सीटोसिन हॉर्मोन को प्रसव हॉर्मोन कहते हैं, क्योंकि यह गर्भावस्था के अन्तिम समय में गर्भाशय की अनैच्छिक पेशियों को संकुचित करके प्रसव को आसान बनाता है तथा प्रसव के बाद गर्भाशय को सामान्य अवस्था में भी लाता है।

प्रश्न 6.
स्तनधारियों में पायी जाने वाली अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
स्तनधारियों में निम्नलिखित अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं –

  • पीयूष
  • थायरॉइड
  • पैराथायरॉइड
  • ऐड्रीनल
  • थायमस
  • अग्न्याशय
  • जनन ग्रन्थियाँ।

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प्रश्न 7.
प्रोजेस्टीरॉन एवं रिलैक्सिन हॉर्मोन्स कहाँ उत्पन्न होते हैं ? इनके कार्य लिखिए।
उत्तर:
प्रोजेस्टीरॉन हॉर्मोन कॉर्पस ल्यूटीयम से निकलता है। इस हॉर्मोन द्वारा गर्भधारण एवं स्तन ग्रन्थियों का विकास होता है। अण्डाशय, प्लैसेन्टा, गर्भाशय से गर्भावस्था में रिलैक्सिन हॉर्मोन का स्रावण होता है। इस हॉर्मोन द्वारा जनननाल (Birth canal) चौड़ी हो जाती है एवं शिशु जन्म में सरलता होती है।

प्रश्न 8.
मनुष्य में वृद्धि के लिए उत्तरदायी हॉर्मोन के नाम लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य में वृद्धि के लिए उत्तरदायी हॉर्मोन पीयूष ग्रंथि के स्रावित होने वाला सोमैटोट्रॉपिक हॉर्मोन है। इसे वृद्धि हॉर्मोन भी कहते हैं। थॉयराइड ग्रंथि से स्रावित थायरॉक्सिन हॉर्मोन भी शरीर की वृद्धि व भिन्नन के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 9.
हॉर्मोन की रासायनिक प्रकृति क्या है ?
उत्तर:
हॉर्मोन को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है –

  • स्टीरॉइड हॉर्मोन (Steroid hormones) – एल्डोस्टीरॉन, कार्टीसॉल, प्रोजेस्टीरॉन, टेस्टोस्टीरॉन।
  • अमीनो अम्ल (Amino acid) – थायरॉक्सिन एवं एपिनेफ्रीन।
  • पेप्टाइड एवं प्रोटीन हॉर्मोन्स (Peptide and protein hormone) – कैल्सिटोनिन, पैराथॉर्मोन, इन्सुलिन, ग्लूकैगॉन।

प्रश्न 10.
ओसटाइसिस फाइब्रोसा सिस्टिका (Osteitis fibrosa cystica) क्या है ?
उत्तर:
पैराथॉर्मोन के अधिक स्रावण के कारण यह रोग होता है। रुधिर एवं मूत्र में Ca+2 आयन बढ़ते हैं। हड्डियों में कैल्सियम का जमाव अधिक होने लगता है।

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रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित हॉर्मोन के स्रोत एवं कार्य लिखिए –

  1. थायरॉक्सिन
  2. इन्सुलिन
  3. एड्रीनेलीन
  4. एस्ट्रोजन
  5. ऑक्सीटोसिन।

उत्तर:
हॉर्मोन्स के स्त्रोत एवं कार्य –

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प्रश्न 2.
इन्सुलिन स्त्रावित करने वाली कोशिका का नाम देते हुए इन्सुलिन के तीन कार्य लिखिए।
उत्तर:
इन्सुलिन अग्नाशय में स्थित आइसलेट्स ऑफ लैंगरहैन्स की बीटा कोशिकाओं द्वारा स्रावित किया जाता है। इन्सुलिन के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  • यह रक्त शर्करा की मात्रा को नियन्त्रित करता है तथा यकृत कोशिकाओं में ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में बदलता है।
  • यह वसीय अम्ल और ग्लूकोज से ऐडिपोज ऊतक (Adipose tissue) के संश्लेषण की क्रिया में भाग लेता है। यह वसा के ऑक्सीकरण को रोकता है।
  • यह ऊतकों में अमीनो अम्लों से प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में भाग लेता है।
  • यह शरीर में प्रोटीन उपापचय की क्रिया को घटाता है।

प्रश्न 3.
फीरोमोन्स क्या हैं ? समझाइए।
उत्तर:
फीरोमोन्स शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कार्लसन और ब्यूटेनेण्ड्ट (Karlson and Butenandt, 1959) ने किया। ये हॉर्मोन्स से मिलते-जुलते, लेकिन बहिःस्रावी ग्रन्थियों में बनने वाले ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं, जो कुछ सूचनाओं को उसी जाति के दूसरे जीवों को गन्ध या दूसरे उद्दीपनों द्वारा पहुँचा देते हैं। इन्हें एक्टोहॉर्मोन्स (Ectohormones) भी कहते हैं।

उदाहरणस्वरूप, मादा रेशम कीट बॉम्बीकॉल या जीप्लूर (Bombycol or Gyplure) नामक फीरोमोन्स का स्रावण करती है, जो नर को प्रजनन के लिए आकर्षित करता है। इसी प्रकार सामाजिक कीट जैसे-चींटियाँ, दीमक व मधुमक्खियाँ फीरोमोन्स के कारण एक स्थान पर सरलता से एकत्रित हो जाती हैं। फीरोमोन्स सूचनाओं को बहुत दूर तक संचरित करते हैं।

प्रश्न 4.
थायरॉइड की आत्महत्या (हाशीमोटो रोग) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
हाशीमोटो रोग ((Hashimoto’s disease):
जब कभी थायरॉक्सिन की कमी से होने वाले प्रभावों को दूर करने के लिए दी जाने वाली दवाएँ पदार्थ के समान व्यवहार करने लगती हैं, तब ऐसी स्थिति में शरीर में इनके प्रतिरक्षी (Antibodies) बनने लगते हैं, जो थायरॉइड ग्रन्थि को ही नष्ट कर देते हैं, इस स्थिति से उत्पन्न रोग को ही हाशीमोटो रोग कहते हैं। चूँकि इसमें थायरॉइड ग्रन्थि शरीर में बने पदार्थ के कारण समाप्त होती है इस कारण इसे ‘थायरॉइड की आत्महत्या’ कहते हैं।

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प्रश्न 5.
हॉर्मोन्स की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर:
हॉर्मोन्स निम्नलिखित दो प्रकारों से अपनी क्रिया को सम्पन्न करते हैं –
(1) कोशिकाकला के स्तर पर अधिकांश हॉर्मोन (प्रोटीन) कोशिकाकला से जुड़कर इसमें उपस्थित ऐड्रीनिल साइक्लेज नामक प्रकीण्व को प्रेरित कर देते हैं, जो कोशिकाद्रव्य के ATP अणुओं को विघटित कर देता है। ATP का अपघटन कोशिकाओं के उपापचय को कई प्रकार से प्रभावित करता है।

(2) जीन स्तर पर प्रोटीन का संश्लेषण करके-कुछ हॉर्मोन (स्टीरॉइड) लक्ष्य कोशिकाओं के केन्द्रक में पहुँचकर सुप्त जीन को सक्रिय या सक्रिय जीन को निष्क्रिय कर देते हैं । इनकी इस क्रिया से mRNA का निर्माण प्रभावित होता है। इसके बाद इसी mRNA के अनुसार कोशिकाओं में प्रोटीन तथा प्रकीण्वों का संश्लेषण होता है, जो कोशिका की उपापचयी क्रिया, वृद्धि, रचना और विकास इत्यादि को बदल देता है।

प्रश्न 6.
लिंग हॉर्मोन्स क्या हैं ? किन्हीं दो लिंग हॉर्मोन्स का वर्णन कीजिए।
अथवा
कॉर्पस ल्यूटीयम द्वारा स्रावित हॉर्मोन का नाम तथा कार्य लिखिए।
उत्तर:
लिंग हॉर्मोन्स-जीवों में लैंगिक क्रियाओं तथा द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के विकास के नियन्त्रक हॉर्मोन्स को लैंगिक हॉर्मोन्स कहते हैं । एण्ड्रोजेन्स नर तथा एस्ट्रोजेन, प्रोजेस्टीरॉन व रिलैक्सिन मादा हॉर्मोन्स हैं।

(1) एस्ट्रोजेन: यह मुख्यतः
अण्डाशय द्वारा स्रावित होता है। इसके अलावा यह ऐड्रीनल ग्रन्थि एवं प्लैसेण्टा द्वारा भी अल्पमात्रा में स्रावित होता है। यह हॉर्मोन्स मादा के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों को नियन्त्रित करता है। इसके प्रभाव से लड़कियों में गर्भाशय, योनि, भग तथा स्तनों का विकास एवं बगल तथा जघन क्षेत्रों में बालों का उगना, शरीर में वसा के जमाव के कारण चिकनाहट, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण, रजोधर्म के प्रारम्भ होने इत्यादि क्रियाओं का नियन्त्रण किया जाता है। इसकी कमी से लैंगिक परिपक्वता देर से, तथा अधिकता से जल्दी आती है।

(2) प्रोजेस्टीरॉन:
कॉर्पस ल्यूटीयम प्रोजेस्टीरॉन नामक हॉर्मोन स्रावित करता है। यह गर्भाशय को निषेचित अण्ड को ग्रहण करने के लिए तैयार करता है साथ ही वह गर्भधारण के बाद गर्भाशय तथा अण्डे की दीवार में सम्बन्ध बने रहने को प्रेरित करता है। गर्भधारण के बाद यह स्तनों के विकास को भी नियन्त्रित करता है। निषेचन हो जाने पर यह उपर्युक्त कार्यों के साथ अण्डाशयी पुटिका के निर्माण को रोकता है, लेकिन निषेचन न होने की स्थिति में यह गर्भाशय तथा स्तनों को प्रारम्भिक स्थिति में ले आता है।

प्रश्न 7.
प्रोटीनयुक्त हॉर्मोन स्रावण करने वाली अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखिए। उत्तर-प्रोटीनयुक्त हॉर्मोन निम्नलिखित अन्तःस्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्रावित होता है –

  • अन्तःस्रावी ग्रन्थि का नाम:
  • थायरॉइड
  • पैराथायरॉइड
  • अग्नाशय
  • पीयूष ग्रन्थि का अग्र पिण्ड
  • प्रोलैक्टिन पीयूष ग्रन्थि का मध्य पिण्ड
  • पीयूष ग्रन्थि का पश्च पिण्ड

हॉर्मोन का नाम:

  • थायरॉक्सिन
  • पैराथॉर्मोन
  • इन्सुलिन, ग्लूकेगॉन
  • TSH, ACTH, FSH, LH, GH,
  • M.S.H.
  • ऑक्सीटोसिन।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए –

  1. हॉर्मोन एवं एन्जाइम
  2. तंत्रिकीय एवं अन्तःस्रावी नियमन।

उत्तर:
(1) हॉर्मोन एवं एन्जाइम में अन्तर –
हॉर्मोन (Hormone):

  • ये अमीनो अम्ल, प्रोटीन, पेप्टाइड और स्टीरॉइड होते हैं।
  • ये नलिकाविहीन ग्रन्थियों में बनते हैं।
  • इनका अणुभार बहुत कम होता है। इस कारण ये जैव झिल्लियों से परासरित हो जाते हैं।
  • ये क्रिया के बाद विघटित होकर नष्ट हो जाते हैं।
  • ये क्रिया को कम या अधिक करते हैं।

एन्जाइम (Enzyme):

  • ये हमेशा जटिल प्रोटीन होते हैं।
  • ये नलिकायुक्त ग्रन्थियों में बनते हैं।
  • इनका अणुभार बहुत अधिक होता है इस कारण ये जैव कलाओं से विसरित नहीं होते हैं।
  • ये क्रिया के बाद भी विघटित नहीं होते।
  • ये क्रिया को केवल अधिक करते हैं।

(2) तंत्रिकीय एवं अन्तःस्रावी नियमन में अन्तर –
तंत्रिकीय नियमन (Neuro system):

  • इसमें सूचनाओं का स्थानान्तरण ऐक्सॉनों में विद्युत् आवेग के रूप में तथा सिनॉप्सों में रसायनों द्वारा होता है।
  • इसमें सूचनाओं का प्रवाह तीव्र गति से होता है।
  • इसकी अनुक्रिया कम समय तक रहती है।
  • इसमें अनुक्रिया निश्चित स्थान पर होती है।

अन्तःस्रावी नियमन (Endocrinal system):

  • इसमें सूचनाओं का स्थानान्तरण रसायनों के द्वारा रुधिर के माध्यम से होता है।
  • इसमें सूचनाओं का प्रवाह धीमी गति से होता है।
  • इसमें अनुक्रिया अधिक समय तक रहती है।
  • इसमें अनुक्रिया बड़े क्षेत्र में होती है।

प्रश्न 9.
ऐडीनल कॉर्टेक्स द्वारा होने वाली विभिन्न अनियमितताओं को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
ऐड्रीनल कॉर्टेक्स द्वारा उत्पन्न अनियमितताएँ निम्नलिखित हैं –
(1) ऐडीसन रोग (Addison disease):
इस रोग का अध्ययन थॉमस ऐडीसन ने किया था। यह ग्लूकोकार्टिकॉइड के अल्पस्रावण से होता है। इस रोग में रोगी की पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, त्वचा पर ताम्र रंग के चकते पड़ जाते हैं। शरीर में निर्जलीकरण के कारण रुधिर दाब घट जाता है और पाचन सम्बन्धी विकार पैदा हो जाते हैं।

(2) हाइपोग्लाइसीमिया (Hypoglycemia):
यह भी ग्लूकोकार्टीकॉइड की कमी के कारण होता है। इस रोग में मस्तिष्क, यकृत तथा हृदय की पेशियों की क्रिया घट जाती है। शरीर का ताप भी गिर जाता है।

(3) कॉन्स रोग (Conn’s disease):
यह मिनरलोकार्टिकॉइड की कमी से होता है। इसमें तन्त्रिकाओं में गड़बड़ी होकर पेशियों में अकड़न आ जाती है और मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।

(4) कुशिंग रोग (Cushing syndrome):
यह रोग कार्टिसोल हॉर्मोन के अतिस्रावण द्वारा होता है। इस रोग में रोगी के वक्षीय भाग में असामान्य रूप से वसा का जमाव हो जाता है।

(5) ऐड्रीनल विरिलिज्म (Adrenal virilism):
यह रोग स्त्री में एण्ड्रोजन के अधिक बनने से होता है। इस रोग में स्त्रियों में पुरुषों के समान लक्षण जैसे-चेहरे पर दाढ़ी, मूंछों का आना, आवाज का भारी होना तथा बाँझ होना आदि हैं।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित कार्यों से सम्बन्धित हॉर्मोन्स के नाम लिखिये –

  1. शिशु के जन्म के समय पेल्विक स्नायु को नरम करना।
  2. शिशु जन्म के तुरन्त बाद स्तन ग्रन्थियों से दुग्ध का निकलना।
  3. नर तथा मादा में युग्मकजनन को प्रेरित करना।

उत्तर:

  1. रिलैक्सिन
  2. प्रोलैक्टिन
  3. एण्ड्रोजेन एवं एस्ट्रोजेन

प्रश्न 11.
थायरॉइड ग्रन्थि की अतिसक्रियता के मानव-शरीर पर प्रभाव लिखिये।
उत्तर:
थायरॉइड ग्रन्थि की अंतिसक्रियता से थायरॉक्सिन हॉर्मोन की अधिकता हो जाती है, जिसका शरीर पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है –

  1.  उपापचयी क्रियाएँ बढ़ने के कारण शरीर का तापक्रम बढ़ जाता है, जिसके कारण मनुष्य को जाड़े में भी गर्मी महसूस होती है।
  2. थायरॉइड ग्रन्थि का आकार बढ़ जाता है, इसे ग्रेब्स रोग कहते हैं।
  3. पाचन तेजी से होने के कारण भूख अधिक लगती है तथा शरीर का भार बढ़ जाता है।
  4. मनुष्य चिड़चिड़ा हो जाता है।
  5. हृदय के धड़कन की गति तीव्र हो जाती है।
  6. आँखें चौड़ी, खुली व बाहर की ओर उभरी दिखाई देती हैं। इस रोग को एक्जोप्थैलिक ग्वॉइटर कहते हैं।

प्रश्न 12.

  1. वृषण की किस कोशिका द्वारा नर लिंग हॉर्मोन का स्त्रावण होता है ?
  2. LH हॉर्मोन को अन्तराकोशिकीय स्टीमुलेटिंग हॉर्मोन क्यों कहते हैं ?

उत्तर:
1. नर लिंग हॉर्मोन (Male sex hormones):
टेस्टोस्टीरॉन का स्रावण सेमीनीफेरस ट्यूब्यूल्स के चारों ओर पायी जाने वाली कोशिकाओं द्वारा होता है, इन्हें लेडिग कोशिकाएँ (Leydig cell) कहते हैं।

2. LH को ICSH कहते हैं, क्योंकि यह इण्टरस्टिशियल कोशिका एवं लेडिग कोशिका (Leyding cell) को टेस्टोस्टीरॉन के स्रावण के लिए उत्तेजित करती है।

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प्रश्न 13.
संकटकालीन हॉर्मोन किसे कहते हैं ? यह हॉर्मोन किस प्रकार संकटकालीन परिस्थिति में हमें बचाता है ?
उत्तर:
ऐड्रीनेलीन हॉर्मोन, अधिवृक्क ग्रन्थि के मज्जा भाग से स्रावित होता है, इसे संकटकालीन हॉर्मोन कहते हैं। यह हॉर्मोन अरेखित पेशियों को उत्तेजित करता है, जिससे शरीर के बाहर तथा अन्दर की ओर की रुधिर केशिकाओं की दीवार संकुचित हो जाती है, फलस्वरूप रुधिर दाब बढ़ जाता है, हृदय तेजी से धड़कने लगता है, शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं; पुतली फैल जाती है, पसीना आने लगता है, आँसू गिरने लगते हैं, रुधिर का थक्का तेजी से बनता है तथा श्वसन की दर बढ़ जाती है। इन सब कारणों को एक साथ डर जाना कहते हैं। वास्तव में यह तब होता है, जब कोई संकट आ जाता है।

उस समय ऐड्रीनेलीन का स्राव तेजी से होने लगता है, जिससे उपर्युक्त लक्षण दिखाई देने लगते हैं। जब कभी संकट आता है या हम डर जाते हैं, उस समय अचानक ऐड्रीनेलीन का स्राव अधिक होने लगता है, जिससे उपर्युक्त लक्षण दिखाई देते हैं। साथ ही यकृत में ग्लाइकोजेन का ग्लूकोज में परिवर्तन तेजी से होता है और मनुष्य में संकट से लड़ने की क्षमता या भयभीत होने पर भागने की क्षमता आ जाती है। इसी कारण इस हॉर्मोन को संकटकालीन हॉर्मोन (Emergency hormone) भी कहते हैं।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित हॉर्मोन्स किस अंतःस्रावी ग्रंथि से स्रावित होते हैं ? प्रत्येक हॉर्मोन के कार्य लिखिए –

  1. पैराथॉर्मोन
  2. कार्टीसोन
  3. सोमैटोट्रॉपिक
  4. मिलैटोनिन।

उत्तर:

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रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पीयूष ग्रन्थि की स्थिति रचना का वर्णन करते हुए इसके द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स के नाम लिखिए।
अथवा
शरीर की मास्टर ग्रंथि कौन-सी है ? इसकी संरचना तथा इसके द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स के कार्यों का वर्णन कीजिये।
अथवा
निम्न बिन्दुओं के आधार पर पीयूष ग्रंथि द्वारा स्रावित पाँच हॉर्मोन्स के नाम एवं कार्य लिखिये –

  1. नाम
  2. उद्भव स्थान
  3. उत्तेजित होने वाले अंग
  4. कार्य
  5. अधिकता या कमी का प्रभाव।

अथवा
पीयूष ग्रन्थि की अग्रपालि द्वारा स्रावित हॉर्मोन के नाम व कार्य लिखिए। (कोई पाँच)
उत्तर:
पीयूष ग्रन्थि (Pituitary gland):
स्थिति एवं संरचना (Position and Structure) – यह मटर के समान सबसे छोटी ग्रन्थि है, जो कि मस्तिष्क में स्थित होती है। यह अग्रमस्तिष्क के डायेनसैफेलॉन भाग के नीचे की दीवार से कपाल की स्फीनॉइड अस्थि के सेलाटर्सिका (Sellaturcica) नामक गड्ढे में लटकी रहती है। यह ग्रन्थि भ्रूण की ग्रसनी एवं मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस से निकलती है। इस ग्रन्थि को मास्टर ग्रन्थि भी कहते हैं, क्योंकि यह ग्रन्थि अन्य सभी ग्रन्थियों के स्रावण पर नियन्त्रण रखती है।

संरचना (Structure):
यह 1 सेमी लम्बी, 5-6 ग्राम वजन वाली ग्रन्थि है। संरचनात्मक दृष्टि से यह तीन पिण्डों में विभाजित होती है।

(A) अग्रपालि (Anterior lobe):
पीयूष ग्रन्थि का 75% भाग बनाता है। इसमें तीन प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं। परिधि-बेसोफिल्स, केन्द्रकीय-ऐसिडो- Pars tuberalis Brain floor फिल्स एवं बिखरी हुई अवस्था में क्रोमोफिल्स पायी जाती है। अग्रपालि द्वारा निम्नलिखित 6 हॉर्मोन स्रावित होते हैं –

  1. सोमैटोट्रॉपिकहॉर्मोन (STH);
    यह शरीर की वृद्धि को नियन्त्रित करता है। यदि यह STH हॉर्मोन अधिक बनता है, तो अधिक अमीनो अम्ल शरीर की कोशिका में पहुँचते हैं। STH के असाधारण स्राव से महाकायता, एक्रोमेगाली, बौनापन तथा साइमण्ड रोग होता है।
  2. थायरोट्रॉपिक हॉर्मोन (TSH):
    यह हॉर्मोन थायरॉइड ग्रन्थि के स्राव को नियन्त्रित करता है।
  3. एड्रीनोकॉर्टिकोट्रॉपिक हॉर्मोन (ACTH):
    यह हॉर्मोन अधिवृक्क ग्रन्थि के कॉर्टेक्स की वृद्धि तथा इसमें निकलने वाले हॉर्मोन्स के स्राव को नियन्त्रित करता
  4. फॉलिकल स्टीमुलेटिंग हॉर्मोन (FSH):
    यह हॉर्मोन स्त्रियों में अण्डाशय से अण्ड तथा पुरुषों में वृषण से शुक्राणुओं के बनने को उत्तेजित करता है।
  5. ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (LH):
    यह हॉर्मोन अण्डाशय में कॉर्पस ल्यूटीयम के बनने तथा वृषण में इण्टरस्टीशियल कोशिकाओं की क्रियाओं को उत्तेजित करता है।
  6. प्रोलैक्टिन या लैक्टोजेनिक या ल्यूटीयोट्रॉपिक हॉर्मोन (LTH):
    यह हॉर्मोन स्तन ग्रन्थियों से दूध के स्राव को उत्तेजित करता है।

(B) मध्य पालि (Middle lobe):
मनुष्य में यह भाग अल्पविकसित होता है एवं एक झिल्लीनुमा संरचना के रूप में पाया जाता है। MSH हॉर्मोन मध्य पालि से स्रावित होता है, परन्तु मनुष्य में यह अग्रपालि द्वारा स्रावित होता है।

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(C) पश्च पालि (Posterior lobe):
यह सम्पूर्ण ग्रन्थि का 1/4 भाग है। यह भाग तंत्रिका ऊतक के समान होता है, क्योंकि इसमें हाइपोथैलेमस के तंत्रिका स्रावी कोशिकाओं के ऐक्सॉन पाये जाते हैं, पश्च पालि द्वारा दो प्रकार के हॉर्मोन स्रावित होते हैं-1. वैसोप्रेसीन या प्रतिमूत्रक हॉर्मोन-यह प्रतिमूत्रक हॉर्मोन (ADH) वृक्क नलिकाओं के दूरस्थ छोर तथा संग्रह नलिकाओं में मूत्र के जल अवशोषण की दर बढ़ा देता है। इससे जल रुधिर परिवहन में पहुँच जाता है तथा मूत्र की मात्रा कम हो जाती है, किन्तु ADH की कमी से मूत्र अधिक मात्रा में बनता है।

2. ऑक्सीटोसिन हॉर्मोन:
यह हॉर्मोन माँ के गर्भाशय की अनैच्छिक पेशियों के सिकुड़ने को उत्तेजित कर शिशु जन्म में सहायक है। स्तन ग्रन्थियों से दूध के स्राव को भी उत्तेजित करता है।

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प्रश्न 2.
थायरॉइड ग्रन्थि की स्थिति, संरचना तथा इसके द्वारा स्रावित हॉर्मोनों के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
थायरॉइड ग्रन्थि की स्थिति:
यह ग्रन्थि मनुष्य के गर्दन में श्वासनली व स्वर यन्त्र के जोड़ के अधर-पार्श्व तल पर दोनों तरफ एक-एक की संख्या में स्थित होती है। इसका उद्गम भ्रूण की ग्रसनी भाग के जिह्वा के आधार से होता है। संरचना-यह मनुष्य की सबसे बड़ी लगभग 30-35 ग्राम की अन्तःस्रावी ग्रन्थि है, जो दो पॉलियों की बनी होती है। दोनों पालियाँ श्वासनली के इधर-उधर स्थित होती हैं तथा संयोजी ऊतक की एक पतली अनुप्रस्थ पट्टी से जुड़ी होती है, जिसे इस्थमस (Isthmus) कहते हैं। स्त्रियों की थायरॉइड पुरुषों की अपेक्षा थोड़ी बड़ी होती है।

संरचनात्मक दृष्टि से इसके चारों तरफ संयोजी ऊतक का आवरण होता है, जिसके अन्दर संयोजी ऊतक के ही एक ढीले आधार स्ट्रोमा (Stroma) में गोल व खोखली पुटिकाएँ व्यवस्थित रहती हैं। पुटिकाओं (Follicles) की दीवार घनाकार ग्रन्थिल कोशिकाओं की बनी होती है। पुटिकाओं की गुहा में एक गाढ़े रंग का आयोडीन युक्त कोलॉडडी द्रव भगा रहता है. जिसे आयोडोथाय ग्लोब्यूलिन (Iodothy globulin) कहते हैं, जो जेली जैसा पारदर्शक द्रव है।

इसी में इस ग्रन्थि के हॉर्मोन निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। यह मनुष्य की एकमात्र ऐसी अन्तःस्रावी ग्रन्थि है, जो हॉर्मोन्स को निष्क्रिय अवस्था में पुटिका कोशिकाओं द्वारा स्रावित करते हैं। थायरॉइड ग्रन्थि में पुटिकाओं के अलावा कुछ कोशिकाओं के ठोस गुच्छे भी पाये जाते हैं, जिन्हें पैरापुटिकीय अथवा C कोशिकाएँ कहते हैं।
टीप-चित्र के लिए

थायरॉइड हॉर्मोन:

(1) थायरॉक्सिन या टेट्राआयोडोथायरोनिन या T. (Thyroxine or Tetraiodothyronine or T.) – केण्डॉल (1914) ने सबसे पहले इस हॉर्मोन के रवे प्राप्त किये। इस हॉर्मोन का लगभग 65% भाग आयोडीन होता है। यह हमारे शरीर तथा उनकी कोशिकाओं में निम्नलिखित कार्यों को करता

  • यह उपापचयी क्रियाओं पर नियन्त्रण करता है। थायरॉक्सिन मुख्यतः कोशिकाओं की माइटोकॉण्ड्रिया की संख्या तथा माप को नियन्त्रित कर ऑक्सीकरण उपापचयी क्रियाओं को नियन्त्रित करता है।
  • यह शरीर की वृद्धि एवं भिन्नन के लिए आवश्यक है। यदि मेढक के भेक शिशु की थायरॉइड ग्रन्थि को निकाल दिया जाये तो यह मेढक में रूपान्तरित नहीं हो पाता।
  •  उपापचयी नियन्त्रण के कारण यह शरीर के ताप का भी नियन्त्रण करता है।
  • यह सामान्य वृद्धि को नियन्त्रित करता है।
  • यह ऊतक में पाये जाने वाले अन्तरकोशिकीय पदार्थों की मात्रा को नियन्त्रित करता है।

(2) ट्राइआयोडोथायरोनिन (Tri-iodothyronine):
इसे T, भी कहते हैं। यह भी टायरोसीन अमीनो अम्ल और आयोडीन के मिलने से बनता है। इसका लगभग 10% भाग टायरोसीन अमीनो अम्ल का बना होता है, यह थायरॉक्सिन के समान ही है, लेकिन थायरॉक्सिन की अपेक्षा चार गुना अधिक प्रभावी होता है। कोशिकाओं में जाकर थायरॉक्सिन भी T, में बदल जाता है।

(3) थायरोकैल्सिटोनिन (Thyrocalcitonine):
यह हॉर्मोन प्रोटीन होता है और थायरॉइड के स्ट्रोमा में पायी जाने वाली पैरापुटिका कोशिकाओं द्वारा स्रावित होता है। यह हॉर्मोन रुधिर तथा मूत्र में Ca की मात्रा को नियन्त्रित करता है।

प्रश्न 3.
नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ क्या हैं ? थायरॉइड, ऐड्रीनल, अण्डाशय एवं अग्नाशय ग्रन्थि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ ऐसी ग्रन्थियाँ हैं, जिसमें स्रावित पदार्थ हॉर्मोन नलिकाओं में प्रवाहित न होकर रुधिर परिवहन तंत्र द्वारा ऊतकों या अंगों में पहुँचते हैं।

(1) थायरॉइड ग्रन्थि (Thyroid gland):
यह शरीर के गर्दन में श्वासनली एवं स्वर यंत्र के अधर पार्श्वतल पर स्थित होती है। यह मनुष्य की सबसे बड़ी नलिकाविहीन ग्रन्थि है। इसके चारों ओर संयोजी ऊतक का स्तर पाया जाता है। संयोजी ऊतक से बने स्ट्रोमा भाग में गोल एवं खोखली संरचना पायी जाती है, जिसे पुटिका (Follicle) कहते हैं। यह घनाकार ग्रन्थिल ऊतक का बना होता है, जिसमें गाढ़े रंग का आयोडीनयुक्त कोलॉइडी द्रव भरा रहता है। इस ग्रन्थि द्वारा थायरॉक्सिन हॉर्मोन स्रावित होता है, जो शरीर की उपापचयी क्रियाओं का नियन्त्रण करता है।

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(2) एड्रीनल ग्रन्थि (Adrenal gland):
दोनों वृक्कों के शीर्ष पर टोपी के समान संरचना पायी जाती है, जिसे एड्रीनल या अधिवृक्क ग्रन्थि कहते हैं । इस ग्रन्थि का वजन 4-6 ग्राम होता है। यह ग्रन्थि तन्तुमय संयोजी स्तर द्वारा घिरी रहती है। इस ग्रन्थि को दो भागों में बाँटा गया है-(a) कॉर्टेक्स (Cortex), (b) मेड्यूला (Medulla).

(a) कॉर्टेक्स (Cortex):
यह मीजोडर्म से बनने वाला भाग है, जो कि सम्पूर्ण ग्रन्थि का 90% होता है। इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है –

  1. जोना ग्लोमरुलोसा
  2. जोना फैसीकुलेटा
  3. जोना रेटिकुलेरिस। इसके द्वारा स्रावित हॉर्मोन स्टीरॉइड प्रकृति के होते हैं।

इसके द्वारा लिंग हॉर्मोन, मिनरैलोकॉर्टिकॉइड, कार्टीसोन ग्लूकोकॉर्टिकॉइड स्रावित होते हैं। ऐड्रीनेलिन हॉर्मोन को संकटकालीन हॉर्मोन कहते हैं। इस हॉर्मोन की कमी के कारण ऐडीसन रोग हो जाता है। इसका नियन्त्रण पीयूष ग्रन्थि द्वारा स्रावित ACTH करता है।
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(b) मेड्यूला (Medulla):
यह सम्पूर्ण ग्रन्थि का 10% भाग है। इसका नियन्त्रण स्वायत्त तंत्रिका तंत्र द्वारा होता है। इसके द्वारा ऐड्रीनेलिन एवं नॉर-ऐड्रीनेलिन हॉर्मोन का स्रावण होता है।

(3) अण्डाशय (Ovary):
स्त्रियों में अण्डाशय की संख्या 2 होती है। इसमें उपस्थित कॉर्पस ल्यूटीयम द्वारा निम्नलिखित हॉर्मोन का स्रावण होता है –

  1. एस्ट्रोजन
  2. प्रोजेस्टीरॉन
  3. रिलैक्सिन।

(4) अग्न्याशय (Pancreas):
इसकी उत्पत्ति भ्रूण के आँत से होती है। यह मिश्रित ग्रन्थि है। इसमें अग्न्याशय रस बनता है, जो नलिकाओं में प्रवाहित होता है। आइसलेट्स ऑफ लैंगरहैन्स कोशिकाओं द्वारा इन्सुलिन एवं ग्लूकेगॉन का स्रावण होता है। इन्सुलिन रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा बनाए रखता है। इन्सुलिन की कमी से डायबिटीज रोग होता है।

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MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय

श्वसन और गैसों का विनिमय NCERT प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जैव क्षमता क्या है ? इसका महत्व बताइए।
उत्तर:
यह वायु का वह अधिकतम आयतन है, जिसे व्यक्ति एक बार में नि:श्वसन के दौरान ग्रहण और निःश्वसन के दौरान त्याग सकता है। यह नर में 4,500 मिली. तथा मादा में 3,000 मिली. के बराबर होता है। महत्व-चिकित्सकों के द्वारा फेफड़ों की जैव क्षमता के आधार पर फेफड़ों में असामान्यता या बीमारी का पता लगाया जाता है।

प्रश्न 2.
सामान्य निःश्वसन के उपरांत फेफड़ों में शेष वायु के आयतन को बताइए।
उत्तर:
सामान्य निःश्वसन के उपरांत फेफड़ों में शेष वायु लगभग 2200 मिली. होती है।

प्रश्न 3.
गैसों का विसरण केवल कूपिकीय क्षेत्र में होता है, श्वसन तंत्र के किसी अन्य भाग में क्यों नहीं?
उत्तर:
फेफड़ों में उपस्थित कूपिकाएँ श्वसन के समय गैसों के आदान-प्रदान हेतु एक विस्तृत सतह प्रदान करती है।

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प्रश्न 4.
CO2के परिवहन (ट्रांसपोर्ट)की मुख्य क्रिया-विधि क्या है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कार्बन डाइ-ऑक्साइड का परिवहन (Transportation of CO2 ):
जब कोशिका के अन्दर भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है तो CO2 बनती है जो अधिक मात्रा में हमारे शरीर के लिए हानिकारक है। इस कारण इसे शरीर से बाहर निकाला जाता है। कोशिकाओं में ही बनने के कारण इसमें इसकी सान्द्रता अधिक हो जाती है लेकिन रुधिर में कम होती है। इस कारण यह कोशिका से विसरण द्वारा ऊतक द्रव और ऊतक द्रव से कोशिका से रुधिर में आ जाती है। अब यह रुधिर इसे कूपिकाओं की सतह तक निम्नलिखित तीन रूपों में ले जाता है –

(1) प्लाज्मा में घुलकर (Dissolved in Plasma):
वैसे तो CO2 प्लाज्मा में O2 की अपेक्षा 20 गुना अधिक घुलनशील होती है। फिर भी प्लाज्मा के द्वारा सम्पूर्ण CO2 के केवल 7% भाग (0.3 मिली प्रति 100 मिली रक्त) का ही परिवहन किया जाता है। जब CO2 प्लाज्मा में आती है तो इसके जल से मिलकर कार्बोनिक अम्ल H2CO3 बना देती है और इसी अवस्था में फेफड़े तक लायी जाती है जहाँ पर यह पुनः जल से मुक्त होकर विसरण के द्वारा कूपिका में आती है।
CO2 + H2O ⇌  H2CO3 (कार्बोनिक अम्ल)

(2) कार्बेमिनो यौगिकों के रूप में (As Carbamino Compounds):
कुछ CO2 रुधिर के हीमोग्लोबीन तथा अन्य प्रोटीन से मिलकर कुछ अस्थायी यौगिक बनाती हैं। इन यौगिकों को कार्बेमिनो यौगिक कहते हैं जब ये यौगिक कूपिका की सतह पर पहुँचते हैं तो CO2 को मुक्त कर देते हैं और यह विसरण द्वारा कूपिका में आ जाती है।
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय - 3
ऑक्सीकरण में बनी CO2 की लगभग 23% मात्रा का परिवहन इसी प्रकार होता है।

(3) बाईकार्बोनेट्स के रूप में (As bicarbonates):
कार्बन डाइ-ऑक्साइड की शेष 70% मात्रा का संवहन बाईकार्बोनेट्स के रूप में होता है। कार्बन डाइ-ऑक्साइड रुधिर कणिकाओं के सोडियम और पोटैशियम से मिलकर इनके बाईकार्बोनेट्स बनाती है जो श्वसन सतह पर आकर CO, को मुक्त कर देते हैं और यह विसरण के द्वारा कूपिका में पहुँच जाती है। कार्बोनिक ऐनहाइड्रेज प्रकीण्व इस कार्य में मदद करता है।
H2O + CO3 + Na2 CO2 ⇌ 2NaHCO3
                                      (सोडियम बाइकार्बोनेट)
CO2 का परिवहन चाहे किसी भी प्रकार से हो जब यह कूपिका में पहुँचती है तो यह नि:श्वसन के द्वारा वहाँ से बाहर कर दी जाती है।

प्रश्न 5.
कूपिका वायु की तुलना में वायुमण्डलीय वायु में pO2 तथा pCO2 कितनी होगी, मिलान करें
(a) pO2न्यून
(b) pCO2 उच्च
(c) pO2 उच्च, pO2 न्यून
(d) pO2 न्यून, PO2 न्यून।
उत्तर:
(b) pCO2 उच्च

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प्रश्न 6.
सामान्य स्थिति में अंतःश्वसन की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए। उत्तर- श्वासोच्छ्वास की क्रिया दो पदों में पूर्ण होती है –

  1. निश्वसन (Inspiration)
  2. नि:श्वसन (Expiration)

(1) निश्वसन:
निश्वसन के समय डायफ्राम के पीछे की ओर खींचने एवं वक्षीय पिंजड़े के ऊपर उठने से वक्षगुहा का आयतन चारों ओर बढ़ जाता है। डायफ्राम वक्षगुहा के तल पर स्थित रेडियल पेशियों की एक पतली परत का बना होता है। इसके उपरांत पीछे की ओर तथा पार्श्व में लंबर कशेरुकों से तथा आगे की ओर स्टर्नम से जुड़े होते हैं। विश्रामावस्था में वह गुम्बद के समान होता है। निश्वसन के समय जब रेडियल पेशियाँ सिकुड़ती हैं तो डायफ्राम नीचे की ओर खींचता है।

इसके फलस्वरूप वक्षगुहा अग्र पश्च दिशा में आकार में बड़ी हो जाती है। निश्वसन के समय बाह्य इन्टरकोस्टल पेशियों तथा अन्तर इन्टर कास्टल पेशियों के इन्ट्राकार्टिलेजिनस भागों के सिकुड़ने से पसलियाँ आगे व बाहर की ओर खींच जाती हैं – जिससे वक्षगुहा का आकार बढ़ने पर फुफ्फुसा वरणी गुहाएँ फैल जाती हैं और इनमें इंट्राप्लूरल अथवा अन्त:वक्ष दाब कम हो जाता है। फेफड़ों को अधिक स्थान मिलने से ये फैल जाते हैं। फलस्वरूप इंट्राप्लूरल अथवा अन्त:वक्ष दाब से कम हो जाता है और एक अवशोषण बल उत्पन्न हो जाता है जिससे वायुमण्डल की वायु श्वसन पथ से फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है।

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(2) निःश्वसन:
नि:श्वसन के समय ये परिवर्तन नि:श्वसन से उल्टे होते हैं डायफ्राम की रेडियल पेशियों के शिथिलन तथा अन्त:इन्टरकोस्टल पेशियों के आकुंचन के फलस्वरूप डायफ्राम एवं पसलियाँ अपनी वास्तविक स्थिति में आ जाती हैं। अब डायफ्राम गुम्बद के समान हो जाता है। अंत:वक्ष स्थल का आयतन तथा प्लूरल गुहाओं का निगेटिव दाब भी कम हो जाता है इससे फेफड़ों पर दाब पड़ता है जिससे फेफड़ों की वायु बाहर निकल जाती है। वास्तव में नि:श्वसन निष्क्रिय प्रावस्था है।

प्रश्न 7.
श्वसन का नियमन कैसे होता है ?
उत्तर:
श्वासोच्छ्वास (Breathing) एक भौतिक या यांत्रिक प्रक्रिया है, जो कि आंतरिक एवं कोशिकीय श्वसन से संबंधित होती है। मनुष्य में श्वसन या श्वासोच्छ्वास की दर का नियन्त्रण निम्नलिखित दो विधियों द्वारा होता है –

(1) तंत्रिकीय नियमन (Nervous regulation):
मस्तिष्क में उपस्थित मेड्यूला ऑब्लांगेटा (Medulla oblongata) श्वसन की प्रक्रिया पर नियंत्रण रखता है। इसमें एक जोड़ी श्वसन केन्द्र (Respiratory centre) पाया जाता है, जो कि श्वसन का तंत्रिकीय नियमन करता है। इस भाग के तंत्रिका तन्तु फेफड़ों की भित्तियों अन्तरापर्युक पेशियों (Intercoastal muscles) एवं डायफ्राम की पेशियों तक जाते हैं। ये पेशियाँ मेड्यूला ऑब्लांगेटा के श्वसन केन्द्र के नियंत्रण में कार्य करती हैं।

अतः श्वसन केन्द्र पसलियों और डायफ्राम की पेशियों की क्रिया को संचालित करके श्वसन की क्रिया पर नियंत्रण करता है। अतः श्वास क्रिया तन्त्रिकीय नियन्त्रण में होती है इसी कारण चाह कर भी हम श्वास क्रिया को बहुत देर तक नहीं रोक सकते। इसके अलावा पोन्स (Pons) में स्थित न्यूमोटेक्सिक केन्द्र (Pneumotaxic centre) प्रश्वसन को धीमा करता है।

(2) रासायनिक नियमन (Chemical regulation):

(i) रुधिर की CO2 (CO2 of blood):
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomous nervous system) शरीर के ताप, रुधिर में CO2 की अधिकता या O2 की कमी एवं रुधिर के pH के आदि से प्रभावित होकर श्वास केन्द्र, श्वासोच्छ्वास से संबंधित पेशियों को उद्दीप्त करता है और इन परिस्थितियों में यह साँस लेने की गति में वृद्धि करता है।

(ii) रुधिर की O2 (O2 of blood):
कैरोटिड ग्रंथि (Carotid glands) एवं ऐओर्टिक चाप (Aortic arch) में संवेदी या ग्राही (Receptors) का समूह उपस्थित होता है, जो कि रुधिर को PO2 एवं PCO2 में होने वाले परिवर्तनों को ग्रहण करके उन्हें श्वसन केन्द्र (Respiratory center) तक पहुँचाते हैं तथा यह श्वसन केन्द्र श्वासोच्छ्वास से संबंधित सभी पेशियों को श्वासोच्छ्वास क्रिया के लिए निर्देशित करती है।

जब कभी फेफड़ा आवश्यकता से अधिक फुल जाता है, तब केन्द्र एक प्रकार का प्रतिवर्ती चाप चक्र (Reflex arch of cycle) बनाते हैं, इस चाप चक्र को हेरिंग ब्रुएर चाप (Hering Breuer Arch) कहते हैं । यह चाप ऐसी स्थिति में श्वसन दर को बढ़ा देता है।

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प्रश्न 8.
pCO2 का ऑक्सीजन के परिवहन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
ऐल्विओलर कोशिकाओं में उपस्थित ऑक्सीजन रहित (Deoxygenated) रुधिर के pCO2 के मान 46 mm Hg होता है, जो कि एल्विओलर वायु के pCO2 (40 mm Hg) से अधिक होता है। अत: pCO2 के मान में इस अंतर के कारण CO2 ऐल्विओलर कोशिकाओं में विसरित होकर ऐल्विओलाई (Alveoli) में चली जाती है तथा क्रिया तब तक होती है, जब तक कि रक्त का pCO2 मान घटकर 40 mm Hg तक नहीं हो जाता है।

प्रश्न 9.
पहाड़ पर चढ़ने वाले व्यक्ति की श्वसन प्रक्रिया में क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
जब व्यक्ति ऊपर चढ़ने लगता है तब वायुमण्डलीय दाब बढ़ जाता है। जिससे बाहर की वायु बलपूर्वक फेफड़ों के अन्दर आ जाती है अर्थात् अंतःश्वसन की क्रिया होती है। डायफ्राम और अंतरापर्शक पेशियों का शिथिलन डायफ्राम और उरोस्थि को उनके सामान्य स्थान पर वापस कर देते हैं और वक्षीय आयतन को घटाता है। जिससे फुफ्फुसीय आयतन घट जाता है इसके परिणामस्वरूप अंतर फुफ्फुसीय दाब वायुमण्डलीय दाब से थोड़ा अधिक होता जाता है। जिससे फेफड़ों की हवा बाहर निकल जाती है। अर्थात् निःश्वसन हो जाता है।

प्रश्न 10.
कीटों में श्वसन क्रियाविधि कैसी होती है ?
अथवा
कीटों या ऑर्थोपोड्स में गैसीय आदान-प्रदान का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
कीटों तथा ऑर्थोपोड्स जन्तुओं में गैसीय आदान-प्रदान तथा परिवहन-कीटों और आर्थोपोडा संघ के दूसरे जीवों जैसे-बिच्छू, तिलचट्टा इत्यादि में गैसीय आदान-प्रदान तथा परिवहन पतली-पतली विशिष्ट नलिकाओं के जाल से होता है, जिसे श्वास नलिका तंत्र (Tracheal system) कहते हैं इनकी नलिकाएँ श्वास नलिका (Trachea) कहलाती हैं।

ट्रैकिया विशिष्ट श्वसन रचनाएँ होती हैं, जो शरीर के पार्श्व में ऊपरी सतह पर श्वास रन्ध्र या स्पाइरेकल (Spiracle) नामक छिद्र के रूप में शुरू होती हैं और पतली श्वास नलिकाओं (Tracheoles) के जाल तंत्र में खुलती हैं।

इन ट्रैकिओल्स अर्थात् पतली श्वास नलिकाओं का अन्त छोटे-छोटे कोष्ठों में होता है, जिन्हें वायु कोष्ठ (Air sacs) कहते हैं। ये वायु कोष्ठ शरीर के ऊतकों में स्थित होते हैं। कीटों के वक्षीय (Tho Tracheole racic) भाग में दो जोड़ी तथा उदर भाग में 8 जोड़ी स्पाइरेकिल्स (अर्थात् प्रत्येक खण्ड के दोनों पार्यो में एक-एक) पाये जाते हैं। गैसीय आदान-प्रदान के समय उदर की पेशियाँ शिथिल होती हैं।

परिणामस्वरूप उदर का आयतन बढ़ जाता है, फलतः वातावरणीय वायु श्वास छिद्रों के द्वारा क्रमशः ट्रैकिया, ट्रैकिओल्स और वायु कोष्ठों में चली जाती है।इन कोष्ठों से वायु की ऑक्सीजन ERE विसरित होकर ऊतक कोशिकाओं में चली जाती है और CO2 का कुछ हिस्सा विसरण द्वारा ही वायु कोष्ठों में चला जाता है, अब उदर की पेशियाँ संकुचित होती हैं और बाहर निकल जाती हैं।

श्वसन या वायु कोष्ठों, ट्रैकिओल्स और ट्रैकिया से होते हुए श्वासरन्ध्रों द्वारा बाहर निकल जाता है। श्वसन या ऑक्सीकरण में बनी CO2 की बहुत कम मात्रा को इस विधि द्वारा बाहर निकाला जाता है। अधिकांश CO2का निष्कासन तो रुधिर के माध्यम से होता है। इस विधि में CO2 रुधिर प्लाज्मा में घुल जाती है और बाह्य कंकाल से विसरित होकर शरीर से बाहर निकल जाती है।

स्पाइरेकल से शुरू होने वाली श्वास नलियाँ शरीर के पृष्ठ तथा प्रतिपृष्ठ दोनों सतहों पर नलिका तंत्र बनाती हैं। ऑर्थोपोडा संघ के जन्तुओं में चूँकि O2 का वितरण सीधे नलियों द्वारा कोशिकाओं को होता है, अतः इसमें परिसंचरण तंत्र का कोई योगदान नहीं होता।

इसी कारण कीटों तथा दूसरे ऑर्थोपोडा में हीमोग्लोबिन नहीं होता, फलतः इनका रुधिर रंगहीन होता है। जब ऑर्थोपोडा जन्तु विश्रामावस्था में रहते हैं, तब इनके ट्रैकिओल्स में ऊतक द्रव भरा रहता है, लेकिन जब ये सक्रिय अवस्था में होते हैं, तब वायु के दबाव के कारण ऊतक द्रव ट्रैकिओल्स के अन्तिम सिरों अर्थात् वायु कोष्ठों में केन्द्रित हो जाता है।

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चित्र – एक कीट का श्वास नलिका तंत्र
(A) नलिका तंत्र जिसमें सफेद नलिकाएँ पृष्ठ तथा काली प्रतिपृष्ठ सतह के नलिका तंत्र को व्यक्त करती हैं।
(B) विश्रामावस्था में ट्रैकिओल
(C) सक्रिय अवस्था में ट्रैकिओल

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प्रश्न 11.
ऑक्सीजन वियोजन वक्र की परिभाषा दीजिए, क्या आप इसकी सिग्माभ आकृति का कोई कारण बता सकते हैं ?
उत्तर:
ऑक्सीजन वियोजन वक्र (Oxygen Dissociation Curve):
यह वह वक्र (Curve) है जो दर्शाता है कि PO2 के दबाव के कारण हीमोग्लोबिन में कितने प्रतिशत ऑक्सीजन की मात्रा संतृप्त (Saturated) हुई है। यह वक्र लाक्षणिक सिग्माभ (Sigmoid) या ‘S’ आकृति को प्रदर्शित करता है। वक्र की सिग्माभ आकृति (Sigmoid Pattern) PO2 के कारण हीमोग्लोबिन की संतृप्तता के कारण बनती है।

प्रश्न 12.
क्या आपने अवकाशीयता (हाइपोक्सिया न्यून ऑक्सीजन) के बारे में सुना है ? इस संबंध में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश कीजिए व साथियों के बीच चर्चा कीजिए।
उत्तर:
हाइपोक्सिया ऐसी स्थिति है जिससे ऊतकों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इसके दो प्रकार हैं –

1. कृत्रिम हाइपोक्सिया-इसका कारण ऊँचे स्थान पर ऑक्सीजन की कमी है यह मुख्यत: पहाड़ों पर होती है। इस बीमारी के लक्षण है –

  • साँसों में कमी होती है
  • सिर दर्द
  • चक्कर आना एवं चमड़ी का रंग हल्का नीला हो जाता है।

2. ऐनेमिक हाइपोक्सिया-इसका मुख्य कारण खून में कार्बन मोनोऑक्साइड नामक विषैले पदार्थ का पहुँचना या खून में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाने के कारण ऐनेमिया की बीमारी हो जाती है। इन दोनों घटनाओं में ऑक्सीजन के परिवहन में हीमोग्लोबीन की कमी होना है।

प्रश्न 13.
निम्न के बीच अंतर कीजिए –

  1. अन्तःश्वसित आरक्षित आयतन (IRV) एवं निःश्वसित आरक्षित आयतन (ERV)
  2. अंतःश्वसन क्षमता (IC) और निःश्वसन क्षमता (EC)
  3. जैव क्षमता और फेफड़ों की कुल धारिता।

उत्तर:
(1) अन्तःश्वसित आरक्षित आयतन (IRV) एवं निःश्वसित आरक्षित आयतन (ERV) –

(i) अंतःश्वसित आरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume, IRV):
यह वायु की वह मात्रा है जो एक स्वस्थ व्यक्ति प्रवाही आयतन (Tidal volume) के अतिरिक्त अन्तःश्वसित (Inspiratory) कर सकता है। पुरुषों में अन्तःश्वसित आरक्षित आयतन लगभग 3000 मिली तथा स्त्रियों में लगभग 1900 मिली होती है।

(ii) निःश्वसित आरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume, ERV):
यह वायु की वह मात्रा है जो सामान्य अन्तःश्वसन के पश्चात् प्रवाही आयतन के अतिरिक्त फेफड़ों से बलपूर्वक नि:श्वसित की जा सकती है। पुरुषों में नि:श्वसित आरक्षित आयतन लगभग 1000 मिली. तथा स्त्रियों में 700 मिली. होता है।

(2) अन्तःश्वसन क्षमता (IC) और निःश्वसन क्षमता (EC) में अंतर –

(i) अन्तःश्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity):
यह प्रवाही आयतन (TV) तथा अन्तःश्वसित आरक्षित आयतन (IRV) के योग के बराबर होती है। अत: यह वायु की वह कुल मात्रा है जिसे अधिकतम चेष्टा द्वारा अन्तःश्वसित किया जा सकता है। पुरुषों में यह 3500 (500 + 3000) मिली. तथा स्त्रियों में 2400 (500 +1900) मिली. होती है।

(ii) निःश्वसन क्षमता (Expiratory Capacity) –
यह किसी व्यक्ति में वायु की वह कुल मात्रा है जो वह सामान्य निःश्वसन में बाहर निकालता है। यह प्रवाही आयतन (TV) तथा नि:श्वसित आरक्षित आयतन (ERV) का योग होता है।

(3) जैव क्षमता और फेफड़ों की कल धारिता –

1. जैव क्षमता (Vital Capacity):
यह अन्तःश्वसित आरक्षित आयतन (IRV), प्रवाही आयतन (TV) तथा निःश्वसित आरक्षित आयतन (ERV) के योग के बराबर होती है। इस प्रकार यह वायु की वह अधिकतम आयतन है। जिसे अधिकतम गहरी श्वास लेने के बाद फेफड़ों से बाहर निकाला जाता है। पुरुषों में यह 4500 (3000 + 500 +1000) मिली. तथा स्त्रियों में 3100 (1900 + 500 +700) मिली. होती है।

2. फेफड़ों की कुल धारिता (Total lung Capacity):
यह जैवक्षमता (VC) तथा अवशेषी आयतन (RV) के योग के बराबर होते हैं, अर्थात् यह वायु की वह अधिकतम मात्रा है जो अधिकतम चेष्टा से अन्तःश्वास के उपरांत फेफड़ों में भरी पायी जाती है। पुरुषों में यह 5700 (4500 + 1200) मिली. तथा स्त्रियों में 4200 (3100 +1100) मिली. होती है।

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प्रश्न 14.
ज्वारीय आयतन (Tidal volume) क्या है ? एक स्वस्थ मनुष्य के लिए एक घंटे के ज्वारीय आयतन (लगभग मात्रा) को आकलित कीजिए।
उत्तर:
यह वायु का वह आयतन है, जो एक श्वासोच्छ्वास के दौरान लिया और छोड़ा जाता है। यह वायु के उस आयतन को व्यक्त करता है, जो एक श्वासोच्छ्वास के दौरान पूरे श्वसन तंत्र में स्थानान्तरित की जाती है। एक घंटे में सामान्य वयस्क व्यक्ति में इसका मान 500 मिली. होता है।

श्वसन और गैसों का विनिमय अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

श्वसन और गैसों का विनिमय वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –
1. जब फेफड़ों में 1200 ml वायु शेष रह जाती है तो इसे कहते हैं –
(a) जैव क्षमता
(b) प्रवाही आयतन
(c) अवशेषी आयतन
(d) निश्वसन आरक्षित आयतन।
उत्तर:
(c) अवशेषी आयतन

2. हीमोग्लोबिन के द्वारा परिवहन की गई O2 की प्रतिशत मात्रा होती है –
(a)97%
(b) 100%
(c)3%
(d)49%.
उत्तर:
(a)97%

3. अधिक ऊँचाई (High altitude) पर मनुष्य की R.B.Cs –
(a) के आकार में वृद्धि हो जाती है।
(b) की संख्या में वृद्धि हो जाती है।
(c) का आकार छोटा हो जाता है।
(d) की संख्या में कमी आ जाती है।
उत्तर:
(b) की संख्या में वृद्धि हो जाती है।

4. स्तनियों में फेफड़ों की वेन्टीलेशन गति का नियंत्रण किसके द्वारा होता है –
(a) डायफ्राम द्वारा
(b) कॉस्टल पेशियों द्वारा
(c) फेफड़ों की पेशीय भित्ति द्वारा
(d) (a) और (b) दोनों से।
उत्तर:
(a) डायफ्राम द्वारा

5. मनुष्य में एडम्स एप्पल होता है –
(a) फेफड़ों की उपास्थि में
(b) श्वासनाल की उपास्थि में
(c) कंठ की थायरॉइड उपास्थि में
(d) इपीग्लॉटिस में।
उत्तर:
(d) इपीग्लॉटिस में।

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6. कॉकरोच एवं खरगोश की श्वासनाल का सामान्य लक्षण होता है –
(a) दोनों में रोमाभि उपकला होती है
(b) दोनो में नॉन-कोलैप्सेबल भित्ति होती है
(c) दोनों की उत्पत्ति शीर्ष भाग से होती है
(d) दोनों जोड़ीदार तथा शाखित होते हैं।
उत्तर:
(c) दोनों की उत्पत्ति शीर्ष भाग से होती है

7. फेफड़ों की क्रियात्मक इकाई होती है –
(a) ट्रैकिया
(b) ब्रोंकाई
(c) ब्रोकिओल्स
(d) एल्विओलाई।
उत्तर:
(b) ब्रोंकाई

8. जब CO2 की सान्द्रता अधिक हो जाती है तो O2 का वक्र किस दिशा में जाता है –
(a) बाईं ओर
(b) दाहिनी ओर
(c) केन्द्र की ओर
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं।

9. निश्वसन या प्रश्वसन के समय, डायफ्राम –
(a) संकुचित होता है
(b) फैल जाता है
(c) शिथिल हो जाता है
(d) इनमें कोई परिवर्तन नहीं होता है।
उत्तर:
(b) फैल जाता है

10. वोकल कॉर्ड किसके अन्दर पाये जाते हैं –
(a) लैरिक्स
(b) फैरिक्स
(c) ग्लॉटिस
(d) एल्विओलाई।
उत्तर:
(a) लैरिक्स

11. अवायुवीय श्वसन होता है –
(a) हाइड्रा में
(b) केंचुए में
(c) फीताकृमि में
(d) कॉकरोच में।
उत्तर:
(a) हाइड्रा में

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12. शीत निष्क्रियता के समय मेढक श्वसन करता है –
(a) फेफड़े द्वारा
(b) गिल्स द्वारा
(c) मुखगुहा द्वारा
(d) त्वचा द्वारा।
उत्तर:
(c) मुखगुहा द्वारा

13. R.B.Cs. में वायुवीय श्वसन की क्षमता नहीं पाई जाती क्योंकि उनमें अभाव होता है –
(a) केन्द्रक का
(b) माइटोकॉण्ड्रिया का
(c) लाइसोसोम का
(d) E.R.का।
उत्तर:
(d) E.R.का।

14. जैविक ऑक्सीकरण में ऊर्जा किसके रूप में उत्पन्न होती है –
(a) ग्लूकोज
(b) लैक्टिक अम्ल
(c) A.T.P
(d) A.M.P
उत्तर:
(b) लैक्टिक अम्ल

15. बिच्छू का श्वसनांग होता है –
(a) गिल्स
(b) बुक लंग
(c) त्वचा
(d) बुक गिल्स।
उत्तर:
(c) त्वचा

16. रुधिर में ऑक्सीजन का परिवहन मुख्यतः किसके द्वारा होता है –
(a) रुधिर प्लाज्मा
(b) ल्यूकोसाइट्स
(c) थ्रॉम्बोसाइट्स
(d) इरीथ्रोसाइट्स।
उत्तर:
(b) ल्यूकोसाइट्स

17. CO2 के परिवहन के समय R.B.Cs. एवं प्लाज्मा के मध्य होने वाली क्रिया है –
(a) परासरण
(b) अधिशोषण
(c) क्लोराइड शिफ्ट
(d) अवशोषण।
उत्तर:
(d) अवशोषण।

18. निःश्वसित वायु में ऑक्सीजन की मात्रा होती है –
(a)4%
(b) 16%
(c)21%
(d) 78%.
उत्तर:
(c)21%

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19. श्वसन क्रिया संपन्न होती है –
(a) फेफड़ों की कूपिका कोशिकाओं में
(b) आहारनाल की कोशिकाओं में
(c) मस्तिष्क की कोशिकाओं में
(d) शरीर की समस्त कोशिकाओं में।
उत्तर:
(d) शरीर की समस्त कोशिकाओं में।

20. फेफड़ों का बाहरी स्तर बना होता है –
(a) प्लूरल झिल्ली का
(b) पेरीकार्डियम का
(c) पेरीटोनियम का
(d) श्लेष्मिक झिल्ली का।
उत्तर:
(a) प्लूरल झिल्ली का
उत्तर:

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. फेफड़ा ………….. में स्थित होता है।
  2. कीटों में श्वसन ……………. के द्वारा होता है।
  3. लाल रुधिराणुओं में उपस्थित श्वसन वर्णक ……………. है।
  4. सिगरेट पीने से ……………. रोग होता है।
  5. रुधिराणुओं में CO2 का परिवहन ……………. के रूप में होता है।
  6. क्रेब्स चक्र ……………. कोशिकांग में होता है।
  7. मानव के फेफड़ों में कुल पिण्डों की संख्या …………… होती है।
  8. रुधिर का pH घटने पर श्वसन दर ……………. हो जाती है।
  9. हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से मिलकर ……………. यौगिक बनाता है।
  10. ऊतकों में ऑक्सीजन अत्यधिक या अनुपस्थिति को ……………. कहते हैं।

उत्तर:

  1. वक्ष गुहा
  2. स्पाइरेकल, गिल
  3. हीमोग्लोबिन
  4. एम्फीसेमा
  5. बाईकार्बोनेट
  6. माइटोकॉण्ड्रिया
  7. पाँच
  8. कम
  9. ऑक्सीहीमोग्लोबिन
  10. एनॉक्सिया।

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प्रश्न 3.
एक शब्द में उत्तर दीजिए –

  1. मनुष्य की श्वसन दर क्या होती है ?
  2. मनुष्य में कितनी एल्विओलाई पाई जाती है ? इनका कुल क्षेत्रफल कितना होता है ?
  3. मानव श्वसन गैसों का विनिमय कहाँ होता है ?
  4. ऐसे जीवों का नाम जिनकी श्वसन क्रिया में रक्त भाग नहीं लेता।
  5. श्वासोच्छ्वास में उपयोग की गई गैस के आयतन को क्या कहते हैं ?
  6. लीच और कीटों के श्वसनांग का नाम लिखिए।
  7. हाइड्रा के शरीर का कौन-सा भाग गैसीय विनिमय में भाग लेता है ?
  8. मछली के श्वसनांग का नाम लिखिए।
  9. मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा श्वासोच्छ्वास को नियंत्रित करता है ?
  10. नेरीस के किस अंग में श्वसन के समय गैसीय विनिमय होता है ?

उत्तर:

  1. 16 से 20 प्रति मिनट
  2. मनुष्य में 750,000,000 एल्विओलाई पाई जाती हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 100 वर्गमीटर
  3. फेफड़े में
  4. एक कोशिकीय जन्तु जैसे-अमीबा, पैरामीशियम
  5. टाइडल वाल्यूम (T.V.)
  6. लीच-शरीर की सतह, कीट-ट्रैकियल तंत्र
  7. विशिष्ट कोशाएँ
  8. गिल्स
  9. मेड्युला ऑब्लांगेटा
  10. पैरापोडिया।

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प्रश्न 4.
उचित संबंध जोड़िए –
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय - 1
उत्तर:

  1. (e) पाइरुविक अम्ल
  2. (d) CO2 ATP
  3. (b) माइटोकॉण्ड्रिया
  4. (c) क्रेब्स चक्र
  5. (a) PPP

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय - 2
उत्तर:

  1. (b) ट्रैकिया
  2. (d) जल संवहन तंत्र
  3. (c) पैरापोडिया
  4. (a) त्वक श्वसन
  5. (e) ट्रैकिओल

श्वसन और गैसों का विनिमय अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धूम्रपान का श्वसन संबंधी क्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
धूम्रपान से श्वसन पथ की श्लेष्मा झिल्ली उत्तेजना की स्थिति पर आ जाती है। धुएँ में उपस्थित हानिकारक पदार्थ श्वसनांगों की आंतरिक सतह पर जम जाते हैं जिसके कारण श्वासनली एवं श्वसनिका और . वायु कोष्ठों का स्थान कम हो जाता है तथा इसकी कोशिकाओं को उत्तेजित करके कोशिकाओं को विभाजन के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे कैंसर की सम्भावना बढ़ जाती है।

प्रश्न 2.
शरीर में ऑक्सीजन की कमी को क्या कहा जाता है ?
उत्तर:
शरीर में ऑक्सीजन की कमी को हाइपॉक्सिया (Hypoxia) कहते हैं। यह स्थिति ऊँचाई या वायुदाब में कमी या सायनाइड विषाक्तता के कारण होती है।

प्रश्न 3.
CO2 सान्द्रता तथा ऑक्सीहीमोग्लोबिन का टूटना किस प्रकार एक-दूसरे से संबंधित है ?
उत्तर:
CO2 की सान्द्रता एवं ऑक्सीहीमोग्लोबिन के टूटने के प्रभाव की खोज सबसे पहले बोहर ने की। ये दोनों क्रियाएँ एक-दूसरे की समानुपाती होती हैं । वास्तव में CO2 रक्त में घुलकर इसे अम्लीय बना देती है। फलतः ऑक्सीहीमोग्लोबिन ऑक्सीजन और हीमोग्लोबिन में टूट जाता है।

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प्रश्न 4.
श्वसन एवं श्वासोच्छ्वास में अंतर बताइए।
उत्तर:
श्वसन तथा श्वासोच्छ्वास में अंतर –

श्वसन (Respiration):

  • यह जैव-रासायनिक क्रिया है, जिसमें O2 द्वारा भोजन का ऑक्सीकरण होता है।
  • इस क्रिया में ATP ऊर्जा मुक्त होती है।
  • यह क्रिया अन्त:कोशिकीय होती है।

श्वासोच्छ्वास (Breathing):

  • यह एक भौतिक क्रिया हैं, जिसमें श्वसन में O2 ली जाती है एवं नि:श्वसन में CO2 मुक्त होती है।
  • इस क्रिया में ATP ऊर्जा मुक्त नहीं होती है।
  • यह क्रिया बाह्य कोशिकीय होती है।

प्रश्न 5.
‘नाक से श्वास लेना, मुँह से श्वास लेने की अपेक्षा बेहतर माना जाता है। कारण बताइये।
उत्तर:
नाक से श्वास लेना अधिक स्वास्थ्यप्रद है, क्योंकि –

  • यह एक स्वाभाविक क्रिया है।
  • श्वास में ली जाने वाली वायु में धूल के कण, बैक्टीरिया आदि हानिकारक पदार्थ होते हैं। नाक में पाये जाने वाले रोमों से ये छनते हैं तथा फेफड़े में जाने वाली हवा शुद्ध बनी रहती है।
  • नाक में पाये जाने वाली टर्बाइनल हड्डी हवा को गर्म करने का कार्य करती है।

प्रश्न 6.
प्रोटोजोआ में श्वसन अंग आवश्यक नहीं है, क्यों?
उत्तर:
प्रोटोजोआ समूह के जन्तुओं जैसे-अमीबा, यूग्लीना, पैरामीशियम आदि में श्वसन क्रिया सामान्य शारीरिक सतह के द्वारा होती है, जिसमें O2 गैस कोशिका झिल्ली से विसरित होकर अंदर जाती है। अतः इनमें श्वसनांगों की आवश्यकता नहीं होती है।

प्रश्न 7.
जोंक तथा कीटों के श्वसन अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • जन्तु – श्वसन अंग
  • जोंक – त्वचा
  • कीट – ट्रैकिया (श्वासनाल)।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में श्वसन अंग के नाम लिखिए –

  1. केंचुआ
  2. पक्षी
  3. मछली
  4. उभयचर।

उत्तर:
जन्तु – श्वसन अंग

  1. केंचुआ – त्वचा
  2. पक्षी – फेफड़ा
  3. मछली – गलफड़े या गिल्स
  4. उभयचर – त्वचा।

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श्वसन और गैसों का विनिमय लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हीमोग्लोबिन की रासायनिक प्रकृति एवं गुण समझाइये।
उत्तर:
लाल रुधिर कणिकाओं में एक विशेष वर्णक पाया जाता है, जिसे हीमोग्लोबिन कहते हैं। यह एक विशेष प्रोटीन है, जिसमें आयरन (हीम) समूह जुड़ा होता है, इस प्रोटीन को ग्लोब्यूलीन कहते हैं। हीमोग्लोबिन एक वृहद् अणु है जिसका सूत्र C587 H1213 N195 O214 S3Fe है। यह ऑक्सीजन से संयुक्त होकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है। ऊतकों में यह टूटकर पुनः ऑक्सीजन और हीमोग्लोबिन बना देता है। इस प्रकार यह रुधिर के द्वारा O2 का सम्वहन करता है।

प्रश्न 2.
श्वसन किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार का होता है ? समझाइए।
उत्तर:
श्वसन जीवों में होने वाली एक ऑक्सीकरण क्रिया है, जिसमें जटिल कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में अपघटन किया जाता है, जिसके फलस्वरूप जल और CO2 अथवा कार्बनिक पदार्थ और CO2 बनते हैं अथवा ऊर्जा मुक्त होती है। इसे निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं –
C6H12O6 + 6O2 → 6H2O + 6CO2 + 673 kcal ऊर्जा या 38 ATP

श्वसन के प्रकार:
श्वसन दो प्रकार का होता है –
(1) अवायवीय या अनॉक्सी श्वसन (Anaerobic Respiration) –यह वह श्वसन है, जिसमें भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण O2 की अनुपस्थिति में अपूर्ण रूप से CO2 और सरल कार्बनिक पदार्थों जैसे-ऐथिल ऐल्कोहॉल, साइट्रिक अम्ल, लैक्टिक अम्ल, मैलिक अम्ल, ब्यूटेरिक अम्ल या ऑक्जेलिक अम्ल में हो जाता है। यह श्वसन कुछ निम्न कोटि के सूक्ष्म जीवों, परजीवियों, जीवाणुओं, यीस्टों तथा कुछ जन्तु ऊतकों में होती है।
C6H12O6 → 2C2H5OH (एथिल ऐल्कोहॉल)  + 2CO2 + 21 kcal या 2 ATP

(2) वायवीय या ऑक्सी श्वसन (Aerobic Respiration):
यह वह श्वसन है, जिसमें खाद्य पदार्थों का ऑक्सीकरण O2 की उपस्थिति में जल तथा CO2 में होता है। कुछ पौधों, निम्न श्रेणी के जीवों तथा सभी जन्तुओं में इसी प्रकार का श्वसन होता है।
C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O + 673 kcal ऊर्जा या 38 ATP ऊर्जा

प्रश्न 3.
श्वसन एवं जारण में दो अंतर लिखिए।
उत्तर:
श्वसन एवं जारण में अंतर –
श्वसन (Respiration):

  • यह एक जैविक क्रिया है।
  • इसमें मन्द गति से ऑक्सीकरण होता है।
  • इसकी ऊर्जा ATP के रूप में संचित रहती है।
  • इसमें ताप कम होता है और यह एक नियन्त्रित क्रिया है।

जारण (Combustion):

  • यह एक अजैविक क्रिया है।
  • इसमें तीव्र गति से ऑक्सीकरण होता है।
  • इसकी ऊर्जा प्रकाश एवं ताप के रूप में निकलती है।
  • इसका ताप अधिक होता है और यह एक अनियन्त्रित क्रिया है।

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प्रश्न 4.
निःश्वसन की क्रिया में अन्तःअन्तरापर्युक पेशी का क्या महत्व है ?
उत्तर:
अन्तःअन्तरापर्युक पेशियों (Intercostal muscles) के संकुचन से पसलियाँ दबती हैं। इसी समय डायफ्राम शिथिल व उदरगुहा संकुचित होती है, इन सबके सम्मिलित प्रभाव के कारण वक्षीय गुहा का आयतन कम हो जाता है। फलत: फेफड़े का भी आयतन कम और फेफड़े के अंदर वायु दाब बढ़ जाता है तथा फेफड़े की वायु निकल जाती है। अतः अन्तःअन्तरापर्युक पेशियाँ निःश्वसन क्रिया के होने में मदद करती हैं।

प्रश्न 5.
वायवीय श्वसन एवं अवायवीय श्वसन में अंतर लिखिये।
अथवा
ऑक्सी एवं अनॉक्सी श्वसन में अंतर लिखिये।
उत्तर:
वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में अंतर –
वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration):

  • यह श्वसन 0, की उपस्थिति में होता है। इसकी कुछ क्रिया कोशिकाद्रव्य (ग्लाइकोलिसिस) और कुछ माइटोकॉण्ड्रिया में होती है।
    ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है।
  • उत्पाद CO2 एवं H2 O बनते हैं।
  • 38 ATP या 673 K cal ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • हानिकारक पदार्थ नहीं बनता है।

अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration):

  • यह श्वसन O2 की अनुपस्थिति में होता है तथा इसकी समस्त क्रियाएँ कोशिकाद्रव्य में होती ग्लूकोज का अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है।
  • उत्पाद ऐल्कोहॉल एवं CO2 बनते हैं।
  • 2ATP अथवा 21 k cal ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • एथिल ऐल्कोहॉल जैसा हानिकारक पदार्थ बनता है।

प्रश्न 6.
ऑक्सीजन ऋण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
भारी काम या कसरत के समय पेशियों को जल्दी और अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है जिसके कारण ग्लाइकोलिसिस द्वारा अनॉक्सी रूप में ATP का उत्पादन होने लगता है। इस क्रिया में बना पायरुविक अम्ल लैक्टिक अम्ल में रूपान्तरित होकर जमा होने लगता है। इस अम्ल के ऑक्सीकरण के लिए अतिरिक्त O2 की आवश्यकता पड़ती है। पेशियों में O2 की इसी अतिरिक्त खपत को ऑक्सीजन ऋण कहते हैं। कुछ मात्रा में O2 ऋण की पूर्ति मायोग्लोबीन के द्वारा की जाती है।

प्रश्न 7.
माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का विद्युत् गृह (Power house) क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
माइटोकॉण्ड्रिया ही वह अंग है, जहाँ भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण करके ATP का उत्पादन किया जाता है, जिसमें उच्च ऊर्जा संचित रहती है। यही ATP अपघटित होकर संचित ऊर्जा को मुक्त कर देता है चूँकि माइटोकॉण्ड्रिया में ऊर्जा का उत्पादन होता है, इसी कारण इसे कोशिका का ऊर्जा गृह कहते हैं।

प्रश्न 8.
बाह्य श्वसन तथा आंतरिक श्वसन में क्या अंतर है ?
उत्तर:
बाह्य श्वसन तथा आन्तरिक श्वसन में अंतर –
बाह्य श्वसन (External Respiration):

  • इस प्रकार के श्वसन में गैस विनिमय घिरे हुए माध्यम से होता है, जिसमें O2 ली जाती एवं CO2 मुक्त होती है।
  • यह क्रिया श्वसन अंगों, जैसे-त्वचा या फेफड़ों द्वारा होती है।
  • इस क्रिया में O2 ग्रहण कर एवं CO2 मुक्त किया जाता है।
  • यह एक भौतिक प्रक्रिया है।

आन्तरिक श्वसन(Internal Respiration):

  • इस प्रकार के श्वसन में ऊतक कोशिका द्वारा ऑक्सीजन ली जाती है, जिससे भोजन का ऑक्सी करण होता है एवं ऊर्जा प्राप्त होती है एवं ऊतक कोशिकाओं द्वार CO2 मुक्त होती है।
  • यह क्रिया कोशिका के अंदर सम्पन्न होती है।
  • इस क्रिया में भोजन का ऑक्सीकरण होता है एवं CO2 मुक्त होती है।
  • यह एक रासायनिक प्रक्रिया है।

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प्रश्न 9.
क्लोराइड शिफ्ट से क्या समझते हो?
उत्तर:
क्लोराइड शिफ्ट:
श्वसन क्रिया के परिणामस्वरूप ऊतकों में संचित भोज्य पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है, जिससे ऊर्जा प्राप्त होती है एवं CO2 मुक्त होती है। मुक्त CO2 ऊतक द्रव्य के माध्यम से ऊतक कोशिकाओं में पहुँच जाती है। इस प्रकार R.B.Cs. में कार्बोनेट की मात्रा बढ़ जाने से pH का मान बढ़ जाता है। विद्युत् तटस्थता बनाये रखने के लिए HCO3 आयन प्लाज्मा में जाते हैं एवं समान मात्रा में प्लाज्मा से CI आयन R.B.Cs. में आते हैं । इस प्रकार प्लाज्मा में सोडियम बाइकार्बोनेट एवं R.B.Cs. में पोटैशियम क्लोराइड एकत्रित हो जाता है। इस क्रिया को क्लोराइड शिफ्ट कहते हैं।

प्रश्न 10.
CO2 की सान्द्रता एवं ऑक्सीहीमोग्लोबिन का टूटना किस प्रकार एक-दूसरे से संबंधित है ?
उत्तर:
CO2 की सान्द्रता ऑक्सीहीमोग्लोबिन के टूटने की क्रिया को नियन्त्रित करती है। ये दोनों क्रियाएँ एक-दूसरे के समानुपाती हैं। जब रुधिर या ऊतकों में CO, की सान्द्रता ज्यादा हो जाती है, तब रुधिर का माध्यम अम्लीय हो जाता है, क्योंकि यह रुधिर प्लाज्मा के जल से मिलकर कार्बोनिक अम्ल ( H2CO3) बनाती है –
CO2 +H2O → H2CO3
अम्लीय माध्यम में ऑक्सीहीमोग्लोबिन को ऑक्सीजन तथा हीमोग्लोबिन में टूटने के लिए प्रेरित करता है। फलत: यह O2 और हीमोग्लोबिन में टूट जाती है।

प्रश्न 11.
क्या कारण है कि अधिक कार्य के दौरान हमारी पेशियाँ थक जाती हैं ?
उत्तर:
अधिक या तीव्र कार्य के दौरान पेशियों के लिए आवश्यक ऊर्जा की पूर्ति ऑक्सी ऑक्सीकरण से नहीं हो पाती, इस कारण उनमें भोज्य पदार्थों का अनॉक्सी ऑक्सीकरण तीव्र दर से होने लगता है और ऊर्जा की पूर्ति का प्रयास किया जाता है। अनॉक्सी श्वसन के दौरान ग्लाइकोलिसिस में बने पायरुविक अम्ल को लैक्टिक अम्ल में बदल दिया जाता है। इसी लैक्टिक अम्ल के जमाव के कारण पेशियाँ थक जाती हैं, लेकिन कुछ देर आराम करने के बाद लैक्टिक अम्ल पुनः पायरुविक अम्ल में बदल जाता है और हम सामान्य हो जाते हैं।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. ट्रैकिओल्स एवं ब्रोकिओल्स
  2. कार्ब ऐमीनो हीमोग्लोबिन एवं ऑक्सीहीमोग्लोबिन।

उत्तर:
(1) ट्रैकिओल्स एवं ब्रोकिओल्स में अंतर –
ट्रैकिओल्स (Tracheoles):
कीटों की श्वासनली के अग्र भाग पर ऊतकों से बनी अधिक संख्या में शाखाएँ पाई जाती हैं, जिसके द्वारा गैसीय विनिमय अर्थात् O2 का लेना एवं CO2 का छोड़ना होता है।

ब्रोकिओल्स (Bronchioles):
स्तनधारियों में प्रत्येक ब्रोंकाई कई छोटी शाखाओं में विभाजित हो जाती है, जिसे ब्रोंकिओल्स कहते हैं। इन ब्रोंकिओल्स में गैसीय विनिमय नहीं होता।

(2) कार्ब ऐमीनो हीमोग्लोबिन एवं ऑक्सीहीमोग्लोबिन में अंतर –
कार्ब ऐमीनो हीमोग्लोबिन (Carbamino haemoglobin):

  • कार्बन-डाइऑक्साइड जब एरिथ्रोसाइट (R.B.Cs.) में प्रवेश करती है तो वह इसके ग्लोबिन भाग से जुड़कर कार्ब ऐमीनो हीमोग्लोबिन बनाती है।
  • इसे अशुद्ध रक्त कहा जाता है।

ऑक्सीहीमोग्लोबिन (Oxyhaemoglobin):

  • ऑक्सीजन एरिथ्रोसाइट में विसरित होकर हीमोग्लो बिन के Fe भाग से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है।
  • इस प्रकार के रक्त को शुद्ध रक्त कहा जाता है।

प्रश्न 13.
गैसीय आदान-प्रदान के लिए श्वसन सतह में क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं ?
उत्तर:
गैसीय आदान-प्रदान के लिए श्वसन सतह में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं –

  • श्वसन सतह पतली होती है, जिससे गैसों का आदान-प्रदान सरलता से हो सके।
  • श्वसन सतहों में म्यूकस ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं, जिनके कारण यह हमेशा नम बनी रहती है। इस नमी में आदान-प्रदान से सम्बन्धित गैसें सरलता से घुलकर आदान-प्रदान को सरल बनाती हैं।
  • श्वसन सतहों में रुधिर केशिकाओं का जाल फैला रहता है, जिससे गैसें परासरित होकर इनके रुधिर में घुल जाती हैं।
  • श्वसन सतहों का क्षेत्रफल सामान्य से अधिक होता है, जिससे अधिक-से-अधिक गैसों का आदान-प्रदान हो सके।

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श्वसन और गैसों का विनिमय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य के श्वसन संबंधी किन्हीं चार रोगों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
श्वसन संबंधी कौन-कौन-सी अनियमितताएँ हो सकती हैं ?
उत्तर:
श्वसन तंत्र से संबंधित निम्नलिखित बीमारियाँ या विकार उत्पन्न हो सकते हैं –

(1) अस्थमा (Asthma):
यह एक प्रकार की एलर्जी प्रतिक्रिया है, जिसमें म्यूकस द्रव गाढ़ा हो जाता है। इस कारण नि:श्वसन में बाधा उत्पन्न होती है। यह रोग सामान्यतः पुष्पों के परागकण या भोज्य-पदार्थों से ऐलर्जी उत्पन्न होने के कारण होता है।

(2) सर्दी-जुकाम (Common Cold):
यह रोग वाइरस के कारण होता है। नासिका की म्यूकस झिल्ली में सूजन हो जाती है एवं म्यूकस द्रव का स्रावण अधिक हो जाता है। नाक बन्द हो जाती है एवं साँस लेने में कठिनाई उत्पन्न होती है।

(3) इनफ्लूएन्जा (Influenza):
यह रोग इन्फ्लुएन्जा वाइरस के द्वारा होता है। इस रोग में म्यूकस झिल्ली में सूजन आ जाती है।

(4) एम्फिसेमा (Emphysema):
यह सामान्यतः धूम्रपान एवं प्रदूषण के कारण होता है। इसमें कूपिका की दीवार नष्ट हो जाने के कारण फेफड़ों के वायु ग्रहण या वायु विनिमय की क्षमता नष्ट हो जाती है।

(5) फुफ्फुस कैन्सर (Lung Cancer):
यह सामान्यत: धूमपान करने वाले व्यक्तियों में अधिक होता है। इस रोग के कारण ऊतक असामान्य वृद्धि करते हैं एवं रोगी की मृत्यु निश्चित होती है।

प्रश्न 2.
PO2 का ऑक्सीजन के परिवहन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
पल्मोनरी धमनी में ऑक्सीजनविहीन रुधिर पाया जाता है, जिसका PO2 (40 mmHg) ऐल्विओलाई के PO2 से कम (100 mm Hg) होता है। अतः आंशिक दाब (Partial pressure) में इस अंतर के कारण ऐल्विओलर O2 विसरित होकर कोशिकाओं में चली जाती है। इसे
ऑक्सीजनीकरण (Oxygenation) कहते हैं। यह ऑक्सीजन युक्त रुधिर ऐल्विओलर कोशिकाओं से पल्मोनरी शिरा (Pulmonary veins) में जाकर एकत्रित हो जाता है। पल्मोनरी शिरा में PO2 का मान लगभग 95 mm Hg होता है।

इस अवस्था में ऑक्सीजन युक्त रुधिर में, O2की मात्रा 19.8% होती है। इसी प्रकार ऐल्विओलर कोशिकाओं में उपस्थित ऑक्सीजन रहित (Deoxygen Capillary ated) रुधिर के PCO2 के मान 46 mm Hg होता है, जो कि एल्विओलर वायु के PCO2 (40 mm Hg) से अधिक होता है। अत:PCO2 के मान में इस अंतर के कारण CO2 ऐल्विओलर कोशिकाओं में विसरित होकर ऐल्विओलाई (Alveoli) में चली जाती है तथा क्रिया तब तक होती है, जब तक कि रक्त का PCO2 मान घटकर 40 mm Hg तक नहीं हो जाता है।

इस आंशिक दाब (Partial pressure) पर धमनी में उपस्थित रक्त में CO2 की मात्रा 52.7% होती है, जो कि शिराओं में पहुँचकर घटकर 49% तक हो जाती है। इस प्रकार ऐल्विओलर वायु में उपस्थित O2 पल्मोनरी शिरा के रुधिर में तथा रुधिर में उपस्थित CO2 पल्मोनरी धमनी में चली जाती है।
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय - 6

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित श्वसनांगों को चित्र द्वारा समझाइए –

  1. लैरिक्स
  2. ट्रैकिया
  3. ब्रोंकाई
  4. फेफड़े।

उत्तर:
स्तनी वर्ग का श्वसन तंत्र मुख्यतः चार अंगों लैरिक्स, ट्रैकिया ब्रोंकाई एवं फेफड़ों का बना होता है –

(1) कंठ या लैरिक्स (Larynx):
मनुष्य के नासाछिद्र नासापथ ग्रसनी में खुलते हैं। ग्रसनी की वायु एक छोटे से कोष्ठ में खुलती है, जिसे कंठ (Larynx) कहते हैं। यह भोजन नली की प्रतिपृष्ठ सतह पर स्थित होता है। इसकी गुहा को कण्ठकोष कहते हैं, जो आगे की तरफ ग्लॉटिस छिद्र द्वारा ग्रसनी से जुड़ा होता है। इसके ऊपर एपिग्लॉटिस नामक एक उपास्थि पायी जाती है, जो भोजन निगलते समय ग्लॉटिस को बन्द कर देती है, जिससे इसमें भोजन नहीं जा पाता, लेकिन श्वासोच्छ्वास के समय ग्लॉटिस को खोलकर वायु का आदान-प्रदान होने देती है।

कंठ उपास्थियों थायरॉइड, क्रिकॉइड और एक जोड़ी एरिटेनॉइड से घिरा रहता है। कंठ स्वर उत्पादक अंग है, जिसमें वाक्रज्जु नामक दो तन्तुमय रचनाएँ पायी जाती हैं। जब फेफड़े की वायु इनसे होकर गुजरती है, तब कम्पन के कारण ये ध्वनि पैदा करते हैं।

(2) ट्रैकिया या श्वासनाल (Trachea):
लैरिंक्स नीचे की ओर एक नली में खुलती है, जिसे श्वासनाल (Trachea) कहते हैं। वह वायु को ब्रोंकाई में पहुँचाती और लगभग 12 cm लम्बी पूरी गर्दन की लम्बाई में स्थित होती है। इसका कुछ भाग वक्षीय गुहा में भी स्थित होता है। इसकी दीवार पतली तथा लचीली होती है, जिसमें ‘C’ आकार के उपास्थि छल्ले पाये जाते हैं। ये छल्ले इसे पिचकने से बचाते हैं। इसकी आन्तरिक सतह पर तन्तुमय श्लेष्मा झिल्ली पायी जाती है। यह श्वसन में ली गयी वायु को फेफड़े तक तथा फेफड़े की वायु को कण्ठ तक पहुँचाती है।

(3) ब्रोंकाई (Bronchi):
ट्रैकिया वक्षगुहा में जाकर दो शाखाओं में बँट जाती है, इन शाखाओं को ब्रोंकाई कहते हैं। ये ब्रोंकस अपनी तरफ के फेफड़े में जाकर कई शाखाओं में बँट जाते हैं, जिन्हें ब्रोंकिओल कहते हैं। प्रत्येक ब्रोकिओल पुन: 2 से 11 शाखाओं में बँट जाता है, जिन्हें कूपिका वाहिनियाँ कहते हैं। इनका ऊपरी शिरा फुलकर कूपिका कोष बनाता है। प्रत्येक कूपिका कोष में अनेक छोटी कूपिकाएँ पायी जाती हैं। ये कूपिकाएँ फेफड़े की दीवार में स्थित होती हैं, जिनमें रुधिर कोशिकाएँ फैली होती हैं यहीं पर गैसीय आदान-प्रदान होता है।
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय - 7

(4) फेफड़े (Lungs):
इनकी संख्या 2 होती है। हृदय को छोड़कर समस्त उदरगुहा को यह घेरे रहता है। फेफड़ों के चारों ओर पायी जाने वाली गुहा को फुप्फुसीय गुहा (Pleural cavity) कहते हैं। फेफड़ों के चारों तरफ एक पतला आवरण पाया जाता है, जिसे विसरल प्लूरा (Visceral pleura) कहते हैं। प्लूरल गुहा के चारों ओर एक आवरण पाया जाता है, जिसे पेराइटल प्लूरा (Parietal pleura) कहते हैं।

इन्हीं दोनों आवरणों के बीच प्लूरल गुहा पाई जाती है। संरचनात्मक दृष्टि से फेफड़े में ब्रोन्क्रिओल्स, कूपिका वाहिका, कूपिका, रुधिर वाहिकाओं का जाल पाया जाता है। फेफड़े में वायु कोषों की उपस्थिति के कारण गैसीय विनिमय के लिए मनुष्य में 2,000 वर्ग फीट क्षेत्र प्राप्त होता है।

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MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन NCERT प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि, विभज्योतक तथा वृद्धि दर की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
(1) वृद्धि (Growth):
किसी कोशिका, अंग या सम्पूर्ण जीव के आकार या आयतन में होने वाला स्थायी तथा अनुत्क्रमणीय परिवर्तन जिसमें उसका शुष्क भार बढ़ जाता है, वृद्धि कहलाता है।

(2) विभेदन (Differentiation):
कोशिकाएँ कुछ विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने हेतु अपनी संरचना में कई प्रकार के बदलाव कर दूसरी कोशिकाओं से अलग दिखाई देती है, इस घटना को विभेदन कहते हैं।

(3) परिवर्धन (Development):
पौधे के जीवन-चक्र में आने वाले सभी परिवर्तनों को सम्मिलित रूप से परिवर्धन कहा जाता है।

(4) निर्विभेदन (Dedifferentiation):
जीवित विभेदित कोशिकाएँ कुछ विशेष परिस्थितियों में विभाजन की क्षमता पुनः प्राप्त कर लेती हैं, इस घटना को निर्विभेदन कहते हैं।

(5) पुनर्विभेदन (Redifferentiation):
निर्विभेदित कोशिकाओं द्वारा बनी कोशिकाएँ पुनः विभाजन क्षमता खो देती हैं, जिससे ये विशिष्ट कार्यों को संपन्न कर सकें । इस घटना को पुनर्विभेदन कहते हैं।

(6) विभज्योतक (Meristem):
पादपों में वृद्धि कुछ निश्चित स्थानों से ही होती है जिसे विभज्योतक (Meristem) कहते हैं।

(7) वृद्धि दर (Growth rate):
एक निश्चित समय में किसी अंग या पादप विशेष के आकार (आयतन) या भार में होने वाली वृद्धि उसकी वृद्धि दर कहलाती है।

(8) सीमित वृद्धि:
पौधों की पत्तियाँ, फल एवं पुष्प एक निश्चित आकार ग्रहण करने के पश्चात् वृद्धि करना बंद कर देते हैं, इसे ही सीमित वृद्धि कहते हैं । इस अवस्था के आने पर इन अंगों में कोशिका विभाजन की प्रक्रिया बंद हो जाती है। अत: वृद्धि आगे नहीं होती।

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प्रश्न 2.
पुष्यीय पौधों के जीवन में किसी एक प्राचलिक (Parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यत: जीवद्रव्य मात्रा में वृद्धि का परिणाम है। चूँकि जीवद्रव्य की वृद्धि को सीधे मापना कठिन है, अत: कुछ दूसरी मात्रकों को मापा जाता है, इसलिए वृद्धि को विभिन्न मापदंडों द्वारा मापा जाता है। कुछेक मापदंड हैं-ताजी भार वृद्धि, शुष्क भार, लंबाई क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिकाओं की संख्या आदि। मक्के की मूल शिखाग्र विभज्योतक (Root tip meristem) में प्रति घण्टे 17,500 या अधिक नई कोशिकाएँ पैदा होती हैं, जबकि एक तरबूज में कोशिकाओं की आकार में वृद्धि 3.50,000 गुना तक हो जाती है।

पहले वाले वृद्धि को कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि के रूप में व्यक्त किया जाता है जबकि बाद वाले वृद्धि को कोशिका के आकार में बढ़ोतरी के रूप में एक पराग नलिका की वृद्धि, लंबाई में बढ़त का एक अच्छा मापदंड है, जबकि पृष्ठाधार पत्ती की वृद्धि को उसके पृष्ठीय क्षेत्रफल की बढ़त के रूप में पाया जा सकता है। अतः स्पष्ट है पुष्पीय पौधों की वृद्धि को एक प्राचलिक (Parameter) से वर्णित नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
संक्षिप्त वर्णन कीजिए:

  1. अंकगणितीय वृद्धि
  2. ज्यामितीय वृद्धि
  3. सिग्मॉयड वृद्धि दर
  4. संपूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर।

उत्तर:

(1) अंकगणितीय वृद्धि:
समसूत्री कोशिका विभाजन के बाद के अंकगणितीय वृद्धि में केवल एक पुत्री कोशिका लगातार विभाजित होती रहती है जबकि दूसरी विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है। अंकगणितीय वृद्धि एक सरलतम अभिव्यक्ति है जिसे हम निश्चित दर पर दीर्धीकृत होते मूल में देख सकते हैं।

(2) ज्यामितीय वृद्धि:
ज्यामितीय वृद्धि में समसूत्री कोशिका विभाजन से प्राप्त दोनों संतति कोशिकाएँ विभाजन करती हैं। सीमित पोषण आपूर्ति के कारण वृद्धि धीमी होकर एक स्थिर अवस्था प्राप्त कर लेती है।

(3) सिग्मॉयड वृद्धि दर:
अगर वृद्धि दर का समय के साथ ग्राफ खींचा जाये तो अंग्रेजी भाषा के ‘s’ आकार का वक्र (Curve) प्राप्त होता है जिसे ‘s’ नुमा वक्र या सिग्मॉयड वक्र अथवा समग्र काल वक्र कहते हैं।

(4) संपूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर:
इकाई समय में पूर्ण वृद्धि का मापन एवं तुलना करना संपूर्ण वृद्धि दर (Absolute growth rate) कहलाता है, जबकि किसी दिये गये तरीके से प्रति इकाई समय में वृद्धि दर को प्रदर्शित करने की विधि को सापेक्ष वृद्धि दर (Relative growth rate) कहा जाता है।

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प्रश्न 4.
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखें। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनका प्रयोग के बारे में लिखिए।
उत्तर:
प्राकृतिक पादप वृद्धि के पाँच मुख्य समूह निम्नलिखित है –

  1. ऑक्सिन,
  2. जिबरेलिन्स
  3. साइटोकाइनिन
  4. एथिलीन
  5. एब्सिसिक एसिड।

1. ऑक्सिन:
ऑक्सिन की खोज एफ. डब्ल्यू वेण्ट (1928) ने किया। कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी:

  • यह पौधे को लम्बाई में बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
  • यह जड़ों के विकास को प्रेरित करता है।
  • यह बीजरहित फल निर्माण को प्रेरित करता है।
  • यह फलों के गिरने तथा पतझड़ को रोकता है तथा पुष्पन को प्रेरित करता है। आजकल ऑक्जिन का उपयोग खरपतवारों को नष्ट करने के लिए किया जाता है।

2. जिबरेलिन्स:
जिबरेलिन्स की खोज इवीति कुरोसावा (1926) ने किया। कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी –

  • इसके द्वारा पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है। इससे आनुवंशिक रूप से छोटे पौधे भी थोड़े बढ़ जाते हैं।
  • यह पुष्पन को जल्दी प्रेरित करता है।
  • इसके द्वारा बिना निषेचन के फल प्राप्त किया जा सकता है।
  • इसके प्रयोग से प्रसुप्ति काल को कम किया जा सकता है, जिससे जल्दी अंकुरण हो जाता है। इसके उपयोग से पत्तियाँ लम्बी व चौड़ी होती हैं।

3. साइटोकाइनिन:
साइटोकाइनिन की खोज जेब्रलोस्की एवं स्कूग (1954) ने किया। कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि / बागवानी –

(1) कोशिका विभाजन (Cell division):
अनेक उच्चवर्गीय तथा निम्नवर्गीय पौधों में सभी वृद्धिकारी हॉर्मोनों में साइटोकाइनिन ही कोशिका विभाजन के वास्तविक कारक पाये गये हैं। उच्चवर्गीय पौधों के अलग किये गये विभज्योतकी भागों में वृद्धि के लिए एक साइटोकाइनिन तथा एक ऑक्जिन का होना आवश्यक है। ये कोशिका विभेदन (Cellelongation) करते हैं।

(2) इनके द्वारा ऊतक संवर्धन (Tissue culture) में अवयव रचना का कार्य किया जाता है।

(3) साइटोकाइनिन बीजों तथा पौधों के कुछ अन्य भागों की प्रसुप्तता को भंग करने में अत्यन्त प्रभावी होते हैं।

(4) ये RNA संश्लेषण को नियन्त्रित करने में सूक्ष्म भूमिका निभाते हैं।

4. एथिलीन-एथिलीन की खोज बर्ग (1962) ने किया। कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी –

  • यह हॉर्मोन तनों के अग्र भागों में बनकर तथा फलों में विसरित होकर उनके पकने में सहायता करता है।
  • यह पौधे की लम्बाई में वृद्धि को रोकता है, किन्तु तनों के फूलने में सहायता करता है।
  • यह ऑक्जिन के समान पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनानास में पुष्पन को बढ़ाता है।
  • यह पौधों में नर पुष्पों की संख्या में कमी तथा मादा पुष्पों की संख्या में वृद्धि करता है।
  • यह पत्तियों, फलों व पुष्पों के विलगन को तीव्र करता है।
  • यह मूल रोमों के निर्माण तथा बीजों के अंकुरण को प्रेरित करता है।

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5. एब्सिसिक एसिड-एब्सिसिक एसिड की खोज कार्न एवं एडिकोट (1961-65) ने किया। कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि / बागवानी –
ऐब्सिसिक अम्ल एक प्रमुख पादप हॉर्मोन है जिसका पौधों के लिए निम्नलिखित महत्व है, अतः इन महत्वपूर्ण गुणों के कारण इन्हें तनाव हॉर्मोन भी कहते हैं –

  • यह पौधों की वृद्धि को रोकता है।
  • यह पत्तियों में जीर्णता पैदा करके पतझड़ को प्रेरित करता है।
  • यह जिबरेलिन के प्रभाव को रोकता है इस कारण इसे जिबरेलिन विरोधी भी कहते हैं।
  • यह बीजों के अंकुरण को रोकता है, जिससे इन्हें अधिक दिनों तक संरक्षित किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
दीप्तिकालिता तथा बसंतीकरण क्या है ? इनके महत्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) दीप्तिकालिता (Photoperiodism):
गारनर तथा एलार्ड ने सन् 1920 में दीप्तिकाल (Photoperiod) नामक शब्द का प्रयोग एक पौधे के दिन की अनुकूल लम्बाई के लिए किया। आधुनिक परिभाषा के अनुसार, “पौधों की दिन और रात्रि की आपेक्षिक लम्बाई के अनुसार अनुक्रिया को दीप्तिकालिता कहते हैं।” पौधों में पुष्प बनने की क्रिया इसका सर्वप्रसिद्ध उदाहरण है। यह अनुक्रिया, प्रकाशी-उत्क्रमणीय वर्णक फाइटोक्रोम द्वारा नियन्त्रित की जाती है। दिवालय या ताल (Cireadian or Rhythm) दीप्तिकालिता के आधारभूत साधन माने गये हैं।

दीप्तिकालिता का आर्थिक महत्व-दीप्तिकालिता की बागवानी तथा कृषि में बहुत अधिक महत्व है। प्रकाश की अवधि को नियंत्रित करके किसी पौधे में कभी भी पुष्पन कराया जा सकता है। इस तरह वर्ष में केवल एक बार फलने वाले पौधे से दो बार फल प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार कृत्रिम रूप से प्रकाश की अवधि को नियन्त्रित करके बिना मौसम के भी फल प्राप्त किये जा सकते हैं।

(2) बसन्तीकरण (Vernalization):
सोवियत रूस के वैज्ञानिक लाइसेंको ने देखा कि यदि शीतकालीन पादपों के बीजों को कृत्रिम रूप से 0°C से 5°C ताप पर कुछ दिनों के लिए रख दिया जाए और इन्हें बसन्त के दिनों में बोया जाए तो ये उसी साल फल देने लगते हैं अर्थात् इनमें बसन्ती पादप के समान गुण प्राप्त हो जाते हैं।

इस घटना को बसन्तीकरण (Vernalization) कहते हैं अर्थात् पुष्पीकरण को प्रभावित करने के लिए बीजों या पौधों को ठण्डे स्थानों में रखने की क्रिया को बसन्तीकरण कहते हैं। यदि बसन्तीकृत बीजों या पादपों को उच्च ताप पर रखा जाय तो बसन्तीकरण का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इस क्रिया को डिवर्नेलाइजेशन कहते हैं।

इस क्रिया-विधि के विषय में ऐसा माना जाता है कि शीत उद्दीपन को शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical .meristem) ग्रहण करता है और वर्नेलिन (Vermalin) हॉर्मोन, जो सम्भवतः जिबरेलिन प्रकार का होता है, के द्वारा वृद्धि प्रदेश को स्थानान्तरित कर दिया जाता है। बसन्तीकरण विधि की सहायता से रूस के साइबेरिया क्षेत्र में जहाँ सालभर में 10 माह भूमि बर्फ से ढकी रहती है केवल दो माह में गेहूं की फसल तैयार कर ली जाती है।

बसन्तीकरण का आर्थिक महत्व:

  • इस विधि के द्वारा शीत पादपों को बसन्त पादपों में बदला जा सकता है।
  • फसलों को प्राकृतिक कुप्रभावों से बचाया जा सकता है।
  • पौधों में शीघ्रता से पुष्पन कराया जा सकता है।
  • इस क्रिया के द्वारा फसल को शीघ्रता से उत्पन्न किया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
एब्सिसिक एसिड को तनाव हॉर्मोन कहते हैं, क्यों?
उत्तर:
ऐब्सिसिक अम्ल एक प्रमुख पादप हॉर्मोन है जिसका पौधों के लिए निम्नलिखित महत्व है, अतः इन महत्वपूर्ण गुणों के कारण इन्हें तनाव हॉर्मोन भी कहते हैं –

  • यह पौधों की वृद्धि को रोकता है।
  • यह पत्तियों में जीर्णता पैदा करके पतझड़ को प्रेरित करता है।
  • यह जिबरेलिन के प्रभाव को रोकता है इस कारण इसे जिबरेलिन विरोधी भी कहते हैं।
  • यह बीजों के अंकुरण को रोकता है, जिससे इन्हें अधिक दिनों तक संरक्षित किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
उच्च पादपों में वृद्धि दर को तीन प्रमुख चरणों लेग, लॉग तथा जरा अवस्था में बाँटा गया है। जब कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता खो देती हैं तो यह विभेदन की ओर बढ़ जाती है। विभेदन संरचनाएँ प्रदान करता है जो उत्पाद की क्रियात्मकता के साथ जुड़ी रहती है। कोशिकाएँ, ऊतकों तथा संबंधी अंगों के लिए विभेदन के लिए सामान्य नियम एक समान होते हैं। एक विभेदित कोशिका पुनर्विभेदित हो सकती है। पादपों में विभेदन चूँकि खुला होता है, अतः परिवर्धन लचीला हो सकता है। दूसरे शब्दों में परिवर्धन (Development) वृद्धि और विभेदन (Differentiation) का योग है।

प्रश्न 8.
अल्प प्रदीप्तिकालिक पौधे और दीर्घ प्रदीप्तिकालिक पौधे किसी एक स्थान पर साथसाथ फूलते हैं। विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(1) अल्प प्रदीप्तिकालिक पौधे (Short-day plants):
इन पौधों में पुष्पन की क्रिया सिर्फ लम्बाई में सम्पादित होती है, जो कि प्रत्येक 24 घण्टे के चक्र में एक विशेष क्रान्तिक लम्बाई (Critical length) की अपेक्षा छोटे होते हैं। दूसरे अर्थों में ये पौधे एक दीर्घ रात्रिकालिक (Long night) प्रेरण के प्रति संवेदनशील होते हैं। उदाहरण-कॉस्मॉस, सोयाबीन, गुलदाऊदी (Chrysanthemum), तम्बाकू, यूफोर्बिया, पल्चेरिमा आदि। इन पौधों में यदि दिन की लम्बाई, क्रान्तिक लम्बाई से अधिक हुई तो इन पौधों में पुष्प नहीं लगेंगे।

(2) दीर्घ प्रदीप्तिकालिक पौधे (Long-day plants):
ये पौधे ऐसे दीप्तिकाल की अनुक्रियावश पुष्पित होते हैं, जो कि प्रत्येक 24 घण्टे के चक्र में एक विशेष क्रान्तिक लम्बाई की अपेक्षा लम्बे होते हैं अर्थात् ये पौधे एक अल्प रात्रिकालिक (Short night) प्रेरण संवेदनशील होते हैं। पौधों की भिन्न जातियों (Species) के लिए दिन की क्रान्तिक लम्बाई का मान अलग-अलग हो सकता है। उदाहरण – पालक, मूली, चुकन्दर आदि। उपर्युक्त पौधों में प्रकाशकाल की लम्बाई से क्रान्तिक लम्बाई कम होने पर इनमें पुष्प नहीं लगते अर्थात् इनमें केवल पत्तियों की वृद्धि होती रहेगी।

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प्रश्न 9.
अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक का नाम दीजिए –

  1. किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु।
  2. फल को जल्दी पकाने हेतु।
  3. पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु।
  4. कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु।
  5. एक रोजेट पौधे में वोल्ट’ हेतु।
  6. पत्तियों के रन्ध्र को तुरंत बंद करने हेतु।

उत्तर:

  1. ऑक्जिन
  2. एथिलीन
  3. जिबरेलिन
  4. साइटोकाइनिन
  5. जिबरेलिन
  6. एब्सिसिक अम्ल।

प्रश्न 10.
क्या एक पर्णरहित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया कर सकता है ? यदि हाँ या नहीं तो क्यों?
उत्तर:
हाँ, क्योकि कुछ पौधों में पुष्पन सिर्फ प्रकाश या अंधकार की अवधि पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि उसकी सापेक्षिक अवधि पर निर्भर करता है। इस घटना को दीप्तिकालिता कहते हैं। तने की शीर्षस्थ कलिका (Apical bud) पुष्पन के पहले शीर्षस्थ कलिका में बदलती है, लेकिन स्वतः प्रकाशकाल (Photoperiodism) को महसूस नहीं कर पाती है। प्रकाश अंधकार काल का अनुभव पत्तियाँ करती हैं । हॉर्मोनल तत्व (फ्लोरिजेन) पुष्पन के लिए जिम्मेदार है। फ्लोरिजेन, पुष्पन के लिए पत्ती से तने की कलिकाओं में तभी जाती है जब पौधे आवश्यक प्रेरित दीप्तिकाल से अनावृत होते हैं।

प्रश्न 11.
क्या हो सकता है यदि –

  1. जी ए5 (GA3) को धान के नवोद्भिदों पर दिया जाए।
  2. विभाजित कोशिका विभेदन करना बंद कर दे।
  3. एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए।
  4. अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन डालना भूल जाएँ।

उत्तर:

  1. धान की लम्बाई में वृद्धि होगी।
  2. ऐसी कोशिकाएँ, जो विभाजन की क्षमता खो देती हैं, वे पादप शरीर की रचना करती हैं।
  3. कच्चे फलों के साथ एक सड़ा फल मिला देने से सभी कच्चे फल भी सड़ जायेंगे।
  4. संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन न डालने पर नई पत्तियों में हरित लवक, पार्श्व प्ररोह वृद्धि तथा अपस्थानिक प्ररोह की पत्तियों में जरावस्था शीघ्र आ जाती है।

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पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न 1.
अग्रस्थ प्रभाविता का कारण है –
(a) पार्श्व कलिका में जिबरेलिक अम्ल
(b) पत्तियों के अग्र भाग में साइटोकाइनिन
(c) प्ररोहान में ऑक्जिन
(d) पार्श्व कलिका में एब्सिसिक अम्ल।
उत्तर:
(c) प्ररोहान में ऑक्जिन

प्रश्न 2.
एब्सिसिक अम्ल के उपचार से होता है
(a) पत्तियों का विस्तार
(b) तने का दीर्धीकरण
(c) रन्ध्रों का बन्द होना
(d) जड़ों की लम्बाई में वृद्धि होना।
उत्तर:
(c) रन्ध्रों का बन्द होना

प्रश्न3.
कोशिका विभाजन से संबंधित हॉर्मोन है –
(a)G – A
(b) IAA
(c) NAA
(d) साइटोकाइनिन।
उत्तर:
(d) साइटोकाइनिन।

प्रश्न 4.
किसके उपचार से पौधों के बौनेपन पर नियंत्रण पाया जा सकता है –
(a) जिबरेलिन
(b) साइटोकाइनिन
(c) एन्टी जिबरेलिन
(d) ऑक्जिन।
उत्तर:
(a) जिबरेलिन

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प्रश्न 5.
केले को कृत्रिम रूप से पकाने के लिये किसका उपयोग किया जाता है –
(a) साइटोकाइनिन
(b) एथिलीन
(c) ऑक्जिन
(d) कॉउमेरिन।
उत्तर:
(b) एथिलीन

प्रश्न 6.
छोटे दिन वाले पौधों में पुष्पन क्रिया को किसके द्वारा प्रेरित किया जाता है –
(a) लम्बी रात्रि द्वारा
(b) 12 घंटे से कम अवधि वाले प्रकाश काल से
(c) 12 घंटे से कम प्रकाश अवधि वाले प्रकाश काल तथा सतत् लम्बी रात्रि द्वारा
(d) छोटे प्रकाश काल तथा प्रकाश द्वारा हस्तक्षेपित लम्बी रात्रि।
उत्तर:
(c) 12 घंटे से कम प्रकाश अवधि वाले प्रकाश काल तथा सतत् लम्बी रात्रि द्वारा

प्रश्न 7.
उच्चवर्गीय पौधों में अग्रस्थ प्रभाविता का कारण है –
(a) हॉर्मोन्स
(b) एन्जाइम
(c) कार्बोहाइड्रेट्स
(d) दीप्तिकालिता।
उत्तर:
(a) हॉर्मोन्स

प्रश्न 8.
शीर्षस्थ कलिका को काटने पर पार्श्व कलिकाओं के सक्रिय होने का प्रमुख कारण है –
(a) उनमें साइटोकाइनिन की मात्रा का बढ़ना
(b) उनमें ऑक्जिन का निर्माण होना
(c) उनको अधिक प्रकाश प्राप्त होना
(d) उनको अधिक मात्रा में खाद्य पदार्थ का प्राप्त होना।
उत्तर:
(b) उनमें ऑक्जिन का निर्माण होना

प्रश्न 9.
कौन-सा हॉर्मोन रिचमण्ड-लैंग प्रभाव प्रदर्शित करता है –
(a) ऑक्जिन
(b) जिबरेलिन्स
(c) काइनेटिन
(d) शर्करा।
उत्तर:
(c) काइनेटिन

प्रश्न 10.
जिबरेलिन प्रेरित करता है –
(a) पुष्पन
(b) कोशिका विभाजन
(c) वयता
(d) बीजों के अंकुरण के समय जल-अपघटनी एन्जाइम का निर्माण।
उत्तर:
(d) बीजों के अंकुरण के समय जल-अपघटनी एन्जाइम का निर्माण।

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प्रश्न 11.
पादपों में तीन प्रमुख वृद्धि प्रेरक हॉर्मोन्स हैं –
(a) ऑक्जिन, जिबरेलिन्स तथा एथिलीन
(b) जिबरेलिन्स, साइटोकाइनिन तथा एब्सिसिक अम्ल
(c) एथिलीन, एब्सिसिक अम्ल तथा साइटोकाइनिन
(d) ऑक्जिन, जिबरेलिन्स तथा साइटोकाइनिन।
उत्तर:
(d) ऑक्जिन, जिबरेलिन्स तथा साइटोकाइनिन।

प्रश्न 12.
साइटोकाइनिन प्रेरित करता है –
(a) कोशिका विभाजन
(b) कोशिका वृद्धि
(c) स्तंभ दीर्घन
(d) अनिषेचन।
उत्तर:
(a) कोशिका विभाजन

प्रश्न 2.
एक शब्द में उत्तर दीजिए –

  1. पौधों की वृद्धि किन ऊतकों के कारण होती है ?
  2. पादप वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं के नाम बताइए।
  3. 2-4, D का पूरा नाम बताइए।
  4. IAA का पूरा नाम बताइए।
  5. एक ऐसे हॉर्मोन का नाम बताइए, जो गैसीय अवस्था में पाया जाता है।
  6. वृद्धि मापने के उपकरण का नाम लिखिए।
  7. फाइटोक्रोम कहाँ पाया जाता है ?
  8. उस हॉर्मोन का नाम लिखिए जिसका उपयोग फलों को पकाने के लिए किया जाता है।
  9. ऐसे हॉर्मोन का नाम लिखिये जो पौधों की वृद्धि को रोक देता है।
  10. ऐसे हॉर्मोन का नाम बताइये जो पौधों की पुष्पन क्रिया को प्रेरित करता है।

उत्तर:

  1. प्रविभाजी ऊतकों
  2. कोशिका विभाजन, कोशिका विस्तार एवं परिपक्वन अवस्था
  3. 2,4-डाइफिनॉक्सी एसीटिक एसिड
  4. इन्डोल एसीटिक एसिड
  5. एथिलीन
  6. ऑक्जेनोमीटर
  7. पौधों की कोशिका झिल्ली में
  8. एथलीन गैसीय हॉर्मोन
  9. एब्सिसिक अम्ल
  10. वर्नेलिन, फ्लोरिजेन।

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प्रश्न 3.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. मानव मूत्र से प्राप्त प्रथम ऑक्जिन …………….. है।
  2. …………… फलों को पकाने के लिये उपयोगी होता है।
  3. …………….. पुष्पन क्रिया के लिये उत्तरदायी हॉर्मोन है।
  4. आनुवंशिक रूप से बौने पौधों की लम्बाई बढ़ाने के लिये. …………… हॉर्मोन का उपयोग किया जाता
  5. …………… हॉर्मोन विलगन एवं जीर्णन को बढ़ाता है।
  6. कोशिका विभाजन को बढ़ाने वाला हॉर्मोन …………….. है।
  7. मातृ पौधे के ऊपर बीजों का अंकुरण होना …………… कहलाता है।
  8. धान का बेकेनी रोग …………….. नामक कवक के कारण होता है।
  9. समय के साथ प्रति इकाई के दौरान बढ़ी हुई वृद्धि को …………….. कहा जाता है।
  10. ……………. वृद्धि में समसूत्री विभाजन के बाद केवल एक पुत्री कोशिका लगातार विभाजित होती रहती है।

उत्तर:

  1. IAA
  2. एथिलीन
  3. फ्लोरीजेन
  4. जिबरेलिन
  5. एब्सिसिक अम्ल
  6. साइटोकाइनिन
  7. विवीपैरी
  8. जिबरेला फ्यूजीकुरोई
  9. वृद्धि दर
  10. अंकगणितीय।

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प्रश्न 4.
उचित संबंध जोडिए –
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन - 1
उत्तर:

  1. (e) पुष्पन
  2. (d) ABA
  3. (c) साइटोकाइनिन
  4. (b) प्रोटीन
  5. (a) IAA

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन - 2
उत्तर:

  1. (b) एब्सिसिक अम्ल
  2. (c) जिबरेलिन
  3. (d) साइटोकाइनिन
  4. (a) ऑक्जिन
  5. (e) लाल किरणें।

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वृद्धि को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
वृद्धि वह क्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप किसी जीव या उसके विभिन्न अंगों के भार, आयतन, आकार एवं रूप इत्यादि में स्थायी व अनुत्क्रमणीय परिवर्तन होता है।

प्रश्न 2.
पादप वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं के नाम बताइये।
उत्तर:
पादप वृद्धि में निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ होती हैं –

  • कोशिका विभाजन की अवस्था
  • कोशिका विस्तार की अवस्था
  • परिपक्वन अवस्था।

प्रश्न 3.
पादप हॉर्मोन्स क्या हैं?
उत्तर:
पादप हॉर्मोन्स ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं, जो पौधे के एक भाग में उत्पन्न होते हैं तथा वहाँ से स्थानान्तरित होकर विभिन्न शारीरिक क्रियाओं में भाग लेते हैं।

प्रश्न 4.
फ्लोरीजेन क्या है ?
उत्तर:
यह एक काल्पनिक पुष्पन हॉर्मोन है, जो पत्तियों में उत्पन्न होता है तथा वहाँ से स्थानान्तरित होकर पुष्पन क्रिया को प्रेरित करता है।

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पादप वृद्धि एवं परिवर्धन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वृद्धि नियामक पदार्थ से आप क्या समझते हैं ? किन्हीं तीन वृद्धि नियामक पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
वे रासायनिक पदार्थ, जो जीवों की वृद्धि तथा विकास को नियन्त्रित करते हैं, वृद्धि नियामक पदार्थ कहलाते हैं। वास्तव में ये विशिष्ट प्रकार के कार्बनिक रसायन होते हैं, जिन्हें हॉर्मोन (Hormone) कहते हैं। पादपों में यह उनके शीर्षों पर तथा जन्तुओं में अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में बनते हैं। ये संवहन तन्त्र द्वारा जीव के शरीर के अन्दर फैलकर अपना नियन्त्रण एवं समन्वय का कार्य करते हैं। इनका कम अथवा अधिक मात्रा में बनना हानिकारक होता है। पौधों में पाये जाने वाले तीन प्रमुख नियामक पदार्थों के नाम निम्नानुसार हैं

  • ऑक्जिन
  • जिबरेलिन
  • साइटोकाइनिन।

प्रश्न 2.
साइटोकाइनिन हॉर्मोन के चार कार्य लिखिए।
उत्तर:
(1) कोशिका विभाजन (Cell division)-अनेक उच्चवर्गीय तथा निम्नवर्गीय पौधों में सभी वृद्धिकारी हॉर्मोनों में साइटोकाइनिन ही कोशिका विभाजन के वास्तविक कारक पाये गये हैं। उच्चवर्गीय पौधों के अलग किये गये विभज्योतको भागों में वृद्धि के लिए एक साइटोकाइनिन तथा एक ऑक्जिन का होना आवश्यक है। ये कोशिका विभेदन (Cellelongation) करते हैं।

(2) इनके द्वारा ऊतक संवर्धन (Tissue culture) में अवयव रचना का कार्य किया जाता है।

(3) साइटोकाइनिन बीजों तथा पौधों के कुछ अन्य भागों की प्रसुप्तता को भंग करने में अत्यन्त प्रभावी होते हैं।

(4) ये RNA संश्लेषण को नियन्त्रित करने में सूक्ष्म भूमिका निभातेहैं।

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प्रश्न 3.
दीप्तिकालिता की क्रिया-विधि एवं उसका आर्थिक महत्व लिखिए।
उत्तर:
वैज्ञानिकों के अनुसार दीप्तिकालिता उद्दीपन पत्तियों द्वारा ग्रहण किया जाता है और फाइटोक्रोम नामक वर्णक प्रकाश की विभिन्न किरणों को अवशोषित करते हैं। पत्तियों से यह उद्दीपन फ्लोरिजेन हॉर्मोन के रूप में वृद्धि बिन्दु की ओर स्थानान्तरित होता है जहाँ यह पुष्पन की क्रिया को प्रेरित करता है, जबकि कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार जिबरेलिन दीप्तिकालिता प्रभावित पुष्पन को प्रेरित करता है। प्रकाश की अवधि के अलावा उसकी तीव्रता, प्रकार एवं दिशा भी वृद्धि की क्रिया को प्रभावित करते हैं।

जब प्रकाश की तीव्रता कम होती है, तब पर्व छोटे तथा पत्तियों के फलक चौड़े होते हैं। प्रकाश की सामान्य तीव्रता में पौधों में सामान्य वृद्धि होती है, लेकिन उच्च तीव्रता में कम वृद्धि होती है। हॉर्मोन्स के प्रभाव के कारण प्ररोह प्रकाश की दिशा में तथा जड़ प्रकाश की विपरीत दिशा में बढ़ती है। आर्थिक महत्व-दीप्तिकालिता द्वारा प्रकाश की अवधि को नियन्त्रित करके पौधे में कभी भी पुष्पन कराकर वर्ष में कई बार फल प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
एथिलीन क्या है ? इसके प्रमुख कार्य लिखिए।
अथवा
गैसीय हॉर्मोन के पौधों पर किन्हीं तीन प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एथिलीन (Ethylene):
एथिलीन (H2C = CH2)को सन्1960 तक पादप हॉर्मोन नहीं माना जाता था, लेकिन बर्ग (Burg) ने सन् 1962 में इसे पादप हॉर्मोन प्रमाणित किया। यह एकमात्र ऐसा हॉर्मोन है जो गैसीय अवस्था में पाया जाता है। इसे श्वसन क्लैमेक्टेरिक (Respiratory climacteric) भी कहते हैं। फलों के पकते समय इसकी सान्द्रता बढ़ जाती है।

कार्य:

  • यह हॉर्मोन तनों के अग्र भागों में बनकर तथा फलों में विसरित होकर उनके पकने में सहायता करता है।
  • यह पौधे की लम्बाई में वृद्धि को रोकता है, किन्तु तनों के फूलने में सहायता करता है।
  • यह ऑक्जिन के समान पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनानास में पुष्पन को बढ़ाता है।
  • यह पौधों में नर पुष्पों की संख्या में कमी तथा मादा पुष्पों की संख्या में वृद्धि करता है।
  • यह पत्तियों, फलों व पुष्पों के विलगन को तीव्र करता है।
  • यह मूल रोमों के निर्माण तथा बीजों के अंकुरण को प्रेरित करता है।

प्रश्न 5.
शीर्ष प्रमुखता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शीर्ष प्रमुखता (Apical dominance):
अधिकांश पादपों में जब तक शीर्षस्थ कलिका वृद्धि करती रहती है, तब तक पार्श्व कलिकाएँ वृद्धि नहीं करतीं, अर्थात् शीर्षस्थ कलिका पार्श्व कलिकाओं के विकास को रोक देती है। शीर्ष या अग्रिम कलिका के इस प्रभाव को अग्रिम प्रभाविता कहते हैं। पौधों की शाखाओं के शीर्षस्थ भाग में ही हॉर्मोन बनते हैं तथा फ्लोएम द्वारा पौधों के विविध भागों में पहुँचकर अग्रिम प्रभाविता को नियन्त्रित करते हैं। ऑक्जिन शीर्षस्थ प्रभाविता का नियन्त्रण करता है तथा पार्श्व कलिकाओं के विकास को रोकता है। इसके विपरीत साइटोकाइनिन पार्श्व कलिकाओं के विकास को प्रेरित करता है।

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प्रश्न 6.
फाइटोक्रोम क्या है ? पौधों में इसका क्या महत्व है ?
उत्तर:
फाइटोक्रोम-पौधों की पत्तियों में पाया जाने वाला एक नीला प्रोटीनीय वर्णक है, जो लाल प्रकाश की किरणों को अवशोषित करता है। यह आपस में परिवर्तनीय दो रूपों में पाया जाता है। इसका पहला रूप Pr (Phytochrome red), लाल किरणों, जिनकी तरंगदैर्ध्य 660 µm होती है, को अवशोषित करता है। दूसरा रूप Pfr सुदूर लाल (Far red) प्रकाश किरणें, जिनकी तरंगदैर्घ्य 740 µm होती है, को अवशोषित करता है। Pfr पुष्पन का उद्दीपन तथा Pfr पुष्पन का संदमन करता है।

फाइटोक्रोम पुष्पन तथा बीजों की सुप्तावस्था समाप्त करने में मुख्य भूमिका निभाता है । पुष्पन की क्रिया को फाइटोक्रोम सबसे अधिक प्रभावित करता है, क्योंकि लाल तरंगदैर्घ्य की किरणें पुष्पन को उत्तेजित करती हैं। अल्प दीप्तिकालिक पौधों में दिन में यह पत्तियों का Pfr प्रकाश अवशोषित करता है और रात में यह Pr में परिवर्तित हो जाता है, जो पुष्पन के लिए आवश्यक हॉर्मोन फ्लोरिजेन के निर्माण को प्रेरित कर देता है। फ्लोरिजेन बनने के बाद उन स्थानों पर स्थानान्तरित होता है जहाँ पुष्पों का निर्माण होना होता है –
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन - 3

अल्प दीप्तिकालिक पादपों में रात में अन्धकार मिलने से बना हुआ Pr फिर से Pfr में परिवर्तित हो जाता है, जो पुष्पन को संदमित कर देता है। ऐसा देखा गया है कि कुछ बीज लाल प्रकाश में अंकुरित होते हैं, लेकिन जब सुदूर लाल प्रकाश होता है तो अंकुरित नहीं होते। ऐसा बन्दगोभी की कुछ जातियों में देखा गया है। अर्थात् सुदूर लाल प्रकाश बीजों की सुप्तावस्था को बढ़ाता है। यह परिवर्तन भी फाइटोक्रोम के कारण ही होता है।

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पादप वृद्धि एवं परिवर्धन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वृद्धि (Growth) क्या है ? वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
“वृद्धि वह क्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप किसी जीव या उसके विभिन्न अंगों के भार, आयतन, आकार एवं रूप इत्यादि का स्थायी व अनुत्क्रमणीय (Permanent and Irreversible) बढ़ाव या परिवर्तन होता है।” वृद्धि की अवस्थाएँ या क्रियाएँ (Stages or Actions of Growth)-यह स्पष्ट है कि जीवों में वृद्धि जीवद्रव्य के अधिक निर्माण की अवस्था में निम्नलिखित क्रियाओं के द्वारा होती है

(1) कोशिका विभाजन (Cell Division):
कोशिकाओं का संख्या में बढ़ना वृद्धि का मूलमन्त्र है। युग्मनज निर्माण के बाद यह तुरन्त कोशिका विभाजन के द्वारा विभाजित होकर कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि करने लगता है।

(2) कोशिका विस्तार (Cell Elongation):
इस अवस्था में विभाजन के द्वारा बनी कोशिकाएँ आकार में बढ़ती हैं और परिपक्वता की ओर अग्रसर होती हैं तथा इनसे बड़ी रिक्तिकाएँ बनने लगती हैं।

(3) कोशिका भिन्नन और अंग निर्माण (Cell Differentiation and Organ Formation):
इस अवस्था में कोशिकाओं का रूपान्तरण होता है। कोशिकाओं की संख्या व आकार में वृद्धि के बाद भिन्नन और अंग निर्माण की क्रिया प्रारम्भ होती है, जिसके कारण पादपों में विभिन्न अंगों का निर्माण होता है।

प्रश्न 2.
संश्लेषित वृद्धि हॉर्मोन किसे कहते हैं ? इनका कृषि के क्षेत्र में क्या महत्व है ?
उत्तर:
संश्लेषित वृद्धि हॉर्मोन या वृद्धि नियन्त्रक-चूँकि हॉर्मोन जीवों की वृद्धि एवं विकासात्मक क्रियाओं का नियन्त्रण करते हैं, इस कारण इन्हें वृद्धि नियन्त्रक भी कहते हैं। आजकल प्राकृतिक वृद्धि नियन्त्रकों के समान रसायन तैयार किये जाते हैं, जो प्राकृतिक हॉर्मोन के समान ही कार्य करते हैं ऐसे रसायनों को संश्लेषित वृद्धि नियन्त्रक कहते हैं। इनका कृषि के क्षेत्र में बहुत अधिक महत्व है, जिसे हम निम्नलिखित महत्वपूर्ण उदाहरणों से समझ सकते हैं –

(1) मॉर्पेक्टिन (Morpactins):
ये कृत्रिम संश्लेषित हॉर्मोन, Fluorine-Carboxylic acids के व्युत्पन्न होते हैं । ये बीजांकुरों, तनों एवं पर्ण फलकों की लम्बाई में वृद्धि को रोककर पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को प्रेरित कर पौधे को झाड़ीनुमा बनाते हैं, जिससे कई पादपों जैसे-संतरा का उत्पादन बढ़ता है। ये अनिषेकफलन को भी प्रेरित करते हैं।

(2) मैलिक हाइड्रेजाइड (Malic Hydrazide = MH):
यह भी एक संश्लेषित हॉर्मोन है, जो घास, झाड़ी तथा वृक्षों में वृद्धि को रोकता है। यह आलू एवं प्याज के अंकुरण को रोककर उनको अधिक समय तक रखने के अनुकूल बनाता है।

(3) साइकोसेल (Cycocel):
इसे CCC (2-Chloroethyl-trimethyl ammonium chloride) – भी कहते हैं। यह भी एक संश्लेषित हॉर्मोन है, जो GA के उत्पादन को रोककर पत्तियों में विलगन को प्रेरित करके खरपतवारों को नष्ट करता है।

(4) संश्लेषित ऑक्जिन (I.B.A. और N.A.A.) का छिड़काव अपरिपक्व फलों के विलगन को रोकता है। इनके प्रयोग से पत्तियों के विलगन को भी रोका जा सकता है।

(5) इसी प्रकार संश्लेषित ऑक्जिन, अल्फानेफ्थेलीन ऐसीटिक ऐसिड का आलू के गोदामों में छिड़काव करने से इनकी कलिकाएँ सुप्तावस्था में बनी रहती हैं, जिससे इन्हें बहुत अधिक दिनों तक संरक्षित रखा जा सकता है।

(6) संश्लेषित ऑक्जिन, 2 – 4 डाइक्लोरोफीनॉक्सी ऐसीटिक ऐसिड का उपयोग खरपतवार नियन्त्रण में किया जाता है।

(7) आजकल इथेफोन (2 – Chloroethyl phosphoric acid) का प्रयोग भारत सहित अधिकांश देशों में औद्योगिक स्तर पर फलों (आम, अंगूर, केला आदि) को पकाने के लिए किया जा रहा है। इस प्रकार से पके फल रंग, रूप एवं सुगन्ध में प्राकृतिक फलों जैसे ही लगते हैं। वास्तव में इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है जिसके कारण यह फलों को पका देता है। आजकल लगभग सभी पादप हॉर्मोनों के विकल्प रसायनों का कृत्रिम रूप से संश्लेषण कर लिया गया है, जिनका उपयोग पादप उत्पादन तथा उसकी गुणवत्ता को बढ़ाने में किया जा रहा है।

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प्रश्न 3.
पुष्पन हॉर्मोन्स क्या हैं ? पौधों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के पुष्पन हॉर्मोन्स का विवरण दीजिये।
उत्तर:
पुष्यन हॉर्मोन्स (Flowering Hormones):
इस श्रेणी में मुख्यतः दो हॉर्मोन वर्नेलीन एवं फ्लोरिजेन आते हैं। पुष्पन हॉर्मोन वे हॉर्मोन हैं, जो क्रमशः ताप एवं प्रकाश के प्रभाव से पादपों में पुष्पन की क्रिया को प्रेरित करते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि पुष्पन की क्रिया को प्रेरित या आरम्भ करने में तापमान की दशाओं एवं प्रकाश के कालान्तरों का विशेष कार्य होता है, जिसके कारण पादपों में पुष्पन हॉर्मोन उत्पन्न होते हैं, जो उपापचयी क्रियाओं में ऐसे परिवर्तन करते हैं कि पुष्प के अंगों का निर्माण होने लगता है।

(1) वर्नेलिन (Vernaline):
वर्नेलिन बसन्तीकरण की क्रिया का नियन्त्रण करता है। शीत का प्रभाव जो बसन्तीकरण करता है शिखान कलिका द्वारा ग्रहण किया जाता है। मेल्कर्स (Melchers, 1937) ने देखा कि बसन्तीकरण के प्रभाव से कोई हॉर्मोन बनता है। इन्होंने इसका नाम वर्नेलिन (Vernalin) रखा Hess (1975) ने यह सम्भावना व्यक्त की यह हॉर्मोन जिबरेलिन प्रकार का होता है, क्योंकि जिबरेलिन की क्रिया से शीतलन की आवश्यकता नहीं पड़ती और वह इस क्रिया की जगह पुष्पन को प्रेरित करता है। इस हॉर्मोन का संश्लेषण बसन्तीकरण क्रिया द्वारा अंकुरित बीजों की शिखाग्र कलिका में उचित मात्रा में होता है।

(2) फ्लोरिजेन (Florigen):
फ्लोरिजेन प्रकाश की क्रिया के माध्यम से पुष्पन को नियन्त्रित करने वाला हॉर्मोन है। हरी पत्तियों की कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्ली में एक वर्णक फाइटोक्रोम पाया जाता है। जो प्रकाश, (दिन) और अन्धकार (रात) के अन्तरालों से उद्दीप्त होकर उपापचयी क्रियाओं के कारण पौधों की पत्तियों एवं पुष्प कलिकाओं को फ्लोरिजेन हॉर्मोन के स्रावण से प्रेरित करता है।

यह हॉर्मोन पुष्प के अंगों के विभेदन को प्रेरित करता है। ऐसा माना जाता है कि यह जिबरेलिन एवं ऐन्थेसिन (Anthesin) नामक दो हॉर्मोन्स का सम्मिश्रण है। जिबरेलिन से प्ररोह की वृद्धि और ऐन्थेसिन से पुष्प निर्माण कार्य नियन्त्रित होता है। जिबरेलिन के छिड़काव से दीर्घकाली पादपों में पुष्पन छोटे दिन की दशाओं में भी हो जाता है।

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प्रश्न 4.
वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Growth)-पादप वृद्धि किसी एक कारक से नियन्त्रित न होकर कई कारकों से नियन्त्रित होती है, जिन्हें दो वर्गों में बाँटते हैं –

(A) बाह्य कारक (External Factors):
इस वर्ग में वृद्धि को प्रभावित करने वाले उन कारकों को रखा गया है, जो पादप शरीर से बाहर के होते हैं, ये निम्नलिखित हैं –

  1. जल (Water) – जल पादप शरीर की प्रत्येक क्रिया से जुड़ा होता है और जीवद्रव्य का आवश्यक अवयव है। इसके बिना जीवद्रव्य निष्क्रिय हो जाता है और उसकी जैविक क्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं, जल वृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है।
  2. ऑक्सीजन (O2) – श्वसन क्रिया के लिए यह आवश्यक है और श्वसन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा के द्वारा ही वृद्धि होती है।
  3. भोज्य पदार्थ (Food Material) – भोज्य पदार्थ पादपों को ऊर्जा तथा शक्ति देते हैं, जो वृद्धि के लिए आवश्यक है।

(4) प्रकाश (Light)
अधिकांश पौधों में प्रकाश की उपस्थिति में भोजन का निर्माण किया जाता है। इसके अलावा दूसरी उपयोग की क्रियाओं के लिए भी प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है, इस कारण वृद्धि के लिए इसकी नितान्त आवश्यकता होती है। प्रकाश की अनुपस्थिति में पौधों की गति एकाएक बढ़ जाती है लेकिन पौधे पीले तथा कमजोर हो जाते हैं। वृद्धि करने वाले पादपों के अंगों पर प्रकाश के प्रभाव को दीप्तिकालिता (Photoperiodism) कहते हैं।

प्रकाश की अवधि के अलावा उसकी तीव्रता (Intensity), प्रकार (Quality) एवं दिशा भी वृद्धि की क्रिया को प्रभावित करते हैं। जब प्रकाश की तीव्रता कम होती है, तब पर्व (Internode) छोटे तथा पत्तियों के फलक चौड़े होते हैं। प्रकाश की सामान्य तीव्रता में पौधों में सामान्य वृद्धि होती है, लेकिन उच्च तीव्रता में कम वृद्धि होती है। इसी कारण तीव्र प्रकाश में उगने वाले पौधों के प्ररोह छोटे तथा पत्तियाँ संख्या में कम व छोटी होती

(5) तापक्रम (Temperature):
जीवद्रव्य की क्रियाशीलता 20 – 35°C पर सबसे अधिक होती है। इसी कारण पौधों की वृद्धि भी इसी तापक्रम पर सबसे अधिक होती है, लेकिन ठण्डे तथा गर्म क्षेत्रों में यह तापक्रम कम या अधिक हो सकता है। तापक्रम के आधार पर पौधे तीन प्रकार के हो सकते हैं -शीतकालीन जाति (Winter Plants), बसन्ती जाति (Spring plants) और शीत निष्क्रिय जाति (Temperature neutral plants)।

शीतकालीन पादप जाड़ों में बोये जाते हैं और पुष्पन करके बसन्त तक बीज बना देते हैं। बसन्ती पादप बसन्त ऋतु में बोये जाते हैं और उसी वर्ष ग्रीष्म के अन्त तक फसल तैयार हो जाती है, लेकिन यदि शीतकालीन जाति को बसन्त ऋतु में बोया जाये तो उसमें उस वर्ष फल न लगकर वर्षभर बाद फल लगते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि शीतकालीन जाति को फल पैदा करने के लिए कम ताप की आवश्यकता होती है।

(B) आन्तरिक कारक (Internal Factors):
इस वर्ग में वृद्धि को प्रभावित करने वाले उन कारकों को रखा गया है, जो पादप शरीर के अन्दर स्थित होते हैं। पादपों में वृद्धि तथा विकास को नियंत्रित करने के लिए कुछ विशिष्ट रासायनिक पदार्थ बनते हैं, जिन्हें पादप हॉर्मोन्स (Plant hormones) या वृद्धिकारक (Growth substances) या वृद्धि नियन्त्रक (Growth regulators) कहते हैं।

ये हॉर्मोन्स मुख्यतःशीर्षस्थ कलिकाओं (Apical buds), शीर्षस्थ मेरिस्टेम (Apical meristem) तथा बाल पत्तियों (Young leaves) में बनते हैं – और फ्लोएम द्वारा पौधों के सम्पूर्ण भागों में संचरित होकर, वृद्धि तथा विकास को नियन्त्रित करते हैं। प्रत्येक हॉर्मोन एक विशेष प्रकार की वृद्धि सम्बन्धी घटना को नियन्त्रित करता है, जो कि पादपों में समयानुसार होती रहती है।

इन हॉर्मोनों का विभिन्न अंगों की वृद्धि पर विभिन्न प्रभाव पड़ता है। पादप हॉर्मोन को निम्न प्रकार से परिभाषित कर सकते हैं “पादप हॉर्मोन्स वे जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं, जो पेड़-पौधों में निश्चित स्थानों पर बनते हैं तथा संवहन ऊतकों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में संचरित होकर उनकी वृद्धि तथा विकास सम्बन्धी क्रियाओं को नियन्त्रित करते हैं।”

ऑक्जिन नामक हॉर्मोन सबसे पहले खोजा गया था। इसके बाद जिबरेलिन, काइनिन, साइटोकाइनिन, फ्लोरिजेन, वर्नेलिन, इथिलीन, ऐब्सिसिक अम्ल नामक हॉर्मोनों को खोजा गया। हॉर्मोनों के अलावा पौधों में कुछ वृद्धिरोधक पदार्थ जैसे – काउमेरिन, फिनोलिक यौगिक, स्कोपोलिटिन आदि भी बनते हैं, जो पादप वृद्धि को अवरुद्ध करते हैं।

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