MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 12 कर्तव्यपालनम्

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 12 कर्तव्यपालनम् (संवादः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 12 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) जनाः वञ्चनया किं कर्तुं कामयन्ते? (लोग छल से क्या करना चाहते हैं?)
उत्तर:
स्वार्थ साधनं। (अपना स्वार्थ साधना चाहते हैं।)

(ख) आत्मनः देशस्य वा समुन्नतेः मूलमन्त्र: कः? (अपने देश की उन्नति का मूल मंत्र क्या है?)
उत्तर:
कर्त्तव्यपालनमेव। (कर्त्तव्य का पालन करना है)

(ग) जीवन किम् आवश्यकम्? (जीवन में क्या आवश्यक है?)
उत्तर:
सत्कार्यम्। (अच्छे कार्य करना।)

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(घ) कर्त्तव्यपरायणानां गणना कुत्र भवति? (कर्त्तव्यपालन की गणना कहाँ होती है?)
उत्तर:
श्रेष्ठ पुरुषेषु। (श्रेष्ठ पुरुषों में)

(ङ) यस्य बुद्धिः व्यापन्ना अस्ति सः कर्त्तव्यपालनं करोति न वा? (जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है वह कर्त्तव्य-पालन करता है या नहीं?)
उत्तर:
न करोति। (नहीं करता है।)

प्रश्न 2.
एक वाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) कृषकाः देशस्य उन्नति कथं कुर्वन्ति?(कृषक देश की उन्नति कैसे करता हैं?)
उत्तर:
कृषकाः देशस्य उन्नतिं कृषिकार्येण कुर्वन्ति। (कृषक देश की उन्नति कृषि कार्यों के द्वारा करता है।)

(ख) कर्त्तव्यपालनं किमर्थम् आवश्यकं वर्तते? (कर्त्तव्यपालन क्यों आवश्यक है?)
उत्तर:
कर्त्तव्यपालनं देशस्य समुचित रूपेण उन्नतिम् वर्तते। (कर्तव्यपालन से देश का समुचित रूप से उन्नति होती है।

(ग) यदि जनाः स्वकर्त्तव्यपालनं न कुर्वन्ति तर्हि किं भविष्यति? (यदि लोग अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करेंगे तो क्या होगा?)
उत्तर:
यदि जनाः स्वकर्तव्य पालनं न कुर्वन्ति तर्हि देशस्य समुचित उन्नतिम् न भविष्यति। (यदि लोग अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेंगे तो देश की समुचित उन्नति नहीं होगी।)

(घ) जनाः देशस्य हितसाधनं कथं कुर्वन्ति? (लोग देश का हित किस तरह से करते हैं?)
उत्तर:
जनाः देशस्य हितसाधनं स्वकर्त्तव्यपालन माध्यमेन् कुर्वन्ति। (लोग देश का हित अपने कर्त्तव्य-पालन के माध्यम से करते हैं।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) कर्त्तव्यपालनं किमर्थन् आवश्यकम्? (कर्तव्यपालन क्यों आवश्यक है?)
उत्तर:
कर्त्तव्यपालनं सर्वहिताय आवश्यकम्। (कर्त्तव्यपालन सबके हित के लिए आवश्यक है।)

(ख) ये कर्त्तव्यपालन कुर्वन्ति ते केषां हितसाधनं कुर्वन्ति?(जो कर्त्तव्यपालन करते हैं वे किस तरह हित साधन करते हैं?)
उत्तर:
ये कर्त्तव्यपालनं कुर्वन्ति ते न केवलम् आत्मनः एव प्रत्युत् सम्पूर्णस्यापि देशस्य हितसाधनं कुर्वन्ति। (जो कर्त्तव्यपालन करते हैं वे न केवल अपना अपितु समस्त देश का हित करते हैं।)

(ग) देशस्य उन्नतियोजना केन कथम् अधिकफलवती भवेत्? (देश की योजना की उन्नति कैसे और किसके द्वारा अधिक फलीभूत होती है?)
उत्तर:
देशस्य उन्नतियोजना जनाः कर्त्तव्यपालनं प्रति ध्यानं ददाति तर्हि अधिकफलवती भवेत्। (देश की उन्नति लोगों के द्वारा कर्तव्यपालन के माध्यम से अधिक फलवती होती है।)

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प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत-
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प्रश्न 5.
रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) देशे सर्वे जनाः कर्त्तव्यपालनं कुर्वन्ति।
(ख) जनेषु कर्त्तव्यपालनम् प्रति महती शिथिलता समागता वर्तते।
(ग) जनाः वञ्चनया एव स्वार्थ साधनं कर्तुं कामयन्ते।
(घ) इयम् भूमिः कर्मभूमिः अस्ति।
(ङ) कर्तव्य पालनमेव आत्मनः देशस्य वा समुन्नतेः मूलमन्त्र।

प्रश्न 6.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् ‘आम्’ अशुद्धवाक्यानां समक्षं ‘न’ इति लिखत
उदाहरणं यथ –
जीवने कार्यत् आवश्यकम् अस्ति। – (आम्)
कर्तव्यपालनम् आवश्यकं नास्ति। – (न)
(क) नैकाः जनाः वञ्चनया एव स्वार्थ साधनं कर्तुं कामयन्ते।
(ख) स्वकर्तव्यपालन न करणीयम्।
(ग) कर्त्तव्यपालनमेव देशस्य समुन्नतेः मूलमन्त्रः।
(घ) मनुष्योपरि अनेकविधानां कर्त्तव्यानां पालनस्य महान् भारो वर्त्तते।
(ङ) इयम् भूमिः कर्मभूमिः नास्ति।
उत्तर:
(क) (न)
(ख) (न)
(ग) (आम्)
(घ) (आम्)
(ङ) (न)

प्रश्न 7.
क्रियापदानां धातुं वचनं पुरुषं च लिखत
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प्रश्न 8.
सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
(क) एकोऽपि
उत्तर:
एकः+अपि = पूर्व रूप स्वर सन्धि

(ख) प्रत्येकम्
उत्तर:
प्रति+एक = स्वर सन्धि

(ग) सम्पूर्णस्यापि
उत्तर:
सम्पूर्णस्य+अपि = स्वर सन्धि

(घ) कानिचित्
उत्तर:
कानि+चित् = स्वर सन्धि

प्रश्न 9.
उदाहरणानुसारं शब्दानां विभक्तिं वचनं च लिखत
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प्रश्न 10.
निम्नाङ्कितैः अव्ययैः वाक्यनिर्माणं कुरुत
यथा-सः अपि पठति।
(क) यदि-तर्हि
(ख) यत-तत
(ग) यावत्
(घ) एव
(ङ) कृते
उत्तर:
(क) यदि सः आगच्छति तर्हि अहं अपि गमिष्यामि।
(ख) यतः शान्तिः भवति ततः सुखम् भवति।
(ग) तावत्-यावत् वृष्टिः न भवति तावत् कृषि कार्यं न भवति।
(घ) सः एव गच्छति।
(ङ) मम कृते पुस्तकं ददातु।

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कर्तव्यपालनम् पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

समाज में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य निश्चित होता है। विविध स्थानों में स्थित लोग अपने द्वारा करणीय कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। राजा, प्रजा, अधिकारी, कर्मचारी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री, बंधु-बांधव आदि सभी के समाज की दृष्टि से कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व निश्चित हैं। भारतीय धर्म-ग्रन्थों में कर्तव्य-पालन के उपाय एवं उनका महत्त्व अधिकतर प्रतिपादित है।

कर्तव्यपालनम् पाठ का हिन्दी अर्थ

1. शिक्षक :
जीवने किम् आवश्यकम् अस्ति?

दिव्यांश :
जीवने तु कार्यम् आवश्यकम् अस्ति।

शिक्षक :
मानवाः किमर्थं कार्याणि कुर्वन्ति?

विशाला :
मानवः स्वजीवनयापनार्थं, समाजसेवार्थं, देशसेवार्थं च कार्याणि कुर्वन्ति।

शिक्षक :
आम्। तानि तु तेषां कर्त्तव्यानि सन्ति। अतः ते स्वकर्तव्यपालनं कुर्वन्ति। यस्य मनुष्यस्य यत् कर्त्तव्यं तस्य समुचितरूपेण पालनमेव स्वकर्तव्यपालनं कथ्यते।

मीमांसा :
किं सर्वेषां जनानां कर्त्तव्यभूमिः पृथक्-पृथक् भवन्ति अथवा समानमेव भवन्ति।

शब्दार्थ :
किमर्थ-किस लिए-for what; कुर्वन्ति-करते हैं-do; यापनार्थम्-बिताने के लिए-for spend; तेषां-उनके-Them; यस्य-जिसके-Whose; समुचितरूपेण-समुचित रूप से-Well; कथ्यते-कहा जाता है-says; सर्वेषां-सभी-all; भवन्ति-होते हैं-happens;

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक :
जीवन में क्या आवश्यक है?

दिव्यांश :
जीवन में कार्य आवश्यक है।

शिक्षक :
मनुष्य लोग किस लिए कार्य करते हैं।

विशाला :
लोग अपने जीवन-यापनार्थ, देश की सेवा के लिए समाज की सेवा के लिए कार्य करते हैं।

शिक्षक :
ठीक है। ये सब तो उनके कर्तव्य हैं अतः वे अपना कर्तव्य पालन करते हैं। जिस मनुष्य का जो कार्य है, उसका उचित तरीके से पालन करता है।

मीमांसा :
क्या सभी लोगों के कर्तव्य अलग-अलग होते हैं अथवा सबके समान होते हैं।

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2. शिक्षक-इयम् भूमिः कर्मभूमिः अस्ति कर्तव्यभूमिः अस्तिः। अस्मिन् संसारे यावन्तः जनाः गृहन्ति तेषां सर्वेषामपि पृथक्-पृथक कर्त्तव्यानि भवन्ति। तानि अनेक विधानि भवन्ति। कानिचित् व्यक्तिगतानि, कानिचित पारिवारिकाणि, कानिचित, सामाजिकानि भवन्ति। एवं च प्रत्येक मनुष्यस्योपरि अनेकविधानां कर्त्तव्यानां पालनस्य महान् भारो वर्त्तते। एकोऽपि एवं विधः मनुष्य नास्ति, यस्य किमपि कर्त्तव्यं न स्याद्, यदि तस्य शरीरं बुद्धिर्वा व्यापन्ना नास्ति।

वेदान्त :
कर्त्तव्यपालनं सर्वेषां कृते किमर्थम् आवश्यकम् अस्ति?

शिक्षक :
कर्त्तव्यपालनं जनस्य स्वहिताय देशहिताय सर्वहिताय च परमावश्यकम्। ये स्वकर्तव्यानां समुचित-रूपेण पालनं कुर्वन्ति तेषामेव श्रेष्ठपुरुषेषु गणना भवति। ते : न केवलम् क्षात्मनः एव प्रत्युत् सम्पूर्णस्यापि देशस्य हितसाधनं कुर्वन्ति।

नरेन्द्र :
यदि जनाः स्वकर्तव्यपालनं न कुर्वन्ति तर्हि किं भविष्यति?

शब्दार्थ :
इयम्-इस तरह से-by this type; यावन्त-जब तक-Till that;गृह्णन्ति-ग्रहण करते हैं-Takes; सर्वेषामपि-सभी-all; पृथक-पृथक-अलग-अलग-different-different; कानिचित्-कोई-any; मनुष्योपरि-मनुष्य के ऊपर-on human; कर्त्तव्यनां-कर्तव्यों को-Duties; एकोऽपि-एक भी-one also; नास्ति-नहीं-no; किमपि-कुछ भी-anything also; व्यापन्ना-नष्ट-ruin; किमर्थं-किस लिए-for what; जनस्य-लोगों का-People; देशहिताय-देश का हित-Country profit; सर्वहिताय-सभी का हित-All profit; हितसाधनं-हित साधन-profit source; कुर्वन्ति-करते हैं-Do; धटना-Incident.

हिन्दी अर्थ :
यह घर या भूमि ही कर्तव्य भूमि है, कर्म भूमि है। इस संसार में आने वाले समस्त जन अर्थात् इस संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी के कर्तव्य अलग-अलग होते हैं। उनकी अनेक विधाएँ भी हैं। कुछ कर्तव्य व्यक्तिगत होते हैं कुछ सामाजिक कर्तव्य होते हैं और कुछ पारिवारिक होते हैं। इस तरह प्रत्येक पुरुष पर अनेक विधि के कर्तव्य पालन का महत भार रहता है। एक भी ऐसा मनुष्य नहीं है, जिसका कोई कर्तव्य न हो। यदि उसका शरीर स्वस्थ है तो वह अवश्य ही कर्तव्य पालन करेगा।

देदांत :
कर्तव्य पालन सभी व्यक्तियों के लिए क्यों आवश्यक है?

शिक्षक :
कर्तव्य पालन स्वहित, जनहित व देशहित के लिए अत्यन्त आवश्यक है। जो अपने कर्तव्य का समुचित रूप से पालन करता है उसकी श्रेष्ठ पुरुषों में गिनती होती है। वे केवल अपना ही नहीं बल्कि समस्त देश का हित साधते हैं।

नरेन्द्र :
यदि लोग अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेंगे तो क्या होगा?

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3. शिक्षक-यदि जनाः स्वकर्त्तव्यपालनं न कुर्यु तर्हि समाजस्य कापि व्यवस्था भवितुं न अर्हति। कल्पनां कुरु-यदि अध्यापकाः सम्यक् न अध्यापयेयुः, विद्यार्थिनः परिश्रमेण न पठेयुः, न्यायाधीशाः समुचितरूपेण न्यायं न कुर्युः, शासकाः समीचीनतया शासनकार्य न सम्पादयेयुः, का कराः स्वानि स्वानि कर्माणि सम्यक् न विदध्युः, कृषकाः कृषिकार्य श्रमेण न कुर्युः तर्हि देशस्य कथमपि उन्नतिः भविष्यति न वा? नैव भविष्यति।

स्नेहल :
किम् अस्माकं देशे सर्वे जनाः कर्त्तव्यपालनं कुर्वन्ति?

शिक्षक :
देशस्य कृते महतः दुर्भाग्यस्य अयं विषयः वर्तते यत् साम्प्रतिकेषु जनेषु कर्तव्यपालन प्रति महती शिथिलता समागता वर्तते। नैकाः जनाः श्रमेणः, सत्येन, निष्ठया च कार्यं कर्तुं न वाञ्छन्ति, वञ्चनया एव स्वार्थसाधनं कर्तुं कामयन्ते। अधिकारार्थं सर्वे कलहं कुर्वन्ति परं कर्त्तव्यपालने ध्यान न ददति। देशस्य यावान् अर्थव्ययः समयव्ययः च भवति तावती न कार्यसिद्धिः। यदि जनाः कर्त्तव्यपालनं प्रति ध्यानं ददति तर्हि देशस्य राजकीया अराजकीया वा कापि उन्नतियोजना समुचितरूपेण पूर्णरूपेण फलवती भविष्यत्येव।

कर्त्तव्यपालनमेव अतोऽस्माभिः सङ्कल्पः करणीय यत् स्वकर्तव्यपालनम् अवश्यमेव करणीयम् (आत्मनः देशस्या वा समुन्नतेः मूलमन्त्रः)

शब्दार्थ :
स्वकर्त्तव्यपालनं-अपना कर्तव्य पालन को-to obey the duty; भवितुं-होने के लिए-for becomes; अध्यापयेयु-अध्यापन कराएँ-Do study; समुचितरूपेण-सम्यक रूप से-form of comfortable;समीचीनतया-ठीक प्रकार का-right type;साम्प्रतिकेषु-इस समय में-In this time; समागता-आयी हुई-Come; वाञ्छन्ति-चाहते हैं-Likes; न ददति-नहीं देता-not gives;अराजकीया-अशासकीय, निजी-Private,no government; सङ्कल्प-संकल्प-Promise; करणीय-करना चाहिए-Should do;

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक-यदि लोग स्वकर्तव्य पालन नहीं करेंगे तो उस समाज की कोई भी व्यवस्था सुचारु नहीं हो सकती। कल्पना करो-शिक्षक यदि उचित शिक्षा नहीं देगा, विद्यार्थी परिश्रमपूर्वक नहीं पढ़ेगा, न्यायाधीश समुचित रूप से (सत्यासत्य का विवेचन किए बगैर) न्याय नहीं करेगा, शासक समुचित रूप से शासन कार्य का संपादन नहीं करेगा, कर्मकार अपने-अपने कार्य समुचित विधि से नहीं करेंगे, किसान परिश्रमपूर्वक किसानी न करे, तो उस देश की कैसे उन्नति होगी? कभी नहीं होगी।

स्नेहल :
हमारे देश में क्या सभी लोग कर्तव्य पालन करते हैं?

शिक्षक :
इस देश का सबसे महान दुर्भाग्य यह है कि लोगों में अपने कर्तव्यपालन के प्रति बहुत उदासीनता देखने को मिलती है। अनेक लोग श्रमपूर्वक, सत्यपूर्वक, निष्ठापूर्वक कार्य नहीं करना चाहते वरन अपने स्वार्थ के साधने में लगे हुए हैं। सर्वत्र अधिकारों के लिए लोग लड़ रहे हैं किन्तु अपने कर्तव्य-पालन की ओर ध्यान नहीं देते। देश की अर्थ-व्यवस्था त तक एक समान नहीं होगी जब तक की कार्यों के सिद्धि समुचित तरीके से नहीं होगी। यदि लोग (निष्ठापूर्वक) कर्तव्यपालन की ओर ध्यान दें तो देश की शासकीय एवं अशासकीय (सार्वजनिक) सभी योजनाएँ उन्नति करेंगी, समुचित रूप से पुष्पित फलित होंगी। हम सभी को कर्तव्य पालन का संकल्प करना चाहिए। जिससे अपने-अपने कर्तव्यों का सम्यक् रूप से पालन हो (अपने देश। की उचित रीति से उन्नति ही मूल मंत्र है।)

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 19 उपायैः सर्वं शक्यम्

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 19 उपायैः सर्वं शक्यम् (कथा)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 19 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) हस्ती कुन निपतितः? (हाथी कहाँ गिर गया?)
उत्तर:
पङ्के। (कीचड़ में)

(ख) प्रथमं कं विन्देत्? (पहले किसकी वंदना करनी चाहिए?)
उत्तर:
राजानम्। (राजा की)

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(ग) हस्तेः नाम किमासीत्? (हाथी का क्या नाम था?)
उत्तर:
कर्पूरतिलकः। (कर्पूर तिलक था।)

(घ) राजा विना किं न युक्तम्? (राजा के बिना क्या उपयुक्त नहीं है?)
उत्तर:
अवस्थातुं।अवस्थातुं। (आवास करना।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) वृद्धशृगालेन किं प्रतिज्ञातम्? (बूढ़े सियार ने क्या प्रतिज्ञा की?)
उत्तर:
वृद्ध शृगालेन प्रतिज्ञातम्-यथा बुद्धिप्रभावस्य हस्ति मरणं साधयितव्यम्। (बूढ़े सियार ने प्रतिज्ञा किया कि-मेरी बुद्धि के प्रभाव से हाथी का मरण संभव है।)

(ख) शृगालेन रिहस्य किमुक्तम्? (शृगाल ने हँसकर क्या बोला?)
उत्तर:
शृगालेन विहस्त उक्तम्-देव! मम पुच्छकावलम्बनं कृत्वा उत्तिष्ठ। (शृगाल हँसकर बोला कि-हे देव! मेरी पूँछ पकड़कर के उठो।)

(ग) केन ना आस्थातुं न युक्तम्? (किसके विना निवास करना उपयुक्त नहीं है:)
उत्तर:
राजा विना अवस्थातुं न युक्तम्। (राजा के बिना निवास करना उपयुक्त नहीं है।)

(घ) शृगालैः कः भक्षितः? (शृगालों ने किसका भोजन किया?)
उत्तर:
शृगालैः हस्ती भक्षितः। (शृंगालों ने हाथी का भोजन किया।)

(ङ) कर्पूतिलकः केन लोभेन धावति? (कर्पूरतिलक किरा लोभ से दौड़ता है?)
उत्तर:
कर्पूरलिलकः राज्यं लोभेन धावति। (कर्पूरतिलक राज्य के लोभ से दौड़ता है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) भुवि कीदृशः स्वामी युज्यते? (पृथ्वी में किस तरह (गुण वाले) राजा की स्थापना की जाती है?)
उत्तर:
भुवि अतिशुद्धः, प्रतापवानः, धार्मिकः, नीति कुशलः कुलाभिजना स स्वामी युज्यते। (पृथ्वी में अतिशुद्ध, कुलीन, प्रतापवान, धार्मिक और नीतिकुशल स्वामी की नियुक्ति की जाती है।)

(ख) पङ्केनिमग्नः हस्ती शृगालेन किमुक्तम्? (कीचड़ में गिरा हुआ हाथी सियार से क्या बोला?)
उत्तर:
पङ्के निमग्नः हस्ती शृगालेन उक्तम्-सखे शृगाल! किमधुना विधेयम्? पड़े निपतितोऽहं म्रिये। परावृत्य पश्य। (कीचड़ में गिरा हुआ हाधी सियार से बोला कि-मित्र सियार! अब क्या होगा? मैं कीचड़ में गिर गया हूँ और मरने वाला हूँ। लौटकर देखो।)

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प्रश्न 4.
उचितैः शब्दैः रिस्त स्थानानि पूरयत-
(पशुभिर्मिलित्वा, त्रिये, प्रथम, लोकेऽस्मिन्, यच्छक्य)
(क) पते निपतितोऽहं म्रिये।
(ख) सर्वैः वनवासिभिः पशुभिर्मिलित्वा भवत्सकाशं प्रस्थापितः
(ग) राजन्यसति लोकेऽस्मिन् कुतो भार्या कुतो धनम्।
(घ) उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः।
(ङ) राजानं प्रथमा विन्देत्।

प्रश्न 5.
उचितमेलनं कुरुत-
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प्रश्न 6.
निम्नलिखितशब्दानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
उदारहणं यथा :
शृगालैभक्षितः- शृगालः+भक्षितः। = विसर्गसन्धिः।।
(क) चोक्तम् – च+उक्तं = गुणस्वर संधिः।
(ख) ततस्तेन – ततः+तेन = विसर्गः।
(ग) सर्वैर्वनवासिभिः – सर्वैः+वनवासिभि = विसर्ग सन्धिः।
(घ) तत्रैकेन – तत्र+एकेन = वृद्धिस्वर सन्धिः।
(ङ) ततोऽसौ – ततः+असो = पूर्वरूप सन्धिः
(च) यद्ययम् – यदि +अयम् = यण सन्धिः

प्रश्न 7.
क्रियापदानां धातुं लकारं वचनं पुरुषं च लिखत-
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प्रश्न 8.
अधोलिखितशब्दानां विभक्ति वचनञ्च लिखत-
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प्रश्न 9.
अधोलिखितैः अव्ययैः वाक्यनिर्माणं करुत-
(क) विना – रामेण विना दशरथः न जिवेत्।
(ख) कुतः – भवान् कुतः निवससि!
(ग) इति – अयं वंश नाम्ना गौतम इति ख्यात् आसीत्।
(घ) न – अहं दुग्धं पिवामि चायं न पिवामि।
(ङ) ततः – कर्पूरतिलकोः महापङ्के निमग्नतः।

प्रश्न 10.
अधोलिखितशब्दानां धातुं प्रत्ययञ्च पृथक् कुरुत
(क) भक्षितः -भक्ष् + क्तः।
(ख) कृतः – कृ + क्तः।
(ग) कृत्वा – कृ + क्त्वा।
(घ) प्रणम्य – प्र + नम् + ल्यप्।
(ङ) गत्वा – गम् + क्त्वा।

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उपायैः सर्वं शक्यम् पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

संस्कृत साहित्य में कथा साहित्य का विपुल भंडार है। उसमें पंचतंत्र, कथा सरित् सागर बेताल पंचविंशितिः, विक्रमादित्य कथा; वृहत्कथा मञ्जरी, हितोपदेश इत्यादि प्रसिद्ध कथा ग्रन्थ हैं। उसमें पंचतंत्र की नीति कथाएं पशु-पक्षियों के माध्यम से प्रस्तुत की गई हैं। प्रस्तुत पाठ में कहानी के पात्र हाथी, सियार हैं जो-उपायों के द्वारा सब संभव है-नीति को मनुष्य के लिए सूचित करते हैं।

उपायैः सर्वं शक्यम् पाठ का हिन्दी अर्थ

अस्ति ब्रह्मारण्ये कर्पूरतिलको नाम हस्ती। तमवलोक्य सर्वे शृगालश्चिन्तयन्ति स्म’यद्ययं केनाप्युपायेन म्रियतेतदा अस्माकम् एतद्देहेन मासचतुष्टयस्य भोजनं भविष्यति’। तत्रैकेन वृद्धशृगालेन प्रतिज्ञातम्-‘मया बुद्धिप्रभावादस्य मरणं साधयितव्यम्।’ अनन्तरं स वञ्चकः कर्पूरतिलकसमीपं गत्वा साष्टाङ्गपातं प्रणम्य उवाच-‘देव! दृष्टिप्रसादं कुरु।’ हस्ती ब्रूते-‘कस्त्वम्, कुतः समायातः?’ सोऽवदत्-‘जम्बुकोऽहम्। सर्वैर्वनवासिभिः पशुभिर्मिलित्वा भवत्सकाशं प्रस्थापितः।’ यद्विना राज्ञा अवस्थातुं न युक्तम्, तदात्राटवीराज्येऽभिषेक्तुं भवान् सर्वस्वामिगुणोपेतो निरूपितः।

यतः :
यः कुलाभिजनाचारैरतिशुद्धः प्रतापवान्।
धार्मिको नीतिकुशलः स स्वामी युज्यते भुवि॥

अपरञ्च पश्य :
राजानं प्रथमं विन्देततो भायां ततो धनम्।
राजन्यसति लोकऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनम्॥

शब्दार्थ :
अस्ति-है-is; कर्पूरतिलको-कर्पूरतिलक नाम का -Namely Karpoor Tilak; तमवलोक्य-उसे देखकर-seeing him; सद्ययं-आज मैं-today I; तत्रकेन-इनमें से एक-one among them; साधयितव्यम्-साधना चाहिए-should meditate; वञ्चकः-धूर्त/कपटी-wicked; सोऽवदत्-वह बोला-he spoke; दृष्टिप्रसादं-दृष्टि की कृपा-blessing; नीतिकुशलः-नीति में कुशल-skill in policy, good moral; युज्यते-जोड़ता है-joins कृतः -किया-did; लोकस्मिन-इस संसार में-in this world.

हिन्दी अर्थ :
ब्रह्मारण्य में कर्पूरतिलक नामक हाथी रहता था। उसे देख सभी सियारों ने विचार किया कि यदि यह किसी प्रकार मर जाए तो इसके शरीर की चार महीने की खाद्य सामग्री हो जाएगी। तब एक वृद्ध सियार ने कहा-मैं अपनी बुद्धि चातुर्य से इस हाथी को मार सकता हूँ। तब वह सियारकर्पूर तिलक (हाथी) के पास पहुँच उसे साष्टांग प्रणाम करके बोला-हे भगवान्! मुझ पर दया करो। हाथी बोला-तुम कोन हो? कहाँ से आए हो? तब वह (बूढ़ा) सियार बोला-मैं सियार हूं। वन के सभी पशु-पक्षियों ने मिलकर मुझे आपके पास भेजा है। कारण कि बिना राजा के कहीं पर भी रहना ठीक नहीं है और इस जंगल के राज्य में आपसे अच्छा अभिषेक करने योग्य दूसरा कोई नहीं है। आप में राजा के गुण विद्यमान हैं।

जैसे-इस पृथ्वी पर वही राजा हो सकता है जो कुलीन हो, आचार-विचार से शुद्ध हो, प्रतापी हो, धार्मिक हो साथ ही नीति कुशल भी हो।

और भी-सर्वप्रथम राजा को प्राप्त करना चाहिए, उसके बाद पत्नी और धन को प्राप्त करना चाहिए। यदि राजा ही प्राप्त नहीं हुआ तो कहाँ पत्नी और कहाँ धन प्राप्त हो सकता है।

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2. तद्यथा लग्नवेला न विचलति तथा कृत्वा सत्वरमागम्यतां देवेन। इत्युक्त्वोत्थाय चलितः। ततोऽसौ राज्यलोभाकृष्टः कर्पूरतिलकः शृगालवर्त्मना धावन्महापङ्के निमग्नः। ततस्तेन हस्तिनोक्तम्-‘सखे शृगाल! किाधुना विधेयम्? पङ्के निपतितोऽहं म्रिये। परावृत्य पश्य।’ शृगालेन विहस्योक्तम्-‘देव! मम पुच्छकावलम्बनं कृत्वा उत्तिष्ठ। यन्मद्विधस्य वचसि त्वया प्रत्ययः कृतस्तदनुभूयताम् अशरणं दुःखम्।’

तथा चोक्तम् :
यदाऽसत्सङ्गरहितो भविष्यसि भविष्यसि।
यदाऽसज्जनगोष्ठीषु पतिष्यसि पतिष्यसि॥

ततो महापङ्के हस्ती शृगालैर्भक्षितः। अतोऽहम् ब्रवीसि-
उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः।
शृगालेन हतो हस्ती गच्छता पङ्कवर्मना॥

शब्दार्थ :
प्रणम्य-प्रणाम करके-saluting; प्रतिज्ञातम्-प्रतिज्ञा की-promised; वञ्चकः-धृत/कपटी-wicked person; प्रस्थापित-भेजा गया-send; अटवी-जङ्गल-forest, jungal; युज्यते-उचित होता है।-Satisfied; भुवि-पृथ्वी पर-on earth; विन्देत्-प्राप्त करें-receive; महापङ्के-दलदल में-in mud; निपतितः-गिरा हुआ-fallen; परावृत्य-लौटकर-returning; विहस्य-हँसकर-laughing.

हिन्दी अर्थ :
इसलिए अभिषेक का शुभ मुहूर्त न निकल जाए, ऐसा विचार कर शीघ्रता से आप मेरे साथ चलें। ऐसा कह वह जल्दी से उठा और चल दिया। यह सुन राज्य के लोभ से आकर्षित हो कर्पूरतिलक सियार के पीछे-पीछे चला और दौड़ते हुए भयंकर कीचड़ के दल-दल में फँसकर डूबने लगा, तब उसने सियार से कहा-मित्र सियार! अब क्या करना चाहिए! मैं कीचड़ में फँस मरने वाला हूँ, लौट कर देखो। सियार ने हँसते हुए कहा-हे देव! मेरी पूँछ का सहारा लेकर तुम बाहर आ जाओ। मुझ जैसे के वचन पर तुमने भरोसा किया तो उसका परिणाम दुख ही है। उसे भोगो।

वैसे कहा भी है-जब कोई सत्संगै से रहित हाकर दुर्जनों की संगति में जाएगा। तो उसका पतन ही होगा, उसफा पतन ही होगा।

तब दलदल में फँसे हाथी को सियारों ने खा लिया। इसलिए मैं कहता हूँ-उपाय से जो सम्भव है, वह पराक्रम से नहीं हो सकता। जैसे कि शृगाल द्वारा दलदल भाग पर ले जाने के कारण हाथी मारा गया।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणिः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणिः (संवादः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 17 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) आरुणेः गुरोः नाम किम्? (आरुणि के गुरु का क्या नाम था?)
उत्तर:
धौम्य आयोदः ।(धौम्य आयोद)।

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(ख) गुरुपूर्णिमायां किम् भवति? (गुरु पूर्णिमा को क्या होता है?)
उत्तर:
गुरुजनानां पूजनं सम्मानञ्च। (गुरुजनों का पूजन एवं सम्मान होता है।)

(ग) धौम्यः आरुणिं कुत्र प्रेषयति? (धौम्य ने आरुणि को कहाँ भेजा?)
उत्तर:
केदारखण्ड बधान इति। (खेत की क्यारी को बाँधने।)

(घ) आरुणिः केदारखण्डे किमकरोत? (आरुणि ने खेत के खण्ड में क्या किया?)
उत्तर:
तत्केदारखण्डे संविवेश। (तब वह खेत की क्यारी में लेट गया।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) गुरुः आरुणिं पाञ्चाल्यं किमर्थम् प्रेषयति स्म? (गुरु ने आरुणि को पाञ्चाल किसलिए भेजा?)
उत्तर:
गुरुः आरुणिं पाञ्चाल्यं केदारखण्डे बधान इति प्रेषयति स्म। (गुरु ने आरुणि को पाञ्चाल खेत की क्यारी को बाँधने के लिए भेजा।)

(ख) गुरोः आदेशेन आरुणिः किमकरोत? (गुरु के आदेश से आरुणि ने क्या किया?)
उत्तर:
गुरोः आदेशेन आरुणिः तत्केदारखण्डे संविवेश। (गुरु के आदेश से आरुणि खेत की क्यारी में लेट गया।)

(ग) आरुणिः गुरोः शब्दं श्रुत्वा किं कृतवान्? (आरुणि गुरु के शब्दों को सुनकर क्या किया?)
उत्तर:
आरुणिः गुरोः शब्द श्रुत्वा केदारखण्डात् सहसेत्थाय ऋषि समीपं प्रत्यागच्छत् कृतवान्। (आरुणि गुरु के शब्द को सुनकर खेत की क्यारी को छोड़कर पास में आकर नमस्कार किया।)

(घ) धौम्यः शिष्याय कमाशीर्वादम् अददात्? (आचार्य धौम्य ने शिष्य को क्या आशीर्वाद दिया?)
उत्तर:
धौम्यः शिष्याय ते सर्वे वेदाः प्रतिभाष्यन्ति सर्वाणि च शास्त्राणीति आशीर्वादम् अददात्। (धौम्य ने शिष्य को सभी वेद तथा शास्त्रों के ज्ञाता होने का आशीर्वाद दिया।)

प्रश्न 3.
उचितशब्देन रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) तस्य शिष्यः आरुणिः आसीत्।
(ख) उपाध्यायः धौम्यः शिष्यान् अपृच्छत्।
(ग) भवान् उद्दालक इति नाम्ना भविष्यति।
(घ) अहमभिवादये भवन्तम्।
(ङ) ते सर्वे वेदाः प्रतियास्यन्ति।

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प्रश्न 4.
शुद्धकथनानां समक्षम् “आम्” अशुद्धकथनानां समक्षं “न” इति लिखत
(क) आरुणिः महान् पितृभक्तः आसीत्।
(ख) धौम्यः आरुणिम् आह्वनाय शब्दं चकार।
(ग) आरुणिः गुरोः आज्ञया केदारखण्डम् प्रति गतवान्।
(घ) आरुणिः उद्दालक नाम्ना प्रसिद्धः।
उत्तर:
(क) न
(ख) आम्
(ग) आम्
(घ) आम्

प्रश्न 5.
निम्नलिखितैः अव्ययशब्दैः वाक्यानि रचयत्
(क) श्वः – श्वः गुरुपूर्णिमा पर्व अस्ति।
(ख) तत्र – तत्र आरुणि आसीत्।
(ग) यत्र – यत्र केदारखण्डं आसीत्।
(घ) बाढम् – उपाध्यायः बाढम् कथित्वा अगच्छत्।
(ङ) क्व – क्व आरुणि पाञ्चाल्य।

प्रश्न 6.
क्रियापदानां धातुं लकारं पुरुषं वचनं च लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-1

प्रश्न 7.
निम्नलिखितशब्दानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-2

प्रश्न 8.
निम्नलिखित शब्दानां धातुं प्रत्ययं च विभज्य लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-3

प्रश्न 9.
निम्नलिखितशब्दानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनं लिङ्गं च लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-4

पश्न 10.
निम्नलिखितवाक्यानि कथानुसारेण क्रमेण लिखत
(क) शयाने तस्मिन् प्रवाहं विरराम।
(ख) स तत्र संविवेश केदारखण्डे।
(ग) तदभिवादये भवन्तम्।
(घ) गुरुजनानामाज्ञा पालनीया।
(ङ) तस्य शिष्यः आमीत आरुणिरिति
उत्तर:
(ङ) तस्य शिष्यः आसीत् आरुणिरिति।
(घ) गुरुजनानामाज्ञा पालनीया।
(ख) स तत्र संविवेश केदारखण्डे।
(क) शयाने तस्मिन् प्रवाहं विरराम।
(ग) तद्भिवादये भवन्तम्।

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गुरुभक्तः आरुणिः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

‘श्रद्धागन को ही ज्ञान लाभ होता है’ इस कथन के अनुसार श्रद्धालु शिष्य ही गुरु से ज्ञान प्राप्त करते हैं। न केवल बुद्धि अपितु आसक्ति (गुरु के प्रति) भी ज्ञान प्राप्त करने हेतु आवश्यक होता है। उपनिषदों में अनेक उदाहरण श्रद्धा के महत्त्व को सिद्ध करते हैं। आरुणि का चरित्र भी गुरु-भक्ति का एक उदाहरण है।

गुरुभक्तः आरुणिः पाठ का हिन्दी अर्थ

1. शिक्षक-(छात्रान प्रति) श्वः किम् पर्व अस्ति?
रुचिरा-महोदय! श्वः गुरुपूर्णिमा-पर्व अस्ति।
प्रसून-गुरुपूर्णिमा पर्वणि किम् भवति?

शिक्षक :
अस्मिन् पर्वणि गुरुजनानां पूजनं सम्मानञ्च भवति। लोके आरुणिः, एकलव्यः, उपमन्युः इत्यादयः गुरुभक्तिं कृत्वा प्रसिद्धिं गताः।

अक्षत :
गुरुवर्य! आरुणिः कः आसीत?

शिक्षक :
शोभनम्, शृणोतु! आसीत् कश्चिद् ऋषिः धाम्यो नाम आयोदः। तस्य शिष्यः आसीत् आरुणिरिति।

प्रज्ञा :
तेन गुरोः कीदृशी सेवा कृता?

शिक्षक :
शृणोतु, ऋषि धौम्यः आरुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषयति स्म-गच्छ, केदारखण्डं बधान इति। उपाध्यायेन आदिष्टः आरुणिः तत्र गतवान् परञ्च केदारखण्डं बर्बु नाशक्नोत्। मयङ्क-तदनन्तरं स किमकरोत्?

शब्दार्थः :
श्वः-कल (आने वाला)-tomorrow; भवति-होता है-happens; अस्मिन्-हमारे-our; सम्मानञ्च-सम्मान-Honour; शोभनम्-सुन्दर-beautiful; शृणोतु-सुनाए-to listen;कीदृशी-किस तरह-How;कृता-किया-did;धाम्मो-भेजा-to sent; केदारखण्ड वधान-आचार्य धौम्य-Acharaya Dhoumya. उपाध्यायेन-शिक्षक के द्वारा-By teacher; नाशक्नोत्-असमर्थ-not capable.

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक :
(छात्रों से) आज कौन-सा पर्व है? रुचिरा-महोदय! आज गुरु पूर्णिमा का पर्व है। प्रसून-गुरु पूर्णिमा का पर्व क्या होता है?

शिक्षक :
इस पर्व के दिन गुरु जनों का पूजन एवं सम्मान किया जाता है। संसार में आरुणि एकलव्य उपमन्यु इत्यादि गुरु-भक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं।

अक्षत :
गुरुवर! आरुणि कौन थे?

शिक्षक :
बहुत सुंदर, सुनो! कोई धौम्य आयादि नामक ऋषि थे। उन्हीं के शिष्य का नाम आरुणि था।

प्रज्ञा :
उन्होंने गुरु की किस प्रकार सेवा की?

शिक्षक :
सुनो, ऋषि धौम्य आरुणि पाञ्चाल को कहा-जाओ, खेत की मेड़ को बांधो। गुरु के इस तरह के ओदश को सुनकर आरूणि वहाँ गया किन्तु खेत के उस मेड़ को बाँधने में असमर्थ हो गया।

मयंक :
तब उसने क्या किया?

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2. शिक्षक-कष्टमनुभवन् स अचिन्तयदुपायम्-भवतु एवमहं करिष्यामीति। इति विचिन्त्य स तत्केदारखण्डे संविवेश। शयाने तस्मिन् तदुदकप्रवाहं विरराम। ततः परम्। बहुकालानन्तरमुपाध्यायः आयोदो धौम्यः शिष्यानपृच्छत्-“क्व आरुणिः पाञ्चाल्य गत इति।” ते प्रत्यवदन् भगवतैव प्रेषितः। बहुकालगतेऽपि स न प्रत्यागतः।

अक्षत :
तदा धौम्यः आरुणेः अन्वेषणाय प्रयत्नं न कृतवान् किम्?

शिक्षक :
अवश्यमेव, यदा आरुणिः न प्रत्यागच्छत् तदा चिन्तितः सशिष्यैः ऋषिः तत्र गतवान् यत्र स आरुणिः गतः। तत्र तमाह्वनाय उच्चैः शब्दं चकार-भो आरुणि! क्वासि वत्स? क्वासि? एतच्छ्रुत्वा स तस्मात् केदारखण्डात् सहसोत्थाय ऋषिसमीप प्रत्यागच्छत्। प्रत्यवदच्चैनम् अयमस्मि अत्र केदारखण्डे, अहं निस्सरदकमवारणीयं संरोद्धं संविष्टः। भवच्छब्दं श्रुत्वा केदारखण्ड विदार्य समुपस्थितः। तदभिवादये भवन्तम्। आज्ञापयतु भवान् किमिदानीं करवाणीति।

रुचिरा :
स गुरुणां पुरस्कृतः किम्?

शिक्षक :
शृणोतु! तमुपाध्यायोऽब्रबीत्-“यं केदारखण्डमवदार्य त्वमुपस्थितः, तस्मात् त्वमुद्दालक इति नाम्ना भविष्यतीति।” यस्मात् त्वया मद्वचनं अनुष्ठितं तस्मात् श्रेयोऽवाप्स्यसीति! ते सर्वे वेदाः प्रतिभवन्ति, सर्वाणि च शास्त्राणीति । अनेन स गुरुभक्तः आरुणिः उद्दालक नाम्ना प्रसिद्धो विद्वान शास्त्रज्ञो यशस्वी दीर्घायुश्चाजायतः।

प्रसून :
आस्मभिरपि गुरुजनानामाज्ञा पालनीया। शिक्षक-आम्, अवश्यमेव।

शब्दार्थः :
संविवेश-लेट गया-laid; क्लिश्यमानः-दुखीः होते हुए-being distressed; प्रेषितः-भेज दिया गया-has been sent; प्रत्युवाच-उत्तर भेजा-replied; उत्थाय उठकर-raising; प्रत्यागच्छत्-पास लौट आया-came near; उकम्-पानी को-water; संरोद्धम्-रोकने के लिए-for stop; संविष्टः-लेट गया-laid down; विदार्य-तोड़करbreaking; समुपस्थितः-पहुँचा हूँ-reached; आज्ञापयतु-आज्ञा दीजिए-grant me permission; अनुगृहीत-कृपा किया गया-was blessed; अनुष्ठितम्-किया गया-was done;अवाप्स्यसि-प्राप्त करोगे-will get;प्रतिभास्यन्ति -ज्ञात हो जाएँगे-will be known.

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक :
कष्ट का अनुभव करते हुए उसने एक उपाय सोचा-ठीक है, इस तरह ही मैं करूँगा-ऐसा सोच वह स्वयं उस खेत की मेड़ पर लेट गया। उसके लेटने से पानी का वह प्रवाह रुक गया। कुछ समय बीतने पर आचार्य आयोद धौम्य के शिष्यों से पूछा-आरुणि पाञ्चाल कहाँ गया है? वे बोले-आपने ही उसे भेजा है। बहुत समय व्यतीत हो जाने पर भी अभी तक नहीं लौटा है।

अक्षत :
तब धौम्य ने आरुणि को खोजने के लिए प्रयत्न नहीं किया?

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शिक्षक :
अवश्य किया। जब आरुणि नहीं लौटा तब चिंतित ऋषि शिष्यों सहित गए जहां आरुणि को भेजा था। वहाँ उन्होंने आरुणि का नाम लेकर जोर-जोर से पुकारा-हे आरुणि! तुम कहाँ हो, कहाँ हो। अपने को पुकारता सुन वह मेड़ से उठ गुरु के समीप आ गया और बोला-मैं यहाँ हूँ। यहाँ खेत की मेड़ से बहते हुए पानी को रोकने के लिए मैं यहाँ लेट गया था। आपके शब्दों को सुनकर खेत की मेड़ को छोड़कर यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। हे श्रीमान! मैं आपका अभिवादन करता हूँ। आप आज्ञा दें-अब मैं क्या करूँ।

रुचिरा :
उसे गुरु ने क्या पुरस्कार दिया?

शिक्षक ;
सुनो, आचार्य उससे बोले-जिस तरह खेत के इस खण्ड को तोड़ कर तुम उपस्थित हुए, इससे तुम्हारा नाम उद्दालक होगा और जिस तरह तुमने मेरे वचन का ज्ञान होगा। बाद में, वही गुरु भक्त आरुणि उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह विद्वान शास्त्रों का ज्ञाता एवं यशस्वी व दीर्घायु हुआ।

प्रसून :
हमें भी गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए।

शिक्षक :
हाँ, अवश्य ही।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 16 अध्ययने प्रत्यूहः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 16 अध्ययने प्रत्यूहः (नाट्यांशः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 16 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) सद्भिः सङ्गः केन भवति? (सज्जनों के साथ सम्पर्क किससे होता है?)
उत्तर:
पुण्येना। (पुण्य से)

(ख) दण्डकारण्यप्रदेशे के प्रमुखाः वसन्ति? (दण्डकारण्य प्रदेश में प्रमुख रूप से कौन रहता है?)
उत्तर:
अगस्त्यादयः। (अगस्तादि प्रमुख ऋषि रहते हैं)

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(ग) देवताविशेषेण अद्भुतं किम् उपनीतम्? (देवता गण किस अद्भुत विशेषण को बताते हैं?)
उत्तर:
जृम्भकास्त्राणि। (जृम्भकास्त्र।)

(घ) दारको केन पोषितौ रक्षितौ च? (दोनों किसके द्वारा रक्षित पोषित हुए?)
उत्तर:
वल्मीकिना। (वाल्मीकि के द्वारा)।

(ङ) तयोः कानि जन्मसिद्धानि? (उन दोनों को क्या जन्म सिद्ध था?)
उत्तर:
जृम्भकास्त्र। (जृम्भकास्त्र।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) आत्रेयी दण्डकारण्ये किमर्थं भ्रमति स्म? (आत्रेयी दण्डकारण्य वन में क्यों घूमते थे?)
उत्तर:
आत्रेयी दण्डकारण्ये महानध्ययनप्रत्यूह भ्रमति स्मः। (आत्रेयी दण्डकारण्य में पढ़ाई में विघ्न आ जाने के कारण घूमते थे।)

(ख) वाल्मीकिना तयोः कां विद्याम् अध्यापितौ? (वाल्मीकि के द्वारा उन दोनों को कौन-सी विद्या पढ़ाई जाती थी?)
उत्तर:
वाल्मीकिना तयोः त्रयीवर्जमितरास्तिस्त्रो विद्याम् अध्यापितौ। (वाल्मीकि के द्वारा उन दोनों को वेद को छोड़कर और तीनों (आन्वीक्षिकी, वार्ता और दण्डनीति) विद्याओं का अध्ययन कराया जाता था।)

(ग) गुरुः विद्या कथं वितरति? (गुरु विद्या कैसे देते हैं?)
उत्तर:
गुरुः विद्या प्राज्ञे विद्यां यथैव तथा जड़े वितरति। (गुरु जिस तरह बुद्धिमान छात्र को उसी तरह मन्द बुद्धि छात्र को भी विद्या देता है।)

(घ) ब्रह्मर्षिः किमर्थं तमसामनुप्रपन्नः? (बह्मर्षि तमसा नदी के किनारे किसलिए गए?)
उत्तर:
बह्मर्षिः माध्यन्दिनसवनाय नदीं तमसामनुप्रपन्नः। (ब्रह्मर्षि तमसा नदी के किनारे मध्याह्न (दोपहर की संध्या) वन्दन करने के लिए तमसा नदी के किनारे गए।)

(ङ) क्रौञ्चयोः एकं कः हतवान्? (क्रौञ्च में से एक को किसने मारा?)
उत्तर:
क्रौञ्चयोरेकं एक व्याधेन हतवान्। (क्रौञ्च में से एक को बहेलिया ने मारा।)

प्रश्न 3.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) वनदेवता वनस्य सौन्दर्य विषये तापसी किं वदति? (वनदेता वन के सौन्दर्य के विषय में तापसी से क्या कहता है?)
उत्तर:
वनदेवता वनस्य सौन्दर्य विषये तापसी यथेच्छा भोग्यं दो वदति। (वनदेवता वन के सौन्दर्य के विषय में तापसी से कहता है कि यह वन आपकी इच्छा के अनुसार उपभोग योग्य है।)

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(ख) पद्मयोनिः वाल्मीकि किमवोचत्? (ब्रह्मा ने वाल्मीकि से क्या कहा?)
उत्तर:
पद्मयोनिरवोचत्-ऋषेः प्रबुद्धोऽसि वागात्मनि ब्रह्ममणि। तदृ ब्रहि रामचरितम्। (ब्रह्मा ने वाल्मीकि से कहा कि ऋषि जी! तुम शब्द रूप ब्रह्म में ज्ञान सम्पन्न हो गए हो, इस कारण रामचरित का वर्णन करो।)

(ग) साधूनां चरित कीदृशमस्ति? (सज्जनों का चरित किस तरह का होता है?)
उत्तर:
साधूनां चरितं सतां सद्भिः सङ्गः कथमपि हि पुण्येन भवति। (सज्जनों की संगति सज्जनों द्वारा कष्टमय पुण्य से होती है।)

(घ) क्रौञ्चवधानन्तरं वाल्मीकिमुखात् का वाणी निर्गता? (क्रौञ्च के वध के अनन्तर वाल्मीकि के मुख से कौन-सी वाणी निकली?)
उत्तर:
क्रौञ्चवधानन्तरं वाल्मीकि किं मुखात् वाणी निर्गता-मा निषाद्। प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। (क्रौंच के वध के अनन्तर वाल्मीकि के मुख से वाणी निकली कि-हे व्याध! जो कि तूने एक का वध कर दिया है इसलिए तू बहुत समय तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सकेगा)

प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 16 अध्ययने प्रत्यूह img-1

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
उदाहरणम् :
तापसी अध्वगवेषा अस्ति। – आम्
व्याधः क्रौञ्च न हतवान्। – न
(क) गुरुः यथा प्राज्ञे तथैव जड़े विद्यां वितरति।
(ख) जृम्भकास्त्राणि जन्मसिद्धानि आसन्।
(ग) लवकुशौ त्रयी विद्यां न अधीतवन्तौ।
(घ) वाल्मीकिः आदिकविः अस्ति।
(ङ) वाल्मीकिः रामायणं न लिखितवान्
उत्तर:
(क) आम्
(ख) आम्
(ग) न
(घ) आम्
(ङ) न

प्रश्न 6.
उचितैः पदैः रिक्तस्थानानि पूरयत
(निगमान्तविद्याम्, पुण्येन, प्रतिष्ठाम, विशुद्धम्, माध्यन्दिनसवनाय)
(क) सतां सद्भिः सङ्गः पुण्येन भवति।
(ख) आत्रेयी निगमान्तविद्याम् अध्येतुम् पर्यटति।
(ग) महर्षि माध्यन्दिनसवनाय तमसामनुप्रपन्नः।
(घ) मा! निषाद प्रतिष्ठाम् त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
(ङ) रहस्यं साधूनामनुपधि विशुद्धं विजयते।

प्रश्न 7.
सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
उदाहरणम् :
केनापि- केन + अपि = दीर्घस्वरसन्धिः।
(क) अथापरः – अथ + अपर = दीर्घस्वरसंधिः।
(ख) यथेच्छा – यथा इच्छा – गुणस्वरसंधिः।
(ग) यथैव – यथा + एव = वृद्धिस्वरसंधिः।
(घ) आत्रेय्यस्मि – आत्रेयी + अस्मि = यणस्वरसंधिः।
(ङ) अन्येऽपि – अन्ये + अपि = पूर्ण रूप।

प्रश्न 8.
अव्ययैः वाक्य निर्माण कुरुत
उदाहरणं यथाः
तत्र महर्षिः वाल्मीकिः वसति स्म।
(क) अपि – रामः अपि फलं खादति।
(ख) यदा – यदा मोहितः आगच्छति तदा अन्शुलः, राशिन्तश्च गच्छति।
(ग) किल – रामचन्द्रः किल पितृभक्तिः आसीत्।
(घ) खलु – पासः प्रधानं खलु योग्यतायाः।
(ङ) एकदा – एकदा अहं भेड़ाघट्टम्अवश्यमेव गमिष्यामि।

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अध्ययने प्रत्यूहः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

महाकवि भवभूति रचित ‘उत्तर रामचरितम्’ नामक नाटक ग्रन्थ से उद्धृत यह अंश संस्कृत भाषा के नाट्य परम्परा का परिचय प्रस्तुत करने में सक्षम है। बुद्धि कौशल युक्त गुरु का छात्रों के प्रति समान रूप से समदर्शिता का भाव यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

अध्ययने प्रत्यूहः पाठ का हिन्दी अर्थ
(ततः प्रविशत्यध्वगवेषा तापसी)

1. तापसी-अये, वनदेवता फलकुसुमगर्भेण पल्लवायेण दूरान्मामुपतिष्ठते। (प्रविश्य) वनदेवता-(अर्घ्य विकीय)
यथेच्छाभोग्यं वो वनमिदमयं मे सुदिवसः
सतां सद्भिः सङ्गः कथमपि हि पुण्येन भवति।
तरुच्छाया तोयं यदपि तपसां योग्यमशनं
फलं वा मूलं वा तदपि न पराधीनमिह वः॥

तापसी :
किमत्रोच्यते?
प्रियप्राया वृत्तिर्विनयमधुरो वाचि नियमः
प्रकृत्या कल्याणी मतिरनवगीतः परिचयः।
पुरो वा पश्चाद् वा तदिदमविपर्यासितरसं
रहस्यं साधूनामनुपधि विशुद्धं विजयते॥
(उपविशतः)

शब्दार्थः :
वनदेवता-वनदेवता-forest God;फलकुसुमगर्भेण-फल और फलो से भरे-full of fruits and flowers; पल्लवादंण-पल्लवसहित-with new leaves; दूरान्मामुपतिष्ठते-दूर से ही मेरा सत्कार करती है-salute me from long distance; अर्घ्य विकीर्य-अर्घ्य देखकर-water give by hands; यथेच्छायोग्य इच्छा के अनुसार योग्य-like desire consumation; कथमपि-किसी तरह से-any how; पुण्येन-पुण्य के द्वारा-By good work; तरुछाया-वृक्ष की छाया-shade of tree; तदापि-वह भी-he also; किमत्रोक्यते-क्या कहा जाए-what do say; पुरो-पहले-first; पश्चाद्-बाद में-after; विनयमूर्धरा-विनय के कारण हृदयाकर्षक-to reason of attration by heart; अनवगीतः-अनिन्दित-not criticise; प्रियाप्रायव्रति-अतिशय प्रियकारी व्यवहार-lovely behavioure.

हिन्दी अर्थः :
(तब पथिक रूप में तपस्विनी का प्रवेश)

तापसी :
अरे! वन देवता पुष्प-फलों से पूर्ण, पल्लव फपी अर्घ्य के द्वारा दूर से ही मेरा स्वागत करते हैं। (प्रवेश करके)

वन देवता :
(अर्घ्य देकर) यह वन इच्छानुरूप भोग के लिए आप को अर्पित है क्योंकि सज्जनों का सज्जन पुरुष से संयोग बड़े पुण्य से होता है। वृद्धा की छाया, जल और तप के योग्य जो भी पदार्थ-फल मूल है वह आपकी सेवा में है, पराधीन नहीं है।

तापसी :
इस पर क्या कहा जाए?

व्यवहार अत्यधिक प्रीतियुक्त, हृदय को आकर्षित करने वाली नम्रता, स्वभाव से ही मंगल रूप बुद्धि, न बदलने वाला, व अनिंदित प्रेम, छल-कपट से रहित और विशुद्ध-ऐसा उत्कृष्ट रूप साधुओं का होता है। (दोनों बैठते हैं)

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2. वनदेवता-काम् पुनरत्रभवतीमवगच्छामि?

तापसी :
आत्रेय्यस्मि।

वनदेवता :
आर्ये आत्रेयि! कुतःपुनरिहागम्यते? किम् प्रयोजनो दण्डकारण्योपवनप्रचारः?

आत्रेयी :
अस्मिन्नगस्त्यप्रमुखाः प्रदेशे भूयांस उद्गीथविदो वदन्ति।
तेभ्योऽधिगन्तुं निगमान्तविद्यां वाल्मीकिपादिह पर्यटामि॥

वनदेवता :
यदा तावदन्येऽपि मुनयस्तमेव हि पुराणब्रह्मवादिनम् प्राचेतसमृषिम् ब्रह्मपारायणायोपासते, तत्कोऽयमार्यायाः प्रवासः?

आत्रेयी :
तस्मिन् हि महानध्ययनप्रत्यूह इत्येष दीर्घप्रवासोऽङ्गीकृतः। वनदेवता-कीदृशः?

आत्रेयी :
तत्र भगवतः केनापि देवताविशेषेण सर्वप्रकाराद्भुतं स्तन्यत्यागमात्रके वयसि धर्तमानं दारकद्वयमुपनीतम्। तत्खलु न केवलं तस्य, अपितु तिरश्चामप्यन्तः करणानि तत्त्वान्युपस्नेहयति।

शब्दार्थः :
आत्रेयरिम-मैं आत्रेयी हूं-I am Aitreyi. कुत्रः-कहां से-from where; प्रयोजना-प्रयोजन है -is pland. अगस्त्यप्रमुखाः -अगस्त्य आदि प्रमुख-Augustya and main; प्रदेशे-क्षेत्र में-In area; पर्यटामि-घूमते हुए आ रहा हूं-coming into wonderd; वदन्ति-कहते हैं-says; ब्रह्मवादिनाम्ब्रह्मवादी-of Bramha; उपासते-उपासना करते हैं-prayers; आर्याया-आर्यों का-Aryar; प्रवासः-प्रवास-migration; तस्मिनः-वहां-there; प्रत्यूह- विघ्न-disturbe; दीर्घ प्रवासो-दीर्घप्रवास को-lang bravery; अंगीकृता-स्वीकृत किया है-expect; कीदृशः-कैसा-how, सर्वेकारात-सभी प्रकार से-all types; वयस्वीउम्र में-In age; तस्य-उसके-his; अधिगतुम्-जानने के लिए-for knowing,

हिन्दी अर्थ :
वन देवता-आपको मैं क्या समझू?

तापसी :
मैं आत्रेयी हूँ।

वनदेवता :
आर्ये आत्रेयी! आप कहाँ से आ रही हैं? किस प्रयोजन से आप दण्डकारण्य में घूम रही हैं?

आत्रेयी :
इस स्थान में अगस्त्य आदि प्रमुख ऋषि रहते हैं। उनसे वेदान्त की शिक्षा प्राप्त करने के लिए ऋषि वाल्मीकि के आश्रम से आ रही हूँ।

वनदेवता :
जब अनेक ऋषि मुनि एवं अनुभवी ब्रह्मवेत्ता मुनि महर्षि वाल्मीकि के यहाँ वेदांत शिक्षा ग्रहण करते हैं, तब आर्या के यहाँ आकर प्रवास का क्या कारण है?

आत्रेयी :
वहाँ पढ़ने में व्यवधान उत्पन्न हो जाने के कारण मैंने दीर्घ प्रवास को स्वीकार किया।

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3. वनदेवता-तयैव किल देवतया तयोः कुशलवाविति नामनी प्रभावश्चाख्यातः।

वनदेता :
कीदृशः प्रभावः?

आत्रेयी :
तयोः किल सरहस्यानि जृम्भकास्त्राणि जन्मसिद्धनीति।

वनदेवता :
अहो नु भोश्चित्रमेतत्।

आत्रेयी :
तौ च भगवता वाल्मीकिना धात्रीकर्मतः परिगृह्य पोषितौ रक्षितौ च, निर्वृत्तचौलकर्मणोस्तयोस्त्रयी-वर्जमितरास्तिस्रो विद्याः सावधानेन परिनिष्ठापिताः। तदनन्तरं भगवतैकादशे वर्षे क्षात्रेण कल्पेनोपनीय त्रयीविद्यामध्यापितौ न त्वेताभ्यामतिदीप्तिप्रज्ञाभ्यामस्मदादेः सहाध्ययनयोगोऽस्ति यतः
वितरति गुरुः प्राज्ञे विद्यां यथैव तथा जडे
न तु खलु तयोाने शक्तिं करोत्यपहन्ति वा।
भवति हि पुनर्भूयान् भेदः फलम् प्रति, तद्यथा
प्रभवति शुचिबिम्बग्राहे मणिनं मृदादयः॥

वनदेवता :
अयमध्ययनप्रत्यूहः?

आत्रेयी :
अन्यश्च।

वनदेवता :
अथापरः कः?

शब्दार्थः :
कीदृशः-किस तरह-How type; वितरति-वितरित करती है-Distributes; प्राज्ञे-शास्त्र विषय-Knowledge of book; प्रभवति-प्रभावित करती है-to affect; सुचि-पवित्रता-holyness; प्रत्यूहः-बाध्य-trouble.

हिन्दी अर्थः :
वनदेवता-कैसा विघ्न?

आत्रेयी :
वहाँ भगवान वाल्मीकि के निकट किसी देवता ने सभी प्रकार से अद्भुत एवं स्तन त्याग करने की अवस्था के दो बच्चों को छोड़ दिया है। वे बालक केवल उन्हीं के नहीं वरन् पशु-पक्षियों के हृदय में भी स्नेह का संचार करते हैं।

वनदेवता :
क्या आप उन दोनों बालकों का नाम जानती हैं?

आत्रेयी :
उसी देवता ने उन दोनों का नाम लव एवं कुश यह नाम व प्रभाव बताया है।

वनदेवता :
कैसा प्रभाव? आत्रेयी-उन दोनों को मन्त्रपूरित जृम्भका नामक अस्त्र सिद्ध है। वनदेवता-यह आश्चर्य है।

आत्रेयी :
उन दोनों को भगवान वाल्मीकि ने धात्री के समान पालन-पोषण व रक्षित किया है। चूडाकर्म से निवृत्त होने के बाद बहुत कुशलतापूर्वक उन्हें वेदाध्ययन के अतिरिक्त अन्य तीन विद्याओं (आन्वीक्षिकी, वार्ता एवं दण्डनीति) का अध्ययन कराया। पुनः उनकी ग्यारहवीं साल की उम्र में क्षत्रिय विधि से उपनयन संस्कार कर उन्हें वेद की शिक्षा प्रदान की। अत्यंत प्रतिभा के धनी उन दोनों बालकों के साथ हम लोगों का पढ़ना बहुत कठिन है क्योंकि गुरु तीव्र बद्धि एवं मंद बुद्धि वाले दोनों तरह के छात्रों को एक समान शिक्षा प्रदान करता है। दोनों में से किसी को न अलग से समझने की सामर्थ्य प्रदान करता है और न ही किसी को बोध-शक्ति को नष्ट ही करता है। ऐसा होने पर भी परिणाम में बहुत भिन्नता होती है, जैसे कि हीरा, स्फटिक मणि आदि सभी प्रतिबिम्ब ग्रहण करने में समर्थ होते हैं किन्तु मिट्टी आदि पदार्थ प्रतिबिम्ब धारण नहीं कर सकते।

वन देवता :
पढ़ने में यही विघ्न है?

आत्रेयी :
और दूसरा भी

वन देवता :
और दूसरा विघ्न क्या है?

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4. आयेत्री-अथ स ब्रह्मर्षिरेकदा माध्यन्दिनसवनाय नदीं तमसामनुप्रपन्नः। तत्र युग्मचारिणोः क्रौञ्चयोरेकं व्याधेन वध्यमानं ददर्श। आकस्मिकप्रत्यवभासां देवीं वाचमानुष्टुभेन छन्दसा परिणतामभ्युदैरयत्-
मा निषाद! प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
वनदेवता-चित्रम्? भग्नायादन्यत्र नूतनश्छन्दसामवतारः।

आत्रेयी :
तेन हि पुनः समयेन तं भगवन्तमाविर्भूतशब्दप्रकाशमृषिमुपसङ्गम्य भगवान् भूतभावनः-पद्मयोनिरवोचत् ऋषे प्रबुद्धोऽसि वागात्मनि ब्रह्माणि। तब्रूहि रामचरितम्। अव्याहतज्योतिरार्षं ते चक्षुः प्रतिभातु। आयः कविरसि इत्युक्त्वान्तर्हितः। अथ स भगवान् प्राचेतसः प्रथमम् मनुष्येषु शब्दब्रह्मणस्तादृशं विवर्तमितिहासं रामायणम् प्रणिनाय।

वनदेवता :
हन्त! पण्डितः संसारः।

आत्रेयी :
तस्मादेव हि ब्रवीमि ‘तत्र महानध्ययनप्रत्यूह’ इति।

वनदेवता :
युज्यते। आत्रेयी-विश्रान्तास्मि भद्रे! संप्रत्यगस्त्याश्रमस्य पन्थानम् ब्रूहि।

वनदेवता :
इतः पञ्चवटीमनुप्रविश्य गम्यतामनेन गोदावरी तीरेण।
(इति निष्क्रान्तः)।

शब्दार्थः :
व्याधेन-बहेलिया ने-Hunter. पद्मयोनि-ब्रह्म-Brahma; प्रबुद्धोऽसि-प्रबुद्ध है-wise man; तादृशं-उस तरह-this type; तस्मादेव-इसी कारण से-for this reason; ब्रवीमि-कहती हूँ-says.

हिन्दी अर्थ :
एक दिन ब्रह्मर्षि दोपहर स्नान के लिए तमसा नदी के तट पर गए। वहाँ प्रेमरत नर-मादा क्रौंच पक्षियों में से एक नर को बहेलिए द्वारा मारे जाते हुए देखा। तब उन्होंने एकाएक उत्पन्न हुए छन्दबद्ध श्लोक के रूप में कहा-हे बहेलिए तुमने काम मोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार दिया, इस कारण तुम बहुत समय तक प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर सकोगे।।

वनदेवता :
आश्चर्य है! वेद के अतिरिक्त भी छन्द का नया जन्म हुआ।

आत्रेयी :
जिनको छन्द रूपी प्रकाश का दर्शन हो गया है एवं भगवान वाल्मीकि के पास आकर लोक के जन्मदाता ब्रह्मा ने आकर कहा-ऋषि! तुम शब्द रूप ब्रह्मा से अभिभूत हो गए हो। अब तुम रामचरित का वर्णन करो। न क्षीण होने वाला प्रकाश रूपी आर्य ज्ञान तुम्हें प्रकाशित करे। तुम आदि कवि हो। ऐसा कहकर ब्रह्मा अंतर्धान हो गए। तब भगवान वाल्मीकि ने मनुष्यों में सर्वप्रथम शब्द ब्रह्म का रूपान्तर कर रामायण नामक इतिहास की रचना की।

वनदेवता :
हाय! तब तो सांसारिक लोग भी पण्डित हो जाएँगे। आत्रेयी-इसी कारण वहाँ पढ़ने में विघ्न है-ऐसा मैं कहती हूँ। वनदेवता-ठीक है।

आत्रेयी :
हे भद्र! मैं विश्राम कर चुकी। अब मुझे भगवान अगस्त्य के आश्रम का मार्ग बताएँ।

वनदेवता :
वहाँ से पंचवटी में प्रवेश कर गोदावरी के किनारे से जाइए। इस तरह जाते हैं।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 7 सुविज्ञातमेव विश्वसेत्

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 7 सुविज्ञातमेव विश्वसेत् (कथा)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 7 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत् (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) पर्कटीवृक्षः कुत्र अस्ति? (पाकर का वृक्ष कहां पर है?)
उत्तर:
पर्कटीवृक्षः गृध्रकूटनामि अस्ति। (गृध्रकूट नामक स्थान में)

(ख) पक्षिशावकं भक्षितुं कः आगतः? (पक्षी के बच्चे को खाने के लिए कौन आया?)
उत्तर:
पक्षिशावकं भक्षितुं मार्जारः आगतः। (बिल्ली)

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(ग) विश्वासस्य मार्जारः कुत्र स्थितः? (विश्वास की बिल्ली कहां थी?)
उत्तर:
विश्वासस्य मार्जारः तस्फूटते स्थितः। (उसके कोटर में)

(घ) पक्षिशावकान् खादित्वा मार्जारः कुत्र गतः? (पक्षी के बच्चे को खाकर बिलाव कहां गया?)
उत्तर:
पक्षिशावकान् खादित्वा मार्जारः कोटरान्नि सृत्य बहिः प्रलायतिः। (कोटर से बाहर चला गया।)

(ङ) गृध्रः केः हतः? (गिद्ध ने किनको मारा?)
उत्तर:
गृधः पक्षिभि हतः। (पक्षियों को)

(च) कस्यदोषेण गृध्रः हतः? (किसके दोष के कारण गिद्ध मारा गया?)
उत्तर:
मार्जारस्य हि दोषेण। (बिल्ली के दोष के कारण)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखिए)
(क) जरद्गवनामा गृध्रः कुत्र वसति? (जदर्गव नाम का गिद्ध कहां रहता था?)
उत्तर:
जरद्गवनामा गृध्रः पर्कटीवृक्षः वसति। (जरद्गव नाम का गिद्ध पाकर के वृक्ष में रहता था।)

(ख) जनः वध्यः पूज्यः वा कथं भवति? (लोगों का वध व पूजा कैसे होती थी?)
उत्तर:
जनः वध्यः पूज्यः वा कर्मणा भवति। (लोगों का वध व पूजा कर्म से होती थी।)।

(ग) कस्मै वासो न देयः? (किसको निवास करने नहीं देना चाहिए?)
उत्तर:
आज्ञात् कुलशीलस्य वासो न देयः। (अज्ञात और जिसके कुल का ज्ञान न हो ऐसे लोगों को निवास नहीं देना चाहिए।)

(घ) पञ्चतन्त्रस्य रचनाकारः कः? (पञ्चतन्त्र के रचनाकार कौन हैं?)
उत्तर:
पञ्चतन्त्रस्य रचनाकार विष्णु शर्मा आसीत। (पंचतन्त्र के रचयिता विष्णु शर्मा थे।)

प्रश्न 3.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) पंचतन्त्र कानि पञ्चतन्त्राणि? (पंचतन्त्र में कौन-कौन से पांच तंत्र हैं?)
उत्तर:
पञ्चतंत्रे लब्धप्राणभः, मित्रभेद, मित्रलाभः, काकोलकी अपरिक्षित कारक इति पंचतन्त्राणि। (पंचतंत्र में लब्ध प्राणसा, मित्र-भेद, मित्र-प्राप्ति, काकोलुकीयम अपरिक्षित कारक नाम के पांच तंत्र हैं, (पुस्तकें हैं)

(ख) मार्जारः गृधं कथं विश्वासस्य तरुकोटरे स्थितः? (बिल्ली ने गिद्ध को किस विश्वास के साथ वृक्ष के कोटर में रहने दिया?)
उत्तर:
मार्जारः गृधं अहिंसा परमो धर्मः विश्वासस्य तरु कोटरे स्थितः। (बिल्ली ने गिद्ध को अहिंसा परम धर्म है-इस विश्वास के साथ रहने दिया।)

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(ग) कोटरे निवसन मार्जारः किं करोति स्म? (कोटर में निवास करते हुए बिल्ली क्या करती थी?)
उत्तर:
कोटरे पक्षीशावकामअभक्षयत करोति स्म? (कोटरे में निवास करते हुए बिल्ली पक्षियों के बच्चों को खाती थी।)

(घ) अस्या कथायाः सारः कः? (इस कथा का सार क्या है?)
उत्तर:
अस्या कथायाः सारः अस्ति-अज्ञात् कुलशीलस्य वासो न देयः। (इस कथा का सार है-अज्ञात एवं जिनके कुल का ज्ञान न हो ऐसे व्यक्ति को आश्रय नहीं देना चाहिए।)

प्रश्न 4.
प्रदत्तैः शब्देः रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) गृध्रकूटनाम्नि पर्वते पर्कटीवृक्षः अस्ति। (पर्वते/गृहे)
(ख) वृक्षस्य कोटरे जरद्गवनामा गृध्रः प्रतिवसित। (सिद्धः/गृध्रः)
(ग) मार्जारः प्रतिदिनम् पक्षिशावकम् खादति। (पशुशावकम् पक्षिशावकम्)
(घ) गृध्रः पक्षिशावकान् रक्षति। (रक्षति/भक्षति)
(ङ) पक्षिभिः गृध्रः हतः। (मार्जारः/गृध्रः)

प्रश्न 5.
युग्मेलनं कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 7 सुविज्ञातमेव विश्वसेत् img-1

प्रश्न 6.
कोष्ठकात् उचितपदं चित्वा रेखाङ्गितपदै प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(कैः, कस्य, के, कम्, केन)
उदाहरणं यथा :
अज्ञातः अविश्वसनीयः भवति।
कः अविश्वसनीयः भवति?
(अ) मार्जारस्य दोषेण गृध्रः हतः।
उत्तर:
कस्य दोषेण गृध्रः हतः?

(ब) पक्षिभिः जरद्गवः हतः।
उत्तर:
कैः जरद्गवः हतः?

(स) व्यवहारेण जनः पूज्यः भवति।
उत्तर:
केन जनः पूज्यः भवति?

(द) गृध्रः मार्जारम् उक्तवान्।
उत्तर:
गृध्रः कम् उक्तवान्?

(ङ) पक्षिणः दुःखेन विलापं कृतवन्तः।
उत्तर:
के दुःखेन विलापं कृतवन्तः?

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प्रश्न 7.
विपरीतार्थशब्दानां मेलनं कुरुत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 7 सुविज्ञातमेव विश्वसेत् img-2

प्रश्न 8.
उदाहरणानुसारं धातुं प्रत्ययं च पृथक कुरुत
उदाहरण-
दृष्ट्वा – दृश + क्त्वा
(क) हन्तव्यः
(ख) हतः
(ग) भक्षितुम्
(स) परिज्ञाय
(द) श्रोतुम्
(ङ) श्रुत्वा
उत्तर:
(क) हन्तव्यः – हन् + तव्यत्
(ख) हतः – हन् + क्त
(ग) भक्षितुम् – भक्ष् + तुमुन्
(स) परिज्ञाय – परि + ज्ञा + ल्यप्
(द) श्रोतुम् – श्रु + तुमुन्
(ङ) श्रुत्वा – श्रु + क्त्वा

प्रश्न 9.
उदाहरणानुसारं वर्तमानकालिक क्रियापदानां कालपरिवर्तनं कुरुत
उत्तर:
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 7 सुविज्ञातमेव विश्वसेत् img-3

प्रश्न 10.
निम्नलिखितानि अव्ययानि प्रयुज्य वाक्यानि स्वयत
यदि-यदि पुस्तकम् अस्ति तर्हि पठतु।
उत्तर:
सदा – सदा भूपेन्द्र पटेलः पठति तदा दुर्गेशः लिखति।
कदा – त्वम् कदा विद्यालयं गच्छसि।
अथ – अथ राम कथा श्रावयामि।
एव – अहम् एव गच्छामि।
इति – इति सः भोपालुपरम् अगच्छत्।
अपि – अहम् अपि छात्रः अस्मि।
अत्र – अत्र उत्कृष्ट विद्यालयः अस्ति।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित शब्दानां द्विवचन बहुवचनं च लिखत
उदाहरणं यथा
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 7 सुविज्ञातमेव विश्वसेत् img-4

सुविज्ञातमेव विश्वसेत् पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

कथाएँ प्रायः उपदेशपरक होती हैं। इनमें सरल, रोचक एवं विनोदप्रिय शैली में जीवनोपयोगी विचार व्यक्त किए गए हैं। संस्कृत साहित्य में कथा साहित्य की बहुत दीर्घ परंपरा रही है। संस्कृत कथाकारों में मूर्धन्य नारायण पंडित ने बालकों को शिक्षा के उद्देश्य से हितोपदेश की रचना की। प्रस्तुत पाठ भी हितोपदेश से ही संकलित किया गया है।

सुविज्ञातमेव विश्वसेत् पाठ का हिन्दी अर्थ

1. अस्ति भागीरथीतीरे गृध्रकूटनाम्नि पर्वते महान पर्कटीवृक्षः। तस्य कोटरे दैवदुर्विपाकाद्गलितनस्व-नयने जरद्गवनामा गृध्रः प्रतिवसति। अथ कृपया तज्जीवनाय तवृक्षवासिनः पक्षिणः स्वाहारात् किञ्चित्-किञ्चिदुद्धृत्य ददति। तेन असौ जीवति। अथ कदाचिद् दीर्घकर्णनामा मार्जारः पक्षिशावकान्भक्षितुं तत्रागतः। ततस्तमायान्तं दृष्ट्रवा पक्षिशावकैर्भयार्तेः कोलाहलः कृतः। तच्छ्रुत्वा जरद्गवेनोक्तम्-कोऽयमायाति! दीर्घकर्णो गृध्रमवलोक्य सभयमाह-“हा हतोऽस्मि’ अधुनास्य सन्निधाने पलायितुमक्षमः।

तद्यथा भवितव्यं तद्भवतु। तावविश्वासमुत्पाद्यास्य समीपं गच्छामि। इत्यालोच्योपसृत्याब्रवीत-आर्य! त्वामभिवन्दे। गृध्रोऽवदत्-कस्त्वम्? सोऽवदत्-मार्जारोऽहम्। गृध्रो ब्रूते-दूरमपसर। नो चेत् हन्तव्योऽसि मया। मार्जारोऽवदत्-श्रूयतां तावद्स्मद्वचनम्। ततो यद्यहं व ध्यस्तदा हन्तव्यः यतः

जातिमात्रेण किं कश्चित् हन्यते पूज्यते क्वचित्।
व्यवहारं परिज्ञाय वध्यः पूज्योऽथवा भवेत् ॥

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शब्दार्थ :
पर्कटीवृक्षः-पाकड़ का वृक्ष-Tree of Pakar; दैवदुर्विपाकात्-दुर्भाग्य से-Unfortunatly; किञ्चिदुधृत्य-थोड़ा-थोड़ा निकालकर-To take out of few; निरामिषाशी-मांस का भक्षण न करने वाला-Vegitarian; विद्यावयोवृद्धभ्यो-विद्या और अवस्था में बड़ी से-Knowledge and age an old; वीतरागेणेदम्-विषय वासना को छोड़ने के बाद-After living enjoyment of object of sense; चान्द्रायणव्रतम्-एक प्रकार का व्रत-The fast of karvachouth; कोलाहलः-कलरव-Noise; श्रूयतां-सुनिए-Hello; हन्तव्य-मारना चाहिए-Should kill; निते-गानना चाहिए-Should agree; परिज्ञाय-जानकार-Knowledge.

हिन्दी का अर्थ :
भागीरथी नदी के तट पर स्थित गृद्धकूट नामक पर्वत पर एक विशाल पाकड़ का वृक्ष है। उस (वृक्ष) के कोटर में जरद्गव नामक एक गृद्ध रहता था जिसके दैव गति से नख आदि गल गए थे और आँखों से अंधा था। अतः उसके जीवन के रक्षार्थ उस वृक्ष पर रहने वाले पशु-पक्षी दया वश अपने आहार से थोड़ा-थोड़ा बचाकर उसे भी दे देते थे जिससे वह जीवित था। एक बार दीर्घकर्णनामक बिलाव पक्षियों के भक्षण के उद्देश्य से वहाँ आया। उस बिलाव को वहां आया देख पक्षि-शावकों ने भयभीत होकर कोलाहल किया। उसे सुन जरद्गव बोला-यह कौन आ रहा है? दीर्घकर्ण गद्ध को देख भयभीत होकर बोला-हा!

अब तो मैं मारा गया? अब तो इसके सामने से भागने में भी अक्षम हूँ। तब भी जो होगा देखा जाएगा-ऐसा विश्वास मन में भरकर उसके समीप गया और बोला-आर्य! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। गृद्ध ने कहा-तुम कौन हो? वह बोला-में बिलाव हूँ। गिद्ध बोला-दूर हटो अन्यथा तुम मेरे द्वारा मारे जाओगे। बिलाव बोला-मेरी दो बातें सुन लीजिए। उसके बाद यदि मैं मारने योग्य हूँ तो मार डालिए क्योंकि जाति मात्र से ही कोई मारने या पूजने योग्य नहीं हो जाता बल्कि व्यवहार के कारण मारने या पूजने योग्य होता है।

2. गृध्रो ब्रूते-ब्रूहि किमर्थमागतोऽसि? सोऽवदत्-अहमत्र गङ्गतीरे नित्यस्नायी निरामिषाशी ब्रह्मचारी चान्द्रायण व्रतमाचरंस्तिष्ठामि। “यूयं धर्मज्ञानरता विश्वासभूमयः” इति पक्षिणः सर्वे सर्वदा ममाग्रे प्रस्तुवन्ति। अतो भवद्भ्यो विद्यावयोवृद्धेभ्यो धर्म श्रोतुमिहागतः। भवन्तश्चैतादृशा धर्मज्ञा यन्मामतिथि हन्तुमुद्यताः। गृहस्थ धर्मश्चैषःयदि वा धजं नास्ति तदा प्रीतिवचसात्यतिथिः पूज्य एव।

शब्दार्थ :
किमर्थं-किस लिए-For what; अहम् अत्र-मैं यहाँ-I here; तिष्ठामि-करूँगा-Will do; हन्तुमुद्यताः-मारने के लिए तैयार-Ready to kill.

हिन्दी अर्थ :
गृद्ध बोला-बोलो, किस अर्थ से यहाँ आए हो? तब वह बोला-यहाँ मैं गंगा के तट पर आकर नित्य स्नान करता हूँ, निरामिष हूँ और ब्रह्मचर्य धारण किए हुए चान्द्रायण व्रत का अनुष्ठान करता हूँ। आप धर्म के ज्ञान से परिपूर्ण हो और विश्वास करने योग्य हो-ऐसा सभी पक्षी मेरे समक्ष आकर बोलते हैं। आप विद्या में पारंगत एवं आयु में भी बड़े हैं, धर्म-चर्चा सुनने आपके यहाँ आया हूँ। किन्तु इतना धर्म मर्मज्ञ होने पर भी मुझे मार डालने के लिए उद्यत हैं। गृहस्थ धर्म तो यह है कि अतिथि सेवा करने के लिए धन न होने पर प्रेम पूर्ण वचन से भी अतिथि की सेवा होती है।

3. गृध्रोऽवदत्-“मार्जारो हि मांसरुचिः।” पक्षिशावकाश्चात्र निवसन्ति तेनाहत्मेवं ब्रवीमि। तत्छ्रुत्वा मार्जारो भूमिं स्पृष्ट्वा कर्णौ स्पृशति ब्रूते च-मया धर्मशास्त्रं श्रुत्वा वीतरागेणेदं दुष्करं व्रतं चान्द्रायणमध्यवसितम्। परस्परं विवदमानानामपि धर्मशास्त्राणाम् “अहिंसा परमो धर्मः!” इत्यत्रैकमत्यम्।

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शब्दार्थ :
अवदत्-बोले-Spoke; तेनाहमेवं-इससे मैं इस प्रकार-I am for this, that; वीतरागेणेदं-राग आदि चले गए हों-Attachtment and aversion has gone; चान्द्रायणमध्यवसितम्-चन्द्रायण व्रत का अनुष्ठान-worship of Chandrayan fast; इत्यत्रैकमत्यम्-एक मत है-For one aim.

हिन्दी अर्थ :
तब गृद्ध बोला-बिलाव की रुचि मांस में होती है और यहाँ पक्षियों के बच्चे रहते हैं इसलिए मैंने ऐसा कहा। यह सुनकर बिलाव पृथ्वी का स्पर्श कर कानों को पकड़ता हुआ बोला-मैं धर्मशास्त्र का श्रवण करते हुए वीतराग होकर इस दुष्कर चान्द्रायण व्रत का अनुष्ठान कर रहा हूँ। परस्पर विवाद मानने वालों में भी धर्मशास्त्र कहते हैं-अहिंसा ही परम धर्म है।

4. एवं विश्वास्य स मार्जारस्तरुकोटरे स्थितः। ततो दिनेषु गच्छत्सु पक्षिशावकानाक्रम्य कोटरमानीय प्रत्यहं खादति। येषामपत्यानि खादितानि तैः शोकातैर्विलपद्भिरितस्ततो जिज्ञासा समारब्धा। तत्परिज्ञाय मार्जारः कोटरान्निः सृत्य बहिः पलायितः। पश्चात्पक्षिभिरितस्ततो निरूपयद्भिः तत्र तरु कोतरे शावकास्थीति प्राप्तानि। अनन्तरं ते ऊचुः-“अनेनैव जरद्गवेनास्माकं शावकाः खादिताः” इति सर्वैः पक्षिभिनिश्चित्य गृध्रो व्यापादितः अतोऽहं ब्रीवीमि –
अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित्।
मार्जारस्य हि दोषेण हतो गृध्रो जरद्गवः॥

शब्दार्थ :
मार्जारस्तकोटरे-विलाव वृक्ष की कोटर में-Cat in the hole of tree; गच्छसु-जाने लगा-To going; निसृत्य-बाहर निकलकर-After get out; पलायितः-भागा-Run; प्राप्तानि-प्राप्त किया-Received; अनेनैव-एक तरह-Like that; व्यापादितः-मर गए-Death; अज्ञातकुलशीलस्य-जिसका कुल व शील ज्ञात नहीं-Who has no knowledge of family & nature; जरद्गवः-जरद्गव ने-Jaradgavaney.

हिन्दी अर्थ :
इस तरह गृद्ध को विश्वास में लेकर वह बिलाव वृक्ष के कोटर में रहने लगा। फिर कुछ दिन बीतने पर पक्षि शावकों को बिलाव खा गया था वे पक्षी शोक के कारण विलाप करते हुए अपने बच्चों को ढूँढ़ने लगे। यह जान बिलाव कोटर से निकलकर भाग गया। पक्षियों द्वारा इधर-उधर अच्छी तरह ढूँढ़े जाने पर उस वृक्ष के कोटर में शावकों की अस्थियां मिलीं तब वे बोले-इस गृद्ध ने ही हमारे बच्चों को खाया-ऐसा निश्चय कर सभी पक्षियों ने गृद्ध को मार डाला। इसीलिए मैं कहता

जिसके चरित्र एवं कुल की जानकारी न हो, उसे कभी भी अपने पास नहीं रखना चाहिए क्योंकि इसी भूल के कारण बिलाव के कर्मों का फल जरद्गव को भोगना पड़ा।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 14 वीरबाला

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 14 वीरबाला (संवादः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 14 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)-
(क) वीरबालायाः नाम किम्? (वीरबाला का क्या नाम था?)
उत्तर:
चम्पा। (वीरबाला का नाम चम्पा था)

(ख) चम्पायाः पितुः नान किम्? (चम्पा के पिता का नाम क्या था?)
उत्तर:
महाराणा प्रताप। (महाराणाप्रताप)।

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(ग) रोटिकाद्वयम् कुत्र स्थापितम्? (दोनों रोटियाँ कहाँ रखी थीं?)
उत्तर:
पाषाणतले। (पत्थर के नीचे)!

(घ) उद्वेलितः प्रतापः किं कर्तुमुद्यतः अभवत्? (दुःखी प्रताप क्या करने के जिए तैयार हो गए?)
उत्तर:
अकबरस्याधीनता। (अकबर की आधीनता स्वीकार करने के लिए)।

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) अस्माकं देशे काः काः वीरबालाः जाताः? (हमारे देश में कौन-कौन-सी वीरबालाएँ हुईं?)
उत्तर:
अस्माकं देशे चम्पा, कृष्णा, वीरमती, पद्मादयः वीरबालाः जाताः। (हमारे देश में चम्पा, कृष्णा, वीरमती, पद्ममा जैसी वीरबालाएँ हुईं।)

(ख) प्रतापेन का प्रतिज्ञा कृता? (राणा प्रताप ने क्या प्रतिज्ञा की?).
उत्तर:
प्रतापेन प्रतिज्ञा कृताः अकबरस्य अधीनतां न स्वीकृतवान्। (प्रताप ने अकबर की आधीनता न स्वीकरने की प्रतिज्ञा की।)

(ग) चम्पया रोटिकाद्वयम् किमर्थं संरक्षिता? (चम्पा दोनों रोटियों को किसलिए सुरक्षित रखी थी?)
उत्तर:
चम्पया रोटिकाद्वयम् अनुजाय भोजनार्थम् संरक्षिता। (चम्पा दोनों रोटियों को छोटे भाई के भोजन के लिए सुरक्षित रखी थी।)

(घ) राजकुमारः कथं सुप्तवान् आसीत्? (राजकुमार कैसे सो गया?)
उत्तर:
राजकुमारः बुभुक्षितः सुप्तवान् आसीत्। (राजकुमार भूखा सो गया।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) महाराणाप्रतापस्य प्रतिज्ञा का आसीत्? (महाराणाप्रताप की प्रतिज्ञा क्या थी?)
उत्तर:
महाराणाप्रतापस्य प्रतिज्ञा आसीत् अकबरस्य अधीनतां न स्वीकृत। (महाराणा। प्रताप की प्रतिज्ञा थी कि अकबर की अधीनता न स्वीकारूँगा।)

(ख) चम्पा केन कारणेन मूर्छिता जाता? (चम्पा किस कारण से मूर्छित हो गई?)
उत्तर:
चम्पा दौर्बल्यात् कारणेन मूर्च्छिता जाता। (चम्पा दुर्बल होने के कारण मूर्च्छित हो गई।)

(ग) महाराणाप्रतापः किमर्थं चिन्तामग्नः आसीत्? (महाराणाप्रतापः को किस बात की चिंता थी?)
उत्तर:
महाराणाप्रतापः अतिथिः भोजनार्थम् चिन्तामग्नः आसीत्। (महाराणाप्रताप को अतिथि के लिए भोजन की व्यवस्था की चिंता थी।)

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प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 14 वीरबाला img-1

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् ‘आम्’ अशुद्धवाक्यानां समक्ष कोष्ठके ‘न’ इति लिखत
(क) अरावलीपर्वतस्य उपत्यकायां महाराणाप्रतापः एकाकी आसीत्। (आम्)
(ख) अतिथिः महाराणागृहात् अनश्नन् गतवान्।
(ग) चम्पा स्वभागस्य रोटिकां स्वानुजं ददाति स्म।
(घ) महाराणाप्रतापः आधीनताविषये पत्रं लिखितवान्।
उत्तर:
(क) (आम्)
(ख) (न)
(ग) (आम्)
(घ) (न)

प्रश्न 6.
उचितविकल्पेन वाक्यानि पूरयत
(क) अरावलीपर्वतस्य उपत्यकायाम् कष्टमनुभूतम्। (उपत्यकायाम्/गुहायाम्)
(ख) पाषाणतले रोटिकाद्वयम् संरक्षिता आसीत्। (रोटिका/रोटिकाद्वयम्)
(ग) चम्पामूर्छिता जाता अनश्नन्। (अश्नन्/अनश्नन्)
(घ) कष्टान् अवलोक्य महाराणाप्रतापः उद्वेलितः जातः। (जाता/जातः)
(ङ) राजकुमारः बुभुक्षया पीडित सुप्तवान्। (बुभुक्षया/पिपासया)

प्रश्न 7.
कोष्टकात् चित्वा वाक्यानि रचयत्
यथा- घटना – एक घटना महाराणाप्रताप कालीना आसीत्
(क) चम्पा – एषा महाराणाप्रतापस्य पुत्री आसीत्।
(ख) राजकुमारः – एषः महाराणाप्रतापस्य पुत्रः आसीत।
(ग) शपथः – महाराणाप्रतापः शपथः गृहीतवान्।
(घ) पत्रम् – महाराणाप्रतापः पत्रम् अलिखत्।
(ङ) वीरः – महाराणाप्रतापः वीरः च आसीत्।

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प्रश्न 8.
अधोलिखितशब्दानां धातुं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 14 वीरबाला img-2

प्रश्न 9.
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 14 वीरबाला img-3

प्रश्न 10:
निम्नलिखत क्रियापदानां धातुं लकारं पुरुषं वचनञ्च लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 14 वीरबाला img-4

प्रश्न 11.
निम्ललिखित अव्यायानां वाक्यप्रयोगं कुरुत-
उदाहरणं यथा-
कदा – सः कदा पठति? तदा-यदा अहं आगमिष्यामि तदा त्वम् गमिष्यसि
अद्य – अद्य सोमवासरः अस्ति। ह्यः-ह्यः दीपावली अस्ति।।
कृते – संस्कृतस्य कृते अहं जीवनम् ददामि।
एव – अहं दुग्धं न पिवामि, अहं चायमेव पिवामि।
च – मोहितः राशिन्तश्च विद्यालयं गच्छति।

वीरबाला पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

मेवाड़ के राजा उदयसिंह के पुत्र महाराणा प्रताप पिता के समान विशाल, वीर व पराक्रमी थे। उसने प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं अकबर को पराजित नहीं करूँगा और चित्तौड़ के दुर्ग को नहीं जीत लूँगा तब तक पत्ते में भोजन करूँगा तथा जमीन पर शयन करूँगा परिवार पर आए संकट से विचलित होकर उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा बदलने की इच्छा की किन्तु उनकी पुत्री चम्पा के जीवन का उत्सर्ग करने के बाद महाराणा प्रताप अपनी पूर्व प्रतिज्ञा पर दृढ़ होकर मेवाड़ के गौरव की रक्षा के लिए पुनः प्रतिज्ञा की। प्रस्तुत पाठ में भारतीय बालाओं की गौरव गाथा है

वीरबाला पाठ का हिन्दी अर्थ

1. शिक्षक-भो छात्राः अस्माकं भारतदेशे बहव्यः वीरबालाः चम्पा, कृष्णा, वीरमती, पद्मा दयः सञ्जाताः।
आनन्द :
आचार्य! एतासु केयम् चम्पा? कृपया तद्विषये कथयतु। शिक्षक-आम्! शृणोतु, किं भवन्तः महाराणाप्रताप विषये जानन्ति?

वेदान्त :
किं स एव महाराणाप्रतापः यः भारतवर्षभूषणः स्वदेशस्वातन्त्र्याभिमानी च।

शिक्षक :
आम् तस्यैव पुत्री आसीत् चम्पा।

आरती :
तस्याः विषये विस्तारेण न जानीमः।

शिक्षक :
शृण्वन्तु। महाराणाप्रतापः अकबरस्य अधीनतां न स्वीकृतवान्। अनेन कारणेन अरावलीपर्वतस्य उपत्यकाय गुहासु वनेषु च सपरिवारंपरिभ्रमन् अत्यधिकं कष्टम् अन्वभवत्।

भरत :
तत्र ते कुत्र स्वपन्ति, स्म किञ्च खादन्ति स्म?

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शब्दार्थ :
बहव्य-बहुत-सी-Many; आदय-आदि-and; सजाता-हुए-Happen; केयम्-यह कौन-who is that; तद्विषये-उस विषय में-in that subjects;जानन्ति-जानते हैं-knows; किं-कौन-who; भवन्त-आप सब-every body; स-वह-He, Smile, it; एव-भी-also; भूषण-भूषण-Bhushan; तस्यैव-उसका ही-His; आसीत्-था-was; तस्याः -उसके-His; शृण्वन्तु-सुनिए-listen; जानीमः-जानते हैं-knows; अनेन-इस तरह-This type; अन्वभवत्-अनुभव किया-felt; स्वपन्ति-सोते थे-were sleeping, स्म-थे-were.

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक-हे विद्यार्थियो! हमारे देश भारत में अनेक वीर बालाएँ-कृष्णा, चंपा, वीरमती, पद्मा आदि हुई हैं।

आनन्द :
गुरुजी! इनमें चम्पा कौन थी? कृपया उसके विषय में बताएँ।

शिक्षक :
ठीक है, सुनो। क्या आप लोग महाराणा प्रताप के विषय में जानते हैं?

वेदान्त :
क्या वही महाराणा प्रताप जो भारतवर्ष के गौरव तथा अपने देश की स्वतंत्रताभिमानी थे?

शिक्षक :
हाँ, उन्हीं की पुत्री चंपा थी।

आरती :
उसके विषय में हम विस्तारपूर्वक नहीं जानते।

शिक्षक :
सुनो! महाराणा प्रताप ने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता नहीं स्वीकार की जिसके कारण उन्होंने अरावली पर्वत की घाटियों, गुफाओं, उपत्यका में परिवार सहित गुप्त भ्रमण करते हुए अत्यधिक कष्ट पूर्ण जीवन बिताया।

भरत :
(उन उपत्यकाओं में) वे कहाँ सोते थे और क्या खाते थे।

2. शिक्षक-अहोरात्रं पदातिरेव ते चलन्ति स्म भूमौ शिलायां वा स्वपन्ति स्म। बहुधा उपवासं कृत्वा यदा कदा। बदरीफलानि वा तृणरोटिकांश्च खादन्ति स्म। नैकवारं ईदृशः समयः आगतः यदा तृणरोटिकाम् अपि त्यक्त्वा पलायनार्थं शत्रुभि विवशीकृताः। तस्मिन् काले प्रतापस्य पुत्री चम्पा एकादशवर्षीया पुत्रश्च चतुर्वर्षीयः आस्ताम्।

शालिनी :
आचार्य। यदि तयोः विषये कापि अस्ति तर्हि नूनं कथयतु।

शिक्षक :
एकदा राजकुमारः चम्पा च नदीतटे क्रीडतः आस्ताम्। तदैव राजकुमारः क्षुधापीडितः अभवत्। सः रोटिकां याचमानः रोदितवान!। सः न जानाति स्म यत् रोटिकायाः ग्रासमेकमपि नास्ति। चम्पा तं कथां श्रावयित्वा विनोदयामास। राजकुमारः बुभुक्षितः एव सुप्तवान्।

प्रियङ्का :
(सोत्साहेन पृच्छति) तदा किम् अभवत्?

शिक्षकः :
शृणवन्तु! सुप्तं अनुजं अङ्के नीत्वा चम्पा शयनाय मातुः समीपे आगत्य पितरं चिन्तामग्नम् अपश्यत् अपृच्छच्च भवान् किमर्थं चिन्तातुरोऽस्ति? तदा तेनोक्तम्-सुते। अस्माकं गृहे एकः अतिथिः आगतः, किं चित्तौड़महाराणागृहात् सः अनश्नन् एव गच्छेत् तदा चम्पा अवदत पितः! भवान् मा चिन्तयतु। ह्यः भवता दत्तम् रोटिकाद्वयं सुरक्षितम् अस्ति! मे बुभुक्षा नास्ति। भवान् रोटिकाद्वयम् तस्मै ददातु।

शब्दार्थ :
अहोरात्रं-रात्रि में-on night; चलन्ति-चलते हैं-walks; स्म-थे-were; स्वपन्ति-सोते थे-were slept; बहुधा-बहुत अधिक-very much; कृत्वा-करके-do; वदरीफलानि-बेर का फल-fruit of Bare; तृणरोटिकांश्च-और घास की रोटियाँ-and grass’s chapati; त्यक्त्वा -छोड़कर-After left; पलायनार्थ-भागने के लिए-for running; तस्मिन्-उस-That; प्रतापस्य-प्रताप के-famous; तयो-वे दोनों-these two; कापि-कोई भी-Anybody; वार्ता-वार्ता-Talking, conversation; नूनं-निश्चित ही-certainly;, कथयतु-कहिए-Say; च-और-and; तदेव-उसके अनुसार-According to him;अभवत्-हुआ-Happend; रोटिकां-रोटी को-for chapati; यत्-जो-who; तं-उसको-him; श्रावयित्वा-सुनकर-Listening; एव-भी-Also; मुप्तवान्-सो गया-he slept; नीत्वा-ले जाकर-for going; आगत्य-आकर-for coming; पितरं-माता-पिता-Mother and father; देखा-Seeing; अपश्यत्-देखा-seeing; भवान्-आप-you; तेनोक्तय-उसके कहे अनुसार-his according to saying; आगत-आया-came; गच्छेत्-जाने के लिए-for going; ह्य-बीता हुआ कल-Past; दत्तम्-देने के लिए-for giving; मे-मुझे-me: तस्मै-उसे-His; ददातु-दो-give.

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हिन्दी अर्थ :
शिक्षक-वे रात्रि में चलते थे, भूमि एवं शिलाओं पर सोते थे। अधिकतर उपवास करते थे। कभी-कभी बेर के फल एवं तृण आदि की रोटियाँ खाते थे। एक बार ऐसा समय आ गया जब शत्रुओं ने घास की रोटी खाता छोड़ भागने पर विवश कर दिया। उस समय प्रताप की पुत्री चम्पा ग्यारह वर्ष एवं बालक 4 वर्ष का था।

शालिनी :
गुरु जी! यदि उन दोनों के विषय में कोई कथा हो तो कहें।

शिक्षक :
एक बार राजकुमार एवं चम्पा नदी के तट पर क्रीड़ा कर रहे थे तभी राजकुमार भूख से पीड़ित हो गए और वह रोटियों की माँग करते हुए रोने लगे। उन्हें यह पता नहीं था कि रोटियों के लिए घास नहीं है। चम्पा ने उसे कहानियाँ सुनाकर मन बहलाया। राजकुमार भूखा-प्यासा ही सो गया।

प्रियंका :
(उत्साहपूर्वक) तब क्या हुआ?

शिक्षक :
सुनो! फिर चम्पा सोते हुए अनुज को गोद में लेकर माँ के पास आई तो पिता को चिंता में निमग्न देखा और पूछा-आप क्यों चिंतित हैं? उन्होंने (प्रताप) ने कहा-बेटी! हमारे घर में एक अतिथि आया है। क्या चित्तौड़गढ़ के महाराजा के घर से वह भूखा ही जाएगा? चम्पा बोली-पिताजी! आप चिंतित न हों। आपने कल जो दो रोटी मुझे दी थी, वे अब भी मसुरक्षित रखी हुई हैं। आप दोनों रोटी मेहमान को खिलाएँ। मुझे भूख नहीं है।

3. सर्वेश-ततः किम् अभवत्?

शिक्षक :
तदनन्तरं चम्पा पाषाणतले संरक्षितां तृणरोटिकाम् आनीत्य अतिथये ददाति अतिथिः उपभुज्य गतवान्। परन्तु स्वपरिवार प्रति आगतान् कष्टान् अवलोक्य उद्वेलितः महाराणा स्वप्रतिज्ञां परित्यज्य अकबरस्याधीनता विषये पत्रमलिखत्।

प्रभा :
तदनन्तरं किं जातम?

शिक्षक :
तस्यै बालायै नैक दिनान्तराले याः तृणरोटिकाः मिलन्ति स्म ताः अपि अनुजं भोजयति स्म। अनेन कारणेन क्षुत्क्षामा वीरबाला चम्पा अति दुर्बलतां प्राप्ता। एकदा दौर्बल्यात् सा मूर्छिता जाता। तदा महाराणाप्रतापः ताम् अङ्के उत्थाय रुदन्नवदत्-पुत्रि! इतोप्यधिकम! दुःखम् त्वाम् न दास्यामि। मया अकबरस्य कृते पत्रं लिखितम्। अर्धचेतनायाम् इदम् पितुर्वाक्यं श्रुत्वैव सा पितरमवदत् तात। भवान् किं कथयति, अस्मभ्यं जीवनरक्षणाय दासतां स्वीकरिष्यति भवान्। किं वयम् कदापि न मरिष्यामः? देशस्य अवमानं मा करोतु! देशस्य कुलस्य च गौरवरक्षार्थं लक्षवारमपि यदि वयम् प्राणानुत्सृजामः तदपि न्यूनमस्ति।

अतः मम आग्रहः एषः यत् भवान् कदापि अकबरस्य अधीनतां मा स्वीकरोतु। वीरबाला चम्पा एवं वदन्ती एव महाराणाङ्के चिरनिद्रां गता। ततः महाराणाप्रतापः पराधीनतायाः विचारम् अत्यजत्। इत्थं चम्पया स्वजीवनोत्सर्गेण न केवलं महाराणाप्रतापस्य विचारपरिवर्तनम् : अपितु मेवाड़गौरवस्य रक्षणमपि विहतम्।

शब्दार्थ :
अभवत्-हुआ-happen; तदनन्तरं-इसके बाद-After this; आनीत्यलाया-getting; ददाति-देता है-gives; गतवान्-गया-went; स्वपरिवारं-अपने परिवार को-for own family; आगतान्-आया-came; उद्वेलित-बहुत दुःखी-very sad; स्वप्रतिज्ञां-अपनी प्रतिज्ञा-our promise; तदनन्तरं-इसके बाद-After this; मिलन्ति-मिलते हैं-meet; स्म-थे-was; ता-उसके-his; अपि-भी-also; अनेन-इस कारण-That reason; अङ्के-गोद में-In lap; त्वाम्-तुम में-In you;मया-मेरे-my; कृते-के लिए-for; अर्धचेतनयाम्-अर्ध चेतन स्थिति में-half unconscious situation; श्रुत्वैव-सुनकर भी-to listening; भवान्-आप-you; कथयति-कहें-say; अस्मभ्यं-हमारे-our; दासतां-दासता-Slavery; वयम्-हम सब-we all; मरिष्याम-मरेंगे-will die; अवमान-अपमान-Defame; न्यूनमस्ति-थोड़ा-Little; मम-मेरा-my; आग्रह-निवेदन-Application; अधीनता-अधीनता-Under, Ruled; स्वीकरोतु-स्वीकार करो-to accept; अत्यजत्-छोड़ा-left; इत्थं-इस तरह-That type; रक्षणमपि-रक्षा में भी-In defence also; निहितम्-निहित-Constant.

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हिन्दी अर्थ :
सर्वेश-तब क्या हुआ?

शिक्षक :
तब चम्पा पत्थर के नीचे सुरक्षित रखी तृण की रोटियां निकाल कर अतिथि को प्रदान कर दी। अतिथि उसका उपभोग कर चले गए। परन्तु अपने परिवार पर आए कष्ट को देखकर राजा प्रताप का मन विचलित हो उठा और उन्होंने प्रतिज्ञा को छोड़कर अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए पत्र लिखा।

प्रभा :
फिर क्या हुआ?

शिक्षक :
उनके बच्चों को प्रतिदिन रोटी न मिलकर एक दिन के अंतराल पर रोटी खाने को मिलती थी। उसे भी उसका छोटा भाई खा जाता था इसलिए वह लड़की चम्पा बहुत दुबली हो गई। एक बार दुर्बलता के कारण वह बेहोश हो गई। तब महाराणा प्रताप उसे गोद में उठा रोते हुए बोले-पुत्री! अब मैं इससे अधिक कष्ट तुम्हें नहीं दूंगा, मैं अकबर को पत्र लिखूगा। अर्द्ध मूर्छितावस्था में इस तरह (हताश) पिता के वाक्यों को सुनकर बोली-पिताजी! यह आप क्या कह रहे हैं? हमारे जीवन की रक्षा के लिए आप गुलामी स्वीकार करेंगे? क्या हम कभी मरेंगे नहीं? पिताजी! देश का अपमान न करें देश और कुल के मान की रक्षा के लिए यदि हमें लाखों बार प्राण देने पड़ें तो भी वह थोड़ा है।

मेरी प्रार्थना है कि आप इस तरह कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार न करें…इस प्रकार कहती हुई वह वीर बाला चम्पा महाराणा प्रताप की गोद में ही प्राण त्याग दिए। तब महाराणा ने अधीनता स्वीकार करने की बात अपने मन से निकाल दी। इस प्रकार चम्पा के प्राणोत्सर्ग से न केवल महाराणा के विचारों में परिवर्तन हुआ, बल्कि मेवाड़ के गौरव की रक्षा भी हुई।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 13 गीतादर्शनम्

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 13 गीतादर्शनम् (पद्यम्)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 13 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) ईश्वरः किमर्थम् आत्मानं सृजति? (ईश्वर किसलिए आत्मा का सृजन करता है?)
उत्तर:
धर्मउत्थानाय। (धर्म के उत्थान के लिए)।

(ख) ते अधिकाराः कुत्र? (तुम्हारा अधिकार क्या है?)
उत्तर:
कर्मानिश्व। (स्वयं का कम)।

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(ग) जातस्यध्रुवं किम्? (जन्म लेने वाले का क्या होता है?)
उत्तर:
मृत्युः। (मृत्यु होती है।)

(घ) अन्नात् कानि भवन्ति? (अन्न से क्या होता है?)
उत्तर:
भूतानि। (भूख मिटती है।)

(ङ) कामात् कः अभिजायते? (काम से क्या पैदा होता है?)
उत्तर:
क्रोधो। (क्रोध उत्पन्न होता है।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) तत्त्वदर्शिनः कथम् उपदेक्ष्यन्ति? (तत्त्वज्ञाता क्या उपदेश देते हैं?)
उत्तर:
तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ज्ञानम् उपदेयन्ति। (तत्त्वज्ञाता ज्ञान का उपदेश देते हैं।)

(ख) मनः कथं वशी भवति? (मन किस तरह वश में होता है?)
उत्तर:
मनः यतः यतः निश्चरति ततः ततः नियम्य आत्यनि एव वशम् नयेत्। (मन यहाँ-वहाँ विचरण करता है तब स्वयं द्वारा उसे वश में किया जाता है।)

(ग) त्वं कस्मिन्नर्थे न शोचितुमर्हसि? (तुम्हें किसके लिये सोच नहीं करना चाहिए?)
उत्तर:
त्वं जातस्य मृत्युः ध्रुवः मृतस्य जन्म ध्रुवं च तस्मात् अपरिहार्ये अर्धे शोचितुम् न अर्हषि।। (जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मर रहा है वह जन्मेगा अतः व्यर्थ सोच नहीं करना चाहिये।)

(घ) बुद्धिनाशात् किं भवति? (बुद्धि के नाश होने से क्या होता है?)
उत्तर:
बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति। (बुद्धि के नाश होने से व्यक्ति नष्ट हो जाता है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) पुरुष कथं विनश्यति? (पुरुष का विनाश कैसे होता है?)
उत्तर:
पुरुषः बुद्धिनाशात् विनश्यति। (पुरुष का विनाश बुद्धि के नाश होने पर होता है।)

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(ख) तत्त्वदर्शिनः कथं उपदेक्ष्यन्ति? (तत्त्वदर्शी क्या उपदेश देते हैं?)
उत्तर:
तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति। (तत्त्वदर्शी ज्ञान का उपदेश देते हैं।)

(ग) ईश्वरः कदा सम्भवति? (ईश्वर कब जन्म लेता है?)
उत्तर:
यदा, यदा धर्मस्य ग्लानिः अधर्मस्य अभ्युत्थानम् भवति तदा हि अहम् आत्मानम् सृजामि। (जब-जब पृथ्वी में धर्म का नाश होता है तब धर्म को बचाने के लिये और अधर्म का नाश करने के लिये ईश्वर अवतार लेता है।)

(घ) यज्ञाः कस्मात् संभवति? (यज्ञ किससे संभव है?)
उत्तर:
यज्ञ कर्मात् संभवति। (यज्ञ कर्म से संभव है।)

प्रश्न 4.
रेखाङ्कितशब्दान् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) क्रोधात् सम्मोहः भवति। (क्रोध से सम्मोह होता है।)
उत्तर:
कस्मात् सम्मोहः भवति? (किससे सम्मोह होता है?)

(ख) स्मृतिविभ्रमः सम्मोहात् भवति। (स्मृति भ्रम सम्मोह से होती है।)
उत्तर:
कस्मात् स्मृतिविभ्रमः भवति? (किससे स्मृति भ्रमित होती है?)

(ग) बुद्धिनाशः स्मृतिभ्रशांत् भवति। (बुद्धि का नाश स्मृतिविभ्रम से होता है।)
उत्तर:
कस्य नाशः स्मृतिभंशात भवति? (किसका नाश स्मृति विभ्रम से होता है?)

(घ) यज्ञात् भवति पर्जन्यः। (यज्ञ से पर्जन्य होता है।)
उत्तर:
यज्ञात् कः भवति? (यज्ञ से क्या होता है?)

प्रश्न 5.
श्लोकपूर्ति कुरुत
उत्तर :
(क) विद्यार्थी स्वयं करें।
(ख) अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न संभवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद्भवः॥

प्रश्न 6.
उचितं योजयत्-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 13 गीतादर्शनम् img-1

प्रश्न 7.
उचितशब्देन रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति।
(ख) ते कर्मणि एवं अधिकारः।
(ग) जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः।
(घ) ध्यायतो विषयानुपुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

प्रश्न 8.
अधोलिखितपदाना पर्यायवाचि लिखत
(क) साधुः = सज्जनः
(ख) पर्जन्यः = जलम्
(ग) चञ्चलम् = लोलम्
(घ) यज्ञ = अध्वरः

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प्रश्न 9.
अधोलिखत पदानां विलोमपदानि लिखत
(क) सङ्गः = पृथकः
(ख) मृत्युः = जन्मः
(ग) धर्मः = अधर्मः
(घ) अन्यः = विशेषः
(ङ) परित्राणः = विनाशः।

प्रश्न 10.
पञ्चमी विभक्तिः स्थाने तसिल (तः) प्रत्ययं इति योजयित्वा लिखत
यथा- ग्रामात् – ग्रामतः
(क) सङ्गात् – सङ्गतः
(ख) कामात् – कामतः
(ग) क्रोधात् – क्रोधतः
(घ) सम्मोहात् – सम्मोहतः
(ङ) स्मृतिभ्रंशात् – स्मृतिभ्रंशतः।
(च) बुद्धिनाशात् – बुद्धिनाशतः
(छ) अन्नात्। – अन्नतः।
(ज) पर्जन्यात् – पर्जन्यतः
(स) यज्ञात् – यज्ञतः।

प्रश्न 11.
सन्धिं कुरुत
(क) अभि + उत्थानम् = अभ्युत्थानम्।
(ख) सृजामि + अहम् = सृजाम्यहम्।
(ग) क्रोधः + अभिजायते = क्रोधाभिजायते।
(घ) मनः + चञ्चलं + अस्थिरम् = मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
(ङ) कर्मणि + एव + अधिकारः + ते = कर्मण्येवाधिकारस्ते।

गीतादर्शनम् पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

विश्व के दर्शन ग्रन्थों में सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ उपनिषद हैं। सारे उपनिषदों का सार है-श्रीमद् भगवद्गीता। यह महाभारत का एक अंश है। इसमें भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं। यह मूल उपदेश है इसलिए युद्धादि कर्तव्य में भी इसका अवश्य ही पालन करना चाहिए।

गीतादर्शनम् पाठ का हिन्दी अर्थ

1. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

शब्दार्थ :
अभ्युत्थानम्-वृद्धि-Progress; अधर्मस्य-अधर्म की-Non-religon; तदा-उस समय-That time; आत्मानम्-अपने को-Own; सृजामि-प्रकट करता है-Presentation.

हिन्दी अर्थ :
हे भारत अर्थात् अर्जुन! जब-जब धर्म का पतन होता, अधर्म की बहुलता होती है तब अधर्म से मुक्ति दिलाने हेतु मैं अपने को प्रकट करता हूँ अर्थात् अवतार लेता हूँ।

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2. परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

शब्दार्थ :
परित्राणाय-उद्धार के लिए-Compulsion; संस्थापन-स्थापितSetup, अर्थाय-करने-DD; सम्भवामि-प्रकट होता है-Appears.

हिन्दी अर्थ :
साधु-पुरुषों के उद्धार हेतु एवं दुष्टों का विनाश करने एवं पुनः धर्म राज्य की स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।

3. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि

शब्दार्थ :
कर्मण्ये-कर्म में-At work; मा-नहीं-Never, not; कदाचन-कभी-Any time; सङ्ग-लिप्त होना-To involve; अस्तु-हों-are.

हिन्दी अर्थ :
हे अर्जुन! तुम्हारा केवल कर्म करने का अधिकार है, उसके फल को प्राप्त करने का अधिकार तुम्हारा नहीं हैं। तुम कर्म के फल की इच्छा वाले मत बनो और न ही अकर्मण्यता की ओर से प्रवृत्त हो।

4. जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।

शब्दार्थ :
ज्ञातस्य-उत्पन्न होना-Rising: ध्रुवो-अटल-Fix; तस्माद-इसलिए-So; अपरिहार्येऽर्थे-अचानक-Suddenly.

हिन्दी अर्थ :
हे अर्जुन! इस संसार में प्राणी का जन्म निश्चित है और मृत्यु भी शाश्वत है। अतः न टाले जाने योग्य कारण के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं है।

5. अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः।
यज्ञाभ्दवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुभ्दवः॥

शब्दार्थ :
सम्भव-सम्भव होती है-possibles; पर्जन्यः-वर्षा-Rain; यज्ञः-यज्ञ का सम्पन्न होना-Finished worship; कर्म-नियत कर्त्तव्य से-with good manner; समुद्धवः-उत्पन्न होता है-grows.

हिन्दी अर्थ :
सारे प्राणी अन्न पर निर्भर हैं। यह अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञादि कर्म से होती है। यज्ञ नियत कर्मों से होता है।

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6. ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामाक्रोधोऽभिजायते॥

शब्दार्थ :
ध्यायतः-चिन्तन करते हुए-meditating; विषयान-इन्द्रिय को-Tosenses; तेषु-उन इन्द्रिय-विषयों में-These senses subject; उपजायते-विकसित होती है-Increase, Develop; सगात्-अशक्ति से-Not interest; अभिजायते-प्रकट होता है-Rising.

हिन्दी अर्थ :
इन्द्रियों के विषय में (निरंतर) सोचने से मनुष्य की उसमें आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। इसी आसक्ति को कामोद्वेग उत्पन्न होता है और काम से क्रोध प्रकट होता है।

7. क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

शब्दार्थ :
भवति-होता है-Happens; सम्मोह-पूर्ण मोह-full love; बुद्धि-नाशः-बुद्धि का विनाश-The mind is kill; प्रणश्यति-पतन होता है-Ruins.

हिन्दी अर्थ :
क्रोध से अविवेक उपजता है, अविवेक के उपजने से स्मरण-शक्ति नष्ट हो जाती है। जब स्मरण-शक्ति विभ्रमित हो जाती है तो बुद्धि का नाश होता है। बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य नष्ट हो जाता है।

8. तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।

शब्दार्थ :
विद्धि-जानने का प्रयास करा-Try to know; प्रणिपातेन-गुरु के पास जाकर-Go to near of teacher; परिप्रश्नेन-विनीत जिज्ञासा से-For kindly desire; सेवया-सेवा के द्वारा-Throw seves; ज्ञानिन-स्वरूप सिद्ध-Proved face.

हिन्दी अर्थ :
तुम तत्त्व वेत्ता गुरु के समीप जा उन्हें दण्डवत प्रणाम कर विनीत भाव से, सेवाभाव से युक्त होकर सत्य का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करो। वही तत्त्व वेत्ता गुरु ही तुम्हें सत्य (ज्ञान) का बोध कराएँगे क्योंकि उन्होंने ही सत्य का साक्षात्कार किया है।

9. यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥

शब्दार्थ :
निश्चलति-विचलित होती है-Disturbing; नियम्य-वश में करके-In under; एतत्-इस-This; एव-निश्चय ही-certainly.

हिन्दी अर्थ :
चंचल मन अपनी अथिरता के कारण जहाँ-जहाँ भी विचरण करता हो, मनुष्य का कर्तव्य है कि वह उसे खींचकर अर्थात् उसे नियंत्रित कर अपने वश में लाए।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 1 जयतु मे माता

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 1 जयतु मे माता (गीतम्)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 1 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक शब्द में उत्तर दीजिए)।
(क) गीतायाः गाता क? (गीता का गाने वाला कौन है?)
उत्तर:
गीतायाः गाता कृष्णः। (गीता का गान करने वाला कृष्ण है।)

(ख) सीमान्तरक्षकः कः अस्ति? (सीमा का रक्षक कौन है?)
उत्तर:
सीमान्तरक्षकः सैनिकः अस्ति। (सीमा का रक्षक सैनिक है।)

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(ग) वेदोपनिषज्जनयित्री का? (वेद और उपनिषद् की माता कौन है?)
उत्तर:
वेदोपनिषज्जनयित्री भारतभूमिः। (वेद और उपनिषद् की माता भारतभूमि है)

(घ) निष्कारणविद्वेषकरः कुत्र याति? (बिना कारण के बैर करने वाला कहां जाता है?)
उत्तर:
निष्कारणविद्वेषकर कालमुखिः याति। (बिना कारण के बैर करने वाला काल के मुख अर्थात् मृत्यु के मुख में जाता है)

(ङ) मातुः कष्टकर दुर्दैवं कः शमयतु? (माता के दुखों या कष्टों को कौन दूर करता है)
उत्तर:
मातुः कष्टकरं दुर्दैवं विधाता शमयतु। (माता के दुखों व कष्टों को विधाता दूर करता है।)

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प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत्-(एक वाक्य में उत्तर लिखें)।
(क) मातर्यशशांगाता कः? (माता की यश महिमा का गान करने वाला कौन है?)
उत्तर:
चतुर्दिगन्तवहः पवनः। (चारों दिशाओं में बहने वाली हवा।)

(ख) भारतमाता कैः वंदिता?। (भारत माता किसके द्वारा वंदित की गई है।)
उत्तर:
हर्ष-भोज-शिवराज वंदिता। (हर्ष-भोज और शिवराज के द्वारा पूजी गई।)

(ग) भारतमाता कैः नंदिता? (भारत माता किसके द्वारा प्रसन्न की गई है?)
उत्तर:
मौर्य-शुङ्ग गुप्ताभिनन्दिता। (मौर्य-शुङ्ग और गुप्त के द्वारा प्रसन्न की गई है।)

(घ) अहिंसाव्रती किमर्थं वाणसंधान करोति? (अहिंसा का व्रत धारण करने वाले वाणों का संधान किसलिए करते हैं?)
उत्तर:
निजरक्षार्थमहिंसाव्रती। (अपनी रक्षा के लिए अहिंसाव्रत धारी भी वाण संधान करता है।)

(ङ) आदौ ज्ञानभानुः कुत्र उदितः? (पहले ज्ञान का सूर्य कहां उदित होता है?)
उत्तर:
ज्ञान भानुरादौ त्वय्युदितः।। (ज्ञान का सूर्य तुम ही से उदित होता है।)

प्रश्न 3.
रिक्त स्थानानिपूरयत-(रिक्त स्थानों की पूर्ति करो)
(क) येन न दस्यति कोऽपि तक्षकः।
(ख) भारत रामायण कवयित्री।
(ग) मौर्य शुंङ्ग गुप्ताभिनन्दिता।
(घ) कच्छ शम रूपान्त वासिनी।
(ङ) निष्कारणविद्वेषकरस्तव कालमुखं प्रतियाता।

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प्रश्न 4.
संधिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत् (संधि विच्छेद कर संधि नाम लिखो)।
(क) त्वय्युदित
उत्तर:
त्वयि + उदिता = यण स्वर संधि।

(ख) शूरस्ते
उत्तर:
शूरः + ते = विसर्ग संधि।

(ग) गणोऽयम्
उत्तर:
गणः + अयम् = पूर्वरूप स्वर संधि।

(घ) कोऽपि
उत्तर:
कः + अपि = पूर्वरूप स्वर संधि।

(ङ) विद्वेषकरस्तव
उत्तर:
विद्वेषकरः + तव = विसर्ग संधि।

प्रश्न 5.
यथायोग्यं योजयत (सही जोड़ी बनाओ)
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 1 जयतु मे माता img-1

प्रश्न 6.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत् उदाहरणम्
यथा- पवनः चतुदिर्गन्तवहः अस्ति। – आम्
अस्याः तनः हिंसार्थम् बाण संधाता। –  न
(क) गोपालः गीतायाः गाता।
(ख) भारत माता मौर्य शुङ्ग-गुप्ताभिवन्दिता अस्ति।
(ग) सकल लोकगणः सीमां त्राता अस्ति।
(घ) अस्यां आदौ ज्ञानभानु न उदितः।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) आम्
(ग) आम्
(घ) न

प्रश्न 7.
उदाहरणानुसारं पदानां मूल शब्द विभन्ति च लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 1 जयतु मे माता img-2

जयतु मे माता पाठ संदर्भ/प्रतिपाद्य

आधुनिक काल में भी संस्कृत में गद्य-पद्य लेखन की बहुलता है। इस भाषा के मूर्धन्य विद्वान, कवि और लेखकों के बीच आचार्य डॉ. प्रभुदयाल अग्निहोत्री का विशेष स्थान है। इनकी संस्कृत साहित्य में दर्शन, इतिहास, मनोविज्ञान, कथा, काव्य, नाटक आदि विधाओं में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। ‘त्रिपथगा’ कविता संग्रह 2005 में प्रकाशित हुई। प्रस्तुत गीत भी ‘त्रिपथगा’ नामक कृति से ही लिया गया है। इस गीत में स्वतंत्रता सेनानी एवं संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान अग्निहोत्री दारा सुंदर, मधुर एवं भावपूर्ण शब्दों में भारत माता की वंदना की गई है।

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जयतु मे माता पाठ का हिन्दी अर्थ

1. जयतु जयतु मे माता,
अस्याः कष्टकरं दुर्दैवं शमयतु सदा विधाता।।

शब्दार्थ :
जयतु-जय हो-Vicrory; अस्याः -इसकी-Her/Him; कष्टकरंदुखी-Sorrow; दुर्दैवं-दुर्भाग्य को या बाधाओं को-Misfortune/Unfortunately; शमयतु-शांत कराये/ दूर करवाये; विधाता-ब्रह्मा-God Almighty; सदा-हमेशा-Always.

हिन्दी-अर्ध :
मेरी माता (मातृभूमि) की जय हो, जय हो। हे विधाता! तुम इसके कष्टों एवं आपदाओं को सदैव के लिए शान्त करें।

2. त्वं वेदोपनिषज्जनयित्री,
भारत-रामायण कवयित्री
अजनिष्ठाः कृष्णं गोपालं यो गीतायाः गाता॥

शब्दार्थ :
त्वं–तुम्हारा-Your; वेदोपनिषद्-वेद और उपनिषद्-Ved and Upnishad; जनयित्री-पैदा करने वाली-Mother, Originatee; गाता-गान करने वाले-Singer.

हिन्दी अर्थ :
हे भारत भूमि-तुम ही वेद और उपनिषदों की जननी हो। हे माँ! तुम ही महाभारत, रामायण की रचयित्री हो। हे माँ! तुम ही गीता का गान करने वाले मुरली-मनोहर कन्हैया की जननी हो।

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3. ज्ञान-भानुरादौ त्वरयुदितः,
शूरस्ते तनयः सम्मुदितः,
केवल-निजरक्षार्थमहिंसाव्रती वाण-सन्धाता।

शब्दार्थ :
ज्ञान-ज्ञान-Knowledge; भानु-सूर्य-Sun; तनयः-पुत्र-Son; शूर-वीर-Brave; निज-स्वयं के-Myself; वाण-सन्धाता-वाण से लक्ष्य भेद करने पाला-Arjun or Bowman.

सरलार्थ :
हे भारत माँ! तुममें ही ज्ञान का सूर्य सर्व प्रथम उदित हुआ (अर्थात् भारतभूमि पर सर्व प्रथम ज्ञान रूपी सूर्य उदित हुआ।)। वीर पुत्र की जननी तुम्ही हो (अर्थात् वीरों का जन्म भारतभूमि पर ही हुआ)। केवल अपनी रक्षा के लिए अहिंसा का व्रत धारण करने वाला भी वाण संधान करता है अर्थात् वाणों से लक्ष्य साधता है।

4. मौर्य-शुङ्ग-गुप्ताभिनन्दिता,
हर्ष-भोज-शिवराज-वंदिता,
संप्रति लोकगणोऽयं सकल स्तव सीम्नां त्राता॥

शब्दार्थ :
नंदिता-प्रसन्न की गई-Toglad; वंदिता-पूजित-Worshipper; सम्प्रति-इस समय-This time; अयमं-इस-It; सकल-सभी-All, every; सीमनां-सीमाओं के-Limit; त्राता-रक्षक-Guard.

सरलार्थ :
हे भारत माँ! तुम मौर्य, शुंग, गुप्त वंशों द्वारा पूजित हो और (राजा) हर्ष, (राजा) भोज एवं शिवाजी द्वारा वंदित हुई हो। हे माँ! (इस पावन भूमि पर पैदा हुए) सभी जन तुम्हारी रक्षा करने वाले हैं।

5. कालिदास-कविता-रस-मग्ना,
सांख्ययोग-साधन-संलग्ना,
नालन्दाजन्ता मातस्ते श्रद्धाञ्जलि-प्रदाता॥

शब्दार्थ :
मग्ना-मग्न-Meditate; सांख्ययोग-सांख्ययोग-Sankhyoga; संलग्ना-संलग्न-Enclouse; नालन्दाजन्ता-नालन्दा और अजंता-Nalanda & Ajanta; प्रदाता-प्रदान करने वाले-Giver, Doner.

सरलार्थ :
हे मातृभूमि! कविता (की मधुर रागिनी) रस में मग्न कालिदास (सदृश कवि), सांख्य (दर्शन) योग में निमग्न अजंता एवं नालंदा के विद्वान जन तुम्हारी चरण वंदना करते हैं।

6. कच्छे-कामरूपान्त-वासिनी,
गङ्गा-कावेरी-सुहासिनी,
चतुर्दिगन्तवहः पवनस्ते मातर्यशसां गाता॥

शब्दार्थ :
वासिनी-निवास करने वाली-Inhahitant; चतुर्दिगन्तवहः-चारों दिशाओं में बहने वाला-Omni; पवनः-पवन-Air; ते-तुम्हारे-Your.

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सरलार्थ :
हे भारत माते! तुम कच्छ से कामरूप तक निवास करने वाली (के अंक में) को गंगा-कावेरी (आदि नदियाँ) शोभायमान करती हैं तथा चारों दिशाओं में प्रवाहित होने वाला वायु तुम्हारी महिमा गान करता है।

7. सावहितः सीमान्त-रक्षकः
येन न दंशति कोऽपि तक्षकः
निष्कारण-विद्वेषकरस्तव कालमुखं प्रतियाता॥
जयतु जयतु मे माता। जयतु जयतु मे माता॥

शब्दार्थ :
सावहितः-सावधान-Attention; दंशति-दशता है-Sting; येन-जो-Who, what, which; तक्षकः-लुटेरा-Robber; कोपि-कोई भी-Any one; निष्कारण-बिना कारण के-Without reason; विद्वेष-द्वेष के कारण-Reason of jealous; प्रतिभाता-समाहित होता है-To meet.

सरलार्थ :
हे भारत माता की सीमा को रक्षित करने वाले रखवालो (जवानों)! सावधान रहो जिससे कोई बाहरी दस्यु भारत का नुकसान न कर सके। हे माँ! जो तुमसे (अर्थात् इस भूमि से) वैर भाव रखता है. वह काल रूपी गाल में समा जाता है। हे भारत माता! तुम्हारी जय हो, तुम्हारी जय हो, जय-जय हो माँ।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 9 पितृभक्तः श्रवणकुमारः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 9 पितृभक्तः श्रवणकुमारः (संवादः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 9 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) पितृभक्तः कः आसीत्? (पितृभक्त कौन था?)
उत्तर:
श्रवण कुमारः। (पितृभक्त श्रवण कुमार था।)

(ख) श्रवणः जलार्थं कुत्र गतः? (श्रवण जल लेने कहाँ गया?)
उत्तर:
तमसा तीरे। (श्रवण जल लेने तमसा तीर गया।)

(ग) शब्दवेधि-बाण-विद्यायां निपुणः कः? (शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण कौन था?)
उत्तर:
दशरथः। (शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण दशरथ था।)

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(घ) श्रवणकुमारः किमर्थं प्रख्यातः? (श्रवण कुमार किसलिये प्रसिद्ध हुआ?)
उत्तर:
पितृभक्तिः। (श्रवण कुमार पितृभक्ति के लिए प्रसिद्ध हुआ।)

प्रश्न 2.
एक वाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) प्रवणस्य पितरौ कीदृशौ आस्ताम्? (श्रवण के माता-पिता कैसे थे?)
उत्तर:
श्रवणस्य पितरौ जन्मान्धौ आस्ताम्। (श्रवण के माता-पिता जन्म से अन्धे थे।)

(ख) श्रवणः पित्रोः तीर्थाटनं कथमकारयत्? (श्रवण कुमार अपने माता-पिता को तीर्थयात्रा किससे कराया?)
उत्तर:
श्रवणः पित्रोः तीर्थाटनं विहङ्गिकायाम् कारयत्। (श्रवण कुमार अपने माता-पिता को काँवर से तीर्थयात्रा कराया।)

(ग) दशरथः किमर्थं वनं गतवान्? (दशरथ वन किसलिये गये?)
उत्तर:
दशरथः आखेटम् दनं गतवान्। (दशरथ आखेट के लिये वन गये।)

प्रश्न 3.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत.
(क) वाणविद्धस्य श्रवणस्य कः अभिलाषः आसीत्? (बाण से बिंधे हुये श्रवण कुमार की क्या अभिलाषा थी?)
उत्तर:
बाणविद्धस्य श्रवणस्य अभिलाषः यत ममपित्रोः जलं व्यवस्थां कृत्वा अद्यारभ्य भवान् कदापि निरपराधिनां जन्तूनां हिंसनं मा करोतु। (बाण से बिंधे हुये श्रवण कुमार की अभिलाषा थी कि मेरे माता-पिता के लिये जल की व्यवस्था करें और भविष्य में किसी भी निरपराध प्राणियों की हिंसा न करें।)

(ख) श्रवणस्य वृत्तं ज्ञात्वा पित्रोः का दशा सजाता? (श्रवण कुमार के वृत्तांत को जानकर उनके माता-पिता की क्या दशा हुई?)
उत्तर:
श्रवणस्य वृत्तं ज्ञात्वा पित्रोः वज्रपातः इव सजाता। (श्रवण कुमार के वृत्तांत को जानकर उनके माता-पिता दुःखी हुये।)

(ग) श्रवणस्य पितरौ कं शापं दत्तवन्तौ? (श्रवण के माता-पिता किसको श्राप दिये?)
उत्तर:
श्रवणस्य पितरौ दशरथं शापं दत्तवन्तौ। (श्रवण के माता-पिता दशरथ को श्राप दिये।)

प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 9 पितृभक्तः श्रवणकुमार img-1

प्रश्न 5.
अधोलिखित वाक्यानां शुद्धरूपाणि लिखत
(क) श्रवणकुमारः पितरौ भक्त सन्ति।
उत्तर:
श्रवण कुमार पितरौ भक्तः अस्ति।

(ख) दशरथः वने गतवान्।
उत्तर:
दशरथः वने गतः।

(ग) पितरौ अन्धः आस्ताम्।
उत्तर:
पितरौ अन्धौ आस्ताम्।

(घ) श्रवणः जगतीतलं प्रसिद्धम्।
उत्तर:
श्रवणः जगतीतले प्रसिद्धम्।

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प्रश्न 6.
कोष्ठकस्यौ शब्दैः वाक्यानि रचयत
(क) श्रवणः शान्तनु पुत्रः अस्ति।
(ख) दशरथः अयोध्यायाः राजा आसीत्।
(ग) भवान् सवज्ञः अस्ति।
(घ) अहम् संस्कृतं पठामि।
(ङ) मम विद्यालये षोडश अध्यापकाः सन्ति

प्रश्न 7.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
(क) श्रवणकुमारः पितरौ भक्तः आसीत्।
(ख) माता-पितरौ अन्धौ न आस्ताम्
(ग) एषा कथा कलियुगस्य अस्ति।
(घ) दशरथः महाराजः आसीत्।
(ङ) श्रवणः तमसातीरं न गतवान्
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) न
(घ) आम्
(ङ) न

प्रश्न 8.
उचित विकल्पेन वाक्यानि पूरयत
(क) पितरौ पिपसितौ आस्ताम्। (बुभुक्षितौ/पिपासितौ)
(ख) श्रवण वारिम् आनेतुं तमसा तीरम् आगतः। (वारि/वारिम)
(ग) दशरथः वाण विद्यायां अतिनिपुणः आसीत्। (शस्त्र/वाण)

प्रश्न 9.
सन्धिविच्छेदं कुरुत
(क) तीर्थाटनाय
तीर्थम् + आटनाय

(ख) नरेन्द्रः
नर + इन्द्रः

(ग) जन्मान्धौ
जन्म + अन्धौ

(घ) किञ्च
किम् + च

प्रश्न 10.
समुचितेन अक्षरेण रिक्तस्थानपर्तिं कुरुत
(क) श्र व ण कु मा रः
(ख) म हा रा. जः द श र थः
(ग) वा ण वि द्या यां

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पितृभक्तः श्रवणकुमारः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

संस्कृत साहित्य में नीतिपरक, आचार का बोध कराने वाली अनेक कथाएं हैं। जैसे सती सावित्री की पति-भक्ति, श्री रामचन्द्र की पितृभक्ति, एकलव्य की गुरु-भक्ति इत्यादि कथाएं बहुत प्रसिद्ध हैं। इस पाठ में श्रवण कुमार द्वारा माता-पिता की सेवा का वर्णन किया गया है।

पितृभक्तः श्रवणकुमारः पाठ का हिन्दी अर्थ

1. आचार्यः-ईशभक्तिः गुरुभक्तिः मातापितृभक्तिश्च भारतीयसंस्कृतेः मूलम्। अद्य वयम् मातापितृभक्तिविषये विमृशामः। नरेन्द्र! मातापितृभक्तिविषये त्वं किंजानासि? नरेन्द्रः-गुरुवर्य! श्रूयते श्रवणकुमारः मातापितृभक्तः आसीत् इत्येव जानामि नाधिकम्। आचार्यः-शृणोतु श्रवणस्य पितरौ वृद्धौ जन्मान्धौ चास्ताम्।। भरतः-गुरुदेव! श्रवणस्य पित्रोः नाम किम् ? श्रवणेन किञ्च कृतम्? आचार्यः-श्रवणस्य मातुः नाम भाग्यवती पितुः नाम शान्तनुः च आस्ताम्।

शब्दार्थ:
श्रूयते-सुना जाता है-Is listent नाधिकम्-अधिक नहीं-Not much; शृणोतु-सुनो-Listen; श्रवण-श्रवण के द्वारा-Through Shrawan; कृतम्-किया-Did;

हिन्दी अर्थ:
आचार्य-ईश्वर की भक्ति, गुरुभक्ति, माता-पिता की भक्ति भारतीय संस्कृति की मूल हैं। आज हम माता-पिता की भक्ति के विषय में विचार करेंगे। नरेन्द्र! मातृ-पितृ भक्ति के विषय में तुम क्या जानते हो?

नरेन्द्र :
गुरुवर! सुना है कि श्रवण कुमार माता-पिता भक्त थे। इतना ही जानता हूँ, इससे अधिक नहीं।

आचार्य :
सुना है, श्रवण कुमार के माता-पिता वृद्ध और जन्मांध थे। भरत-गुरुदेव! श्रवण के पिता का नाम क्या था? श्रवण ने क्या किया?

आचार्य :
श्रवण के माता का नाम भाग्यवती, पिता का नाम शान्तनु था।

2. श्रवणः मातरं पितरं च विहङ्गिकायाम् उपवेश्य स्वस्कन्धे तां धृत्वा तीर्थाटनन् अकारयत्। सः वनात् वनान्तरे भ्रमन् तमसानद्याः तीरं समागतः। संयोगात् अयोध्यायः नृपः दशरथः आखेटं कुर्वन् सैनिकैः वियुक्तः मार्गात् भ्रष्टः तत्रैव वनमागतः। तदैव श्रवणः पित्रोः पिपासाशमनार्थं वारि आनेतुं तमसा तीरं जगाम। जलग्रहणकाले जलपात्रात् समुत्पन्नां ध्वनिं श्रुत्वा दशरथः “कश्चित् जन्तुः जलं पिबन् अस्ति” इति अनुमीय शब्दलक्ष्यं कृत्वा त्वरितमेव बाणम् अमुञ्चत्।।

शिष्याः :
(साश्चर्यम्) तदा किमभवत्?

आचार्यः :
शृण्वन्तु! श्रवणकुमारस्य हृदये संलग्नः सः शरः तस्य मर्मभेदनम् अकरोत्। तदा जन्तोः स्थाने मानववाणीं श्रुत्वा दशरथः त्वरितमेव तत्रागतः। तत्र बाणविद्धं श्रवणं दृष्ट्वा दुखितः अभवत्। स तमुत्थाय तस्य परिचयम् पृष्टवान्।

शिष्याः :
श्रवणेन किं कथितम्?

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आचार्यः :
स्वपरिचयं दत्वा तेन कथिम-राजन् मम मृत्योः किमपि दुःखं नास्ति। परन्तु मम पितरौ वृद्धौ अन्धौ च स्तः। इदानीं तौ पिपासितौ। अतः भवान् शीघ्रं गत्वा तौ जलं पाययतु। तदा दशरथः अवदत्-वत्स! अन्यः कस्ते अभिलाषः? श्रवणः अवदत्ममपित्रोः व्यवस्थां कृत्वा अद्यारभ्य भवान् कदापि निरपराधिनां जन्तूनां हिंसनं मा करोतु इत्युक्त्वा श्रवणः स्वप्राणान् अत्यजत्।

महेशः :
ततः किमभवत?

शब्दार्थ :
विहङ्गिका-काँवर-Reg/var, kavar; स्वकन्धे-अपने कंधे पर-On his shoulder; अत्रांतरे-इसके बाद-After it; समागतः-आया-Come; संयोगात्-संयोग से-By co-incidence; आखेटं-शिकार को-To hunting; जगाम्-गया-Went; आनेतुम-लाने के लिए-For bringing: श्रुत्वा-सुनकर-Listen; कश्चित्-कोई-Any; पिवन्-पीने के लिए-For drinking: कृत्वा-करके-Done; बाणम्-बाण को-To arrow; साश्चर्यम्-आश्चर्य के साथ-With wonder; अकरोत्-किया-Did; तत्रागतः-वहाँ आया-Come there; अमुत्थाय-उसे उठाकर-Lift it; किमपि-कुछ भी-Also, Some; करोतु-करो-Do; इत्युक्त्वा-ऐसा कहकर-As said; स्वप्राणान् अत्यजत्-अपने प्राणों को छोड़ दिया-Left own life.

हिन्दी अर्थ :
श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कांवर में बैठाकर अपने कंधे पर ढोते हुए तीर्थाटन कराया। वह एक वन से दूसरे वन का भ्रमण करते हुए तमसा नदी के तट पर पहुँचे । संयोग वश अयोध्या के राजा दशरथ शिकार करते हुए सैनिकों से बिछुड़ मार्ग भूलकर उस वन में आ पहुँचे। तभी श्रवण कुमार माता-पिता की प्यास शान्त करने के लिए जल लेने तमसा के तट पर पहुँचे। जल लेते समय जल पात्र से निकलने वाली ध्वनि सुनकर-संभवतः कोई जानवर जल पी रहा है, ऐसा अनुमान कर शब्द का लक्ष्य कर बाण को छोड़ दिया।

शिष्य :
(आश्चर्य से) तब क्या हुआ?

आचार्य :
सुनो! श्रवण कुमार के हृदय में लगे तीर ने उसका मर्मभेद दिया। कष्ट के कारण मुँह से निकली मनुष्य की आवाज सुन राजा दशरथ तत्काल वहाँ आ गए। तब वाण से घायल श्रवण को देख कर बहुत दुःखी हुए और उसे उठाते हुए उन्होंने परिचय पूछा।

शिष :
तब श्रवण ने क्या कहा?

आचार्य :
तब उसने अपना परिचय देते हुए (राजा दशरथ से) कहा-महाराज! मुझे अपनी मृत्यु से कोई दुःख नहीं है किन्तु मेरे माता-पिता अंधे हैं और इस समय बहुत प्यासे हैं अतः आप उन्हें शीघ्र जाकर जल पिलाएँ। तब दशरथ बोले-पुत्र! तुम्हारी इच्छा क्या है?

श्रवण बोले :
(मेरी अभिलाषा यह है कि) आप मेरे माता-पिता की व्यवस्था करें और आज के बाद फिर कभी निरपराध जन्तुओं की हत्या न करें… ऐसा कहते हुए श्रवण ने अपने प्राण त्याग दिए।

महेश :
तब क्या हुआ?

3. आचार्यः-ततः दशरथः पात्रे जलं गृहीत्वा श्रवणस्य पित्रोः समीपं गतः। तौ पिपासया आकुलो श्रवणम् आह्वयन्तौ कस्यापि आगमनसङ्केतं प्राप्य “वत्स श्रवण” इति अवोचताम्। दशरथः शनैः शनैः तयोः समीपं गत्वा अब्रवीत् गृह्यताम् जलम्।

अयं शब्दः श्रवणस्य नास्ति इति विचार्य तौ अपृच्छताम् को भवान् अस्मभ्यं जलम् प्रयच्छति? तदा राजा नितरां लज्जितः दुःखितश्च सर्वं वृत्तान्तम् अश्रावयत् । तच्छ्रुत्वा तयोः उपरि वज्रपातः इव सञ्जातः। वृद्धावस्था अन्धता, वने निवासः, एकः पुत्रः, तस्यापि अकस्मात् बाणेन मृत्युः इत्यादि व्याकुलो भूत्वा विलपन्तौ, राजानम् अकथयताम्-तव कारणात् एव पुत्र-शोकेन पीडितौ आवाम् इदानीम् प्राणान् परित्यजावः, अतः त्वमपि पुत्रशोकेन प्राणान् परित्यक्ष्यसि इति राजा शप्तः। रामस्य वनगमनकाले तच्छापवशात् पुत्रशोकेन दशरथोऽपि दिवङ्गतः।

छात्राः :
आचार्य! वयं ज्ञातवन्तः यत् वस्तुतः श्रवणः पितृभक्तः आसीत्। एतदर्थं तस्य नाम जगतीतले प्रसिद्धम्।

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शब्दार्थ :
कस्यपि-किसी का भी-Any person; अवोचताम्-सोचा-Thought; अब्रवीत्-बोला-Spoke; ग्रहताम्-ग्रहण करो-Take,do Accept; अप्रक्ष्यताम्-पूछे-Asked; कोभवान्-आप कौन हैं?-Who are you; अस्मभ्यम्-हम दोनों को-We both; प्रयच्छति-दे रहे हो-You are giving; नितराम्-बहुत अधिक-Very much; अश्रावयत्-सुनाया-Told; तत्श्रुत्वा-उसे सुनकर-To listen him; अकथयताम्-कहा/सुनाया-Said/Listened; कारणात्-कारण से-For reason; त्वमपि-तुम भी-You also; परित्यक्षसि-परित्याग करोगे-Will left; वनगमन काले-वनवास के समय-In forest time; दिवगंतः-दिवंगत हुए-Didéd; ज्ञातवंतः-मालूम हुआ-Known; जगतितले-संसार में-In world; प्रसिद्धम-प्रसिद्ध-Famous; एतदर्थ-उसके-His;

हिन्दी अर्थ :
आचार्य-इसके बाद दशरथ जलपात्र में जल लेकर श्रवण के पिता के निकट गए। प्यास से व्याकुल श्रवण के पिता उसके आगमन की आहट पाकर ‘वत्स श्रवण’ इस प्रकार बोले। दशरथ धीरे-धीरे उनके समीप जाकर बोले-इस जल को ग्रहण करे।

यह शब्द श्रवण का नहीं है, ऐसा विचार कर उन्होंने (श्रवण के माता-पिता ने) उनसे पूछा-आप कौन हैं जो मुझे जल दे रहे हैं। तब राजा अत्यन्त दुखित एवं लज्जित होकर सब बातें बताईं। ऐसा सुनकर (श्रवण के माता-पिता पर) वज्रपात-सा हुआ। वृद्धावस्था में अंधा हो जाना, वन में निवास, एक ही पुत्र उसकी भी बाण लगने से अकस्मात् मृत्यु से व्याकुल होकर विलाप करते हुए राजा से बोले-तुम्हारे कारण ही पुत्र-शोक से पीड़ित होकर हम दोनों मृत्यु को प्राप्त होने वाले हैं अतः तुम भी पुत्रशोक में ही प्राण त्याग करोगे-ऐसा राजा को शाप दिया। उसी शाप के कारण राम के वन-गमन के समय राजा दशरथ पुत्र-शोक में प्राण त्याग किए।

विद्यार्थी गण :
गुरु जी! हमें ज्ञात हुआ कि वास्तव में श्रवण पित्र-भक्त थे। इसी कारण उनका नाम पृथ्वी लोक में प्रसिद्ध है।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 8 दशपुरीया अष्टमूर्तिः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 8 दशपुरीया अष्टमूर्तिः (वर्णनात्मकः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 8 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक पद में उत्तर लिखो)
(क) अष्टमूर्तिः कुत्र प्रतिष्ठापिता अस्ति। (अष्टमूर्ति कहाँ स्थित है?)
उत्तर:
दसपुर (दसपुर (मंदसौर))

(ख) कति शैवप्रतिमाः प्रसिद्धाः सन्ति। (कितनी शिव प्रतिमा प्रसिद्ध हैं?)
उत्तर:
त्रिनः। (तीन)

(ग) पूर्वमुखे कः रसः विद्यते? (पूर्व दिशा के मुख में कौन-सा रस विद्यमान है?)
उत्तर:
शान्तरसः। (शान्त रस)

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(घ) कस्यमुखस्य शिला लोहितवर्णा वर्तते? (किस मुख वाली शिला लाल रंग की है?)
उत्तर:
पश्चिमुखस्य। (पश्चिम मुख की)।

(ङ) कश्मिन मुखे शिवः अट्टहासं कुर्वन इव प्रतिभाति? (किस मुख में शिव अट्टहास करते दिखाई देते हैं?)
उत्तर:
उत्तरदिशः। (उत्तर दिशा)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) अष्टमूर्तिः भक्तैः कस्मिन ईशवीये दृष्टा? (अष्टमूर्ति भक्तों ने किस ईशवी में देखी?)
उत्तर:
अष्टमूर्तिः भक्तैः 1940 ईशवीये दृष्टा। (अष्टमूर्ति भक्तों ने 1940 ईशवी में देखी।)

(ख) वरस्य शृङ्गार मनोरमत्वं कस्मिन मुखे उल्लिखितम्? (वर के श्रृंगार का मनोहर वर्णन किस मुख में उल्लिखित है।)
उत्तर:
वरस्य शृंगार मनोरम भावं दक्षिण मुखे उल्लिखितम्। (वर के श्रृंगार का मनोहर वर्णन दक्षिण मुखे उल्लिखित है।)

(ग) ऐतिहासिकैः अर्धनारीश्वरस्य कः कालः निर्धारितः? (ऐतिहासिकों द्वारा अर्धनारीश्वर का कौन-सा काल निर्धारित किया गया है?)
उत्तर:
ऐतिहासिकैः अर्धनारीश्वरस्य चतुर्थदशः शताब्दे कालः निर्धारितः।। (ऐतिहासिकों ने अर्धनारीश्वर का काल चौदहवीं शताब्दी निर्धारित की है।)

(घ) अष्टमूर्तिः इदानीं केन नाम्ना प्रख्याता? (अष्टमूर्ति इस समय किस नाम से प्रसिद्ध हैं?)
उत्तर:
अष्टमूर्तिः इदानी पशुपतिनाथः नाम्ना प्रख्याता। (अष्टमूर्ति इस समय पशुपतिनाथ इस नाम से प्रसिद्ध है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत। (नीचे लिखे हुए प्रश्नों के उत्तर लिखो)
(क) मूर्तेः पश्चिमे मुखे वैशिष्ट्यं किम्? (मूर्ति के पश्चिम मुख की क्या विशेषता है?)
उत्तर:
मूर्तेः पश्चिम मुखे वैशिष्ट्यं प्रलयंकारी शिव।। (मूर्ति के पश्चिम मुख में प्रलंयकारी शिव को दिखाया गया है)

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(ख) काः तिस्रः शैव प्रतिमाः प्रसिद्धः? (कौन-सी तीन शिव प्रतिमा प्रसिद्ध हैं?)
उत्तर:
अर्धनारीश्वरः, ऐलीफैण्टायाः त्रिमूर्ति, चिदम्बरस्य नटराज तिस्रः शैवप्रतिमाः प्रसिद्धाः। (अर्धनारीश्वर, ऐलीफैण्टा की त्रिमूर्ति, व चिदम्बर की नटराज मूर्ति ये तीन शिव प्रतिमा प्रसिद्ध हैं।)

(ग) दशपुर कुत्र अस्ति? अधुना केन नाम्ना प्रसिद्धम्? (दशपुर कहाँ स्थित है? वर्तमान में यह किस नाम से प्रसिद्ध है?)
उत्तर:
दशपुरं मध्यप्रदेशस्य पश्चिम भागे मालवाञ्चले शिवनानधास्तीरे अस्ति। अधुना मंदसौर नाम्ना प्रसिद्धम्। (दशपुर मध्य प्रदेश के पश्चिम भाग में मालवाञ्चल में शिवना नदी के किनारे स्थित है। वर्तमान में यह मंदसौर नाम से प्रसिद्ध है।)

(घ) अष्टमूर्तेः उत्तर मुखे कीदृशं वैशिष्ट्यं विद्यते? (अष्टमूर्ति का उत्तर मुख क्या विशेषता बतलाता है।)
उत्तर:
अष्टमूर्तेः उत्तर मुखे आनंदतत्त्व युक्ता वैशिष्ट्यं विद्यते। (अष्टमूर्ति का उत्तर मुख आनंद तत्त्व से युक्त होने की विशेषता बताता है।)

प्रश्न 4.
रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) पूर्वमुखे शान्तरसविशिष्टः शिवसमाधिः विद्यते।
(ख) अष्टमुखाङ्कितं लिङ्गम् अष्टमूर्तिः इति नाम्ना ज्ञायते।।
(ग) अद्यावधि शैवप्रतिमाः केवलं तिस्रः प्रसिद्धाः।
(घ) लघु सर्पद्वयं प्रतीकरूपेण उत्कीर्णीतम्।

प्रश्न 5.
युग्ममेलनं कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 8 दशपुरीया अष्टमूर्ति img-1

प्रश्न 6.
अवायैः वाक्यनिर्माणं कुरुत-
अधुना – दशपुरम् अधुना मन्दसौरम् इति नाम्ना प्रख्यातम् अस्ति।
इदानीम् – इदानीः सः विद्यालयं गच्छति।
यथा – सः यथा एव आगच्छतिर्तदा अहं गमिष्यामि।
तथा – यथा नृपः तथा प्रजाः।
तत्र – तत्र कोऽपि न विद्यते।
अपि – सः अपि गमिष्यसि।
अत्र – अत्र वृक्षाः सन्ति।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दानां संधिविच्छेद कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
उदाहरणम् :
विद्यार्थी-विद्या+अर्थी = विद्यार्थी।
(क) उभावपि
उत्तर:
उभौ+अपि = अयादि स्वर

(ख) अत्रैव
उत्तर:
अत्र+एव = वृद्धि स्वर

(ग) सर्वे
उत्तर:
सः+एव – विसर्ग = वृद्धि स्वर संधि

(घ) नास्ति
उत्तर:
न+अस्ति = दीर्घ स्वर

(ङ) अत्रास्ति
उत्तर:
अत्र+अस्ति = दीर्घ स्वर।

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प्रश्न 8.
उदाहरणानुसारं क्रियापदानां वचन परिवर्तनं कुरुत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 8 दशपुरीया अष्टमूर्ति img-2

प्रश्न 9.
निम्नलिखितपदानां समास विग्रहं कृत्वा। समासस्य नाम लिखत
उदाहरणं यथा
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 8 दशपुरीया अष्टमूर्ति img-3

प्रश्न 10.
निम्नलिखित मूलशब्दं विभक्तिं वचनं च लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 8 दशपुरीया अष्टमूर्ति img-4

प्रश्न 11.
निम्नलिखितानां शब्दानां धातुं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत
उदाहरणं यथा
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 8 दशपुरीया अष्टमूर्ति img-5

दशपुरीया अष्टमूर्तिः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

मध्य प्रदेश के मालव अंचल में स्थित मंदसौर नगर के पुरातात्त्विक महत्त्व से हम लोग पूर्ण भिज्ञ हैं। यहाँ स्थित आठ मुखों वाली भगवान शिव की लिंग प्रतिमा अद्भुत एवं अनुपम है। प्रस्तुत पाठ डॉ. रामचन्द्र तिवारी द्वारा प्रणीत है। धर्म, दर्शन एवं पुरातत्त्व में इनका अभिनिवेश होने के कारण ‘अद्वितीय अष्टमूर्ति’ नामक पुस्तक आपने लिखी। इसकी मूर्तियाँ ही पाठ की विशेषता हैं।

दशपुरीया अष्टमूर्तिः पाठ का हिन्दी अर्थ

मध्यप्रदेशस्य पश्चिमे भागे मालवाञ्चले शिवनानद्यास्तीरे दशपुरं नाम नगरमस्ति। दशपुरम् अधुना मन्दसौरम इति नाम्मा प्रख्यातमस्ति। एतस्य दशपुरस्य वर्णनम् महाकविकालिदासेनापि स्वकीये ग्रन्थे मेघदूते कृतम्। अत्रैव शिवनानयास्तीरे भगवतः शिवस्य विशालमन्दिरमस्ति। अत्र स्थितम् अष्टमुखाकितं शिव लिङ्गम् अष्टमूर्तिः इति लिखितम् । इदानीं सैव पशुपतिनाथः इति नाम्ना दशपुरे प्रख्यातः।

शब्दार्थ :
अधुना-इस समय-This time; स्वकीये-स्वयं के-by self; इसका-its; लिखतम्-लिखित-Written; इदानीं-इस समय-this time.

हिन्दी अर्थ :
मध्य प्रदेश के पश्चिम भाग मालवांचल में शिवना नदी के किनारे स्थिति दशपुर नामक नगर है। दशपुर का आधुनिक नाम मन्दसौर प्रसिद्ध है। इस दशपुर का वर्णन महाकवि कालिदास ने भी स्वरचित ग्रन्थ मेघदूत में किया है। यहीं पर शिवना नदी के किनारे भगवान शिव का विशाल मन्दिर है। इसमें स्थित अष्टमुखी लिंग प्रतिमा है-ऐसा लिखा गया है। इस समय वही मन्दिर पशुपति नाथ नाम से प्रसिद्ध है।

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2. शैवदर्शनदृष्ट्या शैवकलादृष्ट्या च दशपुरीया अष्टमूर्तिः शैवमूर्तिषु अद्वितीया अस्ति। अद्यावधि शैवप्रतिमाः केवलं तिस्रः प्रसिद्धाः सन्ति। प्रथमा-प्रथमशताब्धाः मथुरायाः अर्धनारीश्वरः, द्वितीया अष्टमशताब्धाः, एलीफैण्टायाः त्रिमूर्ति। तृतीया दशमशताब्याः, चिदम्बरस्य नटराजः। शेषाणि लिङ्गानि। तामु तादृशी कला, दर्शनं वा नास्ति यथा दशपुरे वर्तमानायाः अष्टमूर्ती। वस्तुतः सा अनुपमा, अतिशायिनी शैव प्रतिमा अस्ति। अष्ट मुखानि प्रायः ‘सप्त फिट’ मानात्मके उत्तुङ्गे विशाले नीललोहिते पाषाणलिङ्गे उट्टङ्कितानि सन्ति।

शब्दार्थ :
अष्टमुखाङ्कितम्-उत्कीर्ण आठ मुख वाली-Carve of eight mouth; नीललोहिते-नीले व रक्तवर्ण से युक्त-with blue & Red Colour; पाषाणलिङ्गे-पत्थर के लिङ्ग पर-on the stone statue; अर्धनारीश्वर-अर्धनारीश्वर-(शिव पार्वती का रूप)-the fame of Shiva and Parvati.

हिन्दी अर्थ :
शैव दर्शन की दृष्टि से, शैव कला की दृष्टि से दशपुर की अष्टमूर्ति शिव मूर्ति अद्वितीय है। आज तक शिव की केवल तीन ही प्रतिमाएँ प्रसिद्ध हैं। मथुरा स्थित प्रथम शताब्दी की अर्धनारीश्वर की मूर्ति, आठवीं शताब्दी की एलीटो की त्रिमूर्ति और तीसरी, दशम शताब्दी की चिदम्बरम् की नटराज मूर्ति। शेष सभी शिवलिंग हैं। उनमें वेसी कला दृष्टिगोचर नहीं होती जैसी दशपुर की वर्तमान अष्टमूर्ति में। वस्तुतः यह शिव की मूर्ति अनुपम एवं अद्वितीय है। यह अष्टमुख लिंग मूर्ति सात फुट ऊँचे विशाल गुलाबी-नीले पाषाण खण्ड पर उकेरा गया है।

3. अस्याः मूर्तेः केवलं चतुर्मुखानि एव पूर्णतया लिङ्गमथ्ये निर्मितानि सन्ति, ततोऽधः चतुर्मुखानि केवलम् अशित एव निर्मितानि सन्ति। वैदेशिकानाम् आक्रमणवशात् एषा मूर्तिः रक्षणार्थम् अर्धनिर्मिता एव शिवनागर्भे (ईशवीये चतुर्दशाब्दे) गोपिता, कालेन नदी प्रवाहात् प्रकटिता एषा मूर्तिः 1940 ईशवीये वर्षे भक्तैः दृष्टा, तटे प्रतिष्ठापिता च। अस्या निर्मितानि मुखानि अतीव सुन्दराणि जीवनतत्त्वस्य व्यञ्जकानि च सन्ति।

शब्दार्थ :
ततोऽध-इससे नीचे-below its; गोपिता-छिपा दी गई-is hidden; प्रकटिता-प्रकट हुआ-appeared; जीवनतत्त्वस्य-जीवन के तत्त्व का-factor of life.

हिन्दी अर्थ :
इस मूर्ति के मात्र चार मुख ही पूर्णरूपेण लिंग के मध्य ही निर्मित हैं। उसके नीचे चारमुख केवल अर्धांश में ही निर्मित है। विदेशियों के आक्रमण के कारण इस मूर्ति की रक्षा के लिए अर्धमूर्ति शिवना के गर्भ में चौदहवीं शताब्दी में द्विपादी गई। समायानुसार नदी के प्रवाह के कारण यह मूर्ति बाहर निकल आई। सन् 1940 ई. में भक्तों ने इसे देखकर नदी के तट पर स्थापित कर दिया। इस मूर्ति के मुख बहुत सुंदर हैं जो जीवन के तथ्य को व्यक्त करते हैं।

4. दक्षिणमुखशिल्पे विवाहमण्डपस्थस्य वरस्य शृङ्गारमनोरमत्वं दृश्यते। तत्रैव शीर्षे केशकलापे षोडशीचन्द्र कला शोभते च। अत्रैवमुखे शुचिस्मितत्वं मधुरस्मितत्वं च अवलोकनीयम् । अत्र भयङ्कराः सर्पाः न उत्कीर्णाः, केवलं लघु सर्पद्वयं प्रतीकरूपेण उत्कीर्णितं वर्तते। पूर्व मुखे शान्तरस विशिष्टः शिवसमाधिः व्यज्यते। अस्मिन् केशकिरीटे रुद्राक्षमालयोः रेखाद्वयं निबद्धम् अस्य! मध्यमणिः तिलक रूपेण उपनिबद्धः। अत्र ग्रीवायां सर्पमाला, मन्दारमाला च शोभते।

शब्दार्थ :
स्मितत्वम्-मुस्कुराहट-Smile; मध्यमणि-बीच की मणि-between very precious stone; दृश्यते-दिखाई देता है-Looks; तत्रैव-वहाँ-there; अवलोकनीयम्-देखने को-for Look; उत्कीर्ण-उत्कीर्ण-Carve, scratch; तिलक रूपेण-तिलक के रूप में-in the form of auspious mark; उपनिबद्ध-बंधी हुई-to tie on for head;

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हिन्दी अर्थ :
मूर्ति की दक्षिण मुख की रचना विवाह मण्डप में बैठे श्रृंगार युक्त दूल्हे जैसी दिखाई देती है। उमसें सबसे ऊपर बालों के मध्य चन्द्रमा की सोलहवीं कला सुशोभित हो रही है। इस मुख की पवित्र मुस्कान ही देखने योग्य है। इस मूर्ति में भयंकर सर्प उत्कीर्ण नहीं किए गए हैं। केवल दो छोटे सर्प ही प्रतीक रूप में उत्कीर्ण हैं। मूर्ति के पूर्व मुख से शान्ति रस की विशिष्टता से युक्त शिव के समाधिस्थ होने का भाव व्यक्त होता है। इस मूर्ति में बालों की जटा में रुद्राक्ष की दो मालाएँ दो रेखाओं के रूप में दर्शित होती हैं। इसके बीच की मणि तिलक के समान दृष्टिगोचर होती है। इस मूर्ति में गले के साँप की माला और मंदार की माला शोभित हो रही है।

5. पश्चिममुखे प्रलयङ्करः शिवः रुद्ररूपेण व्यज्यते। अस्यैव मुखस्य सम्पूर्णा शिला केवलं लोहितवर्णा वर्तते। अत्र तादृशी नीलिमा श्वेतधारा वा न दृश्यते यादृशी मुखान्तरेषु। सुखे तृतीयनेत्रं सुस्पष्टम् अवलोक्यते। उग्रक्रोधेन मुखं विकृतम् उत्कीर्णम् । अस्मिन्नेव मुखे ऊँकार उल्लिखितः। ॐकारादेव उदयः, प्रलयश्च उभावपि भवतः इति शिल्पस्य दर्शनम्। उत्तरमुखे आनन्दतत्त्वस्य व्यञ्जना विद्यते। अस्मिन् भगवान विजयामत्त अट्टहासं कुर्वन इव प्रतिभाति। अत्र कपोलौ उत्फुल्लौ, अधरोष्ठौ स्फुटौ, नेत्रौ निमीलिते, शिथिलाः विकीर्णाः मूर्धजाः च सुस्पष्टं दृश्यन्ते। अर्धनिर्मितेषु अधोऽङ्कितेषुमुखेणु प्रथमे विद्यार्विभावःद्वितीये उद्योगार्थिभावः चतुर्थे च अर्थार्थभावः च विद्भिः सम्भाव्यन्ते। वस्तुतः दशपुरीया अष्टमूर्तिः कलासौन्दर्यदृष्ट्या दार्शनिकदृष्ट्या च सर्वासु शैवप्रतिमासु अद्वितीय उत्कृष्टा दर्शनीया च अस्ति।

शब्दार्थ :
प्रलयङ्कर-प्रलय करने वाला-disasterer; लोहितवर्णा-लाल रंग की-Red coloured; निलिमाश्वेतधारा-नीली अथवा सफेद धारा-Blue or white stream; उदयः प्रलयश्च-रचना एवं विनाश-Creation & disaster; उभावपि-दोनों ही-both; विजयामत्त-भांग के नशे में मस्त-to become fortic some with Bhang (hemp leaves); अट्टहासम-जोरों से हँसना-Laughing in a loud voice; विकिर्णाः-फैले हुए-Spread; रुद्ररूपेण-क्रोध के रूप में-in the form of Anger.

हिन्दी अर्थ :
मूर्ति के पश्चिम मुख से शिव का प्रलयंकर रुद्र रूप प्रकट होता है। इस मुख की सम्पूर्ण शिला लोहित वर्ण की है। यहाँ नील-श्वेत वर्ण की धारा नहीं दिखाई देती जैसी दूसरे मुख से। इस मूर्ति में शिव की तीसरी आँख स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अत्यधिक क्रोध को व्यक्त करने के लिए मूर्ति के मुख को विकृत रूप में उत्कीर्ण किया गया है। इसी मूर्ति के मुख में ओंकार लिखा गया है। इसी ओंकार से ही उदय और प्रलय दोनों होता है-ऐसा शिल्पकारों ने इस मूर्ति में दिखाने का प्रयत्न किया है।

मूर्ति के उत्तर मुख में आनन्द तत्त्व की अभिव्यंजना की गई है। इसमें भगवान शिव भाँग के नशे में मत्त अट्टहास करते दिखाई देते हैं। यहाँ उनका गाल फूला हुआ दिखाई देता है, ओठ विकसित एवं आँखें मुंदी (अलसाई हई), सिर के बाल ढीले बिखरे हुए साफ-साफ दिखाई देते हैं। अर्ध निर्मित नीचे के मुखों में पहले मुँह पर ब्रह्मचारी (विद्यार्थी) का भाव, दूसरे में धर्मशील होने का भाव, तीसरे में उद्योगी होने का भाव एवं चौथे मुखसे अर्थार्थी होने का भाव दिखाई देता है।

वास्तव में दशपुर की यह अष्टमूर्ति कला, सौन्दर्य एवं दार्शनिक दृष्टि से सभी शैव मूर्तियों में उत्कृष्ट एवं दर्शनीय है।

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