The Broken Wing Question Answer Class 11 English The Spectrum Chapter 16 MP Board

Class 11 English The Spectrum Chapter 16 The Broken Wing Questions and Answers

The Broken Wing Class 11th Question Answer

Word Power

A. There are some rhyming words given in the poem, find them and
write them down. [कविता में कुछ तुकान्त शब्द हैं, उन्हें ढूंढ़िए और लिखिए।
Answer:

  • past-last
  • flight-light
  • again-vain
  • ope-hope
  • spring-wing
  • note-throat.

B. How would you pronounce the underlined words in the sentences below ? Choose a word with a similar sound given in brackets.
रेखांकित शब्दों का आप कैसा उच्चारण करेंगे? कोष्ठक में दिए हए शब्दों में से मिलती-जुलती ध्वनि वाले शब्द चुनिए।
Answer:
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Comprehension

A. Answer the following questions in one or two sentences each.
इन प्रश्नों का उत्तर एक या दो वाक्यों में दीजिए।

Question 1.
Who does the poet mean by ‘she’?
‘she’से कवि का क्या अर्थ है ?
Answer:
By ‘she’ the poet means the country India.
‘she’ से कवि का अर्थ है देश भारतवर्ष।

Question 2.
What does the poet mean by ‘renascent light’ ?
‘renascent light’ से कवि का क्या तात्पर्य है ?
Answer:
By ‘renascent light the poet means the light which is reviving the glory of our country.
‘renascent light’ से कवि का तात्पर्य है वह प्रकाश जो हमारे देश के गौरव को पुनजीवित कर रहा है।

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Question 3.
What does ‘spring’ stand for? (2008, 10, 13)
‘spring’ किसका प्रतीक है?
Answer:
The period of the British Raj was like winter-cold and dreary and after it, independence will come like spring during which plants get new leaves and then they go on to bloom. Hence, ‘spring’ stands for independence.
ब्रिटिश राज का समय शीत ऋतु के समान था जो ठण्डी और विषादयमय होती है और उसके बाद स्वतन्त्रता वसंत के समान आएगी जिसमें पेड़ों में नई कोपलें आती है और फिर वे फूलों से लद जाते हैं। अत: ‘spring’ से तात्पर्य है स्वतन्त्रता।

Question 4.
What made the song-bird’s pinion bleed?
गाने वाले चिड़िया के पंख को लहूलुहान किसने किया था ?
Answer:
During the British Raj, the intellectuals had to bear the brunt of their repression. The song bird’s bleeding pinion (pinion of hope of the intellectuals) was the result of it.
ब्रिटिश राज के समय बुद्धिजीवियों को उनके दमन का प्रहार झेलना पड़ा था। गाने वाली चिड़िया का रक्तरंजित पंख (बुद्धिजीवियों की आशा के पंख) उसी का परिणाम था।

Question 5.
Which two lines in the poem show that the bird has already started its flight ?
कविता की कौन-सी दो पंक्तियाँ बताती हैं कि चिड़िया ने उड़ान भरना शुरू कर दिया
Answer:
The following two lines show it : निम्न पंक्तियों यह दर्शाती हैंBehold! rise to meet the destined spring
And scale the stars upon my broken wings!

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B. Answer the following questions in two to four sentences each.
इन प्रश्नों का दो से चार वाक्यों में उत्तर दीजिए।

Question 1.
What is meant by ‘age-long sleep’? (2015)
दीर्घकालिक निद्रा से क्या तात्पर्य है ?
Answer:
The period of sleep is a time of maximum inertia. The period of the British Raj is referred to as ‘age-long sleep’ because it was the period of great suppression resulting in inertia.

निद्रा का समय ऐसा होता है जिसमें अत्यधिक निष्क्रियता रहती है। ब्रिटिश राज के समय के कठोर दमन के कारण देश में निष्क्रियता आ गई थी। अतः उस समय को दीर्घकालिक निद्रा कहा है।

Question 2.
Why is the song bird’s wing broken? (2008, 09, 14)
गाने वाली चिड़िया का पंख क्यों टूटा था ?
Answer:
If the intellectuals were not suppressed they could have created an uprising in the country. Hence they were brutally suppressed. This was the cause of the broken wing of the song bird. (The bird in the poem has been compared with the people.)

यदि बुद्धिजीवियों का दमन नहीं किया जाता तो वे देश में विद्रोह करा सकते थे। अतः उनका कठोरता के साथ दमन किया गया। यही गाने वाली चिडिया के पंख टने का कारण था। (कविता में चिड़िया की लोगों से तुलना की गई है।)

Question 3.
Why is the song bird’s heart called wild ? What has it been suffering from?
गाने वाली चिड़िया के हृदय को विद्रोही क्यों कहा गया है ? वह किस कारण दुखी था ?
Answer:
The Indian intellectuals had not in their heart accepted that the British Rule was constitutional. Hence the song bird’s heart is called wild which also means rebellious. It was suffering from the oppression of the British Raj.

भारतीय बुद्धिजीवियों ने अपने हृदय से कभी स्वीकार नहीं किया था कि अंग्रेजों का शासन संवैधानिक था। अत: गाने वाली चिड़िया के हृदय को ‘wild’ कहा गया है क्योंकि उसका एक अर्थ विद्रोही भी होता है। वह ब्रिटिश राज के दमन से पीड़ित था।

Question 4.
Explain the use of the following adjectives for the song bird’s throat: far-reaching, unconquered.
गाने वाली चिड़िया के गले के लिए far-reaching और unconquered विशेषों का उपयोग क्यों किया गया है ? समझाइए।
Answer:
It is called far-reaching because its voice has the ability to rekindle the hopes and spirits. The brute force of the British Raj was able to suppress
physical activities but it was unable to impede mental activity. Hence, the poet has used the word unconquered.

उसको far-reaching इसलिए कहा गया क्योंकि उसमें आशा तथा उत्साह को फिर से जगाने का सामर्थ्य था। ब्रिटिश राज का कठोर दमन शारीरिक गतिविधि को तो रोक सकता था पर मानसिक गतिविधि पर अंकुश लगाना सम्भव नहीं था। अत: unconquered का उपयोग किया गया है।

Question 5.
What is meant by ‘realms of the bird’s desire’?
‘realms of the bird’s desire’ का क्या अर्थ है?
Answer:
It means the field of activity or interest that the bird desires.
इसका अर्थ है चिड़िया द्वारा चाहा गया गतिविधि या रुचि का क्षेत्र ।

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प्रश्न
महान सुबह आ रही है, दुख भरी रात जा चुकी है,
एक लम्बी निद्रा से अन्ततः वह जाग उठी है।
मधुर और लम्बे समय से सोई खुशी की कलियाँ खिल उठी हैं
आशा भरी हवाएँ लौटकर होठों को छू रही हैं,
हमारे उत्सुक हृदय ज्योतिर्मय उड़ान के लिए तैयार है
पुनरुत्पन्न प्रकाश गौरव की ओर ले जा रहा है,
जीवन और देश पूर्व निर्दिष्ट वसंत की प्रतीक्षा कर रहे हैं
गीत गाने वाली चिड़िया तुम क्यों अपना टूटा पंख हो रही हो ?
उत्तर
वसंत जो मरे प्राचीन देश को जगा रहा है
क्या मेरे विद्रोही दुखी हृदय को व्यर्थ ही आवाज देगा ?
या भाग्य के अन्धे बाण खामोश कर देंगे मेरे स्पन्दित स्वर को
या मेरे दुर्बल पर दूरगामी अविजित कंठ को ?
या एक दुर्बल लहरंजित पंख को थकाकर हतोत्साहित करेंगे
उच्च प्रदेशों तक उड़ने की मेरी अभिलाषा को ?
देखो ! मैं ऊपर जा रही हूँ पूर्व निर्दिष्ट वसंत से मिलने
और अपने टूटे हुए पंखों से सितारों से मिलने ! -सरोजिनी नायडू

The Broken Wing Summary in Hindi

कविता भारत में ब्रिटिश राज के उस काल का चित्रण करती है जब स्वाधीनता संग्राम शरू ही हुआ था। सदियों के प्रभुत्व ने भारतवासियों के आत्मबल को तोड़कर रख दिया था और उन बुद्धिजीवियों को भी आघात पहुँचाया था जो साधारण मनुष्य को अधिक प्रभावित कर सकते थे कवि, नाटककार, दूसरे लेखक। कविता में इनका प्रतिरूप है गाना गाने वाली चिड़िया। इनकी आवाज को बहुत समय से दबाया हुआ था। उनके (अंग्रेजों के) द्वारा किसी भी प्रतिकार को सख्ती से, कठोर बल प्रयोग तथा संवाद नियन्त्र” द्वारा दबाया जाता था। किन्तु अब भारतवासी जाग चुके थे। कविता में महान सुबह आसन्न स्वाधीनता है और दुःख भरी रात प्रभुत्वकाल। प्रत्याशा का आनन्द देश में फैला हुआ व्यापक तातावरण है जिसे खिलती हुई कलियों के रूप में चित्रित किया गया है और स्वाधीनता की आशा को वायु के पुनर्वागमन के रूप में। जिस प्रकार पक्षी सुबह होते ही प्रकाश की ओर उड़ने को तैयार होते हैं उसी प्रकार भारत के लोग भी स्वतन्त्रता के शानदार पथ पर चलने को तैयार हैं। ऐसे समय वे बुद्धिजीवियों, जिन्होंने अत्याचार का प्रहार भुगता है तथा जो टूटे हुए पंख वाले पक्षी के समान हैं, से पूछते हैं कि क्या उनमें इतनी शक्ति है कि वे उनके साथ चल सकेंगे ?

गीत गाने वाली चिड़िया का उत्तर प्रशंसनीय है। वह कहती है कि आजादी की जिस पुकार ने लोगों को जगा दिया है उस पुकार को उसका उन्मुक्त किन्तु दु:खी हृदय अनदेखी नहीं कर सकता। सदियों के दमन ने भले ही शरीर को कमजोर कर दिया हो, वह आत्मवल को निश्चय ही नहीं तोड़ पाया है। उसका शरीर भले ही दबाव में हो फिर भी उसका स्वर अविजित है। वह जख्मी पंखों को, लाबे समय से इन्तजार कर रही, उसकी स्वतन्त्रता की ओर उड़ान को रोकने नहीं देगी। इतना कहकर वह घायल चिड़िया ऊपर और ऊपर उड़ जाती है-अपनी हृदय की आकांक्षा, स्वाधीनता को प्राप्त करने के लिए।

The Broken Wing Meanings of Difficult Words

MP Board Class 11th English The Spectrum Solutions Chapter 16 The Broken Wing 3

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The Road Not Taken Question Answer Class 11 English The Spectrum Chapter 7 MP Board

Class 11 English The Spectrum Chapter 7 The Road Not Taken Questions and Answers

The Road Not Taken Class 11th Question Answer

Word Power

Question 1.
Combine words in column A with appropriate ones in column B and use them in the blank spaces of the given sentences.
कॉलम A के शब्दों में कॉलम B से उपयुक्त शब्द चुनकर जोड़िए और फिर दिये गये वाक्यों के खाली स्थानों में भरिये।।
Answer:

  • newspapers
  • childlike
  • something.
  • yellow fever
  • firewood.

Comprehension

A. Answer the following questions in one or two sentences each.
इन प्रश्नों का एक या दो वाक्यों में उत्तर दीजिए।

Question 1.
What did the traveller find in the yellow wood ? (2009, 12)
पीत वन में यात्री को क्या मिला ?
Answer:
He found two diverging roads.
उसे भिन्न दिशा में जाते दो रास्ते मिले।

Question 2.
How far could he see down the road ?
वह रास्ते पर कितनी दूरी तक देख सकता था ?
Answer:
He could see up to the bend in the undergrowth.
वह झाड़-झंखाड़ में आगे वाले मोड़ तक ही देख सकता था।

Question 3.
Why does the first road has a better claim ? (2010)
पहले रास्ते का दावा क्यों बेहतर था ?
Answer:
It had a better claim because it had more grass and was unused.
उसका दावा इसलिए बेहतर था क्योंकि उस पर ज्यादा घास थी और उसका उपयोग नहीं हुआ था।

Question 4.
Why does he doubt if he could ever come back?
उसे यह शक क्यों था कि वह कभी लौट कर आ सकेगा ?
Answer:
He doubted it because a road bifurcates and goes on and on. As such one can’t come back to the starting point.
उसे शक इसलिए था क्योंकि एक रास्ता आगे चलकर कई रास्तों में बँट जाता है और यह क्रम चलता रहता है। ऐसे में कोई भी शुरू के स्थान पर वापस नहीं आ पाता

Question 5.
What would he ask himself in future ?
वह भविष्य में अपने से क्या पूछेगा ?
Answer:
He would want to know, what could have happened had he taken the other road.
वह यह जानना चाहेगा कि यदि उसने दूसरा रास्ता चुना होता तो क्या होता।

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B. Answer the following questions in two to four sentences each.
[इन प्रश्नों का दो से चार वाक्यों में उत्तर दीजिए।

Question 1.
What do the two roads signify ? (2008, 09, 15)
वे दो रास्ते क्या दिखाते हैं ?
Answer:
The roads signify that there is a choice available. You have to make a decision as to which alternative to select.
वे यह दिखाते हैं कि चुनने के लिए विकल्प हैं। तुम्हें निर्णय लेना है कि कौन-सा विकल्प चुना जाए।

Question 2.
The poet calls himself a traveller. What does he mean by that? (2014)
कवि अपने को यात्री कहता है। इससे उसका क्या तात्पर्य है?
Answer:
He calls himself a traveller because he is moving on the path of life. He has no choice to stand still but to keep moving on.

वह अपने आपको यात्री कहता है क्योंकि वह जीवन के पथ पर आगे बढ़ रहा है। वह एक स्थान पर खड़ा नहीं रह सकता उसे तो चलते ही जाना है।

Question 3.
The ‘other road’ did not look as good as the first one. What, according to you, made the traveller opt for the other road ?
दूसरा रास्ता पहले रास्ते से अच्छा नहीं लग रहा था। तम्हारे विचार से उसने दसरे रास्ते को क्यों चुना ?
Why did the poet decide to opt for the other road ? (2011)
कवि ने दूसरे रास्ते को चुनने का निर्णय क्यों लिया ?
Answer:
He opted for the other road because it was less travelled. The idea of deviating from the rut has an attraction in itself.

उसने दूसरे रास्ते को इसलिए चुना क्योंकि उस पर कम चला गया था। घिसीपिटी चीजों से अलग हट कर कुछ करने में अपना अलग ही आकर्षण होता है।

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Question 4.
On taking the other road’, what did the traveller say for the first road?
दूसरा रास्ता पकड़ लेने के बाद यात्री ने पहले रास्ते के बारे में क्या कहा ?
Answer:
On taking the other road the traveller said that it will now not be possible for him to take the first one. The road that he has taken would lead to other roads and it will not be possible to come back to the starting point.

दूसरा रास्ता पकड़ लेने के बाद उसने कहा कि अब पहले रास्ते पर जाना उसके लिए सम्भव नहीं होगा। जो रास्ता उसने चुन लिया है वह दूसरे रास्तों में विभाजित होगा और शुरू के स्थान पर वापस लौटना सम्भव नहीं होगा।

Question 5.
What is the traveller’s justification when he doubts that he would return to take the first’ road ?
यात्री का इस सम्भावना पर शक करने का क्या औचित्य है कि वह वापस पहले वाले मार्ग पर आयेगा ?
Answer:
The traveller is justified in his doubt. The justification is that once he has taken the other road he will have to go on and on. He will not get an opportunity to come back and take the first road.

यात्री का शक करना न्याय संगत है। कारण यह है कि जब उसने दूसरा रास्ता स्वीकार कर लिया और उसे आगे ही बढ़ते जाना है तो उसे यह अवसर कभी नहीं मिलेगा कि वह पहले रास्ते पर वापस आ जाये।

Question 6.
The traveller had made a decision. Do you think he would regret the decision in future?
यात्री ने एक निर्णय ले लिया। क्या तुम सोचते हो कि इस निर्णय पर वह भविष्य में पश्चाताप करेगा ?
Answer:
When we are at a bifurcation point we have to choose between the alternatives available. It is natural to reflect at a later stage as to what would have happened had we chosen the other alternative. It is not necessary that one would regret the decision that he had taken.

जब हम एक विभाजन बिन्दु पर होते हैं तो हमको उपस्थित विकल्पों में से चुनाव करना ही होता है। बाद में इस चुनाव पर विचार करना स्वाभाविक है कि यदि हमने दूसरा विकल्प चुना होता तो क्या हुआ होता। यह आवश्यक नहीं है कि मनुष्य अपने किए गये निर्णय पर पश्चाताप करे।

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The Road Not Taken Hindi Translation

जंगल में दो रास्ते अलग-अलग दिशा में जा रहे थे,
और खेद है कि मैं दोनों पर एक साथ नहीं चल सकता था।
अकेला यात्री होने के कारण देर तक खड़ा सोचता रहा
और जहाँ तक नज़र जा सकती थी देखने का प्रयत्न करता रहा।

झाड़-झंखाड़ में एक रास्ता जिस ओर मुड़ रहा था,
देखने में दूसरा भी वैसा ही दिख रहा था।
शायद उसका दावा अधिक मजबूत था – उस पर कम चला गया था:
हालांकि उन पर चलने वालों के कारण ।
दोनों रास्ते करीब-करीब एक समान ही दिख रहे थे।

सुबह-सुबह उन पर पत्तियाँ पड़ी थीं,
जिनसे लगता था कि उन पर अधिक लोग नहीं चले हैं,
ओह, मैंने पहले वाले को कभी और के लिए छोड़ दिया,
यह जानते हुए भी कि कैसे एक रास्ते से दूसरे अनेक रास्त निकलते हैं,
और मैं उस पहले रास्ते पर कभी नहीं चल सकूँगा।

मैं आह भरते हुए कहूँगा,
कहीं युगों-युगों बाद,
कि जंगल में दो रास्ते भिन्न दिशाओं में जा रहे थे,
मैंने उस पर चलना पसन्द किया जिस पर कम लोग चले थे,
और उसी ने यह हमारा अन्तर पैदा किया है। -रॉबर्ट फ्रॉस्ट

The Road Not Taken Summary in Hindi

अक्सर जिन्दगी हम को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है जब हमारे सामने कई विकल्प होते हैं। एक को स्वीकारने का अर्थ होता है दूसरे को अस्वीकार करना। हम आसान रास्ते को चुन सकते है जिस पर अधिकतर लोग चलते हैं या फिर उस पर जिस पर जोखिम ज्यादा है और कम लोग उस पर चलना पसन्द करते हैं। एक लम्बे अन्तराल के बाद हम यह जानने के लिए उत्सुक हो उठते हैं कि यदि हमने दूसरा विकल्प स्वीकारा होता तो क्या होता।

The Road Not Taken Word Meanings of Difficult Words

MP Board Class 11th English The Spectrum Solutions Chapter 7 The Road Not Taken 1

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The Spectrum Textbook General English Class 11th Solutions

MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण सन्धि

MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण सन्धि

दो या दो से अधिक वर्षों के परस्पर मिलने से जो विकास या परिवर्तन होता है। उसे सन्धि कहते हैं।

जैसे–

  • विद्या + आलय = विद्यालय
  • रमा + ईश = रमेश
  • सूर्य + उदय = सूर्योदय
  • पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा
  • सत् + जन = सज्जन
  • एक + एक = एकैक

सन्धि तीन प्रकार की होती हैं

  1. स्वर संधि,
  2. व्यंजन संधि और
  3. विसर्ग संधि।

जब स्वर से परे स्वर होने पर उनमें जो विकार होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। दूसरे शब्दों में स्वर के बाद जब कोई स्वर आता है तो दोनों के स्थान में स्वर हो जाता है। उसे स्वर संधि कहते हैं;

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जैसे–

  • धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
  • रवि + इन्द्र = रवीन्द्र
  • भानु + उदय = भानूदय
  • सुर + इन्द्र सुरेन्द्र
  • सदा + एव = सदैव
  • इति + आदि = इत्यादि
  • नै + अक = नायक

स्वर संधि के भेद–स्वर संधि के पाँच भेद हैं–

  1. दीर्घ संधि,
  2. गुण संधि,
  3. वृद्धि संधि,
  4. यण संधि, और
  5. अयादि संधि।

1. दीर्घ संधि–ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ, के बाद ह्रस्व या दीर्घ अ इ, उ, ऋ क्रमशः आए तो दोनों को मिलाकर एक दीर्घ–स्वर हो जाता है।

जैसे–

  • परम + अर्थ = परमार्थ
  • राम + आधार = रामाधार
  • अभि + इष्ट = अभीष्ट
  • भानु + उदय = भानूदय
  • मही + इन्द्र = महीन्द्र
  • गिरि + ईश = गिरीश
  • महा + आशय = महाशय
  • अदय + अपि = यद्यपि

2. गुण संधि–अ अथवा आ के पश्चात् ह्रस्व या दीर्घ इ, उ, ऋ आए तो दोनों के स्थान पर क्रमशः ए, ओ तथा अर् हो जाते हैं।

जैसे–

  • सुर + इन्द्र = सुरेन्द्र
  • सुर + ईश = सुरेश
  • सूर्य + उदय = सूर्योदय
  • महा + ऋषि = महर्षि
  • महा + उत्सव = महोत्सव
  • वीर + इन्द्र = वीरेन्द्र
  • राज + ऋषि = राजर्षि
  • हित + उपदेश = हितोपदेश

3. वृद्धि संधि–हस्व अथवा दीर्घ अ के पश्चात् ए अथवा ऐ आने पर “ऐ” और ओ अथवा औ आने पर दोनों के स्थान पर “औ” हो जाता है।

जैसे–

  • सदा + एव = सदैव
  • मत + ऐक्य = मतैक्य
  • परम + औषधि = परमौषधि
  • वन + औषधि = वनौषधि
  • महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
  • जल + ओध = जलौध

4. यण सन्धि–हस्व या दीर्घ इ, उ, ऋ से परे अपने से भिन्न स्वर हो जाने पर इनके स्थान पर क्रमशः य, व और र होता है।

जैसे–

  • अति + उत्तम = अत्युत्तम
  • इति + आदि = इत्यादि.
  • प्रति + एक = प्रत्येक
  • यदि + अपि = यद्यपि
  • सु + आगत = स्वागत
  • अति + आचार = अत्याचार
  • पित्र + आदेश = पित्रादेश।

5. अयादि संधि–ए, ऐ, ओ, औ के पश्चात् स्वर वर्ण आने पर उनके स्थान .. पर अय, आय तथा अव हो जाते हैं।

जैसे–

  • पो + अन = पवन
  • पो + अक = पावक
  • नै + अक = नायक
  • न + अन = नयन
  • नै + इका = नायिका

जब व्यंजन और स्वर अथवा व्यंजन से मेल होता है, तो उसे व्यंजन संधि कहते हैं। जैसे

  • सत् + जन = सज्जन
  • उत् + चारण = उच्चारण
  • जगत + नाथ = जगन्नाथ
  • दुस + चरित्र = दुश्चरित्र
  • शरत् + चन्द्र = शरच्चन्द्र
  • महत् + चक्र = महच्चक्र
  • षट् + आनन = षडानन
  • दिक् + गज = दिग्गज
  • सद् + आचार = सदाचार
  • दिक् + अम्बर = दिगम्बर
  • वाक् + ईश = वागीश
  • उत् + गमन = उद्गमन
  • उत् + हार = उद्धार
  • सम + कल्प = संकल्प
  • राम + अयन = रामायन

विसर्ग के साथ जब किसी स्वर या व्यंजन का मेल होता है, तब विसर्ग संधि होती है।
जैसे–

  • अति + एव = अतएव
  • निः + छल = निश्छल
  • धनु + टंकार = धनुष्टंकार
  • निः + कपट = निष्कपट
  • निः + पाप = निष्पाप
  • निः + धन = निर्धन
  • नमः +. कार = नमस्कार
  • तिरः + कार = तिरस्कार
  • पुरः + कार = पुरस्कार
  • मनः + योग = मनोयोग
  • मनः + रथ = मनोरथ
  • पुनः + जन्म = पुनर्जन्म
  • दुः + तर = दुस्तर
  • सत + आनंद = सदानन्द

अभ्यास के लिए महत्त्वपूर्ण प्रश्न

  1. संधि किसे कहते हैं?
  2. संधि के कितने प्रकार हैं?
  3. निम्नलिखित शब्दों में संधि करो और उनके नाम बताओ
  • मत + ऐक्य,
  • शुभ + इच्छु
  • धन + अभाव,
  • उत + लास
  • पितृ + अनुमति,
  • निः + सन्देह
  • जगत + नाथ,
  • जगत + ईश
  • हित + उपदेश,
  • सदा + ऐव
  • भोजन + आलय,
  • परम + ईश्वर
  • मनः + हर,
  • निः + बल
  • शिव + आलय,
  • उत् + गम
  • निः + रोग,
  • सम + कल्प
  • यदि + अपि,
  • पो + अन
  • नर + इन्द्र,
  • परम + अर्थ।

4. निम्नलिखित शब्दों का संधि–विच्छेद करो
व्यवसाय, दुरुपयोग, उद्योग, निश्चल, निर्जन, उज्ज्वल, सूर्योदय, इत्यादि, निर्भय, जगदीश, निश्चिन्त, मनोरथ।

5. नीचे लिखे प्रत्येक शब्द के आगे संधियों के उदाहरण और संधियों के नाम लिखे हैं, किन्तु वे गलत हैं। आप उन्हें सही क्रम में लिखिए–

  • मनोरथ – अयादि संधि
  • नायक – वृद्धि संधि
  • इत्यादि – गुण संधि
  • विद्यार्थी – व्यंजन संधि
  • महेन्द्र – विसर्ग संधि
  • सदैव – दीर्घ संधि
  • सज्जन – यण संधि
  • सम–कल्प – व्यंजन संधि
  • निष्फल – व्यंजन संधि
  • मनोयोग – विसर्ग संधि

6. निम्नलिखित शब्दों में से व्यंजन संधि का उदाहरण बताइएं।

  • मनोहर,
  • पवन,
  • जगन्नाथ,
  • महाशय।

7. परम + अर्थ, हित + उपदेश, सत् + जन, मनः + विकार उपर्युक्त संधियों में से किन–किन संधियों का उदाहरण है।

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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति

कणों के निकाय तथा घूर्णी गति अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 7.1.
एक समान द्रव्यमान घनत्व के निम्नलिखित पिंडों में प्रत्येक के द्रव्यमान केंद्र की अवस्थिति लिखिए:

  1. गोला
  2. सिलिंडर
  3. छल्ला तथा
  4. घन।

क्या किसी पिंड का द्रव्यमान केंद्र आवश्यक रूप से उस पिंड के भीतर स्थित होता है?
उत्तर:

  1. गोला
  2. सिलिंडर
  3. छल्ला व
  4. घन.

चारों का द्रव्यमान केन्द्र उनका ज्यामितीय केन्द्र होता है। नहीं, जहाँ कोई पदार्थ नहीं है। जैसे वलय, खोखले सिलिंडर व खोखले गोले में द्रव्यमान केन्द्र पिंड के बाहर भी हो सकता है।

प्रश्न 7.2.
HCI अणु में दो परमाणुओं के नाभिकों के बीच पृथकन लगभग 1.27 Å (1Å = 10-10 m) है। इस अणु के द्रव्यमान केंद्र की लगभग अवस्थिति ज्ञात कीजिए। यह ज्ञात है कि क्लोरीन का परमाणु हाइड्रोजन के परमाणु की तुलना में 35.5 गुना भारी होता है तथा किसी परमाणु का समस्त द्रव्यमान उसके नाभिक पर केंद्रित होता है।
उत्तर:
माना द्रव्यमान केन्द्र H परमाणु से x दूरी पर है। माना हाइड्रोजन परमाणु का द्रव्यमान, m1 = m
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 1
तथा क्लोरीन परमाणु का द्रव्यमान m2 = 35.5 m
माना द्रव्यमान केन्द्र (मूलबिन्दु) के सापेक्ष H व C1 \(\vec { r } \) 1 व \(\vec { r } \) 2 दूरी पर है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 2
= 1.235
= 1.24 Å
अर्थात् द्रव्यमान केन्द्र H – परमाणु से 1.24 A की दूरी पर Cl परमाणु की ओर है।

प्रश्न 7.3.
कोई बच्चा किसी चिकने क्षैतिज फर्श पर एकसमान चाल v से गतिमान किसी लंबी ट्राली के एक सिरे पर बैठा है। यदि बच्चा खड़ा होकर ट्राली पर किसी भी प्रकार से दौड़ने लगता है, तब निकाय (ट्राली + बच्चा) के द्रव्यमान केंद्र की चाल क्या है?
उत्तर:
प्रश्नानुसार, ट्राली एक चिकने क्षैतिज फर्श पर गति कर रही है। इसलिए फर्श के चिकना होने के कारण निकाय पर क्षैतिज दिशा में कोई बाह्य बल नहीं लगता है। परन्तु जब बच्चा दौड़ता है तब बच्चे द्वारा ट्राली पर व ट्राली द्वारा बच्चे पर लगाए गए दोनों ही बल आन्तरिक बल होते हैं।
∴ \(\overrightarrow { F_{ ext } } \) = 0
संवेग संरक्षण के नियमानुसार M \(\overrightarrow { V_{ cm } } \) = नियतांक
∴ \(\overrightarrow { V_{ cm } } \) = नियतांक
अतः द्रव्यमान केन्द्र की स्थित चाल होगी।

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प्रश्न 7.4.
दर्शाइये कि a एवं b के बीच बने त्रिभुज का क्षेत्रफल axb के परिमाण का आधा है।
उत्तर:
माना ∆AOB की संलग्न भुजाओं के सदिश \(\overrightarrow { a } \) व \(\overrightarrow { b } \) है।
∴ < AOB = θ
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तथा माना त्रिभुज की ऊँचाई h है।
∴h = AC
समकोण ∆OCA में,
sin θ = \(\frac{AC}{OA}\)
या Ac = OA sin θ
h = b sin θ
हम जानते हैं कि त्रिभुज. AOB का क्षेत्रफल
= \(\frac{1}{2}\) × आधार × ऊँचाई
= \(\frac{1}{2}\) × OB × AC = \(\frac{1}{2}\) × a × b
= \(\frac{1}{2}\) × a × b sin θ
= \(\frac{1}{2}\) ab sin θ
पुनः सदिश गुणन के नियम से
\(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b } \) = ab sin θ \(\hat { n } \)
या |\(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b } \)| = |ab sin θ \(\hat { n } \)|
= ab sin θ [∴|\(\hat { n } \)| = 1]
∴समी० (ii) व (iii) से,
∆AOB का क्षेत्रफल = \(\frac{1}{2}\) |\(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b }\)|
= \(\frac{1}{2}\) \(\overrightarrow { a } \) × \(\overrightarrow { b } \) का परिमाणा

प्रश्न 7.5.
दर्शाइये कि a.(b × c) का परिमाण तीन सदिशों a, b एवं c से बने समान्तर षट्फलक के आयतन के बराबर है।
उत्तर:
माना OABCDEFG एक समान्तर षट्फलक है जिसकी भुजाएँ क्रमश: OA, OC व OE हैं।
माना कि
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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 4a
जहाँ h = a cos θ = \(\overrightarrow { a } \) के शीर्ष द्वारा समचतुर्भुज OABC पर डाला गया लम्ब EE’ है = सदिश a की ऊँचाई।
पुनः माना V = समषट्फलक OABC = DEFG का आयतन है।
∴ V = तल OABC का क्षेत्रफल x OABC तल पर E से अभिलम्ब
= S × h
समी० (i) व (ii) से,
v = \(\overrightarrow { a } \) . (\(\overrightarrow { b } \) × \(\overrightarrow { c } \))

प्रश्न 7.6.
एक कण, जिसके स्थिति सदिश के x, y, z अक्षों के अनुदिश अवयव क्रमशः x, y, हैं, और रेखीय संवेग सदिश P के अवयव px, Py, Pz, हैं, के कोणीय संवेग 1 के अक्षों के अनुदिश अवयव ज्ञात कीजिए। दर्शाइये, कि यदि कण केवल x – y तल में ही गतिमान हो तो कोणीय संवेग का केवल :-अवयव ही होता है।
उत्तर:
माना OX, OY तथा OZ तीन परस्पर लम्बवत् अक्ष हैं। माना x – y तल में स्थिति सदिश
\(\overrightarrow { O } \)P = \(\overrightarrow { r } \) एक बिन्दु P है।
माना रेखीय संवेग \(\overrightarrow { P } \) का \(\hat { r } \) से कोण θ है व कोणीय संवेग \(\overrightarrow { L } \) है।
∴\(\overrightarrow { L } \) = \(\hat { r } \) × \(\hat { p } \)
यह एक संवेग राशि है जिसकी दिशा दाएँ हाथ के नियम से दी जा सकती है। चूँकि \(\hat { r } \) व \(\hat { p } \) तल OXY में हैं। अतः
\(\overrightarrow { r } \) = x\(\hat { i } \) + y\(\hat { j } \) + z\(\hat { k } \)
तथा
\(\overrightarrow { P } \) = px\(\hat { i } \) + py\(\hat { j } \) + pz\(\hat { k } \)
∴समी० (i) व (ii) से,
\(\overrightarrow { L } \) = (x\(\hat { i } \) + y\(\hat { j } \) + z\(\hat { k } \) ) ×
(px\(\hat { i } \) + py\(\hat { j } \) + pz\(\hat { k } \))
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 5
Px P, P.
तुलना करने पर,
Lx, = yPz – zPy
Ly, = zpx – xPz
Lz = xpy – yPx
समी० (iii) से, x, y व z – अक्षों के अनुदिश – के अभीष्ट घटक प्राप्त होते हैं।
हम जानते हैं कि xy – तल में गतिमान कण पर लगने वाला बलाघूर्ण
iz =xFy, – yFz.
जहाँ \(\hat { i } \)z = xy तल में गतिमान गण – अक्ष के अनुदिश लगने वाले बलाघूर्ण का घटक है।
माना xy – तल में \(\overrightarrow { v } \) वेग से गतिमान कण का द्रव्यमान = m इस वेग के vx, व vy, घटक क्रमश: x व – दिशा में हैं।
न्यूटन के गति के दूसरे समी० से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 6
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 6a
अतः समीकरण (vii) से यह निष्कर्ष निकलता है, कि. xy – तल में गतिमान कण का कोणीय वेग (\(\overrightarrow { L } \)) का केवल एक घटक अर्थात् z – अक्ष के अनुदिश है।

प्रश्न 7.7.
दो कण जिनमें से प्रत्येक का द्रव्यमान m एवं चाल v है d दूरी पर, समान्तर रेखाओं के अनुदिश, विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं। दर्शाइये कि इस द्विकण निकाय का सदिश कोणीय संवेग समान रहता है, चाहे हम जिस बिन्दु के परितः कोणीय संवेग लें।
उत्तर:
माना दूरी पर दो समान्तर रेखाओं के अनुदिश गतिमान प्रत्येक कण का द्रव्यमान m है।
माना v प्रत्येक कण विपरीत दिशा में चाल है। माना कि क्षण t व कण P1 व P2, बिन्दुओं पर हैं।
अब इन दोनों कणों द्वारा बनाए गए निकाय का किसी बिन्दु 0 के परितः कोणीय संवेग ज्ञात करते हैं। माना प्रत्येक कण का कोणीय संवेग \(\overrightarrow { L } \) 1 व \(\overrightarrow { L } \)2 है।
∴ \(\overrightarrow { L } \)1 = \(\overrightarrow { r } \)1 × m \(\overrightarrow { v } \) व \(\overrightarrow { L } \)2 = \(\overrightarrow { r } \)2 × m \(\overrightarrow { v } \)
माना कि निकाय का कोणीय संवेग \(\overrightarrow { L } \) है।
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1. जहाँ θ1 व θ2, क्रमश: \(\overrightarrow { r } \)1, \(\overrightarrow { v } \) व \(\overrightarrow { r } \)2, (-\(\overrightarrow { v } \)) के बीच कोण हैं। (चित्र)।
चूँकि कण की स्थिति समय के सापेक्ष परिवर्तित होती है।
अतः \(\overrightarrow { v } \) की दिशा समान रेखा में होगी तथा OM – ON = r2 sin θ2, व ON =r2 sin 6 नियत रहेगा।
पुनः OM – ON = d = MN
∴ r1 sin θ1 – r2 sin θ2 = d

2. समी० (i) व (ii) से,
L = mvd
\(\overrightarrow { L } \) की दिशा भी \(\overrightarrow { r } \) व \(\overrightarrow { v } \) के तल के लम्बवत् होती है। जोकि कागज के तल में होगी। यह दिशा समय के साथ अपरिवर्तित रहती है।
अर्थात् \(\overrightarrow { L } \) परिमाण व दिशा में समान रहता है।

प्रश्न 7.8.
w भार की एक असमांग छड़ को, उपेक्षणीय भार वाली दो डोरियों से चित्र में दर्शाये अनुसार लटका कर विरामावस्था में रखा गया है। डोरियों द्वारा ऊर्ध्वाधर से बने कोण क्रमश: 36.9° एवं 53.1° हैं। छड़ 2 m लम्बाई की है। छड़ के बाएँ सिरे से इसके गुरुत्व केन्द्र की दूरी d ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 8
उत्तर:
माना एक समान छड़ AB का भार W, है। यह छड़ दो डोरियों OA व 0 B से लटकायी गई है। ऊर्ध्वाधर से OA छड़ से 36.9° व 0 B छड़ से 53.1° कोण पर है।
<OAA’ = 90° – 36.9° = 53.1°
इसी प्रकार, <O’BB’ = 36.9°
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 9
AB – 2M, AC = d मीटर
माना डोरी OA व O’B में तनाव क्रमश: T1, व T2, है। यहाँ वियोजित घटक चित्रानुसार होंगे।
चूँकि छड़ विराम में है, अत: A’ B’ अक्ष के अनुदिश व लम्बवत् लगने वाले बलों का सदिश योग शून्य है। अतः
– T1, cos 53.1° + T2 cos 36.9° = 0 … (i)
तथा T1 sin 53.1° + T2, sin 36.9° – W = 0 … (ii)
A के परितः बलाघूर्ण लेने पर व बलाघूर्णों के योग का शून्य रखने पर –
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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 11

प्रश्न 7.9.
एक कार का भाग 1800 kg है। इसकी अगली और पिछली धुरियों के बीच की दूरी 1.8 m है। इसका गुरुत्व केन्द्र, अगली धुरी से 1.05 m पीछे है। समतल धरती द्वारा इसके प्रत्येक अगले और पिछले पहियों पर लगने वाले बल की गणना कीजिए।
उत्तर:
माना आगे के पहिए का द्रव्यमान = m ग्राम
∴ (900 – m) kg = प्रत्येक पहिए का द्रव्यमान
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∴m × 1.05 = (900 – m) × 0.75
या 1.8m = 900 × 0.75
या m = 375 kg
∴ 900 – m = 525 kg
आगे के प्रत्येक पहिये का भार,
w1 = mg = 375 × 9.8 = 3675 न्यूटन
पीछे के प्रत्येक पहिये का भार,
W2 = 525 × 9.8 = 5145 न्यूटन
पृथ्वी द्वारा पहिये पर आरोपित बल = पृथ्वी की प्रतिक्रिया
= W1 = 3675 न्यूटन
इसी प्रकार, प्रत्येक पीछे के पहिये पर पृथ्वी द्वारा आरोपित बल = पृथ्वी की प्रतिक्रिया
w2 = 5145 न्यूटन

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प्रश्न 7.10.

  1. किसी गोले का, इसके किसी व्यास के परितः जड़त्व आघूर्ण 2MR2/5 है, जहाँ M गोले का द्रव्यमान एवं R इसकी त्रिज्या है। गोले पर खींची गई स्पर्श रेखा के परितः इसका जड़त्व आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
  2. M द्रव्यमान एवं R त्रिज्या वाली किसी डिस्क का इसके किसी व्यास के परितः जड़त्व आघूर्ण MR2/4 है। डिस्क के लम्बवत् इसकी कोर से गुजरने वाली अक्ष के परितः इस चकती का जड़त्व आघूर्ण ज्ञात कीजिए।

उत्तर:

1. माना व्यास AB के परित: R त्रिज्या के गोले का जड़त्व आघूर्ण IAB है। जबकि गोले का द्रव्यमान m है।
IAB = \(\frac{1}{2}\) MR2
माना गोले के व्यास AB के समान्तर स्पर्शी CD है।
∴समान्तर x – अक्षों की प्रमेय से,
स्पर्श रेखा के परितः गोले का जड़त्व आघूर्ण
ICD = IAB + MR2
= \(\frac{2}{5}\) MR2 + MR2
= \(\frac{7}{5}\) MR2
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2. माना M द्रव्यमान तथा Rत्रिज्या के गोले के दो कास AB व CD हैं। माना चकती के लम्बवत् इसके द्रव्यमान केन्द्र 0 से गुजरने वाली अक्ष EF है।

चकती के लम्बवत् अक्ष DG है जोकि चकती की परिधि पर स्थित बिन्दु D से गुजरती है।
अर्थात् DG, EF के समान्तर है। माना चकती का EF अक्ष के परित: जड़त्व आघूर्ण IEF है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 14
∴ लम्बवत् अक्षों की प्रमेय से,
IEE = IAB + ICD
= \(\frac { MR^{ 2 } }{ 4 } \) + \(\frac { MR^{ 2 } }{ 4 } \) = \(\frac { MR^{ 2 } }{ 2 } \)
∴समान्तर अक्षों की प्रमेय से,
IDG = IEF + MR2
= \(\frac{1}{2}\) MR2 + MR2 = \(\frac{3}{2}\) 2

प्रश्न 7.11.
समान द्रव्यमान और त्रिज्या के एक खोखले बेलन और एक ठोस गोले पर समान परिमाण के बल आघूर्ण लगाये गये हैं। बेलन अपनी सामान्य सममित अक्ष के परितः घूम सकता है और गोला अपने केन्द्र से गुजरने वाली किसी अक्ष के परितः। एक दिये गये समय के बाद दोनों में कौन अधिक कोणीय चाल प्राप्त कर लेगा?
उत्तर:
माना खोखले बेलन व ठोस गोले के द्रव्यमान व त्रिज्या क्रमश: M व R हैं।
माना खोखले बेलन का सममित के परित: जड़त्व आघूर्ण L1, है तथा ठोस गोले का केन्द्र के परितः जड़त्व आघूर्ण I2, है।
∴I1 = MR2
[I = \(\frac{1}{2}\) (R12 + R22 ~ MR2R 2 ~ R1 ~ R1)
तथा I2 = \(\frac{2}{5}\) MR2
माना प्रत्येक पर लगाया गया बलापूर्ण \(\hat { k } \)  है। माना a, व a, क्रमश: बेलन व गोले पर कोणीय त्वरण हैं।
∴\(\hat { i } \) = I1α1 = I2α2
∴\(\frac { \alpha _{ 1 } }{ \alpha _{ 2 } } \) = \(\frac { I_{ 2 } }{ I_{ 1 } } \) = \(\frac{2}{5}\)
∴ α2 = 2.5 α1
माना ω1, व ω2, किसी क्षण t पर बेलन व गोले की कोणीय चाल है।
∴ω1 = ω0 + α1t व
ω2 = ω0 + α2t
= ω0 + 2.5 α1t
समी० (iv) व (v) से
ω2 > ω1
अर्थात् गोले की कोणीय चाल बेलन से अधिक होगी।

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प्रश्न 7.12.
20 kg द्रव्यमान का कोई ठोस सिलिंडर अपने अक्ष के परितः 100 rad s-1 की कोणीय चाल से घूर्णन कर रहा है। सिलिंडर की त्रिज्या 0.25 m है। सिलिंडर के घूर्णन से संबद्ध गतिज ऊर्जा क्या है? सिलिंडर का अपने अक्ष के परितः कोणीय संवेग का परिमाण क्या है?
उत्तर:
दिया है:
m = 20 किग्रा
R = 0.25 मीटर
ω = 100 रेडियन प्रति सेकण्ड
माना बेलन की अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण I है
तब
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प्रश्न 7.13.
(a) कोई बच्चा किसी घूर्णिका (घूर्णीमंच) पर अपनी दोनों भुजाओं को बाहर की ओर फैलाकर खड़ा है। घूर्णिका को 40 rev/min की कोणीय चाल से घूर्णन कराया जाता है। यदि बच्चा अपने हाथों को वापस सिकोड़ कर अपना जड़त्व आघूर्ण अपने प्रारंभिक जड़त्व आघूर्ण का 2/5 गुना कर लेता है, तो इस स्थिति में उसकी कोणीय चाल क्या होगी? यह मानिए कि घूर्णिका की घूर्णन गति घर्षणरहित है।

(b) यह दर्शाइए कि बच्चे की घूर्णन की नयी गतिज ऊर्जा उसकी आरंभिक घूर्णन की गतिज ऊर्जा से अधिक है। आप गतिज ऊर्जा में हुई इस वृद्धि की व्याख्या किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:

(a) माना बच्चे का प्रारम्भिक व अन्तिम जड़त्व आघूर्ण क्रमशः I1 व I2 है।
अतः
∴I2 = \(\frac{2}{5}\) I1 दिया है।
V1 = 40 rev/min = \(\frac{40}{60}\) rev/min
V2 = ?
∴ω1 = 2 πv1
माना बच्चे को बाहर की ओर हाथ फैलाकर व सिकोड़कर घूर्णीय चाल क्रमश: ω1 व ω2 है। रेखीय संवेग संरक्षण के नियम से,
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(b) घूर्णन की प्रा० गतिज ऊर्जा =
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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 17a
स्पष्ट है कि हाथ सिकोड़कर बच्चे की घूर्णन गतिज ऊर्जा, घूर्णन की प्रा० गतिज ऊर्जा से \(\frac{5}{2}\) गुना अधिक है।
अन्तिम स्थिति में गतिज ऊर्जा में वृद्धि, बच्चे की आन्तरिक ऊर्जा के कारण होती है।

प्रश्न 7.14.
3 kg द्रव्यमान तथा 40 cm त्रिज्या के किसी खोखले सिलिंडर पर कोई नगण्य द्रव्यमान की रस्सी लपेटी गई है। यदि रस्सी को 30 N बल से खींचा जाए तो सिलिंडर का कोणीय त्वरण क्या होगा? रस्सी का रैखिक त्वरण क्या है? यह मानिए कि इस प्रकरण में कोई फिसलन नहीं है।
उत्तर:
दिया है: बेलन का द्रव्यमान,
M = 3 kg
बेलन की त्रिज्या R = 0.4 m
स्पर्शरेखीय बल F = 30 N
α = ?
α = ?
माना खोखले बेलन का अक्ष के परितः जड़त्व घूर्णन है। अतः
τ = FR = 30 × 0.4 = 12NM
∴α = \(\frac { \tau }{ 1 } [latex] = [latex]\frac{12}{0.48}\) = 25 rads-2
∴α = Rα = 0.4 × 25

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प्रश्न 7.15.
किसी घूर्णक (रोटर) की 200 rads-1 की एकसमान कोणीय चाल बनाए रखने के लिए एक इंजन द्वारा 180 Nm का बल आघूर्ण प्रेषित करना आवश्यक होता है। इंजन के लिए आवश्यक शक्ति ज्ञात कीजिए। (नोट : घर्षण की अनुपस्थिति में एकसमान कोणीय वेग होने में यह समाविष्ट है कि बल का आघूर्णशून्य है। व्यवहार में लगाए गए बल आघूर्ण की आवश्यकता घर्षणी बल आघूर्ण को निरस्त करने के लिए होती है।) यह मानिए कि इंजन की दक्षता 100% है।
उत्तर:
दिया है:
ω = 200 रेडियन प्रति सेकण्ड
τ =180 न्यूटन मीटर
P = ?
सम्बन्ध P = τw से,
P = 180 × 200 = 36000 वॉट
= 36 किलो वॉट

प्रश्न 7.16.
R त्रिज्या वाली समांग डिस्क से R/2 त्रिज्या का एक वृत्ताकार भाग काट कर निकाल दिया गया है। इस प्रकार बने वृत्ताकार सुराख का केन्द्र मूल डिस्क के केन्द्र से R/2 दूरी पर है। अवशिष्ट डिस्क के गुरुत्व केन्द्र की स्थिति ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रारम्भिक चकती की त्रिज्या = R
काटकर अलग की गई चकती की त्रिज्या = \(\frac{R}{2}\)
माना A व a चकतियों के क्षे० हैं।
अतः A = π(\(\frac{R}{2}\))2 = \(\frac { \pi R^{ 2 } }{ 4 } \)
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यहाँ 0 प्रारम्भिक चकती का केन्द्र है।
तथा 01 अलग किए गए गोल भाग का केन्द्र है।
व 02, बचे हुए भाग का केन्द्र है।
ρ = डिस्क का प्रति एकांक क्षेत्रफल द्रव्यमान है।
माना m, व m वास्तविक चकती व अलग किए गए चकती के द्रव्यमान है।
अतः
m1 = ρA = πR2ρ
तथा m = ρa = \(\frac { \pi R^{ 2 } }{ 4 } \) ρ
माना शेष बचे भाग का द्रव्यमान m है।
अतः m2 = m1 – m
= πR2ρ – \(\frac { \pi R^{ 2 } }{ 4 } \) = \(\frac{3}{4}\) πR2ρ
माना मूल बिन्दु 0 है।
माना Rcm बचे भाग का द्रव्यमान केन्द्र है।
अतः
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 19
दिया है: x1 = 001, OA – 0,
A = R – \(\frac { R }{ 2 } \) = \(\frac{R}{2}\)
m = \(\frac{π}{4}\) R2ρ
m2 = \(\frac{3}{4}\) πR2ρ
x2 = OO1, OA – O1
A = R – \(\frac{R}{2}\) = \(\frac{R}{2}\)
m = \(\frac{π}{4}\) R2ρ
m2 = \(\frac{3}{4}\) R2ρ
x2 = OO2
समी० (i) व (ii) से,
O = mx1 + m2m2x2
या x2 = \(-\frac { mx_{ 1 } }{ m_{ 2 } } \)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 20
ऋणात्मक चिह्न यह व्यक्त करता है कि बचे भाग का द्रव्यमान केन्द्र 0 से बाईं ओर है जोकि कटे भाग के केन्द्र के विपरीत ओर है।

प्रश्न 7.17.
एक मीटर छड़ के केन्द्र के नीचे क्षुर-धार रखने पर वह इस पर संतुलित हो जाती है जब दो सिक्के, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 5g है, 12.0 cm के चिह्न पर एक के ऊपर एक रखे जाते हैं तो छड़ 45.0 cm चिह्न पर संतुलित हो जाती है। मीटर छड़ का द्रव्यमान क्या है?
उत्तर:
माना m ग्राम = द्रव्यमान/छड़ की ल० सेमी
माना m मीटर का कुल द्रव्यमान व m = 100 ग्राम है।
जब मीटर केन्द्र पर सन्तुलित होता है, तब प्रत्येक भाग का द्रव्यमान = 50 मी/ग्राम
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 21
माना 12 सेमी चिह्न पर रखे दो सिक्कों का द्रव्यमान m2 है।
m2 = 5 × 2 = 10 ग्राम
द्रव्यमान केन्द्र = 45 सेमी के चिह्न पर (बिन्दु A)
चूँकि छड़ी सन्तुलन में है। अतः बिन्दु A के परितः अलग – अलग द्रव्यमानों का आघूर्ण समान है।
∴ 12m × 39 + 10 × 33 + 33m × \(\frac{33}{2}\)
= 55m × \(\frac{55}{2}\)
या \(\frac { (55)^{ 2 } }{ 2 } \) m – \(\frac { (33)^{ 2 } }{ 2 } \)m – 12 × 39m = 330
या (3025 – 1089 – 936) m = 330 × 2 = 660
या 1000m = 660
या m = 0.66 ग्राम

प्रश्न 7.18.
एक ठोस गोला, भिन्न नति के दो आनत तलों पर एक ही ऊँचाई से लुढ़कने दिया जाता है।

(a) क्या वह दोनों बार समान चाल से तली में पहुँचेगा?
(b) क्या उसको एक तल पर लुढ़कने में दूसरे से अधिक समय लगेगा?
(c) यदि हाँ, तो किस पर और क्यों?

उत्तर:
माना तल – 1 पर निम्न बिन्दु से शिखर तक चली दूरी व झुकाव क्रमश: I1 व θ2 है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 22
तथा तल – 2 पर निम्न बिन्दु से शिखर तक चली दूरी व झुकाव क्रमश: I2, व θ2 है।
∴sin θ1 > sin θ2
या \(\frac { sin\theta _{ 1 } }{ sin\theta _{ 2 } } \) > 1
प्रत्येक झुके तल की ऊँचाई,
λ = I1 sin θ1 = I2 sin θ2, (a) है।
तल के शिखर पर, गोले में केवल स्थितिज ऊर्जा होगी। i. e., PE = mgh
जहाँ m = गोले का द्रव्यमान है।
जब गोला शिखर से निम्न बिन्दु तक लुढ़कता है, तो स्थितिज
ऊर्जा, रैखिक ऊर्जा (\(\frac { 1 }{ 2 } I\omega ^{ 2 }\)) गतिज ऊपरिवर्तित हो जाती है। जहाँ I गोले का जड़त्वाघूर्ण है।
माना तल के निम्न बिन्दु पर रेखीय वेग v व कोणीय चाल ω है।
माना v 1 व 2 क्रमश: दोनों तलों (1 व 2) पर निम्न बिन्दु पर रेखीय वेग है।
अतः
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul
जहाँ K घूर्णन त्रिज्या है।
समी० (ii) व (iii) से स्पष्ट है कि प्रत्येक स्थिति में गोला निम्न बिन्दु पर समान वेग से लौटता है।

(b) हाँ, यह तल – 1 पर तल – 2 से अधिक समय लेगा। यह समय कम झुकाव वाले तल के लिए अधिक होगा।
व्याख्या: माना तल – 1 व तल – 2 पर फिसलने में लिया गया समय क्रमशः t1, व t2 है।
ठोस गोले के लिए,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul a
हम जानते हैं कि, झुके तल पर वस्तु का त्वरण निम्न है –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul b
जहाँ θ = झुकाव
माना झुके तल – 1 व 2 पर गोले के त्वरण क्रमशः a<sub>1</sub> व a<sub>2</sub>
अतः
a1 = \(\frac { gsin\theta _{ 1 } }{ 7/5 } \)
= \(\frac{5}{7}\) g sin θ<sub>2</sub>
पुनः माना तल 1 व 2 पर फिसलने का समय क्रमश: t1 व t2 है।
अतः
सूत्र S = ut + \(\frac{1}{2}\)at से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image tul c
समय t, झुकाव कोण θ पर निर्भर करता है। अतः झुकाव कोण जितना कम होगा, गोला लुढ़कने में उतना ही अधिक समय लेगा।

प्रश्न 7.19.
2 m त्रिज्या के एक वलय (छल्ले) का भार 100 kg है। यह एक क्षैतिज फर्श पर इस प्रकार लोटनिक गति करता है कि इसके द्रव्यमान केन्द्र की चाल 20 cm/s हो। इसको रोकने के लिए कितना कार्य करना होगा?
उत्तर:
दिया है:
r = 2 मीटर
m = 100 किग्रा
द्रव्यमान केन्द्र का वेग,
v = 20 cms-1
= 0.20 मीटर/सेकण्ड
रोकने में व्यय कार्य = ?
माना वलय का कोणीय वेग ω है। अतः
ω = \(\frac{v}{r}\) = \(\frac{0.20}{2}\) = 0.10 सेकण्ड/से०
माना वलय का केन्द्र से गुजरती व तल के लम्बवत् अक्ष के परितः जड़त्वाघूर्णन I है।
I = mr2 = 100 × (2)2 = 400 kgm2
वलय की सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा = वलय की घूर्णन गतिज ऊर्जा + वलय की रेखीय गतिज ऊर्जा
या
E = \(\frac{1}{2}\) Iω2 + \(\frac{1}{2}\) mv2
या E = \(\frac{1}{2}\) × 400 × (0.10)2 + \(\frac{1}{2}\) × 100 × (0.20)2
= 200 × \(\frac{1}{100}\) + 2J
= 2 + 2 + 4J.
∴ कार्य ऊर्जा प्रमेय से,
रोकने में व्यय कार्य = वलय की सम्पूर्ण KE
= 4 जूल

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प्रश्न 7.20.
ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान 5.30 x 10-26 kg है तथा इसके केन्द्र से होकर गुजरने वाली और इसके दोनों परमाणुओं को मिलाने वाली रेखा के लम्बवत् अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण 194 x 10-46 kg m2है। मान लीजिए कि गैस के ऐसे अणु की औसत चाल 500 m/s है और इसकेपूर्णन की गतिज ऊर्जा, स्थानान्तरण की गतिज ऊर्जा की दो तिहाई है। अणु का औसत कोणीय वेग ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है: ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान
m = 5.30 x 10-26 किग्रा
ऑक्सीजन अणु का जड़त्वाघूर्णन
I = 1.94 x 10-46 किग्रा – मीटर
अणु का मध्य वेग v = 500 ms-1
औसत कोणीय चाल ω = ?
प्रश्नानुसार, घूर्णन की गतिज ऊर्जा,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 23

प्रश्न 7.21.
एक बेलन 30° कोण बनाते आनत तल पर लुढ़कता हुआ ऊपर चढ़ता है। आनत तल की तली में बेलन के द्रव्यमान केन्द्र की चाल 5 m/s है।

  1. आनत तल पर बेलन कितना ऊपर जायेगा?
  2. वापस तली तक लौट आने में इसे कितना समय लगेगा?

उत्तर:
दिया है: θ =30°
तलों में बेलन के द्रव्यमान केन्द्र की चाल, u = 5 मीटर/सेकण्ड

1. आनत तल पर लुढ़कते बेलन का त्वरण = – a
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 24
= 3.83 मीटर

2. माना तली तक आने में बेलन को T समय लगता है।
∴T = 2t जहाँ t आने या जाने का समय है।
∴\(\frac { gsin\theta }{ 1+\frac { K^{ 2 } }{ R^{ 2 } } } \) = \(\frac{9.8}{3}\) मीटर/से2
s = 3.83 मीटर
दिया है: प्रा० वेग = 0
∴सूत्र s = ut + \(\frac{1}{2}\) at2से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 25
∴T = 2 x 1.53 = 3.06s = 3.0s

प्रश्न 7.22.
जैसा चित्र में दिखाया गया है, एक खड़ी होने वाली सीढ़ी के दो पक्षों BA और CA की लम्बाई 1.6 m है और इनको A पर कब्जा लगा कर जोड़ा गया है। इन्हें ठीक बीच में 0.5 m लम्बी रस्सी DE द्वारा बाँधा गया है। सीढ़ी BA के । अनुदिश B से 1.2 m की दूरी पर स्थित बिन्दु F से 40 kg का एक भार लटकाया गया है। यह मानते हुए कि फर्श घर्षण रहित है और सीढ़ी का भार उपेक्षणीय है, रस्सी में तनाव और सीढ़ी पर फर्श द्वारा लगाया गया बल ज्ञात कीजिए।(g = 9.8 m/s2 लीजिए) (संकेत : सीढ़ी के दोनों ओर के संतुलन पर अलगअलग विचार कीजिए)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 26
उत्तर:
दिया है: AB = AC = 1.6 मीटर
DE = 0.5 मीटर
AD = DB = AE = EC = \(\frac{1.6}{2}\) = 0.8 मीटर
BF = 1.2 मीटर
AF = 0.4 मीटर
माना रस्सी में तनाव = T
फर्श द्वारा सीढ़ी पर बिन्दु B व C पर आरोपित बल
= N’B Nc = ?
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 27
W = 40 kg wt = 40 x 9.8 N = 392 N
माना = A’ = DE का मध्य बिन्दु
∴DA’ = \(\frac{5}{2}\) = 2.5 m,
DF = 125 m
चित्र में स्पष्ट है कि,
NB = Nc = W = 392 N
माना सीढ़ी AB व AC अलग-अलग सन्तुलन में है। A के परितः विभिन्न बलों का आघूर्ण लेने पर
NB x BC’ = W x DF + T x AA’ (AB सीढ़ी के लिए)
या NB x AB cosθ
= W x 0.125 + T x 0.8 sin θ
इसी सीढ़ी AC के लिए,
Nc x CC’ = T x AA’ या
Nc x AC cos θ = T x 0.8 sin θ
∆DEF’ में,
cos θ = \(\frac{DF}{DF}\) = \(\frac{0.125}{0.4}\)
= 0.3125 = cos θ 72.8°
∴θ = 72.8′
∴sin θ = 0.9553
tan θ = 3.2305
∴समी० (ii) व (iv) से,
NB × 1.6 × 0.392 × 0.125 + T × 0.8 × 0.9553
या 0.5 NB = 225 N
या \(\frac{1}{2}\)
∴Nc = NB – 98
= 225 – 98 = 147 N
∴समी० (vi) व (viii) से,
0.5 x \(\frac{147}{0.764}\) = 96.2N

प्रश्न 7.23.
कोई व्यक्ति एक घूमते हुए प्लेटफॉर्म पर खड़ा है। उसने अपनी दोनों बाहें फैला रखी हैं और उनमें से प्रत्येक में 5 kg भार पकड़ रखा है। प्लेटफॉर्म का कोणीय चाल 30 rev/min है। फिर वह व्यक्ति बाहों को अपने शरीर के पास ले आता है जिससे घूर्णन अक्ष से प्रत्येक भार की दूरी 90 cm से बदल कर 20 cm हो जाती है। प्लेटफॉर्म सहित व्यक्ति के जड़त्व आघूर्ण का मान 7.6 kg m2 ले सकते हैं।

  1. उसका नया कोणीय वेग क्या है? (घर्षण की उपेक्षा कीजिए)
  2. क्या इस प्रक्रिया में गतिज ऊर्जा संरक्षित होती है? यदि नहीं, तो इसमें परिवर्तन का स्त्रोत क्या है?

उत्तर:
दिया है: प्रत्येक हाथ में द्रव्यमान = 5 किग्रा
r1 = 90 cm = 0.90 मीटर
r2 = 20 cm = 0.20 मीटर
आदमी तथा प्लेटफॉर्म का जड़त्व आघूर्ण,
I = 7.6 kgm2
माना r1 व r2 दूरी पर जड़त्वाघूर्ण क्रमश: ।’1 व I’2 है।
तब सूत्र I = mr2 से,
I’1 = 2m × r12
= 2 × 5 × (0.9)2
= 8.1 kgm2
तथा I’2 = 2m × r22
= 2 × 5 × (0.2)2
= 0.4kgm2
माना, r1 व r2 दूरी पर निकाय (व्यक्ति + भार + प्लेटफॉर्म) का जड़त्वाघूर्ण क्रमशः
I1 व I है।
तब –
I1 = I’1 + I = 8.1+7.6 = 15.7 kgm2
तथा I2 = I’2I
= 0.4 + 7.6 = 8.0 kgm2
v1 = 30 rpm = \(\frac{30}{60}\) = \(\frac{1}{2}\)ps
ω1 = 2πv1 = 2π × \(\frac{1}{2}\) = πrads-1
माना r2 दूरी पर नवीन कोणीय चाल ω2, है।
∴कोणीय संवेग संरक्षण के नियम से,
या I1ω1 = I2ω2
15.7 × π = 8 × ω2
या ω2 = 15.7 \(\frac{π}{8}\)
= 1.9625 π rads -1
∴कोणीय आवृत्ति v2 निम्न है –
v2 = \(\frac { \omega _{ 2 } }{ 2\pi } \) = \(\frac{1.9625}{2π}\) × πrps
= \(\frac{1.9625}{2}\) × 60rpm
= 58.875rpm = 58.9 rpm = 59 rpm
नहीं, यहाँ गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं होगी? चूँकि घूर्णनी गति में कोणीय संवेग संरक्षित रहता है।
अत: यह आवश्यक नहीं है कि घूर्णनी गतिज ऊर्जा भी संरक्षित रहे जिसे निम्न रूप में समझाया जा सकता है –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 28
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 28a
अर्थात् के घटने पर घूर्णनी KE बढ़ती है। KE में यह परिवर्तन (i.e., वृद्धि) वस्तु के जड़त्वाचूर्ण को कम करने में व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य के व्यय होने के कारण होता है।

प्रश्न 7.24.
10g द्रव्यमान और 500 m/s चाल वाली बन्दूक की गोली एक दरवाजे के ठीक केन्द्र में टकराकर उसमें अंतःस्थापित हो जाती है। दरवाजा 1.0 m चौड़ा है और इसका द्रव्यमान 12 kg है। इसके एक सिरे पर कब्जे लगे हैं और यह इनसे गुजरती एक ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः लगभग बिना घर्षण के घूम सकता है। गोली के दरवाजे में अंत:स्थापन के ठीक बाद इसका कोणीय वेग ज्ञात कीजिए। (संकेत : एक सिरे से गुजरती ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः दरवाजे का जड़त्व – आघूर्ण ML2/3है)
उत्तर:
दिया है: गोली का द्रव्यमान
m =10g = 0.01 किग्रा
गोली का वेग v = 500 मीटर/से०
दरवाजे की चौ० b = 1.0 मीटर
दरवाजे का द्र० M = 12 किग्रा
कोणीय चाल ω = ?
ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
\(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{2}\) Iω2
माना कब्जे वाली भुजा के परित: जड़त्वाघूर्ण है।
∴I = \(\frac{1}{3}\)(M + m)(\(\frac{b}{2}\))2
(∴द्रव्यमान केन्द्र से दूरी = \(\frac{b}{2}\) तथा गोली दरवाजे में है।)
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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 29a
= 49.98 रेडियन/सेकंड

प्रश्न 7.25.
दो चक्रिकाएँ जिनके अपने – अपने अक्षों (चक्रिका के अभिलंबवत् तथा चक्रिका के केंद्र से गुजरने वाले) के परितः जड़त्व आघूर्ण I2 तथा I2 हैं और जो, ω1 तथा ω2 कोणीय चालों से घूर्णन कर रही है, को उनके घूर्णन अक्ष संपाती करके आमने – सामने लाया जाता है?

(a) इस दो चक्रिका निकाय की कोणीय चाल क्या है?
(b) यह दर्शाइए कि इस संयोजित निकाय की गतिज ऊर्जा दोनों चक्रिकाओं की आरंभिक गतिज ऊर्जाओं के योग से कम है। ऊर्जा में हुई इस हानि की आप कैसे व्याख्या करेंगे? ω1 ≠ ω2 लीजिए।

उत्तर:
माना I1 व I2 जड़त्व आघूर्ण वाली चकतियों की कोणीय चाल क्रमशः , ω1 व ω2, है। सम्पर्क में लाने पर दोनों चकतियों के निकाय का जड़त्व आघूर्ण I1 + I2 होगा।।
माना = पूरे निकाय की कोणीय चाल है।

(a) ∴ दोनों चकतियों के कुल प्रा० कोणीय संवेग,
L1 = I1ω1 + I2ω2
संयुक्त निकाय का कुल अन्तिम कोणीय संवेग,
L2 = (I1 + I2
कोणीय संवेग संरक्षण के नियम से,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 30
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 30a
अतः E1 – E2 > 0 या E1 > E2
या E2 > E1 अर्थात् पूरे निकाय की घूर्णनी गतिज ऊर्जा दोनों चकतियों की प्रारम्भिक ऊर्जाओं के योग से कम है।
अतः दो चकतियों को सम्पर्क में लाने पर, गतिज ऊर्जा में कमी आती है। यह कमी दोनों चक्रिकाओं की सम्पर्कित सतहों के बीच घर्षण के बल के कारण होती है।

प्रश्न 7.26.
(a) लम्बवत् अक्षों के प्रमेय की उपपत्ति करें। [संकेत (x, y) तल के लम्बवत् मूल बिन्दु से गुजरती अक्ष से किसी बिन्दु x – y की दूरी का वर्ग (x2 + y2) है]
(b) समांतर अक्षों के प्रमेय की उपपत्ति करें (संकेत: यदि द्रव्यमान केन्द्र को मूल बिन्दु ले लिया जाये तो Σmiri = 0)
उत्तर:
(a) समकोणिक (लम्ब) अक्षों की प्रमेयकिसी समतल पटल को उसके तल में ली गई दो परस्पर लम्बवत् अक्षों Ox तथा OY के परित: जड़त्व आघूर्णों का योग इन अक्षों के कटान बिन्दु 0 में को जाने वाली तथा पटल के तल के लम्बवत् अक्ष OZ के परितः जड़त्व आघूर्ण के बराबर होता है। पटल का अक्ष Oz के परितः जड़त्व आघूर्ण
Iz = Iz + Iy
जहाँ Iz तथा Iy पटल का क्रमश: अक्ष OX तथा OY के परितः जड़त्व आघूर्ण है।
सिद्ध करना – माना एक पटल है जिसके तल में दो परस्पर लम्बवत् अक्षं Ox तथा OY ली गई हैं अक्ष OZ पटल के तल के अभिलम्बवत् है तथा Ox व OY के कटान बिन्दु०से गुजरती है।
माना अक्ष OZ से r दूरी पर m द्रव्यमान का एक कण P है। इस कण का अक्ष OZ के परितः जड़त्व आघूर्ण mr2 होगा। अतः पूरे पटल का अक्ष OZ के परित: जड़त्व आघूर्ण
Iz = Σmr2
लेकिन r2 = x2 + y2
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 31
जहाँ x व y कण भी क्रमशः अक्षों OY व Ox से दूरियाँ हैं।
∴I2 = Σm(x2 + y2)
= Σmx2 + Σmy2
लेकिन Ix = Σmx2 तथा Iy = Σmy2
अतः Iz = Iz + Iy

(b) समान्तर अक्षों की प्रमेय – किसी पिंड का किसी अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण (I) उस पिंड के द्रव्यमान केन्द्र में को जाने वाली समान्तर अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण (Icm) तथा पिंड के द्रव्यमान व दोनों अक्षों के बीच की लम्बवत् दूरी के वर्ग के गुणनफल के योग के बराबर होता है।
I = Icm + Ma2
जहाँ M पिंड का द्रव्यमान है तथा a दोनों अक्षों के बीच लम्बवत् दूरी है।
सिद्ध करना – माना एक समतल पटल है जिसका द्रव्यमान केन्द्र C है। माना पटल का पटल के तल में स्थित अक्ष AB के परितः जड़त्व आघूर्ण 1 है तथा इसके द्रव्यमान केन्द्र C से गुजरने वाली समान्तर अक्ष EF के परितः जड़त्व आघूर्ण Icm है। माना AB तथा EF अक्षों के बीच लम्बवत् दूरी a है।
माना EF अक्ष से दूरी पर m द्रव्यमान का एक कण Pहै। P की AB से दूरी (r + a) होगी।
P का AB के परितः जड़त्व आघूर्ण m (r + a)2 होगा।
अतः पूरे पटल का AB अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 32
I = Σm(r+a)2
= Σm(r2 + a2 + 2ar)
I = Σmr2 + Σma2 + 2aΣmr
लेकिन I cm = Σmr2
तथा a2Σm = a2M
तथा Σmr = 0 क्योंकि किसी पटल के समस्त कणों का पटल के द्रव्यमान केन्द्र में से गुजरने वाली अक्ष के परितः आघूर्णी का योग शून्य होता है। अतः
I = Icm + Ma2

प्रश्न 7.27.
सूत्र v2 = \(\frac { 2gh }{ (1+k^{ 2 }/R^{ 2 }) } \)को गतिकीय दृष्टि (अर्थात् बलों तथा बल आघूर्णों के विचार) से व्युत्पन्न कीजिए। जहाँ v लोटनिक गति करते पिंड (वलय, डिस्क, बेलन या गोला) का आनत तल की तली में वेग है।आनत तल पर वह ऊँचाई है जहाँ से पिंड गति प्रारंभ करता है। सममित अक्ष के परितः पिंड की घूर्णन त्रिज्या है और R पिंड की त्रिज्या है।
उत्तर:
माना M व R क्रमश: गोलीय पिंड के द्रव्यमान व त्रिज्या है, यह एक ऐसे आनत तल पर A बिन्दु पर रखा गया है जिसका क्षैतिज से झुकाव θ है।
∴ इस पिंड में A बिन्दु पर पूर्णत: स्थितिज ऊर्जा होगी।
E = mgh
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 33
जब यह पिंड तल पर फिसलना प्रारम्भ करता है, पिंड द्रव्यमान केन्द्र से गुजरने वाली अक्ष (i.e., c) से गुजरता है जो कि तल के समान्तर है। इसके भार व भार के घटक के कारण घूर्णनी गति नहीं होती है चूँकि इसकी क्रिया रेखा C से गुजरती है। इस प्रकार पिंड पर लगने वाला सम्पूर्ण बलाघूर्ण शून्य होगा। घर्षण बलाघूर्ण अर्थात् घूर्णन के कारण बल लगता है।
∴τ = FR
घूर्णन करते पिंड की सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा (E) में रैखिक गतिज ऊर्जा (Kt व घूर्णनी गतिज ऊर्जा (Kr) होती है।
i.e., E = K1+ Kr
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 34
तथा y = Rω = घूर्णन करते पिंड का रैखिक वेग
जहाँ ω कोणीय वेग है।
पिंड का जड़त्व आघूर्ण, I = \(\frac{1}{2}\)mK2 जहाँ K = घूर्णन त्रिज्या।
माना पृष्ठ सतह खुरदरी है तथा पिंड बिना फिसले ही घूर्णन करता है। बिन्दु B पर, पिंड में दोनों रैखिक व घूर्णनी गतिज ऊर्जाएँ होती हैं। बिन्दु B पर सम्पूर्ण ऊर्जा समी० (iii) के अनुसार होगी।
ऊर्जा संरक्षण के नियम से, बिन्दु A पर स्थितिज ऊर्जा = बिन्दु B पर सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 35

प्रश्न 7.28.
अपने अक्ष पर ω0 कोणीय चाल से घूर्णन करने वाली किसी चक्रिका को धीरे से (स्थानान्तरीय धक्का दिए बिना) किसी पूर्णतः घर्षणरहित मेज पर रखा जाता है। चक्रिका की त्रिज्या R है। चित्र में दर्शाई चक्रिका के बिन्दुओं. A, B तथा C पर रैखिक वेग क्या हैं? क्या यह चक्रिका चित्र में दर्शाई दिशा में लोटनिक गति करेगी?
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 36
उत्तर:
चक्रिका व मेज के मध्य घर्षण बल शून्य है। इस कारण चक्रिका लोटनिक गति नहीं कर पाएगी व मेज के एक ही बिन्दु B के सम्पर्क में रहते हुए अपनी अक्ष के परितः घूर्णनी गति करती रहेगी।
दिया है: बिन्दु A की अक्ष से दूरी R है।
अतः बिन्दु A पर रैखिक वेग, VA = Rω0 (तीर की दिशा में)
तथा बिन्दु B पर रैखिक वेग, VB = Rω0 (तीर की विपरीत दिशा में)
चूँकि बिन्दु C की अक्ष से दूरी \(\frac{R}{2}\)
अतः बिन्दु C पर रैखिक वेग vc = \(\frac{R}{2}\)ω0
(क्षैतिजत: बाईं ओर से दाईं ओर को) अर्थात् चक्रिका लोटनिक गति नहीं करेगी।

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प्रश्न 7.29.
स्पष्ट कीजिए कि चित्र (प्रश्न 7.28) में अंकित दिशा में चक्रिका की लोटनिक गति के लिए घर्षण होना आवश्यक क्यों है?

  1. B पर घर्षण बल की दिशा तथा परिशुद्ध लुढ़कन आरंभ होने से पूर्व घर्षणी बल आघूर्ण की दिशा क्या है?
  2. परिशुद्ध लोटनिक गति आरंभ होने के पश्चात् घर्षण बल क्या है?

उत्तर:

1. बिन्दु B पर घर्षण बल B के वेग का विरोध करता है। अतः घर्षण बल तीर की दिशा में होगा। घर्षण बल आघूर्ण के कार्य करने की दिशा इस प्रकार है कि वह कोणीय गति का विरोध करता है। ω0 व τ दोनों ही कागज के पृष्ठ के अभिलम्बवत् कार्य करते हैं। इनमें ω0 कागज के पृष्ठ के अंतर्मुखी व र कागज के पृष्ठ के बहिर्मुखी है।

2. घर्षण बल सम्पर्क – बिन्दु B के वेग को कम कर देता है। जब यह वेग शून्य होता है तो चक्रिका की लोटन गति आदर्श सुनिश्चित हो जाती है। एक बार ऐसा हो जाने पर घर्षण बल का मान शून्य हो जाता है।

प्रश्न 7.30.
10 cm त्रिज्या की कोई ठोस चक्रिका तथा इतनी ही त्रिज्या का कोई छल्ला किसी क्षैतिज मेज पर एक ही क्षण 10π rads-1 की कोणीय चाल से रखे जाते हैं। इनमें से कौन पहले लोटनिक गति आरंभ कर देगा। गतिज घर्षण गुणांक µ k = 0.21
उत्तर:
दिया है: छल्ले तथा ठोस चक्रिका की त्रिज्या,
R = 10 सेमी = 0.1 मीटर
µk = 0.2
छल्ले का जड़त्व आघूर्ण = MR2 …. (i)
ठोस चक्रिका का जड़त्व आघूर्ण = \(\frac{1}{2}\) mR2 … (ii)
प्रा० कोणीय वेग = ω0 = 10π रेडियन/सेकण्ड
घर्षण बल के कारण गति होती है तथा घर्षण के कारण द्रव्यमान केन्द्र त्वरित होता है। छल्ला शून्य प्रारम्भिक वेग से चलता है। प्रारम्भिक कोणीय वेग 00 में मन्दन घर्षण बलाघूर्ण के कारण होता है।
हम जानते हैं कि µkN = ma
या µkmg = m
या a = µkg
तथा बलाघूर्ण τ = -Iα
= FR = µkmgR
जहाँ R = चकती या वलय की त्रिज्या
ऋणात्मक चिह्न प्रदर्शित करता है कि मन्दन बलाघूर्ण है। यहाँ u = 0
∴v = u + at से
v = at or a = \(\frac{v}{t}\)
समी० (iii) से a = µkg
या \(\frac{v}{t}\) = µkg
या v = µkgt’ (चकती के लिए)
समी० (iv) से
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 37
माना छल्ले की t समय व चकती की t’ समय बाद कोणीय वेग
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 38
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 38-a
R = 0.1 m, ω = 10m rads-1, µ = 0.2
समी० (x) व (xi) में रखने पर,
g = 9.8 ms-2
∴t = \(\frac { 0.1\times 10\pi }{ 3\times 0.2\times 9.8 } \) = 0.8s
तथा t’ = \(\frac { 0.1\times 10\pi }{ 3\times 0.2\times 9.8 } \) = 0.53s
अत: समी० (xii) व (xiii) से स्पष्ट है कि t’ < t अर्थात् चकती पहले फिसलना प्रारम्भ करेगी।

प्रश्न 7.31.
10 kg द्रव्यमान तथा 15 cm त्रिज्या का कोई सिलिंडर किसी 30° झुकाव के समतल पर परिशुद्धत: लोटनिक गति कर रहा है। स्थैतिक घर्षण गुणांक = 0.25

  1. सिलिंडर पर कितना घर्षण बल कार्यरत है?
  2. लोटन की अवधि में घर्षण के विरुद्ध कितना कार्य किया जाता है?
  3. यदि समतल के झुकाव में वृद्धि कर दी जाए तो के किस मान पर सिलिंडर परिशुद्धतः लोटनिक गति करने की बजाय फिसलना आरंभ कर देगा?

उत्तर:
दिया है:
m = 10 kg, R = 0.15 m, θ = 30°, µk = 0.25
1. बेलन पर लगने वाला घर्षण बल –
F = \(\frac{1}{3}\) mg sinθ
= \(\frac{1}{3}\) × 10 × 9.8 × sin 30° = 16.3 न्यूटन

2. चूंकि परिशुद्ध लोटनिक गति में, सम्पर्क बिन्दु पर कोई सरकन गति नहीं है। इसलिए घर्षण बल के विरुद्ध कृत कार्य, w = 0 है।

3. लोटनिक गति के लिए,
\(\frac{F}{R}\) = \(\frac{1}{3}\) tan θ ≤ µs
∴ tan θ = 3 ≤ µs
= 3 × 0.25 = 0.75
∴θ = tan-1(0.75)
= 37°

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प्रश्न 7.32.
नीचे दिए गए प्रत्येक प्रकथन को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा कारण सहित उत्तर दीजिए कि इनमें से कौन – सा सत्य है और कौन – सा असत्य है –

  1. लोटनिक गति करते समय घर्षण बल उसी दिशा में कार्यरत होता है जिस दिशा में पिंड का द्रव्यमान केंद्र गति करता है।
  2. लोटनिक गति करते समय संपर्क बिंदु की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
  3. लोटनिक गति करते समय संपर्क बिन्दु का तात्क्षणिक त्वरण शून्य होता है।
  4. परिशुद्ध लोटनिक गति के लिए घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है।
  5. किसी पूर्णतः घर्षणरहित आनत समतल पर नीचे की ओर गति करते पहिए की गति फिसलन गति (लोटनिक गति नहीं) होगी।

उत्तर:

  1. सत्य, चूँकि स्थानान्तरीय गति घर्षण बल के कारण ही उत्पन्न होती है। इसी बल के कारण पिंड का द्रव्यमान आगे की ओर बढ़ता है।
  2. सत्य, चूँकि लोटनिक गति, सम्पर्क बिन्दु पर सी गति 1 के समाप्त होने पर प्रारम्भ होती है। इस प्रकार परिशुद्ध लोटनिक । गति में सम्पर्क बिन्दु की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
  3. असत्य चूँकि घूर्णन गति के कारण, सम्पर्क बिन्दु की गति में अभिकेन्द्र त्वरण अवश्य ही विद्यमान होता है।
  4. सत्य चूँकि परिशुद्ध लोटनिक गति में सम्पर्क बिन्दु पर कोई सरकन नहीं होता है। इस कारण घर्षण बल के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है।
  5. सत्य, घर्षण के न होने पर आनत तल पर छोड़े गए पहिए का आनत तल के साथ सम्पर्क बिन्दु विरामावस्था में नहीं रहेगा बल्कि पहिए के भार के अधीन माना तल के अनुदिश फिसलता जाएगा। इस कारण यह गति लोटनिक न होकर विशुद्ध सरकन गति होगी।

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प्रश्न 7.33.
कणों के किसी निकाय की गति को इसके द्रव्यमान केन्द्र की गति और द्रव्यमान केन्द्र के परितः गति में अलग – अलग करके विचार करना।
दर्शाइये कि –
(a) P = p’i + miV
जहाँ pi (mi द्रव्यमान वाले) i – वें कण का संवेग है, और p’i = miv’i, ध्यान दें कि , द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष i – वें कण का वेग है। द्रव्यमान केन्द्र की परिभाषा का उपयोग करके यह भी सिद्ध कीजिए कि Σp’i = 0

(b) K = K’ + \(\frac { 1 }{ 2 }\) Mv2
K कणों के निकाय की कुल गति ऊर्जा, K’ = निकाय की कुल गतिज ऊर्जा जबकि कणों की गतिज ऊर्जा द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष ली जाये। MV2/2 संपूर्ण निकाय के (अर्थात् निकाय के द्रव्यमान केन्द्र के)स्थानान्तरण की गतिज ऊर्जा है। इस परिणाम का उपयोग भाग 7.14 में किया गया है।

(c) L = L’ + R x MV
जहाँ L’ = Σr’i, x P’i, द्रव्यमान के परितः निकाय का कोणीय संवेग है जिसकी गणना में वेग द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष मापे गये हैं। याद कीजिए r’ = ri – R; शेष सभी चिह्न अध्याय में प्रयुक्त विभिन्न राशियों के मानक चिह्न हैं। ध्यान दें कि L’ द्रव्यमान केन्द्र के परितः निकाय का कोणीय संवेग एवं MRx Vइसके द्रव्यमान केन्द्र का कोणीय संवेग है।

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 39

(जहाँ ‘ द्रव्यमान केन्द्र के परितः निकाय पर लगने वाले सभी बाह्य बल आघूर्ण हैं।)
[संकेत : द्रव्यमान केन्द्र की परिभाषा एवं न्यूटन के गति के तृतीय नियम का उपयोग कीजिए। यह मान लीजिए कि किन्हीं दो कणों के बीच के आन्तरिक बल उनको मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कार्य करते हैं।]
उत्तर:
(a) माना कि m1m2 …mn, दृढ़ पिंड की रचना करने वाले कणों के द्रव्यमान हैं तथा मूल बिन्दु 0 (0, 0) के सापेक्ष इन कणों के स्थिति सदिश क्रमश: \(\vec { r } \)1\(\vec { r } \)2…..\(\vec { r } \)n हैं।
माना कि मूल बिन्दु के सापेक्ष द्रव्यमान केन्द्र (G) की स्थिति
सदिश \(\vec { R } \) व द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष अलग – अलग कणों की स्थिति क्रमश: \(\vec { r } \)1,\(\vec { r } \)2 …. \(\vec { r } \)n हैं।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image f
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 40a
जहाँ \(\overrightarrow { p } _{ i }\) = mi \(\overrightarrow { v } _{ i }\) = i वे कण का मूल बिन्दु के सापेक्ष रेखीय संवेग है।
\(\overrightarrow { p } _{ i }\) = mi \(\overrightarrow { v } _{ i }\) = i वें कण का द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष रेखिक संवेग
परन्तु द्रव्यमान केन्द्र के परितः कणों के आघूर्ण का सदिश योग शून्य होता है।

(b) किसी निकाय की गतिज ऊर्जा में रैखिक गतिज ऊर्जा | (K) व घूर्णनी गतिज ऊर्जा (K’ ) होती है। i.e., द्रव्यमान केन्द्र की गति की गतिज ऊर्जा (\(\frac{1}{2}\)mv2) व कणों के निकाय के द्रव्यमान केन्द्र के परित: घूर्णनी गति की गतिज ऊर्जा (K’) होता है। अतः निकाय की कुल ऊर्जा निम्नवत् होगी –
k = \(\frac{1}{2}\)mv2 + Iω2
= \(\frac{1}{2}\)mv2 + K’ = K’ + \(\frac{1}{2}\)mv2

(c) समी० (i) के बाईं ओर \(\vec { ri } \) का सदिश गुणन लेने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 41
(d) माना कि कणों के निकाय पर बलाघूर्ण लगाया जाता है।
माना कि कण के लिए \(\vec { L } \) के घटक Lx, Ly, व Lz क्रमशः x, y व z अक्षों के अनुदिश हैं। माना कि px, py. व pz, इसके रैखिक संवेग के घटक हैं।
Lz = xpy – ypx
Lx = ypz – zpy
Ly = zpx – xpz
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति image 41a

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Sister Nivedita Question Answer Class 11 English A Voyage Chapter 15 MP Board

Class 11 English A Voyage Chapter 15 Sister Nivedita Questions and Answers

Sister Nivedita Class 11th Question Answer

Word Power

(A) Make noun forms the following verbs using suffixes wherever necessary:
Example: encompass (verb) – compass (noun)
Initiate, revive, admire, dignify, generate
Answer:
initiation, revival, admiration, dignity, generation.

(B) Find from the text the noun forms for the following verbs:
Awake, regenerate, contribute, educate, petition
Answer:
awakening, regeneration, contribution, education, petitioner.

(C) Make adjectives from the following nouns:
Faith, India, action, intellect, disaster
Answer:
faithful, Indian, active, intellectual, disastrous

(D) Antonym of a word is not a negative, but its opposite in meaning, for example:
Ugly is the antonym of ‘beautiful’
Now find from the text the antonyms of the following words:
Pure, praise, destruction, falsehood, active, done, immoderate
Answer:
Pure – impure Praise – condemn Destruction – creation .
Falsehood – truth Active – retiring Done – undone Immoderate – moderate,

(E) Distinguish between the following pairs of words and use them separate sentences:
For example: principle, principal
Principal – highest in order of importance.
My father is the principal Secretary of a state.
Principle – guiding rule or code for behaviour, basic truth of conduct.
A good man must keep up high moral principles, moderate, moderation/ later, latter/ career, carrier/ exist, exit/ politics, political/ action, active
Answers:

  • Moderate – (liberal) – There W’as a moderate group of leaders.
    Moderation – (modification) – A moderation is required in this plan.
  • Later – (towards the end of) – Later he opted a different career.
    Latter – (mentioned after another) – Of the two the latter was intelligent.
  • Career – (profession) – He opted for teaching as his career.
    Carrier – (a person or thing carrying something) – Truck is a public carrier.
  • Exist – (to be present) – Old traditions still existing society.
    Exit – (a way out) – There was no emergency exit in that building.
  • Politics – (political affairs) – I don’t like politics.
    Political – (of or involving politics) – He has political inclinations.
  • Action – (the process of doing something) – He is a man of action.
    Active – (energetic) – Nehru was very active in politics.

Comprehension

(A) Answer the following questions in one sentence each:

Question 1.
What incident proved to be a turning point in the life of Sister Nivedita?
Answer:
The search for truth proved to be a turning point in the life of Sister Nivedita.

Question 2.
What type of politics was she interested in?
Answer:
She was interested in aggressive politics.

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Question 3.
What was her purpose in taking up a lecture for our of India?
Answer:
She went on a lecture-tour of India to rouse, the national consciousness of the people.

Question 4.
Whom did she inspire to revive the ideals of Indian Art?
Answer:
She inspired Abanindra Nath Tagore to revive the ideals of Indian Art.

Question 5.
Which one is supposed to be her best-known book?
Answer:
‘The Master As I Saw Him’ is supposed to be her best-known book.

Question 6.
Whom did she blame for the ruined economy of India?
Answer:
She blamed British imperialism for the ruined economy of India.

(B) Answer the following questions in 30 – 40 words each:

Question 1.
Write a short note on the early education of Sister Nivedita?
Answer:
Sister Nivedita got her education at Halifare College, run by a Chapter of the Congregationalist Church. She took up teaching work in 1884 at Keswick, in 1886 at Wrexham and in 1889 at Chester. She was greatly influenced by the ‘New Education’ Method of Pestalozzi and Froebel.

Question 2.
What factors made Sister Nivedita a center of a great educational movement?
Answer:
Nivedita’s great intellectual gifts made her well known in the,high society of London. Even Huxley had been much impressed by her intellectual. Gradually she became the centre of a great educational movement.

Question 3.
How did Swami Vivekanand’s preaching’s bring about a change in the career of Sister Nivedita?
Answer:
Sister Nivedita was greatly impressed with Vivekanand’s preaching’s which he gave in London. She immediately took a decision and offered her lifelong services in search of Truth and left for India. She came to Calcutta on 28 January where she was initiated into Brahmacharya and was given the name of Nivedita by Swami Vivekanand on 25 March, 1898.

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Question 4.
The author says, “She was a strong supporter of women’s education.” What were her views about Indian women?
Answer:
Sister Nivedita was a strong supporter of women’s education. She advocated for schools in the same way as they were for the boys. She has tremendous faith in them. She wanted them to have better education. But she also asked them not to give up their own ideals and practices. She strongly believed that once the women of India awoke, the country would be great again.

Question 5.
When was she named Sister Nivedita and by whom?
Answer:
Sister Nivedita was very much impressed with Swami Vivekanand’s views. She offered her lifelong services in .search of truth and left for India. She came to Calcutta on 28 January where she was initiated into Brahmacharya and was given the name of Nivedita by Swami Vivekanand on 25 March, 1898.

Question 6.
What did Sister Nivedita do for the uplift of Indian woman?
Answer:
Sister Nivedita did a lot for the uplift Indian woman. She had tremendous faith in them. She wanted better education for them. She started Kinder garden School for Hindu girls in November 1898. She inspired them in many ways. She asked them not to give up their own ideals and practices.

Question 7.
Give Sister Nivedita’s views on Swadeshi Movement?
Answer:
Sister Nivedita took active interest in India’s struggle for Independence. She supported Swadeshi Movement both in principle and practice. For her Swadeshi Movement was an opportunity for the Indian to make themselves respected by the whole world.

Question 8.
What aspect of Indian womanhood had great appeal to Sister Nivedita?
Answer:

(C) Answer the following questions in about 150 words each:

Question 1.
Give a short life-sketch of Sister Nivedita?
Answer:
Sister Nivedita was bom at Dunganon, Country Tyrone, Ireland, on 28 Oct., 1867. Originally she was called Margaret Elizabeth Noble. She was the eldest daughter of Samuel Richmond and Mary Isabel. Her parents were of Scottish descent and had settled in Ireland later. Margaret got her education at Halifax College, run by a Chapter of the Congregationalist Church.

She took up teaching work in 1884 at Keswick, later at Wrezeham in 1886, and at Chester in 1889. She was greatly influenced by the ‘New Education” Method of Pestolozzi and Froebel. She started a school of her own in 1892 in the name of Ruskin School in Wimbledon. She earned a high repute for the intellectual pursuits in the high society of London. Gradually she became the centre of a great educational movement which resulted in the establishment of the famous Sesame Club.

Right from her childhood she grew up under the influence of Christian doctrines. But the search for Truth led her in 1895 – 96 to swami Vivekanand’s teachings of Vedanta. In response to his message she offered her lifelong services in search of Truth and shifted to India. She initiated a number of revolutionary work. She participated in freedom movement; participated many relief work, wrote many books and contributed to a number of magazines and newspaper. She died on 13 Oct. 1911 after an attack of dysentery at Darjeeling. She was a great multifaceted personality.

Question 2.
“Different aspects of India’s life and society attracted and impressed Sister Nivedita to work.” Discuss.
Answer:
Sister Nivedita alias Margaret Elizabeth Noble was an Irish lady with great soul. Right from the beginning of her career she opted social services and took up teaching as her mission. Later she started her own School. Though she grew up under the influence of Christian doctrines she couldn’t avoid the impact of swami Vivekanand’s teaching of Vedanta and the search for Truth led her 1895-96 to offer her lifelong services to India. She was initiated into Bramacharya.

She started her career here encompassing the fields of teaching, social work and spirituality. She was much concerned with the education of female in India. She started Kindergarten School for female education. She participated in various relief works. She took active part in Indian struggle for freedom. She went of lecture-tours throughout India during September 1902 to 1904 to arouse national consciousness of the people. Herself was a supporter of aggressive politics.

She had cordial relations with the moderate also. She supported Swadeshi Movement whole heartedly. She helped other nationalist groups also. She encouraged the study of science and promoted Indian Art. She didn’t even hesitate to condemn Lord Curzon for calling Indians untruthful. She had all love and respect for India and its age-old ideals.

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Question 3.
Discuss Sister Nivedita’s views on contemporary Indian politics and her interest in it?
Answer:
Sister Nivedita had very’ high opinion about India. She was greatly influenced by the preaching of Swami Vivekanand She offered her lifelong services to India. She undertook a number of social services ,and worked for Indian mass wholeheartedly. She took pains to spread awareness of Indian people.

Female education became her prime concern as she thought it could make country great. After the death of Swami Vivekanand she resigned from the purely spiritual Ramakrishna Order in July 1902 and began taking active interest in the Indian struggle for freedom.

She undertook lecture-tours throughout India to arouse national consciousness of the people. Here was an aggressive type of politics. She didn’t believe in petitioner type of the politics of the moderates. Still she maintained cordial relations with the leaders of Schools of political thought. She attended Banares Congress in 1905. She supported Swadeshi Movement of the Indian people both in principle and practice. She was of the view that-in Swadeshi Movement the Indian people had found an opportunity to make themselves respected by the white world. She also helped other Nationalist groups like Down Society and Anushilan Samity. She was an active leader in Indian politics.

Question 4.
What is information do you gather from the lesson about Sister Nivedita’s approach to-
(i) National education, and
(ii) Indian Art.
Answer:
(i) Sister Nivedita was very much influenced with the preachings of Swami Vivekanand. Right from the beginning of her life she opted for teaching work. She started her own school. She became a prominent centre of great educational movement in London. Later the search for truth led to Vivekanand s teachings of the Vedanta. Later she came to India w here she opted for teaching, social work and spirituality’. She was a strong supporter of female education. For her school for girls was as much essential as it was for the boys. She declared that India needed the arduous transition. She started a Kindergarten for Hindu girls.

(ii) She was highly impressed with the Indian Art. She disapproved of the fiction of the Hellenic influence in the Indian Art. She inspired persons like Abanindra Nath Tagore to receive its ideas and defined the scope and functions of Indian School of Art.

D. Choose the correct alternative:

Question 1.
Sister Nivedita was born in
Answer:
(a) England
(b) New’ Zealand
(c) London
(d) Ireland.
(d) Ireland.

Question 2.
According to Sister Nivedita schooling and education should be planned for
(a) women only
(b) the present and next generation
(c) the present generation only
(d) men and women separately
Answer:
(b) the present and next generation

Question 3.
Aggressive type of politics means
(a) moderate politics
(b) petitioner’s politics
(c) non-violent way of politics
(d) politics of forceful revolution.
Answer:
(d) politics of forceful revolution.

Question 4.
Nivedita wanted to see India educated on
(a) ancient lines
(b) national lines
(c) moderate lines
(d) western lines
Answer:
(b) national lines

Question 5.
Women in India, according to her, were
(a) coward and docile
(b) illiterate and backward
(c) gentle and dignified
(d) awakened and conscious of their rights.
Answer:
(c) gentle and dignified

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(E) Explain what the writer means by following expressions:

(a) In one of her speeches, She said, “We have to carry our country through the arduous transition”
(b) “The world respects that which shows that it to be feared, and the one thing that is feared by all is strong, intelligent, and united action.”
Answer:
(a) Through this line the writer means to say that India needed a struggling transition because it had been under the influence of its age old practices which did not allow female education and their exposition. It was the great drawback of Indian society.

(b) Through these lines the writer says that the world always respects the mighty but not the weak. If we are united we become powerful and the world will automatically come to honourus.

Grammer

(see text book page 121 – 122)
Given’below are sentences with the use of ‘used to’ ‘had to’ ‘has to’, ‘will have to’, ‘shall have to’ and ‘daren’t’. Underline the modals used and find the modality expressed by each.

1. India used to be under British domination up to 15th August, 1947.
2. My sister had to give up her job after her marriage.
3. She used to go to her office on foot.
4. I have to submit the homework tomorrow.
5. A coward daren’t face his own conscience.
6. I advised her, “You had better get it typed ”
7 You don’t have to do it again and again
8 Indian workmen have to work in very poor conditions at work places.
9 I will have.to give up my claim I have lost my case
10. I hardly dared take bath in the morning during the months w inter.
Answer
Modals – Modality expressed

  1. Used to – 1. Habitual action of the past
  2. Had to – 2. Some act done under compulsion or under the force of a circumstance
  3. Used to – 3. Discontinued habitual action of the past.
  4. Have to – 4. Some act done under compulsion or under the force of a circumstance.
  5. daren’t to – 5. Lack of courage in doing something
  6. had – 6. better choice
  7. Have to – 7. Without compulsion
  8. Have to – 8. Some act done under compulsion or under the force of a circumstance
  9. Have to – 9. Done under compulsion or under the force of a circumstance
  10. Hardly dared – 10. Semi-negative

Speaking Activity

You are Suresh, Hold a dialogue with your friend Shakeel on the topic ‘Reading and Playing’. You ma begin as:
Suresh — Hello What is more important reading or play lug?
Shakeel — I think .
Now develop the dialogue, focusing in the following:
1. Place of games in life.
2. Sports as a hobby or profession career.
3 Being career-minded.
4. Studies as the main focus and priority
5. Need to fix goals.
6. Conclusion arrived at.
Answer:

  • Shakeel-I think games have a prominent role in our life.
  • Suresh — How can you say so Reading is more important than playing.
  • Shakeel — But can you read with unhealthy mind and body
  • Suresh — No. But only playing cant make ones life perfect. Infact what future do you see in sports
  • Shakeel — I think life take it as a profession an reach the top
  • Suresh — But can you do it without education
  • Shakeel — No. I don’t mean so Our main focus and priorit’ should he on studies
  • Suresh — First there is a need to fix one’s goal
  • Shakeel — It is true that there ma occur many diversions We should tackle them wisely.

Writing Activity

There have been many Europeans in search of truth, made India their second home and dedicated their lives for the suffering humanity Mother Teresa was one such soul. Write a note on her contribution to the destitute. Make use of the following guidelines:-

1. Born of Albanian parents, in Yugoslavia in 1910.
2. Parent’s rich. Nun in 1928, to Ireland, joined the religious order of Sister’s of Loreto. A year later, to India.
3. Joined Loreto convent in Darjeeling in 1929 sent to Calcutta, taught at St. Mary’s High School, had chances to see slum, pavement, misery. Decided to serve the beggars, lepers, orphans, slum- dwellers. Founded-Missionaries of Charity.
4. Indian citizenship in 1948, Her dress a plain White saree with blue border. A simple cross on left shoulder.
5. Padma Shree Award 1962. Jawaharlal Nehru Avard for International understanding 1972, Noble Prize for Peace 1979. Breathed her last on Sept. 1997
Answer
Mother Teresa’s real name was Agnes Gonreha Bojaxhiu. She was born in Skopje, then in Albania, Yugoslavia, on 27th August, 1910. When she was only twelve years old, she decided to become a nun to spend her life for God’s work. And at 18, she went to Ireland and entered the congregation of sisters of Loretto at the institute of Blessed Virginc Marg. There Agnes took on the name ‘Teresa’. There in that distant land she would get the call to go to India. And it was in ‘Kolkata’ that she arrived in 192°, to become a teacher in a Lorreto school. She devoted 17 years of her life to it.

In 1946 she left the school to serve the ‘poorest of the poor’ of Kolkata. She discarded the black and white dress of the Lorreto nuns and wore a coarse, blue-bordered sari. Sister Teresa became an Indian Citizen in the year 1948 and came to be known as Mother Teresa. She had bounless faith and courage in her heart. She set up her organisation, the Missionaries of Charity.

It began formally in October, 1950.In the early days, she had lack of money and help. But Mother Teresa did not wait for them. She entered a slum, gathered a few children around her, picked up a stick ands drew the letters of the Bengalj alphabet on the ground. Soon someone donated a chair, another a blackboard and teachers Volunteered their services and the school became a reality.

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Later Mother Teresa resolved to build a home where the abandoned could live and die with dignity. The search led her to Kalighat where the Kolkata Corporation gave her some empty halls. Thus became her first home for the dying and she called it ‘Nirmal Hridav’, ‘the place of the Pure Heart’.Mother Teresa also set up Normal Shishu Bhavan for the poor, orphaned and abandoned children. She worked for the lepers too.

Mother setup a shop under a tree in a tempers” colony, and gave out medicines, dressing and dispensed simple treatments. Later she built Prem Nivas, the ‘floor of love” for them. The whole world in general and India in particular is grateful to her. In 1962 the Government of India awarded her ‘Padma Shree”. In the s ear 1971 Pope VI. honoured her the first Pope John XXiii Peace Prize In 1979 she received Nobel Peace Prize. Thus she has received over so mam national and international awards. She spent all cash awards on the poor and the suffering.

Mother travelled throughout the world to set up Islands of hope for the neglected and the poor. She left fourth heavenly abode on Sept, 5, 1997 in Kolkata. The whole world shocked to hear the news of her death Her funeral took place with full state honour. Hundreds of important Indian and world personalities came to pay homage to her.

Think It Over

Swami Dayanand Saraswati, a scholar of Vedas and founder of Ary a Samaj was greatly pained to see the deplorable condition of women in India. He asserted, “Vedas sanctioned the most exalted status to women at home and in society and they had as much right to education and a place in the judiciary, legislature and administration as men”. Compare these views with those of Sister Nivedita.
AnswerThere are many similarities between the views of Swami Dayanand Saraswati and the Sister Nivedita. Both have advocated for the education and exposition of Indian women in every sphere of life. Sister Nivedita considers the women of India to be great and mystery. She thinks awakening of Indian women will certainly make Indian great.

Things To Do

In the text word ‘order means a religious community or brotherhood
Note the uses ‘to take religious order”’. It means to become a priest
Now study the uses of the words, ‘congregation’ and ‘convocation

(a) Congregation is a group of persons who are gathered together in a church to worship. The term may be used for other such activities also
(b) Convocation means a large and formal meeting of church officials. Find other meanings and uses of these words in a dictionary
Answer:
Do it yourself.

Sister Nivedita Summary in English

Sister Nivedita was born on 28 October, 1867 as the oldest daughter of Samuel Richmond and Mary Isabel who were of Scottish descent and had settled in Ireland. Nivedita, originally called Margaret Elizabeth Noble received her education at Halifare College. Later she joined teaching work in 1884 and thereafter in 1892 she started her own school in the name of ‘Ruskin School’ in Wimbledon. She got popularity in the high society of London for her great intellectual gifts. Gradually, she became the centre of a great educational movement which resulted in the famous Sesame club.

Since childhood Christian religious doctrines were instilled into her. But the search for truth led her to Swami Vivekanand’s teaching of the Vedanta in 1895-96. This made her offer her lifelong services in search of truth and she shifted to India. She came to Calcutta on 28 January where she was initiated into Brahmacharya on 25 March, 1898 and named as Sister Nivedita by Swami Vivekanand. She took to her the duties of field of teaching, social work and spirituality. He was a strong supporter of woman‘s/girl’s education.

She advocated for schools in the same way as they were for the boys. She believed in the next generation’s schooling. She started Kindergarden School for Hindu girls in November 1998. She took up a number of relief work like plague relief of the Ramakrishna Mission from 1899 onwards. After the death of Swami Vivekanand in July 1902 she fesigned from the purely spiritual Ramakrishna order and started taking as active interest in the Indian struggle for Independence. She also maintained her relationship with the order.

In order to arouse national consciousness among Indian people she undertook lecture tours throughout India. During September 1902 to 1904. Here’s was an aggressive type of politics. She didn’t believe in moderate politics of the petitioner type. Yet she maintained polities of the petitioner type. Yet she maintained cordial relation with the leaders of different schools of political thought. She also supported Swadeshi Movement both in principle and practice. For her Swadeshi Movement was an opportunity for the Indian to make themselves respected by the whole world. She also helped other nationalist group like Down Society and Anushilan Samiti.

Nivedita’s greatest desire was to see the whole nation educated in national lines. She encouraged the study of science. She believed in Indian Art which she thought essential for regeneration of India. For this she inspired persons like Abanindra Nath Tagore to receive its ideals.

From 1902 onwards she raised her voice against the British policy in India. She condemned Lord Curzon for the Universities Act of 1904 for his insulting the Indians by calling them untruthful. She blamed British Imperialism for the disastrous condition of Indian economy.

Sister Nivedita was a prolific writer: ‘The Master As I Saw Him a book on Swami Vivekanand is considered to be her masterpiece. She wrote about Hindu mythology and gods and goddesses ‘Kali. The Mother’. ‘Shiva’ and ‘Buddha’. ‘The Cradle Tales of Hinduism’ and ‘The Myths of Hindus and Buddhists’ are some of her famous books.

She had tremendous faith in women of India. She wanted them to have better education. But she also asked them not to give up their own deals and practices. She strongly believed that once the woman of India awoke, the country would be great again. She died on 13th October, 1911 after an attack of dysentry at Darjeeling.

Sister Nivedita Summary in Hindi

सिस्टर निवेदिता का जन्म 28 अक्टूबर, 1867 को सैमुअल रिचमण्ड और मेरी ईशाबेल, जो स्कॉटिश वंशज से संबंधित थे और आयरलैण्ड में बस गए थे, की सबसे बड़ी बेटी के रूप में हुआ था। निवेदिता मूल रूप से मारग्रेट एलिजाबेथ नॉबल कही जाती थी। उन्होंने अपनी शिक्षा हैलिफैक्स कॉलेज से प्राप्त की। बाद में उन्होंने 1884 में शिक्षण कार्य अपना लिया और उसके बाद 1892 में उन्होंने विम्बल्डन में ‘रस्किन स्कूल’ के नाम से अपना एक स्कूल खोल लिया। अपनी महान बौद्धिक विलक्षणताओं की वजह से उन्होंने लंदन के उच्च समाज में काफी ख्याति प्राप्त कर ली। धीरे-धीरे वे शैक्षणिक आंदोलन की केन्द्र बन गयी। परिणामस्वरूप सीसेम क्लब अस्तित्व में आया।

बचपन से ही उन्हें ईसाई धार्मिक सिद्धांतों की शिक्षा दी गई थी। लेकिन सत्य की खोज ने 1895-96 में उन्हें स्वामी विवेकानंद की वेदांत की शिक्षा की ओर अग्रसर किया। अतंतोगत्वा उन्होंने अपना पूरा जीवन सत्य की खोज में समर्पित कर दिया। वे भारत आ गयीं। वे 28 जनवरी को कलकत्ता पहुँची जहाँ उन्होंने 25 मार्च, 1898 को ब्रह्मचर्य का व्रत लिया। स्वामी विवेकानंद के द्वारा उन्हें सिस्टर निवेदिता का नाम दिया गया। उन्होंने शिक्षण सामाजिक कार्य और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में अपना काम शुरू कर दिया। वे नारी लड़की की शिक्षा की बहुत बड़ी समर्थक थीं।

उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल को उतना जरूरी ठहराया जितना लड़कों के लिए। वे दूसरी पीढ़ी की पढ़ाई में विश्वास रखती थीं। उन्होंने नवम्बर 1898 में हिन्दू लड़कियों के लिए किन्डर-गार्टेन स्कूल खोला। उन्होंने कई राहत कार्यों में भाग लिया। 1899 के बाद उन्होंने रामकृष्ण मिशन के प्लेग राहत कार्य में भाग लिया। जुलाई 1902 में स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के बाद उन्होंने अध्यात्किम रामकृष्ण ऑर्डर को छोड़ दिया और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेना शुरू कर दिया। उन्होंने रामकृष्ण ऑर्डर के साथ संबंध भी बनाए रखा।

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भारतीयों में राष्ट्रीय जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने सितंबर 1902 से 1904 तक पूरे भारत में व्याख्यान यात्रा शुरू किया। उनकी राजनीति आक्रमक प्रकार की थी। मध्यमागीर्य राजनीति में उनका जरा भी विश्वास नहीं था। इसके बावजूद ने विभिन्न राजनीतिक मत के नेताओं के साथ मधुर संबंध बनाए रखती थीं। वे सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों तरह से स्वदेशी आंदोलन का समर्थन करती थीं। उनका कहना था कि स्वदेशी आंदोलन के जरिए भारत के लोग पूरी दुनिया द्वारा आदर-सम्मान पा सकते हैं। डॉन सोसाइटी और अनुशीलन समिति जैसे राष्ट्रीय समूहों को भी वे मदद देती थीं। निवेदिता की हार्दिक इच्छा थी कि पूरा राष्ट्र राष्ट्रीय विद्या में शिक्षित हो। उन्होंने विज्ञान  के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। वे भारतीय कला में विश्वास करती थीं और इसे भारत के पुनरुत्थान के लिए आवश्यक मानती थी। उन्होंने इसके आदर्शों को पुर्नजीवित करने के लिए अवनिन्द्र नाथ टैगोर जैसे व्यक्तियों को प्रेरित किया।

1902 के बाद से उन्होंने भारत में अंग्रेजी नीति के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने लॉर्ड कर्जन की 1904 यूनिवर्सिटिज एक्ट की निंदा की। इस एक्ट के तहत कर्जन ने भारतीयों को . अविश्वासी कहा था। भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने के लिए उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्यवाद को दोषी ठहराया। सिस्टर निवेदिता उच्चकोटि की लेखिका थीं। ‘The Master 1 Saw Him’ उनकी उत्कृष्ट कृति मानी जाती है जो स्वामी विवेकानंद पर लिखी गई है। उन्होंने हिन्दु पराणविद्या और देवी-देवताओं के बारे में भी लिखा। ‘Kali, The Mother’, ‘Shiva’ और ‘Buddha’, ‘The Cradle Tales of Hinduism’ 3 ‘The Myths of Hindus and Buddhists’ उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं।

भारतीय नारियों में उन्हें अगाध विश्वास था। उनके लिए बेहतर शिक्षा की आवश्यकता पर उन्होंने बल दिया। लेकिन उन्होंने महिलाओं से यह भी कहा कि वे कभी भी अपना आदर्श नहीं छोड़े। उन्हें पूरा विश्वास था कि एक समय आएगा जब भारतीय नारियाँ जगेंगी और देश पुनः महान बनेगा। उनकी मृत्यु 13 अक्टूबर, 1911 को दार्जिलिंग में पेचिश के कारण हुई।

Sister Nivedita Word Meaning

MP Board Class 11th English A Voyage Solutions Chapter 15 Sister Nivedita 1 MP Board Class 11th English A Voyage Solutions Chapter 15 Sister Nivedita 2

Sister Nivedita Comprehension

Read the following passages and answer the questions that follow:

1. Since childhood. Christian religious doctrines were instilled into her But the search for Truth led her in 1895-96 to Swami Vivekananda’s teaching of the Vedanta. Swamiji was at this time preaching in London, and in response to this message of the East she offered her lifelong services in search of Truth and left for India. She came to Calcutta on 28 January. Margaret was initiated into Brahmacharya and was given the name of Nivedita by Swami Vivekanand on 25 March. 1898. From that time onwards Sister Nivedita started her career, encompassing the fields of teaching, social work and spirituality. She was a strong supporter of women’s girls’ education.

Questions:
(i) Which doctrines were instilled into Sister Nivedita since childhood?
(ii) What led her to Swami Vivekanand’s teachings of the Vedanta
(iii) What did she do for it?
(iv) What happened with her after she came to Calcutta?
(v) What field did she opt for her career?
Answers:
(i) Christian religious doctrines were instilled into Sister Nivedita since childhood.
(ii) The search for truth led her to Swami Vivekanand’s teachings of the Vedanta.
(iii) She offered her life-long services for it and left for India
(iv) She was initiated into Brahmacharya and was given the name of Nivedita.
(v) She opted the fields of teaching, social work and spirituality for her career.

2. Her greatest desire was to see the whole nation educated in national lines. She encouraged the study of science, and helped Jagadish Chandra Bose in bringing to light his theories and discoveries. Similarly, she believed that a re-birth of Indian Art was essential for the regeneration of India She disapproved of the fiction of the Hellenic influence in Indian Art, inspired Abanindranath Tagore and others to revive its ideals and define the scope and function of Indian School of Art.

Questions:
(i) What was her greatest desire?
(ii) What did she do for science?
(iii) What was her view about Indian art?
(iv) What did she not approve in Indian Art?
(v) Why did she inspire Abanindra Nath Tagore?
Answers:
(i) Her greatest desire was to see the whole nation educated in national lines.
(ii) She encouraged the study of science and helped Jagadish Chandra Bose in bringing his theories and discoveries to light.
(iii) She thought that a rebirth of Indian Art was essential for the regeneration of India.
(iv) She disapproved of the fiction of the Hellenic influence in Indian Art.
(v) She inspired Abanindra Nath Tagore to revive the ideals of Indian

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3. She had tremendous faith in women of India. She found them shy and retiring, but gentle, proud and dignified. She wanted them to have better education. But she also asked the women not to give up their own ideals and practices. She strongly believed that once the women of India awoke the country would be great again. She called India the land of great women and praised the ideals for which Sita and Savitri, Uma and Gandhari stood. She was full of admiration for the faithfulness and utter selflessness and loving thoughtfulness of Indian wife. She passed away on 13th October, 1911 after an attack of dysentery at Darjeeling.

Questions:
(i) In whom had she tremendous faith?
(ii) What did she find about Indian women?
(ii) What did she want for them?
(iv) What she did not want from Indian women to give up?
(v) What ideals did she praise?
Answers:
(i) She had tremendous faith in Indian women.
(ii) She found them shy and retiring but gentle, proud and dignified.
(iii) She wanted better education for other.
(iv) She didn’t want from Indian women to give up their ideals and practices.
(v) She praised the ideals for which Sita and Savitri, Uma and Gandhari stood.

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MP Board Class 11th English A Voyage Textbook

MP Board Class 11th Samanya Hindi Important Questions हिन्दी साहित्य का इतिहास

MP Board Class 11th Samanya Hindi Important Questions हिन्दी साहित्य का इतिहास

प्रश्न 1.
कहानी की परिभाषाएँ लिखिए एवं दो प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम लिखिए। (म. प्र. 2011, 12)
उत्तर–
कहानी की परिभाषा – कहानी गद्य की कथात्मक विधा है। एलेन पो ने कहानी की परिभाषा इस प्रकार दी है – “कहानी एक ऐसा आख्यान है जो इतना छोटा है कि एक बैठक में पढ़ा जा सके और जो पाठक पर एक ही प्रभाव उत्पन्न करने के लिए लिखा गया हो।”

“कहानी वास्तविक जीवन की ऐसी काल्पनिक कथा है जो छोटी होते हुए भी स्वतः पूर्ण एवं सुसंगठित होती है।”

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“कहानी में मानव जीवन की किसी एक घटना अथवा व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष का मनोरम चित्रण रहता है। उसका उद्देश्य केवल एक – ही प्रभाव को उत्पन्न करना होता है।”

वस्तुतः कहानी एक कथात्मक गद्य विधा है, जिसमें किसी एक घटना या जीवन के मार्मिक अंश का वर्णन पूर्ण अन्विति के साथ होता है।

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार के अनुसार – “घटनात्मक इकहरे चित्रण का नाम कहानी है। साहित्य के सभी अंगों के समान रस उसका आवश्यक गुण है।”

हड्सन (पाश्चात्य समीक्षक) के अनुसार – “कहानी में चरित्र व्यक्त होता है।”

प्रेमचन्द के अनुसार – “कहानी में बहुत विस्तृत विश्लेषण की गुंजाइश नहीं होती। यहाँ हमारा उद्देश्य सम्पूर्ण मनुष्य को चित्रित करना नहीं वरन् उसके चरित्र का एक अंग दिखाना है।”

कहानीकारों के नाम –
(1) मुंशी प्रेमचंद
(2) जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 2.
हिन्दी कहानी के प्रमुख तत्वों का वर्णन कीजिए। (म. प्र. 2009,10, 15)
उत्तर–
कहानी के तत्व – कहानी के निम्नलिखित छः तत्व माने गये हैं

  • कथावस्तु,
  • चरित्र – चित्रण या पात्र,
  • संवाद योजना या कथोपकथन,
  • वातावरण,
  • भाषा शैली,
  • उद्देश्य।

1. कथावस्तु – कथावस्तु के आधार पर ही कहानी का ढाँचा खड़ा होता है। कथा में प्रायः तीन मोड़ होते हैं – आरम्भ, चरम स्थिति तथा समापन या अन्त। इसका आरम्भ कौतूहलपूर्ण होता है। इसकी चरम स्थिति वह बिन्दु है जहाँ पहुँचकर कहानी द्वन्द्व, घटनाक्रम, उद्देश्य आदि अपनी चरमता पर पहुँच जाते हैं और कहानी के अन्त का पाठक या तो पूर्वानुमान कर लेता है या बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगता है।

कहानी का अंत भाग उद्देश्य की स्पष्टता तथा कथावस्तु की अन्तिम परिणति है। इस तरह कहानी की कथावस्तु संक्षिप्त, सजीव, उत्सुकता बढ़ाने वाली तथा स्वाभाविकता एवं द्वन्द से पूर्ण होती है।

2. चरित्र – चित्रण – कहानी में पात्रों की संख्या कम होती है। इन पात्रों का चरित्र – चित्रण विविध कार्य व्यापारों द्वारा तथा पात्रों के कथोपकथन के माध्यम से किया जाता है। पात्रों के व्यक्तित्व का सहज विकास तथा विश्वसनीयता बहुत आवश्यक है। पात्रों के चरित्र की संक्षिप्त, स्पष्ट और संकेतात्मक अभिव्यक्ति कहानी के गुण हैं।

3.संवाद योजना – संवाद योजना कहानी को रोचक, सजीव बनाती है। संवाद छोटे होने चाहिए। लम्बे तथा बोझिल वाक्यों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। संवाद की भाषा चुस्त एवं अभिव्यंजनापूर्ण होनी चाहिए। संवादों के माध्यम से घटना – क्रम का विकास, पात्रों के चरित्रों पर प्रकाश पड़ना चाहिए।

4. वातावरण – कहानी की कथावस्तु किसी – न – किसी देश – काल से सम्बद्ध होती है। अतः देश – काल के अनुसार कहानी का वातावरण स्वाभाविक होना चाहिए। कथाकार घटना, पात्र, प्रकृति – सौन्दर्य से सम्बद्ध स्थानों आदि का ऐसा चित्रण करता है जो सहज होता है तथा कहानी को प्रभावपूर्ण बनाता है। यथा, ‘उसने कहा था’ कहानी का आरम्भ ही अमृतसर के बाजार से होता है, जिसमें लहनासिंह का सम्पूर्ण पंजाबी परिवेश सरसता के साथ रूपायित हो उठता है।

5. भाषा – शैली कहानी की भाषा, विषय एवं पात्र के अनुकूल होती है। मुसलमान पात्र उर्दू शब्द का अधिक प्रयोग करता है तथा पंडितजी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी अधिक बोलते हैं। भाषा सरल, चुस्त एवं छोटे – छोटे वाक्य में गठित होती है। भाषा भावों, द्वन्द्व को अभिव्यक्त करने में सक्षम होनी चाहिए।

कहानी लेखन की अनेक शैलियाँ हो सकती हैं – वर्णनात्मक, संवादात्मक, आत्मकथात्मक, पत्रात्मक डायरी शैली आदि। एक – ही कहानी में एक – से – अधिक शैली का प्रयोग किया जा सकता है। आंचलिकता, हास्य – व्यंग्य, चित्रोपमता, प्रकृति का मानवीकरण आदि आयोजनों के द्वारा भाषा – शैली में सौन्दर्य – वृद्धि की जाती है।

6. उद्देश्य – प्रत्येक रचना में एकाधिक उद्देश्य निहित होते हैं। केवल मनोरंजन करना ही कहानी का उद्देश्य नहीं होता। कहानी की घटनाओं, पात्रों के संवादों आदि माध्यमों से कहानी का उद्देश्य व्यंजित होता है। कभी कहानी का उद्देश्य सामाजिक विद्रुपताओं पर प्रहार होता है तो कभी समाज, व्यक्ति के आचरणों में सुधार लाना होता है।

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प्रश्न 3.
हिन्दी कहानी के विविध प्रकारों का उल्लेख कीजिए। (म. प्र. 2013)
उत्तर–
कहानी के प्रकार – विषय, चरित्र, शैली आदि तत्त्वों के आधार पर कहानी के निम्नलिखित प्रमुख प्रकार हैं
(1) घटना प्रधान,
(2) चरित्र प्रधान,
(3) भाव प्रधान तथा
(4) वातावरण प्रधान कहानी।

(1) घटना प्रधान कहानी में घटनाओं की श्रृंखला होती है तथा किस्सा गोई की शैली में लिखी जाती है।
(2) चरित्र प्रधान कहानी में कहानी लेखक का अधिक ध्यान पात्रों के चरित्र – चित्रण पर ही अधिक रहता है। उसने कहा था’ कहानी चरित्र प्रधान है, जिसमें लहनासिंह का चरित्र प्रमुख है।
(3) भाव प्रधान कहानी में घटना गौण और भाव प्रधान होता है। संवदिया कहानी इसी प्रकार की है।
(4) वातावरण प्रधान कहानी में देश – काल के चित्रण पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है। ऐतिहासिक कहानी कुछ इसी प्रकार की होती है।

प्रश्न 4.
हिन्दी कहानी के विकासक्रम को रेखांकित कीजिए। (म. प्र. 2009, 15)
उत्तर–
हिन्दी कहानी का विकासक्रम – हिन्दी साहित्य में कहानी का जन्म भारतेन्दु युग में हुआ। ‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रकाशन से कहानी के क्षेत्र में क्रांति – सी आ गयी। इसके विकास को चार युगों में विभाजित किया जा सकता है
(1) प्रारम्भिक प्रयोगकाल – (सन् 1900 से 1910)
(2) विकास काल (पूर्वार्द्ध) – (सन् 1910 से 1936)
(3) विकास काल (उत्तरार्द्ध) – (सन् 1936 से 1947)
(4) स्वातन्त्रोत्तर काल – (सन् 1947 से अब तक)

1. प्रारम्भिक काल
कहानीकार – कहानियाँ
1. श्री किशोरी लाल गोस्वामी – इन्दुमती।
2. बंग महिला – दुलाई वाली।
3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल – ग्यारह वर्ष का समय।
4. माधव राव सप्रे – टोकरी भर मिट्टी।
5. गिरिजा दत्त बाजपेयी – पंडित और पंडिताइन।

2. विकास काल (पूर्वार्द्ध) – इस युग को हिन्दी का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है।
कहानीकार – कहानियाँ
1. प्रेमचन्द – पंच परमेश्वर, पूस की रात, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी, कफन।
2. जयशंकर प्रसाद – आकाशदीप, पुरस्कार, गुण्डा।
3. पं. चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ – उसने कहा था, बुद्ध का काँटा, सुखमय जीवन।
4. भगवती प्रसाद बाजपेयी – मिठाई वाला, सूखी लकड़ी।
5. विश्वम्भर नाथ शर्मा ‘कौशिक’ – ताई, रक्षाबन्धन, चित्रशाला।

अन्य कहानीकार – वृन्दावनलाल वर्मा, सियाराम शरण गुप्त, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, सुदर्शन, निराला, विनोद शंकर व्यास, चण्डी प्रसाद हृदयेश।

3. विकास काल (उत्तरार्द्ध)
कहानीकार – कहानियाँ
1. जैनेन्द्र कुमार – अपना – अपना भाग्य, पार्जण।
2. अज्ञेय – रोज, अमर वल्लरी, कोठरी की बात।
3. इलाचन्द्र जोशी – आहुति, छाया, दीवाली।
4. भगवतीचरण वर्मा – प्रायश्चित, दो बाँके।
5. यशपाल – पराया सुख, परदा, दु:ख।

अन्य कहानीकार – रांगेय राघव, विष्णु प्रभाकर, धर्मवीर भारती, अमृतराय, अमृतलाल नागर, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, महादेवी वर्मा, श्रीराम शर्मा, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’।

4.स्वातन्त्रोत्तर काल – इस युग में कहानी के क्षेत्र में नयी कहानी, ‘सचेतन कहानी’ तथा ‘समानान्तर कहानी’ आदि नामों से अनेक आन्दोलन हुए।
कहानीकार – कहानियाँ
1. मोहन राकेश – सौदा, एक और जिन्दगी।
2. कमलेश्वर – साँप, खोई हुई दिशाएँ।
3. राजेन्द्र यादव – किनारे से किनारे तक, छोटे – छोटे ताजमहल।
4. मन्नू भंडारी – सजा, यही है जिन्दगी।
5. फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ – संवदिया, ठेस, लाल पान की बेगम।

अन्य कहानीकार – शिवानी, निर्मल वर्मा, उषा प्रियंवदा, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीकान्त वर्मा, कृष्णा सोबती, भीष्म साहनी आदि।
इस प्रकार हिन्दी कहानी सतत् अपनी विकास यात्रा पर अग्रसर है।

प्रश्न 5.
एकांकी की परिभाषाएँ लिखिए। (Imp.)
उत्तर–
परिभाषा – एकांकी ऐसी नाट्य विधा है जो एक अंक में रचित होती है। इसमें एक ही घटना तथा एक प्रभावान्विति होती है। एकांकी न तो नाटक का संक्षिप्त रूप है न वह नाटक का एक अंक है। एकांकी स्वयं में पूर्ण रचना है।

डॉ. नगेन्द्र के अनुसार – “एकांकी में एक, विस्तार की सीमा कहानी जैसी, जीवन का एक पहलू, एक महत्वपूर्ण घटना, एक विशेष परिस्थिति अथवा उदीप्त क्षण, एकता, एकाग्रता और आकस्मिकता की अनिवार्यता, संकलन त्रय का साधारणत: पालन, कथावस्तु का ऐक्य होना चाहिए।”

उदयशंकर भट्ट के अनुसार – – “एकांकी में जीवन का एक अंश, परिवर्तन का एक क्षण, सब प्रकार के वातावरण से प्रेरित, एक झोंका, दिन में एक घंटे की तरह मेघ में बिजली की तरह, बसंत में फूल के ह्रास की तरह व्यक्त होता है।”

प्रश्न 6.
एकांकी के विविध तत्वों का वर्णन कीजिए। (म. प्र. 2009, 12, 13)
उत्तर–
परिभाषा – एकांकी ऐसी नाट्य विधा है जो एक अंक में रचित होती है। इसमें एक ही घटना तथा एक प्रभावान्विति होती है। एकांकी न तो नाटक का संक्षिप्त रूप है और न वह नाटक का एक अंक है। एकांकी स्वयं में पूर्ण रचना है।

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एकांकी के तत्व –

  1. कथावस्तु,
  2. पात्र या चरित्र – चित्रण,
  3. कथोपकथन,
  4. संकलन त्रय या वातावरण,
  5. संघर्ष,
  6. भाषा – शैली,
  7. अभिनेयता,
  8. उद्देश्य या प्रभावान्विति।

1. कथावस्तु – एकांकी की कथावस्तु छोटी तथा किसी एक मार्मिक घटना पर आधारित होती है। इसमें आरम्भ, विकास तथा चरम परिणति तीन मोड़ होते हैं। इसका आरम्भ कौतूहलपूर्ण होता है। मार्मिकता, परिधि संकोच या संक्षिप्तता, प्रभावान्विति या उद्देश्य कथावस्तु के अनिवार्य तत्व होते हैं। यह कथावस्तु एक अंक तथा कई दृश्यों में होती है।
2. पात्र या चरित्र – चित्रण – एकांकी में पात्रों की संख्या कम होती है। इसमें एक प्रधान पात्र होता है जिसके इर्द – गिर्द दूसरे पात्र होते हैं। पात्रों के क्रिया – कलापों के द्वारा, कथन के द्वारा, पात्रों के चरित्र का चित्रण किया जाता है।
3. कथोपकथन – एकांकी की संवाद – योजना, बहुत – ही चुस्त, संक्षिप्त, सजीव, सरस तथा गतिशील होती है। इसके माध्यम से कथा का विकास एवं चरित्रों के ऊपर प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः एकांकी संवाद प्रमुख रचना है। (म. प्र. 2010)
4. संकलन त्रय या वातावरण – संकलन त्रय का अर्थ है देश, काल तथा घटनाओं की अन्विति अर्थात् एकांकी की घटना एक देश, एक काल तथा एक प्रभावान्विति से युक्त होनी चाहिए तभी उसके वातावरण में स्वाभाविकता, सजीवता तथा सहजता आती है जो एकांकी को प्रभावपूर्ण बनाती है।
5.संघर्ष – आधुनिक एकांकी में घात – प्रतिघात तथा द्वन्द्व या मनोदशाओं का चित्रण अनिवार्य होता है।
6. भाषा – शैली – एकांकी की भाषा सरल तथा पात्रों के अनुकूल होती है। विषय की गम्भीरता के अनुकूल भाषा भी गम्भीर होती है।
7. अभिनेयता – अभिनेयता किसी भी नाट्य – रचना की जान होती है। एकांकी में दृश्यों का संयोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे कि वह रंगमंच पर अभिनीत हो सके। इसलिए एकांकी की संवाद – योजना, रंग – विधान, अभिनेयता की दृष्टि से योजित होते हैं।
8. उद्देश्य या प्रभावान्विति – एकांकी में कोई – न – कोई एक उद्देश्य होता है या प्रभावान्विति होती है। यह प्रभावान्विति एकांकी की चरम सीमा पर जाकर व्यक्त होती है। .

प्रश्न 7.
हिन्दी एकांकी के विविध प्रकारों का उल्लेख कीजिए। (म. प्र. 2015)
उत्तर–
एकांकी के प्रकार – विषय की दृष्टि से एकांकी कई प्रकार के होते हैं। जैसे – सामाजिक, धार्मिक, व्यंग्यपूर्ण, ऐतिहासिक, राजनीतिक, पौराणिक आदि।

शैली की दृष्टि से एकांकी के निम्नलिखित प्रकार हो सकते हैं –

  1. स्वप्न रूप,
  2. प्रहसन,
  3. काव्य एकांकी,
  4. रेडियो रूपक,
  5. ध्वनि रूपक,
  6. वृत्त रूपक।

प्रश्न 8.
हिन्दी एकांकी के विकास को कितने भागों में बाँटा गया है? (म. प्र. 2010, 13)
उत्तर–
(1) भारतेन्दु युग – सन् 1872 से 1910 तक – (सामाजिक कुरीतियाँ, आत्म गौरव का भाव)
(2) प्रसाद युग सन् 1911 से 1930 तक – (राष्ट्रीय, सामाजिक, नैतिक, आदर्शवादी)
(3) रामकुमार वर्मा युग सन् 1930 से 1947 तक – (शिल्प की दृष्टि से नयापन)
(4) स्वातन्त्रयोत्तर युग – सन् 1947 से अब तक। (विषय – वस्तु की दृष्टि से विविधता)

प्रश्न 9.
हिन्दी साहित्य के इतिहास को कितने भागों में बाँटा गया है? प्रत्येक का नाम तथा सन् व एक – एक कवि का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
हिन्दी साहित्य के इतिहास को चार भागों में बाँटा गया है
(1) वीरगाथा काल – सन् 1050 से 1375 तक
(2) भक्तिकाल – सन् 1375 से 1700 तक
(3) रीतिकाल – सन् 1700 से 1900 तक
(4) आधुनिक काल – सन् 1900 से अब तक।

प्रत्येक के एक – एक कवि –
(1) चन्द बरदायी, नरपति नाल्ह
(2) सूरदास, तुलसीदास, कबीर, जायसी
(3) बिहारी, भूषण
(4) प्रसाद, पन्त, निराला।

प्रश्न 10.
हिन्दी के प्रमुख चार एकांकीकारों का नाम एवं उनकी एक – एक रचनाएँ लिखिए। (म. प्र. 2011, 12, 15)
उत्तर–
हिन्दी साहित्य का प्रथम एकांकीकार जयशंकर प्रसाद को माना जाता है। उनका ‘एक घुट’ प्रथम एकांकी है। वैसे तो यह माना जाता है कि एकांकियों की रचना अंग्रेजी साहित्य के अनुकरण पर हुई थी, परन्तु संस्कृत साहित्य में अनेक एकांकी मिलते हैं।

एकांकीकार – प्रसिद्ध एकांकियाँ
1. डॉ. रामकुमार वर्मा – दीपदान, रेशमी टाई, पृथ्वीराज की आँखें।
2. विष्णु प्रभाकर – वापसी, हब्बा के बाद।
3. भगवतीचरण वर्मा – सबसे बड़ा आदमी, दो कलाकार।
4. उदयशंकर भट्ट – नये मेहमान, नकली और असली।
5. भुवनेश्वर प्रसाद – कारवाँ, ऊसर।
6. सेठ गोविन्द दास – केरल का सुदामा।
7. जगदीशचन्द्र माथुर – रीढ़ की हड्डी, भोर का तारा।
8. उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ – सूखी डाली, पापी।

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अन्य एकांकीकार – गिरिजा कुमार माथुर, वृन्दावन लाल वर्मा, धर्मवीर भारती, विनोद रस्तोगी, हरिकृष्ण प्रेमी, लक्ष्मी नारायण मिश्र, लक्ष्मी नारायण लाल।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के एक अंक वाले नाटक ‘भारत दुर्दशा’, ‘अंधेर नगरी’ – इन्हें आधुनिक ढंग का एकांकी नहीं माना जा सकता।

एकांकी आधुनिक युग की ही उपज है। हिन्दी एकांकी विधा का इतिहास अत्यन्त अल्पकालिक है।

प्रश्न 11.
जगदीश चंद्र माथुर एवं रामकुमार वर्मा की दो – दो एकांकी के नाम लिखिए।
उत्तर–
(1) जगदीश चंद्र माथुर –

  • रीढ़ की हड्डी,
  • भोर का तारा।

(2) डॉ. रामकुमार वर्मा –

  • दीपदान,
  • पृथ्वीराज की आँखें।

प्रश्न 12.
स्वातन्त्रोत्तर काल में लिखी गई कहानी एवं कहानीकार के नाम लिखिए।
उत्तर–
कहानीकार – कहानियाँ
1. मोहन राकेश – सौदा, एक और जिन्दगी
2. कमलेश्वर – साँप, खोई हुई दिशाएँ
3. राजेन्द्र यादव – किनारे से किनारे तक
4. मन्नू भण्डारी – सजा
5. फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ – ठेस, संवदिया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1.
हिन्दी कहानी एवं एकांकी के दो समान तत्व कौन – कौन से हैं?
उत्तर–
कथानक, संकलन – त्रय।

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प्रश्न 2.
भारतेन्दु युग का नामकरण किस साहित्यकार के नाम पर किया गया है?
उत्तर–
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।

MP Board Class 11th General Hindi Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi गद्य खण्ड Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi गद्य खण्ड Important Questions

1. शिक्षा

– स्वामी विवेकानंद

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। ज्ञान मनुष्य में स्वभाव सिद्ध है, कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता; सब अंदर ही है। हम जो कहते हैं कि मनुष्य जानता’ है, यथार्थ में, मानसशास्त्र – संगत भाषा में, हमें कहना चाहिए कि वह आविष्कार करता है, “अनावृत’ या ‘प्रकट’ करता है।”

शब्दार्थ – अन्तर्निहित = मन में विद्यमान, अभिव्यक्त = प्रकट, अनावृत्त = जो ढंका हुआ न हो। संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश स्वामी विवेकानंद के ‘शिक्षा’ पाठ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – स्वामी विवेकानंद ने ज्ञान को पहले से संचित बताया है।

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व्याख्या – स्वामी विवेकानंद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार ज्ञान से परिपूर्ण रहता है। मन में विद्यमान ज्ञान जब फूटकर बाहर आता है तो उसे शिक्षा कहते हैं। ज्ञान व्यक्तिगत एवं आंतरिक चीज है, वह बाहर से ग्रहण नहीं किया जा सकता। मनुष्य का सब कुछ जानना’ ज्ञान का सार्वजनिक प्रकटीकरण है। अंदर की वस्तु को बाहर ला देने की प्रक्रिया आविष्कार है। ज्ञान अन्तर्निहित है, शिक्षा उसी का प्रकटीकरण है। शिक्षक भी स्वयं के ढंके हुए ज्ञान को खोल देता है।

विशेष – तत्सम भाषा का प्रयोग है। तथ्यात्मक एवं तर्कसंगत शैली का प्रयोग है। निगमन शैली में सूत्र को समझाया गया है।

2. “समस्त ज्ञान, चाहे वह लौकिक हो अथवा अध्यात्मिक, मनुष्य के मन में है। बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढंका रहता है और जब आवरण धीरे – धीरे हटता है, तो हम कहते हैं कि ‘हम सीख रहे हैं।’ ज्यों – ज्यों आविष्करण की क्रिया बढ़ती जाती है, त्यों – त्यों हमारे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है। जिस मनुष्य पर से यह आवरण उठता जा रहा है, वह अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ज्ञानी है, और जिस पर यह आवरण तह पर तह पड़ा हुआ है, वह अज्ञानी है।”

शब्दार्थ – लौकिक = सांसारिक, आवरण = पर्दा, आविष्करण = खोज का प्रकटीकरण। संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश स्वामी विवेकानंद के ‘शिक्षा’ पाठ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश में ज्ञानी एवं अज्ञानी के बीच अन्तर स्पष्ट किया गया है।

व्याख्या – स्वामी विवेकानंद का मानना है कि सांसारिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य के मन की गहराई में संचित होता है। वह ज्ञान सबके सामने न होकर ढंका रहता है, उस पर एक झीना परदा पड़ा रहता है। परदा का हटना सीखने की प्रक्रिया कही जा सकती है। पर्दा हटने की प्रक्रिया और खोजों के बाहर आने की प्रक्रिया जितनी तेज होती है, ज्ञान का प्रकटीकरण भी उतना ही तेजी से होता है। संचित ज्ञान से पर्दा न उठना अज्ञानता है। परत – दर – परत परदा ढंका रहना घोर अज्ञानता है।

विशेष – तत्सम भाषा का प्रयोग है। ज्ञान एवं ज्ञानी की नई परिभाषा प्रस्तुत की गई है।

3. “शिक्षा विविध जानकारियों का ढेर नहीं है, जो तुम्हारे मस्तिष्क में लूंस दिया गया है और जो आत्मसात हुए बिना वहाँ आजन्म पड़ा रहकर गड़बड़ मचाया करता है। हमें उन विचारों की अनुभूति कर लेने की आवश्यकता है, जो जीवन निर्माण, मनुष्य निर्माण तथा चरित्र – निर्माण में सहायक हों।”

शब्दार्थ – आत्मसात = आत्मा में उतारा हुआ, आजन्म = सम्पूर्ण जीवन। संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश स्वामी विवेकानंद के ‘शिक्षा’ पाठ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – स्वामी विवेकानंद के अनुसार तथ्यात्मक ज्ञान शिक्षा नहीं है।

व्याख्या – स्वामी विवेकानंद के अनुसार किसी भी विषय पर बहुत सारी जानकारी रखना ज्ञान नहीं है। जिस ज्ञान को हम अन्तर्मन में उतार न सकें, वह हमारे किसी काम का नहीं हो सकता। बहुतायत में एकत्र किया तथ्यात्मक ज्ञान मस्तिष्क को कचरे का ढेर बना देता है। जीवन – यापन, मानवता के विकास एवं चरित्र – उत्थान में शिक्षा का योग होना चाहिए। कुछेक विचारों को जीवन में उतारकर भी हम परमज्ञानी बन सकते हैं। तर्क प्रधान शिक्षा से जीवन का कल्याण हो सकता है।

विशेष – तत्सम भाषा की प्रधानता है। ज्ञान की नई परिभाषा प्रस्तुत की गई है। तथ्यात्मक ज्ञान पर बल दिया गया है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही जोड़ी बनाइए
1. मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति – (क) जीवाणुकोश में
2. गुरुत्वाकर्षण का आविष्कार किया था (म. प्र. 2013) – (ख) शिक्षा है
3. विशाल बुद्धि सिमटी होती है (म. प्र. 2013) – (ग) चरित्र निर्माण करना
4. शिक्षा का उद्देश्य है (म. प्र. 2013) – (घ) न्यूटन ने।
उत्तर –
1. (ख), 2. (घ), 3. (क), 4. (ग)।

प्रश्न 2.
विवेकानंद का जन्म किस सन् में हुआ था?
उत्तर –
1863 में।

प्रश्न 3.
विवेकानंद का बचपन का नाम क्या था? (म. प्र. 2009, 11, 13)
उत्तर –
नरेन्द्रनाथ।

प्रश्न 4.
‘शिक्षा’ किस विधा की रचना है?(म. प्र. 2009, 12)
उत्तर –
निबंध।

प्रश्न 5.
ज्ञान का मूल उद्गम स्थान ………… है। (मन/ हृदय) (म. प्र. 2010, 11)
उत्तर –
मन।

प्रश्न 6.
जो बीत चुका , ऐसा समय ……. कहलाता है। (आगत/अतीत) (म. प्र. 2010)
उत्तर –
अतीत।

प्रश्न 7.
काँच के समान पारदर्शी किसे कहा गया है? (म. प्र. 2015)
उत्तर –
काँच के समान पारदर्शी स्वामी रामकृष्ण परमहंस को कहा गया है।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को किस प्रकार अभिव्यक्त करती है?
उत्तर –
ज्ञान मनुष्य में स्वभावतः निहित होता है। ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अंदर ही होता है। मनुष्य जो कुछ ‘जानता’ है, यथार्थ में वह आविष्कार करता है। अंतर्निहित ज्ञान से वह पर्दा हटाता है। अनन्त ज्ञान स्वरूप आत्मा से पतला झीना परदा हटा लेना ज्ञान का प्रकटीकरण है।

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प्रश्न 2.
सुधार के लिए बलात् उद्योग करने का परिणाम सदैव उल्टा ही क्यों होता है?
उत्तर –
निषेधात्मक विचार लोगों को दुर्बल बना देते हैं। सुधार के लिए बल प्रयोग का उल्टा प्रभाव पड़ता है। हमें यह मानना होगा कि गधे को पीटने से वह घोड़ा तो नहीं बन सकता किन्तु मर अवश्य सकता है। माता पिता के अनुचित दबाव व बल प्रयोग से बालकों के विकास का स्वतंत्र अवसर समाप्त हो जाता है। सुधार के लिए बलात् उद्योग करने का परिणाम सदैव उलटा ही होता है। यदि तुम किसी को सिंह न बनने दोगे तो वह सियार ही बनेगा।

प्रश्न 3.
मनुष्य निर्माण, जीवन निर्माण और चरित्र – निर्माण कैसे किया जा सकता है?
उत्तर –
शिक्षा बहुत – सी जानकारियाँ एकत्रित करना मात्र नहीं है। जानकारियों को आत्मसात कर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना आवश्यक है। बिना आत्मसात किया हुआ ज्ञान कभी – भी मनुष्य निर्माण, जीवन निर्माण एवं चरित्र निर्माण में सहायक नहीं हो सकता। जानकारियों के ढेर से अच्छे पाँच सुविचार हैं, जिन्हें हम आत्मसात कर जीवन में उतार सकें। पूरे ग्रंथालय एवं विश्व कोशों को रटने मात्र से मनुष्य निर्माण, जीवन निर्माण और चरित्र – निर्माण कदापि नहीं हो सकता।

प्रश्न 4.
“तुम केवल बाधाओं को हटा सकते हो और ज्ञान अपने स्वाभाविक रूप में प्रकट हो जाएगा” इस उक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
बालक को यदि शिक्षित करना है तो शिक्षा के मार्ग की बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। बालक अपने को स्वयं शिक्षित कर लेगा। ज्ञान का यह स्वाभाविक स्वरूप होगा। पौधे के विकास के लिए जमीन को कुछ पोली बनाना होता है। रक्षा के लिए घेरा बनाना होता है। मनुष्य पौधे के लिए मिट्टी, पानी एवं समुचित वायु का प्रबंध करता है। यहीं मनुष्य का कार्य समाप्त हो जाता है। पौधा अपनी प्रकृति के अनुसार जो आवश्यक होगा ले लेगा। ठीक यही बात विद्यार्थी पर लागू होती है। वातावरण एवं संसाधन उपलब्ध कराकर हम ज्ञान के मार्ग की बाधा दूर करते हैं।

प्रश्न 5.
पाठ के आधार पर ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
मनुष्य के अन्तर्मन में ज्ञान संचित रहता है। सीखने की प्रक्रिया में आविष्करण की क्रिया बढ़ती जाती है। इससे ज्ञान में वृद्धि होती है। अन्तर्मन में संचित ज्ञान से जितना ज्यादा आवरण उठ जाता है, अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा वह व्यक्ति अधिक ज्ञानी है। जिस पर यह आवरण तह – पर – तह पड़ा हुआ है, वह अज्ञानी है।

प्रश्न 6.
व्यक्ति सर्वज्ञ सर्वदर्शी कब बनता है? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
व्यक्ति सर्वज्ञ सर्वदर्शी तब बनता है जब उसके मन में मौजूद ज्ञान पर पड़ा हुआ पर्दा पूरी तरह से हट जाता है। जब तक यह पर्दा पड़ा रहता है, तब तक वह अज्ञानी बना रहता है।

2. दो बैलों की कथा

– प्रेमचंद

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए
1. “बहुत दिनों साथ रहते – रहते दोनों में भाई – चारा हो गया था। दोनों आमने – सामने या आस – पास बैठे हुए एक – दूसरे से मूक – भाषा में विचार – विनिमय करते थे। एक – दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था? हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है।”

शब्दार्थ – भाई – चारा = भाई जैसा प्रेम, मूक = चुप, विनिमय = लेन – देन, गुप्त = छिपी, वंचित = न पाना। संदर्भ प्रस्तुत गद्यांश मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – प्रेमचंद ने यहाँ पर हीरा – मोती नामक बैलों के स्नेह का चित्रांकन किया है।

व्याख्या – प्रेमचंद कहते हैं कि हीरा – मोती की जोड़ी बहुत दिनों से साथ थी जिसके कारण दोनों एक दूसरे को सगे – भाइयों की तरह चाहने लगे थे। उन्हें जब विश्राम के लिए एक साथ बाँध दिया जाता था तो शायद पशुओं की किसी गुप्त भाषा में चुपचाप विचारों का लेन – देन परस्पर किया करते थे। लेखक के अनुसार मनुष्य जीवों मे सर्वश्रेष्ठ है किन्तु ऐसा स्नेह, प्रेम, तालमेल मनुष्यों के समाज में देखने को नहीं मिलता। पशु की तुलना मनुष्यों में ज्यादा मारकाट मची हुई है।

विशेष – प्रेमचन्द की पशुओं के प्रति गहन अन्तर्दृष्टि प्रकट हुई है। प्रेमचन्द ने पशु समाज को मनुष्य समाज से श्रेष्ठ बताया है।

2. “दढ़ियल झल्लाकर बैलों को जबरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढ़ा। उसी वक्त मोती ने सींग चलाया, दढ़ियल पीछे हटा। मोती ने पीछा किया।दढ़ियल भागा। मोती पीछे दौड़ा। गाँव के बाहर निकल जाने पर वह रुका पर खड़ा दढ़ियल का रास्ता देख रहा था। दढ़ियल दूर खड़ा धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ निकाल रहा था, पत्थर फेंक रहा था और मोती विजयी शूर की भाँति उसका रास्ता रोके खड़ा था। गाँव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे।

शब्दार्थ – दढ़ियल = दाढ़ी वाला पुरुष, शूर = वीर। संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश मुंशी प्रेमचन्द की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – दढ़ियल मियाँ द्वारा बैलों को खरीदने की स्थिति में पुराने मालिक झूरी को देखकर हीरा – मोती की प्रतिक्रिया प्रकट की गई है। .

व्याख्या – मुंशी प्रेमचंद के अनुसार झूरी ने दाढ़ी वाले पुरुष के हाथों में अपने प्यारे बैलों को देखा। उसने हीरा – मोती पर अधिकार जताया किन्तु, दढियल मियाँ बैल वापस करने से इंकार कर देता है तथा उन्हें नीलामी में खरीदने की बात बताता है। कोई चारा न देखकर हीरा एवं मोती दुःखित होते हैं। अन्ततः मोती का सब्र टूट जाता है। वह दढ़ियल को मारने के लिए दौड़ाता है। मोती के आक्रमक रूप को देखकर दढ़ियल भागता है किन्तु मोती उसका पीछा नहीं छोड़ता व उसे गाँव के बाहर खदेड़ कर ही दम लेता है। दढ़ियल का मोती पर कोई वश नहीं चलता। वह मोती पर पत्थर इत्यादि फेंककर थक जाता है। दढियल एवं मोती के युद्ध में मोती विजयी होता है। गाँव के लोग इस अद्भुत तमाशे का खूब मजा लेते हैं।

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विशेष – वर्णनात्मक शैली में चित्रण किया गया है। भाषा सरल एवं प्रसंगानुकूल है।

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
झूरी के बैल किस नस्ल के थे?
उत्तर –
पछाई नस्ल।

प्रश्न 2.
गोंई को झूरी ने कहाँ भेज दिया?
उत्तर –
ससुराल।

प्रश्न 3.
मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के संग्रह का क्या नाम है?
उत्तर –
मानसरोवर।

प्रश्न 4.
‘दो बैलों की कथा’ में बैलों का क्या नाम था? (म. प्र. 2013)
उत्तर –
हीरा – मोती।

प्रश्न 5.
गया के घर में हीरा – मोती को सर्वाधिक प्रेम कौन करता था?
उत्तर –
लड़की।

प्रश्न 6.
कहानी सम्राट किसे कहा जाता है?
उत्तर –
मुंशी प्रमेचंद को।

प्रश्न 7.
उपन्यास सम्राट के नाम से विख्यात कौन है?
उत्तर –
मुंशी प्रेमचंद।

प्रश्न 8.
झूरी के बैल ………….जाति के थे। (जर्सी/पछाई) (म. प्र. 2010, 15)
उत्तर –
पछाई

प्रश्न 9.
सही जोड़ी बनाइए
1. झूरी – (क) कैसे नमक – हराम बैल हैं
2. बालिका – (ख) चारा मिलता तो क्या भागते
3. मजूर – (ग) दोनों फूफा वाले बैल भागे जा रहे हैं
4. झूरी की पत्नी – (घ) मालकिन मुझे मार ही डालेगी।
उत्तर –
1. (ख), 2. (ग), 3. (घ), 4. (क)।

प्रश्न 10.
गया के घर जाकर दोनों बैलों ने नाँद में मुँह क्यों नहीं डाला? (म. प्र. 2015)
उत्तर –
गया के घर जाकर दोनों बैलों ने नाँद में मुँह नहीं डाला। यह इसलिए कि उनका अपना घर छूट गया था। यह तो पराया घर था। वहाँ के लोग उन्हें बेगाने लग रहे थे। उन्हें वहाँ का खाना, पीना और रहना तनिक भी रास नहीं आया।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
झरी के घर प्रातः काल लौटे बैलों का किसने स्वागत किया?
अथवा
कैसे प्रातःकाल झूरी के घर वापस आने पर बैलों का स्वागत किस प्रकार किया गया?
उत्तर –
झूरी प्रात:काल बैलों को देखकर स्नेह से गदगद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुम्बन का वह दृश्य अत्यंत मनोहारी था। घर और गाँव के लड़कों ने तालियाँ बजा – बजाकर उनका स्वागत किया। दोनों पशु वीरों को अभिनन्दन स्वरूप कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड़, कोई चोकर और कोई भूसी लाकर खिलाया।

प्रश्न 2.
गया के घर से भाग आने पर बैलों के साथ कैसा व्यवहार किया गया?
उत्तर –
गया के घर से भाग आने पर बैलों के लिए झूरी की पत्नी ने कहा – “कैसे नमक हराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया, भाग खड़े हुए।” झूरी की पत्नी ने बैलों को काम चोर’ कहा और उन्हें खली, चोकर देना बंद कर दिया। सूखे भूसे के सिवा उन्हें कुछ नहीं दिया गया। रसहीन भूसा में हीरा – मोती ने मुँह तक नहीं डाला।

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प्रश्न 3.
दोनों बैलों ने आजादी के लिए क्या – क्या प्रयास किए?
उत्तर –
दोनों बैलों ने गया को इधर – उधर दौड़ाकर थका डाला। उसके घर जाने पर उन्होंने कामचोरी का व्रत धारण कर लिया। अन्ततः अपनी उपेक्षा से आहत होकर पगहा तुड़ाकर दोनों झूरी के घर भाग गए। दोनों के मन में गया या बालिका को चोट पहुँचाने का भी विचार आया किन्तु हीरा की समझाइश पर मोती ने यह विचार त्याग दिया। दूसरी बार जब गया उन्हें फिर अपने यहाँ लेकर आता है तो रस्सियाँ चबाकर उसे तोड़ना चाहते हैं किन्तु रस्सी मोटी होने के कारण उनके मुँह में नहीं आती। दढ़ियल मियाँ को भी मोती मारने का भय पैदा कर स्वतंत्र हो जाता है।

प्रश्न 4.
हीरा – मोती के पारस्परिक प्रेम का वर्णन कीजिए। (Imp.)
उत्तर –
हीरा – मोती में परस्पर भाईचारा था। एक – दूसरे से दोनों भूक भाषा में विचार – विनिमय किया करते थे। दोनों एक – दूसरे को सूंघकर एवं चाटकर अपना प्रेम प्रकट किया करते थे। कभी – कभी स्नेहवश दोनों सींग भी मिला लिया करते थे। दोनों में विनोदप्रियता, आत्मीयता एवं गजब का सामंजस्य था। हीरा मोती को अनुचित काम करने से रोकता भी था।

प्रश्न 5.
भैरों की लड़की की बैलों से आत्मीयता क्यों हो गई थी? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
भैरों की लड़की दोनों बैलों को दो रोटियाँ चोरी से खिलाती थी। दोनों बैलों को इससे बहुत संतोष प्राप्त होता था। उन्हें लगता था कि ‘यहाँ भी किसी सज्जन का वास है।’ भैरों के लड़की की माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता स्थापित हो गई थ बालिका के प्रेम के प्रसाद से दोनों अथक परिश्रम के बाद भी दुर्बल नहीं हुई।

प्रश्न 6.
दोनों बैल दढ़ियल व्यक्ति को देखकर क्यों काँप उठे?
उत्तर –
हीरा – मोती को दढ़ियल व्यक्ति अत्यंत क्रूर दिखाई पड़ा। उसकी आँखें लाल तथा मुद्रा अत्यन्त कठोर थी। उसने हीरा – मोती के कूल्हों में उँगलियाँ गोदकर उनके शरीर में मांस का अनुमान लगाया। उसका चेहरा देखकर अन्तर्ज्ञान से दोनों मित्र के दिल काँप उठे। उन्हें मन ही मन पक्का विश्वास हो गया कि उनका अन्त अत्यंत निकट है।

प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि कहानी अपने उद्देश्य में सफल रही है? (म. प्र. 2009)
उत्तर –
‘दो बैलों की कथा’ में कथाकार ने मानवीय आचरण और अनुभूति को केवल मनुष्य केन्द्रित नहीं माना है। वे मानते हैं कि ये विशेषताएँ पशुओं में भी होती हैं। सामान्य मनुष्य की तरह पशुओं में भी हर्ष, उल्लास, सुख – दुःख और अपने – पराए का बोध होता है। मनुष्य एवं पशु के बीच के संवेदनात्मक संबंध को भी कहानी में उजागर करने का प्रयास है। पशुओं के साथ मनुष्य द्वारा किया जाने वाला आत्मीय व्यवहार जहाँ इस कहानी में भारतीय व्यक्ति की करुणा के विस्तार को व्यक्त करता है, वहीं उनके साथ किया जाने वाला क्रूरता एवं दुर्व्यवहार, मनुष्य के व्यवसायगत उपयोगितावादी दृष्टिकोण को भी प्रकट करता है। कहानी अपने उद्देश्य में अत्यंत सफल रही है।

3. मिठाई वाला

– भगवती प्रसाद वाजपेयी

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए
1. “मेरा वह सोने का संसार था। बाहर संपत्ति का वैभव था, भीतर सांसारिक सुख था। स्त्री सुंदर थी, मेरी प्राण थी, बच्चे ऐसे सुन्दर थे, जैसे सोने के सजीव खिलौने। उनकी अठखेलियों के मारे घर में कोलाहल मचा रहता था। समय की गति। विधाता की लीला अब कोई नहीं है।”

शब्दार्थ – वैभव = सम्पन्नता, सांसारिक = संसार संबंधी, सजीव = जीव युक्त, अठखेलियाँ = चंचलता, कोलाहल = शोर, विधाता = ईश्वर। संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश भगवती प्रसाद वाजपेयी की कहानी ‘मिठाई वाला’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – मिठाई वाला दादी को अपने जीवन की दारुण घटना से अवगत करा रहा है।

व्याख्या – मिठाई वाला अपने अतीत को याद कर रहा है। वह दादी को बताता है कि वह भी एक नगर का सम्मानित व्यक्ति था। उसके भी स्त्री व बच्चे थे। उसका जीवन सुखमय एवं स्वर्णिम था। जीवन में धन सम्पत्ति की कोई कमी नहीं थी। सांसारिकता में जकड़ा हुआ वह भी सुख महसूस करता था। सुन्दर स्त्री व सुन्दर बच्चे उसके प्राण थे। कुंदन के समान रूपवान थे। बच्चों की चंचलता से घर में दिन भर कोहराम मचा रहता था किन्तु ईश्वर को शायद यह मंजूर नहीं था। सब दिवंगत हो गए। उसके जीवन में अब कोई नहीं है। अपने दिवंगत बच्चों की छबि वह मिठाई खरीदने वाले बच्चों में महसूस किया करता है।

विशेष – संस्मरणात्मक कथन है। अतीत की स्मृतियों एवं दुःख का चित्रांकन है। भाग्यवाद एवं ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास व्यक्त किया गया है।

2. “प्राण निकाले नहीं निकले, इसीलिए अपने बच्चों की खोज में निकला हूँ। वे सब अंत में होंगे तो यही कहीं। आखिर, कहीं – न – कहीं जन्में ही होंगे। उस तरह रहता तो घुल – घुल कर मरता। इस तरह सुख – संतोष के साथ मरूँगा। इस तरह के जीवन में कभी – कभी अपने उन बच्चों की एक झलक – सी मिल जाती है।”

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश भगवती चरण वर्मा की कहानी ‘मिठाई वाला’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – मिठाई वाला द्वारा अपने जीवन जीने का स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या – मिठाई वाला दादी को बताता है कि जीवन बोझ अवश्य है, किन्तु चाहकर भी मृत्यु नहीं आती। अपने दिवंगत बच्चों की खोज में गली – गली भटकता रहता हूँ। मेरे बच्चे कहीं – न – कहीं जन्म अवश्य लिए होंगे। बच्चों की याद में यदि मैं खोया रहता तो तड़प – तड़प कर मरना होता! मिठाई बेचकर बच्चों का सामीप्य प्राप्त कर जब भी मरूँगा तो सुख एवं संतोष के साथ मर सकूँगा। मिठाई वाला के रूप में गली – गली घूमते हुए विभिन्न बच्चों से हँसी – मजाक करते हुए मुझे महसूस नहीं हो पाता कि मेरे अपने बच्चे दिवंगत हो चुके हैं। मैं इन्हीं बच्चों में अपने बच्चों का प्रतिरूप पाता हूँ।

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विशेष – करुणाजनक स्थिति का चित्रांकन है। पुनर्जन्म के प्रति आस्था प्रकट की गई है। अतीत की स्मृतियों का चित्रांकन प्रभावी ढंग से है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथनों का पात्रों से संबंध स्थापित कीजिए
कथन – पात्र
1. अब इस बार ये पैसे न लूँगा। – (क) विजय बाबू
2. तुम लोगों को झूठ बोलने की – (ख) दादी माँ आदत ही होती है।
3. ऐ मिठाई वाले, इधर आना। – (ग) रोहिणी
4. इन व्यवसायों में भला तुम्हें क्या मिलता होगा – (घ) मिठाईवाला।
उत्तर –
1. (घ), 2. (क), 3. (ख), 4. (ग)।

प्रश्न 2.
भगवती प्रसाद वाजपेयी के एक कहानी संग्रह का नाम लिखिए।
उत्तर –
स्नेह।

प्रश्न 3.
‘मिठाईवाला’ किस विधा की रचना है? (म. प्र. 2009, 12)
उत्तर –
कहानी।

प्रश्न 4.
भगवती प्रसाद वाजपेयी ने कौन – सी सरकारी नौकरी की थी?
उत्तर –
अध्यापन।

प्रश्न 5.
खिलौने वाले की आवाज ……… थी। (मादक – मधुर/कठोर – कर्कश) (म. प्र. 2009)
उत्तर –
मादक – मधुर।

प्रश्न 6.
मुरली वाले का व्यक्तित्व कैसा था? (म. प्र. 2015)
उत्तर –
मुरली वाले का व्यक्तित्व बड़ा सरल और रोचक था।

प्रश्न 7.
निम्न कथन सत्य है अथवा असत्य
1. मिठाई वाला, मुरली वाला, खिलौने वाला, अलग – अलग व्यक्ति हैं। (म. प्र. 2013)
2. मिठाई वाला धनी व्यक्ति था, इसलिए उसने मुफ्त में दादी को मिठाई दी।
3. जयशंकर प्रसाद को कहानी सम्राट कहा जाता है।
उत्तर –
1. असत्य, 2. असत्य, 3. असत्य।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुरली वाले के भाव सुनकर विजय बाबू ने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की?
उत्तर –
मुरली वाला विजय बाबू को कहता है कि सबको तीन – तीन पैसे के हिसाब से मुरली दी है, किन्तु आपको दो – दो पैसे में ही दे दूँगा। विजय बाबू मुस्कुरा उठते हैं। सोचते हैं कि मुरली वाला ठग है। दो पैसे का एहसान लादना चाहता है। स्वयं का भाव कम करके एक पैसे का एहसान लादना चाहता है। उन्होंने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा – “तुम लोगों को झूठ बोलने की आदत ही होती है। देते होंगे सभी को दो – दो पैसे में पर एहसान का बोझा मेरे ही ऊपर लाद रहे हो।”

प्रश्न 2.
मुरली वाले के अनुसार ग्राहकों के क्या दस्तूर हैं?
उत्तर –
मुरली वाले के अनुसार – “ग्राहकों का दस्तूर होता है कि दुकानदार चाहे हानि ही उठाकर चीज क्यों न बेचें, पर ग्राहक यही समझते हैं – दुकानदार मुझे लूट रहा है।” अविश्वास की गहरी छाया क्रेता एवं विक्रेता के बीच पाई जाती है।

प्रश्न 3.
“तुम्हारी माँ के पास पैसे नहीं है अच्छा, तुम भी यह लो।” इस कथन से मुरली वाले की किस स्वभावगत विशेषता का पता चलता है?
उत्तर –
इस कथन में बच्चों के प्रति स्नेह, ममत्व एवं उदारता की भावना प्रकट हुई है। मुरली वाला प्रत्येक बच्चे को अपना समझता है एवं उनसे स्नेहभाव रखता है। कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिनके पास पैसे नहीं होते। उन्हें पहले तो वह घर से पैसे लाने को कहता है किन्तु जब वह पैसे नहीं ला पाते तो उन्हें वह मुफ्त में मुरली देकर चला जाता है। इससे पता चलता है कि उस मुरली वाले पर व्यावसायिकता हावी नहीं है।

प्रश्न 4.
मिठाई वाला दादी को अपनी मिठाइयों की क्या – क्या विशेषताएँ बताता है? (म. प्र. 2011, 12)
उत्तर –
दादी को मिठाई वाला इन शब्दों में अपने मिठाइयों की विशेषताएँ बताता है—“रंग – बिरंगी, कुछ खट्टी, कुछ – कुछ मीठी, जायकेदार, बड़ी देर तक मुँह में टिकती है। जल्दी नहीं घुलती। बच्चे इन्हें बड़े चाव से चूसते हैं। इन गुणों के सिवा ये खाँसी भी दूर करती हैं। कितनी दूँ? चपटी, गोल, पहलदार गोलियाँ हैं।”

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प्रश्न 5.
कहानी के आधार पर मिठाई वाला की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। (म. प्र. 2010)
उत्तर –
मिठाई वाला वात्सल्य भाव से ओत – प्रोत समर्पणशील व्यक्ति है। विविध व्यवसायों का उद्देश्य बच्चों का सामीप्य प्राप्त करना है। अपने दिवंगत बच्चों की छवि नगर के बच्चों में महसूस किया करता है। उन्हें सस्ती चीजें उपलब्ध कराता है। किसी – किसी बच्चे को मुफ्त में भी सामग्रियाँ दिया करता है। वस्तुतः उसमें व्यावसायिकता हावी नहीं है। धन – प्राप्ति उसके व्यवसाय का उद्देश्य नहीं। दु:ख एवं करुणा से ओतप्रोत मिठाई वाले के हृदय में बच्चों के प्रति अपार स्नेह, ममत्व एवं उदारता समाहित है।

प्रश्न 6.
अन्य दुकानदारों और मिठाई वाले में क्या अन्तर है?
उत्तर –
अन्य दुकानदरों पर व्यावसायिकता हावी रहती है। अधिक धन अर्जन करना उनका मुख्य उद्देश्य होता है। बच्चों की सुकोमल भावनाओं का परितोष इनके पास नहीं हो सकता। जबकि मिठाई वाला शुद्ध व्यावसायिक व्यक्ति नहीं है। धनार्जन भी उसका उद्देश्य नहीं है। वात्सल्य, स्नेह, ममत्व से परिपूरित इस व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य बच्चों का सामीप्य सुख है।

प्रश्न 7.
मिठाई वाले ने रोहिणी से पैसे क्यों नहीं लिए?
उत्तर –
मिठाई वाले के दु:ख एवं करुणा को पहली बार रोहिणी ने स्पर्श किया था। इससे मिठाई वाले को अद्भुत संतोष एवं धीरज प्राप्त हुआ। रोहिणी के घर में अपने अतीत को बताकर भी उसके हृदय का बोझ कम हुआ। अन्ध व्यावसायिकता की होड़ में भी संवेदनशील इंसानों का अभाव नहीं है। रोहिणी को एक नेक दिल एवं संवेदनशील महिला समझकर उसने पैसे नहीं लिए।

4. प्रताप प्रतिज्ञा

– जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द’

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “आ! काँटों के ताज! संकट के स्नेही! मेवाड़ के राजमुकुट! आ! तुझे आज एक तुच्छ सैनिक धारण कर रहा है। इसलिए नहीं कि तू वैभव का राजमार्ग है बल्कि इसलिए कि आज तू देश पर मर मिटने वालों का मुक्तिद्वार है। आ! मेरी साधना के अन्तिम साधन! इस अवनत मस्तक को माँ के लिए कट – मरने का गौरव प्रदान कर।”

शब्दार्थ – तुच्छ = छोटा, वैभव = धन, राजमार्ग = राजमहल की ओर जाने वाली सड़क, अवनत = झुका हुआ, गौरव = महत्ता।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द’ की एकांकी ‘प्रताप प्रतिज्ञा’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रावत द्वारा राजमुकुट धारण करने का चित्रांकन किया गया है।

व्याख्या – ‘मिलिन्द’ जी लिखते हैं कि चन्द्रावत राजमुकुट को धारण करना आसान नहीं समझता। वह प्रलाप करता हुआ कहता है कि इस राजमुकुट के भार को एक छोटा सैनिक किस प्रकार सँभाल सकेगा। यह वैभव भोग का राजमुकुट नहीं है, अपितु काँटों मय ताज है। चन्द्रावत यह भी कहता है कि मैं जानता हूँ जो भी इस राजमुकुट को धारण करेगा उसे देश के लिए शहीद होने का अवसर अवश्य मिलेगा। शहीद होने से बड़ी मुक्ति मनुष्य की नहीं है। चन्द्रावत देश की तस्वीर राजमुकुट धारण करने के लिए अपना सिर झुका देता है।

विशेष – भाषा तत्सम प्रधान है। मातृभूमि एवं देश के प्रति उदात्त भावना प्रकट हुई है। वर्णनात्मक शैली है।

2. “आँखें खोलकर मेवाड़ी वीरों का बलिदान देखने से इस युद्ध ने कान मलकर मुझे बता दिया कि मेरा अहंकार व्यर्थ है। मुझसे कई गुनी वीरता, कई गुनी देश – भक्ति और कई गुना त्याग मेवाड़ के एक – एक सैनिक हृदय में हिलोरें ले रहा है।”

शब्दार्थ – बलिदान = त्याग, कान मलकर बताना = साफ – साफ कहना, व्यर्थ = वेकार, हिलोर = लहर।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द की एकांकी ‘प्रताप प्रतिज्ञा’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – शक्ति सिंह का देश – भक्त सैनिकों के प्रति सम्मान व्यक्त हुआ है।

व्याख्या – ‘मिलिन्द’ जी कहते हैं कि शक्तिसिंह आत्मालाप कर रहा है। वह कहता है कि मुझे इस हल्दीघाटी के युद्ध से बिल्कुल साफ – साफ पता चल गया है कि मेरा घमण्ड वेकार ही था। मैं भ्रम एवं भूलवश स्वयं को बहुत कुछ समझ बैठा था, वस्तुत: मेवाड़ का प्रत्येक सैनिक देश के लिए कुर्बान होने को तत्पर है। मेवाड़ी सैनिकों की देश के प्रति वफादारी एवं त्याग की तुलना हो ही नहीं सकती। देश – भक्ति की अजस्त्र धारा उन सैनिकों के हृदय में तरंग पैदा कर रही है।

विशेष – तत्सम भाषा एवं भाव प्रबलता है। देश – भक्ति की अजस्र सरिता प्रवाहमान दिखाई दे रही है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
महाराणा प्रताप और अकबर के बीच निम्न में से कौन – सा युद्ध हुआ था – (म. प्र. 2015)
(क) हल्दी घाटी का युद्ध (ख) पानीपत का युद्ध (ग) बक्सर का युद्ध (घ) प्लासी का युद्ध।
उत्तर –
(क) हल्दी घाटी का युद्ध।

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप निम्न में से कहाँ के शासक थे (म. प्र. 2013)
(क) दौलताबाद के (ख) मेवाड़ के (ग) ग्वालियर के (घ) दिल्ली के।
उत्तर –
(ख) मेवाड़ के।

प्रश्न 3.
महाराणा प्रताप के घोड़े का क्या नाम था
(क) ऐरावत (ख) रफ्तार (ग) चेतक (घ) शेरा।
उत्तर –
(ग) चेतक।

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प्रश्न 4.
जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ का जन्म किस स्थान पर हुआ था
(क) मेरठ (ख) कलकत्ता (ग) सागर (घ) ग्वालियर।
उत्तर –
(घ) ग्वालियर।

प्रश्न 5.
………… को अधिक होता है। (शक्तिहीन/शक्तिवान) (म. प्र. 2009)
उत्तर –
शक्तिवान।

प्रश्न 6.
प्रताप प्रतिज्ञा किस विधा की रचना है? (म. प्र. 2009)
उत्तर –
एकांकी।

प्रश्न 7.
अपनी पाठ्य – पुस्तक के किसी एक एकांकी का नाम लिखिए। (म. प्र. 2011)
उत्तर –
प्रताप – प्रतिज्ञा।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महाराणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर –
महाराणा प्रताप मेवाड़ की अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले असाधारण योद्धा हैं। वीरता, देश – भक्ति एवं त्याग की अजस्र सरिता उनके हृदय में प्रवाहमान है। मेवाड़ वासियों को उनके नेतृत्व पर दृढ़ विश्वास है। उनकी नेतृत्व क्षमता एवं वीरता के प्रदर्शन से मेवाड़ के सैनिकों को प्रेरणा मिलती है। जनता के सुयोग्य प्रतिनिधि, चित्तौड़ के उद्धारक, संजीवनी शक्ति दाता, देश की आशा एवं स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप हैं।

प्रश्न 2.
शक्तिसिंह स्वयं को क्यों धिक्कारता है?
उत्तर –
शक्तिसिंह स्वयं को इसलिए धिक्कारता है कि महाराणा प्रताप जैसे असाधारण योद्धा, देश – भक्त, मानी और कर्तव्यनिष्ठ का भाई होकर भी देश के प्रति वफादार नहीं हैं। स्वयं के स्वार्थ एवं पदलोलुपता पर भी उसे पश्चाताप होता है।

प्रश्न 3.
महाराणा प्रताप ने चेतक के प्रति अपनी संवेदना किस प्रकार व्यक्त की? (म. प्र. 2010,11)
उत्तर –
महाराणा प्रताप ने चेतक के प्रति संवेदना इन शब्दों में व्यक्त की – “चेतक! प्यारे चेतक! तुम राह ही में चल बसे। तुम्हारी अकाल मृत्यु देखने के पहले ही ये आँखें क्यों न सदा को मुंद गई। मेरे प्यारे सुख – दु:ख के साथी, तुम्हें छोड़कर मेवाड़ में पैर रखने को जी नहीं करता शरीर का रोम – रोम घायल हो गया है, प्राण कंठ में आ रहे हैं, एक कदम चलना भी दूभर है, फिर भी इच्छा होती है कि तुम्हारें शव के पास दौड़ता हुआ लौट आऊँ, तुमसे लिपटकर जी भरकर रो लूँ और वहीं चट्टानों से सिर टकराकर प्राण दे दूँ। अपने प्राण देकर प्रताप के प्राण बचाने वाले मूक प्राणी! तुम अपना कर्तव्य पूरा कर गए पर मैं संसार से मुंह दिखाने योग्य न रहा। हाय, मेरे पापी प्राणों से तुमने किस दुर्दिन में प्रेम करना सीखा था। चेतक, चेतक प्यारे चेतक!

प्रश्न 4.
शक्तिसिंह के स्वभाव में परिवर्तन क्यों आया? (म. प्र. 2009, 12)
उत्तर –
शक्ति सिंह ने मेवाड़ के सैनिकों का बलिदान देखा तो उसके स्वभाव में परिवर्तन आया। उसे अपना अहंकार निरर्थक लगने लगा। मेवाड़ के सैनिकों की तुलना में उसे अपनी वीरता, देश – भक्ति, त्याग तुच्छ प्रतीत होने लगा।

प्रश्न 5.
एकांकी के आधार पर सच्चे सैनिक किसे कहेंगे?
उत्तर –
‘प्रताप प्रतिज्ञा’ एकांकी में सच्चा सैनिक चन्द्रावत है। उसने मातृभूमि की रक्षा एवं कर्त्तव्य निर्वाह के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। चन्द्रावत की वीरता, त्याग एवं देश – भक्ति की भावना समाज के लिए अनुकरणीय है।

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प्रश्न 6.
प्रताप की बातें शक्तिसिंह को हृदय बेधक क्यों लगी? (म. प्र. 2015)
उत्तर –
शक्तिसिंह प्रताप को हृदय – बेधक बातें कहने के लिए उत्प्रेरित करता है। शक्तिसिंह के शब्दों में—“मेरे पापों का कड़वा फल है। मैं मेवाड़ को भूल गया था। भारतीयता को खो बैठा था। देश – भक्ति को ठुकरा चुका था। उसी का यह दण्ड है। कहो, हाँ, खूब कहो, ऐसी हृदय बेधक बातें कहो, भाई, अपराधी को खूब दण्ड मिलने दो। बिना प्रायश्चित पूरा हुए पापी की आत्मा को शान्ति नहीं मिली।।

प्रश्न 7.
युद्ध – भूमि में महाराणा प्रताप को किस विकट स्थिति का सामना करना पड़ा? (Imp.)
उत्तर –
युद्ध – भूमि में महाराणा प्रताप मुगल सेना से चारों ओर से घिर गए। उनके वार से वे घायल हो गए। उनके शरीर से खून की धारा बहने लगी। तलवार चलाते – चलाते उनके दोनों हाथ थक गए। चेतक घोड़ा मृतप्राय हो गया, फिर भी उन्हें पागलों की तरह लड़ना पड़ा था।

5. देश – प्रेम

– आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “भाइयों! बिना रूप – परिचय का यह प्रेम कैसा? जिनके सुख – दुःख के तुम कभी साथी नहीं हुए, उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो, यह कैसे समझे? उनसे कोसों दूर बैठे – बैठे, पड़े – पड़े या खड़े – खड़े तुम विलायती बोली में ‘अर्थशास्त्र’ की दुहाई दिया करो, पर प्रेम का नाम उसके साथ न घसीटो। प्रेम हिसाब – किताब नहीं है। हिसाब – किताब करने वाले भाड़े पर भी मिल सकते हैं, पर प्रेम करने वाले नहीं।”

शब्दार्थ – रूप – परिचय = प्रत्यक्ष देखना, विलायती बोली = विदेशी भाषा, भाड़े = किराया।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश आचार्य रामचन्द्र शुक्ल निबंध के ‘देश – प्रेम’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश में आचार्य शुक्ल ने प्रेम करने के लिए रूप – परिचय को आवश्यक बताया है।

व्याख्या – देशभक्तों! बिना प्रत्यक्ष, साकार दर्शन के प्रेम उत्पन्न नहीं हो सकता। देश के प्रति प्रेम होने का दावा करने के पहले देश जिन चीजों से बनता है, उनके दर्शन करना आवश्यक है। देश के लोगों से प्रेम का दावा भी नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसा दावा करने से पहले देशवासियों के सुख – द:ख में शामिल होना अ है। विदेशी भाषा, में अर्थशास्त्र के फार्मूले के आधार पर सुखी एवं दु:खी के वर्ग में विभाजित करने वाले देश – प्रेमी नहीं हो सकते। झूठे प्रेम की दुहाई भले ही दो किन्तु बिना सुख – दुःख में शामिल हुए ‘देश – प्रेम’ मात्र ढोंग है। अर्थशास्त्रीय फार्मूले के आधार पर अमीर – गरीब, सुखी – दुःखी बताने वाले तो किराये पर भी उपलब्ध हो जाते हैं, किन्तु क्या उन्हें देश की वास्तविक दशा का ज्ञान कभी हो सकता है न ही वे सच्चे देश – प्रेमी हो सकते हैं।

विशेष – सच्चे देश प्रेमियों की पहचान बताई गई है। व्यंग्यात्मक भाषा – शैली है।

2. “रसखान तो किसी की ‘लकुटी अरु कामरिया पर तीनों पुरों का राजसिंहासन तक त्यागने को तैयार थे, पर देश – प्रेम की दुहाई देने वालों में से कितने अपने किसी थके – माँदे भाई के फटे – पुराने कपड़ों पर रीझकर या कम से कम न खीझकर बिना मन मैला किए कमरे का फर्श भी मैला होने देंगे? मोटे आदमियों! तुम जरा – सा दुबले हो जाते, अपने अंदेशे से ही सही, तो न जाने कितनी ठठरियों पर मांस चढ़ जाता है।”

शब्दार्थ – लकुटी = लकड़ी, कामरिया = कमली या काँवर, अंदेशे = आशंका, ठठरियों = हड्डी।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध ‘देश – प्रेम’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – आचार्य शुक्ल ने दीनों – हीनों एवं गरीबों के लिए त्याग करने को कह रहे हैं। व्याख्या – आचार्य शुक्ल लिखते हैं कि भक्तिकालीन कृष्णभक्त कवि रसखान ने अपने एक पद में कृष्ण के सामीप्य के लिए, लकड़ी एवं काँवर के लिए, तीनों लोकों का राजसिंहासन छोड़ने को तत्पर दिखाई देते हैं। आचार्य शुक्ल व्यंग्य करते हुए कथित देशप्रेमियों से कहते हैं कि अरे अमीरों ! फटे – पुराने चिथड़ों में लिपटे अपने भाइयों की दुर्दशा पर भी कभी ध्यान दिया है। उन्हें कभी अपने ऊँचे प्रसादों में स्थान दिया है। या फिर फर्श गंदा होने के भय से उनकी ओर कभी हाथ बढ़ाया अरे धनिकों! तुम्हारी थोड़ी – सी चर्बी आशंका के कारण ही सही कुछ कम होती तो गरीबों की सूखी हड्डियों पर मांस की पतली परत चढ़ जाती।

विशेष – व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग है। तीक्ष्ण एवं मारक शैली है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
साँची क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर –
स्तूप के कारण।

प्रश्न 2.
लेखक ने किस मौसम में साँची की यात्रा की थी?
उत्तर –
बसंत ऋतु।

प्रश्न 3.
रामचन्द्र शुक्ल के निबंध संग्रह का क्या नाम है?
उत्तर –
चिन्तामणि।

प्रश्न 4.
दिए गए शब्दों से वाक्य पूरा कीजिए (रूप परिचय, देहाती, परिचय, आम)

1. यहाँ महुए – सहुए का नाम न लीजिए, लोग ………… समझेंगे। (म. प्र. 2013)
2. बिना ………… का यह प्रेम कैसा?
3. गेहूँ का पेड़ ………… के पेड़ से बड़ा होता है।
4. यह परचना ही ………… है।
5. साँची की प्रसिद्धि का कारण यहाँ के ………… हैं। (म. प्र. 2011)
उत्तर –
1. देहाती, 2. रूप परिचय, 3. आम, 4. परिचय, 5. स्तूप।

प्रश्न 5.
देश प्रेम रचना गद्य की इस विद्या में है (म. प्र. 2011)
(क) निबंध (ख) संस्मरण (ग) कहानी (घ) एकांकी।
उत्तर –
(क) निबंध।

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किस मौसम में साँची की यात्रा की थी?
उत्तर –
लेखक ने बसन्तु ऋतु में साँची की यात्रा की थी।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ला.देश – प्रेम को साहचर्य प्रेम क्यों कहा गया है? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
जिनके बीच हम रहते हैं, जिन्हें बराबर आँखों से देखते हैं, जिनकी बातें बराबर सुनते रहते हैं, जिनका हमारा हर घड़ी का साथ रहता है। जिनके सान्निध्य का हमें अभ्यास पड़ जाता है। उनके प्रति लोभ या राग ही हो सकता है। इसे ही साहचर्य से उपजा देश – प्रेम कह सकते हैं।

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प्रश्न 2.
रसखान ने ब्रज भूमि के प्रेम के संबंध में क्या कहा है? (म. प्र. 2012)
उत्तर –
रसखान ने ब्रजभूमि के संबंध में प्रेम व्यक्त करते हुए लिखा है

“नैनन सों, ‘रसखान’ जबै ब्रज के वन, बाग, तड़ाग, निहारौं,
केतिक वे कल धौत के धाम करील, के कुंजन ऊपर वारौं।’

प्रश्न 3.
देश के स्वरूप से परिचित होने के लिए लेखक ने किन – किन बातों पर बल दिया है? (म. प्र. 2009)
उत्तर –
देश के स्वरूप से परिचित होने के लिए खेतों की हरियाली, नालों के कलकल प्रवाह, पलाश के लाल – लाल फूलों, कछार में पशुओं के चरते हुए झुण्डों के बीच चरवाहों की तानें, आम के बगीचों से झाँकते ग्रामों, आम के पेड़ के नीचे की बैठकों का स्वरूप दर्शन करना होगा।

प्रश्न 4.
गेहूँ का पेड़ आम के पेड़ से छोटा होता है या बड़ा। यह कथन किस संदर्भ में कहा गया है?
उत्तर –
लखनऊ के नवाब जमीनी नहीं थे। कोई आश्चर्य नहीं कि कोई पूछ लें कि “गेहूँ का पेड़ आम के पेड़ से छोटा होता है या बड़ा।” हिन्दुस्तान में भी देशीपन एवं ग्राम्यता को लोग अपनी तौहीन समझते हैं। बाबूपन में बट्टा यहाँ कोई नहीं लगाना चाहता।

प्रश्न 5.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास को कितने भागों में बाँटा है?
उत्तर –
शुक्लजी ने हिन्दी साहित्य के इतिहास को चार भागों में बाँटा है

  1. आदिकाल,
  2. भक्तिकाल,
  3. रीतिकाल,
  4. आधुनिक काल।

प्रश्न 6.
अपने स्वरूप को भूलने पर हमारी कैसी दशा होगी?
उत्तर –
अपने स्वरूप को भूलने पर हमारी दशा अपनी परम्परा से संबंध तोड़कर नई उभरी हुई इतिहास शून्य जातियों के समान होगी।

6. राजेन्द्र बाबू

– महादेवी वर्मा

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “राजेन्द्र बाबू की मुखाकृति ही नहीं, उनके शरीर के सम्पूर्ण गठन में एक सामान्य भारतीय जन की आकृति और गठन की छाया थी, अतः उन्हें देखने वाले को कोई – न – कोई आकृति या व्यक्ति स्मरण हो जाता था और वह अनुभव करने लगता था कि इस प्रकार के व्यक्ति पहले भी कहीं देखा है। आकृति तथा वेशभूषा के समान ही वे अपने स्वभाव और रहन – सहन में सामान्य भारतीय या भारतीय कृषक का ही प्रतिनिधित्व करते थे। प्रतिभा और बुद्धि की विशिष्टता के साथ – साथ उन्हें जो गम्भीर संवेदना प्राप्त हुई थी, वही उनकी सामान्यता को गरिमा प्रदान करती थीं।”

शब्दार्थ – मुखाकृत्ति = मुँह की बनावट, स्मरण = याद, वेशभूषा = पहनावा, प्रतिभा = बुद्धि की प्रखरता, विशिष्टता = विशेषता, संवेदना = दु:ख में भागीदार, गरिमा = गौरव।

संदर्भ प्रस्तुत गद्यांश महादेवी वर्मा के संस्मरण ‘राजेन्द्र बाबू’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – महादेवी वर्मा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का चेहरा – मोहरा, शरीर की बनावट आम भारतीय नागरिक के समान थी। आमतौर पर समाज में हर दूसरा – तीसरा व्यक्ति राजेन्द्र बाबू जैसा ठेठ होता है। उन्हें देखकर इसीलिए भ्रम हो जाता था कि कहीं पहले देखा है। आम भारतीय किसान के समान उनका रहन – सहन एवं स्वभाव था। कृषक वर्ग के वे प्रतिनिधि लगते थे। ज्ञान की आभा एवं बुद्धि की तीक्ष्णता का प्रभाव उनके चेहरे पर विद्यमान रहता था। वे एक संवेदनशील इंसान थे। सभी व्यक्तियों में ऐसी संवेदनशीलता नहीं पाई जाती। इन्हीं गुणों के कारण वे सामान्य होते हुए विशिष्ट थे।

विशेष – चित्रात्मक शैली। तत्सम भाषा। भावात्मकता के साथ व्यक्तित्व का विश्लेषण है।

2. “जीवन मूल्यों की परख करने वाली दृष्टि के कारण उन्हें देश रत्न’ की उपाधि मिली और मन की सरल स्वच्छता ने उन्हें अजात शत्रु बना दिया। अनेक बार प्रश्न उठता है, क्या वह साँचा टूट गया जिसमें ऐसे कठिन कोमल चरित्र ढलते थे।”

शब्दार्थ – परख = पहचान, उपाधि = सम्मान, अजात शत्रु = शत्रु विहीन, साँचा = प्रतिरूप तैयार करने हेतु पूर्व निर्मित आकार।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश महादेवी वर्मा के संस्मरण ‘राजेन्द्र बाबू’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – इसमें लेखिका ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की महानता का उल्लेख किया है।

व्याख्या – लेखिका महादेवी वर्मा ने लिखा है कि दया, प्रेम, सहयोग, करुणा इत्यादि मानवीय मूल्य राजेन्द्र बाबू के व्यक्त्वि में निहित थे। इन्हीं सद्गुणों के कारण उन्हें ‘देश रत्न’ की पदवी प्रदान की गई थी। राजेन्द्र बाबू अत्यंत सरल, स्वच्छ एवं निष्कपट व्यक्ति थे, इसी कारण उनका कोई भी शत्रु नहीं था। आज समाज एवं राजनीति के क्षेत्र में इस प्रकार के मानवीय मूल्यों को धारण करे वाले सरल एवं स्वच्छ राजनेताओं का अभाव हो गया है। राजेन्द्र बाबू का प्रतिरूपी तैयार करने वाला साँचा शायद नष्ट हो चुका है। तभी तो वैसे इंसान अब नहीं हुआ करते।

विशेष – तत्सम शब्दावली का प्रयोग है। राजेन्द्र बाबू की महानता के कारणों को उद्धृत किया गया है। वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
राजेन्द्र बाबू को निम्न में से कौन – सी उपाधि प्राप्त हुई थी (म. प्र. 2011)
(क) पद्म भूषण (ख) भारत रत्न (ग) देश रत्न (घ) भारत पुरुष।
उत्तर –
(ग) देश रत्न।

प्रश्न 2.
राजेन्द्र बाबू देश के किस सर्वोच्च पद पर कार्यरत हुए
(क) प्रधानमंत्री (ख) मुख्य न्यायाधीश (ग) मुख्यमंत्री (घ) राष्ट्रपति।
उत्तर –
(घ) राष्ट्रपति।

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प्रश्न 3.
राजेन्द्र बाबू के प्रथम दर्शन लेखिका ने कहाँ किए (म. प्र. 2015)
(क) राष्ट्रपति भवन (ख) पटना के रेल्वे स्टेशन (ग) बनारस (घ) भोपाल।
उत्तर –
(ख) पटना के रेल्वे स्टेशन।

प्रश्न 4.
‘राजेन्द्र बाबू’ महादेवी वर्मा की किस विधा की रचना है (म. प्र. 2009, 13)
(क) संस्मरण (ख) रेखाचित्र (ग) आत्मकथा (घ) रिपोर्ताज।
उत्तर –
(क) संस्मरण।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजेन्द्र बाबू के व्यक्तित्व के उन कतिपय पहचान चिन्हों का उल्लेख कीजिए जो भारतीय जन की आकृति को व्यक्त करते हैं?
उत्तर –
राजेन्द्र बाबू की मुखाकृति, शारीरिक गठन साधारण भारतीय जन की मुखाकृति एवं शारीरिक गठन से मेल खाती थी। उन्हें देखने वाले को कोई – न – कोई आकृति या व्यक्ति स्मरण हो आता था। उन्हें अनुभूत होता था कि इन्हें कहीं देखा है। आकृति एवं वेशभूषा के समान ही वे अपने स्वभाव और रहन – सहन में भी साधारण भारतीय या भारतीय किसान का प्रतिनीधित्व करते थे। उनकी संवेदनशीलता उनकी सामान्यता को गरिमा प्रदान करती थी।।

प्रश्न 2.
राजेन्द्र बाबू की सहधर्मिणी के गुणों का उल्लेख कीजिए। (Imp.)
उत्तर –
राजेन्द्र बाबू की सहधर्मिणी जमींदार परिवार से थी। राजेन्द्र बाबू की पत्नी होने का घमण्ड उन्हें कभी नहीं रहा। उनके मन में कोई मानसिक दंभ नहीं था। सबके प्रति वे समान ध्यान रखती थी। राष्ट्रपति भवन में भोजन बनाना, आम भारतीय गृहिणी की तरह परिजनों को भोजन कराना उनकी दिनचर्या में शामिल था। सप्ताह में एक दिन वे उपवास अवश्य रखती थीं।

प्रश्न 3.
पाठ के आधार पर राजेन्द्र बाबू की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। (म. प्र. 2015)
उत्तर –
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की शारीरिक बनावट तथा मुखाकृति आम भारतीय जन या कृषक की थी। ग्राम्यता से उन्हें विशेष रुचि थी। भारतीयता की झलक उनके व्यक्तित्व में दिखाई देती थी। सरलता, स्वच्छता, जीवन मूल्यों के प्रति सजगता, प्रतिभा, बुद्धि में विशिष्टता तथा संवेदनशीलता उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

प्रश्न 4.
राजेन्द्र बाबू को अजातशत्रु किस संदर्भ में कहा जाता है? (म. प्र. 2009, 13)
उत्तर –
राजेन्द्र बाबू का मन अत्यंत सरल एवं स्वच्छ था। इन्हीं गुणों के कारण इन्हें लोग पसंद करते थे। उनका सामान्य एवं राजनैतिक जीवन में कोई दुश्मन नहीं था। इसीलिए उन्हें अजातशत्रु कहते थे।

प्रश्न 5.
सामान्यतः हमारा उपवास कैसा होता है?
उत्तर –
सामान्यत: उपवास में हम आम दिनों की अपेक्षा कुछ अधिक स्वादिष्ट सामग्री ग्रहण कर लेते हैं।
फल – फूल, दूध – दही, तली – भुनी सामग्रियों से उपवास का जायका कुछ ज्यादा हो जाता है, जबकि उपवास में काम चलाऊ, साधारण अल्पाहार करना चाहिए।

7. हिम प्रलय

– डॉ. जयन्त नार्लीकर

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “उनकी एकता और अनुशासन यदि मानव जाति में होती तो विभिन्न देशों में भारी भगदड़ न मची होती। तकनीकी लिहाज से जापान, यूरोप, रूस, कनाडा जैसे प्रगत राष्ट्र भी इस हिमपात का मुकाबला नहीं कर सके। अनेक शहरों में पाँच से छः मीटर तक बर्फ गिरी थी। इतने भीषण हिमपात ने चारों तरफ तबाही मचा दी।”

शब्दार्थ – भगदड़ = अस्थिरता, लिहाज = दृष्टि से, प्रगत = विकसित, हिमपात = बर्फ का गिरना, तबाही = बर्बादी।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश डॉ. जयन्त नार्लीकर की विज्ञान कथा ‘हिम प्रलय’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – डॉ. जयन्त नार्लीकर ने मानव समुदाय के मदभेद को पतन का कारण बताया है।

व्याख्या – पशु – पक्षी परस्पर एकता एवं अनुशासन में बँधे होते हैं। प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य इन पशु पक्षियों से सीख क्यों नहीं लेता? पशु – पक्षी खतरे का अनुमान कर सांकेतिक भाषा में सबको एकत्र कर सुरक्षित स्थानों पर चले जाते हैं। मनुष्य में भी अनुकरण, एकता एवं अनुशासन की भावना होती तो वे भी प्राकृतिक कोपों से बच सकते थे। जापान, यूरोप, रूस, कनाडा इत्यादि देशों को विकसित माना जाता है किन्तु इन देशों ने भी भारी बर्फ गिरने का अनुमान नहीं किया। असाधारण बर्फबारी के बाद सड़कों पर पाँच – छ: मीटर मोटी बर्फ की परत चढ़ गई। सर्वत्र खूब तबाही हुई। बच गए तो सिर्फ पशु – पक्षी।

विशेष – भाषा तत्सम एवं शैली वर्णनात्मक है। हिमपात को रुचिवर्द्धक एवं ज्ञानवर्द्धक तरीके से समझाया गया है। मनुष्य को पशु – पक्षियों से एकता एवं अनुशासन की सीख लेने को कहा गया है।

2. “प्रकृति और इंसान के बीच छिड़े युद्ध में इंसान की जीत तो हुई थी, लेकिन अब उसे अनेक समस्याओं का सामाना करना था। बर्फ पिघलने से ‘न भूतो न भविष्यति’ बाढ़ आने वाली थी। पृथ्वी की जनसंख्या आधी हो चुकी थी। अनेक बहुमूल्य चीजें इसी आक्रमण में नष्ट हो गई थी। जिस एकता का परिचय इंसान ने इन्द्र पर आक्रमण के दौरान दिया था, क्या ……?”

शब्दार्थ – ‘भूतो न भविष्यति’ = न हुआ है और न होगा, बहुमूल्य = कीमती, आक्रमण = हमला।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश डॉ. जयंत नार्लीकर की विज्ञान – कथा हिम – प्रलय से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – हिमपात पर मानव मस्तिष्क के विजय का वर्णन किया गया है।

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व्याख्या – प्रकृति ने भारी तबाही मचाई। हिमपात से धरती ढंक गई तब डॉ. चिटणीस के लेख – ‘अभियानः इन्द्र पर आक्रमण के आधार पर अग्निबाणों, उपग्रहों से हमला किया। मनुष्य ने प्रकृति पर जीत हासिल की। बर्फबारी रुक गई। प्रकृति ने मानव सभ्यता के लिए अनेक समस्याएँ पैदा कर दी। हिमपात से गिरी बर्फ पिघलकर पानी बनने लगी और भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ा। धरती पर मनुष्य काल – कवलित होने लगे। आबादी घटकर आधी रह गई। मानव सभ्यता की कीमती चीजें बर्फ बारी की भेंट चढ़ गई। इन्द्र पर आक्रमण करने की बात पर जिस प्रकार सब एकमत हुए, उसी प्रकार डॉ. चिटणीस की चेतावनियों पर किसी ने भी यदि ध्यान दिया होता तो यह ध्वंस ही क्यों होता?

विशेष – संस्कृतनिष्ठ, तत्सम भाषा की प्रधानता है। वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है। वैज्ञानिक चेतावनियों के उल्लंघन की समस्या का अंकन है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ. जयंत नार्लीकर मुख्य रूप से क्या थे
(क) साहित्यकार (ख) समाजसेवी (ग) वैज्ञानिक (घ) संस्कृति कर्मी।
उत्तर –
(ग) वैज्ञानिक।

प्रश्न 2.
‘अभियानः इन्द्र पर आक्रमण’ किसका लेख था
(क) डॉ. चिटणीस (ख) न्यूटन (ग) सी.बी.रमन (घ) डॉ. अरविंद।
उत्तर –
(क) डॉ. चिटणीस।

प्रश्न 3.
‘हिम प्रलय’ को निम्न में से किस विधा में रखा जा सकता है (म. प्र. 2012)
(क) खोज (ख) वैज्ञानिक कथा (ग) मिथ्या कल्पना (घ) अनुमान।
उत्तर –
(ख) वैज्ञानिक कथा।

प्रश्न 4.
डॉ. चिटणीस का पूरा नाम क्या था?
उत्तर –
डॉ. बसंत चिटणीस।।

प्रश्न 5.
डॉ. जयंत नार्लीकर को भारत सरकार ने कौन – सा सम्मान दिया था?
उत्तर –
‘पद्म विभूषण’।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हिमपात से बचने की डॉ. चिटणीस की क्या योजना थी? (म. प्र. 2010, 12)
उत्तर –
“हिम प्रलय प्रतिबंधक उपाय है, वह मँहगा है लेकिन फिर भी उस पर अभी से अमल कीजिए। डॉ. चिटणीस की इसी सलाह को बाद में मानना पड़ा। अग्निबाणों, प्रक्षेपास्त्रों के हमले कर हिमपात रोकने की डॉ. चिटणीस की योजना थी।

प्रश्न 2.
डॉ. बसंत चिटणीस ने क्या चेतावनी दी थी? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
“अब की गर्मियों में इस बर्फ को भूलिए नहीं क्योंकि अगली सर्दियाँ इतनी भयंकर होंगी कि बर्फ पिघलने का नाम ही नहीं लेगी। हिम प्रलय प्रति बंधक उपाय है, वह मँहगा है, लेकिन फिर भी उस पर अभी से अमल कीजिए।”

प्रश्न 3.
अन्य वैज्ञानिकों ने डॉ. बसंत की बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया?
उत्तर –
अन्य वैज्ञानिकों को डॉ. बसंत चिटणीस का सिद्धान्त मान्य नहीं था। वे मानते थे कि शीत लहर प्राकृतिक है। जैसे आई है वैसे ही चली जाएगी। तापमान सामान्य करने हेतु अग्निबाण या प्रक्षेपास्त्र दागने की कोई जरूरत नहीं है किन्तु हिमपात प्रभावित देशों ने डॉ. चिटणीस की बात को माना और उन्हें शीतलहर से मुक्ति मिली।

प्रश्न 4.
डॉ. बसंत को टैलेक्स से क्या संदेश मिला?
उत्तर –
डॉ. बसंत चिटणीस को टैलेक्स से संदेश मिला कि – “आपके कथनानुसार अंटार्कटिक में बर्फ के फैलाव में वृद्धि हुई है और वहाँ के पानी की परत का तापमान भी दो अंश कम पाया गया है। अपने सर्वेक्षण के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि यह परिवर्तन पिछले दो वर्षों में हुआ है।”

प्रश्न 5.
डॉ. बसंत ने राजीव शाह को कहाँ और क्यों जाने की सलाह दी?
उत्तर –
डॉ. बसंत ने राजीव शाह को अगले साल इंडोनेशिया चले जाने की सलाह दी। यह इसलिए की भूमध्य रेखा के पास ही बचने की कुछ गुंजाइश है।।

प्रश्न 6.
हिमपात का मुकाबला कौन – कौन से देश नहीं कर सके थे? (म. प्र. 2015)
उत्तर –
हिमपात का मुकाबला जापान, यूरोप, रूस, कनाडा जैसे प्रगत राष्ट्र नहीं कर सके एवं हिमपात की चपेट में आये तथा काफी नुकसान हुआ।

8. धर्म की झाँकी

– महात्मा गाँधी

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “धर्म का उदार अर्थ करना चाहिए। धर्म अर्थात् आत्मबोध, आत्मज्ञान। मैं वैष्णव सम्प्रदाय में जन्मा था, इसलिए हवेली में जाने के प्रसंग बार – बार आते थे, पर उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं हुई। हवेली का वैभव मुझे अच्छा नहीं लगा। हवेली में चलने वाली अनीति की बातें सुनकर मन उसके प्रति उदासीन बन गया। वहाँ से मुझे कुछ भी न मिला।”

शब्दार्थ – उदार = सख्ती विहीन, आत्मबोध = स्वयं ज्ञान, अनीति = अन्याय, वैभव = सम्पत्ति।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश महात्मा गाँधी की आत्मकथा ‘धर्म की झाँकी’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – लेखन ने धर्म के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला है।

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व्याख्या – मनुष्यों में धार्मिक कट्टरता के गाँधी जी सख्त विरोधी थे। वे धर्म के उदार, परोपकारी, दयालु, परदुःख – कातर स्वरूप को स्वीकार करते थे। धर्म वह जो मनुष्य के मन में स्वतः ज्ञान पैदा कर दे। उचित अनुचित का बोध उसे स्वतः होने लगे। वैष्णव धर्मी गाँधी जी हवेली में जाते थे किन्तु उन्होंने वहाँ धर्म एवं धन का जो घाल – मेल देखा वह उन्हें स्वीकार्य नहीं था। एक ओर धर्म की बातें की जाएँ व दूसरी ओर अन्याय का प्रसार किया जाए, यह कहाँ तक उचित है? अन्याय से पोषित धर्म के गाँधी जी विरूद्ध थे। ऐसे धर्म को उन्होंने कभी प्रश्रय नहीं दिया। हवेली में गाँधी जी को कुछ भी नहीं मिला बल्कि वहाँ उन्होंने धर्म का विकृत स्वरूप देखा।

विशेष – भाषा सरल एवं सुबोध है। धर्म एवं धन के समन्वय का विरोध किया गया है। शैली वर्णनात्मक है।

2. “भागवत एक ऐसा ग्रंथ है जिसके पाठ से धर्म – रस उत्पन्न किया जा सकता है। मैंने तो उसे गुजराती में बड़े चाव से पढ़ा है। लेकिन इक्कीस दिन के अपने उपवास काल में भारत – भूषण मदनमोहन मालवीय जी के शुभ मुख से मूल संस्कृत के कुछ अंश जब सुने तो ख्याल हुआ कि बचपन में उनके समान भगवद् – भक्त के मुँह से भागवत सुनी होती, तो उस पर उसी उमर में मेरा प्रगाढ़ प्रेम हो जाता। बचपन में पड़े हुए शुभ – अशुभ संस्कार बहुत गहरी जड़े जमाते हैं, इसे मैं खूब अनुभव करता हूँ और इस कारण उस उमर में मुझे कई उत्तम ग्रंथ सुनने का लाभ नहीं मिला, सो अब अखरता है।”

शब्दार्थ – चाव = रुचि, प्रगाढ़ = गहरा, अखरता = अफसोस होना।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश महात्मा गाँधी की आत्मकथा ‘धर्म की झाँकी’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – यहाँ गाँधी जी ने भागवत की महत्ता प्रतिपादित की है।

व्याख्या – गाँधी जी का विचार है कि भागवत एक महान ग्रंथ है। नियमित अध्ययन से व्यक्ति में धार्मिक भाव उत्पन्न किए जा सकते हैं। गाँधी जी ने स्वयं गुजराती में लिखित भागवत् का अध्ययन बचपन में किया था। गाँधी जी ने जब इक्कीस दिन का उपवास रखा तब मालवीय जी ने उन्हें मूल संस्कृत भागवत् सुनाई तो उन्हें भागवत् ग्रंथ की महत्ता समझ में आई। उन्हें पछतावा हुआ कि अगर वे इसे अपने बचपन में इस तरह सुने होते तो उसी समय इससे लगाव हो जाता। जीवन का काफी लम्बा समय व्यर्थ ही बर्बाद हुआ। बचपन की अच्छी या बुरी आदत व्यक्तित्व में गहरे तक जड़ जमाती है। गाँधी जी को भी बचपन में अच्छे – अच्छे ग्रंथों के अध्ययन का विशेष अवसर नहीं मिल पाया, इस पर उन्हें अफसोस तो है ही साथ ही समाज के लिए प्रेरणा है कि बचपन से ही बच्चों को सद्ग्रंथ पढ़ाए जाएँ।

विशेष – भाषा सरल एवं आत्म कथात्मक शैली का प्रयोग है। श्री मद्भागवत् की महत्ता का प्रतिपादन है। शैशवावस्था से ही संस्कार विकसित करने के लिए श्रेष्ठ ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही तिथियाँ चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (2 अक्टूबर, 1869, 15 अगस्त, 1947, 30 जनवरी, 1948)
1. भारत को आजादी ………. को मिली।
2. गाँधी जी का जन्म ………. को हुआ। (म. प्र. 2013)
3. गाँधी जी की हत्या ………… को हुई।
उत्तर –
1. 15 अगस्त, 1947,
2. 2 अक्टूबर, 1969
3. 30 जनवरी, 1948।

प्रश्न 2.
गाँधी जी के मन पर किस चीज का गहरा असर पड़ा?
उत्तर –
रामायाण पाठ का।

प्रश्न 3.
गाँधी जी ने इक्कीस दिन के उपवास काल में किन महोदय से भागवत कथा सुनी?
उत्तर –
पं. मदन मोहन मालवीय।

प्रश्न 4.
भूत – प्रेत के भय को दूर करने के लिए गाँधी जी ने किसका सहारा लिया? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
राम नाम।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गाँधी जी के अनुसार धर्म का अर्थ क्या है? (म. प्र. 2010, 13)
उत्तर –
गाँधी जी ने धर्म का उदार अर्थ प्रस्तुत किया है। गाँधी जी ने लिखा है –
“धर्म अर्थात् आत्मबोध, आत्म ज्ञान” अर्थात् धर्म की उपयोगिता तभी है जब वह व्यक्ति में स्वयं ज्ञान उत्पन्न कर दे।

प्रश्न 2.
गाँधी जी के भीतर रामायण – श्रवण और रामायण के प्रति प्रेम की बुनियाद किस घटना ने रखी थी?
उत्तर –
गाँधी जी पोरबन्दर में अपने पिताजी के साथ राम मन्दिर में रात को बीलेश्वर लाघा महाराज से रामायण कथा सुनते थे। राम के परम भक्त लाघा महाराज को कोढ़ की बीमारी हुई। इलाज के बदले उन्होंने बीलेश्वर महादेव पर चढ़े हुए बेल पत्र कोढ़ वाले अंग पर बाँधे और केवल राम नाम का जप शुरू किया। उनका कोढ़ समाप्त हो गया। लाघा महाराज सुमधुर कण्ठ में रामायण का पाठ करते थे। बचपन में कोढ़ वाली घटना एवं लाघा महाराज के मधुर कंठ ने गाँधी जी को आकृष्ट किया। यहीं से रामायण प्रेम की बुनियाद पड़ी।

प्रश्न 3.
गाँधीजी की दृष्टि में सर्वधर्म समभाव का उदय किन प्रसंगों की प्रेरणा से हुआ था? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
गाँधीजी के पिताजी के पास जैन धर्माचार्य आते – जाते रहते थे। दान के अतिरिक्त वे उनसे धर्म चर्चा भी किया करते थे। गाँधी जी के पिता जी के कई मुसलमान और पारसी मित्र थे जिनसे वे धर्म चर्चाएँ किया करते थे। गाँधी जी को पिता जी के सान्निध्य में ही विविध धर्मों के संबंध में जानकारी हुई। विविध धर्मों के प्रति पिता जी के आदर को देखते हुए उनके मन में भी सर्वधर्म समभाव की भावना विकसित हुई।

  • भाव विस्तार कीजिए

प्रश्न 1.
“बचपन में जो बीज बोया गया, वह नष्ट नहीं हुआ।” विचार का विस्तार कीजिए।
उत्तर –
गाँधी जी ने ‘धर्म की झाँकी’ नामक आत्मकथा में लिखा है कि बचपन के संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। उनके प्रभाव परवर्ती जीवन पर पड़ता है। इस कथन में उपदेशात्मक तथ्य भी छिपे हुए हैं। गाँधीजी यह कहना चाहते हैं कि हमें बच्चों को अच्छे संस्कार देने चाहिए ताकि नई पीढ़ी अच्छी तैयार हो सके। गाँधी जी को सर्वधर्म समभाव का संस्कार बचपन में अपने पिता से प्राप्त हुआ था। भागवत एवं रामायण के प्रति रूझान भी उन्हें बचपन से ही हो गया था।

प्रश्न 2.
“बचपन में पड़े हुए शुभ – अशुभ संस्कार बहुत गहरी जड़ें जमाते हैं।” समझाइये। (Imp.)
उत्तर –
महात्मा गाँधी जी ने ‘धर्म का झाँकी’ नामक आत्मकथा में लिखा है कि बचपन की आदतें व्यक्ति में स्थाई निवास बना लेती हैं। युवावस्था तक बचपन की अच्छी या बुरी आदत साथ नहीं छोड़ती। हमें चाहिए कि श्रेष्ठ एवं अच्छे संस्कार बच्चों को प्रदान करें। शुभ संस्कारों के कारण आगामी जीवन जगमगा उठता है। अशुभ संस्कारों से जीवन का उपकार होता है एवं सर्वत्र अंधेरा छा जाता है।

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9. रुपया तुम्हें खा गया

– भगवती चरण वर्मा

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “बीमारी का अन्त होता है, बीमारी में सुधार नहीं हुआ करता। जितने दिन तक बीमारी चलती है, वह बीमारी की अवधि कहलाती है। उस अवधि में उतार – चढ़ाव होते रहते हैं, अगर सुधार हो तब तो बीमारी अच्छी ही हो गई।”

शब्दार्थ – अवधि = समय, उतार – चढ़ाव = कम – अधिक।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश भगवती चरण वर्मा की एकांकी ‘रुपया तुम्हें खा गया’ से उधत किया गया है।

प्रसंग – डॉ. जयलाल के द्वारा बीमारी को समझाया जा रहा।

व्याख्या – लेखक के अनुसार डॉ. जयलाल का विचार है कि बीमारी कम या ज्यादा नहीं हुआ करती। बीमारी इलाज के बाद खत्म हो जाती है, कम नहीं होती। किसी भी बीमारी की एक निश्चित समयावधि हुआ करती है। इलाज के कराने पर, समुचित दवा करने पर वह जड़ से समाप्त हो जाती है। इलाज की समयावधि में जरूर बीमारी में कमी आती है। बीमारी में कमी आना सुधार होने का उपक्रम है। समझ लीजिए कि रोग समाप्ति की ओर है।

विशेष – भाषा सरल एवं प्रवाहमय है। बीमारी ठीक होने की प्रक्रिया को समझाया जा सकता है।

2. “धोखा मैं तुम्हें नहीं दे रहा हूँ, धोखा तुम अपने को दे रहे हो। तुम्हारी सुख – शान्ति अर्थ के पिशाच ने तुमसे छीन ली, तुम्हारा संतोष उसने नष्ट कर दिया। उस दिन जब तुम दस हजार रुपया चुराकर लाए थे। तब तुमने समझा था कि तुम रुपया खा गए ……. लेकिन तुमने गलत समझा था।”

शब्दार्थ – पिशाच = भूत – प्रेत, अर्थ = धन। संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश भगवती चरण वर्मा की एकांकी ‘रुपया तुम्हें खा गया’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – यहाँ मानिकचंद की अज्ञानता को स्पष्ट किया गया है।।

व्याख्या – किशोरीलाल मानिकचंद से कहता है कि मैंने तुम्हारे साथ कोई छल – कपट नहीं किया है। धन के अधीन होकर तुमने जीवन के मर्म को समझने में चूक की है। धन मनुष्य के जीवन की सुख – शान्ति छीनने की क्षमता रखता है। धन से मनुष्य को कभी संतोष प्राप्त नहीं होता। दस हजार रुपए चुराकर तुम स्वयं की बुद्धि को शाबासी दे रहे थे, आत्म – प्रसंशा की स्थिति में थे। तुमने यहीं भूल की, तुमने रुपया नहीं खाया बल्कि रुपया तुम्हारे सम्पूर्ण चरित्र को कलंकित कर गया।

विशेष – अर्थलिप्सा की निन्दा की गई है। भाषा सरल एवं प्रवाहमय है। शैली में व्यंग्य छुपा हुआ है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘रुपया तुम्हें खा गया’ निम्न में से किस विधा की रचना है
(क) नाटक (ख) उपन्यास (ग) एकांकी (घ) कहानी।
उत्तर –
(ग) एकांकी।

प्रश्न 2.
जयलाल के पिता का क्या नाम था?
उत्तर –
किशोरी लाल।

प्रश्न 3.
रुपया चुराने के जुल्म में किसे सजा हुई थी?
उत्तर –
किशोरी लाल को।

प्रश्न 4.
जयलाल का क्या पेशा था? (म. प्र. 2012)
उत्तर –
डॉक्टरी।

प्रश्न 5.
‘रुपया तुम्हें खा गया’ यह किसका कथन है
(क) जयलाल (ख) मानिकचंद (ग) रानी (घ) मदन।
उत्तर –
(ख) मानिकचंद।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों में से सत्य/ असत्य कथन छाँटिए (म. प्र. 2010)
1. जयलाल वकील था।
2. ‘आँख का तारा’ मुहावरे का अर्थ है। बहुत प्रिय।
3. ‘देश में सर्वत्र शांती है’ यह वाक्य शुद्ध है?
4. ‘सम्मान’ शब्द का विलोम शब्द ‘अपयश’ है।
उत्तर –
1. असत्य,
2. सत्य,
3. असत्य,
4. असत्य।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किशोरीलाल के जेल जाने पर परिवार ने अपना जीवन निर्वाह किस प्रकार किया?
उत्तर –
किशोरीलाल के जेल जाने पर जीवन निर्वाह के चक्कर में उसकी पत्नी के जेवर बिक गए। किशोरीलाल की लड़की ने चक्की चलाई तथा पड़ोस के कपड़े सिलकर धनार्जन किया। कमाया हुआ सारा धन बेटे की पढ़ाई पर खर्च हुआ।

प्रश्न 2.
मानिकचंद अपनी सेफ (तिजोरी)की चाबी अपने पुत्र मदन को क्यों नहीं देना चाहता है?
उत्तर –
मानिकचंद अपने जीते – जी अपनी सम्पत्ति का मालिक अपने पुत्र मदन को नहीं बनाना चाहता था। अपनी सेफ की चाबी देकर वह अपनी पत्नी और बेटे के अधीन होकर नहीं जीना चाहता था।

प्रश्न 3.
मानिकचंद को अपनी भूल का अहसास कैसे होता है? (म. प्र. 2010, 13)
उत्तर –
जब किशोरीलाल मानिकचंद को यह कहता है कि ‘रुपया तुम्हें खा गया’। तब मानिकचंद को अपनी भूल का अहसास होता है। मानिकचंद अर्थ – पिशाच, से पीड़ित व्यक्ति है। जीवन के उच्चतर मूल्य दया, प्रेम, ममता एवं मानवता का उसके जीवन में कोई स्थान नहीं है।

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प्रश्न 4.
‘रुपया तुम्हें खा गया’ एकांकी का उद्देश्य क्या है? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
इस एकांकी में व्यक्ति की अर्थ – लालसा को प्रकट किया गया है। धन के चक्कर में मनुष्य सामाजिक एवं पारिवारिक रिश्तों को भी भुला बैठता है। जबकि धन मनुष्य के जीवन की सुख – शान्ति एवं संतोष का हरण करता है। जीवन में उच्च मानवीय मूल्यों का महत्व है, धन उसके समक्ष तुच्छ है। मानवीय मूल्यों की स्थापना से जीवन में सुकून का वास होता है।

प्रश्न 5.
एकांकी के आधार पर मानिकचंद का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर –
रुपया तुम्हें खा गया’ के मानिकचंद में निम्नलिखित गुण – अवगुण विद्यमान हैं

  1. धन – लिप्सा।
  2. अनैतिक विचारों का पोषक।
  3. पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों को धन के समक्ष हे य मानना।
  4. उच्चतर मानवीय मूल्यों की उपेक्षा।
  5. अविश्वास की भावना।
  6. समय बीतने पर पछताना।

प्रश्न 6.
मदन को संपत्ति का मालिक बनाने की बात पर मानिकचंद ने क्या कहा?
उत्तर –
मदन को संपत्ति का मालिक बनाने की बात पर मानिकचंद ने यह कहा – “मेरे मरने के बाद ही उसके पहले नहीं। और मेरे मरने के लिए तुम दोनों माला फेरो, पूजा – पाठ कराओ ……… यहाँ से …….. जाओ तुम दोनों।”

प्रश्न 7.
सजा काटने के पश्चात् किशोरी लाल की मनोदशा का वर्णन कीजिए। (म. प्र. 2015)
उत्तर –
सजा काटने के पश्चात् किशोरी लाल की मनोदशा काफी बिगड़ चुकी थी। वह अपने उजड़े हुए घर परिवार को देखकर अशांत हो गया था। उसने अपनी बीवी अपने बच्चों के कुपोषण को देखा। इससे वह एकदम घबरा गया। उसने लोगों से होने वाले अनादर और उपेक्षा को देखा। घर के घोर अभाव को देखा। इन सब दुखों को देखकर वह काँप गया। उसके बाप – दादा का पुराना मकान कर्ज से दब चुका था। उसे बेचकर वह वहाँ से भाग खड़ा हुआ और दूसरे शहर को चला गया।

10. अंतिम संदेश

– राम प्रसाद ‘बिस्मिल’

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “हमारी मृत्यु से किसी को क्षति और उत्तेजना हुई हो, तो उसको सहसा उतावलेपन से कोई ऐसा कार्य न कर डालना चाहिए कि जिससे मेरी आत्मा को कष्ट पहुँचे। यह समझकर कि अमुक ने मुखबरी कर दी अथवा अमुक पुलिस से मिल गया या गवाही दी, इसलिए किसी की हत्या कर दी जाए या किसी को कोई आघात पहुँचाया जाए , मेरे विचार में ऐसा करना सर्वथा अनुचित तथा मेरे प्रति अन्याय होगा। क्योंकि जिस किसी ने भी मेरे प्रति शत्रुता का व्यवहार किया है और यदि क्षमा कोई वस्तु है तो मैंने उन सबको अपनी ओर से क्षमा किया।”

शब्दार्थ – क्षति = नुकसान, उत्तेजना = जोश, सहसा = एकाएक, अमुक = पहचान सूचक शब्द, मुखबरी = भेदिया, आघात = चोट, सर्वथा = हर प्रकार से।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश शहीद राम प्रसाद बिस्मिल लिखित ‘अंतिम संदेश’ शीर्षक से उद्धृत किया गया

प्रसंग – प्रस्तुत प्रकरण माँ के लिए लिखे पत्रों का अंश है। नवयुवकों को होश में रहकर काम करने का संदेश दिया गया है।

व्याख्या – ‘बिस्मिल’ लिखते हैं कि मुझे फाँसी दिया जाना तय है। मेरी फाँसी से किसी को अतिरिक्त जोश में आने की आवश्यकता नहीं है। यदि देश का कोई भी नागरिक मेरी फाँसी से उद्वेलित होकर विध्वंसक कार्य करता है, तो मेरी मृतात्मा को शान्ति नहीं मिलेगी। किसी को भी भेदिया मानकर उस पर जुल्म नहीं किया जाना चाहिए। मेरी फाँसी के मुद्दे पर देश के किसी भी नागरिक को जिम्मेदार न ठहराया जाए या उसकी हत्या न की जाए। यदि ऐसा किया जाता है तो यह सही एवं नीति संगत नहीं होगा। इस मानवीय समाज में क्षमा सबसे बड़ी चीज है। मैंने अपने दुश्मन को, जिसके कारण मैं फाँसी के फंदे तक पहुँचा हूँ , क्षमा करता हूँ। देश के दुश्मनों की सजा ईश्वर ही निर्धारित कर सकता है।

विशेष – देश भक्ति का जज्बा प्रकट हुआ है। क्षमा को उच्चतर मानवीय मूल्य बताया गया है। तत्सम एवं संस्कृतनिष्ठ भाषा है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
राम प्रसाद बिस्मिल’ ने अंतिम संदेश पत्र किसे लिखा? (म. प्र. 2009)
उत्तर –
माता को।

प्रश्न 2.
‘सरफरोशी की तमन्ना’ किसका लिखा हुआ गीत है? (म. प्र. 2011)
उत्तर –
राम प्रसाद ‘बिस्मिल’।

प्रश्न 3.
अंतिम संदेश’ किस विधा की रचना है?
उत्तर –
पत्र।

प्रश्न 4.
फाँसी के पूर्व राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ किस जेल में कैद थे? (म. प्र. 2013)
उत्तर –
गोरखपुर।

प्रश्न 5.
राम प्रसाद बिस्मिल अनुयायी थे (म. प्र. 2010)
(क) महर्षि दयानंद के (ख) स्वामी विवेकानंद के (ग) स्वामी विद्यानंद के (घ) स्वामी रामानंद के।
उत्तर –
(क) महर्षि दयानंद के।

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  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने अपने पत्र में अपने शत्रु को क्षमा करने के कौन से दो कारण बताए (म. प्र. 2010)
उत्तर –
(1) भारत का वायुमण्डल एवं परिस्थितियाँ इस प्रकार की हैं कि इसमें अभी दृढ प्रतिज्ञ व्यक्ति बहुत कम उत्पन्न होते हैं।
(2) महर्षि दयानन्द सरस्वती ने स्वयं को जहर देने वाले को रुपये देकर भाग जाने को कहा था, तो मैं अपने शत्रु को क्यों नहीं क्षमा कर सकता हूँ।

प्रश्न 2.
राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के अनुसार नवयुवकों को क्या करना चाहिए? (म. प्र. 2009, 13, 15)
उत्तर –
राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के अनुसार नवयुवकों को गाँव – गाँव में जाकर ग्रामीणों एवं कृषकों की दशा सुधारने हेतु काम करने को कहा। मजदूरों एवं रोजमर्रा की जिन्दगी जीने वालों की जीवन दशा सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए। सामान्यजन को शिक्षित करने , दलितों का उद्धार करने, सुख – शान्ति एवं भाई – चारे के वातावरण का निर्माण करने एवं प्रेम और सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने के लिए उन्होंने नवयुवकों से कहा।

प्रश्न 3.
वे क्रान्तिकारियों के विरुद्ध गवाही देने वालों के साथ कैसा व्यवहार करने को कहते हैं?
उत्तर –
राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ क्रान्तिकारियों के विरुद्ध गवाही देने वालों को क्षमा करने की बात कहते हैं। उनके प्रति दया की भावना भी होनी चाहिए। उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि यदि “हमारी मृत्यु से किसी को क्षति और उत्तेजना हुई हो, तो उसको सहसा उतावलेपन से कोई ऐसा कार्य न कर डालना चाहिए कि जिससे मेरी आत्मा को कष्ट पहुँचे।”

11. भगत जी

– रामकुमार ‘भ्रमर’

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “उन्हें चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं, अभिनय की उत्कंठा नहीं, पर उन्हें चाह है खिले गुलाब की नाजुक पंखुड़ियों जैसे हँसते – खेलते बच्चों की और उन्हें उत्कंठा है हरी – भरी लहलहाती धरती की शान्ति की।”

शब्दार्थ – अभिनय – रंगमंच पर पात्र की भूमिका, उत्कंठा = इच्छा।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश रामकुमार ‘भ्रमर’ की कहानी भगत जी से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – यहाँ भगत जी के निर्मल हृदय की चर्चा की गई है।

व्याख्या – ‘भ्रमर’ जी लिखते हैं कि भगत जी निर्मल हृदय के व्यक्ति हैं। कोई भी काम निर्विकार हृदय से करते हैं। वे नेता भी नहीं हैं, न ही भविष्य में कोई चुनाव लड़ने की योजना है। समाजसेवा एवं सादगी उनके सरल व्यवहार का अंग है। वे दिखावे या अभिनय के लिए भी कोई काम नहीं करते। यश प्राप्ति की कामना भी के हृदय में नहीं है। वे संसार के नन्हें – मन्हें बच्चों को प्रसन्नचित एवं खिला हआ देखना – चाहते हैं। किसानों की फसल को लहलहाते देखकर, धरती पर सर्वत्र सुख – शान्ति देखकर, वे खुश हो जाते हैं।

विशेष – तत्सम प्रधान शब्दों का प्रयोग है। गुमनाम समाज सेवकों पर प्रकाश डाला गया है। उच्चतम मानवीय मूल्यों के विकास पर बल दिया गया है।

2. “कुंभाराम का सिर शर्म से झुक गया। उसे लगा कि वह मंदिर में पहुँच गया है और ईश्वर की मूरत की जगह भगतजी को देख रहा है। पश्चाताप और ग्लानि से उसका कंठ अवरुद्ध हो गया। भगतजी कहे जा रहे थे, “तुम मेरे मंदिर न जाने पर नाराज हो गए? चलो, मैं अभी मन्दिर चलता हूँ। चलो न!” उन्होंने कुंभाराम का हाथ पकड़कर खींचा, पर कुंभाराम बुत की तरह मौन था।”

शब्दार्थ – मूरत = मूर्ति, पश्चाताप = पछतावा, ग्लानि = दु:ख, अवरुद्ध = रुक जाना, बुत = पुतला।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश रामकुमार ‘भ्रमर’ की कहानी ‘भगत जी’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – कुंभाराम की आत्मग्लानि का चित्रांकन किया गया है।

व्याख्या – भगतजी जब कुंभाराम को बताते हैं कि दीना की दवा देने ठण्ड में इक्कीस मील दूर जाना था इसलिए वे मंदिर नहीं जा सके तो कुंभाराम शर्म से पानी – पानी हो जाता है। उसे लगता है कि वह व्यर्थ ही मन्दिर में भगवान के दर्शन के लिए जाता है, जीता – जागता भगतजी तो स्वयं भगवान के प्रतिरूप हैं। कुंभाराम को अपने पूर्व व्यवहार पर पछतावा एवं दुःख होता है। दूसरी ओर भगतजी सरलता एवं सादगी से उस दिन मन्दिर न जा पाने की प्रतिपूर्ति आज मंदिर जाकर देना चाहता है। कुंभाराम लज्जित होता है। वह ‘काटों तो खून नहीं’ की स्थिति में पहुँच जाता है।

विशेष – भावात्मक एवं चित्रात्मक शैली का प्रयोग है। मर्मस्पर्शी, भावपूर्ण चित्रण है। मन्दिर की निःसारता एवं उच्च मानवीय मूल्यों के सत्कार की बात कही गई है।

  • वस्तुनष्ठि प्रश्न

प्रश्न 1.
भगत जी की उपेक्षा मन्दिर के नाम पर किसने की? (म. प्र. 2013)
उत्तर –
कुंभाराम ने।

प्रश्न 2.
भगत जी को किसकी दवा पहुँचानी थी?
उत्तर –
दीना।

प्रश्न 3.
क्या भगत जी नास्तिक थे? (म. प्र. 2009)
उत्तर –
नहीं।

प्रश्न 4.
किसने किससे कहा
(क) “तुम नास्तिक जो हो।”
(ख) “दीना मर जाता है तो उसके बाल – बच्चों का क्या होता?”
(ग) “क्यों भगत जी, मन्दिर चल रहे हो दर्शन करने।”
उत्तर –
(क) कुंभाराम ने भगत जी से कहा।
(ख) कुंभाराम से भगत जी ने कहा।
(ग) कुंभाराम ने भगत जी से कहा।

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  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भगत जी का गाँव वालों के साथ किस तरह का व्यवहार था?
उत्तर –
भगत जी का गाँव वालों के साथ अत्यंत आत्मीय, भाई – चारा, स्नेह, सहानुभूति सहृदयता, मानवीयता एवं सहयोगी का संबंध था।

प्रश्न 2.
भगत जी का नाम भगत जी क्यों पड़ा? (म. प्र. 2009)
उत्तर –
भगत जी सच्चे अर्थों में भगत थे। भले ही वे मन्दिरों में ज्यादा समय व्यतीत नहीं करते थे, किन्तु मानव – मात्र की सेवा में उनकी गहरी रुचि थी।

प्रश्न 3.
“मानव सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है।” कथा वस्तु के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
भ्रमर जी का मत है कि इस विशाल संसार में अनेक प्राणी दु:खी हैं। उनके साथ हमें आत्मीयता के साथ मानवतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए। परस्पर एक – दूसरे के सहयोग से मानवता एवं सहानुभूति का विकास होता है। ईश्वर की मंशा भी संसार में सुख – शान्ति की स्थापना है। जब हम मानव मात्र के सुख – दुःख में शामिल होंगे तो वह सच्ची ईश्वर सेवा होगी। ईश्वर की सेवा मन्दिर में जाने से नहीं होगी। मानव के प्रति आदर की भावना ही सच्ची ईश्वर सेवा है।

प्रश्न 4.
भगत जी के चरित्र की कौन – कौन सी विशेषताएँ थीं? (म. प्र. 2013)
उत्तर –
सहानुभूति, परदुःख कातरता, परोपकार, करुणा, सदाशयता, सहजता, सरलता, निष्कपटता, कर्त्तव्यपरायणता, सहनशीलता, निरभिमानी एवं मनुष्य मात्र का आदर करने की प्रवृत्तियाँ भगत जी के चरित्र में विद्यमान थीं।

प्रश्न 5.
कुंभाराम स्वयं को आस्तिक क्यों मानता था? (म. प्र. 2010, 15)
उत्तर –
कुंभाराम प्रतिदिन मन्दिर जाता था। उसने मन्दिर का निर्माण कराया था। प्रतिदिन स्नान करने के बाद वह श्लोक पाठ करता था। तुलसी, रुद्राक्ष आदि की मालाएँ धारण करता था। त्रिपुंड लगाता था अत: वह अपने को धर्म का ठेकेदार व आस्तिकं समझता था।

प्रश्न 6.
कुंभाराम स्वयं को नास्तिक मानता था यह कथन सत्य है, या असत्य बताइये। (म. प्र. 2011)
उत्तर –
असत्य।

प्रश्न 7.
‘भगत जी’ कहानी के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहते हैं? (म. प्र. 2013)
उत्तर –
‘भगत जी’ कहानी के माध्यम से लेखक यह कहना चाहते हैं कि आज समाज में ‘भगत जी’ की तरह लोगों की आवश्यकता है साथ ही कहानी के माध्यम से लेखक मानवीय मूल्यों को स्थापित करना चाहते हैं। भगत जी का चरित्र साधारणता में असाधारणता का बोध कराता है जिसमें आत्मीयता के साथ मानवीयता जीवित है।

लेखक ने स्पष्ट शब्दों में भगत जी के व्यक्तित्व, कार्य व्यवहार एवं सदाशयता की चर्चा की है। भगत जी इंसानियत की कीमत पर मान मर्यादा की चिंता नहीं करते उन्हें ज्ञानी होने का दर्प नहीं, सबके दुख को अपना दुख मानकर पीड़ा का अनुभव करना वह अपना कर्तव्य समझते थे। वे दीन, दुखी की दवा लेने इक्कीस मील चलकर शहर जाते थे। कहानी में वे नाम के भगत जी नहीं वरन् इंसानियत के भगत दिखाई देते हैं आज हमें भगत जी’ के चरित्र एवं आदर्शों को अपने जीवन में अपनाना एवं अनुकरण करना ही हमारा दायित्व है।

12. अथ काटना कुत्ते का भइया जी को

– डॉ. गंगा प्रसाद गुप्त ‘बरसैंया’

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “सुख – दुःख के प्रसंगही आत्मीयता प्रमाणित करने के सबसे अनुकूल सार्वजनिक अवसर होते हैं। वह जमाना गया जब भीतर – ही – भीतर आत्मीयता, स्नेह और श्रद्धा की भावना रखी जाती थी।अब तो बाहर का महत्व है। भीतर का क्या भरोसा? भीतर कुछ, बाहर कुछ।”

शब्दार्थ – आत्मीयता = अपनापन, स्नेह = प्रेम।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश डॉ. गंगा प्रसाद गुप्त ‘बरसैंया’ के व्यंग्य “अथ काटना कुत्ते का भईया जी को” से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – लेखक ने औपचारिकता वश दुःख प्रकट करने वालों पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या – समाज में जब किसी मनुष्य पर सुख या दुःख पड़ता है, तब करीबी शुभचिंतक अपनापन प्रकट करने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं। संवेदना प्रकट करने का ऐसा सार्वजनिक मौका मौकापरस्त समाज का कोई भी व्यक्ति छोड़ना नहीं चाहता। वस्तुत: आत्मीयता, प्रेम एवं श्रद्धा किसी के प्रति किसी के हृदय में रह ही नहीं गई है। व्यक्ति अवसर की ताक में रहता है कि कब उसे अपनापन, प्रेम एवं श्रद्धा प्रकट करने का मौका मिले। व्यक्ति को किसी के सुख – दुःख से कोई सरोकार नहीं रह गया है। आत्मीयता, स्नेह एवं श्रद्धा व्यक्ति के अन्तर्मन में रहने वाली चीज है, किन्तु इस कृत्रिम समाज में इसके बहिरंग स्वरूप का महत्व रह गया है। व्यक्ति दोमुँहा हो गया है। उसके मन में कुछ, बाहर कुछ होता है।

विशेष – कृत्रिम संवेदना पर तीक्ष्ण व्यंग्य है। भाषा सहज एवं सरल है। भाव रोचक एवं सरस है।

2. “आजकल साहित्यकार सत्ता और समर्थकों का गायक बनकर सम्मान और पैसे के पीछे भाग रहा है। दीन – हीन शोषितों की बिरादरी का यह रचनाकार सुखभोगी बनकर भ्रष्ट हो रहा है। अतः इसे सचेत कर सही मार्ग पर लाना जरूरी है। मुझे भईया जी को कुत्ते द्वारा काटे जाने का कारण और समाधान मिल गया। मैं कुत्तों की ओर से अपने साहित्यकार बंधुओं को आगाह करता हूँ कि वे पद, पुरस्कार और सम्मान की ओर भागकर अपने को पथभ्रष्ट न करें। सत्यमार्ग पर चलें। जरूरतमंदों और शोषितों के साथी बनकर समाज की विसंगतियों पर प्रहार करें। अन्यथा उन्हें कुत्तों के प्रहार से नहीं बचाया जा सकता। झाड़ – फूंक और इंजेक्शन भी उनकी रक्षा नहीं कर सकेंगे।”

शब्दार्थ – सत्ता = सरकार, गायक = गाने वाला, समाधान = निराकरण, पथभ्रष्ट = राह से भटका हुआ, विसंगतियों = विषमताओं, प्रहार = चोट।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश डॉ. गंगाप्रसाद गुप्त ‘बरसैंया’ के व्यंग्य ‘अथ काटना कुत्ते का भईया जी को’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग – साहित्यकारों की पदलोलुपता एवं मौकापरस्ती पर प्रहार किया गया है।

व्याख्या – वर्तमान समय में साहित्यकार राजनेताओं की चाटुकारिता कर पैसा कमाने के चक्कर में लगा हुआ है। दुःखी, शोषित जनता की मूक पीड़ा को वाणी देने वाला साहित्यकार रास्ते से भटक गया है। उसे अपने दायित्व का आभास नहीं है। जरूरत है साहित्यकार को सही रास्ता दिखाने की। साहित्यकार पथभ्रष्ट रहेगा, तो उसे कुत्ते काटते ही रहेंगे। ‘बरसैंया जी’ साहित्यिक बिरादरी के लोगों को सचेत करते हुए कहते हैं कि पद के प्रति लगाव, पुरस्कार के प्राप्त करने का मोह और सम्मान की लालसा के कारण साहित्यकार अपने उद्देश्य से भटक गया है। उसे सत्य का मार्ग अपनाना चाहिए। समाज के शोषित, उपेक्षित एवं दीन – हीनों की आवाज को साहित्य के माध्यम से स्वर देना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे। तो पागल कुत्तों का शिकार होने से उन्हें कोई नहीं बचा सकता। कुत्तों का काटना उनका दण्ड कहलायेगा। कुत्ते के काटने का इलाज तो झाँड़ – फूंक एवं इंजेक्शन से हो जाता है किन्तु इन परिस्थितियों में किसी प्रकार का इलाज सम्भव नहीं है।

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विशेष – शैली व्यंगात्मक है। पद लोलुप, सुविधाभोगी, पथ भ्रष्ट साहित्य पर करारा व्यंग्य है। व्यंजना शब्द शक्ति के माध्यम से बात कही गई है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
“अथ काटना कुत्ते का भइया जी को” निम्न में से किस विधा की रचना है
(क) व्यंग्य (ख) कहानी (ग) एकांकी (घ) रिपोर्ताज।
उत्तर –
(क) व्यंग्य।

प्रश्न 2.
भइया जी को काटा था (म. प्र. 2010)
(क) साँप ने (ख) बिच्छु ने (ग) कुत्ते ने (घ) नेवले ने।
उत्तर –
(ग) कुत्ते ने।

प्रश्न 3.
“घर में इन्हीं की झंझट क्या कम है कि एक और मुसीबत मोल ले ली जाए।” किसके द्वारा कहा गया वाक्य है?
उत्तर –
धर्मपत्नी के।

प्रश्न 4.
(अ) सही जोड़ी बनाइये (म. प्र. 2010)
1. धर्म की झाँकी – (क) एकांकी
2. रुपया तुम्हें खा गया – (ख) कविता
3. भगत जी – (ग) निबंध
4. विप्लव गान – (घ) आत्मकथा
5. देश प्रेम – (ङ) कहानी।
उत्तर –
1. (घ), 2. (क), 3. (ङ), 4. (ख), 5. (ग)।

प्रश्न (ब) सही जोड़ी बनाइये
1. राजेन्द्र बाबू – (क) डॉ. जयन्त नार्लीकर
2. भू का त्रास हरो – (ख) मुंशी प्रेमचंद
3. नई इबारत – (ग) श्रीमती महादेवी वर्मा
4. हिम – प्रलय – (घ) श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’
5. दो बैलों की कथा – (ङ) भवानी प्रसाद मिश्र।
उत्तर –
1. (ग), 2. (घ), 3. (ङ), 4. (क), 5. (ख)।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कुत्ता काटने की घटना का वर्णन श्रोतागण भइया जी से किस – किस प्रकार सुनते हैं?
उत्तर –
भईया जी ने श्रोताओं को बताया कि – “भइया जी ने खचाखच भरे दरबार में अपना फटा कुरता और पाजामा तथा मलहम पट्टी लगे हाथ – पाँव और कंधों को प्रदर्शित करते हुए सबकी जिज्ञासा शान्ति के लिये बताया कि रात के अंधेरे में वह जब टॉर्च लेकर एक सामाजिक कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने जा रहे थे, तभी निर्धन . परिवार के एक कुत्ते ने उन्हें काट लिया। वह कुत्ता कैसे पीछे से उन पर झपटा, कैसे उन्होंने दुतकारा, कैसे वे भागे, कैसे गिरे, फिर उठकर कुत्ते का मुकाबला कैसे किया और कहाँ – कहाँ कुत्ते ने काटा इस सवका पूरे अभिनय के साथ सविस्तार वर्णन जब भइया जी ने किया तो स्वाभाविक है कि सहानुभूति प्रदर्शकों ने भरे गले में अपनी आत्मीय वेदना व्यक्त की।

‘प्रश्न 2.
कुत्ते के काटने पर भइया जी को उनके शुभचिन्तकों ने किस तरह के सुझाव दिए? (म. प्र. 2011, 12, 15)
उत्तर –
भइया जी को शुभचिन्तकों ने सुझाव दिया कि कुत्ते के मालिक के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना चाहिए। अन्धविश्वासी व्यक्तियों ने कुत्ते को दस दिन बाँधकर रखने एवं निगरानी करने का सुझाव दिया। दस कुँए झकवाने, झाँड़ – फूंक करवाने एवं तीन हजार रुपए का एक इंजेक्शन लगवाने के सुझाव भी लोगों ने दिए।

प्रश्न 3.
कुत्ते की उस मानसिक स्थिति का वर्णन कीजिए, जिससे उत्तेजित होकर उसने भइया जी को काटने का निश्चय किया।
उत्तर –
भइया जी सफेद कपड़ों में थे, कुत्ते पर टॉर्च की रोशनी डाली। कुत्ते को लगा कि मुझ निर्धन बस्ती के कुत्ते को यह सम्पन्न व्यक्ति अपनी चमक और रोशनी से चकाचौंध करना चाहता है। मेरा मालिक दिनभर परिश्रम कर पसीने से लथपथ फटे, मैले, कुचैले कपड़ों पर आता है और इनके कपड़ों पर एक दाग भी नहीं? हम दर – दर की ठोकरें खाएँ और ये तथा इनके कुत्ते मालपुएँ खाएँ। गाड़ियों में घूमें। झकाझक कपड़ों की शान बघारें। आदमी – आदमी तथा कुत्ते – कुत्ते में भेद पैदा करें। अपमान की इन्हीं व्यथाओं से पीड़ित होकर कुत्ते ने भइया जी को काटने का निश्चय किया।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत व्यंग्य के माध्यम से लेखक साहित्यकारों को क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर –
‘बरसैंया जी’ साहित्यकारों को प्रस्तुत व्यंग्य के माध्यम से संदेश देना चाहते हैं कि वे सत्ता और समर्थकों के गायक न बनें। धन कमाना उनका उद्देश्य नहीं होना चाहिए। शोषितों की आवाज को साहित्य में स्वर प्रदान करें। पद, पुरस्कार एवं सम्मान साहित्यकार का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। वे सत्यमार्ग पर चलकर जरूरतमंदों और शोषितों का साथ समाज की विसंगितयों पर प्रहार करें।

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प्रश्न 5.
कुत्ते का मालिक तो कुत्ते से भी ज्यादा खतरनाक है। आशय स्पष्ट कीजिए। (म. प्र. 2009, 13)
उत्तर –
किसी सहृदय ने भइया जी को सुझाव दिया कि कुत्ते के मालिक के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखाई जाना चाहिए। तब किसी ने बताया कि कुत्ते का मालिक रसूखदार व्यक्ति है। कुत्ते ने तो सिर्फ काटा है, उसका मालिक तो भइया जी की कौन – कौन सी दुर्गत कर देगा क्या मालूम?

प्रश्न 6.
“आजकल साहित्यकार सत्ता और समर्थों का गायक बनकर सम्मान और पैसे के पीछे भाग रहा है” इन पंक्तियों में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए (म. प्र. 2010)
उत्तर –
“आजकल साहित्यकार सत्ता और समर्थों का गायक बनाकर सम्मान और पैसे के पीछे भाग रहा उपर्युक्त पंक्तियों में निहित व्यंग्य यह है कि आज का साहित्यकार साहित्य रचना के सत्य मार्ग को छोड़ चुका है। वह सुख – सुविधाओं के पीछे भाग रहा है। राजनेताओं अधिकारियों और धनपतियों को देवता भागवत के रूप में देख समझ रहा है। फिर उनकी प्रशंसा में वह रात – दिन लगा रहता है। यह इसलिए ऐसा करके ही वह सुख – सुविधामय जीवन बीता सकता है। वह यह अच्छी तरह से जानता है कि सत् साहित्य की रचना करके उसे कुछ भी सुख सुविधाओं का नसीब नहीं हो सकता है, बल्कि उसे तो शोषण, उपेक्षा और अभावों का शिकार होना पड़ेगा। इस प्रकार आजकल का साहित्यकार, साहित्यकार न होकर सत्ता और अधिकारियों का चापलूस, पिछलग्गू और उपासक पुजारी बनकर रह गया है जो हर प्रकार निंदनीय और हेय है।

13. कर्म कौशल

– डॉ. रघुवीर प्रसाद गोस्वामी

  • अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नैसर्गिक नियमों को क्या कहा जाता है?
उत्तर –
प्रत्येक के जीवन – संचालन हेतु जो नैसर्गिक नियम बने उन्हें प्राकृतिक नियम कहा गया।

प्रश्न 2.
किस ग्रन्थ में विवेचित कर्म सिद्धांत की विशिष्ट पहचान है?
उत्तर –
श्रीमद्भगवद्गीता में विवेचित कर्म – सिद्धांत की आज विश्व में विशिष्ट पहचान है।

प्रश्न 3.
कर्ता को किस प्रकार का कार्य करना चाहिए?
उत्तर –
कर्म की आचरण प्रक्रिया पर विचार करते समय स्वाभाविक रूप से कर्म, संकल्प एवं कर्ता के स्वरूप निर्धारण पर विचार करना चाहिए।

प्रश्न 4.
किस कारण से मनुष्य स्वयं को कर्ता मानने लगता है?
उत्तर –
अज्ञान एवं मिथ्या अभिमान से ही मनुष्य स्वयं को कर्ता मानने लगता है।

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीव समुदाय से क्या तात्पर्य है?
उत्तर –
प्रत्येक अनेकानेक जीव समुदाय से परिपूर्ण है। जीव समुदाय का तात्पर्य है – वृक्ष, वनस्पति, जीव – जन्तु और मानव संतति।

प्रश्न 2. कर्म के पाँच कारण कौन – कौन से होते हैं?
उत्तर –
गीता में कहा गया है कि संपन्न किये जाने वाले किसी भी कर्म के पाँच कारण होते हैं – – अधिष्ठान, कर्ता, कारण (इन्द्रियाँ) चेष्टाएँ तथा दैव शक्ति (सर्वोपरि शक्ति)।

प्रश्न 3.
युद्ध के लिये प्रेरित करते हुए योगेश्वर ने अर्जुन से क्या कहा?
उत्तर –
योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन से यह स्पष्ट कहा था कि परिणाम पर दृष्टि न रखते हुए मनुष्यों को अपना कर्म अत्यन्त श्रद्धा एवं पूर्ण समर्पण भाव से करना चाहिए।

प्रश्न 4.
किस कारण से कर्ता का समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है?
उत्तर –
केवल फल प्राप्ति का चिन्तन करने से कर्ता का समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है और फलप्राप्ति होने पर वह उसी फल भोग में उलझ कर रह जाता है।

प्रश्न 5.
श्रेष्ठ व्यक्ति का चरित्र कैसा होता है?
उत्तर –
श्रेष्ठ व्यक्ति का चरित्र अन्य व्यक्तियों के लिये अनुकरणीय होता है और वही लोक में प्रमाण बन जाता है।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सबसे प्रमुख सावधानी की ओर अर्जुन का ध्यान आकृष्ट करते हुए श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
उत्तर –
गीताकार ने स्पष्ट किया है कि कर्म करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए। सबसे पहले सावधानी की ओर उन्होंने अर्जुन का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा है कि किसी सिद्धि और असिद्धि तथा अनुकूलता और प्रतिकूलता में समान भाव रखकर मन, वाणी और क्रिया के पूर्ण भाव से युक्त होकर कर्म करें साथ ही जीवन संग्राम में जय है और पराजय भी, लाभ है और हानि भी, सुख है और दुख भी तुम इन द्वन्द्वों से अनासक्त भावपूर्वक ऊपर उठो।

प्रश्न 2.
फल प्राप्ति में संदेह का प्रश्न किस स्थिति में नहीं रहता है?
उत्तर –
किये गये कर्म में यदि पूर्ण शुद्ध दृष्टि या भाव है तो उसके फल – प्राप्ति में संदेह का प्रश्न ही नहीं रहता। किन्तु इसके लिये वृद्धि की पूर्णता का समावेश भी नितान्त आवश्यक है।

प्रश्न 3.
अपने संकल्प से विपरीत होने पर भी मनुष्य को कर्म करना पड़ता है?
उत्तर –
मनुष्य अपने स्वभावजन्य कर्म से बँधा हुआ होने के कारण पराधीन है। अपने संकल्प से विपरीत होने पर भी उसे कर्म करना पड़ता है, और प्रकृति अथवा पूर्वोक्त पाँच तत्वों का सूमह उसे कर्म में प्रवृत्त करता है। इस कारण कोई भी व्यक्ति यथा निर्धारित कर्म त्याग नहीं कर सकता। यदि कर्म त्याग असंभव है एवं मनुष्य को कर्म करना ही पड़ता है तो उचित यही है कि मनुष्य अपने स्वधर्म अर्थात् सत्कर्म का पालन करें।

कवियों एवं लेखकों का संक्षिप्त जीवन – परिचय

(1) तुलसीदास – जन्म – सं. 1589 में बाँदा जिले के राजापुर ग्राम में।
मृत्यु – सं. 1680 में काशी में।
रचनाएँ – रामचरित मानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, रामलला नहहू, रामाज्ञा प्रश्न, बरवै रामायण।
भाव – पक्ष – प्रमुख रामभक्त कवि एवं समन्वयवादी कवि के रूप में विख्यात।

(2) स्वामी विवेकानन्द – जन्म – 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता में।
मृत्यु – सन् 1902 में।
भाव – पक्ष – पाश्चात्य देशों में सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का जोरदार प्रचार – प्रसार।

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(3) प्रेमचंद – जन्म – 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी जिले के लमही ग्राम में।
मृत्यु – 8 अक्टूबर, 1936 को।
रचनाएँ – गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, कायाकल्प, प्रेमाश्रम, वरदान, मंगलसूत्र, मानसरोवर 8 भाग में, कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी इत्यादि।
भाव – पक्ष – आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद के प्रणेता। ग्राम्य जीवन के प्रमुख कथाकार।

(4) सुमित्रानन्दन पंत – जन्म – 20 मई, 1900 को उ.प्र. के कुमायूँ अंचल के कौसानी गाँव में।
मृत्यु – 28 दिसम्बर, 1977 में।
रचनाएँ – ग्राम्या, युगान्त, वीणा, पल्लव, गुंजन, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, चिदम्बरा, लोकायतन इत्यादि।
भाव – पक्ष – प्रकृति के सुकुमार कल्पनाओं के कवि।

(5) भगवती प्रसाद वाजपेयी – जन्म – 1899 में कानपुर (उ.प्र.) के मंगलपुर ग्राम में।
रचनाएँ – प्रेमपथ, त्यागमयी, मनुष्य और देवता, विश्वास का बल, मधुपर्क, हिलोर, दीपमलिका, मेरे सपने, बाती और लौ, उपहार आदि।
भाव – पक्ष – सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं बालोपयोगी साहित्य का सृजन।

(6) श्रीकृष्ण सरल – जन्म – 1 जनवरी, 1919 को म. प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में।
रचनाएँ – भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र बोस, मुक्तिगान, स्मृति पूजा, बच्चों की फुलवारी, संसार की प्राचीन समस्याएँ, सुभाष – दर्शन आदि।
भाव – पक्ष – राष्ट्रीय विचार – प्रधान रचनाकार। भारतीय संस्कृति के अमर गायक।

(7) जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द’ – जन्म – 1907 में मुरार ग्वालियर (म. प्र.) में।
रचनाएँ – जीवन संगीत, नवयुग के गान, बलिपथ के गीत, भूमि की अनुभूति, मुक्तिका, चिन्तनकण, सांस्कृतिक प्रश्न, विनोद कथा, बिल्लों का नकछेदन आदि।
भाव – पक्ष – देश – भक्ति एवं देश – प्रेम के अतिरिक्त बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार।

(8) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल – जन्म – (उ.प्र.) बस्ती के अगोना ग्राम में 1884 में।
मृत्यु – 8 फरवरी, 1941 में।
रचनाएँ – चिन्तामणि, हिन्दी शब्द सागर, त्रिवेणी,
विचार – वीथी, जायसी, सूर और तुलसी पर श्रेष्ठ आलोचनाएँ, हिन्दी साहित्य का इतिहास इत्यादि।
भाव – पक्ष – मुख्यतः भाव एवं विचार प्रधान निबंधकार। युगप्रवर्तक समीक्षक के रूप में विख्यात।

(9) भवानी प्रसाद मिश्र – जन्म – 28 मार्च, 1914 को म. प्र. होशंगाबाद के टिगरिया गाँव में।
मृत्यु – 20 फरवरी, 1985 में।
रचनाएँ – गीतफरोश, खुशबू के शिलालेख, बुनी हुई रस्सी, शतदल गाँधी पंचदशी, त्रिकाल संध्या आदि।
भाव – पक्ष – सहजता, सरलता और ताजगी। तरक्की की बातें करना। प्रमुख गाँधीवादी कवि।

(10) महादेवी वर्मा – जन्म – 26 मार्च, 1907 को उ. प्र. के फारुखाबाद जिले में।
मृत्यु – 11 सितम्बर, 1987 को।
रचनाएँ – नीहार, नीरजा, दीपाशीखा, यामा।
भाव – पक्ष – वेदना एवं करुणा की कवयित्री। प्रमुख रेखाचित्रकार।

(11) डॉ. जयन्त नार्लीकर – जन्म – 1938 में कोल्हापुर (महाराष्ट्र)।
रचनाएँ – आगन्तुक, धूमकेतु, विज्ञान, मानव, ब्रम्हाण्ड।
उपलब्धियाँ – वैज्ञानिक खोजों के लिए अनेक पुरस्कार। पद्म विभूषः। सम्मानित वैज्ञानिक।

(12) बिहारी – जन्म – 1595 में ग्वालियर के पास बसुआ, गोविन्दपुर गाँव में!
मृत्यु – 1663 ई. में।
रचनाएँ – बिहारी सतसई।
भाव – पक्ष – श्रृंगार, नीति एवं भक्ति के दोहे लिखने में प्रवीणता।
नारी – सौन्दर्य एवं नख – शिख चित्रण में महारथ।

(13) महात्मा गाँधी – जन्म – 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबन्दर में।
मृत्यु – 30 जनवरी, 1948 को गोली मारकर हत्या।
रचनाएँ – हिन्द स्वराज्य, हरी पुस्तक, यंग इंडिया एवं हरिजन नामक पत्र, सत्य के प्रयोग।
महत्व – सत्य, अहिंसा एवं समाज सेवा की प्रतिमूर्ति। राष्ट्रीय आन्दोलन के नायक व भारत के राष्ट्रपिता।

(14) भगवतीचरण वर्मा – जन्म – सन् 1903 में उ. प्र. के उन्नाव जिले के शफीपुर ग्राम में।
रचनाएँ – इंस्टालमेंट, दो बाँके, राख, चिनगारी, मधुकण, प्रेमसंगीत, मानव, टेढ़े – मेढ़े रास्ते, चित्रलेखा, भूले – बिसरे चित्र।
भाव – पक्ष – भारतीय गाँव और शहर के परिवेश एवं समस्याओं के कुशल चितेरे।
सहज – सरल साहित्यकार।

(15) माखनलाल चतुर्वेदी – जन्म – 4 अप्रैल, 1889 को म. प्र. के होशंगाबाद के बाबई में।
मृत्यु – 30 जनवरी, 1968 को।।
रचनाएँ – हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता, युगचरण, समर्पण, वेणु , लो गूंजे धरा, साहित्य देवता, वनवासी और कला का अनुवाद, कृष्णार्जुन युद्ध।
भाव – पक्ष – राष्ट्रीय चेतना के ओजस्वी कवि एवं एक भारतीय आत्मा के नाम से विख्यात।

(16) रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ – जन्म – 4 जून, 1887 को उ. प्र. के मैनपुरी जिले में।
मृत्यु – 19 दिसम्बर , 1927 को गोरखपुर जेल में फाँसी।
रचनाएँ – सरफरोशी की तमन्ना …….। एवं बलिदानी गीत व संस्मरण।
महत्व – स्वतंत्रता आन्दोलन के शहीद सिपाही।

(17) रामकुमार ‘भ्रमर’ – जन्म – 2 फरवरी, 1938 को म. प्र. के ग्वालियर जिले में।
रचनाएँ – कच्ची – पक्की दीवारें, सेतुकथा, फौलाद और आदमी, महाभारत तथा श्रीकृष्ण के जीवन पर 12 तथा 10 खण्डीय उपन्यास।
भाव – पक्ष – अतीतकालीन मूल्यों को व्याख्यायित किया। राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं मानवता के साहित्यकार।

(18) बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’—जन्म – 8 दिसम्बर, 1987 म. प्र. के शाजापुर के भयाना गाँव में।
मृत्यु – 29 अप्रैल, 1960।
रचनाएँ – कुंकुम, रश्मिरेखा, अपलक, क्वासि, विनोवा, स्तवन, प्राणार्पण।
भाव – पक्ष – उदार, फक्कड़, आवेशी तथा मस्त भाव के कवि। सम्पूर्ण क्रान्ति, राष्ट्रीय चेतना, शोषणयुक्त समाज के कवि।

(19) डॉ. गंगा प्रसाद गुप्त ‘बरसैंया’
जन्म – 6 फरवरी, 1937 को उ. प्र. बाँदा के भौंरी ग्राम में।
रचनाएँ – हिन्दी साहित्य में निबंध और निबन्धकार, हिन्दी के प्रमुख एकांकी और एकांकीकार, छत्तीसगढ़ का साहित्य और साहित्यकार, आधुनिक काव्य, संदर्भ और प्रकृति, रस विलास, वीर विलास, सुदामा चरित, चिन्तन – अनुचिन्तन, बुन्देलखण्ड के अज्ञात रचनाकार, अरमान वर पाने का, निंदक नियरे राखिए।
महत्व – समीक्षा, व्यंग्य, काव्य लेखन में पारंगत। लोक बोलियों को महत्व प्रदान किया।

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(20) रामधारी सिंह ‘दिनकर’.
जन्म – 30 सितम्बर, 1908 को बिहार के सेमरिया ग्राम में।
मृत्यु – 24 अप्रैल, 1974 को।
रचनाएँ – कुरुक्षेत्र, उर्वशी, प्राणभंग, रश्मिरथी, वारदोली विजय, द्वन्द्वगीत, रसवंती, रेणुका, हुंकार, दिल्ली, नीलकुसुम, इतिहास के आँसू, नीम के पत्ते, सीपी और शंख, परशुराम की प्रतिज्ञा, सामधेनी, कलिंग विजय, मिट्टी की ओर, संस्कृति के चार अध्याय, पंत प्रसाद, गुप्त हिन्दी साहित्य की भूमिका , अर्द्धनारीश्वर, शुद्ध कविता की खोज में।
भाव – पक्ष – वीर एवं ओज की प्रधानता। राष्ट्रीय चेतना एवं प्रगतिवादी कवि।

MP Board Class 11th General Hindi Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi पद्य खण्ड Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi पद्य खण्ड Important Questions

1. बाल लीला

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

-तुलसीदास

1. कब ससि माँगत आरि करै, कबहूँ प्रतिबिम्ब निहारि डरें। (म. प्र. 2010,11, 15)
कबहूँ करताल बजाइकै नाचत, मातु सबै मन मोद भरैं।
कबहूँ रिसि आई कहैं हठिकै, पुनि लेत सोई जेहि लागि रैं।
अवधेस के बालक चारि सदा, तुलसी-मन-मंदिर में बिहरैं।

शब्दार्थ-आरि = अड़ना, निहारि = देखकर, मोद = प्रसन्नता, रिसिआई = गुस्सा होकर, अरै = अड़ जाना, बिहरै = विचरण करना।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश तुलसीदास के ‘बाललीला’ से उद्धृत किया गया है। प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में राम की बाल-सुलभ चंचलता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान राम बाल-सुलभ चंचलता के कारण कभी चन्द्रमा माँगने की जिद कर लेते हैं। इसके लिए वे अड़ जाते हैं। कभी अपने शरीर का प्रतिबिम्ब अर्थात् परछाईं देखकर भयभीत हो जाते हैं। कभी प्रसन्न होकर तालियाँ बजाकर नाचने लगते हैं। उनकी उपर्युक्त क्रियाओं को माता देख रही हैं एवं प्रसन्न हो रही हैं। भगवान राम कभी रूठ जाते हैं तो कभी जिद करने लगते हैं। वह वस्तु लेकर ही मानते हैं जिसके लिए जिद ठान लेते हैं। राजा दशरथ के चारों पुत्र कवि तुलसीदास के मन-मंदिर में विचरण करते रहते हैं।

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विशेष-अलंकार-रूपक, अनुप्रास, रस-वात्सल्य, भाषा-अवधी, अत्यंत मोहक एवं स्वाभाविक बाल चित्रण हैं।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि तुलसीदास ने किसके बाल रूप का वर्णन किया है (म. प्र. 2011, 13)
(क) राम (ख) कृष्ण (ग) सीता (घ) राधा।
उत्तर-
(क) राम।

प्रश्न 2.
निम्न रचनाओं में से कौन तुलसीदास की नहीं है
(क) रामचरित मानस (ख) विनय पत्रिका (ग) दोहावली (घ) पद्मावत।
उत्तर-
(घ) पद्मावत।

प्रश्न 3.
बालक राम किसको देखकर डर जाते हैं (म. प्र. 2009, 13)
(क) हाथी (ख) भूत (ग) राक्षस (घ) परछाई।
उत्तर-
(घ) परछाई।

प्रश्न 4.
भक्तिकाल में किसकी आराधना की गई? उत्तर-ईश्वर।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित कथन में से सत्य/असत्य छाँटिए (म. प्र. 2011)
(1) सूरदास जी ने राम की सम्पूर्ण लीलाओं का वर्णन किया है।
उत्तर-
असत्य।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कविता के आधार पर बालक राम की सुंदरता का वर्णन कीजिए। (म. प्र. 2011)
उत्तर-
बालक राम की सुंदरता विविध प्रकार से तुलसीदास ने वर्णित की है। राम के सौन्दर्य से लोग ठगे से रह जाते हैं। उनकी आँखों में काजल आपूरित है। चन्द्रमा के समान मुख मण्डल है। विकसित नील-कमल के समान राम प्रतीत हो रहे हैं। पाँवों में नुपूर, हाथों में पहुँची, गले में मणियों की माला, शरीर पर पीला-वस्त्र, धूल-धूसरित शरीर, दाँतों की चमक, बाल-सुलभ चंचलता से पूर्ण श्री राम अत्यंत शोभित हो रहे हैं। तुलसीदास स्वयं राम के इस सौन्दर्य पर स्वयं को न्यौछावर करने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। राम के सौन्दर्य के सम्मुख कामदेव का सौन्दर्य भी फीका है।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार जीवन का सर्वोत्तम फल क्या है? (म. प्र. 2009)
उत्तर-
कवि तुलसीदास बाल-रूप राम के सौन्दर्य पर आसक्त हो जाते हैं। राम के चरणों में नपर और हाथ में पहनी हुई पहुँची, गले में मणियों की माला, श्यामल शरीर पर पीला वस्त्र अत्यंत शोभित हो रहा है। ऐसे सुन्दर बालक को गोद में लेकर राजा दशरथ दुलार रहे हैं एवं प्रसन्न हो रहे हैं। कमल के समान मुखमण्डल, रसपान किए हुए भँवरे के समान नेत्र अत्यंत शोभायमान हो रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि भगवान राम का यह बाल रूप मेरे मन में रम गया है। राम के बाल रूप के दर्शन से जिस फल की प्राप्ति होगी वैसी प्राप्ति का आनंद धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष में भी नहीं है। सांसारिक मनुष्य इन्हीं चार फलों की प्राप्ति के लिए अपना सारा जीवन खपा देता है।

प्रश्न 3.
पाठ में आई तीन उपमाओं को उनके भाव सहित लिखिए। उत्तर-प्रस्तुत पाठ में निम्नांकित तीन उपमाएँ प्रयुक्त हुई हैं
(i) “नवनील सरोरुह से बिकसे” अर्थात् राम शैशवावस्था में ऐसे प्रतीत हो रहे हैं मानो कि नील कमल अभी-अभी विकसित हुआ हो।
(ii) “अरबिंदु सो आनन” अर्थात् राम का मुख-मण्डल कमल के समान प्रतीत हो रहा है।
(iii) “तन की दुति स्याम सरोरुह” अर्थात् राम के शरीर की कांति या आभा नील-कमल के समान है।

प्रश्न 4.
वात्सल्य सम्राट ……………….. को माना जाता है। (तुलसीदास/सूरदास) (म. प्र. 2015)
उत्तर-
सूरदास।

2. ग्राम श्री

-सुमित्रानंदन पंत

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए-

1. फैली खेतों में दूर तलक, (Imp.)
मखमल-सी कोमल हरियाली।
लिपटी जिससे रवि की किरणें,
चाँदी की-सी उजली जाली॥

शब्दार्थ-तलक = तक, रवि = सूर्य। संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘ग्राम श्री’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में पंतजी ने ग्राम-सौन्दर्य का चित्रण किया है।

व्याख्या-पंतजी कहते हैं कि ग्राम सौन्दर्य के भण्डार होते हैं। जहाँ तक दृष्टि जाती है सर्वत्र हरियाली ही-हरियाली खेतों में पसरी दिखाई देती है। हरी-भरी घास मखमल-सी सुकोमल हैं। सूर्य की प्रातः कालीन चमकीली किरणें घासों से लिपटकर चाँदी के तारों का घासों से उलझे रहने का भ्रम पैदा करती हैं।

विशेष-मोहक प्रकृति चित्रण है। अलंकार-उपमा अलंकार। कवि का ग्राम्य-प्रेम झलक रहा है।

2. रोमांचित सी लगती वसुधा, (Imp.)
आई जौ-गेहूँ में बाली।
अरहर सनई की सोने की,
किंकणियाँ हैं शोभाशाली॥

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शब्दार्थ-रोमांचित = पुलकित, वसुधा = धरती, बाली = फलियाँ, सनई = सन की फसल, किंकणियाँ = धनी में लगे छोटे-छोटे घुघरु।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘ग्राम श्री’ से उद्धृत किया गया है। प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में पंतजी ने फसलों से लदी धरती के सौन्दर्य का चित्रण किया है।

व्याख्या-पंतजी कहते हैं कि धरती पुलकित एवं प्रसन्न दिखाई पड़ रही है। धरती की पुलक को जौ एवं गेहूँ के फसलों में निकली बालियाँ स्वर प्रदान कर रही हैं। खेतों में राहर एवं सन की फसलें, धनी में लगे छोटे छोटे घुघरु शोभाशाली एवं सौभाग्यवर्द्धक प्रतीत हो रहे हैं। जौ, गेहूँ, राहर एवं सन की फसलों के कारण धरती की शोभा और बढ़ गई है।

विशेष-अलंकार-उपमा एवं अनुप्रास। ग्राम्य वातावरण का मोहक चित्रण।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
पाठ में आई पंक्तियों के आधार पर सही जोड़ी बनाइए
(क) हरियाली – बालू के साँपों-सी
(ख) रवि की किरणें – मोती के दानों-सी
(ग) आम्र-तरू – मखमल सी
(घ) गंगा की रेती – चाँदी की-सी
(ङ) हिमकन – रजत स्वर्ण मंजरियों से।
उत्तर-
(क) हरियाली – मखमल-सी
(ख) रवि की किरणें – चाँदी की-सी
(ग) आम्र-तरू – रजत स्वर्ण मंजरियों से
(घ) गंगा की रेती – बालू के साँपों सी
(ङ) हिमकन – मोती के दानों-सी।

प्रश्न 2.
निम्नांकित रचनाओं में से कौन-सी रचना पंत जी की नहीं है
(क) लोकायतन (ख) युगांतर (ग) ग्राम्या (घ) कामायनी।
उत्तर-
(घ) कामायनी।।

प्रश्न 3.
कवि ने सोने की किंकणियाँ किसको कहा है
(क) गेहूँ की बाली (ख) धान की फसल (ग) अरहर एवं सन (घ) सरसों के खेतों।
उत्तर-
(ग) अरहर एवं सन।।

प्रश्न 4.
‘ग्राम श्री कविता के रचयिता हैं (म. प्र. 2010, 12)
(क) तुलसीदास (ख) श्रीकृष्ण सरल (ग) सुमित्रानंदन पंत (घ) भवानी प्रसाद मिश्र।।
उत्तर-
(ग) सुमित्रानंदन पंत को।

प्रश्न 5.
खेतों पर पड़ती सूर्य की किरणें……….. की उजली जाली-सी प्रतीत हो रही हैं। (सोने/चाँदी) (म. प्र. 2010)
उत्तर-
चाँदी।

प्रश्न 6.
‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ इन्हें कहा जाता है (म. प्र. 2011)
(क) श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला को। (ख) सूरदास को। (ग) सुमित्रानंदन पंत को। (घ) कबीर को।
उत्तर-
(ग)सुमित्रानंदन पंत को।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कविता में वर्णित खेतों के सौन्दर्य का वर्णन कीजिए। (म. प्र. 2012)
उत्तर-
सुमित्रानंदन पंत जी ने खेतों में फैली हरियाली का वर्णन अत्यंत सुकुमारता के साथ किया है। हरितिमा के साथ सूर्य की स्वर्णिम किरणें लिपटकर अद्भुत वातावरण निर्मित करती हैं। चाँदी की उजली जाली तनी हुई प्रतीत होती है। वसुधा के हरे-हरे शरीर में वायु प्रवाहित होने से स्पन्दन हो रहा है। ऐसा लगता है मानो हरित रक्त हरे शरीर में प्रवाहित हो रहा है। धरती पुलकित दिखाई दे रही है। खेतों में जौ एवं गेहूँ की फसलें लहलहा रही हैं। सन एवं अरहर के खेतों में धनी में लगे छोटे-छोटे घुघरू सौभाग्यशाली प्रतीत हो रहे हैं। सरसों के खेतों में पीले-फूल आ गए हैं। अलसी में नीले फूल आ गए हैं। सरसों एवं अलसी की तेल युक्त गंध वातावरण में फैली हुई है। सम्पूर्ण प्रकृति अत्यंत मोहक दिखाई दे रही है।

प्रश्न 2.
भू पर आकाश उतरने का अनुभव कब होता है? (म. प्र. 2010,11)
उत्तर-
सुमित्रानंदन पंत लिखते हैं कि एक स्थिति ऐसी भी आती है जब मनुष्य को दूसरा मनुष्य दिखाई नहीं देता। कुँहासा अपने आगोश में सारी सृष्टि को लेता है। कुँहासे में प्रकृति की सारी सुन्दरता भी खो जाती है। कुँहासों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानों कि आकाश ने धरती का स्पर्श कर लिया हो। आकाश एवं धरती का यह मिलन भी अत्यंत मोहक होता है। प्रकृति में शामिल सारे उपादान किसानों के खेत, वाटिकाएँ एवं बाग, मनुष्यों के घर एवं सुन्दर जंगलों को कुहरा अपने आगोश में ले लेता है।

प्रश्न 3.
कवि ने ग्राम की तुलना मरकत डिब्बे से क्यों की है? (म. प्र. 2009, 13, 15)
उत्तर-
मरकत का तात्पर्य नीलमणि से है। साफ-स्वच्छ वातावरण में नीला-आकाश का वितान ग्राम को ढंका रहता है। आकाश में टिमटिमाते नक्षत्र नीलमणियों के समान प्रतीत होते हैं। स्वच्छ नीला आकाश में टिमटिमाते तारों की उपमा के लिए कवि के पास शब्द नहीं होते। कवि को ग्राम बर्फ की ठंडक में लिपटा हुआ, चिकना, अत्यंत शांत प्रतीत होता है। अद्वितीय प्राकृतिक सौन्दर्य से सम्पूर्ण ग्राम शोभा को प्राप्त हो रहा है। सर्वत्र खुशियाली का मोहक वातावरण है। ग्राम के सभी लोग प्रमुदित हैं।

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3. अपना देश सँवारे हम

-श्रीकृष्ण सरल

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए-

1. हम प्रतिरूप नए युग के हैं, (Imp.)
सूरज नूतन क्षमता के,
नए क्षितिज के अन्वेषी हम,
पोषक हम जन-समता के।
अपना, सबका, मानवता का मिल-जुल पंथ बुहारें हम।
अपना देश सँवारे हम।

शब्दार्थ-प्रतिरूप = समान रूप, नूतन = नया, क्षितिज = धरती एवं आकाश का काल्पनिक मिलन स्थल, अन्वेषी = खोजने वाला, पोषक = पालने वाला, समता = बराबरी, बुहारें = झाड़ना।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश श्री कृष्ण सरल की कविता ‘अपना देश सँवारे हम’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-प्रस्तुत कविता में कवि ने कहा है कि नौजवान जन-समता को पोषित करते हुए मानवता का मार्ग बाधारहित बनाते हुए अपने देश को समृद्ध कर सकते हैं।

व्याख्या देश के नौजवानों को लक्ष्य करके श्री कृष्ण सरल लिखते हैं कि नए युग की प्रतिच्छाया नौजवान हैं। नए युग के समान-रूपी नवयुवक हैं। इन नौजवानों में अनेक सम्भावनाएँ हैं। सूरज के समान आभा एवं क्षमता इन नवयुवकों में निहित हैं। नवयुवकों के मन में नई-नई परिकल्पनाएँ हैं। वे चाहें तो क्षितिज तक पहुँचने की सामर्थ्य इनमें है। समाज में समानता की स्थापना एवं वर्गभेद मिटाने में नवयुवकों का अभूतपूर्व योगदान हो सकता है। कवि नवयुवकों का आह्वान करते हुए कहता है कि अपना, समाज का, मानवता के पथ पर पड़ी धूल को झाड़ने की आवश्यकता है। देश तभी सँवरा हआ, सुसज्जित लगेगा।

विशेष-ओज की प्रधानता। राष्ट्रप्रेम की भावना बलवती है। नवयुवकों से नए समाज की स्थापना का आह्वान है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
श्री कृष्ण सरल का जन्म कहाँ हुआ था (म. प्र. 2013)
(क) उज्जैन (ख) अशोक नगर (ग) मक्सी (घ) भोपाल।
उत्तर-
(ख) अशोक नगर।

प्रश्न 2.
श्री कृष्ण सरल की एक रचना का नाम लिखिए।
उत्तर-
मुक्तिगान।

प्रश्न 3.
‘अपना देश सँवारे हम’ में सूरज प्रतीक है (म. प्र. 2009)
(क) नई आशा (ख) नया सृजन (ग) नया क्षितिज (घ) नई क्षमता।
उत्तर-
(घ) नई क्षमता।

प्रश्न 4.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए
1. अपना ………….. सँवारे हम।
2. कर्म बने ………… शत्रु की।
3. प्रतिकूल हवाओं से हमें ………… की रक्षा करनी है। (म. प्र. 2010)
उत्तर-
1. देश, 2. तलवार, 3. देश।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सृजन के संवाहक से क्या तात्पर्य है? (म. प्र. 2009, 11, 13, 15)
उत्तर-
कवि श्री कृष्ण सरल ने देश के नौजवानों को सृजन का संवाहक कहा है। देश के नौजवानों के हाथों से देश का नव-निर्माण होना है। देश के रूप को सँवारने एवं निखारने का दायित्व नौजवानों का है। देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाने की गुरुत्तर दायित्व नौजवानों का है। देश की रक्षा का भार एवं प्रत्येक चुनौती का प्रति उत्तर उन्हें ही देना है। समाज में समता एवं मानवता की स्थापना भी नौजवानों के माध्यम से सम्भव है। अत: कवि ने नौजवानों को सृजन का संवाहक कहा है।

प्रश्न 2.
चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए हमारी तैयारी कैसी हो?। (म. प्र. 2012)
उत्तर-
कवि श्री कृष्ण सरल ने देश के समक्ष उपस्थित प्रत्येक चुनौती का डटकर मुकाबला करने का आह्वान किया है। हम ही देश के कर्णधार हैं। देश के पहरुए हम ही हैं। युद्ध-क्षेत्र के सन्नद्ध सिपाही हम ही हैं। अत: कवि आह्वान करता है कि-

“नए सृजन के संवाहक हम
प्रगति-पंथ के राही हैं,
हम प्रतिबद्ध पहरुए युग के
हम सन्नद्ध सिपाही हैं।
जो भी मिले चुनौती उत्तर दें उसको स्वीकारें हम !
अपना देश सँवारे हम।

प्रश्न 3.
कर्म को कवि ने किन रूपों में व्यक्त किया है?
उत्तर-
कवि श्री कृष्ण सरल ने कर्म को निम्न रूपों में व्यक्त किया है-

कर्म हमारे बनें कुदाली
कर्म हलों के फाल बने,
कर्म बनें तलवार शत्रु की
कर्म देश की ढाल बनें।

अर्थात् श्रमिक की चलती हुई कुदाली कर्म का पर्याय है। खेत जोतता किसान भी श्रम एवं कर्म का पर्याय है। युद्ध क्षेत्र में योद्धा के तलवारों की टकराहट महान कर्म है। प्रत्येक वह कर्म जिससे देश की रक्षा एवं देश का कल्याण हो महान कर्म कहा जाएगा।

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प्रश्न 4.
कविता में निहित संदेश को स्पष्ट कीजिए। (म. प्र. 2010)
उत्तर-
कवि श्री कृष्ण सरल ने अपना देश सँवारे हम’ कविता के माध्यम से नौजवानों में ओज एवं वीरता का संचार करना चाहते हैं। कवि ने संदेश देना चाहा है कि नौजवान ही सृजन एवं प्रगति के संवाहक हैं। आज नवयुवकों को कर्म-पथ पर सतत चलने का व्रत लेकर चुनौतियों का सामना करने की आवश्यकता है। नौजवान जन-समता एवं मानवता को पोषित करते हुए अपने देश को समृद्ध कर सकते हैं। कवि ने नवयुवकों से देश की रक्षा का गुरुत्तर दायित्व उठाने का संदेश भी दिया है।

प्रश्न 5.
“नए भागीरथ बन वैचारिक गंगा नई उतारे हम” के भाव को स्पष्ट कीजिए। (म. प्र. 2015)
उत्तर-
“नए भागीरथ बन वैचारिक गंगा नई उतारे हम” का भाव नए युग की माँग के अनुसार देश समाज का कायाकल्प करना है। कवि का यह कहना है कि हमें देश और समाज के नव निर्माण के लिए नए भाव, विचार और नए प्रयास करने चाहिए। इसे सभी देशवासियों को अपना पुनीत कर्तव्य समझकर करना चाहिए।

4. नई इबारत

– भवानीप्रसाद मिश्र

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. जैसा उठा वैसा गिरा जाकर बिछौने पर,
तिफल जैसा प्यार यह जीवन खिलौने पर,
बिना समझे बिना बूझे खेलते जाना,
एक जिद को जकड़ लेकर ठेलते जाना,
गलत है बेसूद है कुछ रचके सो, कुछ गढ़के सो,
तू जिस जगह जागा सबेरे उस जगह से बढ़के सो।

शब्दार्थ-तिफल = बच्चा, बेसूद = निरर्थक/व्यर्थ। संदर्भ प्रस्तुत पद्यांश भवानीप्रसाद मिश्र की कविता ‘नई इबारत’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने प्रस्तुत पंक्तियों में निरन्तर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या-कवि भवानीप्रसाद मिश्र कहते हैं कि जिस स्थिति में हम सुबह जागते हैं, उसी स्थिति में यदि रात्रि को सो जाते हैं, तो हमारा जीवन अर्थपूर्ण नहीं हो पाता है। जिन्दगी ज्यों का त्यों बिस्तर पर सोने का नाम नहीं है। जिस प्रकार बच्चा अपने खिलौने पर मोहित रहता है, उसी प्रकार हमें जीवन रूपी खिलौने पर अत्यधिक मोहित होने की आवश्यकता नहीं है। जीवन समझदारी का नाम है। जीवन का प्रत्येक पग समझदारी से उठना चाहिए। जीवन के किसी भी क्रिया-व्यापार में समझदारी आवश्यक है। जिंदगी में अनावश्यक हठ को छोड़ देना समझदारी है। जिद से ही मनुष्य में मूढ़ता का विकास होता है। जिद एकदम गलत एवं व्यर्थ की भावना है। जिंदगी में रचनात्मक बनो एवं सर्जनात्मक कार्यों से जग में नाम कमाओ। जिंदगी बढ़ते रहने के लिए है। जिस जगह आज सुबह जागे थे, उसके आगे सोने के लिए जिंदगी नहीं है। बढ़ना एवं प्रगति करना जिंदगी है। \

विशेष-अलंकार-उपमा, रूपक एवं अनुप्रास। ओजमय संदेश निहित है। कवि की प्रगतिशील भावना प्रकट हुई है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नई इबारत’ किसकी कविता है? (म. प्र. 2012, 13)
उत्तर-
भवानी प्रसाद मिश्र।।

प्रश्न 2.
निम्नांकित कथन सत्य हैं अथवा असत्य
1. कवि ने ‘नई इबारत’ में सोने के पहले कुछ रचने गढ़ने की प्रेरणा दी है।
2. खेल बिना समझे-बूझे भी खेला जा सकता है।
3. ‘नई इबारत’ कविता में खेतों को कवि ने धान से युक्त बताया है।
उत्तर-
1. सत्य,
2. असत्य,
3. सत्य।

प्रश्न 3.
‘गीत फरोश’ किसकी रचना है?
उत्तर-
भवानी प्रसाद मिश्र।

प्रश्न 4.
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व को क्या कहते हैं?
उत्तर-
अलंकार।

प्रश्न 5.
कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने सोने से पहले कौन-सा काम करने को प्रेरित किया है? (म. प्र. 2010)
उत्तर-
कवि ने सोने से पहले ‘कुछ लिख के और कुछ पढ़के ये दो काम के लिए प्रेरित किया है।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है? (म. प्र. 2010, 11, 13, 15)
उत्तर-
कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने ‘नई इबारत’ कविता में जीवन में उत्साह का संचार करते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी है। उनके अनुसार जिस स्थिति में हम सुबह जागते हैं, उसी स्थिति में यदि रात्रि को सो जाते हैं, तो हमारा जीवन अर्थपूर्ण नहीं हो पाता है। निरर्थक जिद किए बगैर कुछ रचके, कुछ गढ़के ही जीवन को सृजनात्मक बनाया जा सकता है। प्रकृति का संपूर्ण कार्य-व्यापार जीवन के नए पृष्ठ खोलने वाला है। प्रकृति की इस कर्मशीलता से प्रेरणा लेकर जीवन में कठिनाइयों का सामना किया जाना ही उपयुक्त है। इस तरह के दृढ़ निश्चय से ही जीवन के महत्व को प्रतिपादित किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
कविता में प्रकृति के माध्यम से कवि ने कुछ संदेश व्यक्त किए हैं, उनमें से किन्हीं दो को स्पष्ट कीजिए। (म. प्र. 2009)
उत्तर-
कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने ‘नई इबारत’ कविता में प्रकृति के माध्यम से जीवन में आगे बढ़ते रहने का संदेश प्रेषित करना चाहा है। सूर्य जैसी प्रखरता एवं निश्चितता के आगे व्यक्ति को निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए। सूर्य का जागना एवं सोना निश्चित समय से बद्ध है। उसमें एक अद्भुत कांति, शोभा, आभा एवं प्रखरता सन्निहित है। संसार का कल्याण करने के उपरांत, समस्त मानव सृष्टि की सेवा करने के उपरांत ही वह विश्राम करने जाता है। अतः मनुष्य को सूर्य से प्रेरणा लेनी चाहिए। इसी प्रकार वायु सुख-सुकून का संचार सृष्टि में करती है। वायु ही बादलों को इधर से उधर उड़ाकर ले जाती है ताकि सर्वत्र बरसात हो सके। नदियों में जल आपूरित तभी हो पाता है, जब वायु अपना कर्म करती है। वायु प्रवाहित होकर संसार के प्रत्येक प्राणी को सुख प्रदान करती है। मनुष्य को भी समष्टिगत भावना के साथ सूर्य एवं वायु के समान निरन्तर कर्मशील रहना चाहिए।

प्रश्न 3.
निष्क्रियता के संबंध में कवि ने कैसे संकेत किया है?
उत्तर-
‘नई इबारत’ कविता की निष्क्रियता के संबंध में कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं

“जैसे उठा वैसा गिरा जाकर बिछौने पर,
तिफ्ल जैसा प्यार यह जीवन खिलौने पर,
बिना समझे बिना बूझे खेलते जाना
एक जिद को जकड़ कर ठेलते जाना,
गलत है बेसूद है कुछ रचके सो कुछ गढ़के सो,
तू जिस तरह जागा सबेरे उस जगह से बढ़के सो।”

अर्थात् मनुष्य जागने एवं सोने के बीच कम से कम कार्यशील रहे। जीवन से अधिक मोह न पाले। समझ बूझ कर, जिद को छोड़कर कर्मशील रहे। अकर्मण्यता का जीवन में कोई स्थान नहीं है। व्यक्ति को सर्जनात्मक एवं रचनात्मक होना चाहिए। प्रगतिशीलता जीवन में हमेशा दिखाई देना चाहिए। पिछली नींद से जागने एवं अगली नींद लेने के बीच में बढ़त होनी चाहिए।

5. बिहारी के दोहे
प्रकृति

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “कहलाने एकत बसत, अहि, मयूर, मृग, बाघ।
जगत तपोवन सो कियो, दीरघ, दाघ, निदाघ॥” (म. प्र. 2012, 13)

शब्दार्थ-बसत = रहना, अहि = सर्प, मयूर = मोर, निदाघ = गरमी।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश कवि बिहारी द्वारा रचित है। ‘बिहारी के दोहे’ के उपभाग ‘प्रकृति’ से इसे उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में प्रकृति के प्रभाव को चित्रित किया गया है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं कि एक ही वन में नदी के किनारे मोर और सर्प तथा हिरण और शेर बसेरा लिए हुआ है। नदी के किनारे के इस परिदृश्य को देखकर किसी को भी भ्रम हो सकता है कि यह कहीं तपोवन तो नहीं है? जहाँ विरोधी प्रकृति के जीव एक साथ बसेरा लिए हुए हैं। वस्तुत: भीषण गर्मी के कारण नदी के किनारे ये समस्त जीव बसेरा लिए हुए हैं। प्रकृति की उग्रता के कारण इन जीवों ने अपना परम्परागत विरोध भी भुला दिया है।

विशेष-
1. ग्रीष्म की प्रखरता का प्रभावी चित्रण है।
2. बिहारी की बहुज्ञता दृष्टव्य है।
3. एकावली अलंकार है।

नीति

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए
1. स्वारथ, सुकृत, न श्रम वृथा, देखि विहंग विचारि।
बाज पराए पानि परि तूं पच्छीनु न मारि॥

शब्दार्थ-स्वारथ = स्वार्थ, सुकृत = अच्छा कार्य, वृथा = व्यर्थ, विहंग = पक्षी, पानि = हाथ, पच्छीनु = पक्षियों। . संदर्भप्रस्तुत पद्यांश कवि बिहारी द्वारा रचित है। ‘बिहारी के दोहे’ के उपभाग ‘नीति’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-इस दोहे में सजातीय बंधुओं पर अन्यथा प्रेरणा से प्रहार करने से मना किया गया है।

व्याख्या-कवि बिहारी शिवाजी को लक्ष्य करके लिखते हैं कि छोटे-छोटे देशी हिन्दू राजा मुगल अत्याचार के कारण उनका कहना मानकर उनके लिए युद्ध कर रहे हैं, जबकि वे राजा तुम्हारे ही जाति के हैं। उनका वर्तमान आचरण उनकी मजबूरी है। वीर शिवाजी के द्वारा यदि उनका वध किया जाता है तो इससे शिवाजी का न तो कोई स्वार्थ सिद्ध होगा, न ही यह अच्छा कार्य कहा जाएगा। देशी हिन्दू शासकों को मारने से श्रम ही व्यर्थ होगा। अतः हे शिवाजी दूसरों के कहने में न आकर स्वविवेक से काम लें। पक्षियों रूपी छोटे राजाओं के लिए तुम्हें बाज नहीं बनना चाहिए।

विशेष-रस-वीर। अलंकार-अन्योक्ति एवं रूपक। जातीय गौरव जगाने का उपक्रम है।

2. सोहत ओढ़े पीतु पट, स्याम सलोने गात। (म. प्र. 2015)
मनौं नील मनि-सैल पर, आतपु परपौ प्रभात॥

शब्दार्थ-सोहत = शोभायमान, ओढै = धारण करने पर, पीतु = पीला, पट्ट = वस्त्र, मनौं = मानो, आतपु = धूप, परयो = पड़ा।

प्रसंग-यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक सामान्य हिन्दी भाग 1 में संकलित तथा कविवर बिहारी द्वारा विरचित ‘सतसई के भक्ति शीर्षक से उद्धत है इसमें कवि ने श्रीकृष्ण के शारीरिक सौन्दर्य का चित्रण करते हुए कहा है।

व्याख्या-श्रीकृष्ण साँवले हैं। उन्होंने पीताम्बर धारण किया है। उनको इस तरह देखकर ऐसा लगता है, मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह-सुबह सूर्य की किरणें पड़ रही हैं। दूसरे शब्दों में पीताम्बर धारण किए हुए साँवले श्रीकृष्ण सुबह की पड़ती हुई सूर्य की किरणों से सुशोभित नीलमणि पर्वत के समान बहुत ही सुन्दर लग रहे हैं।

विशेष-
(i) चित्रात्मक शैली है।
(ii) ब्रजभाषा की शब्दावली है।
(iii) श्रीकृष्ण के अद्भुत सौन्दर्य का चित्रण है।
(iv) श्रृंगार रस है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बिहारी सतसई’ में कितने दोहे संगृहीत हैं
(क) 700 (ख) 7000 (ग) 77 (घ) 1277.
उत्तर-
(क) 700.

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प्रश्न 2.
बिहारी किस राजा के राज्याश्रयी कवि थे
(क) बहादुर शाह रंगीले (ख) अकबर (ग) राजा जयसिंह (घ) पृथ्वीराज।
उत्तर-
(ग) राजा जयसिंह।

प्रश्न 3.
इस तिथि को सूर्य और चंद्र एक साथ होते हैं (म. प्र. 2011)
(क) द्वितीया को (ख) पूर्णिमा को (ग) अष्टमी को (घ) अमावस्या को।।
उत्तर-
(घ) अमावस्या को।

प्रश्न 4.
‘गागर में सागर’ किस कवि की रचनाओं में है?
उत्तर-
बिहारी।

प्रश्न 5.
कविता में प्रत्ययांत का क्या अर्थ होता है?
उत्तर-
प्रत्यय से होने वाले अंत को प्रत्ययांत कहते हैं।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाज के माध्यम से कवि ने किसके आचरण को लक्षित किया है और क्यों?
उत्तर-
कवि बिहारी ने बाज के माध्यम से वीर शिवाजी के आचरण को लक्षित किया है। वीर शिवाजी ऐसे देशी हिन्दू शासकों का लगातार वध करते चले जा रहे थे जो मजबूरी या कमजोरीवश मुगलों की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। कवि ने अपने दोहे के माध्यम से सचेत करते हुए कहा कि- “बाज पराए पानि परि, तू पच्छीनु न मारि!”

प्रश्न 2.
सज्जन के प्रेम की क्या विशेषताएँ हैं? (Imp.)
उत्तर-
कवि बिहारी ने लिखा है
चटक न छाँड़तु घटत हूँ, सज्जन-नेहुँ गंभीरू।
फीकौ परै न, बरू फटै, रंग्यौ चोल-रंग चीरू।

अर्थात् सज्जन पुरुषों का प्रेम उपर्युक्त विशेषताओं से युक्त होता है। सज्जन व्यक्ति के प्रेम का चटकीलापन कभी समाप्त नहीं होता। ऐसे व्यक्तियों का प्रेम मंजीठे पर रंगा हुआ वह कपड़ा है, जो फट भले ही जाए किन्तु रंग न उतरे।

प्रश्न 3.
मित्रता सदैव चलती रहे, इस हेतु क्या सावधानी बरतनी चाहिए? (म. प्र. 2010)
उत्तर–
कवि बिहारी के अनुसार सच्ची मित्रता वह है जिसकी गर्मी एवं चटकीलापन कभी समाप्त नहीं होता। मित्र परस्पर एक-दूसरे के प्रति हृदय में दुरभाव नहीं आने देते। उनके चित्त संकुचित एवं मैले नहीं होते। मित्रता से आपूरित चिकने एवं पवित्र हृदय पर धूल का कण भी नहीं ठहर सकता।

प्रश्न 4.
श्री कृष्ण की बंशी इन्द्रधनुष के समान क्यों लगती है? (म. प्र. 2013)
उत्तर-
श्री कृष्ण के गुलाबी होठ, नेत्रों का काला एवं सफेद रंग, पहने हुए वस्त्रों का पीला रंग एवं हरे बाँस से बनाई हुई बाँसुरी का हरा रंग मिलकर इन्द्रधनुषी वातावरण निर्मित कर रहे हैं। वर्ण-संयोजन को कवि बिहारी ने इन शब्दों में व्यक्त किया है

“अधर धरत हरि कै परत, ओठ, दीठि-पट-जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्र धनुष-रंग होति॥

6. उलाहना

– माखनलाल चतुर्वेदी

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. बड़े रस्ते, बड़े पुल, बाँध, क्या कहने।
बड़े ही कारखाने हैं, इमारत हैं,
जरा पोछु इन्हें आँसू उभर आये,
बड़प्पन यह न छोटों की इबादत है।

शब्दार्थ-बड़प्पन = बड़ा होने का भाव, इबादत = पूजा। संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘उलाहना’ से उद्धृत किया गया है। प्रसंग-कवि ने भौतिक तरक्की के साथ-साथ मानवीय संवेदना के विकास को भी आवश्यक माना है।

व्याख्या-कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी कहते हैं कि हमने भौतिक तरक्की खूब कर ली है। देश में अनेक बड़े-बड़े रास्ते, बड़े पुल, बड़े बाँधों का निर्माण हुआ है। अनेक बड़े-बड़े कारखाने एवं भवन निर्मित हुए हैं। श्रमिक एवं सर्वहारा वर्ग के पसीने से यह भौतिक समृद्धि तर है। सर्वहारा वर्ग का विकास योजनाओं में पर्याप्त शोषण किया गया है। अब इनके आँसू पोछने का वक्त आ गया है। अपने बड़प्पन में मगरूर रहना बड़प्पन नहीं है, बल्कि श्रम-साधकों की संवेदना में भागीदार बनना बड़प्पन है। समाज के निम्नतर लोगों की संवेदना के साथ तादात्म्य ही सच्चा विकास है।

विशेष-सर्वहारा वर्ग के प्रति कवि की सहानुभूति व्यक्त हुई है। मार्क्सवादी चेतना का प्रकटीकरण है।

2. उठो, कारा बनाओ इस गरीबी की, (म. प्र. 2011)
रहो मत दूर अपनों के निकट आओ,
बड़े गहरे लगे हैं, घाव सदियों के,
मसीहा इनको ममता भर के सहलाओ।

शब्दार्थ-कारा = जेल, मसीहा = अवतारी पुरुष, ममता = ममत्वपूर्ण प्रेम। संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘उलाहना’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-कवि माखनलाल चतुर्वेदी सर्वहारा वर्ग के करीब आने का आह्वान कर रहे हैं।

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व्याख्या-कवि माखन लाल चतुर्वेदी कहते हैं कि इस देश की गरीबी को कारावास में बंद करना होगा, तभी देश से गरीबी दूर होगी। गरीब लोग भी मनुष्य हैं उनके निकट जाकर उनके प्रति सहानुभूति, प्रेम एवं सहयोग की भावना प्रकट करने की आवश्यकता है। लम्बे समय से समाज का यह वर्ग शोषण का शिकार रहा है। शोषण के कारण इस वर्ग की अन्तर्रात्मा आहत हो चुकी है। किसी अवतारी पुरुष की भाँति, ममत्वमय स्नेहिल स्पर्श की आवश्यकता इन्हें है।

विशेष-सामाजिक वर्गभेद मिटाने के प्रति प्रतिबद्धता दृष्टिगोचर हो रही है। प्रगतिवादी सोच की मुखर अभिव्यक्ति है।

3. भुला दी सूलियाँ? जैसे सभी कुछ (म. प्र. 2010)
जमाने से तालियों से पा लिया तुमने
न तुम बहले, न युग बहला, भले साथी
बताओ तो किसे बहला लिया तुमने।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक सामान्य हिन्दी भाग -1 से संकलित तथा माखन लाल चतुर्वेदी विरचित ‘उलाहना’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अमीर वर्ग के प्रति जन सामान्य के उलाहना को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। अमीर वर्ग को उलाहना देते हुए जनसामान्य कह रहा है।

व्याख्या-कवि का कहना है—तुमने देश के आन पर मर मिटने वाले अमर देश भक्तों की पवित्र यादों को भुला दिया है। अपने चापलूसों और पिछलग्गुओं द्वारा वाह वाही की तालियों को बजवाकर मानों तुमने सब कुछ पा लिया है। इस प्रकार की सोच रखने वाले क्या तुम यह बतलाओगे कि अगर तुम बहके नहीं हो और न जमाना ही बहका है, तो फिर तुम्हे किसने बहका लिया है।

विशेष-
(1) अमीर वर्ग से खास तौर से देश के गद्दारों का उल्लेख है।
(2) व्यंग्यात्मक शैली है।
(3) तुकांत शब्दावली है।
(4) यह अंश मार्मिक है।
(5) ‘बलिदान का मंदिर’ में रूपक अलंकार है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए
1. तुम्ही जब …………….. टीसें भुलाते हो।
2. बड़े सब …………….. छोटे सलामत हैं।
3. उलाहना में रमलू भगत …………….. का प्रतीक है। (म. प्र. 2009, 12; Imp.)
4. माखनलाल चतुर्वेदी की एक कृति का नाम …………….. है। (म. प्र. 2013)
5. माखनलाल चतुर्वेदी को …………….. के नाम से भी जाना जाता है। (म. प्र. 2011)
6. उलाहना कविता ……………. को लक्ष्य कर लिखी गई है।
7. काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व को ……………. कहते हैं। (अलंकार / रस)
उत्तर-
1. याद, 2. मिट गए , 3. निम्न वर्ग, 4. हिमकिरीटनी, 5. एक भारतीय आत्मा, 6. राजनेताओं 7. अलंकार।

प्रश्न 2.
‘उलाहना’ क्या है? (म. प्र. 2009)
उत्तर-
कविता।

प्रश्न 3.
रमलू भगत किसका प्रतीक है? (म. प्र. 2011)
उत्तर-
सर्वहारा वर्ग का।

प्रश्न 4.
उलाहना’ कविता में कवि ने गरीबी की कारा बनाने की प्रेरणा दी है, निम्न कथन सत्य है या असत्य। (म. प्र. 2010)
उत्तर-
सत्य।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
छोटे अपने किन गुणों के कारण सलामत रह जाते हैं? (म. प्र. 2009, 12, 15)
उत्तर-
कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा है
“सदा सहना, सदा श्रम-साधना मर-मर,
वहीं हैं जो लिए छोटों का मृत-वृत हैं,
तनिक छोटों से घुल-मिलकर रहो जीवन,
बड़े सब मिट गए, छोटे सलामत हैं।”

बड़ों के अत्याचार सहना छोटों की नियति है। निरन्तर श्रम में संलग्न रहना उनका जीवन है। अपने वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति का साथ देने का उनका संकल्प है। बड़ों का अनुशरण करना एवं उनके सम्मान के लिए स्वयं को न्यौछावर कर देना छोटों का स्वभाव है। उपर्युक्त कारणों से छोटे आज भी सलामत हैं।

प्रश्न 2.
कवि अमीरों से उनके जीवन में किस तरह के परिवर्तन की आकांक्षा करता है?
उत्तर-
कवि अमीरों से कहता है कि

“तुम्हारी चरण रेखा देखते हैं वे,
उन्हें भी देखने का तुम समय पाओ,
तुम्हारी आन पर कुर्बान जाते हैं,
अमीरी से जरा नीचे उतर आओ।”

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अमीरी को छोड़कर अपना स्नेहिल हाथ गरीबों के सिर पर फेरना होगा। रमलू भगत की झोपड़ी में जाकर प्रेमभाव से दलिया ग्रहण करना होगा। जब अमीर गरीबों के आँस पोछने के लिए तत्पर रहेगा तभी समाज में परिवर्तन की बयार चलती दिखाई देगी।

प्रश्न 3.
कविता में ‘कुटिया निवासी’ बनने का क्या तात्पर्य है? (Imp.)
उत्तर-
कवि ने ‘उलाहना’ कविता में अमीरों का आह्वान करते हुए कहा है कि

“तुम्हारी बाँह में बल है जमाने का,
तुम्हारे बोल में जादू जगत का है,
कभी कुटिया निवासी बन जरा देखो,
कि दलिया न्यौतता रमलू भगत का है।”

कवि का मानना है कि अमीरों के हाथ में सभी प्रकार की शक्तियाँ केन्द्रित हो गई हैं। अमीरों की एक आवाज पर समाज में उलट-पुलट हो सकता है। गरीब की कुटिया में आकर और वहाँ का रुखा-सूखा भोजन ग्रहण करने से अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल सकेगी एवं समाज से वर्ग भेद मिटाया जा सकेगा।

7. विप्लव गायन

– बालकृष्ण शर्मा नवीन

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. “प्राणों के लाले पड़ जायें, त्राहि-त्राहि रवनभ में छाएँ,
नाश और सत्यानाशों का धुंआधार जग में छा जाए,
बरसे आग, जलद जल जाए, भस्मसात भूधर हो जाएँ,
पाप-पुण्य सद् सद्भावों की, धूल उड़ उठे दाएँ-बाएँ।” (म. प्र. 2009, 13)

शब्दार्थ-रव = ध्वनि, जलद = बादल, भस्मसात = राख में मिल जाना, भूधर = पहाड़। संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविता ‘विप्लव गायन’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-कवि नवीन क्रांति एवं प्रखरता के गीत गाने का आह्वान कर रहे हैं।

व्याख्या-कवि नवीन जी कहते हैं कि कवियों को ऐसे गीत रचने चाहिए, जिसे सुनकर समाज में खलबली मच जाए। लोग मरने-मारने को तत्पर हो जाए। सम्पूर्ण क्रांति की प्रखर ध्वनि से आकाश गूंजने लगे। सर्वत्र विनाश की स्थिति निर्मित हो जाए। विनाश के धुआँधार में कुछ भी दिखाई न दे। आकाश से आग बरसे, बादल और पहाड़ जलकर राख हो जाएँ। पाप-पुण्य जैसे सैकड़ो भावों का अन्तर लोगों को समझ में न आए। ऐसा तभी संभव है जब सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान होगा। विचारकों, समीक्षकों एवं कवियों के माध्यम से ही ऐसी क्रांति आएगी।

विशेष-
1. सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया गया है।
2. वीर रस एवं ओजपूर्ण शैली है।
3. प्रगतिवादी विचारधारा का प्रकटीकरण है।

  • वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
विप्लव गायन कविता के रचयिता हैं (म. प्र. 2009)
(क) श्रीकृष्ण सरल (ख) माखन लाल चतुर्वेदी (ग) बालकृष्ण शर्मा नवीन (घ) भवानी प्रसाद मिश्र।
उत्तर-
(ग) बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’।

प्रश्न 2.
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ विधानसभा के सदस्य थे अथवा संसद सदस्य थे?
उत्तर-
संसद सदस्य।

प्रश्न 3.
कवि की तान से कौन भस्मसात् हो रहे हैं? (म. प्र. 2011)
उत्तर-
कवि की तान से पहाड़ भस्मसात् हो रहे हैं।

प्रश्न 4.
सही जोड़ी बनाइए
1. माता की छाती का अमृतमय – (क) अचल शिला विचलित हो जाए
2. आँखों का पानी सूखे – (ख) गतानुगति विगलित हो जाए
3. एक ओर कायरता काँपे – (ग) वे शोणित के घूटे हो जाए
4. अन्धे मूढ़ विचारों की (म. प्र. 2013) – (घ) पय काल कूट हो जाए
5. ‘विप्लव गायन’ पाठ के कवि (म. प्र. 2015) – (ङ) बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’।
उत्तर-
1. (घ), 2. (ग), 3. (ख), 4. (क), 5. (ङ)।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विप्लव गायन से क्या तात्पर्य है? कवि ने विप्लव के कौन-कौन से लक्षण गिनाए हैं? (म. प्र. 2013)
उत्तर-
रूढ़ एवं जीर्ण-शीर्ण समाज ध्वंस करने के लिए विप्लव गान आवश्यक है। सम्पूर्ण क्रांति, सम्पूर्ण परिवर्तन विप्लव गायन से संभव है। समाज में उथल-पुथल, प्राणों के लाले, त्राहि-त्राहि मचने, नाश एवं सत्यानाश का धुआँधार छाने, आग बरसने, बादल भस्म होने, पाप एवं पुण्य जैसे सत-असत भावों की धूल उड़ने, धरती का वक्ष स्थल फटने, नक्षत्रों के टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर हमें मान लेना चाहिए कि समाज में कवि ने सम्पूर्ण क्रांति, सम्पूर्ण परिवर्तन का विप्लव गान गाकर जागृति ला दी है। समाज को विप्लवगान के बाद बदलने से कोई नहीं रोक सकता।

प्रश्न 2.
कवि किन-किन रूढ़ियों को समाप्त करना चाहता है? (म. प्र. 2010,11,12)
उत्तर-
कवि चाहता है कि माता अपने आँचल में छिपाकर बच्चे को दूध न पिलाए बल्कि उसे विष पीने के लिए भी तत्पर रखे। पुत्र के दुःख में वह आँसू न बहाए बल्कि दुश्मन का सामना करते हुए अपने पुत्र को देखकर आँखों में खून उतर आए। देश को कायर पुत्रों की आवश्यकता नहीं है। रूढ़िवादिता, मूढ़ता जैसे विचार जो बहुत गहरे तक हममें स्थापित हैं, पिघल जाएँ। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में नाश करने वाली गर्जना गूंजने लगे। कवि समाज में वर्षों से स्थापित सारी रूढ़ियों को ‘विप्लव गान’ के माध्यम से समाप्त कर देना चाहता है।

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प्रश्न 3.
नये सृजन के लिए ध्वंस की आवश्यकता क्या है-इस कथन के आधार पर कवि द्वारा वर्णित तथ्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
कवि बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की मान्यता है कि नाश में ही निर्माण के बीज छिपे रहते हैं। कवि विप्लव गान के माध्यम से रूढ़ एवं जीर्ण-शीर्ण समाज का ध्वंस करना चाहता है। कवि के गीतों में युग परिवर्तन की शक्ति समायी होती है। प्रलय की प्रेरणाएँ भी उसके गीतों में निहित होती हैं। एक ओर ध्वंस और दूसरी ओर सृजन की सामर्थ्य को अपनी कविता में केन्द्रीभूत करने वाले कवि ने जागृति का गीत गाया है। रूढ़ियों, अंध विचारों एवं कायरता की समाप्ति के लिए ध्वंस आवश्यक है। नए युग की परिस्थितियों के अनुसार निर्माण की सामर्थ्य एवं प्रेरणा भी इस कविता में निहित है।

प्रश्न 4.
“प्रलयंकारी आँख खुल जाए” से क्या तात्पर्य है? (म. प्र. 2015)
उत्तर-
प्रलयंकारी आँख खुल जाए से तात्पर्य है-सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रलयंकारी क्रांति का आना बेहद जरूरी है। उससे ही आमूलचूल अपेक्षित परिवर्तन सम्भव हैं।

8. भू का त्रास हरो

– रामधारी सिंह ‘दिनकर’

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए

1. रोक-टोक से नहीं सुनेगा, नृप समाज अविचारी है,
ग्रीवाहर निष्ठुर कुठार का, यह मदान्ध अधिकारी है।
इसीलिए तो मैं कहता हूँ, अरे ज्ञानियों खड्ग धरो,
हर न सका जिसको कोई भी, भू का वह तुम त्रास हो।

शब्दार्थ-नृप = राजा, अविचारी = विचारहीन, ग्रीवाहर = गर्दन काटने वाला, कुठार = कुल्हाड़ी, मदान्ध = नशे में अन्धा, खड्ग = तलवार, भू = धरती, त्रास = कष्ट, दु:ख।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘भू का त्रास हरो’ से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-कवि की मान्यता है कि नीति विमुख राजसत्ता को सख्ती से सुधारकर संसार का कष्ट दूर किया जा सकता है।

व्याख्या-कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते हैं कि राज-समाज विचारहीन हैं। रोक-टोक का असर उस पर नहीं होगा। नशे में डूबे इन लोगों पर किसी भी चीज का प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। इनका दण्ड यही है कि कुल्हाड़ी से इनकी गर्दन काट ली जाए। समाज तभी सुख का अनुभव कर सकेगा। जब समाज के चरित्रवान कवि, कलाकारों और ज्ञानियों द्वारा तलवार धारण की जाएगी। इस धरती का दुःख एवं कष्ट तभी दूर हो सकेगा जब कुविचारी एवं मदान्ध राजा मारे जाएँगे। धरती की मुक्ति तभी हो सकेगी।

विशेष-वीर रस की प्रधानता है। सामाजिक अव्यवस्था के प्रति क्षोभ प्रकट हुआ है। ओज गुण प्रधान है।

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘भूका त्रास हरो’ कविता में मदान्ध शासकों को सबक सिखाने के लिए क्या धारण करने को कवि कहता है?
उत्तर-
तलवार।

प्रश्न 2.
‘दिनकर’ का शाब्दिक अर्थ क्या होता है? (म. प्र. 2009)
उत्तर-
सूर्य।

प्रश्न 3.
कवि ‘दिनकर’ राज्यसभा में किस सन् में मनोनीत हुए?
उत्तर-
19521

प्रश्न 4.
‘उर्वशी’ के लिए ‘दिनकर’ को कौन-सा सम्मान मिला था?
उत्तर-
ज्ञानपीठ पुरस्कार।

प्रश्न 5.
भू का त्रास कविता में नृप समाज का उल्लेख किस रूप में हुआ है? (म. प्र. 2009)
उत्तर-
मदांध शासक।

  • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि का भोगी भूप से क्या आशय है? (म. प्र. 2013, 15)
उत्तर-
कवि ‘दिनकर’ ने भोगी भूप ऐसे राजाओं को कहा है जो अविचारी एवं विलासी हैं। ऐसे राजा प्रजाहित में कार्य नहीं करते और तलवार की ताकत से अपनी सत्ता को सुरक्षित रखते हैं। ऐसे राजा न तो नीति निपुण होते हैं, न ही उनमें त्याग व तप की भावना होती है।

प्रश्न 2.
कवि ने अविचारी नृप समाज के साथ कैसा व्यवहार करने के लिए प्रेरित किया है? (म. प्र. 2010, 12)
उत्तर-
कवि ‘दिनकर’ ने लिखा है…

रोक-टोक से नहीं सुनेगा, नृप समाज अविचारी है,
ग्रीवाहर निष्ठुर कुठार का यह मदान्ध अधिकारी है।

अर्थात् अविचारी एवं मदान्ध राजाओं के सिर कुल्हाड़ी से कलम कर देना चाहिए। भोग-विलास में डूबे रहने वाले राजाओं के सिर कलम करने की जिम्मेदारी कवि, ज्ञानी, वैज्ञानिकों, कलाकारों एवं पंडितों पर है।

प्रश्न 3.
आग में पड़ी धरती से कवि का क्या तात्पर्य है? (म. प्र. 2011)
उत्तर-
आग में पड़ी धरती के संबंध में कवि ‘दिनकर’ ने लिखा है

“तब तक पड़ी आग में धरती, इसी तरह अकुलायेगी,
चाहे जो भी करे, दु:खों से छूट नहीं वह पायेगी।
अर्थात् इस समाज में जब तक कवियों, ज्ञानियों,
वैज्ञानिकों, कलाकारों एवं पंडितों का मोल नहीं पहचाना जाएगा,

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जब तक उज्ज्वल चरित्र के अभिमानी लोगों को सम्मान नहीं मिलेगा तब तक धरती आग में जलती हुई व्याकुल रहेगी। भोगी, मदान्ध एवं अविचारी राजाओं के सिर कलम करते ही उनके खून से धरती की आग भी ठंडी होगी।

प्रश्न 4.
कवि दिनकर ज्ञानियों को क्या धारण करने का उपदेश देते हैं?
उत्तर-
कवि दिनकर कहते हैं, “हे ज्ञानियों ! तुम जब तक अपने हाथ में तलवार धारण नहीं करोगे तब तक इस धरती का कष्ट कम नहीं होगा।”

प्रश्न 5.
कवि दिनकर के अनुसार राजाओं से भी अधिक पूज्य कौन है? (म. प्र. 2010)
उत्तर-
कवि के अनुसार राजाओं से भी पूज्य कवि, कलाकार और ज्ञानीजन हैं। अर्थात् राजाओं की पूजा केवल देश में होती है जबकि कवि, कलाकार और ज्ञानीजन को संपूर्ण विश्व में श्रेष्ठ माना जाता है एवं उन्हें सबसे पहले आदर दिया जाता है। इसलिये राजाओं से पूज्य ये सब माने गये हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
दिये गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनकर लिखिए

1. ‘उलाहना’ कविता में रमलू भगत किसका प्रतीक है (म. प्र. 2015)
(क) गरीब का (ख) अमीर का (ग) शोषक का (घ) कृषक का।

2. ‘मिठाई वाला’ पाठ किस विधा में है-
(क) जीवनी (ख) निबंध (ग) कहानी (घ) आत्मकथा।

3. ‘अंतिम संदेश पत्र शहीद रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा किसे लिखा गया था
(क) माँ (ख) पिता (ग) बहिन (घ) मित्र।

4. प्रकृति के सुकुमार कवि हैं
(क) बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (ग) सुमित्रानंदन पंत (घ) श्रीकृष्ण सरल।

5. शब्द के प्रारंभ में जुड़ने वाला शब्दांश क्या कहलाता है
(क) उपसर्ग (ख) प्रत्यय (ग) संधि (घ) समास।
उत्तर-
1. (क), 2. (ग), 3. (क), 4. (ग), 5. (क)।

प्रश्न 2.
सही जोड़ी बनाइये (म. प्र. 2015)
1. रुपया तुम्हें खा गया – (क) भवानी प्रसाद मिश्र
2. गीत फरोस पंचदशी रचनाएँ – (ख) स्वामी विवेकानंद
3. जयपाल था – (ग) भगवती चरण वर्मा
4. ‘शिक्षा’ निबंध के लेखक – (घ) डॉक्टर
5. रात-दिन – (ङ) संधि (च) समास।
उत्तर-
1. (ग), 2. (क), 3. (घ), 4. (ख), 5. (च).

प्रश्न 3.
निम्नलिखित कथनों में से सत्य/असत्य छाँटिए (म. प्र. 2015)
1. रमेश में स्वर संधि है।
2. कवि की तान से भूधर भस्मसात् हो रहे हैं।
3. सर्प, मोर, हिरण और सिंह तपोवन में एक साथ रह सकते हैं।
4. मुहावरा वाक्य है।
5. क्या राम पढ़ता है? वाक्य विधिवाचक है।
उत्तर-
1. सत्य, 2. सत्य, 3. सत्य, 4. असत्य, 5. असत्य।

प्रश्न 4.
एक शब्द अथवा वाक्य में उत्तर लिखिए
1. प्रतिदिन शब्द में कौन-सा समाज है?
2. जिसका शत्रु न हो।
3. जगदीश शब्द में कौन-सी संधि है?
4. दिनकर जी का पूरा नाम क्या है?
उत्तर-
1. अव्ययी भाव समास,
2. अजातशत्रु,
3. व्यंजन संधि,
4. रामधारी सिंह ‘दिनकर’।

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प्रश्न 5.
‘कब तक योगी भूप प्रजाओं के नेता कहलाएँगे’ का भाव पल्लवन कीजिए। (म. प्र. 2015)
उत्तर-
‘कब तक भोगी भूप प्रजाओं के नेता कहलाएँगे’ का भाव यह है कि जब तक अविचारी और विलासी शासक प्रजाहित में कार्य नहीं करेगा, तब तक कवियों, कलाकारों और ज्ञानियों को मान-सम्मान प्राप्त नहीं होगा। चारों ओर अत्याचार और दुःखद वातावरण बना रहेगा। उससे जीवन खतरे में पड़ जायेगा।

MP Board Class 11th General Hindi Important Questions

MP Board Class 11th Special Hindi प्रायोजना कार्य

MP Board Class 11th Special Hindi प्रायोजना कार्य

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अभाव में नवीन चिन्तन, नवीन विचार, नवीन धारणाएँ आकार नहीं ले पाती, न कोई सृजन हो पाता है। छात्र इस स्तर तक आते-आते क्रमशः अपनी भाषा के विकास के क्रम में इतना सक्षम हो जाता है कि वह अपने सबसे प्रभावशाली साधन बोली का उपयोग करे। अपने अनुभव एवं अपने विचार व्यक्त करे। क्षेत्रीय बोली की कहावतें, चुटकुलों और लोकगीतों का संग्रह कर उनका परिचय प्राप्त करे। अपने क्षेत्र की पत्र-पत्रिकाओं का पाठ्य-पुस्तकों के अलावा अध्ययन करे।

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1. भाषा के विविध क्षेत्रों का परिचय भाषा के चार मुख्य क्षेत्र हैं-

  • सुनना-श्रवण,
  • बोलना-भाषण,
  • पढ़ना-पठन,
  • लिखना-लेखन।

इस विषय का समावेश पाठ्यक्रम में इसलिए किया गया है कि बालक कक्षा 11वीं के स्तर तक भाषा के इन चारों स्तरों से भली-भाँति परिचित हो जाता है। अब उन्हें शिक्षकों द्वारा अपनी इन भाषायी योग्यता के विस्तार की प्रेरणा देना है। वह अपनी इस योग्यता से पाठ्य-पुस्तक के अतिरिक्त भी कुछ पढ़े-लिखे और इस क्रिया में रुचि उत्पन्न करने के लिए शिक्षक छात्रों को यह गृह कार्य दें कि वे अपने-अपने क्षेत्र की बोली की कहावतें, चुटकुले और लोकगीतों का संग्रह करें। इसके अतिरिक्त छात्रों को कक्षा में तथा गृह कार्य के रूप में यह लेखन कार्य दिया जाये कि वे अपने क्षेत्र की पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ें और उसमें उन्हें जो भी विवरण रोचक लगे उसे अपने शब्दों में लिखें। इससे उनका पठन-कौशल और लेखन-कौशल विकसित होगा।

छात्र के श्रवण कौशल को विकसित करने के लिए वह दूरदर्शन के रोचक कार्यक्रमों को सुने और उसे जो भी कार्यक्रम रुचिकर लगे उसे लिखे।

इस प्रकार छात्रों को पाठ्य-पुस्तक के अतिरिक्त अपनी भाषायी योग्यता विस्तार का अवसर प्राप्त होगा।

मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा वह राज्य है जिसकी सीमाओं को सात प्रदेश घेरे हैं। अतः मध्य प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्रीय भाषा या बोलियाँ अस्तित्व में हैं।

शिक्षक अपने-अपने क्षेत्र की भाषा के लोकगीतों एवं कहावतों का संग्रह छात्रों से करवायें। हमारे प्रदेश में मुख्य रूप से मालवी, निमाड़ी, बुन्देलखण्डी, बघेलखण्डी, छत्तीसगढ़ी, मराठी, गुजराती, मारवाड़ी बोली जाती हैं, अतएव इनके चुटकुले, गीत, कविता, कहावतें एकत्रित करें। उदाहरण के तौर पर मालवा, निमाड़ क्षेत्र का मुख्य समाचार-पत्र है ‘नई दुनियाँ’, जो इन्दौर से प्रकाशित होता है। उसमें प्रत्येक बुधवार को इस तरह की रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। इस क्षेत्र के छात्र उनका संग्रह कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में चालीस से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अलग-अलग बोलियाँ हैं। झाबुआ के निवासी भील हैं और इनकी भीली बोली में मुहावरों का अत्यधिक प्रचलन है। हम यहाँ कुछ भीली मुहावरे और उनका हिन्दी अर्थ दे रहे हैं। छात्र अपने अध्यापकों की सहायता से अपने आस-पास बसने वाले आदिवासियों की लोक कथाएँ, कविता, मुहावरे, कहावतें संकलित कर उनका हिन्दी अनुवाद करें।

सुबह, दोपहर, शाम समय की सूचना वाले मुहावरे

भीली बोली पर मालवी, राजस्थानी, गुजराती भाषाओं का पर्याप्त प्रभाव है।
भीली कहावतें

  1. भूखला तो भूखला सूकला खरी-भूखा ही सही पर सुखी तो हूँ।
  2. भील भोला ने चेला-भील भोले होते हैं।
  3. खारड़ा माँ काँटो, भील माँ आटो भील में बदले की भावना रहती है।
  4. पाली पपोली मनाव राखवू घणो मसकल है. भील को खुशामद से मनाना बहुत मुश्किल है।
  5. ढोली नौ सौरो गाद्यो नी मरे न भील, सौरो रोद्यो नी मरे-ढोली का लड़का गाने से और भील का लड़का रोने से नहीं मरता-वे अभावों से जूझते रहते हैं।
  6. भील भाई ने डगले दीवो-भील भले ही अभावग्रस्त रहे, वह सदा निश्चिन्त रहता है।

कुछ बुन्देली बोली की कहावतें

  1. खीर सों सौजं, महेरी को न्यारे।
  2. पराई पातर को बरा बड़ो।
  3. पराये बघार में जिया मगन।
  4. देवी फिरै बिपत की मारी पण्डा कहै करो सहाय।
  5. रौन कुमरई की कुतिया (लोककथन)।
  6. नौनी के नौ मायके, गली-गली सुसरार।
  7. जौन डुकरिया के मारे न्यारे भए बई हिस्सा में परी।
  8. माँगे को मठा मोल पर गौ।
  9. कानी अपने टेण्ट तो निहारत नईया दूसरे की फुली पर पर के देखत।
  10. कनबेरी देवो।
  11. मर गई किल्ली काजर खों।

2. पहेलियाँ

1. भीली भाषा – उत्तर
1. गाय वाकड़ी ने बेटी डाकणी – तीर-कमान
2. धवल्या बुकड़ा ने बारेह खाल – प्याज
3. औंधे बाटके ने दही लटके – कपास
4. भूत्या हेलग्या ने पेटा में दाँत – कद्दू
5. छोटी-सी दड़ी, दगड़-सी लड़ी – सुपारी

2. बुन्देली
1. थोड़ो सो सोनो, घर भर नोनो – दीपक
2. दीवार पर धरो टका, ऊको तुम उठा पाओ न बाप न कका – चन्द्रमा
3. ठाड़े हैं तो ठाड़े हैं, बैठे हैं तो ठाड़े हैं। – सींग
4. सीताजी की गोल-गोल, शिवजी को आड़ो – सीताजी की गोल बिंदिया
बूझो पहेली मोरी रामजी को – शिवजी का आड़ा त्रिपुण्ड और रामजी
ठाँड़ों। – का खड़ा रामनामी तिलक।

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3. निमाड़ी
1. एक बाई असा कि सरकजड नी – दीवाल
2. काली गाय काँटा खाय, पाणी देखे बिचकी जाय जूता

4. बघेली
अड़ी हयन, खड़ी हयन, लाख मोती जड़ी हयन बाबा केरे बाग में दुशाला ओढ़े पड़ी हयन – भुट्टा मक्के का

5. छत्तीसगढ़ी
पेट चिरहा, पीठ कुबरा – कौड़ी

6. मालवी
नानो सो चुन्नू भाय, लम्बी सारी पूँछ नी चाल्या चुन्नू भाया, पकड़ी लाओ पूँछ – सुई धागा

3. चुटकुले

  1. न्यायाधीश-तुम चार साल पूर्व भी एक ओवर कोट चुराने के अपराध में इस अदालत में आ चुके हो।।
    अपराधी-आप ठीक कहते हैं। लेकिन ओवर कोट इससे अधिक चलता भी कहाँ है।
  2. मजदूर–क्या मालिक ! गधे के समान काम कराया और एक रुपया दे रहे। कुछ तो न्याय करना चाहिए।
    मालिक-न्याय ! हाँ तुम ठीक कहते हो। मुनीम जी, इसका रुपया छीन लो और बाँध कर इसके सामने थोड़ी सी घास डाल दो।
  3. पिता-हमारा लड़का आजकल बहुत तरक्की कर रहा है। पड़ोसी-अच्छा, कैसे?
    पिता–पुलिस ने उस पर घोषित इनाम की रकम पाँच हजार से बढ़ाकर दस हजार कर दी है।

4. लोकगीत

निमाड़ी कवाड़ा
बड़ा-बड़ा तो वई गया
ढोली कय कि पार उतार
वई का वई गया ना
उतरई की उतरई लगी
एकली कुतरी कई भुख
न कई कंसुऱ्या ले
फट्या कपड़ा बुड्ढा ढोर
इनका दाम लई गया चोर
ऊँट थारो कई वाको
ऊँच कय सब वाको
थारी बइगण म्हारी छाछ
भली बघार म्हारी माय

प्रस्तुति : हरीश दुबे

कसा भनई रिया हो?
मास्टर बा तम
असा-कसा भनइ रिया हो,
छातरवती दई ने
अँगूठा लगवई रिया हो।

-दिनेश दर्पण

साथन : निमाड़ी

‘मँहगई’
एको राज ओको राज
हुया मँहगा अनाज।
काँ छे घोटालो,
समझ मज आव नी
उनकी वात!
हम, पाँच बरस तक
देखाँ, रामराज की वाट

-अखिलेश जोशी

विश्वास
आस बाँधी ने
दो कदम
चाल्यौ थो
कि
टाँग धैची लिदी।
पाछै
फरीने दैख्यौ आपणा वारा पे भी
विश्वास नी करनो कदी।।

-जगदीश सस्मरा

वात कई कयj
बैल गाड़ी की वात कई कयj
खेत वाड़ी की वात कई कयj
मीठा लागज जुवार का रोटा
नऽ अमाड़ी की वात कई कयj
जे खड़ बुनकर वणा व मयसर का
उनी साड़ी की वात कई कयणुं
दूध-घी की कमी नि होणऽ दे
भैस-पाड़ी की वात कई कयj
घर क राखज चगन-मगन केतरो
छोटी लाड़ी की वात कई कयj
गाँव मऽ उनको बड़ो नाव वजज
माय माता की वात कई कयj
वोली न अपणी जगा सब छे ‘हरिश’
पण निमाड़ी की वात कई कयणुं।

– हरीश दुबे

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गजल
हुण रे भाया म्हारी वात।
हद की दी मनखौं की जात।
जणी जण्या पारया पोस्या,
अब लगावे वण पे घात।
वा, दर-दर की माँगे भीख
जण के जीवे बेटा हात।
लाड्या की होरयां बारी,
मंगता अशो करयो उत्पाद।
मनखाँ ती वंची ने रो
झूठी कोनी या केवात॥

– प्रमोद रामावत

फागुण का दोहा
फागुण का पगल्या पड्या, बदल्या सारा रंग।
ढोलक बजी चौपाल पऽ खडक्या खड़-खड़ चंग॥
सरसों पीली हुई गई, मुहवो वारऽगन्ध।
फूल-फूल पऽ भैरा दौड़, पीणऽख मकरन्द॥
अम्बा भी बौरइ गया, फूल्या घणा पलास।
कोयलिया की कूक की, प्यारी लाग मिठास॥
अबीर गुलाल का साथ मैंs, रंग की उड़ी फुहार।
हिली-मिली न मनवाँ, आवो यो तेव्हार।।

-चन्द्रकान्त सेन

एल्याँग ………. वोल्याँग
एल्यांग गुरुजी
पकावणऽ लग्या
दलिया न दाल
वोल्याँग हुई
शिक्षा-बे-हाल
शेर की सी उनकी नियति
एकाजऽ लेण
जिन्दगी अकेलीज बीती
वोटर सी पूछो
ईज सरकार रखोगा
कि बदलोगा?
बोल्या अगला
को काई भरोसा?
ऊ एतरी धाँधली
चलन दे कि नई?

-ललित नारायण उपाध्याय

ऊँचो मोल को है तमारो पसीनो

साथे लइला हिम्मत ने हेली-मेली ताकत,
तमारा आगे माथो टेकी ऊबी रेगा आफत,

काय को डर धरती रो घर अन से भरया चालो।
चालो भरयां चालो, चालो मरदाँ चालो।

घणो ऊँचों मोल को है तमारो पसीनो
आलसी के समझावो के कसो होय है जीनो।
स्वास्थ छोड़ी मजदूरी री पूजा करदाँ चालो।
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो।

गाँवों में कबीर पंथ आज भी तो गावे है
परेम से तो मारा भाई दुनिया जीती जावे है
लड़ता-मरता आदमी ने आपण वरजाँ चालो
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो

-मोहन अम्बर

सन्दर्भ : होली

कई हँसो बाबूजी!
यूँ दूर ऊबा
नाक सिकोड़ी के
कई हँसो ओ बाबूजी,
हमारे
कीचड़ का अबीर गुलाल से
होली खेलता देखि के।
हमारो तो
योज बड़ो तीवार है
यो
कीचड़ को जरूर है, बाबूजी
पणे
तमारी जग-मग दीवाली से
घणों अच्छो है,
देखिलो
दोल्यो/धुल्यो
दोड़ी-दोड़ी के
खाँकरा की केशूड़ी को
सन्तरिया रंग के
एक-दुसरा का ऊपर ढोलिरिया
मन का बन्द किमाड़
खोलीरिया
आत्मा से घीरणा को
कीचड़ धुइरिया है
काल तक जो प्यासा था
एक दूसरा का खून का
बाबूजी
आज ऊई पाछा
एक दुइरिया है।

-बंशीधर बन्धु’

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अजगर से बड़ा साँपजी

थोड़ी-घणी लिखी या पाती,
आखी समजो बाप जी।

यो कई हुई रियो इनी दुनियाँ में,
कई करूँ इको जाप जी।

तम भी पड्या हो ईका चक्कर में
घणा ईमानदार था साबजी।

भेती गंगा में जो हाथ नी धोया तो
जनम भर होयगो भोत संतापजी।

तूज अकेली जेरीलो नी हे धरती पे,
बेठ्या हे, अजगर से बड़ा साँपजी।

घणी देर से सोया हो, अब तो जागो,
जगावा को कद से करि रियो हूँ अलापजी।

कई लाया था ने कई ली जावगा,
आता-जाता को मत करो विलापजी।

-हुकुमचन्द मालवीय

खोटो नरियल होली में !
मन में आदर भाव नी रियो, राम नी रियो बोली में,
नगद माल सब जेब हवाले, खोटो नारियल होली में।
स्वारथ आगे सब कईं भूल्या, कितरा कड़वा हुईग्या हो,
फिर भी थोड़ी तो मिठास है पाकी लीम लिम्बोड़ी में।

कई गावाँ कई ढोल बजावाँ, कई स्वागत सत्कार करौं,
डण्डा-झण्डा साते लइनें, नेता निकले टोली में।

कुरसी मिली तो मोटरगाड़ी से, तम नीचे नी उतरो,
नेताजी वी दन भूलीग्या, रेता था जद खोली में।

खन, पसीना, साँते बईग्यो, पेट पीठ से चोंटीग्यो,
सपनो हुईग्यो धान ने दलियो, टाबर रोवे झोली में।

कुल की लाज बहू ने बेटी, भूल्या सगली मरयादा,
बहू की जगे दहेज बठीग्यो, अब दुल्हन की डोली में।

नारी को सम्मान घणों है, भाषण लम्बा-चौड़ा दो,
पण मौका पे चूको नी तम, भावज बणाओ ठिठोली में।

-ओमप्रकाश पंड्या

तम देखी लेजो
बन्द कोठड़ी म
गरम गोदड़ी ओढ़ेल
सोचतो मनख;
कस लिखी सकग
ठण्ड न कड़ायलां गीत,
फटेल चादरा का दरद
अन टूटेल झोपड़ा की वारता?
कसा कई सकग
फटेल हाथ-पाँव की
बिवई न में
खोयेल नरमई,
अन सियालां म।
बगलेलो
डोलची दाजी को दम !
भई,
तम कोशिश करी न
देखी ले जो;
पन असली वात न क
कभी नी कई सकग।।

-शरद क्षीरसागर

जीवन कँई हे?
जीवन एक मेंकतो
हुवो फूल हे
हवेरा, खिले अरु हाँजे
मुरजई जावे
समजी नी जिने
जीवन की परिभासा
ऊ कदी रोवे
कदी खिलखिलावे
जीवन पाणी को
ऊठतो हुवो बुलबुलो हे,
देखतां-देखतां
जिको नामो निसान मिटी जावे
फिर बी हम
जीवन को अरथ नी जाणां
तपतो हुवो सूरज बी
हाँजे ठण्डो वई जावे।

-कन्हैयालाल गौड़

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5. लोक कथाएँ

लोक कथाओं में मानव का सुकोमल एवं हृदय को छू जाने वाला इतिहास अंकित है। आदमी ने जो कुछ किया, उसका लेखा-जोखा तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन अपने मनोजगत में उसने जो कुछ भी सोचा, विचारा, रंगीन कल्पनाओं का ताना-बाना बुना, सुन्दर सपने संजोए उन सबका विवरण इन लोक कथाओं में सुरक्षित है।

सदियों से ये लोक कथाएँ मनुष्य का मनोरंजन करती आयी हैं। इनमें कुछ भी असम्भव नहीं होता है। इनमें शेर और साँप भी दोस्ती निभाते, पक्षी सन्देश पहुँचाते और जरूरत पड़ने पर चित्र भी बोलने लगते हैं। इनमें मनुष्य सोचने के साथ ही सात समुद्र पार पहुँच जाता है, क्षण में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है और किसी द्वीप की असीम सुन्दरी से शादी करता है।

इनकी जो सबसे बड़ी विशेषता है वह यह है कि ये मानवीय तत्त्वों से भरपूर हैं। इनमें देवी-देवता के माध्यम से भी मानव जीवन की कहानी कही गयी है। चाहे सूर्य हो या ब्रह्मा, सावित्री, वे सब यहाँ मानवीय स्वरूप लेकर और पारिवारिक प्रतीकों के सहारे सामाजिक जीवन को समृद्ध कर अपना योगदान देते हैं।

इन कथाओं में व्यक्ति, स्थान या समय का कोई महत्त्व नहीं होता। इनकी उँगली पकड़ कर ही आदमी ने सदियों की दूरी को लाँघा, देश-विदेश की यात्राएँ की और सुदूर रेगिस्तान से लगाकर अपने खेत-खलिहान और घर के आँगन के सहारे सारी रात जागकर बिता दी है। इन्होंने निराशा के क्षणों में मनुष्य के मन में अमिट आशा का संचार किया है।

(क) छत्तीसगढ़ी कहानी
नियाय के गोठ

चैतू ठाकुर बिमार हावे। गाँव के सबो झन झोला देख देख के जावत हैं। तीर तिखार के गाँव के कतको सज्जन अऊ बड़े किसान किसनहा झोला देखे बार आता हे। आखर कावर नइ आहीं ओखर सुझाव सब झन बर गुरतर हावे दूरिहा दूरिया के मन ऐला जानाथे। चाहे कइसनो मुशकुल बात होय ठाकुर ओला दुइच छिन में निबटा देय। वइसे ओखर तीर कोनो बड़े जइदाद, नइहे नहिं सोना चाँदी के खजाना। ओखर तीर सिरिफ दुठन बांही के भरोसा हावे। एक छोटे असन घर बाड़ी थोरकिन खेत अउ गिनती ढोर डंगर। रात दिन मिहनत करना ओखर नियम है।

एक जमाना रिहिस के वोहा गरीब रिहिस। मजदूरी करके अपन पेट ला चलाय। तब तो हा परम संतोषी रिहिस अऊ आजो भी बोला। चिटिक मात्र घमण्ड नहीं हे यही कारण है कि गाँव भर के मन वोला मानये।

आज वो ही हा बिमार हे त पूरा गाँव दुखी है। सबो झन भगवान ले पराथना करत है कि ठाकुर जल्दी बने हो जाय।

ठाकुर परिवार में कुल चार पराणी हावे। ठाकुर ओखर घरवाली ओखर बेटा अउ अनाथ भांचा। हावो तो भांचा फेर ठाकुर बोला अपने बेटा ले चिटिक मात्र कमती नहीं समझे। ऊखर असन बेटा बीस बरस के लगभग अउ भांचा मोहन अठरह बरस के लगभग हावे। बड़ मिहनती हे। बलराम कोनो काम बूता म ओखर आगू नई टिकै।

बलराम के सगई होने। ठाकुर सोचे कि मोहन बर भी कहूँ बात चलाये जाय त दूनो के बिहाव एक संग निपट जाही। ठकुराइन के मन मां घलो यही बिचार उठे।

फेर एकोती बलराम बड़ा उलझन अउ उदंड होगे। न माँ के सुनय न बाप के सुनय कभू भूले भटके खेत के मेड नहीं खूदय न खलिहान में बैठय। लोगन कहिये कि बलराम ताश पत्ती खेले बर सीखेगे हे। कोनोन कहाय कि ससुराल वाला मन बोला बहिकाल फुसलात हावे। ससुराल वाला मन डरावत हे कि कहूँ मोहन का बलराम के हिस्सा में बाँटा झन ले लय।

चैतू ठाकुर ये सब चाल ल समझत हावे फिर मोहन ल ये पाय कि नइ भाय कि वा हा भांचा हे फेर ये पाय के चाहे कि ओखर माँ बाप गरगे हे, बल्कि ठाकुर ओखर मिहनत देख खुश होवय।
खेती बारी के संगे वो हा घर के चेता सुरता रखथे। ठाकुर ठकुरइन की कतेक सेवा कर थे।

ये बात ठीक है कि बलराम ऊखर बेटा है फेर कतेक मुरुख। काम देखता बोला जर आ जाये। भेजबे उत्तर दिशा व वोहा जाये दक्षिण दिशा। वोहा ठीक से अपने चारों खेत ला छलख नई जानय कालि के दिन वोला खेत दे दिए जाय त का होही?

ठाकुर बीमार हावे। बलराम ला ओखर ससुराल वाला मन बलवा ले हय। अभी तक ले लहुट के नई आये है। खबर भिजवाय गय हय, फिर ससुराल ले कोनो मनख नइ आय हे।

संझा के बेरा बलराम अपना दलदल के संग ठाकुर के आगु में अइस। राम राम के बाद ससुराल पक्ष के जन विहिस कि ठाकुर अब ये थोरे दिन के मेहमान हावस ऐखर सेती तोला अपन संपत्ति ला बलराम के नाम देना चाही।

ये सुनके ठाकुर ला कोनो अचंभा नइ होइस। अइसन बात के खियाल ओला आगु ले रिहिस। बोलिन”तुम्हार बात तो ठीक फिर बलराम अभी लइका है। काम धाम के सूझ अभी
बने अइसन नइ है।”

अतका सुनके रिहिस बलराम भड़क गये-बापू के त बुध सठिया गेहे। जब देख बेत मोला लइका समझते अऊ ये सब मोहन के सेती होवत हे। माहा घलो ओखरे पक्ष ले थे। फेर बापू आज त तोला फइसला करेच बर पड़ ही।

ठाकुरहा जल्दी ले गाँव के पाँच पंचु बुलबइस फिर ठकुराइन ले पूछिस मोहन कहाँ है? ठकुरइन बतइस-वो हा मंझनिया के जंगल चल दे हावे। एक ठन बइला बीमार हावेले तेखर बर जड़ी बुटी लाने बर गये है।

ठाकुर हां पंच मन ला बलराम के मंशा बतलइस। सबला बड़ अचंभा होइस फेर बलराम के संग ओखर ससुरारी मन ला देख के चुप रहिगे। ठाकुर बाते बात में बलराम लातियारिस बेटा थोरकिन खलिहान में जाके देख आतो धान मिजाइ के कुछ उड़ल हे या नइ। बलराम भागत गइस अउ आके बतइस कि खलिहान म दूनों नौकर बइठे बीड़ी पियत हावे।

ठाकुर फेर विहिस-ऊखर ले पूछ नइ लेतेस बेटा के दौरी कतेक बेर म चल ही। बलराम हा आज्ञाकारी बेटा अइसन फेर गइस अऊ आके खबर दइस कि अभीत सबो बाइला नइ आये हे। ठाकुर पूछिस”आखिर कतका बइला कमती पड़त हे?”

बलराम गल्ती कबूलिस के बापू में तो गिनती करे बार भुला गये। अभीच जाके पता करथ हंव।

बलराम लहुटके बड़ा घमण्ड करके बतइस दुबइला कमती है। अऊ तब ठाकुर हा पूछिस”उहां अभी कुल कतका बइला है।”

अऊ लोगन देखिन कि बलराम फेर बइका के गिनती करे बर भागिस।

ओतकेच बार मोहन आगे। वे हा सब झन के पांव परिस अऊ चले ल धरिस। तब ठाकुर बोलिस-बेटा थोरकिन पता लगा के आ धान वे भिंजइ होही के नई।

तभेच बलराम आके बइला के संख्या बताय लगिस। सब चुप रहिन। थोरिक देर बाद मोहन आके बतइस कि कंगलू अउ मंगलू इनो मिल के पझ डार डाले हावे। ढेर लगा चुके है। दु बइला के कमी रिहिस त बहू झगरू देके गेहे। रात के खां पी के दौरी शुरू हो जाही। फिकर के कोनो बात नइहे।

ऐखर बाद कोनो कुछु नई बोलिन। ठाकुर पारी पारी से सबके मुंह ला देखे लगिस। अऊ आखिर में बलराम ले बोलिस कुछ समझ में आइस बेटा, तोर अऊ मोहन में का फरक हे? तें घंकभु ये समझे के कोशि नई करेस के भुइयां ह मेहनत चाहथे। खेती-बारी करना हंसी-ठट्ठा नोहे। बड़ सूझ के काम हे। मोहन तो ले के छोटे हे फेर कतेक लायक हे अऊ तेहा कतेक नालयक पहिले मोर विचार रिहिस कि तुम दूनो ला संपत्ति के आधा-आधा हिस्सा दे दवं, फेर अब एक अ रास्ते रही कि तोता ईमानदार किसान बने बर पड़ही जइसे ते मोहन ला देखत हस। तबहि तेहां आधा हिस्सा के हकदार होबे।

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ठाकुर के फइसला सबके समझ में आ गइस। आज ये फेर साबित होंगे कि ठाकुर हमेशा नियाय के ही बात कहिये।

खड़ी बोली में अनुवाद

न्याय की बात
चैतू ठाकुर बीमार हैं। गाँव के सब लोग उन्हें देखकर जा चुके हैं। आस-पास के गाँवों से भी अनेक प्रतिष्ठित किसान उन्हें देखने आ रहे हैं। आखिर क्यों न हो? उनका व्यवहार सबके लिए इतना नम्र रहा है कि दूर-दूर तक लोग उन्हें जान गए हैं। चाहे कैसी भी उलझी समस्या क्यों न हो, चैतू ठाकुर अपनी सूझ-बूझ से उसे आनन-फानन में सुलझा देते हैं। वैसे उनके पास लम्बी चौड़ी जायदाद नहीं हैं, न ही सोने-चाँदी के अनगिनत सिक्के हैं। उन्हें तो केवल अपनी बाँहों का भरोसा है। एक छोटा-सा घर है। बाड़ी है कुछ खेत हैं और गिनती के ढोर-डांगर हैं। रात-दिन मेहनत करना ही उनका नियम है।

एक समय था कि वे गरीब थे। मजदूरी करके अपना पेट भरते थे। अब भी वे परम संतोषी हैं और आज भी घमण्ड उन्हें छू तक नहीं गया। यही कारण है कि गाँव के लोग उन्हें मानते हैं।

आज वे बीमार हैं, तो सारा गाँव दु:खी है। ईश्वर से सब के सब यही प्रार्थना कर रहे हैं कि वे जल्दी अच्छे हो जायें।

उनके परिवार में कुल चार प्राणी हैं। वे उनकी पत्नी, उनका बेटा और अनाथ भांजा। है तो भांजा, पर वे उसे अपने बेटे से जरा भी कम नहीं मानते। उनका अपना बेटा बलराम लगभग बीस साल का है। भांजे का नाम है मोहन, यही कोई सत्रह-अठारह वर्ष का होगा। बड़ा मेहनती है। बलराम तो उसके किसी काम में भी नहीं ठहर सकता।

बलराम की सगाई हो चुकी है। ठाकुर सोचते हैं कि मोहन के लिए भी कहीं बात हो जाय तो दोनों का विवाह एक साथ ही निपटा दें। ठकुराइन के मन में भी यही बात है।

परन्तु बलराम इधर बड़ा मनमौजी हो गया है। न माँ की बात मानता है, न बाप की सुनता है। खेत पर कभी भूलकर भी नहीं जाता है और न ही घड़ी भर खलिहान में बैठता है। लोग कहते हैं कि बलराम आजकल ताश खेलने लगा है। कुछ लोगों का यह भी ख्याल है कि उसके ससुराल वाले उसे बहका रहे हैं। ससुराल वालों को शायद यह डर है कि कहीं मोहन बलराम का हिस्सा न बँटा ले।

चैतू ठाकुर यह सब समझते हैं। वे मोहन को केवल इसलिए नहीं चाहते कि वह उनका भांजा है, उसके माँ-बाप मर गए हैं, बल्कि ठाकुर उसकी मेहनत देखकर खुश हैं। खेती-बारी के साथ-साथ वह घर का भी कितना ध्यान रखता है। उन दोनों की कितनी सेवा करता है।

ठीक है कि बलराम उनका बेटा है किन्तु कितना मूर्ख है। काम के नाम से ही ज्वर आ जाता है। भेजो उत्तर दिशा की ओर तो दक्षिण चला जाता है। उसे तो ठीक से अपने चार खेतों का भी ज्ञान नहीं है और कल यदि उसे सारे खेत दे दिये जाएँ तो क्या होगा?

ठाकुर बीमार है। बलराम को उसकी ससुराल वालों ने बुलवा लिया है। अभी तक वह लौटकर नहीं आया। सूचना भिजाई गई थी, परन्तु उसकी ससुराल से भी कोई नहीं आया।

दूसरे दिन सुबह बलराम आ गया। ठाकुर ने सुना कि उसके साथ कुछ लोग भी आए हैं, पर अभी तक कोई सामने नहीं आया।

शाम के समय बलराम अपने दल के साथ ठाकुर के सामने आया। राम-राम के बाद ससुराल पक्ष के एक आदमी ने कहा कि ठाकुर अब तो थोड़े ही दिन के मेहमान हैं, इसलिए उन्हें अपनी सम्पत्ति बलराम के नाम लिख देनी चाहिए।

यह सुनकर ठाकुर को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात की कल्पना उन्हें पहले से ही थी। बोले “बात तो ठीक है, किन्तु बलराम अभी बच्चा है। काम-धाम की सूझ अभी उसे नहीं है।”

इतना सुनना था कि बलराम उबल पड़ा “बापू की तो बुद्धि सठिया गई है। जब देखो तब मुझे बच्चा ही समझते हैं और यह सब उस मोहन के कारण ही है। माँ भी उसका ही पक्ष लेती है, लेकिन आज तो बाबू को फैसला करना ही पड़ेगा।”

ठाकुर ने शीघ्र ही गाँव के पंच बुलवा लिए। फिर ठकुराइन से पूछा “मोहन कहाँ है?” ठकुराइन बोली- “वह तो दोपहर से ही जंगल चला गया है एक बैल बीमार है, उसी के लिए कुछ जड़ी-बूटी चाहिए थी।”

ठाकुर ने पंचों से बलराम की इच्छा कह सुनाई। सबको बड़ा अचम्भा हुआ, परन्तु बलराम के साथ उसकी ससुराल वालों को देखकर चुप रह गए। ठाकुर ने बात ही बात में बलराम से कहा- “बेटे जरा खलिहान जाकर देख तो आओ धान मिजाई का कुछ डौल है या नहीं।”

बलराम भागकर गया और आकर बताया कि खलिहान में दो नौकर बैठे बीड़ी पी रहे हैं। ठाकुर ने कहा, “उनसे पूछ नहीं लिया बेटा कि कितनी देर बाद दौरी चलेगी?”

बलराम एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह फिर गया और जाकर उसने सूचना दी कि अभी तो पूरे बैल ही नहीं आये।

ठाकुर ने फिर पूछा-“आखिर कितने बैल कम पड़ते हैं?” बलराम ने अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा-“बापू मैं तो गिनती करना ही भूल गया। अभी जाकर पता लगाता हूँ।”

बलराम ने लौटकर गर्व के साथ बताया कि दो बैल कम पड़ते हैं। तभी ठाकुर ने पूछ लिया “वहाँ अभी कुल जमा बैल कितने हैं?”

और लोगों ने देखा कि बलराम बैलों की गिनती करने फिर खलिहान की ओर भागा जा रहा है।

तभी मोहन आ गया। उसने सबके पाँव छुए और चलने लगा। ठाकुर बोले-“बेटे, जरा पता तो लगाओ कि आज धान की मिजाई हो सकेगी या नहीं।”

तभी बलराम आकर बैलों की संख्या बताने लगा। सब चुप रहे। जरा देर बाद मोहन ने आकर बताया कि कंगलू और मंगलू दोनों मिलकर पैर डाल चुके हैं, ढेर लगा चुके हैं, दो बैलों की कमी थी सो अभी झगरू दे गया है। रात को खा-पीकर दौरी शुरू हो जायेगी। चिन्ता की कोई बात नहीं।

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। ठाकुर बारी-बारी से सबका चेहरा देखने लगे और अन्त में बलराम से बोले-कुछ समझ में आया बेटे, तुममें और मोहन में क्या फर्क है? तूने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं कि जमीन मेहनत माँगती है। खेती बारी करना कोई हँसी-ठट्ठा नहीं है। बड़ी सूझबूझ का काम है। मोहन तुझसे छोटा है, पर कितना लायक है और तू कितना नालायक है। पहले मेरा विचार था कि तुम दोनों को मैं अपनी सम्पत्ति का आधा-आधा हिस्सा दे दूँ, किन्तु अब एक शर्त यह भी रहेगी कि तुझे ईमानदार किसान बनना होगा, जिस प्रकार तू मोहन को देख रहा है, तभी तू आधे हिस्से का हकदार होगा।

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ठाकुर का फैसला सबकी समझ में आ चुका था। आज यह बात पूरी तरह से सिद्ध हो गयी कि ठाकुर हमेशा न्याय की ही बात कहते हैं।

(ख) निमाड़ी लोक कथा’
झूठी मंजरी

एक थी चिड़ई, एक थो कबूतर, एक थो कुत्तो और एक थी मांजरी। सबइ न विचार करयो कि अपुण खीर बणावा।
कोई लायो लक्कड़, कोई लायो पाणी, कोई लायो शक्कर, कोई लायो दूध उन खीर तैयार हुई गई।

कहयो चलो सब खाई लेवां, मांजरी न कहयो-म्हारा तो डोला आई गयाज। उन उडोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई।

सबन अपणे अपणा वाटड की खीर खाई न बचेल का ढाकी न धरी दियो।

सब अपणा, अपणा काम न पर चली गया, तंवज मांजरी उठी उन सबका वाय की खीर खाई न डोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई। सांझ ख जंव सबई काम पर सी आया तो देख्यो खीर को बासरण खाली थो।

एक एक सी पूछयो क्यों भाई तुम न खीर खाई ज।

सबई न न मना करी दियो। मांजरी से पूछ्यो तो वा बोलो हऊँ काई जाणु म्हारो तो डोला आयाज। हऊ दिन भर सी पट्टी बांधी न पड़ोज। सब न तै करयो कि एक सूखा कुआ पर झूलो बांध्यो सब ओपर बारी-बारी सी बढ़ी न कहे कि मन खीर होय तो झूलो टूटी जाये। जेन खीर खाई हायेगा ओकी बखत झूला टूटी जायगा। पहली चिड़ी बठी बोली-“ची, ची, मन खीर खाई हो तो झूलो टूटी जाय, झूलो न टूटयो।”

फिर कबूतर बठ्यो बोल्यो गुटरू गूं-गुटर गूं, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिरी कुतरो बठ्यो बोल्या–भों-भों, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिर मांजरी बठी बोली–म्यांउ म्यांउ मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय।

झूलो तो टूटी गयो अन मांजरी सूखा कूआ म पड़ी गई। खेल खतम पैसा हजम।

खड़ी बोली में अनुवाद

झठी बिल्ली

एक थी चिड़िया, एक था कबूतर, एक था कुत्ता और एक थी बिल्ली। सबने मिलकर विचार किया कि अपनी खीर बनायें।

कोई लाया लकड़ी, कोई लाया पानी, कोई लाया शक्कर, कोई लाया दूध और खीर बनकर तैयार हो गई।

कहा, चलो सब खा लें। बिल्ली ने कहा- “मेरी तो आँखें आई हैं” और वह आँखों पर पट्टी बाँध कर सो गई।

सबने अपने-अपने हिस्से की खीर खाई और शेष बची हुई खीर को शाम के लिए ढाँक कर रख दिया।

सब अपने-अपने काम पर चले गये। तब बिल्ली उठी और सबके हिस्से की खीर खाकर फिर आँखों पर पट्टी बाँधकर सो गई।

शाम को जब सब काम पर से आये, तो देखा, खीर का बरतन खाली था। हर एक से पूछा-“क्यों भाई तुमने खीर खायी है?” सबने इनकार किया।

बिल्ली से पूछा, वह भी बोली- “मैं क्या जाने? मेरी आँखें आयी हैं,सुबह से पट्टी बाँधे पड़ी हूँ।” तब सबने विचार किया कि एक सूखे कुएँ पर कच्चे धागे से झूला बाँधा जाये। सब बारी-बारी से उस पर बैठे और कहें-“मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाये।” जिसने खीर खायी होगी, उसकी बार झूला टूट जायेगा।

पहले चिड़िया बैठी-“ची-ची, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।” झूला नहीं टूटा। फिर कबूतर बैठा, बोला-“गुटर गूं-गुटर पूँ, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर कुत्ता बैठा, बोला-“ौं-भौं, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर बिल्ली बैठी, बोली-“म्याऊँ-म्याऊँ, मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाय।”

झूला था सो टूट गया और बिल्ली थी सो कुएँ में गिर गयी। खेल खतम-पैसा हजम।

(ग) मालवी कहानी
पीपल तुलसी

कणी गाम माय सासू अर बऊ रेती थी। एक दिन सासू ने बऊ तो कियो के मू तीरथ कारवा सारू जरूरी हूँ, तुम अपणे याँ जो दूध दही होवे है ऊ बेची-बेची के रुपया भेलाकर लीयो। अतरो कइके सासू चलीगी।

चैत-बैसाख को माइनो आया तो बऊ सगलो दूध-दई लई जई के पीपल अर तुलसी म सीची देती अर फेरी खाली बासन लइके घर मेली देती। सास तीरथ करी के पीछे घरे अई तो बीने बऊती दूध अर दई का रुप्या मांग्या। बऊ ने क्यो के बई मूं तो सगली दूध अर दई पीपल तुलसी म सींचत री हूँ, म्हारा कन रुप्या नी है। पण सासू ने कियो कई बी होवे जो-वी हो म्हारे तो रुप्या देणा पड़ेगा। तो बऊ पीपल अर तुलसी का कने जइके बैठीगी, अर वीनती बोलो के म्हारी सासू म्हार ती दूध दही का पइसा माँगे है। पीपल-तुलसी ने कियो के बेटी-म्हारा कन रुप्या-पइसा काँ है? इ भाटा कोंकरिया जरूर पड़िया है इनके भलाई-उठई के लई जा। बऊ सगला कोंकरिया भाटा उठई के घेर लई अर अई घरे लइके अपण कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन सासू ने फेरी रुप्या मांग्या तो बऊ ने अपणो कोठो खोल्यो। बऊ ने देख्यो कि सगला कोंकरिया भाटा का हीरा-मोती वणी ग्या है अर कोठी जगमग इरियो है। बऊ ने सास ती कियो के सासू जी अपणा रुप्या लइलो। हीरा-मोती देखी के सासु का मन-म-लालच अईग्यो। उने कियो के D वी पीपल अर तुलसी सोचूँगी।

दूसरा दन से सासू जद दूध-दई बेची के जाती तो खाली वासन माय पाणी भरी के पीपल अर तुसी म कूढ़ी आती। जद थोड़ा दन ऐसो करता-करता वइग्या तो एक दिन सासू न बऊ तो क्यों के त म्हारती दूध दई का रुप्या मांग। सासू केवा तो बऊ ने रुप्या मांग्या तो सासू बोली के म्हारा कन रुप्या कां है? मूं तो दूध-दई ती पीपल अर तुलसी के सींचती री हूँ। मेरा सासू जइके पीपल अर तुलसी का हेटे बैठी गी अर बोली के म्हारी बऊ दूध-दई का रुप्या माँगे है। पीपल तुलसी ने जवाब दियो के हमारा कन रुप्या कां है? इ कोंकरिया–भाटा पड्या है चावो तो भला ही लई जावो। सासू कोंकरिया-भाटा लइके खुशी-खुशी घरे अई अर बीने कोंकरिया-भाटा लइके अपणा कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन जद कोठी खेल्यो ग्यो तो सासू कई देखे है के पूरो कोठो सांप पर विछू तो भरियो पड्यो है।

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सासू ने बऊ ते पूछयो-के बऊ, या कंई बात है? तू तो कोंकरिया-भाटा उठई के लई थो वीनका तो हीरा मोती वणीग्या अर मूंजो कोंकरिया-भाटा उठई के लई वीनका सांप विछ्वणी गया? बऊ ने सरल भाव ती जवाब दियो के सासू जी मने पीपल-तुलसी के साफ मन तो सींच्यो थो अणी सासू कोंकरिया भाटा का हीरा-मोती वणीग्य अर थाने लालच म ऐसो करियो यो अणी वास्ते था का लाया हुआ कोंकरिया-भाटा का सांप बिछु वणीग्या।

खड़ी बोली में अनुवाद

पीपल-तुलसी

किसी गाँव में सास और बहू रहती थीं। एक दिन सास ने बहू से कहा कि मैं तीर्थाटन के लिए जा रही हूँ, तुम अपने यहाँ जो दूध-दही होता है वह बेच-बेचकर रुपये इकट्ठे कर लेना। इतना कहकर सास चली गयी।

चैत-बैसाख का महीना आया तो बहू सारा दूध-दही ले जाकर पीपल और तुलसी को सींच देती और फिर खाली बर्तन लाकर घर रख देती। सास तीर्थाटन से वापस घर आयी तो उसने बहू से दूध और दही के पैसे माँगे। बहू ने कहा कि मैं तो सारा दूध और दही पीपल-तुलसी में सींचती रही हूँ मेरे पास रुपये नहीं हैं, लेकिन सास ने कहा कि चाहे जो भी हो मुझे तो रुपये देने पड़ेंगे। तब बहू पीपल और तुलसी के पास जाकर बैठ गयी और उनसे बोली कि मेरी सास मुझसे दूध-दही के पैसे माँगती है। पीपल-तुलसी ने कहा कि बेटी, हमारे पास रुपये पैसे कहाँ हैं, ये कंकड़-पत्थर अवश्य पड़े हैं इन्हें भले उठाकर ले जा। बहू सारे कंकड़-पत्थर उठाकर धर लायी और घर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन सास ने फिर से पैसे माँगे तो बहू ने अपना कमरा खोला। बहू ने देखा कि सारे कंकड़-पत्थरों के हीरे-मोती बन गये और कमरा जगमगा रहा है। बहू ने सास से कहा कि सास जी, अपने रुपये ले लो। हीरे-मोती आदि देखकर सास के मन में लालच आ गया। उसने कहा कि मैं भी पीपल और तुलसी सीनूंगी।

दूसरे दिन सास जब दूध-दही बेचकर लौटती तो खाली बर्तनों में पानी भरकर पीपल और तुलसी में डाल आती। जब कुछ दिन ऐसा करते-करते हो गये तो एक दिन सास ने बहू से कहा कि मुझसे दूध-दही के पैसे माँग। सास के कहने पर बहू ने पैसे माँगे तो सास बोली कि मेरे पास रुपये कहाँ हैं? मैं तो दूध-दही से पीपल और तुलसी को सींचती रही हूँ। फिर सास जाकर पीपल और तुलसी के नीचे बैठ गयी और बोली कि मेरी बहू दूध-दही के पैसे माँगती है। पीपल-तुलसी ने उत्तर दिया कि हमारे पास रुपये कहाँ हैं? ये कंकड़-पत्थर पड़े हैं चाहे तो इन्हें भले ही ले जाओ। सास कंकड़-पत्थर लेकर खुशी-खुशी घर आयी और उसने कंकड़-पत्थर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन जब कमरा खोला गया तो सास क्या देखती है कि सारा कमरा साँप और बिच्छुओं से भरा पड़ा है।

सास ने बहू से पूछा कि बहू, यह क्या बात है? तू जो कंकड़-पत्थर उठाकर लायी थी उनके तो हीरे-मोती बन गये और मैं जो कंकड़-पत्थर उठाकर लायी उनके साँप-बिच्छु बन गये? बहू ने सहज भाव से उत्तर दिया कि सास जी मैंने पीपल-तुलसी को शुद्ध मन से सींचा था, इसलिए कंकड़-पत्थर के हीरे-मोती बन गये और आपने लालचवश ऐसा किया था, अतः आपके लाये हुए कंकड़-पत्थरों के साँप-बिच्छू बन गये।

6. दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम
दूरदर्शन

वैसे तो दूरदर्शन पर आजकल हर समय कोई न कोई कार्यक्रम दिखाया जाता है तथापि प्रमुख व लोकप्रिय कार्यक्रम इस प्रकार हैं-

सुबह सवेरे, समाचार, रंगोली, महादेव, मैट्रो समाचार, जय बजरंगबली, चित्रहार, सांई बाबा, चिड़ियाघर, टॉम एण्ड जैरी, कलश, चन्द्रगुप्त, कृषि दर्शन, पोकेमॉन, विरासत, हिटलर दीदी, शाका लाका बूम बूम, वाइल्ड डिस्कवरी, सी. आई. डी., घर एक सपना, बालिका वधू, डिजनी जादू, सा रे गा मा, वीर शिवाजी, सोनपरी, बूगी बूगी, ग्रेट इंडियन लाफ्टर चेलेंज एवं लापतागंज।

दूरदर्शन के कार्यक्रमों को देखकर छात्रों को उनका विवरण लिखने की प्रेरणा-लिखित भाषा की शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य छात्रों को अपने भाव, विचार तथा अनुभवों को लिखित रूप में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने योग्य बनाना है.–

  1. छात्रों को सुन्दर, परिमार्जित एवं स्पष्ट लेख लिखने की प्रेरणा देना।
  2. छात्रों के शब्द-कोष को सक्रिय रूप देना।
  3. छात्रों को विराम चिह्नों का उचित प्रयोग सिखाना और अपने भावों को अनुच्छेदों में सजाने का अभ्यास कराना।
  4. छात्रों की अवलोकन (निरीक्षण) शक्ति, कल्पना शक्ति और तर्क शक्ति का विकास करना।
  5. छात्रों की विचारधारा में परिपक्वता लाना।

दूरदर्शन एक ऐसा माध्यम है जिससे छात्रों की श्रवणेन्द्रियों के साथ दृश्येन्द्रियाँ भी क्रियाशील रहती हैं। छात्र दूरदर्शन में वार्ता सुनने के साथ कार्यक्रम में भाग लेने वालों को देख सकते हैं और वे उनके हाव-भाव के साथ बोलना, अभिनय करना, भाषण देना सीख कर स्वरों के उचित उतार-चढ़ाव के द्वारा बात को शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं। वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं क्योंकि दूरदर्शन ज्ञानवर्धन और मनोरंजन का सबल माध्यम है। वे सब कुछ समझकर अन्त में उस कार्यक्रम के समग्र प्रभाव की चर्चा करें।

शिक्षक छात्रों को दूरदर्शन के किसी विशिष्ट कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को कहें। इससे वे लेखन-कौशल में तो पारंगत होंगे ही साथ ही उन्हें विवेचना और समीक्षा करने का भी अवसर मिलेगा। कार्यक्रम के गुण-दोष दोनों पर प्रकाश डालने के लिए छात्रों को स्वतन्त्र अवसर प्रदान करना होगा। इससे उनकी प्रतिभा के विकास के साथ चिन्तन, मनन एवं स्वाध्याय की प्रवृत्ति का पल्लवन तथा उन्नयन भी होगा।

7. हिन्दी साहित्य का स्वतन्त्र पठन

मनुष्य का सबसे बड़ा अलंकार उसकी वाणी है। वाणी जितनी शुद्ध और परिष्कृत होती है, व्यक्ति उतना ही सुसंस्कृत समझा जाता है। सम्पूर्ण मानव समाज अपने भावों और विचारों को दो रूपों में व्यक्त करता है. मौखिक और लिखित। इन दोनों रूपों में भाषा उसका प्रमुख साधन है। यहाँ मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकारों पर विचार करते हैं।

(i) टिप्पणियाँ किसी सुने गए अथवा पढ़े गए भाषण, वार्तालाप, पत्र, लेख, कविता, ग्रन्थ आदि देखे गए दृश्य तथा घटना पर अपना मत मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रकट करना ही टिप्पणी कही जाती है। आकार की दृष्टि से टिप्पणी की यद्यपि कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, किन्तु संक्षिप्त टिप्पणी अच्छी समझी जाती है। मोटे तौर पर टिप्पणियाँ तीन प्रकार की हो सकती हैं
(अ) कार्यालयी टिप्पणी, (ब) सम्पादकीय टिप्पणी, (स) सामान्य टिप्पणी।

(ii) प्रेरणाएँ साहित्य में प्रेरणा से आशय उन रचनाओं अथवा कृतियों से है जो पाठक को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर उनका मार्गदर्शन करती हैं इसके अन्तर्गत मुख्यत: उन कहानियों आदि को शामिल किया जाता है जो इस उद्देश्य को लेकर लिखी जाती हैं अथवा इस उद्देश्य को पूरा करती हैं। परन्तु इन कहानियों आदि के विषय में यह महत्त्वपूर्ण है कि ये इतनी बड़ी न हों कि पाठक पढ़ते-पढ़ते कहानी के उद्देश्य से भटक जाय। एक ही बैठक में पूरी पढ़ी जाने वाली कहानियाँ ही इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है।

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8. हस्तलिखित पत्रिका तैयार करना

छात्र आपस में मिलकर हस्तलिखित पत्रिका तैयार कर सकते हैं जिसमें सर्वप्रथम सभी संकलित अथवा स्वयं के लिखे लेख, कहानियों, कविताओं के अतिरिक्त चुटकुले आदि भी हो सकते हैं, को सूचीबद्ध किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इस सूची में उसके लेखक अथवा उसके संकलनकर्ता का नाम दिया जा सकता है।

इसके बाद सम्पादक की ओर से अपने साथियों को धन्यवाद ज्ञापन के साथ पाठकों को इस पत्रिका से परिचित कराते हुए इसके लिखित अथवा संकलित लेखों आदि पर प्रकाश डाल सकते हैं। तत्पश्चात् इन लेखों आदि को बड़े रोचक रूप में समग्रता से प्रस्तुत किया जा सकता है।

ध्यान रखने लायक बात है कि कोई भी लेख बहुत छोटा व बहुत ही बड़ा न हो जाय, जो पत्रिका में रोचकता समाप्त करे।

9. क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाएँ।

मालवा अंचल

  • इन्दौर-नई दुनिया, इन्दौर समाचार, नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वदेश, भावताव, जागरण।
  • उज्जैन-विक्रम दर्शन, अवन्तिका, अग्नि बाण, भास्कर, प्रजादूत, जलती मशाल।
  • रतलाम-जनवृत, जनमत टाइम्स, प्रसारण, हमदेश। नीमच-नई विधा।
  • देवास-देवास दर्पण, देवास दूत। मंदसौर-दशपुर दर्शन, कीर्तिमान, ध्वज।
  • शाजापुर-नन्दनवन।

बघेलखण्ड अंचल

  • रीवा-बांधवीय समाचार, आलोक, जागरण।
  • सतना-जवान भारत, सतना समाचार।
  • शहडोल-विंध्यवाणी, भारती समय, जनबोध।

बुन्देलखण्ड अंचल

  • कटनी–महाकौशल केशरी, भारती, जनमेजय।
  • सागर–न्यू राकेट टाइम्स, आचरण, राही, जन-जन की पुकार।
  • टीकमगढ़-ओरछा टाइम्स।
  • छतरपुर-क्रान्ति कृष्ण, प्रचण्ड ज्वाला।
  • जबलपुर-नवभारत, नवीन दुनिया, युगधर्म, दैनिक भास्कर, नर्मदा ज्योति, देशबन्धु, लोकसेवा।

निमाड़ अंचल

  • खण्डवा-विंध्याचल, लाजवाब।
  • बुरहानपुर-वीर सन्तरी।
  • बड़वानी-निमाड़ एक्सप्रेस।

छत्तीसगढ़ अंचल

  • बिलासपुर-लोकस्वर, नवभारत, भास्कर।
  • दुर्ग-ज्योति जनता, छत्तीसगढ़ टाइम्स।
  • रायपुर-देशबन्धु, नवभारत, भास्कर, स्वदेश।

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MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions

1. उपसर्ग एवं प्रत्यय

उपसर्ग

प्रश्न 1.
उपसर्ग की परिभाषा दीजिये।
उत्तर–
वे शब्दांश जो किसी शब्द में जुड़कर उसका अर्थ परिवर्तित कर देते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं। उपसर्ग का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, फिर भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलकर एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। उपसर्ग सदैव शब्द के पहले आता है। जैसे – (म. प्र. 2009)
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 1
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प्रश्न 2.
वे शब्दांश जो शब्द के पहले जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं
(क) संधि
(ख) समास
(ग) उपसर्ग
(घ) प्रत्यय।
उत्तर–
(ग) उपसर्ग। प्रत्यय

प्रश्न 3.
प्रत्यय की परिभाषा दीजिये। (म. प्र. 2010)
उत्तर–
जो शब्दांश किसी शब्द या धातु के अंत में जुड़कर नये अर्थ का बोध कराते हैं उन्हें प्रत्यय कहते हैं।
जैसे –
कड़वाहट, लड़कपन में हट, पन प्रत्यय है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शब्द के अंत में प्रत्यय लगाने से उनके अर्थ में विशेषता एवं भिन्नता उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 4.
प्रत्यय कितने प्रकार के होते हैं? सोदाहरण स्पष्ट कीजिये।
उत्तर–
प्रत्यय के दो प्रकार होते हैं –
(i) कृदन्त और
(ii) तद्धित।

(i) कृदन्त – कृदन्त प्रत्यय वे होते हैं जो धातुओं के अंत में लगाये जाते हैं। जैसे
1. राखन + हारा = राखनहारा, (Imp.)
2. कसना + ओटी = कसौटी,
3. सोता + हुआ = सोताहुआ,
4. चट + नी = चटनी,
5. टिकना + आऊ = टिकाऊ,
6. लड़ना + आका = लड़ाका,
7. थक + आवट = थकावट,
8. बच + आव = बचाव।

(ii) तद्धित – तद्धित प्रत्यय वे होते हैं जो संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण के साथ लगाये जाते हैं।
जैसे –
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 3
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 4

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प्रश्न 5.
आई अथवा इक प्रत्यय लगाकर (2 – 2)शब्द बनाओ।
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 5

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्गों को छाँटिए और उनके प्रयोग से अन्य तीन – तीन शब्दों की रचना कीजिए – अलिप्त, गैर – जिम्मेदारी, निष्काम, सुलभता।
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 6

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय और उपसर्ग को अलग कर लिखिए
अज्ञात, विरक्त, ऐश्वर्यवान, अनदेखे, बेपहचान, बलवान, नि:स्तब्ध, सुलभ, सुन्दरता, वीरता।
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 7

प्रश्न 8.
“नैपुण्य” शब्द का दूसरा रूप है “निपुणता” जिसमें ता प्रत्यय लगा है। इसी प्रकार नीचे लिखे शब्दों के रूप बदलकर लिखिए – सुन्दरता, उदारता, चतुरता।
उत्तर–
सौन्दर्य, औदार्य, चातुर्य।

प्रश्न 9.
अध्यक्ष शब्द में ‘ईय’ प्रत्यय लगाकर बना अध्यक्षीय शब्द, इसका अर्थ है – “अध्यक्षका”। इसी तरह नीचे लिखे शब्दों से नये शब्द बनाइए – भोजन, राष्ट्र, वित्त, नाटक, पुस्तक, मनन, पठन, लेखक।
उत्तर–
भोजनीय, राष्ट्रीय, नाटकीय, पुस्तकीय, मननीय, पठनीय, लेखकीय।

प्रश्न 10.
‘अति’ उपसर्ग तथा ‘वट’ प्रत्यय लगाकर एक – एक शब्द लिखिए।
उत्तर–
‘अति’ उपसर्ग – अति + काल = अतिकाल
‘वट’ प्रत्यय – सजा + वट = सजावट।।

प्रश्न 11.
वे शब्दांश जो शब्द के पीछे जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं – (म. प्र. 2010,11)
(क) संधि (ख) समास (ग) प्रत्यय (घ) उपसर्ग
उत्तर–
(ग) प्रत्यय

2. संधि

प्रश्न 1.
संधि किसे कहते हैं? इसके कितने प्रकार हैं? (म. प्र. 2010, 13)
उत्तर–
दो वर्णों के मेल को सन्धि कहते हैं। सन्धि का अर्थ जोड़ होता है। संधि करने में किसी शब्द का अंतिम अक्षर दूसरे शब्द के पहले अक्षर से जुड़ा रहता है। जैसे – विद्या + आलय = विद्यालय। सूर्य + उदय = सूर्योदय।। संधि के तीन प्रकार हैं – 1. स्वर सन्धि 2. व्यंजन संधि और 3. विसर्ग संधि।

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प्रश्न 2.
स्वर संधि किसे कहते हैं? (Imp.)
उत्तर–
दो स्वरों के मेल को स्वर संधि कहते हैं। जैसे –
धर्म + अर्थ = धर्मार्थ।
भानु + उदय = भानूदय।
रवि + इन्द्र = रवीन्द्र। (म. प्र. 2010)

प्रश्न 3.
स्वर संधि कितने प्रकार की होती है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।
उत्तर–
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(i) दीर्घ संधि – जब एक ही स्वर चाहे वह ह्रस्व हो या दीर्घ एक साथ आये अर्थात् अ, इ, उ, ऋके बाद ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ क्रमश: आये तो दोनों को मिलाकर एक दीर्घ स्वर हो जाता है। जैसे
परम + अर्थ = परमार्थ, (म. प्र. 2011)
भानु + उदय = भानूदय, (म. प्र. 2013)
मही + इन्द्र = महीन्द्र,
पितृ + ऋण = पितृण,
अभि + इष्ट = अभीष्ट,
महा + आलय = महालय।

(i) गुण संधि – यदि स्वर अ या आ के बाद इ, ई, उ, ऊ या ऋ आते हैं तो उस स्थान पर क्रमश: ए, ओ तथा अर् हो जाते हैं। जैसे
महा + इन्द्र = महेन्द्र, (संभावित)
देव + ऋषि = देवर्षि, (Imp.)
राका + ईश = राकेश,
बाल + उपयोगी = बालोपयोगी,
सुर + ईश = सुरेश,
वीर + इन्द्र = वीरेन्द्र।

(iii) वृद्धि संधि – यदि अ, आ के बाद ए, ऐ, ओ, औ आये तो इनके स्थान पर क्रमश: ऐ, औ हो जाता है –
जैसे –
सदा + एव = सदैव, (म. प्र. 2010, 13)
मत + ऐक्य = मतैक्य,
परम + औषधि = परमौषधि,
जल + ओध = जलौध।

(iv) यण संधि – यदि इ, ई, उ, ऊ तथा ऋ के बाद कोई असमान स्वर हो तो ये क्रमश: य, व, या, यु हो जाते हैं।
जैसे –
यदि + अपि = यद्यपि,
सु + आगत = स्वागत,
इति + आदि = इत्यादि, (म. प्र. 2011)
प्रति + उपकार = प्रत्युपकार,
प्रति + एक = प्रत्येक,
अति + आचार = अत्याचार।

(v) अयादि संधि – ए, ऐ, औ के बाद किसी असमान भिन्न स्वर आने पर ए, ऐ, ओ के स्थान पर अय, आय, आव हो जाता है।
जैसे –
ने + अन = नयन,
नै + अक = नायक,
पौ + अक = पावक, (म. प्र. 2013)
पो + अन = पवन।

प्रश्न 4.
व्यंजन संधि की परिभाषा सोदाहरण दीजिये।
उत्तर–
जब व्यंजन और स्वर या व्यंजन से मेल होता है तो उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
जैसे –
सत् + जन = सज्जन, (म. प्र. 2010, 13)
वाक् + ईश = वागीश,
महत् + चक्र = महच्चक्र,
दिक् + गज = दिग्गज,
उत् + हार = उद्धार,
दुस + चरित्र = दुश्चरित्र,
राम + अयन = रामायण,
सम + कल्प = संकल्प,
जगत् + नाथ = जगन्नाथ,
उत् + गमन = उद्गमन,
सत् + आचार = सदाचार, (म. प्र. 2013)
सत् + आनन्द = सदानन्द,
दिक् + अम्बर = दिगम्बर, (म. प्र. 2011)
सत् + गति = सद्गति,
उत् + घाटन = उद्घाटन, –
शम् + कर = शंकर,

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प्रश्न 5.
विसर्ग संधि की परिभाषा उदाहरण सहित दीजिये।
उत्तर–
विसर्ग के साथ जब किसी स्वर या व्यंजन का मेल होता है तब विसर्ग संधि होती है।
जैसे –
निः + छल = निश्छल,
धनु: + टंकार = धनुष्टंकार,
दुः + कर = दुष्कर,
मनः + हर = मनोहर, (म. प्र. 2011, 12)
पुनः + जन्म = पुनर्जन्म,
निः + पाप = निष्पाप,
मनः + रथ = मनोरथ,
नमः + कार = नमस्कार,
मनः + योग = मनोयोग,
पुरः + कार = पुरस्कार,
दुः + शासन = दुःशासन, .
निः + झर = निर्झर,
निः + धन = निर्धन (म. प्र. 2010)
निः + रोग = निरोग,
बहिः + कार = बहिष्कार।

प्रश्न 6.
‘राजेन्द्र’ तथा ‘विद्यालय’ शब्द का संधि विच्छेद कीजिए।
उत्तर–
राज + इन्द्र = राजेन्द्र (गुण संधि)
विद्या + आलय = विद्यालय (दीर्घ संधि)

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों का संधि विच्छेद कर उनमें प्रयुक्त संधियों के नाम लिखिए धर्मोपदेशक, अधर्मासक्त, भिन्नतार्थ।
उत्तर–
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3. समास

प्रश्न 1.
समास किसे कहते हैं? समास के विविध प्रकारों को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर–
दो या दो से अधिक शब्दों के ऐसे मेल को जिसमें उन शब्दों के बीच सम्बन्ध बताने वाले अन्य शब्द लोप हो जाते हैं, समास कहते हैं।
यथा – भाई और बहिन = भाईबहिन।
(बीच का सम्बन्ध बताने वाला शब्द ‘और’ लोप है।)

सामासिक पदों के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए विभक्तियों को रखना ‘विग्रह’ कहलाता है। जैसे भाईबहिन सामासिक शब्द है, इसका विग्रह ‘भाई और बहिन’ हुआ।

समास के प्रकार – समास छ: प्रकार के होते हैं –

(1) अव्ययीभाव समास – जब दो पदों में एक पद अव्यय तथा दूसरा पद संज्ञा होकर मेल होता है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
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इसी प्रकार – आजन्म, आमरण, अनुरूप, हररोज, भरपेट, अतिकाल, धीरे – धीरे, हाथों – हाथ, निर्भय, समूल आदि अव्ययीभाव समास हैं। (म. प्र. 2015)

(2) तत्पुरुष समास – यह ऐसे दो पदों का मेल है जिसमें बाद का पद प्रधान होता है। जैसे – पददलित, मार्गव्यय, ऋणमुक्त, बैलगाड़ी, निशाचर, राष्ट्रप्रेम, राममन्दिर, तुलसीकृत, गृहप्रवेश, शरणागत धर्मभ्रष्ट उपर्युक्त सामासिक शब्दों में बाद के पद प्रधान हैं। (म. प्र. 2009)
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(3) कर्मधारय समास – यह ऐसे दो पदों का मेल है जिसमें एक विशेषण होता है। जैसे – नीलाम्बर, मृदुवाणी, श्वेताम्बर, कमलमुख।
नील + अम्बर = नीलाम्बर (म. प्र. 2013)
मृदु + वाणी = मृदुवाणी
श्वेत + अम्बर = श्वेताम्बर
कमल + मुख = कमलमुख
धर्म + नायक = धर्मनायक (म. प्र. 2011)
पीत + अम्बर = पीताम्बर। (म. प्र. 2011)

(4) द्विगु समास – यह ऐसे पदों का मेल है जिसमें प्रथम पद संख्यावाचक विशेषण तथा दूसरा पद संज्ञा हो। जैसे – नवरत्न, त्रिभुवन, चतुष्पदी, चौमासा। पंचवटी (पाँच वटों का समूह), त्रिकाल, नवरात्रि, त्रिनेत्र, चुतर्वेद (चार वेदों का समूह)। नवनिधि (नौ निधियों का समूह) (म. प्र. 2011)
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(5) द्वन्द्व समास – दोनों पद प्रधान होते हैं। दोनों के बीच और शब्द का लोप होता है।
जैसे –
मातापिता = माता और पिता (म. प्र. 2013)
राजरानी = राजा और रानी
गंगा – यमुना = गंगा और यमुना (म. प्र. 2009)
दयाधर्म = दया और धर्म
अन्नजल = अन्न और जल।

(6) बहुब्रीहि समास – यह ऐसे पदों का मेल है जिनसे बना तीसरा पद नवीन अर्थ देता है। जैसे लम्बोदर – लम्बा है उदर जिसका अर्थात् गणेश। नीलकंठ – नीला है कंठ जिसका अर्थात् शंकर। दशानन दस+ आनन् = रावण। पीताम्बर – जिसका वस्त्र पीला है अर्थात् श्रीकृष्ण। चतुर्मुख – चारमुख = ब्रह्मा। (म. प्र. 2010) गजानन – गज + आनन = गणेश। (म. प्र. 2009, 13)

प्रश्न 2.
नीचे दिए समास युक्त पदों का विग्रह कीजिए –
धर्मनायक, दिगंबर, महात्मा, तरुण – तरुणी, समुद्र – यात्रा।
उत्तर–
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित किन्हीं दो शब्दों का समास विग्रह कर समास का नाम लिखिये
(i) भरपेट,
(ii) राजपुत्र,
(iii) सप्ताह,
(iv) लेन – देन।
उत्तर–
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प्रश्न 4.
जिस समास में प्रथम शब्द संख्यावाचक हो, उसे कहते हैं …. (म. प्र. 2010)
(क) द्विगु समास (ख) द्वन्द्व समास (ग) कर्मधारय समास (घ) तत्पुरुष समास।
उत्तर–
(क) द्विगु समास।

प्रश्न 5.
‘समास’ के …………. भेद होते हैं। (पाँच/छः) (म. प्र. 2015)
उत्तर–
छः।

4. लगभग समान रूप से उच्चरित किन्तु अर्थ में भिन्न शब्द

प्रश्न 1.
समोच्चरित भिन्नार्थक शब्द किसे कहते हैं, उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर–
प्रत्येक भाषा में कुछ ऐसे शब्द होते हैं जिनका उच्चारण एक जैसा होता है या लगभग समान होता है, किन्तु उनके अर्थों में अन्तर होता है। छात्रों को इन शब्दों का ज्ञान होना चाहिए।
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नीचे श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्दों के उदाहरण दिये जा रहे हैं –

प्रश्न 2.
निम्नलिखित समोच्चरित भिन्नार्थक शब्दों में अंतर स्पष्ट कीजिए –
अन्न – अन्य, इति – ईति, कृपण – कृपाण, वात – बात।
उत्तर–
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प्रश्न 3.
निम्नांकित समोच्चरित भिन्नार्थक शब्दों में अंतर स्पष्ट कीजिए –
वारिद – वारिधि, क्षात्र – छात्र, सुकर – सूकर, पथ – पथ्य।
उत्तर–
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के दो – दो अनेकार्थक शब्द लिखकर उसके सामने अर्थ स्पष्ट कीजिए –
अंक, अंबर।
उत्तर–
अंक – संख्या, गोद। (म. प्र. 2015)
अंबर – वस्त्र, आकाश।

5. विलोम शब्द

प्रश्न 1.
विलोम शब्द की परिभाषा सोदाहरण दीजिए।
उत्तर–
एक – दूसरे के विपरीत या उल्टा अर्थ बतलाने वाले शब्द विलोम शब्द कहलाते हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिये कि संज्ञा शब्द का विलोम संज्ञा ही होगा और विशेषण शब्द का विलोम विशेषण ही होगा।
जैसे –
अनुराग – विराग।

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कुछ महत्त्वपूर्ण विलोम शब्द शब्द
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प्रश्न 2.
“आदि और अंत” विलोम शब्द हैं। इसी तरह निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए –
वीर, प्राची, फूली, रण, घमण्ड, स्वच्छंद, पुलकित, दलित। (पा. पु. प्रश्न)
उत्तर–
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प्रश्न 3.
नीचे लिखे शब्दों के विलोम शब्द लिखिए –
अज्ञात, अनजान, बलवान, अगम्य, बहुत – सा, वीर, सच्चा, गर्म।
उत्तर–
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प्रश्न 4.
‘सम्पन्न’ एवं ‘नीति’ शब्द का विलोम लिखिए।
उत्तर–
सम्पन्न – विपन्न
नीति – अनीति।

6. पर्यायवाची शब्द

प्रश्न 1.
पर्यायवाची शब्द की परिभाषा सोदाहरण दीजिये।
उत्तर–
जिन शब्दों के अर्थ समान होते हैं उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं। पर्यायवाची शब्दों को समानार्थक या प्रति शब्द भी कहते हैं।
जैसे –
संसार = जग, जगत, दुनिया, विश्व, लोक।

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कुछ महत्त्वपूर्ण पर्यायवाची शब्द
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो – दो पर्यायवाची शब्द लिखिए सोना, आकाश।
उत्तर–
सोना = कंचन, कनक
आकाश = आसमान, अम्बर।

प्रश्न 3.
‘आनंद एवं ईश्वर’ शब्द के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर–
आनंद – प्रसन्न, हर्ष, प्रमोद।
ईश्वर – भगवान, ईश, परमेश्वर।

प्रश्न 4.
‘अमृत’ का पर्यायवाची है
(क) क्षीर (ख) अमर (ग) उपल (घ) सुधा।
उत्तर–
(घ) सुधा। (म. प्र. 2010, 12)

7. भाव – पल्लवन – भाव – विस्तार

विचार एवं भाव विस्तार की प्रक्रिया ‘पल्लवन’ भी कहलाती है। इसके अन्तर्गत महत्वपूर्ण कथन, सूत्र, सूक्ति, विचार अथवा लोकोक्ति में निहित भावों को विस्तार से प्रस्तुत किया जाता है। इसे ‘विशदीकरण’, ‘विस्तारण’, ‘वाक्य विस्तार’ ‘भाव विस्तार’ आदि नामों से भी जाना जाता है। यह सारांश लेखन की प्रतिगामी प्रक्रिया है। भाव विस्तार के द्वारा विद्यार्थी की कल्पना और रचना शक्ति का परिचय मिलता है। इसमें मूल वाक्य में निहित भावों का ही विश्लेषण किया जाता है।

पल्लवन न तो बहुत छोटा होना चाहिए और न ही बहुत बड़ा। सामान्यत: छ: वाक्यों में या 50 से 60 शब्दों में भाव विस्तार करना चाहिए। पल्लवन या भाव विस्तार सम्बन्धी निर्देश निम्नलिखित हैं –
1.दी गई पंक्ति का अर्थ पूरी तरह समझने के लिए उसका एकाधिक बार ध्यान से एवं विचारपूर्वक वाचन करना चाहिए।
2. सम्पूर्ण विचारों में क्रमबद्धता होनी चाहिए।
3. भाव विस्तार अन्य पुरुष में ही लिखा जाना चाहिए।
4. वाक्य छोटे हों तथा सरल, स्पष्ट एवं मौलिक भाषा का प्रयोग होना चाहिए।
5. मूल भाव से सम्बन्धित बातें ही लिखी जाएँ।
6. उदाहरण अपेक्षित हो तभी दिया जाना चाहिए।
7. पुनरावृत्ति या अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए।

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उदाहरण
1. ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं।’ (Imp.)
उत्तर–
दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ इस कहावत का आशय है कि कोई भी चीज दूर से जरा ज्यादा आकर्षक लगती है, क्योंकि दूर की वस्तु यथार्थ से दूर होती है, इसलिए कर्कश नहीं होती। बूढ़ों को अतीत और तरुणों को भविष्य अच्छे लगते हैं वर्तमान से सभी घबराते हैं यहाँ भी वही प्रवृत्ति काम करती है। वर्तमान यथार्थ होता है, कर्कश होता है। अतीत और अनागत दूर के ढोल की तरह सुहावने लगते हैं। पास बजने वाला ढोल सुहावना नहीं कर्कश लगता है।

2. ‘न दोषों का अन्त है न सुधारों का।’ (म. प्र. 2013)
उत्तर–
‘गुण – दोषमय विश्व कीन्ह करतार’ संसार गुण दोषमय है। सुधार सामाजिक जीवन की निरन्तर आवश्यकता है। ऐसा कोई युग नहीं रहा जिसमें समाज सुधार न किया गया हो। मान्यताएँ बदलती हैं परिस्थितियाँ बदलती हैं। अतः कोई व्यवस्था अनन्त काल तक स्वीकृत नहीं हो सकती। प्रत्येक कदम जहाँ कुछ अच्छाई रखता है वहीं उसमें कुछ बुराई भी होती है। बुराई को दूर करने फिर नया कदम उठाना पड़ता है इस तरह बदलते समय के साथ सुधारों का सिलसिला जारी रहता है।

3. ‘धर्म के मूल में पार्थक्य नहीं, एकता का द्योतक है।’
उत्तर–
प्रस्तुत पंक्ति में धर्म का वास्तविक रहस्य स्पष्ट किया गया है। चाहे किसी भी धर्म का मानने वाला हो उसकी मूलभूत अवधारणाएँ लगभग समान होती हैं। विश्व के किसी भी धर्म में पृथकता की भावना नहीं है। प्रत्येक धर्म प्राणीमात्र के साथ मैत्री भाव रखने का संदेश देता है। धर्म की साधना पद्धति या कर्मकांड पृथक हो सकते हैं किन्तु मानव मात्र का कल्याण, भाई चारा उसके चरम लक्ष्य होते हैं। इसलिए धर्म एकता का परिचायक है।

4. “स्वाधीनता विकास की पहली शर्त है।” (म. प्र. 2006, 13)
उत्तर–
‘स्व + अधीनता’ अर्थात् अपने अधीन रहना। यद्यपि इसका अर्थ स्वतंत्रता के लिए लिया जाता है। बंधन मुक्त रहने का अपना सुख है। बिना स्वंत्रतता के जीवन निरर्थक है। तोते को सोने के पिंजरे में पाल लीजिए लेकिन उसे सुख नहीं मिलेगा। स्वाधीनता में ही व्यक्ति का भी विकास सन्निहित होता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तरक्की तभी संभव है जब हम स्वाधीन एवं स्वतंत्र रहें।

5. “बचपन में पड़े हुए शुभ – अशुभ संस्कार बहुत जड़े जमाते हैं।” (म. प्र. 2006)
उत्तर–
व्यक्ति माता – पिता के संरक्षण में अपना बचपन व्यतीत करता है। उसकी स्थिति कुम्हार के कच्चे घड़े के समान होती है। उसको आकार – प्रकार, रंग – रूप कुम्हार प्रदान करता है, ठीक उसी प्रकार अबोध मन को संस्कारित करने का गुरुतर कार्य माता – पिता का होता है। बचपन में पड़े हुए संस्कार ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। शुभ संस्कार से व्यक्ति ऊँचाइयों को स्पर्श कर पाता है और अशुभ संस्कार उसे गर्त की ओर ले जाते हैं।

6. कार्य को पूजा की भावना से करो। (म. प्र. 2010,11)
उत्तर–
हम जो भी कार्य करें वह केवल औपचारिकता को पूर्ण करने के लिए नहीं, बल्कि उस कार्य में एक आत्मिक संतुष्टि का अनुभव हो किया गया कार्य पूर्ण रूप से तह दिल से किया गया है और जब ऐसा कार्य किया जाये तो वह किसी को दिखाने के लिए बल्कि आत्मिक शांति के लिए तब वह किया गया कार्य किसी पूजा से कम नहीं होता, इसके लिए कार्य के प्रति समर्पण भाव होना अनिवार्य है।

7. स्वतंत्रता से अभिप्राय स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता से है। (म. प्र. 2010)
उत्तर–
स्वतंत्रता से अभिप्राय स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता से इसलिए है क्योंकि हम इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से बंधन मुक्त होकर कर सकें किंतु स्वेच्छाचारिता या स्वच्छंदतावादी विचारधारा हो क्योंकि इसके प्रभाव से मनुष्य उच्छृखल प्रवृति का हो सकता है। हम वस्तु स्थिति को समझें, साथ ही अपनी सत्ता को पहचानें।

8. कर्ता से बढ़कर कर्म का स्मारक दूसरा नहीं। (म. प्र. 2010)
उत्तर–
किसी कार्य का सबसे बड़ा स्मारक उस कर्म को करने वाला अर्थात कर्ता होता है। जब हम किसी कर्म की प्रशंसा करते हैं तो हमारी दृष्टि उस कार्यकर्ता की ओर जाती है। कर्म को कर्ता से पृथक करके नहीं देखा जा सकता ! जब हमें उसी प्रकार के कार्य करने का सुअवसर प्राप्त होता है तो मार्गदर्शन के लिए कर्ता की ओर ध्यान चला जाता है। वह कर्ता हमारा आदर्श बन जाता है कर्मों द्वारा ही समाज में कर्ता की स्थिति सुदृढ़ और आकर्षक बनती है। भारतीय संस्कृति का पताका विदेशों में फैलाने की चर्चा होती है तो स्वतः ही हमारा ध्यान स्वामी विवेकानंद की ओर आकर्षित हो जाता है। अत: कर्म का स्मारक कर्ता के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता है।

9. ‘तुम देखते हो कि जीवन सौंदर्य है, हम जागते रहते हैं और देखते रहते हैं कि जीवन कर्त्तव्य है।’ (Imp.)
उत्तर–
माधव अपने मित्र शेखर से कहता है कि एक कवि और राजनीतिज्ञ में बहुत अंतर होता है। कवि जीवन में सौंदर्य देखता है। वह कल्पना की दुनिया में खोया रहता है। यहाँ तक कि वह अपने आप को भी भूल जाता है जबकि राजनीतिज्ञ सदैव जागता रहता है। वह एक पल के लिए भी वास्तविक दुनिया से अलग नहीं होता है। एक राजपुरुष के लिए कर्त्तव्य ही उसकी दुनिया है।

8. मुहावरे एवं लोकोक्ति

मुहावरे का अर्थ – मुहावरा एक ऐसा वाक्यांश होता है जिसका सामान्य से हटकर विलक्षण अर्थ होता है। जैसे – वह लड़का नहीं शेर है शेर। इस कथन में शेर शब्द किसी वन्य पशु के लिए न होकर शेर के गुणों (साहसी) को प्रकट करने वाला है।

लोकोक्ति का अर्थ – इसका अर्थ होता है लोक में प्रचलित उक्ति। लोकोक्ति केवल वाक्यांश के रूप में नहीं होती, वह तो पूरा वाक्य होती है। किसी कथन का उदाहरण बात की पुष्टि होती है, जो इसमें दिया जाता है। वह अपने आप में पूर्ण होती है। (म. प्र. 2012)

प्रश्न 1.
मुहावरा व लोकोक्ति में अंतर स्पष्ट कीजिए। (Imp.)
उत्तर–
मुहावरा एवं लोकोक्ति में अंतर निम्नलिखित हैं-
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प्रश्न 2.
लोक प्रचलित उक्ति को लोकोक्ति कहते हैं यह कथन सत्य है या असत्य।
उत्तर–
सत्य। (म. प्र. 2011)
कुछ महत्वपूर्ण मुहावरों का अर्थ तथा प्रयोग

1. अपना उल्लू सीधा करना – अपना स्वार्थ सिद्ध करना। (म. प्र. 2011)
प्रयोग – जो मनुष्य स्वार्थी होता है वह अपना उल्लू सीधा करता है।

2. अक्ल पर पत्थर पड़ना – अज्ञानता से काम करना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – उस समय न जाने क्यों मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गये थे, जब मैंने अपने बड़े भाई को कटु शब्द कहे थे।

3. आँख का काँटा होना – अत्यधिक खटकना।
प्रयोग – चुनाव के समय विपक्षी दल के सदस्य एक – दूसरे की आँख के काँटा होते हैं।

4. आँखों का तारा – अत्यधिक प्रिय होना। (म. प्र. 2011, 15)
प्रयोग – माँ को अपने सभी बच्चे प्रिय होते हैं परन्तु मोहन सबसे छोटा होने के कारण वह अपनी माँ की आँखों का तारा है।

5. आँच न आने देना – सम्भावित हानि का स्पर्श भी न होने देना।
प्रयोग – रक्षाबन्धन का त्यौहार भाइयों के समक्ष बहनों के अस्तित्व पर आँच न आने देने का प्रतीक है।

6. आग लगाना – भड़काना।
प्रयोग – परदेशी ने अशोक का नाम लेकर शिशुपाल के हृदय में आग लगा दी।

7. आकाश से बातें करना – बढ़ – चढ़कर बोलना।
प्रयोग नगर निगम का सदस्य बनते ही वह आसमान से बातें करने लगा।

8. आटे दाल का भाव मालूम होना – सच्चाई का ज्ञान।
प्रयोग – कार्यक्षेत्र का पूर्ण अनुभव होने पर ही आटे दाल का भाव मालूम होता है।

9. ईद का चाँद होना – कठिनता से दिखाई देना। (म. प्र. 2010, 15)
प्रयोग – रमेश ने जब दो महीने के बाद अपने मित्र को सामने से आते हुए देखा तो कहा कि आजकल तुम तो ईद के चाँद हो गये हो।

10. काया पलट होना – पूर्ण रूप से बदल जाना। (म. प्र. 2011)
प्रयोग – ज्ञानेश के पार्षद बनते ही मुहल्ले की काया पलट गई।

11. गला छुड़ाना – कष्ट से छुटकारा पाना।।
प्रयोग – रमेश पड़ोसियों का झगड़ा शांत करने गया था लेकिन पुलिस स्टेशन जाना पड़ गया, वह बहुत मुश्किल से गला छुड़ाकर भागा।

12. गड़े मुर्दे उखाड़ना – पुरानी बातें याद करना। (Imp.)
प्रयोग – विद्वान व्यक्ति गड़े मुर्दे उखाड़ने की अपेक्षा वर्तमान में जीना पसंद करते हैं।

13. गाल बजाना – व्यर्थ की बात करना। (म. प्र. 2013)
प्रयोग – सुरेन्द्र की बातों पर विश्वास मत करना, उसकी तो गाल बजाने की आदत पड़ गयी है।

14. टेढ़ी खीर – कठिन कार्य। (म. प्र. 2013)
प्रयोग – हिमालय की चढ़ाई करना टेढ़ी खीर है।

15. तिनके को पहाड़ करना – छोटी बात बड़ी बनाना। (म. प्र. 2013)
प्रयोग – आम लोगों में तो तिनके को पहाड़ करना कोई असम्भव बात नहीं है।

16. नोन, तेल, लकड़ी के फेर में पड़ना – आजीविका कमाने के चक्कर में रहना। (Imp.)
प्रयोग–नोन, तेल, लकड़ी के चक्कर में पड़ने के बाद मनुष्य को किसी वस्तु की सुध नहीं रहती।

17. नेत्र लाल होना – क्रोधित होना।
प्रयोग – लक्ष्मण की बातों को सुनकर परशुरामजी के नेत्र लाल हो गये।

18. नौ दो ग्यारह होना – भाग जाना।
प्रयोग – पुलिस को देखकर चोर नौ दो ग्यारह हो गये।

19. पहाड़ खड़ा होना बहुत बड़ी कठिनाई आना।
प्रयोग – तुर्की में भूकंप के कारण विपत्तियों का पहाड़ खड़ा हो गया।

20. पिंड न छोड़ना – पीछा न छोड़ना।
प्रयोग – नशे की आदत एक बार लग जाने से वह पिंड नहीं छोड़ती है।

21. फूला न समाना – अत्यधिक खुश होना।
प्रयोग – प्रथम श्रेणी में पास होने पर राधा फूली न समायी।

22. बंदर के हाथ में मोतियों की माला – अयोग्य व्यक्ति के हाथ में श्रेष्ठ वस्तु।
प्रयोग – मुरारी लाल के हाथ में सरपंच का पद बंदर के हाथ में मोतियों की माला की तरह है।

23. आकाश के तारे तोड़ना – असंभव कार्य करना।
प्रयोग – निशांत का बोर्ड परीक्षा में अव्वल आना आकाश के तारे तोड़ने के समान है।

24. कमर कसना – तैयार रहना। (म. प्र. 2010)
प्रयोग – कारगिल युद्ध के लिए भारतीय सैनिकों ने कमर कस लिया था।

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25. बाल बाँका न होना – कुछ भी हानि न होना।
ईश्वर जिसकी सहायता करता है, उसका कोई बाल बाँका नहीं कर सकता।

26. मिट्टी में मिला देना – नष्ट करना।
प्रयोग – मोहन को परीक्षा में नकल करते हुए जब अध्यापक ने पकड़ लिया तो उसकी सारी इज्जत मिट्टी में मिल गयी।

27. मिट्टी में मिलना – समाप्त होना।
प्रयोग – भारत में हुए घोटालों ने यहाँ की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला दी।

28. लहू सूखना – भयभीत होना।
प्रयोग – पुलिस को देखते ही चोर का लहू सूख गया।

29. हाथ के तोते उड़ना – घबरा जाना।
प्रयोग–अपराधी का जब पता नहीं लग रहा था तब शिशुपाल के हाथ से तोते उड़ने लगे।

30. ईंट से ईंट बजाना – टकराना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – चुनाव में ईंट से ईंट बज जाया करती है।

31. आँखों में धूल झोंकना – धोखा देना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – चोर आँखों में धूल झोंककर बैग लेकर फरार हो गया।

32. कब्र में पाँव लटकाना – मृत्यु करीब होना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – बुजुर्गों के पैर कब्र में लटके होते हैं।

33. कफन सिर से बाँधना – मरने के लिए तैयार रहना। (म. प्र. 2010)
प्रयोग – अभिमन्यु जब चक्र भेदन करने गया तब उसने कफन सिर से बाँधना शुरू किया।

34. उँगली उठाना – आलोचना करना। (म. प्र. 2015)
प्रयोग – मोहन की उन्नति देखकर उसके मित्रों ने उँगली उठाना शुरू कर दिया।

कुछ महत्त्वपूर्ण लोकोक्तियों के अर्थ एवं प्रयोग
1. आँख के अन्धे नाम नैनसुख – नाम और गुणों में अंतर।
प्रयोग—नाम तो करोड़ीमल, लेकिन पास में एक पैसा नहीं अर्थात् आँखों का अंधा और नाम नैनसुख।

2. अकल बड़ी या भैंस शारीरिक शक्ति से मानसिक शक्ति बड़ी होती है।
प्रयोग – उस आदमी ने बुद्धि के बल से एक पहलवान को पटक दिया वास्तव में अकल बड़ी कि भैंस।

3. आम के आम गुठलियों के दाम दोनों तरफ से लाभ होना। (Imp.)
प्रयोग रमेश को सरकारी नौकरी के साथ ही अमेरिका जाने का निमंत्रण भी मिला इसी को कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम।

4. ऊँची दुकान फीका पकवान—दुकान तो बड़ी प्रसिद्ध परन्तु माल घटिया।
प्रयोग नगर के सबसे धनाढ्य सेठ की दुकान में घटिया मिष्ठान देखकर वह बोला, ऊँची दुकान फीका पकवान।

5. ऊँट के मुँह में जीरा—आवश्यकता से कम देना।
प्रयोग—एक व्यक्ति की खुराक दस रोटी है, लेकिन जब वह खाने बैठा तो केवल दो रोटी ही दी, जो ऊँट के मुँह में जीरे के समान है।

6. थोथा चना बाजे घना गुणहीन आडम्बर अधिक करता है।
प्रयोग—पंडित जी बहुत बढ़ – चढ़ कर बातें कर रहे थे जब धर्म और दर्शन पर चर्चा हुई तो वे चुप्पी साध गये, इसे कहते हैं थोथा चना बाजे घना।

7. मान न मान मैं तेरा मेहमान – जबरदस्ती किसी के गले पड़ना।
प्रयोग – एक अपरिचित व्यक्ति रात के समय घर आकर बोला मैं यहाँ ठहरूँगा, इसी को कहते हैं कि मान न मान मैं तेरा मेहमान।

8. सिर मुड़ाते ही ओले पड़े – काम शुरू करते ही विघ्न पड़ना।
प्रयोग इसी साल खेती शुरू की और सूखा पड़ गया इसी को कहते हैं कि सिर मुड़ाते ही ओले पड़े।

9. व्याकरण, भाषा – बोध पर वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नांकित उपसर्ग मिश्रित शब्दों की जोड़ियाँ बनाइए
अभि, उप, कम, नि, कु, कुकर्म, उपलक्ष्य, कमजोर, अभिमान, निकम्मा।
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 30

प्रश्न 2.
थकावट, चटनी, बचाव, खटिया से प्रत्यय छाँटिए
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 31

प्रश्न 3.
‘परमार्थ में कौन – सी संधि है?
उत्तर–
दीर्घ स्वर संधि।

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प्रश्न 4.
‘सज्जन’ में कौन – सी संधि है?
उत्तर–
व्यंजन संधि।

प्रश्न 5.
‘दुष्कर में कौन – सी संधि है?
उत्तर–
विसर्ग संधि।

प्रश्न 6.
सही जोड़ियाँ बनाइए
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 32
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 33

प्रश्न 7.
‘लक्ष – लक्ष्य का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–
लक्ष – लाख।
लक्ष्य – उद्देश्य।

प्रश्न 8.
‘अवधि – अवधी’ का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–
अवधि – निश्चित समय।
अवधी – एक बोली

प्रश्न 9.
निरक्षर, निर्लज्ज का विलोम लिखिए।
उत्तर–
निरक्षर – साक्षर।
निर्लज्ज – सलज्ज।

प्रश्न 10.
पेड़, हवा के दो – दो पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर–
पेड़ – वृक्ष, तरु।
हवा – वायु, समीर।

प्रश्न 11.
‘आग लगाना’ मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर–
भड़काना।

प्रश्न 12.
‘आँख का तारा’ मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर–
अत्यधिक प्रिय।

प्रश्न 13.
‘आँख के अन्धे नाम नयन सुख’ का क्या अर्थ होता है?
उत्तर–
नाम एवं गुण में अंतर।

प्रश्न 14.
‘थोथा चना बाजे घना’ का क्या अर्थ होता है?
उत्तर–
गुणहीन अधिक आडम्बर करता है।

प्रश्न 15.
भाव पल्लवन में क्या किया जाता है?
उत्तर–
किसी भी भाव का विस्तार।

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प्रश्न 16.
संधि विच्छेद कर संधि का नाम लिखिए (म. प्र. 2009)
(i) निश्चल – निः + छल = विसर्ग संधि
(ii) गायक – गै + अक = अयादि स्वर संधि
(iii) दिग्गज – दिक् + गज = व्यंजन संधि
(iv) इत्यादि – इति + आदि = यण स्वर संधि।

प्रश्न 17.
कौन – से समास में दोनों पद प्रधान होते हैं? (म. प्र. 2009)
उत्तर–
द्वन्द्व समास।

प्रश्न 18.
‘मेघ’ पानी बरसते हैं। वाक्य शुद्ध अथवा अशुद्ध? (म. प्र. 2009)
उत्तर–
अशुद्ध।

प्रश्न 19.
(अ) जिसका कोई शत्रु न हो’ उसके लिए एक शब्द है (म. प्र. 2009, 15)
(ब) कविता रचने वाला। (म. प्र. 2015)
(स) कलाओं का सृजन करने वाला। (म. प्र. 2015)
(द) अभिमान करने वाला। (म. प्र. 2015)
उत्तर–
(अ) अजातशत्रु, (ब) कवि, रचयिता, (स) कलाकार, (द) अभिमानी।

प्रश्न 20.
“आपने भोजन कर लिया है।” वाक्य प्रश्न वाचक वाक्य की श्रेणी में आता है। यह वाक्य शुद्ध है या अशुद्ध। (म. प्र. 2011)
उत्तर–
अशुद्ध।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए (म. प्र. 2015)
(i) सीता और राम आता है। शुद्ध वाक्य – सीता और राम आते हैं।
(ii) अपन जल्दी चलें। शुद्ध वाक्य – हम जल्दी चलें।
(iii) गुप्त रहस्य की बात है। शुद्ध वाक्य – रहस्य की बात है।

प्रश्न 22.
विधि वाचक एवं प्रश्न वाचक वाक्य के एक – एक उदाहरण लिखिए। (म. प्र. 2015)
उत्तर–
विधि वाचक वाक्य – अशोक राजनगर में रहता है।
प्रश्न वाचक वाक्य – क्या तुम आज ही वापिस जाओगे?

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