MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण संधि प्रकरण

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण संधि प्रकरण

दो वर्गों के मिलने पर जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं। जैसे-हिम+आलय-हिमालयः।

संधि तीन प्रकार की होती है-
1. स्वर संधि
2. व्यंजन संधि
3. विसर्ग संधि

1. स्वर संधि-दो स्वरों के मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। स्वर संधि के छः भेद होते हैं-
(i) दीर्घ,
(ii) गुण,
(iii) वृद्धि,
(iv) यण,
(v) अयादि,
(vi) पूर्वरूप,
(vi) प्रकृति भाव।”

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(i) दीर्घ संधि-अ, आ के बाद अ, आ आने पर आ इ, ई के बाद इ, ई आने पर ई, उ, ऊ के बाद उ, ऊ आने पर ऊ तथा ऋ, ऋ के बाद ऋ आने पर ऋ हो जाता है, उसे दीर्घ संधि कहते हैं।

जैसे-
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(ii) गुण संधि (आदगुणः)-अ, आ के बाद इ, ई आने पर ‘ए’ बन जाता है। इसी प्रकार अ, आ के आगे उ, ऊ हो तो ‘ओ’ और ऋ आ जाने पर ‘अर’ बन जाता है।

जैसे-
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(iii) वृद्धि संधि (वृरिचि)-अ, आ के आगे ए, ऐ आने से ‘ऐ’ हो जाता है और अ, आ के आगे ओ या औ आने से ‘औ’ हो जाता है। ऐ और औ स्वरों के वृद्धि रूप हैं।

जैसे-
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(iv) यण संधि (इकोयणचि)-इ, ई, उ, ऊ ऋ से आगे उनसे भिन्न स्वर आने पर इ को यु, ड को व् और ऋ को र होता है-
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(v) आयादि संधि (एचोऽयवायावः)-ए, ऐ, ओ, औ से आगे यदि कोई भिन्न स्वर आ जाए तो पहले वर्णों को क्रमशः अय्, आय, अव् और आव् हो जाते हैं।

जैसे-
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(vi) पूर्णरूप संधि-पदान्त ए तथा ओ के पश्चात् अ आने पर अ का लोप हो जाता है तथा उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) लगा दिया जाता है।

  • हरे + अत्र = हरेऽत्र
  • विष्णो + अत्र = विष्णोऽत्र
  • सखे + अर्पय = सखेऽर्पय
  • सर्वे + अपि = सर्वेऽपि।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण वर्ण परिचय

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण वर्ण परिचय

वर्ण-भाषा की वह छोटी-से-छोटी इकाई जिसके और अधिक टुकड़े न किए जा सकें ‘वर्ण’ कहलाती है। वर्ण को अक्षर भी कहते हैं।

वर्ण के भेद-वर्णों के दो भेद हैं :
(अ) स्वर,
(ब) व्यंजन।

(अ) स्वर-जिस वर्गों का उच्चारण किसी अन्य वर्ण की सहायता के बिना स्वतन्त्र रूप से हो सकें वे वर्ण स्वर कहलाते हैं।

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संस्कृत भाषा में तेरह स्वर हैं-

अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ऋ, लु।

स्वरों के भेद-स्वर तीन प्रकार के होते हैं-

  1. ह्रस्व स्वर,
  2. दीर्घ स्वर,
  3. प्लुत स्वर,
  4. संयुक्त स्वर।

1. ह्रस्व स्वर-जिन स्वरों का उच्चारण करने में कम-से-कम समय लगे वे ह्रस्व स्वर कहलाते हैं ये पांच हैं-अ, इ, उ, ऋ, तृ।
2. दीर्घ स्वर-जिन स्वरों का उच्चारण करने में में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगे, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। ये स्वर आठ हैं-आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ।
3. प्लुत स्वर-जिन स्वरों क उच्चारण करने से ह्रस्व स्वरों से तिगुना समय लगे, उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। किसी व्यक्ति को दूर से पुकारने में प्लुत स्वरों का प्रयोग होता है। प्लुत स्वर के आगे ३ का चिह्न लगा दिया जाता है। जैसे ओ३म, बाइल।
4. संयुक्त स्वर-ए, ऐ, ओ, औ ये चार वर्ण संयुक्त स्वर कहलाते हैं।
5. व्यंजन-जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से ही होता है वे वर्ण व्यंजन कहलाते हैं। व्यंजन वर्ण तेंतीस (33) हैं।

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व्यंजनों के भेद-व्यंजनों के तीन भेद हैं-

  1. स्पर्श,
  2. अन्तःस्थ,
  3. ऊष्म।

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1. स्पर्श-स्पर्श वर्ण पच्चीस हैं-

क् ख् ग् घ्
ङ् च् छ् ज्
झ् ज् ट् ठ्
ड् ढ् ण् त्
थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्

इन्हें स्पर्श वर्ण कहा जाता है क्योंकि इनके उच्चारण के समय जिह्वा । कण्ठ्, तालु, मूर्धा, दन्त आदि स्थानों का विशेषतः स्पर्श करती है।
2. अन्तःस्थ-य् र् ल् व् ये चार वर्ण अन्तःस्थ वर्ण कहलाते हैं। इनकी स्थिति स्वरों तथा व्यंजनों के मध्य होती है अतः इन्हें अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं।
3. ऊष्म-श् श् स् ह् ये चार वर्ण ऊष्म कहलाते हैं इनके उच्चारण करते समय श्वास वायु घर्षण करती हुई बाहर निकलती है जिससे ऊष्मा उत्पन्न होती है अतः ये वर्ण ऊष्म कहलाते हैं।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण धातु और क्रिया

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण धातु और क्रिया

संस्कृत में क्रिया या कार्य को प्रकट करने वाले शब्द धातु कहे जाते हैं। इसमें प्रत्यय जोड़कर क्रियाएँ बनाई जाती हैं। क्रियाओं को प्रकट करने के लिए तीन काल होते हैं। संस्कृत में क्रिया की अवस्था को प्रकट करने के लिए दश लकार हैं।

  • लटू-वर्तमान काल
  • लिट्-परोक्षभूत
  • लटू-सामान्य भविष्यत्
  • लुट्-अनद्यन भविष्यत् काल
  • लेट्-वेद में प्रयुक्त
  • लोट-आज्ञार्थक
  • लङ्-अनद्यतनभूत
  • (8-अ) विधिलिङ-प्रार्थना, अनुग्रह
  • (8-ब) आशीलिँङ-शुभकामनाद्योतक
  • लुङ्-सामान्यभूत
  • लृङ्-हेतुहेतुमद्धृत

रूपों की दृष्टि से सारी धातुएँ दस गणों में विभक्त हैं-

  • भ्वादिगण,
  • अदादि गण,
  • जुहोत्यादि गण,
  • दिवादि गण,
  • स्वादि गण,
  • बुदादि गण,
  • रुधादि गण,
  • तनादि गण,
  • क्रियादि गण,
  • चुरादि गण।

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ये रूप की दृष्टि से परस्मैपदी, आत्मनेपदी और उभयपदी हैं। परस्मैपद में लट् लकार में धातु के आगे निम्नलिखित प्रत्यय जोड़े जाते हैं-
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आत्मनेपद में-
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प्रत्येक गण में धातु और इन प्रत्ययों के बीच अ, उ, नु, ना आदि भी जोड़े जाते हैं, तो विकरण कहलाते हैं। जैसे-भू-भू + अ + ति-भवति । कृ-कृ + अ +
ति = करोति । सु-सु + नु + ति = सुनोति। क्री-क्री + ना + ति = क्रीणाति । चुर्-चुर् . + णिच् + ति = चोरयति।

भ्वादिगण भू (होना)
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गम् धातु (जाना)
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दृश् (देखना)
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स्था (रुकना)
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जि (जीतना)
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श्रु (सुनना)
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वस् (रहना)
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दा (देना)
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शक् (सकना)
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इष् (चाहना)
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मुच् (छोड़ना)
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विशेष-मुच् धातू उभयपदी है। यहाँ परस्मैपद के रूप दिए गए हैं। आत्मनेपद में ‘सेव्’ के तुल्य रूप होंगे।

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चुरादिगण चुर् (चुराना) लट् लकार (वर्तमान काल)
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कथ् (कहना)
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आत्मनेपदी धातुएँ
सेव (सेवा करना)
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लभ पाना
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द्वि-जुआ खेलना
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इसी प्रकार विद्-होना जन जानना, अपना होना के रूप बनते हैं।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना

एक भाषा को दूसरी भाषा के बदलने का नाम अनुवाद है। संस्कृत में शब्दों के रखने का कोई क्रम नहीं है। वाक्य का कोई भी शब्द कहीं भी रखा जा सकता है, जैसे

रामः विद्यालयं गच्छति।
या
विद्यालयं रामः गच्छति।

इत्यादि अनुवाद करने के लिए हमें विभक्ति, कारक, वचन, पुरुष, लिंग, शब्द, रूप, धातु रूप का ज्ञान होना आवश्यक है। नीचे सरलता के लिए कारक और उनके चिह्न दिए जा रहे हैं-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना img-1

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पुरुष

कहने वाले, सुनने वाले. या जिसके विषय में बात की जाती है, उस संज्ञा या सर्वनाम का पुरुष कहते हैं। पुरुष तीन प्रकार के होते हैं
(क) अन्य पुरुष या प्रथम पुरुष-जिसके विषय में बात की जाए उसे अन्य पुरुष कहते हैं। जैसे-रामः, सः, सा, तत्, किम्, बालक, बालिका इत्यादि।
(ख) मध्यम पुरुष-जिससे प्रत्यक्ष बात की जाती है उसे मध्यम पुरुष कहते हैं। जैसे-त्वम्, (तुम्), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम सब)।।
(ग) उत्तम पुरुष-जो बात को कहता है उसके लिए उत्तम पुरुष का प्रयोग होता है। जैसे-अहम् (मैं), आवाम् (हम दोनों) वयम् (हम सब)।

लिङ्ग

संस्कृत में लिंग के तीन प्रकार होते हैं
(क) पुल्लिग-रामः, बालकः, हरिः, गुरुः, सः इत्यादि।
(ख) स्त्रीलिंग-सीता, बालिका, सा, माला, रमा, इत्यादि।
(ग) नपुंसकलिंग-फलम्, पुस्तकम्, वस्त्रम्, जलम्, मित्रम्, इत्यादि।

वचन

प्रत्येक विभक्ति में तीन वचन होते हैं-
(क) एकवचन-एक व्यक्ति या वस्तु के लिए एक वचन का प्रयोग होता है। जैसेबालकः (एक बालक), रामः (राम), बालिका (एक लड़की) इत्यादि।
(ख) द्विवचन-दो व्यक्ति या वस्तुओं के लिए द्विवचन का प्रयोग होता है। जैसेबालकौ (दो बालक), बालिके (दो लड़कियाँ), पुस्तके (दो पुस्तकें) इत्यादि।
(ग) बहुजन-तीन या तीन से अधिक व्यक्ति या वस्तुओं के लिए बहुवचन का प्रयोग होता है। जैसे-बालक (बहुत से बच्चे), बालिकाः (लड़कियाँ), पुस्तकानि (पुस्तके) इत्यादि।

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अभ्यास 1.
लट्लकार (वर्तमानकाल)
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अभ्यास 2.
लट्लटकार (वर्तमान काल)
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना img-3

अभ्यास 3.
लङ्लकार (भूतकाल)
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना img-4

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अभ्यासः 4.
लुट्लकार (भविष्यकाल)
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अभ्यास 5.
लोट्लकार (आज्ञार्थ)
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना img-6

अभ्यास 6.
विधिलिंग लकार (चाहिए अर्थ में)
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना img-7

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 15 श्रेष्ठतमं कार्यम्

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 15 श्रेष्ठतमं कार्यम् (कथा)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 15 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) कुण्डलः कः आसीत? (कुण्डल कौन था?)
उत्तर:
वृद्धः ब्राह्मणः। (वृद्ध ब्राह्मण था।)

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(ख) कुण्डलस्य पुत्रस्य नाम किम्? (कुण्डल के पुत्र का क्या नाम था?)
उत्तर:
सुकर्मा। (सुकर्मा)।।

(ग) कस्य प्रभावेण प्राणिनः जातिवैरम् परित्यज्य आनन्देन निवसन्ति स्म? (किसके प्रभाव से जीव-जाति, बैर, त्याग कर आनंदपूर्वक रहते हैं?)
उत्तर:
पिप्पलस्य। (पिप्पल के।)

(घ) कः सारसरूपं धृत्वा पिप्पलस्य समीपं गतवान्? (कौन सारस का रूप धारण कर पिप्पल के पास गया?)
उत्तर:
पितामहः ब्रह्मा। (पितामह ब्रह्मा।)

(ङ) वरम प्राप्य पिप्पलः कीदृशः जातः?(वरदान प्राप्त कर पिप्पल किस तरह हो गया?)
उत्तर:
अहङ्कारी। (अहंकारी।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) कः महान् पितृभक्तः आसीत्? (महान पितृभक्त कौन था?)
उत्तर:
सुकुर्मा महान् पितृभक्तः आसीत्। (सुकर्मा महान पितृभक्त था।)

(ख) पिप्पलः कं वरं याचितवान्? (पिप्पल कौन-सा वरदान माँगा?)
उत्तर:
पिप्पलः अशेषं विश्वं मम अधीन भवतु वरं याचितवान्। (पिप्पल ने वरदान माँगा कि पूरा विश्व मेरे अधीन हो जाये।)

(ग) सगर्वं पिप्पलं वीक्ष्य ब्रह्मा किं निश्चितवान्? (पिप्पल को घमण्डी जानकर ब्रह्मा ने क्या निश्चय किया?)
उत्तर:
सगर्वं पिप्पलं वीक्ष्य ब्रह्मा पिप्पलस्य गर्वः निवारणीय। (पिप्पल को घमण्डी जानकर ब्रह्मा ने पिप्पलस्य के गर्व को दूर करने का निश्चय किया।)

(घ) केन प्रकारेण पिप्पलस्य गर्वः अपगतः? (किस तरह से पिप्पल का घमण्ड दूर हो गया?)
उत्तर:
सुकर्मणः वचनं श्रुतवतः पिप्पलस्य गर्वः अपगतः। (सुकर्मा के वचनों को सुनकर पिप्पल का घमण्ड दूर हो गया।)

(ङ) कस्य उपरि देवाः पुष्पवृष्टिं कृतवन्तः? (किसके ऊपर देवों ने फूलों की वर्षा की?)
उत्तर:
सुकर्मणः उपरि देवाः पुष्पवृष्टिं कृतवन्तः। (सकर्मा के ऊपर देवों ने फलों की वर्षा की।)

(च) पाठमालक्ष्य श्रेष्ठतमं कार्यं किमस्ति? (पाठ के अनुसार श्रेष्ठ कार्य क्या है?)
उत्तर:
पाठमालक्ष्य श्रेष्ठतमं कार्यं पित्रोः सेवायाः श्रेष्ठतमं। (पाठ के अनुसार श्रेष्ठ कार्य माता-पिता की सेवा करना ही है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत (निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखो)
(क) सुकर्मा कथं पित्रोः सेवां करोति स्म? (सुकर्मा किस तरह से माता-पिता की सेवा करता था?)
उत्तर:
सुकर्मा पित्रोः स्नानं कारयति, रुचिकरमं पाकं कृत्वा व्यजनेन वीजयति इदृशं सेवां करोति स्म। (सुकर्मा माता-पिता को स्नान कराता था, रुचिकर भोजन पकाकर खिलाता था तथा पंखे से हवा करके इस तरह सेवा करता था।)

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(ख) पिप्पलस्य गर्वापनयनाय पितामहः किंमुक्तवान्? (पिप्पत के घमण्ड को दूर करने के लिये ब्रह्मा ने क्या किया?)
उत्तर:
पिप्पलस्य गर्वापनयनाय पितामहः सारसरूपं धृत्वा पिप्पलस्य समीपम् अगच्छत् अवदच्च। महत् तपः कृत्वा अपि भवान् ज्ञानं न लब्धवान्। (पिप्पल के घमण्ड को दूर करने के लिये पितामह ब्रह्मा ने सारस का रूप धारण कर पिप्पल से बोले-बहुत अधिक तपस्या करके भी आप ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सके।)

(ग) श्रेष्ठतम कार्यमिति पाठस्य आशयः कः? (श्रेष्ठतम कार्य नामक पाठ का आशय क्या है?)
उत्तर:
श्रेष्ठतं कार्यमिति पाठस्य आशयः पित्रोः सेवायाः श्रेष्ठतम् अन्यत् कार्य नास्ति। (श्रेष्ठतम कार्य नामक पाठ का आशय है कि माता-पिता की सेवा ही श्रेष्ठ कार्य है’अन्य दूसरा कोई कार्य श्रेष्ठ नहीं है।)

प्रश्न 4.
उचितशब्दैः रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत
(अहमेव, तपः, पितृभक्तः, विनयशीलः, पिप्पलः)
(क) कुण्डलस्य पुत्रः सुकर्गा महान् पितृभक्तः
(ख) वरप्राप्त्या पिप्पलः अहङ्कारी जातः।।
(ग) सः आश्रमे तिष्ठन् घोरं तपः आचरति।
(घ) अहमेव सर्वश्रेष्ठः इति सः चिन्तितवान्।
(ङ) सः विनयशीलः सञ्जातः।

प्रश्न 5.
निम्नलिखितशब्दानां पर्यायशब्दान् लिखत
(क) पुत्रः – वत्सः।
(ख) इन्द्रः – महेन्द्रः।
(ग) निशा – रात्रिः।
(घ) माता – जननी।
(ङ) पिता – जनकः।

प्रश्न 6
अधोलिखितपदानां विभक्तिं वचनं च लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 15 श्रेष्ठतमं कार्यम् img-1

प्रश्न 7.
अधोलिखितपदानि संस्कृतवाक्येषु प्रयुज्यन्ताम्
(क) परित्यज्य – बुद्धः पितरौ परित्यज्य वनं गतवान्।
(ख) तपस्वी – सुकर्मा महान् तपस्वी आसीत्।
(ग) पितभक्तः – सुकर्मा महान पितृभक्तः आसीत्।
(घ) सर्वश्रेष्ठः – पितृ सेवाया सर्वश्रेष्ठः।
(ङ) कृतवान् – पिप्पलः कठोरमं तपः कृतवान्।

प्रश्न 8.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
(क) कुण्डलः वेदशास्त्रज्ञः आसीत्।
(ख) पिप्पलः वरप्राप्त्या निरभिमानी जातः।
(ग) इन्द्रः सारसरूपं धृत्वा पिप्पलस्य समीपं गतवान।
(घ) सेवायाः श्रेष्ठतमम् अन्यत् कार्यं नास्ति।
(ङ) सुकर्मा आश्रमे तिष्ठन घोरं तपः आचरति।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) न
(घ) आम्
(ङ) न

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्येषु रेखाङ्कितानि सर्वनाम पदानि कस्य स्थाने प्रयुक्तानि? पाठम् आधृत्य लिखत
(क) अहमेव सर्वश्रेष्ठः इति सः चिन्तितवान्।
उत्तर:
पिप्पलः स्थाने सः प्रयुक्तः।

(ख) पित्रो. सेवायामेव तस्य सर्वः अपि समयः व्ययित भवति।
उत्तर:
सुकर्मा स्थाने तस्य प्रयुक्तः।

(ग) तस्य गर्वः अपि अपगतः।
उत्तर:
पिप्पलस्य स्थाने तस्य प्रयुक्तः।

(घ) भवतां कथं एतादृशं ज्ञानं सम्पादितवान्।
उत्तर:
सुकर्मा स्थाने भवतां प्रयुक्तः।

(ङ) सन्तुष्टः देवाः तस्य उपरि पुष्पवृष्टिं कृतवन्तः।
उत्तर:
सुकर्मा स्थाने तस्य प्रयुक्तः।

प्रश्न 10.
अधोलिखितपदानां सन्धिं सन्धिविच्छेदं च कृत्वा सन्धि नाम लिखत
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प्रश्न 11.
अधोलिखितानां शब्दानां समास विग्रहं कुरुत
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श्रेष्ठतमं कार्यम् पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

कथा के माध्यम से नीति, धर्म, त्याग, सेवा, परोपकारादि भावों का शिक्षण संस्कृत साहित्य में बहुत पुराने समय से ही चलता आ रहा है। वैदिक काल से ही गद्य साहित्य में कथा-विधा का प्रचार-प्रसार एवं लेखन निरंतर आज तक चलता आ रहा है। यहाँ संभाषण संदेश से संकलित यह बाल मनोविनोदिनी कथा प्रस्तुत है।

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श्रेष्ठतमं कार्यम् पाठ का हिन्दी अर्थ

1. कुण्डलः-कश्चन् सदाचारी वृद्धः ब्राह्मणः। सः वेदशास्त्रज्ञः आसीत्। कुण्डलस्य पुत्रः सुकर्मा महान् पितृभक्तः। सः पितुः सकाशादेव वेदशास्त्रयोः अध्ययनं करोति स्म। श्रद्धया मातुः पितुश्च सेवां करोति स्म।

सुकर्मा ‘मातृदेवो भव’ ‘पितृदेवो भव’ इति वचनम् अव्यवधानेन पालयति स्म। प्रतिदिनं नदीतेः जलम् आनीय पित्रोः स्नानं कारयति। समये रुचिकरम् पाकं कृत्वा परिवेषयति। ग्रीष्मकाले तौ व्यजनेन वीजयति। रात्रौ जागरितः सन् एव तयोः सेवां करोति। एवं च पित्रोः सेवायामेव तस्य सर्वः अपि समयः व्ययितः भवतिस्म।

तस्मिन् काले एव पिप्पलः नाम कश्चन् तपस्वी निवसति स्म। सः आश्रमे निष्ठन् घोरं तपः आचरति। तस्य तपःप्रभावेण प्राणिनः अपिजातिवैरंपरित्यज्य सहैव आनन्देन निवसन्ति स्म।

पिप्पलः :
घर्षं यावत् जलम् अन्नं च अस्वीकृत्य वायुमात्रं सेवमानः तपः आचरितवान्। तपसः प्रभावेण तस्य शरीरे अपूर्वं तेजः प्राकाशत। सन्तुष्टाः देवाः तस्य उपरि पुष्प वृष्टिं कृतवन्तः। इन्द्रः प्रत्यक्षः भूत्वा “वरं याचतु” इति उक्तवान्।

शब्दार्थ :
अव्यवधानेन-बाधा के कारण-For disturbing; परिवेष्यति-ढूंढ़ता-Founds; तौ-वे दोनों-They both; वीजयति-पंखा करता है-To file fan; व्यजनेन-पंखे के द्वारा-By fan; जागरित-जाग कर-Get up; भवति स्म-हुआ था-Was happend; घोरं-बहुत अधिक-Very much; जातिवैरं-जाति बैर-Malafide intention by caste; सदैव-हमेशा-Daily; स्म-थे-Were; उक्तवान्-कहा-Invitation; अस्वीकृत्यअस्वीकार-Not accepting; उपरि-ऊपर-Upper; भूत्वा-होकर-Passing, cross.

हिन्दी अर्थ :
कहीं कुण्डल नामक ए. सदाचारी वृद्ध ब्राह्मण रहता था। वह वेदशास्त्रों का अच्छा ज्ञाता था। कण्डल का एक पुत्र सुकर्मा बहुत पित्रभक्त था। वह अपने पिता के साथ वेदशास्त्रों ५। अध्ययन करता रहता था और श्रद्धापूर्वक माता-पिता की सेवा किया करता।

सुकर्मा ‘मातृ देवो भव’, ‘पितृ देवोभव’ इस प्रकार के वचन का व्यवधान रहित पालन किया करता था। प्रतिदिन नदी से जल लाकर माता-पिता को स्नान कराता, समय पर (यथा संभव) स्वादिष्ट भोजन बनाकर परोसता। गर्मी के दिनों में उन दोनों को पंखे से हवा करता। रात्रि में जागकर भी वह उन दोनों की सेवा करता। इस प्रकार माता-पिता की सेवा करता हुआ वह अपना समय व्यतीत करता था।

उन्हीं दिनों पिप्पल नामक कोई तपस्वी निवास करता था। वह आश्रम में रह तप का आचरण करता था। उसके तप के प्रभाव से सभी प्राणी जाति-बैर त्यागकर आनन्दपूर्वक साथ-साथ निवास करते थे। पिप्पल ने एक वर्ष तक अन्न जल का त्याग कर केवल हवा पीकर तपस्या की। उसके तपके प्रभाव से शरीर में अद्वितीय तेज प्रस्फुटित होने लगा। देवगणों ने फूलों की वर्षा की, इंद्रदेव (स्वयं) प्रकट होकर ‘वरदान’ माँगने को कहा।

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2. पिप्पलः-“अशेषं विश्वं मम अधीन भवतु” इति वरमयाचत्। इन्द्रः “तथास्तु” इति उक्तवान्। परन्तु वरप्राप्त्या पिप्पलः अहङ्कारी जातः। प्रपञ्चे मत्सदृशः तपस्वी अन्यः कोऽपि नास्ति। अहमेव सर्वश्रेष्ठः इति सः अमन्यतं।

पितामहः ब्रह्मा “पिप्पलस्य गर्वः निवारणीय” इति निश्चित्य सारसरूपं धृत्वा पिप्पलस्य समीपम् अगच्छत् अवदच्च-“भवान् किमर्थम् आत्मानं श्रेष्ठं मन्यते? एषः भवतः अहङ्कारः। महत् तपः कृत्वा अपि भवान् ज्ञानं न लब्धवान्। कुण्डलस्य पुत्रः सुकर्मा भवदपेक्षया ज्ञानी अस्ति। यद्यपि सः यज्ञयागादिकं न कृतवान्, त्वत् सदृशः कठोरं तपः अपि न आचरितवान्। तथापि तेन पित्रोः सेवया तादृशं ज्ञानं लब्धम्” इति।

एतदाकर्ण्य आश्चर्यचकितः पिप्पलः तदा एव सुकर्मणः समीपं गत्वा अपृच्छत्-“भवता कथम् एतादृशं ज्ञानम् अर्जितम्?” इति।।

सुकर्मा विनयेन पिप्पलं नमस्कृत्य अवोचत्-ब्रह्मन्! अहं किमपि न जानामि। न मया यज्ञः कृतः, न वा तीर्थाटनं कृतम्, तपः अपि न आचरितम्, अहं तु पित्रोः सेवामेव कृतवान्। अहं चिन्तयामि यत् पित्रोः सेवायाः श्रेष्ठतमम् अन्यत् कार्यं नास्ति। तयोः सेवायाः परिणामतः एव मया एतादृशी सिद्धिः प्राप्ता।

सुकर्मणः :
वचनं श्रुतवतः पिप्पलस्य ज्ञाननेत्रे उद्घाटिते। तस्य गर्वः अपि अपगतः। सः विनय-शीलः सञ्जातः।।

शब्दार्थ :
अहङ्कारी-अहंकारी-Proudy; प्रपञ्चे-प्रपञ्च में-; सदृशः-के समान-Like that; अमन्यत्-माना-Obey; ब्रह्मा-ब्रह्मा-God; निवारणीय-निवारण करता हूँ-Solves; साररूपं-सार रूप में-In summary; अवदच्च-और बोला-And speak; मन्यते-मानते हैं-Obeys; कृत्वा-करके-Do; लब्धवान्-प्राप्त किया-Received; भवदपेक्षया-आपकी अपेक्षा-Than you; यज्ञभागादिकं-यज्ञ आदि-And worship; सदृशः-के समान-Like that; एतदाकर्ण्य-ऐसा सुनकर-Listen that; अहं-मैं-I; सजातः-हुआ-Happend.

हिन्दी अर्थ :
पिप्पल-पूरा संसार हमारे अधीन हो-ऐसा वर माँगा। इन्द्र-‘तथास्तु’ ऐसा होगा। किन्तु वर प्राप्त कर लेने के बाद पिप्पल अहंकार से भर उठा। उसे ऐसा प्रपंच लगने लगा कि उसके समान तपस्वी संसार में कोई दूसरा नहीं। उसे अपने सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार हो गया।

पितामह ब्रह्मा पिप्पल के गर्व का निवारण करने हेतु सारस का रूप धारण कर उसके पास आए और बोले-आप अपने को क्यों सर्वश्रेष्ठ मानते हो? यह तुम्हारा अहंकार है। महान तपस्वी सुकर्मा तुम्हारी अपेक्षा अधिक ज्ञानवान है इतनी तपस्या करने पर भी तुम ज्ञान को प्राप्त न हो सके। यद्यपि कुण्डल पुत्र सुकर्मा तुम्हारे समान कठोर तपस्या भी नहीं किया, न ही यज्ञ-यागादि ही किया, तो भी उसने मातृ-पितृ सेवा के ज्ञान प्राप्त कर लिया। (ब्रह्मा की) यह बात सुन आश्चर्यचकित पिप्पल सुकर्मा के निकट जाकर पूछा-आपने कैसे इस प्रकार ज्ञान अर्जित कर लिया?

सुकर्मा ने विनय पूर्वक पिप्पल को नमस्कार कर कहा-ब्रह्मन्! मैं कुछ भी नहीं जानता। न तो मैंने कोई यज्ञ किया, न तीर्थ-व्रत किया, मैंने तपस्या भी नहीं की। मैंने तो केवल माता-पिता की सेवा की है। मैं सोचता हूँ-माता-पिता की सेवा ही सर्वश्रेष्ठ है। दूसरा अन्य कोई कार्य श्रेष्ठ नहीं है। उनकी सेवा के फलस्वरूप मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआ। सुकर्मा के वचन सुन पिप्पल के ज्ञान चक्षु खुल गए। उसका अहंकार तिरोहित हो गया वह विनयी हो गया।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण समास प्रकरण

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण समास प्रकरण

दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक शब्द बनाना समास कहलाता है। समस्तपद के पहले शब्द को पूर्वपद तथा बाद वाले शब्द को उत्तरपद कहते हैं।

समास शब्द सम् उपसर्ग के साथ अस् धातु से बना है। समास का अर्थ है-संक्षेप में कहना। समास छः प्रकार के होते हैं

1. तत्पुरुष समास

जिस समास में दो शब्दों के मध्य से विभक्तियों का लोप कर दिया जाता है तथा उत्तर पद प्रधान होता है वह तत्पुरुष समास होता है। विभक्तियों के अनुसार तत्पुरुष छः भेद होते हैं-
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2. द्विगु समास

जिस समास का पूर्वपद संख्यावाची हो वह समस्त द्विगु समास कहलाता है। यह समास समाहार (समूह) अर्थ में होता है।।

  • त्रयाणाम् पथाम् समाहारः = त्रिपथम्
  • पंचानां रात्रीणां समाहारः = पंचारात्रम
  • सप्त च ते ऋषयः = सप्तर्षयः
  • पञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी
  • नवानां रात्रीणां समाहारः = नवरात्रम्
  • त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रिलोकी
  • पचानाम् पात्राणां समाहारः = पञ्चपात्रम्
  • शतानाम् अब्दानां समाहारः = शताब्दी

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3. द्वन्द्व समास

जिस समास में दो या दो से अधिक शब्दों के मध्य ‘च’ (और) शब्द का लोप हो जाए वह समास द्वन्द्व समास कहलाता है।

जैसे-

  • त्रयाणाम् पथाम् समाहारः – त्रिपथम्
  • रामः च लक्ष्मणः च – रामलक्ष्मणौ
  • हेमन्तः च शिशिरः च वसन्तः च – हेमन्तशिशिरवसन्ताः
  • सीता च रामः च – सीतारामौ
  • उमा च शंकरः च – उमाशंकरौ
  • पत्रं च पुष्पां च फलं च – पत्र पुष्प फलानि
  • हरि च हरः च – हरिहरौ
  • धर्मः च अर्थः च – धर्मार्थों
  • गुरुः च शिष्यः च – गुरुशिष्यौ
  • माता च पिता च – मातापितरौ
  • धर्मः च अर्थः च कामः च मोक्षः च – धर्मार्थकाममोक्षाः
  • धनं च मानं च – धनमानौ
  • पार्वती च परमेश्वरः च – पार्वतीपरमेश्वरी

4. कर्मधारय समास

इस समास में प्रथमपद विशेषण होता है तथा द्वितीय पद विशेष्य होता है। अथवा प्रथम पद उपमान होता है तथा द्वितीय पद उपमेय होता है।

जैसे-

  • नीलम् चतत् उत्पलम् – नीलोपतलम्
  • नीलम् च तत् कमलम् – नीलकमलम्
  • कृष्णः च असौ सर्पः – कृष्णसर्पः
  • महान् च असौ पुरुषः – महापुरुषः
  • महान् च असौ आत्मा – महात्मा
  • महान् च असौ जनः – महाजनक
  • उत्तमः च असौ जनः – उत्तमजनः
  • राजा च असौ ऋषिः – राजर्षिः
  • घन इव श्यामः – घनश्यामः
  • चरणं कमलम् इव – चरणकमलम्
  • चनद्र इव मुखम् – चन्द्रमुखम्
  • नरः सिंहः इव – नृसिंहः
  • नरः शार्दूलः इव – नरशार्दूलः

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5. बहुव्रीहि समास

बहुव्रीहि समास उन दो या दो से अधिक शब्दों का होता है जो मिलकर किसी अन्य पद का विशेषण बन जाते हैं।

जैसे-

  • पीतम् अम्बरम् यस्य सः – पीताम्बरः
  • सागरः मेखला यस्याः सा – सागरमेखला
  • त्यक्तं सर्वस्यं येन सः – त्यक्तसर्वस्यः
  • चक्रं पाणौ यस्य सः – चक्रपाणिः
  • दश आननानि यस्य सः – दशाननः
  • चन्द्रः शेखरेयस्य सः – चन्द्रशेखरः
  • जितानि इन्द्रियाणि येन सः – जितेन्द्रियः
  • कण्ठे कालः यस्य सः – कण्ठकालः
  • चत्वारि मुखानि यस्य सः – चतुर्मुखः
  • श्वेतं वस्त्रं यस्य सः – श्वेतवस्त्रः
  • त्रीणि नयनानि यस्य सः – त्रिनयनः
  • चत्वारि आननानि यस्य सः – चतुराननः
  • सपरिवार – परिवारेण सहितः यः सः
  • चन्द्रः मौलौ यस्य सः = चन्द्रमौलिः
  • प्राप्तम् उदकं यं सः = प्राप्तोदकः
  • दत्तं भोजनं यस्मै सः – दत्त भोजनः

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6. नञ् तत्पुरुष समास

नञ् अर्थात् न (जिसका अर्थ है नहीं) का पदों के साथ समास होता है। इस समास को नत्र तत्पुरुष कहते हैं। यदि न के आगे स्वरादि शब्द हो तो न के स्थान पर अनु हो जाता है।

  • न ब्राह्मणः, अब्राह्मणः
  • न सत्, असत्।
  • न चतुरः, अचुतरः।
  • न उचितम्, अनुचितम्।
  • न अर्थः, अनर्थः।
  • न एक्यम्, अनैक्यमम्।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय

जिस अक्षर या अक्षर समूह को शब्द के अंत में जोड़ते हैं, उसे प्रत्यय कहते हैं। जिन प्रत्ययों को धातुओं में जोड़कर उनसे विशेषण अथवा अव्यय बनाए जाते हैं, उन्हें कृत-प्रत्यय कहते हैं, तथा इस प्रकार कृत्-प्रत्ययों से बनने वाले विशेषण या अव्यय कृदन्त कहलाते हैं। कृदन्तों के द्वारा अपूर्ण वर्तमान काल, पूर्वकालिक क्रिया, कर्म वाच्य (Passive Voice) आदि प्रकार के वाक्य बनाए जाते हैं।

कृदन्त के प्रमुख प्रकार निम्न हैं-

  • पूर्वकालिक कृन्दत
  • वर्तमानकालिक कृदन्त
  • भूतकालिक कृदन्त
  • हेतुवाचक कृदन्त
  • विधिवाचक कृदन्त

पूर्वकालिक कृदन्त

जब काई क्रिया पहले हो चुकी हो और उसके बाद दूसरी क्रिया हो, तब पहिले होने वाली क्रिया को पूर्वाकालिक क्रिया कहते हैं। पूर्वकालिक क्रिया को बतलाने के लिए पूर्वकालिक कृदन्त का प्रयोग करते हैं। इसका प्रयोग अव्यय की तरह होता है। अतः इसके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता है। क्त्वा और ल्यप् पूर्वकालिक कृदन्त के उदाहरण है। ये ‘करके’ के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

अनबंध-‘अनुबंध’ उन वर्गों को कहते हैं, जो ‘प्रत्यय’ में उच्चारण आदि के लिए लगे रहते हैं, पर बाद में लुप्त हो जाया करते हैं। अनुबंध को ‘इत’ या ‘अलग हो जानेवाला’ भी कहते हैं। अतः ‘इत्’ वर्गों को लोप हो जाता है।

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जैसे-

  • ज्ञान + क्तवा ज्ञात्वा

इसमें ‘क’ अनुबंध है, इसलिए जुड़ते समय इसका लोप हो गया। क्त्वा प्रत्यय-‘क्त्वा’ प्रत्यय जोड़ते समय धातु में केवल ‘त्वा’ जुड़ता है।

जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-1

त्वा जोड़ते समय कुछ धातुओं में ‘इकार’ (इ या ई की मात्रा) भी जुड़ता है।
जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-2

ल्यप् प्रत्यय-यदि धातु के पूर्व उपसर्ग जुड़ा हो, तो धातु में ‘क्त्वा’ के बदले ल्यप् प्रत्यय जोड़ा जाता है। धातु में जोड़ते समय केवल ‘य’ जुड़ता है।
जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-3
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-4

यदि धातु के पूर्व उपसर्ग जुड़ा हो और यदि ह्रस्व स्वरांत धातु है, तो धातु में ल्यप् प्रत्यय जोड़ते समय केवल ‘त्य’ जुड़ता है।

जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-5

हेतुवाचक कृदन्त

‘के लिए’ या ‘ने को’ के अर्थ में ‘तुमुन्’ प्रत्यय जोड़ते हैं। ‘तुमुन्’ जोड़ते समय प्रायः ‘तुम’ ही धातुओं में जुड़ता है। ये शब्द अव्यय होते हैं। इनके अंत में ‘म्’ रहता है।

जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-6

‘तुमुन्’ प्रत्यय को ऐसे शब्दों के पूर्व भी जोड़ते हैं, जिनका अर्थ ‘चाहना’ या ‘सकना’ होता है।

जैसे-

  • सः खेलितुं इच्छति। = वह खेलना चाहता है।
  • सः खेलितुं शक्नोति। = वह खेल सकता है।

विधिवाचक कृदन्त

‘चाहिए’ अथवा ‘योग्य’ के अर्थ को प्रकट करने के लिए धातु में अनीयर, या तव्यत् या यत् प्रत्यय लगाकर विधिवाचक कृदन्त बनाते हैं। यह विशेषण होता है। अतः इसका लिंग, वचन और कारक विशेष के अनुसार रहता है। पुल्लिंग में इसकी कारक रचना देव के समान, स्त्रीलिंग में नदी के समान तथा नपुंसकलिंग में फलम् के समान होती है।

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जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-7

भूतकालिक कृदन्त

क्त और क्त्वतु प्रत्यय भूतकालिक कृदन्त हैं।

‘क्त’ प्रत्यय-धातुओं के साथ कर्तवाच्य (Active Voice) में भूतकालिक कृदन्त का प्रयोग भूतकाल की क्रिया के स्थान किया जा सकता है। इसका लिंग, कारक और वचन कर्ता के समान होता है। धातु में ‘क्त’ प्रत्यय जोड़ते समय प्रायः केवल ‘त’ जुड़ता है।

जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-8

‘क्त’ प्रत्यय से युक्त शब्द के रूप पुल्लिंग में ‘देव’ शब्द के समान, स्त्रीलिंग में ‘माला’ शब्द के समान और नपुंसकलिंग में ‘जल’ शब्द के समान होते हैं। इनका वाक्यों में प्रयोग निम्नानुसार होता है

रामः गतः। = राम गया।
सीता गता। = सीमा गई।
बालकौ गतौ। = दो बालक गये।
बालिकाः गताः। = लड़कियाँ गईं।

यहाँ गतः, गता, गतौ, गताः शब्द विशेषण हैं। इसीलिए इनके लिंग, वचन नहीं हैं, जो वाक्यों में कर्ता के हैं। संस्कृत में भूतकाल के ये वाक्य बिना क्रिया शब्दों के ही पूरे हो जाते हैं।

‘क्तवतु’ प्रत्यय-धातु में ‘क्तवतु’ प्रत्यय जोड़ते समय प्रातः केवल ‘तवत्’ जुड़ता है। कर्तवाच्य (Active Voice) में इसका प्रयोग होता है। इसका लिंग, वचन और कारक कर्ता के अनुसार होता है।

जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-9

‘क्तवतु’ प्रत्यय से युक्त शब्द के रूप पुल्लिंग में ‘भगवत्’ शब्द के समान, स्त्रीलिंग में ‘नदी’ शब्द की भाँति और नपुंसकलिंग में ‘जगत्’ की भाँति होते हैं।

इनका वाक्यों में प्रयोग निम्नानुसार होता है-

  • सुरेशः ग्रामात् आगतवान्। = सुरेश गाँव से आया।
  • मारिः मूषक हतवान्। = बिल्ले ने चूहे को मार डाला।

वर्तमानकालिक कृदन्त

‘ता हुभा, ते हुए’ आदि अर्थ के लिए धातु में शतृ या शानच् प्रत्यय लगाए जाते हैं।

शतृ प्रत्यय-शतृ प्रत्यय का परस्मैपदी धातुओं में प्रयोग होता है। धातु के साथ जुड़ते समय केवल ‘अत्’ जुड़ता है। इनके रूप अत् अंत वाले शब्दों के समान चलते हैं।

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जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-10

शानच् प्रत्यय- शानच् प्रत्यय आत्मनेदी धातुओं में जोड़े जाते हैं। धातु के साथ जुड़ते समय शानच् का केवल ‘आन्’ या ‘मान’ बचता है।

जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-11

शतृ के समान यह भी विशेषण होता है। अतः इसका लिंग, वचन और कारक विशेष के अनुसार रहता है। पुल्लिंग में इसकी कारक रचना देव के समान, स्त्रीलिंग में लता के समान तथा नपुंसकलिंग में फल के समान होती है।

क्तिन् प्रत्यय-इससे भाववाचक संज्ञा पद बनाए जाते हैं। ये पद स्त्रीलिंगी होते हैं। धातु के साथ जुड़ते समय क्तिन् का केवल ‘ति’ बचता है।

जैसे-
MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय img-12

तद्वित प्रत्यय

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और अव्यय-पदों में जिन प्रत्ययों के योग से नवीन शब्द बनाए जाते हैं, उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं। प्रत्यय के साथ कोष्टक में दिए गए शब्द ही प्रायः शब्दों के साथ जुड़ते हैं।

जैसे-
1. अण् (कारः) प्रत्यय-कुंभ + कारः = कुंभकारः
(इसी प्रकार भाष्यकारः ग्रन्थकारः)
2. तत् (ता) प्रत्यय-भाव के अर्थ में
सुन्दर + तल् = सुन्दरता – गुरु + तल् = गुरुता
3. तरप् (तर) प्रत्यय-जब दो में से एक को गुण में दूसरे से अधिक या कम बतलाना हो, तो ‘तरप्’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। यह विशेष की उत्तरावस्था है। इसमें धातु में जोड़ते समय केवल ‘तर’ जुड़ता है।

जैसे-
अल्प + तरप् = अल्पतरः (से थोड़ा)
लघु + तरप् = लघुतरः (से छोटा)
स्थूल + तरप् = स्थूलतरः (से मोटा)
कृश + तरप् = कृशतरः (से दुबला)
दूर + तरप् = दूरतरः (से दूर)

4. तमप् (तम) प्रत्यय-जब अनेक में से एक के गुण को सबसे अधिक या कम बतलाना हो, तो ‘तमप्’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। यह विशेषण की उत्तमावस्था है। इसमें धातु में जोड़ते समय केवल ‘तुम’ जुड़ता है।

जैसे-
अल्प + तमप् = अल्पतमः (सबसे थोड़ा)
लघु + तमप् = लघुतमः (सबसे छोटा)
स्थूल + तमप = स्थूलतमः (सबसे मोटा)
कृश + तमप् = कृशतमः (सबसे दुबला)
दूर + तमप् = दूरतमः (सबसे दूर)

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5. मतुप् (मत्, वत्) प्रत्यय-वह इसमें है या वह इसका है-इस अर्थ में मतुप का प्रयोग होता है। मतुप् के पहले ‘अ’ स्वर रहने पर ‘म’ का ‘व’ हो जाता है। इसमें धातु में जोड़ते समय केवल ‘मान्’ जुड़ता है।

जैसे-
अंशु + मतुप् = अंशुमान् (किरणों वाला)
बुद्धि + मतुप् = बुद्धिमान् (बुद्धि वाला)
बल + मतुप् = बलवान् (बल वाला)
गुण + मतुप् = गुणवान् (गुण वाला)

6. इनि (इन) प्रत्यय-वह इसमें है या वह इसका है-इस अर्थ में इनि का प्रयोग नाम हेतु होता है। इसमें धातु में जोड़ते समय ‘ई’ जुड़ता है।

जैसे-
बल + इनि = बली (बलवान)
गुण + इनि = गुणी (गुणवान)

स्त्री प्रत्यय
टाप् (आ) और ङीप् (ई), इका, ई ङीष् (ई), डीन् (ई) प्रत्यय लगाकर रत्रीलिंग शब्द बनाए जाते हैं।
1. अकारान्त पुल्लिंग शब्दों में टाप् (आ) प्रत्यय लगाकर
पंडित + टाप् (आ) = पंडिता
अज + टाप् (आ) = अजा

2. पुल्लिंग शब्दों के अंत में अंक हो, तो इका हो जाता है।
जैसे-
बालक = बालिका, गायक = गायिका

3. ऋकारान्त पुल्लिंग शब्दों में ङीप् (ई) प्रत्यय लगाकर
अभिनेतृ + ङीप् (ई) = अभिनेत्री
कर्तृ + ङीप् (ई) = की

4. व्यंजनांत पुल्लिंग शब्दों के अंत में ङीप् (ई) प्रत्यय लगाकर
तपस्विन् = तपस्विनी,
श्रीमत् = श्रीमती
स्वामिन् = स्वामिनी

5. उकारांत गुणवाचक पुल्लिंक शब्दों और षित् आदि वाले शब्दों के अंत में ङीप् (ई) प्रत्यय लगाकर
नर्तकः = नर्तकी,
रजकः = रजकी

6. नु, नर आदि पुल्लिंग शब्दों के अंत में छीन् (ई) प्रत्यय लगाकर
नृ (ना) + ङीन् = नारी,
नर (नरः) + ङीन् = नारी
ब्राह्मण + ङीन् = ब्राह्मणी

अभ्यास

1. निम्नलिखित में कृत प्रत्यय पहचानिए-
गत्वा, कृत्वा, दृष्टवा, पठितम्, पुष्टवा, कोपितुम्, नत्वा, नेतुम्, याचितुम्।
2. निम्नलिखित में धातु और प्रत्यय अलग-अलग कीजिए-
पठितुम्, करणीयम्, दृष्टवा, पठित्वा, त्यक्तवा, जितुम्, विस्मृत्य, उपकृत्य।
3. निम्नलिखित उपसर्गयुक्त धातुओं में ल्यप् प्रत्यय जोड़िए-

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  • प्र + पा,
  • वि + जि,
  • प्र + नृत्,
  • सम् + भाष,
  • प्र + भाष,
  • प्र + नश्,
  • प्र + स्था,
  • प्र + नम्,
  • वि + स्मृ,
  • सम् + कृत,
  • सम् + भू,
  • प्र + हस्,
  • सम् + भ्रम्,
  • वि + हृ,
  • वि + लिख,

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 21 सूक्तयः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 21 सूक्तयः (स्फुट)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 21 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) सत्य क्षमाभ्यां कस्य सिद्भिः? (सत्य के क्षमाभ्यास से किसकी सिद्धि होती है?)
उत्तर:
सकलार्थः। (सभी प्रकार की)

(ख) मे मनः कीदृशः अस्तु? (मेरः मन किस तरह का हो?)
उत्तर:
शिव संकल्पमस्तु। (शिव संकल्प वाला हो)।।

(ग) कर्मसु कौशलम् किम्? (कर्म में कुशलता किससे आती है?)
उत्तर:
योगः। (योग से)

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(घ) प्रमाद कस्मात् न कर्त्तव्यः? (किसमें प्रमाद नहीं करना चाहिए?)
उत्तर:
स्वाध्याय। (स्वाध्याय में)

(ङ) कः रक्षितः रक्षति? (किसकी रक्षा ही रक्षा है?)
उत्तर:
धर्मा। (धर्म की)

प्रश्न 2.
एक वाक्येन उत्तर लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) सर्वारम्भः कः? (सबसे पहले क्या आरम्र होता है?)
उत्तर:
सर्वारम्भा मन्त्रमूलाः। (सबसे पहले मूल मंत्र आरंभ होता है।)

(ख) नरः कथं सुखी भवति? (व्यक्ति सुखी कैसे होता है?)
उत्तर:
नरः आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्। (जो व्यक्ति भोजन और शिष्टाचार में लज्जा को त्यागने वाला है, वही सुखी रहता है)

(ग) सकलं कदा नष्टं भवति? (सम्पूर्ण कब नष्ट हो जाता है?)
उत्तर:
यदि आचरणं मलिनं भ्रष्टम् तदा सकलं नष्टं भवति। (यदि आचरण सन्तोषप्रद नहीं है तो सम्पूर्ण नष्ट हो जाता है।)

प्रश्न 3.
उचितमेलनं कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 21 सूक्तय img-1

प्रश्न 4.
रेखांवित शब्दार आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) धर्मो रक्षितः रक्षति
प्रश्न : धर्मों कः रक्षति?

(ख) भ्रष्टाचारण सर्वं नष्टंपति।
प्रश्न : केन आचरेण सर्वं नष्टं भवति?

(ग) द्यिा मुक्तिप्रदा अस्ति।
प्रश्न : विद्या का अस्ति?

प्रश्न 5.
रक्तस्थानानि पूरयत
(श) सा विद्या या विमुक्तये।
(ष) स्वाध्याय न प्रमदितव्यम्।
(स) आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।।
(ह) सत्यश्रमाभ्याम् सकलार्थ सिद्धिः।

प्रश्न 6.
सन्धि विच्छेदं कुरुत-
तन्न – तत्+न।
धर्मोरक्षति – धर्मः+रक्षति।
स्वाध्यायान्मा – स्वाध्याय+अयान्मा।

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प्रश्न 7.
कोष्ठकात् शब्द चित्वा सूक्तिं रचयत
धर्मो, योगः, यत्र, सकलम्
यथा-
धर्मो – धर्मो रक्षति रक्षितः।
योगः – योगः कर्मसु कौशलम्।
यत्र – यत्र नारयस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता।
सकलम् – सत्यश्रमाभ्याम् सकलार्थ सिद्धिः।

प्रश्न 8.
सूक्त्या पूर्ति करोतु-(सूक्ति द्वारा)
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 21 सूक्तय img-2

प्रश्न 9.
संस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत
यत्र, तत्र, हि, च, या
यत्र – यत्र धूम्रः तत्र अग्नि।
तत्र – तत्र खगाः सन्ति।
हि – मानो हि महताम धनम।
च – अन्नं, जलं च सुभाषितम् पृथ्वियां श्रेष्ठः रत्नाः सन्ति।
या – सा विद्या या विमुक्तये।

प्रश्न 10.
समानार्थक शब्दं लिखत
लज्जा – व्रीड़ा
ल कष्टं – दुःखं
स्वाध्याय – अध्ययनम्।

प्रश्न 11.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
(क) योगस्याशयः स्पष्टं करोतु?
उत्तर:
कर्मस्य कौशलम्।।

(ख) कुत्र कुत्र प्रमादः न कर्त्तव्यम्?
उत्तर:
देव पितृकार्याभ्यां।

(ग) धर्मः कथं रक्षति?
उत्तर:
सर्व प्रकारेण, धर्म क्षेत्रे, कर्म क्षेत्रे धर्मः रक्षति।

(घ) कीदृशी विद्या मुक्तिं ददाति?
उत्तर:
तपः शालिनी विद्या मुक्तिं ददाति।

(ङ) भ्रष्टाचारेण किं किं भवति?
उत्तर:
भ्रष्टाचारेण सर्वं नष्टं भवति।

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सूक्तयः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

सुंदर उक्ति अर्थात् कथन ही सूक्ति कहलाता है। अनुभव पूर्ण हितकारक वचन ही सूक्ति कहलाता है। सूक्ति मानव स्वभाव को शोध कर सन्मार्ग पर अग्रसर करती है और श्रेष्ठ आचार-व्यवहार का उपदेश देती है। अतः शिक्षण में भी सूक्तियों का विशेष महत्त्व है। प्रस्तुत पाठ में विभिन्न ग्रन्थों से सूक्तियों का संकलन कर यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

शब्दार्थ :
सत्यश्रमाभ्याम्-सत्य और श्रम द्वारा-through truth and labour; विमुक्तये-मुक्ति के लिए-for finished for the freedom; प्रमदितव्यम्-प्रमाद करना चाहिए-intoxication self; रमन्ते-निवास करते हैं-lives; सर्वारम्भाः-सभी कार्यों का आरम्भ-start of all work; अन्तःकरणम्-मन बुद्धि आदि-mind, wisdom; भव-होओ (हे)-happen; देवपितृकार्याभ्यां-देव और पितृ कार्यों में-God and sons work; प्रमदः-आलस्य-Ideal;,laziness; त्यक्त लज्जः-जिसने लज्जा को त्याग दिया हो-wicked; वस्तुषु-वस्तुओं में-In things;सुखी भवेत्-सुखी होता है-Happy;शक्यं-शक्ति-power.

सूक्तयः पाठ का हिन्दी अर्थ

1. मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।
मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।

2. सत्यश्रमाभ्याम् सकलार्थः सिद्धिः।
सत्य एवं परिश्रम से सकलार्थ (सभी कार्यों की) सिद्धि होर्तः है।

3. सा विद्या या विमुक्तये।
विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे।

4. ये.गः कर्मसु कौशलम्।
योग से कर्म करने की कुशलता आती है।

5. स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
स्वाध्याय में प्रमाद न करें।

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6. देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
देव और पितृकार्य में भी आलस्य न करें।

7. धर्मो रक्षति रक्षितः।
धर्म की रक्षा से ही स्व रक्षा होती है।

8. मन्त्रमूलाः सर्वारम्भाः।
सभी कार्यों का मूल मंत्र प्रारंभ करना है।

9. आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।
भोजन और शिष्टाचार में लज्जा का त्याग करने वाला ही सुखी रहता है।

10. सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः।
संदेह होने पर अंतःकरण की वृत्ति ही प्रमाण होती है।

11. सकलं कष्टं निखिलं नष्टं यदि आचरणं मलिनं भ्रष्टम्।
यदि आचरण दूषित हो तो वह समस्त कष्टों को देने वाला है एवं सम्पूर्ण को नष्ट करके वाला होता है।

12. उपायेन हि यच्छक्यं तन्न शक्यं पराक्रमः।
उपाय से ही यथा शक्ति पराक्रम प्राप्त होता है।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 20 वेधशाला (पत्रम्)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 20 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) उज्जयिनी कस्याः विद्यायाः प्रमुखं केन्द्रमस्ति? (उज्जैन किस विद्या का प्रमुख केन्द्र था?)
उत्तर:
ज्योतिषादयः। (ज्योतिष विद्या का)।

(ख) वेधशाला कस्याः नद्याः तटे स्थिता अस्ति? (यंत्रशाला किस नदी के तट के किनारे स्थित है?)
उत्तर:
क्षिप्रा। (क्षिप्रा।)

(ग) उज्जयिनीतः का रेखा निर्गता? (उज्जैन से होकर कौन-सी रेखा गुजरती है?)
उत्तर:
भूमध्य रेखा। (भूमध्य रेखा)।

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(घ) कस्य प्रयत्नेन वेधशालायाः जीर्णोद्धारो जातः? (किसके प्रयत्न से यंत्रशाला का जीर्णोद्धार हुआ?)
उत्तर:
पं. सूर्यनारायण व्यासस्य। (पं. सूर्यनारायण व्यास के)

(ङ) वेधशालायां कास्य विज्ञानस्य बोधं भवति? (यंत्रशाला से कौन-से विज्ञान का बोध होता है?)
उत्तर:
ज्योतिष। (ज्योतिष का)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) केन यन्त्रेण दिगंशः ज्ञायते? (किस यंत्र के द्वारा दिशाओं की गणना की जाती है?)
उत्तर:
दिगंशयन्त्रेण दिगंशः ज्ञायते। (दिशासूचक यंत्र के द्वारा दिशाओं की गणना की जाती है।)

(ख) वेधशालानिर्माणं कदा केन च कारितम्? (यंत्रशाला का निर्माण कब और किसके द्वारा किया गया?)
उत्तर:
वेधशालानिर्माणं अष्टादशशताब्दयां राजा जयसिंहेन च कारितम्। (वेधशाला का निर्माण 18वीं सताब्दी में राजा जयसिंह के द्वारा किया गया।)

(ग) सम्राट् यन्त्रेण कः लभ्यते? (सम्राट यंत्र से क्या जानकारी मिलती है?)
उत्तर:
सम्राट्यन्त्रेण सूर्योदयात् सूर्यास्तं यावत् स्पष्ट समयो लभ्यते। (सम्राट यंत्र के द्वारा सूर्योदय और सूर्यास्त के स्पष्ट समय की जानकारी मिलती है।)

(घ) नाडिवलययन्त्रेण कः ज्ञायते? (नाडिवलय यंत्र से क्या ज्ञान प्राप्त होता है?)
उत्तर:
नाडिवलंययन्त्रेण ग्रहनक्षत्राणां दक्षिणायन विज्ञातं। (नाडिवलय यंत्र के द्वारा ग्रह-नक्षत्रों का तथा दिशाओं का ज्ञान होता है।)

(ङ) पलभायन्त्रेण कस्य ज्ञानं भवति? (पलभा यंत्र द्वारा किसका ज्ञान होता है?)
उत्तर:
पलभायंत्रेण छायायामपि समयस्य ज्ञानं भवति। (पलभा यंत्र के द्वारा छाया से भी समय का ज्ञान होता है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) उज्जयिन्यां वेधशाला कुत्र स्थितास्ति? (उज्जैन की यंत्रशाला कहाँ पर स्थित है?)
उत्तर:
एषा वेधशाला उज्जयिन्याः दक्षिणभागे क्षिप्रायाः दक्षिण तटे स्थितास्ति। (यह वेधशाला उज्जैन के दक्षिण में क्षिप्रा नदी के दक्षिण तट में स्थित है।)

(ख) जयसिंहेन किमर्थं वेधशालानिर्माणं कारितम्? (जयसिंह ने किसलिए यंत्रशाला का निर्माण कराया?)
उत्तर:
जयसिंहेन ज्योतिषानुरागवशात् वेधशाला निर्माणं कारितम्। (जयसिंह ने ज्योतिष के वशीभूत होकर यंत्रशाला का निर्माण करवाया।)

(ग) उज्जयिन्यां कानि-कानि स्थलानि दर्शनीयानि सन्ति? (उज्जैन में कौन-कौन से स्थान देखने योग्य हैं?)
उत्तर:
उज्जयिन्यां महाकालेश्वर मन्दिरम् महर्षेः सान्दीपनेः आश्रमम्, गढ़कालिका मन्दिरम् आदयः स्थलानिदर्शनीयानि सन्ति।
(उज्जैन में महाकालेश्वर का मन्दिर, महर्षि सांदिपनि का आश्रम गढ़कालिका मन्दिर आदि स्थान देखने योग्य हैं।)

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(घ) दिगंशयन्त्रेण दक्षिणोत्तरभित्तियन्त्रेण च कस्य बोधः भवति? (दिक्यंत्र और दक्षिणोत्तर दीवाल यंत्र के द्वारा किसका ज्ञान होता है?)
उत्तर:
दिगंशयन्त्रेण दक्षिणोत्तर भित्तियन्त्रेण च नक्षत्राणाञ्चापि दिगंशोच ग्रहनक्षत्राणां मध्याह्नवृत्ता गमनसमये नतोन्नतांशयोः बोधः भवति। (दिक यंत्र और दक्षिणोत्तर दीवाल यंत्र के द्वारा नक्षत्रों के दिशाओं का, ग्रहों का तथा समयादि का ज्ञान होता है।)

(ङ) उज्जयिन्याः प्राचीननामानि लिखित्वा प्राचीनवैभवमपि वर्णयत? (उज्जैन का प्राचीन नाम लिखकर प्राचीनकालीन वैभव को भी वर्णित करें?)
उत्तर:
उज्जयिन्याः प्राचीननामानि अवन्तिका आसीत् च सर्वत्र पुरातात्त्विकं वैभवं, ज्योतिष-गणित आदयः आसीत्। (उज्जैन का प्राचीन नाम अवन्तिका था जहाँ पुरातात्त्विक वैभव के साथ-साथ ज्योतिष एवं गणित का अध्ययन केन्द्र था।)

प्रश्न 4.
रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) राजा जयसिंहेन वेधशालानिर्माणं कारितम्।
(ख) आङ्ग्लभाषायां वेधशालां अब्जर्वेटरी इति वदन्ति।
(ग) एषा अवन्तिका नाम्नापि शास्त्रेषु वर्णिता अस्ति।
(घ) भूमध्य रेखा इतः एव निर्गता।
(ङ) एतद् ज्योतिष ज्ञानं विज्ञानस्य उत्तमम् उदाहरणम् अस्ति।

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
उदाहरणम् –
वेधशाला क्षिप्रायाः उत्तरतटे स्थिता अस्ति। – न
उज्जयिनी ज्योतिषविद्याया प्रमुख केन्द्रमस्ति। – आम्
(क) वेधशालायाः निर्माणम् अष्टादशशताब्याम् अभवत्।
(ख) जयसिंहेन वेधशालायाः जीर्णोद्धारं कारितम्।
(ग) पलभायन्त्रेण रात्रौ समयस्य ज्ञानं भवति।
(घ) उज्जयिनी विशाला इति नाम्नापि शास्त्रेषु वर्णिता।
(ङ) उज्जयिनीतः कर्करेखा निर्गता।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) न
(घ) न
(ङ) न

प्रश्न 6.
सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
(क) पुरीयम् – पुर+इयम् = स्वरसन्धिः।
(ख) सर्वेऽपि – सर्व+अपि = पूर्व रूप स्वर सन्धिः।
(ग) कुशलताञ्च – कुशलता+च = व्यंजन संन्धिः।
(घ) दृष्टव्येति – दृष्टव्य+इति = स्वर सन्धिः।
(ङ) कालेऽपि – काल:+अपि = पूर्व रूप स्वर सन्धिः।

प्रश्न 7.
उदाहरणानुसारं शब्दानां धातुं प्रत्ययं च पृथक कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला img-1

प्रश्न 8.
अव्ययैः वाक्यनिर्माणं कुरुत-
यथा :
जनाः वेधशालां यन्त्रभवनम् अपि वदन्ति।
(क) सर्वत्र – सर्वत्र शिक्षकाः सन्ति।
(ख) सम्यक् – सः सम्यक् पठितुम् भोपाल नगरम् आगच्छत्।
(ग) अधुना – अधुना उज्जैनयाम् वेधशाला पुरातात्त्विक धरोहरः अस्ति।
(घ) यावत् – यावत् सः अगमिष्यसि तावत् अहम् पठिष्यामि।
(ङ) यदा – यदा पं. सूर्यनारायण व्यासेन वेधशाला जीर्णोद्धारं कारितवान्।

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प्रश्न 9.
उदाहरणनुसारं शब्दानां विभक्तिं वचनं च लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला img-2

प्रश्न 10.
यथायोग्यं योजयत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला img-3

वेधशाला पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

पत्रलेखन भाषण कला के समान एक लेखक कला है। लिखिन रूप में कहा गया अंश थोड़े में लिखते हैं। सरल, सुंदर विन्यास में संक्षिप्त किन्तु सम्पूर्ण लेख लेखन के महत्त्व को बताते हैं। व्यक्ति विशेष के अनुसार भूमिका, उपसंहार, पत्रलेखन की विशेषता होती है। प्रस्तुत पाठ में पत्र के माध्यम से उज्जैन की वेधशाला की विशेषता बताई गई है

वेधशाला पाठ का हिन्दी अर्थ

1.

शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयः
शामगढ़नगरम् (मध्यप्रदेशः)

प्रियमित्र! तपन!
नमस्ते
अहमत्र कुशली, भवतः कुशलताञ्च कामये। मम अध्ययनं सम्यक् प्रचलति। मम विद्यालयस्य त्रैमासिकी परीक्षायाः परिणामः आगतः। मम परिणामः उत्तमः।

विगतसप्ताहे विद्यालयस्यैका शैक्षणिकयात्रांप्रवृत्ता। अहम् संस्कृतशिक्षकस्य निर्देशने छात्रैः सह उज्जयिनी गतवान्। उज्जयिनी भारतस्य अत्यंतं प्राचीनतम् इतिहासधर्म-दर्शन-कला-साहित्य-योग-ज्यौतिषादीनां च केन्द्रमासीत्। एषा अवन्तिका, विशाला नाम्नापि शास्त्रेषु वर्णिता अस्ति। अत्र सर्वत्र पुरातात्विकं वैभवं दृष्ट्वा मनसि आनन्दो जायते। भगवतःमहाकालस्य पुरीयं देशे श्रद्धायाः केन्द्रमस्ति। अत्र भव्यं महाकालेश्वरमन्दिरम्, हरसिद्धिमंदिरम्, गोपालमन्दिरम्, महर्षेः सान्दीपनेः आश्रमम्, गढ़कालिकामन्दिरम् कालभैरवमंदिर अन्यानि चापि सिद्धवट-अङ्कपात-मङ्गलनाथ-कालियादाहंभवनमित्यादि दिव्यस्थानानि अस्माभिः अवलोकितानि। किन्तु वेधशालां दृष्ट्वा वयं सर्वेऽपि आश्चर्यचकिताः सजाताः।

शब्दार्थ :
अहमत्र-मैं यहां हूं-I am hear; कामये-काम-disire/wish; अगतः-आया-come; विगतसप्ताहे-पिछले सप्ताह-last weak; प्रवृत्ता-प्रवृत्त-to go ahead; संस्कृत शिक्षकस्य-संस्कृत शिक्षक-Sanskrit teacher; वापि-और भी-and also; अस्माभिः-हमारे-our; सजाताः-हुए-happend; ज्यौति-ज्यौति-astrology.
हिन्दी अर्थ :

शासकीय उच्चतर माध्यमिक
विद्यालय, शामगढ़नगर (म. प्र.)

प्रिय मित्र तपन!
नमस्ते!
मैं यहाँ कुशलपूर्वक हूँ तथा आपकी कुशलता की कामना करता हूँ। मेरा अध्ययन ठीक से चल रहा है। मेरे विद्यालय की त्रैमासिक परीक्षा का परिणाम आ गया है। मेरा परिणाम उत्तम है।

पिछले सप्ताह विद्यालय की ओर से एक शैक्षणिक यात्रा सम्पन्न हुई। मैं भी संस्कृत के आचार्य महोदय व छात्रों के साथ उज्जैन गया। उज्जयिनी भारत के अत्यन्त प्राचीन इतिहास, धर्म, दर्शन, कला, साहित्य योग और ज्योतिष आदि का केन्द्र था। शास्त्रों में इस नगर को अवन्तिका के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ सर्वत्र पुरातात्त्विक सम्पन्नता को देखकर मन में आनन्द की लहरें हिलारें लेने लगती हैं। यहाँ का प्राचीन कालेश्वर मन्दिर, हरसिद्ध मंदिर, गोपाल मंदिर, महर्षि संदीपन आश्रम, गढ़ कालिका मन्दिर, काल भैरव मंदिर आदि अनेक दर्शनीय स्थल हैं। इसके अतिरिक्त अन्य और भी दर्शकीय स्थल है जैसे-सिद्धवट, अंक पात, मंगलनाथ, कालिया दाह भवन आदि । किन्तु वेधशाला को देखकर हम सभी आश्चर्य चकित हो गए।

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2. मित्र! आङ्ग्लभाषायां वेधशालाम् “ऑब्जर्वेटरी” इति वदन्ति । जनाः वेधशालां “यन्त्रभवनम्” अपि वदन्ति । एषा वेधशाला उज्जयिन्याः दक्षिणभागे क्षिप्रायाः दक्षिणतटे उन्नत-भू-भागे स्थिता अस्ति। प्राचीनकालत् एव उज्जयिनी ज्यौतिषविद्यायाः प्रमुखं केन्द्रम् । भूमध्यरेखा इतः एव निर्गता। इदं स्थानं गणितस्यापि आधारस्थलम् अस्ति। अष्टादशशताब्यां राज्ञा जयसिहेन ज्यौतिषानुरागवशात् वेधशालानिर्माणं कारितम् । ग्रहाणां प्रत्यक्षवेधनाय जयसिंहः उज्जयिन्या, काश्या, देहल्या, जयपुरे च वेधशालाना निर्माणं कृतवान्। सः वेधज्यौतिषमधिकृत्य एक ग्रन्थम् अपि रचितवान् इति श्रूयते। तेन अत्र एकम् उपनगरम् अपि निर्मितम् अधुना अपि जयसिंहपुरा इति नाम्ना तद् विख्यातमेव।

इयं वेधशाला जीर्णशीर्णा आसीत् परं 1961 तमे खीष्टाब्देः पं. सूर्यनारायणव्यासस्य प्रयत्नेन वेधशालायाः जीर्णोद्धारो जातः। अत्र विद्यते सम्राट्यन्त्रम् एतेन सूर्योदयात् सूर्यास्तं यावत् स्पष्टसमयो लभ्यते। अत्र स्थितेन दिगंशयन्त्रेण ग्रहाणां नक्षत्राणाञ्चापि दिगशो ज्ञायते। “नाडिवलययन्त्रेण” ग्रहनक्षत्राणां दक्षिणायन विज्ञातं भवति।

शब्दार्थ :
अब्जर्वेटरी-अब्जर्वेटरी-observatary; वदन्ति-कहते हैं-say; एषा-यह-this; निर्गता-जाती है-goes; इदं-यह-this; ज्यौतिषानुरागवशात्-ज्योतिष के अनुराग से-fond of astrology, astronomer; कारितम्-कराया-done; वेधज्योतिष्मधिकृत्य-यंत्र ज्योतिष पर आधारित-instrument lasred on astrology; श्रूयते-सुना जाता है-is listen; रचिवान्-रचा-create; एकम्-एक-one; निर्मितम्-जाता है-goes; अधुना-आज-today; विख्यातमेव-प्रसिद्ध-famous; प्रयत्नेन-प्रयत्न से-for try; जीर्णोद्धार-जीर्णोद्धार-repair; विद्यते-विद्यमान-wish man; यावत-जब तक-till that; लभ्यते-प्राप्त होता है-receives; ग्रहाणां-नक्षत्रों का-planets; ज्ञायते-ज्ञाता होता है-happens; ग्रह नक्षत्राणां-ग्रह नक्षत्रों का-planets.

हिन्दी अर्थ :
मित्र! आंग्ल भाषा में वेध शाला को ‘आब्जर्वेटरी’ कहते हैं। लोग वेधशाला को ‘यंत्र शाला’ भी या ‘यंत्र भवन’ भी कहते हैं। यह ‘यंत्र भवन’ उज्जैन के दक्षिणी भाग में शिप्रा के दक्षिण तट पर स्थित ऊँचे भू-भाग पर स्थापित की गई है। उज्जैन प्राचीन काल से ही ज्योतिष विद्या का केन्द्र रहा है। यहाँ से कर्क रेखा भी गुजरती है इसलिए यह स्थान गणित का भी प्रमुख आधार स्थल रहा है। अठारहवीं शताब्दी में राजा जयसिंह ज्योतिष प्रेम के वशीभूत एक यंत्र भवन का निर्माण कराया गया। ग्रहों के सम्यक् ज्ञान के लिए राजा जयसिंह ने उज्जैन, काशी, दिल्ली और जयपुर नगर में वेधशालाओं का निर्माण करया। ऐसा प्रचलित है कि उन्होंने वेध, ज्योतिष के आधार पर एक उपनगर भी बसाया जो आज भी जयसिंह पुरा के नाम से जाना जाता है।

यह यंत्र भवन जीर्ण हो गया था किन्तु सन् 1961 में पं. सूर्यनारायण व्यास के प्रयत्न से वेधशाला का जीर्णोद्धार का कार्य पूर्ण हुआ। इस वेधशाला में स्थापित यंत्र से सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त वेला तक समय स्पष्ट दिखाई देता है। यहाँ की स्थिति से दिशा सूचक यंत्र द्वारा ग्रह और नक्षत्र आदि की गणना ज्ञात होती है। नाडि वलय यंत्र द्वारा ग्रह-नक्षत्रों के दक्षिणायन होने का विशेष ज्ञान होता है।

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3. “दक्षिणोत्तरभित्तियन्त्रेण” ग्रहनक्षत्राणां मध्याहूनवृत्तागमनसमये नतोन्नतांशयोः परिज्ञानं सञ्ज्ञायते। “पलभायन्त्रेण” छायायामपि समयस्य सम्यक ज्ञानं भवति।

वस्तुतः वेशधालां वीक्ष्य मनसि गौरवमनुभवामि यत् प्राचीनकालेऽपि अस्माकं पूर्वजनां गणितस्य, ग्रहनक्षत्राणाञ्च ज्ञानम् अद्भुतं वैज्ञानिकञ्चासीत्।

इदानीं पत्रं समापयामि। यदा अवसरः लभ्यते तदा एकवारं ज्ञानविज्ञानस्य पुरीयम् उज्जयिनी अवश्यमेव दृष्टव्येति।
शम्।

भवतः कुशलापेक्षी
राजेशः

शब्दार्थ :
मध्याहनवृत्तागमनसमये-दोपहरी के समय-In the time of afternoon; छायायामपि-छाया भी-sadow also; वैज्ञानिकञ्चासीत्-वैज्ञानिक थे-was scientist; इदानीं-इस समय-this time; पुरीयम्-प्राचीन (नगर में)-old, ancient; परिज्ञान-विशेष ज्ञान-special knowledge; ज्ञानविज्ञानस्य-ज्ञान-विज्ञान के-knowledge of science.

हिन्दी अर्थ :
“दक्षिण-उत्तर दीवार के यंत्र के द्वारा ग्रह-नक्षत्रों के दोपहर के आगमन के समय विभिन्न भू-भाग का ज्ञान प्राप्त होता है। पलभ यन्त्र द्वारा छाया से भी सम्यक् ज्ञान प्राप्त होता है।
वस्तुतः वेधशाला को देखकर मैं गौरव की अनुभूति कर रहा हूँ कि प्राचीनकाल में भी हमारे पूर्वजों को गणित और ग्रह-नक्षत्रों का ज्ञान अद्भुत और वैज्ञानिक था।

अब इस समय पत्र समाप्त कर रहा हूँ। जब भी समय मिले, एक बार इस ज्ञान-विज्ञान के नगर उज्जैन को अवश्य देखना।

आपका कुशलापेक्षी
राजेश

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

शब्द  पर्यायवाची शब्दः
आकाशः नभः, गगनम्, व्योयम्, अन्तरिक्षम, अम्बरम्, खम्।
राजा भूपतिः, नृपः, अधिपतिः, नरेशः, नृपतिः।
वायुः अनिलः, समीरः, वातः, पवनः, मारुतः, गन्धवहः।
सूर्यः रविः, दिनकरः, भानुः, दिवाकरः, दिनेशः।
कमलम् पंकजम्, नीरजम्, अम्बुजम्, सरोजम्, सरोरुहम्।
गंगा भागीरथी, मन्दाकिनी, देवनदी, सुरनदी।
पर्वतः गिरीः, अचलः, भूधरः, शैलः, महीध्र, नगः।
अग्निः पावकः, वह्नि, अनलः, हुताशनः।
अमृतम् पीयूषम्, सुधा, सोमः
पृथ्वी भूमिः, अवनिः, मही, धरा, वसुन्धरा, वसुधा, भू।
जलम् वारि, नीरम्, सलिलम्, अम्बु, तोयम्।
समुद्रः वारिधिः, जलधिः, सागरः, नदीशः, सिन्धुः।
पक्षी खगः, विहगः, द्विजः, विहंगम्, पतलिः।
नदी निम्नगा, गिरितनया, सरित्, निर्झरिणी।
नेत्रम् अक्षि, चक्षुः, दृक, लोचनम्, नयनम्।
चन्द्रमा चन्द्रः, इन्दुः, निशाकरः, विधुः, सुधाकरः, मयंकः।
दुग्धम् पयः, द्रुमः, विटपः, महीरुहः।।
गजः मातंगा, करि, वारणः, हस्ती, द्विपः, नागः, कुञ्जरः।
रात्रिः रजनी, निशा, यामिनी, विभावरी।

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