MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध छन्द

MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध छन्द

छन्द दो प्रकार के होते हैं :

  1. मात्रिक छन्द,
  2. वर्णिक छन्द।

(1) मात्रिक छन्द-पहले प्रकार के छन्द में मात्राएँ गिनी जाती हैं जिन्हें मात्रिक छन्द कहते हैं। इसमें इस प्रकार की मात्राएँ होती हैं
लघु मात्रा – ।
गुरु मात्रा – ऽ

लघु मात्रा को गिनते समय 1 और गुरु मात्रा को 2 माना जाता है। अब लघु और दीर्घ किसे कहेंगे। वह समझ लें।
“सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्, वर्ण: संयोग पूर्वाश्च पादान्त गोऽपि वा।”

तात्पर्य यह कि बिना मात्रा या छोटी (ह्रस्व) मात्रा के अक्षर को लघु मानेंगे तथा अनुस्वार वाले, विसर्ग वाले, दीर्घ मात्रा वाले, संयुक्त अक्षर के पहले का अक्षर तथा कभी-कभी अन्तिम चरण का अन्तिम अभार ‘गुरु’ ऽ मात्रा वाला कहलाता है।

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जैसे-
।।। ऽ।। ऽ।
कमल यह 3 मात्रा मानेंगे। चंचल यह 4 मात्रा होगी। दुःख यह भी विसर्ग के कारण
ऽऽऽ
दो अक्षर होने पर 3 मात्रा गिनेंगे। सम्पत्ति = छ: मात्रा होंगी, क्योंकि स पर मात्रा नहीं है फिर भी आगे संयुक्त अभार होने से सऽ गुरु माना जायेगा।

(2) वर्णिक छन्द-वर्णिक छन्द में मात्रा तो वैसे ही गिनते हैं, किन्तु इसमें गण होते हैं। इसे आप इस सूत्र से याद रख सकते हैं :

  • ‘यमाताराजभानसलगा।
  • प्रत्येक गण तीन अक्षर होता है।
  • यगण (यमाता) ।ऽऽ
  • मगण (मातारा) ऽऽऽ
  • तगण (ताराज) ऽऽ।
  • रगण (राजभा) ऽ।ऽ
  • जगण (जभान) ।ऽ।
  • भगण (भानस) ऽ।।
  • नगण (नसल)।।।
  • सगण (सलगा)।।ऽ

और अन्त में ल= लघु के लिए एवं गा (गुरु के लिए) प्रयुक्त है।

1. कवित्त [2009, 16]

इसके अनेक रूप हैं। कवित्त या मनहरण के प्रत्येक चरण में इकत्तीस वर्ण होते हैं,सोलह और पन्द्रह वर्गों पर विराम होता है। चरण के अन्त में गुरु रहता है।

उदाहरण-
झहरि-झहरि झीनी बूंद हैं परति मानो,
घहरि-घहरि घटा घेरी है गगन में।
आनि कयौं स्याम मोसों चलौ झूलिबे को आज,
फूलि न समानी भई, ऐसी हौं मगन में।
चाहति उद्योई उठि गयी सो निगोड़ी नींद,
सोय गए भाग मेरे जागि वा जगन में।
ऑखि खोल देखौ तौ न घन हैं न घनस्याम,
वेई छाई बूंदें मेरे आँसू है दृगन में।

2. सवैया [2009]

सवैया गण छन्द है। बाइस से लेकर छब्बीस वर्षों तक के वृत्त सवैया कहलाते हैं। इस छन्द के मुख्य भेद मदिरा, चकोर,मत्तगयंद,अरसात, किरीट, दुर्मिल, सुन्दरी, मुक्तहरा आदि 7-8 प्रकार के होते हैं।

यहाँ दुर्मिल सवैया का उदाहरण दिया जा रहा है, जिसके प्रत्येक चरण में आठ सगण होते हैं। इसका दूसरा नाम ‘चन्द्रकला’ भी है।

उदाहरण-
पुर से निकसी रघुवीर-वधू धरि-धीर दये मग में डग द्वै।
झलकी भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गये मधुराधर द्वै।
फिर बूझति हैं चलनौ अब केतकि पर्णकुटी करिहौ कित है।
तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चली जल च्वै॥

(1) मत्तगयंद सवैया [2010, 12]
इसके प्रत्येक चरण में सात भगण और दो गुरु होते हैं।

उदाहरण-
या लकुटी अरु कमरिया पर राज तिहुँपुर को तज डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौं निधि को सुख नन्द की गाय चराइ विसारौं।
रसखान कबौं इन आँखिन सौं ब्रज के वन बाग तड़ाग निहारौं।
कौटिक हूँ कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर बारौं।।

(2) दुर्मिल सवैया दुर्मिल सवैया के हर चरण में आठ सगण पाये जाते हैं। वर्ण संख्या 24 मानी गयी है। इसका दूसरा नाम चन्द्रकला भी है।

उदाहरण-
इसके अनुरूप कहैं किसको, वह कौन सुदेश समुन्नत है।
समझे सुरलोक समान इसे, उनका अनुमान असंगत है।
कवि कोविद वृन्द बखान रहे, सबका अनुभूत यही मत है।
उपमान विहीन रचा विधि ने, बस भारत के सम भारत है।

3. छप्पय [2009]
छप्पय छन्द रोला और उल्लाला छन्दों के मिलने से बनता है। प्रथम चार चरण रोला छन्द के और शेष दो चरण उल्लाला छन्द के होते हैं। इस प्रकार,प्रथम चार चरणों में 24-24 मात्रायें होती हैं और 11-13 पर यति होती है। अन्तिम दोनों चरणों में 28-28 मात्रायें होती हैं और 15-13 पर यति होती है।

उदाहरण-
(1) सर्वभूत हित महामन्त्र का सबल प्रचारक।
सदय हृदय से एक-एक जन का उपकारक।
सत्यभाव से विश्व-बन्धुता का अनुरागी।
सकल सिद्धि सर्वस्व सर्वगत सच्चा त्यागी।
उसकी विचारधारा धरा के धर्मों में है वही। उल्लाला
सब सार्वभौम सिद्धान्त का आदि प्रवर्तक है वही॥

(2) नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है,
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मण्डप है,
बन्दीजन खग-वृन्दृ शेष फन सिंहासन है।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस देश की,
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की।

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(3) निर्मल तेरा नीर अमृत के सम उत्तम है,
शीतल मन्द सुगन्ध पवन हर लेता श्रम है।
षट ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है,
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है।
शुचि सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश,
हे मातृभूमि दिन में परणि करता तम का नाश।

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MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध अलंकार

MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध अलंकार

1. यमक अलंकार।

यमक का सामान्य अर्थ है दो। अत: जब एक ही शब्द की भिन्न अर्थ में आवृत्ति होती है, वहाँ यमक अलंकार होता है।
जैसे-

(1) कनक-कनक ते सौ गुणी मादकता अधिकाय।
या पाये बौरात नर वा खाये बौराय॥ [2014]

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यहाँ कनक शब्द दो बार आया है। एक कनक का अर्थ है सोना और दूसरे कनक का अर्थ है धतूरा।

(2) मूरति मधुर मनोहर देखी।
भयउ विदेह विदेह विसेखी।

जहाँ एक विदेह का अर्थ है राजा जनक और दूसरे विदेह का अर्थ है देह रहित अर्थात् शरीर की सुधबुध खो देना।

(3) ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहनहारी,
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती हैं।
कन्द-मूल भोग करें, कन्द मूल भोग करें,
तीन बेर खाती थीं वे तीन बेर खाती हैं।
भूखन सिथिल अंग, भूखन सिथिल अंग,
विजन डुलाती थीं वे विजन डुलाती हैं।
भूखन भणत सिवराज वीर तेरे त्रास,
नगन जड़ाती थीं वे नगन जड़ाती हैं।

पद या वाक्य खण्ड बार-बार आये पर अर्थ भिन्न हो।

(4) बसन हमारौ, करहु बस; बस न लेहु प्रिय लाज,
बसन देहु ब्रज में हमें, बसन देहु ब्रजराज।

यहाँ बस और बस में अधिकार तथा समाप्ति का अर्थ है। बसन अर्थात् वस्त्र और बसन-निवास करना।

यमक का प्रयोग कभी-कभी एक-से पदों को भंग करके उनके अर्थ करने में होता है।

जैसे-
वर जीते सर मैन के ऐसे देखे मैं न।
हरिनी के नैनान तें हरी नीके ये नैन।

मैन = कामदेव। मैं न = मैंने नहीं। हरिणी = मृगी के। हरी नीके = हरि (कृष्ण) अच्छे हैं।

2. श्लेष अलंकार

काव्य में जहाँ एक शब्द के एक से अधिक अर्थ निकलते हैं वहाँ श्लेष अलंकार होता है। श्लेष शब्द का अर्थ है चिपका हुआ अर्थात् एक से अधिक अर्थ चिपके रहते हैं। जैसे
(1) रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे मोती मानस चून॥ [2015]

इस दोहे में पानी के तीन अर्थ हैं।
1. मोती का पानी = मोती की आभा या चमक।
2. मनुष्य का पानी = मनुष्य की आभा या चमक प्रतिष्ठा।
3. चूने का पानी = चूने में पानी (बिना पानी के चूना सूखकर व्यर्थ हो जाता है)।

(2) चरण धरत चिला करत चितवत चारिहूँ ओर।
सुबरन की चोरी करत कवि व्यभिचारी चोर॥

यहाँ ‘चरण’ और ‘सुबरन’ में श्लेष है।

(3) अज्यौं तरौ ना ही रह्यो, स्रुति सेवत इक अंग।
नाक बास बेसर लह्यौ, बसि मुकतनु के संग॥

इसमें इस प्रकार दो अर्थ हैं। तरौ ना ही = तरौना नामक कर्णाभूषण तथा तरा नहीं = मोक्ष नहीं पाया। स्रुति = वेद,कान। नाक = नासिका,स्वर्ग। बेसर = नथ कान का आभूषण, अनुपम। मुकतनु = मोती, मुक्त पुरुषों के संग।

(4) चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गम्भीर।
को घटि ये वृषभानुजा, ये हलधर के बीर।

1. वृषभ+ अनुजा = बैल की बहन।
2. वृषभानु + जा = वृषभानु की पुत्री राधा।
3. हलधर के बीर = हल धारण करने वाले बैल के भाई। हलधर के बीर = बलदाऊ के भाई कृष्ण। राधा कृष्ण से परिहास किया है।

(5) गुन ते लेत रहीमजन सलिल कूप ते काढ़ि।
कूपहूँ ते कहुँ होत है, मन काहुँ को बाढ़ि।
यहाँ गुन शब्द के दो अर्थ हैं-सद्गुण और रस्सी।

3. व्याजस्तुति। [2011, 13, 16]

जिस वर्णन में देखने में तो निन्दा-सी प्रतीत होती है,पर वास्तव में उसके विपरीत स्तुति का तात्पर्य हो उसे व्याजस्तुति अलंकार कहते हैं। व्याज अर्थात् बहाने, स्तुति यानी प्रशंसा।
जैसे-
“जमुना तुम अविवेकिनी,
कौन लियौ यह ढंग।
पापिन सौं निज बन्धु को,
मान करावति भंग॥”

इस वर्णन में शब्दों के अर्थों से तो यमुनाजी की निन्दा प्रतीत होती है,जो पापियों से अपने भाई यमराज का मान भंग कराती है,पर वास्तव में पुण्य-सलिला यमुना की महिमा का वर्णन है, जिसमें स्नान करने से पापियों के पापों का हरण हो जाता है और वे यमलोक या नरक में नहीं जाते।

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4. व्याजनिन्दा [2011]

जिस वर्णन में देखने में स्तुति प्रतीत हो,पर वास्तव में उसमें विपरीत निन्दा का तात्पर्य हो, उसे व्याजनिन्दा अलंकार कहते हैं। जैसे
नाक कान बिनु भगिनि तिहारी,
छमा कीन्ह तुम धर्म विचारी।
लाजवन्त तुम सहज सुभाऊ,
निज गुन निज मुख कहसिन काऊ॥

हनुमानजी के इस कथन से स्तुति-सी प्रतीत होती है, पर यथार्थ में इसमें कायर और निर्लज्ज होने का तात्पर्य निकलता है, जिसमें निन्दा है।

5. अन्योक्ति

जहाँ किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु को लक्ष्य में रखकर कोई बात किसी दूसरे के लिए कही जाती है, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है। जैसे
(1) स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखि विहंग विचारि।
बाज पराए पानि परि तूं पच्छीनु न मारि॥

हे बाज पक्षी ! रों के हाथ में पड़कर पक्षियों को मत मार। इससे तेरा न तो कोई स्वार्थ सिद्ध होता है और न तुझे पुण्य मिलता है। तेरा यह श्रम व्यर्थ ही है।

बिहारी कवि का यह कथन राजा जयसिंह के लिए है,जो औरंगजेब की ओर से हिन्दुओं के विरुद्ध युद्ध करते थे। सीधे न कहकर भ्रमर के माध्यम से कहा है :

(2) नहीं परागु, नहिं मधुर-मधु, नहिं विकास, इहिं काल।
अली कली ही सौं बिंध्यौ, आगे कौन हवाल॥

(3) करि फुलैल की आचमनु मीठो कहत सराहि।
ए गन्धी ! मतिमन्ध तू इतर दिखावत काहि।

यहाँ कवि का प्रस्तुत विषय तो यह है कि कोई गुणी व्यक्ति मूों के समाज में पहुँच गया है और उन मों को उपदेश दे रहा है जो उसे समझते नहीं। पर कवि इस बात को सीधे न कहकर किसी इत्र बेचने वाले के माध्यम से कह रहा है।

(4) माली आवत देखकर कलियन करी पुकार।
फूले-फूले चुन लिए, कालि हमारी बार॥

यहाँ कबीरदास जी ने नश्वर जीवन के बारे में कली और फूल के माध्यम से अपनी बात कही है। एक न एक दिन सबको जाना है।

6. विभावना [2010]

जहाँ कारण के बिना या कारण के विपरीत कार्य की उत्पत्ति का वर्णन किया जाये, वहाँ विभावना अलंकार होता है। जैसे

(1) बिनु पद चलै, सुने बिनु काना,
कर बिनु करम करै विधि नाना।
आनन-रहित सकल रस भोगी,
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।

चलना, सुनना,करना और खाना ये सब पैर,हाथ,कान,सुख के काम हैं। यहाँ बिना कारण के कार्य है।

(2) सखि, इन नैनन,ते घन हारे,
बिनु ही रितु बरसत निसि-बासर, सदा मलिन दोऊ तारे।

यहाँ पर वर्षा ऋतु के न होने पर भी नेत्रों से आँसुओं की वर्षा हो रही है।

(3) बिनु घनस्याम धामु धामु ब्रज मण्डल के
ऊधो नित बसति बहार वर्षा की।

वर्षा के लिए मेघों का कारण आवश्यक है परन्तु यहाँ बिना बादलों के ही ब्रज के घर-घर में वर्षा होती है। यहाँ घनश्याम से अर्थ श्रीकृष्ण तथा घने श्यामवर्ण बादल से है।

7. व्यतिरेक।

जहाँ उपमेय को उपमान से भी श्रेष्ठ बताया जाये,वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। जैसे
(1) स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहाँ,
किन्तु सुरसरिता कहाँ, सरयू कहाँ?
वह मरों को मात्र पार उतारती,
यह यहीं से जीवितों को तारती।

(2) जनम सिन्धु पुनि बन्धु विषु,
दिन मलीन सकलंक॥
सिय मुख ममता पाव किमि,
चन्द बापुरो रंक॥

(3) सन्त-हृदय नवनीत समाना,
कहौं कवनि पर कहै न जाना।
निज परिताप द्रवै नवनीता,
पर दुःख द्रवै सुसंत पुनीता॥

यहाँ सन्तों (उपमेय) को नवनीत (उपमान) से श्रेष्ठ प्रतिपादित किया गया है।

(4) सिय सुबरन, सुखमाकर, सुखद न थोर
सीय अंग सखि ! कोमल कनक कठोर।

यहाँ सीता के शरीर को सुवर्ण के समान बताकर भी सीता के अंग में स्वर्ण की अपेक्षा कोमलता की विशेषता बतायी है।

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(5) सिय मुख सरद कपल जिमि किमि कहि जाय।
निसी मलीन वह निसिदन यह विगसाय।

शरद कमल तो रात्रि में मुरझा जाता है किन्तु सीता का मुख दिन-रात खिला रहता है।

8. विशेषोक्ति [2010]

जहाँ कारण के उपस्थित होने पर भी कार्य नहीं होता,वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है।

जैसे-
(1) अब छूटता नहीं छुड़ाये, रंग गया हृदय है ऐसा,
आँसू से धुला निखरता यह रंग अनौखा कैसा।

(2) इन नैननि को कछु उपजी बड़ी बलाय,
नीर भरे नित प्रति रहें, तऊ न प्यास बुझाय।

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MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 1-5)

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1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल [2009, 10, 12, 15, 17]

  • जीवन परिचय

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 11 अक्टूबर,सन् 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के अगोना ग्राम में हुआ था। आपके पिता पं. चन्द्रबलि शुक्ल सुपरवाइजर कानूनगो थे। शुक्लजी ने एफ.ए.(इण्टर) तक की शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा समाप्ति पर जीविकोपार्जन के लिए मिर्जापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग के शिक्षक हो गये। इस समय तक इनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। जब नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी द्वारा ‘हिन्दी शब्द सागर’ नाम से शब्द-कोश के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया गया,तब शुक्लजी मात्र छब्बीस वर्ष की अवस्था में उसके सहायक सम्पादक नियुक्त किये गये। उसके बाद हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी में आप हिन्दी विभाग में प्राध्यापक हो गये। सन 1937 में आप वहाँ हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हो गये। 2 फरवरी,सन् 1940 को आपका निधन हो गया।

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  • साहित्य सेवा

आचार्य शुक्लजी की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे कवि, निबन्धकार, आलोचक, सम्पादक तथा अनुवादक अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैं। आपने ‘हिन्दी शब्द सागर’ और ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का सम्पादन किया। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में हिन्दी को उच्चकोटि के निबन्ध, वैज्ञानिक समालोचनाएँ,साहित्यिक ग्रन्थ एवं सरल कविताएँ प्रदान की। शुक्ल जी ने हिन्दी में समालोचना और निबन्ध कला का उच्च आदर्श स्थापित किया। उनसे पहले की समालोचनाओं में गुण-दोष विवेचन की ही प्रधानता थी। उन्होंने वैज्ञानिक ढंग की व्याख्यात्मक आलोचना-पद्धति की नींव डाली और जायसी,तुलसी तथा सूर के काव्यों पर उत्कृष्ट व्याख्यात्मक आलोचनाएँ लिखीं। आपने करुणा, उत्साह,क्रोध,श्रद्धा और भक्ति आदि मनोविकारों पर सुन्दर निबन्ध लिखे। उनके निबन्ध ‘चिन्तामणि’ नामक पुस्तक में संग्रहीत हैं। ‘चिन्तामणि’ पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से आपको ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्राप्त हुआ। उन्होंने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ नामक गवेषणापूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ लिखा, जिस पर हिन्दुस्तानी एकेडमी, प्रयाग ने पुरस्कार प्रदान किया।

  • रचनाएँ

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएँ अग्र प्रकार हैं
(1) निबन्ध-संग्रह-‘चिन्तामणि, ‘विचार-वीथी’।
(2) आलोचना-‘त्रिवेणी, ‘रस-मीमांसा’।
(3) इतिहास–’हिन्दी साहित्य का इतिहास’।

  • वर्ण्य विषय

साहित्य के समस्त क्षेत्रों को स्पर्श करने वाली शुक्लजी की प्रतिभा समालोचना एवं निबन्ध के क्षेत्र में भी प्रखरता के साथ परिलक्षित होती है। निबन्ध एवं आलोचना दोनों ही क्षेत्रों में शुक्लजी ने लोक मंगल एवं नैतिक आदर्श को प्रमुख स्थान दिया है। निबन्ध-रचना के क्षेत्र में उन्होंने सामाजिक उपयोगिता से सम्बन्धित मानव-मनोभावों पर सुन्दर निबन्ध लिखे। शुक्लजी ने मनोभावों सम्बन्धी निबन्धों के साथ ही समीक्षात्मक एवं सैद्धान्तिक निबन्धों की भी रचना की।

  • भाषा

आचार्य शुक्लजी की भाषा परिष्कृत, प्रौढ़ एवं साहित्यिक खड़ी बोली है। इस भाषा में सौष्ठव है तथा उसमें गम्भीर विवेचन की अपूर्व शक्ति है। शुक्लजी की भाषा में व्यर्थ का शब्दाडम्बर नहीं मिलता। भाव और विषय के अनुकूल होने के कारण वह सर्वथा सजीव और स्वाभाविक है। गूढ़ विषयों के प्रतिपादन में भाषा अपेक्षाकृत क्लिष्ट है। उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता है। वाक्य-विन्यास भी कुछ लम्बे हैं। सामान्य विचारों के विवेचन में भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। कहावतों एवं मुहावरों के प्रयोग से उसमें सरसता आ गयी है। शुक्लजी की भाषा व्यवस्थित तथा पूर्ण व्याकरण सम्मत है तथा उसमें कहीं भी शिथिलता देखने को नहीं मिलती। भाषा की इसी कसावट के कारण उसमें समास शक्ति पायी जाती है तथा कहीं-कहीं तो भाषा सूक्तिमयी बन गयी है; जैसे—“बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।”

  • शैली

शुक्लजी अपनी शैली के स्वयं निर्माता थे। उनकी शैली समास के रूप से प्रारम्भ होकर व्यास शैली के रूप में समाप्त होती है अर्थात् एक विचार को सूत्र रूप में कहकर फिर उसकी व्याख्या कर देते हैं। मुख्य रूप से शुक्लजी की शैली चार प्रकार की है-

  1. समीक्षात्मक शैली-शुक्लजी ने व्यावहारिक, समीक्षात्मक एवं समालोचनात्मक निबन्धों में इस शैली का प्रयोग किया है। इस शैली में वाक्य छोटे,संयत एवं गम्भीर हैं। इसमें विषय का प्रतिपादन सरलता के साथ इस प्रकार किया गया है कि सहज ही हृदयंगम हो जाता है।
  2. गवेषणात्मक-अनुसन्धानपरक तथा सैद्धान्तिक समीक्षा सम्बन्धी तथा तथ्यों के विश्लेषण-निरूपण में शुक्लजी ने इस शैली का प्रयोग किया है। यह शैली गम्भीर तथा कुछ सीमा तक दुरूह है। शब्द-विन्यास क्लिष्ट तथा वाक्य-विन्यास जटिल है। यह शैली सामान्य पाठकों के लिए बोधगम्य नहीं है।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली में वाक्य कहीं छोटे तथा कहीं लम्बे हैं तथा भाषा कुछ-कुछ अलंकारिक हो गयी है। इसमें भावनाओं का धाराप्रवाह रूप मिलता है।
  4. हास्य-विनोद एवं व्यंग्य प्रधान शैली-इस शैली के दर्शन मनोविकारों तथा समीक्षात्मक निबन्धों में यत्र-यत्र ही होते हैं, क्योंकि हास्य तथा व्यंग्य शुक्लजी के निबन्धों का मुख्य विषय नहीं है, फिर भी इस शैली के प्रयोग से निबन्धों में रोचकता आ गयी है।
  • साहित्य में स्थान

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी असाधारण प्रतिभा द्वारा साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन किया। लेकिन उनकी विशेष ख्याति निबन्धकार, समालोचक तथा इतिहासकार के रूप में है। उन्होंने हिन्दी में वैज्ञानिक आलोचना-प्रणाली को जन्म दिया, निबन्ध-साहित्य को समृद्ध किया तथा हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन के लिए एक आधार प्रदान किया। शुक्लजी की भाषा तथा शैली आने वाले साहित्यकारों के लिए आदर्श रूप है। वे युग प्रवर्तक निबन्धकार हैं।

2. उषा प्रियंवदा
[2016]

  • जीवन परिचय

यथार्थ के बेजोड़ अंकन में शीर्षस्थ स्थान रखने वाली कहानीकार उषा प्रियंवदा का जन्म 24 दिसम्बर,सन् 1931 को इलाहाबाद में हुआ। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् पी-एच.डी.करके आपने अपनी योग्यता को और आगे बढ़ाया। अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी से भी आपका अनुराग लगातार बना रहा और आप हिन्दी में भी निरन्तर लिखती रहीं। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू तथा संस्कृत पर आपका समान व पूर्ण अधिकार रहा है। लेखन के साथ-साथ आपका मुख्य कार्यक्षेत्र अध्यापन ही रहा है। आपने ‘आधुनिक अमरीकी साहित्य’ पर इंडियाना विश्वविद्यालय से शोधकार्य किया। आप संयुक्त राज्य अमरीका के विस्कांसिन विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्षा रहीं। हिन्दी की सेवा में आपके उत्कृष्ट योगदान को प्रमाणित करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको सम्मानित किया।

  • साहित्य सेवा

साहित्यिक रुचि सम्पन्न उषा प्रियंवदा ने मुख्यतः उपन्यास और कहानियाँ लिखी हैं। उनके साहित्य में भारतीय और अमरीकी संस्कृति का समन्वय स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी प्रथम कहानी ‘लाल चूनर’ थी। लम्बे समय तक अमरीका में निवास होने के कारण आपके चिन्तन में तुलनात्मक दृष्टि नजर आती है। स्वतन्त्रता के पश्चात् के भारतीय जीवन की विश्रृंखलताएँ आपके साहित्य में स्पष्ट देखी जा सकती हैं।

  • रचनाएँ

उषा प्रियंवदा मूलत: एक कहानीकार एवं उपन्यासकार रही हैं। आपकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

  1. उपन्यास-पचपन खम्भे लाल दीवारें’ [1961]: इस उपन्यास का प्रदर्शन दूरदर्शन पर होने के कारण यह अत्यधिक प्रसिद्ध रहा, ‘रुकोगी नहीं राधिका’ [1968], ‘शेष यात्रा’ [1984]।
  2. कहानी-संग्रह ‘जिन्दगी और गुलाब’ [1961], ‘फिर बसन्त आया’ [1961], ‘एक कोई दूसरा’ [1966], ‘कितना बड़ा झूठ’ [1973], ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ [1974]।
  • वर्ण्य विषय

कथा साहित्य की प्रेमिका उषा प्रियंवदा की कहानियों के पीछे एक बीज जरूर होता है,जो उनके एक विचार, एक इमेज, एक अनुभव या अनुभूति को लेखन के रूप में साकार करता है। चुनौतियाँ उन्हें उत्साहित करती हैं, ‘डेड लाइन्स’ उन्हें प्रेरित करती हैं। इन्हीं चुनौतियों और ‘डेड लाइन्स’ के सम्बन्ध और प्रतिध्वनियाँ उनके वर्ण्य विषय हैं। आधुनिक भौतिकवादी, वैयक्तिक तथा एकान्तिक विचारधारा ने भारतीय समाज व परम्पराओं को तोड़कर विसंगतियों तथा मानसिक कुण्ठाओं के साथ पारिवारिक विघटन की नींव डाली है,यह सब मनोवैज्ञानिक परिवर्तन उनकी कहानियों व उपन्यासों में स्पष्ट झलकता है। नई पीढ़ी की टीस पाठक को व्यथित कर देती है। मानव मूल्यों की अनदेखी करना उनकी कहानियों की मार्मिक पहचान है। उनकी रचनाओं का विषय अधिकतर निम्न मध्यवर्गीय समाज की पीड़ा तथा नारी-पुरुष के आयु भेद रहे है।

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  • भाषा

उषा प्रियंवदा ने सरल, सुस्थिर, संयत एवं बोधगम्य खड़ी बोली का प्रयोग किया है। संस्कृत की ज्ञाता लेखिका आकांक्षी,कुण्ठित,अस्थायित्व जैसे शब्दों का प्रयोग कर भाषा को और अधिक सुन्दर बनाती हैं। मर्तबान,कनस्तर,खटिया जैसे प्रचलित शब्द भाषा को सहज बनाते हैं। रिटायर, क्वार्टर, पैसेन्जर जैसे शब्दों के प्रयोग से लेखिका का प्रवास झलकता है। वाजिब, जिम्मेदार, सिर्फ जैसे उर्दू के शब्द भाषा को बोधगम्य बनाने में पूर्णतः सक्षम हैं। लघु वाक्य-विन्यास,कहावतों तथा मुहावरों का प्रयोग भाषा का सरल रूप है। शब्दों के सामासिक प्रयोग से उषा प्रियंवदा के साहित्य की भाषा में कसावट विद्यमान रहती है।

  • शैली

उषा प्रियंवदाजी की शैली भावात्मक विवरणात्मक तथा व्यंग्यात्मक है। उनके उपन्यासों में विवरण शैली के दर्शन होते हैं,तो कहानियों में भावात्मकता तथा व्यंग्य परिलक्षित हैं। उनकी सहज कथन शैली तथा यथार्थ का चित्रण बेजोड़ है। भावुकता,माधुर्य और प्रवाह उनकी शैली की विशेषता है। उनके व्यंग्य चुटीले व सार्थक हैं, जिनमें विदेशी शब्दों की सहायता से पीड़ा व कराहट का अनुभव होता है। इस प्रकार उनकी शैली वर्ण्य-विषय के सर्वथा अनुकूल है।

  • साहित्य में स्थान

हिन्दी कथा साहित्य में लेखिका का विशिष्ट स्थान होने का प्रमुख कारण है-वर्तमान में नष्ट होते हुए भारतीय मूल्यों का सटीक चित्रण।

वर्तमान जीवन की विसंगतियों और उनकी विशृंखलताओं का सामाजिक व मनोवैज्ञानिक स्तर पर यथार्थ व सजीव चित्रण करके लेखिका हिन्दी कथा साहित्य में अपना उच्च स्थान स्वयं निर्धारित करती हैं। उनकी कथाएँ पारिवारिक विघटन को रोकने का संदेश देती हैं। सच्चे अर्थों में उषा प्रियंवदा आधुनिक समाज की एक आदर्श कथाकार हैं।

3. उदयशंकर भट्ट [2014, 16]

  • जीवन परिचय

एकांकी और नाटक के सिद्धहस्त लेखक उदयशंकर भट्ट का जन्म 3 अगस्त, सन् 1898 में उत्तर-प्रदेश के इटावा नगर में हुआ था। इटावा में आपकी ननिहाल भी थी। आपका परिवार साहित्यिक गतिविधियों में गहरी रुचि रखता था। आपने संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी की शिक्षा इटावा में ही प्राप्त की। जब ये मात्र चौदह वर्ष की अल्पायु के थे, इनके सिर से माँ-बाप का साया उठ गया। आपने काशी विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् पंजाब से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात आपने कलकत्ता से काव्यतीर्थ की उपाधि अर्जित की। 1923 में जीविका की तलाश में आप लाहौर चले गये तथा वहाँ संस्कृत और हिन्दी का अध्यापन-कार्य किया। साथ ही, इस दौरान आप अपने अध्ययन में भी रत रहे। जब भारत का बँटवारा हुआ तो भट्टजी लाहौर छोड़कर दिल्ली आकर बस गये। आपने आकाशवाणी में सलाहकार के पद को सुशोभित किया। कुछ वर्षों तक आप आकाशवाणी के नागपुर और जयपुर केन्द्रों पर ‘प्रोड्यूसर’ रहे। सेवानिवृत्ति के पश्चात् आपने स्वतन्त्र रूप से कहानी, उपन्यास, आलोचना और नाटक इत्यादि का लेखन कार्य किया। 22 फरवरी,1966 को आपका देहावसान हो गया।

  • साहित्य सेवा एवं रचनाएँ

भट्टजी का प्रथम एकांकी संग्रह, अभिनव एकांकी’ के नाम से सन् 1940 में प्रकाशित हुआ था। इसके पश्चात् इन्होंने सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि अनेक विषयों पर एकांकियों की रचना की, जिनमें ‘समस्या का अन्त’, ‘परदे के पीछे’, ‘अभिनव एकांकी’, ‘अस्तोदय’, ‘धूपशिखा’, ‘वापसी’, ‘चार एकांकी’ इत्यादि आपके प्रतिनिधि एकांकी संग्रह माने जाते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी उदयशंकर भट्टजी ने नाटक, कविता तथा उपन्यासों की रचना की है।

  • वर्ण्य विषय

भट्टजी ने पौराणिक, समस्या-प्रधान, हास्य-प्रधान, प्रतीकात्मक एवं सामाजिक समस्याओं से सम्बन्धित एकांकियों की रचना की है। आपने वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक की भारतीय जीवन संवेदना को चित्रित किया है। आपकी रचनाओं में विभिन्न समस्याओं को जीवन्त रूप से उजागर किया गया है। युग की प्रवृत्तियों और सामाजिक परिवर्तनों से आपने सदैव संगति बनाए रखी।

  • भाषा व शैली

भट्टजी ने अपने साहित्य सृजन में सरल, स्थिर व चुलबुली बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया है। भाव व पात्रों के अनुसार उनकी भाषा का रूप बदलता रहता है। उनकी भाषा में उर्दू के शब्दों का बाहुल्य है; जैसे-ओफ, फ़ायदा, बेहद, हर्ष इत्यादि। संस्कृत शब्दावली का प्रयोग यत्र-तत्र दिखाई पड़ता है; जैसे-गृहस्थ,सुसंस्कृति, निर्दयी इत्यादि। संवाद सरल व छोटे-छोटे वाक्यों वाले हैं। भट्टजी की लेखन-शैली की एक विशेषता प्रश्नों के माध्यम से भावाभिव्यक्ति है; जैसे-क्या छत तुम्हारे लिए है ? कहो तो मैं कहूँ ? क्या फ़ायदा ? इत्यादि। कहीं-कहीं वाक्य सूक्ति का-सा आभास कराते हैं।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भट्टजी की भाषा सरल व शैली व्याख्यात्मक है।

  • साहित्य में स्थान

एक सफल नाटककार के रूप में अपनी विशिष्ट छवि बनाने वाले उदयशंकर भट्ट प्रख्यात एकांकीकार भी हैं। उन्होंने युग के अनुरूप चरित्र-सृष्टियों की रचना की है। उनके एकांकी रंगमंचीय होने तथा जीवन की मौलिक समस्याओं से सम्बन्धित होने के कारण मर्मस्पर्शी हैं। आधुनिक हिन्दी एकांकीकारों में भट्टजी का एक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट स्थान है। हिन्दी एकांकी साहित्य उनके योगदान को सदैव याद रखेगा।

4. शरद जोशी
[2009, 13, 15]

चाय की दुकान से लेकर राष्ट्रपति भवन तक अपनी लेखनी की आवाज को पहुँचाने वाले शरद जोशी को साधारण व्यक्ति से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग तक अपना समझता है। इसी कारण उनकी तुलना कबीर और मार्क ट्वेन से की गई है।

  • जीवन परिचय

हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य लेखक शरद जोशी का जन्म 23 मई,सन् 1931 को उज्जैन में मगर मुहे की गली में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीनिवास और माता का नाम शान्ति था। विद्यार्थी जीवन से ही इनकी रुचि लेखन में थी। इन्होंने होल्कर कॉलेज, इन्दौर से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1958 में इन्होंने इरफाना सिद्दिकी से प्रेम-विवाह किया। एक स्क्रिप्ट राइटर के रूप में आप आकाशवाणी इन्दौर से लम्बे समय तक जुड़े रहे तथा मध्य प्रदेश सूचना विभाग में दस वर्षों तक जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में सेवारत रहे। तत्पश्चात् वे बम्बई चले गये और वहाँ पर सतत् लेखन कार्य करते हुए आपने 5 सितम्बर, सन् 1991 को अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।

  • साहित्य सेवा

राजनीतिज्ञों पर लगातार करारे व्यंग्य और प्रहार करने वाले शरद जोशी की 18 पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्होंने 1953-54 में लोगों के बीच एक लेखक के रूप में अपनी जगह बना ली। उनका सबसे पहला व्यंग्य लेख ‘नई दुनिया के ‘परिक्रमा’ स्तम्भ में छपा था। उनके लघु व्यंग्य-लेख नई दुनिया, धर्मयुग, रविवार, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बरी, ज्ञानोदय आदि पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से छपते थे। नवभारत टाइम्स के प्रतिदिन’ नामक स्तम्भ के लिए आपने 7 वर्षों तक लिखा। ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ उनका सरकारी अफसरों द्वारा सरकारी वाहनों पर की गई सवारी पर करारा व्यंग्य है। उन्होंने लगभग 35 वर्षों तक गद्य को कवि-सम्मेलन के मंच पर जोर-शोर से जमाये रखा। शरद जोशी को भारत सरकार ने सन् 1990 में पद्मश्री से विभूषित कर सम्मानित किया। शरदजी के कई नाटक जापान में वहाँ की स्थानीय भाषा में अनुवादित होकर मंचित किये गये।

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  • रचनाएँ

शरद जोशी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. व्यंग्य रचनाएँ-‘पिछले दिनों’, ‘तिलिस्म’, ‘रहा किनारे बैठ’, ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’, ‘किसी बहाने’, ‘यथासम्भव’, ‘नावक के तीर’ आदि अनेक प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं।
  2. लघु उपन्यास–’मैं-मैं और केवल मैं’ उनका लोकप्रिय लघु उपन्यास है।
  3. नाटक ‘अन्धों का हाथी’, ‘एक था गधा उर्फ अलादत खान’।
  4. संवाद-शरद जी ने कई फिल्मों के लिए संवाद-लेखन का कार्य भी किया-‘छोटी सी बात’, ‘क्षितिज’, ‘साँच को आँच क्या’, ‘गोधूलि’, ‘उत्सव’, ‘नाम’, ‘चमेली की शादी’, मेरा दामाद’, ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘उड़ान’ आदि।
  5. टी. वी. सीरियल्स-श्याम तेरे कितने नाम’, ‘ये जो है जिन्दगी’, ‘विक्रम और बेताल’, ‘वाह जनाब’, ‘दाने अनार के’, ‘श्रीमती जी’,’सिंहासन बत्तीसी’, ‘ये दुनिया है गजब की’, ‘प्याले में तूफान’, ‘मालगुढी डेज’, गुलदस्ता आदि।
  • वर्ण्य विषय

जोशीजी ने साहित्य की व्यंग्य विधा को अपना विशेष क्षेत्र बनाया। उनके व्यंग्य में हास्य भी मिश्रित था। शरद जोशी एक व्यक्ति नहीं विचारधारा का नाम है। उनकी व्यंग्य विधा को पैनी धार धर्मयुग’ और ‘धर्मवीर भारती’ जैसे साप्ताहिकों-पत्रिकाओं ने दी। उनके व्यंग्य-लेखन के प्रमुख विषय थे-आपातकाल, नौकरशाही, अखबार, राजनीति, सरकारी अफसर, चिन्तन के नाम पर राजनेताओं की ऐय्याशी, पुलिस-हड़ताल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री इत्यादि। इन्दिरा गाँधी से लेकर जयप्रकाश नारायण तक सभी उनके व्यंग्य-बाणों के निशाने पर रहे हैं। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली विसंगतियों का मार्मिक चित्रण कर शरदजी ने पाठकों को स्तम्भित कर दिया है।

  • भाषा

शरदजी की भाषा अत्यन्त सरस व सरल है। शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली में सहजता है। देशज व विदेशी शब्दों के प्रयोग से भाषा बोधगम्य बन गई है। भाषा में एक विशिष्ट प्रवाह है। शब्दों का चयन सटीक है। स्थान-स्थान पर मुहावरों के प्रयोग से भाषा में हास्य व चंचलता आ गई है। शरदजी व्यंग्य के भाषागत सौन्दर्य को अपनी छोटी-छोटी उक्तियों के माध्यम से प्रभावशाली बनाने में सफल रहे हैं। उनकी भाषा में सरसता के साथ-साथ चुटीलापन भी दृष्टिगोचर होता है।

  • शैली

शरदजी की शैली मुख्य रूप से हास्य-व्यंग्य प्रधान है। उन्होंने सामाजिक विडम्बनाओं और उसके अन्तर्विरोधों को आधार मानकर व्यंग्य किये हैं। वे अपनी चमत्कारिक उत्प्रेक्षाओं से व्यंग्य की सर्जना करते हैं। भेटवार्ता जैसे प्रसंगों पर संवाद शैली में गुदगुदाने वाला हास्य और उसके परोक्ष में छिपा व्यंग्य,श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर देता था। उनकी आलोचनात्मक शैली भी व्यंग्य से पूर्ण है। वे राजनीतिज्ञों की आलोचना में भी व्यंग्य करने से नहीं चूकते। उनके हर व्यंग्य में ओज का पुट मौजूद मिलता है। इसीलिए बुद्धिजीवी उनके तर्क,शब्द-शैली, भाषा-शैली और विचारों की पकड़ का लोहा मानते हैं।

  • साहित्य में स्थान

शरदजी के ओजपूर्ण व्यंग्यों ने अपने समय में लोकप्रियता की चरम सीमा को पार किया। उन्होंने अनेक पत्रिकाओं के माध्यम से सारे देश को एकसूत्र में जोड़ दिया था। जोशीजी ने हिन्दी के गम्भीर व्यंग्य को लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचाया। इस प्रकार हिन्दी गद्य साहित्य शरद जोशी को सदैव याद रखेगा।

5. डॉ. श्यामसुन्दर दुबे

  • जीवन परिचय

ललित निबन्धों में परम्परा और आधुनिकता को निभाने वाले डॉ. श्यामसुन्दर दुबे का जन्म 12 दिसम्बर, सन् 1944 को मध्यप्रदेश (हटा, दमोह) के बर्तलाई ग्राम में हुआ था। आपने एम. ए. पी-एच.डी. तक शिक्षा प्राप्त की है। ग्रामीण अंचल आपकी रचनाओं का स्रोत रहा है। आप हिन्दी साहित्य के समर्थ निबन्धकार,कवि, आलोचक होते हुए एक कुशल अध्यापक भी हैं। आप मध्यप्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों में लम्बे समय तक प्राध्यापक पद पर रहे हैं। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होकर वर्तमान में आप निदेशक, मुक्तिबोध सृजनपीठ डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर में कार्यरत हैं।

  • साहित्य सेवा

डॉ. श्यामसुन्दर दुबे साहित्यिक अभिरुचि रखने के कारण एक श्रेष्ठ गद्यकार माने जाते हैं। डॉ. दुबे को उनकी विभिन्न रचनाओं पर अनेक सम्मान तथा पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का ‘बालकृष्ण शर्मा नवीन’ पुरस्कार,मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी’ पुरस्कार, छत्तीसगढ़ शासन का ‘लोक-संस्कृति’ केन्द्रित सम्मान, डॉ. शम्भूनाथ सिंह रिसर्च फाउण्डेशन, वाराणसी का ‘डॉ. शम्भूनाथ सिंह अखिल भारतीय नवगीत’ पुरस्कार इत्यादि पुरस्कारों से आपको सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में भी आप हिन्दी साहित्य की सेवा में सागर विश्वविद्यालय के माध्यम से रत् हैं।

  • रचनाएँ

डॉ. श्यामसुन्दर दुबे ने निबन्ध, कथा, आलोचना और लोकविद् साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी लगभग 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं

  1. ललित निबन्ध संकलन-कालमृगया’, ‘विषाद बांसुरी की टेर’, ‘कोई खिड़की इसी दीवार से।
  2. काव्य संकलन-रीते खेत में बिजूका’, ऋतुएँ जो आदमी के भीतर हैं’, ‘धरती के अनन्त चक्करों में’।
  3. उपन्यास–’दाखिल खारिज’, ‘मरे न माहुर खाये’।
  4. लोक संस्कृति के रूप में-‘लोक : परम्परा, पहचान एवं प्रवाह’, ‘लोक चित्रकला : परम्परा और रचना दृष्टि’, ‘लोक में जल’, भारत की नदियाँ’।
  • वर्ण्य विषय

लोक संस्कृति से सम्बन्ध रखने वाले डॉ.दुबे की समस्त रचनाओं में भारतीयता के उन तत्वों का समावेश है,जिनकी आज के वैज्ञानिक युग में महती आवश्यकता है। आधुनिक जीवन को जीते हुए भी भारतीय ग्रामीण जीवन से अपना सम्बन्ध बनाये रखना ही उनके साहित्य का मूल विषय है। इसी को आधार मानकर डॉ.दुबे ने स्वयं को साहित्य की विभिन्न विधाओं में उतारा। आपने ललित निबन्ध, आत्माभिव्यंजना प्रधान निबन्ध, कविताएँ, कहानियाँ, आलोचना आदि रचनात्मक विधाओं के अतिरिक्त ग्रामीण लोक-संस्कृति को लोक साहित्य के आंचल में बाँधा है। इनकी विद्वता पाठक के हृदय पर गहरा प्रभाव डालती है।

  • भाषा

आपने देशज शब्दों से युक्त संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रयोग किया है। प्रकृति के सौन्दर्य का अंकन करते समय आपकी भाषा जगह-जगह काव्यमयी हो गई है,जैसे-“हलदिया पीलापन ऊर्ध्वमुखी होकर अंधेरे में दिपदिपा रहा था।”…..”अब जलाओ दिया,… करो प्रकाश”। डॉ. दुबे ने शब्दों के प्रयोग में स्वच्छन्दता बरती है तथा चतेवरी, पहलौरी जैसे देशज शब्दों; ट्रेक्टर, ट्रांजिस्टर, टी. वी. जैसे प्रचलित अंग्रेजी शब्दों; इज्जत-आबरू, दाँव जैसे उर्दू शब्दों तथा वानस्पतिक, उल्लास, वंचित जैसे संस्कृत शब्दों के प्रयोग से भाषा को सजाया है। वाक्यों में लघुता के कारण उनका प्रभाव चिरस्थायी हो उठा है।

  • शैली

डॉ. श्यामसुन्दर दुबे व्यास-शैली तथा उद्धरण शैली के माध्यम से विषय को स्पष्ट करते हैं। उनके द्वारा लिखित कहानियों व निबन्धों में विवरणात्मक शैली देखने को मिलती है। बीच-बीच में प्रचलित महावरों, जैसे-ढाक के तीन पात आदि का भी प्रयोग किया गया है। अति सूक्ष्म रूप में उपदेशात्मक शैली का भी प्रयोग हुआ है, जैसे-“बस इसी तरह जगमगाओ”…… “अपनी ज्योति का स्पर्श दो” आदि। यत्र-तत्र व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग भी देखने को मिलता है।

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  • साहित्य में स्थान

बुद्धि और संवेदना के स्वस्थ समन्वय ने डॉ.दुबे को हिन्दी साहित्य में उच्च स्थान दिलाया है। उन्हें लोक-संस्कृति के प्रचारक के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त हुई है। डॉ. दुबे की रचनाओं में कवि हृदय की भावात्मक अनुभूति एवं कथात्मक अभिव्यक्ति के दर्शन होने के कारण हिन्दी के क्षेत्र में उनका एक विशिष्ट स्थान है।

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MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास : आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ

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MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास : आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ

आधुनिक काल

आधुनिक हिन्दी कविता का प्रारम्भ संवत् 1900 से माना जाता है। यह काल अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। इस काल में हिन्दी साहित्य का चहुंमुखी विकास हुआ। इस काल में सांस्कृतिक,राजनीतिक एवं सामाजिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी काव्य में नई चेतना तथा विचारों ने जन्म लिया और साहित्य बहुआयामी क्षेत्रों को सस्पर्श करने लगा। इस काल में धर्म, दर्शन,कला एवं साहित्य,सभी के प्रति नये दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ।

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आधुनिक हिन्दी कविता के विकासक्रम को विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया है किन्तु सर्वमान्य रूप से इस विकास को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता-
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है भारतेन्दु युग हिन्दी कविता का जागरण काल है। इस युग को हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस युग में देशोद्धार, राष्ट्र – प्रेम, अतीत – गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया और कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता का स्वर निनादित होने लगा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र, चौधरी बद्रीनारायण प्रेमघन’, लाला सीताराम आदि प्रमुख रचनाकार हुए।
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द्विवेदी युग में खड़ी बोली कविता की सम्वाहिका बनी। काव्य में सामाजिक तथा पौराणिक विषयों का विस्तार हुआ। श्रीधर पाठक, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’,रामचरित उपाध्याय, रामनरेश

त्रिपाठी, गोपालशरण सिंह, जगन्नाथ प्रसाद ‘रत्नाकर’, सत्यनारायण ‘कविरत्न’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।
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हिन्दी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

1. छायावाद [1920 – 19361]

हिन्दी कविता में आधुनिकता तथा नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय छायावादी युग को प्रदान किया जाता है।

हिन्दी साहित्य में छायावाद द्विवेदीयुगीन काव्य प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया की उपज है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, “छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में है—एक तो कवि उस अनन्त अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर चित्रमयी भाषा में प्रेम के अनेक प्रकार की व्यंजना करता है। दूसरा प्रयोग काव्य – शैली या पद्धति – विशेष के व्यापक अर्थ में है।”

डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, “परमात्मा की छाया आत्मा में पड़ने लगती है और आत्मा की छाया परमात्मा में,यही छायावाद है।”

डॉ. नगेन्द्र ने छायावाद को “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह”माना है।

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के अनुसार, “मानस अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भाव ही छायावाद है।”

  • छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

छायावादी काव्य में पायी जाने वाली प्रवृत्तियों को हम मुख्यतः तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं—
(क) विषयगत, (ख) विचारगत और (ग) शैलीगत।

(क) विषयगत प्रवृत्तियाँ
इसके अन्तर्गत तीन प्रकार की अभिव्यंजना है –
(1) नारी सौन्दर्य और प्रेम – चित्रण,
(2) प्रकृति – सौन्दर्य और प्रेम – व्यंजना तथा
(3) अलौकिक प्रेम या रहस्यवाद।

(1) नारी सौन्दर्य और प्रेम – चित्रण छायावादी कवियों ने सौन्दर्य के स्थूल चित्रण की अपेक्षा उसके सूक्ष्म प्रभाव का अंकन किया है। प्रेम के क्षेत्र में वे किसी रूढ़ि, मर्यादा या नियमबद्धता को स्वीकार नहीं करते। दारले 3 इनके प्रेम की दूसरी विशेषता है – वैयक्तिकता। हिन्दी में पहले भी श्रृंगारी कवियों ने प्रेम – वर्णन किया, किन्तु प्रेममार्गी कवियों को छोड़कर सभी ने राधा, पद्मिनी,उर्मिला,यशोधरा को माध्यम बनाया, जबकि छायावादी कवियों ने निजी प्रेमानुभूतियों की व्यंजना की। उनका प्रेम सूक्ष्म है। इन्होंने श्रृंगार के स्थूल क्रिया – कलापों के बजाय सूक्ष्म भाव दशाओं का उद्घाटन किया। चौथी विशेषता है कि उनकी प्रणय – गाथा का अन्त असफलता एवं निराशा में होता है। प्रेम – निरूपण में सबसे अधिक सफलता विरह – अनुभूति के वर्णन में मिली है।

(2) प्रकृति – सौन्दर्य और प्रेम – व्यंजना प्रकृति के सौन्दर्य और प्रेम का वर्णन भी छायावादी कवियों की श्रृंगारिकता का दूसरा रूप है। वे प्रकृति में नारी और प्रेयसी दोनों की छवि और सौन्दर्य देखते हैं। पत्तों और फूलों की मर्मर, भ्रमरों की गुनगुन में उन्हें पायल की झंकार या मधुर आलाप सुनायी देता है। उन्होंने प्रकृति को सचेतन मानकर (उसका) मानवीकरण और नारीकरण किया है।

(3) अलौकिक प्रेम या रहस्यवाद – ‘प्रेम पथिक’ और ‘आँसू’ में प्रसादजी ने सबसे पहले अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति की थी। रहस्यवाद में पहले वियोग, फिर संयोग होता है। छायावाद में इसके विपरीत है।

(ख) विचारगत प्रवृत्तियाँ छायावाद की विचारगत प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं

(1) दर्शन के क्षेत्र में अद्वैतवाद एवं सर्वात्मवाद।
(2) धर्म के क्षेत्र में रूढ़ियों एवं बाह्याचारों से मुक्त व्यापक मानव – हितचिन्तन।
(3) समाज के क्षेत्र में समन्वयवाद।
(4) राजनीति के क्षेत्र में अन्तर्राष्टीय एवं विश्व – शान्ति का समर्थन।
(5) पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन के क्षेत्र में हृदयतत्व की प्रधानता।
(6) साहित्य के क्षेत्र में व्यापक कलावाद या सौन्दर्यवाद।

(ग) शैलीगत प्रवृत्तियाँ
छायावादी शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) मुक्तक गीत शैली।
(2) प्रतीकात्मकता।
(3) प्राचीन एवं नवीन अलंकारों का प्रचुर मात्रा में सफल प्रयोग।
(4) कोमलकांत संस्कृतनिष्ठ पदावली।
(5) गीति शैली के सभी प्रमुख तत्व – वैयक्तिकता, भावात्मकता, संगीतात्मकता, संक्षिप्तता और कोमलता।

  • छायावाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

छायावाद के चार प्रमुख स्तम्भ हैं
1. जयशंकर प्रसाद,
2. सुमित्रानन्दन पन्त,
3. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’,
4. महादेवी वर्मा।

(1) जयशंकर प्रसाद प्रसाद ने प्रारम्भ में ब्रजभाषा में कविताएँ लिखीं। 1913 – 14 में वे खड़ी बोली में कविता करने लगे। उनके प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं – ‘चित्राधार’, ‘प्रेम पथिक’, ‘करुणालय’, ‘महाराणा का महत्व’, ‘कानन कुसुम’, ‘झरना’, ‘आँसू’, लहर’ और ‘कामायनी’। ‘कामायनी’ उनकी अन्तिम काव्य – रचना है। यह महाकाव्य है। ‘प्रेम पथिक’ लघु प्रबन्ध – काव्य है। ‘आँसू’ खण्ड – काव्य है, विरह – काव्य है। ‘कानन कुसुम’, झरना’, लहर स्फुट’ कविताओं के संग्रह हैं।

प्रसादजी छायावाद के प्रौढ़तम श्रेष्ठ कवि हैं।

(2) सुमित्रानन्दन पन्त—’वीणा’,’ग्रन्थि’, पल्लव’, ‘गुंजन’, ‘युगान्त’,’युगवाणी’, ‘ग्राम्या’, ‘स्वर्ण धूलि’, ‘युगान्तर’, ‘उत्तरा’, ‘रजतशिखर’,’शिल्पी’, ‘अतिमा’, ‘वीणा’ पन्त की काव्य – कृतियाँ हैं। पल्लव’, ‘गुंजन’ में उनकी स्फुट रचनाएँ हैं। ‘वीणा’ में रहस्यवाद का प्रभाव है। ‘पल्लव’ में निराशा और प्रकृति – चित्रण की तथा ‘गुंजन’ में नारी सौन्दर्य एवं मानववाद की प्रवृत्ति दृष्टव्य है। ‘ग्रन्थि’ एक छोटा प्रबन्ध – काव्य है जिसमें असफल प्रेम की कहानी है। ‘युगान्त’ में छायावादी युग का अन्त हो जाता है।

(3) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ – ‘परिमल’, ‘अनामिका’, ‘तुलसीदास’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘अणिमा’,’बेला’, ‘नये पत्ते’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’ निरालाजी की रचनाएँ हैं। इनकी रचनाओं में छायावाद की सभी प्रवृत्तियाँ हैं। कहीं रहस्यवाद भी है। बाद में निरालाजी प्रगतिवादी हो गये।

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(4) महादेवी वर्मा – ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’ और ‘दीपशिखा’ महादेवीजी की काव्य – रचनाएँ हैं। इन चार प्रमुख कवियों के अतिरिक्त मुकुटधर पाण्डेय, भगवतीचरण वर्मा, रामकुमार वर्मा, नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, मोहनलाल महतो ‘वियोगी’, जानकीबल्लभ शास्त्री भी छायावाद के कवि हैं।
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2. रहस्यवाद
[काल निर्धारण कठिन]

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है।”

बाबू गुलाबराय ने “प्रकृति में मानवीय भावों का आरोप कर जड़ – चेतन के एकीकरण की प्रवृत्ति के लाक्षणिक प्रयोगों को रहस्यवाद कहा है।”

मकटधर पाण्डेय के अनुसार, “प्रकृति में सूक्ष्म सत्ता का दर्शन ही रहस्यवाद है।”

रहस्यवाद का अर्थ है – छिपी हुई बात’। अतः रहस्यवाद का अर्थ हुआ वह विचारधारा या वाद जिसका आधार अज्ञात है। हिन्दी कविता में रहस्यवाद का काल निर्धारण करना कठिन है क्योंकि रहस्यवाद सृष्टि के आरम्भ से ही कवियों को प्रिय रहा है।

रहस्यवाद के तीन प्रमुख लक्षण हैं –
(1) अद्वैतवादी विचारधारा की स्वीकृति – आत्मा और परमात्मा एक हैं, अभिन्न हैं।
(2) उस असीम शक्ति से रागात्मक सम्बन्ध की अनुभूति।
(3) भाषा के माध्यम से अनुभूतियों की अभिव्यक्ति। सर्वप्रथम रहस्यवादी कवि कबीर और जायसी माने गये हैं।

आधुनिक युग में रहस्यवादी कवियों में जयशंकर प्रसाद सर्वप्रथम हैं। फिर निरालाजी ने तुंग हिमालय श्रृंग मैं चंचलगति सुर – सरिता” कहकर अलौकिक के साथ अपना स्पष्ट सम्बन्ध जोड़ लिया। पन्तजी भी प्रारम्भ में रहस्यवादी रहे।

रहस्यवाद की साधना में अकेली महादेवी वर्मा विरह के गीत ही गाती रहीं।

  • रहस्यवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

(1) अद्वैतवादी मान्यता,
(2) दाम्पत्य – प्रेम पद्धति,
(3) प्रेम में स्वच्छता एवं पवित्रता,
(4) दैन्य एवं आत्म – समर्पण की भावना,
(5) प्रतीकात्मकता,
(6) मुक्तक गीति शैली।

  • रहस्यवाद के प्रमुख कवि

कबीर, प्रसाद, पन्त, निराला, महादेवी सभी ने इस शैली को अपनाया है। ये सभी रहस्यवादी हैं। रामकुमार वर्मा आदि कवि अंशतया रहस्यवाद के कुछ सोपानों पर चढ़ सके. इसलिए उनकी रचनाओं में कुछ स्थानों पर रहस्यवाद की झलक मिलती है।

3. प्रगतिवाद
[1936 – 19431]

“राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है, वह काव्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद है।”

प्रगतिवादी काव्य की संज्ञा उस कविता को प्रदान की गई जो कि छायावाद के समापन काल में सन् 1936 के आस – पास सामाजिक चेतना को लेकर अग्रसर हुआ। प्रगतिवादी कविता में राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण से मुक्ति का स्वर प्रमुख है। इस कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। रूस के नये संविधान और सन् 1905 में लखनऊ में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की प्रेमचन्द की अध्यक्षता में हुई सभा इसके विकास – क्रम के महत्वपूर्ण सोपान हैं। प्रगति शब्द का अर्थ है – चलना, आगे – बढ़ना, अर्थात् यह वह वाद है जो आगे बढ़ने में विश्वास रखता है। प्रगतिवाद में साम्यवाद दृष्टिकोण को साहित्यिक विचारधारा के रूप में स्वीकार किया गया है।

  • प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

“दर्शन में जिसे द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद माना गया है, राजनीति में जो साम्यवाद है, वही साहित्य में प्रगतिवाद है।”
(1) धर्म,ईश्वर एवं परलोक का विरोध है। समाज में वर्ग – संघर्ष को समाप्त करने के लिए भाग्यवादिता की मान्यता को नष्ट करना होगा, क्योंकि शोषक वर्ग केवल भाग्य के बल पर ही शोषण करता है।
(2) पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा का प्रचार प्रगतिवादी कलाकारों ने किया है।
(3) शोषित वर्ग की दीन – हीन दशा का यथार्थ चित्रण करके ही दोनों वर्गों का भेद स्पष्ट किया है।
(4) नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया गया है। उसे रूपसी, नायिका या राज – वैभव में पलने वाली राजदुलारी नहीं, वरन् मजदूरी करने वाली कृषक ललना के रूप में चित्रित किया है।
(5) सरल शैली को अपनाकर अपनी रचनाओं को जन – साधारण तक पहुँचाना ही इस प्रवृत्ति का उद्देश्य रहा है।

  • प्रगतिवाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

निराला, सुमित्रानन्दन पन्त, नरेन्द्र शर्मा, भगवतीचरण वर्मा के अतिरिक्त आधुनिक कवियों में सबसे अग्रणी नाम रामधारीसिंह ‘दिनकर’ का है। इनके बाद बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथसिंह, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह आदि प्रगतिवादी कवि हुए।
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4. प्रयोगवाद
[1943 – 1950]

सन् 1943 में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के नेतृत्व में हिन्दी में एक आन्दोलनकारी लहर उठी,जो ‘प्रयोगवाद’ कहलायी। इसकी भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है, “ये कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं।”
इस प्रयोगवाद नामक विचारधारा पर यूरोप के अनेक आधुनिक काव्य सम्प्रदायों का प्रभाव है, जिसमें
(1) प्रतीकवाद, बिम्बवाद,
(2) अति यथार्थवाद,
(3) अस्तित्ववाद,
(4) फ्राइडवाद आदि मुख्य हैं।

  • प्रयोगवाद की मुख्य प्रवृत्तियाँ

(1) घोर व्यक्तिवाद – नयी कविता का प्रमुख लक्ष्य निजी मान्यताओं, विचारधाराओं और अनुभूतियों का प्रकाशन है। वस्तुतः इन कविताओं में व्यष्टिवाद को अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है
(2) दूषित वृत्तियों का यथार्थ (एवं) नग्न रूप में चित्रण – जिन वृत्तियों को पहले साहित्य में अश्लील,असामाजिक एवं अस्वस्थ समझा जाता था,उन्हीं कुण्ठाओं और वासनाओं का वर्णन प्रयोगवादी कविता में मिलता है।
(3) निराशावादिता – इस धारा के कवि भूत – भविष्य की प्रेरणा और चिन्ता से मुक्त होकर केवल वर्तमान क्षण में ही जीना चाहते हैं।
(4) बौद्धिकता एवं रूखापन, इस युग की कविताएँ हृदय की न होकर मस्तिष्क की देन हैं। इसलिए वे नीरस हैं और शायद चिरस्थायी साहित्य सम्पदा भी न हो। इन कविताओं में रागात्मकता के स्थान पर विचारात्मकता अधिक परिलक्षित होती है। इनका दावा है कि भले ही ये कविताएँ हृदय पर प्रभाव न डालें,किन्तु बौद्धिकता में भी रस होता है।
(5) साधारण विषयों पर लेखन इन नये कवियों ने आस – पास की साधारण वस्तुओं, जैसे – चूड़ी का टुकड़ा, चाय की प्याली, साइकिल, कुत्ता, होटल, दाल, नोन, तेल,लकड़ी, ब्लेड आदि को लेकर कविताएँ रची हैं।
(6) व्यंग्य एवं कटूक्ति – आधुनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर व्यंग्य किये हैं। पर उनमें गम्भीरता का अभाव है। अतः वे व्यंग्य कटूक्ति बनकर रह गये।
(7) असम्बद्ध प्रलाप – फ्राइडवादी प्रवृत्ति के अनुसार उद्गारों का प्रभाव ग्रहण कर उन्मुक्त साहचर्य की पद्धति अपनाकर नयी कविता में उसका प्रयोग किया गया है।
(8) शैली – नये बिम्ब, प्रतिमान, उपमान, मुक्त छन्द और नयी शब्दावली का प्रयोग, बेढंगी उपमाओं, अनगढ़ शब्दों, असम्बद्ध पदों और अनुपयुक्त विशेषणों का प्रयोग किया है।

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  • प्रयोगवाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

सन् 1943 में अज्ञेय ने ‘तार सप्तक’ का सम्पादन किया,फिर 1951 में दूसरा सप्तक’ और 1959 में ‘तीसरा सप्तक’ का सम्पादन किया।

1. प्रथम तार – सप्तक
(1) अज्ञेय,
(2) नैमिचन्द्र जैन,
(3) गजानन माधव मुक्तिबोध’,
(4) भारत भूषण,
(5) प्रभाकर माचवे,
(6) गिरिजाकुमार माथुर, और
(7) रामविलास शर्मा।

2. दूसरा तार – सप्तक
(1) भवानीप्रसाद मिश्र,
(2) धर्मवीर भारती,
(3) शकुन्तला माथुर,
(4) हरिनारायण व्यास,
(5) रघुवीर सहाय,
(6) शमशेर बहादुर सिंह, और
(7) नरेश मेहता।

3. तीसरा तार – सप्तक
(1) प्रयागनारायण त्रिपाठी,
(2) कीर्ति चौधरी,
(3) मदन वात्स्यायन,
(4) केदारनाथसिंह,
(5) कुँवरनारायण,
(6) विजयदेव नारायण साही, और
(7) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना।

नलिनविलोचन शर्मा,डॉ. जगदीश गुप्त,श्रीकान्त वर्मा, अशोक वाजपेयी, धूमिल स्नेहमयी चौधरी, कैलाश वाजपेयी आदि भी प्रयोगवाद के अन्य प्रसिद्ध कवि हैं।
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5. नई कविता
[1950 से अब तक]

नई कविता भारतीय स्वाधीनता के अनन्तर लिखी गई उन कविताओं को कहा गया जिन्होंने नये भावबोध,नये मूल्यों और नूतन शिल्पविधान को अन्वेषित तथा स्थापित किया। नई कविता अपनी वस्तु – छवि तथा रूपायन में पूर्ववर्ती प्रगतिवाद तथा प्रयोगवाद की विकासान्विति होकर भी अपने में सर्वथा विशिष्ट तथा असामान्य है।

नई कविता में आज की क्षणवादी,लघु मानववादी जीवन दृष्टि के प्रति नकार निषेध नहीं अपितु स्वीकार सहमति के साथ जीवन को पूर्णतया स्वीकार करके उसके भोगने की आकांक्षा है। नई कविता क्षणों की अनुभूतियों में अपनी आस्था प्रकट करती है जो कि समस्त जीवनानुभूतियों के लिए अवरोध न बनकर सहायक होते हैं। नई कविता, लघु मानवत्व को स्वीकार करती है जिसका तात्पर्य है सामान्य मनुष्य की अपेक्षित समूची संवेदनाओं और मानसिकता की खोज या प्रतिष्ठा करना। नई कविता कोई वाद नहीं है। उसमें सर्व महान् विशिष्ट कश्य की व्यापकता तथा सृष्टि की उन्मुक्तता है। नई कविता के दो प्रमुख घटक हैं – (क) अनुभूति की सच्चाई और (ख) बुद्धि की यथार्थवादी दृष्टि।।

नई कविता जीवन के प्रत्येक क्षण को सत्य मानती है। आन्तरिक और मार्मिकता के कारण नई कविता में जीवन के अति साधारण सन्दर्भ अथवा क्रिया – कलाप नूतन अर्थ तथा छवि पा लेते हैं। नई कविता में क्षणों की अनुभूति को लेकर अनेकानेक मार्मिक एवं विचारोत्तेजक कविताएँ लिखी गई हैं जो कि अपने लघु आकार के बावजूद प्रभावोत्पादकता में अत्यन्त तीव्र तथा सघन हैं। नई कविता की वाणी अपने परिवेश की जीवनानुभूतियों से संसिक्त है।

  • नई कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

(1) कुंठा, संत्रास, मृत्युबोध – मानव मन में व्याप्त कुंठाओं का, जीवन के संत्रास एवं मृत्युबोध का मनोवैज्ञानिक ढंग से चित्रण इस काल की कविताओं की पहचान है।
(2) बिम्ब – प्रयोगवादी कवियों ने नूतन बिम्बों की खोज की है।
(3) व्यंग्य प्रधान रचनाएँ – इस काल में मानव जीवन की विसंगतियों, विकृतियों एवं अनैतिकतावादी मान्यताओं पर व्यंग्य रचनाएँ लिखी गई हैं।
(4) लघु मानववाद की प्रतिष्ठा – मानव जीवन को महत्वपूर्ण मानकर उसे अर्थपूर्ण दृष्टि प्रदान की गई।
(5) प्रयोगों में नवीनता – नए – नए भावों को नए – नए शिल्प विधानों में प्रस्तुत किया गया
(6) क्षणवाद को महत्व जीवन के प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण मानकर जीवन की एक – एक अनुभूति को कविता में स्थान प्रदान किया गया है।
(7) अनुभूतियों का वास्तविक चित्रण – मानव व समाज दोनों की अनुभूतियों का सच्चाई के साथ चित्रण किया गया है।

नई कविता में जीवन मूल्यों की पुनः परीक्षा की गई है। प्रगतिवाद में लोक जीवन एक आन्दोलन के रूप में आया,प्रयोगवाद में वह कट गया परन्तु सम्प्रक्ति नई कविता की एक प्रमुख विशेषता बन गई। नई कविता के शिल्प को भी लोक – जीवन ने प्रभावित किया। उसने लोक – जीवन से बिम्बों,प्रतीकों,शब्दों तथा उपमानों को चुनकर निजी संवेदनाओं तथा सजीवता को द्विगुणित किया। नई कविता अपनी अन्तर्लय, बिम्बात्मकता, नव प्रतीक योजना, नये विशेषणों के प्रयोग,नव उपमान – संघटना के कारण प्रयोगवाद से अपना पृथक् अस्तित्व भी सिद्ध करती है।

प्रयोगवाद बोझिल शब्दावली को लेकर चलता है, परन्तु नई कविता ने प्रगतिवाद की तरह विशेष क्षेत्रों के विशिष्ट सन्दर्भ के लिए ही लोक शब्द नहीं लिये, परन्तु समस्त प्रकार के प्रसंगों के लिए लोक शब्दों का चयन किया। नई कविता की भाषा में एक खुलापन और ताजगी है।

निष्कर्षतः नई कविता मानव मूल्यों एवं संवेदनाओं की नूतन तलाश की कविता है।

  • नई कविता के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

नई कविता के प्रमुख कवियों में अज्ञेयजी के अनुभव – क्षेत्र तथा परिवेश में ग्राम एवं नगर, दोनों ही समाहित हैं। शहरी परिवेश के साथ जुड़ने वाले रचनाकारों में बालकृष्ण राव, शमशेर बहादुर सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, कुँवर नारायण, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. प्रभाकर माचवे, विजयदेव नारायण साही, रघुवीर सहाय आदि कवि आते हैं परन्तु भवानीप्रसाद मिश्र, केदारनाथ सिंह, शम्भूनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि ऐसे सृजनकर्ता हैं जिन्होंने मुख्यतः ग्रामीण संस्कारों को अभिव्यक्ति दी।
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प्रश्नोत्तर

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु – विकल्पीय

प्रश्न 1. आधुनिक हिन्दी कविता का प्रारम्भ माना जाता है
(अ) 1901 ई.से, (ब) 1900 ई.से, (स) संवत् 1901 से, (द) संवत् 1900 से।

2. छायावादी युग की कालावधि है
(अ) 920 – 1936, (ब) 1936 – 1943, (स) 1943 – 1950, (द) 1950 – अब तक।

3. छायावादी काव्य की विशेषता है [2009]
(अ) सामाजिक यथार्थ का चित्रण, (ब) अलौकिक सत्ता के प्रति प्रेम, विद्रोह, (स) सुख के लिए फूल तथा दुःख के लिए काँटा, (द) रूढ़ियों के प्रति विद्रोह।

4. नई कविता की कालावधि है
(अ) 1920 – 1936, (ब) 1936 – 1943, (स) 1943 – 1950, (द) 1950 – अब तक।

5. हिन्दी कविता का जागरण काल माना जाता है
(अ) भारतेन्दु युग को, (ब) द्विवेदी युग को, (स) छायावादी युग को, (द) प्रयोगवादी युग को।

6. इस युग के काव्य में सामाजिक तथा पौराणिक विषयों का विस्तार हुआ
(अ) भारतेन्दु युग, (ब) द्विवेदी युग, (स) छायावादी युग, (द) रहस्यवादी युग।

7. “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह” – छायावाद की यह परिभाषा है
(अ) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की, (ब) डॉ.रामकुमार वर्मा की, (स) डॉ.नगेन्द्र की, (द) आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की।

8. प्रसाद, पन्त, निराला और महादेवी को इस युग के चार स्तम्भ माना गया है
(अ) प्रगतिवाद, (ब) छायावाद, (स) प्रयोगवाद, (द) नई कविता।

9. ‘युगधारा’ के रचनाकार हैं
(अ) नागार्जुन, (ब) सुमित्रानन्दन पन्त, (स) त्रिलोचन, (द) निराला।

10. दूसरा तार – सप्तक प्रकाशित हुआ
(अ) 1943 में, . (ब) 1950 में, (स) 1951 में, (द) 1959 में।

11. नई कविता की प्रमुख प्रवृत्ति है
(अ) बिम्ब, (ब) प्रयोगों में नवीनता, (स) व्यंग्य प्रधान रचनाएँ, (द) उपर्युक्त सभी।

12. ‘कामायनी’ इस युग की रचना है [2009]
(अ) रहस्यवाद, (ब) प्रयोगवाद, (स) छायावाद, (द) प्रगतिवाद।
उत्तर–
1. (द), 2. (अ), 3. (ब), 4. (द), 5. (अ), 6. (ब), 7.(स), 8. (ब), 9.(अ), 10. (स), 11. (द), 12. (स)।

  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. नई कविता की कालावधि …… से अब तक मानी गई है।
2. ‘पंचवटी’ के रचनाकार ……. थे।
3. हिन्दी कविता में आधुनिकता तथा नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय ……. युग को प्रदान किया जाता है।
4. ‘नीरजा’ की रचनाकार ……… हैं।
5. “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है,वही भावना के क्षेत्र में ……. है।”
6. प्रथम तार – सप्तक का प्रकाशन ……. में हुआ।
7. ‘सन्नाटा’ के रचनाकार “…” हैं।
8. ……. मानव मूल्यों और संवेदनाओं की कविता है।
9. ……… कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव है।
10. राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है, वह काव्य के क्षेत्र में ……. है।
11. प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना ……….. में हुई। [2009]
12. ……… स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है। [2009]
13. शोषण का विरोध ………. काव्य की प्रमुख विशेषता है। [2009]
14. जयशंकर प्रसाद ……. के प्रमुख कवि हैं। [2010]
15. सुमित्रानन्दन पन्त …… के प्रमुख कवि हैं। [2011]
उत्तर–
1. 1950 ई, 2. मैथिलीशरण गुप्त, 3. छायावादी, 4. महादेवी वर्मा, 5. रहस्यवाद, 6. 1943 ई. 7. भवानीप्रसाद मिश्र, 8. नई कविता, 9. प्रगतिवादी 10. प्रगतिवाद, 11. सन् 1936, 12. छायावाद, 13. प्रगतिवादी, 14. छायावाद, 15. छायावाद।

  • सत्य/असत्य

1. आधुनिक हिन्दी कविता का प्रारम्भ 1900 ई.से माना गया है।
2. आधुनिक काल की कविता में धर्म,दर्शन,कला एवं साहित्य के प्रति नवीन दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ।
3. प्रयोगवादी युग की कालावधि 1943 ई.से 1950 ई. तक मानी गयी है।
4. द्विवेदी युग को हिन्दी साहित्य का प्रवेश – द्वार माना जाता है।
5. प्रसाद,पन्त, निराला और महादेवी वर्मा रहस्यवाद के चार प्रमुख स्तम्भ माने गये हैं।
6. “प्रकृति में सूक्ष्म सत्ता का दर्शन ही रहस्यवाद है।” यह कथन मुकुटधर पांडेय का है।
7. “राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है,वह काव्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद है।”
8. “ये कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं।” प्रयोगवाद के सम्बन्ध में यह कथन अज्ञेयजी का है।
9. गजानन माधव मुक्तिबोध रीतिकाल के प्रमुख कवि हैं। [2010]
10. भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। [2009]
उत्तर–
1. असत्य, 2. सत्य, 3. सत्य, 4. असत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. सत्य, 8. सत्य, 9. असत्य,10. सत्य।

  • सही जोड़ी मिलाइये

I. ‘क’
(1) माखनलाल चतुर्वेदी – (अ) कामायनी
(2) केदारनाथ अग्रवाल – (ब) सूर्य का स्वागत
(3) जयशंकर प्रसाद – (स) हिमकिरीटिनी
(4) धर्मवीर भारती – (द) फूल नहीं रंग बोलते हैं
(5) दुष्यन्त कुमार – (इ) अन्धा युग
उत्तर–
(1) → (स),
(2) → (द),
(3) → (अ),
(4) → (इ),
(5) → (ब)।

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II. ‘क’
(1) छायावाद – (अ) सुमित्रानन्दन पन्त
(2) हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार [2010] – (ब) जयशंकर प्रसाद
(3) प्रकृति के सुकुमार कवि [2011] – (स) नई कविता
(4) प्रयोगवाद – (द) अज्ञेय
(5) व्यंग्य की प्रधानता [2009] – (इ) भारतेन्दु युग
उत्तर–
(1) → (ब),
(2) → (इ),
(3) → (अ),
(4) → (द),
(5) → (स)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
भारतेन्दु युग के कवियों की वाणी में कौन – सा स्वर मुखरित हुआ है?
उत्तर–
राष्ट्रीयता का स्वर।

प्रश्न 2.
द्विवेदी युग में कौन – सी भाषा कविता की संवाहिका बनी?
उत्तर–
खड़ी बोली।

प्रश्न 3.
हिन्दी कविता में नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय किस युग को प्रदान किया जाता है?
उत्तर–
छायावादी युग।

प्रश्न 4.
छायावादी काव्य में किन भावनाओं की प्रधानता है?
उत्तर–
सौन्दर्य तथा प्रेम – भावना।

प्रश्न 5.
महादेवी वर्मा के काव्य में प्रधान रूप से कौन – से स्वर मुखरित हैं?
उत्तर–
विरह – वेदना।

प्रश्न 6.
जयशंकर प्रसाद ने मूलत: अपने काव्य में किन भावों का अंकन किया है?
उत्तर–
सौन्दर्य,प्रेम, यौवन और श्रृंगार।

प्रश्न 7.
छायावादी युग के किस कवि ने क्रान्ति एवं विद्रोह का स्वर निनादित किया है?
उत्तर–
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।

प्रश्न 8.
कामायनी किस युग की रचना है?
उत्तर–
आधुनिक छायावादी युग।

प्रश्न 9.
गजानन माधव मुक्तिबोध’ की रचनाएँ किस युग से सम्बन्धित हैं?
उत्तर–
प्रगतिवाद।

प्रश्न 10.
यथार्थ से पलायन का काव्य कौन – सा है?
उत्तर–
छायावाद।

  • (ख) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रगतिवादी साहित्य किस विचारधारा से प्रभावित है?
उत्तर–
प्रगतिवादी साहित्य साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है।

प्रश्न 2.
दो छायावादी कवियों के नाम बताइये।
उत्तर–
(1) सुमित्रानन्दन पन्त,
(2) महादेवी वर्मा।

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प्रश्न 3.
सुमित्रानन्दन पन्त किन – किन विचारधाराओं से प्रभावित थे?
उत्तर–
सुमित्रानन्दन पन्त गाँधीवाद,मार्क्सवाद एवं अरविन्द दर्शन से अत्यधिक प्रभावित

प्रश्न 4.
भारतेन्दु युग का अन्य क्या नाम है?
उत्तर–
भारतेन्दु युग को ‘पुनर्जागरण काल’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 5.
भारतेन्दु युग में काव्य की भाषा क्या थी?
उत्तर–
भारतेन्दु युग में काव्य की भाषा ब्रज थी।

प्रश्न 6.
आधुनिक काल के द्वितीय युग का नाम लिखिए।
उत्तर–
आधुनिक काल के द्वितीय युग का नाम द्विवेदी युग है।

प्रश्न 7.
द्विवेदी युग के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर–
द्विवेदी युग के प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी माने जाते हैं।

प्रश्न 8.
द्विवेदीयुगीन दो महाकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर–
द्विवेदीयुगीन दो महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ और ‘साकेत’ हैं।

प्रश्न 9.
छायावाद का तात्पर्य समझाइए।
उत्तर–
संसार के किसी पदार्थ में एक अनजान शक्ति का प्रतिबिम्ब निहारना अथवा सको आरोपित करना छायावाद कहलाता है।

प्रश्न 10.
छायावादी काव्य के एक कवि एवं उसकी एक रचना का नाम बताइए।
उत्तर–
एक प्रमुख छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त हैं एवं उनकी रचना लोकायतन’ है।

प्रश्न 11.
छायावाद का समय क्या माना गया है?
उत्तर–
छायावाद का समय सन् 1920 ई.से 1936 ई. माना गया है।

प्रश्न 12.
छायावाद की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर–
‘कामायनी’ तथा ‘परिमल’ छायावाद की प्रमुख दो रचनाएँ हैं।

प्रश्न 13.
छायावादी युग के दो श्रेष्ठ कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर–
जयशंकर प्रसाद एवं सुमित्रानन्दन पन्त छायावाद के दो श्रेष्ठ कवि हैं।

प्रश्न 14.
प्रगतिवादी कविता का विषय क्या रहा है?
उत्तर–
प्रगतिवादी कविता में निर्धन, मजदूरों तथा शोषितों का यथार्थ चित्रण हु

प्रश्न 15.
प्रगतिवादी काव्य की समयावधि का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
प्रगतिवादी काव्य का समय सन् 1936 से लेकर 1943 तक स्वीकारा गया है।

प्रश्न 16.
प्रगतिवादी काव्यधारा के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर–
प्रगतिवादी काव्यधारा के दो श्रेष्ठ कवि नागार्जुन तथा केदारनाथ अग्रवाल हैं।

प्रश्न 17.
प्रयोगवाद का प्रवर्तक किसे माना गया है?
उत्तर–
प्रयोगवाद का प्रवर्तक ‘अज्ञेय’ को माना गया है।

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प्रश्न 18.
‘तार सप्तक’ का सम्पादन प्रथम बार कब और किसने किया?
उत्तर–
तार सप्तक’का प्रथम बार सम्पादन ‘अज्ञेय’ जी ने सन् 1943 में किया था।

प्रश्न 19.
प्रयोगवाद के एक कवि तथा उसकी एक रचना का नाम लिखिए।
उत्तर–
अज्ञेय’ प्रयोगवाद के प्रमुख कवि हैं। उनकी एक रचना का नाम ‘बावरा अहेरी’ है।

प्रश्न 20.
‘नई कविता’ के एक कवि तथा उसकी एक रचना का नाम लिखिए।
उत्तर–
नई कविता’ के प्रमुख कवि भवानीप्रसाद मिश्र हैं तथा उनकी एक रचना का नाम ‘गीत फरोश’ है।

  • (ग) लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हिन्दी कविता के आधुनिक विकासक्रम को विद्वानों ने किस प्रकार वर्गीकृत किया है? सर्वमान्य रूपों को लिखिए तथा यह भी बताइए कि हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार किस युग को माना गया है? [2009]
उत्तर–
आधुनिक हिन्दी कविता के विकासक्रम को विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया है किन्तु सर्वमान्य रूप से इस विकास को अग्रलिखित भागों में बाँटा जा सकता है-
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भारतेन्दु युग हिन्दी कविता का जागरण काल है। इस युग को हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस युग में देशोद्धार, राष्ट्र – प्रेम, अतीत – गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया और कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता का स्वर निनादित होने लगा।

प्रश्न 2.
आधुनिक काल को कितने युगों में विभाजित किया गया है?
उत्तर–
आधुनिक काल को निम्नांकितं युगों में विभाजित किया गया है
(1) भारतेन्दु युग,
(2) द्विवेदी युग,
(3) छायावादी युग,
(4) प्रगतिवादी युग,
(5) प्रयोगवादी युग,
(6) नयी कविता।

प्रश्न 3.
भारतेन्दु युग के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। [2015, 16]
उत्तर–
भारतेन्दु युग के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(1) समाज सुधार का भाव,
(2) राष्ट्रीय चेतना,
(3) भक्ति भावना,
(4) प्रकृति चित्रण,
(5) ब्रजभाषा का प्रयोग,
(6) शृंगार वर्णन,
(7) स्वदेश – प्रेम।

प्रश्न 4.
भारतेन्दु युग के प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर–
भारतेन्द हरिश्चन्द्र प्रताप नारायण मिश्र चौधरी बद्रीनारायण ‘प्रेमघन’ ‘ठाकर जगमोहन सिंह’, राधाकृष्ण दास, अम्बिकादत्त व्यास आदि भारतेन्दु युग के प्रमुख कवि हैं।

प्रश्न 5.
भारतेन्दु युग को हिन्दी कविता का जागरण काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर–
भारतेन्दु युग के कवियों की कविता में देशोद्धार, राष्ट्र – प्रेम, अतीत गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया है। कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता के स्वर मुखरित हैं। सांस्कृतिक,राजनीतिक एवं सामाजिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी काव्य में नयी चेतना तथा विचारों का समावेश हुआ।

प्रश्न 6.
द्विवेदी – युग के काव्य की चार विशेषताएँ बताइए। [2006]
उत्तर–
(1) वर्णन का प्राधान्य,
(2) अतीत के गौरव का बखान,
(3) आदर्शवादिता, और
(4) देश – प्रेम।

प्रश्न 7.
रूपसि तेरा घन केशपाश !
श्यामल – श्यामल कोमल – कोमल
लहराता सुरभित केशपाश !
उपर्युक्त में व्यक्त छायावाद की तीन विशेषताएँ बताइए।
उत्तर–
(1) सौन्दर्य का चित्रण,
(2) मानवीकरण,
(3) कोमलकान्त पदावली।

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प्रश्न 8.
छायावाद के तीन कवियों के नाम उनकी एक – एक रचना सहित लिखिए।
उत्तर–
(1) जयशंकर प्रसाद कामायनी।
(2) सुमित्रानन्दन पन्त – युगवाणी।
(3) महादेवी वर्मा – दीपशिखा।

प्रश्न 9.
छायावादी कविता की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2009]
अथवा
छायावाद की चार विशेषताएँ लिखिए। [2012, 14, 17]
उत्तर–
(1) सौन्दर्य तथा प्रणय – भावनाओं का प्राधान्य।
(2) भाषा में लाक्षणिकता तथा वक्रता की प्रमुखता।
(3) बाह्यार्थ निरूपण के स्थान पर स्वानुभूति निरूपण की प्रमुखता।
(4) प्रकृति का सजीव सत्य के रूप में चित्रण तथा प्रकृति पर कवि द्वारा अपने भावों का आरोपण।
(5) छन्द विधान में नूतनता।।
(6) डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में, छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह था।”

प्रश्न 10.
छायावाद के चार प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
उत्तर–
छायावाद के चार प्रमुख कवि –
(1) जयशंकर प्रसाद,
(2) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’,
(3) सुमित्रानन्दन पन्त, तथा
(4) महादेवी वर्मा हैं।

प्रश्न 11.
छायावादी कविता के ह्रास के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर–
छायावादी कविता में प्रेम और सौन्दर्य का अति सूक्ष्म अंकन हो रहा था। काव्य में यथार्थ से परे रहस्यवादी प्रवृत्तियों की प्रधानता का समावेश हो गया था। जीवन से पलायन की प्रवृत्ति बढ़ गयी थी। प्रतीक और बिम्बों की अतिशयता थी। ये कारण ही छायावाद के हास के कारण बने।

प्रश्न 12.
रहस्यवाद की परिभाषा देते हुए रहस्यवादी कविता की चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
रहस्यवादी कविता की विशेषताएँ लिखिए। [2009, 15]
उत्तर–
परिभाषा – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है।”
विशेषताएँ –
(1) विरह – वेदना की अभिव्यक्ति।
(2) आधुनिक काल में रहस्यवादी कविता व्यापक स्वच्छन्दतावादी काव्य क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट है।
(3) कविता में अप्रस्तुत योजना की नतनता है।
(4) रहस्यवादी कविता में बौद्ध दर्शन के अतिरिक्त उपनिषदों का प्रभाव भी परिलक्षित है।

प्रश्न 13.
छायावाद तथा रहस्यवाद में अन्तर लिखिए। [2010]
उत्तर–
छायावाद तथा रहस्यवाद में अन्तर इस प्रकार है-
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प्रश्न 14.
प्रगतिवादी काव्य का परिचय दीजिए।
उत्तर–
अतिशय भावुकता का विरोध,स्थूल भौतिक जगत की यथार्थता का वर्णन,शोषण के प्रति आक्रोश तथा सामाजिक विषमताओं पर तीव्र प्रहार करने की प्रवृत्ति वाले हिन्दी काव्य को प्रगतिवादी काव्य कहा जाता है।

प्रश्न 15.
पाँच प्रगतिवादी कवियों के नाम बताइए।
उत्तर–
पाँच प्रगतिवादी कवि हैं –
(1) नागार्जुन,
(2) रामधारी सिंह ‘दिनकर’,
(3) नागार्जुन,
(4) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’,
(5) निराला।

प्रश्न 16.
दो प्रगतिवादी कवियों के नाम लिखिए तथा उनकी एक – एक रचना का नाम भी लिखिए।
अथवा
प्रगतिवाद की विशेषताएँ बताते हुए दो प्रमुख कवियों के नाम तथा उनकी एक – एक रचना लिखिए। [2009, 11, 13]
उत्तर–
प्रगतिवाद की विशेषताएँ –
(1) प्रगतिवादी काव्य में यथार्थ का चित्रण है।
(2) इस काव्य में रूढ़िवादी विचारधाराओं का जमकर विरोध किया गया है।
(3) मानव की समानता में आस्था।
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प्रश्न 17.
प्रगतिवाद की चार विशेषताएँ लिखिए। [2017]
उत्तर–
प्रगतिवादी काव्य की चार विशेषताएँ निम्नांकित हैं-
(1) सड़ी – गली रूढ़ियों का विरोध।
(2) शोषण तथा अन्याय के प्रति रोष।
(3) साम्यवाद से प्रभावित।
(4) मानव की समानता में आस्था।

प्रश्न 18.
प्रगतिवादी काव्यधारा से आप क्या समझते हैं? दो प्रगतिवादी कवियों के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर–
प्रगति शब्द का अर्थ है – चलना, आगे बढ़ना। अर्थात् यह वह वाद है जो आगे बढ़ने में विश्वास रखता है। प्रगतिवाद में साम्यवादी दृष्टिकोण को साहित्यिक विचारधारा के रूप में स्वीकार किया गया है। प्रगतिवादी काव्य की संज्ञा उस कविता को प्रदान की गई है जो कि छायावाद के समापन काल में सन् 1936 के आस – पास सामाजिक चेतना को लेकर अग्रसर हुआ। प्रगतिवादी कविता में राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण से मुक्ति का स्वर प्रमुख है। इस कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव है।

दो प्रगतिवादी कवि हैं – सुमित्रानन्दन पन्त, नागार्जुन।

प्रश्न 19.
कुछ प्रमुख महाकाव्यों एवं उनके रचयिता का नाम लिखिए।
उत्तर–
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प्रश्न 20.
‘तार सप्तक’ से क्या आशय है? समझाइए।
उत्तर–
सन् 1943 ई.में प्रथम बार तार सप्तक’ के प्रकाशन के साथ हिन्दी में प्रयोगवाद का आरम्भ हुआ। यही धारा विकसित होकर 1952 – 54 तक ‘नयी कविता के रूप में स्थापित हो गयी। आज इसी का युग चल रहा है। इसकी मुख्य विशेषताएँ ये हैं – अतिवैयक्तिकता. यथार्थवाद, बौद्धिकता का आग्रह, विद्रोह का स्वर, यौन भावनाओं का मुक्त चित्रण, सामाजिक विषमता पर व्यंग्य विचित्रता का प्रदर्शन प्रकृति का बहुविधि चित्रण,भावों और भाषा का अनगढ़ रूप,भदेसपन,प्रतीकात्मकता, नवीन उपमान तथा भाषा शैली के नये प्रयोग।

प्रश्न 21.
प्रयोगवादी कविता की विशेषताएँ लिखिए। [2009]
अथवा
प्रयोगवाद की विशेषताएँ बताते हुए दो प्रयोगवादी कवियों के नाम लिखिए। [2012]
अथवा
प्रयोगवादी काव्य की तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख दो प्रमुख कवियों के नाम, उनकी एक – एक रचना के साथ लिखिए। [2013]
उत्तर–
प्रयोगवाद की विशेषताएँ –
(1) प्रयोगवादी कविता पर मार्क्सवादी प्रभाव परिलक्षित है।
(2) इस काव्य में सजग एवं गहरी पीड़ा का बोध है।
(3) प्रयोगवादी कविता भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता पर विशेष बल देती है।
(4) फ्रायड के काम सिद्धान्त को सर्वोपरि रूप में स्वीकार किया गया है।
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प्रश्न 22.
‘प्रयोगवाद’ का प्रारम्भ काल बताइए तथा उसकी प्रमुख प्रवृत्ति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
‘अज्ञेय’ के सम्पादन में प्रकाशित ‘तार सप्तक’ के साथ सन् 1943 ई. से ‘प्रयोगवाद’ का प्रारम्भ माना गया है। प्रयोग के प्रति आग्रह इस कविता की प्रमुख प्रवृत्ति है।

प्रश्न 23.
प्रयोगवादी कवियों का नाम उल्लेख करते हुए उनकी प्रमुख वृत्तियों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर–
प्रयोगवाद के प्रमुख कवि अज्ञेय, धर्मवीर भारती, भारत भूषण, नरेश मेहता, प्रभाकर माचवे आदि हैं। उनके काव्य में अतिवैयक्तिकता, बौद्धिकता, यथार्थवादिता,स्वार्थपन, विद्रोह,नग्न श्रृंगार, भदेसपन आदि वृत्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। इन कवियों ने प्राचीन का विरोध किया है। भाषा तथा शैली का अनगढ़ विकृत रूप भी इनके काव्य में दिखायी पड़ता है।

प्रश्न 24.
प्रयोगवादी और प्रगतिवादी काव्य में कोई तीन अन्तर लिखिए।
उत्तर–
प्रयोगवादी काव्य में कवि प्रतीक, बिम्ब,शब्द चयन और कथन की विचित्र भाव भंगिमा द्वारा मानव मन की कुंठा की अभिव्यक्ति होती है। इस काव्य में घोर व्यक्तिवाद होता है और इसमें निराशावादी दृष्टिकोण पाया जाता है जबकि प्रगतिवाद पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा व्यक्त करता है,शोषित वर्ग की दीन – हीन दशा का वर्णन करता है और नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण का चित्रण करता है।

प्रश्न 25.
नई कविता की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर–
(1) नई कविता जीवन के हर क्षण को सत्य ठहराती है।
(2) नई कविता की को वाणी अपने परिवेश के जीवन अनुभव पर आधारित है।
(3) नई कविता लघु माननत्व को स्वीकार करती है।
(4) नई कविता में जीवन मूल्यों की पुनः परीक्षा की गयी है।

प्रश्न 26.
नई कविता एवं प्रयोगवादी कविता में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–
नई कविता ने प्रगतिवाद की तरह विशेष क्षेत्रों में विशिष्ट शब्द नहीं लिए हैं। समस्त प्रकार के प्रश्नों हेतु लोक शब्दों का चयन किया है। प्रयोगवाद बोझिल शब्दावली को लेकर चलता है। प्रयोगवादी कविता में मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष को बौद्धिकता के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।

प्रश्न 27.
यह पहाड़ी, पाँव क्या चढ़ते इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीजे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है।
उपर्युक्त पंक्तियों को किन कारणों से नयी कविता कहा जा सकता है?
उत्तर–
नयी कविता में भाषा की सरलता, बिम्बात्मकता और प्रतीक योजना होती है। क्षण की अनुभूति को कविता का आकार दिया जाता है। इन पंक्तियों में नयी कविता की ये विशेषताएँ हैं। इसलिए इनको नयी कविता कहा जा सकता है।

प्रश्न 28.
‘नई कविता’ के प्रमुख कवियों तथा उनकी प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर–
नई कविता’ के प्रमुख कवि एवं उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-
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प्रश्न 29.
‘नई कविता’ की दो विशेषताएँ बताते हुए दो प्रमुख कवियों के नाम तथा उनकी एक – एक रचना का नाम लिखिए। [2010]
अथवा
नई कविता की तीन विशेषताएँ बताते हुए दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर–
नई कविता’ के प्रमुख कवि एवं उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं –
(1) नई कविता जीवन के हर क्षण को सत्य ठहराती है।
(2) नई कविता की को वाणी अपने परिवेश के जीवन अनुभव पर आधारित है।
(3) नई कविता लघु माननत्व को स्वीकार करती है।
(4) नई कविता में जीवन मूल्यों की पुनः परीक्षा की गयी है।

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प्रश्न 30.
लोकगीतों की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। [2012]
उत्तर–
लोकगीतों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं
(1) लोकगीत अधिकांशतः सामूहिक रूप में ही माने जाते हैं।
(2) लोकगीत लोक मानस के भावों और विचारों को प्रकट करने की सक्षम विधा है।
(3) लोकगीतों में जीवन का उल्लास, विषाद, भक्तिभावना, हास्य – व्यंग्य, प्रेम, प्रकृति, आक्रोश आदि भावों का समावेश रहता है।
(4) लोकगीत सामाजिक परम्पराओं में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

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MP Board Class 12th Special Hindi पत्र-लेखन

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आधुनिक युग यद्यपि दूरभाष और मोबाइल संदेशों का है तथापि पत्र-लेखन का महत्त्व आज भी अक्षुण्ण है। आधुनिक युग में तो पत्र-लेखन ने एक कला का रूप धारण कर लिया है। पारिवारिक जीवन तथा सामाजिक जीवन के अनेक कर्तव्यों तथा उत्तर-दायित्वों का निर्वाह करने के लिए हमको प्रतिदिन अनेक प्रकार के पत्र लिखने पड़ते हैं। पारिवारिक पत्र स्नेह सम्बन्धों पर आधारित होते हैं तथा उनमें प्राय: अपनी व्यक्तिगत या परिवार सम्बन्धी बातें ही लिखी जाती हैं। अतः उनको लिखने में कोई कठिनाई नहीं होती तथा लिखने में विशेष सावधानियाँ भी नहीं रखनी पड़तीं। लेकिन जो पत्र सामाजिक, व्यावसायिक तथा व्यापारिक क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हैं, उनको लिखने में विशेष सावधानियाँ बरतने की आवश्यकता होती है। पत्र हमारी भावनाओं तथा विचारों की अभिव्यक्ति होता है। अभिव्यक्ति सरल तथा स्पष्ट होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि (1) अपनी बात स्पष्ट रूप से लिखनी चाहिए। इसके लिए संक्षिप्तता पर ध्यान देना चाहिए। अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए। आजकल प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त है तथा वह समय का सदुपयोग करता है। अतः लम्बे पत्र पढ़ने का समय किसी के पास नहीं है। (2) सरल तथा प्रवाहपूर्ण भाषा का प्रयोग करना चाहिए। विद्वत्ता या पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिए क्लिष्ट शब्दों या समास-प्रधान लम्बे-लम्बे वाक्यों का प्रयोग निरर्थक है। इससे लाभ होने की अपेक्षा हानि अधिक होने की सम्भावना होती है। वाक्य रचना ऐसी होनी चाहिए, जिससे पढ़ने वाला आपके आशय को अच्छी तरह से समझ सके।

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पत्र-लेखन की रूप-रेखा

  1. पत्र प्रेषक का पता और दिनांक।
  2. सम्बोधन।
  3. पत्र का विषय।
  4. अभिवादन।
  5. पत्र का मुख्य भाग।
  6. प्रेषक का आत्मबोधन (हस्ताक्षर से पूर्व प्रयुक्त शब्दावली)।
  7. प्रेषक के हस्ताक्षर और नाम।
  8. पता।

पत्र को ठीक से समझने के लिए उसे अग्रलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता

(1) पत्र प्रेषक का पता और दिनांक-इसके अन्तर्गत आप अपना पता और वह दिनांक लिखते हैं जिस दिन पत्र लिखा गया। ये दोनों बातें पत्र के दाहिने ओर सबसे ऊपर लिखी जाती हैं। अपना पता लिखते समय मकान का नम्बर एवं गली के नाम के बाद अल्प विराम (,) लगाना चाहिए तथा दूसरी पंक्ति में शहर या गाँव का नाम लिखना चाहिए और तब पूर्ण विराम लगाना चाहिए। पते के नीचे दिनांक लिखते समय दिनांक एवं महीना लिखकर अल्प विराम लगाना चाहिए। व्यापारिक पत्रों में इस सबको अब प्राय: बाईं ओर लिखा जाता है। जैसे-
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(2) सम्बोधन-ये दो प्रकार के होते हैं—
(क) निजी अथवा व्यक्तिगत पत्रों के सम्बोधन,
(ख) अन्य पत्रों के सम्बोधन।

व्यक्तिगत पत्रों के लिए (बड़ों के लिए)-श्रद्धेय, परमपूज्य, आदरणीय, पूज्यपाद, माननीय मान्यवर; (स्त्रियों के लिए)-पूज्या, पूज्यपाद, पूजनीया,माननीया आदि।
सम्बोधन इस प्रकार भी लिखते हैं-श्रद्धेय गुरुवर,परमपूज्य पिताजी,आदरणीय माताजी, आदरणीय भ्रातृवर; (बराबर वालों को) -प्रियवर, प्रिय, भाई, मित्रवर, बन्धुवर; (बच्चों के लिए) -आयुष्मान, प्रियवर, परमप्रिय,प्रिय,चिरंजीव आदि।

व्यावसायिक एवं आधिकारिक पत्रों में पहले सम्बन्धित व्यक्ति का उल्लेख करते हैं, जिसको पत्र लिखा जाता है। जैसे

  • सेवा में,
  • प्रधानाचार्य,
  • शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
  • शिवपुरी।
  • इसके बाद नीचे महोदय, मान्यवर, प्रिय महोदय आदि लिखते हैं।

(3) पत्र का विषय-आधिकारिक पत्रों में प्रायः महोदय या प्रिय महोदय आदि के ऊपर पत्र का विषय लिखते हैं जिससे पत्र को सम्बन्धित व्यक्ति के पास भेजने में विभाग को सुविधा रहती है। अब व्यावसायिक पत्रों में भी इसका प्रयोग होने लगा है।

(4) अभिवादन-आधिकारिक एवं व्यावसायिक पत्रों में अभिवादन की परम्परा नहीं है। व्यक्तिगत पत्रों में; (बड़ों को) प्रणाम, सादर प्रणाम, चरण स्पर्श, सादर चरण स्पर्श, नमस्ते, नमस्कार आदि; (बराबर वालों को) नमस्ते, नमस्कार, जय राम जी की,जय हिन्द तथा; (छोटों को)-आशीर्वाद,शुभाशीष,प्रसन्न रहो, सौभाग्यवती रहो आदि लिखते हैं।

(5) पत्र का मुख्य भाग-पत्र का मुख्य भाग सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। व्यक्तिगत पत्रों में कुशल समाचार लिखने के बाद जो भी समाचार या सूचनाएँ देनी होती हैं,वे इसी भाग में होती हैं। व्यापारिक और (सरकारी) आधिकारिक पत्रों में संक्षेप में औपचारिकता का पूरा निर्वाह करते हुए अपनी बात कही जाती है। इस भाग की समाप्ति प्रायः कुछ वाक्यों या शब्दों से की जाती है। व्यक्तिगत पत्रों में ‘शेष फिर’, ‘शेष मिलने पर’, ‘प्रणाम सहित’, दर्शन की प्रतीक्षा में’;(बड़ों के लिए-आशीर्वाद सहित; (छोटों के लिए-साधुवाद आदि तथा व्यापारिक और आधिकारिक पत्रों में ‘सधन्यवाद’, धन्यवाद सहित’, ‘साभार’ आदि लिखते हैं।

(6) प्रेषक का आत्मबोधन (हस्ताक्षर से पूर्व प्रयुक्त शब्दावली)-निजी पत्रों में अपने सम्बन्ध के अनुसार पत्र लिखकर पत्र के अन्त में हस्ताक्षर से पूर्व एक या एक से अधिक सम्बन्ध द्योतक शब्दों का प्रयोग करते हैं। (बड़ों के लिए-आज्ञाकारी, विनीत, आपका दास, भवदीय, आपका सेवक, कृपाकांक्षी, स्नेहभाजन आदि; (बराबर वालों के लिए—आपका, आपका ही, तुम्हारा, सस्नेह तुम्हारा तथा (छोटों के लिए)-तुम्हारा शुभचिन्तक, शुभैषी, शुभेच्छु, शुभाकांक्षी आदि लिखते हैं। आवेदन पत्रों में भवदीय,प्रार्थी आदि लिखते हैं।

(7) प्रेषक के हस्ताक्षर और नाम बड़ों को लिखे गये पत्रों में विनम्रतापूर्वक प्रायः नाम लिखने की परम्परा है। नाम के साथ शर्मा, गुप्ता, तिवारी, सिंह आदि नहीं लिखा जाता। अन्य पत्रों में पूरा नाम लिखते हैं। व्यापारिक एवं आधिकारिक पत्रों एवं आवेदन-पत्रों में तो पूरा नाम अवश्य ही लिखा जाना चाहिए।

(8) पता-निजी पत्र के अन्त में पता नहीं लिखा जाता। अन्य पत्रों के अन्त में पता लिखा जाता है। पता ऊपर बताये अनुसार ही लिखें।

विभिन्न प्रकार के पत्रों में प्रयोग किये जाने वाले सम्बोधन, निवेदन आदि।
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यहाँ पर अभ्यास हेतु आवेदन-पत्रों, स्थानीय निकाय से सम्बन्धित पत्रों एवं सम्पादक के नाम पत्रों (अपनी रचना प्रकाशन हेतु, समसामयिक विषयों पर परिचर्चा तथा समसामयिक समस्याओं के समाधान हेतु पत्र) के कुछ उदाहरण दिये जा रहे हैं। इनके आधार पर विद्यार्थियों को पत्र-लेखन का अभ्यास करना चाहिए, जिससे वे इस कला में पारंगत हो सकें।

1. आवेदन-पत्र

प्रश्न 1.
किसी महाविद्यालय में व्याख्याता पद के लिए आवेदन-पत्र दीजिए।
उत्तर-
सेवा में,
प्राचार्य,
महात्मा गाँधी महाविद्यालय,
सागर (म.प्र)।

विषय : हिन्दी व्याख्याता पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन-पत्र।

मान्यवर,
दैनिक ‘नवभारत’ में दिनांक 11-4-20….. के अंक में प्रकाशित विज्ञापन के सन्दर्भ में आपके महाविद्यालय में हिन्दी व्याख्याता के रिक्त स्थान के लिए मैं आपकी सेवा में यह आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मैंने सागर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है तथा विश्वविद्यालय की योग्यता-सूची में मुझे द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। इसी विश्वविद्यालय से मैंने पी-एच.डी.की उपाधि प्राप्त की है। मेरे शोध प्रबन्ध का विषय है—’नयी कविता के सन्दर्भ में मुक्तिबोध के काव्य का समग्र मूल्यांकन।’

मैं गत तीन वर्षों से जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय, जगदलपुर में हिन्दी व्याख्याता के पद पर कार्य कर रहा हूँ। यह स्थान मेरे गृह-नगर से अत्यधिक दूर है। अपनी पारिवारिक कठिनाइयों के कारण मैं सागर में ही कार्य करने का आकांक्षी हूँ।

मुझे विश्वास है कि मेरी शैक्षिक योग्यताएँ तथा अनुभव पर विचार करते हुए आप मुझे सेवा करने का अवसर प्रदान कर अनुग्रहीत करेंगे।

भवदीय
डॉ.सुरेन्द्र मोहन
50, इतवारी हिल्स, सागर (म.प्र)

दिनांक : 15-4-20….

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प्रश्न 2.
जिला शिक्षा अधिकारी को उसके अधीन सहायक शिक्षक के रिक्त पद पर नियुक्त किये जाने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
सेवा में,
जिला शिक्षा अधिकारी,
रायपुर (छत्तीसगढ़)।

विषय : सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
दैनिक भास्कर’ में दिनांक 10-5-20…. को प्रकाशित विज्ञापन के सन्दर्भ में आपके अधीनस्थ सहायक शिक्षक पद के रिक्त स्थान पर नियुक्ति हेतु यह आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रहा मैंने वर्ष 20…. में रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से बी.ए. की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में 54% अंक प्राप्त कर उत्तीर्ण की है।

मैंने वर्ष 20…. में बी.टी.सी. की परीक्षा उत्तीर्ण की है। मैं 23 वर्ष का एक स्वस्थ युवक हूँ तथा स्काउटिंग, रेडक्रास तथा प्राथमिक चिकित्सा में मैंने अनेक प्रमाण-पत्र प्राप्त किये हैं।

मुझे विश्वास है कि आप अपने अधीन सहायक शिक्षक पद पर मुझे नियुक्त कर सेवा करने का अवसर प्रदान कर अनुग्रहीत करेंगे।

भवदीय
जगदीश कुमार सिंह
363, मालवीय नगर,रायपुर

दिनांक : 17-5-20….

प्रश्न 3.
अपने विद्यालय के प्रधानाध्यापक को निर्धन छात्र कोष से छात्रवृत्ति हेतु आवेदन-पत्र लिखिए। (2009, 12)
उत्तर-
सेवा में,
प्रधानाध्यापक,
महात्मा गाँधी विद्यालय,
रीवा।

विषय : निर्धन छात्र कोष से छात्रवृत्ति हेतु आवेदन-पत्र। महोदय,
आ है कि इस वर्ष विद्यालय द्वारा कक्षा 12 में पढ़ रहे कुछ निर्धन एवं मेधावी छात्रों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जायेंगी। इस सन्दर्भ में, मैं आपकी सेवा में अपना यह आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मैंने वर्ष 20…. में माध्यमिक शिक्षा मण्डल,मध्य प्रदेश की हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की तथा विज्ञान तथा गणित विषयों में मैंने 80% से अधिक अंक प्राप्त किये हैं। कक्षा 11 की वार्षिक परीक्षा में मैंने अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। मैं विद्यालय की ओर से जनपदीय क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में सक्रिय भाग लेता रहा हूँ।

मैं एक सामान्य कृषक परिवार से सम्बन्ध रखता हूँ। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मुझे पढ़ाने में मेरे पिताजी को कठिनाई हो रही है।

मुझे आशा है कि आप मेरे आवेदन-पत्र पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए छात्रवृत्ति प्रदान करने की महती कृपा करेंगे। इसके लिए मैं आपका आजीवन ऋणी रहूँगा।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
राकेश मोहन तिवारी
कक्षा 12 (ब)

दिनांक : 10-7-20……

प्रश्न 4.
अपने विद्यालय के प्राचार्य को विद्यालय में खेलों की समुचित व्यवस्था तथा पर्याप्त खेल-सामग्री उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
उत्तर-
सेवा में,
श्रीमान् प्राचार्य,
महात्मा गाँधी उच्च माध्यमिक विद्यालय,
इन्दौर (म.प्र)।

विषय : विद्यालय में खेलों की समुचित व्यवस्था तथा पर्याप्त खेल-सामग्री उपलब्ध कराने हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
विनम्र निवेदन है कि हमारे विद्यालय में खेलों की व्यवस्था का हाल वर्तमान में काफी खराब है। न तो विद्यार्थी संख्या के अनुपात में खेल-सामग्री विद्यालय में मौजूद है और न ही विभिन्न खेलों के नियमित प्रशिक्षण की ही कोई व्यवस्था है। साथ ही, विद्यालय के शैक्षिक कैलेण्डर में भी खेलों के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका दुष्परिणाम यह है कि विद्यार्थियों की खेल प्रतिभा का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है जबकि विद्यार्थी जीवन में खेलों के महत्व से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं।

अतएव आपसे नम्र प्रार्थना है कि आप अपने स्तर से क्रीडाध्यापक महोदय को आवश्यक निर्देश देते हुए विद्यालय में खेलों की समुचित व्यवस्था तथा पर्याप्त खेल-सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कहें। आपकी अति कृपा होगी।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
प्रवेश सोलंकी
कक्षा 12 (अ)

दिनांक : 10-8-20…….

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प्रश्न 5.
सचिव माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म.प्र., भोपाल को कक्षा 12वीं की अंक-सूची की द्वितीय प्रति भेजने के सम्बन्ध में आवेदन-पत्र लिखिए। (2009, 11, 15, 17)
उत्तर-
सेवा में,
सचिव, माध्यमिक शिक्षा मण्डल,म.प्र.,
भोपाल।

विषय : अंक-सूची की द्वितीय प्रति भेजने के सम्बन्ध में।

महोदय,
मेरी 12वीं परीक्षा 20….. की अंक-सूची खो गयी है। अतः मुझे द्वितीय प्रति भेजने का कष्ट करें। इसके लिए मैं 20 रुपये का बैंक ड्राफ्ट नं.37701 आपके नाम से भेज रहा हूँ।

मुझसे सम्बन्धित जानकारी निम्नानुसार है-
MP Board Class 12th Special Hindi पत्र-लेखन img-3

दिनांक : 17 जुलाई,20…..

विनीत
रवीन्द्र मोहन

प्रश्न 6.
पिता के स्थानान्तरण होने पर प्राचार्य को शाला त्याग-प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
सेवा में,
प्राचार्य,
आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय,
टी.टी. नगर, भोपाल (म.प्र)।

विषय : शाला स्थानान्तरण-प्रमाण-पत्र (टी.सी) प्राप्त करने विषयक।

महोदय,
निवेदन है कि मेरे पिता का स्थानान्तरण भोपाल से छिंदवाड़ा हो गया है। अतः अब मैं वहीं पर अध्ययन करूँगा। आपसे प्रार्थना है कि मेरी शाला स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र शीघ्र देने की कृपा करें। मुझसे सम्बन्धित विवरण निम्नानुसार हैं
नाम : राजीव माथुर
पिता का नाम : श्री चन्द्रमोहन माथुर
कक्षा एवं वर्ग : 12 ‘ब’
प्रवेश वर्ष एवं कक्षा : 20….., 11वीं

दिनांक : 12-2-20…..

भवदीय
राजीव माथुर
7, हर्ष नगर,
भोपाल

प्रश्न 7.
अपने विद्यालय के प्राचार्य को चरित्र प्रमाण-पत्र प्रदान करने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए। [2010]
उत्तर-
सेवा में,
प्राचार्य, महात्मा गाँधी उच्च माध्यमिक विद्यालय
विदिशा (म.प्र)।

विषय : चरित्र प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
निवेदन है कि मेरा चयन पी.एम.टी. में हो गया है। प्रवेश के लिए आवश्यक कागजों में मुझे अन्तिम संस्था प्रमुख का चरित्र प्रमाण-पत्र लगाना आवश्यक है। मैंने इसी वर्ष आपके विद्यालय से 12वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है। मेरा विस्तृत विवरण निम्नवत् है
नाम : संजय कुमार
कक्षा : 12 (स)
पिता का नाम : नीरज कुमार
छात्र रजिस्टर संख्या : 10/239

मैं कक्षा 6 से ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता रहा हूँ। खेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं अन्य पाठ्य-सहगामी क्रिया-कलापों में भी मैं बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता रहा हूँ और कई पुरस्कार जीतता रहा हूँ। मैंने सदैव अपने गुरुजनों,साथियों एवं विद्यालय के अन्य कर्मचारियों के साथ सम्मानित एवं भद्र व्यवहार किया है। मैं विद्यालय का एक अनुशासित छात्र रहा हूँ।

कृपया मुझे चरित्र प्रमाण-पत्र प्रदान करने की कृपा करें।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
संजय कुमार
75, मालवीय कुंज, विदिशा

दिनांक : 13-06-20…..

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प्रश्न 8.
उत्तर-पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन हेतु सचिव, माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म. प्र., भोपाल को आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 12, 14, 16]
उत्तर-
सेवा में,
सचिव,
माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म.प्र., भोपाल

विषय-उत्तर-पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन के सन्दर्भ में।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैंने हाल ही में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भोपाल से कक्षा 10वीं की परीक्षा अनुक्रमांक 30708 के साथ अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की है किन्तु अंग्रेजी विषय में आशानुरूप अंक न आने के कारण मैं प्रथम श्रेणी नहीं पा सका हूँ। मेरी अंग्रेजी की परीक्षा काफी अच्छी हुई थी और मैंने शत-प्रतिशत प्रश्न हल किये थे। मेरे आंकलन के अनुसार मेरे कम-से-कम 90-95 अंक आने चाहिये थे, जबकि आये हैं मात्र 42.

अतः श्रीमान जी से विनम्र प्रार्थना है कि वे प्रार्थी की अंग्रेजी विषय की उत्तर-पुस्तिका खुलवाने व उसका पुनर्मूल्यांकन करवाने की व्यवस्था करें। आपकी अति कृपा होगी।

प्रार्थी
सौरभ सिंह
44, गाँधी कॉलोनी,
भोपाल

2. स्थानीय निकाय से सम्बन्धित
पत्र (शिकायती-पत्र)

शिकायती-पत्र साधारण जनता की ओर से सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों को लिखे जाते हैं। इसमें उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की शिकायत की जाती है। यहाँ पर नमूने के लिए कुछ पत्र दिये जा रहे हैं।

प्रश्न 1.
नगर निगम अध्यक्ष को शिकायती पत्र लिखिए, जिसमें मोहल्ले की नियमित सफाई न होने की बात कही गई हो। [2017]
उत्तर-
सेवा में,
अध्यक्ष,
नगर निगम, इंदौर।

विषय : मोहल्ले की सफाई के सम्बन्ध में।

महोदय,
निवेदन है कि मैं वार्ड क्रमांक चार का निवासी हूँ। इस मोहल्ले में सफाई का कार्य पूरीसरह से उपेक्षित है। नगर निगम के सफाई कर्मचारी 15 दिन में एक बार इस वार्ड में आते हैं। शेष दिनों में कूड़ा-कचरा गलियों तथा सड़कों पर बिखरा रहता है। इस मोहल्ले में नालियों की सफाई भी नियमित नहीं होती जिसके कारण मच्छरों के प्रकोप से बीमारियाँ फैलने का डर है। साथ ही स्थान- स्थान पर कूड़ा-कचरा फैला रहने से मोहल्ले की स्थिति नारकीय हो गई है।

आपसे विनम्र निवेदन है कि आप स्वयं इस मोहल्ले का निरीक्षण करें तथा सार्वजनिक हित में आप नगर निगम के कर्मचारियों को इस मोहल्ले की नियमित सफाई करने का निर्देश दें क्योंकि सफाई की उपेक्षा से मोहल्लेवासियों को बहुत कष्ट है तथा सफाई की समुचित व्यवस्था न होने पर वे आन्दोलन प्रारम्भ कर सकते हैं। कृपया इस शिकायत को प्राथमिकता के आधार पर निराकरण कराने का कष्ट करें। आपका अति आभारी रहूँगा।

भवदीय
रमेश साहू
54- शुभ कॉलोनी, इंदौर

दिनांक : 17 मार्च,20……

प्रश्न 2.
अपने नगर के पोस्ट मास्टर को मनीआर्डर न मिलने की शिकायत कीजिए।
उत्तर-
सेवा में,
पोस्ट मास्टर,
हैड पोस्ट ऑफिस,
होशंगाबाद।

विषय : मनीआर्डर न मिलने की शिकायत।

महोदय,
निवेदन है कि मैंने 20 अगस्त,20….. को 101:00 रुपये का मनीआर्डर अपनी बड़ी बहन श्रीमती आशारानी,54, सातवीं लाइन,इटारसी को भेजा था, जिसका रसीद क्रमांक 3370 है। यह मनीआर्डरदो माह बीत जाने पर भी उनको नहीं मिला। ऐसा लगता है कि आपके पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी की लापरवाही से वह मनीआर्डर खो गया है। रसीद मेरे पास सुरक्षित है। कृपया आप इस सम्बन्ध में छानबीन कीजिए अन्यथा जनता को पोस्ट ऑफिस की कार्य-प्रणाली पर सन्देह होगा। आप मनीआर्डर का भुगतान उपर्युक्त पते पर करायें,अथवा राशि मुझे लौटाने का कष्ट करें।

भवदीय
विष्णुकान्त तिवारी
नर्मदा मन्दिर मार्ग होशंगाबाद

दिनांक : 22-10-20…..

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प्रश्न 3.
परीक्षाकाल में ध्वनि विस्तारक यन्त्र (लाउडस्पीकर) के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु जिलाधीश को पत्र लिखिए। [2009, 15]
उत्तर-
सेवा में,
जिलाधीश,
उज्जैन (म.प्र)।

विषय : परीक्षा-अवधि में ध्वनि विस्तारक यन्त्र (लाउडस्पीकर) पर प्रतिबन्ध लगाने के सम्बन्ध में।

महोदय.
निवेदन है कि माध्यमिक शिक्षा मण्डल की परीक्षाओं का समय निकट है। हम छात्र अपने अध्ययन में व्यस्त हैं,परन्तु जगह-जगह लाउडस्पीकरों की आवाजों से हमारे अध्ययन में व्यवधान पड़ता है। इसके पूर्व महाविद्यालयों के छात्रों ने आपको एक प्रार्थना-पत्र इसी सम्बन्ध में दिया है। धार्मिक कार्यक्रमों,सभा और दुकानों पर निर्बाध रूप से लाउडस्पीकर बजाये जा रहे हैं। इससे ध्वनि-प्रदूषण होता है और हम एकाग्रचित्त होकर अध्ययन नहीं कर सकते। अतः नगर के हजारों छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए शीघ्रातिशीघ्र ध्वनि विस्तारक यन्त्रों के परीक्षा-अवधि में प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाने सम्बन्धी आदेश जारी करें। आपकी अति कृपा होगी।

भवदीय
राजेश रावल
अध्यक्ष, छात्रसंघ
शास.बालक उ.मा.शाला, उज्जैन

दिनांक : 10 मार्च,20….

प्रश्न 4.
शिवपुरी के पोस्ट मास्टर को एक पत्र लिखकर कमलागंज मुहल्ले के डाकिए (पोस्टमैन) द्वारा नियमित डाक वितरण नहीं किये जाने की शिकायत कीजिए।
उत्तर-
सेवा में,
पोस्ट मास्टर, हैड पोस्ट ऑफिस,
शिवपुरी (म.प्र)।

विषय : कमलागंज मुहल्ले में डाक-वितरण की अनियमितता के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि मेरे मुहल्ले कमलागंज में क्षेत्र के पोस्टमैन द्वारा डाक का वितरण नियमित रूप से नहीं किया जा रहा है। इससे मुहल्लावासियों को अत्यधिक परेशानी हो रही है। आवश्यक पत्र देर से मिलने के कारण कभी-कभी बहुत नुकसान भी हो जाता है।

आशा है कि आप मुहल्लावासियों की परेशानी पर ध्यान देते हुए क्षेत्र के पोस्टमैन को . नियमित रूप से डाक वितरण किये जाने का निर्देश देंगे। आपकी अति कृपा होगी।

भवदीय
हरिशंकर वर्मा
105, कमलागंज, शिवपुरी

दिनांक : 15-2-20…..

प्रश्न 5.
नगरपालिका अध्यक्ष को जल की अनियमित पूर्ति के सम्बन्ध में शिकायती-पत्र लिखिए। [2013]
उत्तर-
सेवा में.
नगरपालिका अध्यक्ष,
सागर।

विषय : नगर में जल की अनियमित आपूर्ति के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान नगर की जल आपूर्ति की समस्या की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। गर्मी के इस मौसम में जबकि पानी की अधिक आवश्यकता होती है,नगर की जल आपूर्ति प्रायः ठप्प रहती है। प्रातः तथा सायं केवल एक-दो घण्टे ही नलों में पानी आता है तथा दबाव इतना कम होता है कि ऊँचे स्थानों पर रहने वालों को पानी मिल ही नहीं पाता। अनेक बार इस सम्बन्ध में पूर्व में भी अधिकारियों को लिखा गया, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। कृपया इस बार हमें निराश मत कीजिएगा। आपका आभारी रहूँगा।

भवदीय
नरेन्द्र कुमार
इतवारी बाजार, सागर

दिनांक : 15-5-20……

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प्रश्न 6.
नगर पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर सूचित कीजिए कि आपके मोहल्ले में चोरी की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, पुलिस गश्त बढ़ाई जाये। [2009, 11, 14]
उत्तर-
नगर पुलिस अधीक्षक,
ग्वालियर।

विषय : तानसेन नगर में चोरी की घटनाओं में वृद्धि के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान नवविकसित कॉलोनी तानसेन नगर में चोरी की घटनाओं की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। गत एक पखवाड़े से इस कॉलोनी में चोरी की अनेक घटनाएँ घट चुकी हैं तथा घटनाओं में कमी के स्थान पर निरन्तर वृद्धि ही होती जा रही है। इस कारण से कॉलोनी निवासी भय से त्रस्त हैं। चोरी की घटनाओं ने उनका रात-दिन का चैन छीन लिया है। . अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि कॉलोनी में रात्रिकालीन पुलिस गश्त को और अधिक सक्रिय बनाया जाये तथा पुलिसकर्मियों की पर्याप्त संख्या में तैनाती की जाये, जिससे हम नागरिक निश्चिन्त होकर अपना जीवन-यापन कर सकें।

भवदीय
पवन कुमार बंसल
सचिव, तानसेन नगर आवासीय संघ, ग्वालियर

दिनांक : 15 मार्च,20….

प्रश्न 7.
अपने जिले के जिलाधिकारी को अपने क्षेत्र में सिंचाई-सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए एक आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
सेवा में,
जिलाधिकारी,
रीवा।

विषय : सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान जनपद के ग्रामीण क्षेत्र की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। चित्रकूट धार्मिक क्षेत्र होने के कारण पूरे देश में जितना प्रसिद्ध है,उतना ही आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में कृषि ही लोगों की आजीविका का एकमात्र साधन है, लेकिन सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएँ न होने के कारण यह क्षेत्र कृषि में पिछड़ा हुआ है। क्षेत्र में यदि छोटे-छोटे बाँध तथा बड़े जलाशयों का निर्माण करके सिंचाई की अतिरिक्त सुविधाएँ उपलब्ध करा दी जायें तो इस क्षेत्र में कृषि की बहुत उन्नति होगी। इससे किसानों के साथ-साथ सरकार को भी राजस्व वृद्धि का लाभ प्राप्त होगा।

अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि आप जिला योजना मण्डल तथा सिंचाई विभाग के अधिकारियों को क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं में विस्तार करने के सम्बन्ध में आवश्यक कार्यवाही प्रारम्भ करने का निर्देश प्रदान कर अनुगृहीत करें।

भवदीय
राजीव नारायण तिवारी
ग्राम सिबरी,तहसील रीवा

दिनांक : 23-1-20…..

3. सम्पादक के नाम पत्र

इन पत्रों के अन्तर्गत किसी समाचार-पत्र अथवा पत्रिका के सम्पादक को अपनी रचना प्रकाशन हेतु, समसामयिक विषयों पर परिचर्चा हेतु, समसामयिक समस्याओं के समाधान हेतु, किसी विषय पर जनता को अपने विचारों से अवगत कराने हेतु,खेलों पर अपनी राय प्रकट करने हेतु,टिप्पणी या आलोचना करने हेतु अथवा फिल्म या फिल्म जगत के लोगों के बारे में जानकारी देने हेतु पत्र लिखे जाते हैं।

यहाँ नमूने के लिए कुछ पत्र दिये गये हैं

प्रश्न 1.
स्थानीय समाचार-पत्र के सम्पादक को एक पत्र लिखिए जिसमें उनसे अपनी रचना के प्रकाशन हेतु निवेदन किया गया हो।
उत्तर-
सेवा में,
सम्पादक,
दैनिक नवभारत,
भोपाल (म.प्र)।

विषय : रचना के प्रकाशन के सम्बन्ध में।

महोदय,
आपके प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के माध्यम से मैं समाज में व्याप्त नारी की दुर्दशा पर एक लेख भेज रहा हूँ। आशा है आप इसे प्रकाशित करने की कृपा करेंगे।

धन्यवाद सहित,
दिनांक : 20-05-20….

भवदीय
संजय कुमार सीठा
महाराणा प्रताप नगर, भोपाल

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प्रश्न 2.
किसी स्थानीय समाचार-पत्र के सम्पादक को ‘सम्पादक के नाम पत्र’ कॉलम में प्रकाशन हेतु एक पत्र लिखिये जिसमें बिजली संकट से उत्पन्न कठिनाइयों का वर्णन करते हुए क्षेत्र के प्रभारी मन्त्री से समस्या के निदान हेतु शीघ्र कार्यवाही किये जाने का निवेदन किया गया हो।
उत्तर-
सेवा में,
सम्पादक, दैनिक भास्कर,
भोपाल (म.प्र)।

विषय : बिजली संकट से उत्पन्न कठिनाइयों के सन्दर्भ में।

महोदय,
मैं आपके प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के लोकप्रिय कॉलम ‘सम्पादक के नाम पत्र के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभारी मन्त्री के संज्ञान में यह लाना चाहता हूँ कि तानसेन नगर, भोपाल में बिजली प्रायः गुल रहती है। गर्मी के भीषण मौसम में दिनचर्या को सुचारु रूप से चलाना भी अत्यन्त दुष्कर है। अनेक बार क्षेत्रीय अभियन्ता से शिकायत की जा चुकी है लेकिन परिणाम शून्य है।
अत: मन्त्री जी से सानुरोध प्रार्थना है कि जनता की परेशानी को ध्यान में रखकर सम्बन्धित अधिकारियों को उचित निर्देश देने की कृपा करें।

सधन्यवाद,
दिनांक : 12-09-20….

भवदीय
कनिष्क
तानसेन नगर, भोपाल

प्रश्न 3.
किसी समाचार-पत्र के सम्पादक को ‘सम्पादक के नाम पत्र’ कॉलम में प्रकाशन हेतु एक पत्र लिखिए जिसमें शासकीय चिकित्सालय में निर्धन रोगियों के प्रति हो रही उपेक्षा को लेकर क्षेत्र के प्रभारी सचिव से शिकायत दर्ज की गई हो तथा उनसे इस समस्या के शीघ्रताशीघ्र निवारण हेतु निवेदन किया गया हो।
उत्तर-
सेवा में,
सम्पादक, हिन्दुस्तान,
भोपाल (म.प्र)।

विषय : निर्धन रोगियों के प्रति हो रही उपेक्षा के सन्दर्भ में।

महोदय,
मैं आपके प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के लोकप्रिय कॉलम ‘सम्पादक के नाम पत्र’ के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभारी सचिव, शासकीय चिकित्सालय, भोपाल (म.प्र) के संज्ञान में यह लाना चाहता हूँ कि शासकीय चिकित्सालय, भोपाल में निर्धन रोगियों की चिकित्सा की उपेक्षा की जाती है। उन्हें यथा-समय कोई भी सम्बन्धित चिकित्सक देखने नहीं आता है और न ही उन्हें उचित एवं आवश्यक औषधियाँ ही प्रदान की जाती हैं।

आपसे विनम्र अनुरोध है कि उचित एवं त्वरित कार्यवाही करते हुए कृपया शीघ्रताशीघ्र पीड़ित रोगियों को पर्याप्त चिकित्सा-सेवा व देखभाल सुनिश्चित करने का कष्ट करें।

सधन्यवाद,
दिनांक 15-12-20….

भवदीय
मोहन राव, अरेरा कॉलोनी,
भोपाल

विविध पत्र

प्रश्न 1.
आपके मित्र की रचना विद्यालय की वार्षिक पत्रिका में प्रकाशित हुई है। अतएव उसे बधाई देते हुए पत्र लिखिए तथा प्रकाशित रचना की एक प्रति भेजने का भी अनुरोध कीजिए। [2010]
उत्तर-
10/105, राष्ट्रीय नगर,
हरदा (म.प्र)।

प्रिय मित्र किशोर,
सप्रेम प्रणाम।
विद्यालय की वार्षिक पत्रिका ‘वाणी’ में तुम्हारी रचना ‘राष्ट्र-दीप’ के प्रकाशित होने का समाचार सुनकर मुझे आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई। वास्तव में,मुझे तुम्हारी इस प्रतिभा का भान ही नहीं था। इस हेतु मेरी बधाई स्वीकार करो। साथ ही, मैं तुम्हारी उक्त कविता को पढ़ने के लिए बेहद उत्सुक हूँ, इसलिए कृपया मुझे उसकी एक प्रति भेज देना। माताजी व पिताजी को चरण स्पर्श व भावना को स्नेह।

तुम्हारा
कपिल वाष्र्णेय

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प्रश्न 2.
अपने बड़े भाई के विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिए मित्र को निमन्त्रण-पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर-
26, माधव कुंज,
धार।
10 जनवरी,20…..

प्रिय मित्र संतोष,
सस्नेह नमस्कार,
शुभ समाचार यह है कि मेरे बड़े भैया हर्ष कुमार का शुभ विवाह दिनांक 20 जनवरी, 20….. को होना निश्चित हुआ है। तुम तो जानते ही हो कि ऐसे शुभ अवसर पर तुम्हारा आगमन मेरे लिए कितना सुखद और आनन्ददायक होगा। तुम्हें इस विवाह में कम से कम चार दिन पूर्व जरूर आना होगा। पत्र के साथ निमन्त्रण-पत्र संलग्न है। तुम्हें प्रत्येक कार्यक्रम में शामिल होना है। मुझे तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा रहेगी।

पिताजी और माताजी को चरण स्पर्श एवं छोटू को बहुत-सा प्यार।

तुम्हारा अभिन्न
जितेन्द्र कुमार

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MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

11. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ [2017]

  • जीवन परिचय

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का काव्य राष्ट्रीय चेतना और जनजागृति का काव्य है। इन्होंने जहाँ परतन्त्र भारत के सोते हुए लोगों को जगाने का काम किया वहीं मानवीय भावना से ओतप्रोत प्रेमाकुल काव्य की रचना भी की। इन्होंने वीर एवं श्रृंगार दोनों में समान रूप से लिखकर हिन्दी काव्य को अमर रचनाएँ प्रदान की।

राष्ट्रवादी चिन्तक, जुझारु पत्रकार एवं ओजस्वी कवि पंडित बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जन्म सन् 1897 ई. में शाजापुर जिले के शुजालपुर के मयाना गाँव में हुआ था। इन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के सानिध्य में पत्रकारिता और महात्मा गाँधी के सम्पर्क में गाँधीवादी विचारों को अपनाया। नवीनजी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी, साथ ही भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और नवयुवकों को प्रेरणा देने वाली ओजस्वी रचनाओं को भी लिखते रहे। इन्होंने प्रेम व श्रृंगारपरक गीत भी लिखे। नवीनजी भारतीय संविधान निर्मात्री परिषद के सदस्य भी रहे। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का पद दिलाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1952 से 1960 ई. तक ये संसद सदस्य भी रहे। 1960 में भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। सन् 1960 में हृदय गति रुक जाने से इनका देहावसान हो गया।

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  • साहित्य सेवा

नवीनजी ने अपना साहित्यिक जीवन पत्रकारिता से प्रारम्भ किया। गणेशशंकर विद्यार्थी के सम्पर्क में आने के बाद ‘प्रताप के प्रधान सम्पादक बने। राष्ट्रीय स्वर को प्रधानता देने वाली पत्रिका ‘प्रभा’ के भी ये सम्पादक रहे। इन्होंने प्रेम, श्रृंगार, राष्ट्रीय भावना, भारतीय संस्कृति, भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन आदि विषयों पर ओजस्वी रचनाएँ लिखीं। प्रकृति के विभिन्न रूपों के चित्रण के साथ उनके काव्य में रहस्यवादी भावना के दर्शन भी होते हैं।

  • रचनाएँ
  1. उर्मिला इसमें उर्मिला के जन्म से लेकर लक्ष्मण से पुनर्मिलन तक की कथा वर्णित है। इस काव्य में उर्मिला का विरह वर्णन बड़ा ही मार्मिक है।
  2. रश्मि रेखा-प्रेम, कला तथा संवेदना की दृष्टि से यह उत्कृष्ट काव्य है।
  3. कुंकुम इस गीत संग्रह में यौवन और प्रखर राष्ट्रीयता का स्वर मुखरित है।
  4. अपलक, क्वासि इनमें प्रेम और भक्ति से पूर्ण कविताएँ संकलित हैं।
  5. प्राणार्पण यह गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान पर लिखा गया खण्डकाव्य है।
  6. विनोवा स्तवन-इसमें विनोवा भावे के भूदान यज्ञ की प्रशस्ति में लिखे गये पद हैं।
  • भाव-पक्ष
  1. देश-प्रेम की भावना-इनकी कविताओं में देश-प्रेम की भावना उत्कृष्ट रूप से उजागर हुई है।
  2. क्रान्ति भावना-नवीन जी की कविताओं में स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में भोगे हुए अनुभव जीवन्त हैं और उनसे उपजे जागृति के स्वर भी मुखर हैं।
  3. प्रेम व भक्ति-भावना-देश-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना से स्फूर्त होने के परिणामस्वरूप रचनाओं में ओज प्रखर है तो प्रेम प्रवण अभिव्यक्ति में कोमलता निहित है। प्रेमाकुल संवेदनाएँ मानवीय भावनाओं से सराबोर हैं।
  • कला पक्ष
  1. भाषा शैली-नवीनजी की तत्सम शब्द प्रधान भावानुकूल भाषा है। इनकी शैली ओजपूर्ण एवं प्रबन्ध है।
  2. छन्द योजना-भावों के अनुकूल छन्द योजना उत्कृष्ट बन पड़ी है।
  3. प्रकृति चित्रण-प्रकृति के विविध रूप यत्र-तत्र दृष्टव्य हैं।
  • साहित्य में स्थान

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के काव्य में राष्ट्र प्रेम.मानव प्रेम.लौकिक प्रेम तथा अलौकिक प्रेम का प्रस्फुटन एक साथ हुआ है। नवीनजी छायावाद के समानान्तर बहने वाली प्रेम और श्रृंगार की धारा के कवि हैं। इनका अधिकांश काव्य मानवता तथा राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है,जिसके कारण हिन्दी साहित्य में इनको सम्माननीय स्थान प्राप्त है।

12. श्रीकृष्ण सरल [2015]

  • जीवन परिचय

श्रीकृष्ण सरल का जन्म 9 जून, 1921 ई. को मध्यप्रदेश के अशोक नगर में हुआ था। बचपन से ही ये कविताएँ लिखने लगे थे। यद्यपि उन्होंने गद्य की सभी विधाओं में लिखा है, फिर भी मूल रूप से वह कवि थे।

इनके हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति अनुराग था। प्रमुख क्रान्तिकारियों के ऊपर इन्होंने महाकाव्य लिखे। देश-भक्ति की भावना से ओतप्रोत सरलजी ने देश-भक्तों को ही लेखन का केन्द्र बनाया। उनकी ‘क्रान्ति कथाएँ’ भारतीय क्रान्तिकारियों की ‘एनसाइक्लोपीडिया’ है जिसमें लगभग दो हजार क्रान्तिकारियों के जीवन-वृत्तान्त सम्मिलित हैं। गद्य के क्षेत्र में इन्होंने कहानियाँ, उपन्यास,एकांकी,जीवनियाँ और निबन्ध लिखे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर इन्होंने पन्द्रह ग्रन्थों का प्रणयन किया। उनका कार्यस्थल उज्जैन रहा। इन्होंने बी. ए. तक शिक्षा प्राप्त की। फिर अध्यापन का कार्य किया। सरलजी का देहान्त 2 सितम्बर,2000 ई.को उज्जैन में हुआ।

  • साहित्य सेवा

सरलजी का लेखन इतिहास जैसा प्रामाणिक और शोधपूर्ण है। लेखन के लिए इन्होंने देश के भीतर और देश के बाहर अनेक यात्राएँ की। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित था। उन्होंने स्वयं लिखा है

“कर्त्तव्य राष्ट्र के लिए समर्पित हों अपने,
हो इसी दिशा में उत्प्रेरित चिन्तन धारा,
हर धड़कन में हो राष्ट्र, राष्ट्र हो साँसों में,
हो राष्ट्र-समर्पित मरण और जीवन सारा।”

  • रचनाएँ
  1. महाकाव्य-शहीद भगतसिंह, अजेय सेनानी चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र, जय सुभाष,शहीद अशफाक उल्ला खाँ,विवेक श्री, स्वराज तिलक,क्रान्ति ज्वाला,बागी कर्तार।
  2. गद्य रचनाएँ–’कालजयी सुभाष’,क्रान्ति कथाएँ।
  3. कविताएँ-आँसू,छोड़ो लीक पुरानी,जवानी खुद अपनी पहचान, देश के सपने फूलें फलें,देश से प्यार, धरा की माटी बहुत महान, नेतृत्व,प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है,पीड़ा का आनन्द, प्रेम की पावन धारा,मत ठहरो, मुझमें ज्योति और जीवन है, वीर की तरह,शहीद,सैनिक।
  • भाव पक्ष
  1. देश-विदेश भ्रमण के बाद उन अनुभूतियों को अपने काव्य में मूर्तिरूप प्रदान किया।
  2. राष्ट्रवाद एवं क्रान्तिकारी भावों का अपने काव्य में प्रणयन किया।
  3. राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति सरल जी का हृदय राष्ट्र-प्रेम की भावनाओं से भरपूर था। क्रान्तिकारियों के प्रति इनके हृदय का अनुराग इनके काव्य में परिलक्षित होता है।
  4. कर्त्तव्य और भारतीय संस्कृति में रुचि इनकी अपने कर्त्तव्य और भारतीय संस्कृति में आस्था थी,जो काव्य के रूप में प्रकट हुई। एक उदाहरण देखिए

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“कर्त्तव्य राष्ट्र के लिए समर्पित हों अपने,
हो इसी दिशा में उत्प्रेरित चिन्तन धारा।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा-सरल जी की भाषा ओजपूर्ण है। देश के प्रति अथाह प्रेम इनकी भाषा में देखने को मिलता है। गद्य और पद्य दोनों में इन्होंने अपनी लेखनी चलाई है। भाषा शुद्ध एवं परिमार्जित है।
  2. अलंकार योजना यथास्थान इन्होंने अलंकारों का प्रयोग भी किया है। वह अनूठा बन पड़ा है। प्रतीकों के माध्यम से अपने भावों को पाठकों तक पहुँचाया है।
  3. रस योजना-सरलजी ने प्राय: वीर रस को ही अपनाया है। इनकी कविताएँ वीर रस में डूबी हुई हैं और ओजस्वी भाषा में नवयुवकों को प्रेरणा दे रही हैं। एक उदाहरण देखिए राष्ट्र के श्रृंगार ! मेरे देश के साकार सपनो ! देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना। जिन शहीदों के लहू से लहलहाया चमन अपना उन वतन के लाड़लों की याद तुम मुझाने न देना।
  • साहित्य में स्थान

श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने अपने क्रान्तिकारी लेखन से विश्व में कीर्तिमान स्थापित किया। ‘सरल जी’ का लेखन इतिहास जैसा प्रामाणिक और शोधपूर्ण है। उनकी साहित्य साधना गहन तपस्या थी। राष्ट्र उनकी साँसों में बसता था। यद्यपि इन्होंने गद्य की सभी विधाओं में लिखा है, फिर भी मूल रूप से वह कवि थे। अपनी उत्कृष्ट सेवा के लिए साहित्य में उनका सम्माननीय स्थान है।

13. गोस्वामी तुलसीदास [2014, 17]

  • जीवन परिचय

गोस्वामी तुलसीदास एक सिद्ध कवि हैं जो देश-काल की सीमाओं से परे हैं। मानव प्रकृति के जिन रूपों का हृदयग्राही वर्णन तुलसी के काव्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र उपलब्ध नहीं। गोस्वामी तुलसीदास का कोई प्रामाणिक जीवन परिचय उपलब्ध नहीं है। उनकी जन्म-तिथि,जन्म-स्थान, माता-पिता और विवाहादि के सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। फिर भी तुलसी के जीवन-वृत्त से सम्बन्धित जो भी सामग्री मिलती है उसके आधार पर कहा जाता है कि उनका जन्म संवत् 1589 वि.में बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में हुआ था। परन्तु कुछ लोग सोरों (एटा) को इनका जन्म स्थान मानते हैं। इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि इनका जन्म अभुक्तमूल नामक अनिष्टकारी नक्षत्र में होने के कारण इनके माता-पिता ने इन्हें जन्म होते ही त्याग दिया था। स्वामी नरहरिदास के सानिध्य में इन्होंने वेद-पुराण एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया। तुलसीदास का विवाह दीनबन्धु पाठक की सुन्दर कन्या रत्नावली के साथ हुआ। किंवदन्ती है कि रलावली के व्यंग्य वाणों से आहत होकर ही तुलसी को संसार और सांसारिक ऐश्वर्यों से विरक्ति हो गई और सब कुछ छोड़कर वह काशी चले गए। वहाँ इन्होंने नाना पुराण निगमागम का गहन अध्यन किया,साथ ही रामकथा कहते रहे। काशी छोड़कर तुलसीदास अयोध्या चले गए और वहीं पर ‘रामचरितमानस’ का प्रणयन किया। तुलसी ने संसार तो त्याग ही दिया था। वे राम के चरित गायन में लग गए और स्वयं को अपने आराध्य राम की भक्ति में समर्पित कर दिया। संवत् 1680 वि.में इस महात्मा ने शरीर के बन्धनों को तोड़ दिया और परमतत्व में विलीन हो गए।

तुलसी के काव्य में प्रेम की उन्मत्तता,उत्कृष्ट वैराग्य,राम की अनन्य भक्ति एवं लोकमंगल की भावना भरी हुई थी।

  • साहित्य सेवा

तुलसी के काव्य में लोकमंगल की भावना परिपूर्ण थी। तुलसी ने राम के लोकमंगलकारी रूप को अपनी लोकपावनी कृतियों के सामने प्रतिष्ठापित किया है। तुलसी ने अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से समाजगत,राजनीतिक, आर्थिक स्थितिपरक तथा विविध जातिगत सम्बन्धों और उनके एकीकरण का अन्यतम प्रयास किया है। प्रत्येक तरह की एवं प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने का तर्कसंगत उपाय तुलसी ने प्रत्येक वर्ग के लिए अपने ही सृजित साहित्य में यथास्थान प्रस्तुत किया है।

  • रचनाएँ

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-दोहावली,कवितावली,रामचरित मानस,विनय पत्रिका,रामाज्ञा प्रश्न, हनुमान बाहुक,रामलला,नहछू,पार्वती मंगल,बरबै रामायण,संदीपनी तथा गीतावली। रामचरित मानस हिन्दी साहित्य का सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य है। सोहर छन्दों में लिखे हुए ‘नहछ’, ‘जानकी मंगल’ और ‘पार्वती मंगल’ अच्छे खण्डकाव्य हैं। ‘गीतावली’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘विनय पत्रिका’ हिन्दी के सर्वोत्तम गीतिकाव्यों में से है। ‘विनय पत्रिका’ हिन्दी के . विनय काव्यों में श्रेष्ठ है। ‘कवितावली’ मुक्तक काव्य परम्परा की उत्कृष्ट रचना है।

  • भाव पक्ष

(1) भक्ति-भावना-तुलसी ‘रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे। धार्मिक दृष्टि से उदार होने का परिचय उन्होंने शिव, दुर्गा, गणेश आदि सभी देवी देवताओं की स्तुति करके दिया है। राम के प्रति तुलसी की भक्ति सेव्य-सेवक भाव की है। राम ही उनका एकमात्र बल, एकमात्र आशा और एकमात्र विश्वास है।
उदाहरण देखिए-

“एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास॥”

(2) समन्वयवादी दृष्टिकोण तुलसी का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक एवं समन्वयवादी था। उन्होंने राम के भक्त होते हुए भी अन्य देवी-देवताओं की वन्दना की। तुलसी की रचनाओं में भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक विचारधारा पूर्णतः दिखाई देती है। वह प्रत्येक धर्म पद्धति को भगवान की प्राप्ति का साधन मानते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय के प्रति तुलसी इतने सचेष्ट थे कि अपने आराध्य राम में भी उन्होंने शक्ति, शील और सौन्दर्य का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है।

(3) दार्शनिक भाव-तुलसी ने अपनी भक्ति का निरूपण यद्यपि दार्शनिक आधार पर किया है, किन्तु उनकी दार्शनिक विचारधारा किसी मत या वाद से परे है। तुलसी की दृष्टि में राम साक्षात् परमब्रह्म हैं। संसार क्षणभंगुर और असत्य है। भवसागर को पार करने के दो ही साधन हैं-ज्ञान और भक्ति। वह ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं मानते-

“ज्ञानहिं भक्तिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव संभव खेदा॥”

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(4) लोकहित की भावना-तुलसीदास की भक्ति लोकमंगल की भावना से प्रेरित है। राम लोकपालक भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे लोकहितकारी मानवता के उच्चतम आदर्श और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। तुलसी के रामराज्य की कल्पना एक आदर्श है। उन्होंने मानवीय सिद्धान्तों पर आधारित समाज और शासन पद्धति के वृहद् स्वरूप को प्रस्तुत किया है।

(5) रससिद्धता तुलसी रससिद्ध कवि थे। उनकी कविताओं में श्रृंगार,शान्त, वीर रसों का समन्वय है। श्रृंगार रस के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का बड़ा ही सजीव निरूपण किया है। रौद्र,करुण, अद्भुत रसों का बड़ा ही सुन्दर वर्णन हुआ है।

  • कला पक्ष

(1) भाषा तुलसी ने अपनी काव्याभिव्यक्ति हेतु उस काल में प्रचलित दोनों प्रमुख भाषाओं ब्रज और अवधी को अपनाया है। तुलसी मुख्य रूप से अवधी भाषा के कवि हैं। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रचुरता है। रामचरित मानस अवधी में तथा कवितावली, गीतावली और विनय पत्रिका ब्रजभाषा में लिखी हैं। उनकी भाषा में सरलता, बोधगम्यता, सौन्दर्य,चमत्कार,प्रसाद,माधुर्य, ओज आदि सभी गुणों का समावेश है।

(2) शैली-तुलसी ने अपने युग में प्रचलित सभी शैलियों में काव्य रचना की। सभी मतों,सम्प्रदायों और सिद्धान्तों की कटुता को मिटाकर उनमें समन्वयवादी प्रवृत्ति को अपनाया है। उन्होंने अवधी,ब्रजभाषा में समान रूप से रचनाएँ लिखीं। जहाँ-तहाँ अरबी, फारसी,भोजपुरी और बुन्देलखण्डी भाषाओं के शब्द भी मिल जाते हैं। यत्र-तत्र मुहावरे और लोकोक्तियों ने उनकी भाषा को और भी सरस बना दिया है।

(3) छन्द योजना—तुलसी ने जायसी की दोहा-चौपाई छन्दों में ‘रामचरित मानस’ की रचना की। सरदास की पद शैली को उन्होंने विनय पत्रिका और गीतावली में अपनाया। कवितावली को उन्होंने सवैया शैली में लिखा। दोहावली में उन्होंने दोहा छन्द का प्रयोग किया।

(4) अलंकार योजना-तुलसी का अलंकार विधान अत्यन्त रोचक है। उनकी उपमाएँ अत्यन्त मनोहर हैं। उनके उपमा अलंकार को ही हम कहीं रूपक,कहीं उत्प्रेक्षा तो कहीं दृष्टांत के रूप में देखते हैं। उनके अलंकार काव्य का वास्तविक सौन्दर्य उजागर करने के लिए प्रयुक्त हुए हैं।

  • साहित्य में स्थान

गोस्वामी तुलसीदास लोक कवि हैं। उनके काव्य से जीने की कला सीखी जा सकती है। उनके काव्य का बहिःपक्ष जितना सबल है,उसका अन्तःपक्ष उससे भी सबल है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ने उनके बारे में लिखा है
“कविता करके तुलसी न लसै, कविता लसी या तुलसी की कला।”

14. मैथिलीशरण गुप्त [2009, 12]

  • जीवन परिचय

अपने साहित्य से राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले महान् कवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव जिला झाँसी में सन् 1886 में हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था। वह वैष्णव होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी थे। गुप्तजी को कविता के संस्कार अपने पिता से ही प्राप्त हुए। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा चिरगाँव में ही हुई। बाद में वे 9वीं कक्षा तक झाँसी में पढ़े। स्कूली शिक्षा में मन न लगने के कारण उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और घर पर ही स्वाध्याय किया।

कुछ समय बाद गुप्तजी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आए। द्विवेदीजी की प्रेरणा से उनके मन-मानस में कवि का स्फुरण हुआ। पहले उनकी रचनाएँ ‘सरस्वती’ में छपी। सन् 1923 में गुप्तजी की भारत भारती’ नामक काव्यकृति प्रकाशित हुई जिसने उन्हें साहित्य जगत में प्रसिद्धि दी। सन् 1952 से 1964 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। गुप्तजी को भारत का राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त रहा। सन् 1964 में हिन्दी के इस महान् कवि का स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

मैथिलीशरण गुप्त ने अपने साहित्य से राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की। उन्होंने भारतवासियों में एकता स्थापित करने तथा सद्भाव, सौजन्य व सौहार्द्र विकसित करने के लिए आजीवन साहित्य रचना की। उनका काव्य रामभक्ति व राष्ट्र भक्ति का अनूठा संगम है।

  • रचनाएँ

गुप्तजी ने प्रबन्ध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य लिखे हैं। उनकी रचनाओं को चार भागों में बाँटा जा सकता है खण्डकाव्य, महाकाव्य, गीतिकाव्य और गीतिनाट्य। उन्होंने संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी की कुछ रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। गुप्तजी की मौलिक रचनाएँ निम्न हैं रंग में भंग, जयद्रथ वध, पद्य प्रबन्ध, भारत-भारती, शकुन्तला, तिलोत्तमा, चन्द्रहास,पंचवटी, स्वदेश-संगीत, हिन्दू सैरन्ध्री, वन वैभव, गुरुकुल, साकेत, यशोधरा, द्वापर, सिद्धिराज, मंगल घट, नहुष, कुणाल गीत, अर्जुन और विसर्जन, काबा और कर्बला, विश्ववेदना, अजित, प्रदक्षिणा, पृथ्वी पुत्र, हिडिम्बा, अंजुली और अर्घ्य, जय भारत, युद्ध और
शान्ति,विष्णुप्रिया। साकेत महाकाव्य है। यशोधरा,द्वापर, विष्णुप्रिया,पंचवटी तथा भारत-भारती उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।

  • भाव पक्ष

(1) भारतीय संस्कृति के पक्षधर-प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति उनका आस्था असीम है। उनकी अधिकांश रचनाएँ अतीतकालीन सभ्यता और संस्कृति का गौरव लिए हुए हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम चित्रों से उनके काव्य भरे पड़े हैं।

(2) राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति-प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रखने के साथ-साथ गुप्तजी का हृदय राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है। उनके समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। भारतीय समाज की दशा अत्यन्त दयनीय थी। भारतीय अपने प्राचीन गौरवशाली आदर्शों को भूलते जा रहे थे। अपनी ‘भारत-भारती’ में वह भारतीयों का आह्वान करते हैं

“हम कौन थे, क्या हो गए है और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।”

(3) राम की अनन्य भक्ति-गुप्त जी सगुणोपासक वैष्णव कवि हैं। अन्य धर्मों के प्रति समुचित आदर रखते हुए वह राम के ही अनन्य भक्त हैं। काव्यों में उन्होंने मंगलाचरण के रूप में राम की स्तुति की है। कृष्ण चरित्र पर केन्द्रित द्वापर’ में वह इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं-

“धनुर्बाण या वेणु लो, श्याम रूप के संग।
मुझ पर चढ़ने से रहा, राम दूसरा रंग।”

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(4) मानवतावादी दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति मानवतावादी है। उनकी दृष्टि में सम्पूर्ण संसार एक कुटुम्ब के समान है।। गुप्तजी पूर्णतः मानवतावादी हैं। विश्व-प्रेम एवं लोक-सेवा के माध्यम से उन्होंने अपने काव्य में इसी विचारधारा को व्यक्त किया है।

(5) गाँधीवादी दृष्टिकोण-गुप्त जी गाँधीजी द्वारा चलाए गए स्वतन्त्रता आन्दोलन से भी जडे रहे थे। अतः उन पर गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा। उनके काव्य में अहिंसा, सत्य, राष्ट-प्रेम,समाज सुधार, हरिजनोद्धार,स्वदेशी से सम्बन्धित जो दृष्टिकोण मिलता है वह अधिकतर गाँधीजी के विचारों से प्रेरित है।

(6) नारी के प्रति सम्मान गुप्तजी के हृदय में नारी जाति के प्रति आदर का भाव और उसकी वर्तमान करुण अवस्था के प्रति गहरी करुणा का भाव है। भारतीय समाज में नारी की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। गुप्तजी का हृदय भारतीय नारी की दयनीय अवस्था पर अत्यन्त दुःखी होता है

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

(7) समन्वयवाद के पक्षधर-गुप्तजी को प्रायः समन्वयवादी कवि कहा जाता है। उनके काव्य में अतीत और वर्तमान, सगुण और निर्गुण, भक्ति और ज्ञान,सत और असत,व्यक्ति और समाज.धर्म और कर्म आदि जीवन के विभिन्न विरोधी पक्षों का अदभुत समन्वय है। रामचन्द्र शक्ल ने उनके बारे में लिखा है-“गुप्तजी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि हैं। सब प्रकार उच्चता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त है। प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह दोनों इनमें हैं।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा-गुप्तजी की काव्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी है। उनकी भाषा शुद्ध और परिमार्जित हिन्दी है, जिसमें संस्कृत शब्दों की बहुलता है। लेकिन भाषा क्लिष्ट नहीं होने पायी है। यथास्थान मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ है। सौन्दर्य और सजीवता के साथ-साथ उनकी भाषा में माधुर्य,ओज और प्रसाद गुणों का भी समावेश हुआ है।
  2. अलंकार योजना-गुप्तजी के काव्य में शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों ही प्रकार के अलंकारों का प्रयोग हुआ है। प्राचीन अलंकारों के साथ ही उन्होंने मानवीकरण, विश्लेषण-विपर्यय और ध्वन्यार्थ व्यंजना जैसे पाश्चात्य अलंकारों को भी अपनाया है। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, विभावना, सन्देह आदि अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. छन्द योजना-गुप्तजी के काव्य में छन्द विधान में पर्याप्त विविधता दिखाई देती है। या, छप्पय,घनाक्षरी,शिखरिणी,द्रुत विलम्बित; मालिनी आदि अनेक प्रकार के छन्दों का प्रयोग उन्होंने अपने काव्य में किया है।
  4. रस योजना-मैथिलीशरण गुप्त ने अपने काव्य में प्रायः सभी रसों का नियोजन किया है। उनमें श्रृंगार,करुण, वीर और वात्सल्य रसों की अधिकता है।
  5. शैली-गुप्तजी ने अपने काव्य में प्रमुखतः भावात्मक शैली का प्रयोग किया है। इसी शैली के अन्तर्गत उनके काव्य में विचारात्मक, आत्मकथात्मक, आत्माभिव्यंजक, सूक्ति आदि शैलियों का प्रयोग हुआ है।
  • साहित्य में स्थान

गुप्तजी को साहित्यिक और राष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर पर्याप्त सम्मान मिला। अपने जीवन काल में वह अनेक उपाधियों और पारितोषिकों आदि से विभूषित किये गये। आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट् की उपाधि प्रदान की और ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ ने उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से विभूषित किया। वे सन् 1952 से 1964 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे।

15. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ [2010]

  • जीवन परिचय

सुमन जी छायावाद के अन्तिम चरण में काव्य-क्षेत्र में आए और प्रारम्भ में प्रेमगीत लिखते रहे। प्रकृति के विशाल क्षेत्र से उठती हुई मानवता की कराहट को सुनकर वह राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित हुए और इनके मन में भी क्रान्ति की ज्वाला धधक उठी। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म उन्नाव (उत्तर प्रदेश) के झगरपुर नामक गाँव में सन् 1915 ई. में हुआ था। ‘सुमन’ बाल्यावस्था में ही ग्वालियर चले आए और यहीं उनकी शिक्षा सम्पन्न हुई। उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से बी.ए.किया। 1940 में एम.ए. और डी.लिट् की उपाधियाँ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उनकी नियुक्ति नेपाल स्थित दूतावास में सांस्कृतिक सहायक के रूप में हो गई। 1961 में माधव कॉलेज, उज्जैन के प्राचार्य नियुक्त हुए तथा कुछ वर्षों के बाद उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में उपकुलपति के रूप में कार्यभार संभाल लिया। उनको भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ की उपाधि से विभूषित किया गया। उपकुलपति के पद से अवकाश लेकर साहित्य सेवा में रत हुए। सन् 2002 ई. में उनका निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

सुमन जी की कविता सामाजिक जीवन तथा राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी हुई हैं। इन्होंने प्रारम्भ में प्रेमभाव पर आधारित अनेक गीत लिखे। स्वाधीनता आन्दोलन और शोषित वर्ग की पीड़ा ने इनके काव्य-सृजन की दिशा बदल दी। सुमन जी प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। अपने काव्य के माध्यम से ‘सुमन’ जी ने पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रबल प्रहार किए और पीड़ित मानवता को वाणी दी। साम्यवाद के साथ ही गाँधीवाद में भी इनकी अटूट निष्ठा रही। इनकी कविताओं में जागरण और निर्माण का सन्देश है।

  • रचनाएँ

सुमन जी की रचनाएँ अग्रलिखित हैं

  1. हिल्लोल-यह सुमन जी के प्रेमगीतों का प्रथम काव्य-संग्रह है।
  2. आँखें भरी नहीं में मिलन की आकांक्षा, सौन्दर्य तथा प्रेम का मनोहारी चित्रण है।
  3. जीवन के गान’, प्रलय सृजन’, ‘विश्वास बढ़ता ही गया’-सुमन जी की क्रान्तिकारी भावनाओं से भरे हुए रचना संग्रह हैं।
  4. विंध्य हिमालय-इसमें सुमन जी की देश-प्रेम और राष्ट्रीय भावनाओं वाली कविताएँ संगृहीत हैं।
  5. माटी की बारात-इसमें इनको साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया है।
  • भाव पक्ष
  1. प्रेम-सुमन जी छायावाद के अन्तिम चरण में काव्य क्षेत्र में आए। प्रारम्भ में इन्होंने प्रेमगीत लिखे। धीरे-धीरे इनका ध्यान समाज के प्रति अपने कर्तव्य की ओर गया। प्रकृति के विस्तृत क्षेत्र से उठती हुई त्रस्त मानवता के दुःख ने इनका ध्यान आकर्षित किया और वे देश के राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए।
  2. साम्यवाद सुमन जी को रस की नवीन अर्थव्यवस्था ने बहुत आकर्षित किया। अतः इनका झुकाव साम्यवाद की ओर रहा।
  3. पूँजीवाद का विरोध-सुमन जी के मन में क्रान्ति की ज्वाला जल रही थी। इनका मन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रति विरक्ति के भाव से भर उठा। अत: इनकी कविताओं में साम्राज्यवाद के विरुद्ध आवाज उठाई गई।
  4. सत्य और अहिंसा-सुमन जी की निष्ठा गाँधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों पर दृढ़ रही। इसी कारण इनकी कविताओं में क्रान्तिकारी स्वर पाया जाता है।
  5. जीवन दर्शन-इनके काव्य में इनका स्वयं का पुष्ट जीवन दर्शन स्पष्ट दृष्टिगत है जिसमें वर्तमान के हर्ष पुलक,राग विराग और आशा उत्साह के स्वर भी मुखरित हुए।

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  • कला पक्ष
  1. भाषा-सुमन जी की भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। उनकी खड़ी बोली में संस्कृत के सरल तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। साथ ही उर्दू के शब्द भी यत्र-तत्र मिल जाते हैं। सुमन जी एक प्रखर एवं ओजस्वी वक्ता भी थे। अतः उनकी भाषा जनभाषा कही जा सकती है।
  2. शैली इनकी शैली पर इनके व्यक्तित्व की छाप है। उनकी शैली में सरलता, स्वाभाविकता, ओज, माधुर्य और प्रसाद गुणों का समावेश है। उनके गीतों में स्वाभाविकता, संगीतात्मकता,मस्ती और लयबद्धता है।
  3. अलंकार योजना इनकी कविता में अलंकार अपने आप ही आ गए हैं। नए-नए उपमानों के माध्यम से उन्होंने अपनी बात बड़ी ही कुशलता से कह दी है।
  4. छन्द विधान-सुमन जी ने मुक्त छन्द लिखे हैं और परम्परागत शब्दों की समृद्धि में सहयोग दिया है।
  • साहित्य में स्थान

सुमन जी उत्तर छायावादी युग के प्रगतिशील प्रयोगवादी कवियों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे एक सुललित गीतकार, महान् प्रगतिवादी एवं वर्तमान युग के कवियों में अग्रगण्य हैं। हिन्दी साहित्य की प्रगति में इनका सहयोग अतुलनीय है।

16. विष्णुकान्त शास्त्री

  • जीवन परिचय

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री का जन्म 2 मई, 1929 को कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। इनके पिता का नाम गंगेय नरोत्तम शास्त्री और माता का नाम श्रीमती रूपेश्वरी देवी था। इन्होंने एम.ए,एल.एल.बी.तक शिक्षा प्राप्त की। 1953 में इनका विवाह श्रीमती इन्दिरा देवी से हुआ। इनको बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से डी. लिट् की उपाधि प्रदान की गई। विष्णुकान्त शास्त्री जी 1953 से 1994 तक कोलकाता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक रहे। अवकाश प्राप्त करने के उपरान्त वे भारत भवन, भोपाल में न्यासी सचिव के पद पर रहे तथा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पद को भी इन्होंने सुशोभित किया। 17 अप्रैल,2005 में इनका स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

विष्णुकान्त शास्त्री ने हिन्दी की अनेक पुस्तकें लिखकर साहित्य सेवा की। अनेक बंगाली और अंग्रेजी कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया। ‘उपमा कालिदासस्य’ का बंगला से हिन्दी में अनुवाद किया। बंगला की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया और ‘महात्मा गाँधी का समाज दर्शन’ का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया। डॉ. शास्त्री द्वारा लिखी गई कविताएँ जीवन के संवेदनशील क्षणों की भावना-प्रधान अभिव्यक्ति हैं।

  • रचनाएँ
  1. ‘कवि निराला की वेदना तथा अन्य निबन्ध’, ‘कुछ चन्दन की कुछ कपूर की’, ‘चिन्तन मुद्रा’, ‘अनुचिन्तन’ आदि उनके द्वारा रचित साहित्यिक समीक्षाएँ हैं।
  2. ‘बांग्लादेश के सन्दर्भ में’–उनका रिपोर्ताज है।
  3. ‘भक्ति और शरणागति’, ‘सुधियाँ उस चन्दन के वन की’ ये उनके द्वारा लिखित संस्मरण हैं।
  4. ‘उपमा कालिदासस्य’ बांग्ला से हिन्दी में अनूदित है।
  5. ‘महात्मा गाँधी का समाज दर्शन’ अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित ग्रन्थ है।
  6. ‘दर्शक और आज का हिन्दी रंगमंच’, ‘बालमुकुन्द गुप्त का एक मूल्यांकन’, ‘बांग्लादेश संस्कृति और साहित्य’, ‘तुलसीदास आज के सन्दर्भ में ये इनके द्वारा सम्पादित ग्रन्थ हैं।
  7. ‘जीवन पथ पर चलते-चलते’ उनका काव्य संकलन है।
  • भाव पक्ष
  1. संवेदनशीलता-डॉ. शास्त्री द्वारा लिखी गई कविताएँ जीवन के संवेदनशील क्षणों की भावना-प्रधान अभिव्यक्ति हैं।
  2. भारतीय संस्कृति में आस्था-विष्णुकांत शास्त्री की भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रही। ये देश की स्वतन्त्रता के पक्षधर रहे हैं। उदाहरण देखिए“विजय पथ पर बढ़ सिपाही
    विजय है तेरी सुनिश्चित।
    लोटती है विजय चरणों पर उन्हीं के, जो बढ़े हैं।
    तुच्छ कर सब आपदाएँ, धर्मपथ पर जो अड़े हैं।”
  3. राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति इन्होंने अपनी रचनाओं में राष्ट्र-प्रेम को आदर्श रूप में माना है। इनका राष्ट्र-प्रेम व्यापक और उदार है। एक उदाहरण देखिए”गगन गायेगा गरज कर गर्व से तेरी कहानी
    वक्ष पर पदचिह्न लेगी धन्य हो धरती पुरानी।
    कर रहा तू गौरवोज्ज्वल त्यागमय इतिहास निर्मित।
    विजय है तेरी सुनिश्चित।”
  4. जीवन जीने की शैली जीवन में जैसे-जैसे मोड़ आते गये कविता उन्हीं के अनुरूप मुखरित होती गई। जीवन के अनुरूप गुणों,जैसे–स्नेह, भक्ति,प्रेरणा आदि का समावेश इनकी कविताओं में देखा जा सकता है।

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  • कला पक्ष
  1. भाषा-डॉ. विष्णुकान्त शास्त्री की भाषा ओजस्वी है। इसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है। वीर रस की कविताओं में ओजगुण-प्रधान शब्दावली का प्रयोग है तथा शान्त रस की कविताओं में माधुर्य एवं प्रसाद गुणों का सहज समावेश है।
  2. अलंकार योजना-विष्णुकान्त शास्त्री की कविताओं में अलंकार स्वयं प्रविष्ट हो गए हैं। रूपक,उपमा व अनुप्रास की छटा स्थान-स्थान पर सहज ही दृष्टिगत होती है।
  3. रस निरूपण-डॉ.विष्णुकान्त शास्त्री ने अपनी कविताएँ मुख्यत: वीर रस और शान्त रस में लिखी हैं। वीर रस में ओज-प्रधान शब्दावली है और शान्त रस में माधुर्य और प्रसाद गुण झलकता है।
  • साहित्य में स्थान

शास्त्रीजी को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, डॉ. राममनोहर लोहिया सम्मान तथा राजर्षि टंडन हिन्दी सेवी सम्मान प्राप्त हुए। भावों के आधार पर उनकी कविताओं को राष्ट्रीय, विविधा,प्रेरणा व प्यार,भक्ति एवं काव्यानुवाद के रूप में विभाजित किया जा सकता है। हिन्दी साहित्य में इनका स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

17. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ [2009, 11, 13]

  • जीवन परिचय

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ एक युगान्तकारी कवि हैं। छायावाद के प्रमुख स्तम्भ और आधुनिक काव्य में क्रान्ति के अग्रदूत निराला का जन्म मेदिनीपुर (बंगाल) के महिषादल राज्य में सन् 1897 में हुआ था। इनके पिता रामसहाय त्रिपाठी महिषादल राज्य के कर्मचारी थे। इस प्रकार निराला जी का बचपन बंगाल की शस्य-श्यामला धरती पर व्यतीत हुआ। इनकी स्कूली शिक्षा केवल मैट्रिक तक हुई। कालान्तर में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेजी भाषा तथा साहित्य का बहुत अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। निरालाजी का जीवन दुःख और संघर्षों में ही बीता। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने कलकत्ता में रामकृष्ण आश्रम में रहकर ‘समन्वय’ का कार्य किया। मतवाला (कलकत्ता) एवं सुधा (लखनऊ) का सम्पादन किया। 15 अक्टूबर,1961 को इनका स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

निराला जी का साहित्य बहुमुखी और विपुल है। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानियाँ, निबन्ध,रेखाचित्र,जीवनियाँ,आलोचनात्मक निबन्ध आदि सभी कुछ लिखे हैं। निराला का काव्य दार्शनिक विचारधारा, गम्भीर चिन्तन और भाव सौन्दर्य की अमूल्य निधि है। विवेकानन्द का प्रभाव उन पर सुस्पष्ट है। उनके काव्य में कहीं विराट की ओर रहस्यात्मक संकेत है तो कहीं सामान्य जन के उत्पीड़न के चित्र हैं,कहीं कथा मुखर है तो कहीं गीत माधुरी।

  • रचनाएँ

समर्थ कवि होने के साथ-साथ निराला ने उपन्यास,कहानियाँ, रेखाचित्र,नाटक,जीवनियाँ और निबन्धों की रचना की। अंग्रेजी,बंगला तथा संस्कृत के ग्रन्थों के अनुवाद भी किये। परिमल, अनामिका, गीतिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीतकुंज तथा सान्ध्य काकली ये काव्य कृतियाँ हैं। राम की शक्ति पूजा, तुलसीदास उनकी लम्बी कविताएँ हैं, जो अपनी विशिष्टताओं के कारण खण्डकाव्य मानी गई हैं। ‘सरोज स्मृति हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ शोकगीत माना गया है।

  • भाव पक्ष

(1) प्रेम और सौन्दर्य-छायावाद के उन्नायक कवि होने के कारण निराला के काव्य में प्रेम तथा सौन्दर्य के मोहक चित्र प्राप्त होते हैं। उनका सौन्दर्य चित्रण आकर्षक एवं अद्भुत है। उदाहरण के लिए निम्न पंक्तियाँ देखिए

“नयनों का नयनों से गोपन प्रिय संभाषण,
पलकों पर नव पलकों का प्रथमोत्थान पतन।”

निराला के काव्य में श्रृंगार के मादक एवं सजीव चित्र भी प्राप्त होते हैं।

(2) भक्ति एवं रहस्य भावना निराला जी के काव्य में भक्ति एवं रहस्य, भावनापरक रचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। उन्होंने आत्मा तथा परमात्मा की एकता का प्रतिपादन किया है। निराला जी की भक्तिपरक रचनाओं में सगुण भक्तों का सा आत्मसमर्पण, तल्लीनता तथा हृदय की आर्त भावना परिलक्षित होती हैं।

“उन चरणों में मुझे दो शरण,
इस जीवन को करो हे वरण
x x x
दलित जनों पर करो करुणा
दीनता पर उतर आये
प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा।”

(3) प्रकृति चित्रण-निराला जी के काव्य में प्रकृति चित्रण के विविध रूप प्राप्त होते हैं। उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मधुर और सजीव है। उन्होंने प्रकृति में मानवीय भावों तथा क्रिया-कलापों का आरोप किया है। जैसे

“सखि बसन्त आया,
आवृत्त सरसी-उर सरसिज उठे,
केशर के केश कली से छूटे
स्वर्ण-शस्य अंचल
पृथ्वी का लहराया।”

(4) राष्ट्रीयता निराला जी का काव्य देश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है। उनकी कविताओं में ओज स्पष्ट दिखाई देता है। ‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि ने भारतीयों को जाग जाने का उद्बोधन किया है। जैसे

“जागो फिर एक बार प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें।
अरुण-पंख-तरुण किरण खड़ी खोल रही है द्वार।”

(5) प्रगतिवादी दृष्टिकोण छायावाद का कवि होते हुए भी निराला जी को प्रगतिवाद का भी प्रथम कवि माना जाता है। उनके काव्य में सामाजिक तथा आर्थिक विषमता के प्रति विद्रोह तथा समाज के दलित एवं शोषित वर्ग के प्रति करुणा का भाव है। निम्न वर्ग के जीवन को उन्होंने यथा तथ्य चित्रण किया है। कुकुरमुत्ता कविता में उनका प्रगतिवादी स्वर देखिए

“अबे, सुन बे गुलाब,
भल मत गर पायी खशब रंगो आब
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर इतरा रहा कैपीटलिस्ट।”

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  • कला पक्ष

(1) भाषा-निराला जी की भाषा भावों के अनुरूप है। देश-प्रेम तथा भक्तिपरक व्यंग्यात्मक कविताओं में उनकी भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। गम्भीर रचनाओं में उनकी भाषा क्लिष्ट, संस्कृतनिष्ठ एवं दुरूह हो गई है। निराला जी की भाषा में उर्दू, फारसी एवं बंगला शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। उन्होंने कुछ नवीन शब्दों का गठन भी किया है। निराला जी की काव्य भाषा भावानुकूल, चित्रात्मक, गत्यात्मक तथा ध्वन्यात्मक गुणों से समन्वित है। जैसे

“है अमा निशा, उगलता गगन घन अन्धकार
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार।
अप्रतिहत गरज रहा पीछे, अम्बुधि विशाल
भूधर त्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।”

(2) शैली-निराला जी की दो शैलियाँ हैं-

  • उत्कृष्ट छायावादी गीतों में प्रयुक्त दुरूह शैली।
  • सरल,प्रवाहपूर्ण,प्रचलित उर्दू के शब्द लिए व्यंग्यपूर्ण और चुटीली शैली।

(3) छन्द योजना-निराला जी ने नए-नए छन्दों का प्रयोग किया है। उन्होंने तुकान्त और अतुकान्त दोनों प्रकार के छन्द लिखे हैं। निराला जी ‘मुक्त छन्द’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। मुक्त

छन्द में मात्राओं तथा वर्णों का बन्धन नहीं होता। केवल ध्वनि तथा प्रवाह का ध्यान रखा जाता है। मुक्त छन्द का उदाहरण देखिए-

“रे प्यारे को सेज पास
नम्रमुख हँसी-खिली,
खेल रंग प्यारे संग।”

(4) अलंकार विधान-निराला जी की अलंकार योजना उच्चकोटि की है। उनके काव्य में अलंकारों की प्रचुरता है। उन्होंने नवीन और प्राचीन दोनों प्रकार के उपमान खोजे हैं। उन्होंने उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक,मानवीकरण, विशेषण, विपर्यय, पुनरुक्तिप्रकाश आदि अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है। मानवीकरण का एक उदाहरण देखिए-

“किसलय वसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिया उर-तरु-पतिका।”

  • साहित्य में स्थान

आधुनिक कवियों में निराला का उत्कृष्ट स्थान है। वे मुक्तक के जनक थे। उन्होंने हिन्दी कविता को नयी दिशा प्रदान की। हिन्दी साहित्य में निराला के कृतित्व को उनके व्यक्तित्व ने और भी अधिक महान बनाया है। निराला जी हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकार हैं।

18. गजानन माधव मुक्तिबोध’

  • जीवन परिचय

नई कविता के सशक्त कवि गजानन ‘मुक्तिबोध’ का जन्म 13 अक्टूबर, 1917 को मुरैना जनपद के श्योपुर कस्बे में हुआ था। उन्होंने उज्जैन के माधव विद्यालय से हाईस्कूल की परीक्षा पास की तथा इन्दौर के होल्कर कॉलेज से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। आर्थिक विपन्नता के कारण पढ़ाई बन्द करके शुजालपुर के शारदा शिक्षा सदन में शिक्षक हो गये। सन् 1942 में उज्जैन के मॉडल स्कूल में शिक्षक रहे। सन् 1948 में नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया तथा राजनन्द गाँव के दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक हो गये। उन्होंने ‘हंस’ (वाराणसी) तथा.’समता’ (जबलपुर) मासिक पत्रों में भी कार्य किया। असाध्य रोगों से जूझते हुए सन् 1964 में उनका देहान्त हो गया।

  • साहित्य सेवा

उन्होंने पद्य और गद्य साहित्य दोनों में रचनाएँ लिखीं। मुक्तिबोध की कविताओं का भाव पक्ष उन्नत तथा समसामयिक है। इनकी भाषा परिमार्जित, प्रौढ़ तथा सबल है। मुक्तिबोध ने काव्य के माध्यम से जन को जन-जन तथा मन को मानवीय बनाने की चेष्टा की है।

  • रचनाएँ

‘चाँद का मुँह टेड़ा है’ तार सप्तक में छपने वाली कविताएँ हैं। ‘काठ का सपना’, सतह से उठता हुआ आदमी’ इनके महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं। ‘नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’, भारतीय इतिहास’, ‘कामायनी-एक पुनर्विचार’, संस्कृति एवं नई कविता का आत्मसंघर्ष’ इनकी जानी मानी गद्य रचनाएँ हैं।

  • भाव पक्ष

मुक्तिबोध की कविताओं के भाव पक्ष की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इनकी कविता के वर्ण्य विषय जीवन तथा समाज के यथार्थ से सम्बन्ध रखते हैं। इन्होंने अपनी कविता में समाज की विपन्नता,विवशता तथा विसंगतियों को चित्रित किया है।
  2. मुक्तिबोध के काव्य में मानवतावाद का स्वर स्पष्ट रूप से मुखरित हुआ है। मुक्ति बोध ने लघु मानव की खोज की है तथा उसके प्रति पूर्ण आस्था प्रकट की है। जैसे“जिन्दगी के दलदल के कीचड़ में फंसकर
    वृक्ष तक पानी में फंसकर
    मैं यह कमल तोड़ लाया हूँ।”
  3. उनकी कविता में आधुनिक भाव बोध की सशक्त अभिव्यंजना है।
  4. उनकी काव्य-चेतना में चिन्तन की प्रचुरता है। उनका यह चिन्तन जलते हुए अंगारे पर चलने वाले व्यक्ति की मनस्थिति का चिन्तन है।
  • कला पक्ष

(1) भाषा-इनकी भाषा परिमार्जित,प्रौढ़ तथा पुष्ट है। सामान्य बोलचाल की भाषा के अतिरिक्त संस्कृतनिष्ठ सामासिक पदावली से युक्त उनकी भाषा सरल एवं प्रवाहमय है। भाषा की शक्ति उनके प्रत्येक वर्णन को अर्थपूर्ण तथा चित्रमय बना देती है। मुक्तिबोध की भाषा में प्रांजलता,शब्द चयन की सहजता,सार्थकता के साथ-साथ युग बोध के अनुरूप कथ्य को प्रकट करने की पूर्ण सामर्थ्य है। उनकी भाषा में कहीं पर बनावट तथा अस्वाभाविकता नहीं है।

(2) शैली-मुक्तिबोध की अधिकांश कविताएँ लम्बी हैं। उनकी काव्य शैली बिम्ब तथा प्रतीक प्रधान है। उनके काव्य-बिम्ब तथा प्रतीक नये जीवन-सन्दों से युक्त हैं। वे सहज जीवन को व्यक्त करने के कारण सरलता से ग्राह्य हैं। उनकी शैली सबसे अलग नवीन प्रतीक और नये सन्दर्भो से युक्त है। उन्होंने कविता को एक नया आयाम दिया है।

  • साहित्य में स्थान

गजानन माधव मुक्तिबोध नई कविता के प्रतिनिधि कवि हैं और जीवन मूल्यों के प्रयोग करने वाले कवि भी हैं। नई कविता को स्वरूप प्रदान करने में उनका विशिष्ट स्थान है।

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19. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

  • जीवन परिचय

अज्ञेयजी हिन्दी में प्रयोगवादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने ‘तार-सप्तक’ का प्रकाशन करके हिन्दी में प्रयोगवाद का सूत्रपात किया। अज्ञेय जी का जन्म सन् 1911 में पंजाब के करतारपुर नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री हीरानन्द शास्त्री थे। पिता भारत के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे। इनका बचपन अपने पिता के साथ कश्मीर, लखनऊ, बिहार तथा मद्रास में व्यतीत हुआ। बी. एस-सी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एम.ए.(अंग्रेजी) में प्रवेश लिया। राजनैतिक आन्दोलन में सम्मिलित होने के कारण पढ़ाई का कार्यक्रम बीच में ही छूट गया। देश सेवा में लगे रहने के कारण इन्हें कारावास भी भोगना पड़ा। अज्ञेयजी ने कुछ समय तक अमेरिका में भारतीय साहित्य तथा संस्कृत के अध्यापक के रूप में कार्य किया। इसके बाद जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा अनशीलन विभाग के निदेशक पद पर कार्य किया। 4 अप्रैल,1987 को इस साहित्यकार का निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

अज्ञेयजी का जीवन एक साधक का जीवन था। इन्होंने सन् 1934 ई.के लगभग लेखन कार्य आरम्भ किया। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों में लेखन कार्य किया। उन्होंने निबन्ध, यात्रा-साहित्य, उपन्यास, कहानी, नाटक,संस्मरण,आलोचना आदि विविध विधाओं में साहित्य सृजन किया। सम्पादक और पत्रकार के रूप में उन्हें ख्याति प्राप्त थी। उन्होंने कई ग्रन्थों एवं पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। तार-सप्तक का प्रकाशन करके नये युग को जन्म दिया। उन्होंने ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’, ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘वाक’ (अंग्रेजी) पत्रों का बड़ी कुशलतापूर्वक सम्पादन किया। उनकी पहली कविता सन् 1927 में कॉलेज पत्रिका में प्रकाशित हुई। चित्रकारी,मृत्तिका-शिल्प,चर्म-शिल्प,काष्ठ-शिल्प, फोटोग्राफी,बागवानी,पर्वतारोहण आदि में उनकी विशेष रुचि थी। अज्ञेयजी प्रकृति तथा व्यवस्था प्रेमी व्यक्ति थे। उनकी साहित्यिक सेवाएँ सदैव चिर स्मरणीय रहेंगी।

  • रचनाएँ

अज्ञेयजी प्रतिभा सम्पन्न कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण निम्नवत् है

  1. काव्य-अरी ओ करुणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, हरी घास पर क्षणभर, बावरा अहेरी,इन्द्रधनु रौंदे हुए,कितनी नावों में कितनी बार, इत्यलम,सुनहले शैवाल,चिन्ता तथा पूर्वा।
  2. आलोचना-त्रिशंकु, हिन्दी-साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, तीनों तार सप्तकों की भूमिकाएँ आदि।
  3. नाटक-उत्तर प्रियदर्शी।
  4. कहानी संग्रह-विपथगा, शरणार्थी,जयदोल, तेरे ये प्रतिरूप, अमर बल्लरी, परम्परा आदि।
  5. निबन्ध-संग्रह-आत्मनेपद,लिखि कागद कोरे,सबरंग और कुछ राग आदि।
  6. उपन्यास-शेखर : एक जीवनी (भाग 1 तथा 2), नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी।
  7. यात्रा-साहित्य-एक बूंद सहसा उछली, अरे यायावर रहेगा याद।
  8. सम्पादन सैनिक, विशाल भारत,प्रतीक, दिनमान,वाक् (अंग्रेजी)।
  • भाव पक्ष

उनकी कविता में जीवन की गहरी अनुभूति तथा कल्पना की ऊँची उड़ान का सुन्दर समन्वय हुआ है। अज्ञेयजी ने एक नवीन काव्य धारा का प्रवर्तन किया। उनकी निजी अनुभूतियाँ प्रयोगवादी कविता के रूप में प्रकट हुईं।

  1. प्रकृति चित्रण-अज्ञेयजी प्रकृति प्रेमी कवि हैं। कवि ने प्रकृति का आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में प्रयोग किया है। प्रकृति के मानवीकरण रूप का प्रयोग अपने काव्य में किया है। अज्ञेयजी प्रकृति के पारखी कवि हैं। कहीं-कहीं प्रकृति के मनोरम चित्रों को उभारा है। कहीं-कहीं प्रकृति के भयंकर पक्ष का भी चित्रण किया है।
  2. प्रेम निरूपण-प्रेम के सम्बन्ध में उनका विचार है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान है। उनके प्रेम निरूपण में एक ओर प्रिया के सौन्दर्य का वर्णन किया है। वहीं दूसरी ओर मन की व्याकुलता दिखायी देती है। इनकी प्रारम्भिक रचनाओं में प्रेम की अनुभूति का वर्णन पर्याप्त रूप में किया गया है।
  3. व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति-अज्ञेयजी ने अपनी कविताओं में मानव स्वभाव का वर्णन किया है। वे समाज के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। व्यक्ति के विकास द्वारा ही समाज का विकास सम्भव है। उनका विचार है मानव के विकास के लिए मानसिक विकास भी आवश्यक है। अतः उन्होंने अपने काव्य में व्यक्ति के विकास को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है।
  4. बौद्धिकता कवि ने बौद्धिकता पर विशेष बल दिया है। उनकी कविताओं में बुद्धि का विकास अधिक है। उनकी कविताएँ अतिशय बौद्धिकता का खजाना बन कर रह गयी हैं। अत्यधिक बौद्धिकता ने रस का अभाव उत्पन्न कर दिया है। उनकी कविताओं में सर्वत्र बौद्धिकता के ही दर्शन होते हैं।
  5. क्षणवादी जीवन दृष्टि जीवन क्षणभंगुर है। इस कविता में क्षणवाद का प्रबल विरोध किया है। प्रयोगवादी कवि प्रति क्षण की अनुभूतियों को महत्त्वपूर्ण मानता है। वह क्षण को सत्य मानता है। अतः इसका उपभोग करना चाहता है।
  6. नवीन उपमानों का प्रयोग-प्रयोगवादी कवि नवीनता का पोषक है। उनका विचार है कि पुराने शब्दों में नये अर्थों को प्रकट करने की क्षमता नहीं रही। अत: नये-नये शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। नये विषय, नया शिल्प, नवीन भाषा, नए प्रतीक एवं नये उपमान इन कविताओं में प्रयुक्त किये गये हैं। इन नवीन उपमानों में नये सौन्दर्य बोध के दर्शन होते हैं।
  7. रहस्य भावना-अज्ञेय जी के काव्य में रहस्य की प्रधानता है। हरे भरे खेत,सागर, सुन्दर घाटियाँ, मनुष्य की मुस्कान,प्रेम तथा श्रद्धा आदि सभी में उस विराट ईश्वरीय सत्ता के दर्शन होते हैं। ये सभी उस ईश्वर की ही देन हैं। कवि,ईश्वर से समन्वय स्थापित करना चाहता है। अज्ञेयजी के काव्य में सर्वत्र रहस्य भावना दृष्टिगोचर होती है।
  • कला पक्ष
  1. भाषा-अज्ञेयजी का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। विषय के अनुसार आपकी भाषा बदलती रहती है। आपकी भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली से युक्त है। भावों को व्यक्त करने में जो भाषा आपको अच्छी लगी, आपने उस भाषा का ही प्रयोग किया है। कहीं-कहीं अंग्रेजी तथा उर्दू के शब्दों का प्रयोग भी अज्ञेयजी ने किया है। उनकी भाषा में नूतनता, लाक्षणिकता तथा प्रतीकात्मकता के गुण विद्यमान हैं। देशज शब्दों का प्रयोग भी किया है। भाषा में चित्रात्मकता तथा बिम्ब विधान के भी दर्शन होते हैं। भाषा में चटकीलापन लाने के लिए उन्होंने लोकोक्तियों एवं मुहावरों का प्रयोग भी किया है।
  2. शैली अज्ञेयजी का व्यक्तित्व गम्भीर था। व्यक्तित्व की छाप उनकी शैली पर दिखायी देती है। इनकी शैली में बौद्धिकता और गम्भीरता की प्रधानता है। इन्होंने गद्य में आलोचनात्मक शैली, वर्णनात्मक शैली, विवरणात्मक शैली, सम्वादात्मक शैली, विवेचनात्मक शैली, भावात्मक शैली तथा सम्बोधन शैली का प्रयोग किया है। अज्ञेयजी ने व्यंग्य-प्रधान रचनाओं में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। शैली भाषा तथा भावों के अनुकूल है।
  3. छन्द योजना-अज्ञेयजी ने छन्द मुक्त तथा छन्दबद्ध दोनों रूपों में रचनाएं की हैं। एक ओर उन्होंने छन्द के बन्धन को स्वीकारा है तथा दूसरी ओर छन्द के बन्धन को नकारा है। लय, स्वर तथा गेयता के तत्त्व विद्यमान हैं। छन्दों के प्रयोग द्वारा उनके काव्य में शब्द चित्र का अंकन किया गया है। कवि में गहन भावों को व्यक्त करने की शक्ति है।
  4. अलंकार योजना-अज्ञेयजी ने अपने काव्य में परम्परागत अलंकारों का प्रयोग किया है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। प्रकृति चित्रण में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग मिलता है। ध्वन्यर्थव्यंजना, विशेषण विपर्यय जैसे नवीन अलंकारों का प्रयोग किया है।

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उदाहरणार्थ-

उपमा-यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।
रूपक-मैं कब कहता हूँ, जीवन मरु नंदन कानन का फूल बने।

  • साहित्य में स्थान

अज्ञेयजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अज्ञेयजी हिन्दी साहित्य के लिए वरदान हैं। वे प्रतिभा सम्पन्न कवि हैं। अज्ञेयजी ने कविता का संस्कार किया है। कवि ने काव्य को नवीनता प्रदान की। वे मानवतावादी कवि हैं। उनकी कविताएँ बुद्धि को भी झकझोर देती हैं। वे प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे। नई कविता को शिल्पगत रूप देने में अज्ञेयजी का सर्वाधिक योगदान है। वर्तमान युग में अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व दोनों की विविधता के कारण काफी चर्चित रहे। साहित्य-सेवी अज्ञेयजी का हिन्दी जगत में विशिष्ट स्थान है।

20. वीरेन्द्र मिश्र

  • जीवन परिचय

वीरेन्द्र मिश्र का स्थान नवगीतकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी लेखनी में तथा कण्ठ में एक अजीव-सा माधुर्य है। मिश्रजी सरस्वती के वरद पुत्र हैं। कवि तथा गीतकार वीरेन्द्र मिश्र का जन्म दिसम्बर,1927 को ग्वालियर में हुआ था। श्री मिश्रजी ने जीवन-पर्यन्त मानव मूल्यों की स्थापना की। शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने पूरी तरह स्वयं को लेखन कार्य में तल्लीन कर दिया। उनका स्वभाव सरल तथा विनम्र था। अपने बड़ों का सम्मान करते थे। छोटों को स्नेह करते थे। वे संघर्ष की साक्षात् मूर्ति थे। स्वाभिमान तथा दृढ़ निश्चय उनके स्वभाव का प्रधान गुण था। उस समय कवि सम्मेलन उनके बिना अधूरे समझे जाते थे। अतः मिश्रजी कवि सम्मेलनों की शान थे। जून, 1975 में यह गीतकार सदैव के लिए हमसे दूर हो गया।

  • साहित्य सेवा

मिश्रजी ने अनेक रूपों में माँ भारती की सेवा की। वे गीतकार तथा गद्य लेखक के साथ-साथ एक सफल पत्रकार थे। वीरेन्द्र मिश्र आधुनिक कविता की वर्तमान पीढी के सबसे अधिक लोकप्रिय कवि माने जाते हैं। मिश्र जी छायावादोत्तर गीतकार हैं। उनके गीतों में समय तथा समाज की प्रगतिशील आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी रचनाओं में सामाजिक,सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय धरातल अत्यन्त सबल है। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से जनमानस में आस्था और विश्वास को जाग्रत किया है। उनके गीतों में जहाँ एक ओर भावुक प्रेमी के प्रणय की गूंज हैं,वहीं दूसरी ओर व्यथा एवं पीड़ा के मार्मिक स्वर भी विद्यमान हैं। उनके गीतों में राष्ट्रीय गौरव के स्वर मुखरित हुए हैं। अन्याय,शोषण और विषमता के विरुद्ध सच्ची मानवीय चिन्ता के दर्शन होते हैं।

  • रचनाएँ

वीरेन्द्र मिश्र की प्रमुख रचनाएँ हैं गीतम, मधुवंती, गीत पंचम, उत्सव गीतों की लाश पर,वाणी के कर्णधार,धरती,गीताम्बरा, शांति गन्धर्व आदि प्रमुख हैं। उन्होंने गीत, नवगीत, राष्ट्रीय गीत, मुक्तक के अतिरिक्त रेडियो नाटक एवं बाल साहित्य की रचना की।

  • भाव पक्ष

(1) सरस तथा सफल गीतकार-वीरेन्द्र मिश्र मूलतः गीतकार हैं। उनकी रचनाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरातल अत्यन्त व्यापक है। जनसाधारण उनके प्रेरणा स्रोत हैं। मिश्रजी सदैव सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूक रहे हैं। हमेशा ही युग चेतना का संचार किया है। काव्य का मर्म वही समझ सकता है जिसमें उत्सर्ग एवं त्याग की भावना निहित हो। गीतकार के भाव जगत में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है।

(2) कल्पना और यथार्थ का समन्वय-वीरेन्द्र मिश्र की कविताओं में कल्पना और यथार्थ का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। जीवन के शाश्वत सत्य से विमुख रहकर कल्पना लोक में विचरण करना कवि को रुचिकर नहीं लगता। कल्पना के माध्यम से कवि हृदय की अनुभूति कराता है। सत्य,सौन्दर्य और कल्पना की गहराई के दर्शन होते हैं। उनमें ऐसी कल्पना शक्ति है जिसके द्वारा एक सफल रचनाकार सिद्ध हुए हैं। सुधी पाठक और श्रोता उनकी कविताओं में तल्लीन हो जाता है। धरातल के वास्तविक यथार्थ को भी कवि प्रस्तुत करता है।

(3) वेदना की प्रधानता–मिश्रजी के काव्य में वेदना का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। कवि का व्यक्तिगत जीवन सुख-दुःख तथा आनन्द से पूर्ण रहा है। एक घटना ने तो उनके जीवन को ही बदल दिया। यह घटना उनके व्यक्तिगत जीवन की है। उनके बड़े भाई का असामयिक निधन हो गया। उनकी रचनाओं में सूनेपन का अनुभव होने लगा। मिश्रजी की व्यक्तिगत वेदना पूरे संसार की वेदना हो गयी। कहीं-कहीं हर्षातिरेक भी काव्य में दृष्टिगोचर होता है। उनके काव्य में विरह पीड़ित मानव की विकलता तथा उत्कण्ठा के दर्शन होते हैं। कवि की आँखों से प्रवाहित आँसू उसकी मर्म व्यथा के परिचायक हैं–

क्या तुम्हें कुछ भी पता है,
अश्रु में क्या-क्या व्यथा है?

(4) सत्यम् के सफल गायक कवि केवल कल्पना में ही विचरण नहीं करता अपितु वह सत्य के ठोस धरातल पर आधारित है। वे सत्य और ईमान के मार्ग पर हमें चलने के लिए प्रेरित करते हैं। सत्य सदैव आदरणीय है। कभी-कभी कठोर सत्य का भी समाज सम्मान करता है। कवि मानवीय जीवन के कटु सत्यों से हमें अवगत कराते हैं। यदा-कदा सुखद स्वप्न अतीत में विलीन हो जाता है।

(5) संघर्षों के कवि-संघर्ष मानव जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। जीवन में पग-पग पर बाधाएँ एवं संघर्ष हैं। इन संघर्षों से निकलना तथा टकराना ही सच्चा जीवन है। जीवन के कटु अनुभवों को प्राप्त करके जो कर्त्तव्य-पथ पर आगे बढ़ा है,वह दूसरों के लिए सदैव पथ-प्रदर्शक है। कवि ने अपने गीतों में जीवन की गतिशीलता का वर्णन किया है। कवि के गीतों में चिर शान्ति; प्रेम प्रकट होता है।

(6) युद्ध की विभीषिका का प्रबल विरोध-युद्ध देश के विकास में बाधक होते हैं। युद्ध सदैव ही मानवता के शत्रु हैं। युद्ध में विजय किसी की भी हो या पराजय किसी की हो, हानि तो प्राणिमात्र को पहुँचती ही है। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण ने कवि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। चीन ने भी जबरन भारत को युद्ध की आग में झोंक दिया। इससे अपार धन-जन की हानि हुई। कवि को युद्ध बुरा लगता है। वह चाहे अपने देश से हो अथवा किसी अन्य देश से। युद्धों से जनसामान्य को प्रदूषण, चीत्कार,विनाश और बेकारी ही मिलती है।

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  • कला पक्ष

(1) भाषा-मिश्रजी ने अपने काव्य में तत्सम शब्दों का प्रयोग किया है। कवि ने अपने काव्य में परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया है। चित्रात्मकता आपकी भाषा की प्रमुख विशेषता पायी जाती है। आपकी भाषा में कहीं-कहीं उर्दू-फारसी के शब्दों का प्रयोग स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भाषा-सौष्ठव की गहराई पायी जाती है। कवि की रचनाएँ प्रसाद, ओज तथा माधुर्य गुण से परिपूर्ण हैं। भाषा लक्षणा तथा व्यंजना शब्द शक्ति से पूर्ण है।

(2) शैली-मिश्रजी का काव्य गेयतात्मकता का श्रेष्ठ उदाहरण है। काव्य में संगीतात्मकता भी पायी जाती है। संगीत की प्रधानता तथा गेयता के कारण ही मिश्रजी की कविताएँ मंच पर लोकप्रियता को प्राप्त हुई। प्रत्येक घर में उनके गीतों को बड़े ही चाव से गुनगुनाया जाता है। मिश्रजी की कविता में अनुपम प्रवाह,सहज माधुर्य तथा अदभुत लालित्य है। प्रतीक तथा बिम्ब विधान का प्रयोग स्थान-स्थान पर मिलता है। मिश्रजी की शैली में गीति काव्य का नवीनतम विकास प्राप्त होता है।

(3) छन्द योजना कवि ने छोटे-छोटे छन्दों का प्रयोग किया है। उनका काव्य नवीन प्रकार के छन्द,धुने तथा सुरों का एक विशाल सागर है। मिश्रजी ने गीत की नवीनतम् परम्परा को जन्म दिया है। कवि स्वच्छन्द प्रवाह का पोषक है। उनका विचार है कि छन्दबद्धता स्वाभाविकता को समाप्त कर देती है।

मिश्रजी ने तुकान्त तथा अतुकान्त दोनों प्रकार के छन्दों में गीत लिखे हैं। ‘गीतम’ सर्वाधिक लयात्मक कृति है। कवि ने जन-जन की वाणी को छन्दोबद्ध किया है। लयात्मकता, गतिशीलता,प्रवाहिकता आपके छन्दों की प्रमुख विशेषता है।

(4) अलंकार योजना मिश्रजी ने अपने काव्य में लगभग सभी प्रकार के अलंकारों का प्रयोग किया है। अलंकार साधन के रूप में प्रयुक्त किये हैं; साध्य के रूप में नहीं। परम्परागत अलंकारों का प्रयोग भी कम किया है। यमक, अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, प्रतीप तथा विरोधाभास आदि अलंकार ढूँढ़ने पर यत्र-तत्र मिल जाते हैं। प्रकृति चित्रण में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया है।

  • साहित्य में स्थान

मिश्रजी छायावादोत्तर प्रमुख गीतकार हैं। उन्होंने 1940 से काव्य रचना का प्रयास किया। कवि को अपने देश की सभ्यता तथा संस्कृति से विशेष लगाव है। वे ग्रामीण संस्कृति के उपासक थे। वे देश की समसामयिक समस्याओं, साम्प्रदायिक एकता के समर्थक हैं। वे कुशल तथा लोकप्रिय गीतकार हैं। वे जनसाधारण के मनोबल में वृद्धि करते हैं। उनका विचार है कि उत्साह और आत्मबल को अपनायें तो निश्चय ही तूफान भी अपनी दिशा परिवर्तित कर लेंगे। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण मिश्रजी का हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान है। वे माँ भारती के सच्चे अर्थों में सपूत हैं।

महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न
[2010]

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में मीराबाई की रचना है
(अ) रसिक प्रिया, (ब) राग गोविन्द, (स) साहित्य लहरी, (द) मदनाष्टक।

2. केशवदास का काल है
(अ) भक्तिकाल, (ब) आदिकाल, (स) रीतिकाल, (द) आधुनिक काल।

3. सूरदास के साहित्य की भाषा है
(अ) अवधी, (ब) ब्रजभाषा, (स) खड़ी बोली, (द) उर्दू।

4. मैथिलीशरण गुप्त ने काव्य की रचना की है
(अ) अवधी में, (ब) ब्रज में, (स) खड़ी बोली में, (द) मालवी में।

5. रत्नाकर का देहावसान हुआ
(अ) हरिद्वार में, (ब) कानपुर में, (स) फतेहपुर में, (द) प्रयाग में।

6. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जन्म हुआ
(अ) सन् 1921 में, (ब) सन् 1897 में, (स) सन् 1905 में, (द) सन् 1895 में।

7. श्रीकृष्ण सरल के लेखन का विषय है
(अ) राष्ट्रवाद एवं क्रान्तिकारी. (ब) छायावाद, (स) भक्तिपूर्ण, (द) रहस्यवाद।

8. जयशंकर प्रसाद के पिता का नाम था
(अ) यायावर, (ब) रामरख, (स) सुंघनी साहू, (द) ब्रजनाथ।

9. ‘अनाम तुम आते हो’ के रचयिता हैं
(अ) घनानन्द, (ब) जयशंकर प्रसाद, (स) केशव देव, (द) भवानी प्रसाद मिश्र।

10. कबीर की भाषा को कहा जाता है
(अ) ब्रज भाषा, (ब) बुन्देलखण्डी भाषा, (स) सधुक्कड़ी भाषा, (द) परिष्कृत भाषा।
उत्तर-
1.(ब), 2. (स), 3.(ब), 4. (स), 5. (अ), 6. (ब), 7.(अ), 8. (स), 9.(द), 10. (स)।

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  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. बिहारी की प्रसिद्ध रचना ……….. है।
2. तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली’ ………. परम्परा की उत्कृष्ट रचना है।
3. मैथिलीशरण गुप्त के पिता का नाम ……….. था।
4. ‘पर आँखें नहीं भरौं’ ………. की प्रसिद्ध रचना है।
5. आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री का जन्म …………. हुआ।
6. निराला का बचपन बंगाल की …… धरती पर बीता।
7. मुक्तिबोध को …………. विषमताओं के कारण अपना अध्ययन बीच में ही रोकना पड़ा।
8. अज्ञेय का पूरा नाम …………. है।
9. वीरेन्द्र मिश्र …………. परम्परा के विशिष्ट कवि माने जाते हैं।
10. मीरा का विवाह उदयपुर के महाराज …………. से सम्पन्न हुआ।
11. ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता …………. हैं। [2009]
12. ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ …………. की रचना है। [2009]
13. श्रीकृष्ण के प्रति ……….. का दाम्पत्य भाव है। [2009]
14. ‘सूर्य का स्वागत’ …………. की रचना है। [2009]
15. ‘जहाँगीर जस चन्द्रिका’ के रचयिता …………. हैं। [2009]
16. मीराबाई ……… की कवयित्री हैं। [2009]
17. …………. को ‘हृदयहीन कवि’ कहा जाता है। [2009]
18. ………. वात्सल्य के कुशल चितेरे हैं। [2009]
19. काव्य में सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग ……… ने किया। [2009, 14]
उत्तर-
1. सतसैया, 2. मुक्तक काव्य, 3. सेठ रामचरण शुक्ल, 4. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, 5. कोलकाता, 6. शस्य-श्यामला, 7. आर्थिक, 8. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, 9. नवगीत, 10. भोजराज, 11. केशवदास, 12. गजानन माधव मुक्तिबोध’,13. मीरा,14. दुष्यन्त कुमार,15. केशवदास,16. कृष्णभक्ति शाखा,17. केशव,18. सूरदास,19. कबीरदास।

  • सत्य/असत्य

1. मीरा की भक्ति-भावना हृदय से स्फूर्त है।
2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार केशवदास का जन्मकाल सन् 1555 ई.माना गया है।
3. सूरदास का उद्धव प्रसंग’ भक्तिपूर्ण रचना है।
4. गोपाल सिंह नेपाली के पिता राय बहादुर ‘गोरखा रायफल’ में सैनिक थे।
5. ‘सुजान’ को श्रृंगार पक्ष में नायक और भक्ति पक्ष में दुर्गा मान लेना उचित होगा।
6. जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ ने क्वीन्स कॉलेज इलाहाबाद से बी.ए. पास किया।
7. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आधुनिक युग के ऊर्जावान कवि हैं। [2014]
8. श्रीकृष्ण सरल कहते हैं कि देश की सम्पूर्ण समृद्धि का भवन शहीदों के उत्सर्ग की नींव पर खड़ा है।
9. ‘कामायनी’ के रचयिता सुमित्रानन्दन पन्त हैं।
10. भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी नगर में हुआ था।
11. कबीर प्रेमाश्रयी शाखा के कवि हैं। [2009]
12. केशवदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि हैं। [2009]
13. घनानन्द रीतिसिद्ध कवि हैं। [2009]
14. मीराबाई रामभक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। [2009]
15. केशव रीतिमुक्त कवि हैं। [2012]
उत्तर-
1. सत्य, 2. सत्य, 3. असत्य, 4. सत्य,5. असत्य, 6. असत्य, 7. सत्य,8. सत्य, 9. असत्य, 10. असत्य, 11. असत्य,12. असत्य, 13. सत्य, 14. असत्य, 15. असत्य। सही जोड़ी मिलाइए

I. ‘क’
(1) मीराबाई की रचना – (अ) सुजान
(2) केशवदास – (ब) भक्तिकाल
(3) सूरदास का काल – (स) सन् 1903 में
(4) गोपाल सिंह नेपाली का जन्म – (द) रामचन्द्रिका
(5) घनानन्द की प्रेमिका [2012] – (इ) गीत गोविन्द की टीका
उत्तर-
(1), → (इ),
(2) → (द),
(3) → (ब),
(4) → (स),
(5) → (अ)।

II. ‘क’
(1) कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है [2009] – (अ) सूरदास
(2) बाललीला वात्सल्य के चितेरे [2009] – (ब) छायावाद
(3) जयशंकर प्रसाद – (स) केशवदास
(4) तुलसीदास – (द) मैथिलीशरण गुप्त
(5) साकेत [2014] – (इ) सन्त कवि
उत्तर-
(1) → (स),
(2) → (अ),
(3) → (ब),
(4) → (इ),
(5) → (द)।

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III.
(1) काव्य में सर्वाधिक छंदों का प्रयोग किया है [2009] – (अ) मीरा ने
(2) काव्य में भाव-विह्वलता कूट-कूट कर भरी है [2009] – (ब) केशव ने
(3) राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले कवि हैं [2009] – (स) घनानन्द
(4) रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि हैं [2009] – (द) जगन्नाथदास रत्नाकर
(5) ‘उद्धव प्रसंग’ नामक कविता के रचयिता हैं [2009] – (इ) गोपाल सिंह नेपाली
उत्तर-
(1) → (ब),
(2) → (अ),
(3) → (इ),
(4) → (स),
(5) → (द)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
कबीर ने अद्वैत से क्या अर्थ ग्रहण किया?
उत्तर-
ब्रह्म एक है द्वितीय नहीं।

प्रश्न 2.
बिहारी किस काल के कवि थे?
उत्तर-
रीतिकाल।

प्रश्न 3.
“विनय पत्रिका’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
तुलसीदास।

प्रश्न 4.
मैथिलीशरण गुप्त ने किस भाषा में काव्य रचना की?
उत्तर-
खड़ी बोली में।

प्रश्न 5.
किस कवि की शैली माधुर्य, प्रसाद और ओज गुणों से सम्पन है?
उत्तर-
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’।

प्रश्न 6.
विष्णुकान्त शास्त्री का ‘उपमा कालिदासस्य’ किस भाषा से किस भाषा में अनूदित है-
उत्तर-
बांग्ला से हिन्दी में।

प्रश्न 7.
छायावाद के प्रमुख स्तम्भ और आधुनिक काव्य में क्रान्ति के अग्रदूत किस कवि को माना जाता है?
उत्तर-
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।

प्रश्न 8.
‘काठ का सपना’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
गजानन माधव मुक्तिबोध’।

प्रश्न 9.
प्रयोगवाद किस कवि की सूझ की उपज है?
उत्तर-
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

प्रश्न 10.
‘वाणी के कर्णधार’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
वीरेन्द्र मिश्र।

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प्रश्न 11.
सूरदास के पदों की भाषा कौन-सी है? [2009]
उत्तर-
ब्रजभाषा।

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MP Board Class 12th Special Hindi भाषा-बोध प्रश्नोत्तर

MP Board Class 12th Special Hindi भाषा-बोध प्रश्नोत्तर

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय

प्रश्न
1. वाक्य के प्रमुख गुण होते हैं
(अ) एक, (ब) दो, (स) तीन, (द) चार।

2. ‘वे सज्जन पुरुष आये हैं’ का शुद्ध रूप है
(अ) वह सज्जन पुरुष आया है, (ब) वह सज्जन आया है, (स) वे सज्जन आया है, (द) वे सज्जन आये हैं।

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3. सही वर्तनी है
(अ) परन्तु, (ब) परतुं, (स) पंरतु, (द) परतु।

4. सही वर्तनी है [2013]
(अ) रिचा, (ब) रीचा, (स) ऋचा, (द) ऋिचा।

5. सही शब्द है [2015]
(अ) आशीवाद, (ब) आर्शीवाद, (स) आशिर्वाद, (द) आशीर्वाद।

6. सही शब्द है
(अ) उज्ववल, (ब) उज्ज्वल, (स) उज्बवल, (द) उजव्वल।

7. ‘हमें पानी दो’ का शुद्ध रूप है [2016]
(अ) हमें पानी चाहिए, (ब) हमें पानी पीना है, (स) मुझे पानी दो, (द) मुझे पानी पीना है।

8. निम्नलिखित में से ‘विस्मयादिबोधक चिह्न’ है
(अ) ?, (ब) 1, (स) ;, (द)!.

9. निम्नलिखित में से ‘अर्द्ध विराम’ का चिह्न है
(अ) ?, (ब)।, (द)!.

10. (“) चिह्न है
(अ) पुनरुक्ति बोध चिह्न, (ब) लाघव चिह्न, (स) आदेश चिह्न, (द) हंस पद।

11. रचना के अनुसार वाक्य-भेद के होते हैं
(अ) दो प्रकार, (ब) तीन प्रकार, (स) सात प्रकार, (द) आठ प्रकार।

12. ‘आप दिल्ली जायेंगे’ है, एक
(अ) मिश्रित वाक्य, (ब) सरल वाक्य, (स) नकारात्मक वाक्य, (द) प्रश्नवाचक वाक्य।

13. ‘वह अच्छा खेला, परन्तु हार गया है, एक
(अ) संयुक्त वाक्य, (ब) सरल वाक्य, (स) नकारात्मक वाक्य, (द) प्रश्नवाचक वाक्य।

14. ‘भाषा’ शब्द की मूल क्रिया है
(अ) भाष, (ब) भष, (स) भोष, (द) भए।

15. मध्य प्रदेश में रीवा, सतना, सीधी, शहडोल इत्यादि की प्रमुख बोली है- [2014]
(अ) मालवी, (ब) निमाड़ी, (स) ब्रज, (द) बघेली।

16. राष्ट्रभाषा के लिए प्रयुक्त किये जाने वाला शब्द है
(अ) राज्यभाषा, (ब) सम्पर्क भाषा, (स) मातृभाषा, (द) विभाषा।

17. ‘आसन डोलना’ मुहावरे का अर्थ है
(अ) ऊपर से नीचे आना, (ब) नीचे से ऊपर जाना, (स) चंचल होना, (द) एक जगह से दूसरी जगह जाना।

18. ‘सब धान बाईस पसेरी’ का अर्थ है
(अ) बहुत सस्ता होना, (ब) बहुत महँगा होना, (स) अधिक से सुविधा, (द) अच्छे-बुरे को समान समझना।

19. ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ का अर्थ है
(अ) कठोर स्वभाव, (ब) कपटपूर्ण व्यवहार, (स) झूठा दिखावा, (द) प्रचार करना।

20. ‘तन पर नहीं लत्ता पान खाए कलकत्ता’ का अर्थ है
(अ) बुरी आदत में पड़ना, (ब) बहुत गरीब, (स) झूठा दिखावा, (द) प्रचार करना।

21. ‘शत्रुता’ शब्द का विपरीत अर्थ है [2010]
(अ) मधुरता, (ब) मित्रता, (स) सुन्दरता, (द) मनुष्यता।

22. “कपड़ा’ शब्द का पर्यायवाची क्या है? [2017]
(अ) वसन, (ब) कनक, (स) पाहन, (द) पावन।
उत्तर-
1. (स), 2. (द), 3. (अ), 4.(स), 5. (द), 6. (ब), 7. (स), 8.(द), 9. (स), 10. (अ), 11. (ब), 12. (ब), 13. (अ), 14. (अ), 15. (द), 16. (ब), 17. (स), 18. (द), 19. (ब), 20. (स),
21. (ब), 22. (अ)।

  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. क्या भोपाल सुन्दर शहर है …
2. आह ……..” दर्द असहनीय है।
3. रचना के आधार पर वाक्य ……… प्रकार के होते हैं। [2014]
4. ‘एक पंथ … ‘ प्रसिद्ध मुहावरा है।
5. ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ का अर्थ …… है। [2016]
6. ‘दाल न गलना’ मुहावरे का अर्थ … है। [2017]
7. ‘आम के आम …’ प्रचलित लोकोक्ति है।
8. ‘अनेकों’ का शुद्ध …. होता है।
9. माधुर्यता का शुद्ध रूप …… है।
10. ‘नलनी’ का शुद्ध रूप ……..” है।
11. ‘अनुसुइया’ का शुद्ध रूप ………. है।
12. ‘सामर्थ’ का शुद्ध रूप ……… है।
13. ‘प्रेयसि’ का शुद्ध रूप ……..” है।
14. ‘यदि वह आता तो मैं चला जाता यह वाक्य ……… वाक्य है। [2010]
15. एक भाषा-क्षेत्र में कई ……… होती हैं।
16. जब बोली किसी कारण से महत्त्व प्राप्त कर लेती है तब वह ……” कहलाती है। [2015]
17. प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत ……..होती है।
18. राष्ट्रभाषा के लिए ……… भाषा शब्द भी प्रयुक्त होता है।
19. विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को ……… भी कहते हैं।
20. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ …. है। [2012]
उत्तर-
1. ?, 2. !, 3. तीन, 4. दो काज, 5. आवश्यकता से कम वस्तु, 6. सफल न होना, 7. गुठलियों के दाम, 8. अनेक, 9. माधुर्य, 10. नलिनी, 11. अनुसूया, 12. सामर्थ्य, 13. प्रेयसी, 14. सन्देहवाचक, 15. उप-बोलियाँ, 16. भाषा, 17. राष्ट्र भाषा, 18. सम्पर्क, 19. पल्लवन, 20. कठिन कार्य करना।

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  • सत्य/असत्य

1. शब्दों का कोई भी समूह वाक्य कहलाता है। [2014]
2. यह (,) अल्प विराम का चिह्न है।
3. विस्मय के लिए (!) विराम चिह्न का प्रयोग होता है।
4. ‘नाक रगड़ना’ का अर्थ ‘खुशामद करना है’।
5. ‘चिराग तले अँधेरा’ का अर्थ है-‘चिराग के नीचे अँधेरा’। [2011]
6. ‘कान भरना’ का अर्थ ‘चुगली करना है।
7. काला अक्षर भैंस बराबर का अर्थ साक्षर होता है। [2015]
8. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ ‘खीर खाना है’।
9. ‘उपर्युक्त टिप्पणी संगत है।’ शुद्ध वाक्य है।
10. ‘क्या आप खाना खा लिये हैं।’ वाक्य अशुद्ध है।
11. ‘महत्त्व’ शब्द की वर्तनी शुद्ध है।
12. ‘कवियत्री’ शुद्ध वर्तनी में नहीं है।
13. ‘क्या मधु आयी थी?’ एक प्रश्नवाचक वाक्य है।
14. ‘मेरा लड़का बुद्धिमान है’ का निषेधवाचक वाक्य ‘मेरा लड़का मूर्ख नहीं है।
15. भाषा का सम्बन्ध मनुष्य की ध्वनियों से होता है। [2009]
16. राष्ट्र भाषा को अंग्रेजी में ऑफिशियल लैंग्वेज’ कहते हैं। [2009]
17. हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है।
18. मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ समान नहीं हैं।
19. ‘अपने मुँह मियाँ मिठू बनना’ का अर्थ है-अपने मुँह को मिठू जैसा बनाना। [2010]
20. विचार एवं भाव-विस्तार, आलोचना,टीका-टिप्पणी या व्याख्या से भिन्न है।
21. गगन का पर्यायवाची वसुंधरा है। [2016]
उत्तर-
1. असत्य, 2. सत्य, 3. सत्य, 4. सत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. असत्य, 8. असत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. सत्य, 12. सत्य, 13. सत्य, 14. सत्य, 15. सत्य, 16. असत्य, 17. सत्य, 18. सत्य, 19. असत्य, 20. सत्य, 21. असत्य।

  • सही जोड़ी मिलाइए

I.
1. तुम घर मत जाओ। [2016] – (अ) विस्मयादिबोधक
2. ‘हे राम ! क्या-क्या सहना पड़ेगा।’ वाक्य है – (ब) आज्ञावाचक वाक्य
3. ‘दाँत खट्टे करना’ का अर्थ है – (स) वाक्य
4. ‘द्वन्द’ की शुद्ध वर्तनी है – (द) परास्त करना
5. पूर्ण विचार व्यक्त करने वाला शब्द [2009] – (इ) द्वन्द्व
उत्तर-
1.→ (ब),
2.→ (अ),
3.→ (द),
4.→ (इ),
5.→ (स)।

II.
1. तुम यहाँ आओ। [2017] – (अ) आज्ञावाचक
2. ‘एक मात्र सहारा’ के लिए मुहावरा है – (ब) बिखर जाना
3. ‘तीन तेरह होना’ का अर्थ है – (स) अन्धे की लकड़ी
4. ब्रज [2014] – (द) दर्शनशास्त्री
5. दर्शनशास्त्र को जानने वाला [2010, 15] – (इ) बोली
उत्तर-
1. → (अ),
2. → (स),
3. → (ब),
4. → (इ),
5. → (द)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
जिस वाक्य में एक ही संज्ञा और क्रिया का प्रयोग होता है, उसे कौन-सा वाक्य कहते हैं? [2009]
उत्तर-
सरल या साधारण वाक्य।

प्रश्न 2.
जिस वाक्य में एक उद्देश्य तथा एक विधेय होता है, वह कैसा वाक्य कहलाता [2013]
उत्तर-
सरल या साधारण वाक्य।

प्रश्न 3.
‘जिसका कोई शत्रु न हो’ के लिए एक शब्द क्या है? [2011]
उत्तर-
अजातशत्रु।

प्रश्न 4.
‘प्रमाणिक’ का शुद्ध रूप क्या होगा?
उत्तर-
प्रामाणिक।

प्रश्न 5.
‘लक्ष्मीबाई एक तेजस्वी नारी थी’-यह वाक्य शुद्ध है अथवा अशुद्ध? [2011]
उत्तर-
अशुद्ध।

प्रश्न 6.
‘वह गुणवान महिला है’ का शुद्ध वाक्य क्या होगा? [2014]
उत्तर-
वह गुणवती महिला है।

प्रश्न 7.
‘राम घर पर है’ का सन्देहवाचक रूप क्या होगा?
उत्तर-
शायद राम घर पर है।

प्रश्न 8.
‘बच्चे सुन्दर चित्र बना रहे हैं’ का आज्ञावाचक रूप क्या होगा?
उत्तर-
बच्चो ! सुन्दर चित्र बनाओ।

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प्रश्न 9.
जब बोली किन्हीं कारणों से महत्त्व प्राप्त कर लेती है, तो क्या कहलाने लगती है?
उत्तर-
भाषा।

प्रश्न 10.
घर के सदस्य अपने विचारों का आदान-प्रदान किस भाषा में करते हैं? [2012]
उत्तर-
मातृभाषा में।

प्रश्न 11.
बघेली बोली किस क्षेत्र में बोली जाती है? [2016]
उत्तर-
बधेली बोली मध्य प्रदेश के रीवा,सतना, सीधी, बालाघाट, शहडोल इत्यादि क्षेत्रों में बोली जाती है।

प्रश्न 12.
मालवी बोली मध्य प्रदेश के किन-किन जिलों में बोली जाती है? कोई दो जिलों के नाम लिखिए। [2017]
उत्तर-
(1) देवास,
(2) रतलाम।

प्रश्न 13.
छोटे-छोटे वाक्यांश क्या कहलाते हैं?
उत्तर-
मुहावरे।

प्रश्न 14.
‘उल्टी गंगा बहाना’ का क्या अर्थ है? [2011]
उत्तर-
विपरीत काम करना।

प्रश्न 15.
‘गढ़े मुर्दे उखाड़ना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
पुरानी बातें याद करना।

प्रश्न 16.
विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को और क्या कहते हैं?
उत्तर-
पल्लवन।

प्रश्न 17.
जिसकी कल्पना न की जा सके। [2010]
उत्तर-
कल्पनातीत।

(ख) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए [2015]
कुसंग, अज्ञ, अभ्यस्त।
उत्तर-
कुसंग = सत्संग,अज्ञ = विज्ञ,अभ्यस्त = अनअभ्यस्त।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों को तत्सम में बदलिए। [2015]
पाथर, औगुन, मच्छी।
उत्तर-
पाथर = प्रस्तर, औगुन = अवगुण, मच्छी = मत्स्य।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों के लिए एक शब्द लिखिए [2015]
(i) जिसके आने की तिथि मालूम न हो।
(ii) आयुर्वेदिक औषधियों से इलाज करने वाला।
(iii) कविताएँ रचने वाला।
उत्तर-
(i) अतिथि,
(ii) वैद्य,
(iii) कवि।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
(1) आप लोग अपनी बात कहें।
(2) आपको चलना हो तो चलिए।
उत्तर-
(1) आप अपनी बात कहें।
(2) आपको अगर चलना है तो चलिए।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अवतरण को उचित विराम-चिह्न का प्रयोग करते हुए पुनः लिखिए
कैसा अकेला-सा एकटक देखता रहता है जानते हो क्यों नहीं जानते बात यह है कि एक बार रजनीबाला अपने प्रियतम प्रभात से मिलने चली गहरे नीले कपड़े पहनकर जिसमें सोने के तारे टँके थे?
उत्तर-
कैसा अकेला-सा एकटक देखता रहता है। जानते हो क्यों? नहीं जानते? बात यह है कि एक बार रजनीबाला अपने प्रियतम प्रभात से मिलने चली, गहरे नीले कपड़े पहनकर, जिसमें सोने के तारे टँके थे।

प्रश्न 6.
निम्न अवतरण में उचित विराम चिह्न लगाइए राम अरे भाई तुम बैठे-बैठे क्यों रो रहे हो श्याम लज्जित होकर अभी एक पत्र से पता चला है कि मैं परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा राम क्यों निराश होते हो विश्वास रखो तुम निश्चय ही भविष्य में सफल होगे।
उत्तर-
राम-“अरे ! भाई तुम बैठे-बैठे क्यों रो रहे हो?” श्याम (लज्जित होकर)-“अभी एक पत्र से पता चला है कि मैं परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा।” राम-“क्यों निराश होते हो? विश्वास रखो, तुम निश्चय ही भविष्य में सफल होगे।”

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प्रश्न 7.
निम्न अवतरण में उचित विराम चिह्न लगाइए हमदर्दी क्या ऐसे कहकर दिखायी जाती है हाय-हाय बेचारी के पिता को जेल हो गयी आपस में दबी-दबी जबान से कहती इतने बड़े लोग भी चोरी करते हैं तभी ठाठ थे आशाजी के मेरा जी होता कि चीख-चीख कर सबसे कहूँ कि पप्पा ने कुछ नहीं किया।
उत्तर-
हमदर्दी क्या ऐसे कहकर दिखायी जाती है। “हाय-हाय ! बेचारी के पिता को जेल हो गयी।” आपस में दबी-दबी जबान से कहती है-“इतने बड़े लोग भी चोरी करते हैं? तभी ठाठ थे आशाजी के !” मेरा जी होता, चीख-चीख कर सबसे कहूँ कि पप्पा ने कुछ नहीं किया।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों को उनके समक्ष दिये गये निर्देश के अनुसार परिवर्तित कीजिये
(1) सत्य की सदा जीत होती है। (प्रश्नवाचक)
(2) यह शाम कितनी सुहावनी है? (विस्मयबोधक)
उत्तर-
(1) क्या सत्य की सदा जीत होती है?
(2) अहा ! यह शाम कितनी सुहावनी है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिए
(1) परिश्रमी व्यक्ति की सभी प्रशंसा करते हैं।
(2) वह विद्यालय आकर शिक्षक से मिला।
उत्तर-
(1) जो व्यक्ति परिश्रमी होता है, उसकी सभी प्रशंसा करते हैं।
(2) वह विद्यालय आया और शिक्षक से मिला।

प्रश्न 10.
निर्देशानुसार वाक्यों का परिवर्तन करो
(1) हमें चाहिए केवल बातें ही न बनाएँ अपितु कुछ करके भी दिखाएँ। (सामान्य वाक्य)
(2) सच्चरित्र व्यक्ति को सभी चाहते हैं। (मिश्र वाक्य में)
उत्तर-
(1) बातें न बनाते हुए हमें कुछ करके भी दिखाना चाहिए।
(2) जो व्यक्ति सच्चरित्र होता है,उसे सभी चाहते हैं।

प्रश्न 11.
हिन्दी की अतिरिक्त संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त दो भाषाओं के नाम लिखिए। उत्तर-(1) मराठी,(2) गुजराती। प्रश्न 12. विभाषा किसे कहते हैं?
उत्तर-
यह बोली का कुछ विकसित प्रारूप है। भाषा की अपेक्षा छोटे क्षेत्रों में प्रयोग में लायी जाती है। जैसे-अवधी तथा ब्रजभाषा।

प्रश्न 13.
मध्य प्रदेश की दो प्रमुख बोलियों के नाम लिखिए। (2009, 12)
उत्तर-
(1) छत्तीसगढ़ी,
(2) मालवी।

प्रश्न 14.
बुन्देली एवं मालवी मध्य प्रदेश के किन-किन भागों में बोली जाती है? [2009]
उत्तर-
बुन्देली-दतिया, टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, जबलपुर। मालवी-देवास, इन्दौर, धार,उज्जैन,रतलाम।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(1) खाक छानना,
(2) पट्टी पढ़ाना।
उत्तर-
(1) नौकरी के लिए वह खाक छानता फिर रहा है।
(2) आपने राकेश को क्या पट्टी पढ़ा दी है, वह घर जाने का नाम ही नहीं लेता है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित लोकोक्तियों के अर्थ लिखिए
(1) आँख के अंधे नाम नयनसुख,
(2) नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
उत्तर-
(1) आंख के अंधे नाम नयनसुख-गुण के विपरीत नाम।
(2) नाच न जाने आँगन टेढ़ा-काम न जानना और बहाना बनाना।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखिए
(1) अपना उल्लू सीधा करना,
(2) उन्नीस-बीस होना।
उत्तर-
(1) अपना उल्लू सीधा करना-अपना काम निकालना।
(2) उन्नीस-बीस होना-मामूली अन्तर।

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प्रश्न 18.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(1) गाल बजाना,
(2) जान पर खेलना।
उत्तर-
(1) गाल बजाने से कुछ नहीं होता, काम तो करने से ही होता है।
(2) भारतीय सैनिक देश की रक्षा के लिए जान पर खेल जाते हैं।

प्रश्न 19.
‘नाक नचाना’ का अर्थ बताते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिये
उत्तर-
नाक नचाना (तंग करना)-चिन्मय अपनी माँ को सारे दिन नाक नचाता है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित लोकोक्ति का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए आगे नाथ न पीछे पगहा।
उत्तर-
तुम्हारे तो आगे नाथ न पीछे पगहा, इसीलिए घूमते रहते हो।

प्रश्न 21.
‘कान देना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
शिक्षकों की बातों पर कान देना आवश्यक है।

प्रश्न 22.
‘सिर पीटना का वाक्य में प्रयोग करके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
अब सिर पीटने से क्या होता है,सास माल तो चला गया।

प्रश्न 23.
‘चाँदी का जूता मारना’ लोकोक्ति का सही अर्थ बताइये।
उत्तर-
चाँदी का जूता मारना-पैसे के बल पर काम कराना।

प्रश्न 24.
‘आग में घी डालना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिये।
उत्तर-
श्याम ने आग में घी डालकर झगड़ा बढ़ा दिया नहीं तो दोनों शान्त हो रहे थे।

प्रश्न 25.
भाव विस्तार से क्या आशय है?
उत्तर-
सूत्र रूप में कही गई बात को विस्तार से समझाना, भाव विस्तार कहलाता है।

प्रश्न 26.
भाव विस्तार की क्या उपयोगिता है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
भाव विस्तार से गूढ कथन का अर्थ उजागर होता है। उस कथन के सभी पक्ष समझ में आ जाते हैं।

(ग) लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों में निहित अशुद्धियों को दूर कर उनके व्याकरण-सम्मत शुद्ध रूप लिखिए
(1) कर्मचारी शासन के अधीनस्थ हैं।
(2) मैने खेलते हुए दो गायों को आते देखा।
(3) उसने उधर देखा और बोला।
उत्तर-
(1) कर्मचारी शासन के अधीन हैं।
(2) जब मैं खेल रहा था, तब मैंने दो गायों को आते देखा।
(3) उसने उधर को देखा और बोला।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिये
(1) तुमने अपना सभी काम समय पर करना चाहिए।
(2) आयातित वस्तु गिनती कर रखनी चाहिए।
(3) सुन्दरी बालिका से गाने को कहो।।
(4) यह परिमार्जित है, और व्याकरणसम्मत है।
उत्तर-
(1) तुम्हें अपना सभी काम समय पर करना चाहिए।
(2) आयातित वस्तुएँ गिनकर रखनी चाहिए।
(3) सुन्दर बालिका से गाने को कहा।
(4) यह परिमार्जित और व्याकरणसम्मत है।

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प्रश्न 3.
निम्नांकित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
(1) महादेवी वर्मा विद्वान् महिला थीं।
(2) गाँधीजी पक्के भक्त थे ईश्वर के।
(3) लड़के ने काम करके स्कूल गया।
(4) अनेक सिनेमा के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी।
उत्तर-
(1) महादेवी वर्मा विदुषी महिला थीं।
(2) गाँधीजी ईश्वर के पक्के भक्त थे।
(3) लड़के काम करके स्कूल गये।
(4) सिनेमा के अनेक कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांश को समचित विराम चिह्न का प्रयोग करते हए लिखिए मेरी उपेक्षा से उस विदेशी को चोट पहुंची यह सोचकर मैंने अपनी नहीं को और अधिक कोमल बनाने का प्रयास किया मुझे कुछ नहीं चाहिए भाई चीनी भी विचित्र निकला हमको भाय बोला है तब जरूर लेगा जरूर हाँ होम करते हाथ जला वाली कहावत हो गयी विवश कहना पड़ा देखू तुम्हारे पास है क्या चीनी बरामदे में कपड़े का गट्ठर उतारता हुआ कह चला भोत अच्छा सिल्क लाता है सिस्तर चाइना सिल्क क्रेप बहुत कहने सुनने के उपरान्त दो मेजपोश खरीदना आवश्यक हो गया।
उत्तर-
मेरी उपेक्षा से उस विदेशी को चोट पहुँची, यह सोचकर मैंने अपनी ‘नहीं’ को और अधिक कोमल बनाने का प्रयास किया, “मुझे कुछ नहीं चाहिए भाई !” चीनी भी विचित्र निकला, “हमको भाय बोला है, तब जरूर लेगा-जरूर हाँ?’ ‘होम करते हाथ जला’ वाली कहावत हो गयी-विवश कहना पड़ा-‘देखू तुम्हारे पास है क्या?’ ‘चीनी बरामदे में कपड़े का गठ्ठर उतारता हुआ कह चला-“भोत अच्छा सिल्क लाता है सिस्तर ! चाइना सिल्क, क्रेप …… ” बहुत कहने-सुनने के उपरान्त दो मेजपोश खरीदना आवश्यक हो गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश को विराम-चिह्नों का समुचित प्रयोग करते हुए लिखिए छाया, यह काव्य बड़ी लगन का फल है कल मैं इसे सम्राट की सेवा में ले जाऊँगा और फिर जब मैं उस सभा में इसे सुनाना आरम्भ करूँगा तब सारी उज्जयिनी की आँखें मेरे ऊपर होंगी महाकाव्य महाकाव्य महाकाव्य उस समय सम्राट गदगद हो जायेंगे और छाया बरसों बाद दनिया पढ़ेगी कवि कुल शिरोमणि शेखर कृत भोर का तारा हा हा हा।
उत्तर-
“छाया ! यह काव्य बड़ी लगन का फल है। कल मैं इसे सम्राट की सेवा में ले जाऊँगा और फिर, जब मैं उस सभा में इसे सुनाना आरम्भ करूँगा, तब ………… तब सारी उज्जयिनी की आँखें मेरे ऊपर होंगी। महाकाव्य ! महाकाव्य !! महाकाव्य !!! उस समय सम्राट गद्-गद् हो जायेंगे और छाया ! बरसों बाद दुनिया पढ़ेगी-कविकुल-शिरोमणि शेखरकृत भोर का तारा हा ! हा !! हा !!!”

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिये
(1) श्याम धनी व्यक्ति है। (नकारात्मक)
(2) भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता। (प्रश्नवाचक)
(3) यह सुहावना प्रातःकाल है। (विस्मयबोधक)
उत्तर-
(1) श्याम निर्धन व्यक्ति नहीं है।
(2) क्या भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता?
(3) अहा ! यह कैसा सुहावना प्रातःकाल है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित वाक्यों को एक मिश्रित वाक्य में रूपान्तरित कीजिये
(1) सब पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं।
(2) वे दूसरों की स्वतन्त्रता में बाधक न हों।
(3) वे राजकीय नियमों का पालन करते रहें।
उत्तर-
सब पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं, जब तक दूसरों की स्वतन्त्रता में बाधक न हों और राजकीय नियमों का पालन करते रहें।।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्य-युग्मों को संज्ञा अथवा विशेषण उपवाक्य में बदलिए
(1) राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नहीं है; उसके रहने वाले एक जाति व सम्प्रदाय के हों।
(2) गाँधीजी ने कहा, हमें सत्य और अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(3) साम्प्रदायिकता बुरी है; मनुष्य-मनुष्य के बीच में वह भेदभाव उत्पन्न करे।
उत्तर-
(1) राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसके रहने वाले एक जाति व सम्प्रदाय के हों।
(2) गाँधीजी ने कहा है कि हमें सत्य और अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(3) वह साम्प्रदायिकता बुरी है जो मनुष्य-मनुष्य के प्रति भेदभाव उत्पन्न करे।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिये
(1) मैं साकेत के कवि को नहीं जानता हूँ। (मिश्रित वाक्य)
(2) धातुओं में सोने से अधिक कीमती कोई धातु नहीं है। (विधिवाचक वाक्य)
उत्तर-
(1) साकेत के कवि कौन हैं,मैं नहीं जानता।
(2) धातुओं में सोना सबसे अधिक कीमती धातु है।

प्रश्न 10.
विभाषा किसे कहते हैं? किन्हीं दो विभाषाओं के नाम लिखिए।
अथवा
विभाषा किसे कहते हैं? विभाषा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। [2009]
उत्तर-
विभाषा-बोली का कतिपय अधिक विकासमान रूप जिसके अन्तर्गत साहित्य का सृजन होता है,उसे विभाषा के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यथा-अवधी एवं ब्रज।

विशेषताएँ-
(1) विभाषा का क्षेत्र बोली से अधिक व्यापक होता है परन्तु भाषा से कम व्यापक होता है।
(2) यह किसी प्रदेश के बड़े हिस्से में सामाजिक व्यवहार या साहित्य में प्रयोग की जाती है।

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प्रश्न 11.
विभाषा एवं बोली में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(1) जब बोली किसी कारण महत्त्व प्राप्त करती है तो उसे भाषा कहा जाता है।
(2) प्रत्येक व्यक्ति की भाषा स्वतन्त्र होती है।
(3) एक भाषा के अन्तर्गत कई उप-बोलियाँ होती हैं।

प्रश्न 12.
मातृभाषा किसे कहते हैं एवं मातृभाषा का ज्ञान होना क्यों आवश्यक है? [2010, 14]
अथवा
मातृभाषा किसे कहते हैं? परिभाषा लिखिए। [2015]
उत्तर-
जिस क्षेत्र विशेष में जो भाषा बोली जाती है तथा बालक अपनी माँ के मुँह से जो सुनता,सीखता है,वही मातृभाषा है। सर्वप्रथम मातृभाषा ही शिशु के इस दुनिया में आँख खोलने के साथ ही कानों में पड़ती है। वास्तव में,मातृभाषा पालने की भाषा है,जो माता-पिता, परिवार और स्थानीय परिवेश में बोली जाती है।

मातृभाषा सीखने और समझने में सरल लगती है। इसके माध्यम से परिवार, समाज, रिश्तेदारों में बातचीत करना सरल होता है और भावों की अभिव्यक्ति सहज होती है। अतः मातृभाषा का ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 13.
राजभाषा किसे कहते हैं? राजभाषा की दो विशेषताएँ लिखिए। [2013]
उत्तर-
राजकीय काम-काज में प्रयोग की जाने वाली भाषा राजभाषा कहलाती है। राजभाषा राज्य के प्रशासनिक कार्यों में अपनाई जाती है। प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को राजभाषा का ज्ञान होना आवश्यक होता है। भारतीय संविधान के अनुसार हिन्दी भारत की राजभाषा है किन्तु जब तक सभी राज्यों को हिन्दी का पूरा ज्ञान न हो तब तक प्रदेश की भाषा के साथ-साथ हिन्दी का अनुवाद स्वीकार्य है।

राजभाषा की विशेषताएँ
(1) राजभाषा किसी भी देश के राजकीय काम-काज की भाषा होती है।
(2) राजभाषा की मान्यता मिलने से उस भाषा का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 14.
राष्ट्रभाषा किसे कहते हैं? [2015]
राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ लिखिए। [2009, 16]
उत्तर-
राष्ट्रभाषा प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत राष्ट्रभाषा होती है। राष्ट्रभाषा में राष्ट्र की संस्कृति, साहित्य और इतिहास की प्रेरणाएँ निहित होती हैं, जो जनजीवन को प्रभावित करती हैं। राष्ट्रभाषा के लिए सम्पर्क भाषा’ शब्द भी प्रयुक्त होता है। राष्ट्रभाषा उसी तरह महत्वपूर्ण होती है, जैसे-राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज अथवा राष्ट्रचिह्न। वह पूरे राष्ट्र की संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी भाषा से उस व्यक्ति,समाज व देश का व्यक्तित्व झलकता है।

राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ
(1) राष्ट्रभाषा विकसित होती है।
(2) यह देश के बहुसंख्यक लोगों की भाषा होती है।
(3) राष्ट्र भाषा को संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त होती है।
(4) देश की अन्य भाषाओं से इसका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

प्रश्न 15.
भाषा एवं विभाषा में कोई दो अन्तर लिखिए। (2000, 01, 02, 11)
उत्तर-
(1) भाषा का क्षेत्र विशद् होता है तथा इसके प्रचलन का क्षेत्र भी व्यापक होता है, जबकि विभाषा प्रान्त विशेष की परिधि तक संकुचित रहती है।
(2) भाषा का प्रयोग राजकार्य में होता है। विभाषा मात्र साहित्य एवं बोलचाल तक सीमित है।

प्रश्न 16.
भाषा और बोली में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2012, 14, 17]
उत्तर-
(1) भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है, जबकि बोली का क्षेत्र सीमित होता है।
(2) भाषा का साहित्य प्रचुरता में लिखित होता है, जबकि बोली का साहित्य अलिखित या न्यून होता है।
(3) भाषा में एक से अधिक बोलियाँ हो सकती हैं, जबकि बोली में भाषाओं का समावेश नहीं होता है।
(4) बोली का प्रयोग बोलचाल में होता है, जबकि भाषा का प्रयोग साहित्य तथा शासकीय कार्यों में होता है।

प्रश्न 17.
मुहावरे और लोकोक्ति में क्या अन्तर है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
ऐसा वाक्यांश, जो सामान्य अर्थ का बोध न कराकर किसी विशेष अर्थ का आभास दे, उसे मुहावरा कहते हैं। लोकोक्तियाँ किसी विशेष घटना या कहानी से निकलकर प्रचलित होती हैं। इनमें लोक अनुभव छिपा होता है।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ बताते हुए वाक्य प्रयोग कीजिए अन्धे की लकड़ी, ईद का चाँद होना, छप्पर फाड़ कर देना, पेट में चूहे कूदना।
उत्तर-
अन्धे की लकड़ी (एक ही सहारा) श्रवण कुमार अपने माता-पिता की अन्धे की लकड़ी थे।
ईद का चाँद होना (बहुत दिनों में दिखना)-श्याम, तुम्हें देखने को आँखें तरस गईं, तुम तो ईद का चाँद हो गये।
छप्पर फाड़कर देना (बिना परिश्रम के अनायास प्राप्ति) भगवान देता है तो छप्पर फाड़कर देता है।
पेट में चूहे कूदना (जोर से भूख लगना)-पेट में चूहे कूद रहे हैं, पहले कुछ खा लें तब काम निपटायेंगे।

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प्रश्न 19.
“सब उन्नतियों का मूल धर्म है” का भाव-विस्तार कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत कथन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का है। उन्होंने देशोपकारिणी सभा में भाषण करते हुए भारतवासियों को राष्ट्र के प्रति सजग किया था। भारतेन्दु जी मानते थे कि सभी प्रकार की उन्नतियों का आधार धर्म होता है। धर्म में समाज गठन की अनेक नीतियाँ हैं। धार्मिक अनुष्ठान, त्यौहार आदि समाज को उन्नत बनाने के लिए हैं। हमारे यहाँ धर्म और समाज सुधार दूध तथा पानी के समान मिले हुए हैं। धर्म समाज सुधार के लिए होता है। धर्म समाज में अनुशासन, व्यवस्था तथा पवित्र भावनाओं का विकास करता है। अतः राष्ट्र,समाज तथा व्यक्ति का हित धर्म के अनुसार कार्य करने में है। मंगलकारी भावना से किए कार्य विकास की ओर ले जाने वाले होते हैं। ऐसे कार्यों से हमारा ध्यान समाज कल्याण तथा विश्व बन्धुत्व पर केन्द्रित होगा। इससे मानव मात्र का मंगल विधान होगा। इसीलिए धर्म को सभी प्रकार की उन्नतियों का मूल आधार माना गया है।

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MP Board Class 12th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

MP Board Class 12th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को ‘पल्लवन’ भी कहते हैं। यह वह क्रिया है, जिसके अन्तर्गत सूत्रों,सूक्तियों,लोकोक्तियों एवं महत्त्वपूर्ण कथन या भाव को विस्तार से प्रस्तुत किया जाता है। यह संक्षेपण की प्रतिगामी प्रक्रिया है।

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भाव-विस्तार करते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है :

  1. सूक्ति का अर्थ पूरी तरह से समझने के लिए उसका ध्यान से एवं विचारपूर्वक वाचन करना चाहिए। यदि सन्दर्भ के साथ ही सूत्र उपलब्ध हो सके तो सन्दर्भ के साथ उस सूत्र के अर्थ सम्बन्धों पर दृष्टि केन्द्रित रखते हुए वाचन करना चाहिए। वाचन के समय सूत्र के अर्थ मुख्य रूप से और शेष पदों के साथ उसके अर्थगत सम्बन्ध पर ध्यान रखना चाहिए।
  2. यह आलोचना. टीका-टिप्पणी या व्याख्या से भिन्न है। इसलिए इसमें निरर्थक सन्दर्भो और उदाहरणों का उल्लेख नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही इसे समास शैली और अलंकृत भाषा में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
  3. भाषा-विस्तार करते समय पुनरावृत्ति और अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए। केवल मूल भाव से सम्बद्ध बातें ही लिखनी चाहिए। जो भी कहा जाये वह सटीक और अपेक्षित हो।
  4. भाव-विस्तार करते समय सुस्पष्ट,सुग्राह्य, सरल और अर्थपूर्ण भाषा का प्रयोग करना चाहिए। छोटे-छोटे वाक्य बनाना चाहिए।
  5. भाव-विस्तार के लिए अन्य पुरुष की वाक्य-रचना का प्रयोग करना चाहिए। सामान्य प्रचलित शब्दों का उपयोग करना चाहिए।

यहाँ भाव-विस्तार के कुछ उदाहरण दिये गये हैं। –

(1) कउड़े की आग के ताप से दिपदिपाते चेहरों की प्रसन्नता अँधेरे में भी खनक जाती है [2009]

सर्दियों के मौसम में दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद लोग शाम को अलाव जलाकर उसकी गरमाई के चारों ओर बैठकर अपनी दिनभर की थकान उतारते हैं तथा वार्तालाप, हँसी-मजाक, समस्याओं के समाधान आदि से उनके चेहरे पर अन्धकार में भी छायी प्रसन्नता, उनकी बोली से स्पष्ट हो जाती है। यह सुख आज के वैज्ञानिक युग में समाप्त हो गया है।

(2) जवारों से पीताभ गेहूँ के पौधे क्या यह संदेश नहीं देते कि सृजन की यात्रा कभी रुकती नहीं [2009]

गेहूँ का पौधा बढ़कर मनुष्य को प्रेरणा देता है कि निर्माण सदैव विकास की ओर जाता है। सृजन को अँधेरे-बन्द कमरों में बन्द नहीं किया जा सकता है। जैसे-छोटे से दीपक की लौ दूर-दूर तक प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार सृजन का प्रकाश फैलता ही जाता है। व्यक्ति का आचरण,शील, विवेक,मेहनत, ईमानदारी,आस्था, निष्ठा आदि गुण सृजन की यात्रा को आगे की ओर ले जाते हैं। आले में अंकुरित गेहूँ के पौधे मनुष्य को यही प्रेरणा देते हैं।

(3) अपने सारे उजाले को लेकर भी क्या वह सूर्य यशोधरा के उस वियोगी सूने दिल के निराशपूर्ण अन्धकार को यत्किंचित् भी दूर कर सकता था

गौतम ने यशोधरा को त्यागकर उनके हृदय को सूना कर दिया है तथा यशोधरा को अब प्रियतम के मिलने की भी आशा नहीं है। ऐसे दुःख रूपी अन्धकार से भरे हृदय को सूरज, जो संसार के अन्धकार को मिटाकर उजाले से भर देता है,यशोधरा के हृदय को सुख रूपी प्रकाश से नहीं भर सकता अर्थात् सूर्य भी यशोधरा के सूने मन में प्रसन्नता का प्रकाश नहीं कर सकता।

(4) इस कालकूट को पीकर भी यशोधरा नील-कण्ठ नहीं हुई, कैलाशवासी शंकर भी यह देखकर लज्जा के मारे सकुचा गये
गौतम ने मानव के लिए चिर-सुख का अमृत ढूँढ़ने के लिए संसार को त्यागा था, तो यशोधरा के हिस्से में चिर-वियोग का हलाहल आया। उस विष को पीकर भी यशोधरा नील कण्ठा नहीं कहलायी। लेखक ने इस तुलना से यह स्पष्ट करना चाहा है कि समुद्र मंथन से अमृत व विष निकला। भगवान शंकर ने देवताओं की भलाई के लिए विष का पान किया और नीलकण्ठ कहलाये। यशोधरा के इस आजीवन त्याग को देखकर भगवान शंकर भी लज्जित हो गये,क्योंकि यशोधरा का त्याग भगवान शंकर के त्याग से बड़ा था।

(5) वह विरक्त तपस्वी न तो भौंरों की गुनगुनाहट ही सुनेगा और न मेघ के साथ भेजे गये सन्देश ही उस योगी तक पहुँच पायेंगे

गौतम इस संसार से उदासीन थे। इस कारण उन्हें भौंरों का मधुर संगीत यानि संसार की मधुर स्वर-लहरी सुनायी नहीं देती है। उन्हें अपना सन्देश भेजने के लिए यशोधरा यदि बादलों को अपना दूत बनाकर भेजती है, तो संन्यासी गौतम उसे भी सुन व समझ नहीं पायेंगे।

गद्य-काव्य की इस पंक्ति के माध्यम से डॉ. रघुवीर सिंह बताते हैं कि उस वैरागी-संन्यासी को संसार का सौन्दर्य तथा रिश्तों के बन्धन कभी नहीं बाँध सकते हैं।

(6) काले मतवाले हाथी पर सवार विद्युत-झण्डियों वाले वर्षाराज को देखते ही इन्द्रधनुष आँखों में छा जाता है
वर्षा ऋतु में आकाश में हाथी के काले रंग जैसे बादल तथा हाथी के विशालकाय जैसे बादल हाथी के समान झूमते हुए आकाश में विचरण करते हैं, उन बादलों के बीच चमकती बिजली हाथी पर सवार के हाथ में ली हुई विजय पताका के समान लहराती है। आकाश में इस दृश्य को देखकर वर्षा के थमने के बाद आकाश में छाये इन्द्रधनुष की याद आ जाती है। दूसरा भाव है कि इस दृश्य से आँखों में प्रसन्नता छा जाती है। यहाँ पर मतवाले हाथी काले-काले बादल हैं,झण्डियाँ बिजली का आकाश में लहराना है और इन्द्रधनुष मन का प्रसन्न होना है।

(7) रीतिकालीन कवियों की जिन्दादिली तो रंगबाजी में ही दिखाई पड़ती है [2016]
रीतिकाल के श्रृंगारी कवि नायिका के सौन्दर्य-वर्णन में रंगों का खुले हृदय से प्रयोग करते हैं। नायिका की एड़ी के लाल रंग को छुड़ाने के लिए नाइन गुलाब के झाँवे को रगड़ती है तो लाल खून ही निकल आता है। ब्रज की गोपियों को संसार,यमुना,कदम्ब-कुंज,घटा,वनस्पतियाँ सभी श्याममय अर्थात् काली ही दिखाई देती हैं। उनका रंग भेद नष्ट हो जाता है।

(8) कविता तो कोमल हृदय की चीज है [2011]
मानव-मन की कोमलतम भावनाओं की अभिव्यक्ति ही कविता है। कोमल, संवेदनशील और भावुक हृदय के भावना-तन्त्र जब झंकृत होते हैं, तब कविता का जन्म होता है। सामान्यजनों की अपेक्षा कवि अधिक संवेदनशील होता है। जीवन के सुख-दुःख के प्रति उसके कोमल हृदय की प्रतिक्रिया कविता के रूप में फूट पड़ती है। उसका कोमल हृदय अनजाने में ही कविता के रूप में बहने लगता है। संवेदनशीलता का गुण कोमल हृदय में ही पाया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि कविता हृदय की वस्तु है। जो व्यक्ति ज्ञान की गरिमा और विचारों से बोझिल होता है, वह कविता की रचना नहीं कर सकता। कठोर हृदय, संवेदन-शून्य तथा अरसिक व्यक्ति कविता-रचना करना तो दूर, उसकी अर्चना-आराधना भी नहीं कर सकता।

(9) आँखों के अन्धे नाम नयनसुख
संसार में नाम की ही महिमा है, क्योंकि व्यक्ति नाम से जाना-पहचाना जाता है। किसी व्यक्ति, वस्तु आदि के गुणों और विशेषताओं के आधार पर ही उसका नाम रखा जाता है। लेकिन यह भी सत्य है कि कभी-कभी व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व और गुणों का परिचायक नहीं होता। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आस-पास मिल जाते हैं, जिसमें व्यक्ति का नाम उसके गुण और प्रकृति के विपरीत होता है। ऐसा व्यक्ति जिसका नाम के अनुरूप व्यक्तित्व नहीं होता, वह प्रायः समाज में हास्य-विनोद का आलम्बन बन जाता है। गुणों के विपरीत नाम की इसी विडम्बनापूर्ण स्थिति को देखकर ही यह कहा जाता है-आँखों के अन्धे नाम नयनसुख।

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(10) दूर के ढोल सुहावने होते हैं
यह कहावत है कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं।’ इसका अभिधा अर्थ यह है कि यदि ढोल पास में बजे तो उसका शोर बड़ा कर्णकटु और कर्कश होता है। किन्तु यही ढोल की ध्वनि दर से आये तो बड़ी कर्णप्रिय होती है। दूर से आती ढोल की थाप सुनकर मानव-मन पुलकित हो जाता है और कल्पना करने लगता है कि कहीं कोई खुशी मनायी जा रही है। विवाह का ढोल है तो वह फौरन सोचता है कि जरूर उस घर में नववधू लाज से सिमटी सुनहरे सपने देख रही होगी। इस प्रकार की रमणीय कल्पना करके मन पुलकित होता है। इसी प्रकार जिन्दगी के प्रति बुजुर्गों का कहना है कि सचमुच जिन्दगी की कल्पना दूर के ढोल के समान सुहावनी होती है, क्योंकि जीवन का प्रारम्भ प्रेम से परिपूर्ण होता है। पर जब जीवन के कठोर यथार्थ के धरातल पर युवक को चलना पड़ता है तो अनेक कठिनाइयाँ और समस्याएँ सामने खड़ी रहती हैं, तब उसे जीवन की कटुता का अनुभव होता है। प्रेम का उसका कल्पित संसार न जाने कहाँ खो जाता है और वह जीवन-संग्राम से जूझता हुआ यह सोचता है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

(11) धर्म पार्थक्य का नहीं, एकता का द्योतक है [2009]
इस विशाल संसार में अनेक धर्म हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति अपने विश्वास के साथ अपने धर्म का पालन करता है। अलग-अलग होते हुए भी प्रत्येक धर्म पार्थक्य का नहीं, एकता का द्योतक है। किसी भी धर्म में पृथकता या अलगाव की भावना नहीं है। प्रत्येक धर्म घृणा, विद्वेष तथा हिंसा के स्थान पर प्राणिमात्र को प्रेम,सदभाव,मैत्री,एकता और अहिंसा का सन्देश देता है। धर्म उस ईश्वर को पाने का एक साधन है जो सर्वव्यापक है,सबका रक्षक और पालनहार है। साधन भिन्न-भिन्न होते हुए भी प्रत्येक धर्म का साध्य एक है। अत: धर्म के नाम पर संघर्ष का होना बेईमानी है। धर्म के नाम पर वैमनस्य, ईर्ष्या,द्वेष और कटुता की भावना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना’। इसलिए यह कथन सत्य है कि धर्म तोड़ता नहीं अपितु, जोड़ता है। धर्म पार्थक्य का नहीं अपितु एकता का द्योतक है।

(12) साहित्य को दिशा तो सृष्टा कलाकार ही देता है
साहित्य मानव-जीवन की अभिव्यक्ति है, उसका आख्यान है। जिस साहित्य में मानव जीवन की उदात्त और यथार्थ अभिव्यक्ति होती है, वही साहित्य श्रेष्ठ और स्थायी होता है। साहित्य को यह दिशा साहित्यकार द्वारा मिलती है। साहित्यकार सामान्य हृदय से अधिक संवेदनशील होता है। उसके पास कल्पना करने, विचार करने की अपूर्व क्षमता और उसको मूर्तरूप देने की प्रतिभा होती है। इसके द्वारा ही वह साहित्य की सर्जना करता है। साहित्यकार को किस प्रकार के साहित्य की रचना करनी चाहिए, इसका निर्णय केवल साहित्यकार ही कर सकता है। आलोचक तो मात्र उस साहित्य की समीक्षा कर केवल उसकी उपयोगिता या अनुपयोगिता बता सकता है। वह साहित्यकार को निर्देश नहीं दे सकता। क्योंकि साहित्य का सृजन नियम या निर्देश के आधार पर नहीं हो सकता। इसलिए यह मत समीचीन है कि साहित्य को दिशा तो सृष्टा कलाकार ही देता है।

(13) तुम देखते हो कि जीवन सौन्दर्य है, हम जागते रहते हैं और देखते रहते हैं कि जीवन कर्त्तव्य है

यह एक सैनिक और कवि के वार्तालाप का एक अंश है। सैनिक जीवन की कठोरता और वास्तविकता का तथा कवि जीवन की कल्पना का प्रतीक है। कवि सपनों के संसार में सोते हुए जीवन को सौन्दर्य मानता है,जबकि एक सैनिक यथार्थ के संसार में जागते हुए जीवन को कर्तव्य मानता है। कवि भावुक होता है, इसलिए वह अपनी भावना के द्वारा सौन्दर्य को ही जीवन समझता है तथा जीवन और संसार की वास्तविकता से दूर अपने बनाये हुए काल्पनिक संसार में मग्न रहता है। इसके विपरीत एक सैनिक सदैव चैतन्य रहता है और अपने कर्तव्य का पालन करता है। उसके लिए जीवन का दूसरा नाम ही कर्तव्य का पालन है। वास्तव में,संसार में अपने कर्तव्य का पालन करना ही जीवन है। जीवन सुन्दर है तथा उसकी उपयोगिता कर्त्तव्य-पालन में ही निहित है।

(14) ईश्वर किसी विशेष धर्म या जाति का नहीं होता
यह बात पूर्णतः सत्य है,कि ईश्वर निर्गुण,निराकार,अखण्ड,अजन्मा तथा सर्वत्र व्याप्त है। उसे किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता है। ईश्वर ही परम पिता है। वह समस्त धर्मों का नियामक है। ईश्वर किसी धर्म या जाति का नहीं होता है। ईश्वर सभी पर दया बरसाता है।

(15) स्वावलम्बन की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष [2009]
अंग्रेजी की एक बड़ी सुन्दर कहावत है-‘God helps those who help themselves.” अर्थात् ईश्वर उन लोगों की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। इस बात को एक उर्दू शायर ने इस प्रकार कहा है-“हिम्मते मर्दा मददे खुदा।” कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान और भाग्य भी केवल स्वावलम्बी व्यक्ति की ही सहायता करते हैं। स्वावलम्बी व्यक्ति आत्म-विश्वास और सफलता की जीती-जागती प्रतिमूर्ति होते हैं। स्वावलम्बन का जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। जीवन में केवल वही व्यक्ति सफल होते हैं,जो स्वावलम्बी होते हैं। स्वावलम्बी मनुष्य के सम्मुख संसार की सारी बाधाएँ सिर झुकाती हैं। स्वावलम्बन से व्यक्ति में आत्म-विश्वास और आत्म-गौरव की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे उसका व्यक्तित्व विकसित होता है। समाज में भी केवल ऐसा ही व्यक्ति आदर पाता है,जो अपने पैरों पर खड़ा हो। वास्तव में,यदि यह कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि व्यक्ति में स्वावलम्बन की झलक मात्र से उस पर कुबेर का खजाना तक न्यौछावर रहता है।

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(16) बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है [2010]
क्रोध यदि आम है तो बैर उसका अचार या मुरब्बा है। जिस प्रकार आम की अपेक्षा उसका अचार या मुरब्बा अधिक लम्बे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है अर्थात् अधिक टिकाऊ होता है, उसी प्रकार बैर,क्रोध का स्थायी रूप है। वास्तव में,जो क्रोध तत्काल प्रदर्शित होने से रह जाता है, वह समय आने पर कुछ अवधि के बाद बैर बनकर प्रदर्शित होता है।

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MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण संक्षेपण

MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण संक्षेपण

संक्षेपण का अर्थ और स्वरूप 

संक्षेपण या संक्षेपीकरण अथवा संक्षिप्तीकरण प्रेसी (Precis) का भाषा अनुवाद है। लेटिन भाषा के प्रेसीडर (Praecidere) से प्रेसी शब्द बना है जिसका अर्थ होता है काँट-छाँट कर छोटा करना। संक्षेपण या संक्षेपीकरण शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त होता है। संक्षेपीकरण की तरह सारांश, सरलीकरण, भावार्थ, मुख्यार्थ, आशय आदि में भी संक्षिप्त रूप में लिखने पर बल दिया जाता है, पर संक्षेप इनसे स्वतंत्र कला है। इसकी अपनी शैली है।

संक्षेपण वह कला है जिसमें संक्षेपक का ध्यान सार-ग्रहण की ओर रहता है और वह आसार को छोड़ता चला जाता है। ऐसा करने में वह संक्षेपण की विधि और प्रक्रिया का ध्यान रखता है।

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संक्षेपण वह कला है जिसके द्वारा किसी वक्तव्य को, किसी विषय को कम-से-कम शब्दों … में प्रस्तुत किया जाए तो भी स्वयं में पूर्ण हो। उसमें मूल का न कोई अंश छूटता है और न ही उसके अनिवार्य आशय के समझने में कोई न्यूनता आती है।

संक्षेपण में पदान्वय के समान मूल वक्तव्य का संपूर्ण ब्यौरा नहीं रहता और न ही वह मूल ‘अंश के समान आकार वाला होता है। संक्षेपण मूल वक्तव्य से सदैव आकार में छोटा होता है। समास और व्यास शैली आदि भेद के कारण यद्यपि कोई नियम तय नहीं होता तथापि मूल का लगभग एक तिहाई भाग ही होता है।

संक्षेपण से किसी भी लेख, भाषण, अवतरण के मल तत्त्वों का ज्ञान तो होता ही है. साथ ही इस माध्यम से अभिव्यंजना और आलोचना में विशेष सहायता प्राप्त होती है। संक्षेपण करने में संक्षेपक लाक्षणिक शैली का प्रयोग नहीं करता। इसमें वह स्वाभाविक शैली व सीधे-साधे शब्दों का प्रयोग करता है।

संक्षेपक संक्षेपण करते समय औचित्य के लिए मूल अवतरण या विषय के क्रम में परिवर्तन कर उसे अधिक संगत बना देता है। इसके साथ ही संक्षेपण करते समय वाक्यों की संगति रखना भी आवश्यक होता है जिससे विचारों के तारत्य में अन्तर न आ जाए।

सार यह है कि संक्षेपण वह कला या रचना है जिसमें किसी वक्तव्य, लेख. अनच्छेद. आदि में व्यक्त भावों को मूल की अपेक्षा कम शब्दों में प्रतिपादित किया जाए। संक्षेपण में मूल का लगभग एक तिहाई भाग होता है।

महत्त्व और उपयोगिता

आज के व्यस्त जीवन में सब जगह संक्षेपण का महत्त्व है। यों भी जीवन में ऐसे व्यक्ति को महत्त्व दिया जाता है, जो संक्षेप में बात कहता है और व्यर्थ में अपने कथन को विस्तार नहीं देता। साहित्यकारों में गागर में सागर भरने की प्रवृत्ति इसी कारण है। संक्षिप्तता को वाग्वैदग्ध्य की आत्मा कहा जाता है।

संक्षेपण की कला की अपनी उपयोगिता है। इस कला से विद्यार्थी में स्वतंत्र निर्णय लेने की योग्यता बढ़ती है। वह असार छोड़कर सार ग्रहण करने में समर्थ होता है। किंतु इसके लिए अभ्यास की परम आवश्यकता है। संक्षेपण से भाषा लिखने का सामर्थ्य आता है। संक्षेपण से लेखक की योग्यता का विकास होता है। संक्षेपण कार्यालयों में कार्यप्रणाली का प्रमुख हिस्सा है। इसके बिना कार्यालय का काम-काज ठप्प हो सकता है। पत्रकारों और संवाददाताओं के लिए भी इस कला का बहुत महत्त्व है।

संक्षेपण के गुण या तत्त्व

व्यावहारिक जगत् में, विविध कार्यालयों में, प्रेस कांफ्रेंस आदि में विस्तृत वक्तव्य या अवतरण की रूपरेखा संक्षिप्त करना आजकल आवश्यक है। संक्षेपण के अभाव में ऐसा करना असंभव है। इसके लिए आधारभूत निम्न तत्त्व कहे गए हैं। इन्हें ही गुण भी कह दिया जाता है :

  1. पूर्णता : संक्षेपण अपने आप में पूर्ण होना चाहिए। पढ़ने के बाद ऐसा लगना चाहिए कि उसका कोई मुद्दा छूटा नहीं है।
  2. संक्षिप्तता : संक्षेपण करते समय मूल अवतरण के दृष्टांत, व्याख्या और अलंकारिकता आदि उससे अलग कर देने चाहिए। साधारणतः संक्षेपण का एक तिहाई भाग स्वीकृत माना जाता है।
  3. स्पष्टता : संक्षेपण का पाठक मूल अनुच्छेद नहीं पढ़ता, इसलिए इसमें कोई मुद्दा नहीं छूटना चाहिए। अगर इसमें व्यर्थ का विस्तार किया जाता है तो इससे अस्पष्टता आ जाती है।
  4. तारतम्य : अच्छे संक्षेपण में एक तारतम्य होना चाहिए। विचारों में असम्बद्धता नहीं होनी चाहिए। इसमें एकसूत्रता होनी चाहिए। प्रत्येक वाक्य में शृंखलाबद्धता होनी चाहिए जिससे क्रम में हानि न हो।
  5. प्रभावोत्पादकता : मू वतरण के बिखरे क्रम में परिवर्तनकर उसे प्रभावोत्पादक बनाया जाता है। यह अच्छे संक्षेपक का गुण है। भावों की क्रमबद्धता अच्छे संक्षेपण में प्रभाव पैदा करने की क्षमता रखती है।
  6. सारता : अच्छा संक्षेपण मूल अवतरण का सारमात्र होना चाहिए, अतः अनुच्छेद से न कुछ कम होना चाहिए और न विस्तार होना चाहिए।

इन तत्त्वों के अतिरिक्त संक्षेपण अप्रत्यक्ष कथन शैली में किया जाना चाहिए, मूल अनुच्छेद के शब्दों तथा वाक्यों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। आकार की वृद्धि रोकने के लिए मुहावरे, लोकोक्तियां व दृष्टांत आदि निकाल देने चाहिए। विशेषणों और क्रिया विशेषणों को हटा देना चाहिए। टीका-टिप्पणी निकाल देनी चाहिए। भूमिका व उपसंहार आदि का भी महत्त्व नहीं है।

इस प्रकार इन सब तत्त्वों या गुणों को ध्यान में रखकर संक्षेपण करना चाहिए।

संक्षेपण की विधि

संक्षेपण करते समय संक्षेपण लेखक को इसके गुणों अथवा तत्त्वों को ध्यान में रखना चाहिए और लिखने के लिए पूर्ण मनोयोग के साथ बैठना चाहिए। संक्षेपक संक्षेपण करते समय निम्नलिखित विधि अथवा प्रणाली अपना सकता है:

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1. मूल अनुच्छेद का पठन : संक्षेपण करते समय संक्षेपक को मूल अवतरण कम-से-कम तीन बार पढ़ना चाहिए। पढ़ते हुए उसे विशिष्ट वाक्यों को रेखाकिंत कर लेना चाहिए अथवा असार वाक्यों को रेखाकिंत करना चाहिए। अगर किसी शब्द का ज्ञान नहीं है तो उसे शब्द कोश का आश्रय लेना चाहिए।

2. शीर्षक का चुनाव : प्रायः शीर्षक अवतरण के केन्द्रीय भाव से जुड़ा होता है। यह आकार में लघु होना चाहिए अथवा कुछ शब्दों में होना चाहिए। यह एक पंक्ति से बड़ा नहीं होना चाहिए। यह कथ्य के साथ मेल खाने वाला होना चाहिए। इस शीर्षक में गंभीरता होनी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो संक्षेपक दो-तीन शीर्षक का चुनाव कर सकता है और उसमें भी सबसे उपयुक्त का चुनाव कर सकता है।

शीर्षक प्रायः अनुच्छेद के आरम्भ में एक शब्द से सूचित होता है। कभी-कभी यह भूमिका .. अथवा उपसंहार में होता है। कभी शीर्षक अवतरण के मध्य होता है। कभी यह अवतरण के अन्त में होता है। यदि इनमें भी शीर्षक न मिले तो मूल कथ्य को पढ़कर शीर्षक तैयार किया जा सकता है।

3. शब्द संख्या से संक्षेपण के आकार का निर्माण : शब्द संख्या से संक्षेपण के आकार का निर्माण किया जाता है। संक्षेपक मूल अनुच्छेद को पढ़कर और उसके शब्दों की गणना कर, मूल अनुच्छेद के एक-तिहाई शब्दों में (थोड़ा बहुत या अधिक) संक्षेपण करे। शब्द गणना करते समय अगर विभक्तियाँ शब्दों के साथ जुड़ी हुई हों तो उस रूप में और अलग हों तो उस रूप में गणना करे। प्रायः परीक्षा में संकेत दे दिया जाता है कि संक्षेपण इतने शब्दों में किया जाना चाहिए। अगर ऐसा संकेत न हो तो एक पंक्ति के शब्दों की गणना कर उन्हें कुल पंक्तियों से गुणा कर शब्द संख्या निकाल लेनी चाहिए।

4. संक्षेपण के प्रारूप का निर्माण : अगर विद्यार्थी के पास समय हो तो संक्षेपण का पहले प्रारूप तैयार करना चाहिए। यह मूल अनुच्छेद के आधे के बराबर होना चाहिए। प्रारूप में अन्य पुरुष का प्रयोग किया जाना चाहिए। इस प्रारूप में विशेषणों, कहावतों व मुहावरे आदि को निकाल देना चाहिए। क्रिया विशेषणों को भी अलग कर देना चाहिए।

5. तथ्यात्मकता का प्रारूप : शीर्षक चुनाव के बाद मुख्य विषय से संबंधित सामग्री का चुनाव करना चाहिए। इसके लिए मुख्य तत्त्वों को रेखांकित करना चाहिए अथवा अनावश्यक सामग्री को रेखांकित करना चाहिए। इन दोनों प्रकारों में एक को अपनाकर संक्षेपण तैयार करना चाहिए। किंतु मूल कथ्य में ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

6. लेखन : लेखन संक्षेपण का मूल अन्तिम सोपान है। इससे पूर्व में जो प्रारूप तैयार किया जाता है उसे संक्षिप्त करने और केंद्रीय भाव को ध्यान में रखकर संक्षिप्तता, एकसूत्रता और प्रभावोत्पादकता बनाए रखना चाहिए। लेखन की भाषा सहज और स्वाभाविक होनी चाहिए। उसमें किसी तरह कोई आडम्बर नहीं दिखना चाहिए।

संक्षेपण के प्रकार

संक्षेपण के कई प्रकार हैं :

  1. संवादों का संक्षेपण : प्रत्येक संवाद का संक्षेपण आवश्यक नहीं होता, जहाँ नई बात हो वही रेखांकित की जानी चाहिए। प्रत्यक्ष कथन को अप्रत्यक्ष कथन में कहना चाहिए। पात्रों की भाव-भंगिमा तथा मनोदशा के सूचक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। उद्धरण चिह्नों को हटा देना चाहिए। संज्ञाओं के स्थान पर सर्वनामों का प्रयोग करना चाहिए।
  2. समाचारों का संक्षेपण : प्रत्येक संवादों के सक्षेपण में तिथि, स्थान तथा संबद्ध व्यक्तियों का नामोल्लेख किया जाना चाहिए। इस प्रकार के संक्षेपणों में शीर्षक प्रभावी होना चाहिए।
  3. पत्रचारों का संक्षेपण : सभी कार्यालयों में पत्राचारों के संक्षेपण की आवश्यकता होती है। कार्यालयों के पत्राचारों में समानता होने के कारण प्रायः विषमताओं को उभारना चाहिए।

पत्राचारों के संक्षेपण के दो प्रकार हैं : सामान्य संक्षेपण और सूचीकरण संक्षेपण। सामान्य . संक्षेपण को विस्तृत रूप से संक्षिप्त करना होता है जबकि सूचीकरण संक्षेपण में कमसंख्या, पत्रसंख्या, दिनांक, प्रेषक, प्रेषिती और पत्र के विषय का ध्यान रखा जाता है।

संक्षेपण के कुछेक उदाहरण

1. भारत के पास कुछ ऐसी संपदाएँ हैं तथा लाभ हैं जिनके बारे में विश्व के कुछ देश गर्व से दावा कर सकते हैं। हमें अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान योगदानों तथा अपने भविष्य की रूपरेखा बनाने के लिए प्राप्त प्रतिस्पर्धात्मक लाभ को पहचानना चाहिए। विश्व एक बौद्धिक समाज में परिवर्तित हो रहा है, जहाँ समन्वित ज्ञानराशि तथा धन का स्रोत होगा। यही वह समय है, जब भारत खुद को एक बौद्धिक शक्ति में बदलने और फिर अगले दो दशकों के भीतर एक विकसित देश बनने के लिए इस अवसर का लाभ उठा सकता है। इस रूपांतरण के लिए यह जानना आवश्यक है कि हम प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में कहाँ हैं जो एक बौद्धिक शक्ति बनाने की दिशा में अग्रसर होने के लिए वास्तविक इंजन है।

शब्द संख्या : 122

संक्षेपण

शीर्षक

प्रतिस्पर्धा की पहचान
संक्षेपण : भारतीय को गौरवमय अतीत, वर्तमान उपलब्धियों व भविष्य के प्रारूप को जानने की आवश्यकता है क्योंकि संसार बौद्धिक होता जा रहा है और ज्ञानशक्ति व धन का स्रोत . बनता जा रहा है। विकास के लिए उसे प्रतिस्पर्धा में स्वयं को पहचानना होगा कि वह कहाँ है।

– शब्द संख्या : 40

2. इन सब के पीछे राजनीति है। यह कोई नई बात नहीं है। नालंदा विश्वविद्यालय की कई महिमा रही है। शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा दबदबा रहा है नालंदा का। दस हजार विद्यार्थी और पन्द्रह सौ आचार्य थे। बौद्ध दर्शन, दर्शन, इतिहास, निरुक्त, वेद, हेतुविद्या, न्याय शास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा शास्त्र, ज्योतिष आदि के शिक्षण की व्यवस्था। इस विश्वविद्यालय में। आचार्य शीलभद्र, नागार्जुन, आचार्य धर्म कीर्ति, आचार्य ज्ञानश्री, आचार्य बुद्ध भद्र, आचार्य गुणपति, आचार्य स्थिरमति, आचार्य सागरमति जैसे विख्यात आचार्यों का नाम नालंदा से जुड़ा रहा। लेकिन नालन्दा के इतिहास में काला धब्बा भी लग गया है। यह काला धब्बा नालंदा के पुस्तकालय को लेकर है। बख्तियार खिलजी के आक्रमणों से देश की जो सबसे बड़ी हानि हई, वह थी वहाँ के इन पुस्तकालयों को आग के हवाले करना। इस अग्निकाण्ड में वे अमूल्य ग्रन्थ सदा के लिए भस्म हो गए। जिनका उल्लेख मात्र तिब्बती और चीनी ग्रंथों में मिलता है। युवानच्चाङ ने नालंदा के पुस्तकालय का बड़ा गौरवपूर्ण उल्लेख किया है। तिब्बती विवरणों से पता चलता है कि नालंदा में पुस्तकालयों का एक विशिष्ट क्षेत्र था। उसे वह ‘धर्मगंज’ कहते थे। इसमें ‘रत्नसागर’, ‘रत्नोदधि’ और रत्नंजक नामक तीन विशाल पुस्तकालय थे। ‘रत्नसागर’ का भवन नौ-मंजिला. था।

शब्द संख्या : 193

संक्षेपण

शीर्षक-
नालंदा विश्वविद्यालय की महिमा

नालंदा विश्वविद्यालय की शिक्षा के क्षेत्र में कभी धाक रही है। यहाँ बौद्ध दर्शन, दर्शन, इतिहास, निरुक्त, वेद शास्त्र, हेतु विद्या, न्याय शास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, ज्योतिष आदि तत्कालीन सभी विषयों की उत्तम व्यवस्था थी। कई नामी शिक्षक थे किंत बख्यिार खिलजी के आक्रमणों के समय इसके पुस्तकालयों को जला दिया गया जिसके कारण इसमें स्थित अमूल्य ग्रंथ नष्ट हो गए जिनकी चर्चा केवल तिब्बती और चीनी ग्रंथों में होती है।

शब्द संख्या : 72.

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3. मन की एकाग्रता की समस्या सनातन है। आज के प्रौद्योगिकी युग में जहाँ भौतिक उन्नति की संभावनाएँ अपार हैं ऐसे में छात्र जब अध्ययन करने बैठता है, तब उसके मन को अनेक तरह के विचार घेरने लगते हैं। वह सोचता है इस अर्थ प्रधान युग में मुझे उत्कृष्ट पद प्राप्ति के लिए एकाग्र मन से पढ़कर परीक्षा में उच्चतम श्रेणी प्राप्त करना आवश्यक है। लेकिन वह जब पढ़ने बैठता है तो क्रिकेट, सिनेमा या मित्र-मण्डली की मौज-मस्ती के विचार में उसका मन भटकने लगता है। मन का यह विचलन बुद्धि की एकाग्रता भंग कर देता है। यह घबरा कर सोचता है, परीक्षा तिथि पास है, मन उद्विग्न है, कैसे अध्ययन करूँ? क्या करूँ? व्यर्थ के विचारचक्र से बुद्धि अस्थिर और मन चंचल बना रहता है। वह सोचता है यदि परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। पद, प्रतिष्ठा, वैभव कुछ नहीं मिलेगा, जीवन बोझ बन जाएगा, वह बार-बार हताशा से घिर जाता है। अनियंत्रित मन और एकाग्रहीनता उसे चिंताओं में डुबा देती है। अर्जुन की यह स्वीकारोक्ति कि ‘चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है उसे उचित प्रतीत होने लगता है।’

शब्द संख्या : 198

संक्षेपण

शीर्षक
मन की एकाग्रता
मन की एकाग्रता की समस्या सदा से रही है। छात्र पढ़ने बैठता है तो उसके मन में अनेक विचार घूमने लगते हैं। उन्नति के लिए वह एकाग्र करने का मन बनाता है पर मनोरंजन के साधन उसे भटका देते हैं। मन की एकाग्रहीनता उसे चिंतामग्न कर देती है। अनुभव करने लगता है कि चंचल मन को एकाग्र करना दुष्कर है।
शब्द संख्या : 61

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MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध रस

MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध रस

भारतीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में ‘रस’ शब्द का प्रयोग सर्वोत्कृष्ट तत्त्व के लिए होता है। खाद्य पदार्थों और फलों के क्षेत्र में रस मधुरतम तरल पदार्थ का द्योतक है। संगीत के क्षेत्र में कर्णेन्द्रिय द्वारा प्राप्त ‘आनन्द’ का नाम ‘रस’ है। अध्यात्म के क्षेत्र में स्वयं परमात्मा को ही रस माना है या रस को ही परमात्मा घोषित किया है-“रसौ वै सः” अर्थात् रस ही परमात्मा है। इसी प्रकार साहित्य के क्षेत्र में भी काव्य के आस्वादन से प्राप्त आनन्दानुभूति को ही रस की संज्ञा दी गयी है। काव्यानन्द को ही ‘रस’ कहा गया है।

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रस के अवयव अथवा रस-निष्पत्ति

स्थायीभाव आश्रय के हृदय में आलम्बन के द्वारा उत्तेजित होकर उद्दीपन के प्रभाव से उद्दीप्त होकर, संचारी भावों से पुष्ट होता हुआ अनुभावों के माध्यम से व्यक्त होता है। जब काव्यगत स्थायी भाव की अनुभूति पाठक को होती है तो वही रसानुभूति’ या ‘रस-निष्पत्ति’ कहलाती है।

भरत मुनि ने कहा है–“विभावानुभावव्यभिचारी संयोगाद्रसनिष्पत्तिः।” भावों के उद्वेलन के लिए उसके चार अवयव हैं-

  1. स्थायी भाव,
  2. विभाव,
  3. अनुभाव,
  4. संचारी या व्यभिचारी भाव।

उत्तेजना के मूल कारण को विभाव कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-आलम्बन और उद्दीपन। मानव हृदय में भावनाओं का प्रस्फुटन किसी बाह्य वस्तु, दृश्य या किसी परिस्थिति विशेष की कल्पना द्वारा ही होता है। इसी प्रमुख कारण को आलम्बन कहते हैं। भावोद्वेलन के लिए परिस्थिति की अनुकूलता भी अपेक्षित है। इसी को ‘उद्दीपन’ कहा जाता है। आलम्बन यदि आग है, जो अंगारे के रूप में आग लगाता है, तो उद्दीपन हवा की भाँति अनुकूलता बढ़ाती है। जिस व्यक्ति के हृदय में उसका प्रभाव होता है, उसे आश्रय कहा जाता है। इन भावनाओं के परिवर्तन के द्योतक चिह्नों को अनुभाव की संज्ञा दी गयी है। हृदय में रहने वाले भावों की व्यंजना अनुभावों के माध्यम से होती है। भावनाओं का रूप अत्यन्त सूक्ष्म होता है जिनका वर्णन काव्य में नहीं किया जा सकता। अतः काव्य में अनुभावों की व्यंजना आवश्यक मानी गयी है। “एक ही स्थायी भाव के बीच-बीच में परिस्थितिवश अनेक भावों का भी संचार होता है। इन्हें संचारी भाव कहते हैं।” संचारी भाव स्थायी भाव के विकास में सहायक होते हैं। किन्तु यदि प्रतिकूल रूप में हों तो वे बाधक बन जाते हैं।

स्थायी भाव-मानव-हृदय में वासना-रूप में रहने वाले मनोविकारों को काव्य में ‘स्थायी. भाव’ कहा जाता है। ये स्थायी भाव स्थायी रूप से चित्त में स्थित रहते हैं, इसी कारण इन्हें स्थायी भाव कहते हैं।

जैसे-
प्रीति, हँसी, अरु, सोक पुनि, रिस, उछाह भै भित्त।
घिन, बिसमै, थिर भाव ए, आठ बसें सुभचित।

इन आठ स्थायी भावों के अतिरिक्त एक और भी स्थायी भाव है-निर्वेद। इस प्रकार कुल मिलाकर निम्नलिखित नौ स्थायी भाव हैं, जो रसों में इस प्रकार स्थित हैं-
MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध रस 1

आचार्यों ने दसवाँ रस वात्सल्य रस’ माना है जिसका स्थायी भाव सन्तान प्रेम है।

संचारी भाव-

ये तैंतीस माने गये हैं,जो निम्नलिखित हैं
ग्लानि, दैन्य अरु शंका,श्रम, मन्द और अमर्ष।
स्वप्न, मोह, शान्त, चिन्ता, त्रास, उग्रता, हर्ष।
आवेग अरु निद्रा, स्मृति, जड़ता ब्रीड़ा, धर्म।
अपस्मार, वितर्क, मरण, व्याधि और चापल्य।
अवहित्था, आलस्य पुनि, गर्व,विबोध, विषाद।
औत्युक्य, अरु असूया, निर्वेद अरु उन्माद।

रस के भेद
1. शृंगार रस

शृंगार का आधार प्रेम-भाव है। शृंगार को रसराज कहा है। इसमें नारी-पुरुष के अनुराग का वर्णन आता है।

इसके संयोग और वियोग के कारण दो भेद होते हैं-
(1) संयोग शृंगार,
(2) विप्रलम्भ या वियोग श्रृंगार।

(1) संयोग श्रृंगार स्थायी भाव-रति। आलम्बन नायक या नायिका। उद्दीपन नायक या नायिका का मोहक रूप, एकान्त, नदी का किनारा, चाँदनी रात, फुलवारी आदि। अनुभाव-अपलक निहारना, रोमांच दर्शन, स्पर्श, स्वर-भंग, हास्य कटाक्ष, संकेत, मुस्काना आदि। संचारी भाव हर्ष,संकोच आदि।

उदाहरण-
(1) राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परछाहीं।
यातें सबै सुधि भूलि गयी, कर टेकि रही पल टारत नाहीं।

स्थायी भाव-रति। आश्रय-सीता। आलम्बन-राम। उद्दीपन-राम का रूप। अनुभाव रूप निहारना, सुधि भूल जाना। संचारी भाव-सुधि भूलना।
(2) एक पल मेरे प्रिया के दृग-पलक
थे उठे ऊपर सहज नीचे गिरे
चपलता ने इस विकंपित पुलक से
दृढ़ किया मानो प्रणय सम्बन्ध था।

स्थायी भाव रति। आलम्बन–धरातल। उद्दीपन-निशा-सेज। अनुभाव-बैठना, संकुचित होना,मान करना,स्मरण करना। संचारी भाव- हृदय में हलचल।

(3) एक बार चुनि कुसुम सुहाये
निजकर भूषन राम बनाये।
सीतहिं पहिराये प्रभुनागर
बैठे फटिक सिला परमादर।

(2) वियोग शृंगार

उदाहरण-
(1) उनका यह कुंज-कुटीर, वहीं झरना उडु, अंशु अबीर जहाँ,
अलि कोकिल, कीर शिखी सब हैं, सुन चाकत की रहि पीव कहाँ?
अब भी सब साज-समान वही, तब भी सब आज अनाथ यहाँ,
सखि, जा पहुंचे सुधि-संग वही, यह अन्ध सुगन्ध समीर वहाँ।

स्थायी भाव-रति। आश्रय-यशोधरा। आलम्बन-सिद्धार्थ। उद्दीपन–कुंज कुटीर, किरणे कोकिल, भौंरों, पपीहे की ध्वनि। अनुभाव-विषाद भरे स्वर में कथन। संचारी भाव-स्मृति, मोह, विषाद, धृति हैं।

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(2) कबहुँ नयन मम सीतल ताता,
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता।
वचन न आव नयन भरे बारी।
अतह नाथ मुहिं निपट बिसारी।

(3) बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजैं।
तब ये लता लगत अति शीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजें।

2. हास्य रस।

सहृदय के हृदय में स्थित हास्य नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तो वह हास्य रस कहलाता है।

उदाहरण-
(1) इस दौड़-धूप में क्या रखा आराम करो, आराम करो।
आराम जिन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में राम छिपा, जो भव-बन्धन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो बिरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।

यहाँ हास स्थायी भाव, हास्य पात्र आलम्बन, व्यंगोक्ति उद्दीपन विभाव, खिलखिलाना अनुभाव एवं हर्ष,चपलता,निर्लज्जता संचारी भाव हैं।

(2) विन्ध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतम तिय तरी, तुलसी सो कथा सुनि भे मुनि वृन्द सुखारे।
है हैं सिला सब चन्द्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे।
कीन्हीं भली रघुनायक जू ! करुना करि कानन को पगु धारे।

3. करुण रस [2009]

सहदय के हृदय में शोक नामक स्थित भाव का जब विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के साथ संयोग होता है तो वह करुण रस का रूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरण-
(1) जा थल कीन्हें बिहार अनेकन ता थल काँकरि बैठि चुन्यौ करै।
जा रसना ते करी बहुबातन ता रसना ते चरित्र गुन्यों करै।
‘आलम’ जौन से कुंजन में करि केलि तहाँ अब सीस धुन्यों करै।
नैनन में जो सदा रहते तिनकी, अब कान कहानी सुन्यौ करे।

स्थायी भाव-शोक। आश्रय-प्रियतमा। आलम्बन-प्रिय मरण। उद्दीपन-दयनीय दशा, करुण विलाप। अनुभाव-अश्रु, निःश्वास, प्रलाप। संचारी भाव-स्मृति, दैन्य, आवेश, विषाद।

(2) अभी तो मुकुट बंधा था माथ
हुए कल ही हल्दी के हाथ।
खिले भी न थे लाज के बोल।
खिले भीन चुम्बन-शून्य कपोल।
हाय ! रुक गया यही संसार,
बना सन्दूर अंगार।

(3) प्रिय पति वह मेरा प्राण-प्यारा कहाँ है?
दुःख जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है !
लख सुख जिसका मैं आज लौ जी सकी हूँ
वह हृदय हमारा नैन-तारा कहाँ है?

(4) फिर पीटकर सिर और छाती अश्रु बरसाती हुई।
कुररी सदृश सकरुण गिरा से दैत्य दरसाती हुई।
बहुविध विलाप प्रलाप वह करने लगी उस शोक में।
निज प्रिय वियोग समान दुःख होता न कोई लोक में।

(5) देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुणानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैननि के जल सों पग धोए।

4. वीर रस

सहृदय के हृदय में स्थित उत्साह नामक स्थायीकरण का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है,तो वह वीर रस का रूप ग्रहण कर लेता है। वीर रस’ में वीरता, बलिदान,राष्ट्रीयता जैसे सदगुणों का संचार होता है। दान, दया,धर्म,युद्ध एवं वीरता के भाव वीर रस की विशेषताएँ हैं।

उदाहरण-
(1) देखि पवनसुत कटक बिसाला। क्रोधवन्त जनु धायउ काला।
महा सैल इक तुरत उखारा। अति रिस मेघनाद पर डारा।

(2) सिंहासन हिल उठे,राजवंशों ने भृकुटी तानी थी।
बूढ़े भारत में भी आई,फिर से नई जवानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी।

स्थायी भाव-उत्साह। आश्रय हनुमान। आलम्बन-मेघनाथ। उद्दीपन-कटक की विह्वल दशा। अनुभाव-महान् शैल को उखाड़ना और फेंकना। संचारी भाव-स्वप्न की चिन्ता, शत्रु पर रिस (क्रोध, अमर्ष),उग्रता तथा चपलता।

5. रौद्र रस

सहृदय का क्रोध नामक स्थायी भाव विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रौद्र रस का रूप ग्रहण कर लेता है।

उदाहरण-
श्रीकृष्ण के सुन वचन, अर्जुन क्रोध से जलने लगे।
सब शोक अपना भूलकर, करतल-युगल मलने लगे।
संसार देखे अब हमारे, शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा, वे हो गये उठकर खड़े।
उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा॥

स्थायी भाव क्रोध। आश्रय-अर्जुन। आलम्बन-शत्रु। अनुभाव-क्रोधपूर्ण घोषणा, शरीर काँपना। उद्दीपन श्रीकृष्ण के वचन। संचारी भाव-आवेग, चपलता,श्रम,उग्रता आदि।

6. भयानक रस

भय नामक स्थायी भाव का जब विभाव,अनुभाव,संचारी भाव से संयोग होता है, तब वह भयानक रस का रूप ग्रहण कर लेता है।

उदाहरण-
(1) नभ से झपटत बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच।
कंपति तन व्याकुल नयन,लावक हिल्यो न च॥

स्थायी भाव-भय। आश्रय लावा पक्षी। आलम्बन-बाज। उद्दीपन-बाज का झपटना। अनुभाव-शरीर का काँपना,नेत्रों की व्याकुलता। संचारी भाव-दैन्य,विषाद,काँपना, अपने स्थान से रंचमात्र नहीं हिलना, अर्थात् मूर्छा की,जड़ता की स्थिति।

(2) लपट कराल, ज्वाल, माल चहुँ दिशि
धूम अकुलाने, पहिचाने कौन काहि रे।

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7. वीभत्स रस

सहदय के हृदय में स्थित जुगुप्सा (घृणा) नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तो वह वीभत्स रस का रूप ग्रहण कर लेता है।

उदाहरण-
(1) सिर पर बैठ्यो काग, ऑखि दोऊ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनन्द उर धारत॥
बहु चील्ह नोच लै जात मोद बढ़ौ सब को हियौ।
मनु ब्रह्म भोज जिजमान कोऊ आज भिखारिन कह दियो।

(2) कोउ अंतड़िन की पहिरिमाल इतरात दिखावत।
कोउ चरबी लै चोप सहित निज अंगनि लावत॥
कोउ मुण्डनि लै मानि मोद कन्दुक लौं डारत।
कोउ रुंडनि पै बैठि करै जौ फारि निकारत।

स्थायी भाव-जुगुप्सा (घृणा)। आलम्बन श्मशान का दृश्य। उद्दीपन-अंतड़ी की माला पहनना, चर्बी शरीर पर पोतना, नर-मुण्डों को गेंद की तरह उछालना,धड़ पर बैठकर कलेजा फाड़कर निकालना उद्दीपन विभाव हैं। संचारी भाव-निर्वेद ग्लानि,दीनता से संचारी भाव हैं।

8. अदभुत रस [2009]

विस्मय नामक स्थायी भाव विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयुक्त होकर जिस भाव का उद्रेक होता है वह अद्भुत रस ग्रहण कर लेता है।।

उदाहरण-
अखिल भुवन चर-अचर सब, हरिमुख में लखि मातु।
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥

भगवान श्रीकृष्ण के मुख में सम्पूर्ण विश्व के दर्शन करने के बाद माता यशोदा आश्चर्यचकित रह गयीं।

स्थायी भाव-विस्मय। आलम्बन श्रीकृष्ण का मुख। आश्रय-माता यशोदा। उद्दीपन-मुख में भुवनों का दिखना। अनुभाव-नेत्र विकास, गद्गद् स्वर,रोमांच, बुद्धि का नष्ट हो जाना। संचारी भाव त्रास और जड़ता, चेतना खोना (मूर्छा की स्थिति) और नेत्र अचंचल होना।

9. शान्त रस [2009]

इसका स्थायी भाव निर्वेद है। सांसारिक सुख तथा देह की क्षणभंगुरता का ज्ञान, सन्त समागम, शास्त्र चिन्तन और योग आदि उसके विभाव हैं। सब प्राणियों पर दया, परमानन्द की उपलब्धि से मग्नता और आप्तकाम होकर असंग रहना इसके अनुभाव हैं। मति, धृति और हर्ष आदि इसके संचारी भाव हैं।

उदाहरण-
(1) मन रे ! परस हरि के चरण
सुभग सीतल कमल कोमल,
त्रिविध ज्वाला हरण।

(2) सुत बनितादि जानि स्वारथरत न करह नेह सबही ते।
अन्तहि तोहि तजेंगे पामर ! तू न तजै अबही ते॥
अब नाथहिं अनुराग जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते।
बुझे न काम-अगिनि तुलसी कहूँ विषय भोग बहु घी ते।।

निर्वेद स्थायी भाव है। अनित्य संसार आलम्बन। भक्त हृदय-आश्रय। उद्दीपन है-अनुराग, भोग,विषय,काम। उन्हें छोड़ देने का कथन अनुभाव है। धृति,मति, विमर्ष संचारी भाव हैं।

3) बन बितान रवि सीस दिया,
फल भख सलिल प्रवाह।
अवनि सेज पंखा पवन,
अब न कछू परवाह ॥

10 वात्सल्य रस

सहृदय के मन में वात्सल्य-प्रेम नामक स्थायी भाव से जब अनुभाव, विभाव और संचारी भाव मिलते हैं, तब वह वात्सल्य रस का रूप ग्रहण कर लेता है।

उदाहरण-
(1) बैठि सगुन मनावति माता।
कब ऐहें मेरे लाल कुसल घर, कहह काग फुरि बाता।
दूध-भात की दोनी दैहों, सोने चोंच महों।
जब सिय-समेत बिलोकि नयनभरि राम लखन उर लेंहों।

(2) जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलराइ, मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुलावै।
तू काहे नहिं बेगहिं आवत, तोकौं कान्ह बुलावै।।
कबहूँ पलक हरि मूंद लेत, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है कै रहि, करि-करि सैन बतावै॥

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वात्सल्य-स्थायी भाव। यशोदा-आश्रय। कृष्ण को सुलाना, पलक मूंदना-उद्दीपन विभाव। यशोदा की क्रियाएँ-अनुभाव। शंका, हर्ष आदि संचारी भाव हैं।
MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध रस 2

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