MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 21 Salim Ali Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 21 Salim Ali Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 21 Salim Ali Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 21 सालिम अली प्रश्न उत्तर

सालिम अली बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
बूंखार = हिंसक, निर्दयी, अत्यधिक क्रूर; पर्यवेक्षण अच्छी तरह देखना; विलुप्त = गायब हुआ;प्रेक्षण= देखने की प्रक्रिया वरिष्ठ अपने से अधिक अनुभवी; बुलफ्रेमबुलफ्रम नामक कच्ची धातु की खनन।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए
(क) सालिम अली का पूरा नाम क्या था ?
उत्तर
सालिम अली का पूरा नाम सली भाई जुद्दीन अब्दुल अली था।

(ख) चाचा ने सालिम अली का परिचय किससे कराया था ?
उत्तर
चाचा अमीरुद्दीन तैयबजी ने सालिम अली का परिचय डब्लू. एस. मिलार्ड से कराया। श्री मिलार्ड “बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी” के अवैतनिक सचिव थे।

(ग) अपोलो स्ट्रीट पर किस सोसाइटी का कार्यालय था?
उत्तर
अपोलो स्ट्रीट पर “बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी” का कार्यालय था।

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(घ) सालिम अली ने कौन-से पक्षी को खोज निकाला?
उत्तर
सालिम अली ने ‘बया’ नामक पक्षी को खोज निकाला।

(ङ) सालिम अली को पक्षी संरक्षण के लिए कौन-सा पुरस्कार मिला था ?
उत्तर
सालिम अली को पक्षी संरक्षण के लिए ‘जे. पॉल वाइल्ड लाइफ कंजरवेशन’ पुरस्कार मिला था।

(च) इस पाठ में कौन-कौन सी पुस्तकों का उल्लेख है ?
उत्तर
इस पाठ में-

  1. बुक ऑफ इण्डियन बर्ड्स
  2. हैंडबुक ऑफ द बर्ड्स ऑफ इण्डिया एण्ड पाकिस्तान आदि पुस्तकों का उल्लेख है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए
(क) सालिम अली ने जिस घायल पक्षी को उठाया था, उसकी पहचान मुश्किल क्यों थी ?
उत्तर
सालिम अली ने एक घायल पक्षी को उठाया। वह पक्षी गौरेया जैसा लगता था परन्तु उस पक्षी के गले पर पीला धब्बा था। असमंजस में पड़ा हुआ सालिम अली उस पक्षी को अपने चाचा अमीरुद्दीन तैयबजी के पास ले गया और पूछा कि यह पक्षी किस किस्म का है। उसके चाचा इस विषय में कुछ भी नहीं जानते थे। इसके बाद उसके चाचा उस बालक को ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के ऑफिस में ले गए। वहाँ डब्लू. एस. मिलार्ड से परिचय करवाया। श्री मिलाई उक्त सोसाइटी के अवैतनिक सचिव थे। मिलार्ड ने अपनी एक दराज से मरे हुए पक्षी को उठाया। वह पक्षी बिल्कुल वैसा ही था जैसा वह बालक अपने साथ लाया था। वह एक नर पक्षी था। वह केवल वर्षा ऋतु में ही पहचाना जा सकता है क्योंकि वर्षा ऋतु में उसके गले पर पीला धब्बा उभर आता है। इसकी पहचान केवल बरसात के मौसम में ही हो पाती है।

(ख) ‘बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ में सालिम अली ने क्या-क्या सीखा?
उत्तर
‘बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ में सालिम अली ने पक्षियों के शरीरों में भूसा भरकर रखे गये तरह-तरह के पक्षियों को देखा। वह अचम्भे में रह गया। श्री मिलार्ड ने किसी भी भारतीय वयस्क को इतने उत्साह से भरा नहीं देखा जो पक्षियों के बारे में जानना चाहता हो। उसने सीखना शुरू कर दिया कि पक्षियों को किस तरह पहचाना जाता है। साथ ही उसने यह भी सीख लिया कि मरे हुए पक्षी के शरीर में भूसा भरकर किस तरह सुरक्षित रखा जा सकता है।

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(ग) एक भारतीय बालक द्वारा किसी पक्षी के बारे में सवाल किए जाने पर मिस्टर मिलार्ड को क्यों आश्चर्य हुआ?
उत्तर
मिस्टर मिलार्ड उस बालक को देखकर अचम्भे में पड़ गये कि वह एक पहला भारतीय लड़का है जो उस घायल हुई चिड़िया को देखकर पहचानना चाहता है। मिलार्ड उसे उस । कमरे में भी ले गए जहाँ तरह-तरह के पक्षियों के शरीरों में भूसा भरकर रखे गए थे। उस वयस्क सालिम अली ने इस तरह की कल्पना भी नहीं की थी कि पक्षी इतने प्रकार के होते हैं। उस लड़के ने असाधारण रूप से पक्षियों की पहचानने की कोशिश की। इस पक्षी विज्ञानी लड़के ने पक्षियों के संरक्षण के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया। एक भारतीय में इन पक्षियों को पहचानने की अद्भुत रुचि को देखकर मिस्टर मिलार्ड को आश्चर्य हुआ।

(घ) सालिम अली का अन्य पक्षी प्रेमियों से टकराव होने का क्या कारण था ?
उत्तर
सालिम अली ने बड़े धैर्यपूर्वक इन पक्षियों को अपने-अपने काम में लगे देखा। उन्होंने कई महीनों तक बया पक्षियों का अध्ययन किया। उन्होंने अनेक परीक्षण स्वयं ही किए। उन्होंने यह बात भी समझ ली कि किसी भी बात को आँखें बन्द करके स्वीकार नहीं करना चाहिए, चाहे वह बात कितने ही प्रसिद्ध व्यक्ति ने क्यों न की हो? वे अपने पर्यवेक्षण के परिणामों को बार-बार जाँचते थे और बहुत जल्दी ही किसी परिणाम पर नहीं पहुंच पाते थे। इसलिए उनके विचारों को और उनकी राय को आधिकारिक माना जाने लगा। यही कारण था कि उनका टकराव वरिष्ठ पक्षी प्रेमियों से हुआ।

(ङ) सालिम अली के पास कॉलेज की डिग्री नहीं थी परन्तु वे कौन-से गुण थे, जिन्होंने उन्हें असाधारण बनाया ?
उत्तर
सालिम अली के पास कॉलेज की डिग्री नहीं थी परन्तु दूसरे गुणों ने उन्हें असाधारण व्यक्ति बना दिया। वे बीजगणित से बहुत डरते थे। उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और बर्मा (म्यांमार) चले गए। बर्मा में इनके बड़े भाई रहते थे। वे वहाँ बुलफ्रेम की माइनिंग का काम करते थे। सालिम को माइनिंग के काम में भी सफलता नहीं मिली। वे वहाँ पक्षियों की खोज करने लगे। वहाँ से लौटकर प्राणिशास्त्र में एक कोर्स कर लिया और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के अजायबघर में गार्ड नियुक्त हो गए। वे अब इसका उच्च प्रशिक्षण लेने के लिए जर्मनी चले गए। लौटकर आए तब तक उनकी नौकरी भी चली गई। वे वर्डवाचिंग का काम जरूर करते थे। उन्होंने वर्डवाचिंग के अध्ययन के परिणाम को प्रकाशित किया जिससे उन्हें पक्षी विज्ञान में प्रसिद्धि मिली। उन्होंने विलुप्त पक्षियों की खोज की। इन कामों ने उन्हें असाधारण बना दिया।

प्रश्न 4.
सही जोड़ियाँ बनाइए
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 21 सालिम अली 1
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 21 सालिम अली 2
उत्तर
(क) → (2), (ख) → (1), (ग) → (5), (घ) → (3), (ङ)→(4)

सालिम अली भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का उच्चारण कीजिए और उनको वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
ऑफिस, अवैतनिक, विस्मित, वयस्क, प्राणिशास्त्र, कॉलेज।
उत्तर-

  1. ऑफिस-रवि 10-00 बजे अपने ऑफिस जाता है।
  2. अवैतनिक-विकास दो माह से अवैतनिक अवकाश पर है।
  3. विस्मित-वह अपने भाई को सामने देखकर विस्मित रह गया।
  4. वयस्क-18 वर्ष के वयस्क को मत देने का अधिकार
  5. प्राणिशास्त्र-डॉ. पी. के. मिश्रा प्राणिशास्त्र के प्रवक्ता
  6. कॉलेज-हमारे कॉलेज में इस समय खेलकूद प्रतियोगिताएं चल रही हैं।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्ग लिखिए
विलुप्त, असाधारण, सम्मान, प्रशिक्षण, अनुपस्थिति, उपयोग, सौभाग्य।
उत्तर
शब्द – उपसर्ग + शब्द
विलुप्त = वि + लुप्त
असाधारण = अ + साधारण
सम्मान = सम् + मान
प्रशिक्षण = प्र + शिक्षण
अनुपस्थिति = अनु + उपस्थिति
उपयोग = उप + योग
सौभाग्य’ = सौ + भाग्य

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्यय लिखिए
नारीत्व, राष्ट्रीय, भारतीय, विवाहित, पक्षीवाला।
उत्तर
पूर्ण शब्द शब्द + प्रत्यय
नारीत्व = नारी + त्व
राष्ट्रीय = राष्ट्र + ईय।
भारतीय = भारत + ईय
विवाहित, = विवाह + इत
पक्षीवाला = पक्षी + वाला

प्रश्न 4.
नीचे लिखे शब्द किन दो शब्दों के मेल से बने हैं, लिखिए
अजायबघर, पक्षी-विज्ञानी, महत्त्वपूर्ण, महाद्वीप, महत्त्वाकांक्षी, प्रस्तुतीकरण, प्राणिशास्त्र।
उत्तर
अजायब + घर
पक्षी + विज्ञानी
महत्त्व + पूर्ण
महा + द्वीप
महत्त्व + आकांक्षी
प्रस्तुती + करण
प्राणी + शास्त्र।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए
(1) जो बिना वेतन लिए काम करता है।
(2) जो मार्गदर्शन करता है।
(3) जहाँ पानी के जहाज आकर खड़े होते हैं।
(4) जो पक्षियों से प्रेम करता है।
(5) पक्षियों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान रखने वाला।
(6) जो बात मुख से कही गई है।
उत्तर

  1. अवैतनिक
  2. मार्गदर्शक
  3. बन्दरगाह
  4. पक्षी-प्रेमी
  5. पक्षी-विज्ञानी
  6. मौखिक।

सालिम अली परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) आश्चर्य की बात यह है कि सालिम अली के पास किसी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं थी। यद्यपि उन्होंने कॉलेज में प्रवेश लिया था मगर बीजगणित से डरकर पढ़ाई छोड़कर भाग खड़े हुए। वह अपने भाई की बुलफ्रेम की माइनिंग में मदद करने बर्मा चले गए, लेकिन यहाँ भी वे असफल रहे। वह बर्मा के जंगलों में बुलफ्रेम के बदले पक्षियों की खोज करने लगे।

शब्दार्थ-आश्चर्य = अचम्भा; डिग्री = उपाधि प्रवेश दाखिला; बुलफ्रेम की माइनिंग = बुलफ्रेम नामक कच्ची धातु का खनन; मदद – सहायता; बर्मा – म्यांमार देश; असफल = सफलता न मिलना।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती’ के पाठ ‘सालिम अली’ से अवतरित है। इसके लेखक दिलीप मधुकर साल्वी हैं।

प्रसंग-इस गद्यांश में ‘सालिम अली’ के प्रारम्भिक जीवन के विषय में जानकारी दी जा रही है। वे असाधारण पक्षी-प्रेमी थे।

व्याख्या-लेखक स्पष्ट करते हैं कि यह बात बड़े अचम्भे की है कि सालिम अली ने विश्वविद्यालय स्तर की किसी भी संस्था से शिक्षा सम्बन्धी कोई भी उपाधि प्राप्त नहीं की। उन्होंने एक कॉलेज में पढ़ने के लिए दाखिला तो ले लिया था लेकिन बीजगणित बहुत ही कठिन विषय लगा। इससे वे भयभीत हो गये और उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। वह अपने भाई के पास बर्मा (आजकल म्यांमार) चले गये। वहाँ वे बुलफ्रम नामक कच्ची धातु के खनन में अपने भाई की सहायता करते थे, लेकिन बर्मा में उन्हें इस काम में भी रुचि नहीं लगी। वे वहाँ बर्मा के जंगलों में पक्षियों की खोज करने के काम में जुट गए।

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(2) वह घर पेड़ों के बीच बना हुआ था और वहाँ शान्ति थी। जब वर्षा ऋतु आई तो सालिम अली ने देखा कि घर के पास ही बया पक्षियों ने एक पेड़ पर अपनी बस्ती बनाई है। तब बया पक्षी के बारे में लोगों को कुछ ज्यादा जानकारी नहीं थी। इन पक्षियों का अध्ययन करने का सालिम अली के लिए यह सुनहरा अवसर था। तीन-चार महीनों तक वे रोज घण्टों बैठे बड़े धैर्य से इन पक्षियों को वहाँ कार्यरत् देखते रहते। सन् 1930 ई. में उन्होंने अपने इस अध्ययन के परिणाम को प्रकाशित किया तो उन्हें पक्षी विज्ञान (ऑरनिथोलॉजी) में खूब ख्याति मिली।

शब्दार्थ-वर्षा ऋतु में = बरसात के मौसम में; बस्ती = घोंसले ज्यादा = अधिक; सुनहरा = बहुत अच्छा, महत्त्वपूर्ण; अवसर = मौका; रोज = प्रतिदिन; धैर्य = तसल्ली; कार्यरत् = काम में लगे हुए; परिणाम = नतीजे; प्रकाशित = किताब के रूप में छपवाया। ऑरनिथोलॉजी – पक्षी-विज्ञान; ख्याति = प्रसिद्धि।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-सालिम अली ने पक्षियों के विषयों में जानकारी । प्राप्त करने में बड़ी रुचि ली।

व्याख्या-सालिम अली जिस घर में रहते थे, वह घर ऐसे स्थान पर बना हुआ था जहाँ चारों ओर पेड़ ही पेड़ थे। वहाँ पूर्ण शान्ति थी। जब बरसात का मौसम आया तो सालिम अली ने देखा कि घर के आस-पास के पेड़ों में से एक पेड़ पर बया पक्षियों ने अपने रहने के लिए घोंसले बनाना शुरू कर दिया था। उस समय तक लोग बया पक्षी से सम्बन्धित अधिक जानकारी नहीं रखते थे। यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण अवसर था जबकि सालिम अली बया नामक पक्षियों के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते थे। उस समय (वर्षा ऋतु में) सालिम अली तीन से चार महीने तक प्रतिदिन कई घण्टे तक अकेले बैठे रहते थे और धैर्यपूर्वक. इन पक्षियों के काम को देखते रहते थे। उन्होंने सन् 1930 ई. में अपना अध्ययन पूरा किया और उसके जो नतीजे मिले, उन्हें उजागर कर दिया। इस तरह सालिम अली ने पक्षी-विज्ञान के क्षेत्र में बहुत बड़ी प्रसिद्धि हासिल की।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 20 Nanha Satyagrahi Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 20 Nanha Satyagrahi Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 20 Nanha Satyagrahi Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 20 नन्हा सत्याग्रही प्रश्न उत्तर

नन्हा सत्याग्रही बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
सलूक- व्यवहार; दफा हो जाना = तेजी से भाग जाना या चला जाना; नाचीज = महत्त्वहीन, तुच्छ; बदतमीजी = अभद्रता, बुरा व्यवहार; सकपकाए = घबराए: हलाकानव्याकल, व्यग्र।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में – लिखिए
(क) वह बात जरा-सी थी’, वह जरा-सी बात क्या थी जिसके कारण मोहन रोये जा रहा था ?
उसर
वह ‘बात जरा-सी थी’, वह यह थी कि थानेदार के दर्जे के पुलिस अधिकारी ने मोहन नामक छोटे से बालक को चपत लगा दी थी। मोहन का कोई कसूर नहीं था। फिर भी उसे चपत लगा दी गई। इस छोटी-सी (जरा-सी) बात पर मोहन रोये जा रहा था।

(ख) “जा, जा कुछ नहीं हुआ। पीट दिया हमने। कर ले जो कुछ करना है, अब शेरसिंह के भीतर बैठा पुलिस वाला बोला।” इस कथन में पुलिस वाले का क्या भाव है ? सही उत्तर चुनकर लिखिए।
(क) घमण्ड
(ख) घृणा
(ग) क्रोध
(घ) लापरवाही
उत्तर
(क) घमण्ड।

(ग) मोहन के मित्रों ने उसका साथ कैसे दिया?
उत्तर
मोहन के मित्र प्रभात फेरी के लिए निकले। वे तख्तियाँ लिए हुए थे। उन्हीं में मोहन को भी जाना था परन्तु पुलिस चाचा के द्वारा चपत लगाये जाने पर वह उनके घर के फाटक पर सत्याग्रह कर बैठ गया कि पुलिस चाचा बताएँ कि उसकी क्या गलती है जिसके लिए उसे चपत लगाई। यह बात सुनकर सभी बच्चे रुक गये। बड़े बच्चे ने तिरंगा ऊँचा करके कहा कि इन्सपेक्टर साहब को सफाई तो देनी ही होगी। इसी पर गाँधी जी के नाम के जयकारे लगे। इस प्रकार मित्रों ने मोहन का साथ दिया और पुलिस इन्स्पेक्टर ने अपनी ज्यादती के कसूर को मान लिया।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए
(क) इस पाठ में कुछ वाक्य ऐसे हैं जिनमें बालकों की बात पर ध्यान न देने का भाव दिया है। ऐसे चार वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए।
उत्तर

  1. “अरे भाई, बड़े हैं, जरा जल्दी होगी, किसी ने उन्हें नहीं टोका। एक तुम्हीं उनके आड़े आ गए।”
  2.  “लड़का जिरह किये जाता है, इसे कौन समझाए ?”
  3.  “रोता है, रोने दो-कब तक रोएगा?”
  4.  “अभी थककर आप चुप हो जाएगा।”
  5. “चलो जी चलो …सब इन्स्पेक्टर साहब आप भी चलें .
    ” सुबह-ही-सुबह रोनी सूरत सामने पड़ी। छुट्टी का दिन न बिगड़ जाए।”

(ख) “लड़का जिरह किए जाता है, इसे कौन समझाए ? लोग किस आधार पर ऐसा कह रहे थे? .
उत्तर
लड़का जिरह किए जाता है, इसे कौन समझाए ? इस तरह की बात लोग इस आधार पर कह रहे थे कि मोहन को पुलिस अधिकारी के द्वारा एक चपत लगाए जाने पर वह रोता ही जा रहा था। वह कह रहा था कि उसका अपराध क्या है जिसके लिए उसे चपत लगा दी गई। केवल इसलिए कि मैं छोटा हूँ और कमजोर हूँ, साथ ही बड़ों ने कभी नहीं टोका उन्हें; मोहन ने टोक दिया तो उसे पीट दिया। कोई बड़ा उन्हें रोकता-टोकता तो क्या वह उसके चाँटा जड़ देते ? नहीं तो, परन्तु मोहन को इसलिए पीट दिया कि वह बच्चा है, छोटा है, कमजोर है।

(ग) आस-पास की मुंडेरों से उभर आए चार-पाँच चेहरों ने जो देखा, उससे सम्बन्धित पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर
आस-पास की मुंडेरों से उभर आए चार-पाँच चेहरों ने जो देखा उससे सम्बन्धित पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं

  1. बरामदे के सामने मुँह बिसूरता मोहन खड़ा है और अपने बरामदे में झल्लाए शेरसिंह।
  2. “जाएगा भी यहाँ से या दो-एक चपत खाकर ही टलेगा।”
  3.  “अजीब उजङ्क-ढीठ लड़का है। एक पड़ोसी ने कहा।
  4. “देखिए, आप इसे समझाएँ अगर यहाँ से दफा नहीं हुआ तो मैं इसे कोतवाली में बन्द करवा दूंगा।” शेरसिंह गरजे।
  5.  “आप जो चाहें सो करें, पर मेरा कसूर बताएँ, जिससे मैं आगे ऐसा कुछ न करूं कि बड़ों को मुझ पर हाथ उठाना पड़े?” मोहन बोला।

(घ) फरीद बाबा ने शेरसिंह को क्या-क्या कहा होगा? जिसे सुनकर वे माफी मांगने आ गए।
उत्तर
फरीद बाबा ने फाटक खोला और भीतर गये। उन्होंने शेरसिंह से कहा कि सभी बच्चे मोहन के मित्र हैं। वे सब इकटेहोकर तुम्हारे घर के फाटक पर नारेबाजी कर रहे हैं। आज गाँधी जयन्ती है। शहर में सभी लोग इधर से उधर आ-जा रहे हैं। आपके खिलाफ नारेबाजी हुई तो अखबार वाले छोटी-सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर छापेंगे। बात का बतंगड़ हो जाएगा। अभी-अभी तो आपको तरक्की मिली है। ऐसा न हो कि तुम्हारे खिलाफ तुम्हारे अधिकारी कोई कदम उठा लें। सम्भवतः इसी बात को सुनकर शेरसिंह माफी माँगने आ गए।

नन्हा सत्याग्रही भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
‘चपत’ से बना है ‘चपतिया’ ऐसे ही ‘इया’ प्रत्यय लगाकर पाँच शब्द बनाइए।
उत्तर

  1. चपत + इया = चपतिया।
  2. खाट + इया = खटिया।
  3. लोटा + . इया = लुटिया।
  4. लखटका + इया = लखटकिया।
  5. लकुटी + इया = लकुटिया।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों से भाववाचक संज्ञाएँ बनाइए
ईमानदार, बेईमान, कमजोर, खराब, सफेद, चालाक।
उत्तर

  1. ईमानदारी
  2. बेईमानी
  3. कमजोरी
  4. खराबी
  5. सफेदी
  6. चालाकी।

प्रश्न 3.
नीचे लिखे शब्दों में दूसरा शब्द ‘आत्मा’ है। प्रथम शब्द क्या है ? लिखिए।
महात्मा, धर्मात्मा, पुण्यात्मा, परमात्मा, पापात्मा।
उत्तर

  1. महा + आत्मा
  2. धर्म + आत्मा
  3. पुण्य + आत्मा
  4. परम + आत्मा
  5. पाप + आत्मा।

प्रश्न 4.
आगे लिखे वाक्यों में कोष्ठक में अंकित मूल क्रिया का सही रूप बनाकर रिक्त स्थान भरिए
(1) स्कूल की घण्टी ……….. मन्दिर में घण्टा ……… (बजाना)
(2) हम गाँधी जयन्ती …… बच्चे बाल दिवस …………. (मनाना)
(3) प्रधान जी ने झण्डा ……. अध्यापक ने झण्डियाँ (फहराया)
(4) घर में भाई ………… घर में बहन …… (आना)
उत्तर

  1. बजी, बजाया गया;
  2. मनाते हैं, मनाते हैं;
  3. फहराया, फहराई
  4. आया, आई

प्रश्न 5.
कुछ शब्दों में से “या” हट गये हैं। जहाँ जो जरूरी हो, वहाँ वही चिह्न लगाकर ठीक/सही कर दें।
पाच, डका, मुह, हसना, आख, तख्तिया, गाधी, मच।
उत्तर

  1. पाँच
  2. डंका
  3. मुँह
  4. हँसना
  5. आँख
  6. तख्तियाँ
  7. गाँधी
  8. मंच।

प्रश्न 6.
बड़ा’ या ‘बड़े’ शब्द का प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग कीजिए और अर्थ भी लिखिए।
उत्तर
बड़ा-आकार में या उम्र में बड़ा, पद में बड़ा। खाने की वस्तु का नाम।
वाक्य प्रयोग-

  1. उसका घर बड़ा है।
  2. रामू मोहन का बड़ा भाई है।
  3. मोहन आजकल बड़ा अधिकारी है।
  4. आज मैंने दही के साथ बड़े का स्वाद चखा।

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प्रश्न 7.
इन मुहावरों के अर्थ लिखिए और वाक्य में – प्रयोग कीजिए
टस से मस न होना, पहाड़ टूट पड़ना।
उत्तर

  1. टस से मस न होना-न-हटना या प्रभावित न होना या न हिलना। वाक्य प्रयोग-धरने पर बैठे लोग समझाते, पर भी टस से मस नहीं हुए।
  2. पहाड़ टूट पड़ना-बड़ी विपत्ति आ जाना।
    वाक्य प्रयोग-मोहन को अधिकारी के द्वारा चपत लगा दी तो उस पर कौन-सा-पहाड़ टूट पड़ा।

प्रश्न 8.
‘खाना’ सहायक क्रिया का विभिन्न अर्थों में प्रयोग करते हुए चार वाक्य लिखिए।
उत्तर

  1. वह खाना खा रहा है। (भोजन-संज्ञा)
  2. वह कुछ खा रहा है। (क्रिया)
  3. वह चार खाने की कमीज पहने है। (रंग कला)
  4. वह चारों खाने चित्त गिर पड़ा। (स्थिति)

प्रश्न 9.
निम्नलिखित प्रेरणावर्धक क्रियाओं को अलग-अलग वाक्यों में प्रयोग कीजिए
बनवाया, करवाना, सुनवाया,धुलवाना। उत्तर-विद्यार्थी स्वयं करें।

नन्हा सत्याग्रही परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) “सुनिए, वह लड़का अभी तक फाटक पर उटा है, कह दो कि गुस्सा आ गया था। क्यों जगत् में डंका पिटवाते हो कि बित्तेभर को छोकरा थानेदार के दर्जे के सरकारी अफसर के दरवाजे पर सत्याग्रह किए बैठा है। कहीं अखबार वालों को भनक पड़ गई तो तिल का ताड़ बनेगा। फिर आज गाँधी जयन्ती भी है।”

शब्दार्थ-डटा है = अडिग खड़ा है (जमकर खड़ा होना); गुस्सा = क्रोध; जगत् = दुनिया में;
डंका पिटवाना = बात को फैलाना; बित्तेभर = बालिस्त के बराबर आकार का; छोकरा = लड़का; दर्जे का = बराबरी का; अफसर = अधिकारी; भनक पड़ना = सुन लेना; तिल का ताड़ बनेगा = छोटी बात बढ़ जायेगी।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक भाषा-भारती’ के पाठ ‘नन्हा सत्याग्रही’ से अवतरित है। इसके लेखक आलमशाह खान हैं।

प्रसंग-थानेदार के दर्जे के सरकारी अफसर शेरसिंह की पत्नी, उन्हें समझाते हुए कहती है कि इस छोटे से बच्चे को यह कह दो कि तुम्हें गुस्सा आ गया था।

व्याख्या-शेरसिंह की पत्नी अपने सरकारी अफसर पति को पुकारती हुई कहती है कि जरा आप सुनो तो। वह छोटा-सा बालक अभी भी फाटक पर जमकर खड़ा है। उससे आप केवल इतना भर कह दीजिए कि आपको क्रोध आ गया था, इसलिए तुमने धीरे से चपत लगा दिया था। कहीं ऐसा न हो कि यह बात
सभी जगह फैल जाए। देखिए न। यह लड़का बालिस्त भर का है, छोटे आकार का है, कम उम्र का है, फिर भी थानेदार के दर्जे के सरकारी अधिकारी के फाटक पर सत्याग्रह किये लोग है। वह वहाँ से टलने का नाम भी नहीं लेता है। अगर अखबार वालों को इसकी सूचना मिल गई तो यह छोटी-सी बात बहुत बढ़ जाएगी जिस पर आज गाँधी जयन्ती का दिन है।

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MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 19 Bahadur Beta Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 19 Bahadur Beta Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 19 Bahadur Beta Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 19 बहादुर बेटा प्रश्न उत्तर

बहादुर बेटा बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
हाहाकार = रोने, चिल्लाने की मिश्रित आवाजें; वालंटियर = अपनी ही इच्छा से सेवा के कार्य के लिए समर्पित फर्स्टएड = प्राथमिक चिकित्सा सहायता; ध्यानस्थ = ध्यान करना; रेडक्रॉस- पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय संगठन; वैज = पहचान-पत्र (जो कमीज या कुर्ते की जेब में लगा रहता है)।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षेप में उत्तर लिखिए
(क) संदीप और कुलदीप को घर आने में देर क्यों हो गई?
उत्तर
संदीप और कुलदीप को घर आने में देर इसलिए हो गई क्योंकि वे दोनों बाढ़ में फंसे लोगों की सहायता में जुटे हुए थे।

(ख) नदियों में बाढ़ आ जाने से क्या-क्या हानि होती
उत्तर
नदियों में बाढ़ आ जाने से गाँव के गाँव बह जाते। हैं। सैकड़ों आदमी मर जाते हैं। जानवरों की तो गिनती ही नहीं। फसल भी बह जाती है। कई प्रकार के रोग फैल जाते हैं।

(ग) रेडक्रॉस के सदस्य क्या कार्य करते हैं?
उत्तरे
रेडक्रॉस के सदस्य बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाते हैं। बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए भोजन, कपड़े एवं दवाइयों का प्रबन्ध करते हैं। उन लोगों की सही देखरेख करने में सहायता करते हैं।

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(घ) संदीप पानी में कैसे बह गया?
उत्तर
संदीप बाढ़ में फंसे लोगों को नाव से सुरक्षित स्थान पर ले जा रहा था। इस बचाव कार्य में व्यस्त संदीप की नाव एकदम उलट गई। तभी पानी का बहाव भी तेज हो गया। इस तरह संदीप पानी में बह गया।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से लिखिए
(क) संदीप और कुलदीप को परोपकार की सीख कैसे मिली?
उत्तर
संदीप और कुलदीप को सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के आदेश से बाढ़ की आपदा में फंसे लोगों की सेवा के लिए अन्न, वस्त्र, दवाएँ आदि पहुँचाने का काम करने को मिला। साथ ही मधुर नामक उनकी बहन ने बताया कि उसके पिता और चाचा ने भी आजादी की जंग में भाग लिया। देश के हजारों लोगों ने अपने प्राण बलिदान कर दिए। इस तरह उन्हें भी देश की सेवा करने, मानवता की रक्षा करने की सीख प्राप्त हुई।

(ख) संदीप द्वारा किए गए बचाव कार्य को युवती ने किस तरह बताया ? लिखिए।
उत्तर
रेडक्रॉस की सदस्या एक युवती ने बताया कि वे सभी बाढ़ पीड़ितों की सहायता करने के लिए गए हुए थे। संदीप ने वहाँ सबसे बढ़-चढ़कर काम किया। उसने अपने प्राणों की चिन्ता किए बिना ही सैकड़ों लोगों के प्राणों की रक्षा की। संदीप बहुत साहसी है। उसके साहस को देखकर सभी लोग अचम्भे में पड़ गए। बिना आराम किए ही लगातार उसने लोगों को बाढ़ के – पानी से सुरक्षित बचाया। वे सभी को नाव में बैठाने के बाद स्वयं :नाव में चढ़ते थे, परन्तु अचानक ही उनकी नाव उलट गई। संदीप – को तैरना आता था। वह बराबर उन लोगों की सहायता करते रहे। पानी में बह जाने के बाद उन्हें लोगों ने बचा लिया। कठिन परिश्रम के कारण वह बेहोश हो गया। उन्हें प्राथमिक चिकित्सा सहायता दे दी गई और वह अब ठीक हो जाएगा।

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(ग) बाढ़ पीड़ितों की क्या-क्या आवश्यकताएँ होती हैं? उन्हें किस तरह सहयोग दिया जाता है ?
उत्तर
बाढ़ पीड़ितों की सबसे पहली आवश्यकता होती है, उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने की। उनसे सम्बन्धित सामान को उनके पास पहुँचाने की। उस समय उन्हें भोजन, पानी व कपड़े आदि प्राप्ति कराने की भी जरूरत होती है। इसके अलावा उन्हें दवाइयों की भी जरूरत होती है क्योंकि बाढ़ आ जाने से पानी से फैलने वाले अनेक रोग हो जाते हैं। उन रोगों के इलाज की तुरन्त आवश्यकता होती है। इन बाढ़ पीड़ितों को रेडक्रॉस और वॉलन्टीयर्स सहायता पहुंचाते हैं। कुछ स्थानीय संस्थाएँ व देश की सेना और स्वयंसेवी संस्थाएँ भी इस कार्य में सबसे अधिक कार्य करती हैं। बाढ़ पीड़ितों के लिए अन्न, वस्त्र, औषधि आदि एकत्र करके उन्हें बाँट दिया जाता है।

(घ) इस एकांकी का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
इस एकांकी में बताया गया है कि हमें संकट काल । में सहयोग करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कुलदीप और संदीप दो भाई हैं। उनकी बहन मधुर और माँ भी उनके साथ रहती हैं। कुलदीप को विद्यालय में सूचना मिलती है कि बाढ़ से जन-धन की हानि हुई है। वह अपने साथियों के साथ उन बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए धन संग्रह करने चला जाता है। उधर संदीप नदी की बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने के लिए चला जाता है। वह अपनी जान की परवाह किए बिना ही लोगों को सुरक्षित स्थानों को पहुंचाता है। इस काम में वह स्वयं भी डूबते-डूबते बच जाता है। इस एकांकी में परोपकार की भावना को रेखांकित किया गया है। मानव जाति की सेवा के लिए संस्थापित संस्था रेडक्रॉस का परिचय भी दिया गया है।

(ङ) बहादुर बेटा किसे कहा गया है और क्यों ?
उत्तर
संदीप को बहादुर बेटा कहा गया है। उसने अपने प्राण हथेली पर रखकर बाढ़ में फंसे लोगों को बचाया।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित कथनों में कौन, किससे कह रहा

(1) “हाँ, माँ वह जरूर चले गए होंगे। वह दिन-रात इसी तरह की बातें किया करते हैं। मैं कुछ करना चाहता हूँ, मेरे
पिता और मेरे चाचा ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। मेरे देश में हजारों लोगों ने अपने प्राण दिए थे। अपना सब कुछ गंवा दिया था। अब मुझे भी तो कुछ करना चाहिए। मुझे भी अपने देश की सेवा करनी चाहिए।”
(2) “खाना, कपड़ा, मकान सभी चीजों की जरूरत होगी। मास्टर जी कहते थे कि सरकार प्रबन्ध कर रही है। कैम्प लगाए हैं, माँ, मैं जाता हूँ। स्कूल में वालंटियर की जरूरत है। मैं कैम्प में जाकर तो काम कर ही सकता हूँ।”
(3) “आप लोग दुनिया की इतनी सेवा करते हैं। कभी-कभी तो हमें भी सेवा का अवसर दिया कीजिए।”
उत्तर

  1. मधुर का कथन अपनी माँ के प्रति।
  2. कुलदीप का कथन अपनी बहन मधुर और माँ के प्रति।
  3. माँ का कथन रेडक्रॉस की सदस्या युवती के प्रति।

बहादुर बेटा भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
इस पाठ के योजक चिह्न वाले शब्द छाँटकर लिखिए।
उत्तर

  1. घर-घर
  2. बचाते-बचाते
  3. धीरे-धीरे।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों में से अनुस्वार और अनुनासिक वाले शब्द अलग-अलग लिखिए
गंगा, माँ, पाँच, वंचित, हूँ, मांगने, पांडव, शांत, बाँध, संहारक, संसार, जाऊंगा।
उत्तर
अनुस्वार वाले शब्द-गंगा, वंचित, पांडव, शांत, संहारक, संसार। अनुनासिक वाले शब्द-माँ, पाँच, हूँ, माँगने, बाँध, जाऊँगा।

प्रश्न 3.
हृदय, आँख तथा कान शब्द से मुहावरे बनाइए तथा उनके अर्थ लिखिए।
(क) हृदय-लगाना, टूक-टूक होना, भर आना।
(ख) आँख-तारा, गिरना, अंधा, धूल झोंकना, खुलना।
(ग) कान-खाना, कच्चा होना, पकड़ना, भरना।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 19 बहादुर बेटा 1
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 19 बहादुर बेटा 2

प्रश्न 4.
नीचे बनी वर्ग पहेली (पाठ्यपुस्तक) में से निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन पर्यायवाची शब्द पहचानकर लिखिए
(1) जाह्नवी
(2) जननी
(3) रात्रि
(4) सूर्य।
उत्तर

  1. जाह्नवी-गंगा, भागीरथी, सुरसरि
  2. जननी-माता, माँ, अम्बा
  3. रात्रि-रजनी, यामिनी, निशा।
  4. सूर्य-भानु, सविता, रवि।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिएलाज, तज, धौर. सूरज, भीख, माता।
उत्तर

  1. लज्जा
  2. त्याग
  3. धैर्य
  4. सूर्य
  5. भिक्षा
  6. मातृ।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग और प्रत्यय पहचानकर अलग कीजिए
गाड़ीवान, ‘अपरिचित, प्रकाशित, प्रशंसनीय, रथवान, संहारक, बेकरार, मातृहीन, दयालु, सुशोभित।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 19 बहादुर बेटा 3

प्रश्न 7.
नीचे कुछ वाक्य लिखे हैं, उनमें यथास्थान विराम चिह्न लगाइए’
(क) काश मैं उसे समझ पाता तो मैं उसके पास इस काम के लिए कभी नहीं जाता।
(ख) रेखा पूनम सुनीता और राधा बगीचे में घूम रही हैं।
(ग) जीवन में सुख दुःख लाभ हानि तो लगे ही रहते हैं। हमें इनकी कभी चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
(घ) गीता में कहा है कर्म करो परन्तु फल की इच्छा मत करो।
उत्तर
(क) काश ! मैं उसे समझ पाता तो, मैं उसके पास इस काम के लिए कभी नहीं जाता।
(ख) रेखा, पूनम, सुनीता और राधा बगीचे में घूम रही हैं।
(ग) जीवन में सुख-दु:ख, लाभ-हानि तो लगे ही रहते हैं। हमें इनकी कभी चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
(घ) गीता में कहा है, “कर्म करो, परन्तु फल की इच्छा मत करो

बहादुर बेटा परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या

(1) हाँ, माँ, वह जरूर चले गए होंगे। वह दिन-रात इसी तरह की बातें किया करते हैं-मैं कुछ करना चाहता हूँ, मेरे पिता और मेरे चाचा ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। मेरे देश के हजारों लोगों ने अपने प्राण दिए थे। अपना सब  कछ लुटा दिया था। अब मुझे भी तो कुछ करना चाहिए। . मुझे भी अपने देश की सेवा करनी चाहिए।

शब्दार्थ-जरूर = अवश्य; आजादी = स्वतन्त्रता; लुटा देना = त्याग दिया।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती’ के पाठ ‘बहादुर बेटा’ नामक पाठ से लिया है। इसके लेखक विष्णु प्रभाकर हैं।

प्रसंग-इस एकांकी में ‘मधुर’ नामक बहन अपने भाई सन्दीप के विषय में अपनी माँ से बातें करती है।

व्याख्या-मधुर ने अपनी माँ की बात का उत्तर देते हुए कहा कि हे माँ ! सन्दीप अवश्य ही बाढ़ पीड़ितों की सेवा के लिए चले गये होंगे। संदीप भैया दिन-रात (हर समय) इसी तरह की बातें करते रहते हैं। वे अक्सर कहते रहते हैं कि वे कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं। उन्हें हमेशा अपने पिता और चाचा के बलिदान याद रहते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। मेरे देश के हजारों लोगों ने अपने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। वे आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ त्याग चुके थे। उनके महान् त्याग से मुझे भी कुछ सीखना चाहिए और देश के लिए अति महत्त्वपूर्ण सेवा-कार्य करना ही चाहिए। देश की सेवा करना ही अब मेरा उद्देश्य है।

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(2) मैं रेडक्रॉस की सदस्या हूँ। बाहर मेरे बहुत से साथी हैं। हम सब लोग बाढ़ पीड़ितों की सहायता करने के लिए गए हुए थे। आपके पुत्र संदीप जी ने वहाँ बहुत काम किया। अपने प्राणों की चिन्ता किए बिना उन्होंने सैकड़ों लोगों को बचाया। उनका साहस देखकर हम लोग दंग रह गए। हमारे मना करने पर भी उन्होंने जरा आराम नहीं किया।

शब्दार्थ-रेडक्रॉस = रेडक्रॉस एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था है जो बिना किसी भेदभाव से विश्व के देशों के पीड़ित नागरिकों की युद्धकाल में, आपदा के समय में
सेवा-सहायता करती है; पीड़ित = कष्ट पाए हुए लोगों की सहायता मदद; चिन्ता = परवाह; साहस = हिम्मत; दंग रह गये = अचम्भे में पड़ गए; जरा-थोड़ा-सा।

सन्दर्भ-पूर्व की भाँति।

प्रसंग-एक युवती रेडक्रॉस की सदस्या है। वह संदीप के “द्वारा किए गए कार्य की जानकारी उसकी माता और बहन मधुर को देती है।

व्याख्या-एक युवती अपना परिचय रेडक्रॉस की सदस्या के रूप में देती है। उसके बहुत से साथी भी वहाँ आए हुए हैं जो बाहर खड़े हैं। वे सब बाढ़ से पीड़ित लोगों की सहायता करने के उद्देश्य से गए हुए थे। वह युवती संदीप के विषय में बताती है कि उन्होंने बहुत बड़ा काम किया है। उन्होंने अपने प्राणों की तनिक भी चिन्ता नहीं की। अपनी हिम्मत से उन्होंने सैकड़ों लोगों के प्राणों को बचाया। सभी लोग उनकी हिम्मत को देखकर अचम्भा कर रहे थे। उनकी टीम के सदस्यों ने कई बार इन्कार भी किया परन्तु वे बराबर अपने काम में जुटे रहे। उन्होंने थोड़ा भी आराम नहीं किया।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 18 Yuddh Geeta Question and Answer

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Class 8 Hindi Bhasha Bharti Chapter 18 Yuddh Geeta Question Answer MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 Solutions Chapter 18 Yuddh Geeta Question Answers MP Board

भाषा भारती कक्षा 8 पाठ 18 युद्ध-गीता प्रश्न उत्तर

युद्ध-गीता बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजकर लिखिए
उत्तर
निशाचर = राक्षस, रात्रि में विचरण करने वाले पताका = ध्वजा, झण्डी; जलद = बादल; समर = युद्ध; रेनु = धूल; घोर भयानक, डरावना; अकुलाइ व्याकुल होकर; मारु = एक विशेष राग जिसे युद्ध के मैदान में योद्धाओं में उत्साह पैदा करने के लिए बजाया जाता है; दशानन रावण; हौं- मैं. कराल = कठोर; बंद-समूह; बरन-वर्ण, रंग; जूथ-समूह; मरुत = हवा; सूर शूरवीर; सुमति = श्रेष्ठ बुद्धि; वसुधा= धरती, पृथ्वी; रव= शोर; गाजहि गरजते हैं; केहरिनाद = सिंहनाद: सुभट्टा = उत्तम वीर; भूप = राजा; मर्कट बन्दर; नाना-बान = अनेक तरह के बाण; संक- शंका या सन्देह; जान = सुन-समझकर; अधीरा- बेचैन; स्यंदन = रथ; दृढ़ = मजबूत, पक्का; घोरे = अश्व, घोड़े; कृपाना = तलवार; त्रोन = तरकस; रिपु = शत्रु; पदकंज = कमल के समान पैर; आयुध = हथियार; जोरी = जोड़ी; विरथ = बिना रथ के पदत्राना = जूते; धीरज = धैर्य चाका पहियाविरति = वैराग्य कोदण्डा- धनुष: अभेद = अभेद्य, जिसे काटा या छेदा न जा सके ताके = उसके मिस = बहाने; कटकु-सेना; गज = हाथी;प्रेरे-प्रेरित किये हुए; बहुबहुत से पयोधि-समुद्र पनवभेरी;प्रलय-विनाश;नफीरि= तुरही; पौरुष = पुरुषार्थ; मर्दहु = मसल दो; कपिन्ह = वानरों को; सपच्छ = पंखंयुक्त; चतुरंगिनी अनी = चार प्रकार की सेना; मत्त = मतवाले; गरजे = चिंघाड़ने लगे; विरदैत = युद्ध कला में चतुर; निकाया = समूह; कंधर – कंधा; निसान = नगाड़ा; घन = बादल; सहनाई-शहनाई; उच्चरहि बोल रहे थे, ऊँची आवाज में कह रहे थे; ठट्ठा = समूह; दुहाई = पुकार; भूधर = पर्वत; महादुम = बड़े-बड़े पेड़; निज-निज = अपने-अपने; वरनानि = वर्ण, रंगभेद की भलाई; सनेह = प्रेमपूर्वक; सौरज = शौर्य; परहित = दूसरे से, चर्म = ढाल; शक्ति = ताकत, बल; कवच =शरीर की रक्षा करने वाला आवरण; संसार रिपु-संसार रूपी शत्रु; पुंज = समूह; मृगराज = सिंह; भिरे = भिड़ गये, लड़ने लगे; वंदि- वन्दना करके आना अन्य प्रकार का, दूसरी तरह का; दम = इन्द्रियों का वश में होना; रज्जु = रस्सी; परसु = फरसा; सिलीमुख = बाणजाके जिसके; कहँ-कहाँ अमल = निर्मल, पवित्र।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर लिखिए
(क) राक्षस सेना के चलने पर धरती पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
उत्तर
राक्षस सेना के चलने पर धरती व्याकुल हो उठी।

(ख) कवि ने दौड़ते वानर-भालुओं की तुलना किससे की है?
उत्तर
कवि ने दौड़ते वानर-भालुओं की तुलना पंख धारण करके उड़ने वाले पर्वत समूह से की है। .

(ग) श्रीराम के पराक्रम का मुख्य आधार क्या है ?
उत्तर
श्रीराम के पराक्रम का मुख्य आधार धर्म केतत्व (शौर्य, धैर्य, सत्य-शील, साहस, यम-नियम, दम, दया, परोपकार आदि) हैं।

(घ) धर्मरथ के दो पहिए कौन-कौन से हैं ?
उत्तर
धर्मरथ के दो पहिए-शौर्य और धैर्य हैं।

प्रश्न 3.
शिक्षक की सहायता से सही जोड़ी बनाइए
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 18 युद्ध-गीता 1
उत्तर
(क) → (3), (ख) → (4), (ग) → (2), (घ)→(1)

प्रश्न 4.
इन प्रश्नों के उत्तर तीन से चार पंक्तियों में लिखिए
(क) युद्धभूमि में विभीषण ने अधीर होकर श्रीराम से क्या कहा ?
उत्तर
युद्ध भूमि में विभीषण ने अधीर होकर श्रीराम से कहा कि हे स्वामी आपका शत्रु रावण युद्ध की सभी सामग्री (साधन-रथ आदि) से युक्त है। आपके पास वे साधन नहीं हैं जिनकी सहायता से युद्ध लड़ा जा सके और शत्रु पर विजय प्राप्त हो सके।

(ख) श्रीराम ने विभीषण की शंका का समाधान किस प्रकार किया?
उत्तर
श्रीराम ने विभीषण की शंका का समाधान करते हुए कहा कि जिस रथ की सहायता लेकर विजय प्राप्त की जाती है, वह अन्य (दूसरे ही) प्रकार का होता है। वह धर्म रथ होता है जिसमें शौर्य-धैर्य के पहिए, सत्य-शील की मजबूत ध्वजा होती है। विवेक का बल होता है। इन्द्रिय दमन और परोपकार के घोड़े क्षमा और कृपा की रस्सी से बँधे होते हैं। इन सभी सद्गुणों के रथ पर सवार होकर बाहरी और आन्तरिक शत्रुओं को जीता जा सकता है।

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(ग) आत्मशक्ति और बाह्यशक्ति में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आत्मशक्ति में धर्म के वे तत्व सम्मिलित हैं जिन्हें हम धर्म के आधारभूत तत्व मानते हैं। इनमें शौर्य, धैर्य, सत्य-शील, साहस, यम-नियम, दम, दया, परोपकार आदि गुण सम्मिलित होते हैं। इसे ही सद्गुणों से संयुक्त धर्म रथ कहते हैं। बाह्य शक्ति में-भौतिक साधन होते हैं जिनमें रथ, कवच व अनेक प्रकार की युद्ध सामग्री से युक्त अति बलवान सैनिक होते हैं। इस बाह्यशक्ति में सद्गुणों का अभाव होता है।

(घ) श्रीराम ने धर्मरथ में जोते चार घोड़े किसे कहा है ?
उत्तर
श्रीराम ने धर्मरथ में जोते हुए चार घोड़े-विवेक, दम, परहित तथा क्षमा को बताया है। इनके द्वारा खींचा गया रथ सर्वत्र गति पकड़े रहता है। मनुष्य अपने विवेक, दम, परहित और क्षमा के बल से किसी भी बाधा पर विजय प्राप्त कर लेता है।

(ङ) संसार रूपी शत्रु को किस रथ पर सवार होकर जीता जा सकता है?
उत्तर
संसार रूपी शत्रु को धर्मरथ पर सवार होकर जीता जा सकता है। इस धर्मरथ में शौर्य और धैर्य के पहिए लगे रहते हैं। सत्य और शील का मजबूत ध्वज होता है। क्षमा, कृपा और समता की रस्सी से बल, विवेक, दम और परोपकार के घोड़े जुते रहते हैं। इस विशेष प्रकार के रथ पर सवार व्यक्ति संसार-शत्रु को जीतकर अपने वश में कर लेता है।

युद्ध-गीता भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों को वाक्यों में प्रयोग कीजिए
लोभ, समकक्ष, पराक्रम, धर्मनीति, आत्मशक्ति, दुर्जय, मर्यादा।
उत्तर

  1. लोभ पाप का मूल होता है।
  2. रवि और मोहन को परस्पर समकक्ष ही लाभ मिल सकेगा।
  3. महाराणा प्रताप ने अपने पराक्रम से ही देश की आजादी का दीपक बुझने नहीं दिया।
  4. भारतीय धर्म नीति सहिष्णुता प्रधान है।
  5. आत्मशक्ति शम और दम से बढ़ सकती है।
  6. रावण की सेना वानर-सेना के लिए दुर्जय बन चुकी थी।
  7.  मर्यादा का उल्लंघन कष्टकारी हो सकता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्ग पहचानकर लिखिए
विशेष, विरथ, अधीर, दुर्जय।
उत्तर
शब्द उपसर्ग + शब्द

  1. विशेष = वि + शेष
  2. विरथ = वि + रथ
  3. अधीर = अ + धीर.
  4. दुर्जय = दु: + जय

प्रश्न 3.
बॉक्स में कुछ शब्द और उनके विलोम शब्द लिखे हैं। इनकी सही जोड़ियाँ बनाकर लिखिए
उचित, अपेक्षा, विजय, लाभ, जीवन, सुरक्षा, पराजय, धर्म, अनुचित, मृत्यु, असुरक्षा, उपेक्षा, अधर्म, हानि।
उत्तर
सही – जोड़ियाँ

  1. उचित → अनुचित
  2. अपेक्षा → उपेक्षा
  3. विजय → पराजय
  4. लाभ → हानि
  5. जीवन → मृत्यु
  6. सुरक्षा → असुरक्षा
  7. धर्म → अधर्म।

प्रश्न 4.
पाठ के आधार पर जोड़े बनाइए
(क) रण – (1) दर्शन
(ख) युद्ध – (2) रथ
(ग) मार्ग – (3) सिर
(घ) धर्म – (4) नीति
(ङ) दस – (5) कला
उत्तर
(क) → (4), (ख) → (5), (ग) → (1), (घ)→ (2), (ङ)→ (3)

प्रश्न 5.
निम्नलिखीत शब्दों का समास विग्रह करते हुए समास का नाम लिखिए
धर्मनीति, प्रतिदिन, आत्मशक्ति, राम-रावण।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 18 युद्ध-गीता 2

प्रश्न 6.
निम्नलिखित अनुच्छेद में यथास्थान उचित विराम चिह्न लगाइए
चरित्र का अर्थ है आचरण या चाल-चलन यहाँ आचरण का अर्थ है सदगुणों का भण्डार जिस व्यक्ति के व्यवहार में सत्य, न्याय, प्रेम, मानवता, करुणा, दया, अहिंसा, त्याग आदि गुण एकत्र हो जाते हैं वह चरित्रवान कहलाता है यहाँ चरित्र की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है किस बल पर पाण्डव कौरवों पर भारी पड़े किस बल पर वनवासी राम ने लंकापति रावण को परास्त किया
उत्तर
चरित्र का अर्थ है, आचरण या चाल-चलन । यहाँ आचरण का अर्थ है, सद्गुणों का भण्डार। जिस व्यक्ति के व्यवहार में सत्य, न्याय, प्रेम, मानवता, करुणा, दया, अहिंसा, त्याग आदि गुण एकत्र हो जाते हैं; वह चरित्रवान कहलाता है। यहाँ चरित्र की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है। किस बल पर पाण्डव कौरवों पर भारी पड़े ? किस बल पर वनवासी राम ने लंकापति रावण को परास्त किया ?

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प्रश्न 7.
(अ) निम्नलिखित छन्दों के चरणों में मात्राएँ पहचानकर उनका नाम लिखिए।
उत्तर
MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 18 युद्ध-गीता 3
चौपाई छन्द है। चौपाई के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण और तगण का प्रयोग नहीं होता है।

प्रश्न 7.
(ब) इस पाठ में से अनुप्रास अलंकार के उदाहरण छाँटकर लिखिए। .
उत्तर

  1. बिविध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥
  2. बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया॥ .
  3. अति विचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेनु जनु साजी॥
  4. अमन अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥

प्रश्न 8.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम शब्द लिखिए
धीरज, सौरज, सील, छमा, ईस, बुधि, ताकत, जम।
उत्तर

  1. धैर्य
  2. शौर्य
  3. शील
  4. क्षमा
  5. ईश
  6. बुद्धि
  7. शक्ति
  8. यम।

प्रश्न 9.
पाठ में आए उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा अलंकार के अन्य उदाहरण छाँटकर लिखिए।
उत्तर
उपमा-अमन अचल मन त्रोन समाना। रूपक-महा अजय संसार रिपु, जीती सकइ सो बीर। उत्प्रेक्षा-प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे।

युद्ध-गीता सम्पूर्ण पद्यांशों की व्याख्या

(1) चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा ।।
विविध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल पताका ध्वज नाना।

शब्दार्थ-निसाचर = राक्षस; कटकु = सेना; अपारा = संख्या में बहुत अधिक; चतुरंगिनी-चार प्रकार की-गज सेना, रथ सेना, घुड़सवार और पैदल सेना; अनी = सेना; बहु = अनेक, बहुत प्रकार के धारा = कतार; विविध भाँति = अनेक प्रकार के बाहन = सवारियाँ; बिपुल बहुत-सी; पताका = झण्डियाँ ध्वज = झण्डे; नाना = अनेक प्रकार के।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती’ के पाठ ‘युद्ध-गीता’ से अवतरित हैं। इनके रचियता-तुलसीदास हैं।

प्रसंग-रामचरितमानस के लंका काण्ड से उद्धृत इन पंक्तियों में राम और रावण के मध्य होने वाले युद्ध के लिए आने वाली सेनाओं का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-राक्षसराज रावण की अपार सेना युद्धक्षेत्र की ओर चलने लगी। वह सेना चतुरंगिनी (गज, रथ, अश्व व पैदल सेना) थी और बहुत-सी कतारों में रावण की सेना चली जा रही थी। उस सेना में बहुत प्रकार के वाहन और रथ चले जा रहे थे। उन (वाहनों) पर बहुत प्रकार की पताकाएँ और ध्वज फहरा रहे थे।

(2) चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जल्द मरूत जनु प्रेरे॥
बरन बरन बिरंदैत निकाया। समर सूर जानहि बहु माया॥

शब्दार्थ-मत्त = मतवाले गज = हाथी; जूथ = झुण्ड, दल; घनेरे = बहुत से; प्राबिट = बरसात; जलद = बादल; मरुत = हवा; जनु = मानो; प्रेरे = प्रेरित किए जाकर; बरन बरन = वर्ण और आकार के बिरदैत = युद्धकला में चतुर (निपुण); निकाया = समूह; समर = युद्ध; सूर = योद्धा; माया = कपट।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-रावण की सेना की विपुलता और सैनिकों की युद्धवीरता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-रावण की सेना में मतवाले हाथियों के बहुत-से दल युद्ध क्षेत्र की ओर उसी तरह चले जा रहे थे मानो वर्षा ऋतु में हवा से प्रेरित बादलों का समूह चला आ रहा हो। विविध वर्ण के प्रसिद्ध योद्धाओं का समूह भी था। वे सभी युद्धवीर थे और अनेक प्रकार के युद्ध सम्बन्धी कपटपूर्ण चाल से परिचित थे।

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(3) अति विचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेतु जनु साजी।
चलत कटक दिगसिधुर दगही। छुअित पयोधि कुधर डगमगहीं॥

शब्दार्थ-विचित्र = अनोखा; बाहिनी = फौज, सेना; बिराजी = विराजमान है; साजी = सजाई है; कटक = सेना; दिगसिंधुर-दसों दिशाओं रूपी हाथी; पयोधि सागर; छुभित= क्षुब्ध होकर; कुधर = पर्वत, पहाड़।

सन्दर्भ-पूर्ववत्। प्रसंग-रावण की सेना का सुन्दर प्रस्तुतीकरण किया गया

व्याख्या-तुलसीदासजी कहते हैं कि लंकापति रावण की सेना बड़ी विचित्र है। रावण की सेना को देखकर ऐसा लगता है कि वीर बसंतराज ने अपनी सेना को सजाया हो। उनकी सेना के चलने से दसों दिशाओं रूपी हाथी डिगने लगे, सागर क्षुब्ध हो उठे तथा पर्वत डगमगाने लगे।

(4) उठी रेनु रबि गयऊ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई॥
पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं॥

शब्दार्थ-रेनु धूल: रबि-सूर्य:गयऊछपाई-छिप गया; मरुत = हवा; थकित = थक गई; बसुधा – पृथ्वी; अकुलाई = व्याकुल हो गई; पनव = युद्ध भेरी का बाजा; निसान = नगाड़ा; रव = शोर; बाजहि = बजने लगे; घन = बादल; जनु = मानो; गाजहिं = गरज रहे हों।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-राक्षसराज रावण की शक्तिशाली सेना की विशालता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-लंका नरेश रावण की सेना युद्धक्षेत्र की ओर जब प्रयाण (प्रस्थान) कर रही थी, तब उसके चलने से जो धूल उठी, उससे सूर्य छिप गया। हवा भी थक गई, पृथ्वी भी व्याकुल होने लगी। रणभेरी और युद्ध के नगाड़े इस तरह बजने लगे मानो प्रलय के समय के बादल गरजना कर रहे हों।

(5) भेरति नफीरि बाज सहनाई। मारु राग सुभट सुखदाई॥
कहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं।

शब्दार्थ-नफीरि = तुरही; भेरति = भेरी बज रही है। सहनाई – शहनाई; बाज = बजाई जा रही है। मारु राग- युद्ध में योद्धाओं को उत्साहित करने के लिए बजाया जाने वाला मारु राग; सुभट = योद्धाओं को; सुखदाई = अच्छा लग रहा है; केहरि नाद = सिंह नाद (सिंह गर्जना);बीर = योद्धा; पौरुष = पुरुषार्थ;
उच्चरहीं = वर्णन कर रहे थे।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-रावण के योद्धाओं की शक्ति तथा रणकौशल का वर्णन किया जा रहा है।

व्याख्या-युद्धक्षेत्र के लिए प्रस्थान करती हुई रावण की विशाल सेना को प्रेरित करने के लिए तुरही और भेरी तथा शहनाई बज रही है। युद्धवीरों को अच्छा लगने वाला मारु राग बजाया जा रहा है। सभी योद्धा सिंह गर्जना कर रहे हैं। वे सभी अपने-अपने बल और पुरुषार्थ का बखान कर रहे हैं।

(6) कहड़ दसानन सुनु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा।
हाँ मारिऊँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई।
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दुहाई॥

शब्दार्थ-दसानन दश मुख वाला रावण; कहड़ = कहने लगा; सुनु = सुनो; सुभट्टा = अत्यधिक वीर, उत्तम वीर; मर्दहु – मसल दो; कपिन्ह, बन्दरों; ठट्टा = समूह; हौं = मैं; मारिऊँ = मारूंगा; भूप द्वौ भाई = राजा के पुत्र दोनों भाइयों को; अस = ऐसा; कहि-कहकर; सन्मुख = अपने ही सामने फौज-सेना; रेंगाई = आगे को बढ़ाया, सुधि = समाचार; सकल = सभी; कपिन्ह = बन्दरों ने धाए – दौड़ पड़े; दुहाई = पुकारना।

सन्दर्भ- पूर्व की तरह।

प्रसंग-रावण द्वारा अपनी विशाल सेना को आगे बढ़ने का आदेश दे दिए जाने पर, श्रीराम की वानर-सेना भी इस समाचार को सुनकर राम की दुहाई देकर युद्धक्षेत्र की ओर दौड़ पड़ी।

व्याख्या-दशमुखों वाले रावण ने कहा कि हे श्रेष्ठ वीरो ! आप सभी सुनें। आप सभी वानरों और भालुओं के समूह को मसल डालो। मैं, राजा के पुत्र दोनों भाइयों को मारूंगा। यह कहकर अपने सामने ही अपनी सेना को आगे बढ़ाया। यह समाचार सभी वानरों ने जब प्राप्त किया तो वे भी रघुवीर श्री रामचन्द्रजी की दुहाई देते हुए दौड़ पड़े।

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(7) धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।
मानहुँ सपच्छ उडाहिं भूधर बूंद नाना बानते॥
नख दसन सैल महादुमायुध सबल संक न मानहीं।
जय राम राव मत्त गज मगराज सुजसु बखानहीं।

शब्दार्थ-धाए = दौड़ पड़े; बिसाल = बड़े आकार के कराल- भयंकर; मर्कट = बन्दर; ते वे; सपच्छ = पंख धारण कर; भूधर = पहाड़, पर्वत; बंद = समूह; नाना अनेक प्रकार केबान = तीर या विस्फोटक; नख = नाखून; दसन = दाँत; सैल = पर्वत; महादुमायुध = बड़े-बड़े वृक्ष रूपी हथियार; सबल = बलवान; संक-भय, सन्देह; मत्तगज मतवाला हाथी; मृगराज = सिंह; सुजसु- महान् यश का; बखानहीं = बखान करते हैं।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह। प्रसंग-पूर्व की तरह।

व्याख्या-बड़े आकार वाले भयंकर बन्दर और भालू दौड़ पड़े। वे काल के समान थे। मानो पंख धारण किए हुए पहाड़ों का समूह उड़ रहा हो। वे अनेक तरह के बाण इत्यादि (विस्फोटक) जैसे थे। वे नाखून, दाँत, पर्वत एवं बड़े-बड़े वृक्षों को युद्ध के हथियार रूप में धारण किए हुए थे, वे बलवान होने से बिल्कुल भी भयभीत नहीं होते थे। मतवाले हाथी के समान रावण के लिए मृगराज (सिंह) बने हुए श्रीराम की वे (वानर इत्यादि) जय-जयकार कर रहे थे तथा उनके अच्छे यश का (कीर्ति का) वर्णन कर रहे थे।

(8) दुहु दिसि जय-जयकार करि निज निज जोरी जानि।
भिरे बीत इत रामहि उत रावनहि बखानि॥

शब्दार्थ-दुहु दिसि = दोनों ओर; जोरी = जोड़ी; जानि = समझकर; भिरे-भिड़ बैठे; बीत = युद्ध समाप्त हो जाने के बाद: इत = इधर; उत = उधर; रावनहि = रावण (के गुणों का); बखानि = वर्णन कर रहे थे।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-पूर्व की तरह।

व्याख्या-दोनों ओर से ही (राम की ओर से तथा रावण की ओर से) जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी का (बराबरी का) समझकर वे भिड़ गये (युद्ध करने में लग गये)। युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद, इधर से राम की और उधर से रावण की विशेषताओं का वर्णन कर रहे थे।

(9) रावनु रथी बिरथ रघुवीरा। देखि विभीषन भयउ अधीरा ।।
अधिक प्रीति मन भा सन्देहा। बंदि वरन कह सहित सनेहा ।

शब्दार्थ-रथी = रथयुक्त; बिरथ – बिना रथ के भयउहो गया; अधीर = धैर्यहीन; प्रीति = प्रेम होने से; सन्देहा = शंका; बंदि= वन्दना करके; कह- कहने लगा; सहित सनेहा = प्रेमपूर्वक।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-युद्ध की सामग्री से रहित राम को देखकर विभीषण बहुत ही अधीर होने लगा।

व्याख्या-युद्ध के मैदान में लंका नरेश रावण रथयुक्त था जबकि श्रीरामचन्द्रजी रथ से रहित थे। विभीषण ने जब इस तरह श्रीरामजी को बिना रथ के देखा तो वह अधीर हो उठे। विभीषण श्रीराम जी से बहुत अधिक प्रेम करते थे। प्रेम की अधिकता होने के कारण विभीषण के मन में सन्देह हो उठा। (सन्देह इस बात का कि श्रीरामचन्द्रजी युद्ध में रावण पर विजय प्राप्त नहीं कर सकेंगे।) वह विभीषण उनके (श्रीरामचन्द्रजी के) चरणों की वन्दना करके प्रेमपूर्वक कहने लगा।

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(10) नाथ न रथ नहिं तन पद जाना।
केहि बिधि जितब बीर बलवाना ।।
सुनहु सखा कह कृपा निधाना।
जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥

शब्दार्थ-तन = शरीर; पद = पैर;त्राना = रक्षक, बचाव करने वाला कवच इत्यादि केहि बिधि-किस प्रकार से;जितबजीत प्राप्त कर सकोगे; बीर बलवाना = (रावण) अत्यन्त वीर है और शक्तिशाली है; आना = अन्य या दूसरा; स्यंदन = रथ।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-रावण के शक्तिशाली होने पर विभीषण इस चिन्ता से युक्त हैं कि श्रीरामचन्द्रजी युद्ध के साधनों से रहित होकर किस तरह युद्ध में जीत प्राप्त करेंगे।

व्याख्या-विभीषण श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं कि हे मेरे स्वामी! आपके पास युद्ध करने के लिए रथ नहीं है, शरीर और पैरों की सुरक्षा के लिए कवच इत्यादि भी नहीं है। उस वीर और बलवान रावण को आप किस तरह जीत सकोगे। कृपानिधान श्रीरामचन्द्र जी ने कहा कि हे मेरे मित्र (विभीषण) सुनो। जिस रथ से विजय प्राप्त होती है, वह रथ तो दूसरा ही होता है।

(11) सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

शब्दार्थ-सौरज = शौर्य; धीरज = धैर्य; तेहि = जिसमें; चाका = पहिये; दृढ़ = मजबूत; ध्वजा = झण्डा; पताका = झण्डियाँ; घोरे = घोड़े; रजु रस्सी; जोरे = जोते हुए हैं।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-विजय प्राप्त करने के रथ की विशेषताओं का उल्लेख श्रीरामचन्द्र जी कर रहे हैं।

व्याख्या-जिस रथ में शौर्य और धैर्य रूपी पहिए लगे हुए हैं,सत्य और शील की मजबूत ध्वजा और पताकाओं से जिस रथ को सजाया गया है, बल, विवेक, दम तथा दूसरों की भलाई करने की भावना के घोड़ों को, क्षमा, कृपा और समानता की रस्सी से जोता गया है। उस रथ से विजय प्राप्त होती है।

(12) ईस भजन सारथी सजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर विग्यान कठिन कोदंडा॥

शब्दार्थ-ईस-ईश्वर भजनु भजन करना;सारथी-रथ हाँकने वाला; बिरति = विरक्ति, वैराग्य; चर्म = ढाल कृपाना। कृपाण, तलवार; परसु = फरसा; प्रचंडा = तीव्र बर = श्रेष्ठ, विग्यान = विज्ञान ही; कठिन = कठोर; कोदंडा = धनुष।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-बाहरी और भीतरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के उपाय बताए गए हैं।

व्याख्या-श्रीरामचन्द्रजी विभीषण को उपदेश देते हैं कि ईश्वर का भजन, श्रेष्ठ ज्ञान से युक्त सारथी, वैराग्य की बाल, सन्तोष की तलवार, दान का फरसा, तेज बुद्धि से युक्त शक्ति, श्रेष्ठ विज्ञान रूपी कठोर धनुष विजय प्राप्त करने के साधन हैं।

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(13) अमल अचल मन त्रोन समाना।
सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
कवच अभेद बिन गुर पूजा।
एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥
सखा धर्मरथ अस रथ जाकें।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।

शब्दार्थ-अमल = निर्मल, पापरहित; अचल = स्थिर; त्रोन = तरकस; जम = यम; सम = शम; सिलीमुख = बाण; नाना = अनेक; अभेद = न टूट सकने वाला; बिप्र = ब्राह्मण; एहि सम = इसके समान; दूजा = दूसरा, अन्य; सखा = मित्र; अस = ऐसा, इस प्रकार का; जाकें = जिसके पास; जीतन कहाँ न कहाँ विजय प्राप्त नहीं करता कतहुं रिपु ताकें = उसके कितने ही शत्रु हो सकते हैं।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह। प्रसंग-पूर्व की तरह।

व्याख्या-श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण को बताया कि जिसके पापरहित (निर्मल) और स्थिर मन रूपी तरकस में शम, यम, नियम के अनेक बाण हैं; ब्राह्मण और गुरु की पूजा रूपी अभेद्य कवच जिसके पास है, तो इनके समान विजय प्राप्त करने का कोई भी दूसरा उपाय नहीं है। हे मित्र ! जिसके पास धर्मरथ रूपी ऐसा रथ है, तो वह कहाँ विजय प्राप्त नहीं करता ? चाहे, उसके कितने ही शत्रु क्यों न हों ? अर्थात् उसे सभी जगह विजय प्राप्त होती है।

(14) महा अजय संसार रिपु जीती संकइ सो बीर।
जाके अस रथ होइ दृढ़, सुनहु सखा मतिधीर ॥
सुनि प्रभु बचन बिभीषण हरषि गहे पद कंज।
ऐहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥

शब्दार्थ-अजय = न जीते जाने योग्य, अजेय; रिपु = दुश्मन, शत्रु; जीत सकई = जीत सकता है; सो = वहीं; जाकें = जिसका; दृढ़ = मजबूत; मतिधीर = धैर्ययुक्त बुद्धि वाला; हरषि = प्रसन्न होकर; गहे = पकड़ लिए; पद कंज = कमल जैसे चरणों को; ऐहि = इसके; मिस = बहाने से; मोहि = मुझको; उपदेसेहु – उपदेश दिया; कृपा = कृपा करके; सुखपुंज = सुख समूह, सुखराशि।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-श्रीरामचन्द्रजी के उपदेश को सुनकर विभीषण स्वयं को अत्यन्त सुखी अनुभव करने लगा।

व्याख्या-श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण को सम्बोधित करते हुए कहा कि हे धैर्यशाली बुद्धि वाले मेरे मित्र तुम सुनो ! जिसके पास ऐसा (ऊपर की पंक्तियों में बताया गया) मजबूत धर्म रथ होता है, वही वीर इस बहुत बड़े अजेय संसार रूपी दुश्मन को जीत सकता है। – प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के वचनों को सुनकर प्रसन्न होकर कमल के समान उनके (श्रीराम के) चरणों को पकड़ लिया। (और कहने लगा कि) हे सुखराशि राम ! आपने इसी बहाने से मुझे उपदेश देकर बड़ी कृपा की है।

MP Board Class 8 Hindi Question Answer

MP Board Class 9th General Hindi निबंध लेखन

MP Board Class 9th General Hindi निबंध लेखन

1. दशहरा (विजयादशमी) अथवा एक भारतीय त्योहार

हमारे देश में विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग रहते हैं। उनके विविध कर्म-संस्कार होते हैं। वे अपने कर्मों और संस्कारों को समय-समय पर विशेष रूप से प्रकट करते रहते हैं। इन रूपों को हम आए दिन, त्योहारों, पर्यों, आयोजनों में देखा करते हैं। इस प्रकार के अधिकांश तिथि, पर्व, त्योहार, आयोजन, उत्सव आदि सर्वाधिक हिंदुओं में होते हैं। हिंदुओं के जितने तिथि, त्योहार, पर्व, उत्सव आदि हैं उनमें दशहरा (विजयादशमी) का महत्त्व अधिक बढ़कर है। यह भी कहा जाना कोई अनुचित या अतिशयोक्ति नहीं है कि दशहरा (विजयादशमी) हिंदुओं का सर्वश्रेष्ठ पर्व, त्योहार या उत्सव है।

दशहरा (विजयादशमी) का त्योहार सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में हिंदू धर्म-मत के अनुयायी बड़े ही उल्लास और प्रयत्न के साथ मनाते हैं। यह आश्विन (क्वार) मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (एकम्) से पूर्णिमा (पूर्णमासी) तक बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। अंग्रेजी तिथि-गणना के अनुसार यह त्योहार अक्टूबर माह . में पड़ता है।

दशहरा (विजयादशमी) का त्योहार-उत्सव मनाने के कई कारण और मत हैं। प्रायः सभी हिंदू धर्मावलंबी इस धारण से इसे मनाते हैं कि इसी समय भगवान् श्रीराम ने युग-युग सर्वाधिक अत्याचारी लंका नरेश रावण का अंत करके उसकी स्वर्णमयी नगरी लंका पर विजय प्राप्त की थी। चूँकि प्रतिपदा (एकम्) से लेकर दशमी तक (दस दिनों तक) लगातार भयंकर युद्ध करने के उपरांत ही श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए इसे विजयादशमी भी कहा जाता है। ‘दशहरा’ शब्द भी ‘विजयादशमी’ शब्द का पर्याय और प्रतीक है।

दशहरा (विजयादशमी) त्योहार, पर्व और पुण्य-तिथि के भी रूप में मनाया जाता है। मुख्य रूप से बंगाल-निवासी इसे महाशक्ति की उपासना-आराधना के रूप में मनाते हैं। उनका यह घोर विश्वास होता है कि इसी समय महाशक्ति दुर्गा ने असुरों का विध्वंस करके कैलाश पर्वत को प्रस्थान किया था। महाशक्ति की पूजा-उपासना, ध्यान-भक्ति आदि के द्वारा वे लगातार नौ दिनों तक अखंड पाठ और नवरातों तक पूजा के दीप जलाया करते हैं। इसलिए इसे लोग ‘नवरात’ भी कहते हैं। दुर्गा के अतिरिक्त अन्य देवी-देवताओं के भी व्रत, उपासना, पाठ, संकीर्तन आदि पुण्य कार्य-विधान इसी समय सभी श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए निष्ठा से करते हैं।

इस त्योहार के समय सबमें अद्भुत खुशी और उमंग की झलक होती है। प्रकृति देवी अपनी सुंदरता को सुखद हवा, वनस्पतियों के रंग-बिरंगे फूलों फसलों, फलों, और सभी जीवधारियों विशेष रूप से मनुष्यों के रौनकता और चंचलता के रूप में प्रकट करती हुई दिखाई पड़ती है। उधर मनुष्य भी अपनी विविध सौंदर्य-सज्जा से पीछे नहीं रहता है। दशहरा (विजयादशमी) के समय जगह-जगह मेलों, दंगलों, सभाओं, उद्घाटनों, प्रीतिभोजों, समारोहों आदि के कारण सारा वातावरण अपने आप में बन-ठनकर अधिक रोचक दिखाई देने लगता है।

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दशहरा (विजयादशमी) के त्योहार का बहुत बड़ा संदेश है। वह यह कि सत्य और सदाचार की असत्य और दुराचार पर निश्चय ही विजय होती है। यह त्योहार हमें यह सिखलाता है कि हमें पूरी निष्ठा और श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए। भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अगर कोई वास्तविक त्योहार है तो सबसे पहले दशहरा (विजयादशमी) ही है।

2. समय का सदुपयोग (समय बहुमूल्य है)

महाकवि तुलसी ने समय का महत्त्वांकन करते हुए लिखा है”का वर्षा जब कृषि सुखानी। समय चूकि पुनि का पछतानी।।”

अर्थात् समय के बीत जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं। दूसरे शब्दों में समय के रहते ही कुछ कर लेने का लाभ होता है। अन्यथा समय बार-बार नहीं मिलता है।

गोस्वामी तुलसीदास के उपर्युक्त उपदेश पर विचारने से यह स्पष्ट हो जाता है कि समय का महत्त्व समय के सदुपयोग करने से ही होता है। केवल कथा-वार्ता, चर्चा, घटना-व्यापार आदि के अनुभवों के द्वारा हम अच्छी तरह से समझ जाते हैं कि समय का प्रभाव सबसे बड़ा होता है। दूसरे शब्दों में यह कि समय सबको प्रभावित करता है। समय के उपयोग से गरीबी अमीरी में बदल जाती है। असत्य सत्य सिद्ध हो जाता है। लघुता प्रभुता में बदल जाती है। इसी प्रकार यह कहा जा सकता है कि असंभव संभव में बदल जाता है। इसीलिए कोई भी प्रयत्नशील व्यक्ति-प्राणी समय का सदुपयोग करके मनोनुकूल दशा को प्राप्त करके चमत्कार उत्पन्न कर सकता है।

समय का प्रवाह बहते हुए जल-प्रवाह के समान होता है जिसे रोक पाना सर्वथा कठिन और असंभव होता है। इस तथ्य को बड़े ही सुस्पष्ट रूप से एक अंग्रेज विचारक ने इस प्रकार से व्यक्त किया है-

“Time and Tide wait for none.”

इसी प्रकार से समय के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए किसी अन्य अंग्रेज चिंतक ने ठीक ही सुझाव किया है कि समय सबसे बड़ा धर्म है। यही सबसे बड़ी पूजा है। इसलिए सब प्रकार से महान् और सफल जीवन बिताने के लिए समय की पूजा-आराधना करने के सिवा और कोई चारा नहीं है-

“No religion is greater than time, time is the greatest dharma. So believe the time, worship the time if you want to live and if you want to survive.”

समय के महत्त्व को सभी महापुरुषों ने सिद्ध किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सदुपदेश देते हुए स्वयं को समय (काल) की संज्ञा दी है। काल ही विश्व का कारण है। वही विश्व की रचना करता है, विकास करता है और वही इसका विनाश भी करता है। अतः काल ही काल का कारण है। काल ही महाकाल है। महाकाल ही अतिकाल है और अतिकाल ही विनाश, सर्वनाश, विध्वंस और नाश-विनाश को भी सदैव के लिए स्वाहा करने वाला है। इसलिए यह किसी प्रकार से आश्चर्य नहीं कि काल का अभिन्न स्वरूप सभी देव-शक्तियाँ, ब्रह्मा, विष्णु और महेश काल भी काल के प्रभाव से कभी दूषित, खोटे और निंदनीय कर्म में लिप्त होने से बच नहीं पाते हैं। फिर सामान्य प्राणी जनों की काल के सामने क्या बिसात है।

हम यह देखते हैं और अनुभव करते हैं कि काल अर्थात् समय का सदुपयोग करने वाले विश्व के एक से एक महापुरुषों ने समय के सदुपयोग को आदर्श रूप में व्यक्त किया है। समय का सदुपयोग ही अनंत संभावनाओं के द्वार को खोलता है और अनंत समस्याओं के समाधान को भी प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि आज के वैज्ञानिकों ने अनंत असंभावनाओं को संभावनाओं में बदलते हुए सबके कान खड़े कर दिए हैं। इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि संभावनाओं की ओर आकर्षित होकर समय का सदुपयोग करने वाले निरंतर ही समय के एक-एक अल्पांश को किसी प्रकार से हाथ से निकलने नहीं देते हैं। ऐसा इसलिए कि वे भली-भाँति इस तथ्य के अनुभवी होते हैं-

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“मुख से निकली बात और धनुष से निकला तीर कभी वापस नहीं आते।”

इसलिए समय का सदुपयोग करने से हमें कभी भी कोई चूक नहीं करनी चाहिए अन्यथा हाथ मल-मल कर पश्चाताप करने के सिवा और कुछ नहीं हो सकता-

“अब पछताए क्या होत है, जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत।”

3. सिनेमा या चलचित्र

प्राचीन काल से लेकर अब तक मनुष्य ने अपने शारीरिक और मानसिक थकान और ऊब को दूर करने के लिए विभिन्न प्रकार के साधनों को तैयार किया है। प्राचीन काल में मनुष्य कथा, वार्ता, खेल-कूद और नाच-गाने आदि के द्वारा अपने . तन और मन की थकान और ऊब को शांत किया करता था। धीरे-धीरे युग का परिवर्तन हुआ और मनुष्य के प्राचीन मनोरंजन और विनोद के साधनों में बढ़ोत्तरी हुई। आज विज्ञान के बढ़ते-चढ़ते प्रभाव के फलस्वरूप मनोरंजन के क्षेत्र में प्राचीन काल की अपेक्षा कई गुना वृद्धि हुई। पत्र, पत्रिकाएँ, नाटक, ग्रामोफोन, रेडियो, दूरदर्शन, टेपरिकॉर्डर, वी.सी.आर., वी.डी.ओ., फोटो कैमरा, वायरलेस, टेलीफोन सहित ताश, शतरंज, नौकायन, पिकनिक, टेबिल टेनिस, फुटबाल, वालीवाल, हॉकी, क्रिकेट सहित अनेक प्रकार की कलाएँ और प्रदर्शनों ने मानव द्वारा मनोरंजन हेतु आविष्कृत चौंसठ कलाओं में संवृद्धि की है। दूसरे शब्दों में कहना कि पूर्वकालीन मनोरंजन के साधन यथा-कथा, वार्ता, वाद-विवाद, कविता, संगीत, वादन, गोष्ठी, सभा या प्रदर्शन तो अब भी मनोरंजनार्थ हैं ही, इनके साथ ही कुछ अत्याधुनिक और नयी तकनीक से बने हुए मनोरंजन भी हमारे लिए अधिक उपयोगी हो रहे हैं। इन्हीं में से सिनेमा या चलचित्र भी हमारे मनोरंजन का बहुत बड़ा आधार है।

‘सिनेमा’ अंग्रेजी का मूल शब्द है जिसका हिंदी अनुवाद चलचित्र है अर्थात् चलते हुए चित्र। आज विज्ञान ने जितने भी हमें मनोरंजन के विभिन्न स्वरूप प्रदान किए हैं उनमें सिनेमा की लोकप्रियता बहुत अधिक है। इससे हम अब तक संतुष्ट नहीं हुए हैं और शायद अभी और कुछ युगों तक हम इसी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाएँगे तो कोई आश्चर्य नहीं। कहने का भाव यह कि सिनेमा से हमारी रुचि बढ़ती ही जा रही है। इससे हमारा मन शायद ही कभी ऊब सके।

चलचित्र या सिनेमा का आविष्कार 19वीं शताब्दी में हुआ। इसके आविष्कारक टामस एल्बा एडिसन अमेरिका निवासी थे जिन्होंने 1890 में इसको हमारे सामने प्रस्तुत किया था। पहले-पहल सिनेमा लंदन में ‘कुमैर’ नामक वैज्ञानिक द्वारा दिखाया गया था। भारत में चलचित्र दादा साहब फाल्के के द्वारा सन् 1913 में बनाया गया। उसकी काफी प्रशंसा की गई। फिर इसके बाद न जाने आज तक कितने चलचित्र बने और कितनी धनराशि खर्च हुई; यह कहना कठिन है। लेकिन यह तो ध्यान देने का विषय है कि भारत का स्थान चलचित्र की दिशा में अमेरिका के बाद दूसरा अवश्य है। कुछ समय बाद यह सर्वप्रथम हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

अब सिनेमा पूर्वापेक्षा रंगीन और आकर्षक हो गया है। इसका स्वरूप अब न केवल नैतिक ही रह गया है अपितु विविध भद्र और अभद्र सभी अंगों को स्पर्श कर गया है। अतः सिनेमा स्वयं में बहुविविधता भरा एक अत्यंत संतोषजनक मनोरंजन का साधन सिद्ध होकर हमारे जीवन और दिलो-दिमाग में भली भाँति छा गया है, सिनेमा से हम इतने बंध गए हैं कि इससे हम किसी प्रकार मुक्त नहीं हो पाते हैं। हम भरपेट भोजन की चिंता न करके सिनेमा की चिंता करते हैं। तन की एक-एक आवश्यकता को भूलकर या तिलांजलि देकर हम सिनेमा देखने से बाज नहीं आते हैं। इस प्रकार सिनेमा आज हमारे जीवन को दुष्प्रभावित कर रहा है। इसके भद्दे, अश्लील और दुरुपयोगी चित्र समाज के सभी वर्गों को विनाश की ओर लिये जा रहे हैं। अतः समाज के सभी वर्ग बच्चा, युवा और वृद्ध, शिक्षित और अशिक्षित सभी भ्रष्टता के शिकार होने से किसी प्रकार बच नहीं पा रहे हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि हमें अच्छे चलचित्र को ही देखना चाहिए। बरे चलचित्रों से दूर रहने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। यही नहीं चरित्र को बर्बाद करने वाले चलचित्रों को विरोध करने में किसी प्रकार से संकोच नहीं करना चाहिए। यह भाव सबमें पैदा करना चाहिए कि चलचित्र हमारे सुख के लिए ही है।

4. किसी यात्रा का रोचक वर्णन या किसी पर्वतीय स्थान का वर्णन

जीवन में कुछ ऐसे भी क्षण आते हैं जिन्हें भूल पाना बड़ा कठिन हो जाता है। दूसरी बात यह कि जीवन में कुछ ऐसे भी अवसर मिलते हैं। जो अत्यधिक रोचक और आनंददायक बन जाते हैं। सभी की तरह मेरे भी जीवन में कुछ ऐसे अवसर अवश्य आए हैं जिनकी स्मृति कर आज भी मेरा मन बाग-बाग हो उठता है। उन रोचक और सरस क्षणों में एक क्षण मुझे ऐसा मिला जब मैंने जीवन में पहली बार एक पर्वतीय स्थान की सैर की।

छात्रावस्था से ही मुझे प्रकृति के प्रति प्रेमाकर्षण, प्रकृति के कवियों की रचनाओं को पढ़ने से पूर्वापेक्षा अधिक बढ़ता गया। प्रसाद, महादेवी, मुकुटधर पांडेय आदि की तरह कविवर सुमित्रानंदन पंत की रचनाओं ने हमारे बचपन में अंकुरित प्रकृति के प्रति प्रेम-मोह के जाल को और अधिक फैला दिया। इसमें मैं इतना फँसता गया कि मैंने यह निश्चय कर लिया कि कविवर सुमित्रानंदन पंत का पहाड़ी गाँव कौसानी एक बार अवश्य देखने जाऊँगा। ‘अगर मंसूबे मजबूत हों तो उनके पूरे होने में कोई कसर नहीं रहती है। यह बात मुझे तब समझ में आ गई जब मैंने एक दिन कौसानी के लिए यात्रा करने का निश्चय कर ही लिया।

गर्मी की छुट्टियाँ आ गई थीं। स्कूल दो माह के लिए बंद हो गया था। एक दिन मैंने अपने इष्ट मित्रों से कोई रोचक यात्रा करने की बात शुरू कर दी। किसी ने कुछ और किसी ने कुछ सुझाव दिया। मैंने सबको कौसानी नामक पहाड़ी गाँव की सैर करने की बात इस तरह से समझा दी कि इसके लिए सभी राजी हो गए। एक सुनिश्चित दिन में हम चार मित्र कविवर पंत की जन्मस्थली ‘कौसानी’ को देखने के लिए चल दिए। रेल और पैदल सफर करके हम लोग दिल्ली से सुबह चलकर ‘कौसानी’ को पहुँच गए।

हम लोगों ने देखा कि ‘कौसानी गाँव एक मैदानी गाँव की तरह न होकर बहुत टेढ़ा-मेढ़ा, ऊपर-नीचे बसा हुआ तंग गाँव है। तंग इस अर्थ में कि स्थान की कमी मैदानी गाँव की तुलना में बहुत कम है। यह बड़ी अच्छी बात रही कि हम लोगों का एक सुपरिचित और कुछ समय का सहपाठी कौसानी में ही मिल गया। अतएव उसने हम लोगों को इस पहाड़ी क्षेत्र की रोचक सैर करने में अच्छा दिशा-निर्देश दिया।

हम लोगों ने देखा इस पर्वतीय क्षेत्र पर केवल पत्थरों का ही साम्राज्य है। लंबे-लंबे पेड़ों के सिर आसमान के करीब पहुँचते हुए दिखाई दे रहे थे। कहीं-कहीं लघु आकार में खेतों में कुछ फसलें थोड़ी-बहुत हरीतिमा लिये हुए थी; बिना मेहनत और संरक्षण के पौधों से फूलों के रंग-बिरंगे रूप मन को अधिक लुभा रहे थे। झाड़ियों के नामों-निशान कम थे फिर भी पत्थरों की गोद में कहीं-न-कहीं कोई झाड़ी अवश्य दीख जाती थी जिसमें पहाड़ी जीव-जंतुओं के होने का पता चलता था। उस पहाड़ी क्षेत्र में सैर के लिए बढ़ते हुए हम बहुत पतले और घुमावदार रास्ते पर ही जा रहे थे। ऐसा कोई रास्ता नहीं था जिसमें कोई चार पहिए वाला वाहन आ-जा सके। बहुत दूर एक ही ऐसी सड़क दिखाई पड़ी थी।

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इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासी हम लोगों को बड़ी ही हैरानी से देख रहे थे। उनका पत्थर जैसा शरीर बलिष्ठ और चिकना दिखाई देता था। वे बहुत सभ्य और सुशील दिखाई दे रहे थे। घूमते-टहलते हुए हम लोग एक बाजार में गए। वहाँ पर कुछ हम लोगों ने जलपान किया। उस जलपान की खुशी यह थी कि दिल्ली और दूसरे मैदानी शहरों-गाँवों की अपेक्षा सभी सामान सस्ते और साफ-सुथरे थे। धीरे-धीरे शाम हो गई। सूरज की डूबती किरणें सभी पर्वतीय अंग को अपनी लालिमा की चादर से ढक रही थीं। रात होते-होते एक गहरी चुप्पी और उदासी छा गई। सुबह उठते ही हम लोगों ने देखा कि वह सारा पर्वतीय स्थल बर्फ में कैद हो गया है। आसमान में रुई-सी बर्फ उड़ रही है। सूरज की आँखें उन्हें देर तक चमका रही थीं। कुछ धूप निकलने पर हम लोग वापस आ गए। आज भी उस यात्रा के स्मरण से मन मचल उठता है।

5. समाचार-पत्र या समाचार-पत्र का महत्त्व

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज की प्रत्येक स्थिति से प्रभावित होता है। दूसरी ओर वह भी अपनी गतिविधियों से समाज को प्रभावित करता है। आए दिन समाज में कोई घटना, व्यापार या प्रतिक्रिया अवश्य होती है। इन सबकी जानकारी देने में समाचार-पत्र की भूमिका बहुत बड़ी है। यह सत्य है कि इस प्रकार – की खबरें तो हमें आज विज्ञान की कृपा से रेडियो, टेलीप्रिंटर, टेलीफोन और टेलीविजन के द्वारा अवश्य प्राप्त होती हैं। लेकिन समाचार-पत्र की तरह उनसे एक-एक खबर का हवाला संभव नहीं होता है। यही कारण आज विभिन्न प्रकार के संचार-संदेश के साधनों के होते हुए भी समाचार-पत्र का महत्त्व सर्वाधिक है।

समाचार-पत्र के जन्म के विषय यह आमतौर पर कहा जाता है कि इसका शुभारंभ सातवीं सदी में चीन में हुआ था। यह तो सत्य ही है कि हमारे देश में समाचारपत्र का शुभारंभ 18वीं शताब्दी में हुआ था। सन् 1780 ई. में बंगाल में ‘बंगाल गजट’ नामक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ था। इसके बाद धीरे-धीरे हमारे देश के विभिन्न भागों से समाचार-पत्र निकलने लगे थे। यह निर्विवाद सत्य है कि हमारे देश में समाचार-पत्रों की संख्या युग-प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रचार-प्रसार के फलस्वरूप बढ़ती गई। सबसे अधिक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के हिंदी महत्त्व के लिए किए गए योगदानों के परिणामों से हिंदी समाचार-पत्रों की गति और संख्या में वृद्धि हुई।

हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात् समाचार-पत्रों की संख्या में पूर्वापेक्षा दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हुई। आज हमारे देश में समाचार-पत्रों की संख्या बहुत अधिक है। देश की प्रायः सभी भाषाओं में समाचार-पत्र आज धड़ल्ले से निकलते जा रहे हैं। आज के प्रमुख समाचार-पत्रों के कई रूप, प्रतिरूप दिखाई दे रहे हैं : दैनिक, सांध्य दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक-त्रैमासिक और छमाही (अर्द्धवार्षिक) सहित कुछ वार्षिक समाचार-पत्र भी प्रकाशित हो रहे हैं। मुख्य रूप से ‘नवभारत टाइम्स, ‘जनसत्ता’, ‘हिंदुस्तान’, ‘पंजाब केसरी’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘दैनिक ट्रिब्यून’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘स्टेट्समैन’, ‘वीर अर्जुन’, ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘नयी दुनिया’, ‘समाचार मेल’, ‘आज’, ‘दैनिक जागरण’ आदि दैनिक पत्रों की बड़ी धूम है। ‘सांध्य टाइम्स’ आदि सांध्य-दैनिकों की बड़ी लोकप्रियता है। इसी तरह से समाचारों को प्रस्तुत करने वाली पत्रिकाओं की भी भरमार है। इनमें धर्मयुग, ब्लिट्स, सरिता, इंडिया टुडे, माया, मनोहर कहानियाँ आदि हैं।

समाचार-पत्रों की उपयोगिता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। समाचार-पत्रों के माध्यम से हमें न केवल राजनीतिक जानकारी हासिल होती है, अपितु सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक आदि गतिविधियों का भी ज्ञान हो जाता है। यही नहीं हमें देश और विदेश की पूरी छवि समाचार-पत्रों में साफ-साफ दिखाई देती है। इससे हम अपने जीवन से संबंधित किसी भी दशा से अछूते नहीं रह पाते हैं। इस प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि समाचार-पत्र की उपयोगिता और महत्त्व निःसंदेह है। अतएव हमें समाचार-पत्र से अवश्य लाभ उठाना चाहिए।

6. विद्यार्थी और अनुशासन

मनुष्य समाज में रहता है। उसे समाज के नियमों और दायित्वों के अनुसार रहना पड़ता है। जो इस प्रकार से रहता है उसे अनुशासित कहते हैं। इस प्रकार के नियम और दायित्व को अनुशासन कहते हैं।

अनुशासन जीवन के प्रारंभ से ही शुरू हो जाता है। यह अनुशासन घर से शुरू होता है। बच्चे को उसके संरक्षक उचित और आवश्यक अनुशासन में रखने लगते हैं। इसे पारिवारिक अनुशासन कहते हैं। बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब वह शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करता है। उसे शैक्षिक नियमों-निर्देशों का पालन करना पड़ता है। इस प्रकार के नियम-निर्देश को ‘विद्यार्थी-अनुशासन’ कहा जाता है।

विद्यार्थी अनुशासन का शुभारंभ विद्यालय या पाठशाला ही है। वह शिक्षा के सुंदर और शुद्ध वातावरण में पल्लवित और विकसित होता है। यहाँ विद्यार्थी को शिष्ट गुरुजनों की छत्रछाया में रहकर अनुशासित होकर रहना पड़ता है। यहाँ विद्यार्थी को अपने परिवार के अनुशासन से कहीं अधिक कड़े अनुशासन में रहना पड़ता है। इस प्रकार के अनुशासन में रहकर विद्यार्थी जीवन भर अनुशासित रहने का आदी बन जाता है। इससे विद्यार्थी अपने गुरु की तरह योग्य और महान बनने की कोशिश करने लगता है। उसे किसी प्रकार के कड़े निर्देश-नियम या आदेश धीरे-धीरे सुखद और रोचक लगने लगते हैं। कुछ समय बाद वह जब अपनी पूरी शिक्षा पूरी कर लेता है तब वह समाज में प्रविष्ट होकर समाज को अनुशासित करने लगता है। इस प्रकार से विद्यार्थी जीवन का अनुशासन समाज को एक स्वस्थ और सबल अनुशासित स्वरूप . देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

विद्यार्थी-अनुशासन के कई अंग-स्वरूप होते हैं-नियमित और ठीक समय पर विद्यालय जाना प्रार्थना सभा में पहुंचना, कक्षा में प्रवेश करना, कक्षा में आते ही गुरुओं के प्रति अभिवादन, प्रणाम, साष्टांग दंडवत करना, कक्षा में पूरे मनोयोग से अध्ययन-मनन करना, बाल-सभा, खेल-कूद वाद-विवाद, जल-क्रीड़ा, गीत संगीत आदि में सनियम सक्रिय भाग लेना आदि विद्यार्थी-अनुशासन के ही अभिन्न अंग हैं। इससे विद्यार्थी-अनुशासन की आग में पूरी तरह से तपता है। इससे विद्यार्थी पके हुए घड़े के समान टिकाऊ बनकर समाज को अपने अंतर्गत अनुशासन में मीठे जल का मधुर पान कराता है। इस प्रकार से विद्यार्थी-अनुशासन के द्वारा समाज एक सही और निश्चित दिशा की ओर ही बढ़ता है। वह अपने पूर्ववर्ती कुसंस्कारों और त्रुटियों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। एक अपेक्षित सुंदर और सुखद स्थिति को प्राप्त कर अपने भविष्य को उज्ज्वल और समृद्ध बनाता है। यह ध्यान देने का विषय है कि विद्यार्थी-अनुशासन को पाकर समाज के सभी वर्ग बालक, युवा और वृद्ध एवं शिक्षित व अशिक्षित सभी में एक अपूर्व सुधार-चमत्कार आ जाता है।

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विद्यार्थी अनुशासन हमारे जीवन का सबसे प्रथम और महत्त्वपूर्ण अंग है। यह हमारे समाज की उपयोगिता की दृष्टि से तो और अधिक मूल्यवान और अपेक्षित है। अतएव हमें इस प्रकार से विद्यार्थी-अनुशासन में विश्वास और उत्साह दिखाना चाहिए। यह पक्का इरादा और समझ रखनी चाहिए कि विद्यार्थी-अनुशासन सभी प्रकार के अनुशासन का सम्राट है। यह अनुशासन सर्वोच्च है, यह अनुशासन सर्वव्यापी है। यह अनुशासन सर्वकालिक है। अतएव इसकी पवित्रता और महानता के प्रति समाज के सभी वर्गों को पूर्ण रूप से प्रयत्नशील रहना चाहिए।

7. खेलों का महत्त्व

जिस प्रकार से शिक्षा मनुष्य के सांस्कृतिक और बौद्धिक मानस को पुष्ट और संवृद्ध करती है उसी प्रकार से खेलकूद उसकी शारीरिक संरचना को अधिक प्रौढ़. और शक्तिशाली बनाते हैं। इन दोनों ही प्रकार के तथ्यों की पुष्टि करते हुए एक बार महात्मा गांधी ने कहा था-“By education, I mean, all round development of a child”. इस प्रकार के कथन का अभिप्राय यही है कि बच्चों का सर्वांगीण विकास होना चाहिए, अर्थात् बच्चों को शैक्षिक और सांस्कृतिक वातावरण के साथ-साथ शारीरिक वृद्धि हेतु खेल-कूद, व्यायाम आदि के वातावरण का भी होना आवश्यक है। इस तरह के विचारों को अनेक शिक्षाविदों, चिंतकों और समाज-सुधारकों ने व्यक्त किया है।

जीवन में खेलों के महत्त्व अधिक-से-अधिक रूप में दिखाई देते हैं। खेलों के द्वारा हमारे सम्पूर्ण अंगों की अच्छी-खासी कसरत हो जाती है। सभी मांसपेशियों पर बल पड़ता है। थकान तो अवश्य होती है। लेकिन इस थकान को दूर करने के लिए जब हम कुछ विश्राम कर लेते हैं तब हमारे अंदर एक अद्भुत चुस्ती और चंचलता आ जाती है। फिर हम कोई भी काम बड़ी स्फूर्ति और मनोवेगपूर्वक करने लगते हैं। खेलों से हमारी खेलों में अभिरुचि बढ़ती जाती है। इस प्रकार से हम श्रेष्ठ खिलाड़ी बनने का प्रयास निरंतर करते रहते हैं। खेलों को खेलने से न केवल खेलों के प्रति ही अभिरुचि बढ़ती है अपितु शिक्षा, कृषि, व्यवसाय, पर्यटन, वार्तालाप, ध्यान-पूजा आदि के प्रति भी हमारा मन एकदम केंद्रित होने लगता है।

खेलों के द्वारा हमारा मनोरंजन होता है। खेलों के द्वारा हमारा अच्छा व्यायाम होता है। हमारे अंदर सहनशक्ति आने लगती है। हम संघर्षशील होने लगते हैं। ऐसा इसलिए कि खेलों को खेलते समय हमारे खेल के साथी हमको पराजित करना चाहते हैं और हम उन्हें पराजित कर अपनी विजय हासिल करना चाहते हैं। इस प्रकार से हम जब तक विजय नहीं प्राप्त करते हैं तब तक इसके लिए हम निरंतर संघर्षशील बने रहते हैं। इस तरह खेलों को खेलने से हमारी हिम्मत बढ़ती है। हम निराश नहीं होते हैं। हम आशावान बनकर एक कठिन और दुर्लभ वस्तु की प्राप्ति के लिए अपने विश्वास, अपने बल-तेज और अपने प्रयत्न को बढ़ाते चलते हैं। इस प्रकार इतने अपने पक्के इरादों की दौड़ से किसी अपने मंसूबों की प्राप्ति करके फूले नहीं समाते हैं।

खेलों के खेलने से हमारा अधिक और अपेक्षित मनोरंजन होता है। इससे हमारा चिड़चिड़ापन दूर हो जाता है। हमारे अंदर सरसता और मधुरता आ जाती है।

हम अधिक विवकेशील, सरल और सहनशील बन जाते हैं। खेलों के खेलने से हमारा परस्पर सम्पर्क अधिक सुदृढ़ और घनिष्ठ बनता जाता है। फलतः हम एक उच्चस्तरीय प्राणी बन जाते हैं। खेलों के खेलने से हमारे अंदर अनुशासन का वह अंकुर उठने लगता है जो जीवन भर पल्लवित और फलित होने से कभी रुकता नहीं है। ठीक समय से खेलना, नियमबद्ध होकर खेलना और ठीक समय पर खेल से मुक्त होना आदि सब कुछ नियम अनुशासन के सच्चे पाठ पढ़ाते हैं।

हम देखते हैं कि प्राचीनकालीन खेलों के अतिरिक्त मूर्तिकला, चित्रकला, नाट्यकला, संगीतकला आदि कलाएँ भी एक विशेष प्रकार के खेल ही हैं। जिनसे हमारा बौद्धिक और शारीरिक सभी प्रकार के विकास होते हैं। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि विविध प्रकार के खेलों के द्वारा हमारा जीवन सम्पूर्ण रूप से महान विकसित और कल्याणप्रद बन जाता है। इसलिए निःसंदेह हमारे जीवन में खेलों के अत्यधिक महत्त्व हैं। अतएव हमें किसी-न-किसी प्रकार के खेल में सक्रिय भाग लेकर अपने जीवन को समुन्नत और सर्वोपयोगी बनाना चाहिए।

8. विद्यालय का वार्षिकोत्सव

विद्यालय का वार्षिकोत्सव अन्य वार्षिकोत्सव के समान ही व्यापक स्तर पर होता है। यह उत्सव प्रतिवर्ष एक निश्चित समय पर ही होता है। इसके लिए सभी विद्यालय के ही सदस्य नहीं अपितु इससे संबंधित सभी सामाजिक प्राणी भी तैयार रहते हैं।

हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव प्रति वर्ष 13 अप्रैल की बैसाखी के शुभावसर पर होता है। इसके लिए लगभग पंद्रह दिनों से ही तैयारी शुरू हो जाती है। हमारे कक्षाध्यापक इसके लिए काफी प्रयास किया करते हैं। वे प्रतिदिन की होने वाली तैयारी और आगामी तैयारी के विषय में सूचनापट्ट पर लिख देते हैं। हमारे कक्षाध्यापक घिद्यालय के वार्षिकोत्सव के लिए नाटक, निबंध, एकांकी, कविता, वाद-विवाद, खेल आदि के लिए प्रमुख और योग्य विद्यार्थियों के चुनाव कर लेते हैं। कई दिनों के अभ्यास के उपरांत वे योग्य और कुशल विद्यार्थियों का चुनाव कर लेते हैं। इस चुनाव के बाद वे पुनः छात्रों को बार-बार उनके प्रदत्त कार्यों का अभ्यास कराते रहते हैं।

प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी हमारे विद्यालय के वार्षिकोत्सव के विषय में प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रों में समाचार प्रकाशित हो गया। इससे पूर्व विद्यालय के निकटवर्ती सदस्यों को इस विषय में सूचित करते हुए उन्हें आमंत्रित कर दिया गया। प्रदेश के शिक्षामंत्री को प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। जिलाधिकारी को सभा का अध्यक्ष बनाया गया। विद्यालय के प्रधानाचार्य को अतिथि-स्वागताध्यक्ष का पदभार दिया गया। हमारे कक्षाध्यापक को सभा का संचालक पद दिया गया। विद्यालय के सभी छात्रों, अध्यापकों और सदस्यों को विद्यालय की पूरी साज-सज्जा और तैयारी के लिए नियुक्त किया गया। इस प्रकार के विद्यालय के वार्षिकोत्सव की तैयारी में कोई त्रुटि नहीं रहने पर इसकी पूरी सतर्कता रखी गई।

विद्यालय के वार्षिकोत्सव के दिन अर्थात् 13 अप्रैल बैसाखी के शुभ अवसर पर प्रातः 7 बजे से ही विद्यालय की साज-सज्जा और तैयारी होने लगती है। 8 बजते ही सभी छात्र, अध्यापक और सदस्य अपने-अपने सौंपे हुए दायित्वों को सँभालने लगते हैं। अतिथियों का आना-जाना शुरू हो गया। वे एक निश्चित सजे हुए तोरण द्वार से प्रवेश करके पंक्तिबद्ध कुर्सियों पर जाकर बैठने लगे थे। उन्हें सप्रेम बैठाया जाता था। कार्यक्रम के लिए एक बहुत बड़ा मंच बनाया गया था। वहाँ कई कुर्सियाँ और टेबल अलग-अलग श्रेणी के थे। लाउडस्पीकर के द्वारा कार्यक्रम के संबंध में बार-बार सूचना दी जा रही थी।

ठीक 10 बजे हमारे मुख्य अतिथि प्रदेश के शिक्षामंत्री, सभाध्यक्ष जिलाधिकारी और उनके संरक्षकों की हमारे स्वागताध्यक्ष प्रधानाचार्य ने बड़े ही प्रेम के साथ आवभगत की और उन्हें उचित आसन प्रदान किया। हमारे कक्षाध्यापक ने सभा का संचालन करते हुए विद्यालय से कार्यक्रम संबंधित सूचना दी। इसके उपरांत प्रमुख अतिथि शिक्षामंत्री से वक्तव्य देने के लिए आग्रह किया। प्रमुख अतिथि के रूप में माननीय शिक्षामंत्री ने सबके प्रति उचित आभार व्यक्त करते हुए शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डाला। विद्यार्थियों को उचित दिशाबोध देकर विद्यालय के एक निश्चित अनुदान की घोषणा की जिसे सुनकर तालियों की गड़गड़ाहट से सारा वातावरण गूंज उठा। इसके बाद संचालक महोदय के आग्रह पर सभाध्यक्ष जिलाधिकारी ने संक्षिप्त वक्तव्य दिया। फिर संचालक महोदय के आग्रह पर स्वागताध्यक्ष हमारे प्रधानाचार्य ने सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुए विद्यालय की प्रगति का विस्तार से उल्लेख किया। बाद में संचालक महोदय ने मुख्य अतिथि से आग्रह करके पुरस्कार के घोषित छात्रों को पुरस्कृत करवाया अंत में सबको धन्यवाद दिया। सबसे अंत में मिष्ठान वितरण हुआ।

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दूसरे दिन सभी दैनिक समाचार-पत्रों में हमारे विद्यालय के वार्षिकोत्सव का महत्त्व प्रकाशित हुआ जिसे हम सबने ही नहीं प्रायः सभी अभिभावकों, संरक्षकों ने गर्व का अनुभव किया।

9. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

समय-समय पर भारत में महान् आत्माओं ने जन्म लिया है। गौतम बुद्ध, महावीर, अशोक, नानक, नामदेव, कबीर जैसे महान त्यागी और आध्यात्मिक पुरुषों के कारण ही भारत भूमि संत और महात्माओं का देश कहलाती है। ऐसे ही महान् व्यक्तियों के परम्परा में महात्मा गांधी ने भारत में जन्म लिया। सत्य, अहिंसा और मानवता के इस पुजारी ने न केवल धार्मिक क्षेत्र में ही हम भारतवासियों का नेतृत्व किया, बल्कि राजनीति को भी प्रभावित किया। सदियों से परतंत्र भारत माता के बंधनों को काट गिराया। आज महात्मा गांधी के प्रयत्नों से हम भारतवासी स्वतंत्रता की खुली वायु में साँस ले रहे हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर (कठियावाड़) में 2 अक्टूबर, 1869 को हुआ था। उनके पिता राजकोट के दीवान थे। इनका बचपन का नाम मोहनदास था। इन पर बचपन से ही आदर्श माता और सिद्धांतवादी पिता का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ा।

गांधी जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा राजकोट में प्राप्त की। 13 वर्ष की अल्पआयु में ही इनका विवाह हो गया था। इनकी पत्नी का नाम कस्तूरबा था। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद में वकालत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड चले गए। वे 3 वर्ष तक इंग्लैंड में रहे। वकालत पास करने के बाद वे भारत वापस आ गए। वे आरंभ से ही सत्य में विश्वास रखते थे। भारत में वकालत करते हुए अभी थोड़ा ही समय हुआ था कि उन्हें एक भारतीय व्यापारी द्वारा दक्षिण अफ्रीका बुलाया गया। वहाँ उन्होंने भारतीयों की अत्यंत शोचनीय दशा देखी। गांधी जी ने भारतवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष आरंभ कर दिया।

दक्षिण अफ्रीका से लौटकर गांधी जी ने अहिंसात्मक तरीके से भारतीयों के अधिकारों के लिए लड़ने का निश्चय किया। उस समय भारत में तिलक, गोखले, लाला लाजपतराय आदि नेता कांग्रेस पार्टी के माध्यम से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। गांधी जी पर उनका अत्यधिक प्रभाव पड़ा।

1921 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाया। गांधी जी धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध हो गए। अंग्रेजी सरकार ने आंदोलन को दबाने का प्रयास किया। भारतवासियों पर तरह-तरह के अत्याचार किए। गांधी जी ने 1930 में नमक सत्याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाए। भारत के सभी नर-नारी उनकी एक आवाज पर उनके साथ बलिदान देने के लिए तैयार थे।
गांधी जी को अंग्रेजों ने बहुत बार जेल में बंद किया। गांधी जी ने अछूतोद्धार के लिए कार्य किया। स्त्री-शिक्षा और राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रचार किया। हरिजनों के उत्थान के लिए काम किया। स्वदेशी आंदोलन और चरखा आंदोलन चलाया। गांधी जी के प्रयत्नों से भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ।

सत्य, अहिंसा और मानवता के इस पुजारी की 30 जनवरी, 1948 को नाथू राम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी। इससे सारा विश्व विकल हो उठा।

10. बाल दिवस

हमारे विद्यालय में प्रतिवर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस का आयोजन किया जाता है। बाल दिवस पूज्य चाचा नेहरू का जन्मदिवस है। चाचा नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। वे स्वतंत्रता संग्राम के महान् सेनानी थे। उन्होंने अपने देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। अपने जीवन के अनेक अमूल्य वर्ष देश की सेवा में बिताए। अनेक वर्षों तक विदेशी शासकों ने उन्हें जेल में बंद रखा। उन्होंने साहस नहीं छोड़ा और देशवासियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे।

पं. नेहरू बच्चों के प्रिय नेता थे। बच्चे उन्हें प्यार से ‘चाचा’ कहकर संबोधित करते थे। उन्होंने देश में बच्चों के लिए शिक्षा सुविधाओं का विस्तार कराया। उनके अच्छे भविष्य के लिए अनेक योजनाएँ आरंभ की। वे कहा करते थे ‘कि आज के बच्चे ही कल के नागरिक बनेंगे। यदि आज उनकी अच्छी देखभाल की जाएगी तो आगे आने वाले समय में वे अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, सैनिक, विद्वान, लेखक और वैज्ञानिक बनेंगे।’ इसी कारण उन्होंने बाल कल्याण की अनेक योजनाएँ बनाईं। अनेक नगरों में बालघर और मनोरंजन केंद्र बनवाए। प्रतिवर्ष बाल दिवस पर डाक टिकटों का प्रचलन किया। बालकों के लिए अनेक प्रतियोगिताएँ आरंभ कराईं। वे देश-विदेश में जहाँ भी जाते बच्चे उन्हें घेर लेते थे। उनके जन्मदिवस को भारत में बाल-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

हमारे विद्यालय में प्रतिवर्ष बाल-दिवस के अवसर पर बाल मेले का आयोजन किया जाता है। बच्चे अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगाते हैं। विभिन्न प्रकार की विक्रय योग्य वस्तुएँ अपने हाथ से तैयार करते हैं। बच्चों के माता-पिता और मित्र उस अवसर पर खरीददारी करते हैं। सारे विद्यालय को अच्छी प्रकार सजाया जाता है। विद्यालय को झंडियों, चित्रों और रंगों की सहायता से आकर्षक रूप दिया जाता है।

बाल दिवस के अवसर पर खेल-कूद प्रतियोगिता और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। बच्चे मंच पर आकर नाटक, गीत, कविता, नृत्य और फैंसी ड्रेस शो का प्रदर्शन करते हैं। सहगान, बाँसुरी वादन का कार्यक्रम दर्शकों का मन मोह लेता है। तत्पश्चात् सफल और अच्छा प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को पुरस्कार वितरण किए जाते हैं। बच्चों को मिठाई का भी वितरण किया जाता है। इस प्रकार दिवस विद्यालय का एक प्रमुख उत्सव बन जाता है।

11. विज्ञान की देन या विज्ञान वरदान है या विज्ञान का महत्त्व

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने मनुष्य के जीवन में महान परिवर्तन ला दिया है। मनुष्य के जीवन को नये-नये वैज्ञानिक आविष्कारों से सुख-सुविधा प्राप्त हुई है। प्रायः असंभव कही जाने वाली बातें भी संभव प्रतीत होने लगी हैं। मनुष्य विज्ञान के सहारे आज चंद्रमा तक पहुँच सका है। सागर की गहराइयों में जाकर उसके रहस्य को भी खोज लाया है। भीषण ज्वालामुखी के मुँह में प्रवेश कर सका है; पृथ्वी की परिक्रमा कर चुका है। बंजर भूमि को हरा-भरा बनाकर भरपूर फसलें उगा सका है।

विज्ञान की सहायता से मनुष्य का जीवन सुखमय हो गया है। आज घरों में विज्ञान की देन हीटर, पंखे, रेफ्रिजरेटर, टेलीविजन, गैस, स्टोव, रेडियो, टेपरिकॉर्डर, टेलीफोन, स्कूटर आदि वस्तुएं दिखाई देती हैं। गृहिणियों के अनेक कार्य आज विज्ञान की सहायता से सरल बन गए हैं।

विज्ञान की सहायता से आज समय और दूरी का महत्त्व घट गया है। आज हजारों मील की दूरी पर बैठा हुआ मनुष्य अपने मित्रों और संबंधियों से इस प्रकार बात कर सकता है जैसे कि सामने बैठा हुआ हो। आज दिल्ली में चाय पीकर, भोजन बंबई में और रात्रि विश्राम लंदन में कर सकना संभव है। ध्वनि की गति से तेज चलने वाले ऐसे विमान और एयर बस हैं जिनकी सहायता से हजारों मील का सफर एक दिन में किया जाना संभव है। रेल, मोटर, ट्राम, जहाज, स्कूटर आदि आने-जाने में सुविधा प्रदान करते हैं।

टेलीप्रिंटर, टेलीफोन, टेलीविजन मनुष्य के लिए बड़े उपयोगी साधन सिद्ध हुए हैं। विज्ञान की सहायता से समाचार एक स्थान से दूसरे स्थान पर शीघ्र-से-शीघ्र पहँचाए जा सकते हैं। रेडियो-फोटो की सहायता से चित्र भेजे जा सकते हैं। लाहौर में खेला जाने वाला क्रिकेट मैच दिल्ली में देखा जा सकता है। एक घंटे में एक पुस्तक की हजारों प्रतियाँ छापी जा सकती हैं। आवाज को टेपरिकॉर्डर और ग्रामोफोन रिकॉर्ड पर कैद किया जा सकता है।

चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान की देन भुलाई नहीं जा सकती। एक्स-रे मशीन की सहायता से शरीर के अंदर के भागों का रहस्य जाना जा सकता है। शरीर के किसी भी भाग का ऑपरेशन किया जा सकना संभव है। शरीर के अंग बदले जा सकते हैं। खून-परिवर्तन किया जा सकता है। प्लास्टिक सर्जरी से चेहरे को ठीक किया जा सकता है। भयानक बीमारियों के लिए दवाएँ और इंजेक्शन खोजे जा चुके हैं।

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कृषि के क्षेत्र में नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों ने कृषि उत्पादन में तो वृद्धि की ही है, साथ ही भारी-भारी कार्यों को सरल भी बना दिया है। कृषि, यातायात, संदेशवाहन, संचार, मनोरंजन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विज्ञान की देन अमूल्य है।

12. परोपकार

परोपकार की भावना एक पवित्र भावना है। मनुष्य वास्तव में वही है जो दूसरों का उपकार करता है। यदि मनुष्य में दया, ममता, परोपकार और सहानुभूति की भावना न हो तो पशु और मनुष्य में कोई अंतर नहीं रहता। मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में, ‘मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे।’ मनुष्य का यह परम कर्तव्य है कि वह अपने विषय में न सोचकर दूसरों के विषय में ही सोचे, दूसरों की पीड़ा हरे, दूसरों के दुख दूर करने का प्रयत्न करे।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि ‘परहित सरस धर्म नहिं भाई।’ दूसरों की भलाई करने से अच्छा कोई धर्म नहीं है। दूसरों को पीड़ा पहुँचाना पाप है और परोपकार करना पुण्य है।
परोपकार शब्द ‘पर + उपकार’ से मिलकर बना है। स्वयं को सुखी बनाने के लिए तो सभी प्रयत्न करते हैं परंतु दूसरों के कष्टों को दूर कर उन्हें सुखी बनाने का कार्य जो सज्जन करते हैं वे ही परोपकारी होते हैं। परोपकार एक अच्छे चरित्रवान व्यक्ति की विशेषता है। परोपकारी स्वयं कष्ट उठाता है लेकिन दुखी और पीड़ित मानवता के कष्ट को दूर करने में पीछे नहीं हटता। जिस कार्य को अपने स्वार्थ की दृष्टि से किया जाता है वह परोपकार नहीं है।

परोपकारी व्यक्ति अपने और पराये का भेद नहीं करता। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ अपना जल स्वयं काम में नहीं लेतीं। चंदन अपनी सुगंध दूसरों को देता है। सूर्य और चंद्रमा अपना प्रकाश दूसरों को देते हैं। नदी, कुएँ और तालाब दूसरों के लिए हैं। यहाँ तक कि पशु भी अपना दूध मनुष्य को देते हैं और बदले में कुछ नहीं चाहते। यह है परोपकार की भावना। इस भावना के मूल में स्वार्थ का नाम भी नहीं है।

भारत तथा विश्व का इतिहास परोपकार के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है। स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी, ईसा मसीह, दधीचि, स्वामी विवेकानंद, गुरु नानक सभी महान् परोपकारी थे। परोपकार की भावना के पीछे ही अनेक वीरों ने यातनाएँ सही और स्वतंत्रता के लिए फाँसी पर चढ़ गए। अपने जीवन का त्याग किया और देश को स्वतंत्र कराया।

परोपकार एक सच्ची भावना है। यह चरित्र का बल है। यह निःस्वार्थ सेवा , है, यह आत्मसमर्पण है। परोपकार ही अंत में समाज का कल्याण करता है। उनका नाम इतिहास में अमर होता है।

13. वृक्षारोपण

हमारे देश में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भी वनों का विशेष महत्त्व है। वन ही प्रकृति की महान् शोभा के भंडार हैं। वनों के द्वारा प्रकृति का जो रूप खिलता है वह मनुष्य को प्रेरित करता है। दूसरी बात यह है कि वन ही मनुष्य, पशु-पक्षी, जीव-जंतुओं आदि के आधार हैं, वन के द्वारा ही सबके स्वास्थ्य की रक्षा होती है। वन इस प्रकार से हमारे जीवन की प्रमुख आवश्यकता है। अगर वन न रहें तो हम नहीं रहेंगे और यदि वन रहेंगे तो हम रहेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि वन से हमारा अभिन्न संबंध है जो निरंतर है और सबसे बड़ा है। इस प्रकार से हमें वनों की आवश्यकता सर्वोपरि होने के कारण हमें इसकी रक्षा की भी आवश्यकता सबसे बढ़कर है। . वृक्षारोपण की आवश्यकता हमारे देश में आदिकाल से ही रही है। बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों के आश्रम के वृक्ष-वन वृक्षारोपण के द्वारा ही तैयार किए गए हैं, महाकवि कालिदास ने ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ के अंतर्गत महर्षि कण्व के शिष्यों के द्वारा वृक्षारोपण किए जाने का उल्लेख किया है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि वृक्षारोपण की आवश्यकता प्राचीन काल से ही समझी जाती रही है और आज भी इसकी आवश्यकता ज्यों-की-त्यों बनी हुई है।

अब प्रश्न है कि वृक्षारोपण की आवश्यकता आखिर क्यों होती है? इसके उत्तर में हम यह कह सकते हैं कि वृक्षारोपण की आवश्यकता इसीलिए होती है कि वृक्ष सुरक्षित रहें, वृक्ष या वन नहीं रहेंगे तो हमारा जीवन शून्य होने लगेगा। एक समय ऐसा आ जाएगा कि हम जी भी न पाएँगे। वनों के अभाव में प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा। प्रकृति का संतुलन जब बिगड़ जाएगा तब सम्पूर्ण वातावरण इतना दूषित और अशुद्ध हो जाएगा कि हम न ठीक से साँस ले सकेंगे और न ठीक से अन्न-जल ही ग्रहण कर पाएँगे। वातावरण के दूषित और अशुद्ध होने से हमारा मानसिक, शारीरिक और आत्मिक विकास कुछ न हो सकेगा। इस प्रकार से वृक्षारोपण की आवश्यकता हमें सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करती हुई हमारे जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। वृक्षारोपण की आवश्यकता की पूर्ति होने से हमारे जीवन और प्रकृति का परस्पर संतुलन क्रम बना रहता है।

वनों के होने से हमें ईंधन के लिए पर्याप्त रूप से लकड़ियाँ प्राप्त हो जाती हैं। बांस की लकड़ी और घास से हमें कागज प्राप्त हो जाता है जो हमारे कागज उद्योग का मुख्याधार है। वनों की पत्तियों, घास, पौधे, झाड़ियों की अधिकता के कारण तीव्र वर्षा से भूमि का कटाव तीव्र गति से न होकर मंद गति से होता है या नहीं के बराबर होता है। वनों के द्वारा वर्षा का संतुलन बना रहता है जिससे हमारी कृषि संपन्न होती है। वन ही बाढ़ के प्रकोप को रोकते हैं, वन ही बढ़ते हुए और उड़ते हुए रेत-कणों को कम करते हुए भूमि का संतुलन बनाए रखते हैं।

यह सौभाग्य का विषय है कि 1952 में सरकार ने ‘नयी वन नीति’ की घोषणा करके वन महोत्सव की प्रेरणा दी है जिससे वन रोपण के कार्य में तेजी आई है। इस प्रकार से हमारा ध्यान अगर वन सुरक्षा की ओर लगा रहेगा तो हमें वनों से होने वाले, लाभ, जैसे-जड़ी-बूटियों की प्राप्ति, पर्यटन की सुविधा, जंगली पशु-पक्षियों का सुदर्शन, इनकी खाल, पंख या बाल से प्राप्त विभिन्न आकर्षक वस्तुओं का निर्माण आदि सब कुछ हमें प्राप्त होते रहेंगे। अगर प्रकृति देवी का यह अद्भुत स्वरूप वन, सम्पदा नष्ट हो जाएगी तो हमें प्रकृति के कोप से बचना असंभव हो जाएगा।

14. दूरदर्शन से लाभ और हानियाँ

विज्ञान के द्वारा मनुष्य ने जिन चमत्कारों को प्राप्त किया है। उनमें दूरदर्शन का स्थान अत्यंत महान और उच्च है। दूरदर्शन का आविष्कार 19वीं शताब्दी के आस-पास ही समझना चाहिए। टेलीविजन दूरदर्शन का अंग्रेजी नाम है। टेलीविजन का आविष्कार महान वैज्ञानिक वेयर्ड ने किया है। टेलीविजन को सर्वप्रथम लंदन में सन् 1925 में देखा गया। लंदन के बाद ही इसका प्रचार-प्रसार इतना बढ़ता गया है कि आज यह विश्व के प्रत्येक भाग में बहुत लोकप्रिय हो गया है। भारत में टेलीविजन का आरंभ 15 सितंबर, सन् 1959 को हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति ने आकाशवाणी के टेलीविजन विभाग का उद्घाटन किया था।

टेलीविजन या दूरदर्शन का शाब्दिक अर्थ है-दूर की वस्तुओं या पदार्थों का ज्यों-का-त्यों आँखों द्वारा दर्शन करना। टेलीविजन का प्रवेश आज घर-घर हो रहा है। इसकी लोकप्रियता के कई कारणों में से एक कारण यह है कि यह एक रेडियो कैबिनेट के आकार-प्रकार से तनिक बड़ा होता है। इसके सभी सेट रेडियो के सेट से मिलते-जुलते हैं। इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह या स्थान पर रख सकते हैं। इसे देखने. के लिए हमें न किसी विशेष प्रकार के चश्मे या मानभाव या अध्ययन आदि की आवश्यकताएँ पड़ती हैं। इसे देखने वालों के लिए भी किसी विशेष वर्ग के दर्शक या श्रोता के चयन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। अपितु इसे देखने वाले सभी वर्ग या श्रेणी के लोग हो सकते हैं।

टेलीविजन हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को बड़ी ही गंभीरतापूर्वक प्रभावित करता है। यह हमारे जीवन के काम आने वाली हर वस्तु या पदार्थ की न केवल जानकारी देता है अपितु उनके कार्य-व्यापार, नीति-ढंग और उपाय को भी क्रमशः बडी ही आसानीपूर्वक हमें दिखाता है। इस प्रकार से दूरदर्शन हमें एक-से एक बढ़कर जीवन की समस्याओं और घटनाओं को बड़ी ही सरलता और आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करता है। जीवन से संबंधित ये घटनाएँ-व्यापार-कार्य आदि सभी कुछ न केवल हमारे आस-पास पड़ोस के ही होते हैं अपितु दूर-दराज के देशों और भागों से भी जुड़े होते हैं जो किसी-न-किसी प्रकार से हमारे जीवनोपयोगी ही सिद्ध होते हैं। इस दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि दूरदर्शन हमारे लिए ज्ञानवर्द्धन का बहुत बड़ा साधन है। यह ज्ञान की सामान्य रूपरेखा से लेकर गंभीर और विशिष्ट रूपरेखा को बड़ी ही सुगमतापूर्वक प्रस्तुत करता है। इस अर्थ से दूरदर्शन हमारे घर के चूल्हा-चाकी से लेकर अंतरिक्ष के कठिन ज्ञान की पूरी-पूरी जानकारी देता रहता है।

दूरदर्शन द्वारा हमें जो ज्ञान-विज्ञान प्राप्त होते हैं उनमें कृषि के ज्ञान-विज्ञान – का कम स्थान नहीं है। आधुनिक कृषि यंत्रों से होने वाली कृषि से संबंधित जानकारी का लाभ शहरी कृषक से बढ़कर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले कृषक अधिक उठाते हैं। इसी तरह से कृषि क्षेत्र में होने वाले नवीन आविष्कारों, उपयोगिताओं, विभिन्न प्रकार के बीज, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ आदि का पूरा विवरण हमें दूरदर्शन ही दिया करता है।

दूरदर्शन के द्वारा पर्यो, त्योहारों, मौसमों, खेल-तमाशे, नाच, गाने-बजाने, कला, संगीत, पर्यटन, व्यापार, साहित्य, धर्म, दर्शन, राजनीति, अध्याय आदि लोक-परलोक के ज्ञान-विज्ञान के रहस्य एक-एक करके खुलते जाते हैं। दूरदर्शन इन सभी प्रकार के तथ्यों का ज्ञान हमें प्रदान करते हुए इनकी कठिनाइयों को हमें एक-एक करके बतलाता है और इसका समाधान भी करता है।

दूरदर्शन से सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि इसके द्वारा हमारा पूर्ण रूप से मनोरंजन हो जाता है। प्रतिदिन किसी-न-किसी प्रकार के विशेष आयोजित और प्रायोजित कार्यक्रमों के द्वारा हम अपना मनोरंजन करके विशेष उत्साह और प्रेरणा प्राप्त करते हैं। दूरदर्शन पर दिखाई जाने वाली फिल्मों से हमारा मनोरंजन तो होता ही है इसके साथ-ही-साथ विविध प्रकार के दिखाए जाने वाले धारावाहिकों से भी हमारा कम मनोरंजन नहीं होता है। इसी तरह से बाल-बच्चों, वृद्धों, युवकों सहित विशेष प्रकार के शिक्षित और अशिक्षित वर्गों के लिए दिखाए जाने वाले दूरदर्शन के कार्यक्रम हमारा मनोरंजन बार-बार करते हैं जिससे ज्ञान प्रकाश की किरणें भी फूटती हैं।

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हाँ, अच्छाई में बुराई होती है और कहीं-कहीं फूल में काँटे भी होते हैं। इसी तरह से जहाँ और जितनी दूरदर्शन में अच्छाई है वहाँ उतनी उसमें बुराई भी कही जा सकती है। हम भले ही इसे सुविधा सम्पन्न होने के कारण भूल जाएँ लेकिन दूरदर्शन के लाभों के साथ-साथ इससे होने वाली कुछ ऐसी हानियाँ हैं जिन्हें हम अनदेखी नहीं कर सकते हैं। दूरदर्शन के बार-बार देखने से हमारी आँखों में रोशनी मंद होती है। इसके मनोहर और आकर्षक कार्यक्रम को छोड़कर हम अपने और इससे कहीं अधिक आवश्यक कार्यों को भूल जाते हैं या छोड़ देते हैं। समय की बरबादी के साथ-साथ हम आलसी और कामचोर हो जाते हैं। दूरदर्शन से प्रसारित कार्यक्रम कुछ तो इतने अश्लील होते हैं कि इनसे न केवल हमारे युवा पीढ़ी का मन बिगड़ता है अपितु हमारे अबोध और नाबालिक बच्चे भी इसके दुष्प्रभाव से नहीं बच पाते हैं। दूरदर्शन के खराब होने से इनकी मरम्मत कराने में काफी खर्च भी पड़ जाता है। इस प्रकार दूरदर्शन से बहुत हानियाँ और बुराइयाँ हैं, फिर भी इससे लाभ अधिक हैं, इसी कारण है कि यह अधिक लोकप्रिय हो रहा है।

15. प्रदूषण की समस्या और समाधान

आज मनुष्य ने इतना विकास कर लिया है कि वह अब मनुष्य से बढ़कर देवताओं की शक्तियों के समान शक्तिशाली हो गया। मनुष्य ने यह विकास और महत्त्व विज्ञान के द्वारा प्राप्त किया है। विज्ञान का आविष्कार करके मनुष्य ने चारों ओर से प्रकृति को परास्त करने का कदम बढ़ा लिया है। देखते-देखते प्रकृति धीरे-धीरे मनुष्य की दासी बनती जा रही है। आज प्रकृति मनुष्य के अधीन बन गई है। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि मनुष्य ने प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने के लिए कोई कसर न छोड़ने का निश्चय कर लिया है।

जिस प्रकार मनुष्य मनुष्य का और राष्ट्र राष्ट्र का शोषण करते रहे हैं, उसी प्रकार मनुष्य प्रकृति का भी शोषण करता रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति में कोई गंदगी नहीं है। प्रकृति में बस जीव-जंतु, प्राणी तथा वनस्पति-जगत् परस्पर मिलकर समतोल में रहते हैं। प्रत्येक का अपना विशिष्ट कार्य है जिससे सड़ने वाले पदार्थों की अवस्था तेजी से बदले और वह फिर वनस्पति जगत् तथा उसके द्वारा जीवन-जगत् की खुराक बन सके अर्थात् प्रकृति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का काम अपने स्वाभाविक रूप में बराबर चलता रहता है। जब तक मनुष्य का हस्तक्षेप नहीं होता तब तक न गंदगी होती है और न रोग। जब मनुष्य प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप करता है तब प्रकृति का समतोल बिगड़ता है और इससे सारी सृष्टि का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।

आज का युग औद्योगिक युग है। औद्योगीकरण के फलस्वरूप वायु-प्रदूषण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। ऊर्जा तथा उष्णता पैदा करने वाले संयंत्रों से गरमी निकलती है। यह उद्योग जितने बड़े होंगे और जितना बढ़ेंगे उतनी ज्यादा गरमी फैलाएँगे। इसके अतिरिक्त ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए जो ईंधन प्रयोग में लाया जाता है वह प्रायः पूरी तरह नहीं जल पाता। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि धुएँ में कार्बन मोनोक्साइड काफी मात्रा में निकलती है। आज मोटर वाहनों का यातायात तेजी से बढ़ रहा है। 960 किलोमीटर की यात्रा में एक मोटर वाहन उतनी ऑक्सीजन का उपयोग करता है जितनी एक आदमी को एक वर्ष में चाहिए। दुनिया के हर अंचल में मोटर वाहनों का प्रदूषण फैलता जा रहा है। रेल का यातायात भी आशातीत रूप से बढ़ रहा है। हवाई जहाजों का चलन भी सभी देशों में हो चुका है। तेल-शोधन, चीनी-मिट्टी की मिलें, चमड़ा, कागज, रबर के कारखाने तेजी से बढ़ रहे हैं। रंग, वार्निश, प्लास्टिक, कुम्हारी चीनी के कारखाने बढ़ते जा रहे हैं। इस प्रकार के यंत्र बनाने के कारखाने बढ़ रहे हैं यह सब ऊर्जा-उत्पादन के लिए किसी-न-किसी रूप में ईंधन को फूंकते हैं और अपने धुएँ से सारे वातावरण को दूषित करते हैं। यह प्रदूषण जहाँ पैदा होता है वहीं पर स्थिर नहीं रहता। वायु के प्रवाह में वह सारी दुनिया में फैलता रहता है।

सन् 1968 में ब्रिटेन में लाल धूल गिरने लगी, वह सहारा रेगिस्तान से उड़कर आई। जब उत्तरी अफ्रीका में टैंकों का युद्ध चल रहा था तब वहाँ से धूल उड़कर कैरीबियन समुद्र तक पहुँच गई थी। आजकल लोग घरों, कारखानों, मोटरों और विमानों के माध्यम से हवा, मिट्टी और पानी में अंधाधुंध दूषित पदार्थ प्रवाहित कर रहे हैं। विकास के क्रम में प्रकृति अपने लिए ऐसी परिस्थितियाँ बनाती है जो उसके लिए आवश्यक है इसलिए इन व्यवस्थाओं में मनुष्य का हस्तक्षेप सब प्राणियों के लिए घातक होता है। प्रदूषण का मुख्य खतरा इसी से है कि इससे परिस्थितीय संस्थान पर दबाव पड़ता है। घनी आबादी के क्षेत्रों में कार्बन मोनोक्साइड की वजह से रक्त-संचार में 5-10 प्रतिशत आक्सीजन कम हो जाती है। शरीर के ऊतकों को 25 प्रतिशत आक्सीजन की आवश्यकता होती है। आक्सीजन की तुलना में कार्बन मोनोक्साइड लाल रुधिर कोशिकाओं के साथ ज्यादा मिल जाती है, इससे यह हानि होती है कि ये कोशिकाएँ ऑक्सीजन को अपनी पूरी मात्रा में सँभालने में असमर्थ रहती हैं।

लंदन में चार घंटों तक ट्रैफिक सँभालने के काम पर रहने वाले पुलिस के सिपाही के फेफड़ों में इतना विष भर जाता है मानो उसने 105 सिगरेट पी हों। आराम की स्थिति में मनुष्य को दस लीटर हवा की आवश्यकता होती है। कड़ी मेहनत पर उससे दस गुना ज्यादा चाहिए लेकिन एक दिन में एक दिमाग को इतनी ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जितनी कि 17,000 हेक्टेयर वन में पैदा होती है। मिट्टी में बढ़ते हुए विष से वनस्पति की निरंतर कमी महासागरों के प्रदूषण आदि की वजह से ऑक्सीजन की उत्पत्ति में कमी होती रही है। इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष हम वायुमंडल में अस्सी अरब टन धुआँ फेंकते हैं। कारों तथा विमानों से दूषित गैस निकलती है। मनुष्य और प्राणियों के साँस से जो कार्बन डाइआक्साइड निकलती है वह अलग प्रदूषण फैलाती है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण के प्रदूषण से वर्तमान रफ्तार से 30 वर्ष में जीवन-मंडल (बायोस्फियर) जिस पर प्राण और वनस्पति निर्भर हैं समाप्त हो जाएगा। पशु, पौधे और मनुष्यों का अस्तित्व नहीं रहेगा। सारी पृथ्वी की जलवायु बदल जाएगी, संभव है बरफ का युग फिर से आए। 30 साल के बाद हम कुछ नहीं कर पाएँगे। उस समय तक पृथ्वी का वातावरण नदियाँ और महासमुद्र सब विषैले हो जाएँगे।

यदि मनुष्य प्रकृति के नियमों को समझकर, प्रकृति को गुरु मानकर उसके साथ सहयोग करता और विशेष करके सब अवशिष्टों की प्रकृति को लौटाता है तो सृष्टि और मनुष्य स्वस्थ्य रह सकते हैं, नहीं तो लंबे, अर्से में अणु विस्फोट के खतरे की अपेक्षा प्रकृति के कार्य में मनुष्य का कृत्रिम हस्तक्षेप कम खतरनाक नहीं है।

अतएव हमें प्रकृति के शोषण क्रम को कम करना होगा। अन्यथा हमारा जीवन पानी के बुलबुले के समान बेवजह समाप्त हो जाएगा और हमारे सारे विकास-कार्य ज्यों-के-त्यों पड़े रह जाएँगे।

16. ‘दहेज प्रथा’ एक सामाजिक बुराई . पंचतंत्र में लिखा है

पुत्रीति जाता महतीह, चिन्ताकस्मैप्रदेयोति महानवितकैः।
दत्त्वा सुखं प्राप्तयस्यति वानवेति, कन्यापितृत्वंखलुनाम कष्टम।।

अर्थात् पुत्री उत्पन्न हुई, यह बड़ी चिंता है। यह किसको दी जाएगी और देने के बाद भी वह सुख पाएगी या नहीं, यह बड़ा वितर्क रहता है। कन्या का पितृत्व निश्चय ही कष्टपूर्ण होता है।

इस श्लेष से ऐसा लगता है कि अति प्राचीन काल से ही दहेज की प्रथा हमारे देश में रही है। दहेज इस समय निश्चित ही इतना कष्टदायक और विपत्तिसूचक होने के साथ-ही-साथ इस तरह प्राणहारी न था जितना कि आज है। यही कारण है कि आज दहेज-प्रथा को एक सामाजिक बुराई के रूप में देखा और समझा जा रहा है।

आज दहेज-प्रथा एक सामाजिक बुराई क्यों है? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहना बहुत ही सार्थक होगा कि आज दहेज का रूप अत्यंत विकृत और कुत्सित हो गया है। यद्यपि प्राचीन काल में भी दहेज की प्रथा थी लेकिन वह इतनी भयानक और प्राण संकटापन्न स्थिति को उत्पन्न करने वाली न थी। उस समय दहेज स्वच्छंदपूर्वक था। दहेज लिया नहीं जाता था अपितु दहेज दिया जाता था। दहेज प्राप्त करने वाले के मन में स्वार्थ की कहीं कोई खोट न थी। उसे जो कुछ भी मिलता था उसे वह सहर्ष अपना लेता था लेकिन आज दहेज की स्थिति इसके ठीक विपरीत हो गई है।

आज दहेज एक दानव के रूप में जीवित होकर साक्षात् हो गया है। दहेज एक विषधर साँप के समान एक-एक करके बंधुओं को डंस रहा है। कोई इससे बच नहीं पाता है, धन की लोलुपता और असंतोष की प्रवृत्ति तो इस दहेज के प्राण हैं। दहेज का अस्तित्व इसी से है। इसी ने मानव समाज को पशु समाज में बदल दिया है। दहेज न मिलने अर्थात् धन न मिलने से बार-बार संकटापन्न स्थिति का उत्पन्न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होती है। इसी के कारण कन्यापक्ष को झुकना पड़ता है। नीचा बनना पड़ता है। हर कोशिश करके वरपक्ष और वर की माँग को पूरा करना पड़ता है। आवश्यकता पड़ जाने पर घर-बार भी बेच देना पड़ता है। घर की लाज भी नहीं बच पाती है।

दहेज के अभाव में सबसे अधिक वधू (कन्या) को दुःख उठाना पड़ता है। उसे जली-कटी, ऊटपटाँग बद्दुआ, झूठे अभियोग से मढ़ा जाना और तरह-तरह के दोषारोपण करके आत्महत्या के लिए विवश किया जाता है। दहेज के कुप्रभाव से केवल वर-वधू ही नहीं प्रभावित होते हैं, अपितु इनसे संबंधित व्यक्तियों को भी इसकी लपट में झुलसना पड़ता है। इससे दोनों के दूर-दूर के संबंध बिगड़ने के साथ-साथ मान-अपमान दुखद वातावरण फैल जाता है जो आने वाली पीढ़ी को एक मानसिक विकृति और दुष्प्रभाव को जन्माता है।

दहेज के कुप्रभाव से मानसिक अव्यस्तता बनी रहती है। कभी-कभी तो यह भी देखने में आता है कि दहेज के अभाव में प्रताड़ित वधू ने आत्महत्या कर ली है, या उसे जला-डूबाकर मार दिया गया है जिसके परिणामस्वरूप कानून की गिरफ्त में दोनों परिवार के लोग आ जाते हैं, पैसे बेशुमार लग जाते हैं, शारीरिक दंड अलग मिलते हैं। काम ठंडे अलग से पड़ते हैं और इतना होने के साथ अपमान और असम्मान, आलोचना भरपूर सहने को मिलते हैं।

दहेज प्रथा सामाजिक बुराई के रूप में उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर सिद्ध की जा चुकी है। अब दहेज प्रथा को दूर करने के मुख्य मुद्दों पर विचारना अति आवश्यक प्रतीत हो रहा है।

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इस बुरी दहेज-प्रथा को तभी जड़ से उखाड़ा जा सकता है जब सामाजिक स्तर पर जागृति अभियान चलाया जाए। इसके कार्यकर्ता अगर इसके भुक्त-भोगी लोग हों तो यह प्रथा यथाशीघ्र समाप्त हो सकती है। ऐसा सामाजिक संगठन का होना जरूरी है जो भुक्त-भोगी या आंशिक भोगी महिलाओं के द्वारा संगठित हो। सरकारी सहयोग होना भी जरूरी है क्योंकि जब तक दोषी व्यक्ति को सख्त कानूनी कार्यवाही करके दंड न दिया जाए तब तक इस प्रथा को बेदम नहीं किया जा सकता। संतोष की बात है कि सरकारी सहयोग के द्वारा सामाजिक जागृति आई है। यह प्रथा निकट भविष्य में अवश्य समाप्त हो जाएगी।

17. अगर मैं प्रधानमंत्री होता

किसी आजाद मुल्क का नागरिक अपनी योग्यताओं का विस्तार करके अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सकता है, वह कोई भी पद, स्थान या अवस्था को प्राप्त कर सकता है, उसको ऐसा होने का अधिकार उसका संविधान प्रदान करता है। भारत जैसे विशाल राष्ट्र में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के पद को प्राप्त करना यों तो आकाश कुसुम तोड़ने के समान है फिर भी ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ के अनुसार यहाँ का अत्यंत सामान्य नागरिक भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बन सकता है। लालबहादुर शास्त्री और ज्ञानी जैलसिंह इसके प्रमाण हैं।

यहाँ प्रतिपाद्य विषय का उल्लेख प्रस्तुत है कि ‘अगर मैं प्रधानमंत्री होता’ तो क्या करता? मैं यह भली-भाँति जानता हूँ कि प्रधानमंत्री का पद अत्यंत विशिष्ट और महान् उत्तरदायित्वपूर्ण पद है। इसकी गरिमा और महानता को बनाए रखने में किसी एक सामान्य और भावुक व्यक्ति के लिए संभव नहीं है फिर मैं महत्त्वाकांक्षी हूँ और अगर मैं प्रधानमंत्री बन गया तो निश्चय समूचे राष्ट्र की काया पलट कर दूँगा। मैं क्या-क्या राष्ट्रोत्थान के लिए कदम उठाऊँगा, उसे मैं प्रस्तुत करना पहला कर्तव्य मानता हूँ जिससे मैं लगातार इस पद पर बना रहूँ।

सबसे पहले शिक्षा-नीति में आमूल चूल परिवर्तन लाऊँगा। मुझे सुविज्ञात है कि हमारी कोई स्थायी शिक्षा-नीति नहीं है जिससे शिक्षा का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है, यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से हम शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे हैं, बेरोजगारी की जो आज विभीषिका आज के शिक्षित युवकों को त्रस्त कर रही है, उनका मुख्य कारण हमारी बुनियादी शिक्षा की कमजोरी, प्राचीन काल की गुरु-शिष्य परंपरा की गुरुकुल परिपाटी की शुरुआत नये सिरे से करके धर्म और राजनीति के समन्वय से आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात कराना चाहूँगा। राष्ट्र को बाह्य शक्तियों के आक्रमण का खतरा आज भी बना हुआ है। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा अभी अपेक्षित रूप में नहीं है। इसके लिए अत्याधुनिक युद्ध के उपकरणों का आयात बढ़ाना होगा। मैं खुले आम न्यूक्लीयर विस्फोट का उपयोग सृजनात्मक कार्यों के लिए ही करना चाहूँगा। मैं किसी प्रकार ढुलमुल राजनीति का शिकार नहीं बनूँगा अगर कोई राष्ट्र हमारे राष्ट्र की ओर आँख उठाकर देखें तो मैं उसका मुंहतोड़ जवाब देने में संकोच नहीं करूंगा। मैं अपने वीर सैनिकों का उत्साहवर्द्धन करते हुए उनके जीवन को अत्यधिक संपन्न और खुशहाल बनाने के लिए उन्हें पूरी समुचित सुविधाएँ प्रदान कराऊँगा जिससे वे राष्ट्र की आन-मान पर न्योछावर होने में पीछे नहीं हटेंगे।

हमारे देश की खाद्य समस्या सर्वाधिक जटिल और दुखद समस्या है। कृषि प्रधान राष्ट्र होने के बावजूद यहाँ खाद्य संकट हमेशा मँडराया करता है। इसको ध्यान में रखते हुए मैं नवीनतम कृषि यंत्रों, उपकरणों और रासायनिक खादों और सिंचाई के विभिन्न साधनों के द्वारा कृषि-दशा की दयनीय स्थिति को सबल बनाऊँगा। देश की जो बंजर और बेकार भूमि है उसका पूर्ण उपयोग कृषि के लिए करवाते हुए कृषकों को एक-से-एक बढ़कर उन्नतिशील बीज उपलब्ध कराके उनकी अपेक्षित सहायता सुलभ कराऊँगा।

यदि मैं प्रधानमंत्री हूँगा तो देश में फैलती हुई राजनीतिक अस्थिरता पर कड़ा अंकुश लगाकर दलों के दलदल को रोक दूँगा। राष्ट्र को पतन की ओर ले जाने वाली राजनीतिक अस्थिरता के फलस्वरूप प्रतिदिन होने वाले आंदोलनों, काम-रोको और विरोध दिवस बंद को समाप्त करने के लिए पूरा प्रयास करूंगा। देश में गिरती हुई अर्थव्यवस्था के कारण मुद्रा प्रसार पर रोक लगाना अपना मैं प्रमुख कर्त्तव्य समझूगा। उत्पादन, उपभोग और विनियम की व्यवस्था को पूरी तरह से बदलकर देश को आर्थिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व प्रदान कराऊँगा।।

देश को विकलांग करने वाले तत्त्वों, जैसे-मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार ही नव अवगुणों की जड़ है। इसको जड़मूल से समाप्त करने के लिए अपराधी तत्त्वों को कड़ी-से-कड़ी सजा दिलाकर समस्त वातावरण को शिष्ट और स्वच्छ व्यवहारों से भरने की मेरी सबल कोशिश होगी। यहीं आज धर्म और जाति को लेकर तो साम्प्रदायिकता फैलाई जा रही है वह राष्ट्र को पराधीनता की ओर ढकेलने के ही अर्थ में हैं, इसलिए ऐसी राष्ट्र विरोधी शक्तियों को आज दंड की सजा देने के लिए मैं सबसे संसद के दोनों सदनों से अधिक-से-अधिक मतों से इस प्रस्ताव को पारित करा करके राष्ट्रपति से सिफारिश करके संविधान में परिवर्तन के बाद एक विशेष अधिनियम जारी कराऊंगा . जिससे विदेशी हाथ अपना बटोर सकें।

संक्षेप में यही कहना चाहता हूँ कि यदि मैं प्रधानमंत्री हूँगा तो राष्ट्र और समाज के कल्याण और पूरे उत्थान के लिए मैं एड़ी-चोटी का प्रयास करके प्रधानमंत्रियों की परम्परा और इतिहास में अपना सबसे अधिक लोकापेक्षित नाम स्थापित करूँगा। भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाला यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो कथनी और करनी को साकार कर देता।

18. परिश्रम अथवा परिश्रम का महत्त्व अथवा परिश्रम ही जीवन है

संस्कृत का एक सुप्रसिद्ध श्लोक है-

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

अर्थात् परिश्रम से ही कार्य होते हैं, इच्छा से नहीं। सोते हुए सिंह के मुँह में पशु स्वयं नहीं आ गिरते। इससे स्पष्ट है कि कार्य-सिद्धि के लिए परिश्रम बहुत आवश्यक है।

सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक मनुष्य ने जो भी विकास किया है, वह सब परिश्रम की ही देन है। जब मानव जंगल अवस्था में था, तब वह घोर परिश्रमी था। उसे खाने-पीने, सोने, पहनने आदि के लिए जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी। आज, जबकि युग बहुत विकसित हो चुका है, परिश्रम की महिमा कम नहीं हुई है। बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण देखिए, अनेक मंजिले भवन देखिए, खदानों की खुदाई, पहाड़ों की कटाई, समुद्र की गोताखोरी या आकाश-मंडल की यात्रा का अध्ययन कीजिए। सब जगह मानव के परिश्रम की गाथा सुनाई पड़ेगी। एक कहावत है- ‘स्वर्ग क्या है, अपनी मेहनत से रची गई सृष्टि। नरक क्या है? अपने आप बन गई दुरवस्था।’ आशय यह है कि स्वर्गीय सुखों को पाने के लिए तथा विकास करने के लिए मेहनत अनिवार्य है। इसीलिए मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है-

पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो,
सफलता वर-तुल्य वरो, उठो,
अपुरुषार्थ भयंकर पाप है,
न उसमें यश है, न प्रताप है।।

केवल शारीरिक परिश्रम ही परिश्रम नहीं है। कार्यालय में बैठे हुए प्राचार्य, लिपिक या मैनेजर केवल लेखनी चलाकर या परामर्श देकर भी जी-तोड़ मेहनत करते हैं। जिस क्रिया में कुछ काम करना पड़े, जोर लगाना पड़े, तनाव मोल लेना पड़े, वह मेहनत कहलाती है। महात्मा गांधी दिन-भर सलाह-मशविरे में लगे रहते थे, परंतु वे घोर परिश्रमी थे।

पुरुषार्थ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे सफलता मिलती है। परिश्रम ही सफलता की ओर जाने वाली सड़क है। परिश्रम से आत्मविश्वास पैदा होता है। मेहनती आदमी को व्यर्थ में किसी की जी-हजूरी नहीं करनी पड़ती, बल्कि लोग उसकी जी-हजूरी करते हैं। तीसरे, मेहनती आदमी का स्वास्थ्य सदा ठीक रहता है। चौथे, मेहनत करने से गहरा आनंद मिलता है। उससे मन में यह शांति होती है कि मैं निठल्ला नहीं बैठा। किसी विद्वान का कथन है-जब तुम्हारे जीवन में घोर आपत्ति और दुख आ जाएँ तो व्याकुल और निराश मत बनो; अपितु तुरंत काम में जुट जाओ। स्वयं को कार्य में तल्लीन कर दो तो तुम्हें वास्तविक शांति और नवीन प्रकाश की प्राप्ति होगी।

राबर्ट कोलियार कहते हैं- ‘मनुष्य का सर्वोत्तम मित्र उसकी दस अँगुलियाँ हैं।’ अतः हमें जीवन का एक-एक क्षण परिश्रम करने में बिताना चाहिए। श्रम मानव-जीवन का सच्चा सौंदर्य है।

19. साक्षरता से देश प्रगति करेगा अथवा साक्षरता आंदोलन

साक्षरता का तात्पर्य है-अक्षर-ज्ञान का होना। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति का पढ़ने-लिखने में समर्थ होना साक्षर होना कहलाता है। इस बात में कोई दो मत नहीं हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अक्षर-ज्ञान होना चाहिए। अक्षर-ज्ञान व्यक्ति के लिए उतना ही अनिवार्य है जितना कि अँधेरे कमरे के लिए प्रकाश; या अंधे के लिए आँखें।

वर्तमान सभ्यता काफी उन्नत हो चुकी है। इस उन्नति का एक मूलभूत आधार है- शिक्षा। शिक्षा के बिना प्रगति का पहिया एक इंच भी नहीं सरक सकता। यदि शिक्षा प्राप्त करनी है तो अक्षर-ज्ञान अनिवार्य है। आज की समूची शिक्षा अक्षर-ज्ञान पर आधारित है। भारतीय मनीषियों ने तो अक्षर को ‘ब्रह्म’ माना है। आज ज्ञान-विज्ञान ने जितनी उन्नति की है, उसका लेखा-जोखा हमारे स्वर्णिम ग्रंथों में सुरक्षित है। अतः उस ज्ञान को पाने के लिए साक्षर होना पड़ेगा।

निरक्षर व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ जाता है। वह छोटी-छोटी बातों के लिए दूसरों पर निर्भर बना रहता है। उसे पत्र पढ़ने, बस-रेलगाड़ी की सूचनाएँ पढ़ने के लिए भी लोगों का मुँह ताकना पड़ता है। परिणमास्वरूप उसके आत्मविश्वास में कमी आ जाती है। यहाँ तक कि वह समाचार-पत्र पढ़कर दैनंदिन गतिविधियों को भी नहीं जान पाता। इस प्रकार वह विश्व की प्रगतिशील धारा से कट कर रह जाता है। रोज-रोज होने वाले नये आविष्कार उसके लिए बेमानी हो जाते हैं।

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दुर्भाग्य से भारत में निरक्षरता का अंधकार बहुत अधिक छाया हुआ है। अभी यहाँ करोड़ों लोग वर्तमान सभ्यता से एकदम अनजान हैं। ईश्वर ने उन्हें जो-जो शक्तियाँ प्रदान की हैं, वे भी सोई पड़ी हैं। अगरबत्ती की सुगंध की भाँति उनकी प्रतिभा उन्हीं में खोई पड़ी है। अगर ज्ञान की लौ लग जाए, साक्षरता का दीप जल जाए तो समूचा हिंदुस्तान उनकी सुगंध से महमह कर उठेगा। तब हमारे वनवासी बंधु, जो अज्ञान के कारण अपनी वन-संपदा के महत्त्व को नहीं जानते, उसके महत्त्व को जानेंगे; अपनी वन-भूमि का चहुंमुखी विकास करेंगे। परिणामस्वरूप नये उद्योग-धंधों से भारतवर्ष तो फलेगा-फूलेगा ही; उनके सूखे चेहरों पर भी रंगत आएगी। अतः साक्षरता आज का युगधर्म है। उसे प्रथम महत्त्व देकर अपनाना चाहिए।

20. विज्ञान-वरदान या अभिशाप

विज्ञान एक शक्ति है, जो नित नये आविष्कार करती है। वह शक्ति न तो अच्छी है, न बुरी, वह तो केवल शक्ति है। अगर हम उस शक्ति से मानव-कल्याण के कार्य करें तो वह ‘वरदान’ प्रतीत होती है। अगर उसी से विनाश करना शुरू कर दें तो वह ‘अभिशाप’ लगने लगती है।

विज्ञान ने अंधों को आँखें दी हैं, बहरों को सुनने की ताकत। लाइलाज रोगों की रोकथाम की है तथा अकाल मृत्यु पर विजय पाई है। विज्ञान की सहायता से यह युग बटन-युग बन गया है। बटन दबाते ही वायु देवता पंखे को लिये हमारी सेवा करने लगते हैं, इंद्र देवता वर्षा करने लगते हैं, कहीं प्रकाश जगमगाने लगता है तो कहीं शीत-उष्ण वायु के झोंके सुख पहुँचाने लगते हैं। बस, गाड़ी, वायुयान आदि ने स्थान की दूरी को बाँध दिया है। टेलीफोन द्वारा तो हम सारी वसुधा से बातचीत करके उसे वास्तव में कुटुंब बना लेते हैं। हमने समुद्र की गहराइयाँ भी नाप डाली हैं और आकाश की ऊँचाइयाँ भी। हमारे टी.वी., रेडियो, वीडियो में सभी मनोरंजन के साधन कैद हैं। सचमुच विज्ञान ‘वरदान’ ही तो है।।

मनुष्य ने जहाँ विज्ञान से सुख के साधन जुटाए हैं, वहाँ दुःख के अंबार भी खड़े कर लिए हैं। विज्ञान के द्वारा हमने अणुबम, परमाणु बम तथा अन्य ध्वंसकारी शस्त्र-अस्त्रों का निर्माण कर लिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब दुनिया में इतनी विनाशकारी सामग्री इकट्ठी को चुकी है कि उससे सारी पृथ्वी को पंद्रह बार नष्ट किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रदूषण की समस्या बहुत बुरी तरह फैल गई है। नित्य नये असाध्य रोग पैदा होते जा रहे हैं, जो वैज्ञानिक साधनों के अंधाधुंध प्रयोग करने के दुष्परिणाम हैं।

वैज्ञानिक प्रगति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम मानव-मन पर हुआ है। पहले जो मानव निष्कपट था, निःस्वार्थ था, भोला था, मस्त और बेपरवाह था, अब वह छली, स्वार्थी, चालाक, भौतिकवादी तथा तनावग्रस्त हो गया है। उसके जीवन में से संगीत गायब हो गया है, धन की प्यास जाग गई है। नैतिक मूल्य नष्ट हो गए हैं। जीवन में संघर्ष-ही-संघर्ष रह गए हैं। कविवर जगदीश गुप्त के शब्दों में-

संसार सारा आदमी की चाल देख हुआ चकित।
पर झाँक कर देखो दृगों में, हैं सभी प्यासे थकित।।

वास्तव में विज्ञान को वरदान या अभिशाप बनाने वाला मनुष्य है। जैसे अग्नि से हम रसोई भी बना सकते हैं और किसी का घर भी जला सकते हैं; जैसे चाकू से हम फलों का स्वाद भी ले सकते हैं और किसी की हत्या भी कर सकते हैं; उसी प्रकार विज्ञान से हम सुख के साधन भी जुटा सकते हैं और मानव का विनाश भी कर सकते हैं। अतः विज्ञान को वरदान या अभिशाप बनाना मानव के हाथ में है। इस संदर्भ में एक उक्ति याद रखनी चाहिए–

‘विज्ञान अच्छा सेवक है लेकिन बुरा हथियार।’

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MP Board Class 9th General Hindi पत्र-लेखन

MP Board Class 9th General Hindi पत्र-लेखन

पत्र-लेखन की आवश्यकता-
हम सब अपने निकट संबंधियों, इष्ट मित्रों से बराबर सम्पर्क रखना चाहते हैं। जो हमारे पास में ही रहते हैं, उनसे तो हम मिलते रहते हैं, किंतु जो हमसे दूर दूसरे नगर या गाँव में रहते हैं, उनको तो हम लिखकर ही अपनी कुशल-क्षेम भेज सकते हैं और लिखकर ही उनकी कुशल-क्षेम मँगा सकते हैं। इस प्रकार लिखकर विचारों का जो आदान-प्रदान किया जाता है, उसे पत्र-लेखन कहते हैं। विद्यालय में भी कई अवसरों पर हमें अपने प्राचार्य को प्रार्थना-पत्र लिखने पड़ते हैं। कभी-कभी हम अपने गाँव या नगर के बाहर के किसी पुस्तक विक्रेता से अपनी जरूरत की पुस्तकें भी मँगाते हैं। इसके लिए भी हमें पत्र लिखना पड़ता है। इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पत्र व्यवहार हम सबके लिए अनिवार्य हो गया है।

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  1. अनौपचारिक पत्र (Informal letter)-इस तरह के पत्र अपने सगे-संबंधियों एवं मित्रों को लिखे जाते हैं। जैसे-माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, मित्र आदि के लिए लिखा गया पत्र।
  2. औपचारिक पत्र (Formal Letter)-इस तरह के पत्र कार्यालय से संबंधित होते हैं। जैसे-प्रधानाचार्य, अधिकारी, व्यापारिक वर्ग आदि के लिए इस तरह के पत्र लेखन का प्रयोग होता है।

पत्र लेखन संबंधी कुछ आवश्यक बातें-

  1. पत्र लिखते समय स्थान (जहां से पत्र लिखा जा रहा है), दिनांक, उचित संबोधन का विशेष ध्यान रखना वाहिए।
  2. पत्र की भाषा सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए।
  3. पत्र का विषय सुलझा हुआ होना चाहिए।
  4. अनावश्यक बातों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  5. कम शब्दों में पत्र के उद्देश्य को अधिक से अधिक स्पष्टता के साथ प्रकट करना चाहिए।
  6. भाषा की शालीनता का ध्यान रखना चाहिए।

अनौपचारिक पत्र

1. ‘वार्षिक परीक्षा की तैयारी की सूचना हेतु पिताजी को पत्र’ लिखो।
175, शिवाजी मार्ग
भोपाल
10-5-200…
पूज्य पिताजी!

सादर चरण-स्पर्श,
आपका कृपापत्र हमें 8-5-200… को मिला। पढ़कर मन खुश हुआ। मैं आप सब पूज्य-वृन्दों के आशीर्वाद से सकुशल हूँ। आशा है कि आप सब भी परमात्मा की महाकृपा से ठीक से होंगे।

पूज्य पिताजी! आजकल मैं अपनी वार्षिक परीक्षा की तैयारी में अति व्यस्त हूँ। मेरी वार्षिक परीक्षा 20-5-200… से आरंभ होने वाली है। अब तक मैंने हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और सामाजिक विषयों की पूरी तरह से तैयारी कर ली है परीक्षा के दिन तक तो मुझे सारे विषय कंठस्थ हो जाएंगे। इस आधार पर मैं आपको यह विश्वास दिला रहा हूँ कि मैं प्रथम श्रेणी में अवश्य उत्तीर्ण हो जाऊँगा। आशा है कि इससे आप सबको आनंद और उल्लास होगा।

पूज्य माताजी को सादर चरण-स्पर्श और अनुज शशि को शुभाशीर्वाद।

आपका आज्ञाकारी पुत्र
‘रवि’

2. अपने पिताजी को पत्र लिखिए तथा उसमें मासिक जेब खर्च बढ़ाने की मांग कीजिए।
विष्णु गार्डन,
भोपाल
3-3-200…
पूज्य पिताजी,

सादर चरण-स्पर्श
आप सब सकुशल हैं, इसके लिए मैं परमात्मा से सदैव प्रार्थी हूँ, आपके पत्र की प्रतीक्षा करके मैं यह पत्र लिख रहा हूँ। आपको यह ज्ञात हो कि मेरी परीक्षा आगामी माह की 15वीं तारीख से आरंभ होने वाली है। इसके लिए मैंने जी-जान से अध्ययन आरंभ कर दिया है। कुछ पुस्तकें, कापियाँ और कुछ परीक्षोपयोगी आवश्यकताएँ आ गई हैं। इसलिए आप अब 50 रुपये और अधिक भेजते जाइएगा। ऐसा इसलिए कि परीक्षा खर्च के साथ-साथ आवागमन और सम्पर्क हेतु भी पैसे खर्च होंगे। अतएव आप 500 रुपये तो अवश्य बढ़ाकर भेजते रहियेगा। अन्यथा परीक्षा की तैयारी अधूरी रह जाएगी।

माताजी को सादर चरण-स्पर्श, अनुज, दिव्या को शुभाशीर्वाद

आपका आज्ञाकारी पुत्र
‘प्रभाकर’

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3. प्रतिदिन समाचार-पत्र पढ़ने से जो लाभ है, उन्हें अवगत कराते हुए अपने मित्र को एक पत्र लिखिए।
2/2, तिलक नगर
ग्वालियर (म.प्र.)
6-6-200…

प्रिय मित्र, रमेश!
मुझे तुम्हारा पत्र कल ही प्राप्त हुआ। तुमने लिखा है कि आजकल क्या कर रहा हूँ। तो मित्र मैं आजकल दिल-दिमाग से समाचार-पत्रों को पढ़ने में जुट गया हूँ। मैं हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही समाचार-पत्रों को नियमित रूप से पढ़ रहा हूँ। मुझे इनसे बहुत लाभ मिल रहा है। इस विषय में बता रहा हूँ।

मित्र समाचार-पत्र पढ़ने से लाभ ही लाभ हैं। देश-विदेश की ही नहीं आस-पड़ोस की पूरी खबर घर बैठे ही मिल जाती है। समाचार-पत्र पढ़ने से अच्छा-खासा मनोरंजन हो जाता है, यही नहीं विविध प्रकार के शब्द-अर्थ और भावों-प्रतिक्रियाओं का भी ज्ञान हो जाता है। समाचार-पत्र में छपे समाचारों से अपनी स्थिति का पता लगता है। इससे न केवल वर्तमान अपितु भूत और भविष्य की भी रूप रेखा समझ में आ जाती है। वास्तव में समाचार-पत्र समाज के सभी वर्गों और जीवन के सभी क्षेत्रों के मार्गदर्शन और सच्चे संवाहक हैं। अतएव समाचार-पत्र की उपयोगिता नहीं भूलनी चाहिए।

आशा है मित्र. आप मेरे सझावानसार नियमित रूप से समाचार-पत्र पढकर लाभ उठाओगे। मेरी ओर से माताजी-पिताजी को सादर चरण-स्पर्श, लघु बन्धुओं को शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
राकेश

4. पिता को पत्र लिखिए, जिसमें 300 रुपये पुस्तकों में और अन्य खर्चे के लिए मनीऑर्डर द्वारा मँगाइए।
15 टी.टी. नगर
भोपाल
दिनांक : 15-1-200………
पूजनीय पिताजी,

सादर चरण-स्पर्शी,
मैं यहाँ सकुशल हूँ। आशा करता हूँ कि आप सब लोग सकुशल होंगे। आपके निर्देशों का मैं पूरी तरह पालन कर रहा हूँ। मेरा ध्यान ठीक चल रहा है। मेरी छ:माही परीक्षाएँ 15 दिसम्बर से हो रही हैं। मुझे कुछ पुस्तकें और स्टेशनरी आदि खरीदनी हैं। पढ़ाई के लिए मैं एक छोटा टेबिल लैंप भी लेना चाहता हूँ। इन सबके लिए लगभग 300 रुपये की आवश्यकता पड़ेगी। अतः कृपया उक्त धनराशि यथाशीघ्र मनीऑर्डर.. द्वारा भेजने का कष्ट करिएगा।

शेष कुशल है। मधु को प्यार और माताजी को चरण-स्पर्श।

आपका आज्ञाकारी पुत्र
अमित

5. वार्षिक परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर एक बधाई-पत्र अपने मित्र को लिखिए।
नेहरू. नगर
विलासपुर
26-7-200…

प्रिय मित्र आलोक,
आज माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल द्वारा प्रकाशित कक्षा IX के परीक्षा परिणाम में तुम्हारा प्रथम श्रेणी में अनुक्रमांक व नाम देखकर हृदय को बड़ी प्रसन्नता हुई। मेरे माता-पिता भी तुम्हारी सफलता पर बहुत प्रसन्न हैं। यह वास्तव में तुम्हारे कठिन परिश्रम का फल है। तुम्हारी सफलता हम सबके लिए गौरव की बात है। मित्र मैं तुम्हें घर पर आकर बधाई देता। किंतु व्यस्तता के कारण तुम तक पहुँच नहीं पा रहा हूँ। इसलिए पत्र द्वारा मैं तुम्हें हार्दिक बधाई भेज रहा हूँ। बधाई स्वीकार करें। कभी घर पर आकर तुमसे मिठाई खाऊँगा। शेष कुशल है।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
‘उमेश’

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6. जन्मदिवस समारोह में सम्मिलित होने के लिए अपने मित्र को आमंत्रण पत्र लिखिए।
17/15 तिलक नगर:
ग्वालियर
4 फरवरी, 200…..

प्रिय मोहन,
तुम्हें यह जानकर प्रसन्नता होगी कि मैं दिनांक 6 फरवरी को अपना जन्मदिवस मना रहा हूँ। घर में इसके लिए अच्छी तैयारियाँ की गई हैं। इस अवसर पर चाय तथा संगीत पार्टी का भी आयोजन किया गया है। गत वर्ष तुम इस अवसर पर बीमार होने के कारण नहीं आ सके परंतु इस बार अवश्य आना। तुम्हारे बिना पार्टी का रंग फीका पड़ जाएगा। आशा है तुम समय से पूर्व आकर काम में भी हाथ बँटाओगे।

पूज्य पिताजी और माताजी को मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
रविन्द्र सिंह

औपचारिक पत्र

1. अपने विद्यालय के प्राचार्य को निर्धन छात्र को पुस्तकालय से पुस्तकें प्रदान करने विषयक प्रार्थना पत्र लिखिए। सेवा में,
प्राचार्य
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
इन्दौर (म.प्र.)

महोदय,
सविनय निवेदन है कि प्रार्थी आपके विद्यालय की कक्षा 9वीं ‘द’ का एक छात्र प्रतिनिधि है। प्रार्थी की कक्षा का एक छात्र ‘रमेश’ जिसका अनुक्रमांक 30 है। यह छात्र अत्यंत निर्धन है। यह अनाथ है। जिस किसी तरह से हिम्मत बाँधकर यह अपनी ‘पढ़ाई कर रहा है। पढ़ने में तेज है। यह पुस्तकें खरीदने में असमर्थ है। अतः इसे पुस्तकालय से पुस्तकें दिलवाने की कृपा करें।

आपका आज्ञाकारी छात्र
सुरेश
कक्षा 9वीं ‘द’
अनुक्रमांक 23

दिनांक 22-5-200…

2. अवकाश स्वीकृति हेतु प्राचार्य को प्रार्थना-पत्र।
सेवा में,
प्राचार्य
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
इंदौर (म.प्र.)

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा 9वीं ‘स’ का छात्र हूँ। मेरा अनुक्रमांक 23 है, दिनांक 13.5.2004 से मैं मलेरिया-ज्वर से अधिक पीड़ित हूँ। इस कारण मैं विद्यालय आने में असमर्थ हूँ। चिकित्सक के अनुसार मुझे 13-5-2004 से लेकर 16.5.2004 तक स्वस्थ तक स्वस्थ होने में समय लगेगा। अतः आप इतने दिनों तक मुझे अवकाश देने की कृपा करें। सधन्यवाद

आपका आज्ञाकारी छात्र
सुमन
कक्षा 9वीं ‘स’
अनुक्रमांक 23

दिनांक 13.5.2004

3. अपने विद्यालय के प्राचार्य को दो दिन का बीमारी के कारण अवकाश देने के लिए प्रार्थना पत्र लिखिए।
सेवा में,
श्रीमान प्राचार्य महोदय,
शासकीय सुभाष उ.मा.वि.
शिवाजी नगर, भोपाल

महोदय,
निवेदन है कि गत रात्रि से मैं सर्दी और बुखार से पीड़ित हूँ। डॉक्टर ने मुझे दो दिन पूर्ण विश्राम के लिए सलाह दी है। अतः मैं दो दिन विद्यालय में उपस्थित नहीं हो सकूँगा। कृपया दिनांक 8 एवं 9 अगस्त का अवकाश स्वीकृत करने का कष्ट करें।

धन्यवाद!

आपका आज्ञाकारी शिष्य
परसराम पाण्डेय,
कक्षा 9-ब

8-12-2004

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4. शाला (विद्यालय छोड़ने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु प्राचार्य महोदय को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए।
विषय-शाला (विद्यालय) छोड़ने का प्रमाण-पत्र हेतु प्राचार्य को प्रार्थना-पत्र।
सेवा में,
प्राचार्य
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
भोपाल (म.प्र.)

सविनय निवेदन है कि प्रार्थी आपके विद्यालय की कक्षा 9वीं ‘अ’ अनुक्रमांक 11 का भूतपूर्व छात्र है। प्रार्थी ने आपके विद्यालय से उपर्युक्त कक्षा को द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण करके अध्ययन छोड़ दिया है जिसके प्रमाण-पत्र की आज अत्यंत आवश्यकता आ गई है। अतः आपसे प्रार्थना है कि आप उपर्युक्त प्रमाण-पत्र देने की कृपा करें।

प्रार्थी
सुरेन्द्र कुमार
कक्षा 9 ‘अ’
अनुक्रमांक 11

दिनांक 4-4-2002

5. शिक्षक पद हेतु एक आवेदन-पत्र संचालक शिक्षा विभाग के नाम लिखिए।
श्रीमान् संयुक्त संचालक महोदय,
शिक्षा विभाग
संभाग ग्वालियर (म.प्र.)
दिनांक 15-10-200……..
सेवा में,

विषय-शिक्षक पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
सेवा में सविनय निवेदन है कि प्रार्थी को दैनिक-पत्र आचरण व स्वदेश में प्रकाशित एक विज्ञापन से ज्ञात हुआ है कि आपके अधीनस्थ ग्रामीण अंचलों के प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं। अतः माध्यमिक विद्यालय हेतु शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए मैं अपना आवेदन-पत्र कर रहा हूँ। अतः आपसे अनुरोध है कि मेरी निम्नलिखित योग्यताओं को देखते हुए आप मेरी नियुक्ति शिक्षक पद पर करने की कृपा करें।
मेरी शैक्षणिक योग्यता का विवरण इस प्रकार है-
(1) शैक्षणिक योग्यता-बी.एस.सी.-द्वितीय श्रेणी
(2) प्रशिक्षण योग्यता-बी.एड.-द्वितीय श्रेणी
(3) हायर सेकेण्ड्री परीक्षा-प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण
(4) अन्य योग्यता-हॉकी व क्रिकेट खेल में विशेष रुचि
(5) प्रार्थी की जन्मतिथि एवं चरित्र का प्रमाण-पत्र प्रार्थना-पत्र के साथ संलग्न है। अतः श्रीमान् से पुनः निवेदन है कि प्रार्थी को विभाग में सेवा का अवसर प्रदान करें।

पता- प्रार्थी
दर्पण कॉलोनी ठाठीपुर मुरार। कमल किशोर अष्ठाना

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6. पाठ्य-पुस्तक निगम भोपाल से निर्धारित पाठ्य पुस्तकें मँगवाने हेतु एक पत्र संचालक के नाम लिखिए।
सुभाष उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
रतलाम
दिनांक 7-7-200

श्रीमान् संचालक महोदय,
पाठ्य-पुस्तक महोदय,
भोपाल (म.प्र.)

महोदय,
सेवा में निवेदन है कि पाठ्य-पुस्तक निगम भोपाल (म.प्र.) द्वारा प्रकाशित कक्षा 9 की पुस्तकें हैं हमारे नगर के पुस्तक विक्रेताओं के पास उपलब्ध नहीं हैं। जिन दुकानों पर कुछ पुस्तकें हैं वे दुकानदार अधिक मूल्य पर पुस्तकें बेचना चाहते हैं। अतः आपसे निवेदन है कि निम्नलिखित विषयों की पुस्तकें शासकीय दर पर कमीशन काट कर भेजने की कृपा करें।

(1) विशिष्ट हिंदी – कक्षा XI – 1 प्रति
(2) विशिष्ट अंग्रेजी – कक्षा IX – 1 प्रति
(3) गणित – कक्षा IX – 1 प्रति
(4) भौतिक शास्त्र – कक्षा IX – 1 प्रति
(5) रसायन शास्त्र – कक्षा IX – 1 प्रति

भवदीय
अशोक कुमार गौड़

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MP Board Class 9th General Hindi अपठित अनुच्छेद

MP Board Class 9th General Hindi अपठित अनुच्छेद

परीक्षा में अपठित गद्यांश का प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछा जाता है। ऐसे प्रश्न पूछने का उद्देश्य यह जानना है कि विद्यार्थी किसी गद्यांश को पढ़कर उसमें निहित भावों को समझकर अपने शब्दों में लिख सकते हैं या नहीं। अपठित गद्यांश वे होते हैं, जिन्हें विद्यार्थी अपनी पाठ्यपुस्तकों में नहीं पढ़ते। अपठित गद्यांश के प्रश्न को हल करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए:

  1. गद्यांश को समझने के लिए यह आवश्यक है कि आप उसका वाचन कम-से-कम दो बार करें। यदि दो बार में भी गद्यांश का मूलभाव समझ में नहीं आता तो एक बार और उसे पढ़ें।
  2. अपठित गद्यांश पर दो प्रश्न तो अनिवार्य रूप से पूछे ही जाते हैं-एक तो अपठित का सारांश और दूसरा उसका शीर्षक।
  3. दो या तीन बार पढ़ने से अपठित का मूल भाव आपकी समझ में आ जाएगा। पहले उत्तर पुस्तिका के एक पृष्ठ पर उसका सारांश लिखिए। यह ध्यान रखिए कि कोई मूल भाव छूटने न पाए।
  4. सारांश की भाषा आपकी अपनी हो, गद्यांश की भाषा का प्रयोग न करें। 5. सारांश मूल अंश का एक-तिहाई होना चाहिए।
  5. सारांश में न तो आप अपनी तरफ से कोई बात जोड़ें और न कोई उदाहरण, किसी महापुरुष का कथन या किसी कवि की कोई उक्ति ही उद्धृत करें।
  6. गद्यांश का शीर्षक गद्यांश के भीतर ही प्रारंभिक पंक्तियों या अंतिम पंक्तियों में रहता है। शीर्षक अत्यंत संक्षिप्त हो। वह गद्यांश के मुख्य भाव को प्रकट करे। मुख्य भाव को प्रकट करनेवाला कोई शीर्षक अपनी ओर से भी दिया जा सकता है।
  7. अपठित का सारांश या उसके शीर्षक के अतिरिक्त भी कुछ प्रश्न पूछ जाते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर गद्यांश में ही रहते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर देते समय यह ध्यान रहे कि इनकी भाषा अपनी रहे। गद्यांश की भाषा में उत्तर देना ठीक नहीं। यहाँ अपठित गद्यांश के कुछ उदाहरण हल सहित दिए जा रहे हैं। उनके बाद अभ्यासार्थ कुछ अपठित गद्यांश दिए गए हैं।

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I. गद्यांश

उदाहरण 1.
यह सच है कि विज्ञान ने मानव के लिए भौतिक सुख का द्वार खोल दिया है, किंतु यह भी उतना ही सच है कि उसने मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीन ली है। भौतिक सुखों के लोभ में मनुष्य यंत्र की भाँति क्रियारत है, उसकी मानवीय भावनाओं का लोप हो रहा है और वह स्पर्धा के नाम पर ईर्ष्या और द्वेष से ग्रसित होकर स्वजनों का ही गला काट रहा है। इसी का परिणाम है, अशांति। मनुष्यता को दाँव पर हारकर भौतिक सुख की ओर बढ़ना अशुभ है।

प्रश्न-
(क) उपर्युक्त गद्य खण्ड का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ख) इस गद्य खण्ड का सारांश लगभग 25 शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
(क) शीर्षक-विज्ञान : एक अभिशाप।
(ख) सारांश-विज्ञान ने मानव को सुख के बहुत-से साधन दिए हैं, किंतु उसके कारण मनुष्य की मनुष्यता भी छिन गई है। आज मनुष्य अपने ही भाइयों का विनाश कर रहा है, इसी के कारण सर्वत्र अशांति फैली है।

उदाहरण 2.
राष्ट्र की उन्नति पर ही व्यक्ति की उन्नति निर्भर है। यदि किसी के घोर संकुचित स्वार्थपूर्ण कामों के कारण राष्ट्रीय हित को क्षति पहुँचती हो अथवा राष्ट्र की निंदा होती हो तो ऐसे कुपुत्र का जन्म लेना निरर्थक है। राष्ट्रभक्त के लिए राष्ट्र का तिनका-तिनका मूल्यवान है। उसे राष्ट्र का कण-कण परम प्रिय है। वह अपने गाँव, नदी, पर्वत तथा मैदान को देख आनंद विभोर हो उठता है। जिसका मन, वाणी और शरीर सदा राष्ट्र-हित के कामों में तत्पर है, जिसे अपने पूर्वजों पर गर्व है, जिसको अपनी संस्कृति पर आस्था है तथा जो अपने देशवासियों को अपना समझता है, वही सच्चा राष्ट्रभक्त है।

प्रश्न-
(क) उपर्युक्त गद्य-खण्ड का उचित शीर्षक लिखिए।
(ख) इस गद्यांश का सारांश लगभग तीस शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
(क) शीर्षक-सच्चा राष्ट्रभक्त कौन?
(ख) सारांश-एक राष्ट्रभक्त अपने राष्ट्र के तृण-तृण का आदर करता है। वह राष्ट्र की एक-एक वस्तु नदी, पर्वत, मैदान को देख आनन्दित होता है। राष्ट्रभक्त अपने पूर्वजों, अपनी संस्कृति पर गर्व करता है और अपने देशवासियों को अपना समझता है।

उदाहरण 3.
परोपकार-कैसा महत्त्वपूर्ण धर्म है। प्राणिपात्र के जीवन का तो यह लक्ष्य होना चाहिए। यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो ज्ञात होगा कि प्रकृति के सारे कार्य परोपकार के लिए ही हैं नदियाँ स्वयं अपना पानी नहीं पीतीं। पेड़ स्वयं अपने फल नहीं खाते। गुलाब का फूल अपने लिए सुगन्ध नहीं रखता। वे सब दूसरों के हितार्थ हैं। महात्मा गांधी और अन्य महात्माओं का मत है कि परोपकार ही करना चाहिए, किंतु परोपकार निष्काम हो। यदि परोपकार किसी प्रत्युपकार की आशा से किया जाता है, तो उसका महत्त्व क्षीण हो जाता है।

भारत का प्राचीन इतिहास दया और परोपकार के उदाहरणों से भरा है। राजा शिवि ने कपोल की रक्षा के लिए अपने प्राण देने तक का संकल्प कर लिया था। परोपकार का इससे ज्वलंत उदाहरण और कौन-सा मिल सकता है? चाहे जो हो, परोपकार आदर्श गुण है। हमें परोपकारी बनना चाहिए।

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प्रश्न-
(क) इस गद्यांश का मूल भाव बताइए।
(ख) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(ग) प्राणिमात्र के जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए?
(घ) महात्मा गांधी जैसे महात्माओं ने परोपकार के सम्बन्ध में क्या मत व्यक्त किया है?
(ङ) हमें कैसा बनना चाहिए?
उत्तर-
(क) परोपकार महत्त्वपूर्ण धर्म है। यह प्राणिमात्र के जीवन का परम उद्देश्य होना चाहिए। प्रकृति के सारे कार्य परोपकार के लिए ही हैं। सभी महात्मा जन-जीवन में इसके महत्त्व की आवश्यकता का अनुभव करते हैं। पर यह होना कामना रहित चाहिए। भारत के प्राचीन इतिहास में अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं। अतः हमें यह परोपकार अवश्य करना चाहिए।
(ख) इस गद्यांश का शीर्षक ‘परोपकार’ है।
(ग) प्राणिमात्र के जीवन का एकमात्र उद्देश्य परोपकारी बनना होना चाहिए।
(घ) महात्मा गांधी जैसे महात्माओं ने कहा है कि मानव को परोपकार अवश्य करना चाहिए। परंतु यह निष्काम भावना से सम्पादित होना चाहिए। यदि परोपकार बदले की भावना से किया जाता है, तो उसका महत्त्व क्षीण हो जाता है।
(ङ) हमें परोपकारी बनना चाहिए।

उदाहरण 4.
ऐसा देखा जाता है कि अधिकांश लोग अपने बहुमूल्य समय को व्यर्थ में ही व्यतीत कर देते हैं। परंतु फिर तो वही बात कही जाती है “कि अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत”, आज हम लोग जितना समय व्यर्थ की बातों में नष्ट कर देते हैं, यदि उसके दशमांश का भी सदुपयोग करना सीख जाते तो हम अपने जीवन में असाधारण सफलताएँ प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक सुंदर समय हमारे लिए वस्तुएँ लेकर आता है, किंतु हम उनसे कोई लाभ नहीं उठाते।

प्रश्न-
(क) उपर्युक्त गद्यांश का एक उचित शीर्षक दीजिए।
(ख) गद्यांश का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
(क) ‘समय का सदुपयोग’
(ख) समय बीत जाने से पछताने के सिवा और कोई चारा नहीं रहता। मगर इससे कोई लाभ नहीं होता है। समय के सदुपयोग से हम अपने जीवन में असाधारण सफलताओं को प्राप्त कर सकते हैं।

II. पद्यांश

उदाहरण-

रण-बीच चौकड़ी भर-भर कर,
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े का,
(पड़ गया हवा से पाला था)
गिरता न कभी चेतक तन पर,
राणा प्रताप का घोड़ा था।
(वह दौड़ रहा अरि मस्तक पर)
या आसमान पर घोड़ा था।

प्रश्न-
(क) पद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ख) इस पद्यांश का भावार्थ लिखिए।
(ग) कोष्ठांकित शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) शीर्षक-‘चेतक’
(ख) महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम चेतक था जो बड़ा ही अनोखा था। वह हल्दीघाटी के मैदान में तीव्र गति से दौड़ रहा था। उसे दौड़ाने के लिए कोड़ा न मारना पड़ता था। वह इतना समझदार था कि राणा का संकेत पाते ही मुड़ जाता था और शत्रुओं के मस्तक पर पैर रखता हुआ दौड़ पड़ता था।
(ग) पड़ गया हवा से पाला था-राणा प्रताप के घोड़े की तीव्र गति को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो वायु भी उसकी गति से हार मान गई है।
वह दौड़ रहा अरि मस्कक पर-राणा प्रताप का घोड़ा निर्भय होकर शत्रुओं के मस्तकों को कुचलता हुआ दौड़ जाता था।

अभ्यास के लिए अपठित गद्यांश

(1) प्रत्येक मनुष्य, चाहे वह स्थिति में कितना ही छोटा हो, ऊपर उठ सकता है। प्रत्येक मनुष्य अपनी शक्तियों का विकास कर सकता है। प्रत्येक मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है अथवा उसे बहुत निकट ला सकता है। आवश्यकता इतनी है कि वह भूल जाय कि वह तुच्छ है, पंगु है, कुछ नहीं कर सकता। निराशा का बीज बड़ा घातक होता है। वह जब कलेजे की भूमि में घुस जाता है, तो उसे फोड़कर अपना विस्तार करता है। निराशा से अपने आपको बचाओ। निराशा जीवन के प्रकाश पर दुर्दिन की बदली की तरह छा जाती है। यह आत्मा के स्वर को क्षीण करती है और चेतना के स्थान पर जड़ता, निश्चेष्टता की प्रतिष्ठा करती है।

(क) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(ख) इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(ग) रेखाकित अंशों को स्पष्ट कीजिए।

MP Board Solutions

(2) मस्तिष्क की शक्ति से ही हम गिरते और उठते हैं; बड़े होते और चलते हैं। विचार की तीव्र शक्ति से ही सब काम होते हैं। जो अपने विचारों के स्रोत को नियंत्रित कर सकता है, वह अपने मनोवेग पर भी शासन कर सकता है। ऐसा व्यक्ति. अपने संकल्प से वृद्धावस्था को यौवन में बदल सकता है, रोगी को नीरोग कर सकता है। विचार-शक्ति संसार को चेतना प्रदान करती और चलाती है। शुभ, उन्नत और कल्याणकारी विचारों से मानव-शरीर अधिक सक्षम एवं नीरोग रहता है।

(क) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(ख) इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(ग) रेखांकित अंशों का भाव स्पष्ट कीजिए।

(3) राष्ट्रीय एकता, प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र के लिए नितांत आवश्यक है। जब भी धार्मिक या जातीय आधार पर राष्ट्र से अलग होने की कोई कोशिश होती है, तब हमारी राष्ट्रीय एकता के खंडित होने का खतरा बढ़ जाता है। यह एक सुनिश्चित सत्य है कि राष्ट्र का स्वरूप निर्धारित करने में वहाँ विकास करने वाले जन एक अनिवार्य तत्त्व होते हैं। राष्ट्र के निवासियों के मन में राष्ट्रहित की दृष्टि से भावनात्मक स्तर पर स्नेह-संबंध, सहिष्णुता, पारस्परिक सहयोग एवं उदार मनोवृत्ति के माध्यम से राष्ट्रीय एकता की अभिव्यक्ति होती है। राष्ट्र को केवल भूखण्ड मानकर उसके प्रति अपने कर्तव्यों से उदासीन होने वाले राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में कदापि सहायक नहीं हो सकते। वस्तुतः राष्ट्रीय एकता के आदर्श को व्यवहार में अवतरित करके ही राष्ट्र के निवासी अपने राष्ट्र की उन्नति और प्रगति में सच्चे सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

(क) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लगभग 40 शब्दों में लिखिए।
(ख) इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

(4) आत्मविश्वास श्रेष्ठ जीवन के लिए पहली आवश्यकता है। तन्मयता से आत्मविश्वास का जन्म होता है। संसार का इतिहास उन लोगों की कीर्तिकथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने अंधकार और विपत्ति की घड़ियों में आत्मविश्वास के प्रकाश में जीवन की यात्रा की और परिस्थितियों से ऊपर उठ गए। उनसे भी अधिक संख्या उन वीरों की है, जिन्हें इतिहास आज भूल गया है पर जिन्होंने मानवता के निर्माण में, उसे उठाने में नींव का काम किया है। केवल आत्म-विश्वास और आशा के बल पर वे जिए और उसी के साथ उच्च उद्देश्य के लिए प्राण समर्पण करने में भी न चूके। जैसे तूफान के समय नाविक के लिए दिग्दर्शक यंत्र का उपयोग है, वैसे ही जीवन-यात्रा में आशा और आत्मविश्वास का महत्त्व है।

(क) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश एक-तिहाई भाग में लिखिए।
(ख) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।

(5) यूरोप और अमेरिका में जिन अनेक नए शास्त्रों की खोज हुई है, उन सबसे हमें बहुत कुछ सीखना है। लेकिन भारत की अपनी भी कुछ विद्याएँ हैं और कुछ शास्त्र यहाँ पर भी प्राचीनकाल से विकसित हैं। वेद भगवान ने हमें आज्ञा दी है-आ नो भद्राः कृतवो यन्तु विश्वतः, अर्थात् दुनिया भर से मंगल विचार हमारे पास आएँ। हम सब विचारों का स्वागत करते हैं और यह नहीं समझते कि यह विचार स्वदेशी है या परदेशी, पुराना है या नया। हम इतना ही सोचते हैं कि वह ठीक है या गलत। जो विचार ठीक है, वह पुराना भी हो तो भी अपनाया जाय। इसमें कोई शक नहीं कि हमको बहुत लेना है। लेकिन जो अपने पास है, उसे भी पहचानना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि जो यहाँ का होता है, वह यहाँ की परिस्थिति और चारित्र्य के लिए अनुकूल होता है। वह हमारे स्वभाव के अनुकूल होने के कारण हमें काफी मदद दे सकता है।

(क) इस अवतरण का सारांश लिखिए।
(ख) गद्यांश के लिए उचित शीर्षक लिखिए।

(6) भारत हम सभी का घर है और हम सभी इस घर के सदस्य हैं। हमें आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए। यदि घर में एकता नहीं होगी तो आपस में कलह और द्वेष बढ़ेगा। जिस घर में फूट हो, उस घर की कोई इज्जत नहीं करता। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब हममें एकता का अभाव हुआ, तब-तब हम पराधीन हो गए। जयचंद के कारण भारत पराधीन हुआ। एकता के अभाव के कारण ही सन् 1857 का स्वतंत्रता का संग्राम असफल हुआ। आपस की फूट के कारण ही सन् 1947 में देश का विभाजन हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज फिर फूट डालने वाली शक्तियाँ सिर उठा रही हैं। यदि हम सभी आपस में संगठित रहेंगे तो कोई भी देश हमारा बाल बाँका नहीं कर सकता। संगठन में बड़ी शक्ति होती है। पानी की एक-एक बूंद से बड़ी नदी बन जाती है। अनेक धागे निकलकर जब रस्सी बनाते हैं तो बड़े-बड़े हाथी भी उससे बाँधे जा सकते हैं। आग की छोटी-छोटी चिनगारियाँ मिलकर महाज्वाला बनती हैं और बड़े-बड़े जंगलों और भवनों को स्वाहा कर डालती हैं।

(क) इस अवतरण का उचित शीर्षक लिखिए।
(ख) गद्यांश का सारांश एक-तिहाई भाग में लिखिए।
(ग) आपस की फूट के कारण क्या हानियाँ होती हैं?

MP Board Solutions

(7) यदि सभी लोग अपने-अपने धर्म का पालन करें तो सभी सुखी और समृद्ध हो सकते हैं, परन्तु आज ऐसा नहीं है। धर्म का स्थान छोटा होने से सुख-समृद्धि गूलर का फूल हो गई है। यदि एक सुखी और संपन्न है तो पचास दुखी और दरिद्र हैं। साधनों की कमी नहीं है, परंतु धर्मबुद्धि के विकसित न होने से उनका उपयोग नहीं हो रहा है। कुछ स्वार्थी प्रकृति के प्राणी तो समाज में सभी कालों में रहे हैं और रहेंगे। परंतु आजकल ऐसी व्यवस्था है कि ऐसे लोगों को अपनी प्रवृत्ति के अनुसार काम करने का खुला अवसर प्राप्त हो जाता है और उनकी सफलता दूसरों को उनका अनुगामी बना देती है। दूसरी ओर जो सचमुच सदाचारी हैं, उनके मार्ग में बड़ी-बड़ी अड़चनें

(क) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक लिखो।
(ख) दुखी और दरिद्र लोगों की संख्या अधिक क्यों है?
(ग) इस गद्यांश का सारांश 25 शब्दों में लिखिए।

(8) साम्प्रदायिक सद्भाव और सौहार्द्र बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम दूसरे धर्मावलंबियों के विचारों को समझें और उनका सम्मान करें। हमारा ही धर्म सर्वश्रेष्ठ है, इस विचार को मन में जमने दें। हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि प्रेम से प्रेम और विश्वास से विश्वास उत्पन्न होता है और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि घृणा से घृणा का जन्म होता है, जो दावाग्नि की तरह सबको जलाने का काम करती है। भगवान बुद्ध, महात्मा ईसा, महात्मा गांधी सभी घृणा को प्रेम से जीतने में विश्वास करते थे। गांधीजी ने सर्वधर्म संभव द्वारा साम्प्रदायिक घृणा को मिटाने का आजीवन प्रयत्न किया। हिन्दू और मुसलमान दोनों की धार्मिक भावनाओं को समान आदर की दृष्टि से देखा। सभी धर्म आत्मा की शांति के लिए भिन्न-भिन्न उपाय और साधन बताते हैं। धर्मों में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है। सभी धर्म सत्य, प्रेम, समता, सदाचार और नैतिकता पर बल देते हैं, इसलिए धर्म के मूल में पार्थक्य या भेद नहीं है।

(क) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक लिखो।
(ख) सर्वधर्म समभाव से क्या तात्पर्य है।
(ग) इस गद्यांश का सार लगभग 30-40 शब्दों में लिखिए।

(9) नैतिक का अर्थ है, उचित और अनुचित की भावना। यह भावना हमें कुछ कार्य तथा व्यवहार करने की अनुमति देती है। प्रत्येक समाज की अपनी नैतिकता पृथक्-पृथक् होती है, परंतु इससे समस्त समाज नियंत्रित रहता है। नैतिकता से नियम प्रत्येक देश या समाज के सांस्कृतिक आदर्शों पर आधारित रहते हैं। उदाहरण के लिए भारतीय समाज में सत्य, अहिंसा, न्याय, समानता, दया, वृद्धों के प्रति श्रद्धा आदि कुछ ऐसे नियम हैं, जिनसे सभी व्यक्तियों के आचरण प्रभावित होते हैं। इन नियमों को मारने के लिए कोई दबाव नहीं डाला जाता, बल्कि ये हमारी आत्मा से संबंधित

(क) इस अंश का सारांश लिखिए।
(ख) गद्यांश के लिए उचित शीर्षक लिखिए।

अभ्यास के लिए अपठित पद्यांश :

1. चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ।
चाह नहीं प्रेमी बाला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ .
चाह नहीं देवों के सिर पर चर्दै भाग्य पर इठलाऊँ।

प्रश्न-
(क) उपर्युक्त पयांश का शीर्षक लिखिए।
(ख) मोटे छपे (काले) शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
(ग) इस पद्यांश का भावार्थ लिखिए।

2. सीस पगा न झगा तन पै प्रभु! जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानहु को नहीं सामा॥
द्वार खड़े द्विज दुर्बल देखि रह्यो चकि सों बसुधा अभिरामा।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत अपनो नाम सुदामा।।

प्रश्न-
(क) उपर्युक्त पद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ख) इस पद्यांश का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए।

MP Board Solutions

3. गाँवों में संकुचित विचार, अन्धविश्वास, कुरीतियाँ और व्यर्थ व्यय का बोलबाला है। पंचायतों को चाहिए कि गाँवों में बच्चों के लिए पाठशाला खोलें और उनकी पढ़ाई का प्रबन्ध करें। जब लोग पढ़-लिख जायें तब ग्रामीणों की बुरी आदतें स्वतः ही समाप्त हो जायेंगी।

प्रश्न-
(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ख) उपयुक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(ग) मोटे छपे (काले) शब्दों के अर्थ स्पष्ट कीजिए।

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5

Question 1.
Use a suitable identity to get each of the following products.
(i) (x + 3)(x + 3)
(ii) (2y + 5)(2y + 5)
(iii) (2a – 7)(2a – 7)
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 1
(v) (1.1m – 0.4)(1.1m + 0.4)
(vi) (a2 + b2)(-a2 + b2)
(vii) (6x – 7)(6x + 7)
(viii) (-a + c)(-a + c)
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 2
(x) (7a – 9b)(7a – 9b)
Solution:
(i) (x + 3) (x + 3) = (x + 3)2
= (x)2 + 2(x)(3) + (3)2
[Using identity : (a + b)2 = a2 + 2ab + b2] = x2 + 6x + 9

(ii) (2y + 5) (2y + 5) = (2y + 5)2
= (2y)2 + 2(2y)(5) + (5)2
[Using identity : (a + b)2 = a2 + 2ab + b2] = 4a2 + 20y + 25

(iii) (2a – 7)(2a – 7) = (2a – 7)2
= (2a)2 – 2(2a)(7) + (7)2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2] = 4a2 – 28a + 49

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 3

(v) (1.1m – 0.4) (1.1m + 0.4) = (1.1m)2 – (0.4)2
[Using identity : a2 – b2 = (a + b) (a – b)]
= 1.21m2 – 0.16

(vi) (a2 + b2) (- a2 + b2) = (b2 + a2) (b2 – a2)
= (b2)2 – (a2)2
[Using identity : (a2 – b2) = (a + b) (a – b)] = b4 – a4

(vii) (6x – 7) (6x + 7) = (6x)2 – (7)2 = 36x2 – 49
[Using identity : (a2 – b2) = (a + b) (a – b)]

(viii) (- a + c) (- a + c) = (c – a) (c – a) = (c – a)2 = (c)2 – 2(c)(a) + a2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
= c2 – 2ac + a2

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 4

(x) (7a – 9b)(7a – 9b) = (7a – 9b)2 = (7a)2 – 2(7a)(9b) + (9b)2
[Using identity : (a – b)2 = a2– 2ab + b2]
= 49a2 – 126ab + 81b2

Question 2.
Use the identity
(x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab to find the following products.
(i) (x + 3)(x + 7)
(ii) (4x + 5)(4x + 1)
(iii) (4x – 5)(4x – 1)
(iv) (4x + 5)(4x – 1)
(v) (2x + 5y)(2x + 3y)
(vi) (2a2 + 9)(2a2 + 5)
(vii) (xyz – 4)(xyz – 2)
Solution:
(i)(x + 3)(x + 7) = x2 + (3 + 7)x + 3 × 7
= x2 + 10x + 21

(ii) (4x + 5)(4x + 1) = (4x)2 + (5 + 1)4x + 5 × 1
= 16x2 + 24x + 5

(iii) (4x – 5) (4x – 1) – [4x + (-5)] [4x +(-1)]
= (4x)2 + (-5 – 1)(4x) + (-5) × (-1)
= 16x2 – 24x +5

(iv) (4x + 5) (4x – 1) (4x + 5) (4x + (-1)]
= (4x + (5 – 1)(4x) + (5) × (-1)
= 16x2 + 16x – 5

(v) (2x + 5y)(2x + 3y)
= (2x)2 + (5 + 3)y (2x) + (5y) × (3y)
= 4x2 + 16xy + 15y2

(vi) (2a2 + 9) (2a2 + 5)
= (2a2)2 + (9 + 5) (2a2) + 9 × 5
= 4a4 + 28a2 +45

(vii) (xyz – 4) (xyz – 2)
= [xyz + (-4)] [xyz + (-2)]
= (xyz)2 + (- 4 – 2) (xyz) + (- 4)(-2)
= x2y2z2 – 6xyz + 8

MP Board Solutions

Question 3.
Find the following squares by using the identities.
(i) (b – 7)2
(ii) (xy + 3z)2
(iii) (6x2 – 5y)2
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 5
(v) (0.4p – 0.5q)2
(vi) (2xy + 5y)2
Solution:
(i) (b – 7)2 = (b)2 – 2(b)(7) + (7)2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
= b2 – 14b + 49

(ii) (xy + 3z)2 = (xy)2 + (3z)2 + 2(xy) (3z)
[Using identity : (a + b)2 = a2 + b2 + 2ab]
= x2y2 + 9z2 + 6xyz

(iii) (6x2 – 5y)2 = (6x2)2 + (5y)2 – 2(6x2) (5y)
[Using identity : (a – b)2 = a2 + b2 – 2ab]
= 36x4 + 25y2 – 60x2y

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 6

(v) (0.4p – 0.5p)2
= (0.4p)2 + (0.5q)2 – 2(0.4p) (0.5q)
[Using identity : (a – b)2 = a2 + b2 – 2ab]
= 0.16p2 + 0.25q2 – 0.4pq

(vi) (2xy + 5y)2
= (2xy)2 + (5y)2 + 2(2xy) (5y)
[Using identity : (a + b)2 = a2 + b2 + 2ab] = 4x2y2 + 25 y2 + 20xy2

MP Board Solutions

Question 4.
Simplify.
(i) (a2 – b2)2
(ii) (2x + 5)2 – (2x – 5)2
(iii) (7m – 8n)2 + (7m + 8n)2
(iv) (4m + 5n)2 + (5m + 4n)2
(v) (2.5p – 1.5q)2 – (1.5p – 2.5q)2
(vi) (ab + bc)2 – 2ab2c
(vii) (m2 – n2m)2 + 2m3n2
Solution:
(i) (a2 – b2)2 = (a2)2 – 2a2b2 + (b2)2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
= a4 – 2a2b2 + b4

(ii) (2x + 5)2 – (2x – 5)2
=[2x + 5 – (2x – 5)][2x + 5 + 2x – 5]
[Using identity : a2 – b2 – (a – b) (a + h)]
= (10)(4x) = 40x

(iii) (7m – 8n)2 + (7m + 8n)2
= (7m)2 – 2(7m) (8n) + (8n)2 + (7m)2 + 2(7m)(8n) + (8n)2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
and (a + b)2 = a2 + 2ab + b2]
= 49m2 – 112mn + 64n2 + 49m2 + 112mn + 64n2
= 98m2 + 128n2

(iv) (4m + 5n)2 + (5m + 4n)2
(4m)2 + 2(4m) (5n) + (5n)2 + (5m)2 + 2(5m)(4n) + (4n)2
(Using identity : (a + b)2 = a2 + 2ab + b2)
= 16m2 + 40mn + 25n2 + 25m2 + 40mn + 16n2
= 41m2 + 80mn + 41n2

(v) (2.5p – 1.5q)2 – (1.5p – 2.5q)2
= (2.5p)2 – 2(2.5p)(1.5q) + (1.5q)2 – [(1.5p)2 – 2(1.5p) (2.5q) + (2.5q)2]
[Using identity: (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
= 6.25p2 – 7.5pq + 2.25q2 – [225p2 – 7.5pq + 6.25q2]
= 6.25p2 – 7.5pq + 2.25q2 – 2.25p2 + 7.5pq – 6.25q2
= 4p2 – 4q2

(vi) (ab + bc)2 – 2ab2c
= (ab)2 + 2(ab)(bc) + (bc)2 – 2ab2c
[Using identity : (a + b)2 = a2 + 2ab + b2]
= a2b2 + b2c2 – 2ab2c + 2ab2c = a2b2 + b2c2

(vii) (m2 – n2n)2 + 2m3n2
=(m2)2 – 2(m2)(n2m) + (n2m)2 + 2m3n2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
= m4 – 2m3n2 + 2m3n2 = m4 + n4m2

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Question 5.
Show that
(i) (3x + 7)2 – 84x = (3x – 7)2
(ii) (9p – 5q)2 + 180pq = (9p + 5q)2
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 7
(iv) (4pq + 3q)2 – (4pq – 3q)2 = 48pq2
(v) (a – b)(a + b) + (b – c)(b + c) + (c – a)(c + a) = O
Solution:
(i) To prove: (3x + 7)2 – 84x = (3x – 7)2
LH.S. = (3x + 7)2 – 84x
= (3x)2 + 2(3x)(7) + (7)2 – 84x
= 9x2 + 42x +49 – 84x = 9x2 – 42x + 49
R.H.S. = (3x – 7)2 = (3x)2 – 2(3x)(7) + (7)2 = 9x2 – 42x + 49
∴ L.H.S. = R.H.S.

(ii) To prove : (9p – 5q)2 + 180pq = (9p + 5q)2
L.H.S. = (9p – 5q)2 + 180pq
= (9p)2 – 2(9p)(5q) + (5q)2 + 180pq
= 81p2 – 90pq + 25q2 + 180pq
= 81 p2 + 90 pq + 25 q2
R.H.S. = (9p + 5q)2
= (9p)2 + 2(9p)(5q) + (5q)2
= 81p2 + 90pq + 25q2
∴ L.H.S. = R.H.S.

(iii) To prove :
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 8

(iv) To prove : (4pq + 3q)2 – (4pq – 3q)2 = 48pq2
L.H.S. = (4pq + 3q)2 – (4pq – 3q)2
= (4 pq)2 + 2(4pq)(3q) + (3q)2 – [(4pq)2 – 2(4pq)(3q) + (3q)2]
= 16p2q2 + 24pq2 + 9q2 – [16p2q2 – 24pq2 + 9q2]
= 16p2q2 + 24pq2 + 9q2
= 16p2q2 + 24pq2 – 9q2
= 48pq2 = R.H.S.

(v) To prove : (a – b) (a + b) + (b – c) (b + c) + (c – a) (c + a) = 0
L.H.S. = (a – b) (a + b) + (b – c) (b + c) + (c – a)(c + a)
= a2 – b2 + b2 – c2 + c2 – a2
[Using identity : (x – y)(x + y) = x2 – y2]
= 0 = R.H.S.

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Question 6.
Using identities, evaluate,
(i) 712
(ii) 992
(iii) 1022
(iv) 9982
(v) 5.22
(vi) 297 × 303
(vii) 78 × 82
(viii) 8.92
(ix) 1.05 × 9.5
Solution:
(i) 712 = (70 + 1)2
= (70)2 + 2(70)(1) + 12
[Using identity : (a + b)2 = a2 + 2ab + b2]
= 4900 + 140 + 1 = 5041

(ii) 992 = (100 – 1)2
= (100)2 – 2(100) (1) + 12
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
= 10000 – 200 + 1 = 9801

(iii) (102)2 = (100 + 2)2
= (100)2 + 2(100)(2) + 22
[Using identity : (a + b)2 = a2 + 2ab + b2]
= 10000 + 400 + 4 = 10404

(iv) (998)2 = (1000 – 2)2
= (1000)2 – 2(1000)(2) + (2)2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2]
= 1000000 – 4000 + 4 = 996004

(v) (5.2)2 = (5 + 0.2)2
= (5)2 + 2(5)(0.2) + (0.2)2
[Using identity : (a + b)2 = a2 + 2ab + b2]
= 15 + 1 + 0.04 = 27.04

(vi) 297 2 × 303 = (300 – 3) (300 + 3)
= (300)2 – 32
[Using identity : (a – b) (a + b) = (a2 – b2)
= 90000 – 9 = 89991

(vii) 78 × 82 = (80 – 2) (80 + 2)
= (80)2 – (2)2
[Using identity : (a -b) (a + b) = a2 – b2]
= 6400 – 4 = 6396

(viii) (8.9)2 = (9 – 0.1)2
= (9)2 – 2(9)(0.1) + (0.1)2
[Using identity : (a – b)2 = a2 – 2ab + b2] = 81 – 1.8 + 0.01 = 79.21

(ix) 1.05 × 9.5
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 9
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 Algebraic Expressions and Identities Ex 9.5 10

Question 7.
Using a2 – b2 = (a + b)(a – b), find
(i) 512 – 492
(ii) (1.02)2 – (0.98)2
(iii) 1532 – 1472
(iv) 12.12 – 7.92
Solution:
(i) 512 – 492 = (51 – 49) (51 + 49)
= (2)(100) = 200
(ii) (1.02)2 – (0.98)2 = (1.02 – 0.98) (1.02 + 0.98)
= (0.04)(2) = 0.08
(iii) 1532 – 1472 = (153 + 147) (153 – 147)
= (300) (6) = 1800
(iv) (12.1)2 – (7.9)2 = (12.1 + 7.9) (12.1 – 7.9)
= (20.0) (4.2) = 84

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Question 8.
Using (x + a)(x + b) = x2 + (a + b)x + ab, find
(i) 103 × 104
(ii) 5.1 × 5.2
(iii) 103 × 98
(iv) 9.7 × 9.8
Solution:
(i) 103 × 104 = (100 + 3)(100 + 4)
= (100)2 + (3 + 4) 100 + 3 × 4
= 10000 + 700 + 12 = 10712

(ii) 5.1 × 5.2 = (5 + 0.1)(5 + 0.2)
= (5)2 +(0.1+ 0.2) × 5 + (0.1) (0.2)
= 25 + 1.5 + 0.02 = 26.52

(iii) 103 × 98 = (100 + 3) (100 – 2)
= (100 + 3) [100+ (- 2)]
= (100)2 + (3 – 2) × 100 + (3) (- 2) = 10000 + 100 – 6 = 10094

(iv) 9.7 × 9.8 = (10 – 0.3) (10 – 0.2)
= [10 + (- 0.3)[10 + (- 0.2)]
= (10)2 + (- 0 3 – 0 2) × 10 + (- 0.3) (- 0.2)
= 100 – 5 + 0.06 = 95.06

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MP Board Class 9th General Hindi व्याकरण मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ

MP Board Class 9th General Hindi व्याकरण मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ

(क) मुहावरे

‘मुहाविरा’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘अभ्यास’। वह वाक्यांश, जिसका साधारण शब्दार्थ न लेकर कोई विशेष अर्थ ग्रहण किया जाए, मुहावरा कहलाता-

  1. महावरे वाक्यांश होते हैं। इनका प्रयोग वाक्यों के बीच में ही होता है. स्वतंत्र रूप से नहीं होता।
  2. मुहावरों के प्रयोग से भाषा में सजीवता और रोचकता आ जाती है।
  3. मुहावरा अपना असली रूप कभी नहीं बदलता। उसमें प्रयुक्त शब्दों को उनके पर्यायवाची शब्दों से भी नहीं बदला जा सकता। ‘गाल बजाना’ के स्थान पर ‘कपोल बजाना’ हास्यास्पद है।
  4. मुहावरे का शब्दार्थ नहीं लेना चाहिए, बल्कि प्रसंग के अनुसार उसका अर्थ लेना चाहिए। ‘छाती पर पत्थर रखना’ का यदि शब्दार्थ लिया जाए तो उसका अर्थ बिल्कुल भिन्न होगा, जबकि मुहावरे के रूप में प्रयोग करने पर इसका अर्थ होगा ‘चुपचाप सहना’।
  5. मुहावरे समय के साथ बनते – बिगड़ते रहते हैं।

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यहाँ कुछ बहुप्रचलित मुहावरों के अर्थ और उनका वाक्यों में प्रयोग दिया जा रहा है –

1. अक्ल पर पत्थर पड़ना=बुद्धि मारी जाना।
प्रयोग – तुम्हारी अक्ल पर क्या पत्थर पड़ गए थे तो तुम बच्चे को अकेला छोड़ आए?

2. अंकुश लगाना=नियंत्रण करना।
प्रयोग – सुरेश! तुम अपने बेटे पर अंकुश लगाओ, नहीं तो आगे बहुत पछताओगे।

3. अपना उल्लू सीधा करना स्वार्थ पूरा करना।
प्रयोग – आज के राजनीतिज्ञ जनता की सेवा नहीं करते अपना उल्लू सीधा करते हैं।

4. अपनी खिचड़ी अलग पकाना सबसे अलग।
प्रयोग – मिलजुलकर काम करो, अपनी खिचड़ी अलग पकाने से कोई लाभ नहीं।

5. अपने पैरों पर खड़ा होना स्वावलम्बी होना।
प्रयोग – मैं तुम लोगों का बोझ कब तक उठाऊँगा अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करो।

6. अपने पैरों कुल्हाड़ी मारना – अपने ही हाथों अपना अहित करना।
प्रयोग – तुमने शर्माजी का कहा न मानकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।

7. आँखों में धूल झोंकना धोखा देना।
प्रयोग – तुम यह सड़ी – गली सब्जी देकर मेरी आँखों में धूल झोंकना चाहते हो।

8. आँख खुलना – समझ आ जाना।
प्रयोग – उसका व्यवहार देखकर मेरी आँखें खुल गईं।

9. आँख दिखाना – धमकाना।
प्रयोग – माताजी ने ज्यों ही आँखें दिखाईं त्यों ही बालक ने मिठाई लेने से इन्कार कर दिया।

10. आटे – दाल का भाव मालूम होना वास्तविकता का ज्ञान होना।
प्रयोग – आठ सौ – नौ सौ रुपये में घर का सब खर्च चलाओगे तब आटे – दाल का भाव मालूम होगा।

11. आस्तीन का साँप होना विश्वासघाती सिद्ध होना।
प्रयोग – जिसे हमने अपना परम मित्र समझा था, वह आस्तीन का साँप सिद्ध हुआ।

12. ईंट से ईंट बजाना नष्ट कर देना।
प्रयोग – मानसिंह ने राणा प्रताप से कहा, “मैं मेवाड़ की ईंट से ईंट बजा दूंगा।”

13. उँगली उठाना=दोषारोपण करना।
प्रयोग – ऐसा काम करना कि कोई उँगली न उठा सके।

14. कमर कसना कार्य करने को तैयार होना।
प्रयोग – नौजवानों को देश के सम्मान की रक्षा के लिए कमर कस लेनी चाहिए।

15. कमर टूटना – दुःखदायक स्थिति बनना।
प्रयोग – व्यापार में बहुत हानि होने से उसकी तो कमर ही टूट गई।

16. काठ का उल्लू – महान् मूर्ख।
प्रयोग – उसे क्या समझते हो, वह तो निरा काठ का उल्लू है।

17. कान भरना – चुगली करना, भड़काना।
प्रयोग – शर्माजी अन्य अध्यापकों के खिलाफ प्रिंसिपल साहब के कान भरते रहते हैं।

18. कान का कच्चा होना दूसरों की बात पर शीघ्र विश्वास कर लेना।
प्रयोग – जो अधिकारी कान का कच्चा होता है, उससे न्याय की आशा कैसे की जा सकती है।

19. खरी – खोटी सुनाना भला – बुरा कहना।
प्रयोग – मेरी कोई गलती नहीं थी, फिर भी प्रिंसिपल साहब ने मुझे खरी – खोटी सुना दी।

20. खून खौलना=बहुत क्रुद्ध होना।
प्रयोग – द्रोपदी को लज्जित होते देख भीम का खून खौलने लगा।

21. खाक में मिलना बर्बाद हो जाना।
प्रयोग – रावण की हठधर्मी से सोने की लंका खाक में मिल गई।

22. गड़े मुर्दे उखाड़ना=पुरानी बातें दोहराना।
प्रयोग – इतिहास में तो गड़े मुर्दे ही उखाड़े जाते हैं।

23. गले का हार – अत्यंत प्रिय।
प्रयोग – रामचरितमानस भक्तों के गले का हार है।

24. गाल बजाना बढ़ – चढ़कर बातें करना।
प्रयोग – धीरेन्द्र की बात पर यकीन न करना, उसे गाल बजाने की आदत है।

25. गुदड़ी का लाल=निर्धनता में उत्पन्न प्रतिभाशाली व्यक्ति।
प्रयोग – लाल बहादुर शास्त्री गुदड़ी के लाल थे।

26. घाव पर नमक छिड़कना – दुखी को और दुखी करना।
प्रयोग – एक तो उसका नुकसान हुआ, अब ताने देकर उसके घाव पर नमक मत छिड़को।

27. चंगुल में फँसना काबू में कर लेना।
प्रयोग – भोले – भाले लोग धूर्तों के चंगुल में फँस जाते हैं।

28. चकमा देना – धोखा देना।
प्रयोग – चोर पुलिस को चकमा देकर भाग निकला।

29. चार दिन की चाँदनी थोड़े समय की सम्पन्नता।
प्रयोग – लक्ष्मी चंचल है, चार दिन की चाँदनी पर गर्व मत करो।

30. चिकना घड़ा जिस पर किसी बात का असर न हो।
प्रयोग – वह तो चिकना घड़ा है, तुम्हारी बातों का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

31. छप्पर फाड़कर देना=भाग्य के बल पर लाभ होना।
प्रयोग – भगवान ने उसे छप्पर फाड़कर धन दिया।

32. छोटे मुँह बड़ी बात अपनी मर्यादा से अधिक बोलना।
प्रयोग – छोटे मुँह बड़ी बात करके तुमने समझदारी का काम नहीं किया।

33. जान के लाले पड़ना=संकट में पड़ना।
प्रयोग – सारा गाँव बाढ़ की चपेट में आ गया; लोगों को जान के लाले पड़ गए।

34. जले पर नमक छिड़कना दुखी के दुख को और अधिक बढ़ाना।
प्रयोग – सुरेश तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर वैसे ही दुखी था, तुमने उसका उपहास करके जले पर नमक छिड़क दिया।

35. टका – सा जवाब देना – साफ इन्कार कर देना।
प्रयोग – इस बार भी जब चंदा देने की बात उठी तो उसने टका – सा जवाब दे दिया।

36. टाँग अड़ाना रुकावट डालना।
प्रयोग – मेरी उसकी बात हो रही है, तुम क्यों बीच में टाँग अड़ाते हो?

37. टेढ़ी खीर कठिन कार्य।
प्रयोग – कक्षा में प्रथम आना टेढ़ी खीर है।

38. डंके की चोट सबके सामने।
प्रयोग – उसने डंके की चोट पे समाज से बाहर शादी की।

39. तलवे चाटना – चापलूसी करना।
प्रयोग – वे कोई और होंगे जो आपके तलवे चाटते हैं, मुझसे आशा न करना

40. तिनके का सहारा थोड़ा – सा आश्रय।
प्रयोग – डूबते को तिनके का सहारा होता है।

41. तूती बोलना धाक जमना।
प्रयोग – वे दिन गए, जब जमींदारों की तूती बोलती थी।

42. दंग रह जाना आश्चर्यचकित होना।
प्रयोग – बालक के करतब देखकर दर्शक दंग रह गए।

43. दाँत खट्टे करना=पराजित करना।
प्रयोग – भारत ने अनेक बार दुश्मनों के दाँत खट्टे किए हैं।

44. दाल. में काला होना=संदेहजनक बात होना।
प्रयोग – आपकी बातों से लगता है कि दाल में कुछ काला है।

45. दाल न गलना=चाल सफल न होना।
प्रयोग – पिताजी को पता लग गया है, अब तुम्हारी दाल नहीं गलेगी।

46. दुम दबाकर भागना डरकर भाग जाना।
प्रयोग – दुम दबाकर भागना तो कायरों का काम है।

47. दो टूक बात कहना – साफ – साफ बात कहना।
प्रयोग – मुझे कुछ लेना – देना नहीं है, मैंने दो टूक बात कह दी।

48. नमक खाना – पालन – पोषण होना।
प्रयोग – मैंने इस घर का नमक खाया है, इसे बरबाद न होने दूंगा।

49. नाक कटना – बदनामी होना।
प्रयोग – भारतीय टीम तीनों मैच हार गई, उसकी तो नाक कट गई।

50. नाक में दम करना परेशान करना।
प्रयोग – मच्छरों ने तो नाक में दम कर रखी है, रात भर सोने नहीं देते।

51. नाक रगड़नाखुशामद करना।
प्रयोग – पहले तो बहुत ताव दिखा रहे थे, अब क्यों नाक रगड़ते हो?

52. नाक – भौं सिकोड़ना – नफरत प्रकट करना।
प्रयोग – नाक – भौं मत सिकोड़ो, जो कुछ परोसा गया है, वह खा लो।

53. पत्थर की लकीर अमिट।
प्रयोग – मेरी बात पत्थर की लकीर मानो, शहर में दंगा होनेवाला है।

54. परदा डालना कोई बात छिपाना।
प्रयोग – अपने पापों का प्रायश्चित करो, उन पर पर्दा मत डालो। प्रमा

55. पहाड़ टूटना अत्यधिक विपत्ति आ जाना।
प्रयोग – अवधेश के निधन से पूरे परिवार पर पहाड़ टूट पड़ा।

56. पानी – पानी होना अधिक शर्मिन्दा होना।
प्रयोग – बद्रीसिंह को जब प्रिंसिपल साहब ने डाँटा तो वह पानी – पानी हो गया।

57. पाँचों उँगलियाँ घी में होना सभी प्रकार का सुख होना।
प्रयोग – तुम्हारे भाई एम.एल.ए. हो गए हैं, अब तो तुम्हारी पाँचों उँगलियाँ घी में हैं।

58. पीठ दिखाना कायरता दिखाना।
प्रयोग – युद्ध में पीठ दिखाना क्षत्रिय को शोभा नहीं देता।

59. पेट में चूहे कूदना – बहुत भूखा होना।
प्रयोग – पेट में चूहे कूद रहे हैं, अब काम – धाम नहीं हो सकता।

60. पौ बारह होना बहुत लाभ होना।
प्रयोग – मंत्रीजी का हाथ सिर पर है; अब तो तुम्हारे पौ बारह हैं।

61. फूंक – फूंककर कदम रखना सावधानी बरतना।
प्रयोग – वह एक बार धोखा खा चुका है, इसलिए फूंक – फूंककर कदम रखता

62. बाल की खाल निकालना – अनावश्यक रूप से दोष निकालना।
प्रयोग – बाल की खाल निकालना उसका स्वभाव बन गया है।

(ख) लोकोक्ति

लोकोक्ति का अर्थ है – लोक में प्रचलित उक्ति। किसी महापुरुष, किसी कवि या लेखक की उक्ति कहावत बन जाती है। कहावतों में एक अनुभूत सत्य छिपा रहता है। लोकोक्ति एक स्वतंत्र वाक्य की तरह भाषा में प्रयुक्त होती है। इसका प्रयोग किसी कथन की पूर्ति में उदाहरण के रूप में किया जाता है। लोकोक्ति का क्षेत्र मुहावरे की अपेक्षा अधिक व्यापक है। इसमें स्वयं एक स्वतंत्र अर्थ ध्वनित करने की क्षमता होती है। ‘सुनिए सबकी, करिए मन की’ यह एक लोकोक्ति है। इसका अर्थ है, ‘सबकी बात सुनकर जो मन को अच्छा लगे, वही करना चाहिए। इस प्रकार इस लोकोक्ति में एक वाक्य के सभी आवश्यक तत्त्व विद्यमान हैं।

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मुहावरे और लोकोक्ति में अंतर है। मुहावरा वाक्यांश है, जबकि कहावत स्वतंत्र वाक्य है। मुहावरे का स्वतंत्र रूप में प्रयोग नहीं हो सकता, उसे किसी वाक्य का अंग बनना पड़ता है, कहावत का एक वाक्य की तरह प्रयोग किया जाता है।

लोकोक्ति किसी कथा या चिर- सत्य से संबद्ध रहती है। यहाँ कुछ लोकोक्तियों के अर्थ और उनका वाक्यों में प्रयोग दिया जा रहा है –

1. अधजल गगरी छलकत जाय=गुणहीन व्यक्ति अपने गुणों का अधिक प्रदर्शन करता है।
प्रयोग – किशोर एक साधारण क्लर्क है। घूसखोरी में उसने कुछ धन कमा लिया है तो उसके दिमाग नहीं मिलते। सच है – अधजल गगरी छलकत जाय।

2. अपनी करनी पार उतरे – अपने सुकर्मों से ही अच्छा फल मिलता है।
प्रयोग – अगर पढ़ाई में मन लगाओगे और मेहनत करोगे तो अच्छे नंबरों से पास हो जाओगे, नहीं पढ़ोगे तो फेल हो जाओगे। अपनी करनी पार उतरे।

3. अक्ल बड़ी कि भैंस – शारीरिक शक्ति से बौद्धिक शक्ति बड़ी होती है।
प्रयोग – भीमसिंह देखने में हाथी जरूर है, लेकिन उसकी बुद्धि मोटी है। वह वाद – विवाद में तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकता। अक्ल बड़ी कि भैंस कहावत तुमने सुनी ही होगी।

4. अपना हाथ जगन्नाथ अपना काम स्वयं करना चाहिए।
प्रयोग – सत्यम् ने अलमारी खोलकर लड्डू निकाला और खा लिया। फिर वह बोला, “अपना हाथ, जगन्नाथ”।

5. अंधा पीसे, कुत्ता खाय – ठीक न्याय न होना।
प्रयोग – आज न्याय तो कहीं रहा ही नहीं। भ्रष्टाचारी और चापलूस लोगों का बोलबाला है। स्थिति तो यह है कि अंधा पीसे, कुत्ता खाय।

6. अंधेर नगरी, चौपट राजा – जहाँ कोई व्यवस्था या न्याय न हो।
प्रयोग – बिहार की बात मत पूछो। वहाँ तो अंधेर नगरी चौपट राजा की बात चरितार्थ हो रही है।

7. अपनी – अपनी ढपली, अपना – अपना राग – अपनी – अपनी बात को महत्त्व देना।
प्रयोग – चौदह पार्टियों की सरकार में सब अपनी – अपनी हाँकते हैं। इसीलिए इस सरकार के कार्यकलापों पर लोग कहते हैं – अपनी – अपनी ढपली, अपना – अपना राग।

8. अपनी गली में कुत्ता भी शेर अपने घर पर कमजोर भी अपने आपको बहुत ताकतवर समझता है।।
प्रयोग – जसवीर अपने घर पर खड़ा होकर उदयन को गालियाँ दे रहा था। उदयन ने कहा, “जसवीर अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है, अगर हिम्मत हो तो बाहर निकल आओ।”

9. अंधों में काना राजा मूर्तों के बीच में कोई साधारण समझदार।
प्रयोग – गाँव के अशिक्षितों के बीच वहाँ का पटवारी ही अंधों में काना राजा होता है।’

10. अब पछताये होत का जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत – समय निकल जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं।
प्रयोग – साल भर से तुम्हें समझा रहे थे कि पढ़ाई में ध्यान लगाओ, लेकिन तुमने एक न सुनी। अब फेल हो गए तो रोते हो। यह बेकार है, क्योंकि अब पछताये होत क्या जब चिड़ियाँ चग गई खेत।।

11. अंधा बाँटे रेवड़ी, फिरि – फिरि अपने को देय अपने सगे – सम्बन्धियों को लाभ पहुँचाना।
प्रयोग – यादवजी मंत्री हो गए हैं, वे सरकारी नौकरी में यादवों को ही भर रहे हैं। सच है – अंधा बाँटे रेवड़ी, फिर – फिर अपने को देय।

12. आँखों का अंधा नाम नयनसुख नाम और गुण में विरोध।
प्रयोग – नाम तो है सुशील, लेकिन काम है चरित्रहीनों का। ऐसे ही लोगों के लिए यह कहावत कही जाती है – आँखों का अंधा नाम नयनसुख।

13. आम के आम गुठलियों के दाम दोहरा लाभ।
प्रयोग – हम तो अखबार खरीदते हैं, हमारी बीवी रद्दी अखबारों के लिफाफे बनाकर बेच देती है। आम के आम गुठलियों के दाम।

14. आप भला तो जग भगाभले के लिए सब भले होते हैं।
प्रयोग – छोटे भैया तो यथाशक्ति सबकी सहायता करते हैं और सबसे अच्छी तरह से मिलते हैं, इसलिए सब लोग आदर करते हैं। सच है – आप भला तो जग भला।

15. आगे नाथ न पीछे पगहा – आगे – पीछे कोई न होना।
प्रयोग – पता नहीं अमरनाथ इतने धन का क्या करेगा, उसके आगे नाथ न पीछे पगहा।

16. उल्टे बाँस बरेली का उल्टा काम करना।
प्रयोग – भोपाल से पेठा लेकर आगरा जा रहे हो। दिमाग तो ठीक है. उल्टे बाँस बरेली को।

17. ऊँची दुकान, फीका पकवान बाहरी दिखावा।
प्रयोग – होटल का नाम तो है ग्राण्ड होटल, लेकिन वहाँ कोई विशेष सुविधाएँ नहीं हैं। ऊँची दुकान फीका पकवान की कहावत चरितार्थ होती है।

18. ऊँट के मुँह में जीरा आवश्यकता से बहुत कम वस्तु।
प्रयोग – शर्मा जी के लिए चार पूड़ियाँ तो ऊँट के मुँह में जीरा साबित होंगी।

19. एक अनार सौ बीमार – वस्तु कम, माँग अधिक।
प्रयोग – पिताजी ने आइसक्रीम मँगाई चार और खानेवाले इकट्ठे हो गए चौदह। यह तो एक अनार सौ बीमार वाली कहावत हो गई।

20. ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर कठिन काम शुरू करके कठिनाइयों से क्या डरना।
प्रयोग – बंजर जमीन खरीदकर उसे जोतना शुरू किया है तो उसमें कठिनाइयाँ तो आएँगी ही। ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर?

21. कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली – दो ऐसे असमान व्यक्ति जिनकी आपस में कोई तुलना न हो।
प्रयोग – कहाँ परमानन्द जैसा संत पुरुष और कहाँ रवीन्द्र जैसा स्वार्थी व्यक्ति। आप भी क्या समानता दिखा रहे हैं? कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली।

22. काला अक्षर भैंस बराबर – निरक्षर व्यक्ति।
प्रयोग – राम से पत्र पढ़वाने जा रहे हो। अरे भाई उसके लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है।

23. का वर्षा जब कृषी सुखानी – अवसर निकल जाने पर प्रयत्न करना व्यर्थ है।
प्रयोग – परीक्षा के पहले पुस्तकें खरीदने को रुपये मँगाए थे, वह पिताजी ने भेजे नहीं। अब परीक्षा समाप्त होने पर मनीआर्डर आया है। अब रुपये किस काम के। ठीक ही कहा है – का वर्षा जब कृषी सुखानी।

24. खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है – संगति का प्रभाव पड़ता है।
प्रयोग – उमेश का बड़ा लड़का कामचोर है, छोटे लड़के पर भी उसका प्रभाव पड़ा है। वह भी कामधाम नहीं करता। सच ही तो है – खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।

25. खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे लज्जित होने पर निरपराध पर क्रोधित होना।
प्रयोग – जब ऊषा को उसके पिताजी ने डांट दिया तो वह अपनी छोटी बहिन पर बिगड़ी। तब उसके भाई ने कहा ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे।’

26. खोदा पहाड़ निकली चुहिया=बहुत प्रयास करने का थोड़ा फल मिलना।
प्रयोग – सेन्ट्रल लायब्रेरी में मैथिलीशरण जी की पुस्तकें तलाश करने गया था, लेकिन मिली एक पंचवटी। मन ही मन कहा – खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

27. गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है बड़ों के साथ रहने वालों को भी उनके साथ कष्ट उठाना पड़ता है।
प्रयोग – जसवीर और परमवीर आपस में लड़ रहे थे, विजय दोनों को समझा रहा था। प्रिंसिपल साहब ने तीनों को बुलाकर मार लगाई। गेहूँ के साथ घुन भी पिस गया।

28. घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध – स्वयं के स्थान पर सम्मान नहीं मिलता।
प्रयोग – बनवारीलालजी गाँव के बहुत अच्छे वैद्य हैं, लेकिन गाँववाले डिस्पेन्सरी के कम्पाउण्डर से दवाइयाँ लेते हैं। ठीक ही है – घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध।

29. घर का भेदी लंका ढावै आपसी फूट का फल बुरा होता है।
प्रयोग – जयचन्द ने मुहम्मद गोरी से मिलकर पृथ्वीराज के खिलाफ युद्ध लड़ा। ठीक ही कहा है – घर का भेदी लंका ढावै।

30. चार दिन की चाँदनी, फिर अँधेरी रात – थोड़े समय का सुख।
प्रयोग – धन – संपत्ति का गर्व न करना; यह तो आती – जाती रहती है, चार दिन। की चाँदनी फिर अंधेरी रात कहावत को याद रखो।

31. चोर – चोर मौसेरे भाई एक जैसी मनोवृत्ति वाले लोग।
प्रयोग – विकास और प्रयास दोनों में से किसी पर विश्वास मत करना, दोनों चोर – चोर मौसेरे भाई हैं।

32. चोर की दाढ़ी में तिनका – अपराधी की चेष्टा से उसका अपराध प्रकट हो जाता
प्रयोग – कक्षाध्यापक ने जब चार अपराधी प्रवृत्ति के लड़कों को शीशा तोड़ने के जुर्म में प्रिंसिपल साहब के सामने खड़ा किया तो एक ने चिल्लाकर कहा, “मैं तो कल आया ही नहीं था। इसी को कहते हैं चोर की दाढ़ी में तिनका।”

33. जहाँ चाह वहाँ राह – दृढ़ इच्छाशक्ति से सब काम हो सकते हैं।
प्रयोग – हिम्मत हारकर मत बैठो, प्रयत्न करो – जहाँ चाह वहाँ राह।

34. जिसकी लाठी उसकी भैंस बलवान की ही जीत होती है।
प्रयोग – बद्रीप्रसाद अदालत से तो जीत गए, लेकिन खेत तो अभी भी पहलवान सिंह जोत रहा है। आजकल तो जिसकी लाठी उसकी भैंस है।

35. जैसे नागनाथ, वैसे साँपनाथ दोनों एक समान।
प्रयोग – क्या सुधीर और क्या मधुर’ दोनों में से किसी से सहायता की उम्मीद न करना। जैसे नागनाथ, वैसे साँपनाथ।

36. थोथा चना बाजे घना कम जाननेवाला अधिक बुद्धिमान होने का प्रदर्शन करता
प्रयोग – किशोर एक साधारण ठेकेदार है लेकिन बातें करोड़ों की करता है। सच है – थोथा चना बाजे घना।

37. दूर के ढोल सुहावने होते हैं दूर की चीजें अच्छी लगती हैं।
प्रयोग – सुना था कि कृष्ण जहाँ रासलीला करते थे, वहाँ बड़े सुंदर कुल हैं किंतु जाकर देखा तो सब वीरान दिखा। ठीक ही कहा है – दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

38. धोबी का कुत्ता घर का न घाट का=दोनों तरफ की साधने वाले को कहीं सफलता नहीं मिलती।
प्रयोग – हरीश ने कम्प्यूटर की कक्षा में प्रवेश लिया और एम.बी.ए. की भी तैयारी की। दोनों ओर दिमाग रहने से कहीं भी सफलता नहीं मिली। उसके मित्रों ने कहा – धोबी का कुत्ता घर का न घाट का।

39. न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरीन कारण होगा, न कार्य होगा।
प्रयोग – सत्यम और संकेत कैरम के लिए लड़ते रहते थे। एक दिन उनकी माँ ने कहा, “मैं कैरम उठाके रखे देती हूँ। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।”

40. नाच न जाने आँगन टेढ़ा – स्वयं की अयोग्यता को छिपाकर साधनों को दोष देना।
प्रयोग – सुरेश को चित्र बनाना आता तो नहीं, लेकिन वह कहता था कि ब्रुश खराब था, इसलिए चित्र अच्छा नहीं बना। इसी को नाच न जाने आँगन टेढ़ा कहते हैं।

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MP Board Class 9th General Hindi व्याकरण वाक्य संशोधन

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प्रश्न-
सामान्य अशुद्धियाँ कितने तरह की होती हैं? उदाहरण सहित उन पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
भाषा का शुद्ध और स्पष्ट लेखन उस समय तक संभव नहीं है, जब तक कि शब्दों और उनके अर्थ के विषय में पूर्ण ज्ञान न हो। शुद्ध वाक्य रचना के लिए अशुद्धियों पर ध्यान देना बड़ा आवश्यक है। अशुद्ध वाक्य उतना ही अरुचिपूर्ण लगता है जितना कि बेतरतीब बनाया हुआ भोजन। अतः अशुद्धियों का विवरण नीचे दिया जा रहा है-

1. लिंग संबंधी अशुद्धियाँ-संज्ञा शब्दों में लिंग परिवर्तन होता है;

जैसे-

पुल्लिंग – स्त्रीलिंग
1. पाठक – पाठिका
2. विद्वान् – विदुषी
3. सभापति – सभानेत्री

2. वचन संबंधी अशुद्धियाँ-
1. वह किसके कमल है-वह किसकी कलम है?
2. उसका भाग्य फूट गया-उसके भाग्य फूट गए।
3. मेरे बटुआ उड़ गया-मेरा बटुआ उड़ गया।
4. क्या तेरा प्राण निकल रहा है-क्या तेरे प्राण निकल रहे हैं?

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3. समास संबंधी अशद्धियाँ-

अशुद्ध – शुद्ध
1. माता भक्ति- मातृ भक्ति
2. भ्रातगण – भ्रातागण
3. कालीदास – कालिदास
4. महाराज – महाराजा

4. संधि समास अशुद्धियाँ-
1. निरस-नीरस (निः + रस)
2. उपरोक्त-उपर्युक्त (उपरि + उक्त)
3. सदोपदेश-सदुपदेश (सद् + उपदेश)

5. कारक संबंधी अशुद्धियाँ-कर्ता और क्रिया के वचन, लिंग और पुरुष समान होने चाहिएँ। यदि ऐसा न हुआ तो वाक्य अशुद्ध हो जाता है। उदाहरण के लिए

अशुद्ध वाक्य – शुद्ध वाक्य
1. गाय दूध देता है। – गाय दूध देती है।
2. हम लौटूंगा। – मैं लौटूंगा।

6. शब्दों का यथा स्थान रखना-वाक्य में कर्ता, कर्म, कारण, विशेषण, विशेष्य, क्रिया-विशेषण आदि के स्थान निश्चित होते हैं। यदि वे निश्चित स्थान पर न रखे गए अथवा उनका स्थान बदल दिया गया तो वाक्य अशुद्ध हो जाता है।

अशुद्ध – शुद्ध
1. बंदर को मोहन ने मारा डंडे से। – 1. मोहन ने बंदर को डंडे से मारा।
2. विमला मेरी घड़ी हाय-हाय न – 2. हाय हाय! विमला मेरी घड़ी न जाने
जाने कहाँ खो गई। – कहाँ खो गई।

7. अनावश्यक शब्दों का प्रयोग-
1. रोज प्रतिदिन नवल पाठशाला जाता है। – 1. नवल पाठशाला प्रतिदिन जाता है।
2. वह लड़की क्या नाम कहाँ पढ़ता है? – 2. वह लड़की कहाँ पढ़ती है?

8. वर्ण और मात्रा संबंधी अशुद्धियाँ

अशुद्ध – शुद्ध
1. उदेश्य – उद्देश्य
2. जागृत – जाग्रत
3. उज्जवल – उज्ज्वल
4. कोतुहल – कौतूहल
5. कलस – कलश
6. ग्यान – ज्ञान
7. पैत्रिक – पैतृक

प्रश्न 2 :
निम्नलिखित वाक्यों के शुद्ध रूप लिखिए :
1. इंदिरा गांधी की मृत्यु पर भारत में दुःख छा गया।
2. मैं कल आगरा से वापस लौटूंगा।
3. तुमने यह काम करना है।
4. कोप ही दंड का एक विधान है।
5. आग में कई लोगों के जल जाने की आशा है।
उत्तर-
1. इंदिरा गांधी की मृत्यु पर भारत में शोक छा गया।
2. मैं कल आगरा से लौटूंगा।
3. तुम्हें यह काम करना है।
4. दंड ही कोप का एक विधान है।
5. आग में कई लोगों के जल जाने की आशंका है।

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प्रश्न 3 :
निम्नलिखित अशुद्ध शब्दों को शुद्ध कीजिए-

अशुद्ध शब्द – शुद्ध शब्द
1. राजनीतिक – राजनैतिक
2. सन्मुख – सम्मुख
3. कलेश – क्लेश .

प्रश्न 4 :
चार विकल्पों में शुद्ध शब्द खोजकर उसे चिह्नित कीजिए
1. संग्रहित
(क) संघरित
(ख) संगृहीत
(ग) संग्रहीत
(घ) संघह्वीत
उत्तर-
(ख) संगृहीत।

2. प्रथक
(क) पृथक्
(ख) पिरथक
(ग) परथिक
(घ) पिर्थक
उत्तर-
(क) पृथक्

3. उज्जवल
(क) उजवल
(ख) उज्ज्वल
(ग) उजवल्य
(घ) उज्जवल
उत्तर-
(ख) उज्ज्व ल।

4. प्रनाम
(क) पिरणाम
(ख) पिरनाम
(ग) पृणाम
(घ) प्रणाम
उत्तर-
(घ) प्रणाम।

प्रश्न 5 :
निम्नलिखित वाक्यों के सही रूप चुनकर लिखें।
1. भैंस और बैल खड़े हैं
(क) भैंस खड़ा और बैल खड़ी है।
(ख) भैंस और बैल दोनों खड़ी हैं।
(ग) भैंस और बैल खड़ा हुआ है।
(घ) भैंस और बैल दोनों खड़े हैं।
उत्तर-
(घ) भैंस और बैल दोनों खड़े हैं।

2. आगरा के अंदर हैजा का जोर है
(क) आगरा के अंदर हैजा का प्रकोप है।
(ख) हैजा का जोर है आगरा में।
(ग) हैजा का प्रकोप है आगरा में।
(घ) आगरा में प्रकोप है हैजा का।
उत्तर-
(घ) आगरा में प्रकोप है हैजा का।

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3. उसे अनुत्तीर्ण होने की आशा है
(क) आशा है उसे अनुत्तीर्ण होने की।
(ख) अनुत्तीर्ण होने की उसे आशंका है।
(ग) उसे आशंका है अनुत्तीर्ण होने की।
(घ) उसे अनुत्तीर्ण होने की आशंका है।
उत्तर-
(घ) उसे अनुत्तीर्ण होने की आशंका है।

प्रश्न 6 :
शब्दों के क्रम संबंधी अशुद्धियों को शुद्ध कीजिए-
(क) अशुद्ध-राम, जो कल भूखा भा, ने अभी तक कोई भोजन नहीं किया।
(ख) अशुद्ध-राम बाजार से फूलों की माला एक लाई।
(ग) अशुद्ध-सब लड़कियाँ अपनी किताब और कलम से लिख और पढ़ रहे थे।
उत्तर-
(क) शुद्ध-राम, जो कल भूखा था अभी तक भोजन नहीं किया।
(ख) शुद्ध-राम बाजार से एक फूलों की माला लाया।
(ग) शुद्ध-सब लड़कियाँ अपनी किताब और कलम से पढ़ और लिख रही थीं।।

प्रश्न 7 :
प्रत्यय संबंधी अशुद्धियाँ दूर कीजिए
(क) अशुद्ध-राम यह कार्य आवश्यकीय है।
(ख) अशुद्ध-आपकी सौजन्यता से मेरे पुत्र को नौकरी मिल गई।
(ग) अशुद्ध-साधू के माथे पर रामानन्द तिलक है।
उत्तर-
(क) शुद्ध-राम यह कार्य आवश्यक है।
(ख) शुद्ध-आपके सौजन्य से मेरे पुत्र को नौकरी मिल गई।
(ग) शुद्ध-साधू के माथे पर रामानन्दी तिलक है।

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प्रश्न 8 :
अनुस्वार एवं चन्द्र बिंदु संबंध अशुद्धियाँ शुद्ध कीजिए
1. आँख,
2. ऊंचा,
3. सांप,
4. कुंअर,
5. दांत,
6. हंसिया,
7. चंवर
उत्तर :
आँख, ऊँचा, साँप, कुँअर, दाँत, हँसिया, चँवर

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