MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन

दोलन अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.1.
नीचे दिए गए उदाहरणों में कौन आवर्ती गति को निरूपित करता है?

  1. किसी तैराक द्वारा नदी के एक तट से दूसरे तट तक जाना और अपनी एक वापसी यात्रा पूरी करना।
  2. किसी स्वतंत्रतापूर्वक लटकाए गए दंड चुंबक को उसकी N – S दिशा से विस्थापित कर छोड़ देना।
  3. अपने द्रव्यमान केन्द्र के परितः घूर्णी गति करता कोई हाइड्रोजन अणु।
  4. किसी कमान से छोड़ा गया तीर।

उत्तर:

  1. यह आवश्यक नहीं है कि तैराक को प्रत्येक बार वापस लौटने में समान समय लगे। अर्थात् यह गति आवर्ती गति नहीं है।
  2. दण्ड चुंबक को N – S दिशा से विस्थापित कर छोड़ने पर उसकी गति आवर्ती गति होगी।
  3. यह गति आवर्ती है।
  4. तीर छूटने के बाद कभी भी पुनः प्रारम्भिक स्थिति में नहीं लौटता है। अतः यह गति आवर्ती नहीं है।

MP Board Solutions

प्रश्न 14.2.
नीचे दिए गए उदाहरणों में कौन (लगभग) सरल आवर्त गति को तथा कौन आवर्ती परंतु सरल आवर्त गति नहीं निरूपित करते हैं?

  1. पृथ्वी की अपने अक्ष के परितः घूर्णन गति।
  2. किसी U नली में दोलायमान पारे के स्तंभ की गति।
  3. किसी चिकने वक्रीय कटोरे के भीतर एक बॉल बेयरिंग की गति जब उसे निम्नतम बिन्दु से कुछ ऊपर के बिन्दु से मुक्त रूप से छोड़ा जाए।
  4. किसी बहुपरमाणुक अणु की अपनी साम्यावस्था की स्थिति के परित: व्यापक कंपन।

उत्तर:

  1. आवर्त गति लेकिन सरल आवर्त गति नहीं है।
  2. सरल आवर्त गति।
  3. सरल आवर्त गति
  4. आवर्ती गति लेकिन सरल आवर्त गति नहीं है।

प्रश्न 14.3.
चित्र में किसी कण की रैखिक गति के लिए चार x – t आरेख दिए गए हैं। इनमें से कौन-सा आरेख आवर्ती गति का निरूपण करता है? उस गति का आवर्तकाल क्या है? (आवर्ती गति वाली गति का)।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 1
उत्तर:

  1. ग्राफ से स्पष्ट है कि कण कभी भी अपनी गति की पुनरावृत्ति नहीं करता है; अतः यह गति आवर्ती गति नहीं
  2. ग्राफ से ज्ञात है कि कण प्रत्येक 2 s के बाद अपनी गति की पुनरावृत्ति करता है; अत: यह गति एक आवर्ती गति है जिसका आवर्तकाल 2 s है।
  3. यद्यपि कण प्रत्येक 3 s के बाद अपनी प्रारम्भिक स्थिति में लौट रहा है परन्तु दो क्रमागत प्रारम्भिक स्थितियों के बीच कण अपनी गति की पुनरावृत्ति नहीं करता; अतः यह गति आवर्त गति नहीं है।
  4. कण प्रत्येक 2 s के बाद अपनी गति को दोहराता है; अतः यह गति एक आवर्ती गति है जिसका आवर्तकाल 2 s है।

प्रश्न 14.4.
नीचे दिए गए समय के फलनों में कौन (a) सरल आवर्त गति (b) आवर्ती परंतु सरल आवर्त गति नहीं, तथा (c) अनावर्ती गति का निरूपण करते हैं। प्रत्येक आवर्ती गति का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए: ( ω कोई धनात्मक अचर है।)

  1. sin ωt – cos ωt
  2. sin3 ωt
  3. 3 cos (\(\frac{x}{4}\) – 2 ωt)
  4. cos ωt + cos 3ωt + cos 5ωt
  5. exp (-ω2t2)
  6. 1 + ωt + ω2t2

उत्तर:
1. x = sinωt – cos ωt
= 2 \(\frac { 1 }{ \sqrt { 2 } } \) sin ωt – \(\frac { 1 }{ \sqrt { 2 } } \) cos ωt]
= \(\sqrt { 2 } \) [sin ω + cos \(\frac { \pi }{ 4 } \) – cos ωt sin \(\frac { \pi }{ 4 } \)]
= \(\sqrt { 2 } \) sin (ωt – \(\frac { \pi }{ 4 } \))
स्पष्ट है कि यह सरल आवर्त गति को व्यक्त करता है। इसका आयाम = \(\sqrt { 2 } \)
∴ आवर्त काल, T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \)

2. दिया गया फलन आवर्ती गति को व्यक्त करता है लेकिन यह सरल आवर्त गति नहीं है।
आवर्त काल, T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \)

3. यह फलन स० आ० ग० को व्यक्त करता है।
आवर्त काल T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \) = \(\frac { pi }{ \omega } \)

4. यह फलन आवर्ती गति को व्यक्त करता है जोकि सरल आवर्त गति नहीं है।
फलन cos ωt का आवर्तकाल T1 = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \)
फलन cos 2ωt का आवर्तकाल T2 = \(\frac { 2\pi }{ 3\omega } \)
व फलन cos 5ωt का आवर्तकाल T3 = \(\frac { 2\pi }{ 5\omega } \) है।
यहाँ T1 = 3T2 = 5T3
अत: T1 समय पश्चात् पहले फलन की एक बार दूसरे की तीन बार व तीसरे की पाँच बार पुनरावृत्ति होती है।
∴ दिए गए फलन का आवर्तकाल T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \) है।

5. तथा

6. में दिये दोनों फलन न तो आवर्त गति और न ही सरल आवर्त गति को निरूपित करते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 14.5.
कोई कण एक दूसरे से 10 cm दूरी पर स्थित दो बिन्दुओं A तथा B के बीच रैखिक सरल आवर्त गति कर रहा है। A से B की ओर की दिशा को धनात्मक दिशा मानकर वेग, त्वरण तथा कण पर लगे बल के चिह्न ज्ञात कीजिए जबकि यह कण –
(a) A सिरे पर है
(b) B सिरे पर है
(c) A की ओर जाते हुए AB के मध्य बिन्दु पर है
(d) A की ओर जाते हुए B से 2 cm दूर है
(e) B की ओर जाते हुए A से 3 cm दूर है तथा
(f) A की ओर जाते हुए B से 4 cm दूर है।
उत्तर:
प्रश्न से स्पष्ट है कि बिन्दु A व B अधिकतम विस्थापन की स्थितियाँ हैं जिनका मध्य बिन्दु 0 सरल आवर्त गति का केन्द्र है।

(a)

  • बिन्दु A पर कण का वेग शून्य होगा।
  • कण के त्वरण की दिशा बिन्दु A से 0 की ओर होगी। अतः त्वरण धनात्मक होगा।
  • कण पर बल त्वरण की दिशा में होगा। अतः बल धनात्मक होगा।

(b)

  • बिन्दु B पर कण का वेग शून्य होगा।
  • कण का त्वरण B से O की ओर दिष्ट होगा। अतः त्वरण ऋणात्मक होगा।

(c)

AB का मध्य बिन्दु O से सरल आवर्त गति का केन्द्र है। चूँकि कण B से A की ओर चलता हुआ O से गुजरता है। अतः वेग BA के अनुदिश है अर्थात् वेग ऋणात्मक है।

  • त्वरण शून्य है।
  • बल भी शून्य है।
  • बल भी शून्य है।

(d)

  • B से 2 सेमी० की दूरी पर कण Bव के मध्य होगा।
  • चूँकि कण B से A की ओर जा रहा है अत: वेग ऋणात्मक होगा।
  • त्वरण भी B से O की ओर दिष्ट है अतः त्वरण भी ऋणात्मक होगा।
  • बल भी ऋणात्मक होगा।

(e)

  • चूँकि कण B की ओर जा रहा है अत: वेग धनात्मक होगा।
  • चूँकि कण A व O के मध्य है अतः त्वरण A से 0 की ओर दिष्ट है। अतः त्वरण भी धनात्मक है।

(f)

  • चूँकि कण A की ओर गतिमान है अतः वेग ऋणात्मक होगा।
  • बल भी धनात्मक है।
  • चूँकि कण B तथा O के बीच है व त्वरण B से O की ओर दिष्ट है। अत: त्वरण ऋणात्मक है।
  • बल भी ऋणात्मक है।

प्रश्न 14.6.
नीचे दिए गए किसी कण के त्वरण a तथा विस्थापन x के बीच संबंधों में से किससे सरल आवर्त गति संबद्ध है:

  1. a = 0.7x
  2. a = – 200x2
  3. a = -10x
  4. a = 100x3

उत्तर:
उपरोक्त में से केवल विकल्प (3) में a = – 10x, त्वरण विस्थापन के समानुपाती है। इसमें त्वरण विस्थापन के विपरीत दिशा में है। अतः केवल यह सम्बन्ध सरल आवर्त गति को व्यक्त करता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 14.7.
सरल आवर्त गति करते किसी कण की गति का वर्णन नीचे दिए गए विस्थापन फलन द्वारा किया जाता है,
x (t) = A cos (ωt + φ) यदि कण की आरंभिक (t = 0) स्थिति 1 cm तथा उसका आरंभिक वेग rcms-1 है, तो कण का आयाम तथा आरंभिक कला कोण क्या है? कण की कोणीय आवृत्ति πs-1 है। यदि सरल आवर्त गति का वर्णन करने के लिए कोज्या (cos) फलन के स्थान पर हम ज्या (sin) फलन चुने; x = B sin (ωt + α) तो उपरोक्त आरंभिक प्रतिबंधों में कण का आयाम तथा आरंभिक कला कोण क्या होगा?
उत्तर:
(a) x (t) = A cos (ωt +ϕ) ……. (i)
t = 0, ω = πs-1
∴ x = 1 cm पर
v = ω = cms-1 ……. (ii)
∴ समी० (i) व (ii) से,
1 = A cos (π × 0 + ϕ) = A cos ϕ ….. (iii)
पुनः ω = \(\frac { 2\pi }{ T } \)
∴ T = m \(\frac { 2\pi }{ \omega } \) = \(\frac { 2\pi }{ \pi } \) = 2s
समी० (i) का t के सापेक्ष अवकलन करने पर,
\(\frac{d}{dx}\)(x) = -A sin (ωt + ϕ)
= – Aωsin (ωt + ϕ) …… (iv)
समी० (ii) व (iv) से
π = – A × π × sin (ωt + ϕ)
= – A sin ϕ
या 1 = – A sin ϕ …. (v)
समी० (ii) व (v) का वर्ग करके जोड़ने पर,
12 + 12 = A2 (sin2ϕ + cos2ϕ) = A2
∴ A = \(\sqrt { 2 } \) cm
समी० (v) को समी० (iii) से भाग देने पर,
1 = – \(\frac { sin\phi }{ cos\phi } \) = -tan ϕ
या tan ϕ = – 1 = – tan \(\frac { \pi }{ 4 } \)
= tan (2π – \(\frac { \pi }{ 4 } \))
= tan \(\frac { 7\pi }{ 4 } \)
∴ ϕ = \(\frac{7}{4}\) π

(b) जब x = B sin (ωt + α)
या x = B cos [(ωt + α) – \(\frac { \pi }{ 2 } \)]
अब’ (a) t = 0 पर x = 1 सेमी
तथा ∴ v = πcms-1, ω = πs-1 से,
∴ 1 = B cos (π × 0 + α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))
= B cos (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) …. (vi)
पुनः माना v’ = वेग
∴ v’ = \(\frac{d}{dt}\)(x)
= – BW sin (ωt + α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))
या π = -B × π sin(π × 0 + α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)
= -Bπ sin (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))
= -Bπ sin (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) ….. (vii)
सभी० (vii) व (viii) का वर्ग कर जोड़ने पर,
12 + 12 = B2 [sin2(α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) + cos 2(α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))]
या 2 = B2 or B = \(\sqrt { 2 } \) cm
समी० (viii) को (vii) से भाग देने पर,
1 = -tan (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) = -1 = – tan \(\frac { \pi }{ 4 } \)
= tan (2π – \(\frac { \pi }{ 4 } \)) = tan \(\frac { 7\pi }{ 4 } \)
या
α – \(\frac { \pi }{ 2 } \) = \(\frac { 7\pi }{ 4 } \)
या α = \(\frac { 7\pi +2\pi }{ 4 } \) = \(\frac { 9\pi }{ 4 } \) = \(\frac { 9\pi }{ 4 } \)
= 2π + \(\frac { \pi }{ 4 } \)
∴ α = \(\frac { \pi }{ 4 } \)

MP Board Solutions

प्रश्न 14.8.
किसी कमानीदार तुला का पैमाना 0 से 50 kg तक अंकित है और पैमाने की लम्बाई 20 cm है। इस तुला से लटकाया गया कोई पिण्ड,जब विस्थापित करके मुक्त किया जाता है, 0.6 s के आवर्तकाल से दोलन करता है। पिंड का भार कितना है?
उत्तर:
दिया है, m = 50 kg,
अधिकतम प्रसार y = 20 – 0 = 20 cm
= 0.2 m, T = 0.6s
∴ अधिकतम बल
F = mg = 50 × 9.8 = 490.0 N
∴ स्प्रिंग नियतांक
k = \(\frac{F}{Y}\) = \(\frac{490}{0.2}\)
= \(\frac { 490\times 10 }{ 2 } \) = 2450 Nm-1
हम जानते हैं कि आवर्त काल T = 2π \(\sqrt { \frac { m }{ k } } \)
या T2 = 4π2 \(\frac{m}{k}\)
या m = \(\frac { T^{ k } }{ 4\pi ^{ 2 } } \)
= \(\frac { (0.6)^{ 2 }\times 2450 }{ 4\times 9.87 } \) = 22.36 kg
वस्तु का भार w = mg = 22.36 × 9.8
= 219.1 N = 22.36 kg

प्रश्न 14.9.
1200 Nm-1 कमानी – स्थिरांक की कोई कमानी (चित्र) में दर्शाए अनुसार किसी क्षैतिज मेज से जुड़ी है। कमानी के मुक्त सिरे से 3 kg द्रव्यमान का कोई पिण्ड जुड़ा है। इस पिण्ड को एक ओर 2.0 cm दूरी तक खींच कर मुक्त किया जाता है।

  1. पिण्ड के दोलन की आवृत्ति
  2. पिण्ड का अधिकतम त्वरण, तथा
  3. पिण्ड की अधिकतम चाल ज्ञात कीजिए।

उत्तर:
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 2
दिया है: k = 1200 Nm-1, m = 3.0 kg,
A = 2.0 cm = 0.02 m
= अधिकतम विस्थापन
1. हम जानते हैं कि आवर्तकाल T = 2π\(\sqrt { \frac { M }{ k } } \)
आवृत्ति, v = \(\frac{1}{T}\)
∴ v = \(\frac{1}{2π}\)\(\sqrt { \frac { k }{ m } } \)
= \(\frac { 1 }{ 2\times 3.142 } \) × \(\sqrt { \frac { 1200 }{ 3 } } \)
= \(\frac { 1 }{ 2\times 3.142 } \) = 3.18
∴ v = 3.18 s-1 = 3.2 s-1

2. त्वरण, 4 = -ω2x = \(\frac{-k}{m}\)x
या c|amax| = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) |xmax|, जहाँ ω = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) या x के अधिकतम होने पर त्वरण भी अधिकतम होगा।
या x = A = 0.02 m
∴ a = \(\frac{1200}{3}\) × 0.02 × 8.0 ms-2

3. द्रव्यमान की अधिकतम चाल
v = Aω = A\(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) = 0.02 × \(\sqrt { \frac { 1200 }{ 3 } } \)
= 0.02 × 20 = 0.40 ms-1

प्रश्न 14.10.
प्रश्न 14.9 में मान लीजिए जब कमानी अतानित अवस्था में है तब पिण्ड की स्थिति x = 0 है तथा बाएँ से दाएँ की दिशा x – अक्ष की धनात्मक दिशा है। दोलन करते पिण्ड के विस्थापन x को समय के फलन के रूप में दर्शाइए, जबकि विराम घड़ी को आरम्भ (t = 0) करते समय पिण्ड,
(a) अपनी माध्य स्थिति
(b) अधिकतम तानित स्थिति, तथा
(c) अधिकतम संपीडन की स्थिति पर है।
सरल आवर्त गति के लिए ये फलन एक दूसरे से आवृत्ति में,आयाम में अथवा आरंभिक कला में किस रूप में भिन्न है?
उत्तर:
चूँकि द्रव्यमान x = 0 पर स्थित है। अतः x – दिशा में विस्थापन निम्नवत् होगा
x = A sin ωt …. (i)
[∴ x = 0 पर प्रारम्भिक कला ϕ = 0]
प्रश्न 14.9 से A = 2 cm = 0.02 m
k = 1200 Nm-2 ω = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \)
= \(\sqrt { \frac { 1200 }{ 3 } } \) = 20 s-1

(a) जब वस्तु माध्य स्थिति में है, समी० (i) से,
x = 2 sin 20t ……. (ii)

(b) अधिकतम तानित स्थिति में ϕ = \(\frac{π}{2}\)
∴ x = A sin (ωt + ϕ)
= 2 sin (20t + \(\frac{π}{2}\)) = 2 cos 20t ………… (iii)

(c) अधिकतम सम्पीडन की स्थिति में,
φ = \(\frac{π}{2}\) + \(\frac{π}{2}\) = \(\frac{2π}{2}\)
∴ x = A sin (ωt + ϕ)
A sin (ωt + \(\frac{2π}{2}\)) = – A cos ωt
∴ x = A cos ωt = – 2cos (20t) ……… (iv)
समी० (ii), (iii) तथा (iv) से स्पष्ट है कि फलन केवल प्रारम्भिक कला. में ही असमान है चूँकि इनके आयाम (A = 2 cm) तथा आवर्तकाल समान है।
i.e.,T = \(\frac{2π}{ω}\) = \(\frac{2π}{10}\) = \(\frac{π}{10}\) rad s-1

MP Board Solutions

प्रश्न 14.11.
चित्र में दिए गए दो आरेख दो वर्तुल गतियों के तद्नुरूपी हैं। प्रत्येक आरेख पर वृत्त की त्रिज्या, परिक्रमण काल, आरंभिक स्थिति और परिक्रमण की दिशा दर्शायी गई है। प्रत्येक प्रकरण में, परिक्रमण करते कण के त्रिज्य – सदिश के x अक्ष पर प्रक्षेप की तद्नुरूपी सरल आवर्त गति ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 3
उत्तर:
(a) यहाँ t = 0 पर, OP, x अक्ष से \(\frac{π}{2}\) का कोण बनाती है। चूंकि गति वर्तुल है अतः ϕ = \(\frac{+π}{2}\) रेडियन। अतः t समय पर OP का मन्घटक सरल आवर्त गति करता है।
t = 0 पर OP, x – अक्ष से धन दिशा में T कोण बनाता है।
x = A cos (\(\frac{2πt}{T}\)) + ϕ)
= 3 cos (\((\pi t+\frac { \pi }{ 2 } )\))
(∴A = 3 cm, T = 2s, cx, cm में है)
x = 3 cos (\((\pi t+\frac { \pi }{ 2 } )\)) = -3 sin πt
x = -3 sin πt (cm)
T = 4s, A = 2m
it + 2)=-3 sin t
t = 0 पर Op x – अक्ष से धन,दिशा में T कोण बनाता है। i.e., = ϕ +π
अतः t समय में OP के x घटक की सरल आवर्त गति की समीकरण निम्न होगी –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 4

प्रश्न 14.12.
नीचे दी गई प्रत्येक सरल आवर्त गति के लिए तद्नुरूपी निर्देश वृत्त का आरेख खींचिए। घूर्णी कण की आरंभिक (t = 0) स्थिति, वृत्त की त्रिज्या तथा कोणीय चाल दर्शाइए। सुगमता के लिए प्रत्येक प्रकरण में परिक्रमण की दिशा वामावर्त लीजिए। (x को cm में तथाt को s में लीजिए।)

  1. x = – 2 sin (3t + π/3)
  2. x = cos (π/6 – t)
  3. x = 3 sin (2πt + π/4)
  4. x = 2 cos πt

उत्तर:
1. x = – z sin (3t + π/3)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 5
∴संगत निर्देश वृत्त चित्र (a) में दिखाया गया है।
समी० (i) की तुलना x = A cos (ωt + ϕ) से करने पर,
T = \(\frac{2πt}{3}\) , ϕ = \(\frac{5π}{6}\), A = 2 cm

2. x = cos (\(\frac{π}{6}\) – t)
= cos (t – \(\frac{π}{6}\))
= 1 cos (\(\frac{2π}{2π}\) t – \(\frac{π}{6}\)) ………… (ii)
∴ संगत निर्देश वृत्त चित्र (a) में दिखाया गया है।
समी० (ii) की तुलना x = A cos (\(\frac{2π}{t}\) + ϕ) से करने पर …. (iii)
A = 1cm, t = 2π, ϕ = – \(\frac{π}{-6}\)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 6
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 6-2
संगत निर्देश वृत्त चित्र (c) में दिखाया गया है।
समी० (iv) की (iii) से तुलना करने पर
A = 3 cm
T = 1s
φ = – \(\frac{π}{4}\)

4. x = 2 cos πt
= 2 cos (\(\frac{π}{1}\) t + 0) ……….. (v)
संगत निर्देश वृत्त चित्र (c) में दिखाया गया है।
में दिखाया गया है। समी० (iii) की (v) से तुलना करने पर,
A = 2 cm, T = 15, ϕ = 0
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 7

MP Board Solutions

प्रश्न 14.13.
चित्र (a) में k बल – स्थिरांक की किसी कमानी के एक सिरे को किसी दृढ़ आधार से जकड़ा तथा दूसरे मुक्त सिरे से एक द्रव्यमान m जुड़ा दर्शाया गया है। कमानी के मुक्त सिरे पर बल F आरोपित करने से कमानी तन जाती है। चित्र (b) में उसी कमानी के दोनों मुक्त सिरों से द्रव्यमान m जुड़ा दर्शाया गया है। कमानी के दोनों सिरों को चित्र में समान बल F द्वारा तानित किया गया है।
(a) दोनों प्रकरणों में कमानी का अधिकतम विस्तार क्या है।
(b) यदि (a) का द्रव्यमान तथा (b) के दोनों द्रव्यमानों को मुक्त छोड़ दिया जाए, तो प्रत्येक प्रकरण में दोलन का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 8
उत्तर:
माना कि स्प्रिंग का बल नियतांक = k
मुक्त सिरे से लटकाया गया द्रव्यमान = M

(1) मुक्त सिरे पर लगाया गया बल = F
(a) माना बल F लगाने पर मुक्त सिरे पर द्रव्यमान m लटकाने से उत्पन्न त्वरण a है।
अतः F = ma ……. (i)
माना कि चित्र (a) में उत्पन्न विस्तार y1 है।
F = – ky1
समी० (i) व (ii) से,
ky1 = ma = m \(\frac { d^{ 2 }y }{ dt^{ 2 } } \)
जहाँ a = \(\frac { d^{ 2 }y }{ dt^{ 2 } } \) = \(\sqrt { \frac { -k }{ m } } \) y1 … (ii)
या
a = \(\frac { d^{ 2 }y }{ dt^{ 2 } } \) = \(\sqrt { \frac { -k }{ m } } \) y1
= \(\sqrt { \frac { -k }{ m } } \) y ………….. (iii)
जहाँ y विस्थापन y1 के समान है। पुनः हम जानते हैं कि
a = – ω2 y ……….. (iv)
∴समी० (iii) व (iv) से,
ω2 = \(\frac{k}{m}\) या ω = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) ….. (v)
∴स्प्रिंग में उत्पन्न अधिकतम प्रसार y1 = y या
y1 = \(\frac{F}{K}\)
(b) समी० (v) से, a ∝ y अधिकतम प्रसार y1 = y
या
∴ माना m द्रव्यमान के दोलन का आवर्तकाल T1 है।
अतः T1 = \(\frac{2π}{ω}\)
= 2π \(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) (समी० (v) से)
या T1 = 2π\(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) ……… (vi)

(2) (a) माना दोनों द्रव्यमानों को छोड़ने पर, स्प्रिंग में कुल उत्पन्न प्रसार y2 है। चूँकि दो द्रव्यमान समान हैं अतः प्रत्येक द्रव्यमान के कारण स्प्रिंग में उत्पन्न प्रसार y है। अतः
y2 = y’ + y’ = 2y’
पुनः 1 (a) से,
y2 + \(\frac{F}{K}\)
\(\frac{F}{K}\) = 2y’
या y’ = \(\frac{1}{2}\)\(\frac{F}{K}\)
∴ y2 = 2.\(\frac{F}{2k}\) = \(\frac{F}{K}\)
∴ प्रत्येक द्रव्यमान का विस्थापन
\(\frac { d^{ 2 }y’ }{ dt^{ 2 } } \) = – \(\frac{F}{m}\) = – \(\frac { 2ky’ }{ m } \)
∴ प्रत्येक द्रव्यमान में \(\frac { d^{ 2 }y’ }{ dt^{ 2 } } \) = – \(\frac{F}{m}\) = \(\frac { 2ky’ }{ m } \)
परन्तु स० आ० ग० में \(\frac { d^{ 2 }y’ }{ dt^{ 2 } } \) = – ω2y’
अतः ω2 = \(\frac{2k}{m}\)
या ω = \(\sqrt { \frac { 2k }{ m } } \)
(b) माना प्रत्येक द्रव्यमान का आवर्तकाल T2 है।
अतः T = \(\frac{2π}{ω}\) = \(\frac { 2\pi }{ \sqrt { \frac { 2k }{ m } } } \)
= 2π \(\sqrt { \frac { m }{ 2k } } \)

MP Board Solutions

प्रश्न 14.14.
किसी रेलगाड़ी के इंजन के सिलिंडर हैड में पिस्टन का स्ट्रोक (आयाम का दो गुमा) 1.0 m का है। यदि पिस्टन 200 rad/min की कोणीय आवृत्ति से सरल आवर्त गति करता है तो उसकी अधिकतम चाल कितनी है?
उत्तर:
दिया है:
ω = 200 रेडियन/मिनट = \(\frac{200}{60}\) = \(\frac{10}{3}\) रेडियन प्रति सेकण्ड
स्ट्रोक की लम्बाई = 1 मीटर
माना सरल आवर्त गति का आयाम = a
∴ 2a = 1 मीटर
या a = \(\frac{1}{2}\) = 0.5 मीटर
सूत्र चाल = aω से,
पिस्टन की अधिकतम चाल,
vmax = 400 = 0.5 × \(\frac{10}{3}\)
= \(\frac{5}{3}\) = 1.67 मीटर/सेकण्ड

प्रश्न 14.15.
चंद्रमा के पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण 17 ms-2 है। यदि किसी सरल लोलक का पृथ्वी के पृष्ठ पर आवर्तकाल 3.5 s है, तो उसका चंद्रमा के पृष्ठ पर आवर्तकाल कितना होगा? ( पृथ्वी के पृष्ठ पर g = 9.8 ms-2)
उत्तर:
दिया है:
पृथ्वी के पृष्ठ पर आवर्तकाल T = 3.5 s
चंद्रमा के पृष्ठ पर आवर्तकाल = Tm = ?
पृथ्वी के पृष्ठ पर गुरुत्वाकर्षण के कारण त्वरण
ge = 9.8 ms-2
सरल लोलक की लम्बाई l = ?
सूत्र
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 9
समी० (ii) व (i) से भगा देने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 11
Tm = 8.4s

प्रश्न 14.16.
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(a) किसी कण की सरल आवर्त गति के आवर्तकाल का मान उस कण के द्रव्यमान तथा बल-स्थिरांक पर निर्भर करता T = 2π\(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) कोई सरल लोलक सन्निकट सरल आवर्त गति करता है। तब फिर किसी लोलक का आवर्तकाल लोलक के द्रव्यमान पर निर्भर क्यों नहीं करता?
(b) किसी सरल लोलक की गति छोटे कोण के सभी दोलनों के लिए सन्निकट सरल आवर्त गति होती है। बड़े कोणों के दोलनों के लिए एक अधिक गूढ़ विश्लेषण यह दर्शाता है कि T का मान 2π\(\sqrt { \frac { l }{ g } } \) से अधिक होता है। इस परिणाम को समझने के लिए किसी गुणात्मक कारण का चिंतन कीजिए।
(c) कोई व्यक्ति कलाई घड़ी बाँधे किसी मीनार की चोटी से गिरता है। क्या मुक्त रूप से गिरते समय उसकी घड़ी यथार्थ समय बताती है?
(d) गुरुत्व बल के अंतर्गत मक्त सिरे से गिरते किसी केबिन में लगे सरल लोलक के दोलन की आवृत्ति क्या होती है?
उत्तर:
(a) चूँकि सरल लोलक के लिए k स्वयं m के अनुक्रमानुपाती होता है अत: m निरस्त हो जाता है।
(b) sin θ < θ पर, यदि प्रत्यानयन बल mg sin θ का प्रतिस्थापन mg θ से कर दें तब इसका तात्पर्य यह होगा कि बड़े कोणों के लिए g के परिमाण में प्रभावी कमी व इस प्रकार सूत्र T = 2π\(\sqrt { \frac { l }{ g } } \) से प्राप्त आवर्तकाल के परिमाण में वृद्धि होगी।
(c) हाँ, क्योंकि कलाई घड़ी में आवर्तकाल कमानी क्रिया पर निर्भर करता है, जिसका गुरुत्वीय त्वरण से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।
(d) स्वतन्त्रतापूर्वक गिरते हुए मनुष्य के लिए गुरुत्वीय त्वरण का प्रभावी मान शून्य हो जाता है। अतः आवृत्ति शून्य होती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 14.17.
किसी कार की छत से l लम्बाई का कोई सरल लोलक, जिसके लोलक का द्रव्यमान M है, लटकाया गया है। कार R त्रिज्या की वृत्तीय पथ पर एकसमान चाल से गतिमान है। यदि लोलक त्रिज्य दिशा में अपनी साम्यावस्था की स्थिति के इधर-उधर छोटे दोलन करता है, तो इसका आवर्तकाल क्या होगा?
उत्तर:
कार जब मोड़ पर मुड़ती है तो उसकी गति में त्वरण \(\frac { v^{ 2 } }{ R } \) होता है। अत: कार एक अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र है।
अत: गोलक पर एक छद्म बल \(\frac { mv^{ 2 } }{ R } \) वृत्तीय पथ के बाहर की ओर लगेगा जिस कारण लोलक ऊर्ध्वाधर रहने के स्थान पर थोड़ा तिरछा हो जाएगा।
इस क्षण लोलक पर दो बल क्रमश: उपकेन्द्र बल \(\frac { mv^{ 2 } }{ R } \) व भार mg’ लगेंगे।
यदि लोलक के लिए गुरुत्वीय त्वरण g का प्रभावी मान g’ हो, तो गोलक पर प्रभावी बल mg’ होगा जो कि उक्त दो बलों का परिणामी है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 12
अतः लोलक का नया आवर्तकाल, सूत्र T = 2π\(\sqrt { \frac { l }{ g } } \) से
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 13

प्रश्न 14.18.
आधार क्षेत्रफल A तथा ऊँचाई h के एक कॉर्क का बेलनाकार टुकड़ा ρi घनत्व के किसी द्रव में तैर रहा है। कॉर्क को थोड़ा नीचे दबाकर स्वतंत्र छोड़ देते हैं, यह दर्शाइए कि कॉर्क ऊपर-नीचे सरल आवर्त दोलन करता है जिसका आवर्तकाल
T = 2π\(\sqrt { \frac { h\rho }{ \rho _{ i }g } } \) है।
यहाँ ρ कर्क का धनाथव है (ध्रुव की सायनाथा के कारन अवमंदन को नगण्य मानिये)।
उत्तर:
मना कर्क के टुकड़ों का द्रव्यमान m है मना समथदस्थता मे इस टुकड़ों की l लंबदइ दुव मे डूबती है
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 14
तैरने के सिद्धान्त से, कॉर्क के डूबे भाग द्वारा हटाए गए द्रव का भार कॉर्क के भार के समान होगा। अतः
1g = mg
जहाँ V = डूबे भाग द्वारा विस्थापित द्रव का आयतन माना कि कॉर्क का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है।
∴ V = A × lρig = mg
या Aρil = m ………. (i)
कॉर्क को द्रव में नीचे की ओर दबाकर छोड़ने पर यह ऊपर नीचे दोलन करने लगता है। माना किसी क्षण इसका साम्यावस्था से नीचे की ओर विस्थापन y है। इस क्षण, इसकी लम्बाई (y) द्वारा विस्थापित द्रव का उत्क्षेप बेलनाकार बर्तन को प्रत्यानयन बल प्रदान करेगा।
∴ F = -AYρ1g
यहाँ ऋण चिह्न प्रदर्शित करता है कि प्रत्यानयन बल F1 कॉर्क के टुकड़े के विस्थापन के विपरीत दिशा में लगता है। अतः टुकड़े का त्वरण,
a = \(\frac{F}{m}\) = \(\frac { -Ay\rho _{ 1 }g }{ m } \) … (ii)
चूँकि कॉर्क के टुकड़े का घनत्व ρ व ऊँचाई h है।
m = Ahρ
अतः त्वरण a = \(\frac { -Ay\rho _{ 1 }g }{ Ah } \)ρ
= – (\(\frac { \rho _{ 1 }g }{ h } \rho \)) y
∴ a ∝(-y)
अतः कॉर्क के टुकड़े का त्वरण α, विस्थापन के अनुक्रमानुपाती परन्तु दिशा विस्थापन के विपरीत है। अतः यह स० आ० ग० करता है।
समी० (ii) से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 15
अतः कॉर्क का आवर्तकाल T = 2π\(\sqrt { \frac { y }{ a } } \)
= 2π\(\sqrt { \frac { h\rho }{ \rho _{ 1 }g } } \)

प्रश्न 14.19.
पारे से भरी किसी U नली का एक सिरा किसी चूषण पम्प से जुड़ा है तथा दूसरा सिरा वायुमण्डल में खुला छोड़ दिया गया है। दोनों स्तम्भों में कुछ दाबान्तर बनाए रखा जाता है। यह दर्शाइए कि जब चूषण पम्प को हटा देते हैं, तब U नली में पारे का स्तम्भ सरल आवर्त गति करता है।
उत्तर:
स्पष्ट है कि चूषण पम्प की अनुपस्थिति में दोनों नलियों में पारे के तल समान होंगे। यह साम्यावस्था की स्थिति है। चूषण पम्प लगाने पर पम्प वाली नली में पारे का तल ऊपर उठ जाता है और पम्प हटाते ही पारा साम्यावस्था को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 16
माना पम्प हटाने के बाद किसी क्षण दूसरी नली में पारे का तल साम्यावस्था से ) दूरी नीचे है तो दूसरी ओर यह y दूरी ऊपर होगा।
यदि नली में एकांक लम्बाई में भरे पारे का द्रव्यमान m है तो पम्प वाली नली में चढ़े अतिरिक्त पारद स्तम्भ का भार 2y × mg होगा। यह भार ही द्रव को दूसरी ओर धकेलता है, अतः प्रत्यानयन बल F = – 2mgy होगा।
ऋण चिह्न यह प्रदर्शित करता है कि यह बल विस्थापन के विपरीत दिष्ट है।
माना साम्यावस्था में दोनों नलियों में पारद स्तम्भ की ऊँचाई h है, तब नलियों में भरे पारे का कुल द्रव्यमान M = 2hm होगा।
यदि पारद स्तम्भ का त्वरण a है तो
F = ma
⇒ – 2mgy = 2hma
⇒त्वरण a = – (\(\frac{g}{h}\)) y
अतः a ∝(-y)
इससे स्पष्ट है कि पारद स्तम्भ की गति सरल आवर्त गति है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 17
∴आवर्तकाल T = 2π\(\sqrt { \frac { y }{ a } } \)
⇒ T = 2π\(\sqrt { \frac { h }{ g } } \)

दोलन अतिरिक्त अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.20.
चित्र में दर्शाए अनुसार V आयतन के किसी वायु कक्ष की ग्रीवा (गर्दन) की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल a है। इस ग्रीवा में m द्रव्यमान की कोई गोली बिना किसी घर्षण के ऊपर-नीचे गति कर सकती है। यह दर्शाइए कि जब गोली को थोड़ा नीचे दबाकर मुक्त छोड़ देते हैं, तो वह सरल आवर्त गति करती है। दाब आयतन विचरण को समतापी मानकर दोलनों के आवर्तकाल का व्यंजक ज्ञात कीजिए [चित्र देखिए]।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 18
उत्तर:
गोली को नीचे की ओर दबाकर छोड़ने पर यह अपनी साम्यावस्था के ऊपर नीचे सरल रेखीय दोलन करने लगती है।
माना कि किसी क्षण गोली का साम्य अवस्था से नीचे की ओर विस्थापन है। माना इस स्थिति में कक्ष में भरी वायु का आयतन। के स्थान पर V – ∆V हो जाता है व दाब P ये (P + ∆P) हो जाता है।
∴ बॉयल के नियम से,
PV = (P + ∆P) (V – ∆V)
या ∆P.V = P.∆V (∆P∆V को छोड़ने पर)
∴ P = \(\frac { \Delta P }{ (\Delta V/V) } \)
लेकिन P = ET = वायु की समतापी प्रत्यास्थता है।
∴ ET = \(\frac { \Delta P }{ (\Delta V/V) } \)
∴अभिलम्ब प्रतिबल,
∆P = \(\frac{F}{A}\) = ET. \(\frac { \Delta V }{ V } \)
जहाँ F वायु द्वारा गोली पर लगने वाला अतिरिक्त बल है व a ग्रीवा का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल है।
चूँकि ग्रीवा के गोली का नीचे की ओर विस्थापन ∆V = ax
∴ \(\frac{F}{a}\) = Et.\(\frac { ax }{ V } \)
या F = (\(\frac { E_{ T }a^{ 2 } }{ V } \)) x …………… (i)
परन्तु गोली पर वायु द्वारा लगने वाला बल बाहर की ओर लगता है। अत: यह बल गोली के विस्थापन x के विपरीत दिशा में है अर्थात् यह एक प्रत्यानयन बल है।
सूत्र F = ma से,
ma = – (\(\frac { E_{ T }-a^{ 2 } }{ V } \)) x [समी० (i) से]
∴ त्वरण = – \(\frac { E_{ T }a^{ 2 } }{ mv } \) x ……. (ii)
∴ त्वरण ∝ (-x)
अर्थात् त्वरण विस्थापन के विपरीत दिशा में हैं।
अतः गोली स० आ० ग० करती है।
समी० (ii) से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 19
∴ आवर्तकाल,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 20

प्रश्न 14.21.
आप किसी 3000 kg द्रव्यमान के स्वचालित वाहन पर सवार हैं। यह मानिए कि आप इस वाहन की निलंबन प्रणाली के दोलनी अभिलक्षणों का परीक्षण कर रहे हैं। जब समस्त वाहन इस पर रखा जाता है, तब निलंबन 15 cm आनमित होता है। साथ ही, एक पूर्ण दोलन की अवधि में दोलन के आयाम में 50% घटोतरी हो जाती है। निम्नलिखित के मानों का आंकलन कीजिए:
(a) कमानी स्थिरांक, तथा
(b) कमानी तथा एक पहिए के प्रघात अवशोषक तंत्र के लिए अवमंदन स्थिरांक b यह मानिए कि प्रत्येक पहिया 750 kg द्रव्यमान वहन करता है।
उत्तर:
(a) दिया है: M = 3000 kg
प्रत्येक पहिए पर लटकाया गया द्रव्यमान = m = 750 kg
y = 15 cm = 0.15 m, α = g
स्प्रिंग नियतांक k = ?
हम जानते हैं कि, \(\frac{m}{k}\) = \(\frac{y}{a}\) = \(\frac{y}{g}\)
या mg = ky
या k = \(\frac{mg}{y}\) = \(\frac { 750\times 9.8 }{ 0.15 } \)
= 4.9 × 104 Nm-1
= 5 × 104 Nm-1
(b) \(\sqrt { km } \) = \(\sqrt { 5\times 10^{ 4 }\times 750 } \)
= 61.24 × 102 kgs -1
T = 2π \(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) ………. (i)
पुनः माना कि प्रारम्भिक मान के आधे मान तक छोड़ने पर आयाम की आवर्त काल T1/2 है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 21
दिए गए प्रतिबन्ध से T = T1/2 एक दोलन का समय
या
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 22
= 0.135037 × 104 = 1350 kgs-1

प्रश्न 14.22.
यह दर्शाइए कि रैखिक सरल आवर्त गति करते किसी कण के लिए दोलन की किसी अवधि की औसत गतिज ऊर्जा उसी अवधि की औसत स्थितिज ऊर्जा के समान होती है।
उत्तर:
माना कि m द्रव्यमान का कण सरल आवर्त गति करता है जिसका आवर्त काल T है। किसी क्षण t पर जबकि समय माध्य स्थिति से मापा गया है, कण का विस्थापन निम्नवत् है –
y = a sinωt
V = कण का वेग
\(\frac { dy }{ dt } \) = \(\frac { d }{ dt } \) (a sin ωt)
= a \(\frac { d }{ dt } \) (sin ωt) …. (i)
K.E., Ek = \(\frac{1}{2}\) mv2
= \(\frac{1}{2}\) m (aω cos ωt)2
= \(\frac{1}{2}\) ma2ω2cos2ωt
P.E., Ep = \(\frac{1}{2}\) ky2
= \(\frac{1}{2}\) m(αωcosωt)2
= \(\frac{1}{2}\) ma2a2sin2ωt (∴k = mω2)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 23
पुनः प्रति चक्र औसत स्थितिज ऊर्जा निम्नवत् है –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 24
अतः समी० (ii) व (iii) से स्पष्ट है कि दोलन काल के दौरान औसत गतिज ऊर्जा समान; दोलनकाल में औसत स्थितिज ऊर्जा के समान होती है।

प्रश्न 14.23
10 kg द्रव्यमान की कोई वृत्तीय चक्रिका अपने केन्द्र से जुड़े किसी तार से लटकी है। चक्रिका को घूर्णन देकर तार में ऐंठन उत्पन्न करके मुक्त कर दिया जाता है। मरोड़ी दोलन का आवर्तकाल 1.5 s है। चक्रिका की त्रिज्या 15 cm है। तार का मरोड़ी कमानी नियतांक ज्ञात कीजिए। [मरोड़ी कमानी नियतांक a संबंध J = – αθ द्वारा परिभाषित किया जाता है, जहाँ J प्रत्यानयन बल युग्म है तथा θ ऐंठन कोण है।]
उत्तर:
सम्पूर्ण निकाय मरोड़ी दोलन की भाँति कार्य करता है जिसका साम्य मरोड़ी आघूर्ण निम्नवत् है –
τ = \(\frac { \pi \eta r^{ 4 } }{ 2I } \) θ …. (i)
जहाँ t = तार की त्रिज्या
η = लटकाए गए तार की दृढ़ता गुणांक, θ = तार में ऐंठन कोण प्रति ऐंठन मरोड़ी आघूर्ण
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 25
चूंकि चक्रिका दोलन करती है अतः इस पुर लगने पर विक्षेषणा आधूर्ण = I\(\frac { d^{ 2 }\theta }{ dt^{ 2 } } \)
साम्यावस्था में Cθ = I\(\frac { d^{ 2 }\theta }{ dt^{ 2 } } \) …. (iii)
जहाँ \(\frac { d^{ 2 }\theta }{ dt^{ 2 } } \) = कोणीय त्वरण
समी० (i) की तुलना दी हुई समी० J = -αθ से करने पर,
J = τ
तथा
α = \(\frac { \pi \eta r^{ 4 } }{ 2I } \) ……….. (iv)
∴ समी० (ii) व (iv) से
α ~ C
समीकरण (iv) मरोड़ी कमानी नियतांक को व्यक्त करता है। वृत्तीय चक्रिका के पुनः I = \(\frac{1}{2}\)mr2
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 26
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 26-2
दिया है:
r =15 cm = 0.15 cm,
T = 1.5 s, m=10 kg
इन मानों को समी० (v) में रखने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 27
= 1.97 Nm rad-1
= 2.0 Nm rad-1

प्रश्न 14.24.
कोई वस्तु 5 cm के आयाम तथा 0.2 सेकण्ड की आवृत्ति से सरल आवृत्ति गति करती है। वस्तु का त्वरण तथा वेग ज्ञात कीजिए जब वस्तु का विस्थापन (a) 5 cm (b) 3 cm (c) 0 cm हो।
उत्तर:
दिया है: आयाम, r = 5 cm = 0.05 m
T = 0.2 s
ω = \(\frac { 2\pi }{ T } \) = \(\frac { 2\pi }{ 0.2 } \) = 10π rad s-1
माना कि वस्तु का विस्थापन y है। अतः
v = ω\(\sqrt { r^{ 2 }-y^{ 2 } } \)
तथा a = \(\frac { dv }{ dt } \) = – ω2y
(a) दिया है:
y = 5 cm = 5 × 10-2 m
∴ v = 10π \(\sqrt { (0.05)^{ 2 }=(0.03)^{ 2 } } \) – 0
तथा a = – (10π)2 × 0.05 = – 5π2ms-2
(b) दिया है: y = 3 cm = 3 × 10-2
∴ v = 10π \(\sqrt { (0.05)^{ 2 }=(0.03)^{ 2 } } \)
= 10π × 0.04 ms -1
= 0.4π ms -1
तथा a = – (10π)2 (3 × 10-2)
= – 3π2 ms -2
(c) दिया है: y = 0 cm
v = ω\(\sqrt { r^{ 2 }-0^{ 2 } } \)
= rω = 0.05 × 10π
= 0.5π ms-1
तथा a = -ω2 × 0 = 0

MP Board Solutions

प्रश्न 14.25.
किसी कमानी से लटका एक पिण्ड एक क्षैतिज तल में कोणीय वेग से घर्षण या अवमंद रहित दोलन कर सकता है। इसे जब x0 दूरी तक खींचते हैं और खींचकर छोड़ देते हैं तो यह संतुलन केन्द्र से समय t = 0 पर, v0 वेग से गुजरता है। प्राचल ωx0, तथा v0 के पदों में परिणामी दोलन का आयाम ज्ञात करिये। [संकेत: समीकरण x = a cos (ωt + θ) से प्रारंभ कीजिए। ध्यान रहे कि प्रारंभिक वेग ऋणात्मक है।]
उत्तर:
माना किसी क्षण t कण का विस्थापन निम्न है –
x = a cos (ωt + φ0) ……. (i)
जहाँ a = आयाम
φ0 = प्रा० कला
माना किसी क्षण पर वेग v है। तब,
v = \(\frac { dy }{ dt } \)
= \(\frac { d }{ dt } \) [a cos (ωt + φ0)]
= – aω sin (ωt + φ0) ………. (ii)
t = 0, x0 = x व v = v0 पर
t = 0 रखने पर, समी० (i) व (ii) से,
x0 = a cos φ0
तथा v0 = 0 aωsinφ0
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 28
समी० (iii) यह व्यक्त करता है कि प्रा० वेग ऋणात्मक है। (iii) में दोनों ओर का वर्ग करने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 28

MP Board Class 11 Physics Solutions

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms

Reproduction in Organisms Important Questions

Reproduction in Organisms Objective Type Questions

Question 1.
Choose the correct answers:

Question 1.
The endosperm in angiospermic plant is :
(a) Haploid
(b) Diploid
(c) Triploid
(d) Polyploid.
Answer:
(c) Triploid

Question 2.
The function of tapetum innermost layer of the anther is :
(a) Dehiscence
(b) Mechanical
(c) Protection
(d) Nutritional.
Answer:
(c) Protection

Question 3.
In angiosperms, female gametophyte is represented by :
(a) Synergids
(b) Carpel
(c) Egg
(d) Pollen grain
Answer:
(c) Egg

MP Board Solutions

Question 4.
The endocarp of coconut is :
(a) Liquid
(b) Soft
(c) Fibrous
(d) Very hard and stony.
Answer:
(b) Soft

Question 5.
In Vallisneria, pollination takes place by :
(a) Water
(b) Insect
(c) Animal
(d) Air
Answer:
(d) Air

Question 6.
Movement of male gamete towards archegonium in prothallus of fern is :
(a) Thermotactic
(b) Chemotropic
(c) Chemotactic
(d) Hygroscopic movement.
Answer:
(d) Hygroscopic movement.

Question 7.
The process of double fertilization (triple fusion) was discovered by: (MP 2012)
(a) Navaschin
(b) Leeuwenhoek
(c) Strasburger
(d) Hofmeister.
Answer:
(a) Navaschin

Question 8.
Clonal cell line is obtained from :
(a) Tissue culture
(b) Tissue isolation
(c) Tissue mixture
(d) Tissue system.
Answer:
(a) Tissue culture

Question 9.
Plants simillar to their parents can be obtained by :
(a) Seeds
(b) Stem cutting
(c) Cutting
(d) Both (a) and (b).
Answer:
(d) Both (a) and (b).

Question 10.
A scion is grafted over stock. The quality of fruit depends on :
(a) Scion
(b) Stock
(c) Both (a) and (b)
(d) None of these.
Answer:
(a) Scion

Question 11.
The life span of a parrot is :
(a) One – two week
(b) 15 years
(c) 20 years
(d) 140 years.
Answer:
(d) 140 years.

MP Board Solutions

Question 12.
Stem cutting are commonly used for the propagation of :
(a) Banana
(b) Rose
(c) Mango
(d) Cotton.
Answer:
(b) Rose

Question 13.
If the organism is forged from male gamete without fertilization :
(a) Parthenogenesis
(b) Parthenocarpy
(c) Apogamy
(d) Apospory.
Answer:
(a) Parthenogenesis

Question 2.
Fill in the blanks:

  1. Coconut water is the example of ………………
  2. ……………… is the fusion of male and female gamete.
  3. After fertilization of ovule ……………… is formed.
  4. ……………… is formed from ovary.
  5. The endosperm of gymnosperms is ………………
  6. The fusion of male and female gamete of the same flower of same plant is called ………………
  7. ……………… is called the end of reproductive cycle.
  8. The outer wall of pollen grain is called
  9. In Oxalis vegetative propagation takes place by ………………
  10. In Penicilliumasexual reproduction takes place by ………………

Answer:

  1. Endosperm
  2. Fertilization
  3. Seed
  4. Fruit
  5. Haploid
  6. Self polli – nation
  7. Ageing
  8. Exine
  9. Bulbils
  10. Conidia.

Question 3.
I.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 1
Answer:

  1. (c)
  2. (a)
  3. (d)
  4. (e)
  5. (b)

II.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 2
Answer:

  1. (d)
  2. (e)
  3. (a)
  4. (b)
  5. (c)

Question 4.
Write the answer in one word/sentences:

  1. Name the process in which fruits are formed without fertilisation.
  2. Name the mode of reproduction in which new plants are formed from vegetative parts of the plants.
  3. Transfer of pollen grains from pollengrains to stigma of flower is called.
  4. Name the outer covering of seed.
  5. How many male gametes found in a pollen tube?
  6. Who provide nutrition to developing embryo?
  7. Write the name of an algae in which reproductive metshod occurs by zoospores.
  8. Give an example of vegetative propagation which is occurs by leaf.
  9. Name the animal which is reproduced by asexual reproduction.
  10. Split part of the body which is reproduce and developed in new plant is called.
  11. What we called the population of genetically similar organisms formed by asexual reproduction?
  12. Name the animal in which reproduction occurs by transverse binary fission.

Answer:

  1. Parthenogenesis
  2. Vegetative propagation
  3. Pollination
  4. Seedcoat
  5. Two
  6. Endosperm
  7. Chlamydomonas
  8. Bryophyllum
  9. Spongilla
  10. Fragmentation
  11. Clone
  12. Paramoecium.

Reproduction in Organisms Very Short Answer Type Questions

Question 1.
What is meant by life span?
Answer:
The period from birth to the natural death of an organism is called life span.

Question 2.
Give definition of fertilization.
Answer:
Fertilization is a process in which male and female gametes fused to form the zygote.

Question 3.
What is clone?
Answer:
Morphologically and genetically similar individuals who are produced by single parent is called clone.

Question 4.
Give the name of an organism in which asexual reproduction occurs through conidia.
Answer:
Penicillium.

Question 5.
In which plant vegetative propagation occurs through rhizome?
Answer:
In Ginger and Turmeric.

Question 6.
Give the name of an organism in which transverse binary fission occurs.
Answer:
Paramoecium.

MP Board Solutions

Question 7.
What is ageing?
Answer:
When humans are not capable for reproduction is known as ageing.

Question 8.
Give two examples of hermaphrodite plants.
Answer:
Cucurbita and Coconut are hermaphrodite plants.

Reproduction in Organisms  Short Answer Type Questions

Question 1.
Name the types of reproduction occur in the living organisms.
Answer:
Two types of reproduction occur in the living organisms:

  1. Asexual reproduction
  2. Sexual reproduction.

Question 2.
Which is a better mode of reproduction, sexual or asexual. Why?
Answer:
Sexual mode of reproduction is better because it is biparental reproduction and introduces variation among offsprings and their parants due to crossing over and recombination during gamete formation by meiosis.

Question 3.
Why is the offspring formed by asexual reproduction referred to as clone ?
Answer: In sexual reproduction, the offspring is morphologically and genetically identi-cal to the parent and to each other. Hence, it is called clone.

Question 4.
Write three advantages of asexual reproduction.
Answer:
Following are the three advantages of asexual reproduction:

  1. Large number of offsprings can be produced by single parent.
  2. Purity can be maintained.
  3. It helps in dispersal to far off places.

Question 5.
Offsprings formed due to sexual reproduction have better chances of survival. Why? Is this statement always true?
Answer:
Offsprings formed due to sexual reproduction have better chance of survival because:

  1. The offspring consists of hybrid characters which may adapt better with the different environment.
  2. Genetic variations are introduced among the offsprings which increases the bio – logical tolerance.
  3. Sexual reproduction occurs in adverse condition in lower plant kingdom, so sexual spores survive in adverse condition.

Sexual reproduction may not always show better chances of survival because the off – spring may be inferior to the parents.

Question 6.
How does the progeny formed from asexual reproduction differ from those formed by sexual reproduction?
Answer:
The progenies have similar genetic make up and are exact copies of their parents in asexual reproduction but the progenies have different genetic make up and different from each other and dissimilar to the parent in sexual reproduction.

Variation is absent in asexual reproduction but it is a common phenomenon of sexual reproduction. In asexual reproduction, variation may occur due to mutation whereas variation occurs due to mutation, crossing over and recombination in sexual reproduction.

Question 7.
Distinguish between asexual and sexual reproduction. Why is vegetative reproduction also considered as a type of asexual reproduction?
Answer:
Differences between Asexual and Sexual reproduction:

Asexual reproduction:

  • In this type of reproduction only one parent is required.
  • Whole body or a single cell acts as reproductive unit.
  • Offsprings remain pure, i.e., alike their parents.
  • It occurs by mitosis cell division.
  • Variation does not occur.

Sexual reproduction:

  • In this type of reproduction two parents of different sexes are required.
  • Reproductive units are called as gametes which are produced by specific tissues.
  • Offsprings differ from their parents.
  • Gametes are formed by meiosis cell division and zygote develops by mitosis cell division.
  • Variation occurs.

Vegetative reproduction is considered as a type of asexual reproduction because:

  1. It is uniparental reproduction.
  2. There is no involvement of gametes or sex cells.
  3. Cell division and no reduetional division take place.
  4. Vegetative propagules are somatic cells.

MP Board Solutions

Question 8.
What is vegetative propagation? Give two suitable examples.
Answer:
In plants, the vegetative propagules (runner, rhizome, sucker, etc.) are capable, of producing new offsprings by the process called vegetative propagation. As the formation of these vegetative propagules does not involve both the parents, the process involved is asexual.
Examples:

  1. Adventitious buds in the notches along the leaf margins of bryophyllum grow to form new plants.
  2. Potato tuber having buds when grown, develops into a new plant.

Question 9.
Define:

  1. Juvenile phase
  2. Reproductive phase
  3. Senescent phase.

Answer:
1. Juvenile phase:
It is the pre – reproductive in which all organisms require a certain growth and maturity in the life before reproducing sexually.

2. Reproductive phase:
Reproductive phase is the phase in the life cycle, where an organism possesses all the capacity and potential to reproduce sexually. It is the end of juvenile phase or vegetative phase.

3. Senescent phase:
It is the post reproductive phase in the life cycle where an organism slowly looses the rate of metabolism, reproductive potential and show deterioration of the physiological activity of the body.

Question 10.
Higher organisms have resorted to sexual reproduction inspite of its complexity.Why?
Answer:
Higher organisms have resorted to sexual reproduction to:

  1. Get over the unfavourable conditions.
  2. Restore high gene pool in a population.
  3. Restore vigour and vitality of the race.
  4. Get proper parental care.
  5. Introduce variations to enable better adaptive capacity.

Question 11.
Explain, why meiosis and gametogenesis are always interlinked.
Answer:
Gametogenesis (formation of male and female gametes) is associated with reduction in chromosome number. Thus, the gamete formed contains half chromosome set of the parental cell. So, gametogenesis is interlinked with meiosis because in meiosis reduction of chromosome number from diploid set (2n) to haploid set (n) takes place.

Question 12.
Identify each part in a flowering plant and write whether it is haploid (n) or diploid (2n).
Answer:
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 3

Question 13.
Define external fertilization, mention its disadvantages.
Answer:
The fusion of compatible gametes (male and female) outside the body of an organism is called external fertilization, example in Frog.
Disadvantages of external fertilization:

  1. It requires a medium for fusion of gametes.
  2. The young ones are often exposed to the predators.
  3. After fertilization, offsprings are produced large in number but no parental care is provided.

Question 14.
Differentiate between a zoospore and zygote.
Answer:
Differences between Zoospores and Zygote:

Zoospore:

  • These are endogenously, asexually produced, unicellular, naked and motile spores having one or two flagella.
  • It may be haploid or diploid.
  • Zoospores takes part in dispersal.

Zygote:

  • Zygote is a diploid cell formed by fusion of male and female gametes.
  • It is always diploid.
  • Zygote does not have significant role in dispersal.

Question 15.
Differentiate between gametogenesis and embryogenesis.
Answer:
Differences between Gametogenesis and Embryogenesis:

Gametogenesis:

  • It is the formation of gametes from me – iocytes.
  • This is a pre – fertilization event.
  • It occurs inside reproductive organs.
  • It produces haploid gamete.
  • The cell division during gametogenesis is meiotic in diploid organisms.

Embryogenesis:

  • It is the formation of embryo from zyg – ote cell.
  • This is a post fertilization event.
  • It occurs outside or inside the female body.
  • It gives rise to diploid embryo.
  • The cell division during embryogenesis is mitotic in diploid organisms.

MP Board Solutions

Question 16.
What is gootee? How it is prepared?
Answer:
Gootee or Air layering:
It is a modified form of layering in which the cut or injured branch is not buried in the soil but is bound with mud and rags, etc. which is kept moist with the help of water kept in an earthen pot. The roots develop at this portion within a period of about a month or two. Now, the branch is cut and separated from the parent plant and planted in the soil. This method is applied for the vegetative, propagation of Lemon, Orange, Litchi, Guava, Lokat, etc.

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 4

Question 17.
What do you understand by grafting? Write down the method of grafting.
Answer:
Vegetative propagation:
Vegetative reproduction or vegetative propagation is the process of multiplication in which a portion or fragment of the plant body functions as propagate and develops into new individual. Grafting is a type of artificial vegetative propagation.

Importance of vegetative propagation:

  1. Pure variety can be produced
  2. It increases production.

Grafting:
This is a very significant method and is extensively used for growing Roses and Mangoes. Grafting is making a twig or bud of one plant grow on the trunk and root system of another. In this process a detached portion of one plant is inserted into the stem or root system of another plant. The former is called scion (short piece of detached shoot containing several dormant buds) and the latter stock (lower portion of the plant which is fixed to the soil by its root system).

Grafting is done in such a way that the cambium tissue of both scion and stock comes in contact and forms a cambium layer common to both. Consequently the scion and the stock grow together and the scion becomes part of the plant into which it is grafted.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 5

MP Board Class 12th Biology Important Questions

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता (निबंध, पं. बालकृष्ण भारद्वाज)

मन की एकाग्रता पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

बोध प्रश्न

मन की एकाग्रता अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
छात्रों की समस्या क्या है?
उत्तर:
जब छात्र पढ़ने के लिए बैठता है तो उसके मन को अनेक विचार घेरने लगते हैं, मन भटक उठता है। सोचता है कि पढ़कर अधिक उच्च पद प्राप्त करूँ और अधिक अर्थ अर्जित करूँ, पर जब पढ़ने बैठता है तो सिनेमा व क्रिकेट, मित्र-मण्डल की मौज-मस्ती याद आ जाती है और उसके मन की एकाग्रता हट जाती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
स्थित प्रज्ञता कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर:
मन को किसी परम उच्च में लगा देने से स्थितप्रज्ञता प्राप्त की जा सकती है। जैसे लोक-संग्रह के कार्य में, राष्ट्रभक्ति में, दीन-दुखियों की सेवा में।

प्रश्न 3.
मन कितने प्रकार से उत्तेजित होता है?
उत्तर:
मन दो प्रकार से उत्तेजित होता है-एक तो बाहरी विषयों से और दूसरे भीतर की वासनाओं की स्मृतियों से।

प्रश्न 4.
गीता में परं का अर्थ क्या है?
उत्तर:
गीता में परं का अर्थ परमात्मा है। इसे परिभाषित करते हुए गीता में कहा गया है कि सब विश्व ईश्वर है। मुझ ईश्वर को सब ईश्वर में जानो और मुझमें संपूर्ण विश्व समझो।

मन की एकाग्रता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्जुन की स्वीकारोक्ति को लिखिए।
उत्तर:
अर्जुन की स्वीकारोक्ति है-“चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है।”

प्रश्न 2.
मन को एकाग्र करने की बाह्य साधना क्या है?
उत्तर:
मन को एकाग्र करने की बाह्य साधना यह है कि दो बाहरी आकर्षणों अर्थात् बाहरी चकाचौंध से हटा दिया जाए। जैसे मित्रों के साथ भोज-मस्ती, क्रिकेट, सिनेमा आदि से।

प्रश्न 3.
छात्र की समस्याएँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:
छात्र की समस्याएँ हैं आज के प्रौद्योगिकी युग में भौतिक उन्नति प्राप्त की जाए। इसके लिए जब पढ़ने बैठता है तो उसके मन की एकाग्रता भंग होने लगती है। उसका मन भटकने लगता है। जब पढ़ने में मन नहीं लगता तो उदास हो जाता है और सोचता है कि मैं बिना परीक्षा उत्तीर्ण किए किस प्रकार अच्छे अंक लाकर पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करूँगा? इस तरह तो जीवन बोझ हो जाएगा।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
इंद्रियों का क्या कार्य होना चाहिए।
उत्तर:
जीवन में इंद्रियों का सेवन तो होना चाहिए पर यह आसक्ति व द्वेष से नहीं किया जाना चाहिए। इन्हें स्वच्छंद और निरंकुश कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अगर ऐसा किया तो यह व्यवहार में अनेक समस्याओं का कारण बन सकती हैं।

मन की एकाग्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयम को समझाइए।
उत्तर:
संयम का अर्थ है संसार में सांसारिक भोग भोगते रहें पर उतनी ही मात्रा में जितने आवश्यक हों। जीवन में इंद्रियों का सेवन आसक्ति व द्वेषभाव से कभी नहीं करना चाहिए। इंद्रियों को कभी स्वच्छद नहीं छोड़ना चाहिए। अन्यथा भविष्य में इतनी समस्याएँ पैदा हो जाएँगी कि जीवन को ही नरक बना देंगी।

प्रश्न 2.
परं उच्च लक्ष्य का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
परम का अर्थ है मन को किसी परम् अर्थात् परम लक्ष्य में लगाया जाए। यह लक्ष्य है सेवा-कार्य में लगना, लोक- संग्रह करना, राष्ट्र की सेवा में स्वयं को लगाना। दीन-दुखियों की सहायता करना। जब व्यक्ति इस तरह के कार्यों में अपने मन को लगाता है तो तब उसके मन में व्याप्त आसक्ति स्वयं नष्ट हो जाती है।

मन की एकाग्रता भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
विलोम शब्द लिखिए।
राग, अनाचार।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता img-1

प्रश्न 2.
दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
चंचल, कामनाएँ, निग्रह।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता img-2

प्रश्न 3.
उपसर्ग पहचानकर लिखिए।
विचलना, निग्रह, परिभाषित।
उत्तर:
उपसर्ग की पहचान:

  • विचलना – वि + उपसर्ग – विचलना।
  • निग्रह – नि + उपसर्ग – निग्रह।
  • परिभाषित – परि + उपसर्ग – परिभाषितं।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
समास विग्रह कर नाम बताइए।
अशक्य, बहिर्मुख, लोकसंग्रह।
उत्तर:
विग्रह और नाम:

  • अशक्य – शक्य का अभाव, अव्ययीभाव समास।
  • बहिर्मुख – बाहर की ओर जो मुख, कर्मधारय समास।
  • लोकसंग्रह – लोक के लिए संग्रह, संप्रदान तत्पुरुष या चतुर्थी तत्पुरुष समास।

मन की एकाग्रता योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
स्थित प्रज्ञ के द्वितीयाध्याय के 18 श्लोकों का अर्थ विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
स्थित प्रज्ञ के लक्षण श्रीमद्भगवत् गीता में द्वितीय अध्याय में हैं। इस अध्याय का नाम कर्मयोग है। इसमें 72 श्लोक हैं। 52 से 72 श्लोकों में स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण बताए गए हैं। अर्जुन ने पूछा, हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थितप्रज्ञ पुरुष के क्या लक्षण हैं? स्थित प्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? श्री भगवान ने कहा कि हे अर्जुन! जिस काल में पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है। हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाववाली इंद्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं। इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ मेरे प्रति परायण होकर ध्यान में वैठे हैं। क्रोध से मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।

भगवान् ने अर्जुन से कहा कि अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके संपूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भली-भाँति स्थिर हो जाती है। श्रीभगवान् ने कहा कि संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानंद की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिंस नाशवान् सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं परमात्मा के तत्त्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है।

उन्होंने अपने प्रिय भक्त से कहा कि जैसे नाना नदियों के जल सब और परिपूर्ण अचल, प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परमशान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं। अन्तिम श्लोक में श्रीभगवान् ने कहा- हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अन्तकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानंद को प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 2.
गीता पर लिखी गई पुस्तकों का अध्ययन कीजिए।
उत्तर:
गीता पर बहुत-से विद्वानों ने व्याख्यात्मक व आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी हैं। सबसे श्रेष्ठ पुस्तक बालगंगाधर तिलक की मानी जाती हैं जिसका नाम है ‘गीता रहस्य’ । इसी तरह ‘श्रीमद्भगवद् गीता यथा रूप’ नाम से ग्रंथ प्रसिद्ध है जिसे श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने लिखा है। इन दोनों ग्रंथों में व्याख्याकारों ने विषयों को ही विस्तार से उठाया है। छात्र इन ग्रंथों का अध्ययन कर अपने विषय को विस्तार से समझ सकते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
अवसाद जीवन-मूल्य और सामाजिक समरसता पर निबंध लिखिए।
उत्तर:
निबंध:
अवसाद जीवन-मूल्य और सामाजिक समरसता:
जब व्यक्ति जीवन में निराश हो जाता है तब उसे चारों ओर से अवसाद घेर लेता है। इसका मूल कारण यह है कि वह अपने जीवन-मूल्यों से दूर होता जा रहा है। पहले वह अपने जीवन के लिए कुछ मूल्य निश्चित कर लिया करता था और उन पर चलने का उम्रभर निर्णय करता था।

वह जानता था कि सत्य पर आचरण करने से कभी व्यथित नहीं हो सकता। दूसरों का विश्वास प्राप्त करने पर वह हमेशा लोगों में लोकप्रिय हो सकता है। सभी के साथ समान व्यवहार करने और सबको साथ लेकर चलने से वह सामाजिक समरसता को मजबूत कर सकता है क्योंकि सामाजिक समरसता किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

समाज में बदलाव आया तो लोग केवल अपने बारे में सोचने लगे। दूसरों के बजाय अपनी उन्नति का ख्वाब देखने लगे क्योंकि समाज में एकतानता की जगह अकेलेपन की भावना पैदा हुई इसलिए समाज में अवसाद ने लोगों को घेरना शुरू कर दिया। व्यक्ति अपनी विषय-भावना न पूरी होने पर सही रास्ते के बजाय गलत रास्ते अपनाने लगा। सही-गलत का फर्क मिट गया। आज समाज मन की एकाग्रता के अभाव में बिखर गया है इसलिए उसका जीवन अवसादमय हो गया है।

अगर व्यक्ति चाहता है कि उसका जीवन प्रसन्न हो, तो उसे अपने सही जीवन-मूल्यों पर चलने का निर्णय करना होगा। उसे सत्य और विश्वास के बल पर अपना जीवन का पथ निश्चित करना होगा। वासनाओं का आवश्यक उपभोग करते हुए और उन पर नियंत्रण करते हुए आगे बढ़ना होगा। अतः व्यक्ति को अवसाद से उबरना होगा, निराशा से दूर भागना होगा। सत्य और विश्वास पर टिकने वाले जीवन-मूल्य के बल पर सामाजिक समरसता लाने का प्रयत्न करना होगा, तभी समाज में आनंद का वातावरण बन सकेगा।

प्रश्न 4.
‘मन की एकाग्रता’ विषयक लेखों और विचारों का संग्रह कीजिए।
उत्तर:
‘मन की एकाग्रता’ के संबंध में अनेक निबंधकारों ने लेख लिखे हैं। उन लेखों में एक लेख द्विवेदीयुगीन रचनाकार का है। रचनाकार हैं बालकृष्ण भट्ट इस निबंध का शीर्षक है मन की दृढ़ता। लेखक इस पर जोर देता है कि मन दृढ़ होता है तो उसमें स्थितप्रज्ञता आ जाती है। एक प्रसिद्ध उक्ति है ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत।’ इस उक्ति में भी कवि ने मन की एकाग्रता पर बल दिक है क्योंकि मन अगर एकाग्र होता है तो वह कभी हारता नहीं।

वह सदैव जीतता है। सुदृढ़ मन वाला व्यक्ति उन्नति पर उन्नति करता चला जाता है, पीछे नहीं देखता। एक निबंध ‘एकाग्र मन के गुण’ शिवशंकर चौहान ने लिखा है। यह निबंध योग साधना पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस प्रकार यदा-कदा मन की एकाग्रता पर लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
अपने अशांत मन को संतुलित कर जिन महापुरुषों ने कीर्ति पाई उनका वृत्त संकलित कीजिए।
उत्तर:
भारत में ऐसे अनेक महापुरुष हुए जिन्होंने असंतुलित मन को संतुलित कर देश में यश की पताका फहराई है, जिनमें स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानंद आदि महापुरुषों का नाम लिया जा सकता है। पूर्वप्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के भी इस तरह के कई किस्से हैं। विद्यार्थी इस संदर्भ में पुस्तकालयों से संबंधित महापुरुषों की पुस्तकें नामांकित कर इनके बारे में विशद जानकारी प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 6.
यदि आप अर्जुन होते तो कृष्ण से क्या-क्या प्रश्न करते?
उत्तर:
अगर हम अर्जुन होते तो कृष्ण से प्रश्न करते –

  1. हे भगवन्! मेरा मन अध्ययन में नहीं लग रहा है मुझे क्या करना चाहिए?
  2. सांसारिक वासनाएँ मुझे आपका नाम नहीं लेने देतीं, इनसे मुक्त होने का कोई उपाय बताइए।
  3. मेरा मन आज बहुत उद्विग्न है क्योंकि परीक्षाएँ निकट आ रही हैं, मैं अपना मन कैसे शांत कर सकता हूँ?
  4. मैं जीवन में संतोष कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?
  5. क्या संसार के सीमित भोगों के साथ जीवन-निर्वाह करते हुए मैं मन एकाग्र कर सकता हूँ? आदि।

मन की एकाग्रता परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
मन की एकाग्रता……… है –
(क) सनातन
(ख) अस्थायी
(ग) वेगमय
(घ) मंदमय
उत्तर:
(क) सनातन।

प्रश्न 2.
छात्र का मन …… घबरा उठता है –
(क) मौज-मस्ती के कारण
(ख) अध्ययन न कर पाने के कारण
(ग) होटल में जाने पर
(घ) ईर्ष्या के कारण
उत्तर:
(ख) अध्ययन न कर पाने के कारण।

प्रश्न 3.
चंचल मन का निग्रह वायु की ….. रोकने के समान दुष्कर है।
(क) आँधी
(ख) गति
(ग) साँसें
(ख) मंदता
उत्तर:
(ख) गति।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
मन ………. प्रकार से उत्तेजित होता है।
(क) चार
(ख) केवल एक
(ग) दो
(घ) पाँच
उत्तर:
(ग) दो।

प्रश्न 5.
…..अभाव तभी संभव है जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना संतुष्ट हो।
(क) कामनाओं का
(ग) जीवन का
(ग) बुद्धि का
(घ) परमात्मा
उत्तर:
(क) कामनओं का।

प्रश्न 6.
मन की एकाग्रता पाठ के लेखक हैं…..
(क) बालमुकुंद गुप्ता
(ख) पं. बालकृष्ण भट्ट
(ग) पं. बालकृष्ण भारद्वाज
(घ) पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन
उत्तर:
(ग) पं. बालकृष्ण भारद्वाज।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथनों के सही विकल्प चुनिए –
‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ किस ग्रंथ की सूक्ति है?
(क) श्रीमद्भागवत महापुराण
(ख) शिवपुराण
(ग) श्रीमद्भगवत् गीता
(घ) श्रीराधाकृष्ण चरितमानस
उत्तर:
(क) श्रीमद्भगवत् गीता।

प्रश्न 8.
…… इच्छाएँ समाज में अनाचार पनपाएँगी।
(क) अनियंत्रित
(ख) नियंत्रित
(ग) चंचल
(घ) स्थिर
उत्तर:
(क) अनियन्त्रित।

II. निम्नलिखित कथनों में सत्य या असत्य छाँटिए –

  1. ऐसी छात्र की तीन समस्याएँ हैं।
  2. ‘मन की एकाग्रता’ के लेखक बालकृष्ण भारद्वाज हैं।
  3. स्थितप्रज्ञ पुरुष मन के विषयों के पास जा सकता है।
  4. गीता में परम का अर्थ बहुत अधिक है।
  5. अनियंत्रित इच्छाएँ समाज में अनाचार पनपाएँगीं।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

मन की एकाग्रता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो पंक्तियों में दीजिए।

प्रश्न 1.
जब छात्र पढ़ने बैठता है तो उसका मन कहाँ विचरण करने लगता है?
उत्तर:
जब छात्र पढ़ने बैठता है तो उसका मन क्रिकेट और सिनेमा में विचरण करने लगता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
छात्र को अपना जीवन बोझ कव लगने लगता है?
उत्तर:
जब छात्र का मन पढ़ाई से भटक जाता है तब उसे अपना जीवन बोझ लगने लगता है क्योंकि सोचता है कि न पढ़े पाने के कारण न तो वह अच्छी नौकरी पा सकेगा और न ही प्रतिष्ठित पद।

प्रश्न 3.
कामनाओं का अभाव कब संभव है?
उत्तर:
कामनाओं का अभाव तभी संभव है जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना भी संतुष्ट रह सकता है।

प्रश्न 4.
बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियों की लेखक ने किससे उपमा दी है?
उत्तर:’
बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियों की लेखक ने ग्रीष्म ऋतु के बाद होने वाली वर्षा से उपमा दी है क्योंकि जिस तरह गमी में सूखी वनस्पतियाँ वर्मा का जल गिरने से हरी-भरी हो जाती हैं उसी प्रकार हठयोग से हटाई गई शुष्क इंद्रियाँ विषय का रस पाकर पुनः जाग उठती हैं।

प्रश्न 5.
जीवन का परम सत्य लेखक ने क्या बताया है?
उत्तर:
लेखक ने जीवन का परम सत्य बताया है कि इंद्रियों को वश में नहीं किया जा सकता, अतः इंद्रियों का आवश्यक सेवन करते हुए उस पर अंकुश लगाने का प्रयास करना चाहिए।

मन की एकाग्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मन की एकाग्रता’ निबंध का केंद्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
पं. बालकृष्ण भारद्वाज ने ‘मन की एकाग्रता’ में कहा है कि आज छात्र के पास ज्ञान के अनिवार्य साधन उपलब्ध हैं। पुस्तकालय, इंटरनेट, मेधावी शिक्षक आदि के सहयोग से छात्र बहुमुखी ज्ञान प्राप्त कर रहा है परन्तु प्रतिभा के बिना सब व्यर्थ है। इस प्रतिभा को मन की एकाग्रता से प्राप्त किया जा सकता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
‘मन की एकाग्रता’ के लिए कौन-से साधन महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
‘मन की एकाग्रता’ के लिए दो साधन अपनाए जाते हैं। पहला साधन संसार के आकर्षणों से मुँह मोड़ लेना और दूसरा है आंतरिक मन पर संयम करना। इनमें बाहरी आकर्षणों पर सरलता से अंकुश लगाया जा सकता है पर आंतरिक मन पर संयम करना कठिन है। इसके लिए गीता में बताए गए मार्ग से मन एकाग्र रखा जा सकता है।

प्रश्न 3.
स्थितप्रज्ञ दर्शन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
स्थितप्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए मन विषयों के पास नहीं ले जाना चाहिए और यह तभी संभव है जब इंद्रियों के भोगों में आसक्त न रहे। उनसे दूर रहे। मन इंद्रियों से दूर तभी हो सकता है जब उसमें रहने वाली कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं। कामनाएँ तभी समाप्त हो सकती हैं जब उसमें वस्तुओं के होते हुए भी इच्छाएँ न हों। वह संतुष्ट रहे। ऐसे ही व्यक्ति को स्थित प्रज्ञ की दिशा में गतिशील कहा जा सकता है।

प्रश्न 4.
गीता के अनुसार परं का क्या अर्थ है?
उत्तर:
गीता में परं का अर्थ परमात्मा कहा गया है। इसे परिभाषित करते हुए गीता में कहा गया है कि सारा संसार ही ईश्वर है। मुझे ईश्वर को समस्त विश्व में समझो। मुझसे ही सारा संसार समझो। ईश्वर व विश्व एक-दूसरे से अभिन्न हैं। अतः गीता सबके प्रति सेवाभाव और मन की वासनाओं को शुद्ध करने के लिए दीक्षित करती है।

प्रश्न 5.
क्या इंद्रियों पर नियन्त्रण मन में कुंठाएँ उत्पन्न कर सकता है?
उत्तर:
यह समझा जाता है कि अगर हम अपनी इंद्रियों पर जबरदस्ती नियंत्रण करेंगे तो इससे अनेक कुंठाएँ जन्मेंगी। हम अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाएँगे। पर ऐसा नहीं है। अनियंत्रित इच्छाएँ निश्चित रूप से समाज में अनाचार व व्यभिचार पैदा करती हैं पर इन्हें अनिवार्य रूप से भोगते हुए काबू में रखा जाए तो निश्चित रूप से मन की एकाग्रता में सहायता करेंगी।

मन की एकाग्रता पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
‘मन की एकाग्रता’ निबंध का सार लिखिए।
उत्तर:
मन किस प्रकार एकाग्र होना चाहिए वह सदा से व्यक्ति की समस्या रही है। आज प्रौद्योगिकी का समय है और इसमें प्रगति की सीमाहीन संभावनाएं हैं। ऐसे में जब वह अध्ययन करने के लिए बैठता है तो अनेक चिंताएँ मन की एकाग्रता में बाधा बनती हैं। उत्कृष्ट पद पाने के लिए मन एकाग्र करना चाहता है पर मनोरंजन के साधन उसके लक्ष्य में रुकावट बन जाते हैं। इस कारण वह बार-बार निराशा का शिकार होता है। तब उसे यह ठीक लगता है कि चंचल मन को एकाग्र करना उसी तरह कठिन है जिस प्रकार वायु की गति रोकना दुष्कर है।

मन एकाग्र करने वाले छात्र की दो समस्याएँ हैं-पहली मन का भोगों की ओर भागना और दूसरी पढ़ने में एकाग्रचित्त न होना। वह बाहरी परिस्थितियों से किसी तरह स्वयं को बचा लेता है पर भीतरी मन का चक्र उसे अनेक कामनाओं में भटका देता है। प्राणायाम आदि से कुछ समय के लिए मन पर नियंत्रण हो भी जाता है पर हमेशा नहीं रहता। गीता में इसका उपाय अवश्य लिखा है, : स्थित प्रज्ञ वह है जिसकी बुद्धि अस्थिर व चंचल नहीं है।

स्थित प्रज्ञता इन्द्रिय और मन संयमित बुद्धि का नाम है। इंद्रियों को भोगों से दूर रखकर स्थित प्रज्ञ रहा जा सकता है। कामनाओं को नष्ट कर मन को इंद्रियों से दूर रखा जा सकता है। यह तभी संभव है जब व्यक्ति बिमा वस्तुओं के संतुष्ट हो। गीता में भी कहा गया है कि व्यक्ति अपनी संतुष्टि के लिए अन्य वस्तुओं की इच्छा नहीं रखता। जब तक उसकी एक भी वृत्तिं बाहरी होगी तब तक वह मन के पराधीन होगा।

हठयोग से मन भागों से दूर करके भी नहीं हटता, अवसर पाते ही पुनः उस ओर भागने लगता है। इसी तरह बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियाँ विषय-चिंतन रूपी जल से फिर हरी हो जाती हैं, अतः प्राणायाम आदि उपाय क्षणिक हैं। – मन की उत्तेजना दो कारणों से है : बाहरी विषयों से और भीतरी वासनाओं की याद से। जब तक वासनाएँ हैं तब तक विषय से मन दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे में गीता में दिए गए उपाय का अनुसरण किया जा सकता है। यह उपाय है, मन को किसी परम लक्ष्य के लिए लगाया जाए। जैसे राष्ट्रभक्ति में, दीनों की सेवा में। ऐसा करने से मन में व्याप्त विषयों की आसक्ति नष्ट हो जाएगी। छात्रों के लिए अध्ययन परम लक्ष्य है।

गीता में परं का अर्थ परमात्मा कहा गया है। मैन की वासनाओं को मिटाने का सूत्र गीता में है। उसके अनुसार सब विश्व ईश्वर है, अतः सबके प्रति सेवाभाव रखो। यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या इंद्रियों को भोगों से दूर करने पर मानसिक कुंठाओं का उदय नहीं होगा? गीता में इसका उत्तर तार्किक है। इसमें कहा गया है कि जीवन के लिए इंद्रियों का सेवन आवश्यक है पर यह आसक्ति व द्वेषभाव से नहीं किया जाना चाहिए। इन्हें खुला नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इससे जीवन जीने में अनेक बाधाएँ खड़ी हो जाती हैं। अनियंत्रित इच्छाओं से समाज में अनाचार फैलता है। इसलिए कहा गया है कि इंद्रियों से विषयों का सेवन तो किया जाए पर विवेकशील होकर किया जाए। उन पर नियंत्रण रहे पर अनिवार्य विषयों में वे प्रवृत्त भी रहें।

MP Board Solutions

मन की एकाग्रता संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
मन की एकाग्रता की समस्या सनातन है। आज के प्रौद्योगिकी युग में जहाँ भौतिक उन्नति की संभावनाएँ अपार हैं ऐसे में छात्र जब अध्ययन करने बैठता है, तब उसके मन को अनेक तरह के विचार घेरने लगते हैं। वह सोचता है इस अर्थ प्रधान युग में मुझे उत्कृष्ट पद प्राप्ति के लिए एकाग्र मन से पढ़कर परीक्षा में उच्चतम श्रेणी प्राप्त करना आवश्यक है। लेकिन वह जब पढ़ने बैठता है तो क्रिकेट, सिनेमा या मित्र मण्डली की मौज-मस्ती के विचार में उसका मन भटकने लगता है। मन का यह विचलन बुद्धि की एकाग्रता भंग कर देता है।

वह घबड़ा कर सोचता है, परीक्षा तिथि पास है, मन उद्विग्न है, कैसे अध्ययन करूँ? क्या करूँ? व्यर्थ के विचारचक्र से बुद्धि अस्थिर और मन चंचल बना रहता है। वह सोचता है यदि परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। पद, प्रतिष्ठा, वैभव कुछ नहीं मिलेगा, जीवन बोझ बन जाएगा, वह बार-बार हताशा से घिर जाता है। अनियंत्रित मन और एकाग्रहीनता उसे चिंताओं में डुबो देती है। अर्जुन की यह स्वीकारोक्ति कि ‘चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है उसे उचित प्रतीत होने लगता है।’ (Page 96)

शब्दार्थ:

  • एकाग्रता – मन को एक ओर लगाना।
  • सनातन – पुरानी।
  • अपार – असीमित।
  • उत्कृष्ट – श्रेष्ठ।
  • विचलन – चंचल।
  • उद्विग्न – बेचैन, व्याकुल।
  • विचारचक्र – विचारों का चक्कर।
  • अस्थिर – गतिमान।
  • प्रतिष्ठा – सम्मान।
  • हताशा – निराशा।
  • स्वीकारोक्ति – स्वीकार की गई उक्ति।
  • निग्रह – नियंत्रण।
  • दुष्कर – कठिन, जिसे करना बहुत मुश्किल हो।
  • प्रतीत – लगना।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। आज छात्र उच्च पद की प्राप्ति के लिए अध्ययन करना चाहता है पर मन एकाग्र नहीं रहता। लेखक ने यहाँ उसकी इसी समस्या पर विचार किया है।

व्याख्या:
मन किस प्रकार नियंत्रण में किया जाए, यह सदा से व्यक्ति की समस्या रही है। छात्र चाहता है कि वह प्रौद्योगिकी युग में अपने लिए कोई उच्च पद प्राप्त करे और इसके लिए मन अध्ययन में लगाना चाहता है, पर नहीं, लगता। उसका मन बाहरी विचारों में विचरण करने लगता है। वह सोचता है कि अर्थप्रधान युग में अच्छे अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण करूँ ताकि मुझे उच्च पद प्राप्त हो। वह इस बात को अच्छी तरह जानता है कि जब तक परीक्षा में अच्छे अंकों से पास नहीं होगा तब तक अच्छी नौकरी नहीं प्राप्त कर सकता।

पर जब वह पढ़ने के लिए बैठता है तो बाहरी मनोरंजन के साधन उसके लिए समस्या पैदा कर देते हैं। कभी तो उसका मन क्रिकेट की ओर विचरण करने लगता है तो कभी सिनेमा-जगत् की ओर। कभी वह सोचने लगता है कि पढ़ने में क्या रखा है, जरा मित्र-मण्डली में बैठकर गप-शप की जाए। उसका मन जब इस प्रकार की बातें सोचने लगता है तो उसकी बुद्धि की एकाग्रता भटकं जाती है। वह घबरा जाता है। सोचता है कि मन तो पढ़ाई में लग नहीं रहा है, अब क्या करूँ? मन बहुत बेचैन है, किस तरह इसे पढ़ाई में लगाऊँ? अगर ऐसा रहा तो परीक्षा में अच्छे अंक कैसे आएँगे? और अच्छे अंक नहीं आए तो वह अच्छी नौकरी कैसे पा सकेगा?

सोचता है कि अगर मन एकाग्र न होने के कारण परीक्षा में ही अनउत्तीर्ण हो गया तो तब क्या होगा? मेरा तो जीवन ही नष्ट हो जाएगा! न मुझे कोई प्रतिष्ठित पद मिल पाएगा और न ही अच्छी नौकरी। तब तो यह जीवन बोझ बन जाएगा। यह सोचकर वह बार-बार निराशा में घिर जाता है। अनियंत्रित मन उसे अनेक चिंताओं में डुबो देता है। तब उसे अर्जुन की यह स्वीकारोक्ति याद. आने लगती है कि मन बहुत चंचल है। इस पर नियंत्रण उसी तरह पाना कठिन है जिस तरह बहती हवा को रोकने की नाकाम कोशिश करना।

विशेष:

  1. एकाग्र मन न होने से छात्र में कितना भय व्याप्त हो जाता है, इसका यथार्थ चित्रण है।
  2. ‘मन की एकाग्रता की समस्या सनातन है’, सूक्तिपरक वाक्य है। इसी प्रकार अन्य सूत्र वाक्य है- ‘अर्जुन की यह सकारोक्ति है कि चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है।’
  3. सूत्रात्मक, व्याख्यात्मक और विवेचनात्मक शैली है।
  4. भाषा संस्कृतनिष्ट है, किंतु तद्भव व विदेशी शब्दों के इस्तेमाल से परहेज भी नहीं किया गया है। घेरने, घबरा जैसे शब्द तद्भव हैं तो एकाग्रता, संभावनाएँ, अध्ययन जैसे तत्सम। क्रिकेट, सिनेमा, मौज-मस्ती जैसे शब्द विदेशी हैं। प्रौद्योगिकी पारिभाषिक शब्द है। एकाग्र अर्द्धपारिभाषिक शब्द है। बार-बार युग्म शब्द है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
छात्र के लिए भौतिक उन्नति की क्या संभावनाएँ हैं?
उत्तर:
छात्र के लिए आज प्रौद्योगिकी युग में भौतिक उन्नति की अपार संभावनाएँ – हैं। जैसे इंटरनेट की सुविधा, पुस्तकालय की सुविधा, विद्वान शिक्षकों का समूह और छात्रवृत्ति आदि।

प्रश्न (ii)
छात्र का मन पढ़ने से क्यों भटक जाता है?
उत्तर:
छात्र जब पढ़ने के लिए बैठता है तो उसके सामने बाहरी आकर्षण आकर खड़े हो जाते हैं। ये आकर्षण उसे सिनेमा चलने, मित्रों के साथ गप-शप मारने और क्रिकेट आदि खेलने के संबंध में होते हैं। ऐसे में उसका मन भटक जाता है और उसे समझ नहीं आता कि अब वह अपना अध्ययन किस प्रकार जारी रखे।

प्रश्न (iii)
छात्र के अनियंत्रित मन में किस प्रकार की आंशकाएँ जागती हैं?
उत्तर:
छात्र सोचता है कि मेरा मन तो बाहरी आकर्षणों के कारण पढ़ाई से हट गया है। अब मैं ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाऊँगा, परिणामतः असफल हो जाऊँगा। इससे मुझे न तो अच्छी नौकरी मिल पाएगी और न ही प्रतिष्ठित पद।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
अर्जुन की स्वीकारोक्ति लेखक को उचित क्यों लगती है?
उत्तर:
अर्जुन की स्वीकारोक्ति है कि चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है। यह इसलिए कहा गया है कि मन एकाग्र करना उसी तरह कठिन है जिस तरह वायु की गति को रोकना।

प्रश्न (ii)
मन की एकाग्रता को लेखक ने सनातन क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक ने कहा है कि आदिकाल से ही ऋषि-मुनि इंद्रियों पर निग्रह करने के प्रयास करते रहे हैं। उनमें अधिकांश को सफलता प्राप्त नहीं हो पाई है। आज भी यही समस्या है। आज भी इसे नियंत्रण में करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। इसलिए लेखक का कहना है कि यह समस्या सदा से रही है।

प्रश्न (iii)
मन का विचलन क्या प्रभाव पैदा करता है?
उत्तर:
मन का विचलन बुद्धि के प्रभाव को भंग कर देता है। व्यक्ति का मन किए जाने वाले कार्य से दूर हो जाता है। इससे उसे काम में सफलता प्राप्त नहीं होती। काम पूरा न होने पर वह घबरा जाता है। उसमें कई प्रकार की निराशाएँ जन्म ले लेती हैं।

प्रश्न 2.
ऐसे छात्र की दो समस्याएँ हैं। पहली उसका मन भोग और ऐश्वर्य पाने के लिए उसे लुभा रहा है, और दूसरी पढ़ने में उसकी बुद्धि की एकाग्रता का न होना। बाहर की चकाचौंध उसे अपनी ओर खींचती है और आन्तरिक मन उसे अनेक स्मृतियों और कामनाओं में भटका रहा है। वह बाहर की परिस्थितियों में स्वयं को बचा सकता है, पर आन्तरिक मनश्चक्र की गति अनियंत्रित वेग से चलती रहती है। ऐसी स्थिति में मन का संयम कैसे करें। यम-नियम, आसन, प्राणायाम आदि कुछ क्षण के लिए मन को एकाग्र कर सकते हैं पर ये सब मन की पूर्ण और स्थायी एकाग्रता कराने मन की एकाग्रता में समर्थ नहीं है। इसका पूर्ण उपाय गीता के स्थित प्रज्ञ के विवरण में है। स्थित प्रज्ञ वह है जिसकी बुद्धि अस्थिर, चंचल तथा विचलित नहीं है। स्थित प्रज्ञता इन्द्रिय और मन से संयमित बुद्धि का नाम है। (Page 90)

शब्दार्थ:

  • ऐश्वर्य-भोग – विलास।
  • लुभाना – ललचाना।
  • चकाचौंध – चमक-दमक।
  • आन्तरिक – मन की।
  • मनश्चक्र – मन का चक्र।
  • वेग – तेज।
  • संयम – नियंत्रण।
  • यम-नियम – ये योग के शब्द हैं।
  • प्राणायाम – प्राणों का यौगिक प्रयोग प्राणायाम कहलाता है।
  • समर्थ – क्षमतावान।
  • स्थितप्रज्ञ – जिसने अपनी बुद्धि को वश में कर लिया है।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। आज छात्र उच्च पद की प्राप्ति के लिए अध्ययन करना चाहता है पर मन एकाग्र नहीं रहता। लेखक ने उसकी दो समस्याओं का यहाँ वर्णन किया है, पहली भोग की ओर आकर्षण व दूसरा मन की एकाग्रता का न होना। यहीं इसके उपाय की ओर भी संकेत किया गया है।

व्याख्या:
आज के छात्र की दो सबसे बड़ी समस्याएँ दिखाई दे रही हैं। पहली समस्या यह है कि सांसारिक भोग-विलास उसे अपनी ओर खींचे बिना नहीं रहते और दूसरी यह है कि उसका मन एकाग्र नहीं हो रहा है। इसकी उसे यह हानि उठानी पड़ रही है कि उसका मन पढ़ने में नहीं लग रहा है। बाहर की चकाचौंध यानी क्रिकेट के मैच, सिनेमा व मित्र-मण्डली की गप-शप उसे अपनी ओर खींचती है। उसका भीतरी मन अनेक स्मृतियों के कारण उसे आकुल करता है। जैसे सैर-सपाटा, अच्छे होटलों में खाना खाना, मनोरंजन के साधनों में मन लगे रहना आदि।

वह पढ़ने के लिए कोशिश करते हुए बाहरी परिस्थितियों से मन दूर रखने का प्रयास करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि वह मित्र-मण्डली से किनारा कर लेता है, सिनेमा-क्रिकेट या होटल वगैरह से मन हटा लेता है पर भीतरी परिस्थितियाँ उसे शांत नहीं रहने देतीं। उसका मन इन सब चीजों को प्राप्त करने के लिए व्याकुल रहता है। उसके सामने बड़ी समस्या आकर खड़ी हो जाती है कि आखिर वह इन सबसे किस प्रकार अपने आप को बचाए। वह अपने मन पर किस प्रकार निग्रह करे। मन पर नियंत्रण के लिए वह यम-नियम आदि करता है, आसन-प्राणायाम आदि करता है पर ये सब उसे कुछ समय के लिए ही मन नियंत्रित करने में सहयोग करते हैं।

कुछ देर बाद उसका मन पुनः इन सब बाहरी पदार्थों के लिए विचरण करने लगता है। लेखक कहता है कि मन को किस प्रकार एकाग्र किया जा सकता है, इसका उपाय श्रीमद्भगवत् गीता में है। गीता में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का विवरण दिया गया है। इसमें कहा गया है कि वही व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहलाता है जिसकी बुद्धि स्थिर रहती है और मन चंचल नहीं होता। स्थितप्रज्ञता भी उसे ही कहते हैं जब — इन्द्रिय और मन पर संयम हो जाता है।

विशेष:

  1. लेखक ने छात्रों की प्रमुख दो समस्याओं पर विचार किया है-मन का बाहरी आकर्षणों की ओर भागना व बुद्धि का एकाग्र न होना।
  2. छात्र बाहरी समस्याओं पर किसी प्रकार संयम करता है तो भीतरी मन उसे स्थिर नहीं रहने देता। इस ओर रचनाकार ने विशेष ध्यान दिया है।
  3. यम-नियम, आसन-प्राणायाम मन की एकाग्रता के स्थायी उपचार नहीं हैं।
  4. मन को स्थिर कैसे किया जा सकता है, इसका उपाय गीता में है।
  5. भाषा संस्कृतनिठ है। भोग, ऐश्वर्य, एकाग्रता, स्मृतियाँ आदि तत्सम शब्द हैं। यम-नियम युग्म शब्द हैं। लुभा, सब आदि तद्भव शब्द हैं। चकाचौंध, भटकना आदि देशज शब्द हैं। मनश्चक्र में विसर्ग संधि है। यम-नियम में द्वंद्व समास है। एकाग्र में ता प्रत्यय है। प्रज्ञ में ता प्रत्यय मिलाकर प्रज्ञता शब्द बनाया गया है।
  6. सूक्ति वाक्य है-स्थितप्रज्ञता इन्द्रिय और मन में संयमित बुद्धि का नाम है।
  7. सूत्रात्मक, विवेचनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
भटके हुए छात्र की दो समस्याएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
भटके हुए छात्र की दो समस्याएँ हैं-एक तो यह है कि उसका मन भोग-विलास के लिए हमेशा लुभाता रहा है और दूसरी यह है कि उसकी बुद्धि पढ़ने को नहीं करती। पढ़ने के लिए जिस प्रकार की एकाग्र बुद्धि की आवश्यकता है, वह उसके पास नहीं है।

प्रश्न (ii)
व्यक्ति को मन का संयम करने में क्या दिक्कत आती है?
उत्तर:
व्यक्ति का मन संयम में नहीं हो पाता। इसके मार्ग में पहली दिक्कत यह आती है कि बाहर की चमक-दमक उसे अपनी ओर खींचती है और आंतरिक मन में उन आकर्षणों की यादें उसे भटकाती रहती हैं। इसी कारण उसे अपना मन संयमित करने में दिक्कत आती है।

प्रश्न (iii)
मन को संयम में करने के लिए व्यक्ति को किन विधियों का पालन करना पड़ता है?
उत्तर:
मन को संयमित करने के लिए वह योग साधना में बताए यम-नियम, प्राणायाम आदि का आसरा लेता है। पर वे सब उसके मन को पूरी तरह एकाग्र करने में असफल रहते हैं। ये तो कुछ क्षण के लिए ही मन को नियंत्रित कर पाते हैं।

गयांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
मन को एकाग्र करने का पूरा उपाय कहाँ बताया गया है?
उत्तर:
यों तो मन को एकाग्र करना निश्चित रूप से कठिन है पर श्रीमद्भगवत् गीता में मन को एकाग्र करने का उपाय अवश्य बताया गया है। अगर व्यक्ति उस उपाय का पालन करता है तो वह निश्चित रूप से मन एकाग्र कर सकता है।

प्रश्न (ii)
स्थितप्रज्ञ किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह व्यक्ति स्थित प्रज्ञ कहलाता है जिसकी बुद्धि अस्थिर नहीं है। चंचल व विचलित नहीं है। वस्तुतः स्थित प्रज्ञता इंद्रिय और मन से संयमित होने वाली बुद्धि को कहते हैं।

प्रश्न (iii)
अगर व्यक्ति बाहरी आकर्षण से बच भी जाए तो उसे कौन-सा कारण स्थित प्रज्ञ नहीं होने देना चाहता?
उत्तर:
व्यक्ति प्रयत्न कर बाहरी आकर्षण से बचने का प्रयत्न कर लेता है। उसे सफलता मिल भी जाती है तब भी उसका मन एकाग्र नहीं हो पाता क्योंकि भोगों की स्मृति उसके सभी प्रयास धूल में मिला देती है। परिणामतः वह पुनः आकर्षणों में स्वयं को फँसा पाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
स्थित प्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए आवश्यक है कि मन को विषयों के पास न ले जावें। पर यह तभी संभव है जब मन इन्द्रियों के भोगों में आसक्त न हो, उनसे दूर रहे। मन इन्द्रियों से दूर तभी तक रह सकता है जब उसमें रहने वाली कामनाएँ नष्ट हो जाएँ। पर कामनाओं का अभाव तभी संभव है जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना स्वयं संतुष्ट हो। इसे गीता में ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ कहा है अर्थात् व्यक्ति अपनी तुष्टि के लिए अन्य या भिन्न वस्तु की इच्छा नहीं करता। अतः चित्तं की एक भी वृत्ति जब तक बहिर्मुखी है तब तक मन अशांत रहेगा। इन्द्रियों की गुलामी से वह मुक्त नहीं रह सकता। ऐसा मन, बुद्धि को अस्थिर करता है। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • आसक्त – रमा हुआ।
  • कामनाएँ – अभिलाषाएँ।
  • तुष्टि – संतोष।
  • चित्त – हृदय।
  • वृत्ति – स्वभाव।
  • बहिर्मुखी – बाहरी।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थिर प्रज्ञ नहीं होने देतीं। ये तभी समाप्त हो सकती हैं जब वह अन्य वस्तुओं के बिना भी स्वयं को संतुष्ट अनुभव कर सके।

व्याख्या:
अगर व्यक्ति स्थितप्रज्ञ बनना चाहता है तो उसके लिए परम आवश्यक है कि बुद्धि को स्थिर रखे। यह तभी संभव है जब वह अपने पास विषयों को न फटकने दे। इसलिए उसे अपने मन को इंद्रियों से एकदम हटाना होगा। उनसे बिलकुल दूर रखना होगा। उसका मन तभी इंद्रियों से दूर रह सकता है जब उससे कामनाएँ दूर हो जाएँ। पर कामनाओं का अभाव इतना आसान भी नहीं है। अलबत्ता, जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना भी स्वयं को संतुष्ट या संतोषी अनुभव करने लगेगा, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जा सकेगा।

लेखक श्रीमद्भगवत् गीता से उद्धरण प्रस्तुत करता है कि ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः सूक्ति का अर्थ है कि जो व्यक्ति अपने संतोष के लिए दूसरी वस्तुओं की कामना नहीं करता। लेखक कहता है कि चित्त की एक वृत्ति जब तक बाहरी रहेगी तब तक व्यक्ति का मन शांत नहीं होगा। उसमें व्याकुलता बराबर बनी रहेगी। वह किसी भी सूरत में इन्द्रियों की गुलामी से आज़ाद नहीं हो सकता। ऐसा व्यक्ति अस्थिर मन का ही होता है। उसकी बुद्धि कभी स्थिर हो ही नहीं सकती।

विशेष:

  1. लेखक ने स्थितप्रज्ञ दर्शन का विवेचन किया है।
  2. लेखक का मानना है कि मन की एकाग्रता की पहली शर्त यह है कि व्यक्ति को विषयों से दूर रहना होगा। और मन इन्द्रियों से तब दूर होगा जब उसमें कोई कामना नहीं होगी।
  3. कामना का अभाव उस व्यक्ति में हो सकता है जो बिना अन्य वस्तुओं के मिलने पर भी संतोषी होता है।
  4. गीता से उद्धरण लिया गया है ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ यह इस ..अनुच्छेद का सूत्रवाक्य है।
  5. भाषा संस्कृतनिष्ठ है। तत्सम शब्दों में स्थितप्रज्ञ, बुद्धि की अस्थिरता, संभव, आसक्त आदि हैं। स्थितप्रज्ञ अर्द्ध पारिभाषिक शब्द है। इसी प्रकार वृत्ति और बहिर्मुखी शब्द हैं। स्थिरता में ता प्रत्यय है, अभाव में अ उपसर्ग है। गुलाम में ई प्रत्यय लगने से गुलामी शब्द बना है। बहिर्मुखी बहि + मुखी, विसर्ग संधि है। सूत्रात्मक वाक्य है-“अतः चित्त की एक भी वृत्ति जब तक बहिर्मुखी है तब तक मन अशांत रहेगा। इन्द्रियों की गुलामी से वह मुक्त नहीं रह सकता।”
  6. सूत्रात्मक और विवेचनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
स्थितप्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
स्थितप्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए प्रयत्न करना चाहिए कि मन विषयों की ओर न जाए। यह तभी संभव है जब यह इंद्रियों के वशीभूत न हो व भोगों में न यह फँसे। मन इंद्रियों से दूर तभी हो सकता है जब उसमें किसी प्रकार की कामना न हो।

प्रश्न (ii)
मन की कामनाएँ किस मन में नहीं निवास करती?
उत्तर:
मन की कामनाएँ ऐसे व्यक्ति के मन में निवास नहीं करतीं जिसके मन में भोगों के प्रति कोई लालसा न हो। जिसके पास भोग न हो, तब भी संतोषी रहे। ऐसे व्यक्ति के मन में कामनाओं का कोई काम नहीं है।

प्रश्न (iii)
गीता के किस सूत्र की इस अनुच्छेद में व्याख्या की गई है?
उत्तर:
इस अवतरण में गीता के इस सूत्र की व्याख्या की है : ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ इस सूत्र का अर्थ है कि व्यक्ति अपने संतोष के लिए अन्य अथवा भिन्न वस्तु की अभिलाषा नहीं करता।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
व्यक्ति का मन कब तक अशांत रहेगा?
उत्तर:
वही व्यक्ति सुखी है जिसके मन में एक भी वृत्ति अशांत नहीं है। जब तक उसकी वृत्ति बहिर्मुखी है. तब तक उसका मन शांत हो ही नहीं सकता।

प्रश्न (ii)
स्थितप्रज्ञ शब्द लेखक ने किस स्थान से ग्रहण किया है?
उत्तर:
स्थितप्रज्ञ लेखक ने गोता से ग्रहण किया है। गीता के द्वितीय अध्याय कर्मयोग में भगवान ने अर्जुन को स्थित प्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण बताए हैं। वहीं से यह शब्द भारद्वाज ने चयन किया है।

प्रश्न (iii)
आत्मन्येयात्मना तुष्टः सूत्र का हिंदी अनुवाद कीजिए।
उत्तर:
आत्मन्येयात्मना तुष्टः सूत्र का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी तुष्टि के लिए अन्य या भिन्न वस्तु की इच्छा नहीं करता।

प्रश्न 4.
समस्या यह है कि यदि इंद्रियों को विषयों से बलपूर्वक हठयोग के द्वारा दूर भी कर लें, तो भी विषयों का चिंतन नहीं छूटता वह अवसर आने पर पुनः विकसित होगा। जैसे ग्रीष्म ऋतु के ताप से पृथ्वी पर वनस्पतियाँ सूख जाती हैं, पर वर्षा ऋतु में जल पाकर फिर पल्लवित हो जाती हैं। – इसी प्रकार विषयों से बलपूर्वक हटाई गयी शुष्क इन्द्रियाँ विषय चिन्तन रूपी जल से फिर विषयों में लिप्त हो जाती हैं। क्योंकि इन्द्रियों की विषय रस की चाह बाह्य दमन से नष्ट नहीं होती है। इसीलिए प्राणायामादि के अभ्यास से मन कुछ समय के लिए विषय शून्य हो जाएगा, किंतु बाद में वह अवसर पाकर फिर विषयों में डूब जाएगा। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • बलपूर्वक – जबरदस्ती।
  • हठयोग – योग का एक प्रकार।
  • पल्लवित – विकसित।
  • लिप्त – लीन।
  • दमन – नष्ट करना।
  • प्राणायाम – योग में साँस लेने की एक पद्धति।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से लिया गया है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थित प्रज्ञ नहीं होने देतीं। यहाँ भारद्वाज कहते हैं कि इन्द्रियों को जबरदस्ती विषयों से हटाने पर भी समस्या बनी रहती है क्योंकि विषयों के चिंतन से व्यक्ति का नाता नहीं छूटता।

व्याख्या:
लेखक मन की एकाग्रता पर विचार कर रहा है। वह कामनाओं के संदर्भ में सोचता है कि अगर व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना संतोष कर ले तो उसकी कामनाएँ शांत हो जाएँगी। इस प्रकार वह मन को एकाग्र कर सकेगा। लेखक के विचार में यह भी उचित नहीं लगता। इसमें समस्या यह पैदा होती है कि हम इंद्रियों को बलपूर्वक अपने से अलग तो कर देते हैं पर उनका चिन्तन निरन्तर करते रहते हैं। ऐसे में उनका मन से हटना न हटना व्यर्थ ही है। जैसे ही मन उन विषयों के बारे में चिंतन करता है, वैसे ही वे फिर जाग जाती हैं।

यह स्थिति ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार गर्मी में अतिशय ताप के कारण वनस्पतियाँ सूख जाती हैं परन्तु वर्षा ऋतु आती है तो पुनः हरी-भरी हो जाती हैं। वे पुनः पल्लवित हो जाती हैं। अतःएव बलपूर्वक हटाई गई इन्द्रियाँ अवसर मिलते ही पुनः जाग उठती हैं। और यह काम विषय चिंतन करता है। शुष्क इन्द्रियाँ विषय चिंतन रूपी जल से पुनः विषयों में लिप्त हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यम-नियम, आसन-प्राणायाम आदि से कुछ समय के लिए इंद्रियाँ दब अवश्य जाती हैं पर अवसर आने पर पुनः खड़ी हो जाती हैं और मानव की हानि करना आरम्भ कर देती हैं।

विशेष:

  1. लेखक ने साधक के बलपूर्वक इंद्रियों के दमन को गलत बताया है। उसका मानना है कि बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियाँ उसी तरह पुनः जाग जाती हैं जिस प्रकार गर्मी में सूखी वनस्पतियाँ वर्षा ऋतु में पुनः पल्लवित हो जाती हैं।
  2. उपमा अलंकार है। प्रसाद गुण है।
  3. ऋतुओं के उपयोग की सुंदर व्याख्या की गई है। ग्रीष्म का काम – सूखना और वर्षा का काम हरा-भरा करना है।
  4. विषय किस प्रकार मानव मन पर आक्रमण कर देते हैं, इसका सुंदर विवेचन किया गया है।
  5. संस्कृतनिष्ट भाषा है। इन्द्रियों, बलपूर्वक, वनस्पतियाँ आदि शब्द तत्सम हैं। हठयोग और प्राणयाम शब्द अर्द्ध पारिभाषिक शब्द हैं।
  6. दृष्टांत या उदाहरण व विवेचनात्मक शैली है। सूत्रात्मक शैली भी देखी जा सकती है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक ने इस अनुच्छेद में किस समस्या की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
लेखक ने व्यक्ति की इस समस्या की ओर संकेत किया है कि इंद्रियों को हठयोग से दूर कर भी लिया जाए तब भी उसका विषयों के चिंतन से पीछा नहीं छूटता। अवसर आने पर वे पुनः व्यक्ति पर हावी हो जाती हैं।

प्रश्न (ii)
कामनाओं का पुनः लौट आने को लेखक ने किस उदाहरण से समझाया है?
उत्तर:
लेखक ने कहा है कि जिस प्रकार ग्रीष्म में सूखी वनस्पतियाँ वर्षा का जल पीने पर पुनः हरी-भरी हो जाती हैं उसी प्रकार बलपूर्वक मन से हटाई गई इच्छाएँ विषयों का चिन्तन करने से पुनः जाग जाती हैं।

प्रश्न (iii)
इंद्रियाँ क्यों नहीं समाप्त होती?
उत्तर:
इंद्रियों का समाप्त न होने का कारण यह है कि इन्हें विषय-रस समाप्त नहीं होने देता। हम चाहे हठयोग से इन पर कुछ समय के लिए नियंत्रणं क्यों न कर लें पर जैसे ही विषय याद आते हैं ये पुनः रसमग्न हो जाती हैं।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
हठयोग का इस अवतरण में क्या उपयोग है?
उत्तर:
हठयोग योग का शब्द है। इसे अर्द्धपारिभाषिक शब्द कहा जाता है। हठयोग में बलपूर्वक इंद्रियों को वश में किया जाता है। लेखक यहाँ कहना चाहता है कि व्यक्ति बाहरी वासनाओं को अपने वश में कर लेता है और इसके लिए हठयोग का प्रयोग करता है।

प्रश्न (ii)
क्या हठयोग से मन एकाग्र हो सकता है?
उत्तर:
हठयोग से मन एकाग्र नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे हम बाहरी वासनाओं पर लगाम लगा सकते हैं। वस्तुतः मन का भीतरी पक्ष वासनाओं को स्मरण कर पुनः जीवन धारण करता रहता है। ऐसे में हठयोग मन को एकाग्र करने का कारगर साधन नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न (iii)
शुष्क इंद्रियाँ लेखक ने किसे कहा है?
उत्तर:
लेखक ने शुष्क इंद्रियाँ उन्हें कहा है जिन्हें बलपूर्वक वश में करने का प्रयास किया गया है।

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
मन दो प्रकार से उत्तेजित होता है-बाहर के विषयों से एवं भीतर की वासनाओं और स्मृतियों से। अतः जब तक वासनाएँ हैं विषय रस का संस्कार नष्ट नहीं किया जा सकता। यद्यपि बाह्य प्राणायामादि कुछ सहायक हैं पर पूरी तरह विषय रस का निस्सारण नहीं करते, तब मन से विषय रस कैसे निवृत्त हो? गीता बताती है कि ‘परं दृष्ट्वा निवर्तते’, परं का अर्थ है कि मन को किसी परं अर्थात् परम उच्च लक्ष्य में लगाना जैसे सेवा-कार्य के प्रकल्पों में, लोक-संग्रह में, राष्ट्र भक्ति में या दीन-दरिद्रों की सेवा में। ऐसा करने से मन की विषय आसक्ति नष्ट हो जाती है। इस संदर्भ में छात्रों के लिए अध्ययन ही परम लक्ष्य है। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • उत्तेजित – तनाव।
  • निस्सारण – निकालना।
  • निवृत्त – फारिग।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर लेखक का विचार यह है कि मन दो कारणों से उत्तेजित होता है। इस उत्तेजना को परम लक्ष्य में लगाने पर व्यक्ति मन एकाग्र कर सकता है।

व्याख्या:
भारद्वाज कहते हैं कि मन अगर एकाग्र नहीं होता तो इसके दो कारण कहे जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में मन दो कारणों से उत्तेजित होता है। एक तो उसे बाहरी विषय यानी सैर-सपाटे, होटलों में खाना-पीना, मौज-मस्ती वगैरह मन एकाग्र नहीं करने देते और दूसरे भीतर की वासनाएँ उसे नोच-नोच कर खाती हैं। उसके मन में उठी वासनाओं की आँधी उसे बार-बार याद आती है। उनसे वह उत्तेजित होता है। अगर व्यक्ति मन को एकाग्र करना चाहता है तो उसे सबसे पहले विषय-रस के संस्कार खत्म करने होंगे। यह ठीक है कि मन को एकाग्र करने के लिए प्राणायाम, यम, आसन आदि कुछ लाभ देते हैं पर उनका यह लाभ क्षणिक होता है।

वे पूरी तरह व्यक्ति के मन में रमे विषय रस को मिटा नहीं सकते। तब सवाल पैदा होता है कि मन से विषय रस कैसे समाप्त किए जाएँ? इसका उत्तर हमें मीता में मिलता है कि मन को किसी परं यानी परम उच्च लक्ष्य में लगा देना चाहिए। लोक-संग्रह के कामों में लगा देना चाहिए, राष्ट्रभक्ति में मन लगाना चाहिए, दीन-दुखियों की सेवा में लग जाना चाहिए। इस तरह के काम करने से मन की विषय आसक्ति समाप्त हो जाती है। छात्र के लिए क्योंकि परम लक्ष्य अध्ययन है अतः इस दृष्टि से वह मन को एकाग्र कर सकता है साथ ही अर्थप्रधान युग में उच्च पद पर प्रतिष्ठित भी हो सकता है। अच्छा धनार्जन भी कर सकता है।

विशेष:

  1. मन के एकाग्र न होने के कारण बताए गए हैं। लेखक का कहना है कि बाहर के विषयों से और भीतरी वासनाओं की स्मृति से मन एकाग्र नहीं रह पाता।
  2. प्राणायाम, यम-नियम मन की एकाग्रता में सहायक हैं पर यह चिरकालिक उपाय नहीं हैं।
  3. मन को नियंत्रित करने का उपाय बताया गया है कि इसे उच्च लक्ष्य की ओर मोड़ दो जैसे दीन-दुखियों की सेवा करना, राष्ट्रभक्ति की ओर उन्मुख हो जाना।
  4. छात्र इसी माध्यम से मन एकाग्र कर सकते हैं और उच्च पद पर प्रतिष्ठित हो सकते हैं।
  5. भाषा संस्कृतनिष्ठ है। वासनाओं, उत्तेजित, संस्कार आदि तत्सम शब्द हैं। निस्सारण नि+सारण। यहाँ विसर्ग सन्धि है। प्राणायाम अर्द्ध पारिभाषिक शब्द है। दीन-दरिद्रों मे द्वंद्व समास है।
  6. सूत्रात्मक शैली है। इसके अतिरिक्त विवेचनात्मक शैली है।

गयांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
मन को उत्तेजित करने के दो प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर:
मन को उत्तेजित करने के दो प्रकार हैं-एक तो बाहर के विषयों से मन उत्तेजित होता है और दूसरा विषय-चिंतन से वह तनाव में आ जाता है।

प्रश्न (ii)
विषय की वासनाएँ क्यों नष्ट नहीं होती?
उत्तर:
जब तक इंद्रियों की विषय-वासना रसमग्न रहती हैं तब तक नष्ट नहीं होतीं। कारण यह है कि मन से विषय रस का संस्कार नष्ट नहीं होता। संस्कार के नष्ट न होने से विषय वासनाओं का अंत होने लगता है।

प्रश्न (iii)
वासनाओं पर लगाम लगाने के लिए प्राणायाम का अभ्यास कितना उपयोगी है?
उत्तर:
प्राणायाम का अभ्यास करने से वासनाओं पर नियंत्रण अवश्य होता है पर यह बाहरी आकर्षण पर ही प्रतिबंध लगा सकता है। जैसे मित्र-मण्डली में न जाना, होटलों में जाकर बढ़िया खाना न खाना, क्रिकेट-सिनेमा आदि न देखना। बाहरी आकर्षण के बाद जो भीतरी वासनाएँ व्यक्ति को प्रताड़ित करती हैं, उससे मन एकाग्र नहीं रह पाता।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
गीता में परं का अर्थ क्या है? लेखक ने इस शब्द का यहाँ किस प्रकार उपयोग किया है?
उत्तर:
गीता में परं का अर्थ है मन को किसी श्रेष्ठ कार्य के लिए लगाना। यह . किसी की सेवा करना हो सकता है, दीन-दुखियों की मदद करना हो सकता है अथवा राष्ट्रभक्ति में अपने को खो देना हो सकता है।

प्रश्न (ii)
छात्रों के लिए परम शब्द कितना उपयोगी है?
उत्तर:
छात्रों के लिए परम शब्द बहुत उपयोगी है। लेखक का मानना है कि अगर छात्र अपना मन एकाग्र करने के लिए भटकते मन को देश-सेवा या दीन-दुखियों की सेवा के लिए लगा देते हैं तो उनके मन में एकाग्रता स्थान ग्रहण कर सकती है।

प्रश्न (iii)
मन से विषय रस कैसे दूर किया जा सकता है?
उत्तर:
मन से विषय रस दूर करने के लिए परम लक्ष्य को अपनाना होगा। इसके बिना विषय रस से मुक्ति संभव नहीं।

प्रश्न 6.
गीता में परं का अर्थ परमात्मा है इसे परिभाषित करते हुए गीता कहती है कि सब विश्व ईश्वर ही है। वासुदेवः सर्वम्। यह भी कहा गया है कि मुझ ईश्वर को सब विश्व में व्याप्त जानो और मुझमें संपूर्ण विश्व को समझो। अर्थात् ईश्वर और विश्व अभिन्न हैं। अतः सबके प्रति सेवाभाव रखो। यही मन की वासनाओं की शुद्धि का सूत्र गीता देती है। क्या इंद्रियों के भोगों को नियंत्रण करने से मानसिक कुंठाएँ नहीं उभरेंगी तथा व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रोगों से पीड़ित नहीं हो जाएगा। गीता का इस विषय में उत्तर पूर्णतः तर्क संगतं है। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • परं – परमात्मा।
  • वासुदेव – ईश्वर।
  • व्याप्त – संपूर्ण।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ नहीं रहने देतीं। स्थिर मन के उपायों पर विचार करते हुए लेखक गीता के प्रधान सूत्र का उल्लेख करता है कि यह वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना उत्पन्न करती है। इसी में मन की एकाग्रता का सूत्र विद्यमान है।

व्याख्या:
गीता के एक सूत्र में आए परं शब्द की व्याख्या करते हुए रचनाकार कहता है, परं का अर्थ है परमात्मा। यह समस्त विश्व और कुछ नहीं है, ईश्वर है। कहा भी गया है कि सबमें ईश्वर समाया हुआ है। मुझ ईश्वर को संसार के कण-कण में व्याप्त जानो। यह विश्व किसी अन्य में नहीं, मुझमें ही है। ईश्वर और विश्व को अलग अलग नहीं देखा जा सकता। ये एक-दूसरे में लीन हैं।

इसलिए लेखक गीता के इस सूत्र का आधार लेकर अपने विषय को विवेचित करता है और व्यक्ति मा को संदेश देता है कि मन की वासनाओं को शुद्ध करने का एक ही उपाय है कि सबके प्रति सेवाभाव रखो। यहीं एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि अगर हम वासनाओं पर नियंत्रण करेंगे तो इससे मन में अनेक प्रकार की कुंठाएँ जन्म लेंगी। इससे व्यक्ति में मानसिक व शारीरिक पीड़ा पैदा होगी। ऐसे में संभव नहीं लगता कि व्यक्ति मन एकाग्र कर सकेगा।

विशेष:

  1. इस अंश में लेखक ने वेद सूक्त को विवेचित किया है कि मैं एक अवश्य हूँ पर समस्त विश्व में व्याप्त हूँ। एकोहं….। यहीं लेखक ने एक अन्य सूत्र का उल्लेख भी किया है, “वासुदेवः सर्वम्।
  2. दर्शनशास्त्र में बड़ा झगड़ा है। आत्मा और ब्रह्म अलग-अलग हैं या एक हैं। कुछ ब्रह्मज्ञानी इन्हें अलग-अलग मानते हैं और कुछ अभिन्न। यहाँ ईश्वर व विश्व अभिन्न में ब्रह्मज्ञानियों की यही भावना परिलक्षित होती है।
  3. वासनाओं की शुद्धि का मूल मंत्र बताया गया है-सबके प्रति सेवाभाव रखो, वासनाएँ शांत हो जाएँगी।
  4. यहाँ एक महत्त्वपूर्ण आशंका उठाई गई है कि क्या इन्द्रियों के भोगों को नियन्त्रण करने से मानसिक कुंठाएँ जन्म नहीं लेंगी? शारीरिक पीड़ा नहीं होगी?
  5. भाषा संस्कृतनिष्ठ है। सूत्रात्मक विवेचनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
गीता में परं का अर्थ क्या है?
उत्तर:
गीता में परम का अर्थ परमात्मा है।

प्रश्न (ii)
परं को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
परं को गीता में इस प्रकार परिभाषित किया है–सारा विश्व ईश्वर है। मुझ ईश्वर को सबमें व्याप्त समझो। मुझमें ही सारा विश्व बना है। दूसरे शब्दों में ईश्वर और विश्व अभिन्न हैं।

प्रश्न (iii)
मन की वासनाओं को दूर करने का गीता में क्या उपाय बताया गया है?
उत्तर:
गीता में कहा गया है कि अगर मन की वासनाओं को शांत करना चाहते हो तो सबके प्रति सेवाभाव रखो। इससे मन की वासनाएँ शुद्ध हो जाएंगी।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
इस अनुच्छेद का केंद्रीय भाव क्या है?
उत्तर:
इस अनुच्छेद का केंद्रीय भाव है कि ईश्वर कण-कण में बसा है। सबके प्रति सेवाभाव से मन की वासनाओं को शुद्ध किया जा सकता है।

प्रश्न (ii)
इंद्रियों पर नियंत्रण करने से क्या समस्या पैदा हो सकती है?
उत्तर:
इंद्रियों पर नियंत्रण करने से मन में कुंठाएँ जन्म ले सकती हैं। इससे व्यक्ति अनेक प्रकार की बीमारियों का शिकार हो सकता है।

प्रश्न (iii)
गीता में इंद्रियों के नियंत्रण से पनपने वाली कुंठाओं का क्या समाधान बताया है? .
उत्तर:
गीता में कहा गया है कि वासमाओं पर नियंत्रण से मन में कुंठाएँ तो उपज सकती हैं पर उनका सरल उपाय यह कि विषय का सेवन तो किया जाए पर आसक्ति या द्वेष से न किया जाए। इससे मन में कुंठाएँ उपजने का भय नहीं रह सकता।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.
अनियन्त्रित इच्छाएँ समाज में अनाचार पनपाएँगी। लोग कामनाओं से आवेशित होकर निषिद्ध आचरण में प्रवृत्त होवेंगे। अतः इन्द्रियों द्वारा विषयों का सेवन – तो हो पर विवेक शून्य आसक्ति न हो। इन्द्रियाँ अपने वश में रहें। उन पर अंकुश रहे अनिवार्य विषयों में इंद्रियाँ प्रवृत्त हों, पर निषिद्ध वर्जित विषयों में नहीं। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • अनियन्त्रित – जिन पर नियंत्रण लगा दिया गया है।
  • आवेशित – क्रोधित।
  • वर्जित – त्याज्य।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थित प्रज्ञ नहीं रहने देतीं। लेखक ने अंत में स्वीकार कर लिया है कि कामनाएँ कभी समाप्त नहीं हो सकती हैं पर आवश्यकता इस बात है कि व्यक्ति को उनका दास नहीं होना चाहिए।

व्याख्या:
लेखक का मानना है कि व्यक्ति वासनाओं से स्वयं को कभी दूर नहीं कर सकता पर इन्हें नियंत्रित कर जीवन में अपनाया जाए तो वह अपने मन को एकाग्र कर सकता है। क्योंकि वासनाएँ समाज के लिए अनेक प्रकार अनाचार पैदा करती हैं। लोग कामनाओं से संचालित होने लगते हैं और ऐसे आचरण करने लगते हैं जिनकी समाज में करने की मनाही है। अतः लेखक कहता है कि इन्द्रियों से विषय सेवन करो, तुम्हें कोई नहीं रोकने वाला पर इनके सेवन में विवेक को मत भूलो। उन पर आपका हर हालत में नियंत्रण रहना चाहिए। अनिवार्य हो तो विषयों का सेवन करो अन्यथा इनसे परहेज करो।

विशेष:

  1. जब वासनाओं पर नियंत्रण नहीं होता तो समाज में तरह-तरह के अत्याचार पैदा हो जाते हैं। इससे समाज में अनाचार फैलता है।
  2. इंद्रियों के सेवन की मनाही नहीं है पर विवेक का प्रयोग करते हुए करना चाहिए।
  3. तत्सम प्रधान शब्द हैं, संस्कृतनिष्ठ भाषा है। अनियंत्रित में अ और नि दो उपसर्गों का प्रयोग किया गया है तब जाकर अनियंत्रित शब्द का निर्माण किया गया है। इसी तरह अनाचार में अ उपसर्ग का प्रयोग है। प्र उपसर्ग लगाकर प्रवृत्त शब्द तैयार किया गया है।
  4. विवेचित व सूत्रात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
अनियंत्रित इच्छाएँ समाज का क्या अहित करती हैं?
उत्तर:
जिन इंद्रियों पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं रहता वे समाज को भयावह बना देती हैं। समाज को अनुशासनहीन बना देती हैं। लोग कामनाओं से तनाव में आकर समाज के विरुद्ध आचरण करने लगते हैं।

प्रश्न (ii)
इंद्रियों के सेवन के लिए लेखक ने क्या परामर्श दिया है?
उत्तर:
लेखक ने कहा है कि इंद्रियों का सेवन तो किया जाए पर विवेक से किया जाए। इनके सेवन में आसक्ति का लेश मात्र भी अंश नहीं होना चाहिए।

प्रश्न (iii)
लेखक इंद्रियों का सेवन करते समय किस बात की ओर ज़्यादा ध्यान देना चाहता है?
उत्तर:
इंद्रियों का नियंत्रण अपने हाथ में होना चाहिए। अगर नियंत्रण छूटा तो समाज में अनाचार फैल सकता है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
अनाचार से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
जब समाज-विरुद्ध क्रियाएँ की जाती हैं तो उसे अनाचार की श्रेणी में रखा जाता है। इंद्रियों का नियंत्रित सेवन समाज-सम्मत है और अनियंत्रित सेवन निश्चित रूप से समाज-विरुद्ध है।

प्रश्न (ii)
इस अनुच्छेद में कोई एक पारिभाषिक शब्द का चुनाव कीजिए।
उत्तर:
इस अनुच्छेद में पारिभाषिक शब्द है–आसक्ति।

प्रश्न (iii)
आवेशित शब्द किस प्रकार बना है?
उत्तर:
आवेश में इत प्रत्यय लगकर आवेशित शब्द का निर्माण हुआ है।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 20 ‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 20 ‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’ (कविता, सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’)

हम कहाँ जा रहे हैं…! पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

हम कहाँ जा रहे हैं…! लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि का दोगली-दोहरी सभ्यता से क्या आशय है?
उत्तर:
दोगली-दोहरी सभ्यता से आशय है-पाश्चात्य सभ्यता और भारतीय सभ्यता का सम्मिश्रण।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
हम कैसी दुंदुभी बजा रहे हैं?
उत्तर:
हम विदेशी जीवन-शैली में अपनी संस्कृति की ही वस्तुओं को आयायित समझकर अपना रहे और आधुनिक होने की दुंदुभी बजा रहे हैं।

प्रश्न 3.
हम विदेश क्यों जा रहे हैं?
उत्तर:
अपनी ही संस्कृति के रहस्यों को जानने के लिए हम विदेश जा रहे हैं।

हम कहाँ जा रहे हैं…! दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘उल्टे बाँस बरेली को’ कवि ने किस संदर्भ में कहा है? (M.P. 2009)
उत्तर:
विदेशियों द्वारा हमारी परंपराओं और उपलब्धियों को अपना कहकर प्रचारित करने के सौंदर्य में कवि ‘उल्टे बाँस बरेली को’ कहा है।

प्रश्न 2.
हमने दूसरों को क्या सौंप दिया है? (M.P. 2010)
उत्तर:
हमने दूसरों को अपनी सभ्यता और संस्कृति सौंप दी है।

प्रश्न 3.
‘हम कहाँ जा रहे हैं’ से कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर:
‘हम कहाँ जा रहे हैं’ से कवि यह संदेश केता चाहता है कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, उसकी परंपराएँ, व्यवहार, उपलब्धियाँ और जीवन-मूल्य सर्वश्रेष्ठ है। हमें पाश्चात्य जीवन-शैली और वस्तुओं को नहीं अपनाना चाहिए। हमें भारतीय ही बने रहना चाहिए; क्योंकि इसी में हमारा कल्याण है।

हम कहाँ जा रहे हैं…! भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित का भाव पल्लवन कीजिए –

  1. मान्यताएँ बदल कर हम अपना सर मुड़ा रहे हैं।
  2. अपना खालिसे कलश भी हम विदेशी बना रहे हैं।

उत्तर:
1. हम भारतीय पुरातन काल से चली आ रही परंपराओं, जीवन-मूल्यों और आदर्शों को बदलकर, पाश्चात्य जीवन-शैली को अपनाकर, अपनी संस्कृति और अपने व्यवहार को भूलते जा रहे हैं। आज जब विश्व हमारे चिंतन और ज्ञान से नई चेतना प्राप्त कर रहा है, तब हम अपनी विरासत को छोड़कर विदेशी चिंतन और व्यवहार को ग्रहण करें, यह उचित नहीं है।

2. हम विदेशी वस्तुओं के प्रति इतने आकर्षित हो रहे हैं कि हमने शुद्ध भारतीय ‘देन कलश को विदेशी की देन बता दिया है। कवि ने इसके द्वारा भारतीयों पर व्यंग्य किया है कि हम अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों को भी नकार रहे हैं।

हम कहाँ जा रहे हैं…! भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयोग कीजिए –
(अ) मुलम्में पर मुलम्मा चढ़ाना।
(ब) उल्टे बाँस बरेली को
(स) दुदंभी बजाना
(द) सर मुंडाना।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 20 'हम कहाँ जा रहे हैं...!' img-1

प्रश्न 2.
विलोम शब्द लिखिए –

  1. कड़वा
  2. नीति
  3. ज्ञान
  4. सभ्यता
  5. रहस्य
  6. दानवीर।

उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 20 'हम कहाँ जा रहे हैं...!' img-3
हम कहाँ जा रहे हैं…! योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
किसी प्रवासी भारतीय की कविता खोजिए और उसे कक्षा में सुनाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
चाणक्य और अभिमन्यु के संबंध में जानकारी प्राप्त करें।
उत्तर:
चाणक्य चंद्रगुप्त का प्रधानमंत्री था और अर्थशास्त्र का रचयिता था। अभिमन्यु अर्जुन का पुत्र था। महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए वह उसमें प्रवेश कर गया, किंतु वहाँ कई महारथियों ने मिलकर उसका वध कर दिया था।

प्रश्न 3.
पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण को आप कैसा मानते हैं? अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 4.
विश्व में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार की स्थिति पर अपने विचार अपने साथियों के साथ बाँटिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

हम कहाँ जा रहे हैं…! परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘हम कहाँ जा रहे हैं। कविता के कवि हैं –
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) देवेंद्र ‘दर्शिक’
(ग) बालकवि ‘वैरागी’
(घ) सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’
उत्तर:
(घ) सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’

प्रश्न 2.
मान्यताएँ बदलकर हम अपना सर……………………..रहे हैं –
(क) कटा
(ख) मुँडा
(ग) झुका
(घ) ऊँचा
उत्तर:
(ख) मुँड़ा।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
चक्रव्यूह में फँसा था –
(क) अभिमन्यु
(ख) अर्जुन
(ग) भीम
(घ) द्रोणाचार्य
उत्तर:
(क) अभिमन्यु।

प्रश्न 4.
हम ‘डॉविंची कोड’ बना रहे हैं, कैसे ………..
(क) दबाव में आकर
(ख) जान-बूझकर
(ग) अनजाने में
(घ) देख-सुनकर
उत्तर:
(ख) जान-बूझकर।

प्रश्न 5.
हम कैसी सभ्यता के रंग में रंगे हैं –
(क) दोहरी-दोगली
(ख) भारतीय पाश्चात्य
(ग) असली-नकली
(घ) अच्छी-बुरी
उत्तर:
(क) दोहरी-दोगली।

प्रश्न 6.
कवि ने हमें संदेश दिया है –
(क) हम भारतीय बने रहें
(ख) हम आधुनिक बनने के लिए पाश्चात्य जीवन-शैली अपनाएँ
(ग) हम अपनी संस्कृति-सभ्यता को भूल जाएँ
(घ) हम अपनी उपलब्धियों को नकार दें
उत्तर:
(क) हम भारतीय बने रहें।

प्रश्न 7.
हमारा कल्याण इसी में है कि –
(क) हम भारतीय बने रहें।
(ख) हम नकली जीवन-शैली को उतार फेंकें।
(ग) हम अपनी सांस्कृतिक चेतना को पहचानें।
(घ) हम अपनी शक्ति को, अपनी उपलब्धियों को और अपनी सांस्कृतिक चेतना पहचानें।
उत्तर:
(घ) हम अपनी शक्ति को, अपनी उपलब्धियों को और अपनी सांस्कृतिक चेतना को पहचानें।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार कीजिए –

  1. सुदर्शन ‘प्रियदर्शनी’ ………. हैं। (प्रवासी भारतीय/अप्रवासी भारतीय)
  2. विश्व में ………. पहले स्थान पर है। (चीनी भाषा/हिंदी भाषा)
  3. हिंदी जानने वालों की संख्या ………. करोड़ है। (100/102)
  4. पाश्चात्य जीवन-शैली और वस्तुओं को देखकर हम ………. रहे। (भाग/ललचा)
  5. ‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’ कविता के कवि ……… हैं। (बालकवि वैरागी/सुदर्शन प्रियदर्शिनी)

उत्तर:

  1. अप्रवासी भातीय
  2. हिंदी भाषा
  3. 102
  4. ललचा
  5. सुदर्शन “प्रियदर्शिनी।

MP Board Solutions

III. निम्नलिखित कथनों में सत्य/असत्य छाँटिए –

  1. महाभारत के चक्रव्यूह में अभिमन्यु फँसा था।
  2. कविता ‘हम कहाँ जा रहे हैं’…में हैरीपीटर फिल्म का उल्लेख है।
  3. हम दोहरी-दोगली सभ्यता के रंग में रंगे हैं।
  4. कवि ने संदेश दिया है कि हम भारतीय बने रहें।
  5. ‘दोगली-दोहरी’ में उपमा अलंकार है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. असत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 20 'हम कहाँ जा रहे हैं...!' img-4
उत्तर:

(i) (ङ)
(i) (ग)
(iii) (घ)
(iv) (ख)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

  1. हमारे लिए क्या शुभ संकेत नहीं है।
  2. विदेशी किसे क्या कहकर प्रचारित कर रहे हैं?
  3. हमारा कल्याण किसमें है?
  4. चाणक्य-नीति क्या है?
  5. ‘सब कुछ गड़मड़ा रहा है?

उत्तर:

  1. हमारे लिए यह शुभ संकेत नहीं है कि हम अपनी उपलब्धियों को नकार रहे हैं।
  2. विदेशी हमारी देन वास्तुकला, सत्वज्ञान और योग को अपना कहकर प्रचारित कर रहे हैं।
  3. हमारा कल्याण इसी में हैं कि हम भारतीय बने रहें।
  4. खूब सोच-विचार कर ही कदम उठाना चाणक्य नीति है।
  5. ‘सब कुछ गड़मड़ा रहा है’ से कवि का तात्पर्य है-भारतीय और पाश्चात्य जीवन-शैली एक-दूसरे से इतनी मिल गई हैं कि क्या भारतीय है और क्या पाश्चात्य, यह समझ पाना कठिन होता जा रहा है।

हम कहाँ जा रहे हैं…! लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सुभद्रा कौन-सी कथा सुनते-सुनते सो गई थी?
उत्तर:
सुभद्रा चक्रव्यूह की कथा सुनते-सुनते सो. गई थी?

प्रश्न 2.
‘डॉविंची कोड’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
‘डॉविंची कोड’ से तात्पर्य है नकली नियमावली।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
विदेशी क्या कर रहे हैं?
उत्तर:
विदेशी हमारी वास्तुकला, सत्वज्ञान और योग को अपना कहकर प्रचारित कर रहे हैं।

प्रश्न 4.
विदेशी हमारा क्या-क्या ग्रहण कर उन्हें क्या-क्या बना दिया है?
उत्तर:
विदेशी हमारी वास्तुकला को ग्रहण कर उसे फेंगशुई, सत्वज्ञान को रेकी और योग को योगा बना दिया है।

प्रश्न 5.
कवि ने क्या उतार फेंकने के लिए कहा है?
उत्तर”:
कवि ने नकली जीवन-शैली उतार फेंकने के लिए कहा है।

प्रश्न 6.
‘उल्टे बाँस बरेली को’ कवि सुदर्शन ने किस संदर्भ में कहा है? (M.P. 2009)
उत्तर:
‘उल्टे बाँस बरेली को’ कवि सुदर्शन ने उस संदर्भ में कहा है कि विदेशी हमारी ही वस्तुओं को ग्रहण करके उसे अपना अच्छा बताकर हमें लौटा रहे हैं।

हम कहाँ जा रहे हैं…! दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि ने किन प्रसंगों को उजागर किया है?
उत्तर:
कवि ने भारतीय और पाश्चात्य जीवन-बोध के उन प्रसंगों को उजागर किया है जिनमें हम अपनी संस्कृति और अपने परंपरागत व्यवहार को भूल रहे हैं।

प्रश्न 2.
हम पाश्चात्य जीवन-शैली की चकाचौंध में क्या-क्या खोते जा रहे हैं?
उत्तर:
हम पाश्चात्य जीवन-शैली की चकाचौंध में अपनी सांस्कृतिक पहचान, धर्म-कर्म, वेशभूषा, भाषा-ज्ञान, विधि-विधान आदि खोते जा रहे हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
हमारा क्या-क्या विदेशी हो गया है?
उत्तर:
हमारा खालिस कलश, धर्म, कर्म, वेशभूषा, भाषा-विज्ञान, विधि-विधान सभ्यता, संस्कृति, दानवीरता, वास्तुकला, सत्वज्ञान, योग, नीम की निमोली आदि विदेशी हो गए हैं। इन्हें विदेशी अपना मुलम्मा चढ़ाकर अपना बतलाते हुए प्रचारित कर रहे हैं।

प्रश्न 4.
‘हम कहाँ जा रहे हैं….. कविता के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’ कविता सोद्देश्यपूर्ण कविता है। इसमें कवि सुदर्शन का यह उद्देश्य है कि हमें बाहरी आडम्बरों से दूर रहना चाहिए। तथाकथित सभ्यता और पाश्चात्य जीवन-शैली को बिना सोचे-समझे अपनाना मूर्खता है। हमारी ही विरासत और सांस्कृतिक निष्ठा दुनिया में श्रेष्ठ है। विदेशी वस्तुओं की ओर दौड़ना अच्छी बात नहीं है। अच्छी बात यही है कि हम भारतीय हैं और भारतीय बने रहें।

हम कहाँ जा रहे हैं…! पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
“हम कहाँ जा रहे हैं…!” कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘हम कहाँ जा रहे हैं। कविता में कवि सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’ ने भारतीय और पाश्चात्य जीवन-बोध के उन प्रसंगों को उजागर किया है। जिन्हें हम भारतीय अपनी भारतीय संस्कृति और परंपरागत व्यवहार में होने पर भी भूलते जा रहे हैं। कविने इस बात पर बल दिया है कि हम अपनी छम प्रवृत्ति को छोड़ दें। बाह्य आडंबर को नष्ट कर दें। कुछ नवीन सभ्यता के नाम पर पाश्चात्य जीवन-शैली का अपनाना बुद्धिमानी नहीं है। सच तो यह है कि हमारी विरासत एवं सांस्कृतिक निष्ठा विश्व में श्रेष्ठ है। पाश्चात्य जीवन-शैली और उनकी वस्तुओं को देखकर हम ललचा रहे हैं। उन्हें स्वीकार कर रहे हैं।

अपनी उपलब्धियों को नकार रहे हैं। हम अपनी संस्कृति को देखने-समझने के लिए विदेश जा रहे हैं। यहाँ तक कि हम अपने स्वयं के कलश (धरोहर) को भी विदेशी बता रहे हैं। मैंनशुई, रेकी और योगा का उल्लेख करते हुए कवि कहता है कि यह सब कुछ हमारी वास्तुकला, सत्वज्ञान और योग हमारी ही देन हैं। विदेशी लोग अपना कहकर प्रचारित कर रहे हैं। कवि हमें सचेत करता है कि हमें अपनी शक्ति को, अपनी उपलब्धियों को अपनी सांस्कृतिक चेतना को पहचानना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण है कि हम भारतीय बने रहे। नकली जीवन-शैली को त्याग दें।

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

प्रश्न 1.
चिरंतन काल से
लिख-पीढ़ी दर –
पीढ़ियाँ चली
मान्यताएँ बदलकर
अपना सर हम

मुड़ा रहे हैं…!
न जाने हम कहाँ
जा रहे हैं…!

चाणक्य नीतियों
के चक्रव्यूह में फँसे
हम अभिमन्यु के
व्यूह को दुहरा रहे हैं…।

सुनते-सुनते
कथा, सो गई
सुभद्रा-हम जान-बूझकर
डॉविंची कोड बना रहे हैं।
रहस्य पर रहस्य
दबे हैं संस्कृति के
उन्हें देखने-समझने
विदेश आ रहे हैं…!

पगड़ी उतरी –
बार-बार-हमारी
फिर भी कलगी
की-कलफ सहला रहे हैं…… (Page 93)

शब्दार्थ:

  • चिरंतन – पुरातन, बहुत पहले से चलते रहने वाला।
  • मान्यताएँ – किसी सिद्धांत आदि का मान्य होना, मानने योग्य।
  • सर मुड़ाना – अपने पास का धन गँवा देना।
  • चाणक्य-नीति – चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री की चतुराई भरी चाल।
  • व्यूह – सैनिकों को युद्धभूमि में उपयुक्त स्थान पर रखना।
  • डॉविची कोड – नकली आचारसंहिता, नकली नियमावली।
  • रहस्य – गुप्त भेद।
  • पगड़ी उतारना – प्रतिष्ठा समाप्त करना।
  • कलगी – पगड़ी। में लगाया जाने वाला फूंदना।
  • कलफ़ – माँड़ी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश.सुदर्शन ‘प्रिंयदिर्शनी’ द्वारा रचित कविता ‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’ से उद्धृत है। कवि ने भारतीयों को पुरातन समय से चली आ रही भारतीय संस्कृति की मान्यताओं को छोड़कर पाश्चात्य जीवन-शैली को बिना सोचे-समझे अपनाने और अपनी जीवन-शैली को भूलते जाने को उचित नहीं मानता। इन्हीं भावों को इस काव्यांश में व्यक्त किया गया है।

व्याख्या:
कवि का कहना है कि हम भारतीय पुरातन काल से पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी संस्कृति की परंपरागत जीवन-शैली को बदलकर, अपने परंपरागत व्यवहार को भूलते जा रहे हैं। हम अपने जीवन-मूल्यों और आदर्श परंपराओं को छोड़कर पाश्चात्य परंपराओं और जीवन-शैली का अंधानुकरण करके कहाँ जा रहे हैं। हम पाश्चात्य संस्कृति की चतुराईभरी नीतियों के चक्रव्यूह में फंसकर अभिमन्यु वध वाले कांड को दुहरा रहे हैं; अर्थात् हम भारतीय पाश्चात्य जीवन-शैली के शिकार होते जा रहे हैं, जिसमें एक बार फँसने के बाद निकलना अभिमन्यु की तरह असंभव है।

जिस प्रकार अभिमन्यु ने सुभद्रा के गर्भ में ही चक्रव्यूह में प्रवेश का मार्ग जान लिया या किंतु कहानी सुनते-सुनते सुभद्रा के सो जाने पर वह उससे निकलने का मार्ग नहीं जान पाया क्योंकि सुभद्रा कथा के बीच में ही सो गई थी। अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुस तो गया, लेकिन वापस नहीं लौट सका। वही स्थिति हमारी है। हम पाश्चात्य जीवन-शैली के चक्रव्यूह में फँसते जा रहे हैं। हमारे लिए उससे छुटकारा पाना कठिन है। हम जान-बूझकर इसमें फँस रहे हैं तथा बिना सोचे-समझे इसे अपनाकर, नकली नियमावली बना रहे हैं। हमें यह अपनी छद्म प्रवृत्ति छोड़ देनी चाहिए।

हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति में अनेक गुप्त भेद दबे पड़े हैं। हम उन गुप्त भेदों को जानने के लिए विदेश आ रहे हैं। आज जब हमारे चिंतन और ज्ञान को अपनाकर विश्व नई चेतना ग्रहण कर रहा है, तब हम अपनी विरासत को छोड़कर विदेशी चिंतन और व्यवहार को अपनाने के लिए आतुर हो रहे हैं। ऐसा करने से बारम्बार हमारी प्रतिष्ठा घटती जा रही, है, फिर भी हम कलगी में लगे कलफ़ को सहला रहे हैं।

विशेष:

  1. कवि ने भारतीय संस्कृति को पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बताया है और पाश्चात्य शैली को बिना विचारे स्वीकार करना उचित नहीं है।
  2. सुनते-सुनते, बार-बार मैं पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  3. कलगी की कलफ़ में अनुप्रास अलंकार है।
  4. मुहावरों का सटीक, सार्थक प्रयोग किया गया है।
  5. महाभारत की पौराणिक कथी का प्रयोग हुआ है।
  6. भाषा तत्सम प्रधान है जिसमें अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  7. मुक्त छंद है। तुकांत का अभाव है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
चिरंतन काल से चली आ रही मान्यताओं को बदलेकर हम क्या कर रहे हैं?
उत्तर:
पुरातन काल से चली आ रही अपनी संस्कृति और परंपरागत मान्यताओं को बदलकर हम पाश्चात्य जीवन-शैली का अनुकरण कर अपनी संस्कृति और परंपरागत व्यवहार को भूलते जा रहे हैं।

प्रश्न (ii)
चाणक्य नीतियों से क्या आशय है?
उत्तर:
चाणक्य नीतियों से आशय है चतुराई की चालें। हम पाश्चात्य जीवन-शैली की चतुराईभरी चालों में फँसते जा रहे हैं। आशय यह कि हम बिना सोचे-विचारे उन्हें अपना रहे हैं।

प्रश्न (iii)
हम किन्हें देखने-समझने विदेश जा रहे हैं?
उत्तर:
भारतीय सभ्यता-संस्कृति में अनेक. गुप्त भेद दवे पड़े हैं। हम उन गुप्त भेदों को जानने के लिए विदेश जा रहे हैं।

पयांश पर आधारित सौंदर्य संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।.
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
हम भारतीय अपनी संस्कृति और अपने परंपरागत व्यवहार को भूलते जा रहे हैं। शताब्दियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही मान्यताओं, जीवन आदर्शों और जीवन-शैली को छोड़कर पाश्चात्य जीवन-शैली को बिना सोचे विचारे अपना रहे हैं। अपनी ही संस्कृति के रहस्यों को जानने के लिए हम विदेशों में जा रहे हैं। यह उचित नहीं है।

प्रश्न (ii)
पद्यांश के शिल्प-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
कवि कहता है कि पाश्चात्य जीवन-शैली का बिना सोचे-विचारे स्वीकार करना बुद्धिमानी नहीं है। सुनते-सुनते, बार-बार में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। ‘कलगी की कलफ’ में अनुप्रास अलंकार है। मुहावरों को सटीक, सार्थक प्रयोग किया गया है। महाभारत की पौराणिक कथा और चाणक्य का उल्लेख करने से उदाहरण अलंकार है। चाणक्य…सुभद्रा में रूपक अलंकार है। मुक्तक छंद है। तुकांत का अभाव है। भाषा तत्सम प्रधान है, जिसमें अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया है।

प्रश्न (iii)
पद्यांश का मुख्य भाव बताइए।
उत्तर:
पद्यांश का मुख्य भाव यह है कि हमारी विरासत एवं संस्कृति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
सब कुछ गड़मड़ा
रहा है-क्या है
हमारा-क्या
पाश्चात्य –
जानकर भी
नकारा –
सर हिला रहे हैं…।
दोगली-दोहरी
सभ्यता के रंग
में रंगे हैं –
हम और हमारा
कुछ भी नहीं
यही…
मुलम्में पर
मुलम्मा चढ़ा
रहे हैं…। (Page 94)

शब्दार्थ:

  • गड़मड़ा – अस्त-व्यस्त होना।
  • मुलम्मे पर मुलम्मा चढ़ाना – दिखावे पर दिखावा करना, सोने या चाँदी का पानी चढ़ाया हुआ।
  • नकारा – अस्वीकृत, इनकार, निकम्मा।
  • दोगली – वर्णसंकर।
  • दोहरी – दो तरह की बात।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’ द्वारा रचित कविता ‘हम कहाँ जा रहे हैं’ से उद्धृत है। कवि का मानना है कि हम न तो भारतीय रह पाए हैं और न ही पूरी तरह पाश्चात्य जीवन-शैली को अपना सके। हम दो रंगी सभ्यता में रंगे जा रहे हैं।

व्याख्या:
कवि कहता है कि आज सब कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा है। कहने का भाव यह है कि भारतीय संस्कृति, परंपराएँ और मान्यताएँ तथा पाश्चात्य जीवन-शैली दोनों ही एक-दूसरे में मिलकर गड़मड़ होकर अस्त-व्यस्त हो रही हैं। इस कारण पता ही नहीं चलता कि क्या हमारा है अर्थात् क्या भारतीय है और क्या पाश्चात्य है। सत्य तो यह है कि हम सब कुछ जानकर भी निकम्मे बने हुए अस्वीकृति में सर हिला रहे हैं। हम वर्णसंकर; अर्थात् दो प्रकार की जीवन-शैली अपनाकर दो तरह की बातें करते हैं।

हम एक ओर भारतीय सभ्यता-संस्कृति की अपनी परंपरागत जीवन-शैली को नहीं छोड़ पा रहे हैं और दूसरी ओर हम पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति की जीवन-पद्धति को बिना विचारे अपनाकर दोहरी जिन्दगी जी रहे हैं। कहने का भाव यह है कि हम आधुनिक होने का दिखावा कर रहे हैं। हम अपनी विरासत को भुलाकर पाश्चात्य जीवन-शैली और वस्तुओं को देखकर ललंचा रहे हैं अपनी उपलब्धियों को नकार रहे हैं। इस प्रकार हम दिखावे पर दिखावा कर रहे हैं। भारतीय जीवन-शैली पर पाश्चात्य जीवन-शैली को चढ़ा रहे हैं।

विशेष:

  1. भारतीय जीवन-शैली को छोड़कर पाश्चात्य जीवन-शैली को अपनाने वालों पर व्यंग्य किया है।
  2. भारतीय पाश्चात्य होने का दिखावा कर रहे हैं। अपनी उपलब्धियों को नकार रहे हैं।
  3. दोगली-दोहरी में अनुप्रास अलंकार है।
  4. मुहावरों का सार्थक प्रयोग किया गया है।
  5. छंदविहीन रचना में तुक और लय का अभाव है।
  6. भाषा सरल और उर्दू शब्दावली से युक्त खड़ी बोली है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
कवि और कविता का नाम लिखिए।
उत्तर:
कवि-सुदर्शन ‘प्रियदर्शनी, कविता-‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’

प्रश्न (ii)
‘हम और हमारा’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
‘हम’ से कवि का तात्पर्य है हम भारतीय और ‘हमारा’ से तात्पर्य है-हम भारतीयों की उपलब्धियों से, अपनी विरासत से हे जिसे हम भूलते जा रहे हैं।

प्रश्न (iii)
‘दोगली-दोहरी सभ्यता के रंग में रंगे’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
कवि यह कहना चाहता है कि हा भारतीय अपनी संस्कृति की मान्यताओं और जीवन-शैली के साथ-साथ पाश्चात्य जीवन-शैली और उनकी वस्तुओं के प्रति ललचा रहे हैं। इस तरह हम न तो अपनी जीवन-शैली को छोड़ पा रहे हैं और न ही पाश्चात्य जीवन-शैली को पूरी तरह अपना पा रहे हैं।

पद्यांश पर आधारित सौंदर्य-संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
पद्यांश का भाव-सौदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
भारतीय जीवन-शैली और पाश्चात्य जीवन-पद्धति दोनों मिल जाने के कारण सभी कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा है। हम अपनी विरासत और उपलब्धियों को भी जानते हुए नकार रहे हैं। हमें लगता है कि हमारा कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि हम परत पर परत चढ़ा रहे हैं।

प्रश्न (ii)
पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
हम भारतीय पाश्चात्य होने का दिखावा कर रहे हैं और अपनी उपलब्धियों को नकार रहे हैं। दोगली-दोहरी में अनुप्रास अलंकार है। मुहावरों का सार्थक प्रयोग किया गया है। छंदविहीन रचना में तुक और लय का अभाव है। भाषा सरल और उर्दू शब्दावली से युक्त खड़ी बोली है। विशेषणों का प्रयोग अर्थवत्ता में वृद्धि कर रहा है।

प्रश्न 3.
अपना खालिस
कलश भी हम
विदेश बता रहे, हैं…।
न धर्म न कर्म-अपना
न वेश-न भूषा
न भाषा-न विज्ञान
न विधि-न विधान –
सब कुछ दूसरों
के हवाले –
किए जा रहे हैं….।
बड़े त्यागी –
ऋषि-और दानवीर हैं हम –
दूसरे-हमें –
हमारे ही प्याले
से-हमारी सभ्यता
संस्कृति का
घुट पिला रहे हैं… (Page 94)

शब्दार्थ:

  • खालिस – शुद्ध।
  • कलश – घड़ा।
  • विधि – रचना, ढंग।
  • विधान – व्यवस्था।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश सुर्दशन ‘प्रियदर्शनी’ द्वारा रचित कविता ‘हम कहाँ जा रहे हैं….!’ से उद्धृत है। कवि भारतीयों पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि हम अपनी उपलब्धियों को नकार रहे हैं। यहाँ तक कि इमने स्वयं के कलश (धरोहर) को भी विदेशी दर्शा दिया है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि हम अपनी उपलब्धियों को नकार रहे हैं। यहाँ तक अपने शुद्ध देशी कलश (धरोहर) को भी विदेशी बता रहे हैं। दूसरे शब्दों में, मांगलिक कार्यों में रखा जाने वाला कलश भारतीय संस्कृति की देन है। विदेशी वस्तुओं को अपनाने के चक्कर में हमने उसे भी विदेशी संस्कृति की देन बता दिया है। न धर्म – हमारा है, न कर्म अपना है और न ही पहनावा अपना रहा है। यहाँ तक कि विधि-विधान भी अपने नहीं रहे। हम सब कुछ हवाले किए जा रहे हैं। हम बड़े त्यागी बन रहे हैं। कहने का भाव यह है कि हम अपनी उपलब्धियों को विदेशियों को दिए जा रहे हैं।

हम अपने-आपको ऋषि और दानवीर समझ रहे हैं। दूसरी ओर विदेशी हमारी इन्हीं परंपराओं का सत्व ग्रहण करके हमें ही परोस रहे हैं और हम उन्हें विदेशी मानकर ग्रहण कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, पाश्चात्य संस्कृति के लोग हमारी भारतीय संस्कृति की मान्यताओं व हमारी उपलब्धियों को दूसरा नाम देकर हमारी सभ्यता और संस्कृति हमें ही परोस रहे हैं और हम उन्हें अपना रहे हैं। यह हमारे लिए शुभ संकेत नहीं है।

विशेष:

  1. हम भारतीय अपनी संस्कृति, अपनी मान्यताएँ और परंपरागत व्यवहार को त्यागकर विदेशी जीवन-शैली अपना रहे हैं जो शुभ संकेत नहीं है।
  2. सभ्यता-संस्कृति में अनुप्रास अलंकार है।
  3. मुहावरों का सार्थक प्रयोग किया गया है।
  4. भाषा सरल खड़ी बोली है जिसमें उर्दू के शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  5. छंदविहीन रचना में तुक और लय का अभाव है।
  6. व्यंग्यात्मकता का प्रयोग, किया गया है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
कवि ने भारतीयों पर क्या व्यंग्य किया है?
उत्तर:
कवि ने भारतीयों पर व्यंग्य किया है कि हम लोग विदेशी वस्तुओं के प्रति ललचा रहे हैं इसलिए हमें अपनी संस्कृति में मांगलिक कार्यों में प्रयोग होने वाले भारतीय देन कलश को भी विदेशी बता दिया है। यह सर्वथा अनुचित है।

प्रश्न (ii)
भारतीय अपनी किन-किन सांस्कृतिक उपलब्धियों को दूसरों को सौंप रहे हैं?
उत्तर:
भारतीय अपना धर्म-कर्म, वेशभूषा, भाषा और ज्ञान एवं विधि-विधान आदि दूसरों को सौंप रहे हैं और उनकी जीवन-शैली को अपना रहे हैं। हमारे पास अपना कुछ नहीं रहा है।

प्रश्न (iii)
विदेशी हमें क्या परोस रहे हैं?
उत्तर:
विदेशी हमारी सभ्यता और संस्कृति को अपने साँचे में ढोलकर हमें ही परोस रहे हैं।

पयांश पर आधारित सौंदर्य-संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
कवि ने भारतीयों को व्यंग्य का निशाना बनाया है। हम पाश्चात्य जीवन-शैली और वस्तुओं को देखकर ललचा रहे हैं। इसलिए हम अपना सब कुछ उन्हें सौंप रहे हैं। हमारी यह स्थिति हो गई है कि न हमारा धर्म-कर्म, न ही वेशभूषा, भाषा-ज्ञान और न कोई विधि-विधान रहा है। पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के लोग हमारी उपलब्धियों को अपना बताकर हमें परोस रहे हैं।

प्रश्न (ii)
पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट. कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
कवि ने भारतीयों की मनःस्थिति को व्यंग्य का निशाना बनाया है। अतः पद्यांश की भाषा में व्यंग्यात्मकता है। हमें हमारे’ व ‘सभ्यता-संस्कृति’ में अनुप्रास अलंकार है। मुहावरों का सार्थक प्रयोग किया गया है। भाषा सरल खड़ी बोली है इसमें उर्दू शब्दों का प्रयोग हुआ है। छंदविहीन रचना में तुक और लय का अभाव है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
उल्टे बाँस
बरेली को –
योग-साधना –
धर्म नीति –
सब उल्टे हमें
परोसे
जा रहे हैं…।
वास्तुकला
हुई फेंगशुई
सत्वज्ञान को
रेकी-बना रहे हैं
योग को योगा हुआ देख
कैसी हम
दुंदुभी-बजा
रहे हैं…!
नीम भी
गले नहीं उतरी –
हमें कड़वी लगी –
निमोली की
तरह-तोड़ कर
उन्हें खिला रहे हैं –
हम कहाँ जा रहे हैं…! (Page 94)

शब्दार्थ:

  • दुंदुभी – एक तरह का वाद्य-यंत्र।
  • उल्टे बाँस बरेली को – जैसा होना चाहिए उसके विपरीत होना।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’ द्वारा रचित कविता ‘हम कहाँ जा रहे हैं…!’ से उद्धृत है। इसमें कवि कह रहा है कि पाश्चात्य और अन्य देशों केलोग हमारी परंपराओं का सत्व ग्रहण करके हमें ही परोस रहे हैं और हम उन्हें विदेशी मानकर स्वीकार कर रहे हैं। हमें आधुनिक चकाचौंध में अपनी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए।

व्याख्या:
कवि का कहना है कि विदेशी उल्टे बाँस बरेली की कहावत को चरितार्थ करते हुए अर्थात् हमारी उपलब्धियों, परंपराओं और जीवन-पद्धति को हमें लौटा रहे हैं जबकि होना यह चाहिए था कि हमें ही उन्हें सब कुछ अपना बता कर देना चाहिए था, पर हो रहा इसके विपरीत है। हमारी संस्कृति में प्रारंभ से ही योग-साधना पर बल दिया जाता रहा है। धर्म-नीति हमारी परंपरा का अंग रही है। वे इन्हें हमसे लेकर हमें ही परोस रहे हैं। उदाहरणार्थ-हमारी वास्तुकला को ग्रहण कर उसे फेंगशुई नाम दे दिया गया, सत्वज्ञान को ग्रहण कर रेकी बना दिया और योग को योगा बना दिया गया।

इस प्रकार वास्तुकला, सत्वज्ञान और योग हमारी ही देन है। इसे विदेशी लोग अपना कहकर – प्रचारित कर रहे हैं और हम इन्हें विदेशी मानकर और इन्हें अपनाकर कितने प्रसन्न हो रहे हैं। कवि कहता है कि नीम का वृक्ष हमारी संस्कृति की देन है, लेकिन वह भी – हमारे गले नहीं उतरा। वह भी हमें कड़वा लगा। उसके औषधीय गुणों को हमने नहीं जाना। हम उनकी निमोलियों की दवाई बना-बनाकर उन्हें खिला रहे हैं। दूसरे शब्दों में, विदेशियों ने नीम के महत्त्व को पहचानकर उसे पेटेंट कराने का प्रयास किया।

कवि कहता है कि हम लोग कहाँ जा रहे हैं। हम अपनी संस्कृति को भूले जा रहे हैं। सच तो यह है कि हमारी विरासत और सांस्कृतिक निष्ठा दुनिया में श्रेष्ठ है। हमें अपनी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए। उसकी प्रासंगिकता को आधुनिकता के साथ तलाशें और भली-भाँति भारतीय जीवन-मूल्यों के महत्त्व को समझें। हम भारतीय बने रहें और नकली जीवन-शैली को उतार दें।

विशेष:

  1. कवि ने हमें अपनी शक्ति को, अपनी उपलब्धियों और अपनी सांस्कृतिक चेतना को पहचानने और भारतीय बने रहने का संदेश दिया है।
  2. बाँस बरेली में अनुप्रास अलंकार है।
  3. उदाहरण अलंकार भी है।
  4. मुहावरों और कहावतों का सुंदर प्रयोग किया गया है।
  5. भाषा सरल, तत्सम और विदेशी शब्दों से युक्त खड़ी बोली है।
  6. छंदविहीन रचना में लय और तुक का नितांत अभाव है।

पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
हमारी संस्कृति की किन-किन उपलब्धियों को विदेशी किन-किन नामों से हमें परोस रहे हैं?
उत्तर:
हमारी संस्कृति की वास्तुकला, सत्वज्ञान और योग को विदेशी ग्रहण करके हमें ही फेंगशुई, रेकी और योगा के नाम से परोस रहे हैं।

प्रश्न (ii)
‘कैसी हम दुंदुभी बजा रहे हैं…!’ के द्वारा कवि हम पर क्या व्यंग्य कर रहा है?
उत्तर:
इसके द्वारा कवि यह व्यंग्य कर रहा है कि हम अपनी ही वास्तुकला को फेंगशुई, सत्वज्ञान को रेकी और योग को योगा को विदेशी मानकर, अपनाकर स्वयं को आधुनिक समझकर अत्यंत प्रसन्न हो रहे हैं। यह हमारे लिए उचित नहीं है।

प्रश्न (iii)
कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर:
कवि यह संदेश देना चाहता है कि हम अपनी शक्ति, अपनी उपलब्धियों और अपनी सांस्कृतिक चेतना को पहचानें। हमारी विरासत विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। आधुनिक जीवन की चकाचौंध में अपनी संस्कृति को न भूलें भारतीय बने रहें तथा नकली पाश्चात्य जीवन-शैली को उतार फेंकें।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
इस काव्यांश में कवि ने यह भाव व्यक्त किया है कि हमारी सभ्यता संस्कृति के जीवन-मूल्य विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। विदेशी लोग हमारी संस्कृति की उपलब्धियों को ही अपनी उपलब्धियाँ बताकर प्रचारित कर रहे हैं। वे हमारी वास्तुकला को फेंगशुई, सत्वज्ञान को रेकी और योग का योगा बनाकर हमें परोस रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी संस्कृति की उपलब्धियों को पहचानें और भारतीय बने रहें। इस तरह हमें पाश्चात्य जीवन-शैली अपनाने की आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
‘बाँस बरेली, तरह-तोड़’ में अनुप्रास अलंकार है। उदाहरण अलंकार भी है। मुहावरों और कहावतों का सुंदर प्रयोग किया गया है। भाषा सरल, तत्सम और विदेशी शब्दों से युक्त खड़ी बोली है। छंदविहीन रचना में लय और तुक का अभाव है। शब्द चयन भावानुकूल है।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत

अणुगति सिद्धांत अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 13.1.
ऑक्सीजन के अणुओं के आयतन और STP पर इनके द्वारा घेरे गए कुल आयतन का अनुपात ज्ञात कीजिए। ऑक्सीजन के एक अणु का व्यास 3Å लीजिए।
उत्तर:
दिया है:
d = 3 Å
∴ r = \(\frac{1}{2}\) × 3 = 1.5 Å
= 1.5 × 10-10 मीटर
STP पर 1 मोल गैस का आयतन
V1 = 22.41 = 22.4 × 10-3 मीटर 3
तथा 1 मोल गैस में अणुओं की संख्या
= N = 6.02 × 1023
∴ अणुओं का आयतन, V2 = एक अणु का आयतन × N
= \(\frac{4}{3}\) π3 × N
= \(\frac{4}{3}\) × 3.14 × (1.5 × 10-10)3 × 6.02 × 23
= 8.52 × 10-6 मीटर 2
∴ \(\frac { V_{ 2 } }{ V_{ 1 } } \) = \(\frac { 8.52\times 10^{ -6 } }{ 22.4\times 10^{ -3 } } \) = 3.8 × 10-4
अतः अणुओं के आयतन तथा STP पर इनके द्वारा घेरे गए आयतन का अनुपात 3.8 × 10-4 है।\

MP Board Solutions

प्रश्न 13.2.
मोलर आयतन STP पर किसी गैस (आदर्श) के 1 मोल द्वारा घेरा गया आयतन है। (STP : 1 atm) दाब, 0°C। दर्शाइये कि यह 22.4 लीटर है।
उत्तर:
दिया है: STP पर,
P = 1 atm = 7.6 m of Hg column
= 0.76 × 13.6 × 10 3 × 9.9
= 1.013 × 105 Nm-2
T = 0°C = 273 K
R = 8.31 J mol-1K-1
n = 1 मोल V = 22.41 सिद्ध करने के लिए,
सूत्र PV = nRT से
V = \(\frac { nRT }{ P } \)
= \(\frac { 1\times 8.31\times 273 }{ 1.013\times 10^{ 5 } } \)
= 22.4 × 10 -3 m3
= 22.4 लीटर

प्रश्न 13.3.
चित्र में ऑक्सीजन के 100 x 10-3 kg द्रव्यमान के लिए PV/T एवं P में, दो अलग-अलग तापों पर ग्राफ दर्शाये गए हैं।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 1
(a) बिंदुकित रेखा क्या दर्शाती है?
(b) क्या सत्य है: T1 >T2, अथवा T1 < T2 ?
(c) y – अक्ष पर जहाँ वक्र मिलते हैं वहाँ PV/T का मान क्या है?
(d) यदि हम ऐसे ही ग्राफ 100 × 10-3 kg हाइड्रोजन के लिए बनाएँ तो भी क्या उस बिंदु पर जहाँ वक्र y – अक्ष से मिलते हैं PV/T का मान यही होगा? यदि नहीं तो हाइड्रोजन के कितने द्रव्यमान के लिए PV/T का मान कम दाब और उच्च ताप के क्षेत्र के लिए वही होगा? H2 का अणु द्रव्यमान = 2.02 u, O2 का अणु द्रव्यमान = 32.0 u, R = 8.31 Jmol-1K-1
उत्तर:
(a) बिन्दुकित रेखा यह व्यक्त करती है कि राशि | PV/T स्थिर है। यह तथ्य केवल आदर्श गैस के लिए सत्य है। अर्थात् बिन्दुकित रेखा आदर्श गैस का ग्राफ है।

(b) ताप T, पर ग्राफ की तुलना में ताप T, पर गैस का ग्राफ आदर्श गैस के ग्राफ के अधिक समीप है। हम जानते हैं कि वास्तविक गैसें निम्न ताप पर आदर्श गैस के व्यवहार से अधिक । विचलित होती हैं। अतः T1 > T2

(c) जहाँ ग्राफ y – अक्ष पर मिलते हैं ठीक उसी बिन्दु पर आदर्श गैस का ग्राफ भी गुजरता है। अतः इस बिन्दु पर ऑक्सीजन – गैस, आदर्श गैस का पालन करती है।
अतः गैस समीकरण से,
\(\frac { PV }{ T } \) = nR
हम जानते हैं O2 का 32 × 10-3 kg = 1 मोल
∴ O2 का 1.00 × 10-3 kg
= \(\frac { 1 }{ 32\times 10^{ -3 } } \) × 1 × 10-3
i.e; n = \(\frac{1}{32}\)
R = 8.31 JK-1mol-1
∴ \(\frac{PV}{T}\) = \(\frac{1}{32}\) × 8.31 = 0.26 JK-1

(d) नहीं, हाइड्रोजन गैस के लिए PV/T का मान समान नहीं रहता है। चूंकि यह द्रव्यमान पर निर्भर करता है तथा H2 का द्रव्यमान O2 से कम है।
माना हाइड्रोजन का अभीष्ट द्रव्यमान m किया है जिसमें PV/T का समान मान प्राप्त होता है।
∴ n = \(\frac { m }{ 2.02\times 10^{ -3 } } \)
\(\frac{PV}{T}\) = nR = 0.26 JK-1 से,
n = \(\frac { 0.26 }{ R } \) = \(\frac { 0.26JK^{ -1 } }{ 8.31JK^{ -1 }mol^{ -1 } } \)
= 0.0313 mol
∴ समी० (i) व (ii) से,
n1 = 2.02 × 10-3 × 0.313
= 0.0632 × 10-3 kg
= 6.32 × 10-5 kg

MP Board Solutions

प्रश्न 13.4.
एक ऑक्सीजन सिलिंडर जिसका आयतन 30 लीटर है, में ऑक्सीजन का आरंभिक दाब 15 atm एवं ताप 27°C है। इसमें से कुछ गैस निकाल लेने के बाद प्रमापी (गेज)दाब गिर कर 11 atm एवं ताप गिर कर 17°C हो जाता है। ज्ञात कीजिए कि सिलिंडर से ऑक्सीजन की कितनी मात्रा निकाली गई है। (R = 8.31 Jmol-1K-1, ऑक्सीजन का अणु द्रव्यमान 02 = 32 u)।
उत्तर:
दिया है: ऑक्सीजन सिलिण्डर में प्रारम्भ में
V1 = 30 litres = 30 × 10-3 m3
P1 = 15 atm = 15 × 1.013 × 105 Pa
T1 = 27 + 273 = 300K
R = 8.31 JK-1mol-1
माना सिलिण्डर में ऑक्सीजन गैस के n2 मोल हैं।
अतः सूत्र PV = nRT से,
n1 = \(\frac { P_{ 1 }V_{ 1 } }{ RT_{ 1 } } \)
= \(\frac { 15\times 1.013\times 10^{ 5 } }{ 8.31\times 300 } \) = 18.253
ऑक्सीजन का अणु भार
M = 32 = 32 × 10-3kg
सिलिंडर में ऑक्सीजन का प्रारम्भिक द्रव्यमान
m1 = n1M
= 18.253 × 32 × 10-3kg
माना अन्त में सिलिंडर में O2 kg के n2 kg मोल बचे हैं।
दिया है: V2 = 30 × 10-3 m3, P2 = 11 atm
= 11 × 1.013 × 105 pa
∴ n2 = \(\frac { P_{ 2 }V_{ 2 } }{ RT_{ 2 } } \)
= \(\frac { (11\times 1.013\times 10^{ 5 })\times (30\times 10^{ -3 }) }{ 8.31\times 290 } \)
= 13.847
∴ सिलिंडर में O2 गैस का अन्तिम द्रव्यमान
m2 = 13.847 × 32 × 10-3
∴ सिलिंडर से O2 का लिया गया द्रव्यमान
= m1 – m2
= (584.1 – 453.1) × 10-3 kg
= 141 × 10-3 kg = 0.141 kg

MP Board Solutions

प्रश्न 13.5.
वायु का एक बुलबुला, जिसका आयतन 1.0 cm3 है, 40 m गहरी झील की तली में जहाँ ताप 12°C है, उठकर ऊपर पृष्ठ पर आता है जहाँ ताप 35°C है। अब इसका आयतन क्या होगा?
उत्तर;
जब वायु का बुलबुला 40 मी० गहराई पर है तब
V1 = 1.0 cm3 = 1.0 × 10-6m3
T1 = 12°C = 12 + 273 = 285 K
= 1 atm + 40 m पानी की गहराई
Pc = 1 atm – h1ρg
= 1.013 × 10c + 40 × 103 × 9.8
= 493000 Pa = 4.93 × 105 × Pa
जब वायु का बुलबुला झील की सतह पर पहुँचता है तब
V2 = ?, T2 = 35°C = 35 + 273 = 308 K
P2 = 1 atm = 1.013 × 105 Pa
सूत्र \(\frac { P_{ 1 }V_{ 1 } }{ T_{ 1 } } \) = \(\frac { P_{ 2 }V_{ 2 } }{ T_{ 2 } } \) से,
= \(\frac { P_{ 1 }V_{ 1 } }{ T_{ 1 } } \) × \(\frac { T_{ 2 } }{ P_{ 2 } } \)
= \(\frac { 4.95\times 10^{ 5 }\times 1\times 10^{ -6 }\times 308 }{ 285\times 1.013\times 10^{ 5 } } \)
= 5.275 × 10-6 m
= 5.3 × 10-6 m

प्रश्न 13.6.
एक कमरे में, जिसकी धारिता 25.0 m3 है, 27°C ताप और 1 atm दाब पर, वायु के कुल अणुओं (जिनमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, जलवाष्प और अन्य सभी अवयवों के कण सम्मिलित हैं) की संख्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है: V = 25.0 m3
T = 27°C = 27 + 273 = 300 K
K = 1.38 × 10-23 JK-1
P =1 atm = 1.013 × 105 Pa
गौस समीकरण से, P = \(\frac { nRT }{ V } \)
= \(\frac{n}{V}\) (Nk) T
= (nN) \(\frac{kT}{V}\) = N’\(\frac{kT}{V}\)
जहाँ N’ =nN = दी गई गैस में ऑक्सीजन अणुओं की संख्या
N’ = \(\frac{PV}{KT}\)
= \(\frac { (1.013\times 10^{ 5 })\times 25 }{ 1.38\times 10^{ -23 }\times 300 } \)
= 6.10 × 1026

MP Board Solutions

प्रश्न 13.7.
हीलियम परमाणु की औसत तापीय ऊर्जा का आंकलन कीजिए

  1. कमरे के ताप (27°C) पर
  2. सूर्य के पृष्ठीय ताप (6000 K) पर
  3. 100 लाख केल्विन ताप (तारे के क्रोड का प्रारूपिक ताप) पर।

उत्तर:
गैस के अणुगति सिद्धान्त के अनुसार, ताप T पर गैस की औसत गतिज ऊर्जा (i. e., औसत ऊष्मीय ऊर्जा) निम्नवत् है –
E = \(\frac{3}{2}\) kT
दिया है: k = 1.38 × 10-23 JK-1
1. T = 27°C = 273 + 27 = 300 K पर,
E = \(\frac{3}{2}\) × 1.38 × 10-23 × 300
= 621 × 10 -23 J
= 6.21 × 10 -21 J

2. T = 6000 K पर
∴ E = \(\frac{3}{2}\) × 0138 × 10-23 × 6000
= 1.24 × 10-19 J

3. T = 10 × 106 K = 107 K पर,
∴ E = 3 × 1.38 × 10-23 × 107
= 2.07 × 10-16 J
= 2.1 × 10-16 J

प्रश्न 13.8.
समान धारिता के तीन बर्तनों में एक ही ताप और दाब पर गैसें भरी हैं। पहले बर्तन में नियॉन (एकपरमाणुक) गैस है, दूसरे में क्लोरीन (द्विपरमाणुक) गैस है और तीसरे में यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड (बहुपरमाणुक) गैस है। क्या तीनों बर्तनों में गैसों के संगत अणुओं की संख्या समान है? क्या तीनों प्रकरणों में अणुओं की vrms (वर्ग माध्य मूल चाल) समान है।
उत्तर:
(a) हाँ, चूँकि आवोगाद्रों परिकल्पना से, समान परिस्थितियों में गैसों के समान आयतन में अणुओं की संख्या समान होती है।
(b) नहीं चूँकि Vrms = \(\sqrt { \frac { 3RT }{ m } } \)
∴ Vrms ∝ \(\frac { 1 }{ \sqrt { m } } \)
अतः तीनों गैसों के ग्राम – अणु भार अलग – अलग हैं। अतः अणुओं की वर्ग माध्य – मूल चाल अलग – अलग होगी।

प्रश्न 13.9.
किस ताप पर आर्गन गैस सिलिंडर में अणुओं की Vrms – 20°C पर हीलियम गैस परमाणुओं की Vrms के बराबर होगी। (Ar का परमाणु द्रव्यमान = 39.9 u एवं हीलियम का परमाणु द्रव्यमान = 4.0 u)।
उत्तर:
माना कि T1 व T2 K ताप पर आर्गन व हीलियम गैस की वर्ग माध्य मूल वेग क्रमश: C1 व C2 हैं।
दिया है:
M1 = 39.9 × 10-3 kg,
M2 = 4.0 × 10-3 kg, T1 = ?
T2 = – 20 + 273 = 253 K
हम जानते हैं कि वर्ग माध्य मूल वेग
C = \(\sqrt { \frac { 3RT }{ M } } \)
C1 = \(\sqrt { \frac { 3RT_{ 1 } }{ M_{ 1 } } } \)
तथा C2 = \(\sqrt { \frac { 3RT_{ 1 } }{ M_{ 2 } } } \)
चूँकि C1 = C2 (दिया है)
∴ \(\sqrt { \frac { 3RT_{ 1 } }{ M_{ 1 } } } \) = \(\sqrt { \frac { 3RT_{ 1 } }{ M_{ 2 } } } \)
या \(\frac { T_{ 1 } }{ M_{ 1 } } \) = \(\frac { T_{ 1 } }{ M_{ 2 } } \)
= \(\frac { 39.9\times 10^{ -3 } }{ 4.0\times 10^{ -3 } } \) × 253
या T = 2523.7 K = 2524 K
= 2.524 × 103 K

MP Board Solutions

प्रश्न 13.10.
नाइट्रोजन गैस के एक सिलिंडर में, 2.0 atm दाब एवं 17°C ताप पर नाइट्रोजन अणुओं के माध्य मुक्त पथ एवं संघट्ट आवृत्ति का आंकलन कीजिए। नाइट्रोजन अणु की त्रिज्या लगभग 1.0 Å लीजिए। संघट्ट काल की तुलना अणुओं द्वारा दो संघट्टों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक चलने में लगे समय से कीजिए। ( नाइट्रोजन का आण्विक द्रव्यमान = 28.0 u)।
उत्तर:
मैक्सवेल संशोधन ने गैस अणुओं का मध्य मुक्त पद
λ = \(\frac { 1 }{ \sqrt { 2\pi nd^{ 2 } } } \)
जहाँ d = अणु का व्यास
तथा = N = \(\frac{N}{V}\) = image 1
2 atm दाब पर, m द्रव्यमान गैस का आयतन
V = \(\frac{RT}{P}\), T = 273 + 17 = 290 K
∴ n = \(\frac{N}{V}\) = \(\frac{NP}{RT}\)
दिया है: N = 6.023 × 1023 mole-1
P = 2 atm = 2 × 1.013 × 105 Nm-2
R = 8.3 JK-1mol-1
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 2
= 5.08 × 102 ms-1
= 5.10 × 102 ms-1
∴ संघट्ट आवृत्ति,
v = \(\frac { C }{ \lambda } \) = \(\frac { 5.1\times 10^{ 2 } }{ 1.0\times 10^{ -7 } } \)
= 2.0 × 10-10 s ….. (i)
पुनः माना संघट्ट के लिया गया समय t है।
∴ t = \(\frac { d }{ C } \) = \(\frac { 2\times 10^{ -10 } }{ 5.10\times 10^{ 2 } } \)
= 4 × 10-13 s
समी० (i) को (ii) से भाग देने पर,
\(\frac { \tau }{ \tau } \) = \(\frac { 2.0\times 10^{ -10 }s }{ 4\times 10^{ -13 }s } \) = 500
या τ = 500t
अतः दो क्रमागत टक्करों के मध्य समय टक्कर में लिये गए समय का 500 गुना है। इससे यह प्रदर्शित होता है कि गैस के अणु लगभग हर समय मुक्त रूप से चलायमान रहते हैं।

अणुगति सिद्धांत अतिरिक्त अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 13.11.
1 मीटर लंबी संकरी (और एक सिरे पर बंद) नली क्षैतिज रखी गई है। इसमें 76 cm लंबाई भरा पारद सूत्र, वायु के 15 cm स्तंभ को नली में रोककर रखता है। क्या होगा यदि खुला सिरा नीचे की ओर रखते हुए नली को ऊर्ध्वाधर कर दिया जाए।
उत्तर:
प्रारम्भ में नली क्षैतिज है तब बंद सिरे पर रोकी गई वायु का दाब वायुमण्डलीय दाब के समान होगा।
∴ P1 = 76 सेमी पारे स्तम्भ का दाब।
माना कि नली का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A सेमी2 है।
वायु का आयतन = 15 × A = 15A सेमी3
जब नली का खुला सिरा नीचे की ओर रखते हैं तथा ऊर्ध्वाधर करते हैं जब खुले’ सिरे पर बाहर की ओर से वायुमण्डलीय दाब कार्य करता है जबकि ऊपर की ओर से 76 सेमी पारद सूत्र का दाब व बंद सिरे पर एकत्र वायु का दाब अधिक है। अतः पारद सूत्र असंचुलित रहेगा व नीचे गिरते हुए वायु को बाहर निकाल देता है।
माना कि पारद सूत्र की λ लम्बाई नीचे नली से बाहर निकलती है।
∴ नली में पारद सूत्र की शेष लम्बाई = (76 – h) सेमी तथा बंद सिरे पर वायु स्तम्भ की लम्बाई
= (15 + 9 + h)
= (24 + h) सेमी3
तथा वायु का आयतन V2 = (24 + h) A सेमी3
माना कि इस वायु का दाब P2 है।
∴ सन्तुलन में,
P2 + (76 – h) सेमी पारद सूत्र का दाब = वायुमण्डलीय दाब
∴ P2= R सेमी पारद सूत्र का दाब
सूत्र P1V1 = P2V2 से,
76 × 15A = h × (24 + h) A
या 1140 = 24h + h2
या h2 + 24h – 1140 = 0
∴ h = – 24 ± \(\sqrt { 24^{ 2 }-4\times 17-1140 } \)
= 28.23 या – 4784 सेमी
परन्तु h ≠ ऋणात्मक
∴ h = 28.23 सेमी।
अतः पारद सूत्र की 28.23 सेमी लम्बाई नली से बाहर निकल जाएगी।

MP Board Solutions

प्रश्न 13.12.
किसी उपकरण से हाइड्रोजन गैस 28.7 cm3s-1 की दर से विसरित हो रही है। उन्हीं स्थितियों में कोई दूसरी गैस 7.2 cm3 s-1 की दर से विसरित होती है। इस दूसरी गैस को पहचानिए। [संकेत : ग्राहम के विसरण नियम R1/R2 = (M2/ M1)1/21/2 का उपयोग कीजिए, यहाँ R1, R2 क्रमशः गैसों की विसरण दर तथा M1 एवं M2 उनके आण्विक द्रव्यमान हैं। यह नियम अणुगति सिद्धांत का एक सरल परिणाम है।
उत्तर:
विसरण के ग्राहम के नियम से,
\(\frac { R_{ 1 } }{ R_{ 2 } } \) = \(\sqrt { \frac { M_{ 2 } }{ M_{ 1 } } } \) … (i)
जहाँ R1 = गैस – 1 की विसरण दर = 28.7 cm3s-1
R2 = गैस – 2 की विसरण दर = 7.2 cm2s-1 … (ii)
माना इनके संगत अणुभार M1 व M2 हैं।
∴H2 के लिए, M1 = 2
∴समी० (i) तथा (ii) से
\(\frac { 28.7 }{ 7.2 } \) = \(\sqrt { \frac { M_{ 2 } }{ 2 } } \)
या \(\frac { M_{ 2 } }{ 2 } \) = (\(\frac { 28.7 }{ 7.2 } \))2
या M2 = 2 × 15.89 = 31.77 = 32 u
हम जानते हैं कि O2 का अणुभार 32 है। अत: अज्ञात गैस O2 हैं।

प्रश्न 13.13.
साम्यावस्था में किसी गैस का घनत्व और दाब अपने संपूर्ण आयतन में एकसमान है। यह पूर्णतया सत्य केवल तभी है जब कोई भी बाह्य प्रभाव न हो। उदाहरण के लिए, गुरुत्व से प्रभावित किसी गैस स्तंभ का घनत्व (और दाब) एकसमान नहीं होता है। जैसा कि आप आशा करेंगे इसका घनत्व ऊँचाई के साथ घटता है। परिशुद्ध निर्भरता ‘वातावरण के नियम’ n2 = n1 exp [\(\frac { – mg }{ k_{ B }T } \) (h2 – h1)] से दी जाती है, यहाँ n2,n1 क्रमश: h2 व h1 ऊँचाइयों पर संख्यात्मक घनत्व को प्रदर्शित करते हैं। इस संबंध का उपयोग द्रव स्तंभ में निलंबित किसी कण के अवसादन साम्य के लिए समीकरण n2 = n1exp \(-\frac { mgN_{ A } }{ \rho RT } \)(ρ – ρ’)( h2 – h1)] को व्युत्पन्न करने के लिए कीजिए, यहाँ निलंबित कण का घनत्व तथा ρ’ चारों तरफ के माध्यम का घनत्व है। NA आवोगाद्रो संख्या, तथा सार्वत्रिक गैस नियतांक है। संकेत: निलंबित कण के आभासी भार को जानने के लिए आर्किमिडीज के सिद्धांत का उपयोग कीजिए।
उत्तर:
माना कि कणों तथा अणुओं का आकार गोलाकार है। कणों का भार निम्नवत् है।
w = mg = \(\frac{4}{3}\) π r2ρg … (i)
जहाँ r = कणों की त्रिज्या
तथा ρ = कणों का घनत्व है।
कणों की गति गुरुत्व के अधीन होने पर, ऊपर की ओर उत्क्षेप लगाती है जिसका मान निम्नवत् है –
B = कण का आयतन × प्रतिवेश का घनत्व × g
= \(\frac{4}{3}\) π r3(ρ – ρ’) g … (ii)
मन कण पर नीचे की और लगाने वाला बा F है।
अतः F = W – B
= \(\frac{4}{3}\) π r3(ρ – ρ’) g … (iii)
पुनः n2 = n1 exp [\(\frac { – mg }{ k_{ B }T } \) (h2 – h1)] … (iv)
जहाँ kB = बोल्ट्जमैन नियतांक है।
तथा n1 व n2 क्रमश: h1 व h2 ऊँचाई पर संख्या घनत्व है। समीकरण (iii) में mg के स्थान पर बल F रखने पर, समीकरण (ii) व (iv) से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 3
जो कि अभीष्ट समीकरण है।
जहाँ \(\frac{4}{3}\) π r3 ρg
= कण का द्रव्यमान × g = mg

प्रश्न 13.14.
नीचे कुछ ठोसों व द्रवों के घनत्व दिए गए हैं। उनके परमाणुओं की आमापों का आंकलन(लगभग)कीजिए।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 4
[संकेत: मान लीजिए कि परमाणु ठोस अथवा द्रव प्रावस्था में दृढ़ता से बंधे हैं तथा आवोगाद्रो संख्या के ज्ञात मान का उपयोग कीजिए। फिर भी आपको विभिन्न परमाण्वीय आकारों के लिए अपने द्वारा प्राप्त वास्तविक संख्याओं का बिल्कुल अक्षरशः प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि दृढ़ संवेष्टन सन्निकटन की रुक्षता के परमाणवीय आकार कुछA के परास में हैं।
उत्तर:
1. कार्बन का परमाणु भार
M = 12.01 × 10-3 kg
N = 6.023 × 1023
∴ एक कार्बन परमाणु का द्रव्यमान
M = \(\frac{M}{N}\) = \(\frac { 12.01\times 10^{ -3 } }{ 6.023\times 10^{ 23 } } \)
या m = 1.99 × 10-26kg
= 2 × 10-26 kg
कार्बन का घनत्व ρe = 2.2 × 10+3 kg m-3
∴ प्रत्येक कार्बन परमाणु का आयतन
V = \(\frac { m }{ \rho C } \) = \(\frac { 2\times 10^{ -26 } }{ 2.2\times 10^{ 3 } } \)
= 0.9007 × 10-29m3
माना rC = कार्बन परमाणु की त्रिज्या
∴ \(\frac{4}{3}\) πr3C = 0.9007 × 10-29
या
rC = [\(\frac { 0.9007\times 10^{ -29 } }{ 4\pi } \) × 3]1/3
= [2.16 × 10-30]1/3
= 1.29 × 10-10m = 1.29 Å

2.  दिया है: स्वर्ण परमाणु का परमाणु भार
M = 1.97 × 10-3 kg
∴ प्रत्येक स्वर्ण परमाणु का द्रव्यमान
= \(\frac{M}{N}\) = \(\frac { 197\times 10^{ 3 } }{ 6.023\times 10^{ 23 } } \)
= 3.721 × 10-25 kg
ρg = 19.32 × 103kg m-3
माना rg = गोल्ड परमाणु की त्रिज्या
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 5
= (0.04 × 10-28)1/3
= 0.159 × 10-9m
= 1.59 × 10-10m = 1.59 Å

3. दिया है: नाइट्रोजन परमाणु का परमाणु भार
M = 14.01 × 10-3 kg
∴ प्रत्येक परमाणु का द्रव्यमान
M = \(\frac{M}{N}\) = \(\frac { 14.01\times 10^{ -3 }kg }{ 6.023\times 10^{ 23 } } \)
= 2.3261 × 10-26 kg
माना rn = इसके प्रत्येक परमाणु की त्रिज्या
ρn = 1 × 103 kg m-3
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 6
= (5.55 × 10-30 m3)1/3
= 1.77 × 10-10m = 1.77 Å

4. दिया है: MLi = 6.94 × 10-3 kg
ρLi = 0.53 × 103 kg m-3
∴ MLi = mass of Li atom
= \(\frac { M_{ Li } }{ \rho _{ Li } } \) = \(\frac { 6.94\times 10^{ -3 } }{ 6.023\times 10^{ 23 } } \)
= 1.152 × 10-26 kg
माना rLi = Li परमाणु की त्रिज्या
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 7

5. दिया है: MF = 19 × 10-3 kg
ρF = 1.14 × 103 kg m-3
∴ प्रत्येक फलुओरीन परमाणु का द्रव्यमान
mF = \(\frac { M_{ F } }{ \rho _{ F } } \) = \(\frac { 19\times 10^{ -3 } }{ 6.023\times 10^{ 23 } } \)
= 3.155 × 10-26 kg
माना प्रत्येक फलुओरीन परमाणु की त्रिज्या rF है। अतः
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 13 अणुगति सिद्धांत img 8
= 1.88 × 10-10 m = 1.88 Å

MP Board Class 11 Physics Solutions

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 19 पुस्तक

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 19 पुस्तक (निबन्ध, देवेन्द्र ‘दीपक’)

पुस्तक पाठ्य-पुस्तक पर अधिारित प्रश्न

पुस्तक लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बख्तियार खिलजी के आक्रमण से क्या हानि हुई?
उत्तर:
बख्तियार खिलजी के आक्रमण से सबसे बड़ी हानि नालंदा के पुस्तकालयों को जलाने से हुई।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
पुस्तक पढ़ने की आदत कम क्यों होती जा रही है?
उत्तर:
सूचना क्रांति और दूरदर्शन के प्रभाव से पुस्तकें पढ़ने की आदत कम होती जा रही है।

प्रश्न 3.
नालंदा विश्वविद्यालय में कौन-से तीन पुस्तकालय थे?
उत्तर:
नालंदा विश्वविद्यालय में रत्न सागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नाम के तीन विशाल पुस्तकालय थे।

प्रश्न 4.
पुस्तक या यात्रा का क्या संबंध है?
उत्तर:
पुस्तक बाहरी और भीतरी यात्रा का घनिष्ठ संबंध है।

पुस्तक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नालंदा विश्वविद्यालय की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
नालंदा विश्वविद्यालय में पुस्तकालय का एक विशिष्ट क्षेत्र था। उसे धर्मगंज कहा जाता था। इसमें रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नामक तीन विशाल पुस्तकालय थे। रत्नसागर पुस्तकालय का भवन नौमंजिला था। बख्तियार खिलजी ने इन पुस्तकालयों को जला डाला। इस अग्निकांड में अमूल्य ग्रंथ जलकर सदा के लिए भस्म हो गए।

प्रश्न 2.
पुस्तकें किन षड्यंत्रों का शिकार होती हैं?
उत्तर:
पुस्तकें कई षड्यंत्रों का शिकार होती हैं। षड्यंत्रों के शिकार के कारण ही कुछ पुस्तकें तिरस्कृत हो जाती हैं। कुछ प्रतिबंधित कर दी जाती हैं और कुछ विशेष लेखकों की पुस्तकें जला दी हैं। पुस्तकें भी राजनीतिक, साहित्यिक, धार्मिक और भाषाई षड्यंत्रों का शिकार होती हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
लेखक के अनुसार पुस्तक की समीक्षा किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार पुस्तक की समीक्षा बेबाक होती है और प्रायः प्रायोजित होती है। समीक्षा में अक्सर एक अनावश्यक लंबी भूमिका होती है। इसमें पुस्तक के अंदर जो कुछ है उसकी चर्चा कम होती है और जो नहीं है उसकी चर्चा अधिक होती है। दूसरे शब्दों में, पुस्तक की समीक्षा ठीक प्रकार से नहीं होती है।

प्रश्न 4.
पुस्तकों के जलने से होने वाली क्षति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुस्तकों के जलने से देश की सबसे बड़ी क्षति होती है। ज्ञान का अपार भंडार जलकर राख हो जाता है। प्रत्येक, ग्रंथ रचनाकार की साधना और परिश्रम का प्रतिफल होता है। उसका सारा परिश्रम व्यर्थ चला जाता है। कितने लोगों का शोध व्यर्थ चला जाता है। कितने ही विद्वानों का चिंतन-मनन नष्ट हो जाता है, जो पुनः लौटकर नहीं आता। आगामी पीढ़ियों को ज्ञान नहीं मिल पाता। विश्वधरोहर जलकर नष्ट हो जाती है।

पुस्तक भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्ति का भाव-विस्तार कीजिए“यात्रा में पुस्तक, पुस्तक में यात्रा, यों यात्रा में यात्रा।”
उत्तर:
यात्रा में पुस्तकें यात्रा की मित्र होती हैं। उनको पढ़ने से यात्री की यात्रा आराम से कट जातं. है। पुस्तकें पढ़ने से उनका ज्ञान भी बढ़ता है और मनोरंजन भी होता है। यात्री जिन स्थानों की यात्रा करता है, उनका वर्णन वह पुस्तकों में करता है। उन स्थानों के निवासियों के रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, त्योहारों और ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहरों का वर्णन करता है। इस प्रकार यात्रा में यात्रा हो जाती है। यात्रा से सभी का ज्ञान बढ़ता है और मनोरंजन होता है।

पुस्तक भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
समीक्षा शब्द विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होने के कारण पारिभाषिक शब्द है। इसी तरह के पाँच पारिभाषिक शब्द लिखिए –
उत्तर:
विदेश नीति, विमोचन, प्राक्कथन, प्रायोजित, समालोचक।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से विदेशी शब्द और तत्सम शब्द छाँटिए –
वहशत, ग्रंथ, दहशत, दिमाग, सारस्वत, गैरजरूरी, सुटेबिल, जलयात्रा, अलमारी, समवाय, दुर्लभ, समीक्षा।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 19 पुस्तक img-1

प्रश्न 3.
(क) यह आम रास्ता नहीं है।
(ख) आम के फल मीठे होते हैं।
उपर्युक्त वाक्यों में ‘आम’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। पहले वाक्य में आम का अर्थ ‘जन साधारण’ है, जबकि दूसरे वाक्य में ‘आम’ फल के लिए आया है। इसी प्रकार अंक, अम्बर, अर्थ, उत्तर और मूल शब्दों के उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाइए।
उत्तर:

  • अंक – विमला को सौ में से पचास अंक मिले हैं।
    माँ ने रोते बच्चे को अंक में उठा लिया।
  • अंबर – अंबर में तारे छिटके हैं।
    श्रीकृष्ण पीत अंबर धारण करते हैं।
  • अर्थ – ‘गगन’ शब्द का अर्थ आकाश है।
    आजकल हम अर्थ-अभाव से गुजर रहे हैं।
  • उत्तर – इस प्रश्न का उत्तर बीस शब्दों में लिखिए।
    भारत के उत्तर में पर्वतराज हिमालय है।
  • मूल – मूल कट जाने के कारण यह पौधा सूख गया है।
    मैं मूल रूप से राजस्थान का निवसी हूँ।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए –

  1. पुस्तक चुराया जाता है।
  2. जितना सोचता हूँ उतना खिन्नता बढ़ती है।
  3. हर पाठक को पुस्तक मिलना चाहिए।
  4. रविवार के दिन की छुट्टी रहती है।

उत्तर:

  1. पुस्तक चुराई जाती है।
  2. जितना सोचता हूँ, उतनी खिन्नता बढ़ती है।
  3. हर पाठक को पुस्तक मिलनी चाहिए।
  4. रविवार को छुट्टी रहती है।

पुस्तक योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
‘पुस्तक मित्र’ पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
आधुनिक विश्वविद्यालयों में नालंदा विश्वविद्यालय से भिन्न जिन नए विषयों का अध्ययन किया जाता है, उन नए विषयों की सूची बनाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं सूची बनाएँ।

प्रश्न 3.
पुस्तकालय जाकर देखिकए कि वहाँ पुस्तकें कैसे व्यवस्थित रखी जाती हैं, ताकि कोई भी पुस्तक एक मिनिट में आप खोज सकें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 4.
अपने विद्यालय के पुस्तकालय से ऐसी पुस्तकें प्राप्त कीजिए, जो बहुत पुरानी हो चुकी हों, तथा जो फट रही हों, उन्हें प्राप्त कर चिपकाइए तथा व्यवस्थित कीजिए ताकित वह लम्बे समय तक सुरक्षित रह सकें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

पुस्तक परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
विचारों की जययात्रा का मूर्तरूप है ……..
(क) पुस्तक
(ख) नालंदा
(ग) शिक्षा
(घ) पुस्तकालय
उत्तर:
(क) पुस्तक।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
पुस्तक रची, छापी और ………… की जाती है –
(क) बिक्री
(ख) भेंट
(ग) विमोचित
(घ) चुराई
उत्तर:
(ग) विमोचित।

प्रश्न 3.
पुस्तक समीक्षाओं में होती है ……
(क) एक आवश्यक लंबी भूमिका
(ख) एक गैरज़रूरी लंबी भूमिका
(ग) एक बेकार अर्थहीन भूमिका
(घ) एक सार्थक लंबी भूमिका
उत्तर:
(ख) एक गैरज़रूरी लंबी भूमिका।

प्रश्न 4.
नालंदा विश्वविद्यालय को ………. नामक आक्रमणकारी ने जलाकर राख कर दिया।
(क) अलाउद्दीन खिलजी
(ख) ग्यासुद्दीन खिलजी
(ग) बख्तियार खिलजी
(घ) जलालुद्दीन खिलजी
उत्तर:
(ग) बख्तियार खिलजी।

प्रश्न 5.
नालंदा में पुस्तकालयों के विशिष्ट क्षेत्र को कहते थे ………..।
(क) धर्मगंज
(ख) पुस्तकगंज
(ग) दर्शन गंज
(घ) आचार्य गंज
उत्तर:
(क) धर्मगंज।

प्रश्न 6.
पुस्तकालय वाले कहते हैं, दान में किताबें ही नहीं, उन्हें रखने के लिए ……….. भी दो।
(क) अलमारियाँ
(ख) धन
(ग) स्थान
(घ) आदमी
उत्तर:
(क) अलमारियाँ।

प्रश्न 7.
कमरे को रोशनदान चाहिए, तो याद रखिए दिमाग को भी ………..।
(क) दवाई चाहिए
(ख) पुस्तक चाहिए
(ग) ज्ञान चाहिए
(घ) प्रकाश चाहिए
उत्तर:
(ख) पुस्तक चाहिए।

प्रश्न 8.
हर पुस्तक को उसका मिलना चाहिए ……….. ।
(क) खरीददार
(ख) पाठक
(ग) आलोचक
(घ) समीक्षक
उत्तर:
(ख) पाठक।

MP Board Solutions

प्रश्न 9.
ग्रंथों में प्रक्षेप करते हैं ………..।
(क) कुछ धूर्त लोग
(ख) कुछ धूर्त रचनाकार
(ग) कुछ बेईमान लोग
(घ) कुछ पागल लोग
उत्तर:
(क) कुछ धूर्त लोग।

प्रश्न 10.
सूचना क्रांति और दूरदर्शन के कारण आदत कम होती जा रही है ………….।
(क) पुस्तकें पढ़ने की
(ख) पुस्तकें खरीदने की
(ग) पुस्तकें भेंट करने की
(घ) पुस्तकें एकत्र करने की
उत्तर:
(क) पुस्तकें पढ़ने की।

प्रश्न 11.
एक उम्र होती है कि –
(क) आदमी पुस्तकें लिखता है
(ख) आदमी पुस्तकें सहेजता है
(ग) आदमी पुस्तकें बेचता है
(घ) आदमी पुस्तकें खरीदता है
उत्तर:
(ख) आदमी पुस्तकें सहेजता है।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पर कीजिए –

  1. रातों रात कोई पुस्तक ………. हो जाती है। (बहिष्कृत/तिरस्कृत)
  2. हर पुस्तक को’ उसका ………. मिलना चाहिए। (लेखक/पाठक)
  3. ………. का भवन नौमंजिला था। (रत्नसागर/रत्नरंजक)
  4. आज ………. का दौर है। (हरितक्रांति/सूचनाक्रांति)
  5. पुस्तक ………. जाती है। (रची/लिखी)

उत्तर:

  1. तिरस्कृत
  2. पाठक
  3. रत्नासागर
  4. सूचनाक्रान्ति
  5. रची।

MP Board Solutions

III. निम्नलिखित कथनों में सत्य/असत्य छाँटिए –

  1. ‘पुस्तक’ एक कहानी है।
  2. ‘पुस्तक’ के लेखक देवेन्द्र ‘दीपक’ हैं।
  3. नालंदा में पन्द्रह हजार विद्यार्थी थे।
  4. पुस्तकें षड्यंत्रों का शिकार होती हैं।
  5. कुछ धूर्त लोग कुछ वाक्यों को लुप्त कर देते हैं।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 19 पुस्तक img-2
उत्तर:

(i) (ङ)
(ii) (ग)
(iii) (घ)
(iv) (ख)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
पुस्तक किसका समवाय है?
उत्तर:
पुस्तक बाहरी और भीतरी यात्रा का समवाय है।

प्रश्न 2.
हमारे देश में सबसे बड़ा विद्या का केन्द्र कौन था?
उत्तर:
नालंदा का पुस्तकालय।

प्रश्न 3.
पुस्तक का जलना किसका जलना है?
उत्तर:
पुस्तक का जलना विश्व धरोहर का जलना है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
नालंदा के पुस्तकालय को किसने जला डाला था?
उत्तर:
बख्तियार खिलजी ने।

प्रश्न 5.
पुस्तक जलाना और उसे नष्ट करना क्या है?
उत्तर:
पुस्तक जलाना और उसे नष्ट करना घोर अपराध जैसा कत्य है।

पुस्तक लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुस्तक किसका मूर्तरूप है?
उत्तर:
पुस्तक लेखक के पुरुषार्थ का सारस्वत मूर्तरूप है।

प्रश्न 2.
पुस्तक की भूमिका और प्राक्कथन कैसे लिखवाया जाता है?
उत्तर:
पुस्तक की भूमिका और प्राक्काय लिखवाने के लिए उपयुक्त व्यक्ति खोजे जाते हैं। फिर उनसे प्राक्कथन और भूमिका लिखवाई जाती है।

प्रश्न 3.
पुस्तकों के क्या-क्या प्रयोग किए जाते हैं?
उत्तर:
पुस्तकें भेंट की जाती हैं, माँगी, चुराई, दबाई और पढ़ी जाती हैं।

प्रश्न 4.
पुस्तकालय वाले दान में किताबों के साथ क्या माँगते हैं?
उत्तर:
पुस्तकालय वाले दान में किताबों के लिए अलमारियाँ भी माँगते हैं।

प्रश्न 5.
नालंदा विश्वविद्यालय के साथ कौन-सा काला ध भी लगा है?
उत्तर:
नालंदा विश्वविद्यालय के साथ पुस्तकालय जलाने का काला धब्बा भी लगा है।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
पुस्तकों के संबंध में लेखक की क्या आशा है?
उत्तर:
लेखक की आशा है कि पुस्तक मित्र थीं, मित्र हैं और मित्र रहेंगी।

प्रश्न 7.
‘पुस्तक’ निबंध में लेखक का कौन-सा स्वर है?
उत्तर:
‘पुस्तक’ निबंध में लेखक का आशावादी स्वर है।

प्रश्न 8.
शिक्षा के क्षेत्र में किसका दबदबा रहा?
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में नालंदा विश्वविद्यालय का दबदबा रहा।

प्रश्न 9.
‘रत्नसागर’ का भवन कैसा था?
उत्तर:
रत्नसागर’ का भवन नौमंजिला था।

पुस्तक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुस्तकालय को लेकर घर में चिकचिक क्यों होने लगती है?
उत्तर:
जब घर में आदमी के अपने लिए जगह कम पड़ने लगती है, तो निजी पुस्तकालय को लेकर घर में चिकचिक होने लगती है। प्राध्यापकों की संतानों की शिक्षण में रुचि न होना भी एक कारण है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
नालंदा विश्वविद्यालय की महिमा का वर्णन कीजिए। (M.P. 2012)
उत्तर:
नालंदा प्राचीन भारत का एक सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय था। शिक्षा के क्षेत्र – में इसका बड़ा दबदबा था, जहाँ दस हजार विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। इन विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए 1500 आचार्य थे। यहाँ अनेक विषयों की शिक्षा दी जाती थी। नालंदा का पुस्तकालय बहुत विशाल था। आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने नालंदा के पुस्तकालय को जलाकर राख कर दिया था।

प्रश्न 3.
नालंदा में किन-किन विषयों की शिक्षा दी जाती थी? (M.P. 2012)
उत्तर:
नालंदा में बौद्धदर्शन, दर्शन, इतिहास, निरुक्त, वेद, हेतुविद्या, न्यायशास्त्र, व्याकरण, चिकित्साशास्त्र, ज्योतिष आदि के शिक्षा की व्यवस्था थी।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
नालंदा विश्वविद्यालय में कार्यरत आचार्य कौन-कौन से थे? (M.P. 2010)
उत्तर:
नालंदा विश्वविद्यालय में कार्यरत आचार्य शीलभद्र, नागार्जुन, आचार्य धर्म कीर्ति, आचार्य ज्ञानश्री, आचार्य बुद्ध भंद्र, आचार्य गुणमति, आचार्य स्थिरमति, आचार्य सागरमति आदि विख्यात आचार्य कार्यरत थे।

प्रश्न 5.
‘पुस्तक’ नामक निबंध में देवेन्द्र ‘दीपक’ (लेखक) ने नालंदा विश्वविद्यालय की क्या विशेषताएँ बताई हैं? (M.P. 2009)
उत्तर:
‘पुस्तक’ नामक निबंध में देवेन्द्र ‘दीपक’ (लेखक) नै नालंदा विश्वविद्यालय की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई हैं –
नालंदा विश्वविद्यालय का शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा दबदबा था। वहाँ दस हजार विद्यार्थी और पन्द्रह सौ आचार्य थे। बौद्ध-दर्शन, इतिहास, निरुक्त, वेद, हेतुविद्या, न्यायशास्त्र, व्याकरण, चिकित्साशास्त्र, ज्योतिष आदि के शिक्षण की व्यवस्था थी। आचार्य शीलभद्र, नागार्जुन, आचार्य धर्मकीर्ति, आचार्य ज्ञानश्री, आचार्य बुद्ध भट्ट,आचार्य गुणमति, आचार्य स्थिरमति, आचार्य सागरमीरा जैसे विश्वविख्यात आचार्य वहाँ थे।

प्रश्न 6.
पुस्तक-समीक्षा की क्या विशेषता है?
उत्तर:
पुस्तक-समीक्षा के लिए सुटेबिल आदमी खोजे जाते हैं। समीक्षा कभी बेबाक होती है। समीक्षा प्रायः प्रायोजित होती है। इस प्रकार की समीक्षाओं में प्रायः एक गैरज़रूरी लम्बी भूमिका होती है। पुस्तक में जो है, उसकी चर्चा कम, जो नहीं है, उसकी चर्चा अधिक होती है।

पुस्तक लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
देवेन्द्र ‘दीपक’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
राष्ट्रवादी चिंतक और रचनाकार देवेंद्र ‘दीपक’ का जन्म 31 जुलाई, 1934 ई० को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ। आपने शालेय शिक्षा के बाद साहित्य रत्न, एम.ए. (हिंदी, अंग्रेजी में) किया। उसके बाद पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपने वंचित समाज के विकास में शब्द और कर्म द्वारा अपूर्व कार्य कर महत्त्वपूर्ण योगदान किया। मारीशस, लंदन, सूरीनाम तथा न्यूयार्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में अपना सक्रिय योगदान दिया है। आप उन चिंतकों में से हैं, जिन्होंने हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया है। आप्रे अनुसूचित जाति से संबद्ध परीक्षा पूर्व प्रशिक्षण केंद्र का प्राचार्य रहे हैं। मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के निदेशक के रूप में आपने सराहनीय कार्य किया है।

साहित्यिक-परिचय:
वर्तमान में आप साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् के निदेशक पद पर कार्य करते हुए साहित्य सेवा में जुटे हैं। ‘साक्षात्कार’ पत्रिका के प्रधान संपादक हैं। ‘दीपक’ जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। आपने काव्य, काव्य नाटक, कठपुतली नाटक और अनेक ग्रंथों का अनुवाद किया है। काव्य-सृजन में उन्होंने अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। आपने गद्य-क्षेत्र में भी मानदंड स्थापित किए हैं। आपकी गद्य रचनाओं में जीवन-बोध के सहज और आत्मीय प्रसंग मिलते हैं। आपकी गद्य रचनाओं में सामाजिक चिंताओं और आस्थामूलक दृष्टि का समावेश है।

रचनाएँ:

  • काव्य-संग्रह – सूरज बनती किरण, बंद कमरा, दुली कविताएँ (आपत्तकालीन) मास्टर धर्मदास, हम दंने नहीं (अन्त्यज कविता)
  • काव्य-नाटक – भूगोल राजा का। खगोल राजा का।
  • कठपुतली – नाटक दवाव।
  • अन्य रचनाएँ – शिक्षाशास्त्रियों के सिद्धांत, विचारणा विथि का, कुंडली चक्र पर मेरी वार्ता आदि।

भाव-शैली:
‘दीपक’ जी को भाषा-शैली शब्द विपर्यय के चमत्कार आपकी गद्य रचनाओं के भाव-सौन्दर्य में विशेष रूप से वृद्धि करते हैं। वे भाषा के क्षेत्र में अपनी रचनात्मकता के माध्यम से मुहावर जैरे. चते चलते है। उनकी भाषा सहज स्वाभाविक खड़ी बोली है। उसमें यथास्थान तत्सम, उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का समावेश है।

पुस्तक पाठ का सारांश

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
‘पुस्तक’ पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘पुस्तक’ निबंध में देवेंद्र ‘दीपक’ ने पुस्तक को केंद्र बनाकर अनेक प्रकार के विचारों को प्रस्तुत किया है। लेखक कहता है कि पुस्तक का जीवन में बड़ा महत्त्व है। पुस्तक जीवन की बाहरी और भीतरी,मात्रा का समन्वय है। पुस्तकें लिखी, छापी और विमोचित की जाती हैं। पुस्तकें बेची, खरीदी जाती हैं। बुक डिपो में अलमारी में करीने से सजी होती हैं। ये कभी चौराहे पर भी रेहड़ी में भी बेची जाती हैं। इतना ही नहीं पुस्तकें भेंट की जाती हैं, माँगी, चुराई और दबाई जाती हैं। अंततः पुस्तकें पढ़ी जाती हैं। कुछ पुस्तकें रखी जाती हैं, जबकि कुछ निगली और उनमें से कुछ ही पचाई जाती हैं।

पुस्तकों की भूमिका लिखने के लिए उपयुक्त व्यक्ति खोजे जाते हैं। पुस्तक की समीक्षा की जाती है। व्यक्ति एक आयु में पुस्तकें खरीदता है, पढ़ता है और अंत में पुस्तकालय के कमरे को लेकर परिवार में झगड़ा होता है। पुस्तकालय वाले : भी उन दुर्लभ पुस्तकों को दान में स्वीकार नहीं करते। पुस्तकों को राजनीति के कारण कई उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को बख्तियार खिलजी ने जला डाला था। पुस्तक का जलना विश्व धरोहर का जलना है। पुस्तक जलाना और नष्ट करना घोर अपराध जैसा कार्य है। पुस्तकों को जलाना, जलवाना रचनाकार के कठोर परिश्रम और साधना को बरबाद करने के समान है।

कितनों का शोध और सोचा-समझा व्यर्थ हो जाता, जो पुनः लौट कर नहीं आता। पुस्तकें भी षड्यंत्रों का शिकार होती हैं। कुछ धूर्त लोग ग्रंथों में प्रक्षेप कर देते हैं इसलिए जो ग्रंथ नष्ट होने से बच गए, उनमें भी बहुत बदलाव आ गए। लेखक का आशावादी स्वर भी उभरा है। आधुनिक युग में सूचना क्रांति का दौर होने के कारण पुस्तकों को पढ़ने की आदत अवश्य कम हुई है, लेकिन यह भी पुस्तकों के महत्त्व को कम भी नहीं कर सकता। पुस्तक की उपस्थिति और उपयोगिता बनी ही रहेगी।

पुस्तक संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
पुस्तक बेची जाती हैं-पुस्तक खरीदी जाती हैं-कभी किसी बुक डिपो में करीने से सजी अलमारियों से, तो कभी चौराहे पर खड़े किसी ठेले पर लगे ढेर से। पुस्तक भेंट की जाती है, पुस्तक माँगी जाती है। पुस्तक चुराई जाती है। पुस्तक दबाई जाती है। और यह सब इसलिए कि अंततः पुस्तक पढ़ी जाती है। पढ़ने में कुछ पुस्तकें केवल रखी जाती हैं, कुछ निगली जाती हैं, कुछ ही हैं जो पचाई जाती हैं। पुस्तक की भूमिका और प्राक्कथन के लिए सुटेबिल आदमी खोजे जाते हैं। पुस्तक की समीक्षा की जाती है। कभी यह समीक्षा बेबाक होती है, अक्सर प्रायोजित। इन समीक्षाओं में अक्सर एक गैरज़रूरी लंबी भूमिका होती है। पुस्तक में जो है उसकी चर्चा कम, जो नहीं है उसकी चर्चा अधिक। (Pages 89-90)

शब्दार्थ:

  • सुटेबिल – उपयुक्त।
  • बेबाक – अचूक, सटीक।
  • गैरज़रूरी – अनावश्यक।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश देवेंद्र ‘दीपक’ के द्वारा लिखित निबंध ‘पुस्तक’ से उद्धृत है। लेखक इस गद्यांश में पुस्तकों की उपयोगिता और उनकी समीक्षा पर प्रकाश डाल रहा है।

व्याख्या:
लेखक पुस्तकों की उपयोगिता के संबंध में कहता है कि प्रकाशक पुस्तकों का व्यापार करता है। पुस्तकें प्रकाशन गृहों और बुक डिपों में बेची जाती हैं। बुक डिपो वाले पुस्तकों को अलमारियों में सजाकर रखते हैं और बेचते हैं। कभी-कभी पुस्तकें चौराहे पर खुद को दुकानदारों द्वारा ठेले पर ढेर के रूप में रखकर भी बेची जाती हैं। पाठक पुस्तकों को खरीदते हैं। सुशिक्षित तथा पुस्तकों के सुधी पाठक अपने साहित्यिक मित्रों, सगे-संबंधियों अथवा अन्य लोगों को उपहार के रूप में भी देते हैं। पुस्तकें कुछ लोगों द्वारा माँग कर पढ़ी जाती हैं।

इतना ही नहीं पुस्तकालयों से महत्त्वपूर्ण दुर्लभ पुस्तकों को चुराया भी जाता है और आवश्यक पुस्तकों को इधर-उधर दबाकर भी रख दिया जाता है ताकि जरूरत पड़ने पर उसे प्राप्त किया जा सके। ये सारे काम इसलिए किए जाते हैं कि अंत में पुस्तक पढ़ी जाती है। पुस्तक पढ़ने के बाद कुछ पुस्तकें केवल रखी जाती हैं क्योंकि उन्हें फेंका नहीं जा सकता। कुछ पुस्तकें रोचक अथवा मनोरंजक न होने के कारण जबरदस्ती पढ़ी जाती हैं जबकि कुछ ही पुस्तकें ऐसी होती हैं जिन्हें पाठक पढ़ता है और चिंतन-मनन कर उन्हें आत्मसात् करता है।

लेखक पुस्तक की भूमिका और समीक्षा पर टिप्पणी करते हुए कहता है कि पुस्तक का सर्जन करने वाला अपनी पुस्तक की भूमिका और प्राक्कथन लिखवाने के लिए उपयुक्त आदमी को ढूँढ़कर, उससे भूमिका और प्राक्कथन लिखवाता है। पुस्तक के विषय, उसकी शैली, उसके उद्देश्य और गुण-दोषों की समीक्षा की जाती है। पुस्तक की यह समीक्षा एकदम सटीक होती है। प्रायः यह समीक्षा प्रायोजित होती है। इन समीक्षाओं में प्रायः एक अनावश्यक लंबी भूमिका रहती है, जिसमें जो कुछ पुस्तक के अंदर होता है, उसकी – चर्चा कम होती है और जो उसमें नहीं होता, उसकी चर्चा अधिक की जाती है।

विशेष:

  1. पुस्तकों के अच्छी-बुरी होने का वर्णन रखी, निगली और पचाई जाने जैसे शब्दों से किया गया है।
  2. समीक्षा के ढंग पर व्यंग्य किया गया है।
  3. भाषा तत्सम शब्दों के साथ-साथ विदेशी शब्दों से युक्त खड़ी बोली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
पुस्तकें चुराई और दबाई क्यों जाती हैं?
उत्तर:
कुछ पुस्तकें महत्त्वपूर्ण होती हैं। बाजार में वे उपलब्ध नहीं होती हैं। ऐसी पुस्तकें दुर्लभ होती हैं। जो केवल पुस्तकालयों में ही होती हैं, पाठक या छात्र अथवा शोधकर्ता ऐसी पुस्तकों को चुरा लेते हैं और अपना काम सरलता से निपटा लेते हैं। कुछ पुस्तकें पुस्तकालय में प्रायः छात्रों द्वारा ही दबाई जाती हैं। वे अपने विषय से संबंधित पुस्तक को इधर-उधर दबाकर रख देते हैं और जरूरत पड़ने पर निकाल लेते हैं।

प्रश्न (ii)
पुस्तकों के निगलने और पचाने से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
पुस्तकों के निगलने से लेखक का आशय यह है कि पुस्तकें विषय पर शैली की दृष्टि से रोचक, मनोरंजक नहीं होतीं। ऐसी पुस्तकों को पाठक जबरदस्ती पढ़ता है। कुछ पुस्तकें विषय की दृष्टि से, शैली और उद्देश्य की दृष्टि से रोचक, मनोरंजक और जीविनोपयोगी होती हैं। ऐसी पुस्तकों को पाठक पढ़कर चिंतन-मनन करता है और जीवन में उनकी बातों को व्यवहार में लाता है। यही पुस्तकों का पचाना है।

गद्यांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
पुस्तक की भूमिका और प्राक्कथन लिखवाने के लिए क्या किया जाता है?
उत्तर:
पुस्तक की भूमिका और प्राक्कथन लिखवाने के लिए उपयुक्त व्यक्ति को खोजा जाता है और उससे ही भूमिका और प्राक्कथन लिखवाया जाता है।

प्रश्न (ii)
पुस्तक-समीक्षा पर लेखक ने क्या व्यंग्य किया है?
उत्तर:
पुस्तक-समीक्षा पर लेखक ने व्यंग्य किया है कि पुस्तक प्रायः प्रायोजित है। समीक्षा चर्चा होती है जो पुस्तक में होती ही नहीं है। पुस्तक में होने वाली बातों की चर्चा कम की जाती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
पागल कौन है?-वह जो पुस्तक लिखता है या वह जो पुस्तकालय को जलाता है, जलवाता है। क्या होता है किसी पुस्तक का जलना? क्या होता है किसी पुस्तकालय का जलना! जितना सोचता हूँ, उतनी खिन्नता बढ़ती है। हर पुस्तक अपने में लंबी साधना और परिश्रम का प्रतिफल होती है। कितनी आँखों का कितना जागरण व्यर्थ चला गया। कितने लोगों के कितने शोध व्यर्थ हो गए। कितनों का सोचा-समझा था जो अब लौटकर नहीं आएगा। यह तो विश्वधरोहर को नष्ट करना हुआ। शताब्दियों की सारस्वत साधना के साथ छल किया पुस्तकालय जलाने बालों ने। वहत और दहशत की जुगलबंदी के अलावा और क्या था वह! (Page 90) (M.P. 2010)

शब्दार्थ:

  • खिन्नता – दुख।
  • प्रतिफल – परिणाम।
  • वहशत – असभ्यता, जंगलीपन।
  • दहशत – आतंक।
  • सारस्वत – सरस्वती संबंधी।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश देवेंद्र ‘दीपक’ द्वारा रचित निबंध ‘पुस्तक’ से लिया गया है। लेखक पुस्तकालय जलाने पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है।

व्याख्या:
लेखक पाठकों से प्रश्न करता है कि पागल कौन है? जो पुस्तक की रचना करता है या वह जो पुस्तकालय को जलाता है, अपने लोगों से जलवाता है। इन दोनों में से पागल व्यक्ति कौन है? इसका उत्तर देने से पूर्व लेखक फिर प्रश्न करता है कि इस संबंध में जितना सोचता हूँ, उतनी ही दुख में वृद्धि होती है। लेखक के मतानुसार प्रत्येक पुस्तक लेखक की लंबी साधना और परिश्रम का परिणाम होती है अर्थात लेखक किसी पुस्तक की रचना लंबी साधना और परिश्रम से करता है। पुस्तक के जलने के कारण लेखक का रातों को जागकर पुस्तक लिखना व्यर्थ हो जाता है।

उसकी कृति नष्ट हो जाती है। कितने ही लोगों के अनुसंधान से संबंधित ग्रंथ पुस्तकालय जलने से नष्ट हो जाते हैं। शोधकर्ताओं द्वारा परिश्रम से खोजे गए नए सिद्धांत और नए फार्मूले बेकार हो जाते हैं। अनेक विद्वानों, चिंतकों, दर्शनशास्त्रियों और चिकित्सकों का चिंतन-मनन जलकर राख हो जाता है जो कभी पुनः प्राप्त नहीं हो सकता। पुस्तकों और पुस्तकालयों को जलाना विश्वधरोहर को नष्ट करना है।

इस तरह विश्वधरोहर को नष्ट करना घोर अपराध जैसा कार्य किया है, पुस्तकालय को जलाने वालों ने। शताब्दियों की विद्या की देवी सरस्वती की साधना के साथ धोखा किया है। यह उनकी असभ्यता और आतंक फैलाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। उन्होंने पुस्तकालय जलाकर विश्व को ज्ञान के स्रोत से वंचित किया। यह उनके असभ्य होने का ही परिचायक है।

विशेष:

  1. लेखक ने पुस्तकालय जलाने को घोर अपराध माना है।
  2. पुस्तकालय जलाने वालों को असभ्य कहा है।
  3. विचारात्मक और प्रश्नात्मक शैली है।
  4. भाषा तत्सम व उर्दू शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।

गयांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक ने पुस्तक लेखक और पुस्तकालय जलाने वाले में से किसे पागल माना है?
उत्तर:
लेखक ने पुस्तक लेखक और पुस्तकालय जलाने वाले में से पुस्तकालय जलाने वाले को पागल माना है ऐसा इसलिए कि पुस्तकालय जलाने से पुस्तक लेखकों की लंबी साधना, शोधकर्ताओं का परिश्रम और विद्वानों का चिंतन-मनन नष्ट हो गया।

प्रश्न (ii)
पुस्तकालय को जलाना लेखक की दृष्टि में कैसा कार्य है?
उत्तर:
पुस्तकालय को जलाना लेखक की दृष्टि में घोर आपराधिक कार्य है।

गयांश पर आधारित बोधात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
पुस्तकालय जलाने वालों ने किसके साथ छल किया?
उत्तर:
लेखक के अनुसार पुस्तकालय जलाने वालों ने शताब्दियों की विद्या की देवी सरस्वती के साधकों की साधना के साथ छल किया।

प्रश्न (ii)
लेखक पुस्तकालय जलाने वालों को क्या मानता है?
उत्तर:
लेखक पुस्तकालय जलाने वालों को असभ्य और आतंक फैलाने वाले मानता है; क्योंकि पुस्तकालय जलाना असभ्यता और आतंक फैलाने की मनोवृत्ति का ही सूचक है।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants

Sexual Reproduction in Flowering Plants Important Questions

Sexual Reproduction in Flowering Plants Objective Type Questions

Question 1.
Choose the correct answers:

Question 1.
Apomixis in plants means the development of a plant :
(a) Fusion of gametes
(b) Without fusion of gametes
(c) Stem cuttings
(d) Root cuttings.
Answer:
(b) Without fusion of gametes

Question 2.
Polygonum type of embryo sac is :
(a) 8 – nucleated
(b) 16 – nucleated
(c) 24 – nucleated
(d) 32 – nucleated
Answer:
(a) 8 – nucleated

Question 3.
In angiosperms, female gametophyte is represented by :
(a) Synergids
(b) Carpel
(c) Egg
(d) Pollen grain
Answer:
(c) Egg

MP Board Solutions

Question 4.
The term ‘xenia’ denotes the effect of pollen on the :
(a) Endosperm
(b) Flower
(c) Somatic tissue
(d) Root.
Answer:
(a) Endosperm

Question 5.
The fusion of male gamete with the secondary nucleus of the embryo sac is a process of:
(a) Fertilization
(b) Double fertilization
(c) Parthenocarpy
(d) Parthenogenesis.
Answer:
(b) Double fertilization

Question 6.
Which of the following is formed as a result of double fertilization :
(a) Endosperm
(b) Megaspore
(c) Seed
(d) Fruit.
Answer:
(a) Endosperm

Question 7.
What is the fusion product of polar nucleus and male gamete :
(a) Secondary nucleus
(b) Triple fusion
(c) Primary endosperm nucleus
(d) Zygote.
Answer:
(c) Primary endosperm nucleus

Question 8.
In which of the following plants, water is not necessary for fertilization :
(a) Vallisneria
(b) Pisus sativum
(c) Funaria
(d) Fern.
Answer:
(b) Pisus sativum

Question 9.
Tepetum is a part of :
(a) Male gametophyte
(b) Female gametophyte
(c) Ovary wall
(d) Anther wall.
Answer:
(d) Anther wall.

Question 10.
The endosperm is generally :
(a) Haploid
(b) Diploid
(c) Triploid
(d) Tetraploid
Answer:
(c) Triploid

Question 11.
The exine of pollen grain is made up of:
(a) Cellulose
(b) Pectdcellulose
(c) Lignin
(d) Sporopollenin
Answer:
(d) Sporopollenin

Question 12.
After fertilization ovary develops in to :
(a) Embryo
(b) Fruit
(c) Endosperm
(d) Seed
Answer:
(b) Fruit

Question 13.
A typical embryo sac is eight nuleate and :
(a) Single celled
(b) Seven celled
(c) Eight celled
(d) Four celled
Answer:
(b) Seven celled

MP Board Solutions

Question 14.
Germ pore is the place where exine is :
(a) Thick
(b) Uniform
(c) Thick and Uniform
(d) Absent.
Answer:
(d) Absent.

Question 2.
Fill in the blanks:

  1. The main function of endosperm in embryo is ……………. storage.
  2. Type of pollination which occurs by birds is called …………….
  3. Apple is the example of ……………. fruit.
  4. Ovules are situated on these tissue is called …………….
  5. In sunflower ……………. types of anther is found.
  6. In plants fruit is formed by …………….
  7. Single cotyledon of maize is called …………….
  8. Outer membrane of pollen grain is called …………….
  9. Process of double fertilization is discoverd by …………….
  10. The process of pollination of Vallisneria is occurs by …………….
  11. The study of pollen grain is called …………….
  12. Smell and nectar is the adaptation of ……………. pollinated flowers.
  13. Pollination in cobra plant is occurs through the …………….
  14. Tetradynamous stamen are found in …………….

Answer:

  1. Food material
  2. Omithophily
  3. False fruit
  4. Placenta
  5. Syngenesious
  6. Ovary
  7. Scutellum
  8. Exine
  9. Nawaschin
  10. Water
  11. Palynology
  12. Insect
  13. Snail
  14. Mustard.

Question 3.
Match the followings :
I.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 1
Answer:

  1. (e)
  2. (d)
  3. (b)
  4. (a)
  5. (c)
  6. (f)

II.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 2
Answer:

  1. (c)
  2. (a)
  3. (d)
  4. (b)

Question 4.
Write the answer in one word/sentences:

  1. What is the ploidy of microspore tetrad?
  2. Which component prepare intine of the pollen grain?
  3. Name a scar on a seed marking the point of attachment of the ovule.
  4. Name the type of pollination in which found in Salvia.
  5. What is the ploidy of angiospermic endosperm.
  6. Stigma, style and oVary is the part of.
  7. Name the largest flower of the world.
  8. Name the plant in which found in longest style and stigma.
  9. Name the hormone which is induced the ovary in the form of fruit.
  10. Name the layer of pollen grain which has binuleated cell.
  11. Name the mass of cells which is produced in culture medium.

Answer:

  1. Haploid
  2. Cellulose and Pectin
  3. Hilum
  4. EntomophiIy
  5. Triploid
  6. Female gamete
  7. Rafflesia
  8. Maize
  9. Auxin
  10. Tapetum
  11. Callus.

Sexual Reproduction in Flowering Plants Very Short Answer Type Questions

Question 1.
Development of female gametophyte occurs in which cell?
Answer:
By functional megaspore mother cell.

Question 2.
What is the other name of female gametophyte?
Answer:
Embryo sac.

Question 3.
Ovule derives nourishment from which part of the carpel?
Answer:
Ovule derives nourishment from placenta.

Question 4.
What are cleistogamous flowers? Give an example.
Answer:
The flowers which do not open are called cleistogamous flowers, e.g., Commelina.

Question 5.
What is the substance found on the exine of pollen grains?
Answer:
Sparopollenin.

Question 6.
Give the characters of wind pollinated flowers.
Answer:
White in colour, small in size and.pollen grains are formed in large number.

Question 7.
What is the ploidy of angiospermic endosperm?
Answer:
Triploid.

MP Board Solutions

Question 8.
Give an example of a monocotyledonous endospermic seed.
Answer:
Ricinus.

Question 9.
Give example of two false fruit.
Answer:
Apple, Jackfruit.

Question 10.
What are monocious plants ?
Answer:
Plants which have both male and female flower.

Sexual Reproduction in Flowering Plants Short Answer Type Questions

Question 1.
Write three merits of sexual reproduction in plants.
Answer:

  1. Due to sexual reproduction variations possibilities of evolution become more.
  2. Seeds thus produced can be preserved for years.
  3. It helps the plants to develop adaptations.

Question 2.
Name the parts of an angiosperm flower in which development of male and female gametophyte take place.
Answer:
Development of male gametophyte takes place in anther and female gametophyte in ovary.

Question 3.
Differentiate between microsporogenesis and megasporogenesis. Which type of cell division occurs during these events ? Name the structure formed at the end of these two events.
Answer:
Differences between Microsporogenesis and Megasporogenesis:

Microsporogenesis:

  • In this process haploid microspores are formed from diploid microspore mother cell.
  • The four microspores formed from a single microspore mother cell are generally aranged in a tetrahedral structure.
  • All the four microspores arranged in a tetrahedral tetrad are functional.

Megasporogenesis:

  • In this process, haploid megaspores are formed from diploid megaspore mother cell.
  • The four megaspores formed from a me – gaspore mother cell are arranged in the from of a linear tetrad.
  • Only one megaspore remain functional while the other three degenerates.

Meiosis occurs during micro and megasporogenesis. Microspores (pollen grain) are formed at the end of microsporogenesis and female gametophyte (embryo sac) are formed at the end of megasporogenesis.

Question 4.
Arrange the following terms in the correct developmental sequence :
Pollen grain, sporogenous tissue, microspore tetrad, pollen mother cell, male gametes.
Answer:
Sporogenous tissue → Pollen mother cell → Microspore → Tetrad → Pollen grain → Male gametes.

Question 5.
With a neat, labelled diagram, describe the parts of a typical angiosperm ovule.
Answer:
Structure of Ovule: Each ovule consists of the following parts as visible in a longitudinal section:

1. A small stalk or funicle by which the ovule remains attached with the placenta of the ovary.

2. Hilum is the point at which it is attached with the ovule. In inverted ovule the funicle fuses with the main body of the ovule and is called as raphe.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 4
3. The ovule is surrounded on all sides by two integuments but not at the apex where an aperture called micropyle is present. This end of the ovule is called as micropylar, while the end of the ovule opposite to it is called as chalazal end.

4. Embryo sac is situated inside the nucellus.

5. Towards the micropyle end of embryo sac one egg or oospore and 2 synergids are found, and towards the chalaza end of embryo sac 3 antipodal cells are fpund. At the centre secondary nuclei is found.

MP Board Solutions

Question 6.
Differentiate self – pollination and cross – pollination.
Answer:
Differences between Self and Cross – pollination:

Self – pollination:

  • It is the process of transfer of pollen grains from one flower to the stigma of same flower or another flower of same plant.
  • Medium is not required for pollination.
  • Pollination is sure.
  • Less number of pollen grains are produced.
  • Plants do not show any special character.
  • Pure breed can be obtained.

Cross – pollination:

  • It is the process of transfer of pollen grains from one flower to the stigma of flower of another plant.
  • Medium is required for pollination.
  • Pollination depends on medium.
  • More number of pollen grains are produced.
  • Attractive, coloured, scent or honey bearing flowers are produced to attract insects.
  • Hybrids are produced.

Question 7.
What is apomixis and what is its importance?
Answer:
Apomixis is the process of asexual production of seeds, without fertilisation. The plants that grow from these seeds are identical to the mother plant.
Uses:

  1. It is a cost effective method for producing seeds.
  2. It has great use for plant breeding when specific traits of a plant have to be preserved.

Question 8.
With a neat diagram explain the 7 – celIed, 8 – nucleate nature of the female gametophyte.
Answer:
Explanation:
Nucleus of the functional megaspore undergoes mitosis resulting in 2 – nuclei that move to two opposite poles forming 2 – nucleate embryo sac. Two more mitotic nuclear divisions result in 4 – nucleate and later 8 – nucleate stages of the embryo sac. so far no cytokinesis (cytoplasmic division) has taken place. Now cell walls start to build leading to the organisation of female gametophyte or embryo sac. Six of the 8 – nuclei are bound by cell wall and the ramaining 2 – celled polar nuclei lie below the egg apparatus in the large central cell.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 3

Seven – celled stage:
Three cells are grouped together at the micropylar end and constitute the egg apparatus, which is constituted of two synergids and one egg cell. Three cells at the chalazal end are called antipodals. The large central cell has 2 – polar nuclei. Thus, a typical angiosperm embryo sac at maturity is 7 – celled but 8 – nucleated as the central cell has 2 – nuclei.

Question 9.
What are chasmogamous flowers? Can cross – pollination occur in cleistogamous flower? Give reason for your answer.
Answer:
Chasmogamous flowers are open flowers with exposed stamens and stigma which facilitate cross – pollination. No cross – pollination occurs in cleistogamous flowers. As these flowers are closed and never open and thus no transfer of pollen from outside to stigma of the flower is possible. So there is no cross – pollination.

Question 10.
What is polyembryony?
Answer:
Polyembryony:
When more than one embryo develops in one seed then this condition is called as polyembryony. It is generally found in citrus family. It is also found in nicotiana, conifers, rice, wheat. It occurs when fertilization occurs in all embryo sacs found in the ovule,

Question 11.
Mention two strategies evolved to prevent self – pollination in flowers.
Answer:
Two strategies evolved to prevent self – pollination are:

  1. Pollen release and stigma receptivity is not synchronized.
  2. Anthers and stigma are placed at such positions that pollen doesn’t reach stigma.

Question 12.
What is self – incompatibility? Why does self – pollination not lead to seed formation in self – incompatible species?
Answer:
Self – incompatibility is a genetic mechanism to prevent self – pollen from fertilizing the ovules by inhibiting pollen germination or pollen tube growth in the pistil, In these cases, self – pollination does not lead to seed formation because fertilization is inhibited.

Question 13.
What is bagging technique? How is it useful in a plant breeding programme?
Answer:
It is the covering of female plant with butter paper or polythene to avoid their contamination from foreign pollens during breeding programme.

MP Board Solutions

Question 14.
What is triple fusion? Where and how does it take place? Name the nuclei involved in triple fusion.
Answer:
Triple fusion refers to the process of fusion of three haploid nuclei. It takes place , in the embryo sac. The 3 – nuclei that fuse together are, nucleus of the male gamete and 2 – polar nuclei of the central cell to produce a triploid primary endosperm nucleus,

Question 15.
Why do you think the zygote is dormant for sometime in a fertilized ovule?
Answer:
The zygote is dormant in fertilized ovule for sometime because at this time, endosperm needs to develop. As endosperm is the source of nutrition for the developing j embryo, the nature ensures the formation of enough endosperm tissue before starting the process of embryogenesis.

Question 16.
Differenciate between:
(a) Hypocotyl and Epicotyl
(b) Colcoptile and Coleorhiza,
(c) Integument and Testa
(d) Perisperm and Pericarp.
Answer:
(a) Differences between Hypocotyl and Epicotyl:

Hypocotyl:

  • The region of the embryonal axis that lies between the radicle and the point of attachment of cotyledons is called hypocotyl.
  • Hypocotyl pushes the seed above the soil in epigeal germination.
  • It is an important component of embryonic root system.

Epicotyl:

  • The region of the embryonal axis that lies between the plumule and cotyledons is called epicotyl.
  • Epicotyl pushes the plumule above the soil in hypogeal germination.
  • It is an important component of embryonic shoot system.

(b) Differences between Coleoptile and Coleorhiza:

Coleoptile:

  • The shoot apex and few leaf primordia are enclosed in epicotyl region is called coleoptile.
  • It comes out of the soil.

Coleorhiza

  • The redicle and rootcap are situated at the lower end of embryonal axis are enclosed by protective sheath called coleorhiza.
  • It remains inside the soil.

(c) Differences between Integement and Testa:

Integument:

  • It is the protective covering of the ovule.
  • It is a part of pre fertilisation.

Testa:

  • It is the protective covermg of the seed.
  • It is a part of post fertilisation.

(d) Differences between Perisperm and Pericarp:

Perisperm:

  • It is the part of nucellus which remains in form of thin layer after seed germination.
  • It is a part that belongs to seed.
  • It is usually dry.

Pericarp:

  • Ovary is convert into pericarp after fertilisation.
  • It is a part that belongs to fruit.
  • It can be dry and fleshy.

Question 17.
Why is apple called a false fruit? Which part of the flower forms the fruit?
Answer:
Apple is called a false fruit because it develops from the thalamus instead of ovary (thalamus is the enlarged structure at the the base of the flower).

Question 18.
What is meant by emasculation? When and why does a plant breeder employ this technique?
Answer:
Emasculation means removal of anthers, with a forceps, from the flower bud before dehiscence. Plant breeder employs this technique to prevent contamination of stigma with the undesired pollen. This is useful in artificial hybridisation, where desired pollen is required.

Question 19.
If one can induce parthenocarpy through the application of growth sub – stances, which fruits would you select to induce parthenocarpy and why?
Answer:
Orange, lemon, litchi could be potential fruits for inducing the parthenocarpy because seedless variety of these fruits would be much appreciated by the consumers.

Sexual Reproduction in Flowering Plants Long Answer Type Questions

Question 1.
Describe structure of ovule with labelled diagram.
Answer:
Structure of Ovule:
Each ovule consists of the following parts as visible in a longitudinal section:

1. A small stalk or funicle by which the ovule remains attached with the placenta of the ovary.

2. Hilum is the point at which it is attached with the ovule. In inverted ovule the funicle fuses with the main body of the ovule and is called as raphe.

3. The ovule is surrounded on all sides by two integuments but not at the apex where an aperture called micropyle is present. This end of the ovule is called as micropylar, while the end of the ovule opposite to it is called as chalazal end.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 4
4. Embryo sac is situated inside the nucellus.

5. Towards the micropyle end of embryo sac one egg or oospore and 2 synergids are found, and towards the chalaza end of embryo sac 3 antipodal cells are found. At the centre secondary nuclei is found.

Question 2.
Describe structure of anther with labelled diagram.
Answer:
Structure of Anther:
Transverse section of anther shows that it consists of 2 lobes which are connected by connective. Each lobe contains two pollen sacs. Innermost layer of pollen sac is called as tapetum. Tapetum is a layer rich in nutritive contents which supplies food material for the developing pollen grains. At first many pollen mother cells are formed in them which divides meiotically to form haploid pollen grains.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 5

Question 3.
Give four contrivances for self – pollination.
Answer:
Contrivances for self – pollination:
1. Bisexuality:
When male and female parts are found in same flower then possibility of self – pollination increases.

2. Cleistogamy:
In Commelina benghalensis both cleistogamous and chasmogamous flowers are produced. The former are the underground flowers and the latter are the aerial ones developed on branches. In the small, inconspicuous cleistogamous flowers the pollen are shed within the closed flowers so that self – pollination is a must. This is also observed in Impatiens, Oxalis, Viola, Portulaca etc.

3. Homogamy:
Here the stamens and carpels mature at the same time. So, there is a greater chance of self – pollination as compared to cross – pollination, example Mirabilis, Argemone etc.

4. Failure of cross – pollination:
In some flowers generally cross pollination occurs but if they fails to do cross-pollination then self pollination occurs.

MP Board Solutions

Question 4.
What do you mean by micropropagation?
Answer:
Micropropagation:
It is a modem method of reproduction. By this process thousands of new plants can be obtained from few tissues of mother plant. This method is based on tissue and cell culture technique. In this process a small part of tissue is separated from the plant and then it is grown in nutrient medium in aseptic condition. The tissue develops to form a cluster of cells which is called as callus.

This callus can be preserved for long time for multiplication. A small part of the callus is transferred to nutrient medium, where it grows into a new plant. This plant is then transferred to the field. By this process Orchids, Carnations, Chrysanthemum plants can be grown successfully.

Question 5.
What is self – pollination? Give advantages and disadvantages of self – pollination.
Answer:
Self – pollination:
When the pollen grain of one flower are transferred to the stigma of the same flower then the process is called as self – pollination.

Advantages of self – pollination : These are the advantages of self – pollination:

  1. Parental characters can be preserved indefinitely in several generations.
  2. Self – pollination helps in maintaining pure lines for experimental hybridization.
  3. It is most economical method of pollination. The plants do not consume their energies in the production of large number of pollen grains, nectar and coloured corolla.
  4. It ensures seed production and flowers do not take chances of the failure of fertilization.

Disadvantages of self – pollination : These are the disadvantages of self – pollination:

  1. The weaker characteristics or defects of the plant can never be eliminated from the race.
  2. No useful characters can be introduced in the race.
  3. The immunity of race towards diseases falls and ultimately it falls prey to many diseases.

MP Board Solutions

Question 6.
Describe development of endosperm.
Answer:
Development of endosperm:
It develops from the triploid tissue of the fertilized embryo sac after the act of double fertilization. It is of the following three types:

  1. Free nuclear endosperm.
  2. Cellular type of endosperm.
  3. Helobial type of endosperm.

The name refers to the type of nuclear divisions of the endosperm nucleus. If triploid nucleus divides by free nuclear division the endosperm produced contains many nuclei ly¬ing freely in it and hence it is termed as free nuclear endosperm. If the nuclear division is followed by wall formation it is called as cellular type. If endosperm is intermediate between the two types it is called as helobial type.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 6
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 7

Question 7.
Differentiate between:

  1. Embryo sac and Endosperm,
  2. Seed and Ovule.

Answer:
1. Differences between Embryo sac and Endosperm:

Embryo sac:

  • It is haploid structure.
  • It is found in ovule.
  • It is formed before fertilization.
  • Nutritive materials are stored.
  • It consists of antipodal cells, egg cell, synergid cells and two polar nuclei.

Endosperm:

  • It is triploid structure.
  • It is found in seed.
  • It is formed after fertilization.
  • Nutritive materials are not stored.
  • Antipodal cells, egg cell, synergid cells are absent and all cells are similar

2. Differences between Seed and Ovule:

Seed:

  • It is formed in the fruit seed is formed after fertilization of ovule.
  • Seed is surrounded by integument. Outer covering is called outer integument and inner covering is called inner integument.
  • Embryosac is absent in seed.
  • Embryo is present in seed
  • Endosperm may be found in seed
  • Seed germinates to produce new paint.

Ovule:

  • Before fertilization ovule is found into the ovary called mega sporangium.
  • Nucellus is present below the ovule and is surrounded by inner and outer covering.
  • Embryosac is present in ovule.
  • Embryo is absent in ovule.
  • Endosperm is not found in ovule.
  • Ovule does not germinate.

MP Board Solutions

Question 8.
Explain any five differences between pollination and fertilization.
Answer:
Differences between Pollination and Fertilization:

Pollination:

  • In pollination, pollen grains are transferred from stamens to stigma of the flower.
  • Two male gametes are formed in this process.
  • Haploid cells participating in this process.
  • A medium is required for this process.
  • There is no morphological change after this process.

Fertilization:

  • Fertilization is a process in whieh male and female gametes fused to form the zygote.
  • Zygote is formed at the end of this process.
  • Haploid cells fused to form a diploid cell.
  • Medium is not required for this process.
  • Flower is modified into fruit and seed after this process.

Question 9.
What do you understand by double fertilization? Write its importance.
Answer:
Double fertilization:
It is the process of fusion of one male gamete with the egg nucleus and other male gamete with the polar nuclei or secondary nucleus is called double fertilization. In all angiospermic plants there is double fertilization. This process was discovered by S. N. Navaschin (1898) and Grignard (1899) in Lilium and Fritillaria. In this process, pollen grains reach stigma and then germinate. A short pollen tube comes out through a germpore. The pollen grain nucleus divides mitotically into a tube nucleus and a generative nucleus. The generative nucleus again divides into two male nuclei.

The pollen tube may enter the ovule through micropyle or through integuments or through chalazal end. One of the two male nuclei fuses with the egg nucleus and forms a zygote and this process is called syngamy. The male nucleus fuses with the two polar nuclei or secondary nucleus (diploid) and gives rise to triploid primary endosperm nucleus. This process is called triple fusion and whole process is called double fertilization. This triploid nucleus forms endosperm of the seed.

Importance:
After double fertilization triploid nucleus (endosperm nucleus) developed to form an endosperm which provide nourishment to the developing embryo resulting in the formation of healthy seed and plant.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 8

MP Board Class 12th Biology Important Questions

MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 3 बन्दी पिता का पत्र

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 3 बन्दी पिता का पत्र

बन्दी पिता का पत्र अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
‘बन्दी पिता का पत्र’ किसने किसे संबोधित कर लिखा है?
उत्तर:
‘बन्दी पिता का पत्र’ पंडित कमलापति त्रिपाठी ने अपने प्रिय पुत्र लाल जी को सम्बोधित करते हुए लिखा है।

प्रश्न 2.
पत्र में कैदियों के जीवन के विषय में किन-किन बातों का उल्लेख किया है? (2017)
उत्तर:
पत्र में कैदियों के जीवन के विषय में जिन बातों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं-इन कैदियों के जीवन में आनन्द, सुख और सन्तोष के लिए स्थान नहीं होता है। इनके साथ पशओं जैसा व्यवहार किया जाता है, उन्हें पीसा जाता है। इन कैदियों को समाज से उपेक्षित समझा जाता है। संसार में कहीं पर भी सम्मानपूर्वक इनको खड़े होने का कोई स्थान नहीं है। इनका भविष्य भी अन्धकारपूर्ण ही होता है। इन कैदियों के जीवन के अनेक वर्ष यहाँ ही समाधिस हो गए।

इन जेल के कैदियों के जीवन में कहाँ है बसन्त? और कहाँ है सावन की मेघगर्जन? यहाँ ये ऐसे प्राणी हैं जिनकी सारी जवानी इसी में कट गई। बुढ़ापा यहाँ आ गया और अब मौत भी इन्हें यहाँ ही आकर समाधिस्थ करेगी। वे, फिर किसी भी बन्धन से मुक्त हो जाएँगे।

जेल के कैदियों में ऐसे व्यक्तियों की भी संख्या इतनी अधिक है जिन्हें यह भी पता नहीं कि उनके घर की क्या दशा है? अपने जिन बच्चों को छोड़ आए थे, वे अब कैसे हैं? उनके घर वाले भी अब उन्हें भूल चुके हैं। यदि आज जेल से छूट कर जाएँ, और अपने सौभाग्य से अपने बेटों से मिलें, और अपनी बीबी के सामने खड़े हों तो शायद न बेटा बाप को पहचानेगा और न ही बीबी अपने मियाँ को।

क्या कभी कोई ऐसी कल्पना भी कर सकता है कि इनके हृदय में भी रस का संचार होगा, सम्भव है? क्या होली, क्या दीवाली-किसी में यह सामर्थ्य कहाँ हो सकती है कि इनके हृदय में टूटे हुए तारों को पुनः जोड़ दिया जाए और फिर उनमें से झंकृति निकल सके।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
जीवन के सुख-दुःख से सम्बन्धित विचारों को लेखक ने किस प्रकार व्यक्त किया है?
उत्तर:
प्रकृति एक नटी है। लीलामयी प्रकृति मानव में वह क्षमता उत्पन्न करती है जिससे सुख-दुःख की परिस्थिति में एक सामंजस्य स्थापित हो उठता है। मनुष्य की इस क्षमता को अद्भुत ही कहा जायेगा। परिस्थितिवश स्वयं को उसके अनुकूल किस सरलता से ढाल लेता है। मनुष्य के हृदय में कला, संतुलन और धैर्य का कितना माद्दा है कि प्रत्येक परिस्थिति को अपने अनुसार ढालने में कोई कसर नहीं छोड़ता। अपनी इसी क्षमता के बलबूते पर मनुष्य जीवन धारण करने में समर्थ है।

मेरा स्वयं का अनुभव है कि यह जगत अनन्त वेदना और दुःखों से ही भरा हुआ है। यह जीवन प्रबल गति से बहते महान् काल रूपी नदी के प्रवाह पर उठे हुए बुलबुले के समान क्षणिक है। यह जीवन अस्थायी अस्तित्व लिए हुए है। इस जीवन के कितने क्षण ऐसे हैं जो सुख और शान्ति से बीते हैं। इस जीवन में सुख, आनन्द और तृप्ति नाम का पदार्थ ढूँढ़े नहीं मिल सकता।

यह जीवन बित्तेभर का है, उसके भी बड़े हिस्से में वेदना, पीड़ा और अवसाद भरा हुआ है। यदि सुख के कुछ क्षण यहाँ आ भी जाते हैं, तो वे बिजली की भाँति क्षण भर कौंध जाते हैं और मानव जीवन जो प्रायः अंधकार से भरा हुआ है, कभी-कभी आलोकित हो उठता है। सुख का प्रकाश शीघ्र ही लुप्त हो जाता है। यह सुख नश्वर है, क्षणिक है। परन्तु इस सुख की क्षणिकाओं में सत्य समाया रहता है। यह सत्य अमिट स्मृतियाँ छोड़ चला जाता है। इसी न मिटने वाली स्मृति को जीवन की शक्ति का स्रोत कहते हैं; यही स्मृति निराशा में आशा का संचार करती है, अंधकार में प्रकाश विकीर्ण करती है। मृत्यु और विनाश में जीवन का सृजन का आधार बनकर पुष्ट होती है।

संसारी जीव दु:खों से प्रभावित है। समाज में कौन ऐसा है जो तप्त हो, और अभावों से ग्रस्त न हो। फिर भी दुःखमय, क्षणिक जीवन के प्रति मनुष्य का इतना मोह क्यों? सुख के कणों को बटोरने के प्रयास में जीवन कितने दुःख, वेदना और यातना सहन करता है। कितने अचम्भे की बात है यह?

प्रश्न 4.
पत्र-लेखक ने गाँधी जी के सत्याग्रह के विषय में क्या लिखा है?
उत्तर:
ब्रिटेन अपनी साम्राज्यवादी नीतियों से लोगों के हृदय में अपने प्रति घृणा की आग सुलगा रहा था। यह अवस्था असहनीय हो चुकी थी जिससे लोगों में झुंझलाहट पैदा हो रही थी। इस महान् देश के करोड़ों लोग नपुंसकतापूर्ण ग्लज्जा का उद्रेक कर रहे थे। उस समय हम सोच रहे थे कि गाँधी जी विकट संकट में फंस गए हैं। गाँधी जी उन लोगों में से थे जो अपनी प्रतिज्ञा से एक कदम भी पीछे हटने वाले नहीं थे। शरीर को चाहे दो भागों में विभक्त क्यों न कर दिया जाए? गाँधी जी के शरीर में विदेहत्व का आदर्श सजीव रूप में मूर्तिमान हो चुका था। आदर्श और सत्य के लिए उस व्यक्ति की दृष्टि में न जीवन का मूल्य है और न जगत का।

परन्तु दूसरी ओर स्वार्थ में अंधे हुए कठोर हृदय साम्राज्यवादियों की सत्ता देखी। जिनमें नर रक्तपान करते-करते मनुष्यता नाम के किसी पदार्थ की छाया भी नहीं रह गई है। भय होता, भय नहीं विश्वास था कि यदि कहीं, वह अशिव मुहूर्त आ ही गया जब गाँधी जी की भौतिक देह इस तप के बोझ को सहन करने में असमर्थ होती दिखाई देगी, तो उस समय भी वे मानवता की इस विभूति और पृथ्वी के इस अमूल्य रत्न को नष्ट कर देने में आगा-पीछा न करेंगे। आखिर वे तो मनुष्य ही थे जिन्होंने ईसा के तपःपूत शरीर में लोहे की कील ठोंककर प्रसन्नता और सन्तोष प्राप्त किया था। यदि इतिहास उसी की पुनरावृत्ति करे तो उसे कौन रोक सकेगा।

अब हम यह अनुभव कर रहे हैं कि आज गाँधी नहीं मर रहा है। बल्कि उसके साथ वह आदर्श और वह सत्य भी मर रहा है जिसका प्रतिनिधित्व वह स्वयं कर रहा है और जिसका दिव्य संदेश लेकर यह देवदूत अवनि पर अवतीर्ण हुआ है। अब प्रश्न यह भी उठता है कि क्या मानव के चरम कल्याण के लिए और उसके लिए चेष्टा करना ही कोई जघन्य अपराध है जिसके कारण इतना भयानक दंड मिल रहा है।

यदि मानव समाज को संहार से, विनाश से और पाप से बचाना है, तो उसकी समस्त व्यवस्था को अहिंसा के आधार पर स्थापित करने का आयोजन करना ही होगा। लोग कह देते हैं कि अहिंसा मानव-प्रकृति के प्रतिकूल है और कभी हिंसा का उन्मूलन संभव नहीं है। वे इतिहास को साक्षी रूप में उद्धृत करते हैं। लेकिन लेखक के अनुसार लोग उसी इतिहास को गलत ढंग से देखते हैं। वे यह नहीं देखते कि विकास-पथ का पथिक मानव सदा प्रवृत्तियों से युद्ध करता। उनका संयम और नियंत्रण करता रहता तो आगे बढ़ता चला गया होता। उसकी यही साधना संस्कृतियों को जन्म देती रही है।

प्रश्न 5.
कैदियों ने होली के उत्सव को किस प्रकार मनाया था?
उत्तर:
आज जेल में कैदियों द्वारा होली का उत्सव मनाया जा रहा है। मैंने अपने कानों से अभी-अभी मंद-मंद किन्तु उनके उल्लास से परिपूर्ण स्वर लहरी को सुना है। यह स्वर लहरी मेरे पास वाली बैरक से सुनाई पड़ रही है। परन्तु इन बेचारे कैदियों के जीवन में आनन्द कहाँ? सुख और सन्तोष के क्षण कहाँ? इन्हें तो समाज से उपेक्षित रखा गया है। ये समाज में सम्मान से खड़े भी नहीं रह सकते। इनके जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा कैद में ही समाधिस्थ हो गया है। फिर भी अपने हृदय की भावनाओं को अपनी मस्त स्वर लहरियों में व्यक्त करते हुए इन्हें देख रहा हूँ।

इन्होंने ढपली बनाई है। धुंघरू बनाए हैं। फटे-पुराने चिथड़ों को एकत्रकर रंगा है। अपनी-अपनी बैरकों से बाहर निकल आए हैं और वे स्वाँग रच रहे हैं। फगुआ गा रहे हैं। कोई-कोई तो धुंधरू पहनकर नाच रहा है। इन अभागे कैदियों का उल्लास और उन्माद दर्शनीय है।

स्वतंत्र वायु और निर्मुक्त अनंत आकाश से भी वंचित होकर वे जीवन को कुछ क्षण के लिए मोहक और आकर्षक बनाने में सफल हुए हैं। आज होली न आई होती, तो आज इन्हें इतना भी नसीब न हुआ होता।

प्रश्न 6.
ब्रिटेन की सरकार की मनमानी से लेखक को क्यों क्षोभ हुआ?
उत्तर:
ब्रिटेन की सरकार साम्राज्यवादी है। वह सरकार निष्ठुरता की पराकाष्ठा से ऊपर तक जा चुकी है। उसकी निष्ठुरता के विरुद्ध लोगों के हृदयों में विरोध की आग फूट पड़ने लगी है। उसने जो अवस्था उत्पन्न की है, वह असह्य है, जिससे ब्रितानी शासक वर्ग किसी भी भारतीय की झंझलाहट के पात्र हो सकते हैं। ब्रिटिश सरकार की ज्यादतियों को भारत जैसे महान् देश के लोग सहन कैसे कर रहे हैं? शायद उनमें नपुंसकता का संचार हो गया है। इससे तो लज्जा का उद्रेक हुआ है।

अब बात आती है, गाँधी जी द्वारा आमरण उपवास की। हम लोग सोचते हैं कि गाँधी जी किसी विकट संकट में पड़ गए हैं। गाँधी जी उन लोगों में से एक हैं जो अपनी प्रतिज्ञा से डिगना नहीं जानते; चाहे उनके शरीर के कितने ही टुकड़े क्यों न हो जायें? वस्तुतः उनमें विदेहत्व का एक आदर्श रूप मूर्तिवान हो गया है, जिसमें सजीवता है। गाँधी जी अपने आदर्श और सत्य के लिए जीवन त्याग सकते हैं, जगत से नाता छोड़ सकते हैं। अतः उनके लिए जीवन और जगत-अपने आदर्श और सत्य के लिए कोई महत्त्व नहीं रखते।

अब थोड़ा-सा नर-पिशाचियों की ब्रितानी सरकार पर विहंगम दृष्टि डालते हैं, तो हम पाते हैं कि वे अपने स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं। वह सरकार साम्राज्यवादियों की है। उन स्वार्थी साम्राज्यवादी सरकार की सत्ता नर रक्तपात को मौन खड़ी देख सकती है। उन लोगों में मानवता का एक बिन्दु रूप भी नहीं है। यह अत्यन्त भय की अथवा अशिवता की बात घटित हो जाती है, जिसका हम सबको भय था, और गाँधी जी की भौतिक देह तप के गहन बोझ को सहन करने में असमर्थ हो जाती तो क्या इस मानवता की विभूति और पृथ्वी के रत्न गाँधी को नष्ट करने देने में क्या हम भारतीय आगा-पीछा न करेंगे? अर्थात् अवश्य करेंगे। आखिर वे मनुष्य ही तो थे; जिन्होंने तप से पवित्र शरीर वाले ईसा मसीह के शरीर में लोहे की कील ठोंक दी और स्वयं उन्होंने प्रसन्नता और सन्तोष का अनुभव किया। इतिहास, यदि उसी की पुनरावृत्ति करे तो कर सकता है, उसे रोकने वाला कौन है?

MP Board Solutions

प्रश्न 7.
इस पत्र के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पत्र के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि-
(1) प्रकृति ने मनुष्य की रचना की है और उसमें विचित्रता पैदा की है कि मनुष्य सदैव सुख और दुःख में सामंजस्य बैठाता रहा है। इस सामंजस्य की क्षमता भी उसमें अद्भुत है। सुख क्षणिक होता है। दुःख की अन्धेरी रात्रि अपार होती है। सुख की स्मृतियाँ जीवन में शक्ति, ऊर्जा और उत्साह की स्त्रोत कहलाती हैं।

(2) लेखक वैदिक युग के समाज का दिग्दर्शन कराता हुआ कहता है कि उस युग में स्त्री-पुरुष समाज के उत्सवों में समान रूप से भाग लेते थे। खेलों और उत्सवों तथा क्रीड़ाओं में दोनों की ही सहभागिता महत्त्व रखती थी।

(3) उस युग में इन उत्सवों और पर्वो पर सम्पन्न आयोजनों में ही युवक-युवतियाँ अपने वर और वधुओं का वरण कर लेती थी। माता-पिता की और अन्य सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की उपस्थिति में यह स्वयंवर सम्पन्न हुआ करते थे। पुरातन आर्यों की संस्कृति सुसम्पन्न थी।

(4) आज के होली-दीवाली आदि उत्सवों पर बन्धनयुक्त कल्पित आजादी विषैली हो गयी है। जीवन में पराधीनता का बन्धन सत्य नहीं है। आज हमें सत्य और असत्य से मिश्रित जीवन का उपभोग करने की बाध्यता अनुभव हो रही है।

(5) हम भारतीयों ने लम्बे समय तक पराधीनता के कष्ट भोगे हैं। इस पराधीनता में साम्राज्यवादी सत्ता की निष्ठुरता ने सभी भारतीयों को शताब्दियों तक झुलसाया है। फिर भी गाँ ती जी ने विश्वमानव को अपने शुद्ध तपभूत मन से यह बता दिया कि हिंसा पर अहिंसा विजय पा सकती है, यदि उसके पालन करने वाले सत्य और अपने आदर्श को जीवित रखने के लिए कटिबद्ध हैं। यद्यपि हिंसा मनुष्य में प्राकृत रूप से मौजूद है। सत्य कभी मरता नहीं है।

(6) यदि मानव समाज को संहार से, विनाश से और पाप से बचाना है तो समाज की समस्त व्यवस्था को अहिंसा के आधार पर स्थापित करना होगा। मनुष्यों का कहना है कि अहिंसा मानव-प्रकृति के प्रतिकूल है। अत: हिंसा का उन्मूलन कभी भी सम्भव नहीं है। परन्तु उन्हें यह समझने की कोशिश करनी होगी कि विकास पथ का पथिक मानव सदा प्रारम्भिक प्रवृत्तियों से युद्ध करता रहा है, उन पर संयम साधता रहा है, उन पर नियंत्रण करता रहा है, और परिणामत: वह आगे बढ़ता गया है। इसी तरह की साधना से विश्व में संस्कृतियों ने जन्म लिया।

(7) मनुष्यता का इतिहास परम साधना का इतिहास है। सहज प्रवृत्तियों का उन्मूलन मानव द्वारा सम्भव नहीं है। लेकिन उन प्रवृत्तियों को एक व्यवस्था दे सकता है। उन्हें कला के रंग से रंग सकता है। उन्हें नियंत्रित कर सकता है। इस सहज प्रवृत्तियों को उन्नत पथ की ओर मोड़ा जा सकता है। हिंसात्मक प्रवृत्ति के साथ ही मनुष्य में उसके ऊपर संयम करने की प्रवृत्ति भी तो मानव के अन्दर प्रकृति ने प्रदान की है। इस प्रकार मानव के अन्दर एक विशेष गुण है, वह है मनुष्य का द्वन्द्वात्मक स्वरूप। गाँधी जी ने बताया कि इस हिंसात्मक प्रवृत्ति पर विजय पाने में असफलता, मानवता की पुनीत साधना की असफलता होगी।

(8) मनुष्य लेखन के माध्यम से अपने मन में उठे उद्गारों को स्पष्ट कर देता है। यह उसकी कल्पना शक्ति की अभिव्यक्ति है। जिस पर अन्तःकरण की छाप लगी हुई होती है। लेखक के मन की अनुभूतियाँ जीवन के स्वरूप को बताती हैं। समस्याओं का समाधन आकलित होता है। वैचारिक भिन्नता अनिवार्य है। लेकिन आशा है कि भारत का विविधामय स्वरूप प्रेम और सौन्दर्य के सूत्र में अभिन्नता से पिरोया हुआ होने की आशा की जाती है।

बन्दी पिता का पत्र अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बन्दी पिता का पत्र’ कहाँ लिखा गया था?
उत्तर:
‘बन्दी पिता का पत्र’ पंडित कमलापति त्रिपाठी ने नैनी सैंट्रल जेल में लिखा था।

प्रश्न 2.
पत्र-लेखन के समय नैनी सेंट्रल जेल में कौन-सा त्यौहार मनाया जा रहा था?
उत्तर:
पत्र-लेखन के समय नैनी सेंट्रल जेल में होली का उत्सव मनाया जा रहा था।

MP Board Solutions

बन्दी पिता का पत्र पाठका सारांश

प्रस्तावना :
लेखक अपने प्रिय पुत्र लाल जी को जेल से पत्र लिखता है। वह बताता है कि आज जेल में होली का उत्सव मनाया जा रहा है। लेखक के पास वाली बैरक से उल्लास भरी स्वर लहरियाँ उसे कान में सुनाई पड़ रही हैं। जेल की बैरके ही बहुत से कैदियों की समाधि स्थल बन गयी हैं। कुछ अपनी हड्डियाँ और मांस तक को सुखा चुके हैं; उनके लिए अब बसंत अथवा वर्षा ऋतु के सावन का मेघ गर्जन कहाँ? यहाँ कुछ कैदी ऐसे भी हैं जिनकी सुध लेने वाला बाहर कोई भी नहीं है। घरवाले उन्हें भूल चुके हैं, यहाँ तक कि बेटे, बाप, पत्नी परस्पर उन्हें पहचान नहीं सकते। तो फिर उनके हृदय में रस का संचार कहाँ हो सकता है? ऐसे होली, दीवाली पर्यों में आज वह सामर्थ्य कहाँ जो इनके टूटे हुए तारों को पुनः जोड़ दे?

प्रकृति एक महानटी है :
प्रकृति ने मनुष्य को एक विचित्रता दी है जिससे उसमें सुख और दुःख के सामंजस्य की स्थापना की क्षमता है। जीवन एक अस्थायी अस्तित्व को लिए हुए है जिसमें अनन्त वेदना और दुःख परिपूर्ण है। अतः यहाँ सुख, आनन्द और तृप्ति नाम का पदार्थ ढूँढ़े भी नहीं मिल सकता। सुख क्षणिक है, दु:ख की अनन्त कारा की कलियाँ सर्वत्र फैली हैं यहाँ। परन्तु फिर भी इस दुनिया में निराशा में आशा, अन्धकार में प्रकाश, मृत्यु में जीवन के सृजन का आधार बना रहता है।

समाज में अतृप्ति और अभाव :
सम्पूर्ण मानव समाज अतृप्ति और अभाव की समस्या से व्यथित है। मनुष्य सुख की तलाश ओस की बूंदों से प्यास बुझाने की तरह करता है। इसी तरह जेल के कैदी भी किसी भी तरह अपने मन के अवसाद को भुलाने के लिए ‘फगुआ गा रहे हैं’, कोई ढपली बजा रहा है, तो कोई अपने पैरों में घुघरू पहन नृत्य कर रहा है। इन कैदियों का भाग्य अभागेपन में डूब चुका है। परन्तु अपने जीवन में ये बंदी लोग उल्लारा की मादकता उत्पन्न करने की कोशिश कर रहे हैं। मुक्त आकाश का सौन्दर्य तो इन्हें मिलेगा नहीं, लेकिन कुछ क्षण के लिए मोहक और आकर्षक झलकियाँ जीवन का संचार कर ही देती हैं। इस होली पर्व का भी लम्बा इतिहास है। वैदिक युग में यही होली बसन्तोसव के रूप में मनाई जाती थी। विविध खेलकूद, नाचरंग, नाटक, घुड़दौड़, रथदौड़ होती थी। जीवन में जीवन का संचार था। स्त्री-पुरुष सभी इन उत्सवों में भाग लेते थे।

स्वयंवर प्रथा :
इन विविध प्रक्रियाओं के आयोजनों के बीच ही युवतियाँ भी मन के अनुकूल किसी युवक को पतिरूप में वरण करती थीं। माता-पिता उन युवक-युवतियों की इच्छाओं के अनुकूल आचरण करते थे। परन्तु ज्ञात नहीं कि जीवन और हृदयों के मिलन को पुण्यशाली पर्व की वह स्वस्थ परम्परा काल के गर्त में कब समा गई।

ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सरकार की निष्ठुरता :
ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सरकार की निष्ठुरता के समक्ष मानवतावादी दृष्टि अन्धत्व में समा गई है। उनके लिए न जीवन का मूल्य है, और न जगत का। उन्हें तो स्वार्थ के अन्धेरे में घेरा हुआ है। मनुष्यता से तो उनका दूर का भी परिचय नहीं है।

आदर्शों और सत्य के मूल्यों का ह्रास परन्तु बचाव :
स्वार्थपरता के अन्धकार को विकीर्ण करती यह सरकार आदर्शों और सत्य के मूल्यों से कोई सरोकार नहीं रखती। सम्पूर्ण मानव समाज को संहार से बचाने का प्रयास अहिंसा से ही हो सकता है। लेकिन हिंसा का उन्मूलन भी सम्भव नहीं है। लेकिन निराशा में आशा एवं विकास पथ का पथिक बना मानव सदा से ही इन कुत्सित प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने का क्रम अपनाता रहा है। यही वह साधना है जो संस्कृतियों को जन्म देती रही है।

मानवता का इतिहास ही साधना का इतिहास :
मनुष्य सहज और प्राकृतिक प्रवृत्तियों का उन्मूलन नहीं कर सकता। लेकिन इनको एक व्यवस्था दे सकता है। कला का रंग चढ़ा सकता है। उन्हें उन्नत पथ की ओर मोड़कर ले जाने का भागीरथी प्रयत्न कर सकता है। संस्कृतियों का विकास इसी तपस्या का फल है। हिंसा सहज प्रवृत्ति है लेकिन उस सहज प्रवृत्ति पर अंकुश डाला जा सकता है।

मानव का द्वन्द्वात्मक स्वरूप :
मानव अपने समाज में अपने इस द्वन्द्वात्मक स्वरूप से अभिशप्त है। गाँधी जी हिंसा पर अहिंसा द्वारा नियंत्रण का मंत्र जपते हैं तो यह असफलता उनकी नहीं, वरन् मानवता की पवित्र साधना की असफलता है। हिंसा में मनुष्य गतिहीन हो जाएगा। गाँधीजी उसी हिंसा के विरुद्ध इक्कीस दिन का आमरण व्रत लिए हुए हैं। जीवन निराशा में डूब रहा है।

उपसंहार :
मनुष्य अपनी जीवन नैया को आगे बढ़ाने के उपाय अपनाता है, लेखक भी अपनी लेखन शैली के माध्यम से समय काटता है। लिखता है, परन्तु उस लेखन में सम्बोधन किसी को भी कर सकता है। पत्र लेखक का प्रयोजन केवल सम्बोधित किए व्यक्ति के लिए ही नहीं होता, वह तो स्वयं लेखक के लिए भी महत्त्वपूर्ण होता है। विविध अनुभूतियाँ जीवन चक्र को विविधता देती हैं। विविधता का दृश्य जगत अभिन्नता के धारा प्रवाह में बहता रहे, एक ऐसा अदृश्य सूत्र इस विविधता को पिरोकर आकर्षण का केन्द्र बने भारत माता के हृदय का हार।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 2 सवा सेर गेहूँ

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 2 सवा सेर गेहूँ

सवा सेर गेहूँ अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
सवा सेर गेहूँ उधार लेने के बाद शंकर को क्या-क्या कष्ट सहने पड़े? (2009, 13, 15)
उत्तर:
प्रस्तावना :
अतिथियों की सेवा और भक्ति के लिए शंकर, एक दिन अपने घर पर आए हुए महात्माओं को भोजन कराने के लिए गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ लेकर आया। उसकी पत्नी ने गेहूँ पीसे और गेहूँ के आटे का भोजन उन महात्माओं को कराया। अगले दिन प्रात:काल महात्मा तो आशीर्वाद देकर चलते बने। लेकिन शंकर की घरेलू दशा इस तरह खराब हुई कि उस पर आठ-आठ आँसू रोना आता है। क्योंकि महाराज के सवा सेर गेहूँ साढ़े पाँच मन में बदल गये थे।

पारिवारिक विघटन :
शंकर का छोटा भाई मंगल अलग हो गया। घर का बँटवारा हो गया। साथ रहकर दोनों किसान थे। अब दोनों ही मजूर (मजदूर) हो गए। चूल्हे अलग-अलग जलने लगे। भाई-भाई शत्रु बन गए। प्रेम, खून और दूध के बन्धन टूट गए। कुल मर्यादा का स्थापित वृक्ष सूखने लगा। कई दिन तक शंकर को भूख-प्यास और नींद नहीं आई। शारीरिक रूप से दुर्बल हो गया। बीमारी ने जकड़ लिया। खेती केवल मर्यादा भर के लिए रह गई थी।

शंकर :
एक बन्धुआ मजदूर-महाराज से महाजन बने महाराज के यहाँ ऋण न चुका पाने की दशा में शंकर को बंधुआ मजदूर होना पड़ा। उसे आधा सेर जौ प्रतिदिन, एक कम्बल और मिरजई वर्ष में एक बार दिया जाने लगा।

उपसंहार :
शंकर को बीस वर्ष तक बंधुआ मजदूर की तरह काम करना पड़ा महाराज महाजन के यहाँ, फिर भी एक सौ बीस रुपये का ऋण उसके सिर बाकी रहा। शंकर के जवान बेटे को गरदन पकड़कर उस ऋण की अदायगी के लिए बंधुआ मजदूर बनाया गया। जब तक. शंकर जीवित रहा तब तक महाराज के सवा सेर गेहूँ किसी देवता के अभिशाप के दाने की तरह उसके सिर से नहीं उतरे।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
‘महाराज’ के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
महाराज :
एक सहायक के रूप में-शंकर के गाँव का महाराज गाँव के लोगों की सहायता आवश्यकता पड़ने पर किया करता था। शंकर को जब गेहूँ की जरूरत पड़ी तो वह उसे सवा सेर गेहूँ देता है और उसकी सहायता समय पर कर देता है।

खलिहानी लेने वाला महाराज :
महाराज अपने गाँव के किसानों से वर्ष में दो बार खलिहानी माँगने जाता है। प्रत्येक किसान आदरपूर्वक श्रद्धा से खलिहानी में अच्छी तौल का अन्न देते हैं। शंकर तो उसे बेहिसाब खलिहानी देता है।

गाँव का अकेला महाजन महाराज :
गाँव के किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता अन्न या धन देकर करता रहता है। गाँव में वह ऐसा अकेला ही व्यक्ति है, जो सभी किसानों की जरूरत के समय सहायता करने को तैयार रहता है। लेकिन सभी से ऊँचे दर का मूद वसूल करता है।

लोभी लालची महाजन :
शंकर के गाँव का महाजन लोभी और लालची है। वह किसी भी व्यक्ति को अपने लालच के चंगुल में फंसाकर उसे शीघ्र मुक्ति नहीं देता। स्वयं शंकर उससे सवा सेर गेहूँ उधार लेता है। सात वर्ष में उस सवा सेर गेहूँ का साढ़े पाँच मन गेहूँ के ऋण का बोझ शंकर पर डाल देता है। जीवन भर उसके ऋण को शंकर चुका नहीं पाता।

निर्दयी और कठोर हृदय महाराज :
महाराज सूदखोर होने के साथ-साथ निर्दयी भी है और कठोर हृदय भी। शंकर के बीमार होने की दशा में भी वह उसे अपने यहाँ काम करने से मुक्ति नहीं देता है। अन्त में शंकर इस संसार से विदा लेता है। उसके बाद भी एक सौ बीस रुपये का ऋण शेष बताकर उसके (शंकर के) जवान बेटे को भी बंधुआ मजदूरी करने के लिए पकड़ लेता है। उसमें दीन-दुःखियों के प्रति कोई भी सहृदयता और सहानुभूति नहीं है।

एहसान न मानने वाला बेईमान महाराज :
शंकर अपने खेतों से महाराज को जी खोलकर खलिहानी देता है। वह सोचता है कि मैं इनके सवा सेर गेहूँ को अलग से क्या दूँ? वह सोचता है कि महाराज भी इसी तरह समझ लेंगे, जिस तरह मैं सोच रहा हूँ। लेकिन शंकर की उदारता का लाभ वह महाराज लेता रहा और उसके ऊपर सवा सेर गेहूँ के बदले साढ़े पाँच मन गेहूँ के ऋण का बोझ रख दिया। महाराज एहसान फरामोश और बेईमान व्यक्ति है।

लोगों की श्रद्धा और भक्ति का लाभ लेना :
महाराज शंकर के गाँव के सभी किसानों की श्रद्धा और भक्ति की भावना का लाभ स्वयं लेता रहा। प्रत्येक किसान उस महाराज को वर्ष में खेती पकने पर दो बार खलिहानी देते हैं। वे उसके प्रति अंधी भक्ति रखते हैं। उन लोगों को अगले जन्म में ऋण चुकता करने का भय दिखाकर सरल और उदार हृदय लोगों का शोषण करता है।

उपसंहार :
शंकर के गाँव का महाराज एक चालाक, धोखेबाज, सूदखोर व्यक्ति है जो प्रत्येक क्षण लोगों के शोषण का नया मार्ग अपनाता रहता है।

प्रश्न 3.
“शंकर एक गरीब किसान होते हुए भी समस्याओं से कभी घबराता नहीं था।” उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
प्रस्तावना :
शंकर गाँव का किसान है। सीधा सादा व्यक्ति है। आहार-व्यवहार में भी भोला-भाला। वह यदि ठगा भी गया, तो भी खुश ही रहा। भाग्य और जन्म-जन्मान्तर के खेल में वह विश्वास करता था। उसके दरवाजे पर आये हुए अतिथि भगवान होते थे। उनकी खातिर में सब कुछ खर्च कर देता था। वह विश्वास करता था कि ‘साधु न भूखा जाय’, का सिद्धान्त उसके लिए सर्वोपरि था।

महात्माओं का आना :
शंकर के घर में आर्थिक तंगी थी। दोनों समय भोजन मिलने में भी कोताही। परन्तु महात्माओं के लिए गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ उधार लाया और फिर उन अतिथियों को छककर भोजन कराया गया। महात्मा आशीष देकर विदा हुए।

सवा सेर गेहूँ का ऋण बना पहाड़ जैसा भार :
शंकर गाँव के महाराज को खलिहानी में वर्ष में दो बार अन्न देता रहा। वह भी पाँच सेर से बढ़कर। फिर भी महाराज ने अपने सवा सेर गेहूँ के ऋण को द्रोपदी का चीर बना दिया। अपने सवा सेर गेहूँ के बदले उसने शंकर पर साढ़े पाँच मन गेहूँ का ऋण लाद दिया।

बंधुआ मजदूर बना शंकर :
शंकर महाराज के ऋण को चुकाने की स्थिति में नहीं रहता। सूद के रूप में वह मजदूर बनकर महाराज के यहाँ काम करता है। घर के खर्चे के लिए उसकी पत्नी और बच्चे मजदूरी करते हैं। इतना सब कुछ होने की दशा में शंकर बिल्कुल भी नहीं घबराता। महाराज की प्रत्येक बात को अपना संस्कार और पूर्वजन्म का प्रभाव समझकर स्वीकार कर लेता है।

शंकर का अन्त और पुत्र का बंधुआ मजदूर होना :
शंकर महाराज के यहाँ बीस वर्ष तक बंधुआ मजदूर की तरह कार्य करता है। अन्त में उसकी मृत्यु हो जाती है। फिर भी “एक सौ बीस रुपये” का ऋण अपने सिर छोड़कर दूसरी दुनिया में चला जाता है। महाराज उसके जवान बेटे को गरदन पकड़कर अपने घर बंधुआ मजदूर बनाकर रखता है।

उपसंहार :
इस दुनिया में शंकर जैसे परिश्रमी, ईमानदार लोग पूर्व संस्कारों और अगले जन्म के भय के वशीभूत होकर सवा सेर गेहूँ के ऋण को किसी देवता के “अभिशाप के दाने की तरह” भोगते रहते हैं।

प्रश्न 4.
“यह कहानी प्राचीन भारत में किसानों के होने वाले शोषण को उजागर करती है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर:
प्रस्तावना-शंकर एक गरीब किसान अपने गाँव में कृषि करता है। वे दो भाई हैं। उसका दूसरा भाई मंगल है। दोनों भाइयों का परिवार सन्तोष और धैर्य से गरीबी में भी एक इज्जतदार कृषक परिवार के सम्मान को पाया हुआ है। दो बैलों से किसानी करते हैं। निर्धनता का यह आलम है कि शंकर को भोजन मिला तो खाया, न भी मिला तो भला, चना-चबैना से गुजर हुई-पानी पिया सो गया। ‘राम’ का जाप करते नींद आयी।

लेकिन उस शंकर में अतिथियों, महात्माओं के प्रति बड़ी श्रद्धा थी, भक्ति थी। उनके आने पर उनका आतिथ्य अच्छे भोजन से कराया जाना नहीं भूलता। वह स्वयं भूखा सो सकता था, लेकिन साधू को कैसे भूखा सुलाता क्योंकि भगवान के भक्त जो ठहरे।

एक दिन संध्या समय कुछ साधु-महात्मा आए। सन्ध्या समय भोजन आदि का इन्तजाम करने की चिन्ता में शंकर गाँव में गया। किसी ने भी गेहूँ का आटा नहीं दिया। देते भी कहाँ से, उनके घर में जौ के अलावा कोई अन्य अन्न होता ही नहीं। चिन्तित शंकर को गाँव के महाराज के यहाँ से सवा सेर गेहूँ उधार मिल गए। उसकी पत्नी ने गेहूँ पीसा और साधु महात्माओं को भोजन कराया। प्रातः हुई और महात्मा आशीष देकर चले गये।

महाराज रूपी महाजन :
शंकर ने महाराज को खलिहानी के रूप में कुछ ज्यादा खलिहानी दे देना उचित समझा कि सवा सेर गेहूँ क्या लौटाऊँ ? पसेरी के बदले कुछ ज्यादा ही खलिहानी दे दी गई। वर्ष में दो बार खलिहानी उगाहने का रिवाज इन महाराज महोदय ने पनपा लिया था। प्रति किसान दो बार खलिहानी से वर्ष में काफी अन्न प्राप्त होता रहा। ये लोग बिना परिश्रम किए ही मुफ्त में अन्न धन प्राप्त करते रहे। ये सब होता था किसानों की उदारता और दरियादिली के कारण।

शोषण की स्थिति :
कृषक के कृषि उत्पादन पर न जाने कितने प्रकार की रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्था के चलते निकम्मे लोगों के पोषण का भार होता था। इसका प्रभाव सीधा कृषक की आर्थिक दशा पर पड़ता था। कथित महाराज भी इन्हीं निकम्मे लोगों का प्रतीक है जिसने शंकर जैसे सीधे भोले-भाले कृषक को अपने चंगुल में फंसाया हुआ है।

शंकर को दिए गये सवा सेर गेहूँ का ऋण जीवन के बीस वर्ष तक बंधुआ मजदूर के रूप में महाराज के यहाँ मजदूरी करते-करते चुकता नहीं होता है। उसे अगले जन्म में चुकाने का भय दिखाकर, शंकर जैसे भोले और अशिक्षित किसानों को चतुर चालाक निकम्मे व्यक्ति ठगते रहते हैं।

महाराज से बना महाजन सवा सेर गेहूँ के बदले साढ़े पाँच मन गेहूँ का ऋण वसूलता है। सूद में सारे जीवन भर मजदूरी कराता है, बेगार लेता है। अन्त में बीस वर्ष की बंधुआ मजदूरी में, रोगी होकर, तिल-तिल जलती जिन्दगी से मुक्ति पाता हुआ शंकर दूसरी दुनिया में चला जाता है।

तात्पर्य है कि किसान ऋण में ही पैदा हुआ, ऋण में ही जीवन जीता रहा और ऋण में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। फिर भी ऋण का चुकता नहीं हुआ। शंकर सम्पूर्ण किसान जाति का प्रतीक है। महाराज रूपी महाजन उसके जवान पुत्र को भी एक सौ बीस रुपये का ऋण जिसे उसका बाप चुका नहीं पाया, बंधुआ मजदूर के रूप में चुकाने को मजबूर करता है।

अतः किसान का शोषण अन्तहीन हो गया। वह ऋण पीढ़ी-दर-पीढ़ी चुकाने के लिए ये महाराज रूपी महाजन अपने जाल बुनते रहते थे।

उपसंहार :
“यह कहानी प्राचीन भारत में किसानों के ऊपर होने वाले शोषण को उजागर करती है” इस कथन से हम पूर्णतः सहमत हैं। भारत के कुछ क्षेत्रों में यह शोषण अभी भी चालू है। सरकार इस तरह के शोषण के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करे और ऐसे कदम उठाए जिससे किसानों को उनकी आवश्यकता का ऋण समय पर उपलब्ध हो सके। साथ ही किसानों को भी अपने भले-बुरे का ज्ञान होना चाहिए। उन्हें भी शिक्षित होकर इन महाजन रूपी दैत्यों के चंगुल से बचे रहने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रश्न 5.
प्रस्तुत कहानी में आपको किस पात्र ने अधिक प्रभावित किया है? और क्यों? लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तावना :
एक गाँव है किसानों का। प्रायः सभी कृषि कर्म करते हैं। अपने-अपने कार्य में लगे रहकर, दीनता की पराकाष्ठा तक पहुँचकर भी स्वयं को धन्य, संतुष्ट और भाग्यशाली समझते हैं। भाग्य भरोसे और जन्म-जन्मान्तर के भोग और संस्कारों का प्रतिफल मानते हुए इस जीवन के घोर नरकतुल्य अवसादों की जिन्दगी जीते हैं।

पात्र परिचय :
प्रस्तुत कहानी में-शंकर, महाराज (महाजन), महात्मा (अतिथि), मंगल (शंकर का भाई), शंकर की पत्नी, उसका बेटा और मंगल की पत्नी और बच्चे, सभी पात्र हैं जो भारतीय कृषक गाँवों के निवासी किसान हैं। सभी अशिक्षित, महाजन (महाराज) की ठगी के शिकार, साधु-महात्माओं के आतिथ्य में बढ़-चढ़कर सामर्थ्य से अधिक खर्च करके स्वयं को ईश भक्तों की कतार में खड़ा करने की होड़ वाले हैं। इनका प्रतीक पात्र शंकर है। शंकर अपनी सीधी-सादगी भरी जिन्दगी, कर्मठ, अशिक्षा के कारण ठगी का शिकार होता है। जीवन भर शोषित ही रहकर संसार से विदा लेता है। उसका परिवार विघटित हो जाता है। दोनों भाई इज्जतदार किसान से मजदूर होकर दैन्य जीवन गुजारते हैं। प्रतिष्ठा दाँव पर लगा दी जाती है।

उपर्युक्त निर्दिष्ट पात्रों में मुझे प्रभावित किया है शंकर ने। इस पात्र ने मुझे क्यों प्रभावित किया है-इसका उत्तर भी इसी शोषित शंकर की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक दशा के चित्रण के संदर्भ में दे दिया जाएगा।

शंकर और मंगल निर्धन और शोषित कृषक परिवार के सदस्य हैं। लेकिन अपनी सीधी व सादगी भरी जिन्दगी की गाड़ी परिश्रम करके खींच रहे हैं। सामाजिक रूप से थोड़ा अधिक सम्मान पाने वाला अशिक्षित व्यक्ति दिखावे और बड़प्पन के चक्कर में पड़कर विपत्तियों और कष्टों को आमंत्रित करता रहता है। यही इस शंकर ने किया, स्वयं को अतिथि सत्कार करने में श्रेष्ठ, ईश भक्तों में श्रेष्ठ प्रदर्शित करने की आदत वाला अशिक्षित व्यक्ति साहूकारों से प्राप्त ऋण के चंगुल में पड़कर अपना सर्वस्व गँवा बैठता है।

महात्मा को गेहूँ का श्रेष्ठ भोजन कराने के चक्कर में सवा सेर गेहूँ का साढ़े पाँच मन गेहूँ हो जाता है और उस पहाड़ जैसे ऋण के चुकाने में सारा जीवन बंधुआ मजदूर के रूप में व्यतीत करता है। बड़े धैर्य से इसको सहन करते हुए अपनी पत्नी और पुत्र को भी ऋण चुकाने के चक्कर में कष्ट की चक्की में पिसने को मजबूर कर देता है।

यह शंकर ही है, जो प्रत्येक नई समस्या पैदा करता है अपने परिवार के लिए और स्वयं अविचलित होते हुए उस समस्याग्रस्त जीवन में फंसा रहता है। अपनी श्रेष्ठता को कायम रखने के कारण उसका और उसके भाई मंगल का आपसी विभाजन हुआ। स्वयं ने कड़े परिश्रम से परिवार के वृक्ष को रोपा, सींचा, बड़ा किया परन्तु अन्त में उसको काटने के लिए भी स्वयं महाजन के ऋण को अस्त्र रूप में प्रयोग करता है।

वर्ष में दो बार खलिहानी लेने वाला महाराज रूपी महाजन उसकी उदारता, सहृदयता, भोलेपन, श्रद्धा और भक्ति का लाभ उठाता है। शंकर ऐसे ठग की चालों में अपनी उदारता का प्रभाव देखना चाहता है। इसे चाहिए था पहली बार की ही खलिहानी पर सवा सेर गेहूँ अलग से अधिक दे देता है। परन्तु अपनी अव्यावहारिक नीति के कारण अपने परिवार के सदस्यों को भी कष्ट में झोंक देता है। स्वयं भी बीस वर्ष बंधुआ मजदूर की जिन्दगी भोगता हुआ चल बसता है।

उपर्युक्त सभी कारण ऐसे हैं जिनसे प्रभावित होकर शंकर सभी पाठकों का प्रिय पात्र बन जाता है। सभी इसके प्रति सहानुभूति रखते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी के आधार पर शंकर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी के आधार पर शंकर के चरित्र की दो विशेषताएँ लिखिए। (2017)
उत्तर:
प्रस्तावना :
‘सवा सेर गेहूँ’ मुंशी प्रेमचन्द की सामाजिक विरसता को अभिव्यक्ति देने वाली श्रेष्ठ कहानी है। कहानीकार ने इस कहानी में पात्रों का चयन एक खास वर्ग से किया है जिसकी करतूतों से समस्त भारतीय कृषक समुदाय सदैव से त्रस्त रहा है। आजादी के बाद लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था कायम होने के उपरान्त भी इस शोषक, शोषित और शोषण की अवस्था में कोई भी फर्क नहीं दीख पड़ा है। मुंशी प्रेमचन्द अपनी कहानियों में किसी एक समस्या को प्रधान रूप से इंगित करके जरूर चलते हैं लेकिन उसके परिप्रेक्ष्य में अन्य समस्याएँ उत्पन्न होकर समाज को जड़ समेत उखाड़ती-सी प्रतीत होती हैं।

शंकर एक प्रमुख पात्र :
‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी का प्रमुख पात्र शंकर है। सम्पूर्ण कहानी का घटना चक्र उसके चारों ओर घूमता है। अब यहाँ उसके चरित्र की कुछ विशेषताओं का उल्लेख करते हैं

(1) शंकर का आतिथ्य भाव :
शंकर अपने द्वार पर आए किसी भी महात्मा, साधु, संन्यासी या अन्य अतिथियों का आतिथ्य भक्ति और श्रद्धा से करता है। उसके लिए वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। घर में महात्मा को सांध्यकालीन भोजन में गेहूँ के आटे का उत्तम भोजन देकर, पुण्य अर्जन की कामना करता है। इसके निमित्त अपने ही गाँव के महाराज (महाजन) से सवा सेर गेहूँ उधार लाता है। उसकी पत्नी गेहूँ पीसती है, फिर भोजन तैयार होता है। इस अतिथि सत्कार के कार्यक्रम में शंकर के घर के सभी सदस्य अपना योग देते हैं। परन्तु स्वयं अपने और घर के : सदस्यों के लिए सम्भवत: चना-चबैना खाकर या पानी पीकर ही रात्रि गुजारना उनकी नियति था। आतिथ्य सत्कार का पुण्य और श्रेष्ठ गृहस्थी के जीवन का सपना कंगाली की कराहट में विभाजन तक पहुँच जाता है।

(2) अपने परिवार के प्रति समर्पित :
शंकर अपने परिवार के प्रति पूर्णतः समर्पित है। वह सप्रयास दोनों भाइयों के परिवार को सम्मिलित रूप में खड़ा करता है। वह परिवार रोपे गये, सींचे गए वृक्ष की तरह पल्लवित हुआ है। परन्तु दीनता की आरी ने असमय में काटना प्रारम्भ कर दिया जिससे शंकर की दर्द भरी चीख उठती है। लेकिन रात्रि के अन्धकार में अपने दुपट्टे से मुँह बाँधकर हफ्तों तक भूखे रहते समय बिताता है। वह नहीं चाहता कि उसका समृद्ध वृक्ष-परिवार विभाजित हो।

(3) सादगी भरा शंकर :
शंकर अपने व्यवहार और आचरण में सीधा-सादा और सादगी भरा है। वह ठग विद्या नहीं जानता। अतः वह स्वयं जैसा है, वैसे ही व्यवहार की आशा अन्य लोगों से करता है। महाराज (महाजन) अपनी चालों से, ठगी के पेंचों से ‘सवा सेर गेहूँ’ देकर ‘साढ़े पाँच मन’ गेहूँ के पहाड़ सरीखे कर्ज में डुबो देता है। यदि वह चालबाज होता, ठग विद्या अपनाने वाला होता तो निश्चय ही उसका परिवार कर्ज के सागर में न डूबता।

(4) अशिक्षित :
शंकर अशिक्षित किसान है। शिक्षित होता तो वह किसी भी तरह महाजन द्वारा ठगाई में नहीं आता और ‘सवा सेर गेहूँ’ का कर्ज तिल से ताड़ नहीं बनने देता।

(5) बंधुआ मजदूर :
शंकर महाजन (महाराज) की कुचालों में फंसकर उसका बँधुआ मजदूर होकर पूरी जिन्दगी बिता देता है। फिर भी उसका एक सौ बीस रुपये का ऋण शेष रह जाता है जिसे चुकता करने के लिए शंकर का नौजवान बेटा उसी राक्षस वृत्ति वाले निर्दयी महाराज द्वारा बंधुआ मजदूर बनाया जाता है।

(6) पति और पिता के रूप में शंकर :
शंकर एक पति के रूप में अपनी पत्नी के प्रति व्यवहार में श्रेष्ठता अपनाता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी उसके कारण हुए कर्ज को चुकाने के लिए कष्ट भोगे।।

शंकर एक पिता के रूप में खरा उतरता है। वह स्वयं निर्धनता के अनेक कष्ट भोगता हुआ भी अपने पुत्र को इन सभी कष्टों का आभास तक नहीं होने देता।

(7) सहृदय भाई :
शंकर एक सहृदय भ्राता है। जब उसका भाई मंगल पारिवारिक रूप से अलग होकर रहने लगता है, तो घर के इस विभाजन को बड़ी मुश्किल से सहन कर पाता है। विघटन और विभाजन को रोकने का उसका प्रयास विफल हो जाता है। अन्त में वह स्वयं इस विभाजन से टूट जाता है।

(8) शंकर की उदारता :
शंकर सहृदय और उदार है। सबसे पहले तो वह अपने परिवार के प्रति उदारता का व्यवहार करता है। दूसरे, घर के द्वार पर आए हुए अतिथियों का अपनी शक्ति से ऊपर होकर सत्कार करता है। साथ ही ठग और चालबाज महाराज को भी खलिहानी के रूप में अधिक अन्न देता है। यह सब शंकर के हृदय की उदारता ही है।

(9) उपसंहार :
शंकर सीधा, सरल व्यवहार वाला किसान है। किसान प्रकृति से सहनशील, कष्ट-सहिष्णु, भाग्यवादी और पूर्वजन्म के संस्कारों के प्रभाव से प्रभावित होते रहते हैं। ये सभी गुण शंकर में एक साथ विद्यमान हैं।

सवा सेर गेहूँ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शंकर के द्वार पर पधारे महात्मा की वेशभूषा कैसी थी?
उत्तर:
संध्या समय शंकर के द्वार पर एक महात्मा पधारे। वह तेजस्वी मूर्ति थे, पीताम्बर गले में, जटा सिर पर, पीतल का कमंडल हाथ में, खड़ाऊँ पैर में, ऐनक आँखों पर, सम्पूर्ण वेष महात्माओं का सा था।

प्रश्न 2.
शंकर ने किससे, कितना और क्यों गेहूँ उधार लिया था?
उत्तर:
गरीब किसान शंकर ने गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ उधार लिये थे क्योंकि एक दिन उसके द्वार पर एक महात्मा आ पहुँचे थे और उसके पास उन्हें खिलाने के लिए गेहूँ का एक दाना तक न था।

MP Board Solutions

सवा सेर गेहूँ पाठ का सारांश

शंकर एक किसान :
किसी गाँव में शंकर नाम का एक किसान था। वह अपने काम से काम रखता था, वह सीधा सादा और गरीब था। वह किसी के भी लेन-देन से दूर रहता था। व्यवहार में सरल; भोजन-अशन में सादा, जो मिला खा लिया। परन्तु द्वार पर आए अतिथि उसके लिए भगवान थे। स्वयं भूखा रह लेता, परन्तु आगन्तुक साधु-संन्यासियों की सेवा में दत्तचित्त रहता था। एक दिन घर आए हए महात्माओं के लिए घर में गेहूँ का आटा नहीं था। घर में सिर्फ जौ का ही आटा था। अतिथियों को तो गेहूँ का ही भोजन कराना है। अतः वह गाँव भर में आटे की तलाश में गया। पूरे गाँव में आटा नहीं मिला।

गाँव का महाराज :
गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ लिए, स्त्री ने आटा तैयार किया। महात्मा लोग भोजन करके आशीर्वाद देकर अगले दिन प्रात:काल चल दिए।

महाराज की खलिहानी :
महाराज वर्ष में दो बार खलिहानी लेते थे। शंकर ने सोचा कि इन्हें सेवा सेर गेहूँ क्या हूँ, पसेरी भर से ज्यादा खलिहानी दे दूँगा। दोनों ही आपस में समझ लेंगे। चैत के महीने में महाराज पहुँचे, डेढ़ पसेरी गेहूँ दे दिए गए। शंकर ने सवा सेर गेहूँ से स्वयं को उऋण समझ लिया। सवा सेर गेहूँ की चर्चा महाराज ने कभी नहीं की। महाराज अब महाजन होने लगे।

शंकर के घर की दशा :
शंकर किसान से मजदूर हो गया। छोटा भाई मंगल अलग हो गया। भाई के अलग होने पर शंकर फूट-फूट कर रोने लगा। कुल मर्यादा का वृक्ष उखड़ने लग गया। सात दिन लगातार एक दाना भी उसके मुंह तक नहीं गया। दिन में धूप में काम करता। मुँह लपेटकर रात को सोता। रक्त जल गया मांस मञ्जा घुल चुकी। खेती मान-मर्यादा के लिए रह गई। सब चौपट हो चला। सात वर्ष बीत चुके। शंकर मजदूरी से लौटकर आ रहा था। महाराज ने बुलाया और कहा कि तू अपने बोज-बेंग का हिसाब कर ले। तेरे हिसाब में साढ़े पाँच मन गेहूँ बाकी पड़े हैं। तू देने का नाम ही नहीं लेता, हजम करना चाहता है।

सवा सेर का साढ़े पाँच मन गेहूँ :
शंकर को अचम्भा हुआ। उसने कहा कि मैंने तुमसे कब गेहूँ लिए जो साढ़े पाँच मन हो गए। मुझ पर किसी का भी एक दाना व एक पैसा भी उधार नहीं है। महाराज ने कहा कि तुम अपनी नीयत के कारण कष्ट भोग रहे हो तभी तो खाने को नहीं जुड़ता। तब फिर महाराज ने सवा सेर गेहूँ का जिक्र किया।

शंकर ने कहा कि मैं बढ़-चढ़कर खलिहानी देता रहा। तुम्हारे सवा सेर गेहूँ अभी चुकता नहीं हुए। महाराज ने कहा-बख्शीस सौ-सौ हिसाब जौ-जौ। व्यर्थ की बहस छोड़, मेरा उधार दे।

बंधुआ मजदूर :
शंकर काँप गया। मेहनत मजदूरी करके साल भर में 60 रुपये जुड़े, उन्हें जमा करा दिया, शेष रुपया दो-तीन माह में लौटा देने का वादा किया। पन्द्रह रुपए शेष रह गए। उन्हें चुका नहीं सका। शंकर महाराज के यहाँ बंधक मजदूर हो गया। उसे आधा सेर जौ रोज कलेवा के लिए, ओढ़ने को साल में एक कम्बल मिला करता। एक मिरजई बनवा देता। शंकर महाराज की गुलामी में बँध गया। सवा सेर गेहूँ की बदौलत उम्र भर के लिए गुलामी की बेड़ियों में बँध गया।

उपसंहार :
शंकर इस सब को पूर्व जन्म का संस्कार मानता था। वे गेहूँ के दाने किसी देवता के शाप की भाँति पूरे जीवन उसके सिर से नहीं उतरे। शंकर महाराज के यहाँ बीस वर्ष तक गुलामी करता रहा। संसार से चल बसा। फिर भी एक सौ बीस रुपये उसके सिर पर सवार थे। शंकर के जवान बेटे को गरदन पकड़कर अपने यहाँ शंकर के ऋण को चुकाने के लिए बंधक मजदूर बनाया। वह आज भी काम करता है। ऐसे शंकरों और महाराजों से दुनिया भरी पड़ी है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति

कणों के निकाय तथा घूर्णी गति अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 7.1.
एक समान द्रव्यमान घनत्व के निम्नलिखित पिंडों में प्रत्येक के द्रव्यमान केंद्र की अवस्थिति लिखिए:

  1. गोला
  2. सिलिंडर
  3. छल्ला तथा
  4. घन।

क्या किसी पिंड का द्रव्यमान केंद्र आवश्यक रूप से उस पिंड के भीतर स्थित होता है?
उत्तर:

  1. गोला
  2. सिलिंडर
  3. छल्ला व
  4. घन.

चारों का द्रव्यमान केन्द्र उनका ज्यामितीय केन्द्र होता है। नहीं, जहाँ कोई पदार्थ नहीं है। जैसे वलय, खोखले सिलिंडर व खोखले गोले में द्रव्यमान केन्द्र पिंड के बाहर भी हो सकता है।

प्रश्न 7.2.
HCI अणु में दो परमाणुओं के नाभिकों के बीच पृथकन लगभग 1.27 Å (1Å = 10-10 m) है। इस अणु के द्रव्यमान केंद्र की लगभग अवस्थिति ज्ञात कीजिए। यह ज्ञात है कि क्लोरीन का परमाणु हाइड्रोजन के परमाणु की तुलना में 35.5 गुना भारी होता है तथा किसी परमाणु का समस्त द्रव्यमान उसके नाभिक पर केंद्रित होता है।
उत्तर:
माना द्रव्यमान केन्द्र H परमाणु से x दूरी पर है। माना हाइड्रोजन परमाणु का द्रव्यमान, m1 = m
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 1
तथा क्लोरीन परमाणु का द्रव्यमान m2 = 35.5 m
माना द्रव्यमान केन्द्र (मूलबिन्दु) के सापेक्ष H व C1 \(\vec { r } \) 1 व \(\vec { r } \) 2 दूरी पर है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 2
= 1.235
= 1.24 Å
अर्थात् द्रव्यमान केन्द्र H – परमाणु से 1.24 A की दूरी पर Cl परमाणु की ओर है।

प्रश्न 7.3.
कोई बच्चा किसी चिकने क्षैतिज फर्श पर एकसमान चाल v से गतिमान किसी लंबी ट्राली के एक सिरे पर बैठा है। यदि बच्चा खड़ा होकर ट्राली पर किसी भी प्रकार से दौड़ने लगता है, तब निकाय (ट्राली + बच्चा) के द्रव्यमान केंद्र की चाल क्या है?
उत्तर:
प्रश्नानुसार, ट्राली एक चिकने क्षैतिज फर्श पर गति कर रही है। इसलिए फर्श के चिकना होने के कारण निकाय पर क्षैतिज दिशा में कोई बाह्य बल नहीं लगता है। परन्तु जब बच्चा दौड़ता है तब बच्चे द्वारा ट्राली पर व ट्राली द्वारा बच्चे पर लगाए गए दोनों ही बल आन्तरिक बल होते हैं।
∴ \(\overrightarrow { F_{ ext } } \) = 0
संवेग संरक्षण के नियमानुसार M \(\overrightarrow { V_{ cm } } \) = नियतांक
∴ \(\overrightarrow { V_{ cm } } \) = नियतांक
अतः द्रव्यमान केन्द्र की स्थित चाल होगी।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.4.
दर्शाइये कि a एवं b के बीच बने त्रिभुज का क्षेत्रफल axb के परिमाण का आधा है।
उत्तर:
माना ∆AOB की संलग्न भुजाओं के सदिश \(\overrightarrow { a } \) व \(\overrightarrow { b } \) है।
∴ < AOB = θ
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 3
तथा माना त्रिभुज की ऊँचाई h है।
∴h = AC
समकोण ∆OCA में,
sin θ = \(\frac{AC}{OA}\)
या Ac = OA sin θ
h = b sin θ
हम जानते हैं कि त्रिभुज. AOB का क्षेत्रफल
= \(\frac{1}{2}\) × आधार × ऊँचाई
= \(\frac{1}{2}\) × OB × AC = \(\frac{1}{2}\) × a × b
= \(\frac{1}{2}\) × a × b sin θ
= \(\frac{1}{2}\) ab sin θ
पुनः सदिश गुणन के नियम से
\(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b } \) = ab sin θ \(\hat { n } \)
या |\(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b } \)| = |ab sin θ \(\hat { n } \)|
= ab sin θ [∴|\(\hat { n } \)| = 1]
∴समी० (ii) व (iii) से,
∆AOB का क्षेत्रफल = \(\frac{1}{2}\) |\(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b }\)|
= \(\frac{1}{2}\) \(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b } \) का परिमाणा

प्रश्न 7.5.
दर्शाइये कि a.(b × c) का परिमाण तीन सदिशों a, b एवं c से बने समान्तर षट्फलक के आयतन के बराबर है।
उत्तर:
माना OABCDEFG एक समान्तर षट्फलक है जिसकी भुजाएँ क्रमश: OA, OC व OE हैं।
माना कि
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 4
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 4a
जहाँ h = a cos θ = \(\overrightarrow { a } \) के शीर्ष द्वारा समचतुर्भुज OABC पर डाला गया लम्ब EE’ है = सदिश a की ऊँचाई।
पुनः माना V = समषट्फलक OABC = DEFG का आयतन है।
∴ V = तल OABC का क्षेत्रफल x OABC तल पर E से अभिलम्ब
= S × h
समी० (i) व (ii) से,
v = \(\overrightarrow { a } \) . (\(\overrightarrow { b } \) × \(\overrightarrow { c } \))

प्रश्न 7.6.
एक कण, जिसके स्थिति सदिश के x, y, z अक्षों के अनुदिश अवयव क्रमशः x, y, हैं, और रेखीय संवेग सदिश P के अवयव px, Py, Pz, हैं, के कोणीय संवेग 1 के अक्षों के अनुदिश अवयव ज्ञात कीजिए। दर्शाइये, कि यदि कण केवल x – y तल में ही गतिमान हो तो कोणीय संवेग का केवल :-अवयव ही होता है।
उत्तर:
माना OX, OY तथा OZ तीन परस्पर लम्बवत् अक्ष हैं। माना x – y तल में स्थिति सदिश
\(\overrightarrow { O } \)P = \(\overrightarrow { r } \) एक बिन्दु P है।
माना रेखीय संवेग \(\overrightarrow { P } \) का \(\hat { r } \) से कोण θ है व कोणीय संवेग \(\overrightarrow { L } \) है।
∴\(\overrightarrow { L } \) = \(\hat { r } \) × \(\hat { p } \)
यह एक संवेग राशि है जिसकी दिशा दाएँ हाथ के नियम से दी जा सकती है। चूँकि \(\hat { r } \) व \(\hat { p } \) तल OXY में हैं। अतः
\(\overrightarrow { r } \) = x\(\hat { i } \) + y\(\hat { j } \) + z\(\hat { k } \)
तथा
\(\overrightarrow { P } \) = px\(\hat { i } \) + py\(\hat { j } \) + pz\(\hat { k } \)
∴समी० (i) व (ii) से,
\(\overrightarrow { L } \) = (x\(\hat { i } \) + y\(\hat { j } \) + z\(\hat { k } \) ) ×
(px\(\hat { i } \) + py\(\hat { j } \) + pz\(\hat { k } \))
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 5
Px P, P.
तुलना करने पर,
Lx, = yPz – zPy
Ly, = zpx – xPz
Lz = xpy – yPx
समी० (iii) से, x, y व z – अक्षों के अनुदिश – के अभीष्ट घटक प्राप्त होते हैं।
हम जानते हैं कि xy – तल में गतिमान कण पर लगने वाला बलाघूर्ण
iz =xFy, – yFz.
जहाँ \(\hat { i } \)z = xy तल में गतिमान गण – अक्ष के अनुदिश लगने वाले बलाघूर्ण का घटक है।
माना xy – तल में \(\overrightarrow { v } \) वेग से गतिमान कण का द्रव्यमान = m इस वेग के vx, व vy, घटक क्रमश: x व – दिशा में हैं।
न्यूटन के गति के दूसरे समी० से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 6
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 6a
अतः समीकरण (vii) से यह निष्कर्ष निकलता है, कि. xy – तल में गतिमान कण का कोणीय वेग (\(\overrightarrow { L } \)) का केवल एक घटक अर्थात् z – अक्ष के अनुदिश है।

प्रश्न 7.7.
दो कण जिनमें से प्रत्येक का द्रव्यमान m एवं चाल v है d दूरी पर, समान्तर रेखाओं के अनुदिश, विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं। दर्शाइये कि इस द्विकण निकाय का सदिश कोणीय संवेग समान रहता है, चाहे हम जिस बिन्दु के परितः कोणीय संवेग लें।
उत्तर:
माना दूरी पर दो समान्तर रेखाओं के अनुदिश गतिमान प्रत्येक कण का द्रव्यमान m है।
माना v प्रत्येक कण विपरीत दिशा में चाल है। माना कि क्षण t व कण P1 व P2, बिन्दुओं पर हैं।
अब इन दोनों कणों द्वारा बनाए गए निकाय का किसी बिन्दु 0 के परितः कोणीय संवेग ज्ञात करते हैं। माना प्रत्येक कण का कोणीय संवेग \(\overrightarrow { L } \) 1 व \(\overrightarrow { L } \)2 है।
∴ \(\overrightarrow { L } \)1 = \(\overrightarrow { r } \)1 × m \(\overrightarrow { v } \) व \(\overrightarrow { L } \)2 = \(\overrightarrow { r } \)2 × m \(\overrightarrow { v } \)
माना कि निकाय का कोणीय संवेग \(\overrightarrow { L } \) है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 7

1. जहाँ θ1 व θ2, क्रमश: \(\overrightarrow { r } \)1, \(\overrightarrow { v } \) व \(\overrightarrow { r } \)2, (-\(\overrightarrow { v } \)) के बीच कोण हैं। (चित्र)।
चूँकि कण की स्थिति समय के सापेक्ष परिवर्तित होती है।
अतः \(\overrightarrow { v } \) की दिशा समान रेखा में होगी तथा OM – ON = r2 sin θ2, व ON =r2 sin 6 नियत रहेगा।
पुनः OM – ON = d = MN
∴ r1 sin θ1 – r2 sin θ2 = d

2. समी० (i) व (ii) से,
L = mvd
\(\overrightarrow { L } \) की दिशा भी \(\overrightarrow { r } \) व \(\overrightarrow { v } \) के तल के लम्बवत् होती है। जोकि कागज के तल में होगी। यह दिशा समय के साथ अपरिवर्तित रहती है।
अर्थात् \(\overrightarrow { L } \) परिमाण व दिशा में समान रहता है।

प्रश्न 7.8.
w भार की एक असमांग छड़ को, उपेक्षणीय भार वाली दो डोरियों से चित्र में दर्शाये अनुसार लटका कर विरामावस्था में रखा गया है। डोरियों द्वारा ऊर्ध्वाधर से बने कोण क्रमश: 36.9° एवं 53.1° हैं। छड़ 2 m लम्बाई की है। छड़ के बाएँ सिरे से इसके गुरुत्व केन्द्र की दूरी d ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 8
उत्तर:
माना एक समान छड़ AB का भार W, है। यह छड़ दो डोरियों OA व 0 B से लटकायी गई है। ऊर्ध्वाधर से OA छड़ से 36.9° व 0 B छड़ से 53.1° कोण पर है।
<OAA’ = 90° – 36.9° = 53.1°
इसी प्रकार, <O’BB’ = 36.9°
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 9
AB – 2M, AC = d मीटर
माना डोरी OA व O’B में तनाव क्रमश: T1, व T2, है। यहाँ वियोजित घटक चित्रानुसार होंगे।
चूँकि छड़ विराम में है, अत: A’ B’ अक्ष के अनुदिश व लम्बवत् लगने वाले बलों का सदिश योग शून्य है। अतः
– T1, cos 53.1° + T2 cos 36.9° = 0 … (i)
तथा T1 sin 53.1° + T2, sin 36.9° – W = 0 … (ii)
A के परितः बलाघूर्ण लेने पर व बलाघूर्णों के योग का शून्य रखने पर –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 10
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 11

प्रश्न 7.9.
एक कार का भाग 1800 kg है। इसकी अगली और पिछली धुरियों के बीच की दूरी 1.8 m है। इसका गुरुत्व केन्द्र, अगली धुरी से 1.05 m पीछे है। समतल धरती द्वारा इसके प्रत्येक अगले और पिछले पहियों पर लगने वाले बल की गणना कीजिए।
उत्तर:
माना आगे के पहिए का द्रव्यमान = m ग्राम
∴ (900 – m) kg = प्रत्येक पहिए का द्रव्यमान
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 12
∴m × 1.05 = (900 – m) × 0.75
या 1.8m = 900 × 0.75
या m = 375 kg
∴ 900 – m = 525 kg
आगे के प्रत्येक पहिये का भार,
w1 = mg = 375 × 9.8 = 3675 न्यूटन
पीछे के प्रत्येक पहिये का भार,
W2 = 525 × 9.8 = 5145 न्यूटन
पृथ्वी द्वारा पहिये पर आरोपित बल = पृथ्वी की प्रतिक्रिया
= W1 = 3675 न्यूटन
इसी प्रकार, प्रत्येक पीछे के पहिये पर पृथ्वी द्वारा आरोपित बल = पृथ्वी की प्रतिक्रिया
w2 = 5145 न्यूटन

MP Board Solutions

प्रश्न 7.10.

  1. किसी गोले का, इसके किसी व्यास के परितः जड़त्व आघूर्ण 2MR2/5 है, जहाँ M गोले का द्रव्यमान एवं R इसकी त्रिज्या है। गोले पर खींची गई स्पर्श रेखा के परितः इसका जड़त्व आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
  2. M द्रव्यमान एवं R त्रिज्या वाली किसी डिस्क का इसके किसी व्यास के परितः जड़त्व आघूर्ण MR2/4 है। डिस्क के लम्बवत् इसकी कोर से गुजरने वाली अक्ष के परितः इस चकती का जड़त्व आघूर्ण ज्ञात कीजिए।

उत्तर:

1. माना व्यास AB के परित: R त्रिज्या के गोले का जड़त्व आघूर्ण IAB है। जबकि गोले का द्रव्यमान m है।
IAB = \(\frac{1}{2}\) MR2
माना गोले के व्यास AB के समान्तर स्पर्शी CD है।
∴समान्तर x – अक्षों की प्रमेय से,
स्पर्श रेखा के परितः गोले का जड़त्व आघूर्ण
ICD = IAB + MR2
= \(\frac{2}{5}\) MR2 + MR2
= \(\frac{7}{5}\) MR2
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 13

2. माना M द्रव्यमान तथा Rत्रिज्या के गोले के दो कास AB व CD हैं। माना चकती के लम्बवत् इसके द्रव्यमान केन्द्र 0 से गुजरने वाली अक्ष EF है।

चकती के लम्बवत् अक्ष DG है जोकि चकती की परिधि पर स्थित बिन्दु D से गुजरती है।
अर्थात् DG, EF के समान्तर है। माना चकती का EF अक्ष के परित: जड़त्व आघूर्ण IEF है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 14
∴ लम्बवत् अक्षों की प्रमेय से,
IEE = IAB + ICD
= \(\frac { MR^{ 2 } }{ 4 } \) + \(\frac { MR^{ 2 } }{ 4 } \) = \(\frac { MR^{ 2 } }{ 2 } \)
∴समान्तर अक्षों की प्रमेय से,
IDG = IEF + MR2
= \(\frac{1}{2}\) MR2 + MR2 = \(\frac{3}{2}\) 2

प्रश्न 7.11.
समान द्रव्यमान और त्रिज्या के एक खोखले बेलन और एक ठोस गोले पर समान परिमाण के बल आघूर्ण लगाये गये हैं। बेलन अपनी सामान्य सममित अक्ष के परितः घूम सकता है और गोला अपने केन्द्र से गुजरने वाली किसी अक्ष के परितः। एक दिये गये समय के बाद दोनों में कौन अधिक कोणीय चाल प्राप्त कर लेगा?
उत्तर:
माना खोखले बेलन व ठोस गोले के द्रव्यमान व त्रिज्या क्रमश: M व R हैं।
माना खोखले बेलन का सममित के परित: जड़त्व आघूर्ण L1, है तथा ठोस गोले का केन्द्र के परितः जड़त्व आघूर्ण I2, है।
∴I1 = MR2
[I = \(\frac{1}{2}\) (R12 + R22 ~ MR2R 2 ~ R1 ~ R1)
तथा I2 = \(\frac{2}{5}\) MR2
माना प्रत्येक पर लगाया गया बलापूर्ण \(\hat { k } \)  है। माना a, व a, क्रमश: बेलन व गोले पर कोणीय त्वरण हैं।
∴\(\hat { i } \) = I1α1 = I2α2
∴\(\frac { \alpha _{ 1 } }{ \alpha _{ 2 } } \) = \(\frac { I_{ 2 } }{ I_{ 1 } } \) = \(\frac{2}{5}\)
∴ α2 = 2.5 α1
माना ω1, व ω2, किसी क्षण t पर बेलन व गोले की कोणीय चाल है।
∴ω1 = ω0 + α1t व
ω2 = ω0 + α2t
= ω0 + 2.5 α1t
समी० (iv) व (v) से
ω2 > ω1
अर्थात् गोले की कोणीय चाल बेलन से अधिक होगी।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.12.
20 kg द्रव्यमान का कोई ठोस सिलिंडर अपने अक्ष के परितः 100 rad s-1 की कोणीय चाल से घूर्णन कर रहा है। सिलिंडर की त्रिज्या 0.25 m है। सिलिंडर के घूर्णन से संबद्ध गतिज ऊर्जा क्या है? सिलिंडर का अपने अक्ष के परितः कोणीय संवेग का परिमाण क्या है?
उत्तर:
दिया है:
m = 20 किग्रा
R = 0.25 मीटर
ω = 100 रेडियन प्रति सेकण्ड
माना बेलन की अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण I है
तब
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 15

प्रश्न 7.13.
(a) कोई बच्चा किसी घूर्णिका (घूर्णीमंच) पर अपनी दोनों भुजाओं को बाहर की ओर फैलाकर खड़ा है। घूर्णिका को 40 rev/min की कोणीय चाल से घूर्णन कराया जाता है। यदि बच्चा अपने हाथों को वापस सिकोड़ कर अपना जड़त्व आघूर्ण अपने प्रारंभिक जड़त्व आघूर्ण का 2/5 गुना कर लेता है, तो इस स्थिति में उसकी कोणीय चाल क्या होगी? यह मानिए कि घूर्णिका की घूर्णन गति घर्षणरहित है।

(b) यह दर्शाइए कि बच्चे की घूर्णन की नयी गतिज ऊर्जा उसकी आरंभिक घूर्णन की गतिज ऊर्जा से अधिक है। आप गतिज ऊर्जा में हुई इस वृद्धि की व्याख्या किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:

(a) माना बच्चे का प्रारम्भिक व अन्तिम जड़त्व आघूर्ण क्रमशः I1 व I2 है।
अतः
∴I2 = \(\frac{2}{5}\) I1 दिया है।
V1 = 40 rev/min = \(\frac{40}{60}\) rev/min
V2 = ?
∴ω1 = 2 πv1
माना बच्चे को बाहर की ओर हाथ फैलाकर व सिकोड़कर घूर्णीय चाल क्रमश: ω1 व ω2 है। रेखीय संवेग संरक्षण के नियम से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 16

(b) घूर्णन की प्रा० गतिज ऊर्जा =
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 17
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 17a
स्पष्ट है कि हाथ सिकोड़कर बच्चे की घूर्णन गतिज ऊर्जा, घूर्णन की प्रा० गतिज ऊर्जा से \(\frac{5}{2}\) गुना अधिक है।
अन्तिम स्थिति में गतिज ऊर्जा में वृद्धि, बच्चे की आन्तरिक ऊर्जा के कारण होती है।

प्रश्न 7.14.
3 kg द्रव्यमान तथा 40 cm त्रिज्या के किसी खोखले सिलिंडर पर कोई नगण्य द्रव्यमान की रस्सी लपेटी गई है। यदि रस्सी को 30 N बल से खींचा जाए तो सिलिंडर का कोणीय त्वरण क्या होगा? रस्सी का रैखिक त्वरण क्या है? यह मानिए कि इस प्रकरण में कोई फिसलन नहीं है।
उत्तर:
दिया है: बेलन का द्रव्यमान,
M = 3 kg
बेलन की त्रिज्या R = 0.4 m
स्पर्शरेखीय बल F = 30 N
α = ?
α = ?
माना खोखले बेलन का अक्ष के परितः जड़त्व घूर्णन है। अतः
τ = FR = 30 × 0.4 = 12NM
∴α = \(\frac { \tau }{ 1 } [latex] = [latex]\frac{12}{0.48}\) = 25 rads-2
∴α = Rα = 0.4 × 25

MP Board Solutions

प्रश्न 7.15.
किसी घूर्णक (रोटर) की 200 rads-1 की एकसमान कोणीय चाल बनाए रखने के लिए एक इंजन द्वारा 180 Nm का बल आघूर्ण प्रेषित करना आवश्यक होता है। इंजन के लिए आवश्यक शक्ति ज्ञात कीजिए। (नोट : घर्षण की अनुपस्थिति में एकसमान कोणीय वेग होने में यह समाविष्ट है कि बल का आघूर्णशून्य है। व्यवहार में लगाए गए बल आघूर्ण की आवश्यकता घर्षणी बल आघूर्ण को निरस्त करने के लिए होती है।) यह मानिए कि इंजन की दक्षता 100% है।
उत्तर:
दिया है:
ω = 200 रेडियन प्रति सेकण्ड
τ =180 न्यूटन मीटर
P = ?
सम्बन्ध P = τw से,
P = 180 × 200 = 36000 वॉट
= 36 किलो वॉट

प्रश्न 7.16.
R त्रिज्या वाली समांग डिस्क से R/2 त्रिज्या का एक वृत्ताकार भाग काट कर निकाल दिया गया है। इस प्रकार बने वृत्ताकार सुराख का केन्द्र मूल डिस्क के केन्द्र से R/2 दूरी पर है। अवशिष्ट डिस्क के गुरुत्व केन्द्र की स्थिति ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रारम्भिक चकती की त्रिज्या = R
काटकर अलग की गई चकती की त्रिज्या = \(\frac{R}{2}\)
माना A व a चकतियों के क्षे० हैं।
अतः A = π(\(\frac{R}{2}\))2 = \(\frac { \pi R^{ 2 } }{ 4 } \)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 18

यहाँ 0 प्रारम्भिक चकती का केन्द्र है।
तथा 01 अलग किए गए गोल भाग का केन्द्र है।
व 02, बचे हुए भाग का केन्द्र है।
ρ = डिस्क का प्रति एकांक क्षेत्रफल द्रव्यमान है।
माना m, व m वास्तविक चकती व अलग किए गए चकती के द्रव्यमान है।
अतः
m1 = ρA = πR2ρ
तथा m = ρa = \(\frac { \pi R^{ 2 } }{ 4 } \) ρ
माना शेष बचे भाग का द्रव्यमान m है।
अतः m2 = m1 – m
= πR2ρ – \(\frac { \pi R^{ 2 } }{ 4 } \) = \(\frac{3}{4}\) πR2ρ
माना मूल बिन्दु 0 है।
माना Rcm बचे भाग का द्रव्यमान केन्द्र है।
अतः
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 19
दिया है: x1 = 001, OA – 0,
A = R – \(\frac { R }{ 2 } \) = \(\frac{R}{2}\)
m = \(\frac{π}{4}\) R2ρ
m2 = \(\frac{3}{4}\) πR2ρ
x2 = OO1, OA – O1
A = R – \(\frac{R}{2}\) = \(\frac{R}{2}\)
m = \(\frac{π}{4}\) R2ρ
m2 = \(\frac{3}{4}\) R2ρ
x2 = OO2
समी० (i) व (ii) से,
O = mx1 + m2m2x2
या x2 = \(-\frac { mx_{ 1 } }{ m_{ 2 } } \)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 20
ऋणात्मक चिह्न यह व्यक्त करता है कि बचे भाग का द्रव्यमान केन्द्र 0 से बाईं ओर है जोकि कटे भाग के केन्द्र के विपरीत ओर है।

प्रश्न 7.17.
एक मीटर छड़ के केन्द्र के नीचे क्षुर-धार रखने पर वह इस पर संतुलित हो जाती है जब दो सिक्के, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 5g है, 12.0 cm के चिह्न पर एक के ऊपर एक रखे जाते हैं तो छड़ 45.0 cm चिह्न पर संतुलित हो जाती है। मीटर छड़ का द्रव्यमान क्या है?
उत्तर:
माना m ग्राम = द्रव्यमान/छड़ की ल० सेमी
माना m मीटर का कुल द्रव्यमान व m = 100 ग्राम है।
जब मीटर केन्द्र पर सन्तुलित होता है, तब प्रत्येक भाग का द्रव्यमान = 50 मी/ग्राम
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 21
माना 12 सेमी चिह्न पर रखे दो सिक्कों का द्रव्यमान m2 है।
m2 = 5 × 2 = 10 ग्राम
द्रव्यमान केन्द्र = 45 सेमी के चिह्न पर (बिन्दु A)
चूँकि छड़ी सन्तुलन में है। अतः बिन्दु A के परितः अलग – अलग द्रव्यमानों का आघूर्ण समान है।
∴ 12m × 39 + 10 × 33 + 33m × \(\frac{33}{2}\)
= 55m × \(\frac{55}{2}\)
या \(\frac { (55)^{ 2 } }{ 2 } \) m – \(\frac { (33)^{ 2 } }{ 2 } \)m – 12 × 39m = 330
या (3025 – 1089 – 936) m = 330 × 2 = 660
या 1000m = 660
या m = 0.66 ग्राम

प्रश्न 7.18.
एक ठोस गोला, भिन्न नति के दो आनत तलों पर एक ही ऊँचाई से लुढ़कने दिया जाता है।

(a) क्या वह दोनों बार समान चाल से तली में पहुँचेगा?
(b) क्या उसको एक तल पर लुढ़कने में दूसरे से अधिक समय लगेगा?
(c) यदि हाँ, तो किस पर और क्यों?

उत्तर:
माना तल – 1 पर निम्न बिन्दु से शिखर तक चली दूरी व झुकाव क्रमश: I1 व θ2 है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 22
तथा तल – 2 पर निम्न बिन्दु से शिखर तक चली दूरी व झुकाव क्रमश: I2, व θ2 है।
∴sin θ1 > sin θ2
या \(\frac { sin\theta _{ 1 } }{ sin\theta _{ 2 } } \) > 1
प्रत्येक झुके तल की ऊँचाई,
λ = I1 sin θ1 = I2 sin θ2, (a) है।
तल के शिखर पर, गोले में केवल स्थितिज ऊर्जा होगी। i. e., PE = mgh
जहाँ m = गोले का द्रव्यमान है।
जब गोला शिखर से निम्न बिन्दु तक लुढ़कता है, तो स्थितिज
ऊर्जा, रैखिक ऊर्जा (\(\frac { 1 }{ 2 } I\omega ^{ 2 }\)) गतिज ऊपरिवर्तित हो जाती है। जहाँ I गोले का जड़त्वाघूर्ण है।
माना तल के निम्न बिन्दु पर रेखीय वेग v व कोणीय चाल ω है।
माना v 1 व 2 क्रमश: दोनों तलों (1 व 2) पर निम्न बिन्दु पर रेखीय वेग है।
अतः
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul
जहाँ K घूर्णन त्रिज्या है।
समी० (ii) व (iii) से स्पष्ट है कि प्रत्येक स्थिति में गोला निम्न बिन्दु पर समान वेग से लौटता है।

(b) हाँ, यह तल – 1 पर तल – 2 से अधिक समय लेगा। यह समय कम झुकाव वाले तल के लिए अधिक होगा।
व्याख्या: माना तल – 1 व तल – 2 पर फिसलने में लिया गया समय क्रमशः t1, व t2 है।
ठोस गोले के लिए,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul a
हम जानते हैं कि, झुके तल पर वस्तु का त्वरण निम्न है –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul b
जहाँ θ = झुकाव
माना झुके तल – 1 व 2 पर गोले के त्वरण क्रमशः a<sub>1</sub> व a<sub>2</sub>
अतः
a1 = \(\frac { gsin\theta _{ 1 } }{ 7/5 } \)
= \(\frac{5}{7}\) g sin θ<sub>2</sub>
पुनः माना तल 1 व 2 पर फिसलने का समय क्रमश: t1 व t2 है।
अतः
सूत्र S = ut + \(\frac{1}{2}\)at से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul c
समय t, झुकाव कोण θ पर निर्भर करता है। अतः झुकाव कोण जितना कम होगा, गोला लुढ़कने में उतना ही अधिक समय लेगा।

प्रश्न 7.19.
2 m त्रिज्या के एक वलय (छल्ले) का भार 100 kg है। यह एक क्षैतिज फर्श पर इस प्रकार लोटनिक गति करता है कि इसके द्रव्यमान केन्द्र की चाल 20 cm/s हो। इसको रोकने के लिए कितना कार्य करना होगा?
उत्तर:
दिया है:
r = 2 मीटर
m = 100 किग्रा
द्रव्यमान केन्द्र का वेग,
v = 20 cms-1
= 0.20 मीटर/सेकण्ड
रोकने में व्यय कार्य = ?
माना वलय का कोणीय वेग ω है। अतः
ω = \(\frac{v}{r}\) = \(\frac{0.20}{2}\) = 0.10 सेकण्ड/से०
माना वलय का केन्द्र से गुजरती व तल के लम्बवत् अक्ष के परितः जड़त्वाघूर्णन I है।
I = mr2 = 100 × (2)2 = 400 kgm2
वलय की सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा = वलय की घूर्णन गतिज ऊर्जा + वलय की रेखीय गतिज ऊर्जा
या
E = \(\frac{1}{2}\) Iω2 + \(\frac{1}{2}\) mv2
या E = \(\frac{1}{2}\) × 400 × (0.10)2 + \(\frac{1}{2}\) × 100 × (0.20)2
= 200 × \(\frac{1}{100}\) + 2J
= 2 + 2 + 4J.
∴ कार्य ऊर्जा प्रमेय से,
रोकने में व्यय कार्य = वलय की सम्पूर्ण KE
= 4 जूल

MP Board Solutions

प्रश्न 7.20.
ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान 5.30 x 10-26 kg है तथा इसके केन्द्र से होकर गुजरने वाली और इसके दोनों परमाणुओं को मिलाने वाली रेखा के लम्बवत् अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण 194 x 10-46 kg m2है। मान लीजिए कि गैस के ऐसे अणु की औसत चाल 500 m/s है और इसकेपूर्णन की गतिज ऊर्जा, स्थानान्तरण की गतिज ऊर्जा की दो तिहाई है। अणु का औसत कोणीय वेग ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है: ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान
m = 5.30 x 10-26 किग्रा
ऑक्सीजन अणु का जड़त्वाघूर्णन
I = 1.94 x 10-46 किग्रा – मीटर
अणु का मध्य वेग v = 500 ms-1
औसत कोणीय चाल ω = ?
प्रश्नानुसार, घूर्णन की गतिज ऊर्जा,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 23

प्रश्न 7.21.
एक बेलन 30° कोण बनाते आनत तल पर लुढ़कता हुआ ऊपर चढ़ता है। आनत तल की तली में बेलन के द्रव्यमान केन्द्र की चाल 5 m/s है।

  1. आनत तल पर बेलन कितना ऊपर जायेगा?
  2. वापस तली तक लौट आने में इसे कितना समय लगेगा?

उत्तर:
दिया है: θ =30°
तलों में बेलन के द्रव्यमान केन्द्र की चाल, u = 5 मीटर/सेकण्ड

1. आनत तल पर लुढ़कते बेलन का त्वरण = – a
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 24
= 3.83 मीटर

2. माना तली तक आने में बेलन को T समय लगता है।
∴T = 2t जहाँ t आने या जाने का समय है।
∴\(\frac { gsin\theta }{ 1+\frac { K^{ 2 } }{ R^{ 2 } } } \) = \(\frac{9.8}{3}\) मीटर/से2
s = 3.83 मीटर
दिया है: प्रा० वेग = 0
∴सूत्र s = ut + \(\frac{1}{2}\) at2से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 25
∴T = 2 x 1.53 = 3.06s = 3.0s

प्रश्न 7.22.
जैसा चित्र में दिखाया गया है, एक खड़ी होने वाली सीढ़ी के दो पक्षों BA और CA की लम्बाई 1.6 m है और इनको A पर कब्जा लगा कर जोड़ा गया है। इन्हें ठीक बीच में 0.5 m लम्बी रस्सी DE द्वारा बाँधा गया है। सीढ़ी BA के । अनुदिश B से 1.2 m की दूरी पर स्थित बिन्दु F से 40 kg का एक भार लटकाया गया है। यह मानते हुए कि फर्श घर्षण रहित है और सीढ़ी का भार उपेक्षणीय है, रस्सी में तनाव और सीढ़ी पर फर्श द्वारा लगाया गया बल ज्ञात कीजिए।(g = 9.8 m/s2 लीजिए) (संकेत : सीढ़ी के दोनों ओर के संतुलन पर अलगअलग विचार कीजिए)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 26
उत्तर:
दिया है: AB = AC = 1.6 मीटर
DE = 0.5 मीटर
AD = DB = AE = EC = \(\frac{1.6}{2}\) = 0.8 मीटर
BF = 1.2 मीटर
AF = 0.4 मीटर
माना रस्सी में तनाव = T
फर्श द्वारा सीढ़ी पर बिन्दु B व C पर आरोपित बल
= N’B Nc = ?
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 27
W = 40 kg wt = 40 x 9.8 N = 392 N
माना = A’ = DE का मध्य बिन्दु
∴DA’ = \(\frac{5}{2}\) = 2.5 m,
DF = 125 m
चित्र में स्पष्ट है कि,
NB = Nc = W = 392 N
माना सीढ़ी AB व AC अलग-अलग सन्तुलन में है। A के परितः विभिन्न बलों का आघूर्ण लेने पर
NB x BC’ = W x DF + T x AA’ (AB सीढ़ी के लिए)
या NB x AB cosθ
= W x 0.125 + T x 0.8 sin θ
इसी सीढ़ी AC के लिए,
Nc x CC’ = T x AA’ या
Nc x AC cos θ = T x 0.8 sin θ
∆DEF’ में,
cos θ = \(\frac{DF}{DF}\) = \(\frac{0.125}{0.4}\)
= 0.3125 = cos θ 72.8°
∴θ = 72.8′
∴sin θ = 0.9553
tan θ = 3.2305
∴समी० (ii) व (iv) से,
NB × 1.6 × 0.392 × 0.125 + T × 0.8 × 0.9553
या 0.5 NB = 225 N
या \(\frac{1}{2}\)
∴Nc = NB – 98
= 225 – 98 = 147 N
∴समी० (vi) व (viii) से,
0.5 x \(\frac{147}{0.764}\) = 96.2N

प्रश्न 7.23.
कोई व्यक्ति एक घूमते हुए प्लेटफॉर्म पर खड़ा है। उसने अपनी दोनों बाहें फैला रखी हैं और उनमें से प्रत्येक में 5 kg भार पकड़ रखा है। प्लेटफॉर्म का कोणीय चाल 30 rev/min है। फिर वह व्यक्ति बाहों को अपने शरीर के पास ले आता है जिससे घूर्णन अक्ष से प्रत्येक भार की दूरी 90 cm से बदल कर 20 cm हो जाती है। प्लेटफॉर्म सहित व्यक्ति के जड़त्व आघूर्ण का मान 7.6 kg m2 ले सकते हैं।

  1. उसका नया कोणीय वेग क्या है? (घर्षण की उपेक्षा कीजिए)
  2. क्या इस प्रक्रिया में गतिज ऊर्जा संरक्षित होती है? यदि नहीं, तो इसमें परिवर्तन का स्त्रोत क्या है?

उत्तर:
दिया है: प्रत्येक हाथ में द्रव्यमान = 5 किग्रा
r1 = 90 cm = 0.90 मीटर
r2 = 20 cm = 0.20 मीटर
आदमी तथा प्लेटफॉर्म का जड़त्व आघूर्ण,
I = 7.6 kgm2
माना r1 व r2 दूरी पर जड़त्वाघूर्ण क्रमश: ।’1 व I’2 है।
तब सूत्र I = mr2 से,
I’1 = 2m × r12
= 2 × 5 × (0.9)2
= 8.1 kgm2
तथा I’2 = 2m × r22
= 2 × 5 × (0.2)2
= 0.4kgm2
माना, r1 व r2 दूरी पर निकाय (व्यक्ति + भार + प्लेटफॉर्म) का जड़त्वाघूर्ण क्रमशः
I1 व I है।
तब –
I1 = I’1 + I = 8.1+7.6 = 15.7 kgm2
तथा I2 = I’2I
= 0.4 + 7.6 = 8.0 kgm2
v1 = 30 rpm = \(\frac{30}{60}\) = \(\frac{1}{2}\)ps
ω1 = 2πv1 = 2π × \(\frac{1}{2}\) = πrads-1
माना r2 दूरी पर नवीन कोणीय चाल ω2, है।
∴कोणीय संवेग संरक्षण के नियम से,
या I1ω1 = I2ω2
15.7 × π = 8 × ω2
या ω2 = 15.7 \(\frac{π}{8}\)
= 1.9625 π rads -1
∴कोणीय आवृत्ति v2 निम्न है –
v2 = \(\frac { \omega _{ 2 } }{ 2\pi } \) = \(\frac{1.9625}{2π}\) × πrps
= \(\frac{1.9625}{2}\) × 60rpm
= 58.875rpm = 58.9 rpm = 59 rpm
नहीं, यहाँ गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं होगी? चूँकि घूर्णनी गति में कोणीय संवेग संरक्षित रहता है।
अत: यह आवश्यक नहीं है कि घूर्णनी गतिज ऊर्जा भी संरक्षित रहे जिसे निम्न रूप में समझाया जा सकता है –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 28
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 28a
अर्थात् के घटने पर घूर्णनी KE बढ़ती है। KE में यह परिवर्तन (i.e., वृद्धि) वस्तु के जड़त्वाचूर्ण को कम करने में व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य के व्यय होने के कारण होता है।

प्रश्न 7.24.
10g द्रव्यमान और 500 m/s चाल वाली बन्दूक की गोली एक दरवाजे के ठीक केन्द्र में टकराकर उसमें अंतःस्थापित हो जाती है। दरवाजा 1.0 m चौड़ा है और इसका द्रव्यमान 12 kg है। इसके एक सिरे पर कब्जे लगे हैं और यह इनसे गुजरती एक ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः लगभग बिना घर्षण के घूम सकता है। गोली के दरवाजे में अंत:स्थापन के ठीक बाद इसका कोणीय वेग ज्ञात कीजिए। (संकेत : एक सिरे से गुजरती ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः दरवाजे का जड़त्व – आघूर्ण ML2/3है)
उत्तर:
दिया है: गोली का द्रव्यमान
m =10g = 0.01 किग्रा
गोली का वेग v = 500 मीटर/से०
दरवाजे की चौ० b = 1.0 मीटर
दरवाजे का द्र० M = 12 किग्रा
कोणीय चाल ω = ?
ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
\(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{2}\) Iω2
माना कब्जे वाली भुजा के परित: जड़त्वाघूर्ण है।
∴I = \(\frac{1}{3}\)(M + m)(\(\frac{b}{2}\))2
(∴द्रव्यमान केन्द्र से दूरी = \(\frac{b}{2}\) तथा गोली दरवाजे में है।)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 29
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 29a
= 49.98 रेडियन/सेकंड

प्रश्न 7.25.
दो चक्रिकाएँ जिनके अपने – अपने अक्षों (चक्रिका के अभिलंबवत् तथा चक्रिका के केंद्र से गुजरने वाले) के परितः जड़त्व आघूर्ण I2 तथा I2 हैं और जो, ω1 तथा ω2 कोणीय चालों से घूर्णन कर रही है, को उनके घूर्णन अक्ष संपाती करके आमने – सामने लाया जाता है?

(a) इस दो चक्रिका निकाय की कोणीय चाल क्या है?
(b) यह दर्शाइए कि इस संयोजित निकाय की गतिज ऊर्जा दोनों चक्रिकाओं की आरंभिक गतिज ऊर्जाओं के योग से कम है। ऊर्जा में हुई इस हानि की आप कैसे व्याख्या करेंगे? ω1 ≠ ω2 लीजिए।

उत्तर:
माना I1 व I2 जड़त्व आघूर्ण वाली चकतियों की कोणीय चाल क्रमशः , ω1 व ω2, है। सम्पर्क में लाने पर दोनों चकतियों के निकाय का जड़त्व आघूर्ण I1 + I2 होगा।।
माना = पूरे निकाय की कोणीय चाल है।

(a) ∴ दोनों चकतियों के कुल प्रा० कोणीय संवेग,
L1 = I1ω1 + I2ω2
संयुक्त निकाय का कुल अन्तिम कोणीय संवेग,
L2 = (I1 + I2
कोणीय संवेग संरक्षण के नियम से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 30
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 30a
अतः E1 – E2 > 0 या E1 > E2
या E2 > E1 अर्थात् पूरे निकाय की घूर्णनी गतिज ऊर्जा दोनों चकतियों की प्रारम्भिक ऊर्जाओं के योग से कम है।
अतः दो चकतियों को सम्पर्क में लाने पर, गतिज ऊर्जा में कमी आती है। यह कमी दोनों चक्रिकाओं की सम्पर्कित सतहों के बीच घर्षण के बल के कारण होती है।

प्रश्न 7.26.
(a) लम्बवत् अक्षों के प्रमेय की उपपत्ति करें। [संकेत (x, y) तल के लम्बवत् मूल बिन्दु से गुजरती अक्ष से किसी बिन्दु x – y की दूरी का वर्ग (x2 + y2) है]
(b) समांतर अक्षों के प्रमेय की उपपत्ति करें (संकेत: यदि द्रव्यमान केन्द्र को मूल बिन्दु ले लिया जाये तो Σmiri = 0)
उत्तर:
(a) समकोणिक (लम्ब) अक्षों की प्रमेयकिसी समतल पटल को उसके तल में ली गई दो परस्पर लम्बवत् अक्षों Ox तथा OY के परित: जड़त्व आघूर्णों का योग इन अक्षों के कटान बिन्दु 0 में को जाने वाली तथा पटल के तल के लम्बवत् अक्ष OZ के परितः जड़त्व आघूर्ण के बराबर होता है। पटल का अक्ष Oz के परितः जड़त्व आघूर्ण
Iz = Iz + Iy
जहाँ Iz तथा Iy पटल का क्रमश: अक्ष OX तथा OY के परितः जड़त्व आघूर्ण है।
सिद्ध करना – माना एक पटल है जिसके तल में दो परस्पर लम्बवत् अक्षं Ox तथा OY ली गई हैं अक्ष OZ पटल के तल के अभिलम्बवत् है तथा Ox व OY के कटान बिन्दु०से गुजरती है।
माना अक्ष OZ से r दूरी पर m द्रव्यमान का एक कण P है। इस कण का अक्ष OZ के परितः जड़त्व आघूर्ण mr2 होगा। अतः पूरे पटल का अक्ष OZ के परित: जड़त्व आघूर्ण
Iz = Σmr2
लेकिन r2 = x2 + y2
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 31
जहाँ x व y कण भी क्रमशः अक्षों OY व Ox से दूरियाँ हैं।
∴I2 = Σm(x2 + y2)
= Σmx2 + Σmy2
लेकिन Ix = Σmx2 तथा Iy = Σmy2
अतः Iz = Iz + Iy

(b) समान्तर अक्षों की प्रमेय – किसी पिंड का किसी अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण (I) उस पिंड के द्रव्यमान केन्द्र में को जाने वाली समान्तर अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण (Icm) तथा पिंड के द्रव्यमान व दोनों अक्षों के बीच की लम्बवत् दूरी के वर्ग के गुणनफल के योग के बराबर होता है।
I = Icm + Ma2
जहाँ M पिंड का द्रव्यमान है तथा a दोनों अक्षों के बीच लम्बवत् दूरी है।
सिद्ध करना – माना एक समतल पटल है जिसका द्रव्यमान केन्द्र C है। माना पटल का पटल के तल में स्थित अक्ष AB के परितः जड़त्व आघूर्ण 1 है तथा इसके द्रव्यमान केन्द्र C से गुजरने वाली समान्तर अक्ष EF के परितः जड़त्व आघूर्ण Icm है। माना AB तथा EF अक्षों के बीच लम्बवत् दूरी a है।
माना EF अक्ष से दूरी पर m द्रव्यमान का एक कण Pहै। P की AB से दूरी (r + a) होगी।
P का AB के परितः जड़त्व आघूर्ण m (r + a)2 होगा।
अतः पूरे पटल का AB अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 32
I = Σm(r+a)2
= Σm(r2 + a2 + 2ar)
I = Σmr2 + Σma2 + 2aΣmr
लेकिन I cm = Σmr2
तथा a2Σm = a2M
तथा Σmr = 0 क्योंकि किसी पटल के समस्त कणों का पटल के द्रव्यमान केन्द्र में से गुजरने वाली अक्ष के परितः आघूर्णी का योग शून्य होता है। अतः
I = Icm + Ma2

प्रश्न 7.27.
सूत्र v2 = \(\frac { 2gh }{ (1+k^{ 2 }/R^{ 2 }) } \)को गतिकीय दृष्टि (अर्थात् बलों तथा बल आघूर्णों के विचार) से व्युत्पन्न कीजिए। जहाँ v लोटनिक गति करते पिंड (वलय, डिस्क, बेलन या गोला) का आनत तल की तली में वेग है।आनत तल पर वह ऊँचाई है जहाँ से पिंड गति प्रारंभ करता है। सममित अक्ष के परितः पिंड की घूर्णन त्रिज्या है और R पिंड की त्रिज्या है।
उत्तर:
माना M व R क्रमश: गोलीय पिंड के द्रव्यमान व त्रिज्या है, यह एक ऐसे आनत तल पर A बिन्दु पर रखा गया है जिसका क्षैतिज से झुकाव θ है।
∴ इस पिंड में A बिन्दु पर पूर्णत: स्थितिज ऊर्जा होगी।
E = mgh
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 33
जब यह पिंड तल पर फिसलना प्रारम्भ करता है, पिंड द्रव्यमान केन्द्र से गुजरने वाली अक्ष (i.e., c) से गुजरता है जो कि तल के समान्तर है। इसके भार व भार के घटक के कारण घूर्णनी गति नहीं होती है चूँकि इसकी क्रिया रेखा C से गुजरती है। इस प्रकार पिंड पर लगने वाला सम्पूर्ण बलाघूर्ण शून्य होगा। घर्षण बलाघूर्ण अर्थात् घूर्णन के कारण बल लगता है।
∴τ = FR
घूर्णन करते पिंड की सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा (E) में रैखिक गतिज ऊर्जा (Kt व घूर्णनी गतिज ऊर्जा (Kr) होती है।
i.e., E = K1+ Kr
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 34
तथा y = Rω = घूर्णन करते पिंड का रैखिक वेग
जहाँ ω कोणीय वेग है।
पिंड का जड़त्व आघूर्ण, I = \(\frac{1}{2}\)mK2 जहाँ K = घूर्णन त्रिज्या।
माना पृष्ठ सतह खुरदरी है तथा पिंड बिना फिसले ही घूर्णन करता है। बिन्दु B पर, पिंड में दोनों रैखिक व घूर्णनी गतिज ऊर्जाएँ होती हैं। बिन्दु B पर सम्पूर्ण ऊर्जा समी० (iii) के अनुसार होगी।
ऊर्जा संरक्षण के नियम से, बिन्दु A पर स्थितिज ऊर्जा = बिन्दु B पर सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 35

प्रश्न 7.28.
अपने अक्ष पर ω0 कोणीय चाल से घूर्णन करने वाली किसी चक्रिका को धीरे से (स्थानान्तरीय धक्का दिए बिना) किसी पूर्णतः घर्षणरहित मेज पर रखा जाता है। चक्रिका की त्रिज्या R है। चित्र में दर्शाई चक्रिका के बिन्दुओं. A, B तथा C पर रैखिक वेग क्या हैं? क्या यह चक्रिका चित्र में दर्शाई दिशा में लोटनिक गति करेगी?
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 36
उत्तर:
चक्रिका व मेज के मध्य घर्षण बल शून्य है। इस कारण चक्रिका लोटनिक गति नहीं कर पाएगी व मेज के एक ही बिन्दु B के सम्पर्क में रहते हुए अपनी अक्ष के परितः घूर्णनी गति करती रहेगी।
दिया है: बिन्दु A की अक्ष से दूरी R है।
अतः बिन्दु A पर रैखिक वेग, VA = Rω0 (तीर की दिशा में)
तथा बिन्दु B पर रैखिक वेग, VB = Rω0 (तीर की विपरीत दिशा में)
चूँकि बिन्दु C की अक्ष से दूरी \(\frac{R}{2}\)
अतः बिन्दु C पर रैखिक वेग vc = \(\frac{R}{2}\)ω0
(क्षैतिजत: बाईं ओर से दाईं ओर को) अर्थात् चक्रिका लोटनिक गति नहीं करेगी।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.29.
स्पष्ट कीजिए कि चित्र (प्रश्न 7.28) में अंकित दिशा में चक्रिका की लोटनिक गति के लिए घर्षण होना आवश्यक क्यों है?

  1. B पर घर्षण बल की दिशा तथा परिशुद्ध लुढ़कन आरंभ होने से पूर्व घर्षणी बल आघूर्ण की दिशा क्या है?
  2. परिशुद्ध लोटनिक गति आरंभ होने के पश्चात् घर्षण बल क्या है?

उत्तर:

1. बिन्दु B पर घर्षण बल B के वेग का विरोध करता है। अतः घर्षण बल तीर की दिशा में होगा। घर्षण बल आघूर्ण के कार्य करने की दिशा इस प्रकार है कि वह कोणीय गति का विरोध करता है। ω0 व τ दोनों ही कागज के पृष्ठ के अभिलम्बवत् कार्य करते हैं। इनमें ω0 कागज के पृष्ठ के अंतर्मुखी व र कागज के पृष्ठ के बहिर्मुखी है।

2. घर्षण बल सम्पर्क – बिन्दु B के वेग को कम कर देता है। जब यह वेग शून्य होता है तो चक्रिका की लोटन गति आदर्श सुनिश्चित हो जाती है। एक बार ऐसा हो जाने पर घर्षण बल का मान शून्य हो जाता है।

प्रश्न 7.30.
10 cm त्रिज्या की कोई ठोस चक्रिका तथा इतनी ही त्रिज्या का कोई छल्ला किसी क्षैतिज मेज पर एक ही क्षण 10π rads-1 की कोणीय चाल से रखे जाते हैं। इनमें से कौन पहले लोटनिक गति आरंभ कर देगा। गतिज घर्षण गुणांक µ k = 0.21
उत्तर:
दिया है: छल्ले तथा ठोस चक्रिका की त्रिज्या,
R = 10 सेमी = 0.1 मीटर
µk = 0.2
छल्ले का जड़त्व आघूर्ण = MR2 …. (i)
ठोस चक्रिका का जड़त्व आघूर्ण = \(\frac{1}{2}\) mR2 … (ii)
प्रा० कोणीय वेग = ω0 = 10π रेडियन/सेकण्ड
घर्षण बल के कारण गति होती है तथा घर्षण के कारण द्रव्यमान केन्द्र त्वरित होता है। छल्ला शून्य प्रारम्भिक वेग से चलता है। प्रारम्भिक कोणीय वेग 00 में मन्दन घर्षण बलाघूर्ण के कारण होता है।
हम जानते हैं कि µkN = ma
या µkmg = m
या a = µkg
तथा बलाघूर्ण τ = -Iα
= FR = µkmgR
जहाँ R = चकती या वलय की त्रिज्या
ऋणात्मक चिह्न प्रदर्शित करता है कि मन्दन बलाघूर्ण है। यहाँ u = 0
∴v = u + at से
v = at or a = \(\frac{v}{t}\)
समी० (iii) से a = µkg
या \(\frac{v}{t}\) = µkg
या v = µkgt’ (चकती के लिए)
समी० (iv) से
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 37
माना छल्ले की t समय व चकती की t’ समय बाद कोणीय वेग
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 38
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 38-a
R = 0.1 m, ω = 10m rads-1, µ = 0.2
समी० (x) व (xi) में रखने पर,
g = 9.8 ms-2
∴t = \(\frac { 0.1\times 10\pi }{ 3\times 0.2\times 9.8 } \) = 0.8s
तथा t’ = \(\frac { 0.1\times 10\pi }{ 3\times 0.2\times 9.8 } \) = 0.53s
अत: समी० (xii) व (xiii) से स्पष्ट है कि t’ < t अर्थात् चकती पहले फिसलना प्रारम्भ करेगी।

प्रश्न 7.31.
10 kg द्रव्यमान तथा 15 cm त्रिज्या का कोई सिलिंडर किसी 30° झुकाव के समतल पर परिशुद्धत: लोटनिक गति कर रहा है। स्थैतिक घर्षण गुणांक = 0.25

  1. सिलिंडर पर कितना घर्षण बल कार्यरत है?
  2. लोटन की अवधि में घर्षण के विरुद्ध कितना कार्य किया जाता है?
  3. यदि समतल के झुकाव में वृद्धि कर दी जाए तो के किस मान पर सिलिंडर परिशुद्धतः लोटनिक गति करने की बजाय फिसलना आरंभ कर देगा?

उत्तर:
दिया है:
m = 10 kg, R = 0.15 m, θ = 30°, µk = 0.25
1. बेलन पर लगने वाला घर्षण बल –
F = \(\frac{1}{3}\) mg sinθ
= \(\frac{1}{3}\) × 10 × 9.8 × sin 30° = 16.3 न्यूटन

2. चूंकि परिशुद्ध लोटनिक गति में, सम्पर्क बिन्दु पर कोई सरकन गति नहीं है। इसलिए घर्षण बल के विरुद्ध कृत कार्य, w = 0 है।

3. लोटनिक गति के लिए,
\(\frac{F}{R}\) = \(\frac{1}{3}\) tan θ ≤ µs
∴ tan θ = 3 ≤ µs
= 3 × 0.25 = 0.75
∴θ = tan-1(0.75)
= 37°

MP Board Solutions

प्रश्न 7.32.
नीचे दिए गए प्रत्येक प्रकथन को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा कारण सहित उत्तर दीजिए कि इनमें से कौन – सा सत्य है और कौन – सा असत्य है –

  1. लोटनिक गति करते समय घर्षण बल उसी दिशा में कार्यरत होता है जिस दिशा में पिंड का द्रव्यमान केंद्र गति करता है।
  2. लोटनिक गति करते समय संपर्क बिंदु की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
  3. लोटनिक गति करते समय संपर्क बिन्दु का तात्क्षणिक त्वरण शून्य होता है।
  4. परिशुद्ध लोटनिक गति के लिए घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है।
  5. किसी पूर्णतः घर्षणरहित आनत समतल पर नीचे की ओर गति करते पहिए की गति फिसलन गति (लोटनिक गति नहीं) होगी।

उत्तर:

  1. सत्य, चूँकि स्थानान्तरीय गति घर्षण बल के कारण ही उत्पन्न होती है। इसी बल के कारण पिंड का द्रव्यमान आगे की ओर बढ़ता है।
  2. सत्य, चूँकि लोटनिक गति, सम्पर्क बिन्दु पर सी गति 1 के समाप्त होने पर प्रारम्भ होती है। इस प्रकार परिशुद्ध लोटनिक । गति में सम्पर्क बिन्दु की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
  3. असत्य चूँकि घूर्णन गति के कारण, सम्पर्क बिन्दु की गति में अभिकेन्द्र त्वरण अवश्य ही विद्यमान होता है।
  4. सत्य चूँकि परिशुद्ध लोटनिक गति में सम्पर्क बिन्दु पर कोई सरकन नहीं होता है। इस कारण घर्षण बल के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है।
  5. सत्य, घर्षण के न होने पर आनत तल पर छोड़े गए पहिए का आनत तल के साथ सम्पर्क बिन्दु विरामावस्था में नहीं रहेगा बल्कि पहिए के भार के अधीन माना तल के अनुदिश फिसलता जाएगा। इस कारण यह गति लोटनिक न होकर विशुद्ध सरकन गति होगी।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.33.
कणों के किसी निकाय की गति को इसके द्रव्यमान केन्द्र की गति और द्रव्यमान केन्द्र के परितः गति में अलग – अलग करके विचार करना।
दर्शाइये कि –
(a) P = p’i + miV
जहाँ pi (mi द्रव्यमान वाले) i – वें कण का संवेग है, और p’i = miv’i, ध्यान दें कि , द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष i – वें कण का वेग है। द्रव्यमान केन्द्र की परिभाषा का उपयोग करके यह भी सिद्ध कीजिए कि Σp’i = 0

(b) K = K’ + \(\frac { 1 }{ 2 }\) Mv2
K कणों के निकाय की कुल गति ऊर्जा, K’ = निकाय की कुल गतिज ऊर्जा जबकि कणों की गतिज ऊर्जा द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष ली जाये। MV2/2 संपूर्ण निकाय के (अर्थात् निकाय के द्रव्यमान केन्द्र के)स्थानान्तरण की गतिज ऊर्जा है। इस परिणाम का उपयोग भाग 7.14 में किया गया है।

(c) L = L’ + R x MV
जहाँ L’ = Σr’i, x P’i, द्रव्यमान के परितः निकाय का कोणीय संवेग है जिसकी गणना में वेग द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष मापे गये हैं। याद कीजिए r’ = ri – R; शेष सभी चिह्न अध्याय में प्रयुक्त विभिन्न राशियों के मानक चिह्न हैं। ध्यान दें कि L’ द्रव्यमान केन्द्र के परितः निकाय का कोणीय संवेग एवं MRx Vइसके द्रव्यमान केन्द्र का कोणीय संवेग है।

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 39

(जहाँ ‘ द्रव्यमान केन्द्र के परितः निकाय पर लगने वाले सभी बाह्य बल आघूर्ण हैं।)
[संकेत : द्रव्यमान केन्द्र की परिभाषा एवं न्यूटन के गति के तृतीय नियम का उपयोग कीजिए। यह मान लीजिए कि किन्हीं दो कणों के बीच के आन्तरिक बल उनको मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कार्य करते हैं।]
उत्तर:
(a) माना कि m1m2 …mn, दृढ़ पिंड की रचना करने वाले कणों के द्रव्यमान हैं तथा मूल बिन्दु 0 (0, 0) के सापेक्ष इन कणों के स्थिति सदिश क्रमश: \(\vec { r } \)1\(\vec { r } \)2…..\(\vec { r } \)n हैं।
माना कि मूल बिन्दु के सापेक्ष द्रव्यमान केन्द्र (G) की स्थिति
सदिश \(\vec { R } \) व द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष अलग – अलग कणों की स्थिति क्रमश: \(\vec { r } \)1,\(\vec { r } \)2 …. \(\vec { r } \)n हैं।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image f
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 40a
जहाँ \(\overrightarrow { p } _{ i }\) = mi \(\overrightarrow { v } _{ i }\) = i वे कण का मूल बिन्दु के सापेक्ष रेखीय संवेग है।
\(\overrightarrow { p } _{ i }\) = mi \(\overrightarrow { v } _{ i }\) = i वें कण का द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष रेखिक संवेग
परन्तु द्रव्यमान केन्द्र के परितः कणों के आघूर्ण का सदिश योग शून्य होता है।

(b) किसी निकाय की गतिज ऊर्जा में रैखिक गतिज ऊर्जा | (K) व घूर्णनी गतिज ऊर्जा (K’ ) होती है। i.e., द्रव्यमान केन्द्र की गति की गतिज ऊर्जा (\(\frac{1}{2}\)mv2) व कणों के निकाय के द्रव्यमान केन्द्र के परित: घूर्णनी गति की गतिज ऊर्जा (K’) होता है। अतः निकाय की कुल ऊर्जा निम्नवत् होगी –
k = \(\frac{1}{2}\)mv2 + Iω2
= \(\frac{1}{2}\)mv2 + K’ = K’ + \(\frac{1}{2}\)mv2

(c) समी० (i) के बाईं ओर \(\vec { ri } \) का सदिश गुणन लेने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 41
(d) माना कि कणों के निकाय पर बलाघूर्ण लगाया जाता है।
माना कि कण के लिए \(\vec { L } \) के घटक Lx, Ly, व Lz क्रमशः x, y व z अक्षों के अनुदिश हैं। माना कि px, py. व pz, इसके रैखिक संवेग के घटक हैं।
Lz = xpy – ypx
Lx = ypz – zpy
Ly = zpx – xpz
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 41a

MP Board Class 11 Physics Solutions