MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण कृदन्त, तद्धित और स्त्री प्रत्यय

जिस अक्षर या अक्षर समूह को शब्द के अंत में जोड़ते हैं, उसे प्रत्यय कहते हैं। जिन प्रत्ययों को धातुओं में जोड़कर उनसे विशेषण अथवा अव्यय बनाए जाते हैं, उन्हें कृत-प्रत्यय कहते हैं, तथा इस प्रकार कृत्-प्रत्ययों से बनने वाले विशेषण या अव्यय कृदन्त कहलाते हैं। कृदन्तों के द्वारा अपूर्ण वर्तमान काल, पूर्वकालिक क्रिया, कर्म वाच्य (Passive Voice) आदि प्रकार के वाक्य बनाए जाते हैं।

कृदन्त के प्रमुख प्रकार निम्न हैं-

  • पूर्वकालिक कृन्दत
  • वर्तमानकालिक कृदन्त
  • भूतकालिक कृदन्त
  • हेतुवाचक कृदन्त
  • विधिवाचक कृदन्त

पूर्वकालिक कृदन्त

जब काई क्रिया पहले हो चुकी हो और उसके बाद दूसरी क्रिया हो, तब पहिले होने वाली क्रिया को पूर्वाकालिक क्रिया कहते हैं। पूर्वकालिक क्रिया को बतलाने के लिए पूर्वकालिक कृदन्त का प्रयोग करते हैं। इसका प्रयोग अव्यय की तरह होता है। अतः इसके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता है। क्त्वा और ल्यप् पूर्वकालिक कृदन्त के उदाहरण है। ये ‘करके’ के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

अनबंध-‘अनुबंध’ उन वर्गों को कहते हैं, जो ‘प्रत्यय’ में उच्चारण आदि के लिए लगे रहते हैं, पर बाद में लुप्त हो जाया करते हैं। अनुबंध को ‘इत’ या ‘अलग हो जानेवाला’ भी कहते हैं। अतः ‘इत्’ वर्गों को लोप हो जाता है।

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जैसे-

  • ज्ञान + क्तवा ज्ञात्वा

इसमें ‘क’ अनुबंध है, इसलिए जुड़ते समय इसका लोप हो गया। क्त्वा प्रत्यय-‘क्त्वा’ प्रत्यय जोड़ते समय धातु में केवल ‘त्वा’ जुड़ता है।

जैसे-
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त्वा जोड़ते समय कुछ धातुओं में ‘इकार’ (इ या ई की मात्रा) भी जुड़ता है।
जैसे-
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ल्यप् प्रत्यय-यदि धातु के पूर्व उपसर्ग जुड़ा हो, तो धातु में ‘क्त्वा’ के बदले ल्यप् प्रत्यय जोड़ा जाता है। धातु में जोड़ते समय केवल ‘य’ जुड़ता है।
जैसे-
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यदि धातु के पूर्व उपसर्ग जुड़ा हो और यदि ह्रस्व स्वरांत धातु है, तो धातु में ल्यप् प्रत्यय जोड़ते समय केवल ‘त्य’ जुड़ता है।

जैसे-
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हेतुवाचक कृदन्त

‘के लिए’ या ‘ने को’ के अर्थ में ‘तुमुन्’ प्रत्यय जोड़ते हैं। ‘तुमुन्’ जोड़ते समय प्रायः ‘तुम’ ही धातुओं में जुड़ता है। ये शब्द अव्यय होते हैं। इनके अंत में ‘म्’ रहता है।

जैसे-
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‘तुमुन्’ प्रत्यय को ऐसे शब्दों के पूर्व भी जोड़ते हैं, जिनका अर्थ ‘चाहना’ या ‘सकना’ होता है।

जैसे-

  • सः खेलितुं इच्छति। = वह खेलना चाहता है।
  • सः खेलितुं शक्नोति। = वह खेल सकता है।

विधिवाचक कृदन्त

‘चाहिए’ अथवा ‘योग्य’ के अर्थ को प्रकट करने के लिए धातु में अनीयर, या तव्यत् या यत् प्रत्यय लगाकर विधिवाचक कृदन्त बनाते हैं। यह विशेषण होता है। अतः इसका लिंग, वचन और कारक विशेष के अनुसार रहता है। पुल्लिंग में इसकी कारक रचना देव के समान, स्त्रीलिंग में नदी के समान तथा नपुंसकलिंग में फलम् के समान होती है।

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जैसे-
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भूतकालिक कृदन्त

क्त और क्त्वतु प्रत्यय भूतकालिक कृदन्त हैं।

‘क्त’ प्रत्यय-धातुओं के साथ कर्तवाच्य (Active Voice) में भूतकालिक कृदन्त का प्रयोग भूतकाल की क्रिया के स्थान किया जा सकता है। इसका लिंग, कारक और वचन कर्ता के समान होता है। धातु में ‘क्त’ प्रत्यय जोड़ते समय प्रायः केवल ‘त’ जुड़ता है।

जैसे-
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‘क्त’ प्रत्यय से युक्त शब्द के रूप पुल्लिंग में ‘देव’ शब्द के समान, स्त्रीलिंग में ‘माला’ शब्द के समान और नपुंसकलिंग में ‘जल’ शब्द के समान होते हैं। इनका वाक्यों में प्रयोग निम्नानुसार होता है

रामः गतः। = राम गया।
सीता गता। = सीमा गई।
बालकौ गतौ। = दो बालक गये।
बालिकाः गताः। = लड़कियाँ गईं।

यहाँ गतः, गता, गतौ, गताः शब्द विशेषण हैं। इसीलिए इनके लिंग, वचन नहीं हैं, जो वाक्यों में कर्ता के हैं। संस्कृत में भूतकाल के ये वाक्य बिना क्रिया शब्दों के ही पूरे हो जाते हैं।

‘क्तवतु’ प्रत्यय-धातु में ‘क्तवतु’ प्रत्यय जोड़ते समय प्रातः केवल ‘तवत्’ जुड़ता है। कर्तवाच्य (Active Voice) में इसका प्रयोग होता है। इसका लिंग, वचन और कारक कर्ता के अनुसार होता है।

जैसे-
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‘क्तवतु’ प्रत्यय से युक्त शब्द के रूप पुल्लिंग में ‘भगवत्’ शब्द के समान, स्त्रीलिंग में ‘नदी’ शब्द की भाँति और नपुंसकलिंग में ‘जगत्’ की भाँति होते हैं।

इनका वाक्यों में प्रयोग निम्नानुसार होता है-

  • सुरेशः ग्रामात् आगतवान्। = सुरेश गाँव से आया।
  • मारिः मूषक हतवान्। = बिल्ले ने चूहे को मार डाला।

वर्तमानकालिक कृदन्त

‘ता हुभा, ते हुए’ आदि अर्थ के लिए धातु में शतृ या शानच् प्रत्यय लगाए जाते हैं।

शतृ प्रत्यय-शतृ प्रत्यय का परस्मैपदी धातुओं में प्रयोग होता है। धातु के साथ जुड़ते समय केवल ‘अत्’ जुड़ता है। इनके रूप अत् अंत वाले शब्दों के समान चलते हैं।

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जैसे-
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शानच् प्रत्यय- शानच् प्रत्यय आत्मनेदी धातुओं में जोड़े जाते हैं। धातु के साथ जुड़ते समय शानच् का केवल ‘आन्’ या ‘मान’ बचता है।

जैसे-
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शतृ के समान यह भी विशेषण होता है। अतः इसका लिंग, वचन और कारक विशेष के अनुसार रहता है। पुल्लिंग में इसकी कारक रचना देव के समान, स्त्रीलिंग में लता के समान तथा नपुंसकलिंग में फल के समान होती है।

क्तिन् प्रत्यय-इससे भाववाचक संज्ञा पद बनाए जाते हैं। ये पद स्त्रीलिंगी होते हैं। धातु के साथ जुड़ते समय क्तिन् का केवल ‘ति’ बचता है।

जैसे-
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तद्वित प्रत्यय

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और अव्यय-पदों में जिन प्रत्ययों के योग से नवीन शब्द बनाए जाते हैं, उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं। प्रत्यय के साथ कोष्टक में दिए गए शब्द ही प्रायः शब्दों के साथ जुड़ते हैं।

जैसे-
1. अण् (कारः) प्रत्यय-कुंभ + कारः = कुंभकारः
(इसी प्रकार भाष्यकारः ग्रन्थकारः)
2. तत् (ता) प्रत्यय-भाव के अर्थ में
सुन्दर + तल् = सुन्दरता – गुरु + तल् = गुरुता
3. तरप् (तर) प्रत्यय-जब दो में से एक को गुण में दूसरे से अधिक या कम बतलाना हो, तो ‘तरप्’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। यह विशेष की उत्तरावस्था है। इसमें धातु में जोड़ते समय केवल ‘तर’ जुड़ता है।

जैसे-
अल्प + तरप् = अल्पतरः (से थोड़ा)
लघु + तरप् = लघुतरः (से छोटा)
स्थूल + तरप् = स्थूलतरः (से मोटा)
कृश + तरप् = कृशतरः (से दुबला)
दूर + तरप् = दूरतरः (से दूर)

4. तमप् (तम) प्रत्यय-जब अनेक में से एक के गुण को सबसे अधिक या कम बतलाना हो, तो ‘तमप्’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। यह विशेषण की उत्तमावस्था है। इसमें धातु में जोड़ते समय केवल ‘तुम’ जुड़ता है।

जैसे-
अल्प + तमप् = अल्पतमः (सबसे थोड़ा)
लघु + तमप् = लघुतमः (सबसे छोटा)
स्थूल + तमप = स्थूलतमः (सबसे मोटा)
कृश + तमप् = कृशतमः (सबसे दुबला)
दूर + तमप् = दूरतमः (सबसे दूर)

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5. मतुप् (मत्, वत्) प्रत्यय-वह इसमें है या वह इसका है-इस अर्थ में मतुप का प्रयोग होता है। मतुप् के पहले ‘अ’ स्वर रहने पर ‘म’ का ‘व’ हो जाता है। इसमें धातु में जोड़ते समय केवल ‘मान्’ जुड़ता है।

जैसे-
अंशु + मतुप् = अंशुमान् (किरणों वाला)
बुद्धि + मतुप् = बुद्धिमान् (बुद्धि वाला)
बल + मतुप् = बलवान् (बल वाला)
गुण + मतुप् = गुणवान् (गुण वाला)

6. इनि (इन) प्रत्यय-वह इसमें है या वह इसका है-इस अर्थ में इनि का प्रयोग नाम हेतु होता है। इसमें धातु में जोड़ते समय ‘ई’ जुड़ता है।

जैसे-
बल + इनि = बली (बलवान)
गुण + इनि = गुणी (गुणवान)

स्त्री प्रत्यय
टाप् (आ) और ङीप् (ई), इका, ई ङीष् (ई), डीन् (ई) प्रत्यय लगाकर रत्रीलिंग शब्द बनाए जाते हैं।
1. अकारान्त पुल्लिंग शब्दों में टाप् (आ) प्रत्यय लगाकर
पंडित + टाप् (आ) = पंडिता
अज + टाप् (आ) = अजा

2. पुल्लिंग शब्दों के अंत में अंक हो, तो इका हो जाता है।
जैसे-
बालक = बालिका, गायक = गायिका

3. ऋकारान्त पुल्लिंग शब्दों में ङीप् (ई) प्रत्यय लगाकर
अभिनेतृ + ङीप् (ई) = अभिनेत्री
कर्तृ + ङीप् (ई) = की

4. व्यंजनांत पुल्लिंग शब्दों के अंत में ङीप् (ई) प्रत्यय लगाकर
तपस्विन् = तपस्विनी,
श्रीमत् = श्रीमती
स्वामिन् = स्वामिनी

5. उकारांत गुणवाचक पुल्लिंक शब्दों और षित् आदि वाले शब्दों के अंत में ङीप् (ई) प्रत्यय लगाकर
नर्तकः = नर्तकी,
रजकः = रजकी

6. नु, नर आदि पुल्लिंग शब्दों के अंत में छीन् (ई) प्रत्यय लगाकर
नृ (ना) + ङीन् = नारी,
नर (नरः) + ङीन् = नारी
ब्राह्मण + ङीन् = ब्राह्मणी

अभ्यास

1. निम्नलिखित में कृत प्रत्यय पहचानिए-
गत्वा, कृत्वा, दृष्टवा, पठितम्, पुष्टवा, कोपितुम्, नत्वा, नेतुम्, याचितुम्।
2. निम्नलिखित में धातु और प्रत्यय अलग-अलग कीजिए-
पठितुम्, करणीयम्, दृष्टवा, पठित्वा, त्यक्तवा, जितुम्, विस्मृत्य, उपकृत्य।
3. निम्नलिखित उपसर्गयुक्त धातुओं में ल्यप् प्रत्यय जोड़िए-

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  • प्र + पा,
  • वि + जि,
  • प्र + नृत्,
  • सम् + भाष,
  • प्र + भाष,
  • प्र + नश्,
  • प्र + स्था,
  • प्र + नम्,
  • वि + स्मृ,
  • सम् + कृत,
  • सम् + भू,
  • प्र + हस्,
  • सम् + भ्रम्,
  • वि + हृ,
  • वि + लिख,

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MP Board Class 10th Sanskrit चित्र-आधारितम् वर्णनम्

MP Board Class 10th Sanskrit चित्र-आधारितम् वर्णनम्

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चित्र १.

चित्र १ को देखकर नीचे दिखे शब्दों की सहायता से संस्कृत में पाँच वाक्य बनाओ-

काकः, घटः, उपरि आगच्छिति, वनम्, पिपासितः, व्याकुलः, जलम्, न्यूनम्, पाषाणखण्डानि, पीत्वा, सन्तुष्टः, गच्छति, क्षिपति, आसीत्, सुः।

उत्तर-
(१) एकः काकः पिपनासितः आसीत्।
(२) सः वने एकं घटं पश्यति।
(३) घटे न्यूनम् जलं आसीत्।
(४) सः पाषाणखण्डानि घटे क्षिपति, जलं उपरि आगच्छति।
(५) जलं पीत्वा सः सन्तुष्टः भवति।

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चित्र २.

चित्र २ को देखकर अग्रलिखित शब्दों की सहायता से संस्कृत में पाँच वाक्य बनाओ-

अल्फ्रेड उद्यानम्, चन्द्रशेखरः, भुशुण्डी, गोलिकया, मारितवान्, उपायं, चिन्तितवान्, आरक्षकैः, सह, युद्धं, अकरोत्, आत्मानं, वृक्षस्य पृष्ठे, तत्र।

उत्तर-
(१) एतत् चित्रम्, ‘अल्फ्रेड’ उद्यानस्य अस्ति।
(२) एकदा चन्द्रशेखरः आजादः अल्फ्रेड उद्याने उपविष्टः आसीत्।
(३) तस्मिन् समये आङ्लआरक्षकाः तत्र आगतवन्तः।
(४) चन्द्रशेखरः आरक्षकैः सह युद्धं कृतवान्।
(५) अन्ते गोलिकया चन्द्रशेखरः आत्मानं मारितवान्।

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चित्र ३.

चित्र ३ को देखकर निम्नलिखित शब्दों की सहायता से संस्कृत में पाँच वाक्यों की रचना करो-

श्यामपटः, राष्ट्रगीतम्, वन्दे मातरम्, हारमोनियम इति वाद्ययन्त्रम्, बालकाः बालिकाः, च, सर्वे, अभ्यासः, पश्यन्ति, गायन्ति, कक्षस्य, इदम्, वादयति, चित्रम्।

उत्तर-
(१) इदम् चित्रम् एकस्य अस्ति।
(२) सर्वे छात्राः श्यामपटं पश्यन्ति।
(३) श्यामपटे राष्ट्रगीतं लिखितम् अस्ति।
(४) बालकाः बालिका च राष्ट्रगीतस्य अभ्यासं कुर्वन्ति।
(५) एक: छात्रः ‘हारमोनियम’ इति वाद्ययन्त्रं वादयति।

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MP Board Class 10th Sanskrit संवाद-लेखनम्

MP Board Class 10th Sanskrit संवाद-लेखनम्

(क) निम्नलिखित संवाद में मञ्जूषा की सहायता से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

मञ्जूषा – पुत्रि, सरणिम्, जनाः, मातः, अलम्।

माता- पुत्रि!सरणिम्उभयतः पश्य, किमपि वाहनंतुन आगच्छति।
पुत्री-मातः! (i) …………………. .उभयतः किमपि वाहनं न आगच्छति।
माता- (ii) …………………. ! पश्य, तत्र मोटरचालकः तीव्रगत्या आगच्छति।
पुत्री-आम्, (iii) …………………. ! पश्यामि।
माता-हा! धिक् मोटरचालकम्। मोटरवाहनेन एक:पुरुषः आहतः स च पतितः।
पुत्री-मातः! बहवः (iv) …………………. ! तं पश्यन्ति।
माता-हा! कोऽपि तं न उत्थापयति।
पुत्री-(तम् उत्थाप्य) मान्यवर …………………. ! (v) ” विषादेन। एतां त्रियक्रिकाम् आरोहतु भवान् ! भवन्तं गृहं नेष्यावः।
पथिकः- धन्ये युवाम् यत् माम् अपरिचितम् अपि उपकुरुथः।
उत्तर-
(i) सरणिम्,
(ii) पुत्रि,
(ii) मातः,
(iv) जनाः,
(v) अलम्।

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(ख) निम्नलिखित संवाद में मञ्जूषा में दिये गये शब्दों की सहायता से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

मञ्जूषा – पुरा, कालिदासस्य, कदा, इच्छसि, दृष्टम्, गमिष्यामि, अगच्छम्, माता, अहम्, लतिके।

अध्यापिका-नमिते! किं जानासि (i) …………………. कालम्।
नमिता-महाकविः कालिदासः (ii) …………………. अभवत्। परं तस्य कालं न जानामि।
अध्यापिका-राधे! त्वया तेन लिखितम् अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटकं (iii) ………………….।
राधा-आम्! महोदयं! अहं तत् नाटकं द्रष्टुं ह्यः (iv) ………………….।
अध्यापिका-नमिते! त्वम् इदं नाटकं द्रष्टुं (v) …………………. गमिष्यसि।
नमिता-अहं तु एतत् द्रष्टुं श्वः (vi) ………………….
अध्यापिका- (vii) …………………. किं त्वं नाटकं द्रष्टुं न (viii) ………………….?
लतिका-इच्छामि। यदा मम (ix) …………………. अनुमतिं दास्यति तदा (x) …………………. “द्रक्ष्यामि।
उत्तर-
(i) कालिदासस्य,
(ii) पुरा,
(iii) दृष्टम्,
(iv) अगच्छम्,
(v) कदा,
(vi) गमिष्यामि,
(vii) लतिके,
(viii) इच्छसि,
(ix) माता,
(x) अहम्।

(ग) अधोलिखित संवाद में मञ्जषा में संकेतों की सहायता से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

मञ्जूषा – शोभनम्, विवेक, अद्य, सन्देशः, मम, महाविद्यालये, किमर्थम्, विद्याम्।

वियोमः-भो (i) ………………….। अद्य त्वं (ii) …………………. “अतिप्रसन्नोऽसि?
विवेकः- (iii) …………………. अहम् एकं शुभसन्देशम् प्राप्तवान्।
ऋचा-कः (iv) …………………. अस्ति ?
विवेकः- (v) …………………. .अग्रजस्य सङ्गणकाभियान्त्रिक (vi) …………………. अध्येतुं जाबालिपुरस्य अभियान्त्रिक (vii) …………………. “चयनं जातम्।
वियोमः- एतत् तु अति (viii) …………………. !
उत्तर-
(i) विवेक,
(ii) किमर्थम्,
(ii) अद्य,
(iv) सन्देशः,
(v) मम,
(vi) विद्याम्,
(vii) महाविद्यालये,
(viii) शोभनम्।

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(घ) अधोलिखित संवाद में दिये गये मञ्जूषा में संकेतों की सहायता से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

मञ्जूषा – कारागारः, आजादः, भारतम्, तव, पितुः, कुत्र, सः, आजाद चन्द्रशेखरः सङ्गठनम्, स्वाधीनः।

आचार्यः–प्रथमं तु चन्द्रशेखरन्यायाधीशयोः संवादं शृणुत
न्यायाधीश:- किं (i) …………………. “नाम?
चन्द्रशेखरः- (ii) ………………….
न्यायाधीश:- किं तव (iii) ………………….” नाम?
चन्द्रशेखरः- (iv) ………………….
न्यायाधीश:- (v) ………………….” तव गृहम्?
चन्द्रशेखरः-(vi) ………………….”
पीयुष:- ततस्ततः?
आचार्य:-ततस्तु वैत्रप्रहारैः चन्द्रशेखरः मूर्च्छपर्यन्तं ‘जयतु | (vii) ………………….’ इति उच्चैः अघोषयत्। तस्मात् कालादेवः (viii) ………………….” इति नाम्ना प्रसिद्धः।
रमा स्वतन्त्रतायै (ix) …………………. किं कृतवान्?
आचार्यः-तेन ‘हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ इति स्वाधीनतासैनिकानाम् एकं (x) …………………. कृतम्।
उत्तर-
(i) तव,
(ii) आजादः,
(ii) पितुः,
(iv) स्वाधीनः,
(v) कुत्र,
(vi) कारागारः,
(vii) भारतम्,
(viii) आजाद। चन्द्रशेखरः,
(ix) सः,
(x) सङ्गठनं।

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MP Board Class 10th Sanskrit पत्र-लेखन प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit पत्र-लेखन प्रकरण

१. अवकाश प्रार्थनापत्रम्
(अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र)

सेवायाम्
श्रीमन्तः प्रधानाचार्यमहोदयाः,
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयः,
इन्दौरनगरम्, मध्यप्रदेशः
विषयः-अवकाशार्थं प्रार्थनापत्रम्

महोदयाः!
सविनयं निवेदनतम् अस्ति यद् अहम् अद्य सहसा ज्वरपीड़ितः अस्मि। अतः विद्यालयम् आगन्तुम् असमर्थः अस्मि। कृपया मम पञ्चदिवसानां (सप्तदिनाङ्कतः-एकादशदिनाङ्कपर्यन्तम्) अवकाशं स्वीकुर्वन्तु।

भवदीय:शिष्यः
कौशलः
कक्षा-दशमी ‘अ’ वर्गः

दिनाङ्क-०७/०८/२०…..

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२. छात्रवत्ति-हेतुः आवेदनपत्रम्
(छात्रवृत्ति के लिए आवेदन-पत्र)

प्रतिष्ठायाम्,
माननीयाः प्रधानाचार्यमहोदयाः,
शासकीय-उच्चतर माध्यमिक विद्यालयः,
भिण्डनगरम्,
मध्यप्रदेशः

विषयः-छात्रवत्ति-निमित्तम् आवेदनपत्रम्

महोदयाः!
सविनयं निवेदयामि यत् मम जनकस्य आर्थिकास्थितिः सम्यक् नास्ति। सः मम शिक्षार्थं प्रतिमासं शुल्कं दातुम् असमर्थः अस्ति। अतः श्रीमन्तः मह्यं छात्रवृत्तिं दापयन्तु इति प्रार्थये।

भवतां कृपाकांक्षी
धर्मेन्द्र शर्मा
कक्षा-दशमी ‘स’ वर्गः

दिनाङ्क-१२/०७/२०………………….

३. शुभकानापत्रम्
(शुभकामना पत्र)

भोपालतः
दिनाङ्क-२०-०७-२०….

प्रियवर्याः राजेशमहोदयात!
जयतु संस्कृतम्,

आशा अस्ति भवन्तः सानन्दाः सकुशलाः सन्ति। हर्षस्य विषयः यत् भवान् द्वादश कक्षायां प्रथम स्थानम् प्राप्तवान्। अस्माकं परिवारः भवतां सेवायां सप्रेम शुभकामना प्रेषयति, कामयते च भवतः उत्तरोत्तरं समुन्नतिम्।।

धन्यवादः

भवदीयः मित्रम्
संजयः

४. जन्मदिवसोत्सवस्य आमन्त्रणम्
(जन्मदिन के उत्सव का आमन्त्रण-पत्र)

मान्याः
नमोनमः,
महता हर्षेण सूचयामि यत् मम पुत्रस्य सार्थकस्य प्रथमजन्मदिवसः २५/१०/२०…..दिनाङ्क रविवासरे समायोजितः अस्ति।

कृपया अवसरोऽस्मिन् अवश्यं समागत्य बालकाय स्वकीयं शुभाशीषं दत्वा कृतार्थयन्तु भवन्तः।

स्थानम्-महावीरनगरम्, मथुरा

दिनाङ्क-२५/१०/२०…..

समय-सायं ६ वादनतः ८ वादनपर्यन्तम्

विनम्रः
डॉ.संजय शर्मा

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५. प्रकाशकाय पुस्तका) पत्रम्
(प्रकाशक को पुस्तक के लिए पत्र)

सेवायाम्,
श्रीमन्तः व्यवस्थापकमहोदयाः
शिवलाल अग्रवाल एण्ड कम्पनी
उज्जैन, मध्यप्रदेशः

महोदयाः!
भवत्संस्थानतः प्रकाशिता “शिवलाल हाईस्कूल संस्कृत दिग्दर्शिका” मया दृष्टा। एतत्पुस्तकं सर्वविध-छात्रोपयोगी वर्तते इति मे मतम्। कृपया पुस्तकस्य एकां प्रतिं वी.पी.पी. द्वारा अधोलिखितस्थाने शीघ्रं प्रेषयन्तु भवन्तः।

दिनाङ्क-२०/०८/२०…..

भवदीया
रेनू उपाध्यायः
हनुमान्नगरम्
मुरैना (मध्यप्रदेशः)

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण सन्धि-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण सन्धि-प्रकरण

दो या दो से अधिक वर्गों का मेल सन्धि है। दो या बहुत-से वर्णों को मिलाने से जो परिवर्तन होता है उसे सन्धि कहते हैं,

जैसे-
विद्या + अलायः = विद्यालयः। सन्धि के भेद-सन्धि के तीन भेद होते हैं
(I) स्वरः (अच्) सन्धि
(II) व्यञ्जन (हल्) सन्धि,
(III) विसर्ग सन्धि।

(I) स्वर (अच्) सन्धि
स्वर का स्वर से मेल होने पर जब स्वर में परिवर्तन होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं।
स्वर सन्धि के भेद-
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण सन्धि-प्रकरण img 1

१. दीर्घ सन्धि (सूत्र-अकः सवर्णे दीर्घः)
जब हृस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ स्वरों का मेल सवर्णों से अर्थात् क्रमशः ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ के साथ होता है तो दोनों वर्गों के स्थान पर दीर्घ (आ, ई, ऊ, ऋ) स्वर हो जाता है।

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२. गुण सन्धि (सूत्र-आद्गुणः)
जब अ/आ आगे इ/ई आये तो दोनों मिलकर ए, उ/ऊ आये तो दोनों मिलकर ओ, ऋ/ऋ आये तो दोनों मिलकर अर् तथा लु आये तो अल् हो जाता है।

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३. वृद्धि-सन्धि (सूत्र-वृद्धिरेचि)
जब अ या आ के आगे ए या ऐ आये तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ हो जाता है और ओ या औ आये तो दोनों मिलकर ‘औ’ हो जाता है।

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४. यण् सन्धि (सूत्र-इकोयणचि)
जब ह्रस्व या दीर्घ इ, उ, ऋ,ल के आगे कोई असमान स्वर आ जाता है तो इ-ई को य्, उ-ऊ को व्, ऋ-ऋ को र् और लु को ल हो जाता है।
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५. अयादि सन्धि (सूत्र-एचोऽयवायाव:) 1 जब ए, ऐ, ओ, औ के आगे कोई भी स्वर आता है, तो ‘ए’ को ‘अय्’, ‘ऐ’ को ‘आय’, ‘ओ’ को ‘अव्’ और ‘औ’ को ‘आव्’ हो जाता है।
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६. पूर्वरूप सन्धि (सूत्र-एङः पदान्तादति)
जब पद के अन्त में ‘ए’ अथवा ‘ओ’ आये और उसके आगे ह्रस्व ‘अ’ आये तो वह ‘अ’ अपने पूर्व आये स्वर (ए या ओ) का ही रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार ‘अ’ का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) हो जाता है।

  • वने + अस्मिन् = वनेऽस्मिन्
  • रामो + अपि रामोऽपि
  • हरे + अव = हरेऽव
  • विष्णो + अव = विष्णोऽव

(II) व्यञ्जन (हल) सन्धिः
जो वर्ण स्वर की सहायता से उच्चारित किया जाता है वह व्यञ्जन वर्ण होता है। स्वर के बिना व्यञ्जन वर्ण का उच्चारण कठिन होता है। दो व्यञ्जन वर्ण या व्यञ्जन और स्वर के बीच में जो सन्धि होती है वह व्यञ्जन सन्धि होती है। व्यञ्जन सन्धि के अनेक भेद होते हैं, उनमें से प्रमुख निम्न हैं-

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१. श्चुत्व सन्धि (सूत्र-स्तोः श्चुनाश्चुः)
‘स्’ अथवा ‘त’ वर्ग ( त् थ् द् ध् न्) के पहले या बाद में ‘श’ अथवा ‘च’ वर्ग (च् छ् ज् झ् ञ्) के वर्ण आते हैं तो ‘स्’ को ‘श्’ तथा ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) को क्रमशः ‘च’ वर्ग (च छ् ज् झ् ञ्) हो जाता है।

  • (स् को श्) → हरिस् + शेते = हरिश्शेते
  • (त् को च्) → सत् + चरित्रम् = सच्चरित्रम्
  • (स् को श्) → दुस् + चरित्रः = दुश्चरित्रः
  • (त् को च्) → उत् + चारणम् = उच्चारणम्

२. ष्टुत्व सन्धि (सूत्र-ष्टुना ष्टुः)
‘स्’ अथवा ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) के पहले या बाद में ‘ष्’ अथवा ‘ट’ वर्ग (ट् ठ् ड् ढ् ण) के वर्ण आते हैं तो ‘स्’ को ‘ष्’ तथा ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) को क्रमशः ‘ट’ वर्ग (ट् ठ्। ड् ढ् ण्) हो जाता है।

  • (स् को ष्) → रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः
  • (स् को ) → रामस् + टीकते = रामष्टीकते
  • (द् को ड्) → उद् + डयनम् = उड्डयनम्
  • (त् को ट्) → नष् + तः = नष्टः
  • (न् को ण्) → चक्रिन् + ढौकसे = चक्रिण्ढौकसे

३. जश्त्व सन्धि
(अ) पदान्त (सूत्र-झलां जशोऽन्ते)- पद (शब्द) के अन्त में झल् वर्णों (वर्ग के प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ वर्णों) के स्थान पर अपने वर्ग का तृतीय वर्ण (जश्-ज, ब्, ग्, ड्, द्) हो जाता है।

  • [ प्रथम वर्ण (त्) को तृतीय (द्) वर्ण ] वाक् + ईशः = वागीशः
  • [ प्रथम वर्ण (च्) को तृतीय (ज्) वर्ण ] अच् + अन्तः = अजन्तः
  • [ प्रथम वर्ण (त्) को तृतीय (द्) वर्ण] चित् + आनन्द = चिदानन्दः
  • [ प्रथम वर्ण (ट्) को तृतीय (ड्) वर्ण ] षट् + एव = षडेव

(ब) अपदान्त (सूत्र-झलां जश् झशि)- अपदान्त वर्ग के प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ वर्णों के आगे यदि कोई तृतीय
या चतुर्थ वर्ण आये तो पूर्व आये वर्ण के स्थान पर अपने वर्ग का। तृतीय वर्ण हो जाता है।

  • [चतुर्थ वर्ण (ध्) को तृतीय वर्ण (द्)] वृध् + धः = वृद्धः।
  • [चतुर्थ वर्ण (घ्) को तृतीय वर्ण (ग्) ] दुध् + धम् = दुग्धम्
  • [चतुर्थ वर्ण (भ्) को तृतीय वर्ण (ब्) ] आरभ् + धम् = आरब्धम्।
  • [चतुर्थ वर्ण (ध्) को तृतीय वर्ण (द्)] समृध् + धः = समृद्धः।

४. लत्व या परसवर्ण सन्धि (सूत्र-तोलि) ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) के बाद ‘ल’ आने पर ‘त’ वर्ग के स्थान पर (ल) हो जाता है।।

  • (त् को ल्) तत् + लयः = तल्लयः।
  • (त् को ल्) उत् + लासः = उल्लासः
  • (त् को ल्) तत् + लीनः = तल्लीनः
  • (न् को ल) विद्वान् + लिखति = विद्वाँल्लिखित

५. छत्व सन्धि (सूत्र-शश्छोऽटि)-
यदि शब्द के अन्त में ‘त’ वर्ग के बाद ‘श्’ हो और ‘श्’। के बाद कोई स्वर अथवा य, र व् ह हो तो ‘श्’ के स्थान पर। विकल्प से ‘छ्’ हो जाता है। ‘त’ वर्ग का ‘च’ वर्ग (श्चुत्व सन्धि के अनुसार हो जाता है।

  • तत् + शिवः = तच्छिवः।
  • सत् + शीलः = सच्छीलः
  • तत् + शिला = तच्छिला
  • श्रीमत् + शंकरः = श्रीमच्छंकरः

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६. अनुस्वार सन्धि (सूत्र-मोऽनुस्वारः)
शब्द के अंत में स्थित ‘म्’ के बाद कोई व्यंजन आए, तो ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार् (-) हो जाता है किन्तु अन्त में स्वर होता है तब यह नियम नहीं लगता।

  • (म् को अनुस्वार) धर्मम् + चर = धर्मं चर
  • (म् को अनुस्वार) हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
  • (म् को अनुस्वार) कृष्णम् + वन्दे = कृष्णं वन्दे
  • (म् को अनुस्वार) , सत्यम् + वद = सत्यं वद

७. अनुनासिक सन्धि
(सूत्र-यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा)-पद के अन्त में स्पर्श व्यञ्जन (किसी वर्ग का कोई वर्ण) के बाद किसी वर्ग का पंचम वर्ग आने पर पहले वाले वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का पंचम वर्ण विकल्प से हो जाता है।

  • (क् को ङ्) दिक् + नागः = दिङ्नागः
  • (त् को न्) एतत् + मुरारिः = एतन्मुरारिः
  • (ट् को ण्) षट् + मुखः = षण्मखः

(III) विसर्ग सन्धि विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन का मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं।
नियम १. यदि विसर्ग के पश्चात् ‘च’ अथवा ‘छ’ हो तो विसर्ग के स्थान पर ‘श्’ हो जाता है।

जैसे-

  • रामः + चलति = रामश्चलति (विसर्ग को श्)
  • निः + छलः = निश्छलः (विसर्ग को श्)

नियम २. यदि विसर्ग के पश्चात् ‘न्’ अथवा ‘थ्’ हो तो विसर्ग के स्थान पर ‘स्’ हो जाता है।

जैसे-

  • नमः + ते = नमस्ते (विसर्ग को स्)
  • निः + तारः = निस्तारः (विसर्ग को स्)

नियम ३. यदि विसर्ग के पहले तथा बाद में ‘अ’ हो तो विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ हो जाता है एवं जो ‘अ’ वर्ण होता है उसका पूर्वरूप ‘5’ हो जाता है।

जैसे-

  • सः + अपि = सोऽपि (विसर्ग को ओ तथा अ को 5)
  • सः + अस्ति = सोऽस्ति (विसर्ग को ओ तथा अ को 5)

४. नियम ४. यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ हो तथा बाद में अ’ को छोड़कर कोई भी स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है।

जैसे-

  • रामः + आगतः = राम आगतः (विसर्ग का लोप)
  • सूर्यः + उदेति = सूर्य उदेति (विसर्ग का लोप)

नियम ५. यदि विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और बाद में किसी वर्ग का तृतीय, चतुर्थ या पंचम वर्ण हो, तो ‘अ’ और विसर्ग के। स्थान पर ‘ओ’ हो जाता है।

जैसे-

  • वयः + वृद्धः = वयोवृद्धः (अ और विसर्ग को ओ)
  • पुरः + हितः = पुरोहितः (अ और विसर्ग को ओ)

नियम ६. यदि विसर्ग से पहले ‘आ’ हो और विसर्ग के आगे किसी वर्ग का तृतीय, चतुर्थ, पंचम वर्ण अथवा य् र् ल् व् ह हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है।

जैसे-

  • देवाः + गच्छन्ति = देवा गच्छन्ति (विसर्ग का लोप)
  • नराः + हसन्ति = नरा हसन्ति (विसर्ग का लोप)

नियम ७. यदि अ-आ को छोड़कर अन्य किसी स्वर के आगे विसर्ग हो और विसर्ग के आगे कोई भी स्वर या वर्ग का तृतीय,। चतुर्थ, पंचम वर्ण अथवा य व र ल ह में से कोई भी अक्षर हो तोविसर्ग के स्थान पर ‘र’ हो जाता है। यदि ‘र’ के पश्चात् कोई स्वर होता है तो ‘र’ स्वर में मिल जाता है एवं व्यंजन होता है तो।  ‘र’ का ऊर्ध्वगमन (रेफ) हो जाता है।

जैसे-

  • भानुः + उदेति = भानुरुदेति (विसर्ग को र)
  • निः + जनः = निर्जनः (विसर्ग को र्)
  • दुः + आत्मा = दुरात्मा (विसर्ग को र्)
  • गुरोः + आदेशः = गुरोरादेशः. (विसर्ग को र)

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न १.
‘दीर्घ’ सन्धि है-
(अ) गणेश,
(ब) एकैकः
(स) विद्यालय,
(द) नायकः
उत्तर-
(स) विद्यालय,

प्रश्न २.
‘रमा + ईशः’ = ………………………………. होगा।
(अ) राजेश,
(ब) रामेशः
(स) रोमेशः,
(द) रमेशः
उत्तर-
(द) रमेशः

प्रश्न ३.
‘यण’ सन्धि का सूत्र है
(अ) अकः सवर्णे दीर्घः
(ब) इकोयणचि,
(स) आद्गुणः
(द) वृद्धिरेचि
उत्तर-
(ब) इकोयणचि,

प्रश्न ४.
‘उल्लासः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(अ) उल् + लासः,
(ब) उत् + लासः,
(स) उल्ला + सः,
(द) उ+ ल्लासः।।
उत्तर-
(ब) उत् + लासः,

प्रश्न ५.
‘नमस्ते’ का सन्धि-विच्छेद है
(अ) नम + ते,
(ब) नमः + ते,
(स) नम + स्ते,
(द) न + मस्ते।
उत्तर-
(ब) नमः + ते,

रिक्त स्थान पूर्ति
१. पुस्तक + आलय : = ……………………………….
२. गण + ईश : = ……………………………….
३. सदा + एव : = ……………………………….
४. सु + अस्ति = ……………………………….।
५. पवनः = ……………………………….
उत्तर-
१. पुस्तकालयः,
२. गणेशः,
३. सदैव,
४, स्वस्ति,
५. पो + अनः।

सत्य/असत्य
१. नमः + ते = नमस्ते
२. कपि + ईशः = कवीशः
३. आद्गुणः = दीर्घ सन्धि
४. एचोऽयवायावः = पूर्वरूप सन्धि
५. गिरि + ईशः = गिरीशः
उत्तर-
१. सत्य,
२. असत्य,
३. असत्य,
४. असत्य,
५. सत्य।

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♦ जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण सन्धि-प्रकरण img 10
उत्तर-
१. → (iii)
२. → (iv)
३. → (i)
४. → (ii)

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MP Board Class 10th Sanskrit कथाक्रमसंयोजनम्

MP Board Class 10th Sanskrit कथाक्रमसंयोजनम्

निम्नलिखित वाक्यों के घटना के अनुसार क्रम से लगाओ
(क)
(१) तेषां मध्ये सर्पः फटाटोपं कुर्वन् न्यगदत्।
(२) पक्षिणः तस्य शाखासु नीडानि विरच्य वसन्ति स्म।
(३) कस्मिंश्चित् ग्रामे एकः प्राचीनः विशाल: न्यग्रोधवृक्षः आसीत्।
(४) अनन्तरं शुकः उच्चैः अभणत्।
(५) अस्माभिः मानवैः अपि वृक्षसम्पत् वर्धनीया ननु।
(६) अहम् अस्मिन् वृक्षे चिरात् वसामि’ इति काकः अवदत्।
(७) ततःशाखातःशाखान्तरं चंक्रम्य एकः कीट: प्रत्यवदत्।
(८) वृक्षच्छेदकम् आह्वयामि इमं वृक्षं खण्डशः कर्तुम्।
(९) काकस्य रहनं श्रुत्वा सर्वे प्राणिनः पशवः पक्षिणः साश्च समायाताः।
(१०) ततश्च कृमयः कीटाश्च स्वं-स्वम् अधिकारं घोषयन् कोलाहलम् अकुर्वन्।
उत्तर-

(३) → (२) → (६) → (९) → (१) → (७) → (४) → (१०) → (८) → (५)।

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(ख)
(१) पीवरतनुरुष्ट्री सज्जाता।
(२) अहो! धिगियं दरिद्रताऽस्मद्गेहे।
(३) ततश्च गुर्जरदेशं गत्वोष्ी गृहीत्वा स्वगृहमागतः।
(४) सोऽपि दासेरको महानुष्ट्रः सज्जातः।
(५) सः प्रसववेदनया पीड्यमानाम् उष्ट्रीम् अपश्यत्।
(६) इति चिन्तयित्वा देशान्निष्क्रान्तः।
(७) कस्मिश्चिदधिष्ठाने उज्जवलको नाम रथकारः प्रतिवसति स्म।
(८) स च पूर्वदासेरको मदातिरेकात्पृष्ठे आगत्य मिलति।
(९) ततस्तेन महदुष्ट्रयूथं कृत्वा रक्षापुरुषो धृतः।
(१०) ततः सः नित्यमेव दुग्धं गृहीत्वा स्वकुटुम्बं परिपालयति।
उत्तर-

(७) → (२) → (६) → (५) → (१) → (४) → (१०) → (३) → (९) → (८)।

(ग)
(१). तत्र मुनेः पुरतः ते अश्वं दृष्टवन्तः।
(२) सूर्यवंशस्य राजा सगरः आसीत्।
(३) सः गङ्गां भूमौ आनीतवान्।
(४) सः एकदा अश्वमेधयागं कृतवान्।
(५) भगीरथः तपः कृतवान्।
(६) तस्मात् सः मागस्य विघ्नं कर्तुम् मार्ग चिन्तितवान्।
(७) सगरस्य वंशे भगीरथस्य जन्म अभवत्।
(८) अश्वमेधं कृत्वा सगरः स्वयम् इन्द्रः भविष्यति इति देवेन्द्रस्य असूया आसीत्।
(९) कुपितः मुनि सगरपुत्रान् क्रोधाग्निना दग्धवान्।
(१०) सगरस्य षष्टिसहस्रपुत्राः अश्वम् अन्वेष्टुं सर्वत्र गतवन्तः।
उत्तर-

(२) → (४) → (८) → (६) → (१०) → (१) → (९) → (७) → (५) → (३)।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

शब्द  पर्यायवाची शब्दः
आकाशः नभः, गगनम्, व्योयम्, अन्तरिक्षम, अम्बरम्, खम्।
राजा भूपतिः, नृपः, अधिपतिः, नरेशः, नृपतिः।
वायुः अनिलः, समीरः, वातः, पवनः, मारुतः, गन्धवहः।
सूर्यः रविः, दिनकरः, भानुः, दिवाकरः, दिनेशः।
कमलम् पंकजम्, नीरजम्, अम्बुजम्, सरोजम्, सरोरुहम्।
गंगा भागीरथी, मन्दाकिनी, देवनदी, सुरनदी।
पर्वतः गिरीः, अचलः, भूधरः, शैलः, महीध्र, नगः।
अग्निः पावकः, वह्नि, अनलः, हुताशनः।
अमृतम् पीयूषम्, सुधा, सोमः
पृथ्वी भूमिः, अवनिः, मही, धरा, वसुन्धरा, वसुधा, भू।
जलम् वारि, नीरम्, सलिलम्, अम्बु, तोयम्।
समुद्रः वारिधिः, जलधिः, सागरः, नदीशः, सिन्धुः।
पक्षी खगः, विहगः, द्विजः, विहंगम्, पतलिः।
नदी निम्नगा, गिरितनया, सरित्, निर्झरिणी।
नेत्रम् अक्षि, चक्षुः, दृक, लोचनम्, नयनम्।
चन्द्रमा चन्द्रः, इन्दुः, निशाकरः, विधुः, सुधाकरः, मयंकः।
दुग्धम् पयः, द्रुमः, विटपः, महीरुहः।।
गजः मातंगा, करि, वारणः, हस्ती, द्विपः, नागः, कुञ्जरः।
रात्रिः रजनी, निशा, यामिनी, विभावरी।

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण

संज्ञा, सर्वनाम और विशेषणों में लिंग के अनुसार एवं शब्दों के अन्तिम स्वर अथवा अन्तिम व्यञ्जन के अनुसार परिवर्तन होता है। जिस प्रकार हिन्दी भाषा में कंर्ता, कर्म, करण आदि कारकों का सम्बन्ध प्रकट करने के लिए “ने, को, से/के द्वारा” इत्यादि चिन्ह संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि में जोड़े जाते हैं। उसी प्रकार संस्कृत भाषा में इन सम्बन्धों को प्रकट करने के लिए विभक्तियों के रूप रखे जाते हैं। इनमें हिन्दी के समान अलग से कोई चिह्न नहीं लगता है।

जैसे-
हिन्दी भाषा – संस्कृत भाषा
बालक ने → बालकः
बालक को → बालकम्
बालक से → बालकेन
दो बालकों को → बालकौ इत्यादि।

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(I) संज्ञा शब्दों के रूप
अकारान्त पुल्लिङ्ग “राम” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 1

निर्देश-‘राम’ शब्द के समान ही बालक, छात्र, नर, पुत्र, वानर इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
इकारान्त पुल्लिङ्ग “कवि” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 2

निर्देश-‘कवि’ शब्द के समान ही हरि, रवि, कपि, गिरि, अग्नि इत्यादि शब्दों के रूप बनेंगे।
उकारान्त पुल्लिङ्ग “साधु” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 3

निर्देश- साधु’ शब्द के समान ही गुरु, भानु, तरु, पशु, रिपु इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
ऋकारान्त पुल्लिङ्ग “पितृ” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 4

निर्देश-‘पितृ’ शब्द के समान ही दातृ, भ्रातृ इत्यादि के रूप होते हैं।
हलन्त पुल्लिङ्ग “राजन्” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 5
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 35

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हलन्त पुल्लिङ्ग “भवत्” (आप) शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 6

निर्देश- भवत्’ शब्द के समान ही गच्छत्, धीमत्, श्रीमत्, बुद्धिमत् इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
हलन्त पुल्लिङ्ग “आत्मन्” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 7

निर्देश-‘आत्मन्’ शब्द के समान ही ब्रह्मन्, अध्वन् आदि के रूप होते हैं।
आकारान्त स्त्रीलिङ्ग “रमा” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 8
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 36

निर्देश-‘रमा’ शब्द के समान ही बाला, बालिका, लता, छात्रा, माला, सीता इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
इकारान्त स्त्रीलिङ्ग “मति” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 9

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निर्देश-‘मति’ शब्द के समान ही गति, औषधि, भूमि, जाति इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग “नदी” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 10

निर्देश-‘नदी’ शब्द के समान ही जननी, पार्वती, पत्नी, नारी इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग “मातृ” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 37
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 11

निर्देश-‘मातृ’ शब्द के समान ही ‘दुहितृ’ इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
अकारान्त नपुंसकलिङ्ग “फल” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 12

निर्देश-‘फल’ शब्द के समान ही पुस्तक, गृह, पुष्प, वन | इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
इकारान्त नपुंसकलिङ्ग “वारि” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 13

निर्देश-‘मधु’ शब्द के समान ही वसु, अश्रु, अम्बु इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
नकारान्त नपुंसकलिङ्ग “नामन्” शब्द
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण img 14

निर्देश-‘नामन्’ शब्द के समान हेमन्, प्रेमन्, व्योमन्, धामन्, दामन्, सामन्, लोमन् इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
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(II) सर्वनाम शब्दों के रूप
नोट-सर्वनाम शब्दों में सम्बोधन नहीं होता। इसलिए इनके रूप प्रथमा से सप्तमी विभक्ति तक ही चलते हैं, सम्बोधन में नहीं।
“अस्मद्” (मैं, हम) शब्द
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“युष्मद्” (तू, तुम, तुझे) शब्द
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पुल्लिङ्ग “तत्” (वह, उस) शब्द
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स्त्रीलिङ्ग “तत्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “तत्” शब्द
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पुल्लिङ्ग “एतत्” शब्द (यह)
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स्त्रीलिङ्ग “एतत्” शब्द (यह)
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नपुंसकलिङ्ग “एतत्” शब्द (यह)
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पुल्लिङ्ग “किम्” (कौन, किस) शब्द
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स्त्रीलिङ्ग “किम्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “किम्” शब्द
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पुल्लिङ्ग “यत्” (जो) शब्द
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स्त्रीलिङ्ग “यत्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “यत्” शब्द
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पुल्लिङ्ग “इदम्” (यह, दस, ये, इन) शब्द

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स्त्रीलिङ्ग “यत्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “इदम्” शब्द
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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न १.
‘राम’ शब्द का षष्ठी विभक्ति का रूप है
(अ) रामः,
(ब) रामम्,
(स) रामेण,
(द) रामस्य।

२. ‘कवि’ शब्द का द्वितीया विभक्ति का रूप है
(अ) कविम्,
(ब) कविः
(स) कविना,
(द) कवेः।

३. ‘साधोः’ शब्द में विभक्ति है
(अ) प्रथमा,
(ब) द्वितीया,
(स) चतुर्थी,
(द) पंचमी।

४. ‘पित्रा’ शब्द में विभक्ति है
(अ) चतुर्थी,
(ब) तृतीया,
(स) प्रथमा,
(द) पंचमी।

५. ‘राज्ञः’ शब्द में विभक्ति है
(अ) प्रथमा,
(ब) षष्ठी
(स) सप्तमी,
(द) सम्बोधन।
उत्तर-
१. (द),
२. (अ),
३. (द),
४. (ब),
५. (ब)

रिक्त स्थान पूर्ति
१. ‘रामेण’ शब्द में ………………………………. विभक्ति है।
२. ‘रमायै’ शब्द ………………………………. विभक्ति का है।
३. ‘कवि’ शब्द द्वितीया विभक्ति बहुवचन का रूप ………………………………. है।
४. ‘साधुना’ शब्द में ………………………………. विभक्ति है।
५. ‘पितुः’ शब्द ………………………………. विभक्ति का है।
उत्तर-
१. तृतीया,
२. चतुर्थी,
३. कवीन्,
४. तृतीया,
५. षष्ठी।

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सत्य/असत्य
१. ‘माम्’ रूप प्रथमा विभक्ति का है।
२. ‘राज्ञा’ रूप तृतीया विभक्ति में बनता है।
३. ‘तेन’ रूप में तृतीया विभक्ति है।
४. ‘रामे’ रूप प्रथमा विभक्ति से बनता है।
५. ‘रमायाः’ रूप पंचमी और षष्ठी विभक्ति में बनता है।
उत्तर-
१. असत्य,
२. सत्य,
३. सत्य,
४. असत्य,
५. सत्य।

जोड़ी मिलाइए
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उत्तर-
१. → (iii)
२. → (i)
३. → (iv)
४. → (ii)
५. → (vi)
६. →(v)

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण उपसर्ग-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण उपसर्ग-प्रकरण

धातु या धातु से बने अन्य शब्दों (संज्ञा, विशेषण) आदि से पूर्व लगने वाले निम्नलिखित २२ शब्दांशों को उपसर्ग कहते हैं-
(१) प्र, (२) परा, (३) अप, (४) सम्, (५) अनु, (६) अव, (७) निस् , (८) निर्,
(९) दुस्, (१०) दुर, (११) वि, (१२) आङ्, (१३) नि, (१४) अधि, (१५) अपि, =
(१६) अति, (१७) सु , (१८) उत्, (१९) अभि, (२०) प्रति, – (२१) परि, (२२) उप।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

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प्रश्न १.
‘परा’ उपसर्ग युक्त शब्द है
(अ) परिजनः,
(ब) पराजयः
(स) प्रहारः,
(द) परितः
उत्तर-
(ब) पराजयः

२. ‘अपवादः’ शब्द में उपसर्ग है-
(अ) अ,
(ब) पवा,
(स) आप,
(द) अप।
उत्तर-
(द) अप।

३. ‘सम्’ उपसर्ग युक्त शब्द है
(अ) संस्कृतम्
(ब) सज्जनः,
(स) सत्कर्म,
(द) सकलः
उत्तर-
(अ) संस्कृतम्

४. ‘अनु’ उपसर्ग है
(अ) अनुकरणम्,
(ब) अनुत्तरः,
(स) अनुर्घः,
(द) अनुक्तिः
उत्तर-
(अ) अनुकरणम्,

५. ‘बालकः उद्याने बिहरति’ में उपसर्ग युक्त शब्द है
(अ) बालकः,
(ब) उद्याने,
(स) विहरति,
(द) कोई नहीं।
उत्तर-
(स) विहरति,

रिक्त स्थान पूर्ति
१. ‘पराभवः में ……………………………” उपसर्ग है।
२. ‘अनुस्मरणम्’ में ……………………………” उपसर्ग है।
३. ‘सम्’ उपसर्ग ‘हारः’ में लगाकर ……………………………” बनता
४. ‘अवतारः’ में ……………………………” उपसर्ग है।
५. ‘दुर्व्यवहारः’ में ……………………………” उपसर्ग है।
उत्तर-
१. परा,
२. अनु,
३. संहारः,
४. अव,
५. दुर्।

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सत्य/असत्य
१. ‘अभिज्ञानम्’ में ‘अभि’ उपसर्ग है।
२. ‘आचारः’ में ‘अति’ उपसर्ग लगाने पर ‘अत्याचार’ शब्द बनता है।
३. ‘प्रत्येक’ में ‘प्र’ उपसर्ग है।
४. ‘उपहारः’ में ‘हार’ उपसर्ग है।
५. ‘उत्कर्ष’ में ‘उत्’ उपसर्ग है।
उत्तर-
१. सत्य,
२. सत्य,
३. असत्य,
४. असत्य,
५. सत्य।

जोड़ी मिलाइए
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उत्तर-
१. → (v)
२. → (i)
३. → (ii)
४. → (iii)
५. → (iv)

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण समय ज्ञान-प्रकरण

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घड़ी के चित्र की सहायता से अंकों के स्थान पर संस्कृत में शब्दों में समय लिखना

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