MP Board Class 12th Special Hindi काव्य की परिभाषा एवं लक्षण, भेद, गुण

MP Board Class 12th Special Hindi काव्य की परिभाषा एवं लक्षण, भेद, गुण

1. काव्य की परिभाषा एवं लक्षण

समस्त भाव प्रधान साहित्य को काव्य कहते हैं। विभिन्न विद्वानों ने काव्य के विभिन्न लक्षण बताये हैं-साहित्य दर्पण के प्रणेता आचार्य विश्वनाथ ने ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ कहा है। पण्डितराज जगन्नाथ ने ‘रमणीयार्थ प्रतिपादक: शब्दः काव्यम्’ कहा है। कुन्तक ने ‘वक्रोक्ति काव्यस्य जीवितम्’ कहा है और आनन्दवर्धन तथा अभिनव गुप्त ‘ध्वनिरात्मा काव्यस्य’ कहते हैं। मम्मट ने काव्य को हृदय की ‘सगुणावलंकृतौ पुन: क्वापि’ कहा है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्य हृदय को आनन्द देता है।

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2. काव्य के भेद

(1) मुक्तक पद्य-काव्यं गीत,कविता,दोहा और पद तथा आधुनिक चतुष्पदी तथा मुक्त छन्द मुक्तक काव्य कहलाता है। मुक्तक काव्य का तात्पर्य है कि बिना पूर्वापर सम्बन्ध के वह पद्य या छन्द अपने आप में पूर्ण एक स्वतन्त्र भाव लिये हो जिसके पड़ने मात्र से उसका भाव समझ में आ जाये और किसी भी रस-विशेष की अनुभूति हो सके। सूरदास,मीरा आदि कवियों के गेय पद और बिहारी सतसई,आधुनिक गीत इसके अन्तर्गत आते हैं।

(2) प्रबन्ध काव्य-प्रबन्ध काव्य वह रचना होती है, जिसमें कोई एक कथा आद्योपान्त क्रमबद्ध रूप से गठित हो एवं उसमें कहीं भी तारतम्य न टूटता हो, वरने उस कथा को पुष्ट करने के लिए उसमें अन्य अन्तर्कथाएँ भी हो सकती हैं। प्रबन्ध काव्य विस्तृत होता है, उसमें जीवन की विभिन्न झाँकियाँ रहती हैं। प्रबन्ध काव्य में कथानक को लेकर पात्रों के चरित्रों में घटनाओं और भावों के संघर्ष द्वारा काव्य-वस्तु संजोयी जाती है। प्रबन्ध काव्य के निम्नवत् दो उपभेद स्वीकारे

(1) महाकाव्य,
(2) खण्डकाव्य।

(1) महाकाव्य
आदिकवि वाल्मीकि कृत रामायण के पश्चात् अनेक महाकाव्यों की रचना सम्पन्न हो चुकी है।

आचार्य विश्वनाथ के अनुसार महाकाव्य के लक्षण निम्नवत् हैं-

  1. महाकाव्य सर्गबद्ध तथा सप्रबन्ध रचना है।
  2. आठ तथा उससे अधिक सर्ग होना आवश्यक है।
  3. प्रत्येक सर्ग उत्तरोत्तर सम्बद्ध तथा विभिन्न छन्दों में होना चाहिए।
  4. महाकाव्य का नायक धीरोदात्त गुणों से समन्वित देवता अथवा कुलीन वंश का होना चाहिए।
  5. शान्त, वीर अथवा श्रृंगार रस प्रधान हो तथा अन्य रस सहायक रूप में प्रयुक्त होने चाहिए।
  6. कथानक ऐतिहासिक या सज्जन चरित्र से जुड़ा होना चाहिए।
  7. देश-काल तथा वातावरण का चित्रण अपेक्षित है।
  8. महाकाव्य के उद्देश्य चतुर्वर्ग की प्राप्ति होनी चाहिए।
  9. नामकरण नायक,नायिका,घटना,उद्देश्य अथवा स्थान के आधार पर होना चाहिए।

उपर्युक्त मत के अनुरूप महाकाव्य के चार अनिवार्य लक्षण निम्नवत् ठहराये जा सकते

  1. धीरोदात्त नायक।
  2. रसों की निष्पत्ति।
  3. चतुर्वर्ग की प्राप्ति।
  4. कथानक की ऐतिहासिकता।
  5. भारतीय महाकाव्य में रस निष्पत्ति अनिवार्य रूप से स्वीकारी गई है।
  6. आस्तिकता को भी महाकाव्य में अनिवार्य मानना चाहिए।
  7. भारतीय कण-कण में भगवान को व्याप्त मानते हैं, आत्मा को परमात्मा का अंश ठहराते हैं।
  8. आनन्द स्वरूप में मिल जाना ही भारतीय जीवन का चरम लक्ष्य है। इसी कारण सुखान्त साहित्य को हमारे देश में विशेष स्थान दिया गया है।

उपर्युक्त तत्वों से समन्वित महाकाव्य को सफल महाकाव्य ठहराया जा सकता है।
निष्कर्ष निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि महाकाव्य एक छन्दोबद्ध कथा प्रधान रचना होती है। इस कलेवर में समस्त युग जीवन का अंकन किसी उदात्त उद्देश्य से प्रेरणा ग्रहण करके सरस एवं प्रवाहमयी शैली में प्रभावान्वित के साथ सम्पन्न किया जाता है।
मलिक मुहम्मद जायसी का ‘पद्मावत’, तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’, मैथिलीशरण गुप्त का ‘साकेत’ तथा जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ रचनाएँ महाकाव्य हैं।

(2) खण्डकाव्य

परिभाषा-खण्डकाव्य में नायक के जीवन की किसी एक घटना अथवा हृदयस्पर्शी अंश का पूर्णता के साथ अंकन किया जाता है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार-“खण्डकाव्य महाकाव्य के एक देश या अंश का अनुसरण करने वाला है।”

खण्डकाव्य महाकाव्य का खण्ड मात्र भी नहीं है। खण्डकाव्य में जिन्दगी का खण्डित अथवा बिखरा रूप भी चित्रित नहीं किया जाता, इसमें जीवन के सांगोपांग चित्रण के स्थान पर उसके किसी एक पहलू का पूर्ण अंकन होता है। यद्यपि इसका कलेवर सीमित होता है लेकिन स्वतः पूर्णता इसका अपेक्षित धर्म है। यथा-श्यामनारायण पाण्डेय का ‘हल्दी घाटी का युद्ध’, नरोत्तमदास का ‘सुदामा चरित’,रामनरेश त्रिपाठी का ‘पथिक’, मैथिलीशरण गुप्त की ‘पंचवटी’ रचनाएँ खण्डकाव्य की कोटि में आती हैं।

महाकाव्य तथा खण्डकाव्य में अन्तर

  1. महाकाव्य में जीवन का अथवा घटना विशेष का सांगोपांग चित्रण होता है, जबकि खण्डकाव्य में किसी एक घटना या जीवन के एक अंश का चित्रण किया जाता है।
  2. महाकाव्य का नायक उदात्त तथा महान् होता है। खण्डकाव्य के नायक में इस गुण का पाया जाना अनिवार्य नहीं है। खण्डकाव्य में युग जीवन का एकाधिक रूप ही प्रस्तुत किया जाता है लेकिन महाकाव्य में समग्र युगीन जीवन प्रतिबिम्बित होता है।
  3. महाकाव्य का शिल्प उत्कृष्ट एवं उदात्त होता है लेकिन खण्डकाव्य में इसका पाया जाना अनिवार्य नहीं ठहराया गया है।
  4. खण्डकाव्य का कलेवर सीमित होता है, परन्तु महाकाव्य का कलेवर विस्तृत होता है।
  5. महाकाव्य में कम-से-कम आठ सर्ग होते हैं लेकिन खण्डकाव्य में सर्गों की संख्या नियत नहीं होती।

(3) दृश्य-काव्य-

दृश्य-काव्य के अन्तर्गत नाटक और प्रहसन आते हैं जिनका अभिनय रंगमंच पर पात्रों द्वारा किया जाता है। इसमें गद्य के सम्भाषण के अतिरिक्त गेय गीतों, छन्दों अथवा प्रसंगानुकूल नृत्यों की योजना रहती है। दृश्य-काव्य के अन्तर्गत अधिक रमणीयता होती है, क्योंकि दर्शक उसकी प्रत्यक्षानुभूति करता है। कलाकार अपनी प्रभावशील अभिनय कला द्वारा हृदय पर सीधा प्रभाव डालते हैं। दृश्य-काव्य निश्चय ही श्रव्य-काव्य से श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उसका आनन्द पढ़कर एवं देखकर दोनों रूपों में प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु श्रव्य-काव्य का आनन्द केवल सुनकर ही लिया जा सकता है। नाटक में साहित्य के अन्य तत्वों के अतिरिक्त अभिनय तत्व भी आवश्यक होता है।

(4) चम्पू काव्य-

जिसमें गद्य तथा पद्य मिश्रित रूप से प्रयुक्त होता है, उसे चम्पू काव्य कहते हैं। इसका प्रचलन संस्कृत साहित्य में था, हिन्दी में कहीं-कहीं देखने को मिलता है। मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘सिद्धराज’ प्रसिद्ध चम्पू काव्य है।

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3. काव्य गुण

कविता-कामिनी को अलंकारों से सुसज्जित कर विद्वानों ने उसके आन्तरिक रूप को ही महत्त्व दिया है। अलंकार, छन्द से काव्य का बाह्य रूप सजता है किन्तु सुन्दर सजीला तन भावपूर्ण मन के बिना तथा गुण रहित होने से व्यर्थ होता है। कहा भी है कि “गुणीनां च निर्गुणनां च दृश्यते महदन्तरम्।” अतः मानवोचित गुणों के अनुकूल ही काव्य गुण भी होते हैं। आचार्य दण्डी ने दस काव्य गुणों का उल्लेख किया है और भोज ने चौबीस गुणों का। किन्तु साहित्य में काव्य के तीन गुण ही प्रमुख माने गये हैं। उसी वर्गीकरण के अन्तर्गत इन्हीं तीनों में अन्य सभी गुण समाहित कर लिए हैं। इन गुणों का काव्य में किस प्रकार प्रणयन होता है तथा गुणयुक्त काव्य श्रोता या पाठक पर किस प्रकार प्रभावशील होता है, उनके लिए कुछ नियम हैं।

मुख्य तीन गुण हैं-
(1) माधुर्य,
(2) ओज,
(3) प्रसाद।

(1) माधुर्य गुण-मधुरता के भाव को माधुर्य कहते हैं। मिठास अर्थात् कर्णप्रियता ही इसका मुख्य भाव है। जिस काव्य के श्रवण से आत्मा द्रवित हो जाये,मन आप्लावित और कानों में मधु घुल जाये,वही माधुर्य गुणयुक्त है। यह गुण विशेष रूप से श्रृंगार,शान्त एवं करुण रस में पाया जाता है। माधुर्य गुण की रचना में-

  • कठोर वर्ण यानि सम्पूर्ण ट वर्ग (ट,ठ,ड,ढ, ण) के शब्द नहीं होने चाहिए।
  • अनुनासिक वर्णों से युक्त अत्यन्त दीर्घ संयुक्ताक्षर नहीं होना चाहिए।
  • लम्बे-लम्बे सामासिक पदों का प्रयोग भी वर्जित है।।
  • कोमलकांत मृदु पदावली का एवं मधुर वर्णों (क, ग, ज, द आदि) का प्रयोग होना चाहिए।

उदाहरण-
(1) ‘छाया करती रहे सदा, तुझ पर सुहाग की छाँह।
सुख-दुःख में ग्रीवा के नीचे हो, प्रियतम की बाँह ॥

(2) अनुराग भरे हरि बागन में,
सखि रागत राग अचूकनि सों।

(3) लेकर इतना रूप कहो तुम, दीख पड़े क्यों मुझे छली?
चले प्रभात बात फिर भी क्या खिले न कोमल कमल कली?

(4) बसो मोरे नैनन में नन्दलाल।
मोहिनी मूरत साँवरी सूरत नैना बने बिसाल।

(2) ओज गुण-जिस काव्य-रचना को सुनने से मन में उत्तेजना पैदा होती है,उस कविता में ओजगुण होता है। ओज का सम्बन्ध चित्त की उत्तेजना वृत्ति से है। इसलिए जिस काव्य को पढ़ने से या सुनने से पढ़ने वाले के हृदय में उत्तेजना आ जाती है,वही ओजगुण प्रधान रचना होती है। वीर रस रचना के लिए इस गुण की आवश्यकता होती है। इस गुण को उत्पन्न करने के लिए विद्वानों ने निम्न गुणों का विधान किया है-

  • रचना की शैली एवं शब्द योजना दोनों का ही सुगठित एवं सुनियोजित होना आवश्यक है।
  • पंक्ति अथवा छन्द की रचना में कहीं भी शिथिलता होना अनपेक्षित है।
  • रचना में ट वर्ग (ट,ठ,ड,ढ,ण) और सभी कठोर व्यंजनों का आधिक्य होना चाहिए।
  • र के संयोग से बने शब्द प्रथम एवं तृतीय, द्वितीय और चतुर्थ वर्गों का प्रयोग होते संयोजन तथा रेफ युक्त शब्द प्रभावशाली हैं।
  • लम्बे-लम्बे समासों से युक्त शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। अधिकाधिक संयुक्ताक्षरों का प्रयोग होना चाहिए।

उदाहरण-
(1) अमर राष्ट्र, उदण्ड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र-यह मेरी बोली।
यह ‘सुधार’, ‘समझौते’ वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली।।

(2) निकसत म्यान तें मयूखै प्रलै भानु कैसी,
फारै तम-तोम से गयंदन के जाल को।

(3) महलों ने दी आग, झोंपड़ियों में ज्वाला सुलगाई थी,
वह स्वतन्त्रता की चिनगारी, अन्तरतम् से आई थी।

(4) हिमाद्रि तुंग शृंग पर, प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयंप्रभा समुज्वला, स्वतन्त्रता पुकारती।

(3) प्रसाद गुण प्रसाद का अर्थ है-प्रसन्नता या निर्मलता। जिस काव्य को सुनते या पढ़ते समय वह हृदय पर छा जाये और बुद्धि शब्दों के दुरूह जाल में या क्लिष्ट अर्थों की कलुषता में मलिन न होकर एकदम प्रभावित हो जाये,मन खिल जाये,उसे प्रसाद गुण कहते हैं। कवि का उद्देश्य होता है-मानव हृदय को प्रभावित करना। प्रेमी की बात प्रिय पात्र के हृदय को रस से सराबोर न कर दे, ममता वात्सल्य को आह्लादित न कर पाये, करुणा नयनों के कोरों को यदि अविरल न कर पाये और वीरता का उत्साह यदि ओजित न कर पाये-ये सभी यदि शब्दों की भूलभुलैया में पड़कर क्लिष्टता के अस्त-व्यस्त मार्ग पर चल पड़े तो काव्य ब्रह्मानन्द सहोदर न होकर मस्तक की पीड़ा बन जायेगा। व्यस्तता के इस युग में हमें आज प्रसाद गुण युक्त काव्य की आवश्यकता है। यही गुण अधिक समय तक प्रभावशाली रह सकता है, क्योंकि यह सीधे हृदय पर छाप छोड़ता है। सभी रसों की रचना प्रसाद गुण युक्त हो सकती है। प्रसाद गुण का सम्बन्ध सभी रसों से है। उक्त दोनों गुणों की तरह यह गुण किसी रस विशेष से नियन्त्रित नहीं है। शब्दों के साथ अर्थ का भी सरल होना आवश्यक है। इसमें जो बात कही जाये,उसका वही अर्थ होता है। ‘साहित्य-दर्पण’ के प्रणेता आचार्य विश्वनाथ का कथन है कि-“समस्त रसों और रचनाओं में जो चित्त को सूखे ईंधन में अग्नि के समान शीघ्र व्याप्त करे-वह प्रसाद गुण है।”

उदाहरण-
(1) “चुप रहो जरा सपना पूरा हो जाने दो,
घर की मैना को जरा प्रभाती गाने दो,
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो,
मुझको आँचल में हरसिंगार भर लेने दो।”

(2) मानुस हौं तो वही रसखान
बसौं बज गोकुल गाँव के ग्वारन।

(3) तन भी सुन्दर मन भी सुन्दर
प्रभु मेरा जीवन हो सुन्दर।।

(4) हे प्रभो आनन्द दाता ! ज्ञान हमको दीजिए।

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(5) आशीषों का आँचल भर कर, प्यारे बच्चो लाई हूँ।
युग जननी मैं भारत माता द्वार तुम्हारे आई हूँ।

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 2 नर से नारायण

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 2 नर से नारायण (निबन्ध, बाबू गुलाबराय)

नर से नारायण पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

नर से नारायण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
त्राहि-त्राहि क्यों मची हुई थी? (M.P. 2009, 2012)
उत्तर:
अवर्षा के कारण सूखे की स्थिति हो गई थी, इसीलिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी।

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प्रश्न 2.
बच्चे क्यों प्रसन्न थे?
उत्तर:
लेखक के घर के पीछे वर्षा का पानी भर गया था और बच्चे उस घर की गंगा में कागज की नावें तैराने के कारण प्रसन्न थे।

प्रश्न 3.
लेखक ने किन परिस्थितियों में स्वयं को नारायण कहा है?
उत्तर:
नारायण का निवास स्थान जल में है और उसका घर भी वर्षा के कारण जल में डूबा हुआ था, ऐसी स्थिति में लेखक स्वयं को नारायण समझने लगा था।

प्रश्न 4.
लेखक ने अपने को अनंत का उपासक क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक सीमाओं को क्षुद्र समझता था अतः उसने अपने घर के चारों ओर दीवार नहीं बनाई थी। इसी कारण उसने स्वयं को अनंत का उपासक कहा है।

प्रश्न 5.
बाईबल के किस आदर्श का उल्लेख किया है?
उत्तर:
दान गुप्त होना चाहिए। एक हाथ से दान देते समय दूसरे हाथ को भी पता नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 6.
नाइग्राफाल सा किसे कहा गया है?
उत्तर:
रोशनदानों से तहखाने में गिरते पानी को नाइग्रा फाल कहा गया है।

नर से नारायण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्षा न होने के कारण लेखक ने अपनी वेदना को किस प्रकार व्यक्त किया है?
उत्तर:
ज्वार की पत्तियाँ ऐंठ-ऐंठकर बत्तियाँ बन गई थीं और नए छोटे-छोटे पौधे मुरझाने को विवश हो रहे थे। वर्षा न होने के कारण लेखक निराश था क्योंकि उसकी गाढ़ी कमाई के बीस रुपये बरबाद हो रहे थे क्योंकि इन रुपयों से उसने खेत में चरी बो रखी थी। वर्षा नहीं होने के कारण वे भी मुरझाने लगे थे।

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प्रश्न 2.
भीषण गर्मी के बाद प्रथम वर्षा के सुखद प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भीषण गर्मी के बाद प्रथम वर्षा की बूंदों से मनुष्य का मन प्रसन्न हो उठता है। वह वर्षा की छोटी-छोटी बूंदों के सुख देने वाले शीतल स्पर्श से पुलकित हो जाता है। सड़कें धुलकर साफ़-सुथरी और चिकनी हो जाती हैं। चारों ओर प्रकृति की छटा दर्शनीय हो जाती है। खेतों में हरियाली छा जाती है।

प्रश्न 3.
‘दिग्दाहों से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भीषण गर्मी के कारण दिशाओं के जलने के कारण धुआँ उठा अर्थात् क्षितिज के किनारों पर बादल उठे। लेखक इस बात का निर्णय नहीं कर पा रहा है कि क्षितिज पर भीषण गर्मी से जलने के कारण धुआँ उठ रहा है या क्षितिज से बादल उठ रहे हैं।

प्रश्न 4.
लेखक का आनंद आशंका में क्यों बदल गया? (M.P. 2011)
उत्तर:
लेखक का आनंद आशंका में इसलिए बदल गया क्योंकि उसके मकान के पीछे एक फुट पानी भर गया था और वह धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा था। पानी बढ़ने के साथ-साथ लेखक की आशंका भी बढ़ती जा रही थी।

प्रश्न 5.
जब बिजली चली गई तब लेखक को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना है? (M.P. 2011)
उत्तर:
बिजली के गुल हो जाने पर चारों तरफ घुप अँधेरा हो गया। सारा घर गहन अंधकार में डूब गया। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। सर से सर टकराने की स्थिति आ गई। लालटेन ढूँढ़ी गई तो उसमें तेल नहीं था। घर में माचिस तक न मिली। एक टूटी-फूटी टॉर्च भी थी जिसे ढूँढ़ना कठिन था। रोशनदानों से तहखाने में पानी गिर रहा था। जैसे-तैसे दीपक जलाया गया लेकिन वह तेज हवा के कारण बुझ गया। लेखक के नौकर पड़ोस से लालटेन माँगकर लाए। इस प्रकार जैसे ही रोशनी की व्यवस्था हुई सब लोग घर के भीतर बैठ गए।

प्रश्न 6.
बाढ़-पीड़ितों की सहायता किस प्रकार की गई?
उत्तर:
बाढ़-पीड़ितों को शिक्षण संस्थाओं में आश्रय दिया गया। लोगों ने अन्न, वस्त्रादि देकर उनकी प्राथमिक आवश्यकताएँ पूरी की। उनके घरों के पास वाढ़ के पानी को निकाला गया और मिट्टी डाली गई।

नर से नारायण भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव विस्तार कीजिए –

प्रश्न 1.
‘नारासु अयनं यस्य सः नारायणः’।
उत्तर:
जिसका घर नार (जल) में हो वही नारायण है। नारायण पोषण करने वाले हैं। वर्षा का जल सृष्टि का पोषणकर्ता है। नारायण का घर समुद्र में है जहाँ चारों ओर पानी ही पानी है। वर्षा से उत्पन्न जलभराव के कारण लेखक के घर के चारों ओर पानी भर गया है इसलिए वह बिना किसी करनी के ही स्वयं को नारायण समझने लगा।

प्रश्न 2.
दियासलाई ज्योतिस्वरूप परमात्मा बन गई।
उत्तर:
एकाएक बिजली के गुल होने से गहन अंधकार छा गया। अंधकार में दियासलाई को ढूँढ़ा गया। लेकिन अँधेरे में दियासलाई का मिलना एक टेढ़ी खीर थी। दियासलाई का मिलना ऐसा था जैसे ज्योतिस्वरूप एवं ज्योतिस्रोत ईश्वर का मिलना। इस प्रकार दियासलाई का मिलना परमात्मा के मिलने के समान हो गया था। उस समय घरवालों के लिए दियासलाई ज्योतिस्वरूप परमात्मा के समान बन गई थी।

नर से नारायण भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित का समास-विग्रह कर समास का नाम लिखिए –
मन-मयूर, श्रेय-प्रेय, चिंताग्रस्त, नयनाभिराम, जल-प्लावन, सायंकाल, जीव-दया, सुमनवर्षा, जलबाधा, स्नेहशून्य।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 2 नर से नारायण img-1

प्रश्न 2.
उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित अनेकार्थी शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
अंक, अर्थ, उत्तर, गुरु, फल।
उदाहरणः

  1. स्नेह-शून्य दीपक कब तक जल पाएगा?
  2. दीनों के प्रति स्नेह-शून्य व्यवहार मत करो।

उत्तर:

  • अंक – इस नाटक में कुल पाँच अंक हैं। बच्चे को रोता देख माँ ने उसे अंक में उठा लिया। रमेश ने परीक्षा में बहुत कम अंक प्राप्त किए हैं।
  • अर्थ – भाई-भाई के बीच में बोलने का तुम्हारा अर्थ क्या है? आजकल तो अर्थ के बिना कोई नहीं पूछता।
  • उत्तर – हिमालय पर्वत उत्तर दिशा में है। मैंने उत्तर लिख दिया है।
  • गुरु – बच्चो! गुरुजी की आज्ञा का पालन करो। मजदूरनी गुरु हथौड़ा हाथ में लिये पत्थर तोड़ रही है।
  • फल – बुरे कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। आम का फल बड़ा रसीला होता है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्द-युग्मों का वाक्य में प्रयोग कीजिए –
तन-मन, श्रेय-प्रेय, हँसता-खेलता, टूटी-फूटी, बचा-खुचा।
उत्तर:

  • तन-मन – मैंने उस असहाय बीमार की तन-मन से सेवा की।
  • श्रेय-प्रेय – लेखक आनंद और कर्त्तव्यं तथा श्रेय-प्रेय का समन्वय करने कॉलेज भी गया।
  • हँसता-खेलता – बच्चा हँसता-खेलता ही प्रिय लगता है।
  • टूटी-फूटी – अंग्रेज टूटी-फूटी हिंदी में भी बात कर लेते हैं।
  • बचा-खुचा – नौकर ने बचा-खुचा खाना भिखारी को दे दिया।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित भिन्नार्थी शब्दों के पृथक-पृथक वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
वात-बात, वन-बन, अपेक्षा-उपेक्षा, चिंता-चिता, ओर-और, तरणी-तरणि, सुत-सूत, क्षात्र-छात्र। (M.P. 2010)
उत्तर:

  • वात – वह वात रोग से पीड़ित है।
    बात – रोगी से अधिक बात मत कीजिए।
  • वन – राम वन गए।
    बन – बात बन गई है।
  • अपेक्षा – सोहन से परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है।
    उपेक्षा – हमें अपने माता-पिता की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
  • चिंता – पुत्र को बीमार देखकर माँ का मनचिंता से अनायास भर उठा।
    चिता – चिता की अग्नि धधक उठी।
  • ओर – सूर्य पूर्व दिशा की ओर से उगता है।
    और – धर्म और कर्म ही मनुष्य के साथ जाते हैं।
  • तरणी – भक्ति रूपी तरणी से भवसागर पार किया जा सकता है।
    तरणि – तरणि का तेज देखते ही बनता है! (M.P. 2010)
  • सुत – मेरा ही सुत मुझे आँखें दिखा रहा है।
    सूत – गाँधीजी सूत कातते थे। (M.P. 2010)
  • क्षात्र – क्षात्र को खुला मत छोड़ना।
    छात्र – यह छात्र बहुत परिश्रमी है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
कान में भनक पड़ना, त्राहि-त्राहि मचना, दो-चार आँसू बहाना, घर फूंक तमाशा देखना, भगीरथ प्रयत्न करना।
उत्तर:

  • कान में भनक पड़ना – (निंदा, बुराई अथवा षड्यंत्र की बात सुनने में आना) आतंकी योजना की कान में भनक पड़ने ही पुलिस सजग हो गई।
  • त्राहि-त्राहि मचना – (हाहाकार होना) महँगाई से सारे देश में त्राहि-त्राहि मची हुई है। (M.P. 2009)
  • दो-चार आँसू बहाना – (दख प्रकट करना) महँगाई के नाम पर नेतागण दो-चार आँसू बहा लेते हैं।
  • घर फूंक तमाशा देखना – (हानि उठाकर प्रसन्न होना) दीपावली पर पटाखे चलाना घर फूंक तमाशा देखने के बराबर है।
  • भगीरथ प्रयत्न करना – (अत्यधिक प्रयास करना) आई.ए.एस. बनने के लिए भगीरथ प्रयत्न करना पड़ता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित लोकोक्तियों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए –

  1. का वर्षा जब कृषि सुखानी।
  2. सिमिटि-सिमिटि जल भरहिं तलाबा।

उत्तर:

  1. जब आतंकवादी शहर में विस्फोट करने में सफल हो गए तब पुलिस पहुँची। टीक ही कहा गया है-का वर्षा जब कृषि सुखानी।
  2. लेखक के घर के चारों ओर सिमिटि-सिमिटि जब भरहिं तलाबा वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार रूपांतरित कीजिए –

  1. बच्चे भी घर की गंगाजी में कागज की नावें तैराकर खुश हो रहे थे। (संयुक्त वाक्य)
  2. मेरी सौंदर्योपासना अविचलित रही, क्योंकि ऐसा कई बार हो चुका था। (सरल वाक्य)
  3. सुबह उठकर जलप्लावन का व्यापक एवं भयंकर दृश्य देखा। (मिश्र वाक्य)

उत्तर:

  1. बच्चे भी घर की गंगाजी में कागज की नावें तैरा रहे थे और खुश हो रहे थे।
  2. ऐसा कई बार होने के कारण मेरी सौंदर्योपासना अविचलित रही।
  3. जो सुबह उठकर जलप्लावन का दृश्य देखा, वह व्यापक एवं भयंकर था।
    या
    जब सुबह उठा तब जलप्लावन का व्यापक एवं भयंकर दृश्य देखा।

नर से नारायण योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
यदि आपके गाँव या नगर में बाढ़ आ जाए तो आप बाढ़ पीड़ितों के लिए क्या-क्या उपाय करेंगे? लिपिबद्ध कीजिए।
उत्तर:
यदि हमारे गाँव या नगर में बाढ़ आ जाए तो हम बाढ़ पीड़ितों को उस गाँव या नगर के सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाएँगे और उनकी अन्न, वस्त्र और औषधियों से खूब सहायता करेंगे। उनके घरों के पास से पानी निकालने में प्रशासन की सहायता करेंगे। उनके पशुओं के लिए चारे का प्रबंध करेंगे। पशुओं को भी सुरक्षित स्थानों पर ले जाएँगे।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक आपदाओं के संबंध में जानकारी प्राप्त कर कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
बाढ़, भूकंप, सूखा आदि प्राकृतिक आपदाएँ हैं। छात्र इनके संबंध में स्वयं जानकारी प्राप्त कर चर्चा करें।

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प्रश्न 3.
‘वर्षा-ऋतु’ अथवा ‘जल ही जीवन है’ विषय पर 150 शब्दों में निबंध लिखिए। (M.P. 2011)
उत्तर:
छात्र स्वयं लिखें। निबन्ध खण्ड में देखें।

नर से नारायण परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर –

प्रश्न 1.
‘नर से नारायण’ निबंध का लेखक कौन है?
(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ख) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(ग) बाबू गुलाबराय
(घ) आचार्य नरेंद्र देव
उत्तर:
(ग) बाबू गुलाबराय।

प्रश्न 2.
निबंध में किस ऋतु के प्रभाव का वर्णन किया गया है?
(क) ग्रीष्म ऋतु
(ख) वर्षा ऋतु
(ग) वसंत ऋतु
(घ) शरद ऋतु
उत्तर:
(ख) वर्षा ऋतु।

प्रश्न 3.
स्वयं को नारायण कौन समझने लगा?
(क) बनर्जी साहब
(ख) रणधीर जी
(ग) मंगलदेव जी
(घ) लेखक बाबू गुलाबराय
उत्तर:
(घ) लेखक बाबू गुलाबराय।

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प्रश्न 4.
लेखक ने बनर्जी साहब का निमंत्रण कब स्वीकार किया? (M.P. 2009)
(क) जब बिजली गुल हो गई
(ख) जब बरामदे और शयनागार का फर्श बैठ गया
(ग) जब तहखाने में साँप आ गया
(घ) जब उनका घर जलमग्न हो गया
उत्तर:
(ख) जब बरामदे और शयनागार का फर्श बैठ गया।

प्रश्न 5.
लेखक ने किस काम को संदल घिसने की भाँति सरदर्द वाला बताया है?
(क) लालटेन ढूँढ़ने के काम को
(ख) दियासलाई ढूँढ़ने के काम को
(ग) टॉर्च ढूँढ़ने के काम को
(घ) दीपक जलाने के काम को
उत्तर:
(ग) टॉर्च ढूँढ़ने के काम को।

प्रश्न 6.
लेखक ने अपने किस पड़ोसी की व्यवहारकुशलता की प्रशंसा की है?
(क) बनर्जी साहब की
(ख) मंगलदेव की
(ग) काछी-कुम्हार की
(घ) रणधीर की
उत्तर:
(क) बनर्जी साहब की

प्रश्न 7.
लेखक ने वरुण-रस किसे कहा है?
(क) वर्षा के जल को
(ख) कुएँ के पानी को
(ग) तालाब के जल को
(घ) समुद्र के जल को
उत्तर:
(क) वर्षा के जल को।

प्रश्न 8.
लेखक ने किस रस के लौकिक अनुभव की पुनरावृत्ति न कराने की प्रार्थनकी?
(क) रौद्र रस की
(ख) करुण रस की
(ग) शांत रस की
(घ) वरुण रस की
उत्तर:
(घ) वरुण रस की।

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें –

  1. ‘नर से नारायण’ निबन्ध के लेखक ………. हैं। (गुलाबराय रामचन्द्र शुक्ल) (M.P. 2009)
  2. लेखक गुलाबराय ……… के भूतपूर्व सदस्य थे। (जीव-दया प्रचारिणी सभा/महासभा)
  3. ………. के महीने में पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई थी। (अगस्त सितम्बर)
  4. लेखक के माली का नाम ………. था। (रविदेव/मंगलदेव)
  5. लेखक के पड़ोसी का नाम ……… था। (श्री बनर्जी साहब/श्री चटर्जी साहब)

उत्तर:

  1. गुलाबराय
  2. जीवन-दया प्रचारिणी सभा
  3. सितम्बर
  4. मंगलदेव
  5. श्री बनर्जी साहब।

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III. निम्नलिखित कथन के लिए सही विकल्प चुनिए –

प्रश्न 1.
‘नर से नारायण’ निबन्ध में लेखक ने बीस रुपये किस पर खर्च किए थे?
(क) लालटेन खरीदने में
(ख) फसल बोने में
(ग) तहखाने का रोशनदान बनवाने में
(घ) माली से पौधे लगवाने में
उत्तर:
(ख) फसल बोने में

IV. निम्नलिखित कथनों में सत्य असत्य छाँटिए –

  1. ‘नर से नारायण’ शीर्षक निबन्ध की भाषा संस्कृत प्रधान है।
  2. लेखक को अपने तहखाने के रोशनदानों पर काफी गर्व था।
  3. बिजली गुल होते ही सभी घर से बाहर निकल पड़े।
  4. लालटेन में तेल भरा हुआ था।
  5. लेखक वर्षा के सौंदर्य रूप से अधिक प्रभावित था।
  6. ‘नर से नारायण’ निबंध लेखक बाबू गुलाबराय हैं। (M.P. 2012)

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. सत्य।

V. निम्न के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 2 नर से नारायण img-2
उत्तर:

(क) (iii)
(ख) (i)
(ग) (v)
(घ) (ii)
(ङ) (iv)

VI. निम्न प्रश्नों के एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1.
श्री बनर्जी साहब कौन थे?
उत्तर:
श्री बनर्जी साहब लेखक गुलाबराय के पड़ोसी थे।

प्रश्न 2.
त्राहि-त्राहि क्यों मची हुई थी? (M.P. Board 2009)
उत्तर:
अवर्षा की स्थिति के कारण त्राहि-त्राहि मची हुई थी।

प्रश्न 3.
लेखक ने खेत में क्या बो रखी थी?
उत्तर:
लेखक ने खेत में चरी बो रखी थी।

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प्रश्न 4.
लेखक को कहाँ पर आश्रय मिला था?
उत्तर:
लेखक को जैन बोर्डिंग में आश्रय मिला था।

प्रश्न 5.
लेखक को तहखाने के रोशनदानों पर क्यों गर्व था?
उत्तर:
क्योंकि लेखक सायंकाल को भी वहाँ बैठकर लिख-पढ़ सकता था।

नर से नारायण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक पहले किस स्थिति से दुखी था?
उत्तर:
लेखक पहले अवर्षा की स्थिति से दुखी था।

प्रश्न 2.
गरीब किसानों की भस्म करने वाली आहों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
गरीब किसानों की भस्म करने वाली आहों के प्रभाव से आकाश में बादल – बनते दिखाई देने लगे।

प्रश्न 3.
लेखक को स्फूर्ति क्यों आई और उसने क्या किया?
उत्तर:
वर्षा के कारण लेखक के शरीर में स्फूर्ति आई और वह लिखने बैठ गया।

प्रश्न 4.
लेखक ने बेरोजगारी की समस्या पर क्या चुटकी ली है?
उत्तर:
लेखक ने बेरोजगारी की समस्या पर चुटकी लेते हुए कहा है कि आजकल के युग में बेकारों की अर्जियों से दफ्तर बन जाते हैं।

प्रश्न 5.
अगस्त्य ऋषि का यांत्रिक अवतार किसे कहा गया है?
उत्तर:
फायर बिग्रेड को अगस्त्य ऋषि का यांत्रिक अवतार कहा गया है।

प्रश्न 6.
त्राहि-त्राहि क्यों मची हुई थी? (M.P. 2009)
उत्तर:
सितम्बर महीने तक बारीश न होने से त्राहि-त्राहि मची हुई थी।

प्रश्न 7.
लेखक को तहखाने में बने रोशनदानों पर क्यों गर्व था?
उत्तर:
लेखक को तहखाने में बने रोशनदानों पर इसलिए गर्व था कि उनसे प्रकाश के साथ-साथ वायु का भी आर-पार संचार होता था।

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प्रश्न 8.
लेखक को जल-बाधा से कितने दिन बाद मुक्ति मिली?
उत्तर:
लेखक को पूरे सप्ताह अर्थात् सात दिन बाद जल-बाधा से मुक्ति मिली।

नर से नारायण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक ने वर्षा के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद कैसे लिया?
उत्तर:
लेखक ने वर्षा के दौरान कमरे से बाहर जाकर मेघाच्छादित गगन मंडल की शोभा निहारकर, बगीचे में जाकर शेफाली के गिरते फूलों को देखते हुए तथा धोए-धोए पत्तों वाली हरित-ललित-यौवनभरी लहलहाती लताओं के सौंदर्य का अपने नेत्रों से पान करके प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया।

प्रश्न 2.
लेखक के मकान को वर्षा ने क्या-क्या हानि पहुँचाई?
उत्तर:
लेखक के मकान के तहखाने में पानी भर गया। कमरों तथा बरामदे के फर्श बैठ गए और भैंस बाँधने का छप्पर जलमग्न हो गया। उसके मकान के चारों ओर पानी भर गया।

प्रश्न 3.
बाढ़ का प्रभाव किन-किन स्थानों पर हुआ?
उत्तर:
बाढ़ का प्रभाव लेखक के मकान और उसके पड़ोसियों पर भी पड़ा। जेल के पास नाव चलने की नौबत आ गई। सेंट जोंस गर्ल्स स्कूल जलमग्न हो गया। गाँव के गाँव जलमग्न हो गए। काफी लोगों की मृत्यु हो गई। जो लोग घर से बाहर गए थे उनके लिए लौटना मुश्किल हो गया। आगरा फोर्ट के पास सड़क फट गई। बिजली के खंभे उखड़ गए। इस प्रकार कई स्थान बाढ़ की चपेट में बुरी तरह आ गए।

प्रश्न 4.
लेखक स्वयं को कब नारायण समझने लगा था?
उत्तर:
लेखक यह जानता था कि जल ही नारायण का निवास स्थान है। चूंकि अत्यधिक वर्षा के कारण उसके घर के चारों ओर तथा तहखाने में पानी भर गया था। इस दशा को देखकर वह स्वयं को नारायण समझने लगा था।

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प्रश्न 5.
लेखक अपने घर को मनु की नौका क्यों समझ रहा था?
उत्तर:
चूँकि बारिश बहुत हुई थी। उससे लेखक के घर के चारों ओर पानी भर गया। इससे सारा घर क्षतिग्रस्त हो गया था। इस टूटे-फूटे और जल में डूबते हुए अपने घर को देखकर लेखक उसे मनु की नौका समझ रहा था।

नर से नारायण लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
बाबू गुलाबराय का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
बाबू गुलाबराय हिंदी के प्रसिद्ध समालोचक एवं निबंधकार थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा नगर में सन् 1888 ई० में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में हुई जो काफी सुदृढ़ और नियमित थी। बाद में वे आगरा विश्वविद्यालय के छात्र हो गए और वहाँ से उन्होंने दर्शनशास्त्र में एम.ए. करने के बाद एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे छतरपुर के महाराज के निजी सचिव के रूप में कार्य करते रहे। इसके बाद आप एक रियासत के दीवान रहे और इस पद पर कुशलतापूर्वक कार्य किया।

महाराज के निधन के पश्चात् आप आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज में अध्यापन-कार्य करने लगे। आपने आगरा से निकलने वाले ‘साहित्य-संदेश’ के संपादक के रूप में कार्य करते हुए अपने चिंतन की प्रखरता और गंभीरता से साहित्य जगत् में अपना विशिष्ट स्थान बनाया था। उनकी विशिष्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए आगरा विश्वविद्यालय ने इन्हें डी-लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया था। इनका निधन 13 अप्रैल, सन् 1963 ई० में आगरा में हुआ।

साहित्यिक विशेषताएँ:
बाबू गुलाबराय का साहित्य विविधताओं से भरा हुआ है। उनकी रचनाओं में तर्कपूर्ण विश्लेषण के साथ-साथ भारतीय सिद्धांतों की सूक्ष्म विवेचना मिलती है। उन्होंने धर्म, दर्शन एवं साहित्य से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर निबंध लिखे हैं। उनके निबंध वर्णनात्मक, विवेचनात्मक और भावात्मक होने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिकता से भरपूर हैं। उनके निबंधों में गंभीरता के साथ-साथ व्यंग्य और विनोद का पुट भी मिलता है। उनकी रचनाओं में एक विचित्र रस है जो पाठक और श्रोता को बाँधे रखता है। वे द्विवेदी युग के एक सशक्त एवं परिपक्व गद्यकार हैं। द्विवेदी युग में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में गंभीर विवेचन करने वाले विद्वानों में आपका सर्वोच्च स्थान है।

रचनाएँ:
बाबू गुलाबराय ने गद्य-साहित्य की अनेक विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। उनकी रचनाओं में मुख्य हैं –

  • काव्य-शास्त्र – नवरस, सिद्धांत और अध्ययन, काव्य के रूप, हिंदी नाट्य-विमर्श।
  • साहित्य का इतिहास – हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास।
  • आलोचना – अध्ययन और आस्वाद, हिंदी काव्य-विमर्श।
  • निबंध-संकलन – फिर निराश क्यों, मेरे निबंध, मनोवैज्ञानिक निबंध, जीवन-रश्मियाँ, व्यंग्य-ठलुआ क्लब, डॉक्टर साहब।
  • जीवनीपरक – मेरी असफलताएँ।

भाषा-शैली:
आपकी भाषा-शैली सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक है। आपने गंभीर विषयों में संस्कृत प्रधान भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में अरबी, फारसी, अंग्रेजी का प्रयोग किया है। मुहावरों और कहावतों के सटीक प्रयोग करने में आप सिद्धहस्त हैं।

महत्त्व:
हिंदी गद्य साहित्य में बाबू गुलाबराय का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने गद्य साहित्य की अनेक विधाओं की रचना कर, सशक्त और परिपक्व गद्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने हिंदी आलोचना और निबंध के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान कर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है।

‘नर से नारायण’ पाठ का सारांश ।

प्रश्न 2.
बाबू गुलाबराय द्वारा लिखित निबंध ‘नर से नारायण’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
इस निबंध की विषय-वस्तु ‘वर्षा’ केंद्रित है किंतु निबंधकार ने अपने आत्मगत विस्तार में अनेक विषयों का स्पर्श किया है। निबंध के प्रारंभ में अवर्षा की स्थिति से प्रभावित प्रकृति की ओर संकेत किया गया है, और बाद में अति वर्षा के कारण घर-गृहस्थी पर पड़ने वाले प्रभाव को व्यक्त किया है। सितंबर महीने में सब तरफ पानी का अभाव था लेकिन लेखक ने बीस रुपये व्यय करके खेत में चरी बो दी।

पानी की कमी के कारण चरी के नए पौधे सूखने लगे। खैर, किसानों की आह से आकाश में बादल उमड़ने-घुमड़ने लगे। आकाश में बादल का छाना क्या था, लेखक का मन प्रफुल्लित हो उठा। वह उनकी उपयोगिता की अपेक्षा उनके सौंदर्य से अधिक प्रभावित हुआ। वह घर से बाहर निकलकर वर्षा की छोटी-छोटी बूंदों का आनंद लेता हुआ इधर-उधर घूमने लगा। वर्षा की छटा और खेती के फलने-फूलने के उत्साह से भरा वह घर लौटा।

वर्षा में भीगने के कारण शरीर में स्फूर्ति का संचार हुआ और उससे प्रेरित होकर वह फौरन लिखने बैठ गया। कभी बाहर जाकर बादलों से घिरे आकाश का सौंदर्य निहारता तो कभी बगीचे में उगे शेफानी के फूलों ओर लताओं के सौंदर्य पर निगाह डालता। सचमुच वह बहुत प्रसन्न था। वर्षा लगातार हो रही थी। बहुत जल्दी घर के पीछे की ओर एक फुट पानी भर गया था, परंतु लेखक के लिए यह चिंता का विषय नहीं था। लेकिन जब घर के चारों ओर पानी भर गया तो उसके मन में आशंका उत्पन्न हो गई कि पानी के तालाब में कहीं बाढ़ आ गई तो? शीघ्र ही पास की जमीन का पानी लेखक की जमीन में आ गया।

पानी थोड़ी देर में रोशनदानों के मुँह तक पहुँच गया और पानी घर के अंदर गिरने लगा। लेखक को अपने घर के तहखाने के रोशनदानों पर बड़ा गर्व था। वह सभी आने वाले के सामने तहखाने में आर-पार वायु संचार की व्यवस्था का और टूटी-फूटी शान और स्वास्थ्य-विज्ञान संबंधी ज्ञान का प्रदर्शन करता था। इन्हीं रोशनदानों से तहखाने में पानी के झरने गिरने लगे। वर्षा के इस दौर में बिजली चली गई। चारों ओर घुप अंधकार हो गया। हाथ को हाथ नहीं सूझता था। लालटेन की खोज होने लगी। अँधेरे के कारण घर में दियासलाई मिलनी भी मुश्किल थी। जैसे-तैसे तेलरहि लालटेन मिली। एक टूटी-फूटी टॉर्च थी किंतु उसे ढूँढ़ना कठिन था। लेखक को लगा कि सेलरों से गिरते निर्झर उसकी मूर्खता की घोषणा कर रहे हों। घर के नौकर पड़ोस से लालटेन ले आए और हम सब शांतिपूर्वक घर में बैठ गए।

अभी तक लेखक को कोई खास चिंता नहीं थी। थोड़ी देर में पास के कमरे से आवाज आई, ‘चलियो’ नौकर ने चिल्लाकर कहा, ‘बाबूजी उधर ही रहना’, जमीन बैठ गई थी तथा फर्श के पत्थर आपस में सर से सर मिलाकर खड़े हो गए थे। भैंस का छप्पर भी तालाब बन चुका था। लेखक के पड़ोसी ने उनसे कहा कि कोई तकलीफ हो तो इधर आ जाना। थोड़ी देर में बरामदे और शयन कक्ष का फर्श भी बैट गया। बाद में पड़ोसी के घर में शरण ली। उन्होंने भैंस को भी अपने यहाँ आश्रय दिया। रात वहीं गुज़री। सुबह जब लेखक उठा तो उसे बाढ़ का भयंकर दृश्य दिखाई दिया। लेखक करुण हास्य के साथ जल-प्रवाह देखने लगा और स्वयं को कामायनी का मन ही नहीं नारायण समझने लगा। इस प्रकार लेखक बिना किए ही नर से नारायण बन गया।

उस दिन लेखक को सभी की सहानुभूति मिली। वर्षा के बाद घर से पानी निकालने का प्रयास असफल हो गया। अगले फायर ब्रिगेड ने पानी निकालने का असफल प्र किया। पाँचवें दिन इंजन लगाकर पानी निकाला गया। कोठी के चारों ओर मिट्टी डाली गई। इस प्रकार पूरे एक सप्ताह बाद जल-बाधा दूर हुई। – लेखक के घर का ही यह हाल नहीं था अपितु कई स्थानों पर ऐसा ही दृश्य दिखाई दे रहा था। बाढ़ में गाँव के गाँव जलमग्न हो गए। अनेक लोग मौत के शिकार हो गए। जो लोग घर से बाहर गए हुए थे उनको घर लौटना मुश्किल हो गया। सड़कें टूट गईं, पुल बह गए। सभी शिक्षा संस्थाओं में बाढ़-पीड़ितों को आश्रय दिया गया। सभी बाढ़-पीड़ितों की सहायता कर रहे थे। लेखक के परिवार को भी जैन बोर्डिंग में आश्रय मिला। लेखक ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह इस बाढ़ की पुनरावृत्ति न कराए।

नर से नारायण संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

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प्रश्न 1.
सितंबर के महीने में, पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई थी। मैंने भी धर्म-पालन के लिए पास के एक खेत में चरी बो रखी थी। ज्वार की पत्तियाँ ऐंठ-ऐंठकर बत्तियाँ बन गई थीं। मैं भी जीव-दया प्रचारिणी सभा का भूतपूर्व मेम्बर होने के नाते नौनिहाल, किंतु अब तन-मन मुाए हुए नव-उम्र पौधों की बेकसी पर और अपनी गाढ़ी कमाई के बीस रुपयों की बरबादी पर दो-चार आँसू बहा देता। लेकिन उनसे होता क्या? यदि वे रीतिकालीन काव्यों की विरहिणी गोपिकाओं के समान भी होते, जिनसे कि समुद्र का पानी खारा हो गया था, तो भी वे खारा होने के कारण सिंचाई का काम न देते। खैर, फिर भी गरीब किसानों की सार को भस्म करने वाली आहों के बादल बनते दिखाई दिए, ‘दिग्दाहों से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के।

ऐसा मालूम होने लगा कि अब दीनदयाल के कान में भनक पड़ी और शायद यह न कहना पड़े ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’। ‘धूम-धुआँरे कारे कजरारे’ श्याम घनों को देखकर मेरा। मन-मयूर नृत्य करने लगा। बादलों की उपयोगिता की अपेक्षा मैं उनके सौन्दर्य से अधिक प्रभावित होता हूँ। बाहर घूमता फिरा, नन्हीं-नन्हीं बूंदों के सुखद शीतल स्पर्श से पुलकित हुआ। आनंद और कर्त्तव्य तथा श्रेय-प्रेय का समन्वय करने कॉलेज भी गया। यद्यपि मेरी सदा छुट्टी-सी रहती है तो भी वर्षा के कारण कॉलेज बंद हो जाने से बालकपन के संस्कारोंवश प्रसन्नता का अनुभव किया। धुली-धुलाई सड़कों की स्निग्ध चमकीली छटा तथा चारों ओर के नयनाभिराम छायावादी आर्द्र सौंदर्य का आस्वादन करता हुआ हँसता-खेलता, खेती की ओर हर्ष-पूर्ण दृष्टिपात करता हुआ उमंगभरे हृदय के साथ घर लौटा। (Page 5)

शब्दार्थ:

  • त्राहि-त्राहि करना – किसी आपदा के समय रक्षा के लिए प्रार्थना करना, गुहार लगाना।
  • जीव-दया – जीवों पर दया करना।
  • बेबसी – विवशता।
  • गाढ़ी कमाई – परिश्रम की कमाई।
  • आँसू बहाना – दुख व्यक्त करना।
  • विरहिणी – वियोगिनी।
  • सार – किसी पदार्थ का मुख्य या मूल भाग।
  • दिग्दाह – दिशाओं का जलना।
  • जलघर – बादल।
  • क्षितिज – वह काल्पनिक रेखा जहाँ पृथ्वी और आकाश मिलते प्रतीत होते हैं।
  • दीनदयाल – ईश्वर, भगवान।
  • कान में भनक पड़ना – जानकारी होना।
  • का वर्षा जब कृषि सुखानी – खेती सूखने पर वर्षा होने का क्या लाभ।
  • श्याम घन – काले बादल।
  • पुलकित – आनंदित होना, प्रसन्न होना।
  • छटा – शोभा।
  • उमंग – उत्साह।
  • स्निग्ध – चिकनी।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश बाबू गुलाबराय द्वारा लिखित निबंध ‘नर से नारायण’ से उद्धृत है। इस पद में लेखक ने अवर्षा की स्थिति से प्रभावित प्रकृति की ओर संकेत किया है। बाद में आकाश में बादल छा जाते हैं। लेखक प्रफुल्लित हो जाता है। अपनी मनःस्थिति का वर्णन करते हुए वह कहता है –

व्याख्या:
सितंबर महीने तक वर्षा न होने के कारण पानी की कमी के कारण सभी इंद्रदेवता से सूखे से रक्षा करने के लिए गुहार लगा रहे थे। लेखक कहता है कि उसने भी धर्म का पालन करने के लिए पास के एक खेत में चरी बो रखी थी। पानी की कमी के कारण खेत में खड़ी ज्वार के पौधों की पत्तियाँ सूखकर, ऐंठकर बत्तियों-सी बन गई थीं। अर्थात् ज्वार की फसल सूखकर नष्ट हो रही थी। लेखक जीवों पर दया करने का प्रचार करने वाली संस्था का भूतपूर्व नौजवान सदस्य था। किंतु अब सूखे की स्थिति के कारण खेत में उत्पन्न नए-नए पौधों के तन-मन से मुरझाते जाने की विवशता और अपनी मेहनत से कमाये गए बीस रुपयों के बरबाद होते चले जाने पर आँसू बहाकर दुख व्यक्त कर रहा था।

अर्थात् लेखक ने अपनी मेहनत की कमाई के बीस रुपयों से चरी के बीज खेत में बोए थे। उनमें अंकुर फूटकर पौंधे बन गए थे किंतु पानी के अभाव के कारण चरी के वे नए पौधे सूखने लगे थे। लेखक को अपने बीस रुपये बरबाद होने का दुख हो रहा था। परंतु उसके दुख व्यक्त करने से कुछ होने वाला नहीं था। यदि उसके आँसू रीतिकालीन काव्यों की वियोगिनी नायिकाओं की भाँति भी होते, जिनके आँसुओं के कारण समुद्र का पानी खारा हो गया था, तो भी आँसुओं के खारा होने के कारण सिंचाई के काम न आते। इस प्रकार रीतिकालीन कवियों ने वियोगिनी नायिकाओं के आँसुओं का बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया है। उनके आँसुओं के समुद्र में मिलने के कारण समुद्र का पानी खारा हो गया था।

फिर भी गरीब किसानों की किसी पदार्थ को भस्म करने वाली आहों (कराहने की आवाज) से आकाश में बादल छाते दिखाई पड़ने लगे। उन किसानों की आहों से दिशाओं के जलने से धुआँ उठा या क्षितिज के किनारे बादल उठे, यह निश्चित नहीं हो रहा था। लेकिन आकाश में उठे बादलों को देखकर ऐसा लगता था कि दीन-दुखियों पर दया करने वाले ईश्वर के कानों में अब उनकी आवाज पहुँच गई है और संभवतः यह न कहना पड़ेगा कि कृषि (खेती) सूखने पर वर्षा होने का क्या लाभ? निस्संदेह काले बादलों को देखकर लगता था कि अब वर्षा होगी और खेती सूखने से बच जाएगी। लेखक कहता है कि आकाश में काजल के समान काले-काले बादलों को उमड़ते-घुमड़ते देखकर उसका मन प्रसन्नता से झूम उठा।

वह बादलों की उपयोगिता के स्थान पर उनकी सुंदरता से अधिक प्रभावित होता है। वह वर्षा की छोटी-छोटी बूंदों का आनंद लेते हुए घर से बाहर निकल पड़ता है। घूमते-फिरते बूंदों के सुख देने वाले ठंडे स्पर्श से प्रसन्न हो उठा। आनंद और कर्त्तव्य तथा श्रेय-प्रेय का समन्वय करने के लिए वर्षा में ही कॉलेज भी चला गया। यह बात अलग है कि उसकी तो सदा छुट्टी ही रहती है तब भी वर्षा में कॉलेज बंद हो जाने के कारण बालकपन के संस्कारों के कारण प्रसन्नता का अनुभव किया।

अर्थात् जैसे बालकपन में वर्षा के कारण स्कूल बंद होने पर आनंद का, प्रसन्नता का अनुभव होता था उसी प्रकार अब कॉलेज के बंद होने पर प्रसन्नता का अनुभव हुआ। वर्षा के कारण धुलकर साफ़-सुथरी हुई सड़कों की चमकीली शोभा तथा प्रकृति में चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य का रसपान करता हुआ तथा हँसता-खेलता हुआ, खेतों की ओर प्रसन्नतापूर्वक देखता हुआ, उत्साहभरे हृदय से वापस आया।

विशेष:

  1. इन पंक्तियों में लेखक ने अवर्षा के प्रभाव का वर्णन किया है। बाद में वर्षा होने के प्रभाव को व्यक्त किया है। वर्षा के प्राकृतिक सौंदर्य का आकर्षक चित्रण किया गया है।
  2. भाषा संस्कृत प्रधान है।
  3. शैली वर्णनात्मक एवं आत्मनिष्ठ है।
  4. मुहावरों और लोकोक्तियों के कारण गद्यांश आकर्षक बन पड़ा है।
  5. लोकोक्तियों के प्रयोग से सजीवता आ गई है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक ने किस धर्म-पालन की बात की है?
उत्तर:
लेखक ने खेती करने के धर्म-पालन की बात की है। धर्म-पालन के लिए उसने खेत में चरी बोई थी।

प्रश्न (ii)
ज्वार की पत्तियाँ ऐंठ-ऐंठकर बत्तियाँ क्यों बन गई थीं?
उत्तर:
पानी की कमी के कारण ज्वार की पत्तियाँ ऐंठकर बत्तियाँ बन गई थीं।

प्रश्न (iii)
किसानों की आहों का क्या प्रभाव हुआ?
उत्तर:
किसानों की आहों का यह असर हुआ कि आकाश में बादल उमड़ने-घुमड़ने लगे।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक किंस संस्था का भूतपूर्व सदस्य था?
उत्तर:
लेखक जीव-दया प्रचारिणी सभा का भूतपूर्व सदस्य था।

प्रश्न (ii)
आँसुओं का पानी कैसा होता है?
उत्तर:
आँसुओं का पानी खारा होता है। इस कारण सिंचाई के काम नहीं आ सकता।

प्रश्न (iii)
लेखक बादलों के किस रूप से प्रभावित होता है?
उत्तर:
लेखक बादलों के सौंदर्य रूप से अधिक प्रभावित होता है।

प्रश्न 2.
मैं अपने तहखाने के रोशनदानों पर गर्व किया करता था कि मैं उनके कारण सायंकाल को भी वहाँ बैठकर लिख-पढ़ सकता था। जो महाशय मेरा मकान देखने की कृपा करते, उनसे मैं आर-पार वायु संचार की तारीफ बड़ी प्रसन्नता के साथ करता था, क्योंकि उससे मुझे अपनी टूटी-फूटी शान और स्वास्थ्य-विज्ञान संबंधी ज्ञान के प्रदर्शन का मौका मिल जाता। सौंदर्यप्रिय होते हुए भी तहखाने के झरनों के पुष्ट मांसल सौंदर्य का आस्वादन न कर सका। यदि घर फूंक तमाशा भी देखना चाहता तो नामुमकिन हो गया था।

एक साथ बिजली ठप्प हो गई। घर फूंक तमाशा देखने वाले को कम से कम प्रकाश की तो जरूरत नहीं होती। यहाँ तो पूर्व जन्म के पापों के उदय होने के कारण ‘असूर्या नाम ते लोकाः अन्धेन तमसावृताः’ का दृश्य. उपस्थित हो गया। घनी कालिमा बिना स्तर-स्तर जमे ही पीन होने लगी। सूची-भेद्य अंधकार का साम्राज्य हो गया। हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बाइबिल के आदर्श दानी की भाँति दायाँ हाथ बाएँ हाथ की बात नहीं जान सकता था। सर से सर टकराने की नौबत आ गई थी। लालटेन की पुकार होने लगी। (Pages 5-6)

शब्दार्थ:

  • तहखाना – जमीन के नीचे बना हुआ कमरा।
  • गर्व – घमंड, अभिमान।
  • तारीफ़ – प्रशंसा।
  • मांसल – मांस से भरा हुआ, पुष्ट।
  • आस्वादन – स्वाद लेना।
  • नामुमकिन – असंभव।
  • पीन-भरा – पूरा, स्थूल।
  • नौबत – स्थिति।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश बाबू गुलाबराय द्वारा लिखित निबंध ‘नर से नारायण’ से लिया गया है। लेखक अपनी कोठी में बने तहखाने का वर्णन करने के साथ-साथ, वर्षा के प्रभाव का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि कोठी में जमीन के अंदर बने कमरे (तहखाने) के रोशनदानों पर उसे बड़ा घमंड था, क्योंकि इन रोशनदानों से रोशनी के साथ-साथ वायु का आवागमन निरंतर होता रहता था। इन्हीं रोशनदानों के कारण वह तहखाने में बैठकर शाम को भी लेखन-कार्य कर सकता था। जो भी व्यक्ति लेखक का मकान देखने आता, लेखक उन्हें अपने तहखाने को दिखाता और उसमें वायु के आने-जाने के लिए बने रोशनदानों की बड़ाई करता। वायु संचार की व्यवस्था बताता। इसके कारण लेखक को अपनी झूठी शान और स्वास्थ्य-विज्ञान संबंधी अपनी शान का दिखावा करने का अवसर मिलता था।

लेखक कहता है कि वह सौंदर्यप्रिय होते हुए भी तहखाने के रोशनदानों से तहखाने के अंदर गिरने वाले बाढ़ के पानी के झरनों के मांस से भरे हुए अर्थात् पुष्ट सौंदर्य के स्वाद का आनंद नहीं ले सका। परंतु यदि वह हानि उठाकर प्रसन्न होना चाहता तो भी यह असंभव हो गया था। अर्थात् तहखाने में रोशनदानों से बाढ़ का पानी भर गया था, अतः उसमें गिरने वाले बाढ़ के पानी के झरनों के सौंदर्य का आनंद लेना संभव नहीं था।

हानि उठाकर प्रसन्न होने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है क्योंकि अंधकार में सौंदर्य को नहीं देखा जा सकता। यहाँ तो स्थिति यह हो गई थी कि पिछले जन्म के पापों के कारण असूर्या के नाम लेने मात्र से ही जैसे संसार में अंधकार फैल जाता है, उसी प्रकार पूरे मकान में बिजली चली जाने के कारण अंधकार फैल जाने का दृश्य उपस्थित हो गया था।

अँधेरे के कारण हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। बाइबिल में वर्णित दानी की तरह दायाँ हाथ बाएँ हाथ की बात नहीं जान सकता था। अर्थात् बाइबिल में कहा गया है. कि दान देते समय एक हाथ दूसरे हाथ की बात न जान पाए, वही श्रेष्ठ दान होता है। अंधकार के कारण घर के सदस्यों के बीच परस्पर टकराने की स्थिति आ गई थी। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसी स्थिति में लालटेन की तलाश होने लगी।

विशेष:

  1. लेखक ने मकान में बने तहखाने के हवा और प्रकाशयुक्त होने का वर्णन करने के साथ-साथ उसमें बने रोशनदानों से बाढ़ का पानी अंदर घुसने का वर्णन किया है।
  2. बिजली जाने की स्थिति का वर्णन किया है।
  3. भाषा संस्कृत प्रधान है।
  4. मुहावरों और लोकोक्तियों का सटीक प्रयोग किया गया है।
  5. वर्णनात्मक शैली के साथ-साथ उदाहरण शैली प्रयुक्त है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक को किस पर और क्यों गर्व था?
उत्तर:
लेखक को तहखाने में बने रोशनदानों पर बड़ा गर्व था क्योंकि उनसे प्रकाश के साथ-साथ वायु का आर-पार संचार होता था।

प्रश्न (ii)
तहखाने के झरने किसे कहा गया है?
उत्तर:
तहखाने के रोशनदानों से उसके अंदर गिरते बाढ़ के पानी की धाराओं को तहखाने के झरने कहा गया है।

प्रश्न (iii)
‘हाथ को हाथ न सूझना’ मुहावरे का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गहन अंधकार होना।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
तहखाने में अंधकार क्यों हो गया था?
उत्तर:
बिजली गुल हो जाने के कारण तहखाने में क्या पूरे घर में अंधकार हो गया था।

प्रश्न (ii)
किसको प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती?
उत्तर:
घर फूंककर तमाशा देखने वाले को प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती।

प्रश्न (iii)
लालटेन की पुकार क्यों होने लगी?
उत्तर:
बिजली गुल होने के कारण गहनं अंधकार हो गया, किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, इसलिए लालटेन की पुकार होने लगी।

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प्रश्न 3.
मैं अपने हाल को नूह की किश्ती या मनु की नौका समझ रहा था। उस समय तक भी, चिंता की प्रथम रेखा मेरे ललाट के प्रांगण में खेलती हुई नहीं दिखाई दी, किंतु थोड़ी ही देर में पास के कमरे से ‘चलियो’ की आवाज आई। मेरे बाग के माली श्री मंगलदेव जी मेरे मंगल-विधान में सदा दत्तचित्त रहते थेचिल्ला उठे, ‘बाबू जी उधर ही रहना।’ मैं समझा कहीं से साँप आ गया। खैर, यह भी सही। मेरे दूसरे चाकर देव श्री रणधीर जी ने बड़ी धीरतापूर्वक कहा कि कुछ नहीं, जमीन बैठ गई है। बड़े आदमियों की भाँति उसकी बात भी आधी सच थी।

जमीन बैठी थी और फर्श के पत्थर आपस में सर से सर मिलाकर खड़े हो गए थे, मानो वे सचेत होकर मेरे परित्राण का उपाय सोच रहे हों। उसी समय मेरी गुर्विणी महिषी (भैंस) की, जिसको कलियुग के व्यास जी ने अपनी कविता से अमर कर दिया है, समस्या मेरे सामने आई। उसका छप्पर भी तालाब बन चुका था। उस पर भी एक त्रिपाल डालकर उसे दरवाजे पर खड़ा किया। बहुत कोशिश करने पर . भी बरामदे में पैर न रखा, शायद वह जानती थी कि उसका भी फर्श धसकेगा। (Page 6) (M.P 2009)

शब्दार्थ:

  • नूह – आदम से दसवीं पीढ़ी में पैदा हुए एक पैगंबर (जिनके समय में एक ऐसा तूफान आया था कि सारी सृष्टि जलमग्न हो गई थी। उस समय अपने परिवार तथा जानवरों के एक-एक जोड़े के साथ स्वनिर्मित नौका में बैठाकर इन्होंने सबके प्राण बचाए थे और उन्हीं से पुनः सृष्टि चली।
  • मनु – ब्रह्म के मानस पुत्र आदि प्रजापति।
  • किश्ती – नौका।
  • ललाट – माथा।
  • चाकर – नौकर, सेवक।
  • परित्राण – रक्षा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश बाबू गुलाबराय द्वारा लिखित निबंध ‘नर से नारायण’ से लिया गया है। इन पंक्तियों में अति बारिश के कारण लेखक के मकान पर होने वाले प्रभाव का वर्णन किया गया है। वर्षा ने उसके घर को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया है।

व्याख्या:
वर्षा की अधिकता के कारण लेखक के मकान के चारों ओर पानी भर गया और पूरा घर जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गया। कहीं फर्श टूट गया तो कहीं जमीन धंस गई। लेखक स्वयं को इस स्थिति में अपने जलमग्न घर को नूह की नौका अथवा मनु की नौका समझ रहा था। नूह और मनु ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने जल प्रलय की स्थिति में नौका में बैठकर अपने प्राण बचाए थे और उन्हीं से सृष्टि चली थी। जब तक घर चारों ओर से जलमग्न हो रहा था तब तक लेखक के माथे पर चिंता की एक भी रेखा दिखाई नहीं दी थी, किंतु जब पास के कमरे से चलियो’ की आवाज आई तो वह चिंतित हो उठा।

उसके बाग की देखभाल करने वाले माली मंगलदेव जी जो उसके हित के लिए सदैव दत्तचित्त होकर काम में लगे रहते थे, उन्होंने चिल्लाकर कहा, “बाबूजी उधर ही रहना।” लेखक को कुछ स्पष्ट समझ नहीं आया। उसे लगा कि कोई साँप आ गया होगा, जिसके कारण मंगलदेव ने उधर आने से मना किया होगा। लेखक ने सोचा, चलो यह भी होना था। उनके दूसरे सेवक जिसका नाम रणधीर था, अपने नाम को सार्थक करते हुए बड़े धैर्य के साथ कहा कि कुछ नहीं हुआ, केवल जमीन बैठ गई है। लेखक कहता है जिस प्रकार बड़े आदमियों की बात आधी ही सच होती है, उसी प्रकार मेरे नौकर की बात भी आधी सच थी। जमीन तो धंसी ही थी उसके साथ फर्श भी बैठ गया था। फर्श के पत्थर उखड़कर एक-दूसरे के किनारे से मिलकर खड़े हो गए।

अर्थात् फर्श भी टूट-फूट गया था। फर्श के खड़े हुए पत्थर ऐसे प्रतीत होते थे, मानो वे खड़े होकर लेखक की रक्षा का उपाय सोच रहे हों। उसी समय लेखक की गुणवंती भैंस, जिसको कलयुग के व्यासजी ने अपनी कविताओं का विषय बनाकर अमर बना दिया है, की समस्या उसके सामने उत्पन्न हो गई। भैंस को जिस छप्पर में बाँधा जाता था वह छप्पर भी अतिवर्षा से तालाब बन गया। अतः भैंस पर एक त्रिपाल डालकर घर के दरवाजे पर खड़ा किया गया। उसे बरामदे में बाँधने का बहुत प्रयत्न किया गया, परंतु उसने बरामदे में पैर नहीं रखा। संभवतः वह जानती थी कि उसका फर्श भी नीचे धंस जाएगा। बाद में बरामदे का फर्श भी बैठ गया।

विशेष:

  1. लेखक ने अतिवर्षा के कारण क्षतिग्रस्त हुए मकान की दुर्दशा का वर्णन किया है। नूह और मनु जैसे पौराणिक पात्रों की ओर संकेत किया गया है।
  2. भाषा संस्कृत प्रधान है।
  3. मुहावरों का सटीक प्रयोग हुआ है।
  4. वर्णनात्मक और उदाहरण शैली है।
  5. व्यंग्यात्मकता का समावेश है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक के ललाट पर किस समय तक चिंता की प्रथम रेखा नहींदिखाई दी।
उत्तर:
जब लेखक का पूरा मकान बाढ़ के पानी में घिरता रहा, तब तक उसके ललाट पर चिंता की एक रेखा नहीं दिखाई दी।

प्रश्न (ii)
लेखक ने स्वयं के हाल को नूह की किश्ती या मनु की नौका क्यों समझता रहा था?
उत्तर:
प्रलयकाल में जब सारी पृथ्वी जलमग्न हो गई थी तो नूह अथवा मनु ने नाव में बैठकर जल-प्रवाह से अपने प्राणों की रक्षा की थी। लेखक भी जिस हाल में बैठा था, उसे ही प्राणों की रक्षा करने वाली नौका समझ रहा था।

प्रश्न (iii)
माली मंगलदेव के चिल्लाने का लेखन ने क्या अर्थ निकाला?
उत्तर:
माली मंगलदेव के चिल्लाने का लेखक ने अर्थ निकाला कि कोई साँप आ गया होगा।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक ने अपने नौकर रणधीर की किस बात पर व्यंग्य किया है?
उत्तर:
लेखक ने रणधीर द्वारा बड़े धैर्य के साथ कही गई इस बात पर व्यंग्य किया है कि कुछ नहीं हुआ, जमीन बैठ गई है। अर्थात् नौकर की दृष्टि में जमीन बैठना कोई बड़ी बात नहीं थी।

प्रश्न (ii)
कलियुग का व्यास किसे कहा गया है?
उत्तर:
कलियुग का व्यास आजकल के कवियों को कहा गया है।

प्रश्न (iii)
लेखक के सामने भैंस की क्या समस्या आई?
उत्तर:
भैंस को जिस छप्पर में रखा जाता था, वह भी जलमग्न होकर तालाब बन गया था। अब लेखक के सामने भैंस को बचाने की समस्या उत्पन्न हो गई।

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प्रश्न 4.
मेरे एक पड़ोसी श्री बनर्जी साहब अपनी व्यवहार-कुशलता की दिव्य दृष्टि से मेरा भविष्य देख चुके थे। वे शाम को ही कह गए थे कि यदि कोई तकलीफ ही तो उनका मकान मेरे ‘डिसपोजल’ पर है। उस समय तो मैंने उनका सहानुभूतिपूर्ण निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था, किंतु जब मेरे घर के सामने भी पानी बहने लगा और मेरा मकान प्रायद्वीप बन गया, बरामदे और शयनागार का भी फर्श बैठ गया और उनकी टाइलें मेरे बैठते हुए दिल की समता करने लगी तब जल्दी से मैंने बनर्जी साहब का निमंत्रण स्वीकार किया।

मकान में ताला लगाकर उनका द्वार खटखटाया। उन्होंने मुझे, मेरे नौकर तथा मेरी भैंस को अपने यहाँ आश्रय दिया। चिंता-ग्रस्त मनुष्य को जितनी निद्रा आ सकती है, उतनी ही नहीं उससे कुछ अधिक निद्रा मुझे आई, क्योंकि कोठी के लिए तो मैंने कड़ा जी कर मन में सोच लिया था, ‘इदन्न मम, इदं वरुणाय।’ निद्रा भंग करने की यदि कोई बात थी तो पड़ोस के सज्जनों और सज्जनाओं की करुण पुकार थी। मेरी भैंस तो सुरक्षित थी किंतु गरीब लोगों के जानवर चिल्ला रहे थे। बहुत कोशिश करने पर भी मैं उनकी कुछ सहायता न कर सका। अंधकार और जल के कारण ‘समुझ परहिं नहि पंथ’ की बात हो रही थी। (Page 6)

शब्दार्थ:

  • व्यवहार-कुशलता – आचरण की निपुणता।
  • दिव्य दृष्टि – सूक्ष्म दृष्टि, आंतरिक दृष्टि।
  • डिसपोजल – व्यवस्था, प्रबंध, अधिकार।
  • प्रायद्वीप – पानी से चारों ओर से घिरी भूमि।
  • निद्रा – नींद।
  • शयनागार – शयन कक्ष।
  • समता – समानता।
  • करुण – दयनीय।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश बाबू गुलाबराय द्वारा लिखित निबंध ‘नर से नारायण’ से लिया गया है। लेखक का मकान बाढ़ के पानी से घिर गया था। कहीं जमीन धंस गई थी । तो कहीं फर्श बैठ गया था। उनके पड़ोसी बनर्जी ने लेखक से किसी भी तकलीफ में अपने घर में आश्रय लेने का प्रस्ताव रखा था। अंत में लेखक के परिवार को उनके घर में शरण लेनी पड़ी। इसी घटना का वर्णन उपर्युक्त पंक्तियों में किया गया है।

व्याख्या:
मेरे एक पड़ोसी श्री बनर्जी साहब अपनी आचार निपुणता की आंतरिक दृष्टि से मेरा भविष्य देख चुके थे। अर्थात् बनर्जी साहब लेखक के मकान की क्षतिग्रस्त स्थिति का अनुमान लगा चुके थे। इसीलिए एक पड़ोसी के नाते लेखक के घर आकर कह गए थे कि यदि कोई कठिनाई हो तो उनके घर का प्रयोग कर सकते हैं। उनका मकान लेखक के लिए प्रस्तुत है। उस समय तो लेखक ने उनका सहानुभूति से भरा निमंत्रण ठुकरा दिया था परंतु जब लेखक के घर के सामने भी पानी बहने लगा और उसके घर के चारों ओर पानी भरने से उसका घर प्रायद्वीप जैसा बन गया, उसके रहने, बैठने और सोने के लिए कोई स्थान नहीं रहा तब उसके निराश हृदय ने शीघ्रता से अपने पड़ोसी का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

वह अपने मकान में ताला लगाकर पड़ोसी के घर परिवार सहित पहुँचा और उनका दरवाजा खटखटाया। पड़ोसी ने लेखक और उनके सेवकों और उनकी भैंस को शरण दी। चिंता में डूबे मनुष्य को जितनी नींद आ सकती है, उससे अधिक नींद लेखक को आई क्योंकि उन्होंने अपनी कोठी के संबंध में अपना मन दृढ़ कर सोच लिया था कि यह मेरा नहीं है, यह इंद्र का है। लेखक कहता है कि यदि नींद भंग होने या करने की कोई बात अथवा कारण था तो पड़ोस में काछी और कुम्हार स्त्री-पुरुष की करुण पुकार थी। लेखक की भैंस तो सुरक्षित थी किंतु उन गरीब लोगों के जानवर डूबने के भय से चिल्ला रहे थे। लेखक कहता है कि मैं प्रयास करने के बाद भी उनकी जरा भी मदद नहीं कर पाया। अंधकार और पानी के भर जाने के कारण दूसरों के लिए कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।

विशेष:

  1. लेखक ने अपने पड़ोसी की व्यवहार-कुशलता का परिचय दिया है। पड़ोसी ने लेखक को अपने घर में आश्रय देकर अच्छे पड़ोसी होने का कर्त्तव्य निभाया है।
  2. भाषा संस्कृत प्रधान है। संस्कृत के पूरे-पूरे वाक्य का भी प्रयोग किया गया है। भाषा में अंग्रेजी शब्द ‘डिसपोजल’ का भी प्रयोग हुआ है।
  3. भाषा में मुहावरों का भी सटीक प्रयोग हुआ है।
  4. वर्णनात्मक और उद्धरणात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
बनर्जी साहब लेखक का क्या भविष्य देख चके थे?
उत्तर:
वे लेखक के घर की स्थिति देखकर अनुमान लगा चुके थे कि उन्हें भविष्य में कष्ट होने वाला है।

प्रश्न (ii)
बनर्जी ने लेखक के सामने क्या प्रस्ताव रखा?
उत्तर:
लेखक के सामने बनर्जी ने प्रस्ताव रखा कि बाढ़ के प्रकोप से बचने के लिए वे सपरिवार उसके घर में आश्रय ले सकते हैं।

प्रश्न (iii)
लेखक ने अपने पड़ोसी बनर्जी के घर में आश्रय क्यों लिया?
उत्तर:
लेखक का घर पानी से घिर गया था। उसके तहखाने में पानी भर गया था तथा बरामदे और शयन कक्ष का फर्श बैठ गया था। उनके सुरक्षित रहने के लिए कोई स्थान नहीं बचा था। इसलिए लेखक ने पड़ोसी के घर में आश्रय लिया था।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक के पड़ोसी कौन थे?
उत्तर:
लेखक के पड़ोसी श्री बनर्जी साहब थे।

प्रश्न (ii)
पड़ोसी के घर में लेखक को कैसी नींद आई?
उत्तर:
पड़ोसी के घर में लेखक को चिंता में डूबे व्यक्ति से कुछ अधिक नींद आई।

प्रश्न (iii)
लेखक ने नींद भंग करने के क्या कारण बत 7 हैं?
उत्तर:
लेखक ने गरीब काछी-कुम्हारों की स्त्री-पुरुषों की क प पुकार और उनके जानवरों के चिल्लाने की आवाजों को नींद भंग करने के कारण बताए हैं।

MP Board Class 12th Special Hindi अपठित पद्यांश

MP Board Class 12th Special Hindi अपठित पद्यांश

MP Board Class 12th Special Hindi अपठित पद्यांश

1. “तुम हो धरती के पुत्र न हिम्मत हारो,
श्रम की पूँजी से अपना काज सँवारो।
श्रम की सीपी में ही वैभव पलता है,
तब स्वाभिमान का दीप स्वयं ही जलता है।
मिट जाता है दैन्य स्वयं क्षण में,
छा जाती है नव दीप्ति धरा के कण में,
जागो, जागो श्रम से नाता तुम जोड़ो,
पथ चुनो काम का, आलस भाव तुम छोड़ो।”

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प्रश्न
1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
2. प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
3. कवि ने किस पूँजी से अपने बिगड़े कार्य सँवारने की बात कही है?
4. कवि ने किस भाव को त्यागने की बात कही है?
उत्तर-
1. कवि कहता है कि जिस प्रकार से सृष्टि में परिवर्तन होता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में भी निरन्तर परिवर्तन होता है। अतः व्यक्ति को जीवन में निराश नहीं होना चाहिये। सदैव स्वाभिमान के साथ परिश्रम करते हुए उद्यम के मार्ग को ही अपनाना चाहिए। वास्तव में उद्यम ही सुख की निधि है। श्रम वैभव का प्रवेश द्वार है इसी के कारण स्वाभिमान की भावना जागृत होती है तथा निर्धनता समाप्त हो जाती है। मानव को प्रमाद त्यागकर श्रम करना चाहिए।
2. शीर्षक-‘श्रम की महत्ता’।
3. कवि ने परिश्रम की पूँजी से अपने बिगड़े कार्य सँवारने की बात कही है।
4. कवि ने आलस्य-भाव को त्यागने की बात कही है।

2. “प्राचीन हो या नवीन छोड़ो रूढ़ियाँ जो हों बुरी,
बनकर विवेकी तुम दिखाओ हँस जैसी चातुरी।
प्राचीन बातें ही भली हैं यह विचारो अलीक है,
जैसी अवस्था हो जहाँ, तैसी व्यवस्था ठीक है।
सर्वज्ञ एक अपूर्व युग का हो रहा संचार है,
देखो दिनों दिन बढ़ रहा विज्ञान का विस्तार है।
अब तो उठो क्यों पड़ रहे हो व्यर्थ सोच विचार में,
सुख दूर जीना भी कठिन है श्रम बिना संसार में।”

प्रश्न
1. इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
2. इस पद्यांश का शीर्षक बताइये।
3. कवि ने किन्हें छोड़ने की बात की है?
4. सुख प्राप्त करने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर-
1. हंस का नीर क्षीर विषय ज्ञान विश्व विख्यात है। कवि के मतानुसार मानव को प्राचीन अथवा नवीन रूढ़ियाँ जो उसकी उन्नति में बाधक हैं, उन्हें त्यागकर कल्याणकारी नीतियाँ ग्रहण करनी चाहिये तथा सड़ी-गली रूढ़ियों का मोह त्याग देना चाहिये।
2. शीर्षक प्रगतिशील दृष्टिकोण’।
3. कवि ने बुरी रूढ़ियों को छोड़ने की बात की है।
4. सुख प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम आवश्यक है।

अभ्यासार्थ पद्यांश

“अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरु शिखा मनोहर
छिटका जीवन-हरियाली पर-मंगल कुंकुम-सारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा।”

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प्रश्न
1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
2. प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
3. अपने देश को क्या कहा गया है?
4. देश के सौन्दर्य का वर्णन दो वाक्यों में कीजिए।

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MP Board Class 12th Special Hindi निबन्ध-लेखन

MP Board Class 12th Special Hindi निबन्ध-लेखन

निबन्ध आधुनिक साहित्य की अत्यन्त लोकप्रिय गद्य – विधा है। अंग्रेजी में इसे ‘Essay’ कहते हैं,जो ‘एसाई’ शब्द से बना है। इस शब्द का अंग्रेजी में अर्थ होता है—अपने मन के भावों को व्यक्त करने का प्रयास करना। निबन्ध मन की एक शिथिल विचार तरंग है, जो असंगठित, अपूर्व और अव्यवस्थित होती है। इसे जब व्यवस्थित रूप में संगतिपूर्ण शब्दों के माध्यम से लिपिबद्ध किया जाता है, तब यह निबन्ध होता है। लेखक के मन की विशेष भाव – श्रृंखला की अभिव्यक्ति ही निबन्ध है। सभी व्यक्तित्व भिन्न – भिन्न प्रकृति के होते हैं और उनकी अपनी – अपनी शैली होती है। शैली में व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक होती है। इसीलिए एक ही विषय पर लोग भिन्न – भिन्न प्रकार से विचार व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि निबन्ध को हम सीमित नहीं कर सकते कि अमुक विषय पर बस इसी एक ही प्रकार से निबन्ध लिखा जाये। प्रत्येक छात्र की उस समय की मनोदशा, उसका अपना अनुभव, अपनी भाषा – शैली और व्यक्तित्व तथा शब्द – चयन निबन्ध में व्यक्त होता है। छात्र विशेष को शब्द – योजना और वाक्य – रचना का किस सीमा तक ज्ञान है, क्या वह मुहावरेदार भाषा का प्रयोग करता है या सरल भाषा का, यह सब उसके कौशल पर निर्भर करता है।

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निबन्ध विद्यार्थियों के भाषा – ज्ञान को परखने की कसौटी है। निबन्ध ही परीक्षा का वह प्रश्न है जिससे बालक की लेखन – शैली के कौशल का विास परखा जाता है। परीक्षक यह देखना चाहता है कि अपने ज्ञान को संयोजित कर छात्र किस प्रकार उसे सरस, व्यवस्थित प्रभावशाली भाषा – शैली में व्यक्त कर सकता है।

छात्रों को यह जानना अति आवश्यक है कि वे सीमित समय में सीमित शब्दों में अच्छा निबन्ध किस प्रकार लिखें।

हम अच्छा निबन्ध कैसे लिखें?
निबन्ध लिखने में मुख्य रूप से हमें विचार – समूह अर्थात् आधार – सामग्री पर ध्यान देना आवश्यक है और फिर भाषा – शैली तथा वाक्य – गठन भी भावानुकूल होना चाहिए।

निबन्ध लिखने से पहले हमें भली – भाँति विषय का सही चुनाव करना चाहिए। ऐसा विषय चुनना चाहिए जिसके बारे में भली – भाँति जानकारी हो। निबन्ध की भाषा रोचक होनी चाहिए। भाषा में प्रवाह और बोधगम्यता होनी चाहिए।

सबसे पहले हमें निबन्ध की रूपरेखा सुव्यवस्थित रोचक ढंग से तैयार कर लेनी चाहिए। रूपरेखा पूरी बन जाने के बाद उसके आधार पर निबन्ध लिखना चाहिए।

भाषा – लेखन में सतर्कतापूर्वक वर्तनी की अशुद्धियों पर विशेष ध्यान देकर शुद्ध लिखना चाहिए। विराम – चिह्नों का समुचित प्रयोग आवश्यक है। निबन्ध में आवश्यकतानुसार अनुच्छेद का परिवर्तन एक भाव या विचार समाप्त होने पर करना चाहिए। एक बिन्दु को एक अनुच्छेद में पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करना चाहिए। निबन्ध के बीच – बीच में अपनी बात की पुष्टि के लिए या विचारों में दृढ़ता लाने के लिए प्रमाणस्वरूप यथास्थान विद्वानों के उद्धरण चाहे वे किसी भी भाषा में हों ज्यों के त्यों लिखना चाहिए। उद्धरण को अवतरण चिह्न “………..” के मध्य मूल भाषा में ही लिखना चाहिए। यदि मूल रूप से याद न हो तो विद्वानों के उन विचारों को अपनी भाषा में भी लिख सकते हैं,तब अवतरण चिह्न का प्रयोग न करें।

भाषा के प्रयोग में एक आवश्यक सावधानी रखें कि किसी भी शब्द या वाक्य की पुनरावृत्ति न हो, अन्यथा भाषा का लालित्य समाप्त होकर निबन्ध प्रभावशाली नहीं रह पायेगा।

निबन्ध के अंग –
ये मुख्य रूप से तीन होते हैं—
(1) प्रस्तावना,
(2) विषय – विस्तार और
(3) उपसंहार।

(1) प्रस्तावना – प्राय: छात्रों को यह दुविधा रहती है कि निबन्ध किस प्रकार प्रारम्भ करें। अतएव अच्छे आरम्भ के लिए कुछ बातें ध्यान में रखें क्योंकि यदि प्रारम्भ ही गलत दिशा में हो गया तो पूरे निबन्ध का ढाँचा बिगड़ जाता है।

प्रारम्भ यदि किसी विद्वान के उद्धरण से करें तो उचित होता है। प्रारम्भ में किस विषय पर आप निबन्ध लिख रहे हैं वह क्या है? उसकी परिभाषा या विषय का स्पष्टीकरण और उसके स्वरूप का विवेचन कर दें। उस समय विशेष का हमारे जीवन में, हमारे समाज में या वर्तमान सन्दर्भो में उसकी क्या समसामयिक उपयोगिता है? यह लिखें। फिर प्राचीनकाल में इस सम्बन्ध में क्या विचार थे या क्या स्थिति थी और उसमें क्यों और कैसे परिवर्तन आया? यह लिखें।

(2) विषय – विस्तार–प्रस्तावना की सृष्टि होने पर हम निबन्ध के विषय के जितने क्षेत्र और पक्ष हो सकते हैं,उनके आधार पर निबन्ध आगे बढ़ाते हैं। इसमें भी पुनरावृत्ति से बचना चाहिए। एक स्वतन्त्र बात या विचार को एक अनुच्छेद में रखें। विषय से सम्बन्धित जो भी बात हो, वह छूटने न पाये। विषय के बारे में जो भी जानकारी हो, वह व्यवस्थित रूप में लिखनी चाहिए। किसी भी विषय के बारे में उसके भूतकाल,वर्तमान स्वरूप और भविष्य की क्या रूपरेखा होगी, यह लिख देना चाहिए। उदाहरण के लिए विज्ञान के विषय में प्राचीनकाल में उसकी क्या स्थिति थी। वर्तमान समय में उसकी क्या गतिविधि है और जीवन को क्या लाभ है? यह लिखकर भविष्य की सम्भावनाएँ लिख देनी चाहिए। इस प्रकार आसानी से किसी भी विषय पर निबन्ध लिखा जा सकता है। भाषा – शैली रोचक होनी चाहिए। महापुरुषों के उद्धरण भी लिख देने चाहिए। उससे हमारी बात में दृढ़ता आ जाती है।

निबन्ध के मध्य में ही लेखक पाठक को अपने तर्क समझाने का प्रयत्न करता है। यही भाग निबन्ध का सबसे अधिक विस्तृत भाग होता है। प्रारम्भ से इस भाग का सम्बन्धित होना आवश्यक है और इसके सभी सिद्धान्त वाक्य अन्त की ओर उन्मुख होने चाहिए।

(3) उपसंहार – यह निबन्ध का अन्तिम भाग है। लेखक को यह भाग अति सावधानी से पूरा करना चाहिए। उपसंहार की सफलता पर ही निबन्ध की सफलता निर्भर करती है। भूमिका के समान ही उपसंहार का महत्व होता है। निबन्ध का उपसंहार आकर्षक और सारगर्भित होना चाहिए। हमें निबन्ध का अन्त वहाँ करना चाहिए,जहाँ विषय का विवेचन हमारी जिज्ञासा को पूरी तरह सन्तुष्ट कर दे। उपसंहार में जो कुछ हमने निबन्ध में लिखा है, उसका सारांश संक्षेप में एक अनुच्छेद में लिखना है।

निबन्ध के अन्तिम अंश में ऐसा न लगे कि निबन्ध अनायास समाप्त हो गया है। निबन्ध के समाप्त होने पर भी लेखक की विचारधारा का मूल भाव पाठक के मन में बार – बार आता रहे। वही सफल अन्त है, जिसमें पढ़ने वाले का ध्यान लेखक के तर्कपूर्ण संगत भावों की ओर आकर्षित हो जाये और वह विषय के गुण – दोष दोनों को जानकर अपना एक मत निश्चित कर सके। उक्त प्रकार से लिखा गया निबन्ध उत्कृष्ट होगा।

निबन्ध के प्रकार –

प्रमुख रूप से निबन्ध चार प्रकार के होते हैं –
(1) वर्णनात्मक,
(2) विवरणात्मक,
(3) विवेचनात्मक,
(4) आलोचनात्मक।

(1) वर्णनात्मक – वे निबन्ध जिनमें किसी देखी हुई वस्तु या दृश्य का वर्णन होता है उन्हें हम वर्णनात्मक निबन्ध कहते हैं; जैसे – यात्रा,पर्व, मेला, नदी,पर्वत, समुद्र, पशु – पक्षी,ग्राम,रेलवे स्टेशन आदि का वर्णन।
(2) विवरणात्मक – इसका अन्य नाम चरित्रात्मक भी है। इस प्रकार के निबन्धों में ऐतिहासिक घटनाओं, ऐतिहासिक यात्राओं तथा महान पुरुषों की जीवनियों एवं आत्मकथा आदि का वर्णन होता है।
(3) विवेचनात्मक – इसका अन्य नाम विचारात्मक भी है। इन निबन्धों में विचारों की प्रमुख रूप से प्रधानता होती है। इसीलिये इन्हें विचारात्मक या विवेचनात्मक निबन्ध कहते हैं। इस प्रकार के निबन्धों में भावनात्मक विषयों पर भी लेखनी चलाई जाती है। जैसे—करुणा,क्रोध, श्रद्धा – भक्ति, अहिंसा, सत्संगति, परोपकार आदि विषयों पर लिखे गये निबन्ध इस श्रेणी में आते हैं।
(4) आलोचनात्मक – इस प्रकार के निबन्धों के अन्तर्गत सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं साहित्यिक समस्त प्रकार के निबन्ध आते हैं। इस प्रकार के निबन्धों में तर्क – वितर्क द्वारा पक्ष – विपक्ष को प्रस्तुत किया जाता है।

समसामयिक समस्याओं से सम्बन्धित निबन्ध में यथा आतंकवाद, महँगाई की समस्या, साम्प्रदायिकता, जनसंख्या विस्फोट,बेरोजगारी एवं आरक्षण आदि की समसामयिक समस्याएँ सम्मिलित हैं।

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1. राष्ट्र निर्माण में छात्रों का योगदान [2009]

“चाहे जो हो धर्म तुम्हारा, चाहे जो वादी हो।
नहीं जी रहे अगर देश हित, तो निश्चय ही अपराधी हो।”

विस्तृत रूपरेखा –
(1) प्रस्तावना,
(2) छात्रों का उचित निर्देशन आवश्यक,
(3) एकनिष्ठ भाव से अध्ययन,
(4) छात्र देश का अविभाज्य अंग,
(5) छात्र देश के भावी कर्णधार,
(6) देश के प्रति छात्रों के कर्त्तव्य,
(7) प्रस्तावना। [2014]

प्रस्तावना – राष्ट्र का वास्तविक अर्थ उस देश की भूमि नहीं वरन् देश की भूमि में रहने वाली जनता है। जनता की सुख – समृद्धि ही राष्ट्र की सच्ची प्रगति है। आज के विद्यार्थी कल देश के नागरिक होंगे। अतएव छात्र – जीवन में ही उनके मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना यदि भर दी जाय तो वे राष्ट्र की उन्नति में सहायक होते हैं। जिस मातृभूमि की गोद में हमने जन्म लिया, जिसकी धरती से हमारा पालन – पोषण हुआ उस देश की सेवा,प्रगति में कुछ विशिष्ट लोगों का हाथ हो यह ठीक नहीं, वरन आज के छात्रों को भी इस प्रगति में पूर्ण सहयोग देना चाहिए। छात्रों को न केवल अपने अधिकारों के बारे में सचेत रहना चाहिए वरन् उन्हें अपने कर्तव्य के प्रति भी उतनी ही निष्ठा रखनी चाहिए।

छात्रों को उचित निर्देशन आवश्यक – किशोरावस्था तथा युवावस्था में आत्म – विवेक नहीं रहता और इसके अभाव में आत्म – नियन्त्रण,भी नहीं रहता। अतएव छात्रों को देश की प्रगति के बारे में बताना होगा। देश का प्रत्येक निवासी जो जिस स्थान पर है, जिस स्थिति में है वह वहीं रहकर देश की सेवा कर रहा है—किसान अपने खेतों और खलिहानों में, व्यापारी – व्यापार में, साहित्यकार सृजन में,डॉक्टर, वैद्य अस्पतालों में, सैनिक युद्ध के मोर्चे पर तथा विद्यार्थी अपने विद्यालयों में अध्ययन करके। जिस व्यक्ति का जो काम है वह उसे एकाग्रता से निष्ठापूर्वक करे तो देश की प्रगति होगी। इसके विपरीत यदि छात्र असफल राजनीतिज्ञों,छात्र नेताओं के गलत पथ – प्रदर्शन को अपना लेते हैं तो प्रगति के नाम पर पतन के रास्ते पर चल पड़ते हैं। अधिकारों के नाम पर हड़ताल, प्रदर्शन, सत्याग्रह, आन्दोलन, धरना, घिराव इन सब गतिविधियों में भाग लेकर वे अपना भी नुकसान करते हैं और यह सब राष्ट्र की प्रगति में बाधक है।

एकनिष्ठ भाव से अध्ययन – देश की प्रगति में छात्रों के योगदान का आशय है एकनिष्ठ भाव से विद्याध्ययन करना क्योंकि विद्या प्राप्ति के लिए एक अवस्था और एक समय निश्चित है। यदि इस अवस्था में एकनिष्ठता का अभाव रहा तो भावी जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति सम्भव नहीं है। भावी जीवन की नींव ही यदि कमजोर हुई तो उस पर जो भवन खड़ा होगा वह सुदृढ़ और स्थायी नहीं रह पायेगा। वह केवल लड़खड़ाते हुए अपनी जिन्दगी काटेगा। यदि छात्र सम्पूर्ण तन्मयता से एक शिष्ट सुसंस्कृत सभ्य नागरिक बनने की तैयारी कर रहे हैं तो यही देश सेवा है। छात्र चाहे तो कुशल व्यवसायी, विद्वान् प्रवक्ता, सफल वकील,प्रसिद्ध डॉक्टर, निपुण कलाकार, कर्मठ शिल्पी कुछ भी बन सकता है और यही आज का छात्र कल का सभ्य नागरिक बनकर देश की प्रगति में सहायक होगा।

छात्र देश का अविभाज्य अंग – छात्र देश के कर्णधार हैं। समाज व्यक्ति से ही बनता है, वह बहुत – सी इकाइयों का समूह है और छात्र देश के अविभाज्य अंग हैं। छात्रों का प्रत्येक निष्ठापूर्वक किया हुआ कार्य देश को, देश के चरित्र को, देश के मान – सम्मान और गौरव को बढ़ाता है और इनके ही कृत्यों द्वारा देश बदनाम होता है, उसकी अवनति होती है। छात्रों की प्रत्येक गतिविधि की परछाईं देश के चरित्र में स्पष्ट झलकती है। हमारी प्रगति ही देश की प्रगति है, इस बात को भली प्रकार समझ लेना चाहिए।

छात्र देश के भावी कर्णधार छात्रों का स्वाध्याय, चिन्तन – मनन, उनके शिष्ट व्यवहार, मधर सम्भाषण यह सब देश की प्रगति का सचक है। छात्र और जनता अच्छी होगी तो देश अच्छा कहलायेगा, यदि छात्र अनुशासित होंगे तो देश अनुशासित कहलायेगा। ईमानदारी, सच्चाई और दूसरों के क्रिया – कलाप में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना ही एक प्रगतिशील राष्ट्र की निशानी है। छात्र शान्त – चित्त और अनन्य श्रद्धा से शिक्षा ग्रहण करें यही देश की प्रगति में महत्त्वपूर्ण योगदान है क्योंकि ये ही देश के भावी कर्णधार हैं और देश को महान् बनाने के कर्म में लगे हुए हैं।

शिक्षण और स्वाध्याय से जो समय बचे उसका छात्रों को सदुपयोग करना चाहिए।

देश के प्रति छात्रों के कर्त्तव्य छात्र प्रौढ़ शिक्षा एवं साक्षरता आन्दोलन में भाग लेकर अशिक्षितों को शिक्षित बनाने का काम कर सकते हैं। सार्वजनिक रूप से गोष्ठियों, व्याख्यान मालाओं का आयोजन कर देश के चरित्र को ऊँचा उठाने में नैतिक मूल्यों की.मानवीयता की धर्मनिरपेक्षता की शिक्षा का प्रचार कर एकता का प्रयास कर सकते हैं। अकालग्रस्त या भूकम्प पीड़ित, ओलावृष्टि से प्रभावित क्षेत्रों के लिए टोलियाँ बनाकर धन – सामग्री एकत्रित कर उनकी सहायता कर सकते हैं। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में जाकर डूबने वाले व्यक्तियों को बचा सकते हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं का निर्माण भी कर सकते हैं जो दैवी विपत्ति के समय हरदम मदद को तैयार रहें। अवकाश के समय गाँवों में जाकर श्रमदान द्वारा सड़क निर्माण, कुओं की सफाई,परिसर की स्वच्छता के लिए प्रयास कर सकते हैं। कृषि की उन्नति में नवीन वैज्ञानिक साधनों की, उन्नत बीजों की,खाद,दवा की जानकारी दे सकते हैं। गाँव वालों को सौर ऊर्जा,उन्नत चूल्हे,धूम्ररहित चूल्हे, परिवार नियोजन, अल्प – बचत योजना तथा पोलियो आदि के टीकाकरण के सम्बन्ध में जानकारी दे सकते हैं। अन्ध – विश्वासों व रूढ़िवादिता से छुटकारा दिला सकते हैं।

इंजीनियरिंग तथा मेडीकल के छात्र भी ग्रीष्मावकाश में गाँवों जाकर सेवा – कार्य कर सकते हैं। देश की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता, प्रजातन्त्र का महत्त्व, मतदान की गरिमा, नागरिक के अधिकार, कर्त्तव्य, ऋण – योजना एवं बीमा आदि के बारे में अन्य विषय के छात्र जानकारी दे सकते हैं।

उपसंहार – छात्र – जीवन विद्यार्थी की वह अवस्था होती है, जिसमें मनुष्य अटूट शक्ति – सम्पन्न होता है। उनमें कार्य सम्पादन की अभूतपूर्व क्षमता होती है,मन – मस्तिष्क तेज होते हैं। यदि उन्हें सही दिशा मिले और उनकी शक्ति का उचित मार्गान्तरीकरण हो तो वे देश की प्रगति में अत्यन्त लाभप्रद सिद्ध होंगे। भारतीय छात्र पूर्ण शक्ति और सामर्थ्य से देश को आगे बढ़ायें।

2. समय का सदुपयोग [2017]

“समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चिंत रहिमन लगी, समय चूक की हूक ॥”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) समय जीवन सफलता का मापदण्ड,
(3) समय के सदुपयोग से लाभ,
(4) परिश्रम एवं तपस्या ही जीवन का मूल्यांकन है,
(5) उपसंहार।।

प्रस्तावना – नष्ट हुई सम्पत्ति और खोये हुए वैभव को पुनः प्राप्त करने के लिए मनुष्य निरन्तर मेहनत करता है। एक दिन उसे सफलता मिल जाती है। खोया हुआ स्वास्थ्य और नष्ट हुआ धन पुनः प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु खोया हुआ क्षण फिर वापस नहीं आता। समय न तो मनुष्य की प्रतीक्षा करता है और न परवाह। समय का रथ तो तेजी से चल रहा है उसे कोई भी रोक नहीं सकता। इसीलिए कहा है :

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या, कण नष्ट कुतो धनम्।

प्रत्येक क्षण में विद्या (ज्ञान) प्राप्त करो और कण – कण जोड़कर धन पाओ। क्षण भर का समय नष्ट हो जाय तो विद्या कहाँ और कण नष्ट हो जाय तो धन नहीं। तुलसीदास जी ने भी कहा है :

‘दिवस जात नहीं लागत बारा’

दिन जाते देर नहीं लगती,जो समय पर जाग नहीं सका,वही पीछे रह गया।
नदी बहती है, घड़ी चलती है, सूरज, चाँद तारे भी विश्राम नहीं करते तो हम क्यों आराम करें। समय को व्यर्थ न गँवायें उसका सदुपयोग करें।

काव्यशास्त्र विनोदेन काल: गच्छति धीमताम्
व्यसनेन च मूर्खाणां, निद्रया कलहेन वा

समय जीवन – सफलता का मापदण्ड – जीवन की सफलता का रहस्य समय के सही उपयोग में निहित है। संसार के सभी प्राणियों का समय पर समान रूप से अधिकार है। समय की उपयोगिता साधारण से साधारण व्यक्ति को भी महान् बनाती है। महापुरुषों के चरित्र से हमें प्रेरणा मिलती है,उन्होंने एक – एक क्षण का उपयोग किया तभी जीवन में उन्हें सफलता मिली। हमें प्रात: शीघ्र उठकर दिनभर के कार्यक्रम की रूपरेखा बना लेनी चाहिए और आज के कार्यों को आज ही सम्पन्न कर लेना चाहिए। जो व्यक्ति निश्चित उद्देश्य को सामने रखता है उसे अपना रास्ता स्पष्ट दिखायी देता है। वह उलझन में नहीं रहता और पूर्ण मनोयोग से उस कार्य की ओर बढ़ता है।

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समय के महत्त्व को समझने वाला दुःखी नहीं होता। समय के सदुपयोग का तात्पर्य है नियमित होना। जो अपनी दिनचर्या नियमित रखते हैं वे ही कुछ कर पाते हैं। समय से सोना, समय से उठना, भोजन, अध्ययन, भ्रमण, मनोरंजन, पूजन आदि का समय निश्चित करें। अपने बुजुर्गों के पास बैठे,उनकी सेवा करें। जो व्यक्ति काम टालने वाले होते हैं वे सदैव पछताते हैं।

कबीरदासजी ने कहा है :

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करैगो कब।।

समय के सदपयोग से लाभ – समय के सदपयोग से व्यक्ति की उन्नति होती है अतएव बचपन से ही हमें समय के मूल्य का ध्यान रखना चाहिए। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नियमित होना आवश्यक है और अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए हमें अपने खाली समय में स्वाध्याय हेतु अच्छे – अच्छे ग्रन्थों को पढ़ना चाहिए। अपने से अधिक बुद्धिमान लोगों से चर्चा करनी चाहिए। कभी किसी काम को देर से शुरू न करें,क्योंकि प्रारम्भ की देरी से बाद में भी विलम्ब हो जाता है और फिर उसके बाद के अन्य कामों की सब व्यवस्था अस्त – व्यस्त हो जाती है। पल के अंश में क्या हो जायेगा क्या पता। कहा गया है :

का जाने होइ है पल के चौथे भाग।
अतएव हर पल का उपयोग करें।

परिश्रम एवं तपस्या ही जीवन का मूल्यांकन है देश और समाज के प्रति भी हमारा कर्त्तव्य है। हमें सेवा, परोपकार हेतु भी समय निश्चित रखना चाहिए जिससे देश और समाज की भी उन्नति हो। वर्तमान में विज्ञान का युग होने से हमारी दैनिक जिन्दगी में समय की बचत होने लगी है। यात्रा,लेखन कार्य, भोजन सभी क्षेत्रों में समय बचने लगा है। घण्टों का काम मिनटों में सम्पन्न हो जाता है। समय का सदुपयोग करने वाला व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है। उसे चिन्ता नहीं रहती कि उसका कोई काम अधूरा है। थोड़े समय में वह अधिकाधिक काम कर लेता है। जो लोग बेकार बैठे रहते हैं,वे समाज में परेशानी पैदा करते हैं,जैसे उन्हें यदि पैसों की जरूरत है तो वे काम न करके जेब काटेंगे या चोरी करेंगे। पर जिसके पास समय की कीमत है वह व्यर्थ की बातों में समय न गँवाकर काम करके पैसा कमाता है और अपनी आवश्यकता पूरी करता है।

ऐसे व्यक्ति का सभी आदर करते हैं। समय का सदुपयोग करने वाला व्यक्ति जीवन में उन्नति करता है क्योंकि परिश्रम और तपस्या से ही किसी व्यक्ति का मूल्यांकन किया जाता है कि वह अपना समय कैसे बिताता है। सत्पुरुष स्वयं सद्मार्ग पर चलकर दूसरों को भी समय बचाने की प्रेरणा देते हैं ताकि चूक जाने पर पछताना न पड़े।

भारत में जीवन के समय को चार भागों में बाँटा गया है और उस समय नियत कार्य ही समय का सदुपयोग है।

प्रथमे नार्जिते विद्या, द्वितीये नार्जिते धनं।
तृतीय नार्जिते पुण्यं, चतुर्थ किम करिष्यति?

अर्थात् जीवन के प्रथम भाग में यदि विद्याध्ययन न किया, द्वितीय भाग में धन नहीं कमाया और प्रौढ़ावस्था में परोपकार या पालन – पोषण कर पुण्य नहीं कमाया तो जीवन के अन्तिम चरण में क्या कर लोगे?

उपसंहार – हमें समय का सदुपयोग करना चाहिए तथा उन लोगों से बचना चाहिए जो समय के शत्रु हैं। आलस्य,स्वार्थीपन, बुरी संगति तथा दीर्घसूत्री (काम टालना) ये सब शत्रु हैं। इन्हें पास नहीं फटकने देना चाहिए।

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपु।
आलसी व्यक्ति कल’ कहता है अतएव आज’ कहना प्रारम्भ करो। व्यर्थ की गपशप,घण्टों तक दुर्व्यसन,लड़ाई – झगड़ा या सोये रहना – ये सब समय का दुरुपयोग हैं। जब प्रकृति,पशु – पक्षी सब में समय की नियमितता है तो हम तो मनुष्य हैं। अत: आज से ही समय का सदुपयोग करें,यही सफलता की कुंजी है। सफलता का वास्तविक रहस्य समय के सदुपयोग में निहित है।

3. वनों का महत्त्व अथवा वन महोत्सव
अथवा
वृक्षारोपण या वन संरक्षण

“धरती का श्रृंगार वृक्ष, वृक्षों से इसे सजाओ।
हरियाली से चमक उठे जग, दस – दस वृक्ष लगाओ।”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति में वृक्षों की महत्ता,
(3) वृक्षों की उपासना का प्रचलन,
(4) वृक्ष धरती की उर्वरा शक्ति के परिचायक,
(5) वृक्षों से लाभ,
(6) उपसंहार।

प्रस्तावना – भारतवर्ष का मौसम और जलवायु विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। इसकी प्राकृतिक रमणीयता और हरित वैभव विश्व – विख्यात है। विदेशी पर्यटक यहाँ की मनोहारी प्राकृतिक सुषमा देखकर मोहित हो जाते हैं।

प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति में वृक्षों की महत्ता हमारे देश की प्राचीन संस्कृति में वृक्षों की पूजा और आराधना की जाती है तथा उन्हें देवत्व की उपाधि दी जाती है। वृक्षों को प्रकृति ने मानव की मूल आवश्यकताओं से जोड़ा है। किसी ने कहा है – वृक्ष ही जल है,जल ही अन्न है और अन्न ही जीवन है। यदि वृक्ष न होते तो नदी और जलाशय न होते,वृक्षों की जड़ों के साथ वर्षा का अपार जल जमीन के भीतर पहुँचकर अक्षय भण्डार के रूप में एकत्र रहता है। वन हमारी सभ्यता और संस्कृति के रक्षक हैं। शान्ति और एकान्त की खोज में हमारे ऋषि – मुनि वनों में रहते थे। वहीं उन्होंने तत्त्व ज्ञान प्राप्त किया और वहीं विश्व कल्याण के उपाय सोचे। वहीं गुरुकुल होते थे, जिसमें भावी राजा, दार्शनिक, पण्डित आदि शिक्षा ग्रहण करते थे। आयुर्वेद के अनुसार पेड़ – पौधों की सहायता से मानव को स्वस्थ एवं दीर्घायु किया जा सकता है। तीव्र गति से जनसंख्या बढ़ने तथा राष्ट्रों के औद्योगिक विकास कार्यक्रमों के कारण पर्यावरण की समस्या गम्भीर हो रही है। प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग से पर्यावरण बिगड़ता जा रहा है। वृक्षों की भारी तादाद में कटाई से जलवायु बदल रही है। ताप की मात्रा बढ़ती जा रही है,नदियों का जल दूषित हो रहा है,वायुमण्डल में कार्बन डाइ – ऑक्साइड गैस की मात्रा बढ़ रही है। इससे भावी पीढ़ी के स्वास्थ्य को खतरा है। जलवायु की नीरसता और शुष्कता को दूर करके पुनः प्राकृतिक सुरम्यता और रमणीयता लाने हेतु भारत सरकार ने 1950 में वन महोत्सव की योजना प्रारम्भ की। नये वृक्ष लगाये जाने लगे और वृक्षारोपण की एक क्रमबद्ध योजना प्रारम्भ हुई।

वृक्षों की उपासना का प्रचलन वृक्षों के महत्त्व एवं गौरव को समझते हुए हमारी प्राचीन परम्परा में इनकी आराधना पर बल दिया गया। पीपल के वृक्ष की पूजा करना,व्रत रखकर उसकी परिक्रमा करना,जल अर्पण करना और पीपल को काटना पाप करने के समान है,यह धारणा वृक्षों की सम्पत्ति की रक्षा का भाव प्रकट करती है। प्रत्येक हिन्दू घर के आँगन में तुलसी का पौधा अवश्य पाया जाता है। तुलसी पत्र का सेवन प्रसाद में आवश्यक माना गया है। बेल के वृक्ष,फल और बेलपत्र की महिमा इतनी है कि वे शिवजी पर चढ़ाये जाते हैं। ‘सर्वरोगहरो निम्बः’ यह नीम वृक्ष का महत्त्व है। कदम्ब वृक्ष को श्रीकृष्ण का प्रिय पेड़ बताया है तथा अशोक के वृक्ष शुभ और मंगलदायक हैं। इन वृक्षों की रक्षा हेतु कहते हैं कि हरे वृक्षों को काटना पाप है। सायंकाल किसी वृक्ष के पत्ते तोड़ना मना है—कहते हैं कि वृक्ष सो जाते हैं। जो व्यक्ति हरे वृक्ष को काटता है उसकी सन्तान मर जाती है। ये सब हैं हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक जिसमें वृक्षों को ईश्वर स्वरूप,वन को सम्पदा और वृक्षों के काटने वालों को अपराधी कहा जाता है।

वृक्ष धरती की उर्वरा शक्ति के परिचायक – वृक्षों की अधिकता पृथ्वी की उपजाऊ शक्ति को भी बढ़ाती है। मरुस्थल को रोकने के लिए वृक्षारोपण की महती आवश्यकता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ का जन – जीवन खेती पर निर्भर रहता है, खेती के लिए जल की आवश्यकता होती है। सिंचाई का उत्तम साधन बारिश का जल है। यदि वर्षा न हो तो नदी, जलाशय, झरने, ट्यूबवेल इत्यादि भी सूख जायें। इनके जल की पूर्ति भी वर्षा करती है। अनुकूल वर्षा होती है तो हम उसे ईश्वर की कृपा समझकर प्रसन्न होते हैं और तृप्ति का अनुभव करते हैं।

वृक्ष वर्षा के पानी को सोखकर धरती के भीतर पहुँचा देते हैं। इसी से धरती उपजाऊ होती है।

वृक्षों से लाभ – वृक्षों से स्वास्थ्य लाभ होता है क्योंकि मनुष्य की श्वास प्रक्रिया से जो दूषित हवा बाहर निकलती है, वृक्ष उन्हें ग्रहण कर हमें बदले में स्वच्छ हवा देते हैं। आँखों की थकान दूर करने और तनाव से छुटकारा पाने के लिए विस्तृत वनों की हरियाली हमें शान्ति प्रदान कर आँखों की ज्योति को बढ़ाती है। वृक्ष बालक से लेकर बुजुर्गों तक सभी के मन को भाते हैं। इसीलिए हम अपने घरों में छोटे – छोटे पेड़ – पौधे लगाते हैं। वृक्षों पर अनेक प्रकार के पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहते हैं और उनकी कल – कल मधुर ध्वनि पर्यावरण में मधुरता घोलती है। वृक्षों से अनेक प्रकार के स्वाद के फल हमारे भोजन को रसमय और स्वादिष्ट बनाते हैं। इनकी छाल और जड़ों से दवाइयाँ बनती हैं। अनेक पशु वृक्षों से अपना आहार ग्रहण करते हैं।

वृक्षों से मानव को अनेक लाभ हैं – ये वर्षा कराने में सहायक होते हैं। वृक्षों के अभाव में वर्षा नहीं होती और वर्षा के अभाव में अन्न का उत्पादन नहीं हो पाता। ग्रीष्मकाल में वृक्ष हमें सुखद छाया और मन्द पवन देते हैं। सूखे वृक्ष ईंधन के काम आते हैं। गृह निर्माण,गृह सज्जा, फर्नीचर,काष्ठ शिल्प के लिए हमें वृक्षों से ही लकड़ी मिलती है। कागज, गोंद आदि भी वृक्ष से कच्चा माल ग्रहण करके बनते हैं। कई सुगन्ध, तेल,खाद्य सामग्री में सुगन्ध ये सब भी वृक्षों से प्राप्त होते हैं। आँवला – चमेली का तेल, गुलाब,केवड़े का इत्र,जल,खस की खुशबू ये सभी वृक्षों और उनकी जड़ों से बनते हैं।

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उपसंहार – वृक्षों से हमें नैतिकता, परोपकार और विनम्रता की शिक्षा मिलती है। फल को स्वयं वृक्ष नहीं खाता। वह जितना अधिक फल – फूलों से लदा होगा उतना ही झुका हुआ रहता है। हम जब देखते हैं कि सूखा कटा हुआ पेड़ भी कुछ दिनों में हरा – भरा हो जाता है जो जीवन में आशा का संचार कर धैर्य और साहस का भाव जगाता है। हमें अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए। वृक्षारोपण करके ही हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए जीवनदायी वातावरण सृजित कर सकते हैं।

4. पुस्तकालय

“ज्ञान का भंडार संचित, ज्ञान का प्रसाद पाओ।
पुस्तकालय ज्ञान राशि है, आकर ज्ञान बढ़ाओ॥

विस्तृत रूपरेखा –
(1) प्रस्तावना,
(2) पुस्तकालय का आशय,
(3) मानसिक स्वास्थ्य की पृष्ठभूमि,
(4) पुस्तकालय के प्रकार,
(5) सार्वजनिक पुस्तकालय,
(6) उपसंहार।

प्रस्तावना – पुस्तकें हमारी उत्कृष्ट पथ – प्रदर्शक हैं। हम अकेले में इनसे बातें कर सकते हैं, समय का सदुपयोग कर सकते हैं। महान् आत्माओं के दर्शन कर सकते हैं।

जिज्ञासा,कौतूहल,नित नवीन ज्ञान की प्राप्ति ये मानव स्वभाव के अंग हैं एवं उसकी मूल प्रवृत्ति हैं और पुस्तकें सर्वश्रेष्ठ साधन हैं। छात्र अपनी पाठ्य – पुस्तकों के माध्यम से अपनी सभी जिज्ञासाओं को पूरी नहीं कर पाते, अतएव वे अन्य पुस्तकों को भी पढ़ना चाहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति इतना सम्पन्न नहीं होता कि सभी किताबें खरीद सके, अतएव पुस्तकालय का प्रचलन हुआ।

पुस्तकालय का आशय – पुस्तकालय दो शब्दों से मिलकर बना है – पुस्तक+ आलय। इसका तात्पर्य है – वह स्थान या भवन है जहाँ पुस्तकों का संग्रह होता है। पुस्तकों का घर पुस्तकालय है। पुस्तकालयों में अनेक विद्याओं एवं विषयों की किताबें रहती हैं। साहित्य, धर्म, राजनीति, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र,कानून शिक्षा, दर्शन, विज्ञान की पुस्तकें और साहित्यकोष, ज्ञानकोष,शब्दकोष रहते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य की पृष्ठभूमि – शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जिस प्रकार मनुष्य को पौष्टिक भोजन की जरूरत होती है उसी प्रकार नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए नयी पुस्तकें अपेक्षित हैं। ये सब हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं। अपने मस्तिष्क को सक्रिय रखने के लिए उसे शुद्ध ज्ञान की खुराक देते रहना चाहिए। इस ज्ञान की उपासना के दो स्थान हैं – एक विद्यालय दूसरा पुस्तकालय। पुस्तकालय में हम ज्ञान के व्यापक क्षेत्र का रसास्वादन कर सकते हैं। यहाँ सभी की रुचि के एवं सभी प्रकार के ग्रन्थ सरलता से मिल जाते हैं। यहाँ के शान्त वातावरण में हम अपने जीवन की अशान्ति और संघर्ष से छुटकारा पा सकते हैं। प्रायः पुस्तकालयों के साथ वाचनालय भी होते हैं। जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी – अपनी पसन्द की पुस्तक निकालकर पढ़ सकते हैं और उसमें से आवश्यक महत्त्वपूर्ण नोट भी बना सकते हैं।

पुस्तकालय के प्रकार – पुस्तकालय अनेक प्रकार के हो सकते हैं। हमारी शाला. महाविद्यालय या विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों में छात्रों की रुचि की, उनको प्रेरणा देने वाली तथा उनके अध्ययन विषयों में सहायता कर उनके ज्ञान को परिपक्व बनाने में सहायक पुस्तकें होती हैं। इनका कार्य – क्षेत्र सीमित होता है। केवल छात्र और अध्यापक ही इसका लाभ ले पाते हैं। इन पुस्तकालयों का महत्त्व सर्वोपरि है क्योंकि ये छात्रों की ज्ञान वृद्धि में सहायक होते हैं। वे छात्र जो पुस्तकें खरीदने की क्षमता नहीं रखते या वे जो ज्ञान के भण्डार को और बढ़ाना चाहते हैं, एवं एक विषय के लिए अनेक पुस्तकों में अध्ययन करते हैं, उनके लिए ये संस्थागत पुस्तकालय अमूल्य सेवा देकर छात्रों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर देते हैं।

दूसरे प्रकार के पुस्तकालय वे होते हैं जो व्यक्तिगत कहलाते हैं। अनेक विद्यानुरागी विद्वान् जो धन की दृष्टि से सक्षम हैं वे भी चुन – चुनकर अनेक विषयों की एवं अनेक प्रकार की पुस्तकें स्वयं खरीद कर उनका संग्रह करके एक यादगार पुस्तकालय बनाते हैं। इनमें प्राचीन और नवीन सभी प्रकार की पुस्तकें होती हैं। उनके निकटतम मित्र व सम्बन्धी इसका लाभ उठा सकते हैं। प्रत्येक वह व्यक्ति जिसे नये ज्ञान के प्रति कौतूहल हो वह अपनी रुचि एवं अपनी क्षमता के अनुसार छोटा या बड़ा पुस्तकालय अपने घर पर अपनी अलमारी में बना सकते हैं। विद्या प्रेमी व्यक्तियों की यही सम्पदा है।

कई शासकीय पुस्तकालय भी होते हैं जो भव्य एवं विशाल भवनों में स्थित होते हैं। यहाँ धन की कमी न होने से बड़े से बड़े दुर्लभ ग्रन्थों का रख – रखाव प्रशिक्षित एवं विद्वान पुस्तकालयाध्यक्षों की देख – रेख में होता है। इन पुस्तकालयों की व्यवस्था सरकार करती है और यहाँ की व्यवस्था बनाये रखने के लिए अनेक कर्मचारी तैनात रहते हैं, पर ये पुस्तकालय जन – साधारण की पहुँच से बाहर होते हैं। इनमें प्रवेश के और पुस्तक प्राप्त करने के कठिन नियमों के कारण ये केवल विशेष वर्ग के उपयोग हेतु सीमित रहते हैं।

सार्वजनिक पुस्तकालय सार्वजनिक पुस्तकालय अत्यधिक लोकप्रिय एवं लाभप्रद हैं। ये सार्वजनिक धन से बनाये जाते हैं। सार्वजनिक पुस्तकालयों की पुस्तकें सभी लोगों की रुचि को ध्यान में रखकर संग्रहीत की जाती हैं। ये सम्पूर्ण समाज को लाभ पहुँचाती हैं। छोटा बड़ा कोई भी व्यक्ति यहाँ से मनपसन्द पुस्तक निकलवाकर पढ़ सकता है। कुछ शुल्क नियत होता है जिससे हम इन पुस्तकालयों की सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं और फिर कोई भी पाठक इन पुस्तकों को निश्चित सीमावधि के लिए घर ले जाकर सपरिवार पढ़ सकते हैं। ऐसे पुस्तकालयों में जो सार्वजनिक वाचनालय होता है वहाँ अनेक प्रकार की पत्र – पत्रिकाएँ और दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक समाचार – पत्र भी मँगवाये जाते हैं जिन्हें कोई भी पढ़ सकता है और अपना ज्ञान बढ़ाने के साथ समाज,राज्य,राजनीति की दिन – प्रतिदिन घटित होने वाली समस्याओं से अवगत हो सकता है। कई बुजुर्ग लोग सुबह – शाम व्यर्थ का समय न गवाकर इन वाचनालयों एवं पुस्तकालयों में अपना समय बिताते हैं, वहाँ से बाहर निकलकर ज्ञान चर्चा करते हैं और उन्हें सत्संगति का समागम सुख भी प्राप्त होता है।

उपसंहार—यथार्थ में पुस्तकें मनुष्य की सच्ची सुख मित्र,पथ – प्रदर्शक और साथी हैं। अतः गाँव – गाँब में ऐसे पुस्तकालयों की स्थापना जरूरी है। इससे ग्रामवासियों में पढ़ने के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होगी, उनका ज्ञान बढ़ेगा और इस प्रकार देश में योग्य और सक्षम लोगों की अधिकता स्वयमेव होगी जो देश के सुखद भविष्य का द्योतक होगी।

5. भारत की साम्प्रदायिक एकता
अथवा
राष्ट्रीय एकता (2009, 11)

“मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना।
हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा ॥”

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विस्तृत रूपरेखा ([2017] –
(1) प्रस्तावना,
(2) भारतवर्ष विस्तृत भूखंड है,
(3) अनेकता में एकता भारत की विशेषता,
(4) राष्ट्रीय हित सर्वोपरि,
(5) साम्प्रदायिक सद्भावना अपेक्षित,
(6) प्रान्तीयता की भावना राष्ट्रीय एकता में बाधक,
(7) सर्वधर्म समभाव अपेक्षित,
(8) साम्प्रदायिक एकता के निमित्त प्रयास,
(9) जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी,
(10) उपसंहार।]

प्रस्तावना – ‘भारत की साम्प्रदायिक एकता’ यहाँ के निवासियों की भावनात्मक प्रवृत्ति को स्पष्ट कर देती है जिसमें सबके एक होने (एकत्वभाव) का अर्थ समाहित है। अतः सम्पूर्ण देश के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक,आर्थिक,सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा साहित्यिक दृष्टि से एक होने का अभिप्राय व्यक्त होता है। साम्प्रदायिक एकता और राष्ट्रीयता में भारत राष्ट्र की अनेकता में एकता छिपी हुई है। उपर्युक्त दृष्टि से अनेकता से संयुक्त भारत एकता के सूत्र में बँधा हुआ है। बाहरी रूप से अनेकता (विविधता) लिए हुए भारतवर्ष वैचारिक दृष्टिकोण में एकता धारण किये हुए है। यही एकता में अनेकता और अनेकता में एकता भारत की प्रमुख विशेषता है।

भारतवर्ष विस्तृत भूखंड है – भारतवर्ष एक विशद भूखण्ड (उपमहाद्वीपीय) परिक्षेत्र में फैला हुआ राष्ट्र है जिससे अलगाववादी प्रवृत्तियाँ दूर हैं। यहाँ के निवासी हिन्दू, मुसलमान,ईसाई, पारसी तथा सिख सब बराबर हैं। वे अपने हित को राष्ट्र के हित से अलग नहीं मानते हैं।

अनेकता में एकता भारत की विशेषता भारतवर्ष के सामाजिक परिवेश में अनेक जातियाँ – उपजातियाँ, गोत्र – वर्ण आदि अनेकता लिए हुए होकर भी समाज को एकरूपता देते हैं। अनेक धर्म और सम्प्रदाय अपने अवान्तर भेदों से संयुक्त हैं। सांस्कृतिक रूप में उन सबका रहना – सहना, वेशभूषा, पूजा – पाठ आदि की विविधता ‘एकता’ लिए हुए है। राजनैतिक क्षेत्र में भी समाजवाद, साम्यवाद, गाँधीवाद आदि विविध विचारधाराएँ राष्ट्रवाद से अलग नहीं हैं। साहित्यिक क्षेत्र में भी प्राचीन और नवीन भाषा सम्बन्धी विविध शैलियाँ पल्लवित हैं लेकिन उन सबका ध्येय साहित्यिक समन्वय ही है। आर्थिक दृष्टिकोण भी अनेकता प्रधान है परन्तु उसमें भारत राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को सन्तुलित रखने का प्रयासमात्र है जो राष्ट्रीय एकता को स्थापित करता है। भौगोलिक दृष्टि से भी भारतवर्ष एक लघु विश्व है जिसमें प्राकृतिक विविधता के दर्शन होते हैं। ऋतु परिवर्तन की छटा, पहाड़ों और पठारों के ऊँचे – नीचे शिखर, कहीं बर्फ की चादर ओढ़े हुए और कहीं अपने नंगे प्रकृत स्वरूप में हमारी चेतना पर विपरीत प्रभाव डालती प्रकृति अपने मनोरम स्वरूप में सबको आकर्षित करती है। भारत वसुन्धरा विविध वस्तुओं (रत्नों) को अपने अन्तर में छिपाये हुए है जो भारतीय समृद्धि के एकत्व प्रधान स्वरूप को प्रकट करती है।

राष्ट्रीय हित सर्वोपरि राष्ट्रीय एकता को पल्लवित करने के लिए अलगाववादी प्रवृत्ति को दूर रखना चाहिए। सभी को यहाँ अपने – अपने सम्प्रदाय और धर्मों के प्रति अटूट आस्था रखने की अनुमति दी गई है। परन्तु राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है जो साम्प्रदायिक और धार्मिक अवान्तरों के पालन से ऊपर है। सभी धर्मों का मूल एक है – उस असीम सत्ता की प्राप्ति। अतः राष्ट्रीय स्तर पर साम्प्रदायिक सामंजस्य कायम रखने के लिए धर्म – सहिष्णुता की भावना विकसित करना परमावश्यक है। भारत के अनेक राज्य मिलकर भारत को सबल स्वतन्त्र राजनैतिक इकाई के रूप में स्थिर करते हैं जिनका राजनीतिक और साम्प्रदायिक स्वरूप भारत राष्ट्र का अभिन्न अंग बनकर राष्ट्रीयता की मूल भावना को सुदृढ़ करता है।

साम्प्रदायिक सद्भावना अपेक्षित – साम्प्रदायिकता की भावना अपने सम्प्रदाय के विश्वासों और आस्था को पल्लवित करने की अनुमति देती है परन्तु उस भावना में अन्य सम्प्रदायों की अपेक्षा अधिक अधिकार की इच्छा करना अनुचित है। अपने विश्वासों और धार्मिक आस्थाओं का अविरोध पालन करना साम्प्रदायिकता नहीं है। परन्तु जब अपने विशेष धर्म अथवा सम्प्रदाय के सिद्धान्तों को बलपूर्वक किसी पर थोपना और अन्य धर्मावलम्बियों की सुविधा को अपनी सुविधा के लिए बाधित करना ही साम्प्रदायिकता है। इस तरह की भावना दूषित है और वह पृथकतावादी सिद्धान्त पर विकसित सम्प्रदाय कहा जायेगा जो घृणा के भाव को जन्म देकर राष्ट्र की एकता के विपरीत धारा बहाने में सहायक बनता है। आजादी से पूर्व हिन्दू और मुस्लिम के हीन साम्प्रदायिक सिद्धान्त पर द्विराष्ट्रीय भावना के कारण वृहत्तर भारत का विभाजन हुआ था। इस कारण लोगों को अनेक कष्ट भोगने पड़े।

धर्म एक ऐसा साधन है जिससे एकता की भावना विकसित होती है। साम्प्रदायिकता की दूषित भावना अलगाव को जन्म देती है। परन्तु प्रत्येक धर्म का मौलिक स्वरूप एक है। इस आधार पर लोगों में भेद होना अथवा विरोध होना उचित नहीं है। क्योंकि इस राष्ट्र के निवासी वहाँ की राष्ट्रीयता के अभिन्न अंग हैं। इस अभिन्नता से ही राष्ट्रहित प्राप्त किया जा सकता है।

प्रान्तीयता की भावना राष्ट्रीय एकता में बाधक – क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता की भावना भी राष्ट्र की एकता में बाधक है। इससे पृथक राज्य स्थापित करने की अलगाववादी भावना बल पकड़ जाती है। यह अलगाववादी क्षेत्रीयता उग्ररूप धारण करके आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देती है जिससे जनजीवन अस्तव्यस्त होने लग जाता है तथा भारत की राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए एक बाधा उत्पन्न हो जाती है। भाषावाद से भी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को भारी धक्का लगा है। भारत राष्ट्र की राष्ट्रभाषा हिन्दी है जिसे कुछ प्रान्तों के अलगाववादी तत्व स्वीकार नहीं करते। जातीय कट्टरवाद देश की राष्ट्रीय एकता को झकझोर रहा है।

सर्वधर्म समभाव अपेक्षित – वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ रखने के लिए सभी लोगों में सर्वधर्म समभाव की भावना विकसित होनी चाहिए। व्यष्टिवादी दृष्टिकोण से हटकर समष्टि भाव अपनाना आवश्यक है जिससे सभी लोग धर्म, क्षेत्र, भाषा तथा जाति के संकुचित दायरे से ऊपर उठकर ‘राष्ट्र’ हित साधन में अपना सहयोग देंगे। भारतीय परिवेश में व्याप्त बाह्य विविधता सभी नागरिकों के अन्तर्मन की एकता को विकास देगी जिसके लिए शिक्षा के प्रसार की अत्यधिक आवश्यकता है। भारत की जनसंख्या का आधा भाग अशिक्षा के घोर अन्धकार में डूबा हुआ है। उस अन्धकार को दूर करने के प्रयास ही भारत की एकता को सुदृढ़ता प्रदान कर सकेंगे।

स्वार्थी राजनेताओं को अपने छलछदम त्यागने होंगे। उन्हें साम्प्रदायिक विद्वेष, घृणा फैलाने से बाज आना चाहिये। तभी भारतराष्ट्र की एकता सुदृढ़ रूप से पल्लवित हो सकेगी।

साम्प्रदायिक एकता के निमित्त प्रयास साम्प्रदायिक एकता के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए समय – समय पर राष्ट्रीय स्तर की समितियाँ गठित की गई हैं जो अपने सुझाव देती हैं कि राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के लिए किन – किन उपायों को अपनाना चाहिए। ईश्वर की कृपा से इन विविधताओं के होते हुए भी सभी भारतीय राष्ट्रकों (नागरिकों) में एकता का अदृश सूत्र समाया हुआ है जो उन सबको एकता में बाँधे हुए है। विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है। गाँधीजी के आन्दोलनों के समय भी हमने विदेशियों से अपनी एकता के आधार पर ही आजादी प्राप्त की थी। भारत माता के प्रति भक्ति की भावना हमें एक बनाये हुए है। क्योंकि – ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ हमारे लिए तो – सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ इत्यादि स्वर लहरियाँ उद्दाम देश – प्रेम को सभी के हृदयों में उड़ेल रहा है।

उपसंहार – अपने बालक – बालिकाओं में राष्ट्रीय चेतना की अनुभूति के लिए इतिहास और भूगोल का अध्ययन कराना होगा। धनवान और निर्धन के बीच की खाई पाटनी होगी। एक राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी का अध्ययन अनिवार्य रूप से करना होगा। तब ही सभी नागरिक सामान्य संस्कृति की अनुभूति कर सकेंगे। अपने सीमान्त प्रदेशों के प्रति सचेत रहना होगा तथा राष्ट्रीय भावना की पहचान बनाये रखने के प्रति हमें सावधान रहना होगा। हमें एक राष्ट्र के रूप में क्रियाशील होना चाहिए। यही एक भाव है राष्ट्रीय अखण्डता का, एकता का। “राष्ट्रीयता की यह वो हस्ती विकसित हो जो मिटाये मिटे नहीं।”

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6. आतंकवाद
अथवा
आतंकवाद : अन्तर्राष्ट्रीय समस्या [2009]
अथवा
‘आतंकवाद – एक विभीषिका
अथवा
आतंकवाद और राष्ट्रीय अखण्डता [2009]

“कराह उठी है मानवता, आतंकवाद हटाओ।
जहर है यह मानवता का, इसको दूर भगाओ।”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) आतंकवाद का जाल विश्व स्तर पर,
(3) भारत एवं आतंकवाद,
(4) कश्मीर घाटी में भी आतंकवाद,
(5) पंजाब में आतंकवाद का कुचक्र,
(6) आतंकवाद का समाधान,
(7) उपसंहार।

प्रस्तावना – आतंकवाद से तात्पर्य अपनी स्वार्थपूर्ण कुत्सित इच्छाओं की पूर्ति हेतु हिंसा का सहारा लेना है। इन सभी कामों में असामाजिक तत्व सक्रिय रहते हैं और अपनी घृणित क्रियाओं से अमनप्रिय लोगों को भयभीत करके अपने स्वार्थों की पूर्ति करना ही उनका ध्येय होता है। इन सभी कामों को हिंसक क्रियाओं के माध्यम से अंजाम दिया जाता है।

आतंक के पथ पर कदम बढ़ाने वालों की हिंसा तथा बल प्रयोग पर आस्था होती है। इस प्रकार के बल प्रयोग को अन्य वर्ग – सम्प्रदाय व समुदाय को भयभीत करने तथा उन पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए किया करते हैं। इन आतंकवादियों के द्वारा अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति की जाती है। हिंसक गतिविधियों से सरकार को गिराया जाता है तथा समग्र शासनतन्त्र को पंगु बना दिया जाता है। उन पर अपना आधिपत्य जमा लेने का प्रयास किया जाता है।

आतंकवाद का जाल विश्व – स्तर पर – आतंकवादी लोग आज लगभग विश्व के सभी देशों में अपनी आतंकवादी प्रक्रियाओं को अंजाम दे रहे हैं। ये लोग राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति कर लेते हैं; इसके लिए वे सार्वजनिक तौर पर हिंसा और हत्याओं का सहारा लेते हैं। यह आतंकवाद आज भौतिक रूप से समृद्ध और विकसित देशों में अपने विकराल स्वरूप को दिखा रहा है। ये आतंकवादी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हो रहे हैं और यह आतंक अन्तर्राष्ट्रीय रूप को धारण करता जा रहा है; जो अब और अधिक प्रबल तथा सक्रिय हो गया है। विश्व के कुछ ऐसे भी देश हैं जो इन आतंकवादी गुटों को अकेला समर्थन ही नहीं, अपितु सहायता भी दे रहे हैं। इन आतंकियों की प्रक्रियाओं का स्वरूप निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है (1) राजनयिकों की हत्याएँ करना, (2) विमान अपहरण की क्रियाओं का सम्पादन, (3) रासायनिक हथियारों के प्रयोग से अत्यधिक जान – माल की हानि करना। देश में आतंकवादियों के पीछे विदेशियों का हाथ है। वे धन का प्रलोभन देकर हिंसा करवा रहे हैं।

भारत एवं आतंकवाद–भारत ने सन् 1947 ई. में 15 अगस्त को आजादी प्राप्त की। इसके पश्चात् भारत के विभिन्न हिस्सों में आतंकवादी गतिविधियों को इन आतंकी संगठनों ने अंजाम देना शुरू कर दिया। बड़े – बड़े सरकारी पदों पर तैनात अधिकारियों को इस आतंकवादी क्रियाओं का शिकार होना पड़ा। उन्हें मार डाला गया। इस भय से आतंकित लोगों ने अपने पदों से त्याग – पत्र दे दिया। आतंकवादी क्रियाओं (हिंसा आदि) की काली छाया भारत के पूर्वी राज्यों (नागा प्रदेश, मिजोरम,मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल और असम) में दिखाई देने लगी। असम में बोडो आतंकवाद अभी भी फैला हुआ है। उपर्युक्त शेष सभी राज्यों का आतंकवाद शान्त है। बंगाल के नक्सलवाड़ी से फैला आतंक बंगाल से बाहर भी खूब फैला। नक्सलवादी आतंक ने अपना अति भयावह रूप दिखाया। आज भी नक्सलवादी आतंक बिहार तथा आंध्र प्रदेश में अपने रौद्र स्वरूप को दिखा रहा है। उस समय के रेलमन्त्री ललित नारायण मिश्र को भाषण देते समय मार दिया गया तथा अन्य बहुत से राजनयिकों की निर्मम हत्या कर दी गई।

कश्मीर घाटी में भी आतंकवाद – यह राष्ट्रीय पर्वो – 15 अगस्त, 2 अक्टूबर तथा 26 जनवरी के अवसर पर भयंकर हत्याकाण्ड करके अपने परचम को लहरा रहा है। सन् 1990 में एच.एम.टी.के मुख्य प्रबन्धक एम. एल.खेड़ा की तथा कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री मुशीर – उल – हक की आतंकवादियों ने नृशंस हत्या कर दी। अब निरन्तर ही इन आतंकियों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या की जा रही है। उनके भय के कारण वहाँ के निवासी अपने घर – दुकान – कारखाने आदि सब को छोड़कर वहाँ से भाग निकले हैं।

पंजाब में आतंकवाद का कुचक्र – पंजाब के आतंकवाद ने तो भारत के प्रत्येक नागरिक को हतप्रभ कर दिया है। पंजाब के आतंकवाद में तो धर्म और राजनीति का गड्ड – मड स्वरूप दिखाई देने लगा। भाषायी आधार पर इन आतंकी संगठनों ने पंजाबी सूबे की माँग कर दी और अन्तत: 8 जून, 1966 को तत्कालीन पंजाब का विभाजन कर दिया गया तथा उसका हिन्दी भाषी हिस्सा ‘हरियाणा प्रदेश’ नाम से अलग कर दिया गया। साथ ही पंजाबीभाषी लोगों ने ‘सिख होमलैण्ड’ की माँग उठा दी। इस तरह इन पंजाबीभाषी लोगों ने अपनी माँगें और बढ़ा दीं। अप्रैल 1978 से लगातार – माइक की आवाज कम करने, धूम्रपान न करने, तम्बाकू का व्यापार मत करो – आदि के नारे लगाने के बहाने ये आतंकवादी निर्दोष लोगों की छटपुट हत्यायें करने लगे। इन आतंकियों ने भिखारी से लेकर धनवान लोगों तक अपने हाथ पसार दिये। सन् 1981 ई.में हिन्द – समाचार – पत्र समूह के स्वामी लाला जगतनारायण की हत्या कर डाली। विदेश में रहने वाले डॉ. जगजीतसिंह चौहान ने स्वयं को आतंकियों द्वारा प्रस्तावित ‘खालिस्तान’ राष्ट्र का राष्ट्रपति घोषित कर दिया और भारत सरकार पर स्वतन्त्र खालिस्तान की स्थापना करने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया और उग्रवादियों ने हिंसा का सहारा लेना भी शुरू कर दिया। इस कुत्सित कार्य में सहायता देने वाले देश – इंग्लैण्ड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, चीन, नार्वे तथा पाकिस्तान थे। इन देशों से उन्हें धन व शस्त्रास्त्र प्राप्त होने लगे तथा स्वर्ण मन्दिर इन आतंकियों की गतिविधियों का केन्द्र बन गया।

भारत सरकार ने 4 जून, 1984 को स्वर्ण मन्दिर में सेना को प्रवेश करने के आदेश दे दिये। उग्रवादी तत्वों को नष्ट करने के लिए ‘ऑपरेशन ब्लू – स्टार’ चलाया गया। सैनिक कार्यवाहियों में अनेक आतंकवादी मारे गये और शेष को बन्दी बनाया गया। सरकार की इस कार्यवाही का स्वागत हुआ, लेकिन कुछ लोगों ने इस कार्यवाही को धार्मिक कार्य में हस्तक्षेप माना और अपनी तीखी प्रतिक्रिया की। उदार सिखों ने तथा धर्मनिरपेक्ष समाजसेवियों ने ‘कार – सेवा’ करके स्वर्ण मन्दिर की पवित्रता को बहाल किया। इन उग्रवादियों के विदेशी षड्यन्त्र के तहत 31 अक्टूबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की उनके निवास पर ही उनके ही पहरेदार ने हत्या कर दी। 10 अगस्त, 1986 को भूतपूर्व सेनाध्यक्ष श्री अरुण श्रीधर वैद्य की हत्या कर दी। इसी तरह पंजाब के अनेक हिन्दू पंजाबी पत्रकारों को इन आतंकियों ने मार दिया। अभी भी वह आतंकवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। राजधानी दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में जन्मदिन के समारोह में भाग लेते निर्दोष 14 लोगों को गोली से उड़ा दिया। रेलवे स्टेशनों,बस अड्डों पर आतंकी प्रभाव दिखाई पड़ा। 21 मई,1991 को भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की निर्मम हत्या कर दी गई जिससे सारा संसार दहल गया। आतंकवाद को निम्न रूपों में देखा जा सकता है

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(1) एक विशेष वर्ग को अन्य लोगों के वर्ग से अलग कर देना और हिंसा द्वारा उनके मध्य व्याप्त मैत्री सम्बन्धों को खत्म कर देना।
(2) अत्यधिक हानि पहुँचाने के लिए ज्वलनशील बम आदि आग्नेयास्त्रों का प्रयोग करके लोगों में भय पैदा करना।
(3) हिंसक कार्यवाही करके प्रमुख व्यक्तियों का अपहरण, हत्या आदि करके अनिवार्य सेवाओं को प्रभावित करना।
(4) फिरौती आदि के रूप में उचित या अनुचित माँगें मनवाने की शर्ते रखना, वायुयानों का अपहरण कर लेना तथा बैंकों में डकैती आदि डालकर लोगों में विभीषिका पैदा करना।

आज कश्मीर घाटी इन आतंकियों की बन्दूकों की गोलियों और बम के गोलों के धमाकों से थरथर काँप उठी है। सेना और आतंकियों के मध्य अनेक झड़पें होती हैं और सैनिक वीरों की आहुतियों ने इस समग्र क्षेत्र को अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद पर किया गया हमला आतंकियों की बर्बरता का सुबूत है। अक्षरधाम मन्दिर सहित अनेक धार्मिक पवित्र स्थलों की पवित्रता को नष्ट किया है। परन्तु भारतीय राष्ट्रीय वीर सैनिकों ने इन आतंकियों को प्रत्येक बार मार – मारकर धूल चटा दी है।

आतंकवाद का समाधान – आतंकवाद की समस्या के समाधान के लिए कुछ सुझाव इस तरह प्रस्तुत हैं
(1) राजनैतिक दलों को अपनी पार्टी के लाभ की आशा में साम्प्रदायिक सौहार्द्र को नष्ट नहीं होने देना चाहिए।
(2) सीमा पार से प्रवेश करने वाले प्रशिक्षित आतंकवादियों को रोकना चाहिए।
(3) अलगाववादी दृष्टिकोण वाले युवकों को संविधान की सीमाओं के अन्तर्गत सुविधाएँ देकर राष्ट्रीय मुख्यधारा में मिलाये जाने के प्रयास करने चाहिए।

उपसंहार – आवश्यकता इस बात की है कि सरकार के साथ देश का प्रत्येक नागरिक आतंकवाद को कुचलने का बीड़ा उठायेगा तभी रामराज्य की कल्पना साकार होगी।

7. दूरदर्शन

“दूरदर्शन विज्ञान का अनुपम उपहार है,
विश्व चित्र सम्मुख आ जाते चित्रों का यह हार है।”

विस्तृत रूपरेखा [2016] –
(1) प्रस्तावना,
(2) विज्ञान की अपूर्व देन,
(3) दूरदर्शन का आविष्कार,
(4) भारतवर्ष में दूरदर्शन का प्रथम शुभारम्भ,
(5) दूरदर्शन से लाभ,
(6) विभिन्न वर्गों के लिए लाभप्रद,
(7) मनोरंजन का सुलभ साधन,
(8) भावात्मक एकता का पोषक,
(9) उपसंहार।।

प्रस्तावना दिवस के अवसान और सन्ध्या के समय सुबह से शाम तक थका हुआ मानव शारीरिक विश्राम के साथ मानसिक आराम भी चाहता है जिससे उसकी थकान मिट जाये और मन पुलकित हो उठे। इसके लिए वह जो भी उपाय अपनाता है उसे कहते हैं मनोरंजन। मानव सभ्यता के विकास के साथ – साथ मनोरंजन के साधनों में भी परिवर्तन हुए हैं। पहले कुछ दृश्य साधन थे, कुछ श्रव्य। या तो वह तस्वीरें देखता था या रेडियो, टेप सुनता। घर बैठे या लेटे – लेटे यदि मनोरंजन हो तो क्या बात है? प्राचीनकाल में धृतराष्ट्र अपने महल में बैठे – बैठे जैसे संजय द्वारा कुरुक्षेत्र के मैदान का आँखों देखा हाल सुनते थे वैसे ही दूरदर्शन के आविष्कार से हमें भी यह दृश्य – श्रव्य उपकरण लाभ पहुंचाता है।

विज्ञान की अपूर्व देन – दूरदर्शन विज्ञान का एक अनुपम उपहार है। इसने मानव जीवन में एक हलचल पैदा कर दी है और समाज को थोड़े ही समय में तीव्र गति से विकास की ओर अग्रसर किया है।

दूरदर्शन का आविष्कार – दूरदर्शन का आविष्कार सर्वप्रथम जॉन लागी बेअर्ड महोदय ने 1926 में किया था। ये स्कॉटलैण्ड के रहने वाले थे। इन्होंने टेली कैमरे का आविष्कार किया तथा इसका सफल प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। यह फोटो इलेक्ट्रिक सेल की सहायता से कार्य करता है। रेडियो तरंगों की भाँति ही प्रकाश को विद्युत तरंगों में रूपान्तरित कर दूर तक प्रसारित किया जाता है और रिसीविंग सेट उसे ग्रहण करके प्रकाश में चित्रों को परिवर्तित कर स्क्रीन या परदे पर उतार देता है। पहले ये दृश्य काले, सफेद हुआ करते थे। अब ये रंगीन दृश्य संसार में कहीं भी देखे जा सकते हैं। जीवन्त प्रसारण में तत्कालीन दृश्य ज्यों के त्यों प्रसारित किये जाते हैं।

भारतवर्ष में दूरदर्शन का प्रथम शुभारम्भ हमारे देश में दूरदर्शन का प्रथम प्रसारण 1958 में दिल्ली में हुआ। उस समय दिल्ली में औद्योगिक एवं विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। उस समय भारतीयों के लिए यह एक कौतुक भरी घटना थी। धीरे – धीरे इसका प्रचार – प्रसार होता गया। बाद में 1972 में मुम्बई में,1973 में कश्मीर में दूरदर्शन केन्द्रों की स्थापना हुई। मध्य प्रदेश में 1978 में छत्तीसगढ़ जिले में दूरदर्शन आया तथा उपग्रह द्वारा कार्यक्रमों का प्रसारण हुआ। उन दिनों अधिकांश कार्यक्रम शैक्षिक और ग्रामीण जीवन पर आधारित होते थे।

दूरदर्शन से लाभ – दूरदर्शन के अनेक लाभ हैं, मुख्यतः इसके कुछ उद्देश्य स्पष्ट हैं। सर्वप्रथम यह मनोरंजन का प्रमुख साधन है। इससे हमें ध्वनि, प्रकाश और फोटोग्राफी का चमत्कार देखने को मिलता है। दूरदर्शन की निरन्तर बढ़ती हुईलोकप्रियता का कारण यह है कि इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग, आयु और व्यवसाय के अनुरूप अनेक कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी रुचि और आवश्यकता होती है और दूरदर्शन ही एक ऐसा साधन है जो प्रातः से अर्द्धरात्रि तक अपने कार्यक्रमों के माध्यम से सभी की जरूरतें पूरी करता है। बच्चों, किशोर, प्रौढ़, बुजुर्ग और महिलाओं के लिए अलग – अलग कार्यक्रम हैं। इसी प्रकार भिन्न व्यवसाय एवं रुचि वाले लोगों की भी मनोरंजन – तृप्ति दूरदर्शन से ही होती है।

विभिन्न वर्गों के लिए लाभप्रद बच्चों के लिए कार्टून फिल्में, किशोरों के लिए प्रश्न – मंच आदि कार्यक्रम। छात्रों के लिए यू.जी.सी. तथा इन्दिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय के शैक्षिक कार्यक्रम, विज्ञान, इतिहास, राजनीति से सम्बन्धित कार्यक्रम। देश – विदेश में खेले जा रहे अनेक प्रकार की खेल प्रतियोगिताओं का जीवन्त प्रसारण। गीत, नृत्य या फिल्मी संगीत में रुचि रखने वालों के लिए कार्यक्रम। साहित्यिक रुचि वालों के लिए मुशायरा, कवि सम्मेलन, साहित्यकारों का परिचय – परिचर्चा का प्रसारण। महिलाओं की प्रगति एवं जागृति के अनेक कार्यक्रम। ग्रामीण से लेकर शहरी महिलाओं के लिए अनेकानेक प्रकार के हस्तशिल्प उद्योग – धन्धों की जानकारी। भोजन या विविध व्यंजनों को बनाने की विधियों पर आधारित कई कार्यक्रम, घरेलू दवाओं, नुस्खों का ज्ञान। बुजुर्गों के लिए धार्मिक सन्त महात्माओं के प्रवचन। आप घर बैठे सत्संग का लाभ उठा सकते हैं।

राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए तो दूरदर्शन जीवन का एक आवश्यक अंग बन गया है। देश – विदेश की खबरें, चुनाव – चर्चा, सभी पार्टियों का आँकलन, क्रिया – कलाप और समस्त राजनैतिक व्यक्तियों की समग्र जानकारी हमें दूरदर्शन से प्राप्त होती है।

कहा जाता है कि केवल सुनकर बात हृदयंगम नहीं होती। यदि वह दिखायी दे तो सहजता से ग्रहण होती है। अतः छात्रों को यदि दूरदर्शन के माध्यम से शिक्षा दी जाय तो अधिक लाभ होगा। शासन यदि अधिक से अधिक शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण करे।

विभिन्न प्रकार की मौसम सम्बन्धी जानकारी हमें प्राप्त होती है। आँधी, तूफान, वर्षा, भूकम्प आदि से सम्बन्धित पूर्व सूचनाएँ हमें दूरदर्शन से मिलती हैं।

मनोरंजन का सुलभ साधन – यह मनोरंजन का सबसे सस्ता एवं सुविधाजनक उपकरण है। अफगान – अमेरिका का युद्ध हो या जापान की जीवन झाँकी, आस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच हो या ओलम्पिक.देश में गणतन्त्र दिवस की परेड हो या चुनाव की हलचल सभी कुछ दूरदर्शन पर देखना सुलभ हैं। दूरदर्शन में विज्ञापनों के माध्यम से हमें अनेकानेक नवीन उपकरणों और वस्तुओं के आविष्कार की जानकारी मिलती है। यह विज्ञान का सशक्त जरिया है। इससे व्यापार बढ़ाने के अवसर मिलते हैं।

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भावात्मक एकता का पोषक – दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों से सामाजिक सुधार को दिशा मिलती है। सभी धर्मों के त्यौहारों का सजीव दृश्य हम दूरदर्शन के माध्यम से देखकर जानकारी प्राप्त करते हैं.इससे भावनात्मक एकता सुदृढ़ होती है। कई कार्यक्रम तो इतने लोकप्रिय हुए कि सभी धर्म,जाति तथा उम्र के लोग उसे बड़े चाव से देखते थे; जैसे – रामायण, श्रीकृष्ण, महाभारत, टीपू सुल्तान आदि। इनके प्रसारण के समय शहर सुनसान हो जाता था। आज का किशोर दूरदर्शन के कार्यक्रमों को देखने में व्यस्त हो जाता है तो समाज में अपराध और लड़ाई – झगड़े कम होते हैं। किसी वस्तु को हम पूरी तरह से अच्छा या बुरा नहीं कह सकते। हम उसका उपयोग किस प्रकार करते हैं उस पर उसकी महत्ता निर्भर करती है। दूरदर्शन से जहाँ अनेक लाभ हैं वहाँ कुछ हानि भी हैं। किन्तु यदि छात्र यह बात ध्यान में रखें कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’। यानि हर समय दूरदर्शन के सामने न बैठे रहें,उससे आँखों पर तो बुरा प्रभाव पड़ता है,साथ ही समय भी नष्ट होता है और अनेक जरूरी काम रह जाते हैं। इसलिए वे अपनी रुचि और उपयोगिता के अनुसार कुछ कार्यक्रम पसन्द कर लें और केवल उन्हीं को देखें। विज्ञान तथा सामान्य ज्ञान के प्रश्न मंच तथा परिचर्चा देखें। शैक्षिक प्रसारण से लाभ लें।

उपसंहार – यदि दूरदर्शन पर स्वस्थ,शालीन कार्यक्रमों का प्रसारण हो तो ऐसे उपयोगी ज्ञानवर्द्धक सूचनाओं से गुणात्मक विकास होगा। विवेक और संयम से तथा अभिभावकों की अनुमति तथा सलाह से यदि छात्र दूरदर्शन का उपयोग करेंगे तो वह उनकी जीवन की प्रगति में सहायक होगा।

8. भारत में प्रजातन्त्र का भविष्य

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) प्राचीन शासन – व्यवस्था,
(3) प्रजातन्त्र का स्वरूप,
(4) भारत में प्रजातान्त्रिक शासन,
(5) प्रजातन्त्र के क्रियान्वयन की अपेक्षाएँ,
(6) उपसंहार।

प्रस्तावना – भारत की सभ्यता अत्यन्त प्राचीन एवं समृद्ध है। इसके इतिहास को पढ़ने से यह ज्ञात होता है कि यहाँ के शासनतन्त्र में अनेक उतार – चढ़ाव रहे हैं। लेकिन अधिकांशतः यहाँ राजतन्त्र शासन प्रणाली ही प्रचलित रही है। परन्तु प्राचीन भारत के राजा सार्वभौम शक्ति – सम्पन्न होते हुए भी निरंकुश और तानाशाह नहीं होते थे।

प्राचीन शासन – व्यवस्था – मध्यकाल के कुछ भारतीय राज्यों में गणतन्त्र शासन – व्यवस्था भी थी,जिन्हें हम नगर राज्य भी कह सकते हैं। लेकिन राजतन्त्र की विशाल शक्ति के समक्ष यह शासन – व्यवस्था अधिक टिक न सकी। राजाओं का कार्य विलासमय जीवन के अतिरिक्त कुछ न था। विदेशियों का शासन अत्यन्त क्रूर और अत्याचारी था। प्रजा इन अत्याचारों को सहन न कर सकी। उसने ऐसे शासकों का विरोध किया। परिणामस्वरूप राजा और प्रजा में संघर्ष प्रारम्भ हो गया। इसी का परिणाम प्रजातन्त्र के रूप में अवलोकनीय है।

प्रजातन्त्र का स्वरूप – प्रजातन्त्र की अनेक परिभाषाएँ विद्वानों ने दी हैं, पर प्रजातन्त्र का सीधा – सादा अर्थ किसी व्यक्ति विशेष का शासन न होकर प्रजा के शासन से है। इस शासन – तन्त्र में जनता के ही निर्वाचित प्रतिनिधियों का हाथ रहता है। प्रजातन्त्र के सम्बन्ध में जॉन स्टुअर्ट मिल का कथन है – “प्रजातन्त्र जनसाधारण को नागरिकता की शिक्षा प्रदान करता है। यह नागरिकता का शिक्षणार्थ सर्वश्रेष्ठ विद्यालय है।” प्रजातन्त्र की सबसे अधिक व्यवस्थित, स्पष्ट और लघु परिभाषा अमरीका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने इस प्रकार की है – “प्रजातन्त्र एक ऐसा शासन है जो जनता के लिए,जनता द्वारा,जनता पर किया जाता है।”

भारत में प्रजातान्त्रिक शासन – भारत अपनी दीर्घकालीन पराधीनता के पश्चात 15 अगस्त, सन् 1947 को स्वतन्त्र हुआ। अनेक वर्षों तक उसे विदेशी शासकों की कठोर – यातनाएँ सहन करनी पड़ी। स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए भारत को कठोर संघर्ष करना पड़ा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हमने अपना संविधान बनाया,जो 26 जनवरी, 1950 से लागू किया गया। इस संविधान द्वारा भारत में जनता का शासन स्थापित किया गया।

प्रजातन्त्र की सफलता उस राष्ट्र में निवास करने वाले नागरिकों में निहित होती है। भारत विश्व का सबसे अधिक विलक्षण देश है। यहाँ अनेक धर्म, जातियाँ, संस्कृतियाँ, सम्प्रदाय और राजनीतिक दल हैं। इन सभी को सन्तुष्ट करना सम्भव नहीं हो सकता। इन सभी के बीच भारत के प्रजातन्त्र का स्वरूप अस्थिर हो गया। विघटनकारी तत्त्वों के नारों और भाषणों से यहाँ की जन – भावनाओं को विपरीत दिशा में मोड़ने का कार्य प्रारम्भ कर दिया है। लूट – खसोट,तोड़ – फोड़, घिराव,आन्दोलन,हड़ताल आदि का बोलबाला हो गया है। समस्त जनजीवन त्रस्त और भयभीत है। असुरक्षा और अव्यवस्था ने देश के प्रजातन्त्र की नींव को हिला दिया है। महँगाई, कालाबाजारी,जमाखोरी,तस्करी आदि कुप्रवृत्तियों से अर्थव्यवस्था का ढाँचा नष्ट हो रहा है। ऐसी विषम स्थिति में देश तथा लोकतन्त्र को बचाने का गुरुतर दायित्व हमारी नयी पीढ़ी पर है।

प्रजातन्त्र के क्रियान्वयन की अपेक्षाएँ – एक सफल प्रजातन्त्र के लिए कुछ आवश्यक शर्ते हैं जो प्रजातन्त्र के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक हैं। उसके लिए सर्वप्रथम जनता का शिक्षित होना अनिवार्य है। शिक्षित जनता ही प्रजातन्त्र के उद्देश्य को समझ सकती है। इसके लिए शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार होना चाहिए ताकि निर्वाचित व्यक्ति शासकीय गतिविधियों को भली – भाँति समझ सके और उनके अनुकूल आचरण कर सके तथा जनता भी योग्य व्यक्तियों का चुनाव कर सके।

निष्पक्ष मतदान प्रजातन्त्र के भविष्य के लिए अनिवार्य शर्त है। मतदान ही निर्वाचन का आधार होता है। आज भारत ही नहीं अपितु संसार में सबसे अधिक संख्या साधारण व्यक्तियों की है। ये व्यक्ति या तो कम पढ़े – लिखे हैं या बिल्कुल पढ़े – लिखे नहीं हैं। इनमें विचारशीलता का अभाव है। इनको किसी भी बहाने से फुसलाया जा सकता है। प्रायः धनवान व्यक्ति ऐसे व्यक्तियों से धनादि का लोभ देकर मत प्राप्त कर लेते हैं। इतना ही नहीं कहीं – कहीं तो निर्वाचन में गड़बड़ी,जाली और जबर्दस्ती मत डलवा कर भी लोग चुनाव जीत जाते हैं।

गरीबी, पिछड़ापन, अन्धविश्वास और जातिगत भावना भी प्रजातन्त्र में बाधक होती है। बहुत – से व्यक्ति जातीय आधार पर निर्वाचित कर लिये जाते हैं जबकि उनमें कोई योग्यता नहीं होती। राजनीति में गुण्डागर्दी का बोलबाला है, अतः अधिकांश व्यक्ति निर्वाचन में रुचि नहीं लेते हैं। वे केवल अपना कर्त्तव्य पूर्ण करने के लिए किसी न किसी बक्से में अपना मत डाल आते हैं। गरीब व्यक्ति को जब कोई प्रत्याशी मोटर में बिठाकर मत डालने ले जाता है तो वह उसी को मत डाल देता है। इससे योग्य व्यक्ति का चयन नहीं हो पाता। इसके लिए मताधिकार के नियमों में परिवर्तन की आवश्यकता है।

विरोधी दलों की संख्या अधिक होने से भी प्रजातन्त्र का सही क्रियान्वयन नहीं हो पाता। विरोधी दल अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति न होने पर सत्ताधारी दल की आलोचना करता है और अपने दल के सिद्धान्तों को सरकार पर थोपने के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग करता है। इससे प्रजातन्त्र खतरे में पड़ जाता है। दूसरी ओर सत्ताधारी दल अपनी शक्ति के बल पर विपक्ष की उपेक्षा करता है और अपने स्वार्थ को वरीयता देकर प्रस्तावों को भी पारित करता है। इससे देश की सृजन शक्ति का क्षय होता है। अतः प्रजातन्त्र के लिए यह आवश्यक है कि सत्ताधारी दल प्रत्येक निर्णय पर विरोधी दलों के देशहित के सुझावों पर विचार करे और उचित होने पर उन्हें क्रियान्वित करे।

नागरिकता की भावना का विकास करना भी प्रजातन्त्र के भविष्य के लिए आवश्यक है। प्रत्येक भारतीय को सच्चा नागरिक बनाने के लिए उसे नागरिकता की शिक्षा देना आवश्यक है।

आज स्थिति यह है कि देश का नागरिक अपने व्यक्तिगत हित के लिए देश.समाज और जाति के हितों की उपेक्षा कर सकता है। इस अनर्थ से बचने के लिए प्रत्येक देशवासी को नागरिकता की शिक्षा देना आवश्यक है। अगर स्वतन्त्र होकर भी हमारे देशवासी सच्चे नागरिक नहीं बन पाये,तो प्रजातन्त्र की कल्पना स्वप्नवत् होगी।

राष्ट्रीय चरित्र का विकास भी प्रजातन्त्र का आधार है। किसी भी राष्ट्र की नींव उसके राष्ट्रवासियों के चरित्र पर आधारित है। जिस राष्ट्र के नागरिकों का चरित्र जितना उन्नत होगा उस देश का भविष्य उतना ही महान् होगा। प्रजातन्त्र के क्रियान्वयन में राष्ट्र के चरित्र की रक्षा आवश्यक है। चरित्र से नैतिकता का विकास होता है और नैतिकता प्रजातन्त्र की रक्षा कर उसे सफल बनाती है। राष्ट्रीय चरित्र ही राष्ट्र के गौरव में वृद्धि करता है। भारत आज अपने राष्ट्रीय चरित्र के नाम पर विश्व के समक्ष अपना मस्तक उठाये हुए है।

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हमारे देश में प्रजातन्त्र का भविष्य पूर्णरूपेण सुरक्षित है। वस्तुतः प्रजातान्त्रिक प्रणाली भारत के लिए सर्वथा उपयुक्त है। आज भारतीय प्रजातन्त्र जिस आदर्श को लेकर चल रहा है वह भारत के लिए नहीं अपितु विश्व की चिरस्थायी शान्ति और व्यवस्था का आदर्श है। भारत की पंचशील आदि विश्व शान्ति की नीतियों ने तृतीय विश्वयुद्ध की सम्भावनाओं को धूमिल बना दिया है।

उपसंहार – इस प्रकार भारत ने आज जिन विरोधी शक्तियों और परिस्थितियों के बीच प्रजातान्त्रिक प्रणाली की रक्षा करते हुए जो उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं उनसे स्पष्ट है कि भारत में प्रजातन्त्र का भविष्य उज्ज्वल है। भारत ने सामाजिक, आर्थिक, औद्योगिक, कृषि, चिकित्सा एवं विज्ञान आदि के क्षेत्र में जो प्रगति की है,वह इसके प्रजातन्त्र को सफलता का ज्वलन्त प्रमाण है। भारत ने संसार में प्रजातन्त्र का आदर्श रूप प्रस्तुत किया है, जो उसके स्वर्णिम भविष्य का प्रतीक है। अत: देश में जब प्रजातन्त्र का आदर्श स्वरूप स्थापित हो जाएगा तो भारत को हम नीति और आदर्श में पुनः जगद्गुरु की संज्ञा से विभूषित कर सकेंगे।

9. प्रदूषण : कारण और निदान [2009, 11]
अथवा
पर्यावरण प्रदूषण : समस्या और निदान [2013]

“साँस लेना भी अब मुश्किल हो गया है।
वातावरण इतना प्रदूषित हो गया है।”

विस्तृत रूपरेखा –
(1) प्रस्तावना,
(2) प्रदूषण के विभिन्न प्रकार,
(3) प्रदूषण की समस्या का समाधान,
(4) उपसंहार [2014]

प्रस्तावना – प्रदूषण का अर्थ – प्रदूषण पर्यावरण में फैलकर उसे प्रदूषित बनाता है और इसका प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर उल्टा पड़ता है। इसलिए हमारे आस – पास की बाहरी परिस्थितियाँ जिनमें वायु, जल, भोजन और सामाजिक परिस्थितियाँ आती हैं; वे हमारे ऊपर अपना प्रभाव डालती हैं। प्रदूषण एक अवांछनीय परिवर्तन है; जो वायु, जल, भोजन, स्थल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों पर विरोधी प्रभाव डालकर उनको मनुष्य व अन्य प्राणियों के लिए हानिकारक एवं अनुपयोगी बना डालता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवधारियों के समग्र विकास के लिए और जीवनक्रम को व्यवस्थित करने के लिए वातावरण को शुद्ध बनाये रखना परम आवश्यक है। इस शुद्ध और सन्तुलित वातावरण में उपर्युक्त घटकों की मात्रा निश्चित होनी चाहिए। अगर यह जल, वायु, भोजनादि तथा सामाजिक परिस्थितियाँ अपने असन्तुलित रूप में होती हैं; अथवा उनकी मात्रा कम या अधिक हो जाती है,तो वातावरण प्रदूषित हो जाता है तथा जीवधारियों के लिए किसी न किसी रूप में हानिकारक होता है। इसे ही प्रदूषण कहते हैं।

प्रदूषण के विभिन्न प्रकार – प्रदूषण निम्नलिखित रूप में अपना प्रभाव दिखाते हैं –

(1) वायु प्रदूषण – वायुमण्डल में गैस एक निश्चित अनुपात में मिश्रित होती है और जीवधारी अपनी क्रियाओं तथा साँस के द्वारा ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का सन्तुलन बनाये रखते हैं। परन्तु आज मनुष्य अज्ञानवश आवश्यकता के नाम पर इन सभी गैसों के सन्तुलन को नष्ट कर रहा है। आवश्यकता दिखाकर वह वनों को काटता है जिससे वातावरण में ऑक्सीजन कम होती है, मिलों की चिमनियों के धुएँ से निकलने वाली कार्बन डाइ ऑक्साइड,क्लोराइड,सल्फर डाइ – ऑक्साइड आदि भिन्न – भिन्न गैसें वातावरण में बढ़ जाती हैं। वे विभिन्न प्रकार के प्रभाव मानव शरीर पर ही नहीं वस्त्र, धातुओं तथा इमारतों तक पर डालती हैं।

यह प्रदूषण फेफड़ों में कैंसर, अस्थमा तथा नाड़ीमण्डल के रोग, हृदय सम्बन्धी रोग, आँखों के रोग, एक्जिमा तथा मुहासे इत्यादि रोग फैलाता है।

(2) जल – प्रदूषण – जल के बिना कोई भी जीवधारी,पेड़ – पौधे जीवित नहीं रह सकते। इस जल में भिन्न – भिन्न खनिज तत्व, कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ तथा गैसें घुली रहती हैं, जो एक विशेष अनुपात में होती हैं, तो वे सभी के लिए लाभकारी होती हैं। लेकिन जब इनकी मात्रा अनुपात से अधिक हो जाती है; तो जल प्रदूषित हो जाता है और हानिकारक बन जाता है। जल के प्रदूषण के कारण अनेक रोग पैदा करने वाले जीवाणु, वायरस, औद्योगिक संस्थानों से निकले पदार्थ, कार्बनिक पदार्थ, रासायनिक पदार्थ, खाद आदि हैं। सीवेज को जलाशय में डालकर उपस्थित जीवाणु कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीकरण करके ऑक्सीजन का उपयोग कर लेते हैं जिससे ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और उन जलाशयों में मौजूद मछली आदि जीव मरने लगते हैं। ऐसे प्रदूषित जल से टॉयफाइड,पेचिस,पीलिया,मलेरिया इत्यादि अनेक रोग फैल जाते हैं। हमारे देश के अनेक शहरों को पेयजल निकटवर्ती नदियों से पहुँचाया जाता है और उसी नदी में आकर शहर के गन्दे नाले, कारखानों का बेकार पदार्थ, कचरा आदि डाला जाता है, जो पूर्णतः उन नदियों के जल को प्रदूषित बना देता है।

(3) रेडियोधर्मी प्रदूषण – परमाणु शक्ति उत्पादन केन्द्रों और परमाणु परीक्षणों से जल, वायु तथा पृथ्वी का सम्पूर्ण पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है और वह वर्तमान पीढ़ी को ही नहीं, बल्कि भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए भी हानिकारक सिद्ध हुआ है। इससे धातुएँ पिघल जाती हैं और वह वायु में फैलकर उसके झोंकों के साथ सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो जाते हैं तथा भिन्न – भिन्न रोगों से लोगों को ग्रसित बना देती हैं।

(4) ध्वनि प्रदूषण आज ध्वनि प्रदूषण से मनुष्य की सुनने की शक्ति कम हो रही है। उसकी नींद बाधित हो रही है, जिससे नाड़ी संस्थान सम्बन्धी और नींद न आने के रोग उत्पन्न हो रहे हैं। मोटरकार, बस,जैट – विमान, ट्रैक्टर, लाउडस्पीकर, बाजे, सायरन और मशीनें अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण पर्यावरण को प्रदूषित बना रहे हैं। इससे छोटे – छोटे कीटाणु नष्ट हो रहे हैं और बहुत – से पदार्थों का प्राकृतिक स्वरूप भी नष्ट हो रहा है।

(5) रासायनिक प्रदूषण – आज कृषक अपनी कृषि की पैदावार बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के रासायनिक खादों का,कीटनाशक और रोगनाशक दवाइयों का प्रयोग कर रहा है, जिससे वर्षा के समय इन खेतों से बहकर आने वाला जल, नदियों और समुद्रों में पहुँचकर भिन्न – भिन्न जीवों के ऊपर घातक प्रभाव डालता है और उनके शारीरिक विकास पर भी इसका दुष्परिणाम पहुँच रहा है।

प्रदूषण की समस्या का समाधान – आज औद्योगीकरण ने इस प्रदूषण की समस्या को अति गम्भीर बना दिया है। इस औद्योगीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न प्रदूषण को व्यक्तिगत और शासकीय दोनों ही स्तर पर रोकने के प्रयास आवश्यक हैं। भारत सरकार ने सन् 1974 ई. में जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण अधिनियम लागू कर दिया है जिसके अन्तर्गत प्रदूषण को रोकने के लिए अनेक योजनाएँ बनायी गई हैं।

सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय प्रदूषण को रोकने का ढूँढा गया है, वनों का संरक्षण। साथ ही,नये वनों का लगाया जाना तथा उनका विकास करना। जन – सामान्य में वृक्षारोपण की प्रेरणा दिया जाना, इत्यादि प्रदूषण की रोकथाम के सरकारी कदम हैं। इस बढ़ते हुए प्रदूषण के निवारण के लिए सभी लोगों में जागृति पैदा करना भी महत्त्वपूर्ण कदम है; जिससे जानकारी प्राप्त कर उस प्रदूषण को दूर करने के समन्वित प्रयास किये जा सकते हैं।

नगरों, कस्बों और गाँवों में स्वच्छता बनाये रखने के लिए सही प्रयास किये जायें। बढ़ती हुई आबादी के निवास के लिए समुचित और सुनियोजित भवन – निर्माण की योजना प्रस्तावित की जाय। प्राकृतिक संसाधनों का लाभकारी उपयोग करने तथा पर्यावरणीय विशुद्धता बनाये रखने के उपायों की जानकारी विद्यालयों में पाठ्यक्रम के माध्यम से शिक्षार्थियों को दिये जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

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उपसंहार – इस प्रकार सरकारी और गैर – सरकारी संस्थाओं के द्वारा पर्यावरण की विशुद्धि के लिए समन्वित प्रयास किये जायेंगे, तो मानव – समाज (सर्वे सन्तु निरामया) वेद वाक्य की अवधारणा को विकसित करके सभी जीवमात्र के सुख – समृद्धि की कामना कर सकता है।

10. भारत में कृषि का महत्त्व

“कृषि प्रधान इस देश की, कृषि से ही पहचान है।
कृषि कर्म कर कृषक, देश की धरती का वरदान है।”

विस्तृत रूपरेखा –
(1) प्रस्तावना,
(2) कृषि आत्म – निर्भरता का आशय,
(3) देश में कृषि के पिछड़ेपन के कारण,
(4) कृषि विकास के प्रयास,
(5) हरित क्रान्ति के दुष्परिणाम,
(6) उपसंहार

प्रस्तावना – भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि केवल जीविकोपार्जन का साधन ही नहीं अपितु देश की सभी गतिविधियों का केन्द्र – बिन्दु है। यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसका महत्त्व इसलिए अधिक है क्योंकि राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत है। राष्ट्रीय आय में 50% कृषि का भाग है। 80% रोजगार प्राप्त करने का साधन है। अनेक उद्योग – धन्धों का मूलाधार है। देश की सौ करोड़ आबादी के लिए खाद्यान्नों की पूर्ति का साधन है। प्रति वर्ष 400 करोड़ रुपये की आमदनी भू – राजस्व एवं कृषि आय – कर के रूप में प्राप्त होती है। विदेशी व्यापार – आयात में महत्त्वपूर्ण घटक है। पशुपालन व्यवसाय में कृषि का अपूर्व योगदान है। सरकार के बजट पर महत्त्वपूर्ण प्रभावशाली,राजनैतिक स्थिरता और आर्थिक विकास में सहयोग अन्तर्राष्ट्रीय जगत में देश को महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाने में सहायक है।

कृषि आत्म – निर्भरता का आशय – कृषि आत्म – निर्भरता का आशय एक ऐसी स्थिति से है जिसमें कोई देश अपने निवासियों के लिए पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन करने में पूर्णतः सक्षम हो। स्वदेशी कृषि उद्योगों को कच्चा माल अन्य किसी देश से न मँगवाया जाये। कृषि अधिकांश लोगों की जीविका का साधन है। भारत में यह परम्परागत और पिछड़ी स्थिति में है जिसे अब मशीनीकृत के माध्यम से उन्नत बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

देश में कृषि के पिछड़ेपन के कारण भारत में कृषि के पिछड़ेपन के अनेक कारण हैं। कृषि की वर्षा पर निर्भरता। सिंचाई के पर्याप्त साधन का नहीं होना। आधुनिक खाद – बीज, उपकरणों आदि के उपयोग का अभाव। कृषकों की ऋणग्रस्तता और पर्याप्त कृषि साख का उपलब्ध न होना। अविकसित कृषि – भूमि। कृषि के लिए भू – स्वामित्व एवं भू – धारण नियम विधान की कमियाँ। कृषि एवं ग्रामीण विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं का लाभ पूरी तरह कृषकों तक न पहुँच पाना। लाभकारी एवं व्यावसायिक वस्तुओं का कम उत्पादन। विद्युत आपूर्ति की कमी। कृषि उपज से सम्बन्धित उद्योगों का अल्प – विकसित होना। कृषि उपज विपणन में बाधाएँ। जहाँ किसान मण्डी में अपनी उपज बेचने जाते हैं वहाँ उचित ढंग से मूल्य – निर्धारण न होने से भी किसानों को नुकसान होता है। किसानों का निरक्षर और अनपढ़ होना भी सबसे बड़ी कमी है। इन सभी दोषों को दूर करने के तथा कृषि के विकास एवं आधुनिकीकरण के प्रयास देश में काफी तेजी से किये जा रहे हैं।

कृषि विकास के प्रयास – कृषि विकास के लिए भारत में कुछ ठोस कदम उठाये गये हैं। सबसे पहले तो भू – स्वामित्व में सुधार के लिए भारत में जमींदारी – प्रथा समाप्त की गयी। चकबन्दी कार्यक्रम द्वारा भूमि – व्यवस्था में सुधार किया गया। सिंचाई के साधनों का विकास कर सिंचित भूमि के क्षेत्रफल में वृद्धि की गयी। खाद का उपभोग करके भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ायी गयी। उन्नत बीजों और उन्नत किस्म के आधुनिक कृषि उपकरणों का प्रयोग किया जाने लगा। भण्डारण की स्थिति में सुधार किया गया। विपणन सुविधाओं में वृद्धि तथा कृषि उपज को उचित मूल्य में बेचने की सुविधा के लिए मूल्य – निर्धारण पद्धति का आरम्भ किया गया। स्वाधीनता के बाद कृषि में आत्मनिर्भर होने के लिए भूमिहीन किसानों को भूमि का मालिक बनाया गया। पिछड़े और उपेक्षित वर्ग को इसका पर्याप्त लाभ मिला। अब किसान के पास अपनी भूमि होने से वह खाद – बीज तथा उर्वरकों का प्रयोग करने लगा। इस सबके कारण खेतिहर मजदूरों की मजदूरी बढ़ी। 1980 के बाद भारत खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर तो हुआ ही वरन् दाल और तिलहन को छोड़कर खाद्यान्न निर्यात करने की स्थिति में भी सक्षम हो गया है।

हरित – क्रान्ति के दुष्परिणाम – इस हरित – क्रान्ति से लाभ तो हुआ पर उसके कुछ दुष्परिणाम भी हुए; जैसे—धनी किसान और अधिक धनवान हो गया, पर गरीब किसान निर्धन रह गया। कृषि में मशीनों के उपयोग से गाँव में बेरोजगारी बढ़ी। ग्रामीण नगर में आने लगे,वहाँ घनी आबादी के कारण आवास – आपूर्ति, प्रदूषण एवं पर्यावरण पर प्रभाव पड़ा। उत्पादन लागत तो बढ़ी पर किसान को उचित मूल्य नहीं मिला। इससे असन्तोष छा गया।

उपसंहार—समग्र रूपेण कृषि भारत देश के लिए वरदान है। देश का स्वर्णिम भविष्य खेतों तथा खलिहानों में मुस्करा रहा है। देश का किसान उन्नत तथा समृद्ध होगा तो निम्न तराना गजेगा

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।”

11. परोपकार [2017]
अथवा
परहित सरिस,धरम नहिं भाई [2009, 14]

“काँटा चुभा किसी के, तड़फे हम मीर
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।”

विस्तत रूपरेखा –
(1) प्रस्तावना.
(2) धर्म का व्यापक रूप
(3) परोपकार हेत आवश्यक तथ्य,
(4) प्रकृति का उदात्त स्वरूप,
(5) मानव एवं पशु में भेद,
(6) भारतीय संस्कृति का आदर्श,
(7) मानव जीवन का उद्देश्य,
(8) कष्ट सहन करने की क्षमता,
(9) परोपकार के अनेक रूप,
(10) उपसंहार।

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प्रस्तावना – दुनिया में हर इंसान सुख एवं शान्तिपूर्वक जीवन जीना चाहता है। लेकिन मानव शरीर प्राप्त करके उसका जीना ही सार्थक है जो परोपकार की भावना अपने मन – मानस में गहराई से छिपाए हुए हो। गोस्वामी तुलसीदास ने अपने पावन ग्रन्थ ‘रामचरित मानस’ में इसी सत्य का उल्लेख निम्नवत् किया है देखिए

“परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥”

इसका आशय यह है – सर्वोत्तम धर्म परोपकार है एवं सबसे बड़ा पाप दूसरों को पीड़ा पहुँचाना है। परहित के लिए खुद का बलिदान ही भारतीय संस्कृति का लक्ष्य एवं आदर्श है। धर्म का व्यापक रूप – धर्म को यदि हम व्यापक रूप में परिभाषित करें तो यह कर्म की परिधि में ही समाहित है। इस प्रकार जो वर्जित कार्य हैं वे अधर्म ठहराए गए हैं। इसके विपरीत जो करने योग्य कर्म हैं उन्हें धर्म स्वीकारा गया है। अतः हमारा यह दृढ़ नियम होना चाहिए कि जहाँ तक हो सकेगा हम परहित भावना से निरन्तर जुड़े रहें।

परोपकार हेतु आवश्यक तथ्य – परोपकार के लिए सबसे आवश्यक बात यह है कि मनुष्य को उदार मन होना चाहिए। स्वार्थ का नामोनिशान भी मन में नहीं होना चाहिए। स्वार्थ एवं परोपकार दोनों एक – दूसरे के विपरीत हैं। स्वार्थी इंसान कभी भी परोपकारी प्रमाणित नहीं हो सकता। आज मानव कर्म क्षेत्र में कूदने से पूर्व ही लाभ को अपनी दृष्टि में संजो लेता है। यदि लाभ मिलता है तो वह आगे बढ़ता है, इसके विपरीत हानि की आशंका मात्र से उसके कदम रुक जाते हैं। . परोपकार में जुटा रहना कोई खेल नहीं है। इसके लिए दधीचि के सदृश दृढ़ एवं स्वयं के बलिदान होने की क्षमता होनी चाहिए। बाज के हमले से डरा हुआ कबूतर,शरण पाने की कामना से राजा शिवि की गोद में आ बैठा। इसी बीच बाज भी वहाँ आ गया तथा राजा से कपोत की माँग दुहराने लगा। शिवि ने कबूतर के बराबर माँस अपने शरीर से काटकर बाज को दे दिया। यही बात मैथिलीशरण की निम्न पंक्तियों में अवलोकनीय है

“निज हेतु बरसता नहीं व्योम से पानी।
हम हों समष्टि के लिए व्यष्टि बलिदानी।”

प्रकृति का उदात्त स्वरूप प्रकृति निरन्तर परोपकार में निरत है। सरिताएँ सुबह से शाम तक अथाह जल – समूह को धारण करके निरन्तर प्रवाहित होती रहती हैं। उनका एकमात्र ध्येय धरती की प्यास को बुझाकर दूसरों का हित करना है। वृक्ष रात – दिन,आँधी,तूफान तथा झंझावातों की मार सहकर भी अपने स्थान पर अडिग खड़े रहते हैं।

उनकी यह इच्छा रहती है कि हारे – थके राहगीर आकर उनकी छाया में घड़ी भर विश्राम तथा शान्ति का अनुभव कर सकें। भूख से व्याकुल होने पर मधुर फलों का रसास्वादन भी करें।

मानव एवं पशु में भेद – पशु भी हमारी तरह अपने दैनिक क्रिया – कलापों में जुटे रहते हैं। दोनों के मध्य भेद इस आधार पर किया जा सकता है कि मानव के मन – मानस में परोपकार की भावना विद्यमान रहती है, वहीं पशु इस भावना से कोसों दूर होते हैं। पशुओं के सारे काम स्वयं के हित के लिए होते हैं। गाय अथवा कुत्ते की सन्तान जरा से भोजन के लिए आपस में लड़ने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं। उनके अन्तस में मात्र अपना स्वार्थ ही समाया रहता है। यह प्रश्न विचारणीय है कि यदि मानव भी पशु की तरह जंगली तथा असभ्य व्यवहार करने लगे तो समाज का कितना अहित होगा, यह सोचकर ही मन प्रकम्पित हो जाता है।

भारतीय संस्कृति का आदर्श – भारतीय संस्कृति के मूल में मानव कल्याण की भावना कूट – कूट कर भरी हुई है। इस धरती पर समस्त कार्य स्वयं की संकुचित भावना से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानव समाज की भलाई के लिए सम्पादित किए जाते हैं। हमारा लक्ष्य निम्नवत् अवलोकनीय है

“सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्॥”

अर्थात् सभी सुखी हों,सब निरोग हों, कोई भी दुःख का भागी न हो।
इस प्रकार के उच्चादर्श हमारे देश में सदैव से ही पल्लवित एवं साकार होते रहे हैं। मानव जीवन का उद्देश्य मानव जीवन का उद्देश्य मात्र भोग एवं खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ तक ही सीमित नहीं है। जीवन को सफल बनाने के लिए परमात्मा का सुमिरन तथा भजन करना परमावश्यक है।

कष्ट सहन करने की क्षमता – परोपकारी मनुष्य में कष्ट सहन करने की क्षमता होनी चाहिए। जो मनुष्य जरा – सी तकलीफ में कराहने लगता है तथा जीवन को बोझ समझ बैठता है भला वह परोपकार की डगर पर किस प्रकार कदम बढ़ा सकता है? उसे वृक्षों की भाँति सर्वस्व बलिदान करने के लिए सर्वथा उद्यत रहना चाहिए। देखिए, वृक्षों की त्याग एवं बलिदान की भावना

“तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पानि।
कह रहीम परकाज हित, सम्पत्ति संचय सुजान।”

परोपकार के अनेक रूप – परोपकार का क्षेत्र अति व्यापक है। किसी भी क्षेत्र में इस भावना का प्रदर्शन किया जा सकता है। पड़ोस में रुग्ण बीमार व्यक्ति को चिकित्सालय पहुँचाना, भटके हुए राहगीर को राह बतलाना, अंधे तथा लाचार मानव की सहायता करना, निर्धन को आर्थिक सहायता देना, विकलांग को सहारा देना तथा गिरते हुए को उठाना आदि अनेक ऐसे कार्य हैं जिनको सम्पादित करके मानव आत्मिक सुख तथा शान्ति का अनुभव कर सकता है।

उपसंहार विश्व के सभी धर्मों के अन्तर्गत परोपकार की महिमा को उजागर किया गया है। धर्म के समस्त गुण परोपकार की परिधि में समाहित हैं। परोपकार करने के लिए असीम धैर्य, त्याग, तपस्या तथा बलिदान की परमावश्यकता है। भारत तो दया तथा परहिताय भावना का प्राचीन काल से ही प्रबल पक्षधर रहा है। अतः आइए हम सब भी इस पुनीत भाव को हृदय में धारण करके मानव की सेवा तथा भलाई का व्रत लें तभी सच्चे सुख एवं शान्ति की अनुभूति सम्भव है।

12 विज्ञान : वरदान या अभिशाप [2009]
अथवा
विज्ञान : विकास या विनाश
अथवा
भारत में विज्ञान के बढ़ते चरण [2009]

“शूल को इतना सहो जो फूल बनकर खिल उठे,
और दिल को स्नेह दो इतना कि दीपक जल उठे
प्यार हर इंसान को इतना लुटा दो आज तुम।
आदमी भगवान, मन्दिर आज बन हर दिल उठे।”

विस्तृत रूपरेखा –
(1) प्रस्तावना,
(2) विज्ञान की देन,
(3) चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान की देन,
(4) कृषि के क्षेत्र में,
(5) मनोरंजन के साधन,
(6) अभिशाप,
(7) उपसंहार। [2014]

प्रस्तावना किसी वस्तु विशेष के एक पक्ष को जब हम देखते हैं तो उसके अन्तर्गत बसन्त कलित क्रीड़ा करता हुआ दृष्टिगोचर होता है लेकिन जब उसके दूसरे पक्ष को देखते हैं तो उसमें अभिशापों की काली छाया मँडराती रहती है। जब हम किसी वस्तु को प्रयोग की कसौटी पर कसते हैं तभी उसके स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। वैसे विष प्राणघातक होता है, लेकिन जब कोई चिकित्सक उसका शोधन करके औषधि के रूप में प्रयोग करता है तब वही विष प्राणदायक संजीवनी का काम करता है। इस प्रकार हम विष पर दोषारोपण नहीं कर सकते हैं। ज्ञान का प्रयोग ही उसके परिणाम का उद्घोषक होता है। विज्ञान को भी हम एक विशिष्ट विज्ञान के अन्तर्गत स्वीकारते हैं। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि चाहे हम विज्ञान को विनाशकारी रूप दें अथवा मंगलकारी भव्य रूप प्रदत्त करें।

विज्ञान की देन – विज्ञान ने मानव को जो सुख,मनोरंजन तथा अन्य साधन प्रदत्त किए हैं वे अनगिनत हैं। गर्मी एवं शीत दोनों पर विज्ञान का आधिपत्य है। आज ग्रीष्म ऋतु शीत तथा शीत ऋतु में गर्मी का भरपूर आनन्द ग्रहण किया जा सकता है। रेल,वायुयान,स्कूटर,मोटर कार तथा अन्य शीघ्रगामी साधनों के फलस्वरूप यात्रा बहुत ही सुगम तथा आरामदायक हो गयी है।

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चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान की देन – आज चिकित्सा के क्षेत्र में भी विज्ञान की अभूतपूर्वक देन है। शल्य चिकित्सा, एक्स – रे तथा हृदय प्रत्यारोपण इस बात के ज्वलन्त प्रमाण हैं। प्लास्टिक सर्जरी एवं कृत्रिम अंगों का प्रत्यारोपण भी आज सफलतापूर्वक किया जा रहा है। असाध्य रोगों पर विज्ञान द्वारा आविष्कृत औषधियाँ मानव को नया जीवन प्रदान कर रही हैं।

कृषि के क्षेत्र में कृषि के क्षेत्र में भी विज्ञान ने नवीनतम आविष्कारों के माध्यम से कृषकों में एक नवीन आशा तथा उत्साह का संचार किया है। विभिन्न प्रकार की रासायनिक खादों से खेतों में आशातीत अन्न उत्पन्न हो रहा है। थेसर, ट्रैक्टर आदि यन्त्रों के माध्यम से खेतों में बोआई,कटाई सुविधापूर्वक एवं कम समय में सम्पन्न हो रही है।

मनोरंजन के साधन – विज्ञान ने आज के मानव को मनोरंजन के साधन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराये हैं। सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन एवं टेप रिकार्डर मनोरंजन के सुलभ तथा मनभावन साधन हैं। आप यदि उदासीन एवं चिन्ताग्रस्त हैं तो सिनेमा हाल में तीन घण्टे बैठकर चिन्ताओं से मुक्त हो सकते हैं। दूरदर्शन के माध्यम से यह आनन्द सपरिवार घर पर कमरे में बैठकर ही ग्रहण किया जा सकता है, साथ ही विश्व में घटित होने वाली घटनाओं को भी अपने नेत्रों में साक्षात् निहार सकते हैं।

अभिशाप – हर वस्तु के दो पहलू होते हैं। एक ओर जहाँ उसमें वरदानों का जाल बिछा रहता है, वहीं दूसरी ओर अभिशापों की काली छाया भी मँडराती है। विज्ञान द्वारा आविष्कृत, अभिशाप के साधन अनगिनत हैं। उनका दुरुपयोग किया जाए तो मानव सभ्यता एवं संस्कृति धराशायी हो जायेगी। जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी नगर इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं।

हाइड्रोजन बम, एटम बम, न्यूट्रान बम अलमारी में सजाने के लिए नहीं बनाये गये हैं, निश्चित रूप से इनका विस्फोट होगा। विषैली गैसें वातावरण को दूषित तथा विषाक्त बना रही हैं। प्रदूषण तथा शोरगुल भी बढ़ा है। विज्ञान ने मानव के सुख – साधनों में वृद्धि की है, फलतः आज का मानव विलास – प्रिय हो गया है।

उपसंहार – विज्ञान स्वयं में शक्ति नहीं है, वह मानव के हाथ में पड़कर ही शक्ति प्राप्त करता है। इस प्रकार विज्ञान वरदान अथवा अभिशाप कुछ न होकर मानव के उपयोग पर ही आधारित है। विज्ञान पर दोषारोपण करना उसी प्रकार निरर्थक है जिस प्रकार चलनी में दूध दुहना तथा कर्मों को दोष देना। भगवान मानव को सदबुद्धि प्रदान करे जिससे वह विज्ञान को मानव के कल्याण के लिए प्रयुक्त करे। विज्ञान का कल्याणमय स्वरूप विश्व के कल्याण के लिए है और विनाशमय स्वरूप विनाश के लिए। अतः विश्व कल्याण के लिए ही विज्ञान का प्रयोग किया जाना चाहिए।

13. दहेज प्रथा : एक सामाजिक अभिशाप [2013]

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ॥”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) दहेज का आशय एवं स्वरूप,
(3) दहेज प्रथा का आविर्भाव,
(4) दहेज के दुष्परिणाम,
(5) नौजवानों का कर्त्तव्य,
(6) उपसंहार।]

प्रस्तावना – समाज के अन्तर्गत समस्याओं का विकराल जाल फैला हुआ है। ये तुच्छ तथा साधारण समस्याएँ कभी – कभी जी का जंजाल बन जाती हैं। लाड़ – प्यार तथा स्नेह से पालित – पोषित शिशु कभी – कभी बड़ा होकर जिस प्रकार माता – पिता के लिए बोझ बन जाता है तदनुसार ये समस्याएँ भी असाध्य रोग का रूप धारण कर लेती हैं तथा समाज के रूप को विकृत तथा घिनौना बना देती हैं। उन समस्याओं में से एक विकराल समस्या है दहेज प्रथा जो समाज की जड़ों को ही खोखला किए दे रही है। इससे समाज तथा व्यक्तिगत प्रगति पर विराम – सा लग रहा है। अनुराग एवं वात्सल्य का प्रतीक दहेज युग परिवर्तन के साथ खुद भी परिवर्तित होकर विकराल रूप में उपस्थित है।

दहेज का आशय एवं स्वरूप – साधारण रूप में दहेज वह सम्पत्ति है जिसे पिता अपनी बेटी के पाणिग्रहण संस्कार के समय अपनी पुत्री को इच्छानुकूल प्रदान करता है। पुराने समय से ही दहेज प्रथा का प्रचलन चला आ रहा है। इसके अन्तर्गत विवाह के समय कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को आभूषण, वस्त्र एवं रुपये सहर्ष दान रूप में प्रदत्त किए जाते थे परन्तु समय के साथ – साथ यह परम्परा एवं प्रवृत्ति अपरिहार्य तथा आवश्यक बन गई। आज वर पक्ष दहेज के रूप में टी.वी., फ्रिज, स्कूटर एवं कार आदि की नि:संकोच माँग करता है। इनके अभाव में सुशिक्षित एवं योग्य कन्या को मनचाहा जीवन साथी नहीं मिल पाता। इस स्थिति में निर्धन पिता की पुत्री या तो अविवाहित रहकर पिता तथा परिवार के लिए बोझ बन जाती है अथवा बेमेल एवं अयोग्य वर के साथ जीवन जीने के लिए विवश होती है। दहेज की कुप्रथा ने अनेक युवतियों को काल के गाल में ढकेल दिया है। समाचार – पत्र आए दिन इस प्रकार की अवांछनीय घटनाओं से भरे रहते हैं। रावण ने तो मात्र एक सीता का अपहरण करके उसकी जिन्दगी को अभिशप्त, दुःखप्रद तथा आँसुओं की गाथा बनाया था परन्तु दहेज रूपी रावण ने असंख्य कन्याओं के सौभाग्य सिन्दूर को पोंछकर उनकी जिन्दगी को पीड़ाओं की अमर गाथा बना दिया है।

दहेज प्रथा का आविर्भाव यदि इतिहास की धुंधली दूरबीन उठाकर भूतकाल की क्षीण पगडंडी पर दृष्टिपात करते हैं तो यह बात स्पष्ट होती है कि दहेज प्रथा का प्रचलन सामन्ती युग में भी था। सामन्त अपनी बेटियों की शादी में अश्व, आभूषण एवं दास – दासियाँ उपहार अथवा भेंट के रूप में प्रदत्त किया करते थे। शनै – शनैः इस बुरी प्रथा ने सम्पूर्ण समाज को ही अपनी परिधि में समेट लिया। इस कुप्रथा के लिए झूठी शान,रूढ़िवादिता तथा धर्म का अंधानुकरण उत्तरदायी है।

दहेज के दुष्परिणाम दहेज के फलस्वरूप आज सामाजिक वातावरण विषैला, दूषित एवं घृणित हो गया है। अनमेल विवाहों की भरमार है जिसके कारण परिवार एवं घर में प्रतिपल संघर्ष एवं कोहराम मचा रहता है। जिस बहू के घर से दहेज में यथेष्ट धन नहीं दिया जाता, ससुराल में आकर उसे जो पीड़ा एवं ताने मिलते हैं, उसकी कल्पना मात्र से शरीर सिहरने लगता है। कभी कभी उसे ससुराल वालों द्वारा जहर दे दिया जाता है अथवा जलाकर मार दिया जाता है। मनुष्य क्षण भर के लिए यह सोचने के लिए विवश हो जाता है कि आदर्श भारत का जिन्दगी का रथ किस ओर अग्रसर हो रहा है। प्रणय सूत्र में बंधने के पश्चात् जहाँ सम्बन्ध स्नेह, अनुराग एवं भाईचारे के होने चाहिए वहाँ आज कटुता एवं शत्रुता पैर – पसारे हुए है।

नौजवानों का कर्त्तव्य – दहेज प्रथा समस्या का निराकरण समाज एवं सरकार के बूते का कार्य नहीं है। इसके लिए तो युवक एवं युवतियों को स्वयं आगे बढ़कर दहेज न लेने एवं देने की दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिए। मात्र कानून बनाने से इस समस्या का निराकरण नहीं हो सकता। जितने कानून निर्मित किए जा रहे हैं, दहेज लेने एवं देने वाले भी शोध ग्रन्थों की तरह नए – नए उपाय खोजने में सफल हो रहे हैं। इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महिलाओं को इस सन्दर्भ में प्रयास करना चाहिए। इसके लिए एक प्रभावी आन्दोलन भी चलाना चाहिए। सरकार को भी कठोर कानून बनाकर इस बुरी प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। शासन ने सन् 1961 में दहेज विरोधी कानून पारित किया। सन् 1976 में इसमें कुछ संशोधन भी किए गए थे किन्तु फिर भी दहेज पर अंकुश नहीं लग सका। समाज सुधारक भी इस दिशा में पर्याप्त सहयोग दे सकते हैं। दहेज लेने वालों का सामाजिक बहिष्कार आवश्यक है। सहशिक्षा भी दहेज प्रथा को रोकने में सक्षम है। सामाजिक चेतना को जाग्रत करना भी आवश्यक है।

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उपसंहार – विगत अनेक वर्षों से इस बुरी प्रथा को समाप्त करने के लिए भागीरथ प्रयास किया जा रहा है लेकिन दहेज का कैंसर ठीक होने के स्थान पर निरन्तर विकराल रूप धारण करता जा रहा है। इस कुप्रथा का तभी समापन होगा जब वर पक्ष एवं कन्या पक्ष सम्मिलित रूप से इस प्रथा को समाप्त करने में सक्षम होंगे। यदि इस दिशा में जरा भी उपेक्षा अपनायी गयी तो यह ऐसा कोढ़ है जो समाज रूपी शरीर को विकृत एवं दुर्गन्ध से आपूरित कर देगा। समाज एवं शासन दोनों को जोरदार तरीके से दहेज विरोधी अभियान प्रारम्भ करना परमावश्यक है। अब तो एक ही नारा होना चाहिए। “दुल्हन ही दहेज है” यह नारा मात्र कल्पना की भूमि पर विहार करने वाला न होकर समाज की यथार्थ धरती पर स्थित होना चाहिए तभी भारत के कण – कण से सावित्री,सीता एवं गार्गी तुल्य कन्याओं की यह ध्वनि गुंजित होगी।

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।”

14. साहित्य और समाज [2009, 15]
अथवा
साहित्य समाज का दर्पण है

“प्राचीन से अधुनातन समाज में,
जो कुछ होता आया है।
साहित्य समाज का दर्पण है,
प्रतिबिम्बित सबकी छाया है।”

विस्तृत रूपरेखा [2017]
(1) प्रस्तावना,
(2) साहित्य और समाज का सम्बन्ध,
(3) समृद्ध साहित्य उन्नति की आधारशिला,
(4) साहित्य का समाज पर प्रभाव,
(5) उपसंहार।]

प्रस्तावना – साहित्य एवं समाज दोनों अटूट रूप में एक – दूसरे से बँधे हुए हैं। साहित्य समाज में ही पल्लवित, पुष्पित तथा विकसित होता है एवं समाज भी साहित्य के प्रकाश में स्वयं को जीवन्त,ऊर्जा सम्पन्न,गतिमान या सजग बनाता है। समाज मानव सम्बन्धों का ताना – बाना है तथा साहित्यकार उसमें एक अपरिहार्य सूत्र होता है। इस प्रकार साहित्य एवं समाज दोनों की प्रगति एक – दूसरे पर आश्रित है। इन दोनों में से एक का भी पतन दूसरे के विनाश का सूचक होता है। साहित्य का समाज के नव निर्माण में अपूर्व योगदान है। तद्नुरूप समाज के माध्यम से ही साहित्य का पादप विकसित एवं हरा – भरा रहता है।

जीवन को सरस, आनन्दमय तथा सुखमय बनाने के लिए मानव ने साहित्य का निर्माण किया है। मानव की तरह साहित्य भी हित – चिन्तन करता है लेकिन इन दोनों में आकाश – पाताल का अन्तर है। सामान्यतः मानव का हित – चिन्तन संकुचित तथा अपने तक सीमित होता है। परन्तु साहित्य का हित – चिन्तन समस्त मानव जगत की कल्याण भावना से ओत – प्रोत होता है। इसी सत्य को दृष्टि – पथ में रखकर मनीषियों ने ज्ञान – राशि के संचित कोष को साहित्य के नाम से सम्बोधित किया है। कविवर रवीन्द्र के शब्दों में – “साहित्य शब्द से साहित्य शब्द में मिलने (अर्थात् एक साथ होने) का भाव निहारा जा सकता है। वह केवल भाव – भाव का,भाषा – भाषा का, ग्रन्थ – ग्रन्थ का मिलन नहीं है – दूर के साथ निकट का यह अत्यन्त अन्तरंग मिलन भी है, जो साहित्य के अलावा अन्य से सम्भव नहीं है।”

साहित्य और समाज का सम्बन्ध समाज निर्माण के पश्चात् साहित्य की रचना की जाती है। समाज तथा साहित्य एक – दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हैं। समाज के विभिन्न प्रकार के क्रिया – कलापों का साहित्य में चित्रण किया जाता है। साहित्यकार अपने वर्णन – विषयों को समाज के धरातल से ही चयन करता है। साहित्य समाज की विभिन्न प्रवृत्तियों,रुचियों तथा परम्पराओं का विश्लेषण करता है तथा उनको भली प्रकार सुरक्षित रखने तथा सँवारने का भी प्रयास करता है। इसी के अनुरूप समाज भी यथाशक्ति साहित्य को सुरक्षित रखने में तत्पर रहता है। इस प्रकार साहित्य तथा समाज का गहरा तथा अटूट सम्बन्ध है।

समाज की सभ्यता, संस्कृति, आचार – विचार, परम्परा, नैतिकता तथा मानवीय मूल्यों का निर्देशक साहित्य को ठहराया गया है। यदि, हम पुरातन समाज का ज्ञान प्राप्त करना चाहें तो तत्कालीन साहित्य का ही आश्रय लेना पड़ेगा। तत्कालीन समाज का हर्ष – विषाद, उत्थान – पतन, रीति – रिवाज एवं आचार – विचार साहित्य के कलेवर में ही प्रतिबिम्बित होंगे।

समृद्ध साहित्य उन्नति की आधारशिला हजारों साल पहले भारत शिक्षा तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति की चरम सीमा पर विराजमान था। हमारे पूर्वजों के प्रशंसनीय तथा अनुकरणनीय कार्य आज भी हमारे प्रेरणा के स्रोत हैं। कवि वाल्मीकि तथा तुलसी की पावन वाणी जन – जन के मानस में उल्लास – भक्ति तथा ज्ञान की मन्दाकिनी प्रवाहित कर रही है। गोस्वामी तुलसीदास जी का ‘रामचरितमानस’ नामक ग्रन्थ अज्ञान – तिमिर में भटकने वाले कोटि – कोटि प्राणियों के लिए आज भी आकाशदीप की भाँति मार्गदर्शन कर रहा है।

जिस देश तथा जाति के पास जितना समृद्ध तथा उन्नत साहित्य होगा वह जाति उतनी ही समृद्धशाली ठहरायी जायेगी। यदि हमारे पास समृद्ध साहित्य नहीं होता तो हमारे अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो जाता। साहित्य समाज रूपी शरीर में आत्मा की तरह प्रतिष्ठित है। यह समाज की जीवनदायिनी शक्ति के रूप में विराजमान है। इस सन्दर्भ में निम्न कथन दृष्टव्य है

“अन्धकार है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है।
ह देश जहाँ साहित्य नहीं है।”

समाज का साहित्य पर प्रभाव – साहित्य की तरह समाज का भी साहित्य पर प्रभाव पड़ता है। प्राचीन साहित्य के अध्ययन से यह बात ज्ञात होती है कि तत्कालीन समाज में प्रकृति पूजा का विधान था।

सविता,वरुण तथा उषा आदि देवों की पूजा तथा अर्चना का भी प्रचलन था। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। कृषि में गोवंश की उपयोगिता को दृष्टि – पथ में रखकर गायों की माता के समान पूजा की जाती थी। वीरगाथा काल की रचनाओं में श्रृंगार,प्रेम,युद्ध तथा मारकाट के वर्णन हैं। भारत अनेक राज्यों में विभाजित था। शासकों में आपस में हेल – मेल नहीं था। वे आनन्द, विलास तथा मनोरंजन में ही जीवन का सौन्दर्य निहारते थे। रीतिकालीन साहित्य तात्कालिक समाज की प्रवृत्तियों का जीता – जागता दर्पण है। कवि राज्याश्रय में रहकर विलासमय जीवन – यापन कर रहे थे। समाज की ओर से उन्होंने आँख बन्द कर ली थीं। नायिका के नख – शिख वर्णन तक ही उनकी लेखनी सीमित थी। नायिका के सौन्दर्य पर टीका रचकर उसके रूप का बखान करना ही उन्होंने कला का लक्ष्य स्वीकारा था। यद्यपि बिहारी तथा देव आदि कवियों ने भक्तिपरक रचनाओं का निर्माण भी किया, लेकिन अत्यल्प।

साहित्य का समाज पर प्रभाव – समाज को साहित्य प्रेरणा देता है। जो कार्य अस्त्र – शस्त्र नहीं कर पाते वह कार्य साहित्य सुगमतापूर्वक सम्पन्न कर लेता है। बिहारी के मात्र एक दोहे ने विलासिता के सागर में गोते लगाते हुए महाराज जयसिंह को कर्त्तव्य के पथ पर अग्रसर कर दिया। तुलसीदास ने राम को भगवान के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। साहित्य का प्रमुख उद्देश्य है आनन्द प्रदत्त करना तथा समाज का प्रमुख आदर्श है आनन्द की अनवरत खोज। इस तरह दोनों अभिन्न रूप से जुड़े हैं। साहित्य में जब तक विकास होता रहता है तब तक वह जीवित रहता है। विकास गति अवरुद्ध हो जाती है तब उसे मृत साहित्य की संज्ञा दी जाती है। समाज के वातावरण की नींव पर साहित्य का भवन खड़ा किया जाता है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि “साहित्य समाज का दर्पण है।” संसार में जितनी भी क्रान्तियाँ हुईं,वे वहाँ के साहित्यकारों की लेखनी के माध्यम से ही सम्पन्न हुई।

उपसंहार – निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि समाज साहित्य को तथा साहित्य समाज को प्रतिपल प्रभावित करते रहते हैं। उससे अछूता रहना दोनों के लिए असम्भव है। साहित्य समाज की प्रतिध्वनि है। साहित्य की प्रेरणा से समाज का रूप परिवर्तित होता है तथा वह नया कलेवर धारण करता है। साहित्य युग – युगों से समाज – सुधार का प्रबल साधन प्रमाणित हुआ है। साहित्य राष्ट्रीय चेतना के क्षेत्र में ही नहीं वरन् सामाजिक विषमता को समाप्त करने में भी अग्रणी रहा है। साहित्य विगत समय का लेखा – जोखा है। सनातन मूल्यों का पोषक है। वर्सफील्ड के शब्दों में – “साहित्य मानव समाज का मस्तिष्क है।”

साहित्यकार का सबसे पावन कर्त्तव्य है समाज को प्रेरणा देना, नई ऊर्जा शक्ति प्रदान करना तथा जीवन – पथ को आलोकित करना। तभी निम्न स्वर सुनाई पड़ेंगे। देखिए

“जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना।
उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।”

15. जीवन में खेलों का महत्त्व | [2013, 17]

“शक्ति बढ़े फुर्ती लहे, चोट न अधिक पिराय।।
अन्न पचे, चंगा रहे, खेल हैं सदा सहाय ॥”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) विकास का साधन,
(3) खेलों से सामाजिकता की भावना का विकास,
(4) विद्यार्थी जीवन में खेल की आवश्यकता,
(5) मनोरंजन का साधन,
(6) उपसंहार।

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प्रस्तावना जिस प्रकार स्वस्थ शरीर के लिए खाना – पीना आवश्यक है, उसी प्रकार शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए जीवन में खेलों का भी अत्यन्त महत्त्व है। मनुष्य यदि केवल खाता – पीता ही रहे तो वह स्वस्थ नहीं रह सकता, अपितु उस खाये – पिये को पचाने के लिए, अच्छी भूख लगाने के लिए और शरीर के रक्त संचार आदि को उचित रखने के लिए व्यायाम करना अथवा खेलना अत्यन्त आवश्यक है।

विकास का साधन – मनुष्य के सर्वांगीण विकास में खेलों का अत्यन्त महत्त्व है। खेलने से मनुष्य के मन में स्फूर्ति और उत्साह उत्पन्न होता है जिससे जीवन की अनेक चिन्ताओं और तनावों से मुक्ति पाकर उसका मन अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है। इसका प्रभाव मनुष्य के तन और मन पर स्पष्ट रूप से पड़ता है। इससे मनुष्य का मनोबल ऊँचा होता है व उसमें आगे बढ़ने की ललक उत्पन्न होती है। उसके विचारों में निश्चितता और दृढ़ता आती है। इसी के साथ संसार में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए मन में महत्त्वाकांक्षा भी उत्पन्न होती है। आज हमारे देश ने क्रिकेट, कबड्डी,टेनिस आदि खेलों में विश्व में अपना उच्चस्तरीय स्थान बनाया है। देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को देखकर अन्य खिलाड़ियों में भी जोश उत्पन्न होता है तथा खेलों में प्रतिस्पर्धा की भावना से उनका उत्तरोत्तर विकास होता है।

खेलों से सामाजिकता की भावना का विकास – खेल मनुष्य में सामाजिकता की भावना का अभ्युदय करते हैं। उदाहरणतः जब भारत की टीम और पाकिस्तान की टीम साथ – साथ खेल खेलती हैं,तो मन के अन्दर की अलगाव और कटुता की भावना स्वतः ही समाप्त हो जाती है और उनमें परस्पर सौहार्द्र और बन्धुत्व की भावना का विकास होता है।

विद्यार्थी जीवन में खेल की आवश्यकता विद्यार्थी जीवन में खेल की अत्यन्त आवश्यकता है। खेल से विद्यार्थी के मन में स्फूर्ति और ताजगी उत्पन्न होती है। इससे वह अपना अध्ययन कार्य अच्छी तरह करता है। परस्पर खेलों में स्पर्धा होने से उनके तन और मन की’ क्षमता और कुशलता में भी अभिवृद्धि होती है।

मनोरंजन का साधन – दिनभर कोल्हू के बैल की तरह काम करने वाला मानव या शिक्षा के बोझ से दबा हुआ विद्यार्थी शारीरिक और मानसिक श्रम से इतना अधिक श्रान्त हो जाता है कि उसे कुछ मनोरंजन की आवश्यकता होती है। ऐसे में खेल उसका भरपूर मनोरंजन करते हैं। जब खिलाड़ी खेल के मैदान में अपने करतब दिखाते हैं तब दर्शकगण भी उत्साह से आह्लादित हो उठते हैं। वे अपनी थकान, तनाव आदि भूलकर खेलों के आनन्द में डूब जाते हैं।

उपसंहार – इस प्रकार खेल मनुष्य के मन और तन को प्रसन्न तथा स्वस्थ रखते हैं। जीवन में सामाजिकता, मित्रता, भाईचारे आदि की भावना का विकास खेलों से ही होता है। अतः जिस प्रकार जीवन में खाना – पीना, पढ़ना – लिखना आवश्यक है उसी प्रकार तन – मन को स्वस्थ, प्रसन्न
और आह्लादित रखने के लिए खेलों का अत्यन्त महत्त्व है।
अतः यदि हम सब खेलों के महत्त्व को स्वीकार करेंगे तभी खिलाड़ियों के निम्न स्वर ध्वनित होंगे –

“क्या कहूँ कुछ और अब मैं सिर्फ इतना जानता हूँ।
राह पर चलती हमारे साथ ही मंजिल हमारी ॥”

16. आरक्षण नीति

“एक समय जो हितकर होता दूजे समय विनाशक।
आरक्षण का हाल यही है एक समय था रक्षक ॥
लेकिन आज विनाशक बनकर महाकाल बन आया।
योग्य युवा की आशाओं को ग्रास बनाकर खाया।”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) वर्तमान समय में आरक्षण का बिगडता स्वरूप,
(3) वर्तमान समय में आरक्षण की आवश्यकता,
(4) उपसंहार।]

प्रस्तावना – जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ तब देश में अपना संविधान लागू हुआ। उस समय देश में दलित वर्ग की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। उन्हें न तो राजनीति में कोई स्थान प्राप्त था और न समाज में। समाज में तो उन्हें अत्यन्त हेय दृष्टि से देखा जाता था। ऐसी स्थितियों को देखकर उनका उत्थान करने की भावना को दृष्टिपथ में रखते हुए देश के संविधान निर्माताओं ने उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की।

वर्तमान समय में आरक्षण का बिगड़ता स्वरूप – देश के संविधान निर्माताओं ने दलित वर्ग के उत्थान के लिए जिस आरक्षण नीति का सूत्रपात किया,कालान्तर में वही नीति स्वार्थी और भ्रष्टाचारी नेताओं की लिप्सा पूर्ति का साधन बन गई। जातीय आधार पर किए गए आरक्षण के कारण आरक्षण के अन्तर्गत आने वाले समृद्धशाली लोगों ने इसका खूब फायदा उठाया। निर्धन सवर्ण अपने सामने अपने सपनों पर समृद्ध आरक्षित वर्ग का अधिकार देखता रहा। अयोग्य लोग चुन – चुनकर राजकीय सेवाओं में पहुँच गए। योग्य सवर्ण असहाय दृष्टि से केवल देखता ही रह गया। आरक्षण के दानव ने उसका भविष्य निगल लिया। स्वार्थी अयोग्य किन्तु आरक्षित वर्ग में आने वाला धनाढ्य सरकारी खजाने का,जो उस पर लुटाए जा रहे थे,उपभोग करता रहा। निर्धन और योग्य सवर्ण इससे वंचित हुआ, ठगा – सा अपनी जाति को कोसता रहा। काश ! वह भी दलित और पिछड़े वर्ग में पैदा हुआ होता तो सरकार की कृपा उस पर भी होती। इस प्रकार आरक्षण जनहित की भावना को लेकर बनाई गई योजना थी किन्तु इसका स्वरूप बिगड़कर यह जनविनाश की भावना से कार्य करने लगी।

वर्ष 1953 में प्रथम आयोग का गठन किया गया था। इसके अध्यक्ष काका कालेलकर थे। इस आयोग ने अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति के साथ ऐसी जातियों को सूची में रखने का अनुमोदन किया जो सामाजिक,शैक्षिक और सरकारी सेवाओं के क्षेत्र में अत्यन्त पिछड़ी थीं।

तदनन्तर मंडल आयोग का गठन किया गया। इसमें पिछड़ी जातियों को 27% आरक्षण देने की सिफारिश की गई। इसे तत्कालीन प्रधानमन्त्री वी. पी. सिंह ने लागू करने का प्रयास किया। तब इसके विरोध में युवावर्ग ने भयानक रूप धारण कर लिया। कई युवाओं ने आत्मदाह तक करने का प्रयास किया।

वर्तमान समय में आरक्षण की आवश्यकता – देश में जब आरक्षण नीति लागू की गई थी तब से लेकर आज वर्तमान समय में देश की परिस्थितियाँ परिवर्तित हो चुकी हैं। उस समय ज़ातिगत आरक्षण की आवश्यकता थी किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक आधार पर आरक्षण की आवश्यकता है। यद्यपि जब संविधान में आरक्षण की व्यवस्था केवल दस वर्ष तक के लिए की गई थी किन्तु राजनयिकों ने अपनी कुर्सी मजबूत करने के उद्देश्य से इस व्यवस्था को आज आजादी के साठ वर्षों बाद भी कायम रखा है। इससे लाभ कम और हानि अधिक हुई। आज समाज में ऊँच – नीच और भेदभाव की भावना डालने में जातिगत आरक्षण का बहुत बड़ा हाथ है। व्यावहारिक रूप में समाज में अब जातिगत भेदभाव नहीं रह गया है किन्तु आरक्षण का काँटा सवर्णों के हृदय को निरन्तर वेधता रहता है। इसी कारण आरक्षित वर्ग आज उनकी ईर्ष्या और द्वेष का शिकार हो जाता है।

उपसंहार यदि कोई समस्या होती है तो उसका समाधान भी अवश्य है। आरक्षण की समस्या का समाधान है कि संविधान में संशोधन करके आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की जाए। जातिगत आरक्षण समाप्त कर दिया जाए। इससे एक तो समाज से परस्पर वैमनस्य की भावना दूर होगी। दूसरे योग्य और निर्धन सवर्ण बेरोजगारों को भी सरकारी सेवा में आने का उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होगा। देश की कुंठित और अवसादग्रस्त प्रतिभाएँ फिर से प्रस्फुटित होंगी और देश अयोग्यों के हाथ की कठपुतली बनने से बच जाएगा। तभी देश का वास्तविक रूप से विकास भी होगा। देश का विकास युवाओं की उन्नति और विकास पर ही निर्भर है अतः तब खुला आसमान सबके लिए बिना किसी पक्षपात की भावना के उपलब्ध हो सकेगा।

17. शिक्षित बेरोजगारी की समस्या

“पढ़ा लिखा है युवा, नौकरी नहीं देश में।
जीवन गुजर रहा मर्मान्तक पीड़ा में।
अब आशा की किरण दिखाए कौन कहाँ से।
बड़े – बड़े नेता रहते अपनी ही दुनिया में ॥”

विस्तृत रूपरेखा [2015] –
(1) प्रस्तावना,
(2) शिक्षित बेरोजगारी के प्रमुख कारण – धन सम्बन्धी समस्या, धर्म की समस्या, राजनीतिक समस्या, दोषपूर्ण – शिक्षा पद्धति,
(3) उपसंहार।

प्रस्तावना – आज हमारे देश में बेरोजगारी एक ज्वलंत समस्या के रूप में उभर कर देश के युवा भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। पढ़े – लिखे युवा दर – दर भटक रहे हैं। भिक्षा की भाँति नौकरी माँग रहे हैं किन्तु शासन आँख और कान बन्द करके अन्धे और बहरे की भाँति सब अनदेखा और अनसुना कर रहा है। बड़े – बड़े पूंजीपतियों को भी युवारक्त को चूसने की आदत पड़ गई है। वह नौकरी देते हैं तो इतने कम पैसों पर कि महीने का वेतन चार दिन भी कठिनाई से चल पाता है। युवा प्रातः से सायं तक जी तोड़ परिश्रम करता है,ऊपर से कब नौकरी चली जाए, इसकी सूली भी सदैव उसके सिर पर लटकती रहती है।

शिक्षित बेरोजगारी के प्रमुख कारण धन सम्बन्धी समस्या यह सत्य है कि धन के बिना मनुष्य प्रगति नहीं कर सकता। शिक्षित बेरोजगारी का यह एक मुख्य कारण है – देश में धन का अभाव, चाहे वह कृत्रिम हो अथवा वास्तविक,रोजगार के अवसर कम कर देता है। देश के धन पर वर्ग विशेष का आधिपत्य होने से जो धन रोजगार दे सकता है,वह केवल उनकी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति में व्यय हो रहा है।

धर्म की समस्या देश में बेरोजगारी के प्रमुख कारणों में धार्मिक कारण भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ के धर्मभीरू मनुष्य भाग्यवाद पर विश्वास करके हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। उनके अनुसार “अजगर करे न चाकरी,पंक्षी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम ॥” वाली कहावत सत्य है। वे कार्य करने का प्रयास नहीं करते और यह कहकर सन्तोष कर लेते हैं कि वह उनके भाग्य में ही नहीं था।

राजनीतिक समस्या बेकारी का प्रमुख कारण राजनीति भी है। यहाँ लोग राजनीति में आकर स्वयं और स्वयं के परिवार के लिए धन कमाना चाहते हैं। दूसरों को प्रलोभन देकर उनसे धन लूटकर अपने बैंक के खाते भरते हैं और इतना धन एकत्र कर लेते हैं कि उनकी कई पीढ़ियाँ बिना कोई काम करके आराम और वैभव से अपना जीवन गुजार सकती हैं। इनके पास देश का इतना धन एकत्र होता है कि यदि इनके बैंक के खाते जनता के लिए खोल दिये जाएँ तो देश से निर्धनता और बेरोजगारी स्वतः समाप्त हो जाए।

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दोषपूर्ण – शिक्षा पद्धति–भारत की शिक्षा पद्धति व्यवसायमूलक न होकर पुस्तकीय है। इस कारण छात्र जीवन की वास्तविकताओं का सामना करने में असमर्थ रहता है। वह अध्ययन करने में अपना बहुत समय व्यतीत कर देता है किन्तु इससे उसे जब रोजगार नहीं मिल पाता तब वह अत्यन्त निराशा की स्थिति को प्राप्त हो जाता है।

उपसंहार – समाज से शिक्षित बेरोजगारी को दूर करने का उपाय है कि शिक्षा मनुष्य को वास्तविक जीवन का सामना करने की क्षमता प्रदान करे,रोजगार – परक हो। युवा भी परिश्रम करने की आदत विकसित करें। कर्म में विश्वास करके छोटा, बड़ा जैसा भी कार्य मिले उसका पूरी निष्ठा,परिश्रम और ईमानदारी से निर्वाह करें। दूसरों के द्वारा दिए गए प्रलोभन में न फंसकर स्वयं रोजगार के अवसरों की तलाश करें। अतः स्वविवेक और क्षमता के अनुसार कार्य करने वाला मनुष्य कभी बेरोजगार नहीं रह सकता है। कहा भी गया है – “चरन् वै मधुविन्दन्ति चरन् स्वादुमुदुम्बरं पश्य सूर्यस्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्।” अर्थात् निरन्तर कार्य करने वाला मनुष्य ही जीवन के मधुर फल का आस्वादन करता है। सूर्य को देखिए वह चमकने में कभी प्रमाद नहीं करता।

18. भ्रष्टाचार : समस्या और निदान [2014]

“आचार संहिता के भारत में कैसा कलयुग आया
देव सदृश मानव था उसमें घोर पतन है आया।
राजनीति में और समाज में चहुँओर वही है छाया
भ्रष्टाचार – लिप्त जनमानस कैसा दुर्दिन आया।”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) भ्रष्टाचार का कारण,
(3) भ्रष्टाचार के निवारण के उपाय,
(4) उपसंहार।

प्रस्तावना – भारत आचार संहिता का जनक कहा जाता है। जब विश्व में अज्ञान का अन्धकार छाया था तब भारत ने ही उनमें ज्ञान,नीति और आचार का प्रबोध कर प्रकाश जगाया। विश्व को आचार का पाठ पढ़ाने वाले भारत के ऐसे भी दुर्दिन आएँगे सम्भवतः तत्कालीन नीति – विशारदों ने इसकी कल्पना भी नहीं की होगी। आज जब हम अपने देश के किसी भी क्षेत्र में चाहे वह राजनीतिक हो, सामाजिक हो,शैक्षिक हो अथवा आर्थिक, दृष्टि डालें तो हर स्थान पर भ्रष्टाचार का बोलबाला दिखाई देता है। आज कोई भी कार्य कराना सरल बात नहीं है। नौकरी पानी है तो मोटी रकम रिश्वत में दो। स्थानान्तरण कराना है तो पहले सम्बन्धित अधिकारियों का मुँह पैसे से भरो। किसी कार्य हेतु अनापत्ति प्रमाण – पत्र लेना हो तो श्रृंखलाबद्ध तरीके से अधिकारियों की मुट्ठी गरम करो, महीनों प्रतीक्षा करो, तब जाकर कहीं कोई कार्य सम्पन्न हो सकता है।

भ्रष्टाचार का कारण – आज भ्रष्टाचार समाज में एक जटिल समस्या के रूप में फल – फूल रहा है। रक्तबीज की भाँति जन – जन के भीतर उत्पन्न होता जा रहा है। यह सब देखकर प्रश्न उठता है कि भ्रष्टाचार का कारण क्या है? इस प्रश्न पर विचार करने के लिए हमें समाज की स्थिति के विषय में जानकारी लेना अति आवश्यक है। इसको पनपाने में देश के नेता,उद्योगपति और पूँजीपति जिम्मेदार हैं। श्रमिकों के घोर परिश्रम की कमाई पर अधिकार उद्योगपति जमाता है और उसको केवल उतना देता है जिससे वह केवल प्राणधारण किए रह सके। अपने अधभूखे और अधनंगे परिवार को देखकर उसके मन में विद्रोह की ज्वाला सुलगनी स्वाभाविक है। नेता जनता का धन चूसकर स्वयं ऐशो – आराम की जिन्दगी जीते हैं और अपनी आगे वाली पीढ़ियों के लिए भी धन सुरक्षित करके रख लेते हैं। ऐसे में कुछ लोग उन शोषित लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर उनसे धन लेकर उन्हें अच्छी – अच्छी नौकरियों का प्रलोभन देते हैं। एक व्यक्ति जब किसी से धोखा खाता है तब बदले की भावना से वह दूसरे के साथ भी वही करता है जो उसके साथ हुआ। परिणामतः लोगों की आत्मा मरती गई और स्वेच्छाचार बढ़ता गया। देखते – देखते पूरा समाज भ्रष्टाचार के दलदल में लिप्त हो गया और अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया है। बिना पैसे दिये हमारे देश में कम से कम कोई कार्य हो नहीं सकता।

भ्रष्टाचार के निवारण के उपाय – भ्रष्टाचार का निवारण हो सके इसके लिए सबसे पहले शिक्षा में सुधार होना अति आवश्यक है। मानव अपने – अपने आचरण को सुधारे जिसे वह पुस्तकों में पढ़ता है उसे जीवन में उतारना सीखे। अतः आवश्यकता है कि मनुष्य अपनी योग्यताओं, क्षमताओं को पहचाने और झूठे प्रलोभन में न फंसकर ईमानदारी पर डटा रहै। अपने चरित्रबल को प्रमुखता दे। कहा भी गया है कि यदि धन गया तो कुछ नहीं गया। यदि स्वास्थ्य गया तो कुछ हानि हुई किन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो इन्सान जीते जी ही मर गया। अतः मनुष्य को अपने चरित्र को ऊँचा उठाने के लिए भरसक प्रयत्न करना चाहिए।

उपसंहार – जिस प्रकार समाज में भ्रष्टाचार की जड़ें फैलाने वाले हम लोग ही हैं। उसी प्रकार उसका मूलोच्छेदन करने वाले भी हम ही होंगे। कहते हैं यदि सुबह का भूला शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। इसी प्रकार पहले हम चाहें कैसे भी रहे हों किन्तु आज से ही यदि हम अपने – अपने सुधार का संकल्प ले लें तो भ्रष्टाचार स्वयमेव ही समाप्त हो जाएगा। कहा भी गया है कि

“अपना अपना करो सुधार। तभी मिटेगा भ्रष्टाचार॥”

19. महँगाई की समस्या [2016]

“जब आदमी के हाल पे आती है मुफलिसी।
किस – किस तरह से उसको सताती है मुफलिसी॥”

विस्तृत रूपरेखा –
(1) प्रस्तावना,
(2) कृषि – उत्पादन,
(3) प्रशासन की उदासीनता,
(4) आयात नीति,
(5) जनसंख्या में वृद्धि,
(6) मुद्रा का प्रसार,
(7) घाटे का बजट,
(8) अव्यवस्थित वितरण प्रणाली,
(9) धन का असमान वितरण,
(10) समस्या का निदान,
(11) उपसंहार।

प्रस्तावना – भारत में इस समय जो आर्थिक समस्याएँ विद्यमान हैं, उनमें महँगाई एक प्रमुख समस्या है। भारत में पिछले दो दशकों में सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में अत्यन्त तीव्रता से वृद्धि हुई है। वृद्धि का यह चक्र आज भी गतिवान है।

भारत में अधिकांश वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि के बहुत से कारण हैं। इन कारणों में अधिकांश आर्थिक कारण हैं,किन्तु कुछ कारण गैर – आर्थिक भी हैं। इन कारणों में से प्रमुख रूप से उल्लेखनीय कारण निम्नलिखित हैं

कषि – उत्पादन – कृषि पदार्थों की कीमतों में निरन्तर वृद्धि का एक प्रमुख कारण उन समस्त वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि है जो कृषि के लिए आवश्यक है। कृषि उर्वरकों के मूल्यों में वृद्धि, सिंचाई की दरों में वृद्धि, बीज के दामों में वृद्धि, कृषि मजदूरों की मजदूरी की दर में वृद्धि आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनमें वृद्धि होने से स्वाभाविक रूप से ही उसका प्रभाव कृषि – पदार्थों पर पड़ता है।

भारत में अधिकांश वस्तुओं का मूल्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पदार्थों के मूल्यों से सम्बन्धित है। यही कारण है कि जब किसी भी कारण से या कई कारणों से कृषि होती है तो उसके परिणामस्वरूप देश में अधिकांश वस्तुओं के मूल्य प्रभावित हो जाते हैं।

प्रशासन की उदासीनता – साधारणतः प्रशासन के स्वरूप पर यह निर्भर करता है कि देश में अर्थव्यवस्था एवं मूल्य – स्तर सन्तुलित होगा या नहीं। प्रभावशाली प्रशासक होने से कृत्रिम रूप से वस्तुओं और सेवाओं की पूर्ति में कमी करना व्यापारियों के लिए कठिन हो जाता है। अतः उस परिस्थिति में कीमतों में निरन्तर एवं अनियन्त्रित रूप में वृद्धि करना अत्यन्त कठिन हो जाता है।

आयात नीति – कभी – कभी आयात सम्बन्धी गलत नीति के फलस्वरूप भी देश में वस्तुओं की कमी एवं कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है। यह सही है कि देश में जहाँ तक सम्भव हो, आयात कम होना चाहिए विशेष रूप में उपयोग की वस्तुओं का आयात अधिक नहीं होना चाहिए। किन्तु यदि देश में वस्तुओं की पूर्ति माँग की तुलना में कम हो तो आयात की आवश्यकता होती है। यदि इन वस्तुओं का आयात न किया जाये तो माँग और पूर्ति में असन्तुलन होगा। पूर्ति जितनी कम होगी,वस्तुओं के दाम उतने ही बढ़ेंगे।

जनसंख्या में वृद्धि – भारत में जनसंख्या तीव्रता से एवं अनियन्त्रित रूप में बढ़ रही है। जनसंख्या के इस विशाल आकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी वस्तुओं और सेवाओं का बड़े आकार में होना अनिवार्य है। दुर्भाग्य से,भारत में कृषि और उद्योग के क्षेत्र में उतनी तीव्रता से उन्नति एवं उत्पादन की वृद्धि नहीं हो रही, जितनी की जनसंख्या में वृद्धि हो रही है। इसका स्वाभाविक परिणाम अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं की कमी है, इसी के परिणामस्वरूप अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में निरन्तर वृद्धि जारी है।

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मुद्रा का प्रसार भारत में मुद्रा – प्रसार की प्रवृत्ति तृतीय योजना के प्रारम्भिक काल से ही बनी हुई है। मुद्रा – प्रसार के बहुत से कारण रहे हैं, किन्तु उसका परिणाम एक ही रहा है – मूल्यों में वृद्धि। यद्यपि सरकार की ओर से बार – बार यह आश्वासन दिया जाता रहा है कि मुद्रा – प्रसार को अब कम कर दिया जायेगा एवं इस प्रवृत्ति को रोका जायेगा। किन्तु अभी तक इस दिशा में कोई महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हो सक – प्रसार को यदि नियन्त्रण में कर लिया जाये तो उससे मूल्य – स्तर को नियन्त्रण में रखना सरल हो जाता है।

घाटे का बजट – भारत में बजट और पूँजी – निर्माण की जो स्थिति है वह योजनाओं को पूरा करने के लिए बिल्कुल पर्याप्त नहीं है। अतः इस कमी को दूर करने के लिए, अन्य उपायों के अतिरिक्त घाटे की बजट प्रणाली को अपनाया जाने लगा है। पिछले कई बजटों में इस पद्धति को अपनाया गया है, जिससे अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में तेजी से वृद्धि हुई है।

अव्यवस्थित वितरण प्रणाली – भारत में अधिकतर विक्रेता संगठित हैं। इसके परिणामस्वरूप वह आपस में मिलकर वस्तुओं की खरीद,संचय एवं बिक्री के विषय की नीति का निश्चय करते हैं। धीरे – धीरे वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होने लगती है। यदि सरकार इन प्रवृत्तियों को रोकने में असमर्थ होती है तो यह संस्थाएँ मूल्यों को निरन्तर बढ़ाती जाती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

धन का असमान वितरण – भारत में आर्थिक असमानता बहुत बड़े आकार में विद्यमान है। धन के असमान वितरण का विशेष रूप से उन वस्तुओं के मूल्यों पर प्रभाव पड़ता है जिनकी माँग तो बहुत अधिक है, किन्तु पूर्ति अत्यन्त सीमित। इनमें विलासिता की वस्तुएँ एवं कीमती वस्तुएँ भी शामिल हैं। रोजगार की कमी एवं मूल्यों में वृद्धि से निर्धनों को जीवन – यापन की अधिकतर वस्तुओं और साधनों को जुटाना कठिन हो जाता है।

समस्या का निदान –
(1) कृषि पर अधिक ध्यान देना,
(2) सिंचाई की सुविधा,
(3) वितरण प्रणाली में बदलाव,
(4) भ्रष्टाचार पर अंकुश।

उपसंहार कृत्रिम अभाव के सृजन एवं मूल्यों में निरन्तर वृद्धि से कालाबाजारी एवं अत्यधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति बढ़ती है। भारत में भी यह प्रवृत्ति अभी तक विद्यमान है। यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ देश की अर्थव्यवस्था को अवांछित रूप से प्रभावित करती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सरकार की ओर से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों के द्वारा इन प्रवृत्तियों को रोकने का बराबर प्रयास किया जा रहा है, किन्तु इस दिशा में अभी पूरी सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है। लोकमंगल की भावना एवं पवित्र मन से यथार्थ प्रयास करने से ही इसका निदान सम्भव है। यदि हम सभी परिश्रम से कार्य करें, उत्पादन अधिक बढ़ाएँ और मितव्ययिता से जीवन को चलाने की आदत डालें,तो महँगाई की समस्या का हल हमें अपने आप ही मिल सकता है।

20. भारतीय समाज में नारी का स्थान
अथवा [2009, 12, 14, 15, 17]
भारतीय नारी

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत पग – पग तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।”

विस्तृत रूपरेखा
(1) प्रस्तावना,
(2) प्राचीन भारतीय नारी,
(3) मध्यकाल में नारी,
(4) आधुनिक नारी,
(5) उपसंहार।]

प्रस्तावना – सृष्टि के आदिकाल से ही नारी की महत्ता अक्षुण्ण है। नारी सृजन की पूर्णता है। उसके अभाव में मानवता के विकास की कल्पना असम्भव है। समाज के रचना – विधान में नारी के माँ,प्रेयसी, पुत्री एवं पली अनेक रूप हैं। वह सम परिस्थितियों में देवी है, तो विषम परिस्थितियों में दुर्गा भवानी। वह समाज रूपी गाड़ी का एक पहिया है जिसके बिना समग्र जीवन ही पंगु है। सृष्टि चक्र में स्त्री – पुरुष एक – दूसरे के पूरक हैं।

मानव जाति के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होगा कि जीवन में कौटुम्बिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों में प्रारम्भ से ही नारी की अपेक्षा पुरुष का आधिपत्य रहा है। पुरुष ने अपनी इस श्रेष्ठता और शक्ति – सम्पन्नता का लाभ उठाकर स्त्री जाति पर मनमाने अत्याचार किये हैं। उसने नारी की स्वतन्त्रता का अपहरण कर उसे पराधीन बना दिया। सहयोगिनी या सहचरी के स्थान पर उसे अनुचरी बना दिया और स्वयं उसका पति, स्वामी, नाथ, पथ – प्रदर्शक और साक्षात् ईश्वर बन गया।

प्राचीन भारतीय नारी – प्राचीन भारतीय समाज में नारी – जीवन के स्वरूप की व्याख्या करें तो हमें ज्ञात होगा कि वैदिक काल में नारी को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वह सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में पुरुष के साथ मिलकर कार्य करती थी। रोमशा और लोपामुद्रा आदि अनेक नारियों ने ऋग्वेद के सूत्रों की रचना की थी। रामायण काल (त्रेता) में भी नारी की महत्ता अक्षुण्ण रही। रानी कैकेयी ने राजा दशरथ के साथ युद्ध – भूमि में जाकर उनकी सहायता की। इस युग में सीता, अनुसुइया एवं सुलोचना आदि आदर्श नारी हुईं। महाभारत काल (द्वापर) में नारी पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने लगीं। इस युग में नारी समस्त गतिविधियों के संचालन की केन्द्र – बिन्दु थी। द्रोपदी,गान्धारी और कुन्ती इस युग की शक्ति थीं।

मध्यकाल में नारी – मध्य युग तक आते – आते नारी की सामाजिक स्थिति दयनीय बन गयी। भगवान बुद्ध द्वारा नारी को सम्मान दिये जाने पर भी भारतीय समाज में नारी के गौरव का ह्रास होने लगा था। फिर भी वह पुरुष के समान ही सामाजिक कार्यों में भाग लेती थी। सहभागिनी और समानाधिकारिणी का उसका रूप पूरी तरह लुप्त नहीं हो पाया था। मध्यकाल में शासकों की काम – लोलुप दृष्टि से नारी को बचाने के लिए प्रयत्न किये जाने लगे। परिणामस्वरूप उसका अस्तित्व घर की चहारदीवारी तक ही सिमट कर रह गया। वह कन्या रूप में पिता पर, पत्नी के रूप में पति और माँ के रूप में पुत्र पर आश्रित होती चली गयी। यद्यपि इस युग में कुछ नारियाँ अपवाद रूप में शक्ति – सम्पन्न एवं स्वावलम्बी थीं; फिर भी समाज सामान्य नारी को दृढ़ से दृढ़तर बन्धनों में जकड़ता ही चला गया। मध्यकाल में आकर शक्ति स्वरूपा नारी ‘अबला’ बनकर रह गयी। मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में –

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

भक्ति काल में नारी जन – जीवन के लिए इतनी तिरस्कृत, क्षुद्र और उपेक्षित बन गयी थी कि कबीर, सूर, तुलसी जैसे महान् कवियों ने उसकी संवेदना और सहानुभूति में दो शब्द तक नहीं कहे। कबीर ने नारी को ‘महाविकार’, ‘नागिन’ आदि कहकर उसकी घोर निन्दा की। तुलसी ने नारी को गँवार, शूद्र, पशु के समान ताड़ना का अधिकारी कहा –

‘ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।

आधुनिक नारी – आधुनिक काल के आते – आते नारी चेतना का भाव उत्कृष्ट रूप से जाग्रत हुआ। युग – युग की दासता से पीड़ित नारी के प्रति एक व्यापक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाने लगा। बंगाल में राजा राममोहन राय और उत्तर भारत में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने नारी को पुरुषों के अनाचार की छाया से मुक्त करने को क्रान्ति का बिगुल बजाया। अनेक कवियों की वाणी भी इन दुःखी नारियों की सहानुभूति के लिए अवलोकनीय है। कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने तीव्र स्वर में नारी स्वतन्त्रता की माँग की –

“मुक्त करो नारी को मानव, चिर बन्दिनी नारी को।
युग – युग की निर्मम कारा से, जननी, सखि, प्यारी को।”

आधुनिक युग में नारी को विलासिनी और अनुचरी के स्थान पर देवी, माँ, सहचरी और प्रेयसी के गौरवपूर्ण पद प्राप्त हुए। नारियों ने सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं साहित्यिक सभी क्षेत्रों में आगे बढ़कर कार्य किया। विजयलक्ष्मी पण्डित कमला नेहरू,सुचेता कृपलानी,सरोजिनी नायडू, इन्दिरा गाँधी,सुभद्राकुमारी चौहान,महादेवी वर्मा आदि के नाम विशेष सम्मानपूर्ण हैं।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने नारियों की स्थिति सुधारने के लिए अनेक प्रयल किये हैं। हिन्दू विवाह और कानून में सुधार करके उसने नारी और पुरुष को समान भूमि पर लाकर खड़ा कर दिया। दहेज विरोधी कानून बनाकर उसने नारी की स्थिति में और भी सुधार कर दिया। लेकिन सामाजिक एवं आर्थिक स्वतन्त्रता ने उसे भोगवाद की ओर प्रेरित किया है। आधुनिकता के मोह में पड़कर वह आज पतन की ओर जा रही है।

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उपसंहार – इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से हमें वैदिक काल से लेकर आज तक नारी के विविध रूपों और स्थितियों का आभास मिल जाता है। वैदिक काल की नारी ने शौर्य, त्याग, समर्पण, विश्वास एवं शक्ति आदि का आदर्श प्रस्तुत किया। पूर्व मध्यकाल की नारी ने इन्हीं गुणों का अनुसरण कर अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखा। उत्तर – मध्यकाल में अवश्य नारी की स्थिति दयनीय रही, परन्तु आधुनिक काल में उसने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर लिया है। उपनिषद,पुराण,स्मृति तथा सम्पूर्ण साहित्य में नारी की महत्ता अक्षुण्ण है। वैदिक युग में शिव की कल्पना ही ‘अर्द्ध नारीश्वर’ रूप में की गयी। मनु ने प्राचीन भारतीय नारी के आदर्श एवं महान् रूप की व्यंजना की है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता…” अर्थात् जहाँ पर स्त्रियों का पूजन होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ स्त्रियों का अनादर होता है, वहाँ नियोजित होने वाली क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। स्त्री अनेक कल्याण का भाजन है। वह पूजा के योग्य है। स्त्री घर की ज्योति है। स्त्री गृह की साक्षात् लक्ष्मी है। यद्यपि भोगवाद के आकर्षण में आधुनिक नारी पतन की ओर जा रही है, लेकिन भारत के जन – जीवन में यह परम्परा प्रतिष्ठित नहीं हो पायी है। आशा है भारतीय नारी का उत्थान भारतीय संस्कृति की परिधि में हो। वह पश्चिम की नारी का अनुकरण न करके अपनी मौलिकता का परिचय दे।

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MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ

MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ

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अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ऊर्जा बैण्ड क्या है? किसी क्रिस्टलीय ठोस में ऊर्जा बैण्डों के गठन की क्रिया विधि स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
ऊर्जा बैण्ड (Energy Band)-जब अनेक परमाणु मिलकर किसी ठोस की रचना करते हैं तो इन परमाणुओं के बीच अन्योन्य क्रियाओं के कारण उनके ऊर्जा-स्तरों में विक्षोभ उत्पन्न हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक ऊर्जा-स्तर अनेक ऊर्जा स्तरों में विभक्त होकर एक बैण्ड का रूप ले लेते हैं, जिसे ऊर्जा बैण्ड कहते हैं।

ठोसों में ऊर्जा बैण्ड (Energy Bands in Solids)-प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना होता है। प्रत्येक परमाणु के केन्द्रीय भाग में धनावेशित नाभिक होता है जिसके चारों ओर ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन कुछ निश्चित कक्षाओं में परिक्रमण करते रहते हैं। इस प्रकार किसी पृथक्कृत परमाणु में इलेक्ट्रॉनों के विविक्त (discrete) एवं सुस्पष्ट ऊर्जा-स्तर होते हैं। जब विभिन्न परमाणु एक-दूसरे के अत्यधिक निकट आकर ठोस की रचना करते हैं तब इन परमाणुओं की बाह्य कक्षाएँ एक-दूसरे को ढक लेती हैं।

इन कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन की गति नाभिक-नाभिक, इलेक्ट्रॉन-नाभिक तथा इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन के बीच होने वाली अन्योन्य क्रियाओं के कारण, किसी पृथक्कृत परमाणु में इलेक्ट्रॉन की गति से भिन्न होती है। इस स्थिति में परमाणुओं के ऊर्जा-स्तरों में विक्षोभ उत्पन्न हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक. ऊर्जा-स्तर अनेक ऊर्जा-स्तरों में विभक्त हो जाता है जिनमें ऊर्जा का सतत परिवर्तन होता रहता है। ये ऊर्जा-स्तर एक-दूसरे के अत्यधिक निकट होने के कारण बैण्ड का रूप ले लेते हैं, जिन्हें ऊर्जा बैण्ड (energy band) कहते हैं।

वह ऊर्जा बैण्ड जिसमें संयोजक इलेक्ट्रॉनों (valence electrons) के ऊर्जा-स्तर उपस्थित होते हैं, संयोजी बैण्ड (valence band) कहलाता है। वह ऊर्जा-बैण्ड जिसमें चालक इलेक्ट्रॉनों (conduction electrons) के ऊर्जा-स्तर उपस्थित होते हैं, चालन बैण्ड (conduction band) कहलाता है। सामान्यत: चालन बैण्ड रिक्त होता है। संयोजी बैण्ड तथा चालन बैण्ड के बीच रिक्ति होती है, जिसे वर्जित ऊर्जा अन्तराल (forbidden energy gap) कहते हैं। इस रिक्ति में कभी कोई इलेक्ट्रॉन उपस्थित नहीं रहता है।

सिलिकन में ऊर्जा बैण्डों का निर्माण (Formation of Energy Bands in Silicon)-सिलिकन का परमाणु क्रमांक 14 है, अतः इसकी बाह्य कक्षा में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा इसके सभी कोशों एवं उपकोशों में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2,2s2,2p6,3s23p2 होता है। स्तर 1s,2s, 2p, 3p पूर्णतः भरे होते हैं जबकि स्तर 3p जिसमें अधिकतम 6 इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं, में केवल 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं।

सिलिकन (Si) के N परमाणु वाले क्रिस्टल की बाह्य कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या 4N होगी। किसी एक परमाणु की बाह्यतम कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या 8 हो सकती है। अत: N परमाणुओं के उपस्थित 4N संयोजी इलेक्ट्रॉनों के लिए उपलब्ध ऊर्जा-स्तर 8N होंगे। ये 8N ऊर्जा-स्तर क्रिस्टल में उपस्थित परमाणुओं के बीच की दूरी (7) के आधार पर कोई सतत बैण्ड बना सकते हैं अथवा इनका विभिन्न बैण्डों में समूहन हो . सकता है जिसे आगे स्पष्ट किया गया है

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1. जब r =r3 >> r0 अर्थात् अन्तरपरमाण्विक दूरी (r), क्रिस्टल जालक दूरी r0 से बहुत अधिक हो तो क्रिस्टल जालक में उपस्थित प्रत्येक परमाणु पृथक्कृत परमाणु की भाँति व्यवहार करता है, अत: प्रत्येक परमाणु के विविक्त एवं सुस्पष्ट ऊर्जा-स्तर होते हैं, जिन्हें चित्र-14.17 में परस्पर समान्तर रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया गया है।

2. जब r =r2 >ro तब परमाणुओं के संयोजी इलेक्ट्रॉनों के मध्य अन्त:क्रिया (interaction) प्रभावी हो जाने के कारण 3s व 3p उपकोश अत्यधिक निकट स्थित दो ऊर्जा-स्तरों में विभक्त हो जाते हैं, जिनके बीच का ऊर्जा अन्तराल पहले की अपेक्षा कम होता है। अन्तरपरमाण्विक दूरी r के और घटने पर 3s व 3p स्तरों से सम्बद्ध ऊर्जा बैण्डों का फैलाव बढ़ता है तथा इनके बीच का ऊर्जा अन्तराल घटता है।

3. जब r = r1 > r0 तब 3s व 3p बैण्डों में अतिव्यापन (overlapping) के कारण उनके बीच ऊर्जा-अन्तराल समाप्त हो जाता है तथा सभी 8N स्तर अर्थात् 3 8 से सम्बद्ध 2N ऊर्जा-स्तर तथा 3p से सम्बद्ध 6N ऊर्जा-स्तर अब सतत रूप से वितरित होते हैं। 8N ऊर्जा-स्तरों में से 4N ऊर्जा-स्तर पूर्णतया भरे हुए तथा 4N ऊर्जा-स्तर रिक्त होते हैं।
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4. जब r = ro अर्थात् अन्तरपरमाण्विक दूरी (r), क्रिस्टल जालक दूरी r0 के बराबर हो तो पूर्णतया भरे हुए तथा रिक्त ऊर्जा-स्तर एक ऊर्जा अन्तराल से परस्पर पृथक्कृत हो जाते हैं। यह ऊर्जा अन्तराल वर्जित ऊर्जा अन्तराल (forbidden energy gap) कहलाता है। निचला पूर्णतया भरा हुआ ऊर्जा बैण्ड जिसमें केवल संयोजी इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं, संयोजी बैण्ड (valence band) कहलाता है तथा ऊपरी रिक्त ऊर्जा बैण्ड जिसमें चालक इलेक्ट्रॉन रहते हैं, चालन बैण्ड (conduction band) कहलाता है।

प्रश्न 2.
ऊर्जा बैण्ड के आधार पर चालक, अचालक एवं अर्द्धचालकों का वर्गीकरण स्पष्ट कीजिए। [2017]
अथवा
ऊर्जा बैण्ड क्या है? चालक, अचालक और अर्द्धचालक में अन्तर इनके ऊर्जा बैण्ड आरेखों के आधार पर बताइए। [2018]
उत्तर :
ऊर्जा बैण्ड-जब अनेक परमाणु मिलकर किसी ठोस की रचना करते हैं तो इन परमाणुओं के बीच अन्योन्य, क्रियाओं के कारण उनके ऊर्जा-स्तरों में विक्षोभ उत्पन्न हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक ऊर्जा-स्तर अनेक ऊर्जा-स्तरों में विभक्त होकर एक बैण्ड का रूप ले लेता है, जिसे ऊर्जा बैण्ड कहते हैं।

ऊर्जा बैण्ड के आधार पर ठोसों (चालक, अचालक व अर्द्धचालकों में) का वर्गीकरण (Classification of Solids (in Conductors, Insulators and Semiconductors) on the Basis of Energy Bands)-ठोसों का उनके संयोजी बैण्ड एवं चालन बैण्ड के बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल के आधार पर चालक, अचालक एवं अर्द्धचालकों में वर्गीकरण किया जा सकता है।

1. चालक (Conductors)-चालक वे पदार्थ होते हैं जिनमें चालक इलेक्ट्रॉनों की पर्याप्त संख्या पायी जाती है तथा उनमें धारा प्रवाह सरलता से हो जाता है। उदाहरण-चाँदी, ताँबा, ऐलुमिनियम आदि। ऊर्जा बैण्ड संरचना के अनुसार चालक वे पदार्थ होते हैं जिनके चालन बैण्ड इलेक्ट्रॉनों से आंशिक रूप से भरे होते हैं तथा इनके संयोजी बैण्ड एवं चालन बैण्ड या तो परस्पर अतिव्यापित (overlapped) होते हैं या उनके बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल लगभग नगण्य होता है (चित्र-14.18)।
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2. अचालक (Insulators)-अचालक वे पदार्थ होते हैं जिनमें चालक इलेक्ट्रॉन लगभग नगण्य संख्या में पाए जाते हैं, अत: इनमें धारा का प्रवाह नहीं होता है। उदाहरण-लकड़ी, ऐबोनाइट, काँच आदि। ऊर्जा बैण्ड संरचना के आधार पर अचालक वे पदार्थ होते हैं जिनके संयोजी बैण्ड पूर्णतः भरे हुए तथा चालन बैण्ड पूर्णतः रिक्त होते हैं तथा उनके बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल बहुत अधिक (Eg > 3 ev) होता है (चित्र-14.19)।
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3. अर्द्धचालक (Semiconductors)-अर्द्धचालक वे पदार्थ होते हैं जिनकी चालकता चालकों से कम तथा अचालकों से अधिक होती है। उदाहरण–जर्मेनियम, सिलिकन, कार्बन आदि। ऊर्जा बैण्ड संरचना के आधार पर अर्द्धचालक वे पदार्थ होते हैं जिनके संयोजी बैण्ड पूर्ण रूप से भरे हुए होते हैं तथा चालन बैण्ड पूर्णत: रिक्त होते हैं परन्तु चालन बैण्ड एवं संयोजी बैण्ड के बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल बहुत कम (Eg ≈ 1 ev) होता है (चित्र-14.20)।

परम शून्य ताप (OK) पर अर्द्धचालकों का चालन बैण्ड पूर्णतया रिक्त होता है, अतः परम शून्य ताप पर अर्द्धचालक एक अचालक की भाँति व्यवहार करता है। जैसे-जैसे अर्द्धचालक का ताप बढ़ता है, वर्जित ऊर्जा अन्तराल घटता जाता है तथा संयोजी बैण्ड से कुछ इलेक्ट्रॉन चालन बैण्ड में पहुँच जाते हैं, जिसके फलस्वरूप अर्द्धचालक की चालकता बढ़ जाती है। इस प्रकार अर्द्धचालकों की चालकता ताप बढ़ाने पर बढ़ती है। अतः अर्द्धचालकों का प्रतिरोध ताप गुणांक (α) ऋणात्मक होता है।

प्रश्न 3.
अर्द्धचालक कितने प्रकार के होते हैं? निज अर्द्धचालकों में वैद्युत चालन किस प्रकार होता है? समझाइए।
उत्तर :
अर्द्धचालकों के प्रकार (Types of Semiconductors)-अर्द्धचालक दो प्रकार के होते हैं
1. निज अर्द्धचालक (Intrinsic Semiconductor)-एक शुद्ध अर्द्धचालक जिसमें कोई अशुद्धि (अपद्रव्य impurity) न मिली हो, निज अर्द्धचालक कहलाता है। इस प्रकार शुद्ध जर्मेनियम तथा शुद्ध सिलिकन अपनी प्राकृतिक अवस्था में निज अर्द्धचालक हैं।

2. बाह्य अर्द्धचालक (Extrinsic Semiconductors)-निज अर्द्धचालकों की वैद्युत चालकता बहुत कम होती है परन्तु यदि उसमें संयोजकता 5 अथवा 3 वाले किसी पदार्थ की अल्प मात्रा अपद्रव्य (impurity) के रूप में मिला दी जाए तो अर्द्धचालक की चालकता बहुत अधिक बढ़ जाती है। अपद्रव्य मिलाने की यह क्रिया अपमिश्रण (doping) कहलाती है तथा अपद्रव्य मिले ऐसे अर्द्धचालक को बाह्य अर्द्धचालक कहते हैं। बाह्य अर्द्धचालक दो प्रकार के होते हैं-(a) n-टाइप अर्द्धचालक, (b) pटाइप अर्द्धचालक

निज अर्द्धचालकों में वैद्युत चालन (Electric Conduction in Intrinsic Semiconductors)-जर्मेनियम (Ge32) तथा सिलिकन (Si14) की संयोजकता 4 है। अत: Ge (अथवा Si) के पत्येक परमाणु में 4 संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं। ये इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक तथा उससे दृढ़तापूर्वक बँधे आन्तरिक इलेक्ट्रॉनों के एक आन्तरिक क्रोड जिस पर +4 e आवेश होता है, के चारों ओर होते हैं।

जर्मेनियम क्रिस्टल में प्रत्येक परमाणु एक सम चतुष्फलक के किसी भी कोने पर स्थित होते हैं (चित्र-14.21)। परमाणु के चारों संयोजक इलेक्ट्रॉन, निकटवर्ती चार अन्य परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों में से एक-एक के साथ भागीदार होकर सहसंयोजक बन्धों (covalent bonds) की रचना करते हैं। इन बन्धों के कारण ही पड़ोसी परमाणुओं के बीच बन्धन बल उत्पन्न होता है। इस प्रकार परम शून्य ताप (0 K) पर शुद्ध जर्मेनियम क्रिस्टल में सभी संयोजक इलेक्ट्रॉन क्रोड के साथ दृढ़तापूर्वक बँधे होते हैं, अतः धारा चालन के लिए कोई मुक्त .. इलेक्ट्रॉन नहीं रहता है। सामान्य ताप पर ऊष्मीय विक्षोभ के कारण कुछ संयोजक बन्ध टूट जाते हैं, जिनके कारण कुछ इलेक्ट्रॉन धारा चालन के लिए मुक्त हो जाते हैं, ये इलेक्ट्रॉन मुक्त इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं। क्रिस्टल को गर्म करने पर, अधिकाधिक इलेक्ट्रॉन मुक्त होने लगते हैं, जिससे क्रिस्टल की चालकता बढ़ने लगती है। वैद्युत क्षेत्र की अनुपस्थिति में ये मुक्त इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल जालक के अन्दर गैस के अणुओं की भाँति अनियमित गति करते रहते हैं। जब क्रिस्टल पर वैद्युत क्षेत्र लगाया जाता है तो ये मुक्त इलेक्ट्रॉन वैद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में यादृच्छिक गतियाँ करते हैं जिससे उनमें वैद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में धारा बहती है।
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साधारण ताप पर जर्मेनियम के 109 परमाणुओं में से केवल एक सहसंयोजक बन्ध टूटता है इसलिए निज अर्द्धचालकों की चालकता बहुत कम होती है, जिसके कारण इनका कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं हो सकता है। जब जर्मेनियम के क्रिस्टल जालक में कोई सहसंयोजक बन्ध टूटकर इलेक्ट्रॉन मुक्त होता है तो उस परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है। परमाणु में इलेक्ट्रॉन के मूल स्थान पर उत्पन्न यह रिक्ति ‘कोटर’ (hole) कहलाती. है। क्रिस्टल जालक में ऊष्मीय विक्षोभ के कारण जब किसी अन्य परमाणु का सहसंयोजक बन्ध इस कोटर के निकट आता है तो पहला परमाणु इस परमाणु के सहसंयोजक बन्ध से एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर इस रिक्ति को पूरा कर लेता है।

अब इलेक्ट्रॉन की रिक्ति अर्थात् कोटर दूसरे परमाणु पर उत्पन्न हो जाता है। यह प्रक्रिया क्रिस्टल जालक में निरन्तर चलती रहती है और कोटर एक परमाणु से दूसरे परमाणु पर स्थानान्तरित होता रहता है। वैद्युत क्षेत्र की अनुपस्थिति में क्रिस्टल जालक में कोटर की गति यादृच्छिक (random) होती है। जब क्रिस्टल पर वैद्युत क्षेत्र लगाया जाता है तो ये कोटर यादृच्छिक गति के साथ-साथ वैद्युत क्षेत्र की दिशा में गति करते हैं जिसके परिणामस्वरूप क्रिस्टल में वैद्युत क्षेत्र की दिशा में वैद्युत धारा बहती है। इस प्रकार निज अर्द्धचालक क्रिस्टल में मुक्त इलेक्ट्रॉनों एवं कोटरों दोनों के कारण वैद्युत धारा बहती है।

किसी निश्चित ताप पर निज अर्द्धचालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की सान्द्रता ne तथा कोटरों की सान्द्रता n परस्पर बराबर होती है।

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प्रश्न 4.
(a) n-टाइप अर्द्धचालक से क्या तात्पर्य है? इसकी रचना समझाइए। [2007, 10, 12]]
(b) p-टाइप अर्द्धचालक से क्या तात्पर्य है? इसकी रचना समझाइए। [2007, 10, 12]
उत्तर :
(a) n-टाइप अर्द्धचालक (n-type Semiconductor)—जब शुद्ध जर्मेनियम (अथवा सिलिकन) क्रिस्टल में 5 संयोजकता वाले अपद्रव्य परमाणु, जैसे आर्सेनिक अथवा ऐन्टिमनी अल्प मात्रा में मिलाये जाते हैं तो प्रत्येक अपद्रव्य परमाणु के पाँच संयोजक इलेक्ट्रॉनों में से चार संयोजक इलेक्ट्रॉन, जर्मेनियम के चार निकटतम परमाणुओं के एक-एक संयोजक इलेक्ट्रॉन के साथ मिलकर सहसंयोजक बन्ध बना लेते हैं तथा आर्सेनिक अपद्रव्य का पाँचवाँ संयोजक इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल में गति के लिए मुक्त रह जाता है (चित्र-14.22)। यह इलेक्ट्रॉन आवेश वाहक का कार्य करता है तथा इस पर ऋणावेश होता है।

इस प्रकार शुद्ध जर्मेनियम में अपद्रव्य मिलाने से मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है. अर्थात् क्रिस्टल की चालकता बढ़ जाती है। इस प्रकार के अपद्रव्य मिले जर्मेनियम क्रिस्टल को n-टाइप अर्द्धचालक कहते हैं, क्योंकि इसमें आवेश वाहक (मुक्त इलेक्ट्रॉन) ऋणात्मक होते हैं। अपद्रव्य परमाणुओं को दाता (donor) परमाणु कहते हैं, क्योंकि ये क्रिस्टल को चालक इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं।

उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि n-टाइप अर्द्धचालक क्रिस्टल में चलनशील आवेश वाहक (ऋणात्मक) इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा इतनी ही संख्या में स्थिर (धनात्मक दाता) (donor) आयन होते हैं (चित्र-14.23)। इस प्रकार सम्पूर्ण क्रिस्टल उदासीन ही रहता है।
दाता परमाणु
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(b) p-टाइप अर्द्धचालक (p-type Semiconductor)-जब शुद्ध जर्मेनियम (अथवा सिलिकन) क्रिस्टल में 3 संयोजकता वाले अपद्रव्य परमाणु, जैसे ऐलुमिनियम (अथवा बोरॉन) अल्प मात्रा में मिलाए जाते हैं तो प्रत्येक अपद्रव्य परमाणु के तीन संयोजक इलेक्ट्रॉन, जर्मेनियम के तीन निकटतम परमाणुओं के एक-एक संयोजक इलेक्ट्रॉन के साथ मिलकर सहसंयोजक बन्ध बना लेते हैं तथा जर्मेनियम का एक संयोजक इलेक्ट्रॉन बन्ध नहीं बना पाता है, अत: क्रिस्टल में अपद्रव्य परमाणु के एक ओर रिक्त स्थान रह जाता है जिसे कोटर (hole) कहते हैं (चित्र-14.24)। वैद्युत क्षेत्र लगाने पर, इस कोटर में पड़ोसी परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन आ जाता है, जिससे पड़ोसी परमाणु में एक स्थान रिक्त होकर कोटर बन जाता है।

इस प्रकार क्रिस्टल में कोटर एक स्थान से दूसरे स्थान तक की गति कर सकता है। इसकी गति की दिशा इलेक्ट्रॉन की गति की दिशा के विपरीत होती है। इस प्रकार कोटर एक धनावेशित कण के समान है, अत: अपद्रव्य मिले जर्मेनियम क्रिस्टल को p-टाइप अर्द्धचालक कहते हैं, क्योंकि इसमें आवेश वाहक (कोटर) धनात्मक होते हैं। अपद्रव्य परमाणुओं को ग्राही (acceptor) परमाणु कहते हैं, क्योंकि ये शुद्ध अर्द्धचालक से इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण करते हैं।
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उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि p-टाइप अर्द्धचालक क्रिस्टल में चलनशील (धनात्मक) कोटर होते हैं तथा इतनी ही संख्या में स्थिर (ऋणात्मक) ग्राही आयन होते हैं (चित्र-14.25), परन्तु p-टाइप अर्द्धचालकों में कोटरों की गतिशीलता n-टाइप अर्द्धचालकों में इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता की तुलना में कम होती है।

प्रश्न 5.
p-n सन्धि डायोड का अग्र दिशिक (अभिनत) तथा उत्क्रम दिशिक (अभिनत) वैद्युत परिपथ खींचकर समझाइए। दोनों अवस्थाओं हेतु प्राप्त अभिलक्षण वक्रों को समझाइए। [2008, 11, 12, 15]
अथवा
p-8 सन्धि डायोड में अग्र-अभिनत और उत्क्रम-अभिनत से आप क्या समझते हैं? आवश्यक परिपथ आरेख बनाइए तथा दोनों विन्यासों को समझाइए। [2017, 18]
अथवा
p-n सन्धि डायोड क्या है? इसमें अवक्षय परत तथा विभव प्राचीर कैसे बनते हैं? [2006]
अथवा
उपयुक्त परिपथों की सहायता से prn सन्धि डायोड में वैद्युत धारा प्रवाह की व्याख्या कीजिए। [2013]
अथवा
p-n सन्धि डायोड क्या है? [2014, 16]
अथवा
पश्चदिशिक बायसित सन्धि डायोड में धारा कम क्यों बहती है? [2018]
अथवा
p-n सन्धि डायोड के लिए अग्रदिशिक परिपथ आरेख खींचिए। [2017]
उत्तर :
p.n सन्धि डायोड (p-n Junction Diode)-जब एक p-टाइप अर्द्धचालक क्रिस्टल को एक विशेष विधि द्वारा n-टाइप अर्द्धचालक क्रिस्टल के साथ जोड़ा जाता है तो इस संयोजन को जहाँ पर क्रिस्टल जुड़ते हैं उसे p-n सन्धि कहते हैं (चित्र-14.26)| p-टाइप क्षेत्र में कोटर बहुसंख्यक आवेश वाहक होते हैं तथा इतने ही स्थिर ऋणात्मक ग्राही आयन होते हैं जबकि n-टाइप क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक होते हैं तथा इतने ही स्थिर धनात्मक दाता आयन होते हैं। इस प्रकार दोनों क्षेत्र वैद्युत उदासीन होते हैं।

विभव प्राचीर अथवा p-n सन्धि पर अवक्षय परत का बनना-जैसे ही p-n सन्धि बनती है, ऊष्मीय विक्षोभ के कारण सन्धि के आर-पार आवेश वाहकों का विसरण प्रारम्भ हो जाता है। n-टाइप क्रिस्टल से कुछ इलेक्ट्रॉन p-टाइप क्रिस्टल में तथा p-टाइप क्रिस्टल से कुछ कोटर n-टाइप क्रिस्टल में विसरित हो जाते हैं। विसरण के बाद, ये आवेश वाहक अपने-अपने पूरकों से मिलकर परस्पर उदासीन हो जाते हैं। इस प्रकार सन्धि के समीप n-क्षेत्र में धनावेशित दाताओं की अधिकता तथा p-क्षेत्र में ऋणावेशित ग्राहियों की अधिकता हो जाती है (चित्र-14.27)। इससे सन्धि पर एक आन्तरिक वैद्युत क्षेत्र E; स्थापित हो जाता है जो धन n-क्षेत्र से, ऋण p-क्षेत्र की ओर दिष्ट होता है। कुछ समय पश्चात् यह क्षेत्र इतना प्रबल हो जाता है कि आवेश वाहकों का और आगे विसरण रुक जाता है, क्योंकि इलेक्ट्रॉन क्षेत्र के विपरीत दिशा में चलते हैं तथा कोटर क्षेत्र की दिशा में चलते हैं, अत: वैद्युत क्षेत्र Ei इन्हें चलने से रोक देता है।
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इस प्रकार सन्धि के दोनों ओर एक बहुत पतली परत बन जाती है, जिसमें आवेश वाहक नहीं रहते हैं। इस परत को अवक्षय परत (depletion layer) कहते हैं। इसकी मोटाई 10-6 मीटर कोटि की होती है। इस अवक्षय परत के सिरों के बीच उत्पन्न वैद्युत वाहक बल को सम्पर्क विभव अथवा विभव प्राचीर कहते हैं। सम्पर्क विभव सन्धि के ताप पर निर्भर करता है तथा इसका मान 0.1 से लेकर 0.5 वोल्ट के बीच होता है। सन्धि डायोड का प्रतीक चित्र-14.28 में प्रदर्शित किया गया है। इसमें p को ऐनोड तथा n को कैथोड कहते हैं।

p-n सन्धि डायोड में वैद्युत धारा का प्रवाह-किसी बाह्य बैटरी की अनुपस्थिति में सन्धि डायोड में कोई धारा नहीं बहती है [चित्र-14.28 (a)]| जब इस सन्धि के सिरों को किसी बैटरी के ध्रुवों से जोड़कर इस पर कोई वोल्टता लगाई जाती है तो इसमें वैद्युत धारा प्रवाहित हो जाती है। p-n सन्धि डायोड पर बैटरी को दो प्रकार से जोड़ा जा सकता है-

1. अग्र अभिनत (Forward Bias)-“जब p-n सन्धि डायोड के p-टाइप क्रिस्टल को बाह्य बैटरी के धन सिरे से तथा n-टाइप क्रिस्टल को बैटरी के ऋण सिरे से जोड़ते हैं तो यह सन्धि अग्र अभिनत या फॉरवर्ड बायस कहलाती है” [चित्र-14.28 (a)]। इस दशा में pn सन्धि डायोड · में p-क्षेत्र से n-क्षेत्र की ओर एक बाह्य वैद्युत क्षेत्र E स्थापित हो जाता है। यह क्षेत्र आन्तरिक वैद्युत क्षेत्र E; से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। इस प्रकार सन्धि डायोड में वैद्युत क्षेत्र E के कारण कोटर क्षेत्र से n-क्षेत्र की ओर वैद्युत क्षेत्र E की दिशा में चलने लगते हैं जबकि इलेक्ट्रॉन n-क्षेत्र से p क्षेत्र की ओर वैद्युत क्षेत्र E की विपरीत दिशा में चलने लगते हैं। सन्धि के समीप पहुँचकर ये कोटर तथा . इलेक्ट्रॉन परस्पर संयोग करके विलुप्त हो जाते हैं।

प्रत्येक इलेक्ट्रॉन कोटर संयोग के लिए pक्षेत्र में बैटरी के धन सिरे के समीप एक सहसंयोजक बन्ध टूट जाता है। इससे उत्पन्न कोटर तो सन्धि की ओर चलने लगता है जबकि इलेक्ट्रॉन संयोजक तार में से होकर बैटरी के धन सिरे में प्रवेश कर जाता है। ठीक इसी क्षण बैटरी के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन निकलकर n-क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है तथा सन्धि के समीप इलेक्ट्रॉन-कोटर संयोग प्रक्रिया में लुप्त इलेक्ट्रॉन का स्थान ले लेता है। इस प्रकार p-n सन्धि डायोड में बहुसंख्यक आवेश वाहकों की गति के कारण उच्च वैद्युत धारा बहने लगती है। इस उच्च वैद्युत धारा को ही अग्र धारा कहते हैं। इस उच्च धारा के अतिरिक्त अल्पसंख्यक वाहकों की गति के कारण भी एक अल्प उत्क्रम धारा बहती है। परन्तु यह लगभग नगण्य होती है [चित्र-14.28 (b)]। इस प्रकार बाह्य परिपथ में केवल इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण ही धारा बहती है। कोटर
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चूँकि अग्र अभिनत में आरोपित वैद्युत क्षेत्र E आन्तरिक वैद्युत क्षेत्र E1 से अधिक शक्तिशाली होता है। इस कारण बहुसंख्यक आवेश वाहक (pक्षेत्र में कोटर तथा n-क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन) सन्धि की ओर आकर्षित होते हैं जिसके कारण. अवक्षय परत की मोटाई कम हो जाती है। इसीलिए अग्र अभिनत सन्धि डायोड का धारा प्रवाह के लिए प्रतिरोध कम होता है। चित्र-14.28 में p-n सन्धि पर आरोपित अग्र वोल्टेज तथा अग्र धारा के बीच खींचा गया ग्राफ प्रदर्शित है। प्रारम्भ में जर्मेनियम के लिए 0.3 वोल्ट पर विरोधी विभव प्राचीर के कारण धारा लगभग शून्य रहती है। आरोपित वोल्टेज के बढ़ाने पर, धारा बहुत धीरे-धीरे एवं अरैखिक रूप से तब तक बढ़ती है जब तक कि आरोपित वोल्टेज, विभव प्राचीर से अधिक नहीं हो जाती है [चित्र-14.28 (b) में OA भाग]। जब आरोपित वोल्टेज को और बढ़ाया जाता है तो धारा रैखिक रूप में आगे बढ़ती है (AB भाग)। यदि रेखा AB को पीछे की ओर बढ़ाया जाए तो यह वोल्टेज अक्ष को विभव प्राचीर वोल्टेज पर काटती है।

2. उत्क्रम अभिनत (Reverse Bias)-“जब p-n सन्धि डायोड के p-टाइप क्रिस्टल को बैटरी के ऋण सिरे से तथा n-टाइप क्रिस्टल को बैटरी के धन सिरे से जोड़ते हैं तो यह सन्धि उत्क्रम अभिनत या रिवर्स बायस कहलाती है” [चित्र-14.29 (a)]। इस दशा में p-n सन्धि डायोड में n से p की ओर एक बाह्य वैद्युत क्षेत्र E उत्पन्न हो जाता है, जो आन्तरिक वैद्युत क्षेत्र E; की सहायता करता है। अत: p-क्षेत्र के कोटर बैटरी के ऋण सिरे की ओर तथा n-क्षेत्र के इलेक्ट्रॉन बैटरी के धन सिरे की ओर आकर्षित होकर p-n सन्धि से दूर हो जाते हैं, जिसके कारण धारा प्रवाह पूर्णत: बन्द हो जाता है।
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जब p-n सन्धि उत्क्रम अभिनत होती है तो बहुत क्षीण उत्क्रम धारा परिपथ में बहती है, क्योंकि p तथा n-क्षेत्रों में ऊष्मीय विक्षोभ के कारण क्रमश: कुछ इलेक्ट्रॉन तथा कुछ कोटर विद्यमान रहते हैं. इनको अल्पसंख्यक वाहक कहते हैं। उत्क्रम अभिनत में ये बहुसंख्यक वाहकों की गति का विरोध करते हैं, परन्तु अल्पसंख्यक वाहकों को सन्धि के आर-पार जाने में सहायता करते हैं, जिस कारण बहुत क्षीण उत्क्रम धारा परिपथ में बहने लगती है [चित्र-14.29 (b)]।

इस प्रकार उत्क्रम वोल्टेज (V) तथा उत्क्रम धारा (I) के बीच खींचा गया ग्राफ p-n. सन्धि डायोड का उत्क्रम अभिनत अभिलाक्षणिक वक्र कहलाता है। इससे स्पष्ट है कि उत्क्रम वोल्टेज बढ़ाने पर, उत्क्रम धारा प्रारम्भ में लगभग स्थिर रहती है, परन्तु वोल्टेज बहुत अधिक होने पर, सन्धि के निकट सहसंयोजक बन्ध टूट जाते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म अधिक संख्या में मुक्त हो जाते हैं, इस कारण उत्क्रम धारा एकदम बहुत बढ़ जाती है। इस स्थिति को ऐवेलांश भंजन (avalanche breakdown) कहते हैं।

प्रश्न 6.
p-n सन्धि डायोड को अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे प्रयुक्त किया जाता है? सरल परिपथ बनाकर इसकी कार्य-विधि समझाइए। निवेशी तथा निर्गत वोल्टताओं के तरंग रूप दिखाइए। [2009, 14, 16]
अथवा
सन्धि डायोड का प्रयोग कर अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी का परिपथ आरेख बनाइए। [2017]
उत्तर :
p-n सन्धि डायोड अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी के रूप में (p-n Junction Diode as a Half Wave Rectifier)-p-n सन्धि डायोड, अग्र अभिनत स्थिति में धारा को एक ‘दिशा में प्रवाहित करने के लिए इसके मार्ग में बहुत कम प्रतिरोध लगाता है तथा उत्क्रम अभिनत में धारा को विपरीत दिशा में प्रवाहित करने के लिए इसके मार्ग में बहुत अधिक प्रतिरोध लगाता है। इस गुण के आधार पर p-n सन्धि डायोड, डायोड वाल्व की भाँति दिष्टकारी के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। p-n सन्धि डायोड का अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी परिपथ चित्र-14.30 (a) में तथा इसके निवेशी व निर्गत तरंग रूपों को चित्र-14.30 (b) में प्रदर्शित किया गया है।

जिस प्रत्यावर्ती वोल्टता को दिष्टीकृत करना होता है अर्थात् निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज को एक उच्चायी ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुण्डली (P) के सिरों के बीच लगा देते हैं। सन्धि डायोड के pक्षेत्र को ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयक कुण्डली S के एक सिरे A से जोड़ देते हैं तथा n-क्षेत्र को एक लोड प्रतिरोध RL के सिरे C से जोड़ देते हैं। लोड प्रतिरोध RL का दूसरा सिरा D द्वितीयक कुण्डली के दूसरे सिरे B से जोड़ देते हैं। निर्गत दिष्ट वोल्टेज (या विभव) को लोड प्रतिरोध RL के सिरों पर प्राप्त किया जाता है।
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कार्य-विधि-निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के पहले आधे चक्र में, जब द्वितीयक कुण्डली का A सिरा B सिरे के सापेक्ष धनात्मक है (अर्थात् सन्धि डायोड का p-क्षेत्र धनात्मक तथा n-क्षेत्र ऋणात्मक विभव पर होता है) तो p-nसन्धि डायोड अग्र अभिनत होता है, अत: इसमें से होकर धारा प्रवाहित होती है। इस प्रकार से लोड प्रतिरोध RL में धारा C से D की ओर बहती है। इसके विपरीत निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दूसरे आधे चक्र में, जब द्वितीयक कुण्डली का A सिरा B सिरे के सापेक्ष ऋणात्मक है (अथवा सन्धि डायोड का p-क्षेत्र ऋणात्मक तथा n-क्षेत्र धनात्मक विभव पर होता है) तो p-n सन्धि डायोड उत्क्रम अभिनत होता है।

इस दशा में लोड प्रतिरोध RL में धारा शून्य होती है। इस प्रकार निर्गत धारा केवल निवेशी वोल्टता के पहले आधे चक्रों में प्रवाहित होती है शेष आधे चक्र कट जाते हैं। चित्र-14.30 (b) के निचले भाग में धारा का तरंग रूप दिखाया गया है जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर (अर्थात् थोड़ी-थोड़ी देर में) धारा के एकदिशीय स्पन्द प्रदर्शित हैं। इस प्रकार p-n सन्धि डायोड अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी की भाँति कार्य करता है।

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प्रश्न 7.
p-n सन्धि डायोड को पूर्ण-तरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे प्रयुक्त किया जाता है? सरल परिपथ बनाकर इसकी कार्यविधि समझाइए। निवेशी तथा निर्गत तरंग रूप भी प्रदर्शित कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 15, 17]
अथवा
p-n सन्धि डायोड का प्रयोग कर पूर्ण-तरंग दिष्टकारी का परिपथ आरेख बनाइए। निर्गत तरंग-रूपों को प्रदर्शित कीजिए। [2014, 18]
अथवा
दो p-n सन्धि डायोडों को पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे प्रयुक्त किया जाता है? निवेशी तथा निर्गत
वोल्टताओं के तरंग रूपों को देते हुए, सरल परिपथ आरेख बनाकर इसकी कार्य-विधि समझाइए। [2014]
अथवा
प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में परिवर्तित करने हेतु आवश्यक परिपथ का नामांकित आरेख बनाइए। निर्गत धारा का चित्रांकन भी कीजिए। [2018]
उत्तर :
p-n सन्धि डायोड पूर्ण-तरंग दिष्टकारी के रूप में (p-n Junction Diode as Full Wave Rectifier)पूर्ण-तरंग दिष्टीकरण क्रिया में निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दोनों अर्द्धचक्रों के समय निर्गत धारा एक ही दिशा में प्राप्त . होती है। इसके लिए दो सन्धि डायोड D1 व D2 इस प्रकार प्रयुक्त किए जाते हैं कि एक डायोड तरंग के पहले आधे चक्र का तथा दूसरा डायोड तरंग के दूसरे आधे चक्र का दिष्टीकरण करता है। p-n सन्धि डायोड का पूर्ण-तरंग दिष्टकारी परिपथ चित्र-14.31 (a) में दिखाया गया है तथा इसके निवेशी व निर्गत तरंग रूपों को चित्र-14.31 (b) में प्रदर्शित किया गया है।

जिस प्रत्यावर्ती वोल्टता का दिष्टकरण करना होता है (अर्थात् निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज) उसे एक ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुण्डली P के सिरों के बीच जोड़ते हैं। ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयक कुण्डली के A व B सिरों को दो p-n सन्धि डायोडों के p क्षेत्रों से जोड़ते हैं तथा n-सिरों को परस्पर जोड़कर इनके उभयनिष्ठ बिन्दु M तथा द्वितीयक कुण्डली S1S2 के केन्द्रीय अंश निष्कासित बिन्दु (central tapping point) T के बीच एक लोड प्रतिरोध RL जोड़ देते हैं। निर्गत दिष्ट वोल्टेज को बाह्य. प्रतिरोध RL के सिरों पर प्राप्त किया जाता है।
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कार्य-विधि-निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के पहले आधे चक्र में, जब द्वितीयक कुण्डली का A सिरा मध्य-बिन्दु T के सापेक्ष धनात्मक तथा B सिरा मध्य-बिन्दु T के सापेक्ष ऋणात्मक होता है तो सन्धि डायोड D1 अग्र अभिनत हो जाता है और इसमें धारा प्रवाहित होने लगती है, जबकि इस समय सन्धि डायोड D2 उत्क्रम अभिनत होता है और इसमें धारा नहीं बहती है। सन्धि डायोड D1 से धारा, लोड प्रतिरोध RL में C से D की ओर बहती है, जिससे निर्गत विभव प्राप्त होता है।

निवेशी वोल्टेज के अगले आधे चक्र में, जब ट्रांसफॉर्मर का A सिरा T के सापेक्ष ऋणात्मक तथा B सिरा धनात्मक होता है तो इस समय सन्धि डायोड D1 उत्क्रम अभिनत हो जाता है और इसमें धारा नहीं बहती है, जबकि इस समय सन्धि डायोड D2 अग्र अभिनत हो जाता है और उसमें धारा प्रवाहित होने लगती है। डायोड D2 से धारा, लोड प्रतिरोध RL में पुन: C से D की ओर बहती है, जिससे निर्गत विभव प्राप्त होता है।

इस प्रकार निवेशी विभव के पूर्ण चक्र के लिए बाह्य प्रतिरोध R7 में धारा C से D की ओर प्रवाहित होती है अर्थात् लोड प्रतिरोध में प्रवाहित धारा दिष्ट धारा है। यह निर्गत धारा एकदिशीय स्पन्दों के रूप में होती है, जिसे समकारी फिल्टरों के द्वारा लगभग स्थायी धारा के.रूप में बदला जा सकता है।

प्रश्न 8.
प्रकाश उत्सर्जक डायोड ‘LED’ क्या है? एक परिपथ आरेख खींचिए तथा इसकी क्रिया-विधि समझाइए। प्रचलित लैम्पों की तुलना में इसके लाभ बताइए। [2016]]
अथवा
LED क्या होता है? इसका सिद्धान्त समझाइए। LED में प्रयोग में आने वाली किसी अर्द्धचालक का नाम लिखिए। [2018]
उत्तर :
प्रकाश उत्सर्जक डायोड (Light Emitting Diode : ‘LED’)-प्रकाश उत्सर्जक डायोड एक विशिष्ट प्रकार का अधिक अपमिश्रित (highly doped) p-n सन्धि डायोड होता है जो अग्र-अभिनति (forward biasing) में प्रकाश उत्सर्जित करता है।

प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) सेल एक ऐसी युक्ति है जो अभिनत बैटरी से प्राप्त वैद्युत ऊर्जा को विकिरण ऊर्जा में परिवर्तित करती है। LED का प्रतीक चिह्न तथा परिपथ आरेख चित्र-14.32 में प्रदर्शित किया गया है। LED बनाने के लिए गैलियम आर्सेनाइड (GaAs), गैलियम फॉस्फाइड (GaP), गैलियम आर्सेनाइड फॉस्फाइड (GaAsP) आदि पदार्थ प्रयुक्त किये जाते हैं। LED के p-क्षेत्र को अभिनत बैटरी के धन सिरे से तथा n-क्षेत्र को बैटरी के ऋण सिरे से सम्बन्धित किया जाता है। परिपथ में एक धारा सीमक (current limiting) प्रतिरोध R लगाते हैं जो LED में प्रवाहित धारा को सुरक्षित सीमा से बढ़ जाने पर क्षतिग्रस्त होने से बचाता है। hv उत्सर्जित विकिरण (दृश्य अथवा अदृश्य) की ऊर्जा है।
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कार्यविधि (Working)-जब LED को अग्र-अभिनत किया जाता है तो n-क्षेत्र के बहुसंख्यक आवेश वाहक अर्थात् इलेक्ट्रॉन तथा p-क्षेत्र के बहुसंख्यक आवेश वाहक अर्थात् कोटर सन्धि की ओर गति करते हैं तथा सन्धि क्षेत्र में परस्पर संयोजित हो जाते हैं। संयोजन की इस क्रिया में मुक्त हुई ऊर्जा, वैद्युतचुम्बकीय तरंगों के रूप में सन्धि पर उत्पन्न हो जाती है। ऐसे वैद्युतचुम्बकीय फोटॉन जिनकी ऊर्जा LED के पदार्थ के वर्जित ऊर्जा अन्तराल (forbidden energy gap) के बराबर या उससे कम होती है, LED की सन्धि से बाहर प्रकाश के रूप में आ जाती है। जैसे-जैसे अग्र धारा का मान बढ़ता है LED से उत्सर्जित प्रकाश की तीव्रता भी बढ़ती जाती है और अन्ततः अपना महत्तम मान प्राप्त कर लेती है। यदि अग्र धारा का मान और अधिक बढ़ाएँ तो उत्सर्जित प्रकाश की तीव्रता पुनः घटने लगती है, अत: LED की अभिनति इस प्रकार समायोजित की जाती है कि वह अधिकतम प्रकाश उत्सर्जित करे अर्थात् उसकी दक्षता (efficiency) महत्तम हो।

LED के अभिलक्षण (Characteristics of LED)-LED अवस्था । का वोल्टता-धारा (V-I) अभिलाक्षणिक वक्र, किसी सामान्य p-n. अग्र धारा सन्धि डायोड की भाँति ही होता है, जिसे चित्र-14.33 में प्रदर्शित किया गया है। वक्र में Vf, LED की आन्तरिक अवरोध वोल्टता को प्रदर्शित करता है जिसका मान बैटरी की उस वोल्टता के बराबर होता है जिस पर या जिससे अधिक वोल्टता पर LED में सुचारु रूप से धारा का प्रवाह होता है। अतः वक्र में क्षेत्र-I LED की अक्रियाशील अवस्था (non-active state) को तथा क्षेत्र-II, LED की क्रियाशील अवस्था (active state) को प्रदर्शित करता है।
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LED की परम्परागत प्रदीप्त लैम्पों से तुलना (Comparison of LED’s with Common Incandescent Lamps)-

  1. LED के संचालन के लिए प्रदीप्त लैम्पों की तुलना में बहुत कम वैद्युत वोल्टता एवं शक्ति की आवश्यकता होती है।
  2. LED की दक्षता परम्परागत प्रदीप्त लैम्पों से कई गुना अधिक होती है।
  3. LED का आकार परम्परागत लैम्पों के आकार की अपेक्षा बहुत छोटा होता है।
  4. LED का जीवनकाल, परम्परागत प्रदीप्त लैम्पों की तुलना में बहुत अधिक होता है।
  5. LED के पूर्ण-प्रदीपन के लिए परम्परागत प्रदीप्त लैम्पों की तुलना में बहुत कम समय की आवश्यकता होती है।
  6. LED से उत्सर्जित प्रकाश में ऊष्मीय ऊर्जा लगभग नगण्य होती है, अत: ये ठण्डा प्रकाश उत्सर्जित करते हैं जबकि . परम्परागत प्रदीप्त लैम्प से उत्सर्जित प्रकाश में ऊष्मीय ऊर्जा भी सम्मिलित रहती है।
  7. LED पर्यावरण तथा पारिस्थितिक तन्त्र (ecosystem) को बहुत कम क्षति पहुँचाते हैं। अत: ये अधिक पारिस्थितिक मित्र (eco-friendly) युक्ति है।

LED के उपयोग (Uses of LED)-इसके निम्नलिखित उपयोग हैं

  • कम्प्यूटर तथा कैलकुलेटर के अंक व शब्द प्रदर्शन (alpha numeric display) में LED का प्रयोग किया जाता है।
  • चोर सूचक घण्टी (burglar alarm) बनाने में LED का प्रयोग किया जाता है।
  • प्रकाशीय कम्प्यूटर मैमोरी में सूचना प्रवेश के लिए LED का प्रयोग किया जाता है।
  • LED का उपयोग टी०वी०, डी०वी०डी० प्लेयर, म्यूजिक प्लेयर आदि के रिमोट में अवरक्त विकिरण के उत्सर्जन के लिए किया जाता है।

प्रश्न 9.
फोटो डायोड प्रकाश संसूचक की भाँति कार्य करता है। स्पष्ट कीजिए। [2017]
अथवा
फोटो डायोड में p-n सन्धि डायोड किस प्रकार से संयोजित किया जाता है? इसका क्या उपयोग है? [2016]
अथवा
फोटो डायोड क्या है? प्रकाश संसूचक के रूप में इसके अनुप्रयोग को समझाइए। [2018]
उत्तर :
फोटो डायोड (Photo Diode)-फोटो डायोड एक, ऐसी युक्ति है जो प्रकाशित संकेतों के संसूचन में : प्रयुक्त की जाती है। फोटो डायोड एक प्रकाश संवेदनशील (photosensitive) अर्द्धचालक से बना p-n सन्धि डायोड है जो उत्क्रम अभिनति (reverse biasing) अथवा पश्च-दिशिक में कार्य करता है। यह डायोड सन्धि प्रकाश-प्रभाव पर आधारित है।

रचना- फोटो डायोड का निर्माण करने हेतु एक p-n सन्धि को, जिसका p-क्षेत्र बहुत पतला व पारदर्शी हो, एक काँच अथवा प्लास्टिक के आवरण में इस प्रकार रखा जाता है कि सन्धि के ऊपरी भाग पर प्रकाश सरलतापूर्वक पहुँच जाए। आवरण में प्रयुक्त प्लास्टिक के शेष भागों पर काला पेन्ट कर देते हैं।

कार्यविधि-फोटो डायोड का विद्युतीय परिपथ चित्र-14.34 में प्रदर्शित है। जब p-n सन्धि पर बिना प्रकाश डाले पर्याप्त वोल्टेज (0.1 वोल्ट) लगाकर उत्क्रम अभिनत किया जाता है तो सन्धि के दोनों ओर के अल्पसंख्यक वाहक सन्धि को पार कर जाते हैं, जिसके कारण एक संतृप्त परन्तु लघु धारा (कुछ µA की) का प्रवाह आरम्भ हो जाता है। इस धारा को अदीप्त धारा (dark current) कहते हैं। इस धारा की दिशा सन्धि पर क्षेत्र n से p की ओर होती है। यदि p-n सन्धि पर इतनी ऊर्जा का प्रकाश डाला जाए जिसका परिमाण सन्धि के निषिद्ध ऊर्जा अन्तराल Eg से अधिक (hv > Eg) हो तो, सन्धि के समीप अल्पसंख्यक वाहकों का घनत्व बढ़ जाता है।

सन्धि के उत्क्रम अभिनत होने के कारण जब ये वाहक सन्धि को पार करते हैं तो ये सन्धि पर उत्पन्न धारा की प्रबलता को बढ़ा देते हैं। इस कारण परिपथ की कुल धारा का मान बढ़ जाता है, इस धारा को प्रकाश धारा कहते हैं। फोटो डायोड की सन्धि को प्रदीप्त करने के बाद सन्धि पर पहले से ही मौजूद संतृप्त धारा के मान में हुए परिवर्तन को ज्ञात करके सन्धि पर आपतित प्रकाश की तीव्रता की गणना कर ली जाती है। इस प्रकार यह डायोड प्रकाश संसूचक (light detector) की भाँति कार्य कक्षाएँ।
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उपयोग

  • इसका उपयोग प्रकाश संचालित कुँजियों में किया जाता है।
  • कम्प्यूटर पंच कार्डों आदि को पढ़ने में किया जाता है।

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प्रश्न 10.
सौर सेल की कार्य-विधि उपयुक्त आरेख की सहायता से समझाइए। इसके उपयोग भी लिखिए।
अथवा
सोलर सेल की संरचना तथा कार्य-विधि समझाइए। [2018]
उत्तर :
सौर सेल (Solar Cell)-सौर सेल एक विशिष्ट प्रकार का अनअभिनत (unbiased) p-n सन्धि डायोड होता है जो सौर ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। सौर सेल में p-n सन्धि डायोड का p-टाइप क्षेत्र काफी पतला (लगभग 0.2 um) होता है जिससे इस पर आपतित प्रकाशफोटॉन बिना अधिक अवशोषित हुए p-n सन्धि पर पहुँच जाते हैं। p-टाइप क्षेत्र से एक धात्विक अंगुलीनुमा इलेक्ट्रोड (finger electrode) सम्बन्धित रहता है जो ऐनोड का कार्य करता है। डायोड के n-टाइप क्षेत्र के पदार्थ की प्रकृति, p-टाइप क्षेत्र के पदार्थ की प्रकृति के समान होती है परन्तु इसकी मोटाई p-टाइप क्षेत्र की अपेक्षा बहुत अधिक (लगभग 300 um) होती है। इसके नीचे एक धातु की परत होती है जो कैथोड की भाँति कार्य करती है। सौर सेल की संरचना को चित्र-14.35 (a) तथा इसके प्रतीक को चित्र-14.35 (b) में प्रदर्शित किया गया है।
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कार्य-विधि- सौर सेल बनाने के लिए सिलिकन अर्द्धचालक (Eg = 1.2 ev) तथा गैलियम आर्सेनाइड अर्द्धचालक (GaAs, Eg ≈1:53 ev) का प्रयोग किया जाता है क्योंकि सौर-विकिरण की अधिकतम ऊर्जा लगभग 1.5 ev कोटि की होती है। गैलियम आर्सेनाइड की फोटॉन अवशोषण क्षमता (अवशोषण गुणांक) लगभग 104 प्रति सेमी अति उच्च होती है। अत: यह सौर सेल बनाने के लिए सिलिकन की तुलना में श्रेष्ठ है। जब सूर्य का प्रकाश सौर सेल पर आपतित होता है तो यह p-टाइप क्षेत्र को पार कर p-n सन्धि पर पहुँच जाता है, जहाँ पर यह सहसंयोजी बन्धों को तोड़कर इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म उत्पन्न कर देता है।

अवक्षय परत में n-क्षेत्र से p-क्षेत्र की ओर विद्यमान वैद्युत क्षेत्र E; के कारण p-क्षेत्र में उत्पन्न इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म के इलेक्ट्रॉन n-क्षेत्र की ओर गति करते हैं और शेष बचे कोटर p-क्षेत्र में रह जाते हैं। n-क्षेत्र में उत्पन्न इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म के कोटर वैद्युत क्षेत्र E; के कारण p क्षेत्र की ओर गति करते हैं और शेष बचे इलेक्ट्रॉन n क्षेत्र में रह जाते हैं। इस प्रकार p-क्षेत्र में अतिरिक्त कोटर एवं n-क्षेत्र में अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों के कारण यह युक्ति एक बैटरी की भाँति व्यवहार करती है।

एक सौर सेल से लगभग 0.4 वोल्ट से 0.5 वोल्ट पर लगभग 60 मिलीऐम्पियर धारा प्राप्त होती है। अतः व्यावहारिक उपयोग के लिए अनेक सौर सेलों को एक विशेष श्रेणीक्रम एवं समान्तर-क्रम संयोजन में व्यवस्थित कर. प्रयुक्त करते हैं। सौर सेलों के संयोजन से बनी यह युक्ति सोलर पैनल (solar panel) कहलाती है।

सौर सेल के उपयोग (Uses of Solar Cell)-
1. सौर सेलों से बने सोलर पैनलों का प्रयोग सुदूर क्षेत्रों (remote areas) में जहाँ वैद्युत ऊर्जा के कोई भी स्रोत उपलब्ध नहीं होते हैं, स्ट्रीट लाइट, रेडियो, टेलीविजन आदि उपकरणों को चलाने में किया जाता है।

2. सौर सेलों से बने सोलर पैनलों का प्रयोग सोलर वाटर हीटर के रूप में किया जाता है।

3. कृत्रिम उपग्रहों में लगी बैटरियों के आवेशन के लिए सोलर पैनलों का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
जेनर डायोड क्या है? इसकी धारा-वोल्टता अभिलाक्षणिक खींचिए तथा समझाइए कि यह वोल्टता . नियन्त्रक के रूप में कैसे कार्य करता है? [2015]
अथवा
जेनर डायोड क्या होता है? इसका प्रतीक चिह्न प्रदर्शित कीजिए। जेनर डायोड का वोल्टता नियन्त्रक के रूप में प्रयोग परिपथ बनाकर समझाइए। [2015]
अथवा
जेनर डायोड क्या है? एक परिपथ आरेख की सहायता से जेनर डायोड का उपयोग, वोल्टता नियन्त्रक के रूप में समझाइए। [2015, 16]
अथवा
जेनर डायोड क्या है? जेनर डायोड का उपयोग वोल्टेज रेगुलेटर (stablizer) के रूप में परिपथ आरेख की सहायता से समझाइए। [2014, 15, 17, 18]
अथवा
उचित परिपथ आरेख की सहायता से विभव नियन्त्रक के रूप में जेनर डायोड की क्रियाविधि समझाइए। [2016]]
अथवा
वोल्टता-नियन्त्रक के रूप में जेनर डायोड की उपयोगिता उपयुक्त परिपथ द्वारा स्पष्ट कीजिए। [2017, 18]
उत्तर :
जेनर डायोड अथवा भंजक डायोड (Zener Diode or Breakdown Diode)—“जेनर डायोड विशेष रूप से निर्मित अधिक अपमिश्रित (heavily doped) p-n सन्धि डायोड होता है जो उत्क्रम अभिनति में भंजक वोल्टता (breakdown voltage) पर बिना खराब हुए निरन्तर कार्य कर सकता है।” जेनर डायोड का प्रतीक [चित्र-14.36 (a)] से प्रदर्शित है।

जेनर डायोड में p-n सन्धि डायोड के अधिक अपमिश्रित होने के कारण p-क्षेत्र में ग्राही तथा n-क्षेत्र में दाता अशुद्धियों के उच्च घनत्व के कारण अवक्षय परत की चौड़ाई बहुत कम (लगभग 1 µm) हो जाती है जिसके फलस्वरूप बाह्य बैटरी द्वारा आरोपित सूक्ष्म उत्क्रम वोल्टता (5 वोल्ट) के संगत सन्धि क्षेत्र में वैद्युत क्षेत्र बहुत अधिक हो जाता है। यह प्रबल वैद्युत क्षेत्र संयोजी बैण्ड में उपस्थित इलेक्ट्रॉन को चालन बैण्ड में जाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा दे देता है।

यह इलेक्ट्रॉन अवक्षय परत से होकर n-क्षेत्र की ओर गति करता है। ये इलेक्ट्रॉन ही भंजन के समय उच्च धारा के लिए उत्तरदायी होते हैं। उच्च वैद्युत क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जित होना आन्तरिक क्षेत्रीय उत्सर्जन अथवा क्षेत्रीय आयनन कहलाता है। एक निश्चित उत्क्रम वोल्टता (Vz) के पश्चात् उत्क्रम धारा Iz का मान वोल्टता परिवर्तन के सापेक्ष बहुत तेजी से बढ़ता है। यह निश्चित उत्क्रम वोल्टता, जेनर वोल्टेज (zener voltage) कहलाता है तथा पश्च धारा का अनियन्त्रित रूप से तेजी से बढ़ना जेनर भंजन (zener breakdown) कहलाता है।

जेनर डायोड का धारा-वोल्टता अभिलाक्षणिक वक्र- जेनर डायोड की धारा-वोल्टता अभिलक्षण का विद्युत परिपथ आरेख चित्र-14.36 (b) में प्रदर्शित है। सर्वप्रथम कुंजी K को लगाकर धारा नियन्त्रक Rh की सपी कुंजी J को इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि इसके समान्तर क्रम में जुड़े वोल्टमीटर V का पाठ्यांक न्यूनतम हो जाए। इस स्थिति में वोल्टमीटर V तथा मिलीमीटर mA का पाठ्यांक नोट कर लेते हैं। पश्च वोल्टता को धीरे-धीरे बढ़ाकर उसके संगत वोल्टमीटर V तथा मिलीअमीटर (mA) के पाठ्यांक नोट कर लेते हैं।

इस पश्च वोल्टता को तब तक बढ़ाते जाते हैं जब तक कि मिलीअमीटर mA के पाठ्यांकों में अचानक से वृद्धि न हो जाए। जिस क्षण ऐसा होता है उस क्षण वोल्टमीटर का पाठ्यांक जेनर भंजक वोल्टता Vz को. निरूपित करेगा। पश्च वोल्टता Vz को थोड़ा सा बढ़ाकर, उसके संगत पश्च धारा के मानों को नोट कर लेते हैं। इन पाठ्यांकों की सहायता धारा i व वोल्टता में ग्राफ खींचते है। यही ग्राफ जेनर डायोड का धारा वोल्टता अभिलक्षण ग्राफ कहलाता है [चित्र-14.36(c)]]
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जेनर डायोड से प्रवाहित होने वाली धारा में अत्यधिक परिवर्तन होने पर भी जेनर वोल्टता नियत रहती है। इसी गुण के कारण जेनर डायोड को दिष्ट वोल्टता नियन्त्रक (dc voltage regulator) के रूप में प्रयोग किया जाता है।

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जेनर डायोड वोल्टता नियन्त्रक के रूप में (Zener Diode as Voltage Stabilizer)- जेनर डायोड को वोल्टता नियन्त्रक के रूप में प्रयुक्त करने के लिए आवश्यक परिपथ को चित्र-14.37 में प्रदर्शित किया गया है। जेनर डायोड पर एक स्पन्दित दिष्ट वोल्टता Vinput को श्रेणीक्रम में संयोजित प्रतिरोध R से होते हुए जेनर डायोड से इस प्रकार संयोजित करते हैं कि जेनर डायोड उत्क्रम अभिनत हो। जब निवेशी वोल्टता में वृद्धि होती है तो जेनर डायोड तथा प्रतिरोध R से प्रवाहित होने वाली धारा में वृद्धि हो जाती है। यदि जेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता Vinput का मान जेनर डायोड के जेनर वोल्टता (Vz) से अधिक है तो डायोड भंजन स्थिति में होता है तथा जेनर डायोड की जेनर वोल्टता नियत रहती है, अत: जेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता में कोई परिवर्तन हुए बिना ही R के सिरों पर वोल्टता में वृद्धि हो जाती है।

 

इसी प्रकार जब निवेशी वोल्टता घटती है तो जेनर डायोड व प्रतिरोध R से प्रवाहित होने वाली धारा में कमी हो जाती है। अब जेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता में कोई परिवर्तन हुए बिना ही R के सिरों पर वोल्टता में कमी हो जाती है। इस पर निवेशी वोल्टता के बढ़ने या घटने पर जेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता में कोई परिवर्तन हुए बिना प्रतिरोध R के सिरों पर वोल्टता में वृद्धि अथवा कमी हो जाती है। इस प्रकार जेनर डायोड वोल्टता नियन्त्रक के रूप में कार्य करता है।

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प्रश्न 12.
ट्रांजिस्टर क्या होता है? आवश्यक चित्र की सहायता से p-n-p ट्रांजिस्टर की रचना तथा कार्यविधि समझाइए।
अथवा
p-n-p ट्रांजिस्टर की रचना एवं कार्य-विधि का वर्णन कीजिए। [2017]
उत्तर :
ट्रांजिस्टर (Transistor)-सन्धि ट्रांजिस्टर p तथा n प्रकार के अर्द्धचालकों से बनी एक इलेक्ट्रॉनिक युक्ति है, जो ट्रायोड वाल्व के स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। ट्रांजिस्टर दो प्रकार के होते हैं

  • p-n-p ट्रांजिस्टर,
  • n-p-n ट्रांजिस्टर।

1. P-n-p ट्रांजिस्टर की रचना-इसमें n-टाइप अर्द्धचालक की एक बहुत पतली परत को दो p-टाइप अर्द्धचालकों के छोटे-छोटे क्रिस्टलों के बीच दबाकर रखते हैं [चित्र-14.38 (a)]। इस बहुत पतली n परत को आधार (base) तथा इसके बाएँ व दाएँ क्रिस्टलों को क्रमशः उत्सर्जक (emitter) व संग्राहक (collector) कहते हैं। इन्हें क्रमश: B, E तथा C से प्रदर्शित करते हैं। उत्सर्जक को आधार के सापेक्ष, धन विभव तथा संग्राहक को आधार के सापेक्ष, ऋण विभव दिया जाता है। इस प्रकार बायीं ओर की.उत्सर्जक आधार (p-n) संधि अग्र अभिनत (अल्प प्रतिरोध वाली) है तथा दायीं ओर की आधार संग्राहक (n-p) संधि उत्क्रम अभिनत (उच्च प्रतिरोध वाली) है। इसका प्रतीक चित्र-14.38 (b) में दिखाया गया है, जिसमें बाण की दिशा वैद्युत धारा की दिशा (कोटरों के चलने की दिशा) को प्रदर्शित करती है।
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p-n-p ट्रांजिस्टर की कार्य-विधि- चित्र-14.39 में p-n-p ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार परिपथ दिखाया. गया है। इसके दोनों p-क्षेत्रों में आवेश वाहक (धन) कोटर होते हैं, जबकि n-क्षेत्र में आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसमें बायीं ओर की उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि को बैटरी से थोड़ा-सा अग्र अभिनत विभव VEB देते हैं, जबकि दायीं ओर की आधार-संग्राहक (n-p) सन्धि को बैटरी से बड़ा उत्क्रम अभिनत विभव VCB देते हैं।

उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि के अग्र अभिनत होने के कारण, p-क्षेत्र में उपस्थित कोटर आधार की ओर गति करते हैं, जबकि n-क्षेत्र में उपस्थित इलेक्ट्रॉन p-क्षेत्र (उत्सर्जक) की ओर गति करते हैं। चूँकि आधार बहुत पतला है
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इस कारण इसमें प्रवेश करने वाले अधिकतर कोटर (लगभग 98%) इसे पार करके संग्राहक C तक पहुँच जाते हैं, जबकि उनमें से बहुत कम (लगभग 2%) आधार में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों से संयोग करते हैं। जैसे ही कोई कोटर इलेक्ट्रॉन से संयोग करता है वैसे ही उत्सर्जक में बैटरी के धन ध्रुव के निकट एक सहसंयोजक बन्ध टूट जाता है। बन्ध टूटने से उत्पन्न इलेक्ट्रॉन बैटरी के धन ध्रुव से बैटरी में प्रवेश कर जाता है। ठीक इसी क्षण एक नया इलेक्ट्रॉन बैटरी VEB के ऋण सिरे से निकलकर आधार B में प्रवेश करता है। ठीक इसी क्षण एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक E में से निकलकर बैटरी VEB के धन सिरे पर पहुँचता है। इस कारण उत्सर्जक E में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है, जो आधार की ओर चलना प्रारम्भ कर देता है। इस प्रकार आधार उत्सर्जक परिपथ में एक क्षीण आधार धारा (IB) बहने लगती है।

जो कोटर संग्राहक में प्रवेश कर जाते हैं, वे उत्क्रम अभिनत के कारण टर्मिनल C पर पहुँच जाते हैं। जैसे ही कोई कोटर टर्मिनल C पर पहुँचता है, बैटरी VCB के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन आकर उसे उदासीन कर देता है, पुनः ठीक इसी क्षण एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक E से निकलकर बैटरी VEB के धन सिरे पर पहुँच जाता है। इस कारण उत्सर्जक में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है जो आधार की ओर चलना प्रारम्भ कर देता है। इस प्रकार संग्राहक उत्सर्जक परिपथ में सग्राहक धारा Ic बहने लगती है। आधार टर्मिनल B से चलने वाली धारा को आधार धारा IB तथा संग्राहक टर्मिनल C से बाहर जाने वाली धारा को संग्राहक धारा IC कहते हैं। धाराएँ IB तथा IC मिलकर उत्सर्जक E में प्रवेश करती हैं, अतः इसे उत्सर्जक धारा IE कहते हैं।
अत: IE = IB +Ic
इस प्रकार p-n-p ट्रांजिस्टर के अन्दर धारा प्रवाह कोटरों के उत्सर्जक से संग्राहक की ओर चलने के कारण होता है, जबकि बाहरी परिपथ में इलेक्ट्रॉनों के चलने के कारण होता है।

आधार के बहुत पतला होने के कारण आधार में संयोजित होने वाले कोटर-इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत कम होती है। इस कारण लगभग सभी कोटर, जो उत्सर्जक से आधार में प्रवेश करते हैं, संग्राहक तक पहुँच जाते हैं इसलिए संग्राहक धारा Ic, उत्सर्जक धारा IE से कुछ ही कम होती है।

प्रश्न 13.
आवश्यक चित्र की सहायता से n-p-n ट्रांजिस्टर की रचना तथा कार्यविधि समझाइए। [2012]
अथवा
n-p-n ट्रांजिस्टर में वैद्युत चालन की क्रिया को समझाइए। इसमें आधार पतला क्यों होता है? p-n-p ट्रांजिस्टर की तुलना में यह अधिक उपयोगी क्यों है? [2018]
उत्तर :
n-p-n ट्रांजिस्टर की रचना-इसमें p-टाइप अर्द्धचालक की एक बहुत पतली परत को दो n-टाइप अर्द्धचालकों के छोटे-छोटे क्रिस्टलों के बीच दबाकर रखते हैं। इस पतली परत p को आधार (base) तथा इसके बाएँ व दाएँ क्रिस्टलों को क्रमश: उत्सर्जक (emitter) व संग्राहक (collector) कहते हैं। इन्हें क्रमश: B, E तथा C से प्रदर्शित करते हैं। उत्सर्जक को आधार के सापेक्ष, ऋण विभव तथा संग्राहक को आधार के सापेक्ष धन विभव दिया जाता है। इस प्रकार बायीं ओर की उत्सर्जक-आधार (n-p) सन्धि अग्र अभिनत है तथा दायीं ओर की आधार-संग्राहक (p-n) सन्धि उत्क्रम अभिनत है। इसका प्रतीक चित्र-14.40 (b) में दिखाया गया है, जिसमें बाण की दिशा वैद्युत धारा की दिशा .(इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की विपरीत दिशा) को प्रदर्शित करती है।
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n-p-n ट्रांजिस्टर की कार्यविधि-n-p-n ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार परिपथ [चित्र-14.41] में दिखाया गया है। इसके दोनों n-क्षेत्रों में आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि मध्य के पतले p-क्षेत्र में आवेश वाहक (धन) कोटर होते हैं। इसमें बायीं ओर के उत्सर्जक आधार (n-p) सन्धि को बैटरी से थोड़ा-सा अग्र अभिनत विभव VBE दिया जाता है, जबकि दायीं ओर की आधार संग्राहक (p-n) सन्धि को बैटरी से बड़ा उत्क्रम अभिनत विभव VBc दिया जाता है।
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उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि के अग्र अभिनत होने के कारण, उत्सर्जक , आधार उत्सर्जक (n-क्षेत्र) में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आधार की ओर गति करते हैं, जबकि आधार (p-क्षेत्र से) कोटर उत्सर्जक की ओर गति करते हैं। चूँकि आधार बहुत पतला है। इस कारण इसमें प्रवेश करने वाले अधिकतर इलेक्ट्रॉन (लगभग 98%), इसे पार करके संग्राहक C तक पहुँच जाते हैं जबकि उनमें से बहुत कम (लगभग 2%) आधार में | उपस्थित कोटरों से संयोग करते हैं। जैसे ही कोई इलेक्ट्रॉन कोटर से संयोग करता है वैसे ही बैटरी VEB के धन सिरे के निकट आधार में एक सहसंयोजक बन्ध टूट जाता है। बन्ध टूटने से आधार में उत्पन्न इलेक्ट्रॉन टर्मिनल B से बैटरी VEB के धन सिरे से बैटरी में प्रवेश करता है। ठीक इसी क्षण एक इलेक्ट्रॉन बैटरी VEB के ऋण सिरे से निकलकर टर्मिनल E के द्वारा उत्सर्जक में प्रवेश करता है। आधार से. एक इलेक्ट्रॉन के बैटरी VEB में प्रवेश करने पर आधार में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है जो संयोग के कारण नष्ट हुए कोटर की क्षतिपूर्ति करता है। इस प्रकार आधार उत्सर्जक परिपथ में आधार धारा (IB) बहने लगती है।

जो इलेक्ट्रॉन संग्राहक में प्रवेश कर जाते हैं, वे उत्क्रम अभिनत के कारण टर्मिनल C पर पहुँच जाते हैं। जैसे ही कोई इलेक्ट्रॉन टर्मिनल C को छोड़कर बैटरी VBC के धन सिरे में प्रवेश करता है, वैसे ही बैटरी VBE के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक में प्रवेश करता है। इस प्रकार संग्राहक-उत्सर्जक परिपथ में धारा बहने लगती है।

आधार टर्मिनल B में प्रवेश करने वाली क्षीण धारा को आधार धारा IB तथा संग्राहक टर्मिनल C में प्रवेश करने वाली संग्राहक धारा Ic मिलकर उत्सर्जक टर्मिनल E से निकलती हैं, अत: इसे उत्सर्जक धारा IE कहते हैं।
अतः IE = IB + Ic

इस प्रकार n-p-n ट्रांजिस्टर के अन्दर तथा बाह्य परिपथ में धारा प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है।
ट्रांजिस्टर में आधार पतला रखे जाने का कारण-ट्रांजिस्टर के आधार क्षेत्र में कोटरों तथा इलेक्ट्रॉनों के संयोजन को कम करने के लिए आधार को पतला बनाया जाता है। n-p-n ट्रांजिस्टर, p-n-p ट्रांजिस्टर की तुलना में अधिक उपयोगी होता है क्योंकि इसमें धारा वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि p-n-p ट्रांजिस्टर में धारा वाहक कोटर होते हैं। धारा वाहक इलेक्ट्रॉन, कोटर की अपेक्षा अधिक गतिशील होते हैं।

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प्रश्न 14.
ट्रांजिस्टर परिपथ के विन्यास कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
ट्रांजिस्टर परिपथ के विन्यास-ट्रांजिस्टर में तीन टर्मिनल उत्सर्जक (E), आधार (B) तथा संग्राहक (C) होते हैं। अतः किसी परिपथ में निवेशी तथा निर्गत का संयोजन इस प्रकार होना चाहिए कि तीनों टर्मिनलों में से कोई एक (E या B या C) निवेशी तथा निर्गत में उभयनिष्ठ हो। इस आधार पर ट्रांजिस्टर को तीन विन्यासों में संयोजित किया जा सकता है।
1. उभयनिष्ठ आधार विन्यास- इस विन्यास में ट्रांजिस्टंर के आधार टर्मिनल (B) को निर्गत तथा निवेशी परिपथों के मध्य उभयनिष्ठ करके भू-सम्पर्कित कर देते हैं
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2. उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास-इस विन्यास में उत्सर्जक टर्मिनल (E) को निर्गत तथा निवेशी परिपथों के मध्य उभयनिष्ठ करके भू-सम्पर्कित कर देते हैं [चित्र-14.42 (b)]।

3. उभयनिष्ठ संग्राहक विन्यास–इस विन्यास में संग्राहक टर्मिनल (C) को निर्गत तथा निवेशी परिपथों के मध्य उभयनिष्ठ करके भू-सम्पर्कित कर देते हैं [चित्र-14.42 (c)]|

प्रश्न 15.
ट्रांजिस्टर के अभिलक्षण वक्र क्या हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में n-p-n ट्रांजिस्टर के अभिलाक्षणिक वक्र परिपथ आरेख बनाकर समझाइए।
अथवा
उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में n-p-n ट्रांजिस्टर का अभिलाक्षणिक वक्र प्राप्त करने हेतु आवश्यक परिपथ आरेख बनाइए। निवेशी एवं निर्गत अभिलाक्षणिक वक्रों से प्राप्त निष्कर्षों का उल्लेख कीजिए। [2017]
उत्तर :
ट्रांजिस्टर के अभिलक्षण वक्र (Characteristics Curves of Transistor)-किसी ट्रांजिस्टर परिपथ में निर्गत तथा निवेशी धारा के मान में वोल्टता के साथ होने वाले परिवर्तन को निरूपित करने वाले वक्र ट्रांजिस्टर के अभिलाक्षणिक वक्र कहलाते ये तीन प्रकार के होते हैं

  • निवेशी अभिलाक्षणिक वक्र,
  • निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र तथा
  • अन्तरण अभिलाक्षणिक वक्र।

उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में ट्रांजिस्टर के अभिलाक्षणिक वक्र (Characteristic Curves of a Transistor in Common Emitter Configuration)-किसी n-p-n ट्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास को चित्र-14.43 में प्रदर्शित किया गया है। इस विन्यास में आधार-उत्सर्जक परिपथ को निम्न विभव बैटरी VBB की सहायता से अग्र अभिनत तथा संग्राहक-उत्सर्जक परिपथ को उच्च विभव बैटरी Vcc की सहायता से उत्क्रम अभिनत करते हैं। इस विन्यास में संग्राहक टर्मिनल का विभव सर्वाधिक, उत्सर्जक टर्मिनल का विभव सबसे कम तथा आधार टर्मिनल का विभव इन दोनों टर्मिनलों के विभवों के मध्य होना चाहिए। इस विन्यास में निवेशी (input) आधार तथा उत्सर्जक के बीच लगाते हैं तथा निर्गत (output) संग्राहक व उत्सर्जक के बीच प्राप्त होता है।
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निवेशी अभिलाक्षणिक वक्र (Input Characteristics Curve)- ट्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में आधार-उत्सर्जक वोल्टता (VBE) में परिवर्तन के संगत आधार धारा (IB) में परिवर्तन होना निवेशी अभिलाक्षणिक कहलाता है। उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में नियत संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टता के लिए आधार धारा (IB) तथा आधार-उत्सर्जक वोल्टता (VBE) के बीच खींचा गया वक्र, निवेशी अभिलाक्षणिक वक्र कहलाता है। इसके लिए संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टता (VBE ) को 1 वोल्ट पर नियत रखकर आधार-उत्सर्जक वोल्टता (VBE) को धीरे-धीरे बढ़ाते हुए उनके संगत आधार धारा (IB) का मान पढ़ते हैं। इस प्रकार IB तथा VBE के बीच खींचा गया वक्र, निवेशी अभिलाक्षणिक वक्र है। इसी प्रकार अन्य वक्र VCE को 10 वोल्ट पर स्थिर रखकर प्राप्त किया जा सकता है (चित्र-14.44)।
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निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र (Output Characteristics Curve)-ट ्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टता (VCE) में परिवर्तन के साथ संग्राहक धारा (IC) में परिवर्तन होना निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र कहलाता है तथा नियत आधार धारा । (IB) के लिए. संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टता (VCE) तथा संग्राहक धारा (Ic) के बीच खींचा गया वक्र, निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र कहलाता है।

आधार-उत्सर्जक वोल्टता (VBE) में सूक्ष्म वृद्धि करने पर उत्सर्जक क्षेत्र से कोटर धारा तथा आधार क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन धारा दोनों में वृद्धि होती है, जिसके परिणामस्वरूप आधार धारा IB तथा संग्राहक धारा IC में अनुपातिक रूप से वद्धि हो जाती है। अतः स्पष्ट है कि आधार धारा IB में वृद्धि होने पर संग्राहक धारा IC में भी वृद्धि हो जाती है। आधार धारा को 10 µA मान पर नियत रखते हुए संग्राहक-उत्सर्जकं वोल्टता को धीरे-धीरे बढ़ाते हए संगत संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टता (VCE) (वोल्ट में) संग्राहक धारा का मान पढ़ते हैं।
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इस प्रकार संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टता तथा संग्राहक धारा के बीच प्राप्त वक्र ही निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र है। इसी प्रकार अन्य वक्र आधार धारा को 20 µA, 30 µA,… आदि मानों पर स्थिर रखकर प्राप्त किए जा सकते हैं [चित्र-14.45]।

प्रश्न 16.
ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के रूप में किस प्रकार कार्य करता है?.p-n-p तथा n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की भाँति किस प्रकार कार्य करता है? समझाइए।
अथवा
p-n-p ट्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धन की कार्य-विधि परिपथ आरेख खींचकर समझाइए। [2014, 16, 17]
अथवा
n-p-n ट्रांजिस्टर ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के रूप में किस प्रकार कार्य करता है? समझाइए। [2015]
अथवा
n-p-n ट्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धन क्रिया परिपथ आरेख बनाकर समझाइए। हुए। [2016]
अथवा
उभयनिष्ठ उत्सर्जक (CE) प्रवर्धक के रूप में प्रयुक्त ट्रांजिस्टर को परिपथ चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए। इसके धारा लाभ तथा वोल्टेज लाभ का सूत्र प्राप्त कीजिए। स्पष्ट कीजिए कि निवेशी तथा निर्गत सिग्नल एक-दूसरे के विपरीत कला में होते हैं। [2017, 18]
उत्तर :
ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के रूप में (Transistor as an Amplifier)-किसी दुर्बल प्रत्यावर्ती संकेत को . उसकी तरंग प्रकृति को अपरिवर्तित रखते हुए उसकी क्षमता में वृद्धि करने की प्रक्रिया को प्रवर्धन (amplification) तथा इस कार्य के लिए प्रयुक्त होने वाली युक्ति को प्रवर्धक (amplifier) कहते हैं। ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में निम्न तीन विन्यासों में प्रयुक्त किया जा सकता है

  1. उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक
  2. उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक
  3. उभयनिष्ठ संग्राहक प्रवर्धक

P-n-p ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की भाँति (p-n-p Transistor as Common Emitter Amplifier)-चित्र-14.46 में p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का उभयनिष्ठ उत्सर्जक परिपथ प्रदर्शित है। यहाँ उत्सर्जक E के सापेक्ष, आधार ऋणात्मक है तथा उत्सर्जक E व आधार B दोनों के सापेक्ष, संग्राहक ऋणात्मक हैं। उत्सर्जक टर्मिनल उभयनिष्ठ होने के साथ-साथ भू-सम्पर्कित है। इसमें निवेशी सिग्नल को आधार B पर लगाया जाता है और निर्गत सिग्नल को संग्राहक C पर प्राप्त किया जाता है। चूँकि ट्रांजिस्टर में क्षीण आधार धारा के संगत प्रबल संग्राहक धारा प्राप्त होती है, अतः निवेशी सिग्नल को आधार पर लगाने से आधार धारा में अल्प परिवर्तन, संग्राहक धारा में बहुत अधिक परिवर्तन कर देता है। इस प्रकार इस परिपथ से पर्याप्त ‘धारा प्रवर्धन’ प्राप्त होता है, जबकि उभयनिष्ठ आधार परिपथ में धारा की हानि होती है।
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p-n-p ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक के लाभ-p-n-p ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक से प्राप्त विभिन्न लाभ निम्नलिखित हैं

1. ac धारा लाभ (ac Current Gain)-“एक नियत संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टेज पर, संग्राहक धारा में परिवर्तन Δlc तथा इसके संगत आधार धारा में परिवर्तन ΔIB के अनुपात को ट्रांजिस्टर का ac धारा लाभ कहते हैं।” इसे ‘β’ से प्रदर्शित करते हैं।
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सामान्यत: β का मान 20 से 200 तक होता है।

2. ac वोल्टेज लाभ (ac Voltage Gain)-“निर्गत वोल्टेज में परिवर्तन तथा निवेशी वोल्टेज में परिवर्तन के अनुपात को वोल्टेज लाभ अथवा वोल्टेज प्रवर्धन कहते हैं।” इसे ‘Av‘ से प्रदर्शित करते हैं।
ac वोल्टेज लाभ Av = \(\beta \times \frac{R_{2}}{R_{1}}\) [जहाँ R1 व R2 क्रमशः निवेशी तथा निर्गत प्रतिरोध हैं।]

3. ac शक्ति लाभ (ac Power gain)-“वोल्टेज लाभ तथा धारा लाभ के गुणनफल को शक्ति लाभ कहते हैं।” इसे ‘AP‘ से प्रदर्शित करते हैं।
अतः शक्ति लाभ = धारा लाभ × वोल्टेज लाभ अथवा Ap = \(\beta^{2} \times \frac{R_{2}}{R_{1}}\)

4. कला सम्बन्ध (Phase Relationship) उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक में, निर्गत वोल्टेज सिग्नल तथा निवेशी वोल्टेज सिग्नल विपरीत कलाओं में होते हैं, अर्थात् इनके बीच 180° का कलान्तर होता है।
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n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की भाँति (n-p-n Transistor as a Common Emitter Amplifier)-चित्र-14.47 में n-p-n ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का उभयनिष्ठ उत्सर्जक परिपथ प्रदर्शित है। इसमें आधार B, उत्सर्जक E के सापेक्ष धनात्मक है तथा संग्राहक C, उत्सर्जक E तथा आधार B दोनों के सापेक्ष धनात्मक है। उत्सर्जक टर्मिनल उभयनिष्ठ होने के साथ-साथ भू-सम्पर्कित है। इसमें निवेशी सिग्नल को आधार B पर लगाया जाता है तथा निर्गत सिग्नल को संग्राहक C पर प्राप्त किया जाता है। चूँकि । ट्रांजिस्टर में क्षीण आधार धारा के संगत प्रबल संग्राहक धारा 8 प्राप्त होती है। अत: निवेशी सिग्नल को आधार पर लगाने से आधार धारा में अल्प परिवर्तन संग्राहक धारा में बहुत बड़ा परिवर्तन कर देता है। इस प्रकार इस परिपथ में पर्याप्त धारा प्रवर्धन, प्राप्त होता है, जबकि उभयनिष्ठ आधार परिपथ में धारा की हानि होती है।

प्रश्न 17.
दोलित्र क्या है? ट्रांजिस्टर दोलित्र की भाँति किस प्रकार कार्य करता है? चित्र बनाकर समझाइए।
अथवा
परिपथ चित्र की सहायता से n-p-n ट्रांजिस्टर की दोलनी क्रिया समझाइए। [2014]
अथवा
n-p-n ट्रांजिस्टर का दोलित्र के रूप में प्रयोग परिपथ बनाकर समझाइए। [2017]
अथवा
n-p-n ट्रांजिस्टर दोलित्र की भाँति कैसे कार्य करता है? परिपथ चित्र द्वारा समझाइए। [2018]
उत्तर :
दोलित्र (Oscillator)-दोलित्र एक ऐसी युक्ति है जो दिष्ट धारा स्रोत की ऊर्जा का उपयोग करके नियत आवृत्तिः तथा आयाम की प्रत्यावर्ती वोल्टता का उत्पादन करती है।

ट्रांजिस्टर एक दोलित्र की भाँति (Transistor as an E परिपथ Oscillator)-दोलित्र एक धनात्मक पुनर्भरण (feedback) के साथ स्वयं पोषित ट्रांजिस्टर प्रवर्धक होता है (चित्र-14.48)। ट्रांजिस्टर दोलित्र के तीन प्रमुख भाग होते हैं
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1. टैंक परिपथ (Tank Circuit)-यह परिपथ एक प्रेरकत्व (L) तथा धारिता (C) का समान्तर क्रम संयोजन होता है। यह परिपथ \(f=\frac{1}{2 \pi \sqrt{L C}}\) आवृत्ति के अवमन्दित वैद्युत
दोलन उत्पन्न करता है।

2. ट्रांजिस्टर प्रवर्धक (Transistor Amplifier)-टैंक परिपथ से प्राप्त वैद्युत दोलनों की ट्रांजिस्टर प्रवर्धक पर निवेशी के रूप में आरोपित कर देते हैं, जिससे निर्गत के रूप में प्रवर्धित दोलन प्राप्त होते हैं।

3. पुनर्भरण परिपथ (Feedback Circuit)-ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के निर्गत का एक भाग टैंक परिपथ को निवेशी सिग्नल की कला में लौटा देते हैं जो टैंक परिपथ में होने वाली ऊर्जा-हानि की पूर्ति करता है। यह क्रिया धनात्मक पुनर्भरण (positive feedback) कहलाती है। धनात्मक पुनर्भरण के परिणामस्वरूप नियम आयाम के वैद्युत दोलन प्राप्त होते हैं।

परिपथ आरेख- ट्रांजिस्टर को दोलित्र के रूप में प्रयुक्त करने के लिए एक p-n-p ट्रांजिस्टर को उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में चित्र-14.49 में प्रदर्शित किया गया है। चित्र में L1C1 एक टैंक परिपथ तथा L2 एक पुनर्भरण कुंडली है। संधारित्र C2 दोलन के सिरा निम्न प्रतिघात पथ प्रदान करता है। ट्रांजिस्टर का आवश्यक अभिनति श्रेणीक्रम में जुड़े दो प्रतिरोधों R1 व R2 की सहायता से दी जाती है। ट्रांजिस्टर सन्धि के ताप को RE, उत्सर्जक प्रतिरोध से नियन्त्रित करते हैं। प्रवर्धित संकेतों का आधार-उत्सर्जक परिपथ में ऋणात्मक पुनर्भरण रोकने के लिए संधारित्र CE को प्रयुक्त किया जाता है। बैटरी Vcc के द्वारा पूरे परिपथ को DC शक्ति दी जाती है तथा परिपथ में उत्पन्न दोलनों को प्रेरण कुंडली L3 के सिरों पर प्राप्त किया जाता है।
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कार्यविधि-जैसे ही कुंजी K को जोड़ते हैं वैसे ही टैंक परिपथ के संधारित्र C1 को आवेशन प्रारम्भ हो जाता है। जब यह संधारित्र पूर्ण आवेशित हो जाता है तो प्रेरण कुंडली L1 इसे अनावेशित करना प्रारम्भ कर देती है। इसके फलस्वरूप L1C1 टैंक परिपथ में अवमन्दित दोलन उत्पन्न होने लगते हैं। ये दोलन पुनर्भरण कुंडली L2 में L1C1, टैंक परिपथ के समान आवृत्ति का एक विद्युत वाहक बल उत्पन्न कर देते हैं। पुनर्भरण कुंडली L2 में उत्पन्न विद्युत वाहक बल का परिमाण कुंडली में फेरों की संख्या तथा इस कुंडली का प्रेरण कुंडली L1 के सापेक्ष कपलिंग पर निर्भर करता है। अब पुनर्भरण कुंडली L2 के सिरों पर उत्पन्न इस विभवान्तर को ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के आधार व उत्सर्जक (B-E) टर्मिनलों के बीच लगा देते हैं। इस प्रकार यह प्रवर्धित होकर पुनर्भरण की प्रक्रिया द्वारा टैंक परिपथ L1C1 को पुन: प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार परिपथ बिना अवमन्दित हुए दोलन करता रहता है। इसके दोलनों की आवृत्ति \(f=\frac{1}{2 \pi \sqrt{L_{1} C_{1}}}\) की जाती है।

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प्रश्न 18.
ट्रांजिस्टर स्विच के रूप में किस प्रकार कार्य करता है? चित्र बनाकर समझाइए।
अथवा
n-p-n ट्रांजिस्टर स्विच के रूप में कैसे कार्य करता है? आवश्यक परिपथ चित्र द्वारा कार्य-विधि स्पष्ट कीजिए। [2015, 18]
उत्तर :
ट्रांजिस्टर एक स्विच के रूप में (Transistor as a Switch)-स्विच एक ऐसी युक्ति है जिसका प्रयोग किसी परिपथ में धारा को प्रवाहित करने या रोकने के लिए किया जाता है। ट्रांजिस्टर को एक स्विच के रूप में प्रयुक्त करने के लिए एक n-p-n ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ उत्सर्जक परिपथ चित्र-14.50 में प्रदर्शित किया गया है। परिपथ में धारा प्रवाह को प्रदर्शित किया गया है।
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आधार-उत्सर्जक परिपथ में, VBB = IBRB + VBE …(1)
संग्राहक-उत्सर्जक परिपथ में,
Vcc = Ic Rc + VCE अथवा VCE = Vcc – IcRc …..(2)
यदि आधार-उत्सर्जक परिपथ में लगाया गया निवेशी विभव Vi हो तब VBB = Vi
तथा निर्गत विभव V0 हो तब VCE = V0
अत: समीकरण (1) व (2) से,
Vi = I BRB + VBE …….(3)
तथा V0 = VCC – ICRC ……(4)
सिलिकन ट्रांजिस्टर के लिए विभव प्राचीर 0.6 वोल्ट होता है। अत: सिलिकन ट्रांजिस्टर के लिए
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1. जब Vi < 0.6 वोल्ट है, अर्थात् निवेशी विभव ट्रांजिस्टर के विभव प्राचीर से कम हो परिपथ में कोई संग्राहक धारा नहीं बहती है अर्थात्
IC = 0 अत: V0 = VCC
यह स्थिति ट्रांजिस्टर की संस्तब्ध अथवा अंतक अवस्था (cut off state) कहलाती है। इस स्थिति में ट्रांजिस्टर से होकर कोई धारा नहीं बहती है, अतः ट्रांजिस्टर एक खुले स्विच (OFF Switch) की भाँति कार्य करता है।

2. जब 1.0 वोल्ट >Vi > 0.6 वोल्ट है अर्थात् निवेशी विभव, विभव प्राचीर से अधिक परन्तु 1.0 वोल्ट से कम हो तो परिपथ में संग्राहक धारा बहती है। निवेशी विभव के 0.6 वोल्ट आगे धीरे-धीरे बहने पर संग्राहक धारा IC सरल रेखीय रूप में बढ़ती है जिसके परिणामस्वरूप निर्गत वोल्टता V0 भी सरल रेखीय रूप से घटती है। यह स्थिति ट्रांजिस्टर की सक्रिय अवस्था (active state) कहलाती है।

3. जब Vi > 1.0 वोल्ट है अर्थात् निवेशी विभव 1.0 वोल्ट से अधिक हो तो Vi में वृद्धि के साथ V0 अरेखीय रूप में घटता है परन्तु शून्य कभी नहीं होता है। इस स्थिति में संग्राहक धारा अधिकतम हो जाती है तथा यह स्थिति ट्रांजिस्टर की संतृप्त अवस्था (saturation state) कहलाती है।

निवेशी वोल्टता (Vi) के साथ निर्गत वोल्टता (V0) के इन सभी क्षेत्रों में परिवर्तन को चित्र-14.51 में प्रदर्शित किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जब तक निवेशी वोल्टता (Vi) कम है (0.6 वोल्ट से कम) तब तक परिपथ में निर्गत वोल्टता (V0) अधिकतम है तथा संग्राहक धारा (IC) शून्य है। अत: ट्रांजिस्टर अपनी संस्तब्ध अवस्था में है। अतः ट्रांजिस्टर खुले स्विच की भाँति कार्य करता है। जब निवेशी वोल्टता (Vi) उच्च (1.0 वोल्ट से अधिक) है तब संग्राहक धारा अधिकतम अथवा नियत होती है तथा निर्गत वोल्टता (V0) लगभग शून्य होती है।
अत: ट्रांजिस्टर अपनी संतृप्त अवस्था में होता है और यह एक बन्द (ON) स्विच की भाँति कार्य करता है।

इस प्रकार कोई लघु निवेशी वोल्टता, उच्च निर्गत वोल्टता प्रदान कर ट्रांजिस्टर का स्विच खुला (OFF) कर देती है जबकि उच्च निवेशी वोल्टता, लघु निर्गत वोल्टता प्रदान कर ट्रांजिस्टर का स्विच बन्द (ON) कर देती है। ट्रांजिस्टर को स्विच के रूप में प्रयुक्त करते समय परिपथ इस प्रकार से बनाए जाते हैं कि ट्रांजिस्टर कभी भी अपनी सक्रिय अवस्था में न हो।

प्रश्न 19.
ऐनालोग तथा डिजिटल परिपथ क्या है? ऐनालोग परिपथों की तुलना में डिजिटल परिपथों के लाभ बताइए।
उत्तर :
ऐनालोग परिपथ (Analog Circuit)–“ऐसा वैद्युत परिपथ जिस पर आरोपित वोल्टेज अथवा जिसमें प्रवाहित धारा समय के साथ निरन्तर परिवर्तित होती हैं, ऐनालोग परिपथ कहलाता है” तथा “समय के साथ निरन्तर परिवर्तनशील वोल्टेज अथवा धारा को ऐनालोग सिग्नल कहते हैं।” चित्र-14.52 में एक ऐनालोग वोल्टेज सिग्नल को प्रदर्शित किया गया है जो 0 तथा ±5 वोल्ट के बीच ज्या वक्रीय रूप से निरन्तर बदल रहा है।
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डिजिटल परिपथ (Digital Circuits)-“ऐसा वैद्युत परिपथ जिस पर आरोपित वोल्टेज अथवा जिसमें प्रवाहित धारा केवल दो मान (शून्य तथा कोई निश्चित मान) ग्रहण कर सकती है, डिजिटल परिपथ कहलाता है’ तथा “उस वोल्टेज अथवा धारा को जो केवल दो मान ग्रहण कर सकती है, डिजिटल सिग्नल कहते हैं।” चित्र-14.53 में एक डिजिटल सिग्नल को प्रदर्शित किया गया है, जिसमें वोल्टेज केवल दो मान 0 वोल्ट अथवा +5 वोल्ट ग्रहण कर सकती है। अडिजिटल परिपथों में द्विआधारी संख्या पद्धति (binary number system) प्रयुक्त की जाती है, जिसमें डिजिटल सिग्नल के दो मान 0 तथा 1 से प्रदर्शित किए जाते हैं। इस परिपथ का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों, कम्प्यूटरों, धुलाई की मशीनों, टी० वी० आदि में किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक स्विच भी डिजीटल युक्ति है जिसमें दो अवस्थाएँ ON अथवा OFF होती हैं।

डिजिटल परिपथों के लाभ (Advantages of Digital Circuits)- ऐनालोग परिपथों की तुलना में डिजिटल परिपथों के निम्नलिखित लाभ होते हैं

  1. डिजिटल परिपथों को एकीकृत परिपथों (integrated circuits) IC’s में संविरचित (fabricate) किया जा सकता है। इनका उपयोग टेलीविजन, अन्तरिक्ष यानों, श्रवण यन्त्रों, कम्प्यूटरों इत्यादि में किया जाता है।
  2. डिजिटल परिपथों की सहायता से सूचनाएँ संग्रह करना सरल है। IC’s पर सूचनाएँ थोड़े समय के लिए अथवा सदैव के लिए संचित की जा सकती हैं। .
  3. इनमें यथार्थता तथा परिशुद्धता (accuracy and precision) अधिक है।
  4. डिजिटल परिपथ उपयुक्त लॉजिक द्वार (logic gates) का उपयोग करके सरलता से बनाए जा सकते हैं।
  5. डिजिटल परिपथ को एक उपयोग से दूसरे उपयोग के लिए आसानी से बदला जा सकता है।
  6. डिजिटल परिपथों से उपलब्ध आँकड़े (data) परिशुद्ध (precise) परिकलनों में प्रयुक्त किए जा सकते हैं।
  7. डिजिटल परिपथ प्रोग्रामिंग (programming) में प्रयुक्त होते हैं।
  8. डिजिटल परिपथ शोर से कम प्रभावित होते हैं। वास्तव में जिन सिग्नलों को हम निर्गत सिग्नल में नहीं चाहते, उन्हें ‘शोर’ कहते हैं। इन अवांछित सिग्नलों को डिजिटल परिपथ में से आसानी से हटाया जा सकता है क्योंकि यहाँ वोल्टेज के यथार्थ मान के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है।
  9. जिटल परिपथ सस्ते, हल्के, सूक्ष्म व सरल आकार के विश्वसनीय तथा स्थायी होते हैं।

प्रश्न 20.
लॉजिक गेट क्या है? मूल लॉजिक गेट कितने प्रकार के होते हैं? सत्यता सारणी एवं बूलियन व्यंजक को समझाइए।
उत्तर :
लॉजिक गेट अथवा तर्क द्वार (Logic Gates)-लॉजिक गेट ऐसे इलेक्ट्रॉनिक परिपथ हैं जिसमें निवेशी सिग्नल (input signal) एक या एक से अधिक परन्तु निर्गत सिग्नल (output signal) केवल एक ही होता है। इन परिपथों से निर्गत सिग्नल केवल तभी प्राप्त होता है जबकि निवेशी सिग्नलों के बीच कुछ तर्कपूर्ण शर्ते (logic conditions) सन्तुष्ट होती हैं, अतः वे डिजिटल परिपथ, जिनके निवेशी तथा निर्गत सिग्नलों के बीच एक तर्कपूर्ण सम्बन्ध होता है लॉजिक गेट अथवा तर्क द्वार कहलाते हैं।
मूल लॉजिक गेट तीन प्रकार के होते हैं

  1. OR गेट
  2. AND गेट तथा .
  3. NOT गेट

सत्यता सारणी (Truth Table)-किसी लॉजिक गेट का एक अथवा एक से अधिक निवेशी सिग्नल तथा केवल एक निर्गत सिग्नल होता है। किसी लॉजिक गेट के सभी सम्भव निवेशी संयोगों (input combinations) तथा उनके संगत निर्गतों को प्रदर्शित करने वाली सारणी, उस लॉजिक गेट की सत्यता सारणी कहलाती है।

बूलियन व्यंजक (Boolean Expression)—प्रत्येक लॉजिक गेट का एक तर्कयुक्त प्रतीक (Logical symbol) . होता है। जॉर्ज बूल (George Boole) ने सन् 1854 ई० में एक भिन्न प्रकार का बीजगणित विकसित किया जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल परिपथों को सरल रूप देने में किया जाता है। यह बीजगणित ऐसे तर्कसंगत कथनों (logical statements) पर आधारित है जिनके केवल दो अर्थ अथवा मान हो सकते हैं-सत्य (true) मान अथवा असत्य (false) मान। ये तर्कसंगत कथन बूलियन चर (Boolean variables) कहलाते हैं। बूलियन चर के सत्य मान को द्विआधारी (binary) अंक ” से तथा असत्य मान को द्विआधारी अंक ‘0’ से प्रदर्शित करते हैं।

अत: एक ऐसा व्यंजक जो दो बूलियन चरों के ऐसे संयोग को प्रदर्शित करता है जिससे एक नया बूलियन चर प्राप्त होता है, बूलियन व्यंजक कहलाता है जैसे यदि एक बूलियन चर A तथा दूसरा बूलियन चर B है तो Y = A. B तथा Y = A+ B आदि बूलियन व्यंजक हैं।

प्रश्न 21.
मूल लॉजिक गेटों की संक्रियाएँ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मूल लॉजिक गेटों की संक्रियाएँ (Operations in Basic Logic Gates)-मूल लॉजिक गेटों में निम्न तीन संक्रियाएँ प्रयुक्त होती हैं-
1. OR संक्रिया (OR Operation)- बूलियन बीजगणित (Boolean Algebra) में OR संक्रिया को योग चिह्न (+) से प्रदर्शित किया जाता है। इसका बूलियन व्यंजक A+ B = Y होता है तथा इसे ‘A OR Bequals Y’ पढ़ा जाता है, जहाँ A तथा B निवेशी सिग्नल तथा Y निर्गत सिग्नल है। इसमें दो निवेशियों A तथा B से, व्यंजक के अनुसार निर्गत Y प्राप्त होता है।

2. AND संक्रिया (AND Operation)-बूलियन बीजगणित में AND संक्रिया को गुणन चिन्ह (.) से प्रदर्शित किया जाता है। इसका बूलियन व्यंजक A. B = Y होता है तथा इसे ‘A AND B equals Y’ पढ़ा जाता है, जहाँ A तथा B निवेशी सिग्नल तथा Y निर्गत सिग्नल है। इसमें दो निवेशियों A तथा B को, व्यंजक के अनुसार संयुक्त करके निर्गत Y प्राप्त होता है।

3. NOT संक्रिया (NOT operation)-बूलियन बीजगणित में NOT संक्रिया को चर राशि के ऊपर बार चिह्न (-) लगाकर प्रदर्शित किया जाता है। इसका बूलियन व्यंजक \(\overline{\boldsymbol{A}}\) = Y होता है तथा इसे ‘NOT A equals Y’ पढ़ा जाता है, जहाँ A निवेशी सिग्नल तथा Y निर्गत सिग्नल है। NOT संक्रिया को ऋणक्रमण (negation) अथवा उत्क्रमण (inversion) भी कहते हैं। इसमें केवल एक निवेशी (input) होता है तथा इससे उत्पन्न निर्गत (output) निवेशी का ऋणक्रमण होता है।

प्रश्न 22.
OR गेट का प्रतीक बनाइए तथा इसकी सत्यता सारणी बनाइए। सन्धि डायोड का प्रयोग करके इसे दो निवेशी सिग्नलों वाला OR गेट किस प्रकार बनाया जा सकता है? समझाइए।
अथवा OR गेट के लिए लॉजिक प्रतीक, सत्यता सारणी, परिपथ आरेख तथा बूलियन व्यंजक दीजिए। [2015]
उत्तर :
OR गेट की परिभाषा-OR गेट एक ऐसी युक्ति है जिसमें दो या दो से अधिक निवेश चर (input variables) अथवा सिग्नल A व B होते हैं जबकि एक निर्गत चर (output variables) अथवा सिग्नल Y होता है। चित्र-14.54 (a) में दो निवेशी चर A तथा B वाले OR गेट के प्रतीक को प्रदर्शित किया गया है। इसका बुलियन व्यंजक A+ B= Y होता है जिसे ‘A OR B equals Y पढ़ा जाता है। इसकी सत्यता सारणी चित्र-14.54 (c) में प्रदर्शित है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 33
OR गेट की क्रिया पद्धति को चित्र-14.54 (b) में प्रदर्शित वैद्युत परिपथ की सहायता से समझा जा सकता है। इस परिपथ में एक बैटरी, एक बल्ब व दो स्विचों के समान्तर संयोजन को श्रेणीक्रम में जोड़ा गया है। स्पष्ट है कि स्विचों के खुले अथवा बन्द होने का परिणाम हमें बल्ब में देखने को मिलता है, अतः दोनों स्विच A, B निवेशी टर्मिनल हैं तथा बल्ब Y निर्गत टर्मिनल है। जब कोई स्विच बन्द (ON) होता है अर्थात् धारा को गुजरने देता है तो उसकी अवस्था को बाइनरी अंक 1 से प्रदर्शित किया जाता है तथा जब कोई स्विच खुला (OFF) होता है अर्थात् धारा के प्रवाह को रोक देता है तो उसकी अवस्था को बाइनरी अंक 0 से प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रकार जब बल्ब जला होता है तो उसकी अवस्था Y = 1 होगी जबकि बल्ब के बुझे होने पर उसकी अवस्था Y = 0 होगी।
परिपथ से स्पष्ट है कि यदि

  1. A = 0, B= 0; दोनों स्विच खुले (OFF ) हैं तो बल्ब बुझा रहेगा अर्थात् Y = 0
  2. A = 1, B = 0; A बन्द (ON) है, B खुला (OFF ) है तो बल्ब जल जाएगा अर्थात् Y = 1
  3. A = 0, B= 1; A खुला (OFF ) है, B बन्द (ON) है तो बल्ब जल जाएगा अर्थात् Y = 1
  4. A = 1, B= 1 ; दोनों स्विच बन्द (ON) है तो बल्ब जल जाएगा अर्थात् Y = 1

इस प्रकार इस परिपथ का निर्गम Y = 1 होता है, जबकि कम-से-कम एक निवेश 1 है, अत: इस परिपथ के निर्गम और निवेश में OR गेट के समान सम्बन्ध हैं, इसलिए यह OR गेट का तुल्य परिपथ है।

OR गेट प्राप्त करना (Realisation of OR Gate)-इस गेट को दो p-n सन्धि डायोडों को चित्र-14.55 के अनुसार प्रयोग करके प्राप्त किया जा सकता है। इस परिपथ में एक +5 वोल्ट की बैटरी का ऋण सिरा भू-सम्पर्कित रखा गया है, जो 0 स्थिति को तथा धन सिरा (+5 वोल्ट) 1 स्थिति को प्रदर्शित करता है। सत्यता सारणी के अनुसार निवेश के चार सम्भव संयोजन हैं जिन्हें बारी-बारी से आगे समझाया गया है।

1. प्रथम स्थिति, A = 0, B= 0-यदि दोनों निवेश शून्य हैं अर्थात् दोनों डायोडों के सिरों A तथा B को भू-सम्पर्कित रखा जाए (अर्थात् A = B = 0) तो दोनों में से कोई भी डायोड अग्र अभिनत नहीं होगा; अतः प्रतिरोध R में कोई धारा नहीं बहेगी तथा निर्गत विभव Y शून्य होगा (अर्थात् Y = 0)।
अर्थात् 0 + 0 = 0

2. द्वितीय स्थिति, A = 1, B = 0–यदि B को भू-सम्पर्कित करें (B = 0) तथा A को बैटरी के धन सिरे से जोड़ें तो A पर +5 वोल्ट का विभव होगा अर्थात् (A = 1), तब डायोड D1 अग्र अभिनत होगा, जबकि डायोड D2 पश्च अभिनत होगा। D1 से धारा प्रवाहित होगी तथा अग्र अभिनति के कारण D1 का प्रतिरोध लगभग नगण्य होगा। प्रतिरोध R में धारा प्रवाहित होने के कारण इसके सिरों के बीच 5 वोल्ट का विभवान्तर होगा;
अतः Y पर निर्गत विभव 5 वोल्ट होगा (अर्थात् Y = 1)|
अर्थात् 1 + 0 =1
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3. तृतीय स्थिति, A = 0, B = 1-यह स्थिति A को भू-सम्पर्कित करके तथा B को बैटरी के धन सिरे से जोड़कर प्राप्त होगी। इस स्थिति में केवल डायोड D2 से धारा प्रवाहित होगी। द्वितीय स्थिति के समान ही इस स्थिति में भी निर्गत विभव 5 वोल्ट होगा (अर्थात् Y = 1)। .
अर्थात् 0+1 = 1

4. चतुर्थ स्थिति, A = 1,B = 1–यह स्थिति A तथा B दोनों को बैटरी के धन सिरे से जोड़ने पर प्राप्त होती है। इस स्थिति में दोनों डायोड D1 तथा D2 अग्र अभिनत होते है; अत: बैटरी से चलने वाली धारा अब D1 व D2 में बँट जाती है तथा पुन: संयुक्त होकर प्रतिरोध R से होकर गुजरती है। R के सिरों के बीच पुन: 5 वोल्ट का विभवान्तर उत्पन्न होता है; अत: निर्गत विभव पुन : +5 वोल्ट होगा, (अर्थात् Y = 1)
अर्थात् 1+1 = 1
इस प्रकार OR गेट में यदि दोनों निवेशी 0 हैं तो निर्गत 0 होगा, अन्यथा निर्गत 1 होगा।
OR गेट का तरंग रूप
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प्रश्न 23.
AND गेट का प्रतीक बनाइए तथा इसकी सत्यता सारणी बनाइए। सन्धि डायोड का प्रयोग करके इसे दो निवेशी सिग्नलों वाला AND गेट कैसे बनाया जा सकता है? समझाइए। [2013]
उत्तर :
AND गेट की. परिभाषा-AND गेट एक ऐसी युक्ति है जिसमें दो निवेशी चरों A व B को संयुक्त करके एक निर्गत चर Y प्राप्त होता है। चित्र-14.57 (a) में दो निवेशों A तथा B वाले AND गेट का प्रतीक प्रदर्शित किया गया है इसका बूलियन व्यंजक A. B= Y होता है जिसे ‘A AND B equals Y’ पढ़ा जाता है। इसकी सत्यता सारणी चित्र-14.57 (c) में प्रदर्शित है।

AND गेट की क्रिया-पद्धति को चित्र-14.57 (b) में प्रदर्शित वैद्युत परिपथ की सहायता से समझा जा सकता है। इस परिपथ में एक बैटरी, एक बल्ब व दो स्विचों A तथा B को श्रेणीक्रम में जोड़ा गया है। दोनों स्विच निवेश का निर्माण करते हैं, जबकि बल्ब निर्गम Y को प्रदर्शित करेगा। जब कोई स्विच बन्द (ON) होगा तो उसकी स्थिति 1 होगी तथा खुले (OFF) होने पर स्थिति 0 होगी।
इसी प्रकार बल्ब के जले होने पर Y = 1 होगा अन्यथा Y = 0 होगा। परिपथ से स्पष्ट है कि यदि
1. A = 0, B= 0, दोनों स्विच खुले (OFF ) हैं तो बल्ब बुझा रहेगा अर्थात् Y = 0
2. A= 1, B= 0, स्विच A बन्द (ON) तथा स्विच B खुला (OFF ) है तो बल्ब बुझा रहेगा अर्थात् Y = 0
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3. A = 0, B= 1, स्विच A खुला (OFF ) तथा स्विच B बन्द (ON) है तो बल्ब बुझा रहेगा अर्थात् Y = 0
4. A = 1, B = 1, दोनों स्विच बन्द (ON) हैं तो बल्ब जल जाएगा अर्थात् Y = 1
इस गेट का निर्गम Y = 1 (उच्च) केवल तभी होता है जबकि इसके सभी निवेश 1 (उच्च) हों। यही AND गेट की विशेषता है।

AND गेट प्राप्त करना (Realisation of AND Gate)-इस गेट को दो p-n सन्धि डायोडों का चित्र-14.58 के अनुसार प्रयोग करके प्राप्त । किया जा सकता है। इस परिपथ में एक + 5 वोल्ट की दो बैटरियों का ऋण सिरा भू-सम्पर्कित रखा गया है। प्रथम बैटरी का भू-सम्पर्कित सिरा 0 25V स्थिति को धन सिरा (+ 5 वोल्ट) स्थिति को प्रदर्शित करता है। सत्यता सारणी के अनुसार निवेश के चार सम्भव संयोजन हैं, जिन्हें बारी-बारी से 03 पृथ्वी नीचे समझाया गया है।
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1. प्रथम स्थिति, A = 0,B= 0–यह स्थिति A तथा B दोनों निवेश टर्मिनलों को भू-सम्पर्कित करने पर प्राप्त होती है। इस स्थिति में दोनों डायोड अग्र अभिनत होंगे तथा दोनों से धारा प्रवाहित होगी किन्तु अग्र अभिनति में दोनों का प्रतिरोध शून्य होगा; अतः प्रत्येक डायोड का विभवान्तर शून्य होगा, अत: Y पर निर्गत विभव भी शून्य होगा।
अर्थात् जब A = B = 0 (निम्न) तब Y = 0 (निम्न)
अर्थात् 0.0 = 0

2. द्वितीय स्थिति, A = 1,B = 0 -यह स्थिति A को 5 वोल्ट की बैटरी के धन सिरे से जोड़कर तथा B को भू-सम्पर्कित करने पर प्राप्त होती है। इस स्थिति में A पर +5 वोल्ट का विभव (उच्च स्थिति A = 1) तथा B पर 0 विभव (निम्न स्थिति B = 0) है। इस स्थिति में केवल डायोड D2 अग्र अभिनत है, अत: केवल इसी में धारा प्रवाहित होती है। अग्र अभिनति के कारण इसका प्रतिरोध शून्य होगा, अतः इसके सिरों के बीच विभवान्तर शून्य होगा अर्थात् Y पर निर्गत विभव शून्य होगा (Y = 0 निम्न स्थिति)।
अर्थात् जब A = 1, B = 0, तब Y = 0.
अर्थात् Y = 1. 0 = 0

3. तृतीय स्थिति, A = 0,B = 1–यह स्थिति द्वितीय स्थिति के विपरीत है। इस स्थिति में केवल डायोड D1 में धारा प्रवाहित होती है D2 में नहीं। इस स्थिति में भी Y पर निर्गत विभव शून्य है अर्थात् Y = 0 (निम्न स्थिति)।
अर्थात् Y = 0.1 = 0

4. चतुर्थ स्थिति, A = B = 1- यह स्थिति A तथा B दोनों को 5 वोल्ट की बैटरी के धन सिरे से जोड़ने पर प्राप्त होती है। इस स्थिति में A तथा B दोनों पर + 5 वोल्ट का विभव होता है अर्थात् A = B = 1 (उच्च स्थिति)। इस स्थिति में दोनों डायोड D1 व D2, में से कोई भी अग्र अभिनत नहीं है, अत: किसी में भी धारा प्रवाहित नहीं होती। इस स्थिति में Y पर उपलब्ध विभव प्रतिरोध R से जुड़ी बैटरी के धन सिरे के विभव +5 वोल्ट के बराबर होगा अर्थात् Y = 1 (उच्च स्थिति)।
अर्थात् Y = 1.1 = 1
इस प्रकार AND गेट में, यदि दोनों निवेशी 1 हैं तो निर्गत 1 होगा, अन्यथा निर्गत 0 होगा।
AND गेट का निर्गत तरंग रूप
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MP Board Solutions

प्रश्न 24.
NOT गेट का प्रतीक तथा सत्यता सारणी बनाइए। इस गेट को डिजिटल परिपथ के रूप में कैसे प्राप्त किया जा सकता है? समझाइए।
अथवा
NOT गेट का उपयुक्त आरेख की सत्यता से सत्यता सारणी बनाइए। [2013]
अथवा
NOT गेट के लिए लॉजिक प्रतीक, बूलियन व्यंजक, परिपथ आरेख तथा सत्यता सारणी बनाइए। [2015]
अथवा
NOT गेट के लिए लॉजिक प्रतीक, सत्यता सारणी तथा बूलियन व्यंजक दीजिए। परिपथ आरेख के साथ समझाइए कि यह गेट किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? [2018]
उत्तर :
NOT गेट की परिभाषा–यह एक ऐसी युक्ति है जिसमें एक निवेशी चर (सिग्नल) तथा एक ही निर्गत चर (सिग्नल) Y होता है। चित्र-14.60 (a) में एक निवेशी सिग्नल A तथा एक निर्गत सिग्नल वाला NOT गेट का प्रतीक प्रदर्शित किया गया है। इसका बूलियन व्यंजक \(\bar{A}\) = Y होता है। जिसे ‘NOT A equals Y’ पढ़ा जाता है। इसकी सत्यता सारणी चित्र-14.60 (c) में प्रदर्शित है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 39
NOT गेट की क्रिया पद्धति को चित्र-14.60 (b) में प्रदर्शित वैद्युत परिपथ की सहायता से समझा जा सकता है। इस परिपथ में एक बल्ब Y को एक बैटरी के श्रेणीक्रम में जोड़ा गया है तथा एक स्विच A को बल्ब के समान्तर क्रम मे जोड़ा गया है। स्पष्ट है कि स्विच A को खोलने अथवा बन्द करने का प्रभाव बल्ब Y पर देखने को मिलता है । अर्थात् स्विच A निवेश तथा बल्ब Y निर्गत है। जब स्विच A खुला (OFF ) अर्थात् A = 0 होता है तो बल्ब में धारा. प्रवाहित होती रहती है। अत: बल्ब जला रहता है अर्थात् निर्गम Y = 1 होता है। इसके विपरीत जब स्विच A को बन्द (ON) कर देते हैं अर्थात् जब A = 1 होता है तो बैटरी लघुपथित (short circuit) हो जाती है, जिससे बैटरी के सिरों का विभवान्तर शून्य हो जाता है। अत: बल्ब में धारा शून्य हो जाती है अर्थात् बल्ब बुझ जाता है, जिससे Y = 0 हो जाता है। अतः इस परिपथ में हम पाते हैं कि

यदि निवेश A = 0 है तो निर्गम Y = 1
तथा यदि निवेश A = 1 है तो निर्गम Y = 0
यही NOT गेट की विशेषता है, अतः उपर्युक्त परिपथ NOT गेट का तुल्य परिपथ है।

NOT गेट प्राप्त करना (Realisation of NOT Gate)-इस गेट को n-p-n ट्रांजिस्टर की सहायता से चित्र-14.61 के अनुसार परिपथ तैयार करके प्राप्त किया जा सकता है। ट्रांजिस्टर के आधार B को एक प्रतिरोध RB के द्वारा निवेशी टर्मिनल A से जोड़कर उत्सर्जक E को भू-सम्पर्कित कर देते हैं। संग्राहक को एक अन्य प्रतिरोध Rc तथा 5 वोल्ट की बैटरी के द्वारा भू-सम्पर्कित कर देते हैं। निर्गत Y संग्राहक C का पृथ्वी के सापेक्ष वोल्टेज है।
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सत्यता सारणी के अनुसार निवेश के लिए केवल दो सम्भावनाएँ हैं जिनके संगत निर्गमों को बारी-बारी से नीचे समझाया गया है

1. प्रथम स्थिति, A=0-यह स्थिति A को भू-सम्पर्कित करके प्राप्त होती है। इस स्थिति में A पर निवेशी विभव शून्य है (निम्न स्थिति A = 0), अत: उत्सर्जक आधार सन्धि अग्र अभिनति में नहीं है, अत: इस स्थिति में ट्रांजिस्टर में कोई धारा प्रवाहित नहीं होती। इस स्थिति में बैटरी E2 खुले परिपथ पर है, अत: Y पर उपलब्ध विभव E2 के वैद्युत वाहक बल (5 वोल्ट) के बराबर होगा अर्थात् Y = 1 होगा।
यदि A = 0 तब Y = 1 = \(\bar{0}\) = \(\bar{A}\)

2. द्वितीय स्थिति, A= 1–यह स्थिति A को बैटरी E, के धन सिरे से जोड़ने पर प्राप्त होती है। इस स्थिति में A पर निवेशी विभव +5 वोल्ट होगा (अर्थात् A = 1); अत: उत्सर्जक-आधार सन्धि अग्र अभिनत होगी। ट्रांजिस्टर में उच्च उत्सर्जक धारा प्रवाहित होगी, जिसका अधिकांश भाग संग्राहक से गुजरेगा, इसलिए Rc के सिरों के बीच लगभग 5 वोल्ट का विभवान्तर उत्पन्न हो जाएगा, अत: Y पर उपलब्ध विभव E2 के वैद्युत वाहक बल तथा Rc के विभवान्तर के परिणामी के बराबर होगा।

चूँकि RC में धारा संग्राहक टर्मिनल से बाहर निकलती है, अत: RC के सिरों के बीच विभवान्तर बैटरी E2 के वैद्युत वाहक बल के विपरीत दिशा में होगा, इसलिए Rc के Y से जुड़े सिरे पर उपलब्ध विभव शून्य होगा अर्थात् Y = 0 (निम्न स्थिति)।
अर्थात् \(Y=0 \neq 1=\overline{1}=\bar{A}\)
इस प्रकार NOT गेट में यदि निवेशी 0 है तब निर्गत 1 होगा तथा इसका उल्टा भी होगा।
NOT गेट का निर्गत तरंग रूप-
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प्रश्न 25.
लॉजिक गेटों के संयोजन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
लॉजिक गेटों का संयोजन (Combination of Logic Gates)-कम्प्यूटर, कैलकुलेटर आदि उपकरणों में प्रयुक्त होने वाले जटिल परिपथों में तीन मूल लॉजिक गेटों (OR, AND तथा NOT) के अतिरिक्त इनके संयोजनों से प्राप्त विभिन्न गेट भी प्रयुक्त किए जाते हैं। लॉजिक गेटों के सबसे अधिक प्रचलित संयोजन गेट NOR गेट तथा NAND गेट हैं। इन लॉजिक गेटों को सार्वत्रिक गेट (universal gate) भी कहते हैं, क्योंकि इनको बार-बार विभिन्न क्रमों में प्रयुक्त कर तीनों मूल लॉजिक गेटों को प्राप्त किया जा सकता है।

NOR गेट -NOR गेट को OR गेट तथा NOT गेट के संयोजन से प्राप्त किया जाता है। यदि OR गेट के निर्गत टर्मिनल Y’ को NOT गेट के निवेशी टर्मिनल से जोड़ दें [चित्र-14.63 (a)] तो यह पूर्ण संयोजन NOR गेट कहलाता है, NOR गेट का लॉजिक प्रतीक चित्र-14.63 (b) में प्रदर्शित है।

MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 42
NOR गेट का बूलियन व्यंजक \(\overline{A+B}=Y\) है तथा इसे ‘A OR B negated equals Y’ पढ़ा जाता है। NOR गेट की सत्यता सारणी OR तथा NOT गेटों की सत्यता सारणियों को तर्कसंगत संयोजित करके प्राप्त की जा सकती है चित्र-14.64 (a) व (b)।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 43
इसके लिए प्रदर्शित परिपथ में दो स्विच A व B एक लघु प्रतिरोध, एक बैटरी तथा एक बल्ब Y को चित्र-14.65 के अनुसार जोड़ते हैं। जब दोनों स्विच खुले हैं अर्थात् A = 0, B= 0 तो बल्ब Y जलता । है। जब स्विच A खुला है तथा स्विच B बन्द है अर्थात् A = 0, B= 1 तो बल्ब Y बुझ जाता है।
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जब स्विच A बन्द है तथा स्विच B खुला है अर्थात् A = 1, B= 0 तो बल्ब Y बुझ जाता है। जब दोनों स्विच बन्द हैं अर्थात् A = 1, B= 1 तो बल्ब Y बुझा रहता है।
NOR गेट का निर्गत तरंग रूप
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NAND गेट-NAND गेट को AND गेट तथा NOT गेट के संयोजन से प्राप्त किया जाता है। यदि AND गेट के निर्गत टर्मिनल Y’ को NOT गेट के निवेशी टर्मिनल से जोड़ दें [चित्र-14.67(a)] तो यह पूर्ण संयोजन NAND गेट कहलाता है। इसका लॉजिक प्रतीक [चित्र-14.67 (b)] में प्रदर्शित है।
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NAND गेट का बूलियन व्यंजक \(\overline{A \cdot B}=Y\) है तथा इसे ‘A AND B negated equals Y ‘ पढ़ा जाता है। NAND गेट की सत्यता सारणी AND तथा NOT गेटों की सत्यता सारणियों को तर्कसंगत संयोजित करके प्राप्त की जा सकती है चित्र-14.68
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 47
इसके लिए प्रदर्शित परिपथ में दो स्विच A व B एक लघु प्रतिरोध R, एक बैटरी तथा एक बल्ब Y को चित्र-14.70 के अनुसार जोड़ते हैं। जब दोनों स्विच A व B खुले हैं अर्थात् A = 0, B= 0 तो बल्ब Y जलता है। जब केवल स्विच A खुला है अर्थात् A = 0, B= 1 है तो बल्ब Y जल जाता है। जब स्विच A व B दोनों बन्द हैं अर्थात् A = 1, B= 1 तो बल्ब Y बुझा रहता है।
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प्रश्न 26.
OR गेट, AND गेट, NOT गेट NAND तथा NOR गेट की तुलनात्मक सारणी बनाइए।
अथवा
AND, NOR तथा NOT गेट के लिए लॉजिक प्रतीक, बुलियन व्यंजक तथा सत्यता सारणी बनाइए। [2014]
अथवा
NAND गेट का लॉजिक प्रतीक बनाइए। [2016]
उत्तर :
OR, AND, NOT, NAND तथा NOR गेट की तुलनात्मक सारणी
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 50

प्रश्न 27.
NAND गेटों का प्रयोग कर (i) AND गेट, (ii) OR गेट, किस प्रकार बना सकते हैं? चित्र बनाकर समझाइए।[2018]
अथवा
NAND गेट द्वारा AND गेट किस प्रकार बनाया जाता है? इसकी सत्यता सारणी बनाइए तथा बूलियन व्यंजक लिखिए। [2018]
हल :
1. NAND गेट से AND गेट की प्राप्तिNAND गेट से AND गेट की प्राप्ति का परिपथ चित्र 14.71 में दर्शाया गया है। यदि NAND गेट के दोनों निवेशी B टर्मिनलों पर सिग्नल A व B लगाएँ तथा निर्गत सिग्नल Y1 को दूसरे NAND गेट के दोनों निवेशी टर्मिनलों पर संयुक्त
चित्र-14.71 रूप से लगाएँ तो यह पूर्ण संयोजन AND गेट की भाँति कार्य करता है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 51
यहाँ \(\mathrm{Y}_{1}=\overline{\mathrm{A} . \mathrm{B}}\)
तथा \(\mathrm{Y}=\overline{\mathrm{Y}_{1}}=\overline{\mathrm{A} \cdot \mathrm{B}}=\mathrm{A} \cdot \mathrm{B}\)
सत्यता सारणी :
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2. NAND गेट से OR गेट की प्राप्ति
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यहाँ Y1= \(\overline{\mathbf{A}}\) तथा Y2 = \(\overline{\mathbf{B}}\)
तथा \(\mathrm{Y}=\overline{\mathrm{Y}_{1} \cdot \mathrm{Y}_{2}}=\overline{\overline{\mathrm{A}} \cdot \overline{\mathrm{B}}}=\overline{\overline{\mathrm{A}}}+\overline{\overline{\mathrm{B}}}=\mathrm{A}+\mathrm{B}\)
इस प्रकार NAND गेटों का उपर्युक्त संयोजन OR गेट की भाँति कार्य करता है।

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अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बताइए कि किसी p-टाइप जर्मेनियम अर्द्धचालक के लिए तीन संयोजकता वाला अपद्रव्य क्यों मिलाया जाता है? [2001]
उत्तर :
तीन संयोजकता वाला अपद्रव्य पदार्थ मिलाने से अपद्रव्य परमाणु क्रिस्टल जालक में एक जर्मेनियम परमाणु । का स्थान ले लेता है। इसके समीप के तीन जर्मेनियम परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन अपद्रव्य परमाणु के इलेक्ट्रॉनों के साथ बन्ध बना लेते हैं तथा चौथे जर्मेनियम परमाणु के साथ बन्ध बनाने के लिए इलेक्ट्रॉन की कमी रह जाती है। यह इलेक्ट्रॉन रिक्तिका एक धनावेशित कण के तुल्य है, जिसे कोटर कहते हैं। इस प्रकार जालक में धनावेशित कोटर उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रश्न 2.
अर्द्धचालक में डोपिंग का क्या अर्थ है? इसे क्यों किया जाता है? [2002]
अथवा
किसी निज अर्द्धचालक को मादित (डोपिंग) करने से क्या तात्पर्य है? यह क्रिया अर्द्धचालक की चालकता को किस प्रकार प्रभावित करती है? [2003, 15]]
उत्तर :
डोपिंग (मादित) किसी निज अर्द्धचालक में 3 संयोजी अथवा 5 संयोजी इलेक्ट्रॉन वाली अशुद्धि मिलाकर उसे बाह्य अर्द्धचालक में बदलने की क्रियां डोपिंग (मादित) कहलाती है। ऐसा करने से निज अर्द्धचालक की चालकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 3.
सन्धि-डायोड में विभव प्राचीर से क्या तात्पर्य है? [2005, 18]]
उत्तर :
विभव प्राचीर-p-n सन्धि के दोनों ओर बनी अवक्षय परत के सिरों के बीच उत्पन्न विभवान्तर. को विभव प्राचीर अथवा सम्पर्क विभव कहते हैं। इसका मान 0.1 से लेकर 0.5 वोल्ट तक होता है तथा इसका मान सन्धि के ताप पर निर्भर करता है।

प्रश्न 4.
p-n सन्धि को अग्र अभिनत करने का अवक्षय परत तथा विभव प्राचीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा? [2002, 07, 13]
उत्तर :
p-n सन्धि को अग्र अभिनत करने पर अवक्षय परत की चौड़ाई कम हो जाती है तथा विभव प्राचीर भी कम हो जाता है।

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प्रश्न 5.
ट्रांजिस्टर में आधार क्षेत्र को अपेक्षाकृत पतला क्यों रखा जाता है? [2002, 06, 08, 09]
उत्तर :
आधार क्षेत्र में कोटरों तथा इलेक्ट्रॉनों के संयोजनों को कम करने के लिए आधार को बहुत पतला बनाया जाता है। इस दशा में उत्सर्जक से आने वाले अधिकांश कोटर (अथवा इलेक्ट्रॉन) आधार के आर-पार विसरित होकर संग्राहक पर पहुँच जाते हैं. अतः संग्राहक धारा. उत्सर्जक धारा के लगभग बराबर हो जाती है. आधार धारा अपेक्षाकत बहुत क्षीण होती है। ट्रांजिस्टर द्वारा शक्ति प्रवर्धन तथा वोल्टता प्रवर्धन का भी यही मुख्य कारण है। यदि आधार क्षेत्र मोटा बनाया जाता तो उत्सर्जक से आने वाले अधिकतर आवेश वाहक आधार में ही उदासीन हो जाते तथा संग्राहक धारा बहुत क्षीण हो जाती; अत: ट्रांजिस्टर का उपयोग नहीं हो पाता।

प्रश्न 6.
p-n-p तथा n-p-n प्रकार के ट्रांजिस्टर में से कौन अधिक उपयोगी है तथा क्यों? [2010, 12, 17]
उत्तर :
n-p-n ट्रांजिस्टर अधिक उपयोगी है; क्योंकि इसमें धारावाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि p-n-p ट्रांजिस्टर में धारावाहक कोटर होते हैं। धारावाहक इलेक्ट्रॉन, कोटर की अपेक्षा अधिक गतिशील होते हैं।

प्रश्न 7.
ताप बढ़ाने पर अर्द्धचालक के प्रतिरोध में क्या परिवर्तन होता है? [2004]]
उत्तर :
ताप बढ़ाने से अर्द्धचालक का प्रतिरोध घट जाता है; क्योंकि सहसंयोजक बन्ध टूटने के कारण चालक इलेक्ट्रॉन अधिक संख्या में उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रश्न 8.
p-n सन्धि के अग्र अभिनत तथा पश्च अभिनत के बीच अन्तर बताइए। [2005]
उत्तर :
अग्र अभिनत सन्धि में, सन्धि का p-क्षेत्र बाह्य बैटरी के धन सिरे से तथा n-क्षेत्र बैटरी के ऋण सिरे से जोड़ा जाता है जबकि पश्च अभिनत सन्धि में, सन्धि का p-क्षेत्र बैटरी के ऋण सिरे से तथा n-क्षेत्र बैटरी के धन सिरे से जोड़ा जाता है।

प्रश्न 9.
अग्र धारा तथा पश्च धारा की उत्पत्ति कैसे होती है? [2005]
उत्तर :
अग्र धारा की उत्पत्ति—यह बैटरी द्वारा स्थापित बाह्य वैद्युत क्षेत्र में बहुसंख्यक वाहकों (p-क्षेत्र में कोटर तथा n-क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन) की सन्धि के आर-पार गति के कारण उत्पन्न होती है।
पश्च धारा की उत्पत्ति- यह अल्पसंख्यक वाहकों (p-क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन तथा n-क्षेत्र में कोटर) की गति के कारण उत्पन्न होती है। यह धारा अत्यल्प होती है।

प्रश्न 10.
उत्क्रम अभिनत p-n सन्धि डायोड में ऐवेलांश भंजन का क्या अर्थ है? [2012]
उत्तर :
ऐवेलांश भंजन-जब उत्क्रम वोल्टेज बढ़ाई जाती है तो प्रारम्भ में उत्क्रम धारा स्थिर रहती है, परन्तु वोल्टेज अधिक होने पर सन्धि के निकट सहसंयोजक बन्ध टूट जाते हैं जिसके कारण इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म अधिक संख्या में मुक्त हो जाते हैं तथा उत्क्रम धारा एकदम बहुत बढ़ जाती है। इस स्थिति को ऐवेलांश भंजन कहते हैं।

प्रश्न 11.
उत्क्रम अभिनत सन्धि डायोड द्वारा अल्प धारा क्यों प्रवाहित होती है? [2014]
उत्तर :
उत्क्रम अभिनत सन्धि डायोड में धारा अल्पसंख्यक वाहकों की गति से उत्पन्न होती है जोकि बाह्य व आन्तरिक दोनों वैद्युत क्षेत्रों के अन्तर्गत सन्धि को पार कर जाते हैं। इसीलिए यह धारा अति अल्प होती है।

प्रश्न 12.
n-प्रकार तथा p प्रकार के अर्द्धचालकों में बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक आवेश वाहकों की उत्पत्ति को समझाइए।
उत्तर :
बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक आवेश वाहक (Majority and Minority Charge Carriers)n-टाइप अर्द्धचालक मिलाई गई पाँच इलेक्ट्रॉन वाली अशुद्धि का प्रत्येक परमाणु क्रिस्टल को एक चलनशील इलेक्ट्रॉन प्रदान करता है। n-टाइप अर्द्धचालक में मिश्रित अशुद्धि द्वारा प्रदान किए गए ये इलेक्ट्रॉन ही बहुसंख्यक आवेश वाहक हैं। इसी प्रकार p-टाइप अर्द्धचालक में मिश्रित अशुद्धि द्वारा प्रदान किए गए कोटर बहुसंख्यक आवेश वाहक हैं।

बहुसंख्यक आवेश वाहकों के अतिरिक्त n-टाइप तथा pटाइप अर्द्धचालकों के भीतर ऊष्मीय विक्षोभ से उत्पन्न कुछ इलेक्ट्रॉन व कोटर उपस्थित रहते हैं जिनकी उत्पत्ति सामान्य ताप पर कुछ सहसंयोजक बन्धों के टूटने से होती है अल्पसंख्यक वाहक कहलाते हैं। n-टाइप क्रिस्टल में अल्प कोटरों में तथा pटाइप क्रिस्टल में अल्प इलेक्ट्रॉनों को अल्पसंख्यक वाहक कहते हैं।

प्रश्न 13.
दो समान आदर्श सन्धि डायोड, चित्र (a) तथा (b) के अनुसार जोड़े गए हैं। प्रत्येक में प्रतिरोध R में होकर प्रवाहित होने वाली धारा ज्ञात कीजिए। [2018]
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हल :
[चित्र-14.73 (a)] में दोनों सन्धि डायोड अग्र अभिनत हैं। अतः परिपथ में धारा बहेगी।
प्रतिरोध R में प्रवाहित धारा (i) = \(\frac { V }{ R }\)
= \(\frac { 30 }{ 30 }\) = 0.1 ऐम्पियर।
[चित्र-14.73 (b)] में दोनों सन्धि डायोड उत्क्रम अभिनत हैं। अत: परिपथ में कोई धारा नहीं बहेगी।
∴ प्रतिरोध R में प्रवाहित धारा = शून्य।

प्रश्न 14.
ट्रांजिस्टर में किस जंक्शन को अग्र अभिनत तथा किस जंक्शन को उत्क्रम अभिनत किया जाता है तथा क्यों? [2006] .
उत्तर :
ट्रांजिस्टर में उत्सर्जक-आधार जंक्शन को अग्र अभिनत तथा संग्राहक-आधार जंक्शन को उत्क्रम अभिनत रखा जाता है। ऐसा करने से अल्प उत्सर्जक वोल्टता से ही पर्याप्त उत्सर्जक धारा उत्पन्न होती है, अतः इसमें निवेशी सिरों पर सिग्नल वोल्टता में अल्प परिवर्तन उत्सर्जक धारा में बहुत बड़ा परिवर्तन उत्पन्न कर देता है।

आधार-संग्राहक सन्धि को उत्क्रम अभिनत करने से आधार से विसरित होने वाले सभी आवेश वाहक संग्राहक में पहुँच जाते हैं और प्रबल संग्राहक धारा प्राप्त होती है। यदि आधार-संग्राहक सन्धि को भी अग्र अभिनत कर दिया जाए तो उत्सर्जक से आने वाले आवेश वाहक संग्राहक तक नहीं पहुंचेंगे तथा ट्रांजिस्टर दो अलग-अलग परिपथों (उत्सर्जक-आधार परिपथ तथा संग्राहक-आधार परिपथ) के रूप में कार्य करेगा।

प्रश्न 15.
ऐनालोग सिग्नल क्या है? उदाहरण दीजिए। . .
उत्तर :
ऐनालोग सिग्नल-“वह सिग्नल जो एक दिए गए परिसर में कोई भी मान ग्रहण कर सकता है ऐनालोग सिग्नल कहलाता है। उदाहरण-ज्या वक्रीय सिग्नल तथा आयाम मॉडुलित सिग्नल।

प्रश्न 16.
डिजिटल सिग्नल क्या है? उदाहरण दीजिए। [2003]
उत्तर :
डिजिटल सिग्नल-“वह सिग्नल जो केवल दो सम्भव मान ग्रहण कर सकता है डिजिटल सिग्नलल कहलाता है।” उदाहरण-वोल्टेज स्तर 0 व 5V तथा लैम्प की ON व OFF की अवस्थाएँ।

प्रश्न 17.
ऐनालोग परिपथ से क्या तात्पर्य है? उदाहरण दीजिए।[2003, 07]
उत्तर :
ऐनालोग परिपथ–“जो इलेक्ट्रॉनिक परिपथ ऐनालोग सिग्नलों को क्रियान्वित करने के लिए बनाया जाता है ऐनालोग परिपथ कहलाता है।” जैसे-प्रवर्धक तथा T.V. ग्राही।

प्रश्न 18.
डिजिटल परिपथ से क्या तात्पर्य है? [2007]
उत्तर :
डिजिटल परिपथ-“जो इलेक्ट्रॉनिक परिपथ डिजिटल सिग्नलों को क्रियान्वित करने के लिए बनाया जाता है डिजिटल परिपथ कहलाता है।” जैसे-डिजिटल घड़ी, कैलकुलेटर।

प्रश्न 19.
सार्वत्रिक गेट से क्या तात्पर्य है? [2005, 07, 08]
उत्तर :
सार्वत्रिक गेट-वह गेट, जिसे बारम्बार प्रयुक्त करके तीनों मूल गेट OR, AND तथा NOT प्राप्त किए जा सकते हैं, सार्वत्रिक गेट कहलाता है; जैसे–NAND, NOR तथा EXOR या XOR गेट। NAND गेट का अर्थ है NOT-AND, NOR गेट का अर्थ है NOT-OR तथा EXOR गेट का अर्थ है Exclusive OR गेट।

प्रश्न 20.
लॉजिक गेट क्या है? मूल लॉजिक गेटों के नाम बताइए।[2013, 16]
उत्तर :
लॉजिक गेट–“वे डिजिटल परिपथ, जिनके निवेशी तथा निर्गत सिग्नलों के बीच एक तर्कपूर्ण सम्बन्ध होता है, लॉजिक गेट कहलाते हैं।” यह किसी सिग्नल को या तो अपने अन्दर से होकर गुजरने देता है या उसे रोक देता है। मूल लॉजिक गेट

  • OR गेट,
  • AND गेट तथा
  • NOT गेट हैं।

प्रश्न 21.
बूलियन व्यंजक से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
बूलियन व्यंजक-एक ऐसा व्यंजक जो दो बूलियन चरों के ऐसे संयोग को प्रदर्शित करता है जिससे एक नया बूलियन चर प्राप्त होता है, बूलियन व्यंजक कहलाता है। इसके केवल दो मान 1 तथा 0 हो सकते हैं

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प्रश्न 22.
लॉजिक गेट की सत्यता सारणी क्या है?
उत्तर :
सत्यता सारणी-“किसी लॉजिक गेट के सभी सम्भव निवेशी सिग्नल संयोजनों तथा निर्गत सिग्नल संयोजनों को एकसाथ प्रदर्शित करने वाली सारणी लॉजिक गेट की सत्यता सारणी कहलाती है।”

प्रश्न 23.
OR गेट, AND गेट तथा NOT गेट क्या हैं? इनके बूलियन व्यंजक लिखिए तथा प्रतीकों के चित्र बनाइए। [2010, 12, 13, 14, 16]
अथवा
लॉजिक गेटों NOT तथा OR के प्रतीक बनाइए। [2009, 10, 13]
अथवा
AND तथा OR गेट का लॉजिक प्रतीक बनाइए। [2014, 15]
उत्तर :
OR गेट-इस गेट के दो या दो से अधिक निवेश होते हैं जबकि एक निर्गत होता है। चित्र-14.74 (a) में दो निवेशी सिग्नल A तथा B वाले OR गेट के प्रतीक को प्रदर्शित किया गया है। इस गेट का निर्गत सिग्नल Y है। इसका बूलियन व्यंजक A+ B= Y होता है। इसे ‘A OR B equals Y’ पढ़ा जाता है।
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AND गेट-यह एक ऐसा गेट है जिसमें दो अथवा दो से अधिक निवेशी चर A व B होते हैं तथा एक निर्गत चर Y होता है चित्र-14.74 (b) में दो निवेशों A तथा B वाले AND गेट का प्रतीक प्रदर्शित किया गया है जिसका निर्गम Y है। इसका बूलियन व्यंजक A. B= Y होता है। इसे ‘A AND B equals Y’ पढ़ा जाता है।

NOT गेट-यह एक ऐसा गेट है जिसमें एक निवेशी चर A तथा एक ही निर्गत चर Y होता है। इस गेट का निर्गम 1 उच्च होता यदि और केवल यदि इसका निवेश निम्न हो। चित्र-14.74 (c) में NOT गेट का प्रतीक प्रदर्शित किया गया है जिसका निवेश A तथा निर्गत Y है। इसका बूलियन व्यंजक \(\bar{A}\) = Y होता है। इसे ‘NOT A equals Y’ पढ़ा जाता है।

प्रश्न 24.
OR गेट, AND गेट व NOT गेट की सत्यता सारणी बनाइए। [2010, 12, 13, 16]
हल :
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प्रश्न 25.
संलग्न सत्यता सारणी एक 2-निवेशी तर्क (लॉजिक) गेट के निर्गम को दर्शाती है
प्रयुक्त तर्क गेट को पहचानिए और इसका तर्क प्रतीक बनाइए। [2003]
उत्तर :
सत्यता सारणी से हम देखते हैं कि निर्गम Y केवल तभी 1 के बराबर है जबकि दोनों निवेश A तथा B, 1 के बराबर हैं अन्यथा निर्गम Y शून्य है। यह विशेषता AND गेट की है। अतः प्रयुक्त गेट AND गेट है जिसका प्रतीक प्रश्न 23 के उत्तर में चित्र-14.74 (b) में प्रदर्शित है।
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प्रश्न 26.
दिए गए लॉजिक परिपथ चित्र-17.75 में लॉजिक गेटों 1 20-.Y व 2 के नाम लिखिए। [2004, 09, 10] B P
उत्तर :
लॉजिक गेट-
(1) OR गेट तथा लॉजिक गेट
(2) NOT
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प्रश्न 27.
यदि A = 1 तथा B = 0 हो तो नीचे दिए गए लॉजिक परिपथों में 11 तथा 12 के मान ज्ञात कीजिए। [2008, 18]
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हल
प्रथम चित्र-14.76
(a) OR गेट है जिसके बूलियन व्यंजक A+ B= y1 A = 1, B= 0 रखने पर, y1 = 1 द्वितीय चित्र-14.76
(b) AND गेट है जिसके बूलियन व्यंजक A. B= y2 में A = 1, B= 0 रखने पर, y2 = 0.

प्रश्न 28.
दिए गए लॉजिक परिपथ का बूलियन व्यंजक तथा सम्पूर्ण सत्यता सारणी लिखिए। [2018]
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हल :
दिए गए परिपथ का बूलियन व्यंजक Y = A . B (Y equals negated of A and B)
सत्यता सारणी:
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प्रश्न 29.
चित्र में एक लॉजिक परिपथ दिया गया है। दिखाइए कि यह परिपथ OR गेट की तरह कार्य करता है।[2018]
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हल :
दिए गए परिपथ में, Y’ =\(\overline{\mathrm{A}+\mathrm{B}}\)
तथा Y = Y’ = \(\overline{\mathrm{Y}^{\prime}}=\overline{\overline{\mathrm{A}+\mathrm{B}}}\) या Y = A+ B
अत: दिया गया परिपथ OR गेट की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 30.
बुलियन व्यंजक Y = \(\overline{A B}+\overline{B A}\) में यदि
(i) A = 0 व B = 1 तथा
(ii) A = 1 व B = 1 तब Y का मान क्या होगा? [2012, 14]
हल
(i) A = 0, \(\bar{A}\)= 1 तथा B = 1, \(\bar{B}\) = 0
∴ Y = \(\overline{A B}+\overline{B A}\) = 0.0 + 1.1 = 0+ 1 = 1.

(ii) A = 1, \(\bar{A}\) = 0 तथा B= 1, \(\bar{B}\) = 0 .
∴ Y = \(\overline{A B}+\overline{B A}\) = 1.0+ 1.0 = 0+ 0= 0.

प्रश्न 31.
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  • निर्गत तभी 1 होता है जबकि और केवल जब सभी निवेशी 1 हों।
  • निर्गत तभी होता है जबकि और केवल जब सभी निवेशी 0 हों।

हल :

  • AND गेट A. B= Y
  • OR गेट A+ B= Y

प्रश्न 32.
तीन निवेशी AND गेट का (i) लॉजिक प्रतीक, (ii) बूलियन व्यंजक तथा (iii) सत्यता सारणी दीजिए। [2013]
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उत्तर :
1.

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2. बूलियन व्यंजक Y = A. B.C
3. सत्यता सारणी।

प्रश्न 33.
A तथा B, OR गेट तथा NAND गेट के निवेशी तरंग प्रतिरूप चित्र-14.81 में प्रदर्शित है। दोनों गेटों के निर्गत प्रतिरूप (Y) अपनी । उत्तर-पुस्तिका में दर्शाइए। [2014] ।
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हल :
OR गेट तथा NAND गेट के निर्गत तरंग प्रतिरूप चित्र-14.82 में B प्रदर्शित है
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प्रश्न 34.
निम्न चित्र-14.83 में प्रदर्शित निवेश A तथा B के लिए NAND गेट के निर्गत तरंग रूप को स्केच कीजिए। [2016]
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उत्तर :
NAND गेट का निर्गत तरंग रूप चित्र-14.84 में प्रदर्शित है
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अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ठोसों में उपस्थित ऊर्जा बैण्डों के नाम लिखिए। [2014, 15,17]
उत्तर:
चालन बैण्ड, संयोजी बैण्ड तथा वर्जित ऊर्जा अन्तराल।

प्रश्न 2.
संयोजी बैण्ड किसे कहते हैं?
उत्तर :
संयोजी बैण्ड–वह ऊर्जा बैण्ड जिसमें संयोजक इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा-स्तर उपस्थित होते हैं, संयोजी बैण्ड कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
चालन बैण्ड से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
चालन बैण्ड-वह ऊर्जा बैण्ड जिसमें चालक इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा-स्तर उपस्थित होते हैं, चालन बैण्ड कहलाता है।

प्रश्न 4.
वर्जित ऊर्जा अन्तराल क्या है?
उत्तर :
वर्जित ऊर्जा अन्तराल-संयोजी बैण्ड तथा चालन बैण्ड के बीच एक रिक्ति होती है जिसमें कोई इलेक्ट्रॉन उपस्थित नहीं रहता है, इसे वर्जित ऊर्जा अन्तराल (forbidden energy gap) कहते हैं।

प्रश्न 5.
अर्द्धचालक क्या होता है? दो अर्द्धचालकों के नाम लिखिए।[2007, 09]
उत्तर :
अर्द्धचालक-“वे पदार्थ जिनकी चालकता चालक एवं अचालक के बीच होती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं।” जैसे-सिलिकन तथा जर्मेनियम।

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प्रश्न 6.
ऐसे तीन पदार्थों के नाम लिखिए जिनकी प्रतिरोधकता ताप बढ़ाने पर घटती है।
उत्तर :
कार्बन, सिलिकन तथा जर्मेनियम।

प्रश्न 7.
कोटर किसे कहते हैं? यह किस प्रकार का व्यवहार करता है? [2003]
उत्तर :
कोटर-“p-टाइप अर्द्धचालक में अपद्रव्य परमाणु के एक ओर इलेक्ट्रॉन की जो रिक्ति होती है वह कोटर कहलाता है।” यह धनावेशित कण के समान व्यवहार करता है।

प्रश्न 8.
दाता अपद्रव्यों से क्या तात्पर्य है? किन्हीं दो दाता अपद्रव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर :
दाता अपद्रव्य–“जो अपद्रव्य, अर्द्धचालक को चालक इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं, दाता अपद्रव्य कहलाते हैं।” जैसे-आर्सेनिक तथा ऐन्टिमनी। .

प्रश्न 9.
p-टाइप अर्द्धचालक से क्या तात्पर्य है? इसमें आवेश वाहक क्या होते हैं?[2007, 10]
उत्तर :
pटाइप अर्द्धचालक-“वह अर्द्धचालक जो शुद्ध अर्द्धचालक में 3 संयोजकता वाला अपद्रव्य अपमिश्रित करके बनाया जाता है, p-टाइप अर्द्धचालक कहलाता है।” इसमें बहुसंख्यक आवेश वाहक कोटर (धनात्मक) तथा अल्पसंख्यक आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन (ऋणात्मक) होते हैं।

प्रश्न 10.
n-टाइप अर्द्धचालक से क्या तात्पर्य है? इसमें आवेश वाहक क्या होते हैं?[2003, 10]
उत्तर :
n-टाइप अर्द्धचालक–“वह अर्द्धचालक जो शुद्ध अर्द्धचालक में 5 संयोजकता वाला अपद्रव्य अपमिश्रित करके बनाया जाता है, n-टाइप अर्द्धचालक कहलाता है।” इसमें बहुसंख्यक आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन (ऋणात्मक) तथा अल्पसंख्यक आवेश वाहक कोटर (धनात्मक) होते हैं।

प्रश्न 11.
n-प्रकार के अर्द्धचालक में बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक धारा वाहकों के नाम लिखिए। [2003, 07, 08]
उत्तर :
n-प्रकार के अर्द्धचालक में बहुसंख्यक धारा वाहक इलेक्ट्रॉन तथा अल्पसंख्यक धारा वाहक कोटर होते हैं।

प्रश्न 12.
किन्हीं दो गुणों से एक चालक तथा एक अर्द्धचालक का भेद बताइए। [2004]
उत्तर :

  • अर्द्धचालक की चालकता चालक से कम होती है।
  • अर्द्धचालक का प्रतिरोध ताप गुणांक ऋणात्मक व चालक का धनात्मक होता है।

प्रश्न 13.
n-प्रकार के अर्द्धचालक बनाने के लिए कौन-सी अशुद्धि शुद्ध जर्मेनियम में मिलाई जाती है?
उत्तर :
5 संयोजकता वाला अपद्रव्य परमाणु; जैसे-आर्सेनिक (As) अल्प मात्रा में मिलाया जाता है।

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प्रश्न 14.
जर्मेनियम को किस प्रकार p प्रकार का अर्द्धचालक बनाया जाता है? [2006]
उत्तर :
3 संयोजकता वाला अपद्रव्य परमाणु; जैसे-ऐलुमिनियम (AI) अल्प मात्रा में मिलाने पर p-प्रकार का अर्द्धचालक बनता है।

प्रश्न 15.
दो ऐसे अपद्रव्यों के नाम लिखिए जो शुद्ध सिलिकन को अर्द्धचालक बना देते हैं। [2002, 08]
उत्तर :
आर्सेनिक, ऐलुमिनियम, फॉस्फोरस, बोरॉन।

प्रश्न 16.
निज अर्द्धचालक में अपद्रव्य मिलाकर बाह्य अर्द्धचालक बनाने का उद्देश्य लिखिए। [2000]
अथवा
शुद्ध अर्द्धचालक में जब कोई अपद्रव्य मिलाया जाता है तो क्या होता है? [2009]
उत्तर :
चूँकि निज अर्द्धचालक की वैद्युत चालकता बहुत कम होती है, अत: अपद्रव्य मिलाने से बाह्य अर्द्धचालक की वैद्युत चालकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 17.
सिलिकन में वर्जित बैण्ड की ऊर्जा कितनी होती है? [2001]
उत्तर :
सिलिकन में वर्जित बैण्ड की ऊर्जा 1.1 ev होती है।

प्रश्न 18.
जर्मेनियम, लोहा, निकिल तथा सिलिकन में कौन अर्द्धचालक हैं?
अथवा
किन्हीं दो अर्द्धचालकों के नाम लिखिए। [2001]
अथवा
ट्रांजिस्टर की रचना में सामान्यतया प्रयुक्त होने वाले किन्हीं दो पदार्थों के नाम लिखिए। [2006]
उत्तर :
जर्मेनियम तथा सिलिकन।

प्रश्न 19.
n-टाइप तथा Pटाइप अर्द्धचालकों में आवेश वाहक कौन-कौन होते हैं?[2013]
उत्तर :
n-टाइप में मुक्त इलेक्ट्रॉन (ऋणात्मक) तथा p-टाइप में कोटर (धनात्मक) आवेश वाहक होते हैं।

प्रश्न 20.
सिलिकन में गैलियम मिलाने पर किस प्रकार का अर्द्धचालक बनेगा?[2002]
उत्तर :
p-टाइप अर्द्धचालक।

प्रश्न 21.
अर्द्धचालक को ‘n’ तथा ‘ प्रकार का अर्द्धचालक कैसे बनाया जाता है?[2004]
अथवा
शुद्ध सिलिकन को ‘n’ तथा ‘ प्रकार के अर्द्धचालक बनाने के लिए इसमें कैसे अपद्रव्य मिलाए जाएँगे?[2009]
उत्तर :
अर्द्धचालक में 5 संयोजकता वाला अपद्रव्य (आर्सेनिक) मिलाकर n-टाइप का तथा 3 संयोजकता वाला अपद्रव्य (ऐलुमिनियम) मिलाकर pटाइप का अर्द्धचालक बनाया जाता है।

प्रश्न 22.
ताप बढ़ाने पर अर्द्धचालक की चालकता एवं प्रतिरोध पर क्या प्रभाव पड़ता है?[2004]
उत्तर :
ताप बढ़ाने पर अर्द्धचालक की चालकता बढ़ जाती है तथा प्रतिरोध घट जाता है।

प्रश्न 23.
सामान्यतः pn सन्धि डायोड किस कार्य के लिए प्रयुक्त किया जाता है? [2000]
उत्तर :
प्रत्यावर्ती धारा के दिष्टकरण के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

प्रश्न 24.
p-n सन्धि डायोड में अवक्षय परत से क्या तात्पर्य है?[2005, 10, 11, 17]
उत्तर :
अवक्षय परत-“p-n सन्धि के दोनों ओर की उस परत को जिसमें आवेश वाहक नहीं रहते, अवक्षय परत कहते हैं।”

प्रश्न 25.
P-n सन्धि डायोड के लिए अग्र अभिनत तथा उत्क्रम अभिनत अवस्था में परिपथ बनाइए। [2003, 07, 09]
उत्तर
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 70
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 71

प्रश्न 26.
p-n सन्धि डायोड का प्रतीक बनाइए।[2002]
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 72

प्रश्न 27.
pn सन्धि डायोड को प्रयुक्त करके एक अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी का केवल परिपथ चित्र बनाइए।[2002]
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 73

प्रश्न 28.
सन्धि डायोड द्वारा किसी तरंग के पूर्ण दिष्टीकरण हेतु परिपथ बनाइए। [2003]
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 74

प्रश्न 29.
p-n सन्धि डायोड का पश्चदिशिक परिपथ बनाइए।[2018]
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 75
चित्र-14.86 : p.n सन्धि डायोड़ का पश्चदिशिक परिपथ।

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प्रश्न 30.
अर्द्ध तरंग दिष्टकारी में यदि निवेशी आवृत्ति 50 हर्ट्स है तो निर्गत आवृत्ति क्या होगी? पूर्ण तरंग दिष्टकारी में इसी निवेशी आवृत्ति के लिए निर्गत आवृत्ति कितनी होगी?[2018]
उत्तर :
अर्द्ध तरंग दिष्टकारी में निर्गत आवृत्ति = 50 हर्ट्स, पूर्ण तरंग दिष्टकारी में निर्गत आवृत्ति = 100 हर्ट्स।

प्रश्न 31.
ट्रांजिस्टर की संग्राहक धारा, आधार धारा एवं उत्सर्जक धारा में क्या सम्बन्ध होता है? [2013,.16]
उत्तर :
उत्सर्जक धारा IE = IB + IC.

प्रश्न 32.
चित्र-14.87 में ट्रांजिस्टरों के प्रकार बताइए तथा प्रत्येक में उत्सर्जक, आधार व संग्राहक अंकित कीजिए।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 76
अथवा
p-n-p तथा n-p-n ट्रांजिस्टर के नामांकित प्रतीक चिह्न बनाइए। [2007, 08, 10, 12, 14, 16]
उत्तर :
(a) p-n-p ट्रांजिस्टर चित्र-14.88(a) तथा (b) n-p-n ट्रांजिस्टर चित्र-14.88(b)।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 77

प्रश्न 33.
संलग्न चित्र-14.89 में प्रदर्शित ट्रांजिस्टर किस प्रकार का है? इसमें

  • उत्सर्जक एवं आधार तथा
  • धार एवं संग्राहक के बीच दो p-n सन्धियाँ हैं। इन दोनों में से कौन-सी सन्धि अग्र अभिनत (फॉरवर्ड बायस) तथा कौन-सी सन्धि उत्क्रम अभिनत (रिवर्स बायस) है?

उत्तर :
ट्रांजिस्टर p-n-p प्रकार का है। उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि अग्र अभिनत है, जबकि आधार-संग्राहक (n-p) सन्धि उत्क्रम अभिनत है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 78

प्रश्न 34.
p-n-p ट्रांजिस्टर का नामांकित संकेत चित्र बनाइए।
उत्तर
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 79

प्रश्न 35.
ट्रांजिस्टर से आप क्या समझते हैं?[2004, 05]
उत्तर :
ट्रांजिस्टर-ट्रांजिस्टर p तथा n-टाइप के अर्द्धचालकों से बनी एक इलेक्ट्रॉनिक युक्ति है, जो ट्रायोड वाल्व के स्थान पर प्रयुक्त की जाती है।

प्रश्न 36.
ट्रांजिस्टर की रचना कैसे की जाती है?
उत्तर :
दो समान प्रकार के अर्द्धचालक; जैसे p-टाइप (अथवा n-टाइप) क्रिस्टलों के बीच एक विपरीत प्रकार के अर्द्धचालक जैसे n-टाइप (अथवा p-टाइप) क्रिस्टल की पतली परत को दबाकर ट्रांजिस्टर की रचना की जाती है।

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प्रश्न 37.
ट्रांजिस्टर के एक उपयोग का नाम लिखिए।
उत्तर :
ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के रूप में प्रयुक्त होता है। प्रश्न 38. ट्रांजिस्टर के शक्ति लाभ का व्यंजक लिखिए। उत्तर : शक्ति लाभ = वोल्टेज लाभ x धारा लाभ।

प्रश्न 39.
क्या दो pn सन्धि डायोडों को p-n a n-p क्रम में मिलाकर रखने पर p-n-p ट्रांजिस्टर का कार्य कर सकते हैं?
उत्तर :
नहीं; क्योंकि इस दशा में n-क्षेत्र (जो आधार का कार्य करेगा) बहुत मोटा हो जाएगा।

प्रश्न 40.
p-n-p ट्रांजिस्टर में उत्सर्जक तथा संग्राहक दोनों टाइप के होते हुए भी वे कैसे समान नहीं हैं? [2004]
उत्तर :
उत्सर्जक अधिक अपमिश्रित तथा संग्राहक अपेक्षाकृत कम अपमिश्रित होता है।

प्रश्न 41.
LED का पूरा नाम लिखिए। [2015]
उत्तर :
Light Emitting Diode.

प्रश्न 42.
LED क्या है?
अथवा
परिपथ बनाकर इसके.V-I अभिलाक्षणिक वक्र को प्रदर्शित कीजिए। [2017]
उत्तर :
LED-प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) अधिक अपमिश्रित p-n सन्धि डायोड होता है जो अग्र अभिनति में प्रयुक्त किया जाता है तथा अभिनत बैटरी से प्राप्त वैद्युत ऊर्जा को प्रकाश के रूप में उत्सर्जित करता है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 80

प्रश्न 43.
सौर सेल क्या है?
उत्तर :
सौर सेल-सौर सेल एक विशिष्ट प्रकार का अवअभिनत (unbiased) p-n सन्धि डायोड होता है जो सौर ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

प्रश्न 44.
जेनर डायोड क्या है? इसका परिपथ चिह्न बनाइए। [2014, 17]
उत्तर :
जेनर डायोड-जेनर डायोड अधिक अनमिश्रित p-n सन्धि डायोड होता है जो उत्क्रम अभिनति में भंजक वोल्टता पर बिना खराब हुए निरन्तर कार्य कर सकता है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 81

प्रश्न 45.
जेनर डायोड का उपयोग क्या है?
उत्तर :
जेनर डायोड वोल्टता नियन्त्रक के रूप में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 46.
क्या दिए गए चित्र-14.93 में सन्धि डायोड D अग्र-अभिनत है
अथवा
उत्क्रम-अभिनत है?
उत्तर :
सन्धि डायोड D उत्क्रम-अभिनत है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 82

प्रश्न 47.
ऐनालोग तथा डिजिटल सिग्नलों में क्या अन्तर है? –
उत्तर :
ऐनालोग सिग्नल दिए गए परिसर में कोई भी मान ग्रहण कर सकता है क्योंकि यह सतत होता है जबकि डिजिटल सिग्नल केवल दो विविक्त मान ग्रहण कर सकता है।

प्रश्न 48.
ऐनालोग तथा डिजिटल परिपथों में क्या अन्तर है?[2007]
उत्तर :
ऐनालोग परिपथ में वोल्टेज (अथवा धारा) समय के साथ निरन्तर बदलता रहता है जबकि डिजिटल परिपथ में वोल्टेज (अथवा धारा) के केवल दो स्तर होते हैं।

प्रश्न 49.
मूल लॉजिक गेटों के नाम बताइए।[2003, 10]
उत्तर :
OR गेट, AND गेट तथा NOT गेट।

प्रश्न 50.
AND गेट को व्यवहार में कैसे प्रयुक्त करते हैं?
उत्तर :
AND गेट का बूलियन व्यंजक A. B= Y है। यदि A = 0, B= 0 तो Y = 0; यदि A = 0, B= 1 तो Y = 0; यदि A = 1, B= 0 तो Y = 0; यदि A = 1, B= 1 तो Y = 1.

प्रश्न 51.
NOT गेट को व्यवहार में कैसे प्रयुक्त करते हैं?[2007]
उत्तर :
NOT गेट का बूलियन व्यंजक \(\bar{A}\) = Y है। बाइनरी पद्धति में केवल दो अंक 0 व 1 होते हैं। यदि निवेशी A = 0 तो निर्गत Y = 1 होगा। इसके विपरीत यदि निवेशी A = 1 तो निर्गत Y = 0 होगा।

प्रश्न 52.
AND गेट का बूलियन एक्सप्रेशन लिखिए।[2008]]
अथवा
AND द्वारक हेतु बूलियन व्यंजक लिखिए तथा इसकी सत्यता सारणी भी लिखिए।[2018]
उत्तर :
दो निवेशों A तथा B वाले AND गेट का बूलियन एक्सप्रेशन A. B = Y है।
AND द्वारक की सत्यता सारणी
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 83

प्रश्न 53.
NOT गेट का बूलियन व्यंजक लिखिए।
अथवा
NOT गेट के लिए लॉजिक प्रतीक तथा बूलियन व्यंजक दीजिए। [2018]
उत्तर
एक निवेशी सिग्नल A वाले NOT गेट का बूलियन व्यंजक Y = \(\bar{A}\) है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 84

प्रश्न 54.
OR गेट का बूलियन व्यंजक लिखिए।
उत्तर :
दो निवेशी सिग्नलों A व B वाले OR गेट का बूलियन व्यंजक Y = A+ B है।

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प्रश्न 55.
AND गेट किस नियम पर कार्य करता है?
उत्तर :
AND गेट का निर्गत स्तर 1 केवल तब होता है जब दोनों निवेशियों का स्तर 1 हो।

प्रश्न 56.
NOT गेट किस नियम पर कार्य करता है?
उत्तर :
यदि NOT गेट का एकल निवेशी का स्तर 0 हो तो उसका निर्गत स्तर 1 होता है।

प्रश्न 57.
लॉजिक गेट को लॉजिक गेट क्यों कहा जाता है?
उत्तर
लॉजिक गेट को लॉजिक गेट इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह या तो किसी डिजिटल सिग्नल को रोकता है अथवा गुजरने देता है तथा इसके निर्गत तथा निवेश के बीच एक तर्कपूर्ण सम्बन्ध (logical relation) होता है।

प्रश्न 58.
चित्र-14.95 में प्रदर्शित लॉजिक गेट का नाम लिखिए। [2009]
उत्तर :
AND गेट।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 85

प्रश्न 59.
प्रदर्शित लॉजिक परिपथ के लिए निर्गत सिग्नल Y का बूलियन व्यंजक लिखिए। [2018]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 86
हल :
यहाँ y’ = \(\overline{\mathrm{A}+\mathrm{B}}\) तथा Y= \(\overline{\mathbf{Y}}^{\prime}\)
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 87

अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल आंकिक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एक p-n सन्धि डायोड का अग्र अभिनत में प्रतिरोध 10 ओम है। यदि अग्र वोल्टेज में 0•025 वोल्ट का परिवर्तन करें तो डायोड धारा में कितना परिवर्तन होगा? [2010, 14]
हल :
दिया है, R= 10 ओम, ΔV = 0.025 वोल्ट, ΔI = ?
डायोड धारा में परिवर्तन ΔI = \(\frac { ΔV }{ R }\) = \(\frac { 0.025 }{ 10 }\) = 2.5 x 10-3 ऐम्पियर।

प्रश्न 2.
उभयनिष्ठ उत्सर्जक ट्रांजिस्टर का धारा लाभ 5.0 है। यदि इसकी आधार धारा का मान 0.4 मिलीऐम्पियर हो, तो उत्सर्जक धारा का मान ज्ञात कीजिए। [2018]
हल :
दिया है, β = 5.0, ΔIB = 0.4 मिलीऐम्पियर, Δlc = ?
\(\beta=\frac{\Delta I_{C}}{\Delta I_{B}}\)
∴ ΔIc = β × ΔIB = 5.0 × 0.4 = 2.0 मिलीऐम्पियर
उत्सर्जक धारा ΔIE = ΔIB + ΔIC = 0.4+ 2.0 = 2.4 मिलीऐम्पियर।

प्रश्न 3.
उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक के लिए धारा लाभ 59 है। यदि उत्सर्जक धारा 6.0 मिलीऐम्पियर हो तब आधार धारा का मान ज्ञात कीजिए। [2018]
हल :
दिया है, β = 59, ΔIE = 6.0 मिलीऐम्पियर, ΔIB = ?
β = \(\frac{\Delta I_{C}}{\Delta I_{B}}\) या ΔIc = 59 (ΔIB)
उत्सर्जक धारा ΔIE = ΔIB + ΔIc
6.0 = ΔIB + 59(ΔIB)
6.0 = 60(ΔIB)
या ΔIB = \(\frac { 6.0 }{ 60 }\) = 0.1 मिलीऐम्पियर।

प्रश्न 4.
एक p-n सन्धि डायोड का अग्र अभिनत की स्थिति में प्रतिरोध 250 है। अग्र अभिनत विभव में कितना परिवर्तन किया जाए कि धारा में 2 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन हो जाए?
[2003]
हल :
दिया है, R = 25Ω, ΔI = 2 मिलीऐम्पियर,
अग्र अभिनत विभव ΔV = R × ΔI = 25 × 2 = 50 मिलीवोल्ट।

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प्रश्न 5.
उभयनिष्ठ आधार परिपथ में किसी ट्रांजिस्टर का धारा लाभ 0.98 है। यदि उत्सर्जक धारा में 5.0 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन हो तो संग्राहक धारा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
[2015]
हल :
दिया है, a = 0.98, ΔIE = 5.0 मिलीऐम्पियर, Δlc = ?
संग्राहक धारा में परिवर्तन ΔIC = a × ΔIE = 0.98 × 5 = 4.9 मिलीऐम्पियर।

प्रश्न 6.
एक B = 19 धारा लाभ वाले ट्रांजिस्टर की उभयनिष्ठ उत्सर्जक व्यवस्था में यदि आधार धारा में 0.4 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन किया जाए तो संग्राहक धारा में कितना परिवर्तन होगा? उत्सर्जक धारा में क्या परिवर्तन होगा? [2001]
हल :
दिया है, β = 19, ΔIB = 0.4 मिलीऐम्पियर, Δlc = ?
सूत्र β = \(\frac{\Delta I_{C}}{\Delta I_{B}}\) से,
संग्राहक धारा में परिवर्तन ΔI = β × ΔIB = 19 × 0.4 = 7.6
मिलीऐम्पियर। उत्सर्जक धारा में परिवर्तन ΔIE = ΔIB + Δlc = 0.4+ 7.6 = 8.0 मिलीऐम्पियर।

प्रश्न 7.
एक n-p-n ट्रांजिस्टर में 10-6 सेकण्ड में 1010 इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक में प्रवेश करते हैं। 2% इलेक्ट्रॉन आधार में क्षय हो जाते हैं। उत्सर्जक धारा (IF) तथा आधार धारा (IB) के मान ज्ञात कीजिए। धारा परिणमन अनुपात तथा धारा प्रवर्धन गुणांक की गणना कीजिए। [2005, 06]
हल :
दिया है, t= 10-6 सेकण्ड,
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 88

प्रश्न 8.
n-p-n सिलिकन ट्रांजिस्टर का निवेशी प्रतिरोध 665 2 है। आधार-धारा में 15 माइक्रोएम्पियर का परिवर्तन करने पर संग्राहक धारा में 2 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन होता है। ट्रांजिस्टर का उपयोग उभयनिष्ठ उत्सर्जक का उपयोग उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक के रूप में किया जाता, जिसका लोड प्रतिरोध 5 किलोओम है। प्रवर्धक का वोल्टेज लाभ ज्ञात कीजिए। [2018]
हल :
दिया है, R1 = 665 Ω, ΔIB = 15 माइक्रोएम्पियर = 0.015 मिली ऐम्पियर, ΔIC = 2 मिलीऐम्पियर
R2 = 5 किलोओम = 5000 Ω, A = ?
धारा लाभ \(\beta=\frac{\Delta I_{C}}{\Delta I_{B}}=\frac{2}{0.15}=\frac{2000}{15}=\frac{400}{3}\)
प्रवर्धक का वोल्टेज लाभ (A) = \(\beta \cdot \frac{R_{2}}{R_{1}}=\frac{400}{3} \times \frac{5000}{665}=1002.5\)

प्रश्न 9.
एक सिलिकन ट्रांजिस्टर में, उत्सर्जक धारा में 8.89 मिलीऐम्पियर के परिवर्तन से संग्राहक धारा में 8.80 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन होता है। संग्राहक धारा में इतने ही परिवर्तन के लिए आधार-धारा में कितना परिवर्तन करना होगा?
हल :
दिया है, ΔIE = 8.89 मिलीऐम्पियर, Δlc = 8.80 मिलीऐम्पियर, ΔlB = ?
आधार-धारा ΔIB = ΔIE – ΔIc = 8.89- 8.80 = 0.09 मिलीऐम्पियर

प्रश्न 10.
एक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लिए β = 30, लोड प्रतिरोध RL = 4 किलीओम तथा निवेशी प्रतिरोध Ri = 4002 है। इसका वोल्टेज प्रवर्धन ज्ञात कीजिए।
हल :
वोल्टेज प्रवर्धन Av = \(\beta\left(\frac{R_{L}}{R_{i}}\right)=30 \times \frac{4000}{400}=300\)

प्रश्न 11.
एक ट्रांजिस्टर परिपथ में संग्राहक धारा 13.4 मिलीऐम्पियर तथा आधार-धारा 150 माइक्रोएम्पियर है। परिपथ में उत्सर्जक धारा ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है,ΔIC= 13.4 माइक्रोएम्पियर, ΔIB = 150 माइक्रोएम्पियर = 0.150 मिली ऐम्पियर, ΔIE = ?
उत्सर्जक धारा ΔIE = ΔlC + ΔIB = 13.4+ 0.150 = 13.55 मिलीऐम्पियर।

प्रश्न 12.
एक ट्रांजिस्टर परिपथ की उत्सर्जक धारा में 1.8 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन करने पर संग्राहक धारा में 1.6 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन होता है। इसके लिए परिपथ की आधार धारा में परिवर्तन का मान ज्ञात कीजिए। [2012]
हल :
दिया है, ΔIE = 1.8 मिलीऐम्पियर, ΔlC = 1.6 मिलीऐम्पियर
सूत्र ΔIE = ΔLc + ΔIB से
ΔlB = ΔIE – ΔlC = 1.8 – 1.6 = 0.2 मिलीऐम्पियर।

प्रश्न 13.
संलग्न चित्र 14.97 में प्रदर्शित अमीटर A, तथा A में मापी गई विद्युत धाराएँ क्या हैं? यदि उनके प्रतिरोध नगण्य तथा (p-n) सन्धि डायोड आदर्श हों? [2013]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 89
दिया गया p-n सन्धि डायोड उत्क्रम अभिनति में है, अत: इसका प्रतिरोध अनन्त होगा तथा उस शाखा में कोई धारा नहीं बहेगी।
∴ अमीटर A1 से मापी गई वैद्युत धारा I1 = 0
अमीटर A2 से मापी गई वैद्युत धारा I2 = \(\frac { V }{ R }\) = \(\frac { 2 }{ 5 }\)= 0.4 ऐम्पियर।

प्रश्न 14.
दिए गए p-n सन्धि डायोड से प्रवाहित धारा की गणना कीजिए।
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 90
परिपथ के सिरों पर विभवान्तर = 5 – (-1) = 6 वोल्ट
परिपथ में प्रवाहित धारा I = \(\frac { V }{ R }\) = \(\frac { 6 }{ 300 }\)= 0.02 ऐम्पियर।

प्रश्न 15.
संलग्न चित्र-14.99 में लॉजिक परिपथ की सम्पूर्ण सत्य सारणी लिखिए।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 91
हल :
प्रथम AND गेट तथा द्वितीय NOT गेट है, अतः यह NAND गेट होगा। इसका बूलियन व्यंजक Y’=A. B. C है
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 92

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प्रश्न 16.
संलग्न चित्र 14.100 में लॉजिक परिपथ के लिए सत्य सारणी बनाइए तथा इसका बूलियन व्यंज़क लिखिए [2008, 12]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 93
हल :
प्रथम OR गेट तथा द्वितीय NOT गेट है। अत: यह NOR गेट है। इसका बूलियन व्यंजक Y’= A+ B+ C
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 94

प्रश्न 17.
चित्र में प्रदर्शित लॉजिक गेट का संकेत चित्र दिया गया है-

1. लॉजिक गेट का नाम तथा सत्यता सारणी लिखिए।
2. A व B को दिए गए निवेशी सिग्नलों का निर्गत सिग्नल प्रदर्शित कीजिए।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 95
उत्तर :
1. दिया गया लॉजिक गेट AND गेट है। AND गेट की सत्यता सारणी
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 96
2.
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 97

अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

• निम्नलिखित प्रश्नों के चार विकल्प दिए गए हैं। सही विकल्प का चयन कीजिए

1. Pटाइप का अर्द्धचालक बनाने के लिए शुद्ध जर्मेनियम में मिलाया जाने वाला अपद्रव्य है- [2003, 11,17]
(a) फॉस्फोरस
(b) ऐन्टिमनी
(c) ऐलुमिनियम
(d) नाइट्रोजन।
उत्तर :
(c) ऐलुमिनियम

2. n-टाइप का अर्द्धचालक बनाने के लिए शुद्ध सिलिकन में जो अपद्रव्य मिलाया जाता है, वह है [2004]
(a) बोरॉन
(b) फॉस्फोरस
(c) ऐन्टिमनी
(d) ऐलुमिनियम।
उत्तर :
(b) फॉस्फोरस
(c) ऐन्टिमनी

3. n-टाइप का अर्द्धचालक वैद्युत से होता है[2005]
(a) धनात्मक आवेशित
(b) उदासीन
(c) ऋणात्मक आवेशित
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर :
(b) उदासीन

4. एक p-टाइप अर्द्धचालक होता है [2018]
(a) धनावेशित
(b) ऋणावेशित
(c) उदासीन
(d) धनावेशित या ऋणावेशित कोई भी।
उत्तर :
(c) उदासीन

5. n-टाइप के अर्द्धचालक में वैद्युत चालन का कारण है [2005, 16]
(a) इलेक्ट्रॉन .
(b) प्रोटॉन
(c) कोटर
(d) पॉजिट्रॉन।
उत्तर :
(a) इलेक्ट्रॉन

6. n-टाइप अर्द्धचालक में आवेश वाहक होते हैं [2005, 06, 08, 11]
(a) केवल इलेक्ट्रॉन
(b) केवल कोटर
(c) दोनों, अल्प संख्या में इलेक्ट्रॉन तथा अधिक संख्या में कोटर
(d) दोनों, अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन तथा अल्प संख्या में कोटर।
उत्तर :
(d) दोनों, अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन तथा अल्प संख्या में कोटर।

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7. p-टाइप का अर्द्धचालक बनता है [2007]
(a) जब एक जर्मेनियम क्रिस्टल में 3 संयोजी अपद्रव्य पदार्थ मिलाए जाते हैं
(b) जब एक जर्मेनियम क्रिस्टल में 5 संयोजी अपद्रव्य पदार्थ मिलाए जाते हैं
(c) शुद्ध जर्मेनियम से
(d) शुद्ध ताँबे से।
उत्तर :
(a) जब एक जर्मेनियम क्रिस्टल में 3 संयोजी अपद्रव्य पदार्थ मिलाए जाते हैं

8. p-टाइप चालक प्राप्त करने के लिए जर्मेनियम में थोड़ा अपद्रव्य मिलाया जाता। अपद्रव्य की संयोजकता है- [2018]
(a) 1
(b) 2
(c) 3
(d) 5.
उत्तर :
(c) 3

9. Pटाइप के अर्द्धचालक में आवेश वाहक होते हैं
(a) केवल कोटर
(b) इलेक्ट्रॉनों तथा कोटरों की समान संख्या
(c) इलेक्ट्रॉनों की अधिक संख्या और कोटरों की कम संख्या
(d) कोटरों की अधिक संख्या तथा इलेक्ट्रॉनों की कम संख्या।
उत्तर :
(d) कोटरों की अधिक संख्या तथा इलेक्ट्रॉनों की कम संख्या।

10. अर्द्धचालकों में वैद्युत चालन होता है[2010, 17]
(a) कोटरों से
(b) इलेक्ट्रॉनों से
(c) कोटरों तथा इलेक्ट्रॉनों से
(d) न तो कोटरों से और न ही इलेक्ट्रॉनों से।
उत्तर :
(c) कोटरों तथा इलेक्ट्रॉनों से

11. अर्द्धचालकों की चालकता [2017]
(a) ताप पर निर्भर नहीं करती
(b) ताप बढ़ने पर घटती है
(c) ताप बढ़ने पर बढ़ती है
(d) ताप घटने पर बढ़ती है।
उत्तर :
(c) ताप बढ़ने पर बढ़ती है

12. कोटर (छिद्र) अधिसंख्य आवेश वाहक होते हैं[2017]
(a) नैज अर्द्धचालकों में
(b) n-प्रकार के अर्द्धचालकों में
(c) p-प्रकार के अर्द्धचालकों में ।
(c) धातुओं में।
उत्तर :
(c) p-प्रकार के अर्द्धचालकों में ।

13. n-टाइप के अर्द्धचालक में अल्पसंख्यक आवेश वाहक होते हैं [2010]
(a) इलेक्ट्रॉन
(b) होल
(c) इलेक्ट्रॉन तथा होल
(d) इनमें में से कोई नहीं।
उत्तर :
(b) होल

14. किसी जर्मेनियम क्रिस्टलों को pटाइप अर्द्धचालक में परिवर्तित करने के लिए अपद्रव्य तत्व की संयोजकता है [2012]
(a)6
(b) 5
(c) 4
(d) 3
उत्तर :
(d) 3

15. परम शून्य ताप पर शुद्ध जर्मेनियम का क्रिस्टल व्यवहार करता है [2010, 12, 13]
(a) पूर्ण चालक की भाँति
(b) पूर्ण अचालक की भाँति
(c) अर्द्धचालक की भाँति
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर :
(b) पूर्ण अचालक की भाँति

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16. शुद्ध सिलिकन के n-टाइप अर्द्धचालक बनाने के लिए इसमें अपद्रव्य पदार्थ मिलाते हैं [2014]
(a) ऐलुमिनियम
(b) लोहा
(c) बोरॉन
(d) ऐन्टिमनी।
उत्तर :
(d) ऐन्टिमनी।

17. शुद्ध जर्मेनियम में कौन-सा अपद्रव्य परमाणु मिश्रित कर दें कि यह एक Pटाइप अर्द्धचालक हो जाए
(a) फॉस्फोरस
(b) एण्टीमनी
(c) ऐलुमिनियम
(d) बिस्मथ।
उत्तर :
(c) ऐलुमिनियम

18. निम्न में से कौन-सा कथन सत्य नहीं है? [2018]
(a) अर्द्धचालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कम हो जाता है
(b) वैद्युत क्षेत्र में कोटर (होल) इलेक्ट्रॉन की गति के विपरीत दिशा में गति करता है
(c) धातु का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कम हो जाता है .
(d) n-टाइप के अर्द्धचालक उदासीन होते हैं।
उत्तर :
(c) धातु का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कम हो जाता है .

19. चालन एवं संयोजी बैण्डों की ऊर्जाओं में अन्तर [2018]
(a) चालकों में अधिकतम होता है
(b) चालकों में न्यूनतम होता है
(c) अर्द्धचालकों में चालकों से कम होता है
(d) कुचालकों में चालकों से कम होता है।
उत्तर :
(b) चालकों में न्यूनतम होता है

20. तीन पदार्थों के ऊर्जा बैण्ड चित्र-14.104 में दिए गए हैं, जहाँ V संयोजी बैण्ड तथा Cचालन बैन्ड हैं। ये पदार्थ क्रमशः हैं [2014] |
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 98
(a) चालक, अर्द्धचालक, कुचालक
(b) अर्द्धचालक, कुचालक, चालक
(c) कुचालक, चालक, अर्द्धचालक
(d) अर्द्धचालक, चालक, कुचालक।
उत्तर :
(d) अर्द्धचालक, चालक, कुचालक।

21. एक अर्द्धचालक डायोड के p-सिरे को भू-सम्पर्कित किया गया है तथा n-सिरे पर-2 वोल्ट का विभव लगाया गया है। डायोड में [2004]
(a) चालन होगा
(b) चालन नहीं होगा
(c) आंशिक चालन होगा
(d) भंजन हो जाएगा।
उत्तर :
(a) चालन होगा

22. pn सन्धि डायोड के अवक्षय परत में होते हैं [2007, 12, 17]
(a) केवल कोटर
(b) केवल इलेक्ट्रॉन
(c) इलेक्ट्रॉन तथा कोटर
(d) न इलेक्ट्रॉन न कोटर।
उत्तर :
(d) न इलेक्ट्रॉन न कोटर।

23. p-n सन्धि डायोड में उत्क्रम संतृप्त धारा का कारण है, केवल [2009]
(a) अल्पसंख्यक वाहक
(b) बहुसंख्यक वाहक
(c) ग्राही आयन
(d) दाता आयन।
उत्तर :
(a) अल्पसंख्यक वाहक

24. एक अर्द्धचालक डायोड में विभव प्राचीर विरोध करता है, मात्र [2009]
(a) n-क्षेत्र में बहुसंख्यक वाहकों को
(b) p-क्षेत्र में बहुसंख्यक वाहकों को
(c) दोनों क्षेत्रों के बहुसंख्यक वाहकों को .
(d) दोनों क्षेत्रों के अल्पसंख्यक वाहकों को।
उत्तर :
(c) दोनों क्षेत्रों के बहुसंख्यक वाहकों को .

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25. जर्मेनियम डायोड का प्राचीर विभव लगभग है[2009]
(a) 0.1 वोल्ट
(b) 0.3 वोल्ट
(c) 0.5 वोल्ट
(d) 0.7 वोल्ट।
उत्तर :
(b) 0.3 वोल्ट

26. सिलिकन डायोड में सन्धि विभव का मान होता है [2008]
(a) 0.2 वोल्ट
(b) 0.4 वोल्ट
(c) 0.3 वोल्ट
(d) 0.6 वोल्ट।
उत्तर :
(d) 0.6 वोल्ट।

27. ट्रांजिस्टर मूल रूप से एक [2003, 06]
(a) शक्ति चालित साधन है
(b) विभव चालित साधन है
(c) प्रतिरोध चालित साधन है
(d) धारा चालित साधन है।
उत्तर :
(d) धारा चालित साधन है।

28. n-p-n ट्रांजिस्टर का परिपथ प्रतीक है [2006]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 99
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 100

29. एक ट्रांजिस्टर में [2013]
(a) उत्सर्जक के अपद्रव्य का सान्द्रण न्यूनतम होता है
(b) संग्राहक के अपद्रव्य का सान्द्रण न्यूनतम होता है
(c) आधार के अपद्रव्य का सान्द्रण न्यूनतम होता है .
(d) तीनों क्षेत्रों के अपद्रव्य का सान्द्रण समान होता है।
उत्तर :
(c) आधार के अपद्रव्य का सान्द्रण न्यूनतम होता है .

30. एक n-p-n ट्रांजिस्टर में संग्राहक धारा 10 मिलीऐम्पियर है। यदि इलेक्ट्रॉनों में से 90% संग्राहक पर पहुँचते हैं तो[2013]
(a) उत्सर्जक धारा 9 मिलीऐम्पियर होगी
(b) उत्सर्जक धारा 10 मिलीऐम्पियर होंगी
(c) आधारा धारा 1 मिलीऐम्पियर होगी
(d) आधार धारा 11 मिलीऐम्पियर होगी।
उत्तर :
(c) आधारा धारा 1 मिलीऐम्पियर होगी

31. धारा लाभ β = 19 वाले ट्रांजिस्टर की उभयनिष्ठ उत्सर्जक व्यवस्था में यदि आधार धारा में 0.4 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन किया जाए तो संग्राही धारा में परिवर्तन होगा
[2007]
(a) 7.6 मिलीऐम्पियर
(b) 4.75 मिलीऐम्पियर
(c) 1.31 मिलीऐम्पियर
(d) 0.21 मिलीऐम्पियर।
उत्तर :
(a) 7.6 मिलीऐम्पियर

32. एक ट्रांजिस्टर के आधार धारा में 25 µA का परिवर्तन करने पर संग्राहक धारा में 0.55 मिलीऐम्पियर का परिवर्तन होता है। β (ac) का मान होगा [2009]
(a) 22 .
(b) 0.045
(c) 20
(d) 0.09.
उत्तर :
(a) 22 .

33. एक ट्रांजिस्टर के उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक के लिए शक्ति प्रवर्धन AP तथा वोल्टेज प्रवर्धन AV हो, तो धारा प्रवर्धन होगा [2018]
(a) Ap × AV
(b) AP / AV
(c) AV / Ap
(d) \(\sqrt{A_{P} \times A_{V}}\)
उत्तर :
(b) AP / AV

34.
एक ट्रांजिस्टर की आधार धारा 100 मिलीऐम्पियर तथा संग्राहक धारा 2.15 मिलीऐम्पियर है। 8 का मान होगा [2009]
(a) 21.5
(b) 0.0465
(c) 2.15 × 105
(d) 10.
उत्तर :
(a) 21.5

35. एक n-p-n ट्रांजिस्टर में संग्राहक धारा 24 mA है। यदि संग्राहक की ओर 80% इलेक्ट्रॉन पहुँचते हों तो आधार धारा [2014]
(a) 3 मिली ऐम्पियर
(b) 16 मिली ऐम्पियर
(c) 6 मिली ऐम्पियर
(d) 36 मिली ऐम्पियर।
उत्तर :
(c) 6 मिली ऐम्पियर

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36. डिजिटल निकाय जिस संख्या पद्धति पर कार्य करते हैं, वह है
(a) दशमलव
(b) बाइनरी
(c) अष्ट
(d) षट्दशमलव।
उत्तर :
(b) बाइनरी

37. डिजिटल परिपथ कार्य करता है-.
(a) केवल एक अवस्था में
(b) केवल दो अवस्थाओं में
(c) सभी अवस्थाओं में
(d) कुछ निश्चित नहीं।
उत्तर :
(b) केवल दो अवस्थाओं में

38. दी गई सत्यता सारणी किस गेट की है [2004, 09, 10] |
(a) NAND गेट
(b) AND गेट
(c) OR गेट
(d) NOT गेट।
उत्तर :
(b) AND गेट

39. AND गेट में उच्च (1) निर्गत प्राप्त करने के लिए निवेशी A व B होने चाहिए [2004, 05, 11]
अथवा दो निवेशों A तथा B वाले AND गेट को निर्गत 1 होने के लिए यह आवश्यक है कि [2006]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 101
(a) A= 0, B= 0
(b) A = 1, B= 0
(c) A = 0, B= 1
(d) A = 1, B = 1.
उत्तर :
(d) A = 1, B = 1.

40. दिया गया लॉजिक प्रतीक निरूपित करता है [2004, 06]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 102
(a) AND गेट
(b) OR गेट
(c) NAND गेट
(d) NOT गेट।
उत्तर :
(d) NOT गेट।

41. निवेशियों A तथा B के लिए निर्गत C का बूलियन व्यंजक A+ B = C से दिया गया है। इस समीकरण के संगत गेट होगा [2004, 05, 06]
(a) AND
(b) OR
(c) NOT
(d) NOR.
उत्तर :
(b) OR

42. दो निवेश A तथा B वाले OR गेट का निर्गत शून्य होने के लिए आवश्यक है कि [2011]
(a) A = 0, B= 0
(b) A = 1, B= 0
(c) A = 0, B= 1 .
(d) A = 1, B= 1.
उत्तर :
(a) A = 0, B= 0

43. दिया गया लॉजिक प्रतीक निरूपित करता है [2005, 06]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 103
(a) AND गेट
(b) NAND गेट
(c) OR गेट
(d) NOT गेट।
उत्तर :
(c) OR गेट

44. दिया गया लॉजिक प्रतीक निरूपित करता है [2005, 06]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 104
(a) AND
(b) OR
(c) NOT
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर :
(a) AND

45. बूलियन व्यंजक Y = \(A \bar{B}+B \bar{A}\) दिया गया है। यदि A = 1 तथा B = 1 हो तो Y का मान होगा [2006, 11, 12]
(a) 0
(b) 1
(c) 11
(d) 10.
[संकेत : ∵ A = 1, B= 1 है तो \(\bar{A}\) = 0, \(\bar{B}\) = 0 ∴ \(A \bar{B}+B \bar{A}\) = (1) (0) + (1) (0) = 0+ 0 = 0]
उत्तर :
(a) 0

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46. OR गेट में एक निवेशी ‘0’ तथा दूसरा ‘1’ है। निर्गत होगा [2006]
(a) 0
(b) 1
(c) 0 अथवा 1
(d) अनिश्चित।
उत्तर :
(b) 1

47. दी गई सत्यता सारणी किस गेट की है [2008, 09, 10, 11]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 105
(a) OR गेट की
(b) NOT गेट की
(c) NOR गेट की
(d) AND गेट की।
उत्तर :
(a) OR गेट की

48. दो निवेशी टर्मिनलों वाले OR गेट का निर्गत केवल तब 0 होता है, जब [2013, 16]
(a) कोई एक निवेशी 1 हो
(b) दोनों निवेशी 1 हों
(c) कोई एक निवेशी 0 हो
(d) इसके दोनों निवेशी 0 हों।
उत्तर :
(d) इसके दोनों निवेशी 0 हों।

49. AND गेट में एक निवेशी 0 तथा दूसरा 1 है। निर्गत होगा
(a) 0
(b) 1
(c) अनन्त
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर :
(a) 0

50. चित्र-14.108 में प्रदर्शित गेटों के संयोजन से, निर्गत Y = 1प्राप्त करने के लिए [2015, 16]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 106
(a) A = 1, B= 0, C = 1
(b) A = 1, B= 1, C= 0
(c) A = 0, B= 1, C = 0
(d) A= 1, B= 0, C = 0.
उत्तर :
(a) A = 1, B= 0, C = 1

51. दिए गए लॉजिक गेटों के संयोजन का बूलियन व्यंजक है
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 107
(a)Y = A + \(\bar{B}\)
(b) Y = \(\overline{A+B}\)
(c) Y = \(\bar{A}\) + \(\bar{B}\)
(d) Y = \(\bar{A}\) + B.
उत्तर :
(d) Y = \(\bar{A}\) + B.

52. चित्र-14.110 में प्रदर्शित लॉजिक निकाय निरूपित करता है- [2016]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 14 अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ युक्तियाँ तथा सरल परिपथ 108
(a) NAND गेट
(b) OR गेट
(c) AND गेट
(d) NOT गेट।
चित्र-14.110
उत्तर :
(b) OR गेट

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MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र

MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र

वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसी वैद्युत द्विध्रुव के कारण उसकी अक्षीय स्थिति (अनुदैर्ध्य स्थिति) में किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता के सूत्र का निगमन कीजिए। [2002, 11, 12, 13, 14]
अथवा
वैद्युत द्विध्रुव की अक्षीय दिशा में अत्यधिक दूरी पर स्थित बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक प्राप्त कीजिए। [2015, 16, 17]
उत्तर :
वैद्युत द्विध्रुव की अक्ष पर स्थित किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of the Electric Field at an Axial Point of an Electric Dipole) (अक्षीय अथवा अनुदैर्घ्य स्थिति :End-on Position) –  माना AB वैद्युत द्विध्रुव K परावैद्युतांक के माध्यम में स्थित है, जिसके A सिरे पर +q आवेश तथा B सिरे पर -q आवेश एक-दूसरे से 2l दूरी पर स्थित हैं (चित्र 1.23)। इस वैद्युत द्विध्रुव के मध्य-बिन्दु O से r मीटर की दूरी पर इसकी अक्षीय स्थिति में कोई बिन्दु P है, जहाँ पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 1
बिन्दु P की आवेश +q से दूरी (r – l) और आवेश -q से दूरी (r + l) है। यदि इनके संगत तीव्रताएँ क्रमश: E1 व E2 हों तो
+q आवेश के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E 1 = \(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0} K} \frac{q}{(r-l)^{2}}\) (A →P दिशा में)
-q आवेश के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E2 = \(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0} K} \frac{q}{(r+l)^{2}}\) (P →B दिशा में)

E1 व E2 एक ही रेखा के अनुदिश विपरीत दिशाओं में कार्यरत हैं तथा E1 का मान E2 से अधिक है; अत: बिन्दु P पर परिणामी तीव्रता E इन दोनों तीव्रताओं के अन्तर के बराबर तथा \(\overrightarrow{\mathrm{E}}_{1}\) की दिशा में होगी।
अतः बिन्दु P पर वैद्युत द्विध्रुव के कारण परिणामी वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E = E1 – E2
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 2
यदि l का मान r की अपेक्षा बहुत कम हो (1 <<r) तो l2 का मान r2 की तुलना में नगण्य माना जा सकता है; अत: वैद्युत द्विध्रुव के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 3

यदि वैद्युत द्विध्रुव निर्वात (अथवा वायु) में रखा है, तब निर्वात अथवा वायु के लिए K = 1, अतः वैद्युत द्विध्रुव के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
E = \(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{2 p}{r^{3}}\) न्यूटन/कूलॉम।
सदिश रूप में, \(\overrightarrow{\mathrm{E}}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{2 \overrightarrow{\mathrm{p}}}{r^{3}}\) न्यूटन/कूलॉम।
इस प्रकार अक्षीय स्थिति में वैद्युत क्षेत्र E की दिशा वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण के अनुदिश अर्थात् ऋण आवेश से धन . आवेश की ओर होती है।

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प्रश्न 2.
किसी वैद्युत द्विध्रुव के कारण निरक्षीय (अनुप्रस्थ) स्थिति में किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
[2009, 14]
अथवा
किसी वैद्युत द्विध्रुव के कारण समद्विभाजक लम्ब अक्ष के किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक प्राप्त कीजिए। [2008, 09]
उत्तर :
वैद्युत द्विध्रुव की निरक्षीय स्थिति पर स्थित किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of the Electric Field at an Equatorial point of an Electric Dipole) (निरक्षीय अथवा अनुप्रस्थ स्थिति : Equatorial Line)-माना AB वैद्युत द्विध्रुव K परावैद्युतांक के माध्यम में स्थित है, जिसके A सिरे पर + q आवेश तथा B सिरे पर – q आवेश एक-दूसरे से 2l दूरी पर स्थित हैं [चित्र 1.24 (a)]। इस वैद्युत द्विध्रुव के मध्य-बिन्दु O से r मीटर की दूरी पर इसकी निरक्षीय स्थिति में कोई बिन्दु P स्थित है, जहाँ पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है। माना आवेशों + q तथा –q के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रताएँ क्रमश: E1 व E2 हैं।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 4

समकोण ∆ AOP तथा ∆ BOP से,
AP2 = BP2 = r2+l2 अथवा AP = BP = \(\sqrt{r^{2}+l^{2}}\)
प्रत्येक आवेश से बिन्दु P की दूरी \(\sqrt{r^{2}+l^{2}}\) है; अतः
+q आवेश के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E1 =\(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0} K} \frac{q}{\left(r^{2}+l^{2}\right)}\) (A→P दिशा में)
तथा -q आवेश के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E2 = \(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0} K} \frac{q}{\left(r^{2}+l^{2}\right)}\) (P→B दिशा में)

चूँकि E1 व E2 के मान परस्पर बराबर हैं, परन्तु दिशाएँ भिन्न हैं; अत: E1 व E2 को AB के समान्तर तथा लम्बवत् घटकों में वियोजित करने पर AB के लम्बवत् घटक E1 sin θ व E2 sin θ बराबर व विपरीत होने के कारण एक-दूसरे को निरस्त (cancel) कर देंगे, जबकि AB के समान्तर घटक E1 cos θ व E2 cos θ एक ही दिशा में होने के कारण जुड़ जाएँगे चित्र 1.24 (b)]; अत: बिन्दु P पर वैद्युत द्विध्रुव के कारण परिणामी वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
E = E1 cos θ + E2 cos θ .
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 5

यदि l का मान 7 की अपेक्षा बहुत कम हो (1 <<r) तो 12 का मान 2 की तुलना में नगण्य माना जा सकता है; अत: वैद्युत द्विध्रुव के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
E = \(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0} K} \cdot \frac{p}{\left(r^{2}\right)^{3 / 2}}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0} K} \frac{p}{r^{3}}\) न्यूटन/कूलॉमा
यदि वैद्युत द्विध्रुव निर्वात अथवा वायु में रखा है; तब निर्वात अथवा वायु के लिए K = 1 रखने पर, वैद्युत द्विध्रुव के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
E=\(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{p}{r^{3}}\) न्यूटन/कूलॉम
सदिश रूप में, \(\overrightarrow{\mathrm{E}}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{-\overrightarrow{\mathrm{p}}}{r^{3}}\) न्यूटन/कूलॉम।
इस प्रकार निरक्षीय स्थिति में वैद्युत क्षेत्र E की दिशा वैद्युत द्विध्रुव की अक्ष के समान्तर परन्तु वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण के विपरीत दिशा में अर्थात् धन आवेश से ऋण आवेश की ओर होती है।

प्रश्न 3.
एकसमान रूप से आवेशित वलय के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक ज्ञात कीजिए। अथवा एक वृत्ताकार आवेशित धातु के वलय (छल्ले) की परिधि पर q आवेश है तथा a इसकी त्रिज्या है तो वलय के केन्द्र से इसकी अक्ष पर कितनी दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता अधिकतम होगी? प्रयुक्त सूत्र को स्थापित कीजिए। [2004]
उत्तर :
एकसमान रूप से आवेशित वलय के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of Electric Field due to a Uniformly Charged Ring)-माना a त्रिज्या का एक आवेशित वलय, जिसका केन्द्र O है, वायु में स्थित है। माना इस वलय पर +q आवेश एकसमान रूप से वितरित है। माना वलय की अक्ष पर इसके केन्द्र O से x दूरी पर कोई बिन्दु P है, जहाँ वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।
माना वलय छोटे-छोटे अल्पांशों में विभक्त है तथा इनमें से एक अल्पांश AB पर आवेश ∆q है। माना अल्पांश AB से बिन्दु P की दूरी में r है (चित्र-1.25)।
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अत: ∆q आवेश के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
∆E = \(\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{\Delta q}{r^{2}}\)
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ∆ E को वलय की अक्ष के अनुदिश तथा लम्बवत् घटकों में वियोजित करने पर लम्बवत् । घटक ∆ E sin θ एक-दूसरे के विपरीत दिशा में होने के कारण निरस्त हो जाएँगे, जबकि अनुदिश घटक ∆ E cosθ एक ही दिशा में होने के कारण जुड़ जाएँगे।
अत: पूरी वलय के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
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वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E की दिशा 0 से P की ओर होगी।
विशेष स्थितियाँ-1. यदि बिन्दु P वलय के केन्द्र पर स्थित है तो x = 0; अतः वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E = 0. 2. यदि बिन्दु P वलय के केन्द्र से बहुत दूर स्थित है अर्थात् x >> a
इस स्थिति में उपर्युक्त सूत्र में x2 की तुलना में a2 को नगण्य माना जा सकता है।
अतः वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(E=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q}{x^{2}}\) न्यूटन/कूलॉम।

वलय की अक्ष पर वैद्युत क्षेत्र की अधिकतम तीव्रता की स्थिति – वलय की अक्ष पर वैद्युत क्षेत्र की अधिकतम तीव्रता E, उस बिन्दु पर अधिकतम होगी जिसके लिए \(\frac{d E}{d x}=0\) होगा।
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अत: x = ± a/√2 अर्थात् वलय की अक्ष पर, वलय के केन्द्र के दोनों ओर केन्द्र से a/√2 दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता अधिकतम होगी।

प्रश्न 4.
स्थिर वैद्युतिकी में गाउस की प्रमेय का उल्लेख कीजिए तथा इसे सिद्ध कीजिए। [2014, 18]
अथवा
सिद्ध कीजिए कि किसी बन्द पृष्ठ से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स ΦE उस पृष्ठ द्वारा परिबद्ध कुल आवेश q का 1/ε0 गुना होता है, जहाँ ε0 मुक्त आकाश की वैद्युतशीलता है। [2008, 09]
उत्तर :
गाउस की प्रमेय (Gauss’s Theorem )-इस प्रमेय के अनुसार, “किसी बन्द पृष्ठ A से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स ΦE , उस पृष्ठ द्वारा परिबद्ध (घिरे हुए) कुल आवेश q का 1/e0 गुना होता है।”
अतः वैद्युत फ्लक्स कई \(\phi_{E}=q \cdot\left(\frac{1}{\varepsilon_{0}}\right)=\frac{q}{\varepsilon_{0}}\)

परन्तु बन्द पृष्ठ A से बद्ध कुल वैद्युत फ्लक्स \(\phi_{E}=\oint \overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}\)
अतः \(\int_{A} \overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=\frac{q}{\varepsilon_{0}}\)

जहाँ ε0 निर्वात अथवा वायु की वैद्युतशीलता है। यह गाउस प्रमेय का समाकल रूप है।

उपपत्ति – माना कोई बिन्दु आवेश + q, किसी बन्द पृष्ठ A के भीतर किसी बिन्दु O पर स्थित है। माना पृष्ठ A पर कोई बिन्दु P है जिसकी बिन्दु O से दूरी r है। माना पृष्ठ A पर बिन्दु P के चारों ओर एक अल्पांश क्षेत्रफल dA है जिसके संगत क्षेत्रफल वेक्टर d \(\overrightarrow{\mathrm{A}}\) है जिसकी दिशा बिन्दु P पर अल्पांश क्षेत्रफल dA के बाहर की ओर खींचे गए अभिलम्ब के अनुदिश है (चित्र 1.26)।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 9
माना बिन्दु O पर रखे बिन्दु आवेश + q के कारण बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathrm{E}}\) है जिसका परिमाण
\(E=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q}{r^{2}}\) …(1)
जिसकी दिशा त्रिज्य रेखा OP के अनुदिश है।
यदि वैद्युत वेक्टर \(\overrightarrow{\mathrm{E}}\) तथा क्षेत्रफल वेक्टर d \overrightarrow{\mathrm{A}} के बीच कोण θ है तो अल्पांश क्षेत्रफल dA से गुजरने वाला बाहर की ओर दिष्ट वैद्युत फ्लक्स
\(d \phi_{E}=\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=E d A \cos \theta\)

समीकरण (1) से E का मान रखने पर,
\(d \phi_{E}=\frac{q}{4 \pi \varepsilon_{0} r^{2}} d A \cos \theta=\frac{q}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{d A \cos \theta}{r^{2}}\)……………(2)
परन्तु \(\frac{d A \cos \theta}{r^{2}}=d \omega\)

जहाँ dω अल्पांश क्षेत्रफल dA द्वारा बिन्दु O पर अन्तरित घन कोण है।
तब समीकरण (2) से, \(d \phi_{E}=\frac{q}{4 \pi \varepsilon_{0}} d \omega\)
अत: बिन्दु आवेश q के कारण सम्पूर्ण पृष्ठ A से बाहर की ओर निकलने वाला वैद्युत फ्लक्स
\(\phi_{E}=\oint d \phi_{E}=\oint \frac{q}{4 \pi \varepsilon_{0}} d \omega=\frac{q}{4 \pi \varepsilon_{0}} \oint d \omega\)
परन्तु \(\oint d \omega\), सम्पूर्ण बन्द पृष्ठ क्षेत्रफल A द्वारा बिन्दु O पर अन्तरित कुल घन कोण है, अर्थात् \(\oint d \omega=4 \pi\)
अतः \(\phi_{E}=\frac{q}{\varepsilon_{0}}\)

यही गाउस का प्रमेय है।
यदि बन्द पृष्ठ क्षेत्रफल A के भीतर अनेक बिन्दु आवेश q1, q2, -q3, q4, …. आदि उपस्थित हैं तो पृष्ठ से गुजरने वाला बाहर की ओर दिष्ट कुल वैद्युत फ्लक्स, सभी बिन्दु आवेशों के कारण अलग-अलग वैद्युत फ्लक्सों के बीजगणितीय योग के बराबर होगा। जहाँ धन आवेशों के कारण वैद्युत फ्लक्स बाहर की ओर दिष्ट होगा वहीं ऋण आवेशों के कारण वैद्युत फ्लक्स भीतर की ओर दिष्ट होगा; अत: पृष्ठ से बाहर की ओर गुजरने वाला कुल (नेट) वैद्युत फ्लक्स
\(\phi_{E}=\frac{q_{1}}{\varepsilon_{0}}+\frac{q_{2}}{\varepsilon_{0}}-\frac{q_{3}}{\varepsilon_{0}}+\frac{q_{4}}{\varepsilon_{0}}+\ldots \ldots=\frac{1}{\varepsilon_{0}} \Sigma q\)
जहाँ Σq बन्द पृष्ठ के भीतर स्थित ओवेशों का बीजगणितीय योग है।

माना एक बिन्दु आवेश +q, किसी बन्द पृष्ठ A से बाहर बिन्दु O पर स्थित है। आवेश q को शीर्ष लेकर एक अत्यन्त सूक्ष्म घन कोण dω का शंक्वाकार क्षेत्र बनाते हैं जो बन्द पृष्ठ से चित्र-1.27 के अनुसार दो स्थानों से होकर गुजरता है तथा पृष्ठ पर क्रमश: dA1 व dA 2क्षेत्रफल काटता है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 10

आवेश +q के कारण dω कोण से होकर गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स dΦ= q/e
अतः सूक्ष्म क्षेत्रफल dA1 से होकर प्रवेश करने वाला वैद्युत फ्लक्स \(\phi_{1}=+\frac{q}{\varepsilon_{0}} \frac{d \omega}{4 \pi}\)
तथा सूक्ष्म क्षेत्रफल dA से होकर बाहर आने वाला वैद्युत फ्लक्स \(\phi_{2}=-\frac{q}{\varepsilon_{0}} \frac{d \omega}{4 \pi}\)
६0 41 अतः बन्द पृष्ठ से गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स \(\phi=\phi_{1}+\phi_{2}=+\frac{q}{\varepsilon_{0}} \frac{d \omega}{4 \pi}-\frac{q}{\varepsilon_{0}} \frac{d \omega}{4 \pi}=0\)

इस प्रकार किसी बन्द पृष्ठ से बाहर स्थित आवेश के कारण बन्द पृष्ठ से गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स शून्य होता है। इससे स्पष्ट है कि यदि बन्द पृष्ठ से कोई आवेश परिबद्ध (घिरा हुआ) नहीं है. तो बन्द पृष्ठ से बद्ध वैद्युत फ्लक्स शून्य होगा।

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प्रश्न 5.
स्थैतिक वैद्युत में गाउस के नियम का उल्लेख कीजिए तथा इसकी सहायता से कूलॉम के नियम का निगमन कीजिए।
[2018]
उत्तर :
गाउस का नियम : इस नियम के अनुसार किसी बन्द पृष्ठ A से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स ΦE उस पृष्ठ द्वारा परिबद्ध (घिरे हुए) कुल आवेश q का 1/ε0 गुना होता है।
वैद्युत फ्लक्स \(\phi_{E}=\frac{q}{\varepsilon_{0}}\)

गाउस के नियम से कूलॉम के नियम की प्राप्ति – एक बिन्दु आवेश q को केन्द्र मानकर उसके चारों ओर r त्रिज्या का गोलीय गाउसीय पृष्ठ लेते हैं। गाउसीय पृष्ठ पर एक सूक्ष्म क्षेत्रफल अवयव dA लेते हैं, जिस पर वैद्युत क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathrm{E}} व क्षेत्रफल सदिश d \overrightarrow{\mathrm{A}}\) दोनों की दिशा समान, त्रिज्यत: बाहर की ओर है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 11
यदि q आवेश से r दूरी पर परीक्षण आवेश q0 स्थित हो तब उस पर कार्यरत बल,
\(F=q_{0} E=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q q_{0}}{r^{2}}\) या \(F \propto \frac{q q_{0}}{r^{2}}\)

यही कूलॉम का नियम है।

प्रश्न 6.
गाउस प्रमेय की सहायता से एकसमान रूप से आवेशित अनन्त लम्बाई के सीधे तार के निकट वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक प्राप्त कीजिए। [2012, 15]
अथवा
गाउस के नियम का उपयोग करके आवेशित लम्बे तार के निकट, जिसका रेखीय आवेश घनत्व λ कूलॉम/मीटर है, वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता के लिए व्यंजक व्युत्पन्न कीजिए। [2007, 08]
उत्तर :
अनन्त लम्बाई के एकसमान आवेशित तार के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of Electric Field due to a Uniformly Charged Wire of Infinite Length) –  माना अनन्त लम्बाई का एक तार YY’ है जिस पर धन आवेश एकसमान रूप से वितरित है। माना आवेश का रेखीय घनत्व λ कूलॉम/मीटर है। माना तार से r दूरी पर कोई बिन्दु P है जहाँ पर इस तार के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है (चित्र 1.29)।

इसके लिए हम बिन्दु P से जाने वाले, त्रिज्या r तथा l लम्बाई के लम्बवृत्तीय बेलनाकार , पृष्ठ की कल्पना करते हैं, जिसकी अक्ष तार की अक्ष के साथ सम्पाती है। यह बेलनाकार । पृष्ठ, गाउसियन पृष्ठ की भाँति कार्य करेगा। चूँकि इस बेलन के वक्र पृष्ठ का प्रत्येक बिन्दु तार से समान दूरी पर है; अतः सममिति के कारण वक्र पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र परिमाण में समान तथा उस बिन्दु पर त्रिज्यतः बाहर की ओर दिष्ट होगा। यदि वक्र पृष्ठ पर स्थित बिन्दु P पर कोई क्षेत्रफल वेक्टर \(d \overrightarrow{\mathrm{A}}\) लिया जाए तो उस बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(\overrightarrow{\mathrm{E}}\) तथा क्षेत्रफल वेक्टर d \(\overrightarrow{\mathrm{A}}\) एक ही दिशा में होंगे अर्थात् इनके बीच कोण शून्य होगा।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 12
अत: वक्र पृष्ठ पर स्थित सभी बिन्दुओं के लिए वैद्युत फ्लक्स
\(\phi_{P}=\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=E d A \cos 0^{\circ}=E d A\)
यदि बेलन के वृत्तीय पृष्ठ पर स्थित किसी बिन्दु M पर क्षेत्रफल वेक्टर \(d \overrightarrow{\mathrm{A}}\) हो तो इस बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(\overrightarrow{\mathrm{E}}\)  तथा क्षेत्रफल वेक्टर \(d \overrightarrow{\mathrm{A}}\) परस्पर लम्बवत् होंगे (चित्र 2.29)।

अत: वृत्तीय पृष्ठों के लिए वैद्युत फ्लक्स \(\phi_{M}=\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=E d A \cos 90^{\circ}=0\)
अतः गाउसियन पृष्ठ से बाहर की ओर गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स
ΦE = वक्र पृष्ठ से बद्ध वैद्युत फ्लक्स (ΦP) + वृत्तीय पृष्ठों से बद्ध वैद्युत फ्लक्स (ΦM)
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 13

परन्तु गाउस प्रमेय से, ΦE = \(\frac{1}{\varepsilon_{0}}\) (बेलनाकार पृष्ठ के भीतर स्थित कुल आवेश).
= \(\frac{1}{\varepsilon_{0}}\) (तार की ! लम्बाई पर स्थित आवेश) = \(\frac{1}{\varepsilon_{0}} λl\)
अतः E(2πrl) = \(\frac{1}{\varepsilon_{0}}λl\)

अत: आवेशित तार से r दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E=\(\frac{\lambda}{2 \pi \varepsilon_{0} r}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{2 \lambda}{r}\)

चूँकि तार धनावेशित है; अतः वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E की दिशा त्रिज्यत: बाहर की ओर वेक्टर \(\overrightarrow{\mathbf{r}}\) के अनुदिश होगी। यदि वेक्टर \overrightarrow{\mathbf{r}} की दिशा में एकांक वेक्टर \(\begin{array}{l}{\wedge} \\ {\mathbf{I}^{*}}\end{array}\) है तो वेक्टर रूप में
\(\overrightarrow{\mathrm{E}}=\frac{\lambda}{2 \pi \varepsilon_{0} r} \hat{\mathrm{r}}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{2 \lambda}{r} \hat{\mathrm{r}}\)

इस प्रकार रेखीय आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (E) रेखीय आवेश से बिन्दु की दूरी (r) के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसकी दिशा रेखीय आवेश के लम्बवत् बाहर की ओर होती है। दूरी r के साथ वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E में परिवर्तन का आरेख
चित्र-1.30 संलग्न चित्र 1.30 में प्रदर्शित है।
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प्रश्न 7.
आवेश घनत्व σ कूलॉम/मीटर2 के एक अनन्त विस्तार वाली समतल आवेशित ‘अचालक’ प्लेट के कारण किसी निकट बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए। [2008, 12]
अथवा अनन्त समतल आवेशित अचालक प्लेट के समीप वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक व्युत्पन्न कीजिए। [2009, 13]
अथवा
गाउस की प्रमेय के आधार पर असीमित विस्तार वाले आवेशित समतल चादर के निकट किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र स्थापित कीजिए। [2015, 16]
अथवा
एक समान आवेशित अचालक समतल प्लेट के कारण उसके निकट स्थित किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर :
अनन्त विस्तार की समतल आवेशित अचालक प्लेट के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of Electric Field near an Infinite Plane Charged Non-conducting Plate)-माना अनन्त विस्तार की समतल अचालक प्लेट ABCD के एक तल पर धन आवेश समान रूप से वितरित है। माना इस तल के एकांक क्षेत्रफल पर उपस्थित आवेश की मात्रा (आवेश का पृष्ठ घनत्व) σ है। माना समतल प्लेट की मोटाई नगण्य है तथा समतल प्लेट का यह तल, आवेश की एक समतल चादर के समान है (चित्र 1.31)1
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माना आवेशित तल से r दूरी पर कोई बिन्दु P है जहाँ । वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है। माना चादर के दूसरी
ओर, चादर से समान दूरी r पर एक अन्य बिन्दु Q इस प्रकार है कि रेखा PQ चादर के लम्बवत् है।

बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करने के लिए हम एक ऐसे बेलनाकार पृष्ठ की कल्पना करते हैं जिसकी
अक्ष आवेशित चादर के लम्बवत् है तथा इसके समतल पृष्ठ बिन्दु P तथा २ से होकर गुजरते हैं। माना बेलन के प्रत्येक समतल पृष्ठ का क्षेत्रफल A है। चूँकि बिन्दु P तथा Q चादर से समान दूरी पर हैं; अत: दोनों बिन्दुओं पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता परिमाण में समान होगी।

क्योंकि चादर का विस्तार अनन्त है; अत: चादर के समीप सभी बिन्दुओं पर वैद्युत क्षेत्र की दिशा चादर के लम्बवत् बाहर की ओर दिष्ट (धनावेश के कारण) होगी; अत: बेलन के समतल पृष्ठ पर वैद्युत क्षेत्र की दिशा पृष्ठ के लम्बवत् अर्थात् संगत क्षेत्रफल वेक्टर d \(\overrightarrow{\mathrm{A}}\) की दिशा में होगी, जबकि बेलन के वक्र पृष्ठ पर वैद्युत क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathrm{E}}\) की दिशा पृष्ठ के समान्तर (अक्ष के अनुदिश) अर्थात् संगत क्षेत्रफल वेक्टर d \(\overrightarrow{\mathrm{A}}^{\prime}\) के लम्बवत् होगी (चित्र 1.31)।

अत: बेलन के समतल पृष्ठ हेतु वैद्युत फ्लक्स
\(d \phi_{P}=d \phi_{Q}=\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=E d A \cos 0^{\circ}=E d A\)
तथा बेलन के वक्र पृष्ठ हेतु वैद्युत फ्लक्स \(d \phi_{N}=\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}^{\prime}}=E d A^{\prime} \cos 90^{\circ}=0\)

अत: बेलनाकार गाउसियन पृष्ठ से गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 16

परन्तु गौस प्रमेय से कई \(\phi_{E}=\frac{1}{\varepsilon_{0}}\) (गाउसियन पृष्ठ के भीतर स्थित कुल आवेश)
= \(\frac{1}{\varepsilon_{0}}\) (चादर के क्षेत्रफल A पर आवेश) = \(\frac{1}{\varepsilon_{0}}(Aσ) = \frac{\sigma A}{\varepsilon_{0}}\)
अथवा \frac{\sigma A}{\varepsilon_{0}}=2 E A
अत: चादर के समीप वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E =\(\frac{\sigma}{2 \varepsilon_{0}}\)

चूँकि इस सूत्र में बिन्दु P की आवेशित चादर से दूरी नहीं है। इसका अर्थ है कि आवेशित समतल चादर के समीप सभी बिन्दुओं पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता एकसमान होती है।

  1. यदि समतल चादर धनावेशित है तो चादर के समीप किसी भी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र E की दिशा चादर के लम्बवत् तथा चादर से दूर की ओर होती है।
  2. यदि समतल चादर ऋणावेशित है तो चादर के समीप किसी भी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र E की दिशा चादर के लम्बवत् तथा चादर की ओर होती है।

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प्रश्न 8.
गाउस के प्रमेय की सहायता से एकसमान रूप से आवेशित गोलीय कोश के कारण-(i) कोश के बाहर, (ii) कोश के पृष्ठ पर तथा (iii) कोश के भीतर, वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए। [2009, 10, 13, 16]
अथवा
गाउस के प्रमेय की सहायता से एकसमान आवेशित पतले गोलीय कोश के बाहर किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र ज्ञात कीजिए। [2014, 15, 16, 18]
अथवा
एकसमान आवेशित गोलीय कोश के कारण उसके पृष्ठ के किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक प्राप्त कीजिए। [2015]
अथवा
गाउस की प्रमेय से सिद्ध कीजिए कि किसी आवेशित गोलीय कोश के भीतर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होती है तथा कोश के बाहर बिन्दुओं के लिए आवेशित कोश, केन्द्र पर स्थित बिन्दुवत् आवेश की भाँति व्यवहार करता है? [2005, 06, 18]
उत्तर :
एकसमान रूप से आवेशित गोलीय कोश के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Electric Field Intensity due to a Uniformly Charged Spherical Shell)-माना R त्रिज्या के किसी विलगित गोलीय कोश को + q आवेश दिया गया है, जो उसके पृष्ठ पर समान रूप से वितरित है।

(i) गोलीय कोश के बाहर – माना गोलीय कोश का केन्द्र बिन्दु O पर है। इस कोश के केन्द्र O से r दूरी पर कोश से बाहर (r > R) स्थित किसी बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।
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इसके लिए हम बिन्दु P से जाने वाला त्रिज्या r का संकेन्द्रीय गोलीय पृष्ठ खींचते हैं (चित्र 1.32)। इस गोलीय पृष्ठ को ‘गाउसियन पृष्ठ’ कहते हैं। इस पृष्ठ
पर स्थित बिन्दु P के चारों ओर एक क्षेत्रफल अवयव dA लेते हैं जिसके संगत क्षेत्रफल वेक्टर d \(\overrightarrow{\mathrm{A}}\) है जिसकी दिशा क्षेत्रफल अवयव dA पर बाहर की ओर दिष्ट अभिलम्ब के अनुदिश होगी। चूँकि गाउसियन पृष्ठ तथा आवेशित गोलीय कोश संकेन्द्रीय हैं; अत: गाउसियन पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र का परिमाण E समान तथा पृष्ठ पर बाहर की ओर खींचे अभिलम्ब की ओर दिष्ट होगा।

माना बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र वेक्टर \(\overrightarrow{\mathrm{E}}\) है, जो क्षेत्रफल वेक्टर d \(\overrightarrow{\mathrm{A}}\) के समान्तर बाहर की ओर दिष्ट है अर्थात् इनके बीच कोण शून्य है।
अत: \(\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=E \cdot d A \cos 0^{\circ}=E d A\)
अतः गाउसियन पृष्ठ से बाहर निकलने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स
\(\phi_{E}=\oint \overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=\oint E d A\)
=\(E \Phi d A\) [∵ E पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर नियत है|
= E(4πr2) …………………..(1)
परन्तु गाउस प्रमेय से, \(\phi_{E}=q / \varepsilon_{0}\)
जहाँ q बन्द गाउसियन पृष्ठ द्वारा परिबद्ध सम्पूर्ण आवेश है।
∴ E (4πr2) = q/εo
अतः \(E=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q}{r^{2}}\) न्यूटन/कूलॉम

यह किसी बिन्दु आवेश q के कारण उससे r दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E के सूत्र के समान है; अतः समान रूप से आवेशित गोलीय कोश बाह्य बिन्दुओं के लिए ऐसे व्यवहार करती है जैसे कि उसका सम्पूर्ण आवेश उसके केन्द्र पर स्थित हो।

पुन: चूँकि आवेश + q, गोलीय कोश के सम्पूर्ण पृष्ठ 4πR2 पर समान रूप से वितरित है।
अत: गोलीय कोश पर आवेश का पृष्ठ घनत्व \(\sigma=\frac{q}{4 \pi R^{2}}\) अथवा q = 4πR2σ
अतः आवेशित गोलीय कोश के बाहर उसके केन्द्र से r दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता .
\(E=\frac{1}{\varepsilon_{0}} \frac{4 \pi R^{2} \sigma}{4 \pi r^{2}}=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}\left(\frac{R}{r}\right)^{2}\) ………………(2)

(ii) गोलीय कोश के पृष्ठ पर-यदि हमें गोलीय कोश के पृष्ठ पर अर्थात् कोश के केन्द्र से R दूरी पर वैद्युत . क्षेत्र ज्ञात करना है तो इस बार गाउसियन पृष्ठ की त्रिज्या r = R लेनी होगी, तब समीकरण (2) में r = R रखने पर, वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
\(E=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}\left(\frac{R}{R}\right)^{2}=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}\)

(iii) गोलीय कोश के भीतर-माना गोलीय कोश के भीतर उसके केन्द्र से r (r < R) दूरी पर कोई बिन्दु P है जिस पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है। इसके लिए हम बिन्दु O को केन्द्र मानकर, बिन्दु P से जाने वाला एक गोलीय पृष्ठ खींचते हैं, जो गाउसियन पृष्ठ कहलाएगा। (चित्र 1.33) से स्पष्ट है कि इस दशा में गाउसियन पृष्ठ पूर्णतः गोलीय कोश के भीतर है; अतः गाउसियन पृष्ठ के भीतर उपस्थित आवेश की मात्रा शून्य होगी।
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तब गाउस प्रमेय से, Φ E = q/ ε0 = 0 [∵q = 0]
समीकरण (1) से, Φ E = E (4πr2)= 0; अतः E = 0
अर्थात् आवेशित गोलीय कोश के भीतर प्रत्येक बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होती है।
आवेशित गोलीय कोश के कारण, दूरी के साथ वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का परिवर्तन चित्र 1.34 में प्रदर्शित किया गया है।

वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वैद्युत आवेश से आप क्या समझते हैं? [2000]
उत्तर :
वैद्युत आवेश – जिस मूल कारण की उपस्थिति से वस्तुओं में अन्य वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण आ जाता है, उसे वैद्युत आवेश कहते हैं।

प्रश्न 2.
आवेश की ई०एस०यू०, ई०एम०यू० तथा कूलॉम इकाई में सम्बन्ध बताइए। [2001]
उत्तर :
1 कूलॉम = 3 × 109 e.s.u. अथवा 1e.s.u.=\(\frac{1}{3 \times 10^{9}}\)कूलॉम
तथा 1 कूलॉम = 10-1e.m.u. अथवा 1e.m.u.= 10 कूलॉम।

प्रश्न 3.
‘एक धातु के गोले को वैधुत से आवेशित किया जाता है।’ इस कथन का क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
इस कथन का अर्थ है-1. यदि गोला धनावेशित है तो उससे कुछ इलेक्ट्रॉन हटाए गए हैं।
2. यदि गोला ऋणावेशित है तो उसे कुछ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन दिए गए हैं। .

प्रश्न 4.
ठीक बराबर द्रव्यमान के दो सर्वसम धातु के गोले लिए गए हैं। एक को Q ऋण आवेश से तथा दूसरे को उतने ही धन आवेश से आवेशित किया जाता है। क्या दोनों गोलों के द्रव्यमानों में कोई अन्तर आ जाएगा और क्यों?
उत्तर :
दोनों गोलों के द्रव्यमानों में अन्तर आ जाएगा; क्योंकि धनावेशित गोले से इलेक्ट्रॉन निकल जाने से उसका द्रव्यमान कुछ कम हो जाएगा, जबकि ऋणावेशित गोले पर इलेक्ट्रॉन आ जाने से उसका द्रव्यमान कुछ बढ़ जाएगा।

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प्रश्न 5.
‘मूल आवेश’ से आप क्या समझते हो? इसका मान कितना है?
उत्तर :
मूल आवेश-“वस्तुओं के बीच आवेश का आदान-प्रदान, आवेश की एक न्यूनतम मात्रा (e) के पूर्ण गुणजों के रूप में ही किया जा सकता है।” आवेश की इस न्यूनतम मात्रा को ही मूल आवेश कहते हैं। इसका मान 1.6 × 10-19 कूलॉम होता है।

प्रश्न 6.
आवेश की परमाणुकता से आप क्या समझते हैं? [2001]
अथवा
वैद्युत आवेश के क्वाण्टीकरण से आप क्या समझते हैं? [2005]
उत्तर :
आवेश का क्वाण्टीकरण अथवा परमाणुकता—किसी वस्तु को आवेश, एक न्यूनतम इकाई (e) के पूर्ण गुणजों के रूप में ही दिया जा सकता है। अत: किसी वस्तु को दिया गया आवेश q = ± ne, जहाँ n कोई पूर्णांक है। इस प्रकार किसी वस्तु पर आवेश q = ± 1e, ± 2e, ± 3e,…. हो सकता है। इनके बीच में नहीं। आवेश के इस गुण को आवेश का क्वाण्टीकरण अथवा परमाणुकता (quantization or atomicity of charge) कहते हैं। .

प्रश्न 7.
कूलॉम का वैद्युत बल सम्बन्धी नियम लिखिए। [2016]
अथवा
दो बिन्दु आवेशों के बीच लगने वाले आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल के लिए कूलॉम का सूत्र लिखिए। [2008]
उत्तर :
कूलॉम का नियम – इस नियमानुसार, “दो स्थिर बिन्दु आवेशों के बीच लगने वाला आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल (F), दोनो आवेशों की मात्राओं (q1 व q2) के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा दोनों आवेशों के बीच की दूरी (7) के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।” यह बल दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होता है।
\(F \propto \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\) अथवा \(F=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\) न्यूटन

प्रश्न 8.
दो बिन्दु आवेशों के मध्य लगने वाले आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल के लिए कूलॉम का नियम वेक्टर स्वरूप में लिखिए। [2016]
अथवा कूलॉम के नियम का सदिश रूप लिखिए तथा इसका महत्त्व बताइए।
उत्तर :
कूलॉम के नियम का वेक्टर स्वरूप आवेश q2 द्वारा आवेश q1 पर आरोपित वैद्युत बल
\(\overrightarrow{\mathrm{F}}_{12}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q_{1} q_{2}}{r_{21}^{3}} \overrightarrow{\mathrm{r}} 21\)
इसी प्रकार आवेश q1 द्वारा आवेश q2 पर आरोपित वैद्युत बल
\(\overrightarrow{\mathrm{F}}_{21}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q_{1} q_{2}}{r_{12}^{3}} \overrightarrow{\mathrm{r}}_{12}\)

इस प्रकार \(\overrightarrow{\mathrm{F}}_{21}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q_{1} q_{2}}{r_{12}^{3}} \overrightarrow{\mathrm{r}}_{12}\)

कूलॉम के नियम के सदिश स्वरूप से ज्ञात होता है कि दो बिन्दु आवेशों के बीच कार्यरत वैद्युत बल, केन्द्रीय बल है। अतः यह बल दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश, एक-दूसरे पर बराबर एवं परस्पर विपरीत दिशा में कार्य करता है।

प्रश्न 9.
‘आवेश के रेखीय घनत्व’ का अर्थ बताइए। [2012, 13]
उत्तर :
रेखीय आवेश वितरण की प्रति एकांक लम्बाई पर आवेश की मात्रा को रेखीय आवेश घनत्व कहते हैं। इसे λ से प्रदर्शित करते हैं।
यदि रेखीय आवेश वितरण के सूक्ष्म अवयव dl पर आवेश dq है तो
\(\lambda=\frac{d q}{d l}\)
इसका मात्रक ‘कूलॉम/मीटर’ है।

प्रश्न 10.
‘पृष्ठीय आवेश घनत्व’ का अर्थ बताइए। अथवा आवेश के पृष्ठ घनत्व से क्या तात्पर्य है? [2015]
उत्तर :
पृष्ठीय आवेश वितरण के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर आवेश की मात्रा को पृष्ठीय आवेश घनत्व कहते हैं। इसे ‘o’ से प्रदर्शित करते हैं।
यदि पृष्ठीय आवेश वितरण के सूक्ष्म क्षेत्रफल अवयव dA पर आवेश dq है तो
\(\sigma=\frac{d q}{d A}\)
इसका मात्रक ‘कूलॉम/मीटर 2 है।

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प्रश्न 11.
‘आयतन आवेश घनत्व’ का अर्थ बताइए।
उत्तर :
आयतन आवेश वितरण के प्रति एकांक आयतन पर आवेश की मात्रा को आयतन आवेश घनत्व कहते हैं। इसे ‘ρ’ से प्रदर्शित करते हैं। यदि आयतन आवेश वितरण के सूक्ष्म आयतन अवयव dV पर आवेश dq है तो \(\rho=\frac{d q}{d V}\)
इसका मात्रक कूलॉम/मीटर 3 है।

प्रश्न 12.
वैद्युत क्षेत्र से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र (Electric Field) – “किसी वैद्युत आवेश अथवा आवेश-समुदाय के चारों ओर स्थित वह क्षेत्र, जिसमें कोई अन्य आवेश आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण के बल का अनुभव करता है, उस आवेश अथवा आवेशसमुदाय का वैद्युत क्षेत्र अथवा वैद्युत बल क्षेत्र कहलाता है।”

प्रश्न 13.
वैद्यत क्षेत्र की तीव्रता से क्या तात्पर्य है? इसका मात्रक भी लिखिए। [2015, 16, 17]
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of Electric Field)—“वैद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखे परीक्षण-आवेश पर लगने वाले वैद्युत बल तथा परीक्षण-आवेश के अनुपात को उस बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहते हैं।”
माना वैद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखे परीक्षण आवेश q0 पर लगने वाला बल \(\overrightarrow{\mathrm{F}}\) है तो उस बिन्दु पर
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(\overrightarrow{\mathrm{E}}=\frac{\overrightarrow{\mathrm{F}}}{q_{0}}\)
इसका मात्रक न्यूटन/कूलॉम (N/C) है।
यह एक सदिश राशि है तथा इसकी दिशा धनावेश पर कार्यरत बल की दिशा में होती है।

प्रश्न 14.
किसी बिन्दु आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र लिखिए तथा स्पष्ट कीजिए कि बिन्दु आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र दूरी के साथ किस प्रकार बदलता है?
उत्तर :
किसी बिन्दु आवेश q के कारण उससे r दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
\(E=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q}{r^{2}}\) न्यूटन/कूलॉम; अत: \(E \propto \frac{1}{r^{2}}\)
अत: वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

प्रश्न 15.
बिन्दु आवेश तथा रेखीय आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र दूरी के साथ कैसे परिवर्तित होता है? [2005]
उत्तर :
बिन्दु आवेश के लिए वैद्युत क्षेत्र E ∝ 1/r2 तथा रेखीय आवेश के लिए वैद्युत क्षेत्र E ∝ 1/r होता है।

प्रश्न 16.
सूत्र \(E =\frac{1}{4 \pi \varepsilon} \frac{q}{r^{2}}\) से का मात्रक ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 19

प्रश्न 17.
वैद्युत बल रेखाएँ किसे कहते हैं?
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र में खींची गईं वे काल्पनिक निष्कोण वक्र रेखाएँ जिन पर कोई स्वतन्त्र धन परीक्षण आवेश गति करता है, वैद्युत बल रेखाएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 18.
वैद्युत बल रेखाएँ एक-दूसरे को क्यों नहीं काटतीं? [2001]
अथवा क्या किसी धन बिन्दु आवेश q से चलने वाली दो वैद्युत बल रेखाएँ एक-दूसरे को काट सकती हैं? कारण बताइए।
उत्तर :
दो वैद्युत बल रेखाएँ कभी एक-दूसरे को नहीं काट सकती क्योंकि इस स्थिति में कटान बिन्दु पर दो स्पर्श रेखाएँ खींची जाएँगी जो उस बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की दो दिशाएँ प्रदर्शित करेंगी जो कि असम्भव है।

प्रश्न 19.
विलगित धन आवेश तथा ऋण आवेश के वैद्युत क्षेत्र की वैद्युत बल रेखाएँ खींचिए। अथवा किसी विलगित ऋण बिन्दु. आवेश के वैद्युत क्षेत्र को वैद्युत बल रेखाएँ खींचकर दर्शाइए।
[2002]
उत्तर :
चित्र 1.35 देखिए।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 20

प्रश्न 20.
यदि बिन्दु आवेश पर वैद्युत बल रेखाएँ आकर मिलती हैं तो इस बिन्दु आवेश की प्रकृति कैसी होगी? [2004]
उत्तर :
बिन्दु आवेश की प्रकृति ऋणात्मक होगी क्योंकि वैद्युत बल रेखाएँ धन आवेश से ऋण आवेश की ओर चलती हैं।

प्रश्न 21.
वैद्युत द्विध्रुव से आप क्या समझते हो? दो उदाहरण दीजिए। [2014].
उत्तर :
दो समान परिमाण एवं विपरीत प्रकृति के बिन्दु आवेशों को अल्प दूरी पर रखने पर बना निकाय, वैद्युत द्विध्रुव कहलाता है।
उदाहरण-HCl का अणु, H2O का अणु आदि।

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प्रश्न 22.
वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण से क्या तात्पर्य है? इसका मात्रक एवं विमाएँ लिखिए। यह अदिश राशि है अथवा सदिश राशि? यदि सदिश राशि है तो इसकी दिशा भी बताइए। [2001, 02, 04, 08, 09]
उत्तर :
यह सदिश राशि है इसकी दिशा वैद्युत द्विध्रुव की अक्ष के अनुदिश ऋण आवेश से धन आवेश की ओर होती है।
वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण – वैद्युत द्विध्रुव के दोनों बिन्दु आवेशों में से किसी एक आवेश के परिमाण तथा दोनों आवेशों के बीच की दूरी के गुणनफल को वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण कहते हैं। इसे ‘p’ से प्रदर्शित करते हैं।
यदि वैद्युत द्विध्रुव में + q तथा – q बिन्दु आवेश 21 दूरी पर स्थित हों तब इसका वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण
\(\overrightarrow{\mathrm{p}}=q \times 2 \vec{l}\)
इसका मात्रक ‘कूलॉम-मीटर’ तथा विमा [LTA] है।

प्रश्न 23.
एक वैद्युत द्विध्रुव, एकसमान वैद्युत क्षेत्र में सन्तुलन की स्थिति में रखा है। किस स्थिति में यह सन्तुलन (i) स्थायी तथा (ii) अस्थायी होगा?
उत्तर :
(i) यदि वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण \(\overrightarrow{\mathrm{p}}, वैद्युत क्षेत्र \overrightarrow{\mathrm{E}}\) की दिशा में है तो सन्तुलन स्थायी होगा।
(ii) यदि वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण \(\overrightarrow{\mathrm{p}}\), वैद्युत क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathrm{E}}\) के विपरीत दिशा में है तो सन्तुलन अस्थायी होगा।

प्रश्न 24.
वैद्युत द्विध्रुव द्वारा अक्षीय (अथवा अनुदैर्घ्य ) स्थिति में किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक लिखिए। [2008]
उत्तर :
अक्षीय स्थिति में वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(E=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{2 p}{r^{3}}\) न्यूटन/कूलॉम।
जहाँ p वैद्युत द्विध्रुव का आघूर्ण तथा । वैद्युत द्विध्रुव के मध्य-बिन्दु से वह दूरी है, जहाँ पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।

प्रश्न 25.
वैद्युत द्विध्रुव के कारण निरक्षीय अथवा अनुप्रस्थ स्थिति में किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र प्रयुक्त संकेतों का अर्थ बताते हुए लिखिए।
[2008]
उत्तर :
अनुप्रस्थ स्थिति में वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(E=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{p}{r^{3}}\) न्यूटन/कूलॉम।
जहाँ p वैद्युत द्विध्रुव का आघूर्ण तथा । वैद्युत द्विध्रुव के मध्य-बिन्दु से वह दूरी है, जहाँ पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।

प्रश्न 26.
ज्वलनशील पदार्थों को ले जाने वाले वाहनों को हमेशा धात्विक चेन (chains) से जुड़े हुए रखा जाता है, जिनको गति के समय भूमि के सम्पर्क में रखा जाता है। समझाइए क्यों?
उत्तर :
जब वाहन गति करता है तब वायु से घर्षण के कारण वह आवेशित हो जाता है। वाहन पर अधिक आवेश संचित हो जाने पर चिंगारी उत्पन्न हो सकती है जिससे ज्वलनशील पदार्थ आग पकड़ सकते हैं। ऐसी दुर्घटना से बचने के लिए वाहन से धात्विक चेन जुड़ी रखते हैं जो गति के समय पृथ्वी के सम्पर्क में रहती है। इस चेन द्वारा वाहन पर संचित आवेश पृथ्वी को स्थानान्तरित होता रहता है।

प्रश्न 27.
वायुयान के टायरों का निर्माण करने के लिए एक विशेष प्रकार की रबड़ का प्रयोग किया जाता है जो आंशिक चालक होती है, क्यों?
उत्तर :
वायुयान उड़ान भरते समय अथवा नीचे उतरते समय धावन पथ (run way) पर गति करता है। गति करते समय टायरों तथा पथ के बीच घर्षण से टायरों पर आवेश प्रेरित हो जाता है। यदि टायरों की रबड़ आंशिक चालक है तो यह प्रेरित आवेश पृथ्वी में स्थानान्तरित हो जाता है। अत: आवेश के कारण वैद्युत चिंगारी के उत्पन्न होने की सम्भावना नहीं रहती है।

प्रश्न 28.
वैद्युत फ्लक्स की परिभाषा, मात्रक तथा विमा लिखिए। [2004, 06, 09, 12, 15]]
अथवा
वैद्युत फ्लक्स ऋणात्मक तथा धनात्मक कब होता है?
उत्तर :
वैद्युत फ्लक्स-“किसी वैद्युत क्षेत्र में स्थित किसी काल्पनिक पृष्ठ से, पृष्ठ के लम्बवत् दिशा में गुजरने वाली कुल वैद्युत बल रेखाओं की संख्या को उस पृष्ठ से बद्ध वैद्युत फ्लक्स कहते हैं।’ इसे ΦE से प्रदर्शित करते हैं। इसका मात्रक न्यूटन-मीटर / कूलॉम अथवा वोल्ट-मीटर है। इसकी विमा [ML3T-3A-1] है।
यदि किसी बन्द पृष्ठ से नेट वैद्युत फ्लक्स भीतर प्रविष्ट हो रहा है तो वैद्युत फ्लक्स ऋणात्मक होता है अथवा यदि नेट वैद्युत फ्लक्स सतह से बाहर आ रहा है तो वैद्युत फ्लक्स धनात्मक होता है।

प्रश्न 29.
एक अचालक बेलन एकसमान वैद्युत क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathbf{E}}\) में पूर्णत: भीतर स्थित है तथा बेलन की अक्ष वैद्युत क्षेत्र के समान्तर है। बेलन से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स कितना होगा? [2005]
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 21
सम्पूर्ण बेलन से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 22
चूँकि बाएँ फलक पर \(\overrightarrow{\mathbf{E}} व \overrightarrow{d A}\) के बीच कोण 180°, दाएँ फलक पर कोण शून्य तथा वक्र पृष्ठ पर कोण 90° है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 23
अतः बेलन से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स शून्य होगा।

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प्रश्न 30.
स्थिर वैद्युतिकी में गाउस के नियम का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16]
अथवा
स्थिर वैद्युतिकी में गाउस के प्रमेय को गणितीय रूप में लिखिए। [2010]
उत्तर :
गाउस का नियम-इस नियम के अनुसार, “किसी बन्द पृष्ठ से गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स ΦE, उस पृष्ठ के भीतर स्थित कुल आवेश q का 1/e0 गुना होता है।”
अर्थात् ΦE =1/ε0, जहाँ ε0 निर्वात अथवा वायु की वैद्युतशीलता है।

प्रश्न 31.
गाउसियन पृष्ठ क्या है? स्थिर वैद्युतिकी में गाउसियन पृष्ठ की क्या उपयोगिता है?
उत्तर :
गाउसियन पृष्ठ-किसी दिए गए आवेश को परिबद्ध करने वाला कोई भी काल्पनिक बन्द पृष्ठ उस आवेश का गाउसियन पृष्ठ कहलाता है।
इसका उपयोग किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करने के लिए किया जाता है, जहाँ सामान्य नियमों द्वारा वैद्युत क्षेत्र ज्ञात कर पाना कठिन होता है।

प्रश्न 32.
एकसमान पृष्ठ घनत्व σ कूलॉम/मीटर2 तथा R मीटर त्रिज्या के गोलीय आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र के सूत्र लिखिए।
उत्तर :
गोले के केन्द्र से r दूरी पर वैद्युत क्षेत्र \(E=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}\left(\frac{R}{r}\right)^{2}\) जबकि r>R
गोले के पृष्ठ पर वैद्युत क्षेत्र \(E=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}\)
गोले के भीतर वैद्युत क्षेत्र E = 0.

प्रश्न 33.
गाउस के नियम का उपयोग करते हुए एक असीमित विस्तार वाली आवेशित समतल चादर के निकट वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता की सहायता से समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता का सूत्र प्राप्त कीजिए। [2008, 11]
उत्तर :
असीमित विस्तार की एकसमान धनावेशित समतल चादर के समीप वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
\(E=\frac{\sigma}{2 \varepsilon_{0}}\) (जहाँ σ चादर पर आवेश का पृष्ठ घनत्व है।)
समान्तर प्लेट संधारित्र की दोनों प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
E = E1 + E1 = \(\frac{\sigma}{2 \varepsilon_{0}}+\frac{\sigma}{2 \varepsilon_{0}}=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}\)
चूँकि E1 व E2 की दिशाएँ एक ही हैं; अत: इनके बीच विभवान्तर
\(V=E d=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}} d=\frac{q}{A} \frac{d}{\varepsilon_{0}}\)
अतः समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता \(C=\frac{q}{V}=\frac{\varepsilon_{0} A}{d}\)

प्रश्न 34.
एक खोखले बेलन के भीतर १ कूलॉम आवेश स्थित है। यदि बेलन के वक्रीय पृष्ठ से Φ वोल्ट-मीटर वैद्युत फ्लक्स सम्बन्धित हो तब बेलन के किसी एक समतल पृष्ठ से कितना वैद्युत फ्लक्स सम्बन्धित होगा? [2014]
हल :
गाउस की प्रमेय से, खोखले बेलन से बद्ध वैद्युत फ्लक्स = \(\frac{q}{\varepsilon_{0}}\)
बेलन के वक्रीय पृष्ठ का वैद्युत फ्लक्स = Φ वोल्ट-मीटर
अतः बेलन के पृष्ठ का कुल वैद्युत फ्लक्स = \(\phi+\phi_{p}+\phi_{p}=\frac{q}{\varepsilon_{0}}\)
अथवा Φ + 2Φp =\(\frac{q}{\varepsilon_{0}}\) अथवा 2 \(\phi_{p}=\frac{q}{\varepsilon_{0}}-\phi\)
अत: समतल पृष्ठ के लिए वैद्युत फ्लक्स \(\phi_{p}=\frac{1}{2}\left(\frac{q}{\dot{\varepsilon}_{0}}-\phi\right)\)
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 24

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प्रश्न 35.
एक गाउसीय पृष्ठ के अन्दर 3q, – 2q, q तथा + 2q आवेश रखे हैं। पृष्ठ से परिबद्ध कुल वैद्युत फ्लक्स कितना होगा? [2016]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 25

प्रश्न 36.
m द्रव्यमान की एक आवेशित तेल की बूँद दो क्षैतिज प्लेटों के बीच सन्तुलन में लटकी है। यदि प्रत्येक प्लेट का क्षेत्रफल A मीटर2 तथा उन पर आवेश +q व – कूलॉम हो तो तेल की बूंद पर आवेश की मात्रा ज्ञात कीजिए।
हल :
माना तेल की बूंद पर आवेश q1 कूलॉम है।
सन्तुलन की अवस्था में, q1E = mg
जहाँ E दोनों प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 26

वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वैद्युत आवेश किसे कहते हैं?
उत्तर :
वैद्युत आवेश द्रव्य का वह गुण है जिसके कारण वह वैद्युत तथा चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न करता है तथा उनका अनुभव करता है।

प्रश्न 2.
एक धनावेशित चालक पर इलेक्ट्रॉनों की कमी होती है अथवा अधिकता, बताइए।
उत्तर :
एक धनावेशित चालक पर इलेक्ट्रॉनों की कमी होती है।

प्रश्न 3.
किसी चालक को धनावेशित करने पर उसके द्रव्यमान पर क्या प्रभाव पड़ेगा? कारण सहित बताइए।
उत्तर :
द्रव्यमान घट जाएगा, क्योंकि धनावेशित करने पर चालक से कुछ इलेक्ट्रॉन बाहर निकल जाएँगे।

प्रश्न 4.
3.2 कूलॉम आवेश कितने इलेक्ट्रॉनों द्वारा निर्मित होगा? [2010, 11, 12]
हल :
दिया है, q= 3.2 कूलॉम, n = ?
3.2 सूत्र q = ne से, इलेक्ट्रॉनों की संख्या n = \(\frac{q}{e}=\frac{3.2}{1.6 \times 10^{-19}}\) = 2 x 1019 इलेक्ट्रॉन।

प्रश्न 5.
एक निश्चित दूरी पर स्थित दो इलेक्ट्रॉनों के बीच वैद्युत बल F न्यूटन है। इतनी ही दूरी पर स्थित दो प्रोटॉनों के बीच वैद्युत बल ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
चूँकि प्रोटॉन पर आवेश, इलेक्ट्रॉन के आवेश के बराबर होता है; अत: प्रोटॉन के बीच वैद्युत बल, इलेक्ट्रॉनों के बीच वैद्युत बल के बराबर होगा अर्थात् F न्यूटन ही होगा।

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प्रश्न 6.
यदि दो बिन्दु आवेशों के बीच की दूरी आधी कर दी जाए तो उनके बीच लगने वाले वैद्युत बल पर क्या प्रभाव पड़ेगा? [2000, 01]
उत्तर :
\(F \propto 1 / r^{2}\) से, दूरी आधी करने पर बल चार गुना हो जाएगा।

प्रश्न 7.
एक निश्चित दूरी पर स्थित दो इलेक्ट्रॉनों के बीच वैद्युत बल F न्यूटन है। इससे आधी दूरी पर स्थित दो प्रोटॉनों के बीच वैद्युत बल कितना होगा?
[2011]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 27

प्रश्न 8.
कुछ दूरी पर रखे गए +2 μ C तथा -2μ C के आवेश वाले दो एक जैसे चालकों के बीच 10 न्यूटन का आकर्षण बल क्रिया करता है। यदि इन्हें परस्पर स्पर्श कराकर पुनः उतनी ही दूरी पर रखा जाए तो उनके बीच बल कितना हो जाएगा? [2010]
उत्तर :
चालक एक जैसे हैं; अत: स्पर्श कराने पर प्रत्येक चालक पर
नया आवेश \(q_{1}^{\prime}=q_{2}^{\prime}=\frac{+2 \mu \mathrm{C}+(-2 \mu \mathrm{C})}{2}=0\) होगा।
क्योंकि बल, आवेशों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती होता है।
अतः दोनों के बीच लगने वाला नया बल भी शून्य हो जाएगा।

प्रश्न 9.
निर्वात की वैद्युतशीलता ε0 का मात्रक लिखिए।
उत्तर :
ε0 का मात्रक = कूलॉम2/(न्यूटन-मीटर) है।

प्रश्न 10.
S.I. पद्धति में निर्वात की वैद्युतशीलता ε0 की विमाएँ लिखिए।
[2003]
उत्तर :
ε0 की विमाएँ = [M-1L-3T4A2]

प्रश्न 11.
निर्वात की वैद्युतशीलता तथा किसी परावैद्युत माध्यम की वैद्युतशीलता में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर :
ε = ε0 K, जहाँ K माध्यम का परावैद्युतांक है।

प्रश्न 12.
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मांत्रक लिखिए। यह कैसी राशि है? ।
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक = न्यूटन/कूलॉम। यह सदिश राशि है।

प्रश्न 13.
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता की विमा लिखिए। .
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता की विमा = [MLT-3A-1]

प्रश्न 14.
एक वैद्युत क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन स्वतन्त्र रूप से स्थित हैं। क्या दोनों पर समान बल लगेंगे?
उत्तर :
दोनों पर आवेश समान परन्तु विपरीत प्रकृति के हैं; अतः F = qE से दोनों पर बलों के परिमाण समान होंगे परन्तु उनकी दिशाएँ विपरीत होंगी। .

प्रश्न 15.
एक वैद्युत क्षेत्र में एक इलेक्ट्रॉन तथा एक प्रोटॉन स्वतन्त्र रूप से स्थित हैं। इनमें से किस कण का त्वरण अधिक होगा और क्यों?
उत्तर :
दोनों के आवेश समान होने के कारण दोनों पर बल तो समान ही लगेगा, परन्तु सूत्र a= F/m से, इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान, प्रोटॉन की तुलना में कम होने के कारण इलेक्ट्रॉन का त्वरण अधिक होगा।

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प्रश्न 16.
E तीव्रता वाले एकसमान वैद्युत क्षेत्र से θ कोण पर एक वैद्युत द्विध्रुव रखा है। द्विध्रुव पर लगने वाला शुद्ध स्थानान्तरण बल क्या होगा? [2007]
उत्तर :
द्विध्रुव पर लगने वाला स्थानान्तरण बल F = qE – qE = 0 (शून्य) होगा।

प्रश्न 17.
5.0 x 10-8 कूलॉम बिन्दु आवेश से कितनी दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता 450 वोल्ट/मीटर होगी? [2012]
हल :
दिया है, q = 5.0 x 10-8 कूलॉम, E = 450 वोल्ट/मीटर, r = ?
सूत्र E = 9.0 x 109 \frac{q}{r^{2}} से, 450 = 9.0 x 109 x \(\frac{5 \times 10^{-8}}{r^{2}}\) अत: r = 1 मीटर।

प्रश्न 18.
परस्पर समान्तर वैद्युत बल रेखाएँ किस प्रकार के वैद्युत क्षेत्र को प्रदर्शित करती हैं?
उत्तर :
एकसमान वैद्युत क्षेत्र को।

प्रश्न 19.
वैद्युत द्विध्रुव से क्या समझते हो? दो उदाहरण दीजिए। [2005, 14]
उत्तर :
वैद्युत द्विध्रुव-“वह निकाय जिसमें दो बराबर, परन्तु विपरीत प्रकार के बिन्दु आवेश एक-दूसरे से अल्प दूरी पर स्थित हों, वैद्युत द्विध्रुव कहलाता है।” जैसे HCl, H2O के अणु आदि।

प्रश्न 20.
वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण का S.I. मात्रक एवं विमा लिखिए।
उत्तर :
वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण का S.I. मात्रक कूलॉम-मीटर तथा विमा [LTA] है।

प्रश्न 21.
एकसमान वैद्युत क्षेत्र में स्थित वैद्युत द्विध्रुव पर लगने वाले बलयुग्म के आघूर्ण का व्यंजक लिखिए। यह बलयुग्म का आघूर्ण अधिकतम कब होगा? .
[2006, 08]
उत्तर :
बलयुग्म के आघूर्ण का व्यंजक t = pE sin θ, जब θ = 90° तो t max = pE.

प्रश्न 22.
वैद्युत फ्लक्स तथा वैद्युत क्षेत्र में सम्बन्ध लिखिए। वैद्युत फ्लक्स का मात्रक बताइए। [2007]
उत्तर :
किसी पृष्ठ A से बद्ध वैद्युत फ्लक्स ।
\(\phi_{E}=\int_{A} \overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot d \overrightarrow{\mathrm{A}}=E A\)
अर्थात् वैद्युत क्षेत्र में स्थित किसी पृष्ठ से बद्ध वैद्युत फ्लक्स वैद्युत क्षेत्र के पृष्ठ समाकल के बराबर होता है। इसका मात्रक वोल्ट-मीटर अथवा न्यूटन-मीटर2/कूलॉम है।

प्रश्न 23.
वैद्युत फ्लक्स का मात्रक और विमीय सूत्र निगमित कीजिए।
उत्तर :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 28

प्रश्न 24.
किसी गोलीय पृष्ठ के अन्दर यदि + q आवेश रख दिया जाए तो सम्पूर्ण पृष्ठ से निकलने वाला वैद्युत फ्लक्स कितना होगा?
उत्तर :
वैद्युत फ्लक्स ΦE =q/ε0

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प्रश्न 25.
किसी बन्द पृष्ठ से बद्ध वैद्युत फ्लक्स किस राशि पर निर्भर करता है?
उत्तर :
केवल और केवल उस पृष्ठ द्वारा परिबद्ध वैद्युत आवेश पर।

प्रश्न 26.
क्या किसी आवेश के कारण वैद्युत फ्लक्स इस बात पर निर्भर करता है कि उसको परिबद्ध करने वाले बन्द पृष्ठ की आकृति कैसी है? यदि नहीं, तो किसी आवेश के कारण वैद्युत फ्लक्स का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
नहीं, निर्वात में स्थित आवेश q के कारण कुल वैद्युत फ्लक्स ΦE =q/ε0 .

प्रश्न 27.
एक अचालक बेलन एकसमान वैद्युत क्षेत्र E में पूर्णतः भीतर स्थित है तथा बेलन की अक्ष वैद्युत क्षेत्र के समान्तर है। बेलन से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स कितना होगा? [2005]
उत्तर : चूँकि बेलन वैद्युत क्षेत्र के भीतर स्थित है परन्तु बेलन के भीतर कोई आवेश नहीं है; अत: गाउस के प्रमेय से ΦE =q/ε0 = 0 (∵ q = 0)

प्रश्न 28.
आवेशित खोखले गोलाकार चालक के भीतर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता कितनी होती है? [2002, 03]
हल :
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होती है।

प्रश्न 29.
क्या एक खोखले गोले की अपेक्षा समान त्रिज्या के ठोस चालक गोले को अधिक आवेश दिया जा सकता है ? कारण सहित बताइए।
उत्तर :
नहीं; क्योंकि आवेशित चालक का सम्पूर्ण आवेश उसके बाहरी पृष्ठ पर रहता है न कि सम्पूर्ण आयतन में।

प्रश्न 30.
अनन्त लम्बाई की दो समान्तर प्लेटें एकसमान रूप से आवेशित हैं तथा उन पर आवेश के पृष्ठ घनत्व +σ व -σ हैं। वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहाँ पर शून्य होगी? [2005]
हल :
प्रत्येक प्लेट के बाहर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होगी।

प्रश्न 31.
आवेश घनत्व वाले किसी अनन्त विस्तार के समावेशित पृष्ठ के निकट r दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र लिखिए। [2008]
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(E=\frac{\sigma}{2 \varepsilon_{0}}\)

प्रश्न 32.
+σ तथा -σ पृष्ठ आवेश घनत्व वाली दो समान्तर प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र का सूत्र लिखिए। [2003, 06]
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E = σ/ε0

प्रश्न 33.
समान पृष्ठीय आवेश घनत्व वाली एक धन तथा एक ऋण आवेशित प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E = σ/ε0 जहाँ σ प्लेटों पर आवेश का पृष्ठ घनत्व है।

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प्रश्न 34.
दो समतल धातु प्लेटों के बीच ‘m’ द्रव्यमान तथा ‘वं आवेश वाली द्रव बूंद को गिरने से रोकने के लिए कितने वैद्युत क्षेत्र की आवश्यकता होगी? .
[2004] …
उत्तर :
mg = qE से, अभीष्ट वैद्युत क्षेत्र \(E=\frac{m g}{q}\)

प्रश्न 35.
किसी आवेशित कण के भार को एक वैद्युत क्षेत्र द्वारा किस प्रकार सन्तुलित किया जाता है? [2009]
उत्तर :
जब आवेशित कण पर वैद्युत बल \(\overrightarrow{\mathbf{F}}=\overrightarrow{\mathbf{E}} q\) की दिशा भार \(\overrightarrow{\mathrm{mg}}\) के विपरीत, अर्थात् ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर हो तथा \(\overrightarrow{\mathrm{E}} q=m \overrightarrow{\mathrm{g}}\) हो।

वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र आंकिक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एक चालक पर 1.0 कूलॉम का ऋण आवेश है। इस पर सामान्य अवस्था से कितने इलेक्ट्रॉन अधिक हैं? .
[2000, 10]
हल :
दिया है, q= 1.0 कूलॉम, e= 1.6 x 10-19 कूलॉम, n = ?
अत: सूत्र q= ne से, इलेक्ट्रॉनों की संख्या n = =n=\(\frac{q}{e}=\frac{1.0}{1.6 \times 10^{-19}}\) = 6.25 x 1018
क्योंकि चालक पर ऋण आवेश है; अतः चालक पर 6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉन अधिक हैं।

प्रश्न 2.
एक चालक पर 2.4 x 10-18 कूलॉम धनात्मक आवेश है। इस चालक पर कितने इलेक्ट्रॉन की अधिकता अथवा कमी है?
हल :
दिया है, q = 2.4 x 10-18 कूलॉम, e= 1.6 x 10-19 कूलॉम, n = ?
अत: सत्र = ne से. इलेक्ट्रॉनों की संख्या n = n = \(\frac{q}{e}=\frac{2.4 \times 10^{-18}}{1.6 \times 10^{-19}}=15\)
क्योंकि चालक पर धन आवेश है; अत: चालक पर 15 इलेक्ट्रॉनों की कमी है।

EXTRA SHOTS
वस्तु के धनावेशित होने का तात्पर्य है उस पर इलेक्ट्रॉनों की सामान्य अवस्था से कमी तथा ऋणावेशित होने का __तात्पर्य है उस पर इलेक्ट्रॉनों की सामान्य अवस्था से अधिकता। .

प्रश्न 3.
एक आवेशित चालक में 4000 इलेक्ट्रॉन बाहुल्य में हैं। चालक में उपस्थित कुल आवेश का मान तथा उसकी प्रकृति बताइए।
[2000, 01]
हल :
दिया है, n = 4000, e = 1.6 x 10-19 कूलॉम, q= ?
चालक पर आवेश q= ne = 4000 x 1.6 x 10-19 = 6.4 x 10-16कलॉम चूँकि इलेक्ट्रॉन पर ऋण आवेश होता है; अतः चालक में उपस्थित आवेश ऋण आवेश होगा। अत: चालक पर आवेश q= 6.4 x 10-16 कूलॉम (ऋण आवेश)।

प्रश्न 4.
एक चालक पर 500 इलेक्ट्रॉनों की कमी है। इस पर आवेश की मात्रा तथा प्रकृति ज्ञात कीजिए। [2005]
हल :
दिया है, n = 500, e = 1.6 x 10-19 कूलॉम, q= ?
चालक पर आवेश q = ne = 500 x 1.6 x 10-19 = 8.0 x 10-17 कूलॉम चूँकि चालक पर इलेक्ट्रॉनों की कमी है; अत: चालक में उपस्थित आवेश धन आवेश होगा। अतः चालक पर आवेश q= 8.0 x 10-17 कूलॉम (धन आवेश)।

प्रश्न 5.
3.2 कूलॉम आवेश कितने इलेक्ट्रॉनों द्वारा निर्मित होगा? [2010, 11, 12]
हल :
दिया है, q= 3.2 कूलॉम तथा e = 1.6 x 10-19 कूलॉम, n = ?, आवेश q = ne
n =\( \frac{q}{e}=\frac{3.2}{1.6 \times 10^{-19}}\) = 2 x 10-19

प्रश्न 6.
12.5 x 1018 इलेक्ट्रॉनों के आवेश की गणना कीजिए।
[2018] हल : दिया है, n = 12.5 x 108 तथा e= 1.6 x 10-19 कूलॉम
आवेश q= ne = 12.5 x 1018 x 1.6 x 10-19 = 2 कूलॉम।

प्रश्न 7.
7N14 नाभिक पर कूलॉम में आवेश की गणना कीजिए।
हल :
7N14 नाभिक में 7 प्रोटॉन तथा 7 न्यूट्रॉन हैं। चूँकि न्यूट्रॉन अनावेशित होता है तथा प्रत्येक प्रोटॉन पर +1.6 x 10-19 कूलॉम आवेश होता है; अत: सूत्र q = ne से,
7N14 नाभिक पर आवेश q = 7 x 1.6 x 10-19 = 11.2 x 10-19 कूलॉम।

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प्रश्न 8.
दो प्रोटॉनों के बीच की दूरी 4.0 x 10-15 मीटर है तथा इन पर आवेश 1.6 x 10-19 कूलॉम है तो इनके मध्य लगने वाले प्रतिकर्षण बल की गणना कीजिए।
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 29

प्रश्न 9.
एक 92U238 परमाणु ∝-कण उत्सर्जित करता है। यदि किसी क्षण -कण विघटित परमाणु के केन्द्र से 9.0x 10-15 मीटर की दूरी पर हो तो ∝ -कण पर कितना बल कार्यरत होगा? [2005]
हल:
92U238 परमाणु के केन्द्र (नाभिक) से ∝-कण उत्सर्जित होने के बाद नाभिक में 92 – 2 = 90 प्रोटॉन शेष बचेंगे।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 30

प्रश्न 10.
दो सूक्ष्म गोलों में से प्रत्येक पर 105 इलेक्ट्रॉनों की कमी है। यदि उनके बीच दूरी 1.0 मीटर हो तो वैद्युत बल की गणना कीजिए।
हल :
दिया है , n = 105, r = 1.0 मीटर, e= 1.6 x 10-19 कूलॉम, F = ?
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 31

प्रश्न 11.
दो धनावेश, जो कि परस्पर 0.1 मीटर की दूरी पर हैं, एक-दूसरे को 18 न्यूटन के बल से प्रतिकर्षित करते हैं। यदि दोनों आवेशों का योग 9 uC हो तो उनके अलग-अलग मान ज्ञात कीजिए।
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 32
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 33

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प्रश्न 12.
दो प्रोटॉनों के बीच की दूरी की गणना कीजिए, यदि इनके बीच वैद्युत प्रतिकर्षण बल एक प्रोटॉन के भार के बराबर हो। (प्रोटॉन का द्रव्यमान mp = 1.67 x 10-27 किग्रा, g = 9.8 मीटर/सेकण्ड2) [2007]
हल : दिया है, प्रत्येक प्रोटॉन पर आवेश q1 = q2 = 1.6 x 10-19 कूलॉम
प्रोटॉन का द्रव्यमान mp = 1.67 x 10-27 किग्रा, g= 9.8 मीटर/सेकण्ड2, r = ?
प्रश्नानुसार, प्रोटॉनों के बीच वैद्युत बल = प्रोटॉन का भार
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 34

CLASSROOM EXPERIENCE :
प्रश्न 13.
दो सूक्ष्म गोलियों पर (80/3) x 10-9 तथा (160/3) x 10-9 कूलॉम आवेश हैं तथा वे वायु में एक-दूसरे से 0.10 मीटर पर स्थित हैं। उनके बीच वैद्युत बल ज्ञात कीजिए। यदि उन्हें एक तार द्वारा क्षण भर के लिए सम्बन्धित कर दें तो बल कितना हो जाएगा?
हल :
Step 1.
सर्वप्रथम प्रश्न में दिए गए आँकड़े नोट कर लेते हैं।
गोलियों पर आवेश q1 = \(\frac{80}{3} \times 10^{-9}\) कूलॉम
q2 = \(\frac{160}{3} \times 10^{-9}\) कूलॉम
गोलियों के बीच की दूरी (7) = 0.10 मीटर

Step 2.
कूलॉम के नियमानुसार, दोनों गोलियों के बीच कार्यरत वैद्युत बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 35

Step 3.
गोलियों को तार से सम्बन्धित कर देने पर प्रत्येक गोली पर आवेश दोनों गोलियों पर आवेशों के योग | के आधे के बराबर होगा। अत:
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 36

Step 4.
अब गोलियों के बीच कार्यरत वैद्युत बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 37

प्रश्न 14.
दो बिन्दु आवेशों को वायु में एक निश्चित दूरी पर रखने पर उनके बीच 80 न्यूटन का बल कार्य करता है। इन्हीं आवेशों को एक परावैद्युत माध्यम में इतनी ही दूरी पर रखा जाता है तो इस बल का मान 8 न्यूटन हो जाता है। माध्यम का परावैद्युतांक ज्ञात कीजिए। [2017]
हल :
दो बिन्दु आवेशों के बीच वायु में लगने वाला बल
\(F_{1}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\)
इनके बीच परावैद्युत रखने पर,
बल \(F_{2}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} K \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\)
\(\frac{F_{1}}{F_{2}}=K\) अत: K = \(\frac{F_{80}}{F_{8}}\) = 10.

प्रश्न 15.
+ 2 माइक्रोकूलॉम तथा + 6 माइक्रोकूलॉम के दो बिन्दु आवेश परस्पर 12 न्यूटन के बल से प्रतिकर्षित करते हैं। यदि इन आवेशों में से प्रत्येक को – 4 माइक्रोकूलॉम का आवेश और दिया जाए तो उनके बीच कितना बल लगेगा?
हल :
दिया है, q1 = + 2 माइक्रोकूलॉम = + 2 x 10-6 कूलॉम
q2 = + 6 माइक्रोकूलॉम = + 6 x 10-6 कूलॉम F = 12 न्यूटन
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 38

प्रश्न 16.
दो धनावेश जो कि परस्पर 0.1 मीटर की दूरी पर हैं, एक-दूसरे को 18 न्यूटन के बल से प्रतिकर्षित करते हैं। यदि दोनों आवेशों का योग 9 μC हो तो उनके अलग-अलग मान ज्ञात कीजिए।
– [2017] हल : माना आवेश q1 व q2 हैं; अत:
दिया है , F = 18 न्यूटन,r = 0.1 मीटर, (q1 + q2) = 9 μC = 9 x 10-6 कूलॉम, q1= ?, q2 = ?
सूत्र F = 9 x 109 \(\frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\) से, 18= 9 x 109 \(\frac{q_{1} q_{2}}{(0.1)^{2}}\)
अथवा q1q2= 2 x 10-11 = 20 x 10-12 कूलॉम2
सूत्र (q1 – q2)2 = (q1 + q2)2 – 4q1q2 से,
(q1 – q2)2 = (9 x 10-6)2 – 4 x 20 x 10-12
= 81 x 10-12 – 80 x 10-12 = 10-12
अत: (q1 – q2) = √10-12 = 10-6 …………..(1)
प्रश्नानुसार, q1 + q2 = 9 x 10-6…………………..(2)
(2) समीकरण (1) व समीकरण (2) को हल करने पर,
q1 = 5 x 10-6 = 5μc तथा q2= 9 – 5 = 4 μC

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प्रश्न 17.
10-10 ग्राम द्रव्यमान के ताँबे के दो गोले वायु में एक-दूसरे से 10 सेमी की दूरी पर स्थित हैं। ताँबे के एक गोले के प्रति 106 परमाणुओं से एक इलेक्ट्रॉन दूसरे गोले में स्थानान्तरित किया जाता है। इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण के पश्चात् इनके बीच कितना कूलॉमीय बल लगेगा? ताँबे का परमाणु भार = 63.5 ग्राम/मोल, आवोगाद्रो संख्या = 6.022 x 1023 इलेक्ट्रॉन का आवेश = 1.6 x 10-19 कूलॉम। [2009]
हल :
∵ ताँबे के 63.5 ग्राम में परमाणुओं की संख्या = 6.022 x 1023

∴ ताँबे के 10 ग्राम में परमाणुओं की संख्या = \(\frac{6.022 \times 10^{23} \times 10}{63.5}\)= 9.48 x 1022

∵ ताँबे के एक गोले के प्रति 106 परमाणुओं से स्थानान्तरित इलेक्ट्रॉन = 1
∴ ताँबे के एक गोले से दूसरे गोले में स्थानान्तरित इलेक्ट्रॉन \(n=\frac{9.48 \times 10^{22}}{10^{6}}\) = 9.48 x 1016
∵ एक इलेक्ट्रॉन का आवेश = 1.6 x 10-19 कूलॉम
अत: एक गोले से दूसरे गोले में स्थानान्तरित आवेश
q1 = ne = 9.48 x 1016 x 1.6 x 10-19 = +15.17 x 10-3 कूलॉम
तथा q2 = -15.17 x 10-3 कूलॉम, r = 10 सेमी = 0.1 मीटर, F = ?
दोनों गोलों के बीच लगने वाला कूलॉमीय बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 39
= 2.071 x 108 न्यूटन।

प्रश्न 18.
दो ठीक एक-जैसी धातु की गोलियाँ, जिन पर विभिन्न परिमाणों के सजातीय आवेश हैं,जब एक-दूसरे से 0.5 मीटर दूर रखी जाती हैं तो वे एक-दूसरे को 0.108 न्यूटन के बल से प्रतिकर्षित करती हैं, जब उन्हें आपस में स्पर्श कराकर पुनः उतनी ही दूरी पर रखा जाता है तो वे एक-दूसरे को 0.144 न्यूटन के बल से प्रतिकर्षित करती हैं। प्रत्येक का प्रारम्भिक आवेश ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, r = 0.5 मीटर, F = 0.108 न्यूटन, F = 0.144 न्यूटन, q1 = ?, q2 = ?
माना धातु की गोलियों पर आवेश q1 व q2 है; अतः इनके बीच वैद्युत बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 40
स्पर्श कराने के पश्चात् दोनों पर (q1 + q2)/2 कूलॉम आवेश हो जाएगा।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 42
अथवा (q1 + q2) = ± 2 x 2.0 x 10-6 = ± 4.0 x 10-6कूलॉम ………….(1)
सूत्र (q1 – q2)2 = (q1 + q2)2 – 4q1q2 से,
= 16.0 x 10-12 – 4 x 3.0 x 10-12 = 4.0 x 10-12
अतः (q1 – q2) = ± 2.0 x 10-6 कूलॉम………………………….(2)
समीकरण (1) व समीकरण (2) को हल करने पर,
q1 = ± 3.0 x 10-6 कूलॉम तथा q2= + 1.0 x 10-6 कूलॉम।

प्रश्न 19.
सरकन्डे की दो समान आवेशित गोलियाँ, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 10 ग्राम है, 120 सेमी लम्बे सिल्क के धागों द्वारा एक बिन्दु से लटकाई गई हैं। प्रतिकर्षण के कारण उनके बीच की दूरी 5.0 सेमी है। प्रत्येक गोली पर आवेश का मान ज्ञात कीजिए।
हल :
माना सरकन्डे की प्रत्येक गोली (A व B) पर सजातीय आवेश q है (चित्र 1.38)।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 43
प्रत्येक गोली का द्रव्यमान m = 10 ग्राम = 10-2 किग्रा।
सन्तुलन की स्थिति में गोलियों (A व B) के बीच की दूरी AB= 5.0 सेमी = 0.05 मीटर।
धागे की लम्बाई OA = OB = 120 सेमी = 1.2 मीटर
गोलियों के बीच वैद्युत प्रतिकर्षण बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 44

प्रत्येक गोली तीन बलों के अन्तर्गत सन्तुलन में है।
(i) डोरी का तनाव T डोरी के अनुदिश ऊपर की ओर
(ii) गोली का भार mg नीचे की ओर
(iii) गोलियों के बीच वैद्युत प्रतिकर्षण बल F
माना तनाव T का ऊर्ध्व से झुकाव में है; अत: बलों को क्षैतिज व ऊर्ध्व दिशा में वियोजित करने पर,
क्षैतिज वियोजन से, F = T sin θ ….(1)
ऊर्ध्व वियोजन से, mg = T cos θ ….(2)
समीकरण (1) को समीकरण (2) से भाग देने पर,
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 45

क्योंकि AC, OA व OC की तुलना में बहुत छोटा है; अत: OC व OA लगभग समान होंगे; अत: OC के स्थान पर OA लेने पर,
F = mg (AC/OA)
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 46
वर्गमूल लेने पर, प्रत्येक गोली पर आवेश q= ± 2. 38 x 10-8 कूलॉम है।

प्रश्न 20.
दो बिन्दु आवेश + 9 e एवं + e एक-दूसरे से 16 सेमी की दूरी पर स्थित हैं। इनके बीच एक आवेश q को कहाँ रखा जाए कि वह सन्तुलन में हो?
[2018]
हल :
माना q आवेश + 9 e से x सेमी दूर रखा गया है (चित्र 1.39)।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 47
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COMMON ERRORS :
दो सजातीय आवेशों को मिलाने वाली रेखा पर तीसरे आवेश q की स्थिति जिस पर कार्यरत परिणामी बल शून्य हो अथवा उस पर परिणामी वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य हो, सदैव आवेशों के बीच होगी जबकि विजातीय आवेशों के लिए यह स्थिति आवेशों से बाहर, लघु परिमाण वाले आवेश के निकट होगी।

प्रश्न 21.
दो समान आवेशों q तथा q को जोड़ने वाली रेखा के मध्य-बिन्दु पर एक आवेश Q रख दिया जाता है।Q का मान ज्ञात कीजिए, यदि तीनों आवेशों का निकाय सन्तुलन में हो। [2018]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 48
तीनों आवेशों के निकाय के सन्तुलन में होने पर,
बिन्दु A पर स्थित आवेश q पर कार्यरत परिणामी बल शून्य होगा। अतः
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 49

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प्रश्न 22.
दो बिन्दु आवेश + 4q तथा +q परस्पर r दूरी पर स्थित हैं। एक तीसरे आवेश ‘ को दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा पर कहाँ रखें कि सम्पूर्ण निकाय सन्तुलन में रहे? इस दशा में ‘ का मान तथा चिह्न क्या होंगे? सन्तुलन कैसा होगा?
अथवा
दो स्वतन्त्र बिन्दु आवेश +4q तथा +q, दूरी r पर रखे हैं। एक तीसरे आवेश का मान, चिह्न व स्थिति ज्ञात कीजिए जिससे सम्पूर्ण निकाय साम्य अवस्था में हो। [2012]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 50
माना आवेशों के बीच +4q आवेश से x दूरी पर तीसरा आवेश q’ रखने पर सम्पूर्ण निकाय सन्तुलन में रहता है अर्थात् आवेश q पर दोनों बिन्दु आवेशों द्वारा लगाए गए बल परिमाण में परस्पर बराबर व दिशा में विपरीत हैं, अतः
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 51
आवेश +q के सन्तुलन के लिए,
आवेश +4q द्वारा आवेश +q पर लगाया गया वैद्युत बल (F)+ आवेश q’ द्वारा आवेश +q पर लगाया गया वैद्युत बल = 0
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 52
सन्तुलन की जाँच – यदि आवेश q’ को बायीं ओर थोड़ा-सा विस्थापित कर दें, तब उस पर +4q आवेश द्वारा लगाया गया बल F1 दूरी कम हो जाने के कारण बढ़ जाएगा जबकि +q आवेश द्वारा लगाया गया बल F2 , दूरी बढ़ जाने के कारण कम हो जाएगा। अतः आवेश q’ पर एक परिणामी बल (F1 – F2 ) बायीं ओर कार्य करेगा जिसके प्रभाव में ‘ आवेश + 4g आवेश की ओर गति करेगा। इस प्रकार आवेश q’ की प्रवृत्ति अपनी मूल स्थिति प्राप्त करने की नहीं है, अतः आवेशों का सन्तुलन अस्थायी है।

प्रश्न 23.
किसी वैद्युत क्षेत्र में +5 माइक्रोकूलॉम आवेश पर 1 मिलीन्यूटन का बल कार्य करता है। इस स्थान पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, q = +5μC = 5 x 10-6 कूलॉम, F = 1 मिलीन्यूटन = 10-3 न्यूटन, E = ?
∴ वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(E=\frac{F}{q}=\frac{10^{-3}}{5 \times 10^{-6}}=200\) न्यूटन/कूलॉम

प्रश्न 24.
एक a-कण 15 x 104 न्यूटन/कूलॉम के वैद्युत क्षेत्र में स्थित है, उस पर लगने वाले वैद्युत बल की गणना कीजिए।
हल :
दिया है, E = 15 x 104 न्यूटन/कूलॉम, q = 2 e = 2 x 1.6 x 10-19 कूलॉम, F = ?
वैद्युत बल F = qE = (2x 1.6 x 10-19)x (15 x 104)= 4.8 x 10-14 न्यूटन।

प्रश्न 25.
5.0 x 10-8 कूलॉम बिन्दु आवेश से कितनी दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता 450 वोल्ट/मीटर होगी? [2012]
हल :
आवेश (q) = 5.0 x 10-8 कूलॉम, वैद्युत क्षेत्र (E) = 450 वोल्ट/मीटर, दूरी (r) = ?
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 53

प्रश्न 26.
उस वैद्युत क्षेत्र का मान क्या होगा, जिसमें एक इलेक्ट्रॉन पर उसके भार के बराबर वैद्युत बल कार्य करता है? (इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान = 9.1x 10-31 किग्रा, आवेश = 1.6 x 10-19 कूलॉम)। . [2010]
हल :
प्रश्नानुसार, वैद्युत बल F = Ee = mg
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 54

प्रश्न 27.
एक इलेक्ट्रॉन के कारण निर्वात में 1.0 मीटर दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए। (1.6 x 10-19 कूलॉम)
हल :
दिया है, q = e = 1.6 x 10-19 कूलॉम, r = 1.0 मीटर, E = ?
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E = 9 x 109 \(\frac{q}{r^{2}}\) = 9 x 109 x \(\frac{1.6 \times 10^{-19}}{(1.0)^{2}}\) = 1.44 x 10-9 न्यूटन/कूलॉम।

प्रश्न 28.
एक बिन्दु आवेश से 1 मीटर की दूरी पर उत्पन्न वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता 450 वोल्ट/मीटर है। आवेश का मान ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, r = 1 मीटर, E = 450 वोल्ट/मीटर, q = ?
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 55

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प्रश्न 29.
एक स्थान पर 1000 न्यूटन/कूलॉम का वैद्युत क्षेत्र पूर्व की ओर है। इस क्षेत्र में ऐसी वस्तु स्थित है, जिस पर 106 इलेक्ट्रॉनों की अधिकता है। वस्तु पर लगने वाले बल का परिमाण व दिशा ज्ञात कीजिए।
हल : दिया है, n = 10, E = 1000 न्यूटन/कूलॉम, F = ?
चूँकि वस्तु पर 106 इलेक्ट्रॉनों की अधिकता है।
अतः वस्तु पर आवेश q= ne = -106 x 1.6 x 10-19 = -1.6 x 10-13 कूलॉम।
वस्तु पर बल F = qE = (-1.6 x 10-13) x 1000 = -1.6 x 10-10 न्यूटन।
ऋण चिह्न का अर्थ है कि बल की दिशा वैद्युत क्षेत्र की विपरीत दिशा में है।
अतः वस्तु पर बल F = 1.6 x 10-10 न्यूटन (पश्चिम की ओर )।

प्रश्न 30.
3 μC के किसी बिन्दु आवेश से 2 मीटर की दूरी पर – 2 μc का दूसरा बिन्दु आवेश वायु में रखा हुआ है। इन दोनों आवेशों से 1 मीटर की दूरी पर स्थित बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मान तथा दिशा ज्ञात कीजिए। [2000, 03]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 56
दोनों आवेशों से 1 मीटर की दूरी पर स्थित बिन्दु दोनों आवेशों के बीच की दूरी का मध्य-बिन्दु होगा (चित्र 1.42)।
+ 3μC आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 57
-2 μC आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 58

चूँकि E1 तथा E2 एक ही दिशा में हैं; अत: दोनों आवेशों के कारण परिणामी वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
E = E1 + E2 = (2.7 +1.8) x 104 = 4.5 x 104 न्यूटन/कूलॉम।
इसकी दिशा +3 μC से -2 μc की ओर होगी।

प्रश्न 31.
दो बिन्दु आवेश क्रमशः + 5 x 10-19 कूलॉम तथा + 10 x 10-19 कूलॉम 1 मीटर की दूरी पर स्थित हैं। दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के किस बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य है? [2007, 17]
हल :
माना वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता छोटे आवेश + 5 x 10-19 कूलॉम से x मीटर की दूरी पर शून्य है (चित्र 1.43)।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 59
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 60

प्रश्न 32.
(20/3) x 10-19 तथा -10 x 10-19 कूलॉम आवेश परस्पर 0.04 मीटर की दूरी पर हैं। इनमें गुजरती रेखा के किस बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होगी?
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 61
माना छोटे आवेश अर्थात् q1 = (20/3) x 10-19 कूलॉम से बाहर की ओर x मीटर की दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य है (चित्र 1.44)। तब इस बिन्दु की दूसरे आवेश q2 = -10 x 10-19 कूलॉम से दूरी (x + 0.04) मीटर होगी।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 62
अतः धन आवेश से 0.178 मीटर की दूरी पर बाहर की ओर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होगी।

प्रश्न 33.
भुजा a वाले वर्ग के चारों शीर्षों A, B, C व D पर एकसमान आवेश q रखा गया है। बिन्दु D पर रखे आवेश पर लगने वाला बल ज्ञात कीजिए।
[2000]
हल :
वर्ग की भुजाएँ AB= BC = CD = DA = a
तथा वर्ग के विकर्ण BD की लम्बाई = a√2 मीटर (चित्र-1.45)
शीर्ष D पर रखे आवेश q पर, शीर्ष A पर रखे आवेश q के कारण प्रतिकर्षण बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 63
शीर्ष D पर रखे आवेश q पर, शीर्ष C पर रखे आवेश q के कारण प्रतिकर्षण
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 64
शीर्ष D पर रखे आवेश q पर, शीर्ष B पर रखे आवेश q के कारण प्रतिकर्षण बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 65
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 66
अत: बिन्दु D पर रखे आवेश पर परिणामी प्रतिकर्षण बल
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प्रश्न 34.
+10μC तथा -10μC के दो बिन्दु आवेशों के बीच की दूरी 1 मीटर है। इनके मध्य-बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए।
[2004, 10]
हल :
दिया है, q1 = + 10μC, 42 = – 10μC, r = 1/2 = 0.5 मीटर, E = ?
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 68

प्रश्न 35.
संलग्न चित्र-1.46 के अनुसार आवेशों को मिलाने वाली रेखा के किन +q बिन्दुओं पर वैद्युत क्षेत्र शून्य होगा? [2005]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 69
हल :
माना +q से बायीं ओर x सेमी पर वैद्युत क्षेत्र शून्य होगा (चित्र-1.46); चित्र-1.46 अत: सूत्र E = 9 x 109 q/r2 से,
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 70
अतः +q आवेश से बाहर की ओर x = 136.6 सेमी की दूरी पर वैद्युत क्षेत्र शून्य होगा।

CLASSROOM EXPERIENCE :

प्रश्न 36.
एक इलेक्ट्रॉन धारा में इलेक्ट्रॉन का वेग 2.0 x 107 मीटर/सेकण्ड है। इलेक्ट्रॉन 1.6 x 103 वोल्ट/मीटर के स्थिर वैद्युत क्षेत्र के लम्बवत् दिशा में 10 सेमी चलने में 3.4 मिमी विक्षेपित हो जाता है। इलेक्ट्रॉन के elm की गणना कीजिए।
[2018]
हल :
Step 1.
सर्वप्रथम प्रश्न में दिए गए आँकड़े नोट कर लेते हैं।
v = 2.0 x 107 मीटर/सेकण्ड
E = 1.6 x 103 वोल्ट/मीटर
x = 10 सेमी = 10x 10-2 मीटर
y= 3.4 मिमी = 3.4 x 10-3 मीटर
elm = ?
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Step 2.
वैद्युत क्षेत्र के लम्बवत् गति में इलेक्ट्रॉन पर कोई वैद्युत बल कार्य नहीं कर रहा है। अत: यह एकसमान गति है।
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 72

Step 3.
इलेक्ट्रॉन पर वैद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में उसकी गति के लम्बवत् कार्यरत बल,
F= eE
इस दिशा में इलेक्ट्रॉन पर कार्यरत त्वरण,
\(a=\frac{F}{m}=\frac{e E}{m}\)

Step 4.
अत: इलेक्ट्रॉन के विक्षेपित होते समय त्वरित गति के लिए,
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 73

प्रश्न 37.
1.0 μC के दो बराबर एवं विपरीत प्रकार के आवेश 2.0 मिमी दूर रखे जाते हैं। इसका वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात कीजिए। [2010, 17]
हल :
दिया है, q= 1.0 μC कूलॉम = 10-6 कूलॉम ..
21 = 2 मिमी = 2 x 10-3 मीटर, p= ?
द्विध्रुव आघूर्ण p= q .2l = 10-6 x 2 x 10-3 = 2 x 10-9 कूलॉम-मीटर।

प्रश्न 38.
एक इलेक्ट्रॉन तथा एक प्रोटॉन के बीच की दूरी 0.53 A है। इस निकाय का वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात कीजिए। [2010]
हल :
दिया है, 2l = 0.53 Å = 0.53 x 10-10 मीटर, q = 1.6 x 10-19 कूलॉम, p= ?
वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p= q x 2l = 1.6 x 10-19 x 0.53 x 10-10
= 0.848 x 10-29 कूलॉम-मीटर।

प्रश्न 39.
हाइड्रोजन क्लोराइड अणु का वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण 3.4 x 10-30 कूलॉम-मीटर है। तथा Cl आयनों के बीच विस्थापन ज्ञात कीजिए।
[2000]
हल :
चूँकि H+ तथा Cl प्रत्येक आयन पर वैद्युत आवेश q = 1.6 x 10-19 कूलॉम है। यदि इनका विस्थापन = 21 है तो सूत्र p= q x 2l से,
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प्रश्न 40.
एक वैद्युत द्विध्रुव 105 न्यूटन/कूलॉम के वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता में 30° के कोण पर रखा गया है उस पर 6 x 10-24 न्यूटन-मीटर का बल-आघूर्ण लग रहा है तो वैद्युत द्विध्रुव के आघूर्ण की गणना कीजिए। [2010]
हल :
दिया है, E = 105 न्यूटन/कूलॉम, θ = 30°, t = 6 x 10-24 न्यूटन-मीटर, p= ?
सूत्र t = pE sinθ से,
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प्रश्न 41.
एक वैद्युत द्विध्रुव जिसकी लम्बाई 4 सेमी है, को एकसमान विद्युत क्षेत्र 104 न्यूटन/कूलॉम से 30° पर रखने से 9 x 10-2 न्यूटन-मीटर का बल आघूर्ण लगता है। द्विध्रुव के द्विध्रुव आघूर्ण की गणना कीजिए। [2018]
हल :
दिया है, E = 104 न्यूटन/कूलॉम, θ = 30° , r = 9 x 10-2 न्यूटन-मीटर, p= ?
वैद्युत द्विध्रुव पर कार्यरत बल-युग्म का आघूर्ण t = p E sinθ
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 76
= 1.8 x 10-5 कूलॉम-मीटर।

प्रश्न 42.
एक इलेक्ट्रॉन तथा एक प्रोटॉन के बीच 0.53 x 10-12 मीटर की दूरी है। [2008]
(i) उनका वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण क्या है, जब वे विरामावस्था में हैं?
(ii) औसत वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण क्या है यदि इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन के चारों ओर वृत्ताकार कक्षा में घूमता है?
हल :
दिया है, 2l = 0.53 x 10-12 मीटर, q= 1.6 x 10-19 कूलॉम, p = ?
(i) वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p= q x 2l = 1.6 x 10-19 x 0.53 x 10-12
= 8.5 x 10-32 कूलॉम-सीटर (प्रोटॉन की ओर)।
(ii) प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन के केन्द्र परस्पर सम्पाती हैं; अतः इस स्थिति में द्विध्रुव की भुजा की लम्बाई शून्य होगी; अतः औसत वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होगा।

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प्रश्न 43.
+1μc तथा -1μc के दो बिन्दु आवेश एक-दूसरे से 2 सेमी की दूरी पर स्थित हैं। दोनों मिलकर एक वैद्युत द्विध्रुव की रचना करते हैं। यह द्विध्रुव 1x 105 वोल्ट/मीटर के एकसमान वैद्युत क्षेत्र में स्थित है। ज्ञात कीजिए(i) वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण तथा (ii) द्विध्रुव पर आरोपित अधिकतम बल-आघूर्ण। [2011]
हल :
दिया है, q= +1 μC = 10-6 कूलॉम, 2l = 2 सेमी = 2 x 10-2 मीटर,
E = 105 वोल्ट/मीटर, p = ?, tmax = ?
(i) वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p= q x 2l = 10-6 x 2 x 10-2 = 2 x 10-8 कूलॉम-मीटर।
(ii) अधिकतम बल-आघूर्ण tmax = pE = 2 x 10-8 x 105 =2 x 10-3 न्यूटन-मीटर।

प्रश्न 44.
तीन आवेश -q, +2q, -q समबाहु त्रिभुज के तीन कोणों पर एक-दूसरे से a मीटर की दूरी पर रखे हैं। समायोजन का वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
हल :
शीर्ष A पर स्थित आवेश +2q, आवेश +q तथा +q का योग है (चित्र-1.48)। शीर्ष B पर स्थित -q आवेश A पर स्थित एक +q आवेश के साथ मिलकर एक वैद्युत द्विध्रुव बनाता है; अत: इसका वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण
P1 = q x 2l = q x a (BA दिशा में) (∵ 21 = a)
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इसी प्रकार C पर स्थित -q आवेश A पर स्थित दूसरे +q आवेश के . साथ मिलकर एक अन्य वैद्युत द्विध्रुव बनाता है; अतः इसका वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p2 = q.a (CA दिशा में)
चूँकि p1 तथा p2 की दिशाओं के बीच का कोण 60° है; अत: p1 व p2 का परिणामी वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 78
अत: परिणामी वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण. p= q.a√3 कूलॉम-मीटर।
चूँकि p1 तथा p2 परस्पर समान हैं; अत: इनका परिणामी इनके बीच के कोण को अर्द्धित करेगा अर्थात् परिणामी वैद्युत आघूर्ण ∠BAC के अर्द्धक के अनुदिश होगा।

प्रश्न 45.
दो एक जैसे वैद्युत द्विध्रुव AB तथा CD जिनके प्रत्येक के द्विध्रुव आघूर्ण p हैं तथा 120° कोण पर चित्र-1.49 के अनुसार रखे हैं इस संयोजन का परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात कीजिए। यदि +x दिशा में एक समरूप वैद्युत क्षेत्र \(\overrightarrow{\boldsymbol{E}}\) आरोपित हो तब संयोजन पर कार्य करने वाले बल आघूर्ण का मान क्या होगा?
हल :
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MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 80
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 81

प्रश्न 46.
l भुजा के एक समबाहु त्रिभुज के कोणों पर बिन्दु आवेश चित्रानुसार (1.51) रखे हैं। त्रिभुज के केन्द्रक O पर +Q आवेश पर परिणामी बल का मान व दिशा ज्ञात कीजिए। [2015]
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हल :
चित्र-1.52 से, sin 60° = \(\frac{l / 2}{r}\) अथवा \(\frac{\sqrt{3}}{2}=\frac{l / 2}{r}\)
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अत: r = \(\frac{l}{2} \times \frac{2}{\sqrt{3}}\) अथवा \(r^{2}=\frac{l^{2}}{3}\)
सूत्र \(F=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{0}} \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\) से
आधार के बायीं ओर के आवेश + q द्वारा आवेश +Q पर प्रतिकर्षण बल
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आधार के दूसरे आवेश + q द्वारा आवेश + Q पर प्रतिकर्षण बल
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शीर्ष आवेश – q द्वारा आवेश + Q पर आकर्षण बल
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 86
∴ F1 व F2 के बीच कोण 120° है तथा F1 = F2
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प्रश्न 47.
वैद्युत स्थैतिक क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathbf{E}}=\mathbf{2} \hat{\mathbf{i}}+4 \hat{\mathbf{j}}+7 \hat{\mathbf{k}} में रखने पर पृष्ठ \overrightarrow{\mathbf{S}}=10 \hat{\mathbf{j}}\) से होकर कितना फ्लक्स बाहर आएगा? [2013, 14, 17]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 88

प्रश्न 48.
(\(\hat{5} \hat{i}+10 \hat{j}\)) वोल्ट/मीटर के एकसमान वैद्युत क्षेत्र में 0.2 \(\hat{\mathrm{j}}\) मीटर2 क्षेत्रफल का एक पृष्ठ रखा है। पृष्ठ से निर्गत वैद्युत फ्लक्स ज्ञात कीजिए। [2013]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 89

प्रश्न 49.
एक क्षेत्र में वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता \(\overrightarrow{\mathbf{E}}=(1.2 \hat{\mathbf{i}}+\mathbf{1 . 6} \hat{\mathbf{j}})\) न्यूटन/कूलॉम दी गयी है। Y-Z तल के समान्तर 0.2 मीटर2 क्षेत्रफल के आयताकार पृष्ठ से सम्बद्ध वैद्युत फ्लक्स ज्ञात कीजिए। [2018]
हल :
दिया है, \(\overrightarrow{\mathbf{E}}=(1.2 \hat{\mathbf{i}}+\mathbf{1 . 6} \hat{\mathbf{j}})\) न्यूटन/कूलॉम, Y-Z तल के समान्तर स्थित पृष्ठ के लिए क्षेत्रफल सदिश \(\overrightarrow{\mathrm{A}}=0.2 \hat{\mathrm{i}} \text { thex }^{2}\) मीटर2
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प्रश्न 50.
एक समरूप वैद्युत क्षेत्र \(\overrightarrow{\mathbf{E}}=\left(3 \times 10^{3}\right) \hat{\mathbf{i}}\) न्यूटन/कूलॉम है। 10 सेमी x 10 सेमी के पृष्ठ से कितना वैद्युत फ्लक्स प्राप्त होगा, जबकि पृष्ठ के तल का अभिलम्ब X-अक्ष से 60° कोण पर है। [2013]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 92

प्रश्न 51.
एक समरूप वैद्युत क्षेत्र \(\boldsymbol{E}=5 \times 10^{3} \hat{\mathbf{i}}\) न्यूटन/कूलॉम में एक 10 सेमी भुजा वाला वर्गाकार समतल पृष्ठ Y-Z तल के समान्तर स्थित है। पृष्ठ से कितना वैद्युत फ्लक्स गुजरेगा? यदि पृष्ठ का तल x-अक्ष की दिशा से 30° कोण बनाता है तब कितना वैद्युत फ्लक्स होगा? [2015]
हल :
दिया है, \(\boldsymbol{E}=5 \times 10^{3} \hat{\mathbf{i}}\) न्यूटन/कूलॉम, A= 10 x 10 सेमी2 = 10-2 मीटर2, θ = 30°, ΦE = ?
चूँकि यह तल Y-Z तल के समान्तर है। अतः इसके संगत क्षेत्रफल सदिश \(\overrightarrow{\mathrm{A}}\) भी x-अक्ष की धनात्मक दिशा में होगा अर्थात् \(\overrightarrow{\mathrm{A}}=10^{-2} \hat{\mathrm{i}}\) मीटर2
अत: इस पृष्ठ से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स ΦE= \(\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot \overrightarrow{\mathrm{A}}=\left(5 \times 10^{3} \hat{\mathrm{i}}\right) \times 10^{-2} \hat{\mathrm{i}}\)
= 50 न्यूटन-मीटर2 / कूलॉम।
वैद्युत फ्लक्स ΦE = \(\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot \overrightarrow{\mathrm{A}}\) = EA cos θ = 50 cos 30° = 50 x \(\frac{\sqrt{3}}{2}\) = 25√3
= 25 x 1.732 = 43. 3 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम।

प्रश्न 52.
यदि 17.7 pC आवेश 10 सेमी भुजा वाले घन के केन्द्र पर रखा हो तो धन की प्रत्येक सतह से निकलने वाले वैद्युत फ्लक्स का मान ज्ञात कीजिए। दिया है, ε0 = 8.85 x 10-12 कूलॉम / न्यूटन-मीटर2
[2005, 11]
हल :
घन के पृष्ठ से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स ΦE = q/eo
∵ घन का कुल पृष्ठ क्षेत्रफल उसके एक फलक के क्षेत्रफल का 6 गुना है।
∴ घन के एक फलक से बद्ध वैद्यत फ्लक्स \(\phi_{E}^{\prime}=\frac{1}{6} \phi_{E}=\frac{q}{6 \varepsilon_{0}}=\frac{17.7 \times 10^{-12}}{6 \times 8.85 \times 10^{-12}}=\frac{1}{3}\)
= 0.33 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम।

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प्रश्न 53.
किसी घन के केन्द्र पर 10 माइक्रोकूलॉम का आवेश रखा है। घन के पृष्ठ से कुल कितना वैद्युत फ्लक्स गुजरता है? घन के किसी एक फलक से कितना फ्लक्स घनत्व गुजरेगा? दिया है, ε0 = 8.85 x 10-12 कूलॉम2/न्यूटन-मीटर2। [2011]
हल
∵ घन का पृष्ठ एक बन्द पृष्ठ है; अत: गाउस प्रमेय से,
घन के पृष्ठ से गुजरने वाला फ्लक्स \(\phi_{E}=\frac{q}{\varepsilon_{0}}=\frac{10 \times 10^{-6}}{8.85 \times 10^{-12}}\)
= 1.13 x 106 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम।
चूँकि घन का कुल पृष्ठ क्षेत्रफल उसके एक फलक के क्षेत्रफल का 6 गुना है।
अतः घन के एक फलक से बद्ध वैद्युत फ्लक्स का = \(\phi_{E}^{\prime}=\frac{1}{6} \phi_{E}=\frac{1}{6}\) x 1.13 x 106
= 1.9 x 105 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम।

प्रश्न 54.
4500 फ्लक्स रेखाएँ किसी बन्द पृष्ठ से भीतर जा रही हैं तथा 2500 फ्लक्स रेखाएँ उस बन्द पृष्ठ से बाहर आ रही हैं। आयतन के भीतर कितना आवेश है? दिया है, ε0= 8.85 x 10-12 कूलॉम2 / न्यूटन-मीटर2
हल :
बन्द पृष्ठ से बाहर आने वाली फ्लक्स रेखाओं की नेट संख्या
ΦE= +2500- 4500 = -2000 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम
गाउस की प्रमेय से, ΦE = \(\frac{q}{\varepsilon_{0}}\) अथवा q= ε0ΦE
∴ बन्द पृष्ठ के भीतर आवेश q = 8.85 x 10-12 x (-2000)= -1.77 x 10-8 कूलॉम।

प्रश्न 55.
यदि किसी 8 सेमी भुजा वाले एक घन के केन्द्र पर 1 कूलॉम आवेश रखा जाए तो. घन के किसी फलक से बाहर आने वाले फ्लक्स की गणना कीजिए।
[2017]
हल :
चूँकि घन में 6 फलक होते हैं, अत: वैद्युत फ्लक्स ΦE = \(\frac{q}{\varepsilon_{0}}\) से,
घन के एक फ्लक्स से बद्ध वैद्युत फ्लक्स
\(\phi_{E}=\frac{1}{6} \times \frac{1}{\varepsilon_{0}}=\frac{1}{6 \varepsilon_{0}}=\frac{1}{6 \times 8.85 \times 10^{-12}}\)
= 1.88 x 1010 न्यूटन-मीटर / कूलॉम।

प्रश्न 56.
संलग्न चित्र में वैद्युत क्षेत्र E = 2 x i से प्रदर्शित है। घन से बद्ध वैद्युत फ्लक्स तथा उसके भीतर आवेश का मान ज्ञात कीजिए।
[2016]
हल :
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 93
वैद्युत फ्लक्स केवल X-अक्ष के लम्बवत् तथा दाएँ पृष्ठ से परिबद्ध होगा।
Φबायी = EA cos 180° = 2 x.a2(-1) = 2 x 0 x a2(-1)= 0 (∵ x = 0)
Φदायी = EA cos 0° = 2 x .a2 (1) = 2 x a x a3 = 2a3 (∵ x = a)
कुल वैद्युत फ्लक्सΦकुल = 0+ 2a3 = 2 a3 वोल्ट-मीटर।
सूत्र \(\phi=\frac{q}{\varepsilon_{0}}\) से, आवेश q = \(\phi=\frac{q}{\varepsilon_{0}}\) eoकूलॉम।

प्रश्न 57.
एक समरूप वैद्युत क्षेत्र E = 5 x 103\(\hat{\mathbf{i}}\) न्यूटन/कूलॉम में एक 10 सेमी भुजा वाला वर्गाकार समतल पृष्ठ Y-Z तल के समान्तर स्थित है। पृष्ठ से कितना वैद्युत फ्लक्स गुजरेगा? यदि पृष्ठ का तल X-अक्ष की दिशा से 30° कोण बनाता है तब कितना वैद्युत फ्लक्स होगा? [2013, 15]
हल :
दिया है, \(\overrightarrow{\mathrm{E}}=\left(5 \times 10^{3}\right) \hat{\mathrm{i}}\) न्यूटन/कूलॉम, A= 10 x 10 सेमी2 = 10-2 मीटर2 θ = 30°, Φ = ?
चूँकि यह तल Y-Z तल के समान्तर है। अत: इसके संगत क्षेत्रफल सदिश \(\overrightarrow{\mathrm{A}}\) भी X-अक्ष की धनात्मक दिशा में होगा।
अर्थात् \(\overrightarrow{\mathrm{A}} = 10-2\hat{\mathbf{i}}\) मीटर2
अतः इस पृष्ठ से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स
\(\phi_{E}=\overrightarrow{\mathrm{E}} \cdot \overrightarrow{\mathrm{A}}=\left(5 \times 10^{3} \hat{\mathrm{i}}\right) \times 10^{-2} \hat{\mathrm{i}}\)
= 50 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम।
वैद्युत फ्लक्स ΦE = EA cos θ = 50 cos 60° = 50 x (1/ 2)
= 25 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम।

प्रश्न 58.
एकसमान रूप से आवेशित 2.0 मीटर त्रिज्या वाले गोलीय चालक पर आवेश का पृष्ठ घनत्व σ = 80 माइक्रोकूलॉम/मीटर 2 है। चालक से निकलने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स ज्ञात कीजिए। दिया है, ε0 = 8.85 x 10-12 कूलॉम2/न्यूटन-मीटर2। [2003, 06]
हल :
दिया है, σ = 80 x 10-6 कूलॉम/मीटर2, R= 2.0 मीटर, ΦE = ?
\(\sigma=\frac{q}{A}=\frac{q}{4 \pi R^{2}}\) से, q= 4πR2σ
गाउस की प्रमेय से वैद्यत फ्लक्स \(\phi_{E}=\frac{q}{\varepsilon_{0}}=\frac{4 \pi R^{2} \sigma}{\varepsilon_{0}}=\frac{4 \times 3.14 \times(2.0)^{2} \times 80 \times 10^{-6}}{8.85 \times\)
= 4.54 x 108 न्यूटन-मीटर2/कूलॉम।

प्रश्न 59.
दो बड़ी पतली धातु की प्लेटें एक-दूसरे के समीप तथा समान्तर है। प्लेटों पर आवेश का पृष्ठ घनत्व 1.770 x 10-11 कूलॉम/मीटर2 तथा विपरीत चिह्नों का है। प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता कितनी है? दिया है, ε0 = 8.85 x 10-12 कूलॉम / न्यूटन-मीटर2 [2014]
हल :
दिया है ,σ = 1.770 x 10-11 कूलॉम/मीटर, E = ?
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E=\(\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}=\frac{1.770 \times 10^{-11}}{8.85 \times 10^{-12}}=2\) न्यूटन/कूलॉम।

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प्रश्न 60.
अनन्त लम्बाई की आवेश रेखा पर आवेश का रेखीय घनत्व 4 माइक्रोकूलॉम/मीटर है। इस रेखा से 4 मीटर की दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता की गणना कीजिए।
हल :
दिया है, λ = 4 माइक्रोकूलॉम/मीटर = 4 x 10-6 कूलॉम/मीटर, r = 4 मीटर, E = ?
सूत्र \(E=\frac{\lambda}{2 \pi \varepsilon_{0} r}\) से, 4 मीटर की दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 94
= 1.8 x 104 न्यूटन/कूलॉम।

प्रश्न 61.
अनन्त लम्बाई की आवेश रेखा से 10 मीटर की दूरी पर 2.25 x 103 न्यूटन/कूलॉम का वैद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है। रेखीय आवेश घनत्व ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, E = 2.25 x 103 न्यूटन/कूलॉम, r = 10 मीटर, λ = ?
अत: रेखीय घनत्व 2 = 2πe0Er =\(\frac{1}{2 \times 9.0 \times 10^{9}}\) x 2.25 x 103 x 10
= 1.25 x 10-6 कूलॉम/मीटर = 1.25 माइक्रोकूलॉम/मीटर।

प्रश्न 62.
2.0 मीटर2 क्षेत्रफल वाली धातु की दो समतल प्लेटें परस्पर 5.0 सेमी की दूरी पर एक-दूसरे के समान्तर रखी गई हैं। उनके भीतरी पृष्ठों पर बराबर परन्तु विपरीत आवेश हैं। प्लेटों के बीच के स्थान में वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता 110 न्यूटन/कूलॉम है। प्लेटों पर आवेश की मात्रा ज्ञात कीजिए। दिया है, e0 = 8.85 x 1012 कूलॉम2/न्यूटन-मीटर2
हल :
दिया है, A = 2.0 मीटर2, d = 5.0 सेमी = 0.05 मीटर, E = 110 न्यूटन/कूलॉम, q= ?
सूत्र \(E=\frac{\sigma}{\varepsilon_{0}}\) से, आवेश का पृष्ठ घनत्व σ = e0E तथा सूत्र \(\sigma=\frac{q}{A}\) से, q = σA = e0EA
अतः प्रत्येक प्लेट पर आवेश q = 8.85 x 10-12 x 110 x 2.0 = 1.947 x 10-9 कूलॉम।

प्रश्न 63.
0.002 मिलीग्राम द्रव्यमान वाली तथा 6 इलेक्ट्रॉनों के आवेश से युक्त एक तेल की बूंद समरूप वैद्युत क्षेत्र में स्थिर लटकी रहती है। इस वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, m = 0.002 मिलीग्राम = 0:002 x 10-6 किलोग्राम, n = 6, E = ?
सन्तुलन की अवस्था में बूंद पर लगने वाला वैद्युत बल qE, बूंद के भार mg के बराबर होगा।
अतः qE = mg परन्तु q= ne ; अत: neE = mg
अत: वैद्यत क्षेत्र की तीवता \(E=\frac{m g}{n e}=\frac{0.002 \times 10^{-6} \times 9.8}{6 \times 1.6 \times 10^{-19}}=\frac{49}{24} \times 10^{10}\)
= 2.04 x 1010 न्यूटन/कलॉम।

प्रश्न 64.
500 न्यूटन/कूलॉम के वैद्युत क्षेत्र में 10-4 सेमी त्रिज्या की पानी की एक बूंद स्वतन्त्र रूप से वायु में लटकी है। पानी की बूंद के आवेश की गणना कीजिए। [2010]
हल :
दिया है, E=500 न्यूटन/कूलॉम, r=10-4 सेमी = 10-6 मीटर, ρ = 103 किग्रा/मीटर3 q = ?
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 95

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प्रश्न 65.
एक ऋणावेशित द्रव की बूंद जिसका द्रव्यमान 4.8 x 10-13 ग्राम है, दो क्षैतिज आवेशित प्लेटों के बीच सन्तुलन की अवस्था में लटकी है। यदि प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता 19.6 x 104 न्यूटन/कूलॉम है तो बूंद को आवेशित करने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, m= 4.8 x 10-13 किग्रा, g= 9.8 मीटर/सेकण्ड2
e= 1.6 x 10-19 कूलॉम, . E = 19.6 x 104 न्यूटन/कूलॉम, n = ?
माना इलेक्ट्रॉनों की अभीष्ट संख्या n है तब बूंद पर आवेश की मात्रा q = ne होगी।
सन्तुलन की दशा में, qE = mg अथवा neE = mg
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 96

प्रश्न 66.
तेल की एक बूंद जिस पर 12 आधिक्य इलेक्ट्रॉन हैं, 2.55 x 104 न्यूटन/कूलॉम के एकसमान वैद्युत क्षेत्र में स्थिर लटकी है। तेल का घनत्व 1.26 x 103 किग्रा/मीटर है। बूंद की त्रिज्या ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, बूंद पर आवेश (q) = ne = 12 x 1.6 x 10-19= 19.2 x 10-19 कूलॉम वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (E) = 2.55 x 104 न्यूटन/कूलॉम ।
तेल का घनत्व (ρ) = 1.26 x 103 किग्रा/मीटर3 ,बूंद की त्रिज्या (r) = ?
सन्तुलन की स्थिति में, mg = Eq
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 97

प्रश्न 67.
धातु की एक पतली गोलीय कोश की त्रिज्या 0.25 मीटर है तथा इस पर 0.2 μC आवेश है। इसके कारण एक बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए, जबकि (i) बिन्दु कोश के भीतर है, (ii) कोश के ठीक बाहर है तथा (iii) कोश के केन्द्र से 3.0 मीटर की दूरी पर है।
[2017]]
हल :
दिया है, q= 0.2μC = 0.2 x 10-6 कूलॉम तथा R= 0.25 मीटर
(i) आवेशित कोश के भीतर किसी भी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E = 0 (शून्य) है। ..
(ii) कोश के ठीक बाहर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 98

(iii) आवेशित कोश के बाहर, कोश के केन्द्र से दूरी r (> R) पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 99

प्रश्न 68.
r व R (R > r) त्रिज्याओं वाले दो संकेन्द्री खोखले गोलों पर आवेश Q इस प्रकार वितरित किया गया है कि इन गोलों पर आवेश का पृष्ठ घनत्व समान है। छोटे गोले की सतह पर वैद्युत क्षेत्र का मान ज्ञात कीजिए। [2007]
हल :
माना r व R त्रिज्याओं वाले संकेन्द्री खोखले गोलों पर आवेश क्रमशः q1 व q2 है।
अतः Q= q1 + q2 अथवा \(\frac{Q}{q_{1}}=1+\frac{q_{2}}{q_{1}}\) ……..(1)
चूँकि खोखले गोलों पर आवेश के पृष्ठ घनत्व σ1 व σ2 समान हैं; अत: \(\frac{q_{1}}{4 \pi r^{2}}=\frac{q_{2}}{4 \pi R^{2}}\)
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 100
चूँकि छोटा गोला बड़े गोले के भीतर स्थित है; अत: बड़े गोले के आवेश q2 के कारण छोटे गोले पर वैद्युत क्षेत्र E = 0; अतः छोटे गोले की सतह पर
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 101

वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के चार विकल्प दिए गए हैं। सही विकल्प का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
धन आवेशित वस्तु में होती है [2004]
(a) न्यूट्रॉनों की अधिकता
(b) इलेक्ट्रॉनों की अधिकता
(c) इलेक्ट्रॉनों की कमी
(d) प्रोटॉनों की कमी।
उतर :
(c) इलेक्ट्रॉनों की कमी

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प्रश्न 2.
दो समरूप धातु के गोलों को क्रमशः +q तथा -q आवेश दिए गए हैं तो [2004]
(a) दोनों गोलों के द्रव्यमान बराबर होंगे।
(b) धनावेशित गोले का द्रव्यमान ऋणावेशित गोले के द्रव्यमान से कम होगा
(c) ऋणावेशित गोले का द्रव्यमान धनावेशित गोले के द्रव्यमान से कम होगा
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।।
उतर :
(b) धनावेशित गोले का द्रव्यमान ऋणावेशित गोले के द्रव्यमान से कम होगा

प्रश्न 3.
1 कूलॉम आवेश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या है – [2014]
(a) 6.25 x 1017
(b) 6.25 x 1018
(c) 6.25 x 1019
(d) 1.6 x 1019
उतर :
(b) 6.25 x 1018

प्रश्न 4.
यदि +1μc तथा +4μC के दो आवेश एक-दूसरे से कुछ दूरी पर वायु में रखे हों तो उन पर लगने वाले बलों का अनुपात होगा – [2005, 14]
(a) 1 : 4
(b) 4:1
(c) 1:1
(d) 1:16
उतर :
(c) 1:1

प्रश्न 5.
किसी वैद्युतरोधी माध्यम का परावैद्युत नियतांक K हो सकता है [2006]
(a) शून्य
(b) 0.7
(c) -3
(d) 6.0
उतर :
(d) 6.0

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प्रश्न 6.
कुछ दूरी पर रखे दो बिन्दु आवेशों को वायु के स्थान पर केरोसिन तेल में रख दें तो उन बिन्दु आवेशों के बीच बल [2004]
(a) घटेगा
(b) बढ़ेगा
(c) समान रहेगा
(d) शून्य हो जाएगा।
उतर :
(a) घटेगा

प्रश्न 7.
वैद्युत शीलता का S.I. मात्रक है [2009]
(a) कूलॉम/न्यूटन-मीटर2
(b) न्यूटन-मीटर/कूलॉम2
(c) न्यूटन/कूलॉम.
(d) न्यूटन-वोल्ट-मीटर2
उतर :
(a) कूलॉम/न्यूटन-मीटर2

प्रश्न 8.
दो समान आवेशों व को जोड़ने वाली रेखा के मध्य-बिन्दु पर एक आवेशव रख दिया जाता है। तीनों आवेशों का यह निकाय सन्तुलन में होगा यदि –
[2011]
(a) -q/2
(b) -q/ 4
(c) +q/ 4
(d) +q/ 2.
उतर :
(b) -q/ 4

प्रश्न 9.
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक होता है [2004, 08, 13, 14, 16]
(a) न्यूटन/मीटर
(b) कूलॉम/न्यूटन
(c) न्यूटन/कूलॉम
(d) जूल/न्यूटन।
उतर :
(c) न्यूटन/कूलॉम

प्रश्न 10.
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक है – [2004, 08, 14]
(a) वोल्ट/मीटर
(b) वोल्ट/मीटर2
(c) वोल्ट-मीटर
(d) वोल्ट x मीटर2
उतर :
(a) वोल्ट/मीटर

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन-सा वैद्युत क्षेत्र का मात्रक नहीं है [2009, 14, 18]
(a) न्यूटन/कूलॉम
(b) वोल्ट/मीटर
(c) जूल/कूलॉम
(d) जूल/कूलॉम-मीटर।
उतर :
(c) जूल/कूलॉम

प्रश्न 12.
एक वैद्युत क्षेत्र विक्षेपित कर सकता है – [2007, 10] .
(a) एक्स-किरणों को
(b) न्यूट्रॉनों को
(c) ऐल्फा-कणों को
(d) गामा-किरणों को।
उतर :
(c) ऐल्फा-कणों को

प्रश्न 13.
एक-कण 15 x 104 न्यूटन/कूलॉम के वैद्युत क्षेत्र में स्थित है। उस पर लगने वाले बल का मान होगा- [2009]
(a) 4.8 x 10-14 न्यूटन
(b) 4.8 x 10-10 न्यूटन
(c) 8.4 x 10-14न्यूटन
(d) 8.4 x 10-10 न्यूटन।
उतर :
(a) 4.8 x 10-14 न्यूटन

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प्रश्न 14.
वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण एक वेक्टर होता है जिसकी दिशा होती है – [2003]
(a) उत्तर से दक्षिण की ओर
(b) दक्षिण से उत्तर की ओर
(c) धन से ऋण आवेश की ओर
(d) ऋण से धन आवेश की ओर।।
उतर :
(d) ऋण से धन आवेश की ओर।।

प्रश्न 15.
वैद्युत क्षेत्र \overrightarrow{\mathbf{E}} में \(\overrightarrow{\mathbf{p}}\) आघूर्ण वाले द्विध्रुव पर लगने वाला बल-आघूर्ण है – [2006, 07, 18]
(a) \(\overrightarrow{\mathrm{p}} \cdot \overrightarrow{\mathrm{E}}\)
(b) \(\overrightarrow{\mathrm{p}} \times \overrightarrow{\mathrm{E}}\)
(c) शून्य
(d)\( \overrightarrow{\mathrm{E}} \times \overrightarrow{\mathrm{p}}\)
उतर :
(b) \( \overrightarrow{\mathrm{p}} \times \overrightarrow{\mathrm{E}}\)

प्रश्न 16.
2.0 μC के दो बराबर तथा विपरीत आवेशों के बीच की दूरी 3.0 सेमी है। इसका वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण होगा – [2007, 18]
(a) 6.0 कूलॉम-मीटर
(b) 6.0 x 10-8 कूलॉम-मीटर
(c) 12.0 कूलॉम-मीटर
(d) 12.0 x 10-8 कूलॉम-मीटर।
उतर :
(b) 6.0 x 10-8 कूलॉम-मीटर

प्रश्न 17.
2 कूलॉम के दो बराबर व विपरीत आवेश परस्पर 0.04 मीटर की दूरी पर रखे गए हैं। निकाय का वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण होगा [2014]
(a) 6 x 10-8 कूलॉम-मीटर
(b) 8 x 10-2 कूलॉम-मीटर
(c) 1.5 x 102 कूलॉम-मीटर
(d) 810-6 कूलॉम-मीटर।
उतर :
(b) 8 x 10-2 कूलॉम-मीटर

प्रश्न 18.
किसी वैद्युत द्विध्रुव के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता सुदूर बिन्दुओं पर जिनकी दूरी है, अनुक्रमानुपाती है- [2003]
(a) 1/r के
(b) 1/r2 के
(c) 1/r3 के
(d) 1/r4 के।
उतर :
(c) 1/r3 के

प्रश्न 19.
दूरी r पर स्थित दो बिन्दु आवेश +q तथा -q के बीच बल है। यदि एक आवेश स्थिर हो तथा दूसरा उसके चारों ओर r त्रिज्या के एक वृत्त में चक्कर काटे तो कार्य होगा – [2013]
(a) Fr
(b) F . 2πr
(c) F/ 2πλ
(d) शून्य।
उतर :
(d) शून्य।

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प्रश्न 20.
निर्वात में वैद्युतशीलता का मात्रक है [2014, 15]]
(a) न्यूटन-मीटर2 कूलॉम-2
(b) ऐम्पियर-मीटर-1
(c) न्यूटन-कूलॉम-1
(d) कूलॉम2-न्यूटन-1-मीटर-2
उतर :
(d) कूलॉम2-न्यूटन-1-मीटर-2

प्रश्न 21.
8 कूलॉम ऋण आवेश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है – [2014, 15]
(a) 5 x 1019
(b) 2.5 x 1019
(c) 12.8 x 1019
(d) 1.6 x 1019
उतर :
(a) 5 x 1019

प्रश्न 22.
5 कूलॉम आवेश के दो बराबर तथा विपरीत आवेशों के बीच की दूरी 5.0 सेमी है। इसका वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण है [2014, 15]
(a) 25 x 10-2 कूलॉम-मीटर
(b) 5 x 10-2 कूलॉम-मीटर
(c) 1.0 कूलॉम-मीटर
(d) शून्य।
उतर :
(a) 25 x 10-2 कूलॉम-मीटर

प्रश्न 23.
वायु में रखे दो धनावेशों के मध्य परावैद्युत पदार्थ रख देने पर इनके बीच प्रतिकर्षण बल का मान [2015]
(a) बढ़ जाएगा
(b) घट जाएगा
(c) वही रहेगा
(d) शून्य हो जाएगा।
उतर :
(b) घट जाएगा

प्रश्न 24.
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक होता है [2015]
(a) न्यूटन/कूलॉम
(b) जूल-कूलॉम
(c) जूल/कूलॉम
(d) न्यूटन-कूलॉम।
उतर :
(a) न्यूटन/कूलॉम

प्रश्न 25.
एक निश्चित दूरी r पर स्थित दो समरूप धातु के गोलों पर आवेश+ 4q तथा- 2q हैं। गोलों के बीच आकर्षण बल F है। यदि दोनों गोलों को स्पर्श कराकर पुनः उसी दूरी पर रख दिया जाए तो उनके बीच बल होगा- [2015]
(a) F
(b) \(\frac{F}{2}\)
(c) \(\frac{F}{4}\)
(d) \(\frac{F}{8}\)
उतर :
(d) \(\frac{F}{8}\)

प्रश्न 26.
वैद्युत फ्लक्स का मात्रक है [2018]
(a) न्यूटन/कूलॉम
(b) वोल्ट-मीटर
(c) वोल्ट/मीटर
(d)
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 102
उतर :
(b) वोल्ट-मीटर

प्रश्न 27.
L भुजा वाले घन के केन्द्र पर + q कूलॉम का आवेश रखा है। घन के एक फलक से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स होगा-
[20037 ]
(a) q/ε0.
(b) q/6ε0L2
(c) q/6ε0
(d) 6 qL20
उतर :
(c) q/6ε0

प्रश्न 28.
एक वैद्युतरोधी स्टैण्ड पर रखे 10 सेमी त्रिज्या के चालक खोखले गोले की सतह पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता 10 न्यूटन/कूलॉम है।गोले के केन्द्र पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता है [2007]
(a) शून्य
(b) 10 न्यूटन/कूलॉम
(c) 1 न्यूटन/कूलॉम
(d) 100 न्यूटन/कूलॉम।
उतर :
(a) शून्य

प्रश्न 29.
r मीटर त्रिज्या वाले खोखले गोले के केन्द्र पर कूलॉम का आवेश रखा है। यदि गोले की त्रिज्या दोगुनी कर दी जाए तथा आवेश आधा कर दिया जाए तो गोले के पृष्ठ पर कुल वैद्युत फ्लक्स होगा [2012]
(a) 4q/ε0
(b) 2q/ε0
(c) q/ 2ε0
(d) q/ε0
उतर :
(c) q/ 2ε0

प्रश्न 30.
एक आवेशित गोलीय चालक में वैद्युत क्षेत्र – [2007]
(a) गोले के भीतर शून्य होता है तथा गोले के बाहर भी शून्य होता है
(b) गोले के भीतर शून्य होता है तथा गोले के बाहर दूरी बढ़ने के साथ कम होता जाता है
(c) गोले के भीतर शून्य होता है तथा गोले के बाहर दूरी के वर्ग के साथ कम होता जाता है
(d) गोले के भीतर अधिकतम होता है तथा गोले के बाहर शून्य होता है।
उतर :
(c) गोले के भीतर शून्य होता है तथा गोले के बाहर दूरी के वर्ग के साथ कम होता जाता है

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प्रश्न 31.
2 सेमी त्रिज्या के गोले पर 2 μC का आवेश है,जबकि 5 सेमी त्रिज्या के गोले पर 5 μC का आवेश है।गोलों के केन्द्रों से 10 सेमी की दूरी पर वैद्युत क्षेत्रों का अनुपात होगा – [2006]
(a) 1:1
(b) 2:5
(c) 5:2
(d) 4 : 25.
उतर :
(a) 1:1

प्रश्न 32.
R1 व R2 त्रिज्याओं के दो चालकों के पृष्ठों पर आवेशों के पृष्ठ घनत्व बराबर हैं। पृष्ठों पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रताओं का अनुपात है – [2011]
(a) R_{1}^{2}: R_{2}^{2}
(b) R_{2}^{2}: R_{1}^{2}
(c) R_{1}: R_{2}
(d) 1 : 1.
उतर :
(d) 1 : 1.

प्रश्न 33.
दो प्लेटें जिनमें प्रत्येक का क्षेत्रफल A है, d छोटी दूरी पर एक-दूसरे के समान्तर रखी हैं। उन पर क्रमशः +Q तथा -Q का आवेश है। प्लेटों के बीच के स्थान में वैद्युत क्षेत्र होगा [2008]]
(a) Q/ε0A .
(b) dA/Qd
(c) ε0Q/Ad
(d) Q/2 ε0A.
उतर :
(a) Q/e0A .

प्रश्न 34.
दिए गए चित्र में XY एक अनन्त रेखीय आवेश वितरण है। बिन्दु P तथा Q चित्र में दिखाया गया है। बिन्दु P तथा Q पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रताओं का अनुपात है – [2018]
MP Board Class 12th Physics Important Questions Chapter 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र 103
(a) 1 : 1
(b) 1 : 2
(c) 2 : 1
(d) 1 : 4.
उतर :
(a) 1 : 1

प्रश्न 35.
एक बन्द पृष्ठ के भीतर n वैद्युत द्विध्रुव स्थित हैं। बन्द पृष्ठ से निर्गत कुल वैद्युत फ्लक्स होगा – [2012]
(a) q/ε0
(b) 2q/ ε0
(c) nq/ε0
(d) शून्य।
उतर :
(d) शून्य।

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MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति

MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति

विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति NCERT पाठ्यपुस्तक के अध्याय में पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
30 किलोवोल्ट इलेक्ट्रॉनों के द्वारा उत्पन्न x-किरणों की
(a) उच्चतम आवृत्ति तथा
(b) निम्नतम तरंगदैर्घ्य प्राप्त कीजिए।
हल
दिया है, V = 30 किलोवोल्ट = 30 × 103 वोल्ट
∴ इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा E = eV
x-किरण उत्पादन में लक्ष्य से टकराने वाले इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा x-किरण फोटॉनों की ऊर्जा में बदल जाती है।

(a) यदि किसी फोटॉन की आवृत्ति ν है तो
फोटॉन की ऊर्जा E = hν
∴ ν = \(\frac { E }{ h }\)
स्पष्ट है कि यदि इलेक्ट्रॉन की सम्पूर्ण ऊर्जा एक x-किरण फोटॉन के रूप में विकिरित हो तो फोटॉन की आवृत्ति . महत्तम होगी।
∴ \(v_{\max }=\frac{e V}{h}=\frac{1.6 \times 10^{-19} \times 30 \times 10^{3}}{6.62 \times 10^{-34}}\)
⇒ νmax. = 7.24 × 1018 हर्ट्स।

(b) ∵ X-किरणें प्रकाश के वेग से चलती हैं,
अतः c = νλ
⇒ λ = \(\frac { c }{ ν }\)
∴ λmin = \(\frac{c}{\nu \max }\)
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 1
= 0.0414 नैनोमीटर।

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प्रश्न 2.
सीज़ियम धातु का कार्य-फलन 2.14 इलेक्ट्रॉन वोल्ट है। जब 6 × 1014 हर्ट्स आवृत्ति का प्रकाश धातु-पृष्ठ पर आपतित होता है, इलेक्ट्रॉनों का प्रकाशिक उत्सर्जन होता है।
(a) उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा,
(b) निरोधी विभव और
(c) उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम चाल कितनी है?
हल
दिया है, कार्य-फलन W या Φo= 2.14 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट = 2.14 × 1.6 × 10-19 जूल,
आपतित प्रकाश की आवृत्ति ν = 6 × 1014 हर्ट्स,
h = 6.6 × 10-34 जूल-सेकण्ड

(a) आइन्स्टीन के सूत्र से,
उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की महत्तम गतिज ऊर्जा
Emax = hν – W
= 6.6 × 10-34 × 6 x 1014 – 2.14 × 1.6 × 10-19
= 39.6 × 10-20 जूल – 34.2 × 10-20 जूल
= 5.4 × 10-20 जूल
= \(\frac{5.4 \times 10^{-20}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 0.34 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

(b) यदि निरोधी विभव V0 है तो
eVo = Emax (जूल में)
निरोधी विभव V0 = \(\frac{E_{\max }}{e}\)
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 2

(c) यदि इलेक्ट्रॉनों की महत्तम चाल υ max है तो
\(E_{\max }=\frac{1}{2} m v_{\max }^{2}\)

MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 3
∴ इलेक्ट्रॉनों की महत्तम चाल
\(v_{\max }=\sqrt{\frac{2 \times 5.4 \times 10^{-20}}{9.1 \times 10^{-31}}}\) (∵ m= इलेक्ट्रॉनों का द्रव्यमान)
= 3.44 × 105 मीटर/सेकण्ड।

प्रश्न 3.
एक विशिष्ट प्रयोग में प्रकाश-विद्युत प्रभाव की अन्तक वोल्टता 1.5 वोल्ट है। उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा कितनी है?
हल
दिया है, अन्तक वोल्टता Vo = 1.5 वोल्ट
∴ इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा
Emax = eVo
= 1.6 × 10-19 × 1.5 जूल
= 2.4 × 10-19 जूल
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 4
= 1.5 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

प्रश्न 4.
632.8 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य का एकवर्णी प्रकाश एक हीलियम-नियॉन लेसर के द्वारा उत्पन्न किया जाता है। उत्सर्जित शक्ति 9.42 मिलीवाट है।
(a) प्रकाश के किरण पुंज में प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा तथा संवेग प्राप्त कीजिए।
(b) इस किरण पुंज के द्वारा विकिरित किसी लक्ष्य पर औसतन कितने फोटॉन प्रति सेकण्ड पहुँचेंगे? (यह मान लीजिए कि किरण पुंज की अनुप्रस्थ काट एकसमान है जो लक्ष्य के क्षेत्रफल से कम है) तथा
(c) एक हाइड्रोजन परमाणु को फोटॉन के बराबर संवेग प्राप्त करने के लिए कितनी तेज चाल से चलना होगा?
हल
दिया है, उत्सर्जित शक्ति P= 9.42 मिलीवाट = 9.42 × 10-3 वाट
फोटॉन की तरंगदैर्घ्य λ = 632.8 नैनोमीटर = 632.8 × 10-9 मीटर

(a) प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा E = \(\frac { hc }{ λ }\)
=\(\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{632.8 \times 10^{-9}}\) जूल
= 3.14 × 10-19 जूल।
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 5
= 1.05 × 10-27 किग्रा-मीटर/सेकण्ड।

(b) माना लक्ष्य पर प्रति सेकण्ड n फोटॉन पहुँचते हैं, तब
n × एक फोटॉन की ऊर्जा = उत्सर्जित शक्ति

MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 6
\(=\frac{9.42 \times 10^{-3}}{3.14 \times 10^{-19}}=3 \times 10^{16}\)

(c) हाइड्रोजन परमाणु का द्रव्यमान
m= 1.67 × 10-27 किग्रा
माना इसकी चाल υ है, तब हाइड्रोजन परमाणु का संवेग
mυ = 1.05 × 10-27
⇒चाल υ = \(\frac{1.05 \times 10^{-27}}{1.67 \times 10^{-27}}\)
= 0.63 मीटर/सेकण्ड।

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प्रश्न 5. पृथ्वी के पृष्ठ पर पहुँचने वाला सूर्य-प्रकाश का ऊर्जा-अभिवाह (फ्लक्स) 1.388 × 103 वाट/मीटर है। लगभग कितने फोटॉन प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकण्ड पृथ्वी पर आपतित होते हैं? यह मान लें कि सूर्य-प्रकाश में फोटॉन का औसत तरंगदैर्घ्य 550 नैनोमीटर है।
हल
दिया है, सूर्य-प्रकाश में फोटॉन का तरंगदैर्घ्य
λ = 550 नैनोमीटर = 550 × 10-9 मीटर
प्रति मीटर2 क्षेत्रफल पर ऊर्जा आपतन दर
Φ = 1.388 × 103 वाट/मीटर2
प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा E= \(\frac { hc }{ λ }\)
= \(\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{550 \times 10^{-9}}\)
= 3.6 × 10-19 जूल।
माना प्रति मीटर2 क्षेत्रफल पर n फोटॉन प्रति सेकण्ड गिरते हैं, तब
ऊर्जा फ्लक्स Φ = n × एक फोटॉन की ऊर्जा (E)
∴ \(n=\frac{\phi}{E}=\frac{1.388 \times 10^{3}}{3.6 \times 10^{-19}}\)
= 3.85 × 1021
≈ 4 × 1021.

प्रश्न 6.
प्रकाश-विद्युत प्रभाव के एक प्रयोग में, प्रकाश आवृत्ति के विरुद्ध अन्तक वोल्टता की ढलान 4.12 × 10-15 वोल्ट-सेकण्ड प्राप्त होती है। प्लांक स्थिरांक का मान परिकलित कीजिए।
हल
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 7
∴आइन्स्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण से,
\(e V_{0}=h\left(v-v_{0}\right) \quad \Rightarrow \quad V_{0}=\frac{h}{e}\left(v-v_{0}\right)\)
अतः अन्तक वोल्टता-आवृत्ति वक्र का ढाल m = \(\frac { h}{ e }\)
परन्तु दिया है, m = 4.12 × 10-15 वोल्ट-सेकण्ड
अत: \(\frac { h}{ e }\) = 4.12 × 10-15 वोल्ट-सेकण्ड
∴ प्लांक नियतांक h = e × 4.12 × 10-15
=1.6 × 10-19 × (4.12 × 10-15)
h = 6.59 × 10-34 जूल-सेकण्ड।

प्रश्न 7.
एक 100 वाट सोडियम बल्ब (लैम्प) सभी दिशाओं में एकसमान ऊर्जा विकिरित करता है। लैम्प को एक ऐसे बड़े गोले के केन्द्र पर रखा गया है जो इस पर आपतित सोडियम के सम्पूर्ण प्रकाश को अवशोषित करता है। सोडियम प्रकाश का तरंगदैर्घ्य 589 नैनोमीटर है।
(a) सोडियम प्रकाश से जुड़े प्रति फोटॉन की ऊर्जा कितनी है?
(b) गोले को किस दर से फोटॉन प्रदान किए जा रहे हैं?
हल
दिया है, λ = 589 × 10-9 मीटर, बल्ब की विकिरित शक्ति P = 100 वाट
(a) प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा E = \(\frac { hc }{ λ }\)
\(=\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{589 \times 10^{-9}}\) जूल
= 3. 38 × 10-19 जूल।
अथवा E = \(\frac{3.38 \times 10^{-19}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।
= 2.1 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

(b) माना गोले को फोटॉन प्रदान करने की दर n प्रति सेकण्ड है।
तब n x एक फोटॉन की ऊर्जा = बल्ब की विकिरित शक्ति

MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 8
= \(\frac{100}{3.38 \times 10^{-19}}\)
= 3 × 1020 फोटॉन/सेकण्ड।

प्रश्न 8.
किसी धातु की देहली आवृत्ति 3.3 × 1014 हर्ट्स है। यदि 8.2 × 1014 हर्ट्स आवृत्ति का प्रकाश धातु . पर आपतित हो तो प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के लिए अन्तक वोल्टता ज्ञात कीजिए।
हल
दिया है, देहली आवृत्ति ν = 3.3 × 1014 हर्ट्स,
आपतित प्रकाश की आवृत्ति ν = 8.2 × 1014 हर्ट्स,
अन्तक वोल्टता Vo = ?
उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की महत्तम गतिज ऊर्जा
Emax = h (ν – νo) = 6.62 × 10-34 (8.2 × 1014 – 3.3 × 1014)
= 32.44 × 10-20 जूल
सूत्र eVo = Emax से,
अन्तक वोल्टता V0 = \(\frac{E_{\max }}{e}=\frac{32.44 \times 10^{-20}}{1.6 \times 10^{-19}}\)
= 2.0 वोल्ट।

प्रश्न 9.
किसी धातु के लिए कार्य-फलन 4.2 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट है। क्या यह धातु 330 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य के आपतित विकिरण के लिए प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन देगा?
उत्तर
दिया है : कार्य-फलन W = 4.2 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट = 4.2 × 1.6 × 10-19 जूल
आपतित तरंगदैर्घ्य λ = 330 नैनोमीटर
सूत्र w = \(\frac{h c}{\lambda_{0}}\) से
देहली तरंगदैर्घ्य λ0 = \(\frac{h c}{W}=\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{4.2 \times 1.6 \times 10^{-19}}\)
= 2.95 × 10-7 मीटर
λ0 = 295 × 10-9 मीटर = 295 नैनोमीटर
∵ λ = 330 नैनोमीटर > λ0 = 295 नैनोमीटर
अत: λ = 330 नैनोमीटर के विकिरण के लिए प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन नहीं होगा।

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प्रश्न 10.
7.21 × 1014 हर्ट्स आवृत्ति का प्रकाश एक धातु-पृष्ठ पर आपतित है। इस पृष्ठ से 6.0 × 105 मीटर/सेकण्ड की उच्चतम गति से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो रहे हैं। इलेक्ट्रॉनों के प्रकाश उत्सर्जन के लिए देहली आवृत्ति क्या है?
हल
आपतित प्रकाश की आवृत्ति ν = 7.21 × 1014 हर्ट्स
इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम चाल υmax = 6.0 × 105 मीटर/सेकण्ड
इलेक्ट्रॉनों का द्रव्यमान m = 9.1 × 10-31 किग्रा
∴ इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा
\(E_{\max }=\frac{1}{2} m v_{\max }^{2}=\frac{1}{2} \times 9.1 \times 10^{-31} \times\left(6.0 \times 10^{5}\right)^{2}\)
= 1.64 × 10-19 जूल
आपतित फोटॉन की ऊर्जा hν = 6.62 × 10-34 × 7.21 × 1014
= 4.77 × 10-19 जूल।
Emax = hν – hνo से,
o = hν – Emax
∴ देहली आवृत्ति ν0 = \(\frac{E_{\max }-h v}{h}=\frac{(4.77-1.64) \times 10^{-19}}{6.62 \times 10^{-34}}\)
= 4.7 × 1014 हर्ट्स।

प्रश्न 11.
488 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य का प्रकाश एक आर्गन लेसर से उत्पन्न किया जाता है, जिसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव के उपयोग में लाया जाता है। जब इस स्पेक्ट्रमी रेखा के प्रकाश को उत्सर्जक पर आपतित किया जाता है, तब प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों का निरोधी (अन्तक) विभव 0.38 वोल्ट है। उत्सर्जक के पदार्थ का कार्य-फलन ज्ञात कीजिए।
हल
दिया है, आपतित तरंगदैर्घ्य λ = 488 × 10-9 मीटर
अन्तक विभव Vo = 0.38 वोल्ट, W = ?
फोटॉन की ऊर्जा. E = \(\frac { hc }{ λ }\) = \(\frac{6.6 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{488 \times 10^{-9}}\) = 4.07 × 10-9 जूल
जबकि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की महत्तम गतिज ऊर्जा
Emax = eVo = 1.6 × 10-19 × 0.38
= 0.608 × 10-19 जूल
∴Emax = hν – Φ0 से,
कार्य-फलन W = hν – Emax
= 4.07 × 10-19 – 0.608 × 10-19
= 3.46 × 10-19 जूल।
अथवा W = \(\frac{3.46 \times 10^{-19}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 2.16 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

प्रश्न 12.
56 वोल्ट विभवान्तर के द्वारा त्वरित इलेक्ट्रॉनों का
(a) संवेग और
(b) दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य परिकलित कीजिए।
हल
दिया है, त्वरक विभव V = 56 वोल्ट, इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान m = 9.1 × 10-31 किग्रा,
e= 1.6 × 10-19 कूलॉम
(a) ∴ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा = \(\frac { 1 }{ 2 }\)mv2 = eV
⇒ \(v=\sqrt{\frac{2 e V}{m}}=\sqrt{\frac{2 \times 1.6 \times 10^{-19} \times 56}{9.1 \times 10^{-31}}}\)
= 4.44 × 106 मीटर/सेकण्ड
∴ इलेक्ट्रॉनों का संवेग p = mυ
= 9.1 × 10-31 × 4.44 × 106
= 4.04 × 10-24 किग्रा-मीटर/सेकण्ड।

(b) इलेक्ट्रॉन से सम्बद्ध दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य
\(\lambda=\frac{12.27}{\sqrt{V}} \mathrm{A}=\frac{12.27}{\sqrt{56}} \mathrm{A}=1.64 \mathrm{A}\)
⇒ λ = 1.64 × 10-10 मीटर
= 0.164 × 10-9 मीटर
= 0.164 नैनोमीटर।
अथवा λ = \(\frac { h}{ p }\) = \(\frac{6.62 \times 10^{-34}}{4.04 \times 10^{-24}}\) मीटर
= 0.164 × 10-9 मीटर
= 0.164 नैनोमीटर।

प्रश्न 13.
एक इलेक्ट्रॉन जिसकी गतिज ऊर्जा 120 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट है, उसका
(a) संवेग,
(b) चाल और
(c) दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य क्या है?
हल
दिया है,
इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E = 120 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
(a) ∵ \(E=\frac{1}{2} m v^{2}=\frac{m^{2} v^{2}}{2 m}=\frac{p^{2}}{2 m}\)
∴ इलेक्ट्रॉन का संवेग p= \(\sqrt{2 m E}\)
= \(\left(2 \times 9.1 \times 10^{-31} \times 120 \times 1.6 \times 10^{-19}\right)^{1 / 2}\)
= 5.91 × 10-24 किग्रा-मीटर/सेकण्ड।

(b) p= mυ से,
इलेक्ट्रॉन की चाल υ =\(\frac{p}{m}=\frac{5.91 \times 10^{-24}}{9.1 \times 10^{-31}}\)
= 6.5 × 106 मीटर/सेकण्ड

(c) इलेक्ट्रॉन से सम्बद्ध दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य
λ = \(\frac { h}{ p }\) = \(\frac{6.62 \times 10^{-34}}{5.91 \times 10^{-24}}\)= 0.112 × 10-9 मीटर
= 0.112 नैनोमीटर।

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प्रश्न 14.
सोडियम के स्पेक्ट्रमी उत्सर्जन रेखा के प्रकाश का तरंगदैर्घ्य 589 नैनोमीटर है। वह गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए जिस पर
(a) एक इलेक्ट्रॉन और
(b) एक न्यूट्रॉन का दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य समान होगा।
हल
दिया है, λ = 589 नैनोमीटर = 589 × 10-9 मीटर, me = 9.1 × 10-31 किग्रा,
mn = 1.67 × 10-27 किग्रा
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(a) माना इलेक्ट्रॉन की अभीष्ट ऊर्जा E1 है, तब
इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E1 = \(\frac{\left(6.62 \times 10^{-34}\right)^{2}}{2 \times 9.1 \times 10^{-31} \times\left(589 \times 10^{-9}\right)^{2}}\) = 6.94 x 10-25 जूल।
= \(\frac{6.94 \times 10^{-25}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट = 4.34 × 10-6 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

(b) खण्ड (a) की भाँति, न्यूट्रॉन की ऊर्जा
\(E_{2}=\frac{h^{2}}{2 m_{n} \lambda^{2}}=\frac{\left(6.62 \times 10^{-34}\right)^{2}}{2 \times 1.67 \times 10^{-27} \times\left(589 \times 10^{-9}\right)^{2}}\)
= 3.782 × 10-28 जूल।
= \(\frac{3.782 \times 10^{-28}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट = 2.36 x 10-9 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

प्रश्न 15.
(a) एक 0.040 किग्रा द्रव्यमान का बुलेट जो 1.0 किमी/सेकण्ड की चाल से चल रहा है,
(b) एक 0.060 किग्रा द्रव्यमान की गेंद जो 1.0 मीटर/सेकण्ड की चाल से चल रही है और
(c) एक धूल-कण जिसका द्रव्यमान 1.0 × 10-9 किग्रा और जो 2.2 मीटर/सेकण्ड की चाल से अनुगमित हो रहा है, का दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य कितना होगा?
हल
(a) दिया है, m = 0.040 किग्रा, υ = 1.0 किमी/सेकण्ड = 1000 मीटर/सेकण्ड
∴ दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य \(\lambda=\frac{h}{m v}=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{0.040 \times 1000}\)
= 1.655 × 10-35 मीटर
≈ 1.7 × 10-35 मीटर।

(b) दिया है : m = 0.060 किग्रा, υ = 1.0 मीटर/सेकण्ड-1
∴ दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य \(\lambda=\frac{h}{m v}=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{0.060 \times 1.0}\)
= 1.1 × 10-32 मीटर।

(c) दिया है, m = 1.0 x 10-9 किग्रा, υ = 2.2 मीटर/सेकण्ड
∴ दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य \(\lambda=\frac{h}{m v}=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{1.0 \times 10^{-9} \times 2.2}\)
= 3.01 × 10-25 मीटर।।

प्रश्न 16.
एक इलेक्ट्रॉन और एक फोटॉन प्रत्येक का तरंगदैर्घ्य 1.00 नैनोमीटर है।
(a) इनका संवेग,
(b) फोटॉन की ऊर्जा और
(c) इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
हल
यहाँ λ = 1.00 नैनोमीटर = 1.0 × 10-9 मीटर, h = 6.62 × 10-34 जूल-सेकण्ड,
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान m = 9.1 × 10-31 किग्रा

(a) सूत्र λ = \(\frac { h}{ p }\) = से, p = \(\frac { h }{ λ }\)
∴ प्रत्येक का संवेग \(p=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{1.0 \times 10^{-9}}\)
= 6.62 × 10-25 किग्रा-मीटर/सेकण्ड।

(b) फोटॉन की ऊर्जा E = \(\frac { hc }{ λ }\) = pc .
= 6.62 × 10-25 × 3 × 108
= 19.86 × 10-17 जूल।
अथवा \(E=\frac{19.86 \times 10^{-17}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 1.24 × 103 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

(c) इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा \(E=\frac{p^{2}}{2 m}=\frac{\left(6.62 \times 10^{-25}\right)^{2}}{2 \times 9.1 \times 10^{-31}}\)
= 2.41 × 10-19 जूल।
अथवा \(E=\frac{2.41 \times 10^{-19}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 1.51 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

प्रश्न 17.
(a) न्यूट्रॉन की किस गतिज ऊर्जा के लिए दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य 1.40 × 10-10 मीटर होगा?
(b) एक न्यूट्रॉन, जो पदार्थ के साथ तापीय साम्य में है और जिसकी 300 K पर औसत गतिज ऊर्जा – kT है, का भी दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए।
हल
(a) दिया है, न्यूट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य 2 = 1.40 × 10-10 मीटर .
न्यूट्रॉन का द्रव्यमान m = 1.67 × 10-27 किग्रा
अब न्यटॉन की गतिज ऊर्जा E = \(\frac{p^{2}}{2 m}=\frac{h^{2}}{2 m \lambda^{2}}\) (∵p = \(\frac { h }{ λ }\))
\(=\frac{\left(6.62 \times 10^{-34}\right)^{2}}{2 \times 1.67 \times 10^{-27} \times\left(1.40 \times 10^{-10}\right)^{2}}\)
= 6.69 × 10-21 जूल।
अथवा \(E=\frac{6.69 \times 10^{-21}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 4.18 × 10-2 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

(b) दिया है, T = 300 K, k = 1.38 × 10-23 जूल-K-1
∴ न्यूट्रॉन की गतिज ऊर्जा E = \(\frac{3}{2} k T=\frac{3}{2} \times 1.38 \times 10^{-23} \times 300\)
= 6.21 × 10-21 जूल
∵ E = \(\frac{h^{2}}{2 m \lambda^{2}}\) ∴ λ = \(\frac{h}{\sqrt{2 m E}}\)
∴ दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य = \(\lambda=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{\sqrt{2 \times 1.67 \times 10^{-27} \times 6.21 \times 10^{-21}}}=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{4.55 \times 10^{-24}}\)
= 1.45 × 10-10 मीटर = 0.145 नैनोमीटर।

प्रश्न 18.
यह दर्शाइए कि विद्युतचुम्बकीय विकिरण का तरंगदैर्घ्य इसके क्वाण्टम (फोटॉन) के तरंगदैर्ध्य के बराबर है।
उत्तर
माना किसी विद्युतचुम्बकीय विकिरण की तरंगदैर्घ्य 2 तथा आवृत्ति । है।
तब λ = \(\frac { c }{ v }\) (∵ c = vλ)
इस विकिरण के फोटॉन का गतिज द्रव्यमान
m = \(\frac { h }{ cλ }\)
∴ फोटॉन का संवेग p = mc (∵ फोटॉन का वेग = c)
\(=\frac{h}{c \lambda} \times c=\frac{h}{\lambda}\)
∴ फोटॉन का दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य
\(\lambda^{\prime}=\frac{h}{p}=\frac{h}{h / \lambda} \quad \Rightarrow \quad \lambda^{\prime}=\lambda\)
अतः फोटॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य = विकिरण की तरंगदैर्घ्य।

प्रश्न 19.
वायु में 300 K ताप पर एक नाइट्रोजन अणु का दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य कितना होगा? यह मानें कि अणु इस ताप पर अणुओं के वर्ग-माध्य चाल से गतिमान है। ( नाइट्रोजन का परमाणु द्रव्यमान = 14.0076 u)
हल
दिया है, T= 300 K, , k = 1.38 × 10-23 जूल-K-1
नाइट्रोजन के 1 अणु का द्रव्यमान m = 2 × 14.0076 u
= 2 × 14.0076 × 1.67 × 10-27 किग्रा
= 46.78 × 10-27 किग्रा [∵ 1u = 1.67 × 10-27 किग्रा]
यदि अणु की वर्ग-माध्य-मूल चाल υ है तो
1 अणु की गतिज ऊर्जा \(\frac{1}{2} m v^{2}=\frac{3}{2} k T \Rightarrow v=\sqrt{\frac{3 k T}{m}}\)
∴ अणु की चाल \(v=\sqrt{\frac{3 \times 1.38 \times 10^{-23} \times 300}{46.78 \times 10^{-27}}}\)
= 515 मीटर/सेकण्ड।
∴ नाइट्रोजन अणु का दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य \(\lambda=\frac{h}{m v}=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{46.78 \times 10^{-27} \times 515}\)
= 2.75 × 10-11 मीटर
= 0.028 नैनोमीटर।

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प्रश्न 20.
(a) एक निर्वात नली के तापित कैथोड से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की उस चाल का आकलन कीजिए, जिससे वे उत्सर्जक की तुलना में 500 वोल्ट के विभवान्तर पर रखे गए ऐनोड से टकराते हैं। इलेक्ट्रॉनों के लघु प्रारम्भिक चालों की उपेक्षा कर दें। इलेक्ट्रॉन का आपेक्षिक आवेश अर्थात् \(\frac { e }{ m }\) = 1.76 x 1011 कूलॉम/किग्रा है।
(b) संग्राहक विभव 10 मेगावोल्ट के लिए इलेक्ट्रॉनों की चाल ज्ञात करने के लिए उसी सूत्र का प्रयोग करें, जो (a) में काम में लाया गया है। क्या आप इस सूत्र को गलत पाते हैं? इस सूत्र को किस प्रकार सुधारा जा सकता है?
हल
(a) त्वरक विभव V= 500 वोल्ट
इलेक्ट्रॉन का आपेक्षिक आवेश \(\frac { e }{ m }\) = 1.76 x 1011 कूलॉम/किग्रा
माना ऐनोड से टकराते समय इलेक्ट्रॉनों का वेग υ है, तब
इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा में वृद्धि

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= 13.26 × 106 मीटर/सेकण्ड
∴ इलेक्ट्रॉनों की चाल υ ≈ 1.33 × 107 मीटर/सेकण्ड।

(b) पुन: इलेक्ट्रॉन की चाल υ = \(=\sqrt{2 \times \frac{e}{m} \times V}\) [∵V= 10 मेगावोल्ट = 10 x 106 V]
=\(\sqrt{2 \times 1.76 \times 10^{11} \times 10 \times 10^{6}}\)
= 18.76 × 108 मीटर/सेकण्ड।
∵ इलेक्ट्रॉन की यह चाल निर्वात में प्रकाश की चाल c= 3 × 108 मीटर/सेकण्ड से अधिक है तथा हम जानते हैं कि कोई द्रव्य कण निर्वात में प्रकाश के वेग के बराबर अथवा अधिक चाल से नहीं चल सकता।
इससे स्पष्ट है कि इस दशा में उक्त सूत्र \(\left(\mathrm{K.E}=\frac{1}{2} m v^{2}\right)\) सही नहीं हो सकता।
इस दशा में इलेक्ट्रॉन की सही चाल ज्ञात करने के लिए सापेक्षता के विशिष्ट सिद्धान्त का उपयोग करना होगा।
इस सिद्धान्त के अनुसार यदि कोई द्रव्य कण प्रकाश के वेग के तुलनीय वेग से गति करता है तो उसका गतिज द्रव्यमान निम्नलिखित होगा
\(m=\frac{m_{0}}{\sqrt{\left(1-\frac{v^{2}}{c^{2}}\right)}}\)
तब कण की गतिज ऊर्जा में वृद्धि निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्राप्त होगी
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 11
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 12
∴ इलेक्ट्रॉन की चाल υ = 0.9988 × c
= 0.9988 × 3 × 108
= 2.99 × 108 मीटर/सेकण्ड।

प्रश्न 21.
(a) एक समोर्जी इलेक्ट्रॉन किरण-पुंज जिसमें इलेक्ट्रॉन की चाल 5.20 × 106 मीटर/सेकण्ड है, पर एक चुम्बकीय क्षेत्र 1.30 × 10-4 टेस्ला किरण-पुंज की चाल के लम्बवत् लगाया जाता है। किरण-पुंज द्वारा आरेखित वृत्त की त्रिज्या कितनी होगी, यदि इलेक्ट्रॉन के \(\frac { e }{ m }\) का मान 1.76 × 1011 कूलॉम/किग्रा है।
(b) क्या जिस सूत्र को (a) में उपयोग में लाया गया है वह यहाँ भी एक 20 मिलियन इलेक्ट्रॉन-वोल्ट इलेक्ट्रॉन किरण-पुंज की त्रिज्या परिकलित करने के लिए युक्तिपरक है? यदि नहीं, तो किस प्रकार इसमें संशोधन किया जा सकता है?
[नोट : प्रश्न 20 (b) तथा 21 (b) आपको आपेक्षिकीय यान्त्रिकी तक ले जाते हैं जो पुस्तक के विषय के बाहर है। यहाँ पर इन्हें इस बिन्दु पर बल देने के लिए सम्मिलित किया गया है कि जिन सूत्रों को आप (a) में उपयोग में लाते हैं वे बहुत उच्च चालों अथवा ऊर्जाओं पर युक्तिपरक नहीं होते। यह जानने के लिए कि ‘बहुत उच्च चाल अथवा ऊर्जा’ का क्या अर्थ है? अन्त में दिए गए उत्तरों को देखें।]
हल
(a) दिया है, इलेक्ट्रॉन के लिए \(\frac{e}{m_{0}}\) = 1.76 x 1011 कूलॉम/किग्रा
B= 1.30 × 10-4 टेस्ला υ = 5.20 × 106 मीटर/सेकण्ड
यदि इलेक्ट्रॉन के पथ की त्रिज्या r है तो ।
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 13
अथवा r= 22.7 सेमी।

(b) यहाँ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा \(\frac { 1 }{ 2 }\)mυ2 = 20 मिलियन इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 14
इलेक्ट्रॉन की चाल v = 2.65 × 109 मीटर/सेकण्ड
∵ इलेक्ट्रॉन की चाल निर्वात में प्रकाश की चाल से अधिक है। अत: पथ की त्रिज्या का परिकलन करने के लिए सामान्य सूत्र का प्रयोग नहीं किया जा सकता अपितु आपेक्षिकीय यान्त्रिकी का प्रयोग करना होगा।
अतः त्रिज्या के सूत्र \(r=\frac{m_{0} v}{e B}\) में m के स्थान पर इलेक्ट्रॉन का गतिज द्रव्यमान रखना होगा।
यहाँ इलेक्ट्रॉन गतिज द्रव्यमान \(m=\frac{m_{0}}{\sqrt{\left(1-v^{2} / c^{2}\right)}}\)
∴ \(r=\frac{m_{0}}{\sqrt{\left(1-v^{2} / c^{2}\right)}} \times \frac{v}{e B}=\frac{1}{\sqrt{\left(1-v^{2} / c^{2}\right)}}\left(\frac{m_{0}}{e} \times \frac{v}{B}\right)\)
उक्त सूत्र से पथ की त्रिज्या की गणना की जा सकती है।

प्रश्न 22.
एक इलेक्ट्रॉन गन जिसका संग्राहक 100 वोल्ट विभव पर है, एक कम दाब (~10-2 मिमी Hg) पर हाइड्रोजन से भरे गोलाकार बल्ब में इलेक्ट्रॉन छोड़ती है। एक चुम्बकीय क्षेत्र जिसका मान 2.83 × 10-4 टेस्ला है, इलेक्ट्रॉन के मार्ग को 12.0 सेमी त्रिज्या के वृत्तीय कक्षा में वक्रित कर देता है। (इस मार्ग को देखा जा सकता है क्योंकि मार्ग में गैस आयन किरण-पुंज को इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करके और इलेक्ट्रॉन ग्रहण के द्वारा प्रकाश . उत्सर्जन करके फोकस करते हैं; इस विधि को ‘परिष्कृत किरण-पुंज नली’ विधि कहते हैं।) आँकड़ों से \(\frac { e }{ m }\) का मान निर्धारित कीजिए।
हल
दिया है, इलेक्ट्रॉनों के लिए त्वरक विभव V = 100 वोल्ट, B= 2.83 × 10-4 टेस्ला ,
पथ की त्रिज्या r = 12.0 सेमी = 0.12 मीटर
इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा \(\frac { 1 }{ 2 }\)mυ2 = ev
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= 1.73 × 1011 कलॉम/किग्रा।

प्रश्न 23.
(a) एक x-किरण नली विकिरण का एक सतत स्पेक्ट्रम जिसका लघु तरंगदैर्घ्य सिरा 0.45 A पर है, उत्पन्न करता है। विकिरण में किसी फोटॉन की उच्चतम ऊर्जा कितनी है?
(b) अपने (a) के उत्तर से अनुमान लगाइए कि किस कोटि की त्वरक वोल्टता (इलेक्ट्रॉन के लिए) की इस नली में आवश्यकता है?
हल
(a) X-किरण विकिरण में
λmin = 0.45 A = 45 × 10-12 मीटर
∴ विकिरण में फोटॉन की उच्चतम ऊर्जा
Emax = \(\frac{h c}{\lambda_{\min }}\)
\(=\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{45 \times 10^{-12}}\)
= 4.42 × 10-15 जूल।
अथवा Emax= \(\frac{4.42 \times 10^{-15}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 2.76 × 104 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 27.6 किलोइलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

(b) माना लक्ष्य से टकराने वाले इलेक्ट्रॉनों को उक्त ऊर्जा प्रदान करने के लिए त्वरक विभव V की आवश्यकता
तब इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E = eV
त्वरक विभव V = \(\frac{E}{e}=\frac{E_{\max }}{e}=\frac{4.42 \times 10^{-15}}{1.6 \times 10^{-19}}\)
∴ अभीष्ट त्वरक विभव V = 27.6 किलोवोल्ट।

प्रश्न 24.
एक त्वरित्र (accelerator) प्रयोग में पॉजिट्रॉनों (e+) के साथ इलेक्ट्रॉनों के उच्च-ऊर्जा संघट्टन पर, एक विशिष्ट घटना की व्याख्या कुल ऊर्जा 10.2 बिलियन इलेक्ट्रॉन-वोल्ट के इलेक्ट्रॉन-पॉजिट्रॉन युग्म के बराबर ऊर्जा की दो /-किरणों में विलोपन के रूप में की जाती है। प्रत्येक γ-किरण से सम्बन्धित तरंगदैर्यों के मान क्या होंगे? (1 बिलियन इलेक्ट्रॉन-वोल्ट= 109 इलेक्ट्रॉन- वोल्ट)
हल
घटना में विलुप्त इलेक्ट्रॉन-पॉजिट्रॉन की कुल ऊर्जा = 10.2 × 109 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
यह ऊर्जा दोनों γ-फोटॉनों में बराबर-बराबर बँट जाएगी।
∴ प्रत्येक γ-फोटॉन की ऊर्जा = \(\frac { 1 }{ 2 }\) x 10.2 × 109 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= \(\frac { 1 }{ 2 }\) x 10.2 x 109 x 1.6 x 10-19 जूल
= 8.16 × 10-10 जूल
परन्तु E = \(\frac { hc }{ λ }\)
∴ फोटॉन की तरंगदैर्घ्य λ = \(\frac { hc }{ λ }\) = \(\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{8.16 \times 10^{-10}}\) मीटर
या λ = 2.43 × 10-16 मीटर।

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प्रश्न 25.
आगे आने वाली दो संख्याओं का आकलन रोचक हो सकता है। पहली संख्या यह बताएगी कि रेडियो अभियान्त्रिक फोटॉन की अधिक चिन्ता क्यों नहीं करते। दूसरी संख्या आपको यह बताएगी कि हमारे नेत्र ‘फोटॉनों की गिनती’ क्यों नहीं कर सकते, भले ही प्रकाश साफ-साफ संसूचन योग्य हो?
(a) एक मध्य तरंग (medium wave) 10 किलोवाट सामर्थ्य के प्रेषी, जो 500 मीटर तरंगदैर्घ्य की रेडियो तरंग उत्सर्जित करता है, के द्वारा प्रति सेकण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या।
(b) निम्नतम तीव्रता का श्वेत प्रकाश जिसे हम देख सकते हैं (~10-10 वाट/मीटर2) के संगत फोटॉनों की संख्या जो प्रति सेकण्ड हमारे नेत्रों की पुतली में प्रवेश करती है। पुतली का क्षेत्रफल लगभग 0.4 सेमी2 और श्वेत प्रकाश की औसत आवृत्ति को लगभग 6 × 1014 हर्ट्स मानिए।
हल
(a) प्रेषी की शक्ति P = 10 किलोवाट = 104 वाट
उत्सर्जित फोटॉनों की तरंगदैर्घ्य λ = 500 मीटर
∴ प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा E = \(\frac { hc }{ λ }\) = \(\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{500}\)
= 3.98 × 10-28 जूल
∴ प्रति सेकण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या
\(n=\frac{P}{E}=\frac{10^{4}}{3.98 \times 10^{-28}}\)
= 2.51 × 1031 फोटॉन/सेकण्ड।

हम देख सकते हैं कि 10 किलोवाट सामर्थ्य के प्रेषी द्वारा प्रति सेकण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या काफी अधिक है। अतः फोटॉनों की अलग-अलग ऊर्जा की उपेक्षा करके रेडियो तरंगों की कुल ऊर्जा को सतत माना जा सकता है।

(b) श्वेत प्रकाश की औसत आवृत्ति ν = 6 × 1014 हर्ट्स
∴ श्वेत प्रकाश की फोटॉन की ऊर्जा E = hν
= 6.62 × 10-34 × 6 × 1014
= 3.97 × 10-19 जूल
आँख द्वारा संसूचित न्यूनतम तीव्रता = 10-10 वाट/मीटर2
इस स्थिति में आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की न्यूनतम शक्ति
P= 10-10 वाट/मीटर2 × (0.4 × 10-4) मीटर2
= 4 × 10-15 वाट
∴ आँख में प्रति सेकण्ड प्रवेश करने वाले फोटॉनों की संख्या
\(n=\frac{P}{E}=\frac{4 \times 10^{-15}}{3.97 \times 10^{-19}}\)
= 1.01 × 104 फोटॉन/सेकण्ड।
यद्यपि यह संख्या रेडियो प्रेषी द्वारा प्रति सेकण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या से अत्यन्त कम है परन्तु आँख के सूक्ष्म क्षेत्रफल की दृष्टि से इतनी अधिक है कि हम आँख पर गिरने वाले फोटॉनों के अलग-अलग प्रभाव को संसूचित नहीं कर पाते अपितु प्रकाश के सतत प्रभाव का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 26.
एक 100 वाट पारद (Mercury) स्रोत से उत्पन्न 2271A तरंगदैर्ध्य का पराबैंगनी प्रकाश एक मॉलिब्डेनम धातु से निर्मित प्रकाश सेल को विकिरित करता है। यदि निरोधी विभव – 1.3 वोल्ट हो तो धातु के कार्य-फलन का आकलन कीजिए। एक He-Ne लेसर द्वारा उत्पन्न 6328 A के उच्च तीव्रता (~105वाट/मीटर2) के लाल प्रकाश के साथ प्रकाश सेल किस प्रकार अनुक्रिया करेगा?
हल
दिया है, λ1 = 2271 A = 2271 × 10-10 मीटर के लिए,
निरोधी विभव V0 = – 1.3 वोल्ट, e= – 1.6 × 10-19 कूलॉम
∴ आपतित फोटॉन की ऊर्जा E = \(\frac { hc }{ λ }\)
= \(\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{2271 \times 10^{-10}}\)
= 8.745 × 10-19 जूल
जबकि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की महत्तम गतिज ऊर्जा
Emax = eV0
= (-1.6 × 10-19) × (-1.3)
= 2.08 × 10-19 जूल
∴ Φ0 या W = \(\frac { hc }{ λ }\) – w से,
Φ0 = \(\frac { hc }{ λ }\) – Emax
∴धातु का कार्यफलन W = \(\frac{h c}{\lambda_{1}}\) – Emax
= 8.745 × 10-19 – 2.08 × 10-19
W = 6.665 × 10-19 जूल।
या W = \(\frac{6.665 \times 10^{-19}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 4.17 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।
पुन: W = \(\frac{h c}{\lambda_{0}}\) से,
देहली तरंगदैर्घ्य λ0 = \(\frac { hc }{ w }\) = \(\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{6.665 \times 10^{-19}}\)
= 2.979 × 10-7 मीटर
λ0 = 2979A
∵ दूसरी दशा में आपतित तरंगदैर्घ्य
λ2 = 6328A > λ0
अत: प्रकाश सेल इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं करेगा और कोई धारा प्रवाहित नहीं होगी।

प्रश्न 27.
एक नियॉन लैम्प से उत्पन्न 640.2 नैनोमीटर (1 नैनोमीटर = 10-9 मीटर) तरंगदैर्ध्य का एकवर्णी विकिरण टंगस्टन पर सीजियम से निर्मित प्रकाश-संवेदी पदार्थ को विकिरित करता है। निरोधी वोल्टता 0.54 वोल्ट मापी जाती है। स्रोत को एक लौह-स्रोत से बदल दिया जाता है। इसकी 427.2 नैनोमीटर वर्ण-रेखा उसी प्रकाश सेल को विकिरित करती है। नयी निरोधी वोल्टता ज्ञात कीजिए।
हल
दिया है, λ1 = 640.2 नैनोमीटर = 640.2 × 10-9 मीटर
निरोधी वोल्टता V1 = 0.54 वोल्ट, λ2 = 427.2 नैनोमीटर
= 427.2 × 10-9 मीटर के लिए निरोधी विभव V2 = ?
आइन्स्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण से,
Emax = \(\frac { hc }{ λ }\) – W या eV0 = \(\frac { hc }{ λ }\)-w [∵Emax = eV0 ]
प्रथम दशा में, eV1 = \(\frac{h c}{\lambda_{1}}\) – W ….(1)
दूसरी दशा में, eV2 = \(\frac{h c}{\lambda_{2}}\) – W …(2) [ ∵ सेल वही है, अत: Φ0 नियत है]
समीकरण (2) में से (1) को घटाने पर,
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∴ अभीष्ट निरोधी विभव V2 = V1 + 0.97 = 1.51 वोल्ट।

प्रश्न 28.
एक पारद लैम्प, प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन की आवृत्ति निर्भरता के अध्ययन के लिए एक सुविधाजनक स्रोत है क्योंकि यह दृश्य-स्पेक्ट्रम के पराबैंगनी (UV) से लाल छोर तक कई वर्ण-रेखाएँ उत्सर्जित करता है। रूबीडियम प्रकाश सेल के हमारे प्रयोग में, पारद (Mercury) स्रोत की निम्न वर्ण-रेखाओं का प्रयोग किया गया
λ1 = 3650 A
λ2 = 4047Ā
λ3= 4358 A
λ4 = 5461A
λ5 = 6907A
निरोधी वोल्टताएँ, क्रमशः निम्न मापी गईं हैं
Vo1 = 1.28 वोल्ट,
Vo2 = 0.95 वोल्ट,
Vo3 = 0.74 वोल्ट,
Vo4 = 0.16 वोल्ट,
Vo5 = 0 वोल्ट
(a) प्लांक स्थिरांक का मान ज्ञात कीजिए।
(b) धातु के लिए देहली आवृत्ति तथा कार्यफलन का आकलन कीजिए।
[नोट-उपर्युक्त आँकड़ों से h का मान ज्ञात करने के लिए आपको e = 1.6 × 10-19 कूलॉम की आवश्यकता होगी। इस प्रकार के प्रयोग Na, Li, K आदि के लिए मिलिकन ने किए थे। मिलिकन ने अपने तेल-बूंद प्रयोग से प्राप्त e के मान का उपयोग कर आइन्स्टीन के प्रकाश विद्युत समीकरण को सत्यापित किया तथा इन्हीं प्रेक्षणों से h के मान के लिए पृथक् अनुमान लगाया।]
हल
किसी दी गई तरंगदैर्घ्य λ के लिए संगत आवृत्ति
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 17
अब दिए गए आँकड़े निम्न प्रकार हैं1
ν1 = 8.2 × 1014 हर्ट्स
ν2 = 7.4 × 1014 हर्ट्स
ν3 = 6.9 × 1014 हर्ट्स
ν4 = 5.5 × 1014 हर्ट्स
ν5= 4.3 × 1014 हर्ट्स

Vo1 = 1.28 वोल्ट
Vo2 = 0.95 वोल्ट
Vo3 = 0.74 वोल्ट
Vo4 = 0.16 वोल्ट
Vo5 = 0 वोल्ट

उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर ν तथा V0 के बीच खींचा गया ग्राफ निम्नांकित चित्र में प्रदर्शित है।
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 18
उक्त ग्राफ से स्पष्ट है कि प्रथम चार बिन्दु एक सरल रेखा में हैं तथा ‘,
देहली आवृत्ति νo = 5.0 × 1014 हर्ट्स
∵ पाँचवें बिन्दु के लिए, ν5 < νo
अतः इस दशा में इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन रोकने हेतु निरोधी विभव की आवश्यकता नहीं होती।

(a) ग्राफ का ढाल \(\frac{\Delta V_{0}}{\Delta v}=\frac{V_{A}-V_{B}}{v_{A}-v_{B}}\)
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 19

∴ प्लांक नियतांक h = e × ग्राफ का ढाल
= 1.6 × 10-19 × 4.1 × 10-15
≈ 6.6 × 10-34 जूल-सेकण्ड।

(b) ग्राफ से देहली आवृत्ति νo = 5 × 1014 हर्ट्स।
कार्य-फलन W = hν0
= 6.6 × 10-34 × 5 × 1014 हर्ट्स
= 3.3 × 10-19 जूल।
अथवा W = \(\frac{3.3 \times 10^{-19}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 2.06 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।
≈ 2.1 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट।

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प्रश्न 29.
कुछ धातुओं के कार्य-फलन निम्न प्रकार दिए गए हैं
Na : 2.75 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट; K : 2.30 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट; Mo : 4.17 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट; Ni : 5.15 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट। इनमें धातुओं में से कौन प्रकाश सेल से 1 मीटर दूर रखे गए He-Cd लेसर से उत्पन्न 3300 A तरंगदैर्घ्य के विकिरण के लिए प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन नहीं देगा? लेसर को सेल के निकट 50 सेमी दूरी पर रखने पर क्या होगा?
हल
He-Cd लेसर से उत्पन्न तरंगदैर्घ्य
λ = 3300 A = 3.3 × 10-7 मीटर
इस विकिरण के एक फोटॉन की ऊर्जा
E = \(\frac { hc }{ λ }\)
= \(\frac{6.6 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{3.3 \times 10^{-7}}\)
= 6 × 10-19 जूल
= \(\frac{6 \times 10^{-19}}{1.6 \times 10^{-19}}\) इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 3.75 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
∵ Mo तथा Ni के लिए कार्य-फलन, उक्त विकिरण के एक फोटॉन की ऊर्जा से अधिक है, अतः उक्त दोनों धातु प्रकाश विद्युत उत्सर्जन नहीं देंगे।

यदि लेसर को 1 मीटर के स्थान पर 50 सेमी दूरी पर रख दें तो भी उक्त परिणाम में कोई अन्तर नहीं आएगा, क्योंकि लेसर को समीप रखने पर धातु पर गिरने वाले प्रकाश की तीव्रता तो बढ़ जाएगी, परन्तु एक फोटॉन से सम्बद्ध ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

प्रश्न 30.
10-5 वाट/मीटर2 तीव्रता का प्रकाश सोडियम प्रकाश सेल के 2 सेमी2 क्षेत्रफल के पृष्ठ पर पड़ता है। यह मान लें कि ऊपर की सोडियम की पाँच परतें आपतित ऊर्जा को अवशोषित करती हैं तो विकिरण के तरंग-चित्रण में प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के लिए आवश्यक समय का आकलन कीजिए। धातु के लिए कार्य-फलन लगभग 2 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट दिया गया है। आपके उत्तर का क्या निहितार्थ है?
हल
दिया है, प्रकाश की तीव्रता I = 10-5 वाट/मीटर2
सेल का क्षेत्रफल A = 2 × 10-4 मीटर2,
कार्य-फलन W = 2 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
∵ सोडियम परमाणु की लगभग त्रिज्या
r= 10-10 मीटर
∴ सोडियम परमाणु का लगभग क्षेत्रफल
πr2 = 3.14 × 10-20 ≈ 10-20 मीटर2
∴ एक परत में उपस्थित सोडियम परमाणुओं की संख्या
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 20
∵ 5 परतों में परमाणुओं की संख्या n= 5 × 2 × 1016 = 1017
∵ सोडियम के एक परमाणु में एक चालन इलेक्ट्रॉन होता है, अत: इन n परमाणुओं में n चालन इलेक्ट्रॉन होंगे। सेल पर प्रति सेकण्ड आपतित प्रकाशिक ऊर्जा
= I × A
= 10-5 × 2 × 10-4
= 2 × 10-9 वाट
∵ कुल ऊर्जा सोडियम की पाँच परतों द्वारा अवशोषित होती है, अत: तरंग सिद्धान्त के अनुसार यह ऊर्जा पाँच परतों के n इलेक्ट्रॉनों में समान रूप से बँट जाती है।
∴ एक इलेक्ट्रॉन को प्रति सेकण्ड प्राप्त होने वाली ऊर्जा
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 21
= 2 × 10-26 जूल/सेकण्ड
∵ कार्य-फलन Φ0 = 2 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
= 2 × 1.6 × 10-19 जूल
अर्थात् 1 इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित कराने के लिए आवश्यक ऊर्जा = 3.2 × 10-19 जूल
∴ किसी इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित होने में लगा समय t = पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त करने में लगा समय
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उत्तर का निहितार्थ- इस उत्तर से स्पष्ट है कि प्रकाश के तरंग सिद्धान्त के अनुसार प्रकाश विद्युत-उत्सर्जन की घटना में एक इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित होने में लगने वाला समय बहुत अधिक है जो कि इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन में लगे प्रेक्षित समय (लगभग 10-9 सेकण्ड) से मेल नहीं खाता। इससे स्पष्ट है कि प्रकाश का तरंग सिद्धान्त प्रकाश विद्युत उत्सर्जन की व्याख्या नहीं कर सकता।

प्रश्न 31.
x-किरणों के प्रयोग अथवा उपयुक्त वोल्टता से त्वरित इलेक्ट्रॉनों से क्रिस्टल-विवर्तन प्रयोग किए जा सकते हैं। कौन-सी जाँच अधिक ऊर्जा सम्बद्ध है? (परिमाणिक तुलना के लिए, जाँच के लिए तरंगदैर्घ्य को 1A लीजिए, जो कि जालक (लेटिस) में अन्तर-परमाणु अन्तरण की कोटि का है) (me = 9.11 × 10-31 किग्रा)।
हल
दिया है, x-किरण फोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन की तरंगदैर्घ्य λ= 1A = 10-10 मीटर
∴ x-किरण फोटॉन की ऊर्जा E = \(\frac { hc }{ λ }\) = \(\frac{6.62 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{10^{-10}}\) = 1.986 x 10-15 जूल
∵ इलेक्ट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य λ = \(\frac { h}{ p }\)
∴ इलेक्ट्रॉन का संवेग p = \(\frac { h }{ λ }\)
इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा \(E=\frac{1}{2} m v^{2}=\frac{m^{2} v^{2}}{2 m}\)
⇒ \(E=\frac{p^{2}}{2 m}=\frac{h^{2}}{2 m \lambda^{2}}\)
= \(\frac{\left(6.62 \times 10^{-34}\right)^{2}}{2 \times 9.1 \times 10^{-31} \times\left(10^{-10}\right)^{2}}\)
= 2.40 × 10-17 जूल
स्पष्ट है कि x-किरण फोटॉन की ऊर्जा समान तरंगदैर्घ्य के इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा से अधिक है।

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(b) दिया है, कमरे का तापमान T = 27 + 273 = 300K
न्यूट्रॉन का द्रव्यमान mn = 1.675 × 10-27 किग्रा
बोल्ट्समान नियतांक k = 1.38 × 10-23 जूल/मोल-K
कमरे के ताप पर न्यूट्रॉन की गतिज ऊर्जा
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 34
∴ न्यूट्रॉन का संवेग p= mnυ =\(\sqrt{3 m_{n} k T}\)
अत: न्यूट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 35
= 1.45 A

स्पष्ट है कि 27°C के न्यूट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य, क्रिस्टलों में अन्तरापरमाण्विक दूरी के साथ तुलनीय है। अत: यह न्यूट्रॉन क्रिस्टल विवर्तन प्रयोग के लिए उपयुक्त है।

इससे स्पष्ट है कि न्यूट्रॉनों को क्रिस्टल विवर्तन प्रयोगों में उपयोग में लाने के लिए उन्हें वातावरण के साथ तापीकृत करना चाहिए।

प्रश्न 33.
एक इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में 50 किलोवोल्ट वोल्टता के द्वारा त्वरित इलेक्ट्रॉनों का उपयोग किया जाता है। इन इलेक्ट्रॉनों से जुड़े देब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। यदि अन्य बातों (जैसे कि संख्यात्मक द्वारक आदि) को लगभग समान लिया जाए, इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता की तुलना पीले प्रकाश का प्रयोग करने वाले प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से किस प्रकार होती है?
हल
दिया है, इलेक्ट्रॉनों का त्वरक विभवान्तर V= 50 किलोवोल्ट = 50 × 103 वोल्ट
∴ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E = eV जूल
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 23
∴ इलेक्ट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य λe = \(\frac { h}{ p }\)
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 24
जबकि पीले प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λy = 5900 A
∵ किसी प्रकाशिक यन्त्र की विभेदन क्षमता \(\propto \frac{1}{\lambda}\)
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 25
प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता 0.05481
अर्थात् इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता, प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता की 105 गुनी होती है।

प्रश्न 34.
किसी जाँच की तरंगदैर्घ्य उसके द्वारा कुछ विस्तार में जाँच की जा सकने वाली संरचना के आकार की लगभग आमाप है। प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों की क्वार्क (quark) संरचना 10-15 मीटर या इससे भी कम लम्बाई के लघु पैमाने की है। इस संरचना को सर्वप्रथम 1970 दशक के प्रारम्भ में, एक रेखीय त्वरित्र (Linear accelerator) से उत्पन्न उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों के किरण-पुंजों के उपयोग द्वारा, स्टैनफोर्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका में जाँचा गया था। इन इलेक्ट्रॉन किरण-पुंजों की ऊर्जा की कोटि का अनुमान लगाइए। (इलेक्ट्रॉन की विराम द्रव्यमान ऊर्जा 0.511 मिलियन इलेक्ट्रॉन-वोल्ट है।)
हल
क्वार्क संरचना का आमाप, λ = 10-15 मीटर,
इलेक्ट्रॉन का विराम द्रव्यमान mo = 9.1 × 10-31 किग्रा
∴ इलेक्ट्रॉन की विराम द्रव्यमान ऊर्जा
\(E_{0}=m_{0} c^{2}=9.1 \times 10^{-31} \times\left(3 \times 10^{8}\right)^{2}\)
= 8.19 × 10-14 जूल
सूत्र λ = \(\frac { h}{ p }\) से, संवेग p=\(\frac { h}{ λ }\)
⇒\(p=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{10^{-15}}\)
= 6.62 × 10-34 जूल
∴ आपेक्षिक सिद्धान्त के अनुसार, \(E^{2}=\dot{m}_{0}^{2} c^{4}+p^{2} c^{2}=\left(m_{0} c^{2}\right)^{2}+p^{2} c^{2}\)
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अत: रेखीय त्वरित्र से निकलने वाले इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा 109 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट (अथवा बिलियन इलेक्ट्रॉन वोल्ट) की कोटि की है।

प्रश्न 35.
कमरे के ताप (27°C) और 1 वायुमण्डल दाब पर He परमाणु से जुड़े प्रारूपी दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए और इन परिस्थितियों में इसकी तुलना दो परमाणुओं के बीच औसत दूरी से कीजिए।
हल
कमरे का ताप T = 27+ 273 = 300 K
He का परमाणु द्रव्यमान = 4 ग्राम
1 ग्राम मोल (4 ग्राम) हीलियम में परमाणुओं की संख्या = NA = 6.02 × 1023
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 27
= 0.7274 ≈ 0.73A.
यहाँ गैस का दाब P = 1.01 × 105 पास्कल · तथा T = 300 K
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 28
= 3.4 × 10-9 मीटर = 34 A.
इससे स्पष्ट है कि परमाणुओं के बीच की दूरी, दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य से लगभग 50 गुनी बड़ी है।

प्रश्न 36.
किसी धातु में 27°C पर एक इलेक्ट्रॉन का प्रारूपी दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य परिकलित कीजिए और इसकी तुलना धातु में दो इलेक्ट्रॉनों के बीच औसत पृथक्य से कीजिए जो लगभग 2 × 10-10 मीटर दिया गया है।
[नोट-प्रश्न 35 और 36 प्रदर्शित करते हैं कि जहाँ सामान्य परिस्थितियों में गैसीय अणुओं से जुड़े तरंग पैकेट अ-अतिव्यापी हैं; किसी धातु में इलेक्ट्रॉन तरंग पैकेट प्रबल रूप से एक-दूसरे से अतिव्यापी हैं। यह सुझाता है कि जहाँ किसी सामान्य गैस में अणुओं की अलग पहचान हो सकती है, किसी धातु में इलेक्ट्रॉन की एक-दूसरे से अलग पहचान नहीं हो सकती। इस अप्रभेद्यता के कई मूल निहितार्थताएँ हैं जिन्हें आप भौतिकी के अधिक उच्च पाठ्यक्रमों में जानेंगे]
हल
परम ताप T = 27 + 273 = 300K
इस ताप पर इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा \(E=\frac{1}{2} m v^{2}=\frac{3}{2} k T\)
⇒\(v=\sqrt{\frac{3 k T}{m}}\)
\(\lambda=\frac{h}{p}=\frac{h}{\sqrt{3 m k T}}\)
[m = 9.1 × 10-31 किग्रा, k= 1.38 × 10-23 जूल/मोल-K]
∴ इलेक्ट्रॉन की दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य \(\lambda=\frac{6.62 \times 10^{-34}}{\sqrt{\left(3 \times 9.1 \times 10^{-31} \times 1.38 \times 10^{-23} \times 300\right)}}\)
= 62  × 10-10 मीटर = 62A.
जबकि दो इलेक्ट्रॉनों के बीच की दूरी ro = 2 × 10-10 मीटर
∴ \(\frac{\lambda}{r_{0}}=\frac{62}{2}=31\)
अर्थात् दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य, इलेक्ट्रॉनों के बीच की दूरी की 31 गुनी है।

प्रश्न 37.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(a) ऐसा विचार किया गया है कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के भीतर क्वार्क पर आंशिक आवेश होते है \(\left[\left(+\frac{2}{3}\right) e ;\left(-\frac{1}{3}\right) e\right]\) यह मिलिकन तेल-बूंद प्रयोग में क्यों नहीं प्रकट होते?
(b) \(\frac { e }{ m }\) संयोग की क्या विशिष्टता है? हम e तथा m के विषय में अलग-अलग विचार क्यों नहीं करते?
(c) गैसें सामान्य दाब पर कुचालक होती हैं, परन्तु बहुत कम दाब पर चालन प्रारम्भ कर देती हैं। क्यों?
(d) प्रत्येक धातु का एक निश्चित कार्य-फलन होता है। यदि आपतित विकिरण एकवर्णी हो तो सभी प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन समान ऊर्जा के साथ बाहर क्यों नहीं आते हैं? प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों का एक ऊर्जा वितरण क्यों होता है?
(e) एक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा तथा इसका संवेग इससे जुड़े पदार्थ-तरंग की आवृत्ति तथा इसके तरंगदैर्घ्य के साथ निम्न प्रकार सम्बन्धित होते हैं -E = hν, p = \(\frac { h }{ λ }\)

परन्तु λ का मान जहाँ भौतिक महत्त्व का है, ” के मान (और इसलिए कला चाल A का मान) का कोई भौतिक महत्त्व नहीं है। क्यों?
उत्तर
(a) भिन्नात्मक आवेश वाले क्वार्क न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन के भीतर इस प्रकार सीमित रहते हैं कि प्रोटॉन में उपस्थित क्वार्कों के आवेशों का योग +e तथा न्यूट्रॉन में उपस्थित क्वार्कों के आवेशों का योग शून्य बना रहता है तथा ये क्वार्क पारस्परिक आकर्षण बलों द्वारा बँधे रहते हैं। जब इन्हें अलग करने का प्रयास किया जाता है तो बल और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और इसी कारण वे एक-साथ बने रहते हैं। इसीलिए प्रकृति में भिन्नात्मक आवेश मुक्त अवस्था में नहीं पाए जाते अपितु वे सदैव इलेक्ट्रॉनिक आवेश के पूर्ण गुणज के रूप में ही पाए जाते हैं।

(b) इलेक्ट्रॉन की गति समीकरणों eV= \(\frac { 1 }{ 2 }\) mv2, eE = ma तथा evB= \(\frac{m v^{2}}{r}\) द्वारा निर्धारित होती है। इनमें से प्रत्येक में e तथा m दोनों एक साथ आए हैं। इससे स्पष्ट है कि इलेक्ट्रॉन की गति के लिए e अथवा m पर अकेले-अकेले विचार करने के स्थान पर \(\frac { e }{ m }\) पर विचार किया जाता है।

(c) सामान्य दाब पर गैसों में विसर्जन के कारण उत्पन्न आयन कुछ ही दूरी तय करने तक गैस के अन्य अणुओं से टकराकर उदासीन हो जाते हैं और इस कारण सामान्य दाब पर गैसों में विद्युत चालन नहीं हो पाता। इसके विपरीत अत्यन्त निम्न दाब पर गैस में अणुओं की संख्या बहुत कम रह जाती है। इस कारण उत्पन्न आयन अन्य अणुओं से टकराने से पूर्व ही विपरीत इलेक्ट्रॉड तक पहुँच जाते हैं।

(d) कार्य-फलन से, धातु में उच्चतम ऊर्जा स्तर अथवा चालन बैण्ड में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा का ज्ञान होता है। परन्तु प्रकाश विद्युत उत्सर्जन में इलेक्ट्रॉन अलग-अलग ऊर्जा स्तरों से निकल कर आते हैं। अत: उत्सर्जन के बाद उनके पास भिन्न-भिन्न ऊर्जाएँ होती हैं।

(e) किसी द्रव्य कण की ऊर्जा का निरपेक्ष मान (न कि संवेग) एक निरपेक्ष स्थिरांक के अधीन स्वेच्छ होता है। यही कारण है कि द्रव्य तरंगों से सम्बद्ध तरंगदैर्घ्य λ का ही भौतिक महत्त्व होता है न कि आवृत्ति ν का। इसी कारण कला वेग νλ. का भी कोई भौतिक महत्त्व नहीं होता।

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विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति NCERT भौतिक विज्ञान प्रश्न प्रदर्शिका (Physics Exemplar LO Problems) पुस्तक से चयनित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के हल

विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसी कण को H ऊँचाई से गिराया जाता है। ऊँचाई के फलन के रूप में कण दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य निम्न में से किसके __ अनुक्रमानुपाती होती है
(a) H
(b) H1/2
(c) H0
(d) H-1/2
उत्तर
(d) H-1/2

प्रश्न 2.
नाभिक से 1 Mev ऊर्जा द्वारा बन्धित प्रोटॉन को नाभिक से बाहर निकालने के लिए आवश्यक फोटॉन की तरंगदैर्घ्य लगभग कितनी होती है
(a) 1.2 नैनोमीटर
(b) 1.2 × 10-3 नैनोमीटर
(c) 1.2 × 10-6 नैनोमीटर
(d) 1.2 × 101 नैनोमीटर।
उत्तर
(b) 1.2 × 10-3 नैनोमीटर

प्रश्न 3.
निर्वातित प्रकोष्ठ में रखे धातु के पृष्ठ पर आपतित इलेक्ट्रॉनों को किसी पुंज (जिसमें प्रत्येक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E0 है) पर विचार कीजिए। इस पृष्ठ से
(a) कोई इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा क्योंकि केवल फोटॉन ही इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित कर सकते हैं
(b) इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो सकते हैं परन्तु प्रत्येक की ऊर्जा E0 होगी
(c) अधिकतम ऊर्जा E0 – Φ + सहित, (Φ धातु का कार्य-फलन है) किसी भी ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो सकते हैं
(d) अधिकतम ऊर्जा E0 सहित किसी भी ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो सकते हैं।
उत्तर
(d) अधिकतम ऊर्जा E0 सहित किसी भी ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो सकते हैं।

प्रश्न 4.
एक प्रोटॉन, एक न्यूट्रॉन, एक इलेक्ट्रॉन तथा एक a-कण की ऊर्जा परस्पर बराबर है तो उनकी दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्यों में तुलना इस प्रकार की जा सकती है
(a) λp = λn > λe > λα
(b) λα < λp = λn > he
(c) λ2 < λp = λn > λα
(d) λe = λp = λn = λα.
उत्तर
(b) λα < λp = λn > he

प्रश्न 5.
कोई इलेक्ट्रॉन जिसका प्रारम्भिक वेग \(v=v_{0} \hat{\mathrm{i}}\) है किसी चुम्बकीय क्षेत्र \(\mathrm{B}=B_{0} \hat{\mathrm{j}}\) में गतिमान है। इस इलेक्ट्रॉन की
दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य
(a) अचर रहती है
(b) समय के साथ बढ़ती है
(c) समय के साथ घटती है।
(d) आवर्ती रूप से बढ़ती और घटती है।
उत्तर
(a) अचर रहती है

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विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसी प्रोटॉन और किसी -कण को समान विभवान्तर द्वारा त्वरित किया गया है। दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य λp एवं λα परस्पर किस प्रकार सम्बन्धित हैं? उत्तर
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 29

प्रश्न 2.
(i) प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या करते समय हमने यह माना था कि आवृत्ति का फोटॉन किसी इलेक्ट्रॉन से संघट्ट करता है और अपनी ऊर्जा उसको हस्तान्तरित कर देता है। इससे हमें उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम ऊर्जा, E अधिकतम के लिए निम्न प्रकार का समीकरण प्राप्त होता है
Eअधिकतम = hν-Φ0
जहाँ Φ0 धातु का कार्य-फलन है। यदि कोई इलेक्ट्रॉन दो फोटॉन (प्रत्येक की आवृत्ति । है) अवशोषित करता है, तो उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम ऊर्जा क्या होगी?
(ii) निरोधी विभव सम्बन्धी हमारी विवेचना में दो फोटॉन अवशोषण के इस प्रकरण पर विचार क्यों नहीं किया गया?
उत्तर
(i) इलेक्ट्रॉन द्वारा दो फोटॉन अवशोषित करने पर उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम ऊर्जा,
Eअधिकतम = 2hν-Φ0
(ii) एक ही इलेक्ट्रॉन द्वारा दो फोटॉन अवशोषित करने की प्रायिकता बहुत कम है। अत: इस प्रकरण पर विचार नहीं किया जाता है।

प्रश्न 3.
कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जो लघु तरंगदैर्घ्य के फोटॉन को अवशोषित करते हैं और दीर्घ तरंगदैर्घ्य के फोटॉन उत्सर्जित करते हैं। क्या ऐसे स्थायी पदार्थ भी हो सकते हैं जो दीर्घ तरंगदैर्घ्य के फोटॉन अवशोषित करके लघु तरंगदैर्यों का प्रकाश उत्सर्जित करें।
उत्तर
लघु तरंगदैर्घ्य के फोटॉन, जिनकी ऊर्जा उच्च होती है; को अवशोषित कर दीर्घ तरंगदैर्घ्य के फोटॉन, जिनकी ऊर्जा निम्न होती है; को उत्सर्जित करना सरलता से सम्भव है। दीर्घ तरंगदैर्घ्य के फोटॉन, जिनकी ऊर्जा कम होती है; को अवशोषित कर लघु तरंगदैर्घ्य के फोटॉन, जिनकी ऊर्जा अधिक होती है; को उत्सर्जित करने के लिए पदार्थ को ऊर्जा आपूर्ति करनी होगी तथा किसी भी स्थायी पदार्थ के लिए ऐसा करना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 4.
क्या फोटॉन अवशोषित करने वाले सभी इलेक्ट्रॉन फोटो इलेक्ट्रॉनों के रूप में निष्क्रमित होते हैं?
उत्तर
नहीं, फोटॉन अवशोषित करने वाले सभी इलेक्ट्रॉन, फोटो इलेक्ट्रॉन के रूप में निष्क्रमित नहीं होते हैं क्योंकि अधिकांश इलेक्ट्रॉन धातु में ही प्रकीर्णित हो जाते हैं और केवल कुछ ही इलेक्ट्रॉन धातु से बाहर निष्क्रमित हो पाते हैं।

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विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
25 एवं 2, दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य के दो कण A एवं B मिलकर कोई कण C बनाते हैं। इस प्रक्रिया में संवेग संरक्षण होता है। कण C के दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य का परिकलन कीजिए (गति एकविमीय है)।
हल
कण C का संवेग = (कण A का संवेग) + (कण B का संवेग)
PC = PA + PB.
परन्तु संवेग p = \(\frac { h }{ λ }\), जहाँ λ. कण के संगत दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य है।
MP Board Class 12th Physics Solutions Chapter 11 विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति img 36

विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति आंकिक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
दो प्रकाश स्रोत हैं जिनमें प्रत्येक 100 वाट शक्ति उत्सर्जित करता है। इनमें से एक 1 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य की x-किरणें और दूसरा 500 नैनोमीटर का दृश्य प्रकाश उत्सर्जित करता है। दी गई तरंगदैर्यों के लिए x-किरणों के फोटॉनों की संख्या तथा दृश्य प्रकाश के फोटॉनों की संख्या का अनुपात ज्ञात कीजिए।
हल
दिया है : शक्ति (P) = 100 वाट, λ1 = 1 नैनोमीटर = 1 × 10-9 मीटर,
λ2 = 500 नैनोमीटर = 500 × 10-9 मीटर
P= n1 E1=n2 E2
या \(n_{1} \frac{h c}{\lambda_{1}}=n_{2} \frac{h c}{\lambda_{2}}\)
या \(\frac{n_{1}}{n_{2}}=\frac{\lambda_{1}}{\lambda_{2}}=\frac{1 \times 10^{-9}}{500 \times 10^{-9}}=\frac{1}{500}\)
या n1 : n2 = 1 : 500.

प्रश्न 2.
600 नैनोमीटर की तरंगदैर्घ्य के प्रकाश से उद्भासित किसी धातु की सतह से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम ऊर्जा मापी गई। यह पाया गया कि 400 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का उपयोग करने पर इससे उत्सर्जित होने वाले इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम ऊर्जा दोगुनी हो गई। धातु का कार्य-फलन (ev में) ज्ञात कीजिए।
हल
λ1 = 600 नैनोमीटर, λ2 = 400 नैनोमीटर
प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा, Ek = E – W = \(\frac { hc }{ λ }\) – W
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प्रश्न 3.
कोई विद्यार्थी दो पदार्थ A एवं B लेकर प्रकाश-विद्युत प्रभाव सम्बन्धी प्रयोग करता है। Vनरोधी तथा ν का ग्राफ चित्र-11.3 में (v)| दर्शाया गया है।
(i) A एवं B में किस पदार्थ का कार्य-फलन अधिक है?
(ii) इलेक्ट्रॉन का विद्युत आवेश = 1.6 × 10-19 कूलॉम लेकर 15 प्रयोग से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर A एवं B दोनों के लिए h का 1 मान ज्ञात कीजिए।
टिप्पणी कीजिए कि क्या यह आइन्स्टीन के सिद्धान्त के अनुरूप
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हल
(i) पदार्थ B के लिए देहली आवृत्ति (νo) का मान पदार्थ A से अधिक है। अत: पदार्थ B का कार्य-फलन (W = hνo) अधिक होगा।

(ii) दिए गए ग्राफ का ढलान = \(\frac { h }{ e }\)
पदार्थ A के लिए ग्राफ का ढलान = \(\frac { h }{ e }\)
\(=\frac{2}{(10-5) \times 10^{14}}=\frac{2}{5 \times 10^{14}}\)
∴ पदार्थ A के लिए, h = \(\frac{2}{5 \times 10^{14}} \times 1.6 \times 10^{-19}\)
= 6.04 × 10-34 जूल-सेकण्ड
पदार्थ B के लिए ग्राफ का ढलान = \(\frac { h }{ e }\)
\(=\frac{2.5}{(15-10) \times 10^{14}}=\frac{2.5}{5 \times 10^{14}}\)
∴ पदार्थ B के लिए, h = \(\frac{2.5}{5 \times 10^{14}} \times 1.6 \times 10^{-19}\)
= 8 × 10-34 जूल-सेकण्ड।
दोनों पदार्थों के लिए h के मान भिन्न-भिन्न हैं, अत: यह प्रयोग आइन्स्टीन के सिद्धान्त के अनुरूप नहीं है।

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MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण वाक्य अशुद्धि संशोधन

MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण वाक्य अशुद्धि संशोधन

भावों की अभिव्यक्ति प्रायः दो प्रकार से होती है, एक-वाणी के द्वारा हम अपने विचारों को बोलकर प्रकट करते हैं तथा दूसरे-लेखनी द्वारा हम अपनी भावनाओं को लिपिबद्ध करते हैं। भावों को लिपिबद्ध करने के लिए आवश्यक है कि भाषा पर हमारा पूर्ण अधिकार हो अन्यथा अस्पष्ट, अशुद्ध भाषा के माध्यम से भावों का अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता।

भाषा को परिमार्जित, सशक्त और आकर्षक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम प्रत्येक शब्द की आत्मा को समझें और उस पर अधिकार कर अपनी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना लें। मनुष्य मन के भावों को व्यक्त करने के लिए वाक्यों में शब्दों का उपयुक्त और क्रमबद्ध प्रयोग अत्यधिक आवश्यक है। उचित और अनुरूप शब्दों का चयन तथा उनका व्यवस्थित नियोजन सही और सुन्दर वाक्य रचना के मुख्य उपकरण हैं।

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संक्षेप में शुद्ध लेखन से आशय ऐसे लेखन से है जिसमें सार्थक और उपयुक्त शब्दावली का उपयोग हो। अलंकार, मुहावरों-लोकोक्तियों का विषय के अनुरूप उचित . प्रयोग हो। भाषा अस्वाभाविकता से दूषित न हो। वर्तनी व्याकरण के नियमों के अनुकूल हो और अभिव्यक्ति अपने आप में पूर्ण हो।

वाक्य अशुद्धि

1. क्रम दोष-वाक्य में प्रत्येक शब्द व्याकरण के नियम के अनुसार सही क्रम में होना चाहिए। कर्ता, क्रिया और कर्म को उपयुक्त स्थान पर रखना अत्यन्त आवश्यक है। मिश्र वाक्य में प्रधान वाक्य तथा उसके अन्य उपवाक्यों को ठीक क्रम में न रखने पर वाक्य अशुद्ध हो जाता है,
जैसे-
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2. पुनरुक्ति दोष-एक ही वाक्य में एक शब्द का एक से अधिक बार प्रयोग अथवा पर्यायवाची शब्द का प्रयोग भी दोषपूर्ण हो जाता है। यह आडम्बर की रुचि दर्शाता है,
जैसे-
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3. संज्ञा संबंधी दोष-अपने कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए हम संज्ञा को प्रयुक्त करते समय उसके सही अर्थ से अनभिज्ञ होकर उसका अशुद्ध प्रयोग करते जाते हैं। ऐसे प्रयोग के द्वारा हमारे कथन का सही अर्थ भी स्पष्ट नहीं होता तथा भाषा दोषपूर्ण हो जाती है, जैसे-
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4. लिंग सम्बन्धी दोष-लिंग के प्रयोग में भी सामान्य रूप से अशुद्धि देखने को मिलती हैं, जैसे-
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5. वचन सम्बन्धी अशुद्धियाँ-वचन के प्रयोग में असावधानी बरतने के कारण भी वाक्य में अशुद्धि आ जाती है; जैसे-
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6. सर्वनाम सम्बन्धी अशुद्धियाँ-वाक्य रचना में सर्वनाम सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ देखने को मिलती हैं। सर्वनाम का यथास्थान प्रयोग न करना, सर्वनाम का अधिक प्रयोग करना या गलत सर्वनामों का प्रयोग करना प्रायः देखा गया है; जैसे-
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7. विशेषण सम्बन्धी अशुद्धियाँ-वाक्यों में विशेषण सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ देखने में आती हैं। विशेषणों के अनावश्यक अनुपयुक्त तथा अनियमित प्रयोग से वाक्य भद्दा व प्रभावहीन हो जाता है; जैसे-
MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण वाक्य अशुद्धि संशोधन img-8

8. क्रिया सम्बन्धी अशुद्धियाँ-क्रियाओं सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ देखने को मिलती हैं। जैसे क्रियापदों का अनावश्यक प्रयोग, आवश्यकता के समय प्रयोग न करना, अनुपयुक्त क्रियापद का प्रयोग, सहायक क्रिया में अशुद्धि तथा क्रियाओं में असंगति के कारण ये अशुद्धियाँ होती हैं।
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9. क्रिया-विशेषण सम्बन्धी अशुद्धियाँ-क्रिया-विशेषण सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ। उनके अशुद्ध, अनुपयुक्त और अनियमित प्रयोग से दिखाई देती हैं, जैसे
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10. कारकीय परसों की अशुद्धियाँ-शुद्ध रचना के लिए कारकीय परसर्गों का समुचित प्रयोग करना आवश्यक है। सामान्य रूप से ‘ने’, ‘को’, ‘से’, ‘के ‘द्वारा’, ‘में’, ‘पर’, ‘का’, ‘की’, ‘के लिए’ आदि परसर्गों का गलत प्रयोग करने से वाक्य में अशुद्धि आती है। जैसे-
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11. मुहावरे सम्बन्धी अशुद्धियाँ-मुहावरे हमारी भाषा को सुन्दर, समृद्ध व प्रभावशाली बनाते हैं। इनका प्रयोग करते समय यह विशेष ध्यान रखना होता है कि इनका रूप विकृत और हास्यास्पद न हो। जैसे-
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MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 12 उपभोक्ता संरक्षण

MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 12 उपभोक्ता संरक्षण

उपभोक्ता संरक्षण Important Questions

उपभोक्ता संरक्षण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिकायत कौन दायर कर सकता है ?
उत्तर:
निम्नलिखित शिकायत दायर कर सकते हैं –

  1. एक उपभोक्ता
  2. मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संघ
  3. एक या अधिक उपभोक्ता (जहाँ अनेक उपभोक्ताओं का समान हित है।)
  4. केन्द्रीय सर
  5. राज्य सरकार

प्रश्न 2.
उपभोक्ताओं के अधिकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उपभोक्ताओं के अधिकार –

  1. सुरक्षा का अधिकार
  2. सूचना प्राप्त करने का अधिकार
  3. सुनवाई का अधिकार
  4. प्रतियोगी मूल्य पर माल प्राप्त करने का अधिकार
  5. क्षतिपूर्ति या उपचार का अधिकार
  6. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
  7. उचित प्रतिफल का अधिकार
  8. स्वच्छ वातावरण का अधिकार
  9. हानिकारक बिक्री को रुकवाने का
  10. अपना पक्ष रखने का अधिकार।

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प्रश्न 3.
उपभोक्ता संरक्षण का महत्व बताइये।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण का महत्व निम्न हैं –

  1. उपभोक्ताओं के सामाजिक जीवन में वृद्धि करने के लिए
  2. उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए
  3. सामाजिक दायित्व के प्रति जागरूकता लाने के लिए
  4. परिवेदनाओं, शिकायतों का शीघ्र समाधान करने के लिए।

प्रश्न 4.
भारत में उपभोक्ता संरक्षण के साधनों व तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में उपभोक्ता संरक्षण के साधन व तरीके निम्न हैं –

  1. लोक अदालत – उपभोक्ता अपनी शिकायतों के समाधान हेतु लोक अदालत की शरण ले सकता है जिसमें तुरन्त बहस करके फैसले दिए जाते हैं।
  2. शिकायत निवारण मंच – शिकायत निवारण मंच के अंतर्गत उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में त्रिस्तरीय न्याय व्यवस्था सन् 1986 में स्थापित की जिसमें जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य फोरम, राष्ट्रीय फोरम की स्थापना की गई।
  3. जनहित में मुकदमा – इसमें निर्धन, अल्पसंख्यक या सामूहिक हित रखने वाले व्यक्तियों अथवा उपभोक्ताओं की ओर से जनहित में सामूहिक मुकदमा भी दायर किया जा सकता है।
  4. मुद्रित साहित्य में उपभोक्ता संरक्षण की दशा में भारत सरकार विभिन्न प्रकार के उपभोक्ता साहित्य प्रकाशित करती है। जैसे-उपभोक्ता जागरण, उपभोक्ता के अधिकार आदि।

प्रश्न 5.
उपभोक्ता संरक्षण अथवा गैर सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका (महत्व) पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण हेतु गैर सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका जिसे निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. उपभोक्ता जागरुकता व उपभोक्ता शिक्षा अभियान चलाना।
  2. मिलावट व जमाखोरी के विरुद्ध आवाज उठाना।

प्रश्न 6.
उपभोक्ता संरक्षण के कई तरीके एवं साधन हैं। कोई ऐसे पाँच तरीके लिखें तथा एक उपाय को समझायें।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण के कई तरीके हैं। उनमें से पाँच निम्नलिखित हैं –

  1. व्यवसाय द्वारा स्वयं नियमन
  2. व्यावसायिक संगठन
  3. उपभोक्ता जागरुकता
  4. उपभोक्ता संगठन
  5. सरकार

व्यवसाय द्वारा स्वयं नियमन (Self regulation by business) – विकसित व्यावसायिक इकाइयाँ अब यह समझती है कि उपभोक्ता को भली-भाँति सेवा प्रदान करना उनके अपने दीर्घकालीन हित में है। अतः उन्होंने ग्राहकों की भली – भाँति सेवा करने और उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए अपने स्वयं की उपभोक्ता सेवायें एवं शिकायत कक्षों की स्थापना की है।

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प्रश्न 7.
आप कैसे कह सकते हैं कि उपभोक्ता संरक्षण का क्षेत्र विस्तृत है ?
अथवा
उपभोक्ता संरक्षण का क्षेत्र विस्तृत है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
विस्तृत क्षेत्र (Wide scope)- उपभोक्ता संरक्षण का क्षेत्र विस्तृत है। निम्नलिखित तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं –

  1. यह उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों तथा दायित्वों की जानकारी देता है।
  2. यह उपभोक्ताओं को अपनी शिकायतों को दूर करवाने में सहायता करता है।
  3. उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिये यह न्यायिक तंत्र की व्यवस्था करता है।
  4. यह उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों को संरक्षित करने तथा उन्हें बढ़ाने के लिये संगठित होने तथा अपने संगठन बनाने के लिये प्रेरित करता है।
  5. यह सभी वस्तुओं तथा सेवाओं पर लागू होता है।
  6. इसमें सभी संस्थायें (निजी, सार्वजनिक, सहकारी) सम्मिलित होती है।

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प्रश्न 8.
उपभोक्ता का अधिकार से क्या आशय है ?
उत्तर:
भारत की तुलना में अमेरिका का उपभोक्ता काफी जागरूक व सावधान रहता है क्योंकि भारत की तुलना में वह अधिक शिक्षित राष्ट्र है। वहाँ के उपभोक्ताओं को भारत की तुलना में अधिक व्यापक अधिकार प्राप्त हैं तथा शिकायत करने पर उपचार अतिशीघ्र प्राप्त हो जाता है। अमेरिका में उपभोक्ताओं के अधिकारों पर सर्वाधिक ध्यान वहाँ के भूतपूर्व राष्ट्रपति कैनेडी ने दिया। उन्होंने सर्वप्रथम निम्न चार अधिकारों का पुरजोर समर्थन किया

  1. सुरक्षा का अधिकार
  2. चुनाव का अधिकार
  3. जानने का अधिकार
  4. सुनवाई का अधिकार

कुछ समय पश्चात् ‘मूल्य का अधिकार’ भी वहाँ के अधिनियम में जोड़ दिया गया। उपभोक्ताओं के संरक्षण के संबंध में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘उपभोक्ता संघों का अन्तर्राष्ट्रीय संगठन’ (International organization of consumer union) गठित किया जा चुका है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपर्युक्त पाँच अधिकारों के साथसाथ निम्न तीन अधिकार और जोड़े गये हैं –

  1. उपचार का अधिकार
  2. शिक्षा का अधिकार
  3. स्वस्थ (स्वच्छ) वातावरण का अधिकार।
  4. उपभोक्ता के संरक्षण हेतु आवश्यक होने पर मुकदमा दायर करना।
  5. विभिन्न व्यावसायिक व उपभोक्ताओं से संबंधित सूचनाओं व आँकड़ों का संकलन करना तथा इन सूचनाओं के प्रयोग द्वारा उपभोक्ता संरक्षण का प्रयास करना।
  6. सरकार को उपभोक्ता संरक्षण संबंधी कार्यों में सहयोग प्रदान करना।

प्रश्न 9.
उपभोक्ता संरक्षण के तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सन् 1986 में उपभोक्ताओं के विवादों के समाधान के लिए त्रिस्तरीय अर्द्ध-न्यायिक तंत्र (Threetier quasi-Judicial Machinery) की स्थापना की गई है जो निम्नानुसार है –
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 12 उपभोक्ता संरक्षण IMAGE - 1
प्रश्न 10.
उपभोक्ता संरक्षण के कई उपायों में से एक उपाय उपभोक्ता जागरुकता (Consumer awareness) है। उपभोक्ता जागरुकता का क्या अर्थ है ? उपभोक्ता जागरुकता के लाभ लिखिए।
उत्तर:
उपभोक्ता जागरुकता (Consumer awareness)- उपभोक्ता जागरुकता से अभिप्राय उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों, दायित्वों तथा उनको उपलब्ध उपचारों के बारे में पूरी जानकारी होना है।
उपभोक्ता जागरुकता केलाभ (Advantages of consumer awarness) –

  1. एक जागरुक उपभोक्ता किसी भी अनुचित व्यापार या बेईमान उत्पादकों और व्यापारियों की दोषपूर्ण कार्यवाहियों के विरुद्ध आवाज उठा सकता है।
  2. अपनी जिम्मेदारियों की समझ से उपभोक्ता अपने हितों की रक्षा कर सकता है।

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प्रश्न 11.
उपभोक्ता तथा व्यापारी उपभोक्ताओं का कई तरीके से शोषण करते हैं। शोषण के ऐसे कोई पाँच तरीके लिखिए।
उत्तर:
शोषण के पाँच तरीके निम्न हैं –

  1. उपभोक्ताओं द्वारा घटिया किस्म या नकली उत्पादों को बेचना।
  2. वस्तुओं का वजन उसके पैकेज पर छपी मात्रा से कम होना।
  3. मिलावटी वस्तुएं बेचना।
  4. वस्तुओं के बारे में मिथ्यापूर्ण विज्ञापन देना।
  5. नकली माल बेचना।

प्रश्न 12.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत शिकायत के आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिकायत के आधार (Grounds for complaints) –

  1. अनुचित/प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार
  2. अनुचित व्यापार व्यवहार
  3. दोषयुक्त वस्तुएँ
  4. सेवाओं में न्यूनता
  5. अधिक कीमत लेना
  6. जोखिमपूर्ण वस्तुओं की पूति।

प्रश्न 13.
जिला फोरस की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
जिला फोरम (District forum) – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अनुसार राज्य सरकार प्रत्येक जिले में एक या अधिक जिला फोरम स्थापित कर सकती है। इसकी विशेषताएँ निम्न हैं

  1. इसमें एक अध्यक्ष सहित तीन सदस्य होते हैं जिनमें से एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य है। इनकी नियुक्ति राज्य सरकार करती है।
  2. जिला फोरम में 20 लाख रुपये से कम मूल्य के विवादों से संबंधित शिकायतों का समाधान किया जाता है।
  3. शिकायत उपभोक्ता अथवा किसी उपभोक्ता संघ द्वारा की जा सकती है।

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प्रश्न 14.
उपभोक्ता शिकायत कहाँ दर्ज कराई जा सकती है ?
अथवा उपभोक्ताओं की शिकायतों का निवारण करने वाली न्यायिक प्रणाली के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
भारत में उपभोक्ताओं की शिकायतों को दूर करने की त्रि-स्तरीय न्यायिक प्रणाली स्थापित की गई है।

1.जिला फोरम (District forum)- जिला फोरम में उन शिकायतों को दर्ज कराया जा सकता है जहाँ वस्तुओं या सेवाओं का मूल्य और क्षति के लिए दावे की राशि बीस लाख रुपये तक हो।

2. राज्य आयोग (State commission)- इस आयोग में केवल वही शिकायतें दर्ज कराई जा सकती है जहाँ वस्तुओं या सेवाओं का मूल्य और क्षतिपूर्ति के लिए दावे की राशि बीस लाख से अधिक किंतु एक करोड़ से कम हो। जिला फोरम के विरुद्ध भी अपील की जा सकती है।

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MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण भाव पल्लवन

MP Board Class 12th General Hindi व्याकरण भाव पल्लवन

विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम भाषा है। भाषा और अभिव्यंजना पक्ष पर असाधारण अधिकार रखने वाले व्यक्ति अपने भावों और विचारों को परिष्कृत, सुगठित प्रौढ़ भाषा में संक्षेप में अभिव्यक्त करते हैं। उनके संक्षिप्त कथन में विस्तृत विचारों और गंभीर भावों की अभिव्यक्ति निहित रहती है। उनमें भावों और विचारों की गहराई सूत्र रूप में पिरोई होती है। ये विचार-सूत्र समाज में उक्ति अथवा सूक्ति के रूप में प्रचलित हो जाते हैं। इनमें गागर में सागर भरा होता है। सामान्य जनों को इस प्रकार के गुंथे हुए सूत्रवत एक या एक से अधिक वाक्यों के भाव और विचार स्पष्ट नहीं होते हैं। अब समझने के लिए विचार-सूत्रों के वाक्य अथवा वाक्यों का अर्थ-विस्तार या भाव-विस्तार किया जाता है।

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किसी सुगठित एवं गुम्फित विचार अथवा भाव के विस्तार को पल्लवन कहते हैं।
किसी एक वाक्य या एक से अधिक वाक्यों का पल्लवन करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

  1. मूल वाक्य या अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए।
  2. वाक्य या अवतरण में कोई लोकोक्ति, मुहावरे, अलंकार, रस आदि हो सकते हैं, उन पर ध्यान दीजिए।
  3. पल्लवन काव्य पंक्ति अथवा गद्य पंक्ति किसी का भी किया जा सकता है। उसके केंद्रीय भाव या विचार को समझने का प्रयास कीजिए।
  4. भाव या विस्तार करते समय कथन की पुष्टि हेतु कुछ उदाहरण या तथ्य भी दिए जा सकते हैं।
  5. वाक्य छोटे-छोटे हों और भाषा सरल, स्पष्ट और व्यावहारिक हो।
  6. लेखक या कवि के मूल भाव का ही विस्तार करना उचित है। उसकी आलोचना नहीं करना चाहिए।
  7. पल्लवन हर स्थिति में अन्य पुरुष में कीजिए।
  8. अनावश्यक विस्तार से बचें।
  9. विरामचिह्नों पर ध्यान दें।
  10. पल्लवन हेतु शब्द-चयन सार्थक और प्रभावी है।
  11. पुनरावृत्ति से बचना चाहिए।

उदाहरण
कर्ता से बढ़कर कर्म का स्मारक दूसरा नहीं।

पल्लवन-किसी कर्म का सबसे बड़ा स्मारक उस कर्म को करने वाला अर्थात कर्ता होता है। जब हम किसी कर्म की प्रशंसा करते हैं तो हमारी दृष्टि उस कार्य के कर्ता की ओर जाती है। कर्म को कर्ता से पृथक् करके नहीं देखा जा सकता। जब हमें उसी प्रकार के कार्य करने का सुअवसर प्राप्त होता है तो मार्ग-दर्शन के लिए उसके कर्ता की ओर ध्यान चला जाता है। वह कर्ता हमारा आदर्श बन जाता है। कर्मों द्वारा ही समाज में कर्ता की स्थिति सुदृढ़ और आकर्षक बनती है। भारतीय संस्कृति की पताका विदेशों में फैलाने की चर्चा होती है तो स्वतः ही हमारा ध्यान स्वामी विवेकानंद की ओर आकर्षित हो जाता है। अतः कर्म का स्मारक कर्ता के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता है।

अन्य उदाहरण

1. महत्त्वाकांक्षा मनुष्य का असाध्य रोग है।
2. प्रेम में घनत्व अधिक है तो श्रद्धा में विस्तार।
3. आचरण सज्जनता की कसौटी है।
4. सद्भावना टूटे हृदय को जोड़ती है।
5. कर्ता से बढ़कर कर्म का स्मारक दूसरा नहीं।
6. मनुष्य जितना देता है, उतना ही पाता है। प्राण देने से प्राण मिलता है और मन देने से मन मिलता है।
7. आशा उस घास की भाँति है जो ग्रीष्म में ताप से जल जाती है।
8. सत्ता की भूख ज्ञान की वर्तिका को बुझा देती है।
9. लोभ सामान्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख।
10. नियम जीवन-वाटिका की रक्षा-परिधि है।
11. बंधन सर्वत्र होते हैं किन्तु जो मनुष्य उन्हें शक्ति मानकर चलता है वही सबल होता है।
12. प्रसिद्धि मनुष्य की शांति की सबसे बड़ी शत्रु है जो उसके हृदय की कोमलता का हनन करती है।
13. विदेशी भाषा का विद्यार्थी होना बुरा नहीं, पर अपनी भाषा सर्वोपरि है।
14. उपकार शील का दर्पण है।
15. प्रेम में घनत्व अधिक है तो श्रद्धा में विस्तार।
16. दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात।
17. दुःख की छाया एक तरह की तपस्या ही है, उससे आत्मा शुद्ध होती है।
18. मंदिर एक उपासना स्थल है, जहाँ मनुष्य अपने आपको ढूँढ़ता है।
19. विश्वासपात्र मित्र जीवन की औषधि है।
20. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

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21. जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।
22. होनहार बिरवान के होत चीकने पात।
23. हिंसा बुरी चीज है, पर दासता उससे भी बुरी है।
24. तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर।
25. लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहिं चले कपूत।
लीक छाँड़ि तीनों चलें, शायर, सिंह, सपूत॥
26. जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि।
27. कायर भाग्य की और वीर पुरुषार्थ की बात करते हैं।
28. भाग्यवाद आवरण पाप का और शस्त्र शोषण का।
29. लघुता से प्रभुता मिले प्रभुता से प्रभु दूर।
30. जीवन का नियम स्पर्धा नहीं, सहयोग है।
31. आँखों में हो स्वर्ग लेकिन पाँव पृथ्वी पर टिके हों।
32. महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में पलता है।
33. भविष्य वर्तमान के द्वारा खरीदा जाता है।
34. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
35. करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
36. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
37. हम नदी के द्वीप हैं, धारा नहीं हैं।
हम बहते नहीं, क्योंकि बहना रेत होना है।
38. आनंद के झरने का उद्गम अपने भीतर है, बाहर नहीं।
39. आलस्य जीवित व्यक्ति का कफन है।
40. वाणी का भूषण ही भूषण है।
41. चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग।
42. खोजी मनुष्य के लिए समुद्र सूख जाता है, पहाड़ झुक जाता है।
43. धर्म और जाति का भेद संकीर्ण विचारों के स्वार्थ की उपज है।
44. धर्म का भूषण वैराग्य है, वैभव नहीं।
45. राष्ट्रभाषा के अभाव से पराधीनता की याद ताजा बनी रहती है।
46. भाषा विचार की पोशाक है।
47. यह सत्य ही है, देवता उसी की सहायता करते हैं, जो परिश्रम करता है।

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48. युद्ध असभ्य लोगों का व्यापार है।
49. जीवन अमरता का शैशवकाल है।

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