MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 6 स्नेह बन्ध

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 6 स्नेह बन्ध

स्नेह बन्ध अभ्यास

स्नेह बन्ध अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘स्नेहबंध’ कहानी किन सम्बन्धों पर आधारित है?
उत्तर:
‘स्नेहबंध’ कहानी पारिवारिक सम्बन्धों पर आधारित है। इस कहानी में प्रमुख रूप से सास, ससुर एवं बहू के सम्बन्धों पर प्रकाश डाला गया है।

प्रश्न 2.
मीता से पहली भेंट पर उसकी सास पर क्या प्रभाव पड़ा? (2015)
उत्तर:
मीता से पहली बार भेंट करने पर उसकी सास उसकी आधुनिक वेशभूषा और उच्छृखल व्यवहार को देखकर स्तब्ध रह गयी।

प्रश्न 3.
मीता के ससुराल वालों ने जात-पाँत के बजाय किन बातों को महत्त्व दिया था? (2017)
उत्तर:
मीता के ससुराल वालों ने जात-पाँत के बजाय उसके रूप-गुण, विद्या-बुद्धि एवं संभ्रांत परिवार को महत्त्व दिया था।

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प्रश्न 4.
“अपनी बिटिया को भूल कैसे गई थी मैं?” इस वाक्य में बिटिया शब्द किसके लिए कहा गया है?
उत्तर:
“अपनी बिटिया को भूल कैसे गई थी मैं?” यह वाक्य मीता की सास ने अपनी बहू के लिए प्रयोग किया था।

प्रश्न 5.
मीता के पति व देवर का नाम लिखिए। (2016)
उत्तर:
मीता के पति का नाम ध्रुव और देवर का नाम शिव है।

स्नेह बन्ध लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ध्रुव ने मीता के पिता को किस प्रकार आश्वस्त किया?
उत्तर:
ध्रुव ने मीता के पिता को यह कहकर आश्वस्त किया कि उसकी माँ बहुत ही सहनशील एवं स्नेहमयी हैं। वे मीता को अपने अनुसार ही बदल लेंगी।

प्रश्न 2.
शादियों में कुछ लोग किस उद्देश्य से जाते हैं? सबसे अधिक आलोचना किसे झेलनी पड़ती है?
उत्तर:
शादियों में कुछ लोग केवल टीका-टिप्पणी करने के उद्देश्य से ही आते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य किसी न किसी प्रकार की कमी निकालकर हँसने का होता है। सबसे अधिक आलोचना नवविवाहिता वधू को झेलनी पड़ती है।

प्रश्न 3.
मीता की सास को मीता की कौन-कौन सी बातें खटकती थीं?
उत्तर:
मीता की सास को मीता का प्रत्येक व्यक्ति से बेधड़क बात करना, बात करते समय संकोच न करना, छोटे-बड़े के मध्य दूरी न बनाये रखना बहुत अखरता था।

प्रश्न 4.
मीता के विदेश न जाने के पीछे क्या भावना थी? (2009, 14)
उत्तर:
मीता अनावश्यक खर्च न करके अपनी ससुराल में ही रहना चाहती थी। क्योंकि उसके पति का विदेश जाने का खर्च कम्पनी दे रही थी, मीता का नहीं। उसकी यह भावना घर के प्रति उत्तरदायित्व एवं मितव्ययिता का परिचायक थी।

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स्नेह बन्ध दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“हम लोग इतने दकियानूसी नहीं हैं कि एक आर्किटेक्ट लड़की में सोलहवीं सदी की बहू तलाशें।” कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
“हम लोग इतने दकियानूसी नहीं हैं” यह कथन ध्रुव के पिता का मीता के पिता के प्रति है। इस वाक्य द्वारा ध्रुव के पिता ने यह भावना व्यक्त की है कि वे इतने परम्परावादी नहीं हैं कि वे एक आर्किटेक्ट लड़की में सोलहवीं सदी की बहू तलाशें-ऐसा कहकर उन्होंने मीता के पिता को आश्वस्त किया।

इसका प्रमुख कारण था कि मीता के पिता को अपनी पुत्री की बहुत अधिक चिन्ता थी, क्योंकि उनकी पुत्री मातविहीन थी। अधिकतर उसकी शिक्षा हॉस्टल में रहकर सम्पन्न हुई थी। घर और परिवार के परिवेश से वंचित थी। वह घर और परिवार के रीति-रिवाज से अनभिज्ञ थी। इसी कारण मीता के पिता को ध्रुव के पिता ने अपने उचित व्यवहार एवं तर्कसंगत विचारों से पूर्ण आश्वस्त किया और यह भी दर्शा दिया कि वे रूढ़िवादी नहीं हैं।

प्रश्न 2.
‘स्नेहबंध’ कहानी के माध्यम से लेखिका क्या कहना चाहती हैं? (2008)
उत्तर:
‘स्नेहबंध’ कहानी के माध्यम के द्वारा लेखिका मालती जोशी यह कहना चाहती हैं कि प्रत्येक स्त्री के हृदय में ममत्व, स्नेह एवं वात्सल्य की अजस्र धारा प्रवाहित होती रहती है। स्त्री सास हो अथवा माँ, वह ममत्व की भावना संजोये रहती है। प्रस्तुत कहानी में मीता अपनी सास के प्रति अगाध प्रेम एवं श्रद्धा रखती है। लेकिन उसकी सास सदैव ही उससे रुष्ट रहती है। उसका प्रमुख कारण है मीता को व्यावहारिक ज्ञान न होगा।

ससुर, मीता की सास को बार-बार समझाते हैं कि बिना माँ की बच्ची है, उससे स्नेहपूर्ण व्यवहार करो। परन्तु वह हमेशा झुंझलाती रहती है। मीता के ससुर जब बीमार हो जाते हैं तब वह रात-दिन एक करके अपने ससुर की निष्कपट भाव से सेवा करती है। उसकी ससुर के प्रति निष्कपट एवं समर्पित सेवा भावना देखकर मीता की सास का हृदय परिवर्तित हो जाता है। उसके मन-मानस में मीता के प्रति प्रेम का सागर हिलोरें लेने लगता है।

‘स्नेहबंध’ कहानी के माध्यम से लेखिका ने यह व्यक्त करने का प्रयास किया है कि समय के अनुरूप मानव में परिवर्तन उपस्थित हो जाता है, चाहे वह कितना भी निष्ठुर क्यों न हो? वास्तव में ‘स्नेहबंध’ कहानी के द्वारा लेखिका ने सास-बहू के आदर्श प्रेम को दर्शाया है।

प्रश्न 3.
कहानी के आधार पर मीता की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2010)
उत्तर:
आधुनिक विचारधारा की मीता एक प्रतिष्ठित परिवार की लड़की है। उसे बनावटी बातें पसन्द न थीं। वह जब पहली बार ध्रुव के साथ अपनी ससुराल गयी तो ध्रुव ने उससे साड़ी पहनने को कहा, तब वह बोली, “मैं जैसी हूँ वैसी ही उन्हें देख लेने दो। बेकार नाटक करने से फायदा …….. खैर कपड़ों की छोड़ो।” पहली बार ससुराल जाती है तो वह वहाँ हँसी-मजाक करती है। उसके हृदय में किसी भी प्रकार का छल-कपट न था। वह विनम्रता की साक्षात् मूर्ति थी। साथ ही, रूप-गुण एवं बुद्धि से परिपूर्ण थी।

सौन्दर्य व गुणों से परिपूर्ण होने पर भी उसे तनिक भी घमण्ड न था। अपनी प्रत्येक बात को स्नेह से मनवाना चाहती थी। जब वह पहली बार मैक्सी पहनकर घर में खड़ी हुई तो उसकी ननद ने टोका और कहा-“मीता रानी ! आज ये कौन-सी पोशाक निकाल ली।” “घर की ड्रेस है दीदी।” यह उत्तर साधारण रूप से दे देती है। कहती है दीदी आप तो घर की हैं, अपनी हैं। इस प्रकार वह प्रत्येक प्रश्न का उत्तर सहजता से दे देती है। साथ ही साथ सास को समझाती है कि-

“पर माँ साड़ी पहनकर जरा-भी आरामदायक नहीं लगता। काम तो कर ही नहीं सकती मैं। बस गुड़िया की तरह बैठे रहना पड़ता है।” इस प्रकार साधारण रूप से अपनी सास को परेशानी बता देती है। सास भी उसकी बात को सहजता से स्वीकार कर लेती है।

बाल प्रवृत्ति-यद्यपि मीता का विवाह हो गया था परन्तु वह अपना बचपना नहीं छोड़ती है। उसे तनिक भी झिझक नहीं है। वह सुबह होते ससुर की कुर्सी के हत्थे पर बैठकर पूरा अखबार पढ़ती है।

“घर में रहती तब तक उनके आस-पास मँडराया करती, पापा का जाप किए जाती। इन्हें इसरार करके खाना खिलाती, दवाई समय पर न लेने के लिए डाँटती है।” लेकिन उसकी यह आदतें उसकी सास को पसन्द नहीं थीं। जब मीता के सास-ससुर की शादी की सालगिरह थी वह बातों में मगन थी। उसे कुछ क्षण के लिए याद न था-“मेरा चेहरा देखते ही वह गले में झूल गई-“पकड़ी गई न ! आप लोगों ने सोचा होगा, चुप्पी लगा जायेंगे तो सस्ते में छूटे जायेंगे।”

परिवार के प्रति उत्तरदायी – मीता को अपने परिवार की जिम्मेदारियों का पूर्ण अहसास था, क्योंकि जब मीता का पति जर्मनी जाने लगा तो सभी परिवार के सदस्यों ने कहा-यह भी ध्रुव के साथ चली जाय परन्तु मीता ने इस प्रस्ताव का विरोध इस प्रकार किया-
“वह बोली बेकार रुपये फेंकने से क्या फायदा पापाजी ! ध्रुव का खर्च तो कम्पनी देगी।” इस वाक्य के द्वारा यह प्रतीत होता है कि वह परिवार के प्रति उत्तरदायी है।

हँसमुख व्यवहार – मीता सदैव प्रसन्न रहती है तथा अपने व्यवहार द्वारा परिवार के सभी सदस्यों को प्रसन्न रखने का प्रयास करती है। इसी कारण वह सबसे हँसी-मजाक कर लेती है और स्नेहयुक्त व्यवहार करती है।

आदर्श वधू – मीता को जैसे ही पता चलता है कि उसके ससुर बीमार हैं वह तुरन्त उनकी सेवा तत्परता से करती है। रात-दिन एक कर डालती है। उसे हर समय एक ही दुःख सताता है कि उसके ससुराल वालों ने उसे उसके ससुर के बीमार होने की खबर क्यों नहीं दी? वह अपनी सास के पास चुपचाप लेट जाती है तभी उसकी सास ने पूछा “क्या हुआ बेटे?” मैंने प्यार से पूछा, वह एकदम पलटी। कुछ क्षण मुझे देखती रही फिर मेरी छाती में मुँह छुपाकर सुबकते हुए बोली, “पहले यह बताइए, आपने हमें खबर क्यों नहीं की? पापाजी इतने बीमार हो गये, किसी को मेरी याद भी न आई।”

उसके इस प्रकार की सेवा भावना से प्रतीत होता है कि वह एक आदर्श वधू है। वह अपने असीम स्नेह द्वारा सास का हृदय परिवर्तित कर देती है और सास भी उसको पुत्रीवत् स्नेह करने लगती है।

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प्रश्न 4.
उस प्रसंग का उल्लेख कीजिए जिसके कारण मीता की सास के व्यवहार में परिवर्तन आया?
उत्तर:
मीता आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी युवती है। वह जिस दिन से विवाह करके आयी थी वह हर समय प्रयास करती है कि वह अपनी सास की इच्छा के विरुद्ध न चले। वह हर सम्भव प्रयास करती है कि वह अपनी सास को प्रसन्न रखे परन्तु वह सदैव रुष्ट ही रहती हैं। यद्यपि मीता के ससुर ने भी अपने इन शब्दों द्वारा समझाया, “वह लड़की बेचारी माँ-माँ कहकर मरी जाती है और तुम?”

“बिना माँ की है तो क्या करूँ।” एकदम फट पड़ी। लेकिन कुछ समय के लिए मीता अपने पिता के घर चली जाती है। अचानक ही वह किसी काम से अपनी ससुराल पहुंची तब उसे पता चला कि उसके ससुर बीमार हैं।

मीता तुरन्त ही अपने बीमार ससुर के लिए प्राइवेट वार्ड में कमरा आरक्षित करवा कर उस कमरे की साफ-सफाई स्वयं करती है। जब उसकी सास कमरे में प्रवेश करती है तो कमरे की सुन्दर व्यवस्था को देखकर हैरान रह जाती है। इसके बाद मीता स्वयं स्टोव जलाकर सास के लिए चाय बना देती है और कहती है-
“माँ चाय पी लीजिये।” थोड़ी देर में वह मेरे सामने खड़ी थी। कमरे में आने के बाद से उसने पहली बार बात की थी और उसका स्वर अत्यन्त सपाट था।
“चाय यहाँ?”
तो कहाँ पियेंगी। क्या पापा को इस हालत में छोड़कर जायेंगी?

इसके पश्चात् रातभर जागकर वह कुर्सी पर बैठी रही। मीता की सेवा भावना को देखकर पहली बार सास ने कहा-
“मीता।” मैंने स्नेहयुक्त स्वर में आवाज दी, “भैया आराम कुर्सी में लेट जायेंगे। तू इधर पलंग पर आ जाना, दिन-भर खड़ी की खड़ी है।” इस प्रकार मीता के प्रति सास के हृदय में स्नेह उमड़ आया।

मीता चुपचाप सास के पास नहीं बच्ची की भाँति लेट जाती है। मीता के अबोध शिशु के समान व्यवहार को देख पहली बार मीता की सास को उस पर स्नेह उमड़ आया। क्योंकि दिनभर थकान के बाद वह एक निष्पाप अबोध निरीह शिशु लग रही थी। इस स्थिति को देखकर मीता की सास के मन में ममत्व की भावना जाग्रत हुई।

मीता की सास के शब्दों में ममता का एक ज्वार-सा उठा मन में। एकदम उसे अंक में भर लेने की इच्छा हुई। पर संकोच में मैं बस उसकी पीठ पर, बालों पर हाथ फेरती रही।

अचानक मेरी उँगलियाँ उसकी पलकों को छू गईं।
वे गीली थीं।
“क्या हुआ बेटे?” मैंने प्यार से पूछा।
वह कुछ नहीं बोली। बस, जैसे रुलाई रोकने के लिए होंठ सख्ती से भींच लिए। इसके बाद मीता ने सास की छाती में मुँह छिपाकर सुबकते हुए पूछा, “पहले यह बताइए आपने हमें खबर क्यों नहीं दी?” पापाजी इतने बीमार हो गये ………

इस वाक्य को सुनकर मीता की सास की अन्तरात्मा हिल उठी और उसे लगा कि वह व्यर्थ ही मीता के प्रति आक्रोश की भावना रखती है। जबकि वह उसको सच्चे हृदय से माँ मानती है।

इस घटना के पश्चात् ही मीता की सास ने स्वयं को-
“कटघरे में खड़ा करके मैं बार-बार पूछ रही थी-मुझे उसकी याद क्यों नहीं आई? अपनी बिटिया को कैसे भूल गई थी मैं?”
इस प्रकार मीता की सास के मन में मीता के प्रति पुत्रीवत स्नेह उमड़ आया और मन की शंका भी समाप्त हो गयी।

प्रश्न 5.
मीता के रोने का क्या कारण था?
उत्तर:
मीता के रोने का प्रमुख कारण था कि मीता अपनी ससुराल से अत्यधिक स्नेह करती थी। विशेषकर अपने ससुर से लेकिन जब मीता का पति ध्रुव विदेश चला गया तो वह अपने पिता के घर रहने चली गयी। इसी मध्य में उसके ससुर की तबियत अधिक खराब हो गयी।

इस बात का पता उसे मेहता जी से चलता है इसलिए वह दुःखी हो जाती है। क्योंकि जिस ससुर को व पिता के समान मानती थी तथा अपूर्व स्नेह रखती थी, उनकी अस्वस्थता के विषय में उसे कोई सूचना नहीं दी गयी थी।

मीता को अपने ससुर से अगाध स्नेह था। उसे यह बात कष्टप्रद प्रतीत हुई जिस पिता को वह अपार स्नेह करती है उन्हीं की अस्वस्थता को उसे न बताकर उसको पराया समझ लिया गया।

लेकिन मीता को पता चलते ही उसने ससुर की तन-मन-धन से सेवा की, परन्तु इस बात को भूलने में असमर्थ रही कि उसे ससुर की बीमारी को नहीं बताया गया। जब भी वह इस बात को सोचती तो उसे रोना आने लगता था।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित गद्यांश की सन्दर्भ व प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) ममता का एक ज्वर …………………… फेरती रही।
(2) कभी कभार …………. घुल रही है।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर मीता के व्यवहार से प्रभावित उसकी सास के मन की ममता की सहज अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या :
मीता के अत्यन्त सरल और संवेदनशील सेवाभावी व्यवहार से उद्विग्न हुई मीता की सास के मन में ममता का तीव्र झंझावात जाग उठा। पास लेटी मीता उसे अपनी पुत्री प्रतीत होने लगी। वह उसे अपनी गोद में भर लेना चाहती थी, किन्तु संकोचवश मात्र उसकी पीठ पर तथा बालों पर प्यार भरा हाथ फेरती रही।

(2) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘स्नेह बंध’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसकी लेखिका मालती जोशी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्ति में लेखिका ने मीता की उस समय की मनोदशा का सशक्त अकन किया है जब उसके पति जर्मनी चले गये थे। इससे मीता के ससुर एवं सास भी चिन्तित थे।

व्याख्या :
मीता यदा-कदा अपने मायके से ससुराल आ जाती थी। लेकिन वह पहले की भाँति उछल-कूद नहीं करती थी। हँसती-मुस्कराती तो अवश्य थी। परन्तु पहले जैसी हल-चल नहीं करती थी। उसके हास्य के पीछे पहले जैसे जीवंतता नहीं थी। हास्य के पीछे मन की व्यथा निहित थी। जब मीता पुनः अपने मायके प्रस्थान करती थी तब उसके ससुर सास कहते कि उस समय तो अपने पति ध्रुव के साथ विदेश गमन इसलिए नहीं किया कि व्यर्थ ही रुपये व्यय होंगे। लेकिन अब वह मन-ही-मन पश्चाताप कर रही है। उसके मन में प्रतिपल अपने पति की याद कौंधती रहती है। मीता यद्यपि व्यवहार कुशल एवं दूरदर्शी है, परन्तु नारी के हृदय में पति के प्रति स्नेह भावना रहती है, उसे किस प्रकार नकारा जा सकता है।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-विस्तार कीजिए
(1) माँ की जीवन भर की साधना है।
(2) सभी सौजन्य और विनम्रता की मूर्ति बने थे।
(3) मन पर काँटे से उग आते हैं।
उत्तर:
(1) उपर्युक्त कथन ध्रुव का है-जब मीता की सास नाश्ता बनाकर लाती है तब मीता ध्रुव की माँ से कहती है कि आप इतना भारी नाश्ता देती हैं तभी आपके दोनों सुपुत्र मोटूमल हो रहे हैं। इसी बात का खण्डन करते हुए ध्रुव कहता है कि तुम हमें नजर मत लगाओ, क्योंकि हम दोनों पुत्र ही अपनी माँ की जीवन भर की जमा पूँजी हैं।

हमारी माँ ने हमें पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करके पाला-पोसा है, अतः हमारे खाने-पीने पर टोक मत लगाओ। क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि खाते समय किसी को टोकना अशुभ माना जाता है। माँ के हाथ से दिया हुआ नाश्ता अमृत तुल्य हो जाता है। उसकी तुलना में संसार के समस्त स्वादिष्ट पदार्थ फीके हैं।

(2) प्रस्तुत वाक्य में मीता के विवाह का उल्लेख है क्योंकि अन्तर्जातीय विवाह को लेकर टीका-टिप्पणी करने के लिए बहुत से लोग लालायित थे, परन्तु मीता के परिवार की ओर से आवभगत में किसी भी प्रकार की कोई भी कमी नहीं थी। मीता के परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने-अपने उत्तरदायित्व का सजगता एवं विनम्रता से निर्वाह कर रहा था।

कहने का अभिप्राय है कि पापा के अलावा परिवार के अन्य सदस्य भी विनम्रता की साक्षातमूर्ति थे। कहीं भी किसी भी प्रकार का तनाव न था। इस प्रकार से उनकी विनम्रता के द्वारा कन्यापक्ष की शालीनता और विनम्रता प्रकट हो रही थी।

(3) प्रस्तुत कथन मीता की सास का है जब मीता की सास ने रात जनरल वार्ड में गुजारी थी। उस रात को याद करके उनका मन व्यथित हो जाता है। वह यह जानकर परेशान थी कि उसके पति बीमार हैं उनकी देख-रेख की व्यवस्था उचित प्रकार से नहीं हो पा रही थी। उसका कारण था कि अस्पताल में गन्दगी बहुत थी। ऐसे वातावरण में रहना असहनीय था।

मीता की सास को अस्पताल के अव्यवस्थित माहौल में रात भर बेचैनी रही। वह स्वयं को ही बीमार समझने लगी थी। अस्पताल के दूषित वातावरण एवं दुर्गन्ध को याद करके उनका मन-मानस व्यथित हो रहा था।

उस अस्पताल की दुर्गन्ध की याद करके आज भी मन विह्वल हो उठता है। एक तो पति की बीमारी दूसरे अव्यवस्थित माहौल मन में काँटे की भाँति चुभ रहे थे एवं मन को व्यथित कर रहे थे।

स्नेह बन्ध भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों में प्रयुक्त मुहावरे छाँटकर लिखिए.
(अ) पहली नजर में उसका हुलिया देखा और मन खट्टा हो गया था।
(आ) उस समय तो सचमुच मेरा खून जल जाता पर मैंने किसी को हवा नहीं लगने दी।
(इ) प्रेम करते समय इन लोगों की अक्ल क्या घास चरने चली जाती है।
(ई) हमें नजर मत लगाओ।
(उ) बहू को लेकर मन में कितनी कोमल कल्पनाएँ थीं सब राख हो गईं।
उत्तर:
(अ) मन खट्टा हो गया।
(आ) खून जल जाना, हवा न लगने देना।
(इ) अक्ल घास चरने जाना।
(ई) नजर लगाना।
(उ) राख हो जाना।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के सामने कुछ विकल्प दिये गये हैं, उनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

  1. स्ट्रेचर (हिन्दी, अंग्रेजी, देशज शब्द)
  2. नज़र (हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू शब्द)
  3. जीवन (तत्सम, तद्भव, देशज शब्द)
  4. माटी (तत्सम, विदेशी, देशज शब्द)।

उत्तर:

  1. स्ट्रेचर-अंग्रेजी शब्द
  2. नज़र-उर्दू शब्द
  3. जीवन-तत्सम शब्द
  4. माटी-देशज शब्द।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों में अशुद्ध वर्तनी वाले शब्दों को शुद्ध करके लिखिए
उत्तर:
(क) अशुद्ध-लेकिन बहू घर में आति न थी।
शुद्ध-लेकिन बहू घर में आती न थी।

(ख) अशुद्ध-उसे परदरशन करने की क्या जरूरत थी?
शुद्ध-उसे प्रदर्शन करने की क्या जरूरत थी?

(ग) अशुद्ध-राम को यह सब सेहज-स्वाभाविक लगता था।
शुद्ध-राम को यह सब सहज स्वाभाविक लगता था।

(घ) अशुद्ध-पापा का स्वास्थ्य इन दीनों ठीक न था।
शुद्ध-पापा का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक न था।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित अनुच्छेद में यथास्थान विराम चिह्नों का प्रयोग कीजिए-
कभी कभार वह भी घर पर आ जाती पर पहले का सा तूफान नहीं करती हँसती खिलखिलाती पर उसमें पहले की सी जीवंतता नहीं थी जब वह चली जाती तो यह कहते कहा था साथ चली जाओ तब नहीं मानी पैसे का मुँह देखती रही अब मन ही मन घुल रही है।
उत्तर:
कभी-कभार वह भी घर पर आ जाती है, पर पहले का-सा तूफान नहीं करती। हँसती-खिलखिलाती, पर उसमें पहले की-सी जीवंतता नहीं थी। जब वह चली जाती तो यह कहते, “कहा था, साथ चली जाओ। तब नहीं मानी, पैसे का मुँह देखती रही। अब मन-ही-मन घुल रही है।”

स्नेह बन्ध पाठ का सारांश

‘स्नेह बंध’ कहानी का सम्पूर्ण घटनाक्रम मीता एवं उसकी सास पर आधारित है। यदा-कदा किसी व्यक्ति विशेष के सम्बन्ध में जो धारणा बना लेते हैं उससे छुटकारा पाना दुष्कर है। मीता का आचरण मध्यमवर्गीय संस्कारों से मेल नहीं खाता। यही बात सास एवं बहू के मध्य एक दीवार खड़ी कर देती है। सास की हठधर्मिता सम्बन्धों को सहज रूप बनने में बाधक है। मीता के पति ध्रुव एवं देवर शिव को अपनी माँ का मीता के प्रति ऐसा व्यवहार खलता है।

संयोगवश मीता का पति विदेश गमन करता है। ससुर के आग्रह करने पर भी अपने पति के साथ विदेश इसलिए नहीं जाती है क्योंकि वहाँ अनावश्यक रूप से धन का व्यय होगा। पति की अनुपस्थिति में वह अपने घर के दायित्व के प्रति जागरूक है।

मायके में जब मीता को अपने ससुर की बीमारी का पता चलता है तो अस्पताल जाकर उनकी तत्परता से सेवा करती है। इससे प्रभावित होकर मीता की सास को वह बेटी के रूप में प्रिय प्रतीत होने लगती है।

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स्नेह बन्ध कठिन शब्दार्थ

प्रतिक्रिया = प्रतिकार, बदला। मुआयना = निरीक्षण। तल्ख = कटु, कड़वा, तीखा, तीखापन। कंठस्थ = मौखिक रूप से याद किया। कहकहा = हँसी-मजाक के स्वर, ठहाके। गुलजार = फूलों से भरे बाग की तरह, आनन्दित वातावरण, प्रसन्नता से भरा, हरा-भरा। अदब कायदा = विनीत या शिष्ट व्यवहार। किलककर = प्रसन्न होकर, हर्षित। कृत्रिम = बनावटी। कर्कश = तीखा स्वर। तन्द्रा = नींद। उत्सुक = इच्छुक। अव्यक्त= जिसे व्यक्त न किया जाय। अंधड़ = तूफान। आजिजी = अनमने, बिना मन के। हुलिया = रंग रूप। उसाँस = दीर्घ स्वाँस लेना। औपचारिक = व्यावहारिक। करबद्ध निवेदन = हाथ जोड़कर की गई प्रार्थना। आश्वस्त = भरोसा। सहनशील = विनम्र। स्नेहमयी = ममतामयी। दकियानूसी = रूढ़िवादी। आर्किटेक्ट = वास्तुकार। सौजन्यपूर्ण = सज्जनतापूर्ण। आचारसंहिता = नियमावली। मकसद = उद्देश्य। मीनमेख = नुक्स दोष निकालना। अव्यवस्था = व्यवस्था का अभाव। कोंचना = ताने मारना। उन्मुक्त = स्वतन्त्र। इसरार = अनुरोध। शिकन = सलवट, बल पड़ना। गद्गद् = प्रसन्न होना। आग्नेय दृष्टि = कड़ी नजर से देखना। खीझकर = झुंझलाकर। धींगामुश्ती = शरारत। प्रशिक्षण = ट्रेनिंग, अभ्यास। आक्रोश = क्रोध। स्नेहसिक्त = प्रेम में डूबा हुआ। मिमियाया = गिड़गिड़ाया। प्रतिवाद = विरोध करना। निस्पंद = शान्त, स्वर-मुक्त। निरीह = उदासीन, विरक्त। अंक = गोद। सरजाम = व्यवस्था।

स्नेह बन्ध संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. कभी-कभार वह भी घर पर आ जाती, पर पहले का-सा तूफान बरपा नहीं करती। हँसती-खिलखिलाती, पर उसमें पहले की-सी जीवंतता नहीं थी। जब वह चली जाती तो यह कहते “कहा था, साथ चली जाओ। तब नहीं मानी, पैसे का मुँह देखती रही। अब मन-ही-मन घुल रही है।”

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘स्नेह बंध’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसकी लेखिका मालती जोशी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्ति में लेखिका ने मीता की उस समय की मनोदशा का सशक्त अकन किया है जब उसके पति जर्मनी चले गये थे। इससे मीता के ससुर एवं सास भी चिन्तित थे।

व्याख्या :
मीता यदा-कदा अपने मायके से ससुराल आ जाती थी। लेकिन वह पहले की भाँति उछल-कूद नहीं करती थी। हँसती-मुस्कराती तो अवश्य थी। परन्तु पहले जैसी हल-चल नहीं करती थी। उसके हास्य के पीछे पहले जैसे जीवंतता नहीं थी। हास्य के पीछे मन की व्यथा निहित थी। जब मीता पुनः अपने मायके प्रस्थान करती थी तब उसके ससुर सास कहते कि उस समय तो अपने पति ध्रुव के साथ विदेश गमन इसलिए नहीं किया कि व्यर्थ ही रुपये व्यय होंगे। लेकिन अब वह मन-ही-मन पश्चाताप कर रही है। उसके मन में प्रतिपल अपने पति की याद कौंधती रहती है। मीता यद्यपि व्यवहार कुशल एवं दूरदर्शी है, परन्तु नारी के हृदय में पति के प्रति स्नेह भावना रहती है, उसे किस प्रकार नकारा जा सकता है।

विशेष :

  1. यहाँ पर लेखिका ने मीता के सास-ससुर की मनोदशा का वर्णन किया है।
  2. मुहावरों का प्रयोग है जैसे मन-ही-मन घुलना, तूफान नहीं बरपा, पैसे का मुँह देखना।
  3. शैली परिमार्जित है।

2. मेरे पास लेटी यह नन्हीं सी लड़की। इसका भी तो कभी-कभी मन होता होगा। तब किसके आँचल में मुँह छिपाती होगी। बड़ी बहन है, वह सात समुन्दर पार इतनी दूर है। भाभी तो खुद ही लड़की है अभी। (2008)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में लेखिका बहू की निरीहता और मासूमियत का वर्णन कर रही है जिसे कभी माँ की गोद नसीब नहीं हुई थी।

व्याख्या :
नन्हीं सी बालिका अपने मन की व्यथा, अपनी भावनाओं और अपनी इच्छाओं को किससे कहती होगी। लेखिका इस बात को सोचकर अत्यन्त द्रवित है कि यह बालिका जो मेरे पास लेटी है, कितनी एकाकी और असहाय है। इसकी माँ नहीं है। यह अपनी व्यथा किससे बाँटे। इसका मन होता होगा कि कोई माँ का आँचल होता जिसमें वह स्वयं को छिपाती और स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती। यद्यपि इसकी एक बड़ी बहन है किन्तु वह सुदूर विदेश में रहती है और भाभी जी हैं वह स्वयं ही बालिका हैं। उससे यह अपना सुख-दुःख किस प्रकार बाँट सकती है ? यह सोचकर वह द्रवित है कि सास को उसे अपनी बच्ची की भाँति मानते हुए स्नेह-दुलार देना चाहिए था।

विशेष :

  1. नारी मन का मनोवैज्ञानिक चित्रण है।
  2. पूर्वाग्रहों और परम्पराओं की बेड़ियों में जकड़ी सास अपनी बहू के निश्छल स्नेह और त्याग को नहीं पहचान पाती है। इसका यहाँ पर सूक्ष्म चित्रण किया गया है।

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3. ममता का एक ज्वर सा छा मन में। एकदम उसे अंक में भर लेने की इच्छा हुई। पर संकोच में मैं बस उसकी पीठ पर, बालों पर हाथ फेरती रही। (2015)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर मीता के व्यवहार से प्रभावित उसकी सास के मन की ममता की सहज अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या :
मीता के अत्यन्त सरल और संवेदनशील सेवाभावी व्यवहार से उद्विग्न हुई मीता की सास के मन में ममता का तीव्र झंझावात जाग उठा। पास लेटी मीता उसे अपनी पुत्री प्रतीत होने लगी। वह उसे अपनी गोद में भर लेना चाहती थी, किन्तु संकोचवश मात्र उसकी पीठ पर तथा बालों पर प्यार भरा हाथ फेरती रही।

विशेष :

  1. मीता की दायित्व भावना से प्रभावित उसकी सास की भाव विह्वल दशा को प्रस्तुत किया गया है।
  2. सरल, सपाट भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. भावात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन किया गया है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 8 कोणार्क

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 8 कोणार्क

कोणार्क अभ्यास

कोणार्क अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्मपद के प्रति विशु का अतिशय स्नेह का मुख्य कारण क्या था?
(क) धर्मपद का आशु शिल्पी होना।।
(ख) धर्मपद का निश्छल और व्यवहार कुशल होना।
(ग) धर्मपद की कला में अपनी झलक देखना।
(घ) धर्मपद का निडर एवं विद्रोही स्वभाव होना।
(ङ) घोर विपत्ति और असहायता की स्थिति में आशा की किरण बनकर धर्मपद का आना।
उत्तर:
(क) धर्मपद का आशु शिल्पी होना।

प्रश्न 2.
कोणार्क मन्दिर कहाँ स्थित है?
उत्तर:
कोणार्क मन्दिर उड़ीसा प्रान्त में पुरी के समीप समुद्र तट पर स्थित है।

प्रश्न 3.
कोणार्क मन्दिर किस देवता से सम्बन्धित है?
उत्तर:
कोणार्क मन्दिर सूर्य देवता से सम्बन्धित है।

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प्रश्न 4.
महामात्य ने कितने दिन में मन्दिर पूरा करने का आदेश दिया था?
उत्तर:
महामात्य ने मन्दिर को पूरा करने के लिए एक सप्ताह का आदेश दिया।

प्रश्न 5.
विशु ने मन्दिर के पूरा होने पर धर्मपद को क्या देने का वचन दिया?
उत्तर:
विशु ने मन्दिर के पूर्ण होने पर धर्मपद को महाशिल्पी का पद देने का वचन दिया।

कोणार्क लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
धर्मपद कौन था? वह विशु से क्यों मिलना चाहता था? (2009)
उत्तर:
धर्मपद 18 वर्ष का असाधारण वृत्ति वाला युवक था। उसका रंग साँवला, आँखें तेज से युक्त तथा बाल घुघराले थे। वह विशु से इसलिए मिलना चाहता था, क्योंकि उसने यह सुम रखा था कि कोणार्क मन्दिर में वर्षों से अनेक शिल्पी कार्य कर रहे थे। लेकिन उन शिल्पियों को तथा उनकी स्त्रियों को दासियों के समान कार्य करना पड़ता था। समस्त उत्कल में अकाल पड़ रहा था। शिल्पियों के निरन्तर कार्य करने के बाद भी उन्हें अमानवीय व्यवहार और अत्याचार को सहन करना पड़ता था। इस प्रकार धर्मपद शिल्पियों की परेशानियों को सबके सम्मुख रखना चाहता था।

प्रश्न 2.
मन्दिर पूरा न बनने की स्थिति में विशु ने क्या निर्णय लिया और क्यों? कारण सहित लिखिए।
उत्तर:
मन्दिर पूरा न बनने की स्थिति में विशु ने यह निर्णय लिया कि यदि कोणार्क का मन्दिर बनवाकर पूर्ण करने में धर्मपद की युक्ति सफल हो गयी तो विशु अपने स्थान पर धर्मपद को महाशिल्पी बना देगा। यह निर्णय विशु ने इसलिए लिया था क्योंकि महामन्त्री चालुक्य ने यह घोषणा कर दी थी, कि यदि सप्ताह भर के अन्दर कोणार्क की स्थापना नहीं हुई तो वे समस्त शिल्पियों के हाथ काटकर फेंक देंगे। इसका प्रमुख कारण था, कि चालुक्य ने सुन रखा था कि कोणार्क में राज्य कोष व्यर्थ ही नष्ट हो रहा है। शिल्पी अपना कार्य उचित प्रकार नहीं कर रहे हैं। वे अपना समय व्यर्थ की गप्पों में लगाते हैं। अत: दस दिन के बाद भी कलश स्थापना नहीं हो पायी। इस प्रकार धन व समय दोनों का दुरुपयोग हो रहा है। महामन्त्री के विरुद्ध जाने का साहस विशु को न था और वह कभी भी यह नहीं चाहता था कि शिल्पियों के हाथ काट डाले जायें।

प्रश्न 3.
विशु धर्मपद से क्यों प्रभावित हुए? सकारण लिखिए। (2008, 09)
उत्तर:
विशु धर्मपद से इसलिए प्रभावित हुए क्योंकि धर्मपद कला का पारखी था। कला को वह जीवन यापन का साधन ही नहीं अपितु जीवन की सबसे श्रेष्ठ पूँजी समझता था। जब धर्मपद को पता चलता है कि सात दिन के पश्चात उत्कल के समस्त शिल्पियों का रक्त बहेगा, विपत्ति में अन्य शिल्पियों का सहयोग करने के लिए आगे बढ़ता है और इस प्रकार कहता है-
“निर्दय अत्याचार की छाया में ही जो विकसते और मुरझाते हैं, उनको एकाध विपत की घड़ी के लिए तैयार होने की जरूरत नहीं आर्य।”

इस प्रकार की भावना धर्मपद के मन में इसलिए जागृत हुई क्योंकि उसे यह बात ज्ञात थी कि शिल्पियों के साथ अमानवीय व्यवहार होता था। धर्मपद कभी भी यह नहीं चाहता था कि शिल्पियों को परिश्रम करने के उपरान्त कार्य पूरा न होने पर सजा भुगतनी पड़े। इसके पश्चात् वह सरलता से अपनी युक्ति सफल हो जाने पर एक दिन के लिए महाशिल्पी के समस्त अधिकार माँग लेता है।

लेकिन धर्मपद का उद्देश्य प्रधान शिल्पी बनने का नहीं था। उसका उद्देश्य तो केवल इतना था कि कोणार्क का मन्दिर पूर्ण हो जाये। विशु धर्मपद की कर्त्तव्य भावना, सरलता एवं सहनशीलता से प्रभावित था। प्रताड़ित होने पर भी धर्मपद कर्त्तव्य से विमुख नहीं हुआ। अपने शिल्पी साथियों की तत्परता से सहायता करने में जुट गया। शिल्पकार ही शिल्पकार की वेदना को आँकने में सक्षम होता है।

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प्रश्न 4.
महामात्य के चरित्र की तीन विशेषताएँ बताइए। (2017)
उत्तर:
महामात्य के चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) अभिमानी एवं हृदयहीन – महामात्य चालुक्य अभिमानी एवं हृदयहीन था। उसको किसी के भी सम्मान की परवाह नहीं थी। वह अपनी आज्ञा को सर्वोपरि मानकर प्रजा से उसका पालन करवाना चाहता था। उसके हृदय में शिल्पियों के प्रति न तो दया भावना थी, न ही सम्मान की भावना। चालुक्य के इस कथन को देखें धर्मपद को खड़ा देखकर कहता है-
“प्रतिहारी, इसे धक्का देकर निकालो। मुफ्तखोर कहीं का।
वह शिल्पियों को उपेक्षा की दृष्टि से देखता था।

(2) कार्यकुशल – महामात्य चालुक्य एक चतुर महामात्य था। वह प्रजा की प्रत्येक गतिविधि पर निगाह रखता था। उसका मुख्य उद्देश्य रहता था कि कोई भी व्यक्ति किसी प्रकार की चालाकी न करे। इसी कारण वह बिना किसी सूचना के अचानक ही पहुँचकर शिल्पियों की गतिविधियों का निरीक्षण करता था। वह इस बात को भी स्वीकार करता था कि यदि मैं ऐसा न करूँ तो तुम लोगों का भेद कैसे खुलेगा? चालुक्य की कार्यकुशलता का उदाहरण उसके इस कथन से स्पष्ट होता है-
“सूचना देता तो तुम लोगों को भंडाफोड़ कैसे होता? राजनगरी में मैंने ठीक सुना था कोणार्क में राज्य कोष नष्ट हो रहा है। न शिल्पी लोग ठीक काम रहे हैं न मजदूर। दस दिन हो गए कलश तक न स्थापित हो सका।”

(3) कटुभाषी – महामात्य कार्यकुशल ही नहीं अपितु वह कटुभाषी भी था। यह बात उसके व्यवहार से पूर्णतः उजागर हो जाती है- “कटु शब्द (पैशाचिक हास्य) अब कटु शब्दों से काम नहीं चलेगा विशु। मैंने सुना है कि शिल्पी लोग राज्य के विरुद्ध सिर उठा रहे हैं, सुवर्ण मुद्राओं में वेतन माँगते हैं, और-”

इस प्रकार महामात्य के कटु व्यवहार का पता चलता है। उत्कल नरेश कुछ कहे अथवा न कहे वह अपनी आज्ञा को नरेश की आज्ञा घोषित कर मनमानी करना चाहता है। क्योंकि जब उत्कल नरेश बंग विजय करने गये थे तभी महामात्य यह घोषणा कर देता है और कहता है-

“सुन लो और कान खोलकर सुन लो। आज से एक सप्ताह के अन्दर यदि कोणार्क देवालय पूरा न हुआ तो (कुछ रुककर शब्दों पर जोर देते हुए) तुम लोगों के हाथ काट दिये जायेंगे।” महामात्य अपनी बात को महत्त्व देते हुए पुन: कहता है (रुकता हुआ) हाँ, हाँ। महाराज नरसिंह देव की आज्ञा है। ……और मेरी, महादण्डपाशिक की आज्ञा है (चलते समय सब लोगों पर क्रूर दृष्टि डालते हुए) उत्कल नरेश। हूँ।

प्रश्न 5.
सौम्य कौन थे तथा विशु को जीवन की किस घटना का पश्चाताप करने के लिए कहते हैं?
उत्तर:
तातश्री सौम्य नाट्याचार्य की वेशभूषा में हैं। नाट्याचार्य सौम्यश्री का विचार है कि जब नट मन्दिर में देव दासियाँ नृत्य करेंगी, तो ताल देने के लिए कोणार्क देवालय स्वयं ही थिरक उठेगा। इसके पश्चात् सौम्य अपनी मूर्ति बनाने के लिए विशु से कहता है। विशु तत्परता से छैनी, हथौड़ी लेकर मूर्ति बनाने में लग जाता है। उसी समय विशु और सौम्य परस्पर वार्तालाप करते हैं। विशु सौम्य से इस प्रकार कहता है-
“सौमू अगर कोणार्क पूरा नहीं हुआ तो उसे नष्ट करना होगा और मुझे पातकी का प्रायश्चित।”

इस बात का उत्तर देते हुए सौम्य कहता है-
“शिल्पी तुम विष्णु हो शंकर नहीं, निर्माता हो संहारक नहीं, और फिर ये स्तम्भ और ये पाषाण ! इन्हें तो भूकम्प ही गिरा सकते हैं, अथवा काल की गति।”

इस पर तात श्री सौम्य के समक्ष जब विशु अपने विचार पुनः व्यक्त करता है और सूर्य भगवान् की मूर्ति को निराधार बताता है।

तब तात सौम्य विशु को ईश्वर की शक्ति से परिचित कराते हैं। वे कहते हैं कि तुम जिस ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते वही ईश्वर इस संसार का निर्माता है। वही इस संसार की गति है। अतः तुम्हें ईश्वर के प्रति इस प्रकार के विचार रखने के लिए पश्चाताप करना होगा। सर्वव्यापक भगवान् की सत्ता के प्रति विश्व नतमस्तक है। इसी घटना का पश्चाताप करने को कहा।

प्रश्न 6.
विशु के चरित्र पर प्रकाश डालिए। (2011)
उत्तर:
(1) आदर्श शिल्पी – कोणार्क एकांकी में विशु प्रमुख पात्र है। सम्पूर्ण एकांकी में एकमात्र आचार्य विशु ही इस प्रकार के आदर्श पात्र हैं जो समाज के प्रति एवं शिल्पियों के प्रति उदारता की भावना रखते हैं। वे एक ऐसे आदर्श व्यक्तित्व के पुरुष है जो कि प्रत्येक व्यक्ति को महत्व प्रदान करते हैं। आचार्य विशु के इस कथन द्वारा यह बात ज्ञात होती है, जब राजीव कहता है कि एक नवयुवक आपसे मिलना चाहता है परन्तु उसकी वाणी ओजपूर्ण है। तब उसकी बात को आचार्य विशु सहजता से लेकर कहते हैं। मैं उसे अवश्य मिलूँगा। क्योंकि वे ऐसे के प्रति इस प्रकार का भाव रखते हैं-
“मेरी दृष्टि के स्पर्श से उसकी प्रतिभा की गंध जागृत होकर उसकी वाणी को मौन कर देगी। मुझे उसकी कला चाहिए।”

(2) उदार एवं सहृदय – आचार्य विशु उदार एवं सहृदय प्रकृति के व्यक्ति हैं। उन्हें तनिक भी घमण्ड नहीं है। वे जीवन के प्रति भी इसी प्रकार कर दृष्टिकोण रखते हैं। देखिए-
“यह मन्दिर नहीं सारे जीवन की गति का रूपक है। हमने जो मूर्तियाँ इसके स्तम्भों, इसकी उपपीठ और अधिस्थान में अंकित की हैं उन्हें ध्यान से देखो। देखते ही उनमें मनुष्य के सारे कर्म, उसकी सारी वासनाएँ एवं मनोरंजन और मुद्राएँ चित्रित हैं। यही तो जीवन है।”

इस प्रकार आचार्य विशु जीवन के प्रत्येक पहलू को अपने ध्यान में रखते थे। उनके मन में शिल्पियों के प्रति उदारता की भावना थी। जब महामन्त्री चालुक्य यह आदेश देते हैं कि यदि कलश स्थापना एक सप्ताह के अन्दर नहीं हुई तो वे समस्त शिल्पियों के हाथ कटवा देंगे। तब आचार्य विशु को आश्चर्य होता है, वे निम्न प्रकार कहते हैं-

“(अविश्वासपूर्ण स्वर में) शिल्पियों के हाथ काट लिए जायेंगे। इसके पश्चात् आचार्य विशु अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं और अपने सहयोगी शिल्पियों को दण्ड के विषय में बताने का साहस नहीं कर पाते हैं। इसके लिए वे एक युवक से कहते हैं “विनाश का वह संदेश अपने साथियों को भी सुना दो साहस नहीं कि उस विकराल घड़ी के लिए उन्हें तैयार कर सकूँ।”

(3) पद लालसा से मुक्त-आचार्य विशु.को केवल कर्म की चिन्ता है। उन्हें न तो अपने पद का घमण्ड है न ही किसी प्रकार का लालच । जब आचार्य विशु से धर्मपद एक दिन के उनके सभी अधिकार माँगता है। तब आचार्य विश सहजता से इस प्रकार कहते हैं-

“अगर कोणार्क पूरा हो जाता है तो एक दिन क्या सभी दिन के लिए वे अधिकार तुम्हारे हो जायेंगे। मैं तुम्हें अपने स्थान पर शिल्पी बना दूंगा।” इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य विशु को पद की कोई लालसा न थी।

(4) पारखी व्यक्ति-युवक धर्मपद यद्यपि आयु में आचार्य विशु से छोटा था। परन्तु आचार्य विशु ने उसे पूर्ण सम्मान दिया एवं उसकी प्रतिभा को सराहा। उस युवक ने आचार्य विशु के विनाश होने पर उन्हें कार्य करने की प्रेरणा दी। युवक की भावनाओं ने उन्हें कोणार्क मन्दिर की कलश स्थापना के लिए प्रेरित किया।

अन्त में कह सकते हैं आचार्य विशु एक आदर्श शिल्पी एवं उत्तम पात्र है। उनके मन मानस में मानवता एवं करुणा की लहरें तरंगित हो रही हैं। उनका जीवन एक वीतरागी संन्यासी की भाँति है, जो सर्वस्व अर्पण करके कलाकारों एवं जन-सामान्य को आनन्द की अनुभूति कराना चाहते हैं।

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कोणार्क दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नाटक के तत्त्वों के आधार पर कोणार्क के बारे में लिखिए।
उत्तर:
नाटक के तत्वों के आधार पर कोणार्क का वर्णन इस प्रकार है-
(1) कथावस्तु – कोणार्क की कथावस्तु मुख्य रूप से कोणार्क मन्दिर की स्थापना को लेकर है। प्रारम्भ में कोणार्क मन्दिर के विषय में बताया है कि वह एक भौतिक स्मारक नहीं अपितु भारत के सांस्कृतिक वैभव की भी धरोहर है। कोणार्क का सूर्य मन्दिर उड़ीसा प्रान्त में समुद्र तट पर स्थित है। कथावस्तु में लेखक ने कोणार्क मन्दिर के भव्य सौन्दर्य एवं शिल्पियों की कलाकृति को विशेष महत्त्व दिया है। इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने उस समय की तत्कालीन सामाजिक एवं राजव्यवस्था का भी वर्णन किया है। कथावस्तु में यथास्थान आरोह-अवरोह है। शिल्पकारों के दण्डाधिकारी द्वारा हाथ कटवाने का आदेश कथा का चरमोत्कर्ष है। कथानक धारा प्रवाह एवं रोचक है।

(2) पात्र चरित्र-चित्रण – प्रस्तुत एकांकी में कई पात्र हैं सबका अपना-अपना स्थान एवं महत्त्व है। एकांकी में सभी पुरुष पात्र हैं। मुख्य रूप से विशु, धर्मपद, सौम्य, चालुक्य (महादण्डाधिकारी), राजीव एवं उत्कल नरेश गौण पात्र हैं।

(i) विशु-प्रस्तुत एकांकी का प्रमुख पात्र महाशिल्पी था। वह सरल, सहृदय एवं उत्तम विचारों वाला था। कोणार्क मन्दिर की स्थापना के लिए अथक प्रयास करता है। धर्मपद को अपना पद देने के लिए भी सहर्ष तैयार हो जाता है, क्योंकि वह महा चालुक्य के दण्ड से भयभीत था। वह यह कदापि नहीं चाहता था कि कोणार्क मन्दिर की स्थापना अपूर्ण रहे। शिल्पियों को अकारण ही अपने हाथ गँवाने पड़े। इस समस्या का समाधान विशु धर्मपद की सहायता से करता है। इस प्रकार विशु एक सहृदय एवं उदार विचारों वाला कलाकार है व कला के प्रति समर्पित है।

(ii) धर्मपद-एक साधारण साँवले रंग का 18 वर्ष का नवयुवक है। वह महत्त्वाकांक्षी, निश्छल एवं व्यवहार कुशल है। धर्मपद निडर एवं विद्रोही स्वभाव का है। विपत्ति में वह अपने अपमान की चिन्ता न करते हुए कोणार्क मन्दिर में कलश स्थापना का प्रयास करना चाहता है। वह एक कर्त्तव्यपरायण और आत्मविश्वासी युवक है। उसे ज्ञात था कि कलश स्थापना करना सरल नहीं है परन्तु वह एक बार प्रयत्न करके सभी शिल्पियों को दण्ड से बचाना चाहता है। इस प्रकार चारित्रिक विश्लेषण में इस एकांकी का श्रेष्ठ पात्र धर्मपद है। पराए दुःख में सहभागी बनना उसके जीवन का मुख्य लक्ष्य है।

(iii) सौम्य-नाट्याचार्य है इस कारण वह कलाकार एवं शिल्पियों को सम्मान देता है। उसके शिल्पियों के प्रति इस प्रकार के विचार हैं-
“शिल्पी तुम विष्णु हो, शंकर नहीं। निर्माता हो संहारक नहीं। और फिर ये स्तम्भ और ये पाषाण। इन्हें तो भूकम्प ही गिरा सकते हैं अथवा काल की गति।”

वह उत्कल नरेश को एक श्रेष्ठ व्यक्ति मानता है। चालुक्य के प्रति उसके विचार निम्नवत् हैं-
“चालुक्य महामात्य का इस तरह सहसा आना मुझे अच्छा नहीं लगता, विशु।”
“उत्कल नरेश का क्रोध चाहे क्षणिक भले ही हो लेकिन महामात्य राजराज चालुक्य उसे प्रज्ज्वलित रखते हैं और उन्होंने दया से पसीजना नहीं सीखा है।”

इस प्रकार सौम्य के हृदय में उत्कल नरेश के प्रति सम्मान की भावना है। महाराज चालुक्य को वे हृदयहीन व्यक्ति घोषित करते हैं। क्योंकि उन्होंने स्वयं महादण्डपाशिक की क्रूरता को देखा है। वे इस प्रकार कहते हैं-
“राजनगरी में अपराधियों के हाथ कटते मैंने देखे हैं। बड़ी पीड़ा होती है।” इस प्रकार सौम्य एक आदर्श एवं उत्तम विचारों वाला नाट्याचार्य है।

(iv) महामंत्री चालुक्य-महामंत्री चालुक्य अत्यन्त क्रूर एवं दुष्ट प्रवृत्ति का शंकालु व्यक्ति है। उसको किसी भी व्यक्ति के प्रति विश्वास न था। प्रत्येक राज्य कर्मचारी को शंका की दृष्टि से देखता था। उसके हृदय में राजकर्मचारियों के प्रति इस प्रकार के विचार थे-

“राजनगरी में मैंने ठीक सुना था कि कोणार्क में राज्य कोष नष्ट हो रहा है। न शिल्पी लोग ठीक काम कर रहे हैं न मजदूर। दस दिन हो गये कलश स्थापित न हो सका।”

इसके पश्चात विशु को आदेश देता है यदि एक सप्ताह के अन्दर कलश स्थापना न हुई तो शिल्पियों के हाथ काट डाले जायेंगे। चालुक्य की उक्त भावना उसके हृदय हीनता और क्रूरता का प्रतीक है।

(v) उत्कल नरेश-एक कुशल शासक एवं आदर्श विचारों के हैं। उनके हृदय में दया सद्भावना है। वे महामात्य पर सम्पूर्ण राज्य का उत्तरदायित्व सौंप कर बंग विजय के लिए प्रस्थान करते हैं। वे सरल व सहृदय व्यक्ति हैं। उनके विषय में शिल्पी विशु के विचार इस प्रकार हैं। “महाराज श्री नरसिंह देव की क्रोधाग्नि? उसे तो करुणा की फुहारें क्षण भर में शान्त कर देती हैं।” वह इस एकांकी के गौण पात्र हैं।

(vi) राजीव-राजीव प्रधान मूर्तिकार है। सरल व सहृदय विचारों वाला व्यक्ति है। शिल्पियों के प्रति उसके हृदय में सम्मान एवं दया की भावना है। उसकी दृष्टि में चालुक्य महामंत्री अत्यन्त दुष्ट है, उसको वह देखना भी पसन्द नहीं करता था। उत्कल नरेश व अन्य शिल्पियों के प्रति उदारता का भाव रखता है। कला का पारखी एवं सम्मान करने वाला आदर्श पुरुष है।

इस प्रकार निष्कर्ष में कह सकते हैं कि नाटकीय तत्त्वों के आधार पर प्रस्तुत नाटक सफल एवं प्रशंसनीय है। नाटक के पात्र जीवन्त एवं विषयानुरूप हैं।

(3) भाषा-शैली – प्रस्तुत एकांकी की भाषा सरल, तत्सम प्रधान संस्कृतनिष्ठ है। वाक्य सुगठित हैं तथा वाक्य विन्यास दीर्घ है। लेकिन उनमें सरलता भावगम्य की सहजता है।

भाषा का उदाहरण देखिए-मुझे न मालूम था कि सूर्यदेव के जिस विशाल वाहन का स्वप्न मैं देखा करता था, वह सच्चा होते-होते इस पार्थिव धरातल से उठकर भगवान भास्कर के चरण छूने के लिए उतावला हो उठेगा। भाषा काव्य गुणों से युक्त है। शैली परिमार्जित तथा प्रवाहपूर्ण तथा विषय को स्पष्ट करने में पूर्णरूपेण सक्षम है।

(4) देशकाल वातावरण – प्रस्तुत एकांकी में मन्दिर कलश की स्थापना के समय उपस्थित व्यवधान का अंकन है। मन्दिर के निर्माण में शिल्पियों ने अथक परिश्रम करके जो योगदान दिया है वह प्रशंसनीय है। एकांकीकार ने तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था का उल्लेख किया है।

राजनैतिक दशा का उदाहरण देखिए – राज्य सेना तो बंग प्रदेश में यवनों से लड़ रही है और इधर दण्डपाशिक सैनिकों के बल पर महामात्य की शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

सामाजिक दशा का उदाहरण – “पसीने में नहाते हुए किसान की, कोसों तक धारा के विरुद्ध नौका को खेने वाले मल्लाह की, दिन-दिन भर कुल्हाड़ी लेकर खटने वाले लकड़हारे की।” इस प्रकार एकांकी का देशकाल एवं वातावरण तात्कालिक व्यवस्था के अनुरूप है।

(5) शीर्षक – सम्पूर्ण कथावस्तु कोणार्क के मन्दिर निर्माण पर आधारित है। आदि से लेकर अन्त तक सबका केन्द्र बिन्दु यह मन्दिर ही है। अतः शीर्षक उपर्युक्त सार्थक तथा औचित्यपूर्ण है।

(6) उद्देश्य – एकांकीकार का एकांकी सृजन में कोई न कोई उद्देश्य रहता है। उद्देश्य के अभाव में नाटक का कोई मूल्य नहीं रहता है।

कुशल एकांकीकार जगदीशचन्द्र माथुर ने प्राचीन, कला एवं संस्कृति का जीवन्त रूप प्रस्तुत किया है। तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक दशा का सफल चित्रण किया है। शिल्पकारों की दयनीय स्थिति का विशेष अंकन है। लेखक का मुख्य उद्देश्य शिल्पियों के मनोभावों को चित्रित करना है। एकांकी का अन्त सुखद है। इस प्रकार एकांकी नाट्य कला की दृष्टि से पूर्णरूपेण सफल है।

प्रश्न 2.
कला के सम्बन्ध में आचार्य विशु और धर्मपद के दृष्टिकोणों के अन्तर को स्पष्ट कीजिए। (2008)
उत्तर:
कला के सम्बन्ध में आचार्य विशु और धर्मपद के दृष्टिकोण पृथक्-पृथक् हैं।

विशु कला को जीवन का प्रतिबिम्ब मानता है जबकि धर्मपद कला को जीवन मानता है और जीवन-यापन का साधन भी। धर्मपद का मानना है कि कला जीवन के आदि और उत्कर्ष के मध्य की सीढ़ी है। धर्मपद पुरुषार्थ में विश्वास रखता है जबकि विशु कला को चयन करने के पक्ष में है। विश के कला के विषय में इस प्रकार के विचार हैं देखें-“उपवन में माली छाँट-छाँटकर सुन्दर और मनमोहक पौधों और वृक्षों को ही रखता है।”

लेकिन धर्मपद के विचार विशु के विचारों से अलग हैं देखें-
“छाँटने वाली आँखों का खेल है, आचार्य। आज के शिल्पी की आँखें वहाँ नहीं पड़ती, जहाँ धूल में हीरे छिपे पड़े हैं।”

धर्मपद कलाकारों एवं शिल्पकारों के प्रति उदार विचार रखते हैं। धर्मपद का कहना है कि शिल्पकारों को दास-दासियों के समान कार्य करना पड़ता है। उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। अतः शिल्पियों को धर्मपद सम्मान व स्वाभिमान की श्रेणी में रखना चाहता है।

जबकि विशु का विचार है कि हमें राज्य की अनुचित बातों में कभी नहीं पड़ना चाहिए। इस प्रकार हम देखते हैं कि कला के विषय में विशु एवं धर्मपद की भावना पृथक्-पृथक् है। धर्मपद कर्मनिष्ठ है। वह जलती हुई राख में प्राण फूंक देना चाहता है। इस प्रकार धर्मपद कला का सच्चा पारखी है।
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प्रश्न 3.
शिल्पियों की कौन-कौन सी समस्याएँ इस नाटक में बताई गई हैं? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत नाटक में शिल्पियों की विभिन्न प्रकार की समस्याओं को जगदीशचन्द्र माथुर ने उजागर किया है निम्नवत् अवलोकनीय हैं-
(1) श्रम को महत्त्व न देना – शिल्पियों को श्रम करने के उपरान्त उसका पूरा लाभ नहीं मिलता था। शिल्पकार का पूरा परिवार मूर्ति बनाने में लगा रहता था। यहाँ तक कि शिल्पियों की स्त्रियों को भी दासियों की भाँति कार्य करना पड़ता था। उनके श्रम को महत्त्व नहीं दिया जाता था। उनको किसी भी प्रकार की स्वतन्त्रता नहीं थी। कार्य करते रहने के उपरान्त भी उनको क्षण भर बात करते देखकर भी प्रताड़ित किया जाता है। उदाहरण के लिए देखिए-
“यहाँ तो मैं देखता हूँ गप्पें हो रही हैं। (सहसा धर्मपद पर दृष्टि पड़ जाती है, बातें करते हुए और यह युवक यहाँ क्यों खड़ा है।)

(2) आर्थिक दृष्टि – शिल्पियों की आर्थिक दशा अच्छी न थी। श्रम करने के उपरान्त भी उन्हें जीवन निर्वाह के लिए धन नहीं प्राप्त होता था। कटु वचन भी सुनने पड़ते थे। उदाहरण देखें-
“मैंने सुना है कि शिल्पी लोग राज्य के विरुद्ध सिर उठा रहे हैं, सुवर्ण मुद्राओं में वेतन माँगते है।

आर्थिक परेशानी को जब शिल्पी किसी से कहते हैं तो उस बात को महत्त्व न देकर उन्हें अव्यवहार का सामना करना पड़ता है। अकाल के समय शिल्पियों पर आर्थिक कठिनाइयों का पहाड़ टूट पड़ता है। भूखे रहने पर भी वे किसी से कुछ नहीं कह सकते। शिल्पियों की भावनाओं की कद्र नहीं की जाती थी।

(3) दण्ड विधान – शिल्पियों को राजकर्मचारियों के कटु वचन और अमानवीय व्यवहार तो सहन करना ही पड़ता है। कार्य पूर्ण न होने पर कठोर दण्ड भी भुगतना पड़ता था। महामात्य चालुक्य के व्यवहार से इस तथ्य का पता चलता है। देखें-
“विशु, वर्षों से बिन माँगी प्रशंसा सुनते-सुनते तुम अपने को दण्डविधान से परे समझने लगे हो। आज में तुम्हारे इस घमण्ड को चूर करने ही आया हूँ ……….

पुनः महामात्य चालुक्य आदेश देता है-
“आज से एक सप्ताह के अन्दर यदि कोणार्क देवालय पूरा न हुआ तो (कुछ रुककर शब्दों पर जोर देते हुए) तुम लोगों के हाथ काट दिये जायेंगे।” इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने शिल्पियों की अनेक समस्याओं पर प्रकाश डाला है तथा समाज में शिल्पियों की समस्याओं का निदान करने का प्रयास भी किया है।

क्योंकि इस एकांकी में इस तथ्य को स्पष्ट उजागर किया है कि शिल्पियों के साथ कैसा व्यवहार होता है। देखिए-
“दूर-दूर से आने वाले शिल्पी महामात्य द्वारा किए गए अत्याचारों के समाचार लाते हैं। उनमें से कितनों ही के कुटुम्बों पर महामात्य के अन्याय का हथौड़ा पड़ चुका है।”

प्रश्न 4.
धर्मपद के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) आदर्श नवयुवक – धर्मपद एक आदर्श नवयुवक था। उसकी आयु लगभग 18 वर्ष थी, रंग साँवला था। असाधारण वृत्ति का व्यक्ति है। वह तंग अंगरखा और ऊँची धोती पहनता है। बहुत छोटी आयु में ही बिना किसी आचार्य की सहायता के एक आशु शिल्पी बन गया था। वह एक आदर्श विचारधारा का नवयुवक था। उसे जैसे ही पता चलता है कोणार्क मन्दिर का कार्य अपूर्ण है, तब वह आचार्य विशु के समक्ष एक प्रस्ताव रखता है कि कलश स्थापना के लिए उसे एक अवसर प्रदान किया जाये। उसका कहना था कि-
“मेरे मन में जो चित्र है उसे यों पूरी तरह तो नहीं समझा सकता किन्तु, देखिए अम्ल का आकार यदि कुछ इस तरह का हो तो ……….

इसे पश्चात् वह एक अन्य बात कहता है-
“ठहरिये ! यदि मेरी युक्ति सफल हो जाए और कोणार्क शिखर को हम स्थापित कर सके तो मुझे क्या मिलेगा?”

(2) धर्मपद का निडर एवं विद्रोही स्वभाव होना – धर्मपद एक निर्भीक एवं विद्रोही स्वभाव का व्यक्ति है। वह किसी से कुछ भी कहने में संकोच अथवा भय का अनुभव नहीं करता। जब महामन्त्री चालुक्य उसे बात करते हुए देखते हैं और पूछते हैं कि यह युवक यहाँ क्यों खड़ा है, वह निडरता से उत्तर देता है-

“मैं आचार्य के सामने शिल्पियों की दुःख गाथा कह रहा था। उसे यह भय कदापि न था कि महामंत्री उसे दण्डित भी कर सकते हैं। जब राजीव पहली बार धर्मपद से मिलते हैं तो वह उस नवयुवक में विद्रोह का ताप अनुभव करते हैं।”

(3) धर्मपद की व्यवहार कुशलता – इस बात का प्रमाण है कि वह निर्भीक होते हुए भी व्यवहार कुशल है। उसका घोर विपत्ति के समय शिल्पियों की सहायता करने के लिए आगे बढ़ना उसके निश्छल स्वभाव का प्रमाण है। यद्यपि वह इस बात से भली-भाँति परिचित था कि कोणार्क मन्दिर में यदि कलश स्थापना समय से न हुई तो समस्त शिल्पियों के हाथ काट डाले जायेंगे। लेकिन वह उन शिल्पियों की निश्छल भाव से सहायता करने को आगे बढ़ता है और उसे इस कार्य में सफलता भी मिलती है।

(4) धर्मपद कला में जीवन झाँकी – धर्मपद कला में अपनी झलक देखना पसन्द करता है। क्योंकि उसका दृष्टिकोण अन्य शिल्पियों से पृथक् था। उसकी भावना इस कथन द्वारा स्पष्ट होती है-

“अंगार मूर्तियों को देखते-देखते में अघा गया हूँ। जब चारों ओर अत्याचार और अकाल की लपटें बढ़ रही हों, शिल्पी एक शीतल और सुरक्षित कोने में यौवन और विलास की मूर्तियाँ ही बनाता रहे।”

धर्मपद अपनी इच्छा प्रकट करता है कि यदि मैं कोणार्क शिखर को स्थापित कर सका तो क्या मुझे एक दिन के लिए सिर्फ एक दिन के लिए मन्दिर प्रतिष्ठापन के दिन आप अपने सब अधिकार मुझे दे दें। विशु के हृदय में धर्मपद के क्या विचार हैं, देखिए-
“इस युवक ने ठण्डी होती हुई राख को फूंक मार कर प्रज्ज्वलित कर दिया।”

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि धर्मपद जैसे साहसी शिल्पकार समाज को नई दिशा देने में समर्थ हो सकते हैं। निम्न विचार देखिए-
“अभी-अभी होगा परिवर्तन याद रहे यह बात हमारी।
हे समाज के ठेकेदारों अब न चलेगी घात तुम्हारी।।”

प्रश्न 5.
कोणार्क के किस पात्र ने आपको अत्यधिक प्रभावित किया है। कारण सहित लिखिए।
उत्तर:
कोणार्क का सबसे अधिक प्रभावित करने वाला पात्र धर्मपद है। इस एकांकी में धर्मपद ही ऐसा व्यक्ति है जो कि सम्पूर्ण एकांकी में आरम्भ से अन्त तक छाया हुआ है। धर्मपद के सफल प्रयास के कारण ही एकांकी का अन्त सुखद हो पाया।

वास्तव में, इस एकांकी में धर्मपद ही एकमात्र ऐसा पात्र है जिसने समाज में शिल्पियों के साथ होने वाले अन्याय और अत्याचारों को निडरता से उजागर किया है।

धर्मपद कला को जीवन-यापन का श्रेष्ठ साधन मानता है। उसका कहना है कि कला की व्यक्ति को साधना करनी चाहिए, तभी व्यक्ति जीवन में सफल हो पाता है। उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि उसे किसी आचार्य के समक्ष दीक्षा लेकर ही कार्य करना पड़े। उसका कथन है कि-
“आज के शिल्पी की आँखें वहाँ नहीं पड़ती, जहाँ धूल में हीरे छिपे पड़े हैं।”

वह कला का पारखी है तथा शिल्पियों की दुर्दशा से पूर्णरूपेण परिचित है। वह अपने विचारों को महामंत्री के समक्ष भी रख देता है और कह देता है कि मैं शिल्पियों के साथ होने वाले अन्याय और अत्याचार का वर्णन कर रहा हूँ। राजीव से इस विषय में उसके निम्न विचार देखिए-

“मैं तो एक ऐसे संसार की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ जो कि आपके निकट होते हुए भी ओझल हो गया है। इस मन्दिर में वर्षों से 1200 से अधिक शिल्पी काम कर रहे हैं। इनमें से कितनों की पीड़ा से आप परिचित हैं? जानते हैं आपके महामात्य के भृत्यों ने इनमें से बहुतों की जमीन छीन ली है, कइयों की स्त्रियों को दासियों की तरह काम करना पड़ रहा है, और उधर सारे उत्कल में अकाल पड़ रहा है।”

धर्मपद ने इस एकांकी के शिल्पियों की विषम परिस्थितियों को उजागर किया है। इसके। अतिरिक्त शिल्पियों के प्रति उदार भावना रखने के लिए प्रेरित किया है।
इस सम्बन्ध में किसी कवि की निम्न भावना देखिए-
“मैं कहता हूँ जिओ और जीने दो संसार को।
जितना ज्यादा बाँट सको बाँटो जग में प्यार को।”

इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धर्मपद के चरित्र ने हमें सबसे अधिक प्रभावित किया है। वह एक ऐसा नवयुवक है जो दूसरों के दुःख से द्रवीभूत होने वाला है। वह एक आदर्श मानव होने के साथ ही मानवीय भावनाओं का समुचित मूल्यांकन करने वाला है। भारतीय क्षितिज पर वह एक ध्रुव तारे की भाँति प्रकाशित होकर दूसरों को भी उस पथ पर चलने की प्रेरणा दे रहा है।

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प्रश्न 6.
धर्मपद ने कोणार्क के कलश को स्थापित करने में किस प्रकार सहायता की? समझाइए।
उत्तर:
धर्मपद लगभग 18 वर्ष की आयु का साँवले रंग का नवयुवक था। उसने बहुत छोटी आयु से ही शिल्पकारी का कार्य आरम्भ कर दिया था। जब उसे यह बात पता चलती है कि लगातार दस दिन कार्य करने के बाद भी शिल्पियों को कोणार्क मन्दिर की कलश स्थापना में सफलता न मिली। तब धर्मपद ने साहस कर आचार्य विशु से कहा, “यदि मुझे मन्दिर के कलश की स्थापना का एक अवसर मिल जाये तो मैं इस कार्य को पूरा करके अवश्य दिखा दूंगा।”

ऐसा में इसलिए करना चाहता हूँ जिससे शिल्पियों को महामन्त्री चालुक्य के कोप-भाजन का पात्र न बनना पड़े,क्योंकि शिल्पियों की दशा पहले से ही अच्छी नहीं है।

तातश्री सौम्य ने यद्यपि धर्मपद से यह भी कहा, “तुम अनुभव शून्य हो, इसे पूरा करना कठिन है। अपनी शक्ति से बाहर की बात न करो।” परन्तु धर्मपद ने विशु से कहा, “यदि मुझे अवसर मिल जाये क्या करोगे?” इस पर धर्मपद ने उत्तर दिया-
“आचार्य मुझे लगता है कि कोणार्क के कमल की पंखुड़ियाँ उल्टी हैं। इन्हें उलट देने पर भी कलश शायद ठहर सकेगा।”

इसके पश्चात् उसने यह भी कहा कि इस कार्य को करने के लिए यह प्रक्रिया की जाये-
इसके हरेक पटल को फिर से इस तरह रखा जाए कि जो बाहरी हिस्सा है, वह अन्दर केन्द्र पर हो और जो नुकीला भाग है, वह बाहर निकले तो उसकी आकृति खिले कमल की-सी हो जाएगी कली-की-सी नहीं। लेकिन कलश स्थिर रहेगा।

इस प्रकार धर्मपद ने कलश को स्थापित करने की मौखिक विधि समझायी। इसके पश्चात् उसने खड़िया से चित्र बनाकर समझाने का भी प्रयास किया।

पुनः धर्मपद ने कहा-
“मेरे मन में जो चित्र है उसे यों पूरी तरह तो नहीं समझा सकता किन्तु, देखिए अम्ल का आकार यदि कुछ इस तरह का हो तो-
उसकी इस बात को सुनकर विशु ने समर्थन किया। तुम ठीक कहते हो युवक यदि भार को हल्का कर दिया जाए तो शायद पटल को बदलने में सहायता मिल जाए और हम कलश स्थापित करने में सफल हो जायेंगे। धर्मपद आचार्य विशु से कहता है, “यदि उसकी युक्ति सफल हो जाये तब क्या एक दिन के लिए मन्दिर प्रतिष्ठापन के दिन आप अपने सब अधिकार मुझे दे देंगे।”

इस पर महाशिल्पी विशु धर्मपद से कहते हैं, “यदि कोणार्क पूरा हो गया तो वे केवल एक दिन के लिए नहीं अपितु सदैव के लिए अपने स्थान पर महाशिल्पी का पद देंगे।” इस प्रकार धर्मपद अपने वाक्य चातुर्य एवं प्रतिभा के द्वारा सभी को प्रसन्न करके कलश स्थापना के लिए चल देता है। उसके इस प्रयास में आचार्य विशु तथा अन्य शिल्पी सहयोग के लिए प्रस्थान करते हैं।

जिस कार्य में बार-बार सभी शिल्पी असफल हो रहे थे। उस कार्य को धर्मपद ने करके दिखा दिया, क्योंकि इस नवयुवक ने वास्तव में-
“ठण्डी होती हुई राख को फूंक मारकर प्रज्ज्वलित कर दिया।” धर्मपद ने सभी शिल्पियों की निराशा को आशा में बदल कर परिश्रम करने के लिए प्रेरित किया और सफलता प्राप्त की। इस प्रकार से धर्मपद ने कलश स्थापना में सहायता की।

प्रश्न 7.
नीचे दी गई पंक्तियों की व्याख्या कीजिए
(क) “हमने पत्थर में …………….. खड़ा कर दिया है।”
(ख) “शिल्पी को ………. मुझे उसकी कला चाहिए।”
(ग) “शिल्पी तुम ………… काल की गति।”
(घ) “जीवन के आदि ……………… जीवन अधूरा है।”
(ङ) “मैं तो एक ऐसे………………… ओझल हो गया है।”
उत्तर:
(क) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘कोणार्क’ नामक एकांकी से अवतरित है। इसके रचयिता ‘जगदीश चन्द्र माथुर’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में सौम्य का विशु के प्रति कथन है कि क्या तुम इस बात को सत्य ठहराते हो कि कोणार्क मन्दिर के वृहद् पाषाण एवं विस्तृत मूर्तियाँ आकाश में प्रस्थान कर सकती हैं।

व्याख्या :
इस कथन को सुनकर विशु गम्भीर होकर प्रत्युत्तर देता है कि हमने मूर्तियों को आकार देकर उन्हें जीवन्त बना दिया है साथ ही उन्हें गति भी प्रदान की है। उत्साहपूर्वक पुनः कहता है कि पत्थर वसुधा के गर्भ से निकला है अतः वह पृथ्वी का ही पदार्थ है। उसके चरण पृथ्वी पर स्थिर नहीं रहना चाहते हैं। पाषाण के इस देवालय के निर्माण में शिल्पकारों का ऐसा अद्भुत कौशल है कि यह वायु की भाँति गतिशील तथा किरण की भाँति स्पर्श से रहित है। इसकी महक चहुँओर व्याप्त है अर्थात् इसकी सुषमा की परिधि एक स्थान पर सीमित न होकर चारों ओर फैली हुई है। परन्तु पृथ्वी भी इसके सौन्दर्य पर इतनी मुग्ध है कि इसे ईर्ष्या से कहिये अथवा अपनत्व की भावना से अपने पाश में जकड़े रहने के लिए लालायित है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम लोगों ने अज्ञानतावश धरती एवं आसमान के मध्य व्यर्थ में ही भयंकर विवाद उत्पन्न कर दिया है अर्थात् पृथ्वी एवं आकाश एक-दूसरे के पूरक हैं। उन दोनों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है।

(ख) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में जब राजीव किशोर शिल्पी के विषय में विशु को बताता है कि वह बालक तीक्ष्ण बुद्धि वाला है तब विशु उससे मिलने के लिए आतुर है।

व्याख्या :
विशु शिल्पी की वाणी के सन्दर्भ में कहता है कि शिल्पी की वाणी में विद्रोह के स्वर गुंजित न होकर संयमित होने चाहिए। इसी मध्य विशु कहता है कि मेरी कला जिन्दगी की परछाईं की भाँति है साथ ही उसमें विद्रोह की भावना भी मुखरित है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब कला को मधुर वाणी एवं विद्रोह दोनों की ही आवश्यकता है। विशु राजीव से कहता है कि मैं उस ओजपूर्ण वाणी से सम्पन्न नवयुवक से भेंट करने का इच्छुक हूँ अतः आप उसे बुलायें। मेरे सम्पर्क से उसकी प्रतिभा (योग्यता) की सुगन्ध पुनः चैतन्य होकर उसकी वाणी पर विराम लगा देगी अर्थात् जब वह नवयुवक मेरी भावनाओं के सम्पर्क में आयेगा तब उस युवक की विचारधारा में परिवर्तन हो जायेगा और उस युवक की प्रतिभा और भी निखर जायेगी। वह मौन होकर कला की साधना में एकाग्रता से संलग्न हो जायेगा। आज मुझे इस प्रकार के कुशल कलाकर की कला की अपेक्षा है जो पत्थरों को अपनी कला के माध्यम से जीवन्त बना दे। कला मौन रूप से जीवन की व्याख्याता है।

(ग) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में नाट्याचार्य सौम्य शिल्पी एवं सृष्टिकर्ता दोनों का पृथक्-पृथक् महत्त्व बताते हैं।

व्याख्या :
जब विशु सौम्य से कहता है कि मन्दिर के अपूर्ण रहने पर उसे नष्ट करना होगा तथा इस पाप का प्रायश्चित भी निश्चित है। सौम्य अपने विचार विशु के प्रति व्यक्त करते हुए कह रहा है कि एक शिल्पकार विष्णु भगवान की तरह पालन करता है वह सृष्टि को जीवनदान देता है। शिल्पकार निर्माण करने वाला है। शंकर की भाँति तांडव नृत्य करके सृष्टि का संहार अथवा विनाश नहीं कर सकता है। निर्माता कभी संहारक का रूप नहीं ले सकता है। भारतीय कला के प्रतीक स्तम्भ (खम्भा) और ये पत्थर भूकम्प के द्वारा ही ध्वस्त हो सकते हैं अथवा काल के गाल में समा सकते हैं, अर्थात् कोई भी वस्तु प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो सकती है या काल के द्वारा।

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(घ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
विशु की मूर्तियों के सम्बन्ध में विचार सुनकर धर्मपद उत्तर देता है कि जिन्दगी आदि एवं उत्थान के मध्य स्थिर एक सोपान की भाँति है। इनके मूल में मानव के जीवन का पुरुषार्थ निहित है।

व्याख्या :
धर्मपद विशु को उत्तर देता है कि जीवन में आदि एवं उत्कर्ष की एक श्रृंखला है जिसके द्वारा व्यक्ति आगे कदम बढ़ाता है। पुरुषार्थ के अभाव में कला निर्जीव हो जाती है। अपराध क्षमा करें, आचार्य आज हमारी कला पुरुषार्थ को महत्त्व नहीं देती है। उन्नति अथवा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उद्योग अपेक्षित है।

इन मूर्तियों में आलिंगन करते हुए प्रेमी युगलों को जब मैं देखता हूँ तब मेरी कल्पना में यह बात पुनः जाग्रत हो जाती है कि अथक परिश्रम में जुटे हुए किसान जो कि पसीने से नहाये हुए हैं, सरिता की विपरीत धारा के मध्य योजनों नाव को खेने वाले मल्लाह तथा दिवस पर्यन्त तक कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने वाले मजदूरों की जो खून-पसीना एक करके श्रम करते हैं। इनके अभाव में जीवन मूल्यहीन एवं अपूर्ण है अर्थात् शिल्पकार को कला के गर्भ में निहित श्रम को आँकना चाहिए। पुरुषार्थ के बिना जीवन एवं कला अपूर्ण है।

(ङ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में राजीव का यह कहना कि धर्मपद तर्क कला में कुशल हैं। इसका उत्तर देता हुआ धर्मपद कह रहा है।

व्याख्या :
मेरे आने का उद्देश्य तर्क-वितर्क न होकर, मैं आपका ध्यान एक ऐसी दुनिया की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ जो कि हमारे समीप है फिर भी हम उससे अनजान बने हुए हैं। वह हमारी आँखों से ओझल है। कलाकार की कला का यश तो सर्वत्र विकीर्ण है। लेकिन हम उस ओर दृष्टि केन्द्रित नहीं कर रहे हैं अर्थात् हम कलाकार की भावनाओं से अपरिचित हैं।

प्रश्न 8.
दिए गये वाक्यों का भाव विस्तार कीजिए
(1) “कला जीवन भी है और जीवन-यापन का साधन भी।” (2008)
उत्तर:
कला के सन्दर्भ में धर्मपद विशु से कहता है कि कला के अन्तर्गत कलाकार के जीवन की झाँकी निहित है। कलाकार कला को मूर्त रूप देने के लिए अपने परिश्रम में तनिक भी कमी नहीं रखता। वह तो अपनी कला को जीवन का आधार मानता है। कला के माध्यम से वह धनोपार्जन करके अपने जीवन का निर्वाह करता है, क्योंकि कला जीवन यापन का एक साधन है।

(2) “जीवन के आदि और उत्कर्ष के बीच एक और सीढ़ी है-जीवन का पुरुषार्थ।”
उत्तर:
धर्मपद का विशु के प्रति कथन है-“कला जीवन के आरम्भ एवं उत्थान के मध्य एक सोपान के सदृश है। कला के सृजन में पुरुषार्थ आवश्यक है। बिना पुरुषार्थ के कलाकार अपनी कला को साकार रूप देने में कभी भी सफल नहीं हो सकता। अत: कलाकार को जीवन में आगे बढ़ने के लिए अथक परिश्रम एवं लगन की आवश्यकता है।” कलाकार की निम्न भावना देखिए-
“हारकर सौ बार तमस के समर में,
ज्योति की मैं जोत लेकर आ रहा हूँ।”

कोणार्क भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग और प्रत्ययों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों से उपसर्ग, प्रत्यय पृथक् करके लिखिए-
प्रतिष्ठापन, विचित्र, ओजमयी, प्रतिभावान, निर्द्वन्द, कायरपन, निष्कलुष, रमणीयता, अरुणिमा, निराधार।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 8 कोणार्क img-1

प्रश्न 2.
निम्न शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए-
पृथ्वी, नरेश, गगन, जंगल, सूर्य।
उत्तर:
पृथ्वी – भू, धरती, वसुन्धरा, भूमि।
नरेश – भूपति, नृप, राजा, भूपाल, क्षितीश।
गगन – नभ, व्योम, अम्बर, आकाश।
जंगल – वन, कानन, अरण्य, अटवी।
सूर्य – भानु, रवि, भास्कर, सूरज।

प्रश्न 3.
निम्न शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए
हरेक, खबर, साफ, चीज, निगाह, साल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 8 कोणार्क img-2

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प्रश्न 4.
निम्न मुहावरों का अर्थ लिखते हुए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर:
(1) मुँह छिपाना – लज्जित होना।
वाक्य प्रयोग – हाईस्कूल परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाने पर रोहन मुँह छिपाकर घर में ही बैठ गया।

(2) राह पर लाना – सुधार करना।
वाक्य प्रयोग – आज के युग में बिगड़े हुए नवयुवकों को राह पर लाना दुष्कर कार्य है।

(3) घमण्ड चूर करना – अभिमान नष्ट करना।
वाक्य प्रयोग – पाकिस्तान की टीम को पराजित करके भारतीय खिलाड़ियों ने उनके घमण्ड को चूर-चूर कर दिया।

(4) छूमन्तर होना – गायब होना।
वाक्य प्रयोग – भीषण गर्मी के कारण पक्षी छूमन्तर हो गये।

(5) पंख लगना – गर्व अनुभव करना।
वाक्य प्रयोग – लॉटरी निकल आने पर पल्लव के मानो पंख लग गये हों।

(6) भंडाफोड़ होना – भेद खुलना।
वाक्य प्रयोग – पुलिस की मार से बैंक डकैती का भंडा फूट गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध कीजिए।
(अ) मानो स्वप्न भ्रष्ट हुई हो।
(आ) यह कलश छप्र पर नहीं टिकती।
(इ) कोणार्क की सूर्य मन्दिर प्रसिद्ध है।
(ई) क्या ये पाषाण मूर्तियाँ ऊर्ध्वगामी हो जायेंगे?
उत्तर:
(अ) मानो स्वप्न भंग हो गया हो।
(आ) यह कलश छप्र पर नहीं टिकता।
(इ) कोणार्क का सूर्य मन्दिर प्रसिद्ध है।
(ई) क्या ये पाषाण मूर्तियाँ ऊर्ध्वगामी हो जायेंगी?

प्रश्न 6.
निम्नलिखित अनुच्छेद में यथास्थान विराम चिह्नों का प्रयोग कीजिए-
हमने जो मूर्तियाँ इसके स्तम्भों इसकी उपपीठ और अधिस्थान में अंकित की हैं उन्हें ध्यान से देखो देखते हो उसमें मनुष्य के सारे कर्म उसकी सारी वासनाएँ मनोरंजन और मुद्राएँ चित्रित हैं यही तो जीवन है।
उत्तर:
हमने जो मूर्तियाँ इसके स्तम्भों, इसकी उपपीठ और अधिस्थान में अंकित की हैं उन्हें ध्यान से देखो। देखते हो, उसमें मनुष्य के सारे कर्म, उसकी सारी वासनाएँ, मनोरंजन और मुद्राएँ चित्रित हैं। यही तो जीवन है।

कोणार्क पाठ का सारांश 

कोणार्क का सूर्य मन्दिर उड़ीसा प्रान्त में है। यह समुद्र के किनारे है। कोणार्क केवल भौतिक स्मारक न होकर भारत के सांस्कृतिक गुणों का प्रतीक है। कोणार्क का मन्दिर सूर्य के दिव्य एवं विशाल रथ का ही प्रतिरूप है। एकांकी में मन्दिर के कलश स्थापन के समय आये हुए गतिरोध का विवेचन है। कोणार्क मन्दिर कुशल शिल्पकारों के मनोभावों का भी प्रतिबिम्ब है। यह जीवन का जीता जागता चित्रण है। यह मात्र लोकरंजन का ही विषय नहीं अपितु जीवन के आदि एवं उत्कर्ष की कहानी है।

एकांकी का चरमोत्कर्ष उस समय निहारा जा सकता है, जब महादण्ड का अमानवीय आदेश जिसमें शिल्पियों के हाथ काटने की चर्चा है। यह उस समय की राज्य व्यवस्था का भी द्योतक है। एकांकी का अन्त उल्लास का प्रतीक है।

कोणार्क कठिन शब्दार्थ

पाषाण-कोर्तक = पत्थर की मूर्ति बनाने वाला। धरातल = पृथ्वी से। वीरश्रृंखला = जंजीर। सुवर्ण श्रृंखला = सोने की कड़ियाँ। कटकमुद्रा = नृत्य की मुद्रा। उत्कल = आज का उड़ीसा। दण्डपाशिक = डंडा रखने वाले सैनिक। महामात्य = मंत्री। बंग प्रदेश = बंगाल। निर्निमेष = अपलक देखना, एकटक देखना। प्रतिबिम्ब = परछाईं। पाषण = पत्थर। अंगरखा = एक प्रकार का वस्त्र। उत्कर्ष = उत्थान। कीर्तिस्तम्भ = यश का स्मारक। उत्कीर्ण = उकेरना। प्रतिष्ठापन = स्थापित करना। गीति गोविन्द = जयदेव लिखित रचना। कण्ठहार = गले में पहनने की माला। रागिनी = लययुक्त, संगीत। निर्माता = बनाने वाला। कोलाहल = शोर। विषाद = दुःख। निराश्रिता = बेसहारा। उपपीठ = सहस्थान। आशुशिल्पी = जन्मजात कारीगर। अधिस्थान = आधार स्थान। पुरुषार्थ = उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उद्योग करना (पुरुषार्थ चार माने गये हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष)। महादण्डपाशिक = दण्ड देने वाला बड़ा अधिकारी। वेत्रासन = बेंत का आसन। तोशक = रुई भरा बिछावन, रजाई। प्राचीर = दीवार। भंडाफोड = रहस्य उद्घाटित होना। प्रतिहारी= द्वारपाल। षड्यंत्र = कुचक्र। नेपथ्य = मंच के पीछे जगह जहाँ नये वेश की रचना की जाती है। कुठाराघात = भीषण आघात। प्रतारणा = सांत्वना। छप्र = छत। अम्ल = मंडप का ऊपरी खाली भाग। अन्तरमुखी = भीतर की ओर, अन्दर की ओर। स्वप्न भ्रष्ट = सपना टूटा हो, नष्ट हुआ हो। अवलोकन = देखना। युक्ति = उपाय। मुग्ध = मोहित। प्रज्वलित = जलता हुआ। आतुर = बेचैन।

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कोणार्क संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. हमने पत्थर में जान डाल दी है, उसे गति दे दी है। (सोत्साह) वह भूल रहा है कि वह धरती का पदार्थ है। उसके पैर धरती पर नहीं टिकते। पत्थर का यह मन्दिर आज कल्पना के स्पर्श से हवा की तरह गतिमान, किरण की तरह स्पर्शहीन, सुगन्ध की तरह सर्वव्यापी हो रहा है। लेकिन ………. लेकिन धरती उसे जकड़े हुए है, ईर्ष्या से। ……..” मुझे लगता है, जैसे अनजाने ही हम लोगों ने पृथ्वी और आकाश के बीच भीषण संघर्ष खड़ा कर दिया है।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘कोणार्क’ नामक एकांकी से अवतरित है। इसके रचयिता ‘जगदीश चन्द्र माथुर’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में सौम्य का विशु के प्रति कथन है कि क्या तुम इस बात को सत्य ठहराते हो कि कोणार्क मन्दिर के वृहद् पाषाण एवं विस्तृत मूर्तियाँ आकाश में प्रस्थान कर सकती हैं।

व्याख्या :
इस कथन को सुनकर विशु गम्भीर होकर प्रत्युत्तर देता है कि हमने मूर्तियों को आकार देकर उन्हें जीवन्त बना दिया है साथ ही उन्हें गति भी प्रदान की है। उत्साहपूर्वक पुनः कहता है कि पत्थर वसुधा के गर्भ से निकला है अतः वह पृथ्वी का ही पदार्थ है। उसके चरण पृथ्वी पर स्थिर नहीं रहना चाहते हैं। पाषाण के इस देवालय के निर्माण में शिल्पकारों का ऐसा अद्भुत कौशल है कि यह वायु की भाँति गतिशील तथा किरण की भाँति स्पर्श से रहित है। इसकी महक चहुँओर व्याप्त है अर्थात् इसकी सुषमा की परिधि एक स्थान पर सीमित न होकर चारों ओर फैली हुई है। परन्तु पृथ्वी भी इसके सौन्दर्य पर इतनी मुग्ध है कि इसे ईर्ष्या से कहिये अथवा अपनत्व की भावना से अपने पाश में जकड़े रहने के लिए लालायित है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम लोगों ने अज्ञानतावश धरती एवं आसमान के मध्य व्यर्थ में ही भयंकर विवाद उत्पन्न कर दिया है अर्थात् पृथ्वी एवं आकाश एक-दूसरे के पूरक हैं। उन दोनों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है।

विशेष:

  1. भाषा काव्यमयी है।
  2. शिल्पकारों के कौशल का वर्णन है।
  3. भारतीय सभ्यता एवं कला का गौरवपूर्ण चित्रण है।

2. शिल्पी को विद्रोह की वाणी नहीं चाहिए, राजीव मेरी कला में जीवन का प्रतिबिम्ब और उसके विरुद्ध विद्रोह दोनों सन्निहित हैं। तुम उस किशोर को बुला लाओ। मेरी दृष्टि के स्पर्श से उसकी प्रतिभा की गंध जागृत होकर उसकी वाणी को मौन कर देगी। मुझे उसकी कला चाहिए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में जब राजीव किशोर शिल्पी के विषय में विशु को बताता है कि वह बालक तीक्ष्ण बुद्धि वाला है तब विशु उससे मिलने के लिए आतुर है।

व्याख्या :
विशु शिल्पी की वाणी के सन्दर्भ में कहता है कि शिल्पी की वाणी में विद्रोह के स्वर गुंजित न होकर संयमित होने चाहिए। इसी मध्य विशु कहता है कि मेरी कला जिन्दगी की परछाईं की भाँति है साथ ही उसमें विद्रोह की भावना भी मुखरित है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब कला को मधुर वाणी एवं विद्रोह दोनों की ही आवश्यकता है। विशु राजीव से कहता है कि मैं उस ओजपूर्ण वाणी से सम्पन्न नवयुवक से भेंट करने का इच्छुक हूँ अतः आप उसे बुलायें। मेरे सम्पर्क से उसकी प्रतिभा (योग्यता) की सुगन्ध पुनः चैतन्य होकर उसकी वाणी पर विराम लगा देगी अर्थात् जब वह नवयुवक मेरी भावनाओं के सम्पर्क में आयेगा तब उस युवक की विचारधारा में परिवर्तन हो जायेगा और उस युवक की प्रतिभा और भी निखर जायेगी। वह मौन होकर कला की साधना में एकाग्रता से संलग्न हो जायेगा। आज मुझे इस प्रकार के कुशल कलाकर की कला की अपेक्षा है जो पत्थरों को अपनी कला के माध्यम से जीवन्त बना दे। कला मौन रूप से जीवन की व्याख्याता है।

विशेष :

  1. लेखक ने शिल्पकार एवं उसकी कला का विवेचन किया है।
  2. भाषा, सरल, संयत्र एवं परिमार्जित है।

3. शिल्पी तुम विष्णु हो शंकर नहीं। निर्माता हो संहारक नहीं। और फिर ये स्तम्भ और ये पाषाण। इन्हें तो भूकम्प ही गिरा सकते हैं, अथवा काल की गति। (2012)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में नाट्याचार्य सौम्य शिल्पी एवं सृष्टिकर्ता दोनों का पृथक्-पृथक् महत्त्व बताते हैं।

व्याख्या :
जब विशु सौम्य से कहता है कि मन्दिर के अपूर्ण रहने पर उसे नष्ट करना होगा तथा इस पाप का प्रायश्चित भी निश्चित है। सौम्य अपने विचार विशु के प्रति व्यक्त करते हुए कह रहा है कि एक शिल्पकार विष्णु भगवान की तरह पालन करता है वह सृष्टि को जीवनदान देता है। शिल्पकार निर्माण करने वाला है। शंकर की भाँति तांडव नृत्य करके सृष्टि का संहार अथवा विनाश नहीं कर सकता है। निर्माता कभी संहारक का रूप नहीं ले सकता है। भारतीय कला के प्रतीक स्तम्भ (खम्भा) और ये पत्थर भूकम्प के द्वारा ही ध्वस्त हो सकते हैं अथवा काल के गाल में समा सकते हैं, अर्थात् कोई भी वस्तु प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो सकती है या काल के द्वारा।

विशेष :

  1. शिल्पकार को विष्णु का रूप प्रदान किया गया है।
  2. शिल्पी का कार्य निर्माण करना है विध्वंस करना नहीं।
  3. भाषा सुबोध, सरस एवं प्रवाहयुक्त है।

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4. जीवन के आदि और उत्कर्ष के बीच एक और सीढ़ी है-जीवन का पुरुषार्थ। अपराध क्षमा हो आचार्य, आपकी कला उस पुरुषार्थ को भूल गई है। जब मैं इन मूर्तियों में बँधे रसिक जोड़ों को देखता हूँ तो मुझे याद आती है पसीने में नहाते हुए किसान की, कोसों तक धारा के विरुद्ध नौका को खेने वाले मल्लाह की, दिन-दिन भर कुल्हाड़ी लेकर खटने वाले लकड़हारे की। ………. इसके बिना जीवन अधूरा है, आचार्य।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
विशु की मूर्तियों के सम्बन्ध में विचार सुनकर धर्मपद उत्तर देता है कि जिन्दगी आदि एवं उत्थान के मध्य स्थिर एक सोपान की भाँति है। इनके मूल में मानव के जीवन का पुरुषार्थ निहित है।

व्याख्या :
धर्मपद विशु को उत्तर देता है कि जीवन में आदि एवं उत्कर्ष की एक श्रृंखला है जिसके द्वारा व्यक्ति आगे कदम बढ़ाता है। पुरुषार्थ के अभाव में कला निर्जीव हो जाती है। अपराध क्षमा करें, आचार्य आज हमारी कला पुरुषार्थ को महत्त्व नहीं देती है। उन्नति अथवा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उद्योग अपेक्षित है।

इन मूर्तियों में आलिंगन करते हुए प्रेमी युगलों को जब मैं देखता हूँ तब मेरी कल्पना में यह बात पुनः जाग्रत हो जाती है कि अथक परिश्रम में जुटे हुए किसान जो कि पसीने से नहाये हुए हैं, सरिता की विपरीत धारा के मध्य योजनों नाव को खेने वाले मल्लाह तथा दिवस पर्यन्त तक कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने वाले मजदूरों की जो खून-पसीना एक करके श्रम करते हैं। इनके अभाव में जीवन मूल्यहीन एवं अपूर्ण है अर्थात् शिल्पकार को कला के गर्भ में निहित श्रम को आँकना चाहिए। पुरुषार्थ के बिना जीवन एवं कला अपूर्ण है।

विशेष :

  1. लेखक ने श्रमिकों की महत्ता का प्रतिपादन किया है।
  2. मूर्तियाँ मानव जीवन की अमूल्य निधि हैं।
  3. भाषा सरस एवं बोधगम्य है।

5. मैं तो एक ऐसे संसार की ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ जो कि आपके निकट होते हुए भी आपकी आँखों से ओझल हो गया है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में राजीव का यह कहना कि धर्मपद तर्क कला में कुशल हैं। इसका उत्तर देता हुआ धर्मपद कह रहा है।

व्याख्या :
मेरे आने का उद्देश्य तर्क-वितर्क न होकर, मैं आपका ध्यान एक ऐसी दुनिया की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ जो कि हमारे समीप है फिर भी हम उससे अनजान बने हुए हैं। वह हमारी आँखों से ओझल है। कलाकार की कला का यश तो सर्वत्र विकीर्ण है। लेकिन हम उस ओर दृष्टि केन्द्रित नहीं कर रहे हैं अर्थात् हम कलाकार की भावनाओं से अपरिचित हैं।

विशेष :

  1. कला की महत्ता का प्रतिपादन है।
  2. भाषा मुहावरेदार है, जैसे-आँखों से ओझल होना।

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MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 10 मेरे बचपन के दिन

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 10 मेरे बचपन के दिन

मेरे बचपन के दिन अभ्यास

मेरे बचपन के दिन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महादेवी वर्मा ने अपने बचपन में सबसे पहली कौन-सी पुस्तक पढ़ी? (2016)
उत्तर:
महादेवी वर्मा ने अपने बचपन में पहली पुस्तक पंचतन्त्र पढ़ी।

प्रश्न 2.
छात्रावास में महादेवी वर्मा की पहली साथिन कौन थी?
उत्तर:
छात्रावास में महादेवी वर्मा की पहली साथिन सुभद्रा कुमारी चौहान थीं।

प्रश्न 3.
लेखिका के भाई का नामकरण किसने किया था?
उत्तर:
लेखिका के भाई का नामकरण “जवारा” की बेगम साहिबा, जिनको वह ताई कहती थी, उन्होंने किया।

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मेरे बचपन के दिन लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पुरस्कार में मिले चाँदी के कटोरे को देखकर लेखिका को दुःख के साथ-साथ प्रसन्नता क्यों हुई?
उत्तर:
पुरस्कार में मिले चाँदी के कटोरे को देखकर लेखिका को दुःख के साथ प्रसन्नता इस कारण हुई क्योंकि उपहार में मिला चाँदी का कटोरा बापू ने ले लिया था, दुःख इस कारण हुआ क्योंकि उन्होंने कविता सुनाने के लिये नहीं कहा था। इस प्रकार लेखिका को दु:ख व प्रसन्नता की अनुभूति साथ-साथ हुई।

प्रश्न 2.
लेखिका और सहेलियाँ अपने जेब खर्च के पैसे क्यों बचाती थीं?
उत्तर:
लेखिका और उनकी सहेलियाँ अपने जेब खर्च के पैसे देश के लिए बचाती थीं और जब बापू आते थे तब वह पैसा उन्हें दे देती थीं।

प्रश्न 3.
लेखिका की ताई साहिबा उनके भाई के जन्म पर कपड़े लेकर क्यों आई थीं? (2014)
उत्तर:
लेखिका की ताई साहिबा उनके भाई के जन्म पर कपड़े इसलिए लाईं, क्योंकि छोटे बच्चों को माँ के यहाँ के कपड़े पहनाते हैं। यदि माँ न हो तो ताई या चाची छ: महीने तक बच्चे को कपड़े पहनाती हैं। इसी कारण ताई साहिबा उनके भाई के जन्म पर कपड़े लेकर आयीं थीं।

मेरे बचपन के दिन दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखिका ने अपनी माँ की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
उत्तर:
लेखिका ने अपनी माँ की निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है-
(1) आदर्श महिला-महादेवी वर्मा की माँ एक आदर्श महिला थीं। वे परिवार व बच्चों के प्रति जागरूक थीं। बच्चों की प्रत्येक गतिविधि को स्वयं देखती थीं। महादेवी वर्मा की शिक्षा में सबसे अधिक उनकी माँ का ही सहयोग था क्योंकि महादेवी को संस्कृत में रुचि थी। इस कार्य में उन्हें अपनी माँ के द्वारा सहायता मिल जाती थी।

(2) धर्मपरायण-महादेवी वर्मा की माँ धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। सुबह होते ही वे गीता पढ़ती थीं। इसके अतिरिक्त वे मीरा के भजन भी गाती थीं। इसी कारण महादेवी वर्मा को बचपन से ही काव्यमय वातावरण मिला। अपनी माँ के साथ-साथ महादेवी वर्मा भी गाते-गाते तुकबन्दी करना सीख गयी थीं। महादेवी वर्मा को आगे बढ़ने में उनकी माँ से प्रेरणा मिली।

(3) आदर्श माँ-महादेवी वर्मा को अपनी माँ के रूप में आदर्श शिक्षिका मिल गयी थी, क्योंकि महादेवी वर्मा को जब मौलवी साहब पढ़ाने के लिये आते थे वे चारपाई के नीचे छिप जाती थीं, लेकिन अपनी माँ के द्वारा लायी गयी पुस्तक ‘पंचतन्त्र’ उन्हें बहुत अच्छी लगी। उन्होंने सबसे पहले इसी पुस्तक को पढ़ा। इसके अतिरिक्त जब भी कभी कोई कविता लिखती वे अपनी माँ को अवश्य सुनाती थीं। माँ लेखिका को भाई व परिवार के अन्य सदस्यों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने को कहती थी। माँ को जातिगत भेदभाव तनिक भी पसन्द न था।

(4) उत्तम संस्कार-महादेवी वर्मा ने माँ के उत्तम संस्कारों के विषय में इस प्रकार कहा “जब मैं विद्यापीठ आई तब तक मेरे बचपन का वही क्रम जो आज तक चलता आ रहा है। कभी-कभी बचपन के संस्कार ऐसे होते हैं कि हम बड़े हो जाते हैं, तब तक चलते हैं।” वे अपनी माँ के सानिध्य में अधिक रहती थीं अत: माँ के संस्कारों से प्रभावित थीं।

(5) सबके प्रति अपनत्व की भावना-माँ मानवता के उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित थीं। इसी कारण जब बेगम साहिबा उनके घर आती थीं तो उनको पूरा सम्मान देकर ताई कहकर बुलाती थीं। यहाँ तक महादेवी की माँ ने बेगम साहिबा द्वारा रखा गया उनके भाई का नाम हमेशा के लिए मनमोहन ही रखा। इस प्रकार उनकी माँ ने कभी अपने-पराये का भेद न रखा।

बेगम साहिबा के एक बेटा भी था जब राखी का त्यौहार आता था तब वे महादेवी वर्मा से इस प्रकार कहती थीं, “बहनों को राखी बाँधनी चाहिए, राखी के दिन सवेरे से पानी भी नहीं पीने देती थीं।”

निष्कर्ष में कह सकते हैं महादेवी की माँ एक ऐसी उच्च संस्कारों से सम्पन्न महिला थीं जो समाज को अपने स्नेह सम्बन्धों से एकता के सूत्र में बाँधने की इच्छुक थीं। मानव-मानव के मध्य धर्म, सम्प्रदाय एवं जातिगत दीवार खड़ी करने की घोर विरोधी थी। उनका चरित्र आधुनिक महिलाओं के लिये एक अनुकरणीय उदाहरण है।

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प्रश्न 2.
लेखिका के बचपन के दिनों के सामाजिक तथा भाषायी वातावरण का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक वातावरण-लेखिका के बचपन के दिनों में समाज का वातावरण अच्छा था। घर में तथा परिवार में आपस में प्रेम था। लोगों में आपसी सम्बन्ध सगे-सम्बन्धियों की भाँति थे। लेन-देन और व्यवहार में अपनत्व की भावना थी। निम्नलिखित उदाहरण में देखें-

“बेगम साहिबा कहती थीं ‘हमको ताई कहो !’ हम लोग उन्हें ‘ताई साहिबा’ कहते थे। उनके बच्चे हमारी माँ को चाचीजान कहते थे। हमारे जन्म दिन वहाँ मनाए जाते थे। उनके जन्मदिन हमारे यहाँ मनाए जाते थे। समाज में एक-दूसरे को अपनत्व के अतिरिक्त पूरा सम्मान दिया जाता था।” देखिये-

“हमारी माँ को दुल्हन कहती थीं। कहने लगी दुल्हन, जिनके ताई-चाची नहीं होती वो अपनी माँ के कपड़े पहनते हैं।” इस प्रकार लेखिका ने इस संस्मरण के माध्यम से सामाजिक स्थिति को स्पष्ट किया है।

भाषायी वातावरण – समाज में यदि आपसी प्रेम भाव हो तो भाषा के कारण कहीं भी विवाद हो ही नहीं सकता। अत: किसी को भी कोई भी भाषा पढ़ने-लिखने की कोई परेशानी न थी। सभी भाषाओं को सम्मान दिया जाता था। व्यक्ति को किसी भी भाषा के बोलने की स्वतन्त्रता थी। अतः भाषा की दृष्टि से वातावरण सुखद था, आपस में कोई विवाद न था। उदाहरण देखें-

“उस समय यह देखा मैंने कि साम्प्रदायिकता नहीं थी। जो अवध की लड़कियाँ थीं, वे आपस में अवधी बोलती थीं, बुन्देलखण्डी भी आती थीं, वे बुंदेली में बोलती थीं। इसके अलावा प्रत्येक को पूर्ण अधिकार था.चाहे वह उर्दू बोले, मराठी या अन्य भाषा, सब एक-दूसरे की भाषा का सम्मान करते थे। एक-दूसरे को प्रेमपूर्वक अपनी भाषा सिखा भी देते थे। इसी कारण भाषा की दृष्टि से वातावरण अच्छा था।”

प्रश्न 3.
परिवारों में लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए? (2009)
उत्तर:
“मेरे बचपन के दिन” संस्मरण के द्वारा महादेवी वर्मा ने परिवार में लड़कियों की स्थिति के बारे में स्पष्ट किया है। महादेवी वर्मा ने यह बताने का प्रयास किया है कि उनके समय में परिवार में लड़कियों की स्थिति सम्मानजनक थी। जब उनके परिवार में कोई भी कन्या दो सौ वर्ष तक न जन्मी तब परिवार वालों ने कन्या का जन्म न होना दैवीय प्रकोप समझा।

इसके पश्चात् कुल देवी की आराधना के उपरान्त जन्मी कन्या की खातिर की गयी व उसकी शिक्षा-दीक्षा का अच्छा प्रबन्ध किया। इस संस्मरण के माध्यम से लेखिका ने परिवार में लड़कियों की स्थिति को आदर्श दिखाने का प्रयत्न किया है।

(1) परिवार में सम्मान – परिवार में लड़कियों को सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए। लड़कियों को व लड़कों को एक समान दृष्टि से देखना चाहिए। उस समय लड़कियों को इतना सम्मान मिलता था। निम्न उदाहरण से स्पष्ट है-देखिये

“उनका एक लड़का था उसको राखी बाँधने को वे कहती थीं। बहनों को राखी बाँधनी चाहिए। राखी के दिन सवेरे से पानी भी नहीं देती थीं, राखी के दिन बहनें राखी बाँध जाएँ तब तक भाई को निराहार रहना चाहिए।” इस प्रकार बताया है कि परिवार में लड़कियों का आदर होता था।

(2) शिक्षा प्राप्त करने की स्वतन्त्रता – परिवार में लड़कियों को पढ़ने-लिखने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये। इस संस्मरण के माध्यम से लेखिका ने बताया है कि जब उनको घर पर पढ़ना अच्छा न लगा तो उनकी शिक्षा का प्रबन्ध विद्यालय में किया गया।

लड़कियों को पढ़ाने के लिये उनकी रुचि के अनुसार पढ़ने देना चाहिये। लड़कियाँ शहर में ही नहीं अन्य शहरों में छात्रावास में भी रहकर पढ़ सकती हैं। आज से वर्षों पूर्व जब लड़कियाँ बाहर छात्रावासों में रहकर शिक्षा ग्रहण कर सकती थीं तो बदलती हुई परिस्थितियों में लड़कियों पर अंकुश नहीं लगाना चाहिये।

(3) सभा व सम्मेलनों में भाग लेने की स्वतन्त्रता-इस संस्मरण के द्वारा लेखिका ने बताया है कि लड़कियाँ उन्मुक्त होकर सभा, सोसाइटियों एवं सम्मेलनों में भाग ले सकती हैं। उस समय स्त्री-पुरुष एक साथ सम्मेलन में भाग लिया करते थे। आपस में वार्तालाप भी करते थे। इस प्रकार पर्दा-प्रथा व स्त्री-पुरुष के मेल-मिलाप की स्वतन्त्रता थी-उदाहरण देखें-

“हम कविता सुनाते थे हरिऔध जी, अध्यक्ष होते थे, श्रीधर पाठक होते थे कभी रत्नाकर जी होते थे, कभी कोई और होता था।” इस प्रकार बताया है कि लड़कियों को कविता करने व सभाओं में जाने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए।

(4) जाति-पाँति के भेदभाव से मुक्त-इस संस्मरण के माध्यम से लेखिका ने बताया है कि लड़कियों को जाति-पाँति के बन्धन से मुक्त रखना चाहिए जिससे वे बाहर शिक्षा ग्रहण करने जाये तो उन्हें किसी भी प्रकार की कठिनाई न हो। ये समस्त संस्कार लड़कियों को परिवार से ही प्राप्त होते हैं। अतः परिवार में जाँति-पाँति का बन्धन नहीं होना चाहिये।

(5) भाषा की स्वतन्त्रता-परिवार में लड़कियों को उनकी इच्छानुसार भाषा बोलने का अधिकार होना चाहिए।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि परिवार के अन्तर्गत लड़के एवं लड़कियों के मध्य भेदभाव की भावना नहीं रखनी चाहिए। दोनों को समान दृष्टि से देखकर उन्नति की मंजिल की ओर कदम बढ़ाने का अवसर प्रदान करना चाहिए। तभी समाज पल्लवित-पुष्पित एवं विकास की ओर उन्मुख हो सकेगा।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांशों की संदर्भ प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(क) हम हिन्दी ……… नहीं होता था।
(ख) उनके यहाँ भी ………… सपना खो गया है।
उत्तर:
(क) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में महादेवी वर्मा ने छात्रावास के आदर्श एवं सद्भावना के वातावरण का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
जब महादेवी वर्मा छात्रावास में रह रही थीं, उस समय अध्ययन करने वाली सहयोगी छात्राओं में जाति सम्बन्धी एवं भाषा विषयक भेदभाव तनिक भी विद्यमान नहीं था। सब अपनी-अपनी भाषाओं का स्वतन्त्रतापूर्वक निसंकोच प्रयोग करते थे।

उस समय विद्यालय में हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू भाषा की भी शिक्षा प्रदान की जाती थी। प्रान्तीयता की भावना छात्राओं के मन-मानस में न थी। वार्तालाप में छात्राएँ अपनी भाषा का प्रयोग करती थीं। मेस में हम सभी एक साथ बैठकर भोजन करते थे। प्रार्थना भी सम्मिलित रूप से होती थी। सब तर्क-वितर्क से कोसों दूर थे। सब प्रेम के सूत्र में आबद्ध होकर जीवन-यापन करते थे।

(ख) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश के द्वारा महादेवी वर्मा ने अपने बाल्यकाल की, परिवार एवं समाज की झाँकी प्रस्तुत करके यह बताने का प्रयत्न किया है, कि उनके समय में वातावरण बहुत सौहार्द्रपूर्ण था।

व्याख्या :
महादेवी वर्मा ने इस गद्यांश में अपने भाई प्रोफेसर मनमोहन वर्मा के विश्वविद्यालय की स्थिति का वर्णन करते हुए बताया है। प्रोफेसर मनमोहन वर्मा का नाम बचपन में बेगम साहिबा ने रखा। उनका नाम सदैव वही रहा, क्योंकि हमारे मन में कोई भी जातिवाद की भावना न थी। जिस प्रकार घरों में जाति-पाँति का भेदभाव न था उसी प्रकार विद्यालयों में भी भाषागत भेदभाव न था। प्रोफेसर मनमोहन के विद्यालय में भी हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाएँ सिखाई जाती थीं जबकि हम लोग घर पर परस्पर अवधी भाषा का प्रयोग करते थे।

इस प्रकार भाषा प्रयोग के लिए किसी पर कोई भी रोक-टोक न थी। परिवार और समाज में एक-दूसरे के प्रति सद्भावना और अत्यधिक स्नेह था। सभी आपस में एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे। परन्तु आज समाज में परिवारों एवं समाज में जातिगत एवं भाषागत भेद-भाव और आपसी मनमुटाव को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वे सब बातें स्वप्नवत् थीं। जिस प्रकार स्वप्न नींद खुलने के बाद टूट जाता है उसी प्रकार पिछली बातें स्वप्नवत् ही प्रतीत होती हैं, क्योंकि पूर्व जैसी स्थिति आज न तो परिवार में दिखायी देती है न ही विद्यालयों में।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव पल्लवन कीजिए
(क) बचपन की स्मृतियों में एक विचित्र-सा आकर्षण होता है। (2010)
(ख) परिस्थितियाँ सदैव एक सी नहीं रहती हैं।
उत्तर:
(क) उपर्युक्त कथन में महादेवी वर्मा ने अपनी बाल्यावस्था से जुड़ी समस्त बातों को याद करते हुए कहा है कि बचपन की यादों में एक अनोखा सा सम्मोहन होता है, क्योंकि जब मानव अपनी बचपन की बातें याद करता है तो वे सभी बातें अद्भुत-सी प्रतीत होती हैं। बड़े होने के उपरान्त भी व्यक्ति को उन बातों से बहुत लगाव-सा होता है।

जब व्यक्ति अपने बचपन की यादों में खो जाता है, तब वह बड़ा होने पर बचपन की उन अनुभूतियों को स्मरण करके प्रसन्नता का अनुभव करता है, क्योंकि बचपन की सभी यादें क्रमशः हमारे मस्तिष्क पर चित्रपट की रीलों की भाँति एक-एक करके दृष्टिगोचर होने लगती हैं तथा हम उन यादों में खोकर एक अनिर्वचनीय सुख का अनुभव करते हैं।

(ख) महादेवी वर्मा ने इस कथन के द्वारा यह बताने का प्रयत्न किया है कि व्यक्ति के जीवन में परिस्थितियाँ हमेशा एक-सी नहीं रहती हैं। जिस प्रकार राह-चलते समय उतार-चढ़ाव होता है। सुख व दुःख तथा रात और दिन क्रम से आते हैं। उसी प्रकार जीवन में हर क्षण बदलाव होता रहता है। कभी-भी संसार में कोई भी वस्तु एक समान नहीं रहती। परिवर्तन जीवन का शाश्वत नियम है। परिवर्तन के अनुसार परिस्थितियाँ भी परिवर्तित होती हैं। इस सन्दर्भ में लेखक का निम्न कथन देखिए-
“चलाचल ओ राही तू राह न कर कुछ मग की परवाह।
विश्व के कण-कण में तू खेलता रहता है परिवर्तन ॥”

प्रश्न 6.
“शायद वह सपना सत्य हो जाता तो भारत की कथा कुछ और होती।” कथन के आधार पर भारत की वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व भारत की सामाजिक परिस्थिति पूर्णरूप से भिन्न थी। समाज में आपस में प्रेम पूर्ण सम्बन्ध होते थे। इस कारण आपसी मनमुटाव नहीं होता था। लोग दूसरों के प्रति त्याग और सद्भाव की भावना रखते थे। लेकिन आज का मानव प्रत्येक सम्बन्ध को स्वार्थ की दृष्टि से देखता है। यदि व्यक्ति का स्वार्थ निहित है, तो वह उसके लिये कोई भी कार्य करना चाहेगा अन्यथा वह उसे देखकर अनजान बन जायेगा।

आज के समाज में इस बदलाव के कारण साम्प्रदायिक झगड़े होते रहते हैं। परिवारों में भी विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। परिणामस्वरूप पारिवारिक विघटन हो गया है। पत्नी एवं पति व बच्चों की भी आपस में नहीं पटती है। पति-पत्नी में सम्बन्ध विच्छेद हो जाते हैं। बच्चे वृद्ध होने पर माता-पिता को सम्मान नहीं देते हैं। वे उनके साथ अशोभनीय व्यवहार करते हैं।

यदि आज भी 100 वर्ष पूर्व की सामाजिक स्थिति होती तो आज शायद जो समाज की व्यवस्था है, उस प्रकार की व्यवस्था कदापि न होती। पिछली सभी बातें स्वप्नवत् प्रतीत होती हैं। जिस प्रकार की आज की सामाजिक परिस्थितियाँ हैं, उन्हीं के कारण आजकल लूटपाट, हत्याएँ एवं चोरी-डकैती व अन्याय अत्याचार होते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आज की सामाजिक परिस्थितियाँ इतनी घणित एवं अशोभनीय हो गयी हैं कि हमारा मस्तक लज्जा से झुक जाता है। आज देश के उत्थान के लिए पुरानी प्रगतिशील मान्यताओं का अपनापन परम आवश्यक है। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
“परिवर्तन ही उन्नति है, तो अब क्यों बढ़ते जाते हैं।
किन्तु मुझे तो सीधे सच्चे पूर्ण भाव ही भाते हैं।।”

मेरे बचपन के दिन भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिएअनंत, निरपराधी, दण्ड, शांति।
उत्तर:
अनंत – अन्त, निरपराधी – अपराधी, दण्ड – पुरस्कार, शांति – अशांति।

प्रश्न 2.
निम्न शब्दों के सामने दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प लिखिए
(अ) निराहारी – (निर + आहार + ई) (निरा + हारी) (निराह + आरी)
(आ) अप्रसन्नता – (अप्र + सन्नता) (अ + प्रसन्नता) (अ + प्रसन्न + ता)
(इ) अपनापन – (अप + नापन) (अपन + आपन) (अपना + पन)
(ई) किनारीदार – (कि + नारी + दार) (किनारी + दार) (किना + रीदार)
उत्तर:
(अ) (निर + आहार + ई)
(आ) (अ + प्रसन्न + ता)
(इ) (अपना + पन)
(ई) (किनारी + दार)।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम, तद्भव तथा विदेशी शब्द पहचानकर लिखिए
दर्जे, मेज, जेब, छात्रावास, मित्र, हॉस्टल, प्रथम, कटोरा, भवन, खर्च, खीर, द्वंद, कपड़े, सपना।
उत्तर:
तत्सम शब्द – छात्रावास, मित्र, प्रथम, भवन।
तद्भव शब्द – खीर, सपना, द्वंद, कपड़े।
विदेशी शब्द – दर्जे, मेज, जेब, हॉस्टल, कटोरा, खर्च।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्द युग्मों में से पूर्ण पुनरुक्त, अपूर्ण पुनरुक्त, प्रतिध्वन्यात्मक शब्द और भिन्नार्थक शब्द छाँटकर लिखिए-
पहले-पहल, रोने-धोने, सुन-सुन, प्रचार-प्रसार, जहाँ-तहाँ, कुछ-कुछ, कपड़े-वपड़े, इकड़े-तिकड़े, बार-बार, मिली-जुली, ताई-चाची।
उत्तर:

  1. पूर्ण पुनरुक्त शब्द-सुन-सुन, कुछ-कुछ, बार-बार।
  2. अपूर्ण पुनरुक्त शब्द-पहले-पहल, प्रचार-प्रसार, जहाँ-तहाँ, मिली-जुली।
  3. प्रतिध्वन्यात्मक शब्द-रोने-धोने, कपड़े-वपड़े, इकड़े-तिकड़े।
  4. भिन्नार्थक शब्द-ताई-चाची।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के बीच योजक चिह्न (-) का प्रयोग किस स्थिति को स्पष्ट करता है-
कुल-देवी, दुर्गा-पूजा, जेब-खर्च, कवि-सम्मेलन।
उत्तर:

  1. कुल-देवी-कुल की देवी-सम्बन्धकारक योजक चिह्न
  2. दुर्गा-पूजा-दुर्गा की पूजा-सम्बन्धकारक योजक चिह्न
  3. जेब-खर्च-जेब का खर्च-सम्बन्धकारक योजक चिह्न
  4. कवि-सम्मेलन-कवियों का सम्मेलन-सम्बन्धकारक योजक चिह्न।

मेरे बचपन के दिन पाठ का सारांश

महादेवी वर्मा संस्मरण एवं रेखाचित्रों की सुप्रसिद्ध लेखिका हैं। प्रस्तुत “मेरे बचपन के दिन” नामक संस्मरण में उन्होंने जो पारिवारिक, शैक्षिक एवं सामाजिक सम्बन्धों के हृदयस्पर्शी एवं भावपूर्ण चित्र उकेरे हैं, वे मर्मस्पर्शी हैं।

संस्मरण में धर्मों एवं भाषा बोली की समरसता का अत्यन्त ही भावपूर्ण अंकन है। संस्मरण में पूज्य बाबू द्वारा लेखिका को दिये गये पुरस्कार स्वरूप मिले चाँदी के कटोरे को बाप के माँग लेने का अत्यन्त ही हृदयस्पर्शी चित्रण है।

संस्मरण में सुभद्रा कुमारी चौहान तथा जेबुन्निसा एवं जवारा नबाव के परिवार के साथ सम्बन्धों का उल्लेख है। अध्ययन करते समय लेखिका जिन लड़कियों के सम्पर्क में आयी, उनका भी विवरण है। स्वतन्त्रता आन्दोलन की भी चर्चा है।

मेरे बचपन के दिन कठिन शब्दार्थ

बचपन = बाल्यावस्था। विचित्र = अनोखा। आकर्षण = लगाव। उत्पन्न = पैदा। अवश्य = जरूर। वश = सामर्थ्य। उपरान्त = बाद में। साथिन = सहेली, सहयोगी। तलाशी = ढूँढ़ना। मित्रता = दोस्ती। बेचैनी = व्याकुलता। पुरस्कार = इनाम, उपहार। हमेशा = सदैव। प्रसन्नता = खुशी। अवकाश = छुट्टी। विवाद = तर्क। इकड़े-तिकड़े = इधर-उधर। मुहर्रम = मुसलमानों का त्यौहार । दुल्हन = वधू। लोकर-लोकर = मराठी मूलशब्द अर्थात् जल्दी-जल्दी। नेग = मांगलिक अवसरों पर सगे-सम्बन्धियों को उपहार देने की रस्म। निराहार = बिना भोजन के।

मेरे बचपन के दिन संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. हमारी कुल-देवी दुर्गा थीं। मैं उत्पन्न हुई तो मेरी बड़ी खातिर हुई। परिवार में बाबा फारसी और उर्द जानते थे। पिता ने अंग्रेजी पढ़ी थी। हिन्दी का कोई वातावरण नहीं था।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘मेरे बचपन के दिन’ नामक पाठ से अवतरित है। इसकी लेखिका महादेवी वर्मा हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में महादेवी ने अपने जन्म तथा परिवार के बारे में बताया है।

व्याख्या :
महादेवी वर्मा का जन्म दुर्गा जी की आराधना के बाद हुआ था। उनके जन्म से दो सौ वर्ष पूर्व तक उनके घर में कोई भी कन्या न थी। इसी कारण जब महादेवी वर्मा का जन्म हुआ सबसे पहले कुल देवी दुर्गाजी का पूजा-पाठ किया गया। उसके पश्चात् महादेवी को बहुत लाड़-प्यार से रखा गया। महादेवी वर्मा ने अपने बाबा के विषय में लिखा है। उनके बाबा को फारसी और उर्दू भाषा का ज्ञान था। इसके अतिरिक्त उनके पिताजी को केवल अंग्रेजी भाषा आती थी। इस प्रकार महादेवी वर्मा के परिवार में हिन्दी भाषा का कोई भी वातावरण नहीं था।

विशेष :

  1. भाषा सरल व सुबोध है, शैली विचारात्मक है।
  2. महादेवी वर्मा ने लड़कियों के महत्त्व को दर्शाने का प्रयत्न किया है।
  3. भाषा में प्रचलित शब्दों का व उर्दू शब्दों का प्रयोग है, जैसे-खातिर।”
  4. कुलदेवी में सामासिक पद है।

2. हम पढ़ते हिन्दी थे। उर्दू भी हमको पढ़ाई जाती थी, परन्तु आपस में हम अपनी भाषा में ही बोलती थीं। वह बहुत बड़ी बात थी। हम एक मेस में खाना खाते थे, एक प्रार्थना में खड़े होते थे, कोई विवाद नहीं होता था। (2010)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में महादेवी वर्मा ने छात्रावास के आदर्श एवं सद्भावना के वातावरण का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
जब महादेवी वर्मा छात्रावास में रह रही थीं, उस समय अध्ययन करने वाली सहयोगी छात्राओं में जाति सम्बन्धी एवं भाषा विषयक भेदभाव तनिक भी विद्यमान नहीं था। सब अपनी-अपनी भाषाओं का स्वतन्त्रतापूर्वक निसंकोच प्रयोग करते थे।

उस समय विद्यालय में हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू भाषा की भी शिक्षा प्रदान की जाती थी। प्रान्तीयता की भावना छात्राओं के मन-मानस में न थी। वार्तालाप में छात्राएँ अपनी भाषा का प्रयोग करती थीं। मेस में हम सभी एक साथ बैठकर भोजन करते थे। प्रार्थना भी सम्मिलित रूप से होती थी। सब तर्क-वितर्क से कोसों दूर थे। सब प्रेम के सूत्र में आबद्ध होकर जीवन-यापन करते थे।

विशेष :

  1. छात्रावास के आदर्श वातावरण का चित्रण है।
  2. शैली सरल व सुबोध है।
  3. एकता की भावना का प्रतिपादन है।

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3. उनके यहाँ भी हिन्दी चलाई जाती थी, उर्दू भी चलती थी। यों, अपने घर में वे अवधी बोलती थीं। वातावरण ऐसा था उस समय कि हम लोग बहुत निकट थे। आज की स्थिति देखकर लगता है, जैसे वह सपना ही था। आज वह सपना खो गया है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश के द्वारा महादेवी वर्मा ने अपने बाल्यकाल की, परिवार एवं समाज की झाँकी प्रस्तुत करके यह बताने का प्रयत्न किया है, कि उनके समय में वातावरण बहुत सौहार्द्रपूर्ण था।

व्याख्या :
महादेवी वर्मा ने इस गद्यांश में अपने भाई प्रोफेसर मनमोहन वर्मा के विश्वविद्यालय की स्थिति का वर्णन करते हुए बताया है। प्रोफेसर मनमोहन वर्मा का नाम बचपन में बेगम साहिबा ने रखा। उनका नाम सदैव वही रहा, क्योंकि हमारे मन में कोई भी जातिवाद की भावना न थी। जिस प्रकार घरों में जाति-पाँति का भेदभाव न था उसी प्रकार विद्यालयों में भी भाषागत भेदभाव न था। प्रोफेसर मनमोहन के विद्यालय में भी हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाएँ सिखाई जाती थीं जबकि हम लोग घर पर परस्पर अवधी भाषा का प्रयोग करते थे।

इस प्रकार भाषा प्रयोग के लिए किसी पर कोई भी रोक-टोक न थी। परिवार और समाज में एक-दूसरे के प्रति सद्भावना और अत्यधिक स्नेह था। सभी आपस में एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे। परन्तु आज समाज में परिवारों एवं समाज में जातिगत एवं भाषागत भेद-भाव और आपसी मनमुटाव को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वे सब बातें स्वप्नवत् थीं। जिस प्रकार स्वप्न नींद खुलने के बाद टूट जाता है उसी प्रकार पिछली बातें स्वप्नवत् ही प्रतीत होती हैं, क्योंकि पूर्व जैसी स्थिति आज न तो परिवार में दिखायी देती है न ही विद्यालयों में।

विशेष :

  1. महादेवी वर्मा ने अपने समय के वातावरण की तुलना आज के समाज से की है।
  2. भाषा-शैली गंभीर एवं चिंतन प्रधान है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 7 मर्यादा

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 7 मर्यादा

मर्यादा अभ्यास

मर्यादा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मर्यादा’ एकांकी में निहित है (2009)
(अ) सामाजिक आदर्श
(ब) पारिवारिक आदर्श
(स) सांस्कृतिक आदर्श
(द) धार्मिक आदर्श।
उत्तर:
(ब) पारिवारिक आदर्श।

प्रश्न 2.
इनमें से किस ग्रन्थ में पारिवारिक मर्यादा का सर्वोत्तम उदाहरण देखने को मिलता है?
(अ) गीता
(ब) रामायण (रामचरितमानस)
(स) कामायनी
(द) कठोपनिषद।
उत्तर:
(ब) रामायण (रामचरितमानस)।

प्रश्न 3.
संयुक्त परिवार की नींव है
(अ) सद्भाव और त्याग
(ब) भाईचारा
(स) परस्पर भावनाओं का सम्मान
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

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प्रश्न 4.
परिवार चलता है”
(अ) धन से
(ब) परिश्रम से
(स) सूझबूझ से
(द) इन सबके सामंजस्य से।
उत्तर:
(द) इन सबके सामंजस्य से।

प्रश्न 5.
जोड़ी बनाइएकिसको किस चीज का घमण्ड था?
जगदीश – डॉक्टर होने का
प्रदीप – सबसे अधिक कमाने का
विनय – सूझ-बूझ का
अशोक – परिश्रम का
उत्तर:
जगदीश – सूझ-बूझ का।
प्रदीप – परिश्रम का।
विनय – डॉक्टर होने का।
अशोक – सबसे अधिक धन कमाने का।

प्रश्न 6.
सुमन कौन थी और वह जगदीश के घर क्यों आई थी? (2015)
उत्तर:
सुमन जगदीश के छोटे भाई की पुत्री थी। वह जगदीश के घर रामायण सुनने के लिए आई थी।

प्रश्न 7.
रीता अपने जेठ जी जगदीश के घर क्यों आई थी?
उत्तर:
रीता का पति तीन वर्ष के लिए अमेरिका चला गया था। अत: रीता अपने जेठ जी जगदीश के घर रहने आई थी।

प्रश्न 8.
प्रदीप किस बात को कहने में शर्म अनुभव कर रहा था?
उत्तर:
प्रदीप को यह बात कहने में शर्म अनुभव हो रही थी कि उनका अपना गुजारा भी नहीं चलता था। किसी अन्य व्यक्ति को किस प्रकार संरक्षण दे पायेगा।

प्रश्न 9.
सुमन के ताऊजी और ताईजी के नाम लिखिए। (2016)
उत्तर:
सुमन के ताऊजी का नाम जगदीश और ताईजी का नाम मालती है।

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मर्यादा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सपना देखने से पहले जगदीश क्या सोचता था?
उत्तर:
सपना देखने से पहले जगदीश सोचता था कि एक को कमाने का घमण्ड है, दूसरे को परिश्रम का, तीसरे को डॉक्टरी का, पर यह कोई जानता है कि यह घर मेरी सूझ-बूझ, मेरे प्रभाव के कारण चल रहा है। दूर-दूर तक मेरी पहुँच है। बड़े से बड़ा काम मैं देखते-देखते कर लेता हूँ।

प्रश्न 2.
प्राचीन संयुक्त परिवार के सदस्य किस प्रकार रहते थे? (2008)
उत्तर:
संयुक्त परिवार में परिवार के सभी सदस्य मिल-जुलकर रहते थे। परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति मुखिया होता था। परिवार के समस्त सदस्यों को उसकी आज्ञा माननी पड़ती थी। सभी कार्यों में मुखिया की अनुमति अनिवार्य थी। मुखिया को परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के प्रति प्रेम, सद्भावना बनाये रखने के लिए मर्यादा का पालन करना पड़ता था। एकमात्र मुखिया पर सम्पूर्ण परिवार निर्भर रहता था। सम्पूर्ण परिवार को एकसूत्र में बाँधने की जिम्मेदारी मुखिया की होती थी। संयुक्त परिवार में दादी, बाबा, चाचा, चाची, बेटे, बहुएँ एवं उन सबकी सन्तानें मिलकर रहती थीं।

मर्यादा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिखरे हुए परिवार को फिर एक होने में कौन-सी घटनाएं सहायक सिद्ध होती हैं? (2013)
उत्तर:
बिखरे हुए परिवार को फिर से एक होने में बहुत-सी छोटी-छोटी घटनाएँ सहायक सिद्ध होती हैं। प्रस्तुत एकांकी में बताया है कि परिवार विभाजन के उपरान्त छोटे भाई की पुत्री सुमन सुबह-सुबह रामायण सुनने के लिए अपने ताऊजी एवं ताईजी के पास आ जाती है। सुमन से पूछने पर पता चला कि उसके पापा ने उसे घर से भगा दिया क्योंकि वह प्रतिदिन पापा से रामायण की माँग करती थी। इस पर ताऊजी ने कहा-“हाँ, हाँ जा। जा तू रामायण सुन, मैं तेरे बाप के पास जाता हूँ। वाह वा। बच्चे को इस तरह ताड़ते हैं क्या समझा है उसने। समझ लिया कि अलग हो गये तो जैसे मैं मर गया। कोई बात है वाह ……… वा ………..

इसके पश्चात् जब छोटा भाई प्रदीप मिलता है तो बड़े भाई से कहता है-
“क्या बताऊँ-(एकदम) आप उसे यहीं रख लीजिये, वह आपके बिना नहीं रह सकती।” इस प्रकार की बातें परिवार को एकसूत्र में पुनः बाँधने में सहायक हैं।

छोटा भाई विनय जब विदेश में डाक्टरी पढ़ने जाता है तब यह प्रश्न उठता है कि उसकी बहू एवं बच्चों की देखभाल कौन करेगा। शर्म के कारण वह अपने भाई को पत्र में लिखकर भेजता है। इस बात को सुनकर बड़ा भाई जगदीश कहता है-
“प्रदीप, उसे लिख दो कि वह निश्चिन्त होकर अमेरिका जाये। उसकी बहू और बच्चे मेरे पास रहेंगे।”
यह घटना एक बार फिर से परिवार को बिखरने से रोकने में सहायक सिद्ध होती है।

जगदीश का भाई प्रदीप अपनी आर्थिक परेशानी का वर्णन अपने बड़े भाई से करता है तब वह उससे इस प्रकार कहता है-
“वाह-वा शर्म भी क्या पुरुषों का आभूषण है? अरे पागल यह बड़ा अच्छा अवसर है तीन वर्ष के लिए तू भी आ जा।” इसके पश्चात् अन्य घटना है।

जब जगदीश और प्रदीप आपस में बातें कर रहे थे तब उस वक्त वहाँ रीता का प्रवेश होता है। रीता तेजी से एकदम घबराई हुई वहाँ आती है और बताती है कि “परसों अनिल छत से गिर गया है और उसकी पैर की हड्डी टूट गई जिससे उसे ढाई महीने का प्लास्टर लगाया जाएगा।”

वह आगे बताती है कि वह परसों से अपने ताऊजी एवं ताईजी को याद कर रहा है। किसी की कोई बात नहीं सुनता। यह बात सुनकर जगदीश बहुत दुःखी होता है। वह कहता है-
“अनिल मुझे पुकारता रहा, और उसकी आवाज मुझ तक नहीं पहुँचने दी गई। यह सब क्या हो गया? अलग होते सब एक दूसरे के दुश्मन हो गए।”

यह सुनकर रीता बताती है कि उसे अस्पताल ले गए। उसके प्लास्टर लगवा दिया है लेकिन उसके पास अस्पताल में रुकने के लिए कोई नहीं है। वह कहती है कि-
“आज तो जानते हो इन्हें एक क्षण की भी फुर्सत नहीं मिलती है और मुझे सभा-सोसाइटी का काम रहता है।”
इस पर मालती कहती है कि “भला छोटा-सा बच्चा बिना अपनों के अस्पताल में कैसे रहेगा।”

रीता की बातें सुनकर जगदीश को क्रोध आता है। वह रीता से कहता है कि-
“भाई साहब ! कौन भाई साहब ! किसका भाई साहब ! भाई साहब होता तो परसों ही मैं अनिल के पास होता ! बहुत कमाते हो, जाओ बच्चों को घर ले आओ। एक नर्स रख लो ! नौकर रख लो।”

जब मालती से रहा नहीं गया तो वह कहती है-
“मैं चल रही हूँ, अस्पताल अनिल के पास। मैं अनिल को यहाँ ले आऊँगी, मैं देखभाल करूँगी उसकी, देखती हूँ कौन रोकता है मुझे।”
इस तरह आपस में वाद-विवाद चलता है। आखिर जगदीश मान जाता है। वह अनिल को लाने के लिए तैयार हो जाता है।

इससे रीता को अहसास होता है कि वह गलत थी। वह कहती है कि-
“मैं जान गई हूँ। मान गई हूँ मैं कि पैसा सब कुछ नहीं होता है।”
उपर्युक्त सभी घटनाएँ परिवार को एकसूत्र में पिरोने के लिए सहायक सिद्ध हुईं।

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प्रश्न 2.
एकांकी में उल्लेखित चौपाइयों के आधार पर रामचन्द्र जी और भरत जी की भेंट का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी में एकांकीकार ने भरत जी एवं रामचन्द्र जी की भेंट का जो चित्र प्रस्तुत किया है वह हृदयस्पर्शी एवं मार्मिक है। भरतजी की राम के प्रति जो निष्ठा है वह अनन्य एवं प्रशंसनीय है। स्वार्थ की भावना से वे कोसों दूर हैं। उनका स्वभाव छल-कपट से परे है। इसी कारण माताओं का उनके प्रति राम जैसा अनुराग ही है।
प्रस्तुत चौपाई इस सत्य को प्रमाणित करती है-
सरल सुभाय माय हित लाये।
अति हित मनहुँ राम फिर आये ।।
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई।
सोकु सनेहु न हृदय समाई ॥

राम के वन गमन करने पर भरत प्रतिपल उनके विरह में व्यथित रहते हैं। येन-केन-प्रकारेण उनकी यह भावना है कि राम से किस प्रकार भेंट हो। वे राम से मिलने के लिए वन में प्रस्थान करते हैं। राम से भेंट के समय उनका हृदय गद्-गद् था। नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। राम से गले मिलते समय अभिभूत होकर उनके चरणों में गिर पड़े। भगवान् राम ने भरत को हृदय से लगा लिया। पर भरत के निम्न उद्गार दृष्टव्य हैं भरत बोले “मेरा स्थान यहाँ नहीं है मेरा स्थान तो आपके चरणों में है।” फिर वे भगवान के चरणों में पड़ गये-
“बरबस लिए उठाय उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥”

प्रस्तुत एकांकी के माध्यम से विष्णु प्रभाकर ने,यह सन्देश देने का प्रयास किया है कि भरत और राम की भाँति ही परिवार के सभी भाइयों में स्नेह, त्याग एवं अपनत्व की भावना विद्यमान रहनी चाहिए। इस भावना से ही परिवार में निरन्तर स्नेह और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण पल्लवित हो सकता है। लेखक ने एकांकी के माध्यम से संयुक्त परिवार के महत्त्व को प्रदर्शित किया है।

प्रश्न 3.
“अब हम किसी एक के नहीं रहेंगे एक-दूसरे के होंगे।” इस कथन के आधार पर संयुक्त परिवार की आधारशिला को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी में यह स्पष्ट है कि संयुक्त परिवार हमेशा सम्पन्न तथा खुशहाल होता है। संयुक्त परिवार में सब एक-दूसरे की सहायता करते हुए नजर आते हैं। वह स्वयं अपने आप में एक पूर्ण समाज के रूप में स्थापित रहता है। प्रस्तुत एकांकी में यह बताया गया है कि जब जगदीश के पास प्रदीप, रीता और सुमन आते हैं तो अपनी-अपनी परेशानी जगदीश को बताते हैं। सुमन रामायण सुनने आती है।

प्रदीप अपने बड़े भाई से कहता है भाईसाहब आप इसे अपने पास ही रखें। यह आपके बिना नहीं रह सकती। उसी समय रीता अनिल के गिरने की खबर लाती है तथा वह यह कहना चाहती है कि अनिल को जगदीश भाईसाहब अपने पास ही रखें। क्योंकि वह दिन भर ताऊजी की रट लगाये रहता है। भाईसाहब के पास रहने से उसकी देखभाल अच्छी तरह से हो जायेगी और अनिल का मन भी लगा रहेगा।

जब सुमन और जगदीश साथ-साथ रहते हैं तब वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि हम समस्त परिवार के लिए ही जियेंगे। हम एक-दूसरे की दुःख-सुख में सहायता करेंगे। यही हमारा नैतिक धर्म हो ऐसा करके हमें प्रसन्नता का अनुभव होगा।

एकांकी का उद्देश्य है कि संयुक्त परिवार की परम्परा निरन्तर बनी रहे। परिवार सदा एक सूत्र में बँधा रहे। वह कभी टूटे नहीं और न ही किसी प्रकार का द्वेष एक-दूसरे प्रति आये। सब एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहें। इस प्रकार जगदीश का स्वप्न पूरा करने के लिए चारों भाई एक साथ खड़े हो गये। संयुक्त परिवार में यदि एकता हो तो वह कदापि टूटता नहीं है।

प्रश्न 4.
निम्नांकित गद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) अपना मन नहीं ………………………… उनकी आन थी।
(आ) आज के जमाने ……………………. लेना नहीं चाहते।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक की ‘मर्यादा’ नामक एकांकी से अवतरित है। इसके लेखक ‘विष्णु प्रभाकर’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत कथन मालती का अपने पति जगदीश के व्यवहार पर आधारित है। संयुक्त परिवार में सब लोग हिलमिल कर रहते थे तथा सबकी भावनाओं का ध्यान रखते थे।

व्याख्या :
मालती कह रही है संयुक्त परिवार का वातावरण प्रेम तथा त्याग की भावना पर आधारित था। अपने मन की भावनाओं को दृष्टिपथ में रखते हुए परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति भी उदार एवं सहृदय थे। संयुक्त परिवार के लोग स्वयं के लिए जीवित न रहकर परिवार के अन्य व्यक्तियों के लिए भी हित साधन में जुटे रहते थे। उनकी दृष्टि में कुटुम्ब ही सर्वोपरि था। अत: कुटुम्ब की मर्यादा को वे स्वयं ही मर्यादा ठहराते थे।

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जगदीश एवं उसकी पत्नी मालती के परिवार के विषय में उनके हृदयगत भावों का विवेचन है।

व्याख्या :
जगदीश का कथन है वह युग बीत गया जब मनुष्य बिना विचारे भेड़-बकरी की भाँति आचरण करते थे। आज का मानव चिन्तनशील एवं विवेक प्रधान है। वह सोच-समझकर ही किसी कार्य को करता है। वह स्वावलम्बी है। उसे दूसरों का सहारा लेकर जीवित रहना श्रेयस्कर प्रतीत नहीं होता। प्रदीप से जगदीश ने पूछा कि विनय ने अपने पत्र में क्या लिखा है ? इस सन्दर्भ में जानकारी लेने हेतु मैं जिज्ञासु हूँ।

प्रश्न 5.
इन पंक्तियों का भाव पल्लवन कीजिए (2008)
(अ) आज तो मर्यादाओं को फिर से पहचानना है।
(आ) वह जमाना लद गया जब एक का हुक्म चलता था।
(इ) कोई भी वस्तु अपने आप में सब कुछ नहीं है।
उत्तर:
भाव पल्लवन-
(अ) इस पंक्ति का आशय है कि आज का जमाना वह नहीं जब मनुष्य अपनी मर्यादा के लिए कुछ भी कर सकता है। आज व्यक्ति अपनी मर्यादा को भूलकर अपने स्वार्थ के लिए जी रहा है। जगदीश अपने बिखरे परिवार से बहुत दुःखी होते तथा वह स्वयं से कहते हैं। आज रामायण व महाभारत का युग नहीं जहाँ मनुष्य मर्यादा को जानता था। आज मनुष्य को अपनी मर्यादा की सीमा को एक बार फिर जानना पहचानना है।

(आ) मर्यादा नामक एकांकी में यह बताया है कि पहले जमाने में संयुक्त परिवारों में मुखिया होता था। वह घर के सदस्यों के लिए अपने आप नियम और शर्ते तय करता था। वह जो कह देता था वह पत्थर की लकीर होती थी। वहाँ कोई व्यक्ति स्वयं अपनी मर्जी से कुछ नहीं करता था। आज के जमाने में कोई किसी की इच्छा से अपना जीवन नहीं बिताना चाहता; न कोई किसी का हुक्म मानना चाहता। सब मनुष्य अपनी इच्छा का कार्य करना चाहते हैं।

(इ) प्रस्तुत एकांकी में लेखक यह कहना चाहता है कि मनुष्य कभी स्वयं में पूरा नहीं होता। उसे समय पर एक-दूसरे की आवश्यकता पड़ती है। किसी का किसी के बिना पूर्ण रूप नहीं होता है। मनुष्य स्वयं कभी कुछ नहीं कर सकता। उसे किसी न किसी सहारे की जरूरत होती है। संयुक्त परिवार भी कभी पूरा नहीं होता है और एकल परिवार भी कभी पूरा नहीं होता है। अतः लेखक कहना चाहता है कि कभी व्यक्ति को घमण्ड नहीं करना चाहिए।

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मर्यादा भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी रूप लिखिएगुलाम, कोशिश, खर्च, दुश्मन, चिट्ठी, औलाद, शर्म।
उत्तर:
गुलाम-दास; कोशिश-प्रयत्न; खर्च-व्यय; दुश्मन-शत्रु; चिट्ठी-पत्र; औलाद-सन्तान; शर्म-लज्जा।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
(अ) जिसे जीता न जा सके।
(आ) जिसके समान दूसरा न हो।
(इ) जो परिश्रम करने वाला हो।
(ई) जिसका कोई शुल्क न देना पड़े।(2016)
(उ) जिस स्त्री का पति मर गया हो।
(ऊ) जिसका बहुत प्रभाव हो।
उत्तर:
(अ) अजेय
(आ) अद्वितीय
(इ) परिश्रमी
(ई) निःशुल्क
(उ) विधवा
(ऊ) प्रभावशाली।

प्रश्न 3.
नीचे कुछ शब्द और उनके विलोम दिये गये हैं। आप शब्द और उनके विलोम की सही जोड़ी बनाइए
कठोर, गलत, कोमल, सही, सबल, सच, दुर्बल, खाद्य, उन्नति, अवनति, अखाद्य, झूठ।
उत्तर:
कठोर – कोमल
गलत – सही
सबल – दुर्बल
सच – झूठ
खाद्य – अखाद्य
उन्नति – अवनति

प्रश्न 4.
निम्नलिखित लोकोक्तियों का अपने वाक्यों में प्रयोग करो।
उत्तर:
(1) अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
वाक्य प्रयोग – कोई भी व्यक्ति अकेले कुछ नहीं कर सकता है, जैसे-अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है।

(2) आम के आम गुठलियों के दाम।
वाक्य प्रयोग – समाचार-पत्र पढ़ लिया तथा उनकी रद्दी भी बेच दी। यह बात आम के आम गुठलियों के दाम के सदृश प्रमाणित हुई।

(3) ऊँची दुकान फीके पकवान।
वाक्य प्रयोग – सेठ दौलतराम नाम से ही दौलतराम है। वहाँ जाकर पता चला कि ऊँची दुकान फीके पकवान वाली बात है।

(4) खोदा पहाड़ निकली चुहिया।
वाक्य प्रयोग – हम ओरछा से कठिन यात्रा करके ऊटी घूमने के लिए गये परन्तु वहाँ जाकर पता चला कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

(5) नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
वाक्य प्रयोग – रेखा को रसोई में सब्जी बनानी नहीं आई तो उसने सब्जियों में ही मीन-मेख निकालना शुरू कर दिया। इस पर तो नाच न जाने आँगन टेढ़ा वाली बात सही बैठती है।।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्य पंक्तियों में यथास्थान विराम-चिह्नों का प्रयोग कीजिए।
(अ) जगदीश तीव्रता से बन्द करो चुप हो जाओ मैं एक को भी नहीं जाने दूंगा अभी नहीं जाने दूंगा देखूगा कैसे घर से दूर जाता है-कैसे
(आ) जगदीश और प्रकाश मंजू किशोर और इलाहाबाद वाली ताई और सुधीर पप्पू कुणाल ये सब अच्छे नहीं हैं इन्हें तू प्यार नहीं करेगी।
उत्तर:
(अ) जगदीश-(तीव्रता से) बन्द करो, चुप हो जाओ, मैं एक को भी नहीं जाने दूंगा। अभी नहीं जाने दूंगा, देखेंगा, कैसे कोई घर से दूर जाता है ………. कैसे?
(आ) जगदीश-और प्रकाश, मीना, मंजू, किशोर और इलाहाबाद वाली ताई और सुधीर, पप्पू, कुणाल, ये सब अच्छे नहीं हैं? इन्हें तू प्यार नहीं करेगी?

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्द युग्मों के सामने कुछ विकल्प दिये गये हैं, आप सही विकल्प का चयन कीजिए
(क) कभी-कभी (सामासिक पद, द्विरुक्ति)
(ख) माँ-बाप (द्विरुक्ति, सामासिक पद)
(ग) सूझ-बूझ (अपूर्ण पुनरुक्त शब्द, पूर्ण पुनरुक्त शब्द)
(घ) देखते-देखते (अपूर्ण पुनरुक्त शब्द, पूर्ण पुनरुक्त शब्द)।
उत्तर:
(क) कभी-कभी – द्विरुक्ति पद।
(ख) माँ-बाप – सामासिक पद।
(ग) सूझ-बूझ – अपूर्ण पुनरुक्त शब्द।
(घ) देखते-देखते – पूर्ण पुनरुक्त शब्द।

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मर्यादा पाठका सारांश 

विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित मर्यादा एकांकी की कथावस्तु एक ऐसे संयुक्त परिवार से सम्बन्धित है जो पूर्णरूप से बिखरा हुआ है। एकांकी का प्रमुख पात्र जगदीश है। प्रदीप, विनय एवं अशोक जो जगदीश के भाई हैं अत्यन्त ही स्वार्थी प्रवृत्ति के हैं। हर भाई परिवार के प्रति स्वयं को ही समर्पित मानता है। जगदीश भी इस भावना से मुक्त नहीं है। इसी के फलस्वरूप परिवार की एकता छिन्न-भिन्न हो जाती है। इसका यह परिणाम निकलता है कि बालक संयुक्त परिवार के प्यार एवं निरीक्षण से वंचित हो जाते हैं। सुमन एवं अनिल इस बात के साक्षी हैं।

जगदीश उदार हृदय वाला है। वह अपने भाइयों की भूलों को क्षमा कर देता है। निष्कपट प्रेम और स्वार्थ को तिलांजलि देने पर ही परिवार मिल-जुलकर रह सकता है। इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने पुनः संयुक्त परिवार की महत्ता को प्रतिपादित किया है।

मर्यादा कठिन शब्दार्थ

पहरुए = पहरेदार। इच्छाओं का दमन करना = इच्छाओं को रोकना, आत्मनियन्त्रण करना। घमण्ड = गर्व। निःश्वास = दीर्घ साँस लेना। निर्मम = निष्ठुर, कठोर। खास तौर = मुख्य रूप से। दुश्मन = शत्रु। सुभाय = स्वभाव। ताड़ना = डाँट-फटकार। कुबेर = देवताओं के कोषाध्यक्ष। बजीफा = छात्रवृत्ति। मंजूषा = पेटी। कॉरू = एक प्रसिद्ध राजा मूसा का चचेरा भाई जो बहुत धनवान पर बड़ा कंजूस था। बिसराई = भूल जाना। औलाद = सन्तान। दुर्बल = कमजोर । इन्सान = व्यक्ति।

मर्यादा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. “अपना मन मारते नहीं थे, दूसरों का मन रखते थे। वे अपने लिए नहीं दूसरों के लिए, कुटुम्ब के लिए जीते थे। कुटुम्ब उनके लिए सब कुछ था। कुटुम्ब की आन उनकी आन थी। (2010)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक की ‘मर्यादा’ नामक एकांकी से अवतरित है। इसके लेखक ‘विष्णु प्रभाकर’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत कथन मालती का अपने पति जगदीश के व्यवहार पर आधारित है। संयुक्त परिवार में सब लोग हिलमिल कर रहते थे तथा सबकी भावनाओं का ध्यान रखते थे।

व्याख्या :
मालती कह रही है संयुक्त परिवार का वातावरण प्रेम तथा त्याग की भावना पर आधारित था। अपने मन की भावनाओं को दृष्टिपथ में रखते हुए परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति भी उदार एवं सहृदय थे। संयुक्त परिवार के लोग स्वयं के लिए जीवित न रहकर परिवार के अन्य व्यक्तियों के लिए भी हित साधन में जुटे रहते थे। उनकी दृष्टि में कुटुम्ब ही सर्वोपरि था। अत: कुटुम्ब की मर्यादा को वे स्वयं ही मर्यादा ठहराते थे।

विशेष :

  1. भाषा सरल, सुबोध एवं प्रवाहपूर्ण है।
  2. संयुक्त परिवार के विषय में निम्नलिखित कथन देखिए-
    “कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है।”

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2. आज के जमाने में लोग भेड़-बकरी नहीं हैं। उनके दिमाग है, वे सोचते हैं, ………. समझते हैं। वे अपने पर निर्भर रहना चाहते हैं। दूसरों का सहारा लेना नहीं चाहते। ……..”हाँ प्रदीप ! क्या लिखा है, विनय ने?

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जगदीश एवं उसकी पत्नी मालती के परिवार के विषय में उनके हृदयगत भावों का विवेचन है।

व्याख्या :
जगदीश का कथन है वह युग बीत गया जब मनुष्य बिना विचारे भेड़-बकरी की भाँति आचरण करते थे। आज का मानव चिन्तनशील एवं विवेक प्रधान है। वह सोच-समझकर ही किसी कार्य को करता है। वह स्वावलम्बी है। उसे दूसरों का सहारा लेकर जीवित रहना श्रेयस्कर प्रतीत नहीं होता। प्रदीप से जगदीश ने पूछा कि विनय ने अपने पत्र में क्या लिखा है ? इस सन्दर्भ में जानकारी लेने हेतु मैं जिज्ञासु हूँ।

विशेष :

  1. आज का मनुष्य विवेकशील प्राणी है।
  2. वर्तमान युग में मानव स्वावलम्बी बनने का आकांक्षी है।
  3. भाषा बोधगम्य है। उर्दू शब्दों का प्रयोग है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 8 जीवन दर्शन

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 8 जीवन दर्शन

जीवन दर्शन अभ्यास

जीवन दर्शन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर कोष्ठक में दिए विकल्पों में हैं। सही विकल्प छाँटकर लिखिए
(अ) अंगद किसका पुत्र था? (राम, सुग्रीव, बालि)
(आ) बालि ने काँख में किसे छिपा लिया था? (सुग्रीव, रावण, अंगद)
(इ) ‘भृगुनन्दन’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? (परशुराम, राम, रावण)
(ई) ‘तुम पै धनु रेख गई न तरी’ किसके लिए कहा गया है? (राम, हनुमान, रावण)
(उ) ‘कवच-कुंडल’ दान किसने किए थे? (कर्ण, इन्द्र, अर्जुन)
उत्तर:
(अ) बालि
(आ) रावण
(इ) परशुराम
(ई) रावण
(उ) कर्ण

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जीवन दर्शन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कुछ न पाया जिन्दगी में-किसने, किस कारण कहा है? (2010, 14, 17)
उत्तर:
‘कुछ न पाया जिन्दगी में यह कथन कवि गिरिजा कुमार माथुर का है। वे समस्त जीवन भर दौड़-भाग करते रहे, किन्तु उन्हें ऐसा कुछ प्राप्त नहीं हुआ जिससे कह सकें कि उनके जीवन की यह उपलब्धि है। आशय यह है कि सारा जीवन जिस विश्वास के लिए खपा दिया, वह सब व्यर्थ गया। अब जीवन की अन्तिम अवस्था में खाली हाथ ही रह गये। कोई आश्रय भी नहीं है। अनाथ होकर भटकने को विवश है। विश्वास भी साथ छोड़ रहा है।

प्रश्न 2.
‘विश्वास की साँझ’ कविता के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
अथवा
‘विश्वास की साँझ’ कविता का मुख्य कथ्य क्या है? (2016)
उत्तर:
‘विश्वास की साँझ’ कविता में कवि कहना चाहता है कि व्यक्ति इस विश्वास के सहारे समस्त जीवन में अति सक्रिय रहकर दौड़-भाग करता रहता है कि उसे कुछ विशेष उपलब्धि होगी। वह कुछ ऐसा करेगा जो उल्लेखनीय होगा। यह लालसा ही उसे दिन-रात नाना प्रकार के कार्यों में व्यस्त रखती है। लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध के आते-आते उसके पास मात्र अपने होने का विश्वास मात्र रह जाता है और कुछ शेष नहीं बचता है। जिस संसार के लिए व्यक्ति भला-बुरा सब करता है, वह भी अलग हो जाता है। अन्तिम वास्तविकता अर्थात् मृत्यु से व्यक्ति को निहत्थे ही सामना करना पड़ता है। कोई साथ नहीं होता है, हाथ भी खाली होते हैं।

प्रश्न 3.
केशव की ‘रामचन्द्रिका’ में अंगद-रावण संवाद अधिक सुन्दर, स्वाभाविक और प्रभावशाली है। उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हिन्दी काव्य में जितने अच्छे संवाद केशव ने रचे हैं, उतने अन्यत्र दुर्लभ हैं। उनके संवादों में सजीवता, नाटकीयता तथा प्रति उत्पन्न मतित्व का सौन्दर्य सर्वत्र दिखाई पड़ता है। वाक्-चातुर्य, उत्साह, तत्परता, राजनीतिक सूझबूझ, शिष्टाचार आदि की सफलता ने संवादों को बहुत सुन्दर बना दिया है। व्यंग्य, संक्षिप्तता, स्वाभाविकता, पात्रानुकूलता आदि के संयोग से केशव के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हो गए हैं। केशव दरबारी कवि थे, उन्हें राज दरबार का पूरा ज्ञान था इसीलिए उनके संवादों में सभी प्रकार का कौशल स्पष्ट दृष्टिगत होता है। केशव के संवाद अनूठे हैं।

जीवन दर्शन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘अंगद-रावण संवाद’ शीर्षक में सभी संवाद पात्रों के अनुकूल हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कथोपकथन में पात्र का विशेष महत्त्व होता है। अत: यह आवश्यक है कि संवाद पात्र के स्तर के अनुरूप हों। केशव ने इन सभी बातों को ध्यान में रखकर संवाद-योजना की है। उनके संवाद पात्रों के मनोभावों एवं परिस्थितियों को स्पष्ट परिलक्षित करते हैं। उनके संवाद से पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का ज्ञान सहज ही हो जाता है। प्रस्तुत अंश में जहाँ अंगद का शिष्टाचार, वीरत्व, वाक्चातुर्य तथा भक्ति भाव व्यक्त होता है, वहीं रावण के कथन उसके अहंकारी चरित्र का स्पष्ट आभास कराते हैं। अंगद अपनी या अपने सहयोगियों की प्रशंसा न करके अपने स्वामी राम की महिमा को आधार बनाकर अपनी बात सशक्त रूप में रखता है, जबकि रावण कुण्ठाग्रस्त होकर अपनी प्रशंसा स्वयं ही करता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
“कौन के सुत” ‘बालि के’, ‘वह कौन बालि’, ‘नजानिए?’
काँख चापि तुम्हें जो सागर सात न्हात बखानिए।”
“है कहाँ वह बीर? अंगद “देवलोक बताइयो”
‘क्यों गयो? रघुनाथ बान बिमान बैठि सिधाइयो।’
इस तरह केशव के संवादों में पात्रानुकूलता की विशेषता सर्वत्र विद्यमान है।

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प्रश्न 2.
क्या विश्वास की साँझ’ कविता में निराशावाद है? तर्क सहित समझाइए।
उत्तर:
‘विश्वास की साँझ’ कविता में जीवन पर्यन्त सक्रिय एवं सचेष्ट रहने वाले व्यक्ति के विश्वास को जीवन के उत्तरार्द्ध में डगमगाते दिखाया गया है। आस्था एवं विश्वास के साथ कार्यशील रहने वाला कवि अब जीवन के आखिरी पड़ाव में पूर्व अनुभव करता है कि मैंने भाग-दौड़, हाय-हाय, काम-धाम करते-करते जीवन गँवा दिया और कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाया। मात्र एक विश्वास बचा था। नियति ने यह कहकर कि “जिन्दगी में साथ देता है कभी कोई बशर, असलियत से युद्ध होता है निहत्था जान ले।” उस विश्वास को भी छीन लिया और नियति ने स्पष्ट कर दिया कि तू अपने आस्था और विश्वास सभी कवच-कुण्डल का दान कर दे।

जब जीवन में आस्था और विश्वास ही नहीं रहेगा तो जीवन की क्या सार्थकता होगी। व्यक्ति को हताशा आकर घेर लेगी। इससे स्पष्ट होता है कि इस कविता में निराशावाद का निरूपण हुआ है।

प्रश्न 3.
सन्दर्भ सहित व्याख्या लिखिए
(अ) नियति बोली, आस्था वाले
अरे ओ होश कर
जिन्दगी में साथ देता है
कभी. कोई बशर।
असलियत से युद्ध होता है
निहत्था जान ले।

(आ) सिन्धु तर्यो उनको वनरा तुम पै धनु रेख गई न तरी।
बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यो, उन बारिधि बाँधिकै बाट करी
अजहूँ रघुनाथ प्रताप की बात तुम्हें दसकंठ न जानि परी।
तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराइ जरी।।
उत्तर:
इन पद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग में पढ़िए।

जीवन दर्शन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिएसाँझ, न्हात, जित्यो, जरी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 8 जीवन दर्शन img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित काव्यांशों में अलंकार पहचान कर लिखिए
(अ) कौन के सुत? बालि के, वह कौन बालि? न जानिए?
(आ) बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यों, उन वारिधि बाँधि के बाट करी।
(इ) तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराइ जरी।
उत्तर:
(अ) अनुप्रास
(आ) अनुप्रास
(इ) यमक।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्यांशों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
(क) असलियत से युद्ध होता है निहत्था जान ले।
इसलिए तू पूर्व इसके कवच कुंडल दान दे।
(ख) आज तक मानी नहीं, वह आज मानी हार।
(ग) हैहय कौन? वहै बिसर्यो जिन खेलत ही तोहि बाँधि लियो।
उत्तर:
इन काव्यांशों का काव्य-सौन्दर्य पाठ के सन्दर्भ प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से सम्बन्धित काव्यांश की व्याख्या के काव्य सौन्दर्य से पढ़िए।

प्रश्न 4.
‘अंगद-रावण संवाद’ काव्यांश में से उन पंक्तियों को लिखिए जिनमें रौद्र और वीर रस है।
उत्तर:
‘अंगद-रावण संवाद’ काव्यांश में से कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं जिनमें वीर एवं रौद्र रस है-
(क) काँख चापि तुम्हें जो सागर सात न्हात बखानिए।
(ख) ‘हैहय कौन?’ वहै विसर्यो जिन खेलत ही तोहि बाँधि लियो।
(ग) तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराई जरी।
(घ) छत्र विहीन करी छन में छिति गर्व हर्यो तिनके बल कौ रे।

प्रश्न 5.
‘विश्वास की साँझ’ कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए कि जीवन में आस्था और विश्वास जैसे भाव मानव को त्याग की ओर प्रेरित करते हैं।
उत्तर:
व्यक्ति को जीवन में कार्य करने की शक्ति आस्था और विश्वास प्रदान करते हैं। ये ही विषम से विषम स्थिति में भी मनुष्य को संघर्ष का साहस देते हैं। किन्तु जीवन के उत्तरार्द्ध में एक ऐसी स्थिति भी आती है, जब आस्था और विश्वास जैसे भाव मानव को त्याग की ओर प्रेरित करते हैं। आखिरी समय में अनाथ होने पर आस्था और विश्वास भी डगमगाने लगते हैं और जीवन से पलायन की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों में निहित शब्द शक्ति का नाम लिखिए
(क) कौन के सुत? बालि के
(ख) ‘है कहाँ वह वीर? अंगद ‘देवलोक बताइयो।’
(ग) ‘बालि बली’, ‘छल सों’।
‘भृगुनन्दन गर्व हर्यो’, ‘द्विज दीन महा’।
(घ) ‘सिन्धु तरयो उनको वनरा, तुम पै धनु रेख गई न तरी।’
उत्तर:
(क) अभिधा
(ख) लक्षणा
(ग) लक्षणा
(घ) व्यंजना।

अंगद-रावण संवाद भाव सारांश

रीतिकाल के आचार्य केशवदास की ‘रामचन्द्रिका’ में मानवीय व्यवहारों का सुन्दर समायोजन हुआ है। ‘रावण अंगद संवाद’ शीर्षक इसी श्रेष्ठ महाकाव्य से संकलित है।

प्रस्तुत अंश में रावण-अंगद के सटीक संवादों का सौन्दर्य अवलोकनीय है। जहाँ रावण का अहंकारी रूप प्रतिध्वनित है वहीं अंगद नैतिक व्यक्तित्व वाले राम भक्त सिद्ध होते हैं। जैसे ही अंगद रावण के दरबार में पहुँचते हैं तो रावण उनसे परिचय पूछता है। वे उसी परिचयात्मक वार्तालाप में ही रावण की हीनताओं को व्यंजित कर देते हैं। जब अंगद ने अपना नाम बताते हुए कहा कि मैं बालि का पुत्र हूँ तो रावण पूछ बैठे कौन बालि तो अंगद उसे बताते हैं कि तुम बालि को नहीं जानते? ये वहीं हैं जिन्होंने तुम्हें अपनी बगल में दबाकर सप्त सागरों का स्नान किया था। राम के बाण से उनका वध हो गया है।

जब रावण ने पूछा लंका स्वामी कौन है तो अंगद ने कहा विभीषण। तुम्हें जीवित कौन कहता है? तुम अपनी सुबुद्धि से काम लो और राजाधिराज राम के पैरों पड़कर क्षमा माँग लो वे तुम्हें राज्य, कोष आदि सब देकर सीता को लेकर शीघ्र अपने घर चले जायेंगे।

यह सुनकर रावण अहं से भरकर कहता है कि संसार तथा लोकपाल आदि की सीमाएँ हैं। ये सब विष्णु भगवान की रक्षा में रहते हैं किन्तु देव, देवेश आदि का संहार शिवजी मात्र भ्रू भ्रंग द्वारा कर देते हैं। अतः मैं पैर पढूंगा तो शिव के पढूंगा अन्य के नहीं। वह कहता है राम में शत्रु पर विजय पाने की क्षमता ही नहीं है। अंगद बताते हैं राम ने परशुराम, सहस्रार्जुन आदि वीरों को पराजित किया है। सहस्रार्जुन ने तो खेल में तुमको बाँध लिया था।

राम महाप्रतापी हैं उनका बन्दर तुम्हारी लंका जला गया, उन्होंने पत्थरों का पुल बनाकर सागर पर रास्ता बना लिया। यह सुनते रावण बताता है-मृत्यु मेरी दासी है, सूर्य द्वारपाल है, चन्द्रमा मेरा छत्र लिए रहता है, यमराज कोतवाली करता है। अतः मुझे राम, सुग्रीव आदि कैसे हरा पायेंगे। अंगद के बार-बार समझाने पर भी रावण अपनी गर्वोक्तियों से बाज नहीं आता है। फिर भी अंगद राम के महान् प्रभाव को सिद्ध करने में समर्थ होता है। ये संवाद अनूठे हैं।

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अंगद-रावण संवाद संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] अंगद कूदि गए जहाँ, आसनगत लंकेस।
मनु मधुकर करहट पर, सोभित श्यामल बेस॥
रावण-कौन हो, पठाए सो कौने, ह्याँ तुम्हें कह काम है?
अंगद-जाति वानर, लंकनायक ! दूत अंगद नाम है।
“कौन है वह बाँधि कै हम देह छि सबै दही”?
“लंक जारि संहारि अच्छ गयो सो बात बृथा कही।

शब्दार्थ :
आसनगत = आसन पर; लंकेस = लंका का स्वामी; मधुकर = भौंरा; करहट = कमल की छतरी; ह्याँ = यहाँ; दही = जला दिया; बृथा = व्यर्थ।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘जीवन दर्शन’ के ‘रावण अंगद संवाद’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता केशवदास हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राम द्वारा युद्ध से पहले अंगद को दूत के रूप में लंका भेजने पर रावण-अंगद का परिचयात्मक संवाद है।

व्याख्या :
लंका का राजा रावण जहाँ सिंहासन पर बैठा था अंगद कूदकर वहीं पहुंच गए। वे ऐसे लग रहे हैं मानो कलम की छतरी पर श्याम वेष वाला भौंरा बैठा हो। रावण अंगद से पूछता है कि तुम कौन हो, तुम्हें किसने भेजा है और यहाँ तुमको क्या काम है? तब अंगद उत्तर देते हुए कहता है कि मेरी जाति वानर है, मैं श्रीराम का दूत हूँ और मेरा नाम अंगद है। तब रावण कहता है कि वह कौन है जिसे हमने बाँध लिया तथा उसकी पूँछ, शरीर आदि सब जला दिया। तब अंगद उत्तर देते हैं कि वे (हनुमान) लंका को जलाकर और तुम्हारे बेटे अक्षय कुमार को मारकर गये। वह बात व्यर्थ रही।

काव्य सौन्दर्य :

  1. अंगद का रावण के दरबार में पहुँचकर वार्ता को प्रारम्भ किया गया है।
  2. उत्प्रेक्षा, अनुप्रास अलंकार । सरल, सुबोध एवं लाक्षणिकता से परिपूर्ण ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[2] “कौन के सुत?” ‘बालि के’, ‘वह कौन बालि’, न जानिए?
काँख चापि तुम्हें जो सागर सात न्हात बखानिए।”
“है कहाँ वह बीर?” अंगद “देवलोक बताइयो।” ‘क्यों गयो’?
रघुनाथ बान बिमान बैठि सिधाइयो। ‘लंका नायक को’?
विभीषण, देव दूषण को दहै? ‘मोहि जीवन होहिं क्यों?
जग तोहि जीबत को कहै। ‘मोहि को जग मारि है’?
दुर्बुद्धि तेरिय जानिए? ‘कौन बात पठाइयो कहि वीर बेगि बखानिए।’

शब्दार्थ :
सुत = पुत्र; काँख = बगल; चापि = दबाकर; बान-बिमान = बाण रूपी विमान; सिधाइयो = सिधार गये; देवदूषण = देवताओं के शत्रु; दहै = दग्ध करता है, जलाता है; दुर्बुद्धि = कुबुद्धि; पठाइयो = भेजा है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में रावण और अंगद के प्रश्नोत्तर हैं।

व्याख्या:
रावण अंगद से पूछता है कि तुम किसके पुत्र हो? अंगद बताता है कि मैं बालि का पुत्र हूँ। रावण ने पूछा कि यह बालि कौन है? अंगद ने पूछा कि क्या तुम बालि को नहीं जानते हो? जिसने तुम्हें अपनी बगल में दबाकर सप्त सागरों में स्नान किया था। आशय है कि दीर्घकाल तक तुम्हें अपनी बगल में दबाए रखा था। रावण ने पूछा कि वह पराक्रमी वीर अब कहाँ है? उत्तर में अंगद ने कहा कि वे देवलोक (स्वर्ग) सिधार गये हैं। रावण ने प्रश्न किया कि वे देवलोक क्यों गये हैं आशय है कि उनका निधन कैसे हुआ? अंगद ने बताया कि रघुकुल के स्वामी श्रीराम के बाण रूपी विमान पर बैठकर वे देवलोक सिधार गये हैं।

आशय यह है कि श्रीराम के बाण से उनका वध हो गया है। पुनः रावण पूछता है कि लंका का स्वामी कौन है? अंगद ने उत्तर दिया कि देवताओं के शत्रु को दग्ध करने वाले विभीषण लंका के स्वामी हैं। रावण बोला मेरे जीते जी वह लंका का स्वामी कैसे है? अंगद ने कहा कि तुम्हें संसार में जीवित कहता ही कौन है? आशय यह है कि तुम तो मरे के समान हो। रावण ने कहा कि मुझे संसार में कौन मार सकता है? अंगद ने बताया कि तेरी कुबुद्धि ही तेरा वध कराएगी। रावण ने अंगद से पूछा कि हे वीर ! शीघ्र बताइए कि तुमको यहाँ किस काम के लिए भेजा है?

काव्य सौन्दर्य :

  1. रावण और अंगद के संवाद से आभास मिलता है कि रावण की कुबुद्धि ही उसका विनाश कर देगी और विभीषण लंका का नायक बनेगा।
  2. श्लेष एवं अनुप्रास अलंकार।
  3. सरल, सुबोध ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

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[3] राम राजान के राज आये इहाँ
धाम तेरे महाभाग जागे अबै।
देवि मंदोदरी कुम्भकर्णादि दै
मित्र मंत्री जिते पूछि देखो सबै।
राखिजै जाति को, पांति को वंश को
साधिजै लोक में पर्लोक को।
आनि कै पाँ परौ देस लै, कोस लै
आसुहीं ईश सीताहि लै ओक को।

शब्दार्थ :
धाम = नगर; देवि = पटरानी; पांति = सम्मान; कोस लै = खजाना ले; आसुही = शीघ्र ही; ओक = घर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद्यांश में अंगद रावण को सत्परामर्श दे रहे हैं।

व्याख्या :
अंगद कहते हैं कि हे रावण ! यह तेरे महाभाग्य जाग्रत हो गये हैं कि राजाधिराज राम यहाँ तेरे घर पर आए हैं। मैं जो श्रेष्ठ परामर्श देने जा रहा हूँ, उसके बारे में तुम अपनी पटरानी मंदोदरी, अपने बन्धु कुम्भकर्ण आदि से और जितने भी तुम्हारे मित्र और मन्त्री हैं उन सभी से पूछकर देख लो कि मेरी सलाह उत्तम है या नहीं। तुम अपनी जाति, अपनी प्रतिष्ठा और वंश की रक्षा कर लो, अपने इस लोक में ही परलोक की साधना कर लो। श्रीराम को सादर महल में लाकर उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँग लो और सीता जी को लौटा दो। तुम्हारे द्वारा ऐसा किए जाने पर परम उदार श्रीराम तुमको यह देश, यहाँ का खजाना आदि देकर अपनी पत्नी सीता को साथ लेकर शीघ्र ही अपने घर चले जायेंगे।

काव्य सौन्दर्य :

  1. अंगद ने रावण की भूल के लिए क्षमा याचना का परामर्श दिया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद-मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है।

[4] रावण-लोक लोकेस स्यौं सोचि ब्रह्मा रचे
आपनी आपनी सीव सो सो रहे।
चारि बाहें धरे विष्णु रच्छा करें
बान साँची यहै वेदवाणी कहै।।
ताहि भ्रूभग ही देस देवेस स्यों
विष्णु ब्रह्मादि दै रुद्रजू संहरै।
ताहि सौं छाँड़ि कै पायँ काके परों
आजु संसार तो पायँ मेरे परै।।

शब्दार्थ :
लोकेश = लोक के स्वामी; रचे = बनाए हैं; स्यौं = से, सहित; भ्रूभग = भौंह टेढ़ी होने से, क्रुद्ध होने से; सींव = सीमा; रुद्रजू = शंकर जी; काके = किसके।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में अहंकारी रावण अंगद का परामर्श सुनकर क्रोध से भर उठता है तथा शिव के अतिरिक्त किसी के भी सामने न झुकने की गर्वोकित करता है।

व्याख्या :
रावण कहता है कि ब्रह्मा ने विचार करके जितने भी लोक और लोकों के स्वामी रचे हैं वे सभी अपनी-अपनी सीमाओं में रहते हैं। चार भुजा वाले विष्णु उस सृष्टि की रक्षा करते हैं। वेदवाणी इस सत्य को कहती है कि उस सृष्टि का देवताओं, देवराज इन्द्र सहित विष्णु और ब्रह्मा के होते हुए भी शिवजी भृकुटि मात्र से संहार कर देते हैं। इस प्रकार के सर्वशक्तिमान शिव को छोड़कर मैं किसके पैरों में पढूं। आज तो मेरे प्रताप की यह स्थिति है कि सारा संसार मेरे पैरों में पड़ता है। अतः मैं किसी के पैरों में नहीं पड़ सकता हूँ।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इसमें अभिमानी रावण की गर्वोक्ति है।
  2. अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, यमक, श्लेष अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है।
  3. भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[5] ‘राम को काम कहा’? ‘रिपु जीतहिं’
‘कौन कबै रिपु जीत्यौ कहा’?
‘बालि बली’, ‘छल सों, भृगुनंदन
‘गर्व हर्यो’, ‘द्विज दीन महा।।
‘दीन सो क्यों? छिति छत्र हत्यो’
‘बिन प्राणनि हैहयराज कियो’
“हैहय कौन? “वहै विसरयो जिन’
खेलत ही तोहि बाँधि लियो।।

शब्दार्थ :
रिपु = शत्रु; छल सों = धोखे से; भृगुनन्दन = परशुराम; छिति छत्र हत्यो = पृथ्वी के क्षत्रिय मारे; हैहयराज = सहस्रार्जुन; विसर्यो = भूल गये।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश के संवादों में रावण की गर्वोक्तियों और अंगद के व्यंग्यों का सुन्दर संयोजन है।

व्याख्या :
रावण अंगद से पूछता है कि राम का उल्लेखनीय कार्य क्या है? अंगद ने उत्तर दिया कि श्रीराम अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। रावण ने पलटकर प्रश्न किया कि राम ने कब, कौन-से शत्रु पर विजय पाई है? तो अंगद ने बताया कि उन्होंने वीरवर बालि पर विजय प्राप्त की। रावण ने तुरन्त कहा बालि को तो छलपूर्वक मारा गया था अर्थात् छिपकर मारने में कौन सी वीरता है ? फिर अंगद दूसरा नाम बताते हैं कि राम ने भृगु के पराक्रमी पुत्र परशुराम का मान मर्दन किया है। इस पर रावण ने कहा कि वह (परशुराम) तो महादीन ब्राह्मण था। उसमें युद्ध की शक्ति ही कहाँ थी? अंगद इसकी काट करते हुए कहते हैं कि वह दीन क्यों हैं ? उन्होंने अनेक बार पृथ्वी भर के क्षत्रियों को मार डाला था। इतना ही नहीं उन्होंने ही प्रसिद्ध योद्धा सहस्रार्जुन (हैहयराज) का वध कर प्राण लिए थे। तब रावण पूछता है कि हैहय कौन है? अंगद ने बताया कि तुम उस बलशाली हैहयराज को भूल गये जिन्होंने तुम्हें खेल-खेल में ही बाँध लिया था और अपनी घुड़साल में रखा था।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ रावण की गर्वोक्तियों का मुंहतोड़ जवाब अंगद ने दिया है।
  2. परशुराम तथा सहस्रार्जुन का बल विख्यात रहा है।
  3. अनुप्रास अलंकार।
  4. विषयानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

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[6] अंगद-सिंधु तर्यो उनको वनरा तुम पै धनुरेख गई न तरी।
बाँध्योई बाँधत सो न बँध्यो उन वारिधि बाँधि कै बाट करी।।
अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हें दसकंठ न जानि परी।
तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराई जरी।। (2009,14)

शब्दार्थ :
वनरा = बन्दर (हनुमान); धनुरेख = धनुष की रेखा लक्ष्मण ने सीता की सुरक्षा के लिए पर्णकुटी के सामने धनुष की नोंक से जो रेखा खींची थी उसे रावण पार नहीं कर पाया था; तरी = पार की गई; वारिधि = समुद्र; बाट = मार्ग; दसकंठ = रावण; तूलनिक रुई; जराई जरी = रत्नों से जड़ी हुई।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में राम की महिमा तथा रावण की दीनता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
अंगद राम की महिमा का बखान करते हुए अहंकारी रावण से कहता है कि उन श्रीराम का छोटा बन्दर (हनुमान) विशाल सागर को पार कर गया और स्वयं को बहुत बलशाली कहने वाले तुम लक्ष्मण द्वारा खींची गई एक धनुष की रेखा को भी लाँघ नहीं पाए। उन श्रीराम ने विशालकाय सागर को सेतुबन्ध द्वारा बाँधकर रास्ता बना लिया किन्तु तुम छोटे से बन्दर को बाँधने का प्रयास करते हुए भी नहीं बाँध सके। अंगद कहते हैं कि हे दशकंठ रावण ! आज भी तुम्हें रघुकुल के स्वामी श्रीराम के प्रताप का बात बोध नहीं हुआ है। वे महाप्रतापी हैं और तुम बहुत हीन हो क्योंकि तुम पूरा प्रयास करके तेल और रूई के सहारे भी छोटे से बन्दर की पूँछ को नहीं जला पाये। इसके विपरीत वह बन्दर रत्नों से जड़ी तुम्हारी लंका को जला गया।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ राम की महिमा तथा रावण के हीनत्व का अंकन हुआ है।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा दर्शनीय है।
  3. विषय के अनुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[7] रावण- महामीचु दासी सदा पाइँ धोवै
प्रतीहार हैं कै कृपा सूर जोवै।
क्षमानाथ लीन्हें रहै छत्र जाको।
करैगो कहा सत्रु सुग्रीव ताकौ”
सका मेघमाला, सिखी पाककारी
करें कोतवाली महादंडधारी।
पढ़े, वेद ब्रह्मा सदा द्वार जाके,
कहा बापुरो, सत्रु सुग्रीव ताके।

शब्दार्थ :
महामीचु = मृत्यु; प्रतीहार = द्वारपाल; सूर = सूर्य; जोवै= देखता है; क्षमानाथ = चन्द्रमा; ताकौ = उसका; सका = भिश्ती; मेघमाला = बादल; सिखी = अग्नि; पाककारी = रसोइया; बापुरो = बेचारा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद्यांश में रावण ने अपनी महिमा का स्वयं बखान किया है।

व्याख्या :
रावण कहता है कि हे अंगद ! महामृत्यु जिसकी (रावण की) दासी बनकर सदैव पैर धोती रहती है, सूर्य द्वारपाल होकर जिसकी कृपा की बाट जोहता रहता है, चन्द्रमा जिसका छत्र लिए रहता है। उस रावण का शत्रु सुग्रीव क्या बिगाड़ पायेगा।

मेघमालाएँ जिसके यहाँ भिश्ती का काम करती हैं, स्वयं अग्नि जिसकी रसोइया है, यमराज जिसके यहाँ कोतवाल का दायित्व निभाता है, जिसके दरवाजे पर ब्रह्मा सदैव वेदों का पाठ करते हैं उस रावण का शत्रु बेचारा सुग्रीव क्या कर लेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. रावण की महिमा का वर्णन हुआ है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री। भावों के अनुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है।

[8] डरै गाय बि, अनाथै जो भाजै।
परद्रव्य छाँई, परस्त्रीहि लाजै
परद्रोह जासौं न होवै रती को
सु कैसे लरै वेष कीन्हें यती को।।
तपी गयी विप्रनि छिप ही हरौं।
अवेद-द्वेषी सब देव संहरौ।
सिया न दैहों, यह नेम जी धरौं
अमानुषी भूमि अवानरी करौं।

शब्दार्थ :
विप्र = ब्राह्मण; परद्रव्य = दूसरे का धन; परद्रोह = विरोध; रती = कामदेव की स्त्री; यती = संन्यासी; छिप्र= शीघ्र; अवानरी= बानरों से हीन; अमानुषी = मनुष्यों से हीन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में रावण ने राम के गुणों को कमजोरी तथा अपने दोषों को गुणों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

व्याख्या :
जो गाय और ब्राह्मण से डरता है अर्थात् गाय और ब्रह्म के समक्ष भीरू बन जाता है, दूसरे के धन को छोड़ देता है, दूसरे की स्त्री के सामने लज्जित हो उठता है, जिससे एक रत्तीभर परद्रोह (विरोध). नहीं होता है, संन्यासी का वेष धारण करने वाला वह राम कैसे युद्ध कर सकता है। अर्थात् वह युद्ध नहीं कर पायेगा।

तपस्या में लीन ब्राह्मणों का शीघ्र ही हरण कर लूँगा, जो वेदों को न मानने वालों (राक्षसों) के शत्रु देवता हैं उनका संहार कर दूंगा, मैंने अपने हृदय में यह दृढ़ कर लिया है कि सीता को नहीं दूंगा और समस्त भूमि को नर व वानरों से रहित कर दूंगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ रावण ने राम के गुणों को कमजोरियों तथा अपने अवगुणों को वीरता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री।
  3. भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

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[9] अंगद-पाहन तै पतिनी करि पावन, टूक कियौ हर को धनु को रे?
छत्र विहीन करी छन में छिति गर्व हर्यो तिनके बल को रे।।
पर्वत पुंज पुरैनि के पात समान तरे, अजहूँ धरको रे।
होइँ नरायन हूँ पै न ये गुन, कौन इहाँ नर वानर को रे?

शब्दार्थ :
पाहन = पत्थर; पावन = पवित्र; हर = शिव; छिति = पृथ्वी; विहीन = रहित; पुंज = समूह; पुरैनि = कमल; धरको = धड़का; नरवानर को = मनुष्य और बन्दरों की तो बात ही क्या।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर अंगद द्वारा श्रीराम की महिमा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
अंगद कहता है कि हे रावण तुमको राम की महिमा का ज्ञान नहीं है। जिन्होंने पत्थर रूपी अहिल्या को स्पर्शमात्र से पवित्र (उद्धार) कर दिया, जिस शिव के धनुष को कोई भी वीर हिला नहीं पाया था उसके टुकड़े कर दिए, जिन्होंने समस्त पृथ्वी को क्षण भर में छत्र रहिल कर दिया उनकी शक्ति का कौन पार पा सकता है। राम के अलावा ऐसा कौन कर सकता है। जिस राम के स्पर्श से पर्वत समूह कमल पत्तों की तरह सागर के पानी पर तैर गये जिसका धमाका तुम्हारे हृदय पर आज भी है। ये गुण तो नारायण में भी नहीं हैं। यहाँ मनुष्य या बन्दर कौन है? अर्थात् यहाँ राम के साथ होने वाले महान् गुणवान हैं। राम में नारायण से अधिक बल प्रभाव है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राम की परम शक्ति का वर्णन हुआ है।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार तथा पदमैत्री की सुन्दरता दर्शनीय है।
  3. प्रवाहमयी ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

विश्वास की साँझ भाव सारांश

आधुनिक हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि गिरिजा कुमार माथुर ने अपने काव्य में जीवन-संवेदना के विविध रूप अंकित किए हैं। आपका काव्य विषम स्थितियों में भी उत्प्रेरणा देने की क्षमता से युक्त है। विश्वास की साँझ कविता में आस्था और विश्वास की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। ये जीवन मूल्य जीवन के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं उसका संकेत यह कविता करती है। कवि कहते हैं कि जीवन भर संघर्ष करने के बाद भी जिन्दगी में कुछ उपलब्धि न मिल सकी।

आज तक आस्था और विश्वास के सहारे जो संघर्ष करता रहा, आज वे भी डगमगा रहे हैं। मेरी दयनीय दशा हो गयी है। मैंने नियति से आस्था और विश्वास के अतिरिक्त सब कुछ लूट लेने को कहा किन्तु उसने स्पष्ट कर दिया कि जीवन में कुछ भी साथ नहीं होता है। वस्तुतः आस्था और विश्वास के कवच-कुंडल दान करने के बाद ही निहत्थे होकर मृत्यु से संघर्ष करना होता है। इस प्रकार इस कविता में आस्था और विश्वास त्याग के प्रेरक बनकर प्रस्तुत हुए हैं।

विश्वास की साँझ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] कुछ न पाया जिन्दगी में
रही साँझ अनाथ
लौट आये युद्ध से हम
हाय खाली हाथ
आज तक मानी नहीं
वह आज मानी हार
एक था विश्वास
वह भी छोड़ता है साथ।

शब्दार्थ :
जिन्दगी = जीवन; अनाथ = बिना संरक्षक, असहाय; साँझ = संध्या; साथ छोड़ना = दूर होना।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘विश्वास की साँझ’ पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता गिरिजा कुमार माथुर हैं।

प्रसंग :
कवि ने इन पंक्तियों के माध्यम से जीवन की व्यस्तता एवं संघर्ष का हृदयस्पर्शी चित्रण किया है।

व्याख्या :
जीवन संवेदनाओं में विभिन्न रूपों का अंकन करने की सामर्थ्य रखने वाले कवि कहते हैं कि समस्त जीवन भर संघर्ष करने के बाद भी जीवन की संध्या अनाथ, असहाय रह . गई। हम जीवन युद्ध में संघर्ष करते-करते खाली हाथ लौट आए हैं। कुछ भी उल्लेखनीय प्राप्त नहीं कर सके हैं। संघर्षशील जीवन जीते हुए मैंने जो हार स्वीकार नहीं की थी आज स्वीकार कर ली है। मेरे पास मात्र एक विश्वास था जो संघर्ष की प्रेरणा देता था। आज वह भी साथ छोड़ रहा है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण का अंकन हुआ है।
  2. सरल सुबोध किन्तु प्रभावी भाषा में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

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[2] अब अकेला हूँ झुका है माथ
सरल होगा आखिरी आघात
कहा मैंने नियति से
सब खत्म कर दे
लूट ले
एक मेरी आस्था,
विश्वास रहने दे।

शब्दार्थ :
माथ = मस्तक; आघात = प्रहार; नियति = भाग्य; खत्म = समाप्त; आखिरी = अन्तिम।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में जीवन के उत्तरार्द्ध की असहाय अवस्था (वृद्धावस्था) में होने वाली निराशाजन्य स्थिति का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जीवन में हार मानने पर असहाय हुए कवि कहते हैं कि मैं आज अकेला रह गया हूँ, कोई संगी-साथी नहीं है। इसलिए निराशा से आज मेरा मस्तक झुक गया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि मृत्यु का अन्तिम प्रहार अधिक कष्टप्रद नहीं होगा। मैंने नियति से प्रार्थना की कि मेरे पास जो भी है उस सब को तू समाप्त कर दे और लूटकर ले जा; किन्तु मेरी आस्था और विश्वास को मेरे ही पास रहने दे। मैं इनसे रहित नहीं होना चाहता हूँ।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन-निराशा का स्वाभाविक अंकन हुआ है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा सरल, सुस्पष्ट भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

[3] नियति बोली
आस्था वाले
अरे ओ होश कर
जिन्दगी में साथ देता है
कभी कोई बशर
असलियत से युद्ध होता है निहत्था
जान ले
इसलिए तू
पूर्व इसके
कवच कुण्डल दान दे।

शब्दार्थ :
नियति = भाग्य, अदृष्ट; होश = भली प्रकार जान ले; असलियत = वास्तविकता; निहत्था = खाली हाथ; कवच-कुण्डल = कवच और कुण्डल कर्ण के पास थे; जिनके रहते उसे कोई पराजित नहीं कर सकता था किन्तु इन्द्र ने वे कर्ण से दान में माँग लिए और दानवीर कर्ण मना नहीं कर पाए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में स्पष्ट किया गया है कि जब तक आस्था तथा विश्वास का त्याग नहीं होगा, जीवन समापन असंभव है।

व्याख्या :
जब नियति से सब कुछ लेने पर भी आस्था एवं विश्वास को छोड़ देने की बात कही तो नियति ने कहा कि हे आस्था चाहने वाले मानव? तू भली प्रकार जान ले कि जीवन में कोई किसी का साथ नहीं देता है। जीवन की वास्तविकता तो मृत्यु है, उससे खाली हाथ ही संघर्ष करना होता है अर्थात् मृत्यु के समय मानव के साथ कुछ नहीं होता है। इसलिए हे मानव ! तू आस्था और विश्वास रूपी कवच-कुण्डल का दान कर दे।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ पर आस्था और विश्वास त्याग की भावना को परिपुष्ट करते हैं।
  2. सरल, सुबोध एवं स्पष्ट भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 7 सरजू भैया

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 7 सरजू भैया

सरजू भैया अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
सरजू भैया के व्यक्तित्व का संक्षिप्त परिचय लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तावना-सरजू भैया की गिनती गाँव के सबसे लम्बे और दुबले आदमियों में हो सकती है। उनका रंग साँवला है। बगुले की सी लम्बी-लम्बी टाँगों जैसी लम्बी बाहें। कमर में धोती पहनते हैं, कंधे पर अंगोछा डाले रहते हैं। जब वे खड़े होते हैं तब, आप उनकी पसलियों की हड्डियाँ गिन लीजिए। नाक खड़ी सी और लम्बी। सघन भर्दै। उनकी आँखें बड़ी-बड़ी हैं जो कोटर में धंसी सी लगती हैं। गाल पिचके से हैं। अंग-अंग की शिराएँ उभरी हुई हैं। कभी-कभी मालूम होता है मानो ये नसें नहीं, उनके शरीर को किसी ने पतली डोरों से जकड़ रखा है।

सरजू की सूरत :
उनको देखने से तो उनकी तस्वीर निस्संदेह किसी भुखमरे, मनहूस आदमी की मालूम होती है। परन्तु ऐसा है भी कि नहीं? सरजू भैया लेखक के गाँव के चन्द जिन्दादिल लोगों में से हैं। बड़े मिलनसार, मजाकिया और हँसोड़ हैं।

दिल खोलकर हँसना :
वे जब दिल खोलकर हँसते हैं, तो शरीर भर में जो सबसे छोटी चीजें उन्हें मिली हैं, वे उनके पंक्तिबद्ध छोटे-छोटे दाँत हैं। तब वे बेतहाशा चमक पड़ते हैं। अंग-अंग हिलने-डुलने लगते हैं, जैसे मानो हर अंग हँस रहा हो। सरजू भैया के पास इतनी सम्पत्ति है कि वह खुद या अपने परिवार का ही पेट नहीं भर सकते वरन् आगत-अतिथि की सेवा पूजा भी मजे से कर सकते हैं। तो फिर यह हड्डियों का ढाँचा क्यों? के जवाब में एक पुरानी कहावत पेश करूँगा-काजी दुबले क्यों-शहर के अंदेशे से।

उपसंहार :
अब सरजू भैया की जो हालत है, वह स्वयं अपने कारण नहीं, दूसरों के चलते है। पराये उपकार के चलते उन्होंने सिर्फ अपना यह शरीर सुखा लिया है, बल्कि अपनी सम्पत्ति की भी कुछ कम हानि नहीं की है।

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प्रश्न 2.
सरजू भैया क्या व्यवसाय करते थे? वे अपने व्यवसाय में सफल क्यों नहीं हो सके?
उत्तर:
सरजू भैया के पास खेतीबाड़ी थी, रुपये और गल्ले का अच्छा लेन-देन था। परिवार बड़ा नहीं था और न खर्चीला। लेकिन सरजू के पिता के मरते ही सरजू भैया ने लेन-देन चौपट किया। बाढ़ ने खेती बर्बाद कर दी और भूकम्प ने मकान का सत्यानाश कर दिया। उनका लेन-देन बहुत अच्छा था। खेती को भी सम्हाला जा सकता था। घर भी खड़ा किया जा सकता था। किन्तु सरजू भैया लेन-देन का काम नहीं सम्हाल सकते थे। इसके भी कुछ कारण थे; जिससे सरजू भैया ने इन कामों में रुचि नहीं दिखाई।

“लेन-देन, जिसे नग्न शब्दों में सूदखोरी कहिए, चाहता है, आदमी अपने आदमीपन को खो दे, वह जोंक, खटमल नहीं, चीलर बन जाए। काली जोंक और लाल खटमल का स्वतंत्र अस्तित्व है। हम उनका खून चूसना महसूस करते हैं; हम उनमें अपना खून प्रत्यक्ष पाते हैं और देखते हैं। लेकिन चीलर? गंदे कपड़े में, उन्हीं सा काला कुचैला रंग लिए वह चीलर चुपचाप पड़ा रहता है और हमारे खून को इस तरह धीरे-धीरे चूसता है और तुरन्त उसे अपने रंग में बदल देता है कि उसका चूसना हम जल्द अनुभव नहीं कर सकते और अनुभव करते भी हैं, तो जरा सी सुगबुगी या ज्यादा से ज्यादा चुनमुनी मात्र और अनुभव करके भी उसे पकड़ पाने के लिए तो कोई खुर्दबीन चाहिए।”

इस तरह सूद पर दिए धन का सूद प्राप्त करने के लिए सरजू भैया चीलर नहीं बन सकते थे। उनके इस लम्बे शरीर में जो हृदय मिला है, वह शरीर के ही परिमाण में है अर्थात वे बड़े दिलदार हैं। जो भी दुखिया आया, अपनी विपदा बताई; उसे देवता सा दे दिया और वसूलने के समय जब वह आँखों में आँसू लाकर गिड़गिड़ाया, तो देवता की ही तरह पसीज गए। सूद कौन? कुछ दिन में मूलधन भी शून्य में परिवर्तित हो गया।

बाढ़ और भूकम्प ने उनके खेत और घर को बर्बाद किया जरूर, लेनिक सरजू भैया, लेखक का यकीन है, आज फटेहाली से बहुत कुछ बचे रहते, यदि लेन-देन के बाद भी इन दोनों की तरफ भी पूरा ध्यान दिए होते। यह नहीं कि वह जी चुराने वाले या आलसी और बोदा (कमजोर) गृहस्थ हैं। नहीं, ठीक इसके खिलाफ-चतुर, फुर्तीला और कामकाजी आदमी है। लेकिन करें तो क्या? उन्हें दूसरे के काम से ही कहाँ फुर्सत मिलती है।

यदि किसी का बच्चा बीमार होता है, तो वैद्य बुलाने जायेगा सरजू भैया। बाजार से किसी को सौदा खरीदना है, तो कौन जाएगा-सिवाय सरजू भैया के। किसी भी छोटे से लेकर बड़े काम तक करवाने की जिम्मेदारी है तो सरजू भैया की। इस तरह सरजू भैया ने अपनी खेती को चौपट किया हुआ है। अच्छा भोजन न मिलने से इनकी कमर झुक गई है। चाहे दिन का कोई समय हो, या रात्रि का आधा भाग, फिर भी वहाँ के लोग अपने काम के लिए बुलाएँगे सरजू भैया को। सरजू भैया का दरवाजा हर किसी के लिए चौबीसों घण्टे खुला रहता है। सरजू भैया नर-रल हैं। उनकी भलमनसाहत को कोई भी नहीं ध्यान देता है। सभी उसे सीधा समझकर ठगने की कोशिश करते हैं। इस तरह बहुत से कारण थे जिनकी वजह से वे व्यवसाय में सफल नहीं हुए।

प्रश्न 3.
सूदखोर किस तरह दूसरों का शोषण करते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
सूदखोर दूसरों का खूब शोषण करते हैं। उनमें आदमीपन तो रहता ही नहीं। सूदखोर तो जोंक, खटमल नहीं, चीलर बन जाता है। काली जोंक और लाल खटमल अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना लेते हैं, क्योंकि जब उनके द्वारा हमारा खून चूसा जाता है, तो हम उनके अन्दर अपना ही रक्त चूसा हुआ पाते हैं। लेकिन चीलर? गन्दे कपड़े में, उन्हीं सा काला कुचैला रंग लिए वह चीलर चुपचाप पड़ा रहता है और हमारे ही रक्त को धीरे-धीरे चूसता रहता है। तुरन्त ही उस चूसे गए खून को अपने रंग में मिला लेता है और अपने रंग में बदल देता है। चीलर के द्वारा चूसा जाना बहुत जल्दी अनुभव नहीं कर पाते। इसी तरह सूदखोर पैसा कमाता है और शोषण करता है।

प्रश्न 4.
“सादगी, सरल स्वभाव और सहज भोलापन ग्रामीणों की विशेषता है।” सरजू भैया पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
सरजू भैया लेखक के गाँव के रहने वाले हैं। उनमें सरलता है, सादगी है और सहज भोलापन है। यही सरजू भैया भारतीय ग्रामीणों की इन विशेषताओं को अपने अन्दर सँजोए हुए हैं। वे सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। उनका हृदय विशाल है, उनके विचार भी विस्तृत और उदार हैं। ग्रामीणों की किसी भी आवश्यकता के काम को पूरा करने के लिए चौबीस घण्टे उनका द्वार खुला रहता है।

सरजू भैया यद्यपि शरीर से कमजोर दीखते हैं लेकिन उनमें आत्मिक साहस भरा पड़ा है। बीमार के लिए वैद्य लाकर, किसी की सहायता के लिए बाजार से उसकी आवश्यकता की वस्तुओं को लाकर, बाहर से आई खबर को प्रत्येक घर में पहुँचाकर, किसी के भी काम के लिए उन पर समय ही समय था। लोग उनके सीधेपन का फायदा उठाते और उन्हें ठगने की कोशिश भी करते।

ग्रामीण व्यक्ति सूदखोरों के चंगुल में बहुत जल्दी फंस जाते हैं। सरजू भैया के आधार पर स्पष्ट होता है कि सादगी, सरल स्वभाव और सहज भोलापन ग्रामीणों की विशेषता है।”

प्रश्न 5.
“दूसरों की सहायता करना, सरजू भैया का स्वभाव था” इस सन्दर्भ में बताइए कि सरजू भैया किस प्रकार दूसरों की,सहायता करते थे?
उत्तर:
सरजू भैया का स्वभाव था दूसरों की सहायता करने का। वे चौबीसों घण्टे अपने गाँव के सभी लोगों की सहायता में लगे रहते थे। वे अपने किसी भी काम को देखते नहीं थे। यदि उन्होंने अपना काम किया होता, अपनी खेतीबाड़ी, अनाज व पैसे के लेन-देन को थोड़ा भी समय निकालकर देखा होता तो अवश्य ही उनकी आर्थिक दशा ठीक रही होती। कृषि कार्य के लिए थोड़ा बहुत समय दिया होता तो धान्य आदि की कमी नहीं होती। उनका घर भी नष्ट नहीं होता। लेकिन वे अपने स्वभाव और आदत से लाचार थे कि वे अपने किसी भी काम को नहीं देखते थे। दूसरे लोगों (अपने गाँववासियों) की सहायता में तत्परता से लगे रहते। लोग उन्हें उनके सीधेपन और सहायता की भावना वाला होने से, मूर्ख समझते थे।

लेखक के अनुसार, वे गाँव के किसी भी बीमार व्यक्ति के उपचार के लिए वैद्य को लेकर आते थे। किसी को किसी चीज की आवश्यकता है, सौदा खरीद कर लाना है, तो सरजू भैया बाजार जाता और उनके लिए उस इच्छित वस्तु को लाकर देता। गाँव के किसी रिश्तेदार की बीमारी आदि की सूचना देने और लेने यदि किसी को भेजा जाना है, तो वह है सरजू भैया। इन सभी बातों के पीछे है सरजू भैया का तेजगति से चलना और दूसरे लोगों की सहायता करने की प्रवृत्ति।

गाँव का कोई सज्जन किसी की जमीन, मकान आदि को यदि खरीदता है, तो उसकी शिनाख्त सरजू भैया ही करता है। गाँव में किसी के यहाँ विवाह हो रहा है, यज्ञ आदि का आयोजन है तो समझिए इस सब की जिम्मेदारी सरजू भैया की होती है। बहुत ही अस्त-व्यस्त दिखते रहते हैं। गाँव में किसी के यहाँ कोई मृत्यु होती है, तो भी समय कोई भी हो, इसके लिए भी आवश्यक सामग्री, जैसे कफन आदि खरीदकर लाने का उत्तरदायित्व सरजू भैया का ही रहता है।

इस प्रकार गाँव के लोगों का सारा उत्तरदायित्व अपने सिर पर लेकर सरजू भैया उनकी सहायता करते थे।

प्रश्न 6.
सरजू भैया को सूदखोर ने किस प्रकार ठग लिया था? संक्षिप्त में लिखिए। (2011)
उत्तर:
सरजू भैया अपने सीधेपन से ठगे गए। वे एक दिन एक सूदखोर के चंगुल में इस तरह फंस गए कि लेखक ने सरजू भैया के पास जो रुपये थे; उन्हें अपने काम में लगा लिए। कुछ दिन बाद उन्हें धन की जरूरत पड़ी होगी। संकोचवश लेखक से धन माँग नहीं सके। वे अपनी आवश्यकता की अधिकता के कारण एक सूदखोर के पास चले गए। यह सूदखोर कोई अन्य नहीं था, यह वही था जो पहले इनसे कर्ज लिया करता था। यह सूदखोर तरह-तरह के काम करता रहता है, उनके कारण यह अब धन्ना सेठ बन गया है। उसने इन्हें (सरजू भैया को) धन दे दिया। लेकिन जैसे ही वे चलने लगे तो उसने (धन्ना सेठ बने सूदखोर) कहा, “आपके पास से रुपये जायेंगे कहाँ? लेकिन कोई सबूत तो चाहिए ही।” सरजू भैया ने कहा “क्या सबूत? मैं तैयार हूँ।” उस समय तक सरजू भैया रुपये बाँध चुके थे। उन्हें खोलकर लौटाया नहीं जा सकता था। और न सरजू भैया उसकी (सूदखोर की) माँग को नामंजूर कर सकते थे। सूदखोर ने कहा- नहीं, नहीं, कुछ नहीं-कागज पर सिर्फ निशान बना दीजिए। आपसे बाजाब्ता है नोट क्या कराया जाए?”

सरजू भैया ने बमभोला की तरह कजरौटे से अंगूठा बोर कर कागज पर चिपढ़ा दिया और चले आए, मानो किसी आधुनिक एंटोनियो ने किसी कलजुगी शाइलॉक के हाथ में अपने को गिरवी कर दिया। अब वह कहने लगा कि रुपये जल्दी लौटा दो, अन्यथा नालिश कर दूंगा और नालिश कितने की करेगा, कौन ठिकाना।” यह तो सरजू भैया की बेचारगी बोल रही थी। लेखक उनके मुख की ओर आश्चर्य से देख रहा था। लेखक ने कहा-“आपने ऐसी गलती क्यों कर दी” लेकिन इसके अलावा, उनके पास इसका जबाव क्या दे सकते थे। बस यह कि “क्या करूँ रुपये बाँध चुका था।” इस प्रकार सूरज भैया को सूदखोर ने ठग लिया था।

सरजू भैया अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी का सरजू भैया से क्या सम्बन्ध था?
उत्तर:
लेखक का सरजू भैया से कोई खून का रिश्ता न था। वास्तव में सरजू भैया का सगा छोटा भाई जाता रहा। लेखक ने उन्हें अपना बड़ा भाई मान लिया और स्वयं उनके छोटे भाई बन गये।

प्रश्न 2.
सरजू भैया का खेत और घर कैसे बर्बाद हो गये?
उत्तर:
बाढ़ और भूकम्प ने सरजू भैया के खेत और घर बर्बाद कर दिये थे।

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सरजू भैया पाठ का सारांश

प्रस्तावना-पात्र-परिचय :
सरजू भैया लेखक के पड़ोसी हैं। सरजू भैया अपनी माँ का बड़ा बेटा है। लेखक इकलौते ठहरे। परन्तु सरजू भैया का छोटा भाई नहीं रहा, अतः लेखक उन्हें अपना बड़ा भाई मानता है और स्वयं को उनका छोटा भाई।।

शारीरिक बनावट :
सरजू भैया गाँव भर में सबसे लम्बे और दुबले व्यक्ति हैं। उनका रंग साँवला है। बगुले की टाँगों जैसी लम्बी बाँहें, उनकी पसलियों को एक-एक करके गिना जा सकता है। नाक लम्बी और खड़ी हुई। घनी भवॆ, बड़ी-बड़ी आँखें, परन्तु कोटरों में फंसी हुई। गाल पिचके हुए। अंग-अंग की शिराएँ उभरी हुई। वे नसें ऐसी लगती हैं, मानो उनके शरीर को पतली डोरों से जकड़ रखा है।

पहनावा :
सरजू भैया धोती पहनते हैं। कंधे पर अंगोछा डाले रहते हैं। खड़े होने पर ऐसा प्रतीत होता था कि लकड़ियों पर कपड़ों को टाँग दिया गया है।

स्वभाव :
ऊपर से देखने में उनकी तस्वीर निःसन्देह ही किसी मनहूस भुखमरे व्यक्ति की जैसी लगती है। परन्तु सरजू भैया गाँवभर में जिन्दा-दिल आदमी है, वे मिलनसार, मजाकिया और हँसोड़ हैं। अतिथि का सत्कार करने वाले व्यक्ति हैं।

आर्थिक दशा :
सरजू भैया ने परोपकार करते रहने से शरीर सुखा लिया और अपनी सम्पत्ति भी इसी कारण बरबाद कर डाली। इनके पिता गाँव के अच्छे किसान गिने जाते थे। अच्छा, सुन्दर मकान था, अच्छी खासी बैठक थी। लेकिन सरजू भैया की तो यह राम मढैया है। पिता का कारोबार खेती और लेन-देन का कामकाज़। उनके मरने के बाद सरजू ने लेन-देन चौपट कर दिया। बाढ़ ने खेती और भूकम्प ने मकान आदि सब कुछ नष्ट कर दिया। सरजू चाहते तो सब कुछ ठीक हो सकता था। लेकिन सरजू ………।

सरजू के लिए सूदखोरी का काम आदमीपन को खो देने वाला था। यह काम काली जौक, लाल खटमल और चीलर बने लोगों का है।

सरजू भैया चीलर नहीं बन सकते। उनका हृदय बड़ा है। उसने विपदा में सब लोगों को पैसा देकर सहायता की। सूद की बात दूर, किसी ने इन्हें मूल तक नहीं लौटाया। सरजू भैया आज फटेहाली से गुजर रहे हैं। इसका कारण उनका आलसी होना या काम से जी चुराना नहीं है, वरन् वह तो फुर्तीले और कामकाजी व्यक्ति हैं उन्हें अपने कामों के लिए दूसरों के काम से फुरसत कहाँ?

परोपकार की भावना :
सरजू भैया एकदम परोपकारी हैं। गाँव के किसी भी व्यक्ति का कोई भी काम हो-किसी तरह का कार्य हो सकता है, लेकिन सरजू भैया सभी गाँववासियों की सहायता के लिए तैयार रहते हैं। अपना चाहे कोई भी काम क्यों न पड़ा रहे, लेकिन दूसरों की सहायता में सरजू भैया सबसे आगे। परोपकार और सेवा के लिए तो उनके घर का दरवाजा हर समय खुला रहता था। यही गुण सरजू भैया को दूसरे आदमियों से अलग करता है। इसलिए वे सबके द्वारा वंदनीय और पूजनीय हैं। उनका सीधापन देखकर लोग उन्हें ठगते हैं। लोग उन्हें झंझटों में डालकर मजा लेते हैं।

सरजू भैया का तड़पना :
एक दिन सरजू भैया बहुत भयभीत और तड़पते आये। गाँव का एक चालाक और बेईमान आदमी सरजू भैया पर नालिश करने जा रहा है। यदि समय पर उसे पैसे दे दिए जाएँ, तो वह नालिश नहीं करेगा। दूसरे यदि वह रुपये नहीं देता है तो नालिश कर देगा। लेखक ने उसे धन दिया और इन्हें सूदखोर से मुक्त कराया। ऐसी घटनाएँ पनपती रहती हैं। लेखक भी रात भर सो नहीं सका, यह सोचते हुए कि लोग बड़े कृतघ्न होते हैं। सरजू भैया रूपी किसी आधुनिक एन्टोनियों ने किसी कलयुगी शाइलॉक के हाथ में स्वयं अपनी जिन्दगी को गिरबी रख दिया हो, ऐसी दशा हो रही थी।

उपसंहार :
सरजू भैया जैसे अनगिनत लोग होते हैं जो दूसरों की खातिर स्वयं को परेशानी में डाल लेते हैं।

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MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग

MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग

वे शब्दांश जो किसी शब्द में जुड़कर उसका अर्थ परिवर्तित कर देते हैं। उपसर्गों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता; फिर भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलकर एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। उपसर्ग सदैव शब्द के पहले आता है, जैसे-‘परा’ उपसर्ग को ‘जय’ के पहले रखने से एक नया शब्द ‘पराजय’ बन जाता है। जिसका अर्थ होता है-हार।

उपसर्ग के शब्द में तीन प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

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जैसे-
1. शब्द के अर्थ में विपरीतता आ जाती है।
2. शब्द के अर्थ में नूतनता आ जाती है।
3. शब्द के अर्थ में कोई नया परिवर्तन नहीं होता।
उत्तर-
हिन्दी भाषा में उपसर्ग तीन भाषाओं के हैं
(a) संस्कृत उपसर्ग
(b) हिन्दी उपसर्ग
(c) उर्दू उपसर्ग।

(a) संस्कृत उपसर्ग
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-1
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-2
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-3
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-4

उपसर्ग के समान प्रयुक्त होने वाले कुछ अन्य शब्द
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-5
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-6

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(b) हिन्दी उपसर्ग
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-7

(c) उर्दू उपसर्ग
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-8
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-9

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 11 समय का मोल

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 11 समय का मोल

समय का मोल अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
लेखक ने यौवन को जीवन का मक्खन क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक का कथन है कि यदि व्यक्ति इस उम्र में अपने समय का सदुपयोग रचनात्मक कार्यों में करता है तो उसका परिणाम निश्चित ही अच्छा प्राप्त होता है जो जीवन के अन्य पड़ावों में प्राप्त नहीं हो पाता है। अतः लेखक ने इसको जीवन का मक्खन कहा है।

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प्रश्न 2.
लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि “शिखर के बजाए तलहटी में ही जीवन कट जाएगा?”
उत्तर:
यदि व्यक्ति ने अपने जीवन काल के सबसे ऊर्जावान समय जवानी को मनोरंजन, अवकाश और व्यसनों आदि में व्यर्थ व्यतीत कर दिया और वह जागरूक नहीं हो पाया कि यह समय तो सर्वश्रेष्ठ उपयोग में लेने का था तो निश्चित ही वह सफलता के शिखर को छूने से वंचित रह जायेगा। इसीलिए लेखक का कथन है कि “शिखर के बजाए तलहटी में ही जीवन कट जाएगा।”

प्रश्न 3.
“हम पसीने की कमाई खर्च करके विष खरीदते हैं।” इस पंक्ति से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
लेखक का आशय है मनोरंजन जीवन के महत्त्व को कम करने वाला रह गया है। जब मन दुःखी हो, अवसादग्रस्त या थका हो तभी मनोरंजन की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार बिना भूख लगे खाने से कष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मन को रंजन में लगा देने का भी परिणाम अच्छा नहीं आता, मन भटक जाता है, प्रमादी हो जाता है। आज जिस प्रकार रंजन हो रहा है वह तो मन तक पहुँचता ही नहीं। अखबार, मैंगजीनों का चटपटापन जीवन में प्रतिदिन धीमे विष की तरह मन को दूषित करता है। अत: लेखक का कथन है कि हम मनोरंजन पर पसीने की कमाई खर्च करके विष खरीदते हैं।

प्रश्न 4.
प्रबंधन के गुरु की बात जीवन को किस प्रकार सार्थक बनाती है?
उत्तर:
प्रबंधन गुरु का कहना है कि प्रत्येक कार्य को उसके परिणाम को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। परिणाम ही जीवन का लक्ष्य बनता है और उसी के अनुसार व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यही बात जीवन को सार्थक बनाती है।

प्रश्न 5.
जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए?
उत्तर:
जीवन का लक्ष्य ‘घटिया विषय से दूरी और सर्वश्रेष्ठ का चुनाव’ होना चाहिए। सत्संगति पाकर व्यक्ति का जीवन स्वयं श्रेष्ठता को प्राप्त कर लेता है जैसे कि “जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी वास सुवास।”

प्रश्न 6.
व्यक्तित्व का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
जीवन का लक्ष्य कार्य का परिणाम होता है और उसी के अनुरूप मन में चेतना की जागृति हो जाती है और उसी तरह के व्यक्तित्व का निर्माण हो जाता है।

समय का मोल अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवन मूल्यों का कार्य क्या है?
उत्तर:
जीवन मूल्यों का प्रमुख कार्य जीवन का मूल्य बनाए रखना है।

प्रश्न 2.
लेखक ने जवानी को क्या कहा है?
उत्तर:
लेखक ने जवानी को जीवन का मक्खन कहा है।

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समय का मोल पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
लेखक व्यक्ति को समय के मूल्य को समझने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि व्यक्ति समय के मूल्य को स्वयं नहीं समझ सका तो कोई दूसरा उसे नहीं समझायेगा और उसका पूरा जीवन व्यर्थ ही निकल जायेगा। अतः जीवन का मुख्य कार्य समय के मूल्य को समझना ही है।

समय के मूल्य की समझ आवश्यक :
आज व्यक्ति को सोचने की आवश्यकता है कि वह जिस मार्ग पर जा रहा है, उसकी मंजिल कहाँ है? समय कम है, मार्ग भटकने पर उसे मार्ग दर्शन किससे मिलेगा? क्योंकि मार्ग की दिशा पूछने में भी अपने आप में शर्म महसूस करता है।

समय के मूल्य को जानने के लिए कार्य के उद्देश्य को नहीं भूलना होगा। हम घर से जिस कार्य को करने निकले हैं, उसे पूरा न करके व्यर्थ की बातों में दोस्तों के साथ समय व्यर्थ न गवाएँ। हमें याद रहे कि हमें दुकान से क्या खरीदना है? टी. वी. चलाने के बाद टी. वी. में क्या देखना है? अच्छे और बुरे, आवश्यक और अनावश्यक, लाभ और हानि के बीच भेद को पहचानना होगा। यदि इस भेद को न जानकर हमने समय गँवा दिया और हम अपने कार्य पूर्ण नहीं कर पाये तो यह स्पष्ट है कि हमें समय की कीमत का अहसास नहीं है।

समय का सदुपयोग :
हम कहते हैं, जवानी जीवन का मक्खन है। जो इस उम्र में कार्य करते हैं, उसी का फल हमें पूरी उम्र व्यतीत करने के लिए मिल जाता है। परन्तु हमें याद रखना है कि इसका एक-एक क्षण कीमती है, व्यर्थ में एक क्षण भी नष्ट न होने पाये।

यदि हमने जवानी को मनोरंजन बना दिया, अवकाश का समय मान लिया और हम जागरूक नहीं हुए कि यह तो तपस्या का समय है, सफलता के शिखर को छूने का समय है तो निश्चित है कि हम जीवन के सर्वश्रेष्ठ काल का उपयोग नहीं कर पायेंगे।

हमें मनोरंजन के सही अर्थ को समझना होगा। जब मन दुःखी होता है, अवसादग्रस्त या थका होता है, तब मनोरंजन की आवश्यकता होती है। आज का मनोरंजन जीवन के महत्व को कम करने वाला रह गया है। हमें चिन्तनशील विषय पढ़ने-देखने में अच्छे नहीं लगते। सिनेमा, फैशन आदि ऐसे विषय नहीं हैं कि जिन पर घण्टों चर्चा की जाए। अखबार, मैगजीनों का चटपटापन धीमे विष की भाँति मन को दूषित कर रहा है। हमें समय का सदुपयोग करना ही होगा तभी हम जीवन के लक्ष्य को पा सकेंगे।

संकल्प :
आज हमें संकल्प करना ही होगा कि हम अनावश्यक कुछ नहीं करेंगे। समय का रचनात्मक कार्यों में ही उपयोग करेंगे। समय लौटकर नहीं आता। समय ही तो जीवन है। यह हमें हमेशा याद रखना होगा। कार्य का परिणाम ही जीवन का लक्ष्य होता है और इसको हम तभी प्राप्त कर सकते हैं जब हम अच्छे लोगों के सामीप्य में आयें और सार्थक करें-
महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नति कारकः।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अभ्यास

सामाजिक समरसता अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा किस ज्ञान को उपयोगी माना है?
उत्तर:
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष ज्ञान को उपयोगी माना है।

प्रश्न 2.
राधा दुःखी माता यशोदा को क्या कहकर सांत्वना देती थीं?
उत्तर:
‘श्रीकृष्ण ब्रज को कैसे छोड़ सकते हैं वे अवश्य लौटकर आयेंगे’ यह कहकर राधा यशोदा को सांत्वना देती थीं।

प्रश्न 3.
राधा अपने विरह जनित दुःख को छिपाने के लिए किस प्रकार का बहाना बनाती थीं?
उत्तर:
‘मैं रो नहीं रही हूँ, मेरी आँखों में अति हर्ष का पानी छलक आया है।’ यह बहाना बनाकर राधा अपने दुख को छिपाती थीं।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के व्यथित होने का क्या कारण था? (201 15, 16)
उत्तर:
श्रीकृष्ण का ब्रज छोड़कर मथुरा चले जाना ब्रजवासियों के व्यथित होने का कारण था।

प्रश्न 5.
कबीर का मन फकीरी में क्यों सुख पाता है?
उत्तर:
नाशवान जगत से परे रहकर राम नाम के भजन का आनन्द मिलने के कारण कबीर को फकीरी में सुख प्राप्त होता है।

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सामाजिक समरसता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने संसार को पागल क्यों कहा है? भाव स्पष्ट कीजिए। (2017)
अथवा
‘साधो देखो जग बौराना’ पद के माध्यम से कबीर क्या कहना चाहते हैं? (2008)
उत्तर:
कबीर कहते हैं कि संसार पागल हो गया है। उससे सत्य बात कही जाय तो वह मारने दौड़ता है और जो झूठ कहते हैं उनका वह विश्वास कर लेता है। हिन्दू और मुसलमान राम तथा रहीम नाम पर झगड़ते हैं जबकि दोनों एक ही हैं। नियमी-धर्मी और पीर-औलिया नाना पाखण्ड करते हैं किन्तु संसार उन्हीं के बहकावे में आ जाता है। संसार के लोग सच्चे गुरु द्वारा बताए गए ज्ञान के मार्ग का अनुसरण न करके जीवन को नष्ट करने वाले संसार की ओर आकर्षित होते हैं। इससे स्पष्ट है कि वे पागल हो गए हैं।

प्रश्न 2.
कबीर ने कर्मकाण्ड पर करारा प्रहार किया है। स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
कबीर धार्मिक पाखण्ड के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कर्मकाण्ड पर करारे प्रहार किये हैं। वे कहते हैं किं बहुत से तथाकथित नियमों का पालन करने वाले धर्मात्मा मिले हैं जो प्रात:काल ही स्नान कर लेते हैं किन्तु आत्मा की आवाज न मानकर स्थूल पत्थर की पूजा करते हैं। उनका ज्ञान खोखला एवं दिखावटी है। इसी प्रकार अनेक पीर-औलिया देखें हैं जो वक्तव्य देकर अपने शिष्य बनाते हैं, किन्तु वे भी खुदा को नहीं जानते हैं। उनके हृदय में दया, अनुकम्पा आदि मानवीय भाव नहीं होते हैं।

प्रश्न 3.
राधा ने विरह व्यथा में डूबे ब्रजवासियों को कर्त्तव्य पालन का उपदेश क्यों दिया था? (2008)
उत्तर:
भारतीय संस्कृति का मूलाधार कर्म है। यहाँ कर्म को सर्वोपरि माना गया है। जीवन की सार्थकता कर्म में ही है। इसलिए राधा श्रीकृष्ण के विरह की वेदना में डूबे ब्रजवासियों को समझाती हैं कि उन्हें श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लग जाना चाहिए। इससे श्रीकृष्ण जो चाहते थे वे कार्य पूर्ण होंगे और ब्रजवासियों को भी सन्तोष होगा कि वे श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों को कर रहे हैं। कर्म करने से व्यक्ति को मानसिक सन्तोष भी मिलता है। ब्रजवासी जब कामों में लग जायेंगे तो उनका ध्यान भी बँटेगा। वे धीरे-धीरे विरह कष्ट से छुटकारा पा लेंगे।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के सुख-दुःख दूर करने के लिए राधा ने क्या-क्या उपाय किए थे?
उत्तर:
राधा ने नन्द, यशोदा, गोप, गोपियों, बच्चों, पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों के प्रति दया, सहानुभूति एवं सेवा का भाव अपनाया। उन्होंने यशोदा को कृष्ण के लौटने का आश्वासन दिया तो नंद को शास्त्रों का ज्ञान सुनाया। गोपों को श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाकर, बालकों को फूलों के खिलौने देकर तथा गोपियों को कृष्ण की लीला के गीत, वंशी तथा वीणा सुनाकर प्रसन्न किया। उन्होंने वृद्ध-रोगियों तथा अनाथों की सेवा की तथा दीन-हीन, निर्बलों एवं विधवाओं को सहारा दिया। इस तरह उन्होंने सभी के संताप (दुःख) दूर करने के लिए अनेक उपाय अपनाए।

प्रश्न 5.
राधा ब्रजबालाओं का दुःख किस प्रकार दूर करती थी?
उत्तर:
राधा ने ब्रजबालाओं का विरह दुःख दूर करने के लिए सेवा धर्म अपनाया था। उन्होंने यशोदा का दुःख पैर सहलाकर, आँखों के आँसू पोंछकर तथा सांत्वना देकर दूर किया तो नन्द का दुःख उनकी सेवा करके तथा शास्त्र ज्ञान सुनाकर समाप्त किया। गोपों की पीड़ा को कम करने के लिए उन्हें श्रीकृष्ण के काम में लगाया। विरहिणी गोपियों को श्रीकृष्ण की लीलाएँ वंशी आदि सुनाई और उनके दुःख को शान्त करने का प्रयास किया। बच्चों को फूलों के खिलौने देकर प्रसन्न करती तो रोगियों, अनाथों, विधवाओं, दीन-हीनों को सहारा देकर उनका कष्ट मिटाया। इस तरह राधा सभी की वेदना दूर करने का प्रयास करती थीं।

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सामाजिक समरसता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संकलित अंशों के आधार पर कबीर के विचार लिखिए।
उत्तर:
इस प्रश्न के उत्तर के लिए ‘कबीर की वाणी’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
(अ) मन लाग्यौ मेरा फकीरी में
जो सुख पायौ नाम भजन में, सो सुख, नाहि अमीरी में।
भला-बुरा सबकों सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।

(आ) तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सत गुरु धारा निरमल बाहे, वा में काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे॥
उत्तर:
इन पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

प्रश्न 3.
‘राधा की समाज सेवा’ विषय का केन्द्रीय भाव लिखिए। (2009)
उत्तर:
इसके लिए ‘राधा की समाज सेवा’ का भाव-सारांश पढ़िए।

प्रश्न 4.
“अपने दुःख को भुला देने का सबसे अच्छा उपाय है, अपने को किसी और काम में लगा देना।” राधा ने इस आदर्श का पालन किस प्रकार किया? (2009)
उत्तर:
जब व्यक्ति दुःखी होता है तब उसके चित्त पर बड़ा दबाव रहता है। इसलिए यह माना गया है कि दु:ख के समय व्यक्ति स्वयं को किसी अन्य कार्य में संलग्न कर दे ताकि उसका ध्यान उस कार्य से बँट जाए और दुःख भूल में पड़ जाए। जब श्रीकृष्ण ब्रजवासियों को बिलखता छोड़कर मथुरा चले गये तो उनकी प्रेमिका विरह वेदना से ग्रस्त हो गयी। उन्होंने उस वियोग की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए स्वयं को समाज की सेवा में संलग्न कर दिया। वे यशोदा को सांत्वना देने, उसके पैर सहलाने, आँसू पोंछने का कार्य करने लगीं। ब्रज के राजा नन्द को शास्त्र सुनाने लगीं। गोपों को काम में संलग्न कर दिया। गोपियों को कृष्ण लीला सुनाना और वंशी बजाकर प्रसन्न करना प्रारम्भ कर दिया। बच्चों को विविध फूलों के खिलौने देकर बहलाया। वृद्धों, रोगियों, अनाथों, विधवाओं आदि को सहारा देने में व्यस्त हो गयीं। इस तरह सभी की सेवा में व्यस्त होने के कारण वे अपना दुःख भूल गयीं।

प्रश्न 5.
“पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थीं।” आधुनिक सन्दर्भ में इसकी उपयोगिता समझाइए।
उत्तर:
वृक्ष-वनस्पतियाँ प्रदूषण को नियन्त्रित करने में बड़ी सहयोगी होती हैं। जितनी अधिक हरियाली होगी उतना पर्यावरण सुधार होगा। राधा को इस बात का ज्ञान था इसीलिए वे पेड़-पौधों की पत्तियों को व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। आज संसार भर में पर्यावरण प्रदूषण का प्रकोप है इसीलिए नाना प्रकार के वृक्ष लगाने के अभियान चलाये जा रहे हैं। वन संरक्षण की अनेक योजनाओं का कार्यान्वयन हो रहा है। हरित पट्टिकाएँ तथा हरित क्षेत्र निर्धारित किए जा रहे हैं ताकि हरियाली बनी रहे और मनुष्य को प्रदूषण से कुछ मुक्ति मिले। आज के वैज्ञानिक युग में प्राकृतिक सम्पदा का महत्त्व और बढ़ गया है। इस प्रकार के विचार हरिऔध के समय में आने लगे थे। इसीलिए उन्होंने राधा के द्वारा वनस्पतियों के संरक्षण का कार्य कराया है।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए
(अ) हो उद्विग्ना बिलख ………….. तजेंगे।
(आ) सच्चे स्नेही ………….. कोई न होवे।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

सामाजिक समरसता काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
पथरा, चदरिया, कागद, जुग, जतन, हाथ।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए
पृथ्वी, आँख, पक्षी, पुष्प, दिन।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-2

प्रश्न 3.
कबीर के संकलित पदों में कौन-सा रस है?
उत्तर:
कबीर के संकलित पदों में शान्त रस है।

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प्रश्न 4.
कबीर की भाषा के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
कबीर भ्रमण करने वाले सन्त थे। वे यहाँ-वहाँ जाकर जनमानस को ज्ञान का उपदेश दिया करते थे। वे एक स्थान पर स्थिर होकर नहीं रहे। अतः उनकी भाषा में विविध क्षेत्रों के शब्द आ गये हैं। इसलिए उनकी भाषा को खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है। ब्रज, अरबी, फारसी, अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली, उर्दू आदि सभी भाषाओं के शब्द कबीर के काव्य में मिल जाते हैं। विविध भाषाओं का संगम होते हुए भी कबीर की भाषा में अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में अलंकार पहचानकर लिखिए-
(अ) काहे के ताना काहे के मरनी, कौन तार से बीनी चदरिया।
(आ) जुगन जुगन समुझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
(इ) राधा जैसी सदय हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
(ई) पूजी जाती ब्रज अवनि में देवियों सी अतः थी।
उत्तर:
(अ) अनुप्रास
(आ) पुनरुक्तिप्रकाश
(इ) उपमा
(ई) उपमा।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए (2009)
(क) आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।
(ख) साधो देखो जग बौराना, सांची कहो तो मारन धावै झूठे जग पतियाना।
उत्तर:
(क) इस पंक्ति में सन्त कबीर ने भौतिक जगत् की नश्वरता का बोध कराया है। संसार की वस्तुओं पर अभिमान करना जीव की अज्ञानता है। ये सभी तो नष्ट होने वाली हैं। जिस शरीर के बल पर जीव अहंकार पाले फिरता है, एक दिन यह मिट्टी में मिल जाता है। इसलिए इस पर गर्व करना व्यर्थ है। अमर तो केवल आत्मा है, उसी का अनुसरण करना चाहिए।

(ख) साक्षात संसार से ज्ञान अर्जित करने वाले सन्त कबीर कहते हैं कि इस संसार के लोग अज्ञान अहंकार में फंसकर पागल हो गये हैं। यही कारण है कि जब उनसे सत्य बात कही जाती तो मारने दौड़ते हैं; उसका विश्वास नहीं करते हैं किन्तु कोई झूठा व्यक्ति उनसे कुछ कहता है तो वे उसका विश्वास कर लेते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
गुण, प्रेम, सदय, विधवा, सबल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-3

प्रश्न 8.
छन्द किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
मात्रा, वर्ण संख्या, यति, गति (लय) तथा तुक आदि के नियमों से युक्त रचना छन्द कहलाती है।
छन्द दो प्रकार के होते हैं।-
(1) मात्रिक छन्द-इसमें मात्राओं की गणना की जाती है।
(2) वर्णिक छन्द-इसमें वर्गों की गणना की जाती है।

प्रश्न 9.
आपकी पाठ्य-पुस्तक के पद्य भाग में कौन-कौन से पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं?
उत्तर:
हमारी पाठ्य-पुस्तक के विनय के पद, पदावली, कृष्ण की बाल लीलाएँ, पद्माकर के छन्द, मतिराम के छन्द, वृन्द के दोहे, रहीम के दोहे, ऋतु वर्णन, नौका विहार, छत्रसाल का शौर्य वर्णन, कविता का आह्वान, कबीर की वाणी, कुण्डलियाँ, दुष्यन्त की गजलें, बरसो रे तथा चलना हमारा काम है पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित पंक्तियों में गण पहचानिए
(क) जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
(ख) आटा चींटी विहग गण थे वारि औ अन्न पाते।
उत्तर:
(क) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽऽ। ऽऽ।
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
जो वे हो ता मलि न लख ती गोप के बाल कौं को
(ख) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽ।ऽ ऽ।ऽ
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
आटा ची टी विह गगण थेवारि औ अन्न पाते

प्रश्न 11.
निम्नलिखित काव्यांश में निहित काव्य सौन्दर्य को लिखिए
(अ) तो धीरे मधुर स्वर से हो विनीता बताती।।
हाँ आवेंगे व्यथित ब्रज को श्याम कैसे तजेंगे।
(आ) गाके लीला स्व प्रियतम की वेणु वीणा बजा के।
प्यारी बातें कथन करके वे उन्हें बोध देतीं।
उत्तर:
इन काव्यांशों के काव्य सौन्दर्य इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

कबीर की वाणी भाव सारांश

सारग्राही सन्त कबीर ने सभी धर्मों के सत्य को ग्रहण कर मानवतावादी व्यावहारिक धर्म अपनाया। जीवन के प्रत्यक्ष ज्ञान के सहारे उन्होंने सत्यासत्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उन्होंने बाह्य आडम्बरों, पाखण्डों, द्वेष-भावनाओं का डटकर विरोध किया। संकलित पदों में उन्होंने उन्हीं भावों को व्यक्त किया। फकीरी में रमने वाले कबीर को अमीरी के बजाय भगवान् का भजन प्रिय है। इस शरीर को नश्वर कहने वाले कबीर सन्तोष को सर्वोपरि मानते हैं। उन्हें पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान पर विश्वास है। इसीलिए वे समझाते हैं कि सजग रहकर सच्चे गुरु के बताये मार्ग पर चलकर ही उद्धार हो सकता है। धर्म या सम्प्रदाय के नाम पर आडम्बर करने वालों को उन्होंने खूब फटकारा है। उनके लिए राम और रहीम एक हैं। पत्थर पूजा, जीव हत्या आदि में संलग्न ढोंगी हिन्दू-मुसलमानों को उन्होंने करारी डाँट लगाई है। वे सत्य पर आधारित मानवता को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं।

कबीर की वाणी संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] मन लाग्यो मेरा यार फकीरी में।
जो सुख पावों नाम भजन में, सो सुख नाहि अमीरी में।।
भला-बुरा सबको सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।।
प्रेमनगर में रहनि हमारी, भलि बनि आई सबूरी में।।
हाथ में पूड़ी बगल में सोंटा, चारों दिसा जगीरी में।।
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी में ।।1।।

शब्दार्थ :
फकीरी = वैराग्य; अमीरी = वैभव सम्पन्नता; गुजरान = गुजारा; भलि = भला; सबूरी = सन्तोष; कँड़ी = पत्थर की बनी कटोरी; सोंटा = डण्डा, छड़ी; खाक = धूल; मगरूरी = अहंकार, अभिमान; साहिब = स्वामी।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद (शब्द) हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘कबीर की वाणी’ से अवतरित है। इसके रचयिता सन्त कबीरदास हैं।

प्रसंग :
इस पद में कवि ने मन की वैराग्य प्रवृत्ति पर बल दिया है।

व्याख्या :
कबीर कहते हैं कि मेरा मन तो वैराग्य में लग गया है। मुझे जो आनन्द परमब्रह्म के भजन में मिला है; वह वैभव सम्पन्नता में नहीं मिल सकता है। अमीरी नाशवान है और अस्थायी सुख देने वाली है। जबकि ब्रह्म परमानन्द देने वाले हैं। अभिमान से दूर रहकर जो कोई भला-बुरा कहे उसे सहन करके गरीबी में गुजारा करना अच्छा है। कवि का निवास तो प्रेम की नगरी है अर्थात् जहाँ प्रेम भाव है वहीं रहना उचित है। सन्तोष सबसे अधिक हितकारी है इसलिए मेरे हाथ में पूड़ी आदि पात्र तथा बगल में एक डण्डा रहता है। इनके साथ मैं संसार की चारों दिशाओं में चाहे जहाँ जाने को मुक्त हूँ। सांसारिक बन्धन व्यर्थ हैं, धन, वैभव अस्थिर हैं क्योंकि अन्त में यह शरीर मिट्टी में मिल जायेगा। अतः सम्पत्ति, बल आदि का अभिमान करना व्यर्थ है। हे सन्तो! वास्तविकता यह है कि सन्तोष से ही स्वामी (ब्रह्म) मिलते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सांसारिक आकर्षणों से परे रहकर सन्तोष के द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का सन्देश दिया गया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

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[2] मेरा तेरा मनवा, कैसे इक होई रे।
मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यों उरझाइ रे।।
मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोइ रे।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।।
जुगन जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सतगुरु धारा निरमल बाहै, वामें काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ।।2।। (2008)

शब्दार्थ :
मनवा = मन; लेखी = लिखी हुई; सुरझावन हारी = सुलझाने वाली; उरझाई = उलझाकर; निरमोही = मोह से मुक्त; जुगन-जुगन = युगों-युगों से; रंगी = संसार के माया मोह में डूबा; बिहंगी = पक्षी के समान इधर-उधर भटकने वाला; बाहै = बहती है; वामें = उसमें; काया = शरीर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान की महिमा को बताते हुए सच्चे गुरु के ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।

व्याख्या :
सांसारिक माया मोह में फँसे व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि मेरा और तुम्हारा मन एक कैसे हो सकता है। मैं तो वह कहता हूँ जो साक्षात् आँखों से देखा है और तुम वह बात कहते हो जो पुस्तकों में लिखी है। मैं व्यावहारिक ज्ञान के आधार पर सुलझाने वाली स्पष्ट बात करता हूँ। जबकि तुम अज्ञानतावश सोच में उलझे रहते हो। मैं समझाता हूँ कि सत्य, उचित की पहचान के प्रति जागरूक रहो, अन्धानुकरण मत करो किन्तु तुम अज्ञान की निद्रा में सोते रहते हो। मैं सजग करता हूँ कि संसार नाशवान है इसके प्रति मोह मत पालना परन्तु तुम इस नश्वर संसार के प्रति मोहित रहते हो।

मैं युगों-युगों से समझाते -समझाते थक गया हूँ कि मायावी संसार से मुक्त रहकर सत्य का अनुसरण करो किन्तु मेरी इस बात को कोई नहीं मानता है। तुम तो संसार के माया-मोह में लीन होकर उड़ने वाले पक्षी की तरह इधर-उधर भटक रहे हो। इस तरह भटकते हुए तुमने समस्त ज्ञानरूपी धन खो दिया है। सारा जीवन व्यर्थ गँवा दिया है। सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! ध्यान से सुन लो कि सच्चे गुरु के ज्ञान की पवित्र धारा बह रही है। उसी में अपने शरीर के विकारों को धो डालोगे तभी तुम्हारा मनचाहा हो सकेगा अर्थात् गुरु का सच्चा उपदेश ही तुम्हारा उद्धार कर सकेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. संसार की निरर्थकता को इंगित करते हुए सच्चे ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा अवलोकनीय है।
  3. सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा में दार्शनिक विषय का प्रतिपादन किया है।

[3] साधो, देखो जग बौराना।
साँची कहाँ तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
हिन्दू कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमाना।
आपस में दोऊ लहै मरतु हैं, मरम कोई नहिं जाना।।
बहुत मिले मोहि नेमी धर्मी प्रात करै असनाना।
आतम छोड़ि पषानै पू0, तिनका थोथा ज्ञाना।
बहुतक देखे पीर औलिया, पढ़े किताब कुराना।
करै मुरीद कबर बतजावै, उनहूँ खुदा न जाना।।
हिन्दु की दया मेहर तुरकन की, दोनों घर से भागी।
वे करैं जिबह वे झटका मारे, आग दोऊ घर लागी।
या विधि हँसत चलत है हमको, आपु कहावै स्याना।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दीवाना ।।3।।

शब्दार्थ :
जग = संसार; बौराना = पागल हो गया है; धावै = दौड़ता है; पतियाना = विश्वास करता है; मरम = रहस्य, वास्तविकता; नेमी = नियमों का पालन करने वाले आतम = आत्मा; पषाने = पाषाण, पत्थर; तिनका = उनका; थोथा = खोखला, निरर्थक; मुरीद = शिष्य; उनहूँ = उन्हें भी; मेहर = अनुकम्पा; तुरकन = मुसलमानों; जिबह = हलाल करना, पशु को धीरेधीरे काटना; झटका = एक ही बार में पशु का वध करना; स्याना = चतुर, होशियार; दीवाना = पागल।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद में धार्मिक पाखण्डों की निन्दा कर समरसता का सन्देश दिया है।

व्याख्या :
सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! देख लो संसार कैसा पागल हो गया है। पागलपन की यह स्थिति है कि यदि कोई व्यक्ति सत्य बात कहे तो उसे मारने दौड़ता है। यह संसार झूठे पाखण्डियों का विश्वास करता है। हिन्दू कहते हैं कि हमारे तो राम सब कुछ हैं और मुसलमान कहते हैं कि रहीम ही सब कुछ है। इस तरह ये आपस में लड़ते-मरते रहते हैं। उनमें इस रहस्य को कोई नहीं जानता है कि राम और रहीम दोनों एक ही हैं। कवि कहते हैं कि मुझे बहुत से नियमों का पालन करने वाले धार्मिक व्यक्ति मिले हैं। वे प्रात:काल ही स्नान-ध्यान करते हैं। आत्मा की आवाज की अवहेलना करके पत्थर की पूजा करने वाले उन लोगों का ज्ञान खोखला (दिखावटी) है।

मैंने बहुत से पीर और औलिया भी देखे हैं जो कुरान आदि पुस्तकें पढ़ते हैं। वे लोगों को अपने शिष्य बनाते हैं, बड़े-बड़े व्याख्यान देते हैं किन्तु उन्हें भी खुदा की जानकारी नहीं होती है। हिन्दुओं की दया तथा मुसलमानों की मेहर (कृपा)दोनों ही मनुष्यों के हृदय से पलायन कर गयी हैं। दोनों ही निर्दयी, हिंसक हो गये हैं। उनमें से एक हलाल करते हैं तो दूसरे झटका मारते हैं। इस तरह दोनों ही ओर हिंसा की आग लगी है। वे हम सब का उपहास करते हैं तथा स्वयं बहुत चतुर कहलाते हैं। कबीर कहते हैं कि ऐसी स्थिति में इनमें से किसे पागल कहा जाय। दोनों ही उन्मत्त हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. धार्मिक पाखण्ड जनित विद्वेष का तिरस्कार कर सामंजस्य एवं सहभाव का सन्देश दिया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा में समझाया गया है।

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राधा की समाज सेवा भाव सारांश

पौराणिक प्रसंगों का अपने काव्य का आधार बनाने वाले अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का प्रिय प्रवास कृष्ण काव्य परम्परा में आता है। ‘राधा की समाज सेवा’ अंश ‘प्रिय प्रवास’ महाकाव्य से लिया गया है।

परमप्रिय श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर चले जाने पर समस्त ब्रजवासियों में विरह-वेदना व्याप्त हो जाती है। राधा श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल हैं किन्तु वे अपने दुःख को भुला देने का सबसे उत्तम उपाय खोजती हैं और स्वयं को समाज सेवा में लगा देती हैं। वे नित्यप्रति यशोदा के पास जाकर उनको समझाती हैं। उनके पैर सहलाकर तथा आँसू पोंछकर सांत्वना देती हैं। उन्हें आश्वासन देती हैं कि दुःखी ब्रज को श्रीकृष्ण कैसे छोड़ सकते हैं, वे अवश्य लौटकर आयेंगे। नन्द की पीड़ा को मिटाने के लिए वे विभिन्न शास्त्रों को सुनाकर सांसारिक वैभव की हीनता का प्रतिपादन करती हैं। दुःखी ग्वालों को समझाकर श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाती हैं। ग्वालों के बालकों को दुःखी देखकर वे उन्हें फूलों के विभिन्न प्रकार के खिलौने लाकर देती हैं। उनसे श्रीकृष्ण की लीलाएँ कराती हैं और स्वयं ध्यानमग्न होकर उन्हें देखती रहती हैं। विरहिणी गोपियों को वे विधिपूर्वक सुखी करती हैं।

उन्हें श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर सुनाती हैं, वंशी तथा वीणा बजाती हैं। वृद्धों, रोगियों की वे सेवा करती हैं तथा दवा आदि देती हैं। निर्बल, दीन-हीन, अनाथ तथा विधवाओं को वे सम्मान सहित सहारा देती हैं। उनके मन में जो भी विकार हैं उनको अपने सद्व्यवहार से धो देती हैं। चींटी, पक्षी, कीड़ों आदि को अन्न-जल आदि देती हैं। वे वृक्षों के पत्तों को भी व्यर्थ में नहीं तोड़ती हैं। वे सज्जनों की संरक्षक तथा दुष्टों की प्रशासक बनी हैं। वे सभी प्राणियों की समृद्धि के कार्यों में लगी रहती हैं, कुमारी बालिकाएँ भी ब्रज में शान्ति का विस्तार करने में लगी हैं। कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर जाने पर जो महाकाली संकट देने वाली रात्रि अब आयी थी उसमें राधा चाँदनी के समान सुशोभित थीं। श्रीकृष्ण के संयोग से ब्रज में आनन्द वर्षा हुई थी, वह पुनः-पुनः आये। राधा और श्रीकृष्ण इस भूमि पर आयें किन्तु इस प्रकार की वियोग की घटना फिर न हो।

राधा की समाज सेवा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] राधा जाती प्रति- दिवस थीं पास नन्दांगना के।
नाना बातें कथन करके थीं उन्हें बोध देती।
जो वे होती परम- व्यथिता मूर्छिता या विपन्ना।
तो वे आठों पहर उनकी सेवना में बितातीं॥1॥ (2014)

घण्टे ले के हरि-जननि को गोद में बैठती थी।
वे थी नाना जतन करती पा उन्हें शोक मग्ना।
धीरे-धीरे चरण सहला औ मिटा चित्त-पीड़ा।
हाथों से थी दृग-युगल के वारि को पोंछ देती ॥2॥

शब्दार्थ :
प्रति-दिवस = रोजाना, प्रतिदिन; नन्दांगना = यशोदा, नन्द की पत्नी; नाना = तरह-तरह की; कथन = कहकर; बोध = ज्ञान समझाना; परम = बहुत; व्यथिता = पीड़ित; मूछिता = बेहोश; विपन्न = दु:खी; सेवना = सेवा; जननि = माँ; जतन = प्रयत्न, उपाय; शोक = दुख; चित्त-पीड़ा = हृदय का कष्ट; दृग-युगल = दोनों आँखें; वारि = जल, आँसू।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘राधा की समाज सेवा’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा की गयी यशोदा की सेवा का अंकन किया गया है।

व्याख्या :
श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होते हुए भी राधा प्रतिदिन नन्द की पत्नी यशोदा के पास जाती और तरह-तरह की बातें करके उन्हें समझाती थीं। यदि वे बहुत पीड़ित बेहोश या दुःखी होती तो राधा दिन-रात उनकी सेवा में ही बिताती थी अर्थात् हर समय उनकी देखभाल में ही लगी रहती थीं।

राधा श्रीकृष्ण की माँ यशोदा को अपनी गोद में लेकर घण्टों तक बैठी रहती थीं। उनको श्रीकृष्ण के चले जाने के दुःख से दुखी पाकर वे विभिन्न प्रकार के उपाय करती थीं। धीरे-धीरे उनके पैरों को सहलाती थीं और उनकी समस्त पीड़ा को मिटा देती थीं। वे अपने हाथों से यशोदा की दोनों आँखों के आँसू पोंछ देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभावी रूप का सजीव चित्रण किया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

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[2] हो उद्विग्ना बिलख जब यों पूछती थीं यशोदा।
क्या आवेंगे न अब ब्रज में जीवनाधार मेरे।
तो वे धीरे मधुर-स्वर से हो विनीता बतातीं।
हाँ आवेंगे, व्यथित बृज को श्याम कैसे तजेंगे ॥ 3 ॥

आता ऐसा कथन करते वारि राधा-दृगों में।
बूंदों-बूंदों टपक पड़ता गाल पै जो कभी था।
जो आँखों से सदुख उसको देख पातीं यशोदा।
तो धीरे यों कथन करतीं खिन्न हो तू न बेटी ॥ 4॥

शब्दार्थ :
उद्विग्ना = परेशान; बिलख = व्याकुल; जीवनाधार = जीवन के आधार, श्रीकृष्ण; विनीता = विनम्र; व्यथित = पीड़ित; तजेंगे = छोड़ेंगे; सदुःख = दुःख युक्त; खिन्न = परेशान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

इस प्रकार की बात कहते हुए विरह से व्याकुल राधा के नेत्रों में भी आँसू छलक आते थे। जो कभी-कभी आँसुओं की बूंदें यशोदा के गाल पर टपक पड़ती थीं तो वे कहती थीं कि बेटी राधा तू परेशान मत हो, सब ठीक होगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा द्वारा व्याकुल यशोदा की सेवा तथा यशोदा द्वारा राधा को सांत्वना देने का वर्णन है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली अपनायी गयी है।

[3] हो के राधा विनत कहतीं मैं नहीं रो रही हूँ।
आता मेरे दृग युगल में नीर आनन्द का है।
जो होता है पुलक कर के आप की चारु सेवा।
हो जाता है प्रगटित वही वारि द्वारा दृगों में ॥5॥

वे थीं प्रायः ब्रज नृपति के पास उत्कण्ठ जातीं।
सेवायें थीं पुलक करतीं क्लान्तियाँ थीं मिटाती।
बातों ही में जग विभव की तुच्छता थी दिखाती।
जो वे होते विकल पढ़ के शास्त्र नाना सुनातीं ॥6॥

शब्दार्थ :
विनत = विनम्र; दृग युगल = दोनों नेत्र; पुलक = रोमांच, हर्ष; चारु = सुन्दर; ब्रज-नृपति = ब्रज के राजा, नन्द; उत्कण्ठ उद्यत; क्लांतियाँ = दु:ख; जग-विभव = सांसारिक वैभव; तुच्छता = दीनता।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में सेवा भावी राधा के ज्ञानपरक प्रबोध को प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या :
राधा की आँखों में छलके आँसुओं की बूंद कभी यशोदा के गाल पर पड़ जाती थीं तो वे उसे सांत्वना देती तब राधा विनम्र होकर कहती कि मैं रो नहीं रही हूँ। मेरे दोनों नेत्रों में तो अति आनन्द के आँसू हैं। आपकी सुखद सेवा करके मुझे जो हर्ष होता है, वही आँखों से जल के रूप में प्रकट हो जाता है।

राधा प्रायः उद्यत होकर ब्रज के राजा के पास जाती और प्रसन्नतापूर्वक उनकी सेवा करती तथा उनके समस्त दुःखों को मिटाती थीं। बातों ही बातों में वे सांसारिक वैभव की दीनता प्रदर्शित करती और यदि वे अधिक व्याकुल होते थे तो राधा विभिन्न शास्त्र पढ़कर सुनाती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रबुद्ध राधा के सेवा भावी रूप का अंकन हुआ है।
  2. तत्सम प्रधान सानुप्रासिक भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दक्रान्ता छन्द है।

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[4] होती मारे मन यदि कहीं गोप की पंक्ति बैठी।
किम्वा होता विकल उनको गोप कोई दिखाता।
तो कार्यों में सविधि उनको यत्नतः वे लगाती।
औ ए बातें कथन करती भूरि गंभीरता से।। 7॥

जी से जो आप सब करते प्यार प्राणेश को हैं।
तो पा भू में पुरुष तन को, खिन्न हो के न बैठे।
उद्योगी हो परम रुचि से कीजिए कार्य ऐसे।
जो प्यारे हैं परम प्रिय के विश्व के प्रेमिकों के ॥8॥

शब्दार्थ :
किम्वा = अथवा; गोप = ग्वाला; सविधि = विधि से; यत्नतः = प्रयत्नपूर्वक; भूरि = बहुत अधिक; रुचि = लगन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा ने गोपों को कर्म में लीन होने का उद्बोधन दिया है।

व्याख्या :
यदि कहीं पर कोई मलिन मन वाले ग्वालाओं की कोई पंक्ति होती अथवा राधा को कोई ग्वाला व्याकुल होता हुआ दिखाई पड़ता तो वे विधि से प्रयत्नपूर्वक उनको अपने-अपने काम में लगा देतीं। वे बहुत गम्भीरता से यह बात कही कि यदि आप सभी प्राणप्रिय श्रीकृष्ण को हृदय से प्यार करते हो तो पृथ्वी पर दुर्लभ मनुष्य का शरीर पाकर दुःखी होकर न बैठे। पूरी लगन के साथ ऐसे कामों को करें जो परमप्रिय श्रीकृष्ण के प्रेमियों को अच्छे लगते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहने का उद्बोधन दिया गया है।
  2. कर्म के प्रति निष्ठा भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। उसी का प्रतिपादन यहाँ हुआ है।
  3. संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली में विषय की अभिव्यक्ति हुई है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[5] जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
देती पुष्पों रचित उनको मुग्धकारी-खिलौने।
दे शिक्षाएँ विविध उनसे कृष्ण लीला करातीं।
घंटों बैठी परम रुचि से देखतीं तद्गता हो ॥9॥

पाई जातीं यदि दुखित जितनी अन्य गोपांगनाएँ।
राधा द्वारा सुखित वह भी थीं यथा रीति होती।
गा के लीला स्व प्रियतम की वेणु, वीणा बजा के।
प्यारी-बातें कथन कर के वे उन्हें बोध देतीं ॥10॥

शब्दार्थ :
मलिन = उदास; लखती = देखती; मुग्धकारी = मोहित करने वाले तद्गता = तन्मय; गोपांगनाएँ = गोपियाँ, ग्वालों की पत्नियाँ; वेणु = वंशी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा ग्वालों के बच्चों तथा उनकी पत्नियों (गोपियों) की उदासी दूर करने का वर्णन है।

व्याख्या :
वे राधा यदि ग्वालों के बच्चों को उदास देखतीं तो वे उन्हें फूलों से बने मन को मोहित करने वाले खिलौने देतीं। वे उन्हें नाना प्रकार की शिक्षाएँ देकर कृष्ण लीला कराती । घण्टों तक बैठी रहतीं और उस लीला को तन्मय होकर देखती रहती थीं।

यदि ग्वालों की पत्नियाँ दु:खी पाई जाती तो वे भी राधा द्वारा इसी तरह सुखी होती थीं। अपने प्रियतम श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर, वंशी एवं वीणा बजाकर और प्यारी-प्यारी बातें कहकर उनको उद्बोधन देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ग्वालों के बच्चों तथा पत्नियों की सेवा का वर्णन किया गया है।
  2. मन्दाक्रान्ता छन्द है। तत्सम युक्त सरल सुबोध भाषा का प्रयोग किया गया है।

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[6] संलग्ना हो विविध कितने सान्त्वना कार्य में भी।
वे सेवा थीं सतत करती वृद्ध-रोगी जनों की।
दीनों, हीनों, निबल विधवा आदि को मानती थीं।
पूजी जाती बृज-अवनि में देवियों सी अतः थी ॥11॥

खो देती थीं कलह जनि, आधि के दुर्गुणों को।
धो देती थीं मलिन मन की व्यापनी कालिमायें।
बो देती थी हृदय तल में बीज भावज्ञता का।
वे थी चिन्ता-विजित गृह में शांति धारा बहाती ॥12॥

शब्दार्थ :
संलग्ना हो = लगकर; निबल = निर्बल; बृज-अवनि = ब्रज भूमि; आधि = मानसिक चिन्ता; व्यापिनी = प्रभावित करने वाली; कालिमाएँ = दोषों को; भावज्ञता = मनोभाव समझने; चिन्ता-विजित-गृह = चिन्ता को जीत लेने वाला घर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा किए गए सद्भावपूर्ण सेवा कार्यों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा नाना प्रकार के कितने ही सान्त्वना देने वाले कार्यों में लगी रहती थी। वे वृद्ध और रोगी जनों की निरन्तर सेवा करती रहती थीं। वे दीन-हीनों, निर्बलों, विधवाओं आदि का सम्मान करती थीं, उनकी सेवा करती थीं। इसीलिए ब्रजभूमि में वे देवियों की तरह पूजी जाती थीं।

राधा पारस्परिक कलह तथा मानसिक दुःखों को दूर कर देती थीं। वे दुःखी मन को प्रभावित करने वाले सभी दोषों को धो डालती थीं। वे मनुष्यों के तन-मन के सभी कष्टों को दूर करके उनके हृदय में सहृदयता भर देती थीं। वे चिन्ता को जीत लेने वाले घर में शान्ति की धारा प्रवाहित कर देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के जन सेवी रूप का वर्णन हुआ है।
  2. सानुप्रासिक भाषा तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  3. समास प्रधान तत्सम शब्दावली में विषय-का प्रतिपादन किया गया है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[7] आटा चींटी विह्या गण थे वारि ओ अन्न पाते।
देखी जाती सदय उनकी दृष्टि कीटादि में भी।
पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थी।
जी से भी निरस्त रहती भूत सम्बर्द्धना में ॥13॥

वे छाया थी सुजन शिर की शासिका थी खलों में।
कंगालों की परम निधि थी औषधि पीड़ितों की।
दोनों की थी बहिन, जननी थी अनाथाश्रितों की।
आराध्य थी ब्रज-अवधि की प्रेमिका विश्व की थीं ॥14॥

शब्दार्थ :
विा = पक्षी; कीटादि = कीड़े आदि; वृथा = व्यर्थ में; निरत = संलग्न; भूत सम्बर्द्धना = प्राणियों के उत्थान में; अनाथ = सहारे हीन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा की पशु-पक्षियों, अनाथों आदि की व्यापक सेवा का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा की सेवा का क्षेत्र व्यापक था। चींटी, पक्षी राधा से अन्न एवं जल पाते थे। कीड़े आदि के प्रति भी उनकी दयापूर्ण दृष्टि थी। श्रेष्ठ वृक्षों के पत्तों को भी वे व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। वे अपने हृदय से स्वाभाविक रूप में प्रेमियों के उत्थान के कार्यों में लगी रहती थीं।

वे (राधा) सज्जनों के सिर की छाया थीं तथा दुष्टजनों पर शासन करने वाली थीं। वे निर्धनों के लिए महान् सम्पत्ति का भण्डार थीं और पीड़ितों (रोगियों) के लिए सही उपचार करने वाली दवा थीं। वे दीन-हीनों की बहन थीं और जो अनाथ और आश्रयहीन थे उनके लिए माँ थीं। वे ब्रज भूमि के निवासियों की पूज्य थीं तथा समस्त संसार की प्रेमिका थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभाव का व्यापक रूप अंकित किया गया है।
  2. समास प्रधान संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

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[8] जैसा व्यापी विरह दुख था गोप गोपांगनाका।
वैसी ही थी सदै हृदया स्नेह की मूर्तिराधा।
जैसी मोहावरित ब्रज में तामसी रात आयी।
वैसी ही वे लसित उसमें कौमुदी के समा थी॥15॥

जो थी कौमार-व्रत निरता बालिकायें अनेकों।
वे भी पा के समय ब्रज में शान्ति विस्तारती थीं।
राधा के हृदय बल से दिव्य शिक्षा गुणों से।
वे भी छाया सृदृश उनकी वस्तुतः हो गई थीं॥16॥

शब्दार्थ :
सदै = दयामय; मोहावरित = मोह से जकड़ी; तामसी रात = महाकाली अंधेरी रात; निरता = संलग्न; विस्तारती = बढ़ाती; दिव्य = अलौकिक; छाया-सदृश = परछाईं के समान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा के स्नेहपूर्ण व्यापक सेवा भाव का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
जिस प्रकार की व्यापक विरह वेदना ग्वालों और ग्वालों की पत्नियों में थी, उसी प्रकार की दयामय हृदय वाली राधा साक्षात् स्नेह की प्रतिमा थीं। श्रीकृष्ण के ब्रज से चले जाने पर जिस प्रकार की मोह से जकड़ी महाकाली अन्धेरी रात ब्रज में आयी थी उसी तरह से वे (राधा) उस रात में चाँदनी के समान सुशोभित थीं अर्थात् श्रीकृष्ण के विरह से व्यथित ब्रजवासियों में वे सुख का संचार कर रही थीं।

जो कौमार्य व्रत में संलग्न अनेक बालिकाएँ थीं वे भी कुछ समय पाकर ब्रज में शान्ति का विकास करती थीं। राधा के हृदय में विद्यमान सद्भावनाओं के प्रभाव से और उनकी शिक्षा के अलौकिक गुणों के कारण वे उनकी परछाईं के समान हो गई थीं अर्थात् वे उनके हर कार्य में सहयोग करती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सहृदय राधा के सेवा भाव की प्रभावशीलता का अंकन हुआ है।
  2. सामाजिक एवं सानुप्रासिक भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है। उपमा, अनुप्रास, रूपक अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है।

[9] तो भी आई न वह घटिका और न वे बार आये।
वैसी सच्ची सुखद ब्रज में वायु भी आ न डोली।
वैसे छाये न घन रस की सोत सी जो बहाते।
वैसे उन्माद कर-स्वर से कोकिला भी न बोली ॥17॥

जीते भूले न ब्रज महि के नित्य उकण्ठ प्राणी।
जी से प्यारे जलद तनको, केलि क्रीड़ादिकों को।
पीछे छाया विरह दुख की वंशजों-बीच व्यापी।
सच्ची यों है ब्रज अवनि में आज भी अंकिता है ॥18॥

सच्चे स्नेही अवनिजन के देश के श्याम जैसे।
गधा जैसी सद्य हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
हे विश्वात्मा ! भरत भुव के अंक में और आवें।
‘ऐसी व्यापी विरह घटना किन्तु कोई न होवे ॥19॥

शब्दार्थ :
घटिका = घड़ी, 24 मिनट का समय; सोत = स्रोत; महि = भूमि। जलद-तन = बादल के समान श्याम शरीर वाले, श्रीकृष्ण; विश्व प्रेमानुरक्ता = संसार भर से प्रेम करने वाली; भरत भुव = भारत भूमि; अंक = गोद।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
ब्रज में राधा की सेवा के प्रभाव स्वरूप पर्याप्त अच्छा वातावरण था किन्तु जो आनन्द श्रीकृष्ण के ब्रज में होने पर था वे घड़ी या दिन आये ही नहीं। श्रीकृष्ण के समय जैसी सच्चा सुख देने वाली वायु भी ब्रज में फिर नहीं बही। आनन्द का स्रोत सा बहाने वाले वैसे बादल भी फिर नहीं छाए और न उस प्रकार के मस्ती भरे स्वर में कोयल ही कुहकी।

नित्य प्रति श्रीकृष्ण पुनः मिलन की उत्कण्ठा से भरे रहने वाले ब्रजभूमि के निवासी प्राणों से प्यारे श्रीकृष्ण और उनके क्रीड़ा-विहार आदि से मिलने वाले आनन्द को जीते जी नहीं भूल पाए। श्रीकृष्ण के वियोग जनित दुःख ने उनके वंशजों को भी प्रभावित किया। वास्तविक सत्य यह है कि ब्रजभूमि में आज भी उस विरह का प्रभाव अंकित है।

कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. श्रीकृष्ण के संयोग काल के सुख और विरह काल के दुःख का स्मरण किया गया है।
  2. परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि श्रीकृष्ण जैसी विभूतियाँ पुनः-पुनः अवतरित हों किन्तु विरह का व्यापक कष्ट न दें।
  3. उपमा एवं अनुप्रास अलंकार तथा सामाजिक भाषा का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 10 प्रेरक प्रसंग

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 10 प्रेरक प्रसंग

प्रेरक प्रसंग अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने वृद्धा को अपनी रॉयल्टी के सारे पैसे किस भाव से दिये थे? (2010)
उत्तर:
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने वृद्धा भिखारिन को अपनी रॉयल्टी के सारे पैसे इस भाव से दिये थे कि वह फिर कभी भी भीख नहीं माँगेगी। वह इस राशि से कोई भी धन्धा कर लेगी। उसने ऐसा संकल्प लेते हुए कहा। ‘निराला’ जी ने उस बुढ़िया भिखारिन को एक सौ चार रुपये जो रॉयल्टी के मिले थे, वे सब उसे दे दिए और स्वयं खाली हाथ इक्के में बैठकर महादेवी के घर की ओर चल पड़े। इक्के का किराया भी महादेवी ने चुकाया।

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प्रश्न 2.
‘गरीबों का मसीहा’ कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? (2008)
उत्तर:
‘गरीबों का मसीहा’ कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि इस समस्त मानव समाज में गरीबी और अमीरी की विषमता को दूर करने के लिए हम सभी को प्रयास करना चाहिए। जिससे हमारे बीच धनवान् और निर्धन का भेद मिट जाये। कोई भी व्यक्ति गरीब न रहे। इस गरीबी के कारण न जाने कितने इस मनुष्य समाज में अपराध किये जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूख मिटाने के लिए भीख माँगने को अपना धन्धा न बनाये। तब ही ‘गरीबों का मसीहा’ का उद्देश्य सफल हो सकेगा। अन्यथा गरीबी में धनवान् बनकर मसीहा कोई भी नहीं बन सकता। उस व्यक्ति को त्याग करना पड़ता है, परिश्रम करना पड़ता है। परिश्रम से प्राप्त धन गरीबों में वितरित किया जाये, तभी गरीबों का मसीहा स्वयं को सिद्ध कर सकता है। मसीहा कभी भी अपने साथी मनुष्यों की गरीबी को देख नहीं सकता। गरीबी में मसीहा को तो गरीब बनकर ही जीना पड़ता है क्योंकि उनकी गरीबी, उनकी दरिद्रता उनसे (मसीहा से) देखी कहाँ जाती है?

प्रश्न 3.
आपके मतानुसार निराला जी का रॉयल्टी के सारे पैसे देने का निर्णय सही था या गलत, कारण सहित बताइए।
उत्तर:
हमारा मत है कि निराला जी द्वारा रॉयल्टी के सारे पैसे वृद्धा भिखारिन को दिया जाने का निर्णय गलत था। इसके सन्दर्भ में निम्नलिखित कारण स्पष्ट रूप से दिये जा रहे हैं-
(1) ‘निराला’ जी ने अपनी रॉयल्टी के सारे रुपये (एक सौ चार) भीख माँगने वाली वृद्धा को इस संकल्प के साथ दिये कि वह फिर कभी भी भीख नहीं माँगेगी। वह उन रुपयों से कोई धन्धा कर लेगी।

अब यहाँ यह विचार करना है कि वह बूढ़ी भिखारिन कौन-सा कार्य कर सकती है जिससे उसका स्वयं का भरण-पोषण हो सके। उस वृद्ध अवस्था में उसके हाथ-पैर चलते नहीं हैं, निश्चय ही वह कोई भी कार्य नहीं कर पायेगी। रॉयल्टी के दिये गये रुपयों को अपनी निकम्मी सन्तान के ऊपर ही खर्च कर डालेगी और उन पैसों को खर्च कर देने के उपरान्त भीख माँगने के लिए सड़क के किनारे फिर बैठ जायेगी।

(2) उस वृद्धा से उन रुपयों को उसकी सन्तान छीन लेगी और उस वृद्धा को पुनः भीख माँगने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

(3) प्रायः देखा गया है कि इन भिखारिन बनी औरतों पर कोई अभाव नहीं होता। वे भीख माँगने की आदत से मजबूर हो जाती हैं और बदस्तूर भीख माँगती रहती हैं।

(4) ऐसे भिखारी अपने भीख माँगने के स्थान को बदल देते हैं लेकिन अपने भीख माँगने के धन्धे को नहीं बदलते।

(5) मैंने खुद ऐसे भिखारियों को देखा है, जो भीख न माँगने का वायदा करते रहे हैं; परन्तु उन्होंने अपने इस काम को नहीं छोड़ा है। इस भीख माँगने को उन्होंने अपना व्यवसाय बना रखा है। वे अपने असली रूप को भिखारी के वेश में बदल देते हैं और समाज के लोगों को निर्धनता के होने का स्वांग करते हुए प्रदर्शित करते हैं।

(6) इन भिखारी बने लोगों को किसी भी तरह के रोजगार से लगाने की आपकी चेष्टा अवश्य विफल होगी। इसके कारण हैं-एक तो वे काम न करने की आदत में ढल गये हैं। दूसरे वे जहाँ भी रोजगार प्राप्त करने जाते हैं, वहाँ से चोरी करके भाग जाते हैं, या काम पर लौटकर नहीं आते।

इस तरह इन भीख माँगने वाले लोगों ने पूरे भारतीय समाज को कलंकित किया हुआ है। अतः मेरा मत तो यही है कि निराला द्वारा दिया गया रॉयल्टी का पैसा व्यर्थ गया। उनका निर्णय परिस्थितियों के प्रतिकूल था, अव्यावहारिक था। इस दिए गये दान का कोई सुफल प्राप्त होने का नहीं दिखता।

प्रश्न 4.
“अर्थोपार्जन मेरा ध्येय नहीं है। गरीबी मेरी शान है।” इस कथन के भाव अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
उत्तर:
“अर्थोपार्जन मेरा ध्येय नहीं है। गरीबी मेरी शान है।” इस कथन को स्पष्ट करते हुए यह कहा जा सकता है कि जहाँ तक धन कमाने का प्रश्न है, धन तो कमाया जा सकता है। लेकिन धन को कमाने के उपाय कैसे होंगे, इन अपनाये गये उपायों का स्वरूप कैसा होगा इसका निर्धारण करना महत्त्वपूर्ण बात है।

श्री बालमुकुन्द गुप्त ‘भारत-मित्र’ नामक दैनिक मित्र के सम्पादक हैं। उनकी साख एक ईमानदार एवं परिश्रमी सम्पादक की है। लोग उनके सच्चे सम्पादकत्व में बेईमानी अथवा भ्रष्टता की दुर्गन्ध होने का विश्वास नहीं करते। अतः अपने परिष्कृत एवं परिमार्जित सम्पादकत्व की गरिमा को उन्होंने अपने सदाचार और परिश्रम से सुरक्षित किया है। वे धन कमाने का ध्येय बनाते तो कोई भी गलत आचरण का उपयोग करके धन अर्जित कर सकते थे, लेकिन अपने स्थापित आदर्शों के परिपालन के लिए उन्होंने गरीबी में जीवनयापन करना उचित समझा। यह निर्धनता कोई ऐसी खराब अवस्था नहीं होती जिससे व्यक्ति व्यथित होकर गलत आचरण करे। ईमानदारी से परिपूर्ण एवं सच्ची लगन से किये गये परिश्रम से उस निर्धनता को दूर किया जा सकता है और वह व्यक्ति समाज में शानदार और इज्जतदार व्यक्ति का सम्मान पा सकता है।

गरीबी में अच्छे-अच्छे महान् कार्यों का सम्पादन करते हुए लोगों को देखा है। उन्होंने अपने आदर्शों का पालन किया है। वे समाज के लिए बड़े ही उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

श्री बालमुकुन्द जी गुप्त ने इस गरीबी को अपना प्राण और शान के रूप में धारण किया है, वरण किया है, स्वीकार किया है क्योंकि वे समाज के लोगों से अपने आपको अलग प्रदर्शित करते हुए जीवित रहना नहीं चाहते। भारत का आम नागरिक गरीब है। सम्पादक जी अपने पत्र में अपने इस ईमानदार पेशे से लोगों को सच्ची सूचना देकर उन्हें गुमराह करना नहीं चाहते। एक सम्पादक समाज और देश का सजग प्रहरी होता है। देश के प्रत्येक नागरिक को सही दिशा निर्दिष्ट करता है। उन्हें इंगित करता है कि उचित मार्ग क्या है? सच्ची घटना क्या है? वे चाहते तो कितना ही मनमाना धन अर्जित कर सकते, केवल अपने आदर्श को छोड़कर, सिद्धान्तों में परिवर्तन करके। उनमें इस बात की चाहना है, एक ललक है कि आम नागरिक के दुःख-दर्द को एक सम्पादक समझे और अनुभव करे। यही अनुभव उनके साहित्य को सप्राणता प्रदान करते हैं। अत: गरीबी की अनुभूति समाज के स्तर पर, उसके सतही रूप में गहरी अनुभूति देती है जो व्यक्ति की शान के रूप में उसके चरित्र को उभारकर रखती है।

प्रश्न 5.
“बालमुकुन्द जी भारत के एक आम नागरिक का जीवन जीना चाहते थे।” इस कहानी के आधार पर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्री बालमुकुन्द गुप्त ‘भारत-मित्र’ जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सम्पादक हैं। वे फटेहाली का जीवन जी रहे हैं। वे बहत सस्ते और कम कीमत के वस्त्र पहनते हैं और अपने घर के सभी सदस्यों को मितव्ययिता से जीवन बिताने की सुशिक्षा देते हैं। वे फिजूलखर्ची को अच्छी आदत नहीं मानते हैं। धन को तो किसी भी तरह कमाया जा सकता है, लेकिन फिजूलखर्ची से उसका उपयोग अच्छे रूप में नहीं किया जा सकता, ऐसा उनका मत है।

वे जो भी सिद्धान्त या आदर्श स्थापित करते हैं, या उनको प्रस्तावित करते हैं, वे सबसे पहले अपने ऊपर, अपने परिवार के सदस्यों के ऊपर व्यवहार में लाये जाते हैं। इसका एक कारण है, वह है एक सजग सम्पादक जो अपने परिवेश अपने समाज और देश (राष्ट्र) की नीति और रीति से जुड़ा रहता है। इसके विपरीत चलने पर वह अपने आम नागरिक होने के सिद्धान्त का कोरा ढिंढोरा ही पीटता रहता है।

एक सम्पादक का उत्तरदायित्व होता है आम नागरिक के दुःख-दर्द को समझने का, उन दुःख-दर्दी में अनुभूतिपरक सहयोग का। इन सभी दशाओं में एक सुयोग, सफल और सच्चा सम्पादक वही है जो आम नागरिक को कम से कम परिस्थिति के अनुसार उचित मार्ग निर्देशन देकर सहयोग करे। यही अनुभव सम्पादकीय साहित्य में संजीवनी घोलते हैं और सम्पूर्ण समाज को सचेष्ट और क्रियाशील बनाते हैं। वे एक सच्चे नागरिक के रूप में उभर कर आते हैं तथा राष्ट्र रूपी भवन की ऊँचाइयों को प्राप्त करने के लिए मजबूत स्तम्भ सिद्ध होते हैं।

आम नागरिक का जीवन किसी भी व्यक्ति को चाहे वह साहित्यकार हो या समाज सेवी हो या संस्थागत कर्मचारी-उन सभी का यह सद्कर्त्तव्य होता है कि वे अपने आचरण से, व्यवहार से, लोगों को सच्ची दिशा इंगित करते चलें। अन्याय के कुमार्ग से बचते हुए सन्मार्ग के पथिक होकर वास्तविकताओं को स्वीकारते हुए विकास पथ का अनुसरण करें। आम नागरिक का जीवन इन सभी सामाजिक संस्थानों के सेवकों के आचरण-व्यवहार से प्रभावित होता है। आम नागरिक वस्तुतः गरीबी, साधनहीनता, अशिक्षा के अभिशाप से संतृप्त है, तो फिर बताइये बालमुकुन्द गुप्त जैसे सचेष्ट, सजग सम्पादक स्वयं किस तरह आम नागरिक से अलग प्रभाव से प्रभावित हों। अशिक्षा को मिटाने का उनका ध्येय पूर्ण हो सकेगा, लोग गरीबी से मुक्ति पायेंगे, उनकी समृद्धि के साधन जुटाये जायेंगे-केवल उन्हें सुदिशा, इंगित की जाए। उन्हें सच्ची और सही सूचना प्रदान की जाये।

सही दिशा निर्दिष्ट करना, सच्ची, सही सूचना देना एक सम्पादक का सद्धर्म है। अतः अन्याय से बचकर न्यायमार्ग का अनुसरण करके ही आम आदमी (नागरिक) का जीवन जीवित रहा जा सकता है।

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प्रेरक प्रसंग अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि ‘निराला’ के अनुसार मानवता कहाँ से आती है?
उत्तर:
कवि ‘निराला’ के अनुसार मानवता हृदय की विशालता से आती है, भौतिक सम्पन्नता से नहीं।

प्रश्न 2.
‘गुप्त जी’ का पूरा नाम क्या था? वह किस अखबार के सम्पादक थे?
उत्तर:
‘गुप्त जी’ का पूरा नाम श्री बालमुकुन्द गुप्त था। वह भारत मित्र’ नामक हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के सम्पादक थे।

प्रेरक प्रसंग पाठ का सारांश

1. गरीबों का मसीहा पाठ का सारांश

प्रस्तावना-ईश्वर की सृष्टि में विषमता :
निर्धनता सिर पर चढ़कर बोलती है। इस संसार में कोई धनवान है, तो कोई निर्धन। कोई कुछ भी काम नहीं करता फिर भी मौज की जिन्दगी जीता है और कोई दिन-रात परिश्रम करते-करते दो जून की रोटी को तरसता है। परिस्थितियों से समझौता, उसकी लाचारी है। इस संसार में यह विषमता कब तक चलती रहेगी, इसका उत्तर किसी के पास भी नहीं है।

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ :
गरीबों के मसीहा-निराला जी कई दिनों से उपवास कर रहे थे और पैदल भी चले जा रहे थे। वे दुनिया से दीनता, गरीबी को मिटाने सम्बन्धी विचारों जिससे इक्का ताँगा कर लेते। वे गरीबों के मसीहा थे। अत: उन्हें भी गरीब बनकर जीना है। वे गरीबों की दरिद्रता देख नहीं सकते थे। स्वयं मौज मारे, दूसरे भाई भूखे नंगे रहे, ऐसा वे स्वप्न में

भिखारिन की सहायता :
वे भूखे थे, लीडर प्रेस-दारागंज चले जा रहे थे। सोचते थे कि प्रेस से रॉयल्टी के कुछ पैसे मिलें, तो वे अपनी भूख मिटाएँ। रॉयल्टी के 104 रुपये प्राप्त हुए; इक्के पर सवार हो लिए और अपनी मुँह बोली बहन महादेवी के घर पहुँचने ही वाले थे कि एक करुण पुकार उनके कानों में पड़ी, तो इक्का रुकवाया, स्वयं उतरे और सड़क किनारे बैठी भिखारिन के पास जा पहुंचे। उनके हृदय में करुणा जाग गई, बोले माँ! हमारे रहते तुम्हें भीख माँगनी पड़ती है, ऐसा नहीं हो सकता।

भीख न माँगने का संकल्प :
बुढ़िया ने अपने कमजोर स्वर में कहा कि मैं बुढ़ापे की कमजोरी में कुछ कर नहीं सकती। सन्तान ने दूध से निकाली मक्खी की तरह मुझे फेंक दिया है। विवशता से भीख माँगकर खाती हूँ। कवि ने कहा कि एक रुपया दूं तो कब तक भीख नहीं माँगोगी। यदि पाँच रुपये दूं तो कब तक ? बुढ़िया ने उत्तर दिया एक दिन और पाँच दिन क्रमशः

इस पर कवि निराला ने कहा कि यदि एक सौ चार रुपये दे दिये जाएँ तो कब तक भीख नहीं माँगनी पड़ेगी? बुढ़िया का उत्तर था कभी नहीं। वह कोई धन्धा कर लेगी। इसका संकल्प उस बुढ़िया ने ले लिया।

उपसंहार :
निराला जी, खाली जेब ही महादेवी के घर पहुँचे और इक्के का भाड़ा भी महादेवी को देना पड़ा क्योंकि उनके पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उनकी आत्मा आज भी दहाड़ मारती हुई कहती है कि मानवता हृदय की विशालता से आती है; भौतिक सम्पन्नता से नहीं।

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2. आदर्शवादी बिक नहीं सकता पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
श्री बालमुकुन्द गुप्त ‘भारत-मित्र’ जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सम्पादक थे। उनके दरवाजे को किसी ने खटखटाया। अन्दर कमरे में नीचे फर्श पर दरी बिछाकर बैठे हुए श्रीगुप्त जी चौकी पर कागज रखकर लिख रहे थे। तब उन्होंने छोटे पुत्र को आवाज दी और कहा, “देखना बेटा! कौन आये हैं?”

छोटे बेटे ने दरवाजा खोला और एक सज्जन अन्दर प्रविष्ट हुए। गुप्त जी उन्हें देखकर खड़े हो गये और पूछा कि हे मित्र! बहुत दिन बाद दिखाई दिए हो, आजकल कहाँ हो और क्या कर रहे हो?

आगन्तुक पुराने मित्र :
जो सज्जन आये हुए थे, वे गुप्तजी के पुराने मित्र थे। भारत-मित्र’ हिन्दी दैनिक के सम्पादक श्री बालमुकुन्द गुप्त की कमीज पीछे दीवार पर खूटी पर टंगी हुई थी। वह कमीज बहुत हल्के और सस्ते कपड़े की सिली हुई थी। गुप्त जी मोटी निब वाली सस्ते दामों वाली कलम से लिख रहे थे।

आगन्तुक महोदय ने सभी वस्तुओं को, घर के वातावरण को बड़ी बारीकी से देखा। सज्जन अपने मन्तव्य की बात कहना ही चाहते थे कि गुप्त के ज्येष्ठ पुत्र ने कमरे में प्रवेश किया और बाजार से खरीद कर लाई गई दो कमीजों को अपने पिताजी श्री गुप्त जी के सामने रखा।

मितव्ययिता की सीख :
गुप्त जी ने कहा कि कमीज तो अच्छी है लेकिन है कितने की? बेटे ने कमीज का मूल्य बताया चार रुपये ! गुप्त जी को विस्मय हुआ और आपत्ति के स्वर में कहा कि कमीज को इतना महँगा क्यों खरीदा? इतने रुपये में तो घर के सभी सदस्यों के लिए कपड़े बन सकते थे। इसी बीच आगन्तुक महादेय ने कहा कि गुप्त जी बच्चे हैं, “यदि वे इस समय नहीं खायेंगे, नहीं पीयेंगे और नहीं पहनेंगे, तो फिर ये कब खाएँगे और पहनेंगे।”

फिजूलखर्ची को रोकना :
गुप्तजी ने कहा- यह तो सरासर फिजूलखर्ची है। महँगे कपड़े पहनने की सामर्थ्य हमारे परिवार में नहीं है। रह जाती है बात खाने-पीने की उम्र का सम्बन्ध भी मितव्ययिता से होना चाहिए। मितव्ययिता भी इसी समय सीखनी है।

धन की कमी की पूर्ति :
आगन्तुक महोदय बोले कि धन की कमी से होने वाली कठिनाई को तो मैं दूर करे देता हूँ। मैं इसलिए ही तो आपके पास आया हूँ। इतना कहते ही आगन्तुक मित्र महोदय ने पाँच हजार रुपये उनकी चौकी पर रख दिये।

विस्मय :
गुप्त जी यह देखकर चौंक पड़े और लगा कि उनके शरीर पर सैकड़ों साँप और बिच्छू रेंग गये हों। विस्मय से फटे नेत्र वाले गुप्त जी ने यह देखते हुए कहा-क्या मतलब?

दो धनवानों के बीच मुकद्दमा :
आपको विहित है कि यहाँ की फौजदारी की अदालत में दो धनवान व्यक्तियों के बीच मुकद्दमा चल रहा है। दोनों पक्षों से सम्बन्धित सनसनीपूर्ण विवरणों द्वारा अपने पत्र के माध्यम से उनका समर्थन करें, तो उन लोगों को लाभ मिल सकता है। इसी के लिए उनकी ओर से आपके पास भेंट लेकर आया हूँ।

गरीबी मेरी शान है :
गुप्त जी ने धीरे से लेकिन गम्भीर स्वर में कहा-‘मित्र ! तुम गलत समझते हो। अगर धन कमाना ही मेरा ध्येय रहा होता; तो आप जो अभी चारों ओर घूर-चूर कर देख रहे थे और मेरी गरीबी पर आश्चर्य कर रहे थे। वह नहीं होता। गरीबी मेरी शान है। मैंने अपनी इच्छा से ही इसका (गरीबी का) वरण किया है। इसका कारण यह है कि मैं आम नागरिक से एक होकर जीवन जीना चाहता हूँ। उसके दुःख-दर्द को समझने की और अनुभव करने की ललक है। यही अनुभव मेरे साहित्य को प्राण देते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो गरीबी मेरे प्राण हैं। यह भी अन्याय की खातिर कदापि सम्भव नहीं।”

उपसंहार :
गरीबी की गरिमा का गान सुनकर बेचारे मित्र महोदय, अपना रुपया उठाकर चलते बने और गुप्त जी पुनः लेखन में व्यस्त हो गये।

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