MP Board Class 10th Sanskrit निबन्ध-लेखन प्रकरण

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१. सदाचारः
(आचारः परमो धर्म:/आचारस्य महत्त्वम्)

अस्माकं भारतीया संस्कृतिः आचार-प्रधाना अस्ति। आचारः द्विविधः भवति-दुराचारः सदाचारः च। सताम् आचारः सदाचारः इत्युच्यते। सज्जनाः विद्वांसो च यथा आचरन्ति तथैव आचरणं। सदाचारो भवति। सज्जनाः स्वकीयानि इन्द्रियाणि वशे कृत्वा सर्वैः सह शिष्टतापूर्वकं व्यवहारं कुर्वन्ति। ते सत्यं वदन्ति, मातुः पितुः गुरुजनां वृद्धानां ज्येष्ठानां च आदरं कुर्वन्ति, तेषाम् आज्ञां पालयन्ति, सत्कर्मणि प्रवृत्ता भवन्ति।

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जनस्य समाजस्य राष्ट्रस्य च उन्नत्यै सदाचारस्य महती आवश्यकता वर्तते। सदाचारस्याभ्यासो बाल्यकालादेव भवति। सदाचारेण बुद्धिः वर्तते नरः धार्मिकः, शिष्टो, विनीतो, बुद्धिमान् च भवति। संसारे सदाचारस्यैव महत्त्वं दृश्यते। ये सदाचारिणः भवन्ति, ते एव सर्वत्र आदरं लभन्ते। यस्मिन् देशे जनाः सदाचारिणो भवन्ति तस्यैव सर्वतः उन्नतिर्भवति। अतएव महार्षिभिः “आचारः परमो धर्मः” इत्युच्यते। सदाचारी जनः परदारेषुमातृवत् परधनेषु लोष्ठवत्, सर्वभूतेषु च आत्मवत् पश्यति। सदाचारीजनस्य शीलम् एव परमं भूषणम् अस्ति। हिन्दी अनुवाद- सदाचार (आचार परम धर्म है/आचार का महत्व) हमारी भारतीय संस्कृति आचार (व्यवहार) प्रधान है। आचार दो प्रकार का होता है-दुराचार और सदाचार। सज्जनों का आचार, सदाचार’ कहा जाता है। सज्जन और विद्वान जैसा व्यवहार करते हैं वैसा ही आचरण सदाचार होता है। सज्जन अपनी इन्द्रियों को वश में करके सभी के साथ शिष्टतापूर्वक व्यवहार करते हैं। वे सत्य बोलते हैं, माता, पिता, गुरुजन, वृद्धों और बड़ों का आदर करते हैं, उनकी आज्ञा का पालन करते हैं, अच्छे कार्यों में लगते हैं। – व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए सदाचार की बहुत आवश्यकता है। सदाचार की आदत बचपन से ही होती है। सदाचार से बुद्धि बढ़ती है, मनुष्य धार्मिक, सभ्य, नम्र और बुद्धिमान होता है। संसार में सदाचार का ही महत्व दिखाई देता है। जो सदाचारी होते हैं, वे ही सब जगह सम्मान पाते हैं। जिस देश में लोग सदाचारी होते हैं उसकी ही सब प्रकार से उन्नति होती है। इसलिए ही महर्षियों के द्वारा “आचार परम धर्म है” यह कहा गया है। सदाचारी व्यक्ति दूसरे की स्त्रियों को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखता है। सदाचारी व्यक्ति का व्यवहार ही सबसे बड़ा आभूषण होता है।

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२. महाकवि कालिदासः
(मम प्रियः कविः)

महाकविः कालिदासः मम प्रियः कविः अस्ति। सः संस्कृत भाषायाः श्रेष्ठतमः कविः अस्ति। यादृशः रस-प्रवाहः कालिदासस्य काव्येषु विद्यते तादृशः अन्यत्र नास्ति। सः कविकुलशिरोमणिः अस्ति। कालिदासेन त्राणीनाटकानि, (मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम् च) द्वे महाकाव्ये (रघुवंशम् कुमारसम्भव च) द्वि गीतिकाव्ये (मेघदूतम् ऋतुसंहारम् च) च रचितानि।

कालिदासस्य लोकप्रियतायाः कारणं तस्य प्रसादगुणयुक्ता ललिता शैली अस्ति। कालिदासस्य प्रकृतिचित्रणं अतीवरम्यम् अस्ति। चरित्रचित्रणे कालिदासः अतीव पटुः अस्ति।

कालिदासः महाराजविक्रमादित्यस्य सभाकविः आसीत्। अनुमीयते यत्तस्य जन्मभूमिः उज्जीयनी आसीत्। मेघदूते उज्जयिन्याः भव्यं वर्णनं विद्यते। कालिदासस्य कृतिषु कृत्रिमतायाः अभावः अस्ति। कालिदासस्य उपमा प्रयोगः अपूर्वः अतः साधूच्यते-‘उपमा कालिदासस्य।’ हिन्दी अनुवाद- महाकवि कालिदास (मेरा प्रिय कवि) महाकवि कालिदास मेरे प्रिय कवि हैं। वह संस्कृत भाषा के श्रेष्ठतम् कवि हैं। जैसा रस का प्रवाह कालिदास के काव्यों में है वैसा दूसरे स्थान पर नहीं है। यह कवियों के कुल के शिरोमणि हैं। कालिदास ने तीन नाटक (मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञानशाकुन्तलम्) दो महाकाव्य (रघुवंश और कुमारसम्भव) और दो गीतिकाव्य रचे हैं। ___कालिदास की लोकप्रियता का कारण उनकी प्रसादगुण युक्त ललित शैली है। कालिदास का प्रकृति चित्रण बहुत सुन्दर है। चरित्र-चित्रण में कालिदास बहुत चतुर हैं। .. … कालिदास महाराज विक्रमादित्य के सभाकवि थे। माना जाता है कि इनकी जन्मभूमि उज्जयिनी थी। मेघदूत में उज्जयिनी का भव्य वर्णन है। कालिदास की रचनाओं में कृत्रिमता का अभाव है। कालिदास की उपमा का प्रयोग अनोखा है। इसलिए ठीक ही कहा गया है कि-“उपमा कालिदास की (सर्वश्रेष्ठ है)।”

३. विद्या-महिमा
(विद्याधनं सर्वधन-प्रधानम्/विद्या ददाति विनयम्/विद्या विहीनः – पशुः/विद्या सर्वस्य भूषणम्)

कस्यापि विषयस्य सम्यग् ज्ञानं यया भवति या विद्या कथ्यते।

अतः विद्यया एव मनुष्यः सत्य-असत्यं च जानाति। विद्या विनयं ददाति। पुरुषः विनयात् पात्रताम् आयाति। पात्रतया सः धनं प्राप्नोति, धनेन धर्म, धर्मेण च सुखं लभते। एतेन कारणेन सुखस्य आधारः विद्या एव अस्ति। . विद्या धनंव्यये कृते वृद्धिमायाति परन्तु संचये कृते क्षयमायाति। अतः विद्या अपूर्वं धनमस्ति। इदम् धनं चौरः हत्तुं न शक्नोति भ्राता विभाजयितुं न समर्थोऽअस्ति। विद्यावान् पुरुषः सर्वत्र उच्च स्थान प्राप्नोति। राजा केवलं स्वदेशेपूज्यते परन्तु विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। विद्या अज्ञानस्य तिमिरं दूरीकरोति ज्ञानस्य प्रकाशं प्रसारयति च।

विद्या एव जगति मनुष्यस्य उन्नतिं करोति। विद्या एव कीर्तिं धनं च ददाति। विद्या वस्तुतः कल्पलता इव विद्यते। विदेशगमने विद्या परमसहायिका भवति। यस्य समीपे विद्या नास्ति सः नेत्रयुक्तः अपि अन्धः एव। विद्या माता इव रक्षति पिता इव हिते नियुङ्क्ते। हिन्दी अनुवाद- विद्या-महिमा (विद्या धन सभी धनों में प्रधान है/विद्या विनय देती है/विद्यो से विहीन पशु है/विद्या सभी का आभूषण है) – किसी भी विषय का उचित ज्ञान विद्या से होता है। अतः विद्या से ही मनुष्य सत्य और असत्य को जानता है। विद्या विनय देती है। पुरुष में विनय से पात्रता आती है। पात्रता से वह धन पाता है, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त करता है। इस कारण से सुख का आधार विद्या ही है। – विद्या धन व्यय करने पर वृद्धि को प्राप्त होता है किन्तु संचय करने पर कम होता जाता है। इसलिए विद्या धन अद्भुत धन है। इस धन को चोर चुरा नहीं सकता और भाई विभाजित नहीं कर सकता। विद्यावान् पुरुष सर्वत्र ऊँचा स्थान प्राप्त करता है। राजा केवल अपने देश में ही पूजा जाता है, किन्तु विद्वान् की पूजा (आदर) सर्वत्र होती है। विद्या अज्ञान के अन्धकार को दूर करती है तथा ज्ञान का प्रकाश. फैलाती है।

विद्या ही संसार में मनुष्य की उन्नति करती है। विद्या ही कीर्ति और धन देती है। विद्या वास्तव में कल्पलता के समान है। विदेश जाने पर विद्या परम सहायिका है। जिसके पास विद्या नहीं है वह आँखों वाला होता हुआ भी अन्धा ही है। विद्या माता के समान रक्षा करती है और पिता के समान हित के कार्यों में लगाती है।

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४. दीपावलिः

भारतवर्षे अनेके उत्सवाः भवन्ति। तेषु उत्सवेषु दीपावलिः एकः मुख्यः धार्मिकः उत्सवः अस्ति। दीपावलिः कार्तिकमासे कृष्णपक्षे अमावस्यायां भवति। मनुष्याः गृहाणि सुधया अङ्गनं च गोमयेन लिम्पन्ति। जनाः रात्रौ तैलैः वर्तिकाभिः च पूर्णान् दीपान् प्रज्वालयन्ति। ते धनदेव्याः लक्ष्म्याः पूजनं कुर्वन्ति। दीपैः नगरं प्रकाशितं भवति। बालाः बहुप्रकारकैः सफोटकैः मनोविनोदयन्ति। दीपावलीसमये वणिजोऽपि स्वान् आपणान् बहुविधं सज्जयन्ति। विद्युद्दीपकानां प्रकाशः आपणेषु नितरां शोभते। नानाविधानि वस्तूनि क्रयविक्रयार्थं प्रसारितानि भवन्ति। अयं कालः नात्युष्णो नाप्यतिशीतो भवति। तेन मोदन्तेऽस्मिन् महोत्सवे नराः नार्यश्च।

हिन्दी अनुवाद- दीपावली
भारतवर्ष में अनेकों उत्सव होते हैं। उन उत्सवों में दीपावली एक मुख्य धार्मिक उत्सव है। दीपावली कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में अमावस्या को होती है। मनुष्य घरों को सफेदी से और आँगन को गोबर से लीपते हैं। लोग रात में तेल और बत्तियों से भरे दीपकों को जलाते हैं। वे धन की देवी लक्ष्मी का पूजन करते हैं। दीपकों के द्वारा नगर प्रकाशित होता है। बच्चे अनेक प्रकार पटाखों से मनोरंजन करते हैं। दीपावली के समय व्यापारी भी अपनी दुकानों को अनेक प्रकार से सजाते हैं। बिजली के बल्बों की रोशनी बाजारों में बहुत शोभित होती है। अनेकों प्रकार की वस्तुएँ क्रय-विक्रय के लिए सजी होती हैं। यह समय न अधिक गर्म और न अधिक ठण्डा होता है। उससे स्त्री-पुरुष इस उत्सव में प्रसन्न होते हैं।

५. अस्माकं देशः

भारतवर्षः अस्माकं देशः अस्ति। अस्य भूमिः विविधरत्नानां जननी अस्ति। अस्य प्राकृतिकी शोभा अनुपमा अस्ति। हिमालयः अस्य प्रहरी अस्ति। एषः उत्तरे मुकुटमणिः इव शोभते। सागरः। अस्य चरणौ प्रक्षालयति। अनेकाः पवित्रतमाः नद्यः अत्र वहन्ति। गङ्गा, गोदावरी, सरस्वती, यमुना प्रभृतयः नद्यः अस्य शोभां वर्द्धयति। अथं देशः सर्वासां विद्यानां केन्द्रम् अस्ति। अयं अनेकप्रदेशेषु विभक्त। अत्र विविधधर्मावलम्बिनः सम्प्रदायिनः जनाः निवसन्ति। अस्य संस्कृतिः धर्मपरम्परा च श्रेष्ठा अस्ति। अयं भू-स्वर्गः अपि वर्तते। ईश्वरस्य अवताराः अस्मिन् देशे सञ्जाताः। सङ्कटकाले वयं क्षुद्रभेदान् परित्यज्य देशहितं चिन्तयामः।

विशालं भूमण्डलं व्याप्य अयं देशः एशियामहाद्वीपस्य अन्यतमः राष्ट्रः सञ्जताः।
वयं सदा स्वराष्ट्रस्य रक्षां कर्तुम् उद्यताः स्याम।
कथितमस्ति-“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”

हिन्दी अनुवाद- हमारा देश
भारतवर्ष हमारा देश है। इसकी भूमि विभिन्न रत्नों की जननी है। इसकी प्राकृतिक शोभा अनुपम है। हिमालय इसका प्रहरी है। यह उत्तर में मुकुटमणि के समान सुशोभित होता है। सागर इसके चरणों को धोता है। अनेको पवित्र नदियाँ यहाँ बहती हैं। गंगा, गोदावरी, सरस्वती तथा यमुना नदियाँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यह देश सभी विद्याओं का केन्द्र है। यह अनेक प्रदेशों में विभक्त है। यहाँ अनेक धर्मों तथा सम्प्रदाय के लोग निवास करते हैं। इसकी संस्कृति और धर्म, परम्परा श्रेष्ठ है। यह पृथ्वी का स्वर्ग भी है। ईश्वर के अवतार इसी देश में हुए। संकट के समय हम छोटी-छोटी बातों को छोड़कर देश का हित सोचें। विशाल भूमि से परिपूर्ण यह देश एशिया महाद्वीप का एक राष्ट्र हो गया है। हम सदा अपने राष्ट्र की रक्षा करने के लिए तैयार हों। कहा गया है-“जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।”

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६. विद्यार्थी जीवनम्

छात्रजीवनमेव मानवजीवनस्य प्रभातवेला आधारशिला च वर्तते। समस्तजीवनस्य विकासस्य हासस्य वा कारणम् एतज्जीवनमेवास्ति। वस्तुतः विद्यार्थिजीवनं साधनामयं जीवनम्। अध्ययनं परमं तप उच्यते।

छात्रजीवने परिश्रमस्य महती आवश्यकता वर्तते। यः छात्रः आलस्यं त्यक्त्वा परिश्रमेण विद्याध्ययन करोति स एव साफल्यं लभते। अतएव छात्रैः प्रातःकाले ब्रह्ममुहूर्ते एव उत्थातव्यम्। कस्मैचित् कालाय भ्रमणाये अनिवार्यम्। ततः प्रतिनिवृत्य स्नानसन्ध्योपासनादिकं विधाय अध्ययनं कर्त्तव्यम्। तदान्तरं च लघुसात्विक भोजनं दुग्ध च महीत्वा विद्यालयं गन्तव्यम्। तत्र गत्वा गुरून् नत्वा अध्ययनं कर्त्तव्यम्। छात्रैः असत्यवादं न कदापि कर्त्तव्यम्।

छात्रजीवनं पूर्णतः अनुशासनबद्धं भवति। विद्यार्थिजीवने एव समस्तानां मानवोचितगुणानां विकास भवति। छात्र एव राष्ट्रस्ययानुपमा निधिरस्ति। अतः छात्राणां शारीरिकं चारित्रिकंच विकासं अत्यन्तानिवार्यम् विद्यार्थिजीवनमेव सम्पूर्णााँमिजीवनस्य आधारशिला। अतः तेषां सम्यक् रक्षणं, पोषणम् च कर्त्तव्यम्।

हिन्दी अनुवाद- विद्यार्थी जीवन
छात्र जीवन ही मानव की प्रभातवेला और आधारशिला है। समस्त जीवन के विकास या ह्रास का कारण यही जीवन है। वास्तव में विद्यार्थी जीवन साधनामय जीवन है। अध्ययन सबसे बड़ा तप कहा गया है।

छात्र जीवन में परिश्रम की बहुत आवश्यकता है। जो छात्र आलस्य को छोड़कर परिश्रम से विद्या का अध्ययन करता है वह ही सफलता पाता है। इसलिए ही छात्रों को प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त। में ही उठना चाहिए। कुछ समय के लिए घूमना भी अनिवार्य है।

वहाँ से लौटकर स्नान, सन्ध्या उपासना आदि करके अध्ययन करना चाहिए। उसके बाद थोड़ा-सा भोजन और दूध पीकर विद्यालय जाना चाहिए। वहाँ जाकर गुरुजनों को प्रणाम करके अध्ययन करना चाहिए। छात्रों को झूठ कभी नहीं बोलना चाहिए।

अत्र जीवन पूर्णरूप से अनुशासनबद्ध होता है। विद्यार्थी जीवन में ही समस्त मानवोचित गुणों का विकास होता है। छात्र ही राष्ट्र की अनुपम निधि है। इसलिए छात्रों का शारीरिक और चारित्रिक विकास अत्यन्त आवश्यक है। विद्यार्थी जीवन ही सम्पूर्ण आगे के जीवन की आधारशिला है। इसलिए उनकी अच्छी तरह से रक्षा और पोषण करना चाहिए।

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७. सत्सङ्गति।

ये मनसा सद् विचारयन्ति, वचसा सद् वदन्ति वपुषा च सद् आचरन्ति ते सज्जनाः कथ्यन्ते। सतां सज्जनानां सङ्गतिः ‘सत्सङ्गतिः’ कथ्यते। ये सज्जनाः साधवः पवित्र-आत्मानाः सन्ति, तेषां संगत्या मनुष्यः, सज्जनः साधुः शिष्टश्व भवति। ये दुर्जनाः सन्ति तेषां संगत्या मनुष्यो दुर्जनो भवति, पतनं विनाशं च प्राप्नोति। मनुष्यस्योपरि सङ्गतेः महान् प्रभावो भवति। यादृशैः पुरुषैः सह सः निवसति, तादृशः एव स भवति। तथा चोक्तम्

“संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति।”
सज्जानानां संगत्या मनुष्य उन्नतिं प्राप्नोति। तस्य विद्या कीर्तिश्च वर्धते। सङ्गत्याः प्रबलः प्रभावो वर्तते। बालकस्य कोमलं शरीरम् अपरिपक्वं च मस्तिष्कं भवति। सः यादृशैः बालकैः सह पठति, क्रीडति, गच्छति तादृशः एव जायते। अत एव विद्यायशोबलसुखवृद्धये सत्सङ्गः करणीयः।

हिन्दी अनुवाद- सत्संगति
जो मन से अच्छा सोचते हैं, वाणी से अच्छा बोलते हैं और शरीर से अच्छा आचरण करते हैं, वे सज्जन कहे जाते हैं। सज्जनों की संगति सत्संगति’ कही जाती है। जो सज्जन, साधु और पवित्र आत्मा वाले होते हैं, उनकी संगति से मनुष्य सज्जन, साधु और शिष्ट होता है। जो दुर्जन हैं उनकी संगति से मनुष्य दुर्ग होता है और उसका पतन और विनाश होता है। मनुष्य के ऊपर संगति का बड़ा प्रभाव होता है। जैसे मनुष्यों के साथ वह रहता है, वैसा ही हो जाता है। कहा गया है

“दोष और गुण साथ में रहने से होते हैं।”
सज्जनों की संगति से मनुष्य उन्नति प्राप्त करता है। उसकी विद्या और कीर्ति बढ़ती है। संगति का बहुत प्रभाव होता है। बालक का कोमल शरीर और कच्चा मस्तिष्क होता है। वह जैसे बालकों के साथ पढ़ता है, खेलता है, जाता है, वैसा ही हो जाता है। इसलिए ही विद्या, यश, बल और सुख की वृद्धि के लिए सत्संग करना चाहिए।

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