MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 5 उधार का अनंत आकाश

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 5 उधार का अनंत आकाश (व्यंग्य, शरद जोशी)

उधार का अनंत आकाश अभ्यास

बोध प्रश्न

उधार का अनंत आकाश अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यह पाठ किन लोगों को लक्ष्य करके लिखा गया है?
उत्तर:
यह पाठ उधार लेने वाले तथा उधार देने वालों को लक्ष्य करके लिखा गया है।

प्रश्न 2.
लेखक के अनुसार मनुष्य और पशु में क्या अन्तर है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार मनुष्य और पशु में यह अन्तर है कि मनुष्य तो उधार लेता है पर पशु नहीं।

प्रश्न 3.
लेखक ने इस पाठ में अन्वेषी’ किसे कहा है?
उत्तर:
लेखक ने इस पाठ में उधार लेने वाले को अन्वेषी कहा है।

प्रश्न 4.
मानव जाति किन दो भागों में बँटी हुई है?
उत्तर:
मानव जाति उधार लेने वाले और उधार देने वाले दो भागों में बँटी हुई है।

प्रश्न 5.
अमेरिका की खोज किसने की थी?
उत्तर:
अमेरिका की खोज ‘कोलम्बस’ ने की थी।

प्रश्न 6.
कर्ज से दबा हुआ आदमी क्या खोजता है?
उत्तर:
कर्ज से दबा हुआ आदमी निराश होकर आत्महत्या का रास्ता खोजता है।

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उधार का अनंत आकाश लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक ने उधार लेने को आशावादिता का प्रमाण क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक ने उधार लेने को आशावादिता का प्रमाण इसलिए कहा है कि जो व्यक्ति अपने जीवन से निराश हो जाता है, वह आत्महत्या जैसे पाप को करता है लेकिन जो आशावान व्यक्ति है वह उधार ले लेकर अपने जीवन को सुखद एवं गतिशील बनाये रखता है। सम्पूर्ण संसार की उन्नति उधार पर ही टिकी हुई है।

प्रश्न 2.
व्यक्ति लाइट वेट चैम्पियन’ से कब ‘हेवीवेट चैम्पियन’ बनता है?
उत्तर:
व्यक्ति ‘लाइट वेट चैम्पियन’ से तभी ‘हेवीवेट चैम्पियन’ बनता है जब वह कर्ज को भार नहीं मानता है अपितु उससे उत्साहित होता जाता है। आज जिसने सौ रुपये कर्ज लिए हैं वहीं कल हजार रुपये कर्ज लेगा और इस प्रकार धीरे-धीरे वह ‘लाइटवेट चैम्पियन’ से ‘हैवीवेट चैम्पियन’ बन जाएगा।

प्रश्न 3.
किसी भारतीय को चाँद पर भेजने के पीछे लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
किसी भारतीय को रॉकेट में बिठाकर चाँद पर भेजने के पीछे लेखक का यह आशय है कि भारतीय लोग उधार की विद्या में बड़े पारंगत होते हैं वे वहाँ जाकर भी कुछ-न-कुछ उधार ले आएँगे।

प्रश्न 4.
लेखक के अनुसार उधार लौटाने वाले परिहास के पात्र क्यों होते हैं?
उत्तर:
उधार लौटाने वाले परिहास के पात्र इसलिए होते हैं क्योंकि ऐसे लोग जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते क्योंकि वे धारा के विरुद्ध तैरने का प्रयास करते हैं। उधार की धारा सतत् प्रवाहित रहती है और इसी से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक जीवन के खेत हरे-भरे रहते हैं। यह एक ऐसी धारा है जो मनुष्य को जीवन्त रखती हैं। इस देश में पुनर्जन्म का सिद्धान्त चलता है अतः उधार कला विशेषज्ञों को यह नयी भूमि प्रदान करता है। उधार लेने वाला और देने वाला दोनों ही सोचते हैं कि यदि किसी कारण उधार का हिसाब इस जन्म में चुकता नहीं हुआ तो अगले जन्म में हो जाएगा अतः वे निश्चिन्त रहते हैं। इसी कारण उनमें आशावादिता का संचार रहता है और निराशा उनसे कोसों दूर रहती है।

प्रश्न 5.
‘हमें कर्ज के पानी से निकालोगे तो हम तड़पने लगेंगे’ का अर्थ बताइए।
उत्तर:
इस कथन का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति सिर से पैर तक कर्ज में उसी तरह डूबा हुआ है जैसे मछली पानी में डूबी रहती है। मछली का पानी में डूबे रहना ही उसका सफल जीवन है। इसी प्रकार मनुष्य का भी कर्ज में डूबे रहना उसका सफल जीवन है। यदि कर्ज में डूबे मनुष्य को कर्ज से निकाला तो वह मछली के समान बिना पानी के तड़पने लगेगा। कहने का भाव यह है कि उसे तो सच्चा सुख कर्ज में डूबे रहने पर ही मिलता है।

उधार का अनंत आकाश दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्रेडिट फेसिलिटी’सेलेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
क्रेडिट फेसिलिटी’ से लेखक का आशय है ‘उधार की सुविधा’। कहने का भाव यह है कि हमारे देश में ‘उधार की सुविधा’ मजबूत है क्योंकि यहाँ पुनर्जन्म का सिद्धान्त चलता है। आदमी जानता है कि अगर इस जन्म में नहीं चुका सके तो अगले जन्म में चुका देंगे। मनुष्य की आत्मा स्थायी पूँजी है इसकी साख पर हम कितना भी उधार ले सकते हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए।
(क) “हम सिर से पैर तक कर्ज में डूबे रहते हैं पर क्या मछली को आप पानी में डुबो सकते हैं। वही तो उसका जीवन है। हमें कर्ज के इस पानी से निकालोगे तो हम तड़पने लगेंगे। हम फिर पानी में कूदेंगे यानी कर्ज ले लेंगे।”
उत्तर:
लेखक कहता है कि जिस व्यक्ति को कर्ज लेने का चस्का लग जाता है वह उसके बिना जीवित नहीं रह सकता। कर्ज में डूबे व्यक्ति की तुलना लेखक पानी में रहने वाली मछली से करते हुए कहता है कि जिस प्रकार मछली सदैव पानी में डूबी रहती है, बिना पानी के वह जीवित ही नहीं रह सकती उसी प्रकार जिस व्यक्ति को कर्ज लेने की आदत पड़ जाती है, वह उसके बिना जीवित ही नहीं रह सकता। चाहे कोई व्यक्ति सिर से लेकर पैर तक कर्ज में डूबा हुआ क्यों न हो वह उसी में अपने जीवन की सार्थकता समझता है।

जिस प्रकार पानी के बिना मछली का जीवित रहना सम्भव नहीं है उसी प्रकार उधार लेने वाले का भी जीवन बिना उधार के सम्भव नहीं है। यदि हमने कर्जदार को कर्ज रूपी पानी से बाहर निकाल दिया तो वह उसी प्रकार तड़पने लगेगा जिस प्रकार बिना पानी के मछली तड़पती है। अत: कर्जदार के जीवन को बचाने के लिए एक ही मार्ग है कि उसे पुन: उसी जाल में फंसा दिया जाए जिससे वह निकाला गया था अर्थात् उसे पुनः कर्ज के व्यूह में फंसा दिया जाए।

(ख) “उधार की सीमा आकाश है, चाँद हैं, तारे हैं, हमें मिलेगा, मिलता रहेगा, देखो वह चाँद की ओर एक रॉकेट चला। कोई इसमें किसी भारतीय को बिठा दें।”
उत्तर:
लेखक कहता है कि उधार की कोई सीमा नहीं होती अर्थात् वह सीमा रहित होती है। उधार लेना उतना ही असीम है जितना कि आकाश। चन्द्रमा और तारे जिस प्रकार आकाश में अपनी चमक सदैव बनाये रखते हैं उसी प्रकार इस देश में उधार की चमक भी सदैव बनी रहेगी। उधार हमें पहले भी मिला था आज भी मिल रहा है और भविष्य में भी मिलता रहेगा। इस देश के लोगों की अक्ल की दाद देनी होगी कि वे प्रत्येक स्थिति और समय पर उधार लेने का सुयोग बना लेते हैं।

चाहे चन्द्रमा की ओर जाने वाला रॉकेट ही क्यों न हो। आप उस रॉकेट में भारतीय व्यक्ति को बिठा दीजिए। वह वहाँ से भी कुछ-न-कुछ उधार लेकर ही आयेगा। यह संसार कितना सुखमय है कि यहाँ उधार का कोई टोटा नहीं है। यह आकाश कितना असीम फैला हुआ है इसी के समान हमें उधार देने वालों की कोई कमी नहीं है। बस हमारे मन में केवल यह भावना होनी चाहिए कि हमें अभी थोड़ा-सा कर्ज चाहिए। इस अनोखे वचन के बोलते ही आपकी सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी।

प्रश्न 3.
‘उधार का अनन्त आकाश’ में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक ने इस पाठ के माध्यम से उधार लेने तथा न लौटाने की वृत्ति पर करारे प्रहार किये हैं। इसके द्वारा वे कहना चाहते हैं कि जैसे आकाश का अन्त नहीं होता है वैसे ही उधार लेने की कोई सीमा नहीं होती है।

उधार लेना और उसे न लौटाना दोनों ही कला हैं। जो उधार लेता है, वह निरन्तर प्रयास, धीरज और व्यवहार कुशलता के सहारे उसे न लौटाने में भी सिद्द हो जाता है। लेखक व्यंग्यात्मक लहजे में लिखते हैं कि उधार लेना आशावादी दृष्टि का परिचायक है और उधार न लेना निराशा का प्रतीक है। लेखक इस पाठ में निहित व्यंग्य को व्यक्त करते हुए आगे कहते हैं कि उधार लेने वाला शोधकर्ता होता है। वह उधार लेने के लिए नये-नये उपाय खोजता है। विकास के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए नये-नये मार्ग खोजने से ही काम चलेगा। लेखक व्यंग्य की उच्चता को स्पर्श करता हुआ कहता है, कि इस देश में उधार की अपार सम्भावना है।

प्रश्न 4.
“ओह! यह सृष्टि कितनी सुखमय है, पर आकाश कितना असीम फैला है और फिलहाल हमें थोड़ा-सा कर्जचाहिए।” इस पंक्ति की सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
लेखक कहता है कि उधार की कोई सीमा नहीं होती अर्थात् वह सीमा रहित होती है। उधार लेना उतना ही असीम है जितना कि आकाश। चन्द्रमा और तारे जिस प्रकार आकाश में अपनी चमक सदैव बनाये रखते हैं उसी प्रकार इस देश में उधार की चमक भी सदैव बनी रहेगी। उधार हमें पहले भी मिला था आज भी मिल रहा है और भविष्य में भी मिलता रहेगा। इस देश के लोगों की अक्ल की दाद देनी होगी कि वे प्रत्येक स्थिति और समय पर उधार लेने का सुयोग बना लेते हैं। चाहे चन्द्रमा की ओर जाने वाला रॉकेट ही क्यों न हो। आप उस रॉकेट में भारतीय व्यक्ति को बिठा दीजिए। वह वहाँ से भी कुछ-न-कुछ उधार लेकर ही आयेगा। यह संसार कितना सुखमय है कि यहाँ उधार का कोई टोटा नहीं है। यह आकाश कितना असीम फैला हुआ है इसी के समान हमें उधार देने वालों की कोई कमी नहीं है। बस हमारे मन में केवल यह भावना होनी चाहिए कि हमें अभी थोड़ा-सा कर्ज चाहिए। इस अनोखे वचन के बोलते ही आपकी सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी।

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उधार का अनंत आकाश भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
पाठ में बड़ी-छोटी, सुख-दुःख शब्द आये हैं, आप भी ऐसे पाँच शब्द सोचकर लिखो जिनमें किसी शब्द का विलोम शब्द शामिल हो।
उत्तर:

  1. आशा – निराशा
  2. हानि – लाभ
  3. जीवन – मृत्यु
  4. जय – पराजय
  5. सुपुत्र – कुपुत्र।

प्रश्न 2.
नीचे नाक से सम्बन्धित कुछ मुहावरे दिए गए हैं, इनके अर्थ समझकर प्रत्येक मुहावरे से वाक्य बनाइए।
उत्तर:

  1. नाकों चने चबाना-नदी पर पुल बाँधने पर इंजीनियरों को नाकों चने चबाने पड़े।
  2. नाक में दम करना-आज नौकर ने मालिक की नाक में दम कर दिया है।
  3. नाक रखना-हमें हर हाल में अपनी नाक रखनी चाहिए।
  4. नाक ऊँची करना-हमें हमेशा ऐसे काम करने चाहिए जिससे हमारी नाक ऊँची हो।
  5. नाक नीची करना-हमें कभी भी ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिससे हमारी नाक नीची हो।
  6. नाक-भौं एक करना-अधिक काम आ पड़ने पर रमेश ने अपनी नाक-भौं एक कर ली है।
  7. नाक चढ़ाना-सतीश से जब भी कोई काम करने कहो वह हमेशा नाक चढ़ा लिया करता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए।
उत्तर:
सिर्फ = केवल; कर्ज = ऋण; इंकार = अस्वीकार; शरीफ = सज्जन; शराफत = सज्जनता; खुद = स्वयं।

प्रश्न 4.
‘सूझ-बुझ’ ‘एक-दूसरे’ जैसे शब्द युग्मों में योजक चिन्ह का प्रयोग हुआ है। इस पाठ से योजक चिन्ह वाले अन्य शब्द युग्म ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर:
धीरे-धीरे; बड़ी-छोटी; छोटे-मोटे; जीवन-शक्ति; लेन-देन; लेता-देता।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग और प्रत्यय अलग करके लिखिए-
राष्ट्रीय, आशावादिता, व्यर्थता, परिहास, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, परिस्थिति, परिपूर्ण।
उत्तर:
राष्ट्रीय = य
आशावादिता = ता, (प्रत्यय)
व्यर्थता = ता
परिहास = परि (उपसर्ग)
सामाजिक = इक
आर्थिक = इक
राजनैतिक = इक
परिस्थिति = परि उपसर्ग
परिपूर्ण = परि (उपसर्ग)।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द विलोम
जीवन मरण
आशा निराशा
प्रसिद्ध गुमनाम, अप्रसिद्ध
आकाश पाताल
सफल असफल
पुरानी नई।

प्रश्न 7.
वह धन-धान्य से सम्पन्न था तथा अन्य क्षेत्र में अन्न का व्यापार करता था।
ऊपर लिखे रेखांकित शब्द देखने में मिलते-जुलते लगते हैं पर उनके अर्थ भिन्न हैं। नीचे इस तरह कुछ समरूपी शब्द दिए गए हैं, वाक्य बनाकर उनके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ओर – हिमालय उत्तर दिशा की ओर स्थित है।
और – राम और श्याम गंगा नहाने गये हैं।
अंश – इस पाठ के एक अंश में यह कहा गया है।
अंस – बैल के अंस बड़े पुष्ट होते हैं।
भवन – राजा का भवन संगमरमर का बना हुआ था।
भुवन – भगवान तीनों भुवनों के मालिक हैं।
में – दिन में धूप तेज पड़ती है।
मैं – मैं और गोपाल सिनेमा जा रहे हैं।
सकल – भगवान ने पृथ्वी पर सकल पदार्थ बनाये हैं।
शक्ल – उसकी शक्ल राम से मिलती-जुलती है।

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उधार का अनन्त आकाश संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) मानव जाति दो भागों में बँटी है वे जो उधार देते हैं और वे जो उधार लेते हैं। मनुष्य और मनुष्य के बीच सारी बड़ी-छोटी खाइयाँ उधार के छोटे-मोटे पुलों से बँधी हैं। जब ये पुल टूट जाएँगे, आदमी अकेला हो जाएगा।

कठिन शब्दार्थ :
खाइयाँ = दूरियाँ; पुल = माध्यम।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘उधार का अनन्त आकाश’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्री शरद जोशी हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने बताया है कि संसार के सभी मनुष्य दो वर्गों में बँटे हुए हैं-एक उधार लेने वाला और दूसरा उधार देने वाला।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि सम्पूर्ण मानव जाति दो वर्गों में विभक्त है। एक वर्ग वह है जो उधार देता है और दूसरा वर्ग वह है जो उधार लेता है। मनुष्यों का आपसी व्यवहार उधार के इन्हीं छोटे-मोटे पुलों से जुड़ा हुआ है और जब ये उधार रूपी पुल टूट जाएँगे तो मनुष्य दुनिया में अकेला ही रह जाएगा।

विशेष :

  1. उधार लेना-देना मानव की बुनियादी समस्या है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) हम सिर से पैर तक कर्ज में डूबे रहते हैं पर क्या मछली को आप पानी में डूबी कह सकते हैं? वही तो उसका जीवन है। हमें कर्ज के इस पानी से निकालो तो हम तड़पने लगेंगे। हम फिर पानी में कूदेंगे यानी कर्ज ले लेंगे।

कठिन शब्दार्थ :
कर्ज = उधार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मानना है कि जिन्हें कर्ज लेने की आदत पड़ जाती है, उसके बिना उनके जीवन की कल्पना ही नहीं हो सकती।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जिस व्यक्ति को कर्ज लेने का चस्का लग जाता है वह उसके बिना जीवित नहीं रह सकता। कर्ज में डूबे व्यक्ति की तुलना लेखक पानी में रहने वाली मछली से करते हुए कहता है कि जिस प्रकार मछली सदैव पानी में डूबी रहती है, बिना पानी के वह जीवित ही नहीं रह सकती उसी प्रकार जिस व्यक्ति को कर्ज लेने की आदत पड़ जाती है, वह उसके बिना जीवित ही नहीं रह सकता। चाहे कोई व्यक्ति सिर से लेकर पैर तक कर्ज में डूबा हुआ क्यों न हो वह उसी में अपने जीवन की सार्थकता समझता है।

जिस प्रकार पानी के बिना मछली का जीवित रहना सम्भव नहीं है उसी प्रकार उधार लेने वाले का भी जीवन बिना उधार के सम्भव नहीं है। यदि हमने कर्जदार को कर्ज रूपी पानी से बाहर निकाल दिया तो वह उसी प्रकार तड़पने लगेगा जिस प्रकार बिना पानी के मछली तड़पती है। अत: कर्जदार के जीवन को बचाने के लिए एक ही मार्ग है कि उसे पुन: उसी जाल में फंसा दिया जाए जिससे वह निकाला गया था अर्थात् उसे पुनः कर्ज के व्यूह में फंसा दिया जाए।

विशेष :

  1. लेखक का मानना है कि कर्ज लेना भी जीवन-यापन का एक अनोखा ढंग है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(3) उधार ही वह धारा है जो सतत् चली आ रही है और हमारे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक जीवन के खेत उससे लहलहा रहे हैं। यह जीवनधारा है। इस देश में उधार के लिए सबसे अच्छी परिस्थितियाँ हैं। क्योंकि यहाँ पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर विश्वास है। आदमी जानता है कि अगर इस जन्म में नहीं चुका सके तो अगले जन्म में चुका देंगे। ऐसी ‘क्रेडिट फेसिलिटी’ किस धर्म में मिली होगी? आत्मा स्थायी पूँजी है जो अमर है। इसकी साख पर हम कोई भी सौदा कर सकते हैं। शरीर एक बटुआ है जो सिक्के लेता-देता रहता है। महत्त्व बटुए का नहीं, उस लेन-देन की प्रथा का है। प्रथा बनी रही तो बटुए तो नये आते रहेंगे।

कठिन शब्दार्थ :
सतत् = निरन्तर; पुनर्जन्म का सिद्धान्त = मरने के पश्चात् आदमी पुनः जन्म लेता है; क्रेडिट फेसिलिटी (अंग्रेजी का शब्द है-Credit facility) = उधार की सुविधा; साख = क्रेडिट, भरोसा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक इस अंश में यह बताना चाहता है कि उधार की धारा अनन्त काल से चली आ रही है, पुनर्जन्म के सिद्धान्त के कारण यह इस देश में खूब पनप रही है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि उधार लेने की आदत जिस व्यक्ति को पड़ जाती है, वह निरन्तर उधार लेता चला जाता है। ऐसे व्यक्ति चाहे सामाजिक क्षेत्र के हों, चाहे आर्थिक क्षेत्र (उद्योग-धन्धे वाले) और चाहे राजनैतिक दलों से सम्बन्धित हों, वे सब इस उधार रूपी कृषि को उगाते रहते हैं। उनके जीवन की यह धारा सतत् रूप से प्रवाहित होती रहती है। कहने का भाव यह है कि जिसे एक बार उधार लेने का चस्का लग जाता है वह सदैव उसी में गोते लगाता रहता है। हमारे देश में उधार लेने वालों की एक विशाल संख्या है। इस देश का पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी उधार की इस भावना को अच्छी तरह पुष्पित करता है। क्योंकि उधार लेने वाला व्यक्ति जानता है कि यदि किसी कारण हम इस जन्म में उधार चुका सके तो कोई बात नहीं अगले जन्म में उधार चुका देंगे। इस प्रकार की उधारी की सुविधा किसी अन्य धर्म में नहीं है। उधार लेने वाले व्यक्ति की आत्मा अमर है और वह ऋण लेने को सौदेबाजी के लिए एक स्थायी पूँजी का कार्य करती है। आत्मा रूपी स्थायी पूँजी के बल पर उधार लेने वाले किसी भी प्रकार का सौदा कर सकते हैं।

व्यंग्यात्मक शैली में लेखक कहता है कि यह शरीर आत्मा रूपी सिक्के का बटुआ है। इस शरीर रूपी बटुए से सिक्कों का आदान-प्रदान होता रहता है। असली बात यह है कि बटुए का कोई मूल्य नहीं है, मूल्य तो लेन-देन की उस प्रथा का है जो इस देश में निरन्तर बनी हुई है। ये बटुए रूपी शरीर तो नित्य आते-जाते रहते हैं अर्थात् मानव विभिन्न शरीरों को समय-समय, पर धारण करता रहता है। अत: उधार की इस पद्धति को हमें सदैव बनाये रखना चाहिए।

विशेष :

  1. लेखक का मत है कि भारत देश में उधार के व्यवसाय के लिए परिस्थितियाँ बहुत अनुकूल हैं।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।
  3. व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

(4) आज जिसने सौ रुपए कर्ज लिया है, वह कल हजार रुपए लेगा। कर्ज आदमी को उत्साहित करता है। वह भार नहीं है। वह तो गैस का बड़ा गुब्बारा है; जो हमें भूमि से आकाश की सैर कराता है। गुब्बारा कितना ही बड़ा हो, भार नहीं होता।

कठिन शब्दार्थ :
उत्साहित = उत्साह बढ़ाता है; भूमि = पृथ्वी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मत है कि जिस व्यक्ति को उधार लेने का चस्का लग जाता है, वह उससे विमुख नहीं होता है।

व्याख्या :
लेखन का कथन है कि जब व्यक्ति में कर्ज लेने की आदत पड़ जाती है तो वह फिर उससे अपना नाता नहीं तोड़ता है बल्कि वह इस प्रक्रिया को आगे-ही-आगे बढ़ाता रहता है। प्रारम्भ में वह कम उधार लेता है फिर धीरे-धीरे उसकी यह हवस बढ़ती जाती है सौ से हजार, हजार से लाख और इसी प्रकार यह परिधि बढ़ती जाती है। उधार के धन को वह बोझ नहीं मानता है। उधार लेना बड़े आकार वाले गुब्बारे के समान होता है जिसमें गैस भरी रहती है। उस गैस भरे गुब्बारे रूपी कर्जदार को आकाश की सैर करने को छोड़ दिया जाता है। वह गुब्बारा बड़े-से-बड़ा तो हो सकता है पर उसमें भार नहीं होता है।

विशेष :

  1. उधार का चस्का जब एक बार लग जाता है तब वह समाप्त नहीं होता है अपितु दिन-दूना बढ़ता जाता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(5) उधार की सीमा आकाश है, चाँद हैतारे हैं, हमें मिलेगा, मिलता रहेगा। देखो, वह चाँद की ओर एक रॉकेट चला। इसमें कोई किसी भारतीय को बिठा दे। वे कुछ लेकर आएँगे; ओह! यह सृष्टि कितनी सुखमय है। यह आकाश कितना असीम फैला है और फिलहाल हमें थोड़ा-सा कर्ज चाहिए।

कठिन शब्दार्थ :
फिलहाल = अभी, इसी समय; सृष्टि = प्रकृति; असीम = अनन्त।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि उधार की कोई सीमा नहीं होती अर्थात् वह सीमा रहित होती है। उधार लेना उतना ही असीम है जितना कि आकाश। चन्द्रमा और तारे जिस प्रकार आकाश में अपनी चमक सदैव बनाये रखते हैं उसी प्रकार इस देश में उधार की चमक भी सदैव बनी रहेगी। उधार हमें पहले भी मिला था आज भी मिल रहा है और भविष्य में भी मिलता रहेगा। इस देश के लोगों की अक्ल की दाद देनी होगी कि वे प्रत्येक स्थिति और समय पर उधार लेने का सुयोग बना लेते हैं। चाहे चन्द्रमा की ओर जाने वाला रॉकेट ही क्यों न हो। आप उस रॉकेट में भारतीय व्यक्ति को बिठा दीजिए। वह वहाँ से भी कुछ-न-कुछ उधार लेकर ही आयेगा। यह संसार कितना सुखमय है कि यहाँ उधार का कोई टोटा नहीं है। यह आकाश कितना असीम फैला हुआ है इसी के समान हमें उधार देने वालों की कोई कमी नहीं है। बस हमारे मन में केवल यह भावना होनी चाहिए कि हमें अभी थोड़ा-सा कर्ज चाहिए। इस अनोखे वचन के बोलते ही आपकी सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी।

विशेष :

  1. लेखक व्यंग्य करता है कि उधार से बढ़िया पूँजी कोई नहीं है क्योंकि इसे लौटाने की कोई चिन्ता नहीं रहती है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 4 नारियल

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 4 नारियल (ललित निबन्ध, विद्यानिवास मिश्र)

नारियल अभ्यास

बोध प्रश्न

नारियल अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार अनुष्ठान के मांगलिक द्रव्यों की सूची में कौन-सी चीज है? जो अवश्य रखी जाती है।
उत्तर:
अनुष्ठान के मांगलिक द्रव्यों की सूची में नारियल को अवश्य रखा जाता है।

प्रश्न 2.
नारियल कहाँ का वृक्ष है?
उत्तर:
नारियल उष्ण कटिबन्ध का वृक्ष है।

प्रश्न 3.
नारियल का फल कैसा होता है?
उत्तर:
नारियल का फल ऊपर से कठोर एवं शुष्क होता है पर भीतर से एकदम रसपूर्ण होता है।

प्रश्न 4.
‘वंश’ शब्द के क्या अर्थ हैं?
उत्तर:
‘वंश’ शब्द के दो अर्थ हैं-बाँस और पुत्र।

प्रश्न 5.
भारवि की प्रशंसा में मल्लिनाथ की उक्ति क्या है?
उत्तर:
भारवि की प्रशंसा में मल्लिनाथ की उक्ति है कि भारवि की अर्थ गम्भीर वाणी नारियल के फल की तरह ऊपर से कठोर और भीतर से एकदम रसपूर्ण है।

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नारियल लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तमिलनाडु में लेखक को क्या-क्या देखने को मिला?
उत्तर :
तमिलनाडु में लेखक को भारत के समुद्र की तटरेखा देखने को मिली। यह तटरेखा पल्लवों के ऐश्वर्य की छाँह में नारियल के पेड़ों की पंक्ति से युक्त थी।

प्रश्न 2.
नारियल को पिता के प्यार से जोड़ने के पीछे जो दृष्टि है वह क्या है और क्यों?
उत्तर:
नारियल को पिता के प्यार से जोड़ने के पीछे लोक चेतना की गहरी जीवन दृष्टि है जो अनुशासन को महत्त्व देती है, अनुशासित वात्सल्य को महत्व देती है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन में कठोर अनुशासन तो हो पर साथ ही दूसरों को सुख देने की मधुर कामना भी हो तभी जीवन सार्थक एवं सफल माना जाएगा।

प्रश्न 3.
नारियल के ‘भाव बन्धन’ से लेखक का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
नारियल के ‘भाव बन्धन’ से लेखक का यह तात्पर्य है कि जब हम अपने किसी पूज्य या सम्मानित व्यक्ति को नारियल भेंट करते हैं तो उसके पीछे यह भाव होता है कि तुम हमारे जीवन में अन्तर्निहित सम्पूर्ण श्रद्धा की भावना को ले जाओ और श्रद्धा से आबद्ध व्यक्ति सदैव गतिशील रहता है, वह कभी भी रुकता नहीं है।

नारियल दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित गद्य खण्डों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) इसमें वह कठोरता ………………… आँख न हो।
उत्तर:
सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘नारियल’ पाठ लेख से लिया गया है। इसके लेखक पं. विद्यानिवास मिश्र हैं।

प्रसंग :
लेखक ने इस अंश में नारियल के रूप में छिपी हुई भावनाओं पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि नारियल का फल मांगलिक कार्यों में प्रयोग में लाया जाता है। मांगलिक का अर्थ मधुर होना है। पर यहाँ यह भी बताया गया है कि उसका अर्थ मधुर होना
तो है ही साथ ही उसमें कठोरता का होना भी अनिवार्य माना गया है। क्योंकि कठोरता के अभाव में मधुरता की रक्षा नहीं हो सकती। यदि उसमें कठोरता होगी तो वह ताप को तथा अन्य अनेक प्रकार की कुत्सित (बुरी) दृष्टियों को भी सरलता से झेल सकेगी। इसके साथ ही उसमें हर चीज को गहनता से देखने हेतु एक तीसरा नेत्र भी हो। नारियल में तीन आँखें होती हैं, इसी ओर लेखक का इशारा है।

(ब) कठोरता के बिना …………….. द्रव नहीं बनता।
उत्तर:
सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जीवन में मधुरता की रक्षा कठोरता ही कर सकती है अतः मानव को मधुर एवं सहज होने के साथ-ही-साथ कठोर एवं संयमित भी होना चाहिए। ताप या कष्टों के झेल लेने के पश्चात् ही मधुर रस का जन्म होता है। अतः मनुष्यों को नारियल के समान ऊपर से शुष्क एवं कठोर होना चाहिए तथा अन्दर से रससिक्त।

(स) ऋतु चक्र …………… पर ही होता है।
उत्तर:
लेखक कहता है कि यह हिन्दुस्तान देश अपने आपमें अनोखा है। इसकी पहचान इसमें बहने वाली नदियों से होती है या इस देश में पायी जाने वाली वनस्पतियों से होती है। इसके देशकाल की जानकारी यहाँ बहती हुई नदियाँ अथवा यहाँ पर पाये जाने वाले बड़े वृक्षों से होती है। कौन-सी ऋतु कब आ रही है। उसका आभास सबसे पहले वनस्पतियाँ ही देती हैं। यथा-सरसों के फूलने पर या नये-नये पत्तों के आने पर बसन्त ऋतु के आगमन की सूचना मिल जाती है उसी प्रकार पत्तों के वृक्षों से पृथ्वी पर गिरने से हमें पतझड़ की सूचना मिल जाती है।

प्रश्न 2.
‘नारियल’ विषय पर संक्षिप्त आलेख लिखिए।
उत्तर:
‘नारियल’ का हमारी संस्कृति में विशेष महत्त्व है। सभी मांगलिक कार्यों में; यथा-हवन में, कथा में, विवाह में, पूजा में, मकान, दुकान के शुभ मुहूर्त आदि सभी में नारियल की महत्ता मानी जाती है।

नारियल का फल उष्ण कटिबन्ध का फल है। समुद्र तटीय इलाकों में इसकी खूब पैदावार होती है। यह देखने में ऊपर से शुष्क एवं कठोर होता है पर भीतर से एकदम मधुर होता है। लेखक का मानना है कि कर्तव्यपरायण व्यक्ति भी नारियल के ही समान होता है। वह कर्तव्यपालन में अनुशासन एवं आत्म संयम पर बल देता है साथ ही अन्दर से वह कोमल एवं मधुर तथा परोपकारी होता है। इस प्रकार अनुशासन रखते हुए भी वह कल्याणकारी कार्य करता है। इसी कारण मांगलिक कार्यों में नारियल को विशेष महत्त्व दिया गया है।

नारियल की तुलना पिता से की गयी है। पिता भी नारियल के समान ही ऊपर से कठोर एवं अनुशासन प्रिय होता है पर भीतर से दयार्द्र एवं कोमल होता है। समाज के लोगों को भी अपना जीवन नारियल के अनुरूप बनाना चाहिए।

प्रश्न 3.
‘पिता’ की तुलना नारियल की किस प्रकृति विशेष से की है और क्यों?
उत्तर:
पिता की तुलना नारियल की उस प्रकृति विशेष से की है जिसमें नारियल ऊपर से तो शुष्क एवं कठोर दिखाई देता है पर भीतर से मधुर रस से पूर्ण होता है। उसी तरह पिता भी अनुशासन का प्रबल समर्थक होने के कारण ऊपर से शुष्क एवं कठोर दिखाई देता है पर इस अनुशासन की कठोरता धारण करता हुआ पिता बालक के हित एवं कल्याण की भावना अपने अन्त:करण में संजोये रखता है। अनुशासन के मूल में दूसरों के हित की भावना भरी हुई है। अतः जीवन में अनुशासन पिता के समान ही होना चाहिए।

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नारियल भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों की शुद्ध वर्तनी लिखिएसारथकता, रितु, रिणियों, मधूर।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण img 4

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिएपिपरा, इमलिया।
उत्तर:
शब्द            हिन्दी मानक रूप
पिपरा          पीपल
इमलिया       इमली

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम रूप लिखिएसिंचन, तपन, भोग, गाँव, मधुर।
उत्तर:

शब्द विलोम
सिंचन असिंचन
तपन शीत
भोग योग
गाँव नगर
मधुर कटु

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
वनस्पति, मधुरता, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, वंश वृक्ष, अभिनन्दन।
उत्तर:
वनस्पति – पर्वतीय क्षेत्रों में वनस्पतियाँ बहुत मिलती हैं।
मधुरता – नारियल ऊपर से तो कठोर लगता है पर भीतर मधुरता भरे रहता है।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी – मनुष्य इस संसार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने समाज को कुछ-न-कुछ देता ही रहता है।
वंश वृक्ष – हर मनुष्य का अपना वंश वृक्ष होता है।
अभिनन्दन – सज्जन लोगों का समाज को सदैव अभिनन्दन करना चाहिए।

‘प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों में रूढ़, यौगिक और योगरूढ़ शब्द अलग-अलग लिखिए
नववधु, उद्यान-विज्ञानी, विरूप, विश्व, मंत्र, लता, हिमालय।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण img 3

नारियल संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) हिन्दुस्तान एक विचित्र देश है, उसकी पहचान नदी से होती है या वनस्पति से। उसके देशकाल का बोध या तो नदी कराती है या वनस्पति कराती है। विशेष रूप से काल का बोध वनस्पति ही कराती है। उसके ऋतु चक्र का अवतरण सबसे पहले वनस्पति जगत् पर ही होता है।

कठिन शब्दार्थ :
विचित्र = अनोखा; ऋतु-चक्र = छः ऋतुओं का बारी-बारी से; अवतरण = आना।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश नारियल’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक पं. विद्यानिवास मिश्र हैं।

प्रसंग :
इन पंक्तियों में लेखक ने नदियों एवं वनस्पतियों के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि यह हिन्दुस्तान देश अपने आपमें अनोखा है। इसकी पहचान इसमें बहने वाली नदियों से होती है या इस देश में पायी जाने वाली वनस्पतियों से होती है। इसके देशकाल की जानकारी यहाँ बहती हुई नदियाँ अथवा यहाँ पर पाये जाने वाले बड़े वृक्षों से होती है। कौन-सी ऋतु कब आ रही है। उसका आभास सबसे पहले वनस्पतियाँ ही देती हैं। यथा-सरसों के फूलने पर या नये-नये पत्तों के आने पर बसन्त ऋतु के आगमन की सूचना मिल जाती है उसी प्रकार पत्तों के वृक्षों से पृथ्वी पर गिरने से हमें पतझड़ की सूचना मिल जाती है।

विशेष :

  1. लेखक ने भारत में नदियों एवं वनस्पतियों के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(2) ये पेड़ हमारी समष्टि-चेतना के प्रतीक हैं। एक देह से अनेक होने की फलवत्ता इनमें दिखाई पड़ती है और अनेक होकर भी एक ही पहचान रखने की अन्विति भी इनमें दिखाई पड़ती है। इन सबका अलग-अलग स्वाद है, रस है। पर नारियल की बात अलग है। वह सम्पूर्ण जीवन है, एक कठोर आचरण में मधुर रस संहित रूप से संचित करने वाला जीवन है।

कठिन शब्दार्थ :
समष्टि-चेतना = चेतना जगत् के; फलवत्ता = फलवती होना; अन्विति = समाहित होने की भावना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-लेखक ने वृक्षों को मानव चेतना का प्रमाण माना है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि वनस्पतियाँ अर्थात् पेड़-पौधे अपने भीतर एक चेतना जगत् को धारण किये हुए हैं। वृक्ष तो एक अकेला ही होता है लेकिन जब वह पुष्पित एवं फलित होता है तो उस एक से अनेकता का जन्म होता है। कहने का भाव यह है कि वृक्ष के फलने पर उन फलों के बीजों से अनेक वृक्ष उत्पन्न होते हैं यही एकता की अनेकता है। बीज का पुनः वृक्ष रूप में उपजना उसके अमरत्व की निशानी है। इस प्रकार वे अनेक होते हुए भी एक होने के स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं। वृक्षों के विविध रूप होते हैं और अपने इस विविध रूप में ही वे अलग-अलग स्वाद वाले फल देते हैं। उन सबका रस भी अलग-अलग गुणों वाला होता है। परन्तु इन वृक्षों में नारियल की पहचान अलग ही है।

वह अपने आप में समग्रता को धारण किए हुए है। उसका ऊपरी आवरण कठोर होता है पर अपने अन्त:करण में वह मधुर रस को छिपाये रहता है। वह रस एक संहिति है जिससे जीवन को सरसता प्राप्त होती है। कहने का भाव यह है कि नारियल का फल ऊपर से भले कठोरता का आभास करा रहा है और यह कठोरता भी जीवन में अनुशासन का पर्याय है अर्थात् हमें अपने जीवन को अनुशासन में बाँधकर शुष्क रूप में रखना है लेकिन हमारे अन्त:करण में रस का खजाना होना चाहिए जो संसार को सुख एवं शान्ति प्रदान कर सके।

विशेष :

  1. लेखक नारियल के फल के समान ही व्यक्ति को ऊपर से शुष्क एवं कठोर बने रहने की तथा भीतर से रस पूर्ण बने रहने की शिक्षा देता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(3) जो लोकगीत मैंने पहले उद्धत किया उसका यही तो अभिप्राय है कि तुम सम्पूर्ण जीवन जियो, कठोर भी बनो, मधुर भी बनो। बिना कठोर हुए, बिना कर्तव्य-परायण हुए करुणा कहाँ से आएगी। निरी करुणा भी किस काम की, यदि उसमें चारुता और मंजुता न हो। चारुता के लिए मृदु और कठोर का सन्तुलन चाहिए और मंजुता के लिए ताप की पकाई चाहिए। यह जीवन केवल अपने खाने-पीने की वस्तु नहीं है। यह उपभोक्ता नहीं है। यह उपभोग्य है। यही इसका सौभाग्य है। सौभाग्य से वंचित भाग अमंगल है, निरर्थक है।

कठिन शब्दार्थ :
अभिप्राय = मतलब; निरी = कोरी, केवल; चारुता = सुन्दरता; मंजुता = कोमलता; मृदु = कोमल; उपभोग्य = उपभोग में लाने योग्य; अमंगल = अशुभ; निरर्थक = जिसका कोई अर्थ न हो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इसके लेखक ने खाउ पियउ धना नरियर, बिलसउ धना सेनुर’ लोकगीत की व्याख्या की है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि मैंने जो यह उपर्युक्त लोकगीत की एक पंक्ति प्रस्तुत की है उसका स्पष्ट मतलब यह है कि तुम जीवन को ठाठ से जियो, उमंग से जियो लेकिन जीवन में कठोरता भी रहे और मधुरता भी। जीवन में कठोरता धारण किए बिना अथवा कर्तव्यपरायण हुए बिना करुणा नहीं आ पायेगी और आगे लेखक कहता है कि कोरी करुणा भी जीवन में कोई महत्त्व नहीं रखती है उसमें चारुता एवं मंजुता भी होनी चाहिए। चारुता जीवन में तभी आएगी जब उसमें मृदु एवं कठोर का सन्तुलन होगा, साथ ही मंजुता के लिए उसमें तपन भी होनी चाहिए। बिना तपन के मंजुता भी सारगर्भित नहीं रहती है। हमारे जीवन का लक्ष्य केवल उपभोक्ता बनकर रह जाना नहीं है अपितु हमें तो अपने आपको उपभोग्य बनाना होगा। जब मनुष्य अपने जीवन को दूसरों के लिए उपभोग्य बना देगा तभी उसे उसके जीवन की सार्थकता प्राप्त हो सकेगी। यही सार्थकता उसका सौभाग्य होगी। सौभाग्य से रहित भोग अकल्याणकारी होता है, वह निरर्थक होता है।

विशेष :

  1. लेखक का मानना है कि जीवन में कठोरता एवं मधुरता दोनों का सामंजस्य होना चाहिए। तभी जीवन सार्थक बन पायेगा।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(4) नारियल को पिता के प्यार से जोड़ने के पीछे लोक-चेतना की गहरी जीवन दृष्टि है जो अनुशासन को महत्त्व देती है, अनुशासित जीवन वात्सल्य को महत्त्व देता है। नारियल को पूर्णाहुति के रूप में अर्पित करने का यह अभिप्राय है कि अनुशासन में संधा पर भीतर रस की उत्कण्ठा से दूसरों को सुख देने की कामना से भरा हो, तभी जीवन है, पूर्ण जीवन है, उसी को अर्पित करके अनुष्ठान पूर्ण होता है। बिना आत्म-संयम की दीक्षा के कोई भी स्नेह, कोई भी प्यार पूर्ण नहीं होता है। 

कठिन शब्दार्थ :
पूर्णाहुति = पूर्ण आहुति यज्ञ में की जाती है; अर्पित = भेंट; संधा=बँधा हुआ, डटा हुआ; अनुष्ठान = किसी विशेष प्रयोजन से किया जाने वाला व्रत या यज्ञ; दीक्षा = शिक्षा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में नारियल को लेखक ने पिता के प्यार से जोड़ा है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि पिता के मन में नारियल फलता है। यह नारियल ऊपर से बड़ा संयत, शुष्क एवं कठोर दिखाई देता है पर भीतर से वह रस से पूर्ण होता है। इस नारियल का सम्बन्ध पिता के प्यार से जोड़ने में लेखक को लोक चेतना की गहरी जीवन दृष्टि देखने को मिलती है और यह जीवन दृष्टि ऐसी है जो अनुशासन को महत्त्व देती है तथा अनुशासित वात्सल्य को महत्त्व देती है। यज्ञों में पूर्णाहुति के समय नारियल की महत्ता को बताते हुए लेखक कहता है कि पूर्णाहुति के समय जो नारियल यज्ञ की वेदी में आहुत किया जाता है उसके पीछे मन्तव्य यह है कि व्यक्ति को अनुशासन में तो आबद्ध रहना चाहिए पर अन्त:करण में दूसरों को सुख देने की ही भावना होनी चाहिए। जीवन की सार्थकता एवं पूर्णता भी अर्पण में है और इसी अर्पण से अनुष्ठान पूर्ण होता है। जब तक जीवन में आत्म-संयम नहीं है तब तक न कोई दीक्षा, न प्यार पूर्ण हो सकता है।

विशेष :

  1. लेखक जीवन में अनुशासन को बहुत महत्त्व देता है क्योंकि अनुशासित व्यक्ति ही संयत रहकर समाज में कुछ योगदान कर सकता है साथ ही उसे अन्त:करण से दयालु होना चाहिए।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 एक कुत्ता और एक मैना

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 एक कुत्ता और एक मैना (संस्मरण, हजारीप्रसाद द्विवेदी)

एक कुत्ता और एक मैना अभ्यास

बोध प्रश्न

एक कुत्ता और एक मैना अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक सर्वव्यापक पक्षी किसे समझ रहा था?
उत्तर:
लेखक सर्वव्यापक पक्षी’कौए’ को समझ रहा था।

प्रश्न 2.
दूसरी बार सबेरे गुरुदेव के पास कौन उपस्थित था?
उत्तर:
दूसरी बार गुरुदेव के पास स्वयं लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी उपस्थित थे।

प्रश्न 3.
लेखक के अनुसार मैना कैसा पक्षी है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार मैना दूसरों पर अनुकम्पा दिखाने वाला पक्षी है।

प्रश्न 4.
गुरुदेव कहाँ रहते थे?
उत्तर:
गुरुदेव श्री निकेतन के पुराने तिमंजिले मकान में रहते थे।

प्रश्न 5.
गुरुदेव ने शांति निकेतन को छोड़ कहीं और रहने का मन क्यों बनाया?
उत्तर:
गुरुदेव ने शंति निकेतन को छोड़कर स्वास्थ्य के गड़बड़ होने के कारण दूसरी जगह रहने का मन बनाया।

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एक कुत्ता और एक मैना लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों का आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) भावहीन दृष्टि की करुण व्याकुलता जो कुछ समझती है, उसे समझा नहीं पाती और मुझे इस सृष्टि में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।
उत्तर:
आशय-गुरुदेव शान्ति निकेतन छोड़कर श्री निकेतन में रहने लगते हैं। उनका पालूत कुत्ता अपने अन्तर्मन से गुरुदेव का नया ठिकाना ढूँढ़ लेता है। वह दो मील की दूरी बिना किसी के बताये अकेला ही तय करके गुरुदेव के पास पहुँच जाता है। उस कुत्ते की भावदृष्टि की करुणामय व्याकुलता ने बिना भाषा के प्रयोग किए ही गुरुदेव को समझा दिया कि उसका लगाव गुरुदेव के प्रति सच्चा है।।

(ख) “सबेरे की धूप में मानो सहज मन से आहार चुगती हुई झड़े हुए पत्तों पर कूदती फिरती है सारा दिन।”
उत्तर:
आशय-लेखक कहता है कि वह विधवा मैना सबेरे के समय की धूप में सहज भाव से अपने आहार को चुगती हुई पेड़ से गिरे हुए पत्तों पर पूरे दिन कूदती फिरती रहती है।

(ग) मूक प्राणी मनुष्य से कम संवेदनशील नहीं होते।
उत्तर:
आशय-लेखक कहता है कि बोलने की क्षमता ईश्वर ने केवल मनुष्य को प्रदान की है पर मूक प्राणी भी मनुष्य से किसी भी दशा में कम संवेदनशील नहीं होते हैं। कहने का भाव यह है कि इन मूक प्राणियों को भी दु:ख सुख, हर्ष-विषाद की अनुभूति होती है और उसे वे अपने आचरण से व्यक्त कर देते हैं।

एक कुत्ता और एक मैना दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन कला की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध, उपन्यास, आलोचना, शोध हिन्दी साहित्य का इतिहास आदि विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। इन विविध विषयों में उन्होंने अनेक शैलियों का प्रयोग किया है। आपने अपनी रचनाओं के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा के तीन रूप हैं-तत्सम प्रधान, तद्भव प्रधान एवं उर्दू-अंग्रेजी शब्द युक्त व्यावहारिक रूप। आपकी भाषा प्रांजल, सुबोध एवं प्रवाहमय है। शब्द चयन उत्तम और वाक्य-विन्यास सुगठित है। यथास्थान आपने लोकोक्तियों एवं मुहावरों का भी प्रयोग किया है।

प्रश्न 2.
निबंध गद्य साहित्य की उत्कृष्ट विधा है, जिसमें लेखक अपने भावों और विचारों को कलात्मक और लालित्यपूर्ण शैली में अभिव्यक्त करता है। इस निबंध में उपर्युक्त विशेषताएँ कहाँ झलकती हैं? किन्हीं चार विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर:
लेखक ने अपने भावों और विचारों को कलात्मक और लालित्यपूर्ण शैली में इस अंश में व्यक्त किया है, उदाहरण प्रस्तुत है “एक दिन हमने सपरिवार दर्शन की ठानी। दर्शन को मैं जो यहाँ विशेष रूप से दर्शनीय बनाकर लिख रहा हूँ। उसका कारण यह है कि गुरुदेव के पास जब कभी मैं जाता था तो प्रायः वे यह कहकर मुस्करा देते थे कि ‘दर्शनार्थी हैं क्या?’ शुरू-शुरू में मैं उनसे ऐसी बांग्ला में बात करता था जो वस्तुतः हिन्दी मुहावरों का अनुवाद हुआ करती थी।”

एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है-
“गुरुदेव वहाँ बड़े आनन्द में थे। अकेले रहते थे। भीड़-भाड़ उतनी नहीं होती थी जितनी शांति निकेतन में। जब हम लोग ऊपर गए तो गुरुदेव बाहर एक कुर्सी पर चुपचाप बैठे अस्तगामी सूर्य की ओर ध्यान स्तिमित नयनों से देख रहे थे। हम लोगों को देखकर मुस्कराए, बच्चों से जरा छेड़छाड़ की, कुशल प्रश्न पूछे और फिर चुप हो रहे।”

अन्य उदाहरण-
“इसकी भावहीन दृष्टि की करुण व्याकुलता जो कुछ . समझती है, समझा नहीं पाती और मुझे इस सृष्टि में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।

अन्य उदाहरण-
“सबेरे की धूप में मानो सहज मन से आहार चुगती हुई झड़े हुए पत्तों पर कूदती फिरती है, सारा दिन।”

प्रश्न 3.
करुण मैना को देखकर गुरुदेव ने कविता लिखी, उसका सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
“उस मैना को आज न जाने क्या हो गया है? वह न मालूम अपने दल से क्यों अलग हो गई है? पहले दिन मैंने उसे एक पैर से लंगड़ाते हुए देखा था। इसके बाद नित्य प्रात:काल मैं उसे देखता हूँ तो वह अकेली ही बिना अपने नर मैना के कीड़ों का शिकार किया करती है और नाच-कूदकर इधर-उधर फुदकती रहती है। उसकी यह चिंतनीय दशा क्यों हो गई, इसे मैं बार-बार सोचा करता हूँ।”

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एक कुत्ता और एक मैना भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में से रूढ़ योगरूढ़ और यौगिक शब्द अलग-अलग कीजिए।
विद्यानगर, त्रिवेणी, महादेवी, श्रीहीन, असामयिक, चरण, निर्मल, काव्य-सरोवर, दशानन, दशरथनन्दन, प्रसाद, अनुराग, विवेकानन्द, ब्रजनंदन, गुण, चहलकदमी।
उत्तर:
रूढ़ शब्द – चरण, प्रसाद, गुण।
योगरूढ़ – विद्यानगर, त्रिवेणी, महादेवी, श्रीहीन, निर्मल, दशानन, अनुराग विवेकानन्द।
यौगिक – असामयिक, काव्य-सरोवर, दशरथनन्दन चहलकदमी।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर:

  1. विभूतियाँ-हिन्दी साहित्य में अनेक विभूतियाँ! उत्पन्न हुई। यथा-रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, भारतेन्दु, हरिश्चन्द्र विद्यानिवास मिश्र आदि।
  2. अधिवेशन-हिन्दी परिषद् का अधिवेशन आगामी में 15 अप्रैल, 2008 को होगा।
  3. अवसाद-मनुष्य के जीवन में कभी-कभी अवसाद के क्षण आ जाते हैं।
  4. आशुतोष-शिव भगवान आशुतोष हैं।
  5. रसानुभूति-अच्छी कविता पढ़ने में पाठकों को रसानुभूति होती है।
  6. गंगाजल-भारतीय संस्कृति में गंगाजल बड़ा पवित्र माना जाता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों की शुद्ध वर्तनी लिखिए।
उत्तर:
दुरभाग = दुर्भाग्य; आसुतोष = आशुतोष; औजसवी = ओजस्वी; अनकूल = अनुकूल; विशाद = विषाद; निशतेज = निस्तेज; साहित्यक = साहित्यिक।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए।
उत्तर:

  1. हृदय को स्पर्श करने वाली दृष्टि = हृदयस्पर्शी, मर्म-स्पर्शी।
  2. साहित्य की रचना करने वाला = साहित्यकार।
  3. जानने की इच्छा = जिज्ञासा।
  4. रस की अनुभूति करना = रसानुभूति।
  5. जो पढ़ा-लिखा न हो = अशिक्षित।
  6. जो सब जगह व्याप्त हो = सर्वव्यापक।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के युग्मरूप लिखिए।
उत्तर:
समय-असमय; अवस्था-अनअवस्था; शक्ति-भक्ति; दिन-रात।

प्रश्न 6.
पाठ में आये वाक्यांशों के अर्थ लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी पाठ पढ़कर स्वयं लिखे।।

प्रश्न 7.
नीचे पाठ के आधार पर कुछ शब्द-युग्म दिये गए हैं, जैसे-संभव-असंभव, स्वस्थ-अस्वस्थ।
इसी तरह पाठ से कुछ शब्द चुनिए एवं अया अन् उपसर्ग लगाकर नए शब्द बनाइए।
उत्तर:
प्रगल्भ – अप्रगल्भ
स्थान – अस्थान
अवस्था – अनवस्था
स्वीकृति – अस्वीकृति
करुण – अकरुण
दृष्टि – अदृष्टि
सत्य – असत्य।

प्रश्न 8.
भाषा और बोली में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बोली बहुत सीमित स्थान में ही बोली जाती है। इसमें लिखा हुआ कोई साहित्य नहीं होता है। जब बोलने वालों का क्षेत्र बढ़ जाता है तब बोली भाषा बन जाती है और भाषा में साहित्य का सृजन होने लगता है। कभी-कभी राजनैतिक कारणों से किसी बोली का स्थान ऊँचा उठ जाता है जैसे कि आज की खड़ी बोली जो राष्ट्रभाषा के पद पर बैठी है वह स्वतन्त्रता से पूर्व केवल दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ आदि के आस-पास बोली जाती थी। साथ ही उस समय उसमें कोई विशेष साहित्य भी नहीं था। पर दिल्ली राजधानी होने से उसका स्थान बहुत ऊँचा हो गया है और वह आज राष्ट्रभाषा मानी जाती है अर्थात् पूरे देश की मानक भाषा। ब्रज, अवधी आदि भाषाएँ हैं।

प्रश्न 9.
मध्य प्रदेश की प्रमुख चार बोलियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
ग्वालरी, भदावरी, उज्जैनी, मालवी।

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एक कुत्ता और एक मैना संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) यहाँ यह दुःख के साथ कह देना चाहता हूँ कि अपने देश के दर्शनार्थियों में कितने ही इतने प्रगल्भ होते थे कि समय-असमय, स्थान-अस्थान, अवस्था-अनवस्था की एकदम परवाह नहीं करते थे और रोकते रहने पर भी आ जाते थे। ऐसे दर्शनार्थियों से गुरुदेव कुछ भीत-भीत से रहते थे।

कठिन शब्दार्थ :
दर्शनार्थियों में दर्शन के लिए आने वालों में; प्रगल्भ = लापरवाह, धृष्ट; भीत-भीत से = डरते से।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘एक कुत्ता और एक मैना’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने भारतवर्ष के दर्शनार्थियों की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि हमारे देश के नागरिकों में सभ्य समाज के सिद्धान्तों एवं ढंगों का ज्ञान तक नहीं होता है। वे बड़े ही दु:ख के साथ कह देना चाहते हैं कि हमारे देश के दर्शनार्थियों में शिष्टता की कमी होती है। वे जिन महान् पुरुषों का दर्शन करना चाहते हैं उनसे मिलने का कौन-सा उचित समय है, उनसे मिलने का कौन-सा उचित स्थान है और कौन-सी अवस्था है। इस तक का ज्ञान नहीं होता है। उनको रोकने की चेष्टा भी व्यर्थ जाती थी। इस प्रकार के अशिष्ट दर्शनार्थियों से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को भय लगा रहता था।

विशेष :

  1. लेखक ने अपने देश के दर्शनार्थियों में जो शिष्टता की कमी है, उस ओर ध्यान दिलाया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) इस वाक्यहीन प्राणिलोक में सिर्फ यही एक जीव अच्छा-बुरा सबको भेदकर सम्पूर्ण मनुष्य को देख सका है, उस आनन्द को देख सका है, जिसे प्राण दिया जा सकता है जिसमें अहेतुक प्रेम ढाल दिया जा सकता है, जिसकी चेतना असीम चैतन्य लोक में राह दिखा सकती है। जब मैं इस मूक हृदय का प्राणपण आत्मनिवेदन देखता हूँ, जिसमें वह अपनी दीनता बताता रहता है, तब मैं यह सोच ही नहीं पाता कि उसने अपने सहज बोध से मानव स्वरूप में कौन-सा मूल आविष्कार किया है। इसकी भावहीन दृष्टि की करुण व्याकुलता जो कुछ समझती है, उसे समझा नहीं पाती और मुझे इस सृष्टि में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।

कठिन शब्दा :
र्थवाक्यहीन = मुख से न बोलने वाले प्राणिलोक = प्राणी संसार में; अहेतुक = बिना किसी कारण या अभिप्राय के; असीम = सीमा रहित; चैतन्य लोक = चेतना युक्त संसार में; प्राणपण = प्राणों की बाजी लगाने वाले आविष्कार = खोज; सृष्टि = संसार में।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के स्वामीभक्त कुत्ते की मानवीय भावना का वर्णन करते हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि अपने स्वामीभक्त पालतू कुत्ते की भावनाओं की अभिव्यक्ति में कविवर टैगोर ने ‘आरोग्य’ नामक पत्रिका में एक कविता लिखी थी। उसी कविता के भावों का वर्णन यहाँ किया गया है। कवि टैगोर के शब्दों को व्यक्त करते हुए लेखक कहता है कि वह मूक प्राणी प्राणियों की अच्छी बुरी भावनाओं से भी ऊपर उठकर मनुष्य को देख सका है, वह उस आनन्द को देख सका है जिसे प्राण दिया जा सकता है, साथ ही वह अहेतुक प्रेम में ऐसा ढल गया था कि उसकी चेतना असीम चैतन्य लोक में मार्ग दिखा सकती है।

कवि टैगोर जी आगे कहते हैं कि जब मैं इस मूक प्राणी के प्राणों की बाजी लगा देने वाले आत्मनिवेदन को देखता हूँ जिसमें कि वह अपनी दीनता को व्यक्त करता रहता है, तब उस क्षण मैं यह सोच ही नहीं पाता कि उस मूक प्राणी ने अपने सहज ज्ञान से मानक स्वरूप में कौन-सी नई चीज खोज ली है। उसकी भावहीन दृष्टि की करुण बेचैनी जो कुछ मुझे समझाना चाहती है, उसे वह समझा नहीं पाती है. और मुझे इस जगत् में उसके स्वरूप में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।

विशेष :

  1. गुरुदेव टैगोर अपने स्वामीभक्त कुत्ते से बहुत स्नेह करते थे। उसके आन्तरिक अलौकिक गुणों की उन्हें पहचान थी।
  2. भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं दुरूह है।

(3) तीन-चार वर्ष से मैं एक नये मकान में रहने लगा था। मकान के निर्माताओं ने दीवारों में चारों ओर एक-एक सुराख छोड़ रखी है। यह शायद आधुनिक वैज्ञानिक खतरे का समाधान होगा। सो, एक मैना दंपति नियमित भाव से प्रतिवर्ष यहाँ गृहस्थी जमाया करते हैं, तिनके और चीथड़ों का अम्बार लगा देते हैं, भलेमानस गोबर के टुकड़े तक ले आना नहीं भूलते। हैरान होकर हम सूराखों में ईंट भर देते हैं, परन्तु वे खाली बची जगह का भी उपयोग कर लेते हैं।

कठिन शब्दार्थ :
निर्माताओं = बनाने वालों ने; सुराख = छेद; समाधान = इलाज, बचाव; दम्पति = नर और मादा का जोड़ा; प्रतिवर्ष = हर साल; गृहस्थी= घर-परिवार; अम्बार = ढेर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक जब नये मकान में रहने आता है तो वह वहाँ दीवारों के सुराख में मैना के अण्डे सैने की घटना का वर्णन करते हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि तीन-चार वर्ष से मैं एक नये मकान में किरायेदार रूप में रह रहा हूँ। इस भवन के निर्माणकर्ताओं ने संभवतः किसी वैज्ञानिक सिद्धान्त के सहारे मकान की दीवारों में कुछ सुराख करवा रखे थे। इन दीवारों के सुराखों में एक मैना दम्पति प्रतिवर्ष अण्डे सैने के लिए अपना घोंसला बना लेते थे। इस घोंसले के निर्माण के लिए वे तिनके, चीथड़ों का एक ढेर इकट्ठा कर देते थे और इससे भी जब उनका मन नहीं भरता तो वे गोबर के टुकड़े तक ले आया करते थे। उनके द्वारा निर्मित घोंसले से हमारे घर में गन्दगी फैलती थी अतः हैरान होकर हमने मकान की दीवारों के सुराखों को ईंटों से भर दिया था परन्तु उसने भी जो खाली जगह मिल जाती उसी में वे अपना घोंसला जमा लिया करते थे।

विशेष :

  1. इस अवतरण में लेखक ने मैना दम्पति के गृह निर्माण की कथा को व्यक्त किया है।
  2. भाषा सहज एवं भावानुकूल है।

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(4) उस मैना को क्या हो गया है, यही सोचता हूँ। क्यों वह दल से अलग होकर अकेली रहती है ? पहले दिन देख था संसार के पेड़ के नीचे मेरे बगीचे में। जान पड़ा जै एक पैर से लंगड़ा रही हो। इसके बाद उसे रोज सबेरे देखन हूँ संगीहीन होकर कीड़ों का शिकार करती फिरती है। चढ़ जाती है बरामदे में। नाच-नाचकर चहलकदमी किया करती है, मुझसे जरा भी नहीं डरती। क्यों है ऐसी दशा इसकी? समाज के किस दंड पर उसे निर्वासन मिला है, दल के किस अविचार पर उसने मान किया है।

कठिन शब्दार्थ :
संसार = एक वृक्ष का नाम; संगीहीन = अपने नर पति के बिना; चहलकदमी = घूमना-फिरना; निर्वासन = पति से अलग; अविचार = अनुचित निर्णय पर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक इस अंश में यह बताता है कि गुरुदेव के बगीचे एवं बरामदे में एक अकेली मैना मादा इधर-उधर फुदकती रहती है। इसी मादा को आधार बनाकर गुरुदेव ने उस पर एक कविता लिखी थी। इसी कविता का भाव इस अंश में है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि गुरुदेव ने उस विधवा मैना पर जो कविता लिखी है उसका भाव यह है कि उस मैना को न मालूम क्या हो गया है, मैं यही सोचता रहता है। वह बेचारी अपने संगी-साथियों से अलग होकर क्यों रह रही है? प्रथम दिन मैंने उसे अपने बगीचे में संसार पेड़ के नीचे देखा था। ऐसा लग रहा था कि वह एक पैर से लंगड़ा रही हो। इसके बाद मैं उसे रोजाना सबेरे के समय देखता हूँ कि वह अपने नर साथी के अभाव में अकेली ही कीड़ों को पकड़कर खा रही है। कभी वह बरामदे पर चढ़ जाती है। वह मुझसे जरा भी भय नहीं करती है और मेरे सामने ही नाच-नाचकर इधर-उधर घूमा करती है। मैं उसकी इस दशा को देखकर दुःखी हो उठता हूँ और सोचने लग जाता हूँ कि पक्षी समाज ने कौन-सा दण्ड देकर उसे अकेला छोड़ दिया है या फिर पक्षी समाज का ऐसा कौन-सा विवेकहीन निर्णय था जिस पर वह अकेली ही मान किये अलग-अलग थिरक रही है।

विशेष :

  1. कविवर गुरुदेव की पैनी दृष्टि ने पक्षियों के व्यवहार को भी पढ़ लिया था।
  2. भाषा सहज एवं भावानुकूल है।

(5) इस बेचारी को ऐसा कुछ भी शौक नहीं है। इसके जीवन में कहाँ गाँठ पड़ी है, यही सोच रहा हूँ। “सवेरे की धूप में मानो सहज मन से आहार चुगती हुई झड़े हुए पत्तों पर कूदती फिरती है सारा दिन।” किसी के ऊपर इसका कुछ अभियोग है, यह बात बिलकुल नहीं जान पड़ती। इसकी चाल में वैराग्य का गर्व भी तो नहीं है, दो आग सी जलती आँखें भी तो नहीं दिखतीं।

कठिन शब्दार्थ :
सहज = स्वाभाविक; आहार = भोजन; अभियोग = मुकदमा; वैराग्य = विरक्ति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग:
इस अंश में लेखक ने उसी विधवा मैना का वर्णन किया है जो गुरुदेव के बगीचे में फुदकती रहती है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि यह विधवा ना अन्य मैनाओं से अलग रूप में दिखाई देती है। क्योंकि जहाँ अन्य मैनाएँ बक-बक करती हुई उछल-कूद कर रही हैं। वैसा व्यवहार इस मैना का नहीं है। मैं बार-बार यही सोचता रहता हूँ कि इसके जीवन में न मालूम कौन-सी गाँठ पड़ गई है जिसने इसकी सहज खुशी को छीन लिया है। वह प्रात:काल की धूप में सहज भाव से अपना आहार चुगती रहती हैं। वह पेड़ से गिरे हुए पत्तों पर पूरे दिन कूदती-फिरती रहती है। किसी अन्य जीव ने इसके साथ कुछ धोखा किया है, यह बात भी पता नहीं चलती है। उसकी चाल में विरक्ति का भाव भी दिखाई नहीं देता है और क्रोध के कारण उसकी दोनों आँखें जलती हुई भी दिखाई नहीं देती।

विशेष :

  1. लेखक पक्षी जगत् के जीवों के मनोभावों को बड़े ही सहज रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
  2. भाषा भावानुकूल है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 3 नदी बहती रहे

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 3 नदी बहती रहे (निबन्ध, भगवतीशरण सिंह)

नदी बहती रहे अभ्यास

बोध प्रश्न

नदी बहती रहे अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गंगा नदी की पहली तथा बड़ी पश्चिमी सहायक नदी कौन-सी है?
उत्तर:
यमुना।

प्रश्न 2.
नदियाँ हमारे जीवन के किस-किस पक्ष को समृद्ध करती हैं?
उत्तर:
नदियाँ हमारे जीवन के आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पक्ष को समृद्ध करती हैं।

प्रश्न 3.
‘स्वयंजात वन’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
‘स्वयंजात वन’ उन वनों को कहते हैं जो प्राकृतिक रूप में स्वयं बन गये हैं; यथा-कुरु प्रदेश का कुरु जंगल, साकेत का अंजनवन आदि।

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नदी बहती रहे लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय भू-भौगोलिक स्थिति को ठीक-ठीक किस प्रकार समझा जा सकता है?
उत्तर:
भारतीय भू-भौगोलिक स्थिति को ठीक-ठीक समझने के लिए यहाँ के पर्वत समूहों और नदी-समूहों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 2.
भारत के ‘स्वयंजात’ वन कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
भारत के ‘स्वयंजात’ वनों में कुरु प्रदेश का कुरु जंगल, साकेत का अंजनवन, वैशाली और कपिलवस्तु में महावन, श्रावस्ती के तट पर पारिलेण्य वन एवं रोहिणी नदी के तट पर लुम्बिनी वन प्रमुख थे।

प्रश्न 3.
जनसंख्या वृद्धि के प्रकृति पर क्या प्रभाव हो रहे हैं?
उत्तर:
निरन्तर होती जा रही जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप योजनाविहीन विकास हो रहा है जिससे प्राकृतिक पर्यावरण समाप्त होते जा रहे हैं।

नदी बहती रहे दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वन, पर्वत और नदियों के नजदीकी रिश्ते को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वनों, पर्वतों और नदियों का बहुत नजदीकी रिश्ता है। ये तीनों ही एक साथ रहते हैं और एक वन और नदियाँ मैदानों में उतरती हैं। लेकिन जिस प्रकार की वन व्यवस्था आज है उसमें न तो वनस्पतियाँ, न वन्य पशुओं और न नदियों की रक्षा सम्भव है। मनुष्य की समग्र समृद्धि के लिए अर्थात् आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि और विकास के लिए वनों, वन्य पशुओं, नदियों और पर्वतों का संरक्षण बहुत आवश्यक है। यदि इस ओर हमने ध्यान नहीं दिया तो इससे भारतीय सांस्कृतिक विरासत भी खतरे में पड़ जाएगी।

प्रश्न 2.
भारत की नदियाँ अब मोक्षदायिनी क्यों नहीं रह गई हैं? पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर:
आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कांवेरी आदि नदियाँ अत्यधिक पवित्र मानी जाती थीं। इनका जल पीकर तथा इनमें स्नान कर मनुष्य अपने शारीरिक एवं मानसिक क्लेशों से मुक्ति पाता था। इतना ही नहीं इनके किनारे तप करके मनुष्य अपने जीवन को मोक्ष के मार्ग पर ले जाता था पर औद्योगीकरण के प्रभाव एवं नई शहरी संस्कृति ने अब इन नदियों को प्रदूषित कर दिया है। इनमें शहरों का मल-मूत्र, उद्योगों का अवशिष्ट कचरा आदि प्रवाहित किया जा रहा है। फलतः इनका जल प्रदूषित होकर वनस्पतियों, मनुष्यों, जलचरों, वन्य जीवों एवं पक्षियों आदि को रुग्ण बना रहा है। इस प्रकार ये नदियाँ अब मोक्षदायिनी न होकर संक्रामक रोगों को जन्म देने वाली बन गई है।

प्रश्न 3.
नदियों, पर्वतों और वनों से भरपूर देश की स्थिति में आज क्या परिवर्तन आया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत विशाल देश है। यह देश अनेक नदियों, पर्वतों एवं वनों से भरपूर है। नदियों, पर्वतों एवं वनों का परस्पर अटूट रिश्ता है। जिस प्रकार वनों का नदियों से सम्बन्ध है उसी प्रकार नदियों का भी वनों से सम्बन्ध है। यदि वनों का अस्तित्व बना रहता है तो नदियाँ स्वतः प्रवाहित होती रहेंगी। यदि वन नहीं रहेंगे तो नदियाँ स्वतः विलुप्त हो जाएँगी। जनसंख्या के बढ़ते दबाव तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप वनों को निर्ममता से साफ किया जा रहा है। बड़े-बड़े नगर नदियों के किनारे स्थित हैं फलतः नगर की गन्दगी बेरोकटोक इन नदियों में प्रवाहित की जा रही है। वनों की निरन्तर कटाई तथा नदियों के प्रदूषित जल से मानव जीवन के स्वास्थ्य को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः हमें सावधानी से इन समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना चाहिए। वनों को कटाई से बचाना, नदियों को प्रदूषण से बचाना एवं पर्वतों के क्षरण को रोकना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है और हमें इनका सामना कर सुखद मार्ग बनाने होंगे।

प्रश्न 4.
वर्तमान समय में अपने परिवेश को प्रदूषण के प्रभाव से कैसे बचाया जा सकता है? टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में अपने परिवेश को प्रदूषण के प्रभाव से तभी बचाया जा सकता है जबकि हम नदियों में गन्दगी प्रवाहित न कर उसे अन्यत्र डालें नदियों में नालों के जलों को मिलाने से पूर्व उनके पानी को प्रशोधित किया जाए तभी उसे नदियों में मिलाया जाए। आस-पास की वनस्पति के संरक्षण का प्रयास किया जाए और प्रतिवर्ष अधिक-से-अधिक नये वृक्ष लगाये जाएँ। वनों के अधिक उगाने से पर्वतों का भी क्षरण रुकेगा। इस प्रकार के उपाय करके हम अपने परिवेश को प्रदूषण के प्रभाव से बचा सकते हैं।

प्रश्न 5.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) जब गंगा गंगा न रही, तब काशी की क्या स्थिति रहेगी?
उत्तर:
आशय-लेखक का आशय है कि गंगा जैसी बारहमासी नदियाँ आज जल प्रदूषण से अधिक ग्रस्त हैं। मानव बस्तियों और उद्योगों के गन्दे पानी के इसमें निरन्तर मिलते रहने से पानी और अधिक प्रदूषण युक्त हो गया है। जब गंगा नदी की यह भयावह स्थिति है तो काशी भी इन प्रभावों से अछूती नहीं रह पायेगी।

(ख) वनों की उपयोगिता मानव की समग्र समृद्धि के लिए है। समृद्धि की इस समग्रता में उसकी आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक समृद्धियाँ शामिल हैं।
उत्तर:
आशय-लेखक का आशय है कि वनों की उपयोगिता मानव की समग्र समृद्धि के लिए है। बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों पर हमारी निर्भरता अधिक बढ़ गई है। अनेक उद्योगों के संचालन हेतु वनों की लकड़ी की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। इस कारण वनों को बेरहमी से काटा जा रहा है। इसके कारण वन सम्पदा शनैः-शनैः समाप्त होती जा रही है। वनों के अभाव में वर्षा की भी समस्या उत्पन्न होने लगी है। यह एक चिन्ता की बात है। इसके लिए हमें वनों का संरक्षण, परिवर्धन एवं विकास करना होगा तभी हम पर्यावरण को भी प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। वनों की समृद्धि में ही मानव की आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक समृद्धियाँ सम्मिलित हैं। अतः हमें हर सम्भव प्रयास से वनों का संरक्षण करना चाहिए।

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नदी बहती रहे भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों की शुद्ध वर्तनी लिखिएपौराणिक, पश्चीमी, नरमदा, मंदीर, आर्थीक, स्थिती, शिघ्रता।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण img 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
दर्दनाक, प्रदूषण, कृषि, समृद्धि, प्राकृतिक, स्थापना।
उत्तर:

  1. दर्दनाक – आज वनस्पतियों को जिस बेरहमी से काटा जा रहा है उससे मानव जीवन दर्दनाक बनता जा रहा है।
  2. प्रदूषण – हमें अपने आसपास बढ़ रहे प्रदूषण से सावधान होना होगा।
  3. कृषि – भारत एक कृषि प्रधान देश है।
  4. समृद्धि – नदियों द्वारा ही मानव की सर्व प्रकार की समृद्धि आ सकती है।
  5. प्राकृतिक – भारत का प्राकृतिक परिवेश बहुत विशाल है।
  6. स्थापना – हमें वनों की सुरक्षा एवं नदियों के शुद्धीकरण के प्रयासों की स्थापना करनी चाहिए।

प्रश्न 3.
दिए गए शब्दों के विलोम शब्द लिखिए-
सम्मान, उन्नति, व्यापक, प्राचीन, आवश्यक, ज्ञान।
उत्तर:

शब्द विलोम
सम्मान असम्मान
उन्नति अवनति
व्यापक संकुचित, सीमित
प्राचीन नवीन
आवश्यक अनावश्यक
ज्ञान अज्ञान

प्रश्न 4.
नीचे दिये गये शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए।
उत्तर:
नजदीकी = निकटता; खासकर = विशेषकर; रिश्ता = सम्बन्ध; जमीन = पृथ्वी; किस्म = प्रकार; दर्दनाक = पीड़ादायक; अमलदारी = प्रभावी।

प्रश्न 5.
दिये गये वाक्यों के वाक्यांश लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण img 2

नदी बहती रहे संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) भारत नदियों का देश रहा है इसलिए नहीं कि इस देश में नदियों की ही अधिकता है बल्कि इसलिए कि इस देश में नदियों का विशेष रूप से सम्मान हुआ है। वे हमारे जीवन में बहुत महत्त्व रखती रही हैं। इनसे हमारा आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन समृद्ध हुआ है।

कठिन शब्दार्थ :
अधिकता बहुतायत; सम्मान = आदर; समृद्ध = उन्नत।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्य खण्ड ‘नदी बहती रहे’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्री भगवतीशरण सिंह हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने नदियों के महत्त्व के बारे में बताया है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि हमारा भारत देश नदियों का देश है। यह इस कारण नहीं कि इस देश में बहुत-सी नदियाँ बहती हैं बल्कि इस कारण से इसे नदियों का देश कहा गया है क्योंकि यहाँ पर नदियों का बड़ा ही आदर किया जाता है। नदियों में स्नान करके मनुष्य अपने जीवन को धन्य मानता है। इन नदियों का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। इनसे हमारा आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन उन्नत हुआ है अर्थात् नदियों से हमें पैदावार मिलती है जिससे हमारी आर्थिक दशा सुधरती है। नदियों का सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व भी है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इन्हीं के किनारे पर तप एवं यज्ञ करते हैं।

विशेष :

  1. लेखक ने नदियों को हमारे जीवन का आधार बताया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) नदियों के न रहने पर हमारी संस्कृति विच्छिन्न हो जाएगी हमारा जीवन-स्रोत ही सूख जाएगा। अतः वनों की आवश्यकता और महत्ता को अस्वीकार करके न तो हम आर्थिक उन्नति के सोपान गढ़ सकते हैं और न स्वास्थ्य और सुख की कल्पना ही कर सकते हैं।

कठिन शब्दार्थ :
संस्कृति = सभ्यता; विच्छिन्न = अलग-थलग; जीवन-स्रोत = जीवन का झरना; अस्वीकार = न मानकर; सोपान = सीढ़ी; गढ़ सकते हैं = बना सकते हैं।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक ने इस अंश में इस बात को स्पष्ट किया है कि नदियों के अभाव में न तो हमारी संस्कृति जीवित रह पायेगी और न सुख-समृद्धि।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि यदि नदियाँ नहीं रहेंगी तो हमारी संस्कृति भी जीवित नहीं रह पायेगी, वह छिन्न-भिन्न हो जाएगी। नदियों के न रहने पर हमारे जीवन की निरन्तरता व ताजगी नष्ट हो जाएगी। नदियों से ही वनों का सम्बन्ध है। यदि हम वनों की आवश्यकता और महत्ता को नकारते हैं तो हम न तो आर्थिक दृष्टि से उन्नति कर पाएँगे और न स्वास्थ्य एवं सुख की कल्पना कर पाएंगे। अतः हमें नदियों और वनों दोनों को महत्व देना चाहिए।

विशेष :

  1. इस अंश में लेखक ने मानव जीवन की खुशहाली एवं उन्नति के लिए वन एवं नदी दोनों के महत्त्व को स्वीकार किया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(3) आदमी की जिन्दगी अपने आप में बहत ही अकेली और नीरस होती है। आदमी-आदमी के रिश्ते नाते उसका बहुत दूर तक साथ नहीं देते। पर जब वह इनसे आगे बढ़कर एक व्यापक सम्बन्ध कायम करने की कोशिश करता है, तो उसके साथ वन, पर्वत, नदी आदि सभी चल पड़ते हैं। तब वह अकेला नहीं रह जाता। आज वह वनस्पतियों और पानी के रिश्ते को भूलकर अपने को भी अकेला बना रहा है और उनके आपसी सम्बन्धों को भी विच्छेद करता जा रहा है। गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा और कावेरी आज भी भारत में बह रही हैं पर अब वे मोक्षदायिनी नहीं रह गई हैं।

कठिन शब्दार्थ :
नीरस = सूखी; व्यापक = विशाल, लम्बा चौड़ा; विच्छेद = नष्ट; मोक्षदायिनी = मोक्ष (जीवन के आवागमन को नष्ट करने वाली) देने वाली।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक मानव के जीवन में नदियों एवं वनों के महत्त्व को स्थापित करता है पर वह आज प्रदूषण के द्वारा नदियों की दुर्दशा पर भी चिन्ता व्यक्त करता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि आदमी अकेला रहकर कभी सुखी नहीं रह सकता। आदमी और आदमी के बीच जो रिश्ते और नाते होते हैं वे एक सीमा तक ही उसके मददगार होते हैं। परन्तु जब वह इनसे आगे बढ़कर व्यापक सम्बन्ध जोड़ना चाहता है तब उसके साथ वन, पर्वत एवं नदी आदि प्राकृतिक उपादान जुड़ जाते हैं। ऐसी दशा में वह अकेला नहीं रह जाता है। आज मनुष्य वनस्पतियों एवं पानी से सम्बन्ध तोड़कर जहाँ अपने आपको अकेला बना रहा है वहीं वह उनके आपसी सम्बन्धों को भी नष्ट करता जा रहा है। यद्यपि आज भी भारत में गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा एवं कावेरी आदि नदियाँ बह रही हैं पर वे पूर्व की भाँति प्रदूषण के कारण मोक्ष देने वाली नहीं रही हैं।

विशेष :
नदियों की वर्तमान दशा से लेखक दु:खी है।

(4) मानव बस्तियों और उद्योगों का गंदा पानी सीधे जल प्रवाह में मिल जाता है। जो अधिकांश रूप में उपयोग लायक नहीं रह जाता। रोजाना जिस प्रकार गंदा पानी छोड़ा जा रहा है उससे प्राकृतिक जल, जैसे-नदियों, खाड़ियों और समुद्र तटवर्ती पानी को खतरा पैदा हो गया है। अत: ऐसी स्थिति में न कश्मीर ही स्वर्ग रह गया और न काशी ही तीन लोक से न्यारी रह गई। जब गंगा गंगा न रही तब काशी की क्या स्थिति रहेगी?

कठिन शब्दार्थ :
अधिकांश = अधिकतर; तीन लोक से न्यारी = तीनों लोकों में श्रेष्ठ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक की चिन्ता है कि उद्योग-धन्धों के गन्दे पानी ने नदियों में मिलकर नदियों को गन्दा बना दिया है, उनकी महत्ता खत्म हो गई है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि नदी किनारे रहने वाले लोगों . ने अपनी गन्दगी नदियों में बहाना शुरू कर दिया साथ ही नदियों के किनारे जो उद्योग-धन्धे, कल-कारखाने लगे हैं वे भी अपना गन्दा पानी इन नदियों में मिल रहे हैं, इसके कारण नदियों का स्वच्छ पवित्र जल अब उपयोग लायक नहीं रहा है। नदियों में निरन्तर गन्दे जल को छोड़े जाने से नदियों, खाड़ियों और समुद्र तटों के पानी पर संकट आ गया है। ऐसी विषम दशा में न तो अब कश्मीर स्वर्ग रह पायेगा और न काशी ही तीन लोक से न्यारी रह पायेगी।

विशेष :

  1. मनुष्यों द्वारा नदियों में गन्दगी बहाने और उद्योगों द्वारा अपना कचरा प्रवाहित कर देने से नदियों का पानी उपयोग लायक नहीं रहा है, यही लेखक की चिन्ता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(5) निरन्तर तेजी से बढ़ती जा रही जनसंख्या के दबाव के कारण लुप्त होती जा रही प्रजातियाँ तथा पारिस्थितिकीय व्यवस्थाओं के फलस्वरूप तथा प्राकृतिक पर्यावरण के योजनाविहीन विकास के कारण हमारी प्रजातियों के प्राकृतिक आवास शीघ्रता से समाप्त अथवा कुछ बदलते जा रहे हैं।

कठिन शब्दार्थ :
प्रजातियाँ = अनेकानेक छोटी जातियाँ; पारिस्थितिकीय व्यवस्थाओं = प्राकृतिक परिवेश में परिवर्तन के कारण।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने बताया है कि हमारे देश में तीव्रगति से बढ़ रही जनसंख्या के कारण वनों और नदियों में रहने वाली अनेक प्रजातियाँ नष्ट होता जा रही हैं।

व्याख्या :
लेखक का मत है कि हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में जनसंख्या का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है, जिसके कारण यहाँ के प्राकृतिक परिवेश में रहने वाले पशुओं, पक्षियों, जलचरों की प्रजातियाँ समाप्त होती जा रही हैं। आज प्रगति एवं उन्नति के नाम पर विकास योजनाएँ प्राकृतिक परिवेश को नष्ट करने पर तुली हुई हैं। इन योजनाओं के फलस्वरूप वनचरों, नभचरों एवं जलचरों के प्राकृतिक शरण स्थल नष्ट किये जा रहे हैं जिससे इनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।

विशेष :

  1. लेखक का मत है कि योजनाएँ, इस ढंग से विचारपूर्वक बनाई जाएँ जिससे प्रजातियों पर कोई संकट न आने पाए।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(6) वनों का उपयोग उद्योग-व्यापार में होगा। इससे विरत नहीं हुआ जा सकता। वनों की उपयोगिता मानव की समग्र समृद्धि के लिए है। समृद्धि की इस समग्रता में उसकी आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक समृद्धियाँ शामिल हैं।

कठिन शब्दार्थ :
विरत = अलग; समग्र = सम्पूर्ण; समृद्धि – उन्नति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने वनों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि हमारे बहुत-से उद्योगों के उत्पाद पूरी तरह वनों पर ही निर्भर हैं। इस तरह वनों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। वनों के सहयोग से मानव निरन्तर उन्नति की सीढ़ियों पर चढ़ता गया है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वनों की उपयोगिता मानव की सम्पूर्ण उन्नति के लिए अनिवार्य है। समृद्धि की यह समग्रता आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति को अपने में समेटे हुए हैं।

विशेष :

  1. लेखक की मान्यता है कि मानव की उन्नति में वनों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 2 हिम्मत और जिन्दगी

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 2 हिम्मत और जिन्दगी (निबन्ध, रामधारी सिंह दिनकर)

हिम्मत और जिन्दगी अभ्यास

बोध प्रश्न

हिम्मत और जिन्दगी अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साहसी मनुष्य किस प्रकार सपने देखता है?
उत्तर:
साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता, वह अपने विचारों में रंगा हुआ अपनी ही किताब पढ़ता है।

प्रश्न 2.
लहरों में तैरने वालों को क्या मिलता है?
उत्तर:
लहरों में तैरने वालों को मोती मिलते हैं।

प्रश्न 3.
जिन्दगी में लगाने वाली पूँजी कौन-सी है?
उत्तर:
जिन्दगी में लगाने वाली पूँजी है-संकटों से सामना करना, अंगारों पर चलना और विपत्ति में कभी न घबड़ाना।

प्रश्न 4.
पानी में अमृत वाला तत्व है, उसे कौन जानता है?
उत्तर:
पानी में जो अमृत वाला तत्व है उसे वही जानता है जो धूप में खूब सूख चुका है। विपत्ति जिसने नहीं झेली है वह इस अमृत तत्व को नहीं जानता है।

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हिम्मत और जिन्दगी लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चाँदनी की ताजगी और शीतलता का आनन्द किसे है?
उत्तर:
चाँदनी की ताजगी और शीतलता का आनन्द उसको ही प्राप्त होता है जो दिन भर धूप में थककर लौटा है जिसके शरीर को अब रतनाई की जरूरत महसूस होती है।

प्रश्न 2.
‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इसका अर्थ यह है कि कुछ त्याग करने के पश्चात् ही जीवन का भोग करो।

प्रश्न 3.
विंस्टन चर्चिल ने जिन्दगी के बारे में क्या कहा है?
उत्तर:
विंस्टन चर्चिल ने जिन्दगी के बारे में कहा है कि जिन्दगी की सबसे बड़ी सिफत हिम्मत है। आदमी के सारे गुण उसके हिम्मती होने से ही पैदा होते हैं।

प्रश्न 4.
लेखक ने साहसी मनुष्य से सिंह की तुलना किस प्रकार की है?
उत्तर:
लेखक ने साहसी मनुष्य से सिंह की तुलना इस प्रकार की है कि जिस प्रकार अकेला होने पर भी मगन रहता है उसी प्रकार साहसी व्यक्ति अपने बलबूते पर ही किसी काम को करने की क्षमता रखता है, वह दूसरों पर आश्रित नहीं रहता है।

प्रश्न 5.
अर्नाल्ड बेनेट ने हिम्मत और साहस के सम्बन्ध में क्या कहा?
उत्तर:
अर्नाल्ड बेनेट ने हिम्मत और साहस के सम्बन्ध में कहा है कि हिम्मत और साहस के बल पर वीर व्यक्ति जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करते हैं और उन पर विजय पाकर सुखी जीवन जीते हैं।

प्रश्न 6.
साहसी मनुष्य की क्या पहचान है?
उत्तर:
साहसी मनुष्य की पहली पहचान है कि वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि तमाशा देखने वाले लोग उसके बारे में क्या सोच रहे हैं। जनमत की उपेक्षा करके जीने वाला आदमी दुनिया की असली ताकत होता है और मनुष्यता को प्रकाश भी उसी आदमी से मिलता है।

हिम्मत और जिन्दगी दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्जा करती हैं? उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्जा करती हैं। इस तथ्य को हम इस उदाहरण से स्पष्ट कर सकते हैं-अकबर महान सम्राट ऐसे ही नहीं बन गया था। जिस ‘समय उसकी अवस्था तेरह वर्ष की थी, उसने अपने पिता के शत्रु को रणक्षेत्र में परास्त किया था। इसका एकमात्र कारण यह था कि वह संकटों एवं विपत्तियों से घबडाता नहीं था। उसका जन्म ही संकटों से पूर्ण भू-भाग रेगिस्तान में हुआ था। वहीं से उसने संकटों से जूझने को अपना लक्ष्य बना लिया था।

प्रश्न 2.
जिन्दगी की कौन-कौन सी दो सूरतें हैं? समझाइए।
उत्तर:
जिन्दगी की दो सूरतें हैं। एक तो यह कि आदमी बड़े-से-बड़े मकसद के लिए कोशिश करे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाए और अगर असफलताएँ कदम-कदम पर जोश की रोशनी के साथ अंधियारी का जाल बुन रही हों, तब भी वह पीछे को पाँव न हटाए। दूसरी सूरत यह है कि उन गरीब आत्माओं का हमजोली बन जाएँ जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहुत अधिक दुख पाने का ही संयोग है।

प्रश्न 3.
“फूलों की छाँह के नीचे खेलने वालों के लिए जिन्दगी के असली मजे नहीं हैं” उदाहरण द्वारा इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
जिन्दगी के असली मजे उनके लिए नहीं है जो फूलों की छाँह के नीचे खेलते और सोते हैं बल्कि फूलों की छाँह के नीचे अगर जीवन का स्वाद छिपा है तो वह भी उन्हीं के लिए जो दूर रेगिस्तान से आ रहे हैं जिनका कंठ सूखा हुआ है, होंठ फटे हुए हैं और सारा बदन पसीने से तर है।

प्रश्न 4.
जिन्दगी को सही ढंग से जीने के लिए लेखक द्वारा दिए गए सुझावों पर अपना मत व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
जिन्दगी को सही ढंग से जीने के लिए लेखक ने जो सुझाव दिए हैं, वे वास्तव में सत्य एवं सार्थक हैं। जीवन का असली मजा मनुष्य को तभी मिलता है जब वह संकटों से होकर गुजरता है। बिना कष्ट पाये आनन्द भोगना जीवन को विनाश की ओर ले जाना है। मनुष्य को अपने पुरुषार्थ पर भरोसा रखना चाहिए। पुरुषार्थी व्यक्ति जीवन में सब कुछ प्राप्त कर लेता है उसके लिए संसार में कोई चीज असम्भव नहीं है।

प्रश्न 5.
सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए
(अ) पानी में जो …………….. पड़ा ही नहीं।
उत्तर:
लेखक कहता है कि इस संसार में जिन्दगी का सच्चा आनन्द वही व्यक्ति उठा सकता है जो फूलों की छाँह में न सोकर काँटों की सेज पर सोता है। फूलों की छाँह के नीचे खेलने और सोने वाले जीवन का सच्चा आनन्द नहीं जानते हैं। अगर फूलों की छाँह के नीचे जीवन का स्वाद छिपा हुआ है, तो वह उन्हीं लोगों के लिए है जो रेगिस्तान की भीषण गर्मी को झेलकर आ रहे हैं, जिनका गला प्यास के लिए सूखा हुआ है, होंठ फटे हुए हैं और पूरा शरीर पसीने से लथपथ है। पानी के अन्दर जो अमृत तत्व छिपा है उसे वही व्यक्ति जानता है जो धूप में अच्छी तरह से सूख चुका है, वह नहीं जिसने अपने जीवन में कभी भी रेगिस्तान की तपन एवं गर्मी को नहीं झेला है।

(ब) झुण्ड में चलना …………… मग्न रहता है।
उत्तर:
लेखक कहता है कि साहसी व्यक्ति अपने आप पर भरोसा रखता है वह किसी अन्य पर आश्रित नहीं रहता है। कभी-कभी वह ऐसी-ऐसी कल्पनाएँ कर लिया करता है जिनका संसार के जीवन में कोई अर्थ नहीं हुआ करता है। साहसी व्यक्ति दूसरे पर भरोसा नहीं करता वह अपने पर ही भरोसा रखता है। झुण्ड में चलना और झुण्ड में चरना (खाना) भैंस या पेड़ का स्वभाव होता है। शेर तो अकेले चलने में ही आनन्द लेता है।

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हिम्मत और जिन्दगी भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग अलग कीजिए।
उत्तर:
सुनयन = सु; अन्याय = अ; पराधीन = पर; अहिंसा = अ: विदेश = वि; प्रगति = प्र: विराग = वि।

प्रश्न 2.
अनु, परि, सु, कु उपसर्ग शब्दों को जोड़कर दो-दो नए शब्द बनाइए।
उत्तर:
अनु – अनुकम्पा, अनुचर।
परि – परिक्रमा, परिवेश।
सु – सुपुत्र, सुकृति।
कु – कुपुत्र, कुपात्र।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्द छाँटकर लिखिए
फूल, छाँह, जिन्दगी, खौफ, निर्भय, उपदेश, रेल, टेबिल, रोशनी, पाँव, पंख, कब्जा, मकसद।
उत्तर:
तत्सम – निर्भय, उपदेश।
तद्भव – फूल, पंख।
देशज – छाँह, पाँव।
विदेशी – जिन्दगी, खौफ, रेल, टेबिल, रोशनी कब्जा, मकसद।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
आँसू, पूरब, मोर, सपना, धीरज।
उत्तर:
आँसू = अश्रु; पूरब = पूर्व; मोर = मयूर; सपना = स्वप्न; धीरज = धैर्य।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द विलोम
आदान प्रदान
उर्वरा बंजर
प्रवृत्ति निवृत्ति
कृतज्ञ कृतघ्न
कृत्रिम प्राकृत, अकृत्रिम
संक्षेप विस्तृत
रक्षक भक्षक।

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हिम्मत और जिन्दगी संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) जिन्दगी के असली मजे उनके लिए नहीं हैं जो फूलों की छाँह के नीचे खेलते और सोते हैं। बल्कि फूलों की छाँह के नीचे अगर जीवन का स्वाद छिपा है तो वह भी उन्हीं के लिए है जो दूर रेगिस्तान से आ रहे हैं, जिनका कंठ सूखा हुआ, होंठ फटे हुए और सारा बदन पसीने से तर है। पानी में जो अमृत तत्व है, उसे वह जानता है जो धूप में खूब सूख चुका है, वह नहीं जो रेगिस्तान में कभी पड़ा नहीं है।

कठिन शब्दार्थ :
तर = गीला; छाँह = छाया; कंठ= गला।

सन्दर्भ :
यह गद्यांश ‘हिम्मत और जिन्दगी’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्रीरामधारीसिंह ‘दिनकर’ हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने बताया है कि जीवन का असली मजा विपत्तियों एवं संकटों को झेलने के बाद ही मिलता है। आनन्द का जीवन जीना कोई जीवन नहीं है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि इस संसार में जिन्दगी का सच्चा आनन्द वही व्यक्ति उठा सकता है जो फूलों की छाँह में न सोकर काँटों की सेज पर सोता है। फूलों की छाँह के नीचे खेलने और सोने वाले जीवन का सच्चा आनन्द नहीं जानते हैं। अगर फूलों की छाँह के नीचे जीवन का स्वाद छिपा हुआ है, तो वह उन्हीं लोगों के लिए है जो रेगिस्तान की भीषण गर्मी को झेलकर आ रहे हैं, जिनका गला प्यास के लिए सूखा हुआ है, होंठ फटे हुए हैं और पूरा शरीर पसीने से लथपथ है। पानी के अन्दर जो अमृत तत्व छिपा है उसे वही व्यक्ति जानता है जो धूप में अच्छी तरह से सूख चुका है, वह नहीं जिसने अपने जीवन में कभी भी रेगिस्तान की तपन एवं गर्मी को नहीं झेला है।

विशेष :

  1. भाषा सहज एवं सरल है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।

(2) सुख देने वाली चीजें पहले भी थीं और अब भी हैं। फर्क यह है कि जो सुखों का मूल्य पहले चुकाते हैं और उनके मजे.बाद में लेते हैं, उन्हें स्वाद अधिक मिलता है। जिन्हें आराम आसानी से मिल जाता है, उनके लिए आराम ही मौत है।

कठिन शब्दार्थ :
मूल्य = कीमत; मौत = मृत्यु।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक यह बताना चाहता है कि सच्चा आनन्द उन्हीं लोगों को मिलता है जो उसे पाने से पहले संकटों से जूझते हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि इस संसार में सुख देने वाली चीजें तो पहले भी थीं और अब भी हैं। परन्तु इसमें फर्क यह है कि जो व्यक्ति सुख का आनन्द उठाने से पहले उसकी प्राप्ति में जितना अधिक संघर्ष करते हैं या विपत्तियाँ झेलते हैं, उन्हें उतना ही आनन्द प्राप्त होता है। इसके विपरीत जिन व्यक्तियों को जीवन में आराम बिना संघर्ष किये मिल जाता है उन्हें मौत भी उसी आराम से प्राप्त होती है। अत: जीवन में सच्चा आनन्द तभी मिल सकता है जब हम संघर्ष करें।

विशेष :

  1. संघर्ष के पश्चात् मिलने वाला आनन्द ही सच्चा आनन्द है।
  2. भाषा सरल एवं प्रवाहात्मक।

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(3) भोजन का असली स्वाद उसी को मिलता है, जो कुछ दिन बिना खाए भी रह सकता है। तेन त्यक्तेन भुंजीथा, जीवन का भोग त्याग के साथ करो, यह केवल परमार्थ का ही उपदेश नहीं है क्योंकि संयम से भोग करने पर जीवन से जो आनन्द प्राप्त होता है, वह निरा भोगी बनकर भोगने से नहीं मिल पाता।

कठिन शब्दार्थ :
त्येन त्यक्तेन भुंजीथा = त्याग के पश्चात् ही भोग किया जाना चाहिए; परमार्थ = परकल्याण का; संयम = इन्द्रियों को अपने वश में रखना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने बताया है कि हमारे ऋषि मुनियों ने त्याग एवं परमार्थ का महत्त्व जाना है तभी उन्होंने इनको अपनाने की बात कही है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि भोजन का असली स्वाद उसी व्यक्ति को मिलता है जो कुछ दिन तक भूखा रहता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसीलिए कहा है कि जीवन का भोग त्याग के साथ करो। ऋषि-मुनियों का यह उपदेश केवल परोपकार की भावना के लिए नहीं है बल्कि संयम के पश्चात् भोग करने पर जो आनन्द प्राप्त होता है वह मात्र भोगी बनकर भोगने से नहीं मिल सकता।

विशेष :

  1. किसी ने कहा है कि जल निष्फल था यदि तृषा न होती।
  2. भाषा सरल एवं प्रवाहमयी है।

(4) बड़ी चीजें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्जा करती हैं। अकबर ने तेरह साल की उम्र में अपने पिता के दुश्मन को परास्त कर दिया था जिसका एकमात्र कारण यह था कि अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था और वह भी उस समय जब उसके पिता के पास एक कस्तूरी को छोड़कर और कोई दौलत नहीं थी।

कठिन शब्दार्थ :
विकास = तरक्की; परास्त = हरा दिया; कस्तूरी = हिरन की नाभि में पायी जाने वाली एक विशेष प्रकार की सुगन्धित बूटी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक यह बताना चाहता है कि बड़ी चीजों या बड़े व्यक्तियों का निर्माण बड़े संकटों से जूझने के बाद ही होता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि संसार में वह व्यक्ति बड़ा या महान् हो सकता है जो जीवन में बड़े-से-बड़े संकटों को झेलता है। अकबर महान् ऐसे ही नहीं बन गया था, उसने जीवन में अनेकानेक मुसीबतें झेली थीं। जिस समय अकबर की अवस्था केवल तेरह वर्ष की थी उस समय भी उसने अपने पिता के दुश्मन अर्थात् हुमायूँ के दुश्मन शेरशाह को परास्त किया था। इस सफलता के मूल में एक कारण यही था कि अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था जहाँ संकट ही संकट थे। इन्हीं संकटों में पलकर वह बहादुर सैनिक और सम्राट बन सका। उस समय उसके पिता के पास कोई विशेष धन-दौलत भी न थीं मात्र एक कस्तूरी थी। कहने का अर्थ यह है कि संकटों में पलने वाला व्यक्ति ही आगे महान् बनता है।

विशेष :

  1. भाषा सरल एवं भावानुकूल है।
  2. शैली वर्णनात्मक।

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(5) साहसी मनुष्य उन सपनों में भी रस लेता है जिन सपनों का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है। साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता, वह अपने विचारों में रंगा हुआ अपनी ही किताब पढ़ता है। झुण्ड में चलना और झुण्ड में चरना, यह भैंस या भेड़ का काम है। सिंह तो बिल्कुल अकेला होने पर भी मगन रहता है।

कठिन शब्दार्थ :
सपनों में रस लेना = जीवन में महत्त्वाकांक्षा रखना; व्यावहारिक अर्थ नहीं = व्यावहारिक जीवन में जिनका कोई अर्थ नहीं होता; सपने उधार नहीं लेता = दूसरों के बलबूते पर वह कोई काम नहीं करता है; अपनी ही किताब पढ़ता है = अपने लक्ष्य में पूरी तरह लगा रहता है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक.ने इस अंश में साहसी व्यक्ति की इच्छा शक्ति एवं लगनशीलता के बारे में बताया है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि साहसी व्यक्ति अपने आप पर भरोसा रखता है वह किसी अन्य पर आश्रित नहीं रहता है। कभी-कभी वह ऐसी-ऐसी कल्पनाएँ कर लिया करता है जिनका संसार के जीवन में कोई अर्थ नहीं हुआ करता है। साहसी व्यक्ति दूसरे पर भरोसा नहीं करता वह अपने पर ही भरोसा रखता है। झुण्ड में चलना और झुण्ड में चरना (खाना) भैंस या पेड़ का स्वभाव होता है। शेर तो अकेले चलने में ही आनन्द लेता है।

विशेष :
(i) लेखक का मानना है कि-
कर बहियाँ बल आपनी, छाँड़ विरानी आस।
जाके आँगन है नदी सो कत मरत प्यास॥

(ii) इस भाव का भी इसमें उल्लेख है-
लीक पकड़ तीनों चले कायर क्रूर कपूत।
लीक छोड़ तीनों चलें शायर शूर सपूत॥

(iii) भाषा शैली लाक्षणिक।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 व्याख्यान

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 व्याख्यान (भाषण, स्वामी विवेकानंद)

व्याख्यान अभ्यास

बोध प्रश्न

व्याख्यान अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में जन्म लेने पर विवेकानन्द जी को क्यों अभिमान है?
उत्तर:
भारत में जन्म लेने पर विवेकानन्द जी को इसलिए अभिमान है क्योंकि इस देश में सभी धर्मों एवं देशों को सम्मान दिया जाता है।

प्रश्न 2.
स्वामीजी ने शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में व्याख्यान के प्रारम्भ में किन शब्दों से श्रोताओं को सम्बोधित किया?
उत्तर:
अमेरिकावासी बहनों तथा भाइयो।

प्रश्न 3.
शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता के विषय में स्वामीजी ने क्या कहा है?
उत्तर:
शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता के विषय में स्वामी जी ने कहा है कि ये बातें किसी सम्प्रदाय विशेष की एकाधिकार प्राप्त सम्पत्ति नहीं है।

प्रश्न 4.
पृथ्वी हिंसा से क्यों भरती जा रही है? कोई दो कारण दीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी हिंसा से इसलिए भरती जा रही है कि बहुत समय तक इस पृथ्वी पर साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और धर्मान्धता ने अपना शासन जमा लिया है। इसके दो प्रमुख कारण हैं-साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता।

प्रश्न 5.
स्वामी जी के अनुसार भारत के लोग दूसरे धर्मों को किस रूप में स्वीकार करते हैं।
उत्तर:
स्वामी जी के अनुसार भारत के लोग दूसरे धर्मों को उसी रूप में स्वीकार करते हैं जिस प्रकार समुद्र विभिन्न दिशाओं से आने वाली नदियों को अपने में समा लेता है।

प्रश्न 6.
स्वामी जी के अनुसार शीघ्र ही प्रत्येक धर्म की पताका पर क्या लिखा मिलेगा?
उत्तर:
स्वामी जी के अनुसार शीघ्र ही प्रत्येक धर्म की पताका परं लिखा मिलेगा-“सहायता करो, लड़ो मत।”

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व्याख्यान लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभिन्न धर्मों के सम्बन्ध में स्वामी जी ने क्या विचार दिए हैं? लिखिए।
उत्तर:
विभिन्न धर्मों के सम्बन्ध में स्वामी जी ने कहा है कि जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार सभी धर्म परमात्मा में आकर मिल जाते हैं, एक हो जाते हैं।

प्रश्न 2.
साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और धर्मान्धता ने मानवता को क्या हानि पहुँचाई है?
उत्तर:
साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और धर्मान्धता ने मानवता को कलंकित किया है। इन्होंने पृथ्वी पर हिंसा को जन्म दिया है तथा ये मानवता को रक्त से नहलाती रही हैं। इन्होंने सभ्यता को गर्त में डाल दिया है।

प्रश्न 3.
लेखक ने बीज के माध्यम से धर्म की किस विशेषता की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
लेखक ने बीज के माध्यम से धर्म की अच्छाई, सद्गुणों को प्रचार-प्रसार करने, सुख-समृद्धि आने आदि विशेषताओं की ओर संकेत किया है। साथ ही धर्म, दूसरे धर्मों की अच्छी बातें ग्रहण करे और अपनी विशेषताओं को बनाये रखे।

प्रश्न 4.
स्वामी जी किस पर अपने हृदय के अंतस्तल से दया प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
स्वामी जी उस व्यक्ति पर अपने हृदय के अंतस्तल से दया प्रदर्शित करना चाहते हैं जो व्यक्ति ऐसा स्वप्न देखता हो कि सारे धर्म तो नष्ट हो जाएँगे केवल मेरा ही धर्म जीवित रहेगा।

व्याख्यान दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव समाज की उन्नति में कौन-कौन से तत्व बाधक रहे हैं? इन बाधक तत्वों ने कौन-कौन सी हानियाँ पहुँचाई हैं?
उत्तर:
मानव समाज की उन्नति में साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और धर्मान्धता बाधक रहे हैं। इन तत्वों ने पृथ्वी को सदैव हिंसा से भरा है तथा इनके कारण ही मानवता बार-बार रक्त से नहाती रही है। इन्होंने ही सभ्यता को विनष्ट किया है और इन्हीं ने देशों को निराशा के गर्त में डाले रखा है।

प्रश्न 2.
भारत ने संसार को कौन-सी दो बातों की शिक्षा दी है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
भारत ने संसार को सहिष्णुता एवं सार्वभौमिक स्वीकृति नामक दो शिक्षाएँ दी हैं। भारतवासी केवल सब धर्मों के प्रति सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते हैं अपितु वे सभी धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नांकित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) शुद्धता, पवित्रता ………….. जन्म दिया है।
उत्तर:
लेखक कहता है कि शिकागो (अमेरिका) में आयोजित इस सर्वधर्म सभा की सबसे महान् उपलब्धि यह रही है कि उसने इस विचार को सही सिद्ध कर दिया है कि शुद्धता पवित्रता और दयाशीलता किसी एक सम्प्रदाय विशेष की एकाधिकार प्राप्त पूँजी नहीं है अपितु इसने सभी धर्मों से सद्विचारों को पाला-पोषा है, उसने श्रेष्ठ चरित्रवान स्त्री-पुरुष की सृष्टि की है।

(ब) यदि यहाँ कोई ………….. असम्भव है।
उत्तर:
लेखक कहता है कि यदि कोई मनुष्य या जाति यह विश्वास करती है कि समाज में एकता तभी आ सकती है जब हम अपने धर्म को तो विजय दिला दें और दूसरे धर्मों को नष्ट करवा डालें तो उनकी यह सोच नितान्त मूर्खतापूर्ण और असम्भव है।

(स) बीज भूमि में …………….. वृक्ष हो जाता है।
उत्तर:
लेखक कहता है कि जब हम बीज को भूमि में बो देते हैं और यथासमय उसे हम मिट्टी, वायु और जल से संयुक्त कर देते हैं तो वह बीज उचित समय पर अपनी वृद्धि के नियम के अन्तर्गत ही एक विशाल एवं हरा-भरा वृक्ष बन जाता है। वह बीज न तो मिट्टी बनता है और न ही वह जल या वायु बनता है। वह तो जल, वायु और मिट्टी को अपने में पचाकर तथा पृथ्वी को फोड़कर अपने नये रूप अर्थात् वृक्ष रूप में प्रकट हो जाता है।

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व्याख्यान भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ स्पष्ट करते हुए अपने वाक्यों में प्रयोग लिखिए
धूल में मिलना, दावा करना, गर्त में मिला देना।
उत्तर:
(i) धूल में मिलना-पूरी तरह नष्ट हो जाना।
वाक्य प्रयोग-जो धर्म दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाता है वह स्वत: धूल में मिल जाता है।

(ii) दावा करना-अपना प्रभुत्व दिखाना।
वाक्य प्रयोग-दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु रहकर ही हम अपने धर्म की श्रेष्ठता का दावा कर सकते हैं।

(iii) गर्त में मिला देना-मिट्टी में मिला देना।
वाक्य प्रयोग-हम श्रेष्ठ गुणों के बल पर ही अत्याचारियों को गर्त में मिला पायेंगे।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखो
नदी, समुद्र, वायु, वृक्ष, मिट्टी, जल।
उत्तर:
नदी – सरिता, तटिनी।
समुद्र – वारिधि, जलधि।
वायु – मरुत, पवन।
वृक्ष – पादप, विटप।
मिट्टी – मृत्तिका, धूल।
जल – नीर, तोय।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिएविजय, विनाश, जल, प्रातः, उन्नत।।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति-चित्रण img 1

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी सुधारकर लिखिए।
उत्तर:
वीभत्स = बीभत्स; आवृत्ति = आवृत्ति; अवणनियि = अवर्णनीय; सौहार्द्र = सौहार्द्र।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्यय को लिखिए
सहिष्णुता, ज्ञापित, बचपन, आन्तरिक, मूर्तिमान।
उत्तर:
सहिष्णुता में ‘ता’; ज्ञापित में ‘इत’ बचपन में ‘पन’; आन्तरिक में ‘इक’: मूर्तिमान में ‘मान’।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित उपसर्ग जोड़कर दो-दो वाक्य बनाइए
अ, सम्, सु, अनु, वि, अभि।
उत्तर:
अ – असत्य, अधर्म।
सम् – सम्मान, सम्यक।
सु – सुपुत्र, सुपात्र। अनु
अनु – अनुमति, अनुयायी।
वि – विज्ञान, विशेष।
अभि – अभ्यास, अभिसिक्त।

व्याख्यान संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों को और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है।

कठिन शब्दार्थ :
सहिष्णुता = सहनशीलता; अभिमान = गर्व; उत्पीड़ितों = सताये हुए लोगों को; शरणार्थियों = जिनको अपने मूल निवास स्थान से उजाड़कर दूसरी जगह रहने को मजबूर कर दिया हो।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्य खण्ड ‘स्वामी विवेकानन्द’ के ‘व्याख्यान’ शीर्षक से लिया गया है।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक भारत देश तथा यहाँ के धर्म की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए कहता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि हम भारतवासी केवल दूसरे धर्मों के प्रति सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते हैं बल्कि उन धर्मों को सच्चे रूप में स्वीकार भी करते हैं। आगे लेखक भारत देश की उस महान् संस्कृति के विषय में बताते हुए कहता है कि मुझे एक ऐसे देश अर्थात् भारत में जन्म लेने का गौरव है, जहाँ संसार भर के दुखियों एवं शरणार्थियों को शरण दी जाती रही है।

विशेष :

  1. इसमें भारत की सहिष्णुता की भावना की प्रशंसा की गयी है।
  2. भाषा सरल एवं संस्कृतनिष्ठ है।

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(2) साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है तथा इस पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है, उसको बारम्बार मानवता के स्तर से नहलाती रही है, सभ्यता को विध्वंस करती और पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है। यदि यह वीभत्स दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता।

कठिन शब्दार्थ :
साम्प्रदायिकता = भिन्न-भिन्न धर्म के मानने वालों में आपसी शत्रुता; हठधर्मिता = अपनी बात चाहे वह गलत हो या सही मनवाने के लिए दबाव बनाना; वीभत्स = घृणापूर्ण, भयानक; धर्मान्धता = अपने धर्म के प्रति विशेष लगाव; मानवता = मनुष्यता; विध्वंस्त = नष्ट; गर्त = गड्ढे; दानवी = राक्षसी प्रवृत्ति; उन्नत = ऊँचा, तरक्की किया हुआ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक यह बताना चाहता है कि धर्मान्धता ने इस देश का बड़ा नुकसान किया है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत काल तक साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और धर्मान्धता ने राज्य किया है तथा अपने दुष्कर्मों से इस पृथ्वी पर हिंसा का नंगा नाच करवाती रही है। उसने इस पृथ्वी को अनेक बार मानवीय रक्त की होली से भर दिया है। यह दुष्प्रवृत्ति सभ्यता को विनष्ट कर सम्पूर्ण देशों को निराशा के गड्डे में ढकेलती रही है। यदि यह राक्षसी दुष्प्रवृत्ति इस पृथ्वी पर न होती तो मानव समाज आज बहुत उन्नति कर गया होता।

विशेष :

  1. धर्मान्धता तथा साम्प्रदायिकता आदि राक्षसी प्रवृत्ति हैं इन्होंने संसार के राष्ट्रों का बड़ा अहित किया है। अतः हमें इनसे बचना चाहिए।
  2. भाषा संस्कृतनिष्ठ है।

(3) यदि यहाँ कोई यह आशा कर रहा है कि यह एकता किसी एक धर्म की विजय और बाकी सब धर्मों के विनाश से सिद्ध होगी, तो उससे मेरा कहना है कि भाई तुम्हारी यह आशा असम्भव है।

कठिन शब्दार्थ :
विनाश = नाश; असम्भव = कभी भी पूरी न होने वाली।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक यह कहना चाहता है कि सब धर्मों को साथ लेकर ही हम जीवन क्षेत्र में विजय प्राप्त कर सकते हैं। नफरत या घृणा द्वारा नहीं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि यदि कोई मनुष्य या जाति यह विश्वास करती है कि समाज में एकता तभी आ सकती है जब हम अपने धर्म को तो विजय दिला दें और दूसरे धर्मों को नष्ट करवा डालें तो उनकी यह सोच नितान्त मूर्खतापूर्ण और असम्भव है।

विशेष :

  1. सभी धर्मों को साथ लेकर चलने से ही समाज में एकता स्थापित हो सकती है।
  2. भाषा सरल एवं भावानुकूल है।

(4) बीज भूमि में बो दिया गया और मिट्टी, वायु तथा जल उसके चारों ओर रख दिये गए, तो क्या वह बीज मिट्टी हो जाता है? अथवा वायु या जल बन जाता है? नहीं, वह तो वृक्ष ही होता है। वह अपनी वृद्धि के नियम से ही बढ़ता है। वायु, जल और मिट्टी को अपने में पचाकर उनको उद्भिज पदार्थ में परिवर्तित करके एक वृक्ष हो जाता है।

कठिन शब्दार्थ :
वृद्धि = बढ़ते रहना; उद्भिज = जमीन फोड़कर बाहर निकलना; परिवर्तित = बदल करके।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मत है कि जिस प्रकार पृथ्वी में बीज बोने पर उससे हरा-भरा वृक्ष ही निकलता है, उसी प्रकार सद्विचारों के प्रचार से समाज में अच्छे गुणों का ही विकास होता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जब हम बीज को भूमि में बो देते हैं और यथासमय उसे हम मिट्टी, वायु और जल से संयुक्त कर देते हैं तो वह बीज उचित समय पर अपनी वृद्धि के नियम के अन्तर्गत ही एक विशाल एवं हरा-भरा वृक्ष बन जाता है। वह बीज न तो मिट्टी बनता है और न ही वह जल या वायु बनता है। वह तो जल, वायु और मिट्टी को अपने में पचाकर तथा पृथ्वी को फोड़कर अपने नये रूप अर्थात् वृक्ष रूप में प्रकट हो जाता है।

विशेष :

  1. लेखक मानता है कि जिस प्रकार जमीन में बोया गया बीज उचित समय पर जल, मिट्टी एवं वायु के संयोग से वृक्ष रूप धारण कर लेता है उसी प्रकार सद्विचार धर्म को सशक्त बनाते हैं।
  2. भाषा सरल एवं प्रवाहपूर्ण है।

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(5) इस धर्म महासभा ने जगत् के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है, तो यह है “उसने सिद्ध कर दिया है कि शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है, एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत चरित्र स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है।”

कठिन शब्दार्थ :
समक्ष = सामने प्रदर्शित = दर्शाया है; एकान्तिक = एकाधिकार वाली; अतिशय = बहुत अधिक; उन्नत चरित्र = उच्च एवं महान् चरित्र वाले।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इसं गद्यांश में लेखक ने शिकागो (अमेरिका) में आयोजित धर्म सभा की उपलब्धि के विषय में बताते हुए कहा है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि शिकागो (अमेरिका) में आयोजित इस सर्वधर्म सभा की सबसे महान् उपलब्धि यह रही है कि उसने इस विचार को सही सिद्ध कर दिया है कि शुद्धता पवित्रता और दयाशीलता किसी एक सम्प्रदाय विशेष की एकाधिकार प्राप्त पूँजी नहीं है अपितु इसने सभी धर्मों से सद्विचारों को पाला-पोषा है, उसने श्रेष्ठ चरित्रवान स्त्री-पुरुष की सृष्टि की है।

विशेष :

  1. शिकागो में आयोजित सर्वधर्म सभा ने संसार के सभी धर्मों में आपसी समझ को बढ़ाया है, इससे निश्चय ही सुसभ्यता का संसार में विकास होगा।
  2. भाषा सरल एवं प्रवाहपूर्ण है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा

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विविधा अभ्यास

बोध प्रश्न

विविधा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘झोंपड़ी में ही हमारा देश बसता है’ से क्या आशय है?
उत्तर:
इस पंक्ति का आशय यह है कि जबकि संसार के अन्य देशों ने बहुत उन्नति कर ली है, हमारे देश की अधिकांश जनता आज भी झोंपड़ों में निवास करती है।

प्रश्न 2.
कवि ने वासना को साँप क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि ने वासना को साँप इसलिए कहा है क्योंकि जैसे साँप हर किसी को डस लेता है उसी तरह वासना भी हर किसी को डस लेती है।

प्रश्न 3.
कवि को घर की यादें क्यों आ रही हैं?
उत्तर:
जेल में होने के कारण बरसात की ऋतु में कवि को अपने घर की याद आ रही है।

प्रश्न 4.
कवि घर पर किसके द्वारा संदेश भेजना चाहता हैं?
उत्तर:
कवि घर पर बरसात के बादलों द्वारा अपना संदेश भेजना चाहता है।

प्रश्न 5.
‘दीनता की उपासना’ से क्या आशय है?
उत्तर:
दया भाव दिखलाते हुए मालिक के समक्ष भोजन इत्यादि हेतु स्वाभिमान रहित चापलूसी करना।

प्रश्न 6.
स्वामी के पीछे-पीछे कौन पूँछ हिलाता है?
उत्तर:
अपने भोजन इत्यादि की लालसा में स्वामी के पीछे-पीछे श्वान (कुत्ता) पूँछ हिलाता फिरता है।

प्रश्न 7.
पिंजड़े में किसे बंद रखा जाता है?
उत्तर:
जंगल के राजा सिंह (शेर) को पकड़े जाने पर पिंजड़े के अंदर बंद रखा जाता है।

प्रश्न 8.
बँधी हुई जंजीर किसके गले में आभरण का रूप धारण करती है?
उत्तर:
स्वाभिमान रहित कायरतापूर्ण आचरण करने वाले और पराधीनता में भी प्रसन्नता का अनुभव करने वाले श्वान (कुत्ता) को गले में बाँधी जंजीर की चुभन का अनुभव नहीं होता। अपितु वह उसे आभरण (आभूषण) समझ कर प्रसन्नतापूर्वक धारण करता है।

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विविधा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि ने वासना से पहले कौन-कौन से विशेषण प्रयुक्त किये हैं और क्यों?
उत्तर:
कवि ने वासना से पहले लोलुप’, ‘विषैली’ विशेषण प्रयुक्त किये हैं। उसने वासना को लोलुप और विषैली इसलिए कहा है कि क्योंकि गाँव के लोग भोले-भाले हैं। शहर के धूर्त लोग उनका शोषण करने के लिए उन्हें ललचाते हैं।

प्रश्न 2.
‘सभ्यता का भूत और संस्कृति की दुर्दशा’ के विषय में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
आज शहरों में निवास करने वाले युवाओं पर पश्चिमी सभ्यता का भत सिर चढ़कर बोल रहा है। इस सभ्यता की चकाचौंध में वे अपनी संस्कृति और प्रतिष्ठा को भूल गए हैं। इसके वशीभूत होकर वे भोले-भाले ग्रामीण लोगों एवं बालाओं का शोषण कर रहे हैं।

प्रश्न 3.
कवि ने अपनी माँ की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
कवि ने अपनी माँ की इन विशेषताओं की ओर संकेत किया-उसकी माँ बिना पढ़ी-लिखी है लेकिन उसकी गोद में मैं अपने सब कष्ट भूल जाया करता था, यद्यपि वह लिखना पढ़ना नहीं जानती फिर भी उसे मेरे सुख-दुखों की चिन्ता हमेशा सताये रहती है।

प्रश्न 4.
पिताजी की सक्रियता को कवि ने किस रूप में देखा है?
उत्तर:
पिताजी की सक्रियता को कवि ने इस रूप में देखा है-मेरे पिताजी वृद्ध हैं पर उन पर वृद्धावस्था का कोई प्रभाव नहीं है, वे इस उम्र में भी दौड़ने की, खिलखिलाने की हिम्मत रखते हैं, वे मौत से भी नहीं डरते हैं, और शेर से भी कुश्ती लड़ने को तैयार रहते हैं। उनके बोलने में बादलों जैसी कड़क है तथा काम में वे कभी भी पस्त नहीं होते हैं।

प्रश्न 5.
कवि अपने आपको अपने पिता के सामने किस रूप में रखना चाहता है?
उत्तर:
कवि अपने आपको अपने पिता के सामने इस रूप में प्रस्तुत करना चाहता है कि वह जेल में बहुत मस्त है, खूब भोजन करता है। खूब खेलता-कूदता है, खूब पढ़ता-लिखता है और खूब काम करता है। वह चरखा कातकर सूत निकालता है। वह इतना मस्त है कि उसका वजन 70 किलो हो गया है।

प्रश्न 6.
स्वाधीनता और पराधीनता में क्या अंतर है?
उत्तर:
स्वाधीनता का अर्थ है स्वतंत्रता, अर्थात् स्वयं पर स्वयं का ही शासन-अनुशासन जबकि पराधीनता अर्थात् परतंत्रता से आशय है दूसरों के अधीन होना। स्वाधीनता की स्थिति में आप पर, स्वयं का ही नियंत्रण होता है। आप किसी के गुलाम नहीं होते जबकि पराधीनता आपको दूसरों के इशारों पर नाचे जाने को विवश करती है।

प्रश्न 7.
शेर पिंजड़े में बंद रहते हुए भी स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा कैसे करता है?
उत्तर:
शेर जंगल का राजा कहलाता है। उसे स्वयं पर किसी और का नियंत्रण स्वीकार नहीं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता पर आँच नहीं आने देता। यदि परिस्थितिवश उसे पिंजड़े में रहने के लिए विवश होना पड़े तब भी वह श्वान की तरह अपने मालिक के पीछे-पीछे दुम घुमाने की बजाए अपनी पूँछ स्वाभिमान से खड़ी-तनी रखता है। साथ ही शेर अपने गले में कभी भी पट्टा या जंजीर भी धारण नहीं करता। इस प्रकार पिंजड़े में बंद होते हुए भी शेर अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा बखूबी करता है।

प्रश्न 8.
श्वान स्वाधीनता का मूल्य नहीं समझता है। कैसे?
उत्तर:
श्वान निजी स्वार्थ के चलते निज-गौरव को तिलांजलि देने में भी संकोच नहीं करता। एक रोटी के लिए वह अपने गले में गुलामी का प्रतीक पट्टा बाँधकर अपने मालिक के पीछे-पीछे दुम हिलाता फिरता है। गले में पट्टे से बँधी जंजीर की चुभन का भी अनुभव नहीं होता। अपितु वह तो उसे गले का आभूषण समझकर सहर्ष धारण करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि श्वान को निज गौरव एवं स्वाधीनता की तनिक भी चिंता नहीं होती।

प्रश्न 9.
श्वान को कौन-सी बात नहीं चुभती?
उत्तर:
मानसिक गुलामी का प्रतीक पट्टा एवं उससे बँधी जंजीर श्वान को खूब सुहाती है। बल्कि वह तो उसे अपना आभूषण समझकर सहर्ष धारण करके अपने मालिक के आगे-पीछे मात्र एक रोटी के लिए दुम हिलाता फिरता है। उसे गले में बँधी जंजीर की चुभन तक का अनुभव नहीं होता। वास्तव में उसे निज स्वाभिमान एवं स्वाधीनता की तनिक भी चिंता नहीं होती।

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विविधा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“हमारी ग्रामीण संस्कृति को शहरी बुराइयाँ प्रभावित कर रही है” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हमारा देश गाँवों का देश है। यहाँ आज भी सम्पूर्ण देश की 70% जनता निवास करती है। गाँवों में रहने वाले ग्रामीण गरीब एवं अशिक्षित हैं लेकिन वे बहुत भोले-भाले हैं। शहरी धूर्त लोग अपनी लोलुप और विषैली वासनाओं से उनका शिकार करते हैं। वे गरीबों का शोषण करते हैं तथा उनकी युवा कन्याओं को वासना के जाल में फंसा लेते हैं। इस प्रकार शहरी बुराइयाँ ग्रामीण संस्कृति का शोषण कर उन पर अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयास कर रही है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों की प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) इन्हीं के मर्म को ………………. साँप डसता है।
उत्तर:
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि ये ग्रामीण अत्यन्त भोले-भाले एवं सीधे सच्चे हैं। नगर के धूर्त एवं मक्कार लोग इन्हें अपने भोग-विलास का शिकार बनाते रहते हैं। इन ग्रामों में बसने वाली निर्धन कन्याओं पर ये धूर्त लोग अपनी वासना भरी दृष्टि डालते हैं और फिर इनका शोषण करते हैं।

(ब) इन्हीं में लहराती ………….. भूत हँसता है।
उत्तर:
कविवर कहते हैं कि शहर के तथाकथित संभ्रान्त व्यक्ति ही इन ग्रामीण अल्हड़ बालिकाओं पर कुदृष्टि डालते हैं तथा इन्हीं को अपनी वासना का शिकार बनाते हैं साथ ही उनकी दुर्दशा पर शहरी सभ्यता का भूत ठहाके लगाता है।

(स) पाँव जो पीछे …………….. बच्चे।
उत्तर:
कविवर मिश्र कहते हैं कि स्वतन्त्रता के आन्दोलन में उसने अपने पिता की इच्छा से ही भाग लिया था लेकिन फिर भी माता-पिता के प्यार को स्मरण कर वे बेचैन हो उठते हैं और कहते हैं कि मेरी माँ मेरे बारे में रोज सोचती होगी कि मुझे जेल में बहुत कष्ट भोगने पड़ रहे होंगे। वह अपनी आँखों में आँसओं को उमड़ा रही होगी लेकिन फिर वह यह कहकर सन्तोष कर लेती थी कि मेरा पाँचवाँ पुत्र भवानी जेल में आराम से रह रहा होगा।

उस समय वह मेरे पिताजी से कह रही होगी कि तुम क्यों रो रहे हो, भवानी जेल में अच्छी तरह रहा होगा। वह तुम्हारी इच्छा जानकर और देश से अपनेपन की भावना होने के कारण ही तो जेल में गया है। उसका यह काम अच्छा है क्योंकि देश के लिए स्वयं को न्यौछावर कर देने की परम्परा तो तुम्हारी ही है। अतः उसने अच्छा किया जो वह देश की खातिर जेल चला गया। यदि वह जेल जाने से अपने पाँव पीछे खींचता तो निश्चय ही वह मेरी कोख को लजाता। जेल जाकर उसने मेरी कोख की लाज रख ली है। अतः तुम अपना दिल कमजोर मत करो। यदि तुम अपना दिल कमजोर करोगे तो दूसरे बच्चे भी रोना आरम्भ कर देंगे।

प्रश्न 3.
‘हमारा देश’ कविता के काव्य सौन्दर्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
‘हमारा देश’ कविता में कवि ने भारतीय ग्रामीण संस्कृति का चित्रण किया है। आज भी गाँव के अधिकांश लोग निर्धन और अशिक्षित हैं वे घास-फूस से बने झोंपड़ों में रहते हैं।

वे अपना मनोरंजन देशी वाद्य यंत्रों-ढोल, मृदंग और बाँसुरी से करते हैं। वे भोले-भाले एवं निष्पाप हैं। वे शहरी चकाचौंध से पूरी तरह बेखबर हैं। शहर के धूर्त व्यक्ति इनके मर्म को अपनी लोलुप और विषैली वासना से साँप की तरह डस लेते हैं। इतना ही नहीं ये शहरी साँप ग्रामीण अल्हड़ एवं मासूम युवा कन्याओं से अपनी वासना पूर्ति करते रहते हैं। उनकी दुर्दशा पर आधुनिक सभ्यता रूपी भूत अट्टहास किया करता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कवि ने अपनी व्यंग्य शैली द्वारा ग्रामीण संस्कृति का शहरी संस्कृति द्वारा किये जा रहे शोषण को उजागर किया है।

प्रश्न 4.
शेर स्वाभिमानी और श्वान दीनता और पराधीनता स्वभाव का होता है। इसे आप कैसे सिद्ध करेंगे?
उत्तर:
शेर जंगल का राजा कहलाता है। उसे स्वयं पर किसी और का नियंत्रण स्वीकार नहीं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता पर आँच नहीं आने देता। यदि परिस्थितिवश उसे पिंजड़े में रहने के लिए विवश होना पड़े तब भी वह श्वान की तरह अपने मालिक के पीछे-पीछे दुम घुमाने की बजाए अपनी पूँछ स्वाभिमान से खड़ी-तनी रखता है। साथ ही शेर अपने गले में कभी भी पट्टा या जंजीर भी धारण नहीं करता। इस प्रकार पिंजड़े में बंद होते हुए भी शेर अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा बखूबी करता है।

श्वान निजी स्वार्थ के चलते निज-गौरव को तिलांजलि देने में भी संकोच नहीं करता। एक रोटी के लिए वह अपने गले में गुलामी का प्रतीक पट्टा बाँधकर अपने मालिक के पीछे-पीछे दुम हिलाता फिरता है। गले में पट्टे से बँधी जंजीर की चुभन का भी अनुभव नहीं होता। अपितु वह तो उसे गले का आभूषण समझकर सहर्ष धारण करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि श्वान को निज गौरव एवं स्वाधीनता की तनिक भी चिंता नहीं होती।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों की प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए-
(अ) बंधन को प्राप्त हुआ सिंह
पिंजड़े में भी
बिना पट्टा ही घूमता रहता है
उस समय उसकी पूँछ
ऊपर ही तनी रहती है
अपनी स्वतंत्रता स्वाभिमान को
कभी किसी भाँति आँच नहीं आने देता, वह
उत्तर:
‘विविधा’ के शीर्षक ‘स्वाभिमान’ के पद्यांशों के उत्तर देखें।

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विविधा काव्य-सौंदर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
सोने में सुहागा होना, कोख लजाना, आँच न आने देना, पीछे-पीछे पूँछ हिलाना।
उत्तर:
(1) सोने में सुहागा होना- (अच्छी वस्तु का और अच्छा हो जाना)।
वाक्य प्रयोग-कार मिली वह भी नई। यह तो सोने में सुहागा वाली बात हो गई।

(2) कोख लजाना-(नीचा दिखाना)
वाक्य प्रयोग-देश के गद्दार कुछ कागज़ी रुपयों के लालच में माँ भारती की कोख लजाने में संलग्न हैं।

(3) आँच न आने देना-(नुकसान न होने देना)
वाक्य प्रयोग-जो ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, ईश्वर कभी उन पर आँच नहीं आने देते।

(4) पीछे-पीछे पूँछ हिलाना-(चापलूसी करना)
वाक्य प्रयोग-कान के कच्चे अधिकारियों के पीछे-पीछे उनके मातहत पूँछ हिलाते रहते हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिएसाँप, माँ, पिता, घर, नैन।
उत्तर:
साँप = सर्प, माँ = धात्री, पिता = पितृ, घर = गृह, नैन = चक्षु।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार पहचान कर लिखिए

  1. घर कि घर में चार भाई
  2. चार भाई चार बहिनें
  3. गया है सो ठीक ही है, यह तुम्हारी लीक ही है
  4. स्वामी के पीछे-पीछे पूँछ हिलाना।

उत्तर:

  1. अनुप्रास अलंकार
  2. अनुप्रास अलंकार
  3. रूपक अलंकार
  4. अनुप्रास अलंकार।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए-
1. पराधीनता-दीनता वह श्वान को चुभती नहीं
2.शहरों की ढंकी लोलुप विषैली वासना का साँप डॅसता
3. पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता
उत्तर:
1. प्रस्तुत पंक्ति में कवि श्वान (कुत्ता) का उदहारण प्रस्तुत करते हुए कहता है कि श्वान याचना-परतंत्रता का प्रतीक है। वह एक रोटी के लिए अपने मालिक के आगे-पीछे दुम हिलाता फिरता है। उसे गले में दासता का पट्टा पहनने में भी कष्ट नहीं होता है और न ही पट्टे में बँधी जंजीर की चुभन का अनुभव ही वह कर पाता है।

2. कवि के अनुसार शहरों के रहने वाले लोग बड़े लालची हैं। इन शहरियों की सभ्यता पर पर्दा पड़ा हुआ है, उसमें बनावटीपन है। ये शहर के रहने वाले लोग अत्यन्त विषैले साँप की तरह अपनी कामनाओं के वशीभूत हैं और ग्रामीण बालाओं को अपनी कामनाओं के विष का शिकार बनाते रहते हैं। वे धोखा खा जाती हैं क्योंकि इन शहरवालों की सभ्यता हुँकी हुई है, जिनके भेद का आभास उन्हें नहीं हो पाता।

3. प्रस्तुत पंक्ति में कवि ने अपनी माता द्वारा चिंतित पिता को समझाने का काल्पनिक दृश्य अंकित किया है। माँ ने पिता को दिलासा देते कहा होगा कि हमारा बेटा अपने कर्त्तव्य-पथ से पीछे हटकर भारत माँ की स्वतंत्रता के आन्दोलन में भाग न लेता अर्थात् अपने पाँव पीछे खींच लेता तो इससे मेरी कोख ही लज्जित होती। सभी मेरे लिए सोचते कि कैसी माता है कि जिसने ऐसे कुपुत्र को अपनी कोख से जन्म दिया जो अपनी मातृभूमि के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह नहीं कर सका।

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हमारा देश संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

इन्हीं तृण-फूल छप्पर से
ढके ढुलमुल गँवारू
झोंपड़ों में ही हमारा देश
बसता है। ॥1॥

कठिन शब्दार्थ :
तृण = घास-फूस; ढुलमुल = बेडौल; गँवारू = गाँव के रहने वाले, असभ्य।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के विविधा पाठ के अन्तर्गत ‘हमारा देश’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके कवि स. ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ है।

प्रसंग :
इस अंश में कवि ने ग्रामीण एवं निर्धन गाँवों की दशा का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय भारतीय ग्रामीण जीवन की दरिद्रता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि आज भी हमारे देश का अधिकांश भाग घास-फूस के छप्परों वाली झोंपड़ियों में निवास करता है। वे आज भी अशिक्षित एवं असभ्य हैं। इन्हीं में हमारा देश बसता है।

विशेष :

  1. भारत के गाँवों की आज भी जो दुर्दशा है, उसका वर्णन किया है।
  2. ढले ढुलमुल में अनुप्रास अलंकार।
  3. भाषा भावानुकूल खड़ी बोली है।।

इन्हीं के ढोल-मादल बाँसुरी के
उमगते सुर में
हमारी साधना का रस
बरसता है। ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
मादल = मृदंग; उमगते = उमंग और उत्साह भरने वाले; सुर = स्वर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने यहाँ बताया है कि इन ग्रामीण लोगों के मनोरंजन के साधन आज भी वही पुराने वाद्य यंत्र हैं।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि इन ग्रामीण जनों के मनोरंजन के साधन आज भी वही पुराने वाद्य यंत्र-ढोल, मृदंग एवं बाँसुरी हैं। इनके उमंग और उत्साह से पूर्ण स्वर आज भी इस बात का प्रमाण दे रहे हैं कि निर्धन भारतीय अभावों में भी किस उमंग से जीवन जीता है। इन बाजों से आनन्द के रस की वर्षा होती है।

विशेष :

  1. भारतीय ग्रामीण जीवन की उमंग दशा का वर्णन किया है।
  2. भाषा भावानुकूल खड़ी बोली है।
  3. अभावों में भी भारतीय ग्रामीणों में गजब का उत्साह देखा जाता है।

इन्हीं के मर्म को अनजान
शहरों की ढंकी लोलुप विषैली
वासना का साँप
इंसता है। ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
मर्म = हृदय; लोलुप = लालची; विषैली = जहरयुक्त।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में कवि ने स्पष्ट किया है कि शहर के धूर्त एवं मक्कार लोग इन गरीब ग्रामीणों का किस प्रकार शोषण करते हैं।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि ये ग्रामीण अत्यन्त भोले-भाले एवं सीधे सच्चे हैं। नगर के धूर्त एवं मक्कार लोग इन्हें अपने भोग-विलास का शिकार बनाते रहते हैं। इन ग्रामों में बसने वाली निर्धन कन्याओं पर ये धूर्त लोग अपनी वासना भरी . दृष्टि डालते हैं और फिर इनका शोषण करते हैं।

विशेष :

  1. यहाँ कवि ने ग्रामीणों की दयनीय दशा का वर्णन किया है।
  2. वासना का साँप में रूपक अलंकार।
  3. भाषा भावानुकूल है।

इन्हीं में लहराती अल्हड़
अयानी संस्कृति की दुर्दशा पर
सभ्यता का भूत
हँसता है। ॥4॥

कठिन शब्दार्थ :
अल्हड़ = मदमस्त जवानी; अयानी = अज्ञानी; भोली-भाली; सभ्यता का भूत = शहर के तथाकथित सुसंस्कृत नागरिक।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में शहरी जीवन के उन सफेदपोशों पर कवि ने व्यंग्य कसा है जो अपनी वासना की हवस गाँव की निर्धन एवं भोली-भाली कन्याओं से जुटाते हैं।

व्याख्या :
कविवर कहते हैं कि शहर के तथाकथित संभ्रान्त व्यक्ति ही इन ग्रामीण अल्हड़ बालिकाओं पर कुदृष्टि डालते हैं तथा इन्हीं को अपनी वासना का शिकार बनाते हैं साथ ही उनकी दुर्दशा पर शहरी सभ्यता का भूत ठहाके लगाता है।

विशेष :

  1. ‘सभ्यता का भूत’ से अभिप्राय पश्चिमी भौतिकवादी सभ्यता से है।
  2. ‘सभ्यता का भूत’ लाक्षणिक प्रयोग है।
  3. भाषा भावानुकूल है।

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घर की याद संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है, 
रात भर गिरता रहा है, 
प्राण मन घिरता रहा है, 
बहुत पानी गिर रहा है, 
घर नज़र में तिर रहा है, 
घर कि मुझसे दूर है जो, 
घर खुशी का पूर है जो, 
घर कि घर में चार भाई, 
मायके में बहिन आई, 
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर! ॥1॥

कठिन शब्दार्थ :
तिर रहा है= ऊपर तैर रहा है; पुर = पूरा; परिताप = कष्ट, दुःख।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘विविधा’ पाठ के अन्तर्गत ‘घर की याद’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता पं. भवानी प्रसाद मिश्र हैं।

प्रसंग :
इस अंश में कवि ने अपने जेल प्रवास में घर से अलग रहने की पीड़ा को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र कहते हैं कि आज पानी बरस रहा है अर्थात् सावन-भादों का समय है। पानी पूरी रात बरसता रहा है। ऐसे में घर की यादें मेरे प्राण एवं मन को घेर रही हैं।

एक ओर पानी बादलों से बरस रहा है तो दूसरी ओर कवि की आँखों में अपने घर की यादें उभर रही हैं। आज उसे लग रहा है कि उसका घर उससे दूर है। वही उसके लिए प्रसन्नता का भरपूर खजाना है।

इसका घर भरा-पूरा है। उसके घर में चार भाई हैं और एक बहिन है। बहिन अभी-अभी ससुराल से अपने मायके में आई है। बहिन तो पिता के घर आ गई किन्तु मेरा तो यह दुर्भाग्य है कि मैं तो अपने घर से बहुत दूर हूँ। मुझे इससे बड़ा कष्ट हो रहा है क्योंकि मैं उन सबके साथ नहीं हूँ।

विशेष :

  1. जेल प्रवास में वर्षा ऋतु के समय अपने घर की याद कवि को बहुत कष्ट दे रही है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा सहज, सरल एवं व्यंजनात्मक है।

घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें
आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला-हिला कर,
मूठ उनकी मिला कर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है।
घर नजर में तिर रहा है। ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
दंड = दंड बैठक लगाना, कसरता करना; मुगदर = व्यायाम के लिए प्रयोग की जाने वाली एक भारी युक्ति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जेल प्रवास में जब कवि को अपने घर की याद आती है तो वह भावुक हो उठता है, इसी का वर्णन है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र कहते हैं कि आज मेरे घर में सब भाई-बहिन इकट्ठे हुए हैं। मेरे चार भाई हैं और चार ही बहिनें हैं। सभी भाई एक-दूसरे की बाहों के समान हैं और बहिनें प्रेम की साकार मूर्ति हैं। लेकिन मुझे दुःख है कि इस अवसर पर मैं उनके साथ नहीं हूँ।

मेरे वे चारों भाई गीता का पाठ करके, दो सौ साठ दंड बैठक लगाकर तथा खूब मुगदर हिला-हिलाकर एवं उनकी मूठे आपस में मिलाकर जब वे नीचे उतर कर आए होंगे तब मुझको अपने साथ न पाकर उनके नेत्रों में भी आँसू छा गये होंगे। हाय! बरसात का पानी गिर रहा है और मेरा घर मेरी नजरों में तैर रहा है।

विशेष :

  1. कवि स्वयं को वहाँ न पाकर दु:ख का अनुभव कर रहा है।
  2. भाइयों की दिनचर्या का वर्णन हुआ है।
  3. भाषा भावानुकूल है।

पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दु:ख नहीं फिर
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा,
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता। ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
सोने पर सुहागा = मुहावरा है, जिसका अर्थ है और अधिक प्रिय तथा गुणवान; दुःख में गढ़ी = दुःख में डूबी हुई; पसारा = फैलाव।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि अपने भाई-बहिनों का वर्णन करने के पश्चात् इस अंश में अपनी बिना पढ़ी लिखी माँ का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र कहते हैं कि मैं अभागा पाँचवाँ भाई हूँ लेकिन परिवार में मेरी चाहना वैसी ही है जैसे कि सोने में सुहागे की होती है। मेरी माँ बिना पढ़ी-लिखी है। मेरे जेल में जाने के कारण वह नित्य प्रति दुःख में डूबी रहती है। मेरी माँ की गोद सुखों का खजाना थी। जब भी मैं उसकी गोद में अपना सिर रख लेता था तब मेरे सब दुःख नष्ट हो जाया करते थे। मेरी माँ की स्नेह की धारा मुझे जेल जीवन में भी सम्बल दे रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है इसी कारण उसका मेरे जेल के पते पर कोई पत्र नहीं आता है। कवि को इस बात का दुःख है कि अशिक्षित माँ मेरे प्रति जो भावनाएँ रखती है वे मेरे पास खत के माध्यम से नहीं आ पाती हैं। यदि वे शिक्षित होती तो निश्चय ही अपना पत्र भेजा करती।

विशेष :

  1. कवि का माँ से बहुत प्रेम है।
  2. कवि को इस बात का दुःख है कि उसकी माँ बिना पढ़ी-लिखी है अत: वह उसके जेल के पते पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने वाला पत्र भी नहीं भेज सकती है।
  3. भाषा भावानुकूल।

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पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचके,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे। ॥4॥

कठिन शब्दार्थ :
व्यापा = सताया; झंझा = तेज हवा; बिचके = डरते।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-कवि इस अंश में अपने पिताजी के बारे में बताता है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र कहते हैं कि यद्यपि मेरे पिताजी वृद्ध हैं पर उनके ऊपर वृद्धावस्था का कोई भी प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता है। यदि कोई उनसे आज भी कह दे तो वे बिना सोचे-समझे दौड़ लगा देंगे और जब कोई खुशी का वातावरण होता है तो वे बालकों की तरह आज भी खिल-खिलाकर हँसने लग जाते हैं। मेरे पिताजी इतने साहसी हैं कि वे मृत्यु के आगे भी डरते नहीं हैं और यदि उनके सामने शेर भी आ जाए तो वे उससे भयभीत न होकर उससे द्वन्द्व युद्ध करने को तैयार हो जाते हैं। जब भी वे बोलते हैं तो उनकी बोली में बादलों जैसी गुरु गम्भीरता देखने को मिलती है। उनके काम करने में आँधियाँ भी लज्जित होती हैं। कहने का भाव यह है कि जैसे आँधियों का वेग तीव्र होता है वैसे ही तीव्र वेग से वे किसी भी कार्य को सम्पन्न कर डालते हैं। उनमें आलस्य का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है।

मेरे घर में चार भाई है और चार बहिनें हैं। भाइयों में परस्पर इतनी समझ एवं प्यार है कि सभी भाई एक-दूसरे को अपनी भुजा मानते हैं और बहिनों से उन्हें असीमित प्यार मिलता है। चाहे तो वे खेल रहे हों या फिर खड़े हों, वे एक-दूसरे को मन से चाहते हैं।

विशेष :

  1. कवि ने अपने पिता के स्वभाव एवं व्यवहार का वर्णन किया है।
  2. चारों भाइयों एवं बहिनों में परस्पर बहुत प्यार था।
  3. भाषा भावानुकूल।

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा। ॥5॥

कठिन शब्दार्थ :
स्वर्ण = सोने जैसे; हेटे = तुच्छ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में कवि ने अपने पिता की भावनाओं का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र कहते हैं कि यद्यपि मेरे पिताजी वृद्ध हैं पर उन पर वृद्धावस्था की कोई छाप नहीं है। जब घर में चारों भाइयों को उन्होंने देखा होगा और मुझ पाँचवें अभागे को नहीं देखा होगा तो वे मेरा नाम लेकर रोने लग गये होंगे। पिताजी अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कह रहे होंगे कि मेरे पाँचवें पुत्र ने जेल प्रवास में कितने कष्ट सहे होंगे। पिताजी निश्चय ही मेरी याद करते रहे होंगे और मेरे प्रति जो उनका प्यार है, उसमें वे बहते रहे होंगे।

ऐसा लगता है कि संभवतः आज उनके स्वर्ण जैसे खरे पुत्र तुच्छ जान पड़ रहे होंगे। क्योंकि मैं पाँचवाँ भाई होने के नाते सब भाइयों में सुहागे की तरह प्रिय था पर समय के कुप्रभाव से आज मैं उन सबके मध्य न होकर यहाँ जेल की दीवारों के बीच बैठा हुआ हूँ।

विशेष :

  1. कवि अपने पिता की लगनशीलता, बहादुरी एवं अपने प्रति मोह का वर्णन कर रहे हैं।
  2. कवि को इस बात का दुःख है कि इन सुखद क्षणों में वह अपने परिवार के साथ नहीं है।
  3. भाषा भावानुकूल है।
  4. स्वर्ण-बेटे में रूपक अलंकार।

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और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा,
आँख में किस लिए पानी
वहाँ अच्छा है भवानी
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे। ॥6॥

कठिन शब्दार्थ :
लीक = प्रतिज्ञा, पद्धति; कोख = गोद; कच्चे = कमजोर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत अंश में कवि सोचता है कि जेल चले आने से उसके माता-पिता बहुत दु:खी होंगे।

व्याख्या :
कविवर मिश्र कहते हैं कि स्वतन्त्रता के आन्दोलन में उसने अपने पिता की इच्छा से ही भाग लिया था लेकिन फिर भी माता-पिता के प्यार को स्मरण कर वे बेचैन हो उठते हैं और कहते हैं कि मेरी माँ मेरे बारे में रोज सोचती होगी कि मुझे जेल में बहुत कष्ट भोगने पड़ रहे होंगे। वह अपनी आँखों में आँसओं को उमड़ा रही होगी लेकिन फिर वह यह कहकर सन्तोष कर लेती थी कि मेरा पाँचवाँ पुत्र भवानी जेल में आराम से रह रहा होगा।

उस समय वह मेरे पिताजी से कह रही होगी कि तुम क्यों रो रहे हो, भवानी जेल में अच्छी तरह रहा होगा। वह तुम्हारी इच्छा जानकर और देश से अपनेपन की भावना होने के कारण ही तो जेल में गया है। उसका यह काम अच्छा है क्योंकि देश के लिए स्वयं को न्यौछावर कर देने की परम्परा तो तुम्हारी ही है। अतः उसने अच्छा किया जो वह देश की खातिर जेल चला गया। यदि वह जेल जाने से अपने पाँव पीछे खींचता तो निश्चय ही वह मेरी कोख को लजाता। जेल जाकर उसने मेरी कोख की लाज रख ली है। अतः तुम अपना दिल कमजोर मत करो। यदि तुम अपना दिल कमजोर करोगे तो दूसरे बच्चे भी रोना आरम्भ कर देंगे।

विशेष :

  1. कवि ने माता-पिता के स्वभाव का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक एवं मार्मिक वर्णन किया है।
  2. कवि की माँ तथा पिता में देश प्रेम की भावना कूट-कूटकर भरी है तभी तो उसे अपनी कोख पर गर्व है।
  3. भाषा भावानुकूल।।

और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ खेलता हूँ,
दुःख डट कर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यो न कहना अस्त हूँ मैं,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता कहाँ हूँ,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लेना वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें ॥7॥

कठिन शब्दार्थ :
कातने = चरखा पर रुई कातने में; ढेर = बहुत; अस्त = समाप्त; धीर = धैर्य; पावन = पवित्र।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि यहाँ अपनी जीवन-लीला का वर्णन करते हुए माता-पिता को निश्चिंत रहने की बात कहता है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र कहते हैं कि हे सावन! तुम मेरे घर जाकर मेरे माता-पिता से कहना कि मैं यहाँ जेल की चहारदीवारी में मस्त रहता हूँ तथा मैं चरखे पर रुई कातने में व्यस्त रहता हूँ। मैं इस समय हष्ट-पुष्ट हूँ, मेरा वजन सत्तर किलो है तथा मैं ढेर सारा भोजन करता हूँ।

मैं यहाँ और लोगों के साथ कूदता हूँ, खेलता हूँ और यदि कभी कोई मुसीबत आ जाती है तो उसका डटकर सामना करता हूँ। हे बादल! तुम मेरे माता-पिता तथा परिवारीजनों से कहना कि मैं यहाँ जेल में मस्त हूँ और मुझे किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं है। मैं न तो यहाँ मुसीबतों को देखकर रोता हूँ और न अपना धैर्य खोता हूँ।

हे सजीले एवं हरे-भरे सावन! तुम मेरे लिए पुण्यवान एवं पावन हो। तुम चाहे कितना बरस लेना पर मेरे परिवारीजनों से ऐसी कोई बात मत कहना जिससे कि वे दुखी हों और नेत्रों में आँसू भर लाएँ। वे मुझ पाँचवें पुत्र के लिए कोई दुःख न करें।

विशेष :

  1. कवि सजीले सावन से अपनी कुशल क्षेम अपने परिवारीजनों को भेज रहा है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा भावानुकूल।

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मैं मजे में हूँ सही है, 
घर नहीं हूँ बस यही है, 
किन्तु यह बस बड़ा बस है, 
इसी बस से सब विरस है, 
किन्तु उनसे यह न कहना, 
उन्हें देते धीर रहना, 
उन्हें कहना लिख रहा हूँ, 
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ, 
काम करता हूँ कि कहना, 
नाम करता हूँ कि कहना, 
चाहते हैं लोग कहना,
मत करो कुछ शोक कहना। ॥8॥

कठिन शब्दार्थ :
विरस = रसहीन, शुष्क; धीर = धैर्य; नाम करता हूँ = आप लोगों की मान-मर्यादा को ऊँचा उठा रहा हूँ; शोक = दुःख।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि बादल के माध्यम से अपने परिवारीजनों को अपनी कुशलता भेजा रहा है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र बादलों से कहते हैं कि हे बादलो! तुम मेरे घर जाकर मेरे घरवालों को बताना कि मैं जेल में जरूर हूँ पर मैं मजे में हूँ और ठीक-ठाक हूँ। अन्तर बस इतना ही है कि आज मैं घर पर आप लोगों के साथ नहीं हैं। वास्तव में यह मेरी मजबूरी है और इसी मजबूरी के वशीभूत होकर लोग अपने जीवन को रसहीन बनाया करते हैं।

हे बादल! तुम मेरे परिवारीजनों से कहना कि वे मेरी चिन्ता न करें और साथ ही उन्हें धैर्य धारण कराये रखना। उनसे तुम कहना कि मैं पत्र के द्वारा अपने समाचार उनको लिखकर भेज रहा हूँ और तुम उनसे यह भी कहना कि वह भवानी खाली समय होने पर वहाँ किताबें भी पढ़ा करता है।

उनसे तुम कहना कि मैं खाली नहीं बैठा रहता। वहाँ रहकर भी मैं कुछ-न-कुछ काम करता रहता हूँ। यहाँ रहकर भी मैं अपने कुल एवं वंश की मर्यादा को बनाये रखता हूँ। इस प्रकार जेल में रहकर भी मैं आप लोगों का नाम रोशन किया करता हूँ। इतना ही नहीं मेरे अच्छे कामों के कारण यहाँ के लोग मुझे बहुत चाहते हैं। तुम उनसे यह बात जरूर कहना कि वे मेरे कारण कोई दुःख अनुभव न करें।

विशेष :

  1. कवि ने जेल जीवन की कार्य शैली का वर्णन किया है।
  2. जेल में रहते हुए भी कवि को अपने कुल की मर्यादा का ध्यान बना हुआ है।
  3. भाषा भावानुकूल।

हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझू कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें। ॥9॥

कठिन शब्दार्थ :
बक न देना = ऊल-जलूल कोई बात मत कह देना; शक = सन्देह; सजीले = सजे-सजाए, (सुन्दर लगने वाले)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में कवि अपने जेल में जीवन की कार्य प्रणाली का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या :
कविवर मिश्र बादलों से कहते हैं कि हे बादल! मेरे बारे में तुम ऐसी-वैसी अर्थात् उल्टी-सीधी बातें मत कह देना। तुम यह मत कह देना कि मैं रात-रात भर जागता हूँ और जेल में दूसरे मनुष्यों से भयभीत रहता हूँ। तुम मेरे बारे में कुछ उल्टा-सीधा मत कह देना। तुम ऐसी बात भी मत कहना जिससे उन्हें मेरे बारे में कुछ शक हो जाए।
हे सजीले सावन के बादल! तुम मेरे लिए पुण्यवान एवं पवित्र हो। तुम जमकर बरस लेना पर ऐसी कोई बात उन्हें मत बताना जिससे वे आँखों में आँसू भर लाएँ और मुझ पाँचवें पुत्र के लिए वे तरस जाएँ।

विशेष :

  1. कवि बादलों से परिवारीजनों को सुखद समाचार ही भेजना चाहता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

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स्वाभिमान संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

जीवन सामग्री हेतू दीनता की उपासना
कभी नहीं करता सिंह!
जब कि
स्वामी के पीछे-पीछे पूँछ हिलाता
श्वान फिरता है एक रोटी के लिए।
सिंह के गले में पट्ट बँध नहीं सकता
किसी कारण वश
बन्धन को प्राप्त हुआ सिंह
पिजंड़े में भी
बिना पट्टा ही घूमता रहता है।

कठिन शब्दार्थ :
दीनता = दया भाव, उपासना = पूजा, श्वान = कुत्ता।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘विविधा के शीर्षक ‘स्वाभिमान’ से अवतरित हैं। इन पंक्तियों के रचयिता ‘आचार्य विद्यासागर’ हैं।

प्रसंग :
शेर और कुत्ते के स्वभावों के मध्य तुलना का रोचक वर्णन है।

व्याख्या :
कवि के अनुसार जीवन में स्वाभिमान का भाव होना अत्यन्त आवश्यक है और स्वयं के स्वाभिमान के मूल्य को शेर के स्वभाव से सरलता से समझा जा सकता है। कवि के अनुसार जंगल का राजा स्वाभिमान शेर अपने भोजन के लिए कभी भी किसी के आगे दया भाव नहीं दिखलाता है जबकि दूसरी ओर कुत्ता एक रोटी की प्राप्ति की प्रबल इच्छा लिये अपने मालिक के आगे-पीछे पूँछ हिलाता फिरता है।

यदि किसी कारण से शेर को बन्धन युक्त करके उसे पिंजरे में डाल भी दिया जाये तब भी उसके गले में कोई भी कुत्तों वाली पट्टा नहीं बाँध सकता। दूसरे के बंधन में होते हुए भी शेर विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं करता और पिजड़े में भी निर्भीक होकर बिना गले में पट्टा धारण किये दहाड़ते हुए इधर-से-उधर घूमता रहता है।

विशेष :

  1. स्वाभिमान का मूल्य कवि ने समझाया है।
  2. भाषा सरल व सहज है।
  3. भावानुकूल शब्दों का चयन किया गया है।
  4. स्वाभिमान के रूप में शेर का प्रतीकात्मक उदाहरण एकदम सटीक किया गया है।

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उस समय उसकी पूँछ
ऊपर उठी तनी रहती है
अपनी स्वतंत्रता-स्वाभिमान को
कभी किसी भांति
आँच अपने नहीं देता वह!
और श्वान
स्वतंत्रता का मूल्य नहीं समझता,
पराधीनता-दीनता वह
श्वान के गले चुभती नहीं कभी,
श्वान के गले में जंजीर भी
आभरण का रूप धारण करती है।

कठिन शब्दार्थ :
स्वतंत्रता = आजादी, स्वाभिमान =स्वयं पर गर्व का अनुभव होना, आँच आना= संकट आना, पराधीनता = दूसरों के आधीन होना, आभरण = आभूषण, गहना।

सन्दर्भ-प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कवि स्वाभिमान एवं स्वतंत्रता के मूल्य को रेखांकित करते हुए कहते हैं तो पिंजड़े में बंद होते हुए भी बंधनयुक्त शेर की पूँछ कुत्ते की पूँछ के विपरीत सदैव ऊपर की ओर उठी-तनी रहती है। अर्थात् प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शेर कभी भी अपनी आज़ादी और स्वयं पर गर्व का अनुभव होने की भावना पर संकट नहीं आने देता और दूसरी ओर कुत्ता मानो उसे स्वतंत्रता की कीमत की समझ ही न हो, अपने गले में दासता की जंजीर को किसी आभूषण की तरह पहने अपने मालिक के पीछे-पीछे दुम हिलाता एवं खींसे-निपोरता फिरता है। वह पराधीनता एवं दीनता के भाव में बहकर स्वयं के स्वाभिमान तक की चिंता नहीं करता और उसे अपने गले में पड़ी भारी जंजीर की चुभन का भी भान नहीं होता है।

विशेष :

  1. कवि ने शेर और कुत्ते के प्रतीकात्मक उदाहरणों से स्वतंत्रता-पराधीनता के सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किये हैं।
  2. भाषा सरल, सहज, सपाठ व सुग्राह्य है।
  3. शब्दों का चयन निहित भाव के अनुकूल है।
  4. आँच आने नहीं देता के माध्यम से भाषा अलंकारिक हो गई है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह

कल्याण की राह अभ्यास

बोध प्रश्न

कल्याण की राह अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि ‘मन’ में किस बात के लिए इंगित करते
उत्तर:
कवि ‘मन’ में इस बात के लिए इंगित करते हैं कि हमारा विश्वास सूरज के चक्र के समान सदैव गतिशील बना रहे।

प्रश्न 2.
कवि किस चक्र को नहीं रुकने देने की बात करता है?
उत्तर:
कवि विश्वास एवं प्रगति चक्र को नहीं रुकने देने की बात करता है।

प्रश्न 3.
तुलसीदास एवं गिरिजाकुमार माथुर की दो अन्य कविताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास जी ने ‘विनय-पत्रिका’ एवं ‘दोहावली’ नामक रचनाएँ लिखी हैं। गिरिजाकुमार माथुर ने ‘धूप के धान’ तथा ‘नाश और निर्माण’ नामक कृतियाँ रची हैं।

प्रश्न 4.
‘तात राम नर नहीं भूपाला’ कथन किसने किससे कहा?
उत्तर:
यह कथन विभीषण ने रावण से कहा है।

प्रश्न 5.
माल्यवन्त कौन था?
उत्तर:
माल्यवन्त रावण का सचिव (मंत्री) था।

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कल्याण की राह लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभीषण रावण से बार-बार क्या विनती करता है?
उत्तर:
विभीषण रावण से बार-बार विनती करता है कि हे तात! यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं तो सीताजी को राम को वापस दे दीजिए, राम कोई साधारण पुरुष नहीं है। वे तो काल के भी काल हैं, दीनबन्धु हैं और शरणागत शत्रु की रक्षा करने वाले हैं अतः आप मेरी बात मान जाइए और सीताजी को उन्हें वापस लौटा दीजिए।

प्रश्न 2.
“सीता देहु राम कहुँ अहित न होय तुम्हार” से क्या आशय है?
उत्तर:
विभीषण रावण को समझाते हुए कहते हैं कि हे तात! मैं तुम्हारे चरणों को पकड़कर विनती करता हूँ कि तुम्हें मेरे दुलार की (छोटे भाई-बहन के प्रति बड़ों का स्नेह अथवा कल्याण की भावना) रक्षा करनी चाहिए। तुम्हें श्रीराम को उनकी सीता को लौटा देना चाहिए इससे तुम्हारा किसी भी दशा में अहित नहीं होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो तुम्हें समझ लेना चाहिए कि सीता राक्षसों के कुल के लिए काल सिद्ध होगी।

प्रश्न 3.
“पाँव में अनीति के मनुष्य कभी झुके नहीं” का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गिरिजाकुमार माथुर का इस पंक्ति से आशय यही है कि मनुष्य को कभी अनीति और अन्याय के मार्ग पर अपना कदम नहीं बढ़ाना चाहिए। अनीति और अन्याय करने से मनुष्य की अच्छी वृत्तियों के विकास में बाधा पड़ती है। अपने जीवन के लक्ष्य को नीति का अनुसरण करके प्राप्त किया जा सकता है।

कल्याण की राह दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभीषण के समझाने पर रावण ने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की?
उत्तर:
विभीषण ने जब रावण से कहा कि उसे राम से बैर मोल नहीं लेना चाहिए। वे कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे तीनों लोकों के स्वामी और काल के भी काल है। उनसे शत्रुता करके कोई बच नहीं सकता। अत: बैर भाव छोड़कर उन्हें सीता सौंपकर उनकी शरण में चले जाओ। वे शरणागत वत्सल हैं। वे तुम्हें क्षमा कर देंगे और तुम्हारा कल्याण करेंगे। इस प्रकार जब विभीषण ने रावण को समझाया तो रावण पर इसकी विपरीत ही प्रतिक्रिया हुई। वह क्रोध से आग बबूला हो उठा और बोला कि तुम शत्रु के उत्कर्ष की बात करते हो, शत्रु का गुणगान करते हो। अरे कोई है जो इन दोनों को (विभीषण और माल्यवन्त को) राजसभा से दूर कर दे। इतना सुनकर माल्यवन्त तो उठकर अपने घर चला गया। किन्तु विभीषण ने फिर भी हार नहीं मानी। वह उसे पुनः समझाने का प्रयास करने लगा। इस पर रावण ने उस पर अपने पाँव से आघात किया। तब दु:खी होकर और मन में रावण का सर्वनाश विचार कर विभीषण राम की शरण में आ गया।

प्रश्न 2.
‘सूरज का पहिया’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
‘सूरज का पहिया’ से कवि का यह आशय है कि जिस प्रकार सूरज का पहिया बिना थके, बिना रुके रात-दिन चलता रहता है उसी तरह मनुष्य को भी मन के विश्वास के स्वर्णिम चक्र को चलाए रखना चाहिए। उसे अपने विश्वास को कभी रुकने नहीं देना चाहिए। सूर्य की भाँति न तो उसकी आभा मन्द होनी चाहिए और न गति रुकनी चाहिए।

प्रश्न 3.
‘विभीषण-रावण संवाद’ एवं ‘सूरज का पहिया’ कविताएँ कल्याण की राह बताती हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘विभीषण-रावण संवाद’ कविता में विभीषण ने रावण को बार-बार समझाया है कि हे तात! तुम कुबुद्धि को त्याग दो क्योंकि कुबुद्धि विपत्तियों का घर होती है और उससे मानव का कुछ भला नहीं होता है। अत: सुमति को अपनाओ और पर स्त्री को श्रीराम को सौंपकर उनकी शरण ले लो तो तुम्हारा उद्धार हो जाएगा।

‘सूरज का पहिया’ कविता भी मानव के कल्याण की बात करती है। मानव को सूर्य के समान सदैव आभा युक्त होकर बिना थके, बिना रुके अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर आगे बढ़ता रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
सूरज की तश्तरी’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
‘सूरज की तश्तरी’ से कवि का आशय है कि मानव जीवन भर सूर्य के समानं संसार को ज्ञान (प्रकाश) बाँटता रहे। वह कभी थके नहीं, रुके नहीं। उसके होठों पर अपने विश्वास के गीत हों और भविष्य निरन्तर प्रगति के पथ पर बढ़ता चला जाए। सूरज की तश्तरी के समान ही उसकी चमक कभी कम न होने पाए।

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कल्याण की राह काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए
(1) सचिव वैद गुरु………….बेगिही नास।
उत्तर:
कविवर तुलसीदास का कथन है कि मंत्री, वैद्य और गुरु यदि भय के कारण प्रिय लगने वाला झूठ बोलते हैं अर्थात् चापलूसीवश सत्य बात न बोलकर मीठी बातें बोलते हैं तो इनसे क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म का शीघ्र ही नाश हो जाता है। कहने का भाव यह है कि यदि मंत्री राज्य की वास्तविक स्थिति का वर्णन न करके राजा को झूठी खबर या सूचना देता है, यदि वैद्य रोगी की वास्तविक दशा को न बताकर झूठ बोलता है और यदि गुरु भयवश (या स्वार्थवश) धर्म की बात नहीं बोलता है तो इन स्थितियों में क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म का शीघ्र ही नाश हो जाता है। अतः किसी भी परिस्थिति में झूठ नहीं बोलना चाहिए।

किन्तु रावण की राजसभा में तो यही हो रहा था। चाटुकार मंत्री उसकी झूठी प्रशंसा कर रहे थे। उसी समय उपयुक्त अवसर समझकर विभीषण वहाँ आ गया। उसने भाई के चरणों में अपना शीश झुकाकर प्रणाम किया। तदुपरान्त सिर को झुकाकर पुनः प्रणाम करके अपने आसन पर बैठकर और रावण से आज्ञा पाकर इस प्रकार वचन बोला-हे दयामय! आप यदि मुझसे कुछ पूछना चाहें तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपकी हितकारी बात को कहना चाहता हूँ। हे तात! यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, यदि आप सुन्दर कीर्ति, सुन्दर बुद्धि, शुभ गति और अनेक प्रकार के सुख चाहते हैं तो आप पराई स्त्री के मस्तक को चौथ के चन्द्रमा की भाँति कलंक युक्त मानते हुए उसका परित्याग कर दें।

अर्थात् जिस प्रकार भाद्रपद मास में कृष्णपक्ष की चतुर्थी का चन्द्र दर्शन कलंक का कारण बनता है, उसी भाँति पराई स्त्री को घर में रखना कलंक का कारण है। अतः पराई स्त्री का त्याग करना ही उचित है। अत: तुम श्रीराम की पत्नी सीता को उन्हें वापस लौटा दो। वे चौदह लोकों के स्वामी हैं, उनसे द्रोह करके कोई बच नहीं सकता। हे स्वामी! मनुष्य के लिए काम वासना, क्रोध, अहंकार, लिप्सा ये सब नरक के मार्ग हैं अर्थात् इनसे व्यक्ति को नरक का मुँह देखना पड़ता है। अतः इन सबका त्याग करके सीता को राम को सौंपकर उनका भजन करो, जिनका भजन साधु सन्त करते रहते हैं अर्थात् उन श्रीराम की भक्ति करने से ही तुम्हारा कल्याण हो सकता है।

(2) मन में विश्वास …………. चुके नहीं।
उत्तर:
कविवर श्री गिरिजाकुमार माथुर कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन के विश्वास को सदैव मजबूत बनाये रखना चाहिए। वह निरन्तर स्वर्णिम चक्र की भाँति (सूर्य के गोले के समान) निरन्तर गतिशील बना रहना चाहिए। तुम्हें हमेशा यह प्रयास करना चाहिए कि तुम्हारे मन में पीली केसर की भाँति जो स्वप्न जन्म ले रहे हैं, वे कभी चुक न जाएँ अर्थात् समाप्त न हो जाएँ। कहने का भाव यह है कि तुम्हारे मन में जो स्वप्न जन्मे हैं वे सदैव पल्लवित और पुष्पित होते रहें, वे कभी मुरझाएँ नहीं। तुम अपने जीवन में सदैव उसी तरह प्रकाशित होते रहो जिस तरह सूर्य का गोला प्रकाशित होता रहता है।

अतीत के डंठलों पर भविष्य के चन्दनों को उगाओ। कहने का भाव यह है कि अतीत में तुमने अनेकानेक संकट एवं विपत्तियाँ झेली हैं पर अपने भविष्य को तुम चन्दन के समान महकाओ। तुम्हारी आँखों में तुम्हारे विश्वास की रंग-बिरंगी तस्वीर हो। तुम्हारे ओठों पर तुम्हारे स्वप्नों के गीत हों। यदि कभी तुम्हारे जीवन में शाम भी आ जाए अर्थात् निराशा आ जाए तब भी तुम चन्द्रमा के समान अपनी शीतलता बिखेरते रहना। कहने का भाव यह है कि निराशा में भी अपनी आशा का संबल मत छोड़ना। तुम्हारी आँखों की बरौनियों में चन्द्रमा कभी भी थके नहीं अपितु वह निरन्तर गतिशील बना रहे। तुम्हारे जीवन के स्वप्नों की पीली केसर कभी भी मुरझाए नहीं, ऐसा तुम्हें सदैव प्रयत्न करना चाहिए।

(3) काम क्रोध………………जेहि संत।
उत्तर :
किन्तु रावण की राजसभा में तो यही हो रहा था। चाटुकार मंत्री उसकी झूठी प्रशंसा कर रहे थे। उसी समय उपयुक्त अवसर समझकर विभीषण वहाँ आ गया। उसने भाई के चरणों में अपना शीश झुकाकर प्रणाम किया। तदुपरान्त सिर को झुकाकर पुनः प्रणाम करके अपने आसन पर बैठकर और रावण से आज्ञा पाकर इस प्रकार वचन बोला-हे दयामय! आप यदि मुझसे कुछ पूछना चाहें तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपकी हितकारी बात को कहना चाहता हूँ। हे तात! यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, यदि आप सुन्दर कीर्ति, सुन्दर बुद्धि, शुभ गति और अनेक प्रकार के सुख चाहते हैं तो आप पराई स्त्री के मस्तक को चौथ के चन्द्रमा की भाँति कलंक युक्त मानते हुए उसका परित्याग कर दें।

अर्थात् जिस प्रकार भाद्रपद मास में कृष्णपक्ष की चतुर्थी का चन्द्र दर्शन कलंक का कारण बनता है, उसी भाँति पराई स्त्री को घर में रखना कलंक का कारण है। अतः पराई स्त्री का त्याग करना ही उचित है। अत: तुम श्रीराम की पत्नी सीता को उन्हें वापस लौटा दो। वे चौदह लोकों के स्वामी हैं, उनसे द्रोह करके कोई बच नहीं सकता। हे स्वामी! मनुष्य के लिए काम वासना, क्रोध, अहंकार, लिप्सा ये सब नरक के मार्ग हैं अर्थात् इनसे व्यक्ति को नरक का मुँह देखना पड़ता है। अतः इन सबका त्याग करके सीता को राम को सौंपकर उनका भजन करो, जिनका भजन साधु सन्त करते रहते हैं अर्थात् उन श्रीराम की भक्ति करने से ही तुम्हारा कल्याण हो सकता है।

प्रश्न 2.
‘तुलसीदास’ एवं ‘गिरिजाकुमार माथुर’ की काव्य-कला की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास जी सामाजिक एवं धार्मिक मर्यादाओं के पोषक रहे हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति विशेष के आचरण में जितनी पवित्रता होगी समाज का कल्याण भी उतना ही होगा। इसी तथ्य को उन्होंने ‘विभीषण-रावण संवाद’ के माध्यम से व्यक्त किया है। ये विचार तुलसी ने अवधी भाषा में दोहा एवं चौपाई छन्दों के माध्यम से व्यक्त किए हैं।

गिरिजाकुमार माथुर के गीत छायावादी प्रभाव लिए हुए हैं। उनमें आनन्द, रोमांस और संताप की तरल अनुभूति के साथ लय भी मिलती है। उनके शब्द चयन में तुक-तान और अनुतान की काव्यात्मक झलक मिलती है। वास्तव में वे माँसल रोमांस के वाचिक परम्परा के कवि हैं। आधुनिक कविता के वे श्रेष्ठ कवि हैं।

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विभीषण-रावण संवाद संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।
अवसर जानि विभीषन आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
पुनि सिरू नाइ बैठनिज आसन । बोला बचन पाइ अनुशासन॥
जो कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाई। तजउ चउथि के चंद कि नाई।
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोही तिष्टइ नहिं सोई॥
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहिभजहुभजहिंजेहि संत ॥1॥

कठिन शब्दार्थ :
सचिव = मंत्री, सलाहकार; बैद = वैद्य (चिकित्सक); गुर = गुरु (शिक्षक); भय = डर के कारण; राज = राज्य; बेगिहीं = शीघ्र; सहाई = सहायक; नाइ = झुकाकर; अनुशासन = आज्ञा; सुजसु = सुन्दर यश; परनारि = पराई स्त्री; लिलार = माथे पर; भुवन = लोक; भूतद्रोही = प्राणियों से शत्रुता रखने वाला।

सन्दर्भ :
यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘कल्याण की राह’ के अन्तर्गत ‘विभीषण-रावण-संवाद ‘शीर्षक से लिया गया है। मूलतः यह अंश तुलसीकृत रामचरितमानस’ के ‘सुन्दरकाण्ड’ से लिया गया है।

प्रसंग :
विभीषण अपने भ्राता रावण को नीतिगत बातें बताते हुए कहता है।

व्याख्या :
कविवर तुलसीदास का कथन है कि मंत्री, वैद्य और गुरु यदि भय के कारण प्रिय लगने वाला झूठ बोलते हैं अर्थात् चापलूसीवश सत्य बात न बोलकर मीठी बातें बोलते हैं तो इनसे क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म का शीघ्र ही नाश हो जाता है। कहने का भाव यह है कि यदि मंत्री राज्य की वास्तविक स्थिति का वर्णन न करके राजा को झूठी खबर या सूचना देता है, यदि वैद्य रोगी की वास्तविक दशा को न बताकर झूठ बोलता है और यदि गुरु भयवश (या स्वार्थवश) धर्म की बात नहीं बोलता है तो इन स्थितियों में क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म का शीघ्र ही नाश हो जाता है। अतः किसी भी परिस्थिति में झूठ नहीं बोलना चाहिए।

किन्तु रावण की राजसभा में तो यही हो रहा था। चाटुकार मंत्री उसकी झूठी प्रशंसा कर रहे थे। उसी समय उपयुक्त अवसर समझकर विभीषण वहाँ आ गया। उसने भाई के चरणों में अपना शीश झुकाकर प्रणाम किया। तदुपरान्त सिर को झुकाकर पुनः प्रणाम करके अपने आसन पर बैठकर और रावण से आज्ञा पाकर इस प्रकार वचन बोला-हे दयामय! आप यदि मुझसे कुछ पूछना चाहें तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपकी हितकारी बात को कहना चाहता हूँ। हे तात! यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, यदि आप सुन्दर कीर्ति, सुन्दर बुद्धि, शुभ गति और अनेक प्रकार के सुख चाहते हैं तो आप पराई स्त्री के मस्तक को चौथ के चन्द्रमा की भाँति कलंक युक्त मानते हुए उसका परित्याग कर दें।

अर्थात् जिस प्रकार भाद्रपद मास में कृष्णपक्ष की चतुर्थी का चन्द्र दर्शन कलंक का कारण बनता है, उसी भाँति पराई स्त्री को घर में रखना कलंक का कारण है। अतः पराई स्त्री का त्याग करना ही उचित है। अत: तुम श्रीराम की पत्नी सीता को उन्हें वापस लौटा दो। वे चौदह लोकों के स्वामी हैं, उनसे द्रोह करके कोई बच नहीं सकता। हे स्वामी! मनुष्य के लिए काम वासना, क्रोध, अहंकार, लिप्सा ये सब नरक के मार्ग हैं अर्थात् इनसे व्यक्ति को नरक का मुँह देखना पड़ता है। अतः इन सबका त्याग करके सीता को राम को सौंपकर उनका भजन करो, जिनका भजन साधु सन्त करते रहते हैं अर्थात् उन श्रीराम की भक्ति करने से ही तुम्हारा कल्याण हो सकता है।

विशेष :

  1. इस पद्यांश में नीति सम्बन्धी वचनों का उपदेश दिया गया है।
  2. काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ आदि मनुष्य के आन्तरिक शत्रु हैं। मनुष्य अपनी इन्द्रियों पर संयम रखकर इन पर विजय प्राप्त कर सकता है।
  3. भारतीय पुराणों में ब्रह्माण्ड में स्वर्ग, नरक, पृथ्वी, आकाश-पाताल आदि चौदह लोक बताए गए हैं।
  4. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल हैं।
  5. चौपाई एवं दोहा छन्द का प्रयोग।
  6. चौथ के चन्द्र दर्शन से कलंक लगता है। इस जन विश्वास का सटीक वर्णन किया गया है।

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेश्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। व्यापक अजित अनादि अनंता॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।
ताहि बयरू तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजन राम बिनु हेतु सनेही॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जिय रावन॥
बार बार पद लागऊँ विनय करऊँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद, भजहु कोसलाधीस॥
मुनि पुलकित निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरू तात ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
भूपाला = राजा; भुवनेश्वर = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी; कालहु कर काला = मृत्यु की भी मृत्यु; अज = अजन्मा; अनामय = विकार रहित; अजित = जिससे कोई जीत न सके; अनादि = जिसका आदि नहीं है; मानुष = मनुष्य; जनरंजन = लोगों को प्रसन्न करने वाला; भंजन = नष्ट करने वाला; गो = पृथ्वी; धेनु = गाय; खल ब्राता = दुष्टों के समूह को; रच्छक = रक्षक; बयरू = बैर; नाइअ = झुकाइए; प्रनतारति = शरण में आये हुए के दुःख को; अघ = पाप; त्रय ताप = तीनों तापों को; दससीस = रावण; परहरि = त्यागकर; कोसलाधीस = रामचन्द्रजी; सन = से।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में विभीषण अपने भाई रावण को समझाता है कि वह प्रभु राम को सीता को लौटा दे और प्रभु की शरण में चला जाए तो उसका कल्याण हो जाएगा।

व्याख्या :
कविवर तुलसीदास जी कहते हैं कि विभीषण अपने भाई रावण को समझाते हुए कहता है कि हे तात! अर्थात् भाई रावण। काम, क्रोध, मद और लोभ-ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्र जी को भजिए, जिन्हें सन्त पुरुष भजते हैं। हे तात! राम मनुष्यों के राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे भगवान हैं वे विकार रहित, अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं। उन कृपा के समुद्र भगवान ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का हित करने के लिए ही मनुष्य शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिए, वे सेवकों को आनन्द देने वाले, दुष्टों के समूह को नष्ट करने वाले और वेद तथा धर्म की रक्षा करने वाले हैं। अत: आप उनसे बैर त्यागकर उन्हें अपना माथा नवाइए। वे रघुनाथ शरणागत का दुःख नष्ट करने वाले हैं। हे तात! उन प्रभु श्रीराम को जानकी जी दे दीजिए और बिना ही कारण स्नेह करने वाले श्रीराम को भजिए।

आगे विभीषण समझाता है कि जिसे सम्पूर्ण जगत् से द्रोह (बैर) करने का पाप लगा है, शरण जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते अर्थात् शरणागत चाहे कितना ही बैरी या पापी क्यों न हो? भगवान श्रीराम उसे अपना लेते हैं। जिनका नाम तीनों तापों (दैविक, दैहिक, भौतिक) का नाश करने वाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्य रूप में प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदय में यह बात अच्छी तरह समझ लो।

हे दसशीश! मैं बार-बार आपके चरणों में लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को त्यागकर आप कौशलपति श्रीराम का भजन करिए। मुनि पुलस्त्य जी ने अपने शिष्य के हाथ यह बात तुम्हारे लिए कहला भेजी है। हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरन्त यह बात प्रभु अर्थात् आप से कह दी है।

विशेष :

  1. कवि ने काम, क्रोध, मद एवं मोह को त्यागने का उपदेश दिया है।
  2. भगवान के निराकार और साकार दोनों रूपों का वर्णन है
  3. अजित अनादि अनन्ता में अनुप्रास अलंकार है।
  4. भाषा सहज एवं सरल है।
  5. शान्त रस।

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माल्यवन्त अति सचिव सयाना। तासु वचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तब नीति विभूषन । सो उर धरहु जो कहत विभीषन॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दुरिन करहु इहाँ हइ कोऊ॥
माल्यवन्त गृह गयउ बहोरी। कहइ विभीषन पुनि कर जोरी॥
सुमुति कुमति सबके उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपत्ति नाना। जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना॥
तब उर कुमति बसी विपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥
दोहा : तात चरन गहि मागउँराखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँअहित न होइ तुम्हार ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
सचिव = मन्त्री; सयाना = चतुर; अति = अधिक; अनुज = छोटा भाई; नीति विभूषन = नीतिवान; उर = हृदय में; रिपु = शत्रु; उतकरष = उत्कर्ष, महिमा; सठ = मूर्ख; दुरिन करहुँ = इन्हें दूर कर दो अर्थात् यहाँ से ‘भगा दो; गयउ = चला गया; पुरान = पुराण; निगम = शास्त्र; अस = ऐसा; सुमति = अच्छी बुद्धि; कुमति = दुष्ट बुद्धि; निदाना = परिणाम में; विपरीता = उल्टी; रिपु प्रीता = शत्रु को मित्र; कालराति = कालरात्रि; निसिचर कुल = राक्षस कुल; घनेरी = अधिक; राखहु मोर दुलार = मेरा दुलार रखिए अर्थात् मेरी बात को प्रेमपूर्वक मान लो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में विभीषण अपने भाई रावण को समझाते हुए कहते हैं कि श्रीराम को उनकी पत्नी लौटा दो, इसी में तुम्हारा कल्याण है।

व्याख्या :
कविवर तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस समय विभीषण रावण को नेक सलाह दे रहा था उस समय वहाँ माल्यवन्त नामक एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री बैठा हुआ था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना और कहा हे तात! (रावण) आपके छोटे भाई बहुत ही नीतिवान हैं। अतः विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे आप अपने हृदय में धारण कर लीजिए।

इस पर रावण ने कहा कि ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा का बखान कर रहे हैं। क्या यहाँ कोई व्यक्ति है जो इन्हें यहाँ से दूर कर दे। यह सुनकर माल्यवन्त तो अपने घर चला गया लेकिन विभीषण पुनः हाथ जोड़कर कहने लगे-हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि सभी मनुष्यों के हृदय में रहती है। जहाँ सुबुद्धि होती है वहाँ नाना प्रकार की सम्पत्तियाँ आ जाती हैं और जहाँ कुबुद्धि होती है वहाँ परिणाम में विपत्ति ही प्राप्त होती है। ऐसा लगता है कि आपके हृदय में उल्टी बुद्धि अर्थात् कुबुद्धि आ बसी है। इसी से आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे हैं जो राक्षस कुल के लिए कालरात्रि के समान है उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है।

हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ अर्थात् विनती करता हूँ कि आप मेरा दुलार रखिए अर्थात् मेरी बात को स्वीकार कर लीजिए और सीताजी को श्रीराम को दे दीजिए, जिसमें आपका अहित नहीं होगा।

विशेष :

  1. विभीषण रावण से बार-बार विनती करके सीताजी को लौटाने की प्रार्थना करता है।
  2. सुमति और कुमति सभी में होती है पर विद्वान लोग सुमति को धारण करते हैं कुमति से दूर रहते हैं।
  3. अनुप्रास की छटा।
  4. भाषा सहज एवं सरल है।
  5. शान्त रस।

सूरज का पहिया संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

मन में विश्वास का यह सोनचक्र रुके नहीं
जीवन की पियरी केसर कभी चुके नहीं।
उम्र रहे झलमल
ज्यों सूरज की तश्तरी
डंठल पर विगत के
उगे भविष्य संदली
आँखों में धूप लाल
छाप उन ओठों की
जिसके तन रोओं में
चंदरिमा की कली
छाँह में बरौमियों के चाँद कभी थके नहीं।
जीवन की पियरी केसर कभी चुके नहीं ॥1॥

कठिन शब्दार्थ :
सोनचक्र = स्वर्णिम पहिया; पियरी = पीली; झलमल = झिलमिलाती रहे, चमकती रहे; सूरज की तश्तरी = सूरज का गोला; विगत = बीते हुए; संदली = चन्दन के समान; चंदरिया = चन्द्रमा।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के कल्याण की राह पाठ से गिरिजाकुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘सूरज का पहिया से लिया गया है।

प्रसंग :
इस अंश में कवि संसार के मनुष्यों को सचेत करते हुए कहता है कि तुम विपत्तियों और संकटों में कभी भी घबड़ाना मत और अपने लक्ष्य को पाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना।

व्याख्या :
कविवर श्री गिरिजाकुमार माथुर कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन के विश्वास को सदैव मजबूत बनाये रखना चाहिए। वह निरन्तर स्वर्णिम चक्र की भाँति (सूर्य के गोले के समान) निरन्तर गतिशील बना रहना चाहिए। तुम्हें हमेशा यह प्रयास करना चाहिए कि तुम्हारे मन में पीली केसर की भाँति जो स्वप्न जन्म ले रहे हैं, वे कभी चुक न जाएँ अर्थात् समाप्त न हो जाएँ। कहने का भाव यह है कि तुम्हारे मन में जो स्वप्न जन्मे हैं वे सदैव पल्लवित और पुष्पित होते रहें, वे कभी मुरझाएँ नहीं। तुम अपने जीवन में सदैव उसी तरह प्रकाशित होते रहो जिस तरह सूर्य का गोला प्रकाशित होता रहता है।

अतीत के डंठलों पर भविष्य के चन्दनों को उगाओ। कहने का भाव यह है कि अतीत में तुमने अनेकानेक संकट एवं विपत्तियाँ झेली हैं पर अपने भविष्य को तुम चन्दन के समान महकाओ। तुम्हारी आँखों में तुम्हारे विश्वास की रंग-बिरंगी तस्वीर हो। तुम्हारे ओठों पर तुम्हारे स्वप्नों के गीत हों। यदि कभी तुम्हारे जीवन में शाम भी आ जाए अर्थात् निराशा आ जाए तब भी तुम चन्द्रमा के समान अपनी शीतलता बिखेरते रहना। कहने का भाव यह है कि निराशा में भी अपनी आशा का संबल मत छोड़ना। तुम्हारी आँखों की बरौनियों में चन्द्रमा कभी भी थके नहीं अपितु वह निरन्तर गतिशील बना रहे। तुम्हारे जीवन के स्वप्नों की पीली केसर कभी भी मुरझाए नहीं, ऐसा तुम्हें सदैव प्रयत्न करना चाहिए।

विशेष :

  1. इस कविता में कवि ने सार्थक जीवन जीने का सन्देश दिया है।
  2. ज्यों सूरज की तश्तरी में उपमा अलंकार।
  3. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल है।

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मन में विश्वास
भूमि में ज्यों अंगार रहे
आरई नजरों में
ज्यों अलोप प्यार रहे
पानी में धरा गंध
रुख में बयार रहे
इस विचार-बीज की
फसल बार-बार रहे
मन में संघर्ष फाँस गड़कर भी दुखे नहीं।
जीवन की पियरी केसर कभी चुके नहीं ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
अंगार = जलता हुआ कोयला; आरई नजरों = प्रेमपूर्ण दृष्टि में; अलोप = प्रकट; धरा = पृथ्वी; गन्ध = सुगन्ध; बयार = वायु; विचार-बीज= विचार रूपी बीज।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में कवि ने जीवन में संचार बनाये रखने तथा निरन्तर आगे बढ़ते रहने का सन्देश दिया है।

व्याख्या :
कविवर माथुर कहते हैं कि हमारे मन में विश्वास की लौ उसी प्रकार प्रज्ज्वलित होती रहनी चाहिए जिस प्रकार पृथ्वी पर जलता हुआ कोयला दिखाई देता है। कहने का भाव यह है कि हमें जीवन में सदैव ऊर्जा का संचार करते रहना चाहिए। जिस प्रकार प्रेम भरी दृष्टि से प्रेम प्रकट हो जाता है, जिस प्रकार जल में पृथ्वी की गंध समाई रहती है, जिस प्रकार वायु भी निरन्तर गतिमान रहती है उसी प्रकार तुम्हारा लक्ष्य भी निरन्तर गतिमान रहना चाहिए। जिस लक्ष्य को तुमने अपने विचारों में बीज की भाँति बोया है उसे कभी नष्ट नहीं होने देना है। तुम्हें सतत् प्रयत्न करते हुए आगे ही आगे बढ़ते रहना है। अपने विचारों को कार्य रूप में परिणत करना है। तुम्हारा विचार बीज कभी भी नष्ट नहीं होना चाहिए अपितु वह बार-बार पल्लवित एवं पुष्पित होते रहना चाहिए। तुम्हें चाहे जीवन में कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े पर इस संघर्ष रूपी काँटे को कभी भी मन में मत चुभाना। इससे अपना मन दुःखी न करना। अपनी पीली केसर जैसी जिन्दगी को कभी भी समाप्त मत होने देना अपितु उसे निरन्तर गतिमान बनाये रखना।

विशेष :

  1. कवि ने जीवन में सदैव उत्साह भरने की प्रेरणा दी है।
  2. भूमि में ज्यों अंगार रहे में उपमा अलंकार।
  3. विचार-बीज में रूपक अलंकार।
  4. भाषा सहज एवं सरल तथा लाक्षणिक है।

आगम के पंथ मिलें
रंगोली रंग भरे
तिए-सी मंजिल पर
जन भविष्य-दीप पर
धूरी साँझ घिरे
उम्र महागीत बने
सदियों में गूंज भरे।
पाँव में अनीति के मनुष्य कभी झुके नहीं।
जीवन की पियरी केसर कभी चुके नहीं ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
आगम = शास्त्र, पुराण; भविष्य-दीप= जीवन के भविष्य का दीपक; अनीति = अन्याय; रंगोली = अल्पना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का सन्देश है कि हमें निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए और कभी भी अनीति के आगे झुकना नहीं चाहिए।

व्याख्या :
कविवर गिरिजाकुमार माथुर कहते हैं कि हमारे प्राचीन आर्य ग्रन्थ ही हमारे मार्गदर्शक बन जाएँ और हम अपना जीवन उन्हीं सिद्धान्तों पर जिएँ। हमारे जीवन में सदैव मंगलकारी रंगोलियाँ बनती रहें। इन लक्ष्यों को पाने के लिए हम अपने उज्ज्वल भविष्य के दीप जलाते चलें। हम जीवन में इतना प्रयास करें कि हमारा जीवन स्वयं एक महागीत बन जाए और उसकी गूंज सदियों तक गूंजती रहे। इसके साथ ही हमारे पाँव कभी भी अनीति के सामने झुके नहीं अपितु उन अनीतियों का हमें दृढ़ता से सामना करना चाहिए। हमें सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे जीवन की पीली केसर कभी समाप्त न होने पाए।

विशेष :

  1. कवि प्राचीन आगम-निगमों को अपना आदर्श मानता है।
  2. जीवन में जीवन्तता बनाये रखना ही जीवन का लक्ष्य है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अभ्यास

बोध प्रश्न

सामाजिक समरसता अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृष्ण और सुदामा कौन थे?
उत्तर:
कृष्ण और सुदामा बाल्यावस्था के घनिष्ठ मित्र थे।

प्रश्न 2.
सुदामा की पत्नी ने उन्हें क्या सलाह दी?
उत्तर:
सुदामा की पत्नी ने सुदामा को यह सलाह दी कि तुम्हारे बचपन के मित्र श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा हैं अतः इस विपत्ति में तुम उनके पास चले जाओ, वे तुम्हारी सहायता करेंगे।

प्रश्न 3.
शबरी के आश्रम में कौन आये थे?
उत्तर:
शबरी के आश्रम में राम और लक्ष्मण दोनों भाई आये थे।

प्रश्न 4.
शबरी ने राम को प्रेम सहित खाने को क्या दिया?
उत्तर:
शबरी ने राम को प्रेम सहित कन्द, मूल एवं फल खाने को दिए।

प्रश्न 5.
शबरी के मुँह से शब्द क्यों नहीं निकल पा रहे थे?
उत्तर:
शबरी श्रीराम के प्रेम में इतनी मग्न हो गई थी कि उसके मुँह से शब्द तक नहीं निकल पा रहे थे।

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सामाजिक समरसता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शबरी ने अपने आश्रम में श्रीराम का किस प्रकार स्वागत किया?
उत्तर:
शबरी ने अपने आश्रम में राम का प्रेमपूर्वक स्वागत किया। उसने आदर के साथ जल लेकर प्रभु के चरण पखारे तत्पश्चात् उन्हें सुन्दर आसन पर बैठाया।

प्रश्न 2.
द्वारपाल द्वारा वर्णित सुदामा का चित्र अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
द्वारपाल ने जाकर श्रीकृष्ण से कहा कि हे प्रभु! एक अनजान व्यक्ति आया हुआ है, उसके सिर पर न तो पगड़ी है, और न शरीर पर झंगा है। न मालूम वह किस गाँव का रहने वाला है। उसकी धोती फटी हुई है और उसका दुपट्टा भी जीर्ण-शीर्ण है। वह अपने पैरों में जूते भी नहीं पहने हुए हैं। बड़े आश्चर्य से आपके महलों को देख रहा है और अपना नाम सुदामा बता रहा है।

प्रश्न 3.
सुदामा द्वारा पोटली न दिये जाने पर कृष्ण ने कौन-सी बातें याद दिलाईं ?
उत्तर:
सुदामा द्वारा सुदामा की पत्नी द्वारा भेजे गये चार मुट्ठी चावलों की पोटली न दिये जाने पर कृष्ण ने कहा कि हे मित्र! तुम चोरी की कला में बचपन से ही निपुण हो। जब बचपन में गुरुमाता ने हमें चबाने के लिए चने दिये थे तो तुमने चुपचाप चोरी से खा लिये थे संभवत: तुम्हारी वही चोरी की आदत आज भी नहीं छूटी है तभी तो तुम भाभी द्वारा दिये गये चावलों की पोटली को काँख में छिपाए हए हो।

प्रश्न 4.
बिना भक्ति के मनुष्य की स्थिति किस प्रकार की हो जाती है?
उत्तर:
बिना भक्ति के मनुष्य की स्थिति जलरहित बादलों के समान होती है अर्थात् जैसे जलरहित बादल किसी काम में नहीं आते हैं उसी तरह भक्ति रहित मनुष्य भी संसार में किसी के काम नहीं आता है।

प्रश्न 5.
शबरी और राम प्रसंग सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण है, समझाइए।
उत्तर:
शबरी निम्न जाति की भीलनी थी और राम चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पुत्र थे पर जब श्रीराम वन में शबरी के आश्रम पर पहुँचे तो उसके आतिथ्य को बड़े ही प्रेम से स्वीकारा। उसके द्वारा परोसे गये कन्द, मूल और फलों को प्रेम से खाया। उन्होंने जाति-पाँति का भेद न करके प्रेम को महत्त्व प्रदान किया। इस प्रकार शबरी और राम प्रसंग सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण है।

सामाजिक समरसता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण और सुदामा की मैत्री का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
श्रीकृष्ण और सुदामा की मैत्री सच्ची थी। यह मैत्री बचपन में ही पाठशाला से शुरू होती है और जीवन भर चलती है। संयोग से कृष्ण द्वारिका के राजा बन जाते हैं और सुदामा दरिद्र बनकर भीख माँगकर अपना पेट पालता है। एक दिन सुदामा की पत्नी ने राजा श्रीकृष्ण के पास जाने की बात कही। पत्नी की बात मानकर सुदामा द्वारिका पहुँच जाते हैं। जब द्वारपाल के द्वारा सुदामा के आने की सूचना मिलती है, तो वे अपना राज-काज छोड़कर अपने मित्र का स्वागत करते हैं। मित्र सुदामा की दीन दशा देखकर वे अपने नेत्रों के आँसुओं से ही उनके पैर धो देते हैं। बिना सुदामा को बताये वे सुदामा को भी अपने समान सम्पन्न बना देते हैं।

प्रश्न 2.
सुदामा ने जब द्वारिका का वैभव देखा तो उनके मन में क्या विचार आए?
उत्तर:
सुदामा ने जब द्वारिका का वैभव देखा तो उनकी दृष्टि स्वर्ण निर्मित भवनों को देखकर चौंधिया गई। वहाँ उन्होंने देखा कि एक से बढ़कर एक द्वारिका के भवन हैं। वहाँ बिना पूछे कोई किसी से बात तक नहीं कर रहा है, ऐसा लगता है कि वहाँ के सभी लोग मौन साधकर देवताओं की तरह बैठे हुए हैं।

प्रश्न 3.
नवधा भक्ति समझाइए।
उत्तर:
श्रीराम ने भक्ति के नौ प्रकार बताए हैं, ये नौ प्रकार ही नवधा भक्ति के नाम से जाने जाते हैं। यह उपदेश श्रीराम ने शबरी को देते हुए कहा है कि प्रथम प्रकार की भक्ति संत पुरुषों की संगति है। दूसरी प्रकार की भक्ति मेरी कथा में प्रीति रखना है, तीसरी भक्ति गुरु के चरण कमलों की निरभिमान भाव से सेवा करना है। चौथी भक्ति कपट त्यागकर निश्छल हृदय से मेरा गुणगान करना है। पाँचवीं भक्ति मंत्रों का जाप करना, मुझ पर दृढ़ विश्वास करना और वेद विहित कर्म करना है।

छठी भक्ति इन्द्रियों को वश में रखना, शील धारण करना, सकाम कर्मों से विरक्त रहना और सज्जनों के धर्म का अनुसरण करना है। सातवीं प्रकार की भक्ति सारे संसार को मेरे स्वरूप में देखना, सब में समान भाव रखना तथा मुझसे भी अधिक सन्तपुरुषों को सम्मान देना है। आठवीं भक्ति जथा लाभ संतोष करना, स्वप्न में भी दूसरों के दोष न देखना है। नवीं भक्ति सबसे सरलता का व्यवहार करना, निष्कपट होना, मुझ पर अटूट श्रद्धा रखना, हृदय में प्रसन्नता का भाव रखना और स्वयं को दीनहीन न समझना है। आगे श्रीराम कहते हैं कि इन नौ प्रकार की भक्ति में से जिनके पास कोई एक भी हो, तो वह मनुष्य मुझे सम्पूर्ण संसार में प्रिय है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) ऐसे बेहाल…………….पग धोए।
उत्तर:
कवि कहता है कि जब श्रीकृष्ण ने सुदामा की दयनीय दशा को देखा तो वे भावविह्वल हो उठे। वे उनके पैरों की बिवाइयों एवं पैरों में चुभे हुए काँटों को देखकर दुःखी हो उठे और फिर उन्होंने अपने मित्र से कहा कि हे मित्र! तुमने इतना कष्ट उठाया? तुम इधर अर्थात् हमारे पास क्यों नहीं आए? इतने दिन तक तुम कहाँ रहे? सुदामा की इस दीन दशा को देखकर करुणा के सागर श्रीकृष्ण अत्यन्त दुःख करके रोने लगे। सुदामा के पैरों को धोने के लिए परात में रखे हुए पानी को तो उन्होंने हाथ भी नहीं लगाया तथा अपने नेत्रों से झरने वाले आँसुओं से ही सुदामा के चरण धो डाले।

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सामाजिक समरसता काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
रूढ़, यौगिक और योगरूढ़ शब्द छाँटिए-
पंकज, मित्र, गुरुबंधु, दीनबंधु, धर, मुकुट, किनारीदार, राजधर्म।
उत्तर:
रूढ़ शब्द-मित्र, धर, मुकुट। यौगिक शब्द-गुरुबंधु, दीनबंधु, किनारीदार। योगरूढ़ शब्द-पंकज, राजधर्म।

प्रश्न 2.
दिये गये शब्दों में उपसर्ग और प्रत्यय छाँटिए-
सुशील, परलोक, अनाथन, अधीर, बेहाल, चतुराई।
उत्तर:
उपसर्ग – सु + शील, पर + लोक, अ + धीर, बे + हाल।
प्रत्यय – अनाथन (न प्रत्यय), चतुराई (आई प्रत्यय।)

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिएसत्य, धर्म, प्रिय, सुलभ, सुमति, अहित, सुअवसर, संत।
उत्तर:
सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, प्रिय-अप्रिय, सुलभ-दुर्लभ, सुमति-कुमति, अहित-हित, सुअवसरकुअवसर, संत-दुष्ट, असंत।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन पर्यायवाची शब्द लिखिए।
नभ, कमल, लोचन, जग, पिता।
उत्तर:
नभ – गगन, अम्बर, आकाश।
कमल – सरसिज, पंकज, वारिज।
लोचन – नेत्र, चक्षु, अक्षि।
जग – जगत्, संसार, लोक।
पिता – जनक; तात, पितृ।

प्रश्न 5.
ते दोउ बंधु………………तब कीन्हीं॥
चापत चरन………………जल जाता॥
उठे लषनु………………..राम सुजान।
(1) यह प्रसंग किस काव्य से लिया गया है?
उत्तर:
उपर्युक्त तीनों प्रसंग गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ से लिए गये हैं।

(2) ‘रामचरितमानस’ के उपर्युक्त अंश में कौन-से छन्द आये हैं?
उत्तर:
‘रामचरितमानस’ के उपर्युक्त अंश में से प्रथम दो में चौपाई छन्द तथा अन्तिम में दोहा छन्द है।

(3) चौपाई और दोहा छन्द की क्या पहचान है?
उत्तर:
चौपाई-यह एक मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। पहले तुक चरण की दूसरे चरण से और तीसरे चरण की चौथे चरण से मिलती है।

दोहा-यह एक मात्रिक छन्द है। इसके विषम चरणों में 13-13 मात्राएँ और सम चरणों में 11-11 मात्राएँ होती हैं। कुल 48 मात्राएँ होती हैं।

प्रश्न 6.
इस पाठ में किन-किन छन्दों को तुलसीदास ने अपनाया है ? प्रत्येक छन्द का इसी पाठ से एक-एक उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
इस पाठ में तुलसीदास ने दोहा एवं चौपाई छन्दों को अपनाया है। उदाहरण प्रस्तुत हैं-
चौपाई-
जाति-पाँति कुल धर्म बड़ाई। धनबल परिजन गुन चतुराई।
भगतिहीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल वारिद देखिअ जैसा।

दोहा-
गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

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सुदामा चरित संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

विप्र सुदामा बसत हो, सदा आपने धाम।
भीग माँगी भोजन करे, हिये जपत हरि नाम।
ताकी घरनी पतिव्रता, गहै वेद की रीति।
सलज सुसील सुबुद्धि अति, पति-सेवा सौं प्रीति॥
कहो, सुदामा एक दिन, कृष्ण हमारे मित्र।
करत रहित उपदेश तिय, ऐसो परम विचित्र ॥1॥

कठिन शब्दार्थ :
विप्र = ब्राह्मण; धाम = घर; हिये = हृदय में; घरनी = पत्नी; गहै = ग्रहण करती है, चलती है; सलज = लज्जाशील; सुबुद्धि = अच्छी बुद्धिवाली; सौं = से; प्रीति = प्रेम; तिय = पत्नी से।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश कविवर नरोत्तमदास रचित ‘सुदामा चरित्र’ से लिया गया है।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में कवि ने सुदामा की स्थिति और दिनचर्या का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर नरोत्तमदास जी कहते हैं कि ब्राह्मण सुदामा अपने घर में रहता था, वह भीख माँगकर भोजन करता था और अपने हृदय में हरि नाम का जाप करता रहता था। उनकी पत्नी बड़ी ही पतिव्रता थी और वह सदैव वेदों के बताये मार्ग पर चलती थी। वह लज्जाशील, सुशील एवं अच्छी बुद्धि वाली थी तथा सदैव पति की सेवा में लगी रहती थी। एक दिन सुदामा ने अपनी पत्नी से कहा कि कृष्ण मेरे मित्र हैं। इस मित्रता की बातें वह नित्य अपनी पत्नी से किया करता था।

विशेष :

  1. सुदामा कृष्ण के बाल सखा एवं सहपाठी थे।
  2. वे सन्तोषी ब्राह्मण थे तथा भिक्षाटन किया करते थे।
  3. सलज सुसील सुबुद्धि-में अनुप्रास अलंकार।
  4. भाषा सहज एवं सरल है।

स्त्री
लोचन-कमल दुख-मोचन तिलक भाल,
स्रबननि कुंडल मुकुट धरे माथ है।
ओढ़े पीत बसन गरे मैं, बैजयंती माल,
संख चक्र गदा और पदम लिय हाथ है।
कहत नरोतम संदीपनि गुरु के पास।
तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं।
द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे पिय,
द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
लोचन = नेत्र; दुख मोचन = दुखों को दूर करने वाला; सवननि – कानों में; माथ = माथे पर; पीत बसन = पीले वस्त्र कर = हाथ; पद्म = कमल; संदीपनि गुरु = इन्हीं गुरु के आश्रम में कृष्ण और सुदामा सहपाठी थे; हरि = भगवान; दारिद = दरिद्रता; अनाथन = गरीबों के।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग ;
प्रस्तुत पद्यांश के पूर्वार्द्ध में सुदामा की पत्नी भगवान की रूप छवि का वर्णन करती है फिर वह अपने पति से द्वारिका जाने का आग्रह करती है।।

व्याख्या :
कविवर नरोत्तमदास जी कहते हैं कि सुदामा की पत्नी पहले तो भगवान की रूप छवि का वर्णन करती है कि भगवान के नेत्र कमल जैसे हैं और उनके माथे पर जो तिलक लगा हुआ है वह दु:खों का नाश करने वाला है। उनके कानों में कुंडल लटक रहे हैं तथा माथे पर मुकुट धारण किये हुए हैं। वे पीत वस्त्र ओढ़े हुए हैं तथा उनके गले में वैजयन्ती माला शोभा दे रही है। उनके चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल रखे हुए हैं।

नरोत्तम कवि कहते हैं कि सुदामा की पत्नी सुदामा से कहती है कि तुम्ही हमें यह बताया करते हो कि हम दोनों संदीपन गुरु के आश्रम में एक साथ ही पढ़ते थे। हे प्रियतम! श्रीकृष्ण तुम्हारे मित्र हैं तो तुम निश्चय ही द्वारका को चले जाओ। तुम्हारी दीन दशा देखकर वे तुम्हारे दरिद्रों को दूर कर देंगे। हे प्रिय! द्वारिका के नाथ भगवान श्रीकृष्ण अनाथों एवं बेसहारा लोगों के नाथ हैं अर्थात् उनको सहायता प्रदान करने वाले हैं।

विशेष :

  1. कवि ने पद के पूर्वार्द्ध में चतुर्भुज भगवान की मोहक रूप छवि का वर्णन किया है।
  2. श्रीकृष्ण और सुदामा संदीपन गुरु के आश्रम में एक साथ पढ़े थे।
  3. अनुप्रास अलंकार।
  4. भाषा सहज एवं सरल।

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सुदामा
सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय, ताको कहा अब देति है सिच्छा

जे तप ते परलोक सुधारत, संपति की तिनके नहि इच्छा
मेरे हिये हरि के पद पंकज, बार हजार लै देखि परीच्छा।
औरन को धन चाहिए, बावरि, बामन को धन केवल भिच्छा ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
सिच्छक = शिक्षक: सिगरे = सम्पूर्णः तिय = पत्नी; हिये = हृदय में; पद पंकज = चरण रूपी कमल; परीच्छा = परीक्षा; बावरि = पगली; बामन = ब्राह्मण।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में सुदामा अपनी पत्नी को समझाते हुए कहता है कि ब्राह्मण को कभी धन की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

व्याख्या :
हे प्रिय! तू जो बार-बार श्रीकृष्ण के पास द्वारिका जाने की शिक्षा दे रही है सो तो ठीक है पर तू यह भी अच्छी तरह से जान ले कि मैं ब्राह्मण होने के नाते सारे संसार का शिक्षक हूँ और अब तू उसी ब्राह्मण को इस प्रकार की शिक्षा दे रही है। हम ब्राह्मणों का धर्म तो तपस्या करके अपने परलोक को सुधारना है और साथ ही हममें सम्पत्ति एवं धन के लिए नाममात्र की भी इच्छा नहीं है।

हे प्रिय! मेरे हृदय में तो सदैव भगवान के चरण-कमल विराजे रहते हैं चाहे तू हजार बार मेरी परीक्षा लेकर देख ले। हे पगली स्त्री! धन की चाहना तो और जाति के लोग करते हैं हमारा धन तो केवल भिक्षा ही है।

विशेष :

  1. सुदामा एक संतोषी ब्राह्मण थे। उन्हें भौतिक सुखों से कोई लगाव नहीं था।
  2. पद पंकज में रूपक, अन्यत्र-अनुप्रास अलंकार।
  3. भाषा सहज एवं सरल।

स्त्री
कोदा सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती।
सीत वितीत कियो सिसयातहि हों, हठती मैं तुम्हें न हठौती॥
जो जनती न हित हरि सों तुम्हें काहे को द्वारके पेलि पठौती।
या घर तें न गयौ कबहूँ पिय, टूटो तवा अरू फूटी कठौती ॥4॥

शब्दार्थ :
कोदा सवाँ = चावल की सबसे घटिया किस्म; मिठौती = मिष्ठान्न; सीत = जाड़ा; वितीत = बिता दिया; सिसयातहि = ठिठुरते हुए; हठती = अपनी जिद्द से हट जाती; न हठौती = तुम्हें तुम्हारी जिद्द से न हटाती; हितू = मित्रता; पेलि पठौती = जबरन भेजती; अरु = और; कठौती = काठ (लकड़ी) की परात जिसमें आटा गूंथा जाता है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद में सुदामा की पत्नी अपनी दयनीय दशा का वर्णन करते हुए सुदामा को कृष्ण के पास जाने का आग्रह करती है।

व्याख्या :
सुदामा की पत्नी सुदामा से कह रही है कि यदि मुझे भर पेट कोदों और सवों के चावल भी मिल जाते तो मैं कभी भी दही, दूध और मिठाई की चाहना न करती। जाड़े की रातें मैंने ठिठुरते हुए ही बिता दीं। मैं अपनी जिद्द (कि तुम द्वारिका चले जाओ) से हट जाती पर तुम्हें तुम्हारी जिद्द से न हटाती। यदि मुझे यह पता न होता कि श्रीकृष्ण से तुम्हारी मित्रता है तो मैं तुम्हें जबरन द्वारिका भेजने की जिद्द न करती। हे पतिदेव! हमारा तो यह दुर्भाग्य है कि इस घर से कभी भी टूटा हुआ तवा और फूटी हुई कठौती नहीं गई।

विशेष :

  1. गरीबी की दयनीय दशा का वर्णन है।
  2. सुदामा की पत्नी कष्टों को सहने वाली है।
  3. भाषा सहज एवं सरल।

सुदामा
छोड़ि सबै जक तोहिं लगी बक, आठहु जाम यहै जक ठानी।
जातहि देहें लदाय लढ़ा भरि, लैहों लदाय यह जिय जानी॥
पार्वै कहां ते अटारी अटा, जिनके विधि दीन्हीं है टूटी-सी छानी।
जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तो, काहू पै मेटि न जात अजानी ॥5॥

कठिन शब्दार्थ :
जक = बातें; बक= वे सिर पैर की बातें कहना; आठहु जाम = आठों पहर अर्थात् चौबीस घण्टे; जक = जिद्द, जातहिं = जाते ही; लढ़ा = बैलगाड़ी; लैहों लदाय = मैं लदा लूँगा, भर लूँगा; यहै= यही बात; जिय जानी = अपने हृदय में मान लिया है; अटारी अटा = ऊँची-ऊँची हवेलियाँ, महल; विधि = भाग्य में; छानी = छप्पर; दरिद्र = गरीबी; ललाट = भाग्य में; अजानी = हे अज्ञानी स्त्री।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि पत्नी की द्वारिका (श्रीकृष्ण के पास) जाने की जिद्द का उत्तर देते हुए सुदामा कहते हैं।

व्याख्या :
कवि कहता है कि सुदामा अपनी पत्नी से कहते हैं कि तूने और सब सार्थक बातें करना तो छोड़ दिया है केवल निराधार एक ही बात की रट लगाये हुए है, अब तू चौबीस घण्टे केवल एक ही बात को लेकर अड़ गयी है। तू यह समझती है कि जैसे ही मैं द्वारिका पहुँचूँगा तो वे गाड़ी भरकर मुझे दे देंगे और मैं उस धन सम्पत्ति को लदाकर तेरे पास आ जाऊँगा। हे बावली स्त्री! तू यह क्यों नहीं सोचती है कि विधाता ने जिनके भाग्य में टूटा-सा छप्पर दिया है, वे ऊँचे-ऊँचे महल और हवेलियाँ कहाँ से प्राप्त कर लेंगे। हे अज्ञानी स्त्री ! जिनके भाग्य में दरिद्रता लिखी हुई है वह किसी से भी मिटाये नहीं मिटती है।

विशेष :

  1. सुदामा भाग्यवादी है।
  2. पत्नी अपने मन में यह समझती है कि कृष्ण मित्र सुदामा को धन वैभव से सम्पन्न कर देंगे।
  3. अनुप्रास अलंकार की छटा।

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स्त्री
बिप्र के भगत हरि जगत विदित बंधु,
लेत सब ही की सुध ऐसे महादानि हैं।
पढ़े एक चटसार कहीं तुम कैयो बार,
लोचन-अपार वै तुम्हें न पहिचानि हैं,
एक दीनबंधु, कृपासिंधु फेरि गुरुबंधु,
तुम-सम कौन दीन जाको जिय जानी है?
नाम लेत चौगुनी, गए तें द्वारा सोगुनी सो,
देखत सहस्र गुनी प्रीति प्रभु मानि है ॥6॥

कठिन शब्दार्थ :
विप्र के भगत = ब्राह्मणों के भक्त; हरि = श्रीकृष्ण; जगत् = संसार में; विदित = जाने जाते हैं; सुधि = खबर; चटसार = पाठशाला में; कैयो बार = अनेक बार; लोचन-अपार = उनकी दृष्टि महान् एवं दूरदर्शी है; दीनबंधु = गरीबों के भाई; कृपासिंधु = कृपा के सागर; सम= समान; सहस्त्र = हजार गुनी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
सुदामा के वचनों का उत्तर देती हुई उनकी पत्नी कहती है।

व्याख्या :
सुदामा की पत्नी सुदामा से कहती है कि भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मणों के भक्त हैं, वे एक श्रेष्ठ बंधु हैं यह बात सारा संसार जानता है। वे तो ऐसे महादानी हैं कि वे सभी प्राणियों की खबर लेते रहते हैं। तुमने तो मुझसे अनेक बार कहा है कि तुम श्रीकृष्ण के साथ एक ही पाठशाला में पढ़े हो, उनकी दृष्टि बड़ी अपार है, फिर वे तुम्हें क्यों नहीं पहचान लेंगे ? अर्थात् अवश्य पहचान लेंगे। एक तो वे श्रीकृष्ण दीन लोगों के सच्चे बंधु हैं, वे कृपा के सागर हैं और फिर तुम्हारे तो वे गुरुभाई हैं। इस समय तुम्हारे समान दुनिया में कौन दीन है जिसको वे अपने हृदय में नहीं जानते होंगे ? अर्थात् वे तुम्हारी दीनता को अवश्य ही जानते होंगे। अंत में सुदामा की पत्नी सुदामा से कहती है कि प्रभु श्रीकृष्ण का नाम लेते ही प्रभु भक्त के प्रेमभाव को चौगुना, उनके यहाँ जाने पर प्रेमभाव को सौ गुना और उनका दर्शन करते ही प्रेमभाव को वे हजार गुना मानते हैं।

विशेष :

  1. अपने वाक् चातुर्य से सुदामा की पत्नी सुदामा को निरुत्तर कर देती है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल है।

सुदामा
द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहू जू, आठहु जाम यहै जक तेरे।
जौ न कहो करिए तो बड़ो दुख, जैए कहाँ अपनी गति हेरे॥
द्वार खरे प्रभु के छरिया, तहं भूपति जान न पावत नेरे।
पाँच सुपारी तें देंखु विचारिक, भेंट को चारि न चाउर मेरे॥
यह सुनिके तब ब्राह्मनी, गई परोसिनि-पास।
पाव-सेर चाउर लिए, आई संहित हुलास॥
सिद्धि करी गनपति सुमिरि, बांधि दुपटिया खूट।
मांगत खात चले तहाँ, मारग बाली-बूट॥
दीठि चकचौँधि गई देखते सुबर्नमई,
एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं।
पूछे बिन कोऊ कहूं काहू सौं न करें बात,
देवता से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं।
देखत सुदामें धाय पौरजन गहे पाय,
कृपा करि कहौ विप्र कहाँ कीन्ह गौन है?
धीरज अधीर के, हरन पर पीर के,
बताओ बलबीर के महल यहाँ कौन है? ॥7॥

कठिन शब्दार्थ :
जक = जिद्द; जैए कहाँ = कहाँ जाएँ; गति = दशा; हेरे = देखें; छरिया = हाथ में दण्ड धारण किये हुए; तहँ = उस स्थान पर; भूपति = राजा लोग; जान न पावत = जा नहीं पाते हैं; नेरे = समीप; चाउर = चावल; ब्राह्मनी = ब्राह्मण सुदामा की पत्नी; सहित हुलास = आनन्द के साथ; गनपति = गणेशजी; सुमिरि = स्मरण करके; दुपटिया = दुपट्टे में; छूट = गाँठ; दीठि= दृष्टि; चकचौंधि = चौंधिया गई; सुबर्नमई = स्वर्ण से बनी हुई; सरस = सुन्दर; भौन = भवन, महल; साधि-साधि मौन है = मौन धारण कर सब बैठे हुए हैं; धाय = दौड़कर; पौर जन = नगर निवासी; गहे पाय = चरण पकड़ लिए; विप्र = ब्राह्मण; गौन = गमन, जाना; धीरज अधीर के = अधीर लोगों को धीरज देने वाले; हरन पर पीर के = दूसरों की पीड़ा को हरने वाले बलबीर = बलदाऊ के भाई अर्थात् श्रीकृष्ण।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
सुदामा अपनी पत्नी द्वारा बार-बार कहे जाने पर विवश होकर द्वारिका जाने को तैयार हो जाते हैं, उसी समय का वर्णन है।

व्याख्या :
सुदामा जी अपनी पत्नी से कहते हैं कि तुमने तो द्वारिका जाने की एक तरह से आठों पहर रट लगा रखी है। यदि मैं तुम्हारी बात नहीं मानता हूँ तो तुम्हें बहुत दुःख होगा और यदि मैं तुम्हारी बात मानकर द्वारिका चला भी जाऊँ तो मेरी स्थिति कैसी होगी, यह तुम नहीं जानती हो। जब मैं वहाँ पहुँचूँगा तो श्रीकृष्ण के महल के बाहर दण्डधारी द्वारपाल खड़े मिलेंगे, उस जगह बड़े-बड़े राजा भी सरलता से नहीं जा सकते हैं फिर मेरी तो बिसात ही क्या है? शायद तुम यह भी नहीं जानती हो कि राजा के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाया जाता है। वहाँ जाने के लिए कम-से-कम पाँच सुपाड़ी तो होनी ही चाहिए जो मेरे पास नहीं है। इतना ही नहीं यदि पाँच सुपाड़ी न भी हों तो कम से कम चार मुट्ठी चावल तो होना ही चाहिए, संयोग से वह भी हमारे घर नहीं है। तो सोचो ऐसी दशा में वहाँ जाना कैसे सम्भव है।

सुदामा के मुख से यह बात सुनकर तब सुदामा की पत्नी अपनी पड़ोसिन के पास गई और उससे पाव भर चावल उधार लेकर बड़े ही उल्लास एवं उमंग के साथ आ गई। सबसे पहले भगवान! गणेश का स्मरण कर और अपने दुपट्टे के एक छोर में चावल रखकर तथा उसमें गाँठ लगाकर और उसे कन्धे पर रखकर माँग कर खाते हुए वे द्वारिका के मार्ग पर चल निकले।

सुदामा जी बीहड़ मार्ग को पार कर जैसे ही द्वारिका नगरी में पहुँचते हैं तो वहाँ के स्वर्ण निर्मित जगमगाते हुए भवनों को देखकर जो एक से एक सुन्दर हैं, उनकी दृष्टि चौंधिया जाती है। वहाँ के लोगों की एक विचित्र दशा यह है कि कोई भी व्यक्ति बिना पूछे किसी से कोई बात ही नहीं कर रहा है तथा वे सभी लोग अपना-अपना मौन साधकर देवता जैसे बैठे हए हैं।

जैसे ही द्वारिका के नागरिकों ने सुदामा को देखा तो उन्होंने दौड़कर सुदामा के पैर पकड़ लिए और विनती करके कहने लगे कि हे विप्रवर! कृपा करके यह बतलाएँ कि आपको कहाँ जाना है? यह बात सुनकर सुदामा बोले कि जो अधीर लोगों को धैर्य धारण कराते हैं, दूसरों की पीड़ा को हरते हैं तथा जो बलराम के भाई हैं, उन्हीं का घर कृपया बता दीजिए।

विशेष :

  1. सुदामा की सहज भावना का वर्णन किया गया है।
  2. अनुप्रास की छटा है।
  3. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल है।
  4. शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि राजा एवं गुरु के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।

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द्वारपाल
सीस पगा न झगा तन पै, प्रभु जाने को आहि, बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी सी लटी दुपटी, अरूपाय उपानह की नहि सामा॥
द्वार खरौ द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सौ बसुधा अभिरामा।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा ॥8॥

कठिन शब्दाधं :
सीस = सिर पर; पगा = पगड़ी; झगा = झंगा एक प्रकार का कुर्ता; आहि = है; बसै = रहता है; केहि= कौन से; ग्रामा = गाँव में; लटी दुपटी = दुपट्टा जीर्ण-शीर्ण है; अरु = और; उपानह = जूता; सामा = सामर्थ्य; खरौ = खड़ा है; दुर्बल = कमजोर; चकि = चकित होकर; वसुधा = पृथ्वी; अभिरामा = सुन्दर; धाम = भवन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
सुदामा के द्वारिका पहुँचने पर श्रीकृष्ण का द्वारपाल श्रीकृष्ण को सुदामा की वेशभूषा के बारे में बताता है।

व्याख्या ;
द्वारपाल ने श्रीकृष्ण से कहा कि हे प्रभु! कोई एक अनजान व्यक्ति आपसे मिलता चाहता है। उसके सिर पर न तो पगड़ी है और न शरीर पर झंगा ही है। न जाने वह कौन है और किस गाँव में रहता है। उसकी धोती फटी हुई है और उसका दुपट्टा भी चीथड़ा बना हुआ है। उसके पैरों में जूते भी नहीं हैं। हे प्रभु! द्वार पर इस प्रकार का एक अत्यन्त दीन एवं कृशकाय ब्राह्मण खड़ा हुआ है। वह बड़े आश्चर्य से इस सुन्दर भूमि को देख रहा है। वह दीनदयाल श्रीकृष्ण अर्थात् आपका भवन पूछ रहा है और अपना नाम सुदामा बता रहा है।

विशेष :

  1. कवि ने सुदामा की दीन-हीन दशा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार की छटा।
  3. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल।

बोल्यौ द्वारपालक सुदामा नाम पांडे,
सुनि, छांड़े राज-काज ऐसे जी की गति जाने को?
द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय,
भेंट लपटाय करि ऐसे दुख सानै को?
नैन दोऊ जल भरि पूछत कुसल हरि,
बिप्र बौल्यौ बिपदा में मोहि पहिचाने को?
जैसी तुम करी तैसी करै को कृपा के सिन्धु।
ऐसी प्रीति दीनबंधु दीनन सो माने को? ॥9॥

कठिन शब्दार्थ :
छांड़े = छोड़ दिए; गति = दशा; को = कौन; धाय = दौड़कर; भेंट = गले लगना; विपदा = विपत्ति; मोहि = मुझे कृपा के सिंधु = दया के सागर; दीनबन्धु = दीनों के बंधु; दीनन = गरीबों से।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में उस समय का वर्णन है जब द्वारपाल ने श्रीकृष्ण के पास जाकर सुदामा नाम बताया तो श्रीकृष्ण राज-काज छोड़कर सुदामा से मिलने के लिए पैदल ही दौड़ पड़े।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जैसे ही द्वारपाल ने श्रीकृष्ण को यह बताया कि कोई सुदामा नाम का ब्राह्मण आपका धाम पूछ रहा है तो श्रीकृष्ण राज-काज को छोड़कर सुदामा से मिलने के लिए व्याकुल हो उठे। उस समय उनके हृदय की गति को कोई नहीं समझ सकता। द्वारिका के नाथ श्रीकृष्ण ने हाथ जोड़कर तथा दौड़कर सुदामा के पैर पकड़ लिए और फिर उन्हें गले से लगाकर उनकी दुःखभरी दीन स्थिति को देखकर दोनों नेत्रों में जल भरकर सुदामा की कुशल क्षेम पूछने लगे। श्रीकृष्ण से इतना अधिक प्रेम पाकर सुदामा भाव-विभोर होकर श्रीकृष्ण से कहने लगे कि हे प्रभु! इस विपत्ति काल में मुझे कौन पहचानता है? अर्थात् कोई नहीं। किन्तु हे दया के सागर ! जिस प्रकार से आपने मेरा सम्मान किया और कुशल क्षेम पूछी, इस प्रकार की प्रीति आपके अतिरिक्त और कौन कर सकता है? अर्थात् कोई नहीं। आप दीनों के बंधु हैं, दीनों की कुशल क्षेम पूछते हैं अन्यथा अन्य कोई तो दीनों को समझता ही कहाँ है?

विशेष :

  1. दीन सुदामा और दीनबन्धु श्रीकृष्ण की भेंट का बड़ा ही भावपूर्ण चित्रण हुआ है।
  2. कृष्ण एवं सुदामा की मानसिक दशा का सूक्ष्म वर्णन हुआ है।
  3. अनुप्रास अलंकार।
  4. सहज एवं सरल ब्रजभाषा का प्रयोग।

ऐसे बेहाल बेवाइन सों, पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
हाय महादुख पायो सखा, तुम आए इतै न कितै दिन खोए।।
देखि सुदामा की दीनं दसा, करुना करिकै करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयौ नहिं, नैनन के जल सों पग धोए ॥10॥

कठिन शब्दार्थ :
बेहाल = बुरी दशा में; बेवाइन = फटे हुए पैरों के घाव; कंटक जाल = काँटों का झुण्ड; जोए = देखने लगे; इतै = इधर; कितै = किधर; दीन दसा = दयनीय दशा; करुणानिधि = करुणा के सागर; नैनन के जल = आँसुओं से; पग = पैर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
श्रीकृष्ण और सुदामा की भेंट होने पर सुदामा की दीनदशा, फटी हुई बिवाइयों एवं पैरों में लगे हुए काँटों को देखकर श्रीकृष्ण भाव विह्वल हो उठते हैं। उसी का यहाँ वर्णन है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जब श्रीकृष्ण ने सुदामा की दयनीय दशा को देखा तो वे भावविह्वल हो उठे। वे उनके पैरों की बिवाइयों एवं पैरों में चुभे हुए काँटों को देखकर दुःखी हो उठे और फिर उन्होंने अपने मित्र से कहा कि हे मित्र! तुमने इतना कष्ट उठाया? तुम इधर अर्थात् हमारे पास क्यों नहीं आए? इतने दिन तक तुम कहाँ रहे? सुदामा की इस दीन दशा को देखकर करुणा के सागर श्रीकृष्ण अत्यन्त दुःख करके रोने लगे। सुदामा के पैरों को धोने के लिए परात में रखे हुए पानी को तो उन्होंने हाथ भी नहीं लगाया तथा अपने नेत्रों से झरने वाले आँसुओं से ही सुदामा के चरण धो डाले।

विशेष :

  1. कवि ने कृष्ण सुदामा की सच्ची मित्रता का अत्यन्त भावग्राही चित्रण किया है।
  2. भगवान तो वास्तव में सच्ची भक्ति के वश में रहते हैं। इसी भाव का यहाँ अंकन हुआ है।
  3. पानी परात को हाथ छुओ नहिं नैनन के जल सों पग धोए-में अतिशयोक्ति अलंकार।
  4. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल है।

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श्रीकृष्ण
कछु भाभी हमको दियो, सो तुम काहे न देत।
चाँपी पोटरी काँख में, रहे कहो केहि हेत॥
आगे चना गुरु-माता देत ते लए तुम चाबि हमें नहिं दीने।
स्याम कहो मुसुकाय सुदामा सों, चोरी की बानि मैं हो जू प्रबीने॥
पोटरी काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस भीने।
पाछिली बानि अजौ न तजौ तुम, तैसेइ भाभी के तंदुल कीने॥
देनो हुतो तो दे चुके, बिप्र न जानी गाथ।
चलती बेर गोपालजू, कछु न दीन्हौ हाथ ॥11॥

कठिन शब्दार्थ :
चाँपी = दबा रखी है; पोटरी = पुटरिया; = केहि हेत = किस लिए; गुरु माता = संदीपनि गुरु की धर्म पत्नी; चाबि = चबा कर खा लिए; बानि = आदत; प्रबीने = चतुर; सुधारस भीने = अमृत रस से सिक्त; पाछिली = पुरानी; अजौ = अब भी; तंदुल = चावल; गाथ = कहानी; बेर = समय।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
सुदामा श्रीकृष्ण की भेंट के समय यद्यपि अपनी पत्नी के हाथ से चार मुट्ठी चावल श्रीकृष्ण को देने के लिए लाये थे, पर वे संकोचवश उन्हें नहीं दे सके तो श्रीकृष्ण ने उनकी काँख में दबी हुई पोटली के बारे में पूछ ही लिया, उसी का यहाँ वर्णन है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा से पूछा कि क्या मेरी भाभी ने हमारे लिए कुछ भेंट के रूप में भेजा है? जो हमारी भाभी ने मेरे लिए भेंट भेजी है उसे तुम मुझे क्यों नहीं देते हो? बताओ तो सही भाभी द्वारा दी हुई भेंट की पोटरी को तुम काँख में किसलिए छिपाए हुए हो?

फिर श्रीकृष्ण बचपन की एक घटना सुदामा को स्मरण दिलाते हुए सुनाते हैं कि बचपन में जब हम तुम एक साथ पाठशाला में पढ़ते थे तो गुरुमाता ने जंगल से ईंधन लाने के लिए हम दोनों को भेजा था और साथ ही गुरुमाता ने चबाने के लिए कुछ भुने हुए चने भी बाँधकर तुम्हें दे दिए थे कि जब भूख लगे तो तुम दोनों खा लेना लेकिन तुमने मेरे साथ कपट किया और अकेले ही उन चनों को चबा लिया था। फिर श्रीकृष्ण मुस्कराकर सुदामा से कहते हैं कि हे मित्र! तुम तो बचपन से ही चोरी की कला में चतुर रहे हो। तुम काँख में दबी हुई उस पोटरी को क्यों नहीं खोल रहे हो जिसमें अमृत रस से भीगे हुए चावल रखे हुए हैं। ऐसा लगता है कि तुमने अपनी पिछली चोरी की आदत आज भी नहीं छोड़ी है और इसी कारण मेरी भाभी द्वारा भेजे. चावलों को भी तुम मुझसे छिपा रहे हो। – इस प्रकार अपने मित्र के दुःखों को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण जो कुछ भी दे सकते थे वह उन्होंने बिना सुदामा को बताये दे दिया लेकिन प्रत्यक्ष रूप में गोपाल जी ने उनके हाथ में कुछ नहीं दिया।

विशेष :

  1. अन्तिम दो पंक्तियों में श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्ष रूप में तो सुदामा को कुछ नहीं दिया पर अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें दो लोक का स्वामी बना दिया है।
  2. अनुप्रास अलंकार की छटा।
  3. भाषा, सहज, सरल एवं भावानुकूल है।

सुदामा
वह पुलकनि वह उठि मिलनी, वह आदर की भांति।
यह पठवनि गोपाल की, कछु न जानी जाति॥
घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज।
कहो भयौ जो अब भयौ, हरिको राज-समाज॥
हौं कब इत आवत हुतौ, बाही पठयौ ठेलि।
कहिहौ धन सो जाइकै, अब धन धरौ सकेलि ॥12॥

कठिन शब्दार्थ :
पुलकनि = पुलकित दशा, रोमांचित होना; पठवनि = भेजना; घर-घर = द्वार-द्वार पर; ओड़त-फिरे = माँगते फिरते हैं; तनक= थोड़े; कहो भयौ = जो कुछ मैं कहता था; जो अब भयौ = वही हो गया; इत = इधर; आवत हुतौ = आना चाह रहा था; बाही = उसी ने अर्थात् मेरी पत्नी ने; पठ्यौ ठेलि= जबरदस्ती भेज दिया; धरौ सकेलि = इकट्ठा करके धर लो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रकट में श्रीकृष्ण ने जब सुदामा को कुछ नहीं दिया तो सुदामा हतोत्साहित होकर अपनी व्यथा का वर्णन करते हैं।

व्याख्या :
कवि कहता है कि सुदामा श्रीकृष्ण की भेंट के समय दोनों में कैसी पुलकन थी, कैसा दोनों का उठना-बैठना और मिलना था और कैसा श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया आदर-सम्मान था? श्रीकृष्ण ने जब सुदामा को विदा किया तो कैसे किया? ये बातें कोई भी जान नहीं सका अर्थात् श्रीकृष्ण ने अपने मित्र की दशा देखकर उन्हें जो दो लोकों का राज्य दे दिया उसे केवल श्रीकृष्ण के अलावा कोई नहीं जानता था।

सुदामा निराश होकर कहने लग जाते हैं कि मैं तो थोड़े-से दही की चाहना में द्वार-द्वार भीख माँगता फिरता था लेकिन उस दशा में भी मैं सन्तुष्ट था लेकिन पत्नी की हठ के कारण यहाँ श्रीकृष्ण की द्वारिका में आकर मुझे क्या प्राप्त हुआ अर्थात् कुछ भी नहीं। राजाओं के राज-समाज की तो अनोखी गति होती है। मैं तो इधर किसी भी कीमत पर आना नहीं चाहता था पर मेरी उस घरवाली ने मुझे जबरन जिद्द करके इधर द्वारिका भेज दिया। अब मैं घर लौटकर अपनी गृहिणी से कहूँगा कि मैं जो अपने साथ बहुत सारा धन लेकर आया हूँ उसे तुम भली-भाँति सजाकर रख लो।

विशेष :

  1. सुदामा की खीझ का वर्णन है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल।

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वैसेई राज-समाज बने, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ।
वैसेई कंचन के सब धाम है, द्वारिकै माहि नौं फिरी आयो।
भौन बिलोकि ये को मन लोचत-सोचत ही सब गाँव मँझायो।
पूछत पांडे फिर सबसों, पर झोंपरी को कहुँ खोज न पायो।। ॥13॥

कठिन शब्दार्थ ;
वैसेई = वैसे ही; गज-बाजि = हाथी घोड़े; घने = बहुत अधिक; संभ्रम = धोखा, भ्रम; कंचन = सोना; धाम = महल; बिलोकि = देखकर, मंझायो = ढूँढ़ डाला।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहां उस समय का वर्णन है जब सुदामा लौटकर अपने घर आ जाते हैं पर यहाँ के ठाठ-बाट देखकर वे चकरा जाते हैं कि कहीं मैं पुनः लौटकर द्वारिका तो नहीं पहुँच गया।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जब सुदामा द्वारिका से लौटकर अपने घर वापस आते हैं तो उन्हें वैसे ही ठाठ-बाट यहाँ देखने को मिलते हैं। वे देखते हैं कि यहाँ भी वैसा ही राज-समाज बैठा हुआ है जैसा कि द्वारिका में था। वैसे ही हाथी, घोड़े और सोने के महल हैं। सुदामा को लगता है कि कहीं वह भूलकर फिर से द्वारिका तो नहीं आ गया है। सारे भवनों को देखते-देखते उन्होंने पूरा गाँव घूम लिया वे सभी लोगों से अपनी पुरानी झोंपड़ी के बारे में पूछते हैं पर उन्हें अपनी वह पुरानी झोंपड़ी नहीं मिली।

विशेष :

  1. अपने घर की नई बसावट एवं सजावट देखकर सुदामा को भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि कहीं वे लौटकर फिर द्वारिका तो नहीं आ गये।
  2. भाषा सहज, सरल एवं भावपूर्ण है।

कनक दंड कर में लिए, द्वारपाल है द्वार।
जाय दिखायौ सबनि लै, या है महल तुम्हार॥
टूटी-सी मडैया मेरी परी हुती याही ठौर,
तामै परो दु:ख काटौं हेम-धाम री।
जेवर-जराऊ तुम साजे प्रति अंग-अंग,
सखी सोहें, संग वह छूछी हुती छाम री॥
तुम तौ पटंबर री ओढ़े हो किनारीदार।
सारी जरतारी, वह ओढ़े कारी कामरी।
मेरी वा पँडाइन तिहानी अनुहार ही पै,
विपदा-सताई वह पाई कहाँ पामरी।। ॥14॥

कठिन शब्दार्थ :
कनक दंड = सोने का दण्डा; सबनि = सबने; मडैया = छाया हुआ छोटा-सा छप्पर; परी-हुती = पड़ी हुई थी; याही ठौर = इसी स्थान पर; हेम-धाम = स्वर्ण निर्मित महल; जेवर-जराऊ = जड़े हुए जेवर; साजे = सज रहे हैं; प्रति अंग-अंग = हर अंग में; छूछी हुती = बिना आभूषण के; छामरी = पतली दुबली; पटंबर = ऊपरी वस्त्र; सारी = साड़ी; जरतारी = जरदोई के काम वाली; कारी कामरी = काला कम्बल; पँडाइन = पंडिताइन; अनुहार ही पै = तुम्हारी जैसी ही; विपदा = विपत्ति; पामरी = बेचारी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग ;
सुदामा जी द्वारिका से जब अपने घर लौटते हैं तो वहाँ की भव्य अभिराम छवि को देखकर वे हक्के-बक्के रह जाते हैं और अपनी टूटी-सी छानी तथा अपनी पंडिताइन को ढूँढ़ते फिरते हैं, इसी का यहाँ वर्णन है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जब सुदामा श्रीकृष्ण से भेंट करने के पश्चात् द्वारिका से अपने घर वापस आते हैं तो भगवान की कृपा से सुदामा के घर पर कंचन बरसने लगता है। उनके मकान आदि भी वैसे ही भव्य हो जाते हैं जैसे कि द्वारिका में थे तो वे आश्चर्य चकित होकर कहने लगते हैं कि यहाँ तो द्वार पर खड़े द्वारपाल अपने हाथों में स्वर्ण निर्मित डण्डा लिए हुए हैं। फिर नगर के अन्य लोगों ने सुदामा को ले जाकर उन्हें बताया कि यही तुम्हारा महल है।

इस पर सुदामा कहने लगते हैं कि मेरी तो इस स्थान पर टूटी सी मडैया खड़ी हुई थी, उसी में मैं अपने दुःखों को काटता रहता था, पर अब यहाँ स्वर्ण निर्मित भवन कहाँ से आ गये? उसी घर पर एक स्त्री खड़ी हुई मिलती है उसे देखकर सुसुदामा जी कहते हैं कि हे भाग्यवती! तुम्हारे अंग-प्रत्यंग पर तो जड़ाऊ जेवर शोभा दे रहे हैं साथ ही तुम्हारे साथ तो सखियाँ भी हैं लेकिन मेरी वह पंडिताइन तो बिना किसी आभूषण के पतली-दुबली सी थी। तुम तो किनारीदार पटंबर पहने हुए हो साथ ही तुम्हारी साड़ी भी जरदोई के काम से युक्त है लेकिन मेरी पंडिताइन तो केवल काली कामरी ओढ़े रहती थी। इतना अवश्य है कि मेरी वह पंडिताइन तुम जैसी ही लगती थी। विपत्ति ने मेरा साथ नहीं छोड़ा है। मैं अपनी उस भोली-भाली पंडिताइन को कहाँ से पा सकूँगा।

विशेष :

  1. भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कृपा से सुदामा को भी राजसी ठाठ-बाट प्रदान कर दिए हैं पर भगवान ने अपना रहस्य सुदामा को नहीं बताया था इसीलिए वह दिग्भ्रम हो रहा है।
  2. भाषा, सहज, सरल एवं भावानुकूल है।

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कै वह टूटी-सी छानी, हती, कहै कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग मैं पनही न हती, कहै लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै, कै कोमल सेज पै नींद न आवत।
के जुरतो नहीं कोदो सवाँ, प्रभु के परताप तैदाख न भावत ॥15॥

कठिन शब्दार्थ :
कै= कहाँ छानी = टूटी झोंपड़ी, छप्पर; हती = थी; कंचन = सोने के; धाम = महल; सुहावत = शोभा दे रहे हैं; पनहीं = जूते; जुरतो नहीं = जुड़ता नहीं था, मिलता नहीं था; कोदों सवाँ = चावल की सस्ती एवं मोटी जाति; परताप = महिमा; तै = से; दाख = अंगूर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से सुदामा के बुरे दिन फिर गये।

व्याख्या :
कवि कहता है कि सुदामा कहते हैं कि जहाँ वह टूटी-सी झोंपड़ी पड़ी हुई थी अब वहीं पर सुन्दर-सुन्दर सोने के महल शोभायमान हो रहे हैं। कहाँ तो सुदामा के पैरों में जूता तक न था अब भगवान की कृपा से उन्हें ले जाने के लिए गजराजों के साथ महावत खड़े हुए हैं। कहाँ तो कठोर भूमि पर (बिना बिस्तरों के) रात कट जाती थी कहाँ अब कोमल शैया पर भी नींद नहीं आ रही है। कहाँ खाने के लिए कोदों और सवाँ के चावल भी नहीं मिलते थे और कहाँ अब ईश्वर की महिमा से अंगूर भी नहीं खाये जा रहे हैं।

विशेष :

  1. भगवान की कृपा से भक्तों के दिन फिर जाते हैं जैसे कि सुदामा के।
  2. प्रभु की महिमा का बखान है।
  3. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल है।
  4. अनुप्रास की छटा।

शबरी प्रसंग संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मनभावा॥
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयऊ गगन आपनि गति पाई॥
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी के आश्रम पगु धारा॥
सबरी देखि राम गृह आए। मुनि के वचन समुझि जिय भाए।
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर वनमाला॥
स्याम गौर सुन्दर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥
प्रेम मगन मुख वचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥
सादर जल लैं चरन पखारे। पुनि सुन्दर आसन बैठारे॥
दोहा-कंद मूल फल सुरस अति दिएराम कहूँ आनि।
प्रेम सहित प्रभुः खाए बारंबार बखानि ॥1॥

कठिन शब्दार्थ-निज धर्म = भागवत धर्म; आपनि गति = गन्धर्व का स्वरूप; उदारा = दयालु; सरसिज = कमल; लोचन = नेत्र; सरोज = कमल; पुनि = पुनः; सुरस = रसपूर्ण; बारंबार = बार-बार।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत अंश ‘सामाजिक समरसता’ के शीर्षक ‘शबरी प्रसंग’ से लिया गया है। इसके रचयिता महाकवि तुलसी दास हैं। यह प्रसंग मूलतः ‘अरण्य काण्ड’ से लिया गया है।

प्रसंग :
गिद्धराज जटायु का अन्तिम संस्कार करने के पश्चात् सीताजी की खोज में दोनों भाई आगे चले। उस मार्ग में कबंध नामक राक्षस जब सामने आया तो श्रीराम ने उसका वध कर डाला। कबंध राक्षस ने अपने शाप की बात श्रीराम से कही। श्रीराम ने कबंध से कहा हे, गंधर्व। सुनो, मैं तुमसे कुछ कहता हूँ

व्याख्या :
कविवर तुलसीदास कहते हैं कि तब श्रीराम ने उसे (कबंध को) अपना भागवत धर्म समझाते हुए कहा। अपने चरणों में प्रेम देखकर वह उनके मन को अच्छा लगा। तत्पश्चात् श्रीरघुनाथ जी के चरण कमलों में सिर नवाकर वह अपनी गति (गन्धर्व स्वरूप) पाकर आकाश में चला गया। उदार श्रीराम जी उसे गति देकर शबरी के आश्रम में पधारे। शबरी ने श्रीरामचन्द्र जी को घर में आते देखा. तो मुनि मतंग जी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया।

कमल जैसे नेत्र और विशाल भुजा वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरी लिपट गयीं। वे प्रेम में इतनी डूब गयीं कि उनके मुख से वचन तक नहीं निकला। वे बार-बार प्रभु के चरण-कमलों में सिर झुका रही हैं। इसके पश्चात् उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोये फिर उन्हें सुन्दर आसानों पर बैठाया। शबरी ने अत्यन्त रसदार और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्रीराम जी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया।

विशेष :

  1. श्रीराम भक्तवत्सल हैं। शबरी की भक्ति भावना देखकर वे उसके आश्रम पर जाते हैं तथा उसके द्वारा दिये गये कन्द, मूल और फलों को प्रेम सहित खाते हैं।
  2. भाषा अवधी है।
  3. उपमा, रूपक एवं अनुप्रास अलंकारों का प्रयोग।
  4. दोहा चौपाई छन्द का प्रयोग।

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जातिपाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
नवधा भगति कहऊँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरू मन माहीं॥
प्रथम भगति सन्तन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंग।
दोहा-गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
भगतिहीन = भक्ति भावना से रहित; वारिद = बादल; नवधा = नौ प्रकार की; रति = प्रेम; पद पंकज = चरण कमल; मम = मेरे।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में भक्ति की महिमा का बखान किया गया है। भक्ति के आगे जाति, पाँति, कुल धर्म आदि का कोई महत्त्व नहीं है।

व्याख्या :
कविवर तुलसीदास जी कहते हैं भगवान श्रीराम शबरी को भक्ति की महिमा बताते हुए कहते हैं कि जाति-पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता इन सबके होने पर भी भक्ति रहित मनुष्य कैसा लगता है जैसे जलहीन बादल दिखाई पड़ता है।

आगे श्रीराम कहते हैं कि मैं तुमसे अब नवधा भक्ति के बारे में बताता हूँ। तुम सावधान होकर सुनो और मन में धारण करो। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम। तीसरी भक्ति अभिमान रहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति है कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करना।

विशेष :

  1. भगवान भक्ति को बहुत महत्त्व देते हैं।
  2. इस अंश में कवि ने नवधा भक्ति में से चार प्रकार की भक्ति का वर्णन किया है।
  3. उपमा एवं रूपक अलंकार।
  4. अवधी भाषा का प्रयोग।

मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
सातवें सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।
आठवें सम जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोकि बंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सलभ भई सोई॥
मन दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥
सो सब कहि देव रघुवीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
प्रकासा = प्रसिद्ध है; विरति = विरक्ति; जथालाभ = जो कुछ मिल जाए; परदोषा= दूसरों के दोष; सब सन = सबके साथ; करिबर गामिनी = गज गामिनी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत अंश में कवि ने श्रीराम के मुख से शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान कराया है।

व्याख्या :
कविवर तुलसी कहते हैं कि श्रीराम जी शबरी से कहते हैं कि मंत्र जाप करना, मुझ पर दृढ़ विश्वास रखना तथा वेद विहित कर्मकाण्ड करना पंचम प्रकार की भक्ति है। इन्द्रियों को वश में करना, शील व्यवहार बनाये रखना, सकाम कर्मों से विरक्त रहना और निरन्तर सज्जनों के धर्म का अनुकरण करना मेरी छठवीं प्रकार की भक्ति है। सातवीं प्रकार की भक्ति के अन्तर्गत सम्पूर्ण संसार को मेरे स्वरूप में देखना, सब में समान भाव रखना तथा मुझसे अधिक सन्त पुरुषों को सम्मान देना है। आठवीं प्रकार की भक्ति है-जितना मिले उतने में ही संतोष करना तथा स्वप्न में भी किसी दूसरे के दोषों को न देखना है।

सबसे सरलता तथा निष्कपट व्यवहार, मुझ पर अटूट विश्वास, हृदय में प्रसन्नता का भाव तथा स्वयं को कभी दीन-हीन न समझना मेरी नवम् प्रकार की भक्ति है। इन नौ भक्तियों में से जिनके पास एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़ चेतन कोई भी हो, हे भामिनि (शबरी)! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है। फिर तुममें तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गयी है। मेरे दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि (शबरी)! अब यदि तुम गजगामिनी जानकी की कुछ खबर जानती हो तो बताओ।

इस पर शबरी ने कहा-हे रघुनाथ जी! आप पंपा नामक सरोवर को जाइए, वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवर! वह सब हाल बता देगा। हे धीर बुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं।

विशेष :

  1. इस अंश में श्रीराम ने भक्ति के अन्य प्रकारों का सहज रूप में वर्णन किया है।
  2. सम्पूर्ण विश्व को राममय देखना ही राम की भक्ति है।
  3. अवधी भाषा का प्रयोग।
  4. दोहा, चौपाइ छन्द का प्रयोग।
  5. शान्त रस।

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

जीवन दर्शन अभ्यास

बोध प्रश्न

जीवन दर्शन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘काँटे कम से कम मत बोओ’ का क्या आशय है?
उत्तर:
इस पंक्ति का आशय यह है कि यदि तुमसे दूसरों की भलाई न हो सके तो कम-से-कम दूसरों के लिए मुसीबतें तो मत खड़ी करो।

प्रश्न 2.
भय से कातर होने पर मनुष्य की स्थिति कैसी हो जाती है?
उत्तर:
भय से कातर होने पर मनुष्य की स्थिति बड़ी ही दयनीय हो जाती है।

प्रश्न 3.
जीवन का सच क्या है?
उत्तर:
जीवन का सच मात्र संघर्ष है।

प्रश्न 4.
जीवन मार्ग में काँटे और कलियाँ क्या हैं?
उत्तर:
जीवन मार्ग में काँटे से अभिप्राय संकट और मुसीबतों से है तथा कलियों से अभिप्राय सुख-सम्पन्नता से है।

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जीवन दर्शन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि अंचल के अनुसार दुनिया की रीति क्या
उत्तर:
कवि अंचल के अनुसार दुनिया की रीति यह है कि यातना तो शरीर सहता है पर रोता मन है। उसी तरह इस संसार में करता कोई है और भोगता कोई है। समाज में भी प्रायः यह देखा जाता है कि सम्पन्न लोगों की गलतियों का परिणाम निरीह गरीब लोगों को भोगना पड़ता है।

प्रश्न 2.
“संकट में यदि मुस्का न सके” भय से कातर हो मत रोओ” पंक्ति में कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
इस पंक्ति में कवि यह कहना चाहता है कि मनुष्य में इतना आत्मबल नहीं है कि वह संकट में मुस्करा न सके तो उसे भय से कातर होकर रोना भी नहीं चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से उसके व्यक्तित्व की दुर्बलता प्रकट होती है।

प्रश्न 3.
गुप्तजी ने जीवन का संदेश किसे माना है और क्यों?
उत्तर:
श्रीजगदीश गुप्त ने जीवन का यह संदेश दिया है कि मनुष्य को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे उसका जीवन जड़वत् न रह जाए। जीवन में चाहे कैसी भी विपत्तियाँ आएँ अथवा सुखसम्पन्नता आए, मनुष्य को अपने लक्ष्य से डिगना नहीं चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति ही अपनी मंजिल को पा सकता है।

प्रश्न 4.
गुप्ता जी ने अपने हृदय को सशक्त बनाने के लिए क्या मार्ग सुझाया है?
उत्तर:
कवि ने अपने हृदय को सशक्त बनाने के लिए निरन्तर संघर्ष का मार्ग चुनने का उपदेश दिया है। जो व्यक्ति अपने लक्ष्य को पाने के लिए निरन्तर संघर्षशील रहता है वही मनुष्य जीवन में सफलता प्राप्त करता है।

जीवन दर्शन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“काँटे कम-से-कम मत बोओ” कविता की केन्द्रीय भावना लिखिए।
उत्तर:
इस कविता का केन्द्रीय भाव यह है कि मानव को कभी भी अपने आपको दुर्बल नहीं समझना चाहिए। हमें जीवन पूरी जिन्दादिली से जीना चाहिए। यदि हम दूसरों के जीवन में सुख के फूल नहीं उगा सकते तो कम-से-कम हमें उनके मार्ग में काँटे तो नहीं बोना चाहिए। कहने का भाव यह है कि यदि बन सके तो दूसरों का हित करो उनको दुःख मत दो।

प्रश्न 2.
‘वह जिन्दगी क्या जिन्दगी जो सिर्फ पानी सी बही’ कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पंक्ति का आशय यह है कि मनुष्य को परिस्थितियाँ अपने अनुकूल बनाने के लिए संघर्ष करना चाहिए न कि परिस्थितियों से हार मानकर चुप बैठ जाना चाहिए। व्यक्ति को पानी के उस स्वभाव को त्याग देना चाहिए कि जिधर भी ढलान मिले उधर बह ले। मनुष्य में तो इतनी सामर्थ्य है कि वह अपना मार्ग स्वयं बना लेता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए-
(अ) यदि बढ़ न सको……………………मत बोओ।
उत्तर:
कवि का कथन है कि संकल्प बाहरी दुनिया के आडम्बर से उत्पन्न नहीं होता, यह तो मन के भीतर स्वतः उपजता है। यदि हम कुछ नया करना चाहते हैं तो इससे हमारी परेशानियाँ बढ़ती ही हैं, इससे हमारे कष्ट कम नहीं होते हैं।

यदि हमारे मन में थोड़ा-सा भी सन्देह रहता है तो उस सूक्ष्म अन्धकार में विश्वास की जड़ें जमती नहीं हैं। अतः विश्वास को मजबूत बनाने के लिए सन्देह के अन्धकार को बिल्कुल नष्ट कर देना चाहिए। हमें अपने विश्वास को इस प्रकार दृढ़ करना चाहिए जैसे बादलों के बीच हवा का जयघोष मुखर रहता है। कहने का भाव यह है कि जब बादल गर्जना करते हैं तब हमें हवा की स्थिति ज्ञात होती है। यदि तुम अपने मन में विश्वास को नहीं जगा सकते तो इस प्रकार का जीवन तुम्हारा व्यर्थ है। बिना विश्वास के तो जीवन इस प्रकार है जैसे श्वांस तो चल रही हो पर शरीर मृत अवस्था में हो। यदि तुम फूल नहीं बो सकते तो संसार में दूसरों के लिए काँटे मत बोओ।

(आ) है अगम चेतना………………….स्वयं शमन।
उत्तर:
कविवर अंचल जी कहते हैं कि हे मनुष्यो! यदि तुम दूसरों के लिए फूल नहीं बो सकते हो तो कम-से-कम उनके लिए काँटे मत बोओ। भाव यह है कि यदि आप दूसरों का हित नहीं कर सकते तो कम-से-कम दूसरों की उन्नति में रुकावट तो मत बनो।

यह संसार अगम्य चेतना की घाटी है और संसारी मनुष्य बड़ा ही कमजोर होता है। जब मनुष्य अपने कार्यों से समाज में ममता की शीतल छाया बिखेरता है तो उससे स्वयं ही कटुता का शमन हो जाता है। जिस समय विपत्ति की ज्वालाएँ घुल जाती हैं तब जीवन के मुँदै हुए नेत्र स्वतः खुल जाते हैं। कहने का भाव यह है कि जब विपत्ति का बुरा समय बीत जाता है तो मानव के हृदय में स्वयं आनन्द की वर्षा होने लगती है और उस समय प्राणों का दुखी पवन निर्मलता धारण कर शान्ति से बहता रहता है।

हे मनुष्यो! यदि तुम संकट की दशा में मुस्करा नहीं सकते हो तो कम-से-कम भय से व्याकुल होकर रोओ तो मत। कहने का भाव यह है कि यदि तुममें इतना साहस और बल नहीं है कि संकट की दशा में भी तुम मुस्करा नहीं सकते हो तो कम-से-कम इतना साहस तो अपने में संचित करो कि भय से व्याकुल होकर रोओ मत अपितु उसका वीरता से सामना करो। यदि तुम दूसरों के जीवन में फूलरूपी खुशी नहीं भर सकते हो तो कम-से-कम इतना तो करो ही कि दूसरों के मार्ग में अथवा कार्य में उनके बाधक मत बनो।

(इ) सच हम नहीं…………………हमको पोंछना।
उत्तर:
आगे कवि कहता है कि हमारे हृदय को किस बात से आनन्द प्राप्त हो सकता है, इस सत्य को हमें ही खोजना है। हमारे कष्ट किस प्रकार दूर हो सकते हैं, इसका समाधान भी हमें स्वयं करना है। बाहर का संसार हमें सुख नहीं दे सकता है। क्या हमारी सहायता आकाश करेगा या फिर पृथ्वी हमारी इस दीन दशा पर आँसू बहायेगी अर्थात् कदापि नहीं। हमें तो उसी रास्ते को चुनना है जिससे हमें ऊर्जा और उत्साह मिले। वास्तव में न सच हम हैं और न सच तुम हो अपितु सच तो मात्र संघर्ष ही है और इसी संघर्ष से मानव के जीवन में उत्कर्ष आता है।

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जीवन दर्शन काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिएहार, बड़ा, विश्वास, अपना।
उत्तर:

शब्द विलोम
हार जीत
बड़ा छोटा
विश्वास अविश्वास
अपना पराया

प्रश्न 2.
वर्तनी सुधारिए-
उत्तर:
निरमल = निर्मल, घाटि = घाटी, विसवास = विश्वास, मरत = मृत्यु, कलीयां = कलियाँ।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
(क) मत याद करो………………….बीता जीवन।
उत्तर:
इस पंक्ति में यह भाव निहित है कि तुम्हारे जीवन में जो भी विपत्तियाँ या संकट आए हैं उन्हें न तो तुम याद करो और न ही उनके विषय में सोचो। अपने जीवन को सुखी रखने का यही एक मंत्र है।

(ख) यदि बढ़ न सको ………….. मत ढोओ।
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव यह है कि यदि मनुष्य के मन में कुछ करने का विश्वास नहीं है तो उसका जीवन मृतक के समान है। वह केवल सांसों से अपने मृत शरीर को ढो रहा है।

(ग) जो नत हुआ …………. झरकर कुसुम।
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव यह है कि जिस व्यक्ति ने परिस्थितियों से हार मान ली वह मृतक के समान है। जिस प्रकार डाली से झड़कर पुष्प सूख जाता है उसी प्रकार बिना संघर्ष के मनुष्य का जीवन भी सूख जाता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार पहचान कर लिखिए

  1. अनसुना, अनचीन्हा करने से संकट का वेग नहीं कमता।
  2. जो नत हुआ वह मृत हुआ, ज्यों वृत्त से झरकर कुसुम।
  3. वह जिन्दगी क्या जिन्दगी जो सिर्फ पानी-सी बही।

उत्तर:

  1. अनुप्रास अलंकार
  2. उपमा अलंकार
  3. उपमा अलंकार।

काँटे कम से कम मत बोओ संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

यदि फूल नहीं बो सकते तो
काँटे कम से कम मत बोओ!
है अगम चेतना की घाटी, कमजोर बड़ा मानव का मन,
ममता की शीतल छाया में होता, कटुता का स्वयं शमन!
ज्वालाएँ जब घुल जाती हैं, खुल-खुल जाते हैं मुँदै नयन,
होकर निर्मलता में प्रशान्त बहता प्राणों का क्षुब्ध पवन!
संकट में यदि मुस्का न सको, भय से कातर हो मत रोओ!
यदि फूल नहीं बो सकते तो, काँटे कम से कम मत बोओ! ॥1॥

कठिन शब्दार्थ :
फूल = खुशियों का, अच्छे कामों का प्रतीक है; काँटे = राह में रोड़े अटकाने, दूसरों को दुःख पहुँचाने का प्रतीक है; अगम = पहुँच से परे; कटुता = कड़वेपन का, बुराइयों का; शमन = नाश; क्षुब्ध = दुःखी; कातर = डरपोक।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश जीवन-दर्शन’ पाठ के ‘काँटे कम से कम मत बोओ’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘रामेश्वर शुक्ल अंचल’ हैं।

प्रसंग :
इस काव्यांश में कवि ने बताया है कि मनुष्य को कभी भी दूसरों की उन्नति में बाधक न बनकर साधक बनना चाहिए। यही जीवन की सार्थकता है।

व्याख्या :
कविवर अंचल जी कहते हैं कि हे मनुष्यो! यदि तुम दूसरों के लिए फूल नहीं बो सकते हो तो कम-से-कम उनके लिए काँटे मत बोओ। भाव यह है कि यदि आप दूसरों का हित नहीं कर सकते तो कम-से-कम दूसरों की उन्नति में रुकावट तो मत बनो।

यह संसार अगम्य चेतना की घाटी है और संसारी मनुष्य बड़ा ही कमजोर होता है। जब मनुष्य अपने कार्यों से समाज में ममता की शीतल छाया बिखेरता है तो उससे स्वयं ही कटुता का शमन हो जाता है। जिस समय विपत्ति की ज्वालाएँ घुल जाती हैं तब जीवन के मुँदै हुए नेत्र स्वतः खुल जाते हैं। कहने का भाव यह है कि जब विपत्ति का बुरा समय बीत जाता है तो मानव के हृदय में स्वयं आनन्द की वर्षा होने लगती है और उस समय प्राणों का दुखी पवन निर्मलता धारण कर शान्ति से बहता रहता है।

हे मनुष्यो! यदि तुम संकट की दशा में मुस्करा नहीं सकते हो तो कम-से-कम भय से व्याकुल होकर रोओ तो मत। कहने का भाव यह है कि यदि तुममें इतना साहस और बल नहीं है कि संकट की दशा में भी तुम मुस्करा नहीं सकते हो तो कम-से-कम इतना साहस तो अपने में संचित करो कि भय से व्याकुल होकर रोओ मत अपितु उसका वीरता से सामना करो। यदि तुम दूसरों के जीवन में फूलरूपी खुशी नहीं भर सकते हो तो कम-से-कम इतना तो करो ही कि दूसरों के मार्ग में अथवा कार्य में उनके बाधक मत बनो।

विशेष :

  1. कवि मनुष्य को सचेत करता है कि मानव का धर्म दूसरों को प्रसन्न करना है, न कि दुःखी करना।
  2. रूपक एवं प्रतीकों का सुन्दर चित्रण हुआ है।
  3. भाषा सहज, सरल एवं भावानुकूल है।

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हर सपने पर विश्वास करो, लो लगा चाँदनी का चन्दन,
मत याद करो, मत सोचो ज्वाला में कैसे बीता जीवन,
इस दुनिया की है रीति यही-सहता है तन, बहता है मन;
सुख की अभिमानी मदिरा में, जो जाग सका, वह है चेतन!
इसमें तुम जाग नहीं सकते, तो सेज बिछाकर मत सोओ!
यदि फूल नहीं बो सकते तो, काँटे कम-से-कम मत बोओ! ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
ज्वाला = प्रतीक है विपत्तियों का; मदिरा = शराब; चेतन = जाग्रत प्राणी; सेज बिछाकर मत – सोओ = अपने जीवन को अकर्मण्य मत बनाओ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि मानव अपने जीवन में जो भी. लक्ष्य निर्धारित कर ले उसे वह पूरे विश्वास के साथ प्राप्त करे।

व्याख्या :
कविवर अंचल कहते हैं कि तुमने अपने जीवन में जो भी स्वप्न बुने हैं अर्थात् लक्ष्य निर्धारित किए हैं, उन्हें तुम अवश्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील बनो। तुम अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लो कि चाँदनी के चन्द्र से उन्हें संतृप्त कर लो। कहने का भाव यह है कि जिस प्रकार चाँदनी रात में चन्दन की सुगन्ध संसार को सुवासित कर देती है उसी प्रकार तुम भी अपने स्वप्नों को आशाओं की ज्योति से और उमंग की खुशियों से भर लो। तुम अपने कष्टमय अतीत को मत याद करो, न तुम यह सोचो कि तुमने इस संसार में कितने कष्ट सहे हैं क्योंकि यह तो संसार की रीति है कि यातना तो शरीर सहन करता है और रोता हमारा मन है।

अतः अपने मन को मजबूत करके विगत को भुलाकर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो जाओ। यदि जीवन में कभी सुख प्राप्त होता है तो उस सुख की मदिरा में इतना उन्मत्त मत हो जाओ कि स्वयं का विवेक एवं होश भी खो बैठो। सुख में भी जो उन्मत्त नहीं होता वही मनुष्य जाग्रत माना जाता है। यदि तुम सुख में जाग्रत अथवा चेतन नहीं रह सकते तो इस तरह आराम से शैया बिछाकर सोने का भी तुम्हारा अधिकार नहीं है। यदि तुम दूसरों को फूल नहीं बो सकते अर्थात् उन्हें सुख प्रदान नहीं कर सकते तो उनकी राहों में काँटे बिछाने अर्थात् विपत्तियाँ उत्पन्न करने का भी तुम्हारा अधिकार नहीं है।

विशेष :

  1. कवि ने इस पद्यांश में सुख-दुःखे समं कृत्वा’ गीता के उपदेश को समझाया है।
  2. ‘इस दुनिया की है रीति यही, सहता है तन बहता है मन’-मन में विरोधाभास अलंकार।
  3. भाषा भावानुकूल।

पग-पग पर शोर मचाने से मन में संकल्प नहीं जमता,
अनसुना-अचीन्हा, करने से संकट का वेग नहीं कमता।
संशय के सूक्ष्म कुहासे में विश्वास नहीं क्षण-भर रमता,
बादल के घेरों में भी तो जय-घोष न मारुत का थमता।
यदि बढ़ न सको विश्वासों पर, साँसों से मुरदे मत ढोओ,
यदि फूल नहीं बो सकते तो, काँटे कम से कम मत बोओ! ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
पग-पग पर = कदम-कदम पर, प्रत्येक पल; अचीन्हा = न पहचाना हुआ; कमता = कम होना; जयघोष = विजय का स्वर; मारुत = पवन; मुरदे = मृतक; ढोओ = वहन करो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्

प्रसंग :
प्रस्तुत अंश में कवि का कथन है कि मनुष्य को अपना कार्य संकल्प के साथ करना चाहिए। संकल्प के लिए मन में विश्वास की आवश्यकता होती है। यह बाहर से नहीं, अपितु भीतर से प्राप्त होता है।

व्याख्या :
कवि का कथन है कि संकल्प बाहरी दुनिया के आडम्बर से उत्पन्न नहीं होता, यह तो मन के भीतर स्वतः उपजता है। यदि हम कुछ नया करना चाहते हैं तो इससे हमारी परेशानियाँ बढ़ती ही हैं, इससे हमारे कष्ट कम नहीं होते हैं।

यदि हमारे मन में थोड़ा-सा भी सन्देह रहता है तो उस सूक्ष्म अन्धकार में विश्वास की जड़ें जमती नहीं हैं। अतः विश्वास को मजबूत बनाने के लिए सन्देह के अन्धकार को बिल्कुल नष्ट कर देना चाहिए। हमें अपने विश्वास को इस प्रकार दृढ़ करना चाहिए जैसे बादलों के बीच हवा का जयघोष मुखर रहता है। कहने का भाव यह है कि जब बादल गर्जना करते हैं तब हमें हवा की स्थिति ज्ञात होती है। यदि तुम अपने मन में विश्वास को नहीं जगा सकते तो इस प्रकार का जीवन तुम्हारा व्यर्थ है। बिना विश्वास के तो जीवन इस प्रकार है जैसे श्वांस तो चल रही हो पर शरीर मृत अवस्था में हो। यदि तुम फूल नहीं बो सकते तो संसार में दूसरों के लिए काँटे मत बोओ।

विशेष :

  1. कवि ने जीवन में सन्मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी है।
  2. पग-पग में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।
  3. संशय के सूक्ष्म कुहासे में रूपक अलंकार।
  4. भाषा भावानुकूल।

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सच है, महज संघर्ष ही संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

सच हम नहीं, सच तुम नहीं
सच है, महज संघर्ष ही।
संघर्ष से हट कर जिए तो क्या जिए हम या कि तुम।
जो नत हुआ वह मृत हुआ ज्यों वृंत से झरकर कुसुम।
जो लक्ष्य भूल रुका नहीं।
जो हार देख झुका नहीं।
जिसने प्रणय पाथेय माना जीत उसकी ही रही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
ऐसा करो जिससे न प्राणों में कहीं जड़ता रहे।
जो हैं जहाँ चुपचाप अपने-आप से लड़ता रहे। ॥1॥

कठिन शब्दार्थ :
संघर्ष = मुकाबला; नत = झुका; वृंत= डंठल; कुसुम = फूल; प्रणय = प्रेम का; पाथेय = कलेवा।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘जीवन-दर्शन के अन्तर्गत ‘सच है, महज संघर्ष ही’ शीर्षक से लिया गया है। इसके कवि जगदीश गुप्त जी हैं।

प्रसंग :
कवि ने यहाँ दर्शाया है कि संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष विहीन जीवन मृत्यु है।

व्याख्या :
कविवर गुप्तजी कहते हैं कि न हम सच हैं और न तुम, सच तो केवल संघर्ष ही है। अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्षरत रहना ही वास्तविक जीवन है। यदि संच से हटकर हमने जीवन जिया तो क्या जिया। जो व्यक्ति संघर्षों के सम्मुख नत, होकर अर्थात् हार मानकर अपना सिर झुका लेता है तो वह उसी प्रकार मृतक के समान है जैसे कि डंठल से टूटा हुआ पुष्प। इस संसार में वही व्यक्ति जीवित माना जाता है जो अपने लक्ष्य को छोड़कर कभी रुकता नहीं है। जो व्यक्ति अपनी हार से समझौता नहीं करता अपितु जिसने अपने लक्ष्य को ही अपने प्रेम का कलेवा माना वही संघर्ष के लिए तत्पर रहता है और अंत में वही व्यक्ति जीत को प्राप्त करता है। अतः सच न हम हैं और न तुम। अतः हे मनुष्यो! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे तुम्हारे प्राणों में कहीं भी जड़ता न रहे। जो भी व्यक्ति जिस भी स्थान पर है वह चुपचाप अपने आप से लड़ता रहे, शान्त न रहे, थके नहीं।

विशेष :

  1. इस अंश में कवि ने संघर्ष को ही सच्चा जीवन माना है।
  2. सम्पूर्ण अनुप्रास की छटा, प्रणय-पाथेय में रूपक, ज्यों वृंत से झरकर सुमन में उपमा अलंकार।
  3. भाषा भावानुकूल है।

जो भी परिस्थितियाँ मिलें।
काँटे चुभे, कलियाँ खिलें।
हारे नहीं इंसान, है संदेश जीवन का यही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
हमने रचा आओ हमी अब तोड़ दे मँझधार को।
जो साथ फूलों के चले।
जो ढाल पाते ही ढले।
वह जिन्दगी क्या जिन्दगी जो सिर्फ पानी-सी बही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
संसार सारा आदमी की चाल देख हुआ चकित।।
पर झाँक कर देखो दृगों में, हैं सभी प्यासे थकित।। ॥2॥

कठिन शब्दार्थ :
काँटे चुभे = चाहे विपत्तियाँ आएँ; कलियाँ खिलें = जीवन में खुशहाली आए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस काव्यांश में कवि बताता है कि जो पानी के समान सरलता से बहता रहे वह कोई जिन्दगी नहीं है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि चाहे तुम्हारे मार्ग में काँटे चुभे या कलियाँ खिलें तुम्हें तो निरन्तर अपने पथ पर बढ़ते जाना है। कहने का भाव यह है कि चाहे तुम्हारे रास्ते में विपत्तियाँ आएँ या फिर सुख आएँ, तुम्हें किसी भी दशा में हार नहीं माननी है। न सच तुम हो, न सच हम हैं।

आगे कवि कहता है कि हमने जो कुछ भी आज तक रचा है उसे मँझधार में ही छोड़ देते हैं। जो फूलों के साथ चले और जो ढाल पाते ही ढल जाए तो ऐसी जिन्दगी किस काम की। जो जिन्दगी पानी के समान सरलता से बहने लगे वह भी कोई जिन्दगी है अर्थात् नहीं। वास्तव में न हम सच हैं और न तुम सच हो। आज सम्पूर्ण संसार आदमी की चाल देखकर आश्चर्यचकित हो रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि इनके नेत्रों में झाँकने से यह प्रतीत होता है कि ये सभी मनुष्य प्यासे और थके हुए हैं। इनमें से कोई भी अपने जीवन से संतुष्ट नहीं है।

विशेष :

  1. कवि ने जीवन में निरन्तर संघर्ष करने की प्रेरणा दी है।
  2. भाषा लाक्षणिक है।
  3. अनुप्रास की छटा है।

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जब तक बँधी है चेतना।
जब तक हृदय दुख से घना।
तब तक न मानूँगा कभी इस राह को ही मैं सही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
अपने हृदय का सत्य अपने-आप हमको खोजना।
अपने नयन का नीर अपने आप हमको पोंछना।
आकाश सुख देगा नहीं।
धरती पसीजी है कहीं?
जिससे हृदय को बल मिले है ध्येय अपना तो वही।
सच हम नहीं सच तम नहीं।
सच है महज संघर्ष ही। ॥3॥

कठिन शब्दार्थ :
चेतना = ज्ञानबुद्धि; राह = रास्ते को; नीर = आँसू पसीजी = पिघली, दया से द्रवित; ध्येय = लक्ष्य।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में कवि ने कहा है कि जिस उद्देश्य की पूर्ति से मनुष्य का हृदय संतुष्ट हो उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसे निरन्तर संघर्षशील होना चाहिए।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जब तक हमारी चेतना जीवित है और जब तक हृदय दुःख से भारी बना हुआ है तब तक मैं इस रास्ते को कभी भी उचित नहीं मानूँगा। कहने का भाव यह है कि बिना लक्ष्य प्राप्ति जीवन में संतोष पा लेना मेरी नियति नहीं है। वास्तव में न सच हम हैं और न सच तम हो।

आगे कवि कहता है कि हमारे हृदय को किस बात से आनन्द प्राप्त हो सकता है, इस सत्य को हमें ही खोजना है। हमारे कष्ट किस प्रकार दूर हो सकते हैं, इसका समाधान भी हमें स्वयं करना है। बाहर का संसार हमें सुख नहीं दे सकता है। क्या हमारी सहायता आकाश करेगा या फिर पृथ्वी हमारी इस दीन दशा पर आँसू बहायेगी अर्थात् कदापि नहीं। हमें तो उसी रास्ते को चुनना है जिससे हमें ऊर्जा और उत्साह मिले। वास्तव में न सच हम हैं और न सच तुम हो अपितु सच तो मात्र संघर्ष ही है और इसी संघर्ष से मानव के जीवन में उत्कर्ष आता है।

विशेष :

  1. कवि ने संघर्ष में ही अपनी आस्था जताई है।
  2. अनुप्रास अलंकार की छटा।
  3. भाषा भावानुकूल है।

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