MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 मेरे सपनों का भारत

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 मेरे सपनों का भारत (निबन्ध, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम)

मेरे सपनों का भारत पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

मेरे सपनों का भारत लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बौद्धिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया में किस-किसका योगदान था?
उत्तर:
बौद्धिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया में धार्मिक संतों, दार्शनिकों, कवियों, वैज्ञानिकों, खगोलविदों और गणितज्ञों का योगदान था।

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प्रश्न 2.
शिक्षा के क्षेत्र में कौन-कौन से आचार्य प्रसिद्ध हुए हैं? (M.P. 2010)
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में कौटिल्य, पाणिनि, जीवक, अभिनव गुप्त और पतंजलि आदि आचार्य प्रसिद्ध हुए हैं।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के विकास के लिए किस प्रकार की योजनाएँ बनाई गईं?
उत्तर:
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गईं।

प्रश्न 4.
भारत विकसित देशों की श्रेणी में वैसे आ सकेगा?
उत्तर:
भारत बौद्धिक समाज के रूप में बदलकर ही विकसित देशों की श्रेणी में आ सकेगा।

प्रश्न 5.
भारतीय सेना में कौन-कौन सी स्वदेशी मिसाइलें शामिल की गई हैं?
उत्तर:
भारतीय सेना में ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ स्वदेशी मिसाइलें शामिल की गई हैं।

मेरे सपनों का भारत दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अतीत में शिक्षा के क्षेत्र में भारत को बहुत उन्नत क्यों कहा गया है?
उत्तर:
अतीत में भारत में तक्षशिला और नालंदा जैसे महान् विश्वविद्यालय थे, जिनमें भारत के अतिरिक्त सुदूर देशों के विद्यार्थी भी भाषा, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, औषधि, विज्ञान, सर्जरी, धनुर्विद्या, एकाउंट्स, वाणिज्य, भविष्य-विज्ञान, दस्तावेजीकरण, तंत्रविद्या, संगीत, नृत्य तथा छिपे खजानों की शिक्षा प्राप्त करने आते थे। इसीलिए अतीत में शिक्षा के क्षेत्र में भारत को बहुत उन्नत कहा गया है।

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प्रश्न 2.
शून्य के आविष्कार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (M.P. 2011)
उत्तर:
गणित के क्षेत्र में भारत ने शून्य का आविष्कार किया जिससे गणना करने की दोहरी प्रणाली विकसित हुई। इसी दोहरी प्रणाली पर आधुनिक कंप्यूटर निर्भर हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने विश्व को गणना सिखाने का श्रेय भारतीयों को दिया। शून्य के आविष्कार से अनेक महत्त्वूपर्ण वैज्ञानिक खोज संभव हो सकीं।

प्रश्न 3.
आर्यभट्ट की क्या देन है? (M.P. 2009, 2012)
उत्तर:
आर्यभट्ट ने हमें बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। उन्होंने रेखागणित के क्षेत्र में वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात को पाई के रूप में परिभाषित किया था और दशमलव के चार अंकों तक इसका शुद्ध मान बतलाया था। इस प्रकार रेखागणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट की महत्त्वपूर्ण देन है। दशमलव पद्धति भी उनकी देन है।

प्रश्न 4.
भारत के आधारभूत ढाँचे के निर्माण के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए?
उत्तर:
भारत ने आधारभूत ढाँचे के निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण उद्योगों की स्थापना की। अनुसंधान व विकास और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना की। इनका नेतृत्व योग्य व्यक्तियों के हाथों में दिया गया।

प्रश्न 5.
“स्वतंत्रता से पूर्व भी भारतीयों ने विश्वस्तरीय उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं।” इस कथन का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए। (M.P. 2012)
उत्तर:
इस कथन का तात्पर्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भी भारत में प्रत्येक क्षेत्र से जुड़े प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, कवि, दार्शनिक, इंजीनियर, चिकित्सक आदि थे। वैज्ञानिकों ने अपनी खोजों के द्वारा विदेशों में भारत का नाम रोशन किया। टैगोर ने साहित्य के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। सी.वी. रमन, के.एस. कृष्णन को उनकी वैज्ञानिक खोजों के लिए ‘सर’ उपाधि से सम्मानित किया गया। दार्शनिक क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद ने अपने व्याख्यानों से विश्व के लोगों को प्रभावित किया।

प्रश्न 6.
अंतर्राष्ट्रीय व्यावसायिक बाजार में भारतीय सॉफ़्टवेयर की अच्छी साखक्यों है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय व्यावसायिक बाजार में भारतीय सॉफ्टवेयर की अच्छी साख है, क्योंकि इस क्षेत्र में सक्रिय भारतीय इंजीनियरों ने अपनी कुशलता का परिचय दिया है। हमारा कुशल- जन-संसाधन विश्व में सर्वोपरि है। इसमें युवा उद्यमियों का कुशल प्रबंधन प्रशंसनीय है।

प्रश्न 7.
सही जोड़ियाँ बनाइए –
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 मेरे सपनों का भारत img-1
उत्तर:

  1. (ग)
  2. (ङ)
  3. (क)
  4. (ख)
  5. (घ)।

मेरे सपनों का भारत भाव-विस्तार/पल्लवन

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प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्ति का भाव-विस्तार कीजिए- “विश्व एक बौद्धिक समाज में परिवर्तित हो रहा है।”
उत्तर:
21वीं शताब्दी ज्ञान युग और बौद्धिक युग से सम्बन्धित है। जहाँ ज्ञान की प्राप्ति, उपलब्धि और प्रयोग को महत्त्वपूर्ण संसाधन माना जाता है। आज संसार में प्रत्येक व्यक्ति विविध विषयों का ज्ञान अर्जित करना चाहता है। ज्ञान बुद्धि का विषय है। इसीलिए समाज के लिए अपना बौद्धिक विकास करने में संलग्न है और विश्व एक बौद्धिक समाज में परिवर्तित हो रहा है। जहाँ अज्ञान और अंधविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं है।

मेरे सपनों का भारत भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह करते हुए उनके नाम भी लिखिए –
विश्वविद्यालय, दर्शनशास्त्र, औषधि विज्ञान, तंत्र विद्या, आधारशिला।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 मेरे सपनों का भारत img-2

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए –

  1. हम इसका श्रेय भारतीयों को देते हैं, जिन्होंने हमें गणना करना सिखाया। (सरल वाक्य में)
  2. भारत ने महत्त्वपूर्ण उद्योगों की स्थापना और आधारभूत ढाँचे के निर्माण को प्रेरित किया। (मिश्र वाक्य में)
  3. बालक रो-रोकर चुप हो गया। (संयुक्तं वाक्य में)

उत्तर:

  1. हमें गणना करना सिखाने का श्रेय भारतीयों को देना चाहिए।
  2. जब भारत ने महत्त्वपूर्ण उद्योगों की स्थापना की, तब उसने आधारभूत ढाँचे का भी निर्माण किया।
  3. बालकं रो रहा था और वह रोकर चुप हो गया।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्य को शुद्ध रूप में लिखिए –

  1. खिड़की खुलने से प्रकाश आएगा।
  2. तुम तुम्हारे घर जाओ।
  3. हमारे को अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना चाहिए।

उत्तर:

  1. खिड़की खुलने से प्रकाश आता है।
  2. तुम अपने घर जाओ।
  3. हमें अपनी उपलब्धि पर गर्व करना चाहिए।

मेरे सपनों का भारत योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
भारत ने शून्य का आविष्कार किया, ऐसे ही भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में और क्या-क्या उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं? सूची बनाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
भारतीय मिसाइल का मॉडल तैयार कर उसका प्रदर्शन कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

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प्रश्न 3.
आपके सपनों में भारत कैसा है, विषय पर परिचर्चा का आयोजन कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 4.
गाँव/शहर का विकास ही भारत का विकास है, अतः आप अपने गाँव/शहर के विकास के लिए स्वयं क्या करना चाहते हैं, लेखबद्ध करें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

मेरे सपनों का भारत परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
विश्व को शून्य की देन ……….. है।
(क) इंग्लैंड की
(ख) अमेरिका की
(ग) जापान की
(घ) भारत की
उत्तर:
(घ) भारत की।

प्रश्न 2.
रामानुजम प्रसिद्ध ……….. थे।
(क) वैज्ञानिक
(ख) गणितज्ञ
(ग) दार्शनिक
(घ) शिक्षा शास्त्री
उत्तर:
(ख) गणितज्ञ।

प्रश्न 3.
भारत ने ………… का आविष्कार किया।
(क) दशमलव प्रणाली
(ख) कंप्यूटर
(ग) शिक्षा प्रणाली
(घ) मिसाइल प्रणाली
उत्तर:
(क) दशमलव प्रणाली।

प्रश्न 4.
‘हम इसका श्रेय भारतीयों को देते हैं’ किसने कहा?
(क) अल्बर्ट आइंस्टाइन ने
(ख) अल्बर्ट डिसूजा ने
(ग) अल्बर्ट मारकोनी ने
(घ) सी.वी. रमन ने
उत्तर:
(क) अल्बर्ट आइंस्टाइन ने।

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प्रश्न 5.
वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात को पाई के रूप में ……….. परिभाषित किया।
(क) आर्यभट्ट ने
(ख) भास्कराचार्य ने
(ग) मिहिर वराह ने
घ) नागार्जुन ने
उत्तर:
(क) आर्यभट्ट ने।

प्रश्न 6.
भारतीय सेना में शामिल की जा चुकी मिसाइलें हैं –
(क) सूर्य और आकाश
(ख) पृथ्वी और अग्नि
(ग) क्रूज और नाग
(घ) गौरी और हल्फ
उत्तर:
(ख) पृथ्वी और अग्नि।

प्रश्न 7.
विश्व किस समाज में परिवर्तित हो रहा है –
(क) बौद्धिक
(ख) धार्मिक
(ग) वैज्ञानिक
(घ) आध्यात्मिक
उत्तर:
(क) बौद्धिक।

प्रश्न 8.
‘मेरे सपनों का भारत’ के लेखक हैं……….। (M.P. 2012)
(क) अब्दुल कलाम आजाद
(ख) डॉ. अब्दुल कलाम
(ग) अब्दुल कादिर
(घ) अब्दुल रहमान
उत्तर:
(ख) डॉ. अब्दुल कलाम।

प्रश्न 9.
सुश्रुत ने कब जटिल शल्य क्रिया की थी?
(क) 15,000 वर्ष पहले
(ख) 1,000 वर्ष पहले
(ग) 2,500 वर्ष पहले
(घ) 2,000 वर्ष पहले
उत्तर:
(ग) 2,500 वर्ष पहले।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पर कीजिए –

  1. भारत पिछली शताब्दी में एक ………. राष्ट्र था। (प्रबल उन्नत)
  2. भारत ने ………. का आविष्कार किया। (गुरुत्वाकर्षण/शून्य)
  3. इक्कीसवीं सदी ………. से संबंधित है। (बौद्धिक युग/धार्मिक युग)
  4. स्वतंत्रता के बाद भारत ने ………. शुरू की। (पंचवर्षीय योजना/राजनीतिक योजना)
  5. 70 के दशक में पहले ………. क्रान्ति के परिणाम देखने को मिले। (समग्र/हरित)

उत्तर:

  1. उन्नत
  2. शून्य
  3. बौद्धिक युग
  4. पंचवर्षीय योजना
  5. हरित।

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III. निम्नलिखित कथनों में सत्य असत्य छाँटिए –

  1. ‘मेरे सपनों का भारत’ निबंध के लेखक पंडित नेहरू हैं।
  2. हमें अपने उल्लेखनीय उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए।
  3. भारतीय सेना में ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ को शामिल किया गया।
  4. परमाणु ऊर्जा उत्पत्ति तथा अस्त्र विकास में हमारी उपलब्धियाँ विकसित विश्व के मुकाबले की नहीं हैं।
  5. विश्व एक बौद्धिक समाज में परिवर्तित हो रहा है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए – (M.P. 2009)

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 11 मेरे सपनों का भारत img-3
उत्तर:

(i) (ङ)
(ii) (ग)
(iii) (घ)
(iv) (ख)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
किस दशक में पहले हरित क्रांति के परिणाम देखने को मिले?
उत्तर:
70 के दशक में।

प्रश्न 2.
भारत किस अवसर का लाभ एक विकसित देश बनने के लिए उठा सकता हैं।
उत्तर:
दो दशकों के भीतर का।

प्रश्न 3.
भास्कराचार्य ने किस सिद्धान्त की स्थापना की?
उत्तर:
‘सूर्य-सिद्धान्त’ की।

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प्रश्न 4.
‘सूर्य सिद्धान्त’ में भास्कराचार्य ने किसके नियम को पहचाना था?
उत्तर:
गुरुत्वाकर्षण के नियम को।

प्रश्न 5.
शिक्षकों के पैनल में कौन-कौन से प्रसिद्ध आचार्य थे?
उत्तर:
कौटिल्य, पाणिनि, जीवक, अभिनव गुप्त और पतंजति।

मेरे सपनों का भारत लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अतीत में भारत के दो महान् विश्वविद्यालय कौन-कौन से थे? (M.P. 2012)
उत्तर:
अतीत में भारत में तक्षशिला. और नालंदा दो महान् विश्वविद्यालय थे।

प्रश्न 2.
2500 वर्ष पहले किस चिकित्सक ने जटिलशल्य क्रियाएँ की थीं?
उत्तर:
2500 वर्ष पहले सुश्रुत ने जटिलशल्य क्रियाएँ की थीं।

प्रश्न 3.
आज़ादी से पूर्व के प्रसिद्ध कवि कौन थे?
उत्तर:
आज़ादी से पूर्व रवींद्रनाथ टैगोर प्रसिद्ध कवि थे।

प्रश्न 4.
ऑपरेशन फ्लड से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
ऑपरेशन फ्लड से तात्पर्य है-दूध उत्पादन में क्रांति होना।

प्रश्न 5.
पी.एस.एल.वी. सी.-5 की सातवीं सफल उड़ान ने क्या प्रदर्शिताकिया?
उत्तर:
उपग्रह को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने की स्वदेशी योग्यता को।

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प्रश्न 6.
आर्यभट्ट कौन थे?
उत्तर:
आर्यभट्ट एक महान भारतीय वैज्ञानिक थे। उन्होंने किसी वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपातको पाई के रूप में परिवर्तित किया था।

प्रश्न 7.
लेखक ने शल्य-क्रिया के क्षेत्र में किसका नाम लिया है?
उत्तर:
लेखक ने शल्य-क्रिया के क्षेत्र में सुश्रुत का नाम लिया है।

प्रश्न 8.
स्वतंत्रता के बाद भारत ने क्या शुरू की?
उत्तर:
पहली पंचवर्षीय योजना।

मेरे सपनों का भारत दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हरित क्रांति से क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति के कारण भारत खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना। खाद्यान्नों के आयात पर उसकी निर्भरता समाप्त हो गई।

प्रश्न 2.
अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने क्या प्रगति की?
उत्तर:
अंतरिक्ष-विज्ञान के क्षेत्र में हर प्रकार उपग्रह डिजाइन तथा विकसित करने और उन्हें अपने प्रक्षेपण यानों द्वारा अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने के साथ ही स्वदेशी तकनीक विकसित करने की योग्यता प्राप्त कर ली है।

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प्रश्न 3.
मिसाइल क्षेत्र में भारत की क्या उपलब्धि है?
उत्तर:
मिसाइल के क्षेत्र में भारत ने किसी भी प्रकार की मिसाइल या मुखाग्र को डिजाइन करने, विकसित करने तथा उसे उत्पादित करने की स्वदेशी क्षमता प्राप्त कर ली है।

प्रश्न 4.
आजादी से पहले हमारे पास विस-किस क्षेत्र के कौन-कौन-से लोग जुड़े हुए थे?
उत्तर:
आजादी से पहले हमारे पास विश्वस्तरीय वैज्ञानिक, कवि, दार्शनिक, इंजीनियर, चिकित्सक और लगभग हरेक क्षेत्र से लोग जुड़े हुए थे। हमारे पास एस. एन. बोस, मेघनाद साहा, जे.सी. बोस., सर सी.वी. रमन, सर के.एस. कृष्णन, होमी जहाँगीर भाभा, विक्रम साराभाई, वी.एस. राय जैसे वैज्ञानिक, रामानुजम् जैसे गणितज्ञ, रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे कवि, विवेकानंद जैसे दार्शनिक जुड़े हुए थे।

प्रश्न 5.
व्यावसायिक बाजार में भारत किस प्रकार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है?
उत्तर:
हमारा कुशल जन-संसाधन संसार में सबसे इच्छित संसाधनों में से एक है। यह विकसित संसार के आर्थिक विकास में भारतीय वैज्ञानिकों और उद्यमियों के बड़े योगदान से स्पष्ट है। इसके अलावा अपनी जनसंख्या और शिक्षित जनशक्ति की उपलब्धता के कारण भारत तुरन्त बौद्धिक कर्मियों की विशाल संख्या कर सकने में सक्षम है। ऐसा कर सकने में बहुत कम विकसित देश सक्षम हैं।

मेरे सपनों का भारत लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का संक्षिप्त जीवन-परिचय और साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
भारतरत्न और भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम का जन्म सन् 1931 में तमिलनाडु के रामेश्वरम जिले के धनुष कोटि नगर के एक साधारण परिवार में हुआ। उनका पूरा नाम डॉ. चंबुल पाकिर जैनुल आवदीन अब्दुल कलाम था। उनका जीवन सादगी की अनूठी मिसाल था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम में हुई। उच्चशिक्षा के लिए आप तिरुचिरापल्ली चले गए और वहाँ के सेंट जोसफल कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त की।

ईश्वर में आपकी पूर्ण आस्था थी। आप सच्चे धर्मनिरपेक्ष थे। आप जिस प्रकार कुरान का पाठ करते थे, उसी प्रकार गीता के दर्शन में भी आपकी आस्था थी। उनका कहना था कि जब में विज्ञान विपय से संबंधित अनेक सूक्ष्म कणों से मिलकर बने कणों का अध्ययन करता था, तो उससे प्रभु की सत्ता में मेरा विश्वास और भी दृढ़ हो जाता।

आपकी परिकल्पना थी कि सन् 2020 तक भारत विकसित राष्ट्र बने। इस कल्पना को साकार करने के लिए आपने विज्ञान के क्षेत्र में गहन अनुसंधान किया तथा देश को उपग्रह प्रणाली में आत्मनिर्भर बनाया। सर्वप्रथम मिसाइल कार्यक्रम को भारत में एक पहचान दी। इसी कारण उन्हें ‘मिसाइलमैन’ भी कहा जाता है। आपके प्रयासों से भारतीय सेना को पृथ्वी और अग्नि जैसी मिसाइलों से सुसज्जित किया गया है तथा अनेक मिसाइलों के निर्माण का कार्य प्रगति पर है। डॉ. कलाम ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इन्हीं विशिष्ट उपलब्धियों एवं वैज्ञानिक परिकल्पना के लिए उनको राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत-रत्न’ प्रदान किया गया। 28 जुलाई, 2015 को इनका निधन हो गया।

साहित्यिक उपलब्धियाँ:
विज्ञान के अतिरिक्त साहित्य के क्षेत्र में डॉ. कलाम ने उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। आपकी रचनात्मक प्रतिभा का लाभ साहित्य जगत् को भी मिलता रहा है। आपके बहुमूल्य विचार, कल्पना शक्ति एवं दूर-दृष्टि आपकी बहुमूल्य रचनाओं में भी झलकती हैं। आपमें देश के भावी कर्णधारों को सँवारने की अद्वितीय परिकल्पनाएँ थीं।

रचनाएँ:
मेरे सपनों का भारत।

महत्त्व:
आप बच्चों को राष्ट्र की धरोहर मानते थे। आप भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद पर आसीन थे। आप वैज्ञानिक क्षेत्र के साथ-साथ शिक्षण और साहित्य-सृजन में भी संलग्न थे।

मेरे सपनों का भारत पाठ का सारांश

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प्रश्न 1.
डॉ. अब्दुल कलाम के द्वारा रचित ‘मेरे सपनों का भारत’ लेख का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘मेरे सपनों का भारत’ पाठ के रचयिता डॉ. अब्दुल कलाम हैं। इसमें लेखक ने भारत जैसे विकासशील देश के लिए एक बौद्धिक समाज के रूप में विकसित होने और स्वयं को एक बौद्धिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने के तरीकों व उपायों पर विचार किया है। लेखक का कहना है कि भारतीय सभ्यता की प्रभावशाली उपलब्धियों को देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि विगत सहस्राब्दी में भारत एक उन्नत समाज था। यहाँ धार्मिक संतों, दार्शनिकों, कवियों, वैज्ञानिकों, खगोलविदों और गणितज्ञों के प्रेरक योगदानों से बौद्धिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया निरंतर चलती रही है। उनके मौलिक विचारों, सिद्धांतों और व्यवहारों ने बौद्धिक समाजका ठोस आधारशिला रखी।

तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय जिनमें अन्य देशों के विद्यार्थी भी अनेक विषयों की शिक्षा ग्रहण करने आते थे। इस बात के प्रमाण हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में भारत बहुत उन्नत था। कौटिल्य, पाणिर्णाने, जीवक, अभिनव गुप्त तथा पतंजलि जैसे योग्य शिक्षाविद् थे। गणित के क्षेत्र में भारतीयों ने विश्व को शून्य और दशमलव पद्धति दी, जिसक कारण वर्तमान कम्प्यूटर और महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज संभव हो सकी। यूकलिड से बहुत पहले भारत में ज्यामिति’ के नाम से रेखागणित का प्रयोग किया जाता था। आर्यभट्ट ने किसी वृत्त की परिधि और अनुपात को पाई के रूप में परिभाषित किया था और दशमलव के चार अंकों तक शुद्ध मान बतलाया था।

इसी प्रकार भास्कराचार्य ने सूर्य सिद्धांत की स्थापना की। उन्होंने बताया था। कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण को पहचाना था। चरक ने आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को दिया, तो सुश्रुत ने जटिल शल्य क्रियाएँ की थीं। हमें अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व है। भारत में आजादी से पूर्व भी भारत में एस.एन. बोस, मेघनाथ साहा, जे.सी. बोस, सर सी.वी. रमन, सर के.एस. कृष्णन, होमी जहाँगीर भाभा, विक्रम सारा भाई जैसे वैज्ञानिक, रामानुजम जैसे गणितज्ञ, रवींद्रनाथ जैसे कवि, विवेकानंद जैसे दार्शनिक थे।

स्वतंत्रता के बाद भारत में पंचवर्षीय योजना प्रारंभ की गई। उद्योगों के लिए आधारभूत ढाँचा बना। 1970 में हरित क्रांति हुई। देश खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बना। ऑपरेशन फ्लड के द्वारा देश विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में काफी विकास हुआ। भारत ने उपग्रह डिजाइन तथा विकसित करने, अपनी धरती से प्रक्षेपण यानों द्वारा कक्षा में प्रक्षेपित करने की क्षमता प्राप्त की। इसी प्रकार मिसाइल या मुखाग्र को डिजाइन करने की क्षमता प्राप्त की है। भारतीय सेना में पृथ्वी और अग्नि को शामिल किया जाना स्वदेशी क्षमता का ही प्रमाण है।

परमाणु ऊर्जा उत्पत्ति तथा अस्त्र विकास में हम विश्व के समकक्ष हैं। भारतीय सॉफ्टवेयर क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिकों व उद्यमियों ने विश्व आर्थिक व्यवस्था में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत तुरंत बौद्धिक कर्मियों की विशाल संख्या तैयार करने में सक्षम है। आज विश्व बौद्धिक समाज में बदल रहा है, जहाँ समन्वित ज्ञान-शक्ति तथा धन का स्रोत होगा। अतः भारत को विकसित देश बनने के लिए अवसर का लाभ उठाना चाहिए। इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि हम प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में कहाँ हैं, जो यह एक बौद्धिक शक्ति बनने के लिए आवश्यक है।

मेरे सपनों का भारत संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
भारतीय सभ्यता की प्रभावशाली उपलब्धियों को देखने पर यह विश्वास प्रबल हो जाता है कि भारत पिछली सहस्राब्दी में एक उन्नत समाज था। कई धर्मों के संतों, दार्शनिकों, कवियों, वैज्ञानिकों, खगोलविदों और गणितज्ञों के प्रेरक योगदानों के द्वारा बौद्धिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया निरंतर चलती रही। उनके भए तथा मौलिक विचारोंसिद्धांतों और व्यवहारों ने हमारे अपने बौद्धिक समाज के लिए एक ठोस आधार प्रदान किया। (Page 49)

शब्दार्थ:

  • प्रबल – दृढ़।
  • सहस्राब्दी – हजारों वर्ष।
  • उपलब्धियों – प्राप्तियों।
  • बौद्धिक – बुद्धि से संबंधित।
  • पुनर्जागरण – फिर जागृत होने की प्रक्रिया।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा लिखित लेख ‘मेरे सपनों का भारत’ से लिया गया है। लेखक प्राचीन भारत की उपलब्धियों के आधार पर बौद्धिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया के निरंतर चलते रहने की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

व्याख्या:
भारत विगत एक हजार वर्षों के दौरान एक उन्नत समाज था, यह बात प्राचीन भारतीय सभ्यता की विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावशाली देनों को देखने से प्रमाणित हो जाता है। यह विश्वास भी दृढ़ हो जाता है कि भारत एक प्रगतिशील देश था। भारत में प्रचलित विभिन्न धर्मों के साधु-सं, ऋषि-महर्षियों, दर्शन-शास्त्र के तत्त्ववेत्ताओं, कवियों, वैज्ञानिकों, आकाशमंडल के ग्रह-नक्षत्रों के जानकारों और गणित के विद्वानों के प्रेरित करने वाले योगदानों के द्वारा बुद्धि संबंधी पुनजागरण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती थी। इससे फिर जागृत होने की प्रक्रिया में कभी बाधा उत्पन्न नहीं होती थी। उनके नवीन और मौलिक विचारों, सिद्धांतों और व्यवहारों ने हमारे अधुिनिक बौद्धिक समाज के लिए ठोस आधार प्रदान किया है।

विशेष:

  1. लेखक ने प्राचीन भारत की उपलब्धियों को प्रेरक बताया है। यह भी बताया है कि उस काल में बौद्धिक पुनजांगरण की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया ने समाज को ठोस आधार प्रदान किया है।
  2. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त है।
  3. विचारात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
भारत एक उन्नत समाज था, यह कैसे प्रमाणित होता है?
उत्तर:
भारतीय सभ्यता की विगत एक हजार वर्षों की प्रभावशाली उपलब्धियों को देखने पर यह बात प्रमाणित हो जाती है कि भारत एक उन्नत समाज था।

प्रश्न (ii)
प्राचीन काल में समाज को ठोस आधार किसने प्रदान किया है?
उत्तर:
प्राचीन काल में बौद्धिक पुनर्जागरण की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया ने समाज को ठोस आधार प्रदान किया है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस ओर ध्यान आकर्षित किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने प्राचीन भारत की उपलब्धियों और निरंतर चलने वाली बौद्धिक प्रक्रिया की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

प्रश्न (ii)
किन लोगों के योगदान से पुनर्जागरण की प्रक्रिया निरंतर चलती रही?
उत्तर:
धार्मिक संतों, दार्शनिकों, कवियों, वैज्ञानिकों, खगोलविदों और गणितज्ञों के प्रेरक योगदानों से भारत में पुनर्जागरण की प्रक्रिया निरंतर चलती रही।

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प्रश्न 2.
भारत ने शून्य का आविष्कार किया, जिसने गणना की दोहरी प्रणाली की आधारशिला रखी, जिस पर वर्तमान कंप्यूटर निर्भर हैं। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था, “हम इसका श्रेय भारतीयों को देते हैं, जिन्होंने हमें गणना करना सिखाया, जिसके बिना कोई भी महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज नहीं की जा सकती थी।” इसी प्रकार, भारत ने दशमलवे पद्धति (डेसिमल सिस्म) का आविष्कार किया। यूकलिड से काफी पहले भारत में ज्यामिति के नाम से रेखागणित का प्रयोग किया जाता था। आर्यभट्ट ने किसी वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात को पाई के रूप में परिभाषित किया था और दशमलव के चार अंकों तक इसका शुद्ध मान बतलाया था। (Page 50)

शब्दार्थ:

  • शून्य – जीरो।
  • आविष्कार-खोजगणना – गिनने की प्रक्रिया आधारशिलानींव का रह पत्थर, जिसके ऊपर मकान की दीवार बनाई जाती है।

प्रसंग:
प्नत गद्यांश डॉ. अब्दुल कलाम द्वारा लिखित लेख ‘मेरे सपनों के भारत’ में लिया गया है। खक प्राचीन भारत के गणित के क्षेत्र में योगदान का उल्लेख किया है।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि गणित के क्षेत्र में भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस क्षेत्र में भारत ने शून्य (जीरो) का आविष्कार किया, जिसने गिनती करने की दोहरी पद्धति की नींव रखी। गणना की इसी दोहरी पद्धति पर वर्तमान कंप्यूटर आश्रित है। आधुनिक कंप्यूटर दोहरी प्रणाली से ही संचालित है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने जीरो के आविष्कार का श्रेय भारतीयों को देते हुए कहा कि भारतीयों ने ही हमें गिनती करना सिखाया। विश्व के लिए उनका यह बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। समुचित गणना के अभाव में कोई भी महत्त्वपूर्ण खोज नहीं की जा सकती थी; अर्थात् गणित के क्षेत्र में भारतीयों द्वारा शून्य की विश्व को देन के पश्चात् ही महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज और आविष्कार संभव हो सके हैं।

दशमलव प्रणाली भी विश्व को भारतीयों की ही देन है। इतना ही नहीं यूकलिड से बहुत पहले भारत में ज्यामिति के नाम से रेखागणित का प्रयोग किया जाता था। दूसरे शब्दों में, यूकलिड से पहले ही भारतीयों ने रेखागणित का आविष्कार कर लिया था। आर्यभट्ट ने वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात को पाई के रूप में परिभाषित किया था। इसके साथ ही दशमलव के चार अंकों तक इसका शुद्ध मान निकालकर बताया था।

विशेष:

  1. गणित के क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियों और विश्व में उनके – योगदान के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।
  2. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
  3. गणित की पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।

मयांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्राचीन भारत की गणित के क्षेत्र में विश्व को क्या देन है?
उत्तर:
प्राचीन भारत की गणित के क्षेत्र में विश्व को महत्त्वपूर्ण देन है-शून्य (जीरो)। इस देन से गिनती करने की दोहरी पद्धति की नींव पड़ी, जिससे अनेक वैज्ञानिक आविष्कार संभव हो सके।

प्रश्न (ii)
भारत में यूकलिड से पूर्व किस नाम से रेखागणित का प्रयोग होता था।
उत्तर:
यूकलिड से पूर्व ही भारत में ‘ज्यामिति’ के नाम से रेखागणित का प्रयोग होता था।

प्रश्न (iii)
अल्बर्ट आइंस्टाइन ने भारतीयों को किस बात का श्रेय दिया?
उत्तर:
अल्बर्ट आइंस्टाइन ने भारतीयों को विश्व को गणना सिखाने का श्रेय दिया।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
गणित के क्षेत्र में जीरो के अतिरिक्त भारतीयों ने क्या आविष्कार किया?
उत्तर:
गणित के क्षेत्र में जीरो के अतिरिक्त भारतीयों के दशमलव पद्धति का आविष्कार किया। आधुनिक दशमलव पद्धति विश्व को भारतीयों की ही देन है।

प्रश्न (ii)
आर्यभट्ट ने पाई के रूप में किसे परिभाषित किया था?
उत्तर:
आर्यभट्ट ने किसी वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात को पाई के रूप में परिभाषित किया था।

प्रश्न 3.
ऐसा नहीं है कि उल्लेखनीय उपलब्धियाँ केवल हमारे अतीत तक सीमित हैं। भारत की आजादी से पहले, हमारे पास विश्व स्तरीय वैज्ञानिक, कवि, दार्शनिक, इंजीनियर, चिकित्सक और लगभग प्रत्येक क्षेत्र से जुड़े लोग थे। हमारे पास एस.एन. बोस, मेघनाद साहा, जे.सी. बोस, सर सी.वी. रमन, सर के.एस. कृष्णन, होमी जहाँगीर भाभा, विक्रम साराभाई, बी.सी. राय जैसे वैज्ञानिक, रामानुजम जैसे गणितज्ञ; रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे कवि; विवेकानंद जैसे दार्शनिक संत रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद के काल में भी उतनी ही महान् उपलब्धियाँ देखने को मिली हैं। (Page 50)

शब्दार्थ:

  • आजादी – स्वतंत्रता।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ. अब्दुल कलाम द्वारा लिखित लेख ‘मेरे सपनों का भारत’ से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक अतीत की उपलब्धियों की चर्चा करने के पश्चात् स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के विद्वानों की चर्चा किया है।

व्याख्या:
लेखक का कहना है कि ऐसा नहीं है कि भारत ने केवल अतीत (प्राचीनकाल) में ही विभिन्न क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की हों, अपितु भारत में स्वतत्रता प्राप्ति से पहले भी विश्व-स्तरीय अर्थात् उच्चकोटि के वैज्ञानिक, कवि, दार्शनिक, इंजीनियर, डॉक्टर और लगभग प्रत्येक क्षेत्र के जुड़े लोग थे।

हमारे देश में एस.एन बोस, मेघनाद साहा, जे.सी. बोस, सर सी.वी. रमन, सर के.एस. कृष्णन, होमी जहाँगीर भाभा, विक्रम साराभाई और बी.सी. राय जैसे योग्य वैज्ञानिक, गणित के क्षेत्र में रामानुजम जैसे गणितज्ञ, साहित्य के क्षेत्र में रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान् कवि और आध्यात्मिक संसार में विवेकानंद जैसे संत रहे हैं। हमारे देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के समय में भी उतनी ही योग्य और उच्चकोटि की महान् प्राप्तियाँ देखने को मिली हैं। इस प्रकार हमारे देश ने अतीत में, स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और बाद में वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यिक, इंजीनियरिंग, गणित आदि सभी क्षेत्रों में महान् उपलब्धियाँ अर्जित की हैं।

विशेष:

  1. स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत महान् लोगों की गणना करवाई गई है।
  2. भाषा सरल, सुबोध खड़ी बोली है।
  3. वर्णनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
आजादी से पहले भारत के पास कौन-सा विश्व स्तर कवि रहा है?
उत्तर:
आज़ादी से पहले भारत के पास कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसा विश्वस्तरीय कवि रहा है।

प्रश्न (ii)
स्वतंत्रता से पहले भारत में कौन-कौन से क्षेत्रों से जुड़े उच्चकोटि के लोग रहे हैं?
उत्तर:
स्वतत्रता प्राप्ति से पहले भारत में वैज्ञानिक, कवि, दार्शनिक, इंजीनियर, डॉक्टर आदि प्रत्येक क्षेत्र से जुड़े विश्वस्तरीय लोग रहे हैं।

प्रश्न (iii)
लेखक ने गणित के क्षेत्र में किस गणितज्ञ का नाम लिया है?
उत्तर:
लेखक ने गणित के क्षेत्र में सुप्रसिद्ध गणितज्ञ रामानुजम का नाम लिया है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में किस काल की चर्चा की है?
उत्तर:
लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व काल की चर्चा की है।

प्रश्न (ii)
लेखक ने किन वैज्ञानिकों के नाम गिनाए हैं, जिनका स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद महान् उपलब्धियों में योगदान रहा है?
उत्तर:
होमी जहाँगीर भाभा, विक्रम सारा भाई, और बी.सी. राय जैसे वैज्ञानिकों की स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद भी महान वैज्ञानिक उपलब्धियों में योगदान रहा है।

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प्रश्न 4.
स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी पहली पंचवर्षीय योजना शुरू की। इसने महत्त्वपूर्ण उद्योगों की स्थापना और आधारभूत ढाँचे के निर्माण को प्रेरित किया। ’70 के दशक में पहले हरित क्रांति के परिणाम देखने को मिले, जिसने भारत को खाद्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया। ऑपरेशन फ्लड ने भारत को निश्चित समयावधि में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक बनाया। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में भी काफी विकास देखने को मिला और कई अनुसंधान व विकास और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना हुई, जिनका नेतृत्व विभिन्न क्षेत्रों के योग्य नेता कर रहे थे। इसने उच्च प्रौद्योगिकी मिशनों के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। (Page 50)

शब्दार्थ:

  • पंचवर्षीय – पाँच वर्ष की।
  • निर्माण – बनाने की प्रक्रिया।
  • प्रेरित – प्रेरणा देना।
  • प्रौद्योगिकी – किसी विशेष क्षेत्र या व्यवसाय-संबंधी तकनीक।
  • अनुसंधान – अन्वेषण, जाँच-पड़ताल द्वारा वस्तुस्थिति का पता लगाना।
  • मिशन – लक्ष्य।
  • मजबूत – दृढ़ आधार-नींव।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ. अब्दुल कलाम द्वारा लिखित लेख ‘मेरे सपनों का भारत’ से लिया गया है। लेखक स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अर्जित की गई उपलब्धियों का वर्णन किया है।

व्याख्या:
लेखक का कहना है कि भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की। उसके बाद भारत ने अपने चहुंमुखी विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू की। भारत में स्वतंत्रता के बाद पहली पाँच साल की योजना आरंभ की गई। पहली पंचवर्षीय योजना में महत्त्वपूर्ण जनोपयोगी माल या सामान बनाने के लिए कल-कारखानों की स्थापना और उनके विकास के लिए मुख्य नींव के रूप में ढाँचा खड़ा करने के लिए प्रेरित किया गया। दूसरे शब्दों में, इस पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत देश के औद्योगिक विकास के लिए आधारभूत ढाँचा तैयार किया गया।

1970 के दशक (दस वर्षों) में सबसे पहले कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति के परिणाम सामने आए। इस हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया। इसके बाद ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम के अंतर्गत भारत एक निश्चित समय सीमा में विश्व का सबसे बड़ा उत्पादन करने वाला देश बना। विज्ञान और तकनीकी में भी इस अवधि में पर्याप्त बड़ा दूध उत्पादन करने वाला देश बना। विज्ञान और तकनीकी में भी इस अवधि में इसमें पर्याप्त विकास देखने को मिला उस समय अनुसंधान व विकास के लिए अनेक विज्ञान तथा तकनीकी संस्थानों की स्थापना की गई। इन संस्थानों का नेतृत्व विभिन्न क्षेत्रों के योग्य वैज्ञानिक, इंजीनियर आदि कर रहे थे। इसने उच्च तकनीक प्राप्त करने के लिए एक सुदृढ़ आधार भी तैयार किया।

विशेष:

  1. लेखक ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हरित क्रांति और ऑपरेशन फ्लड की सफलता का उल्लेख किया है, जिससे देश खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बना और दूध का सबसे बड़ा उत्पादक देश बना।
  2. भाषा पारिभाषिक शब्दावली से युक्त खड़ी बोली है।
  3. वर्णनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के वाद विकास के लिए क्या तरीका अपनाया है?
उत्तर:
भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का तरीका अपनाया है।

प्रश्न (ii)
लेखक ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की किन उपलब्धियों का वर्णन किया है?
उत्तर:
लेखक ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाढ़ की हरित क्रांति और ऑपरेशन फ्लड का वर्णन किया है। सन् 1970 के पहले दशक में हरित क्रांति हुई, जिसके कारण देश खाद्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना। ऑपरेशन फ्लड के अंतर्गत भारत एक निश्चित समय में विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना।

प्रश्न (iii)
भारत ने वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक क्षेत्र में क्या प्रगति की है?
उत्तर:
भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिक के क्षेत्र में काफी प्रगति की है। यहाँ • कई अनुसंधान व विकास और विज्ञान प्रौद्योगिकी संस्थाओं की स्थापना हुई है। इससे उच्च प्रौद्योगिकी लक्ष्यों की प्राप्ति का आधार तैयार हुआ।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत गद्यांश में किन उपलब्धियों का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की उपलब्धियों का वर्णन किया गया है।

प्रश्न (ii)
कृषि के क्षेत्र में कौन-सी क्रांति हुई? उसका क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति हुई। इस क्रांति के कारण देश खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बना।

प्रश्न 5.
भारत के उपग्रह तथा उपग्रह प्रक्षेपण यान कार्यक्रमों द्वारा रखे गए ठोस आधार ने देश को किसी प्रकार का उपग्रह डिजाइन तथा विकसित करने और उसे अपनी ही धरती से अपने प्रक्षेपण यानों द्वारा कक्षा में प्रक्षेपित करने की क्षमता प्रदान की है। पी. एस.एल.वी. सी-5 की सातवीं सफल उड़ान ने, जिसमें रिसोर्स सेट-1 को सन सिंक्रोनस ऑरबिट में स्थापित किया गया, ने स्वदेशी योग्यता में भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया है। इसी प्रकार, भारत किसी भी प्रकार की मिसाइल या मुखाग्र को डिजाइन करने, विकसित करने तथा उत्पादित करने में सक्षम है। भारतीय सेना में ‘पृथ्वी’ तथा ‘अग्नि’ को शामिल किया जाना इस स्वदेशी क्षमता का प्रमाण है। परमाणु ऊर्जा उत्पत्ति तथा अस्त्र विकास में हमारी उपलब्धियाँ विकसित विश्व के मुकाबले की हैं। (Page 50)

शब्दार्थ:

  • उपग्रह – कृत्रिम ग्रह, अंतरिक्ष में राकेट द्वारा भेजे गए कृत्रिम ग्रह।
  • प्रक्षेपण – दूर फेंकना।
  • ठोस – सुदृढ़।
  • आधार – नींव।
  • डिजाइन – रूपांकन, आकृति।
  • क्षमता – शक्ति, योग्यता।
  • स्वदेशी – अपने देश में विकसित।
  • प्रदर्शित – दिखाना।
  • मुखाग्र – मुख का अगला भाग।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ. अब्दुल कलाम द्वारा रचित लेख ‘मेरे सपनों का भारत’ से लिया गया है। लेखक भारत की आंतरिक तथा रक्षा के क्षेत्र में अर्जित उपलब्धियों का वर्णन किया है।

व्याख्या:
भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में आशातीत उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। भारत के उपग्रह तथा उपग्रह प्रक्षेपण यान कार्यक्रमों के द्वारा रखी गई सुदृढ़ नींव ने देश को किसी भी तरह के उपग्रह (कृत्रिम ग्रह) को आकार देने तथा उसे विकसित करने और अपने ही प्रक्षेपण यानों द्वारा अंतरिक्ष की किसी भी कक्षा में स्थापित करने अथवा फेंकने की योग्यता से संपन्न किया। भारत उपग्रह बनाने तथा उन्हें अपने प्रक्षेपण यानों के द्वारा अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है। पी.एस.एल.वी. सी-5 की सातवीं सफल उड़ान के द्वारा रिसोर्स सेट-1 को सन सिंक्रोनस ऑर बिट में स्थापित किया गया।

इसके द्वारा भारत ने अपनी स्वदेशी योग्यता तथा क्षमता को प्रदर्शित किया है। इसी प्रकार रक्षा-अनुसंधान के क्षेत्र में भारत किसी भी तरह की मिसाइल अथवा उसके अग्रभाग को डिजाइन करने, उसे विकसित करने के साथ ही साथ उसका उत्पादन करने में भी सक्षम है। भाव यह कि भारत किसी भी प्रकार की मिसाइल बनाने और उसका उत्पादन करने में सक्षम है। भारतीय सेना में सम्मिलित की गई पृथ्वी और अग्नि नामक मिसाइलें इस स्वदेशी प्रौद्योगिकी क्षमता का जीवंत उदाहरण है। परमाणु ऊर्जा तथा परमाणु अस्त्र विकसित करने की भारतीय प्राप्तियाँ विकसित विश्व के स्तर की हैं। दूसरे शब्दों में भारत ने उपग्रह प्रक्षेपण, मिसाइल निर्माण और परमाणु अस्त्र निर्माण की जो स्वदेशी तकनीक विकसित की है, वह विकसित राष्ट्रों की तकनीक के स्तर की है।

विशेष:

  1. लेखक ने विज्ञान के क्षेत्र में भारत की आधुनिक उपलब्धियों से परिचित कराया है।
  2. भाषा पारिभाषिक शब्दावली से युक्त खड़ी बोली है।
  3. वर्णनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
भारत ने उपग्रह तथा उपग्रह प्रक्षेपण में कौन-सी क्षमता प्राप्त की है?
उत्तर:
भारत ने उपग्रह के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का उपग्रह डिजाइन करने और उसे विकसित करने की स्वदेशी तकनीक विकसित की है। वह हर प्रकार के उपग्रह बनाने में समर्थ है। भारत ने उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में भी आशातीत क्षमता प्राप्त की है। वह प्रक्षेपण यान बनाने और उनसे अपनी ही धरती से उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है।

प्रश्न (ii)
भारत ने उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में अपनी स्वदेशी योग्यता कैसे प्रमाणित की है?
उत्तर:
भारत ने पी.एस.एल.वी., सी-5 प्रक्षेपण यान की सातवीं सफल उड़ान के द्वारा रिसोर्स सेट-1 को सन सिंक्रोनस ऑरबिट में स्थापित कर अपनी प्रक्षेपण की स्वदेशी योग्यता और क्षमता को प्रमाणित किया है।

प्रश्न (iii)
भारत की मिसाइल निर्माण की क्षमता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत ने मिसाइल निर्माण के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है। वह किसी भी प्रकार की मिसाइल अथवा उसका मुखाग्र डिजाइन करने, विकसित करने और उत्पादित करने की क्षमता रखता है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
मिसाइल के क्षेत्र में भारत की स्वदेश क्षमता का प्रमाण क्या है?
उत्तर:
भारतीय सेना में भारत द्वारा निर्मित ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ मिसाइलों का सम्मिलित किया जाना ही मिसाइल के क्षेत्र में उसकी स्वदेशी क्षमता का प्रमाण है।

प्रश्न (ii)
भारत की कौन-सी उपलब्धियाँ विश्वस्तर की हैं?
उत्तर:
भारत की परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता तथा परमाणु अस्त्र निर्माण की क्षमता विकसित विश्व के स्तर की हैं।

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प्रश्न 6.
भारत के पास कुछ ऐसी संपदाएँ तथा लाभ हैं, जिनके बारे में विश्व के कुछ देश गर्व से दावा कर सकते हैं। हमें अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान योगदानों तथा अपने भविष्य की रूपरेखा बनाने के लिए प्राप्त प्रतिस्पर्धात्मक लाभ को पहचानना चाहिए। विश्व एक बौद्धिक समाज में परिवर्तित हो रहा है, जहाँ समन्वित ज्ञानशक्ति तथा धन का स्रोत होगा। यही समय है, जब भारत खुद को एक बौद्धिक शक्ति में बदलने और फिर अगले दो दशकों के भीतर एक विकसित देश बनने के लिए इस अवसर का लाभ उठा सकता है। इस रूपांतरण के लिए यह जानना आवश्यक है कि हम प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में कहाँ हैं, जो एक बौद्धिक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर होने के लिए वास्तविक इंजन है। (Page 51) (M.P. 2009)

शब्दार्थ:

  • संपदाएँ – संपत्तियाँ, कोश, खजाना।
  • गर्व – घमंड, अभिमान।
  • दावा – किसी वस्तु को अपनी बताने का अधिकार प्रतिस्पर्धात्मक-होड़, प्रतियोगिता।
  • समन्वित – संतुलित।
  • रूपांतरण – रूप में परिवर्तन।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ. अब्दुल कलाम द्वारा लिखित लेख ‘मेरे सपनों का भारत’ से लिया गया है। लेखक कहता है कि भारत को विकसित राष्ट्र बनने के लिए स्वयं को एक बौद्धिक अर्थव्यवस्था में बदलने की आवश्यकता है। इसके लिए उसे तरीकों और उपायों को जानना होगा।

व्याख्या:
लेखक का मत है कि भारत के पास कुछ ऐसी खनिज संपदाएँ और प्राकृतिक लाभ हैं, जिनके संबंध में संसार के कुछ देश अभिमान के साथ अधिकार जता सकते हैं। दूसरे शब्दों में भारत खनिज संपदाओं से संपन्न देश है और इससे वह लाभ उठा सकता है। इन संपदाओं के होने का दावा वह गर्व के साथ कर सकता है। लेखक का मत है कि हमें अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान के विविध क्षेत्रों में योगदान तथा भविष्य की योजना बनाने के लिए प्राप्त उपलब्धियों के प्रतियोगितात्मक लाभ को पहचानकर लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। वर्तमान में विश्व बौद्धिक समाज में बदल रहा है, जहाँ संतुलित ज्ञान शक्ति तथा धन का स्रोत होगा।

आज संसार बौद्धिक अर्थव्यवस्था में बदल रहा है। धन का स्रोत वहीं होगा, जहाँ बौद्धिक ज्ञान का संतुलित रूप से उपयोग किया जाएगा। इसलिए भारत जैसे विकासशील देश के लिए स्वयं का एक बौद्धिक समाज के रूप में विकसित होना है, तो उसे एक बौद्धिक अर्थ-व्यवस्था में बदलना होगा। अतः भारत को स्वयं को एक बौद्धिक शक्ति में बदलने और फिर आगामी बीस वर्षों में एक विकसित देश बनने के अवसर का लाभ उठाना चाहिए।

किंतु स्वयं को विकसित देश में परिवर्तित करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि हम प्रतियोगितात्मक के दृष्टिकोण से कहाँ हैं? इसके लिए हमें बौद्धिक अर्थव्यवस्था में बदलने के तरीकों और उपायों की जाँच-पड़ताल करनी पड़ेगी। उसी के आधार पर हम एक बौद्धिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं और विकसित देशों में सम्मिलित हो सकते हैं।

विशेष:

  1. लेखक ने भारत के विकसित देश बनने की रूपरेखा प्रस्तुत की है।
  2. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
  3. विचारत्मक तार्किक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए क्या किया जाना आवश्यक है?
उत्तर:
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए स्वयं को एक द्धिक अर्थव्यवस्था में बदलना आवश्यक है। इसके लिए उसे तरीकों और उपायों को जानना आवश्यक है।

प्रश्न (ii)
लेखक के अनुसार हमें कौन-सा लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए?
उत्तर:
लेखक के अनुसार हमें अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान के विविध क्षेत्रों में योगदान और भविष्य की योजना बनाने के लिए प्राप्त उपलब्धियों के प्रतियोगितात्मक लाभ को पहचानकर अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
विश्व किस प्रकार की अर्थव्यवस्था में बदल रहा है?
उत्तर:
विश्व आज बौद्धिक अर्थव्यवस्था में बदल रहा है।

प्रश्न (ii)
हम किस आधार पर बौद्धिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं?
उत्तर:
हम बौद्धिक अर्थव्यवस्था में बदलने के तरीकों और उपायों की जाँच-पड़ताल के आधार पर ही एक बौद्धिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकते है।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 13 तीन बच्चे

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 13 तीन बच्चे (कहानी, सुभद्राकुमारी चौहान)

तीन बच्चे पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

तीन बच्चे लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बच्चों में किस बात पर बहस छिड़ी थी?
उत्तर:
बच्चों में अपनी-अपनी क्यारियों में फूल अधिक सुंदर होने को लेकर बहस छिड़ी थी।

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प्रश्न 2.
माँ को अपने बच्चों के प्रति न्याय करने में कठिनाई क्यों आ रही थी?
उत्तर:
माँ के लिए सभी बच्चे एक समान होते हैं इसीलिए उसे न्याय करने में कठिनाई आ रही थी।

प्रश्न 3.
लड़की ने अपने पिता के संबंध में क्या बताया?
उत्तर:
लड़की ने बताया कि उसका पिता शराब पीकर दंगा करता था और माँ को मारता था।

प्रश्न 4.
लड़की की माँ को जेल क्यों हुई थी?
उत्तर:
लड़की की माँ ने उन पुलिसवालों को मारा था, जो उसके बाप को पकड़कर ले जा रहे थे।

तीन बच्चे दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तीनों बच्चों की दशा कैसी थी? (M.P. 2009)
उत्तर:
तीनों बच्चों की दशा दयनीय थी। उन्होंने चिथड़े पहन रखे थे। शरीर पर मैल की परत जम गई थी। वे भूखे और असहाय थे। जेल के पास नाले पर बने पुल के नीचे रहते थे। वे भीख माँगकर पेट भरते थे।

प्रश्न 2.
चौके का काम निपटाकर बाहर आने पर लेखिका ने क्या देखा? (M.P. 2009)
उत्तर:
चौके का काम निपटाकर लेखिका घर से बाहर गई, तो उसने देखा-तीन भिखारी बच्चे बड़े मजे में पूरियाँ खा रहे थे और उसके बच्चे भी बड़े उत्साह से उन्हें पूरियाँ परस रहे थे।

प्रश्न 3.
लेखिका को सबसे छोटे लड़के पर दया क्यों आई?
उत्तर:
लड़का उन तीनों में सबसे छोटा था। वह मुश्किल से पाँच वर्ष का था। उसने फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे। उसके बाल रूखे-सूखे थे। कई दिनों से न नहाने के कारण उसके शरीर पर मैल की परत जम गई थी। उसके गालों पर आँसुओं के निशान बने हुए थे। लड़के की असहाय स्थिति को देखकर लेखिका को बड़ी दया आई।

प्रश्न 4.
जबलपुर की जेल में लेखिका को किस प्रकार रखा गया था?
उत्तर:
लेखिका को जबलपुर की जेल में रखने की जगह अस्पताल में रखा था। उसकी सेवा के लिए दो महिला कैदियों को नियुक्त किया गया था।

प्रश्न 5.
अखबार में जबलपुर की कौन-सी घटना छपी थी?
उत्तर:
अखबार में जबलपुर की निम्नलिखित घटना छपी थी कल रात एकाएक पानी बरसा और खूब बरसा। जेल के पास के नाले में तीन गरीब बच्चे बह गए। उन तीनों की लाशें मिलीं। बहुत कोशिश करने पर भी इनकी शिनाख्त नहीं हो सकी। दो लड़कियाँ हैं और एक लड़का। ऐसा सुना गया है कि वे गाना गाकर भीख माँगा करते थे।

तीन बच्चे भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथनों का भाव-विस्तार कीजिए – (M.P. 2010)

प्रश्न 1.
“जज के पथ-प्रदर्शन के लिए कानून होते हैं और नज़ीर भी।”
उत्तर:
न्यायालय में न्याय करने के लिए न्यायाधीश को न्याय का रास्ता दिखाने के लिए लिखित कानून हैं और उसके सामने उदाहरण भी होते हैं। न्यायाधीश उन कानूनों के अंतर्गत, वकीलों के तर्क, गवाहों और उदाहरणों की रोशनी में न्याय करते हैं। कभी-कभी आँख मूंदकर कानूनों को मानने से न्याय करने में अन्याय भी हो जाताहै।

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प्रश्न 2.
“कैदखाने की दुनिया भी एक विचित्र ही है।”
उत्तर:
कैदखाने अर्थात् जेल का संसार भी अद्भुत ही होता है। जेल में विभिन्न प्रकार के अपराध करने वाले अपराधी होते हैं। इन अपराधियों में स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं। कोई चोर है, तो कोई हत्यारा और कोई चरस बेचने का अवैध धंधा करता है। कोई अपने ही बच्चे की जान लेने वाली होती है तो कोई पुलिस की पिटाई करने वाले/वाली है। कैदियों में जवान से लेकर बूढ़े तक होते हैं। सब अलग-अलग धर्म और जाति के होते हुए पुलिस की दृष्टि में सब अपराधी और कैदी हैं।

तीन बच्चे भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्द-युग्मों को वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
अपनी-अपनी, खाली-खाली, दो-दो, ठहरो-ठहरो, रोज-रोज।
उत्तर:

  1. अपनी-अपनी-वर्तमान में सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी ढपली बजा रहे हैं।
  2. खाली-खाली-भिखारियों की झोली खाली-खाली लग रही थी।
  3. दो-दो-पहलवान दो-दो हाथ करने को तैयार हैं।
  4. ठहरो-ठहरो-ठहरो, ठहरो! कहाँ जाते हो? पुलिस आ रही है।
  5. रोज-रोज़-तुम रोज़-रोज़ यहाँ खाने आ जाते हो। इसे क्या धर्मशाला समझ रखा है।

प्रश्न 2.
मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
लकीर का फकीर होना, माथा टेकना, पेट दिखाना, बाँह पकड़ना।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 13 तीन बच्चे img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह कीजिए –
पथ-प्रदर्शक, सत्याग्रह, दशानन, भरपेट, चौराहा।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 13 तीन बच्चे img-2

प्रश्न 4.
दिए गए गद्यांश को पढ़कर यथास्थान उचित विराम-चिह्नों का प्रयोग कीजिए –
मैं बहत सोचती थी कि लखिया कौन है वह जेल क्यों आई एक दिन अचानक मैंने मेट्रन से पूछा जिसका उत्तर मिला ओह यह बड़ी खतरनाक औरत है इसने पुलिस को मारा है पुलिस को पर हमने इसका दिमाग ठीक कर दिया है आपको कोई तकलीफ तो नहीं देती।
उत्तर:
मैं बहुत सोचती थी कि लखिया कौन है। वह जेल क्यों आई? एक दिन अचानक मैंने मेट्रन से पूछा, जिसका उत्तर मिला- ‘ओह! यह बड़ी खतरनाक औरत है। इसने पुलिस को मारा है-पुलिस को। पर हमने उसका दिमाग ठीक कर दिया है। आपको कोई तकलीफ तो नहीं देती?”

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए –

  1. आपको चुप रहना चाहिए। (आज्ञा वाचक)
  2. क्या तुम खेलोगे? (इच्छा वाचक)
  3. अहा! कैसा सुंदर दृश्य है। (विधिवाचक)

उत्तर:

  1. आप चुप रहिए।
  2. ईश्वर करे! तुम खेलो।
  3. बहुत सुंदर दृश्य है।

तीन बच्चे योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
आपने सड़क पर भजन गाते हुए छोटे बच्चों को देखा होगा, उन्हें देखकर आपके मन में क्या विचार आते हैं?
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

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प्रश्न 2.
न्यायालय, न्यायाधीश और जेल पर चार-चार वाक्य लिखिए।
उत्तर:
न्यायालय:

  1. देश में अपराधों की रोकथाम के लिए न्यायालयों की स्थापना की गई है।
  2. न्यायालय दो प्रकार के होते हैं-दीवानी और फौजदारी न्यायालय।
  3. देश में कनिष्ठ न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक की न्याय व्यवस्था है।
  4. सुप्रीम कोर्ट देश का सर्वोच्च न्यायालय है।

न्यायाधीश:

  1. न्यायाधीश का कार्य न्याय करना होता है।
  2. न्यायाधीश के अदालतों के स्तर पर अपने-अपने अधिकार क्षेत्र होते हैं।
  3. न्यायाधीश मुकदमों की सुनवाई करते हैं।
  4. न्यायाधीश अपराधियों को सजा सुनाते हैं।

जेल:

  1. जेल न्यायालय से सजा-प्राप्त कैदियों को रखने का स्थान होता है।
  2. जेल में विभिन्न प्रकार के अपराधी रखे जाते हैं।
  3. जेल में यातनाएँ दी जाती हैं।
  4. जेल एक भयावह स्थान है। हमें जेल जाने योग्य कर्म नहीं करने चाहिए।

प्रश्न 3.
बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए क्या योजनाएँ चलाई जा रही हैं? इन योजनाओं की जानकारी स्थानीय निकायों से प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 4.
बाल-सुधार गृह व बाल न्यायालय के बारे में जानकारी एकत्रित करके जानकारी प्राप्त करें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

तीन बच्चे परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
बच्चों के काकाजी को किसी का ………… के ऊपर बोलना पसंदनहीं था।
(क) सप्तम स्वर
(ख) पंचम स्वर
(ग) अष्टम स्वर
(घ) द्वितीय स्वर
उत्तर:
(ख) पंचम स्वर।

प्रश्न 2.
बड़ी लड़की की आयु दस वर्ष और छोटी की आयु सात-आठ वर्ष और लड़के की आयु थी ……..।
(क) छह वर्ष
(ख) चार वर्ष
(ग) पाँच वर्ष
(घ) एक वर्ष
उत्तर:
(ग) पाँच वर्ष।

प्रश्न 3.
लेखिका के जेल में जाने का कारण था –
(क) भारत छोड़ो आंदोलन में सत्याग्रह करना
(ख) नमक तोड़ो आंदोलन में सत्याग्रह करना
(ग) युद्ध विरोधी आंदोलन में सत्याग्रह करना
(घ) बहिष्कार आंदोलन में भाग लेना।
उत्तर:
(ग) युद्ध विरोधी आंदोलन में सत्याग्रह करना।

प्रश्न 4.
भिखारी बच्चों का बाप अमरावती जेल में था और माँ …….. थी।
(क) अमरावती जेल में
(ख) जबलपुर जेल में
(ग) थाणे जेल में
(घ) तिहाड़ जेल में
उत्तर:
(ख) जबलपुर जेल में।

प्रश्न 5.
भिखारी बच्चों ने अपने न नहाने का कारण बताया था कि …..।
(क) हमारे पास दूसरे कपड़े नहीं हैं।
(ख) हमारे पास नहाने के लिए साबुन नहीं है।
(ग) हमारे पास पानी नहीं है।
(घ) हमारे पास घर नहीं है।
उत्तर:
(क) हमारे पास दूसरे कपड़े नहीं हैं।

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प्रश्न 6.
भिखारी बच्चे जेल के पास के एक ……….. में रहते थे।
(क) झोंपड़ी
(ख) नाले
(ग) मकान
(घ) छप्पर
उत्तर:
(ख) नाले।

प्रश्न 7.
जेल में मिनू किससे हिल गई थी?
(क) लेखिका से
(ख) लखिया से
(ग) जेलर से
(घ) मेट्रन से
उत्तर:
(ख) लखिया से।

प्रश्न 8.
तीन भिखारी बच्चों की मौत हुई थी …….।
(क) बरसात के पानी में बहने से
(ख) बीमारी लग जाने से
(ग) भूख के कारण से
(घ) दुर्भाग्य से
उत्तर:
(क) बरसात के पानी में बहने से।

प्रश्न 9.
हर एक का कहना था कि –
(क) उसकी क्यारी के पौधे सबसे अधिक सुन्दर हैं।
(ख) उसकी क्यारी के फूल सबसे सुन्दर हैं।
(ग) उसकी क्यारी की मिट्टी सबसे अच्छी है।
(घ) उसकी क्यारी सबसे अधिक सुन्दर है।
उत्तर:
(ख) उसकी क्यारी. के फूल सबसे सुन्दर हैं।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पस्कीजिए –

  1. तीन बच्चे ………. है। (एकांकी/कहानी) (M.P. 2012)
  2. सुभद्राकुमारी का जन्म सन् ………. में हुआ था। (1804/1904)
  3. तीन बच्चे के रचनाकार हैं ……….। (मनमोहन मदारिया/सुभद्राकुमारी चौहान)
  4. बिखरे मोती सुभद्रा कुमारी चौहान का ………. है। (काव्य-संग्रह/कहानी-संग्रह)
  5. सत्याग्रह के दौरान सुभद्राकुमारी ………. गईं। (जेल/जेल नहीं)

उत्तर:

  1. कहानी
  2. 1904
  3. सुभद्राकुमारी चौहान
  4. कहानी-संग्रह
  5. जेल।

III. निम्नलिखित कथनों में सत्य असत्य छाँटिए –

  1. जज के पथ-प्रदर्शन के लिए कानून होते हैं।
  2. लेखिका के सामने कानून और नज़ीर थीं।
  3. गाना कोरस में था और स्वर बच्चों का-सा।
  4. लेखिका ने बाहर आकर देखा-चार बच्चे।
  5. लेखिका की सेवा के लिए दो औरतें तैनात थीं।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 13 तीन बच्चे img-3
उत्तर:

(i) (ग)
(ii) (घ)
(iii) (ङ)
(iv) (ख)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
तीन बच्चे कौन थे?
उत्तर:
दो लड़कियाँ और एक लड़का।

प्रश्न 2.
लड़की ने गोद से लड़के को उतारकर क्या किया?
उत्तर:
लड़की ने गोद से लड़के को उतारकर जमीन से माथा टेककर लेखिका को प्रणाम किया।

प्रश्न 3.
बच्चों ने लेखिका को क्या बतलाया?
उत्तर:
बच्चों ने लेखिका को बतलाया कि वे भूखे हैं।

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प्रश्न 4.
बाहर से कौन-से गाने की आवाज आई?
उत्तर:
बाहर से निम्नलिखित गाने की आवाज आई “भगवान दया करके मेरी नैया को पार लगा देना।”

प्रश्न 5.
लड़की की माँ जेल में क्यों थी?
उत्तर:
पुलिस की पिटाई करने के कारण लड़की की माँ जेल में थी।

तीन बच्चे लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखिका ने किन्हें हिटलर और मुसोलिनी कहा है?
उत्तर:
लेखिका ने अपने बच्चों को हिटलर और मुसोलिनी कहा है।

प्रश्न 2.
काका ने बच्चों का झगड़ा कैसे समाप्त किया?
उत्तर:
काका ने कहा, यदि तुम लड़े-भिड़े तो मैं तुम्हारी माँ को सत्याग्रह नहीं करने दूंगा। यह सुनकर बच्चों ने अपना झगड़ा समाप्त कर दिया।

प्रश्न 3.
तीन बच्चे किस प्रकार भीख माँग रहे थे?
उत्तर:
तीन बच्चे गाना गाकर भीख माँग रहे थे।

प्रश्न 4.
लेखिका ने अपने बच्चों को क्या निर्देश दिया?
उत्तर:
लेखिका ने अपने बच्चों को भीख माँगने वालों को दो-दो पूरियाँ देने का निर्देश दिया।

प्रश्न 5.
तीनों बच्चों के क्या नाम थे?
उत्तर:
बड़ी लड़की का ईठी, छोटी लड़की का सीठी और लड़के का प्रेम नाम था।

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प्रश्न 6.
बच्चों का बाप कहाँ था?
उत्तर:
अमरावती जेल में।

प्रश्न 7.
लेखिका की सेवा के लिए दोनों औरतें कैसी थीं?
उत्तर:
लेखिका की दोनों औरतें अलग-अलग विशेषताओं की थीं। उनमें एक अल्लड़-सी थी, जिसे कुछ काम-काज नहीं आता था। दूसरी समझदार थी जो हर काम को मन लगाकर करती थी।

तीन बच्चे दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बच्चे कौन-सा गाना गाकर भीख माँग रहे थे?
उत्तर:
बच्चे निम्नलिखित गाना गाकर भीख माँग रहे थे –
“भगवान दया करना इतनी,
मेरी नैया को पार लगा देना।”
“मैं तो डूबत हूँ मँझधार पड़ीं.
मेरी बैयाँ पकड़ के उठा लेना।”

प्रश्न 2.
दूसरे दिन लेखिका के बच्चों ने क्या तर्क देकर भिखारी बच्चों को पूरियाँ खिलाईं?
उत्तर:
बच्चों ने कहा पूरियाँ तो धरी हैं। बेचारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। जाने अकी माँ है या नहीं। वे भला कहाँ पकायेंगे। इससे तो अच्छा यह है कि उन्हें कुछ न दिया जाए। आप माँ होकर ऐसा क्यों कहती हो। उन बेचारों को भी भूख लगी होगी। हमारे हिस्से की ही दें दो। हम शाम को नाश्ता नहीं करेंगे। ये तर्क देकर लेखिका के बच्चों ने दूसरे दिन भिखारी बच्चों को पूरियाँ खिलाईं।

प्रश्न 3.
लेखिका जेल क्यों गई?
उत्तर:
लेखिका युद्ध-विरोध के आंदोलन में सत्याग्रह करके जेल गई। उसके बच्चे चाहते थे कि उनकी माँ सत्याग्रह करके जेल जाएँ।

प्रश्न 4.
लड़की ने अपने माता-पिता के संबंध में क्या बताया?
उत्तर:
लड़की ने बताया कि उसका बाप शराब पीकर दंगा करता था। माँ को मारता था और गाली बकता था। इसलिए पुलिसवाले पकड़कर ले गए और माँ ने पुलिसवालों को मारा था क्योंकि उसने हमारे बाप को पकड़ा था। इसलिए पुलिस उसे भी साथ ले गई। अब माँ-बाप दोनों जेल में हैं।

प्रश्न 5.
नाले में तीनों बच्चे क्यों बह गए?
उत्तर:
नाले में तीनों बच्चे बह गए क्योंकि उस दिन खूब पानी बरसा था। खूब बादल गरजे थे और कड़क-कड़क कर बिजली चमकी थी। अधिक पानी बरसने से बच्चों को बचने की कोई गुंजाइश नहीं रही। वे उस पानी में बह गए।

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प्रश्न 6.
लेखिका को लखिया के बारे में मेट्रन से क्या जानकारी मिली?
उत्तर:
लेखिका को लखिया के बारे में मेट्रन से यह जानकारी मिली कि वह बड़ी खतरनाक औरत है। उसने पुलिस को मारा है लेकिन पुलिस ने जेल में उसके दिमाग को ठीक कर दिया है।

तीन बच्चे लेखिका-परिचय

प्रश्न 1.
सुभद्राकुमारी चौहान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी. साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 ई० को निहालपुर, इलाहाबाद में हुआ था। इनका परिवार एक प्रगतिशील परिवार था। इन्होंने प्रयाग के क्रास्थवेस्ट स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। इनकी पहली रचना ‘नीम’ 1913 ई० में ‘मर्यादा’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। उस समय इनकी आयु मात्र 9 वर्ष की थी। इनका विवाह 1919 में श्री लक्ष्मणसिंह के साथ हुआ। 1921 में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन का प्रभाव इन पर भी पड़ा। इन्होंने अपने पति के साथ पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।

इसके पश्चात् आप दोनों ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया। 1923 में इनको सत्याग्रह के सिलसिले में पुलिस ने हिरासत में ले लिया। 1942 में भी इनको दस मास का कारावास मिला। देश के स्वाधीन होने पर आप मध्य प्रदेश विधानसभा की सदस्य बनीं। 15 फरवरी, 1948 में एक मोटर-दुर्घटना में इनकी दिमाग की नस फट गई और सिवनी में ही इनका देहावसान हो गया।

साहित्यिक विशेषताएँ:
श्रीमती सुभद्राकुमारी की साहित्य और राजनीति में आरंभं से ही रुचि थी। स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के कारण आप अधिक साहित्य रचना नहीं कर पाईं। फिर भी कविता, कहानी और निबंध के क्षेत्र में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। इनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी हुई हैं। इनकी सुप्रसिद्ध कविता ‘झाँसी की रानी’ है, जिसे अंग्रेजों ने जब्त कर लिया था। इनकी कविताओं के दो विषय रहे-राष्ट्रीयता तथा सामाजिक जीवन की समस्याएँ। राष्ट्रीय रचनाओं का मूल स्वर स्वाधीनता आंदोलन और देशभक्ति रहा।

इन कविताओं में अपने देश के प्रति अपनी भक्ति-भावना को प्रदर्शित किया है। इन कविताओं में राष्ट्रभक्ति के साथ-साथ निर्भीकता और ओजस्विता का गुण मुख्य है। सुभद्राजी हिंदी काव्य जगत् में अकेली ऐसी कवयित्री हैं, जिन्होंने अपने कंठ की पुकार से लाखों भारतीय युवक-युवतियों को युग-युग की अकर्मण्य उदासी को त्याग, स्वतंत्रता संग्राम में अपने को समर्पित कर देने के लिए प्रेरित किया। सामाजिक जीवन से संबंधित कविताओं में दाम्पत्य-प्रेम और वात्सल्य भाव की कविताएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके काव्य में एक ओर नारी सुलभ ममता तथा सुकुमारता है तो दूसरी ओर पद्मिनी के जौहर की भीषण ज्वाला है।

रचनाएँ:
काव्य-संग्रह-त्रिधारा और मुकुल।

कहानी-संग्रह:
सीधे-सादे चित्र, बिखरे मोती और उन्मादिनी।

इनकी कविताओं की भाषा सरल तथा बोलचाल के निकट है। वर्ण्य-विषय के अनुरूप उसमें प्रसाद और ओजगुण मिलता है। आपकी कविताओं में मानक जीवन की सहज अनुभूति हुई है। इन कविताओं में अलंकारों का प्रयोग भी सहज ढंग से ही हुआ है; अर्थात् इन रचनाओं में अलंकारों का प्रयोग प्रयत्नपूर्ण नहीं किया गया है।

तीन बच्चे पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
‘तीन बच्चे’ कहानी का सार लिखिए।
उत्तर:
लेखिका के बच्चों ने घर की क्यारियों में फूलों के पौधे लगाए थे। थोड़े दिन बाद क्यारियों में फूल खिल आए। बच्चे आपस में झगड़ने लगे कि उसकी क्यारी के फूल सबसे सुंदर हैं। उनके झगड़े की आवाज सुनकर लेखिका को रसोईघर छोड़कर बगीचे में जाना पड़ा। लेखिका को बच्चों की लड़ाई को न्यायपूर्वक समाप्त करना था। इतने में बच्चों के काकाजी आ गए। उन्होंने बच्चों से कहा कि यदि तुम लड़े-भिड़े तो मैं तुम्हारी माँ को सत्याग्रह न करने दूंगा। लेखिका के बच्चे चाहते थे कि मैं (लेखिका) सत्याग्रह करूँ और जेल जाऊँ। बच्चों ने झगड़ना बंद कर दिया और कहा सभी क्यारियों के फूल सुंदर हैं।

सब घर के अंदर जा रहे थे कि बाहर से बच्चों के गाने की आवाज आई, “भगवान दया करना इतनी, मेरी नैया को पार लगा देना।” हम दरवाजे की और दौड़ पड़े। बाहर आकर देखा तीन बच्चे थे। दो लड़कियाँ और एक लड़का। बड़ी लड़की 10 साल की तथा छोटी 8 साल की होगी। लड़का 5 साल के लगभग होगा, जो बड़ी लड़की की गोद में था। उनके कपड़े फटे-पुराने थे। उन्होंने बताया कि वे भूखे हैं। कल से कुछ नहीं खाया है। लेखिका ने अपने बच्चों से उन्हें दो-दो पूरी लाकर देने को कहकर, अंदर चली गई। बच्चों ने उन्हें भरपेट पूरियां खिलाईं।

दूसरे दिन जब वे लोग चाय पी ही रहे थे कि उन बच्चों की टोली फिर आ पहुँची। लेखिका ने अपने बच्चों से कहा कि कल तुमने खूब पूरियाँ खिलाई थीं न, अब वे सब फिर आ गए। जैसे उनके लिए यहाँ रोज पूरियाँ रखी हैं। बच्चों ने एक साथ कहा, ‘धरी तो हैं माँ! इसके साथ ही उनके हाथ पूरी के डिब्बे की ओर बढ़े। एक बच्चे ने कहा, ‘न जाने उनकी माँ भी है या नहीं।’ बच्चों ने उन तीनों को पूरियाँ खिलाईं।

लेखिका भी दरवाजे पर पहुँच गई। लेखिका ने उनके संबंध में जानना चाहा। उसे पता लगा कि वे तीनों भाई-बहन हैं। उनमें से बड़ी लड़की का नाम ‘ईठी’, छोटी बहन का नाम ‘सीठी’ और भाई का नाम ‘प्रेम’ था। उनके माँ-बाप जेल में थे। उनका बाप शराब पीकर दंगा मचाता था और उनकी माँ को पीटता था। पुलिस ने उसके बापू को पकड़ा, तो माँ ने पुलिसवालों को मारा था इसलिए पुलिसवाले उसे भी ले गए। उनकी माँ के साथ उनका एक छोटा भाई भी था।

लेखिका को बड़ा दुख हुआ कि माँ-बाप जेल में और ये अनाथ सड़क पर भीख माँगते फिरते हैं। उन्हें देखकर लेखिका को लगा कि इन बच्चों को नहाये हुए भी काफी दिन हो गए हैं। लेखिका ने बड़ी लड़की से पूछा कि तुम अपनी माँ से मिलने जेल नहीं जातीं। इस पर उसने बताया कि तीन महीने में एक बार मुलाकात होती है। एक बार मुलाकात करने गए थे। दूसरी बार तीन महीने बाद गए, तो पता चला कि माँ को यहाँ की जेल में भेज दिया गया है। इसलिए हम काली माँ के साथ यहाँ आ गए।

काली माँ भीख माँगती है। वे तीनों बच्चे जेल के पास बने नाले के पुल के नीचे रहते हैं। कभी-कभी काली माँ आ जाती है। बड़ी लड़की कहती है-जब माँ जेल से छूटेगी तो हम उसको साथ लेकर देश जाएँगे। बालिका का मुँह इस विचार से खुशी से भर उठा। बच्चों ने लेखिका को बताया कि उनके पास दूसरे कपड़े नहीं हैं। इस पर लेखिका के बच्चों ने अपने ढेर सारे कपड़े उन्हें लाकर दिए।

लेखिका भी युद्ध-विरोधी सत्याग्रह करके जेल की अतिथि बनी। उनकी सबसे छोटी बेटी मिनू उनके साथ ही गई; क्योंकि वह बहुत छोटी थी। उन्हें जेल की बजाय, अस्पताल में रखा गया और उनकी सेवा के लिए दो साधारण कैदी स्त्रियों को लगा दिया गया था। लेखिका की सेवा में तैनात औरतों में से एक अल्हड़-सी थी। उसे कुछ काम-काज नहीं आता था और दूसरी प्रौढ़ा थी। उसकी गोद में एक बच्चा था। वह बड़ी फिक्र से सब काम करती थी। मिनू को तो उसने अपनी बच्ची की तरह हिला लिया था। उस औरत का नाम लखिया था। लेखिका लखिया के संबंध में सोचती थी कि लखिया कौन है? यह जेल क्यों आई? एक दिन लेखिका ने मेट्रन से पूछा तो उसने बताया कि इसने पुलिस को मारा था।

इस पर लेखिका को उन तीन बच्चों की याद आई। उनकी माँ भी तो पुलिस को मारने के कारण जेल में थी और उसके साथ भी एक बच्चा था लेकिन लेखिका लखिया से कुछ पूछने का साहस न जुटा पाई। एक दिन खूब मूसलाधार बरसात हुई। बादल जोर-जोर से गरजे। लेखिका ने ईश्वर से सब बच्चों को अच्छी तरह रखने की प्रार्थना की। लेखिका के पास जेल में अखबार आता था। उसमें एक खबर थी। कल रात, एकाएक बहुत पानी बरसा। जेल के पास के नाले में तीन गरीब बच्चे बह गए। उनकी लाशें मिलीं।

वे गाकर भीख माँगा करते थे। लेखिका के सामने उन तीनों बच्चों के चित्र खिंच गए। उसने जबरदस्ती अपने आँसुओं को रोका। उसके मुख से निकला-बेचारे बच्चे। लेखिका ने लखिया से पूछा कि जेल के बाहर उसके कितने बच्चे हैं? लखिया ने गहरी साँस लेकर कहा-“जेल के बाहर बाई साहब! वो तो भगवान के हैं-अपने कैसे कहूँ।” उसके बाद वह अखबार की खबर पूछती ही रह गई लेकिन उसे कुछ नहीं बता सकी।

तीन बच्चे संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

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प्रश्न 1.
संग्राम में विषैले वाक्यों का प्रयोग होते सुनकर मुझे चौके का काम छोड़, बगीचे की ओर जाना पड़ा। मुझे देखते ही सब एक साथ अपने-अपने पक्ष का समर्थन कर न्याय की दुहाई देने लगे। न्याय का कार्य उतना आसान न था, जितना एक अदालत के जज का होता है। जज के पथ-प्रदर्शन के लिए कानून होते हैं और नजीरें भी। चाहे लकीर की फकीरी में अन्याय ही क्यों न हो जाए; पर उसका मार्ग स्पष्ट रहता है। मेरे सामने न कानून था, न नज़ीर-फिर भी मुझे यह लड़ाई समाप्त करनी थी और न्यायपूर्वक। (Page 57)

शब्दार्थ:

  • संग्राम – युद्ध, लड़ाई।
  • विषैले – जहर में बुझे।
  • आसान – सरल।
  • अदालत – न्यायपालिका।
  • जज – न्यायाधीश।
  • नज़ीरें – अनेक उदाहरण।
  • प्रदर्शन – दिखावा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा लिखित कहानी ‘तीन बच्चे’ से , उद्धृत है। लेखिका इस गद्यांश में अपने बच्चों के परस्पर हो रही लड़ाई का वर्णन करते हुए और उनकी लड़ाई समाप्त करने के लिए न्यायाधीश की भूमिका निभाने की अपनी स्थिति का वर्णन कर रही है।

व्याख्या:
लेखिका के बच्चों ने घर की क्यारियों में एक-एक फूलों का बगीचा लगाया था। उन क्यारियों में फूल खिल आए थे और बच्चे अपनी-अपनी क्यारियों के फूलों को एक-दूसरे से सुंदर बताते हुए परस्पर लड़ने लगे थे। बच्चों की लड़ाई में प्रयुक्त हो रहे, विष की तरह वाक्यों को सुनकर लेखिका को रसोईघर का काम बीच में ही छोड़कर बगीचे में जाना पड़ा। लेखिका को बगीचे में देखकर बच्चे परस्पर लड़ना छोड़कर, लेखिका से अपने-अपने पक्ष का समर्थन कर न्याय की माँग करने लगे। बच्चे चाहते थे कि वह न्याय करे कि किसकी क्यारी के फूल सुंदर हैं।

लेखिका कहती हैं कि बच्चों में न्याय करना सरल नहीं था। यदि एक का पक्ष लेकर उसकी क्यारी के फूलों को सुंदर बताया तो दूसरा नाराज. हो जाएगा और यदि दूसरे के फूलों को सुंदर बताया तो पहला नाराज हो जाएगा। न्यायालय में बैठे न्यायाधीश के लिए न्याय करना अधिक आसान होता है, क्योंकि न्याय के लिए न्यायालय के न्यायाधीश के सामने कानून होता है, जो उसको मार्ग दिखाते हैं।

इतना ही नहीं उसके सामने उदाहरण होते हैं और वकीलों के तर्क होते हैं। यह दूसरी बात है कि कानूनों का अक्षरशः पालन करने में अन्याय ही क्यों न हो जाए, किंतु उसका न्याय करने का रास्ता एकदम साफ होता है। लेखिका कहती है कि उसके सामने न तो कोई कानून था और न ही कोई उदाहरण था। ऐसी स्थिति में भी उसे बच्चों की इस लड़ाई को.समाप्त करना था और वह भी बिना किसी का पक्ष लिए हुए। उसे निष्पक्ष रहकर न्याय करनाथा।

विशेष:

  1. लेखिका ने इस तथ्य को उजागर किया है कि बच्चों की लड़ाई का निर्णय करना आसान नहीं होता है।
  2. न्याय के रास्ते की कठिनाइयों का वर्णन किया गया है।
  3. भाषा उर्दू शब्दावली युक्तखड़ी बोली है।
  4. मुहावरों का भी प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 2.
हम लोगों को देखते ही उन्होंने गाना बंद कर दिया। लड़के को गोद से उतारकर, बड़ी ने जमीन से माथा टेककर हमें प्रणाम किया। उसकी देखा-देखी छोटी लड़की और लड़के ने जमीन से माथा टेका और तीनों ने अपने चीथड़ों से छिपे हुए पेट को दिखाकर यह बतलाया कि वे भूखे हैं। बड़ी के हाथ में एक झोली थी और छोटी के हाथ में एक टीन का डिब्बा। उन्होंने एक बार झोली की ओर देखा जो बिलकुल खाली जान पड़ती थी फिर हमारी ओर याचना की दृष्टि से देखने लगे। मैंने उनसे कहा-“तुम गाती तो बहुत अच्छा हो, और भी कोई गाना. जानती हो?” (Page 57)

शब्दार्थ:

  • जमीन – धरती, पृथ्वी।
  • चीथड़ों – फटे-पुराने कपड़े।
  • माथा टेकना – भूमि से सर लगाकर प्रणाम करना।
  • याचना – प्रार्थना करना, माँगना।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कहानी ‘तीन बच्चे’ से उद्धृत है। लेखिका तीन भीख माँगने वाले बच्चों की दुर्दशा का वर्णन करती हुई कहती है।

व्याख्या:
बच्चों की लड़ाई समाप्त होने के बाद लेखिका घर के अंदर जा रही थी कि बाहर से बच्चों के गाने की आवाज सुनकर सब दरवाजे की ओर दौड़ पड़े और बाहर आकर उन्होंने देखा कि तीन बच्चे दो लड़कियाँ और एक लड़का गाकर भीख माँग रहे हैं। लेखिका कहती है कि हमें बाहर आया देखकर उन तीनों बच्चों ने गाना बंद कर दिया। उनमें से बड़ी लड़की ने लड़के को गोद से उतार दिया और भूमि से सर लगाकर उसे प्रणाम किया।

उस बड़ी लड़की का अनुसरण करते हुए छोटी लड़की और लड़के ने भी भूमि से माथा टेककर उसे प्रणाम किया। उन तीनों ने अपने फटे-पुराने, मैल से भरे हुए कपड़ों में छिपे पेट को दिखलाते हुए बताया कि वे भूखे हैं। बड़ी लड़की के हाथ में एक झोली थी और छोटी के हाथ में टीन का डिब्बा था। उनकी झोली बिलकुल खाली थी। उन तीनों में माँगने की दृष्टि से हमारी ओर देखा। लेखिका कहती है कि मैंने उन तीनों से कहा कि तुम तीनों बहुत अच्छा गाते हो। क्या और भी कोई गाना जानती हो?

विशेष:

  1. भीख माँगने वाले बच्चों की स्थिति का हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया हैं।
  2. भाषा सरल, स्पष्ट, सुबोध खड़ी बोली है।
  3. मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 3.
हमारी माँ ने पुलिस वालों को मारा था-जिसने हमारे बाप को पकड़ा था न, उसी को। और फिर वे हमारी माँ को भी पकड़ कर ले गए। बड़े बुरे होते हैं पुलिस वाले-“हमारी माँ को भी ले गए। माँ के बिना हमको भी बुरा लगता है, पर यह प्रेमा तो रात-दिन रोता ही रहता है।” मैंने लड़के की ओर देखा-बेचारा छोटा-सा बच्चा; मुश्किल से पाँच बरस का फटे चीथड़ों में लिपटा हुआ, सर में महीनों से तेल का नाम नहीं, रूखे-बिखरे बाल न जाने कब से नहाया नहीं था; शरीर पर एक मैल की तह-सी जम गई थी, गालों पर आँसुओं के निशान बने हुए थे, आँसुओं के साथ-साथ उस स्थान की मैल जो धुल गई थी। मुझे उस बच्चे पर बड़ी दया आई। (Pages 59-60)

शब्दार्थ:

  • मुश्किल – कठिनाई।
  • तह जमना – परत जमना।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कहानी ‘तीन बच्चे’ से उद्धृत है। भीख माँगने वाली लड़की अपनी माँ के जेल जाने का कारण लेखिका को बता रही है, तो लेखिका उनके साथ छोटे लड़के की दुर्दशा का चित्रण कर रही है।

व्याख्या:
भीख माँगने वाले तीन बच्चों में से बड़ी लड़की बताती है कि हमारी माँ ने उन पुलिसवालों को मारा था, जिन्होंने हमारे बाप को पकड़ा था। पुलिसवालों को पीटने के अपराध में पुलिस हमारी माँ को भी पकड़कर ले गई थी। लड़की कहती है कि पुलिसवाले बहुत बुरे होते हैं। वे हमारी माँ को पकड़कर ले गए। उसे भी जेल में डाल दिया। माँ के बिना हम बच्चों को बुरा लगता है। माँ का अभाव हमें खलता है। यह मेरा भाई प्रेम तो रात-दिन माँ को याद करके रोता ही रहता है।

लेखिका कहती है कि मैंने उस लड़के की ओर देखा-बेचारा (असहाय, विवश) छोटा-सा बच्चा है। वह मुश्किल से पाँच वर्ष का होगा। फटे-पुराने मैले कपड़ों में लिपटा हुआ है। उसके बाल रूखे-सूखे हैं, लगता है उसे नहाये हुए बहुत दिन हो गए थे। उसके शरीर पर मैल की एक तह-सी जम गई थी। उसके गालों पर आँसुओं के बहने के निशान बन गए थे। गालों पर आँसुओं के बहने से उस छोटे-से बच्चे के गालों से मैल भी धुल गई थी। लेखिका कहती है कि मुझे उसकी दुर्दशा देखकर बड़ी दया आई। लेखिका के मन में उस अबोध बालक के प्रति दया का भाव जागृत हो उठा।

विशेष:

  1. लड़की ने अपनी माँ के जेल जाने के कारण को स्पष्ट किया है।
  2. लेखिका ने छोटे लड़के की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला गया
  3. भाषा सरल, स्पष्ट खड़ी बोली है।

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प्रश्न 4.
मेरी सेवा के लिए जो दो औरतें तैनात थीं, उनमें एक तो अल्हड़-सी थी, जिसे कुछ काम-काज न आता था पर दूसरी समझदार थी। वह प्रौढ़ा थी। उसकी गोद में भी एक बच्चा था। वह बड़ी फिक्र से सब काम करती थी। वह अधिकतर चुप रहती थी, जैसे सदा मन ही मन कुछ सोचा करती हो। मिनू को तो उसने इस प्रकार हिला लिया था जैसे वह उसकी बच्ची हो। उसका खुद का बच्चा पाँव-पाँव चलता और मिनू उसकी गोदी पर। पानी भरती, तो मिनू उसके साथ होती; दाल दलती, तो मिनू उसके साथ और बर्तन मलती तो मिनू भी उसके साथ छोटी-छोटी कटोरियाँ और गिलास मलती दीख पड़ती। अंत को बात इतनी बढ़ी कि वह मिनू को अपनी पीठ से बाँधकर झाडू देने लगी। उसका नाम का लखिया’। (Page 61)

शब्दार्थ:

  • तैनात – नियुक्त।
  • अल्हड़ – बालोचित सरलता के साथ मस्त और लापरवाह।
  • प्रौढ़ा – वह स्त्री जिसकी आयु अधिक हो चली हो।
  • फिक्र – चिंता।
  • हिला लेना – घुल-मिल जाना।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कहानी ‘तीन बच्चे – उद्धृत है। इस गद्यांश में लेखिका उनकी सेवा में नियुक्त दोनों स्त्रियों की विशेषताओं पर प्रकाश डाल रही है।

व्याख्या:
लेखिका युद्ध-विरोधी आंदोलन में सत्याग्रह करके जेल चली गई, तो उसे जबलपुर जेल में रखने की अपेक्षा अस्पताल में आ गया और दो महिला कैदियों को उसकी देखभाल के लिए नियुक्त कर दिया था था। उन दोनों महिलाओं में से एक बातूनी सरसता के साथ मस्त और लापरवाह थी। उसे कोई काम-काज नहीं आता था किंतु दूसरी समझदार थी। वह अधिक आयु की थी। उसकी गोद में भी एक बच्चा था। वह प्रत्येक काम में निपुण थी और बड़ी चिंता के साथ सब काम करती थी। वह अधिक नहीं बोलती थी। अधिकांश समय चुप ही रहती थी। उसे देखकर लगता था जैसे वह मन ही मन सोचती रहती हो।

लेखिका कहती कि उस औरत ने मेरी लड़की मिनू को अपने साथ इस प्रकार घुला मिला लिया था जैसे वह उसकी लड़की हो। उसका स्वयं का लड़का पैदल चलता था और मीनू उसकी गोदी में रहती। जब वह पानी भरती तो भी मिनू उसके साथ ही रहती, दाल दलती तो भी मिनू उसके साथ ही रहती और वह बर्तन साफ करती तो मिनू भी उसके काम में हाथ बँटाती। वह छोटी-छोटी कटोरियाँ और गिलास मलती दिखाई पड़ती। भाव यह कि मिनू उस औरत के ही साथ रहती। आखिर में बात इतनी बढ़ गई कि वह मिनू को अपनी पीठ से बाँधकर सफाई का काम करने लगी। उस औरत का नाम लखिया था। लखिया के साथ मीनू बहुत अधिक घुल-मिल गई थी।

विशेष:

  1. लेखिका ने लखिया नामक महिला कैदी और अपनी सेविका के चरित्र पर प्रकाश डाला है।
  2. भाषा चित्रात्मक है।
  3. भाषा खड़ी बोली है।

प्रश्न 5.
मैं बहुत सोचती थी कि लखिया कौन है। वह जेल क्यों आई? एक दिन अचानक मैंने मेट्रन से पूछा, जिसका उत्तर मिला-“ओह! यह बड़ी खतरनाक औरत है। इसने पुलिस को मारा है-पुलिस को। पर हमने उसका दिमाग ठीक कर दिया है। आपको कोई तकलीफ तो नहीं देती?” अचानक मुझे उन बच्चों का ख्याल में गया। उनकी माँ भी तो पुलिस को मारने के कारण जेल भेजी गई थी और उसके साथ भी तो एक छोटा बच्चा था। पूछना मैंने कई बार चाहा, पर लखिया की गंभीर और उदास मुद्रा देखकर, हिम्मत मेरी एक बार भी न हुई। (Page 61)

शब्दार्थ:

  • अचानक – एकाएक, अकस्मात।
  • दिमाग – मस्तिष्क।
  • तकलीफ – कष्ट, दुख।
  • ख्याल – ध्यान।
  • मुद्रा – आकृति।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कहानी ‘तीन बच्चे’ से उद्धृत है। लेखिका लखिया के संबंध में बता रही है।

व्याख्या:
लेखिका कहती है कि मैं लखिया के संबंध में बहुत सोचती थी कि यह कौन है और किस अपराध में जेल आई है? एक दिन एकाएक मैंने मेट्रन से लखिया के संबंध में पूछा, तो उसने बताया कि यह बहुत खतरनाक स्त्री है। इसने पुलिसवालों की पिटाई की है किंतु हमने इसका दिमाग ठीक कर दिया है। यह आपको कोई कष्ट तो नहीं देती। लेखिका कहती है कि यह सुनकर कि इसने पुलिसवालों को पीटा है, मुझे उन तीन भीख माँगने वाले बच्चों का ध्यान आ गया।

उनकी माँ भी तो पुलिसवालों को मारने के अपराध में जेल में थी। उसके साथ भी एक बच्चा था। लेखिका कहती है कि मैंने इस संबंध में लखिया से कई बार पूछना चाहा लेकिन उसका गंभीर और उदास मुख देखकर, एक बार भी साहस नहीं हुआ। कहने का भाव यह है कि लेखिका लखिया से चाहते हुए भी कुछ नहीं पूछ सकी।

विशेष:

  1. लेखिका लखिया के संबंध में जिज्ञासा होते हुए उससे कुछ भी पूछने का साहस नहीं जुटा सकी। लेखिका की मनःस्थिति पर प्रकाश डाला गया है।
  2. भाषा सरल, स्पष्ट खड़ी बोली है।

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MP Board Class 12th Special Hindi बोली, विभाषा, मातृभाषा, राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा

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1. भाषा

‘भाषा’ शब्द की मूल क्रिया भाष’ है। भाष का अर्थ ‘बोलना’ या ‘कहना’ होता है। जिन ध्वनियों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है,उसकी समष्टि को भाषा कहते हैं। बोलते समय हमारे विचारों की पूर्ण अभिव्यक्ति ध्वनि-चिह्नों से नहीं होती, मदद के लिए हम इंगित का भी प्रयोग करते हैं; जैसे-मुखाकृति, नयनों के भाव, हाथों का संचालन आदि। इंगित की सहायता के बिना वाणी अभिव्यक्ति में अपूर्ण रह जाती है।

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परिभाषा-उच्चरित ध्वनि-संकेतों की सहायता से भाव या विचार की पूर्ण अभिव्यक्ति भाषा है। भाषा के मुख के कण्ठ,तालु आदि उच्चारण अवयवों से बोली गयी वह ध्वनि है जिसके द्वारा किसी समाज के लोग आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। भाषा के तीन पक्ष होते हैं-

(1) व्यक्तिगत,
(2) सामाजिक,
(3) सामान्य या सर्वव्यापक।

भाषा के उपयोग का सबसे व्यापक क्षेत्र व्यक्ति और समाज के सम्पर्क से उत्पन्न होता है। मनुष्य का अपने आप से या किसी दूसरे व्यक्ति से भाषा की दृष्टि से जो सम्बन्ध है, वह अपेक्षाकृत सीमित होता है। जिस प्रकार कोई कार्य करने के लिए अपने अंगों में समन्वय की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार व्यक्ति भी समाज के अंग होते हैं और परस्पर समन्वय तथा संगठन बनाये रखने के लिए भाषा का उपयोग अपेक्षित है। सामाजिक दृष्टि से भाषा के चार उपयोग हैं :
(1) सूचन,
(2) प्रेरण,
(3) रसन,
(4) चिन्तन।

(1) भाषा का बहुलांश सूचनात्मक होता है। तकनीकी विषय, विज्ञान, इतिहास, भूगोल और समाचार-पत्र का उद्देश्य किसी न किसी प्रकार की सूचना देना होता है।
(2) प्रेरण को भाषा का गत्यात्मक उपयोग,कह सकते हैं। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग जनमत के निर्माण या किसी वस्तु के पक्ष-विपक्ष में धारणा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
(3) सामाजिक दृष्टि से भाषा का तीसरा उपयोग रचनात्मक या रसास्वादन है, जिसमें भाषा का रमणीय पक्ष सामने आता है। इसका मुख्य लक्षण भावों को उद्दीपन करना है। जैसे—युद्ध आदि के अवसर पर वीर रस की कविताएँ या चुनाव-प्रचार के समय जोशीले भाषण जन-भावना को जगाने की दृष्टि से होते हैं। इसका प्रधान उद्देश्य सौन्दर्यबोध भी है।
(4) भाषा का अन्यतम सामाजिक उपयोग चिन्तन से सम्बद्ध है। हम अपनी कोई वैयक्तिक समस्या सुलझाने के लिए जो चिन्तन करते हैं, वह समाज-निरपेक्ष होता है। इसके विपरीत धर्म,दर्शन, अर्थनीति, राजनीति आदि का सैद्धान्तिक निरूपण समाज-सापेक्ष चिन्तन के अन्तर्गत आता है।

भाषा के इन उपयोगों में परस्पर संकीर्णता नहीं है, क्योंकि एक की सीमा दूसरे से मिल जाती है।

भाषा का प्रयोग कई अर्थों में होता है। भाषा शब्द का प्रयोग कभी व्यापक अर्थ में होता है तो कभी संकुचित। जैसे—मूक भाषा,पशु-पक्षियों की भाषा आदि। व्यक्त वाणी का अर्थ यह भी है कि स्पष्ट और पूर्ण अभिव्यंजना हो जो वाचिक भाषा के सूक्ष्म अर्थ की बोधक है।

2. बोली

शिक्षा, संस्कार, पालन-पोषण, व्यवसाय, सामाजिक स्थिति, वातावरण आदि के भेद से व्यक्ति की भाषा का निर्धारण होता है। प्रत्येक व्यक्ति की भाषा दूसरे से भिन्न होती है या प्रत्येक व्यक्ति की भाषा स्वतन्त्र बोली जाती है। उसकी अपनी भाषा की विशेषता दूसरों से भिन्न होती है। किन्तु एक व्यक्ति की भाषा सदा एकरूप नहीं होती।

एक भाषा-क्षेत्र में कई उप-बोलियाँ होती हैं। प्रकृति की दृष्टि से भाषा और बोली में अन्तर करना बहुत कठिन है। ‘बोली’ किसी भाषा के एक ऐसे सीमित क्षेत्रीय रूप को कहते हैं जो ध्वनि, रूप, वाक्य-गठन, अर्थ,शब्द-समूह तथा मुहावरों आदि की दृष्टि से उस भाषा के अन्य क्षेत्रीय रूपों से भिन्न होती है।

जब बोली किन्हीं कारणों से महत्त्व प्राप्त कर लेती है तो भाषा कहलाने लगती है।

  • मध्य प्रदेश की मुख्य बोलियाँ –
  • मालवी – देवास,इन्दौर, धार, उज्जैन,रतलाम। [2009]
  • निमाड़ी – खरगौन, बड़वानी, खंडवा,झाबुआ।
  • ब्रज – भिण्ड,मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, गुना।
  • बुन्देली – दतिया, टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, जबलपुर। [2009]
  • छत्तीसगढ़ी – सरगुजा, बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग।
  • बघेली – रीवा, सतना, सीधी, बालाघाट, शहडोल।
  • खड़ी बोली–प्रायः पूरे प्रदेश में पढ़े – लिखे सुसंस्कृत लोगों की बोली है। इसमें संस्कृत के साथ अरबी, फारसी, अंग्रेजी के तद्भव शब्दों के रूप मिलते हैं।

3. विभाषा (उप-भाषा)

इसे उप-भाषा भी कहा जाता है। विभाषा का क्षेत्र भाषा से कम व्यापक एकं बोली से अधिक विस्तृत होता है। एक प्रदेश में अथवा प्रदेश के भाग में सामान्य बोल-चाल, साहित्य आदि के लिए प्रयुक्त होने वाली भाषा को विभाषा कहते हैं। इसे क्षेत्रीय भाषा भी कहते हैं। पूर्वी हिन्दी, पश्चिमी हिन्दी,राजस्थानी, बिहारी एवं गढ़वाली आदि विभाषाएँ हैं।

हिन्दी की पाँच उप-भाषाएँ हैं और प्रत्येक उप-भाषा की निम्नलिखित बोलियाँ हैं
(1) शौरसेनी-पश्चिमी हिन्दी (ब्रजभाषा,खड़ी बोली,बाँगरू, कन्नौजी,बुन्देली)। राजस्थानी (मेवाती,मारवाड़ी,मालवी,जयपुरी)। गुजराती (सौराष्ट्री)।
(2) अर्द्धमागधी-पूर्वी हिन्दी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी) मागधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली,बंगला,असमी,उड़िया।
(3) खस–पहाड़ी (गढ़वाली, कुमाऊँनी, गोरखाली)।
(4) ब्राचड़-पंजाबी, सिन्धी।
(5) महाराष्ट्री-मराठी,कोंकणी।

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4. मातृभाषा

जो जिस प्रान्त का होता है और उसके माता-पिता,विशेषकर माता जो बोली बोलती हैं,वह मातृभाषा कहलाती है। भारत में बोलियों के अलावा 15 भाषाएँ प्रमुख हैं,जो वहाँ के सम्बन्धित निवासियों की मातृभाषा है। हिन्दी,मराठी, गुजराती,बंगला, असमिया,तेलुगू, तमिल,मलयालम, कन्नड़,पंजाबी,सिन्धी,उड़िया,उर्दू-ये प्रमुख मातृभाषाएँ हैं। इनको संविधान में भी स्थान प्राप्त है। प्रायः इन सभी भाषाओं में साहित्य की रचना की गयी है। इसलिए इन्हें भाषा का दर्जा प्राप्त है।

5. राजभाषा

राजभाषा और राष्ट्रभाषा ये दोनों शब्द मिलते-जुलते हैं,पर इनमें सामान्य और पारिभाषिक शब्द भिन्न हैं। अंग्रेजी में इनको ‘ऑफिशियल लेंग्वेज’ और ‘नेशनल लेंग्वेज’ कहते हैं।

राजभाषा यानी सरकारी कामकाज की भाषा अथवा भारतीय संघ की भाषा है। भारत का संविधान बनाते समय हिन्दी को राजभाषा माना गया। सात राज्यों में हिन्दी राजभाषा है, शेष राज्यों में अपनी-अपनी प्रदेशों की भाषाएँ हैं। सिन्धी, संस्कृत, कश्मीरी किसी भी राज्य की राजभाषा नहीं है।

राजभाषा बनाने के लिए सरकारी कामकाज इसी भाषा में होना चाहिए। शिक्षा का माध्यम, कार्य के निर्णय,रेडियो और दूरदर्शन में राजभाषा का प्रयोग होना चाहिए। लेकिन अहिन्दी भाषी राज्यों की सुविधा को ध्यान कर भारतीय संविधान में अंग्रेजी का प्रयोग सीमित समय तक के लिए रखा गया है।

6. राष्ट्रभाषा

प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत राष्ट्रभाषा होती है। राष्ट्रभाषा में राष्ट्र की संस्कृति, साहित्य और इतिहास की प्रेरणाएँ निहित होती हैं,जो जनजीवन को प्रभावित करती हैं। बहुभाषी देशों में सभी भाषाओं को समान सम्मान मिलता है,लेकिन वहाँ सम्पर्क की एक ही भाषा होती है जो राष्ट्रभाषा कहलाती है। देश के विभिन्न प्रदेश अपने प्रदेश में अपनी भाषा का प्रयोग कर सकते हैं, किन्तु जहाँ सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रश्न आता है, वहाँ वे अपनी राष्ट्र भाषा का ही प्रयोग करते हैं। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय संविधान में हिन्दी को राष्ट्र भाषा का पद दिया गया है।

राष्ट्रभाषा उसी तरह महत्त्वपूर्ण होती है,जैसे-राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज अथवा राष्ट्र चिह्नी वह पूरे राष्ट्र की संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी भाषा से उस व्यक्ति,समाज, देश का व्यक्तित्व झलकता है।

राष्ट्रभाषा के लिए सम्पर्क भाषा शब्द भी प्रयुक्त होता है।

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हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रमुख कारण यह है कि देश में इसके बोलने वाले 52 प्रतिशत से अधिक हैं। यही एकमात्र ऐसी भाषा है जो सभी प्रान्तों में किसी न किसी रूप में समझी जा सकती है। देश के सात हिन्दी राज्यों में हिन्दी मातृभाषा के रूप में प्रयुक्त होती है। हिन्दी का उद्भव संस्कृत परम्परा से जुड़े होने के कारण समस्त आर्य-परिवार की प्रान्तीय भाषा-शब्दावली हिन्दी से जुड़ी प्रतीत होती है।

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MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य-परिवर्तन

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किसी वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्यों में, अर्थ का परिवर्तन किये बिना परिवर्तित करने की प्रक्रिया को वाक्य-रूपान्तरण या वाक्य-परिवर्तन कहते हैं। किसी भी वाक्य को दूसरे वाक्यों में बदला जा सकता है, किन्तु उसके मूल भाव या अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।

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वाक्य-रूपान्तरण के कुछ उदाहरण यहाँ दिये जा रहे हैं :
1. साधारण या सरल वाक्य से मिश्रित वाक्य में
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2. सरल वाक्य से संयुक्त वाक्य
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3. मिश्रित वाक्य से सरल वाक्य में
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4. मिश्रित वाक्य से संयुक्त वाक्य में
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5. संयुक्त वाक्य से मिश्रित वाक्य में
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6. कर्तृवाचक वाक्य से कर्मवाच्य वाक्य में
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7. विधिवाचक वाक्य से निषेधवाचक वाक्य में
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8. विधिवाचक वाक्य से प्रश्नवाचक वाक्य में
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9. विधिवाचक वाक्य से आज्ञावाचक वाक्य में
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निम्नलिखित वाक्यों को कोष्ठक में दिये गये निर्देश के अनुसार रूपान्तरित कीजिये
1. वह मेरा मित्र है। (बिना भाव बदले निषेधात्मक)
[वह मेरा शत्रु नहीं है।

2. राम घर पर है। (सन्देहवाचक)
[शायद राम घर पर है।

3. आलसी व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता। (मिश्रित वाक्य)
[जो व्यक्ति आलसी होता है,वह उन्नति नहीं कर सकता।]

4. भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता। (प्रश्नवाचक)
क्या भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता?]

5. उसने ताजमहल देखा है। (प्रश्नवाचक) (2012, 14)
क्या उसने ताजमहल देखा है?]

6. मैं यहाँ के प्राचार्य को नहीं जानता हूँ। (मिश्रित वाक्य)
मैं नहीं जानता हूँ कि यहाँ के प्राचार्य कौन हैं?

7. देशभक्त देश की रक्षा करते हैं। (आदेशात्मक)
देशभक्तो ! देश की रक्षा करो।

8. मैंने वह मकान खरीदा, जो मोहन का था। (साधारण वाक्य)
मैंने मोहन का मकान खरीदा।]

9. राम मूर्ख नहीं है। (बिना भाव बदले विधिवाचक वाक्य)
राम चतुर है।

10. मेरा विचार है कि आज घूमने चलें। (साधारण वाक्य)
मेरा आज घूमने जाने का विचार है।]

11. मैं गीता के रचयिता को नहीं जानता। (मिश्रित वाक्य) [2011]
मैं नहीं जानता कि गीता का रचयिता कौन है?]

12. कितना अद्भुत दृश्य है। (विस्मयवाचक) (2010, 11)
[वाह ! कितना अद्भुत दृश्य है।]

13. राम बुद्धिमान है। (बिना भाव बदले नकारात्मक) [2010]
[राम मूर्ख नहीं है।

14. तुम कल जाओगे। (प्रश्नवाचक) [2010]
क्या तुम कल जाओगे?]

15. जो छात्र परिश्रम करेंगे, उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी। (सरल वाक्य) [2009]
[परिश्रमी छात्रों को सफलता अवश्य मिलती है।।

16. मोहन पुस्तक पढ़ रहा है। (प्रश्नवाचक) (2015)
क्या मोहन पुस्तक पढ़ रहा है?]

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17. वर्षा होने पर हम बाहर नहीं जाते। मिश्रित वाक्य) [2009]
(जब वर्षा होती है, तब हम बाहर नहीं जाते हैं।

18. अच्छे विद्यार्थी परिश्रमी होते हैं। (मिश्रित वाक्य) [2009]
जो विद्यार्थी अच्छे होते हैं,वे परिश्रम करते हैं।

19. सूर्योदय होने पर पक्षी चहकने लगते हैं। (मिश्रित वाक्य) [2009]
[जब सूर्योदय होता है, तब पक्षी चहकने लगते हैं।]

20. गरीब (दरिद्र) होने पर भी वह ईमानदार है। (मिश्र वाक्य) [2009]
यद्यपि वह गरीब (दरिद्र) है,किन्तु ईमानदार है।

21. सत्य की सदा जीत होती है। (प्रश्नवाचक वाक्य) [2009]
क्या सत्य की सदा जीत होती है?]

22. यह काम कर दीजिए। (निषेधवाचक वाक्य) [2009]
यह काम मत कीजिए।

23. वह भोजन करके विद्यालय जाता है। (संयुक्त वाक्य) [2016]
वह भोजन करता है और विद्यालय जाता है।

24. कठोर बनकर भी सहदय बनो। (संयुक्त वाक्य) [2017]
कठोर बनें किन्तु सहृदय रहें।।

25. मयूर वन में नाचता है। (संदेहवाचक वाक्य) [2017]
[शायद मयूर वन में नाचता है।।

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MP Board Class 12th General Hindi Model Question Paper

MP Board Class 12th General Hindi Model Question Paper

Time : 3 Hours
Maximum Marks: 100

निर्देशः

  • सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
  • प्रश्न क्रमांक 1 से 5 तक वस्तुनिष्ठ प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के लिए 5 अंक आवंटित हैं। उपप्रश्न पर 1 अंक आवंटित है।
  • प्रश्न क्रमांक 6 से 15 तक प्रत्येक प्रश्न के लिए 2-2 अंक आवंटित हैं। प्रत्येक का उत्तर लगभग 30 शब्दों में लिखिए।
  • प्रश्न क्रमांक 16 से 21 तक प्रत्येक प्रश्न के लिए 3-3 अंक आवंटित हैं। प्रत्येक का उत्तर लगभग 75 शब्दों में लिखिए।
  • प्रश्न क्रमांक 22 से 24 तक प्रत्येक प्रश्न के लिए 4-4 अंक आवंटित हैं। प्रत्येक का उत्तर लगभग 120 शब्दों में लिखिए।
  • प्रश्न क्रमांक 25 से 27 तक के लिए 5-5 अंक आवंटित हैं। प्रत्येक का उत्तर लगभग 150 शब्दों में लिखिए।
  • प्रश्न क्रमांक 28 के लिए 10 अंक आवंटित हैं। शब्द सीमा लगभग 200-250 शब्द है।

1. उचित शब्दों का चयन कर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए: [1 x 5 = 5]
(i) सूरदास की भक्ति ____________ भाव की है। (दास्य/साख्य)
(ii) नगर शोभा में दोहों की संख्या ____________ है। (142/152)
(iii) सुभद्रा कुमारी चौहान का काव्य संग्रह ह ____________ (त्रिधारा/पंचधारा)
(iv) हिन्दी निबन्ध का उद्भव काल ____________ युग है। (भारतेन्दु/द्विवेदी)
(v) एक से अधिक अर्थ देने वाले शब्द ____________ कहलाते हैं। (एकार्थी/अनेकार्थी)
उत्तर-
(i) साख्य
(ii) 142
(iii) त्रिधारा
(iv) भारतेन्दु
(v) अनेकार्थी

2. सही विकल्प चुनकर लिखिए: [1 x 5 = 5]
(i) गोपालसिंह नेपाली का जन्म सन् है
(अ) 1932 (ब) 1902 (स) 1904 (द) 1911
(ii) सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाने की घोषणा की
(अ) गुरु नानक (ब) अर्जुन सिंह (स) गोविन्द सिंह (द) तेग बहादुर
(iii) साठ हजार हाथियों से अधिक बलराशि का स्वामी
(अ) दारा (ब) शाहजहाँ (स) औरंगजेब (द) हुमायू
(iv) कर्मधारय समास का उदाहरण है
(अ) अष्टांग (ब) दोराहा (स) माता-पिता (द) कनकलता
(v) ‘बाल बाँका न होना’ का अर्थ है
(अ) हानि होते होते बचना (ब) कुछ भी हानि न होना (स) कुछ भी असर न होना (द) कम असर होना
उत्तर-
(i) 1902
(ii) गोविन्द सिंह
(iii) दारा
(iv) कनकलता
(v) कुछ भी हानि न होना

3. सत्य/असत्य का चयन कर लिखिए: [1 x 5 = 5]
(i) ‘प्रभावती’ निराला का काव्य संकलन है।
(ii) मेषमाता बकरी को कहते हैं।
(iii) निष्ठामूर्ति कस्तूरबा संस्मरण विधा है।
(iv) निबन्ध मन की सहज और उन्मुक्त उड़ान है।
(v) अड्यार पुस्तकालय केरल में है।
उत्तर-
(i) असत्य
(ii) असत्य
(ii) सत्य
(iv) सत्य
(v) सत्य

4. सही जोड़ी बनाइये: [1 x 5 = 5]

5. एक वाक्य में उत्तर दीजिए: [1 x 5 = 5]
(i) धरती का ताज किसे कहा है
(ii) देवेन्द्र दीपक का जन्म किस सन् में हुआ?
(iii) प्रक्रिया सामग्री का तकनीकी शब्द क्या है?
(iv) अर्थ की दृष्टि से वाक्य के कितने भेद होते हैं?
(v) ‘दक्षिण भारत की एक झलक’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
(i) हिमालय
(ii) 31 जुलाई 1934
(iii) सॉफ्टवेयर
(iv) आठ
(v) आचार्य विनय मोहन शर्मा

6. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए:
चंद्रमा, बादल, हवा, पानी
उत्तर-
पर्यायवाची शब्द
(i) चंद्रमा → निशाकर, मयंक।
(ii) बादल → मेघ, नीरद।
(iii) हवा → पवन, वायु।
(iv) पानी → नीर, जल।
अथवा

निर्देशानुसार वाक्य परिवर्तन कीजिए:
(i) वह फल खरीदने के लिए बाजार गया। (संयुक्त वाक्य)
(ii) स्वावलंबी व्यक्ति सदा सुखी रहते हैं। (संयुक्त वाक्य)
उत्तर-
(i) उसे फल खरीदने थे, इसलिए वह बाजार गया।
(ii) जो व्यक्ति स्वावलंबी होते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं।

7. समास विग्रह कर नाम लिखिए: (कोई दो)
(i) सत्यग्रह
(ii) कमलचयन
(iii) माता-पिता
(iv) नवरत्न
उत्तर-
(i) सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह (तत्पुरुष समास)
(ii) कमलनयन = कमल के समान नयन (कर्मधारय समास)
(iii) माता-पिता = माता और पिता (द्वन्द्व समास)
(iv) नवरत्न = नौ रत्नों का समूह (द्विगु समास)
अथवा

मुहावरों का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयोग कीजिए: (कोई दो)
(i) गज भर की छाती होना
(ii) सूरज को दीपक दिखाना
(ii) सिर धुनना
उत्तर-
(i) गज भर की छाती होना = बलवान होना।
वाक्य प्रयोग-रमेश की गज भर की छाती है।

(ii) सूरज को दीपक दिखाना = मूर्खतापूर्ण व्यवहार करना।
वाक्य प्रयोग-विश्वविख्यात कथावाचक के सम्मुख मुकेश ने कुछ तर्क
किया, जो सूरज को दीपक दिखाने जैसा हुआ

(iii) सिर धुनना = पश्चाताप करना।
वाक्य प्रयोग-हायर सेकेण्ड्री की परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर अरुण ने अपना सिर धुन लिया।
मकरंद : हिंदी सामान्य

8. संक्षेपण किसे कहते हैं?
उत्तर-
संक्षेपण की परिभाषा-संक्षेपण वह कला है जिसके द्वारा किसी वक्तव्य को, किसी विषय को कम-से-कम शब्दों में प्रस्तुत किया जाए तो भी वह स्वयं में पूर्ण हो। उसमें मूल का न कोई अंश छूटता है और न ही उसक
अनिवार्य आशय के समझने में कोई न्यूनता आती है।
अथवा
भाव पल्लवन कीजिए:
“दूर के ढोल सुहावने होते हैं”
उत्तर-
भाव पल्लवनः आज के परिवेश में आधुनिकता की मानसिकता, फैशन, बनावटी दिखावा से घिरे हुए व्यक्ति की वास्तविकता का सम्यक् पता नहीं चल पाता। हम उसके बाह्य स्वरूप को देखकर आकर्षित हो जाते हैं। उसके मौलिक, विचारों, गुणों से पूर्णतः अनभिज्ञ रहते हैं।

9. अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध कीजिए:
(i) रानी पन्द्रह अगस्त में भाषण बोलेगी।
(ii) मैं गीता पढ़ा हूँ
उत्तर-
(i) रानी पन्द्रह अगस्त को भाषण देगी।
(ii) मैंने गीता पढ़ी है।

अथवा
रचना के आधार पर वाक्य के कितने भेद होते हैं नाम लिखिए।
उत्तर-
रचना के आधार पर वाक्य तीन प्रकार के होते हैं
(i) साधारण वाक्य
(ii) संयुक्त वाक्य
(iii) मिश्र वाक्य

10. कोई चार तकनीकी शब्द लिखिए।
उत्तर-
(i) अनुवांशिकी
(ii) पारिस्थितिकी
(iii) जीवाश्म
(iv) विकिरण।
अथवा
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए:
(i) आवश्यक
(ii) परिष्कृत
(iii) स्वाधीन
(iv) प्रशंसा
उत्तर-
विलोम शब्दः
(i) आवश्यक = अनावश्यक
(ii) परिष्कृत = दूषित
(iii) स्वाधीन = पराधीन
(iv) प्रशंसा = निंदा।

11. अनेकार्थी शब्दों के अलग-अलग अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए:
(i) घटा (ii) अंक
उत्तर-
(i) घटा = बादल
वाक्य प्रयोग- आकाश में घटा छाई है।
घटा = कम हुआ
वाक्य प्रयोग- अब जाके दाल का मूल्य घटा।

(ii) अंक = गोद
वाक्य प्रयोग- माँ शिशु को अंक में बिठाए हुए है।

अंक = अध्याय
वाक्य प्रयोग- इस नाटक के सात अंक हैं।
अथवा
समोच्चारित शब्दों का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयोग कीजिए: –
(i) अवधि – अवधी
(ii) अविराम – अभिराम
उत्तर-
(i) अवधि = समय
वाक्य प्रयोग- प्रश्न पत्र हल करने की अवधि 3 घंटे की है।

अवधी = एक भाषा
वाक्य प्रयोग- तुलसीदास अवधी भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।

अविराम = लगातार
वाक्य प्रयोग- मोहन ने अविराम चलकर अल्प समय में अपने गन्तव्य पर पहुँच गया।

अभिराम = सुंदर
वाक्य प्रयोग- कमलों से युक्त यह सरोवर अभिराम लग रहा है।

12. सिरचन कौन सी वस्तुएँ बनाना जानता था?
उत्तर-
सिरचन मोथी घास और पटेर की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, मोढ़े, मूंज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, ताल के पत्तों की छतरी-टोपी आदि बनाना जानता था।
अगवा
बाबू गुलाबराय ने किन परिस्थितियों में स्वयं को नारायण कहा है?
उत्तर-
नारायण का निवास स्थान जल में है और बाबू गुलाबराय का घर भी वर्षा के कारण जल में डूबा हुआ था, ऐसी स्थिति में लेखक स्वयं को नारायण समझने लगा था।

13. चन्द्रकांत किस सभ्यता व रहन-सहन का प्रेमी था?
उत्तर-
चंद्रकांत अंग्रेजी सभ्यता व रहन-सहन का प्रेमी था।
अथवा
मंत्री जी उदास क्यों थे?
उत्तर-
देश के राजा नि:संतान चल बसे थे। तब राजा किसे चुना जाए, इसी फ़िक्र में मंत्री जी उदास थे।

14. विषय के आधार पर निबन्ध को कितने भागों में बाँटा गया है? नाम लि खिए।
2 उत्तर-
निबंध के प्रकार
(i) साहित्यिक (ii) सांस्कृतिक (iii) सामाजिक (iv) ऐतिहासिक (v) व्यक्तिनिष्ठ (vi) वस्तुनिष्ठ
अथवा
हिन्दी निबन्ध का विकास क्रम लिखिए।
उत्तर-
हिन्दी निबंध का विकास क्रम
(i) भारतेंदुयुगीन निबंध
(ii) द्विवेदीयुगीन निबंध
(iii) शुक्लयुगीन निबंध
(iv) शुक्लयुगोत्तर निबंध
(v) सामयिक निबंध – 1940 से अब तक।

15. व्यास शैली से क्या आशय है?
उत्तर-
व्यास शैली में लेखक निबंधों के तथ्यों को खोलता हुआ चला जाता है। उन्हें विभिन्न तर्को उदाहरणों के द्वारा व्याख्यायित करता चला जाता है। वर्णनात्मक और तुलनात्मक तथा विवरणात्मक निबंधों में निबंधकार इसी प्रकार की शैली का प्रयोग करता है।
अथवा
किन्हीं चार अप्रवासी हिन्दी निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर-
निबंधकारों के नाम
(i) प्रभाकर श्रोत्रिय
(ii) प्रदीप मांडव
(iii) चंद्रकांत वांदिवडेकर
(iv) सुधीश पचौरी

16. यशोदा ने देवकी को क्या संदेशा भेजा?
उत्तर-
यशोदा ने देवकी को संदेश भेजा कि मैं तो कृष्ण का पालन-पोषण करने वाली धाय हूँ। मेरी आपसे विनती है कि आप कृष्ण पर ममता, दया करती रहना। उसके प्रति कठोरता का व्यवहार कभी न करना। कृष्ण को उसका प्रिय माखन-रोटी ही खाने को देना। वह बड़ी मुश्किल से स्नान करता है, अतः उसकी सभी फरमाइशों को पूरा करके स्नान कराना। कृष्ण संकोची स्वभाव का है। वह कुछ नहीं बोलेगा, अतः उसकी मनोवृत्ति व आदतों का ध्यान रखना।

अथवा
रहीम ने समुद्र के जल की अपेक्षा कुएँ के जल को श्रेष्ठ क्यों बताया है?
उत्तर-
रहीम ने समुद्र और कुएँ के जल में कुएँ के जल को श्रेष्ठ बताया है। उन्होंने कहा- यद्यपि कुआँ आकार में छोटा होता है, लेकिन प्यासा कुएँ के पास ही जाकर अपनी प्यास बुझाता है। समुद्र आकार में बड़ा है, लेकिन प्यासा उसके जल से प्यास नहीं बुझा सकता है, वह प्यासा ही रह जाता है। अतः कवि ने समुद्र जल की अपेक्षा कुएँ को श्रेष्ठ बताया है।

17. छत्रसाल की बरछी की विशेषताएँ लिखिए?
उत्तर-
विशेषताएँ-छत्रसाल की बरछी नागिन के समान है। वह अपने शत्रुओं की चुन-चुनकर मारती है। वह अपने शत्रुओं के बख्तर को फाड़कर उनके शरीर में इस प्रकार घुस जाती है, जैसे मछली जल की धारा को चीरकर आगे बढ़ जाती है।
अथवा
“हम कहाँ जा रहे हैं” कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं? उत्तर ‘हम कहाँ जा रहे हैं’ से कवि संदेश देना चाहता है कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, उसकी परंपराएँ, व्यवहार, उपलब्धियाँ और जीवन मूल्य सर्वश्रेष्ठ हैं। हमें पाश्चात्य जीवन-शैली और वस्तुओं को नहीं अपनाना चाहिए। हमें भारतीय ही बने रहना चाहिए, क्योंकि इसी में हमारा कल्याण है।

18. कवि गोपालसिंह नेपाली ने गंगाजल की क्या विशेषताएँ बतलाई हैं?
उत्तर-
गंगाजल की बहत बडी विशेषता है कि वह बहत ही पवित्र है। उसको पीने वाला दुःख में भी मुस्कुराता रहता है। यही नहीं, इसको पीने वाला तो हर प्रकार के दुःखों को हँसते-हँसते सहन कर जाता है।
अथवा
पंचतत्व के किन गुणों को माँ धारण किए हुए है?
उत्तर-
पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल और वायु पाँच तत्व होते हैं। माँ इन सभी गुणों को धारण किए हुए है। माँ पृथ्वी का गुण धैर्य, आकाश के गुण चैतन्य अथवा प्रकाश को, अग्नि के गुण तीव्रता, पवन की गतिमयी व्यापकता तथा जल के गुण गंभीरता को धारण किए हुए हैं।

19. मोमबत्ती बुझने के बाद परिवेश में क्या-क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर-
मोमबत्ती बुझने के बाद पूर्णिमा के चाँद की चाँदनी दरवाजे और खिड़की से झाँकती हुई पूरे कमरे में फैल गई। सारा परिवेश प्रकाशमय हो गया।
अथवा
दुनिया में कौन सी दो अमोघ शक्तियाँ मानी गई हैं? कस्तूरबा की निष्ठा किसमें अधिक थी?
उत्तर-
दुनिया में शब्द और कृति दो अमोघ शक्तियाँ मानी गई हैं। शब्दों ने तो सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। किंतु अंतिम शक्ति तो ‘कृति’ की है। कस्तूरबा ने इन दोनों शक्तियों से ही अधिक श्रेष्ठ शक्ति कृति की नम्रता के साथ उपासना करके संतोष माना और जीवन सिद्धि प्राप्त की।

20. अखबार में जबलपुर की कौन सी घटना छपी थी?
उत्तर-
अखबार में जबलपुर की घटना छपी थी कि कल रात एकाएक खूब पानी बरसा। जेल के पास के नाले में तीन गरीब बच्चे बह गए। उन तीनों की लाशें मिलीं। बहुत कोशिश करने पर भी इनकी शिनाख्त नहीं हो सकी दो लड़कियाँ हैं और एक लड़का। ऐसा सुना गया है कि वे गाना गाकर भीख माँगा करते थे।
अथवा
देवेन्द्र दीपक के अनुसार पुस्तक की समीक्षा किस प्रकार की जाती है?
उत्तर-
लेखक देवेन्द्र दीपक के अनुसार पुस्तक की समीक्षा बेबाक होती है और प्रायः – प्रायोजित होती है। समीक्षा में अक्सर एक अनावश्यक लंबी भूमिका होती है। इसमें पुस्तक के अंदर जो कुछ भी है, उसकी चर्चा कम होती है तथा जो नहीं है उसकी चर्चा अधिक होती है। दूसरे शब्दों में पुस्तक की समीक्षा ठीक प्रकार से नहीं होती है।

21. गाँधीजी का शिक्षा के प्रति क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर-
गाँधी जी का शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण था कि जो शिक्षा चरित्र निर्माण की भावना और कर्तव्य की भावना उत्पन्न करे, वही सर्वश्रेष्ठ है। केवल अक्षर ज्ञान शिक्षा नहीं है। सच्ची शिक्षा तो चरित्र-निर्माण और कर्त्तव्य-बोध है।
अथवा
स्थितप्रज्ञता कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर-
मन को किसी परम उच्च में लगा देने से स्थिर प्रज्ञता प्राप्त होती है। जैसे लोक-संग्रह के कार्य में, राष्ट्रभक्ति में, दीन-दु:खियों की सेवा में।

22. शरीरबल और आत्मबल में लेखक ने किसे श्रेष्ठ माना है आज विश्व कल्याण के लिए दोनों में से कौन सा अधिक उपयोगी है
उत्तर-
शरीरबल और आत्मबल में से आत्मबल को लेखक ने श्रेष्ठ माना है। आज विश्वकल्याण के लिए दोनों में से आत्मबल सर्वाधिक उपयोगी है।
अथवा
केरल के गाँवों की कौन सी विशेषताएँ हैं उत्तर-केरल के गाँव की विशेषताएँ-केरल के गाँव की गलियाँ साफ-सुथरी रहती हैं। केरल के गाँवों में बिजली की पूर्ण व्यवस्था है। गाँव बिजली की रोशनी से चमचमाते रहते हैं। केरल के गाँवों में डाकखाना, दवाखाना, और स्कूल की समुचित व्यवस्था है। केरल के गाँवों में हिन्दी का प्रचार और प्रसार बहुत है। यहाँ हिन्दी परीक्षा की अनिवार्य भाषा है।

23. “माँ बस यह वरदान चाहिए” कविता में देश की जय के लिए कवि किस भाव के आकांक्षी हैं?
उत्तर-
‘माँ बस यह वरदान चाहिए’ कविता में कवि देश की जय के लिए अपनी हार, स्वार्थ, त्याग, और बलिदान के भाव का आकांक्षी है।
अथवा
कवि जागो फिर एक बार में क्या उद्बोधन देते हैं?
उत्तर-
कवि ने ‘जागो फिर एक बार’ कविता में भारतीयों को उद्बोधन दिया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के महासंग्राम में योद्धा की तरह संघर्ष करो। अपनी परिवर्ती परंपरा को अक्षुण्ण रखने वाले भारतीय को अपनी संपूर्ण कायरता को त्यागकर अपने पराक्रमी और पुरुषार्थी स्वरूप को जाग्रत करो। अपनी दासता के सम्पूर्ण बंधनों को तोड़ने के लिए उसे जागृत करना आवश्यक है।

24. निम्नलिखित पद्यांश की सन्दर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए:
साजि चतुरंग सैन अंग मैं उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
भूषन भनत नाद विहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत हैं।
ऐलफैल खैलभैल खलक में गैलगैल,
गजन की छैलपैल सैल उलसत हैं।
तारा सो तरनि धूरिधारा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है ॥
उत्तर-
इसी पुस्तक का पृष्ठ संख्या 89-90 देखें।
अथवा
तप मेरे मोहन का उद्धव धूल उड़ाता आया,
हाय विभूति रमाने का भी मैंने योग न पाया,
सूखा कण्ठ, पसीना छूटा मृग-तृष्णा की माया,
झुलसी दृष्टि, अँधेरा दीखा, टूट गई वह छाया,
मेरा ताप और तप उनका
जलती है यह जठर मही॥
उत्तर-
इसी पुस्तक का पृष्ठ संख्या 218-219 देखें।

25. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए: [1 + 1 + 1 + 235]
समय एक अमूल्य निधि है, जीवन संग्राम में सफल होने के लिए समय का सदुपयोग परम आवश्यक है। अक्सर लोग समय की तुलना धन से करते हैं, लेकिन समय धन से अधिक मूल्यवान है। धन तो एक साधन मात्र है, परन्तु समय सब कुछ है। धन नष्ट भी हो जाये तो पुनः प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु नष्ट किए समय को प्राप्त करना असंभव है। जो मनुष्य समय नष्ट करता है समय उसे नष्ट कर देता है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का सार्थक शीर्षक लिखिए।
(ii) जीवन में सफल होने के लिए क्या आवश्यक है
(iii) सबसे अधिक मूल्यवान क्या है
(iv) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(i) गद्यांश का शीर्षक – समय का सदुपयोग।
(ii) जीवन में सफल होने के लिए समय का सदुपयोग परम आवश्यक है।
(iii) सबसे अधिक मूल्यवान धन नहीं समय है।
(iv) सारांश-समय अमूल्यनिधि है। समय की तुलना धन से नहीं की जा सकती। नष्ट धन की तो दुबारा प्राप्त कर सकते हैं, समय को नहीं। अतः समय का सदुपयोग करना परमावश्यक हैं।

26. निम्नलिखित अपठित पद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए: [2 + 1 + 2 = 5]
रवि जग में शोभा सरसाता,
सोम सुधा बरसाता,
सब हैं जग कर्म में कोई,
निष्क्रिय दृष्टि न आता,
है उद्देश्य नितान्त तुच्छ,
तृण के भी लघु जीवन का
उसी पूर्ति में वह करता है,
अंत कर्ममय तन का।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
(ii) तृण का जीवन कैसा है
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(i) पद्यांश का शीर्षक-कर्म की प्रधानता।
(ii) तृण का जीवन तुच्छ है।
(iii) सारांश-संसार में छोटा-बड़ा सभी प्राणी कर्मरत है। प्रकृति भी कर्मरत – है। कोई कहीं खाली नहीं बैठा। सब अपने कार्य का निर्वाह करते हैं, मरते दम तक।

27. थाना प्रभारी को पत्र लिखकर ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक लगाने का अनुरोध कीजिए।
उत्तर-
सेवा में,
थाना प्रभारी, सदर बाजार
जबलपुर (म.प्र.)
विषय-ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक लगाने हेतु प्रार्थना-पत्र।

महोदय,
निवेदन है कि मैं सदर बाजार जबलपुर का निवासी महेश चंद्र आपसे अनुरोध करता हूँ कि मैं आई.ए.एस. परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ, साथ ही अन्य छात्र भी अपनी-अपनी कक्षाओं की पढ़ाई में लगे हैं। ऐसे में आए दिन प्रचार-प्रसार की गाड़ियाँ, जगह-जगह पर होने वाले कार्यक्रमों में बजने वाले ध्वनि विस्तारक यंत्रों की तेज आवाज हमारी पढ़ाई में व्यवधान डालते हैं, अत: इन पर कुछ रोक लगाने की कृपा करें, ताकि हम अपनी पढ़ाई कर सकें। अति कृपा होगी।

भवदीय
महेश चंद्र
निवास-ए-120 सदर बाजार
जबलपुर (म.प्र.)

दिनांक: 02. 04. 20xx

अथवा

परीक्षा की तैयारी की सूचना हेतु मित्र को पत्र लिखिए।
उत्तर-
175, शिवाजी मार्ग
भोपाल (म.प्र.)
05. 06. 20xx
प्रिय मित्र अंकुर

सप्रेम नमस्कार!
आपका पत्र मुझे दिनांक 25. 05. 20xx को प्राप्त हुआ। पढ़कर मन प्रसन्न हुआ। मैं यहाँ सकुशल हूँ। आशा है आप भी ईश्वर की कृपा से प्रसन्न होंगे। मित्रवर! आजकल मैं अपनी परीक्षा की तैयारी में व्यस्त हूँ। मेरी सी.ए. की मकरंद हिंदी सामान्य परीक्षा जुलाई मास में होने वाली है। मैंने पाठ्यक्रम की सम्यक् तैयारी कर ली है। इस आधार पर मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं प्रथम श्रेणी में अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण होऊँगा। आशा है कि इससे आप भी प्रसन्न होंगे।
आपके माता-पिता को मेरा सादर प्रणाम।

आपका मित्र
सौरभ
वर्मा 28.

(अ) किसी एक विषय पर लगभग 200 से 250 शब्दों में निबन्ध लिखिए: [7 + 3 = 10]
(i) पर्यावरण संरक्षण : हमारा दायित्व
(ii) स्वच्छ भारत अभियान
(iii) स्वदेश प्रेम
(iv) स्वावलंबन
(v) राष्ट्र निर्माण में युवकों का योगदान
उत्तर-
इसी पुस्तक का निबंध वाला भाग देखें।
(ब) किसी एक विषय की रूपरेखा लिखिए :
(i) मेरे सपनों का भारत
(ii) राष्ट्रीय त्यौहार
(iii) जल ही जीवन है
(iv) महिला सशक्तिकरण
(v) विद्यार्थी और अनुशासन
उत्तर-
इसी पुस्तक का निबंध वाला भाग देखें।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 1 सूर के बालकृष्ण

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 1 सूर के बालकृष्ण (कविता, सूरदास)

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सूर के बालकृष्ण पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

सूर के बालकृष्ण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालक कृष्ण वृंदावन जाने को लालायित क्यों हैं?
उत्तर:
बालक कृष्ण वृंदावन जाने के लिए इसलिए लालायित हैं क्योंकि वह वृंदावन में अनेक प्रकार के फलों को अपने हाथों से तोड़कर खाना चाहते हैं।

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प्रश्न 2.
गोचारण हेतु जाने के लिए कृष्ण क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
गोचारण हेतु जाने के लिए कृष्ण तर्क देते हैं कि माँ मुझे तेरी सौगंध कि मुझे न तो गर्मी लगती है, न ही भूख-प्यास सताती है। मैं तो गोचारण के लिए अवश्य जाऊँगा।

प्रश्न 3.
यशोदा अपने आपको कृष्ण की धाय क्यों कहती हैं?
उत्तर:
यशोदा ने कृष्ण को जन्म नहीं दिया था। उन्होंने केवल उनका पालन-पोषण किया था इसलिए वह स्वयं को कृष्ण की धारा कहती हैं।

सूर के बालकृष्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यशोदा ने कृष्ण को वन की क्या-क्या कठिनाइयाँ बताईं? (M.P. 2010)
उत्तर:
यशोदा ने कृष्ण को वन की निम्नलिखित कठिनाइयाँ बताईं –

  1. वन बहुत दूर है। तुम छोटे-छोटे पाँवों से चलकर कैसे जाओगे।
  2. वन से घर लौटते हुए रात हो जाती है।
  3. अतः घर से जाओगे और रात को घर लौटोगे। भूख-प्यास से व्याकुल्हो जाओगे।
  4. धूप में गायों के पीछे-पीछे घूमते रहने के कारण तुम्हारा कमल के समान कोमल शरीर मुरझा जाएगा।

प्रश्न 2.
बालकृष्ण को देखकर माता यशोदा के हृदय में कौन-कौन-सी अभिलाषाएँ जागती हैं?
उत्तर:
बालकृष्ण को देखकर माता यशोदा के हृदय में कई अभिलाषाएँ जगती हैं, जैसे-कृष्ण घुटनों के बल चलें, उनके दूध के दो दाँत निकलें, तोतली बोली में वे नंद को बाबा और उन्हें माता कहकर पुकारें, आँचल पकड़कर बालहठ करें, अपने हाथों से थोड़ा-थोड़ा खाकर अपना मुख भरें, सभी दुखों को दूर करने वाली अपनी मधुर हँसी बिखेरें।

प्रश्न 3.
यशोदा ने देवकी को क्या संदेश भेजा? (M.P. 2009, 2012)
उत्तर:
यशोदा ने देवकी से संदेश में कहा कि मैं तो कृष्ण का पालन-पोषण करने वाली धाय हूँ। मैं तमसे विनती करती हैं कि तुम बालक कृष्ण पर ममता, दया करती रहना। उसके प्रति कठोरता का व्यवहार मत करना। श्रीकृष्ण को प्रातःकाल माखन-रोटी अच्छी लगती है इसलिए उसे प्रातःकाल माखन रोटी ही देना। वह बड़ी मुश्किल से स्नान करता है। तुम उसकी सभी फरमाइशों को पूरा करके उसे स्नान के लिए मनाना, तभी वह तेल, उबटन और गर्म पानी से स्नान करेगा अर्थात् उसकी रुचियों और आदतों का ध्यान रखना। कृष्ण संकोची स्वभाव का है, अतः वह अपने मुख से कुछ नहीं कहेगा। देवकी तुम्हें ही उसकी रुचियों और आदतों का ध्यान रखना पड़ेगा।

सूर के बालकृष्ण भाव-विस्तार/पल्लवन

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प्रश्न 1.
निम्नलिखित हाव्य-पंक्तियों की व्याख्या कीजिए –

संदेसौ देवकी सौं कहियौ।
हौं तो धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ॥
जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै।
प्रात होत मेरे लाड़ लडैते, माखन रोटी भावै॥

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश भक्तिकालीन सगुण कृष्णभक्ति धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ के मथुरागमन प्रसंग से लिया गया है। उद्धव जब वृंदावन से मथुरा वापस जाते समय यशोदा से मिलने जाते हैं तो यशोदा उन्हें देवकी के नाम संदेश भेजती हैं। यशोदा उद्धव से कहती हैं –

व्याख्या:
हे. राहगीर! कृष्ण की जननी देवकी को मेरा यह संदेश देना कि मैं तो कृष्ण का पालन-पोषण करने वाली धाय मात्र हूँ, कृष्ण की माता तो तुम ही हो। धाय, बच्चे के संबंध में उसकी माँ से कुछ कहे यह उचित नहीं लगता। परंतु फिर भी मैं यह विनती करती हूँ कि तुम बालक पर ममता, दया करती रहना। अर्थात् उसके प्रति कठोरता का व्यवहार मत करना। यद्यपि मैं जानती हूँ कि तुम कृष्ण की सभी रुचियों-आदतों से भली-भाँति परिचित हो, परंतु फिर भी मुझसे रहा नहीं जाता, इसलिए कह रही हूँ कि प्रातःकाल मेरे लाड़ले बालक कृष्ण को माखन-रोटी का नाश्ता ही अच्छा लगता है। अतः प्रातःकाल नाश्ते में उसे माखन-रोटी ही देना।

विशेष:

  1. यशोदा मातृ हृदय का अत्यंत मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है।
  2. लाड़ लडैतें में अनुप्रास अलंकार है।
  3. पद्यांश में ब्रजभाषा तथा गेयता है।

सूर के बालकृष्ण भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन समानार्थी शब्द लिखिए –
पग, कमल, जननी, गगन।
उत्तर:

  • पग – पैर, पाद, चरण।
  • कमल – राजीव, जलज, पंकज।
  • जननी – माता, माँ, अम्बा।
  • गगन – आकाश, नभ, अम्बर।

प्रश्न 2.
दिए गए मुहावरों के अर्थ लिखते हुए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
बाल-बाल बचना, सर धुनना, कान का कच्चा, नाक में दम करना, मुँह की. खाना, पेट में चूहे दौड़ना, पाँचों अंगुली घी में होना। (M.P. 2011)
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 1 सूर के बालकृष्ण img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों को छाँटिए –
मुख, दाँत, दूध, घर, जननी, साँझ, जनि, तनक, कमल, पथिक, गैया, टेव।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 1 सूर के बालकृष्ण img-2

सूर के बालकृष्ण योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
गाय चराते हुए कृष्ण का एक सुन्दर चित्र बनाने का प्रयास कीजिए तथा उसे चित्र प्रदर्शनी में प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

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प्रश्न 2.
वात्सल्य विषयक अन्य कवियों की रचनाओं का संकलन कीजिए।
उत्तर:
छात्र तुलसीदास, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि की कविताओं का संकलन कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
कृष्ण की बाल लीलाओं से संबंधित चित्रों का संकलन कर एलबम बनाइए।
उत्तर:
कृष्ण की बाल लीलाओं के चित्र बाजार में उपलब्ध हैं। छात्र उनको प्राप्त कर एलबम स्वयं बना सकते हैं।

प्रश्न 4.
आधुनिक काल के उन कवियों की सूची बनाइए जिन्होंने कृष्ण-चरित्र को अपने काव्य का विषय बनाया।
उत्तर:
छात्र अपने विषय अध्यापक की सहायता से सूची स्वयं बनाएँ।

सूर के बालकृष्ण परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘आजु मैं गाइ चरावन जैहौं’ पद के रचयिता हैं –
(क) नन्ददास
(ख) मीराबाई
(ग) सूरदास
(घ) तुलसीदास
उत्तर:
(ग) सूरदास।

(घ) चौक में
प्रश्न 2.
ब्रज के लोग अत्यंत भयभीत क्यों हो गए?
(क) कंस की ललकार सुनकर
(ख) श्रीकृष्ण की चीख सुनकर
(ग) वादलों की गर्जना सुनकर
(घ) कालिया नाग की फुफकार सुनकर
उत्तर:
(ग) बादलों की गर्जना सुनकर।

प्रश्न 3.
सूरदास किसके अनन्य भक्त थे?
(क) श्रीकृष्ण के
(ख) श्रीराम के
(ग) भगवान विष्णु के
(घ) भगवान महादेव के
उत्तर:
(क) श्रीकृष्ण के।

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प्रश्न 4.
यशोदा श्रीकृष्ण को अकेला कहाँ छोड़कर गईं?
(क) आँगन में
(ख) णलने में
(ग) नंद के पास
उत्तर:
(क) ऑगन में।

प्रश्न 5.
‘पर्यो आपनी टेक’ में ‘टेक’ शब्द का अर्थ है –
(क) टिकना
(ख) ठिकाः
(ग) हठ
(घ) हटा
उत्तर:
(ग) हठ।

प्रश्न 6.
‘लाड़ लडैतें’ का अर्थ है –
(क) प्यार से लड़ना
(ख) लाड़ला बालक
(ग) लाड़-प्यार करना
(घ) लाड़ लड़ाना
उत्तर:
(ख) लाड़ला बालक।

प्रश्न 7.
यशोदा श्रीकृष्ण को नहाने के लिए कैसे मनाती हैं?
(क) माखन-रोटी देकर
(ख) जो कुछ माँगते उसे देकर
(ग) लाड़-प्यार से पुचकारकर
(घ) जबरदस्ती पकड़कर
उत्तर:
(ख) जो कुछ माँगते उसे देकर।

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें:

  1. सूरदास ने श्रीकृष्ण के ………. का वर्णन किया है। (बालरूप/यौवनरूप)
  2. माँ ……… ने श्रीकृष्ण का पालन-पोषण किया था। (देवकी/यशोदा)
  3. बड़े होने पर श्रीकृष्ण ………. के राजा बन गए। (बनारस/मथुरा)
  4. श्रीकृष्ण को खाने में ………. पसंद था। (माखन-रोटी/दही-रोटी)
  5. सूरदास ने अपनी कविता में …….. भाषा का प्रयोग किया है। (अवधी/ब्रज)
  6. सूरदास ………. अनन्य भक्त थे। (श्रीराम के/श्रीकृष्ण के)

उत्तर:

  1. बालरूप
  2. यशोदा
  3. मथुरा
  4. माखन-रोटी
  5. ब्रज
  6. श्रीकृष्ण के।

III. निम्न कथनों में सत्य/असत्य छाँटिए:

  1. श्रीकृष्ण स्नान करने के बड़े शौकीन थे।
  2. माँ देवकी, उद्धव के माध्यम से यशोदा को संदेश भेजती हैं।
  3. माँ यशोदा श्रीकृष्ण को बहुत प्यार करती थीं।
  4. श्रीकृष्ण इतने संकोची थे कि माँ यशोदा की हर बात चुपचाप मान – लेते थे।
  5. श्रीकृष्ण गाय चराने के लिए बन जाने को लालायित थे।
  6. सोइ-सोइ, क्रम-क्रम में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  7. ब्रज के लोग बादलों की गर्जना सुनकर अत्यंत भयभीत हो गए। (M.P. 2009)

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. सत्य
  7. सत्य।

IV. निम्न के सही जोड़े मिलाइए:

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 1 सूर के बालकृष्ण img-3
उत्तर:

  1. (घ)
  2. (ग)
  3. (क)
  4. (ङ)
  5. (ख)।

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V. निम्न प्रश्नों के उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए:

  1. श्रीकृष्ण की असली माँ कौन थीं?
  2. श्रीकृष्ण का स्वभाव कैसा था?
  3. माँ यशोदा किसके माध्यम से देवकी के पास संदेश भेजती हैं?
  4. ‘कमल बदन’ में कौन-सा अलंकार है?
  5. श्रीकृष्ण ने क्या निश्चय कर लिया है?

उत्तर:

  1. श्रीकृष्ण की असली माँ देवकी थीं।
  2. श्रीकृष्ण का स्वभाव संकोची था।
  3. उद्धव के माध्यम से।
  4. रूपक अलंकार।
  5. श्रीकृष्ण ने वन जाकर गाय चराने का निश्चय कर लिया है।

VI. निम्न कथन के लिए सही विकल्प चुनिए:

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को अपनी गाय चराने के लिए वन में जाने का निश्चय सुनाया ताकि –
(क) अपने साथियों के साथ खेलकूद सकें।
(ख) अपनी मनमानी कर सकें।
(ग) अनेक प्रकार के फल अपने हाथों से तोड़कर खा सकें।
(घ) उन्हें किसी प्रकार की चिन्ता न हो सके।
उत्तर:
(ग) अनेक प्रकार के फल अपने हाथों से तोड़कर खा सकें।

सूर के बालकृष्ण लघु उत्तरीय प्रश्न.

प्रश्न 1.
सूरदास ने श्रीकृष्ण के किस रूप का वर्णन किया है?
उत्तर:
सूरदास ने श्रीकृष्ण के बाल-रूप का वर्णन किया है।

प्रश्न 2.
‘जसुमति मन अभिलाष करै’ पद में यशोदा की किन अभिलाषाओं का चित्रण किया गया है?
उत्तर:
इस पद में यशोदा की शिशुपरकी अभिलाषाओं का चित्रण किया है।

प्रश्न 3.
यशोदा किसके द्वारा किसे संदेश भेजती हैं?
उत्तर:
यशोदा कृष्ण के अनन्य मित्र उद्धव के द्वारा देवकी को संदेश भेजती हैं।

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प्रश्न 4.
कृष्ण अपनी किस बात पर अड़े हुए हैं?
उत्तर:
कृष्ण गाय चराने के लिए जाने की बात पर अड़े हुए हैं।

प्रश्न 5.
माता यशोदा कृष्ण की किस प्रकार की हँसी की अभिलाषा करती हैं?
उत्तर:
माता यशोदा कृष्ण के समस्त दुखों को दूर करने वाली मधुर हँसी की अभिलाषा करती हैं।

प्रश्न 6.
श्रीकृष्ण की हँसीयुक्त छवि की क्या विशेषता है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण की हँसीयुक्त छवि की यह विशेषता है कि उससे सारे दुख दूर हो जाते हैं।

प्रश्न 7.
श्रीकृष्ण क्या देखकर भाग जाया करते थे और क्यों?
उत्तर:
श्रीकृष्ण तेल, उबटन और गर्म पानी देखकर भाग जाया करते थे ताकि नहाना न पड़े।

प्रश्न 8.
यशोदा ने श्रीकृष्ण का निश्चय सुनकर क्या किया?
उत्तर:
यशोदा ने श्रीकृष्ण का निश्चय सुनकर उन्हें समझाने का प्रयास किया।

सूर के बालकृष्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मथुरा जाकर कृष्ण राजा हो गए, फिर भी. माता का हृदय उन्हें किस रूप में अनुभव करता है?
उत्तर:
मथुरा जाकर कृष्ण राजा बन गए। निस्संदेह वे बड़े हो गए। पूरी मथुरा की जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर उठा ली लेकिन माता का हृदय उन्हें कभी भी बड़ा स्वीकार नहीं करता। उनका हृदय तो सदैव अपने पुत्र को शिशु रूप में ही अनुभव करता है। माता यशोदा के लिए तो वे सदैव बच्चे ही रहते हैं।

प्रश्न 2.
यशोदा और देवकी में से कृष्ण पर किसका अधिकार अधिक है औरक्यों?
उत्तर:
यशोदा और देवकी में से कृष्ण पर यशोदा का अधिकार अधिक है। देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया था, परंतु उनका पालन-पोषण करने के लिए उन्हें यशोदा नर से नारायण के पास भेज दिया था। यशोदा ने बड़े लाड़-प्यार से कृष्ण का पालन-पोषण किया। इस कारणं कृष्ण पर उनका अधिकार अधिक है, न कि देवकी का।

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प्रश्न 3.
यशोदा ने देवकी को क्या संदेश भेजा? (M.P. 2009, 2012)
उत्तर:
यशोदा ने देवकी को यह संदेश भेजा कि मैं तो कृष्ण का पालन-पोषण करने वाली धाय थी, लेकिन तुम तो वास्तविक माँ हो इसलिए उस पर दया करते रहना। कृष्ण को मक्खन-रोटी बहुत पसंद है। वह गर्म जल से स्नान नहीं करना चाहता है। वह तेल-उबटन देखकर भागने लगता है। मैं तो उसकी इच्छानुसार उसे सारी चीजें देती थी। तुम भी उसकी इच्छाओं का ध्यान रखना।

प्रश्न 4.
श्रीकृष्ण ने माता यशोदा से क्या हठ किया?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने माता यशोदा से यह हठ किया कि वह वन में अवश्य जाएँगे। उन्होंने तर्क देकर कहा-माँ! तेरी कसम, वंन में मुझे न गरमी, न भूख, न प्यास और न ही कोई चीज परेशान करेगी। इसलिए मैं वन में अवश्य जाऊँगा।

सूर के बालकृष्ण कवि-परिचय

प्रश्न 1.
सूरदास का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
सूरदासजी भक्तिकाल की सगुण भक्तिधारा के प्रमुख कवि थे। वे कृष्ण भक्त थे। उनका जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को विक्रम संवत 1535 (सन् 1478 ई०) रुनकता नामक गाँव में हुआ था। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म दिल्ली के पास सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सूरदासजी विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित अष्टछाप के अग्रणी कवि थे। वे वृंदावन के गऊघाट पर जाकर रहने लगे थे। वहाँ वे भक्तिमय विनय के पद गाते थे, जिनमें दैन्य भाव की प्रधानता थी। वल्लभाचार्य ने इन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया और भगवद्लीला से परिचित कराया। उनके आदेश से आप ‘गोकुल में श्रीनाथजी के मंदिर में कीर्तन करने लगे और आजन्म वहीं रहे। उनका देहावसान विक्रम संवत 1642 में हो गया।

साहित्यिक विशेषताएँ:
कहा जाता है कि सूरदास जन्मांध थे। वे बहुश्रुत, अनुभव संपन्न, विवेकशील और संवेदनशील व्यक्तित्व के स्वामी थे। परंतु उनके काव्य में प्रकृति और श्रीकृष्ण की लीलाओं आदि का वर्णन देखकर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि वे जन्मांध थे। उन्होंने कृष्ण के जन्म से लेकर मथुरा जाने तक की कथा और कृष्ण की विभिन्न लीलाओं से संबंधित अत्यंत मनोहर पदों की रचना की है। श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन उनकी सहजता, मनोवैज्ञानिकता और स्वाभाविकता के कारण अद्वितीय है। वे मुख्यतः वात्सल्य एवं शृंगार के कवि थे। उनके काव्य में वात्सल्य, माधुर्य एवं सख्य भाव की धारा सतत प्रवाहमान रही है।

रचनाएँ:
सूरसागर, सूर सारावली और साहित्य लहरी।

1. भाषा-शैली:
कवि सूरदास की भाषा ब्रजभाषा है। साधारण बोलचाल की भाषा को परिष्कृत कर उन्होंने उसे साहित्यिक रूप प्रदान किया है। उनके काव्य में ब्रजभाषा का स्वाभाविक, सजीव एवं भावानुकूल प्रयोग है।

2. अलंकार विधान:
सूर का अलंकार विधान उत्कृष्ट है। उसमें शब्द चित्र उपस्थित . करने एवं प्रसंगों की वास्तविक अनुभूति कराने को पूर्ण क्षमता है। उनके काव्य में अन्य अनेक अलंकारों के साथ उपमा, उत्प्रेक्षा और रूपक का कुशल प्रयोग हुआ है। उनकी भाषा में मुहावरों और लोकोक्तियों का सहज प्रयोग हुआ है।

3. शैली:
सूर के सभी पद गेय हैं और किसी न किसी राग से संबंधित हैं। उनके पदों में काव्य और संगीत का अपूर्व संगम है।

4. महत्त्व:
हिंदी साहित्य में सूरदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे सगुण कृष्ण भक्ति-धारा के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवि थे। उनके काव्य में भक्ति, काव्य और संगीत की त्रिवेणी के दर्शन होते हैं। उन्होंने कृष्ण की बाल छवि, स्वभाव, बाल क्रीड़ाओं आदि का सरल, सहज, माधुर्यपूर्ण वर्णन किया है। उनके काव्य में बालक कृष्ण के प्रति नन्द-यशोदा के स्नेह का हृदयग्राही चित्रण दृष्टिगोचर होता है। उनका वात्सल्य वर्णन विश्व साहित्य की अमूल्य निधि है। हिंदी साहित्यजगत् में सूरदासजी सदा सूर्य की भाँति प्रकाशमान रहेंगे।

सूर के बालकृष्ण’ पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
‘सूरदास के बालकृष्ण’ पदों का सार लिखिए।
उत्तर:
पहले पद में माँ यशोदा की शिशुपरक अभिलाषा का वर्णन किया गया है। माँ यशोदा की अभिलाषा है कि कब कृष्ण घुटनों के बल चलेंगे, कब उनके दूध के दाँत दिखेंगे, कब वे तोतली बोली में बोलेंगे और नंदजी को बाबा कहकर और उन्हें माँ कहकर संबोधित करेंगे, कब वे आँचल खींचकर झगड़ा करेंगे, हठ ठानेंगे, कब अपनी मधुर हँसी बिखेरेंगे और कब अपने मुँह को अपने हाथों से भरेंगे। इस बीच यशोदाजी श्रीकृष्ण को आँगन में अकेला छोड़कर कुछ काम करने चली गईं और आकाश में बादल गरजने लगे। सूरदासजी कहते हैं कि गर्जना सुनकर ब्रज के सभी लोग बहुत भयभीत हो गए।

दूसरे पद में श्रीकृष्ण थोड़े बड़े हो जाते हैं और अपनी माँ से वन में गाय चराने के लिए जाने की हठ करते हैं। माँ उन्हें समझाती हैं कि तुम छोटे-छोटे पैरों से कैसे चलोगे, सुबह जाओगे और शाम को घर लौटोगे। धूप-गर्मी में तुम्हारा कोमल शरीर कुम्हला जाएगा। लेकिन श्रीकृष्ण के भी अपने तर्क हैं। वे उन तर्कों का हवाला देकर गाय चराने के लिए वन जाने की बात दोहराते हैं।

तीसरे पद में माँ यशोदा, उद्धव के माध्यम से देवकी को संदेश भेजती हैं। यद्यपि कृष्ण अब राजा हैं किंतु माँ का हृदय तो सदैव अपने पुत्र को शिशु रूप में अनुभव करता है। वे संदेश भेजती हैं कि कृष्ण को सुबह माखन-रोटी अच्छी लगती है। उबटन करके, उसे गर्म पानी से नहाना अच्छा नहीं लगता। वे जो कुछ माँगते हैं, उन्हें देती हैं। इसमें माँ का वात्सल्य भाव प्रकट हुआ है।

सूर के बालकृष्ण संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
जसुमति मन अभिलाष करै।
कब मेरो लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै॥
कब द्वै दाँत दूध के देखों, कब तोतरै मुख बचन झरे।
कब नंदहिं बाबा कहि बोलें, कब जननी कहि मोहि ररै॥
कब मेरो अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौं झगरे।
कब धौं तनक-तनक कछु खैहैं, अपने कर सौं मुखहिं भरै।
कब हँसि बात कहैगौ मोसौं, जा छबि तैं दुख दूर हरै।
स्याम अकेले आँगन छाँडै, आपु गई कछु काजु धरै॥
इहि अंतर अँधवाइ उठ्यो इक, गरजत गगन सहित घहरै।
सूरदास ब्रज-लोग सुनत धुनि, जो जहँ-तहँ सब अतिहि डरै॥ (Page 1)

शब्दार्थ:

  • जसुमति – माता यशोदा।
  • अभिलाष – इच्छा, चाहना।
  • लाल – पुत्र (श्रीकृष्ण)।
  • घुटुरुवनि – घुटनों के बल।
  • धरनी – पृथ्वी।
  • पग – पैर।
  • द्वैक – दो, एक।
  • तोतरें – तोतला।
  • झरै – निकलें।
  • अँचरा गहि – आँचल पकड़कर।
  • मोसौं – मुझसे।
  • तनक-तनक – छोटे-छोटे।
  • कर – हाथ।
  • काजु – काम।
  • अंतर – बीच।
  • अँधवाइ – आँधी।
  • गगन – आकाश।
  • सुनत – सुनना।
  • अतिहि – अत्यधिक।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद भक्तिकाल के कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इस पद में माता यशोदा की शिशुपरक अभिलाषा का चित्रण किया है। माता यशोदा चाहती हैं कि श्रीकृष्ण घुटनों के बल चलें और वे बोलना सीखकर उन्हें तोतली भाषा में संबोधित करें। अपनी मधुर हँसी बिखेरें। माँ की इन आकांक्षाओं, शिशु की भाव-भंगिमाओं और चेष्टाओं में वात्सल्य भाव व्यक्त हुआ है।

व्याख्या:
श्रीकृष्ण की आयु सात-आठ मास की होगी। माता यशोदा उन्हें देखकर अपने मन में अभिलाषा करती हैं, वह चाहती हैं कि कब उनका पुत्र कृष्ण घुटनों के बल रेंगना सीखेगा और कब पृथ्वी पर अपने दो-एक पग धर कर चलेगा। अर्थात्! माता यशोदा की आकांक्षा है कि श्रीकृष्ण जल्दी से घुटनों के बल चलें फिर खड़े होकर अपने पैरों से चलें। माता यशोदा चाहती हैं कि बालकृष्ण के मुख में दूध के दो दाँत दिखाई दें अर्थात् श्रीकृष्ण के दूध के दाँत निकलें और उनके मुख से तोतली भाषा में शब्द निकलें। वे अपनी तोतली भाषा में नंद को बाबा कहकर पुकारें और उन्हें तोतली बोली में माता कहकर संबोधित करें।

कब वे मेरा आँचल पकड़कर, जोइ-सोइ कहकर मुझसे झगड़ा करेंगे अर्थात् माता यशोदा की इच्छा है कि श्रीकृष्ण अपनी तोतली बोली में नंद को बाबा और मुझे माता कहकर पुकारें तथा मेरा आँचल पकड़कर मुझसे झगड़ा करें, बाल-हठ करें। कब वे हँसकर मुझसे अपनी बात कहेंगे अर्थात् कब अपनी मधुर हँसी बिखेरेंगे, उनकी हँसीयुक्त छवि को देखकर मेरे समस्त दुख दूर हो जाएंगे। यह अभिलाषा करती हुई माता यशोदा श्रीकृष्ण को घर के आँगन में खेलता हुआ छोड़कर, घर का कुछ काम करने के लिए अंदर चली गईं। इसी बीच एक आँधी उठी और आकाश में गर्जना करते हुए बादल छा गए। कवि सूरदास कहते हैं कि ब्रज के लोग बादलों की गर्जना को सुनकर, जो जहाँ था वहीं सब अत्यंत भयभीत हो उठे।

विशेष:

  1. इस पद में माँ की शिशुपरक अभिलाषाओं का बड़ा यथार्थ चित्र हुआ है। प्रत्येक माता चाहती है कि उसका बाल अथवा पुत्र जल्दी से घुटनों के बल चले, फिर पैदल चले। उसके दूध के दाँत निकलें और वह तोतली बोली में उसे पुकारे, आँचल पकड़कर बालहठ करे तथा अपने हाथों से अपना मुँह । यहाँ माता के हृदय का यथार्थ
    वर्णन हआ है।
  2. मनोविज्ञान की सुंदर अवधारणा हुई है।
  3. अंतिम पंक्तियों में प्रकृति की कठोरता का भी चित्रण हुआ है।
  4. द्वै दाँत दूध के देखों, दुख दूर, अकेले आँगन, कछु काजु, अंतर अँधवाइ, गरजत गगन में अनुप्रास अलंकार है।
  5. ‘तनक-तनक’ में पुनरुक्ति अलंकार है।
  6. ब्रजभाषा की सरसता, सरलता तथा पद में गेयता है।
  7. माँ की आकांक्षाओं, शिशु की भाव-भंगिमाओं और चेष्टाओं में वात्सल्य भाव का चित्रण है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i) यशोदा अपने मन में क्या-क्या अभिलाषा करती हैं?
उत्तर:
यशोदा की उत्कट अभिलाषा है कि उनका पुत्र घुटनों के बल चले, फिर अपने पैरों के बल। उसके दूध के दाँत निकलें और वह अपने मुख से तोतली भापा बोले और नंद को बाबा कहकर तथा मुझे माता कहकर पुकारे।

प्रश्न (ii)
श्रीकृष्ण की हँसीयुक्त छवि का क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण की हँसीयुक्त छवि से सारे दुख दूर हो जाते हैं।

प्रश्न (iii)
आकाश में बादल गरजने का ब्रज के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
आकाश में बादल गरजने से ब्रज के सभी लोग बहुत भयभीत हो गए।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पद में माता यशोदा की शिशुपरक अभिलाषा का चित्रण किया गया है। माँ यशोदा चाहती हैं कि उनका कृष्ण जल्दी से जल्दी घुटनों के बल चले, तोतली बोली में उन्हें माँ कहकर और नंद को बाबा कहकर संबोधित करे, और अपना बाल सुलभ हठ दिखाए। दुखों को दूर करने वाली हँसी बिखेरे। माँ की इन आकांक्षाओं, शिशु की भाव-भंगिमाओं, चेष्टाओं द्वारा वात्सल्य भाव व्यक्त हुआ है।

प्रश्न (ii)
पद का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पद में माँ यशोदा की शिशुपरक इच्छा तथा अंतिम पंक्तियों में प्रकृति के कठोर रूप का चित्रण हुआ है। द्वै दाँत दूध के देखों, दुख दूर, अकेले आँगन, कछ काजु, अंतर अँधवाइ, गरजत गगन में अनुप्रास अलंकार है। ‘तनक-तनक’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। सरल, सरस तथा स्वाभाविक ब्रजभाषा है। पद में गेयता, लय और तुक का प्रयोग किया गया है।

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प्रश्न 2.
आजु मैं गाइ चरावन जैहौं।
वृंदावन के भाँति-भाँति फल अपने कर मैं खैहौं।
ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखो अपनी भाँति।
तनक-तनक पग चलिहौं कैसें, आवत है है राति।
प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं साँझ।
तुम्हरौ कमल बदन कुम्हिलैहैं, रेंगति घामहिं माँझ।
तेरी सौं मोहि धाम न लागत, भूख नहीं कछु नेक।
सूरदास प्रभु को न मानत पर्यो आपनी टेक। (Page 2)

शब्दार्थ:

  • आजु – आज।
  • गाइ – गाय।
  • चरावन – चराने के लिए।
  • जैही – जाऊँगा।
  • कर – हाथ।
  • खैहौं – खाऊँगा।
  • जनि – मत।
  • बारे – बालक।
  • भाँति – तरह।
  • तनक – छोटे, लघु।
  • पग – पैर।
  • आवत – आना।
  • कमल बदन – कमल के समान कोमल शरीर।
  • कुम्हिलैहैं – मुरझाना, थक जाना।
  • रेंगति – धीरे-धीरे चलना।
  • माँझ – मध्य।
  • सौं – शपथ, सौगंध, कसम।
  • घाम – धूप, गर्मी।
  • टेक – हट।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद भक्तिकाल के कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इस पद में कवि ने श्रीकृष्ण की बालसुलभ इच्छा का, माँ की ममता और बच्चे को समझाकर रोकने के प्रयास के साथ-साथ बालहठ का भी सुन्दर चित्रण किया है। श्रीकृष्ण अपनी माँ यशोदा से ‘अपनी इच्छा एवं निश्चय व्यक्त करते हुए कहते हैं –

व्याख्या:
माँ, मैंने निश्चय कर लिया है कि आज मैं वन में गौएँ चराने जाऊँगा। आज मुझे वह अवसर उपलब्ध होगा जिससे मैं वृंदावन के अनेक प्रकार के फल अपने हाथ से तोड़कर खाऊँगा। श्रीकृष्ण के उक्त निश्चय को सुनते ही यशोदा बोलीं-मेरे लाड़ले! तुम अभी बच्चे हो, अपनी उम्र देखो। बड़ों की देखा-देखी करने की अभी मत सोचो। वन के कष्टों का वर्णन करती हुई यशोदा बोलीं-तुम्हारे पैर छोटे-छोटे हैं और वन बहुत दूर तुम चलकर कैसे जा पाओगे? फिर आने के समय काफी गहरी रात और घना अँधेरा छा चुका होता है। ऐसा कभी-कभार नहीं होता, अपितु प्रतिदिन होता है।

प्रतिदिन ही ग्वाल-बाल प्रातःकाल गायों को लेकर जाते हैं और सायंकाल बहुत देर से लौटते हैं। जिस प्रकार ग्वाल-बाल प्रतिदिन गायों के पीछे-पीछे धूप-गर्मी में चलते हैं, उस प्रकार चलने से तो तुम्हारा कमल जैसा कोमल शरीर एक ही दिन में कुम्हला जाएगा। यशोदा द्वारा वर्णित कठिनाइयों को सुनकर श्रीकृष्ण बोले-माँ, मुझे तेरी कसम, मुझे गर्मी, भूख, प्यास, कुछ भी परेशान नहीं करेगी। मैं तो आज गोचारण के लिए वन में अवश्य जाऊँगा। सूरदासजी कहते हैं कि भगवान् कृष्ण माँ का कहना नहीं मानते। वे अपने हठ पर अडिग भाव से टिके हुए हैं।

विशेष:

  1. इस पद में बाल मनोविज्ञान का बड़ा ही यथार्थ वर्णन हुआ है। बच्चे बड़ों की नकल करने अथवा उसकी देखा-देखी करने को उत्सुक रहते हैं। ग्वाल-बाल जब सायंकाल घर लौटने पर दिनभर के वन-विहार के अनुभव सुनाते होंगे तो श्रीकृष्ण का मन भी उन्मुक्त विहार के लिए मचलता होगा। इसकी प्रतिध्वनि इस पंक्ति में हुई है-“वृंदावन के भाँति-भाँति फल अपने कर मैं खैहौं।” इसके साथ ही मातृ हृदय का भी यथार्थ वर्णन हुआ है। माँ की दृष्टि में बच्चा कितना ही बड़ा हो जाए, वह बच्चा ही रहता है। इस प्रकार बाल मनोविज्ञान और मातृ मनोविज्ञान दोनों का ही सुंदर चित्रण हुआ है।
  2. पद में माँ-बेटे के मध्य संवादात्मकता ने कथ्य को सजीव एवं चित्रात्मक बना दिया है।
  3. ‘तेरी सौं’ के द्वारा तत्कालीन समाज में माँ की कसम की महत्ता को अंतिम निर्णय की सूचना के रूप में चित्रित किया गया है।
  4. ‘कमल बदन’ में रूपक अलंकार है।
  5. भाँति-भाँति, तनक-तनक में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  6. पद में ब्रजभाषा की मधुरता एवं गेयता है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
श्रीकृष्ण ने अपना कौन-सा निश्चय माता यशोदा को बताया और क्यों?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को गाय चराने के लिए वन में जाने का अपना निश्चय बताया ताकि वे वन में जाकर वृंदावन के अनेक प्रकार के फल अपने हाथ से तोड़कर खा सकें।

प्रश्न (ii)
श्रीकृष्ण का निश्चय सुनकर यशोदा की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
श्रीकृष्ण का गाय चराने के लिए वन में जाने का निश्चय सुनकर माँ यशोदा की चिंतायुक्त प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने श्रीकृष्ण को वन में जाने से रोकने के लिए उनकी कोमलता और प्रकृति की कठोरता की बात बता उन्हें समझाने का प्रयास किया।

प्रश्न (iii)
कवि ने श्रीकृष्ण की किस हठ का वर्णन किया है?
उत्तर:
कवि ने श्रीकृष्ण की बालहठ का वर्णन किया है। वे गायें चराने के लिए वन में जाने की जिद पर अड़े हुए हैं।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
श्रीकृष्ण थोड़े बड़े होने पर गाय चराने के लिए वन में जाना चाहते हैं। वे वन में जाकर अपने हाथों से फल तोड़कर खाना चाहते हैं। वे अपना निश्चय माँ यशोदा को बताते हैं। माँ यशोदा उन्हें रोकने के लिए उनकी कोमलता और प्रकृति कठोरता का तर्क देती हैं तो श्रीकृष्ण अपने तर्क देते हैं कि उन्हें धूप, भूख कुछ नहीं लगेगी। वे वन अवश्य जाएँगे।

प्रश्न (ii)
काव्यांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पद में बाल मनोविज्ञान और मातृ-स्नेह का सुंदर चित्रण हुआ है। बालहठ का सजीव एवं आकर्षक चित्रण हुआ है। माँ-बेटे के मध्य हुए संवाद ने कथ्य को सजीव एवं चित्रात्मक बना दिया है। ‘तेरी सौं’ के द्वारा तत्कालीन समाज में माँ की कसम के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। ‘कमल बदन’ में रूपक अलंकार है। भाँति-भाँति और तनक-तनक में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ब्रजभाषा माधुर्य गुण संपन्न सरल एवं सरस है। पद में गेयता, लय और तुक का समावेश है।

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प्रश्न 3.
संदेसौ देवकी सौं कहियौ। (M.P. 2011)
हौं तो धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ॥
जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै।
प्रात होत मेरे लाड़ लडैतें, माखन रोटी भावै॥
तेल उबटनौ अरु तातौ जल, ताहि देखि भजि जाते।
जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते॥
सूर पथिक सुनि मोहि रैन-दिन, बढ्यो रहत उर सोच।
मेरौ अलक लडेतो मोहन, है हैं करत संकोच ॥ (Page 2)

शब्दार्थ:

  • संदेसौ – संदेश।
  • सौं – से।
  • हौं – मैं।
  • धाइ-(धाय) – पालन-पोषण करने वाली दासी।
  • तिहारे – तुम्हारे।
  • मया – ममता, दया।
  • टेव – आदत, स्वभाव, पसंद-नापसंद।
  • लाड़ लडैतें – लाड़ले, प्यार से पले बालक कृष्ण।
  • भावै – अच्छी लगती है।
  • तातो – गर्म।
  • भजि जाते – भाग जाना।
  • क्रम-क्रम करि कै – नखरे करते हुए।
  • पथिक – राहगीर।
  • रैन-दिन – रात-दिन।
  • उर – हृदय।
  • सोच – चिंता।
  • संकोच – हिचकिचाहट।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद भक्तिकाल के कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ के मथुरागमन प्रसंग से लिया गया है। श्रीकृष्ण मथुरा जाने के बाद अपने अनन्य मित्र उद्धव को गोपियों तथा नंद-यशोदा को समझाने, उन्हें ढाढ़स बँधाने के लिए ब्रज भेजते हैं। उद्धव ब्रज से वापस मथुरा जाते समय यशोदा से मिलने जाते हैं तो यशोदा उन्हें देवकी के नाम जो संदेश देती हैं, उसमें मातृ हृदय के ममत्व का अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण कवि ने किया है। यशोदा उद्धव से कहती हैं –

व्याख्या:
हे राहगीर! कृष्ण की जननी देवकी को यशोदा का यह संदेश देना कि मैं तुम्हारे पुत्र पर अपना अधिकार नहीं जता रही हूँ। मैं यह स्वीकार करती हूँ कि. कृष्ण की माँ तुम ही हो, मैं तो केवल उसका पालन-पोषण करने वाली धाय हूँ। धाय, बच्चे के संबंध में उसकी माँ से कुछ कहे यह सर्वथा अनुचित ही लगेगा। फिर भी मैं यह विनती करती हूँ कि तुम बालक पर ममता, दया करती रहना अर्थात् उसके प्रति कठोरता का व्यवहार मत करना। यद्यपि मैं यह जानती हूँ कि तुम कृष्ण की सभी रुचियों-आदतों से भली प्रकार परिचित हो परंतु फिर भी मुझसे रहा नहीं जाता, इसलिए कह रही हूँ कि प्रातःकाल मेरे लाड़ले बालक कृष्ण को माखन-रोटी का नाश्ता ही अच्छा लगता है। अतः उसे प्रातःकाल माखन-रोटी ही देना।

यहाँ मैं यह भी बता दूँ कि तेल, उबटन और गरम पानी आदि स्नान करने की चीज़ों को देखकर वह दूर भाग जाता है। अर्थात् वह मुश्किल से ही स्नान करता है। फिर अपनी फरमाइशें रखता है। वह जो कुछ माँगता है, उसे वह सब देती हूँ। इस प्रकार अनेक नखरे करने के बाद तेल, उबटना लगवाता है और नहाता है। अतः यदि वह स्नान करने से इनकार करे तो तुम खीझना नहीं अपितु उसको मनाना, उसकी माँगों को पूरा करके उसे नहाने के लिए तैयार करना।

सूरदास कहते हैं कि यशोदा उद्धव को संबोधित करती हुई कहती हैं-हे राहगीर! रात-दिन मेरे हृदय में यही चिंता रहती है कि मेरा लाड़ला पुत्र कृष्ण अत्यंत संकोचशील स्वभाव का है। वह अपने मुँह से कुछ नहीं कहेगा। वह देवकी की रुचि-प्रवृत्ति के अनुसार अपने मन को मारकर चलेगा। यह उचित नहीं होगा। इसी कारण मैं रात-दिन चिंता में रहती हूँ। चिंता के कारण न तो मुझे नींद आती है और न ही दिन में मुझे चैन पड़ता है।

विशेष:

  1. यशोदा के मातृ हृदय का अत्यंत मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है अपने को धाय कहना और अधिकार न जताते हुए भी उसके प्रति चिंतित होना मातृ-स्नेह का बड़ा गहन, सूक्ष्म और यथार्थ चित्रण सूरदास ने किया है।
  2. लाड़ लडैतें, क्रम-क्रम करि कै, है हैं’ में अनुप्रास अलंकार है।
  3. जोइ-जोइ, सोइ-सोइ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. पद में प्रवाहपूर्ण ब्रजभाषा तथा गेयता है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
माता यशोदा किसके माध्यम से किसे संदेश भेजती हैं और क्यों?
उत्तर:
माता यशोदा श्रीकृष्ण के मित्र उद्धव के माध्यम से देवकी को संदेश भेजती हैं क्योंकि माता यशोदा ने श्रीकृष्ण का पालन-पोषण कर बड़ा किया है और अब वे अपनी माता देवकी के पास मथुरा में रहने लगे हैं। माता यशोदा को श्रीकृष्ण की सभी आदतों का पता है इसीलिए वे उद्धव के माध्यम से श्रीकृष्ण की आदतों के बारे में जानकारी देने के लिए संदेश भेजती हैं।

प्रश्न (ii)
श्रीकृष्ण को प्रातःकाल खाने में क्या अच्छा लगता है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण को प्रातःकाल माखन-रोटी खाना अच्छा लगता है।

प्रश्न (iii)
यशोदा देवकी को श्रीकृष्ण की कौन-कौन-सी आदतों से परिचित कराती है?
उत्तर:
यशोदा देवकी को श्रीकृष्ण की खाने, स्नान करने, रूठने और मनाने की आदतों से परिचित कराती हैं।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि कृष्ण अब मथुरा के राजा हैं किंतु माता का हृदय तो अपने पुत्र को सदैव शिशु रूप में ही अनुभव करता है। वे अपने संदेश में कृष्ण के खाने-पीने, स्नान करने, रूठने-मनाने की आदतों से देवकी को परिचित कराती हैं। इस पद में माँ का वात्सल्य भाव व्यक्त हुआ है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोदा के मातृ हृदय का अत्यंत प्रभावपूर्ण एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है, कवि ने मातृ-विज्ञान का गहन, सुक्ष्य और यथार्थ चित्रण कर अपनी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का परिचय दिया है। लाड़-लडैतें, क्रम-क्रम करि कै, है हैं, में अनुप्रास अलंकार है। जोइ-जोइ, सोइ-सोइ, क्रम-क्रम में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार हैं, ब्रजभाषा माधुर्य गुण संपन्न है। पद में गेयता, लय और तुक समाहित है।

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MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य-बोध, वाक्य-भेद

MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य – बोध, वाक्य – भेद

1. वाक्य – बोध।

मनुष्य के भावों और अर्थों को भाषा के माध्यम से व्यक्त और स्पष्ट करना ही वाक्य का मुख्य प्रयोजन है। भाषा का सौन्दर्य और चमत्कार सुन्दर और सुगठित सुवाक्य रचना में होता है। वाक्य के तीन गुण प्रमुख होते हैं –
(i) आकांक्षा,
(ii) योग्यता और
(iii) सन्निधि।

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(i) आकांक्षा – वाक्य के एक पद को सुनकर आगे जानने की जिज्ञासा आकांक्षा है।
(ii) योग्यता – अन्वय करने के बाद वाक्य के अर्थबोध में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती है,उसे योग्यता कहते हैं।
(iii) सन्निधि – योग्यता और आकांक्षा के साथ ही वाक्य के शब्दों में परस्पर सन्निधि आवश्यक है।

  • शुद्ध वाक्य के गुण
  1. स्पष्टता – वाक्य सरल और स्पष्ट होना चाहिए। उन्हें पढ़ते या सुनते समय बराबर विचारों का उद्रेक हो।
  2. समर्थता – पाठक या श्रोता की भावनाओं को जाग्रत करने में सुगठित वाक्य ठीक माना जाता है।
  3. अति मधुरता – रचना को प्रभावशाली बनाने के लिए उसमें ऐसे वाक्य होने चाहिए जो सुनने में मधुर लगें। ऐसे वाक्यों से युक्त रचना को पढ़ने से पाठक आनन्द का अनुभव करता है।
  • वाक्य – रचना में होने वाली सामान्य अशुद्धियाँ

लिखते और बोलते समय स्पष्ट बात कहने की बड़ी आवश्यकता होती है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि बोला कुछ जाय, लिखा कुछ जाय और समझा कुछ और जाय। इन सब दोषों का मूल कारण होता है – वाक्य में भाषा का निर्वाह न करना। कभी – कभी असावधानी के कारण वाक्य – रचना में भ्रामकता का दोष आ जाता है। कभी – कभी दूसरी भाषा से प्रभावित होने के कारण लेखक शिथिल और अनावश्यक वाक्यों की रचना कर जाते हैं।
इन गुण – दोषों को ध्यान में रखकर बड़ी सावधानी से वाक्यों की शुद्ध रचना करनी चाहिए। वाक्य रचना में होने वाली सामान्य अशुद्धियाँ प्रायः इस प्रकार हैं

1. वचन सम्बन्धी अशुद्धियाँ – आदि, अनेक अथवा बहुवचन संज्ञा की क्रियाओं में प्रायः वचन सम्बन्धी त्रुटियाँ होती हैं। जैसे
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2. लिंग सम्बन्धी अशुद्धियाँ – विशेषण और विशेष्य का लिंग एक जैसा हो,समस्त पदों के सर्वनाम का लिंग एवं क्रिया का लिंग अन्तिम पद के अनुसार होना चाहिए। उदाहरण
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3. अर्थ सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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4. काल सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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5. पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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6. मात्रा सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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7. अन्य अशुद्धियाँ
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1. वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध शब्दों का प्रयोग

वर्तनी (Spelling) का तात्पर्य अक्षर – विन्यास से है। पहले इसके लिए ‘हिज्जे’ या ‘अक्षरी’ नाम प्रचलित थे। उच्चारण की शुद्धता के अनुसार एवं व्याकरण की दृष्टि के अनुरूप शब्दों को लिखना ही, वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध शब्दों का प्रयोग कहलाता है।

इन अशुद्धियों के कारण होते हैं—अज्ञान, भ्रान्ति, असावधानी,बनकर बोलने की दुष्प्रवृत्ति और विदेशी प्रभाव।

शुद्ध लेखन के लिए शुद्ध वर्तनी अपेक्षित होती है। वर्तनी ही भाषा की प्रभाव – क्षमता बढ़ाती है। अतः वर्तनी के सुधार या शब्द – शुद्धिकरण के लिए नीचे कुछ अशुद्ध शब्दों के शुद्ध रूप दिये हैं-
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2. अर्थ की दृष्टि से सही शब्दों का चयन

हिन्दी में कतिपय ऐसे शब्द हैं जिन्हें ऊपर से देखने पर कोई अर्थ – भेद नहीं दिखाई देता है,पर सूक्ष्मतः उनमें अन्तर होता है। ऐसे शब्दों का ज्ञान आवश्यक है।
कुछ शब्दों का अर्थ तो एक ही रहता है, पर उनके प्रयोग में कुछ अन्तर रहता है। कभी – कभी सम्बद्ध शब्दों के प्रयोग से भी वाक्य अशुद्ध हो जाता है। जैसे
अशुद्ध वाक्य – शुद्ध वाक्य
(1) उसे व्यापार में हानि होने की आशा है। (1) उसे व्यापार में हानि होने की आशंका
(2) विनय को परीक्षा में उत्तीर्ण होने की आशंका है। (2) विनय को परीक्षा में उत्तीर्ण होने की आशा है।
(3) राम बुरी तरह प्रसिद्ध है। – (3) राम बुरी तरह बदनाम है।
(4) शोक है कि आपने मेरे पत्रों का उत्तर नहीं दिया। – (4) खेद है कि आपने मेरे पत्रों का उत्तर नहीं दिया।
(5) मैंने एक वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा देखी। – (5) मैंने एक वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा की।
(6) रमा एक मोतियों का हार गले में पहने – (6) रमा मोतियों का एक हार गले में पहने
(7) मीना चाचाजी के ऊपर विश्वास करती – (7) मीना चाचाजी पर विश्वास करती है।
(8) शब्द केवल संकेत मात्र होते हैं। – (8) शब्द संकेत मात्र होते हैं।
(9) आपके एक – एक शब्द तुले हुए होते – (9) आपका एक – एक शब्द तुला हुआ होता
(10) उसे अनेकों व्यक्तियों ने आर्शीवाद दिया। – (10) उसे अनेक व्यक्तियों ने आशीर्वाद दिया।

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(11) विंध्याचल पर्वत के दक्खिन में नर्मदा स्थित है। – (11) विंध्याचल के दक्षिण में नर्मदा स्थित
(12) मैं अपनी बात का स्पष्टीकरण करने के लिए तैयार हूँ। – (12) मैं अपनी बात का स्पष्टीकरण देने के लिए तैयार हूँ।
(13) मैं अपने गुरु के ऊपर बहुत श्रद्धा करता – (13) मैं अपने गुरु पर बहुत श्रद्धा रखता हूँ।
(14) सौन्दर्यता सबको मोह लेती है। – (14) सुन्दरता सबको मोह लेती है।
(15) हवा चल रही है। – (15) हवा बह रही है।
(16) महादेवी वर्मा विद्वान महिला थी। – (16) महादेवी वर्मा एक विदुषी महिला थीं।
(17) श्रीकृष्ण के अनेकों नाम हैं। – (17) श्रीकृष्ण के अनेक नाम हैं।
(18) यह घी की शुद्ध दुकान है। – (18) यह शुद्ध घी की दुकान है।
(19) मोहन आटा पिसाकर लाया। – (19) मोहन अनाज पिसाकर लाया।
(20) वे सज्जन पुरुष कौन हैं? – (20) वे सज्जन कौन हैं?
(21) प्रत्येक वृक्ष फल देते हैं। – (21) प्रत्येक वृक्ष फल देता है।

अर्थ की दृष्टि से सही शब्दों का चयन करने के लिए सूक्ष्म अन्तर वाले शब्दों को जान लेना चाहिए जिससे सही अर्थ का ज्ञान हो तो हम सभी जगह उसका उपयोग कर सकें। जैसे

(1) अनुराग = स्त्री – पुरुष के बीच होने वाला स्नेह। प्रेम = स्नेह सम्बन्ध मात्र। वात्सल्य = छोटों के प्रति बड़ों का स्नेह। भक्ति = बड़ों के प्रति छोटों का श्रद्धायुक्त स्नेह।
(2) अस्त्र = जो फेंक कर मारा जाय; जैसे – तीर, भाला, बम। शस्त्र = जिससे काटा जाय; जैसे – तलवार, छुरा। आयुध = लड़ाई के सभी साधन आयुध कहलाते हैं। इसमें अस्त्र – शस्त्र के अतिरिक्त लाठी,गदा,छड़ आदि को भी ले सकते हैं। हथियार = हाथ से चलाये जाने वाले आयुध।
(3) अशुद्धि = अपवित्रता, मिलावट, लिखने अथवा बोलने में कमी, इन सभी को अशुद्धि कहते हैं। भूल = विस्मृति, जिसमें कर्ता की असावधानी प्रकट होती है। त्रुटि = वस्तु में किसी कमी का होना।
(4) अमूल्य = वस्तु जो मूल्य देकर प्राप्त न की जा सके। जैसे – विद्या, ज्ञान, प्रेम, सफलता, सुख, विश्वास। बहुमूल्य = जिसका अधिक मूल्य देना पड़े,जो वस्तु साधारण मूल्य की न हो। जैसे—सोना,प्लेटिनम,हीरा। महँगा = जिस वस्तु को बदलते बाजार भाव के कारण अधिक मूल्य देकर पाया जाये।
(5) अलभ्य = जिसे किसी उपाय से न पाया जाय। दुर्लभ = जिसे अधिक कष्ट उठाकर पाया जाय।
(6) अलौकिक = जो संसार में इन्द्रियों के द्वारा सुलभ न हो। असाधारण = जो सांसारिक होकर भी अधिकता से न मिलता हो। अस्वाभाविक = अप्राकृतिक, जो प्रकृति के नियमों से बाहर का प्रतीत हो।
(7) अर्पण = शरणगति का भाव लिए अर्पण। दान = धार्मिक भावना के साथ दूसरे का स्वत्व स्थापित करना; जैसे – जलदान, दीपदान, विद्यादान, गोदान, अन्नदान। प्रदान = सामान्य रूप से बड़ों के द्वारा छोटों को देना। वितरण = समाज में उत्पादित वस्तुओं के विभाजन की प्रणाली।
(8) अनुग्रह = बड़े की ओर से छोटों के अभीष्ट सम्पादन की स्नेहपूर्ण क्रिया अनुग्रह है। अनुकम्पा = दुःख दूर करने की चेष्टा से युक्त कृपा। दया = दुःख देखकर द्रवित होना। कृपा = दुःख – निवारण के सामर्थ्य से युक्त दया। सहानुभूति = दूसरे के दुःख में समभागी होने का भाव। करुणा = दुःख निवारण की व्याकुलता लिए हुए द्रवित होना। ममता = माता के समान किसी पर वत्सल भाव।
(9) अंग = (अवयव) भौतिक समष्टि का भाग; जैसे – शरीर का अंग, वृक्ष का अंग, शाखा आदि। देह = शरीर। आकृति = रेखाओं से बनी कोई समष्टि, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव।
(10) अमर्ष = द्वेष या दुःख जो तिरस्कार करने वाले के कारण होता है। क्रोध = प्रतिकूल आचरण के बदले में प्रतिकूल आचरण की प्रवत्ति। कलह = क्रोध को जब सक्रिय रूप दिया जाता है तो उससे होने वाला वाचिक या शारीरिक आचरण।

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(11) असुर = दैत्य या दानव – एक जाति विशेष, जो देवों के समकक्ष थी। राक्षस = यह अनुचित आचरण के कारण मनुष्य जाति के लिए आता है।
(12) अनुपम = बेजोड़ – जिसकी तुलना न हो सके। अपूर्व = जिसे पहले अनुभव न किया गया हो। अद्भुत = जो विस्मयजनक हो।
(13) आयु = जीवन के सम्पूर्ण समय को आयु कहते हैं। वयस् = जीवन के शरीर विकास सूचक भाग को वयस् कहा जाता है, जैसे – शैशव। अवस्था = दशा – जीवन के प्रसंग में बीते हुए जीवन का भाग। वयस् के अर्थ में भी चलता है, जैसे—युवावस्था, वृद्धावस्था।
(14) अबला = स्त्री की संज्ञा है जिससे उसकी कोमलता एवं निर्बलता का संकेत मिलता है। नारी = केवल नर जाति की स्त्री या मानवी। कान्ता = प्रिया, किसी पुरुष के स्नेह – सम्बन्ध से दिया हुआ स्त्री का नाम – जो चमक को भी प्रकट करता है। भार्या = वह स्त्री जो किसी पुरुष से अपने भरण – पोषण की प्राप्ति का अधिकार रखती हो। पत्नी = पति से सम्बद्ध धार्मिक कार्यों में पति का साथ देने वाली, जिसका धार्मिक रीति से विवाह सम्पन्न हुआ हो। वधू = विवाह के बाद नारी की संज्ञा। अंगना = अंगों की कोमलता तथा सुन्दरता की सूचक स्त्री की संज्ञा।
(15) आनन्द = समस्त मन, प्राण,शरीर, आत्मा के सम्मिलित सुखानुभूति को आनन्द कहते हैं, हर्षित,प्रसन्न। सुख = मन के अनुकूल किसी भी प्रतीति को सुख कहते हैं। हर्ष = सुख या आनन्द के कारण शरीर की रोमांचमयी अवस्था हर्ष है। उल्लास – उमंग = मन में सुख की वेगयुक्त अल्पकालिक क्रिया।

(16) भिज्ञ = विषय के ज्ञान से सम्पन्न। विज्ञ = विषय का विशेष ज्ञान रखने वाला। बहुज्ञ = अनेक विषयों का ज्ञाता।
(17) अंश = मूर्त, अमूर्त तत्त्व का भाग। खण्ड = मूर्त पदार्थ का विभाजन।
(18) अन्न = मुख्य भोजन का धान्य विशेष। दाना = किसी भी वस्तु का गोलाई लिए छोटी इकाई का नाम। जैसे–माला का दाना,मोती का दाना, अनाज का दाना। शस्य = फसल, जो खेत में काटने हेतु लगी हो। खाद्य = सभी प्रकार का भोजन योग्य पदार्थ। पकवान = पका हुआ भोजन।
(19) आज्ञा = बड़ों द्वारा छोटों के प्रति काम की प्रेरणा। अनुज्ञा = श्रोता की इच्छा के समर्थन में स्वीकृतिसूचक कथन। अनुमति = बड़ों द्वारा सहमति अथवा किसी काम करने की इच्छा का समर्थन। आदेश = प्रायः कार्याधिकारी द्वारा दी हुई आज्ञा।
(20) अनुनय = किसी बात पर सहमत होने की प्रार्थना। विनय = निवेदन, शिष्टता. अनुशासन। प्रार्थना = किसी कार्यसिद्धि या वस्तु प्राप्ति के लिए विनययुक्त कथन। निवेदन = अपनी बात विनयपूर्वक रखना। आवेदन = अपनी योग्यता आदि के कथन द्वारा किसी पद या कार्य हेतु प्रस्तुत होना।
(21) आमन्त्रण – किसी अवसर पर सम्मिलित होने का बुलावा। निमन्त्रण = उत्सव के अवसर पर बुलाना। आह्वान = ललकारना, संघर्ष के लिए बुलाना।
(22) इच्छा = किसी वस्तु के प्रति मन का राग। आशा = इच्छा के साथ प्राप्ति की सम्भावना का सुख। उत्कण्ठा = जिज्ञासा। स्पृहा = उत्कृष्ट इच्छा। मनोरथ = अभिलाषा।
(23) उत्साह = बड़े कार्यों के प्रति प्रेरित करने वाला आनन्ददायक भाव। साहस = सहने की शक्ति को साहस कहते हैं।
(24) तेज = बाहरी प्रकाश। कान्ति = चमक। प्रकाश = किरण समूह।
(25) ईर्ष्या = दूसरे की उन्नति न सह पाना। स्पर्धा = दूसरे को उन्नत देखकर स्वयं उन्नति की होड़। असूया = दूसरे के गुणों में दोष ढूँढ़ना। द्वेष = दूसरे की बुराई की कामना।
बैर = बहुत दिनों का संचित क्रोध का रूप।
(26) खेद = अनिष्ट सूचना। अवसाद = मन – शरीर की निश्चेष्टता। क्लेश = मन – शरीर दोनों का पीड़ित होना। कष्ट = दुःखजनक स्थिति। व्यथा = पीड़ा। वेदना = पीड़ा का मानसिक अनुभव। यातना = दुःख भोगने की मनोदशा। यन्त्रणा = दुःख की दीर्घकालिक जकड़न।
(27) ऋतु = छ: ऋतुएँ होती हैं। मौसम = पारिस्थितिक भेद।

यहाँ पर उदाहरण के लिए कुछ अशुद्ध तथा शुद्ध वाक्य दिये गये हैं, जिनका सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए। (पहला वाक्य अशुद्ध है तथा दूसरा वाक्य शुद्ध है।)
1. अनावृष्टि के कारण आगामी वर्ष पशुओं के आहार में भारी कमी की आशंका है।
[अनावृष्टि के कारण आगामी वर्ष में पशुओं के आहार में भारी कमी की सम्भावना है।]

2. अनुराधा ने अपने पति के गले में एक फूल की माला डाल दी।
[अनुराधा ने अपने पति के गले में फूलों की एक माला डाल दी।]

3. अनेकों विद्यार्थी उपाधि – वितरणोत्सव के समारोह में सम्मिलित नहीं हो सके। ”
[अनेक विद्यार्थी उपाधि – वितरण समारोह में सम्मिलित नहीं हो सके।।

4. अपने से बड़ों के प्रति स्नेह और छोटों के प्रति श्रद्धा का भाव व्यक्त करना चाहिए।
[अपने से बड़ों के प्रति श्रद्धा और छोटों के प्रति स्नेह का भाव व्यक्त करना चाहिए।

5. आज का छात्र पढ़ने से अधिक फैशन को महत्व देते हैं।
[आज के छात्र पढ़ने से अधिक महत्त्व फैशन को देते हैं।]

6. आज शनिवार है और कल रविवार की छुट्टी है।
[आज शनिवार है और कल रविवार की छुट्टी होगी।

7. शीला आज्ञाकारी पत्नी है।
[शीला आज्ञाकारिणी पत्नी है।]

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8. हमारी देश की सरकार ईमानदार है।
[हमारे देश की सरकार ईमानदार है।

9. आपका पत्र धन्यवाद सहित मिला।
[आपका पत्र धन्यवादपूर्वक मिला।

10. आपका भवदीय। [2010]
[आपका या भवदीय ]

11. उसकी आँख से आँसू बह रहा है।
[उसकी आँख से आँसू निकल रहे हैं।]

12. हमें पानी दो।
[मुझे पानी दो।

13. आपका लिखावट बड़ा अच्छा है।
[आपकी लिखावट बड़ी अच्छी

14. आपकी सलाह ग्राह्य योग्य है।
[आपकी सलाह ग्राह्य है।)

15. कश्मीर की सौन्दर्यता दर्शनीय है।
कश्मीर का सौन्दर्य दर्शनीय है।।

16. वह लौटकर वापस आ गया।
[वह वापस आ गया। या वह लौटकर आ गया।

17. आपने वह प्रतिज्ञा न भूले होंगे।
[आप वह प्रतिज्ञा न भूले होंगे।

18. रामचरितमानस सबसे श्रेष्ठतम ग्रन्थ है। [2011]
[रामचरितमानस श्रेष्ठतम ग्रन्थ है।।]

19. यद्यपि वे सज्जन है लिन्तु क्रोधी है।
[यद्याचे वह सज्जन है, किन्तु क्रोधी है।]

20. वह धनी व्यक्ति है। (बिना अर्थ बदले नकारात्मक)
वह निर्धन व्यक्ति नहीं है।

21. उसके पास पाँच भूगोल की पुस्तकें हैं।
[उसके पास भूगोल की पाँच पुस्तकें हैं।]

22. सरोवर के अन्दर पानी भरा है। ,
सरोवर में पानी भरा है।।

23. पिता का पुत्र में विश्वास है।
पिता का पुत्र पर विश्वास है।।

24. कई ऑफिस के अधिकारी छुट्टी लेकर चले गए।
[ऑफिस के कई अधिकारी छुट्टी लेकर चले गए।

25. उनका बहुत भारी सम्मान हुआ।
[उनका बहुत सम्मान हुआ।]

26. उनके पूज्यास्पद पूज्य पिता चल बसे।
[उनके पूज्यास्पद (या पूज्य) पिता चल बसे।

27. उनका वहाँ जाने की इच्छा न थी।
उनकी वहाँ जाने की इच्छा न थी।

28. उसे मृत्यु – दण्ड की सजा मिली है।
[उसे मृत्यु – दण्ड मिला है।]

29. गाँधीजी का देश सदा आभारी रहेगा।
देश गाँधीजी का सदा आभारी रहेगा।

30. यह कार्य आवश्यकीय है।
यह कार्य आवश्यक है।।

31. मैं कल दिल्ली से वापस लौटूंगा।
[मैं कल दिल्ली से लौटूंगा।]

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32. उसने मेरे को कुछ नहीं बोला।
[उसने मुझे कुछ नहीं कहा।]

33. मैं आटा पिसवाने जा रहा हूँ।
मैं गेहूँ पिसवाने जा रहा हूँ।

34. वह गुणवान महिला है।
[वह गुणवती महिला है।

35. बन्दूक एक उपयोगी शस्त्र है।
[बन्दूक एक उपयोगी अस्त्र है।]

36. मेरी अंक सूची गुम हो गई है।
मेरी अंक सूची गुम गयी है।]

37. यदि परिश्रम करोगे तो अच्छे अंक प्राप्त करोगे।
[यदि परिश्रम करेंगे तब अच्छे अंक प्राप्त होंगे। [2010]

38. दोनों में यह उत्तमतर है।
दोनों में यह उत्तम है।]

39. उसके बाद फिर क्या हुआ?
[उसके बाद क्या हुआ?]

40. गाय बोलती है।
गाय रम्भाती है।

41. खरगोश को काटकर गाजर खिलाओ।
(खरगोश को गाजर काटकर खिलाओ।

42. बच्चा दूध को रो रहा है।
[बच्चा दूध के लिये रो रहा है।।

43. महान् व्यक्ति सदा पूज्यनीय होते हैं।
[महान् व्यक्ति सदा पूजनीय होते हैं।

44. धातुओं में सोने से अधिक कीमती कोई धातु नहीं है।
सोना सबसे अधिक कीमती धातु है।।

45. वह बुद्धिमान लड़का है। (बिना अर्थ बदले नकारात्मक)
(वह मूर्ख लड़का नहीं है।।

46. यह एक उपयोगी पुस्तक है.उसे खरीद लो।
[यह एक उपयोगी पुस्तक है,इसे खरीद लो।

47. वह प्रतिदिन सबेरे के समय पढ़ता है।
[वह प्रतिदिन सुबह पढ़ता है।

48. भगवान के अनेकों नाम हैं।
भगवान के अनेक नाम हैं।]

49. उसने ऊपर को देखकर हँसा।
[वह ऊपर देखकर हँसा।]

50. रमेश प्रतिदिन हर रोज स्कूल जाता है।
[रमेश प्रतिदिन स्कूल जाता है।]

51. श्रीमती महादेवी वर्मा विद्वान् महिला हैं।
[श्रीमती महादेवी वर्मा विदुषी हैं।]

52. उसकी टाँग टूट गया।
[उसकी टाँग टूट गई।

53. उसके सामने एक गहरी समस्या है।
[उसके सामने एक गम्भीर समस्या है।

54. लक्ष्मीबाई एक तेजस्वी नारी थीं।
लक्ष्मीबाई एक तेजस्विनी नारी थीं।

55. वह सन्तान को लेकर दुःखी है।
वह सन्तान के कारण दुःखी है।] [2011]

56. जो कल आएगा सो पुरस्कार पाएगा।
जो कल आएगा वह पुरस्कार पाएगा।

57. गाँधी जी पक्के ईश्वर भक्त थे।
गाँधी जी सच्चे ईश्वर भक्त थे।

58. जंगल में शेर चिंघाड़ने लगा।
जंगल में शेर दहाड़ने लगा।

59. वह खाना खाकर के जाएगा।
वह खाना खाकर जाएगा।।

60. वे सज्जन पुरुष कौन हैं?
वे सज्जन कौन हैं?]

61. आप अपने मन से सोचें।
आप अपने मन में सोचें।।

62. भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या वृद्धि के कारण लिखिए।
भारत की जनसंख्या वृद्धि के कारण लिखिए।]

63. राम – श्याम के झगड़े का हेतु क्या हो सकता है?
[राम – श्याम के झगड़े का कारण क्या हो सकता है?]

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  • विराम चिह्नों का उपयोग

बोलना एक विशिष्ट कला है, जिसका आवश्यक गुण यह है कि सुनने वाला या सुनने वाले बोलने वाले के भाव को अच्छी तरह समझ सकें। इसके लिए यह अनिवार्य है कि बोलने वाला बीच – बीच में आवश्यकतानुसार कुछ – कुछ ठहरकर बोले। यही क्रम बोलने में होता भी है। वह किसी पद,वाक्यांश या वाक्य को बोलते समय ठहरता जाता है ! इस विश्राम को व्याकरण में ‘विराम’ कहते हैं। लिखते समय ऐसे स्थानों पर कुछ चिह्न लगा दिये जाते हैं। इन चिह्नों को ‘विराम चिह्न’ कहते हैं। शाब्दिक अर्थ के अनुसार विराम’ का अर्थ है रुकाव, ठहराव अथवा विश्राम। बोलने में कहीं कम समय लगता है और कहीं ज्यादा। इसी दृष्टि से चिह्न भी कम समय और अधिक समय के अनुसार अलग – अलग होते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ और भी चिह्न होते हैं, जिनका अध्ययन साहित्य के विद्यार्थी के लिए अत्यन्त अनिवार्य है।

चिह्नों का महत्त्व इतना अधिक है कि भूल से गलत स्थान पर चिह्न लगा देने से वाक्य का अर्थ बदल जाता है, अत: चिह्न लगाने में पूर्ण सावधानी रखना आवश्यक है,जैसे – –
रुको मत जाओ। (कोई चिह्न नहीं)
रुको मत जाओ। (जाने का निषेध)
रुको मत,जाओ। (रुकने का निषेध)

राष्ट्र भाषा हिन्दी में आजकल उसके विकास के साथ – साथ विराम चिह्नों की संख्या और प्रयोग बढ़ता जा रहा है। प्रमुख विराम चिह्न जिनका आजकल प्रयोग बहुतायत से होता है, निम्नानुसार हैं
1. अल्प विराम ( , )
2. अर्द्ध विराम (;)
3. पूर्ण विराम (।)
4. प्रश्न चिह्न (?)
5. विस्मयादि बोधक (!)
6. संयोजक चिह्न ( – )
7. निर्देशक चिह्न ( – )
8. कोष्ठक () []
9. उद्धरण या अवतरण चिह्न ‘ ‘ ” ”
10. लोप निर्देशक xxx …..
11. आदेश चिह्न : –
12. लाघव चिह्न °
13. हंस पद ^
14. बराबर सूचक चिह्न =
15. पुनरुक्ति बोध चिह्न (,,)
16. समाप्ति सूचक चिह्न – : x : –

(1) अल्प विराम (,)
यह चिह्न उस स्थान पर लगाया जाता है, जहाँ वक्ता बहुत ही थोड़े समय के लिए रुके।
जैसे –
हेमलता,शारदा, वेदश्री और जयश्री उज्जैन, देवास और महू होकर आज ही लौटी हैं। वह आयेगा, परन्तु रुकेगा नहीं।

(2) अर्द्ध विराम ( ; )
अर्द्ध विराम के चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि अल्प विराम से कुछ अधिक समय तक रुकना हो। इसका प्रयोग प्रायःदो स्वतन्त्र उपवाक्यों को अलग करने के लिए किया जाता है।

जैसे
मैंने गोली चलने की आवाज सुनी;
चार पक्षी फड़फड़ाकर जमीन पर गिर पड़े।

(3) पूर्ण विराम (।)
वाक्य पूरा होने पर कुछ अधिक समय के लिए रुकना होता है, इसलिए प्रत्येक वाक्य की पूर्णता पर इस चिह्न का प्रयोग करते हैं। जैसे
बांग्लादेश आजाद हो गया।

संकेत – कुछ लोग इस चिह्न को पूर्ण विराम के स्थान पर केवल ‘विराम’ कहते हैं और पूर्ण विराम के चिह्न दो खड़ी लकीर ( ॥) को मानते हैं। साधारणत: दो खड़ी लकीर वाले इस चिह्न
का प्रयोग पद्य की पूर्णता पर किया जाता है। जैसे

देख्यो रूप अपार, मोहन सुन्दर श्याम को।
वह ब्रज राजकुमार,हिय – जिय नैनन में बस्यो।

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(4) प्रश्न चिह्न (?)
प्रश्नवाचक चिह्न, प्रश्न सूचक वाक्यों के अन्त में पूर्ण विराम के स्थान पर आता है। जैसे
1. यह किसका घर है?
2. वह कहाँ जा रहा है?

(5) विस्मयादिबोधक चिह्न (!)
इस चिह्न का प्रयोग विस्मयादि सूचक शब्दों या वाक्यों के अन्त में किया जाता है। सम्बोधन कारक की संज्ञा के अन्त में भी इसे लगाया जाता है। जैसे
1. अरे ! वहाँ कौन खड़ा है।
2. हाय ! इसका बुरा हुआ।
3. हे ईश्वर ! उसकी रक्षा करो।

(6) संयोजक चिह्न ( – )
इसे सामासिक चिह्न भी कहते हैं। इस चिह्न का प्रयोग सामासिक शब्दों के मध्य में होता है। जैसे
हे ! हर – हार – अहार – सुत,मैं विनवत हूँ तोय।

(7) निर्देशक चिह्न ( – ) (: – )
इस चिह्न का दूसरा नाम विवरण चिह्न भी है। इसका प्रयोग उस स्थिति में किया जाता है, जबकि किसी वाक्य के आगे कई बातें क्रम से लिखी जाती हैं। इसे आदेश चिह्न भी कहते हैं।
निम्नलिखित शब्दों की परिभाषा लिखो संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया। कभी – कभी (: – ) इस चिह्न के स्थान पर डेश ( – ) का भी प्रयोग कर लिया जाता है।

(8) कोष्ठक () [ ]
कोष्ठक का प्रयोग निम्न प्रकार से किया जाता है—
1. किसी विषय के क्रम बतलाने के लिए अक्षरों या अंकों के साथ इसका प्रयोग होता है। जैसे
(क) व्यक्ति वाचक संख्या। (ख) जाति वाचक संख्या।
(1) एशिया
(2) यूरोप

2. वाक्य के मध्य में किसी शब्द के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इसका प्रयोग होता है। जैसे
हे कोन्तेय,(अर्जुन) तू क्लेव्यता (कायरता) को प्राप्त न हो।

3. नाटकों में अभिनय को प्रकट करने के लिए भी कोष्ठकों का प्रयोग किया जाता है। जैसे
महाराणा प्रताप – क्रोध से) नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता।
मानसिंह – (नम्रता से) राणा ! हठ न करो। बात के मान लेने में तुम्हारा हित है।

(9) अधरण या अवतरण चिह्न (‘) (” “)
हिन्दी में इस चिह्न के अन्य नाम भी हैं। जैसे – उल्टा विराम,युगल – पाश,आदि। इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है जबकि किसी व्यक्ति की बात या कथन को उसी के शब्दों में लिखना होता है। यह चिह्न वाक्य के आदि और अन्त में लगाया जाता है। इकहरे और दोहरे चिह्नों में यह अन्तर है कि जब किसी उद्धरण को लिखना होता है तो दोहरे चिह्न लगाये जाते हैं, किन्तु वाक्य के मध्य में यदि आवश्यकता हुई तो इकहरे उद्धरण चिह्न को लगाया जाता है।

अकबर ने उस दिन प्रार्थना के स्वर में कहा, “हे विश्वनियन्ता ! तू सत्य है; तू ही राम; तू ही रहीम है।” उसने आगे कहा,“दुनिया में सच्चा ईमान ‘मानव धर्म’ है।”

(10) लोप निर्देशक चिह्न (xxx) (……)
इन चिह्नों का प्रयोग तब होता है, जबकि कोई लेखक किसी का उद्धरण देते समय कुछ अंश छोड़ना चाहता है। इनका प्रयोग निम्नांनुसार किया जाता है
1. उस स्थिति में जबकि लेखक किसी लम्बे विवरण को छोड़कर आगे की बात लिखना चाहता है,तब वह चार – पाँच ऐसे निशान लगा देता है। जैसे
आग का वह दृश्य क्या था,सर्वस्व नाश की विभीषिका थी। चारों ओर से लोग दौड़ रहे थे। xxx सम्पूर्ण गाँव जलकर स्वाहा हो गया।
2. जब कुछ शब्द या वाक्य छोड़ने होते हैं, तो ‘ इसका प्रयोग करते हैं। जैसे – बम्बई नगर है। रिक्त स्थान की पूर्ति करो।

(11) आदेश चिह्न (: – )
जब प्रश्न न पूछा जाकर आदेश दिया जाये वहाँ आदेश चिह्न लगाया जाता है, जैसे किन्हीं पाँच चीनी यात्रियों का नाम लिखिए :

(12) लाघव चिह्न (०)।
जब किसी प्रसिद्ध शब्द को पूरा न लिखकर संक्षेप में लिखा जाता है,तब उसका प्रारम्भिक अक्षर लिखकर लाघव चिह्न (०) लगा दिया जाता है। जैसे
हिन्दी साहित्य सम्मेलन – हि. सा. स.
मध्य प्रदेश राज्य – म. प्र. राज्य
नागरी प्रचारिणी सभा,काशी – ना० प्र० स० ,काशी

(13) हंस पद (.)
इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि कोई शब्द या बात वाक्य लिखते समय मध्य में छूट जाय। उस स्थिति में नीचे इस चिह्न को लगाकर ऊपर वह शब्द लिख दिया जाता है। जैसे
वह
“मैंने पास जाकर देखा गुलाब का फूल था।”

(14) बराबर सूचक चिह्न (=)
इस चिह्न को तुल्यता सूचक चिह्न भी कहते हैं। इसका प्रयोग समानता दिखलाने के लिए किया जाता है। जैसे –
विद्या + आलय = विद्यालय

(15) पुनरुक्ति बोध चिह्न (,)
उस स्थिति में जबकि ऊपर कही हुई बात अथवा शब्द को नीचे की ओर उसी रूप में लिखना होता है, तो इस चिह्न को लगा देते हैं, जिसका मतलब होता है – यह वही शब्द है जो
ऊपर लिखा हुआ है। जैसे
5 आदमी एक काम 15 दिन में करते हैं
MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य-बोध, वाक्य-भेद img-13

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(16) समाप्ति सूचक चिह्न ( – : x : – )
इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है,जबकि कोई लेख अध्याय,परिच्छेद, पुस्तक आदि समाप्त हो गई हो। जैसे
और इस प्रकार भारत देश आजाद हुआ।
( – : x : – )

वाक्य – भेद

(1) रचना के अनुसार वाक्य के तीन भेद होते हैं :

  1. सरल,
  2. मिश्रित और
  3. संयुक्त वाक्य।

(i) जिस वाक्य में एक ही संज्ञा और क्रिया का प्रयोग होता है, उसे सरल या साधारण वाक्य कहते हैं।
(ii) जन मूल वाक्य के साथ एक या अधिक वाक्य और भी मिले होते हैं,तब वह वाक्य मिश्रित वाक्य कहलाता है।
(ii) जब कई सरल और मिश्रित वाक्य – समूह अव्ययों के द्वारा एक ही वाक्य में जुड़े रहते हैं, तब वह वाक्य संयुक्त वाक्य कहलाता है।

(2) अर्थ के अनुसार वाक्यों के प्रकार

  1. विधिवाचक – मधु मेरे घर आयी।
  2. निषेधवाचक – मधु मेरे घर नहीं आयी।
  3. आज्ञार्थक – मधु मेरे घर आये और मिले।
  4. प्रश्नवाचक क्या मधु आयी थी?
  5. विस्मयादिबोधक – हाय मधु आए तो कितना अच्छा !
  6. इच्छाबोध – अच्छा हो कि मधु मेरे घर आए।
  7. सन्देहसूचक – मधु जरूर मेरे घर आयी होगी।
  8. संकेतार्थक – यदि मधु जानती तो जरूर मेरे घर आती।

(3) क्रिया के अनुसार वाक्यों के भेद

  1. कर्तृ प्रधान,
  2. कर्म प्रधान,
  3. भाव प्रधान।

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अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अभाव में नवीन चिन्तन, नवीन विचार, नवीन धारणाएँ आकार नहीं ले पातीं, न कोई सृजन हो पाता है। छात्र इस स्तर तक आते – आते क्रमश: अपनी भाषा के विकास के क्रम में इतना सक्षम हो जाता है कि वह अपने सबसे प्रभावशाली साधन बोली का उपयोग करे। अपने अनुभव एवं अपने विचार व्यक्त करे। क्षेत्रीय बोली की कहावतें, चुटकुलों और लोकगीतों का संग्रह कर उनका परिचय प्राप्त करे। अपने क्षेत्र की पत्र – पत्रिकाओं का पाठ्य – पुस्तकों के अलावा अध्ययन करे।

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(1) भाषा के विविध क्षेत्रों का परिचय भाषा के चार मुख्य क्षेत्र हैं –

  1. सुनना – श्रवण,
  2. बोलना – भाषण,
  3. पढ़ना – पठन,
  4. लिखना – लेखन।

इस विषय का समावेश पाठ्यक्रम में इसलिए किया गया है कि बालक कक्षा 11वीं के स्तर तक भाषा के इन चारों स्तरों से भली – भाँति परिचित हो जाता है। अब उन्हें शिक्षकों द्वारा अपनी इन भाषायी योग्यता के विस्तार की प्रेरणा देना है। वह अपनी इस योग्यता से पाठ्य – पुस्तक के अतिरिक्त भी कुछ पढ़े लिखे और इस क्रिया में रुचि उत्पन्न करने के लिए शिक्षक छात्रों को यह गृह कार्य दें कि वे अपने – अपने क्षेत्र की बोली की कहावतें,चुटकुले और लोकगीतों का संग्रह करें। इसके अतिरिक्त छात्रों को कक्षा में तथा गृह कार्य के रूप में यह लेखन कार्य दिया जाये कि वे अपने क्षेत्र की पत्र – पत्रिकाओं को पढ़ें और उसमें उन्हें जो भी विवरण रोचक लगे उसे अपने शब्दों में लिखें। इससे उनका पठन – कौशल और लेखन – कौशल विकसित होगा।

छात्र के श्रवण कौशल को विकसित करने के लिए वह दूरदर्शन के रोचक कार्यक्रमों को सुने और उसे जो भी कार्यक्रम रुचिकर लगे उसे लिखे।

इस प्रकार छात्रों को पाठ्य – पुस्तक के अतिरिक्त अपनी भाषायी योग्यता विस्तार का अवसर प्राप्त होगा।

मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा वह राज्य है जिसकी सीमाओं को सात प्रदेश घेरे हैं। अत: मध्य प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्रीय भाषा या बोलियाँ अस्तित्व में हैं।

शिक्षक अपने – अपने क्षेत्र की भाषा के लोकगीतों एवं कहावतों का संग्रह छात्रों से करवायें। हमारे प्रदेश में मुख्य रूप से मालवी, निमाड़ी, बुन्देलखण्डी, बघेलखण्डी, छत्तीसगढ़ी, मराठी, गुजराती,मारवाड़ी बोली जाती हैं, अतएव इनके चुटकुले, गीत,कविता,कहावतें एकत्रित करें। उदाहरण के तौर पर मालवा,निमाड़ क्षेत्र का मुख्य समाचार – पत्र है—’नई दुनियाँ’, जो इन्दौर से प्रकाशित होता है। उसमें प्रत्येक बुधवार को इस तरह की रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। इस क्षेत्र के छात्र उनका संग्रह कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में चालीस से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अलग – अलग बोलियाँ हैं। झाबुआ के निवासी भील हैं और इनकी भीली बोली में मुहावरों का अत्यधिक प्रचलन है। हम यहाँ कुछ भीली मुहावरे और उनका हिन्दी अर्थ दे रहे हैं। छात्र अपने अध्यापकों की सहायता से अपने आस – पास बसने वाले आदिवासियों की लोक कथाएँ, कविता, मुहावरे, कहावतें संकलित कर उनका हिन्दी अनुवाद करें।
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सुबह दोपहर, शाम समय की सूचना वाले मुहावरे
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भीली बोली पर मालवी, राजस्थानी, गुजराती भाषाओं का पर्याप्त प्रभाव है।

  • भीली कहावतें
  1. भूखला तो भूखला सूकला खरी – भूखा ही सही पर सुखी तो हूँ।
  2. भील भोला ने चेला – भील भोले होते हैं।
  3. खारड़ा माँ काँटो,भील माँ आटो – भील में बदले की भावना रहती है।
  4. पाली पपोली मनाव राखवू घणो मसकल है – भील को खुशामद से मनाना बहुत मुश्किल है।
  5. ढोली नौ सौरो गाद्यो नी मरे न भीलनुं सौरो रोद्यो नी मरे – ढोली का लड़का गाने से और भील का लड़का रोने से नहीं मरता – वे अभावों से जूझते रहते हैं।
  6. भील भाई ने डगले दीवो – भील भले ही अभावग्रस्त रहे, वह सदा निश्चिन्त रहता हैं।

कुछ बुन्देली बोली की कहावतें

  1. खीर सों सौजं,महेरी को न्यारे।
  2. पराई पातर को बरा बड़ो।
  3. पराये बघार में जिया मगन।
  4. देवी फिरै बिपत की मारी पण्डा कहै करो सहाय।
  5. रौन कुमरई की कुतिया (लोककथन)।
  6. नौनी के नौ मायके, गली – गली सुसरार।
  7. जौन डुकरिया के मारे न्यारे भए बई हिस्सा में परी।
  8. माँगे को मठा मोल पर गौ।
  9. कानी अपने टेण्ट तो निहारत नईया दूसरे की फुली पर पर के दैखत।
  10. कनबेरी देवो।
  11. मर गई किल्ली काजर खों।

(2) पहेलियाँ

1. भीली भाषा – उत्तर
1. गाय वाकड़ी ने बेटी डाकणी – तीर – कमान
2. धवल्या बुकड़ा ने बारेह खाल – प्याज
3. औंधे बाटके ने दही लटके – कपास
4. भूत्या हेलग्या ने पेटा में दाँत – कद्दू
5. छोटी – सी दड़ी,दगड़ – सी लड़ी – सुपारी

2. बुन्देली
1. थोड़ो सो सोनो,घर भर नोनो – दीपक
2. दीवार पर धरो टका,ऊको तुम उठा पाओ न बाप न कका – चन्द्रमा
3. ठाड़े हैं तो ठाड़े हैं, बैठे हैं तो ठाड़े हैं। – सींग

3. निमाड़ी
1. एक बाई असा कि सरकजड नी – दीवाल
2. काली गाय काँटा खाय,पाणी देखे बिचकी जाय – जूता

4. बघेली
अड़ी हयन,खड़ी हयन, लाख मोती जड़ी हयन बाबा करें बाग में दुशाला ओढ़े पड़ी हयन – भुट्टा मक्के का

5. छत्तीसगढ़ी
पेट चिरहा, पीठ कुबरा – कौड़ी

6. मालवी
नानो सो चुन्नू भाय, लम्बी सारी पूँछ नी चाल्या चुन्नू भाया,पकड़ी लाउ – सुई धागा

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(3) चुटकुले

(1) न्यायाधीश – तुम चार साल पूर्व भी एक ओवर कोट चुराने के अपराध में इस अदालत में आ चुके हो।
अपराधी – आप ठीक कहते हैं। लेकिन ओवर कोट इससे अधिक चलता भी कहाँ है।

(2) मजदूर क्या मालिक ! गधे के समान काम कराया और एक रुपया दे रहे हो। कुछ तो न्याय करना चाहिए।
मालिक – न्याय ! हाँ तुम ठीक कहते हो। मुनीम जी,इसका रुपया छीन लो और बाँध कर इसके सामने थोड़ी – सी घास डाल दो।

(3) पिता हमारा लड़का आजकल बहत तरक्की कर रहा है। पड़ौसी – अच्छा,कैसे?
पिता – पुलिस ने उस पर घोषित इनाम की रकम पाँच हजार से बढ़ाकर दस हजार कर दी है।

(4) लोकगीत

निमाड़ी कवाड़ा
बड़ा – बड़ा तो वई गया
ढोली कय कि पार उतार
वई का वई गया ना
उतरई की उतरई लगी
एकली कुतरी कई भुख
न कई कंसुऱ्या ले
फट्या कपड़ा बुड्डा ढोर
इनका दाम लई गया चोर
ऊँट थारो कई वाको
ऊँच कय सब वाको
थारी बइगण म्हारी छाछ
भली बघार म्हारी माय

प्रस्तुति : हरीश दुबे

साथन : निमाड़ी

‘मँहगई
एको राज ओको राज
हुया मँहगा अनाज।
काँ छे घोटालो,
समझ मज आव नी
उनकी वात।
हम, पाँच बरस तक
देखाँ, रामराज की वाट

– अखिलेश जोशी

विश्वास
आस बाँधी ने
दो कदम
चाल्यौ थो
कि
टाँग घैची लिदी !
पाछै
फरीने देख्यो आपणा वारा पे भी
विश्वास नी करनो कदी!!

– जगदीश सरगरा

वात कई कई
बैल गाड़ी की वात कई कयणुं
खेत वाड़ी की वात कई कयणुं
मीठा लागज जुवार का रोटा
नऽ अमाड़ी की वात कई कयणुं
जे खड़ बुनकर वणा व मयसर का
उनी साड़ी की वात कई कयणुं
दुध – घी की कमी नि होणऽ दे
भैस – पाड़ी की वात कई कयणुं
घर क राखज चगन – मगन केतरो
छोटी लाड़ी की वात कई कयणुं
गाँव मऽ उनको बड़ो नाव वजज
माय माता की वात कई कयणुं
वोली न अपणी जगा सब छे ‘हरिश’
पण निमाड़ी की वात कई कयणं

– हरीश दुबे

गजल हुण रे भाया म्हारी वात।
हद की दी मनखाँ की जात॥
जणीं जण्या पारया पोस्या,
अबे लंगावे वर्ण पे घात।
वा,दर – दर की माँगे भीख
जण के जीवे बेटा हात।
लाड्या की होरयां बारी,
मंगता अशो करयो उत्पाद।
मनखाँ ती वंची ने रो
झूठी कोनी या केवात।

– प्रमोद रामावत

फागुण का दोहा
फागुण का पगल्या पड्या,बदल्या सारा रंग।
ढोलक बजी चौपाल पऽ खडक्या खड़ – खड़ चंग।।
सरसों पीली हुई गई,महुवो वारऽ गन्ध।
फूल – फूल पऽ भैरा दौड़,पीणऽख मकरन्द।।
अम्बा भी बौरइ गया, फूल्या घणा पलास।
कोयलिया की कूक की,प्यारी लाग मिठास॥
अबीर गुलाल का साथ मँऽ,रंग की उड़ी फुहार।
हिली – मिली न मनवाँ, आवो यो तेव्हार ॥

– चन्द्रकान्त सेन

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एल्याँग ……. वोल्याँग
एल्यांग गुरुजी
पकावणऽ लग्या
दलिया न दाल
वोल्याँग हुई
शिक्षा – बे – हाल
शेर की सी उनकी नियति
एकाजऽ लेण
जिन्दगी अकेलीज बीती
वोटर सी पूछो
ईज सरकार रखोगा
कि बदलोगा?
बोल्या अगला
को काई भरोसा?
ऊ एतरी धाँधली
चलऽन दे कि नई?

– ललित नारायण उपाध्याय

ऊँचो मोल को है तमारो पसीनो
साथे लइलाँ हिम्मत ने हेली – मेली ताकत,
तमारा आगे माथो टेकी ऊबी रेगा आफत,
काय को डर धरती रो घर अन से भरया चालो।
चालो भरयां चालो, मरदाँ चालो।
घणो ऊँचों मोल को है तमारो पसीनो
आलसी के समझावो के कसो होय है जीनो
स्वास्थ छोड़ी मजदूरी री पूजा करदाँ चालो।
चलो मरदाँ,चालो, चालो मरदाँ चालो।
गाँवों में कबीर पंथ आज भी तो गावे है
परेम से तो मारा भाई दुनिया जीती जावे है
लड़ता – मरता आदमी ने आपण वरजाँ चालो
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो
आदिवासी भाई मारा धणो दुःख पायो
नीचे को यो आदमी भी अपणी माँ को जायो
तो छापर वाली टापरी ने पक्की करदाँ
चालो चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो।

– मोहन अम्बर

सन्दर्भ : होली

कई हँसो बाबूजी !
यूँ दूर ऊबा
नाक सिकोड़ी के
कई हँसो ओ बाबूजी,
हमारे
कीचड़ का अबीर गुलाल से
होली खेलता देखि के।
हमारो तो
योज बड़ो तीवार है
यो
कीचड़ को जरूर है, बाबूजी
पणे
तमारी जग – मग दीवाली से
घणों अच्छो है,
देखिलो
दोल्यो /धुल्यो
दोड़ी – दोड़ी के
खाँकरा की केशूड़ी को
सन्तरिया रंग के
एक – दुसरा का ऊपर ढोलिरिया
मन का बन्द किमाड़
खोलीरिया
आत्मा से धीरणा को
कीचड़ धुइरिया है
काल तक जो प्यासा था
एक दूसरा का खून का
बाबूजी
आज ऊई पाछा
एक हुइरिया है।

– बंशीधर ‘बन्धु’

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अजगर से बड़ा साँपजी
थोडी – घणी लिखी या पाती.
आखी समजो बाप जी।
यो कई हुई रियो इनी दुनियाँ में,
कई करूँ इको जाप जी।
तम भी पड्या हो ईका चक्कर में
घणा ईमानदार था साबजी।
भेती गंगा में जो हाथ नी धोया तो
जनम भर होयगो भोत संतापजी।
तूज अकेली जेरीलो नी हे धरती पे,
बेठ्या हे, अजगर से बड़ा साँपजी।
घणी देर से सोया हो, अब तो जागो,
जगावा को कद से करि रियो हूँ अलापजी।
कई लाया था ने कई ली जावगा,
आता – जाता को मत करो विलापजी।

– हुकुमचन्द मालवीय

खोटो नरियल होली में !
मन में आदर भाव नी रियो, राम नी रियो बोली में,
नगद माल सब जेब हवाले,खोटो नरियल होली में।

स्वारथ आगे सब कईं भूल्या, कितरा कड़वा हुईग्या हो,
फिर भी थोड़ी तो मिठास है पाकी लीम लिम्बोड़ी में।

कई गावाँ कई ढोल बजावाँ, कई स्वागत सत्कार कराँ,
डण्डा – झण्डा साते लइने,नेता निकले टोली में।

कुरसी मिली तो मोटरगाड़ी से,तम नीचे नी उतरो,
नेताजी वी दन भूलीग्या,रेता था जद खोली में।

खून, पसीना, साँते बईग्यो,पेट पीठ से चोंटीग्यो,
सपनो हुईग्यो धान ने दलियो,टाबर रोवे झोली में।

कुल की लाज बहू ने बेटी, भूल्या सगली मरयादा,
बहू की जगे दहेज बठीग्यो, अब दुल्हन की डोली में।

नारी को सम्मान घणों है, भाषण लम्बा – चौड़ा दो,
पण मौका पे चूको नी तम, भावज बणाओ ठिठोली में।

– ओमप्रकाश पंड्या

तम देखी लेजो
बन्द कोठड़ी म
गरम गोदड़ी ओढ़ेल
सोचतो मनख;
कस लिखी सकग
ठण्ड न क कड़ायलां गीत,
फटेल चादरा का दरद
अन टूटेल झोपड़ा की वारता?
कसा कई सकग
फटेल हाथ – पाँव की
बिवई न में
खोयेल नरमई,
अन सियालां म
बगलेलो
डोलची दाजी को दम !
भई,
तम कोशिश करी न
देखी ले जो;
पन असली वात न क
कभी नी कई सकग ॥

– शरद क्षीरसागर

जीवन कँई हे?
जीवन एक मेंकतो
हुवो फूल हे
हवेरा, खिले अरु हाँजे
मुरजई जावे
समजी नी जिने
जीवन की परिभासा
ऊ कदी रोवे
कदी खिलखिलावे
जीवन पाणी को
ऊठतो हुवो बुलबुलो हे,
देखतां – देखतां
जिको नामो निसान मिटी जावे
फिर बी हम
जीवन को अरथ नी जाणां
तपतो हुवो सूरज बी
हाँजे ठण्डो वई जावे।

– कन्हैयालाल गौड़

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(5) लोक कथाएँ

लोक कथाओं में मानव का सुकोमल एवं हृदय को छू जाने वाला इतिहास अंकित है। आदमी ने जो कुछ किया, उसका लेखा – जोखा तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन अपने मनोजगत् में उसने जो कुछ भी सोचा, विचारा, रंगीन कल्पनाओं का ताना – बाना बुना, सुन्दर सपने संजोए उन सबका विवरण इन लोक कथाओं में सुरक्षित है।

सदियों से ये लोक कथाएँ मनुष्य का मनोरंजन करती आयी हैं। इनमें कुछ भी असम्भव नहीं होता है। इनमें शेर और साँप भी दोस्ती निभाते,पक्षी सन्देश पहुँचाते और जरूरत पड़ने पर चित्र भी बोलने लगते हैं। इनमें मनुष्य सोचने के साथ ही सात समुद्र पार पहुँच जाता है,क्षण में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है और किसी द्वीप की असीम सुन्दरी से शादी करता है।

इनकी जो सबसे बड़ी विशेषता है वह यह है कि ये मानवीय तत्वों से भरपूर हैं। इनमें देवी – देवता के माध्यम से भी मानव जीवन की कहानी कही गयी है। चाहे सूर्य हो या ब्रह्मा, सावित्री, वे सब यहाँ मानवीय स्वरूप लेकर और पारिवारिक प्रतीकों के सहारे सामाजिक जीवन को समृद्ध कर अपना योगदान देते हैं।

इन कथाओं में व्यक्ति, स्थान या समय,का कोई महत्त्व नहीं होता। इनकी उँगली पकड़ कर ही आदमी ने सदियों की दूरी को लाँघा, देश – विदेश की यात्राएँ की और सुदूर रेगिस्तान से लगाकर अपने खेत – खलिहान और घर के आँगन के सहारे सारी रात जागकर बिता दी है। इन्होंने निराशा के क्षणों में मनुष्य के मन में अमिट आशा का संचार किया है।

(क) छत्तीसगढ़ी कहानी
नियाय के गोठ

चैतू ठाकुर बिमार हावे। गाँव के सबो झन झोला देख देख के जावत हैं। तीर तिखार के गाँव के कतको सज्जन अऊ बड़े किसान किसनहा झोला देखे बार आता हे। आखर कावर नइ आही ओखर सुझाव सब झन बर गुरतर हावे दूरिहा दूरिया के मन ऐला जानाथे। चाहे कइसनो मुशकुल बात होय ठाकुर ओला दुइच छिन में निबटा देय। वइसे ओखर तीर कोनो बड़े जइदाद, नइहे नहिं सोना चाँदी के खजाना। ओखर तीर सिरिफ दुठन बांही के भरोसा हावे। एक छोटे असन घर बाड़ी थोरकिन खेत अउ गिनती ढोर डंगर। रात दिन मिहनत करना ओखर नियम है।

एक जमाना रिहिस के वोहा गरीब रिहिस। मजदूरी करके अपन पेट ला चलाय। तब वो हा परम संतोषी रिहिस अऊ आजो भी वोला। चिटिक मात्र घमण्ड नहीं हे यही कारण है कि गाँव ‘भर के मन वोला मानये।

आज वो ही हा बिमार हे त पुरा गाँव दखी है। सबो झन भगवान ले पराथना करत है कि ठाकुर जल्दी बने हो जाय।

ठाकुर परिवार में कुल चार पराणी हावे। ठाकुर ओखर घरवाली ओखर बेटा अउ अनाथ भांचा। हावो तो भांचा फेर ठाकुर बोला अपने बेटा ले चिटिक मात्र कमती नहीं समझे। ऊखर असन बेटा बीस बरस के लगभग अउ भांचा मोहन अठरह बरस के लगभग हावे। बड़ मिहनती हे। बलराम कोनो काम बूता म ओखर आगू नई टिकै।

बलराम के सगई होने। ठाकुर सोचे कि मोहन बर भी कहूँ बात चलाये जाय त दूनो के बिहाव एक संग निपट जाही। ठकुराइन के मन मां घलो यही बिचार उठे।

फेर एकोती बलराम बड़ा उलझन अउ उदंड होगे। न माँ के सुनय न बाप के सुनय। कभू भूले भटके खेत के मेड नहीं बूंदय न खलिहान में बैठय। लोगन कहिये कि बलराम ताश पत्ती खेले बर सीखेगे हे। कोनोन कहाय कि ससुराल वाला मन वोला बहिकाल फुसलात हावे। ससुराल वाला मन डरावत हे कि कहूँ मोहन का बलराम के हिस्सा में बाँटा झन ले लय।

चैतू ठाकुर ये सब चाल ल समझत हावे फिर मोहन ल ये पाय कि नइ भाय कि वा हा भांचा हे फेर ये पाय के चाहे कि ओखर माँ बाप गरगे हे, बल्कि ठाकुर ओखर मिहनत देख खुश होवय। खेती बारी के संगे वो हा घर के चेता सुरता रखथे। ठाकुर ठकुरइन की कतेक सेवा कर थे।

ये बात ठीक है कि बलराम ऊखर बेटा है फेर कतेक मुरुख। काम देखता बोला जर आ जाये। भेजबे उत्तर दिशा त वोहा जाये दक्षिण दिशा। वोहा ठीक से अपने चारों खेत ला छलख नई जानय कालि के दिन वोला खेत दे दिए जाय त का होही?

ठाकुर बीमार हावे। बलराम ला ओखर ससुरार वाला मन बलवा ले हय। अभी तक ले लहुट के नई आये हे। खबर भिजवाय गय हय, फिर ससुराल ले कोनो मनख नइ आये हे।

संझा के बेरा बलराम अपना दलदल के संग ठाकुर के आगु में अइस। राम राम के बाद ससुरार पक्ष के जन विहिस कि ठाकुर अब ये थोरे दिन के मेहमान हावस ऐखर सेती तोला अपन संपत्ति ला बलराम के नाम देना चाही।

ये सनके ठाकर ला कोनो अचंभा नइ होइस। अइसन बात के खियाल ओला आग ले रिहिस। बोलिन – “तुम्हार बात तो ठीक फिर बलराम अभी लइका है। काम धाम के सूझ अभी बने अइसन नइ हे।”

अतका सुनके रिहिस बलराम भड़क गये—बापू के त बुध सठिया गेहे। जब देख बेत मोला लइका समझते अऊ ये सब मोहन के सेती होवत हे। मांहा घलो ओखरे पक्ष ले थे। फेर बापू आज त तोला फइसला करेच बर पड़ ही।

ठाकुरहा जल्दी ले गाँव के पाँच पंच बुलबइस फिर ठकुराइन ले पुछिस मोहन कहाँ है? ठकुरइन बतइस – वो हा मंझनिया के जंगल चल दे हावे। एक ठन बइला बीमार हावे ले तेखर बर जड़ी बुटी लाने बर गये है।

ठाकुर हां पंच मन ला बलराम के मंशा बतलइस। सबला बड़ अचंभा होइस फेर बलराम के संग ओखर ससुरारी मन ला देख के चुप रहिगे। ठाकुर बाते बात में बलराम लातियारिस बेटा थोरकिन खलिहान में जाके देख आतो धान मिजाइ के कुछ उडल हे या नइ। बलराम भागत गइस अउ आके बतइस कि खलिहान म दूनों नौकर बइठे बीड़ी पियत हावे।

ठाकुर फेर विहिस – ऊखर ले पूछ नइ लेतेस बेटा के दौरी कतेक बेर म चल ही। बलराम हा आज्ञाकारी बेटा अइसन फेर गइस अऊ आके खबर दइस कि अभीत सबो बाइला नइ आये हे। ठाकुर पूछिस – “आखिर कतका बइला कमती पड़त हे?”

बलराम गल्ती कबलिस के बाप में तो गिनती करे बार भुला गये। अभीच जाके पता करथ हंव। बलराम लहुटके बड़ा घमण्ड करके बतइस दुबइला कमती है। अऊ तब ठाकुर हा पूछिस – “उहां अभी कुल कतका बइला हे।”
अऊ लोगन देखिन कि बलराम फेर बइका के गिनती करे बर भागिस। ओतकेच बार मोहन आगे। वे हा सब झन के पांव परिस अऊ चले ल धरिस। तब ठाकुर बोलिस – बेटा थोरकिन पता लगा के आ धान वे भिंजइ होही के नई।

तभेच बलराम आके बइला के संख्या बताय लगिस। सब चुप रहिन। थोरिक देर बाद मोहन आके बतइस कि कंगलू अउ मंगलू इनो मिल के पझ डार डाले हावे। ढेर लगा चुके है। दुबइला के कमी रिहिस त बहू झगरू देके गेहे। रात के खां पी के दौरी शुरू हो जाही। फिकर के कोनो बात नइहे।

ऐखर बाद कोनो कुर्छ नई बोलिन। ठाकुर पारी पारी से सबके मुंह ला देखे लगिस। अऊ आखिर में बलराम ले बोलिस कुछ समझ में आइस बेटा, तोर अऊ मोहन में का फरक हे? तें घंकभु ये समझे के कोशिश नई करेस के भुइयां ह मेहनत चाहथे। खेती – बारी करना हंसी – ठट्ठा नोहे। बड़ सूझ के काम हे। मोहन तो ले के छोटे हे फेर कतेक लायक हे अऊ तेहा कतेक नालयक पहिले मोर विचार रिहिस कि तुम दूनो ला संपत्ति के आधा – आधा हिस्सा दे दवं,फेर अब एक अ रास्त ये रही कि तोता ईमानदार किसान बने बर पड़ही जइसे ते मोहन ला देखत हस। तबहि तेहां आधा हिस्सा के हकदार होबे।

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ठाकुर के फइसला सबके समझ में आ गइस। आज ये फेर साबित होंगे कि ठाकुर हमेशा नियाय के ही बात कहिये। खड़ी बोली में अनुवाद न्याय की बात चैतू ठाकुर बीमार है। गाँव के सब लोग उन्हें देखकर जा चुके हैं। आस – पास के गाँवों से भी अनेक प्रतिष्ठित किसान उन्हें देखने आ रहे हैं। आखिर क्यों न हो? उनका व्यवहार सबके लिए इतना नम्र रहा है कि दूर – दूर तक लोग उन्हें जान गए हैं चाहे कैसी भी उलझी समस्या क्यों न हो,चैतू ठाकुर अपनी सूझ – बूझ से उसे आनन – फानन में सुलझा देते हैं। वैसे उनके पास लम्बी चौड़ी जायदाद नहीं हैं,न ही सोने – चाँदी के अनगिनत सिक्के हैं। उन्हें तो केवल अपनी बाँहों का भरोसा है। एक छोटा – सा घर है। बाड़ी है,कुछ खेत हैं और गिनती के ढोर – डांगर हैं। रात – दिन मेहनत करना ही उनका नियम है।

एक समय था कि वे गरीब थे। मजदूरी करके अपना पेट भरते थे। अब भी वे परम संतोषी हैं और आज भी घमण्ड उन्हें छु तक नहीं गया। यही कारण है कि गाँव के लोग उन्हें मानते हैं।

आज वे बीमार हैं, तो सारा गाँव दु:खी है। ईश्वर से सब के सब यही प्रार्थना कर रहे हैं कि वे जल्दी अच्छे हो जायें।

उनके परिवार में कुल चार प्राणी हैं। वे,उनकी पत्नी,उनका बेटा और अनाथ भांजा। है तो भांजा,पर वे उसे अपने बेटे से जरा भी कम नहीं मानते। उनका अपना बेटा बलराम लगभग बीस साल का है। भांजे का नाम है मोहन, यही कोई सत्रह – अठारह वर्ष का होगा। बड़ा मेहनती है। बलराम तो उसके किसी काम में भी नहीं ठहर सकता।

बलराम की सगाई हो चुकी है। ठाकुर सोचते हैं कि मोहन के लिए भी कहीं बात हो जाय तो दोनों का विवाह एक साथ ही निपटा दें। ठकुराइन के मन में भी यही बात है।

परन्तु बलराम इधर बड़ा मनमौजी हो गया है। न माँ की बात मानता है,न बाप की सुनता है। खेत पर कभी भूलकर भी नहीं जाता है और न ही खड़ी भर खलिहान में बैठता है। लोग कहते हैं कि बलराम आजकल ताश खेलने लगा है। कुछ लोगों का यह भी ख्याल है कि उसके ससुराल वाले उसे बहका रहे हैं। ससुराल वालों को शायद यह डर है कि कहीं मोहन बलराम का हिस्सा न बॅटा ले।

चैतू ठाकुर यह सब समझते हैं। वे मोहन को केवल इसलिए नहीं चाहते कि वह उनका भांजा है. उसके माँ – बाप मर गए हैं,बल्कि ठाकुर उसकी मेहनत देखकर खुश हैं। खेती – बारी के साथ – साथ वह घर का भी कितना ध्यान रखता है। उन दोनों की कितनी सेवा करता है।

ठीक है कि बलराम उनका बेटा है किन्तु कितना मूर्ख है। काम के नाम से ही ज्वर आ जाता है। भेजो उत्तर दिशा की ओर तो दक्षिण चला जाता है। उसे तो ठीक से अपने चार खेतों का भी ज्ञान नहीं है और कल यदि उसे सारे खेत दे दिये जाएँ तो क्या होगा?

ठाकुर बीमार है। बलराम को उसकी ससुराल वालों ने बुलवा लिया है। अभी तक वह लौटकर नहीं आया। सूचना भिजवाई गई थी,परन्तु उसकी ससुराल से भी कोई नहीं आया। दूसरे दिन सुबह बलराम आ गया। ठाकुर ने सुना कि उसके साथ कुछ लोग भी आए हैं, पर अभी तक कोई सामने नहीं आया।

शाम के समय बलराम अपने दल के साथ ठाकुर के सामने आया। राम – राम के बाद ससुराल पक्ष के एक आदमी ने कहा कि ठाकुर अब तो थोड़े ही दिन के मेहमान हैं, इसलिए उन्हें अपनी सम्पत्ति बलराम के नाम लिख देनी चाहिए।

यह सुनकर ठाकुर को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात की कल्पना उन्हें पहले से ही थी। बोले – “बात तो ठीक है, किन्तु बलराम अभी बच्चा है। काम – धाम की सूझ अभी उसे नहीं इतना सुनना था कि बलराम उबल पड़ा – “बापू की तो बुद्धि सठिया गई है। जब देखो तब मुझे बच्चाही समझते हैं और यह सब उस मोहन के कारण ही है। माँ भी उसका ही पक्ष लेती है.लेकिन आज तो बाबू को फैसला करना ही पड़ेगा।”

ठाकुर ने शीघ्र ही गाँव के पंच बुलवा लिए। फिर ठकुराइन से पूछा “मोहन कहाँ है?” ठकुराइन बोली – “वह तो दोपहर से ही जंगल चला गया है एक बैल बीमार है,उसी के लिए कुछ जड़ी – बूटी चाहिए थी।”

ठाकुर ने पंचों से बलराम की इच्छा कह सुनाई। सबको बड़ा अचम्भा हुआ,परन्तु बलराम के साथ उसकी ससुराल वालों को देखकर चुप रह गए। ठाकुर ने बात ही बात में बलराम से कहा – “बेटे जरा खलिहान जाकर देख तो आओ धान मिजाई का कुछ डौल है या नहीं।”

बलराम भागकर गया और आकर बताया कि खलिहान में दो नौकर बैठे बीड़ी पी रहे हैं। . ठाकुर ने कहा, “उनसे पूछ नहीं लिया बेटा कि कितनी देर बाद दौरी चलेगी?”

बलराम एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह फिर गया और जाकर उसने सूचना दी कि अभी तो पूरे बैल ही नहीं आये।

ठाकुर ने फिर पूछा – “आखिर कितने बैल कम पड़ते हैं?” बलराम ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा – “बापू मैं तो गिनती करना ही भूल गया। अभी जाकर पता लगाता

बलराम ने लौटकर गर्व के साथ बताया कि दो बैल कम पड़ते हैं। तभी ठाकुर ने पूछ लिया – “वहाँ अभी कुल जमा बैल कितने हैं?”

और लोगों ने देखा कि बलराम बैलों की गिनती करने फिर खलिहान की ओर भागा जा रहा है।

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तभी मोहन आ गया। उसने सबके पाँव छुए और चलने लगा। ठाकुर बोले – “बेटे,जरा पता तो लगाओ कि आज धान की मिजाई हो सकेगी या नहीं।”

तभी बलराम आकर बैलों की संख्या बताने लगा। सब चुप रहे। जरा देर बाद मोहन ने आकर बताया कि कंगलू और मंगलू दोनों मिलकर पैर डाल चुके हैं, ढेर लगा चुके हैं, दो बैलों की कमी थी सो अभी झगरू दे गया है। रात को खा – पीकर दौरी शुरू हो जायेगी। चिन्ता की कोई बात नहीं।

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। ठाकुर बारी – बारी से सबका चेहरा देखने लगे और अन्त में बलराम से बोले कुछ समझ में आया बेटे,तुममें और मोहन में क्या फर्क है? तूने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं कि जमीन मेहनत माँगती है। खेती बारी करना कोई है। बड़ी सूझबूझ का काम है। मोहन तुझसे छोटा है, पर कितना लायक है और तू कितना मागता है। खाता बारा करना काइहसा – ठट्रानहा नालायक है। पहले मेरा विचार था कि तुम दोनों को मैं अपनी सम्पत्ति का आधा – आधा हिस्सा दे दूँ, किन्तु अब एक शर्त यह भी रहेगी कि तुझे ईमानदार किसान बनना होगा, जिस प्रकार तू मोहन को देख रहा है, तभी तू आधे हिस्से का हकदार होगा।

ठाकुर का फैसला सबकी समझ में आ चुका था। आज यह बात पूरी तरह से सिद्ध हो गयी कि ठाकुर हमेशा न्याय की ही बात कहते हैं।।

(ख) निमाड़ी लोक कथा
झूठी मंजरी

एक थी चिड़ई,एक थो कबूतर,एक थो कुत्तो और एक थी मांजरी। सबइ न विचार करयो कि अपुण खीर बणावा।

कोई लायो लक्कड़,कोई लायो पाणी,कोई लायो शक्कर,कोई लायो दूध उन खीर तैयार हुई गई।

कहयो चलो सब खाई लेवां,मांजरी न कहयो – म्हारा तो डोला आई गयाज। उन उ डोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई।

सबन अपणे अपणा वाटड की खीर खाई न बचेल का ढाकी न धरी दियो।

सब अपणा, अपणा काम न पर चली गया, तंवज मांजरी उठी उन सबका वाय की खीर खाई न डोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई। सांझ ख जंव सबई काम पर सी आया तो देख्यो खीर को बासरण खाली थो।।

एक एक सी पूछयो क्यों भाई तुम न खीर खाई ज। . सबई न न मना करी दियो। मांजरी से पूछयो तो वा बोलो हऊँ काई जाणु म्हारो तो डोला आयाज। हऊ दिन भर सी पट्टी बांधी न पड़ोज। सब न तै करयो कि एक सूखा कुआ पर झूलो बांध्यो सब ओपर बारी – बारी सी बढी न कहे कि मन खीर होय तो झूलो टूटी जाये। जेन खीर खाई हायेगा ओकी बखत झूला टूटी जायेगा। पहल चिड़ी बठी बोली – “ची,ची,मन खीर खाई हो तो झूलो टूटी जाय,झूलो नो टूटयो।”

फिर कबूतर बठ्यो बोल्यो गुटरू गूं – गुटर गूं, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिरी कुतरो बठ्यो बोल्यो – भों – भों, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिर मांजरी बठी बोली – म्यांउ म्यांउ मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय।

झूलो तो टूटी गयो अन मांजरी सूखा कूआ म पड़ी गई। खेल खतम पैसा हजम।

खड़ी बोली में अनुवाद

झूठी बिल्ली

एक थी चिड़िया, एक था कबूतर, एक था कुत्ता और एक थी बिल्ली। सबने मिलकर विचार किया कि अपनी खीर बनायें।
कोई लाया लकड़ी,कोई लाया पानी,कोई लाया शक्कर,कोई लाया दूध और खीर बनकर तैयार हो गयी।

कहा, चलो सब खा लें।
बिल्ली ने कहा – “मेरी तो आँखें आई हैं” और वह आँखों पर पट्टी बाँध कर सो गई। सबने अपने – अपने हिस्से की खीर खाई और शेष बची हुई खीर को शाम के लिए ढाँक कर रख दिया। सब अपने – अपने काम पर चले गये। तब,बिल्ली उठी और सबके हिस्से की खीर खाकर, फिर आँखों पर पट्टी बाँधकर सो गई। शाम को जब सब काम पर से आये,तो देखा,खीर का बरतन खाली था। हर एक से पूछा – “क्यों भाई तुमने खीर खायी है?” सबने इनकार किया।

बिल्ली से पूछा,वह भी बोली – “मैं क्या जानू? मेरी आँखें आयी हैं,सुबह से पट्टी बाँधे पड़ी हूँ।” तब सबने विचार किया कि एक सूखे कुएँ पर कच्चे धागे से झूला बाँधा जाये। सब बारी – बारी से उस पर बैठे और कहें – “मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाये।” जिसने खीर खायी होगी,उसकी बार झूला टूट जायेगा।

पहले चिड़िया बैठी – “ची – ची, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर कबूतर बैठा, बोला – “गुटर गूं – गुटर – गूं, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर कुत्ता बैठा, बोला – “भौं – भौं,मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।” झूला नहीं टूटा। फिर बिल्ली बैठी, बोली – “म्याऊँम्याऊँ,मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाय।”

झूला था सो टूट गया और बिल्ली थी सो सूखे कुएँ में गिर गयी। खेल खतम—पैसा हजम।

(ग) मालवी कहानी
पीपल – तुलसी

कणी गाम माय सासू अर बऊ रेती थी। एक दिन सासू ने बऊ तो कियो के मू तीरथ कारवा सारू जरूरी हूँ,तुम अपणे याँ जो दूध दही होवे है ऊ बेची – बेची के रुपया भेलाकर लीयो। अतरो कइके सासू चलीगी।

चैत – बैसाख को माइनो आयो तो बऊ सगलो दूध – दई लई जई के पीपल अर तुलसी म सीची देती अर फेरी खाली बासन लइके घरे मेली देती। सास तीरथ करी के पीछो घरे अई तो बीने बऊती दूध अर दई का रुप्या मांग्या। बऊ ने क्यो के बई मूं तो सगलो दूध अर दई पीपल तुलसी म सींचती री हूँ,म्हारा कन रुप्या नी है। पण सासू ने कियो कई बी होवे जो – वी हो म्हारे तो रुप्या देणा पड़ेगा। तो बऊ पीपल अर तुलसी का कने जइके बैठीगी, अर वीनती बोलो के म्हारी सासू म्हार ती दूध दही का पइसा मागे है। पीपल – तुलसी ने कियो के बेटी – हम्हारा कन रुप्या – पइसा काँ है? इ भाटा कोंकरिया जरूर पड़िया है इनके भलाई – उठई के लई जा। बऊ सगला कोंकरिया भाटा उठई के घेर लई अर अई घरे लइके अपण कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन सास ने फेरी रुप्या मांग्या तो बऊ ने अपणो कोठो खोल्यो। बऊ ने देख्यो कि सगला भले ही ले जाओ। सास कंकड़ – पत्थर लेकर खुशी – खुशी घर आयी और उसने कंकड़ – पत्थर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन जब कमरा खोला गया तो सास क्या देखती है कि सारा कमरा साँप और बिच्छुओं से भरा पड़ा है।

सास ने बहू से पूछा कि बहू, यह क्या बात है? तू जो कंकड़ – पत्थर उठाकर लायी थी। उनके तो हीरे – मोती बन गये और मैं जो कंकड़ – पत्थर उठाकर लायी। उनके साँप – बिच्छू बन गये? बहू ने सहज भाव से उत्तर दिया कि सास जी मैंने पीपल – तुलसी को शुद्ध मन से सींचा था, इसलिए कंकड़ – पत्थर के हीरे – मोती बन गये और आपने लालचवश ऐसा किया था अतः आपके लाये हुए कंकड़ – पत्थरों के साँप – बिच्छू बन गये।

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(6) दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम दूरदर्शन

पर आजकल हर समय कोई न कोई कार्यक्रम दिखाया जाता है तथापि प्रमुख व लोकप्रिय कार्यक्रम इस प्रकार हैं –

सुबह सवेरे,समाचार,रंगोली,कृष्ण कथाएँ,मैट्रो समाचार, जय गणेश, चित्रहार, सांई बाबा, खिचड़ी,टॉम एण्ड जैरी,कलश,शांति, कृषि दर्शन,पोकेमॉन,विरासत,कुमकुम,शाका लाका बूम बूम, वाइल्ड डिस्कवरी, करम चन्द, कसौटी जिन्दगी की, कहानी घर – घर की, डिजनी जादू, सारे गा मा, हनुमान, सोनपरी,बूगी बूगी,ग्रेट इंडियन लामटा चेलेंज एवं अंताक्षरी। दूरदर्शन के कार्यक्रमों को देखकर छात्रों को उनका विवरण लिखने की प्रेरणा लिखित भाषा की शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य छात्रों को अपने भाव, विचार तथा अनुभवों को लिखित रूप में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने योग्य बनाना है –

  1. छात्रों को सुन्दर, परिमार्जित एवं स्पष्टं लेख लिखने की प्रेरणा देना।
  2. छात्रों के शब्द – कोषं को सक्रिय रूप देना।
  3. छात्रों को विराम चिह्नों का उचित प्रयोग सिखाना और अपने भावों को अनुच्छेदों में सजाने का अभ्यास कराना।
  4. छात्रों की अवलोकन (निरीक्षण) शक्ति, कल्पना शक्ति और तर्क शक्ति का विकास करना।
  5. छात्रों की विचारधारा में परिपक्वता लाना।

दूरदर्शन एक ऐसा माध्यम है जिससे छात्रों की श्रवणेन्द्रिय के साथ दृश्येन्द्रियाँ भी क्रियाशील रहती हैं। छात्र दूरदर्शन में वार्ता सुनने के साथ कार्यक्रम में भाग लेने वालों को देख सकते हैं और वे उनके हाव – भाव के साथ बोलना, अभिनय करना,भाषण देना सीख कर स्वरों के उचित उतार – चढ़ाव के द्वारा बात को शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं। वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। क्योंकि दूरदर्शन ज्ञानवर्धन और मनोरंजन का सबल माध्यम है। वे सब कुछ समझकर अन्त में उस कार्यक्रम के समग्र प्रभाव की चर्चा करें।

शिक्षक छात्रों को दूरदर्शन के किसी विशिष्ट कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को कहें। इससे वे लेखन – कौशल में तो पारंगत होंगे ही साथ ही उन्हें विवेचना और समीक्षा करने का भी अवसर मिलेगा। कार्यक्रम के गुण – दोष दोनों पर प्रकाश डालने के लिए छात्रों को स्वतन्त्र अवसर प्रदान करना होगा। इससे उनकी प्रतिभा के विकास के साथ चिन्तन,मनन एवं स्वाध्याय की प्रवृत्ति का पल्लवन तथा उन्नयन भी होगा।

(7) हिन्दी साहित्य का स्वतन्त्र पठन

मनुष्य का सबसे बड़ा अलंकार उसकी वाणी है। वाणी जितनी शुद्ध और परिष्कृत होती है, व्यक्ति उतना ही सुसंस्कृत समझा जाता है। सम्पूर्ण मानव समाज अपने भावों और विचारों को दो रूपों में व्यक्त करता है – मौखिक और लिखित। इन दोनों रूपों में भाषा उसका प्रमुख साधन है। यहाँ मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकारों पर विचार करने हैं।

(i) टिप्पणियाँ
किसी सुने गए अथवा पढ़े गए भाषण, वार्तालाप, पत्र, लेख, कविता, ग्रंथ आदि देखे गए दृश्य तथा घटना पर अपना मत मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रकट करना ही टिप्पणी कही जाती है। अकार की दृष्टि से टिप्पणी की यद्यपि कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, किन्तु संक्षिप्त टिप्पणी अच्छी समझी जाती है।

मोटे तौर पर टिप्पणियाँ तीन प्रकार की हो सकती-

(अ) कार्यालयीय टिप्पणी,
(ब) सम्पादकीय टिप्पणी,
(स) सामान्य टिप्प्णी।

(ii) प्रेरणाएँ
साहित्य में प्रेरणा से आशय उन रचनाओं अथवा कृतियों से है जो पाठक को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर उनका मार्गदर्शन करती हैं। इसके अन्तर्गत मुख्यतः उन कहानियों आदि को शामिल किया जाता है जो इस उद्देश्य को लेकर लिखी जाती हैं अथवा इस उद्देश्य को पूरा करती हैं। परन्तु इन कहानियों आदि के विषय में यह महत्त्वपूर्ण है कि ये इतनी बड़ी न हों कि पाठक पढ़ते – पढ़ते कहानी के उद्देश्य से भटक जाय। एक ही बैठक में पूरी पढ़ी जाने वाली कहानियाँ ही इसके लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।

(8) हस्तलिखित पत्रिका तैयार करना

छात्र आपस में मिलकर हस्तलिखित पत्रिका तैयार कर सकते हैं जिसमें सर्वप्रथम सभी संकलित अथवा स्वयं के लिखे लेख,कहानियों,कविताओं के अतिरिक्त चुटकुले आदि भी हो सकते हैं,को सूचीबद्ध किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इस सूची में उसके लेखक अथवा उसके संकलनकर्ता का नाम दिया जा सकता है।।

इसके बाद सम्पादक की ओर से अपने साथियों को धन्यवाद ज्ञापन के साथ पाठकों को इस पत्रिका से परिचित कराते हुए इसके लिखित अथवा संकलित लेखों आदि पर प्रकाश डाल सकते हैं। तत्पश्चात् इन लेखों आदि को बड़े रोचक रूप में समग्रता से प्रस्तुत किया जा सकता ध्यान रखने लायक बात है कि कोई भी लेख बहुत छोटा व बहुत ही बड़ा न हो जाय,जो पत्रिका में रोचकता समाप्त करे।

(9) क्षेत्रीय पत्र – पत्रिकाएँ

मालवा अंचल

  • इन्दौर – नई दुनिया,इन्दौर समाचार, नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वदेश, भावताव, जागरण।
  • उज्जैन – विक्रम दर्शन, अवन्तिका, अग्नि बाण, भास्कर, प्रजादूत, जलती मशाल।
  • रतलाम – जनवृत,जनमत टाइम्स, प्रसारण, हमदेश।
  • नीमच – नई विधा। देवास – देवास दर्पण, देवास दूत।
  • मंदसौर – दशपुर दर्शन, कीर्तिमान, ध्वज।
  • शाजापुर – नन्दनवन।

बघेलखण्ड अंचल

  • रीवा – बांधवीय समाचार, आलोक, जागरण।
  • सतना – जवान भारत,सतना समाचार।
  • शहडोल – विंध्यवाणी, भारती समय,जनबोध।

बुन्देलखण्ड अंचल

  • कटनी – महाकौशल केशरी, भारती, जनमेजय।
  • सागर – न्यू राकेट टाइम्स, आचरण, राही, जन – जन की पुकार।
  • टीकमगढ़ – ओरछा टाइम्स।
  • छतरपुर – क्रान्ति कृष्ण,प्रचण्ड ज्वाला।
  • जबलपुर – नव भारत, नवीन दुनिया, युगधर्म, दैनिक भास्कर, नर्मदा ज्योति, देशबन्धु, लोकसेवा।

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निमाड़ अंचल

  • खण्डवा – विध्यांचल,लाजवाब।
  • बुरहानपुर – वीर सन्तरी।
  • बड़वानी – निमाड़ एक्सप्रेस।

छत्तीसगढ़ अंचल

  • बिलासपुर – लोकस्वर, नवभारत, भास्कर।
  • दुर्ग – ज्योति जनता, छत्तीसगढ़ टाइम्स।
  • रायपुर – देशबन्धु, नवभारत, भास्कर, स्वदेश।

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 ठेस

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 ठेस (कहानी, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’)

ठेस पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

ठेस लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिरचन कौन-कौन सी वस्तुएँ बनाना जानता था?
उत्तर:
सिरचन मोथी घास और पटेर की रंगीन- शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, मोढ़े, पूँज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, ताल के पत्रों की छतरी-टोपी आदि बनाना जानता था।

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प्रश्न 2.
बड़ी भाभी ने मानू के संबंध में क्या चेतावनी दी थी?
उत्तर:
बड़ी भाभी ने मानू के संबंध में चेतावनी दी थी कि मानू के साथ मिठाई आए या न आए लेकिन तीन जोड़े फैशनेबिल चिक, पटेर की दो शीतलपाटी अवश्य आनी चाहिए और यदि ये चीजें नहीं आईं तो मानू बैरंग वापस भेज दी जाएगी।

प्रश्न 3.
चाची ने माँ के पास जाकर क्या कहा था?
उत्तर:
चाची ने माँ से पास जाकर कहा कि छोटे आदमी का मुँह भी छोटा होता है। मुँह लगाने से सर पर चढ़ेगा ही। किसी की ससुराल की बात वह क्यों करेगा?

प्रश्न 4.
सिरचन मानू से मिलने रेलवे स्टेशन क्यों गया था? (M.P. 2009)
उत्तर:
सिरचन मानू को बेटी मानता है। वह अपने हाथ से बनी वे चीजें मानू को देने के लिए स्टेशन गया जिन्हें बनाता हुआ आधा-अधूरा छोड़ आया था और मान-मनौती करने पर भी उन्हें पूरा करने नहीं गया था।

ठेस दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोगों की सिरचन के प्रति क्या धारणा थी? स्पष्ट कीजिए। (M.P. 2011)
उत्तर:
गाँव के लोगों की सिरचन के प्रति दो तरह की धारणाएँ थीं। पहली-लोग उसे एक कुशल कलाकार मानते हैं जो केवल पारिश्रमिक को ध्यान में रखकर कार्य नहीं करता। उसके जैसा शीतलपाटी, चिक, मोढ़े, जाले और छतरी-टोपी बनाने वाला कारीगर उस गाँव में कोई नहीं है। पहले लोग उसका सम्मान करते हैं। उसे घर बुलाने के लिए खुशामद करते हैं। दूसरी-समय के साथ-साथ सिरचन के प्रति लोगों की धारणा बदल जाती है। अब लोग उसे बेकार ही नहीं, बेगार समझते हैं। उनकी धारणा है कि सिरचन मुफ्तखोर, कामचोर, चटोर होने के साथ-साथ घमंडी और मुँहफट है। लोग उसके काम को बेकार का काम समझते हैं और उसे कोई महत्त्व नहीं देते हैं।

प्रश्न 2.
सिरचन को एक सप्ताह पहले बुलाने का कारण लिखिए।
उत्तर:
मानू पहली बार ससुराल जा रही थी। मानू के पति ने बड़ी भाभी को खत लिखकर चेतावनी दे दी थी कि मानू के साथ मिठाई की पतीली न आये कोई बात नहीं। लेकिन तीन जोड़े फैशनेबिल चिक, पटेर की दो शीतलपाटी अवश्य आनी चाहिए। यदि इनके बिना मानू आई तो बैरंग वापस भेज दी जाएगी। यही कारण था कि सिरचन को एक सप्ताह पहले ही बुलवाकर काम पर लगा दिया गया था।

प्रश्न 3.
मानू ने सिरचन को पान का बीड़ा देते समय क्या सलाह दी थी? (M.P. 2010)
उत्तर:
मानू ने सिरचन को पान का बीड़ा देते समय सलाह दी थी कि सिरचन दादा, कामकाज का घर है। पाँच तरह के लोग पाँच किस्म की बातें करेंगे। तुम किसी की बात पर ध्यान मत दो।

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प्रश्न 4.
सिरचन ने मानू को उपहार में क्या दिया था?
उत्तर:
सिरचन ने मानू को उपहार में शीतलपाटी, चिक और कुश की एक जोड़ी आसनी दी थी। इसके साथ उसने मानू को अपने हृदय की ममता का भी उपहार दिया था।

प्रश्न 5.
कहानी का अंत आपको कैसा लगा? अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

ठेस भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्ति का भाव-विस्तार कीजिए: खाने-पीने में चिकनाई की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म।
उत्तर:
खाने-पीने के शौकीन व्यक्ति को स्वादिष्ट भोजन चाहिए। उसके भोजन में पर्याप्त मात्रा में घी-तेल होना चाहिए। सिरचन एक ऐसा ही प्रसिद्ध एवं सिद्धहस्त ग्रामीण कलाकार है। उसके मन में धन के प्रति आसक्ति नहीं है, परंतु यदि उसे स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध न हो तो वह कार्य नहीं करता। मनोनुकूल भोजन न मिलने पर उसके काम में कला की सारी बारीकियाँ समाप्त हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में वह मन लगाकर कार्य नहीं करता अथवा कोई न कोई बहाना बनाकर कार्य को अधूरा छोड़कर चला जाता है।

ठेस भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
दिए गए शब्दों में से तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी (आगत) शब्दों को छाँटकर पृथक-पृथक लिखिए –
इलाका, किसान, फैशनेबिल, प्रबंध, खुशामद, अफ़सर, खेत, पनियाई, जतन।
उत्तर:

  • तत्सम शब्द – प्रबंध
  • तद्भव शब्द – किसान, खेत
  • देशज शब्द – पनियाई, जतन
  • विदेशी शब्द – इलाका, फैशनेबिल, अफसर, खुशामद

प्रश्न 2.
नीचे कुछ शब्द दिए जा रहे हैं, इनका समास-विग्रह करते हुए समास का नाम भी बताइए –
खेत-खलिहान, यथास्थिति, दशानन, राजपुत्र।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 ठेस img-1
प्रश्न 3.
दिए गए मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
दुम हिलाना, मुँह लटकाना, कान पकड़ना, फूट-फूटकर रोना।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 ठेस img-2

ठेस योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
आप अपने गाँव. या क्षेत्र के किसी निपुण कारीगर के बारे में जानते हो। उसके संबंध में लिखिए।
उत्तर:
हमारे गाँव में प्रभातीलाल कुम्हार एक निपुण कारीगर है। बहे अत्यन्त ही सरल एवं सहज स्वभाव का व्यक्ति है। सभी लोग उसके काम एवं व्यवहार की बड़ी तारीफ करते हैं। वह मिट्टी के ऐसे सुंदर खिलौने बनाता है कि उन्हें देखकर लगता है कि अभी बोल पड़ेंगे। दुर्गा-पूजा और दीपावली पर तो उसकी दुकान पर खरीददारों की भीड़ लगी रहती है। दूर-दूर से लोग दुर्गा-पूजा के लिए माँ दुर्गा की प्रतिमाएँ बनवाने के लिए उसके पास आते हैं।

वह विभिन्न आकार और रूप-रंग की साकार प्रतीत होने वाली प्रतिमाएँ बनाने की कला में कुशल है। इतना ही नहीं, वह घर की सजावट के लिए आकर्षक फूलदान, फूल, मुखौटे, जालियाँ भी बनाप्ता है। मटके और सुराहियाँ तो इतनी फैशनेबिल और रंगीन होती हैं कि खरीदने को मन ललचा उठता है।

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प्रश्न 2.
अपनी रुचि के अनुसार चित्रकला, हस्तकला, मूर्तिकला आदि से संबंधित सामग्री का निर्माण कर प्रदर्शित करें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 3.
अपने क्षेत्र की लोककला की जानकारी प्राप्त कर कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
छात्र अपने माता-पिता अथवा भाषा-अध्यापक से स्वयं जानकारी प्राप्त करें।

ठेस परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘ठेस’ कहानी के कहानीकार हैं –
(क) फणीश्वरनाथ ‘रेणु’
(ख) प्रेमचंद
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) जैनेंद्र कुमार
उत्तर:
(क) फणीश्वरनाथ ‘रेणु’।

प्रश्न 2.
बड़े लोगों की बस…….होती है –
(क) हवेली ही बड़ी
(ख) बात ही बड़ी
(ग) धमकियाँ ही बड़ी
(घ) डींगें ही बड़ी
उत्तर:
(ख) बात ही बड़ी।

प्रश्न 3.
सिरचन के किसी दिन आकर पूरा कर दूंगा में किसी दिन’ का अर्थ है –
(क) दो-चार दिन बाद
(ख) जब मौका मिलेगा
(ग) कभी नहीं
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) कभी नहीं।

प्रश्न 4.
‘आज तो अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है’ में ‘अधकपाली’ का अर्थ है –
(क) आधा सरदर्द
(ख) आधा पैर दर्द
(ग) आधा हाथ दर्द
(घ) अधपका खाने का दर्द
उत्तर:
(क) आधा सरदर्द

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प्रश्न 5.
सिरचन जब काम में मगन रहता है तो उसकी………निकल आती है।
(क) लार जरा बाहर
(ख) जीभ जरा बाहर
(ग) आँखें जरा बाहर
(घ) आँखें, जीभ बाहर
उत्तर:
(ख) जीभ जरा बाहर।

प्रश्न 6.
सिरचन जब काम करता था दब –
(क) उसका लार जहर बाहर निकल जाता था।
(ख) उसकी जीभ जरा बाहर निकल जाती थी।
(ग) उसकी आँखें जरा बाहर निकल जाती थीं।
(घ) उसके होठ जरा बाहर निकल जाते थे।
उत्तर:
(ख) उसकी जीभ जरा बाहर निकल जाती थी।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पर करें –

  1. ‘ठेस’ कहानी के लेखक हैं ……..। (गुलाबराय फणीश्वरनाथ ‘रेणु’)
  2. फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ……. उपन्यासकार हैं। (जासूसी आंचलिक)
  3. ‘ठेस’ कहानी ……. पर केन्द्रित है। (स्वाभिमान/अहंकार)
  4. ‘टेस’ कहानी का नायक ………. है। (पंचानंद चौधरी सिरचन)
  5. सिरचन ने ………. को उपहार दिया था। (चाची/मानू)

उत्तर:

  1. फणीश्वरनाथ ‘रेणु’
  2. आंचलिक
  3. स्वाभिमान
  4. सिरचन
  5. मानू।

III. निम्नलिखित कथनों में सत्य/असत्य छाँटिए- (M.P. 2010-2011)

  1. ‘ठेस’ एक निबन्ध है।
  2. ‘ठेस’ कहानी शहरी जीवन की है।
  3. सिरचन ने मानू को उपहार में शीतलपाटी, चिक और कुश की एक जोड़ी आसनी दी थी।
  4. सिरचन एक स्वाभिमान कलाकार है।
  5. मोहर छाप वाली धोती आठ रुपये में आती है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य।

IV. निम्नलिखित के सही नोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 3 ठेस img-3
उत्तर:

(i) (घ)
(ii) (ग)
(iii) (क)
(iv) (ङ)
(v) (ख)।

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V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

  1. सिरचन मान से मिलने रेलवे स्टेशन क्यों गया था?
  2. सिरचन कौन था?
  3. “ठहरो! मैं माँ से जाकर कहती है। इतनी बड़ी बात।” यहकसने कहा?
  4. “यह तुम्हारी माँ ही कर सकती हबबुनी।” यह कथन किसका है?
  5. सिरचन ने किसको तिरस्कृत किया?

उत्तर:

  1. अपने हाथ से बनी चीजें देने के लिए।
  2. सिरचन एक ग्रामीण कलाकार था।
  3. भज्जू महाजन की बेटी ने।
  4. सिरचन ने।
  5. भज्जू महाजन की पत्नी को।

ठेस लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘ठेस’ कहानी का नायक कौन है?
उत्तर:
‘ठेस’ कहानी का नायक सिरचन है।

प्रश्न 2.
सिरचन का चरित्र कहानी में किस बात को उजागर करता है?
उत्तर:
सिरचन का चरित्र ग्रामीण कलाकार के आत्मसम्मान को उजागर करता है।

प्रश्न 3.
सिरचन गाँववालों से किस व्यवहार की अपेक्षा करता है?
उत्तर:
सिरचन गाँववालों से सहज और आत्मीय व्यवहार की अपेक्षा करता है।

प्रश्न 4.
सिरचन ने गाँव टोली के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को कैसे बेपानी कर दिया था?
उत्तर:
सिरचन ने लेखक के सामने ही चौधरी के लड़के को यह कहकर बेपानी कर दिया कि तुम्हारी भाभी कंजूसी से तरकारी परोसती है और इमली की कढ़ी तो उसकी (सिरचन की) घरवाली बनाती है।

प्रश्न 5.
लेखक के परिवार के साथ सिरचन का व्यवहार किस प्रकार अलग होता था?
उत्तर:
सिरचन स्वादिष्ट खाने का शौकीन था। वह जहाँ भी काम करने जाता, खाने की लालसा जरूर रखता पर वह लेखक के परिवार में काम करते समय कभी पूजा-भोग की बात नहीं करता था।

प्रश्न 6.
सिरचन क्या-क्या बनाता था? (M.P.2011)
उत्तर:
सिरचन शीतलपाटी, चिक, मोढ़े, जमले, छतरी और टोप बनाता था।

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प्रश्न 7.
बड़ी भाभी ने मानू के संबंध में क्या चेतावनी दी धी?
उत्तर:
बड़ी भाभी ने तीन जोड़े फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतलपाटियों को मानू के दूल्हे के लिए भेजे जाने संबंधी चेतावनी दी थी।

ठेस दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिरचन की तीन चारित्रक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
कुशल कारीगर:
सिरचन अपने इलाके का एक निपुण कारीगर है। उसके जैसी मोथी घास और पटेर की शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोरे के मोढ़े, मूंज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, ताल के सूखे पत्तों की छतरी-टोपी कोई नहीं बना सकता। वह एक प्रतिभाशाली कलाकार है।

स्वाभिमानी;
सिरचन एक स्वाभिमानी कलाकार है। वह गरीब भले ही हो, लेकिन किसी का तिरस्कार सहन नहीं कर सकता। अपमानित होने की अपेक्षा वह भूखा रहना पसंद करता है। वह लेखक की मँझली भाभी और मानू की चाची के द्वारा तिरस्कृत होने पर काम अधूरा छोड़कर चला जाता है।

स्वादिष्ट भोजन का शौकीन:
सिरचन स्वादिष्ट भोजन का शौकीन है। यदि उसे स्वादिष्ट भोजन न मिले तो वह काम नहीं करता। उसे तली, बघारी तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध पसंद है। मनोनकूल भोजन न मिलने पर वह कोई न कोई बहाना बनाकर खिसक जाता है। इसीलिए लोग उसे चटोर भी कहते हैं।

प्रश्न 2.
सिरचन मानू के घर से काम छोड़कर क्यों चला जाता है?
उत्तर:
सिरचन जिसके घर काम करता है, उनसे सहज और आत्मीय व्यवहार की अपेक्षा करता है। जब सिरचन मानू के घर में काम कर रहा है तो उसकी मँझली भाभी तथा उसकी चाची उसे तिरस्कृत और अपमानित करती हैं। वह मानू के घर से काम छोड़कर चला जाता है। दूसरे वह स्वयं को मानू की हवेली में सर्वाधिक सम्मानित अनुभव करता था क्योंकि वहाँ उसकी कारीगरी का सम्मान होता था, परंतु अब उसे वहाँ भी तिरस्कृत और अपमानित किया गया है इस कारण उसके हृदय को ठेस पहुँचती है और वह काम अधूरा छोड़कर चला जाता है।

प्रश्न 3.
‘ठेस’ कहानी का उद्देश्य संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘ठेस’ कहानी का उद्देश्य एक ग्रामीण कलाकार के स्वाभिमान और आत्मगौरव को प्रकट करना है। कलाकार दूसरों से सम्मान प्राप्त करने का आकांक्षी होता है। उसे जब सम्मान की जगह तिरस्कार और अपमान प्राप्त होता है तो उसके संवेदनशील कोमल हृदय को ठेस पहुंचती है। यही ठेस उसे भविष्य में काम न करने का कठोर निर्णय लेने पर विवश करती है।

प्रश्न 4.
सिरचन को गाँववाले चटोरा क्यों समझते थे?
उत्तर:
सिरचन को गाँववाले चटोरा समझते थे। ऐसा इसलिए कि उसे खाने को दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध जरूर चाहिए, इसके बिना उसका मन काम में नहीं लगता था।

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प्रश्न 5.
सिरचन को लोग बेकार ही नहीं, अपितु बेगार क्यों समझते थे?
उत्तर:
जब दूसरे मजदूर खेत पर पहुँचकर एक तिहाई काम कर चुके होते थे, तब वह हाथ में खुरपी डुलाता हुआ दिखाई देता। फिर पगडंडी पर तौल-तौलकर कदम रखता हुआ धीरे-धीरे काम पर आता था। इसीलिए सिरचन को लोग बेकार ही नहीं अपितु बेगार भी समझते थे।

ठेस लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
आंचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णियाँ जिले के औराही हिंगना गाँव में 4 मार्च, 1921 ई० को हुआ था। इनकी विद्यालयी शिक्षा इंटरमीडिएट तक ही हो पाई। आपने उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश तो लिया, लेकिन महात्मा गाँधी के आह्वान पर पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आपने सन् 1942 ई० के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लिया लेकिन 1952 में राजनीति को छोड़कर पूरी तर पे साहित्य-सेवा में जुट गए। सन् 1970 ई० में आपको ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। रेणुजी जीवन के अंतिम समय तक साहित्य सेवा करते रहे। 11 अप्रैल, 1977 ई० को इनका देहांत हो गया।

साहित्यिक विशेषताएँ:
हिंदी साहित्य जगत् में ‘रेणुजी’ आंचलिक उपन्यास के जनक माने जाते हैं। उन्होंने कथाकार के साथ-साथ रिपोर्ताज लेखक के रूप में भी ख्याति प्राप्त की। उनका जीवन उतार-चढ़ाव व संघर्ष से भरा था। उनके रचनात्मक साहित्य ने देश की राजनीति को भी प्रभावित किया। सन् 1954 में इनका बहुचर्चित आंचलिक उपन्यास मैला आँचल प्रकाशित हुआ जिसने हिंदी उपन्यास को एक नई दिशा दी। हिंदी जगत् में आंचलिक उपन्यासों का प्रारंभ मैला आँचल से ही हुआ। आंचलिकता की इस अवधारणा ने उपन्यासों और कथा-साहित्य में गाँव की भाषा-संस्कृति और वहाँ के लोकजीवन को केंद्र में ला खड़ा किया।

लोकगीत, लोकसंस्कृति, लोकभाषा लोकनायक की इस अवधारणा ने भारी-भरकम चीज़ एवं नायक की जगह अंचल को ही नायक बना डाला। उनकी रचनाओं में अंचल कच्चे और अनगढ़ रूप में ही आता है इसलिए उनका यह अंचल एक त शस्य-श्यामल है तो दूसरी तरफ धूलभरा और मैला भी।.स्वातंत्र्योत्तर भारत में जब सारा चिकास शहर केंद्रित होता जा रहा था, ऐसे में रेणुजी ने अपनी रचनाओं से अंचल की समस्याओं की ओर भी लोगों का ध्यान खींचा। उनकी रचनाएँ इस अवधारणा को भी पुष्ट करती हैं कि भाषा की सार्थकता वोली के साहचर्य में ही है।

रचनाएँ:
फणीश्वरनाथ ‘रेणु जी’ की लेखनी उपन्यास, कहानी, संस्मरण और रिपोर्ताज आदि निकले हैं। उन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य को नई दिशा दी है।

  • उपन्यास – मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, कितने चौराहे।
  • कहानी-संग्रह – ठुमरी, अग्निखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरीकी धूप।
  • संस्मरण – ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गंध, श्रुत अश्रुत पूर्व।
  • रिपोर्ताज – नेपाली क्रांति कथा।

इनके नाम से ‘रेणु रचनावली’ भी पाँच भागों में प्रकाशित हो चुकी है जिसमें इनका सारा साहित्य समाहित किया गया है।

भाषा-शैली:
रेणुजी की भाषा आंचलिक है। उनकी भाषा में आंचलिक शब्दों के साथ अंग्रेजी, अरबी, फारसी आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। भाषा में मुहावरों, लोकोक्तियों और सूक्तियों का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग हुआ है। भाषा में सर्वत्र प्रवाह है। इनके साहित्य में मानव जीवन की स्थानीय वैयक्तिकता विशिष्ट रूप से उभरी है।

महत्त्व:
हिंदी साहित्य में ‘रेणुजी’ को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उन्हें हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यास व कहानियों का जनक माना जाता है। वे एक सशक्त और परिपक्व गद्यकार के साथ-साथ आंचलिक कथाकार और रिपोर्ताज लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं।

ठेस का पाठ सारांश

प्रश्न 2.
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानी का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
फणीश्वरनाथ रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ गाँव के एक कलाकार के स्वाभिमान पर केंद्रित है। गाँव में सिरचन (श्री चंद्र) को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। वह बहुत आलसी है इसलिए कोई किसान उसे अपने खेत में मजदूरी के लिए नहीं बुलाना चाहता है। सिरचन को गाँव में ‘कामचोर’ और ‘चटोर’ दोनों कहा जाता है। कुछ समय पहले उसकी ऐसी स्थिति न थी। गाँव में उसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।

बाबू लोग सिरचन की खुशामद किया करते थे। सिरचन उच्च कोटि का कारीगर था। वह मनोनुकूल भोजन पाकर लोगों को विभिन्न प्रकार की चीजें बनाकर दिया करता था। उसमें स्वाभिमान भी कूट-कूटकर भरा था। एक बार पंचानन चौधरी के लड़के को अपमानित करते हुए उसने कहा था- ‘तुम्हारी भाभी नाखून से खाँटकर तरकारी परोसती है और इमली का रस डालकर कढ़ी तो हम कहार-कुम्हारों की घरवाली बनाती हैं, तुम्हारी भाभी ने कहाँ सीखा?’

सिरचन अपनी कला में अत्यंत निपुण है। वह धीरे-धीरे कार्य करता परंतु कार्य करते समय वह अत्यंत तन्मय हो जाता है। वह एक-एक मोथी और पटरे को हाथ में लेकर बड़े जतन से उसकी कुच्ची बनाता। फिर कुच्चियों को रंगने से लेकर सुतली सुलझाने में पूरा दिन लगाता है। काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी तो वह गेहुँअन साँप की तरह फुफकार उठता है।

सिरचन को गाँव में ‘चटोर माना जाता है। यदि व्यक्ति उसे काम पर बुलाना चाहता है तो उसे तली हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध आदि का प्रबंध पहले करना पड़ता है। सिरदन को यदि मनोनुकूल भोजन नहीं मिलता तो वह कोई-न-कोई बहाना बनाकर कार्य को अधूरा छोड़ देता है। सिरचन ‘मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंग डोर के मोढ़े’ आदि बनाने में अत्यंत कुशल है। मानू की माँ ने सिरचन को चिक और शीतलपाटी बनाने के लिए कहा। सिरचन ने चिक बनाने का कार्य प्रारंभ किया। ‘रंगीन सुतलियों में झब्बे डालकर वह चिक बनने बैठा। डेढ के हाथ की बिनाई देखकर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनी।

सिरचन में मानू के प्रति ममत्व की भावना है। सिरचन चिक बुनने में अपनी संपूर्ण क्षमता का प्रयोग कर रहा था। वह जब काम में लीन होता तो इसे खाने-पीने की सुधि नहीं रहती। वह चिक में सुतली के फंदे डाल रहा था कि उसकी दृष्टि पास पड़े सूप की ओर गई। सूप में चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला पड़ा था। मानू की माँ को पता लगा तो उसने अपनी मँझली बहू को कहा कि उसने सिरचन को ‘बँदिया’ क्यों नहीं दी? मँझली बह ने क्रोध में मुट्ठी-भर ‘बुंदिया’ सूप में फेंकी और चली गई। सिरचन मँझली बहू के इस व्यवहार से. अपने को अपमानित महसूस किया। उसके लिए यह अपमान हो गया।

उसने कहा- “मँझली बहूरानी अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोलकर बाँटती हैं क्या?” मँझली भाभी सिरचन की बात सुनकर रोने लगी। मानू की माँ ने सिरचन से कहा कि उसे बहुओं का अपमान करने का अधिकार नहीं है। सिरचन को बुरा लगा। मानू पान सजाकर बैठकखाने में भेज रही थी। उसने पान का एक बीड़ा सिरचन को देते हुए कहा कि उसे छोटी बातों पर नाराज नहीं होना चाहिए। सिरचन को मानू की चाची ने पान खाते देखा तो विस्मित हो गई। सिरचन चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देखकर कहा- ‘छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया, का गमकौआ जर्दा तो खिलाना।’ छोटी चाची, जरा भड़क उठी। उसने सिरका को बुरी तरह से अपमानित किया।

सिरचन कुछ क्षणों तक चुपचाप बैठा रहा फिर वह कार्य को अधूरा छोड़कर चला गया। मानू का मन व्यथा से भर उठा। अधूरी चिक के सातों तारे फीके पड़ गए। माँ ने उसे धैर्य बँधाते हुए कहा कि वह उसे मेले से चिक खरीदकर भेज देगी। मानू का भाई सिरचन को मनाने उसके घर गया तो वह एक फटी हुई शीतलपाटी पर लेटकर कुछ सोच रहा था। उसने काम करने के लिए इनकार करते हुए कहा-“बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं। मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा? कौन पहनेगा? ससुरी खुद मेरे, बेटे-बेटियों को ले गई अपने साथ बबुआ जी, मेरी घरवाली जिन्दा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है।

इस शीतलपाटी को छूकर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा।” गाँव-भर में केवल मानू की माँ का घर ही तो बचा था जहाँ उसे सम्मान मिलता था। लेकिन अब वहाँ भी उसका अपमान हो गया। अपमानित सिरचन ने चिक और शीतलपाटी बुनना स्वीकार नहीं किया। मानू का भाई जब उसे ससुराल पहुँचाने जा रहा था तो स्टेशन पर उसकी दृष्टि प्लेटफार्म पर दौड़ते सिरचन पर पड़ी। उसकी पीठ पर बोझ लदा था। उसने हकलाते हुए कहा कि वह मानू दीदी के लिए चिक, शीतलपाटी और एक जोड़ी कुश की आसनी लेकर आया है। मानू उसे दाम निकालकर देने लगी तो उसने इनकार कर दिया। मानू फूट-फूटकर रोने लगी। सिरचन ने चिक और शीतलपाटी को बुनने में अपनी कला का अद्भुत चमत्कार . प्रदर्शित किया था।

ठेस संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

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प्रश्न 1.
खेती-बारी के समय गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसे बेकार ही नहीं, ‘बेगार’ समझते हैं। इसलिए खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा उसको बुलाकर । दूसरे मजदूर खेत पर पहुंचकर एक तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचनराय हाथ में खुरपी डुलाता हुआ दिखाई पड़ेगा-पगडंगी पर तौल-तौलकर पाँव रखता हुआ, धीरे-धीरे। मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।

आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई एक समय था, जब उसकी मडैया के पास बड़े-बड़े लोगों की सवारियाँ बँधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे-अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गई है सारे इलाके में। एक दिन भी समय निकालकर चलो। कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से-सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवाकर भेज दो। (Page 10)

शब्दार्थ:

  • बेकार – बेरोज़गार, व्यर्थ।
  • बेगार – बिना मजदूरी के परिश्रम कराना।
  • मुफ्तखोर – मुफ्त में खाने वाला।
  • कामचोर – काम से मन चुराने वाला।
  • चटोर – चाटने वाला, स्वादी।
  • खुशामद – चापलूसी।
  • चिक – बाँस की तीलियों से बना पर्दा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश आंचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ से लिया गया है। सिरचन एक ग्रामीण कलाकार हैं परंतु समय परिवर्तन . के साथ उसके जीवन में बदलाव आता है। पहले उसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है लेकिन अब उसे कोई पूछता तक नहीं है। लेखक सिरचन के जीवने में आए बदलाव पर प्रकाश डालते हुए कहता है..व्याख्या-खेत जोतने-बोने के काम के समय गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते हैं अर्थात् उसे कृषि-कर्म के समय कोई नहीं पूछता। वह बेकार ही नहीं, बेगार भी समझा जाता है। खेत-खलिहान में मजदूरी करने के लिए कोई बुलाने नहीं जाता।

लेखक सिरचन को, मजदूरी के लिए न बुलाने के कारणों को स्पष्ट करता हुआ कहता है कि लोग समझते हैं कि उसे मजदूरी करने के लिए बुलाकर क्या होगा? अर्थात् उसे बुला भी लिया तो वह कुछ नहीं करेगा। जब तक दूसरे कृषि श्रमिक खेत पर पहुंचकर एक-तिहाई काम समाप्त कर चुके होंगे, तब कहीं सिरचन हाथ में खुरपी इधर-उधर हिलाता पगडंडी पर धीरे-धीरे जमा-जमा कर पैर रखते हुए आता दिखाई देगा। अर्थात् सिरचन खेत पर देर से पहुँचेगा और इसलिए ज्यादा काम नहीं कर पाएगा। यदि बिना काम करवाए ही मजदूरी देनी हो तो अलग बात है।

दूसरे शब्दों में, सिरचन को खेती के काम के लिए बुलाना बेकार में मजदूरी देने के समान आज गाँव के लोग सिरचन को मुफ्त में खाने वाला, काम से जी चुराने वाला या चटोर भले ही कह लें, परंतु उसके जीवन में एक समय ऐसा भी था, जब उसकी झोंपड़ी के पास गाँव के बड़े-बड़े सेठ-साहूकार, जमींदार आदि लोगों की सवारियाँ बँधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, अपितु उसकी चापलूसी भी करते थे और कहते थे कि अरे, सिरचन भाई! अब तो इस क्षेत्र में केवल तुम्हारे हाथों में ही यह हुनर रह गया है। एक दिन समय निकालकर हमारे साथ भी घर चलो। कल बड़े भाई साहब का शहर से पत्र आया है कि सिरचन से एक जोड़ा बाँस की तीलियों से बना पर्दा भिजवा दो।

विशेष:

  1. लेखक ने एक ग्रामीण कलाकार के जीवन में आए उतार-चढ़ाव का वर्णन किया गया है। पहले सिरवन की गाँव में पूछ थी और आज उसे कोई मजदूरी तक के लिए नहीं बुलाता है।
  2. भाषा अरबी, फारसी और आंचलिक शब्दों से युक्त है।
  3. शैली वर्णनात्मक है।
  4. मुहावरों के प्रयोग से कथन ज्यादा सटीक लगने लगे हैं।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
गाँव के लोग सिरचन के संबंध में क्या सोचते हैं?
उत्तर:
गाँव के लोग सिरचन को कामचोर समझते हैं।

प्रश्न (ii)
सिरचन और दूसरे मजदूरों में क्या अंतर है?
उत्तर:
दूसरे मजदूर सिरचन से पहले काम पर पहुँचकर अपना एक तिहाई काम समाप्त कर लेते थे जबकि सिरचन अपना काम शुरू भी नहीं किया होता।

प्रश्न (iii)
पहले लोग सिरचन की खुशामद कैसे करते थे?
उत्तर:
सिरचन भाई! इस इलाके में अब तो तुम्हारे ही हाथ में कारीगरी रह गई है। एक दिन समय निकालकर चलो।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
किसकी मडैया के पास बड़े-बड़े लोगों की सवारियाँ बँधी रहती थीं और क्यों?
उत्तर:
सिरचन की मडैया के पास बड़े-बड़े लोगों की सवारियाँ बँधी रहती थीं . क्योंकि वह चिक बनाने का कुशल कारीगर था।

प्रश्न (ii)
‘मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।’ इससे सिरचन के चरित्र की कौन-सी विशेषता उजागर होती है?
उत्तर:
इससे सिरचन के चरित्र की काम से जी चुराने वाली विशेषता उजागर होती है।

प्रश्न (iii)
पहले लोग सिरचन को क्यों पूछते थे?
उत्तर:
सिरचन गाँव का एक कुशल कारीगर था। वह बाँस की तीलियों से बड़े सुंदर पर्दे बनाता था इसलिए लोग उसे पूछते थे।

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प्रश्न 2.
सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं…..तली-बघारी हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध, इन सबका प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ, दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा। खाने-पीने में चिकनाई की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म? काम अधूरा रखकर उठ खड़ा होगा-आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा-सा रह गया है, किसी दिन आकर पूरा कर दूंगा।

‘किसी दिन’ माने कभी नहीं? मोथी घास और पटेर की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोरे के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्रों की छतरी-टोपी तथा इसी तरह के बहुत काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गाँव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग-बेकाम का काम, किसकी मजदूरी में अनाज यो पैसा देने की कोई ज़रूरत नहीं। पेट-भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना-धुराना कपड़ा देकर बिदा करो। (Page 11)

शब्दार्थ:

  • चटोर – चटपटा खाने का शौकीन।
  • बधारी – छौंक लगाई हुई।
  • तरकारी – सब्जी।
  • दुम हिलाना – दीन बनकर प्रसन्न करने का यत्न करना।
  • हाजिर – उपस्थित।
  • अधकपाली – आधा सरदर्द।
  • माथा टनटनाना – सरदर्द होना।
  • बेकाम – बेकार का काम।
  • पटेर – सरकंडे की जाति की एक पानी की घास।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ से लिया गया है। लेखक कथानक सिरचन की आदतों और उसकी कारीगरी पर प्रकाश डालते हुए कहता है –

व्याख्या:
गाँव के लोग सिरचन को चटोस समझते हैं। उसे खाने में स्वादिष्ट वस्तुएँ चाहिए। घर में सिरचन को काम पर बुलाने से पहले घी में तली हुई और छौंकी हुई सब्जी, दही से बनी कढ़ी, मलाईवाले दूध आदि का इंतजाम कर लो, तब सिरचन को घर में काम के लिए बुलवाओ। सिरचन को ये सब वस्तुएँ पसंद हैं। इन वस्तुओं के प्रबंध का हवाला देकर, उसे बुलाओ तो वह खुशी-खुशी काम परु उपस्थित हो जाएगा।

यदि उसके खाने-पीने की चीज़ों में घी कम हुआ तो उसके काम में जो बारीकियाँ और सुंदरता होती हैं, वह सब समाप्त हो जाएँगी। अर्थात् वह मन लगाकर अच्छा काम नहीं करेगा। काम अपूर्ण छोड़कर उठ जाएगा और कहेगा, आज सरदर्द हो रहा है और दर्द के मारे माथा फटा जा रहा है। थोड़ा-सा काम अधूरा रह गया है। किसी दिन आकर पूरा कर दूंगा। उसके ‘किसी दिन’ कहने का अर्थ होता है, वह काम कभी पूरा नहीं होगा। उसका ‘किसी.दिन’ कभी नहीं आता। अधूरा काम, अधूरा ही पड़ा रहेगा।

सिरचन गाँव का एक कुशल कारीगर हैरिसे मोथी घास पर पटेर की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की बारीक तीलियों का रंगीन झिलमिलाता पर्दा, सात रंग के डोरे (मोटे धागे) से मोढ़े बनाना, भूसी और चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े-बड़े जाल, हल चलाने वालों के लिए ताल के सूखे पत्तों से छतरी-टोपी बनाना आदि इस प्रकार के बहुत-से काम आते हैं। इन कामों को सिरचन के अतिरिक्त पूरे गाँव में कोई नहीं जानता। यह अलग बात है कि अब इन कामों को गाँव के लोगों का मानना है कि इस प्रकार के काम करवाने के लिए पेट भर खिला दो और काम पूरा होने पर फटे-पुराने कपड़े देकर बिदा कर दो, इतना ही पर्याप्त है।

विशेष:

  1. लेखक ने ग्रामीण कलाकार के प्रति गाँव के लोगों की दृष्टि में आए – बदलाव और कलाकार की आदतों पर प्रकाश डाला है।
  2. भाषा सरल और सुबोध है। उसमें अरबी-फारसी शब्दों के साथ आंचलिक शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।
  3. शैली वर्णनात्मक है।
  4. मुहावरों का सटीक प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
सिरचन को गाँव के लोगों द्वारा चटोरा समझने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
सिरचन को खाने में स्वादिष्ट वस्तु, चाहिए। उसे खाने में घी में तली हुई और छौंकी हुई सब्जी, दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध अच्छा लगता है। यदि उसके खाने की चीजों में घी कम हुआ तो वह काम मन से नहीं करता। इन्हीं कारणों से लोग उसे चटोरा कहते हैं।

प्रश्न (ii)
सिरचन की कला की बारीकियाँ और सुंदरता कब समाप्त हो जाती है?
उत्तर:
जब सिरचन के खाने में घी कम हो जाता है तो वह मन से काम नहीं करता। और जब मन से काम नहीं करता तो उसकी कला की बारीकियाँ और सुंदरता गायब हो जातीं।

प्रश्न (iii)
‘थोड़ा-सा रह गया है, किसी दिन आकर पूरा कर दूंगा।’ सिरचन के इस कथन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सिरचन एक कलाकार है। उसे चिकनाईयुक्त वस्तुएँ खाने का शौक है और जब उसके खाने में चिकनाई कम हो जाती है तो वह कोई न कोई बहाना बनाकर काम अधूरा छोड़कर उपर्युक्त वाक्य कहता हुआ चला जाता है। इसका अर्थ होता है कि अब वह कार्य अधूरा ही पड़ा रहेगा। कभी पूरा नहीं होगा।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
गाँव में सिरचन के अतिरिक्त कौन-सा काम कोई नहीं जानता?
उत्तर:
गाँव में मोथी घास और पटेर की ‘रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोरे के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के बड़े-बड़े जाले, ताल के सूखे पत्तों की छतरी-टोपी आदि जैसे काम सिरचन के अतिरिक्त कोई नहीं जानता।

प्रश्न (ii)
अब सिरचन के काम के संबंध में लोगों की सोच में क्या परिर्वतन आ गया है?
उत्तर:
अब गाँव के लोग उसके काम के लिए अनाज या पैसा देने की आवश्यकता नहीं समझते। उसे पेट भर स्वादिष्ट भोजन करा देना और एकाध पुराना कपड़ा दे देना काफी समझते हैं।

प्रश्न 3.
बड़ी बात ही है, बिटिया। बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पाटियों का काम सिर्फ खंसारी का सत्तू खिलाकर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी मा ही कर सकती है, बबुनी। (Page 11)

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ से लिया गया है। इन पंक्तियों में कथानायक सिरचन के आत्मसम्मान की भावना उजागर हुई है। महाजन टोले के भज्जू महाजन की वेटी को सिरचन ने तिरस्कृत करते हुए यह शब्द कहे थे।

व्याख्या:
सिरचन महाजन की बेटी से कहता है कि ‘बड़े लोग’ अर्थात् समाज के सम्मानित और पूँजीपति लोग केवल बड़ी-बड़ी बातें ही करना जानते हैं। तथाकथित बड़े लोगों का बड़प्पन केवल शब्दों की सीमा तक ही सीमित है। तुम्हारी माँ खंसारी का सत्तू खिलाकर ही मुझसे कितना कार्य करा लेती है। तुम्हारी माँ काम के बदले केवल मधुर शब्दों की ही मजदूरी देती है। इस प्रकार समाज के धनी और प्रतिष्ठित कहलाने वाले लोग मजदूरों का इसी तरह से शोषण करते हैं। इस वर्ग के लोगों का हृदय अत्यंत संकुचित होता है वे काम करवाना तो जानते हैं लेकिन उचित मजदूरी देना नहीं जानते। वे मजदूरों से अधिक-से-अधिक काम लेकर कम-से-कम मजदूरी देते हैं।

विशेष:

  1. सिरचन के माध्यम से कथाकार ने समाज के कटु सत्य को उजागर किया है।
  2. भाषा सरल और सुबोध है।
  3. आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
‘बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है’। इस कथन से सिरचन का क्या आशय है?
उत्तर:
इंस कथन से सिरचन का आशय है कि समाज के तथाकथित सम्मानित और पूँजीपति लोग केवल बड़ी-बड़ी बातें ही करना जानते हैं। उनका बड़प्पन केवल शब्दों तक सीमित रहता है। उनके काम से उनका बड़प्पन बिलकुल नहीं झलकता है। बड़ों जैसी बातें जरूर कर लेते हैं किन्तु बड़ों जैसा काम नहीं करते।

प्रश्न (ii)
सिरचन किसको तिरस्कृत कर रहा है? ।
उत्तर:
सिरचन महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी को तिरस्कृत कर रहा है।

प्रश्न (iii)
सिरचन ने महाजन टोले की भज्जू महाजन की बेटी को किस प्रकार तिरस्कृत किया?
उत्तर:
सिरचन ने महाजन टोले की भज्जू महाजन की बेटी को तथाकथित बड़े, लोगों की असलियत बताकर व्यंग्य करते हुए तिरस्कृत किया। उसने कहा, “बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर के पाटियों का काम सिर्फ खंसारी का सत्तू खिलाकर कोई करवाये भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है।”

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
‘यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है, बबुनी’ यह कथन किसका है और किससे कहा गया है?
उत्तर:
यह कथन सिरचन का है और महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी से कहा गया है।

प्रश्न (ii)
सिरचन को केवल खंसारी का सत्तू खिलाकर कौन काम करवाती थी?
उत्तर:
महाजन टोले के भज्जू महाजन की पत्नी यह काम करवाती थी।

प्रश्न (iii)
इस गद्यांश में छिपा व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस गद्यांश में समाज में सम्मानित, प्रतिष्ठित समझे जाने वाले लोगों पर व्यंग्य किया गया है कि उनकी कथनी और करनी में अंतर होता है। बातें बड़ी-बड़ी करते हैं, काम नहीं। मजदूरों का शोषण करते हैं। उन्हें पूरी मजदूरी भी नहीं देते।

प्रश्न 4.
अरे बाप रे बाप! इतनी तेजी? कोई मुफ्त में तो काम नहीं करता। आठ रुपये में मोहर छाप वाली धोती आती है। … इस मुँहझोले के न मुँह में लगा है, न आँख में शील। पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चिकें मिलेंगी। चिक बनाने वाली टोली की औरतें सर पर गट्ठर लेकर गली-गली मारी फिरती हैं। (Page 13)

शब्दार्थ:

  • बाप रे बाप! – दुख या आश्चर्य सूचित करने वाला उद्गार।
  • तेजी – गुस्सा, क्रोध।
  • मुँहझोले – मुँहफट, जो मुँह में आए कह देना।
  • मुँह में लगाम – समझकर बोलना।
  • आँख में शील न होना – निर्लज्ज होना।
  • गली-गली फिरना – दुर्दशा में इधर-उधर घूमना।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ से लिया गया है। मानू की चाची और सिरचन में नहीं बनती थी। सिरचन मानू के घर में काम कर रहा था। वह मानू के द्वारा दिया गया पान चबाते हुए काम में लगा था कि चाची आ गई। सिरचन ने चाची से गमकौओ जर्दा माँग लिया। इस पर चाची ने उसे डाँटते हुए चटोर कह दिया। चाची की बात से सिरचन काफी दुःखी हो गया। वह चुपचाप अपना सारा सामान इकट्ठा कर चला गया। उसे जाते देखकर चाची मन-ही-मन बड़बड़ा उठी। लेखक उसी का वर्णन करते हुए कह रहा है।

व्याख्या:
चाची आश्चर्य भाव से बकबक करती हुई बोली-“इतना गुस्सा करता है। कोई मुफ़्त में तो काम करता नहीं है। उसे मजदूरी देते हैं। खाना खिलाते हैं। मोहर छाप वाली नई धोती बाज़ार से आठ रुपये में आती है। उसे मोहरे छाप वाली धोती देने का वादा किया है। सिरचन मुँहफट है, बिना सोचे-समझे जो कुछ मुँह में आता है, बोलता है। उसमें न शर्म-लिहाज है, न ही सहनशक्ति है, उसका स्वभाव बड़ा उग्र है। काम छोड़कर जाता है तो जाए पैसा खर्च करने पर बाज़ार में सैकड़ों चिकें मिल जाएँगी। चिक बनाने वालों की औरतें सर पर पोटली बाँधे चिक बेचने के लिए गली-गली घूमती फिरती हैं।”

विशेष:

  1. लेखक ने सिरचन और मानू की चाची के संबंधों के साथ-साथ दोनों के स्वभाव पर प्रकाश डाला है।
  2. भाषा पात्रानुकूल है।
  3. मुहावरों का भरपूर प्रयोग हुआ है।
  4. वर्णनात्मक शैली के साथ-साथ संवादात्मक शैली का भी प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
‘अरे बाप रे बाप! इनकी तेजी’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस कथन में आश्चर्य व्यक्त किया है कि इस मज़दूर सिरचन में इतना गुस्सा भरा है। एक मजदूर के लिए इतना क्रोध करना अच्छा नहीं है।

प्रश्न (ii)
इस गद्यांश के आधार पर सिरचन की दो चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. सिरचन स्वभाव से अत्यंत क्रोधी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति है।
  2. वह मुँहफट है पर हृदय का साफ है। वह अपने में कुछ भी दबाकर नहीं रखता। जो कुछ उसे उचित लगता है, वेझिझक बोल देता है।

प्रश्न (iii)
‘चिक बनाने वाली औरतें गट्ठर लेकर मारी-मारी फिरती हैं, इससे कलाकारों की किस दशा का परिचय मिलता है?
उत्तर:
इससे कलाकारों की दुर्दशा का परिचय मिलता है। उन्हें अपनी कलाकृतियों को सर पर उठाकर गाँव-गाँव, गली-गली घूमना पड़ता है।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
यह कथन किसका है और इससे वक्ता के चरित्र का कौनसा पक्ष उजागर होता है?
उत्तर:
यह कथन मानू की चाची का है। इससे मानू की चाची के चरित्र का यह पक्ष उजागर होता है कि उसकी दृष्टि में ग्रामीण कलाकारों के प्रति सम्मान का अभाव है। वह अपने कथन एवं भाव-भंगिमा से कलाकार के मन को ठेस पहुँचाती है।

प्रश्न (ii)
‘पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चितें मिलेंगी।’ यह ग्रामीण लोगों की सोच में आए किस परिवर्तन का सूचक है?
उत्तर:
यह पंक्ति इस बात का सूचक है कि गाँव के लोगों में अब ग्रमीण कलाकारों के प्रति सम्मान की भावना समाप्त हो गई है। वे केवल पारिश्रमिक देकर ही काम कराना चाहते हैं।

प्रश्न (iii)
मोहर छाप वाली धोती कितने में आती है?
उत्तर:
मोहर छापवाली धोती आठ रुपये में आती है।

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प्रश्न 5.
बबुआजी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं। मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा? कौन पहनेगा? ससुरी खुद मरी, बेटे-बेटियों को ले गई अपने साथ। बबुआजी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बनी हुई है। इस शीतलपाटी को छूकर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा।… गाँव भर में तुम्हारी हवेली में मेरी कदर होती थी। अब क्या? (Page 13)

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ से लिया गया है। इस गद्यांश में कथानायक के संवेदनशील व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। कलाकार छोटा हो या बड़ा, अपमान सहन नहीं कर सकता। मानू की चाची के कटु शब्दों से सिरचन के हृदय को ठेस पहुँचती है और वह अधूरा कार्य छोड़कर होली से चला जाता है। मानू का भाई जब उसे मनाने के लिए उसके पास जाता है तो वह अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहता है –

व्याख्या:
बाबूजी, मुझसे अब चिक और शीतलपाटी नहीं बुनी जाएगी। मैं कान पकड़ता हूँ, अब आगे यह काम नहीं करूँगा। मुझे मोहर छाप वाली धोती नहीं चाहिए। उसे पहनने के लिए कौन-सी मेरी पत्नी बैठी है। वह तो कब का स्वर्ग सिधार गई। खुद भी गई और अपने साथ अपनी संतानों को भी ले गई। यदि आज मेरी पत्नी जीवित होती तो मुझे ऐसी अपमानजनक स्थिति में नहीं रहना पड़ता। यह शीतलपाटी मेरी पत्नी की बुनी हुई है।

यह शीलतपाटी उसके प्रेम की अंतिम निशानी है। मैं इसी शीतलपाटी की शपथ लेकर कहता हूँ कि मुझसे अब लोगों की गुलामी नहीं की जाएगी। अब भविष्य में ये सब बुनने का काम नहीं करूँगा। तुम्हारी हवेली में ही मेरी कारीगरी का सम्मान होता था। मैं तुम्हारी हवेली में ही स्वयं को सम्मानित समझता था। परंतु अब उसी हवेली में अपमानित हुआ हूँ। अब तुम्हारा यहाँ आना . व्यर्थ है क्योंकि अब मैं यह काम नहीं करूंगा।

विशेष:

  1. कलाकार के कोमल हृदय पर लगी ठेस की प्रतिक्रिया अभिव्यक्त हुई है। सिरचन अपमानित होकर आगे कार्य न करने का कठोर निर्णय लेता है।
  2. सिरचन के हृदय की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं।
  3. भाषा पात्रानुकूल है।
  4. आंचलिक शब्दों के प्रयोग से भाषा प्रभावपूर्ण एवं सजीव हो उठी है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
सिरचन ने यह क्यों कहा कि कान पकड़ता हूँ, अब नहीं।
उत्तर:
सिरचन एक स्वाभिमानी ग्रामीण कलाकार है। लेखक की चाची अपने कटु शब्दों से उसके हृदय को ठेस पहुँचाती है। लेखक उसे मनाने उसके घर पहुँचता है। इसलिए वह आगे काम न करने का निर्णय लेता हुआ कहता है।

प्रश्न (ii)
‘मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा? कौन पहनेगा’ में छिपी वेदना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की माँ ने मानू के पहली बार ससुराल जाने के अवसर पर सिरचन को एक सप्ताह पहले काम पर बैठाते हुए उसे मोहर छाप धोती देने का वादा किया था। लेकिन मानू की चाची की बातों से उसे ठेस पहुँचती है। वह चिक एवं शीतलपाटी बनाने का काम बीच में ही छोड़कर चला जाता है। लेखक उसे मनाने जाता है तो सिरचन हृदय की वेदना फूट पड़ती है। उसकी पत्नी, बेटे-बेटियों की मृत्यु हो चुकी है। वह दुनिया में अकेला है। उसके लिए मोहर वाली धोती कोई अर्थ नहीं रखती। वह उसे लेकर क्या करेगा। उसके हृदय में दुनिया में अकेले रहकर अपमानित जीवन व्यतीत करने की पीड़ा है।

प्रश्न (iii)
सिरचन किस शीतलपाटी की शपथ लेता है और क्यों?
उत्तर:
सिरचन अपनी पत्नी की बुनी हुई शीतलपाटी की शपथ लेता है क्योंकि वह अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करता है और अब उसी की कसम खाकर भविष्य में काम न करने की शपथ लेता है।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
सिरचन ने भविष्य में काम न करने का निर्णय को लिया?
उत्तर:
सिरचन ने भविष्य में काम न करने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि गाँव के जिस घर में उसे सबसे अधिक सम्मान मिलता था, जहाँ उसकी कला की कदर होती थी, उसी हवेली में भी कटु शब्दों के द्वारा उसके हृदय को ठेस पहुंचाई गई थी।

प्रश्न (ii)
सिरचन ने मोहर छाप वाली धोती लेने से इनकार क्यों कर दिया?
उत्तर:
सिरचन के घर मोहर छाप वाली धोती पहनने वाला कोई नहीं था। उसकी पत्नी और बेटे-बेटियों की मृत्यु हो चुकी थी। इसलिए उसने मोहर छाप वाली धोती लेने से इनकार कर दिया।

 

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 6-11)

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 6-11)

6. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’
[2010]

  • जीवन परिचय

साठोत्तरी हिन्दी नाटककारों में डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। आपका जन्म 8 फरवरी,सन् 1936 को उन्नाव (उत्तर प्रदेश) जिले के राजापुर गढ़ेवा ग्राम में हुआ था। आपने एम. ए. और पी-एच.डी. तक शिक्षा ग्रहण की है।

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  • साहित्य सेवा

डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ आधुनिक नाट्यशास्त्र को नई दिशा की ओर मोड़ने वाले एक प्रतिभासम्पन्न नाटककार के रूप में सुविख्यात हैं। आपने अब तक सोलह नाटक, चार एकांकी संग्रह,दो कविता-संग्रह,एक उपन्यास,आत्मकथा तथा समीक्षात्मक ग्रन्थ लिखे हैं। लेखन का यह तीव्र क्रम वर्तमान में भी जारी है।

  • रचनाएँ

इनकी अनेक रचनाएँ हैं, जिनमें ऐतिहासिक तथा समाज की विसंगतियों का सरलता से बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया गया है। इनके द्वारा लिखे गये एकांकियों में ‘स्वप्न का सत्य’, ‘टूटते हुए’,’बहुरुपिए’, ‘मुखौटे बोलते हैं’, ‘गृह कलह’, कायाकल्प’,’समर्पण’,’प्रायश्चित’ आदि प्रमुख।

  • वर्ण्य विषय

इनके नाटक व एकांकी सम-सामायिक समाज की स्थिति तथा ऐतिहासिकता को लेकर रचे गये हैं, जिनके पात्र भी ऐतिहासिक व सत्य हैं। सामाजिक रचनाओं में इन्होंने समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनैतिकता और अन्धविश्वास पर करारा व्यंग्य किया है।

  • भाषा

इनकी भाषा सरल, अभिनेय और मंचीय है। वाक्य छोटे होने के साथ बोधगम्य तथा सरल हैं। भाषा में प्रवाह है तथा वह संवाद तथा कथ्य को आगे बढ़ाने में पूर्णतः समर्थ है। कहीं-कहीं संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। कथ्य को प्रभावशाली बनाने के लिए विदेशी, देशज इत्यादि शब्दों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया गया है। भाषा में महावरों तथा कहावतों का प्रयोग भी देखने को मिलता है; जैसे—आस्तीन का साँप, इज्जत धूल में मिलाना इत्यादि। भाषा पात्रों के अनुकूल है।

  • शैली

जहाँ एक ओर आपने सामाजिक बुराइयों को उजागर कर उन्हें दूर करने के लिए व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया गया है वहीं दूसरी ओर आपने अपने समस्त नाटक नाट्य-शैली में प्रस्तुत किये हैं। संवादों की लघुता, भावों की गहराई का परिचय देती है। एकांकियों की शैली मंचीय है। व्यंग्यात्मक स्थानों में उद्धरण, व्याख्या, व्यास और सूक्ति शैली को अपनाया गया है।

  • साहित्य में स्थान

नई पीढ़ी के नाटककारों में डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ को एक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। आपने नाटक,कहानी,एकांकी, कविता, उपन्यास, आत्मकथा तथा समीक्षात्मक विधाओं में हिन्दी साहित्य को अनुपम कृतियाँ प्रदान की हैं। कृतियों की मौलिकता के कारण डॉ.शक्ल अग्रणी साहित्यकारों में गिने जाते हैं।

7. पं. रामनारायण उपाध्याय
[2009, 11, 14, 17]

घर के विद्वत् वातावरण तथा संस्कृतनिष्ठ संस्कारों से युक्त पं. रामनारायण उपाध्याय ने मध्य प्रदेश की आदिवासी संस्कृति को साहित्य में उतारने का प्रशंसनीय कार्य किया है। उनका साहित्य ग्रामीण को उजागर करने में सफल रहा है। वह अपने पाठकों को अपनी बात बताने में सहजता की डोर पकड़े रहते हैं।

  • जीवन परिचय

पं.रामनारायण उपाध्याय का जन्म 20 मई,सन् 1918 को कालमुखी नामक ग्राम,जिला (खण्डवा) मध्य प्रदेश में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री सिद्धनाथ तथा माता का नाम दुर्गादेवी था। आपने साहित्य वाचस्पति की उपाधि प्राप्त की और पण्डित कहलाने लगे। आपने अंग्रेजी-हिन्दी का विशद अध्ययन किया जिस कारण आपका जीवन दृष्टिकोण भी अति उदार तथा विशाल बना। आप ग्रामीण जीवन व माटी से जुड़े रहे। यही ग्रामीण वातावरण आपके साहित्य में परिलक्षित होता है। आप गाँधीवादी विचारधारा से पूरी तरह प्रभावित थे। आपकी लेखनी सत्य और मानव कल्याण के लिये थी। ग्राम संस्कृति के चितेरे पं.रामनारायण उपाध्याय 20 जून,सन् 2001 को स्वर्गवासी हए।

  • साहित्य सेवा

निमाडी लोक साहित्य के मर्मज्ञ पं. उपाध्यायजी जन्मजात प्रतिभासम्पन्न साहित्यकार थे। ‘ अत: लिखने के लिए एकान्त के अतिरिक्त उन्हें किसी वस्तु व साधन की आवश्यकता नहीं थी। वे ‘मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद्-भोपाल’ तथा ‘राष्ट्र भाषा परिषद भोपाल’ के संस्थापक सदस्य रहे। आपने अपनी पत्नी शकुन्तला देवी की स्मृति में ‘लोक-संस्कृति न्यास की स्थापना 27 नवम्बर, सन् 1989 को की। आपको लोक संस्कृति शोध संस्थान, चुरू (राजस्थान) द्वारा ‘निमाड़ का सांस्कृतिक इतिहास’ पर झवेर चन्द मेधाणी स्वर्णपदक (1982) में, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मान (1986) में, इंडियन फोकलोर सोसायटी, कलकत्ता द्वारा भोजपुरी सम्मेलन, रेणुकूट, वाराणसी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद द्वारा ‘साहित्य वाचस्पति’ (1993) में,तथा मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा 11000 रुपये का भवभूति अलंकरण’ (1996) में प्राप्त हुआ। पंडितजी की प्रकाशित रचनाओं की संख्या चालीस से अधिक है। ‘कुंकुम-कलश और आम्रपल्लव’, ‘हम तो बाबुल तोरे बाग की चिड़िया’, ‘कथाओं की अन्तर्कथाएँ’, ‘चतुर चिडिया’ तथा ‘निमाड़ का लोक-साहित्य और उसका इतिहास’ उनकी पुरस्कृत रचनाएँ हैं।

  • रचनाएँ

पं. उपाध्याय जी ने साहित्य की विविध विधाओं; जैसे-व्यंग्य, निबन्ध, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज,लघु कथाएँ आदि में लिखा।

  1. संस्मरण-कथाओं की अन्तर्कथाएँ’, जिन्हें भूल न सका।
  2. व्यंग्य–’बख्शीश नामा’, ‘घुघराले काँच की दीवार’।
  3. ललित निबन्ध–’जनम-जनम के फेरे’, ‘आओ अब घर चलें’ ‘आस्थाओं की जमीन’।
  4. लोक साहित्य-निमाड़ का सांस्कृतिक इतिहास’, ‘लोक जीवन में राम’।
  5. पत्र-संग्रह–’चिट्ठी-पत्री’।
  6. व्यक्तित्व-कृतित्व-‘मामूली आदमी’, ‘धरती का बेटा’। वर्ण्य विषय बहुमुखी प्रतिभा के धनी पं.उपाध्याय जी को अपने गाँव से ही साहित्य रचने की प्रेरणा मिली। उनकी सम्पर्क-शीलता, जनसाधारण से पत्र-व्यवहार और परिचय की व्यापकता ने

उन्हें साहित्य रचना का वर्ण्य-विषय प्रदान किया। निमाड़ी लोक-जीवन को साहित्य में उतारने का सराहनीय कार्य पंडितजी ने किया। एक सच्चे किसान की भावुकता,सहृदयता और क्रियाशीलता उनके साहित्य में सर्वज्ञ दिखाई देती है। गाँधीवादी जीवन और विचारधारा के साथ ग्राम और ग्राम्य संस्कृति उनकी रचनाओं के आधार हैं।

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  • भाषा

लोक साहित्यविद् पंडितजी की भाषा भी लोकभाषा ही है। लेकिन संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली में विदेशी शब्द, जैसे-ऑर्डर, स्टेशन इत्यादि का प्रयोग है। साथ ही, साधारण बोलचाल के आंचलिक शब्दों का प्रयोग भाषा को मधुरता देता है। पंडितजी को शब्दों से मोह नहीं है। वह तो यन्त्र के पुजों की तरह फिट बैठने वाले शब्दों का प्रयोग करते हैं। कहीं-कहीं वाक्यों में सूत्रता आ जाती है। अधिकतर वाक्य छोटे व विचारपूर्ण हैं। परन्तु लघु गद्यांश रूप में भी वाक्यों का प्रयोग करने में वे नहीं चूकते। इस प्रकार उनकी भाषा प्रवाहपूर्ण तथा बोधगम्यतापूर्ण है।

  • शैली

पं.रामनारायण उपाध्याय जी की शैली में विविधता है। “मैं क्यों लिखता हूँ?” निबन्ध में उन्होंने आत्मपरक शैली को अपनाया। लोक साहित्य में वर्णनात्मक शैली को निभाया। इस शैली की भाषा सरल व प्रवाहपूर्ण है। अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए उन्होंने यत्र-तत्र सूत्रात्मक शैली को अपनाया है। व्यंग्यात्मक निबन्धों में व्यंग्यात्मक शैली को अपनाया तो संस्मरणों में भावात्मक शैली को। इस प्रकार लेखक ने समय के अनुसार विविध शैलियों का प्रयोग करके अपने साहित्य का कलेवर सजाया है।

  • साहित्य में स्थान

लोक-संस्कृति-पुरुष के रूप में पंडित जी ने पर्याप्त ख्याति प्राप्त की है। हिन्दी साहित्य के भण्डार को विविध साहित्यिक विधाओं से भरने के कारण उनका एक विशिष्ट स्थान है। ग्रामीण जीवन की अभिव्यक्ति ने उनके साहित्य को अनुपम बना दिया है। हिन्दी गद्य साहित्य सदैव उनका ऋणी रहेगा।

8. डॉ. रघुवीर सिंह [2009, 11, 12, 13]

इतिहास को साहित्य में पिरोने वाले डॉ.रघुवीर सिंह इतिहास एवं संस्कृति के प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। एक राजघराने में जन्म लेकर भी आप साहित्य-सृजन के कष्टपूर्ण और तपस्या के मार्ग पर बड़ी सफलता से आगे बढ़े। इनके भावात्मक निबन्धों के लिए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं-~-“ये हृदय के मर्मस्थल से निकले हैं और सहृदयों के शिरीष-कोमल अन्तस्तल में सीधे जाकर सुखपूर्वक आसन जमाएँगे।”

  • जीवन परिचय

डॉ. रघुवीर सिंह का जन्म सन् 1908 ई. में मन्दसौर जिले के सीतामऊ के राजघराने में हुआ था। इनके पिता मालवा की सीतामऊ रियासत के महाराज थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर तथा उच्च शिक्षा होल्कर कॉलेज, इन्दौर में हुई। आपने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा एल. एल. बी. की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। ‘मालवा में युगान्तर’ नामक शोधग्रन्थ पर आगरा विश्वविद्यालय ने इन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। सन् 1991 में इनका निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

राजघराने से सम्बन्धित होते हुए भी रघुवीर सिंह ने साहित्य-साधना के कठिन मार्ग को अपनाया। ये प्रमुख रूप से निबन्ध लेखक थे। इनके निबन्धों की शैली सजीव एवं ओजपूर्ण है। ‘शेष स्मृतियाँ’ इनकी सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक है। ‘ताज’, ‘फतेहपुर सीकरी’ पर आलंकारिक शैली में निबन्ध लिखकर इन्होंने पर्याप्त ख्याति अर्जित की।

• रचनाएँ
(1) इतिहास सम्बन्धी रचनाएँ–’पूर्व मध्यकालीन भारत’, ‘मालवा में युगान्तर’, ‘पूर्व आधुनिक राजस्थान’।
(2) साहित्यिक कृतियाँ-‘शेष स्मृतियाँ’, ‘सप्तदीप’,’बिखरे फूल’ तथा ‘जीवन कण’।

• वर्ण्य विषय
रघुवीर सिंह प्रसिद्ध इतिहास लेखक तथा गद्यकाव्य सर्जक हैं। ‘मध्य युग का इतिहास’ उनके साहित्य का विषय था। इतिहास के ज्ञाता होने के साथ-साथ तथा सहृदय सौन्दर्य उपासक होने के कारण वे साहित्य में भी अपनी गहरी पैठ बना सके। आप हिन्दी साहित्य में ऐतिहासिक निबन्धकार के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसी कारण इनके साहित्यिक निबन्धों में भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का आश्रय विद्यमान है, जिसमें तत्कालीन युग-जीवन मुखर है। सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ‘शेष स्मृतियाँ’ ऐतिहासिक आधार पर लिखे गये भावात्मक निबन्धों का संग्रह है।

  • भाषा

डॉ. रघुवीर सिंह की भाषा सरल, स्पष्ट और सुबोध है। यद्यपि भाषा संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से युक्त है तथापि यथावसर उर्दू शब्दों के प्रयोग से भी परहेज नहीं किया गया है। इसी कारण विषय-प्रतिपादन में प्रवाह और प्रभावोत्पादकता आ गई है। भाषा ललित हो गई है जो सहज ही पाठक को भाव-प्रवण और संवेदनशील बना देती है। तत्सम शब्दों की प्रधानता है, जैसे-द्युति, स्मृति, विरक्त, तृप्त आदि। कहावतों,मुहावरों और अलंकारों के प्रयोग ने भाषा को गति प्रदान की है। ‘प्यार की ठण्डी दुलारी बयार’ जैसे शब्द-समूहों के प्रयोग से भाषा सजीव हो उठी है। भावों की अभिव्यक्ति के लिए कहावतों,मुहावरों का सटीक चयन किया गया है।

  • शैली

डॉ. रघुवीर सिंह की शैली की प्रमुख विशेषता-रोचकता, चित्रात्मकता, भावुकता तथा अलंकार योजना है।

  1. भावात्मक शैली–अधिकांश निबन्ध भावात्मक शैली में हैं जिनकी भाषा काव्यात्मक एवं सरस हो गई है; जैसे- “दिवस भर के उत्थान के बाद संध्या समय अपने पतन पर क्षुब्ध मरीत्तिमाली जब प्रतीची के पादप पुंज में अपना मुख छिपाने को दौड़ पड़ते हैं और विदा होने से पूर्व अश्रुपूर्ण नेत्रों से जब वे उस अमर करुण कहानी की ओर एक निराशपूर्ण दृष्टिं डालते हैं तब तो वह पुराना किला रो पड़ता है।”
  2. चित्रात्मक शैली इस शैली का सहारा लेकर एक चित्रकार की भाँति इन्होंने अपने भावों को पाठकों के समक्ष रखा है; जैसे-“सन्दरता में ताज का प्रतियोगी. एत्मादोला का मकबरा, भाग्य की चंचलता का मूर्तिमान रूप है।”
  3. आलंकारिक शैली-आलंकारिक शैली के प्रयोग से इनके निबन्धों में सजीवता तथा प्रभावोत्पादकता आ गई है। उपमा, रूपक, अतिश्योक्ति इत्यादि अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है। विरोधाभास अलंकार का उदाहरण देखिए-यशोधरा कहती है, “हिमालय की छाँह में रहकर भी मेरा यह ताप किसी प्रकार घटता नहीं है।”
  4. विचारात्मक शैली-गम्भीर विषयों की विवेचना में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का सहारा लिया गया है; जैसे-“मानव जीवन एक पहेली है और उससे भी अधिक अनबूझ वस्तु है विधि का विधान।”
  5. वर्णनात्मक शैली इतिहासकार होने के कारण आपकी रचनाओं में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग स्वाभाविक ही है।

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  • साहित्य में स्थान

रघुवीर सिंह मुख्यतः ऐतिहासिक विषयों के निबन्धकार माने जाते हैं। इनके निबन्ध दार्शनिक चिन्तन,शोधपरक अनुसन्धान और सांस्कृतिक आलोचना की छत्र-छाया माने जाते हैं। इनकी इस शोध चिन्तन एवं सांस्कृतिक साहित्यिक अभिरुचि का मूर्तरूप ‘नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ’ है। यहाँ साहित्य, इतिहास एवं संस्कृति में शोध की अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इनके निबन्धों को वर्णन, चित्र एवं भाव-निरूपण की दृष्टि से अमूल्य समझा जाता है। हिन्दी साहित्य में इनकी उत्कृष्ट कृतियों के कारण इन्हें प्रतिभाशाली साहित्यकार के रूप में माना जाता है।

9. जैनेन्द्र कुमार

आधुनिक हिन्दी गद्य साहित्य में उपन्यास एवं कहानियों के लेखन में जैनेन्द्रजी अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। ये प्रेमचन्दोत्तर युग के श्रेष्ठ कथाकार माने जाते हैं। ये हिन्दी साहित्य में मनोविश्लेषणात्मक लेखन के पुरोधा हैं।

  • जीवन परिचय

गहन चिन्तनशील जैनेन्द्र कुमार का जन्म अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज नामक कस्बे में सन् 1905 ई.में हुआ। इनके पिता का नाम श्री प्यारेलाल और माता का नाम श्रीमती रामदेवी था। पिता की मृत्यु के समय ये मात्र दो वर्ष के थे। इनका पालन-पोषण माताजी तथा नानाजी ने किया। इनका बचपन का नाम आनन्दीलाल था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर के जैन गुरुकुल “ऋषि ब्रह्मचर्य आश्रम” में हुई और यहीं इनका नाम जैनेन्द्र कुमार रखा गया। सन् 1912 में गुरुकुल छोड़कर 1919 में पंजाब से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और काशी विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। सन् 1921 में पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन तथा स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन में भाग लेने के कारण इन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। इन्होंने माताजी की सहायता से व्यापार भी किया परन्तु असफल होने पर साहित्य क्षेत्र में प्रवेश किया। दिल्ली में रहकर स्वतन्त्र रूप से साहित्य सेवा करते हुए 24 दिसम्बर, सन् 1988 को इनका देहान्त हो गया।

  • साहित्य सेवा

इनकी प्रथम कहानी ‘खेल’ सन् 1928 ई.में ‘विशाल भारत’ में छपी थी। सन् 1929 में इनका पहला उपन्यास ‘परख’ प्रकाशित हुआ जिस पर साहित्य अकादमी ने 500 रुपये का पुरस्कार प्रदान किया। जीवन-पर्यन्त साहित्य साधना में संलग्न रहकर जैनेन्द्र जी ने हिन्दी साहित्य को उपन्यास,कहानी, निबन्ध,संस्मरण, अनुवाद और विविध विधाओं की रचना से धनी बनाया।

  • रचनाएँ

प्रेमचन्द के बाद जैनेन्द्र ही कथा साहित्य के सरताज हैं। परन्तु यश उन्हें निबन्ध के क्षेत्र में ही मिला।

  1. कहानी-संग्रह–फाँसी’, ‘एक रात’, ‘स्पर्धा’, ‘पाजेब’, ‘वातायण’, ‘नीलम देश की राजकन्या’, ‘ध्रुवयात्रा’, ‘दो चिडिया’ आदि। ‘जैनेन्द्र की कहानियाँ’ नाम से दस भागों में आपकी कहानियाँ संगृहीत हैं।
  2. उपन्यास-परख’, ‘सुनीता’, ‘त्याग-पत्र’, कल्याणी’, ‘विवर्त’, ‘सुखदा’ ‘व्यतीत’, ‘मुक्तिबोध’।
  3. निबन्ध-संग्रह–’प्रस्तुत प्रश्न’, पूर्वोदय’, ‘जड़ की बात’,’साहित्य का श्रेय और प्रेम’, ‘मन्थन’,’गाँधी-नीति’,’काम-प्रेम और परिवार’ आदि।
  4. संस्मरण ‘ये और वे’।
  5. अनुवाद–’मंदालिनी’ (नाटक), पाप और प्रकाश’ (नाटक), प्रेम और भगवान’ (कहानी)।
  • वर्ण्य विषय

बहुमुखी प्रतिभा के धनी जैनेन्द्र जी ने कहानी, उपन्यास, निबन्ध,संस्करण, अनुवाद आदि अनेक गद्य विधाओं को अपना वर्ण्य विषय बनाया। एक ओर उनकी रचनाओं में पात्रों के अन्तर्मन एवं बाह्य रूप की झाँकी में दार्शनिकता मिलती है तो दूसरी ओर मानव जीवन के वर्तमान समय में उपस्थित विविध प्रश्नों के साथ-साथ उसकी शाश्वत समस्याओं का उद्घाटन भी मिलता है। उनके निबन्धों का वर्ण्य विषय साहित्य,समाज,राजनीति, धर्म,संस्कृति आदि है। आपका दृष्टिकोण मानवतावादी है। मनोवैज्ञानिकता आपकी रचनाओं का आधार थी। हाड़-माँस के पात्र जो अच्छाइयों और बुराइयों के समवेत पुंज हैं, इनकी रचनाओं के वर्ण्य विषय हैं। इन पात्रों के चरित्र की आधारशिला बुद्ध की करुणा, महावीर की अहिंसा और महात्मा गाँधी की सहनशीलता है। इसी कारण इनकी कथावस्तु संक्षिप्त और पात्र कम होते हैं। इनकी तुलना प्रेमचन्द से की जाती है। प्रेमचन्द का रचना-क्षेत्र ग्रामीण समाज और उसके शोषण पर केन्द्रित था, परन्तु जैनेन्द्र शहरी समाज की मनोवैज्ञानिक ग्रन्थियों पर कलम चलाते हैं।

  • भाषा

उनकी भाषा के कई रूप हैं—पहला, उनके उपन्यासों और कहानियों में है। जो सरल, सुबोध और संस्कृतनिष्ठ है। दूसरा रूप निबन्धों में है जिसमें गम्भीरता व दुरूहता आ गई है। इनकी भाषा विषय के अनुकूल परिवर्तित हो जाती है। भाषा की गम्भीरता के समय वाक्य बड़े तथा तत्सम शब्दावली से युक्त हैं। वर्णनात्मकता के समय वाक्य छोटे और अन्य भाषाओं के शब्दों से युक्त हैं, जैसे-“वायसरायगिरी करते हैं जो बेहद जिम्मेदारी का काम है।” दूसरी भाषाओं, जैसे-अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत के शब्दों को अपनाने में उदारता है। भाषा में प्रभाव व चमत्कार उत्पन्न करने के लिए मुहावरे और कहावतों का भी प्रयोग है, जैसे-दर-दर भटकना, ठन-ठन गोपाल होना,पूँछ हिलाना आदि।

  • शैली

जैनेन्द्रजी की शैली के निम्नलिखित तीन रूप देखने को मिलते हैं

  1. विचार-प्रधान विवेचनात्मक शैली-इनका रूप निबन्धों में देखने को मिलता है, जिसमें विचारों की गम्भीरता और चिन्तन की दुरूहता है। “पर अहंकार हवा में थोड़े उड़ जाता है। साधना से उसे धीमे-धीमे हल्का और व्यापक बनाना होता है।”
  2. मनोविश्लेषणात्मक शैली कहानी और उपन्यास के पात्रों के अन्तर्द्वन्द्व और बहिर्द्वन्द्व की अनुभूतियों को स्पष्ट करने के लिए इस शैली का प्रयोग किया गया है।
  3. व्यावहारिक शैली कथा में जीवन्तता लाने के लिए इस शैली का प्रयोग किया गया है। वार्तालाप के माधुर्य और सहज व्यंग्यात्मकता के कारण इसमें रोचकता आ गयी है। प्रसादगुण इस शैली की विशेषता है। इसमें वाक्य छोटे व सहज हैं।
  • साहित्य में स्थान

गहन चिन्तनशील जैनेन्द्रजी ने मनोवैज्ञानिकता प्रधान उपन्यास और कहानी की एक विशेष धारा प्रारम्भ की थी। आपके चिन्तन तथा नवीन शैली विधान ने हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की है। आपका सरल, सुबोध अभिव्यक्ति-कौशल, कथा को मार्मिक और प्रभावपूर्ण बनाता है। अपने इसी विशिष्ट रचना-कौशल और सामाजिक सम्बद्धता के बल पर आपने हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान बनाया है।

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10. डॉ. शिवप्रसाद सिंह
[2009]

प्रेमचन्द की परम्परा को पुनः जीवित करके उसे आधुनिक मान देने वाले डॉ. शिवप्रसाद सिंह हिन्दी साहित्य में अपनी बहुमुखी प्रतिभा और लेखन-सामर्थ्य का परिचय देने वाले हैं।

  • जीवन परिचय

डॉ.शिवप्रसाद सिंह का जन्म 19 अगस्त,सन् 1929 ई.में वाराणसी जनपद के एक कृषक परिवार में हुआ। इनकी शिक्षा वाराणसी के उदय प्रताप विद्यालय और हिन्दू विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुई। इन्होंने एम. ए. करने के पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में रीडर पद पर अध्यापन कार्य किया तथा हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे और उसी पद से सेवानिवृत्त हुए।

  • साहित्य सेवा

डॉ. शिवप्रसाद सिंह का लेखन-क्षेत्र बहुत व्यापक है। इन्होंने कहानी, उपन्यास, निबन्ध, नाटक,जीवनी, आलोचना एवं सम्पादन इत्यादि सभी विधाओं में लेखन-कार्य किया है। आपको ‘नीला चाँद’ उपन्यास के लिए 1992 में व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया। ‘अलग-अलग वैतरणी’ उपन्यास ने उन्हें साहित्य जगत् में चर्चा का केन्द्र बनाया। उनकी कहानियाँ चरित्र-प्रधान होने के साथ-साथ अतीत से प्रेरणा ग्रहण करती हैं। उनके ललित निबन्धों में उनकी संवेदनशील आध्यात्मिक व्यक्तित्व की छवि है।

  • रचनाएँ

डॉ.शिवप्रसाद सिंह ने साहित्य की विविध विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी। उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. कहानी-‘आर-पार की माला’, ‘कर्मनाशा की हार’, ‘मुरदा सराय’, इन्हें भी इन्तजार है’, भेड़िया’ तथा ‘अंधेरा हँसता है’ प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
  2. उपन्यास–अलग-अलग वैतरणी’, ‘गली आगे मुड़ती है’, ‘वैश्वानर’, ‘चाँद फिर उगा’, ‘नीला चाँद’ आदि प्रमुख उपन्यास हैं।
  3. नाटक-‘घंटिया गूंजती हैं।
  4. निबन्ध-संग्रह-‘शिखरों के सेतु’,’चतुर्दिक’, कस्तूरी मृग’ इत्यादि निबन्ध-संग्रह हैं।
  5. समीक्षा-‘कीर्तिलता’, विद्यापति’, लेखन और नवालेखन’ आदि आलोचनाएँ हैं।
  6. सम्पादन–आपने ‘शिवालिक’ और ‘कल्पना’ का सम्पादन भी किया।
  • वर्ण्य विषय

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ.शिवप्रसाद सिंह ने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर लेखनी चलाई। कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, समीक्षा, सम्पादन आदि सभी पर लिखा। मनुष्य और मनुष्यता के विविध सन्दर्भ और रूप उनके लेखन को व्यापकता प्रदान करते हैं। मनुष्य और प्रकृति का तादात्म्य उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है। यथार्थ के उद्घाटन में व्यंग्य का धरातल है। कहानियों में ग्राम्य कथानक के साथ सामाजिक समस्याओं का भी समाधान है। डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने अपने साहित्य-सृजन में बदलते मूल्यों को स्वीकार किया है।

  • भाषा

डॉ.शिवप्रसाद सिंह की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है,जिसमें मुहावरों का सटीक प्रयोग विद्यमान है; जैसे-रंग जमता है,रंग उखड़ता है,रंग चढ़ता है,दाल में काला होना,खाक छानना इत्यादि। संस्कृत शब्दावली के प्रयोग से भाव-ग्रहण में कहीं-कहीं क्लिष्टता आ गई है; जैसे-स्निग्धाभिन्नाञ्जनाभा, विद्रुमभंगलोहित, श्वेत-तुषार-मण्डित। उर्दू के भी प्रचलित शब्दों का प्रयोग है; जैसे—मजेदार, चीजें, खूब, सैलाब, हौसला आदि। आंचलिक अथवा ग्रामीण शब्दावली है; जैसे–मानुष,डीह,टेस, बिरबा, चौरा आदि।

इस प्रकार भाषा में विभिन्न शब्दों के प्रयोग से प्रसंगों को जीवन्त और प्रवाहपूर्ण बनाते हुए भाषा को सजीवता प्रदान की गई है।

  • शैली

डॉ.शिवप्रसाद सिंह ने शैली के निम्नलिखित कई रूपों को अपनाया है-

  1. उद्धरण शैली-डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए स्थान-स्थान पर संस्कृत व हिन्दी के लेखकों के अनेकों उदाहरण दिये हैं; जैसे-तुलसी-‘गिरा अनयन नयन बिनु पानी’। इसमें लघु वाक्यों का सुन्दर प्रयोग किया गया है।
  2. सामासिक पद शैली-इनकी शैली में सामासिक पद शैली के द्वारा विचारों को स्पष्ट करने का सफल प्रयास परिलक्षित होता है; जैसे—“रंग-भ्रान्ति और रंग-परिवर्तन विर-वर्णनों में स्वभावतः अधिक दिखाई पड़ते हैं।” इस शैली के माध्यम से वाक्य की संक्षिप्तता सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक है।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली का प्रयोग कहानियों में किया गया है। इस शैली में भाषा अपेक्षाकृत कठिन हो जाती है। ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी में भावात्मक शैली के दर्शन होते हैं।
  • साहित्य में स्थान

कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार, निबन्धकार एवं समीक्षक डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने अपनी प्रबल लेखनी के जाद से हिन्दी गद्य साहित्य को एक नया रूप प्रदान किया है। आपने अब तक अनछुए विषयों पर लिखकर अपनी लेखन कुशलता का परिचय दिया है। रचनाओं की मौलिकता तथा अभिव्यक्ति के कारण डॉ.शिवप्रसाद सिंह वर्तमान युग के अग्रणी साहित्यकार माने जाते हैं।

11. आचार्य विनोबा भावे

  • जीवन परिचय

आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितम्बर,1895 को महाराष्ट्र में कोंकण क्षेत्र के एक छोटे से गाँव नागोदा में हुआ था। आपका मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। माता का नाम रुक्मिणी था जो एक विदुषी तथा धार्मिक महिला थीं तथा पिता नरहरि भावे को गणित एवं विज्ञान के प्रति गहन अनुराग था। माँ उन्हें प्यार से विन्या पुकारती थीं। आपने सन् 1915 में हाईस्कूल पास किया। बम्बई में इण्टर करने गये परन्तु पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। माँ से भक्ति-आध्यात्म चिन्तन मिला,पिता से वैज्ञानिक सूझ-बूझ तो गुरु रामदास,संत ज्ञानेश्वर तथा शंकराचार्य से ब्रह्मचर्य पालन व संन्यास की प्रेरणा मिली और सन्त विनोबा बने। आपने किसानों के लिए एक स्वप्न देखा कि प्रत्येक किसान के पास एक जमीन का टुकड़ा हो। इसके लिए आपने एक ‘भूदान आन्दोलन’ शुरू किया। आप एक आदर्श नेता एवं संगठनकर्ता भी थे। जीवन का संध्याकाल पुनार (महाराष्ट्र) के आश्रम में गुजारते हुए आप 15 नवम्बर,1982 को अनन्त में विलीन हो गए।

  • साहित्य सेवा

विनोबा भावे एक आदर्श छात्र, विचारक, लेखक, दर्शनशास्त्री, प्रवचनकर्ता थे तो एक अनुवादक तथा भाषाविद भी थे। संस्कृत ग्रन्थों के अनुवाद के द्वारा आपने दर्शन को आम आदमी तक पहुँचाया। मराठी, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत एवं कन्नड़ पर उनका पूर्ण अधिकार था। कन्नड़ को वह सभी भाषाओं की रानी कहते थे। उन्होंने भगवद्गीता को अपने जीवन की सास मानते हुए उसकी व्याख्या व आलोचना की तथा उसके दर्शन को जनता तक पहुंचाया। आपने आदिगुरु शंकराचार्य, बाईबिल तथा कुरान पर भी कार्य किया। संत ज्ञानेश्वर की कविताओं पर गहन अध्ययन किया। ‘गीता प्रवचन’ तथा ‘संतप्रसाद’ जैसी पुस्तकें उनकी मौलिकता का परिचय देती हैं। सन् 1931 में माँ के कहने पर आपने गीता का मराठी में अनुवाद किया। आपने वर्धा आश्रम में ‘महाराष्ट्र धर्म’ पत्रिका का सम्पादन किया। आप देवनागरी को सम्पर्क लिपि के रूप में विकसित करने के पक्षधर थे। इस हेतु आपने ‘नागरी लिपि संगम’ की स्थापना की। इस प्रकार साहित्य जगत में मूल रूप से न रहते हुए भी आपने साहित्य की अनुपम सेवा की।

  • रचनाएँ

भगवद्गीता, बाईबिल तथा कुरान जैसे अनेक धार्मिक ग्रन्थों पर कार्य करके उनके दर्शन व रहस्य को बताने वाले विनोबा भावे ने अनेक पुस्तकें लिखीं तथा संस्कृत की अनेक पुस्तकों का मराठी में अनुवाद किया। हिन्दी में निबन्ध लिखे। आपकी रचनाएँ निम्नवत् हैं ‘गीता प्रवचन’, गीता का मराठी में अनुवाद, संतप्रसाद’, ‘गीताई’, ‘महाराष्ट्र धर्म’ पत्रिका का सम्पादन, The Essence of Quran (कुरान का सार), The Essence of Christian Teachings (ईसाई शिक्षाओं का सार), Thoughts of Education (शिक्षा पर विचार), ‘स्वराज्य शास्त्र’।

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  • वर्ण्य विषय

आध्यात्म चेतना के साधक विनोबा भावे का प्रिय विषय दर्शनशास्त्र था। कशाग्र बद्धि विनोबा भावे ने गणित, कविता तथा आध्यात्म को अपना वर्ण्य विषय बनाया। संन्यासी जीवन व्यतीत करते हुए अपरिग्रह, अस्तेय,निस्पृह, निर्लिप्त जीवन की व्याख्या उनके निबन्धों में मिलती है। गीता उन्हें बचपन से कण्ठस्थ थी, अत : गीता का मराठी में अनुवाद, हिन्दी में निबन्ध तथा प्रवचन साधारण मनुष्य को जीवन का संदेश देते हैं। उन्होंने ब्रह्म-जगत-सत्य-संन्यास पर चर्चा की। मात्र 21 वर्ष की अल्पायु में अद्वैतवाद पर बहस की। आदर्श समाज सुधारक के रूप में ‘भूदान आन्दोलन’ चलाया। भारतीय दर्शन की सरल भाषा में व्याख्या करके आपने उसे सामान्य जनता तक पहुँचाया। इसी कारण से आपके निबन्ध, व्याख्या, आलोचना, कविता, अनुवाद, प्रवचन, सम्पादन आदि भारतीय जन को प्रभावित करते हैं।

  • भाषा

एक सरल हृदय विचारक की भाषा भी सरल ही होती है। मराठी, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत तथा कन्नड़ भाषाओं पर आपको अद्भुत अधिकार प्राप्त था। इसी कारण आपको भाषाविद् भी कहा जाता है। आपकी भाषा में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य है। इसकी वजह से भाषा क्लिष्ट तथा गंभीर हो गई है। अनेक स्थानों पर आपकी भाषा काव्यमयी हो गई है। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आपने मुहावरों का प्रयोग कर भाषा को सजीव व चुटीला बनाया है। स्वजनासक्ति जैसे संस्कृत के सामासिक शब्दों के प्रयोग के साथ रूपक व उपमा अलंकार के प्रयोग ने आपके गद्य को भी काव्यमय बना दिया है। लघु वाक्य सूत्र का सा आभास देते हैं। इस प्रकार आपकी भाषा में अपार प्रवाह युक्त आकर्षण है।

  • शैली

कलम के धनी विनोबा जी की शैली व्याख्यात्मक तथा उदाहरण शैली का नमूना है। आपने निबन्धों में विवरणात्मक शैली को अपनाया है। उर्दू आदि के शब्द प्रयोग से शैली में सरलता आ गई है। अति सूक्ष्म रूप में उपदेशात्मक शैली का भी प्रयोग हुआ है। वाक्य भावों के अनुरूप अति लघु व विस्तृत हो गए हैं। दर्शन और आलोचनात्मक निबन्धों में गवेषणात्मक शैली के दर्शन होते हैं। विनोबा भावे चिन्तनशील निबन्धकार हैं। आपकी रचनाओं में विचार प्रधान, पांडित्यपूर्ण, प्रौढ़ एवं परिमार्जित शैली विद्यमान है। चिन्तन की उदात्तता पाठक को प्रभावित किए बिना नहीं रहती।

  • साहित्य में स्थान

आचार्य विनोबा भावे अनेक भाषाओं के विद्वान, कुशल राजनीतिज्ञ, मर्मज्ञ साहित्यकार, भारतीय संस्कृति एवं दर्शन के ज्ञाता, गम्भीर विचारक तथा जागरूक समाज सुधारक के रूप में सामने आते हैं। उनके नाम पर हजारी बाग (झारखण्ड) में विनोबा भावे विश्वविद्यालय स्थापित किया गया है। केरल राज्य में उन्होंने स्वयं 7 ‘विनोबा भावे आश्रम’ तथा 7 ‘विनोबा निकेतन’ स्थापित किए। सम्पादन के क्षेत्र में आपका अद्वितीय स्थान है। आपकी कृतियों में चिन्तन,मनन और अनुशीलता के बिम्ब दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मूलतः साहित्यकार न होते हुए भी विनोबा भावे का साहित्य में उच्च स्थान है

महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म हुआ था
(अ) आगरा में, (ब) अगोना में, (स) अजमेर में, (द) अलीगढ़ में।

2. ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ सर्वप्रथम लिखा
(अ) मोहन राकेश ने, (ब) श्यामसुन्दर दास ने, (स) रामचन्द्र शुक्ल ने. (द) डॉ. रघुवीर सिंह ने।

3. उषा प्रियंवदा ने इस विद्यालय से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की उपाधि अर्जित की है
(अ) सागर विश्वविद्यालय, (ब) अम्बेडकर विश्वविद्यालय, (स) इलाहाबाद विश्वविद्यालय, (द) दिल्ली विश्वविद्यालय।

4. ‘पचपन खम्भे लाल दीवार’ किसकी रचना है [2012]
(अ) महादेवी वर्मा की,
(ब) मृणाल पाण्डे की, (स) शिवानी की, (द) उषा प्रियंवदा की।

5. सन् 1923 में जीविका की तलाश में उदयशंकर भट्ट गये
(अ) लाहौर, (ब) चटगाँव, (स) इस्लामाबाद, (द) शक्करपुर।

6. उदयशंकर भट्ट ने नागपुर और जयपुर रेडियो केन्द्रों पर इस रूप में कार्य किया
(अ) न्यूज रीडर, (ब) प्रोड्यूसर, (स) स्क्रिप्ट राइटर, (द) संवाददाता।

7. शरद जोशी प्रसिद्ध हैं [2011]
(अ) कवि के रूप में, (ब) गजलकार के रूप में, (स) व्यंग्यन लेखक के रूप में, (द) इतिहासकार के रूप में।

8. प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ किस लेखक की रचना है?
(अ) हरिशंकर परसाई, (ब) शरद जोशी, (स) धर्मवीर भारती, (द) निर्मल वर्मा।

9. डॉ. श्यामसुन्दर दुबे की लगभग कितनी पुस्तकें प्रकाशित हैं?
(अ) पाँच, (ब) पच्चीस, (स) पाँच सौ, (द) सौ।

10. डॉ. श्यामसुन्दर दुबे के लेखन का इस संस्कृति से गहरा तादात्म्य था
(अ) नागरीय संस्कृति, (ब)लोकसंस्कृति, (स) पाश्चात्य संस्कृति, (द) पूर्वी संस्कृति।

11. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ ने मूलत: हिन्दी साहित्य की इस विधा को अपनी लेखनी का
विषय बनाया (अ) उपन्यास, (ब) संस्मरण, (स) नाटक, (द) रिपोर्ताज।

12. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ द्वारा लिखित ‘तात्या टोपे’ किस प्रकार का एकांकी है?
(अ) सामाजिक, (ब) ऐतिहासिक, (स) राजनैतिक, (द) आर्थिक।

13. ‘निमाड़ी लोक साहित्य’ के मर्मज्ञ गद्य-लेखक कौन थे?
(अ) प्रेमचन्द, (ब) शिवप्रसाद सिंह, (स) जैनेन्द्र, (द) रामनारायण उपाध्याय।

14. रामनारायण उपाध्याय इस महापुरुष के जीवन व विचारधारा से प्रभावित थे
(अ) गाँधीजी, (ब) कार्ल मार्क्स, (स) हिटलर, (द) विनोबा भावे।

15. प्रसिद्ध गद्यकाव्य लेखक हैं
(अ) जैनेन्द्र, (ब) रामचन्द्र शुक्ल, (स) शरद जोशी, (द)डॉ.रघुवीर सिंह।

16. डॉ. रघुवीर सिंह इस विषय के प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं
(अ) हिन्दी, (ब) इतिहास, (स) गणित, (द) संस्कृत।

17. जैनेन्द्र कुमार की तुलना किस महान् गद्य लेखक से की जाती है?
(अ) प्रेमचन्द, (ब) बाबू गुलाबराय, (स) हजारी प्रसाद द्विवेदी, (द) वियोगी हरि।

18. प्रसिद्ध उपन्यास ‘परख’ के लेखक हैं
(अ) जैनेन्द्र कुमार, (ब) यशपाल, (स) भीष्म साहनी, (द) अमरकान्त।

19. डॉ. शिवप्रसाद सिंह किस विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे?
(अ) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, (ब) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, (स) अम्बेडकर विश्वविद्यालय, (द) दिल्ली विश्वविद्यालय।

20. ललित निबन्ध ‘रंगोली’ के लेखक हैं
(अ) डॉ.शिवप्रसाद सिंह, (ब) हजारी प्रसाद द्विवेदी, (स) महादेवी वर्मा, (द) वासुदेवशरण अग्रवाल।

21. ‘महाराष्ट्र धर्म’ पत्रिका का सम्पादन किया
(अ) विनोबा भावे, (ब)रामचन्द्र शुक्ल, (स) धर्मवीर भारती, (द) डॉ.रघुवीर सिंह।

22. ‘गीता प्रवचन’ के लेखक हैं
(अ) वाल्मीकि, (ब) तुलसीदास, (स) आचार्य विनोबा भावे, (द) महर्षि रमण।
उत्तर-
1.(ब), 2. (ब), 3. (स), 4. (द), 5. (अ), 6. (ब), 7. (स), 8. (ब), 9.(ब), 10. (ब), 11. (स), 12. (ब), 13. (द), 14. (अ), 15. (द), 16. (ब), 17. (अ), 18. (अ), 19. (ब), 20. (अ), 21. (अ), 22. (स)।

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  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की प्रारम्भिक शिक्षा …….. में हुई।
2. सूत्रात्मक शैली के प्रणेता ……. हैं। [2013]
3. ‘रुकोगी नहीं राधिका’ उपन्यास की लेखिका ……… हैं।
4. ‘फिर बसन्त आया’ ……. का कहानी संग्रह है। [2009]
5. रेडियो प्रसारण की दृष्टि से उदयशंकर भट्ट के ……. अत्यधिक सफल हुए हैं।
6. उदयशंकर भट्ट का जन्म उत्तर प्रदेश के ……..” नगर में हुआ।
7. व्यंग्य नाटक ‘एक था गधा’ के लेखक ……. हैं।
8. शरद जोशी हिन्दी के सुप्रसिद्ध ……… लेखक हैं।
9. डॉ.श्यामसुन्दर दुबे शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के पद से सेवानिवृत्त हुए।
10. ‘कालमृगया’ डॉ.श्यामसुन्दर दुबे का …… संकलन है।
11. डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ का जन्म ……… के राजापुर गढ़ेवा गाँव में हुआ था।
12. ‘मुखौटे बोलते हैं’,एकांकी के लेखक …….. हैं।
13. ……… रामनारायण उपाध्याय की पुरस्कृत कृति है।
14. ……… में एक सच्चे किसान की सी भावुकता एवं कर्मठता थी।
15. डॉ.रघुवीर सिंह ……. एवं संस्कृति के प्रवक्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं।
16. …… “डॉ. रघुवीर सिंह का उच्चकोटि का गद्यकाव्य है।
17. जैनेन्द्र कुमार की प्रथम कहानी ….. है।
18. जैनेन्द्र कुमार ने अपनी रचनाएँ …. आधार पर लिखी हैं।
19. आधुनिक प्रेमचंद ………. को कहते हैं। [2014]
20. ‘कस्तूरी मृग’ डॉ.शिवप्रसाद सिंह का प्रसिद्ध ……… है।
21. साहित्य में चर्चा का केन्द्र ……… उपन्यास है।
22. विनोबा भावे का जन्म 11 सितम्बर ……. को हुआ था।
23. गीता का मराठी भाषा में अनुवाद ………….” ने किया।
उत्तर-
1. हमीरपुर, 2. रामचन्द्र शुक्ल, 3. उषा प्रियंवदा, 4. उषा प्रियंवदा, 5. गीतिनाट्य, 6. इटावा, 7. शरद जोशी,
8. हास्य-व्यंग्य, 9. प्राचार्य, 10. ललित निबन्ध, 11. उन्नाव जिले, 12. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’, 13. चतुर चिड़िया,
14. रामनारायण उपाध्याय, 15. इतिहास, 16. यशोधरा, 17. खेल, 18. मनोवैज्ञानिक, 19. जैनेन्द्र कुमार,
20. निबन्ध संग्रह, 21. अलग-अलग वैतरणी, 22. 1895, 23. आचार्य विनोबा भावे।

  • सत्य/असत्य

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी शब्द सागर का सम्पादन कार्य किया।
2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म सन् 1940 में हुआ।
3. उषा प्रियंवदा का स्वदेश की संस्कृति से तनिक भी लगाव न था।
4. उषा प्रियंवदा के उपन्यासों में निम्न-मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियाँ देखने को मिलती
5. उदयशंकर भट्ट आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।
6. 14 वर्ष की अल्पायु में ही उदयशंकर भट्ट अनाथ हो गये।
7. शरद जोशी प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं। [2009]
8. 1990 में शरद जोशी को पदमश्री से विभूषित किया गया।
9. ललित निबन्ध ‘तिमिर गेह में किरण-आचरण’ में बताया गया है कि आदमी का सदआचरण और श्रम उसे पतन की ओर ले जाता है।
10. मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘वागीश्वरी’ पुरस्कार डॉ. श्यामसुन्दर दुबे को मिला।
11. साठोत्तरी हिन्दी नाटककारों में डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ का अपना विशिष्ट स्थान है।
12. डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ के एकांकी कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टि से नीरस हैं।
13. रामनारायण उपाध्याय ने ‘लोक संस्कृति’ न्यास की स्थापना अपने माता-पिता की मधुर स्मृति में की।
14. उपाध्यायजी की रचनाएँ ग्राम और ग्राम संस्कृति से पूर्ण नहीं थीं।
15. डॉ.रघुवीर सिंह ने इतिहासपरक रचनाएँ लिखीं।
16. ‘मालवा में युगान्तर’ डॉ. रघुवीर सिंह की एक व्यंग्य रचना है।
17. जैनेन्द्र कुमार की शिक्षा-दीक्षा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हुई।
18. ‘फाँसी’ जैनेन्द्र का प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यास है।
19. ‘रंगोली’ डॉ.शिवप्रसाद सिंह का प्रसिद्ध ललित निबन्ध है।
20. ‘कीर्तिलता’ तथा ‘विद्यापति’ डॉ.शिवप्रसाद सिंह की समीक्षात्मक कृतियाँ हैं।
21. आचार्य विनोबा भाबे की शैली व्यंग्यात्मक थी।
22. कुरान का सार (The Essence of Quran) आचार्य विनोबा भावे कृत रचना है।
उत्तर-
1. सत्य, 2. असत्य, 3. असत्य, 4. सत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. सत्य, 8. असत्य, 9. असत्य,10. सत्य,11. सत्य,12. असत्य,13. असत्य,14. असत्य,15. सत्य, 16. असत्य, 17. असत्य, 18. असत्य, 19. सत्य, 20. सत्य, 21. असत्य, 22. सत्य।

  • सही जोड़ी मिलाइए

I. ‘क’
(1) रुकोगी नहीं राधिका – (अ) एकांकी
(2) रामचन्द्र शुक्ल [2011] – (ब) विक्रम और बेताल
(3) समस्या का अन्त – (स) बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ पुरस्कार
(4) शरद जोशी – (द) उपन्यास
(5) डॉ.श्यामसुन्दर दुबे – (इ) चिन्तामणि
उत्तर-
(1) → (द),
(2) → (इ),
(3) → (अ),
(4) → (ब),
(5) → (स)।

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(1) डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ – (अ) लोक-संस्कृति पुरुष
(2) आधुनिक युग का प्रेमचन्द (2012, 15) – (ब) ऐतिहासिक निबन्धकार
(3) रामनारायण उपाध्याय – (स) गृह कलह
(4) डॉ.शिवप्रसाद सिंह – (द) जैनेन्द्र कुमार
(5) डॉ.रघुवीर सिंह – (इ) आदर्श अध्यापक
(6) आचार्य विनोबा भावे – (ई) समाज सुधारक एवं दर्शनशास्त्री
उत्तर-
(1) → (स),
(2) → (द),
(3) → (अ),
(4) → (इ),
(5) → (ब),
(6) → (ई)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल किस विश्वविद्यालय में कार्यरत थे?
उत्तर-
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय।।

प्रश्न 2.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्धों में किन दो निबन्ध शैलियों का समन्वय है?
उत्तर-
भारतीय एवं पाश्चात्य।

प्रश्न 3.
उषा प्रियंवदा लिखित किसी एक कहानी का नाम क्या है?
उत्तर-
वापसी।

प्रश्न 4.
उषा प्रियंवदा के शोध ग्रन्थ का क्या नाम है?
उत्तर-
आधुनिक अमरीकी साहित्य।।

प्रश्न 5.
उदयशंकर भट्ट लाहौर के एक विश्वविद्यालय में कौन-से विषय पढ़ाते थे?
उत्तर-
हिन्दी और संस्कृत।

प्रश्न 6.
उदयशंकर भट्ट ने अपने नाटकों के लिए किस प्रकार के परिवारों की समस्याओं को चुना है?
उत्तर-
निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार।

प्रश्न 7.
शरद जोशी ने मध्य प्रदेश सूचना विभाग में कितने वर्षों तक सेवा की?
उत्तर-
10 वर्षों तक।

प्रश्न 8.
शरद जोशी लिखित नाटक ‘अन्धों का हाथी’ साहित्य की किस विधा के अन्तर्गत आता है?
उत्तर-
व्यंग्य नाटक।

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प्रश्न 9.
डॉ. श्यामसुन्दर दुबे की रचना ‘दाखिल खारिज’ साहित्य की किस विधा को दर्शाती है?
उत्तर-
उपन्यास।

प्रश्न 10.
‘तिमिर गेह में किरण आचरण’ ललित निबन्ध के लेखक कौन हैं? [2009]
उत्तर-
डॉ.श्यामसुन्दर दुबे।।

प्रश्न 11.
‘तात्या टोपे’ रचना लेखन की कौन-सी विधा है?
उत्तर-
एकांकी।

प्रश्न 12.
‘स्वप्न का सत्य’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’।

प्रश्न 13.
‘निमाड़ी लोक-साहित्य’ रचना के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
रामनारायण उपाध्याय।

प्रश्न 14.
रामनारायण उपाध्याय की माताजी का नाम क्या था?
उत्तर-
दुर्गावती।

प्रश्न 15.
डॉ. रघुवीर सिंह का जन्म कहाँ हुआ? \
उत्तर-
सीतामऊ।

प्रश्न 16.
डॉ. रघुवीर सिंह की शोध, चिन्तन एवं साहित्यिक अभिरुचि का मूर्त रूप क्या है?
उत्तर-
नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ।

प्रश्न 17.
आधुनिक युग का प्रेमचन्द किसे कहा जाता है? [2011]
उत्तर-
जैनेन्द्र कुमार को।

प्रश्न 18.
जैनेन्द्र कुमार ने किस समाज की ग्रन्थियों को खोला है?
उत्तर-
शहरी समाज।

प्रश्न 19.
‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
डॉ.शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 20.
डॉ. शिवप्रसाद सिंह किस विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे?
उत्तर-
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।

प्रश्न 21.
आचार्य विनोबा भावे के नाम पर स्थापित ‘विनोबा भावे विश्वविद्यालय’ कहाँ स्थित है?
उत्तर-
हज़ारी बाग (झारखण्ड)।

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प्रश्न 22.
‘गीता प्रवचन’ तथा ‘संतप्रसाद’ पुस्तकों के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
आचार्य विनोबा भावे।

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