MP Board Class 8th Special Hindi निबन्ध लेखन

MP Board Class 8th Special Hindi निबन्ध लेखन

1. विज्ञान के चमत्कार

रूपरेखा

  • प्रस्तावना
  • विज्ञान के आविष्कार
  • विज्ञान से लाभ-हानि
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना-
आकाश में चमकने वाली बिजली, चमचमाता हुआ सूर्य तथा तारों का टिमटिमाना, बर्फीली पर्वत शृंखलाएँ इत्यादि को देखकर मानव मन में इन्हें जानने एवं समझने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यही जिज्ञासा विज्ञान को जन्म देती है।

2. विज्ञान के आविष्कार-
आज विज्ञान के बल पर व्यक्ति चन्द्रमा पर पहुँच चुका है, समुद्र की गहराइयों को नाप चुका है, हिमालय की चोटी पर पहुँच चुका है। आज वैज्ञानिक खोजों ने व्यक्ति के जीवन में अभूतपूर्व चमत्कार ला दिया है। जो यात्रा पहले हम महीनों-सालों में पूर्ण करते थे, वही अब घण्टों में पूर्ण हो जाती है। आज हमारे पास यात्रा के लिए रेलगाड़ी, बसें तथा हवाई जहाज उपलब्ध हैं। इनसे हमारे समय की बचत हुई है तथा यात्रा सुगम एवं आरामदायक हो गयी है। विज्ञान ने लंगड़े को पैर एवं अन्धों को आँखें प्रदान की हैं। विभिन्न प्रकार की मशीनों का आविष्कार करके भूखों को रोटी दी है।

आज टेलीफोन से हम हजारों मील दूर बैठे हुए व्यक्ति से आसानी से बातचीत कर सकते हैं। टेलीविजन द्वारा पर्वतों एवं देश-विदेश के विभिन्न दृश्यों का अवलोकन करते हैं। ज्ञानवर्द्धक प्रोग्राम देखकर हम अपने ज्ञान में वृद्धि करते हैं। आज चन्द्रमा के दृश्य एवं ध्वनियाँ पृथ्वी पर लायी जा चुकी हैं। अन्य नक्षत्रों से भी सम्बन्ध स्थापित हो चुका है। बिजली के आविष्कार ने मानव को बहुत-सी सुविधाएँ प्रदान की हैं। जैसे-ए. सी. से गर्मियों में भी सर्दियों जैसी ठण्डक मिल जाती है, वाशिंग मशीन से बिना श्रम के मिनटों में कपड़े धुल जाते हैं, रूम हीटर से सर्दियों में कमरा गर्म हो जाता है, बड़े-बड़े कारखाने भी इसी बिजली से चलते हैं। विभिन्न प्रकार की औषधियों की खोज करके अनेक असाध्य बीमारियों का इलाज सम्भव हो गया है। शल्य चिकित्सा से ऑपरेशन करने में मदद मिली है। प्लास्टिक सर्जरी से व्यक्ति को सुन्दरता प्रदान की जा सकती है।

छापेखानों से हजारों पुस्तके छपकर निकलती हैं जो हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रदान करती हैं। विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री एवं वस्त्र कारखानों द्वारा उत्पादित किए जा रहे हैं। कृषि क्षेत्र में विभिन्न रासायनिक खादों ने पैदावार में वृद्धि की है तथा खेती करने के अनेक नये तरीके विज्ञान ने ईजाद किए हैं। अब बैलों एवं हल से खेत न जोतकर, ट्रैक्टर से जोते जाते हैं। कीटनाशक औषधियाँ भी खेत की रक्षा करने बहुत लाभप्रद सिद्ध हुई हैं। परमाणु शक्ति की खोज से इस धरा पर स्वर्गीय सुख लाया जा सकता है; उसका प्रयोग सृजन के लिए किया जाए। यदि विध्वंस के लिए किया जाएगा तो महाविनाश का कारण बन जाएगा। मिसाइलों, टैंकों, लड़ाकू विमान तथा हाइड्रोजन बमों ने दुनिया को विनाश के तट पर लाकर खड़ा कर दिया है।

3. विज्ञान से हानि-
लाभ-विज्ञान से उद्योग-धन्धों में विकास हुआ है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। यातायात के साधनों से दूरियाँ समाप्त हो गयी हैं। नवीन औषधियों ने मानव को दीर्घ जीवन प्रदान किया है। मनोरंजन के विभिन्न साधनों ने मानव को नवीन उत्साह एवं उमंग प्रदान करके उनके जीवन में व्याप्त नीरसता को समाप्त किया है।

विज्ञान ने दूसरी ओर व्यक्ति को अकर्मण्य बना दिया है। मशीनों के निर्माण ने बेरोजगारी की समस्या को उत्पन्न कर दिया है। विस्फोटक पदार्थों एवं कल-कारखानों ने वायु को प्रदूषित कर दिया है। मनुष्य अधिक स्वार्थी हो गया है तथा वह आलसी होकर अकर्मण्य हो गया है। वह तरह-तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर धन प्राप्ति के लिए छटपटा रहा है।

4. उपसंहार-
विज्ञान मानव के लिए महान् वरदान सिद्ध हो सकता है यदि हम उसका सृजनात्मक कार्यों के लिए प्रयोग करें। भगवान् हमें सद्बुद्धि दे कि हम विज्ञान के आविष्कारों का प्रयोग मानव के हित के लिए करें। तभी विश्व के कण-कण से सुख-शान्ति एवं मंगल की ऐसी धारा प्रवाहित होगी, जिसमें स्नान करके सम्पूर्ण मानव जाति सुख-चैन तथा सन्तोष का अनुभव करेगी।

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2. कोई महापुरुष (महात्मा गाँधी) 

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना
  • जीवन परिचय
  • बैरिस्टरी पास करने का निर्णय
  • दक्षिण अफ्रीका में जाना
  • नेटाल इण्डियन कांग्रेस की स्थापना
  • राजनीति में प्रवेश
  • जनता का आन्दोलन
  • दूसरा विश्व युद्ध
  • भयानक उपद्रव
  • गाँधी जी के चारित्रिक गुण
  • कुशल लेखक
  • मृत्यु,
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना-
पृथ्वी पर जब अनाचार, अत्याचार एवं अन्याय का दौर प्रारम्भ होता है तब पृथ्वी के भार को हल्का करने
के लिए एवं मानव कल्याण के लिए महापुरुषों का आविर्भाव होता है। बीसीं शताब्दी में जिन महापुरुषों ने भारत के गौरव में चार चाँद लगाए: उनमें महात्मा गाँधी एवं रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। राजनीति के क्षेत्र में ही नहीं अपितु नैतिक एवं धार्मिक क्षेत्र में भी गाँधी जी की अपूर्व देन है।

2. जीवन परिचय-
महात्मा गाँधी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गाँधी था। इनके पिता करमचन्द थे। इनकी जाति गाँधी थी। इन्होंने अपनी बचपन की आँखें 2 अक्टूबर, 1869 को पोरबन्दर में खोली थीं। शुरू की शिक्षा-दीक्षा पोरबन्दर में ही ग्रहण की। गाँधी जी की माता बहुत ही साधु स्वभाव 1 की धर्मपरायण महिला थीं जिसका गाँधी जी के जीवन पर । व्यापक प्रभाव पड़ा। इनके पिता राजकोट रियासत के दीवान । पद पर प्रतिष्ठित थे। पिता की यह इच्छा थी कि उनका पुत्र ! पढ़-लिखकर एक योग्य व्यक्ति बने।

3.बैरिस्टरी पास करने का निर्णय-
उन दिनों में बैरिस्टरी पास करके वकालत करना एक उत्तम व्यवसाय माना जाता था। माता पुत्र को विदेश में भेजने के पक्ष में नहीं थी। गाँधी जी ने माता से आज्ञा लेने के लिए प्रतिज्ञा ली, “विदेश में शराब, माँस
और अनाचार से दूर रहूँगा।” गाँधी जी ने इस प्रतिज्ञा का अक्षरश: पालन किया। वकालत का व्यवसाय प्रारम्भ-इंग्लैण्ड से बैरिस्टर की उपाधि ग्रहण करके गाँधी जी ने भारत भूमि पर पदार्पण किया तथा वकालत का व्यवसाय करना प्रारम्भ कर दिया। इस पेशे में झूठ बोले बिना काम नहीं चल सकता, गाँधी जी सत्य पथ के राही थे अत: इस पेशे में वह असफल ही सिद्ध हुए।

4. दक्षिणी अफ्रीका में जाना-
एक बार गाँधी जी को । एक मुकदमे की पैरवी की वजह से दक्षिणी अफ्रीका जाना पड़ा। दक्षिणी अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के साथ बहुत – ही अमानवीय व्यवहार किया जाता था। वे उस बुरे व्यवहार
को कर्मगति समझकर सहन कर लेते थे। एक बार गाँधी जी से अदालत में पगड़ी उतारने को कहा। गाँधी जी ने अदालत से बाहर आना स्वीकार किया परन्तु पगड़ी को सिर से नहीं उतारा।

5. नेटाल इण्डियन कांग्रेस की स्थापना-
गाँधी जी ने 1894 में इण्डियन नेटाल कांग्रेस की स्थापना की। इस संस्था ने भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। देशवासियों को दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों की दुर्दशा से अवगत कराया। दक्षिण अफ्रीका में रहकर गाँधी जी ने सत्याग्रह एवं असहयोग की नवीन नीति से सरकार का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। गाँधी जी तथा जनरल स्मट्स में समझौते के आधार पर भारतीयों को बहुत से अधिकार मिले। इससे उनके मन-मानस में आशा का संचार हुआ।

6. राजनीति में प्रवेश-
सन् 1915 में गाँधी जी ने भारत की राजनीति में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए उन्होंने सत्य एवं अहिंसा को अस्त्र-शस्त्र के रूप में प्रयोग किया। इसी मध्य चौरी-चौरा नामक गाँव में सत्याग्रह के मध्य हिंसक घटना घटित हो गई। अहिंसा के उपासक गाँधी जी ने सत्याग्रह को तब तक के लिए स्थगित कर दिया जब तक अहिंसा का अनुपालन न हो। 1930 में पुनः सत्याग्रह प्रारम्भ हुआ जिससे गोरी सरकार को गाँधी जी के समक्ष घुटने टेकने पड़े। लन्दन में समझौते के निमित्त एक गोलमेज सभा आमन्त्रित की गई किन्तु यह व्यर्थ प्रमाणित हुई। गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। ..

7. जनता का आन्दोलन-
गाँधी जी ने आजादी के आन्दोलन को जनता के आन्दोलन का रूप दे दिया। उनके नेतृत्व में मजदूर एवं कृषक स्वाधीनता के संघर्ष में भाग लेने के लिए सहर्ष तैयार हो गए। अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति से अछूतों को चुनाव से अलग कर दिया। गाँधी जी का सन् 1930 से 1939 तक का समय रचनात्मक कार्यों में व्यतीत हुआ।

8. दूसरा विश्व युद्ध-
सन् 1939 में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। गाँधी जी ने प्रथम विश्व युद्ध में कुछ आशा लेकर अंग्रेजों की भरपूर सहायता की लेकिन युद्ध के बाद अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति रुख और भी कठोर हो गया। इसी हेत द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों की तब तक सहायता न करने की ठान ली जब तक वे अपने बोरी-बिस्तर बाँधकर देश को आजाद नहीं कर देते।

9. भयानक उपद्रव-
देश के बँटवारे के फलस्वरूप भयानक उपद्रव हुए। हिंसा तथा मारकाट का दौर चला। गाँधी जी ने शान्ति स्थापना का भरसक प्रयास किया। दंगा रोकने के लिए आमरण अनशन का व्रत लिया।

10. गाँधी जी के चारित्रिक गुण-
गाँधी जी का मनोबल असाधारण था। वे प्राणों की कीमत पर भी सत्य की रक्षा करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। वे सत्य तथा अहिंसा के पुजारी थे। वे व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ राजनीति में भी सत्य एवं अहिंसा के प्रयोग के प्रबल समर्थक थे। वे जीवन एवं राजनीति को जुड़ा हुआ स्वीकारते थे। राजनीति के अलावा गाँधी जी ने देशवासियों का सभी क्षेत्रों में मार्गदर्शन किया। कंगाल एवं रोगियों की सेवा में उनका अधिकांश समय व्यतीत होता था।

11. कुशल लेखक-
गाँधी जी एक कुशल लेखक भी थे। उन्होंने ‘हरिजन एवं हरिजन सेवक’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। ‘यंग इण्डिया’ नामक पत्र भी निकाला। 12. मृत्यु-साम्प्रदायिकता मानव को विकारग्रस्त कर देती है। ऐसे ही एक विकृत नाथूराम विनायक गोडसे ने 30 जनवरी, सन् 1948 की शाम को प्रार्थना सभा में आते ही गाँधी जी पर गोलियाँ चला दी। हत्यारे को हाथ जोड़कर नमस्ते करते हुए गाँधी पंच’ – में विलीन हो गए।

13. उपसंहार-
महात्मा गाँधी युगपुरुष थे। धर्म, नैतिकता, राजनीति एवं आध्यात्मिकता के क्षेत्र में उनकी देनों
को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। गाँधी जी ने अन्धकार में भटकते हुए भारतीयों को प्रकाश के दर्शन कराए। सत्य एवं अहिंसा का एक ऐसा अमोघ अस्त्र उन्होंने समस्त विश्व को प्रदान किया जिसकी आज के हिंसा एवं मारकाट के दौर से गुजर रहे विश्व को महान् आवश्यकता है।महादेवी वर्मा की गाँधी जी के प्रति कही गई निम्नलिखित पंक्तियाँ देखिए

“हे धरा के अमर सुत ! तुमको अशेष प्रणाम।
जीवन के सहस्त्र प्रणाम, मानव के अनन्त प्रणाम।।”

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3. पुस्तकालय का महत्व

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • पुस्तकालय से अभिप्राय
  • भारत में पुस्तकालयों की परम्परा
  • पुस्तकालयों के प्रकार
  • पुस्तकालय से लाभ
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना-
मानव स्वभाव से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति का होता है। बाल्यावस्था से ही उसकी यह प्रवृत्ति हमें देखने को मिलती है। उदाहरणस्वरूप बच्चा किसी भी खिलौने को लेता है, तो उसे तोड़कर यह जानना चाहता है कि इसके अन्दर क्या छिपा है ? यह कैसे बनाया गया है ? हर व्यक्ति की इतनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं होती कि वह अपनी ज्ञान पिपासा शान्त करने के लिए मनचाही पुस्तक ले सके। पुस्तकालय एक ऐसा स्थान है, जहाँ पहुँचकर व्यक्ति अपनी ज्ञान-पिपासा को विभिन्न पुस्तकें पढ़कर शान्त कर सकता है।

2. पुस्तकालय से अभिप्राय-
जहाँ पुस्तकों को विषयानुसार सुव्यवस्थित ढंग से रखा जाता है। उस स्थान को पुस्तकालय कहते हैं। यहाँ पाठकों के पढ़ने के लिए बैठने की अच्छी व्यवस्था होती है।

3. भारत में पुस्तकालयों की परम्परा-
भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि पुस्तकालय भारत में प्राचीन समय से चले आ रहे हैं। तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालयों में उच्चकोटि के शासकों ने भी कई उच्चस्तरीय पुस्तकालयों की स्थापना की।

4. पुस्तकालयों के प्रकार-
पुस्तकालय अनेक प्रकार के होते हैं। कुछ पुस्तकालय स्कूल व कॉलेजों में  होते हैं, जहाँ विद्यार्थियों को उपयोगी पुस्तकें तथा अन्य पुस्तकें भी उपलब्ध होती हैं। दूसरे प्रकार के पुस्तकालय निजी पुस्तकालय होते हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी रुचि के अनुकूल पुस्तकें इकट्ठी करता है। विदेशों में अपेक्षाकृत हमारे देश से अधिक निजी पुस्तकालय हैं। तीसरी प्रकार के पुस्तकालय सार्वजनिक पुस्तकालय हैं।

इनमें पुस्तकें अधिक संख्या में रहती हैं। इनकी संख्या अधिक है। इसके साथ ही वाचनालय होते हैं जहाँ छात्रोपयोगी पुस्तकें संग्रहीत रहती हैं। यहाँ विदेशी उच्चस्तरीय पत्र-पत्रिकाएँ भी उपलब्ध रहती हैं। एक निश्चित धनराशि देकर इसका सदस्य बना जा सकता है एवं इससे लाभ ग्रहण किया जा सकता है। ये पुस्तकालय सामाजिक संस्थाओं और शासन द्वारा चलाये जाते

5. पुस्तकालय से लाभ-
मानव मस्तिष्क की भूख मिटाने के लिए पुस्तकें ही भोजन का कार्य करती हैं। पुस्तकें ही हमें इतिहास, धर्म, समाज एवं दर्शन इत्यादि का ज्ञान कराती हैं। पुस्तकालय से हमें अतीतकाल एवं वर्तमान काल का ज्ञान मिलता है तथा भविष्य में उन्नति के शिखर पर पहुँचने का मार्ग भी प्रशस्त होता है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। इससे बचने के लिए पुस्तकालय ही सर्वश्रेष्ठ मनोरंजन का साधन है।

6. उपसंहार-
पुस्तकालय का देश के विकास एवं समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान होता है। इसलिए इमें पुस्तकालय एवं पुस्तकों की तन-मन-धन से रक्षा करना चाहिए। पुस्तकालय ज्ञान का उद्गम स्रोत है। यह एक ज्ञान रूपी मन्दिर है, जहाँ पहुँचकर व्यक्ति को निर्मल ज्ञान की प्राप्ति होती है। पुस्तकालय एक ऐसी ज्ञान की गंगा है, जिसमें अवगाहन करके व्यक्ति का हृदय निर्मल एवं बुद्धि विकसित होती है।

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4. किसी मेले का वर्णन

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना
  • भारत मेला प्रधान देश
  • मेला जाने का प्रस्ताव पारित
  • मेले में पहुँचना
  • घाट तथा मन्दिरों का मनोहारी दृश्य
  • मेले की चहल-पहल
  • एक आयोजन
  • मेले की व्यवस्था
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना-
विश्व के हर देश में मेलों का आर्योजन किया जाता रहा है। मेला मनुष्य को शारीरिक एवं मानसिक थकान को मिटाकर एक नवीन उत्साह एवं आनन्द प्रदान करता है। हजारों की संख्या में लोग यहाँ एकत्रित होते हैं। इसलिए यह एक-दूसरे से मिलने एवं पारस्परिक स्नेह एवं सौहार्द्र प्रकट करने का अति उत्तम स्थल है।

2. भारत मेला प्रधान देश-
भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहाँ विभिन्न तीर्थ स्थलों पर समय-समय पर मेलों का आयोजन होता रहता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्रीय मेले भी लगने लगे हैं। त्यौहारों पर भी मेले लगते रहते हैं।

3. मेला जाने का प्रस्ताव पारित-
यमुना के किनारे आगरा से करीब तीस मील दूर बटेश्वर है। यहाँ हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा को बहुत बड़ा मेला आयोजित होता है। प्रमुख रूप से यह पशुओं को खरीदने एवं बेचने का मेला है। साथ ही मनुष्य को आकर्षित करने के लिए भी इसमें अनेक झूले एवं मनोहारी आयोजन किए जाते हैं। मैंने भी अपने मित्रों के साथ दीपावली के पश्चात् बटेश्वर जाने का मन बना लिया।

4. मेले में पहुँचना-
हम आगरा से टैक्सी करके बटेश्वर के लिए रवाना हो गये। मार्ग में खेतों एवं गाँवों की हरियाली एवं प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर हृदय खुशी से भर गया और एक नवीन ताजगी एवं स्फूर्ति का हमारे भीतर संचार हुआ। हमें सीधे टैक्सी वाले ने मेले पर छोड़ दिया। यह बटेश्वर भगवान शिव का पवित्र तीर्थ है। यहाँ पहुँचकर तीर्थ के प्रभाव से हमारा हृदय पावन भावों से ओत-प्रोत हो गया और हमने प्रतिदिन एक अच्छा कार्य करने का संकल्प लिया।

5. घाट तथा मन्दिरों का मनोहारी दृश्य-
शाम को मित्र के घर पर भोजन करके यमुना किनारे टहलने गये। पूर्णिमा के – चाँद का प्रतिबिम्ब पानी में बहुत सुन्दर छटा बिखेर रहा था। चारों ओर दूधिया उजाला फैल रहा था तथा यमुना शान्त भाव से । कल-कल करती हुई आगे बहती जा रही थी।

चन्द्रमा की चाँदनी पड़ने से सभी मन्दिर संगमरमर जैसे श्वेत दिखाई पड़ रहे थे जिन्हें देखकर मन में एक अलौकिक शान्ति – की अनुभूति हो रही थी तथा सात्विक भावनाएँ मन में हिलोरें ले रही थीं। वास्तव में, जिस अभूतपूर्व आनन्द की उपलब्धि तीर्थों 1 में होती है, वैसी आनन्दानुभूति अन्यत्र कहाँ।।

6. मेले की चहल-पहल-
सभी लोगों ने सर्वप्रथम यमुना । में ब्रह्म मुहूर्त से ही कार्तिक पूर्णिमा का पुण्य-लाभ लेने के लिए स्नान करना आरम्भ कर दिया। बच्चों एवं किशोरों को पानी में किलोल करना बहुत ही अच्छा लग रहा था। स्नानोपरान्त सभी 1 ने भगवान शंकर के मन्दिर में जाकर पूजा-अर्चना की। चारों ओर का वातावरण भगवान की स्तुति एवं घण्टों की आवाज से आपूरित हो गया।

कहीं मिठाइयों की तो कहीं चाट-पकौड़ी की दुकानें थीं। जहाँ लोग अपनी रुचिनुसार चीजें खाकर अपनी जिह्वा का आनन्द ले रहे थे। कहीं बच्चे गुब्बारे एवं खिलौने के लिए हठ कर रहे थे। स्त्रियों की टोलियाँ भजन गाती हुई जा रही थीं। सुबह दस बजे से पशु भी बिकने के लिये लाये जाने लगे; जैसे-गाय, भैंस, बकरी, ऊँट तथा बैल इत्यादि।

दूसरी तरफ चरखी तथा विभिन्न प्रकार के झूले थे जो बच्चों तथा बड़ों सभी को समान रूप से आकर्षित कर रहे थे। कहीं जोकर नाना प्रकार की क्रिया-कलापों द्वारा सबको हँसा रहे थे। पुरुष स्त्री का वेश बनाकर नाच दिखाकर पैसे अर्जित कर रहे थे।

7.एक आयोजन-
एक तरफ मुशायरा तथा कवि सम्मेलन का आयोजन चल रहा था। कवि नीरज प्रेम रस की कविताओं का गान कर रहे थे जिससे हृदय में प्रेम भावना उद्वेलित हो रही थी। काका हाथरसी अपनी कविताओं से चारों ओर हास्य रस की पिचकारी चला रहे थे, जिसमें भीगकर सभी श्रोता हँस रहे थे। कहीं वीर रस में देश-प्रेम की कविताएँ हो रही थीं जो हृदय में देश-प्रेम की भावनाओं को पुष्ट एवं सुदृढ़ कर रही थीं।

8. मेले की व्यवस्था-
मेले में पुलिस का अच्छा प्रबन्ध था जिससे जेबकतरे किसी को हानि नहीं पहुँचा सकें। मेले में एक तरफ उद्घोषणा का प्रबन्ध था जिससे अगर कोई बच्चा मेले में अपने परिवारीजनों से बिछुड़ जाता है, तो वहाँ माइक पर आवाज लगाकर कह दिया जाता था कि अमुक का बच्चा यहाँ है उसके घर वाले आकर ले जायें। मेले में सफाई की व्यवस्था अच्छी थी तथा खाने की चीजों के अच्छे स्तर का विशेष ध्यान रखा गया था।

9. उपसंहार-
मेले सभी प्रियजनों एवं मित्रों को एक स्थान पर मिलाने का कार्य करते हैं जिससे सब एक-दूसरे के हाल-चाल से अवगत हो जाते हैं। आयोजकों को मेले से आर्थिक लाभ भी होता है, ये सभी का मनोरंजन करते हैं। ये हमारी संस्कृति का परिचय कराते हैं। इसलिए जिला परिषद् को इसकी उत्तम व्यवस्था का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सरकार को भी विभिन्न मेलों का आयोजन करके सभी का उत्साहवर्धन करना चाहिए।

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5. राष्ट्रीय पर्व : स्वतन्त्रता दिवस

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना
  • स्वतन्त्रता दिवस की महत्ता
  • नाना प्रकार के आयोजन
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना
भारत उत्सव प्रधान देश है। हमारे देश में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक आयोजन होते रहते हैं किन्तु ये त्यौहार प्रान्त, धर्म एवं जाति तक के दायरे में रहते हैं

जिस त्यौहार को समस्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता है उसे राष्ट्रीय पर्व कहते हैं। सन् 1947 में हमारे देश ने गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आजादी की स्वच्छन्द हवा में पहली साँस ली थी। इतनी कुर्बानियों एवं संघर्षों से मिली आजादी के परम हर्षोल्लास के दिवस पर हमारा देश 15 अगस्त के दिन राष्ट्रीय पर्व का आयोजन करता है।

2. स्वतन्त्रता दिवस की महत्ता-
इस स्वतन्त्रता दिवस की प्राप्ति के लिए हमारे देश के न जाने कितने सपूतों ने अंग्रेजों के कोड़े खाए। कारागार में बन्दी रहे तथा न जाने कितने वीर शहीद अपनी माँ की गोद सूनी करके, अपनी पत्नी की माँग का सिन्दूर पोंछकर अपनी बहन एवं भाइयों एवं बच्चों को रोता-बिलखता छोड़कर भारत माता को स्वतन्त्र कराने के लिए हँसते-हंसते फाँसी के तख्ते पर झूल गये। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अहिंसा आन्दोलन

चलाकर अंग्रेज सरकार के छक्के छुड़ा दिए। दूसरी ओर गरम दल के सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, शहीद भगतसिंह इत्यादि द्वारा देश की स्वतन्त्रता के लिए किया गया बलिदान अमिट एवं अविस्मरणीय है। 14 अगस्त, 1947 की आधी रात को देश के स्वतन्त्र होने की घोषणा कर दी गयी थी। 15 अगस्त, 1947 को हमारे देश की आजादी का तिरंगा दिल्ली के लाल किले पर फहराया गया था। समस्त देश एवं देशवासी प्रसन्नता से झूम उठे थे।

3. नाना प्रकार के आयोजन-
इस दिन सभी कॉलेज, कार्यालय इत्यादि में छुट्टी रहती है। सभी सरकारी भवनों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है। बहुत से लोग अपने घरों के ऊपर भी तिरंगा फहरा देते हैं। जुलूस आदि निकलते हैं। सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया जाता है। रात में रोशनी की सजावट की जाती है। प्रत्येक वर्ष प्रधानमन्त्री दिल्ली के लाल किले पर ध्वजारोहण करते हैं। तीनों (जल, थल, नभ) सेनाएँ एवं स्कूली छात्र-छात्राएँ एवं एन. सी. सी. कैडेट राष्ट्रीय ध्वज को अपनी सलामी देते हैं। तत्पश्चात् प्रधानमन्त्री राष्ट्र के नाम सन्देश देते

स्कूल, विद्यालय एवं कॉलेजों में ध्वजारोहण के पश्चात् प्रधानाचार्य अपने भाषण द्वारा छात्र-छात्राओं को हृदय में देश प्रेम एवं उसके प्रति उनके कर्तव्यों का ज्ञान कराते हैं। उसके पश्चात् मिठाई बाँटी जाती है। प्रभातकालीन फेरी लगायी जाती है। स्कूलों में बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं।

4. उपसंहार-
इस प्रकार शहीदों की शहादत से मिली स्वतन्त्रता का हमें दुरुपयोग न करके उसे सदैव स्थायी बनाये रखने का प्रयास करना चाहिए। देश में भाई-चारे एवं प्रेम की भावना को विकसित एवं कायम रखते हुए, देश की अखण्डता एवं स्वतन्त्रता को सुरक्षित बनाये रखते हुए, सत्य, प्रेम, अहिंसा की त्रिवेणी प्रवाहित करनी चाहिए जिससे हमारी भारत माता एवं उसके सभी निवासी सुख, प्रेम एवं शान्ति के सागर में अवगाहन करते हुए देश को विकास के मार्ग पर अग्रसर करते हुए विश्व के समक्ष एक मिसाल प्रस्तुत कर सके।

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6. दीपावली

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना
  • दीपावली का इतिहास एवं महत्ता
  • मनाने का तरीका
  • लाभ-हानि
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना-
आज व्यक्ति दैनिक कार्यों में इतना व्यस्त है कि सारे दिन के परिश्रम के फलस्वरूप वह कुछ स्वस्थ मनोरंजन की अपेक्षा करता है। इसलिए हमारे यहाँ त्यौहारों को धूमधाम से मनाने की परम्परा चली आ रही है। जैसे-दशहरा, रक्षाबन्धन, होली एवं दीपावली। इनमें से प्रमुख त्यौहार है-दीपावली। ये अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। यह अन्धकार पर प्रकाश की विजय है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। यह कार्तिक अमावस्या के दिन मनायी जाती है। दीपक प्रकाश एवं ज्ञान का प्रतीक माना गया है। यह अन्धकार में प्रकाश फैलाता है। इस दिन सभी लोग अपने घरों के अन्दर एवं बाहर दीपक जलाते हैं।

2. दीपावली का इतिहास एवं महत्ता-
इसी दिन भगवान श्रीराम चौदह वर्ष पश्चात् अयोध्या में लंका पर विजय प्राप्त करके आये थे। अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी यादगार में दीपावली का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ प्रतिवर्ष मनाया जाता है। दीपावली से पहले विजयादशमी के दिन राम ने रावण का वध करके विजयश्री प्राप्त की थी। इसी प्रकार एक दूसरी कथा है द्वापर युग की। इस युग में नरकासुर नामक राजा ने अनेक राजाओं को पराजित करके उनकी कन्याओं को बन्दी बना लिया था। उनकी करुण पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन कार्तिक अमावस्या को उन कन्याओं को बन्दीगृह से मुक्त कराया था। एक और कथा राजा बलि से सम्बन्धित है कि भगवान राजा बलि की परीक्षा लेने के लिए बामन अवतार लेकर आये थे।

राजा बलि की दानशीलता देखकर भगवान विष्णु ने सभी को यह आदेश दिया कि दीप जलाकर उत्सव मनाया करो। इसी दिन समुद्र मन्थन से माँ लक्ष्मी उत्पन्न हुई थीं। इसके अलावा माँ महाकाली ने रक्त बीज का वध करके एवं राक्षसों का खून पीने के उपरान्त जब माँ रोष में आ गईं तो दीपक प्रज्ज्वलित करके उनकी पूजा की गयी थी। तब से ही बंगाली लोग माता महाकाली की पूजा धूमधाम से करते हैं। जैनियों के भगवान महावीर स्वामी का महानिर्वाण भी इसी दिन का है। स्वामी दयानन्द भी आज ही के दिन ब्रह्मलीन हुए थे। स्वामी रामतीर्थ का जन्म एवं मरण भी इसी दिन का है। पुराने समय से व्यापारी विदेशों में व्यापार कर धन अर्जित

करके इसी दिन घर लौटकर अत्यन्त हर्षोल्लास सहित इस उत्सव को मनाकर लक्ष्मी पूजन करते थे।
दीपावली हमारा सांस्कृतिक त्यौहार है। वर्षा के उपरान्त सब जगह मच्छर एवं गन्दगी हो जाती है। दीपावली के बहाने घरों में पुताई हो जाती है। सफाई से मच्छर भाग जाते हैं। दीपकों के जलने से वातावरण शुद्ध हो जाता है। नयी फसल बोने की खुशी में कृषक इसे उल्लासपूर्वक मनाते हैं।

3. मनाने का तरीका-
दीपावली का प्रारम्भ धनतेरस से हो जाता है। इसी दिन सभी हिन्दू चाहे वे धनी हों अथवा निर्धन अपनी सामर्थ्य के अनुसार बर्तन खरीदते हैं। दूसरे दिन नरक चौदस होती है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध किया था। इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। बड़ी दीपावली के दिन रात्रि को धन की लक्ष्मी एवं विघ्न विनाशक भगवान गणेश का पूजन किया जाता है।

मान्यता है कि पूरी रात श्री लक्ष्मी गणेश के सामने दीप जलते रहने से खूब धन घर में आता है। रात्रि को सब अपने घरों में दीप जलाकर प्रकाश करते हैं। रात को बच्चे-बड़े पटाखे एवं आतिशबाजी जलाते हैं तथा बच्चे फुलझड़ियाँ छुड़ाकर खुशी मनाते हैं। दूसरे दिन पड़वा को गोवर्धन की पूजा होती है। अन्नकूट की सब्जी बनायी जाती है। द्वितीया को भैया दौज मनायी जाती है। इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों को टीका करती हैं और भाई उन्हें भेंट देते हैं। इस दिन सभी नये कपड़े पहनते हैं।

4. लाभ-हानि-
बरसात की सारी गन्दगी एवं प्रदूषण का सफाया हो जाता है। सफाई होने से रोग के कीटाणु समाप्त हो जाते हैं लेकिन कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते हैं। यह सारे संकटों का कारण है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इससे बचकर रहना चाहिए।

5. उपसंहार-
यह त्यौहार अच्छाई की बुराई पर विजय है। भगवान राम ने स्वयं अपने श्रीमुख से कहा है कि
“सखा धर्ममय रस रथ जाके, जीतन सकै न कतहुँ रिपु
ताके॥”
इसी आधार पर सैन्य बल रहित, रथ रहित एवं शस्त्र रहित भगवान राम ने सर्वशक्तिसम्पन्न रावण पर विजय प्राप्त की थी। इन बातों से हमें यह शिक्षा लेनी चाहिए कि हमें कर्तव्यों का पालन करते हुए सही मार्ग पर चलते रहना चाहिए।

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7. विद्यालय का वार्षिकोत्सव 

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना
  • तैयारियाँ
  • उत्सव के कार्यक्रम
  • उपसंहार

1. प्रस्तावना-
उत्सव मनुष्य के हृदय की खुशी को व्यक्त करते हैं। आज मानव दैनिक कार्यों में बुरी तरह जुटा हुआ है।उसे जीवन बोझ स्वरूप लगने लगता है। मानव उत्सवों में भाग लेकर जिन्दगी की परेशानियों से कुछ समय के लिए छुटकारा प्राप्त कर सकता है। जीवन में रस का संचार होता है।

2. तैयारियाँ-
हमारे विद्यालय में वार्षिकोत्सव की तैयारियाँ करीब एक सप्ताह पूर्व प्रारम्भ हो जाती हैं। विद्यालय भवन को रंग-रोगन तथा पुताई करके बहुत ही आकर्षक बनाया गया। मुख्य द्वार को रंग-बिरंगी झण्डियों तथा झालरों से सजाया गया। कहीं ऊँची कूद का अभ्यास हो रहा था तो कहीं दौड़ का। नाटक, कविता तथा वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाले जी जान से तैयारियों में जुटे हुए थे। अध्यापकगण भी छात्रों के उत्साह को बढ़ा रहे थे।

3. उत्सव के कार्यक्रम-
पहले दिन मुख्य अतिथि के पधारने पर प्रधानाचार्य ने उनका जोशीला स्वागत किया। सम्मानपूर्वक उन्हें मंच पर ले जाकर फूलमाला पहनाई गई। सभी ने ताली बजाकर प्रसन्नता प्रकट की। छात्रों ने नाटक, कविता, भाषण तथा खेलकूद में अपने करतब दिखाए। डॉक्टर रामकुमार द्वारा लिखित एकांकी ‘दीपदान’ अभिनीत किया गया। इसको छात्रों ने इतनी कुशलता के साथ प्रदर्शित किया कि पन्ना धाय के बलिदान के प्रति करुणा तथा बलिदान का सागर हिलोरें लेने लगा।

मुख्य अतिथि ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पुरस्कार वितरित किए। प्रधानाचार्य ने विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट पढ़कर सुनाई। सभी ने विद्यालय की उन्नति पर गौरव का अनुभव किया। अन्त में मुख्य अतिथि ने भाषण दिया। उन्होंने विद्यालय की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया।

4. उपसंहार-
विद्यालय के वार्षिकोत्सव के चार दिन बहुत ही जोश तथा खुशी से बीते। अब जब कभी उन दिनों की याद आती है तो मन आनन्द तथा उमंग से भर जाता है। वास्तव में, विद्यालय के वार्षिकोत्सव छात्रों में हेल-मेल तथा भाईचारे का बीज बोते हैं तथा प्रेम का विस्तार करते हैं। इससे विद्यालय का गौरव बढ़ता है।

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8. गणतन्त्र दिवस (राष्ट्रीय पर्व)

रूपरेखा

  • प्रस्तावना
  • गणतन्त्र दिवस का इतिहास
  • भारतीय गणतन्त्र दिवस
  • गणतन्त्र दिवस का महत्त्व व उपयोगिता
  • गणतन्त्र दिवस का सन्देश
  • उपसंहार

1. प्रस्तावना-
एक पक्षी सोने के पिंजरे में सम्पूर्ण खानपान की सुविधाओं से युक्त होकर भी पराधीनता का जीवन बिताने को बेबस होता है। अपने अन्नदाता के संकेतों पर वह विविध कार्य करता है। स्वच्छन्द उड़ान का सपना देखता है। उसकी आत्मा में एक अजीब पीड़ादायक तड़प उठती है। यही तड़पन थी जो सन् 1857 ई. में प्रथम स्वतन्त्रता संघर्ष में परिवर्तित हो गई थी।

2. गणतन्त्र दिवस का इतिहास-
प्रथम स्वतन्त्रता संघर्ष सन् 1857 ई. में बर्बर अंग्रेज शासकों ने कुचल दिया। यह दबी हुई आग सुलगती हुई बाल गंगाधर तिलक की सिंह गर्जना में ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ फूट पड़ी। महात्मा गाँधी राजनैतिक रंगमंच पर प्रकट हुए। जवाहरलाल नेहरू ने राजसी

वैभव त्यागा और स्वतन्त्रता की साधना की धूनी रमा ली। कांग्रेस |दल ने रावी तट पर एक सभा में पूर्ण स्वराज की माँग करडाली। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 26 जनवरी, 1930 की अन्धेरी रात्रि में तिरंगे तले कांग्रेस का अधिवेशन सम्पन्न हआ। नेहरू के साथ सभी सदस्यों ने अपने लक्ष्य की घोषणा की कि

“आज से हमारा लक्ष्य है-पूर्ण स्वराज।” सत्याग्रह चले, बर्बर विदेशी शासकों के हौसले पस्त होने लगे। हमारे क्रान्तिकारियों के बलिदानों से परन्तु विजय हुई सत्य की, अहिंसा की, स्वतन्त्रता के दीवारों की ओर अमर बलिदानियों की और 15 अगस्त, सन् 1947 ई. को भारत ने स्वतन्त्र वायुमण्डल में साँस ली। लाल किले के लहराते तिरंगे ने प्रेरणा दी अभी संघर्ष बाकी है। संविधान बना। भारत को सार्वभौम सत्ता सम्पन्न गणराज्य घोषित करते हुए 26 जनवरी, सन् 1950 ई. के पवित्र दिन हमारा संविधान लागू हुआ।

3. भारतीय गणतन्त्र दिवस-
भारत ने 26 जनवरी, 1950 ई. को अपने द्वारा निर्मित संविधान के अनुरूप शासन चलाने की स्वतन्त्रता प्राप्त की। संविधान में जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधियों द्वारा देश का शासन चलाने की व्यवस्था की गयी। विभिन्न राज्यों में जनता के प्रतिनिधियों की सरकार होगी और उन राज्यों का समूह भारत राष्ट्र निर्माण करेगा। 26 जनवरी को भारत में गणतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था लागू हुई थी, इसलिए इस पवित्र दिन को गणतन्त्र दिवस कहा जाता है।

4. गणतन्त्र दिवस का महत्त्व व उपयोगिता-
यह दिवस भारतीय स्वतन्त्रता के दीवाने अमर शहीदों की स्मृति दिलाता है। राष्ट्र की प्रगति को प्रदर्शित करती विभिन्न झाँकियाँ जन-जन के मन को स्पर्श करती हैं। राष्ट्रपति का सन्देश राष्ट्र निर्माण में लगे रहने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक नगर, प्रत्येक गाँव में यह दिवस धूमधाम से मनाया जाता है। प्रभात फेरियाँ निकलती हैं। ध्वजारोहण होता है। भाषण होते हैं। भारतीय स्वतन्त्रता और उसकी अखण्डता की शपथ दिलायी जाती है।

5. गणतन्त्र दिवस का सन्देश-हमारा गणतन्त्र दिवस प्रत्येक वर्ष प्रगति का नया सन्देश लेकर आता है। इसके सन्देश को 26 जनवरी के उदित होते सूर्य की प्रथम किरण के साथ ही लहरों पर थिरकते, तैरते सभी के द्वारा जल, थल और नभ में सर्वत्र स्वर लहरियों में सुना जाता है। भारत के प्रत्येक नागरिक की अन्तरात्मा में भारत की रक्षा का सन्देश, उसकी अखण्डता का सन्देश और उसकी स्वाधीनता का सन्देश सुनायी पड़ता है।

6. उपसंहार-
गणतन्त्र दिवस का पवित्र राष्ट्रीय पर्व हमें देश पर अपने प्राण न्यौछावर करने की प्रेरणा देता है। यह प्रतिज्ञा का दिवस है। हमारे हृदय में इस दिन एक ही स्वर गूंजता रहता
“जिएँ तो सदा इसी के लिए यही अभिमान रहे यह हर्ष। निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।”

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9. खेलों का महत्व

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना
  • मन और मस्तिष्क से खेल का सम्बन्ध
  • खेल का महत्त्व
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना-
कहा जाता है कि “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।” यदि मनुष्य अपना सम्पूर्ण विकास करना चाहता है तो उसके शरीर का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। शरीर को स्वस्थ बनाने में खेलों का विशेष योगदान है। खेल स्वास्थ्य का सर्वोत्तम साधन हैं। उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है।

2. मन और मस्तिष्क से खेल का सम्बन्ध-
खेल का सम्बन्ध मनुष्य के मन और मस्तिष्क से होता है। खिलाड़ी अपनी रुचि के अनुसार ही खेल चुनता है। रुचि जब तृप्त होती है, रुचि के अनुकूल जब मनुष्य को कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है, तब ये रुचियाँ उसके आत्मविकास में सहायक होती हैं। इसी प्रकार खेल का सम्बन्ध आत्मा से होता है।

दिनभर के मानसिक श्रम के बाद खेलना मनुष्य के लिए आवश्यक है। केवल एक ही प्रकार का कार्य करते रहने से, मानसिक श्रम करते रहने से मस्तिष्क रुक जाता है। शरीर भी थकान और उदासीनता अनुभव करता है। यदि व्यक्ति खेल के मैदान पर नहीं उतरता है तो वह व्यक्ति भोजन के बाद केवल निद्रा में निमग्न हो जायेगा। मानसिक कार्य करने की क्षमता समाप्त होती जायेगी। प्रात:काल जब वह सोकर उठेगा तो नई ताजगी और उत्साह का अभाव ही पाएगा।

वास्तविकता यह है कि खेल में जिसकी रुचि नहीं है, उस व्यक्ति का जीवन उदासीन और निराश रहता है। इसके विपरीत जिस व्यक्ति की खेल में रुचि है, वह सदैव प्रसन्न रहता है। वह जीवन में आने वाले संघर्षों तथा उतार-चढ़ावों से भयभीत न होकर उनका डटकर सामना करता है।

3. खेल का महत्त्व-
खेल एक ओर मनोरंजन का अच्छा साधन है तो दूसरी ओर समय के सदुपयोग का सबसे उत्तम तरीका। मनोरंजन का जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। मनोरंजन से मनुष्य की थकान और उदासीनता दूर होती है। इसलिए मनुष्य मनोविनोद को जीवन में अपनाता है। खेल के मैदान में खिलाड़ी, दिनभर की थकान, चिन्ता इत्यादि को भूल जाता है। खेल के मैदान पर उसका मन निर्मल हो जाता है।

इसके विपरीत जिन व्यक्तियों को खेल में रुचि नहीं है, वे अपना अमूल्य समय, व्यर्थ में ही नष्ट करते हैं। खेल के मैदान में मनुष्य अपने समय का सदुपयोग करता है। खेल के मैदान पर व्यक्ति में सहयोग और मित्रता की सामाजिक भावना का उदय होता है, जिसकी जीवन में पग-पग पर आवश्यकता पड़ती है और जिससे जीवन सजता है, सँवरता है और निखरता है।

इसे ही खिलाड़ी भावना’ कहा गया है। खेल के मैदान पर व्यक्ति एक-दूसरे के शत्रु रहकर भी मित्रता का व्यवहार करते हैं। आपस में उनमें प्रेम और सद्भाव रहता है। उनमें सहयोग और सहानुभूति की भावना कूट-कूटकर भरी होती है। खेलने से अनुशासन का गुण विकसित होता है। खेल से जीवन में संघर्ष करने की भावना पैदा हो जाती है जिसे हम ‘खिलाड़ी प्रवृत्ति’ कहते हैं। इस प्रकार,खेलों से अनुशासन, एकता, साहस तथा धैर्य की शिक्षा मिलती है। खिलाड़ी के ये गुण ही, उसके भावी जीवन का निर्माण करते हैं।

व्यावहारिक जीवन में भी खेल का बहुत महत्त्व है। छात्र जीवन में खेल के कारण छात्र लोकप्रिय हो जाता है। सभी लोगों के प्रेम का पात्र बन जाता है। शिक्षा के पूर्ण होने पर वह जीवन क्षेत्र में उतरता है और किसी पद का प्रत्याशी बनता है। तब खेल उसके निर्वाचन की कसौटी सिद्ध होता है। खिलाड़ी जहाँ भी जाते हैं, सफलता पाते हैं और नौकरियों में उन्हें प्राथमिकता मिलती है।

4. उपसंहार-
खेल और ज्ञान का उचित सम्बन्ध होने पर ही व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास हो सकेगा और वह अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकेगा।

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10. शिक्षक

रूपरेखा

  • प्रस्तावना
  • आदर्श शिक्षक
  • उपसंहार।

1. प्रस्तावना-
प्राचीनकाल से ही शिक्षक को राष्ट्रनिर्माता के रूप में सम्मान प्राप्त होता रहा है। शिक्षकों के शब्द विद्यार्थियों के लिए कानून के समान होते थे। वे उनके कथन का पालन हर स्थिति में किया करते थे। शिक्षक भी अपने सारे जीवन को शिष्यों, समाज और राष्ट्र के सनिर्माण में लगा देते थे। आज शिक्षा पद्धति ने शिक्षक को वेतनभोगी बना दिया है। वह एक कर्मचारी है। शिक्षक विद्यादानी न होकर नौकरी करने वाला साधारण व्यक्ति बन गया है। वह राजनीति की गन्दगी में फंस गया है। उसमें बुरी प्रवृत्तियाँ पनप गयी हैं। वह आदर्शों और । यथार्थ से दूर भटक गया है।

2. आदर्श शिक्षक-
शिक्षक समाज की बुद्धि है। वह अपने ज्ञान से समाजगत अन्धकार को मिटाता है। वह अपने विषय का ज्ञाता होता है। वह स्वयं अध्ययन और अध्यापन में व्यस्त रहता है। आदर्श शिक्षक नवीनतम् खोजों और शोधों की जानकारी अपने शिष्यों को देता है। उन्हें राष्ट्रीयता के मन्त्र से प्रभावित करता है। वह समयबद्ध कार्यों को पूरा करता है। समय का पालन करके समय को व्यर्थ नहीं गंवाता। वह सदैव ध्यान रखता है कि समय बहुत कीमती धन है जिसकी बचत करके नए ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
एक शिक्षक का उद्देश्य अपने अन्दर निर्मलता और निष्पक्षता लाकर सभी छात्रों की भलाई करना होता है। एक अच्छा शिक्षक कभी भी धनवान और सामर्थ्यवान शिष्यों के प्रति पक्षपात नहीं करता। उनका रहन-सहन सादा होता है। सादा जीवन और उच्च विचार ही उसकी जीवन शैली होती है।”

3. उपसंहार-
आदर्श शिक्षक अपनी धनराशि को अच्छे | साहित्य और पुस्तकों पर खर्च करता है। उसकी बोली में मिठास होती है। वेशभूषा सादा होती है। सही अर्थों में ऐसा शिक्षक राष्ट्रनिर्माता होता है। वह भावी पीढ़ी का निर्माण करता है। वह मानवता का रक्षक व पालक कहा जा सकता है। मानव हित ही उसका सिद्धान्त होता है। वह परमब्रह्म के पद से पुकारा जाने वाला गुरु सबके कल्याण का काम करता हुआ यशस्वी जीवन जीता है।

MP Board Class 8th Hindi Solutions

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.5

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.5

प्रश्न 1.
निम्नलिखित गुणनफलों में से प्रत्येक को प्राप्त करने के लिए उचित सर्वसमिका का उपयोग कीजिए –

  1. (x + 3) (x + 3)
  2. (2y + 5) (2y + 5)
  3. (2a – y) (2a – y)
  4. (3a – \(\frac{1}{2}\)) (3a – \(\frac{1}{2}\))
  5. (11m – 0.4) (1.1m + 0.4)
  6. (a2 + b2)(- a2 + b2)
  7. (6x – 7) (6x + 7)
  8. (- a + c) (- a + c)
  9. (\(\frac{x}{2}\) + \(\frac{3y}{4}\)) (\(\frac{x}{2}\) + \(\frac{3y}{4}\))
  10. (7a – 9b) (7a – 9b)

हल:
1. (x + 3) (x + 3)
सर्वसमिका (a + b)2 = a2 + 2ab + b2 के उपयोग से,
(x + 3)2 = x2 + 2 x 3 × x + (3)2
= x2 + 6x + 9

2. (2y + 5) (2y + 5) = (2y + 5)2
सर्वसमिका (a + b)2 = a2 + 2ab + b2 का उपयोग करने पर,
∴ (2y + 5) = (2y)2 + 2 x (2y) x 5 + (5)2
= 4y2 + 20y + 25

3. (2a – 7) (2a – 7) = (2a – 7)2
सर्वसमिका (a – b)2 = a2 – 2ab + b2 का उपयोग करने पर,
∴ (2a – 7)2 = (2a)2 – 2 x 2a x (7) + (- 7)2
= 4a2 – 28a + 49

4. (3a – \(\frac{1}{2}\)) (3a – \(\frac{1}{2}\)) = (3a – \(\frac{1}{2}\))2
सर्वसमिका (a – b)2 = a2 – 2ab + b2 का उपयोग करने पर,
∴ (3a – \(\frac{1}{2}\))2 = (3a)2 – 2 x (3a) x (\(\frac{1}{2}\)) + (- \(\frac{1}{2}\))2
= 9a2 – 3a + \(\frac{1}{4}\)

5. (1.1m – 0.4) (1.1m + 0.4)
सर्वसमिका (a – b) (a + b) = a2 – b2 का उपयोग करने पर,
∴ (1.1m – 0.4) (11m + 0.4) = (1.1m)2 – (0.4)2
= 1.21m – 0.16

6. (a2 + b2) (- a2 + b2) = (b2 + a2) (b2 – a2)
सर्वसमिका (a + b) (a – b) = a2 – b2 का उपयोग करने पर,
∴ (b2 + a2) (b2 – a2) = (b2)2 – (a2)2
= b4 – a4

7. (6x – 7) (6x + 7)
सर्वसमिका (a – b)(a + b) = a2 – b2 का उपयोग करने पर
∴ (6x – 7) (6x + 7) = (6x)2 – (7)2
= 36x2 – 49

8. (- a + c) (- a + c) = (- a + c)2
सर्वसमिका (a – b)2 = a2 – 2ab + b2 का उपयोग करने पर,
= (- a)2 – 2(a)(c) + (c)2
= a2 – 2ac + c2

9. (\(\frac{x}{2}\) + \(\frac{3y}{4}\)) (\(\frac{x}{2}\) + \(\frac{3y}{2}\)) = (\(\frac{x}{2}\) + \(\frac{3y}{4}\))2
सर्वसमिका (a + b)2 = a2 + 2ab + b2 का उपयोग करने पर,
(\(\frac{x}{2}\) + \(\frac{3y}{4}\))2 = (\(\frac{x}{2}\))2 + \(\frac{x}{2}\) x \(\frac{3y}{4}\) + (\(\frac{3y}{4}\))2
= \(\frac { x^{ 2 } }{ 4 } \) + \(\frac{3xy}{4}\) + \(\frac { 9y^{ 2 } }{ 4 } \)

10. (7a – 9b) (7a – 9b) = (7a – 9b)2
सर्वसमिका (a – b) = a2 – 2ab+ b2 का उपयोग करने पर,
∴ (7a – 7b) = (7a)2 – 2 x 7a x 9b + (9b)2
= 49a2 – 126ab + 81b2

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित गुणनफलों को ज्ञात करने के लिए सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b) x + ab का
उपयोग कीजिए –

  1. (x + 3) (x + 7)
  2. (4x + 5) (4x + 1)
  3. (4x – 5) (4x – 1)
  4. (4x + 5) (4x – 1)
  5. (2x + 5y) (2x + 3y)
  6. (2a2 + 9) (2a2 + 5)
  7. (xyz – 4) (xyz – 2).

हल:
1. (x + 3) (x + 7)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab में
a = 3 तथा b = 7 रखने पर,
(x + 3) (x + 7) = x2 + (3 + 7)x + 3 x 7
= x2 + 10x + 21

2. (4x + 5) (4x + 1)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b) x + ab में
x = 4x, a = 5 तथा b = -1 रखने पर,
(4x + 5) (4x + 1) = (4x)2 + (5 + 1) 4x + 5 x 1
= 16x2 + 4x + 5

3. (4x – 5) (4x – 1)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b) x + ab में
x= 4x, a = -5 तथा b = 1 रखने पर,
(4x – 5) (4x – 1) = (4x)2 + (- 5 – 1)4x + (-5)(-1)
= 16x2 – 24x + 5

4. (4x + 5) (4x – 1)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab में
x = 4x, a = 5 तथा b = – 1 रखने पर,
(4x + 5) (4x – 1) = (4x)2 + (5 – 1)4x + (5)(-1)
= 16x2 + 16x – 5

5. (2x + 5y) (2x +3y)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab में
x = 2x, a = 5y तथा b = 3y रखने पर,
(2x + 5y) (2x + 3y)= (2x)2 + (5y + 3y) (2x) +5y x 3y
= 4x2 + 16xy + 15y2

6. (2a2 + a) (2a2 + 5)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab में
x = 2a2, a = 9 तथा b = 5 रखने पर,
(2a2 + 9) (2a2 + 5) = (2a2)2 + (9 + 5) 2a2 + 9 x 5
= 4a4 + 28a2 + 45

7. (xyz – 4) (xyz – 2)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab में
x = xyz, a =- 4 तथा b = – 2 रखने पर,
(xyz – 4) (xyz – 2) = (xyz) + (- 4 – 2)xyz + (- 4)(- 2)
= x2y2z2 – 6xyz +8

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प्रश्न 3.
सर्वसमिका का उपयोग करते हुए निम्नलिखित वर्गों को ज्ञात कीजिए –

  1. (b – 7)2
  2. (xy + 3z)2
  3. (6x2 – 5y
  4. (\(\frac{2}{3}\)m + \(\frac{3}{2}\)n)2
  5. (0.4p – 0.54)2
  6. (2xy + 5y)2

हल:
1. (b – 7)2 सर्वसमिका (a – b)2 = a2 – 2ab + b2 से,
(b – 7)2 = b2 – 2 x b x 7 + (7)2
= b2 – 14b + 49

2. (xy + 3z)
सर्वसमिका (a + b)2 = a2 + 2ab + b2 से,
(xy + 3z)2 = (xy) + 2 × xy x 3z + (3z)2
= xy2 + 6xyz + 9z2

3. (6x2 – 5y)2
सर्वसमिका (a – b)2 = a2 – 2ab + b2 से,
(6x2 – 5y)2 = (6x2)2 – 2 x 6x2 × 5y + (5y)2
= 36x4 – 60xy + 25y2

4. (\(\frac{2}{m}\)m – \(\frac{3}{2}\)n)2
सर्वसमिका (a + b)2 = a2 + 2ab + b2 से,
(\(\frac{2}{3}\)m + \(\frac{3}{2}\)n)2 = (\(\frac{2}{3}\)m)2 + 2 x \(\frac{2}{3}\)m x \(\frac{3}{2}\)n + (\(\frac{3}{2}\)n)2
= \(\frac{4}{9}\)m2 + 2mn + \(\frac{9}{4}\)n

5. (0.4p – 0.5q)2
सर्वसमिका (a – b)2 = a2 – 2ab + b2 से
(0.4p – 0.5q) = (0.4p)2 – 2 x 0.4p x 0.5q + (0.5q)2
= 0.16p2 – 0.4pq + 0.25q2

6. (2xy + 5y)2
सर्वसमिका (a + b)2 = a2 + 2ab + b2 से,
(2xy + 5y)2 = (2xy)2 + 2 x 2xy x 5y + (5y)2
= 4x2y2 + 20xy2 + 25y2

प्रश्न 4.
सरल कीजिए –

  1. (a2 – b2)2
  2. (2x + 5)2 – (2x – 5)2
  3. (7m – 8n)2 + (7m + 8n)2
  4. (4m +5n)2 + (5m +4n)2
  5. (2.5p – 1.5q)2 – (1.5p – 2.5q)2
  6. (ab + bc) – 2ab2c
  7. (m2 – n2 – m)2 + 2m3n2

हल:
1. (a2 – b2)2 = (a2)2 – 2 x a2 x b2 + (b2)2
= a4 – 2a2b2 + b4

2. (2x + 5)2 – (2x – 5)2
= (4x2 + 20x + 25) – (4x2 – 20x + 25)
= 4x2 + 20x + 25 – 4x2 + 20x – 25
= 40x

3. (7m – 8n)2 + (7m + 8n)2
= (49m2 – 112mn + 64n2) + (49m2 + 112mn + 64n2)
= 49m2 – 112mn + 64n2 + 49m2 + 112mn + 64n2
= 98m2 + 128n2

4. (4m + 5n)2 + (5m + 4n)2
= (16m2 + 40mn + 25n2) + (25m2 + 40mn + 16m2)
= 16m2 + 40mn + 25n2 + 25m2 + 40mn + 16n2
= 41m2 + 80mn + 41n2

5. (2.5p – 1.5q)2 – (1.5p – 2.5q)2
= (6.25p2 – 7.5pq + 2.25q2) – (2.25p2 – 7.5pq + 6.25q2)
= 6.25p2 – 7.5pq + 2.25q2 – 2.25p2 + 7.5pq – 6.25q2
= 6.25p2 – 2.25p2 + 2.25q2 – 6.25q2
= 4p2 – 4q2

6. (ab + bc)2 – 2ab2c
= ab2 + 2 x ab x bc + b2c2 – 2ab2c
= ab2 + 2ab2c + b2c2 – 2ab2c
= a2b2 + b2c2

7. (m2 – n2m2) + 2m3n2
= (m2)2 – 2 x m2 x n2m + (n2m)2 + 2m3n2
= m4 – 2m3n2 + n4m2 + 2m3n2
= m4 + n4m2

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प्रश्न 5.
दर्शाइए कि –

  1. (3x + 7)2 – 84x = (3x – 7)2
  2. (9p – 5q)2 + 180pq = (9p + 54)2
  3. (\(\frac{4}{3}\)m – \(\frac{3}{4}\)n)2 + 2mn = \(\frac{16}{9}\) m2 + \(\frac{9}{16}\)n2
  4. (4pq +3q)2 – (4pq – 3q)2 = 48pq2
  5. (a – b) (a + b) + (b – c) (b + c) + (c – a) (c + a) = 0.

हल:
1. (3x + 7)2 – 84x = (3x – 7)2
L.H.S. = (3x + 7)2 – 84x
= (9x2 + 42x + 49) – 84x
= 9x2 – 42x + 49
= (3x)2 – 2 x (3x) (7) + (7)2
= (3x – 7)2 = R.H.S.

2. (9p – 5q)2 + 180pq = (9p + 5q)2
L.H.S. = (9p – 5q)2 + 180pq
= 81p2 – 90pq + 25q2 + 180pq
= 81p2 + 90pq + 25q2
= (9p)2 + 2(9p)(5q) + (5q)2
= (9p + 5q) = R.H.S.

3. (\(\frac{4}{3}\)m – \(\frac{3}{4}\)1)2 + 2mn = \(\frac{16}{9}\) m2 + \(\frac{9}{16}\)n2
L.H.S. = (\(\frac{4}{3}\)m – \(\frac{3}{4}\))2 + 2mn
= \(\frac{16}{9}\) m2 – 2mn + \(\frac{9}{16}\)n2 + 2mm
= \(\frac{16}{9}\)m2 + \(\frac{9}{16}\)n2
= R.H.S.

4. (4pq + 3q)2 – (4pq – 3q)2 = 48pq2
L.H.S. = (4pq + 3q)2 – (4pq – 3q)2
= (16p2q2 + 24pq2 + 9q2) – (16p2q2 – 24pq2 + 9q2)
= 16p2q2 + 24pq2 + 9q2 – 16p2q2 + 24pq2 – 9q2
= 48pq2 = R.H.S.

5. (a – b)(a + b) + (b – c)(b + c) + (c – a)(c + a) = 0
L.H.S. = (a – b) (a + b) + (b – c) (b + c) + (c – a) (c + a)
= a2 – b2 + b2 – c2 + c2 – a2
= 0 = R.H.S.

प्रश्न 6.
सर्वसमिकाओं के उपयोग से निम्नलिखित मान ज्ञात कीजिए –

  1. 712
  2. 992
  3. 1022
  4. 9982
  5. 5.22
  6. 297 x 303
  7. 78 x 82
  8. 8.92
  9. 1.05 x 9.5

हल:
1. 712 = (70 + 1)2
= (70)2 + 2 x 70 x 1 + (1)2
= 4900 + 140 + 1
= 5041

2. 992 = (100 – 1)2
= (100)2 – 2 x 100 x 1 + (1)2
= 10000 – 200 + 1
= 9801

3. (102)2 = (100 + 2)2
= (100)2 + 2 x 100 x 2 + (2)2
= 10000 + 400 + 4 = 10404

4. (998)2 = (1000 – 2)2
= (1000)2 – 2 x 1000 x 2 + (2)2
= 1000000 – 4000 + 4
= 996004

5. (5.2)2 = (5 + 0.2)2
= (5)2 + 2 x 5 x 0.2 + (0.2)2
= 25 + 2 + 0.04
= 27.04

6. 297 x 303 = (300 – 3) (300 + 3)
= (300)2 – (3)2
[∴ (a – b) (a + b) = a2 – b2]
= 90000 – 9
= 89991

7. 78 x 82 = (80 – 2) (80 + 2)
= (80)2 – (2)2
= 6400 – 4
= 6396

8. (8.9)2 = (9 – 0.1)2
= (9)2 – 2 x 9 x 0.1 + (0.1)2
=81 – 1.8 + 0.01
= 81.01 – 1.8
= 79.21

9. 1.05 x 9.5 = (1 + 0.05) 9.5
= 1 x 9.5 + 0.05 x 9.5
= 9.5 + 0.475
= 9.975

प्रश्न 7.
a2 – b2 = (a + b) (a – b) का उपयोग करते हुए निम्नलिखित का मान ज्ञात कीजिए –

  1. 512 – 492
  2. (1.02)2 – (0.98)2
  3. 1532 – 1472
  4. 12.12 – 7.92

हल:
1. 512 – 492
a2 – b2 = (a + b) (a-b) का उपयोग करने पर,
512 – 4a2 = (51 + 49) (51 – 49)
= 100 x 2 = 200

2. (1.02)2 – (0.98)2
a2 – b2 = (a + b) (a – b) का उपयोग करने पर
(1.02)2 – (0.98)2 = (1.02 + 0.98) (1.02 – 0.98)
= 2.00 x 0.04 = 0.08

3. 1532 – 1472
a2 – b2 = (a + b)(a – b) का उपयोग करने पर
1532 – 1472 = (153 + 147) (153 – 147)
= 300 x 6 = 1800

4. 12.12 – 7.92
a2 – b2 = (a + b) (a – b) का उपयोग करने पर,
12.12 – 7.92 = (12.1 + 7.9) (12.1 – 7.9)
= 20 x 4.2 = 84

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प्रश्न 8.
(x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab का उपयोग करते हुए निम्नलिखित मान ज्ञात कीजिए –

  1. 103 x 104
  2. 5.1 x 5.2
  3. 103 x 98
  4. 9.7 x 9.8.

हल:
1. 103 x 104 = (100 + 3) (100 + 4)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab में
x = 100, a = 3 तथा b = 4 रखने पर,
(100 + 3) (100 + 4) = (100)2 + (3 + 4) 100 + 3 x 4
= 10000 + 700 + 24 = 10724

2. 5.1 x 5.2 = (5 + 0.1) (5 + 0.2)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab में,
x = 5, a = 0.1 तथा b = 0.2 रखने पर,
(5 + 0.1) (5.02) = (5)2 + (0.1 + 0.2) 5 + 0.1 x 0.2
= 25 + 1.5 + 0.02 = 26.52

3. 103 x 98 = (100 + 3) (100 – 2)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b) x + ab में
x = 100, a = 3 तथा b = – 2 रखने पर,
(100 + 3) (100 – 2)= (100)2 + (3 – 2) 100 – 3 x (-2)
= 10000 + 100 – 6 = 10094

4. 9.7 x 9.8 = (9 + 0.7) (9 + 0.8)
सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x2 + (a + b) x + ab में
x = 9, a = 0.7 तथा b = 0.8 रखने पर,
(9 + 0.7) (9 + 0.8) = (9)2 + (0.7+ 0.8)9 + 0.7 x 0.8
= 81 + 13.5 + 0.56 = 95.06

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MP Board Class 8th Sanskrit परिशिष्टम्

MP Board Class 8th Sanskrit परिशिष्टम्

MP Board Class 8th Sanskrit पुस्तक में दिये गये पद्यांशों का हिन्दी अनुवाद

1. संस्कृतस्य सेवनम् (संस्कृत की सेवा हो)

संस्कृतस्य सेवन………… संस्कृतं विराजताम्॥

भावार्थ :
संस्कृत की सेवा हो अर्थात् संस्कृत भाषा का व्यवहार हो एवं संस्कृत के लिए मानव जीवन हो तथा संसार के कल्याण की वृद्धि के लिए मानव शरीर समर्पित हो।-
(क) अपने कार्य की गरिमा का स्मरण करते हुए तथा विघ्न रूपी सागर को पार करते हुए अपने लक्ष्य की सफलता को दृष्टिगत (समक्ष) रखते हुए मैं स्वयं परिश्रम करता हूँ। जिससे प्रत्येक व्यक्ति तथा प्रत्येक घर में संस्कृत पहुँच सके तथा इसकी निरन्तर गतिशीलता हो सके तब लगाकर संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कदम बढ़ता रहे।

(ख) मैं सम्पत्ति की कामना नहीं करता हूँ और न भोगैश्वर्य साधन जन्य सुख की भी कामना करता हूँ अपितु संस्कृत की उन्नति के अतिरिक्त मैं किसी अन्य विषय को उसके समान आदर नहीं देता हूँ। अस्तु संस्कृत को अपने गौरवपूर्ण स्थान तक पहुँचाने के लिए अपने जीवन को दाँव पर लगातार प्रत्येक व्यक्ति को कमर कसनी होगी।

(ग) मेरे द्वारा यह जो वाणी कही गयी है, वह निश्चय ही कथित वाणी सुदृढ़तया अटल सत्य हो और साथ ही कहे जाते हुए भाव को प्राप्त कर पुनः-पुनः चिरकाल तक यही वाणी विराजमान हो। यह संस्कृत भाषा भारतभूमि का आभूषण है तथा सभी वाणियों का विशेषतः आभूषण है और साथ ही भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने वाली होने से संस्कृत सर्वथा विराजमान होती रहे।

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2. चिरवीना संस्कृता एषा (जो कभी पुरानी न हो ऐसी यह संस्कृत भाषा है।)

चिरनवीना संस्कृता ……….”अनुपमा सरसा॥चिरनवीना॥

भावार्थ :
जो कभी पुरानी न हो ऐसी यह संस्कृत भाषा है। यह देवताओं की भाषा है। जो कभी पुरानी न हो ऐसी यह संस्कृत भाषा है।

बहुत बड़ा जनसमुदाय इसमें श्वांस लेता है अर्थात् इसे बोलता है। इसमें अति प्राचीन वेद और साहित्य है अर्थात् हमारे बहुत प्राचीन वेद और साहित्य इसी संस्कृत भाषा में लिखे हुए हैं।

शास्त्रों से भरी, स्मृतियों के विचारों से युक्त और सर्वश्रेष्ठ कवियों के काव्यों के सार से रंग-बिरंगी सुन्दर पेटी वाली सुन्दर संस्कृत भाषा है।

वाल्मीकि और वेदव्यास मुनियों के द्वारा रचित रामायण और महाभारत महाकाव्य इसी भाषा में है।

कायरता के दोष से युद्ध से रुके हुए पार्थ (अर्जुन) को उसके युद्ध रूपी कार्य में लगाने वाली श्रीमद्भगवद् गीता को भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा कही गयी है, इसी संस्कृत भाषा में है।

यह संस्कृत भाषा भारत में बोली जाने वाली मातृभाषाओं की भी मातृभाषा है। यह भारतीयों की राष्ट्रभाषा होने के योग्य है जिससे भाषा का विरोध समाप्त हो जायेगा। यह बात हमेशा पूरे जोर-शोर से हम कहते हैं। यह भारतीयों की भाषा है, और अत्यन्त मधुर है।

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MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti महत्त्वपूर्ण पाठों के सारांश

MP Board Class 8th Hindi Bhasha Bharti Solutions महत्त्वपूर्ण पाठों के सारांश

1. आत्मविश्वास

जीवन में सफलता प्राप्त करने का एक शक्तिशाली मन्त्र है-आत्मविश्वास। जीवन के प्रत्येक पग पर हमें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वही मनुष्य जीवन में सफलता प्राप्त करता है, जिसे अपनी शक्ति एवं प्रयासों में पूर्ण विश्वास होता है।

अपने सद्प्रयासों और शक्तियों में विश्वास ही हमारे विरोध आत्महीनता, कायरता और कुसंस्कार उसकी शक्ति और मनोबल को आधा करके असफलता की ओर ले जाते हैं। मनुष्य में परिस्थितिजन्य भय उसे आत्मविश्वासहीन कर देता है। अपनी क्षमता पर विश्वास हमारे लिए सफलता को निश्चित करता है। केवल इस शर्त पर कि हमारे अन्दर अपनी क्षमता और सफलता में अखण्ड विश्वास हो। हमारे अन्दर भय, शंका और अधीरता से विश्वास डिग जाता है।

मनुष्य को सदैव ऐसे व्यक्तियों की संगति से दूर रहना वे सदैव असफल होने के भय से आक्रान्त रहते हैं। अपने आत्मगौरव और आत्मविश्वास की भावना को खण्डित होने से बचाए रखना चाहिए। मनुष्य किसी भी काम को हाथ में लेने से यह अनुभव करता है कि वह अवश्य सफल होगा, तो इससे बड़ा मन्त्र कोई नहीं है। जो व्यक्ति सफलता और विजय प्राप्त करने के प्रतिकूल (विरुद्ध) भाव रखता है, उसे सफलता कभी भी मिल ही नहीं सकती।

मनुष्य के विचार श्रेष्ठ हैं, सफलता के हैं, सौभाग्य के हैं, तो उसे सफलता, सौभाग्य और श्रेष्ठता आगे ही बढ़ाती जायेगी। निराश और निष्क्रिय व्यक्ति निठल्ले बैठकर सफल और श्रेष्ठ कार्य करने वाले व्यक्तियों को कोसते रहते हैं। हमारे सद्प्रयास सदैव सुख के द्वार को खोलते रहते हैं। खतरों से खेलने वाले व्यक्तियों के गले में ही विजयमाला पड़ती है।

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2. प्राण जाएँ पर वृक्ष न जाएँ

प्रस्तुत पाठ में पर्यावरण की रक्षा का महत्व समझाया गया है। पर्यावरण की शुद्धता को बनाए रखने में पेड़ों का बड़ा महत्व है। पेड़ों में अपने जैसा ही जीव होता है। अत: उनकी सुरक्षा अपने प्राण देकर भी करनी चाहिए। यही इस पाठ का मूल भाव है। साथ ही पर्यावरण की रक्षा के प्रति छात्रों में जागरूकता पैदा करना इस पाठ का मूल ध्येय है।

सम्पूर्ण विश्व चिन्ता में डूबा हुआ है क्योंकि वृक्षों की लगातार कटाई ने पर्यावरण को बिगाड़ दिया है। इसलिए सभी देशों की सरकारों ने वृक्षों के काटने पर रोक लगा दी है। आज से 500 वर्ष पूर्व सन् 1485 ई. में भगवान जम्भेश्वर ने विश्नोई समाज की स्थापना की। उन्होंने 29 नियमों का पालन करने का उपदेश दिया। इन्हीं नियमों में से वृक्षों की रक्षा और सभी जीवों पर दया करना एक मुख्य नियम था। इस नियम का पालन करना ही विश्नोई समाज की आन, बान, शान व पहचान है।

अमृतादेवी विश्नोई ने तथा 362 अन्य विश्नोइयों ने वृक्षों को काटे जाने से बचाने के लिए अपने आपको शहीद कर दिया। जोधपुर के राजा अभय सिंह ने अपने महल के निर्माण के लिए खेजड़ली गाँव से पेड़ काटकर लाने का आदेश अपने सिपाहियों को दे दिया। उन्होंने वहाँ जाकर विश्नोइयों के विरोध को अनदेखा कर दिया। अनेक विश्नोई पेड़ों से लिपट गए। वे पेड़ों को काटने से बचाने के लिए अपना बलिदान देने को तत्पर हो गए। वे नारा लगा रहे थे, “सिर साँटे पर रूख रहे।” अमृता देवी के बलिदान से प्रेरित 362 विश्नोई नर-नारी स्वयं कट गए पर एक भी वृक्ष नहीं कटने दिया।

इस समाचार को सुनकर राजा अभयसिंह दुःखी हुए और खेजड़ली ग्राम आए। अपनी सेना के कुकृत्य के लिए क्षमा माँगी। ताम्रपत्र पर आज्ञा जारी की गई कि कोई भी व्यक्ति पेड़ नहीं काटेगा। यदि काटेगा तो वह राजदण्ड का भागी होगा। इसी तरह हरिणों की रक्षा के लिए अनेक विश्नोइयों ने अपना बलिदान कर दिया। सन् 1996 के अक्टूबर महीने में राजस्थान के चुरू जिले में हरिणों की रक्षा करते हुए श्री निहालचन्द विश्नोई शहीद हो गए। भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त शौर्यचक्र से सम्मानित किया। गैर-सैनिक निहालचन्द को यह सम्मान प्राप्त हुआ। मूक हरिण भी अपने रक्षकों को अच्छी तरह पहचानते हैं। विश्नोइयों के आगे-पीछे हरिण बकरियों की तरह घूमते हैं।

वृक्षों और जीवों की रक्षा करने का संकल्प तथा नए वृक्ष लगाने और उनकी रक्षा करना ही शहीद विश्नोइयों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी।

भारत सरकार ने शहीद अमृता देवी तथा 362 अन्य शहीदों की स्मृति में राष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार प्रस्तावित किए हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने वन सम्वर्द्धन के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत अथवा किसी भी संस्था को एक लाख रुपये का पुरस्कार प्रस्तावित किया है। साथ ही अमृता देवी विश्नोई के नाम से दो व्यक्तिगत पुरस्कार भी चलाए हैं। ये सभी पुरस्कार उसे दिए जाते हैं जो वन सम्बर्द्धन और जीव रक्षा में उत्कृष्ट कार्य करता है।

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3. पथिक से

एक पथिक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर उस दिशा में आगे बढ़ता है लेकिन लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग अनेक बाधाओं रूपी काँटों से भरा होता है। इसके अतिरिक्त लक्ष्य मार्ग में – अनेक आकर्षक वस्तुएँ भी होती हैं, जिन्हें हम प्रकृति के विविध उपादान कह सकते हैं। इन उपादानों में सुहावने दृश्य, नदियाँ, झरने, पहाड़ और वन उस पथिक को आकर्षित कर सकते हैं। उनका सौन्दर्य एकदम अनुपम होता है। इस सौन्दर्य से प्रभावित होकर वह यात्री (पथिक) यात्रा-पथ पर आगे बढ़ने की अपेक्षा रुक जाता है।

साधारण यात्रा की जो दशा होती है, वही दशा जीवन-यात्रा की भी होती है। सांसारिक समस्याएँ मनुष्य को अपने कर्त्तव्य से विमुख बना देती हैं। दुःख, शोक और हताशा उसे कर्त्तव्य के प्रति उदासीन कर देते हैं। कवि डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ – अपनी इस कविता के माध्यम से जीवन-पथ के बने पथिक को : सचेत करते हैं और सद्परामर्श भी देते हैं कि इन सभी बाधाओं का साहस से और स्व-विवेक शक्ति से सामना करना चाहिए। इस प्रकार निरन्तर ही अपने कर्तव्य मार्ग पर आगे ही आगे बढ़ते 1 जाना चाहिए। अपनी कल्पनाओं को साकार करते जाना चाहिए।

जीवन-पथ की विफलताएँ तुम्हें अपने मार्ग से भटका न दें। उस विफलता के समय में अपने लोग भी पराये हो जाते हैं। घोर निराशा छा सकती है। उस अकेले पथिक को उचित मार्ग से – भटकाकर हताश न कर दें।
रणक्षेत्र की ओर जाने वाले जीवन-पथ पर अग्रसर होने की रणभेरी बज चुकी है अर्थात् कर्त्तव्य पालन का समुचित समय आगे आ चुका है। इस अवसर पर प्रेम और आकर्षण का कुमकुम तुम्हें कर्त्तव्य से विमुख न बना दे और अपने मार्ग से विमुख मत हो जाना। असमंजस की दशा में अपने कर्तव्य-पथ से मत भटक जाना। यही कविता का सार है।

4. युद्ध-गीता

राम को केन्द्र में रखकर अनेक ग्रन्थों की रचना की गई है। इन कविताओं में आदि कवि वाल्मीकि सबसे पहले हैं। कालिदास और भवभूति भी इसी परम्परा के पालन करने वाले कवि रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी ‘रामचरितमानस’, ‘कवितावली, ‘गीतावली’ आदि ग्रन्थों की रचना करके इसी परम्परा का पालन किया है। इसके सन्दर्भ में यह बात कही जा सकती है कि भूत, भविष्य और वर्तमान तथा देशकाल की सभी सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं।

देखिए, लंका-युद्ध श्रीराम और रावण के बीच लड़ा जा रहा है। रावण युद्ध करने के लिए अपने रथ पर आरूढ़ होकर चला आ रहा है। उसकी सेना भी शक्तिशाली है और विशाल है। उसके युद्ध सम्बन्धी साधन भी अपार हैं। दूसरे उसने युद्ध की तैयारी भी ठीक तरह से की हुई है।

विभीषण राम का मित्र है। वह अपने भाई रावण की दोषपूर्ण नीतियों के कारण उससे विमुख होकर राम से आ मिला है। वह मन में बहुत अधिक आशंकित है और विचार करता है कि राम के पास ऐसे कोई भी साधन नहीं हैं, जिनकी सहायता से वे रावण को पराजित कर पायेंगे। अपनी इस शंका को संशय को, विभीषण राम के सम्मुख रखता है। राम भी उसकी शंकाओं का समाधान करते हैं।

वे कहते हैं कि धर्म के कुछ आधारभूत तत्व होते हैं; ये तत्व हैं-शौर्य, धैर्य, सत्य, शील, साहस, यम-नियम, दम, दया तथा परोपकार। धर्म के इन आधारभूत तत्वों का सन्दर्भ देते हुए श्रीराम कहते हैं कि सद्गुण रूपी धर्मरथ पर चढ़कर ही हम अपने आन्तरिक और बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। तुलसीदास द्वारा राम के मुख से वर्णित धर्मरथ के रूपक को श्रीमद्भगवद्गीता के युद्ध सूत्रों द्वारा भी प्रतिपादित किया गया है। राम के धर्मरथ के उपांग-शौर्य और धैर्य (दो पहिए), सत्य और शील (ध्वजा-पताका), बल, विवेक, दम, परोपकार (चार घोड़े), क्षमा, दया, समता रस्से (डोरी), ईशभजन (सारथी), वैराग्य, सन्तोष, दान, बुद्धि, विज्ञान [युद्ध के हथियार (आयुध)], निर्मल और अचलमन (तरकश) हैं। यम-नियम और संयम (बाण) हैं।

ब्राह्मणों और गुरुओं की पूजा ही (कवच) है। कौरवों की विशाल सेना, युद्ध सामग्री आदि को देखकर अर्जुन भी अपनी आशंकाओं को भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख कहते हैं। श्रीकृष्ण उस कायर बने अर्जुन को अपने कौशल से । उत्साहित कर देते हैं और युद्ध में विजयी होते हैं। ठीक इसी तरह राम भी विभीषण को आश्वस्त कर देते हैं कि वे (राम) अवश्य । ही रावण पर विजय प्राप्त कर सकेंगे।

MP Board Class 8th Hindi Solutions

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.3

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.3

प्रश्न 1.
निम्नलिखित युग्मों में प्रत्येक के व्यंजकों का गुणन कीजिए –

  1. 4p, q+ r
  2. ab, a – b
  3. a + b, 7a2 – b2
  4. a2 – 9, 4a
  5. pq + qr + rp, 0

हल:
1. 4p x (q + r) = 4p x q + 4p x r
= 4pq + 4pr

2. ab x (a – b) = ab x a – ab x b
= a2b – ab2

3. (a + b) x 7a2b2 = a x 7a2b2 + b x 7a2b2
= 7a2b2 + 7a2b3

4. (a2 – 9) x 4a = a2 x 4a – 9 x 4a
= 4a3 – 36a

5. (pq + qr + rp) x 0 = 0

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प्रश्न 2.
सारणी पूरी कीजिए –
हल:
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.3 img-1

प्रश्न 3.
गुणनफल ज्ञात कीजिए –

  1. (a2) x (2a22) x (4a26)
  2. (\(\frac{2}{3}\)xy) x (\(\frac{-9}{10}\)x2y2)
  3. (\(\frac{-10}{3}\)pq3) – (\(\frac{6}{5}\)p3q)
  4. x × x2 × x3 × x4.

हल:
1. (a2) – (2a22) x (4a26)
= (1 x 2 x 4) x (a2 x a22 x a26)
= 8a2+22+26 = 8a50

2.
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.3 img-2
3.
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.3 img-3
4. x × x2 × x3 × x = x1+2+3+4 = x10

प्रश्न 4.
(a) 3 x (4x – 5) + 3 को सरल कीजिए और

  1. x = 3 एवं
  2. x = 1 के लिए इसका मान ज्ञात कीजिए।

(b) a (a + a + 1) + 5 को सरल कीजिए और

  1. a = 0
  2. a = 1 एवं
  3. a = – 1 के लिए इसका मान ज्ञात कीजिए।

हल:
(a) 3 x (4x – 5) + 3
= 3x × 4x – 3x × 5 + 3
= 12x2 – 15x + 3

1. जब x = 3 हो, तब
3x (4x – 5) + 3 = 3 x 3 (4 x 3 – 5) + 3
= 9 (12 – 5) + 3
= 9 x 7 + 3 = 63 + 3 = 66

2. जब x = \(\frac{1}{2}\) हो, तब
3x (4x – 5) + 3 = 3 x \(\frac{1}{2}\) (4 x \(\frac{1}{2}\) – 5) + 3
= \(\frac{3}{2}\) (2 – 5) + 3
= \(\frac{3}{2}\) x (-3) + 3 = – \(\frac{1}{2}\) + 3
= \(\frac{-9+6}{2}\) = \(\frac{-3}{2}\)

(b) a(a2 + a + 1) + 5 = a3 + a2 + a + 5

1. जब a = 0 हो, तब
a(a2 + a + 1) + 5 = 0 (0 + 0 + 1) +5
= 0 (1) + 5 = 0 + 5 = 5

2. जब a = 1 हो, तब
a (a2 + a + 1) + 5 = 1 (12 + 1 + 1) + 5
= 1 (3) + 5 = 3 + 5 = 8

3. जब a = – 1 हो, तब
a (a2 + a + 1) + 5 = (-1) (1 – 1 + 1) + 5
= (-1) x 1 + 5
= – 1 + 5 = 4

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प्रश्न 5.

(a) p (p – q), q(q – r) एवं r (r – p) को जोडिए।
(b) 2x (z – x – y) एवं 2y (z – y – x) को जोड़िए।
(c) 4l (10n – 3m + 21) में से 3l (l – 4l + 5n) को – घटाइए।
(d) 4c (- a + b + c) में से 3a (a + b + c) – 2b (a – b + c) को घटाइए।

हल:
(a) p (p – q) + q (q – r) + r (r – p)
= p x p – p x q + q x q – q x r + r x r – r x p
= p2 – pq + q2 – qr + r2 – rp
= p2 + q2 + r2 – pq – qr – rp

(b) 2x (z – x – y) + 2y (z – y – x)
= 2xz – 2x2 – 2xy + 2yz – 2y2 – 2xy
= 2x2 – 2y2 – 4xy + 2yz + 2zx

(c) 4l (10n – 3m + 2l) – 3l (1 – 4m + 5n)
= 40ln – 12lm +8l2 – 3l2 + 12lm – 15ln
= 8l2 – 3l2 – 12lm + 12lm + 40ln – 15In
= 5l2 + 25ln

(d) 4c(- a + b + c) – [3a (a + b + c) 2b(a – b + c)]
= 4c(- a + b + c) – 3a (a + b + c) + 2b(a – b + c)
= – 4ca + 4bc + 4c2 – 3a2 – 3ab – 3ac + 2ab – 2b2 +2bc
= – 3a2 – 2b2 + 4c2 – 3ab + 2ab + 4bc + 2bc – 4ca – 3ac
= – 3a2 – 2b2 + 4c2 – ab + 6bc – 7ca

MP Board Class 8th Maths Solutions

MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 21 नर्मदा

MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Surbhi Chapter 21 नर्मदा

MP Board Class 8th Sanskrit Chapter 21 अभ्यासः

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत(एक शब्द में उत्तर लिखो-)
(क) अस्माकम् प्रदेशस्य जीवनदायिनी का? (हमारे प्रदेश की जीवनदायिनी कौन है?)
उत्तर:
नर्मदा। (नर्मदा)

(ख) नर्मदा कस्मात् स्थानात् प्रादुर्भवति? (नर्मदा किस स्थान से निकलती है?)
उत्तर:
अमरकण्टकपर्वतात्। (अमरकण्टक पर्वत से)

(ग) कस्याः नाम रेवा? (किसका नाम रेवा है?)
उत्तर:
नर्मदायाः। (नर्मदा का)।

(घ) अमरकण्टकस्थानं कस्मिन् मण्डले अस्ति? (अमरकण्टक स्थान किस मण्डल में है?)
उत्तर:
अनूपपुर मण्डले। (अनूपपुर मण्डल में)

(ङ) नर्मदा कस्मिन् सागरे मिलति? (नर्मदा किस सागर में मिलती है?)
उत्तर:
अरबसागरे। (अरब सागर में)

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(च) मण्डनमिश्रः कस्मिन् नगरे वसति स्म? (मण्डनमिश्र किस नगर में रहते थे?)
उत्तर:
मण्डलेश्वरनगरे। (मण्डलेश्वर नगर में)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत(एक वाक्य में उत्तर लिखो-)
(क) धूमधारजलप्रपातः कुत्र अस्ति? (धूआँधार झरना कहाँ है?)
उत्तर:
धूमधारजलप्रपात: भेड़ाघाटनामके स्थाने अस्ति। (धूआँधार झरना भेड़ाघाट नामक स्थान पर है।)

(ख) सेठानीघाटस्थानं कस्मिन् नगरे अस्ति? (सेठानीघाट स्थान किस नगर में है?)
उत्तर:
सेठानीघाटस्थानं होशंगाबादनगरे अस्ति। (सेठानीघाट स्थान होशंगाबाद नगर में है।)

(ग) ओङ्कारेश्वरनगरे किं नाम ज्योतिर्लिङ्गम्? (ओङ्कारेश्वर नगर में किस नाम का ज्योतिर्लिंग है?)
उत्तर:
ओङ्कारेश्वरनगरे ममलेश्वरनामज्योतिर्लिंङ्गम्। (ओंकारेश्वर नगर में ममलेश्वर नाम का ज्योतिर्लिंग है।)

(घ) सरदारसरोवरबन्धः कस्यां नद्याम् अस्ति? (सरदार सरोवर बाँध किस नदी पर है?)
उत्तर:
सरदारसरोवरबन्धः नर्मदानद्याम् अस्ति। (सरदार सरोवर बाँध नर्मदा नदी पर है।)

(ङ) बन्धैः के लाभाः? (बाँधों से क्या लाभ हैं?)
उत्तर:
बन्धैः विधुदुत्पादनम्, भूमिसेचनम्, जलपरिवहनम्, अभयारण्यनिर्माणम्, पर्यटनस्थलनिर्माणम् इत्यादयो विविधलाभाः। (बाँधों से बिजली उत्पादन, भूमि का सींचना, जल परिवहन, अभयारण्य निर्माण, पर्यटन स्थल का निर्माण इत्यादि विभिन्न लाभ हैं।)

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प्रश्न 3.
उचितशब्देन रिक्तस्थानम् पूरयत(उचित शब्द से रिक्त स्थान भरो-)
(क) नर्मदायाः अपरं नाम ……….. अस्ति। (भागीरथी/मेकलसुता)
(ख) नर्मदानदी ……………. जीवनदायिनी कथ्यते। (उत्तरप्रदेशस्य/मध्यप्रदेशस्य)
(ग) ममलेश्वरज्योतिर्लिङ्गम् …………… अस्ति। (उज्जयिन्याम्/ओङ्कारेश्वरनगरे)
(घ) आद्यशङ्कराचार्यस्य गुरोः नाम ………… अस्ति। (महर्षि वाल्मीकि/गोविन्दपादाचार्यः)
(ङ) बरगीबन्धः ……………. अस्ति। (नर्मदायाम्/गोदावर्याम्)
उत्तर:
(क) मेकलसुता
(ख) मध्यप्रदेशस्य
(ग) ओङ्कारेश्वरनगरे
(घ) गोविन्दपादाचार्यः
(ङ) नर्मदायाम्।

प्रश्न 4.
उचितं योजयत(उचित को मिलाओ-)
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 21 नर्मदा 1
उत्तर:
(क) → (iii)
(ख) → (v)
(ग) → (ii)
(घ) → (i)
(ङ) → (iv)

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत्।
(शुद्धवाक्यों के सामने “आम्” (हाँ) और अशुद्ध वाक्यों के सामने “न” (नहीं) लिखो-)
(क) नर्मदा अमरकंटाकात् प्रादुर्भवति।
(ख) रेवा नर्मदायाः अपरं नाम अस्ति।
(ग) नर्मदायाम् सरदारसरोवरबन्धः अस्ति।
(घ) मेघदूते नर्मदायाः वर्णनं नास्ति।
(ङ) पुराणेषु नर्मदायाः वर्णनम् अस्ति।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) आम्
(ग) आम्
(घ) न
(ङ) आम्

प्रश्न 6.
नामोल्लेखपूर्वकं सन्धिविच्छेदं कुरुत(नाम का उल्लेख करते हुए सन्धि-विच्छेद करो-)
(क) गहनारण्येषु
(ख) अत्रैव
(ग) अवलोकनार्थम्
(घ) इत्यादयः।
उत्तर:
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 21 नर्मदा 2

प्रश्न 7.
नामोल्लेखपूर्वकं समासविग्रहं कुरुत(नाम का उल्लेख करते हुए समास विग्रह करो-)
(क) अभयारण्य निर्माणम्
(ख) देवालयाः
(ग) घण्टानादाः
(घ) भूमिसेचनम्।
उत्तर:
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 21 नर्मदा 3

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नर्मदा हिन्दी अनुवाद

पावनसलिलानर्मदा अस्माकम् प्रदेशस्य जीवनदायिनी सरिता अस्ति। एषा एव रेवा-मेकलसुतादिभिः अनेकानामभिः प्रसिद्धा। अस्याः उभयोः तटयोः अनेकानि तीर्थस्थानानि, तपस्विनाम् आश्रमाश्च सन्ति। प्राचीनकालादेव अस्याः पावनतटयोः तपस्विनां सिद्धस्थलानि सन्ति। अतः जनाः नर्मदायाः परिक्रमणं कृत्वा आत्मानं धन्यम् पवित्रं च मन्यते अत्रत्यं नैसर्गिक सौन्दर्यमपि दर्शनीयम्।।

अनुवाद :
पवित्र जल वाली नर्मदा हमारे प्रदेश की जीवनदायिनी (जीवन प्रदान करने वाली) नदी है। यही रेवा, मेकलसुता आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध है। इसके दोनों किनारों पर अनेक तीर्थस्थान और तपस्वियों के आश्रम हैं। प्राचीनकाल से ही इसके पवित्र किनारों पर तपस्वियों के सिद्ध स्थल हैं। इसलिए लोग नर्मदा की परिक्रमा करके अपने को धन्य और पवित्र मानते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य भी देखने योग्य है।

अनूपपुरमण्डले अमरकण्टवं नाम पर्वतोऽस्ति। तत एव नर्मदा प्रादुर्भवति। तदनन्तरम् एषा गहनारण्येषु उत्तुङ्गपर्वतेषु च भ्रमणं कुर्वती डिण्डोरीमण्डलम् प्रविशति। डिण्डोरीतः सपाकारगत्या उच्चावचमार्गेण महाराजपुरम् प्राप्नोति। ततः जाबालिपुरम् आगच्छति। श्वेतशिलाखण्डानां कृतेऽतिप्रसिद्धे भेड़ाघाटनामके स्थाने धूमधारजलप्रपातस्वरूपं धारयति। तद् अवलोकनार्थं बहवः पर्यटकाः अत्र आगच्छन्ति।

अनुवाद :
अनूपपुर मण्डल में अमरकण्टक नामक पर्वत है। वहाँ से ही नर्मदा निकलती है। उसके बाद यह घने वनों और ऊँचे पर्वतों पर भ्रमण करती हुई डिण्डोरी मण्डल में प्रवेश करती है। डिण्डोरी से सर्पाकार गति से ऊँचे-नीचे मार्ग से महाराजपुर (मण्डल) पहुँचती है। वहाँ से जबलपुर आती है। संगमरमर की चट्टानों के लिए अति प्रसिद्ध भेड़ाघाट नाम के स्थान पर धूआँधार झरने का रूप धरती है। उसे देखने के लिए बहुत से पर्यटक यहाँ आते हैं।

जाबालिपुरतः ब्रह्माण्डघट्टम् आयाति ततः अनेकक्षेत्राणि पावयन्ती इयं होशङ्गाबादनगरम् प्रविशति। अत्रत्यं सेठानीघाट’। इति स्थानम् प्रसिद्धम्। अस्मिन नगरे अस्याः तटे अनेके देवालयाः आश्रमाश्च सन्ति। अत्र भक्तैः कृताः प्रार्थनाः घण्टानादाश्च अहर्निशं श्रूयन्ते।।

अनुवाद :
जबलपुर से ब्रह्माण्डघाट (बरमान घाट) आती है वहाँ से अनेक क्षेत्रों को पवित्र करती हुई यह होशंगाबाद नगर में। प्रवेश करती है। यहाँ का ‘सेठानीघाट’ स्थान प्रसिद्ध है। इस नगर। में इसके किनारे अनेक मन्दिर और आश्रम हैं। यहाँ भक्तों के द्व रा की गयी प्रार्थना और घण्टों का स्वर रात-दिन सुनाई देता है।

ततो वेगवती एषातरंगिणी ओङ्कारेश्वरनगरं स्पृशति। अत्र ममलेश्वरनामज्योतिर्लिङ्ग समाराधयन्ती ओंकार इव आकृति धारयति। अत्रैव आद्यशङ्कराचार्यस्य गुरोः गोविन्दपादाचार्यस्य पवित्रस्थानम् अप्यस्ति।

अनुवाद :
वहाँ से वेग वाली यह नदी ओंकारेश्वर नगर को छूती है। यहाँ ममलेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग की आराधना करती। हुई ओंकार के समान आकृति को धारण करती है। यहीं पर आदि शंकराचार्य के गुरु गोविन्दपाद् आचार्य का पवित्र स्थान भी है।

ततः मण्डनमिश्रेण मण्डितम् मण्डलेश्वरनगरमपि। एषा मण्डयति। मण्डलेश्वरनगरात् महाराजया अहिल्यया सेविते माहिष्मतीनगरे अस्याः अतिविस्तृतं रूपं दृश्यते। पश्चात् खलघाटेशूलपाणेश्वरादीनि स्थानानि सिञ्चन्ती सा गुर्जरप्रान्तस्य भृगुकच्छनगरसमीपे अरबसागरे विलीयते।।

अनुवाद :
वहाँ से मण्डनमिश्र से सुशोभित मण्डलेश्वर नगर को भी यह सुशोभित करती है। मण्डलेश्वर नगर से महारानी अहिल्या के द्वारा सेवित माहिष्मती (महेश्वर) नगर में इसका अति विस्तृत रूप दिखाई देता है। बाद में खलघाट शूलपाणेश्वर आदि स्थानों को सींचती हुई गुजरात प्रान्त के भरुच नगर के पास अरब सागर में विलीन हो जाती है।

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नर्मदानद्यामेव बरगी-इन्दिरासागर-सरदारसरोवरदायः बहवः बन्धाः निर्मिताः सन्ति। यावन्तः बन्धाः नर्मदानद्यां सन्ति तावन्तः अन्यासु नदीषु न सन्ति। एभिः बन्धैः विधुदुत्पदानम्, भूमिसेचनम्, जलपरिवहनम्, अभयारण्यनिर्माणम्, पर्यटनस्थलनिर्माणम् इत्यादयो विविधलाभाः भवन्ति। एतेषाम् उपकराणां हेतुः एषा एव।

अनुवाद :
नर्मदा नदी पर ही बरगी, इन्दिरासागर, सरदार सरोवर आदि बहुत से बाँध निर्मित हैं। जितने बाँध नर्मदा नदी पर हैं उतने अन्य नदियों पर नहीं हैं। इन बाँधों से बिजली उत्पादन, भूमि का सींचना, जल परिवहन, अभयारण्य का निर्माण, पर्यटनस्थल का निर्माण इत्यादि विभिन्न लाभ होते हैं। इनके उपकारों के लिए यही है।

एषा नामस्मरणमात्रेण पापम् अपाकरोति। पुराणेषु अस्याः बहुविधमाहात्म्यम् प्रतिपादितम्। कालिदासेनापि मेघदूते अस्याः सौन्दर्यम् माहात्म्यं च वर्णितम्। धन्य एषा भूमिः यत्र रेवा राजते।

अनुवाद :
यह नाम के स्मरण मात्र से पाप को दूर करती है। पुराणों में इसकी बहु विध महिमा प्रतिपादित है। कालिदास ने भी मेघदूत में इसके सौन्दर्य और महिमा का वर्णन किया है। धन्य है यह भूमि जहाँ रेवा (नर्मदा) सुशोभित होती है।

नर्मदा शब्दार्थाः

सिद्धस्थलानि = सिद्धभूमि/तीर्थ। धूमधारः = धुंआधार। अत्रत्यम् = यहाँ का। ओंकार इव = ओंकार के समान। उत्तुङ्गम् = ऊँचा। ब्रह्माण्डघट: बरमान घाट का प्राचीन नाम। उच्चावचमार्गेण = ऊँचे-नीचे मार्गों से। सर्पाकारगत्या = वक्रगति से। माहिष्मतीनगरम् = महेश्वर नगर का प्राचीन नाम। महाराजपुरम् = मण्डला का प्राचीन नाम। भृगुकच्छनगरम् = भरूच नगर का प्राचीन नाम। प्राप्नोति = पहुँचती है। श्वेतशिलाखण्डानाम् = सङ्गमरमर की चट्टानों के।

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MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.4

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.4

प्रश्न 1.
द्विपदों को गुणा कीजिए –

  1. (2x + 5) और (4x – 3)
  2. (y – 8) और (3y – 4)
  3. (2.5l – 0.5m) और (2.51+ 0.5m)
  4. (a + 3b) और (x + 5)
  5. (2pq + 3q2) और (3pq – 2q2)
  6. (\(\frac{3}{4}\)a2 +3b2) और 4 (a2 – \(\frac{2}{3}\)2b2)

हल:
1. (2x + 5) x (4x – 3)
= (2x × 4x – 3) + 5 (4x – 3)
= 2x × 4x – 2x × 3 + 5 × 4x – 5 x 3
= 8x2 – 6x + 20x – 15
= 8x + 14x – 15 (समान पदों को जोड़ने पर)

2. (y – 8) x (3y – 4) = y × (3y – 4) – 8 (3y – 4)
= y × 3y – y × 4 – 8 × 3y + 8 × 4
= 3y2 – 4y – 24y + 32
= 3y2 – 28y + 32

3. (2.51 – 0.5m) x (2.51 + 0.5m)
= 2.51 (2.51 + 0.5m) – 0.5m (2.51 + 0.5m)
= 6.25l2 + 1.25lm – 1.25lm – 0.25m2
= 6.25l2 – 0.25m2

4. (a + 3b) x (x + 5) = a x (x + 5) + 3b (x + 5)
= ax + 5a + 3bx + 3b x 5
= ax + 5a + 3bx + 15b

5. (2pq + 3q2) (3pq – 2q2)
= 2pq x (3pq – 2q2) + 3q2(3pq – 2q2)
= 2pq x 3pq – 2pq x 2q2 + 3q2 x 3pq – 3q2 x 2q2
= 6p2q2 – 4pq2 + 9pq3 – 6q4
= 6p2q2 + 5pq3 – 6q4

6. (\(\frac{3}{4}\)a2 + 3b2) = 4 (a2 – \(\frac{2}{3}\)b2)
= (\(\frac{3}{4}\)a2 + 3b2) + (4a2 – \(\frac{8}{3}\)b2)
= \(\frac{3}{4}\)a2(4a2 – \(\frac{8}{3}\) b2) + 3b3 (4a2 – \(\frac{8}{3}\)b2)
= 3a4 – 2a2b2 + 12a2b2 – 8b4
= 3a4 – 10a2b2 – 8b4

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प्रश्न 2.
गुणनफल ज्ञात कीजिए –

  1. (5 – 2x) (3 + x)
  2. (x + 7y) (7x – y)
  3. (a2 + b) (a + b2)
  4. (p2 – q2) (2p + q)

हल:
1. (5 – 2x) x (3 + x) = 5 x (3 + x) – 2x × (3 + x)
= 15 + 5x – 6x – 2x2
= 15 – x – 2x2

2. (x + 7y) x (7x – y) = x × (7x – y) + 7y x (7x – y)
= 7x2 – xy + 49xy – 7y2
= 7x2 + 48xy – 7y2

3. (a2 + b) x (a + b2) = a2 x (a + b2) + b x (a + b2)
= a + a2b2 + ab + b2
= a3 + a2b2 + ab + b3

4. (p2 – q2) x (2p + q) = p2 x (2p + q) – q2 x (2p +9)
=2p3 + p2q – 2pq2 – q3
= 3p3 + p2q – 2pq2 – q3

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प्रश्न 3.
सरल कीजिए –

  1. (x2 – 5) (x + 5) + 25
  2. (a2 + 5) (b3 + 3) + 5
  3. (t + s2)(t2 – s)
  4. (a + b)(c – d) + (a – b) (c + d) + 2(ac + ba)
  5. (x + y (2y + y) + (x + 2y) (x – y)
  6. (x + y) (x2 – xy + y)
  7. (1.5x – 4y) (1.5x + 4y + 3) – 4.5x + 12y
  8. (a + b + c) (a + b – c)

हल:
1. (x2 – 5) (x + 5) + 25
=x2 × (x + 5) – 5 x (x + 5) + 25
=x3 × 5x2 – 5x – 25 + 25
= x3 + 5x2 – 5x

2. (a2 + 5) × (b3 + 3) + 5
= a2 x (b3 + 3) + 5 x (b3 + 3) + 5
= a2b3 + 3a2 + 5b3 + 15 + 5
= a2b3 + 3a2 + 5b3 + 20

3. (t + s2) (t2 – s) = t × (t2 – s) + s2 + (t2 – s)
= t3 – ts + s2t2 – s3

4. (a + b)(c – d) + (a – b)(c + d) + 2(ac + bd)
= a (c – d) + b(c – d) + a(c – d) – b(c + d) + 2ac + 2bd
= ac – ad + bc – bd + ac + ad – bc – bd + 2ac + 2bd
= (1 + 1 + 2)ac + (- 1 + 1) ad + (1 – 1)bc (- 1 – 1 + 2)bd
= (4ac + (0) ad + (0) bc + (0) bd
= 4ac

5. (x + y) (2x + y) + (x + 2y) (x – y)
= x(2x + y) + y x (2x + y) + x × (x – y) + 2y (x – y)
= 2x2 + xy + 2xy + y2 + x2 – xy + 2xy – 2y2
= 2x2 + x2 + xy + 2xy – xy + 2xy + y2 – 2y2
= 3x2 + 4xy – y2

6. (x + y) (x2 – xy + y2)
= x × (x2 – xy + y2) + y x (x2 – xy + y2)
= x3 – x2y + xy2 + x2y – xy2 + y3
= x3 – x2y + x2y + xy2 – xy2 + y3
= x3 + y3

7. (1.5x – 4y) (1.5x + 4y + 3) – 4.5x + 12y
= 1.5x (1.5x + 4y + 3) – 4y(1.5x + 4y + 3) – 4.5x + 12y
= 2.25x2 + 6.0xy + 4.5x – 6.0xy – 16y2 – 12y – 4.5x + 12y
= 2.25x2 + 6.0xy – 6.0xy + 4.5x – 4.5x – 12y + 12y – 16y2
= 2.25x2 – 16y2

8. (a + b + c)(a + b – c) = a (a + b – c) + b(a + b – c) + c(a + b – c)
= a2 + ab – ac + ab + b2 – bc + ac + bc – c2
= a2 + b2 – c2 + ab + ab – ac + ac – bc + bc
= a2 + b2 – c2 + 2ab

पाठ्य-पुस्तक पृष्ठ संख्या # 158

प्रयास कीजिए (क्रमांक 9.8)

प्रश्न 1.
सर्वसमिका (I) में b के स्थान पर – b रखिए। क्या आपको सर्वसमिका (II) प्राप्त होती है?
हल:
सर्वसमिका (I) से, हम प्राप्त करते हैं
(a + b)2 = a2 + 2ab + b2
b के स्थान पर – b रखने पर,
{a + (-b)}2 = a2 + 2a(- b) + (- b)2
(a – b)2 = a – 2ab + b2 (सर्वसमिका II)
हाँ, सर्वसमिका (I) में b के स्थान पर – b रखने पर हमें सर्वसमिका II प्राप्त होती है।

प्रयास कीजिए (क्रमांक 9.9)

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प्रश्न 1.
a = 2, b = 3,x = 5 के लिए सर्वसमिका (IV) का सत्यापन कीजिए।
हल:
हम जानते हैं कि सर्वसमिका
(x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab
a = 2
b = 3 तथा
x = 5 रखने पर,
L.H.S. = (x + a) (x + b)
= (5 + 2) (5 + 3)
= 7 x 8 = 56
R.H.S. = x2 + (a + b)x + ab
= (5)2 + (2 + 3)5 + 2 x 3
= 25 + 25 + 6 = 56
∴ L.H.S. = R.H.S.
अत: a = 2, b = 3 और x = 5 के लिए सर्वसमिका (IV) का सत्यापन होता है।

प्रश्न 2.
सर्वसमिका (IV) में a = b लेने पर आप क्या प्राप्त करते हैं? क्या यह सर्वसमिका (I) से सम्बन्धित है?
हल:
हम जानते हैं कि सर्वसमिका (IV)
(x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab
इसमें a = b रखने पर, हम प्राप्त करते हैं –
(x + b) (x + b) = x2 + (b + b)x + b x b
= x2 + 2bx + b2
अथवा
x + 2ax + a
हाँ, यह सर्वसमिका (I) से सम्बन्धित है।

प्रश्न 3.
सर्वसमिका (IV) में a = – c तथा b = – c लेने पर, आप क्या प्राप्त करते हैं। क्या यह सर्वसमिका (II) से सम्बन्धित है?
हल:
सर्वसमिका (IV) से, x = – c रखने पर हम प्राप्त करते हैं –
[x + (- c)] [x + (- c)] = x2 + (- c – c) x + (- c) (- c)
या (x – c) (x – c) = x2 – 2cx + c2
(x – c)2 = x2 – 2cx + c2
हाँ, यह सर्वसमिका (II) से सम्बन्धित है।

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प्रश्न 4.
सर्वसमिका (IV) में b = – a लीजिए। आप क्या पाते हैं? क्या यह सर्वसमिका (III) से सम्बन्धित है?
हल:
सर्वसमिका (IV) में b = – a लेने पर, हम पाते हैं –
(x + a) {x + (- a)} = x2 + (a – a)x + (a)(- a)
या (x + a) (x – a) = x2 – a2
हाँ, यह सर्वसमिका (II) से सम्बन्धित है।

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MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 3 चतुर्भुजों को समझना Ex 3.4

MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 3 चतुर्भुजों को समझना Ex 3.4

प्रश्न 1.
बताइए कथन सत्य है या असत्य –

  1. सभी आयत वर्ग होते हैं।
  2. सभी समचतुर्भुज समान्तर चतुर्भुज होते हैं।
  3. सभी वर्ग समचतुर्भुज और आयत भी होते हैं।
  4. सभी वर्ग समान्तर चतुर्भुज नहीं होते।
  5. सभी पतंगें समचतुर्भुज होती हैं।
  6. सभी समचतुर्भुज पतंग होते हैं।
  7. सभी समान्तर चतुर्भुज समलम्ब होते हैं।
  8. सभी वर्ग समलम्ब होते हैं।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य
  6. सत्य
  7. सत्य
  8. सत्य।

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प्रश्न 2.
उन सभी चतुर्भुजों की पहचान कीजिए जिनमें –

  1. चारों भुजाएँ बराबर लम्बाई की हों।
  2. चार समकोण हों।

उत्तर:

  1. ऐसे चतुर्भुज जिनकी चारों भुजाएँ समान लम्बाई की हों, वर्ग और समचतुर्भुज हैं।
  2. चतुर्भुज जिनमें चार समकोण हों-वर्ग और आयत।

प्रश्न 3.
बताइए कैसे एक वर्ग –

  1. एक चतुर्भुज
  2. एक समान्तर चतुर्भुज
  3. एक समचतुर्भुज
  4. एक आयत है।

उत्तर:

  1. एक वर्ग में चार भुजाएँ होती हैं; इसलिए यह एक चतुर्भुज है;
  2. एक वर्ग की सम्मुख भुजाएँ समान्तर होती हैं; इसलिए यह एक समान्तर चतुर्भुज है।
  3. वर्ग एक ऐसा समान्तर चतुर्भुज होता है जिसकी सभी भुजाएँ बराबर होती हैं; इसलिए यह एक समचतुर्भुज है।
  4. वर्ग एक ऐसा समान्तर चतुर्भुज होता है; जिसके सभी कोण समकोण होते हैं; इसलिए यह एक आयत है।

प्रश्न 4.
एक चतुर्भुज का नाम बताइए जिसके विकर्ण –

  1. एक दूसरे को समद्विभाजित करते हैं।
  2. एक दूसरे पर लम्ब समद्विभाजक हों।
  3. बराबर हों।

उत्तर:

  1. एक चतुर्भुज जिसके विकर्ण एक दूसरे को समद्विभाजित करते हैं-समान्तर चतुर्भुज; समचतुर्भुज; वर्ग और आयत।
  2. एक चतुर्भुज जिसके विकर्ण एक दूसरे पर लम्ब समद्विभाजक होते हैं समचतुर्भुज; वर्ग।
  3. एक चतुर्भुज जिसके विकर्ण बराबर होते हैं-वर्ग; आयत।

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प्रश्न 5.
बताइए एक आयत उत्तल चतुर्भुज कैसे हैं?
उत्तर:
एक आयत उत्तल चतुर्भुज है क्योंकि –

  1. इसके प्रत्येक कोण की माप 180° से कम है।
  2. इसके दोनों विकर्ण अभ्यंतर में होते हैं। अतः आयत उत्तल चतुर्भुज है।

प्रश्न 6.
ABC एक समकोण त्रिभुज है और ‘o’समकोण की सम्मुख भुजा का मध्य बिन्दु है। बताइए कैसे ‘o’ बिन्दु A, B तथा C से समान दूरी पर स्थित है। (बिन्दुओं से चिह्नित अतिरिक्त भुजाएँ आपकी सहायता के लिए खींची गई हैं)।
हल:
BO को D तक इस प्रकार आगे बढ़ाते हैं कि BO = OD.
AD और DC को मिलाया।
MP Board Class 8th Maths Solutions Chapter 3 चतुर्भुजों को समझना Ex 3.4 img-1
अब ABCD एक आयत है। आयत ABCD में विकर्ण AC और BD बराबर हैं तथा एक-दूसरे को बिन्दु o पर प्रतिच्छेद करते हैं।
\(\overline { AB } \) || \(\overline { BC } \);\(\overline { AB } \) || \(\overline { DC } \)
तथा OA = OC
और OB = OD
परन्तु AC = BD
∴ OA = OB = OC
अतः बिन्दु o; A, B तथा C से समान दूरी पर है।

पाठ्य-पुस्तक पृष्ठ संख्या # 61

सोचिए, चर्चा कीजिए और लिखिए –

प्रश्न 1.
एक राजमिस्त्री एक पत्थर की पट्टी बनाता है। वह इसे आयताकार बनाना चाहता है। कितने अलग-अलग तरीकों से यह विश्वास हो सकता है कि यह आयताकार है?
उत्तर:
राजमिस्त्री को पत्थर की पट्टी को आयताकार बनाने के लिए निम्न प्रकार विश्वास हो सकता है –

  1. पट्टी की आमने-सामने के किनारे बराबर हों।
  2. विकर्ण बराबर हों।
  3. प्रत्येक कोण 90° का हो।

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प्रश्न 2.
वर्ग को आयत के रूप में परिभाषित किया गया था जिसकी सभी भुजाएँ बराबर होती हैं। क्या हम इसे समचतुर्भुज के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिसके कोण बराबर माप के हों? इस विचार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हम वर्ग को समचतुर्भुज के रूप में परिभाषित नहीं कर सकते जब तक कि इसके विकर्ण बराबर नहीं होते और प्रत्येक कोण समकोण नहीं हो।

प्रश्न 3.
क्या एक समलम्ब के सभी कोण बराबर माप के हो सकते हैं? क्या इसकी सभी भुजाएँ बराबर हो सकती हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. समलम्ब के सभी कोण बराबर माप के हो सकते हैं जबकि सम्मुख भुजाएँ समान्तर हों। लेकिन समलम्ब में भुजा का एक युग्म ही समान्तर होता है।

2. समलम्ब की सभी भुजाएँ बराबर नहीं हो सकती जब तक कि सम्मुख भुजाएँ समान्तर न हो जाएँ। लेकिन समलम्ब एक ऐसा चतुर्भुज है जिसमें भुजाओं का एक युग्म ही समान्तर होता है।

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MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 22 सूक्तयः

MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Surbhi Chapter 22 सूक्तयः

MP Board Class 8th Sanskrit Chapter 22 अभ्यासः

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो-)
(क) कः सर्वत्र पूज्यते? (कौन सब जगह पूजा जाता है?)
उत्तर:
विद्वान्। (विद्वान्)

(ख) कस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता वर्तते? (किसका स्वयं स्वामित्व है?)
उत्तर:
विक्रमार्जितसत्त्वस्य। (पराक्रम के द्वारा अर्जित शक्ति)

(ग) कस्मात् परं सुखं नास्ति? (किससे बढ़कर सुख नहीं है?)
उत्तर:
ज्ञानात्। (ज्ञान से।)

(घ) सर्वत्र धनं किम् अस्ति? (सर्वत्र क्या धन है?)
उत्तर:
शीलम्। (चरित्र।)

(ङ) केषां क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति? (किनकी कार्य की सिद्धि साहस से होती है?)
उत्तर:
महताम्। (महान् लोगों की)

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प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत(एक वाक्य में उत्तर लिखो-)
(क) पूजास्थानं के न भवतः? (पूजा के योग्य कौन नहीं होते हैं?)
उत्तर:
पूजास्थानं लिङ्ग वयः च न भवतः। (पूजा के योग्य लिंग और आयु नहीं होती है।)

(ख) दुर्लभं वचः का? (दुर्लभ वाणी क्या है?)
उत्तर:
हितं मनोहरि च दुर्लभं वचः। (हितकारी और मनोहारी वाणी दुर्लभ है।)

(ग) केषाम् आज्ञा अविचारणीया? (किनकी आज्ञा अविचारणीय है?)
उत्तर:
गुरुणाम् आज्ञा अविचारणीय है। (गुरुओं की आज्ञा अविचारणीय है।)

(घ) किंन अन्विष्यति किंच मृग्यते? (कौन नहीं खोजता है और कौन खोजा जाता है?)
उत्तर:
रत्नं न अन्विष्यति तत् च मृग्यते। (रत्न नहीं खोजता है और वह ही खोजा जाता है।)

(ङ) महतां क्रियासिद्धिः कुत्रं भवति? कुत्र न भवति? (महान् लोगों की क्रिया की सिद्धि कहाँ होती है? कहाँ नहीं होती है?)
उत्तर:
महतां क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति, उपकरणे न। (महान् लोगों की क्रिया की सिद्धि साहस से होती है, साधनों से नहीं होती है।)

प्रश्न 3.
रिक्तस्थानानि पूरयत (रिक्त स्थान भरो-)
(क) ……….. एकरूपता।
(ख) ………. सर्वत्र पूज्यते।
(ग) नास्ति ……… परं सुखम्।
(घ) गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च ……… न च ………।
(ङ) ……….. सर्वत्र वै धनम्।
उत्तर:
(क) महताम्
(ख) विद्वान्
(ग) ज्ञानात्
(घ) लिङ्गम्, वयः
(ङ) शीलम्।

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प्रश्न 4.
विलोमपदानि पाठात् चित्त्वा लिखत- (विलोम शब्द पाठ से चुनकर लिखो-)
(क) एकत्र
(ख) दोषः
(ग) अस्ति
(घ) अनेकरूपता
(ङ) दुःखम्।
उत्तर:
(क) सर्वत्र
(ख) गुणः
(ग) नास्ति
(घ) एकरूपता
(ङ) सुखम्।।

प्रश्न 5.
उचितमेलनं कुरुत(उचित मिलान करो-)
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 22 सूक्तयः 1
उत्तर:
(क) → (iii)
(ख) → (v)
(ग) → (iv)
(घ) → (ii)
(ङ) → (i)

प्रश्न 6.
शुद्धवाक्यानां, समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
(शुद्ध वाक्यों के सामने “आम्” (हाँ) और अशुद्ध वाक्यों के सामने “न” (नहीं) लिखो-)
(क) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।
(ख) विद्वान सर्वत्र न पूज्यते।
(ग) गुणाः पूजास्थानम्।
(घ) रत्नम् अन्विष्यति न मृग्यते।
(ङ) विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) आम्
(घ) न
(ङ) आम्।

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प्रश्न 7.
संस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत(संस्कृत वाक्यों में प्रयोग करो-)
(क) सर्वत्र
(ख) दुर्लभम्
(ग) मृग्यते
(घ) ज्ञानात
(ङ) एव।
उत्तर:
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 22 सूक्तयः 2

प्रश्न 8.
रेखाङ्कितम् पदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत(रेखांकित शब्द के आधार पर प्रश्न निर्माण करो-)
(क) विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। (विद्वान सभी जगह पूजे जाते हैं।)
उत्तर:
कः सर्वत्र पूज्यते? (कौन सभी जगह पूजे जाते हैं?)

(ख) गुणाः पूजास्थानम्? (गुण पूजा के योग्य हैं।)
उत्तर:
के पूजास्थानम्? (कौन पूजा के योग्य हैं?)

(ग) आज्ञा गुरुणां ह्यविचारणीया। (गुरुओं की आज्ञा अविचारणीय है।)
उत्तर:
आज्ञा केषाम् ह्यविचारणीया? (किनकी आज्ञा अविचारणीय है?)

(घ) नास्ति ज्ञानात् परं सुखम्। (ज्ञान से बढ़कर सुख नहीं है।)
उत्तर:
नास्ति कस्मात् परं सुखम्? (किससे बढ़कर सुख नहीं है?)

(ङ) क्रियासिद्धि सत्त्वे भवति। (कार्य की सिद्धिः साहस से होती है।)
उत्तर:
किम् सत्त्वे भवति?(क्या साहस से होती है?)

(साधकों के अनुभव से निकली वाणी उक्ति या सूक्ति हो जाती है। यहाँ युक्ति की अपेक्षा जीवन के अनुभव का महत्त्व है। सूक्ति के सुनने के बाद ही कहने वाला और सुनने वाला सूक्ति के तत्व को समान रूप से अनुभव करता है। सूक्ति जीवन के सार को संक्षेप में प्रस्तुत करती है।)

सूक्तयः हिन्दी अनुवाद

(1) विद्वान सर्वत्र पूज्यते।
अनुवाद :
विद्वान् सब जगह पूजा जाता है?

व्याख्या :
कोई मूर्ख व्यक्ति है तो उसका सम्मान अपने घर तक ही होता है। कोई धनी व्यक्ति है तो उसकी सीमा अपने गाँव तक ही है अर्थात् उसका सम्मान अपने गाँव तक ही होता है। कोई राजा है तो उसकी पूजा (सम्मान) अपने देश में ही होती है, परन्तु यदि कोई विद्वान् है तो उसका सम्मान अपने घर, गाँव एवं देश में ही नहीं होता बल्कि सारे संसार में होता है।

(2) महतामेकरूपता।
अनुवाद :
महान् व्यक्ति एक समान रहते हैं।

व्याख्या :
महान् व्यक्ति चाहे सुख हो या दुःख हो एक समान ही रहते हैं क्योंकि सुख-दुःख तो आते-जाते रहते हैं इसलिए वे अपने स्वभाव को परिवर्तित नहीं करते। महान् लोग जैसा सोचते हैं वैसा ही बोलते हैं और जैसा बोलते हैं वैसा ही करते हैं। उनकी कथनी और करनी में एक समानता रहती है। जैसे सूर्य उगते समय भी लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है। वैसे ही महान लोग भी सर्वदा एक समान रहते हैं।

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(3) शीलम् सर्वत्र वै धनम्।
अनुवाद :
चरित्र (या स्वभाव) सब जगह धन है।

व्याख्या :
विदेश जाने पर विद्या ही धन होता है। विपत्ति आने पर बुद्धि ही धन होती है। मृत्यु के पश्चात् परलोक जाने पर धर्म ही धन होता है। परन्तु विचित्र सब जगह धन है। इसलिए चरित्र की रक्षा करनी चाहिए। धन का क्या है, आता है और चला जाता है। व्यक्ति धन से क्षीण है तो वह क्षीण नहीं कहलाता परन्तु चरित्र से गिरने पर उसका सब तरफ से पतन हो जाता है।

(4) नास्ति ज्ञानाम् परं सुखम्।
अनुवाद :
ज्ञान से बढ़कर सुख नहीं है।

व्याख्या :
संसार में सब वस्तुएँ नश्वर हैं, वे एक समय आने पर स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं। केवल ईश्वर ही सत्य सनातन है। जब मनुष्य को यह ज्ञान हो जाता है तो भौतिक सुखों से उसकी अनासक्ति हो जाती है। इसलिए कहते हैं कि ज्ञान से बढ़कर सुख नहीं है।

(5) आज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया।
अनुवाद :
गुरु की आज्ञा को सोचना नहीं चाहिए।

व्याख्या :
गुरु सर्वदा शिष्य का कल्याण ही देखते हैं। गुरु कुम्हार के समान एवं घड़े के समान होता है। गुरु ही शिष्य के भविष्य का निर्माण करते हैं। इसलिए गुरु जो भी आज्ञा दे चाहे वह उस समय अच्छी हो या बुरी उसके बारे में नहीं सोचना चाहिए क्योंकि उसका परिणाम निश्चित रूप से अच्छा ही निकलेगा। अतः गुरु की आज्ञा पर भले-बुरे का विचार नहीं करना चाहिए।

(6) हितम् मनोहारि च दुर्लभ वचः।
अनुवाद :
हितकारी और मनोहर वचन दुर्लभ होता है।

व्याख्या :
हितकारी (कल्याणकारी) और मनोहारी (मन को अच्छी लगने वाली) बातें संसार में बहुत ही कम होती हैं। क्योंकि सत्य कड़वा होता है और असत्य मीठा होता है। जो अच्छी भी लगे और कल्याणकारी भी हो, ऐसा दुर्लभ है। अतः मनुष्य को हितकारी बातों पर ध्यान देना चाहिए, चाहे वह अप्रिय ही क्यों न हों।

(7) क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।
अनुवाद :
महान लोगों के कार्य साहस से पूर्ण होते हैं, साधनों से नहीं।

व्याख्या :
महान् लोगों के किसी भी कार्य की सिद्धि साहस। से होती है, साधनों के होने पर नहीं। साधन तो सहायक होते हैं, | कार्य पूर्ण करने के लिए साहस परम आवश्यक है। जैसे श्रीराम
ने अल्प साधन होते हुए भी साहस से लंका पर विजय प्राप्त की।

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(8) गुणा पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्ग न च वयः।।
अनुवाद :
गुण पूजा के योग्य होते हैं, गुणियों में लिंग और अवस्था की अपेक्षा नहीं होती।

व्याख्या :
गुणों का सर्वदा आदर होता है, वह गुणी के किसी भी लिंग (पुरुष या स्त्री) या आयु (बचपन या वृद्धावस्था) के होने पर कोई प्रभाव नहीं डालते। अर्थात् गुणी व्यक्ति स्त्री या पुरुष हो अथवा किसी भी आयु का हो, उसका सर्वदा सम्मान होता है।

(9) न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत्।
अनुवाद :
रत्न किसी को खोजने नहीं जाता अपितु वह। स्वयं खोजा जाता है।

व्याख्या :
मनुष्य में यदि गुण हों तो उसे प्रकट करने की। आवश्यकता नहीं होती, गुणों के पारखी लोगों द्वारा वे स्वयं ही पहचान लिए जाते हैं। रत्न कभी अपने ग्राहक को खोजने के के लिए नहीं जाता बल्कि ग्राहक ही उसे खोजता हुआ आ जाता है। उदाहरण के लिए कुँआ प्यासे को नहीं खोजता बल्कि प्यासा ही कुँए को खोजता है।

(10) विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
अनुवाद :
पराक्रम के द्वारा अर्जित शक्ति से स्वयं ही। स्वामित्व आता है।

व्याख्या :
मनुष्य में पराक्रम के द्वारा अर्जित शक्ति से स्वयं ही स्वामित्व (शासन) करने की क्षमता आती है। उदाहरण के लिए। जंगल में सिंह का सभी जानवर मिलकर राज्याभिषेक नहीं करते बल्कि सिंह अपने पराक्रम की शक्ति से जंगल पर राज करता है।

सूक्तयः शब्दार्थाः

एकरूपता सब को एक भाव से मानना। मृगेन्द्रता=सिंह का आधिपत्य/पशुओं का स्वामित्व। वाणी = वचन। ह्यविचारणीया = विचार करने योग्य नहीं। क्रियासिद्धिः = कार्य की सिद्धि। अन्विष्यति = ढूँढेगा। पूजास्थानम् = पूजा योग्य/आदर योग्य/पूजा का स्थान। मृग्यते = ढूँढता है। वयः = अवस्था/आयु। लिङ्गम् = पुरुष/स्त्री (पुल्लिङ्ग/स्त्रीलिङ्ग)। विक्रमार्जितसत्त्वस्य = पराक्रम द्वारा प्राप्त किये हुए स्वामित्व का। लिङ्गम् = पुरुष/स्त्री पुल्लिङ्ग/स्त्रीलिङ्ग)।

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MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 19 प्रियदर्शिनी इन्दिरा

MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Surbhi Chapter 19 प्रियदर्शिनी इन्दिरा

MP Board Class 8th Sanskrit Chapter 19 अभ्यासः

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत(एक शब्द में उत्तर लिखो-)
(क) इन्दिरायाः भाषणानि कीदृशानि आसन्? (इन्दिरा के भाषण कैसे थे?)
उत्तर:
ऊर्जस्वलानि। (तेजस्वी)

(ख) इन्दिरायाः उच्चशिक्षा कुत्र अभवत्? (इन्दिरा की उच्च शिक्षा कहाँ हुई?)
उत्तर:
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालये। (ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में।)

(ग) नेहरूः स्वपुत्रीं कथं द्रष्टुमैच्छत्? (नेहरू अपनी पुत्री को कैसा देखना चाहते हैं?)
उत्तर:
ऊर्जस्वलाम्। (तेजस्वी)

(घ) इन्दिरा कुत्र भारतीयसेनाम् प्रेषितवती? (इन्दिरा ने कहाँ भारतीय सेना को भेजा?)
उत्तर:
बङ्ग्लादेशम्। (बंग्लादेश में)

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(ङ) इन्दिरायाः का उद्घोषणा आसीत्? (इन्दिरा की क्या उद्घोषणा थी?)
उत्तर:
दरिद्रतामपनय। (दरिद्रता हटाओ)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत(एक वाक्य में उत्तर लिखो-)
(क) दिवङ्गतापि का अस्माकं कृते वर्तमानेवास्ति? (मरकर भी कौन हमारे लिए उपस्थित ही है?)
उत्तर:
दिवङ्गतापि इन्दिरा अस्माकं कृते वर्तमानेवास्ति। (मरकर भी इन्दिरा हमारे लिए उपस्थित ही है।)

(ख) इन्दिरायाः जन्म कदा अभवत्? इन्दिरा का जन्म कब हुआ?)
उत्तर:
इन्दिरायाः जन्म १९१७ तमे ख्रिस्ताब्दे अभवत् (इन्दिरा का जन्म 1917 वीं ईस्वी में हुआ।)

(ग) इन्दिरायाः जन्म कुत्र अभवत्? (इन्दिरा का जन्म कहाँ हुआ?)
उत्तर:
इन्दिरायाः जन्म प्रयागनगरे अभवत्। (इन्दिरा का जन्म प्रयाग नगर में हुआ।)

(घ) जवाहरलालनेहरुः किं कुर्वन् कारागारमगच्छत्? (जवाहरलाल नेहरू क्या करते हुए जेल गये?)
उत्तर:
जवाहरलालनेहरुः स्वतन्त्रतायै आन्दोलनं कुर्वन् कारागारमगच्छत्। (जवाहरलाल नेहरू स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन करते हुए जेल गए।)

(ङ) इन्दिरायाः समाधिस्थलं केन नाम्ना प्रसिद्धमस्ति? (इन्दिरा का समाधि स्थल किस नाम से प्रसिद्ध है?)
उत्तर:
इन्दिरायाः समाधिस्थलं ‘शक्तिस्थलम्’ इति नाम्ना प्रसिद्धमस्ति। (इन्दिरा का समाधिस्थल ‘शक्तिस्थल’ नाम से प्रसिद्ध है।)

प्रश्न 3.
रिक्तस्थानानि पूरयत(रिक्त स्थान भरो-)
(क) ………. इन्दिरायाः पिता आसीत्।
(ख) सर्वे ………. तत्रागच्छन्।
(ग) तया ……….. नाम्नी बालकानां सङ्घटना कृता।
(घ) ……… सहयोगेन बङ्ग्लादेशः स्वतन्त्रः जातः।
(ङ) सर्वे जनाः तां ……… इति रूपेण स्मरन्ति।
उत्तर:
(क) जवाहरलाल नेहरु
(ख) राष्ट्रियाः नेतारः
(ग) वानरसेना इति
(घ) भारतस्य
(ङ) शान्तिदूती।

प्रश्न 4.
नामोल्लेखपूर्वकं समासविग्रहं कुरुत(नाम का उल्लेख करते हुए समास-विग्रह करो-)
(क) पुष्पमालाः
(ख) देशभक्तेः
(ग) सीमानिर्धारणम्
(घ) वीरगतिम्।
उत्तर:
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 19 प्रियदर्शिनी इन्दिरा 1

प्रश्न 5.
नामोल्लेखपूर्वकं सन्धिविच्छेदं कुरुत(नाम का उल्लेख करते हुए सन्धि-विच्छेद करो-)
(क) दर्शनमनेकधा
(ख) स्वतन्त्रतान्दोलनस्य
(ग) तत्रागच्छन्
(घ) दरिद्रतामपनय
(ङ) द्रष्टुमैच्छत्।
उत्तर:
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 19 प्रियदर्शिनी इन्दिरा 2

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प्रश्न 6.
अधोलिखितशब्दान् आधृत्य वाक्यरचनां कुरुत (नीचे लिखे शब्दों के आधार पर वाक्य रचना करो-)
(क) कृते
(ख) समाप्य
(ग) कुर्वन्
(घ) सह
(ङ) अङ्गीकृत्य।
उत्तर:
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 19 प्रियदर्शिनी इन्दिरा 3

प्रश्न 7.
उचितं योजयत(उचित को जोड़ो-)
MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 19 प्रियदर्शिनी इन्दिरा 4
उत्तर:
(क) → (v)
(ख) → (iii)
(ग) → (iv)
(घ) → (ii)
(ङ) → (i)

प्रश्न 8.
भिन्नप्रकृतिकं शब्दं चिनुत (भिन्न प्रकृति के शब्द को चुनो-)
(क) इन्दिरा, पार्वती, अहिल्या, लक्ष्मीबाई।
(ख) अक्टूबरमासः, अगस्तमासः, चैत्रमासः, जूनमासः।
(ग) जलसेना, वानरसेना, थलसेना, वायुसेना।
(घ) प्रधानमन्त्री, वित्तमन्त्री, रक्षामन्त्री, महामन्त्री।
उत्तर:
(क) पार्वती
(ख) चैत्रमासः
(ग) वानरसेना
(घ) महामन्त्री।

प्रियदर्शिनी इन्दिरा हिन्दी अनुवाद

अस्माभिः प्रियदर्शिन्याः इन्दरायाः दर्शनमनेकधा कृतम्। कोटिजनैः तस्या ऊर्जस्वलानि भाषणानि श्रुतानि। सहस्रैः बालकैः तस्याः हस्ताभ्यां सस्नेहं प्रदत्ताः पुष्पमाला: गृहीता अतः दिवङ्गतापि सा देवी अस्माकं कृते वर्तमानेवास्ति।

तस्याः जन्म प्रयागनगरे १९१७ तमे ख्रिस्ताब्दे आनन्दभवनामके पैतृकगृहे अभवत्। जवाहरलाल नेहरुः तस्याः पिता कमलानेहरु च जननी अभवत्।

अनुवाद :
हम सबके द्वारा सुन्दर इन्दिरा का दर्शन कई बार किया गया। करोड़ों लोगों के द्वारा उनके तेजस्वी भाषणों को सुना गया। हजारों बालकों के द्वारा उनके हाथों से प्रेमपूर्वक दी गयी पुष्पमाला ली गई, इसलिए मरकर भी वह देवी हमारे लिए उपस्थित ही है।

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उनका जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) नगर में 1917 ईस्वी में आनन्दभवन नामक पैतृक घर पर हुआ। जवाहरलाल नेहरू उनके पिता और कमला नेहरू माता थीं।

इन्दिरायाः प्रारम्भिकी शिक्षा प्रयागे पूनानगरे चाभवत्। तेषु दिवसेषु आनन्दभवनं स्वतन्त्रतान्दोलनस्य केन्द्रमासीत्। सर्वे राष्ट्रियाः नेतारः तत्रागच्छन्। इन्दिरा तेभ्यः देशभक्तेः सङ्घर्षशीलतायाश्च संस्कारानगृह्णात्। प्राथमिकी शिक्षा समाप्य सा शान्तिनिकेतनमगच्छत्। तत्र गुरुदेवस्य रवीन्द्रनाथठाकुरस्य सान्निध्ये भारतीयसंस्कृतेः मानवप्रेम्णः च महतीं शिक्षाम् प्राप्नोत्। तस्याः उच्चशिक्षा इङ्ग्लैण्डदेशे आक्सफोर्डविश्वविद्यालये सम्पन्ना।

अनुवाद ;
इन्दिरा की प्रारम्भिक शिक्षा प्रयाग और पूना नगर में हुई। उन दिनों में आनन्दभवन स्वतन्त्रता आन्दोलन का केन्द्र था। सभी राष्ट्रीय नेता वहाँ आते थे। इन्दिरा ने उनसे देशभक्ति और संघर्षशीलता के संस्कारों को ग्रहण किया। प्राथमिक शिक्षा को समाप्त करके वह शान्ति निकेतन गयीं। वहाँ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पास से भारतीय संस्कृति और मानव प्रेम की महान् शिक्षा प्राप्त की। उनकी उच्च शिक्षा इंग्लैण्ड देश में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुई।

जवाहरलालनेहरुः बहुधा स्वतन्त्रतायै आन्दोलनं कुर्वन् कारागारमगच्छत्। कारागारात् सः इन्दिरायै अनेकपत्राणि प्रेषितवान्। एतानि पत्रााणि ‘पुत्र्याः कृते पितुः पत्राणि’ इति नाम्ना पुस्तकरूपेण प्रसिद्धानि सन्ति। तेभ्यः ज्ञायते यत् नेहरुः स्वपुत्रीं विदुषीं दूरदर्शिनी ऊर्जस्वलां च द्रष्टुमैच्छत्।

अनुवाद :
जवाहरलाल नेहरू बहुत बार स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन करते हुए जेल गये। जेल से उन्होंने इन्दिरा के लिए अनेक पत्र भेजे। ये पत्र ‘पुत्री के लिए पिता के पत्र’ इस नाम से पुस्तक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनसे जाना जाता है कि नेहरू अपनी पुत्री को विदुषी, दूरदर्शिनी और तेजस्वी देखना चाहते थे।

इन्दिरायाः एते गुणाः प्रसिद्धाः सन्ति। स्वमातु: कमलानेहरुतः सत्यस्य शुद्धान्तःकरणस्य च शिक्षामलभत्। बाल्यकाले एव तया ‘वानरसेना’ इति नाम्नी बालकानां सङ्घटना कता। – तस्याः विवाहः फिरोजगान्धिना सहाभवत्। तौ दम्पती स्वाधीनतान्दोलने कारागारं गतवन्तौ। १९६० तमे खिस्ताब्दे तस्याः पतिः स्वर्गमगच्छत्।

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अनुवाद :
इन्दिरा के ये गुण प्रसिद्ध है। अपनी माता कमला नेहरू से सत्य और शुद्ध अन्त:करण (मन) की शिक्षा को प्राप्त किया। बाल्यकाल में ही उनके द्वारा ‘वानरसेना’ नाम से बच्चों का संघटन किया गया।

उनका विवाह फिरोज गान्धी के साथ हुआ। वे दोनों पति-पत्नी स्वाधीनता के आन्दोलन में जेल गये। 1960 वीं ईस्वी में उनके पति (फिरोज गान्धी) स्वर्गवासी हो गये।

लालबहादुरशास्त्रिणः मृत्योरनतरं सा भारतस्य। ‘प्रधानमन्त्री’ अभवत्। तत्पदमङ्गीकृत्य सा देशसेवायां। सर्वभावेन संलग्ना जाता। अधिकोषाणां राष्ट्रियकरणम् भूतपूर्वराज्ञां विशिष्टाधिकाराणां समाप्तिः तेषां नैजधनदानस्य (प्रिवीपस) अन्तः भूमिसम्पत्योः सीमानिर्धारणं चेत्यादीनि कार्याणि तस्याः महत्त्वम् उद्भासयन्ति। बङ्ग्लादेशस्य मुक्तिसङ्ग्रामे भारतीयसेनां प्रेष्य तया अपूर्वसाहसे कृतम्। भारतस्य सहयोगेनैव बङ्गलादेशः स्वतन्त्रः जातः। सा जीवनपर्यन्तम् भारतस्य कल्याणाय निर्धानानामुत्थानाय च प्रयत्नमकरोत्। दरिद्रतामपनय इति तस्या उद्घोषणासीत्।

अनुवाद :
लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद वह भारत की ‘प्रधानमन्त्री’ हुईं। उस पद को स्वीकार करके वह देश सेवा में पूर्णरूप से संलग्न हो गयीं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भूतपूर्व राजाओं के विशिष्ट अधिकारों की समाप्ति, उनके अपने धन के दान का (प्रिवीपर्स) अन्त, भूमि और सम्पत्ति की सीमा का निर्धारण इत्यादि कार्य उनके महत्व को प्रकट करते हैं। बांग्लादेश की मुक्ति संग्राम में भारतीय सेना को भेजकर उनके द्वारा अपूर्व साहस किया गया। भारत के सहयोग से ही बांग्लादेश स्वतन्त्र हुआ। उन्होंने जीवन पर्यन्त भारत के कल्याण और निर्धनों के उत्थान के लिए प्रयत्न किया। दरिद्रता को दूर हटाओ’ यह उनका नारा था।

१९८४ तमस्य ख्रिस्ताब्दस्य अक्टूबरमासे एकत्रिंशदिनाङ्के सा एकस्य स्वरक्षकस्यैव गोलिकाभिः वीरगतिम् प्राप्नोत्।

सर्वे जनाः तां ‘शान्तिदूती’ इति रूपेण श्रद्धया स्मरन्ति। तस्याः समाधिस्थलं शक्तिस्थलमिति नाम्ना प्रसिद्धमस्ति।

अनुवाद :
1984 वी ईस्वी की अक्टूबर महीने की इक्तीस दिनांक की वह अपने एक रक्षक की ही.गोलियों से वीरगति को प्राप्त हुईं।

सभी लोग उनको ‘शान्तिदूती’ के रूप में श्रद्धा से याद करते हैं। उनका समाधि स्थल ‘शक्तिस्थल’ नाम से प्रसिद्ध है।

प्रियदर्शिनी इन्दिरा शब्दार्थाः

अनेकधा = कई बार। अधिकोषः = बैंक। कोटिजनैः = करोड़ों लोगों के द्वारा। सान्निध्ये = पास में। उर्जस्वलानि = तेजस्वी/तेजपूर्ण। उद्भासयन्ति = प्रगट करते हैं। सर्वभावेन = पूर्णरूप से। अपनय = दूर करो/हटाओ। अङ्गीकृत्य = स्वीकार करके। अवहन् ले जाते थे। अतीताः= भूतकाल की। उद्घोषणा = नारा।

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