MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय (सुभद्रा कुमारी चौहान)

बालिका का परिचय अभ्यास-प्रश्न

बालिका का परिचय लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इस कविता में जीवन-ज्योति का क्या आशय है? स्पष्ट करें।
उत्तर
इस कविता में जीवन-ज्योति का आशय है-जीवन का आधार । बिटिया के प्रति माँ का वात्सल्य प्रेम अनन्य होता है। वह उसके लिए अतुल्य होता है।

प्रश्न 2.
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है’ यह भाव किस पंक्ति में है? चुनकर लिखिये।
उत्तर
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है। यह भाव निम्नलिखित पंक्ति में हैं-‘दीपशिखा है अंधकार की।’

बालिका का परिचय सही उत्तर चुनिये

प्रश्न 1.
बेटी का परिचय कौन सबसे अच्छा दे सकता है?
(क) पिता
(ख) माता
(ग) दादा
उत्तर
(ख) माता।

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प्रश्न 2.
इस कविता में कौन-सा भाव है?
(क) श्रृंगार
(ख) वीरता
(ग) वात्सल्य
उत्तर
(ग) वात्सल्य।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालिका परिचय कविता का सारांश लिखिये।
उत्तर
देखें-‘कविता का सारांश’।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा क्यों कहा है स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा कहा है। यह इसलिए कि किसी भी माँ की गोद में उसकी बालिका का मचलना एक न केवल अपूर्व आनन्द देता है, अपितु मन को मोह भी लेता है। इससे माँ का हृदय बाग-बाग हो उठता है। उस समय की शोभा देखते ही बनती है।

प्रश्न 3.
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का क्या आशय है?
उत्तर
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का आशय है-बाल-सुलभ क्रियाएँ मन को भाने वाली और गुदगुदाने वाली होती है। अतएव उसे देखकर सभी आनन्द से झूम उठते हैं।

प्रश्न 4.
निम्न पंक्तियों का भावार्थ लिखो।
(क) मेरा मन्दिर …………………….. मेरी।
उत्तर
उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि किसी माँ के लिए उसकी बालिका सब कुछ होती है। माँ अपनी बालिका को किसी मन्दिर, मस्जिद, काबा, काशी, पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप से कम नहीं समझती है। इस प्रकार वह अपने हृदय में बसाए रहती है।

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(ख) प्रभु ईशा ………………………….. पास ॥
उत्तर
(ख) उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि बालिका में महान आत्माओं के गुण होते हैं। उसमें ईसामसीह की क्षमाशीलता, नबी-मुहम्मद का विश्वास और महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीव-दया के भाव भरे होते हैं।

प्रश्न 5.
वही जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥
इन पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
इन पंक्तियों का भाव यह है कि बालिका के महान और उच्च गुणों का वर्णन करना सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कि बालिका की महानता और श्रेष्ठता को कह-सुनकर नहीं, अपितु अनुभव करके ही जाना-समझा जा सकता है।

प्रश्न 6.
बेटी की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर
बेटी की तुलना राम, कृष्ण, ईसामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से की गई है।

बालिका का परिचय भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

क. कविता में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है। जैसे जीवन-ज्योति नष्ट नयनों की पंक्ति में ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति हुई है। कविता में से अनुप्रास अलंकार छाँटकर लिखिए।
ख. निम्नलिखित उदाहरण में ‘पतझड़ के साथ हरियाली का प्रयोग कर काव्य में विरोधाभास के सौन्दर्य को प्रस्तुत किया गया है। कविता में से इस प्रकार की अन्य पंक्तियाँ छाँटिए।
उदाहरण-
है पतझड़ की हरियाली
पतझड़ की हरियाली है।
उत्तर-(क) ‘सुख-सुहाग, शाही शान, मनोकामना मतवाली, घनी घटा. मस्ती मगन. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद, काबा-काशी, पूजा-पाठ, जप-तप, अपने आँगन और मात्र मोदे।

1. शाहीशान भिखारिन की है।
भिखारिन की शाही शान है।

2. दीपशिखा है अंधकार की।
अंधकार की दीपशिखा है

3. सुधा-धार यह नीरस दिल की।
नीरस दिल की यह सुधा-धार।

बालिका का परिचय योग्यता-विस्तार

प्रश्न
1. भारतीय संस्कृति में ‘कन्या’ के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए दो अनुच्छेद लिखिए।
2. धर्म अनेक परन्तु सन्देश एक है। हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई, धर्मों के मूल आदर्श जानिए, उनकी और शिक्षाओं और मूल्यों के चार्ट तैयार कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

बालिका का परिचय परीक्षोपयोग अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का आशय है-बालिका का अद्भुत प्रभाव। किसी माँ के लिए उसकी बालिका अमृत की धारा के समान होती है। अर्थात् बालिका अपनी माँ के सूनेपन को दूर कर उसमें चंचलता और सजीवता ला देती है।

प्रश्न 2.
इस कविता में किसके परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है?
उत्तर
इस कविता में माँ और बेटी के परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है।

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प्रश्न 3.
इस कविता में कवयित्री की कौन-सी भावना प्रकट हुई है?
उत्तर
इस कविता में कवयित्री की ‘बेटी माँ के भविष्य की निर्मात्री है’ यह भावना प्रकट हुई है।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इस कविता में रूपक अलंकार की छटा है। आप उन्हें छाँटकर लिखिए।
उत्तर
सुख-सुहाग की लाली, सुधा-धार और जीवन-ज्योति।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका के लिए कौन-कौन से उदाहरण प्रस्तुत किए हैं?
उत्तर
कवयित्री ने बालिका के लिए.अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, आँखों की ज्योति. ईशामसीह की क्षमा, नबी मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध की दया को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

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प्रश्न 3.
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत कविता ‘बालिका का परिचय’ कवयित्री श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की भाववर्द्धक कविता है। सुभद्राकुमारी चौहान ने इसमें वात्सल्य रस को उड़ेल दिया है। इसे लक्ष्य कर लिखी गई यह रचना ‘बालिका का परिचय’ आज भी मील का पत्थर कही जा सकती है। प्रस्तुत कविता में कवयित्री का मानो उनका मातृ हदय ही साकार हो उठा है। वे नन्हीं बालिका को अधिक प्रभावशाली रूप में अनुभव करती हैं। इसके लिए वे बालिका को अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, नयनों की ज्योति, ईशा की क्षमा, मुहम्मद का विश्वास तथा गौतम की दया जैसे अनेक यशस्वी प्रतीकों के रूप में देखती हैं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि उन्होंने माँ और शिशु के बीच के रागात्मक सम्बन्ध का नैसर्गिक चित्रण किया है। “बेटियाँ भविष्य की निर्माता हैं।” कवयित्री की यही भावना उनकी इस कविता में दिखाई देती है।

बालिका का परिचय कवयित्री-परिचय

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान वीर रस की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री हैं। जीवन परिचय-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयाग के निहालपुर महसे में श्री रामनाथ सिक नामक एक सुशिक्षित परिवार में हुआ था। आपके पिता सम्पन्न, ईश्वरभक्त, उदार, विद्यानुरागी एवं राष्ट्रीय-विचारधारा वाले व्यक्ति थे। आपकी प्रतिभा बचपन से ही विलक्षण थी। इससे प्रभावित होकर आपकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था हुई थी। आप प्रयाग के क्राइस्ट कालेज में अध्ययन करते समय काव्य-रचना किया करती थीं। उस समय भी आपकी कविताएँ राष्ट्रीय-भावों से ओत-प्रेत हुआ करती थीं। उसमें तत्कालीन राष्ट्रीय-आन्दोलनों की झलक, स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीयता की बलवती भावना मुखरित होती थी। ये ही भावनाएँ आपकी आगामी कविता की प्रेरणा-शक्ति बनकर आयीं। ‘कर्मवीर’ पत्र में प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से आपकी ख्याति अमर हो गई। आपका विवाह सन् 1919 में खण्डवा निवासी ठाकुर लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ। पति की स्वीकृति लेकर आपने अपने अध्ययन का क्रम नहीं छोड़ा। बनारस के थियोसोफिकल स्कूल में प्रवेश लेकर अध्ययन जारी रखा। महात्मा गाँधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आन्दोलन में आपने जमकर भाग लिया। फलतः आपको कई बार जेल जीवन बिताना पड़ा। इस स्थिति में भी आपने अपनी पारिवारिक व्यवस्था को अव्यवस्थित नहीं होने दिया। सन् 1934 ई. में आप विधान-परिषद् की सदस्या बनीं। सन् 1948 ई. में एक मोटर दुर्घटना में आपकी असामयिक मृत्यु हो गई।

कृतियाँ-आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. काव्य-संग्रह-

  • ‘मुकुल’
  • ‘नक्षत्र’
  • त्रिधारा’

2. कहानी-संग्रह

  • ‘सीधे-साधे चित्र’
  • ‘बिखरे मोती’
  • ‘उन्मादिनी’।

3. बाल-साहित्य-‘सभा के खेल’। भाषा-शैली-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान की भाषा सरल और प्रवाहमयी है। वह रोचक और हृदयस्पर्शी है। उसमें ओज और वेग है। वीर रस, करुण रस, वात्सल्य, शान्त रस आदि आपके प्रिय रस हैं। उपमा, अनुप्रास, मानवीकरण, उत्प्रेक्षा आदि आपके रुचिप्रद अलंकार हैं। बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग आपने यथावत् किए हैं। श्रीमती सुभ्रदा कुमारी चौहान की शैली चित्रात्मक, काव्यात्मक और भावात्मक गरसमें प्रवाहमयता और बोधगम्यता नामक शैलीगत विशेषताएँ अधिक रूप में दिखाई देती हैं। मूल रूप से आपकी शैली उपदेशात्मक और प्रेरणादायक है। वह सहज होकर भी कठिन दिखाई देती है।

साहित्यिक महत्त्व-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का साहित्यिक महत्त्व वीर रस काव्य-क्षेत्र में सर्वोच्च है। आपने राजनीति और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में अपनी बहुत बड़ी पहचान बनाई है। यही नहीं आपने ग़द्य-पद्य दोनों ही साहित्यिक विधाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है। एक ओर जहाँ ‘झाँसी की रानी’ कविता हर युवक की जबान पर है, वहीं दूसरी ओर बचपन सम्बन्धी कविताएँ प्रत्येक को मधुर बचपन की याद दिलाती हैं। यही नहीं आप एक सफल कहानी लेखिका भी हैं। आपकी कहानियों में नारी-जीवन, शोषित-समाज और पारिवारिक-जीवन का मार्मिक चित्रण है। आपका साहित्यिक-महत्त्व रखने के लिए आपके काव्य-संग्रह ‘मुकुल’ पर सन् 1931 ई. में आपको सेक्सरिया पुरस्कार मिला था।

बालिका का परिचय कविता का सारांश

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ माता के हृदय के भावों को प्रकट करने वाली एक ज्ञानवर्द्धक कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवयित्री अपनी बेटी के प्रति अपने वात्सल्य भावों को उडेलती हई कह रही है कि वह उनकी गोदी की शोभा और सुख-सुहाग की लालिमा है। वह अंधकार की दीपशिखा, घनी घटाओं की चमक, उषा काल में कमल-भंगों (भौरी) की तरह सुखदायक है,तो पतझड़ की हरियाली है। नीरस और उदास हदय में अमत की धारा बहाने वाली है तो मस्त मगन तपस्वी के समान है। ज्योति खोई आँखों की जीवन-ज्योति और मनस्वी की सच्ची लगन है। बीते हुए बचपन की क्रीड़ामयी वाटिका है। यह तो मेरे लिए मन्दिर-मस्जिद, काबा-काशी के समान है। यह तो मेरी पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप है। उसने अपने आँगन में बालक कृष्ण की क्रीड़ाओं को देखा है। माता कौशल्या की प्रसन्नता को अपने मन के भीतर देखा। आओ सभी ईशामसीह की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद के विश्वास, और गौतम बुद्ध का जीवों के प्रति दया की भावना को बालिका के पास आकर देख लें। अगर कोई उससे परिचय पूछ रहा है, तो वह उसका किस प्रकार परिचय दे सकती है। उसे तो वही अच्छी तरह से जान सकता है, जिसमें माता का दिल है।

बालिका का परिचय संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. यह मेरी गोदी की शोभा,
सुख सुहाग की है लाली।
शाही शान भिखारिन की है,
मनोकामना मतवाली ॥1॥

दीपशिखा है अंधकार की,
घनी घटा की उजियाली।
उषा है यह कमल-भंग की,
है पतझड़ की हरियाली ॥2॥

शब्दार्थ-सुहाग-सौभाग्य। शाही-सम्पन्नता, वैभव। शान-स्वाभिमान। दीप शिखा-दीपक की लौ। भृग-मौंरा।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी सामान्य’ में संकलित तथा श्रीमती सुभद्रा कुमारी विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ से है। इसमें कवयित्री ने अपनी बेटी को अपनी गोद की शोभा और सुख-सौभाग्य की लालिमा मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-यह मेरी बिटिया मेरी गोद की शोभा और मेरे सुख-सौभाग्य की लालिमा है। यह मेरे लिए भिखारिन की शाही शान और मेरी स्वच्छन्द मनोकामना को पूरी करने के लिए मानो मतवाली बनी रहती है। यह मेरे दुख-अभाव रूपी अंधकार की दीपशिखा और कठिनाइयों की उमड़ती घटाओं के बीच उत्पन्न आशा रूपी उजियाली है। यही नहीं, यह तो मेरे लिए वैसे ही सुखकर और आनन्द है, जैसे उषा के होने पर कमलों-भौरों को आनन्द और सुख मिलता है। इसी प्रकार यह मेरे जीवन में आए पतझड़ के लिए हरियाली स्वरूप है। कहने का भाव यह कि मेरी बिटिया मेरे जीवन के लिए हर प्रकार से सुखद और आनन्ददायक है।

विशेष-

  1. कवयित्री का वात्सल्य भाव सच्चे रूप में है।
  2. वात्सल्य रस का संचार है।
  3. भाषा सरल और सुबोध है।
  4. रूपक अलंकार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-विधान वात्सल्य रस से लबालब है। उसे रूपक अलंकार से आकर्षक बनाकर सरल और सुबोध शब्दावली से रोचक बनाने का प्रयास सचमुच में सराहनीय है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना में सरलता और स्वाभाविकता है, तो रोचकता और प्रवाहमयता भी है। इस तरह यह पद्यांश भाववर्द्धक रूप में है। यह कहा जा सकता है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने क्या किया है?
(ii) बालिका का चरित्र कैसा है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने बालिका का परिचय दिया है।
(ii) बालिका का चरित्र अत्यधिक विशुद्ध और स्वाभाविक है।

2. सुपा-धार यह नीरस दिल की मस्ती मगन तपस्वी की।
जीवन ज्योति नष्ट नयनों की सच्ची लगन मनस्वी की॥3॥

बीते हुए बालपन की यह क्रीड़ा पूर्ण वाटिका है।
वही मचलना, वही किलकना हँसती हुई नाटिका है।।4।।

शब्दार्च
सुधा-धार-अमृत की धार। नयनों-आँखों। मनस्वी-बुद्धिमान। बालपन-बचपन। नाटिका-नाटक करने वाली।

प्रसंग-पूर्ववत । इसमें कवयित्री ने अपनी बिटिया को नीरस दिल में अमृत धारा प्रवाहित करने वाली मानते हुए कहा है।

व्याख्या-मेरी बिटिया मेरे नीरस हृदय के लिए अमृत की धारा है। इसकी मस्ती और प्रसन्नता किसी तपस्वी से कम नहीं है। आँखों की गयी हुई रोशनी को वापस लाने वाली यह जीवन की ज्योति के समान है। इसमें बुद्धिमानों की तरह सच्ची लगन है। यह मेरे बीते हुए बचपन को लौटाने वाली क्रीड़ामयी वाटिका की तरह है। इसका मचलना और किलकना किसी हँसती हुई नाटिका से किसी प्रकार कम नहीं है।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली सरल और सुबोध है।
  2. शैली चित्रात्मक है।
  3. रूपक अलंकार है।
  4. वात्सल्य रस का संचार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न(i) प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-स्वरूप सरल और सुबोध शब्दावली से होकर वात्सल्य रस में प्रवाहित हुआ है। इसमें चमत्कार लाने के लिए किया गया रूपक अलंकार का प्रयोग मन को और लुभा रहा है।
(ii) प्रस्तुत पयांश की भाव-योजना हृदय को बड़ी आसानी से छू रही है। बालिका के प्रति वात्सल्य भावना की सच्चाई की रोचकता निश्चर्य ही आकर्षक है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) बालिका को किन-किन रूपों में प्रस्तुत किया गया है?
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से क्या अनुभूति होती है?
उत्तर
(i) बालिका को अमृत की धारा, मस्त मगन तपस्वी, जीवन-ज्योति, मनस्वी की सच्ची लगन, क्रीड़ामयी वाटिका और हँसती हुई नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से बीते हुए बचपन की अनुभूति होती है।

3. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद
काबा-काशी यह मेरी।
पूजा-पाठ, ध्यान-जप-तप है
घट-घट वासी यह मेरी ॥5॥

कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को
अपने आँगन में देखो।
कौशल्या के मात्र-मोदे को।
अपने ही मन में लेखो ॥6॥

शब्दार्थ-काबा-मुसलमानों का धार्मिक स्थान । घट-घट बासी-अन्दर निवास करने वाला परमात्मा। कृष्णचन्द्र-बालक श्रीकृष्ण। लेखो-देखो।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवयित्री ने बालिका को धर्मस्वरूप मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-मेरे लिए यह मेरी बेटी मन्दिर-मस्जिद, काबा, काशी के समान अत्यन्त पवित्र है। यह मेरे लिए पूजा-पाठ और ध्यान, जप-तप के समान है। यह मेरे घट-घट में निवास करती है। इस प्रकार मैंने अपनी बालिका को अपने आँगन में अनेक प्रकार के खेल-खेलते हुए देखा, तो मुझे ऐसा लगा मानो बालक श्रीकृष्ण ही मेरे ऑगन में बाल-क्रीड़ा कर रहे हैं। इसे आप लोग भी अपनी-अपनी बालिकाओं में देख सकते हैं। इस प्रकार माता कौशल्या के आनन्द को अपने मन में अनुभव कर सकते हैं।

विशेष-

  1.  भाषा में सजीवता है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. वात्सल्य रस का प्रवाह है।
  4. सामाजिक शब्दावली है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश वात्सल्य रस की सहज धारा से प्रवाहित है, जो सरल शब्दावली से पुष्ट हुआ है। अनुप्रास अलंकार (कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं की, अपने आँगन, मात्र मोदे और मन में) के आकर्षक प्रयोग से यह पद्यांश प्रभावशाली बन गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरल, स्वाभाविक और भाववर्द्धक है। यह पूरी तरह से बोधगम्य और हृदय को छू लेने वाला है। बालक के चरित्र की पवित्रता का उल्लेख सचमुच में बड़ा ही अनूठा है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर प्रश्न-10 बालिका की पवित्रता कैसी है?

(i) बालिका की बाल-लीला कैसी होती है? उत्तर-0 बालिका की पवित्रता मन्दिर, मस्जिद, काबा और काशी जैसी है।
(ii) बालिका की बाललीला बालक राम-कृष्ण जैसी होती है।

4. प्रभु ईशा की क्षमाशीलता
नवी मुहम्मद का विश्वास।
जीव दया जिनवर गौतम की
आओ देखो इसके पास ॥7॥

परिचय पूछ रहे हो मुझसे
कैसे परिचय हूँ इसका।
वहीं जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥8॥

शब्दार्थ-ईशा-ईशामसीह। नबी-इस्लाम धर्म के महापुरुष। जिनवर-तीर्थकर/ महावीर स्वीमी।

प्रसंग-पूर्ववत्। उसमें कवयित्री ने बालिका को संसार के महापुरुष के समान बतलाने का प्रयास किया है। इसके लिए कवयित्री का कहना है कि

व्याख्या-चूँकि बालिका का तन-मन स्वच्छंद और पवित्र भावों से भरा होता है।

इसलिए उसमें ईशामसीह की क्षमाशीलता और नबी-मुहम्मद के अटूट विश्वास को समझा जा सकता है। यही नहीं, उसमें महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति अपार दया की भावना जैसे अद्भुत और अनोखे उच्च गुणों को देखा-परखा जा सकता है। कवयित्री का पुनः कहना है कि अगर कोई उससे बालिका का परिचय पूछे तो वह क्या दे सकती है। उसका तो यही कहना है कि बालिका को एक माता का दिल ही सचमुच में जान सकता है।

विशेष-

  1. बालिका के उदार और विशाल हृदय को अत्यधिक श्रेष्ठ कहा गया है।
  2. ईशामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से बालिका की तुलना की गई है। इसलिए इसमें उपमा अलंकार है।
  3. उदाहरण शैली है।
  4. सम्पूर्ण कथन अत्यधिक रोचक है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश को उपमा अलंकार की झड़ी लगाकर अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास सचमुच में प्रशंसनीय है। इसे और रोचक बनाने के लिए भाषा को धारदार बनाकर कथन की सच्चाई का सामने लाया गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान स्वाभाविक, यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय और हदयस्पर्शी है। बालिका की अद्भुत विशेषता को महानतम रूप में लाने का कवयित्री का प्रयास न केवल अनूठा है, अपितु प्रेरक भी है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बालिका के असाधारण गुण कौन-कौन से हैं?
(ii) बालिका की सच्चाई को कौन बता सकता है?
उत्तर
(i) बालिका के असाधारण गुण हैं-ईशामसीह की क्षमाशीलता, नवी-मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति दया-भावना।
(ii) बालिका की सच्चाई माता ही बता सकती है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 धनुष की प्रत्यंचा

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 धनुष की प्रत्यंचा (डॉ. देवेन्द्र दीपक)

धनुष की प्रत्यंचा अभ्यास-प्रश्न

धनुष की प्रत्यंचा लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तूफानों से खेलने का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
तूफानों से खेलने का आशय है-निडर होकर बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए जीवन-पथ पर आगे बढ़ते जाना।

प्रश्न 2.
कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी के लिए किस प्रकार सेतु बन सकता है?
उत्तर
कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी के लिए उसके हौसला को बढ़ाकर सेतु बन सकता है।

प्रश्न 3.
प्रत्यंचा को शक्ति के साथ खींचने से कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रत्यंचा को शक्ति के साथ खींचने से कवि का आशय है-वह जितनी अधिक शक्ति से खींची जाएगी, वह उतनी ही तेजी से और शक्ति से लक्ष्य को भेदने तक तीर को फेंकती है। दूसरे शब्दों में, पूरी शक्ति और युक्ति से ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

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प्रश्न 4.
शिष्य की प्रसन्नता और दुख का गुरु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
शिष्य की प्रसन्नता और दुख का गुरु पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। शिष्य को प्रसन्न देखकर गुरु प्रसन्न होता है और शिष्य को दुखी देखकर गुरु दुखी हो जाता है।

प्रश्न 5.
गुरु ने शिष्य को अंशज और बंशज क्यों कहा है?
उत्तर
गुरु ने शिष्य को अंशज और वंशज कहा है। यह इसलिए कि उसकी विशेषताएँ उसमें मिलती-जुलती हैं।

प्रश्न 6.
कवि का मन खुशी से कब झूमने लगता है?
उत्तर
कविका मन तब खुशी से झूमने लगता है, जब शिष्य अपने गुरु के पास अपने मौलिक भावों से स्वाभिमानपूर्वक जीवन-अर्थ का नयापन लेकर आता है।

धनुष की प्रत्यंचा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘शूल के बीच ही फूल खिलता है’ इसका आशय प्रस्तुत कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शूल के बीच ही फूल खिलता है।’ इस तथ्य की सत्यता यह है कि गुरु की डाँट-फटकार और कड़े अनुशासन में रहने वाला शिष्य बहुत योग्य और महान बनता है। उसमें ऐसे-एसे गुणों की पैठ हो जाती है कि वह अपने जीवन में आने वाली बाधाओं को झुकाकर आगे बढ़ जाता है। इससे सफलता उसे चूम लेती है।

प्रश्न 2.
‘मीन को बेंधने’ में कौन-सी पौराणिक अन्तर्कया निहित है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
मीन को बेंधने में महाभारत की पौराणिक अन्तर्कथा निहित है। इसमें वह कथा निहित है, जो द्रोपदी स्वयंवर की है। उस स्वयंवर में अर्जुन नीचे रखे हुए जल में देखकर ऊपर रखी हुई और नाचती हुई मछली की आँख में तीर से निशाना लगाया था। शर्त के अनुसार द्रोपदी के साथ उनका विवाह हुआ था।

प्रश्न 3.
“में नींव बन नीचे रहूँगा।” इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मैं नींव बन नीचे रहूँगा’। इस पंक्ति का गहरा और बड़ा अर्थ। इसमें गुरु का अपने शिष्य के प्रति आत्मीय त्याग के भाव भरे हुए हैं। गुरु सदा ही अपने शिष्य के सख और उसके विकास के लिए अपना योगदान देने से पीछे नहीं हटता है। उसका तो एकमात्र यही उद्देश्य होता है कि उसका शिष्य महान बने। वह अपने शिष्य की उन्नति और उसकी अच्छाई के लिए यह सब कुछ करने-सहने के लिए तैयार रहता है। यहाँ उसके जीवन-भवन की नींव बनने के लिए सहर्ष तैयार रहता है।

प्रश्न 4.
कवि शिष्य को कहाँ उतरने की सलाह देता है? इस कविता के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कवि शिष्य को जीवन-संग्राम में उतरने की सलाह देता है। वह उसे अपने गुरु से आशीर्वाद लेकर आँधी-तूफान आदि से टकराने-खेलने की सलाह देता है। वह उसे सभी प्रकार की बाधाओं को अपनी छाती पर झेलने की भी सलाह-उत्साह देता है।

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प्रश्न 5.
‘अज्ञान की मीन को तुम बेंध डालो’
सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।’
इन पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ आज के हताश और भटके हुए विद्यार्थियों को प्रेरित करने के संदर्भ में हैं। द्रोपदी स्वयंवर के प्रसंग के द्वारा इन विद्यार्थियों को अपनी हताशा को त्याग कर सफलता प्राप्त करने की सीख दी गई है। इससे सफलता निश्चय ही कदम चूम लेगी। इसकी संभावना ही निश्चयात्मकता भी है। लेकिन यह तभी संभव है जब आज का यह हताश-निराश विद्यार्थी वर्ग अर्जुन की तरह पुरुषार्थी और कर्मठ हो।

प्रश्न 6.
में साधना हूँ…केतु बन जाना।’ इन पंक्तियों का भावार्य संदर्भ-प्रसंग सहित लिखिए।
उत्तर
तुम सदैव अपने प्रगति-पथ पर बढ़ते चलो, मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहूँगा। इसके लिए मैं साधना बनकर तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम सफलता बनकर आगे बढ़ते जाना। इसी प्रकार मैं तुम्हारे आँख बनकर रहूँगा, तो तुम ज्योति रूप में बढ़ते चले जाना। इसी प्रकार में तुम्हारे विजय के स्तंभ के रूप में मौजूद रहँगा, तो तुम विजय की पताका बनकर फहराते चलते चले जाना। तुम्हें आज इन बातों को बड़ी गंभीरतापूर्वक अमल करना नहीं भूलना है यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारा मानस पिता हूँ। इसे समझकर तुम आज मेरी इन बातों को हृदय से स्वीकार करके मेरी महिमा को बनाए रखना। तुमसे मेरी यही उम्मीद भी है कि तुम मेरा महत्त्व घटाओगे नहीं अपितु बढ़ाते ही जाओगे।

प्रश्न 7.
आज का विद्यार्थी उदास और अनिश्चय की स्थिति में क्यों है? प्रस्तुत कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आज का विद्यार्थी उदास और अनिश्चय की स्थिति में है। यह इसलिए कि वह अज्ञानमय कुआँ में डूब रहा है। उसे बाहर निकालने वाला कोई योग्य अध्यापक नहीं दिखाई दे रहा है। यह निराधार होकर इधर-उधर भटक रहा है। अगर उसे आत्मीय और सहदय प्राप्त हो जाए तो उसकी उदासी और निराशा देखते-देखते दूर हो जाएगी। फिर वह सफलता के शिखर पर चढ़ता ही जाएगा।

प्रश्न 8.
‘शिष्य के लिए गुरु की महिमा’ विषय पर अपना बिचार लिखिए।
उत्तर
‘शिष्य के लिए गुरु की महिमा’ निस्संदेह है। गुरु के बिना शिष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। गुरु के बिना शिष्य अज्ञानमय अंधकार में डूबा रहता है। वह
उसकी ज्ञानमयी किरणों के बिना बाहर निकल पाने में असमर्थ रहता है। जैसे गुरु की ज्ञानमयी किरणें शिष्य पर पड़ने लगती हैं; वैसे ही शिष्य का अज्ञानान्धकार दूर हो जाता है। फिर वह हर प्रकार से सक्षम और योग्य बनकर जीवन के विकास पथ पर बढ़ने लगता है।

प्रश्न 9.
छात्र की योग्यता के विकास की यात्रा में शिक्षक की क्या भूमिका होती है?
उत्तर
छात्र की योग्यता के विकास की यात्रा में शिक्षक की भूमिका बहुत बड़ी होती है। शिक्षक छात्र के अज्ञान को दूर करके, उसे सर्व समर्थ बनाने की शिक्षा देता है। एक योग्य शिक्षक की यह योग्यता होती है कि वह अपने युग और युग की आवश्यकता का सच्चा पारखी होता है। उसका आंकलन वह अपने छात्र में करता है। उसे युग की कसौटी पर खरा उतरने के उपयुक्त और अनुकूल शिक्षा देता है। इस तरह से एक योग्य शिक्षक अपने छात्र की योग्यता का विकास कर बहुत बड़ी भूमिका को निभाता है।

धनुष की प्रत्यंचा भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
कंठ-कंठ के शब्द पुनरुक्त शब्द हैं। इस प्रकार के अन्य शब्द पाठ में से छाँटकर लिखिए।
प्रश्न 2.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों के तत्सम शब्द रूप लिखिए।
भौंह, जोत, मछली, फूल, नैन।

प्रश्न 3
‘अंधकार’ में कार तवा ‘कटोरता’ में ता प्रत्यय जुड़े हैं इसी प्रकार ‘कार’
तथा ‘ता’ जोड़कर 5-5 नए शब्द बनाइए।
उत्तर
1. कभी-कभी, तनी-तनी, जब-जब, तब-तब, गड़ी-गड़ी।

2. तुभव शब्द तत्सम शब्द ।
भाह – भौं
जोत – ज्योति
मछली – मत्स्य
पुष्प – पेश
नैन – नेत्र

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3. ‘कार’ और ‘ता’ प्रत्यय से जुड़े 5-5 नए शब्द
(क) ‘कार’ प्रत्यय से जुड़े शब्दशब्द
प्रत्यय
रचना – रचनाकार
दर – दरकार
बद – बदकार
अदा – अदाकार
पेशकार – फल

(ख) ‘ता’ प्रत्यय से जुड़े नए
शब्द – प्रत्यय
अधीर – अधीरता
कोमल – कोमलता
मधुर – मधुरता
मूर्ख – मूर्खता
शिष्ट . शिष्टता।

धनुष की प्रत्यंचा योग्यता-विस्तार

1. शिक्षक की गरिमा से संबंधित अन्य कोई प्रसंग या कविता खोजकर लिखिए।
2: आप शिक्षक बनकर कौन-कौन से कार्य करना चाहेंगे लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

धनुष की प्रत्यंचा परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उदास और मलिन चेहरा होने का क्या कारण है?
उत्तर
उदास और मलिन चेहरा होने का कारण है-अज्ञानमय अंधकार में पूरी तरह से डूब जाना।

प्रश्न 2.
सेतु-निर्माण का क्या उद्देश्य है?
उत्तर
सेतु-निर्माण का उद्देश्य बहुत बड़ा है। इस पर निडर और निश्चित होकर ही अंधकार को पार कर ज्योति का द्वार खोला जा सकता है।

प्रश्न 3.
कवि ने कटोरता की विवशता की क्या विशेषता बतलायी है?
उत्तर
कवि ने कठोरता की विवशता की यह विशेषता बतलायी है कि कठोरता सीपी है, जिसमें मोती पलती-बढ़ती है।

प्रश्न 4.
झिड़कियाँ और तनी-तनी भृकुटियों के प्रतीक को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
झिड़कियाँ और तनी-तनी भृकुटियाँ शूलस्वरूप रक्षा-परिधि की प्रतीक हैं। इनके ही बीच में आशा रूपी फूल खिलते हैं।

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प्रश्न 5.
कवि ने अध्यापक द्वारा अपने छात्र को जीवन-संग्राम में उतरकर विजयी होने की किन-किन विशेषताओं से उसके हौसले को बढ़ाया है?
उत्तर
कवि ने अध्यापक द्वारा अपने छात्र को जीवन-संग्राम में उतरकर विजय होने की अनेक विशेषताओं से उसके हौसले को बढ़ाया है। वे विशेषताएँ हैं-उसकी आत्मा के अंशज, वंशज, उसकी अर्जन, उसकी कविता और उसका सर्जन।

प्रश्न 6.
अध्यापक ने अपने छात्र से किस तरह अपनी अंतिम अभिलाषा व्यक्त किया है?
उत्तर
अध्यापक ने अपने छात्र से मानस पिता के रूप में अपनी अंतिम अभिलाषा ‘मेरी लाज रख लेना’ व्यक्त किया है।

प्रश्न 7.
‘प्रत्यंचा’ और ‘तीर’ किसके प्रतीक हैं?
उत्तर
‘प्रत्यंचा’ शिक्षक के शिक्षण और ‘तीर’ ‘ज्ञान और लगन’ के प्रतीक हैं।

धनुष की प्रत्यंचा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“यह दुनिया एक अंधा कुआँ है? लो, में रज्जु बन लटका हूँ।” उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
यह दुनिया एक अंधा कुआँ है,
लो, मैं रज्जु बन लटका हूँ।”
उपर्युक्त पंक्तियों के द्वारा यह भाव व्यक्त करने का प्रयास किया गया है कि आज के छात्र का भविष्य अंधकारमय हो गया है। उसे चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण है कि उसमें अज्ञानता, अयोग्यता और अक्षमता है। उसे इन सबसे मुक्त कर उसमें ज्ञान, योग्यता और क्षमता लाने वाला कोई नहीं दिखाई देता है। उसे इस प्रकार अज्ञानमय अंधकार में पड़े हुए देखकर उसे प्रबोध देकर उसे योग्य और सक्षम उसका अध्यापक ही उसके लिए रस्सी का काम कर सकता है। उसके सहारे ही वह इस अंधकार से निकलकर अपने भविष्य को चमका सकता है।

प्रश्न 2.
मीन को बेंधने की पौराणिक कथा का उल्लेख जिन पंक्तियों में हुआ है उन्हें लिखिए।
उत्तर
मीन को बेंधने की पौराणिक कथा का उल्लेख निम्नलिखित पंक्तियों में हुआ है-.मैं धनुष की प्रत्यंचा हूँ अपनी पूरी शक्ति से खींचो, रखना विश्वास नहीं टूट्रॅगा, नहीं टूटूंगा चलाओ ज्ञान के तुम तीर, अज्ञान की मीन को बेंध डालो सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।

प्रश्न 3.
वर्तमान में प्रस्तुत कविता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ द्वारा विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ वर्तमान युग में बहुत अधिक प्रासंगिक है। यह इसलिए कि आज अध्यापक और छात्र के संबंध परस्पर बिगड़ चुके हैं। दोनों अपनी-अपनी गरिमा से गिर चुके हैं। इसलिए दोनों के संबंध पुनः मधुर और सरस होकर गरिमा-मंडित हों, यह आज के युग की बहुत बड़ी आवश्यकता है। यह तभी संभव है, जब आज का अध्यापक अपने अध्यापन के द्वारा अपने छात्र को सही दिशा-निर्देश दें। यह इसलिए कि आज का छात्र अंधकार से ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित करने, व्यक्तित्व को मोती-सा कांतिवान बनाने, सुजनशील होकर राष्ट्रीय भाव जगाने और उदात्त चरित्र के निर्माण के लिए अपने शिक्षक के प्रेरणा पुंज से ही आलोकित हो सकता है।

प्रश्न 4.
‘नींव बने रहने का भाव किन पंक्तियों में है? चुनकर लिखिए।
उत्तर
‘नींव बने रहने का भाव निम्नलिखित पंक्तियों में है
मैं नोंव बन नीचे रहूँगा ।
लेकिन तुम सीढ़ियाँ चढ़ना
हर दिवस बढ़ना हर रात बढ़ना
आसमान छूना।
तुम रुकोगे
तो नींव में गड़ी-गड़ी
मेरी अस्थियों में दर्द होगा।

प्रश्न 5.
‘धनुष की प्रत्यंचा’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
चूँकि आज छात्र अपने कर्त्तव्य से विमुख हो रहे हैं। उनमें कर्त्तव्यहीनता का तनिक बोध नहीं हो रहा है। इससे शिक्षा-जगत में एक बहुत बड़ी विडम्बना आ गई है। इसे आज एक योग्य और महान अपने दायित्व की दृष्टि से समझ सकता है। इस दृष्टि से हिन्दी के जाने-माने कवि एवं मनीषी डॉ. देवेन्द्र दीपक की ‘धनुष की प्रत्यंचा’ हिन्दी की उन विरल कविताओं में शीर्षस्थ कविता है जिसमें एक शिक्षक अपने पक्ष के औदात्य को गंभीरता से प्रस्तुत करता है। इस कविता में इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया कि लक्ष्य का भेद धनुष की प्रत्यंचा के ऊपर निर्भर करता है। वह जितनी अधिक शक्ति से खींची जाती है वह उतनी ही तीव्रता और शक्ति के लक्ष्य भेदन तक तीर को प्रक्षेपित करती है। ठीक इसी प्रकार शिक्षक का शिक्षण उसके छात्र के लिए प्रत्यंचा के समान है। इस प्रत्यंचा को जितनी अपनी जिज्ञासा और लगन की शक्ति से शिक्षक से सीखने का प्रयास करेगा, वह उतना ही अधिक, ज्ञान के तीर से अपने जीवन की बाधाओं को बेध सकेगा।

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प्रश्न 6.
इस कविता में शिक्षक ने अपने विद्यार्थी के लिए जिन-जिन रूपों को प्रस्तुत किया है, उन पंक्तियों को लिखिए
उत्तर
इस कविता में शिक्षक ने अपने विद्यार्थियों के लिए जिन-जन रूपों को प्रस्तुत किया है, वे विद्यार्थी पाठ में देखें।

धनुष की प्रत्यंचा कवि-परिचय

प्रश्न
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के . महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-डॉ. देवेन्द्र दीपक की हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकारों में गणना की जाती है। मध्य-प्रदेश के चर्चित कवियों और सम्पूर्ण हिन्दी-जगत के प्रतिष्ठित कवियों के साथ आपका नाम लिया जाता है। शिक्षा समाप्त कर आपने मध्य-प्रदेश के विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में समय-समय पर स्थानान्तरण के फलस्वरूप अस्थायी रूप में अध्यापन कार्य करते रहे। इसके साथ-साथ आप पत्रकारिता से भी जुड़े।

पत्रकारिता में महारत हासिल करने के उद्देश्य से अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य करते रहे। यही नहीं, आपने, कई छोटी-बड़ी स्तर की पत्रिकाओं और चर्चित पत्रों के संपादन कुशलतापूर्वक किया। बचपन से ही डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का झुकाव हिन्दी काव्य की ओर रहा। फलस्वरूप आपकी काव्य-रचनाएँ अधिक प्रकाश में आयी. हैं। इसके साथ-ही-साथ आपकी कविताओं के अनुवाद भी कई भारतीय भाषाओं में हुए हैं। काव्य-रचना के साथ ही सम्पादन कार्य भी आप करते रहे। इस प्रकार साहित्य और पत्रकारिता इन दोनों क्षेत्र में आप योगदान देने में सक्रिय रहे।

रचनाएँ-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ की निम्नलिखित रचनाएँ हैं

काव्य-संग्रह-‘सूरज बनती किरण’, ‘बन्द कमरा’, ‘खुली कविताएँ’, ‘भूगोल राजा का, खगोल राजा का’, ‘कुण्डली चक्र पर मेरी वार्ता’, ‘मास्टर धरमदास’, ‘हम बौने नहीं दबाव’ आदि।

संपादन-‘छन्द प्रणाम’, “सार्थक एक’ आदि। संप्रति-‘साक्षात्कार’ के संपादक

महत्त्व-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का असाधारण साहित्यिक महत्त्व है। आपने हिन्दी काव्य-क्षेत्र में आशातीत योगदान दिया है। फलस्वरूप आपकी कविताओं के अनुवाद, संस्कृत, मराठी, सिंधी, पंजाबी, अंग्रेजी, तमिल आदि भारतीय भाषाओं में हुए हैं। आपकी कविताएँ शिक्षित और सांस्कृतिक वर्ग के लिए अधिक उपयोगी और सार्थक सिद्ध हुई हैं। आगामी साहित्यिक पीढ़ी के लिए आप प्रेरणा-स्रोत बने रहेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

धनुष की प्रत्यंचा कविता का सारांश

प्रश्न
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ द्वारा विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’-विरचित प्रस्तुत कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ न केवल आधुनिक कविता है, अपितु प्रासंगिक भी है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है
शिक्षक अपने छात्र को प्रेरित करते हुए कह रहा कि वह क्यों इस तरह होकर अपना मलिन चेहरा लिए अंधकार में डूबकर उदास खड़ा है। वह तो उसके लिए सेतु के रूप में बनकर सामने आया है। अब वह उस पर चढ़कर निडरतापूर्वक ज्योति के द्वार को खोलने के लिए इस अंधकार के उस पार उतर जाए। इसलिए लो, अपना हाथ बढ़ाओ।

शिक्षक का कहना है कि मैं तुम्हें कुंजी-अपनी सहेजी हई पूँजी के रूप में दे रहा हूँ। मेरी कठोरता पर तुम गुस्सा करते हो, लेकिन यह मेरी मजबूरी है। मैं इसे सीपी समझकर सहता हूँ और तुम्हें तो केवल मोती-सा पालना है। यह मैं अच्छी तरह से जानता और अनुभव करता हूँ कि मेरी फटकार तुम्हें शूल के समान चुभ गई है। यह मेरी रक्षा-परिधि थी, जिसमें तुम्हें फूल बनकर खिल जाना था। तुम्हारी मौलिकता और स्वाभिमान मुझे बड़ा ही अनमोल बना देते। इसलिए अब मैं तुमसे यह कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारे लिए नींव के रूप में बना रहूँगा और तुम उस नींव की सीढ़ियों पर एक-एक कदम बढ़ाते जाना। अगर तुम रुकोगे तो नींव में गड़ी हुई मेरी हड्डियों में दर्द होने लगेगा। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम फूल-सा खिलो और अपनी महक को चारों ओर फैलाओ। यह मेरी बहुत बड़ी खुशी होगी। ऐसा इसलिए कि मैंने इसी खुशी के लिए सावन-सा तुम्हारे उदास मन रूपी मरुस्थल में बरसा था।

शिक्षक अपने छात्र को प्रबोध देते हुए कह रहा है-तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि संसार एक अंधकारमय कुआँ है। मैं उसके ऊपर एक रस्सी बनकर लटक रहा हूँ। तुम निश्चित होकर अपने पात्र को भरकर अपने फूलों की बगिया को सींच डालो। मेरी आत्मा के तुम वंशज-अंशज हो। मेरी अर्जन, कविता आदि सब कुछ तुम्हीं हो। रक्षा-कवच की तरह मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। इसे लेकर तुम आँधी-तूफानों का सामना करो। तुम्हारे शत्रुओं के लिए तुम्हें मैं वज्र के समान और तुम्हारे ओठों पर फूल की तरह खिलने के लिए बनकर तैयार हो गया हूँ। इस तरह मैं तुम्हारे लिए धनुष की प्रत्यंचा हूँ।

उसे तुम अपनी पूरी शक्ति से इस विश्वास से खींचो कि यह नहीं टूटेगा। इस पर तुम अपने ज्ञान के तीर चलाते हुए अज्ञान रूपी मछली को बेंध डालो। अपनी सफलता को वैसे ही प्राप्त कर लो जैसे अर्जुन ने स्वयंवर में द्रोपदी को प्राप्त किया था। तुम्हें प्रसन्न देखकर मैं प्रसन्न होता हूँ और दुखी देखकर दुख में डूब जाता हूँ। इसलिए मैं कह रहा हूँ-मैं साधना हूँ तो तुम सिद्धि बन जाना। मैं आँख हूँ तो तुम दृष्टि बन जाना। मैं विजय स्तम्भ हूँ तो तुम विजय का पताका बन जाना। इस प्रकार अपनी हथेली पर विजय प्राप्त करके आज मेरी लाज रख लेना। यह अब तुम्हारे मानस. पिता का वचन है।

धनुष की प्रत्यंचा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. इधर क्यों खड़े हो उदास
क्यों महिलन हो गया चेहरा
अंधकार में,
भटकन में,
डूबे हो कंठ-कंठ।
लो, मैं तुम्हारे हेतु सेतु बना हूँ।
इस सेतु पर पाँव रखकर
निर्भीक और निर्द्वन्द्व होकर
उतर जाना तुम पार
क्योंकि तुम्हें खोलना है
ज्योति का वह द्वार।

शब्दार्थ-मलिन-उदास, मुरझा गया। कंठ-कंठ-पूरी तरह । हेतु-लिए। सेतु-पुल । पाँव-पैर। निर्भीक-निडर। ज्योति-प्रकाश।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी सामान्य’ में संकलित तथा डॉ. देवेन्द्र दीपक-विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ शीर्षक से है। इसमें कवि ने एक सुयोग्य शिक्षक द्वारा आज के अंधकार में डूबे छात्र को ज्ञान की ज्योति जलाकर चरित्र-निर्माण करने के लिए किस प्रकार प्रेरित किया गया है, यह चित्रित करने का प्रयास किया है। इस विषय में कवि का यह कहना है कि

व्याख्या-शिक्षक अपने छात्र को प्रेरित करते हुए कह रहा है-तुम इस तरह क्यों मुरझाए और निराश होकर खड़े हुए दिखाई दे रहे हो। तुम्हारा चेहरा उदास और मलिन होकर दिखाई दे रहा है, तुम्हें देखने से ऐसा लगता है कि तुम अंधकार में काफी भटकने के बाद पूरी तरह से डूब चुके हो। फलस्वरूप तुम्हें कहीं से कोई सहारा और आशा की एक किरण नहीं दिखाई दे रही है, लेकिन ऐसी बात नहीं है। अब मैं तुम्हारे लिए पुल बनकर तुम्हारे सामने आया हूँ। अब तुम किसी प्रकार से डरो नहीं और उदास-निराश भी न होवो! इस पुल पर आकर तुम अब खड़े हो जाओ। इससे तुम किसी प्रकार के भय और रुकावट के इस अंधकार से उस पार उतर जाओगे, जहाँ से तुम्हें प्रकाश के किरण द्वार को सबके लिए खोल देना है।

विशेष-

  1. भाषा सरल और सपाट है।
  2. कथन में ओज और प्रभाव है।
  3. ‘कंठ-कंठ’ में पुररुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. मुक्तक छंद है।
  5. यह अंश प्रेरणादायक रूप में है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना विशिष्ट भावों को व्यक्त करने वाले शब्दों से युक्त है। मुक्तक छंद की स्वच्छन्दता को उपदेशात्मक शैली के द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास है। इसे आकर्षक बनाने के लिए लक्षणा शब्द-शक्ति और पुररुक्ति प्रकाश एवं रूपक अलंकार के मिले-जुले प्रयोग सटीक और उपयुक्त रूप में हैं। वीर रस के प्रवाह से प्रतीकात्मक योजना सुन्दर बन गयी है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना सहज और बोधगम्य है। भावों की प्रस्तुति स्वाभाविक है। आत्मीयता, संवेदनशीलता और उदारता जैसी भावगत विशेषताओं को एक साथ लाकर उन्हें हृदय-स्पर्शी बनाने का प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। कथन की यथार्थता को विश्वसनीयता के द्वारा सामने लाने की युक्ति बड़ी ही उपयुक्त सिद्ध हुई है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उदास खड़े होने से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में किस ओर संकेत है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) उदास खड़े रहने से कवि का अभिप्राय है-हर प्रकार की आशा-विश्वास को तिलांजलि देना। दूसरे शब्दों में हार जाना-थक जाना।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में आज के शिक्षक और छात्र की ओर संकेत है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव यह है कि आज का छात्र अज्ञानग्रस्त है। उसे कोई योग्य शिक्षक ही अपेक्षित ज्ञान के द्वारा सुयोग्य बना सकता है।

2. और लो, बढ़ाओ हाथ
तुम्हें देता हूँ कुंजी जिसे
पूंजी समझ मैंने सहेजा है!
मेरी कठोरता पर
कभी-कभी तुम गुसियाते हो,
मन-ही-मन कुछ कह-सुन जाते हो
लेकिन मैं कठोर हूँ
यह मेरी एक विवशता है
मेरी कठोरता
सीपी की कठोरता है
जो कुछ भी सहना है
मुझको ही सहना है
तुम्हें तो बस मोती सा पलना है।

शब्दार्थ-सहेजा-सँभाला। गुसियाते-गुस्सा करते अर्थात् क्रोध करते। विवशता-मजबूरी। पलना-बढ़ना। बस-केवल ।

प्रसंग-पूर्ववत् ! इसमें कवि ने शिक्षक द्वारा अपने असहाय छात्र को साहस देने का उल्लेख किया है। शिक्षक अपने छात्र को उत्साहित करते हुए कह रहा है

व्याख्या-तुम मेरी ओर आओ! मैं तुम्हें अज्ञानमय अंधकार से बाहर निकालने के लिए तुम्हारे पास खड़ा हूँ। अब तुम अपने हाथ मेरी ओर बढ़ाओ। मैंने बहुत समय से अपने अनुभव की जो पूंजी सँभालकर रखी है, उसे तुम्हें अंधकार के बंद कमरे से बाहर निकल आने के लिए कुंजी के रूप में दे रहा हूँ। उसे लेकर अब बंद अंधेरे कमरे को खोलकर बाहर आ जाओ। मैंने तुम्हें पहले कई कठोरतामयी हिदायतें दी थीं, उनका तुमने अमल करने के बजाय मुझ पर गुस्सा ही किया। यही नहीं तुमने मन-ही-मन मेरा विरोध किया। उसके लिए कुछ भुनभुनाया और बुदबुदाया भी। फिर भी मैं तुम्हें अपनी कठोर हिदायतें देता रहा। यह इसलिए कि यह मेरी आदत है। यह भी कि मेरी लाचारी है। मेरी कठोर हिदायतें क्या हैं? इस पर तनिक विचार करोगे तो यह जरूर समझ जाओगे कि मेरी कठोर हिदायतें सीपी की तरह कठोर हैं, जिसके अंदर मोती पलती-बढ़ती रहती है। इस प्रकार मैं सीपी की कठोरता को सहना और उसे बरकरार रखना मेरी लाचारी है। मेरी तो यही कोशिश रही है कि तुम मेरी कठोरता की सीपी के अंदर मोती की तरह पलते-बढ़ते रहो।

विशेष-

  1. योग्य अध्यापक के उच्च और उदार दृष्टिकोण का उल्लेख है।
  2. सत्यता में कठोरता होती है, जो पूरी तरह से कल्याणकारी सिद्ध होती है, इसे बतलाने का प्रयास किया गया है।
  3. कभी-कभी में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तो ‘मोती-सा’ में उपमा अलंकार है।
  4. शैली उपदेशात्मक है।
  5. मुक्तक छंद है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश मुक्तक छन्द में पिरोकर वीर रस में प्रवाहित है, जिसे पुनरुक्ति प्रकाश (कभी-कभी) और उपमा अलंकार (मोती-पलना है) से प्रभा मंडित किया गया है। ‘विवशता-कठोरता, गुसियाते हो-सुन जाते हो और सहना है-पलना है शब्दों की तुकान्लता बड़ा आकर्षक और लयात्मक है। इससे इस पद्यांश की प्रभावमयता और निरख रही है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा बड़ी स्पष्ट और निश्छल है। उनमें बिना लागलपेट की सच्ची विशेषता है, तो अपनापन और उदारता की सरसता भी है। कल्याण को प्रदान करने वाली कठोरता की स्पष्टोक्ति को सहजतापूर्वक अपनाने के लिए सीपी के अंदर पलने वाली मोती की तरह बतलाने की शैली मन को छू लेती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुंजी से तात्पर्य क्या है?
(ii) कठोरता को विवशता क्यों कहा गया है?
(iii) ‘मुझको ही सहना है’ का क्या भाव है?
उत्तर
(i) कुंजी से तात्पर्य है लम्बा अनुभव। ऐसे अनुभव जो किसी प्रकार के संकट से मुक्ति दिला सके।
(ii) कठोरता को विवशता कहा गया है। यह इसलिए कि कल्याणकारी स्वरूप कठोरता से होने वाले कल्याण के लिए कठोरता को नहीं त्यागते हैं। उसके लिए वे विवश हो जाते हैं।
(iii) ‘मुझको ही सहना है’ का भाव है-उदारशील व्यक्ति सभी प्रकार के कष्टों-बाधाओं को सहकर परोपकार करते चलते हैं। दूसरों के कष्टों-अभावों को सहना वे अपनी मजबूरी मान लेते हैं।

3. मैं जानता हूँ, अनुमानता हूँ
मेरी उक्तियाँ झिडकियाँ
तनी-तनी भृकुटियाँ
कभी-कभी तुम्हें शूल-सी लगी हैं।
मुझे शूल तो
बनना ही था,
क्योंकि मेरी रक्षा-परिधि में
तुम्हें फूल बन
खिलना ही था।

शब्दार्थ-उक्तियाँ-कहावतें। अनुमानता-अनुमान करता हूँ। झिड़कियाँ-फटकार। भृकुटियाँ-आँखें दिखाना, क्रोध करना।शूल-काँटा, भाला। रक्षा परिधि-रक्षा की सीमा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक योगय शिक्षक के अपने छात्र के प्रति आत्मकथन की स्पष्टता का उल्लेख किया है। शिक्षक का अपने छात्र के प्रति स्पष्ट रूप से कहना है

व्याख्या-मैं यह भलीभाँति जानता हूँ। यही नहीं, मैं यह अनुमान भी करता हूँ कि मैं जब कभी तुम्हें फटकारता और डाँटता हूँ। इसी प्रकार मैं जब कभी तुम्हें अपनी आँखें दिखाता हूँ तो तुम्हें उनसे बड़ी पीड़ा होती है। वे तुम्हें कभी-कभी शूल की तरह चुभो गयी होंगी, तो इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन यह सब कुछ मैंने मजबूरी में किया है। मुझे तुम्हारे लिए शूल बनना भी मेरी एक ऐसी ही मजबूरी थी। यह मेरी रक्षा-परिधि थी। इसी में तुम्हें एक आकर्षित और सुगन्धित फूल खिलाना था।

विशेष-

  1. भाषा में ओज और प्रवाह है।
  2. तुकांत शब्दावली है।
  3. शैली उपेदशात्मक है।
  4. वीर रस का संचार है।
  5. ‘तनी-तनी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’
(ii) उपर्युक्त पद्यांश वीर रस से प्रवाहित और मुक्तक छंद से परिपुष्ट है। इसे तुकान्त शब्दावली की लयात्मकता और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (कभी-कभी) व उपमा अलंकार (शूल-सी लगी है) से चमत्कृत किया गया है। प्रतीकात्मक शैली के प्रयोग के यह पद्यांश रोचक बन गया है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना स्पष्ट कथन पर आधारित है। उमसें सहजता, स्वाभाविकता और स्पष्टता की बहती हुई त्रिवेणी से अभिप्राय है ऊँचे तरंगे उठ रही हैं। इस प्रकार इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य मन को बार-बार छू रहा है, जो कवि की अद्भुत सफलता को प्रकट कर उसकी सार्थकता को सिद्ध कर रहा है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) झिड़कियाँ और फिर तनी-तनी भृकुटियाँ के प्रयोग की क्या विशेषता है?
(ii) ‘रक्षा-परिधि’ से क्या तात्पर्य है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) झिड़कियाँ और फिर तनी-तनी भृकुटियाँ के प्रयोग की बड़ी विशेषता है। झिड़कियाँ अर्थात् फटकार का जब-जब कोई खास असर न होने पर तनी-तनी भृकुटियों के द्वारा असर डालने का विशेष प्रयास किया जाता है।
(ii) ‘रक्षा-परिधि’ से तात्पर्य है-कल्याणकारी योजना या सोच-विचार।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-कल्याणार्थ कठोरता मूलतः फलदायिनी होती है।

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4. जब-जब तुम
मौलिकता की साँस हिय में भरकर
उठाकर शीश आते,
किन्तु छंद के नये अर्थ बतलाते
तब-तब मैं खुशी से
गोल हो जाता
अपने में बड़ा
अनमोल हो जाता।

शब्दार्थ-हिय-हृदय। शीश-सिर। गोल-गद्गद् । अनमोल-अमूल्य।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि एक महान अध्यापक के अपने छात्र के प्रति व्यक्त किए भावों का उल्लेख किया है। अध्यापक अपने छात्र का हौसला बुलंद करते हुए कह रहा है

व्याख्या-मैं जब कभी तुम्हारी मौलिकता को देखता हूँ, तो प्रसन्न हो उठता हूँ। उस समय मुझे और अधिक प्रसन्नता होती थी, जब तुम अपने मौलिक विचार को हृदय से तौलकर मेरे सामने स्वाभिमानपूर्वक सिर उठाकर रखते थे। उससे भी मुझे बढ़कर प्रसन्नता तब होती थी, जब तुम छंदमय अपने भावों को मेरे सामने रखकर उसके अभिप्राय को स्पष्ट करते थे। उस समय की मेरी खुशी सभी खुशियों से ऊपर होती थी। इस प्रकार मैं बाग-बाग होकर अपने आप में बड़प्पन और अनमोल होने का अनुभव करने लगता था।

विशेष-

  1. भाषा सुस्पष्ट है।
  2. शैली प्रतीकात्मक है।
  3. मुक्तक छंद है।
  4. ‘जब-जब’ और ‘तब-तब’ मैं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. यह अंश उत्साहवर्द्धक है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा-सरल और सहज शब्दों की है। शैली-विधान लाक्षणिक है। लक्षणा शब्द-शक्ति से भावों के अर्थ को खोलने का प्रयास किया गया है। अलंकार-योजना की सटीकता और उपयुक्तता से यह आकर्षक बन गया है। मुक्तक छंद को वीर रस से गतिशील बनाने की सफलता सहज रूप में मान्य है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य तेज और ओज रूप में है। मौलिकता की नवीनता और अनूठापन इसकी एक खास विशेषता दिखाई दे रही है। चूँकि भाव असाधारण और प्रभावशाली हैं, इसलिए वे अपनी इस रोचकता में सुन्दरता की झलक स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत कर रहे हैं।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(क) ‘मौलिकता की साँस हिय में भरकर’ से क्या अभिप्राय है?
(ख) ‘उठाकर शीश आते’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘खुशी से गोल हो जाता’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(क) ‘मौलिकता की साँस हिय में भरकर’ से अभिप्राय है–उन्मुक्त भावों के साथ प्रस्तुत होना।
(ख) ‘उठाकर शीश आते’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है-स्वाभिमानपूर्वक
अपने आपको प्रस्तुत करने का साहस करना।
(ग) ‘खुशी से गोल हो जाता’ का अर्थ है-फूले न समाना। दूसरे शब्दों में दूसरों की उन्नति देखकर अपने-आपको भूल जाना।

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5. मैं नींव बन नीचे रहूँगा
लेकिन तुम सीढ़ियाँ चढ़ना
हर दिवस बढ़ना हर रात बढ़ना आसमान छूना।
तुम रुकोगे तो नींव में गड़ी-गड़ी
मेरी अस्थियों में दर्द होगा।

शब्दार्थ-नींव-बुनियाद। दिवस-दिन। अस्थियाँ-हड्डियाँ। दर्द-कष्ट, पीड़ा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने महान अध्यापक की उदारता-त्यागशीलता को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। महान् अध्यापक अपने छात्र को उन्नति के शिखर पर चढ़ाने के लिए उत्साहित करते हुए कह रहा है

व्याख्या-मैं तुम्हारी हरेक प्रकार की उन्नति के लिए बुनियाद बनने के लिए तैयार हूँ। मेरी इस बुनियाद पर तुम अपनी उन्नति की एक-से-एक बढ़कर सीढ़ियों पर लगातार चढ़ते जाना। इससे मुझे अपार प्रसन्नता और सुख की अनुभूति होगी। इसके लिए मेरी यही तुमसे हार्दिक इच्छा व्यक्त कर रहा हूँ कि तुम हरेक दिन और रात बिना किसी रोक-टोक के उन्नति के शिखर पर चढ़कर आसमान को छूते चलो। किसी भी अवस्था में न रुको और न पीछे हटो। अगर तुम किसी प्रकार से रुक जाओगे या पीछे हटने लगोगे तो मुझे भारी दुख होगा। मेरी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। फलस्वरूप उस बुनियाद में पड़ी और गड़ी हुईं मेरी हड्डियाँ में बहुत बड़ी पीड़ा होने लगेगी। शायद ऐसी पीड़ा होगी, जिससे वे छटपटाने लगेंगी।

विशेष-

  1. मुक्तक छन्द है।
  2. ‘आसमान छूना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।
  3. ‘गड़ी-गड़ी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. भावात्मक शैली है।
  5. वीर रस और करुण रस का मिश्रित प्रवाह है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।

(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य सरस और आत्मीय भावों पर आधारित है। ‘नींव बनना, आसमान छूना’ जैसे मुहावरों और तत्सम तद्भव शब्द के मेलजोल क्रो-पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से चमत्कृत-मंडित किया गया है। प्रतीकात्मक शैली और मुक्तक छंद के प्रयोग से यह पद्यांश और रोचक हो गया है। . (iii) उपर्युक्त पद्यांश में अध्यापक की उदारता, सहनशीलता, आत्मीयता, सरसता और त्यागशीलता जैसे अत्युच्च भावों की प्रस्तुति अपने आप में अनूठी हे। छात्र को उन्नति के शिखर पर चढ़ते जाते हुए देखने की तमन्ना और उसके रुक जाने से दुखी होने की भावना एक सुयोग्य अध्यापक में ही संभव है। इसे दर्शाने में कवि का प्रयास सचमुच में सराहनीय है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘नींव बनने से क्या अभिप्राय है?
(ii) ‘नींच में गडी-गड़ी अस्थियों’ का मुख्यार्थ बताइए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) ‘नींव बनने’ से अभिप्राय है-परोपकारार्थ त्याग-समर्पण कर देना।
(ii) ‘नींव में गड़ी-गड़ी अस्थियों’ का मुख्यार्थ-परोपकारार्थ अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने का एकमात्र जीवन लक्ष्य प्रस्तुत करना।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-आधुनिक स्वार्थवाद के घोर अंधकार से बाहर निकालकर एक सुयोग्य अध्यापक का अपने छात्र के भविष्य को चमकाने की प्रेरणा देना।

6. तुम खिलो, महको
गंधदान का यज्ञ रचाओ इसीलिए,
तुम्हारी स्वच्छंदता को छंदा था मैंने।
तुम मरुस्थल थे।
मैं तुम्हारे हित बरसा बन सावन
आज तुम कितने भावन!

शब्दार्थ-खिलो-फूल जाओ, विकसित हो जाओ। महको-सुगंध फैलाओ। गंधदान-सुगंध को प्रदान करना। छंदा था-छंदबद्ध किया था। हित के लिए (भलाई के लिए)। भावन-मन को भाने (अच्छे लगने) वाले।

प्रसंग-पूर्ववत्। इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने छात्र को परोपकारी होने का सदुपदेश देने का उल्लेख किया है। अध्यापक का अपने छात्र को परोपकार करने की सीख देते हुए यह कहना है

व्याख्या-तुम अपने जीवन-पथ पर लगातार बढ़ते अपने सद्गुणों को बिखेरते चलो। उनसे लोगों को आकर्षित और मोहित करते हुए आगे बढ़ते चलो। संभव हो
सके तो अपने उज्ज्वल गुणों से लोगों को यथाशक्ति सुख-सुविधाएँ पहुँचाते चलो। . तुम्हारे प्रति इस प्रकार आशावान होकर मैंने तुम्हारे स्वतंत्र विकास के लिए अनेक भावों को संजोया था। मैंने इसीलिए तुम्हारी जिज्ञासारूपी मरुस्थल के लिए अपने . सद्भावों और सशिक्षाओं रूपी सावन की बरसात की थी। उससे तुम कितने खिल उठे हो, यह मैं अनुभव कर रहा हूँ।

विशेष-

  1. अध्यापक की सद्भावना का छात्र पर पड़े हुए प्रभावों का उल्लेख है।
  2. शैली उपदेशमयी है।
  3. ‘तुम मरुस्थल थे’ में रूप अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।
  5. मुक्तक छन्द है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।

(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप सरल किन्तु प्रेरक भाषा-शैली से तैयार है उपदेशात्मक शैली और वीर रस से संचारित मुक्तक छंद की धारा भावों को तेजी से बढ़ा रही है। बिम्ब और प्रतीक अभिधा शक्ति के द्वारा प्रस्तुत रूपक अलंकार के चमत्कार से इस पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य चमक उठा है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य बड़ा ही सहज, सरल और सपाट है। भावों में जहाँ आत्मीयता है, वहीं उनसे रोचकता और सरसता भी है। कुल मिलाकर उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य मनमोहक और हृदयस्पर्शी है।।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘गंधदान का यज्ञ कराओ’ कहने का क्या तात्पर्य है?
(ii) ‘तुम मरुस्थल थे
मैं तुम्हारे हित बरसा बन सावन।’
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
(iii) ‘आज तुम कितने भावन’ का भावार्थ लिखिए।
उत्तर
(i) “गंधदान का यज्ञ कराओ’ कहने का तात्पर्य है-अपने दिव्य और उच्च गुणों के द्वारा परोपकार की सरस धारा निरन्तर प्रवाहित करते रहना।
(ii) ‘तुम मरुस्थल थे,
तुम्हारे हित बरसा
बन सावन।
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव यह है कि दीन-दुखी हृदय को सही रूप में पहचान कर उनके दुखों और अभावों को अपनी शक्ति सम्पन्नता से दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए। उनकी संतुष्टि से सुख-आनंद का वातावरण तैयार होता है।
(iii) ‘आज तुम कितने भावन’ का भावार्थ है-दुःखी और संतप्त हृदय में जब सुख-आनंद का प्रवाह होने लगता है, तब एक अपूर्व सौन्दर्य का वातावरण फैलकर मन को मोह लेता है।

7. यह दुनिया एक अंधा कुआँ है
लो, मैं रज्जु बन लटका हूँ
निश्चित होकर तुम अपने-अपने
पात्र भर लो अपनी फुल-बगिया का
सिंचन कर लो।

शब्दार्थ-रज्जू-रस्सी। पात्र-बर्तन, घड़ा। बगिया-बाग। सिंचन-सिंचाई।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने अज्ञानी और भटके हुए छात्र के प्रति कथन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है
व्याख्या-यह सारा संसार एक अंधकारमय कुआँ है। उसमें तुम पड़े हुए छटपटा रहे हो। अब तुम्हें इसमें और पड़े रहकर छटपटाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा इससे बाहर निकलने का समय आ गया है। इसके लिए रस्सी के समान इसमें लटक रहा हूँ। अब तुम बिल्कुल ही निडर हो जाओ। फिर अपनी आवश्यकतानुसार इसमें से अपने घड़े में पानी भर लो। इस तरह अब तुम अपनी स्वतंत्रता रूपी फूलों के बाग की सिंचाई करके अपने जीवन को धन्य कर लो।

विशेष-

  1. भाषा सरल और सुबोध है।
  2. दुनिया को एक अंध कुआँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए इसमें रूपक अलंकार है।
  3. तुकान्त शब्दावली है।
  4. लय और संगीत की ध्वनि आकर्षक रूप में है।
  5. मुक्तक छंद है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ ।
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप आकर्षक और मोहक है। दुनिया को अंधा कुआँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है फिर उससे ज्ञान की रस्सी से अपेक्षित जल प्राप्त करके अपने मन रूपी बागों में इच्छामयी फूलों को खिलाने की रूपक-योजना निश्चय ही ऊँची है और सराहनीय भी है।।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-विधान अद्भुत और प्रेरक रूप में है। तुकान्त शब्दावली असंस्कृत भावयोजना से यह पद्यांश सुन्दर और भाववर्द्धक बन गया है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘अंध कुआँ’ से क्या तात्पर्य है?
(ii) ‘रज्जु बनना’ किसका प्रतीक है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) ‘अंध कुआँ’ से तात्पर्य है-‘गहरा और अत्यधिक स्वार्थ’।
(ii) ‘रज्जु बनना’ सहायक होने का प्रतीक है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-योग्य और समर्थ व्यक्ति ही मुसीबतों से निकालकर सुखमय जीवन प्रदान करता है।

8.मेरी आत्मा के अंशज हो तुम,
मेरी आत्मा के वंशज हो तुम,
मेरी अर्जन हो तुम,
मेरी कविता हो तुम
मेरा सर्जन हो तुम,
रक्षा, कवच की भांति,
मेरा आशीष तुम्हारे साथ।
जाओ, जाकर आँधी से टकराओ,
तूफानों से खेलो,
सबको अपनी छाती पर झेलो
जिनकी पसलियों में
मैं वज्र बनकर मिल गया हूँ,
अधरों पर तुम्हारे
फूल बनकर खिल गया हूँ।

शब्दार्थ-अंशज-अंश से उत्पन्न। वंशज-वंश से जन्म लेने वाले । अर्जन-प्राप्ति । सर्जन-निर्माण। आशीष-आशीर्वाद। अधरों-ओठों।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने छात्र का हौसला बढ़ाने के लिए उसे सब कुछ अपना मानने का उल्लेख किया। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मेरी आत्मा के अंश से ही तुम उत्पन्न हो और मेरे ही वंश में जन्म लेने वाले हो; अर्थात् तुममें मेरे गुण-संस्कार वर्तमान हैं। उन्हें केवल तुम्हें प्रकट कर देना है। इस प्रकार तुम मेरे अर्जन हो, सर्जन हो। यही तुम मेरी कविता हो और इस प्रकार के मौलिक व्यक्तित्व के निर्माण स्वरूप हो। यही कारण है कि मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ एक रक्षा-कवच की तरह मौजूद है। इसलिए अब मैं तुम्हें यही आदेश दे रहा हूँ कि तुम इन सब बातों को अपने हृदय की गहराइयों में उतार लो। फिर अपने सामने वाली हर एक प्रकार की कठिनाइयों रूपी आँधियों से टकरा जाओ। उन्हें तुम समाप्त कर दो। सामने वाले एक-से-एक जानलेवा संकट रूपी तूफानों को तुम खेल-ही-खेल मसल डालो। इस प्रकार तुम उन सबको अपनी अपार शक्ति से झेलते हुए आगे बढ़ते जाओ, जिनकी पसलियों में बज्र बनकर समा गया हूँ। इस प्रकार तुम्हारे अंदर शक्ति का संचार करके मैं तुम्हारे ओठों पर फूल की तरह सुन्दरता बिखेर रहा हूँ।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली असाधारण है।
  2. लक्षणा शब्द-शक्ति है।
  3. ‘मेरी’ और ‘तुम’ शब्दों की पुनरावृत्ति होने से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।
  5. लय-संगीत की सुन्दर योजना है।
  6. प्रतीकात्मक और उपदेशात्मक शैली है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से अलंकृत-मंडित है। वीर रस के संचार और मुक्तक छंद के द्वारा उसे मुक्त रूप से प्रस्तुत करने का कवि-प्रयास आकर्षक है। भाषा की शब्दावली को तुकान्त रूप देकर लक्षणा शब्द-शक्ति से मजबूत और प्रभावशाली बनाने की शैली भी मन को अपनी ओर खींच लेती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सहज रूप में प्रवाहित होकर विशेष अर्थ को प्रकट कर रही है। सम्पूर्ण पद्यांश आत्मीय भावों पर आधारित होकर कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरक स्वरूप बन गया है। ‘जाओ, जाकर आँधी से टकराओ, तूफानों से खेलो’ और सबको अपनी छाती पर झेलो जैसें भाव साधारण रूप में होकर असाधारण अर्थ को व्यक्त कर रहे हैं।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
(ii) ‘मेरा-मेरी’ के साथ ‘तुम’ की पुनरावृत्ति से कौन-से भाव व्यक्त हो रहे हैं?
(iii) ‘फूल बनकर खिल गया हूँ’ का तात्पर्य क्या है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-आत्मीय भावों के द्वारा सोए हुए पुरुषार्थ को जगाना।
(ii) ‘मेरा-मेरी’ के साथ ‘तुम’ की पुनरावृत्ति से आत्मीय भाव व्यक्त हो रहे हैं।
(iii) ‘फूल बनकर खिल गया हूँ’ का तात्पर्य है-अत्यधिक प्रसन्नता से झूम उठना ।

9. मैं धनुष की प्रत्यंचा हूँ
अपनी पूरी शक्ति से खींचो,
रखना विश्वास नहीं टूटूंगा,
नहीं टूटूंगा चलाओ ज्ञान के तुम तीर
अज्ञान की मीन को बेध डालो
सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।

शब्दार्थ-धनुष-धनुष की डोरी। मीन-मछली।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक सुयोग्य अध्यापक का अपने छात्र के प्रति आत्मीयतापूर्ण कथन को प्रस्तुत किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मैं तुम्हारे लिए धनुष की प्रत्यंचा हूँ। अर्थात तुम मेरा आधार (सहयोग) लेकर अपने कर्मक्षेत्र में आगे बढ़ो। अपनी पूरी शक्ति से बढ़ो। इसके लिए तुम मेरी प्रत्यंचा (मेरा सहयोग) जितना चाहो, प्राप्त कर सकते हो। ऐसा करते समय तुम पूरी तरह से इस बात के लिए विश्वस्त रहना कि यह मेरी प्रत्यंचा (अर्थात् मेरी सहयोग शक्ति नहीं टूटेगी। इस पर तुम निश्चिंत होकर अपने ज्ञान-शक्ति की तीर चलाते चलो। इससे अज्ञानमयी मछली का बेधन कर अर्जुन की तरह सफलतापूर्वक द्रोपदी को स्वयंवर में वरण कर लोगे।

विशेष-

  1. भाषा में ओज, प्रभाव और आकर्षण है।
  2. शैली उपदेशात्मक है।
  3. प्रतीक शब्दावली है।
  4. मुक्तक छंद है।
  5. पौराणिक कथा को प्रेरक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना में रूपक अलंकार की प्रधानता है। पौराणिक कथा-प्रसंग को सजीवता प्रदान करने के लिए कवि ने लक्षणा शब्द-शक्ति के बल-प्रयोग से कथन को आकर्षक बना दिया है। वीर रस की तीव्रता से भाव-अभिप्राय तुरन्त स्पष्ट हो रहे हैं। इस प्रकार यह पद्यांश अपने काव्य-सौन्दर्य से हृदय को छू लेता है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान प्रतीकात्मक है। महाभारत पुराण की घटना पर आधारित प्रस्तुत कथन स्वाभाविक रूप से आकर्षक है। इससे प्रस्तुत हुई भावधारा और अधिक तेज हो गयी है। इस कथन का प्रभाव इस दृष्टि से और अधिक बड़ा हो गया है कि इसमें कल्पना की उड़ान नहीं है, यथार्थ का ही सपाट धरातल है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का प्रतिपाद्य लिखिए।
(ii) ‘धनुष की प्रत्यंचा’ रूपक को स्पष्ट कीजिए।
(iii) द्रोपदी के स्वयंवर के प्रतीक को लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा सहयोग प्रदान करने की निरंतरता और उसके प्रति महत्त्वाकांक्षा का उद्घाटन किया गया है। प्रेरणा जगाने के मूल भाव के द्वारा इसे प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘धनुष की प्रत्यंचा’ रूपकार्थ प्रस्तुत है, जिसका मूल और सांकेतिक दोनों ही अर्थ है-पूर्ण रूप से सहयोग प्रदान करना। धनुष की प्रत्यंचा से बाण को छोड़कर लक्ष्य साधने का प्रयास सफलता को प्रदान करता है। सहयोग से भी लक्ष्य की प्राप्ति आसान हो जाती है।
(iii) द्रोपदी का स्वयंवर प्रतियोगिता और सर्वाधिक एवं सर्बोच्च पुरुषार्थ प्रदर्शित करने का प्रतीक है।

10. तुम्हें खुश देख लेता हूँ
मेरा मन झूम उठता है।
तुम्हें गमगीन जब देखू
मेरा मन सूख जाता है।

शब्दार्थ-गमगीन-उदास। सूख जाता है-दुखी हो जाता है।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक उदार और सुयोग्य अध्यापक के अपने छात्र के प्रति व्यक्त की गई अत्यधिक आत्मीयता का उल्लेख किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मेरी भावना तुमसे अटूट रूप से जुड़ी हुई है। इसलिए मैं तुम्हारे हर सुख-दुख में हरदम जुड़ा हुआ हूँ। यही कारण है कि जब मैं तुम्हें सुखी और आनंदित देखता हूँ, तब मैं गद्गद् हो उठता हूँ। इसके विपरीत जब मैं तुम्हें उदास और चिन्तित देखता हूँ, तब मैं दुखी होने लगता हूँ। कहने का भाव यह कि तुम खुश हो तो मैं खुश हूँ और तुम दुखी तो मैं भी दुखी।

विशेष-

  1. सम्पूर्ण कथन सुस्पष्ट है।
  2. शैली आत्मीय है।
  3. उर्द शब्दों की प्रधानता है।
  4. ‘मेरा मन’ में अनुप्रास अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ ।
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’ ।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य-विधान बिल्कुल सरल और सामान्य है। उर्दू शब्दों के द्वारा अनुप्रास अलंकार के चमत्कार को तुकान्त शब्द-योजना से प्रभावशाली बनाने का प्रयास उल्लेखनीय है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सरल तो है, लेकिन सपाट है। बिना किसी लाग-लपेट के कथन को प्रस्तुत करने का ढंग अनोखा है। इससे कथ्य का तथ्य बड़ी आसानी से स्पष्ट हो रहा है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
(ii) ‘झूम उठना’ और ‘सूख जाना’ किस प्रकार के शब्द-प्रयोग हैं? स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में आत्मीयता पूर्ण भावों का उल्लेख हुआ है, जो परस्पर कटुता और दूरी को समाप्त कर निकटता और अभेद को उत्पन्न करने के लिए अपेक्षित हैं।
(ii) ‘झूम उठना’ और ‘सूख जाना’ परस्पर विपरीतार्थ शब्द-प्रयोग हैं। खुशी के साथ गम के प्रतीक ये शब्द हमारे जीवन की सच्चाई को व्यक्त करते हैं।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश से हमें परस्पर मेल-मिलाप की शिक्षा मिलती है। परस्पर सहयोग और सहानुभूति रखना ही जीवन की महानता है, यह भी शिक्षा मिलती है।

11. मैं साधना हूँ
तुम सिद्धि बन जाना,
मैं नयन हूँ
तुम दृष्टि बन जाना,
विजय का स्तम्भ हूँ मैं
तुम विजय का केतु बन जाना,
हथेली पर तुम विजय कर
‘आज’ रख लेना,
मानस पिता हूँ मेरी
लाज रख लेना।
मेरी लाज रख लेना।

शब्दार्थ-साधना-तपस्या। सिद्धि-फल । नयन-आँख । स्तंभ-खंभा। केतु-पताका, झंडा। मानस-मन से उत्पन्न।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान, सुयोग्य और उदार शिक्षक का अपने छात्र के प्रति दी गई प्रेरणादायक बातों का उल्लेख किया है। अध्यापक का अपने छात्र से कहना है

व्याख्या-तुम सदैव अपने प्रगति-पथ पर बढ़ते चलो, मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहूँगा। इसके लिए मैं साधना बनकर तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम सफलता बनकर आगे बढ़ते जाना। इसी प्रकार मैं तुम्हारे आँख बनकर रहूँगा, तो तुम ज्योति रूप में बढ़ते चले जाना। इसी प्रकार में तुम्हारे विजय के स्तंभ के रूप में मौजूद रहँगा, तो तुम विजय की पताका बनकर फहराते चलते चले जाना। तुम्हें आज इन बातों को बड़ी गंभीरतापूर्वक अमल करना नहीं भूलना है यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारा मानस पिता हूँ। इसे समझकर तुम आज मेरी इन बातों को हृदय से स्वीकार करके मेरी महिमा को बनाए रखना। तुमसे मेरी यही उम्मीद भी है कि तुम मेरा महत्त्व घटाओगे नहीं अपितु बढ़ाते ही जाओगे।

विशेष-

  1. मुक्तक छंद है।
  2. वीर रस का प्रवाह है।
  3. ‘विजय की स्तंभ होना’ और ‘लाज रख लेना’ मुहावरों के साथ प्रयोग है।
  4. शैली आत्मीय और भावपूर्ण है।
  5. भाषा के शब्द अत्यन्त सरल हैं।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना सरल और नपे-तुले शब्दों पर आधारित है। परस्पर अर्थों की समानता की शब्द-योजना से भावों की स्पष्टता दिखाई दे रही है। मुक्तक छन्द के इस प्रवाह में लय-संगीत की मधुरता बहुत मोहक है। बिम्बों-प्रतीकों की प्रस्तुति प्रशंसनीय है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान सहज और अपेक्षित रूप में है। पथ-प्रदर्शक की प्रेरणा और उसकी अपेक्षाएँ मर्यादित और सीमाबद्ध हैं। इसके माध्यम से उपदेशात्मक लक्ष्य को रखने का कवि-प्रयास निश्चय ही काबिलेतारीफ है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त. पद्यांश का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में किन भावों को महत्त्व दिया गया है और क्यों?
(iii) ‘लाज रखने का मुख्यार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा अध्यापक की सद्भावनाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया है। इसे अत्यधिक उपयोगी और अपेक्षित रूप में भी लाने का एक प्रयास प्रस्तुत हुआ है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में आत्मीयतापूर्ण भावों को महत्त्व दिया गया है। यह इसलिए यह आज समाज में नहीं है। इसके बिना समाज का रूप बिगड़ रहा है। इसलिए उसकी आज सख्त जरूरत है।
(iii) ‘लाज रखने’ का मुख्यार्थ मर्यादा-महत्त्व को बचा लेना। आज अध्यापक की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। उसे उसका अपना ही कोई छात्र बचा सकता है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 3 रसखान पदावली

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 3 रसखान पदावली (रसखान)

रसखान पदावली अभ्यास-प्रश्न

रसखान पदावली लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रसखान कहाँ जन्म लेना चाहते हैं और क्यों?
उत्तर
रसखान गोकुल में, गोवर्द्धन पर्वत पर. और यमुना के किनारे कदंब की डाल पर जन्म लेना चाहते हैं। यह इसलिए कि उन्हें अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण का दर्शन होता रहे।

प्रश्न 2.
रसखान किस-किस रूप में जन्म लेना चाहते हैं?
उत्तर
रसखान गोकुल गाँव के ग्वालों, नंद की गायों, पत्थर और पक्षी के रूप में जन्म लेना चाहते हैं।

प्रश्न 3.
तीनों लोकों का राज्य कवि किस पर और क्यों न्यौछावर करना चाहता है?
उत्तर
तीनों लोकों का राज्य कवि अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण की लकुटी (लाठी) और कामरी पर न्यौछावर करना चाहता है। यह इसलिए कि उसे अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की लकुटी और कामरिया (कामरी) के सामने तीनों लोकों का सुख तुच्छ लगता है।

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प्रश्न 4.
गोपियों के छाछ को महत्त्वपूर्ण क्यों बताया गया है?
उत्तर
गोपियों के छाछ को महत्त्वपूर्ण इसलिए बताया गया है कि उससे ही वे अपने प्राण प्यारे कृष्ण को न केवल रिझाती हैं, अपितु नाच भी नचाती हैं।

प्रश्न 5.
कौए को भाग्यशाली क्यों कहा गया है?
उत्तर
कौए को भाग्यशाली कहा गया है। यह इसलिए कि जिस कृष्ण की शोभा पर कामदेव भी अपनी करोड़ों सुंदरताओं को निछावर कर देता है। उस कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी छीनकर ले जाना एक अधम पक्षी. कौए का सचमुच में सौभाग्य है।

रसखान पदावली दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कृष्ण को गिरधारी क्यों कहा जाता है?
उत्तर
गिरधारी अर्थात् गिरिधारी। गिरिधारी में दो शब्द हैं-गिरि और धारी। इसका अर्थ है, पर्वत को धारण करने वाला। भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए गोवर्द्धन पर्वत को अपनी एक अँगुली से उठा लिया था। इसलिए उन्हें गिरधारी (गिरिधारी) कहा जाता है।

प्रश्न 2.
कृष्ण की छवि पर कवि सर्वस्व निछावर करने को तैयार है।’ इस कवन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कृष्ण की छवि पर कवि सर्वस्व निछावर करने को तैयार है। इस कथन के आलोक में हम यह कह सकते हैं कि कविवर रसखान कृष्ण के अनन्य उपासक हैं। उनके वे परम भक्त हैं। वे उन्हें अपने इष्टदेव के रूप में स्वीकार कर चुके हैं। हम यह भली-भाँति जानते और समझते हैं कि जो भक्त जिस किसी ईश्वर को अपने प्राणों के समान समझता है। उसके लिए अपने सभी प्रिय वस्तुओं को यहाँ तक कि अपने प्राणों को भी निछावर करने में देर नहीं करता है। इस दृष्टि से यह कृष्ण की छवि पर कविवर रसखान सर्वस्व निछावर करने को तैयार हैं।

प्रश्न 3.
ईश्वर को अनादि और अनंत क्यों कहा गया है?
उत्तर
ईश्वर सभी प्राणियों का रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है। उसकी ही रचना सृष्टि है। सृष्टि का रचनाकार होने के कारण उसको अनादि कहा गया है। उसकी रचना का न कोई आरंभ जानता है, न विस्तार और न अंत ही जानता है। इस दृष्टि से वह अनंत है। इस प्रकार ईश्वर को अनादि और अनंत कहा गया है।

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प्रश्न 4.
श्रीकृष्ण के बालरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर
श्रीकृष्ण का बालरूप बड़ा ही अदभुत और आकर्षक है। बालकृष्ण के सिर पर मोर का पंख है। उनके गले में गुंज की माला है। वे पीताम्बर धारण किए हुए हैं। वे लकुटी लिए हुए ग्वालों के साथ गाएँ चरा रहे हैं। वे मुरली की मधुर ध्वनि से सबको मोह रहे हैं। बालक कृष्ण धूल से सने हुए मन को मोह रहे हैं। उनके सिर की बँधी हुई चोटी बहुत सुन्दर लग रही है। वे माखन-रोटी खाते हुए आँगन में इधर-उधर घूम रहे हैं। उनके इधर-उधर घूमने से उनके पैरों की पैंजनी बहुत अच्छी ध्वनि कर रही है। उनकी पीली कछनी मन को छू रही है। उनकी इस अद्भुत सुन्दरता पर रीझकर कामदेव अपनी करोड़ों सुन्दरता को निछावर कर रहा है।

प्रश्न 5.
निम्नांकित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(क) मानुष हों तो………….कूल कदंब की डारन।
(ख) सेस महेस, गनेस……………पै नाच नचावें।
(ग) मोरपंखा सिर ऊपर…………….धरी अघरा न घरोंगी।
उत्तर
(क) अगर मुझे दूसरी बार मनुष्य का जन्म प्राप्त हो, तो मैं वहीं जन्म लूँ और अपनी पूरी जिन्दगी वहीं बिता दूँ, जहाँ ब्रज-गोकुल के गाँव के ग्वाल-बाल रहते हैं। अगर मनुष्य जन्म न मिले तो फिर मेरा इसमें तो क्या अधिकार है? अर्थात कुछ भी नहीं है, ऐसा होते हुए यदि मुझे पशु-योनि (जन्म) प्राप्त हो तो मेरी यही इच्छा है कि मैं वहीं जन्म लूँ जहाँ प्रतिदिन बाबा नंद की गाएँ चरती हैं। इन्हीं के बीच में सदैव रहकर मैं अपने जन्म को सार्थक कर सकूँ। यदि यह जन्म भी न मुझे मिले तो फिर क्या? यदि मैं पत्थर भी बनूँ तो मेरी यही हदय की इच्छा है कि मैं उसी गोवर्द्धन पर्वत पर जाकर पत्थर बनूं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के कोप से रक्षा करने के लिए अपनी एक अँगुली से उठा लिया था। इन सबके बावजूद यदि किसी पक्षी का जन्म मिले तो मेरी यही कामना है कि मैं उस यमुना के तट पर स्थित कदम्ब की डालों पर प्रतिदिन दिन-रात बसा करूँ अर्थात् रहा करूँ

(ख) महाकवि रसखान का कहना है कि जिस परम आराध्य देव श्रीकृष्ण के गुणों का गुणगान, शेषनाग, गणेश, महेश (शिव), सूर्य और इन्द्र निरंतर किया करते हैं, जिस श्रीकृष्ण की अनन्त सत्ता को वेद अपने अल्प और किंचित् ज्ञान के फलस्वरूप अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बतलाया करते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि-पंडित भी अपने अनंत प्रयल के बावजूद भी जिसके स्वरूप और गति का पता न लगा सके और अंततः हार-थककर बैठ गए, ऐसे महाप्रभु श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए बार-बार नाच नचाया करती हैं।

(ग) हे सखी! मैं अपने श्रीकृष्ण के समान ही बनकर उन्हें रिझाने के लिए सिर पर मोर के पंखों को मुकुट के समान धारण कर लूँगी। कृष्ण के समान ही गुंजों की माला को गले में पहल लूँगी। उनके जैसे ही पीले वस्त्रों को पहनकर और हाथ में लकुटी (डंडे) को लेकर वृन्दावन में ग्वाल-ग्वालिनों के साथ गाय को चराती हुई इधर-उधर भटकती फिरूँगी। रसखान कवि कह रहे हैं कि उस प्रेम दीवानी गोपी ने अपनी सखी से यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि हे सखी! मेरे कृष्ण जिस प्रकार से मुझसे रीझ जाएँ, मैं ठीक उसी प्रकार से अपनी वेश-भूषा को धारण करने में तनिक भी संकोच नहीं करूँगी, लेकिन तुम इतना तो निश्चय ही जान लो कि मैं किसी भी दशा में अपनी सौतस्वरूप मुरली को कभी भी अपने होठों पर नहीं रखूगी, नहीं रखूगी। भाव यह है कि गोपी कृष्ण पर हर प्रकार से प्रेम दीवानी होते हुए मुरली रूपी सौत को इस प्रेम का भागीदार होना स्वीकार नहीं कर रही है।

रसखान पदावली भाषा-अध्ययन काव्य-सौंदर्य

प्रश्न 1.
(क) पठित पाठ में फिरौहों, चरौं, करौं आदि ब्रजभाषा के शब्द हैं, इनके अर्व लिखिए।
(ख) महेस, गनेस, दिनेस, सुरेस शब्दों को मानक रूप में लिखिए।
(ग) ‘कोटिन हूँ कलधौत के घाम करील की कुंजनि ऊपर बारो।’ इस पंक्ति में अलंकार बताइए।
उत्तर
(क) ब्रजभाषा के शब्द अर्व
फिरौहौं – फिरूँगी
चरौं – चरूँगा
करौं – करूँगा

(ख) शब्द – मानक रूप
महेस – महेश
गनेस – गणेश
दिनेश – दिनेस
सुरेस – सुरेश

(ग) ‘कोटिन हूँ कलधौत के धाम, करील की कुंजनि ऊपर बारो’ पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है।

रसखान पदावली योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. रसखान और सूर के कुछ समाना अर्थी पदों को एकत्र करके उनके अर्थ लिखिए।
प्रश्न 2. रसखान के किसी पद पर कक्षा में लघु नाटिका प्रस्तुत करें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

रसखान पदावली परीक्षापयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लपूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि का कृष्ण के प्रति अनन्य और अटूट भक्ति-भावना कैसे प्रकट हो रही है?
उत्तर
कवि का कृष्ण के प्रति अनन्य और अटूट भक्ति भावना उसके अनेक ‘जन्मों में कृष्ण के ही पास रहने की प्रबल इच्छा से प्रकट हो रही है।

प्रश्न 2.
गोपी कृष्ण का कौन-सा स्वांग नहीं करना चाहती है?
उत्तर
गोपी कृष्ण की मुरली को अपने होठों पर रखने का स्वांग नहीं करना चाहती है।

प्रश्न 3.
कृष्ण अहीर की लड़कियों के छछिया भरी छाछ पर क्यों नाचते हैं?
उत्तर
कृष्ण अहीर की लड़कियों के छछिया भरी छाछ पर इसलिए नाचते हैं कि वे उनके वश में हो चुके हैं।

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प्रश्न 4.
राजभवन का सुख पाकर कृष्ण ब्रज को क्यों नहीं भूल पाते हैं?
उत्तर
राजभवन का सुख पाकर कृष्ण ब्रज को नहीं भूल पाते हैं। यह इसलिए राजभवन का सुख उन्हें ब्रज के सुख के सामने बहुत ही फीका और छोटा लगता है।

प्रश्न 5.
कामदेव किस पर क्या न्यौछावर कर रहा है?
उत्तर
कामदेव कृष्ण की बाल सुन्दरता पर रीझकर अपनी करोड़ों सुन्दरता को न्यौछावर कर रहा है।

रसखान पदावली दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रसखान किस-किस रूप में कहाँ-कहाँ जन्म लेना चाहते हैं और क्यों?
उत्तर
रसखान मनुष्य के रूप में गोकुल के गाँव के ग्वालों के यहाँ, पशु के रूप में नंद की गायों में, पत्थर के रूप में गोवर्द्धन पर्वत पर और पक्षी के रूप में यमुना के किनारे कदंब की डालों पर जन्म लेना चाहते हैं। यह इसलिए कि वे अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की निकटता प्राप्त करते रहें।

प्रश्न 2.
कृष्ण अपने बचपन की लकुटी, कामरिया, ब्रज के बन, बाग और तड़ाक, नंद की गायों को चराने और करील के कुंजों के प्रति क्या-क्या निछावर करने के लिए तैयार हैं और क्यों?
उत्तर
कृष्ण अपने बचपन की लकुटी कामरिया ब्रज के वन, बाग और तड़ाग, नंद की गायों को चराने और करील के कुंजों के प्रति तीनों लोकों के सुख, आठों सिद्धियों, नवों निधियाँ और करोड़ों सोने के महलों को निछावर करने के लिए तैयार हैं।

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण का गुणगान निरन्तर करते हुए कौन-कौन पार नहीं पा सके?
उत्तर
श्रीकृष्ण का गुणगान शेषनाग, शिव, गणेश, सूर्य व इन्द्र निरन्तर करते रहते हैं। उनकी अनंत सत्ता को वेद अपने थोड़े-से ज्ञान से अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बतलाते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे महामुनि भी उनके नाम को रट-रट करके अपनी अनंत कोशिश के बावजूद उनके स्वरूप और गति का पता नहीं लगा सके। इस प्रकार वे उनके विषय में कुछ भी पता लगाने का पार नहीं पा सके।

प्रश्न 4.
‘रसखान-पदावली’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘रसखान-पदावली’ महाकवि रसखान द्वारा विरचित है। उनकी इन प्रस्तुत हुई सवैयों में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेमानुराग और अद्भुत सौंदर्य के चित्र हैं। इसके साथ-साथ बाल-लीला का भी बड़ा ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत है। कवि ने बार-बार गोकुल में ही जन्म लेने की इच्छा प्रकट की है। इन सवैयों में गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति अगाध प्रेम तो है ही, उन्हें रिझाने के लिए विविध रूपों का स्वांग समर्पण भाव भी है।

रसखान पदावली कवि-परिचय

प्रश्न
कविवर रसखान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-कविवर रसखान का पूरा असली नाम सैयद इब्राहीम था। उनका जन्म 1548 में दिल्ली में हुआ था। उनके बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से वल्लभ सम्प्रदाय के अंतर्गत दीक्षा ली थी। उनके काव्य में अच्य वल्लभाचार्य के अनुयायी कृष्ण-भक्त कवियों जैसी प्रेम-माधुरी और भक्ति-शैली से इस बात की पुष्टि होती है। उनके निधन की निश्चित तिथि के विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। अधिकांश विद्वानों ने उनको 85 वर्षों तक जीवित होना स्वीकार किया है। ‘ रचनाएँ-रसखान की निम्नलिखित रचनाएँ हैं

  1. सुजान रसखान
  2. प्रेमवाटिका
  3. दानलीला
  4. स्फुट छंद और संदिग्ध छंद।

काव्यगत विशेषताएँ-कविवर रसखान की काव्यगत विशेषताएँ मध्यकालीन कवियों में महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने काव्य में भक्ति के तीनों रूपों को अर्थात् . रूप-वर्णन, विरह-वर्णन और आत्म-समर्पण को चित्रित किया है। इसके लिए रसखान ने ब्रजभाषा और अवधी भाषा के साथ-साथ कुछ अरबी मिश्रित शब्दों के प्रयोग किए हैं। रसखान की शैली भावात्मक और चित्रात्मक दोनों ही है। उसमें गीतात्मकता की प्रधानता है। प्रवाहमय और गतिशील होने के कारण वह अधिक लोकप्रिय है। रसखान के काव्य में रस, छंद और अलंकार की विविधता है।

साहित्यिक महत्त्व-रसखान हिंदी भक्तिकाव्य की कृष्णाश्रयी काव्यधारा के अधिक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। फलस्वरूप वे बहुत लोकप्रिय हैं। इनके प्रेम का चित्रण इतना प्रभावशाली है कि उनके पदों को पढ़कर कोई भी गुनगुनाने लगता है। वास्तव में वे प्रेमरस के खान थे।

रसखान पदावली कविता का सारांश

प्रश्न
रसखान द्वारा विरचित ‘सवैया’ के पदों का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कविवर रसखान विरचित ‘सवैया’ के पदों में श्रीकृष्ण के प्रति अपार प्रेम की भावना व्यक्त की गई है। इसमें श्रीकृष्ण की अद्भुत सुन्दरता के भी चित्र खींचे गए हैं। श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अपार भक्ति भावना को दशति हुए कवि का कहना है कि वह जिस जन्म में हो, वह अपने प्रभु श्रीकृष्ण से यही चाहता है कि उसे वे अपने ही आस-पास उसे विचरने की कृपा प्रदान करें। इस प्रकार वह पहले पद में मनुष्य का जन्म पाकर गोकुल गाँव के ग्वालों के साथ, पशु का जन्म पाकर नंद की गायों के बीच, पत्थर होने पर श्रीकृष्ण द्वारा धारण किए गए मोवर्द्धन पर्वत पर और पक्षी का जन्म पाकर श्रीकृष्ण का प्रिय स्थान यमुना के तट पर विचरण करना चाहता है। दूसरे पद में वह श्रीकृष्ण द्वारा लकुटी-कम्बल पर तीनों लोकों के सुख को, नंद की गायों को चराते हुए आठों सिद्धि और नवों निधि के सुख और ब्रज के वन, बाग, तड़ाग को बार-बार देखते रहने के सुख के सामने करोड़ों सोने के घरों को करील के कंजों के ऊपर निछावर करने के लिए तैयार होने का उल्लेख है।

तीसरे पद में एक गोपी का दूसरे गोपी का श्रीकृष्ण की मुरली के प्रति सौतिया डाह का वह कथन प्रस्तुत है, जिसमें वह श्रीकृष्णमय होने के लिए उनकी ही तरह मोर के पंख, गले में गुंज की माला, पीताम्बर, लकुटी लेकर गायों और गोपियों के साथ घूमने-फिरने के साथ-साथ वह सब कुछ उसके कहने पर करने के लिए तैयार है, लेकिन वह किसी भी दशा में श्रीकृष्ण की तरह मुरली (अपनी सौत) को अपने ओंठ पर नहीं धारण करेगी। चौथे पद में कवि ने जिस श्रीकृष्ण का यशगान सभी देवता और ऋषि-मुनि व वेद-पुराण करते हुए पार नहीं पाते हैं। उन्हें अहीर की लड़कियाँ छाछ रखने के बर्तन भर छाछ के लिए नाच-नचाने का चित्रण किया है। पाँचवें पद में श्रीकृष्ण के अद्भुत बाल-सौंदर्य और बाल-चरित्र का चित्रण करते हुए कवि ने उसे करोड़ों कामदेव की सुंदरता को निछावर करने वाला कहा है।

रसखान पदावली संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पदों की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौंदर्य एवं विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मानुस हाँ तो वही रसखानि फिरो मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। .
जो पशु हों तो कहा बस मेरो चौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हों तो वही गिरि को जो धरयो पुर छत्र पुरन्दर धारन ।
जो खग हों तो बसेरो करौं नित कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन॥

शब्दार्थ-मानस-मनुष्य। हौं-मैं। बसौं-निवास करूँ। बस-अधिकार। नित-नित्य। मँझारन-बीच में। पाहन-पत्थर । गिरि-गोवर्द्धन पर्वत । पर्यो-धारण किया। पुरन्दर-इन्द्र। खग-पक्षी। कालिन्दी-यमुना। कूल-किनारे।

प्रसंग-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती’ हिंदी सामान्य में संकलित व महाकवि रसखान द्वारा विरचित ‘सवैया’ शीर्षक से है। इसमें कवि ने अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण के प्रति अपनी स्वतंत्र भक्तिभावना को प्रस्तुत करते हुए कहा है कि

व्याख्या-अगर मुझे दूसरी बार मनुष्य का जन्म प्राप्त हो, तो मैं वहीं जन्म लूँ और अपनी पूरी जिन्दगी वहीं बिता दूँ, जहाँ ब्रज-गोकुल के गाँव के ग्वाल-बाल रहते हैं। अगर मनुष्य जन्म न मिले तो फिर मेरा इसमें तो क्या अधिकार है? अर्थात कुछ भी नहीं है, ऐसा होते हुए यदि मुझे पशु-योनि (जन्म) प्राप्त हो तो मेरी यही इच्छा है कि मैं वहीं जन्म लूँ जहाँ प्रतिदिन बाबा नंद की गाएँ चरती हैं। इन्हीं के बीच में सदैव रहकर मैं अपने जन्म को सार्थक कर सकूँ। यदि यह जन्म भी न मुझे मिले तो फिर क्या? यदि मैं पत्थर भी बनूँ तो मेरी यही हदय की इच्छा है कि मैं उसी गोवर्द्धन पर्वत पर जाकर पत्थर बनूं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के कोप से रक्षा करने के लिए अपनी एक अँगुली से उठा लिया था। इन सबके बावजूद यदि किसी पक्षी का जन्म मिले तो मेरी यही कामना है कि मैं उस यमुना के तट पर स्थित कदम्ब की डालों पर प्रतिदिन दिन-रात बसा करूँ अर्थात् रहा करूँ।

विशेष-

  1. इस पद में उन्हीं वस्तुओं का उल्लेख किया गया है जिनसे श्रीकृष्ण का अटूट सम्बन्ध है। इसलिए श्रीकृष्ण के प्रति कवि की पूरी भक्ति-भावना प्रकट होती है।
  2. ‘बसौ ब्रज-गोकुल गाँव के ग्वारन’ और ‘कालिंदी कूल-कदंब की’ में छेकानुप्रास अलंकार है।
  3. ‘पाहन हौं तो वही गिरि की जो धर्यो कर छत्र पुरंदर-धारन’ में अंतर्कथा है।
  4. भाव और भाषा में मधुरता है।

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1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद के भाव-सौंदर्य को लिखिए।
(iii) प्रस्तुत पद में किसका उल्लेख हुआ है और क्यों?
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद में कवि का विशुद्ध भाव अपने इष्टदेव के प्रति प्रकट हुआ। है। उसे दर्शाने के लिए कवि ने ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली को अपनाया है। गोवर्द्धन पर्वत का प्रासंगिक उल्लेख करके स्मरण अलंकार को उपयुक्त स्थान दिया गया है। भक्तिरस के प्रवाह से पूरा पद अधिक सरस और हदयस्पर्शी बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद की भाव-योजना आकर्षक है। उसमें प्रवाह है तो सरसता है। रोचकता है तो स्वाभाविकता है। अलंकारों का चमत्कार है, तो कथन की क्रमबद्धता भी है। इस पद के भावों की सुन्दरता निश्चय ही सराहनीय है।
(iii) प्रस्तुत पद में श्रीकृष्ण के निकटवर्ती वस्तुओं और स्थानों का उल्लेख हुआ है। यह इसलिए उनके प्रति कवि की पूरी रुचि और अधिक लगाव है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद में किसके प्रति क्या भाव प्रकट हुआ है?
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में कवि की अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति-भावना प्रकट हुई है।
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति-भावना को प्रकट करते हुए उसे प्रेरक बनाना है।

2. या लकुटी अरू कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहूँ सिद्धि नवो निधि को सुख नंद की गाय चराय बिसाएँ।
रसखानि कबै इन आँखिन तैं ब्रज के बन, बाग, तडाग निहारौं ।
कोटिन हूँ कलधौत के धाम करील की कुंजनि ऊपर बारौं ।

शब्दार्थ-या-उस। लकुटी-लाठी। तिहूँपुर-पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल। सिद्ध-अलौकिक शक्ति। आटहुँ सिद्ध-आठ सिद्धियाँ-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वाशित्व । निधि-अपूर्व भंडार, वैभव । निधियाँ-नौ प्रकार की कही गई हैं-पद, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व ।कोटिक-करोड़ों। कलधौत के घाम-सोने-चाँदी के महल । बारौं-निछावर करता हूँ।

प्रसंग-पूर्ववत् इसमें कवि ने श्रीकृष्ण के ब्रज के प्रति अनन्य प्रेम का उल्लेख करते हुए कहा है।

व्याख्या-द्वारिका में रहते हुए श्रीकृष्ण को एक दिन ब्रज की याद आ गई। वे उससे व्याकुल होकर रुक्मणी से कह रहे हैं कि उस लाठी और कामरी के लिए मैं तीनों लोकों का राज्य भी एकदम छोड़ देने के लिए तैयार हूँ। नंद की गाय चराने के लिए अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वाशित्व-इन आठों सिद्धियों तथा पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व-इन नवों निधियों के सुख का त्याग करने के लिए तैयार हूँ। जब मैंने अपनी इन आँखों से ब्रज के वन और तालाबों को देखा है, अर्थात् मुझे उनकी याद आई है, तब से मैं उनके लिए इतना आतुर हो गया हूँ कि मैं वैभव के प्रतीक इन करोड़ों सोने-चाँदी के महलों को ब्रज के करील-कुँजों के ऊपर न्यौछावर करता हैं।

विशेष-

  1. ‘ब्रज के वन-बाग’ और ‘करील की कुंजन’ में अनुप्रास अलंकार है। पूरे पद में मुख्य रूप से स्मरण अलंकार है।
  2. ब्रजभाषा की शब्दावली है।
  3. भावात्मक शैली है।

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1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य को लिखिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य बताइए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य रसात्मक और आलंकारिक है। ब्रज के प्रति कृष्ण के अनन्य प्रेम-भाव को मुख्य रूप से स्मरण अलंकार से अलंकृत करने के प्रयास में अनुप्रास अलंकार को भी जोड़ दिया गया है। ब्रजभाषा की शब्दावली से भावों को पुष्ट करने में सवैया छंद का प्रयोग सार्थक है। इससे पूरा पद आकर्षक बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-विधान न केवल स्वाभाविक है अपितु प्रेरक भी। अपने बचपन की याद की व्याकुलता सभी को सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए उकसाती है। इस प्रकार के भाव-चित्र निश्चय ही मन को छूने वाले हैं।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में किसका किसके प्रति भाव प्रकट हुए हैं?
(ii) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में श्रीकृष्ण का ब्रज के प्रति अनन्य भाव प्रकट हुए हैं।
(ii) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव है-जन्मभूमि के प्रति पवित्र और सर्वस्व निछावर कर देने की प्रेरणा-शिक्षा देना है।

3. मोरपंखा सिर ऊपर राखिहाँ, गंज की माल गरे पहिरोंगी।
ओढ़ि पीताम्बर ले लकुटी बन, गोधन ग्वारिन संग फिरॉगी।
भावतों बोहि मेरे रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग भरोंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अघरान-धरी अधरा न धरोंगी।

शब्दार्च-मोरपंखा-मोर के पंख। ओढि-ढ़ककर। पीताम्बर-पीला वस्त्र । लकुटी-लाठी। ग्वारिन-ग्वालिनी। स्वांग-रूप। मुरलीधर-श्रीकृष्ण । अधरा-होंठों पर। घरौंगी-धारण करूँगी।

प्रसंग-पूर्ववत् । श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी हुई एक गोपी अपनी एक प्रिय सखी से इस प्रकार कह रही है कि

व्याख्या-हे सखी! मैं अपने श्रीकृष्ण के समान ही बनकर उन्हें रिझाने के लिए सिर पर मोर के पंखों को मुकुट के समान धारण कर लूँगी। कृष्ण के समान ही गुंजों की माला को गले में पहल लूँगी। उनके जैसे ही पीले वस्त्रों को पहनकर और हाथ में लकुटी (डंडे) को लेकर वृन्दावन में ग्वाल-ग्वालिनों के साथ गाय को चराती हुई इधर-उधर भटकती फिरूँगी। रसखान कवि कह रहे हैं कि उस प्रेम दीवानी गोपी ने अपनी सखी से यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि हे सखी! मेरे कृष्ण जिस प्रकार से मुझसे रीझ जाएँ, मैं ठीक उसी प्रकार से अपनी वेश-भूषा को धारण करने में तनिक भी संकोच नहीं करूँगी, लेकिन तुम इतना तो निश्चय ही जान लो कि मैं किसी भी दशा में अपनी सौतस्वरूप मुरली को कभी भी अपने होठों पर नहीं रखूगी, नहीं रखूगी। भाव यह है कि गोपी कृष्ण पर हर प्रकार से प्रेम दीवानी होते हुए मुरली रूपी सौत को इस प्रेम का भागीदार होना स्वीकार नहीं कर रही है।

विशेष-

  1. ‘सौतिया डाह’ नामक नारी सुलभ स्वभाव का कवि ने सजीव और रोचक चित्र प्रस्तुत किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार की सुन्दर योजना है।
  3. चित्रात्मक शैली है, और भाषा ब्रजभाषा है।
  4. गोपी का सच्चा प्रेम चित्रित हुआ है।

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1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) गोपी ने क्या धारण करने से मना कर दिया और क्यों?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में श्रीकृष्ण की एक अनन्य प्रेमिका गोपी के भावों को कवि ने ब्रजभाषा की शब्दावली से पुष्ट करके उसे अनुप्रास अलंकार से चमत्कृत करने का सार्थक प्रयास किया है। इसके लिए प्रस्तुत हुआ शृंगार रस का प्रवाह बड़ा ही सुंदर है। चित्रात्मक शैली से यह अंश अधिक आकर्षक बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्वाभाविक रूप में है। गोपी का कृष्ण के प्रति उमड़ा हुआ प्रेम सात्त्विक और विशुद्ध भावों का है। कृष्ण का स्वांग करने वाली गोपी का कृष्ण की मुरली के प्रति सौतिया डाह नारी स्वभाव के अनुकूल है।।
(iii) गोपी ने अपने होठों पर कृष्ण की मुरली को धारण करने से मना कर दिया है। यह इसलिए कि वह उसे अपनी सौत समझती थी।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव क्या है?
(ii) गोपी ने कृष्ण का स्वांग करने के लिए क्यों कहा?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद का भाव यह है कि कृष्ण का सौंदर्य अद्भुत है। इसलिए वह रोचक है। इसे दर्शाना ही उपर्युक्त पद का मुख्य भाव है।
(ii) गोपी ने कृष्ण को रिझाने के लिए ही उनका स्वांग करने के लिए कहा।

4. सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहू जाहि निरंतर गावें।
जाहि अनादि अनन्त अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावें।
नारद लै सुक व्यास रटे पचिहारे तऊ पुनि पार न पावें।
ताहि अहीर की छोहरियों छछिया भरि छाछि पै नाच नचावें।

शब्दार्थ-सेस-शेषनाग। गनेस-गणेश। महेस-शिव । दिनेस-सूर्य । सुरेस-इन्द्र। जाहि-जिसके। अभेद-भेदरहित। अछेद-अमर। अभेद-जिसका रहस्य न जाना जा सके। पचि-कोशिश करके।

प्रसंग-प्रस्तुत सवैया रीतिकालीन रीतिमुक्त काव्यधारा के महत्त्वपूर्ण महाकवि ‘रसखान द्वारा विरचित है। इसमें महाकवि रसखान ने अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत प्रेममय उदारता और भक्त-वत्सलता का चित्ताकर्षक चित्रण किया है।

व्याख्या-महाकवि रसखान का कहना है कि जिस परम आराध्य देव श्रीकृष्ण के गुणों का गुणगान, शेषनाग, गणेश, महेश (शिव), सूर्य और इन्द्र निरंतर किया करते हैं, जिस श्रीकृष्ण की अनन्त सत्ता को वेद अपने अल्प और किंचित् ज्ञान के फलस्वरूप अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बतलाया करते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि-पंडित भी अपने अनंत प्रयल के बावजूद भी जिसके स्वरूप और गति का पता न लगा सके और अंततः हार-थककर बैठ गए, ऐसे महाप्रभु श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए बार-बार नाच नचाया करती हैं।

विशेष-

  1. संपूर्ण पद में क्रमशः अंत्यानुप्रास, छेकानुप्रास और वृत्यानुप्रास अलंकार की सुंदर योजना है।
  2. संपूर्ण पद में भक्ति और श्रृंगार रस का सुंदर प्रवाह है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पद में कृष्ण के किस रूप का चित्रण किया गया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में कृष्ण के असाधारण और सामान्य रूप को चित्रित करने के लिए कवि ने अनुप्रास अलंकारों की झड़ी लगा दी हैं। पूरे पद को हृदयस्पर्शी बनाने के लिए भक्ति रस और शृंगार रस के मिश्रित प्रयोग सचमुच में अनूठे हैं।
(ii) प्रस्तुत पद की भाव-योज़ना पद भक्ति-भावना आधारित है। भाव बड़े ही – चित्ताकर्षक और रोचक होने के साथ गतिशील और विविध हैं।
(iii) प्रस्तुत पद में कृष्ण को दो रूपों में चित्रित किया है-परब्रह्म और गोपियों के प्रेमी के रूप में।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कृष्ण के परस्पर अलग-अलग स्वरूपों के चित्रण से कवि क्या दर्शाना चाहता है?
(ii) श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए क्यों नचाया करती हैं?
उत्तर
(i) कवि कृष्ण के परस्पर अलग-अलग स्वरूपों के चित्रण से उनके प्रति अपनी अनन्य भक्ति-भावना को दर्शाना चाहता है।
(ii) श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नचाया करती हैं। यह इसलिए कि इससे उन्हें कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेमरस का आनंद प्राप्त होता है।

5. धूरि भरे अति सोभित स्यामंज, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरें अंगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी।
वा छवि को रसखानि विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि साथ सों ले गयो माखन रोटी।

शब्दार्व-पूर-धूल । स्याम-श्रीकृष्ण । अंगना-आँगन। छवि-सौंदर्य । विलोकत-देखते ही। वारत-निछावर। कोटी-करोड़ों। काग-कौआ।

प्रसंग-पूर्ववत्। एक गोपी अपनी प्रिय सखी से अपने प्राण-प्यारे श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का उल्लेख करते हुए कह रही है कि

व्याख्या-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की सुंदरता का वर्णन करती हुई कहती है कि धूल से सने हुए शरीर वाले श्रीकृष्ण अत्यंत शोभायमान थे। ऐसी ही शोभा से युक्त उनके सिर की सुंदर चोटी बनी हुई थी। वे खेलते हुए और माखन, रोटी खाते हुए अपने आँगन में घूम रहे थे। उनके पैरों की पैंजनी बज रही थी। वे पीली लंगोटी पहने हुए थे। उनकी उस समय की शोभा को देखकर कामदेव भी अपनी करोड़ों संदरताओं को उस पर न्यौछावर कर रहा था। हे सखि! उस कौवे का बहत बडा सौभाग्य है जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी झपटकर उड़ गया।

विशेष-

  1. कृष्ण की बाल-लीला का सुंदर एवं स्वाभाविक वर्णन है।
  2. ‘वा छवि को ‘रसखानि’ विलोकत, वारत काम कला निधि कोटी’ में व्यतिरेक अलंकार है।
  3. पाठान्तर-चतुर्थ पंक्ति का यह पाठ भी मिलता है।’काग के भाग कहा कहिए हरि हाव सों ले गयो माखन-रोटी।’

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1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) श्रीकृष्ण का सौंदर्य कैसा हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य अनूठा है। यह इसलिए कि उसमें अनुप्रास अलंकार का चमत्कार है, तो शृंगार रस का तीव्र प्रवाह है। चित्रात्मक शैली से सवैया छंद अधिक मनमोहक हो गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य बाल-स्वभाव के चित्रों से अधिक आकर्षक है बालक कृष्ण का बाल-चरित्र न केवल रिझाने वाला है वरन् उसमें गति, ओज और क्रमबद्धता है।
(iii) श्रीकृष्ण का सौंदर्य कामदेव की करोड़ों सुंदरता को लज्जित करने वाला है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में कृष्ण के किस रूप का चित्रण हुआ है?
(ii) उपर्युक्त पद का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) उपर्युक्त पद में कृष्ण के बाल-रूप का अत्यधिक भावपूर्ण चित्रण हुआ है।
(ii) उपर्युक्त पद का भाव सरल किंतु आकर्षक है। बालक कृष्ण की बाल-लीला का स्वाभाविक, विश्वसनीय और यथार्थमय चित्रण है। इसके द्वारा कवि ने अपनी अनन्य भक्ति-भावना करते हुए इसे प्रेरक स्वरूप प्रदान किया है।

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित बोध

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित बोध

अपठित का तात्पर्य है जो पढ़ा हुआ न हो। अपठित का अवतरण पाठ्य-पुस्तकों से सम्बन्धित नहीं होता। परीक्षा में अपठित के अन्तर्गत निम्न प्रश्न पूछे जाते हैं। देखिए

  1. अवतरण का शीर्षक।
  2. समस्त गद्य-अवतरण अथवा पद्यावतरण का स्वयं की भाषा में सारांश।
  3. अवतरण पर आधारित प्रश्नों के उत्तर।

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(1) शीर्षक–अवतरण का शीर्षक जहाँ तक हो सके लघु (छोटा) तथा उपयुक्त होना चाहिए। शीर्षक में अवतरण का समस्त भाव परिलक्षित होना नितान्त आवश्यक है। शीर्षक के लिए गद्यांश के प्रारम्भिक एवं आखिरी अंश का चिन्तन एवं मनन करना चाहिए।

(2) सारांश परीक्षा में अवतरण का सारांश अथवा भाव लिखने को आता है। सारांश छोटा तथा सारगर्भित होना चाहिए। इसमें अपनी भाषा का प्रयोग करना परमावश्यक है। अवतरण की भाषा को ज्यों का त्यों लिखना वर्जित है। भाषा का परिमार्जित होना जरूरी है।

सार-लेखन में पूछे गये अवतरण का ही भाव परिलक्षित होना चाहिए। सारांश का कलेवर एक तिहाई से किसी भी दशा में अधिक नहीं होना चाहिए।

(3) प्रश्नोत्तर–प्रश्नों के उत्तर लघु तथा सारगर्भित होने चाहिए। अवतरण के आधार पर ही उत्तर देने चाहिए। अनर्गल उत्तर देना वर्जित है। प्रश्नोत्तरों की भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए।

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित गद्यांश

प्रश्न-
निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. मन के सशक्त होने पर शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आती है। यदि मन दुर्बल है तो शरीर निष्क्रिय और निरुद्यम ही रहेगा। यह संसार शक्तिशाली का है। दुर्बल का इस संसार में कहीं ठिकाना नहीं। कायर व्यक्ति मृत्यु से पहले ही सहस्रों बार मरता है। कायरता का सम्बन्ध मन से है। कायरता और निरुत्साह का दूसरा नाम ही मन की हार है। परिणामत: मन की हार अत्यन्त भयंकर है। मनुष्य भाग्य का निर्माता है, पर कायर पुरुष नहीं। सबल ही भाग्य निर्माता की सामर्थ्य रखता है। कायर तो दैव-दैव ही पुकारता है। साहसी व्यक्ति को अपने मानसिक बल पर अभिमान होता है।

प्रश्न-
(1) इस अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) इस अवतरण में भाग्य का निर्माता किसे कहा गया है?
(3) इस अवतरण का सारांश 30 शब्दों में दीजिए।
(4) मन के सशक्त होने पर शरीर में क्या होता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘मनोबल’।’
(2) मानव को स्वयं अपने भाग्य का निर्माता कहा गया है।
(3) सारांश-मन का सबल एवं पुष्ट होना सबसे बड़ी ताकत है। मन के दुर्बल होने पर मानव भीरु (कायर) बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का दुनिया में जीवित रहना अथवा न रहना एकसमान है। अतः मन को सशक्त बनाओ तथा अपने भाग्य की सृष्टि (निर्माण) करो।
(4) मन के सशक्त होने पर शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आती है।

2. क्षमा पृथ्वी का गण-धर्म है। क्षमा वीरों का भूषण है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से अपराध होते रहते हैं,गलतियाँ होती रहती हैं। हमारी दृष्टि में कोई अपराधी है तो हम भी किसी की दृष्टि में अपराधी हैं। यहाँ निर्दोष कोई भी नहीं है, इसलिए परस्पर क्षमा-भावना की अति आवश्यकता है। क्षमा के अभाव में क्रोध, हिंसा, संघर्ष का साम्राज्य छा जायेगा जिसे कोई भी स्वीकार नहीं करता है। माता-पिता, गुरु सभी क्षमाशील होते हैं। मानव जीवन में क्षमा के अवसर आते रहते हैं। क्षमा के अभाव में जीवन चलना दूभर हो जाता है। अहिंसा, करुणा, दया, मैत्री, क्षमा आदि दैवीय गुण हैं। ये गुण मानव-जीवन के लिए आवश्यक हैं। (2009)

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) क्षमा के अभाव में किसका साम्राज्य छा जाता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक–’क्षमा दैवीय गुण’।

(2) सारांश-क्षमा पृथ्वी का गुण है। पृथ्वी अनेक आघातों को सहकर भी मानव सेवा में तत्पर रहती है। क्षमा वीरों का आभूषण है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से जाने-अनजाने में अपराध करता रहता है। सब एक-दूसरे की दृष्टि में अपराधी हैं। अत: मानव को अपने मन मानस में क्षमा को प्रथम वरीयता देनी चाहिए। जीवन में क्षमा के अनेक अवसर आते हैं। अहिंसा, दया, मित्रता, क्षमा आदि ईश्वरीय गुणों के परिचायक हैं।

(3) क्षमा के अभाव में क्रोध, हिंसा और संघर्ष का साम्राज्य छा जायेगा।

3. मानव का अकारण ही मानव के प्रति अनुदार हो उठना न केवल मानवता के लिए लज्जाजनक है, वरन् अनुचित भी है। वस्तुतः यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है, कर सकता है। केवल इसलिए कि कोई मनुष्य बुद्धिहीन है अथवा दरिद्र वह घृणा का तो दूर रहा, उपेक्षा का भी पात्र नहीं होना चाहिए। मानव तो इसलिए सम्मान के योग्य है कि वह मानव है, भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है। [2009, 14]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) यथार्थ मनुष्य किसे कहा गया है?
(3) उक्त गद्य खण्ड का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘आदर्श मानव’।
(2) यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है।
(3) सारांश-मानव का उदारता रहित होना मानवता के लिए लज्जाजनक ही नहीं अपितु अनुचित भी है। वास्तव में सच्चा मनुष्य वही है जिसके मन मानस में मानवता के प्रति संवेदना हो। वह प्रत्येक व्यक्ति का आदर करना जानता हो।

बद्धिहीन निर्धन व्यक्ति के प्रति भी उपेक्षा की भावना नहीं होनी चाहिए अपितु उनको भी यथेष्ट सम्मान प्रदान करना चाहिए।

4. राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त होने के कारण हिन्दी का दायित्व कुछ बढ़ जाता है। अब वह मात्र साहित्य की भाषा ही नहीं रह गयी है, उसके माध्यम से ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई उपलब्धियों का भी ज्ञान विकास करना तथा प्रशासन की भाषा के रूप में उसका नव-निर्माण करना हमारा दायित्व है। यह बड़ा महान् कार्य है और इसके लिए बड़ी उदार और व्यापक दृष्टि तथा कठिन साधना की अपेक्षा है।

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) हिन्दी भाषा किस पद पर अभिषिक्त है?
(4) हिन्दी का दायित्व क्यों बढ़ गया है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-राष्ट्रभाषा हिन्दी।’
(2) सारांश-आज हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन है। आज हिन्दी भाषा से ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी की जानकारी मिल रही है। प्रशासकीय स्तर पर भी हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया है। हिन्दी सभी क्षेत्रों में एक गौरवशाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर हिन्दी को पूरा सम्मान देना होगा। इसी में सबका हित-साधन है।
(3) हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त है।
(4) राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त होने से हिन्दी का दायित्व बढ़ जाता है, क्योंकि अब यह ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की भाषा बन चुकी है।

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5. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज से अलग उसके अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। परिचित तो बहुत होते हैं,पर मित्र बहुत कम हो पाते हैं,क्योंकि मैत्री एक ऐसा भाव है जिसमें प्रेम के साथ समर्पण और त्याग की भावना मुख्य होती है। मैत्री में सबसे आवश्यक है, परस्पर विश्वास। मित्र ऐसा सखा, गुरु और माता है जो सभी स्थानों को पूर्ण करता है। [2009]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का एक सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) मैत्री में कौन-कौन से भाव सम्मिलित हैं?
उत्तर-
(1) शीर्षक ‘सच्चा मित्र’।
(2) सारांश-मानव एक समाज में रहने वाला प्राणी है। उसका अस्तित्व ही समाज पर है। समाज में परिचित तो अनेक होते हैं लेकिन मित्रों की संख्या कम होती है। सच्ची मित्रता में त्याग एवं समर्पण की भावना प्रमुख रूप से निहित होती है।

मित्रता में आपसी विश्वास का होना अपेक्षित है। सच्चा मित्र गुरु एवं माता के समान है जो समस्त स्थानों की पूर्णता का द्योतक है।

(3) मैत्री में प्रेम भाव के साथ-साथ समर्पण, त्याग और परस्पर विश्वास होना आवश्यक है।

6. अमृत तो प्रत्येक प्राणी के हृदय में समाया हुआ है, जरूरत है तो उसे जानने की। इस काया के अन्दर भरपूर अमृत है। गुरु के शब्द पर विचार करके ही उसे प्राप्त किया जा सकता है। जो प्रभु की खोज करते हैं वह इस अमृत को देह से ही प्राप्त करते हैं लेकिन गुरु के शब्द पर विचार न कर पाने के कारण अज्ञानी जीव व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है। इस शरीर के नौ द्वार हैं परन्तु इन नौ द्वारों में से हमें अमृत प्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि वह दसवें द्वार में स्थित है। मनुष्य नौ द्वारों के रहस्य को तो जानता है परन्तु गुरु रूपी दसवें द्वार को भूला हुआ है। गुरु का कार्य उस द्वार को प्रकट करना है। यदि अन्तर में परमपिता परमात्मा से हमें प्रेम है, परन्तु जब तक हमें परमात्मा के दर्शन नहीं होते हम तब तक अमृतपान नहीं कर सकते। [2011]

प्रश्न- (1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) व्यक्ति अमृतपान कब कर सकता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक–’अमृत की अभिलाषा।’

(2) सारांश इस गद्यांश के द्वारा लेखक ने यह बताने का प्रयत्न किया है, कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में ईश्वर का निवास है। लेकिन ईश्वर तक पहुँचने का साधन गुरु है। गुरु के द्वारा ही व्यक्ति अपने गन्तव्य तक पहुँच सकता है। व्यक्ति अज्ञानता के कारण इधर-उधर भटकता रहता है और अपने जीवन को बेकार ही नष्ट कर लेता है। लेखक के अनुसार मानव उसके शरीर में मौजूद नौ द्वारों के रहस्य को तो जानता है किन्तु अमृत से तृप्त दसवें द्वार को वह भूला हुआ है, जिसे बिना गुरु के मार्गदर्शन के वह प्राप्त नहीं कर सकता है। सच्चे गुरु का कर्त्तव्य उस दसवें द्वार को प्रकट कर शिष्य भगवानरूपी अमृत से साक्षात्कार करवाना है।

(3) व्यक्ति गुरु के सानिध्य में रहकर अमृत पान कर सकता है।

7. यदि हम समय का सदुपयोग करना सीख लें,तो इससे लाभ ही लाभ हैं। व्यर्थ ही समय व्यतीत करके जो काम दिन भर में कर पाते हैं,उसे कुछ घण्टों में ही कर सकते हैं। इस प्रकार पूरे जीवन में हम कई गुना कार्य करके अपना विकास और मानवता की सेवा कर सकते हैं। अधिक कार्य करके हम अधिक धन,यश, सम्मान अर्जित कर सकते हैं। निरन्तर ऊँचे उठते हुए जीवन को सार्थक बना सकते हैं। हममें कर्मठता आती है, चरित्र में दृढ़ता आती है। सच्चे अर्थों में हम मनुष्य बन जाते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं,सभी ने समय के महत्व को समझा तथा उसका सम्पूर्ण उपयोग किया था। [2009]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
(3) जीवन को सार्थक किस प्रकार बनाया जा सकता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘समय का सदुपयोग।
(2) सारांश-मानव जीवन में समय का पालन करना नितान्त आवश्यक है। समय के सदुपयोग से कार्य पूर्ण होने में समय की बचत होती है।

समय के सदुपयोग से स्वयं का विकास एवं मानवता की सेवा भी सम्भव है। समय के सदुपयोग से हमारी कर्मशीलता एवं चरित्र का विकास होता है। हम सच्चे अर्थों में मानव कहे जाने के अधिकारी बन सकते हैं।

(3) अधिक कार्य करके धन, यश, सम्मान अर्जित करके निरन्तर ऊँचे उठते हुए जीवन को सार्थक बना सकते हैं।

8. धर्म एक व्यापक शब्द है। मजहब, मत,पंथ या संप्रदाय सीमित रूप है। संसार के सभी धर्म मूल रूप में एक ही हैं। सभी मनुष्य के साथ सद्व्यवहार सिखाते हैं। ईश्वर किसी विशेष धर्म या जाति का नहीं। सभी मानवों में एक प्राण स्पंदन होता है। उसके रक्त का रंग भी एक ही है। सुख-दुःख का भाव बोध भी उनमें एक जैसा है। आकृति और वर्ण, वेशभूषा और रीतिरिवाज तथा नाम ये सब ऊपरी वस्तुएँ हैं। ईश्वर ने मनुष्य या इंसान को बनाया है और इंसान ने बनाया है धर्म या मजहब को। ध्यान रहे मानवता या इंसानियत से बड़ा धर्म या मजहब दूसरा कोई नहीं। वह मिलना सिखाता है, अलगाव नहीं। ‘धर्म’ तो एकता का द्योतक है। [2010]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।
(2) सबसे बड़ा धर्म कौन-सा है?
(3) बाह्य वस्तुएँ क्या हैं?
उत्तर-
(1) शीर्षक-धर्म का अर्थ।’
(2) इन्सानियत या मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
(3) संसार में भिन्न-भिन्न आकृति एवं वर्ण वाले लोग होते हैं। इन व्यक्तियों के रीतिरिवाज और वेशभूषा भी अलग-अलग होती हैं। ये सभी बाह्य वस्तुएँ कहीं जाती हैं।

9. मनुष्य का जीवन बहुत संघर्षमय होता है। उसे पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। फिर भी ईश्वर के द्वारा जो मनुष्यरूपी वरदान की निर्मिति इस पृथ्वी पर हुई है मानो धरती का रूप ही बदल गया है। यह संसार कर्म करने वाले मनुष्यों के आधार पर ही टिका हुआ है। देवता भी उनसे ईर्ष्या करते हैं। मनुष्य अपने कर्म बल के कारण श्रेष्ठ है। धन्य है मनुष्य का जीवन। [2012]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) मनुष्य किस कारण श्रेष्ठ माना गया है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘मनुष्य और कर्म।’
(2) सारांश-मानव ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है। यद्यपि मानव जीवन कदम-कदम पर कठिनाइयों और संघर्षों की अनवरत कहानी है किन्तु ईश्वर द्वारा पृथ्वी पर मानव की रचना एक वरदान जैसी है। पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति से धरती का स्वरूप पूर्णतः बदल गया है और उसका सबसे बड़ा कारण है मानव का कर्म प्रधान व्यवहार। वास्तव में यह दुनिया ऐसे लोगों के कारण ही इतनी सुन्दर है जो कर्म को अपना धर्म मानते हैं। देवता तक ऐसे कर्मशील व्यक्तियों से ईर्ष्या करते हैं, या कहें प्रेरित होते हैं। मानव जन्म मात्र अपने कर्म कौशल के कारण ही सभी जीवजन्तुओं में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऐसे कर्म के धनी मानव जीवन की जय है।
(3) मनुष्य अपने कर्म-बल के कारण श्रेष्ठ माना गया है।

10. कई लोग समझते हैं कि अनुशासन और स्वतन्त्रता में विरोध है, किन्तु वास्तव में यह भ्रम है। अनुशासन द्वारा स्वतन्त्रता नहीं छीनी जाती, बल्कि दूसरों की स्वतन्त्रता की रक्षा होती है। सड़क पर चलने के लिए हम स्वतन्त्र हैं, हमें बाईं तरफ से चलना चाहिए किन्तु चाहें तो हम बीच में भी चल सकते हैं। इससे हम अपने प्राण तो संकट में डालते हैं, दूसरों की स्वतन्त्रता भी छीनते हैं। विद्यार्थी भारत के भावी राष्ट्र-निर्माता हैं। उन्हें अनुशासन के गुणों का अभ्यास अभी से करना चाहिए जिससे वे भारत के सच्चे सपूत कहला सकें। [2013, 18]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘अनुशासन और विद्यार्थी जीवन’।
(2) सारांश-प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनुशासन आवश्यक है। इससे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के साथ-साथ दूसरों की स्वतन्त्रता की भी रक्षा होती है। अपना जीवन सुरक्षित होता है और दूसरों का भी। भविष्य के आशा पुंज विद्यार्थियों को अनुशासन में रहना चाहिए, जिससे वे भावी भारत का स्वस्थ निर्माण कर सकें।

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11. स्वार्थ और परमार्थ मानव की दो प्रवृत्तियाँ हैं। हम अधिकतर सभी कार्य अपने लिए करते हैं, पर’ के लिए सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानवता है। यही धर्म है,यही पुण्य है। इसे ही परोपकार कहते हैं। प्रकृति हमें निरन्तर परोपकार का संदेश देती है। नदी दूसरों के लिए बहती है। वृक्ष मनुष्यों को छाया तथा फल देने के लिए ही धूप, आँधी,वर्षा और तूफानों में अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं। [2015]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) सच्ची मानवता क्या है?
(3) वृक्ष हमें परोपकार का सन्देश कैसे देते हैं?
(4) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘परोपकार का महत्व’।
(2) दूसरों के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानवता है।
(3) वृक्ष धूप, आँधी, वर्षा और तूफानों में डटकर खड़े रहते हैं और सब कुछ सहन करने के बावजूद भी मनुष्यों को अपनी शीतल छाया व रसदार फल प्रदान करके हमें परोपकार का सन्देश देते हैं।
(4) सारांश-अपने लिए जीना’ तथा दूसरों के हित में अपना सब कुछ बलिदान करना’, मानव की ये दो प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ हैं। अपने लिए तो प्रत्येक व्यक्ति कार्य करता ही है किन्तु दूसरों के लिए अपना सबकुछ दाँव पर लगा देने वाला व्यक्ति ही सच्चा परोपकारी होता है। परोपकार करना ही सच्चा धर्म और बहुत बड़ा पुण्य माना गया है। नदी स्वयं अपना जल नहीं पीती,वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाते और न ही अपनी शीतल छाया का उपयोग स्वयं के लिए करते हैं। अर्थात् प्रकृति भी हमें परोपकार करने की सीख देती है।

12. आप हमेशा अच्छी जिन्दगी जीते आ रहे हैं। आप हमेशा बढ़िया कपड़े, बढ़िया जूते, बढ़िया घड़ी, बढ़िया मोबाइल जैसे दिखावों पर बहुत खर्च करते हैं मगर आप अपने शरीर पर कितना खर्च करते हैं? इसका मूल्यांकन जरूरी है। यह शरीर अनमोल है। अगर शरीर स्वस्थ नहीं होगा तो आप ये सारे सामान किस पर टाँगेंगे? अतः स्वयं का स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है एवं स्वस्थ रहने में हमारे खान-पान का सबसे बड़ा योगदान है। [2016]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) अनमोल क्या है?
(3) शुद्ध व असली शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘पहला सुख निरोगी काया’।
(2) मानव शरीर अनमोल है।
(3) शुद्ध = अशुद्ध; असली = नकली।

13. आदर्श व्यक्ति कर्मशीलता में ही अपने जीवन की सफलता समझता है। जीवन का प्रत्येक क्षण वह कर्म में लगाता है। विश्राम और विनोद के लिए उसके पास निश्चित समय रहता है। शेष समय जन सेवा में व्यतीत होता है। हाथ पर हाथ धर कर बैठने को वह मृत्यु के समान समझता है। काम करने की उसमें लगन होती है। उत्साह होता है। विपत्तियों में भी वह अपने चरित्र का सच्चा परिचय देता है। धैर्य की कुदाली से वह बड़े-बड़े संकट पर्वतों को ढहा देता है। उसकी कार्यकुशलता देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाते हैं। संतोष उसका धन है। वह परिस्थितियों का दास नहीं है। परिस्थितियाँ उसकी दासी हैं। [2017]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश में वर्णित व्यक्ति के गुणों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-कर्म ही पूजा है।
(2) कर्मशील व्यक्ति सदैव कर्म को ही पूजा समझता है। वह व्यर्थ में समय नहीं गँवाता। आराम तथा मनोरंजन के लिए भी उसके पास एक पूर्व निर्धारित समय होता है। बेकारी की बजाय वह बेगारी करना पसंद करता है। कार्य के प्रति उसमें लगन एवं उत्साह होता है। संकट के समय में भी वह धैर्य के बल पर विजेता बनकर उभरता है। वह परम संतोषी होता है। उसकी कार्यकुशलता प्रेरणाप्रद होती है। वह परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता अपितु परिस्थितियाँ उसकी दासी होती हैं।

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित पद्यांश

निम्नलिखित पद्यांशों को पढ़कर उनके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए

1. वे मुस्काते फूल, नहीं-
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं-
जिनको भाता है बुझ जाना।

वे नीलम के मेघ, नहीं-
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनन्त ऋतुराज नहीं
जिसने देखी जाने की राह।

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प्रश्न-
1. उपर्युक्त पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
2. उक्त पद्यांश का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
3. कवयित्री के अनुसार देवलोक के पुष्प किस प्रकार के हैं?
4. देवलोक का ऋतुराज किस प्रकार का है?
उत्तर-
1. शीर्षक–’अपरिवर्तनीय प्रकृति।’
2. सारांश-कवयित्री का कथन है कि देवलोक में प्रत्येक वस्तु अपरिवर्तनीय है, इसलिए वहाँ आनन्द नहीं है,क्योंकि परिवर्तन ही जीवन का आनन्द है। देवलोक के पुष्प एक बार खिलते हैं,तो वे मुरझाते ही नहीं हैं। तारे चमकते हैं,तो वे बुझते ही नहीं हैं। नीलम जैसे काले चमकीले मेघ आसमान में छा जाते हैं, किन्तु बरसते नहीं। वहाँ का ऋतुराज अनन्त है और वह सदैव स्थायी रहता है।
3. कवयित्री के अनुसार देवलोक के पुष्प सदैव खिले रहते हैं, वे कभी मुरझाते नहीं हैं।
4. देवलोक का ऋतुराज (वसन्त) स्थायी रूप से वहाँ निवास करता है।

2. तुम माँसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण! हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की
जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन।
तुम मांस तुम्ही हो रक्त अस्थि
निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा निःस्व त्याग
हे विश्व भोग का वर साधन।

प्रश्न-
1. प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
2. प्रस्तुत पद्यांश का सारांश लिखिए।
3. कवि ने जीवन की पूर्ण इकाई किसे कहा है?
4. नवयुग का तन किससे निर्मित होगा?
उत्तर-
1. शीर्षक–’आत्मा की अमरता।’
2. सारांश-कवि का कथन है कि ऋषि जो संसार के निमित्त जीवन जीते हैं, वे केवल अस्थि मात्र से ही शेष दिखलाई देते हैं, किन्तु उनकी शुद्ध बुद्ध आत्मा जीवन की पूर्ण इकाई है। उनके निःस्वार्थ त्याग के आधार पर देश की संस्कृति का ढाँचा रखा जाएगा। उन्हीं से देश का युवा पल्लवित और पुष्पित होगा, जो संसार के भोगों को आनन्द प्राप्त करेगा।।
3. कवि ने जीवन की पूर्ण इकाई शुद्ध चिन्तनशील और निःस्वार्थ आत्मा से युक्त ऋषि को कहा है।
4. नवयुग का तन ऋषि की अमर आत्मा से निर्मित होगा।

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MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.6

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.6

Question 1.
find:

  1. 64\(\frac{1}{2}\)
  2. 32\(\frac{1}{5}\)
  3. 125\(\frac{1}{3}\)

Solution:

  1. 64\(\frac{1}{2}\) = (82)\(\frac{1}{2}\)
  2. 32\(\frac{1}{5}\) = (25)\(\frac{1}{5}\)
  3. 125\(\frac{1}{3}\) =(5)3x\(\frac{1}{2}\) = 5

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Question 2.
Find:

  1. 9\(\frac{3}{2}\)
  2. 32\(\frac{1}{5}\)
  3. 16\(\frac{3}{4}\)
  4. 125\(\frac{-1}{3}\)

Solution:

  1. 9\(\frac{3}{2}\) = (32)\(\frac{3}{2}\)
  2. 32\(\frac{2}{2}\) = (25)\(\frac{2}{5}\)
  3. 16\(\frac{3}{4}\) = (24)\(\frac{3}{4}\) = (2)4x\(\frac{3}{4}\) = (2)3 = 8
  4. 125\(\frac{1}{3}\) = (53)\(\frac{-1}{3}\) = (5) 3x\(\frac{-1}{3}\) = (5)-1 = \(\frac{3}{2}\)

Question 3.
Simplify:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.6 img-1
Solution:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.6 img-2

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 9 मैं अमर शहीदों का चारण

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 9 मैं अमर शहीदों का चारण (श्री कृष्ण सरल)

मैं अमर शहीदों का चारण अभ्यास-प्रश्न

मैं अमर शहीदों का चारण लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि चारण बनने की कामना क्यों करता है।
उत्तर
कवि चारण बनने की कामना करता है, क्योंकि वह अमर शहीदों के अद्भुत त्याग-बलिदान से बहुत अधिक प्रभावित है।

प्रश्न 2.
इस कविता में कवि किसका कर्ज चुकाना चाहता है?
उत्तर
इस कविता में कवि अपने राष्ट्र का कर्ज चुकाना चाहता है?

प्रश्न 3.
आजादी प्राप्त करने में शहीदों का क्या योगदान रहा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आजादी प्राप्त करने में शहीदों का विशेष ही नहीं, अपितु सर्वाधिक योगदान रहा। उन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया।

मैं अमर शहीदों का चारण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शहीदों का नाम गौरव के साथ क्यों लिया जाता है?
उत्तर
शहीदों का नाम गौरव के साथ लिया जाता है। यह इसलिए कि उन्होंने स्वतंत्रता-संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। उन्होंने अपने जीवन में आने वाली अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं को त्याग कर अपनी मातृभूमि के आँसुओं को पोंछने के लिए अनेक तरह के कष्टों को सहा। अंत में उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगा दी।

प्रश्न 2.
धरती में मस्तक बोने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर
धरती में मस्तक बोने का तात्पर्य है-अपने-आपको निछावर कर देना। हमारे देश के अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए अपने तन-मन-धन आदि सब कुछ को न्यौछावर कर दिया।

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प्रश्न 3.
माँ के आँसू देखकर शहीदों ने किस पब को अपनाया?
उत्तर
माँ के आँसू देखकर शहीदों ने अपने जीवन में आई हुई सरस फुहारों को लौटा दिया। उन्होंने काँटों को चुन लिया। इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन की रंगीन बहारों को लौटाकर स्वतंत्रता-संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

प्रश्न 4.
‘जो कर्ज राष्ट्र ने……………है’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जो ‘कर्ज राष्ट्र ने….है’ इस पक्ति का आशय है-कवि अपने राष्ट्र के प्रति वफादार है। इसलिए वह राष्ट्र की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वालों अमर शहीदों का चारण बनकर उनकी यशस्वी गौरव-गाथा का गान करते हुए नहीं थकता है। इसे वह अपनी मातृभूमि के प्रति पवित्र कर्त्तव्य समझता-मानता है।

प्रश्न 5.
कवि ने किस जीवन को श्रेष्ठ माना है और क्यों?
उत्तर
कवि ने देश के लिए समर्पित जीवन को श्रेष्ठ माना है। यह इसलिए कि किसी भी देश के निवासियों का यह पवित्र कर्त्तव्य है। इसका निर्वाह करके ही कोई देशवासी अपने देश के इस ऋण-भार से मुक्त हो सकता है।

मैं अमर शहीदों का चारण भाषा-अध्ययन/काव्य-सौंदर्य

प्रश्न 1.
‘उनने धरती में मस्तक बोए हैं’ इस पंक्ति में प्रतीकात्मकता है। प्रतीक के माध्यम से शहीदों की वीरता का यशोगान किया गया है। इसी तरह की अन्य प्रतीकात्मक पंक्तियाँ लिखिए।
2. यह कविता वीर रस से ओत-प्रोत है। इसी तरह वीर रस की कोई अन्य पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर

  1. उनकी लाशों पर चलकर आजादी आई है।
  2. हिंदुस्तान आज जिंदा उनकी कुर्बानी से।
  3. वे अगर न होते, तो भारत मुर्दो का देश कहा जाता।
  4. दाग गुलामी के उनके लोहू से धोए हैं।
  5. माँ के अर्जन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े।
  6. भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहाकर दिखा गए।
  7. इस प्रश्न को छात्र/छात्रा स्वयं हल करें।

मैं अमर शहीदों का चारण योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
चंद्रशेखर आजाद की जन्म शताब्दी कब मनाई गई? अपने शिक्षक से जानकारी प्राप्त करें तवा आजादी पर केंद्रित कविता याद करें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

2. श्रीकृष्ण ‘सरल’ के जीवन की घटनाओं को एकत्र कर एक संक्षिप्त जीवनी लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मैं अमर शहीदों का चारण परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि’चारण बनकर क्या करता है?
उत्तर
कवि चारण बनकर अमर शहीदों का यशगान करता है।

प्रश्न 2.
अगर अमर शहीद न होते तो क्या होता?
उत्तर
अगर अमीर शहीद न होते तो हमारा देश मुर्दो का देश कहा जाता। इससे हमारा जीवन न सहने योग्य एक बोझ बनकर रह जाता।

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प्रश्न 3.
अपनी मातृभूमि की अर्चना अमर शहीदों ने किससे की?
उत्तर
अपनी मातृभूमि की अर्चना अमर शहीदों ने फूल से नहीं की, अपितु अपने मस्तक को देकर की, अर्थात् अपने प्राणों की आहुति देकर की।

मैं अमर शहीदों का चारण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि के अनुसार क्या सच है?
उत्तर
कवि के अनुसार सच है

  1. हम लोगों ने शहीदों की यादों को दफना दिया है, अर्थात् शहीदों को भुला दिया है।
  2. उनके ही त्याग-बलिदानों से हमने आजादी हासिल की है।
  3. आज हिंदुस्तान उन्हीं की कुर्बानी से जिंदा है।
  4. आज हम उनके ही बलिदान से अपना मस्तक ऊँचा किए हुए हैं।
  5. हम गुलामी के दाग उनके ही प्राण निछावर से मिटा सके हैं।

प्रश्न 2.
अमर शहीदों के जीवन में क्या-क्या सुख-आनंद आए थे? उनको उन्होंने क्या किया?
उत्तर
अमर शहीदों के जीवन में रंगीन-बहारें, सपने के समान निधियाँ, सरस फुहारें आदि सुख-आनंद आए थे। उनको उन्होंने अपनी मातृभूमि के आँसुओं को देखकर वापस कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने सभी प्रकार के सुखों को अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए न्यौछावर कर दिए।

प्रश्न 3.
‘मैं अमर शहीदों का चारण’ कविता का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ विरचित कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण’ एक प्रेरणादायक कविता है। इसमें श्री ‘सरल’ ने अपनी ओजपूर्ण भावधारा को भक्तिरस से भर दिया है। इस कविता में उन्होंने स्वयं को ‘अमर शहीदों का चारण’ कहा है। फिर देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर शहीदों के गौरवपूर्ण अतीत का चित्रण कर उनका यशोगान किया है। उन्होंने यह सुस्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता संग्राम में इन वीरों ने फूलों के मार्ग को त्यागकर काँटों से भरे रास्ते का वरण किया, यही नहीं उन्होंने भारत माँ की अर्चना में सहर्ष अपना मस्तक समर्पित कर दिया। फलस्वरूप ऐसे वीर शहीद इतिहास में अमर होकर जन-जन के लिए प्रेरणादायी हो गए।

मैं अमर शहीदों का चारण कवि-परिचय

प्रश्न
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
भारतीय स्वाधीनता सेनानियों और क्रांतिकारियों का यशगान करने वाले कवियों में श्रीकृष्ण ‘सरल’ का नाम अत्यंत लोकप्रिय है। शहीदों के प्रति श्रद्धा-भाव रखने और प्राचीन भारतीय सभ्यता के अमर-गायक श्रीकृष्ण ‘सरल’ अत्यधिक प्रसिद्ध कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

जीवन-परिचय-कविवर श्रीकृष्ण ‘सरल’ का जन्म मध्य प्रदेश के गुना जिलान्तर्गत अशोक नगर में 1 जनवरी 1919 को हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में ही हुई। आपका बालस्वरूप अत्यंत स्वाभिमानी और स्वाध्यायी था। आपने अपने स्वाध्याय के द्वारा कई परीक्षाओं को अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर लिया। शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत आपने अध्यापन क्षेत्र में प्रवेश लिया। इस अध्यापन-वृत्ति से आप आजीवन संबद्ध रहे। इसे आपने अत्यंत सफलतापूर्वक निभाया। सन् 1976 में आप शिक्षा महाविद्यालय उज्जैन से सेवा-निवृत्त हुए। तब से लेकर आज तक आप स्वतंत्र रूप से लेखन-कार्य में व्यस्त हैं
रचनाएँ-श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने काव्य और गद्य दोनों पर ही अपना समानाधिकार दिखाया है। आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. महाकाव्य-

  • भगत सिंह
  • चन्द्रशेखर आजाद
  • सुभाष चन्द्र बोस

2. काव्य-संकलन-

  • मुक्तिगान
  • स्मृति-पूजा।

3. बाल-साहित्य-बच्चों की फुलवारी।
4. गय-ग्रंथ-संसार की प्राचीन समस्याएँ, सभाष-दर्शन आदि।

भाषा-शैली-श्रीकृष्ण ‘सरल’ की भाषा उसके नाम के अनुरूप ही है। दूसरे शब्दों में उनकी भाषा सरल, सुबोध और सुस्पष्ट भाषा है। उसमें तद्भव और देशज शब्दावली की प्रधानता है। इस प्रकार की भाषा से भावाभिव्यक्ति को स्पष्ट होने में कोई कठिनाई नहीं दिखाई देती। श्रीकृष्ण ‘सरल’ की शैली ओजमयी और प्रौढ़मयी है। वह अधिक सशक्त, पुष्ट और सबल है। गंभीर-से गंभीर विषयों को अलंकृत शैली में प्रस्तुत करने की विशेषता प्रकट करने वाले श्रीकृष्ण ‘सरल’ में भाषा-शैली की प्रचुर क्षमता और योग्यता है।

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व्यक्तित्व-श्रीकृष्ण ‘सरल’ का व्यक्तित्व देशभक्त और क्रांतिकारी व्यक्तित्व है। उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष है भारतीय अतीत के प्रति आस्थावान और श्रद्धावान व्यक्तित्व । इन दोनों प्रकार के व्यक्तित्त्व को जोड़कर एक पूरा और सफल व्यक्तित्व बना है-सफल और परिपक्व रचनाशील व्यक्तित्व । इस तरह से श्रीकृष्ण ‘सरल’ का व्यक्तित्व एक युगीन व्यक्तित्व सिद्ध होता है।

महत्त्व-श्रीकृष्ण ‘सरल’ का राष्ट्रीय विचार प्रधान रचनाकारों में विशिष्ट स्थान है। अतीत को सरेरक रूप में प्रस्तुत करने वाले साहित्यकारों में भी उनका स्थान सर्वोच्च है। भारतीय संस्कृति का महत्त्वांकन करने में जितनी बड़ी सफलता आपको मिली है। यह अन्यत्र कम ही दिखाई देती है।

मैं अमर शहीदों का चारण कविता का सारांश

प्रश्न
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’-विरचित कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ विरचित कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण’ एक प्रेरक और भावों को जगाने वाली कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवि अमर शहीदों के प्रति अपना श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए कहता है कि वह अमर शहीदों के यश का गायन करता है। इससे वह अपने राष्ट्र के कर्ज-पार से मुक्त’ हुआ करता है। इस सच्चाई को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता है कि हमने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देने वाले वीर बलिदानों को मुला दिया है। लेकिन आज देश उन्हीं के प्राण न्यौछावर से स्वतंत्र है। अगर वे नहीं होते तो हम आजाद नहीं होते और गुलामी के बंधनों में पड़े-पड़े छटपटाते रहते। इसलिए वह (कवि) आज की पीढ़ी के अंदर उन अमर शहीदों के प्रति सच्चे श्रद्धाभावों को जगाने का प्रयत्न किया करता है। उन्हें याद करते हुए हमें यह अच्छी तरह से जानना चाहिए कि उन अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि के आँसुओं को देख करके अपने सुखों का परित्याग कर दिया और उसके लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। ऐसा करते हुए उन्होंने कोई लम्बे-चौड़े वादे नहीं किए। वे अपनी मातृभूमि की पूजा-अर्चना के लिए फूलों के स्थान पर अपने मस्तक ही लेकर आगे बढ़े थे।

मैं अमर शहीदों का चारण संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पदों की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौंदर्य व विषय-वस्त पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता है
जो कर्ज राष्ट्र से खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।
यह सच है, बाद शहीदों की, हम लोगों ने दफनाई है,
यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आजादी आई है।
यह सच है, हिंदुस्तान आज जिंदा उनकी कुर्बानी से,
यह सच, अपना मस्तक ऊँचा उनकी बलिदान कहानी से

शब्दार्च-चारण-भाट, यश गान करने वाला। दफनाई-भुला दी। लाश-पलिदानों। कुर्बानी-बलिदान।

प्रसंग-यह पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिंदी सामान्य’ में संकलित तथा श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’-विरिचत कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण से है। इसमें कवि ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वालों के प्रति अपने श्रद्धा-भावों को प्रकट करते हुए कहा है कि

व्याख्या-वह अपने देश की आजादी के लिए मर-मिटने वाले अमर शहीदों का चारण है। वह उनके यश का गीत हमेशा गाया करता है। इससे वह अपने सष्ट्र के ऋण-भार से मुक्त हुआ करता है।

कवि का पुनः कहना है कि इस सच्चाई को कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता है कि जिन अमर शहीद के बदौलत हमारे देश को एक लंबी गुलामी के बाद आजादी मिली है, उन्हें आज हम देशवासी लगभग भुला दिए हैं। यह भी एक सच्चाई है कि उन शहीदों के सब कुछ न्यौछावर कर देने और उनके बलिदानों से ही हम आजादी को हासिल किए हैं। यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि उन अमर शहीदों के बलिदानों के बदौलत ही आज हमारा देश अपनी पहचान बढ़ा रहा है और अपनी शक्ति-संपन्नता का परिचय दे रहा है। यह भी अपने आप में बहुत बड़ी सच्चाई है कि उन अमर शहीदों के त्याग और बलिदान के कारण ही हमारा यह भारत देशबड़े गर्व से अपना सिर उठाए हुआ अपना महत्त्व क्तला रहा है।

विशेष-

  1. भाषा हिन्दी-उर्दू के सरल शब्दों की है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।
  3. वीर रस का प्रवाह है।
  4. यह पद्यांश प्रेरक रूप में है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में यह सच है कि पुनरावृत्ति से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का चमत्कार भक्ति रस के प्रवाह से गतिशील बनाकर भाववर्द्धक है। तुकांत शब्दावली की योजना से प्रस्तुत पद्यांश का सौंदर्य बढ़ गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य मिश्रित भाव और भाषा के प्रयोग से और कथन की स्वाभाविकता-सरलता रोचक रूप में प्रस्तुत हुआ है। इस प्रकार यह प्रेरक और मर्मस्पर्शी होने के साथ-साथ अनूठा भी कहा जा सकता है।

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2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) आज देशवासियों ने शहीदों के प्रति क्या अपराध किया है?
(ii) शहीदों की कुर्बानी का क्या फल मिला?
उत्तर
(i) आज देशवासियों ने शहीदों के प्रति यह अपराध किया है कि उन्होंने शहीदों की यादों को भुला दिया है।
(ii) शहीदों की कुर्बानी का फल यह मिला कि उससे ही हमने आजादी पाई है। उनकी ही कुर्बानी से आज यह हमारा देश
आत्मनिर्भरता का मस्तक ऊँचा किया है।

2. ये अगर न होते, तो भारत मुदों का देश कहा जाता,
जीवन ऐसा बोझा होता, जो हमसे नहीं सहा जाता।
यह सच है दाग गुलामी के उनके लोहू से धोए हैं,
हम लोग बीज बोते, उनने घरती में मस्तक बोए हैं।

शब्दार्थ-मुर्दो-बेजानों। बोझा-वजन, भार। दाग-दोष, कलंक। लोहू-खून।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने देश के अमर शहीदों का महत्त्वांकन करते हुए कहा है कि

व्याख्या-अगर हमारे देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ त्याग-बलिदान करने वाले हमारे अमर शहीद न होते, तो देश गुलामी के बंधन में बँधा रहता। उसे मुर्दा समझकर उस पर बाहरी शासक अर्थात् अंग्रेजी सत्ता अपना शासन करती। फलस्वरूप प्रत्येक देशवासी की जिंदगी एक ऐसा बोझ बनकर रह जाती, जिसे सहना बड़ा ही असंभव-सा हो जाता। अगर हम अपने देश के अमर शहीदों को गहराई से समझने की कोशिश करेंगे, तो हम यह अवश्य पाएँगे कि हमारे देश के ऊपर गुलामी का जो दाग लगा था, उसे उन्होंने अपना सब कुछ परित्याग-न्यौछावर करके बिल्कुल धो दिया है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हम लोग तो साधारण बीज बोते हैं, लेकिन उन्होंने तो इस देश की धरती पर अपने मस्तक रूपी बीज को बोकर हमें अमन-चैन की जिंदगी दी है।

विशेष-

  1. अमर शहीदों की असाधारण देन का उल्लेख किया गया है।
  2. इस पयांश से देश-भक्ति की भावना जग रही है।
  3. मुहावरेदार शैली है।
  4. तुकांत शब्दावली है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा सरल शब्दों से प्रस्तत होकर महावरेदार शैली से प्रभावशाली बन गई है। बिंब-प्रतीक यथास्थान है। काव्य-स्वरूप की योजना आकर्षक रूप में है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य शहीदों के त्याग-बलिदान की वीरता को सरलता से बतलाकर भावों को बढ़ाने वाला है। अमर शहीदों की एक-एक विशेषताओं को रोचक रूप में प्रस्तुत करने का भाव सचमुच में अनूठा है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) अमर शहीद न होते क्या होता और क्यों?
(ii) ‘दाग गुलामी के लोहू से घोए हैं’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) अमर शहीद न होते तो देश आजाद नहीं होता। यह इसलिए गुलामी की बेड़ी नहीं टूटती और यह देश न जाने कब तक गुलाम बना रहता।
(ii) ‘दाग गुलामी के लोहू से धोए हैं, से तात्पर्य है, अमर शहीदों ने अपने प्राणों का बलिदान करके, इस गुलाम देश को आजाद करवाया है।

3. इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के, में भाव जगाया करता हूँ,
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।
यह सच, उनके जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं,
जीवन की स्वप्निल निधियाँ भी उनने जीवन में पाई थीं।

शब्दार्थ-भाव-उत्साह। रंगीन-आकर्षक, सुखद। स्वप्निल-स्वप्न के समान। निधियाँ-खजाने।

प्रसंग-पूर्ववत। इसमें कवि ने देश के अमर शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धा और कर्तव्य-भाव को प्रकट करते हुए कहा है कि

व्याख्या-वह अपने देश के वर्तमान युवा पीढ़ी के अंदर बार-बार अपने देश के अमर शहीदों के त्याग-बलिदान को उत्साहवर्द्धक और प्रेरक रूप में रखने का प्रयास किया करता है। इस प्रकार वह उन अमर शहीदों का चारण है। उनके अमर यशगान को गाया करता है। यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि उन अमर शहीदों के भी जीवन में सबकी तरह आकर्षक और सुखद अवसर प्राप्त हुए थे। इस प्रकार स्वप्न के समान उन्होंने अपने जीवन में अनेक प्रकार के सुख-सुविधाओं के खजाने (अवसर) प्राप्त किए थे।

विशेष-

  1. कवि का आत्मकर्तव्य-बोध सराहनीय है।
  2. तुकांत शब्दावली आकर्षक है।
  3. लय और संगीत की सुंदर योजना है।
  4. यह अंश ज्ञानवर्द्धक और भाववर्द्धक है।
  5. भक्ति रस का प्रवाह है।

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1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौंदर्य सरल शब्दों और सरल काव्य-स्वरूपों से निखरकर आया है। भक्ति रस का प्रवाह और तुकांत शब्दावली से प्रस्तुत लयात्मकता से काव्याकर्षण बढ़ गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना सहज रूप में है। कवि-धर्म देश-भक्तों का गुणगान करना भी होता है, इसे कवि ने अपने भावों के द्वारा व्यक्त कर दिया है। शहीदों के त्याग-बलिदान के संकेत से भाव-योजना में और स्वाभाविकता आ गई है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के’ कवन का तात्पर्य क्या है?
(ii) ‘अमर शहीदों के जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं’ और ‘उन्होंने अपने जीवन में स्वप्निल निधियाँ पाई वी’ कहकर कवि ने क्या प्रकट करना चाहता है?
उत्तर
(i) इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के कथन का तात्पर्य है. वर्तमान युवा पीढ़ी को अमर शहीदों के युग-प्रभाव’ को बतलाना।
(ii) अमर शहीदों के जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं और उन्होंने अपने जीवन में स्वप्निल निधियाँ पाई थीं’ कहकर कवि यह प्रकट करना चाहता है कि अमर शहीदों ने अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह न करके देश की आजादी को प्राप्त करने को ही महत्त्व दिया।

4. पर, माँ के आँसू लख उनने सब सरस फुहारें लौटा दी,
काँटों के पथ का वरण किया, रंगीन बहारें लौटा दी।
उनने धरती की सेक के वादे न किए लंबे-चौड़े
माँ के अर्चन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े।

शब्दार्थ-लख-देखकर। फुहारें-बहारें। बरण-स्वागत। अर्चन-पूजा। हित-के लिए। निज-अपने।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने अमर शहीदों के अद्भुत देश-भक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-देश के अमर शहीदों ने अपने जीवन में आई हई सरसता भरी फहारों की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और न उन्होंने उसे और को महत्त्व ही दिया। उन्होंने तो अपनी मातृभूमि को गुलामी की बेड़ियों में कसे हुए देखा। उसे आँसू बहाते हुए देखा तो अपने जीवन की ‘सरस फुहारों’ को अनदेखा कर दिया। इस तरह उन्होंने अपने सुखमय जीवन को छोड़कर दुखमय जीवन को चुना। फूलों को छोड़कर काँटों को अपनाया। ऐसा करके उन्होंने अपने जीवन में आई रंगीन बहारें लौटा दीं। इस प्रकार उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा, उसकी आजादी और सेवा के लिए किसी भी प्रकार की बड़ी-बड़ी खोखली बातें नहीं की। आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने अपनी मातृभूमि की अर्चना-पूजा के लिए फूल नहीं, अपने शीश (मस्तक) को ही अर्पित-समर्पित कर दिया।

विशेष-

  1. अमर शहीदों की देशभक्ति के प्रति किए गए त्याग-बलिदान का उल्लेख है।
  2. प्रतीकात्मक शब्दों के प्रयोग हैं-सरस फुहारें, रंगीन बहार, काँटों का पथ, लंबे-चौड़े वादे आदि।
  3. मुहावरेदार शैली है।
  4. यह अंश उत्साहवर्द्धक है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश में मुहावरेदार शैली के द्वारा कथ्य को आकर्षक बनाने का प्रयास किया गया है। फुहारें लौटाना, काँटों के पथ का वरण करना, रंगीन बहारें लौटाना, लंबे-चौड़े वादे करना और मस्तक लेकर दौड़ना मुहावरे प्रचलित रूप में हैं। इनसे काव्य-सौंदर्य में अच्छा निखार आ गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना सरस और सरल शब्दों से पुष्ट हुई है। अमर शहीदों के असाधारण और बेजोड़ त्यागपूर्ण देश-भक्ति की भावना को अनूठे रूप में रखने का प्रयास काबिलेतारीफ है।

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2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए क्या-क्या किया?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए अपने जीवन में आई हुई सरस फुहारें और रंगीन बहारें लौटा दीं। उन्होंने काँटों के पथ का वरण किया। कोई लंबे-चौड़े वादे नहीं किए। इस प्रकार उन्होंने अपनी मातृभूमि की अर्चना के लिए फूल नहीं, अपितु अपने शीश ही चढ़ाए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-अमर शहीदों की बेजोड देशभक्ति को प्रेरक रूप में प्रस्तुत करना।

5. भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहाकर दिखा गए,
जग के इतिहासों में अपनी, वे गौरव-गाथा लिखा गए।
उन गाथाओं से सर्द खून को मैं गरमाया करता हूँ।
में अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।

शब्दार्थ-जग-संसार । गौरव-प्रतिष्ठा, महत्त्व, बड़प्पन । गाथा-गीत-कथा, कथा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने अमर शहीदों के अमर त्याग-बलिदान का यशगान करते हुए कहा है कि

व्याख्या-हमारा देश अमर शहीदों का देश है। इसलिए यहाँ के प्रत्येक देशवासी को इसे अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि हमारे अमर शहीदों ने अपने त्याग-बलिदान से यह सिद्ध कर दिया है कि हमारे देश भारत का खून पतला नहीं है, अर्थात् बेअसर और निरर्थक नहीं है। इससे वे पूरे संसार के इतिहास में अपनी यशस्वी गौरव-गाथा को अंकित कर गए। अर्थात् संसार में एक नया इतिहास बना गए। कवि अपने देश के इस प्रकार की अद्भुत वीरता और त्याग-बलिदान का गुणगान करते हुए पुनः कह रहा है कि वह उन अमर शहीदों की अमर जीवन गाथा की चर्चा के फीकी पड़ने को सहन नहीं कर सकता है। उन्हें फिर से अधिक चर्चित करने के लिए वह उनका चारण है। इस प्रकार वह उनके यश का हमेशा गुणगान करता है।

विशेष-

  1. भारतीय अमर शहीदों के बेजोड़ त्याग-बलिदान का उल्लेख है।
  2. कवि की सच्ची देशभक्ति प्रकट हुई है।
  3. ‘पतला खून’ और ‘सर्द खून’ प्रतीकात्मक शब्द से भाषा सजीव हो उठी है।
  4. ‘खून बहाना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य को लिखिए।
उत्तर-
(i) उपर्युक्त पद्यांश में अमर शहीदों के अद्भुत त्याग-बलिदान को प्रतीकात्मक शब्दावली में पिरोकर भक्ति रस से हृदयस्पर्शी बनाने का प्रयास किया गया है। लय और संगीत के मिश्रित प्रयास से प्रस्तुत पद्यांश का सौंदर्य बढ़ गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य सुस्पष्ट है। अमर शहीदों के त्याग-बलिदान को ओजस्वी और सजीव भावों के द्वारा प्रस्तुत कर कवि ने इस पद्यांश के भाव-सौंदर्य में अधिक चमत्कार ला दिया है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश में अमर शहीदों की किन विशेषताओं को बतलाया गया है?
(ii) कवि ने शहीदों के प्रति अपनी कौन-सी भावना व्यक्त की है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में अमर शहीदों की त्याग-बलिदान और गौरवमयी ऐतिहासिक गाथा प्रस्तुत करने वाली विशेषताओं को बतलाया गया है।
(ii) कवि ने शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धाभावना व्यक्त किया है।

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 10th Special Hindi पत्र-लेखन

MP Board Class 10th Special Hindi पत्र-लेखन

इस प्रश्न की परिधि में पारिवारिक, विद्यालयीन एवं कार्यालयीन पत्र लिखने को आते हैं। इसके हेतु 5 अंक नियत हैं।

पत्र लिखना भी कला के अन्तर्गत आता है। इस कला में जो व्यक्ति जितना सिद्धहस्त तथा पटु होगा, जिन्दगी में उतनी ही उन्नति की डगर तय करेगा। पत्र मात्र भावों तथा विचारों को व्यक्त करने का ही साधन नहीं है अपितु इसकी परिधि में लेखक का व्यक्तित्व परोक्ष रूप से झाँकता है।

पत्र चाहे पारिवारिक हो अथवा सामाजिक,सब में लेखक का व्यक्तित्व मुखरित होता है। व्यक्तित्व भिन्न होने के कारण पत्र लेखन की शैली भी अनेकरूपता लिए होती है। शासकीय, कार्यालयीन, व्यावसायिक एवं विद्यालयीन पत्र एक नियत पद्धति के अनुसार लिखे जाते हैं। निरन्तर अभ्यास तथा पढ़ने-लिखने से इसे सफलतापूर्वक लिखा जा सकता है।

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प्रस्तुत पुस्तक में क्रमशः पारिवारिक, विद्यालयीन और कार्यालयीन पत्र दिये गये हैं, जो क्रमशः इस प्रकार हैं-

1. पारिवारिक पत्र

प्रश्न 1.
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए अपने मित्र को बधाई देते हुए एक पत्र लिखिए। [2010]
उत्तर-

49,गाँधी नगर,
ग्वालियर
20.7.20……

प्रिय मित्र नगेन्द्र कुमार,

सप्रेम हार्दिक अभिनन्दन!
आज तुम्हारा पत्र प्राप्त हुआ। सौभाग्य से आज ‘अमर उजाला’ में तुम्हारा परीक्षा परिणाम भी पढ़ा। जैसे ही तुम्हारा अनुक्रमांक प्रथम श्रेणी के कॉलम में देखा,मन प्रसन्नता से गद्गद् हो उठा। हर्षातिरेक में मैंने अपने भाई को गोद में उठा लिया और नाचने लगा।

तो सबसे पहले तुम्हें मेरी बहुत-बहुत बधाई। मैं परम पिता परमात्मा से सदैव यह प्रार्थना करता रहूँगा कि तुम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता अर्जित करो और दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करते रहो। माताजी,पिताजी को सादर अभिवादन। छोटे बच्चों को स्नेह। पत्रोत्तर शीघ्र देना।

तुम्हारा शुभेच्छु
रजनीकान्त

प्रश्न 2.
वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर अपने मित्र को एक बधाई-पत्र लिखिए। (2013)
उत्तर-
प्रश्न 1 के उत्तर की सहायता से स्वयं लिखिए।

प्रश्न 3.
अपने मित्र/छोटे भाई को एक पत्र लिखकर उसे नित्य समाचार-पत्र पढ़ने की प्रेरणा दीजिए। (2009)
उत्तर

कमलागंज,
शिवपुरी
10-6-20…

प्रिय मित्र रमेश,
नमस्कार।
तुम्हारा पत्र बहुत समय से प्राप्त नहीं हुआ। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम मुझे पत्र लिखना ही भूल गये हो।

तुम्हें अपनी पढ़ाई निरन्तर करते रहना चाहिए। इसी में तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है। पुस्तकीय ज्ञान-प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य ज्ञान भी होना आवश्यक है। व्यक्ति को समाचार-पत्रों से भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। इस हेतु व्यक्ति को समाचार-पत्र पढ़ना बहुत आवश्यक है। समाचार-पत्रों से देश-विदेश का ज्ञान प्राप्त होता है। अतः मेरी यह राय है कि अपने ज्ञान को और उन्नत बनाने को समाचार-पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। आधुनिक युग में समाचार-पत्र पढ़ना आवश्यक है।

तुम्हारा मित्र
देवेन्द्र

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प्रश्न 4.
अपने मित्र को उसके अनुत्तीर्ण हो जाने पर संवेदना प्रकट करते हुए एक प्रेरक पत्र लिखिए जिससे वह इस बार अच्छी तैयारी के साथ उत्साहपूर्वक परीक्षा में बैठे। [2009]
उत्तर-

30, रामनगर,
सागर
26-7-20….

प्रिय मित्र देवेन्द्र,

सप्रेम नमस्कार।
आज के समाचार-पत्र ‘दैनिक भास्कर’ में तुम्हारा परीक्षा परिणाम देखा। लेकिन तुम्हारा अनुक्रमांक वहाँ नहीं था। यह जानकर मुझे दुःख है कि तुम परीक्षा में सफल नहीं हो सके। इस वर्ष बोर्ड का परीक्षाफल अधिक अच्छा न था।

अतः तुम चिन्ता न करो। अगले वर्ष की परीक्षा के लिए उचित प्रकार से तैयारी करके अच्छे अंक प्राप्त करना। मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं। बड़ों को प्रणाम व छोटे भाई-बहनों को प्यार।

तुम्हारा मित्र
प्रदीप

प्रश्न 5.
मित्र को पत्र लिखकर प्रात:काल उठने का महत्त्व समझाइये। (2009)
उत्तर-

शिवपुरी,
दिनांक 20-7-20…

प्रिय रोहित,

नमस्कार।
तुम्हारा पत्र आया तुम्हारी कुशलता का पूर्ण समाचार मिला। यहाँ पर सब ठीक प्रकार से हैं। मैं तुम्हें मित्र होने के कारण एक अच्छी सलाह दे रहा हूँ कि प्रातःकाल उठकर तुम घूमने के लिए जाओ। घूमना प्रत्येक व्यक्ति के लिए लाभदायक है।

घूमने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है, किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते हैं। व्यक्ति पूर्णरूप से स्वस्थ रहता है। अतः तुम प्रतिदिन प्रातः काल टहलने जाया करो। पूज्यजनों को यथायोग्य नमस्कार कहना,छोटे भाई-बहिनों को प्यार। पत्रोत्तर शीघ्र देना।

तुम्हारा मित्र
प्रेम कुमार

प्रश्न 6.
अपने बड़े भाई के विवाह में अपने मित्र को आमन्त्रित करने के लिए पत्र लिखिए। [2015]
उत्तर

16, माधव कुंज,
ग्वालियर (म.प्र)
दिनांक : 10-01-20…

प्रिय मित्र स्वप्निल,

सप्रेम नमस्कार।
शुभ समाचार यह है कि मेरे बड़े भाई श्री सुरेश कुमार का शुभ विवाह दिनांक 24 जनवरी, 20… को होना निश्चित हुआ है। तुम तो जानते ही हो कि ऐसे शुभ अवसर पर तुम्हारा आगमन मेरे लिए कितना सुखद और आनन्ददायक होगा। तुम्हें इस विवाह में वैवाहिक कार्यक्रमों से पूर्व ही आना होगा। निमन्त्रण पत्र छपते ही तुम्हें भेज दूंगा। तुम इसी निमन्त्रण को स्वीकार कर पधारने का कष्ट करना। पिताजी और माताजी को चरण स्पर्श।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
अखिलेश

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प्रश्न 7.
अपने पिताजी को पत्र लिखकर अपनी शैक्षिक प्रगति एवं लक्ष्य से अवगत कराइए। [2011, 18]
अथवा
वार्षिक परीक्षा की तैयारी का उल्लेख करते हुए अपने पिताजी को एक पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर-

ग्वालियर
19 जनवरी,20……..

आदरणीय पिताजी/माताजी,

सादर प्रणाम।
आपकी अनुकम्पा से मैं पूरी तरह स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त हूँ। मेरी वार्षिक परीक्षा बहुत निकट है। परीक्षा को दृष्टि-पथ में रखकर मैं पूरी तरह से तैयारी करने में जुटा हूँ। इस समय मुझ पर भूगोल तथा अंग्रेजी की पुस्तकें नहीं हैं। पुस्तकों के अभाव में मेरी विधिवत् पढ़ाई नहीं हो पा रही है। अपनी तरफ से मैं पढ़ाई की तैयारी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा हूँ। विज्ञान एवं गणित में कुछ कठिनाई का अनुभव कर रहा हूँ, अतः इसके निमित्त कोचिंग की आवश्यकता है।

मुझे पूरा भरोसा है कि गत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष मैं आपकी आशा के अनुरूप उत्तम श्रेणी प्राप्त करने में सक्षम सिद्ध होऊँगा।

माताजी को चरण-वंदना,छोटे भाइयों को ढेर सारा प्यार तथा बहिनजी को शत-शत प्रणाम कहना। पत्र के उत्तर की प्रतीक्षा में।

आपका बेटा
पुलकित

प्रश्न 8.
अपने बड़े भाई को पत्र लिखिए और उन्हें बताइए कि गर्मी की छुट्टियाँ किस प्रकार व्यतीत करना चाहते हैं ? [2014, 17]
उत्तर

20, अशोकनगर
जबलपुर
दिनांक-1 मार्च,20…..

आदरणीय भाईसाहब,

सादर प्रणाम।
मैं यहाँ कुशल हूँ, आशा है कि आप सानन्द होंगे। आजकल मैं परीक्षा की तैयारी में लगा हूँ, इसीलिए पत्र लिखने में देर हो गई है। मेरी परीक्षाएँ 7 मार्च से प्रारम्भ होंगी और 5 अप्रैल तक चलेंगी। परीक्षाएँ समाप्त होते ही विद्यालय की ओर से एक ग्रीष्मावकाश भ्रमण का आयोजन निश्चित किया गया है। भ्रमण के लिए सभी लोग कश्मीर जायेंगे। इसके लिए प्रत्येक विद्यार्थी को दो हजार रुपये जमा करने हैं। यात्रा,आवास और भोजन का प्रबन्ध इसी में से किया जायेगा। कुछ धनराशि विद्यालय लगायेगा। मैं इस भ्रमण में जाना चाहता हूँ। अतः आप तीन हजार रुपये भिजवाने की कृपा करें ताकि मैं रुपये जमा कर सकूँ। घर पर माताजी, पिताजी को चरण स्पर्श, भाभीजी को प्रणाम,प्रिय चिन्मय को प्यार।

आपका अनुज
धीरज

2. विद्यालयीन-पत्र

प्रश्न 9.
बुक बैंक से पुस्तकें प्राप्त करने के लिए अपने विद्यालय के प्राचार्य को प्रार्थनापत्र लिखिए। [2009]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
दूरा उ.मा.शाला,
ग्वालियर

विषय-बुक बैंक से पुस्तकें प्राप्त करने हेतु आवेदन।

महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा 10 ‘अ’ का एक अत्यन्त निर्धन छात्र हूँ। मेरे पिताजी मजदूरी करके घर का लालन-पालन करते हैं।

पिताजी की आय अल्प होने की वजह से मैं पुस्तकें खरीदने में भी असमर्थ हैं। अत: श्रीमान् जी से अनुरोध है कि मुझे बुक बैंक से पुस्तकें प्रदत्त करने की कृपा करें। इस सन्दर्भ में शाला के जो नियम होंगे उनका मैं पूरी तरह पालन करूँगा। आपकी इस महती कृपा के लिए मैं आजन्म आभारी रहूँगा।

दिनांक : 11-8-20……..

प्रार्थी
विकास जैन
कक्षा 10 ‘अ’

प्रश्न 10.
अपने प्राचार्य महोदय को विद्यालय छोड़ने (स्थानान्तरण) का प्रमाण-पत्र देने के लिए आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 14,16, 18]
अथवा
पिताजी के स्थानान्तरण के कारण अपनी शाला के प्राचार्य को शाला-त्याग प्रमाण-पत्र देने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
उत्तर-
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
शासकीय उच्चतर मा.वि.,
ग्वालियर

मान्यवर,
सेवा में विनम्र प्रार्थना है कि प्रार्थी ने आपके विद्यालय से कक्षा 9 की परीक्षा उत्तम अंक लेकर उत्तीर्ण की है। संयोगवश मेरे पिताजी का स्थानान्तरण मुरैना हो गया है। इस हेतु मैं आपके आदर्श विद्यालय में आगे अध्ययन करने में असमर्थ हूँ।

अतः मुझे सधन्यवाद शाला त्याग (स्थानान्तरण) प्रमाण-पत्र प्रदान करने की अनुकम्पा करें।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
अक्षय कुलश्रेष्ठ
कक्षा 9-स
अनुक्रमांक -1537

 

दिनांक :10-8-20………

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प्रश्न 11.
प्राचार्य को शुल्क मुक्ति के लिए आवेदन कीजिए। [2010]
अथवा
अपनी निर्धनता का उल्लेख करते हुए शाला शुल्क मुक्ति हेतु अपने प्राचार्य को आवेदन पत्र लिखिए। [2015]
अथवा
शाला शुल्क मुक्ति के आर्थिक कारण बताते हुए प्राचार्य को आवेदन पत्र लिखिए। [2009]
उत्तर-
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
शासकीय उच्चतर मा.वि,
रायपुर

विषय-शाला शुल्क मुक्ति के सम्बन्ध में।

मान्यवर,
विनम्र निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय का कक्षा X का छात्र हूँ। मेरे अभिभावक (पिताजी) एक स्थान पर प्राइवेट नौकरी करते हैं। उन्हें मासिक वेतन मात्र पाँच सौ रुपये मिलता है। इतने अल्प वेतन से परिवार की रोजी-रोटी की समस्या भी कठिनाई से हल हो पाती है। पिताजी पर पैसे की कमी होने के कारण मैं अपनी पाठ्य-पुस्तकों को क्रय करने में भी असमर्थ हूँ।

अतः श्रीमान् जी से करबद्ध निवेदन है कि मुझे शाला के शुल्क से मुक्ति प्रदान करने की महती कृपा करें। इस कृपा के लिए मैं आपका आजीवन आभारी रहूँगा।

दिनांक :25-7-20……..

प्रार्थी
मनोज कुमार
कक्षा X-C

3. कार्यालयीन-पत्र

प्रश्न 12.
डाक वितरण में अनियमितता के कारण आपको जो हानि हुई है, उसके सम्बन्ध में एक शिकायती पत्र डाक अधीक्षक महोदय को लिखिए।
उत्तर-
गाँधी नगर,
ग्वालियर (म.प्र)।
दिनांक : 07-09-20……..

श्रीमान् अधीक्षक महोदय.
मुख्य डाक-तार घर,
ग्वालियर (म.प्र)

महोदय,
मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि हमारे इलाके के अन्तर्गत डाक वितरण की उचित व्यवस्था नहीं है। मेरे पत्र ज्यादातर दूसरे के पते पर प्रेषित कर दिये जाते हैं।

मान्यवर भूल से मेरा एक नौकरी का साक्षात्कार पत्र किसी और के यहाँ चला गया, परिणामस्वरूप में साक्षात्कार से वंचित रह गया। इससे मुझे जो कष्ट हुआ उसका उत्तरदायी कौन है ?

अतः आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि इस ओर विशेष ध्यान देकर डाक वितरण की उचित व्यवस्था करें, जिससे भविष्य में जन-सामान्य को इस भाँति की असुविधा न हो।

सधन्यवाद

भवदीय
मोहित

प्रश्न 13.
आप सुरेश कुमार हैं। आप ई-5/102 न्यू ईदगाह कॉलोनी, भोपाल में रहते हैं। आप नगर निगम को एक आवेदन-पत्र लिखिए, जिसमें नालियों की सफाई व कीटनाशक दवा के छिड़काव का सुझाव हो।
उत्तर-

ई-5/102, न्यू ईदगाह कॉलोनी,
भोपाल

सेवा में,
आयुक्त महोदय,
नगर निगम, भोपाल।

मान्यवर,
मैं आपका ध्यान न्यू ईदगाह कॉलोनी की स्वच्छता के सन्दर्भ में आकर्षित करना चाहता हूँ। इस कॉलोनी में नियमित रूप से सफाई नहीं होती है। नालियाँ तथा सड़कें घोर गन्दगी से पटी रहती हैं। नालियों पर मच्छरों का अम्बार लगा हुआ है।

आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि अपने अधीनस्थ सफाई कर्मियों को कॉलोनी में नालियों की सफाई करने तथा कीटनाशक दवा का छिड़काव करने का आदेश दें। ऐसा होने से कालोनी का वातावरण स्वच्छ एवं स्वास्थ्यप्रद बनेगा।

भवदीय
अक्षय कुमार

दिनांक : 15-1-20………..

MP Board Solutions

प्रश्न 14.
परीक्षाकाल में ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक लगाने हेतु जिलाधीश महोदय को पत्र लिखिए। [2012]
उत्तर-
डी-6/133,शान्ति कॉलोनी,
मुरैना

सेवा में,
जिलाधीश महोदय,

मुरैना। मान्यवर,
मैं आपका ध्यान अपनी कॉलोनी में ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के जोर से बजने की वजह से उपस्थित समस्या की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। कारण यह है कि माध्यमिक शिक्षा मण्डल की हाईस्कूल तथा इण्टरमीडिएट की परीक्षाएँ सम्पन्न होने जा रही हैं। परीक्षाकाल में ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के शोर के कारण छात्रों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। पढ़ाई का क्रम रुक रहा है तथा चित्त की एकाग्रता भंग हो रही है।

अतः आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि आप तत्काल ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के बजने पर प्रतिबन्ध लगाने का निर्देश पारित करें, जिससे छात्रगण शान्त वातावरण में परीक्षा की भली प्रकार तैयारी करने में सक्षम हो सकें।

भवदीय
राहुल

दिनांक : 10 मार्च,20…….

प्रश्न 15.
अपने शहर के नगरपालिका अधिकारी को शिकायती पत्र लिखते हुए मोहल्ले में व्याप्त गन्दगी को दूर करने का निवेदन कीजिए। [2011, 17]
उत्तर-
सेवा में,
अधिशासी अधिकारी,
नगरपालिका-शिवपुरी।
विषय-गन्दगी की समस्या।

महोदय,
मैं आपका ध्यान न्यू कॉलोनी में व्याप्त गन्दगी और दुर्दशा की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। इस मोहल्ले में आये हुए छ: वर्ष हो गये लेकिन यहाँ पर कुछ सड़कें ऐसी हैं,जहाँ पर जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं और स्थान-स्थान पर नालियाँ भी टूटी हुई हैं। उन नालियों में गन्दगी भरी होने के कारण नालियों का पानी सड़कों पर बहता रहता है।

सफाई कर्मचारियों की लापरवाही के कारण यह मोहल्ला जीता-जागता नरक बना हुआ है। मौसम बदलाव व गन्दगी के कारण मच्छरों का भी प्रकोप हो गया है, जो कि बीमारियों का कारण है।

आपसे निवेदन है कि कृपया इस बस्ती की दुर्दशा को देखते हुए इसकी सड़कों की सफाई और नालियों की मरम्मत करवाने का कष्ट करें। धन्यवाद सहित

भवदीय
अक्षय कुलश्रेष्ठ

दिनांक : 5-4-20…

प्रश्न 16.
मध्य प्रदेश बोर्ड भोपाल से हाईस्कूल परीक्षा प्रमाण-पत्र मँगाने हेतु सचिव मा. शि. म. को आवेदन-पत्र लिखिए। [2009]
उत्तर-
7-7-20..

सेवा में,
श्रीमान सचिव,
मा.शि.म, भोपाल

महोदय,
विनम्र निवेदन यह है कि मैंने हाईस्कूल की परीक्षा सन् 2008 में (अनुक्रमांक 302810) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। अब मेरे पिताजी का स्थानान्तरण ग्वालियर हो गया है। अत: मुझे अन्यत्र विद्यालय में प्रवेश लेने के लिए हाईस्कूल प्रमाण-पत्र की आवश्यकता है।

कृपा करके मेरे घर के पते पर मेरा प्रमाण-पत्र भेजने का कष्ट करें। मेरी अंक प्रतिलिपि प्रार्थना-पत्र के साथ संलग्न है। कष्ट के लिए क्षमा।

भवदीय
कुमार गौरव
15, माधव नगर,
शिवपुरी

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प्रश्न 17.
सचिव, मा. शि. मण्डल, भोपाल को दसवीं बोर्ड परीक्षा की अंक-सूची की द्वितीय प्रति प्राप्त करने हेतु एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2012]
उत्तर-
सेवा में,
8-7-20….

श्रीमान् सचिव,
मा.शि. म, भोपाल

महोदय
विनम्र निवेदन यह है कि मैंने दसवीं की बोर्ड परीक्षा 2009 में (अनुक्रमांक 27711) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। उपरोक्त परीक्षा की अंक-सूची खो गयी है। अतः मुझे द्वितीय प्रति भेजने का कष्ट करें। इसके लिए मैं 20 रुपये का बैंक ड्राफ्ट नं.37701 आपके नाम भेज रहा हूँ।

कृपा करके मेरे घर के पते पर अंक-सूची की द्वितीय प्रति भेजने का कष्ट करें। कष्ट के लिए क्षमा।

भवदीय
राकेश कुमार
10/51,माधवन मार्ग,
शहडोल

MP Board Class 10th Hindi Solutions

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5

Question 1.
Classify the following numbers as rational or irrational –

  1. 2 – √5
  2. (3 + \(\sqrt{23}\) ) – \(\sqrt{23}\)
  3. \(\frac { 2\sqrt { 7 } }{ 7\sqrt { 7 } } \)
  4. \(\frac{1}{sqrt { 2 }}\)

Solution:

  1. 2 – \(\sqrt{5}\) is an irrational number
  2. (3 + \(\sqrt{23}\) ) – \(\sqrt{23}\) = 3 is a rational number
  3. \(\frac { 2\sqrt { 7 } }{ 7\sqrt { 7 } } \) = \(\frac{2}{7}\) is a rational number
  4. \(\frac{1}{\sqrt { 2 }}\) = is an irrational number
  5. 2π is an irrational number.

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Question 2.
Simplify each of the following expressions –

  1. (3 + \(\sqrt{3}\) ) (2 +\(\sqrt{2}\))
  2. (3 + \(\sqrt{3}\) ) (3 – \(\sqrt{3}\))
  3. (\(\sqrt{5}\) + \(\sqrt{2}\))2
  4. (\(\sqrt{5}\) – \(\sqrt{2}\)) (\(\sqrt{5}\) + \(\sqrt{2}\))

Solution:
1. (3 + \(\sqrt{3}\) ) (2 +\(\sqrt{2}\))
= 6 + 3\(\sqrt{2}\) + 2\(\sqrt{3}\) + \(\sqrt{6}\)

2. (3 + \(\sqrt{3}\)) (3 – \(\sqrt{3}\))
= (3)2 – (\(\sqrt{3}\) )2 = 9 – 3 = 6

3. (\(\sqrt{5}\) + \(\sqrt{2}\) )2
= (\(\sqrt{5}\))2 + 2\(\sqrt{5}\) x \(\sqrt{2}\) + (\(\sqrt{2}\))2
= 5 + 2\(\sqrt{10}\) + 2 = 7 + 2\(\sqrt{10}\)

4. (\(\sqrt{5}\) – \(\sqrt{2}\)) (\(\sqrt{5}\) + \(\sqrt{2}\))
= (\(\sqrt{5}\))2 – (\(\sqrt{2}\))2 = 5 – 2 = 3

Question 3.
Recall, 7t is defined as the ratio of the circumference (say c) of a circle to its diameter (say d). That is, π = \(\frac{c}{d}\). This seems to contradiet the fact n is irrational. How will you resolve this contradiction?
Solution:
No contradiction will be there. Whenever we measure any length with any device, we only get an approx, rational value and so cannot realise that either c or d is irrational.

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Question 4.
Represent \(\sqrt{9.3}\) on the number line.
Solution:
Steps:

  1. Draw a line segment AC = 9.3 cm and extend it to B such that CB – 1 cm.
  2. Draw the perpendicular bisector of AS and mark the mid point O of AB.
  3. With O as centre and OB as radius, draw a semicircle.
  4. At point C, draw perpendicular CD which intersect the semicircle at D such that CD = \(\sqrt{9.3}\).
  5. With C as centre and CD as radius, draw an arc which intersect AB produced at E.

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-1
Proof:
OA = OB = \(\frac{10.3}{2}\) = 5.15cm
OD = 5.15 cm
OC = OB – BC = 5.15 – 1 = 4.15 cm
CD = \(\sqrt { OD^{ 2 }-OC^{ 2 } } \)
= \(\sqrt{9.3}\) cm

Question 5.
Rationalise the denominators of the following:

  1. \(\frac{1}{\sqrt { 7 }}\)
  2. \(\frac{1}{\sqrt{7}-\sqrt{6}}\)
  3. \(\frac{1}{\sqrt{5}+\sqrt{2}}\)
  4. \(\frac{1}{\sqrt{7}-2}\)

Solution:
1. \(\frac{1}{\sqrt { 7 }}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-2

2. \(\frac{1}{\sqrt{7}-\sqrt{6}}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-3

3. \(\frac{1}{\sqrt{5}+\sqrt{2}}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-4

4. \(\frac{1}{\sqrt{7}-2}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-5

Laws of Exponents for real numbers:
If a, n and m are natural numbers, then

  1. am x an = am+n
  2. (am)n = amn
  3. \(\frac { a^{ m } }{ b^{ n } } \) where m > n
  4. am x bm – (ab)m

Example 1.

  1. 23 x 24 = 23+4 = 27
  2. (32)3 = 32×3 = 36
  3. \(\frac { 5^{ 5 } }{ 5^{ 2 } } \) = 55-2 = 53
  4. 23 x 33 = (2 x 3)3 = 63

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Example 2.
1. 6\(\frac{2}{5}\) x 6\(\frac{3}{5}\)
Solution:
6\(\frac{2}{5}\) x 6\(\frac{3}{5}\) = 6\(\frac{5}{5}\) = 6

2. 6\(\frac{1}{2}\) x 7\(\frac{1}{2}\)
Solution:
6\(\frac{1}{2}\) x 7\(\frac{1}{2}\) = (6 x 7)\(\frac{1}{2}\) = 42\(\frac{1}{2}\)

3. \(\frac{5^{6 / 7}}{5^{2 / 3}}\)
Solution:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-6

Example 3.
Simplify
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-7
Solution:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-8
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.5 img-9

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MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2

Question 1.
State whether the following statements are true or false. Justify your answers.

  1. Every irrational number is a real number.
  2. Every point on the number line is of the form √m , where m is a natural number.
  3. Every real number is an irrational number.

Solutions:

  1. True, because all irrational numbers come in the collection of real numbers.
  2. False, because a negative number cannot be the square root of any natural number.
  3. False, because the collection of real numbers contains not only irrational numbers but also rational numbers.

Question 2.
Are the square roots of all positive integers irrational? If not, give an example of the square root of a number that is a rational number.
Solution:
No. For example, √4 = 2 is a rational number.

Question 3.
Show how √5 can be represented on the number line.
Solution:
Representing √5 on a number line as shown in fig. below.
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-1

  1. Take OA = 2 units and draw perpendicular AB on A.
  2. Cut AB = 1 unit and join OB.
  3. By taking O as centre and OB as radius, draw an arc which inter-sect the number line at C.

Hence OC = √5
∴ Point C represents ^5 on the number line.
Proof:
OBD is a right angled A.
∴ OD2 = OB2 + BD2
OD2 = (2)2 + (1)2 = 5
OD = √5
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-2

Representation of Real Numbers on Number Line

Real Numbers:
The rational and irrational numbers taken together are known as real numbers. Every real number Is either rational or irrational. Different operations on real numbers are shown below:
For example:

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Example 1.
Add (3√2 + 5√3) and (√2 + √3).
Solution:
(3√2+ 5√5)+ (√2+ √3)
= 3√2 + 5√5 + √5 + √5 = (3√5+ √5)+ (5√5+ √5)
= 4√2 + 6√3
= 4√5 + 6√5

Example 2.
Add (√5 + 7√5) and (4√3 + 6√5).
Solution:
(√5 + 7√5) + (4√3 + 6√5)
= √3 + 7√5 + 4√3 + 6√5
= (√3 + 4√3) + (7√5 + 6√5)
= 5√3 + 13√5.

Example 3.
Simplify (3 + √2) (3 – √2).
Solution:
(3)2 – (√2)2
(∴ a2 – b2 = (a + b) (a – b))
= 9 – 2
= 7.

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Example 4.
Divide 16√6 by 4√2 .
Solution:
16√6 ÷ 4√2
\(\frac { 16\sqrt { 6 } }{ 4\sqrt { 2 } } \)
4√3.

Example 5.
Simplify the following:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-3
Solution:
(i) \(\sqrt{45}\) – 3\(\sqrt{20}\) = 4\(\sqrt{5}\) = \(\sqrt{9×5}\) – 3\(\sqrt{4×5}\) + 4\(\sqrt{5}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-4
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-5

Example 6.
Simplify by rationalising the denominator of \(\frac { 2+3\sqrt { 5 } }{ 2-3\sqrt { 5 } } \)
Solution:
We have 3 \(\frac { 2+3\sqrt { 5 } }{ 2-3\sqrt { 5 } } \), multiply numerator and denominator by 2 + 3√5, we have
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-6

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 8 देवताओं के अंचल में

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 8 देवताओं के अंचल में (अज्ञेय)

देवताओं के अंचल में अभ्यास-प्रश्न

देवताओं के अंचल में लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कुलू में भारी मेला कब लगता है? वहाँ कौन-कौन-सी चीजें विकने आती
उत्तर
कुलू में दशहरे के अवसर पर बड़ा भारी मेला लगता है। रंग-बिरंगे कम्बल, पटू-पट्टियाँ, पश्मीना, ‘चरू’ और अन्य प्रकार की खालें-रीछ की, मग की, बाघ की, कभी-कभी बर्फ के बाघ (स्नो-लेपड) की तरह-तरह के जूते, मोजे, सिली-सिलाई पोशाकें, टोपियाँ, बाँसुरी, बर्तन, पीतल और चाँदी के आभूषण, लकड़ी, हड़ी और सींग की कंधियाँ, देशी और विदेशी काँच, बिल्लौर और पत्थर के मनकों के हार-न जाने क्या-क्या चीजें वहाँ बिकने आती हैं।

प्रश्न 2.
‘हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ किसके द्वारा स्थापित किया गया और यह संस्था किस संबंध में कार्य करती है?
उत्तर
रूसी कलाकार रोयरिक द्वारा स्थापित हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट है। यह संस्था रोयरिक के भाई डॉक्टर जॉर्ज रोयरिक की देखरेख में हिमालय की भाषाओं, जातियों, लोक-साहित्य और वनस्पतियों के संबंध में अनुसंधान करती है। स्वयं रोयरिक भी अक्सर यहीं रहते हैं।

प्रश्न 3.
लेखक ने ऊनी कपड़ों के लिए बढ़िया लांड्री किसे कहा है?
उत्तर
कट्राई से आगे कलाथ है। उसमें गर्म पानी का कुंड है। उसमें गंधक और अन्य रसायन काफी मात्रा में होते हैं। इसे ही लेखक ने ऊनी कपड़ों के लिए बढ़िया लाँड्री कहा है।

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प्रश्न 4.
कुलू प्रदेश को ‘देवताओं का अंचल’ कहा है, क्यों? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कुलू प्रदेश को ‘देवताओं का अंचल’ कहा है। यह इसलिए कि यहाँ सैकड़ों देवी-देवताओं और उनके मंदिर हैं। और साल में एक बार वे अपने-अपने रथों में बैठकर कुलू के रघुनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित राम की उपासना के लिए जाते हैं। इस विराट देव सम्मेलन के कारण भी लेखक ने कुल प्रदेश को देवताओं का अंचल कहा

प्रश्न 5.
लेखक ने ‘मनाली’ के नामकरण के पीछे क्या कारण बताया है?
उत्तर
लेखक ने ‘मनाली’ का नाम यहाँ अधिक संख्या में पाया जाने वाला मुनाल नामक पक्षी से सम्बन्धित बताया है। लेखक ने यह भी कहा है कि कुछ लोग मनाली को वहाँ के सेबों और नाशपाती के कारण ही जानते हैं।

देवताओं के अंचल में दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पाठ के आधार पर ‘कुलू’ व ‘मनाली’ के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर
कुलू को प्राचीन हिंदू-सभ्यता का हिण्डोला (झूला) कहा जा सकता है। यहाँ के हरेक कस्बे और गाँव के अपने-अपने देवता हैं। उनके अपने-अपने मंदिर और भक्त हैं। साल में एक बार वे सभी अपने-अपने रथों में बैठकर कुलू के रखनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित राम की उपासना के लिए जाते हैं। इसलिए कल प्रदेश को ‘देवताओं का अंचल’ (बली ऑफ दि गॉङ्स) कहते हैं। दशहरे के अवसर पर यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है। उसमें अनेक प्रकार की जीवनोपयोगी वस्तुएँ बेची जाती हैं। कुलू-प्रांत में व्यास कुंड तथा व्यास मुनि, बशिष्ठ आदि ऋषि-मुनियों के स्थान हैं, पांडवों के मंदिर हैं. भीम की पत्नी हिडिंबा देवी भी पूजा पाती है, और सबसे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वहाँ पर ‘मनु रिखि’ या मन भगवान का भी एक मंदिर है। शायद भारत में एकमात्र स्थान है, जहाँ मानवता का यह स्वयंभू आदिम प्रवर्तक मंदिर में प्रतिष्ठित हो और पूजा पाता हो।

मनाली का नामकरण यहाँ अधिक संख्या में पाया जानेवाला मुनाल नामक पक्षी के नाम पर हुआ है। कुछ लोग यहाँ के सेब और नाशपाती की श्रेष्ठता के कारण इसे जानते हैं। मनाली की दो बस्तियाँ हैं-एक तो बाहर से आकर बसे हुए लोगों द्वारा बनाए हए बंगलों और बाजार वाली चस्ती, जो दाना कहलाती है, और दूसरी उससे करीब मील भर ऊपर चलकर खास मनाली गाँव की। मोटर दाना तक जाती है। दाना से सड़क फिर व्यास नदी पार करके रोहतंग की जोत से होकर लाहौर को चली जाती है। इसी मार्ग पर मनाली से दो मील की दूरी पर वशिष्ठ नाम का गाँव है, जहाँ गरम पानी के कंड है। और वशिष्ठ मंदिर भी हैं। कहते हैं कि वशिष्ठ ऋषि यहीं तपस्या करते-करते पाषाण हो गए थे, पाषाण-मूर्ति वहाँ पूजी भी जाती हैं। यहाँ पानी में गंधक की मात्रा काफी है, और यह स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है।

प्रश्न 2.
‘कुलू’ प्राचीन हिंदू सभ्यता का गहबारा है।’ लेखक के इस कवन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘कुलू’ प्राचीन हिंदू सभ्यता का गहवारा है। लेखक के इस कथन का आशय यह है कि यहाँ के हरेक कस्बे और गाँव के अपने-अपने देवताओं के मंदिर हैं। वे साल में एक बार अपने रथ में बैठकर कुलू के रघुनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित राम की उपासना के लिए जाते हैं। इससे हिन्दू सभ्यता की अच्छी झलक मिलती है।

प्रश्न 3.
कोकसर के मार्ग में बर्फानी सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर
कोकसर के मार्ग में पड़ने वाले बर्फीले सौंदर्य अद्भुत और बेजोड़ हैं। कुछ मीलों के क्षेत्रफल एक प्याला के समान बना हुआ दृश्य है। उसके चारों ओर बर्फ की ऊँची-ऊँची चोटियाँ हैं। उनके नीचे पहाड़ के खुले रूप हैं, जो काले दिखाई देते हैं। उस प्याले के बीच में बर्फ से ढका हुआ बहुत बड़ा मैदान है। उसे देखकर ऐसा लगता है, मानो अभिमान में आकर पहाड़ की इन ऊँची-ऊँची चोटियों ने अपने सिर और कटि-प्रदेश को ढक लिया है।

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प्रश्न 4.
कुलू और मनाली में कौन-कौन से दर्शनीय स्थल हैं तथा उनका क्या महत्त्व है?
उत्तर
कुलू में प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत रूप में दिखाई देता है। यहाँ अनेक देवी-देवताओं के मंदिर हैं। वे बड़े ही मनोरम हैं। यहाँ कट्राई सबसे सुंदर स्थान है। फैले हए धान के खेतों के बीच-बीच में सेब, नाशपाती, खुबानी, आड़ और आलचे के पेड़ मन को मोह लेते हैं। यहाँ के पुराने राजाओं के महल आदि अनेक दर्शनीय इमारतें और कुछ प्राचीन मंदिर हैं। मनाली का मुनाली पक्षी बहुत ही सुंदर होता है। मनाली से दो मील की दूरी पर वशिष्ठ गाँव में गरम पानी के कुंड हैं और वशिष्ठ मंदिर भी है। यहाँ के पानी में गंधक की मात्रा अधिक है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक है।

प्रश्न 5.
कट्राई के सौंदर्य को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कट्राई के सौंदर्य उसकी सड़क के हर मोड़ पर दिखाई देते हैं। एक ओर ऊँचे-ऊँचे चीड़ के जंगल हैं, तो दूसरी ओर फैली तराई में धान के खेत लहराते हुए दिखाई देते हैं। वे मानों मखमली आँगन हैं। इसी सड़क पर जगत सुख एक ऐसा गाँव है, जहाँ अनेक दर्शनीय पुराने मंदिर हैं।

देवताओं के अंचल में भाषा-अध्ययन

1. पाठ में कई ऐसे शब्द भी आए हैं जिनके एक से अधिक अर्थ मिल जाते हैं। जैसे-सोते (स्रोत, झरना) सोना (क्रिया) हार (पराजय, माला)।
निम्नलिखित शब्दों के एक से अधिक अर्थ बताइए
सोना, तीर, मत, अंबर, श्री, हरि।
उत्तर
शब्द – एक से अधिक अर्व
सोना – नींद में होना, स्वर्ण (एक बहुमूल्य धातु)
तीर – बाण, किनारा
मत – विचार, नहीं
अंबर – वस्त्र, आकाश
श्री. – शोभा, यश
हरि – विष्णु, सिंह।

2. वर्तनी शुद्ध कीजिए
स्रष्टि – सृष्टि
अनूमति – ………….
प्रवतर्क – …………..
प्रतीष्ठीत – ………….
दरशनीय – …………….
अभीमानी – …………..
पोषाक – ………….
सैलानि – …………….
उत्तर
अशुद्ध शब्द – शुद्ध शब्द
स्रष्टि – सृष्टि
अनुमति – अनुमति
प्रर्वतक – प्रवर्तक
प्रतीष्ठीत – प्रतिष्ठित
दरशनीय – दर्शनीय
अभीमानी – अभिमानी
पोषाक – पोशाक
सैलानि – सैलानी।

3. नीचे लिखे शब्दों में से मूल शब्द और प्रत्यय छाँटकर अलग-अलग कीजिए।
साहसिक, दर्शनीय, लड़कपन, सुंदरता, अभिमानी, दुकानदार, प्रतिष्ठित ।
उत्तर
मूल शब्द – प्रत्यय
साहस – ईक
दर्शन – ईय
लड़का – पन
सुन्दर – ता
अभिमान – ई
दुकान – दार
प्रतिष्ठा – इत

4. दिए हुए वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए :
1. जिसके बराबर कोई दूसरा न हो-अद्वितीय ……………….
2. जिसका वर्णन न किया जा सके………..
3. आकाश को छूने वाला………….
4. जिसका कोई आकार न हो….
5. दूसरों पर आश्रित रहने वाला…………
उत्तर

  1. जिसके बराबर कोई दूसरा न हो – अद्वितीय
  2. जिसका वर्णन न किया जा सके – अवर्णनीय
  3. आकाश को छूने वाला – गगनचुम्बी
  4. जिसका कोई आकार न हो – निराकार
  5. दूसरों पर आश्रित रहने वाला – पराश्रित

देवताओं के अंचल में योग्यता-विस्तार

1. इस लेखक के अतिरिक्त किसी अन्य हिन्दी के साहित्यकार द्वारा लिखे गए यात्रा-वृत्तांतों की सूची बनाइए।
2. आप भी किसी स्थान को देखने गए होंगे, उसका यात्रा-वृत्तांत अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

देवताओं के अंचल में परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कहाँ से देवताओं का अंचल आरंभ होता है?
उत्तर
मंडी से कुलू-प्रदेश तक देवताओं का अँचल आरंभ होता है।

प्रश्न 2.
मणिकर्ण क्या है?
उत्तर
मणिकर्ण तीर्थ-स्थान है। यहाँ गरम पानी के कई सोते हैं। उसकी उष्णता अलग-अलग है। कोई नहाने के लिए ठीक है, तो किसी में चावल उबाले जा सकते हैं।

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प्रश्न 3.
कुलू-प्रांत की सबसे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बात क्या है?
उत्तर
कुलू-प्रांत की सबसे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वहाँ पर ‘मनु रिखि’ या मनु भगवान का भी एक मंदिर है। यह शायद भारत में एकमात्र ऐसा स्थान है, जहाँ मानवता यह स्वयंभू आदिम प्रवर्तक मंदिर में प्रतिष्ठित होकर पूजा पाता है।

देवताओं के अंचल में दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मंडी से कुलू-प्रदेश में कैसे जाना पड़ता है?
उत्तर
मंडी से कुलू-प्रदेश में जाने के लिए व्यास नदी को पार करना पड़ता है। व्यास नदी पर रस्सी के झूलना पुल है। उस पर लारी से जाना पड़ता है जो बहुत खतरनाक है। कोई अप्रिय घटना न घटे, इसके लिए यह प्रबंध किया गया है कि पुल का चौकीदार अपनी पीठ पर बड़े-बड़े अक्षरों में यह लिखी हई एक तख्ती टाँगे रहता है-‘चार मील रफ्तार। उसके पीछे-पीछे लारी चलती है। पुल के दोनों ओर चौकीदार पहरा देता रहता है। उसकी अनुमति के बिना कोई आर-पार नहीं जा सकता है।

प्रश्न 2.
रोहतंग मार्ग की क्या विशेषता है?
उत्तर
रोहतंग की जोत पर ही व्यास-कंड है। यहाँ से कुछ मील हटकर व्यास मुनि का स्थान है, जहाँ से व्यास नदी का उद्गम है। रोहतंग का मार्ग बहुत रमणीक है। व्यास नदी के वेग से किस तरह पहाड़ के पहाड़ कट गए हैं, वे भी देखने की चीज है। कहीं-कहीं तो नदी आठ-दस फुट चौड़ी दरार में चार-पाँच सौ फुट नीचे जाकर अदृश्य हो गई है, केवल स्वर सुनाई पड़ता है। इसका कारण यह है कि व्यास नदी तीव्र गति से नीचे उतरती है-अपने मार्ग के पहले पाँच मील में जितना नीचे उतर आती है, वह उतना अगले पचास मील में नहीं, और उसके बाद में पाँच सौ मील में नहीं।

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प्रश्न 3.
मनाली लौटकर आने पर लेखक ने क्या सोचा?
उत्तर
मनाली लौटकर आने पर लेखक ने एकांत में रहकर एक बड़ा-सा उपन्यास लिखने को सोचा। इससे पहले उसने अंग्रेजी में एक पूरा उपन्यास लिख भी डाला था, लेकिन जेल के चार वर्षों के अनुभवों ने उसे यह बता दिया था कि उसमें अभी लड़कपन है। अब उसने अपने नए अनुभवों के आधार पर परिवर्तन और परिष्कार कर उसे हिन्दी में लिखने को सोचा।

प्रश्न 4.
देवताओं के अंचल में’ यात्रा-वृत्तांत के मुख्य भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तांत प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक है। यह भारत के प्रमुख पर्यटन क्षेत्र ‘कुलू’ व मनाली की रचना ‘अरे यायावर रहेगा याद’ से उधत है। इसमें लेखक ने शहरी कोलाहल से दूर प्रकृति की गोद में बैठकर स्वास्थ्य लाभ लिया है। इसके साथ-साथ उपन्यास लेखन की इच्छा से वह देवभूमि ‘कुलू’ आता है। इस लेख में कुलू-मनाली के निवासियों की सहज धार्मिक आस्थाओं, रीति-रिवाजों और विभिन्न मनमोहक स्थलों के सौंदर्य एवं महत्त्व को लेखक ने चित्रित किया है। प्राकृतिक संपदा तथा स्थानीय उत्पादों का सजीव चित्रण इस यात्रा-वृत्तांत में अलौकिक अनुभूति कराता है। फलस्वरूप यह यात्रा-वृत्तांत न केवल हृदयस्पर्शी बन गया है, अपितु भाववर्द्धक भी। .

देवताओं के अंचल में लेखक-परिचय

प्रश्न
श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर-प्रदेश के देवरिया जिले के कसिया नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता पंडित हीरानंद शास्त्री पुरातत्त्व विभाग में थे। उनका तबादला एक स्थान से दूसरे स्थान पर होता रहा। उससे अज्ञेय की शिक्षा भी एक स्थान से दूसरे पर होती रही। आरंभिक शिक्षा समाप्त करके उन्होंने लाहौर के फॉरसन कॉलेज से बी-एस.सी की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद अंग्रेजी विषय लेकर एम.ए. में प्रवेश लिया, लेकिन उसी समय क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही लटककर रह गई। क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के कारण वे कई बार गिरफ्तार होकर जेल गए और रिहा हुए। वे 1936 में ‘सैनिक’ के संपादक मंडल में काम करने लगे। इसके बाद ‘विशाल भारत’ के संपादक मंडल में कलकत्ता रहे। 1943 से 1946 तक वे सेना में रहे। 1947 में ‘प्रतीक’ नामक पत्र निकाला। 1950 में आकाशवाणी दिल्ली में नौकरी की। 1955 से 1960 तक अनेक देशों की यात्रा की। 1987 में उनका निधन हो गया।

रचनाएँ-‘अज्ञेय’ की निम्नलिखित रचनाएँ हैंकाव्य-संग्रह-‘आँगन के पार द्वार’,’कितनी नावों में कितनी बार’, ‘सागर-मुद्रा’ आदि।

उपन्यास-‘शेखर एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’ और ‘अपने-अपने अजनबी।’ कहानी-संग्रह-‘शरणार्थी’, ‘कोठरी की बात’ आदि।

निबंध-डायरी और यात्रा-‘एक बूँद सहसा उछली’, ‘अरे यायावर रहेगा याद’, ‘लिखी कागज कोरे’, ‘भवन्ती’ आदि।

महत्त्व-चूँकि ‘अज्ञेय’ बहुमुखी प्रतिभासंपन्न रचनाकार रहे। इसलिए उनका रचना-संसार भी विविध है। वे गद्य और काव्य दोनों ही क्षेत्र में युग-प्रवर्तक के रूप में याद किए जाते रहेंगे। ‘तार-सप्तक’ कविता संकलनों के संपादक के रूप में वे युग-युग तक अविस्मरणीय रहेंगे।

देवताओं के अंचल में यात्रा-वृत्तांत का सारांश

प्रश्न
‘अज्ञेय’ द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तांत ‘देवताओं के आँचल में’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
‘अज्ञेय’ द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तांत ‘देवताओं के आँचल में एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है। इसमें कुलू से मनाली तक की यात्रा का उल्लेख किया गया है। इस यात्रा-वृत्तांत का सारांश इस प्रकार है मंडी से कुलू में प्रवेश को देवताओं का आँचल कहा जाता है। इसमें जाने के लिए व्यास नदी को रस्सी के झूलन पुल से पार करने के लिए लारी से जाना वास्तव में बहत खतरनाक होता है। इसलिए चार मील की ही रफ्तार से लारी को चलाने के लिए, का संकेत लिखा हुआ एक आदमी लारी से आगे-आगे चलता है। पुल के चौकीदार की अनुमति से कोई आर-पार आ-जा सकता है।

अपने लोगों के साथ लेखक दस बजे के आस-पास लोट पहुँचकर मोटर में बैठकर शिमला के लिए रवाना हो जाता है। वह व्यास नदी के किनारे-किनारे होते हुए कुलू बारह बजे पहुँच गया। कुलू में अनेक प्राचीन हिन्द-सभ्यता का झला है। यहाँ के हरेक कस्बे और गाँव के अपने-अपने देवता हैं। इस प्रकार के सैकड़ों देवी-देवताओं के मंदिरों और इस विराट देव-सम्मेलन के कारण ही कुलू प्रदेश का नाम ‘देवताओं का अंचल’ (वैली ऑफ दि गाइस) पड़ा है। दशहरे के दिन आस-पास के लगभग हजारों देवी-देवताओं को रथ में बैठाकर यहाँ लाया जाता है। उस दिन विजयी राम का उत्सव होता है। कुलू प्रदेश में व्यास-कुंड, व्यास मुनि, वशिष्ठ आदि ऋषि-मुनियों के स्थान और पाण्डवों के मंदिर हैं। यहाँ भीम की पत्नी हिडिंबा देवी की भी पूजा होती है। सबसे रोचक बात यह है कि यहाँ मानवता का आदिम प्रवर्तक स्वयंभ (मन) की भी पूजा की जाती है।

दशहरे के अवसर पर यहाँ बहुत बड़ा मेले का आयोजन किया जाता है। फलस्वरूप तरह-तरह की दुकानें और खरीददार यहाँ आते हैं। इस तरह यहाँ एक से एक महँगी वस्तुओं की खरीद-बिक्री होती है। इसके साथ ही यहाँ अनेक प्रकार के खेल-तमाशे, गाने-बजाने और सजावट होती है। लेखक यहाँ अपने साथियों के साथ दो घंटे ठहरकर और भोजन करके लारी में बैठकर आगे चला गया। व्यास नदी के कटाव से कट्राई सबसे सुन्दर स्थान है। यहाँ की घाटी अधिक चौड़ी है। ऊपर चढ़कर देखने से धान के खेतों के बीच-बीच में सेब, नाशपाती, खूबानी, आड़ और आलूचे के पेड़ मन को मोह लेते हैं। यहाँ मछली का शिकार बहुत अच्छा होता है। कट्राई से दो मील की ऊँचाई पर कुलू राज्य की पुरानी राजधानी है।

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यहाँ अनेक दर्शनीय इमारतें-मंदिर हैं। यहाँ रूसी कलाकार रोपरिक द्वारा स्थापित ‘हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ है, जहाँ पर हिमालय की भाषाओं. जातियों. लोक-साहित्य और वनस्पतियों से संबंधित रिसर्च होते हैं। कट्राई से मनाली तक का पुराना रास्ता नगर और जगत सुख होकर जाता था लेकिन अब नगर उससे अलग हो गया है। मनाली से नगर वाली सड़क कच्ची है, लेकिन लम्बी है। इस पर फैला प्राकृतिक दृश्य मन को मोह लेता है। इसी सड़क पर जगत सुख गाँव में अनेक दर्शनीय हिन्दू युग के कलाकारों से निर्मित प्राचीन मंदिर हैं। कटाई से आगे कलाथ में गर्म पानी का एक ऐसा कुंड है, जिसमें गंधक और अन्य रसायन की अधिक मात्रा होती है। यहाँ पर पहाड़ी औरतें खासतौर पर अपने कपड़े धोती हैं।

ऊनी कपड़ों के लिए यहाँ बहुत अच्छी लांडी है। मनाली या मुनाली का नाम यहाँ पर अधिक संख्या में पाया जाने वाला ‘मुनाल’ नामक अधिक सुन्दर पक्षी के नाम पर रखा गया है। यहाँ के कुछ सेबों और नाशपाती के अधिकता के कारण मनाली को जानते हैं। मनाली की दो बस्तियाँ हैं-एक बाहर से आकर बसे हुए लोगों के बंगलों और बाजारवाली बस्ती और दूसरी-उससे मील भर ऊपर बसी खास मनाली गौण की बस्ती जो मोटर दाना तक जाती है। फिर वहाँ से व्यास नदी को पार करके रोहतंग की जोत से लाहौर को चली जाती है। इसी मार्ग पर मनाली से दो मील दूर वसिष्ठ नामक गाँव और मंदिर है। रोहतंग की जोत पर व्यास कुंड है। यहीं से व्यास नदी निकलती है। रोहतंग की जोत के दूसरी पार कोकसर नामक बर्फ की सुन्दरता में बेजोड़ है। मनाली से आकर लेखक की स्वास्थ्य-लाभ करने के बाद सबसे बड़ी आकांक्षा एक बड़ा-सा उपन्यास लिखने की थी। दूसरे दिन सुबह उसने स्वयं को पाया कि वह भी देवताओं का समकक्षी होकर स्रष्टा हो गया है। वह लिखने लगा।

देवताओं के अंचल में संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण व विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

1. सुभीते के लिहाज से चाहे जैसा हो, सौंदर्य-रक्षा के लिए एक बहुत अच्छा हुआ है। मनाली से नगरवाली कच्ची सड़क उस तरफ की सबसे लंबी सैर है। ऊँच-नीच भी बहुत अधिक नहीं है और दृश्य तो हर एक मोड़ पर ऐसा सुंदर दिखता है कि कहा नहीं जा सकता। एक ओर उठते हुए चीड़ के जंगल की गजियाँ, दूसरी ओर खुली हुई तराई में लहराते हुए धन-खेतों के मखमली आँगन-न जाने किस रहस्यमय की नीरव पद-चाप हर समय उसमें एक हिलोस्-सी उठाती रहती हैं।

शब्दार्थ-सुभीते-सुविधा। लिहाज-दृष्टिकोण। सैर-दूरी, भ्रमण। नीरव-शान्त। पद-चाप-पैर की ध्वनि। हिलोर-उमंग।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिंदी सामान्य’ में संकलित तथा सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यावन’ ‘अज्ञेय’ लिखित यात्रा-वृत्तांत ‘देवताओं के आँचल में से है। इसमें लेखक ने कट्राई से मनाली तक की सुंदरता का उल्लेख करते हुए कहा है कि

व्याख्या-कट्राई से मनाली तक का प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोह लेता है। यहाँ तक आने के लिए पूर्वापेक्षा यातायात की बहुत बड़ी सुविधा हो गई है। जो कुछ सुविधा इस समय है, और जैसे भी हो, कोई यहाँ पहुँचता है, तो वह यही पाता है कि इस सुविधा से प्राकृतिक सुंदरता की बहुत बड़ी रक्षा हुई है। इस दृष्टि से यह प्रशंसनीय कदम कहा जा सकता है। यहाँ तक आने का यह पता लग जाता है। कट्राई से मनाली और फिर मनाली से नगर जानेवाली सड़क पक्की नहीं है, अपितु वह कच्ची है। उस ओर जानेवाली वही सबसे लंबी सड़क है। अधिकतर वह समतल है। कहीं-कहीं वह ऊँची-नीची अवश्य है। उसका हरेक मोड़ अपनी सुंदरता से आने-जानेवालों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। सचमुच उसका वर्णन करना असंभव-सा लगता है। उस पर एक ओर ऊँचे-ऊँचे चीड़ के जंगल हैं तो दूसरी ओर तराई है। उसमें धान के खेत ऐसे दिखाई देते हैं, मानो वे मखमल के आँगन की तरह फैले हुए हैं। उन पर फैली हुई शांति एक रहस्यमयी-लगती है। उस पर पैरों की ध्वनि मानों रह-रहकर लहरों से उठ रहो है और गिर रही है।

विशेष-

  1. प्राकृतिक सौंदर्य का आकर्षक चित्र है।
  2. शैली चित्रमयी है।
  3. भाषा काव्यात्मक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) सौंदर्य-रक्षा के लिए क्या बहुत अच्छा हुआ है?
(ii) मनाली से नगरवाली सड़क कैसी है?
उत्तर
(i) सौंदर्य-रक्षा के लिए कटाई से मनाली तक का पुराना रास्ता नया हो गया है। अब इस पर मोटर चलने लगी है।
(ii) मनाली से नगरवाली सड़क कच्ची है। उस ओर की वह सबसे लंबी सड़क है। वह बहुत ऊँची नहीं है और बहुत नीची भी नहीं है।

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2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) किसके मोड़ पर सुंदर-सुंदर द्रश्य दिखाई देते हैं?
(ii) धान के खेत कैसे लगते हैं?
उत्तर
(i) मनाली से नगरवाली सड़क के हर मोड़ पर सुंदर-सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं।
(ii) धान के खेत मखमली आँगन की तरह एक रहस्यमयी ऐसी शांति जैसे दिखाई देते हैं। उनसे होने वाली धीमी ध्वनि लहरों के उठने-गिरने की तरह सुनाई देती

2. रोहतंग की जोत के दूसरी पार कोकसर पड़ाव है। यहाँ जाते हुए बर्फ के सौंदर्य का जो दृश्य दिखता है, मैंने दूसरा नहीं देखा। उसका न वर्णन हो सकता है, न चित्र खिंच सकता है। कुछ मीलों के दायरे का एक प्याला-सा बना हुआ है, जिसके सब ओर ऊँची-ऊँची हिमावृत्त चोटियाँ, उससे कुछ नीचे पहाड़ों के नंगे काले अंग, और प्याले के बीच में फिर बर्फ से छाया हुआ मैदान मानो अभिमानी पर्वत सरदारों ने. अपना शीश और कटि प्रदेश को ढक लिया है, लेकिन छाती दर्प से खोल रखी है… इस स्थान से तीन नदियों का उद्गम है, ऊपर से व्यास, मध्य से चन्द्रा और भागा, जो आगे चलकर मिल जाती हैं। लेकिन रोहतंग की यात्रा का और कुलू प्रदेश के अपने दूसरे विचित्र अनुभवों का वर्णन अलग लेख माँगता है।

शब्दार्च-हिमावृत्त-बर्फ से ढकी हुई। कटि-प्रदेश-नीचे का भाग। दर्प-गर्व, अहंकार । उद्गम-उत्पत्ति स्थान ।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें लेखक ने कोकसर पड़ाव से आगे बर्फीले सौंदर्य का चित्रण करते हुए कहा है कि

व्याख्या-रोहतंग की जोत के दूसरी तरफ कोकसर का पड़ाव पड़ता है, जो अपनी खास विशेषता रखता है। यहाँ से आगे बढ़ने पर बर्फ का फैला हुआ रूप अपनी सुंदरता से आने-जाने वालों के मन को मोह लेता है। लेखक का यह मानना उसने ऐसा कोई और मोहक दृश्य और कहीं नहीं देखा है। यही नहीं वह उसका वर्णन भी नहीं कर सकता है। शायद वह उसका पूरा-पूरा चित्र भी नहीं खींच सकता है। उसने बड़े ध्यान से देखा कि एक प्याले की कोई आकृति लगभग कुछ मीलों का विस्तार लिए हुए है। उसके चारों ओर केवल बर्फ से ढकी हुई चोटियाँ हैं। उन चोटियों के नीचे काले रंग का फैले हुए पहाड़ के छोटे-बड़े रूप हैं। मीलों तक फैले हुएय उस प्याले-सी आकृति के बीच में और कुछ नहीं है। केवल बर्फ-ही-बर्फ है। वह बहुत बड़ा विस्तार लिए हुए है। उसे देखने से ऐसा लगता है मानो अपने बड़प्पन और उच्चता के अभिमान को लिए हुए पर्वतों का एक एक ऊँचे-ऊँचे भाग स्वयं को छिपा लिये हैं। फिर भी वे अपने विस्तार रूपी छाती को दर्पपूर्वक फैला रखने में अपने-आपको बडा दिखाने का प्रदर्शन कर रहे हैं। इस स्थान के बारे में यह कहा जाता है कि इससे व्यास, चन्द्रा और भागा ये तीन नदियाँ निकलती हैं। वे इसके क्रमशः ऊपर और मध्य भाग से निकलती तो हैं, लेकिन आगे चलकर परस्पर मिल भी जाती हैं। लेखक के अनुसार यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि अगर रोहतंग और कुलू प्रदेश की यात्रा के अनुभवों का उल्लेख अपेक्षित और समुचित रूप में करना है, तो उसके लिए अलग से लेख लिखना पड़ेगा।

विशेष

  1. लेखक की कोकसर पड़ाव से आगे के प्राकृतिक सुन्दरता के प्रति दृष्टि आकर्षक है।
  2. संपूर्ण उल्लेख रोचक और ज्ञानवर्द्धक है।
  3. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  4. शैली चित्रमयी है।

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1. गद्यांश पर आधारित अर्यग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कोकसर पड़ाव से आगे कौन-सा अद्भुत दृश्य दिखाई देता है?
(ii) प्याला-सा बने दृश्य की क्या विशेषता है?
उत्तर
(i) कोकसर पड़ाव से आगे बर्फ का अत्यधिक आकर्षक दृश्य दिखाई देता
(ii) प्याला-सा बने दृश्य की विशेषता है कि वह कुछ मीलों के दायरे में फैला हुआ है। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची बर्फीली चोटियाँ हैं।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बर्फ के मैदान से कौन-कौन नदियाँ निकलती हैं?
(ii) लेखक ने किसके लिए अलग लेख लिखने का सुझाव दिया है?
उत्तर
(i) बर्फ के मैदान से व्यास, चन्द्रा, और भागा नदियाँ निकलती हैं।
(ii) लेखक ने रोहतंग और कुलू प्रदेश की यात्रा के विचित्र अनुभवों के लिए अलग लेख लिखने का सुझाव दिया है।

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