MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3

Write the following in decimal form and say what kind of decimal expansion each has:

  1. \(\frac{36}{100}\)
  2. \(\frac{1}{11}\)
  3. 4\(\frac{1}{8}\)
  4. \(\frac{3}{13}\)
  5. \(\frac{2}{11}\)
  6. \(\frac{329}{400}\)

Solution:
1. \(\frac{36}{100}\)
\(\frac{36}{100}\) = 0.36
The decimal expansion is terminating.

2. \(\frac{1}{11}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-1
The decimal expansion is non-terminating repeating.

3. 4\(\frac{1}{8}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-2
The decimal expansion is terminating.

4. \(\frac{3}{13}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-3'
The decimal expansion is non-terminating repeating.

5. \(\frac{2}{11}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-4
The decimal expansion is non-terminating repeating.

6. \(\frac{329}{400}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-5
The decimal expansion is terminating.

Question 2.
You know that \(\frac{1}{7}\) = \(\overline { 0.142857 } \). Can vou predict what the decimal expansions of \(\frac{2}{7}\), \(\frac{3}{7}\), \(\frac{4}{7}\), \(\frac{5}{7}\), \(\frac{6}{7}\) are, without actually doing the long division? If so, how?
[Hint: Study the remainders while finding the value of \(\frac{1}{7}\) carefully.]
Solution:
\(\frac{1}{7}\) = \(\overline { 0.142857 } \)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-6

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Question 3.
Expressthe following in the form \(\frac{p}{q}\), wherep and q are integers and q ≠ 0.

  1. \(0 . \overline{6}\)
  2. \(0 . \overline{oo1}\)

Solution:
1. \(0 . \overline{6}\)
Let x = \(0 . \overline{6}\) …(i)
10x = \(6 . \overline{6}\)
[Multiplying (i) by 10 on both sides] …(ii)
Subtracting (i) from (ii). we get
9x = 6
x = \(\frac{6}{9}\) = \(\frac{2}{3}\)
∴ \(6 . \overline{6}\) = \(\frac{2}{3}\)

2. \(0 . \overline{oo1}\)
1000x = \(1 . \overline{001}\)
[Multiplying (i) by 1000] …(ii)
Subtracting (i) from (ii), we get
999x = 1
x = \(\frac{1}{999}\)
∴ \(0 . \overline{001}\) = \(\frac{1}{999}\)

Question 4.
Express 0.99999….. in the form \(\frac{p}{q}\). Are you surprised by vour answer? With your teacher and classmates, discuss why the answer make sense.
Solution:
0.99999 = \(0 . \overline{9}\)
Let x = 0.9 …(i)
10x = \(9 . \overline{9}\)
[Multiplying (i) by 10] …(ii)
Subtracting (i) from (ii), we get
9x = 9
x = \(\frac{9}{9}\)
∴ \(9 . \overline{9}\) = 1

Question 5.
What can the maximum number of digits be in the repeating block of digits in the decimal expansion of \(\frac{1}{17}\)? Perform the division to check your answer.
Solution:
The maximum number of digits in the repeating block of digits in the decimal expansion \(\frac{1}{17}\) can be 16.
0. 05882352941176470588235294117647….
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-7
By Long Division, the number of digits in the repeating block of digits in the decimal expansion of = \(\frac{1}{17}\) = 16
∴ The answer is verified.

Question 6.
Look at several examples of rational numbers in the form \(\frac{p}{q}\) (q ≠ 0),where p and q are integers with no common factors other than 1 and having terminating decimal representation (expansions). Can you guess what property q must satisfy?
Solution:
Examples:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-8
The property that q must satisfy is that the prime factorisation of q have only powers of 2 or powers of 5 or both.

Question 7.
Write three numbers whose decimal expansions are non – terminating non – recurring.
Solution:
0. 01001000100001……..,
0. 20200220002200002…….,
0. 003000300003

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Question 8.
Find three different irrational numbers between the rational numbers \(\frac{5}{7}\) and \(\frac{9}{11}\).
Solution:
Irrational numbers between \(\frac{5}{7}\) and \(\frac{9}{11}\)
\(\frac{5}{7}\) = 0.71 and \(\frac{9}{11}\) = 0.81
Three irrational numbers between \(\frac{5}{7}\) and \(\frac{9}{11}\) are
0. 7201001000…
0. 7301001000…
0. 7401001000…

Question 9.
Classify the following numbers as rational or irrational:

  1. \(\sqrt{23}\)
  2. \(\sqrt{225}\)
  3. 0. 3796
  4. 7. 478478…
  5. 1. 101001000100001…

Solution:

  1. \(\sqrt{23}\) is an irrational number
  2. \(\sqrt{225}\) = 15, a rational number
  3. 0. 3796 is a rational number
  4. 7. 478478….. is an irrational number
  5. 1. 101001000100001… is an irrational number

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 जागरण गीत

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 जागरण गीत (सोहनलाल द्विवेदी)

जागरण गीत अभ्यास-प्रश्न

जागरण गीत लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि गीत गाकर ही लोगों को क्यों जगाना चाहता है?
उत्तर
कवि गीत गाकर ही लोगों को जगाना चाहता है। यह इसलिए कि साधारण रूप से कही गई बातों की अपेक्षा गीत के माध्यम से कही बातें अधिक प्रभावशाली होती हैं।

प्रश्न 2.
इस गीत में किस रास्ते को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है?
उत्तर
इस गीत में उदयाचल को सर्वश्रेष्ठ रास्ता बताया गया है।

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प्रश्न 3.
कवि किस रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए आतुर है?
उत्तर
कवि प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए आतुर है।

प्रश्न 4.
संकीर्णताएँ तोड़ने के लिए कवि क्या करना चाहता है?
उत्तर
संकीर्णताएँ तोड़ने के लिए कवि सोए हुए दृढ़ भावों को जगाना चाहता है।

जागरण गीत दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि आकाश में उड़ने के लिए क्यों रोक रहा है? कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कवि आकाश में उड़ने के लिए रोक रहा है। यह इसलिए कि इससे जीवन की वास्तविकता का ज्ञान नहीं हो पाता है। फलस्वरूप जीवन दुखद और निरर्थक बना रहता है।

प्रश्न 2.
शूल को फूल बनाने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर
शूल को फूल बनाने से कवि का आशय है-जीवन में आने वाली कठिनाइयों, रुकावटों और कष्टों को अपनी क्षमता, शक्ति आर बुद्धिबल से दूर करके जीवन को हर प्रकार से सुखद और सुन्दर बना लेना। इसके द्वारा कवि ने आलसी और निराश लोगों को प्रेरित और उत्साहित करना चाहा है।

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प्रश्न 3.
‘अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूँगा। अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ।’ उपरोक्त पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा। अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ।’ उपरोक्त पंक्तियों के द्वारा कवि ने यह भाव दर्शाना चाहा है कि गहरी नींद में पड़े रहना, जीवन की सच्चाई को नकारना है। इस प्रकार का जीवन डूबते हुए सूरज के समान है, जिसमें न कोई आशा, विश्वास, आकर्षण, समुल्लास आदि जीवन-स्वरूप दिखाई देते हैं। इस प्रकार का जीवन न स्वयं के लिए अपितु दूसरे के लिए भी दुखद और कष्टकर होता है। इसलिए इस प्रकार के जीवन का परित्याग करके अरुण उदयाचल अर्थात् प्रगति के पथ पर बढ़ने के लिए हर प्रकार से कदम बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 4.
विपथ होकर मुड़ने का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विपथ होकर मुड़ने का आशय है-सन्मार्ग से हटकर कुमार्ग पर चलना। दूसरे शब्दों में अच्छाई और सुन्दरता को छोड़कर बुराई और कुरूपता को अपनाना।

जागरण गीत भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं उन्हें दूर कर पुनः लिखिए।
अरूण, सीस, सूल, मंझदार, श्रृंखलाएँ, पातवार, पृगति, संकीणताएँ, विपथ, झनझनाये।
उत्तर
अशुद्धियाँ – शुद्धियाँ
अरूण – अरुण
शीस – शीश
सूल – शूल
मंझदार – मैंनधार
श्रृंखलाएँ – श्रृंखलाएँ
पातवार – पतवार
पृगति – प्रगति
संकीणताएँ – संकीर्णताएँ
विपथ – बिपथ
झनझनाये – झनझनाए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखकर पुनः वाक्य लिखिए
1. अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूंगा।
2. फूल मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।
3. विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा।
4. मैं किनारे पर तुम्हें बकने न दूंगा।
5. सिंधु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।
उत्तर

  1. अब तुम्हें आसमान में उड़ने न दूंगा।
  2. पुष्प मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।
  3. कुपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा।
  4. मैं तट पर तुम्हें थकने न दूँगा।
  5. समुद्र बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों को पढ़िए और पाठ में आए शब्दों में से स्वर मैत्री समझकर लिखिए
अस्ताचल – उदयाचल
साधना – ……………..
मैंनदार – ………………..
उठाए – ……………….
गति – ………………..
शूल – ……………
उत्तर
अस्ताचल – उदयाचल
साधना – कल्पना
मँझदार – पतवार
उठाए – झनझजाए
गति – गति
शूल – फूल

जागरण गीत योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
जीवन में प्रगति तभी सम्भव है जब हम निराशा के क्षणों में तथा विरोधी परिस्थितियों में संघर्षरत रहकर आशावादी दृष्टिकोण रखकर आगे बढ़ें। इस सन्दर्भ की अन्य कविताएँ संकलित कीजिए तवा विभिन्न अवसरों पर अपने मित्रों/साथियों को सुलेख में लिखकर भेंट करें।

प्रश्न 2.
कक्षा में एक डिब्बा रखिए। अपने साथियों के किस गुण से किस परिस्थिति से आप प्रभावित हुए एक कागज पर लिखकर डिब्बे में डालिए। कुछ दिनों के उपरांत अपने शिक्षक एवं कक्षा के सम्मुख उन्हें खोलकर सबको सुनाएँ।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

जागरण गीत परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गहरी नींद में सोने वाले अब सो न सकेंगे। क्यों?
उत्तर
गहरी नींद में सोने वाले अब सो न सकेंगे। यह इसलिए कि कवि उन्हें गीत गाकर जगाने आ रहा है।

प्रश्न 2.
कवि अस्ताचल जाने के बजाय कहा जाने की बात कह रहा है? उत्तर-कवि अस्ताचल जाने के बजाय उदयाचल जाने की बात कह रहा है। प्रश्न 3. कवि के अनुसार क्या दुख-सुख है?
उत्तर
कवि के अनुसार नींद में सपने संजोना दुख है और इससे हटकर परिश्रम पूर्वक जीवन जीना सुख है।

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प्रश्न 4.
मैंनधार से किनारे पर आने के लिए कवि ने क्या कहा है?
उत्तर
मँझधार से किनारे पर आने के लिए कवि ने कहा है कि मैंझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। हिम्मत करके विश्वासपूर्वक हाथ में पतवार लेकर किनारे की ओर आने का लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।

जागरण गीत दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि गीत किसके लिए गा रहा है?
उत्तर
कवि गहरी नींद में सोने वालों, अतल अस्ताचल की ओर जाने वालों, कल्पना के पंख लगाकर आकाश में उड़ने वालों, जीवन को काँटा समझने वालों, जीवन के मँझधार में पड़कर घबड़ाने और थकने वालों, मन में तुच्छ विचारों को रखने वालों और विपथ होकर जीवन की सच्चाई को नकारने वालों के लिए गीत गा रहा है।

प्रश्न 2.
‘आ रहा हूँ। ऐसा कवि ने बार-बार क्यों कहा है?
उत्तर
‘आ रहा हूँ।’ ऐसा कवि ने बार-बार कहा है। यह इसलिए कि इसके द्वारा वह अपना जागरण सन्देश देना चाहा है। उसने अपना यह जागरण सन्देश उन लोगों को ही देना चाहा है, जो जीवन की सच्चाई को नकारते रहे हैं और संकीर्ण मनोवृत्तियों जैसे-आलस्य, निराशा आदि को स्वीकारते रहे हैं। कवि इस प्रकार की संकीर्ण मनोवृत्तियों को त्यागकर कर्मरत होते हुए जीवन की वास्तविकता को स्वीकारने के लिए ही बार-बार ‘आ रहा हूँ। कहकर आत्मीयता प्रकट करना चाहता है।

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प्रश्न 3.
‘जागरण गीत’ का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री सोहनलाल द्विवेदी-विरचित कविता ‘जागरण गीत’ एक प्रेरक कविता है। इस गीत के द्वारा द्विवेदी जी ने बड़े ही नपे-तुले शब्दों में जीवन की सार्थकता को बतलाने का प्रयास किया है। द्विवेदी जी इस जागरण गीत के माध्यम से जीवन की वास्तविकता का चित्रण किया है। उन्होंने यह बतलाना चाहा है कि जीवन में आलस्य, निराशा तथा संकीर्ण मनोवृत्ति को नकारते हुए मनोवृत्ति कर्मरत जीवन को ही प्रगति का मूलमंत्र बताया है। इस प्रकार उन्होंने पुराने मिथक तोड़ते हुए नव-जीवन के संचार का सन्देश इस गीत माध्यम से दिया है।

जागरण गीत कवि-परिचय

प्रश्न
श्री सोहनलाल द्विवेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परचिय-श्री सोहनलाल द्विवेदी का राष्ट्रीय विचारधारा के कवियों में प्रमुख स्थान है। उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता का अधिक स्वर सुनाई पड़ता है। उनका जन्म सन् 1905 ई. में हुआ था। उन्होंने छोटी-सी आयु में ही काव्य-रचना आरम्भ किया, जो क्रमशः देश-प्रेम और भक्ति के स्वर से गुंजित होता गया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय विचारधारा का प्रवाह है, तो गाँधीवादी चिन्तन और दृष्टिकोण भी है।

रचनाएँ-द्विवेजी जी की निम्नलिखत-रचनाएँ हैं-भैरवी-पूजा, ‘गीत’, ‘सेवाग्राम’, ‘दूध बतासा’, ‘चेतना’,’बाल भारती’ आदि।

भाषा-शैली-द्विवेदी जी की भाषा सहज और ऐसे प्रचलित शब्दों की है, जिसमें विविधता और अनेकरूपता है। तत्सम शब्दों की अधिकता है। जिसकी सहजता के लिए तभव और देशज शब्द बड़े ही उपयुक्त और सटीक रूप में प्रस्तुत हुए हैं। कहीं-कहीं मुहावरों-कहावतों को प्रयुक्त किया गया है। उनसे भाषा में और सजीवता आ गई है। बोधगम्यता और प्रवाहमयता उनकी शैली की पहली विशेषता है।

महत्त्व-द्विवेदी जी भारतीय संस्कृति को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के प्रबल समर्थक थे चूँकि गाँधी की विचारधारा से वे पूरी तरह प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने उसका न केवल समर्थन किया, अपितु उसे अपनी रचनाओं के माध्यम से जन-जन तक प्रेरित भी किया। गाँधीवादी विचारधारा में आस्था रखने के कारण उनकी रचनाओं में प्रेम, अहिंसा और समता के भाव दिखाई देते हैं। इस प्रकार वे अपने विशिष्ट योगदानों के लिए सदैव याद किए जाते रहेंगे।

जागरण गीत कविता का सारांश

प्रश्न
सोहन लात द्विवेदी विरचित कविता ‘जागरण गीत’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री सोहनलाल द्विवेदी-विरचित कविता ‘जागरण गीत’ एक भाववर्द्धक और सन्देशवाहक कविता है। इसमें कवि ने यथार्थ जीवन जीने का सन्देश दिया है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवि गहरी नींद में सोने वालों से कह रहा है कि वह गीत गाकर उसे जगाने के लिए आ रहा है। वह अब नींद की गहराई से ऊपर निकालकर उसे आकर्षक उदयाचल की तरह उत्साह प्रदान करने का जागरण गीत गा रहा है। कवि गहरी नींद में सोने वाले को फटकारते हुए कह रहा है कि वह आज तक नींद में पड़े-पड़े मीठी-मीठी कल्पना का उड़ान भरता रहा है। परिश्रम करने से कतराता रहा है।

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लेकिन वह ऐसा नहीं कर पायेगा। ऐसा इसलिए कि वह अपने जागरण गीत से उसे यथार्थ जमीन पर ला देगा। उसमें यह चेतना ला देगा कि नींद में सपने देखना सुखदायक नहीं है। उसके दुःखों को सुखों में वह अपने जागरण गीत से फूल में बदल देगा। गहरी नींद में सोने वाले को कवि की सीख है कि उसे जीवन के दुखों के मझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। ऐसा इसलिए कि वह अपने जागरण गीत से उसे पार लगा देगा। इसलिए उसे अपने मन में उठने वाली छोटी-छोटी बातों को भूल जाना चाहिए। उसे यह विश्वास होना चाहिए कि वह अपने जागरण गीत से उसकी हीनता को समाप्त कर देगा। यह सोच-समझकर अपने जीवन-पथ पर निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। वह अपने जागरण गीत से उसे उसके प्रगति के पथ से पीछे नहीं मुड़ने देगा।

जागरण गीत संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे,
गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूँ।
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा,
अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ॥

कल्पना में आज तक उड़ते रहे तुम,
साधना से सिहरकर मुड़ते रहे तुम।
अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूँगा,
आज धरती पर बसाने आ रहा हूँ॥

शब्दार्च-अतल-गहराई। अस्ताचल-पश्चिम का वह कल्पित पर्वत जिसके पीछे सूर्य का अस्त होना माना जाता है। उदयाचल-पूर्व का वह कल्पित पर्वत जहाँ से सूर्य उदित होता है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासन्ती’ हिन्दी सामान्य में संकलित तथा श्री सोहनलाल द्विवेदी विरचित कविता ‘जागरण गीत’ से है। इसमें कवि ने आलसी मनुष्यों को सावधान करते हुए कहा है कि

व्याख्या-अब मैं तुम्हें गहरी नींद में नहीं सोने दूंगा। मैं तुम्हें जगाने के लिए जागरण गीत तुम्हें सुनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ। अस्ताचल की गहराई अर्थात् जीवन की बर्बादी की ओर तुम्हें जाने से रोकने के लिए मैं आकर्षक उदयाचल को सजाने के लिए अर्थात् तुम्हारे जीवन को आनन्दित बनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ। तुम्हें अपने-आपके विषय में यह अच्छी तरह से जानकारी होनी चाहिए कि तुम आज तक कल्पना की ऊँची उड़ान उड़ते रहे हो। परिश्रम से मुँह मोड़ते रहे हो। लेकिन अब मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगा। अब तो मैं आकाश की उड़ान से नीचे धरती पर लाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हैं। दूसरे शब्दों में तम्हें जीवन की वास्तविकता बतलाने-समझाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. कवि का जागरण-सन्देश भाववर्द्धक है।
  2. शब्द-चयन लाक्षणिक है।
  3. तत्सम शब्दों एवं तदभव शब्दों के प्रयोग सटीक हैं।
  4. शैली उपदेशात्मक-भावात्मक है।
  5. वीर रस का संचार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य काव्यांग के स्वरूपों से पष्ट है। अनप्रास अलंकार की छटा (गीत गाकार व अतल अस्ताचल) इस पद्यांश में जहाँ है, वहीं मुहावरेदार शैली (गहरी नींद में सोना, आकाश में उड़ना और धरती पर बसाना) का प्रयोग आकर्षक है। वीर रस से यह अंश अधिक गतिशील होकर ओजपूर्ण बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरस और सहज शब्दों का है गहरी नींद में गीत गाकर जगाने का भाव न केवल अनूठा है अपित आत्मीयता से परिपूर्ण है।
गहरी नींद की सच्चाई को विश्वसनीयता के साथ बतलाने का ढंग रोचक होने के । साथ प्रेरक भी है। इससे कथन की सफलता को नकारा नहीं जा सकता है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि गीत गाकर किसे जगाना चाहता है?
(ii) आकाश में उड़ने के लिए कवि क्यों मना करता है?
उत्तर
(i) कवि गीत गाकर गहरी नींद में सोने वाले को जगाना चाहता है।
(ii) आकाश में उड़ने के लिए कवि मना करता है। यह इसलिए कि इससे जीवन की निरर्थकता सिद्ध होती है।

2. सुख नहीं यह, नींद में सपने संजोना,
दुख नहीं यह, शीश पर गुरू भार ढोना।
शूल तुम जिसको समझते वे अभी तक,
फूल में उसको बनाने आ रहा हूँ।
देखकर मँझधार को घबरा न जाना,
हाथ ले पतवार को घबरा न जाना।
मैं किनारे पर तुम्हें चकने न दूंगा,
पार में तुमको लगाने आ रहा हूँ।

शब्दार्थ-गुरूभार-भारीभार। शूल-काँटा (कठिनाई)। मझधार-बीच धारा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इस पद्यांश में कवि ने कायर और आलसी मनुष्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहा है कि

व्याख्या-हे आलसी, कायर मनुष्य! तुम्हें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि गहरी नींद में पड़े रहना किसी प्रकार से सुखद नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह हर प्रकार से दुखद और हानिकर ही होगा। इस प्रकार दुःखद होगा कि यह सिर का एक बहुत बड़ा बोझ बन जायेगा। उसे ढो पाना निश्चय ही असम्भव होगा। अब तक तुमने जिसे फूल अर्थात् जीवन की कठिनता समझते आ रहे हो। उसे ही मैं फूल बनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

कवि का पुनः गहरी नींद में सोने वाले अर्थात् जीवन-संघर्ष से भागने वाले मनुष्य को समुत्साहित करते हुए कहना है कि तुम स्वयं को जीवन-सागर के मँझधार में पाकर घबड़ाओ नहीं, अपितु धैर्य और हिम्मत से काम लो। जीवन-सागर के मँझधार से निकलकर किनारे पर आने के लिए तुम धैर्य रूपी पतवार को अपने हाथ में संभाल लो। इस प्रकार जब तुम साहस करोगे तो मैं तुम्हें किनारे पर आने तक उत्साहित करते हुए किसी प्रकार से निराश नहीं होने दूंगा। इस प्रकार मैं तुम्हें तुम्हारे जीवन-सागर से पार लगाने के लिए ही तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. वीर रस का प्रवाह है।
  2. तुकान्त शब्दावली है।
  3. शैली उपदेशात्मक है।
  4. ‘नींद में सपने संजोना’, ‘फूल बनाना’, हाथ में पतवार लेना और पार लगाना मुहावरों के सटीक और सार्थक प्रयोग हैं।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पयांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाक्-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश को काव्य:विधान-स्वरूप शब्द-भाव-योजना से निखारने का प्रयास प्रशंसनीय कहा जा सकता है। ‘घबरा न जाना’ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से अलंकृत यह पद्यांश कई मुहावरों के एकजुट आने से अधिक भावपूर्ण होकर सार्थकता में बदल गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना अपनी प्रभावमयता के फलस्वरूप रोचक और आकर्षक है। निराश और जीवन-संघर्ष के सामने घुटना टेकने वालों को सत्प्रेरित करने के विविध प्रयास प्रभावशाली रूप में हैं।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) नींद में सपने संजोना क्यों नहीं सुखद है?
(ii) मँझधार में पड़ने पर क्या नहीं करना चाहिए और क्या करना चाहिए?
उत्तर-
(i) नींद में सपने संजोना सुखद नहीं है। यह इसलिए कि इससे दुखों का बोझ कम न होकर बहुत भारी हो जाता है। फिर उसे ढोना असम्भव-सा हो जाता है।
(ii) मँझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। हाथ में पतवार लेकर किनारे पर आने के लिए पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए।

3. तोड़ दो मन में कसी सब शृंखलाएँ
तोड़ दो मन में बसी संकीर्णताएँ।
बिन्दु बनकर मैं तुम्हें ढलने न दूंगा
सिन्धु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ॥
तुम उठो, धरती उठे, नभ शिर उठाए,
तुम चलो गति में नई गति झनझनाए।
विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा,
प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ॥

शब्दार्व-संकीर्णताएँ-तुच्छ विचार । श्रृंखलाएँ-कड़ियाँ। नभ-आकाश । शिर-मस्तक, सिर। विपथ-बुरा रास्ता। प्रगति-उन्नति।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने आलसी और निराश व्यक्ति को समुत्साहित करते हुए कहा है कि

व्याख्या-तुम अपने मन को हीन करने वाली विचारों की कड़ियों को खण्ड-खण्ड कर डालो। इसी प्रकार तुम अपने अन्दर के तुच्छ विचारों और हीन भावों का परित्याग कर दो। तुम्हें स्वयं को कम न समझते हुए समुद्र की तरह विशाल और असीमित शक्ति से भरपूर समझना चाहिए। अगर तुम ऐसा नहीं समझते हो तो मैं तुम्हें ऐसा समझने के भावों को तुम्हारे अन्दर से जगाऊँगा।

इस प्रकार तुम्हें एक बिन्दु के समान जीवन जीने की स्थिति में नहीं रहने देगा। मैं तो तुम्हें समुद्र की तरह जीने देने के लिए तुम्हारे अन्दर सोई हुई भावनाओं को जगाने के लिए तुम्हारे ही पास आ रहा हूँ। कवि का पुनः जीवन में हारे हुए और निराश व्यक्ति को समुत्साहित करते हुए कहना है कि तुम अब अपनी गहरी नींद से जग जाओ। तुम्हारी जागृति और चेतना से इस संसार में जागृति और चेतना आ जाएगी। सारा आसमान अपना मस्तक ऊंचा कर लेगा। तुम्हारे गतिशील होने से सब ओर गतिशीलता आ जाएगी। तुम्हें विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के उद्देश्य से मैं तुम्हारे जीवन में हारने नहीं दूंगा। इस प्रकार मैं तुम्हें विकास के रास्ते पर निरंतर बढ़ाने के उद्देश्य से तुम्हारे पास ही आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. भाषा में ओज और गति है।
  2. मुहावरों के प्रयोग सटीक हैं।
  3. शब्द-चयन प्रचलित रूप में है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप प्रचलित तत्सम शब्दावली से परिपुष्ट है। उसे रोचक और आकर्षक बनाने के लिए तुकान्त शब्दावली की योजना ने लय
और संगीत को प्रस्तुत करके भाववर्द्धक बना दिया है। वीर रस के प्रवाह-संचार से यह पद्यांश प्रेरक रूप में है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य वीरता के भावों से प्रेरक रूप में है। निराश मनों को वीर रस से संचारित करने का प्रयास प्रशंसनीय है। भाव और अर्थ का सुन्दर मेल है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘शृंखलाओं’ से कवि का क्या आशय है?
(ii) ‘विपव’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) शृंखलाओं से कवि का आशय है हीन भावनाएँ।
(ii) ‘विपथ’ से कवि का तात्पर्य है-कुपथ। सन्मार्ग को छोड़कर दुखद रास्ते पर चलना।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 10 न्यायमंत्री

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 10 न्यायमंत्री (सुदर्शन)

न्यायमंत्री अभ्यास प्रश्न

न्यायमंत्री लघुत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशुपाल के घर आने वाला अतिथि कौन था? उसकी बातों से शिशुपाल क्यों नाराज हो गये?
उत्तर
शिशुपाल के घर आने वाला अतिथि एक परदेशी था। उसकी बातों से शिशुपाल नाराज हो गए, क्योंकि उसने उनके पुत्र को सेवक कहा था।

प्रश्न 2.
‘गोबर में फूल खिला हुआ है।’ यह वाक्य किसके लिए कहा गया है और क्यों ?
उत्तर
‘गोबर में फूल खिला हुआ है।’ यह वाक्य उस परदेशी अतिथि द्वारा शिशुपाल के लिए कहा गया है। यह इसलिए कि उसके युक्तियुक्त और शासन पद्धति का इतना विशाल ज्ञान उस छोटे-से गाँव के ऐसे व्यक्ति में होने की उसने कल्पना भी नहीं की थी।

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प्रश्न 3.
शिशुपाल महाराज अशोक के दरबार में जाने से क्यों घबरा रहे थे?
उत्तर
शिशुपाल महाराज अशोक के दरबार में जाने से घबरा रहे थे। यह इसलिए कि उनके मन में यह आशंका हो रही थी कि उनके शत्रओं ने महाराज से कोई शिकायत कर दी है। उन्हें हो सकता है कि प्राणदंड मिल जाए।

प्रश्न 4.
न्यायमंत्री को प्रहरी के हत्यारे का पता कैसे चला?
उत्तर
न्यायमंत्री को प्रहरी के हत्यारे का पता एक स्त्री के द्वारा गुप्त रूप से चला।

प्रश्न 5.
न्यायमंत्री ने महाराज को दंड किस तरह दिया?
उत्तर
न्यायमंत्री ने महाराज की सोने की मुर्ति को फाँसी पर लटकवाया और उनको चेतावनी देकर छोड़ दिया। इस प्रकार न्यायमंत्री ने महाराज को दंड दिया।

न्यायमंत्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“शिशुपाल का न्याय अंपा और बहरा है।’ यह उक्ति किन संदर्भो में कही गई है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शिशुपाल का न्याय अंधा और बहरा है। यह उक्ति उन संदर्भो में कही गई है कि शिशुपाल ने न्यायमंत्री के अधिकार से पूरे पाटलीपुत्र नगर में न्याय और सप्रबंध की धूम मचा दी। उन्होंने चोर-डाकुओं को इस प्रकार वश में कर लिया था, जिस प्रकार बीन बजाकर सपेरा साँप को वश में कर लेता है। उन दिनों लोगबाग दरवाजे खुले छोड़ देते थे, फिर भी किसी की हानि नहीं होती थी। इस प्रकार शिशपाल का न्याय अंधा और बहरा था। जो न सूरत देखता था, न कोई सिफारिश सुनता था। वह तो केवल शिक्षाप्रद दंड ही देना जानता था।

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प्रश्न 2.
पाठ के आधार पर शिशुपाल के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
शिशुपाल के चरित्र में हमें निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं
1. आतिथ्य सत्कार की भावना-शिशुपाल अपने गाँव का घोर दरिद्र ब्राह्मण था। उसकी जीविका थोड़ी-सी भूमि पर चलती थी। फिर भी एक परदेशी को द्वार पर खड़ा देखकर उसका मुख खिल गया। वह मुस्कुर.कर कहता है कि यह मेरा सौभाग्य है। आइए, पधारिए अतिथि के चरणों से मेरा चौका पवित्र हो जाएगा। इस प्रकार उसमें अतिथि-सत्कार की भावना दिखाई देती है।

2. सच्चा न्यायप्रिय-शिशुपाल ब्राह्मण को शासन-पद्धति का पूरा-पूरा ज्ञान था। सम्राट अशोक ने उसे न्यायमंत्री बना दिया। शिशुपाल का न्याय अंधा और बहरा था जो न सूरत देखता था और न सिफारिश मानता था। वह तो केवल दंड देना जानता था। उसने प्रहरी की हत्या के अपराध में सम्राट अशोक को भी दंडित किया। वह एक सच्चा न्यायी था।

3. निर्भीक और साहसी-शिशुपाल पाटलिपुत्र का न्यायमंत्री था। वह सम्राट अशोक से भी भयभीत नहीं होता था। जब सम्राट अशोक प्रहरी की हत्या के अपराध में पकड़े जाते हैं तो शिशुपाल उनके हाथ में बड़े साहस के साथ हथकड़ी डलवा देता है और निर्भीकता से सम्राट को दंडित करता है।

4. कर्तब्ध-परायण-शिशुपाल ने एक बार कहा था कि अवसर मिले तो दिखा हूँ कि न्याय किसे कहते हैं। मुझसे कोई अपराधी दंड से नहीं बचेगा। मैं न्याय का डंका बजाकर बता दूंगा। और शिशुपाल ने ऐसा ही करके दिखा दिया। प्रहरी की हत्या का पता उसने तीन दिन में निकाल लिया ! उसके न्याय के आगे न राजा बड़ा है और न रंक। वह राजा अशोक को प्रहरी की हत्या के अपराध में बंदी बनाता है और उसे दंडित भी करता है।

प्रश्न 3.
आपकी दृष्टि में न्यायमंत्री कैसा होना चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
हमारी दृष्टि में न्यायमंत्री सच्चा और निष्पक्ष होना चाहिए। उसमें अपने कर्तव्य का बोध होना चाहिए और उसका पालन करने की दृढ़ता होनी चाहिए। उसका न्याय दोषी और अपराधी के प्रति कठोर और सीधा होना चाहिए। उसे दंड-विधान का ज्ञान होना चाहिए। उसका दंड शिक्षाप्रद और सुधारप्रद होना चाहिए।

प्रश्न 4.
अपराधी घोषित होने पर भी महाराज अशोक का हृदय क्यों प्रफुल्लित वा?
उत्तर
अपराधी घोषित होने पर भी महाराज अशोक का हदय प्रफुल्लित था। यह इसलिए कि उन्होंने अपने गुप्त वेश में शिशुपाल की जो दृढ़ता सुनी थी, उसने उसे कर दिखाया। इस प्रकार शिशुपाल के न्याय को सुनकर उन्होंने प्रफुल्लित हदय से यह विचार किया कि यह मनुष्य सोना है, जो अग्नि में पड़कर कुंदन हो गया। ऐसे मनुष्यों पर जातियाँ अभिमान करती हुई अपने तन-मन को निछावर करने के लिए तैयार हो जाती हैं।

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प्रश्न 5.
न्यायमंत्री की जगह यदि आप होते, तो किसी प्रकार का न्याय करते? लिखिए।
उत्तर
न्यायमंत्री की जगह यदि हम होते तो उचित-अनुचित का ध्यान रखकर न्याय करते। ‘राजा को ईश्वर माना गया है। ईश्वर ही दंड दे सकता है।’ इसे हम ध्यान में रखकर महाराज अशोक की मूर्ति को फाँसी पर लटकाए जाने का आदेश तो अवश्य देते, लेकिन उन्हें सम्मान देते, उन्हें सार्वजनिक रूप से चेतावनी नहीं देते।

प्रश्न 6.
आशय स्पष्ट कीजिए

(क) जिसका अंतःकरण कुढ़ रहा हो जिसके नेत्र आँसू बहा रहे हों, जिसका मस्तिष्क अपने आपे में नहीं, उसके होंठों पर हँसी ऐसी भयानक प्रतीत होती है, जैसे श्मशान में चाँदनी वरन् उससे भी अधिक।
(ख) उन्होंने चोर-डाकुओं को इस प्रकार वश में कर लिया था जिस प्रकार बीन बजाकर सपेरा सर्प को वश में कर लेता है।
उत्तर
उपर्युक्त कथन का आशय है कि शुष्क हृदय, शुष्क आँखों और अव्यवस्थित मन और मस्तिष्क में अचानक आशाओं को जगा देने से क्षणिक सुख का अनुभव अवश्य होता है। वह सुखद होकर भी भयानकता से बाहर नहीं दिखाई देता है। भाव यह है कि दुखमय जीवन में आने वाले सुखद क्षणों से पूरा जीवन हरा-भरा नहीं दिखाई देता है।

(ख) उपर्युक्त वाक्य का आशय यह है कि सुशासन और सुप्रबंध से अपराधियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। जनता में प्रशासन के प्रति विश्वास बढ़ जाता है। भय और आतंक के पादल छंटने लगते हैं। चारों ओर अमन-चैन का माहौल बनने लगता है।

न्यायमंत्री भाषा-अध्ययन

1. वाक्य शुद्ध कीजिए
(क) मेरे को आपकी परीक्षा करना है।
(ख) मैं तुमही को जानमा हूँ।
(ग) हम लोग आपस में परस्पर हमेशा विचार विमर्श करने हैं।
(घ) मैं सोती नींद से उठ बैठा।
(ङ) कृपया उनका कार्य करने की कृपा करें।

2. दिए हुए शब्दों में से तत्सम, तद्भव शब्दों को छाँटकर लिखिए
सर्प, चरण, आँखें, रक्त, कठिन, अश्रु, अंधा, मृत्यु, आग, कदाचित, बातचीत, सफल, नींद, ग्राम।

3. निम्नलिखित शब्दों को पढ़कर उनका सही उच्चारण कीजिए
दृढ़-संकल्प, निर्विवाद, हतोत्साह, निस्तब्धता, आत्मोत्सर्ग।
उत्तर
1. शुद्ध वाक्य
(क) मुझे आपकी परीक्षा करनी है।
(ख) मैं तुम्हें जानता हूँ।
(ग) हम लोग आपस में हमेशा विचार-विमर्श करते हैं।
(घ) मैं नींद से उठ बैठा।
(ङ) उनका कार्य करने की कृपा करें।

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2. तत्सम शब्द तद्भव शब्द
सर्प – आँखें
चरण – कठिन
रक्त – अंधा
अश्रु – आग
मृत्यु – बातचीत
कदाचित – नींद
ग्राम – सफल।

3. निम्नलिखित शब्दों को पढ़कर उनका सही उच्चारण छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से करें
दृढ़-संकल्प, निर्विवाद, हतोत्साह, निस्तब्धता, आत्मोत्सर्ग।

न्यायमंत्री योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
बदलते परिवेश में शिशुपाल का चरित्र कितना प्रासंगिक है? इस संबंध में अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों के बारे में जानकारी एकत्रित करें जिससे आप प्रभावित हैं।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

2. पाठ में आए शिशुपाल के संवार्दो को अभिनय के साथ कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

3. सम्राट अशोक से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं को एकत्र करें तश नाटिका या कहानी लिखें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

न्यायमंत्री परीक्षापयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशुपाल कौन था?
उत्तर
शिशुपाल बुद्ध गया नामक गाँव का सबसे अधिक निर्धन ब्राह्मण था। बाद में महाराज अशोक के दरबार में न्यायमंत्री बना।

प्रश्न 2.
अशोक कैसा था?
उत्तर
अशोक बहुत ही निष्ठुर और निर्दयी था। वह ब्राह्मणों और स्त्रियों को भी फाँसी पर चढ़ा दिया करता था।

प्रश्न 3.
अशोक ने शिशुपाल के न्याय की परीक्षा लेने के लिए क्या कहा?
उत्तर
अशोक ने शिशुपाल के न्याय की परीक्षा लेने के लिए कहा, “यह राजमुद्रा है, तुम कल प्रातःकाल से सूर्य की पहली किरण के साथ न्यायमंत्री समझे जाओगे। मैं देखूगा, तुम अपने-आपको किस प्रकार सफल शासक सिद्ध कर सकते हो?

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प्रश्न 4.
न्यायमंत्री निरुत्तर क्यों हो गए?
उत्तर
न्यायमंत्री ने जब अशोक को उसकी मुद्रा लौटाते हुए कहा कि वे यह अपनी वस्तु सँभाले। वह अपने गाँव वापिस जाएगा, तब अशोक ने कहा, “आपका साहस मैं कभी नहीं भूलूँगा। यह बोझ आप ही उठा सकते हैं। मुझे कोई दूसरा इस पद के योग्य दिखाई नहीं देता।” अशोक की इन बातों को सुनकर न्यायमंत्री निरुत्तर हो गए।

न्यायमंत्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने राज्य में क्या व्यवस्था की थी?
उत्तर
न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने राज्य में व्यवस्था के लिए पुलिस और पहरेदारों को संगठित किया। पहरेदारों के कारण पहले तो अपराध होते ही नहीं थे। यदि अपराध हो जाए तो अपराधी को कठोर सजा मिलती थी। कुछ दिनों में सारे राज्य में शिशुपाल के न्याय की पताका फहरा उठी थी।

प्रश्न 2.
न्यायमंत्री ने अपनी कार्यकुशलता का परिचय किस प्रकार दिया?
उत्तर
सम्राट अशोक के बुलाने पर शिशुपाल सामने आए। महाराज ने पूछा-“घातक का पता लगा?” न्यायमंत्री ने कहा, “हाँ, लग गया।” न्यायमंत्री ने थोड़ी देर कुछ सोचा फिर दृढ़ संकल्प के साथ कहा, “मेरी आज्ञा है, सम्राट अशोक को गिरफ्तार कर लो।” इस पर अशोक क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने ब्राह्मण से कहा-“ब्राह्मण! तुममें इतनी शक्ति है कि जो तुम मुझ तक बढ़ आए” किंतु शिशुपाल ने सम्राट अशोक की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। शिशुपाल ने फिर दोहराया, “मैं आज्ञा देता हूँ गिरफ्तार कर लो। यह घातक है। इसे मेरी अदालत में पेश करो।”

धनवीर ने अशोक को हथकड़ी लगा दी और शिशुपाल की अदालत में सम्राट अशोक को बंदी के रूप में पेश किया। शिशपाल ने धीरे से कहा, “सम्राट तुम पर एक पहरेदार की हत्या का अपराध है। तुम इसका क्या उत्तर देते हो?” सम्राट अशोक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। परंतु उन्होंने उसे उद्दण्डता के कारण मारा था। शिशुपाल ने कहा, “अशोक! तुमने एक राजकर्मचारी की हत्या की है। मैं तुम्हारे वध की आज्ञा देता हूँ।”

प्रश्न 3.
लोग शिशुपाल के किस न्याय पर मुग्ध हो गए?
उत्तर
जब न्यायमंत्री ने खड़े होकर कहा, “महाशय! यह सच है कि एक राजकर्मचारी की हत्या की गई है। उसका दंड अवश्यंभावी है। परंतु शास्त्रों में राजा को ईश्वर माना गया है। उसे ईश्वर ही दंड दे सकता है। यह काम न्यायमंत्री की शक्ति के बाहर है, अतएव मैं आज्ञा देता हूँ कि महाराज को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए और उनकी मूर्ति फाँसी पर लटकाई जाए जिससे लोगों को शिक्षा मिले।”न्यायमंत्री का जय-जयकार हुआ। लोग इस न्याय पर मुग्ध हो गए।

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प्रश्न 4.
शिशुपाल और महाराज अशोक में तुम किसे श्रेष्ठ समझते हो और क्यों?
उत्तर
शिशुपाल और महाराज अशोक में हम शिशुपाल को श्रेष्ठ समझते हैं। यह इसलिए कि उसमें निष्पक्ष न्याय करने की योग्यता थी। वह अपराधी सिद्ध होने पर सम्राट अशोक को भी फाँसी की सजा देने से नहीं हिचकता है। वह परम न्यायी है। उसे न्याय के सिवाय और कुछ नहीं दिखाई देता है जबकि सम्राट अशोक न्याय के नाम पर क्रोधित हो जाते हैं। लेकिन वह निडर होकर अपने न्याय पर ही डटा रहता है।

प्रश्न 5.
सुदर्शन-लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’ का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
न्यायमंत्री’ शीर्षक कहानी महान कथाकार सुदर्शन की एक श्रेष्ठ और चर्चित कहानी है। इस कहानी में यह बतलाने का प्रयास किया गया है कि सम्राट अशोक के शासनकाल में शिशुपाल एक निर्धन ब्राह्मण था। इसके साथ ही वह एक न्यायप्रिय, निर्भीक तथा लोकप्रिय व्यक्ति भी था। शिशुपाल के यहाँ अतिथि के रूप में रहकर सम्राट अशोक ने उसकी उस अद्भुत योग्यता को परखा। उससे प्रभावित होकर उसे न्यायमंत्री के पद पर नियुक्त किया। उसने न्यायमंत्री बनते ही राज्य में सुख-शांति का वातावरण फैला दिया। अपने न्याय के बल पर उसने एक परिवार की रक्षा करते पहरेदार की हत्या के आरोप में सम्राट अशोक को ही दोषी सिद्ध कर दिया। फिर उन्हें मृत्युदंड के रूप में सजा सुना दिया। उसकी न्यायप्रियता और राज्यभक्ति वर्तमान समय में भी अनुकरणीय है।

न्यायमंत्री लेखक-परिचय

प्रश्न
श्री तुदर्शन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश झलिए।
उत्तर
श्री सुदर्शन प्रेमचंदकालीन कहानीकारों में एक प्रमुख कहानीकार हैं।

जीवन-परिचय-श्री सुदर्शन जी का असली नाम पंडित बदरीनाथ था। आपका जन्म सन् 1896 ई. में स्यालकोट में हुआ था। आपने हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू जादि भाषाओं का सम्यक अध्ययन किया। आपकी प्रवृत्ति लेखन की ओर आरंभ से ही थी। प्रेमचंद की तरह आपने उर्दू के बाद हिंदी में कच्ची उम्र में ही लिखना शुरू किया था।

रचनाएँ-‘तीर्थ-यात्रा’, ‘पनघट’, ‘फूलवती’, ‘भाग्यचक्र’, ‘सिकंदर’ आदि आपकी लोकचर्चित रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त आपने नाटक और बाल-साहित्य भी रचा है।

भाषा-शैली-श्री सुदर्शन जी की भाषा-शैली सरस और प्रवाहमयी है, आपकी भाषा शैली संबंधित निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

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1. भाषा-श्री सुदर्शनजी की भाषा में उर्दू-फारसी और अरबी के प्रचलित शब्द स्थान-स्थान पर दिखाई देते हैं। उसमें जगह-जगह कहावतों और मुहावरों के भी प्रयोग हुए हैं। इससे आपकी भाषा सुबोध भाषा कही जा सकती है।

2. शैली-श्री सुदर्शन जी की शैली में बोधगम्यता नामक विशिष्ट गुण है। वह सर्वत्र रोचक और हदयस्पर्शी है। मार्मिकता उसकी प्रमुख पहचान है। स्थान-स्थान पर उद्धरणों और कथा-सूत्रों को प्रयुक्त करके विषय को स्पष्ट करने के प्रयास अधिक आकर्षक लगते हैं। महत्त्व-श्री सुदर्शनजी का स्थान मुंशी प्रेमचंद के बाद है ये उनके अनुवर्ती हैं, उर्दू से हिंदी में लिखने वाले आप मुंशी प्रेमचंद के बाद सर्वप्रमुख हैं। कथा-साहित्य में आपने प्रेमचंद के बाद अत्यधिक भूमिका निभाई है।

न्यायमंत्री कहानी का सारांश

प्रश्न
श्री सुदर्शन लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’ का तारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री सुदर्शन लिखित कहानी न्यायमंत्री एक शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक कहानी है। इस कहानी का सारांश इस प्रकार है आज से 2500 साल पहले बुद्ध गया नामक गाँव में एक बहुत गरीब शिशुपाल नामक ब्राह्मण रहता था। उसके यहाँ एक परदेशी रहा। उस परदेशी की शिशुपाल ने यथाशक्ति आदर-सत्कार किया। उससे वह परदेशी बहुत खुश था। उसने उसकी खूब प्रशंसा की। उससे उसने यह भी कहा-“मुझे ख्याल भी न था कि गोबर में फूल खिलाहुआ है। महाराज अशोक को पता लग जाए तो कोई बड़ी-सी ऊँची पदवी पर नियुक्त कर दें।”

शिशुपाल ने उस परदेशी की बातें सुनकर मुस्कुरा दिया। कुछ देर बाद उसने उस परदेशी से कहा, “आजकल के बढ़ रहे अन्याय को देखकर मेरा रक्त उबलने लगता है। अगर मुझे अवसर मिले तो कोई अन्याय नहीं होने दूंगा और कोई अपराधी दंड से नहीं बचेगा।” परदेशी ने हँसते हुए कहा, “यदि मैं अशोक होता तो आपकी इच्छा पूरी कर देता।” . दूसरे दिन महाराज अशोक ने जब शिशुपाल को दरबार में बुलाया तो लोगों ने अशोक की कठोरता-निर्दयता को याद कर यह समझ लिया कि अब शिशुपाल जीवित नहीं लौटेगा।

शिशुपाल अपने पुत्र-स्त्री को समझाकर पाटलीपुत्र पहुँचा तो उसके मन में तरह-तरह की आशका होने लगी। उसे यह भी आशंका हुई कि कहीं वह परदेशी ही हो, यह उसी की लगाई हुई हो। इस प्रकार की आशंकाओं से उसका कलेजा धड़कने लगा। उसी समय महाराज अशोक ने राजकीय ठाठ से कमरे में आकर उससे पूछा कि क्या उसने उसे पहचान लिया? उसने कहा कि उसे पता होता कि वही महाराज हैं, तो वह उतनी स्वतंत्रता से बात नहीं करता। महाराज ने उससे कहा कि उसने कहा था कि उसे अवसर दिया जाए तो वह न्याय का डंका बजा देगा। महाराज ने उससे आगे कहा कि इसके लिए अब उसे एक परीक्षा देनी होगी। कल प्रातः से वह न्यायमंत्री के रूप में कार्य करेगा। उसके अधीन पुलिस अधिकारी होंगे। उसका उत्तरदायित्व पाटलीपुत्र में शांति रखने का होगा। यह देखा जाएगा कि वह स्वयं को किस प्रकार सफल शासक सिद्ध करता है। एक माह बीतते ही न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने अपने कड़े शासन की चारों ओर धूम मचा दी। इससे नगर की दशा में आकाश-पाताल का अंतर पड़ गया।

एक रात को एक अमीर ने एक विशाल भवन के द्वार को खटखटाकर खुलवाना चाहा, लेकिन उसके अंदर से किसी स्त्री ने खोलने से मना कर दिया। उसने उस स्त्री को धमकाया तो उसने उससे कहा कि शिशुपाल का राज्य है। कोई किसी को तंग नहीं कर सकता। लेकिन उस अमीर ने उसकी एक न सुनी और तलवार निकालकर दरवाजे पर आक्रमण कर दिया। अचानक आकर एक पहरेदार ने उसका हाथ थामकर उसे फटकारा। पूछने पर उस पहरेदार ने उसे बताया कि उसे न्यायमंत्री ने नियुक्त किया है। उसने यह प्रण किया है कि उसके तन में जब तक प्राण और खून की अंतिम बूँद है, वह अपने कर्त्तव्य से पीछे नहीं हटेगा। इसलिए अगर इस समय महाराज अशोक भी आ जाएँ तो भी वह नहीं टलेगा। उस अमीर ने उसकी बातों को अनसुना कर उस पर तलवार लेकर झपटा। उसका सामना करते हुए वह पहरेदार मारा गया। उसकी लाश को एक ओर करके वह अमीर वहाँ से भाग निकला।

इस घटना को सुनकर सब हैरान थे कि शिशुपाल के शासन में ऐसी घटना! शिशु की नींद हराम हो गई। वे खाना-पीना सब भूलकर उस घातक का पता न लगा सके। महाराज उनसे बार-बार पूछते-“घातक पकड़ा गया…कब तक पकड़ा जाएगा।” न्यायमंत्री उन्हें तसल्ली देते-“जल्दी ही पकड़ लिया जाएगा।” एक दिन महाराज ने क्रोध में आकर यह चेतावनी दे दी, “तुम्हें तीन दिन की अवधि दी जाती है। यदि इस बीच घातक न पकड़ा गया तो तुम्हें फाँसी दे दी जाएगी।” इस समचार से पूरे नगर में

हलचल मच गई। तीसरे दिन आने पर शिशुपाल नगर के घने बाजार में घूम रहे थे। एक स्त्री ने उन्हें खिड़की से देख लिया। उसने उन्हें अंदर बलाकर उस बीती घटना के बारे में सब कुछ बता दिया। दूसरे दिन दरबार में आते ही महाराज अशोक के पछने पर शिशुपाल ने कहा कि घातक का पता लग गया है और वह घातक तुम हो। तुम पर पहरेदार की हत्या का अपराध है। तुम इसका क्या उत्तर देते हो? महाराज अशोक ने कहा कि वह उइंड था। इसलिए उन्होंने उसको मार डाला। न्यायमंत्री शिशुपाल ने उन्हें एक राजकर्मचारी का वध करने के अपराध में उनके वध की आज्ञा दी।

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उसे सुनकर लोगों ने शिशुपाल को गाली दी। लेकिन अशोक ने उन्हें शांत रहने का संकेत किया। अशोक ने उपेक्षापूर्वक कहा कि वे इस आज्ञा के विरुद्ध कछ नहीं बोल सकते। न्यायमंत्री के आदेश पर एक मनुष्य अशोक की सोने की मूर्ति लेकर उपस्थित हुआ। न्यायमंत्री ने खड़े होकर कहा, “महाशय! यह सच है कि राजकर्मचारी की हत्या की गई है। उसका दंड अवश्यंभावी है। परंतु शास्त्रों में राजा को ईश्वर माना गया है। ईश्वर ही दंड दे सकता है। यह काम न्यायमंत्री की शक्ति से बाहर है। अतएव मैं आज्ञा देता हूँ कि महाराज को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए और उनकी मूर्ति को फाँसी दे दी जाए, जिससे लोगों को शिक्षा मिले।” इसे सुनकर सभी ने न्यायमंत्री की जय-जयकार की।

रात को न्यायमंत्री ने राजमहल में जाकर अशोक को उसकी अंगठी और मद्रा देते हुए अपने गाँव वापिस जाने की बात कही। अशोक ने उसे सम्मानभरी आँखों से देखते हुए कहा कि अब यह संभव नहीं है। वह उसके साहस को नहीं भूल सकता है। दूसरा. इस पद के योग्य उसे कोई नहीं दिखाई देता।

न्यायमंत्री संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, अर्थ-ग्रहण संबंधी व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. महाराज ने सिर झुका दिया। इस समय उनके हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें मार रहा था। सोचते थे, यह मनुष्य स्वर्ण है, जो अग्नि में पड़कर कुंदन हो गया। कहता था मेरा न्याय अपनी पूम मचा देगा, यह वचन झूठा न था। इसने अपने कहने की लाज रख ली है। ऐसे ही मनुष्य होते हैं जिन पर जातियाँ अभिमान करती हैं और जिन पर अपना तन-मन निष्ठावर करने को उद्धृत हो जाती हैं।

शब्दार्थ-ब्रह्मानंद-ब्रह्म का आनंद । लाज-इज्जत। निछावर-बलिदान।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश महाकथाकार श्री सुदर्शन द्वारा लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’

प्रसंग-इस गद्यांश में कहानीकार ने इस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहा है कि जब शिशुपाल ने अपराधी का पता लगा लिया और यह पाया कि अपराधी स्वयं सम्राट अशोक ही हैं तो शिशुपाल ने अपराधी होने के कारण उन्हें फाँसी की सजा दे दी। इस पर सम्राट अशोक की क्या प्रतिक्रिया हुई।

व्याख्या-जब फाँसी की सजा को न्यायमंत्री शिशुपाल ने सुनाया तब सम्राट अशोक का सिर झुक गया। उस समय उनके हृदय में स्वर्ग के आनंद की लहर उठ रही थी। ऐसा इसलिए कि उन्हें अपने एक सच्चे और निर्भीक न्यायमंत्री का न्याय देखकर आनंद आ रहा था। वे मन-ही-मन सोच रहे थे कि शिशुपाल वास्तव में सच्चा स्वर्ण-मानव था जो कत्र्तव्यरूपी अग्नि में पड़कर शुद्ध हो गया था। वह कहा करता था कि उसके न्याय की धूम मचेगी यह बात निःसंदेह सच ही निकली। उसने जो कुछ कहा था उसको पूरा कर दिया। शिशुपाल जैसे मनुष्य जो सच्चे और साहसी होते हैं उन पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व करती हैं और ऐसे ही लोगों पर अपना तन-मन-धन न्यौछावर करने के लिए वे तत्पर भी हो उठती हैं।

विशेष-

  1. सत्य और निष्पक्ष न्याय के महत्त्व को प्रदर्शित किया गया है।
  2. भाषा सरल और स्पष्ट है।
  3. ‘धूम मचाना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।
  4.  शैली सुबोध है।
  5. संपूर्ण अंश प्रेरणादायक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) महाराज ने सिर क्यों झुका लिया?
(ii) महाराज के हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें क्यों मार रहा था? .
उत्तर
(i) महाराज ने सिर झुका लिया। यह इसलिए कि उन्हें न्यायमंत्री शिशुपाल ने अपराधी सिद्ध कर दिया था। उसे सिर झुकाकर स्वीकार कर लेना उन्होंने अपना कर्तव्य समझ लिया था।
(ii) महाराज के हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें मार रहा था। यह इसलिए कि उनसे शिशुपाल ने कहा था कि उसका न्याय धूम मचा देगा तो उसने आज सचमुच यह कर दिखाया है। इस प्रकार उसने उनको झूठे वचन न देकर उनके विश्वास को कायम रखा था।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) जातियाँ किन पर अभिमान कर अपना तन-मन निछावर करने को उद्यत हो जाती हैं?
(ii) उपर्युक्त गयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) जातियाँ कथनी-करनी में अंतर न रखने वालों पर अपना तन-मन निछावर करने को उद्यत हो जाती हैं।
(ii) उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव है-किसी को दिए गए वचन को झूठा न होने देना। किसी भी परिस्थिति में अपने कहने की लाज रखना।

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 17 मृत्तिका

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 17 मृत्तिका (नरेश मेहता)

मृत्तिका अभ्यास-प्रश्न

मृत्तिका लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी के मातृरूपा होने का क्या आशय है?
उत्तर
मिट्टी के मातृरूपा होने का आशय है-हर प्रकार से ऐसी सम्पन्नता जो भरण-पोषण कर जीवन-शक्ति प्रदान कर सके।

प्रश्न 2.
जब मनुष्य का अहंकार समाप्त हो जाता है, तब मिट्टी उसके लिए क्या बन जाती है?
उत्तर
जब मनुष्य का अहंकार समाप्त हो जाता है, तब मिट्टी उसके लिए पूज्य बन जाती है।

प्रश्न 3.
मिट्टी के किस रूप को प्रिया कहा गया है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी के कुंभ और कलश रूप को प्रिया कहा गया है। यह इसलिए कि इसे लेकर किसी की प्रिया जल भरने जाती है। वह उस जल को अपने प्रिय को पिला उसकी प्रिया होने के धर्म को निभाती है।

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प्रश्न 4.
में तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर
‘में तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी ने ऐसा कहा है। यह इसलिए कि उसे अपना कोई विशेष और चमत्कारी संस्कार नहीं प्राप्त होता है।

प्रश्न 5.
मिट्टी किस प्रकार चिन्मयी शक्ति बन जाती है?
उत्तर
मिट्टी को मनुष्य जब अपने पुरुषार्थ से पराजित होकर अपनेपन की भावना से पुकारता है, तब वह चिन्मयी शक्ति बन जाती है।

मृत्तिका दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी किन कष्टों को सहकर हमें धन-धान्य से पूर्ण करती है?
उत्तर
मिट्टी मनुष्य के पैरों से रौंद दिए जाने और हल के फाल से विदीर्ण किए जाने जैसे बहुत ही असहनीय कष्टों को सहकर हमें धन-धान्य से पूर्ण करती है।

प्रश्न 2.
इस कविता में मिट्टी के किन-किन स्वरूपों का उल्लेख किया गया
उत्तर
इस कविता में मिट्टी के विविध स्वरूपों का उल्लेख किया गया है।
माता, कुंभ, कलश, खिलौना, प्रजा, चिन्मयी शक्ति, आराध्या, प्रतिमा आदि मिट्टी के अलग-अलग स्वरूपों को इस कविता में चित्रित किया गया है।

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प्रश्न 3.
पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व क्यों कहा गया है?
उत्तर
पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व कहा गया है। यह इसलिए कि इससे ही किसी साधारण वस्तु को उसको महान और उपयोगी स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में पुरुष द्वारा असंभव को संभव किया जा सकता है और मिट्टी जैसे साधारण-सी वस्तु को देवत्व का दर्जा दिया जा सकता है।

प्रश्न 4.
‘मृत्तिका’ कविता के माध्यम से कवि ने क्या संदेश दिया है?
उत्तर
‘मृत्तिका’ कविता के माध्यम से कवि ने हमें यह संदेश दिया है कि हमें किसी भी साधारण-सी-साधारण चीज को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए। मिट्टी जैसी साधारण-सी वस्तु को मनुष्य अपने पुरुषार्थ के द्वारा उसे न केवल विविध स्वरूप प्रदान करता है अपितु अधिक उपयोगी और पूज्य स्वरूप में भी ढाल देता है। इसलिए हमें अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनी पूरी शक्ति, बुद्धि और विश्वास को लगा देना चाहिए। इससे कोई भी लक्ष्य दूर नहीं रह जाएगा। वह आसानी से हासिल हो ही जाएगा।

प्रश्न 5.
मृत्तिका के माता, प्रिया और प्रजा रूपों में से आपको सबसे अच्छा रूप कौन-सा लगता है और क्यों?
उत्तर
मृत्तिका के माता, प्रिया और प्रजा रूपों में हमें सबसे अच्छा रूप माता का लगता है। यह इसलिए कि माता से ही हमारा इस संसार में आना संभव हुआ। इससे हमारे जीवन की आरंभिक आवश्यकताएँ पूरी हुई, जिनके बलबूते पर हमने न केवल अपना विकास-विस्तार किया, अपितु दूसरों के विकास-विस्तार में सहायता की। अगर माता किसी को न प्राप्त हो, तो उसका कब अस्तित्व नहीं हो सकता है।

प्रश्न 6.
पुरुषार्थ पराजित स्वत्व से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पुरुषार्थ पराजित स्वत्व से आशय है-अहंकार के अपनापन का विसर्जन। जब पुरुषार्थ अहंकार के अपनापन का विसर्जन हो जाता है, तब दूसरों का महत्त्व और उपयोगिता का पता चलने लगता है। यह किसो के लिए आवश्यक है और कल्याणकारक भी।

मृत्तिका भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखत शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
अंतरंग, पराजित, स्वत्व, देवत्व, विश्वास।
उत्तर
शब्द – विलोम
अंतरंग – बहिरंग
पराजित – अपराजित
देवत्व – राक्षसत्व
विश्वास – अविश्वास।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
1. जिसकी रुचि साहित्य में हो।
2. जो सब कुछ जानता हो।
3. जो किए हुए उपकारों को मानता है।
4. जो किए उपकारों को नहीं मानता है।
5. जो देखा नहीं जा सकता है।
उत्तर
वाक्यांश के लिए एक शब्द
बाक्यांश – एक शब्द
1. जिसकी रुचि साहित्य में हो। – साहित्यिक
2. जो सब कुछ जानता हो। – सर्वज्ञ
3. जो किए हुए उपकारों को मानता है। – कृतज्ञ
4. जो किए हुए उपकारों नहीं मानता है। – कृतघ्न
5. जो देखा नहीं जा सकता है। – अदृश्य।

प्रश्न 3.
“अपने ग्राम देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ।” काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त काव्य-पंक्ति का काव्य-सौन्दर्य ओजस्वी भावों से पष्ट है। मिट्टी को वाणी प्रदान करने से मानवीकरण अलंकार की चमक से कथन को प्रभावशाली ढंग में प्रस्तुत करने का कवि प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। .

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प्रश्न 4.
(क) में तो मात्र मृत्तिका हूँ
जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो तव में
धनधान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ।

1. उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ मुक्त छंद हैं लय मात्रा से विहीन हैं इन्हें अतुकान्त पद भी कहा जाता है।
क. काव्य में मृत्तिका (मिट्टी) ने मानव को सम्बोधित करते हुए अपने विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। अतः सम्बोधन शैली द्रष्टव्य है।
ख. कविता में माँ के रूप में त्याग, प्रेमिका के रूप में शांति-तृप्ति, प्रजा के रूप में मनचाहा व्यवहार, प्रतिमा के रूप में आराधना बताई गयी है इस प्रकार भाषा के साधारण अर्व के साथ गहन (द्वितीय) अर्व भी हो तो लाक्षणिकता कहलाती है। कविता से लाक्षणिक शब्दों से युक्त पंक्तियाँ छाँटकर लिखिए।
उत्तर
कविता से लाक्षणिक शब्दों से युक्त पंक्तियाँ
1. जब तुम
मुझे पैरों से रौंदते हो
तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो,
तब में
धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ!

2. कुंभ और कलश बनकर
जल लाती तुम्हारी अंतरंग प्रिया हो जाती हूँ।

3. जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने रूप पर
आकर्षित होकर मचलने लगते हो
तब मैं
तुम्हारे शिशु-हाथों में पहुँच प्रजारूपा हा जाती हूँ।

4. पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्थ, पराजित स्वत्व से मुझे पुकारते हो
तब मैं
अपने ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मय शक्ति हो जाती हूँ।

5. प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ।

मृत्तिका योग्यता-विस्तार

(क) मृत्तिका कविता की तरह पवन और जल विषय पर अपनी कल्पना से कविता बनाइए और कक्षा में सुनाइए।
(ख) कवि शिवमंगल सिंह सुमन की कविता ‘मिट्टी की महिमा’ पढ़कर मिट्टी की सृजन-शक्ति और महिमा को जानिए।
(ग) मानव का पुरुषार्थ ही उसे देवत्व प्रदान करता है इस विषय पर कक्षा में अपने विचार लिखिए।
(घ) ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ ये पाँचों तत्त्व प्रकृति द्वारा प्रदत्त हैं। इनका महत्त्व प्रतिपादित करते हुए अपने शब्दों में आलेख लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मृत्तिका परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी के ऐसा कहने से उसका कौन-से भाव व्यक्त हो रहे हैं?
उत्तर
‘मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ मिट्टी के ऐसा कहने से उसका सरल, सामान्य और निराभिमान के भाव व्यक्त हो रहे हैं।

प्रश्न 2.
स्वयं को मातृरूपा कहकर मिट्टी ने माता की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर
स्वयं को मातृरूपा कहकर मिट्टी ने माता की कई विशेषताओं की ओर संकेत किया है। उसके अनुसार अपनी संतान की रक्षा और उसके सुख के लिए माता अनेक प्रकार के कष्टों को सहती है। यहाँ तक कि वह अपने प्राणों को संकट में डालने से भी पीछे नहीं हटती है।

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प्रश्न 3.
मिट्टी का सबसे लोकप्रिय रूप कौन-सा होता है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी का सबसे लोकप्रिय रूप उससे बने हुए खिलौने होते हैं। यह इसलिए कि उसे बनाकर मनुष्य उसे मेले में बेचने के लिए ले जाता है, तब देखने वाले उस पर लट्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
शिशु-हायों में पहुँचकर मिट्टी प्रजारूपा क्यों हो जाती है?
उत्तर
शिशु-हाथों में पहुँचकर मिट्टी प्रजारूपा हो जाती है। यह इसलिए कि शिशु-हाथ अपनी इच्छानुसार उसका उपयोग करते हैं।

प्रश्न 5.
सबसे बड़ा देवत्व क्या है?
उत्तर
सबसे बड़ा देवत्व यही है कि मनुष्य पुरुषार्थ करता है। मिट्टी उसके पुरुषार्थ से एक-से-एक महान और उपयोगी स्वरूप को प्राप्त करती है।

मृत्तिका दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी को अत्यधिक आकर्षक स्वरूप कौन और कैसे प्रदान करता है?
उत्तर
मिट्टी को अत्यधिक आकर्षक स्वरूप कुम्हार प्रदान करता है। वह मिट्टी को भिगो-भिगो कर उसे फूलने देता है। उसके बाद वह उसे अपने पैरों से रौंदता है फिर वह अपने हाथों से मल-मलकर मुलायम करके रख देता है। उसे मनमाने रूप देने के लिए चाक पर रखकर घुमाने लगता है। ऐसा करते हुए वह उसे अपने हाथों से सहला-सहला कर मनमाने रूप में ढालकर चाक पर से उतारकर रख देता है। सूख जाने पर वह विभिन्न प्रकार के रंगों से रंगकर उसे सुन्दर और मोहक बना देता है।

प्रश्न 2.
मिट्टी का कौन-सा रूप हमारे लिए अधिक उपयोगी है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी का उत्पादक स्वरूप हमारे लिए अधिक उपयोगी है। यह इसलिए कि इससे हमारा जीवन संभव होता है। हमारा अस्तित्व बना रहता है। अगर मिट्टी हमें एक माँ की तरह अन्न-धन प्रदान न करे तो हम जीवित नहीं रह सकेंगे। हमारा अस्तित्व नहीं रह सकेगा। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यों तो मिट्टी के सभी रूप-प्रतिरूप हमारे लिए उपयोगी और आवश्यक हैं, लेकिन उसका उत्पादक स्वरूप सबसे अधिक उपयोगी और आवश्यक है।

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प्रश्न 3.
कविता में मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख किया गया है, क्यों?
उत्तर
कविता में मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख किया गया है। यह इसलिए मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों से अधिकांश लोग अनजान होते हैं। वे मिट्टी को सामान्य रूप में ही देखते-समझते हैं। कवि ने उनके इस भ्रम को तोड़ने के लिए ही मिट्टी के एक-से-एक बढ़कर आकर्षक और उपयोगी स्वरूपों को बहलाने का प्रयास किया है।

प्रश्न 4.
‘मृत्तिका’ कविता का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मृत्तिका’ कविता कविवर नरेश मेहता की एक ज्ञानवर्द्धक और रोचक कविता है। कविवर नरेश मेहता अपनी इस कविता में अपनी कल्पना को एक ओर रख करके केवल अपनी अनुभूति को ही स्थान दिया है। उन्होंने इस कविता के द्वारा मिट्टी के प्रति हमारे सोए हुए ज्ञान को जगाने का प्रयास किया है। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि मृत्तिका कविता में कवि ने मिट्टी के विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। माटी को मातृत्व स्वरूपा, प्रिया स्वरूपा और शिशु-भाव से जोड़कर उसे प्रजारूपा दर्शाया है। इन तीनों रूपों का सार्थक समन्वय ही देवत्व को प्रकट करता है।

मृत्तिका किवि-परिचय

प्रश्न
श्री नरेश मेहता का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-कविवर नरेश मेहता का नयी कविताधारा के कवियों में विशिष्ट स्थान है। उनकी कविताओं में उनके असाधारण और बहमुखी प्रतिभा की झलक साफ-साफ दिखाई देती है। चूंकि उनका रचनात्मक व्यक्ति बड़ा ही अद्भुत है तो उनकी रचनाएँ उनकी इस विशेषता को तुरन्त प्रकट कर देती हैं।
रचनाएँ-कविवर नरेश मेहता की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. वन पारखी सुनीं
  2. बोलने को चीड़ को
  3. संशय की एक रात
  4. समय देवता आदि नरेश मेहता जी के काव्य-संग्रह हैं।

साहित्यिक महत्त्व-कविवर नरेश जी का साहित्यिक महत्त्व नयी कविता के उल्लेखनीय कवियों में से एक है। मध्य-प्रदेश के साहित्यकारों में तो आपका अग्रणीय स्थान है। आपकी कविताओं की यह सर्वमान्य विशेषता है कि उनमें कल्पना की नहीं, अपितु अनुभूति की ही प्रधानता है। आपकी साहित्यिक सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपसे वर्तमान साहित्य और साहित्यकारों को अनेक अपेक्षाएँ हैं।

मृत्तिका कविता का सारांश

प्रश्न 1.
कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ एक ज्ञानवर्द्धक कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है मिट्टी मनुष्य को संबोधित करती हुई कह रही है-हे मनुष्य! मैं तो केवल मिट्टी हूँ। जब तुम अपने पैरों से मुझे रौंदते हो और हल के फाल से विदीर्ण करते हो, तब मैं धन-धान्य बनकर तुम्हारे लिए माँ के रूप में बन जाती हूँ। जब तुम मुझे अपने हाथों से स्पर्श करते हो और मुझे चाक पर रखकर घुमाने लगते हो, तब मैं घड़ा बनकर जल लाने वाली तुम्हारी प्रिया का रूप धारण कर लेती हूँ। जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने के रूप पर गद्गद् होकर मचलने लगते हो, तब मैं तुम्हारे बच्चों के हाथों में पहुँचकर प्रजा का रूप धारण कर लेती हूँ। जब तुम अपनी शक्ति-क्षमता को भूलकर मुझे बुलाते हो, तब मैं अपनी ग्रामीण शक्ति से चिन्मयी शक्ति को शरण कर लेती हूँ। उस समय मेरी मूर्ति तुम्हारी आराध्या हो जाती है। इसलिए हे पुरुषार्थी मनुष्य! तुम यह विश्वास कर लो कि यही मेरा मिट्टी स्वरूप देवत्व है।

मृत्तिका संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ
जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो
तवा हल के फाल से विदीर्ण करते हो
तब मैं धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूं।
जब तुम मुझे हाथों से स्पर्श करते हो
तथा चाक पर चढ़ाकर घुमाने लगते हो।

शब्दार्थ-मात्र-केवल। मृत्तिका-मिट्टी। रौंदते-कुचलते। विदीर्ण-फाड़ना। धन-धान्य-अन्न-धन। मातृरूपा-माता का रूप।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती, हिन्दी सामान्य’ में संकलित व कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ से है। इसमें कविवर नरेश मेहता ने मिट्टी मनुष्य के प्रति क्या कह रही है, इसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कवि का कहना है कि

व्याख्या-हे मनुष्य! तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि जब तक मैं तुम्हारे सम्पर्क-स्पर्श में नहीं रहती है, तब तक मैं अपने साधारण रूप में ही रहती हैं। लेकिन जैसे ही मैं तुम्हारा सम्पर्क-स्पर्श प्राप्त करती हूँ, वैसे ही मैं कई रूपों को धारण कर लेती हूँ। उदाहरणस्वरूप जब तुम मुझे अपने पैरों से खूब मलते-कुचलते हो अर्थात् . रगड़ते हो। फिर हल के फाल से चीरते-फाड़ते हो, तब मैं वह साधारण मिट्टी नहीं रह पाती हूँ। दूसरे शब्दों में मैं अपने साधारण रूप को उतारकर असाधारण रूप को धारण कर लेती हूँ। मेरा यह असाधारण रूप धन-धान्य से भरा-पूरा होता है। वह मेरा भरा-पूरा रूप माता का होता है। इसी प्रकार जब तुम अपने हाथों से मुझे सहलाकर छूते हो, और फिर मुझे चाक पर चढ़ाकर नचाने लगते हो, तब मेरा रूप कुछ और ही हो जाता है।

विशेष-

  1. मिट्टी का आत्मकथन सत्यता और वास्तविकता पर आधारित है।
  2. भाषा की शब्दावली उच्चस्तरीय तत्सम शब्दों की है।
  3. शैली आत्मकथात्मक है।
  4. ‘मैं मात्र-मृत्तिका’ और ‘धन-धान्य’ में अनुप्रास अलंकार है।
  5. यह अंश रोचक और सरस है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-नरेश मेहता कविता-‘मृत्तिका’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना मुक्तछंद से तैयार है। इसमें तत्सम शब्द
(मात्र, मृत्तिका, विदीर्ण, मातृरूपा और स्पश) अधिक हैं: तो पैर, हाथ आदि तद्भव शब्द भी हैं। आत्मकथात्मक शैली में प्रस्तुत इस पद का काव्य-सौन्दर्य इससे निखरकर सामने आया है। कथन की सत्यता अद्भुत और चौंकाने वाली है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना.बड़ी लाक्षणिक और रोचक है। इस विशेषता को प्रस्तुत करने के लिए कवि ने मिट्टी के आत्मकथन की सत्यता को सामने रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। मिट्टी को विविध रूप देता हुआ मनुष्य मिट्टी की इस विशेषता को जान नहीं पाता है, इस तथ्य की विचित्रता को सरल भावों-कथनों से इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य और ही बढ़ गया है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) मिट्टी ने क्यों कहा है-“मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ।”
(ii) मिट्टी के मातृरूपा स्वरूप की क्या विशेषता है?
(iii) उपर्युक्त पयांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) मिट्टी ने कहा है-“मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ।” यह इसलिए कि मिट्टी मनुष्य के सम्पर्क-स्पर्श में जब तक नहीं आती है, तब तक उसका स्वरूप बिल्कुल साधारण और सामान्य ही बना रहता है।
(ii) मिट्टी के मातरूपा स्वरूप की बड़ी ही अद्भत विशेषता है। इस स्वरूप को प्राप्त हुई मिट्टी सचमुच में माता की ही तरह होती है। वह भी अपने पुत्र मनुष्य का भरण-पोषण अनेक प्रकार के धन-धान्य के द्वारा करती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-मिट्टी की अनोखी और उपयोगी विशेषताओं को प्रस्तुत करना। इसके द्वारा कवि ने मिट्टी में किस प्रकार से ऐसे गुण छिपे हुए हैं, इसे सुस्पष्ट करना चाहा है।

2. तब में
कुंभ और कलश बनकर
जल लाती तुम्हारी अंतरंग प्रिया हो जाती हूँ।
जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने रूप पर
आकर्षित होकर मचलने लगते हो

तब मैं
तुम्हारे शिशु-हावों में पहुँच प्रजारूपा हो जाती हूँ।
पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्व-पराजित स्वत्व से मुझे पुकारते हो।

शब्दार्थ-कुंभ-घड़ा। अंतरंग-घनिष्ठ, अभिन्न। प्रिया-धर्मपत्नी। आकर्षित-लट्ट। शिशु-बालक। पुरुषार्थ-वीरता। पराजित-हार। स्वत्व-अपनापन।

प्रसंग-पूर्ववत । इसमें कवि ने मनुष्य के संपर्क-स्पर्श में आने पर मिट्टी के बदलते हुए स्वरूप को चित्रित करने का प्रयास किया है। इस विषय में कवि का कहना है कि मिट्टी मनुष्य से कह रही है

व्याख्या-हे मनुष्य! जब मैं तुम्हारे स्पर्श से चाक पर चढ़कर घूमने (चक्कर काटने लगती हूँ’ तब मैं एक नये और आकर्षक रूप को धारण कर लेती हैं। मह मेरा नया और आकर्षक स्वरूप कुंभ (घड़ा) और कलश का होता है। इस नये और आकर्षक स्वरूप की यह विशेषता होती है कि वह तुम्हारी अंतरंग प्रिया को प्रभावित किए बिना नहीं रहता है। दूसरे शब्दों में यह कि उस मेरे नये और आकर्षक स्वरूप कुंभ (घड़ा) और कलश को तुम्हारी अंतरंग प्रिया बड़े प्रेम से उठाकर तुम्हारे लिए उसमें जल लाती हूँ। इससे मुझे तुम्हारी अंतरंग प्रिया होने का गौरव प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार जब मैं तुम्हारे द्वारा चाक पर चढ़कर चक्कर काटने लगती हूँ, तब मुझे तुम एक और ही नया और अधिक स्वरूप दे देते हो। वह मेरा नया और अधिक स्वरूप खिलौने का होता है। फलस्वरूप उसे देखकर तुम खुशी से नाच उठते हो। फिर उसे मेले में ले जाकर तुम और अधिक खुशी से झूमने लगते हो। वहाँ जाकर जब मैं तुम्हारे बच्चों के हाथों में पहुँचती हूँ, तब मेरा रूप एक बार फिर बदल जाता है। वह बदला हुआ मेरा नया रूप प्रजा का रूप होता है। इतना होने पर जब कभी तुम अपने पुरुषार्थ के अहं का परित्याग कर अपनापन के भावों से मुझे जानने-समझने और पुकारने लगते हो, तब मैं उस समय कुछ और ही हो जाती हूँ।

विशेष-

  1. मिट्टी के बदलते स्वरूप पर प्रकश डाला गया है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. मुक्तक छंद है।
  4. मुझे मेले में मेरे, रूप पर, पहँच प्रजारूपा और पुरुषार्थ पराजित पराजित, में अनुप्रास अलंकार है।
  5. यह अंश भाव-वर्द्धक है।

1. पयांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
उपर्युक्त पयांश के कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-श्री नरेश मेहता कविता-‘मृत्तिका’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-विधान आकर्षक है। इसके लिए कवि ने रस, छंद, अलंकार और प्रतीक-बिम्ब का चुन-चुन कर प्रयोग किया है। अनुप्रास अलंकार (मुझे मेले में मेरे, रूप पर, पहुँच प्रजा रूप और पुरुषार्थ-पराजित) की झड़ी लगा दी है। मुक्तक छंद से मिट्टी की मुक्त अभिव्यक्ति साकार होकर मन को छू लेती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान सरल भावों का है। मिट्टी का कथन बड़ा ही स्वाभाविक और उपयुक्त है। मनुष्य का मिट्टी के बदलते स्वरूप से अज्ञान रहने की सच्चाई खोलने का प्रयास सचमुच में प्रशंसनीय है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुंभ और कलश से मिट्टी का कौन-सा स्वरूप प्रकट होता है?
(ii) मनुष्य मिट्टी के किस रूप को देखकर मचलने लगता है और क्यों?
(iii) मिट्टी के प्रजारूप से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) कुंभ और कलश से मिट्टी का नया और अत्यधिक आकर्षक रूप प्रकट होता है। वह आकर्षक रूप मनुष्य के प्रिया-स्वरूप का होता है, जो उसके लिए सुख और अधिक मोहक कहा जाता है।
(ii) मनुष्य मिट्टी के खिलौने रूप को देखकर मचलने लगता है। यह इसलिए कि उसमें बहुत बड़ा आकर्षण होता है। उससे उसके बच्चे जब फूले नहीं समाते हैं,
तो उसको अपनी मेहनत का बड़ा ही सुखद और अद्भुत अनुभव होने लगता है।
(iii) मिट्टी के प्रजारूप से तात्पर्य है-प्रजा का स्वरूप। जिस प्रकार प्रजा अपने स्वामी के प्रति कृतज्ञ होकर उसकी इच्छानुसार उसकी सेवा में लगी रहती है, उसी प्रकार मिट्टी भी मनुष्य द्वारा खिलाने-रूप में ढालने पर उसके और उसके बच्चों को खुश करने की सेवा में लग जाती है।

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3. तब मैं
अपने ग्राम्य देवत्य के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ
प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ
विश्वास करो
यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि
तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो
और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।

शब्दाभग्राम-देवत्व-गाँव के देवता । चिन्मयी शक्ति-चेतना युक्त शक्ति । प्रतिमा-मूर्ति। आराध्या-आराधना के योग्य, पूज्य। देवत्व-देवता होने का महत्त्व।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने मिट्टी का मनुष्य के प्रति अपने विविध स्वरूप में ढलने का कथन हैं इस विषय में कवि का कहना है कि मिट्टी मनुष्य को ज्ञानमयी बातों को बतला रही है। उसका कहना है

व्याख्या-हे मनुष्य! जब तुम अपने पुरुषार्थ से हार-थककर मुझे अपनेपन की ‘ भावना से पुकारते हो, तब मैं अपने गाँव के देवत्व (देवता होने के महत्त्व) की भावना के फलस्वरूप चेतनामुक्त शक्ति-सम्पन्न हो जाती हूँ। इसकी छवि और सुन्दरता को मैं अपनी अलग-अलग बनी हुई मूर्तियों में धारण करके तुम्हारे लिए पूज्य बन जाती हूँ। इसलिए मैं तुमसे यही कहना चाहती हूँ कि तुम मुझ पर विश्वास करो। इससे ही तुम्हें पूरी तरह से यह यकीन हो जाएगा कि सबसे बड़ा देवत्व है कि तुम असाधारण पुरुषार्थ करते हो और में तुम्हारे इस असाधारण पुरुषार्थ के फलस्वरूप ही अनेक रूपों-प्रतिरूपों में बदलती हुई महत्त्व प्राप्त करती हूँ।

विशेष-

  1. भाषा प्रभावशाली है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. शैली आत्मकथात्मक है।
  4. मुक्त क छंद है।
  5. मिट्टी को मनुष्य की वाणी दी जाने के कारण मानवीकरण अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-नरेश मेहता कविता-मत्तिका।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-स्वरूप प्रभावशाली रूप में है। मिट्टी का मानवीकरण करके इसे और आकर्षक बनाने का जो प्रयास किया गया है, वह निश्चय ही
और सटीक है। मिट्टी के कथन को प्रभावशाली बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से चित्रित करने का ढंग भी कम अनोखा नहीं है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-स्वरूप सहज और रोचक है। सम्पूर्ण कथन सच्चा होने पर भी चौंकाने वाला है। यही नहीं यह ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ अधिक ध्यान दिलाने वाला है। मिट्टी की सहजता में उसकी छिपी हुई विशेषता को प्रकाशित करने का कवि-प्रयास को दाद दी जा सकती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) मिट्टी की चिन्मयी शक्ति से क्या अभिप्राय है?
(ii) मिट्टी कब पूज्य बन जाती है? ।
(iii) मनुष्य और मिट्टी की क्या सच्चाई है?
उत्तर
(i) मिट्टी की चिन्मयी शक्ति से अभिप्राय है-मिट्टी के चेतनायुक्त शक्ति। मिट्टी मनुष्य के तरह-तरह के परिश्रम से तरह-तरह के सजीव और आकर्षक रूपों में दिखाई देती है।
(ii) मिट्टी, मनुष्य के परिश्रम और अद्भुत बुद्धि-कला से विभिन्न आकर्षक और देव-देवी की प्रतिमा में बदल जाती है। उससे वह मनुष्य के लिए पूज्य बन जाती है।
(iii) मनुष्य और मिट्टी की सच्चाई बड़ी ही सुस्पष्ट है। मनुष्य पुरुषार्थ (मेहनत) करता है। उसके पुरुषार्थ मेहनत के कारण मिट्टी एक से एक बढ़कर आकर्षक महान रूपों को धारण करती है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 समर्पण

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 समर्पण (सुरेशचन्द्र शुक्ल)

समर्पण अभ्यास-प्रश्न

समर्पण लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मनुष्य कब देवतुल्य बन जाता है?
उत्तर
अपने उच्च और महान गुणों से मनुष्य देवतुल्य बन जाता है।

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने अकबर को संधि-पत्र क्यों भेजा था?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने अकबर को संघि-पत्र भेजा था। यह इसलिए कि उनमें अकबर का सामना करने की शक्ति नहीं रह गई थी।

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प्रश्न 3.
अकबर ने महाराणा प्रताप का संधि-पत्र क्यों अस्वीकार कर दिया?
उत्तर
अकबर ने महाराणा प्रताप का संधि-पत्र अस्वीकार कर दिया। यह इसलिए कि अकबर को वह संधि-पत्र जाली लगा। उसने राजकवि पृथ्वीराज को उसकी सत्यता का पता लगाने की आज्ञा दे दी।

प्रश्न 4.
भामाशाह के चरित्र में निहित राष्ट्रीय भावना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भामाशाह का पूरा चरित्र राष्ट्रीय भावनाओं से भरा हुआ था। उसमें अपार देशभक्ति की भावना थी। वह देश का सच्चा सेवक था। इसलिए वह मेवाड़ पर आए । हुए संकट को नहीं देख सकता था। इसके लिए महाराणा प्रतापं को धन की वह थेली भेंट की जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह साल तक चल सकता था। यही नहीं उसने फिर से तलवार ग्रहण करके प्रतिज्ञा की वह तन-मन और धन से मेवाड़ की रक्षा में आजीवन अपना योगदान देता रहेगा

समर्पण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप की स्तुति किन शब्दों में की?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप की स्तुति निम्नलिखित शब्दों में की आज भारत के अनेक राजाओं ने अकबर के आगे सिर झुका दिया है-सिर ही नहीं, रोटी और बेटी का संबंध भी जोड़ा है। अब आप ही भारत माँ के मस्तक की बिंदी की तरह बचे हैं। आपका सिर झुकाना भारत माँ का सिर झुकाना होगा। संसार में पार्थिव रूप से कोई अमर नहीं है प्रताप! यदि आपने अपने शीर्य को सँभाला तो आपकी यशगाथा युगों-युगों चलेगी।

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने के लिए क्या प्रतिज्ञा की?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने के लिए निम्नलिखित प्रतिज्ञा की जब तक मेवाड़ को स्वतंत्र न करा लूँगा, तब तक दाढ़ी और बाल न बनवाऊँगा। और न पलंग पर सोऊँगा, न स्वर्ण-पात्रों में भोजन करूँगा। (भूमि की ओर संकेत कर) यह भूमि ही मेरी शैया होगी और (मिट्टी को हाथ में उठाकर) इस मिट्टी के बने बर्तन ही मेरे पात्र होंगे। जब तक इस शरीर में प्राण रहेंगे, यह सिर अकबर के आगे नत न होगा।

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प्रश्न 3.
‘समर्पण’ एकांकी का नायक आप किसे मानते हैं? उसके चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
‘समर्पण’ एकांकी का नायक हम महाराणा प्रताप को मानते हैं। उनके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
1. पारिवारिक उत्तरदायित्व का निर्वाह-महाराणा प्रताप में पारिवारिक संबंधों को निभाने की अहम् विशेषता है। यद्यपि वे अपने मेवाड़ की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए तत्पर हैं। इससे पहले वे अपने परिवार के सदस्यों, पत्नी, बेटा और बेटी को सुखी और स्वतंत्र देखना चाहते हैं। यही कारण है कि वे उनके सुख के लिए ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए संधि-पत्र भेज देते हैं।

2. समय का सच्चा पारखी-महाराणा प्रताप के चरित्र की दूसरी विशेषता है-समय का सच्चा पारखी। सचमुच में महाराणा प्रताप समय के सच्चे पारखी हैं। हर प्रकार से अकबर से लोहा लेकर जब वे बार-बार हार जाते हैं तो उन्हें यही समझ में आता है कि समय उनके विपरीत है। अब तो अपने बच्चों और पत्नी का और दुख उनसे नहीं देखा जाता। इस प्रकार वे अपने बुरे समय की परख करके ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने को ही उचित समझते हैं।

3. कृतज्ञता-महाराणा प्रताप के चरित्र की तीसरी विशेषता है-कृतज्ञता। वे अकबर के राजकवि पृथ्वीराज के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं कि उन्होंने उनकी वीरता और महानता को उनके शत्रु अकबर के सामने खुलकर प्रकट की है। इसी प्रकार वे अपनी घोर विपत्ति के समय अपने मंत्री और दीवान भामाशाह द्वारा दी गई सहायता राशि को पाकर उसकी बार-बार प्रशंसा कर अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

4. महान देश-भक्त-महाराणा प्रताप महान देश-भक्त हैं। वे मेवाड़ को स्वतंत्र करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।

प्रश्न 4.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) ‘दुख में जो विचलित हो जाते हैं वे वीर नहीं कहलाते।’
(ख) परिस्थितियाँ मनुष्य को विवश कर देती हैं, मनुष्य चाहे तो परिस्थितियों को विवश कर सकता है। जो परिस्थितियों को मोड़कर आगे बढ़ते हैं उन्हीं की यशगाथा अमर रहती है।
उत्तर
(क) उपर्युक्त वाक्य का आशय यह है कि सच्चे वीर परुष किसी भी दशा में अपनी वीरता प्रकट करते ही रहे हैं। उन्हें कठिन-से-कठिन परिस्थितियाँ न तो झुका सकती हैं और न उन्हें बदल सकती हैं। कहने का भाव यह कि वीर पुरुष की वीरता सभी प्रकार की बाधाओं को पार कर आगे निकल जाती है।
(ख) उपर्युक्त वाक्यों का आशय यह है कि साधारण खासतौर से कायर मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है; लेकिन वीर पुरुष इसके ठीक विपरीत होते हैं। वे परिस्थितियों के न तो दास होते हैं और न उनसे वे विवश ही होते हैं। वे तो परिस्थितियों को अपना दास बना लेते हैं। उन्हें वे विवश कर देते हैं। ऐसे वीर पुरुष का यशगान संसार युगों-युगों तक करता रहता है।

प्रश्न 5.
भारत-माता को महाराणा प्रताप से क्या अपेक्षाएँ वी?
उत्तर
भारत-माता को महाराणा प्रताप से अनेक अपेक्षाएं थीं। उसे उनसे यह अपेक्षा वे अकबर के जनाने के कैद अबलाओं की पुकार सुनेंगे। फिर उन्हें आजाद करेंगे। यही नहीं वे भारत के उन राजाओं को स्वतंत्र करेंगे, जो अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके हैं।

समर्पण भाषा-अध्ययन

(क) वर्तनी सुधारिए
कीर्ती, करुड़, स्विकार, गृहण, आहूति, कालीख, शक्तीयाँ, प्रतीज्ञा।
उत्तर
(क) अशुद्ध वर्तनी शुद्ध वर्तनी
कीर्ती – कीर्ति
करुड़ – करुण
स्विकार – स्वीकार
गृहण – ग्रहण
आहूति – आहुति
कालीख – कालिख
शक्तीयाँ – शक्तियाँ
प्रतीज्ञा – प्रतिज्ञा।

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(ख) दिये गये वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए
(i) जिसे क्षमा न किया जा सके।
(ii) जो कुछ न करता हो।
(iii) जिसमें दया न हो।
(iv) जहाँ पहुँचना कठिन हो।
(v) उपकार को मानने वाला।
उत्तर
वाक्यांशों के लिए एक
शब्द वाक्यांश – एक शब्द
(i) जिसे क्षमा न किया जा सके। – अक्षम्य
(ii) जो कुछ न करता हो। – निठल्ला, निकम्मा
(ii) जिसमें दया न हो। – निर्दयी
(iv) जहाँ पहुँचना कठिन हो। – दुर्गम
(v) उपकार को मानने वाला। – कृतज्ञ।

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(घ) अपने मित्र को पत्र लिखिए जिसमें अपने प्रदेश की संपन्नता और संस्कृति के बारे में बताया गया हो।
उत्तर

मित्र के नाम पत्र

26 बंगलो रोड़
दिल्ली-110007
23-10-2008

प्रिय मित्र रवि,
सप्रेम नमस्ते!

तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। पत्र में तुमने मेरे प्रदेश (दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी) की संपन्नता और संस्कृति के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की है, इससे मुझे और प्रसन्नता हुई। मित्र! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मेरा प्रदेश दिल्ली है। इसे देश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह इसलिए कि यह देश के अन्य महानगरों से बहुत अधिक सम्पन्न है। यहाँ सब कुछ है। मुख्य रूप से ऐतिहासिक महानगर होने के साथ-साथ यह आधुनिक महानगर है। लाल किला, जामा मस्जिद, कुतुब मीनार, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन आदि से इसकी ऐतिहासिक संपन्नता है, तो अनेक विश्वविद्यालयों, शिक्षा-विज्ञान के संस्थानों, बाजारों, पर्यटन स्थलों, धार्मिक स्थलों, यातायात की सभी प्रकार की सुविधाओं को यहाँ देखा जा सकता है और उनसे आनंद प्राप्त किया जा सकता है। परस्पर मेल-मिलाप की संस्कृति यहाँ के किसी कोने में देखी जा सकती है। अलग-अलग भाषाओं, बोलियों, तिथि-त्यौहारों, उत्सवों, खान-पान, पहनावे आदि की संस्कृति की सम्पन्नता यहाँ जितनी अधिक और जिस रूप में है, उतनी और कहीं नहीं है। यही मेरे प्रदेश दिल्ली का कमाल है। इसे देखकर किसी ने कहा है

‘दिल्ली है दिलवालों की, बाम्बे पैसेवालों की!’
माँ को चरण-स्पर्श रवि

तुम्हारा अभिन्न
दयाल

रवि
17-ए कमच्छा
वाराणसी

समर्पण योग्यता-विस्तार

(1) भारत भूमि सदा से वीरों और महापुरुषों की भूमि रही है। हमारे स्वर्णिम इतिहास में जिन-जिन महापुरुर्षों और वीर-वीरांगनाओं का योगदान रहा है उनके चित्र और जानकारी एकत्रित कीजिए।
(2) आज हम पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर रहे हैं। हमें अपने जीवन-मूल्यों का महत्त्व समझना है। इस विषय पर कक्षा में अपने साथियों से चर्चा कीजिए।
(3) आप पाश्चात्य संस्कृति के किन बिन्दुओं से असहमत हैं अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर
उपयुक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

समर्पण परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अकबर के दरबार में महाराणा प्रताप की कौन-सी बात चल रही थी?
उत्तर
अकबर के दरबार में महाराणा प्रताप की वीरता की बात चल रही थी। अकबर कह रहा था-“मैंने प्रताप-सा वीर, अपने जीवन में नहीं देखा। भारत के बड़े-बड़े राजाओं ने मेरी अधीनता स्वीकार कर ली, पर प्रताप ने मेरे सामने सिर नहीं झुकाया। उसकी वीरता सराहनीय है।

प्रश्न 2.
राजकवि ने अकबर से संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने का क्या कारण कहा?
उत्तर
राजकवि ने अकबर से कहा कि जहाँपनाह सिसौदिया कुल के मेवाड़ राजाओं ने मेवाड़ की रक्षा अपने प्राणों को देकर की है, उसे महाराणा प्रताप इस तरह नहीं खो देगा। इसलिए इस संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने की उसे आज्ञा दी जाए।

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प्रश्न 3.
लक्ष्मी ने वीरों की क्या विशेषता बतलायी है?
उत्तर
लक्ष्मी ने वीरों की यह विशेषता बतलायी है-‘वीर सुख-दुख दोनों में कर्त्तव्य का ध्यान रखते हैं। दुख में जो विचलित हो जाते हैं, वे वीर नहीं कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
कौन मनुष्य नहीं देवता होते हैं? उत्तर-जो परिस्थितियों को मोड़कर आगे बढ़ते हैं, वे मनुष्य नहीं देवता होते हैं। प्रश्न 5. भामाशाह ने महाराणा प्रताप को क्या सहयोग दिया?
उत्तर
भामाशाह ने महाराणा प्रताप को धन की एक थैली दी, जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह वर्ष तक चल सकता था।

समर्पण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अकबर को संघि-पत्र भेजने पर अमर सिंह ने विरोध किया तो महाराणा प्रताप ने उससे क्या कहा?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने अमर सिंह को समझाते हुए कहा “बेटा समय सब कुछ करा लेता है। तुम देख रहे हो, किस प्रकार हम सब वन में मारे-मारे फिर रहे हैं। तुम्हारी माँ, जो महलों में आराम से रहती थी, भीलनियों के साथ, इस जलजलाती धूप में, हम सबके लिए फल ढूँढ़ रही है, और दिनों का फेर कि सुबह से शाम तक कभी-कभी एक भी फल नहीं मिलता।”

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने राजकवि पृथ्वीराज से अपनी विवशता किन शब्दों में व्यक्त किया?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने राजकवि पृथ्वीराज से अपनी विवशता निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया मोह में नहीं डूब रहा हूँ कवि। यदि मेरे पास साधन होते तो अकबर को दिखा देता कि प्रताप सिंह ने कितनी शक्ति है। असहाय होने के बाद भी, चार वर्ष से कोशिश कर रहा हूँ, पर कोई सहारा नहीं मिला। सब तरफ से निराश होकर मैंने संधि-पत्र लिखा था।

प्रश्न 3.
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप को किस प्रकार उत्साहित किया?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने राणा प्रताप को इस प्रकार उत्साहित करते हुए कहा साहस से काम लो प्रताप! देखो, बाप्पा रावल और हंसपाल ने शक्ति न होते हुए भी, जीते-जी मेवाड़ की रक्षा की। अपने पितामह को देखो, शरीर में अस्सी घाव होने पर भी पानीपत के मैदान में बहादुरी से लड़े। झालामाना पर दृष्टि डालो, जिसने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। आज आपके संधि-पत्र को देखकर इन वीरों का हृदय स्वर्ग में रहा रहा होगा।

प्रश्न 4.
राजकवि पृथ्वीराज से महाराणा प्रताप ने क्या अपनी व्यथा प्रकट की?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप ने अपनी निम्नलिखित व्यथा प्रकट की “कवि! तुमने मेरी स्थिति न सोची होगी। बच्चों की करुण-पुकार तुम्हें न सुनाई पड़ी होगी, नहीं तो तुम्हारा हदय भर आता, और तुम ऐसा न करते। मैंने अपने सुख के लिए संधि पत्र नहीं लिखा। पर इन सबके (रजनी की ओर संकेत कर) कष्ट मुझसे नहीं देखे गए। जब बच्चे रोटी के एक-एक टुकड़े को रोते हैं, तो मेरा धैर्य पिघलकर पानी-पानी हो जाता है। अब मैं और अधिक नहीं रह सकता कवि! तुमने ऐसा क्यों किया?

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प्रश्न 5.
‘समर्पण’ एकांकी का प्रतिपाय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
‘समर्पण’ एकांकी महान एकांकीकार डॉ. सुरेश शुक्ल-लिखित ऐतिहासिक एकांकी है। इसमें मुगल शासक अकबर और मेवाड़ केसरी महाराणा के बीच होने वाली संधि को आधार बनाकर महाराणा प्रताप और उनके परिवार की सहनशीलता, देशभक्ति और वीरता से संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। ये सभी तथ्य न केवल चौकाने वाले हैं, अपितु देश-भक्ति के सोए हुए भावों को जगाने वाले भी हैं। इस प्रकार एकांकीकार ने इस एकांकी के माध्यम से हमें यह संदेश देना चाहा है कि हम कितनी ही कठिन, दुखद और अपार परिस्थितियों में क्यों न घिरे रहें, हमें अपनी मातृभूमि के दुख और दुर्दशा को नहीं भूलना चाहिए। उसे हर प्रकार से सुखमय और संपन्न बनाने के लिए हमें अपने तन-मन, धन सब कुछ न्यौछावर कर देना चाहिए।

समर्पण लेखक का परिचय

प्रश्न
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल का आधुनिक हिंदी एकांकीकारों में प्रमुख स्थान है। ऐतिहासिक एकांकी रचना के क्षेत्र में आप अधिक उल्लेखनीय हैं।

जीवन परिचय-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल हिंदी के एक ऐसे महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं, जिन्होंने हिंदी गद्य-विधा के लिए अपना अद्भुत योगदान दिया है। खासतौर से आपने ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित एकांकी रचना के लिए विशेष प्रयास किया है। इस तरह से आपका दृष्टिकोण पूरी तरह से स्वस्थ और नया है। इस तरह आपने आधुनिक हिंदी एकांकी-नाटकों को एक ऐसी नई दिशा दी है, जिनमें मुख्य रूप से मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना के स्वर सुनाई देते हैं।

रचनाएँ-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल के अब तक सोलह पूर्णाकार नाटक और चार एकांकी संग्रह, प्रकाशित हो चुके हैं; जो इस प्रकार हैं! ‘प्रत्यावर्तन’, ‘स्वप्न का सत्य’, ‘टूटते हए’ और ‘मेरे श्रेष्ठ रंग’

महत्त्व-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल हिन्दी के जाने-माने सशक्त एकांकीकार हैं। उनका इस दृष्टि से दिया गया योगदान सर्वथा अपेक्षित रहा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि उनकी रचनाएँ नयी पीढ़ी को मार्गदर्शन प्रदान करती रहेंगी।

समर्पण एकांकी का सारांश

प्रश्न
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल लिखित एकांकी ‘समर्पण’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल लिखित एकांकी ‘समर्पण’ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित एक प्रेरक और भाववर्द्धक एकांकी है। इस एकांकी का सारांश इस प्रकार है

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भीषण गर्मी से पूरा पर्वत-प्रदेश लू की चपेट में है। चारों फैले हुए सन्नाटे में महाराणा प्रताप एक वृक्ष की छाया में बैठे हुए हैं। उनकी दाढ़ी और बाल बढ़े हुए हैं। वे धोती-कुर्ता पहने हुए तलवार लटका रहे हैं। उनका बेटा-बेटी के भी पैर नंगे हैं। तीनों ही खिन्न हैं। बेटी रजनी को भूख से सिसकती देखकर महाप्रताप उसे सहलाते हुए कहते हैं कि वह रोये नहीं। कुंजर अकबर को संधि-पत्र देकर आ रहा होगा। इसे सुनकर पुत्र अमर सिंह चकित होकर प्रश्न करता है कि क्या वे सब अकबर का गुलाम बनकर रहेंगे? अगर ऐसा है तो उसे यह मंजूर नहीं है। महाप्रताप उसे समझाते हैं कि उसकी माँ किस तरह भीलनियों के साथ वन-वन फल ढूँढ़ती हुई परेशान हो जाती है। फिर भी कभी-कभी उसे एक भी फल नहीं मिलता है।

अमर सिंह महाप्रताप को उनकी वीरता की याद दिलाता है तो महाप्रताप अकबर की अधीनता को स्वीकारने की अपनी मजबूरी बतलाते हैं। उसी समय वहाँ पर कुंजर आता है। उसने महाप्रताप को बतलाया कि उनकी प्रशंसा अकबर कर रहा था तो मानसिंह ने विरोध किया। दूसरे राजपूत अर्थात् पृथ्वीराज कवि ने उसे समझाते हुए उनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर अकबर ने जैसे संधि-पत्र को स्वीकार किया, वैसे ही पृथ्वीराज कवि ने कहा कि संधि-पत्र महाप्रताप का न होकर किसी षड्यंत्रकारी का है; क्योंकि वह महाराणा प्रताप को भलीभाँति जानता है कि वे किसी दशा में अधीनता नहीं स्वीकार करेंगे। जब मैंने (कुंजर ने कहा कि मैं महाप्रताप का सेवक हूँ। उन्होंने ही यह संधि-पत्र मुझसे भेजवाया है। इस पर राजकवि पृथ्वीराज ने संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने की आज्ञा अकबर से माँग ली। उसे देखकर मानसिंह राजकवि पर आरोप लगाया कि वे महाप्रताप का पक्ष ले रहे हैं। कुंजर ने कहा कि राजकवि आ रहे होंगे।

महाप्रताप को उनकी धर्मपत्नी महारानी लक्ष्मी ने समझाया कि वीर पुरुष दुख’ में भी अटल रहते हैं। उनसे ही भारत माँ को आशा है। एक पुत्री के आँसू से भारत के आँसू बढ़कर हैं। मैं अपनी पुत्री को भोजन दूंगी लेकिन मुझे अकबर की अधीनता मंजूर नहीं है। उसी समय राजकवि पृथ्वीराज का प्रवेश होता है।राजकवि ने महाप्रताप को समझाया कि वे भारत के मुकट हैं। संधि-पत्र तो उनकी वीरता को कलंकित कर रही है।

परिस्थितियाँ मनुष्य को विवश नहीं करती हैं, अपितु मनुष्य चाहे तो परिस्थितियों को विवश कर सकता है। परिस्थितियों को मोड़ने वाले ही अमर वीर पुरुष होते हैं। इसलिए वे मोह में न पड़े। इस अपने कर्तव्य को निभाने की आवश्यकता है। उन्हें अपने अमर वीरों की वीरतापूर्ण त्याग को याद करके साहस धारण करना चाहिए कि वीर पुरुष भटक सकते हैं, लेकिन अपयश नहीं ले सकते हैं। सभी भील उनकी सहायता अपने प्राणों की परवाह किए बिना करेंगे। उसी समय भामाशाह आकर महाप्रताप को पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह साल तक चलाने का धन भेंट करता है। महाप्रताप उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। भामाशाह ने कहा कि वह आजीवन मेवाड़ के राणा के साथ है। उससे उत्साहित होकर महाप्रताप प्रतिज्ञा करते हैं कि वे जब तक मेवाड़ को स्वतंत्र न करा लेंगे, तब तक दाढ़ी-बाल नहीं कटवायेंगे। मिट्टी के बर्तन में खायेंगे और जमीन पर सोयेंगे। सभी एक साथ बोलते हैं “हिन्दूपति महाप्रताप की जय”।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Chapter 14 मेहमान की वापसी (मालती जोशी)

मेहमान की वापसी अभ्यास-प्रश्न

मेहमान की वापसी लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अजय के घर कौन-कौन आये थे और क्यों?
उत्तर
अजय के घर राय अंकल और राय आँटी अपने कुत्ते जॉली के साथ आये थे। वे बॉली को महीने भर की छुट्टियों में अजय के घर पर छोड़ने के लिए आये थे।

प्रश्न 2.
राय अंकल ने अजय से जॉली की दोस्ती कैसे कराई?
उत्तर
राय अंकल ने जॉली से कहा, “जॉली! कम हियर… शेक हैंड्स विद अजय।” जॉली ने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह अपना दाहिना पंजा उठाया। अजय ने जॉली की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया। इस तरह राय अंकल ने अजय से जॉली की दोस्ती कराई।

प्रश्न 3.
जॉली के घर लौटने के पश्चात् अजय के मन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
जॉली के घर लौटने के पश्चात् अजय के मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। उसके मन से शिकायतों का बोझ उतर गया। वह प्रसन्नता से खिल उठा।

मेहमान की वापसी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मेहमान की वापसी’ कहानी का उद्देश्य क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मेहमान की वापसी’ कहानी एक सोद्देश्यपरक कहानी है। इसमें मनुष्य और पशु के परस्पर प्रेम को दर्शाया गया है। इसके माध्यम से लेखिका ने मनुष्य के प्रति पशुओं की वफादारी, कृतज्ञता और निःस्वार्थता को प्रेरक रूप में प्रस्तुत किया

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प्रश्न 2.
अजय ने जॉली को अपनी दिनचर्या में कैसे सम्मिलित कर लिया?
उत्तर
अजय जॉली के साथ घुल-मिल गया था। वह सुबह उठते ही जॉली को गुड-मार्निंग बोलता था। वह जॉली के पास अपनी छोटी-सी मेज लगाकर.अपनी छुट्टियों का होमवर्क जॉली से बातें करते हुए करता था। वह घर से बाहर निकलने पर जॉली को ‘टा-टा’ करना नहीं भूलता था। शाम को वापस लौटने पर जब जॉली अपनी पूँछ हिलाकर अजय की अगवानी करता था तो वह उसके गले में हाथ डालकर उसे चूम लेता था। वह अपनी मम्मी-पापा के फर्स्ट शो देखने चले जाने पर घर में जॉली के साथ रह लेता। दोस्तों के कुट्टी कर लेने की उसे कोई परवाह नहीं थी, क्योंकि उसे खेलने के लिए जॉली एक अच्छा साथी मिल गया था। वह जॉली के साथ ही खाना खाता था। इस तरह अजय ने जॉली को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित कर लिया था।

प्रश्न 3.
कहानी के मुख्य पात्र अजय का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
कहानी के मुख्य पात्र अजय की चरित्रगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. बाल-सुलभ व्यवहार-अजय बालक है, इसलिए उसमें अनुभव की कमी है। उसे यह नहीं मालूम है कि कोई पालतू अपने स्वामी के साथ उसके पास आने पर उसे काट लेगा। इसलिए राय अँकल और राय आंटी के अल्सेशियन कुत्ते को देखकर डर जाता है। बहुत समझाने-बुझाने पर भी वह उससे डरा-डरा रहता है। अजय अपने बाल-सुलभ व्यवहार के कारण ही जॉली के प्रति धीरे-धीरे समझने का दृष्टिकोण अपनाने लगता है।

2. भावुक हदय-अजय के चरित्र की दूसरी विशेषता है-भावक हदय। अजय में भावुकता है। वह जॉली के रात-भर रोने-चिल्लाने पर भावुक हो उठता है। उसे आपबीती, अकेलेपन की दुखद बातें जब याद आती हैं, तो वह जॉली के प्रति सहानुभूति करने से स्वयं को रोक नहीं पाता है। उससे अपना प्यार जताने के लिए उसे थपथपाने लगता है। उसके प्यार को पाकर रूठा हुआ जॉली खुश होकर खाना खा लेता है।

3. सच्चा मित्र-अजय के चरित्र की तीसरी विशेषता है-सच्चा मित्र । अजय जॉली के प्रति दोस्ती का जब हाथ बढ़ाता है, तो उसका अन्त तक निर्वाह करता है। वह जॉली को अपना सबसे बड़ा और एक मात्र दोस्त मानता है। इसलिए वह अपने किसी भी पुराने दोस्त की परवाह नहीं करता है। वह जॉली को अपना सच्चा दोस्त मानकर उसे अपनी दिनचर्या में सम्मिलित कर लेता है। जॉली के चले जाने पर उसकी भूख गायब हो जाती है। उसे जॉली के लौट आने की आशा जोर मारने लगती है। जॉली के वापस आने पर उसकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगते हैं। उनसे उसकी जॉली के प्रति उसके न होने पर की गयी शिकायतें एक-एक कर बहकर समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 4.
पाठ में आए उन महत्त्वपूर्ण अंशों को लिखिए, जिसने अजय के बाल-सुलभ व्यवहार और भावुक हृदय को प्रभावित किया हो।
उत्तर
1. ‘मम्मी…’ उसने दरवाजे के बाहर खड़े होकर जोर से आवाज दी।

2. ‘मर गए। अजय ने सोचाः यह इतना बड़ा कुत्ता घर में रहेगा, तो मेरा एक दोस्त भी यहाँ पाँव नहीं रखेगा। मैं भी जैसे जेल में बन्द हो जाऊँगा। अब मम्मी की आँख बचाकर जब-तब बाहर नहीं निकला जा सकेगा। यह राक्षस जो बैठा होगा – बरामदे में। सारी छुट्टियों का मजा किरकिरा हो जाएगा। इस माहौल में घर में बैठना अजय को जरा भी अच्छा नहीं लगा। वह चुपचाप पिछले दरवाजे से खिसक गया और रात के खाने पर ही लौटा। मन-ही-मन प्रार्थना करता रहा कि हे भगवान, राय अँकल के पिता जी को जल्दी से अच्छा कर दो ताकि वे जल्दी लौट आएँ और यह मुसीबत हमारे यहाँ से जल्दी से विदा हो जाए।

3. क्या पता जॉली को भी अँकल और आंटी की याद आ रही हो। इस बार , जब उसकी रुलाई कान में पड़ी, तब वह सहन नहीं कर सका और धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर आ गया। जॉली कोने में सिमटकर बैठा हुआ था। दोपहर की तरह -अब वह बूंखार नहीं लग रहा था, बल्कि एक नन्हें बच्चे की तरह असहाय लग रहा था। अजय ने साहस बटोरा और उसके पास जा खड़ा हुआ और प्यार से बोला : ‘जॉली…!’

4. उनकी भी सावाज कुछ नम हो गई थी। और अजय? उसकी तो भख ही गायब हो गई थी। सामने रखी नाश्ते की प्लेट को वह यों ही घूरता रह गया था। उसे लग रहा था, अभी कहीं से जल्दी से जॉली आएगा और पास बैठकर बिस्कुट मांगेगा।

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5. नाश्ते की प्लेट वैसी की वैसी ही सरकाकर वह बाहर आया। बरामदे का वह कोना एकदम सूना लग रहा था। उसकी सारी गृहस्थी वहाँ से उठ गई थी। जगह पहले की तरह साफ हो गई थी-पर कितना उदास-उदास लग रही थी।

6. ‘खाक जानता है प्यार की कीमत!’ अजय ने सोचा : ‘कितना प्यार किया उसे। अपने दोस्त, अपनी पढ़ाई, अपना खाना-पीना सब कुछ भूल गया था मैं। पर उसे क्या, अंकल-आंटी को देखते ही सब कुछ भूल गया होगा।

7. खाना एकदम जहर लग रहा था उसे, फिर भी उसने खाया। क्यों भूखा रहे वह एक बेवफा कुत्ते के लिए। वह हजरत वहाँ मजे से अंकल और आंटी के हाथ से माल खा रहे होंगे।

मेहमान की वापसी भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
आवाज, हिदायतें, कम हियर आदि शब्द विदेशी भाषा से लिए गए हैं ऐसे ही विदेशी भाषा के अन्य शब्द कहानी से छाँटकर मानक भाषा में परिवर्तित कर लिखिए।
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी img 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
जान निछावर करना, साँस अटकना, मुसीबत गले पड़ना, मज़ा किरकिरा होना, ठण्डा करना, फूलकर कुप्पा हो जाना
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी img 2

प्रश्न 3.
‘सूना-सूना’ जैसे पुनरुक्त शब्दों का प्रयोग कहानी में किया गया है। कहानी में आए ऐसे शब्दों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर
पीछे-पीछे, टा-टा, दूर-दूर, सूना-सूना, उदास-उदास और भांय-भाय।

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प्रश्न 4.
दिए हुए अनेकार्थी शब्दों के दो-दो अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य बनाइये।
उदाहरण-राम ने अपना कार्य जल्दी कर लिया।
मुख्य अतिथि ने अपने कर कमलों से पुरस्कार बाँटे।
अपेक्षा, कल, पद, उपचार, हल
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी img 3

प्रश्न 5.
निम्नलिखित लोकोक्तियों के अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए
(i) ऊँची दुकान फीके पकवान
(ii) काला अक्षर भैंस बराबर
(iii) अँधा क्या जाने दो आँखें
(iv) चोर की दाढ़ी में तिनका
(v) जिसकी लाठी उसकी भेंस। उदाहरण देकर ऊपर लिखी लोकोक्तियों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य बनाइयेजैसे :-‘एक अनार सौ बीमार’ अर्थ-वस्तु एक चाहने वाले अनेक।
वाक्य रचना-चालीस ‘पद’ रिक्त हैं। प्रार्थना पत्र दस हजार हैं। यह तो वही बात हुई कि एक अनार, सौ बीमार।
उत्तर
(i) ऊँची दुकान फीका पकवान . अर्थ-आडम्बर अधिक असलियत कम
वाक्य-रचना-उसने लिखा तो है स्वादिष्ट भोजनालय, लेकिन उसके एक भी भोजन में कोई स्वाद नहीं है। इसे कहते हैं, ‘ऊँची दुकान फीका पकवान।’
(ii) काला अक्षर भैंस बराबर अर्थ-निरक्षर, अनपढ़
वाक्य-रचना-उसे बार-बार समझाया जाता है। फिर भी वह नहीं समझता है; क्योंकि वह पूरी तरह से काला अक्षर भैंस बराबर है।
(iii) अंघा क्या जाने दो आँखें अर्थ-दुखी को सुख का अनुभव नहीं होता
वाक्य-रचना-चुनाव के समय मन्त्री गरीबों को लाभकारी योजना की घोषणा करते हैं, लेकिन गरीब उन पर यकीन नहीं करते हैं। यह तो वही बात हुई कि अँधा क्या जाने दो आँखें।
(iv) चोर की दाढ़ी में तिनका अर्थ-बुरे व्यक्ति का मन हमेशा शंकालु होता है।
वाक्य-रचना-भ्रष्टाचारी तो भ्रष्टाचार करते हैं, लेकिन पकड़ लिए जाने के भय से परेशान रहते हैं। इसे कहते हैं ‘चोर की दाढ़ी में तिनका।’
(v) जिसकी लाठी उसकी भैंस अर्थ-हमेशा शक्तिशाली की विजय होती है।
वाक्य-रचना-आखिरकार उसने अपने धन-बल से चनाव जीत ही लिया। यह सच ही कहा गया है-‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’।

मेहमान की वापसी योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
यदि आपके घर कोई पालतू पशु है तो आप उसमें कितना ‘लगाव’ महसूस करते हैं। कोई एक घटना के आधार पर एक संस्मरण लिखिए।
प्रश्न 2.
आप अपनी दिनचर्या में कितने विदेशी शब्द प्रयोग करते हैं? उसकी सूची बनाइये।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मेहमान की वापसी परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अजय की साँस दरवाजे पर क्यों अटककर रह गई?
उत्तर
अजय ने बरामदे में एक शेर की तरह एक बड़ा-सा अल्सेशियन कुत्ता । देखा। उसे देखकर दरवाजे पर ही उसकी साँस अटककर रह गई।

प्रश्न 2.
जॉली कौन था?
उत्तर
जॉली शेर की तरह एक बड़ा-सा अल्सेशियन कुत्ता था।

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प्रश्न 3.
जॉली को वपथपाने का साहस अजय को कैसे हुआ?
उत्तर
अजय ने जॉली की बेबसी को समझने का प्रयास किया। उसने देखा कि जॉली रात-भर रो-रोकर थक गया है। वह एक कोने में एक नन्हें बच्चे की तरह सिमटा हुआ बड़ा ही असहाय लग रहा है। इससे उसके प्रति उसकी सहानुभूति हो गई। उसी के सहारे उसे थपथपाने का उसे साहस हुआ।

प्रश्न 4.
कुत्ते की क्या विशेषता होती है?
उत्तर
कुत्ते की यही विशेषता होती है कि वह प्यार की कीमत को जानता-समझता है। इसलिए वह प्यार करने वालों पर अपना प्राण निछावर कर देता है।

मेहमान की वापसी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जॉली के आने पर अजय ने क्या अनुभव किया?
उत्तर
जॉली के आने पर अजय ने अनुभव किया कि वह तो नाराज है ही। उसके मम्मी-पापा भी नाराज हैं। उसकी मम्मी की नाराजगी इस बात से है कि वह महीने जॉली के लिए खाना कैसे बना पायेगी। उसके पापा को उस समय गुस्सा आया, जब जॉली ने उनके द्वारा कटोरे में रखे गए दूध-रोटी को खाने से मुंह फेर लिया। इस प्रकार अजय ने अनुभव किया कि जब इतना बड़ा कुत्ता घर में रहेगा तो उसके दोस्तों का आना-जाना बन्द हो जायेगा और वह जैसे जेल में बन्द हो जाएगा।

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प्रश्न 2.
जॉली का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर
जॉली एक बड़ा-सा अल्सेशियन कुत्ता था। वह शेर की तरह भयानक था। फिर वह बहुत ही समझदार और वफादार था। वह अपने स्वामी के द्वारा दूसरे को सौंप दिए जाने से अपनापन को नहीं भूल पाता है। वह अपने स्वामी के प्रति वफादारी दिखाने के लिए रात-भर चीखता-चिल्लाता है। उसके प्रति वह आँसू बहाता है। विवश होकर ही वह अपने दूसरे स्वामी के बच्चे के साथ दोस्ती कर लेता है। उसे बड़ी समझदारी से निभाता है। उस बच्चे से इतना घुल-मिल जाता है कि वह अपने पहले स्वामी को भूल जाता है। वह उसे इतना भूल जाता है कि वह उसे अपने दूसरे स्वामी के बच्चे के पास हमेशा के लिए छोड़ने को मजबूर कर देता है।

प्रश्न 3.
‘मेहमान की वापसी’ कहानी का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मेहमान की वापसी’ कहानी सुप्रसिद्ध महिला कथाकार मालती जोशी की एक लोकचर्चित कहानी है। इसमें मूक पशुओं, और मनुष्यों के परस्पर प्रेम को बड़े ही भावपूर्ण शब्दों में चित्रित किया गया है। लेखिका की इस कहानी से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि यदि मनुष्य पशुओं के प्रेम की अनुभूति करता है, उनके दुःख-दर्द
और भावनाओं को समझता है तो पशु भी उनके प्रति अपने प्रेम को किसी-न-किसी प्रकार से अवश्य ही प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार वे आत्मीयता का भाव प्रकट करते रहते हैं।

मेहमान की वापसी लेखिका-परिचय

प्रश्न
श्रीमती मालती जोशी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-श्रीमती जोशी का हिन्दी के आधुनिक महिला कथाकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी शिक्षा समाप्त कर उन्होंने हिन्दी कथा-लेखन में सक्रिय रूप से भाग लिया। धीरे-धीरे उनके कथा-स्वरूप ने अपनी जड़ें जमाते हुए अत्यधिक सशक्त रूप ले लिया। उनके कथा-स्वरूप में पुरुष जगत-नारी जगत का विस्तार अधिक देखा जा सकता है। ‘ रचनाएँ-श्रीमती मालती जोशी के कथा-संग्रह इस प्रकार है-‘विश्वास गाथा’, ‘एक घर सपनों का’, ‘पटाक्षेप’, ‘रोग-विराग’, ‘समर्पण का सुख’, ‘सहचारिणी’, ‘मध्यान्तर’, ‘दादी की घड़ी’, आदि। महत्त्व-श्रीमती मालती जोशी का हिन्दी के उन आधुनिक महिला कथाकारों में बहुचर्चित स्थान है, जिन्होंने मध्यवर्गीय परिवारों का सूक्ष्म चित्रण मानवीय धरातल पर किया है। बाल-कथा-लेखन में भी उनका उन महिला बाल-कथाकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिन्होंने बाल-मनोविज्ञान का सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और गहन-से-गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस प्रकार श्रीमती मालती जोशी एक प्रतिष्ठित महिला कथाकार के रूप में आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेंगी।

मेहमान की वापसी कहानी का सारांश

प्रश्न
श्रीमती मालती जोशी-लिखित कहानी ‘मेहमान की वापसी’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्रीमती मालती जोशी-लिखित कहानी ‘मेहमान की वापसी’ पशु-मनुष्य के परस्पर प्रेम-चित्रण की कहानी है। इस कहानी का सारांश इस प्रकार है अजय रोज की तरह सीटी बजाते हुए अपने घर में आया तो उसने दरवाजे पर शेर की तरह एक अल्सेशियन कुत्ता देखकर डर गया। उसकी इस डर को देखकर उसके पापा के दोस्त राय अंकल ने उसे समझाया कि काटता नहीं है। उन्होंने अंकल से उसकी दोस्ती कराने के लिए उसे पुचकारते हुए कहा-“जॉली, कम हियर… शेक हैंड विद अजय।” जॉली ने अपना दाहिना पंजा उठाया तो अजय ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया। राय अंकल ने अजय से कहा कि जॉली महीने भर की छुट्टियों में उसके पास ही रहेगा और वह उससे दोस्ती निभाता रहे। इसे सुनकर अजय दुखी हो गया कि इससे तो उसके दोस्तों का आना-जाना बन्द हो जायेगा और वह घर में ही बन्द पड़ा रहेगा। राय अंकल के चले जाने पर उसकी मम्मी को भी यह ठीक. नहीं लगा था। उसके नाराज होने पर उसके पापा ने उसे समझाया कि वे लोग जॉली के लिए एक बोरी आटा रख गए हैं।

रात होने पर अजय के पापा ने दूध में रोटियों को मीड़कर कटोरे में जॉली के सामने रख दिया। लेकिन उसने देखा तक नहीं। इससे अजय की मम्मी और पापा दोनों झल्ला गए। सबके सोने पर जॉली बिलखने लगा। उसका रोना अजय की मम्मी को असगुन लगा तो उसके पापा ने तसल्ली देते हुए कहा कि नई जगह है, थोड़ी. देर बाद ठीक हो जायेगा। अजय को अपनी पिछली छुट्टियों में बीते हुए अपने अकेलेपन के कारण अपने बहाए आँसुओं की जॉली के आँसुओं से समानता दिखाई दी। इससे उसके प्रति अचानक सहानुभूति हो आयी। उस समय उसे जॉली खूखार न लगकर एक नन्हें बच्चे की तरह असहाय लग रहा था। उसने उसे थपथपाते हुए कहा, “ऑटी की याद आ रही है न!

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उन्हें जल्दी आने के लिए हम लोग कल ही पत्र लिखेंगे, फिर उसने उसके गले में हाथ डालकर पुचकारते हुए कटोरे में पड़े हुए दूध-रोटी को उसे खिला दिया। सुबह गुडमार्निंग कहने पर जॉली ने दोनों पंजे उठाकर स्वागत किया तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसने अपने आस-पास के सहमे हुए बच्चों को समझा दिया कि जॉली काटता नहीं, प्यार करता है। वह जब घर से बाहर निकलता तो जॉली उसे सड़क तक छोड़ने जाता और वापस लौटने पर वह पूँछ हिलाकर उसका स्वागत करता। उसके पापा ने राय अंकल को पत्र लिख दिया था। पत्र पाकर राय अंकल और राय आँटी जॉली को ले गए। इसे सुनकर अजय एकदम उदास हो गया। यों तो खाना उसे जहर लग रहा था। फिर भी उसने खाया। क्यों न खाये। एक बेवफा कुत्ते के लिए वह क्यों भूखा रहे। वह तो वहाँ पर राय

अंकल और राय आँटी के हाथ से माल खा रहा होगा। जॉली के जाने पर सारा घर मानो काटने को दौड़ रहा था। अजय की तरह उसके मम्मी-पापा भी खूब उदास थे। उसी मोटर की आवाज आयी। अजय के पापा ने दरवाजा खोला। राय अंकल ने कहा, “माफ करना भाई साहब, बड़े बेवक्त तकलीफ दे रहा हूँ, लेकिन… ‘इसी बीच जॉली तीर की तरह घर में आकर अजय के पैरों से ऐसे लिपट गया, जैसे बरसों बाद मिला हो। अजय की सारी शिकायतें आँसुओं में बह गई थीं।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 गुणवन्ती

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 गुणवन्ती (संकलित)

गुणवन्ती अभ्यास-प्रश्न

गुणवन्ती लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मोहन का बचपन किस प्रकार बीता?
उत्तर
मोहन के बचपन में ही उसके माता-पिता का निधन हो गया। उसका पालन-पोषण उसकी सौतेली बहन ने किया फिर भी वह उसके प्रति ठीक व्यवहार नहीं करती थी। इस तरह से उसका बचपन बड़ी ही कठिनाइयों में बीता।

प्रश्न 2.
राजकुमारी की शादी के लिए राजा क्यों चिन्तित था?
उत्तर
राजकुमारी की शादी के लिए राजा चिन्तित था। यह इसलिए कि उसकी सुन्दर और गुणवन्ती बेटी को कोई भी व्यक्ति पसन्द नहीं आता था। वह अपने से अधिक सुन्दर और गुणवान व्यक्ति से शादी करना चाहती थी।

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प्रश्न 3.
विवाह के पश्चात् राजकुमारी ने क्या संकल्प किया?
उत्तर
विवाह के पश्चात् राजकुमारी ने संकल्प किया कि वह अपनी मेहनत, लगन, साहस और धैर्य के सहारे इन परिस्थितियों का सामना करेगी।

प्रश्न 4.
राजकुमारी को पुरस्कार क्यों मिला?
उत्तर
राजकुमारी को पुरस्कार मिला। यह इसलिए कि उसकी गुड़िया की सभी ने बहुत प्रशंसा की।

गुणवन्ती दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर.

प्रश्न 1.
राजा को नाई की चालाकी का कब पता चला?
उत्तर
गुड़ियों की प्रदर्शनी में राजकुमारी को प्रथम पुरस्कार देने के लिए जब राजा ने उसे बुलाया तब राजकुमारी ने राजा से कहा कि आपने एक धोखेबाज नाई के चक्कर में फंसकर एक अनपढ़ और बेकार आदमी से मेरी शादी कर दी। इससे राजा को नाई की धोखेबाजी का पता चल गया।

प्रश्न 2.
गुणवन्ती के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
गुणवन्ती का चरित्र बड़ा ही उज्ज्वल और निश्छल है। वह एक स्वाभिमानी है। उसमें दृढ़-संकल्प और कुछ कर गुजरने की अटूट भावना है। फलस्वरूप वह अपने सामने आई हुई कठिनाइयों और विपत्तियों से हताश व निराश नहीं होती है। इस प्रकार वह अपनी हिम्मत व बुद्धि से सफलता को चूम लेती है।

प्रश्न 3.
अपना संकल्प पूरा करने के लिए राजकुमारी ने क्या-क्या कार्य किए?
उत्तर
राजकुमारी ने अपना संकल्प पूरा करने के कई कार्य किए। उसने अपनी सुन्दर रेशमी साड़ी फाड़कर सुई और धागे की सहायता से सुन्दर-सुन्दर गुड़ियाँ बनाई। फिर उन्हें बाजार में अपने पति से बेचवाया। अपनी सुन्दरता के कारण वे सभी गुड़ियाँ देखते-ही-देखते बिक गईं। उसे अच्छे पैसे मिल गए। उन पैसों से उसने अपनी बुद्धि-प्रतिभा से रंग, लकड़ी और कुछ सामान मँगवाकर एक सुंदर घोड़ा बनाया। उन घोड़ों के भी अच्छे दाम मिल गए। इस तरह से उसका कारोबार चल निकला। अब उसकी आमदनी इतनी बढ़ गई कि उसने राजा से भी बड़ा महल और सुख-सुविधाएँ जुटा लीं। इस प्रकार से उस राजकुमारी ने अपना संकल्प पूरा कर लिया।

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प्रश्न 4.
इस कहानी से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर
इस कहानी से हमें बहुत वही प्रेरणा मिलती है। वह प्रेरणा यह है कि हमें अपने जीवन में आनेवाली विपत्तियों और कठिनाइयों पर हताश, निराश और बुजदिल नहीं होना चाहिए। उसे हिम्मत, परिश्रम और विवेक से आगे बढ़ना चाहिए। इससे वह अवश्य अपने जीवन में सफलता प्राप्त करके सुखी और सम्पन्न होकर आनन्दमय जीवन बिता सकता है।

प्रश्न 5.
‘गुणवन्ती’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘गुणवन्ती’ कहानी एक सार्थक शीर्षक की कहानी है। इस कहानी में एक राजकुमारी के महान और प्रेरणादायक गुणों का उल्लेख हुआ है। घोर विपत्ति और अचानक कुसमय होने के बावजूद वह अपने गुणों को त्यागती नहीं अपितु उनके ही सहारे वह मॅझधार में पड़ी हुई गृहस्थी को पार लगा लेती है। इसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि ‘गुणवंती’ शीर्षक सार्थक है।

गुणवन्ती भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए
घर, घोड़ा, अंधेरा, राजा, धन।
उत्तर
शब्द – पर्यायवाची शब्द
घर – आवास, गृह
घोड़ा – अश्व, हय
अँधेरा – अंधकार, तम
राजा – नृप, नरेश
धन – द्रव्य, सम्पत्ति।

प्रश्न 2.
दिए गए शब्दों में से प्रत्यय छाँटकर लिखिए
हिनहिनाहट-हिनहिन+आहट
अनपढ़, बचपन, दुकानदार, परिस्थितिवश।
उत्तर
शब्द
अनपढ़ = अन-पढ़
दुकानदार = दुकान-दार
बचपन = बच-पन
परिस्थितिवश = परिस्थिति-वश।

प्रश्न 3.
नीचे लिखे उपसर्गों का उपयुक्त प्रयोग करते हुए शब्द बनाइए
बे, कु, सद्, सु, नि, सद्।
सहारा – ……………….
पोषण – ……………….
व्यवस्थित – ………………
डर – ……………
लोक – …………….
व्यवहार – ……………
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 गुणवन्ती img 1

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प्रश्न 4.
रेखांकित शब्दों के लिंग बदलकर रिक्त स्थान भरिए
1. मोहन ने सोचा नाई से शादी की बात करूँ परन्तु……ने मना कर दिया।
2. साधारण पुरुष का यह काम नहीं था न ही किसी…..का।
3. सभी पुरुष विद्वान थे और स्त्रियाँ…..थीं।
4. दिए गए शब्द युग्मों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
पालन-पोषण, काम-धंधा, धन-दौलत, सुख-सुविधा।
उत्तर
1. मोहन ने सोचा नाई से शादी की बात करूँ, परन्तु नाईन ने मना कर दिया।
2. साधारण पुरुष का यह काम नहीं था, न ही किसी स्त्री का।
3. सभी पुरुष विद्वान और स्त्रियाँ विदुषी थीं।
4. शब्द-युग्मों का वाक्य-प्रयोग
(i) पालन – पोषण
पालन – उसने उसका पालन किया है।
पोषण – पौधों के लिए पोषण तत्त्व आवश्यक है।
(ii) काम – धंधा
काम – वह दुकान पर काम करता है।
धंधा – मोहन कबाड़ी का धंधा करता है।
(iii)धन – दौलत
धन – मेरे पास पुस्तक ही धन है।
दौलत – आजकल दौलत के स्वामी पूजे जाते हैं।
(iv) सुख – सुविधा
सुख – भिखारी को भीख माँगने से ही सुख मिलता है।
सुविधा – अमीरों को सभी सुविधाएं प्राप्त होती हैं

गुणवन्ती योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
विद्यार्थी बची हुई, व्यर्थ अथवा पुरानी सामग्री से छोटे-छोटे खिलौने या काम आने वाली चीजें बनाएँ और कक्षा में प्रदर्शनी लगाएँ।
प्रश्न 2.
गुणवन्ती कहानी की तरह अपनी कल्पनाओं से दिए गए बिन्दुओं की मदद से कहानी बनाइए
एक राजकुमारी थी। वह बहुत सुन्दर……..थी। एक दिन बाग में……..और उसके सफेद घोड़े पर सवार युवक……. । वह उस समय खतरे में थी क्योंकि…..। तभी मदद …… । राजकुमारी वापस…………. । राजा ने……विवाह कर दिया और वे दोनों खुशी खुशी रहने लगे।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

गुणवन्ती परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मोहन का पालन-पोषण किसने किया?
उत्तर
मोहन का पालन-पोषण उसकी सौतेली बहन ने किया।

प्रश्न 2.
सौतेली बहन का व्यवहार मोहन के प्रति कैसा था?
उत्तर
सौतेली बहन का व्यवहार मोहन के प्रति अच्छा नहीं था।

प्रश्न 3.
मोहन की शादी क्यों नहीं हो पा रही थी?
उत्तर
मोहन की शादी निम्नलिखित कारणों से नहीं हो पा रही थी

  1. वह अनपढ़ और गंवार था।
  2. वह कामचोर था।
  3. वह बहुत गरीब था
  4. वह अनाथ था।
  5. वह बेसहारा था।

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प्रश्न 4.
गाँव का नाई कैसा था?
उत्तर
गाँव का नाई पूरी तरह से धूर्त और चालाक था। उसने अपनी इसी धूर्तता और चालाकी से कई गरीबों, बेसहारों और अपंगों की शादियां करवा दी थीं।

प्रश्न 5.
झोपड़ी को देखकर राजकुमारी ने क्या सोचा?
उत्तर
झोपड़ी को देखकर राजकुमारी बहुत दुखी हुई। उसने समझ लिया कि उसके साथ धोखा हुआ है।

प्रश्न 6.
राजकुमारी को पुरस्कार किसने दिया?
उत्तर
राजकुमारी को पुरस्कार उसके पिता राजा ने ही दिया।

प्रश्न 7.
राजा ने अपनी बेटी से क्या कहा? ।
उत्तर
राजा ने अपनी बेटी का हौसला बढ़ाते हए कहा-“बेटी! हमें तम पर गर्व है। तुम्हारी सफलता उन सभी के लिए प्रेरणादायक हो सकती है जो बाधाओं और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं।”

प्रश्न 8.
शादी के लिए राजा की बेटी की क्या शर्त थी?
उत्तर
शादी के लिए राजा की बेटी की यही शर्त थी कि वह अपने से अधिक सुन्दर और गुणवान व्यक्ति से ही शादी करेगी।

प्रश्न 9.
राजा की बेटी की डोली कहाँ रुकी?
उत्तर
राजा की बेटी की डोली एक टूटी हुई झोपड़ी के सामने रुकी।

गुणवन्ती दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मोहन अपनी शादी करवाने की प्रार्थना करने के लिए किसके पास गया?
उत्तर
मोहन अपनी शादी करवाने की प्रार्थना करने के लिए अपने ही गांव के एक नाई के पास गया। यह इसलिए कि उस नाई ने कितनी ही शादियाँ गरीब-से-गरीब लड़के-लड़कियों की करवाई थी। इस विश्वास और आशा से वह उस नाई के पास गया कि उसकी भी शादी वह अवश्य करवा देगा।

प्रश्न 2.
नाई ने मोहन को क्या सिखाया?
उत्तर-नाई ने मोहन को यही सिखाया कि, तुम्हारी शादी एक राजा की बेटी से करवा दूंगा। तुम इसे मजाक मत समझो। मैं तुमसे जैसा कहता हूं, तुम वैसा ही करना। तुम धोबी के यहाँ से अच्छी पोशाक माँगकर पहन लो। कहीं से सफेद अरबी घोड़ा ले आओ। पन्द्रह-बीस गीदड़ों को इक्ठे कर लो। इसके बाद की बातें मैं देख लूँगा।

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प्रश्न 3.
नाई ने राजा से जाकर क्या कहा?
उत्तर
नाई ने राजा के पास जाकर कान में कहा कि आपको जिस प्रकार के वर की तलाश थी उस तरह का वर मिल गया है। वह किसी देश का राजा है। उसके पास धन-दौलत सब कुछ है। उसे दान-दहेज कुछ नहीं चाहिए। इन सबके बावजूद उसकी एक शर्त है कि अंधेरा होने पर लड़की को डोली में बैठाकर शहर के बाहर बरगद के पेड़ के पास पहुँचा दिया जाए। लड़की के साथ और कोई न आए। लड़की वहीं से ससुराल चली जाएगी।

प्रश्न 4.
राजा की बेटी ने झोपड़ी के अन्दर क्या देखा?
उत्तर
राजा की बेटी ने झोपड़ी के अन्दर जो कुछ देखा वह सब उसकी कल्पना के विपरीत था। उसने झोपड़ी के अन्दर देखा कि एक मिट्टी का मटका तथा कुछ टूटे हुए बर्तन हैं।

गुणवन्ती कहानी का सारांश

प्रश्न
‘गुणवंती’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
गुणवंती’ कहानी एक प्रेरक कहानी है। इस कहानी से कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न हारने की शिक्षा मिलती थी। इस कहानी का सारांश इस प्रकार है | एक गाँव में मोहन नामक एक अनाथ बालक का पालन-पोषण उसकी सौतेली बहन ने किया था। बड़ा होने पर मोहन अपनी शादी तो करना चाहता था लेकिन कोई उसे अपनी लड़की देने के लिए तैयार नहीं होता था। एक दिन उसने अपने.. गाँव के नाई से अपनी शादी कहीं करवा देने की मिन्नत की। नाई ने उसकी शादी राजकुमारी से करवाने की बात उससे कही तो उसने इसे मजाक समझा, फिर बाद में इसे सत्य मान लिया। नाई ने कहा कि इसके लिए तुम्हें एक काम करना होगा। वह यह कि तुम धोबी के यहाँ से अच्छी पोशाक माँगकर पहन लो। कहीं से सफेद अरबी घोड़ा ले आओ।

पन्द्रह-बीस गीदड़ इकट्ठे कर लो। बाकी सब मैं देख लूंगा। मोहन ने जब यह सब कुछ कर लिया, तब नाई ने उसे शहर के बाहर एक बरगद के पेड़ के नीचे रुकने के लिए कहा। फिर वह दौड़ते हुए राजा के कान में कहा-आपकी पसन्द का वर मिल गया है। इस राजकुमार के पास सब कुछ है। इसलिए उसे दहेज नहीं चाहिए। उसकी शर्त है कि अँधेरा होने पर लड़की को डोली में बैठाकर शहर के बाहर बरगद के पेड़ के पास पहुंचा दिया जाए। लड़की अकेली ही ससुराल जाएगी। यह इसलिए कि अगर राजकुमार यहाँ आएँगे तो लोगबाग यही समझेंगे कि कोई आप पर हमला करने आ रहा है। राजा ने नाई के इस सुझाव को मानकर नाई के कथनानुसार राजा ने अपनी बेटी को डोली में भेजकर महल के ऊपर चढ़कर राजा ने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे वह राजकुमार घोड़े पर चढ़ा है। गीदड़ों के शोर और घोड़ो की हिनहिनाहट से उसे लगा कि उसकी सेना में हलचल है। राजा ने चैन की सांस ली।

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मोहन की झोपड़ी में पहुंचने पर गुणवंती का विवाह जब हो गया तो उसे पता चला कि उसके साथ धोखा हुआ है। फिर भी उसने हिम्मत और साहस से काम लिया। उसने अपने पति को काम करने के लिए कहा तो उसने अपनी अयोग्यता बताई। एक दिन उसने अपनी रेशमी साड़ी से कई गुड़ियां बनाकर अपने पति को बाजार में बेचने के लिए भेजा। लोगों ने उन्हें बहुत सराहा। वे सभी अच्छे पैसे में बिक गईं। बाद में गुणवन्ती ने मोर और घोड़े बनाकर भेजे। वे सभी अच्छे दाम में बिक गए। इस तरह गुणवन्ती ने खिलौने का एक बहुत बड़ा कारखाना खोल लिया। उसकी आमदनी से अपने पिता से अच्छा महल बना लिया।

कुछ समय पहले शहर में लगी हुई प्रदर्शनी में गुणवन्ती की गुड़िया को सर्वश्रेष्ठ इनाम घोषित किया गया। राजा ने वह इनाम अपने हाथों से दिया। इनाम लेते समय राजा और गुणवन्ती ने एक-दूसरे को पहचान लिया। उसने राजा से कहा कि आपने धोखेबाज नाई के कहने पर मेरा विवाह एक गंवार, बेकार और अयोग्य व्यक्ति से कर दिया फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने तो अपनी हिम्मत और मेहनत से दुनिया की सारी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। इसे सुनकर राजा ने लज्जित होकर कहा कि बेटी हमें तुम पर गर्व है। तुम्हारी सफलता उन सभी के लिए प्रेरणादायक हो सकती है जो बाधाओं और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं।

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MP Board Class 9th Special Hindi निबन्ध-लेखन

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1. ‘दीपावली’ अथवा ‘किसी त्यौहार का वर्णन’

प्रस्तावना-भारतीय त्यौहार समाज के लिए सामूहिक उत्सव हैं, इन त्यौहारों पर जनसामान्य अपनी आन्तरिक और बाह्य भावनाओं को अपनी किसी भी कार्य-शैली के माध्यम से प्रकट करता है। इसका कारण है कि मनुष्य इन उत्सवों के मनाने के लिए विविध आयोजनों की रूपरेखा तैयार करता है।

भारत में वर्ष के प्रत्येक महीने त्यौहार मनाये जाते दिखते हैं। अतः भारत में वर्ष के प्रत्येक दिन उत्सव व त्यौहार आदि का आयोजन होता ही रहता है। इस आधार पर भारत को त्यौहारों और पर्वो का देश कहा जाता है। दीपावली हिन्दुओं का सबसे प्रमुख त्यौहार है।

तैयारियाँ-दीपावली आने से 10-15 दिन पहले से ही इसकी तैयारी करना प्रारम्भ कर दी जाती है। घरों और दुकानों की सफाई की जाती है। उनमें चित्र टाँग दिए जाते हैं। इन चित्रों से वे सजे हुए अच्छे लगते हैं। चारों ओर चाहे शहर हो या गाँव अथवा छोटा शहर, सभी सजे हुए इस तरह प्रतीत होते हैं जैसे मानो वे लक्ष्मीजी के आने की प्रतीक्षा कर रहे हों। यह दीपावली त्यौहार शरद ऋतु के प्रारम्भ में आता है। उस समय न अधिक गर्मी होती है और न अधिक ठण्ड। मौसम सुहावना होता है। इस समय धीरे-धीरे शीतल और सुगन्ध युक्त हवा बहती रहती है। प्रकृति खुशनुमा होती है। पशु-पक्षी, लता-वृक्ष, स्त्री-पुरुष सभी आनन्दमय होते हैं। प्रकृति भी इस त्यौहार को मनाने के लिए तत्पर प्रतीत होती है।

दीपावली कैसे मनाई जाती है ?-दीपावली का पर्व हिन्दू कार्तिक महीने की अमावस्या को पड़ता है। वैसे यह त्यौहार कार्तिक महीने की कृष्णपक्षीय तेरस (धन तेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (दौज) तक लगातार पाँच दिन तक बड़ी धूमधाम और सज-धज के साथ मनाया जाता है। धन तेरस का दिन भगवान धन्वन्तरि का जन्मदिन माना जाता है। अतः वैद्य लोग इस दिन उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। लोग इस दिन बर्तनों की खरीददारी करना शुभ मानते हैं। अतः इस दिन बाजारों में बड़ी-बड़ी दुकानें बर्तनों से भरी हुई और सजावट की हुई आकर्षक लगती हैं। इसके दूसरे दिन चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) होती है। इसे छोटी दीपावली कहते हैं। लोग प्रातः तेल-मालिश कर नहाते हैं और समझा जाता है कि इस तरह के स्नान करने से उनके शारीरिक रोग व पाप दूर हो जाते हैं। सायंकाल घर की प्रमुख नाली के पास दीपक जलाया जाता है।

इसके बाद बड़ी दीपावली आती है। अमावस्या का दिन दीपावली का मुख्य दिन होता है। दिन में पकवान बनते हैं। घरों में प्रायः रसगुल्ले बनाने का रिवाज अधिक है। बच्चे नये स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। वे अति प्रसन्न दिखते हैं। विभिन्न पकवान और मिठाइयाँ खाकर वे चारों ओर धमा-चौकड़ी भरते नजर आते हैं। सर्वत्र खुशी का वातावरण होता है। रात्रि का आगमन होता है। निर्दिष्ट बेला में लक्ष्मी जी का पूजन होता है। घर, दुकान, कारखानों पर पूजा विद्वान पण्डित कराते हैं। उन्हें विविध उपहार व मिठाइयाँ दी जाती हैं। व्यापारी लोग अपने खाते और बहीखाते बदलते हैं। पूजा में प्रमुख रूप से ताजे फूल, रोली, चन्दन, धूपबत्ती व खील रखी जाती हैं। लोग व बालक पटाखे चलाते हैं। दीपक जलाये जाते हैं, चारों ओर उजाला होता है।

दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपदा (पड़वा) होती है। इस दिन गोवर्धन पूजा का उत्सव हुआ करता है। दूध, खील और पकवानों से गोवर्धन की पूजा की जाती है। गोबर का गोवर्धन बनाया जाता है। सायंकाल को घर के सभी सदस्य एकत्र होकर पूजा करते हैं। पाँचवें दिन भैया दौज होती है। बहन अपने भाइयों का टीका करती हैं। उन्हें मिठाई, वस्त्र आदि देती हैं और उनके स्वस्थ रहने तथा दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इस दौज को भाई-बहन (यम-द्वितीयां पर) यमुना में साथ-साथ स्नान करके दीर्घ आयु प्राप्त करने का वरदान पाते हैं।

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दीपावली का महत्त्व-दीपावली हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। इस पर्व पर सभी प्रतिष्ठानों आदि की मरम्मत आदि करा दी जाती है। सफाई की जाती है। रंगाई और पुताई से दुकान और घर सुन्दर लगते हैं। मक्खी-मच्छर मर जाते हैं। लोगों में विशेष उत्साह होता है। क्योंकि उनकी खरीफ की फसल पक जाती है और रबी की फसल बोये जाने की तैयारी की जाती है। लोग परस्पर मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं। सभी में सद्भाव और सहानुभूति की जागृति होती है।

उपसंहार-इस उत्सव पर लोग जुआ आदि खेलकर इसकी पवित्रता को दाग लगा देते हैं। इन गन्दी आदतों से मुक्ति पाने के लिए सभी समाज के लोगों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

2. भारत की राष्ट्रीय एकता

प्रस्तावना-वही राष्ट्र सुख, वैभव एवं प्रगति की मंजिल. को प्राप्त कर सकता है जहाँ समस्त नागरिक बन्धुत्व, स्नेह, सद्भावना तथा एकता के सूत्र में आबद्ध हो। यदि नागरिकों के मनमानस में एकता एवं अपनेपन की भावना नहीं होगी तो वह राष्ट्र पतन के गर्त में चला जाएगा।

राष्ट्र के अंग-राष्ट्र के तीन अंग होते हैं। प्रथम वहाँ के निवासी, द्वितीय संस्कृति, तृतीय सभ्यता। ये तीनों चीजें ही एक राष्ट्र का निर्माण करती हैं तथा उन्हें एकता के सूत्र में पिरोती हैं। सभ्यता यदि शरीर है तो राष्ट्र उसका प्राण है। इसीलिए राष्ट्ररूपी शरीर के लिए संस्कृतिरूपी प्राण को बनाए रखना अत्यावश्यक है।

एकता की अनिवार्यता-आज समस्त विश्व में आतंकवाद अपना सिर उठा रहा है। निरीह लोगों की हत्या करके ये आतंकवादी अपने कुत्सित एवं घृणित इरादों को भी अंजाम दे रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हुआ वह इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। अतः आज के युग में राष्ट्रीय एकता परमावश्यक है।

भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की एजेन्सियाँ लगातार हमला कर रही हैं। असंख्य क्षेत्रीय लोग मारे जा चुके हैं। वहाँ से पलायन कर चुके हैं। इससे भारतीय नागरिक भारतीय संघ से अलग होने की विचारधारा बना रहे हैं। हमारी फौज अवश्य इस दिशा में सही निर्णय लेती है। परन्तु राजनैतिक दबाव उसे उचित कार्यवाही नहीं करने देता।

स्वार्थ लोलप राजनीति-ये स्वार्थी राजनीतिज्ञ, राष्ट्र के समक्ष अवसर मिलते ही गम्भीर संकट खड़ा कर देते हैं। इन्हें नैतिकता तथा राजनीतिक स्तर का तनिक भी ध्यान नहीं रहता।

एकता के मार्ग में अवरोध-एकता के मार्ग में कुछ तत्व आज भी अवरोध बने हुए हैं। अंग्रेजों ने इस देश की धरती पर ऐसे विषैले बीजों को बो दिया है जो आज भी पनप रहे हैं। आज अनेक विघटनकारी शक्तियाँ हमारे देश का नाश करने पर तुली हुई हैं। अगर राष्ट्र के कर्णधार देश या राष्ट्र की एकता को स्थिर रखने का प्रयास करते हैं तो वे इसमें सफल नहीं हो पाते।

भारत की भूमि पर ही भारत के खिलाफ प्रपंच रचकर यहाँ की अखण्डता को खण्डित करना चाहते हैं। उल्फा संगठन, दक्षिण भारत तथा कश्मीर के आतंकी संगठन सभी देश को खण्डित करना चाहते हैं। भाषायी आधार भी उन्हें भड़काने का काम करता है।

सम्पूर्ण वर्गों का योगदान-राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को सुरक्षित रखने के लिए सभी वर्गों का योगदान अपेक्षित है।

विद्यार्थी, राजनीतिक, मजदूर, धर्म सुधारक एवं वैज्ञानिक सभी को किसी-न-किसी रूप में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में सहयोग देना चाहिए। सभी वर्गों में एक-दूसरे के धर्म के प्रति सम्मान होना चाहिए। आर्थिक स्वतन्त्रता भी परमावश्यक है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है “जब जेब में पैसा है तथा पेट में रोटी है, तो हर एक शबनम मोती है।”

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उपसंहार-आज साम्प्रदायिकता का जहरीला नाग मानवता को डसने के लिए अपना फन फैला रहा है, सबसे प्रथम उसका फन कुचलना होगा। देश के कर्णधारों को सत्ता लोलुप एवं स्वार्थ की भावना से ऊपर उठकर राष्ट्र का हित चिन्तन करना होगा तभी राष्ट्र में एकता के स्वर गुंजित होंगे तथा निम्न राग दोहराना होगा-“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।”

3. भारत की बढ़ती जनसंख्या

प्रस्तावना-विश्व के विभिन्न देश अपनी-अपनी समस्याओं से ग्रसित हैं। उसी तरह भारतीय गणराज्य भी सबसे . अधिक समस्याओं से घिरा हुआ राष्ट्र है। जिनमें सर्वोपरि है-भारत की बढ़ती जनसंख्या। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ ही अन्य अनेक समस्याएँ स्वतः ही उत्पन्न होती रहती हैं जिससे देश की तरक्की के विषय में जारी की गई योजनाएँ, प्रभावित हो जाती हैं। भारत में जनसंख्या की वृद्धि एक गम्भीर समस्या है, लेकिन इसे लेकर यहाँ के नागरिक उसके प्रति बिल्कुल भी गम्भीर नहीं हैं।

जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ-जनसंख्या वृद्धि एक ऐसी समस्या है, जो अन्य अनेक समस्याओं को जन्म देती है। उन समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या है-बढ़ते लोगों को रोटी देने की, उनके लिए वस्त्र आदि की व्यवस्था करने की तथा उन्हें आवास प्रदान करने की। इनकी समस्याओं के साथ ही, उनको उचित शिक्षा देने, उन्हें रोजगार देने, उन लोगों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के सुलझाने की स्वच्छ पानी देने, स्वच्छ वातावरण प्रदान करने सम्बन्धी विभिन्न समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।

अभाव की स्थिति-देश ने आजादी प्राप्त की। इसके साथ ही विकास योजनाएँ प्रारम्भ हुईं। कृषि, उद्योग एवं व्यवसाय के क्षेत्र में विकास की दिशा पकड़ी गई। लगभग सभी क्षेत्रों में विकास तीव्र गति से बढ़ने लगा। खेतों, कारखानों में उत्पादन शुरू हुआ। नई तकनीक अपनाई गई। कृषि आधारित उद्योग पनपने लगे। विकास तो अपनी तीव्र गति से होने लगा परन्तु बढ़ती जनसंख्या ने उसकी गति को बहुत ही प्रभावित कर दिया।

विकास के कार्यों के लिए राष्ट्र हित में कर्ज लिया जाने लगा। देश जिस गति से आगे बढ़ता, उतनी गति विकास के क्षेत्र में नहीं पकड़ सका। इस जनसंख्या वृद्धि ने सभी क्षेत्र के विकास सम्बन्धी कार्यों को ठप्प कर दिया।

जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव-जनसंख्या की बढ़ोत्तरी ने अपना प्रभाव सभी क्षेत्रों में दिखाया। शिक्षा का क्षेत्र भी प्रभावित हुआ, यातायात व्यवस्था-रेल परिवहन, सड़क परिवहन आदि का विकास रुक गया। भोजन, पानी, आवास व वस्त्र आदि की समस्या से ग्रसित भारतीय समाज फिर से अभावग्रस्त होने लगा। परन्तु भारतीय सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, कल-कारखानों और व्यवसाय के क्षेत्र में तीव्र विकास करना शुरू किया। बढ़ती जनसंख्या को रोजगार देने की दिशा में प्रभावकारी कदम उठाया। परन्तु इन सभी समस्याओं के समाधान के साथ-ही-साथ अन्य अनेक समस्याओं, जैसे-भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य समस्याओं और प्रदूषण समस्याओं ने देश को बुरी तरह जकड़ा हुआ है। साथ ही बेरोजगार लोगों की फौज प्रतिवर्ष बढ़ जाती है। उस दिशा में तो विकास दर गिरती लग रही है। इस तरह इस जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने अनेक ऐसी समस्याओं को जन्म दे दिया है जिनका समाधान शायद निकट भविष्य में होता दिखाई नहीं पड़ता।

जनसंख्या वृद्धि की समस्या का समाधान-राष्ट्रीय समस्या बनी जनसंख्या वृद्धि एक विकराल रूप धारण करती जा रही है। इसके हल के लिए किए गए उपाय भी कम और प्रभावहीन होते नजर आ रहे हैं। लोगों में इस समस्या के निराकरण के लिए जागृति की जा रही है। उन्हें बताया जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण करें। नियोजित परिवार ही सुखी हो सकता है। तरक्की कर सकता है, समृद्धि प्राप्त कर सकता है। सरकार की ओर से और व्यक्तिगत रूप से विविध संस्थानों द्वारा लोगों को इस समस्या के समाधान के उपाय बताए गए हैं। लोगों को उत्साहित किया जा रहा है कि वे शिक्षित बनें, अपनी सन्तान को, बालिकाओं और बालकों को शिक्षा ग्रहण करायें जिससे वे राष्ट्र हित की सोच सकें तथा स्वयं को राष्ट्र कल्याण के मार्ग से जोड़कर कार्य करें।

उपसंहार-देशवासियों को राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए निरन्तर कार्य करना चाहिए। उन्हें जन-जागृति पैदा करके अपने कर्त्तव्य का और उत्तरदायित्व का पालन करना चाहिए।

4. विज्ञान के चमत्कार

प्रस्तावना-आज विज्ञान का युग है। विज्ञान ने विश्व में सभी क्षेत्रों में अपनी विजय पताका फहरा रखी है। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज के युग को यदि हम वैज्ञानिक युग का नाम दे दें। प्राचीन और आधुनिक काल में पूर्णतः विपरीतता आ गयी है। रहन-सहन, वस्त्र पहनावा, यातायात तथा जीवन प्रणाली पूर्णतः परिवर्तित हो गई है। उसमें नवीनता का समावेश हो चुका है। आज की दुनियाँ प्रतिक्षण बदलती दिखती है। परिवर्तन ही विकास है।

आवागमन के साधन-आज आवागमन के साधन भी विज्ञान की कृपा से सर्वसुलभ हो गये हैं। रेल, मोटर, साइकिल, स्कूटर, जलयान तथा वायुयान इस क्षेत्र में अभूतपूर्व चुनौती दे रहे हैं। राष्ट्रीय पर्यों एवं शोक के अवसर पर समस्त राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्षों का एक मंच पर उपस्थित होना इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है।

बिजली वरदान स्वरूप-बिजली प्रतिपल एक दासी की भाँति सेवा में जुटी रहती है। कारखाने, रेडियो, टेलीविजन बिजली की सहायता से चलते हैं। बिजली से चलने वाले पंखे दुपहरी में निरन्तर चलकर मानव को परम शान्ति प्रदान कर रहे हैं।

कृषि में योगदान-कृषि के लिए नये यन्त्र विज्ञान ने आविष्कृत किये हैं। विज्ञान द्वारा उपलब्ध रासायनिक खाद्य उत्पादन क्षमता में एवं रासायनिक दवाइयाँ फसल को नष्ट होने से रोक रही हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान-एक्स-रे शरीर का आन्तरिक फोटो लेकर अनेक बीमारियों का पता लगा रहा है। कैंसर तथा एड्स जैसे रोगों पर निरन्तर शोध जारी है। परमाणु शक्ति भी विज्ञान की ही देन है।

श्रम की बचत-विज्ञान के द्वारा आविष्कृत मशीनों के माध्यम से पूरे दिन का कार्य मनुष्य कुछ ही घंटों में समाप्त कर लेता है। बचे हुए समय को मनुष्य मनोरंजन या स्वाध्याय में व्यतीत करता है।

अन्तरिक्ष के क्षेत्र में योगदान-अन्तरिक्ष के क्षेत्र में भी आज मनु पुत्र अपने कदम बढ़ा चुका है। जो चन्दा मामा कभी बालकों के लिए अगम बना हुआ था, आज वैज्ञानिक उसके तल पर पहुँचने में सक्षम हुए हैं।

विज्ञान से हानि-हर अच्छाई के पीछे बुराई छिपी है। जहाँ विज्ञान ने मनुष्य को अनेक सुख-सुविधाएँ प्रदत्त की हैं, वहाँ अशान्ति तथा दुःख का भी सृजन किया है।

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अगर हम सावधानीपूर्वक विचार करें तो विदित होता है कि इसमें विज्ञान का इतना दोष नहीं है जितनी कि मानव की कुत्सित प्रवृत्तियाँ दोषी हैं।

उपसंहार-विज्ञान स्वयं में अच्छा-बुरा नहीं है। यह मानव के प्रयोग पर निर्भर है। आज विज्ञान के गलत प्रयोग के फलस्वरूप ही दुनिया में विनाशकारी दृश्य नजर आ रहा है। अतः आज हमें विज्ञान को मानव के कल्याण के निमित्त प्रयोग करके सुख एवं समृद्धि का साधन बनाना है। इसी में सबका हित सन्निहित है।

5. भ्रष्टाचार-समस्या और समाधान

प्रस्तावना-भ्रष्टाचार का शब्दिक अर्थ होता है-आचरण (व्यवहार या चरित्र) से गिरा हुआ। इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति नैतिक रूप से पतित व्यवहार करता है वह अनैतिक और भ्रष्ट आचरण वाला हुआ करता है। जब कोई व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था में न्याय के पक्ष से गिरकर समाज के मान्य नियमों का पालन न करते हुए अपने गलत निर्णय लेता है और व्यवहार में गिरा हुआ हो जाता है, तो वह भ्रष्टाचारी कहा जाता है। वह इस तरह के व्यवहार को अपनी स्वार्थपरता के कारण किया करता है। अनुचित रूप से स्वयं लाभ प्राप्त करता है।

आचरण भी भ्रष्टता, रिश्वत लेकर, कालाबाजारी करके, भाई-भतीजावाद फैलाकर जातीय आधार पर उल्लू सीधा करना, किसी वस्तु पर जान-बूझकर अधिक लाभ कमाने की दृष्टि से मूल्य वृद्धि कर देना, रुपये-पैसे लेकर कार्य करना, अपने तुच्छ लाभ के लिए दूसरों को बड़ी हानि पहुँचा देना आदि सभी आचरण भ्रष्ट (पतित) कहे जाते हैं।

आजकल देश व सम्पूर्ण समाज भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ चुका है। भारतीय संस्कृति, राजनीति, समाज, धर्म, व्यापार, उद्योग, कला एवं शासन-प्रशासन पूर्णतः भ्रष्ट हो चुका है। इस भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना तो असम्भव ही लगता है।

भ्रष्टाचार के कारण-

  1. किसी क्षेत्र में अभाव के कारण उत्पन्न असन्तोष किसी को व्यावहारिक रूप से भ्रष्ट और पतित बना देता है। अपनी इस विवशता के कारण वह भ्रष्टाचारी हो जाता है।
  2. स्वार्थ के वशीभूत होकर सम्मान प्राप्त न होने से आर्थिक, सामाजिक पद-प्रतिष्ठा में कमी के कारण भ्रष्टाचार पनपने लगता है।
  3. भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण भाई-भतीजावाद, जाति-वर्ग एवं साम्प्रदायिकता, भाषावाद आदि के कारण उचित न्याय नहीं कर पाते और भ्रष्ट बन जाते हैं।

भ्रष्टाचार से प्रभावित क्षेत्र-भ्रष्टाचार का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। जीवन का प्रत्येक भाग भ्रष्टाचार से प्रभावित है। किसी भी क्षेत्र का विधायक या सांसद हो, वह अपने निजी जीवन में किसी भी तरह प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक रूप से भ्रष्ट पाया जाता है, तो यह उसकी महान् गलती है। हमारे ऊपर बैठी ईश्वरीय सत्ता के प्रति विश्वास और श्रद्धा समाप्त हो जाती है। इस भ्रष्टाचार ने सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों को इतना प्रदूषित कर दिया है कि वहाँ साँस लेना भी दूभर हो गया है।

भ्रष्टाचार के दुष्परिणाम-भ्रष्टाचार के दुष्परिणाम यह हुए हैं कि ईमानदारी और सत्यता पूर्णतः विलुप्त हो चुकी है। बेईमानी और कपट का प्रसार होता जा रहा है। भ्रष्टाचार को मिटाना बड़ी चुनौती हो चुकी है। नकली माल बेचना, खरीदना, वस्तुओं में मिलावट करना, धर्म के नाम पर अधर्म का आचरण करना, रिश्वतखोर अपराधी को रिश्वत के ही बल पर छुड़ा लेना, कालाबाजारी करना आदि भ्रष्टाचार के ही दुष्परिणाम हैं। – भ्रष्टाचार को रोकने के उपाय-भ्रष्टाचार संक्रामक रोग की तरह सब ओर फैलता जा रहा है। अतः समाज में व्याप्त इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार की दशा ऐसी है कि भ्रष्ट व्यक्ति रिश्वत देकर (भ्रष्टाचार के द्वारा) ही मुक्त हो जाता है। उसे राजदण्ड का कोई भय नहीं है। उसके जीवन में शिष्ट आचरण की महत्ता बिल्कुल भी नहीं है। भ्रष्टाचारी को कठोर दण्ड से ही सुधारा जा सकता है। कितने ही ऊँचे प्रतिष्ठित पद पर आसीन भ्रष्ट व्यक्ति को कठोरतम दण्ड देकर ही दण्डित किया जाय। भ्रष्टाचारी को दण्डित किये बिना स्थिति में सुधार नहीं आ सकता। भ्रष्टाचारी को किसी भी सामाजिक उत्सव में उपेक्षित किया जाना बहुत ही आवश्यक है।

उपसंहार-भ्रष्टाचारी लोग समाज और राष्ट्र को बहुत बड़ी हानि पहुँचा रहे हैं हमारे राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लग चुका है। इसे मिटाने की दिशा में राजनैतिक लोगों और समाज के प्रबुद्ध लोगों को आगे आना होगा और स्वयं को सर्वप्रथम न्यायवादी और शिष्टाचारी सिद्ध करना होगा।

6. वृक्षारोपण

प्रस्तावना-भारत प्रकृति का पालना है। यहाँ की धरती पर चहुँओर हरियाली दृष्टिगोचर होती है। कहीं-कहीं वनों में मयूर नृत्य करते हुए नजर आते हैं तो कहीं कोयल की मधुर कूक सुनायी देती है। यह हरियाली, सुषमा वृक्षों के कारण अस्तित्व में है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही वृक्षों को अति महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वृक्षों की छाया में बैठकर ही ऋषि-मुनियों ने ज्ञान को अर्जित किया था। प्राणिमात्र के पालन-पोषण के उपयोगी तत्वों के स्रोत वन ही थे। अतः इनके आरोपण और संरक्षण की अति आवश्यकता है।

वृक्षों पर कुठाराघात-आज का मानव पूरी तरह भौतिकवादी बन गया है। लोभ के वशीभूत होकर उद्योगों के नाम पर विशाल पैमाने पर वृक्षों का विनाश कर रहा है। वृक्षों को पूर्ण वयस्क होने में वर्षों लग जाते हैं लेकिन उन्हें कटने में कुछ ही समय लगता है। प्रकृति से दूर होने के कारण आज मनुपुत्र अनेक रोगों का शिकार हो रहा है।

वृक्षों की उपयोगिता-वृक्ष मानव के लिए बहुत ही उपयोगी हैं। वनों से जीवनदायिनी औषधि प्राप्त होती है। भवनों . को बनाने के लिए दियासलाई तथा कागज बनाने में भी वनों की लकड़ी आवश्यक है। इन वृक्षों से फल-फूल, वनस्पति, औषधि, जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं। धरती पर प्राण वायु संचरित होती है। वनों से पहाड़ों का कटाव रुकता है। नदियों को उचित बहाव मिलता है। इमारती लकड़ी, आश्रय आदि सभी मिलते हैं।

वृक्ष विषाक्त गैस कार्बन डाइ-ऑक्साइड का शोषण करके मानव को बीमारियों से बचाते हैं। नदियों के किनारे लगे वृक्ष . भूमि के कटाव को रोकते हैं। वृक्ष लगाना एक तरह से परोपकार की कोटि में आता है। ये हमें प्राण वायु देते हैं।

सरकार का प्रयास-हमारी राष्ट्रीय सरकार ने आज वनों की सुरक्षा तथा वृक्षों को बढ़ाने का संकल्प लिया है। प्रत्येक वर्ष वन महोत्सव सप्ताह सम्पन्न किया जाता है। यदि कोई स्वार्थी व्यक्ति इन वृक्षों को काटता है तो कानून की दृष्टि से वह अपराध का भागी होता है।

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उपसंहार-हम सबको वृक्षों के पल्लवन एवं विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देना चाहिए। वृक्ष लगाने के लिए लोगों के मनमानस में नयी उमंग जगानी चाहिए। वृक्षों के विकास में ही राष्ट्र की प्रगति सन्निहित है।

7. विद्यार्थी जीवन

प्रस्तावना-जीवन में प्रतिपल ही सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है। विद्यार्जन के लिए उम्र का बन्धन बाधा नहीं पहुँचाता है। परन्तु विद्यार्थी जीवन वह काल है जिसमें विद्यार्थी विद्यालय में रहकर विद्यार्जन करता है। इस विद्यार्जन की प्रक्रिया में एक क्रम होता है। जितनी अवधि तक विद्यार्थी विद्यार्जन करता है, उसका वह जीवन विद्यार्थी जीवन कहलाता है।

विद्यार्थी जीवन का महत्त्व-विद्यार्थी जीवन जिन्दगी का स्वर्णिम काल होता है। इसी जीवन में विद्यार्थी अपने भविष्य के जीवन की आधारशिला रखता है। यहीं से सुन्दर और दृढ़ जीवन की पड़ी आधारशिला (नीव) पर उस विद्यार्थी के भविष्य का भवन खड़ा हो पाता है जो बहुत ही आकर्षक होगा।

विद्यार्थी जीवन में ही एक छात्र अपने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक गुणों को विकास की एक दिशा प्रदान करता है। इन गुणों के विकसित होने पर ही वह विद्यार्थी एक ठोस व्यक्तित्व का धनी होता है।

विद्यार्थी के लक्षण-विद्यार्थी का जीवन किसी तपस्वी के जीवन से कम कठोर नहीं होता। माँ सरस्वती की कृपा प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। विद्या कभी भी आराम से, सुख से प्राप्त नहीं हो सकती। जीवन में संयम और नियमों के अनुसार चलना पड़ता है। विद्यार्थी के पाँच लक्षणों को निम्न प्रकार बताया गया है..

“काकचेष्टा, बकोध्यानम्, श्वाननिद्रातथैवच।
गृहत्यागी, अल्पाहारी, विद्यार्थी पंच लक्षणम्॥

उपर्युक्त पद्यांश में बताए गए लक्षणों वाला विद्यार्थी अपने जीवन में सदैव सफल होता है। यह जीवन साधना और सदाचार का है।

आधुनिक विद्यार्थी जीवन-आज हमारे देश की समाज व्यवस्था लड़खड़ा रही है। विद्यार्थी ने अपने जीवन की गरिमा को भुला दिया है। विद्यार्थी के लिए स्कूल मौज-मस्ती का स्थल रह गया है। वह अब विद्यादेवी की आराधना का मन्दिर नहीं . रह गया है। वह तो उसके लिए मनोरंजन तथा समय काटने का स्थल भर रह गया है। विद्यार्थी में उद्दण्डता और असत्यता घर बनाए बैठी है। परिश्रम करने से अब वह पीछे हट रहा है। उसका लक्ष्य प्राप्त करना, केवल धोखा और चालपट्टी रह गया है। वह अनुशासनहीन होकर ही अपना कल्याण करना चाहता है। उसने विनय, सदाचार और संयम को पूर्णतः भुला दिया है। विद्यार्थी ने स्वयं को कलंकित बना लिया है। . अनुशासनहीनता को दूर किया जा सकता हैअनुशासनहीनता को दूर करने के लिए विद्यार्थी को अपने अंग्रेजों के अनुशासित जीवन से सीख प्राप्त करें। विद्यालयों के वातावरण को सही कर देना चाहिए। अध्यापकों को विशेष रूप से विद्यार्थियों की प्रत्येक प्रक्रिया पर सख्त नजर रखनी होगी। उनके प्रति अपने आचरण का भी प्रभाव छोड़ना पड़ेगा।

उपसंहार–आज के विद्यार्थी कल के राष्ट्र के कर्णधार हैं। अतः इन्हें अपने अन्दर ऊँचे वैज्ञानिक के, ऊँचे विचारक के, ऊँचे चिन्तनकर्ता के महान गणों को अपने में विकसित करते हुए अपने अभिलाषित लक्ष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए। ज्ञान पिपासा, श्रम, विनय, संयम, आज्ञाकारिता, सेवा, सहयोग, सह-अस्तित्व के गुणों को अपने अन्दर विकसित कर लेना चाहिए। एक आदर्श नागरिक बन कर विद्यार्थी राष्ट्र की सेवा करते हुए राष्ट्र धर्म का पालन कर सकने में समर्थ होते हैं।

8. अनुशासन का महत्त्व
अथवा
विद्यार्थी और अनुशासन

प्रस्तावना-विद्यार्थी किसी राष्ट्र विशेष का अक्षय कोष होते हैं। जो आज का विद्यार्थी है वह कल देश के भविष्य का कर्णधार बन सकता है। देश की प्रगति उन्ही के कन्धों पर अवलम्बित है। विद्यार्थी जीवन में बालक में अच्छे भाव, विचार, संस्कार एवं मानवीय भावनाएँ पल्लवित एवं विकसित होती हैं। विद्यार्थी जीवन में अर्जित ज्ञान जीवन पथ का सम्बल बनता है।

अनुशासन का महत्त्व-अनुशासन के नियमों का बीजारोपण बाल्यकाल से होना चाहिए क्योंकि विद्यार्थी जीवन में जो संस्कार पड़ जाते हैं, वे स्थायी होते हैं। प्रकृति भी अनुशासन में बँधकर संचालित हो रही है। जिस भाँति रात-दिने तथा ऋतु परिवर्तित होती रहती हैं, उसी प्रकार नियमबद्ध जीवन में भी परिवर्तन का चक्र निरन्तर रहता है। _ अनुशासन की जड़ें-शिक्षा संस्कारयुक्त होनी चाहिए। अनुशासन स्वेच्छा से होना चाहिए, यह हमें संयमी बनाता है। छात्रों के लिए अनुशासन वायु तथा जल की भाँति आवश्यक है। छात्र जीवन जितना सदाचार, अनुशासित तथा सुन्दर होगा उतना ही शेष जीवन भी सुखी तथा सम्पन्न होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

विद्यार्थी से आशाएँ-आज का विद्यार्थी ही कल देश का कर्णधार बनेगा। वही राष्ट्र का भाग्य विधाता बनेगा। आज भारत माता की लौह-श्रृंखलाएँ छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं, अत: छात्रों को जागरूक होकर अनुशासित होकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए।

छात्रों में अनुशासनहीनता तथा उसका निवारण-छात्रों द्वारा निरन्तर तोड़-फोड़, हड़तालें तथा सरकारी सम्पत्ति के विनाश के समाचार हर रोज समाचार-पत्रों में आते रहते हैं। परिवार का वातावरण भी पूर्णतः अनुशासित नहीं है। विद्यालय आज घिनौनी राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं। इस समस्या से निपटने के लिए विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा गोष्ठियों का आयोजन होना चाहिए। छात्रों के समक्ष उनके भविष्य निर्माण के लिए भी एक सुनियोजित योजना का प्रारूप होना चाहिए जिससे वे चिन्तारहित होकर जीवनयापन कर सकें।

अनुशासन की जरूरत-अनुशासन से ‘छात्रों में अपने उत्तरदायित्व को निभाने का गुण स्वयं उभर कर आता है। अपनी उन्नति के लिए अनुशासन और आज्ञापालन नितान्त आवश्यक है। अनुशासन से योग्य नागरिक बनकर देश की अच्छी तरह सेवा कर सकते हैं। अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह भी उचित रूप से करते हैं। ऐसे विद्यार्थी कर्त्तव्यपरायण होकर राष्ट्र रूपी भवन की गहरी नींव डालते हैं। अनुशासनं से स्वर्ग धरती पर उतर सकता है।

उपसंहार-जीवन को सुखमय एवं प्रगतिशील बनाने का – साधन अनुशासनमय जीवन ठहराया गया है। अनुशासित इन्सान ही उत्तरदायित्व का सफल निर्वाह कर सकता है, जो मानव अनुशासन को अपने जीवन का अंग बना लेते हैं, वे स्वयं तो सुखी रहते ही हैं, समाज को भी सुखमय एवं शान्तमय बनाते हैं। उद्देश्य भी उन्हें आसानी से प्राप्त हो जाता है। अतः क्या ही अच्छा हो कि हम अनुशासन का पालन करके राष्ट्र के गौरव में चार चाँद लगा सकें।

9. खेलों का महत्त्व

प्रस्तावना-जीवन में वही मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन कर सकता है, जो स्वस्थ एवं सबल हो। किसी विद्वान ने उचित ही कहा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। शरीर को स्वस्थ एवं निरोग बनाने के लिए सम्यक् खान-पान के साथ ही नियमित रूप से व्यायाम करना भी परमावश्यक है। खेलों के माध्यम से शरीर स्वस्थ रहता है। साथ-साथ भरपूर मनोरंजन भी होता है।

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मन मस्तिष्क एवं खेल-मानव के मन तथा मस्तिष्क से खेल का घनिष्ठ सम्बन्ध है। खिलाड़ी अपनी रुचि के अनुसार खेल का चयन करता है।

आज का जीवन संघर्षमय है। मनुष्य दिनभर रोजी-रोटी की समस्या को हल करने में लगा रहता है। दिनभर की मानसिक थकान को मिटाने के लिए मानव खेल के मैदान में उतरता है। इससे उसे असीम उल्लास एवं ताजगी का अनुभव होता है। – खेलों के प्रकार-प्रमुख रूप से दो प्रकार के खेल खेलने का प्रचलन है। एक वे जो घर के अन्दर खेले जाते हैं। दूसरे प्रकार के खेल मैदानों में खेले जाते हैं। घर के अन्दर खेलने वाले खेल लूडो, टेनिस, शतरंज, कैरम आदि हैं। मैदानों में खेले जाने वाले खेलों के अन्तर्गत हॉकी, क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी तथा बास्केटबॉल इत्यादि हैं।

खेलों का महत्त्व-खेल मनोरंजन का सबसे उत्तम साधन है। इससे मानव की थकान दूर होती है। समय का सदुपयोग होता है। सामाजिक भावना का भी खेल के मैदान में पल्लवन होता है। इससे जीवन में निखार तथा प्रेम का अभ्युदय होता है।

खेल हमें अनुशासन एवं समय का पाठ पढ़ाते हैं। जीवन में संघर्षों से जूझने की शक्ति आती है। साहस, धीरता, गम्भीरता तथा उदारता के भाव भी जाग्रत होते हैं।

उपसंहार-भली प्रकार चिन्तन एवं मनन करने से यह तथ्य उजागर होता है कि खेलों का जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। खेल यथार्थ में शिक्षा एवं जीवन का एक भाग है। खेलों से खेल भावना के साथ ही भाईचारे की भावना का भी विकास होता है। श्रम के प्रति निष्ठा खेलों से उत्पन्न होती है। हार को प्रसन्नतापूर्वक सहन करने की क्षमता का विकास होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमें राजनैतिक दाँव-पेंच में न उलझकर खेलों को प्रोत्साहन देना चाहिए। छात्रों में खेल के मैदान में खेल की भावना विकसित होती है। उसके सहारे प्रगति की मंजिल पर निरन्तर अग्रसर होते जाते हैं।

10. पुस्तकालय के लाभ

प्रस्तावना-मनुष्य के मनमानस में जिज्ञासा की भावना प्रतिपल जाग्रत होती रहती है। उसकी यह आकांक्षा रहती है कि सीमित समय में अधिक-से-अधिक जानकारी हासिल कर सके। लेकिन प्रत्येक मनुष्य की अपनी सीमाएँ होती हैं। प्रायः प्रत्येक मनुष्य में इतनी क्षमता नहीं होती कि मनवांछित पुस्तकें क्रय करके उनका अध्ययन कर सके। पुस्तकालय मानव की इसी इच्छा की पूर्ति करता है।

पुस्तकालय का अर्थ-पुस्तकालय का अर्थ है-‘पुस्तकों का घर’, जिस जगह अनेक प्रकार की पुस्तकों को संग्रह होता है, उसे पुस्तकालय कहा जाता है। पुस्तकालयों में मानव मन में उमड़ती-घुमड़ती शंकाओं का निराकरण करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। – पुस्तकालयों के प्रकार-जिन्हें पुस्तकों से लगाव होता है वे अपने घर में निजी पुस्तकालय बना लेते हैं। विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में भी पुस्तकालय होते हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय भी होते हैं जिनमें अधिक-से-अधिक लोग ज्ञान अर्जन कर सकते हैं। सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाएँ ऐसे पुस्तकालयों का संचालन करती हैं। आज पुस्तकों की माँग के फलस्वरूप चलते-फिरते पुस्तकालय भी अवलोकनीय इसके अतिरिक्त वाचनालयों में दैनिक, साप्ताहिक-मासिक पत्रिकाएँ भी सुगमता से पढ़ने को उपलब्ध हो जाती हैं।

पुस्तकालयों से लाभ-पुस्तकालय ज्ञान-विज्ञान, साहित्य एवं संस्कृति का अक्षय कोष होते हैं। प्राचीन ग्रन्थ भी यहाँ उपलब्ध होते हैं। आविष्कार करने वाले यहाँ हर विषय की जिज्ञासा शान्त करते हैं।

पुस्तकालयों में पाठक विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन करके मनोरंजन के साथ-साथ अपने ज्ञान का विकास भी करता है। पुस्तकालय के अमूल्य ग्रन्थों से हमें धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों की प्रेरणा मिलती है।

विख्यात पुस्तकालय-पुस्तकालय प्रत्येक समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होते हैं। नालन्दा तथा तक्षशिला में भारत के गौरव पुस्तकालय थे। आज भी कोलकाता, दिल्ली, वाराणसी तथा पटना में बहुत से प्रसिद्ध पुस्तकालय हैं।

उपसंहार-पुस्तकालय ज्ञान का ऐसा पवित्र एवं स्वच्छ सरोवर हैं जिसमें स्नान करके मन एवं मस्तिष्क को एक नयी ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम पुस्तकालयों का क्षमता के अनुसार प्रयोग करने का अधिक-से-अधिक प्रयत्न करें। पुस्तकालय के अपने कुछ निर्धारित नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मानव का दायित्व है। आज हमें देश की धरती पर एक ऐसे पुस्तकालय की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला एवं संगीत सभी विषयों की पुस्तकें आसानी से उपलब्ध हो सकें। उन्नत पुस्तकालय देश के भावी कर्णधारों के लिए एक अमूल्य धरोहर है जो उनके जीवन के लिए प्रगति का एक सबल माध्यम है।

11. कम्प्यूटर

प्रस्तावना-विज्ञान ने आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपना जबरदस्त प्रभाव छोड़ा है। उसकी सहायता से मनुष्य ने जीवन में काम आने वाली अनेक उपयोगी वस्तुओं और मशीनों का आविष्कार किया है। इन मशीनों ने मनुष्य की व्यस्तता प्रधान जीवन-शैली को सुखकर बनाया है। सुविधाएँ दे दी गई हैं। कम्प्यूटर की सहायता से मनुष्य ने अपने लिए श्रम, समय और शक्ति की बचत कर डाली है। मानव अपनी बची हुई शक्ति, श्रम . और समय को अन्य किसी काम में लगाकर अपने लिए उपयोगी बना लेता है और उसका सीधा लाभ प्राप्त करता है। .. .

विज्ञान की महत्वपूर्ण देन-‘कम्प्यूटर विज्ञान का अनौखा उपहार है। इसकी सहायता से सही और सरल तरीके से नाप-तौल कर सकते हैं। उसके आँकड़े भी आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। कम्प्यूटर की सहायता से हमें तत्काल ही स्थितियों का ज्ञान हो जाता है। इस मशीन से एक ही बार में अन्य कई काम किये जा सकते हैं।

क्या है कम्प्यूटर ?-कम्प्यूटर यान्त्रिक मस्तिष्कों का समन्वयात्मक एवं गुणात्मक योग है जिससे हमें त्रुटिहीन जानकारी बहुत कम समय में प्राप्त हो जाती है। इससे प्राप्त गणनाएँ शुद्ध, उपयोगी तथा त्वरित हुआ करती हैं।

इसके सारे कार्य संकेतों पर अवलम्बित होते हैं। ये संकेत गणितीय भाषा में होते हैं। बड़े-बड़े रिकॉर्डों को कम्प्यूटर की स्मृति-भण्डार में संचित किया जाता है। इच्छानुसार इन्हें उपयोग के लिए प्राप्त कर सकते हैं।

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कम्प्यूटर के उपयोग-कम्प्यूटर का उपयोग सुरक्षा, उद्योग, व्यापार, उत्पादन, वितरण, परिवहन आदि सभी कामों में किया जाता है। व्यापक रूप से कम्प्यूटर का उपयोग प्रकाशन में किया जा रहा है। साथ ही, इसका उपयोग बैंकिंग में काफी हो रहा है। इसके अलावा मेडिकल के क्षेत्र में कम्प्यूटर का उपयोग हो रहा है।

उपसंहार-कम्प्यूटर से सहायता प्राप्त करने के लिए इसकी सारी जानकारी रखना अनिवार्य है। अनुभव से अपना कार्य क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।

12. गणतन्त्र दिवस
अथवा
राष्ट्रीय पर्व

प्रस्तावना-भारत त्यौहारों का देश है। इसकी धरती पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक त्यौहार सम्पन्न किये जाते हैं। परन्तु ये त्यौहार किसी धर्म सम्प्रदाय अथवा ज़ाति से जुड़े रहते हैं। लेकिन जो पर्व समस्त देश में एक साथ मनाया जाता है उसे राष्ट्रीय पर्व की संज्ञा से विभूषित किया जाता है। इसी श्रृंखला में 26 जनवरी हमारा राष्ट्रीय पर्व है। हर वर्ष 26 जनवरी को विशेष उल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन हमारे देश को पूर्ण गणतन्त्र घोषित किया गया था।

गणतन्त्र दिवस का इतिहास-यद्यपि सन् 1857 में स्वतन्त्रता की चिंगारी भड़की थी, परन्तु पारिवारिक फूट का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने इन आन्दोलनों को कुचल दिया। परन्तु तिलक, गाँधी, सुभाष तथा नेहरू ने देश को आजाद कराने का प्रण लिया। राजनीतिक क्षितिज पर 1947 को भारत को आजादी मिली। 26 जनवरी, सन् 1950 से हमारा संविधान लागू हुआ

और यह दिन हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। अंग्रेजों के गवर्नर जनरल की जगह भारत का शासन राष्ट्रपति के हाथों में आया। इस भाँति 26 जनवरी की महिमा सर्वत्र व्याप्त है।

26 जनवरी के कार्यक्रम-26 जनवरी को सभी जगह ध्वजारोहण किया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। प्रभात फेरियाँ निकाली जाती हैं। दिल्ली में सैनिकों की परेड भी उत्साहवर्द्धक होती है। आकाशवाणी से राष्ट्रपति तथा प्रधानमन्त्री के भाषण प्रसारित होते हैं। रात्रि में भी दिन जैसा प्रकाश होता है।

26 जनवरी का गौरव-यह दिन हमें देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की याद दिलाता है। दिल्ली में आयोजित विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम देश के उत्थान के परिचायक हैं।

स्वतन्त्र भारत के नागरिकों का दायित्व-स्वतन्त्र भारत ने अपनी, आजादी और इसकी अखण्डता की सुरक्षा के लिए अति महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हमारी सीमाओं की सुरक्षा, आन्तरिक शान्ति व्यवस्था में सैनिक बल और अर्द्ध-सैनिक बल अपना उत्तरदायित्व निभाते हुए पूर्ण सहयोग कर रहे हैं। साथ ही सम्पूर्ण जनता उनकी अभिवृद्धि और खुशहाली के लिए सहयोग

के साथ प्रार्थना भी करती है। – यद्यपि देश में आतंकवादी एजेन्सियाँ मिलकर अपना कार्य कर रही हैं, परन्तु हमारे सैनिक व सुरक्षा बल उस आतंकवाद को समूल नष्ट करने के लिए तत्पर हैं, सक्षम हैं।

गणतन्त्र का पर्व हम सभी भारतवासियों का आह्वान करता है कि अभी वास्तविक रूप से गणतन्त्र की स्थापना में कुछ कमी है। वह कमी है सभी को सामाजिक व्यवस्था में समानता के अधिकार की। आर्थिक शैक्षिक विपन्न व्यक्ति भारत गणराज्य की ओर एकटक बेबसी की दृष्टि से देखने को मजबूर है।

उपसंहार-हमारे देश में स्वतन्त्रता देवी का आगमन कठोर साधना एवं बलिदान के फलस्वरूप हुआ है। अत: देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि इसे अक्षुण्ण बनाने में सहयोग दें। तभी इस पावन पर्व को सम्पन्न करना सार्थक होगा।

13. पर्यावरण और प्रदूषण

प्रस्तावना-आज पर्यावरण प्रदूषण विश्व के समक्ष एक विकराल समस्या की तरह उपस्थित है। पर्यावरण प्रदूषण ने मानव के जीवन को नरकतुल्य बना दिया है। आज विश्व में कोई भी देश ऐसा शेष नहीं है जो इस समस्या से ग्रस्त न हो। विश्व के वैज्ञानिक एवं मनीषी लोग इस समस्या के निवारण के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। साधन तलाश कर रहे हैं।

प्रदूषण का आशय-जल, वायु, पृथ्वी के रासायनिक, जैविक, भौतिक गुणों में घटित होने वाला अवांछनीय परिवर्तन प्रदूषण की श्रेणी में आता है। वर्तमान में विश्व नवीन युग में पदार्पण कर रहा है। लेकिन खेद का विषय है कि आज विषाक्त वातावरण उसके जीवन में जहर घोल रहा है।

प्रदूषण के कारण-प्रदूषण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण जनसंख्या वृद्धि है। बढ़े हुए कल-कारखाने भी पर्यावरण प्रदूषण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, पानी का शुद्ध न होना, ध्वनि प्रदूषण में आविष्कृत वाहन ये सभी पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। गन्दगी फैलने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो रहे हैं। पर्यावरण को प्रदूषित करने का महत्त्वपूर्ण कारण है-

  • निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या।
  • वनों और वृक्षों का अनियोजित ढंग से काटा जाना।
  • शहरों के कूड़े-करकट का सुनियोजित निस्तारण न किया जाना।
  • जल निकासी और उसके प्रवाह का अनुचित प्रबन्ध।

पर्यावरण प्रदूषण के निराकरण के उपाय-वृक्षारोपण, ध्वनि नियन्त्रण यन्त्रों का प्रयोग, परमाणु विस्फोटों पर रोक, कल-कारखानों में फिल्टर का प्रयोग, नुकसानदायक, रासायनिक तत्वों को नष्ट करना, नदियों में प्रवाहित गन्दगी पर रोक, इन सभी के द्वारा हम प्रदूषण को पूर्णरूप से तो नष्ट नहीं कर सकते लेकिन उसे कुछ मात्रा में कम तो कर ही सकते हैं। प्रदूषण को रोकने वाले तत्वों में प्रधान तत्व हैं-वृक्षों का आरोपण, उनकी सुरक्षा और देखभाल का उचित प्रबन्ध। प्राचीन वनों को सुरक्षित रखा जाए। नवीन वनों का प्रबन्ध किया जाए। वृक्ष लगाये जाएँ। वृक्षों की सिंचाई व्यवस्था ठीक की जाए।

उपसंहार-पर्यावरण प्रदूषण के निवारण हेतु विश्व के समस्त देश निरन्तर प्रयासरत हैं। आशा है निकट भविष्य में मनु पुत्र को इस समस्या से कुछ हद तक निजात अवश्य प्राप्त होगी। क्योंकि बीमारी का तो इलाज है लेकिन प्रदूषण द्वारा उत्पन्न रोग असाध्य है।

14. परोपकार

प्रस्तावना-संसार के अनेक जीवों में मनुष्य समझदार और बुद्धिमान प्राणी है। वह स्वयं अकेला और अपने तक ही सीमित रहकर जीवित नहीं रह सकता। मनुष्य अपनी सामाजिकता के गुण के कारण परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सभी प्राणियों से जुड़ा हुआ है। यही जुड़ाव उसे दूसरों की भलाई करने के लिए प्रेरित करता है।

परोपकार का अर्थ-‘परोपकार’ शब्द ‘पर + उपकार’ के मेल से बना है। ‘पर’ का तात्पर्य दूसरों का होता है तथा उपकार’ का अर्थ भलाई से होता है। अर्थात् दूसरों की भलाई करना ही परोपकार है। हम अपने सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में इसी परोपकार की भावना से सक्रियता और प्रेरणा प्राप्त करते हैं। परोपकार में दया, करुणा, सहयोग आदि भाव आते हैं। ये सात्विक भाव होते हैं।

परोपकार की आवश्यकता-इस विश्व में तरह-तरह के जीवों को तरह-तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं, उन्हें कष्टदायी रोग पीड़ा पहुँचाते हैं। अतः हमें उनके प्रति दयालुता और करुणा प्रदर्शित करते हुए परोपकार करना चाहिए।

यह प्रकृति भी परोपकारी शिक्षा देती है। नदी पानी बहाकर लाती है, उस पानी का उपयोग, प्राणियों के लिए पीने के काम आता है। फसलों की सिंचाई के काम आता है। पेड़ हमें फल देते हैं। उनके फूल व पत्तियाँ भी हमें शुद्ध वायु, पर्यावरण की शुद्धता देकर लाभ प्राप्त कराती है। वर्षाऊ बादल झुककर नीचे आ जाते हैं और समय पर वर्षा कर देते हैं। इस तरह प्रकृति के विभिन्न उपादान-चन्द्रमा (शीतल चाँदनी देता है), सूरज (प्रकाश देता है) आदि प्रत्येक पहलू हमारे लिए लाभ देता है, साथ ही हमें परोपकार की शिक्षा भी देता है।

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उपसंहार-‘परोपकार’ करना महाविभूतियों की विशेषता है। वे सदैव परोपकार का कार्य स्वयं ही खुश हुआ करते हैं।

15. समाचार-पत्र का महत्त्व

प्रस्तावना-आज समाचार-पत्र जनजीवन का अभिन्न अंग बन गया है। प्रात:काल उठते ही हर व्यक्ति चाय ग्रहण करने के साथ ही अखबार को पढ़कर अपना मनोरंजन कर लेता है। परिवार के सभी सदस्य अखबार पढ़ने एवं समाचार जानने के लिए लालायित हो उठते हैं। समाचार देश-विदेश की खबरों को जानने का सर्वसुलभ साधन है।

इतिहास-समाचार-पत्र का प्रचलन इटली के वेनिस नगर में तेरहवीं शताब्दी में हुआ। जैसे-जैसे मुद्रण कला का विकास हुआ, समाचार-पत्रों का भी उसी गति से प्रचार एवं प्रसार हुआ।

विभिन्न व्यक्तियों को लाभ-बेरोजगार युवक रोजगार के विषय में, खिलाड़ी खेल के विषय में, नेता राजनीतिक हलचल के विषय में, व्यापारी वस्तु के भावों के विषय में सूचना समाचार-पत्रों के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं।

समाचार-पत्रों का महत्त्व-आज विश्व की परिस्थिति निरन्तर जटिल होती चली जा रही है। जीवन संघर्षमय हो गया है, राजनीतिक गतिविधियाँ निरन्तर अपना रंग दिखा रही हैं, ऐसे में समाचार-पत्रों के माध्यम से इनके विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इनके अभाव में ज्ञान का क्षेत्र अधूरा प्रतीत होता सम्पादक का दायित्व-सम्पादकीय टिप्पणी पढ़कर ही किसी समाचार-पत्र का स्तर निर्धारित होता है। इसमें राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को उजागर किया जाता है।

अखबार प्रकाशन के आज के साधन-आज हैण्ड कम्पोजिंग के स्थान पर कम्प्यूटर काम में लाया जाता है। इससे समाचार-पत्रों का प्रकाशन सुलभ एवं सस्ता हो गया है। ज्ञान के प्रचारक एवं प्रमुख वाहक-समाचार-पत्र पाठकों के ज्ञान का विस्तार करता है। देश के कर्णधारों के आदर्शों से प्रभावित होकर जन-सामान्य उनका अनुगमन करके अपने जीवन को सफल बनाते हैं।

स्वतन्त्रता से पूर्व समाचार-पत्रों का दायित्व-सम्पादकों ने अंग्रेजों के शोषण तथा अत्याचार को देश के समक्ष अखबारों के माध्यम से निडरता से उजागर किया। ऐसा करने से उन्हें कठिनाईयों का सामना करना पड़ा लेकिन वे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए।

युद्ध एवं विपत्ति में समाचार-पत्रों का दायित्व-प्राकृतिक प्रकोपों की सूचना जन-सामान्य तक समाचार-पत्रों के माध्यम से पहुँचती है। इसको पढ़कर समाज सेवी संस्थाएँ उन स्थानों तक यथासम्भव सहायता पहुँचाती हैं।

हानियाँ-कल्पित तथा झूठे समाचार-पत्र जन-सामान्य को भुलावे में डाल देते हैं। यदा-कदा इनके फलस्वरूप साम्प्रदायिक दंगों का जन्म होता है। जनता का सम्बन्ध-समाचार-पत्रों के माध्यम से सरकार जनता की भावनाओं से अवगत होती है।

उपसंहार-समाचार-पत्र राष्ट्र विशेष की अमूल्य सम्पत्ति होते हैं, इनकी तनिक-सी लापरवाही से राष्ट्र की विशेष हानि हो सकती है। अतः समाचार-पत्रों को अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिपल सजग रहना चाहिए। ये राष्ट्र विशेष के जीवन्त प्रहरी हैं। इनके प्रभाव से राष्ट्र अवनति के गर्त में जा सकता है। अतः इनका प्रतिपल जागरूक रहना अत्यावश्यक है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय (सुभद्रा कुमारी चौहान)

बालिका का परिचय अभ्यास-प्रश्न

बालिका का परिचय लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इस कविता में जीवन-ज्योति का क्या आशय है? स्पष्ट करें।
उत्तर
इस कविता में जीवन-ज्योति का आशय है-जीवन का आधार । बिटिया के प्रति माँ का वात्सल्य प्रेम अनन्य होता है। वह उसके लिए अतुल्य होता है।

प्रश्न 2.
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है’ यह भाव किस पंक्ति में है? चुनकर लिखिये।
उत्तर
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है। यह भाव निम्नलिखित पंक्ति में हैं-‘दीपशिखा है अंधकार की।’

बालिका का परिचय सही उत्तर चुनिये

प्रश्न 1.
बेटी का परिचय कौन सबसे अच्छा दे सकता है?
(क) पिता
(ख) माता
(ग) दादा
उत्तर
(ख) माता।

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प्रश्न 2.
इस कविता में कौन-सा भाव है?
(क) श्रृंगार
(ख) वीरता
(ग) वात्सल्य
उत्तर
(ग) वात्सल्य।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालिका परिचय कविता का सारांश लिखिये।
उत्तर
देखें-‘कविता का सारांश’।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा क्यों कहा है स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा कहा है। यह इसलिए कि किसी भी माँ की गोद में उसकी बालिका का मचलना एक न केवल अपूर्व आनन्द देता है, अपितु मन को मोह भी लेता है। इससे माँ का हृदय बाग-बाग हो उठता है। उस समय की शोभा देखते ही बनती है।

प्रश्न 3.
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का क्या आशय है?
उत्तर
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का आशय है-बाल-सुलभ क्रियाएँ मन को भाने वाली और गुदगुदाने वाली होती है। अतएव उसे देखकर सभी आनन्द से झूम उठते हैं।

प्रश्न 4.
निम्न पंक्तियों का भावार्थ लिखो।
(क) मेरा मन्दिर …………………….. मेरी।
उत्तर
उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि किसी माँ के लिए उसकी बालिका सब कुछ होती है। माँ अपनी बालिका को किसी मन्दिर, मस्जिद, काबा, काशी, पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप से कम नहीं समझती है। इस प्रकार वह अपने हृदय में बसाए रहती है।

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(ख) प्रभु ईशा ………………………….. पास ॥
उत्तर
(ख) उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि बालिका में महान आत्माओं के गुण होते हैं। उसमें ईसामसीह की क्षमाशीलता, नबी-मुहम्मद का विश्वास और महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीव-दया के भाव भरे होते हैं।

प्रश्न 5.
वही जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥
इन पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
इन पंक्तियों का भाव यह है कि बालिका के महान और उच्च गुणों का वर्णन करना सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कि बालिका की महानता और श्रेष्ठता को कह-सुनकर नहीं, अपितु अनुभव करके ही जाना-समझा जा सकता है।

प्रश्न 6.
बेटी की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर
बेटी की तुलना राम, कृष्ण, ईसामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से की गई है।

बालिका का परिचय भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

क. कविता में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है। जैसे जीवन-ज्योति नष्ट नयनों की पंक्ति में ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति हुई है। कविता में से अनुप्रास अलंकार छाँटकर लिखिए।
ख. निम्नलिखित उदाहरण में ‘पतझड़ के साथ हरियाली का प्रयोग कर काव्य में विरोधाभास के सौन्दर्य को प्रस्तुत किया गया है। कविता में से इस प्रकार की अन्य पंक्तियाँ छाँटिए।
उदाहरण-
है पतझड़ की हरियाली
पतझड़ की हरियाली है।
उत्तर-(क) ‘सुख-सुहाग, शाही शान, मनोकामना मतवाली, घनी घटा. मस्ती मगन. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद, काबा-काशी, पूजा-पाठ, जप-तप, अपने आँगन और मात्र मोदे।

1. शाहीशान भिखारिन की है।
भिखारिन की शाही शान है।

2. दीपशिखा है अंधकार की।
अंधकार की दीपशिखा है

3. सुधा-धार यह नीरस दिल की।
नीरस दिल की यह सुधा-धार।

बालिका का परिचय योग्यता-विस्तार

प्रश्न
1. भारतीय संस्कृति में ‘कन्या’ के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए दो अनुच्छेद लिखिए।
2. धर्म अनेक परन्तु सन्देश एक है। हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई, धर्मों के मूल आदर्श जानिए, उनकी और शिक्षाओं और मूल्यों के चार्ट तैयार कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

बालिका का परिचय परीक्षोपयोग अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का आशय है-बालिका का अद्भुत प्रभाव। किसी माँ के लिए उसकी बालिका अमृत की धारा के समान होती है। अर्थात् बालिका अपनी माँ के सूनेपन को दूर कर उसमें चंचलता और सजीवता ला देती है।

प्रश्न 2.
इस कविता में किसके परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है?
उत्तर
इस कविता में माँ और बेटी के परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है।

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प्रश्न 3.
इस कविता में कवयित्री की कौन-सी भावना प्रकट हुई है?
उत्तर
इस कविता में कवयित्री की ‘बेटी माँ के भविष्य की निर्मात्री है’ यह भावना प्रकट हुई है।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इस कविता में रूपक अलंकार की छटा है। आप उन्हें छाँटकर लिखिए।
उत्तर
सुख-सुहाग की लाली, सुधा-धार और जीवन-ज्योति।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका के लिए कौन-कौन से उदाहरण प्रस्तुत किए हैं?
उत्तर
कवयित्री ने बालिका के लिए.अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, आँखों की ज्योति. ईशामसीह की क्षमा, नबी मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध की दया को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

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प्रश्न 3.
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत कविता ‘बालिका का परिचय’ कवयित्री श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की भाववर्द्धक कविता है। सुभद्राकुमारी चौहान ने इसमें वात्सल्य रस को उड़ेल दिया है। इसे लक्ष्य कर लिखी गई यह रचना ‘बालिका का परिचय’ आज भी मील का पत्थर कही जा सकती है। प्रस्तुत कविता में कवयित्री का मानो उनका मातृ हदय ही साकार हो उठा है। वे नन्हीं बालिका को अधिक प्रभावशाली रूप में अनुभव करती हैं। इसके लिए वे बालिका को अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, नयनों की ज्योति, ईशा की क्षमा, मुहम्मद का विश्वास तथा गौतम की दया जैसे अनेक यशस्वी प्रतीकों के रूप में देखती हैं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि उन्होंने माँ और शिशु के बीच के रागात्मक सम्बन्ध का नैसर्गिक चित्रण किया है। “बेटियाँ भविष्य की निर्माता हैं।” कवयित्री की यही भावना उनकी इस कविता में दिखाई देती है।

बालिका का परिचय कवयित्री-परिचय

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान वीर रस की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री हैं। जीवन परिचय-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयाग के निहालपुर महसे में श्री रामनाथ सिक नामक एक सुशिक्षित परिवार में हुआ था। आपके पिता सम्पन्न, ईश्वरभक्त, उदार, विद्यानुरागी एवं राष्ट्रीय-विचारधारा वाले व्यक्ति थे। आपकी प्रतिभा बचपन से ही विलक्षण थी। इससे प्रभावित होकर आपकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था हुई थी। आप प्रयाग के क्राइस्ट कालेज में अध्ययन करते समय काव्य-रचना किया करती थीं। उस समय भी आपकी कविताएँ राष्ट्रीय-भावों से ओत-प्रेत हुआ करती थीं। उसमें तत्कालीन राष्ट्रीय-आन्दोलनों की झलक, स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीयता की बलवती भावना मुखरित होती थी। ये ही भावनाएँ आपकी आगामी कविता की प्रेरणा-शक्ति बनकर आयीं। ‘कर्मवीर’ पत्र में प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से आपकी ख्याति अमर हो गई। आपका विवाह सन् 1919 में खण्डवा निवासी ठाकुर लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ। पति की स्वीकृति लेकर आपने अपने अध्ययन का क्रम नहीं छोड़ा। बनारस के थियोसोफिकल स्कूल में प्रवेश लेकर अध्ययन जारी रखा। महात्मा गाँधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आन्दोलन में आपने जमकर भाग लिया। फलतः आपको कई बार जेल जीवन बिताना पड़ा। इस स्थिति में भी आपने अपनी पारिवारिक व्यवस्था को अव्यवस्थित नहीं होने दिया। सन् 1934 ई. में आप विधान-परिषद् की सदस्या बनीं। सन् 1948 ई. में एक मोटर दुर्घटना में आपकी असामयिक मृत्यु हो गई।

कृतियाँ-आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. काव्य-संग्रह-

  • ‘मुकुल’
  • ‘नक्षत्र’
  • त्रिधारा’

2. कहानी-संग्रह

  • ‘सीधे-साधे चित्र’
  • ‘बिखरे मोती’
  • ‘उन्मादिनी’।

3. बाल-साहित्य-‘सभा के खेल’। भाषा-शैली-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान की भाषा सरल और प्रवाहमयी है। वह रोचक और हृदयस्पर्शी है। उसमें ओज और वेग है। वीर रस, करुण रस, वात्सल्य, शान्त रस आदि आपके प्रिय रस हैं। उपमा, अनुप्रास, मानवीकरण, उत्प्रेक्षा आदि आपके रुचिप्रद अलंकार हैं। बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग आपने यथावत् किए हैं। श्रीमती सुभ्रदा कुमारी चौहान की शैली चित्रात्मक, काव्यात्मक और भावात्मक गरसमें प्रवाहमयता और बोधगम्यता नामक शैलीगत विशेषताएँ अधिक रूप में दिखाई देती हैं। मूल रूप से आपकी शैली उपदेशात्मक और प्रेरणादायक है। वह सहज होकर भी कठिन दिखाई देती है।

साहित्यिक महत्त्व-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का साहित्यिक महत्त्व वीर रस काव्य-क्षेत्र में सर्वोच्च है। आपने राजनीति और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में अपनी बहुत बड़ी पहचान बनाई है। यही नहीं आपने ग़द्य-पद्य दोनों ही साहित्यिक विधाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है। एक ओर जहाँ ‘झाँसी की रानी’ कविता हर युवक की जबान पर है, वहीं दूसरी ओर बचपन सम्बन्धी कविताएँ प्रत्येक को मधुर बचपन की याद दिलाती हैं। यही नहीं आप एक सफल कहानी लेखिका भी हैं। आपकी कहानियों में नारी-जीवन, शोषित-समाज और पारिवारिक-जीवन का मार्मिक चित्रण है। आपका साहित्यिक-महत्त्व रखने के लिए आपके काव्य-संग्रह ‘मुकुल’ पर सन् 1931 ई. में आपको सेक्सरिया पुरस्कार मिला था।

बालिका का परिचय कविता का सारांश

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ माता के हृदय के भावों को प्रकट करने वाली एक ज्ञानवर्द्धक कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवयित्री अपनी बेटी के प्रति अपने वात्सल्य भावों को उडेलती हई कह रही है कि वह उनकी गोदी की शोभा और सुख-सुहाग की लालिमा है। वह अंधकार की दीपशिखा, घनी घटाओं की चमक, उषा काल में कमल-भंगों (भौरी) की तरह सुखदायक है,तो पतझड़ की हरियाली है। नीरस और उदास हदय में अमत की धारा बहाने वाली है तो मस्त मगन तपस्वी के समान है। ज्योति खोई आँखों की जीवन-ज्योति और मनस्वी की सच्ची लगन है। बीते हुए बचपन की क्रीड़ामयी वाटिका है। यह तो मेरे लिए मन्दिर-मस्जिद, काबा-काशी के समान है। यह तो मेरी पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप है। उसने अपने आँगन में बालक कृष्ण की क्रीड़ाओं को देखा है। माता कौशल्या की प्रसन्नता को अपने मन के भीतर देखा। आओ सभी ईशामसीह की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद के विश्वास, और गौतम बुद्ध का जीवों के प्रति दया की भावना को बालिका के पास आकर देख लें। अगर कोई उससे परिचय पूछ रहा है, तो वह उसका किस प्रकार परिचय दे सकती है। उसे तो वही अच्छी तरह से जान सकता है, जिसमें माता का दिल है।

बालिका का परिचय संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. यह मेरी गोदी की शोभा,
सुख सुहाग की है लाली।
शाही शान भिखारिन की है,
मनोकामना मतवाली ॥1॥

दीपशिखा है अंधकार की,
घनी घटा की उजियाली।
उषा है यह कमल-भंग की,
है पतझड़ की हरियाली ॥2॥

शब्दार्थ-सुहाग-सौभाग्य। शाही-सम्पन्नता, वैभव। शान-स्वाभिमान। दीप शिखा-दीपक की लौ। भृग-मौंरा।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी सामान्य’ में संकलित तथा श्रीमती सुभद्रा कुमारी विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ से है। इसमें कवयित्री ने अपनी बेटी को अपनी गोद की शोभा और सुख-सौभाग्य की लालिमा मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-यह मेरी बिटिया मेरी गोद की शोभा और मेरे सुख-सौभाग्य की लालिमा है। यह मेरे लिए भिखारिन की शाही शान और मेरी स्वच्छन्द मनोकामना को पूरी करने के लिए मानो मतवाली बनी रहती है। यह मेरे दुख-अभाव रूपी अंधकार की दीपशिखा और कठिनाइयों की उमड़ती घटाओं के बीच उत्पन्न आशा रूपी उजियाली है। यही नहीं, यह तो मेरे लिए वैसे ही सुखकर और आनन्द है, जैसे उषा के होने पर कमलों-भौरों को आनन्द और सुख मिलता है। इसी प्रकार यह मेरे जीवन में आए पतझड़ के लिए हरियाली स्वरूप है। कहने का भाव यह कि मेरी बिटिया मेरे जीवन के लिए हर प्रकार से सुखद और आनन्ददायक है।

विशेष-

  1. कवयित्री का वात्सल्य भाव सच्चे रूप में है।
  2. वात्सल्य रस का संचार है।
  3. भाषा सरल और सुबोध है।
  4. रूपक अलंकार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-विधान वात्सल्य रस से लबालब है। उसे रूपक अलंकार से आकर्षक बनाकर सरल और सुबोध शब्दावली से रोचक बनाने का प्रयास सचमुच में सराहनीय है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना में सरलता और स्वाभाविकता है, तो रोचकता और प्रवाहमयता भी है। इस तरह यह पद्यांश भाववर्द्धक रूप में है। यह कहा जा सकता है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने क्या किया है?
(ii) बालिका का चरित्र कैसा है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने बालिका का परिचय दिया है।
(ii) बालिका का चरित्र अत्यधिक विशुद्ध और स्वाभाविक है।

2. सुपा-धार यह नीरस दिल की मस्ती मगन तपस्वी की।
जीवन ज्योति नष्ट नयनों की सच्ची लगन मनस्वी की॥3॥

बीते हुए बालपन की यह क्रीड़ा पूर्ण वाटिका है।
वही मचलना, वही किलकना हँसती हुई नाटिका है।।4।।

शब्दार्च
सुधा-धार-अमृत की धार। नयनों-आँखों। मनस्वी-बुद्धिमान। बालपन-बचपन। नाटिका-नाटक करने वाली।

प्रसंग-पूर्ववत । इसमें कवयित्री ने अपनी बिटिया को नीरस दिल में अमृत धारा प्रवाहित करने वाली मानते हुए कहा है।

व्याख्या-मेरी बिटिया मेरे नीरस हृदय के लिए अमृत की धारा है। इसकी मस्ती और प्रसन्नता किसी तपस्वी से कम नहीं है। आँखों की गयी हुई रोशनी को वापस लाने वाली यह जीवन की ज्योति के समान है। इसमें बुद्धिमानों की तरह सच्ची लगन है। यह मेरे बीते हुए बचपन को लौटाने वाली क्रीड़ामयी वाटिका की तरह है। इसका मचलना और किलकना किसी हँसती हुई नाटिका से किसी प्रकार कम नहीं है।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली सरल और सुबोध है।
  2. शैली चित्रात्मक है।
  3. रूपक अलंकार है।
  4. वात्सल्य रस का संचार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न(i) प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-स्वरूप सरल और सुबोध शब्दावली से होकर वात्सल्य रस में प्रवाहित हुआ है। इसमें चमत्कार लाने के लिए किया गया रूपक अलंकार का प्रयोग मन को और लुभा रहा है।
(ii) प्रस्तुत पयांश की भाव-योजना हृदय को बड़ी आसानी से छू रही है। बालिका के प्रति वात्सल्य भावना की सच्चाई की रोचकता निश्चर्य ही आकर्षक है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) बालिका को किन-किन रूपों में प्रस्तुत किया गया है?
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से क्या अनुभूति होती है?
उत्तर
(i) बालिका को अमृत की धारा, मस्त मगन तपस्वी, जीवन-ज्योति, मनस्वी की सच्ची लगन, क्रीड़ामयी वाटिका और हँसती हुई नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से बीते हुए बचपन की अनुभूति होती है।

3. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद
काबा-काशी यह मेरी।
पूजा-पाठ, ध्यान-जप-तप है
घट-घट वासी यह मेरी ॥5॥

कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को
अपने आँगन में देखो।
कौशल्या के मात्र-मोदे को।
अपने ही मन में लेखो ॥6॥

शब्दार्थ-काबा-मुसलमानों का धार्मिक स्थान । घट-घट बासी-अन्दर निवास करने वाला परमात्मा। कृष्णचन्द्र-बालक श्रीकृष्ण। लेखो-देखो।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवयित्री ने बालिका को धर्मस्वरूप मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-मेरे लिए यह मेरी बेटी मन्दिर-मस्जिद, काबा, काशी के समान अत्यन्त पवित्र है। यह मेरे लिए पूजा-पाठ और ध्यान, जप-तप के समान है। यह मेरे घट-घट में निवास करती है। इस प्रकार मैंने अपनी बालिका को अपने आँगन में अनेक प्रकार के खेल-खेलते हुए देखा, तो मुझे ऐसा लगा मानो बालक श्रीकृष्ण ही मेरे ऑगन में बाल-क्रीड़ा कर रहे हैं। इसे आप लोग भी अपनी-अपनी बालिकाओं में देख सकते हैं। इस प्रकार माता कौशल्या के आनन्द को अपने मन में अनुभव कर सकते हैं।

विशेष-

  1.  भाषा में सजीवता है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. वात्सल्य रस का प्रवाह है।
  4. सामाजिक शब्दावली है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश वात्सल्य रस की सहज धारा से प्रवाहित है, जो सरल शब्दावली से पुष्ट हुआ है। अनुप्रास अलंकार (कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं की, अपने आँगन, मात्र मोदे और मन में) के आकर्षक प्रयोग से यह पद्यांश प्रभावशाली बन गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरल, स्वाभाविक और भाववर्द्धक है। यह पूरी तरह से बोधगम्य और हृदय को छू लेने वाला है। बालक के चरित्र की पवित्रता का उल्लेख सचमुच में बड़ा ही अनूठा है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर प्रश्न-10 बालिका की पवित्रता कैसी है?

(i) बालिका की बाल-लीला कैसी होती है? उत्तर-0 बालिका की पवित्रता मन्दिर, मस्जिद, काबा और काशी जैसी है।
(ii) बालिका की बाललीला बालक राम-कृष्ण जैसी होती है।

4. प्रभु ईशा की क्षमाशीलता
नवी मुहम्मद का विश्वास।
जीव दया जिनवर गौतम की
आओ देखो इसके पास ॥7॥

परिचय पूछ रहे हो मुझसे
कैसे परिचय हूँ इसका।
वहीं जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥8॥

शब्दार्थ-ईशा-ईशामसीह। नबी-इस्लाम धर्म के महापुरुष। जिनवर-तीर्थकर/ महावीर स्वीमी।

प्रसंग-पूर्ववत्। उसमें कवयित्री ने बालिका को संसार के महापुरुष के समान बतलाने का प्रयास किया है। इसके लिए कवयित्री का कहना है कि

व्याख्या-चूँकि बालिका का तन-मन स्वच्छंद और पवित्र भावों से भरा होता है।

इसलिए उसमें ईशामसीह की क्षमाशीलता और नबी-मुहम्मद के अटूट विश्वास को समझा जा सकता है। यही नहीं, उसमें महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति अपार दया की भावना जैसे अद्भुत और अनोखे उच्च गुणों को देखा-परखा जा सकता है। कवयित्री का पुनः कहना है कि अगर कोई उससे बालिका का परिचय पूछे तो वह क्या दे सकती है। उसका तो यही कहना है कि बालिका को एक माता का दिल ही सचमुच में जान सकता है।

विशेष-

  1. बालिका के उदार और विशाल हृदय को अत्यधिक श्रेष्ठ कहा गया है।
  2. ईशामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से बालिका की तुलना की गई है। इसलिए इसमें उपमा अलंकार है।
  3. उदाहरण शैली है।
  4. सम्पूर्ण कथन अत्यधिक रोचक है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश को उपमा अलंकार की झड़ी लगाकर अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास सचमुच में प्रशंसनीय है। इसे और रोचक बनाने के लिए भाषा को धारदार बनाकर कथन की सच्चाई का सामने लाया गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान स्वाभाविक, यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय और हदयस्पर्शी है। बालिका की अद्भुत विशेषता को महानतम रूप में लाने का कवयित्री का प्रयास न केवल अनूठा है, अपितु प्रेरक भी है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बालिका के असाधारण गुण कौन-कौन से हैं?
(ii) बालिका की सच्चाई को कौन बता सकता है?
उत्तर
(i) बालिका के असाधारण गुण हैं-ईशामसीह की क्षमाशीलता, नवी-मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति दया-भावना।
(ii) बालिका की सच्चाई माता ही बता सकती है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 धनुष की प्रत्यंचा

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 धनुष की प्रत्यंचा (डॉ. देवेन्द्र दीपक)

धनुष की प्रत्यंचा अभ्यास-प्रश्न

धनुष की प्रत्यंचा लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तूफानों से खेलने का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
तूफानों से खेलने का आशय है-निडर होकर बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए जीवन-पथ पर आगे बढ़ते जाना।

प्रश्न 2.
कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी के लिए किस प्रकार सेतु बन सकता है?
उत्तर
कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी के लिए उसके हौसला को बढ़ाकर सेतु बन सकता है।

प्रश्न 3.
प्रत्यंचा को शक्ति के साथ खींचने से कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रत्यंचा को शक्ति के साथ खींचने से कवि का आशय है-वह जितनी अधिक शक्ति से खींची जाएगी, वह उतनी ही तेजी से और शक्ति से लक्ष्य को भेदने तक तीर को फेंकती है। दूसरे शब्दों में, पूरी शक्ति और युक्ति से ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

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प्रश्न 4.
शिष्य की प्रसन्नता और दुख का गुरु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
शिष्य की प्रसन्नता और दुख का गुरु पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। शिष्य को प्रसन्न देखकर गुरु प्रसन्न होता है और शिष्य को दुखी देखकर गुरु दुखी हो जाता है।

प्रश्न 5.
गुरु ने शिष्य को अंशज और बंशज क्यों कहा है?
उत्तर
गुरु ने शिष्य को अंशज और वंशज कहा है। यह इसलिए कि उसकी विशेषताएँ उसमें मिलती-जुलती हैं।

प्रश्न 6.
कवि का मन खुशी से कब झूमने लगता है?
उत्तर
कविका मन तब खुशी से झूमने लगता है, जब शिष्य अपने गुरु के पास अपने मौलिक भावों से स्वाभिमानपूर्वक जीवन-अर्थ का नयापन लेकर आता है।

धनुष की प्रत्यंचा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘शूल के बीच ही फूल खिलता है’ इसका आशय प्रस्तुत कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शूल के बीच ही फूल खिलता है।’ इस तथ्य की सत्यता यह है कि गुरु की डाँट-फटकार और कड़े अनुशासन में रहने वाला शिष्य बहुत योग्य और महान बनता है। उसमें ऐसे-एसे गुणों की पैठ हो जाती है कि वह अपने जीवन में आने वाली बाधाओं को झुकाकर आगे बढ़ जाता है। इससे सफलता उसे चूम लेती है।

प्रश्न 2.
‘मीन को बेंधने’ में कौन-सी पौराणिक अन्तर्कया निहित है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
मीन को बेंधने में महाभारत की पौराणिक अन्तर्कथा निहित है। इसमें वह कथा निहित है, जो द्रोपदी स्वयंवर की है। उस स्वयंवर में अर्जुन नीचे रखे हुए जल में देखकर ऊपर रखी हुई और नाचती हुई मछली की आँख में तीर से निशाना लगाया था। शर्त के अनुसार द्रोपदी के साथ उनका विवाह हुआ था।

प्रश्न 3.
“में नींव बन नीचे रहूँगा।” इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मैं नींव बन नीचे रहूँगा’। इस पंक्ति का गहरा और बड़ा अर्थ। इसमें गुरु का अपने शिष्य के प्रति आत्मीय त्याग के भाव भरे हुए हैं। गुरु सदा ही अपने शिष्य के सख और उसके विकास के लिए अपना योगदान देने से पीछे नहीं हटता है। उसका तो एकमात्र यही उद्देश्य होता है कि उसका शिष्य महान बने। वह अपने शिष्य की उन्नति और उसकी अच्छाई के लिए यह सब कुछ करने-सहने के लिए तैयार रहता है। यहाँ उसके जीवन-भवन की नींव बनने के लिए सहर्ष तैयार रहता है।

प्रश्न 4.
कवि शिष्य को कहाँ उतरने की सलाह देता है? इस कविता के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कवि शिष्य को जीवन-संग्राम में उतरने की सलाह देता है। वह उसे अपने गुरु से आशीर्वाद लेकर आँधी-तूफान आदि से टकराने-खेलने की सलाह देता है। वह उसे सभी प्रकार की बाधाओं को अपनी छाती पर झेलने की भी सलाह-उत्साह देता है।

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प्रश्न 5.
‘अज्ञान की मीन को तुम बेंध डालो’
सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।’
इन पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ आज के हताश और भटके हुए विद्यार्थियों को प्रेरित करने के संदर्भ में हैं। द्रोपदी स्वयंवर के प्रसंग के द्वारा इन विद्यार्थियों को अपनी हताशा को त्याग कर सफलता प्राप्त करने की सीख दी गई है। इससे सफलता निश्चय ही कदम चूम लेगी। इसकी संभावना ही निश्चयात्मकता भी है। लेकिन यह तभी संभव है जब आज का यह हताश-निराश विद्यार्थी वर्ग अर्जुन की तरह पुरुषार्थी और कर्मठ हो।

प्रश्न 6.
में साधना हूँ…केतु बन जाना।’ इन पंक्तियों का भावार्य संदर्भ-प्रसंग सहित लिखिए।
उत्तर
तुम सदैव अपने प्रगति-पथ पर बढ़ते चलो, मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहूँगा। इसके लिए मैं साधना बनकर तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम सफलता बनकर आगे बढ़ते जाना। इसी प्रकार मैं तुम्हारे आँख बनकर रहूँगा, तो तुम ज्योति रूप में बढ़ते चले जाना। इसी प्रकार में तुम्हारे विजय के स्तंभ के रूप में मौजूद रहँगा, तो तुम विजय की पताका बनकर फहराते चलते चले जाना। तुम्हें आज इन बातों को बड़ी गंभीरतापूर्वक अमल करना नहीं भूलना है यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारा मानस पिता हूँ। इसे समझकर तुम आज मेरी इन बातों को हृदय से स्वीकार करके मेरी महिमा को बनाए रखना। तुमसे मेरी यही उम्मीद भी है कि तुम मेरा महत्त्व घटाओगे नहीं अपितु बढ़ाते ही जाओगे।

प्रश्न 7.
आज का विद्यार्थी उदास और अनिश्चय की स्थिति में क्यों है? प्रस्तुत कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आज का विद्यार्थी उदास और अनिश्चय की स्थिति में है। यह इसलिए कि वह अज्ञानमय कुआँ में डूब रहा है। उसे बाहर निकालने वाला कोई योग्य अध्यापक नहीं दिखाई दे रहा है। यह निराधार होकर इधर-उधर भटक रहा है। अगर उसे आत्मीय और सहदय प्राप्त हो जाए तो उसकी उदासी और निराशा देखते-देखते दूर हो जाएगी। फिर वह सफलता के शिखर पर चढ़ता ही जाएगा।

प्रश्न 8.
‘शिष्य के लिए गुरु की महिमा’ विषय पर अपना बिचार लिखिए।
उत्तर
‘शिष्य के लिए गुरु की महिमा’ निस्संदेह है। गुरु के बिना शिष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। गुरु के बिना शिष्य अज्ञानमय अंधकार में डूबा रहता है। वह
उसकी ज्ञानमयी किरणों के बिना बाहर निकल पाने में असमर्थ रहता है। जैसे गुरु की ज्ञानमयी किरणें शिष्य पर पड़ने लगती हैं; वैसे ही शिष्य का अज्ञानान्धकार दूर हो जाता है। फिर वह हर प्रकार से सक्षम और योग्य बनकर जीवन के विकास पथ पर बढ़ने लगता है।

प्रश्न 9.
छात्र की योग्यता के विकास की यात्रा में शिक्षक की क्या भूमिका होती है?
उत्तर
छात्र की योग्यता के विकास की यात्रा में शिक्षक की भूमिका बहुत बड़ी होती है। शिक्षक छात्र के अज्ञान को दूर करके, उसे सर्व समर्थ बनाने की शिक्षा देता है। एक योग्य शिक्षक की यह योग्यता होती है कि वह अपने युग और युग की आवश्यकता का सच्चा पारखी होता है। उसका आंकलन वह अपने छात्र में करता है। उसे युग की कसौटी पर खरा उतरने के उपयुक्त और अनुकूल शिक्षा देता है। इस तरह से एक योग्य शिक्षक अपने छात्र की योग्यता का विकास कर बहुत बड़ी भूमिका को निभाता है।

धनुष की प्रत्यंचा भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
कंठ-कंठ के शब्द पुनरुक्त शब्द हैं। इस प्रकार के अन्य शब्द पाठ में से छाँटकर लिखिए।
प्रश्न 2.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों के तत्सम शब्द रूप लिखिए।
भौंह, जोत, मछली, फूल, नैन।

प्रश्न 3
‘अंधकार’ में कार तवा ‘कटोरता’ में ता प्रत्यय जुड़े हैं इसी प्रकार ‘कार’
तथा ‘ता’ जोड़कर 5-5 नए शब्द बनाइए।
उत्तर
1. कभी-कभी, तनी-तनी, जब-जब, तब-तब, गड़ी-गड़ी।

2. तुभव शब्द तत्सम शब्द ।
भाह – भौं
जोत – ज्योति
मछली – मत्स्य
पुष्प – पेश
नैन – नेत्र

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3. ‘कार’ और ‘ता’ प्रत्यय से जुड़े 5-5 नए शब्द
(क) ‘कार’ प्रत्यय से जुड़े शब्दशब्द
प्रत्यय
रचना – रचनाकार
दर – दरकार
बद – बदकार
अदा – अदाकार
पेशकार – फल

(ख) ‘ता’ प्रत्यय से जुड़े नए
शब्द – प्रत्यय
अधीर – अधीरता
कोमल – कोमलता
मधुर – मधुरता
मूर्ख – मूर्खता
शिष्ट . शिष्टता।

धनुष की प्रत्यंचा योग्यता-विस्तार

1. शिक्षक की गरिमा से संबंधित अन्य कोई प्रसंग या कविता खोजकर लिखिए।
2: आप शिक्षक बनकर कौन-कौन से कार्य करना चाहेंगे लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

धनुष की प्रत्यंचा परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उदास और मलिन चेहरा होने का क्या कारण है?
उत्तर
उदास और मलिन चेहरा होने का कारण है-अज्ञानमय अंधकार में पूरी तरह से डूब जाना।

प्रश्न 2.
सेतु-निर्माण का क्या उद्देश्य है?
उत्तर
सेतु-निर्माण का उद्देश्य बहुत बड़ा है। इस पर निडर और निश्चित होकर ही अंधकार को पार कर ज्योति का द्वार खोला जा सकता है।

प्रश्न 3.
कवि ने कटोरता की विवशता की क्या विशेषता बतलायी है?
उत्तर
कवि ने कठोरता की विवशता की यह विशेषता बतलायी है कि कठोरता सीपी है, जिसमें मोती पलती-बढ़ती है।

प्रश्न 4.
झिड़कियाँ और तनी-तनी भृकुटियों के प्रतीक को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
झिड़कियाँ और तनी-तनी भृकुटियाँ शूलस्वरूप रक्षा-परिधि की प्रतीक हैं। इनके ही बीच में आशा रूपी फूल खिलते हैं।

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प्रश्न 5.
कवि ने अध्यापक द्वारा अपने छात्र को जीवन-संग्राम में उतरकर विजयी होने की किन-किन विशेषताओं से उसके हौसले को बढ़ाया है?
उत्तर
कवि ने अध्यापक द्वारा अपने छात्र को जीवन-संग्राम में उतरकर विजय होने की अनेक विशेषताओं से उसके हौसले को बढ़ाया है। वे विशेषताएँ हैं-उसकी आत्मा के अंशज, वंशज, उसकी अर्जन, उसकी कविता और उसका सर्जन।

प्रश्न 6.
अध्यापक ने अपने छात्र से किस तरह अपनी अंतिम अभिलाषा व्यक्त किया है?
उत्तर
अध्यापक ने अपने छात्र से मानस पिता के रूप में अपनी अंतिम अभिलाषा ‘मेरी लाज रख लेना’ व्यक्त किया है।

प्रश्न 7.
‘प्रत्यंचा’ और ‘तीर’ किसके प्रतीक हैं?
उत्तर
‘प्रत्यंचा’ शिक्षक के शिक्षण और ‘तीर’ ‘ज्ञान और लगन’ के प्रतीक हैं।

धनुष की प्रत्यंचा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“यह दुनिया एक अंधा कुआँ है? लो, में रज्जु बन लटका हूँ।” उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
यह दुनिया एक अंधा कुआँ है,
लो, मैं रज्जु बन लटका हूँ।”
उपर्युक्त पंक्तियों के द्वारा यह भाव व्यक्त करने का प्रयास किया गया है कि आज के छात्र का भविष्य अंधकारमय हो गया है। उसे चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण है कि उसमें अज्ञानता, अयोग्यता और अक्षमता है। उसे इन सबसे मुक्त कर उसमें ज्ञान, योग्यता और क्षमता लाने वाला कोई नहीं दिखाई देता है। उसे इस प्रकार अज्ञानमय अंधकार में पड़े हुए देखकर उसे प्रबोध देकर उसे योग्य और सक्षम उसका अध्यापक ही उसके लिए रस्सी का काम कर सकता है। उसके सहारे ही वह इस अंधकार से निकलकर अपने भविष्य को चमका सकता है।

प्रश्न 2.
मीन को बेंधने की पौराणिक कथा का उल्लेख जिन पंक्तियों में हुआ है उन्हें लिखिए।
उत्तर
मीन को बेंधने की पौराणिक कथा का उल्लेख निम्नलिखित पंक्तियों में हुआ है-.मैं धनुष की प्रत्यंचा हूँ अपनी पूरी शक्ति से खींचो, रखना विश्वास नहीं टूट्रॅगा, नहीं टूटूंगा चलाओ ज्ञान के तुम तीर, अज्ञान की मीन को बेंध डालो सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।

प्रश्न 3.
वर्तमान में प्रस्तुत कविता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ द्वारा विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ वर्तमान युग में बहुत अधिक प्रासंगिक है। यह इसलिए कि आज अध्यापक और छात्र के संबंध परस्पर बिगड़ चुके हैं। दोनों अपनी-अपनी गरिमा से गिर चुके हैं। इसलिए दोनों के संबंध पुनः मधुर और सरस होकर गरिमा-मंडित हों, यह आज के युग की बहुत बड़ी आवश्यकता है। यह तभी संभव है, जब आज का अध्यापक अपने अध्यापन के द्वारा अपने छात्र को सही दिशा-निर्देश दें। यह इसलिए कि आज का छात्र अंधकार से ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित करने, व्यक्तित्व को मोती-सा कांतिवान बनाने, सुजनशील होकर राष्ट्रीय भाव जगाने और उदात्त चरित्र के निर्माण के लिए अपने शिक्षक के प्रेरणा पुंज से ही आलोकित हो सकता है।

प्रश्न 4.
‘नींव बने रहने का भाव किन पंक्तियों में है? चुनकर लिखिए।
उत्तर
‘नींव बने रहने का भाव निम्नलिखित पंक्तियों में है
मैं नोंव बन नीचे रहूँगा ।
लेकिन तुम सीढ़ियाँ चढ़ना
हर दिवस बढ़ना हर रात बढ़ना
आसमान छूना।
तुम रुकोगे
तो नींव में गड़ी-गड़ी
मेरी अस्थियों में दर्द होगा।

प्रश्न 5.
‘धनुष की प्रत्यंचा’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
चूँकि आज छात्र अपने कर्त्तव्य से विमुख हो रहे हैं। उनमें कर्त्तव्यहीनता का तनिक बोध नहीं हो रहा है। इससे शिक्षा-जगत में एक बहुत बड़ी विडम्बना आ गई है। इसे आज एक योग्य और महान अपने दायित्व की दृष्टि से समझ सकता है। इस दृष्टि से हिन्दी के जाने-माने कवि एवं मनीषी डॉ. देवेन्द्र दीपक की ‘धनुष की प्रत्यंचा’ हिन्दी की उन विरल कविताओं में शीर्षस्थ कविता है जिसमें एक शिक्षक अपने पक्ष के औदात्य को गंभीरता से प्रस्तुत करता है। इस कविता में इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया कि लक्ष्य का भेद धनुष की प्रत्यंचा के ऊपर निर्भर करता है। वह जितनी अधिक शक्ति से खींची जाती है वह उतनी ही तीव्रता और शक्ति के लक्ष्य भेदन तक तीर को प्रक्षेपित करती है। ठीक इसी प्रकार शिक्षक का शिक्षण उसके छात्र के लिए प्रत्यंचा के समान है। इस प्रत्यंचा को जितनी अपनी जिज्ञासा और लगन की शक्ति से शिक्षक से सीखने का प्रयास करेगा, वह उतना ही अधिक, ज्ञान के तीर से अपने जीवन की बाधाओं को बेध सकेगा।

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प्रश्न 6.
इस कविता में शिक्षक ने अपने विद्यार्थी के लिए जिन-जिन रूपों को प्रस्तुत किया है, उन पंक्तियों को लिखिए
उत्तर
इस कविता में शिक्षक ने अपने विद्यार्थियों के लिए जिन-जन रूपों को प्रस्तुत किया है, वे विद्यार्थी पाठ में देखें।

धनुष की प्रत्यंचा कवि-परिचय

प्रश्न
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के . महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-डॉ. देवेन्द्र दीपक की हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकारों में गणना की जाती है। मध्य-प्रदेश के चर्चित कवियों और सम्पूर्ण हिन्दी-जगत के प्रतिष्ठित कवियों के साथ आपका नाम लिया जाता है। शिक्षा समाप्त कर आपने मध्य-प्रदेश के विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में समय-समय पर स्थानान्तरण के फलस्वरूप अस्थायी रूप में अध्यापन कार्य करते रहे। इसके साथ-साथ आप पत्रकारिता से भी जुड़े।

पत्रकारिता में महारत हासिल करने के उद्देश्य से अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य करते रहे। यही नहीं, आपने, कई छोटी-बड़ी स्तर की पत्रिकाओं और चर्चित पत्रों के संपादन कुशलतापूर्वक किया। बचपन से ही डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का झुकाव हिन्दी काव्य की ओर रहा। फलस्वरूप आपकी काव्य-रचनाएँ अधिक प्रकाश में आयी. हैं। इसके साथ-ही-साथ आपकी कविताओं के अनुवाद भी कई भारतीय भाषाओं में हुए हैं। काव्य-रचना के साथ ही सम्पादन कार्य भी आप करते रहे। इस प्रकार साहित्य और पत्रकारिता इन दोनों क्षेत्र में आप योगदान देने में सक्रिय रहे।

रचनाएँ-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ की निम्नलिखित रचनाएँ हैं

काव्य-संग्रह-‘सूरज बनती किरण’, ‘बन्द कमरा’, ‘खुली कविताएँ’, ‘भूगोल राजा का, खगोल राजा का’, ‘कुण्डली चक्र पर मेरी वार्ता’, ‘मास्टर धरमदास’, ‘हम बौने नहीं दबाव’ आदि।

संपादन-‘छन्द प्रणाम’, “सार्थक एक’ आदि। संप्रति-‘साक्षात्कार’ के संपादक

महत्त्व-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का असाधारण साहित्यिक महत्त्व है। आपने हिन्दी काव्य-क्षेत्र में आशातीत योगदान दिया है। फलस्वरूप आपकी कविताओं के अनुवाद, संस्कृत, मराठी, सिंधी, पंजाबी, अंग्रेजी, तमिल आदि भारतीय भाषाओं में हुए हैं। आपकी कविताएँ शिक्षित और सांस्कृतिक वर्ग के लिए अधिक उपयोगी और सार्थक सिद्ध हुई हैं। आगामी साहित्यिक पीढ़ी के लिए आप प्रेरणा-स्रोत बने रहेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

धनुष की प्रत्यंचा कविता का सारांश

प्रश्न
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ द्वारा विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’-विरचित प्रस्तुत कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ न केवल आधुनिक कविता है, अपितु प्रासंगिक भी है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है
शिक्षक अपने छात्र को प्रेरित करते हुए कह रहा कि वह क्यों इस तरह होकर अपना मलिन चेहरा लिए अंधकार में डूबकर उदास खड़ा है। वह तो उसके लिए सेतु के रूप में बनकर सामने आया है। अब वह उस पर चढ़कर निडरतापूर्वक ज्योति के द्वार को खोलने के लिए इस अंधकार के उस पार उतर जाए। इसलिए लो, अपना हाथ बढ़ाओ।

शिक्षक का कहना है कि मैं तुम्हें कुंजी-अपनी सहेजी हई पूँजी के रूप में दे रहा हूँ। मेरी कठोरता पर तुम गुस्सा करते हो, लेकिन यह मेरी मजबूरी है। मैं इसे सीपी समझकर सहता हूँ और तुम्हें तो केवल मोती-सा पालना है। यह मैं अच्छी तरह से जानता और अनुभव करता हूँ कि मेरी फटकार तुम्हें शूल के समान चुभ गई है। यह मेरी रक्षा-परिधि थी, जिसमें तुम्हें फूल बनकर खिल जाना था। तुम्हारी मौलिकता और स्वाभिमान मुझे बड़ा ही अनमोल बना देते। इसलिए अब मैं तुमसे यह कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारे लिए नींव के रूप में बना रहूँगा और तुम उस नींव की सीढ़ियों पर एक-एक कदम बढ़ाते जाना। अगर तुम रुकोगे तो नींव में गड़ी हुई मेरी हड्डियों में दर्द होने लगेगा। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम फूल-सा खिलो और अपनी महक को चारों ओर फैलाओ। यह मेरी बहुत बड़ी खुशी होगी। ऐसा इसलिए कि मैंने इसी खुशी के लिए सावन-सा तुम्हारे उदास मन रूपी मरुस्थल में बरसा था।

शिक्षक अपने छात्र को प्रबोध देते हुए कह रहा है-तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि संसार एक अंधकारमय कुआँ है। मैं उसके ऊपर एक रस्सी बनकर लटक रहा हूँ। तुम निश्चित होकर अपने पात्र को भरकर अपने फूलों की बगिया को सींच डालो। मेरी आत्मा के तुम वंशज-अंशज हो। मेरी अर्जन, कविता आदि सब कुछ तुम्हीं हो। रक्षा-कवच की तरह मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। इसे लेकर तुम आँधी-तूफानों का सामना करो। तुम्हारे शत्रुओं के लिए तुम्हें मैं वज्र के समान और तुम्हारे ओठों पर फूल की तरह खिलने के लिए बनकर तैयार हो गया हूँ। इस तरह मैं तुम्हारे लिए धनुष की प्रत्यंचा हूँ।

उसे तुम अपनी पूरी शक्ति से इस विश्वास से खींचो कि यह नहीं टूटेगा। इस पर तुम अपने ज्ञान के तीर चलाते हुए अज्ञान रूपी मछली को बेंध डालो। अपनी सफलता को वैसे ही प्राप्त कर लो जैसे अर्जुन ने स्वयंवर में द्रोपदी को प्राप्त किया था। तुम्हें प्रसन्न देखकर मैं प्रसन्न होता हूँ और दुखी देखकर दुख में डूब जाता हूँ। इसलिए मैं कह रहा हूँ-मैं साधना हूँ तो तुम सिद्धि बन जाना। मैं आँख हूँ तो तुम दृष्टि बन जाना। मैं विजय स्तम्भ हूँ तो तुम विजय का पताका बन जाना। इस प्रकार अपनी हथेली पर विजय प्राप्त करके आज मेरी लाज रख लेना। यह अब तुम्हारे मानस. पिता का वचन है।

धनुष की प्रत्यंचा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. इधर क्यों खड़े हो उदास
क्यों महिलन हो गया चेहरा
अंधकार में,
भटकन में,
डूबे हो कंठ-कंठ।
लो, मैं तुम्हारे हेतु सेतु बना हूँ।
इस सेतु पर पाँव रखकर
निर्भीक और निर्द्वन्द्व होकर
उतर जाना तुम पार
क्योंकि तुम्हें खोलना है
ज्योति का वह द्वार।

शब्दार्थ-मलिन-उदास, मुरझा गया। कंठ-कंठ-पूरी तरह । हेतु-लिए। सेतु-पुल । पाँव-पैर। निर्भीक-निडर। ज्योति-प्रकाश।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी सामान्य’ में संकलित तथा डॉ. देवेन्द्र दीपक-विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ शीर्षक से है। इसमें कवि ने एक सुयोग्य शिक्षक द्वारा आज के अंधकार में डूबे छात्र को ज्ञान की ज्योति जलाकर चरित्र-निर्माण करने के लिए किस प्रकार प्रेरित किया गया है, यह चित्रित करने का प्रयास किया है। इस विषय में कवि का यह कहना है कि

व्याख्या-शिक्षक अपने छात्र को प्रेरित करते हुए कह रहा है-तुम इस तरह क्यों मुरझाए और निराश होकर खड़े हुए दिखाई दे रहे हो। तुम्हारा चेहरा उदास और मलिन होकर दिखाई दे रहा है, तुम्हें देखने से ऐसा लगता है कि तुम अंधकार में काफी भटकने के बाद पूरी तरह से डूब चुके हो। फलस्वरूप तुम्हें कहीं से कोई सहारा और आशा की एक किरण नहीं दिखाई दे रही है, लेकिन ऐसी बात नहीं है। अब मैं तुम्हारे लिए पुल बनकर तुम्हारे सामने आया हूँ। अब तुम किसी प्रकार से डरो नहीं और उदास-निराश भी न होवो! इस पुल पर आकर तुम अब खड़े हो जाओ। इससे तुम किसी प्रकार के भय और रुकावट के इस अंधकार से उस पार उतर जाओगे, जहाँ से तुम्हें प्रकाश के किरण द्वार को सबके लिए खोल देना है।

विशेष-

  1. भाषा सरल और सपाट है।
  2. कथन में ओज और प्रभाव है।
  3. ‘कंठ-कंठ’ में पुररुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. मुक्तक छंद है।
  5. यह अंश प्रेरणादायक रूप में है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना विशिष्ट भावों को व्यक्त करने वाले शब्दों से युक्त है। मुक्तक छंद की स्वच्छन्दता को उपदेशात्मक शैली के द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास है। इसे आकर्षक बनाने के लिए लक्षणा शब्द-शक्ति और पुररुक्ति प्रकाश एवं रूपक अलंकार के मिले-जुले प्रयोग सटीक और उपयुक्त रूप में हैं। वीर रस के प्रवाह से प्रतीकात्मक योजना सुन्दर बन गयी है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना सहज और बोधगम्य है। भावों की प्रस्तुति स्वाभाविक है। आत्मीयता, संवेदनशीलता और उदारता जैसी भावगत विशेषताओं को एक साथ लाकर उन्हें हृदय-स्पर्शी बनाने का प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। कथन की यथार्थता को विश्वसनीयता के द्वारा सामने लाने की युक्ति बड़ी ही उपयुक्त सिद्ध हुई है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उदास खड़े होने से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में किस ओर संकेत है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) उदास खड़े रहने से कवि का अभिप्राय है-हर प्रकार की आशा-विश्वास को तिलांजलि देना। दूसरे शब्दों में हार जाना-थक जाना।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में आज के शिक्षक और छात्र की ओर संकेत है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव यह है कि आज का छात्र अज्ञानग्रस्त है। उसे कोई योग्य शिक्षक ही अपेक्षित ज्ञान के द्वारा सुयोग्य बना सकता है।

2. और लो, बढ़ाओ हाथ
तुम्हें देता हूँ कुंजी जिसे
पूंजी समझ मैंने सहेजा है!
मेरी कठोरता पर
कभी-कभी तुम गुसियाते हो,
मन-ही-मन कुछ कह-सुन जाते हो
लेकिन मैं कठोर हूँ
यह मेरी एक विवशता है
मेरी कठोरता
सीपी की कठोरता है
जो कुछ भी सहना है
मुझको ही सहना है
तुम्हें तो बस मोती सा पलना है।

शब्दार्थ-सहेजा-सँभाला। गुसियाते-गुस्सा करते अर्थात् क्रोध करते। विवशता-मजबूरी। पलना-बढ़ना। बस-केवल ।

प्रसंग-पूर्ववत् ! इसमें कवि ने शिक्षक द्वारा अपने असहाय छात्र को साहस देने का उल्लेख किया है। शिक्षक अपने छात्र को उत्साहित करते हुए कह रहा है

व्याख्या-तुम मेरी ओर आओ! मैं तुम्हें अज्ञानमय अंधकार से बाहर निकालने के लिए तुम्हारे पास खड़ा हूँ। अब तुम अपने हाथ मेरी ओर बढ़ाओ। मैंने बहुत समय से अपने अनुभव की जो पूंजी सँभालकर रखी है, उसे तुम्हें अंधकार के बंद कमरे से बाहर निकल आने के लिए कुंजी के रूप में दे रहा हूँ। उसे लेकर अब बंद अंधेरे कमरे को खोलकर बाहर आ जाओ। मैंने तुम्हें पहले कई कठोरतामयी हिदायतें दी थीं, उनका तुमने अमल करने के बजाय मुझ पर गुस्सा ही किया। यही नहीं तुमने मन-ही-मन मेरा विरोध किया। उसके लिए कुछ भुनभुनाया और बुदबुदाया भी। फिर भी मैं तुम्हें अपनी कठोर हिदायतें देता रहा। यह इसलिए कि यह मेरी आदत है। यह भी कि मेरी लाचारी है। मेरी कठोर हिदायतें क्या हैं? इस पर तनिक विचार करोगे तो यह जरूर समझ जाओगे कि मेरी कठोर हिदायतें सीपी की तरह कठोर हैं, जिसके अंदर मोती पलती-बढ़ती रहती है। इस प्रकार मैं सीपी की कठोरता को सहना और उसे बरकरार रखना मेरी लाचारी है। मेरी तो यही कोशिश रही है कि तुम मेरी कठोरता की सीपी के अंदर मोती की तरह पलते-बढ़ते रहो।

विशेष-

  1. योग्य अध्यापक के उच्च और उदार दृष्टिकोण का उल्लेख है।
  2. सत्यता में कठोरता होती है, जो पूरी तरह से कल्याणकारी सिद्ध होती है, इसे बतलाने का प्रयास किया गया है।
  3. कभी-कभी में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तो ‘मोती-सा’ में उपमा अलंकार है।
  4. शैली उपदेशात्मक है।
  5. मुक्तक छंद है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश मुक्तक छन्द में पिरोकर वीर रस में प्रवाहित है, जिसे पुनरुक्ति प्रकाश (कभी-कभी) और उपमा अलंकार (मोती-पलना है) से प्रभा मंडित किया गया है। ‘विवशता-कठोरता, गुसियाते हो-सुन जाते हो और सहना है-पलना है शब्दों की तुकान्लता बड़ा आकर्षक और लयात्मक है। इससे इस पद्यांश की प्रभावमयता और निरख रही है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा बड़ी स्पष्ट और निश्छल है। उनमें बिना लागलपेट की सच्ची विशेषता है, तो अपनापन और उदारता की सरसता भी है। कल्याण को प्रदान करने वाली कठोरता की स्पष्टोक्ति को सहजतापूर्वक अपनाने के लिए सीपी के अंदर पलने वाली मोती की तरह बतलाने की शैली मन को छू लेती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुंजी से तात्पर्य क्या है?
(ii) कठोरता को विवशता क्यों कहा गया है?
(iii) ‘मुझको ही सहना है’ का क्या भाव है?
उत्तर
(i) कुंजी से तात्पर्य है लम्बा अनुभव। ऐसे अनुभव जो किसी प्रकार के संकट से मुक्ति दिला सके।
(ii) कठोरता को विवशता कहा गया है। यह इसलिए कि कल्याणकारी स्वरूप कठोरता से होने वाले कल्याण के लिए कठोरता को नहीं त्यागते हैं। उसके लिए वे विवश हो जाते हैं।
(iii) ‘मुझको ही सहना है’ का भाव है-उदारशील व्यक्ति सभी प्रकार के कष्टों-बाधाओं को सहकर परोपकार करते चलते हैं। दूसरों के कष्टों-अभावों को सहना वे अपनी मजबूरी मान लेते हैं।

3. मैं जानता हूँ, अनुमानता हूँ
मेरी उक्तियाँ झिडकियाँ
तनी-तनी भृकुटियाँ
कभी-कभी तुम्हें शूल-सी लगी हैं।
मुझे शूल तो
बनना ही था,
क्योंकि मेरी रक्षा-परिधि में
तुम्हें फूल बन
खिलना ही था।

शब्दार्थ-उक्तियाँ-कहावतें। अनुमानता-अनुमान करता हूँ। झिड़कियाँ-फटकार। भृकुटियाँ-आँखें दिखाना, क्रोध करना।शूल-काँटा, भाला। रक्षा परिधि-रक्षा की सीमा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक योगय शिक्षक के अपने छात्र के प्रति आत्मकथन की स्पष्टता का उल्लेख किया है। शिक्षक का अपने छात्र के प्रति स्पष्ट रूप से कहना है

व्याख्या-मैं यह भलीभाँति जानता हूँ। यही नहीं, मैं यह अनुमान भी करता हूँ कि मैं जब कभी तुम्हें फटकारता और डाँटता हूँ। इसी प्रकार मैं जब कभी तुम्हें अपनी आँखें दिखाता हूँ तो तुम्हें उनसे बड़ी पीड़ा होती है। वे तुम्हें कभी-कभी शूल की तरह चुभो गयी होंगी, तो इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन यह सब कुछ मैंने मजबूरी में किया है। मुझे तुम्हारे लिए शूल बनना भी मेरी एक ऐसी ही मजबूरी थी। यह मेरी रक्षा-परिधि थी। इसी में तुम्हें एक आकर्षित और सुगन्धित फूल खिलाना था।

विशेष-

  1. भाषा में ओज और प्रवाह है।
  2. तुकांत शब्दावली है।
  3. शैली उपेदशात्मक है।
  4. वीर रस का संचार है।
  5. ‘तनी-तनी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’
(ii) उपर्युक्त पद्यांश वीर रस से प्रवाहित और मुक्तक छंद से परिपुष्ट है। इसे तुकान्त शब्दावली की लयात्मकता और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (कभी-कभी) व उपमा अलंकार (शूल-सी लगी है) से चमत्कृत किया गया है। प्रतीकात्मक शैली के प्रयोग के यह पद्यांश रोचक बन गया है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना स्पष्ट कथन पर आधारित है। उमसें सहजता, स्वाभाविकता और स्पष्टता की बहती हुई त्रिवेणी से अभिप्राय है ऊँचे तरंगे उठ रही हैं। इस प्रकार इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य मन को बार-बार छू रहा है, जो कवि की अद्भुत सफलता को प्रकट कर उसकी सार्थकता को सिद्ध कर रहा है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) झिड़कियाँ और फिर तनी-तनी भृकुटियाँ के प्रयोग की क्या विशेषता है?
(ii) ‘रक्षा-परिधि’ से क्या तात्पर्य है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) झिड़कियाँ और फिर तनी-तनी भृकुटियाँ के प्रयोग की बड़ी विशेषता है। झिड़कियाँ अर्थात् फटकार का जब-जब कोई खास असर न होने पर तनी-तनी भृकुटियों के द्वारा असर डालने का विशेष प्रयास किया जाता है।
(ii) ‘रक्षा-परिधि’ से तात्पर्य है-कल्याणकारी योजना या सोच-विचार।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-कल्याणार्थ कठोरता मूलतः फलदायिनी होती है।

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4. जब-जब तुम
मौलिकता की साँस हिय में भरकर
उठाकर शीश आते,
किन्तु छंद के नये अर्थ बतलाते
तब-तब मैं खुशी से
गोल हो जाता
अपने में बड़ा
अनमोल हो जाता।

शब्दार्थ-हिय-हृदय। शीश-सिर। गोल-गद्गद् । अनमोल-अमूल्य।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि एक महान अध्यापक के अपने छात्र के प्रति व्यक्त किए भावों का उल्लेख किया है। अध्यापक अपने छात्र का हौसला बुलंद करते हुए कह रहा है

व्याख्या-मैं जब कभी तुम्हारी मौलिकता को देखता हूँ, तो प्रसन्न हो उठता हूँ। उस समय मुझे और अधिक प्रसन्नता होती थी, जब तुम अपने मौलिक विचार को हृदय से तौलकर मेरे सामने स्वाभिमानपूर्वक सिर उठाकर रखते थे। उससे भी मुझे बढ़कर प्रसन्नता तब होती थी, जब तुम छंदमय अपने भावों को मेरे सामने रखकर उसके अभिप्राय को स्पष्ट करते थे। उस समय की मेरी खुशी सभी खुशियों से ऊपर होती थी। इस प्रकार मैं बाग-बाग होकर अपने आप में बड़प्पन और अनमोल होने का अनुभव करने लगता था।

विशेष-

  1. भाषा सुस्पष्ट है।
  2. शैली प्रतीकात्मक है।
  3. मुक्तक छंद है।
  4. ‘जब-जब’ और ‘तब-तब’ मैं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. यह अंश उत्साहवर्द्धक है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा-सरल और सहज शब्दों की है। शैली-विधान लाक्षणिक है। लक्षणा शब्द-शक्ति से भावों के अर्थ को खोलने का प्रयास किया गया है। अलंकार-योजना की सटीकता और उपयुक्तता से यह आकर्षक बन गया है। मुक्तक छंद को वीर रस से गतिशील बनाने की सफलता सहज रूप में मान्य है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य तेज और ओज रूप में है। मौलिकता की नवीनता और अनूठापन इसकी एक खास विशेषता दिखाई दे रही है। चूँकि भाव असाधारण और प्रभावशाली हैं, इसलिए वे अपनी इस रोचकता में सुन्दरता की झलक स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत कर रहे हैं।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(क) ‘मौलिकता की साँस हिय में भरकर’ से क्या अभिप्राय है?
(ख) ‘उठाकर शीश आते’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘खुशी से गोल हो जाता’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(क) ‘मौलिकता की साँस हिय में भरकर’ से अभिप्राय है–उन्मुक्त भावों के साथ प्रस्तुत होना।
(ख) ‘उठाकर शीश आते’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है-स्वाभिमानपूर्वक
अपने आपको प्रस्तुत करने का साहस करना।
(ग) ‘खुशी से गोल हो जाता’ का अर्थ है-फूले न समाना। दूसरे शब्दों में दूसरों की उन्नति देखकर अपने-आपको भूल जाना।

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5. मैं नींव बन नीचे रहूँगा
लेकिन तुम सीढ़ियाँ चढ़ना
हर दिवस बढ़ना हर रात बढ़ना आसमान छूना।
तुम रुकोगे तो नींव में गड़ी-गड़ी
मेरी अस्थियों में दर्द होगा।

शब्दार्थ-नींव-बुनियाद। दिवस-दिन। अस्थियाँ-हड्डियाँ। दर्द-कष्ट, पीड़ा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने महान अध्यापक की उदारता-त्यागशीलता को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। महान् अध्यापक अपने छात्र को उन्नति के शिखर पर चढ़ाने के लिए उत्साहित करते हुए कह रहा है

व्याख्या-मैं तुम्हारी हरेक प्रकार की उन्नति के लिए बुनियाद बनने के लिए तैयार हूँ। मेरी इस बुनियाद पर तुम अपनी उन्नति की एक-से-एक बढ़कर सीढ़ियों पर लगातार चढ़ते जाना। इससे मुझे अपार प्रसन्नता और सुख की अनुभूति होगी। इसके लिए मेरी यही तुमसे हार्दिक इच्छा व्यक्त कर रहा हूँ कि तुम हरेक दिन और रात बिना किसी रोक-टोक के उन्नति के शिखर पर चढ़कर आसमान को छूते चलो। किसी भी अवस्था में न रुको और न पीछे हटो। अगर तुम किसी प्रकार से रुक जाओगे या पीछे हटने लगोगे तो मुझे भारी दुख होगा। मेरी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। फलस्वरूप उस बुनियाद में पड़ी और गड़ी हुईं मेरी हड्डियाँ में बहुत बड़ी पीड़ा होने लगेगी। शायद ऐसी पीड़ा होगी, जिससे वे छटपटाने लगेंगी।

विशेष-

  1. मुक्तक छन्द है।
  2. ‘आसमान छूना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।
  3. ‘गड़ी-गड़ी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. भावात्मक शैली है।
  5. वीर रस और करुण रस का मिश्रित प्रवाह है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।

(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य सरस और आत्मीय भावों पर आधारित है। ‘नींव बनना, आसमान छूना’ जैसे मुहावरों और तत्सम तद्भव शब्द के मेलजोल क्रो-पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से चमत्कृत-मंडित किया गया है। प्रतीकात्मक शैली और मुक्तक छंद के प्रयोग से यह पद्यांश और रोचक हो गया है। . (iii) उपर्युक्त पद्यांश में अध्यापक की उदारता, सहनशीलता, आत्मीयता, सरसता और त्यागशीलता जैसे अत्युच्च भावों की प्रस्तुति अपने आप में अनूठी हे। छात्र को उन्नति के शिखर पर चढ़ते जाते हुए देखने की तमन्ना और उसके रुक जाने से दुखी होने की भावना एक सुयोग्य अध्यापक में ही संभव है। इसे दर्शाने में कवि का प्रयास सचमुच में सराहनीय है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘नींव बनने से क्या अभिप्राय है?
(ii) ‘नींच में गडी-गड़ी अस्थियों’ का मुख्यार्थ बताइए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) ‘नींव बनने’ से अभिप्राय है-परोपकारार्थ त्याग-समर्पण कर देना।
(ii) ‘नींव में गड़ी-गड़ी अस्थियों’ का मुख्यार्थ-परोपकारार्थ अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने का एकमात्र जीवन लक्ष्य प्रस्तुत करना।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-आधुनिक स्वार्थवाद के घोर अंधकार से बाहर निकालकर एक सुयोग्य अध्यापक का अपने छात्र के भविष्य को चमकाने की प्रेरणा देना।

6. तुम खिलो, महको
गंधदान का यज्ञ रचाओ इसीलिए,
तुम्हारी स्वच्छंदता को छंदा था मैंने।
तुम मरुस्थल थे।
मैं तुम्हारे हित बरसा बन सावन
आज तुम कितने भावन!

शब्दार्थ-खिलो-फूल जाओ, विकसित हो जाओ। महको-सुगंध फैलाओ। गंधदान-सुगंध को प्रदान करना। छंदा था-छंदबद्ध किया था। हित के लिए (भलाई के लिए)। भावन-मन को भाने (अच्छे लगने) वाले।

प्रसंग-पूर्ववत्। इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने छात्र को परोपकारी होने का सदुपदेश देने का उल्लेख किया है। अध्यापक का अपने छात्र को परोपकार करने की सीख देते हुए यह कहना है

व्याख्या-तुम अपने जीवन-पथ पर लगातार बढ़ते अपने सद्गुणों को बिखेरते चलो। उनसे लोगों को आकर्षित और मोहित करते हुए आगे बढ़ते चलो। संभव हो
सके तो अपने उज्ज्वल गुणों से लोगों को यथाशक्ति सुख-सुविधाएँ पहुँचाते चलो। . तुम्हारे प्रति इस प्रकार आशावान होकर मैंने तुम्हारे स्वतंत्र विकास के लिए अनेक भावों को संजोया था। मैंने इसीलिए तुम्हारी जिज्ञासारूपी मरुस्थल के लिए अपने . सद्भावों और सशिक्षाओं रूपी सावन की बरसात की थी। उससे तुम कितने खिल उठे हो, यह मैं अनुभव कर रहा हूँ।

विशेष-

  1. अध्यापक की सद्भावना का छात्र पर पड़े हुए प्रभावों का उल्लेख है।
  2. शैली उपदेशमयी है।
  3. ‘तुम मरुस्थल थे’ में रूप अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।
  5. मुक्तक छन्द है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।

(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप सरल किन्तु प्रेरक भाषा-शैली से तैयार है उपदेशात्मक शैली और वीर रस से संचारित मुक्तक छंद की धारा भावों को तेजी से बढ़ा रही है। बिम्ब और प्रतीक अभिधा शक्ति के द्वारा प्रस्तुत रूपक अलंकार के चमत्कार से इस पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य चमक उठा है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य बड़ा ही सहज, सरल और सपाट है। भावों में जहाँ आत्मीयता है, वहीं उनसे रोचकता और सरसता भी है। कुल मिलाकर उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य मनमोहक और हृदयस्पर्शी है।।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘गंधदान का यज्ञ कराओ’ कहने का क्या तात्पर्य है?
(ii) ‘तुम मरुस्थल थे
मैं तुम्हारे हित बरसा बन सावन।’
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
(iii) ‘आज तुम कितने भावन’ का भावार्थ लिखिए।
उत्तर
(i) “गंधदान का यज्ञ कराओ’ कहने का तात्पर्य है-अपने दिव्य और उच्च गुणों के द्वारा परोपकार की सरस धारा निरन्तर प्रवाहित करते रहना।
(ii) ‘तुम मरुस्थल थे,
तुम्हारे हित बरसा
बन सावन।
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव यह है कि दीन-दुखी हृदय को सही रूप में पहचान कर उनके दुखों और अभावों को अपनी शक्ति सम्पन्नता से दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए। उनकी संतुष्टि से सुख-आनंद का वातावरण तैयार होता है।
(iii) ‘आज तुम कितने भावन’ का भावार्थ है-दुःखी और संतप्त हृदय में जब सुख-आनंद का प्रवाह होने लगता है, तब एक अपूर्व सौन्दर्य का वातावरण फैलकर मन को मोह लेता है।

7. यह दुनिया एक अंधा कुआँ है
लो, मैं रज्जु बन लटका हूँ
निश्चित होकर तुम अपने-अपने
पात्र भर लो अपनी फुल-बगिया का
सिंचन कर लो।

शब्दार्थ-रज्जू-रस्सी। पात्र-बर्तन, घड़ा। बगिया-बाग। सिंचन-सिंचाई।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने अज्ञानी और भटके हुए छात्र के प्रति कथन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है
व्याख्या-यह सारा संसार एक अंधकारमय कुआँ है। उसमें तुम पड़े हुए छटपटा रहे हो। अब तुम्हें इसमें और पड़े रहकर छटपटाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा इससे बाहर निकलने का समय आ गया है। इसके लिए रस्सी के समान इसमें लटक रहा हूँ। अब तुम बिल्कुल ही निडर हो जाओ। फिर अपनी आवश्यकतानुसार इसमें से अपने घड़े में पानी भर लो। इस तरह अब तुम अपनी स्वतंत्रता रूपी फूलों के बाग की सिंचाई करके अपने जीवन को धन्य कर लो।

विशेष-

  1. भाषा सरल और सुबोध है।
  2. दुनिया को एक अंध कुआँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए इसमें रूपक अलंकार है।
  3. तुकान्त शब्दावली है।
  4. लय और संगीत की ध्वनि आकर्षक रूप में है।
  5. मुक्तक छंद है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ ।
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप आकर्षक और मोहक है। दुनिया को अंधा कुआँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है फिर उससे ज्ञान की रस्सी से अपेक्षित जल प्राप्त करके अपने मन रूपी बागों में इच्छामयी फूलों को खिलाने की रूपक-योजना निश्चय ही ऊँची है और सराहनीय भी है।।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-विधान अद्भुत और प्रेरक रूप में है। तुकान्त शब्दावली असंस्कृत भावयोजना से यह पद्यांश सुन्दर और भाववर्द्धक बन गया है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘अंध कुआँ’ से क्या तात्पर्य है?
(ii) ‘रज्जु बनना’ किसका प्रतीक है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) ‘अंध कुआँ’ से तात्पर्य है-‘गहरा और अत्यधिक स्वार्थ’।
(ii) ‘रज्जु बनना’ सहायक होने का प्रतीक है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-योग्य और समर्थ व्यक्ति ही मुसीबतों से निकालकर सुखमय जीवन प्रदान करता है।

8.मेरी आत्मा के अंशज हो तुम,
मेरी आत्मा के वंशज हो तुम,
मेरी अर्जन हो तुम,
मेरी कविता हो तुम
मेरा सर्जन हो तुम,
रक्षा, कवच की भांति,
मेरा आशीष तुम्हारे साथ।
जाओ, जाकर आँधी से टकराओ,
तूफानों से खेलो,
सबको अपनी छाती पर झेलो
जिनकी पसलियों में
मैं वज्र बनकर मिल गया हूँ,
अधरों पर तुम्हारे
फूल बनकर खिल गया हूँ।

शब्दार्थ-अंशज-अंश से उत्पन्न। वंशज-वंश से जन्म लेने वाले । अर्जन-प्राप्ति । सर्जन-निर्माण। आशीष-आशीर्वाद। अधरों-ओठों।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने छात्र का हौसला बढ़ाने के लिए उसे सब कुछ अपना मानने का उल्लेख किया। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मेरी आत्मा के अंश से ही तुम उत्पन्न हो और मेरे ही वंश में जन्म लेने वाले हो; अर्थात् तुममें मेरे गुण-संस्कार वर्तमान हैं। उन्हें केवल तुम्हें प्रकट कर देना है। इस प्रकार तुम मेरे अर्जन हो, सर्जन हो। यही तुम मेरी कविता हो और इस प्रकार के मौलिक व्यक्तित्व के निर्माण स्वरूप हो। यही कारण है कि मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ एक रक्षा-कवच की तरह मौजूद है। इसलिए अब मैं तुम्हें यही आदेश दे रहा हूँ कि तुम इन सब बातों को अपने हृदय की गहराइयों में उतार लो। फिर अपने सामने वाली हर एक प्रकार की कठिनाइयों रूपी आँधियों से टकरा जाओ। उन्हें तुम समाप्त कर दो। सामने वाले एक-से-एक जानलेवा संकट रूपी तूफानों को तुम खेल-ही-खेल मसल डालो। इस प्रकार तुम उन सबको अपनी अपार शक्ति से झेलते हुए आगे बढ़ते जाओ, जिनकी पसलियों में बज्र बनकर समा गया हूँ। इस प्रकार तुम्हारे अंदर शक्ति का संचार करके मैं तुम्हारे ओठों पर फूल की तरह सुन्दरता बिखेर रहा हूँ।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली असाधारण है।
  2. लक्षणा शब्द-शक्ति है।
  3. ‘मेरी’ और ‘तुम’ शब्दों की पुनरावृत्ति होने से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।
  5. लय-संगीत की सुन्दर योजना है।
  6. प्रतीकात्मक और उपदेशात्मक शैली है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से अलंकृत-मंडित है। वीर रस के संचार और मुक्तक छंद के द्वारा उसे मुक्त रूप से प्रस्तुत करने का कवि-प्रयास आकर्षक है। भाषा की शब्दावली को तुकान्त रूप देकर लक्षणा शब्द-शक्ति से मजबूत और प्रभावशाली बनाने की शैली भी मन को अपनी ओर खींच लेती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सहज रूप में प्रवाहित होकर विशेष अर्थ को प्रकट कर रही है। सम्पूर्ण पद्यांश आत्मीय भावों पर आधारित होकर कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरक स्वरूप बन गया है। ‘जाओ, जाकर आँधी से टकराओ, तूफानों से खेलो’ और सबको अपनी छाती पर झेलो जैसें भाव साधारण रूप में होकर असाधारण अर्थ को व्यक्त कर रहे हैं।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
(ii) ‘मेरा-मेरी’ के साथ ‘तुम’ की पुनरावृत्ति से कौन-से भाव व्यक्त हो रहे हैं?
(iii) ‘फूल बनकर खिल गया हूँ’ का तात्पर्य क्या है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-आत्मीय भावों के द्वारा सोए हुए पुरुषार्थ को जगाना।
(ii) ‘मेरा-मेरी’ के साथ ‘तुम’ की पुनरावृत्ति से आत्मीय भाव व्यक्त हो रहे हैं।
(iii) ‘फूल बनकर खिल गया हूँ’ का तात्पर्य है-अत्यधिक प्रसन्नता से झूम उठना ।

9. मैं धनुष की प्रत्यंचा हूँ
अपनी पूरी शक्ति से खींचो,
रखना विश्वास नहीं टूटूंगा,
नहीं टूटूंगा चलाओ ज्ञान के तुम तीर
अज्ञान की मीन को बेध डालो
सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।

शब्दार्थ-धनुष-धनुष की डोरी। मीन-मछली।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक सुयोग्य अध्यापक का अपने छात्र के प्रति आत्मीयतापूर्ण कथन को प्रस्तुत किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मैं तुम्हारे लिए धनुष की प्रत्यंचा हूँ। अर्थात तुम मेरा आधार (सहयोग) लेकर अपने कर्मक्षेत्र में आगे बढ़ो। अपनी पूरी शक्ति से बढ़ो। इसके लिए तुम मेरी प्रत्यंचा (मेरा सहयोग) जितना चाहो, प्राप्त कर सकते हो। ऐसा करते समय तुम पूरी तरह से इस बात के लिए विश्वस्त रहना कि यह मेरी प्रत्यंचा (अर्थात् मेरी सहयोग शक्ति नहीं टूटेगी। इस पर तुम निश्चिंत होकर अपने ज्ञान-शक्ति की तीर चलाते चलो। इससे अज्ञानमयी मछली का बेधन कर अर्जुन की तरह सफलतापूर्वक द्रोपदी को स्वयंवर में वरण कर लोगे।

विशेष-

  1. भाषा में ओज, प्रभाव और आकर्षण है।
  2. शैली उपदेशात्मक है।
  3. प्रतीक शब्दावली है।
  4. मुक्तक छंद है।
  5. पौराणिक कथा को प्रेरक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना में रूपक अलंकार की प्रधानता है। पौराणिक कथा-प्रसंग को सजीवता प्रदान करने के लिए कवि ने लक्षणा शब्द-शक्ति के बल-प्रयोग से कथन को आकर्षक बना दिया है। वीर रस की तीव्रता से भाव-अभिप्राय तुरन्त स्पष्ट हो रहे हैं। इस प्रकार यह पद्यांश अपने काव्य-सौन्दर्य से हृदय को छू लेता है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान प्रतीकात्मक है। महाभारत पुराण की घटना पर आधारित प्रस्तुत कथन स्वाभाविक रूप से आकर्षक है। इससे प्रस्तुत हुई भावधारा और अधिक तेज हो गयी है। इस कथन का प्रभाव इस दृष्टि से और अधिक बड़ा हो गया है कि इसमें कल्पना की उड़ान नहीं है, यथार्थ का ही सपाट धरातल है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का प्रतिपाद्य लिखिए।
(ii) ‘धनुष की प्रत्यंचा’ रूपक को स्पष्ट कीजिए।
(iii) द्रोपदी के स्वयंवर के प्रतीक को लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा सहयोग प्रदान करने की निरंतरता और उसके प्रति महत्त्वाकांक्षा का उद्घाटन किया गया है। प्रेरणा जगाने के मूल भाव के द्वारा इसे प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘धनुष की प्रत्यंचा’ रूपकार्थ प्रस्तुत है, जिसका मूल और सांकेतिक दोनों ही अर्थ है-पूर्ण रूप से सहयोग प्रदान करना। धनुष की प्रत्यंचा से बाण को छोड़कर लक्ष्य साधने का प्रयास सफलता को प्रदान करता है। सहयोग से भी लक्ष्य की प्राप्ति आसान हो जाती है।
(iii) द्रोपदी का स्वयंवर प्रतियोगिता और सर्वाधिक एवं सर्बोच्च पुरुषार्थ प्रदर्शित करने का प्रतीक है।

10. तुम्हें खुश देख लेता हूँ
मेरा मन झूम उठता है।
तुम्हें गमगीन जब देखू
मेरा मन सूख जाता है।

शब्दार्थ-गमगीन-उदास। सूख जाता है-दुखी हो जाता है।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक उदार और सुयोग्य अध्यापक के अपने छात्र के प्रति व्यक्त की गई अत्यधिक आत्मीयता का उल्लेख किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मेरी भावना तुमसे अटूट रूप से जुड़ी हुई है। इसलिए मैं तुम्हारे हर सुख-दुख में हरदम जुड़ा हुआ हूँ। यही कारण है कि जब मैं तुम्हें सुखी और आनंदित देखता हूँ, तब मैं गद्गद् हो उठता हूँ। इसके विपरीत जब मैं तुम्हें उदास और चिन्तित देखता हूँ, तब मैं दुखी होने लगता हूँ। कहने का भाव यह कि तुम खुश हो तो मैं खुश हूँ और तुम दुखी तो मैं भी दुखी।

विशेष-

  1. सम्पूर्ण कथन सुस्पष्ट है।
  2. शैली आत्मीय है।
  3. उर्द शब्दों की प्रधानता है।
  4. ‘मेरा मन’ में अनुप्रास अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ ।
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’ ।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य-विधान बिल्कुल सरल और सामान्य है। उर्दू शब्दों के द्वारा अनुप्रास अलंकार के चमत्कार को तुकान्त शब्द-योजना से प्रभावशाली बनाने का प्रयास उल्लेखनीय है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सरल तो है, लेकिन सपाट है। बिना किसी लाग-लपेट के कथन को प्रस्तुत करने का ढंग अनोखा है। इससे कथ्य का तथ्य बड़ी आसानी से स्पष्ट हो रहा है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
(ii) ‘झूम उठना’ और ‘सूख जाना’ किस प्रकार के शब्द-प्रयोग हैं? स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में आत्मीयता पूर्ण भावों का उल्लेख हुआ है, जो परस्पर कटुता और दूरी को समाप्त कर निकटता और अभेद को उत्पन्न करने के लिए अपेक्षित हैं।
(ii) ‘झूम उठना’ और ‘सूख जाना’ परस्पर विपरीतार्थ शब्द-प्रयोग हैं। खुशी के साथ गम के प्रतीक ये शब्द हमारे जीवन की सच्चाई को व्यक्त करते हैं।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश से हमें परस्पर मेल-मिलाप की शिक्षा मिलती है। परस्पर सहयोग और सहानुभूति रखना ही जीवन की महानता है, यह भी शिक्षा मिलती है।

11. मैं साधना हूँ
तुम सिद्धि बन जाना,
मैं नयन हूँ
तुम दृष्टि बन जाना,
विजय का स्तम्भ हूँ मैं
तुम विजय का केतु बन जाना,
हथेली पर तुम विजय कर
‘आज’ रख लेना,
मानस पिता हूँ मेरी
लाज रख लेना।
मेरी लाज रख लेना।

शब्दार्थ-साधना-तपस्या। सिद्धि-फल । नयन-आँख । स्तंभ-खंभा। केतु-पताका, झंडा। मानस-मन से उत्पन्न।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान, सुयोग्य और उदार शिक्षक का अपने छात्र के प्रति दी गई प्रेरणादायक बातों का उल्लेख किया है। अध्यापक का अपने छात्र से कहना है

व्याख्या-तुम सदैव अपने प्रगति-पथ पर बढ़ते चलो, मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहूँगा। इसके लिए मैं साधना बनकर तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम सफलता बनकर आगे बढ़ते जाना। इसी प्रकार मैं तुम्हारे आँख बनकर रहूँगा, तो तुम ज्योति रूप में बढ़ते चले जाना। इसी प्रकार में तुम्हारे विजय के स्तंभ के रूप में मौजूद रहँगा, तो तुम विजय की पताका बनकर फहराते चलते चले जाना। तुम्हें आज इन बातों को बड़ी गंभीरतापूर्वक अमल करना नहीं भूलना है यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारा मानस पिता हूँ। इसे समझकर तुम आज मेरी इन बातों को हृदय से स्वीकार करके मेरी महिमा को बनाए रखना। तुमसे मेरी यही उम्मीद भी है कि तुम मेरा महत्त्व घटाओगे नहीं अपितु बढ़ाते ही जाओगे।

विशेष-

  1. मुक्तक छंद है।
  2. वीर रस का प्रवाह है।
  3. ‘विजय की स्तंभ होना’ और ‘लाज रख लेना’ मुहावरों के साथ प्रयोग है।
  4. शैली आत्मीय और भावपूर्ण है।
  5. भाषा के शब्द अत्यन्त सरल हैं।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना सरल और नपे-तुले शब्दों पर आधारित है। परस्पर अर्थों की समानता की शब्द-योजना से भावों की स्पष्टता दिखाई दे रही है। मुक्तक छन्द के इस प्रवाह में लय-संगीत की मधुरता बहुत मोहक है। बिम्बों-प्रतीकों की प्रस्तुति प्रशंसनीय है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान सहज और अपेक्षित रूप में है। पथ-प्रदर्शक की प्रेरणा और उसकी अपेक्षाएँ मर्यादित और सीमाबद्ध हैं। इसके माध्यम से उपदेशात्मक लक्ष्य को रखने का कवि-प्रयास निश्चय ही काबिलेतारीफ है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त. पद्यांश का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में किन भावों को महत्त्व दिया गया है और क्यों?
(iii) ‘लाज रखने का मुख्यार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा अध्यापक की सद्भावनाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया है। इसे अत्यधिक उपयोगी और अपेक्षित रूप में भी लाने का एक प्रयास प्रस्तुत हुआ है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में आत्मीयतापूर्ण भावों को महत्त्व दिया गया है। यह इसलिए यह आज समाज में नहीं है। इसके बिना समाज का रूप बिगड़ रहा है। इसलिए उसकी आज सख्त जरूरत है।
(iii) ‘लाज रखने’ का मुख्यार्थ मर्यादा-महत्त्व को बचा लेना। आज अध्यापक की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। उसे उसका अपना ही कोई छात्र बचा सकता है।

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