MP Board Class 11th Special Hindi प्रायोजना कार्य

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अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अभाव में नवीन चिन्तन, नवीन विचार, नवीन धारणाएँ आकार नहीं ले पाती, न कोई सृजन हो पाता है। छात्र इस स्तर तक आते-आते क्रमशः अपनी भाषा के विकास के क्रम में इतना सक्षम हो जाता है कि वह अपने सबसे प्रभावशाली साधन बोली का उपयोग करे। अपने अनुभव एवं अपने विचार व्यक्त करे। क्षेत्रीय बोली की कहावतें, चुटकुलों और लोकगीतों का संग्रह कर उनका परिचय प्राप्त करे। अपने क्षेत्र की पत्र-पत्रिकाओं का पाठ्य-पुस्तकों के अलावा अध्ययन करे।

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1. भाषा के विविध क्षेत्रों का परिचय भाषा के चार मुख्य क्षेत्र हैं-

  • सुनना-श्रवण,
  • बोलना-भाषण,
  • पढ़ना-पठन,
  • लिखना-लेखन।

इस विषय का समावेश पाठ्यक्रम में इसलिए किया गया है कि बालक कक्षा 11वीं के स्तर तक भाषा के इन चारों स्तरों से भली-भाँति परिचित हो जाता है। अब उन्हें शिक्षकों द्वारा अपनी इन भाषायी योग्यता के विस्तार की प्रेरणा देना है। वह अपनी इस योग्यता से पाठ्य-पुस्तक के अतिरिक्त भी कुछ पढ़े-लिखे और इस क्रिया में रुचि उत्पन्न करने के लिए शिक्षक छात्रों को यह गृह कार्य दें कि वे अपने-अपने क्षेत्र की बोली की कहावतें, चुटकुले और लोकगीतों का संग्रह करें। इसके अतिरिक्त छात्रों को कक्षा में तथा गृह कार्य के रूप में यह लेखन कार्य दिया जाये कि वे अपने क्षेत्र की पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ें और उसमें उन्हें जो भी विवरण रोचक लगे उसे अपने शब्दों में लिखें। इससे उनका पठन-कौशल और लेखन-कौशल विकसित होगा।

छात्र के श्रवण कौशल को विकसित करने के लिए वह दूरदर्शन के रोचक कार्यक्रमों को सुने और उसे जो भी कार्यक्रम रुचिकर लगे उसे लिखे।

इस प्रकार छात्रों को पाठ्य-पुस्तक के अतिरिक्त अपनी भाषायी योग्यता विस्तार का अवसर प्राप्त होगा।

मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा वह राज्य है जिसकी सीमाओं को सात प्रदेश घेरे हैं। अतः मध्य प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्रीय भाषा या बोलियाँ अस्तित्व में हैं।

शिक्षक अपने-अपने क्षेत्र की भाषा के लोकगीतों एवं कहावतों का संग्रह छात्रों से करवायें। हमारे प्रदेश में मुख्य रूप से मालवी, निमाड़ी, बुन्देलखण्डी, बघेलखण्डी, छत्तीसगढ़ी, मराठी, गुजराती, मारवाड़ी बोली जाती हैं, अतएव इनके चुटकुले, गीत, कविता, कहावतें एकत्रित करें। उदाहरण के तौर पर मालवा, निमाड़ क्षेत्र का मुख्य समाचार-पत्र है ‘नई दुनियाँ’, जो इन्दौर से प्रकाशित होता है। उसमें प्रत्येक बुधवार को इस तरह की रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। इस क्षेत्र के छात्र उनका संग्रह कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में चालीस से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अलग-अलग बोलियाँ हैं। झाबुआ के निवासी भील हैं और इनकी भीली बोली में मुहावरों का अत्यधिक प्रचलन है। हम यहाँ कुछ भीली मुहावरे और उनका हिन्दी अर्थ दे रहे हैं। छात्र अपने अध्यापकों की सहायता से अपने आस-पास बसने वाले आदिवासियों की लोक कथाएँ, कविता, मुहावरे, कहावतें संकलित कर उनका हिन्दी अनुवाद करें।

सुबह, दोपहर, शाम समय की सूचना वाले मुहावरे

भीली बोली पर मालवी, राजस्थानी, गुजराती भाषाओं का पर्याप्त प्रभाव है।
भीली कहावतें

  1. भूखला तो भूखला सूकला खरी-भूखा ही सही पर सुखी तो हूँ।
  2. भील भोला ने चेला-भील भोले होते हैं।
  3. खारड़ा माँ काँटो, भील माँ आटो भील में बदले की भावना रहती है।
  4. पाली पपोली मनाव राखवू घणो मसकल है. भील को खुशामद से मनाना बहुत मुश्किल है।
  5. ढोली नौ सौरो गाद्यो नी मरे न भील, सौरो रोद्यो नी मरे-ढोली का लड़का गाने से और भील का लड़का रोने से नहीं मरता-वे अभावों से जूझते रहते हैं।
  6. भील भाई ने डगले दीवो-भील भले ही अभावग्रस्त रहे, वह सदा निश्चिन्त रहता है।

कुछ बुन्देली बोली की कहावतें

  1. खीर सों सौजं, महेरी को न्यारे।
  2. पराई पातर को बरा बड़ो।
  3. पराये बघार में जिया मगन।
  4. देवी फिरै बिपत की मारी पण्डा कहै करो सहाय।
  5. रौन कुमरई की कुतिया (लोककथन)।
  6. नौनी के नौ मायके, गली-गली सुसरार।
  7. जौन डुकरिया के मारे न्यारे भए बई हिस्सा में परी।
  8. माँगे को मठा मोल पर गौ।
  9. कानी अपने टेण्ट तो निहारत नईया दूसरे की फुली पर पर के देखत।
  10. कनबेरी देवो।
  11. मर गई किल्ली काजर खों।

2. पहेलियाँ

1. भीली भाषा – उत्तर
1. गाय वाकड़ी ने बेटी डाकणी – तीर-कमान
2. धवल्या बुकड़ा ने बारेह खाल – प्याज
3. औंधे बाटके ने दही लटके – कपास
4. भूत्या हेलग्या ने पेटा में दाँत – कद्दू
5. छोटी-सी दड़ी, दगड़-सी लड़ी – सुपारी

2. बुन्देली
1. थोड़ो सो सोनो, घर भर नोनो – दीपक
2. दीवार पर धरो टका, ऊको तुम उठा पाओ न बाप न कका – चन्द्रमा
3. ठाड़े हैं तो ठाड़े हैं, बैठे हैं तो ठाड़े हैं। – सींग
4. सीताजी की गोल-गोल, शिवजी को आड़ो – सीताजी की गोल बिंदिया
बूझो पहेली मोरी रामजी को – शिवजी का आड़ा त्रिपुण्ड और रामजी
ठाँड़ों। – का खड़ा रामनामी तिलक।

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3. निमाड़ी
1. एक बाई असा कि सरकजड नी – दीवाल
2. काली गाय काँटा खाय, पाणी देखे बिचकी जाय जूता

4. बघेली
अड़ी हयन, खड़ी हयन, लाख मोती जड़ी हयन बाबा केरे बाग में दुशाला ओढ़े पड़ी हयन – भुट्टा मक्के का

5. छत्तीसगढ़ी
पेट चिरहा, पीठ कुबरा – कौड़ी

6. मालवी
नानो सो चुन्नू भाय, लम्बी सारी पूँछ नी चाल्या चुन्नू भाया, पकड़ी लाओ पूँछ – सुई धागा

3. चुटकुले

  1. न्यायाधीश-तुम चार साल पूर्व भी एक ओवर कोट चुराने के अपराध में इस अदालत में आ चुके हो।।
    अपराधी-आप ठीक कहते हैं। लेकिन ओवर कोट इससे अधिक चलता भी कहाँ है।
  2. मजदूर–क्या मालिक ! गधे के समान काम कराया और एक रुपया दे रहे। कुछ तो न्याय करना चाहिए।
    मालिक-न्याय ! हाँ तुम ठीक कहते हो। मुनीम जी, इसका रुपया छीन लो और बाँध कर इसके सामने थोड़ी सी घास डाल दो।
  3. पिता-हमारा लड़का आजकल बहुत तरक्की कर रहा है। पड़ोसी-अच्छा, कैसे?
    पिता–पुलिस ने उस पर घोषित इनाम की रकम पाँच हजार से बढ़ाकर दस हजार कर दी है।

4. लोकगीत

निमाड़ी कवाड़ा
बड़ा-बड़ा तो वई गया
ढोली कय कि पार उतार
वई का वई गया ना
उतरई की उतरई लगी
एकली कुतरी कई भुख
न कई कंसुऱ्या ले
फट्या कपड़ा बुड्ढा ढोर
इनका दाम लई गया चोर
ऊँट थारो कई वाको
ऊँच कय सब वाको
थारी बइगण म्हारी छाछ
भली बघार म्हारी माय

प्रस्तुति : हरीश दुबे

कसा भनई रिया हो?
मास्टर बा तम
असा-कसा भनइ रिया हो,
छातरवती दई ने
अँगूठा लगवई रिया हो।

-दिनेश दर्पण

साथन : निमाड़ी

‘मँहगई’
एको राज ओको राज
हुया मँहगा अनाज।
काँ छे घोटालो,
समझ मज आव नी
उनकी वात!
हम, पाँच बरस तक
देखाँ, रामराज की वाट

-अखिलेश जोशी

विश्वास
आस बाँधी ने
दो कदम
चाल्यौ थो
कि
टाँग धैची लिदी।
पाछै
फरीने दैख्यौ आपणा वारा पे भी
विश्वास नी करनो कदी।।

-जगदीश सस्मरा

वात कई कयj
बैल गाड़ी की वात कई कयj
खेत वाड़ी की वात कई कयj
मीठा लागज जुवार का रोटा
नऽ अमाड़ी की वात कई कयj
जे खड़ बुनकर वणा व मयसर का
उनी साड़ी की वात कई कयणुं
दूध-घी की कमी नि होणऽ दे
भैस-पाड़ी की वात कई कयj
घर क राखज चगन-मगन केतरो
छोटी लाड़ी की वात कई कयj
गाँव मऽ उनको बड़ो नाव वजज
माय माता की वात कई कयj
वोली न अपणी जगा सब छे ‘हरिश’
पण निमाड़ी की वात कई कयणुं।

– हरीश दुबे

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गजल
हुण रे भाया म्हारी वात।
हद की दी मनखौं की जात।
जणी जण्या पारया पोस्या,
अब लगावे वण पे घात।
वा, दर-दर की माँगे भीख
जण के जीवे बेटा हात।
लाड्या की होरयां बारी,
मंगता अशो करयो उत्पाद।
मनखाँ ती वंची ने रो
झूठी कोनी या केवात॥

– प्रमोद रामावत

फागुण का दोहा
फागुण का पगल्या पड्या, बदल्या सारा रंग।
ढोलक बजी चौपाल पऽ खडक्या खड़-खड़ चंग॥
सरसों पीली हुई गई, मुहवो वारऽगन्ध।
फूल-फूल पऽ भैरा दौड़, पीणऽख मकरन्द॥
अम्बा भी बौरइ गया, फूल्या घणा पलास।
कोयलिया की कूक की, प्यारी लाग मिठास॥
अबीर गुलाल का साथ मैंs, रंग की उड़ी फुहार।
हिली-मिली न मनवाँ, आवो यो तेव्हार।।

-चन्द्रकान्त सेन

एल्याँग ………. वोल्याँग
एल्यांग गुरुजी
पकावणऽ लग्या
दलिया न दाल
वोल्याँग हुई
शिक्षा-बे-हाल
शेर की सी उनकी नियति
एकाजऽ लेण
जिन्दगी अकेलीज बीती
वोटर सी पूछो
ईज सरकार रखोगा
कि बदलोगा?
बोल्या अगला
को काई भरोसा?
ऊ एतरी धाँधली
चलन दे कि नई?

-ललित नारायण उपाध्याय

ऊँचो मोल को है तमारो पसीनो

साथे लइला हिम्मत ने हेली-मेली ताकत,
तमारा आगे माथो टेकी ऊबी रेगा आफत,

काय को डर धरती रो घर अन से भरया चालो।
चालो भरयां चालो, चालो मरदाँ चालो।

घणो ऊँचों मोल को है तमारो पसीनो
आलसी के समझावो के कसो होय है जीनो।
स्वास्थ छोड़ी मजदूरी री पूजा करदाँ चालो।
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो।

गाँवों में कबीर पंथ आज भी तो गावे है
परेम से तो मारा भाई दुनिया जीती जावे है
लड़ता-मरता आदमी ने आपण वरजाँ चालो
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो

-मोहन अम्बर

सन्दर्भ : होली

कई हँसो बाबूजी!
यूँ दूर ऊबा
नाक सिकोड़ी के
कई हँसो ओ बाबूजी,
हमारे
कीचड़ का अबीर गुलाल से
होली खेलता देखि के।
हमारो तो
योज बड़ो तीवार है
यो
कीचड़ को जरूर है, बाबूजी
पणे
तमारी जग-मग दीवाली से
घणों अच्छो है,
देखिलो
दोल्यो/धुल्यो
दोड़ी-दोड़ी के
खाँकरा की केशूड़ी को
सन्तरिया रंग के
एक-दुसरा का ऊपर ढोलिरिया
मन का बन्द किमाड़
खोलीरिया
आत्मा से घीरणा को
कीचड़ धुइरिया है
काल तक जो प्यासा था
एक दूसरा का खून का
बाबूजी
आज ऊई पाछा
एक दुइरिया है।

-बंशीधर बन्धु’

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अजगर से बड़ा साँपजी

थोड़ी-घणी लिखी या पाती,
आखी समजो बाप जी।

यो कई हुई रियो इनी दुनियाँ में,
कई करूँ इको जाप जी।

तम भी पड्या हो ईका चक्कर में
घणा ईमानदार था साबजी।

भेती गंगा में जो हाथ नी धोया तो
जनम भर होयगो भोत संतापजी।

तूज अकेली जेरीलो नी हे धरती पे,
बेठ्या हे, अजगर से बड़ा साँपजी।

घणी देर से सोया हो, अब तो जागो,
जगावा को कद से करि रियो हूँ अलापजी।

कई लाया था ने कई ली जावगा,
आता-जाता को मत करो विलापजी।

-हुकुमचन्द मालवीय

खोटो नरियल होली में !
मन में आदर भाव नी रियो, राम नी रियो बोली में,
नगद माल सब जेब हवाले, खोटो नारियल होली में।
स्वारथ आगे सब कईं भूल्या, कितरा कड़वा हुईग्या हो,
फिर भी थोड़ी तो मिठास है पाकी लीम लिम्बोड़ी में।

कई गावाँ कई ढोल बजावाँ, कई स्वागत सत्कार करौं,
डण्डा-झण्डा साते लइनें, नेता निकले टोली में।

कुरसी मिली तो मोटरगाड़ी से, तम नीचे नी उतरो,
नेताजी वी दन भूलीग्या, रेता था जद खोली में।

खन, पसीना, साँते बईग्यो, पेट पीठ से चोंटीग्यो,
सपनो हुईग्यो धान ने दलियो, टाबर रोवे झोली में।

कुल की लाज बहू ने बेटी, भूल्या सगली मरयादा,
बहू की जगे दहेज बठीग्यो, अब दुल्हन की डोली में।

नारी को सम्मान घणों है, भाषण लम्बा-चौड़ा दो,
पण मौका पे चूको नी तम, भावज बणाओ ठिठोली में।

-ओमप्रकाश पंड्या

तम देखी लेजो
बन्द कोठड़ी म
गरम गोदड़ी ओढ़ेल
सोचतो मनख;
कस लिखी सकग
ठण्ड न कड़ायलां गीत,
फटेल चादरा का दरद
अन टूटेल झोपड़ा की वारता?
कसा कई सकग
फटेल हाथ-पाँव की
बिवई न में
खोयेल नरमई,
अन सियालां म।
बगलेलो
डोलची दाजी को दम !
भई,
तम कोशिश करी न
देखी ले जो;
पन असली वात न क
कभी नी कई सकग।।

-शरद क्षीरसागर

जीवन कँई हे?
जीवन एक मेंकतो
हुवो फूल हे
हवेरा, खिले अरु हाँजे
मुरजई जावे
समजी नी जिने
जीवन की परिभासा
ऊ कदी रोवे
कदी खिलखिलावे
जीवन पाणी को
ऊठतो हुवो बुलबुलो हे,
देखतां-देखतां
जिको नामो निसान मिटी जावे
फिर बी हम
जीवन को अरथ नी जाणां
तपतो हुवो सूरज बी
हाँजे ठण्डो वई जावे।

-कन्हैयालाल गौड़

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5. लोक कथाएँ

लोक कथाओं में मानव का सुकोमल एवं हृदय को छू जाने वाला इतिहास अंकित है। आदमी ने जो कुछ किया, उसका लेखा-जोखा तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन अपने मनोजगत में उसने जो कुछ भी सोचा, विचारा, रंगीन कल्पनाओं का ताना-बाना बुना, सुन्दर सपने संजोए उन सबका विवरण इन लोक कथाओं में सुरक्षित है।

सदियों से ये लोक कथाएँ मनुष्य का मनोरंजन करती आयी हैं। इनमें कुछ भी असम्भव नहीं होता है। इनमें शेर और साँप भी दोस्ती निभाते, पक्षी सन्देश पहुँचाते और जरूरत पड़ने पर चित्र भी बोलने लगते हैं। इनमें मनुष्य सोचने के साथ ही सात समुद्र पार पहुँच जाता है, क्षण में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है और किसी द्वीप की असीम सुन्दरी से शादी करता है।

इनकी जो सबसे बड़ी विशेषता है वह यह है कि ये मानवीय तत्त्वों से भरपूर हैं। इनमें देवी-देवता के माध्यम से भी मानव जीवन की कहानी कही गयी है। चाहे सूर्य हो या ब्रह्मा, सावित्री, वे सब यहाँ मानवीय स्वरूप लेकर और पारिवारिक प्रतीकों के सहारे सामाजिक जीवन को समृद्ध कर अपना योगदान देते हैं।

इन कथाओं में व्यक्ति, स्थान या समय का कोई महत्त्व नहीं होता। इनकी उँगली पकड़ कर ही आदमी ने सदियों की दूरी को लाँघा, देश-विदेश की यात्राएँ की और सुदूर रेगिस्तान से लगाकर अपने खेत-खलिहान और घर के आँगन के सहारे सारी रात जागकर बिता दी है। इन्होंने निराशा के क्षणों में मनुष्य के मन में अमिट आशा का संचार किया है।

(क) छत्तीसगढ़ी कहानी
नियाय के गोठ

चैतू ठाकुर बिमार हावे। गाँव के सबो झन झोला देख देख के जावत हैं। तीर तिखार के गाँव के कतको सज्जन अऊ बड़े किसान किसनहा झोला देखे बार आता हे। आखर कावर नइ आहीं ओखर सुझाव सब झन बर गुरतर हावे दूरिहा दूरिया के मन ऐला जानाथे। चाहे कइसनो मुशकुल बात होय ठाकुर ओला दुइच छिन में निबटा देय। वइसे ओखर तीर कोनो बड़े जइदाद, नइहे नहिं सोना चाँदी के खजाना। ओखर तीर सिरिफ दुठन बांही के भरोसा हावे। एक छोटे असन घर बाड़ी थोरकिन खेत अउ गिनती ढोर डंगर। रात दिन मिहनत करना ओखर नियम है।

एक जमाना रिहिस के वोहा गरीब रिहिस। मजदूरी करके अपन पेट ला चलाय। तब तो हा परम संतोषी रिहिस अऊ आजो भी बोला। चिटिक मात्र घमण्ड नहीं हे यही कारण है कि गाँव भर के मन वोला मानये।

आज वो ही हा बिमार हे त पूरा गाँव दुखी है। सबो झन भगवान ले पराथना करत है कि ठाकुर जल्दी बने हो जाय।

ठाकुर परिवार में कुल चार पराणी हावे। ठाकुर ओखर घरवाली ओखर बेटा अउ अनाथ भांचा। हावो तो भांचा फेर ठाकुर बोला अपने बेटा ले चिटिक मात्र कमती नहीं समझे। ऊखर असन बेटा बीस बरस के लगभग अउ भांचा मोहन अठरह बरस के लगभग हावे। बड़ मिहनती हे। बलराम कोनो काम बूता म ओखर आगू नई टिकै।

बलराम के सगई होने। ठाकुर सोचे कि मोहन बर भी कहूँ बात चलाये जाय त दूनो के बिहाव एक संग निपट जाही। ठकुराइन के मन मां घलो यही बिचार उठे।

फेर एकोती बलराम बड़ा उलझन अउ उदंड होगे। न माँ के सुनय न बाप के सुनय कभू भूले भटके खेत के मेड नहीं खूदय न खलिहान में बैठय। लोगन कहिये कि बलराम ताश पत्ती खेले बर सीखेगे हे। कोनोन कहाय कि ससुराल वाला मन बोला बहिकाल फुसलात हावे। ससुराल वाला मन डरावत हे कि कहूँ मोहन का बलराम के हिस्सा में बाँटा झन ले लय।

चैतू ठाकुर ये सब चाल ल समझत हावे फिर मोहन ल ये पाय कि नइ भाय कि वा हा भांचा हे फेर ये पाय के चाहे कि ओखर माँ बाप गरगे हे, बल्कि ठाकुर ओखर मिहनत देख खुश होवय।
खेती बारी के संगे वो हा घर के चेता सुरता रखथे। ठाकुर ठकुरइन की कतेक सेवा कर थे।

ये बात ठीक है कि बलराम ऊखर बेटा है फेर कतेक मुरुख। काम देखता बोला जर आ जाये। भेजबे उत्तर दिशा व वोहा जाये दक्षिण दिशा। वोहा ठीक से अपने चारों खेत ला छलख नई जानय कालि के दिन वोला खेत दे दिए जाय त का होही?

ठाकुर बीमार हावे। बलराम ला ओखर ससुराल वाला मन बलवा ले हय। अभी तक ले लहुट के नई आये है। खबर भिजवाय गय हय, फिर ससुराल ले कोनो मनख नइ आय हे।

संझा के बेरा बलराम अपना दलदल के संग ठाकुर के आगु में अइस। राम राम के बाद ससुराल पक्ष के जन विहिस कि ठाकुर अब ये थोरे दिन के मेहमान हावस ऐखर सेती तोला अपन संपत्ति ला बलराम के नाम देना चाही।

ये सुनके ठाकुर ला कोनो अचंभा नइ होइस। अइसन बात के खियाल ओला आगु ले रिहिस। बोलिन”तुम्हार बात तो ठीक फिर बलराम अभी लइका है। काम धाम के सूझ अभी
बने अइसन नइ है।”

अतका सुनके रिहिस बलराम भड़क गये-बापू के त बुध सठिया गेहे। जब देख बेत मोला लइका समझते अऊ ये सब मोहन के सेती होवत हे। माहा घलो ओखरे पक्ष ले थे। फेर बापू आज त तोला फइसला करेच बर पड़ ही।

ठाकुरहा जल्दी ले गाँव के पाँच पंचु बुलबइस फिर ठकुराइन ले पूछिस मोहन कहाँ है? ठकुरइन बतइस-वो हा मंझनिया के जंगल चल दे हावे। एक ठन बइला बीमार हावेले तेखर बर जड़ी बुटी लाने बर गये है।

ठाकुर हां पंच मन ला बलराम के मंशा बतलइस। सबला बड़ अचंभा होइस फेर बलराम के संग ओखर ससुरारी मन ला देख के चुप रहिगे। ठाकुर बाते बात में बलराम लातियारिस बेटा थोरकिन खलिहान में जाके देख आतो धान मिजाइ के कुछ उड़ल हे या नइ। बलराम भागत गइस अउ आके बतइस कि खलिहान म दूनों नौकर बइठे बीड़ी पियत हावे।

ठाकुर फेर विहिस-ऊखर ले पूछ नइ लेतेस बेटा के दौरी कतेक बेर म चल ही। बलराम हा आज्ञाकारी बेटा अइसन फेर गइस अऊ आके खबर दइस कि अभीत सबो बाइला नइ आये हे। ठाकुर पूछिस”आखिर कतका बइला कमती पड़त हे?”

बलराम गल्ती कबूलिस के बापू में तो गिनती करे बार भुला गये। अभीच जाके पता करथ हंव।

बलराम लहुटके बड़ा घमण्ड करके बतइस दुबइला कमती है। अऊ तब ठाकुर हा पूछिस”उहां अभी कुल कतका बइला है।”

अऊ लोगन देखिन कि बलराम फेर बइका के गिनती करे बर भागिस।

ओतकेच बार मोहन आगे। वे हा सब झन के पांव परिस अऊ चले ल धरिस। तब ठाकुर बोलिस-बेटा थोरकिन पता लगा के आ धान वे भिंजइ होही के नई।

तभेच बलराम आके बइला के संख्या बताय लगिस। सब चुप रहिन। थोरिक देर बाद मोहन आके बतइस कि कंगलू अउ मंगलू इनो मिल के पझ डार डाले हावे। ढेर लगा चुके है। दु बइला के कमी रिहिस त बहू झगरू देके गेहे। रात के खां पी के दौरी शुरू हो जाही। फिकर के कोनो बात नइहे।

ऐखर बाद कोनो कुछु नई बोलिन। ठाकुर पारी पारी से सबके मुंह ला देखे लगिस। अऊ आखिर में बलराम ले बोलिस कुछ समझ में आइस बेटा, तोर अऊ मोहन में का फरक हे? तें घंकभु ये समझे के कोशि नई करेस के भुइयां ह मेहनत चाहथे। खेती-बारी करना हंसी-ठट्ठा नोहे। बड़ सूझ के काम हे। मोहन तो ले के छोटे हे फेर कतेक लायक हे अऊ तेहा कतेक नालयक पहिले मोर विचार रिहिस कि तुम दूनो ला संपत्ति के आधा-आधा हिस्सा दे दवं, फेर अब एक अ रास्ते रही कि तोता ईमानदार किसान बने बर पड़ही जइसे ते मोहन ला देखत हस। तबहि तेहां आधा हिस्सा के हकदार होबे।

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ठाकुर के फइसला सबके समझ में आ गइस। आज ये फेर साबित होंगे कि ठाकुर हमेशा नियाय के ही बात कहिये।

खड़ी बोली में अनुवाद

न्याय की बात
चैतू ठाकुर बीमार हैं। गाँव के सब लोग उन्हें देखकर जा चुके हैं। आस-पास के गाँवों से भी अनेक प्रतिष्ठित किसान उन्हें देखने आ रहे हैं। आखिर क्यों न हो? उनका व्यवहार सबके लिए इतना नम्र रहा है कि दूर-दूर तक लोग उन्हें जान गए हैं। चाहे कैसी भी उलझी समस्या क्यों न हो, चैतू ठाकुर अपनी सूझ-बूझ से उसे आनन-फानन में सुलझा देते हैं। वैसे उनके पास लम्बी चौड़ी जायदाद नहीं हैं, न ही सोने-चाँदी के अनगिनत सिक्के हैं। उन्हें तो केवल अपनी बाँहों का भरोसा है। एक छोटा-सा घर है। बाड़ी है कुछ खेत हैं और गिनती के ढोर-डांगर हैं। रात-दिन मेहनत करना ही उनका नियम है।

एक समय था कि वे गरीब थे। मजदूरी करके अपना पेट भरते थे। अब भी वे परम संतोषी हैं और आज भी घमण्ड उन्हें छू तक नहीं गया। यही कारण है कि गाँव के लोग उन्हें मानते हैं।

आज वे बीमार हैं, तो सारा गाँव दु:खी है। ईश्वर से सब के सब यही प्रार्थना कर रहे हैं कि वे जल्दी अच्छे हो जायें।

उनके परिवार में कुल चार प्राणी हैं। वे उनकी पत्नी, उनका बेटा और अनाथ भांजा। है तो भांजा, पर वे उसे अपने बेटे से जरा भी कम नहीं मानते। उनका अपना बेटा बलराम लगभग बीस साल का है। भांजे का नाम है मोहन, यही कोई सत्रह-अठारह वर्ष का होगा। बड़ा मेहनती है। बलराम तो उसके किसी काम में भी नहीं ठहर सकता।

बलराम की सगाई हो चुकी है। ठाकुर सोचते हैं कि मोहन के लिए भी कहीं बात हो जाय तो दोनों का विवाह एक साथ ही निपटा दें। ठकुराइन के मन में भी यही बात है।

परन्तु बलराम इधर बड़ा मनमौजी हो गया है। न माँ की बात मानता है, न बाप की सुनता है। खेत पर कभी भूलकर भी नहीं जाता है और न ही घड़ी भर खलिहान में बैठता है। लोग कहते हैं कि बलराम आजकल ताश खेलने लगा है। कुछ लोगों का यह भी ख्याल है कि उसके ससुराल वाले उसे बहका रहे हैं। ससुराल वालों को शायद यह डर है कि कहीं मोहन बलराम का हिस्सा न बँटा ले।

चैतू ठाकुर यह सब समझते हैं। वे मोहन को केवल इसलिए नहीं चाहते कि वह उनका भांजा है, उसके माँ-बाप मर गए हैं, बल्कि ठाकुर उसकी मेहनत देखकर खुश हैं। खेती-बारी के साथ-साथ वह घर का भी कितना ध्यान रखता है। उन दोनों की कितनी सेवा करता है।

ठीक है कि बलराम उनका बेटा है किन्तु कितना मूर्ख है। काम के नाम से ही ज्वर आ जाता है। भेजो उत्तर दिशा की ओर तो दक्षिण चला जाता है। उसे तो ठीक से अपने चार खेतों का भी ज्ञान नहीं है और कल यदि उसे सारे खेत दे दिये जाएँ तो क्या होगा?

ठाकुर बीमार है। बलराम को उसकी ससुराल वालों ने बुलवा लिया है। अभी तक वह लौटकर नहीं आया। सूचना भिजाई गई थी, परन्तु उसकी ससुराल से भी कोई नहीं आया।

दूसरे दिन सुबह बलराम आ गया। ठाकुर ने सुना कि उसके साथ कुछ लोग भी आए हैं, पर अभी तक कोई सामने नहीं आया।

शाम के समय बलराम अपने दल के साथ ठाकुर के सामने आया। राम-राम के बाद ससुराल पक्ष के एक आदमी ने कहा कि ठाकुर अब तो थोड़े ही दिन के मेहमान हैं, इसलिए उन्हें अपनी सम्पत्ति बलराम के नाम लिख देनी चाहिए।

यह सुनकर ठाकुर को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात की कल्पना उन्हें पहले से ही थी। बोले “बात तो ठीक है, किन्तु बलराम अभी बच्चा है। काम-धाम की सूझ अभी उसे नहीं है।”

इतना सुनना था कि बलराम उबल पड़ा “बापू की तो बुद्धि सठिया गई है। जब देखो तब मुझे बच्चा ही समझते हैं और यह सब उस मोहन के कारण ही है। माँ भी उसका ही पक्ष लेती है, लेकिन आज तो बाबू को फैसला करना ही पड़ेगा।”

ठाकुर ने शीघ्र ही गाँव के पंच बुलवा लिए। फिर ठकुराइन से पूछा “मोहन कहाँ है?” ठकुराइन बोली- “वह तो दोपहर से ही जंगल चला गया है एक बैल बीमार है, उसी के लिए कुछ जड़ी-बूटी चाहिए थी।”

ठाकुर ने पंचों से बलराम की इच्छा कह सुनाई। सबको बड़ा अचम्भा हुआ, परन्तु बलराम के साथ उसकी ससुराल वालों को देखकर चुप रह गए। ठाकुर ने बात ही बात में बलराम से कहा- “बेटे जरा खलिहान जाकर देख तो आओ धान मिजाई का कुछ डौल है या नहीं।”

बलराम भागकर गया और आकर बताया कि खलिहान में दो नौकर बैठे बीड़ी पी रहे हैं। ठाकुर ने कहा, “उनसे पूछ नहीं लिया बेटा कि कितनी देर बाद दौरी चलेगी?”

बलराम एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह फिर गया और जाकर उसने सूचना दी कि अभी तो पूरे बैल ही नहीं आये।

ठाकुर ने फिर पूछा-“आखिर कितने बैल कम पड़ते हैं?” बलराम ने अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा-“बापू मैं तो गिनती करना ही भूल गया। अभी जाकर पता लगाता हूँ।”

बलराम ने लौटकर गर्व के साथ बताया कि दो बैल कम पड़ते हैं। तभी ठाकुर ने पूछ लिया “वहाँ अभी कुल जमा बैल कितने हैं?”

और लोगों ने देखा कि बलराम बैलों की गिनती करने फिर खलिहान की ओर भागा जा रहा है।

तभी मोहन आ गया। उसने सबके पाँव छुए और चलने लगा। ठाकुर बोले-“बेटे, जरा पता तो लगाओ कि आज धान की मिजाई हो सकेगी या नहीं।”

तभी बलराम आकर बैलों की संख्या बताने लगा। सब चुप रहे। जरा देर बाद मोहन ने आकर बताया कि कंगलू और मंगलू दोनों मिलकर पैर डाल चुके हैं, ढेर लगा चुके हैं, दो बैलों की कमी थी सो अभी झगरू दे गया है। रात को खा-पीकर दौरी शुरू हो जायेगी। चिन्ता की कोई बात नहीं।

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। ठाकुर बारी-बारी से सबका चेहरा देखने लगे और अन्त में बलराम से बोले-कुछ समझ में आया बेटे, तुममें और मोहन में क्या फर्क है? तूने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं कि जमीन मेहनत माँगती है। खेती बारी करना कोई हँसी-ठट्ठा नहीं है। बड़ी सूझबूझ का काम है। मोहन तुझसे छोटा है, पर कितना लायक है और तू कितना नालायक है। पहले मेरा विचार था कि तुम दोनों को मैं अपनी सम्पत्ति का आधा-आधा हिस्सा दे दूँ, किन्तु अब एक शर्त यह भी रहेगी कि तुझे ईमानदार किसान बनना होगा, जिस प्रकार तू मोहन को देख रहा है, तभी तू आधे हिस्से का हकदार होगा।

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ठाकुर का फैसला सबकी समझ में आ चुका था। आज यह बात पूरी तरह से सिद्ध हो गयी कि ठाकुर हमेशा न्याय की ही बात कहते हैं।

(ख) निमाड़ी लोक कथा’
झूठी मंजरी

एक थी चिड़ई, एक थो कबूतर, एक थो कुत्तो और एक थी मांजरी। सबइ न विचार करयो कि अपुण खीर बणावा।
कोई लायो लक्कड़, कोई लायो पाणी, कोई लायो शक्कर, कोई लायो दूध उन खीर तैयार हुई गई।

कहयो चलो सब खाई लेवां, मांजरी न कहयो-म्हारा तो डोला आई गयाज। उन उडोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई।

सबन अपणे अपणा वाटड की खीर खाई न बचेल का ढाकी न धरी दियो।

सब अपणा, अपणा काम न पर चली गया, तंवज मांजरी उठी उन सबका वाय की खीर खाई न डोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई। सांझ ख जंव सबई काम पर सी आया तो देख्यो खीर को बासरण खाली थो।

एक एक सी पूछयो क्यों भाई तुम न खीर खाई ज।

सबई न न मना करी दियो। मांजरी से पूछ्यो तो वा बोलो हऊँ काई जाणु म्हारो तो डोला आयाज। हऊ दिन भर सी पट्टी बांधी न पड़ोज। सब न तै करयो कि एक सूखा कुआ पर झूलो बांध्यो सब ओपर बारी-बारी सी बढ़ी न कहे कि मन खीर होय तो झूलो टूटी जाये। जेन खीर खाई हायेगा ओकी बखत झूला टूटी जायगा। पहली चिड़ी बठी बोली-“ची, ची, मन खीर खाई हो तो झूलो टूटी जाय, झूलो न टूटयो।”

फिर कबूतर बठ्यो बोल्यो गुटरू गूं-गुटर गूं, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिरी कुतरो बठ्यो बोल्या–भों-भों, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिर मांजरी बठी बोली–म्यांउ म्यांउ मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय।

झूलो तो टूटी गयो अन मांजरी सूखा कूआ म पड़ी गई। खेल खतम पैसा हजम।

खड़ी बोली में अनुवाद

झठी बिल्ली

एक थी चिड़िया, एक था कबूतर, एक था कुत्ता और एक थी बिल्ली। सबने मिलकर विचार किया कि अपनी खीर बनायें।

कोई लाया लकड़ी, कोई लाया पानी, कोई लाया शक्कर, कोई लाया दूध और खीर बनकर तैयार हो गई।

कहा, चलो सब खा लें। बिल्ली ने कहा- “मेरी तो आँखें आई हैं” और वह आँखों पर पट्टी बाँध कर सो गई।

सबने अपने-अपने हिस्से की खीर खाई और शेष बची हुई खीर को शाम के लिए ढाँक कर रख दिया।

सब अपने-अपने काम पर चले गये। तब बिल्ली उठी और सबके हिस्से की खीर खाकर फिर आँखों पर पट्टी बाँधकर सो गई।

शाम को जब सब काम पर से आये, तो देखा, खीर का बरतन खाली था। हर एक से पूछा-“क्यों भाई तुमने खीर खायी है?” सबने इनकार किया।

बिल्ली से पूछा, वह भी बोली- “मैं क्या जाने? मेरी आँखें आयी हैं,सुबह से पट्टी बाँधे पड़ी हूँ।” तब सबने विचार किया कि एक सूखे कुएँ पर कच्चे धागे से झूला बाँधा जाये। सब बारी-बारी से उस पर बैठे और कहें-“मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाये।” जिसने खीर खायी होगी, उसकी बार झूला टूट जायेगा।

पहले चिड़िया बैठी-“ची-ची, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।” झूला नहीं टूटा। फिर कबूतर बैठा, बोला-“गुटर गूं-गुटर पूँ, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर कुत्ता बैठा, बोला-“ौं-भौं, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर बिल्ली बैठी, बोली-“म्याऊँ-म्याऊँ, मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाय।”

झूला था सो टूट गया और बिल्ली थी सो कुएँ में गिर गयी। खेल खतम-पैसा हजम।

(ग) मालवी कहानी
पीपल तुलसी

कणी गाम माय सासू अर बऊ रेती थी। एक दिन सासू ने बऊ तो कियो के मू तीरथ कारवा सारू जरूरी हूँ, तुम अपणे याँ जो दूध दही होवे है ऊ बेची-बेची के रुपया भेलाकर लीयो। अतरो कइके सासू चलीगी।

चैत-बैसाख को माइनो आया तो बऊ सगलो दूध-दई लई जई के पीपल अर तुलसी म सीची देती अर फेरी खाली बासन लइके घर मेली देती। सास तीरथ करी के पीछे घरे अई तो बीने बऊती दूध अर दई का रुप्या मांग्या। बऊ ने क्यो के बई मूं तो सगली दूध अर दई पीपल तुलसी म सींचत री हूँ, म्हारा कन रुप्या नी है। पण सासू ने कियो कई बी होवे जो-वी हो म्हारे तो रुप्या देणा पड़ेगा। तो बऊ पीपल अर तुलसी का कने जइके बैठीगी, अर वीनती बोलो के म्हारी सासू म्हार ती दूध दही का पइसा माँगे है। पीपल-तुलसी ने कियो के बेटी-म्हारा कन रुप्या-पइसा काँ है? इ भाटा कोंकरिया जरूर पड़िया है इनके भलाई-उठई के लई जा। बऊ सगला कोंकरिया भाटा उठई के घेर लई अर अई घरे लइके अपण कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन सासू ने फेरी रुप्या मांग्या तो बऊ ने अपणो कोठो खोल्यो। बऊ ने देख्यो कि सगला कोंकरिया भाटा का हीरा-मोती वणी ग्या है अर कोठी जगमग इरियो है। बऊ ने सास ती कियो के सासू जी अपणा रुप्या लइलो। हीरा-मोती देखी के सासु का मन-म-लालच अईग्यो। उने कियो के D वी पीपल अर तुलसी सोचूँगी।

दूसरा दन से सासू जद दूध-दई बेची के जाती तो खाली वासन माय पाणी भरी के पीपल अर तुसी म कूढ़ी आती। जद थोड़ा दन ऐसो करता-करता वइग्या तो एक दिन सासू न बऊ तो क्यों के त म्हारती दूध दई का रुप्या मांग। सासू केवा तो बऊ ने रुप्या मांग्या तो सासू बोली के म्हारा कन रुप्या कां है? मूं तो दूध-दई ती पीपल अर तुलसी के सींचती री हूँ। मेरा सासू जइके पीपल अर तुलसी का हेटे बैठी गी अर बोली के म्हारी बऊ दूध-दई का रुप्या माँगे है। पीपल तुलसी ने जवाब दियो के हमारा कन रुप्या कां है? इ कोंकरिया–भाटा पड्या है चावो तो भला ही लई जावो। सासू कोंकरिया-भाटा लइके खुशी-खुशी घरे अई अर बीने कोंकरिया-भाटा लइके अपणा कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन जद कोठी खेल्यो ग्यो तो सासू कई देखे है के पूरो कोठो सांप पर विछू तो भरियो पड्यो है।

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सासू ने बऊ ते पूछयो-के बऊ, या कंई बात है? तू तो कोंकरिया-भाटा उठई के लई थो वीनका तो हीरा मोती वणीग्या अर मूंजो कोंकरिया-भाटा उठई के लई वीनका सांप विछ्वणी गया? बऊ ने सरल भाव ती जवाब दियो के सासू जी मने पीपल-तुलसी के साफ मन तो सींच्यो थो अणी सासू कोंकरिया भाटा का हीरा-मोती वणीग्य अर थाने लालच म ऐसो करियो यो अणी वास्ते था का लाया हुआ कोंकरिया-भाटा का सांप बिछु वणीग्या।

खड़ी बोली में अनुवाद

पीपल-तुलसी

किसी गाँव में सास और बहू रहती थीं। एक दिन सास ने बहू से कहा कि मैं तीर्थाटन के लिए जा रही हूँ, तुम अपने यहाँ जो दूध-दही होता है वह बेच-बेचकर रुपये इकट्ठे कर लेना। इतना कहकर सास चली गयी।

चैत-बैसाख का महीना आया तो बहू सारा दूध-दही ले जाकर पीपल और तुलसी को सींच देती और फिर खाली बर्तन लाकर घर रख देती। सास तीर्थाटन से वापस घर आयी तो उसने बहू से दूध और दही के पैसे माँगे। बहू ने कहा कि मैं तो सारा दूध और दही पीपल-तुलसी में सींचती रही हूँ मेरे पास रुपये नहीं हैं, लेकिन सास ने कहा कि चाहे जो भी हो मुझे तो रुपये देने पड़ेंगे। तब बहू पीपल और तुलसी के पास जाकर बैठ गयी और उनसे बोली कि मेरी सास मुझसे दूध-दही के पैसे माँगती है। पीपल-तुलसी ने कहा कि बेटी, हमारे पास रुपये पैसे कहाँ हैं, ये कंकड़-पत्थर अवश्य पड़े हैं इन्हें भले उठाकर ले जा। बहू सारे कंकड़-पत्थर उठाकर धर लायी और घर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन सास ने फिर से पैसे माँगे तो बहू ने अपना कमरा खोला। बहू ने देखा कि सारे कंकड़-पत्थरों के हीरे-मोती बन गये और कमरा जगमगा रहा है। बहू ने सास से कहा कि सास जी, अपने रुपये ले लो। हीरे-मोती आदि देखकर सास के मन में लालच आ गया। उसने कहा कि मैं भी पीपल और तुलसी सीनूंगी।

दूसरे दिन सास जब दूध-दही बेचकर लौटती तो खाली बर्तनों में पानी भरकर पीपल और तुलसी में डाल आती। जब कुछ दिन ऐसा करते-करते हो गये तो एक दिन सास ने बहू से कहा कि मुझसे दूध-दही के पैसे माँग। सास के कहने पर बहू ने पैसे माँगे तो सास बोली कि मेरे पास रुपये कहाँ हैं? मैं तो दूध-दही से पीपल और तुलसी को सींचती रही हूँ। फिर सास जाकर पीपल और तुलसी के नीचे बैठ गयी और बोली कि मेरी बहू दूध-दही के पैसे माँगती है। पीपल-तुलसी ने उत्तर दिया कि हमारे पास रुपये कहाँ हैं? ये कंकड़-पत्थर पड़े हैं चाहे तो इन्हें भले ही ले जाओ। सास कंकड़-पत्थर लेकर खुशी-खुशी घर आयी और उसने कंकड़-पत्थर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन जब कमरा खोला गया तो सास क्या देखती है कि सारा कमरा साँप और बिच्छुओं से भरा पड़ा है।

सास ने बहू से पूछा कि बहू, यह क्या बात है? तू जो कंकड़-पत्थर उठाकर लायी थी उनके तो हीरे-मोती बन गये और मैं जो कंकड़-पत्थर उठाकर लायी उनके साँप-बिच्छु बन गये? बहू ने सहज भाव से उत्तर दिया कि सास जी मैंने पीपल-तुलसी को शुद्ध मन से सींचा था, इसलिए कंकड़-पत्थर के हीरे-मोती बन गये और आपने लालचवश ऐसा किया था, अतः आपके लाये हुए कंकड़-पत्थरों के साँप-बिच्छू बन गये।

6. दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम
दूरदर्शन

वैसे तो दूरदर्शन पर आजकल हर समय कोई न कोई कार्यक्रम दिखाया जाता है तथापि प्रमुख व लोकप्रिय कार्यक्रम इस प्रकार हैं-

सुबह सवेरे, समाचार, रंगोली, महादेव, मैट्रो समाचार, जय बजरंगबली, चित्रहार, सांई बाबा, चिड़ियाघर, टॉम एण्ड जैरी, कलश, चन्द्रगुप्त, कृषि दर्शन, पोकेमॉन, विरासत, हिटलर दीदी, शाका लाका बूम बूम, वाइल्ड डिस्कवरी, सी. आई. डी., घर एक सपना, बालिका वधू, डिजनी जादू, सा रे गा मा, वीर शिवाजी, सोनपरी, बूगी बूगी, ग्रेट इंडियन लाफ्टर चेलेंज एवं लापतागंज।

दूरदर्शन के कार्यक्रमों को देखकर छात्रों को उनका विवरण लिखने की प्रेरणा-लिखित भाषा की शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य छात्रों को अपने भाव, विचार तथा अनुभवों को लिखित रूप में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने योग्य बनाना है.–

  1. छात्रों को सुन्दर, परिमार्जित एवं स्पष्ट लेख लिखने की प्रेरणा देना।
  2. छात्रों के शब्द-कोष को सक्रिय रूप देना।
  3. छात्रों को विराम चिह्नों का उचित प्रयोग सिखाना और अपने भावों को अनुच्छेदों में सजाने का अभ्यास कराना।
  4. छात्रों की अवलोकन (निरीक्षण) शक्ति, कल्पना शक्ति और तर्क शक्ति का विकास करना।
  5. छात्रों की विचारधारा में परिपक्वता लाना।

दूरदर्शन एक ऐसा माध्यम है जिससे छात्रों की श्रवणेन्द्रियों के साथ दृश्येन्द्रियाँ भी क्रियाशील रहती हैं। छात्र दूरदर्शन में वार्ता सुनने के साथ कार्यक्रम में भाग लेने वालों को देख सकते हैं और वे उनके हाव-भाव के साथ बोलना, अभिनय करना, भाषण देना सीख कर स्वरों के उचित उतार-चढ़ाव के द्वारा बात को शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं। वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं क्योंकि दूरदर्शन ज्ञानवर्धन और मनोरंजन का सबल माध्यम है। वे सब कुछ समझकर अन्त में उस कार्यक्रम के समग्र प्रभाव की चर्चा करें।

शिक्षक छात्रों को दूरदर्शन के किसी विशिष्ट कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को कहें। इससे वे लेखन-कौशल में तो पारंगत होंगे ही साथ ही उन्हें विवेचना और समीक्षा करने का भी अवसर मिलेगा। कार्यक्रम के गुण-दोष दोनों पर प्रकाश डालने के लिए छात्रों को स्वतन्त्र अवसर प्रदान करना होगा। इससे उनकी प्रतिभा के विकास के साथ चिन्तन, मनन एवं स्वाध्याय की प्रवृत्ति का पल्लवन तथा उन्नयन भी होगा।

7. हिन्दी साहित्य का स्वतन्त्र पठन

मनुष्य का सबसे बड़ा अलंकार उसकी वाणी है। वाणी जितनी शुद्ध और परिष्कृत होती है, व्यक्ति उतना ही सुसंस्कृत समझा जाता है। सम्पूर्ण मानव समाज अपने भावों और विचारों को दो रूपों में व्यक्त करता है. मौखिक और लिखित। इन दोनों रूपों में भाषा उसका प्रमुख साधन है। यहाँ मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकारों पर विचार करते हैं।

(i) टिप्पणियाँ किसी सुने गए अथवा पढ़े गए भाषण, वार्तालाप, पत्र, लेख, कविता, ग्रन्थ आदि देखे गए दृश्य तथा घटना पर अपना मत मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रकट करना ही टिप्पणी कही जाती है। आकार की दृष्टि से टिप्पणी की यद्यपि कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, किन्तु संक्षिप्त टिप्पणी अच्छी समझी जाती है। मोटे तौर पर टिप्पणियाँ तीन प्रकार की हो सकती हैं
(अ) कार्यालयी टिप्पणी, (ब) सम्पादकीय टिप्पणी, (स) सामान्य टिप्पणी।

(ii) प्रेरणाएँ साहित्य में प्रेरणा से आशय उन रचनाओं अथवा कृतियों से है जो पाठक को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर उनका मार्गदर्शन करती हैं इसके अन्तर्गत मुख्यत: उन कहानियों आदि को शामिल किया जाता है जो इस उद्देश्य को लेकर लिखी जाती हैं अथवा इस उद्देश्य को पूरा करती हैं। परन्तु इन कहानियों आदि के विषय में यह महत्त्वपूर्ण है कि ये इतनी बड़ी न हों कि पाठक पढ़ते-पढ़ते कहानी के उद्देश्य से भटक जाय। एक ही बैठक में पूरी पढ़ी जाने वाली कहानियाँ ही इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है।

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8. हस्तलिखित पत्रिका तैयार करना

छात्र आपस में मिलकर हस्तलिखित पत्रिका तैयार कर सकते हैं जिसमें सर्वप्रथम सभी संकलित अथवा स्वयं के लिखे लेख, कहानियों, कविताओं के अतिरिक्त चुटकुले आदि भी हो सकते हैं, को सूचीबद्ध किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इस सूची में उसके लेखक अथवा उसके संकलनकर्ता का नाम दिया जा सकता है।

इसके बाद सम्पादक की ओर से अपने साथियों को धन्यवाद ज्ञापन के साथ पाठकों को इस पत्रिका से परिचित कराते हुए इसके लिखित अथवा संकलित लेखों आदि पर प्रकाश डाल सकते हैं। तत्पश्चात् इन लेखों आदि को बड़े रोचक रूप में समग्रता से प्रस्तुत किया जा सकता है।

ध्यान रखने लायक बात है कि कोई भी लेख बहुत छोटा व बहुत ही बड़ा न हो जाय, जो पत्रिका में रोचकता समाप्त करे।

9. क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाएँ।

मालवा अंचल

  • इन्दौर-नई दुनिया, इन्दौर समाचार, नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वदेश, भावताव, जागरण।
  • उज्जैन-विक्रम दर्शन, अवन्तिका, अग्नि बाण, भास्कर, प्रजादूत, जलती मशाल।
  • रतलाम-जनवृत, जनमत टाइम्स, प्रसारण, हमदेश। नीमच-नई विधा।
  • देवास-देवास दर्पण, देवास दूत। मंदसौर-दशपुर दर्शन, कीर्तिमान, ध्वज।
  • शाजापुर-नन्दनवन।

बघेलखण्ड अंचल

  • रीवा-बांधवीय समाचार, आलोक, जागरण।
  • सतना-जवान भारत, सतना समाचार।
  • शहडोल-विंध्यवाणी, भारती समय, जनबोध।

बुन्देलखण्ड अंचल

  • कटनी–महाकौशल केशरी, भारती, जनमेजय।
  • सागर–न्यू राकेट टाइम्स, आचरण, राही, जन-जन की पुकार।
  • टीकमगढ़-ओरछा टाइम्स।
  • छतरपुर-क्रान्ति कृष्ण, प्रचण्ड ज्वाला।
  • जबलपुर-नवभारत, नवीन दुनिया, युगधर्म, दैनिक भास्कर, नर्मदा ज्योति, देशबन्धु, लोकसेवा।

निमाड़ अंचल

  • खण्डवा-विंध्याचल, लाजवाब।
  • बुरहानपुर-वीर सन्तरी।
  • बड़वानी-निमाड़ एक्सप्रेस।

छत्तीसगढ़ अंचल

  • बिलासपुर-लोकस्वर, नवभारत, भास्कर।
  • दुर्ग-ज्योति जनता, छत्तीसगढ़ टाइम्स।
  • रायपुर-देशबन्धु, नवभारत, भास्कर, स्वदेश।

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The Happy Prince Question Answer Class 10 English The Rainbow Workbook Chapter 2 MP Board

Class 10 English The Rainbow Workbook Chapter 2 The Happy Prince Questions and Answers

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The Happy Prince Class 10th Question Answer

The Happy Prince Vocabulary

I. Find out from the lesson the words which mean:
(a) The chief church of a Christian diocese (= an area under Bishop)
(b) A member of a race of very small people in Africa
(c) A person elected each year by a town council to be head of that city or town
(d) Heaven
(e) A deep red precious stone
Answer:
(a) Archdiocese,
(b) Pygmy,
(c) Mayor,
(d) Paradise,
(e) Ruby.

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II. Find out the meanings of the following phrases from the dictionary and construct one sentence with each of them.

(i) to put up
Answer:
I can’t put up with this sort of situation any more.

(ii) plenty of
Answer:
He has a plenty of dresses.

(iii) to keep off
Answer:
Keep off the dust from this medicine.

(iv) to bid good bye
Answer:
We went to the station to bid good bye to his friend.

(v) to stay behind
Answer:
You must give up your habit to stay behind in cultural functions.

(vi) in the company of
Answer:
You are spoiling yourself in the company of Mohan.

(vii) to make a note of
Answer:
My father asked me to make a note of my expenses daily.

III. Practice saying the following words.
cloaks – clocks
quite – quiet
angel – angle
met – mate
swallow – shallow
Answer:
Do yourself.

Listening Skill

I. Listen to the passage carefully.

See Workbook page 7

Now, answer the following questions. Choose the right option to complete the following sentences.

1. According to definition, a fairy tale is
(a) a humorous story,
(b) a fictional story,
(c) a tragic story.
Answer:
(b) a fictional story,

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2. The name ‘fairy tale’ was given by
(a) Madame Elizabeth,
(b) Madame Victoria,
(c) Madame d’ Aulnoy.
Answer:
(c) Madame d’ Aulnoy.

3. Fairy Tales refer to
(a) legends,
(b) fables,
(c) myths.
Answer:
(b) fables,

4. A fairy tale may start with words like
(a) in modem times,
(b) once upon a time,
(c) in olden days.
Answer:
(b) once upon a time,

5. The history of fairy tales is
(a) famous,
(b) well known,
(c) difficult to trace.
Answer:
(c) difficult to trace.

Speaking Skill

1. Speak on Maharana Pratap Singh. Clues are given for your help.

See Workbook page 8

Answer:
Do yourself.

II. Imagine that you are a statue in a public park. Narrate the activities that go on in the park from morning till night and are silently witnessed by you.
Answer:
Do yourself.

Reading Skill
Read the passage carefully.

See Workbook page 9

Now, answer the following questions.

1. (a) With what name was the Buddha born?
Answer:
Buddha was born as Siddhartha.

(b) Why did the animals respect the hare?
Answer:
The animals respected the hare because he was wise and gentle.

(c) What did the hare vow?
Answer:
The hare vowed that if anyone was hungry, he would offer him his own body.

(d) Whom did he convey it to?
Answer:
He conveyed it to the earth.

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(e) What do the Jataka Stories recount?
Answer:
The Jataka Stories recount the many previous births of the Buddha in human and animal lives.

2. Match the animal with the food he found:
Animals – Food
1. monkey – (a) fish
2. jackal – (b) mangoes
3. hare – (c) lizard and a pot of milk
4. otter – (d) nothing
Answer:
1. (b)
2. (c)
3. (d)
4. (a).

3. Substitute the appropriate word from the passage for the following:
1. calm and kind:
2. change of appearance:
3. pledge:
4. very great:
5. not objecting to:
6. wanting to express thanks:
Answer:

  1. gentle,
  2. disguised,
  3. vow,
  4. tremendous,
  5. willingly,
  6. gratitude.

Grammar
Tense:

See Workbook pages 11-12

Change the number and rewrite the following sentences. (One is done for you)

1. Birds usually build nests in the trees.
Answer:
A bird usually builds a nest in a tree.

2. Good children always obey their parents.
Answer:
A good child always obeys his parents.

3. The boys box in the gymnasium on Sundays.
Answer:
The boy boxes in the gymnasium on a Sunday.

4. Her dogs always attack strangers.
Answer:
Her dog always attacks a stranger.

5. These hotels don’t allow dogs.
Answer:
This hotel doesn’t allow a dog.

6. I brush my teeth everyday.
Answer:
I brush my tooth everyday.

7. They do exercises every morning before breakfast.
Answer:
He does exercise every morning before breakfast.

8. Horses run fast.
Answer:
The horse runs fast.

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9. They spend all their money on clothes.
Answer:
He spends all his money on clothes.

10. Some girls enjoy singing.
Answer:
The girl enjoys singing.

Convert the verbs in the following passage into Simple Past Tense and Simple Future Tense.

A beautiful and very successful actress is the star of a new musical show. Her home is in the country, but she does not want to go back there every night. So she rents an expensive flat in the centre of the city, places order for some beautiful furniture and hires a man to paint the rooms in new colours. It is very difficult to get tickets for her show, because everybody wants to see it.
Answer:
Simple Past:

A beautiful and very successful actress was the star of a new musical show. Her home was in the country, but she did not want to go back there every night. So, she rented an expensive flat in the centre of the city, placed order for some beautiful furniture and hired a man to paint the rooms in new colours. It was very difficult to get tickets for her show, because everybody wanted to see it.

Simple Future:
A beautiful and very successful actress will be the star of a new musical show. Her home will be in the country, but she will not want to go back there every night. So, she will rent an expensive flat in the centre of the city, place order for some beautiful furniture and hire a man to paint the rooms in new colours. It will be very difficult to get tickets for her show, because everybody will want to see it.

Writing Skill

l. Your school is going to organise a social work for the welfare of the poor living in slum areas of your city. Draft the principal’s notice to the students. (50 words)

Notice Board
Welfare Work in Slum Area

All the students are hereby notified that our school has organised a welfare work in the slum area of Seemapuri. We will undertake cleaning, educating and some other such jobs. Those who wish to participate must submit their name in the office of the PT in charge on or before 25 Sep 20xx.

Principal

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2. Write a summary of the story of the ‘The Happy Prince.’ (150 words)
Answer:
The statue of a Happy Prince stood on a tall column in the city centre. It was covered with golden leaves. Two sapphires were fitted in his eyes and ruby glowed in his sword hilt. The prince looked around and viewed the pathetic plight of the poor.

A little swallow flew over the city one night. His friends had already gone to Egypt. He stayed back for he was in love with the most beautiful Reed. His courtship lasted all through the summer. But there were no Reeds when autumn came. All the swallows flew away.

The lonely swallow came and sat on the statue. He longed to spend the night there. A large drop of water fell over him as he was going to sleep. The swallow was amazed since there was no cloud. The swallow decided to fly away when another drop of water fell over him. He looked at the statue when the third drop of water fell down. He found the Happy Prince weeping.

The statue told the swallow that he didn’t know what tears were when he was alive. Now he sat quite high and could view the miseries of the city. The Happy Prince told the swallow about a seamstress. She was embroidering flowers on the satin gown of the Queen’s maids-of honour. Her son was suffering from fever. The Happy Prince asked the swallow to pick the ruby from his sword hilt and give that to her.

The swallow flew to the woman’s house and put the ruby near her thimble. He also fanned the boy’s forehead. Feeling a bit better the boy sank into a deep slumber. The swallow’s good action made him feel warmer though it was cold. The Happy Prince asked him to stay there one more night. He told him about a playwright who was too cold to write and finish his play for the Director of the Theatre. He was feeling hungry also. He asked the swallow to pluck one sapphire from his eye and give that to the playwright. The swallow did accordingly.

The playwright became happy to see the sapphire. It would enable him to finish the play. The swallow returned to the Happy Prince to bid him good bye. The Happy Prince again requested him to stay for another night.

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The Happy Prince told the swallow about a little match girl in the square below. Her matches had fallen in the gutter. Her father would punish her if she returned home without money. Therefore, she was crying. He asked the swallow to fly to her and give her a sapphire from his eye. The swallow placed the sapphire into the little girl’s hand. Then he flew back to the Happy Prince who had gone blind. The swallow promised to stay with him forever. The Happy Prince asked him to fly over the city and tell him what he saw. The swallow told the Happy Prince about the hungry children and the poor people. As desired by the Happy Prince, the swallow took leaf after leaf of the fine gold over his body and gave them to the needy and helpless. As a result, the children played and the poor laughed.

Then winter set in and snow and frost appeared. The poor little swallow grew colder and colder but kept staying with the Happy Prince. However, he felt that his death was near. The swallow asked the Happy Prince to let him kiss his hand. The Prince asked him to kiss on the lips before going to Egypt. The swallow apprised him that he was going to the house of Death. Just then, he fell down dead.
Then a crack appeared inside the statue. The heart of the Happy Prince broke into two. The dead swallow lay on his feet. The Mayor and the Town Councillors happened to pass that way, the next morning. They declared that the Happy Prince was no longer beautiful and useful. They ordered to destroy it melting in fire.

The broken heart of the Happy Prince did not melt in the furnace. The Mayor declared that his own statue must be made with metal. The town Councillors disagreed and started quarrelling among themselves.

The broken lead heart was thrown away in the dust-heap near the swallow. God asked one of His Angels to bring him the two most precious things in the city. The Angel obeyed. God said that the little bird would sing for Him forever in the Garden of Paradise. The Happy Prince would praise him forever in the city of gold.

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MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions

1. उपसर्ग एवं प्रत्यय

उपसर्ग

प्रश्न 1.
उपसर्ग की परिभाषा दीजिये।
उत्तर–
वे शब्दांश जो किसी शब्द में जुड़कर उसका अर्थ परिवर्तित कर देते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं। उपसर्ग का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, फिर भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलकर एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। उपसर्ग सदैव शब्द के पहले आता है। जैसे – (म. प्र. 2009)
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प्रश्न 2.
वे शब्दांश जो शब्द के पहले जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं
(क) संधि
(ख) समास
(ग) उपसर्ग
(घ) प्रत्यय।
उत्तर–
(ग) उपसर्ग। प्रत्यय

प्रश्न 3.
प्रत्यय की परिभाषा दीजिये। (म. प्र. 2010)
उत्तर–
जो शब्दांश किसी शब्द या धातु के अंत में जुड़कर नये अर्थ का बोध कराते हैं उन्हें प्रत्यय कहते हैं।
जैसे –
कड़वाहट, लड़कपन में हट, पन प्रत्यय है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शब्द के अंत में प्रत्यय लगाने से उनके अर्थ में विशेषता एवं भिन्नता उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 4.
प्रत्यय कितने प्रकार के होते हैं? सोदाहरण स्पष्ट कीजिये।
उत्तर–
प्रत्यय के दो प्रकार होते हैं –
(i) कृदन्त और
(ii) तद्धित।

(i) कृदन्त – कृदन्त प्रत्यय वे होते हैं जो धातुओं के अंत में लगाये जाते हैं। जैसे
1. राखन + हारा = राखनहारा, (Imp.)
2. कसना + ओटी = कसौटी,
3. सोता + हुआ = सोताहुआ,
4. चट + नी = चटनी,
5. टिकना + आऊ = टिकाऊ,
6. लड़ना + आका = लड़ाका,
7. थक + आवट = थकावट,
8. बच + आव = बचाव।

(ii) तद्धित – तद्धित प्रत्यय वे होते हैं जो संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण के साथ लगाये जाते हैं।
जैसे –
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प्रश्न 5.
आई अथवा इक प्रत्यय लगाकर (2 – 2)शब्द बनाओ।
उत्तर–
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प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्गों को छाँटिए और उनके प्रयोग से अन्य तीन – तीन शब्दों की रचना कीजिए – अलिप्त, गैर – जिम्मेदारी, निष्काम, सुलभता।
उत्तर–
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प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय और उपसर्ग को अलग कर लिखिए
अज्ञात, विरक्त, ऐश्वर्यवान, अनदेखे, बेपहचान, बलवान, नि:स्तब्ध, सुलभ, सुन्दरता, वीरता।
उत्तर–
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प्रश्न 8.
“नैपुण्य” शब्द का दूसरा रूप है “निपुणता” जिसमें ता प्रत्यय लगा है। इसी प्रकार नीचे लिखे शब्दों के रूप बदलकर लिखिए – सुन्दरता, उदारता, चतुरता।
उत्तर–
सौन्दर्य, औदार्य, चातुर्य।

प्रश्न 9.
अध्यक्ष शब्द में ‘ईय’ प्रत्यय लगाकर बना अध्यक्षीय शब्द, इसका अर्थ है – “अध्यक्षका”। इसी तरह नीचे लिखे शब्दों से नये शब्द बनाइए – भोजन, राष्ट्र, वित्त, नाटक, पुस्तक, मनन, पठन, लेखक।
उत्तर–
भोजनीय, राष्ट्रीय, नाटकीय, पुस्तकीय, मननीय, पठनीय, लेखकीय।

प्रश्न 10.
‘अति’ उपसर्ग तथा ‘वट’ प्रत्यय लगाकर एक – एक शब्द लिखिए।
उत्तर–
‘अति’ उपसर्ग – अति + काल = अतिकाल
‘वट’ प्रत्यय – सजा + वट = सजावट।।

प्रश्न 11.
वे शब्दांश जो शब्द के पीछे जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं – (म. प्र. 2010,11)
(क) संधि (ख) समास (ग) प्रत्यय (घ) उपसर्ग
उत्तर–
(ग) प्रत्यय

2. संधि

प्रश्न 1.
संधि किसे कहते हैं? इसके कितने प्रकार हैं? (म. प्र. 2010, 13)
उत्तर–
दो वर्णों के मेल को सन्धि कहते हैं। सन्धि का अर्थ जोड़ होता है। संधि करने में किसी शब्द का अंतिम अक्षर दूसरे शब्द के पहले अक्षर से जुड़ा रहता है। जैसे – विद्या + आलय = विद्यालय। सूर्य + उदय = सूर्योदय।। संधि के तीन प्रकार हैं – 1. स्वर सन्धि 2. व्यंजन संधि और 3. विसर्ग संधि।

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प्रश्न 2.
स्वर संधि किसे कहते हैं? (Imp.)
उत्तर–
दो स्वरों के मेल को स्वर संधि कहते हैं। जैसे –
धर्म + अर्थ = धर्मार्थ।
भानु + उदय = भानूदय।
रवि + इन्द्र = रवीन्द्र। (म. प्र. 2010)

प्रश्न 3.
स्वर संधि कितने प्रकार की होती है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।
उत्तर–
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(i) दीर्घ संधि – जब एक ही स्वर चाहे वह ह्रस्व हो या दीर्घ एक साथ आये अर्थात् अ, इ, उ, ऋके बाद ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ क्रमश: आये तो दोनों को मिलाकर एक दीर्घ स्वर हो जाता है। जैसे
परम + अर्थ = परमार्थ, (म. प्र. 2011)
भानु + उदय = भानूदय, (म. प्र. 2013)
मही + इन्द्र = महीन्द्र,
पितृ + ऋण = पितृण,
अभि + इष्ट = अभीष्ट,
महा + आलय = महालय।

(i) गुण संधि – यदि स्वर अ या आ के बाद इ, ई, उ, ऊ या ऋ आते हैं तो उस स्थान पर क्रमश: ए, ओ तथा अर् हो जाते हैं। जैसे
महा + इन्द्र = महेन्द्र, (संभावित)
देव + ऋषि = देवर्षि, (Imp.)
राका + ईश = राकेश,
बाल + उपयोगी = बालोपयोगी,
सुर + ईश = सुरेश,
वीर + इन्द्र = वीरेन्द्र।

(iii) वृद्धि संधि – यदि अ, आ के बाद ए, ऐ, ओ, औ आये तो इनके स्थान पर क्रमश: ऐ, औ हो जाता है –
जैसे –
सदा + एव = सदैव, (म. प्र. 2010, 13)
मत + ऐक्य = मतैक्य,
परम + औषधि = परमौषधि,
जल + ओध = जलौध।

(iv) यण संधि – यदि इ, ई, उ, ऊ तथा ऋ के बाद कोई असमान स्वर हो तो ये क्रमश: य, व, या, यु हो जाते हैं।
जैसे –
यदि + अपि = यद्यपि,
सु + आगत = स्वागत,
इति + आदि = इत्यादि, (म. प्र. 2011)
प्रति + उपकार = प्रत्युपकार,
प्रति + एक = प्रत्येक,
अति + आचार = अत्याचार।

(v) अयादि संधि – ए, ऐ, औ के बाद किसी असमान भिन्न स्वर आने पर ए, ऐ, ओ के स्थान पर अय, आय, आव हो जाता है।
जैसे –
ने + अन = नयन,
नै + अक = नायक,
पौ + अक = पावक, (म. प्र. 2013)
पो + अन = पवन।

प्रश्न 4.
व्यंजन संधि की परिभाषा सोदाहरण दीजिये।
उत्तर–
जब व्यंजन और स्वर या व्यंजन से मेल होता है तो उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
जैसे –
सत् + जन = सज्जन, (म. प्र. 2010, 13)
वाक् + ईश = वागीश,
महत् + चक्र = महच्चक्र,
दिक् + गज = दिग्गज,
उत् + हार = उद्धार,
दुस + चरित्र = दुश्चरित्र,
राम + अयन = रामायण,
सम + कल्प = संकल्प,
जगत् + नाथ = जगन्नाथ,
उत् + गमन = उद्गमन,
सत् + आचार = सदाचार, (म. प्र. 2013)
सत् + आनन्द = सदानन्द,
दिक् + अम्बर = दिगम्बर, (म. प्र. 2011)
सत् + गति = सद्गति,
उत् + घाटन = उद्घाटन, –
शम् + कर = शंकर,

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प्रश्न 5.
विसर्ग संधि की परिभाषा उदाहरण सहित दीजिये।
उत्तर–
विसर्ग के साथ जब किसी स्वर या व्यंजन का मेल होता है तब विसर्ग संधि होती है।
जैसे –
निः + छल = निश्छल,
धनु: + टंकार = धनुष्टंकार,
दुः + कर = दुष्कर,
मनः + हर = मनोहर, (म. प्र. 2011, 12)
पुनः + जन्म = पुनर्जन्म,
निः + पाप = निष्पाप,
मनः + रथ = मनोरथ,
नमः + कार = नमस्कार,
मनः + योग = मनोयोग,
पुरः + कार = पुरस्कार,
दुः + शासन = दुःशासन, .
निः + झर = निर्झर,
निः + धन = निर्धन (म. प्र. 2010)
निः + रोग = निरोग,
बहिः + कार = बहिष्कार।

प्रश्न 6.
‘राजेन्द्र’ तथा ‘विद्यालय’ शब्द का संधि विच्छेद कीजिए।
उत्तर–
राज + इन्द्र = राजेन्द्र (गुण संधि)
विद्या + आलय = विद्यालय (दीर्घ संधि)

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों का संधि विच्छेद कर उनमें प्रयुक्त संधियों के नाम लिखिए धर्मोपदेशक, अधर्मासक्त, भिन्नतार्थ।
उत्तर–
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3. समास

प्रश्न 1.
समास किसे कहते हैं? समास के विविध प्रकारों को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर–
दो या दो से अधिक शब्दों के ऐसे मेल को जिसमें उन शब्दों के बीच सम्बन्ध बताने वाले अन्य शब्द लोप हो जाते हैं, समास कहते हैं।
यथा – भाई और बहिन = भाईबहिन।
(बीच का सम्बन्ध बताने वाला शब्द ‘और’ लोप है।)

सामासिक पदों के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए विभक्तियों को रखना ‘विग्रह’ कहलाता है। जैसे भाईबहिन सामासिक शब्द है, इसका विग्रह ‘भाई और बहिन’ हुआ।

समास के प्रकार – समास छ: प्रकार के होते हैं –

(1) अव्ययीभाव समास – जब दो पदों में एक पद अव्यय तथा दूसरा पद संज्ञा होकर मेल होता है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
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इसी प्रकार – आजन्म, आमरण, अनुरूप, हररोज, भरपेट, अतिकाल, धीरे – धीरे, हाथों – हाथ, निर्भय, समूल आदि अव्ययीभाव समास हैं। (म. प्र. 2015)

(2) तत्पुरुष समास – यह ऐसे दो पदों का मेल है जिसमें बाद का पद प्रधान होता है। जैसे – पददलित, मार्गव्यय, ऋणमुक्त, बैलगाड़ी, निशाचर, राष्ट्रप्रेम, राममन्दिर, तुलसीकृत, गृहप्रवेश, शरणागत धर्मभ्रष्ट उपर्युक्त सामासिक शब्दों में बाद के पद प्रधान हैं। (म. प्र. 2009)
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(3) कर्मधारय समास – यह ऐसे दो पदों का मेल है जिसमें एक विशेषण होता है। जैसे – नीलाम्बर, मृदुवाणी, श्वेताम्बर, कमलमुख।
नील + अम्बर = नीलाम्बर (म. प्र. 2013)
मृदु + वाणी = मृदुवाणी
श्वेत + अम्बर = श्वेताम्बर
कमल + मुख = कमलमुख
धर्म + नायक = धर्मनायक (म. प्र. 2011)
पीत + अम्बर = पीताम्बर। (म. प्र. 2011)

(4) द्विगु समास – यह ऐसे पदों का मेल है जिसमें प्रथम पद संख्यावाचक विशेषण तथा दूसरा पद संज्ञा हो। जैसे – नवरत्न, त्रिभुवन, चतुष्पदी, चौमासा। पंचवटी (पाँच वटों का समूह), त्रिकाल, नवरात्रि, त्रिनेत्र, चुतर्वेद (चार वेदों का समूह)। नवनिधि (नौ निधियों का समूह) (म. प्र. 2011)
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(5) द्वन्द्व समास – दोनों पद प्रधान होते हैं। दोनों के बीच और शब्द का लोप होता है।
जैसे –
मातापिता = माता और पिता (म. प्र. 2013)
राजरानी = राजा और रानी
गंगा – यमुना = गंगा और यमुना (म. प्र. 2009)
दयाधर्म = दया और धर्म
अन्नजल = अन्न और जल।

(6) बहुब्रीहि समास – यह ऐसे पदों का मेल है जिनसे बना तीसरा पद नवीन अर्थ देता है। जैसे लम्बोदर – लम्बा है उदर जिसका अर्थात् गणेश। नीलकंठ – नीला है कंठ जिसका अर्थात् शंकर। दशानन दस+ आनन् = रावण। पीताम्बर – जिसका वस्त्र पीला है अर्थात् श्रीकृष्ण। चतुर्मुख – चारमुख = ब्रह्मा। (म. प्र. 2010) गजानन – गज + आनन = गणेश। (म. प्र. 2009, 13)

प्रश्न 2.
नीचे दिए समास युक्त पदों का विग्रह कीजिए –
धर्मनायक, दिगंबर, महात्मा, तरुण – तरुणी, समुद्र – यात्रा।
उत्तर–
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित किन्हीं दो शब्दों का समास विग्रह कर समास का नाम लिखिये
(i) भरपेट,
(ii) राजपुत्र,
(iii) सप्ताह,
(iv) लेन – देन।
उत्तर–
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प्रश्न 4.
जिस समास में प्रथम शब्द संख्यावाचक हो, उसे कहते हैं …. (म. प्र. 2010)
(क) द्विगु समास (ख) द्वन्द्व समास (ग) कर्मधारय समास (घ) तत्पुरुष समास।
उत्तर–
(क) द्विगु समास।

प्रश्न 5.
‘समास’ के …………. भेद होते हैं। (पाँच/छः) (म. प्र. 2015)
उत्तर–
छः।

4. लगभग समान रूप से उच्चरित किन्तु अर्थ में भिन्न शब्द

प्रश्न 1.
समोच्चरित भिन्नार्थक शब्द किसे कहते हैं, उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर–
प्रत्येक भाषा में कुछ ऐसे शब्द होते हैं जिनका उच्चारण एक जैसा होता है या लगभग समान होता है, किन्तु उनके अर्थों में अन्तर होता है। छात्रों को इन शब्दों का ज्ञान होना चाहिए।
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नीचे श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्दों के उदाहरण दिये जा रहे हैं –

प्रश्न 2.
निम्नलिखित समोच्चरित भिन्नार्थक शब्दों में अंतर स्पष्ट कीजिए –
अन्न – अन्य, इति – ईति, कृपण – कृपाण, वात – बात।
उत्तर–
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प्रश्न 3.
निम्नांकित समोच्चरित भिन्नार्थक शब्दों में अंतर स्पष्ट कीजिए –
वारिद – वारिधि, क्षात्र – छात्र, सुकर – सूकर, पथ – पथ्य।
उत्तर–
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के दो – दो अनेकार्थक शब्द लिखकर उसके सामने अर्थ स्पष्ट कीजिए –
अंक, अंबर।
उत्तर–
अंक – संख्या, गोद। (म. प्र. 2015)
अंबर – वस्त्र, आकाश।

5. विलोम शब्द

प्रश्न 1.
विलोम शब्द की परिभाषा सोदाहरण दीजिए।
उत्तर–
एक – दूसरे के विपरीत या उल्टा अर्थ बतलाने वाले शब्द विलोम शब्द कहलाते हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिये कि संज्ञा शब्द का विलोम संज्ञा ही होगा और विशेषण शब्द का विलोम विशेषण ही होगा।
जैसे –
अनुराग – विराग।

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कुछ महत्त्वपूर्ण विलोम शब्द शब्द
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प्रश्न 2.
“आदि और अंत” विलोम शब्द हैं। इसी तरह निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए –
वीर, प्राची, फूली, रण, घमण्ड, स्वच्छंद, पुलकित, दलित। (पा. पु. प्रश्न)
उत्तर–
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प्रश्न 3.
नीचे लिखे शब्दों के विलोम शब्द लिखिए –
अज्ञात, अनजान, बलवान, अगम्य, बहुत – सा, वीर, सच्चा, गर्म।
उत्तर–
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प्रश्न 4.
‘सम्पन्न’ एवं ‘नीति’ शब्द का विलोम लिखिए।
उत्तर–
सम्पन्न – विपन्न
नीति – अनीति।

6. पर्यायवाची शब्द

प्रश्न 1.
पर्यायवाची शब्द की परिभाषा सोदाहरण दीजिये।
उत्तर–
जिन शब्दों के अर्थ समान होते हैं उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं। पर्यायवाची शब्दों को समानार्थक या प्रति शब्द भी कहते हैं।
जैसे –
संसार = जग, जगत, दुनिया, विश्व, लोक।

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कुछ महत्त्वपूर्ण पर्यायवाची शब्द
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो – दो पर्यायवाची शब्द लिखिए सोना, आकाश।
उत्तर–
सोना = कंचन, कनक
आकाश = आसमान, अम्बर।

प्रश्न 3.
‘आनंद एवं ईश्वर’ शब्द के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर–
आनंद – प्रसन्न, हर्ष, प्रमोद।
ईश्वर – भगवान, ईश, परमेश्वर।

प्रश्न 4.
‘अमृत’ का पर्यायवाची है
(क) क्षीर (ख) अमर (ग) उपल (घ) सुधा।
उत्तर–
(घ) सुधा। (म. प्र. 2010, 12)

7. भाव – पल्लवन – भाव – विस्तार

विचार एवं भाव विस्तार की प्रक्रिया ‘पल्लवन’ भी कहलाती है। इसके अन्तर्गत महत्वपूर्ण कथन, सूत्र, सूक्ति, विचार अथवा लोकोक्ति में निहित भावों को विस्तार से प्रस्तुत किया जाता है। इसे ‘विशदीकरण’, ‘विस्तारण’, ‘वाक्य विस्तार’ ‘भाव विस्तार’ आदि नामों से भी जाना जाता है। यह सारांश लेखन की प्रतिगामी प्रक्रिया है। भाव विस्तार के द्वारा विद्यार्थी की कल्पना और रचना शक्ति का परिचय मिलता है। इसमें मूल वाक्य में निहित भावों का ही विश्लेषण किया जाता है।

पल्लवन न तो बहुत छोटा होना चाहिए और न ही बहुत बड़ा। सामान्यत: छ: वाक्यों में या 50 से 60 शब्दों में भाव विस्तार करना चाहिए। पल्लवन या भाव विस्तार सम्बन्धी निर्देश निम्नलिखित हैं –
1.दी गई पंक्ति का अर्थ पूरी तरह समझने के लिए उसका एकाधिक बार ध्यान से एवं विचारपूर्वक वाचन करना चाहिए।
2. सम्पूर्ण विचारों में क्रमबद्धता होनी चाहिए।
3. भाव विस्तार अन्य पुरुष में ही लिखा जाना चाहिए।
4. वाक्य छोटे हों तथा सरल, स्पष्ट एवं मौलिक भाषा का प्रयोग होना चाहिए।
5. मूल भाव से सम्बन्धित बातें ही लिखी जाएँ।
6. उदाहरण अपेक्षित हो तभी दिया जाना चाहिए।
7. पुनरावृत्ति या अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए।

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उदाहरण
1. ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं।’ (Imp.)
उत्तर–
दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ इस कहावत का आशय है कि कोई भी चीज दूर से जरा ज्यादा आकर्षक लगती है, क्योंकि दूर की वस्तु यथार्थ से दूर होती है, इसलिए कर्कश नहीं होती। बूढ़ों को अतीत और तरुणों को भविष्य अच्छे लगते हैं वर्तमान से सभी घबराते हैं यहाँ भी वही प्रवृत्ति काम करती है। वर्तमान यथार्थ होता है, कर्कश होता है। अतीत और अनागत दूर के ढोल की तरह सुहावने लगते हैं। पास बजने वाला ढोल सुहावना नहीं कर्कश लगता है।

2. ‘न दोषों का अन्त है न सुधारों का।’ (म. प्र. 2013)
उत्तर–
‘गुण – दोषमय विश्व कीन्ह करतार’ संसार गुण दोषमय है। सुधार सामाजिक जीवन की निरन्तर आवश्यकता है। ऐसा कोई युग नहीं रहा जिसमें समाज सुधार न किया गया हो। मान्यताएँ बदलती हैं परिस्थितियाँ बदलती हैं। अतः कोई व्यवस्था अनन्त काल तक स्वीकृत नहीं हो सकती। प्रत्येक कदम जहाँ कुछ अच्छाई रखता है वहीं उसमें कुछ बुराई भी होती है। बुराई को दूर करने फिर नया कदम उठाना पड़ता है इस तरह बदलते समय के साथ सुधारों का सिलसिला जारी रहता है।

3. ‘धर्म के मूल में पार्थक्य नहीं, एकता का द्योतक है।’
उत्तर–
प्रस्तुत पंक्ति में धर्म का वास्तविक रहस्य स्पष्ट किया गया है। चाहे किसी भी धर्म का मानने वाला हो उसकी मूलभूत अवधारणाएँ लगभग समान होती हैं। विश्व के किसी भी धर्म में पृथकता की भावना नहीं है। प्रत्येक धर्म प्राणीमात्र के साथ मैत्री भाव रखने का संदेश देता है। धर्म की साधना पद्धति या कर्मकांड पृथक हो सकते हैं किन्तु मानव मात्र का कल्याण, भाई चारा उसके चरम लक्ष्य होते हैं। इसलिए धर्म एकता का परिचायक है।

4. “स्वाधीनता विकास की पहली शर्त है।” (म. प्र. 2006, 13)
उत्तर–
‘स्व + अधीनता’ अर्थात् अपने अधीन रहना। यद्यपि इसका अर्थ स्वतंत्रता के लिए लिया जाता है। बंधन मुक्त रहने का अपना सुख है। बिना स्वंत्रतता के जीवन निरर्थक है। तोते को सोने के पिंजरे में पाल लीजिए लेकिन उसे सुख नहीं मिलेगा। स्वाधीनता में ही व्यक्ति का भी विकास सन्निहित होता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तरक्की तभी संभव है जब हम स्वाधीन एवं स्वतंत्र रहें।

5. “बचपन में पड़े हुए शुभ – अशुभ संस्कार बहुत जड़े जमाते हैं।” (म. प्र. 2006)
उत्तर–
व्यक्ति माता – पिता के संरक्षण में अपना बचपन व्यतीत करता है। उसकी स्थिति कुम्हार के कच्चे घड़े के समान होती है। उसको आकार – प्रकार, रंग – रूप कुम्हार प्रदान करता है, ठीक उसी प्रकार अबोध मन को संस्कारित करने का गुरुतर कार्य माता – पिता का होता है। बचपन में पड़े हुए संस्कार ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। शुभ संस्कार से व्यक्ति ऊँचाइयों को स्पर्श कर पाता है और अशुभ संस्कार उसे गर्त की ओर ले जाते हैं।

6. कार्य को पूजा की भावना से करो। (म. प्र. 2010,11)
उत्तर–
हम जो भी कार्य करें वह केवल औपचारिकता को पूर्ण करने के लिए नहीं, बल्कि उस कार्य में एक आत्मिक संतुष्टि का अनुभव हो किया गया कार्य पूर्ण रूप से तह दिल से किया गया है और जब ऐसा कार्य किया जाये तो वह किसी को दिखाने के लिए बल्कि आत्मिक शांति के लिए तब वह किया गया कार्य किसी पूजा से कम नहीं होता, इसके लिए कार्य के प्रति समर्पण भाव होना अनिवार्य है।

7. स्वतंत्रता से अभिप्राय स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता से है। (म. प्र. 2010)
उत्तर–
स्वतंत्रता से अभिप्राय स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता से इसलिए है क्योंकि हम इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से बंधन मुक्त होकर कर सकें किंतु स्वेच्छाचारिता या स्वच्छंदतावादी विचारधारा हो क्योंकि इसके प्रभाव से मनुष्य उच्छृखल प्रवृति का हो सकता है। हम वस्तु स्थिति को समझें, साथ ही अपनी सत्ता को पहचानें।

8. कर्ता से बढ़कर कर्म का स्मारक दूसरा नहीं। (म. प्र. 2010)
उत्तर–
किसी कार्य का सबसे बड़ा स्मारक उस कर्म को करने वाला अर्थात कर्ता होता है। जब हम किसी कर्म की प्रशंसा करते हैं तो हमारी दृष्टि उस कार्यकर्ता की ओर जाती है। कर्म को कर्ता से पृथक करके नहीं देखा जा सकता ! जब हमें उसी प्रकार के कार्य करने का सुअवसर प्राप्त होता है तो मार्गदर्शन के लिए कर्ता की ओर ध्यान चला जाता है। वह कर्ता हमारा आदर्श बन जाता है कर्मों द्वारा ही समाज में कर्ता की स्थिति सुदृढ़ और आकर्षक बनती है। भारतीय संस्कृति का पताका विदेशों में फैलाने की चर्चा होती है तो स्वतः ही हमारा ध्यान स्वामी विवेकानंद की ओर आकर्षित हो जाता है। अत: कर्म का स्मारक कर्ता के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता है।

9. ‘तुम देखते हो कि जीवन सौंदर्य है, हम जागते रहते हैं और देखते रहते हैं कि जीवन कर्त्तव्य है।’ (Imp.)
उत्तर–
माधव अपने मित्र शेखर से कहता है कि एक कवि और राजनीतिज्ञ में बहुत अंतर होता है। कवि जीवन में सौंदर्य देखता है। वह कल्पना की दुनिया में खोया रहता है। यहाँ तक कि वह अपने आप को भी भूल जाता है जबकि राजनीतिज्ञ सदैव जागता रहता है। वह एक पल के लिए भी वास्तविक दुनिया से अलग नहीं होता है। एक राजपुरुष के लिए कर्त्तव्य ही उसकी दुनिया है।

8. मुहावरे एवं लोकोक्ति

मुहावरे का अर्थ – मुहावरा एक ऐसा वाक्यांश होता है जिसका सामान्य से हटकर विलक्षण अर्थ होता है। जैसे – वह लड़का नहीं शेर है शेर। इस कथन में शेर शब्द किसी वन्य पशु के लिए न होकर शेर के गुणों (साहसी) को प्रकट करने वाला है।

लोकोक्ति का अर्थ – इसका अर्थ होता है लोक में प्रचलित उक्ति। लोकोक्ति केवल वाक्यांश के रूप में नहीं होती, वह तो पूरा वाक्य होती है। किसी कथन का उदाहरण बात की पुष्टि होती है, जो इसमें दिया जाता है। वह अपने आप में पूर्ण होती है। (म. प्र. 2012)

प्रश्न 1.
मुहावरा व लोकोक्ति में अंतर स्पष्ट कीजिए। (Imp.)
उत्तर–
मुहावरा एवं लोकोक्ति में अंतर निम्नलिखित हैं-
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 29

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प्रश्न 2.
लोक प्रचलित उक्ति को लोकोक्ति कहते हैं यह कथन सत्य है या असत्य।
उत्तर–
सत्य। (म. प्र. 2011)
कुछ महत्वपूर्ण मुहावरों का अर्थ तथा प्रयोग

1. अपना उल्लू सीधा करना – अपना स्वार्थ सिद्ध करना। (म. प्र. 2011)
प्रयोग – जो मनुष्य स्वार्थी होता है वह अपना उल्लू सीधा करता है।

2. अक्ल पर पत्थर पड़ना – अज्ञानता से काम करना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – उस समय न जाने क्यों मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गये थे, जब मैंने अपने बड़े भाई को कटु शब्द कहे थे।

3. आँख का काँटा होना – अत्यधिक खटकना।
प्रयोग – चुनाव के समय विपक्षी दल के सदस्य एक – दूसरे की आँख के काँटा होते हैं।

4. आँखों का तारा – अत्यधिक प्रिय होना। (म. प्र. 2011, 15)
प्रयोग – माँ को अपने सभी बच्चे प्रिय होते हैं परन्तु मोहन सबसे छोटा होने के कारण वह अपनी माँ की आँखों का तारा है।

5. आँच न आने देना – सम्भावित हानि का स्पर्श भी न होने देना।
प्रयोग – रक्षाबन्धन का त्यौहार भाइयों के समक्ष बहनों के अस्तित्व पर आँच न आने देने का प्रतीक है।

6. आग लगाना – भड़काना।
प्रयोग – परदेशी ने अशोक का नाम लेकर शिशुपाल के हृदय में आग लगा दी।

7. आकाश से बातें करना – बढ़ – चढ़कर बोलना।
प्रयोग नगर निगम का सदस्य बनते ही वह आसमान से बातें करने लगा।

8. आटे दाल का भाव मालूम होना – सच्चाई का ज्ञान।
प्रयोग – कार्यक्षेत्र का पूर्ण अनुभव होने पर ही आटे दाल का भाव मालूम होता है।

9. ईद का चाँद होना – कठिनता से दिखाई देना। (म. प्र. 2010, 15)
प्रयोग – रमेश ने जब दो महीने के बाद अपने मित्र को सामने से आते हुए देखा तो कहा कि आजकल तुम तो ईद के चाँद हो गये हो।

10. काया पलट होना – पूर्ण रूप से बदल जाना। (म. प्र. 2011)
प्रयोग – ज्ञानेश के पार्षद बनते ही मुहल्ले की काया पलट गई।

11. गला छुड़ाना – कष्ट से छुटकारा पाना।।
प्रयोग – रमेश पड़ोसियों का झगड़ा शांत करने गया था लेकिन पुलिस स्टेशन जाना पड़ गया, वह बहुत मुश्किल से गला छुड़ाकर भागा।

12. गड़े मुर्दे उखाड़ना – पुरानी बातें याद करना। (Imp.)
प्रयोग – विद्वान व्यक्ति गड़े मुर्दे उखाड़ने की अपेक्षा वर्तमान में जीना पसंद करते हैं।

13. गाल बजाना – व्यर्थ की बात करना। (म. प्र. 2013)
प्रयोग – सुरेन्द्र की बातों पर विश्वास मत करना, उसकी तो गाल बजाने की आदत पड़ गयी है।

14. टेढ़ी खीर – कठिन कार्य। (म. प्र. 2013)
प्रयोग – हिमालय की चढ़ाई करना टेढ़ी खीर है।

15. तिनके को पहाड़ करना – छोटी बात बड़ी बनाना। (म. प्र. 2013)
प्रयोग – आम लोगों में तो तिनके को पहाड़ करना कोई असम्भव बात नहीं है।

16. नोन, तेल, लकड़ी के फेर में पड़ना – आजीविका कमाने के चक्कर में रहना। (Imp.)
प्रयोग–नोन, तेल, लकड़ी के चक्कर में पड़ने के बाद मनुष्य को किसी वस्तु की सुध नहीं रहती।

17. नेत्र लाल होना – क्रोधित होना।
प्रयोग – लक्ष्मण की बातों को सुनकर परशुरामजी के नेत्र लाल हो गये।

18. नौ दो ग्यारह होना – भाग जाना।
प्रयोग – पुलिस को देखकर चोर नौ दो ग्यारह हो गये।

19. पहाड़ खड़ा होना बहुत बड़ी कठिनाई आना।
प्रयोग – तुर्की में भूकंप के कारण विपत्तियों का पहाड़ खड़ा हो गया।

20. पिंड न छोड़ना – पीछा न छोड़ना।
प्रयोग – नशे की आदत एक बार लग जाने से वह पिंड नहीं छोड़ती है।

21. फूला न समाना – अत्यधिक खुश होना।
प्रयोग – प्रथम श्रेणी में पास होने पर राधा फूली न समायी।

22. बंदर के हाथ में मोतियों की माला – अयोग्य व्यक्ति के हाथ में श्रेष्ठ वस्तु।
प्रयोग – मुरारी लाल के हाथ में सरपंच का पद बंदर के हाथ में मोतियों की माला की तरह है।

23. आकाश के तारे तोड़ना – असंभव कार्य करना।
प्रयोग – निशांत का बोर्ड परीक्षा में अव्वल आना आकाश के तारे तोड़ने के समान है।

24. कमर कसना – तैयार रहना। (म. प्र. 2010)
प्रयोग – कारगिल युद्ध के लिए भारतीय सैनिकों ने कमर कस लिया था।

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25. बाल बाँका न होना – कुछ भी हानि न होना।
ईश्वर जिसकी सहायता करता है, उसका कोई बाल बाँका नहीं कर सकता।

26. मिट्टी में मिला देना – नष्ट करना।
प्रयोग – मोहन को परीक्षा में नकल करते हुए जब अध्यापक ने पकड़ लिया तो उसकी सारी इज्जत मिट्टी में मिल गयी।

27. मिट्टी में मिलना – समाप्त होना।
प्रयोग – भारत में हुए घोटालों ने यहाँ की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला दी।

28. लहू सूखना – भयभीत होना।
प्रयोग – पुलिस को देखते ही चोर का लहू सूख गया।

29. हाथ के तोते उड़ना – घबरा जाना।
प्रयोग–अपराधी का जब पता नहीं लग रहा था तब शिशुपाल के हाथ से तोते उड़ने लगे।

30. ईंट से ईंट बजाना – टकराना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – चुनाव में ईंट से ईंट बज जाया करती है।

31. आँखों में धूल झोंकना – धोखा देना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – चोर आँखों में धूल झोंककर बैग लेकर फरार हो गया।

32. कब्र में पाँव लटकाना – मृत्यु करीब होना। (म. प्र. 2009)
प्रयोग – बुजुर्गों के पैर कब्र में लटके होते हैं।

33. कफन सिर से बाँधना – मरने के लिए तैयार रहना। (म. प्र. 2010)
प्रयोग – अभिमन्यु जब चक्र भेदन करने गया तब उसने कफन सिर से बाँधना शुरू किया।

34. उँगली उठाना – आलोचना करना। (म. प्र. 2015)
प्रयोग – मोहन की उन्नति देखकर उसके मित्रों ने उँगली उठाना शुरू कर दिया।

कुछ महत्त्वपूर्ण लोकोक्तियों के अर्थ एवं प्रयोग
1. आँख के अन्धे नाम नैनसुख – नाम और गुणों में अंतर।
प्रयोग—नाम तो करोड़ीमल, लेकिन पास में एक पैसा नहीं अर्थात् आँखों का अंधा और नाम नैनसुख।

2. अकल बड़ी या भैंस शारीरिक शक्ति से मानसिक शक्ति बड़ी होती है।
प्रयोग – उस आदमी ने बुद्धि के बल से एक पहलवान को पटक दिया वास्तव में अकल बड़ी कि भैंस।

3. आम के आम गुठलियों के दाम दोनों तरफ से लाभ होना। (Imp.)
प्रयोग रमेश को सरकारी नौकरी के साथ ही अमेरिका जाने का निमंत्रण भी मिला इसी को कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम।

4. ऊँची दुकान फीका पकवान—दुकान तो बड़ी प्रसिद्ध परन्तु माल घटिया।
प्रयोग नगर के सबसे धनाढ्य सेठ की दुकान में घटिया मिष्ठान देखकर वह बोला, ऊँची दुकान फीका पकवान।

5. ऊँट के मुँह में जीरा—आवश्यकता से कम देना।
प्रयोग—एक व्यक्ति की खुराक दस रोटी है, लेकिन जब वह खाने बैठा तो केवल दो रोटी ही दी, जो ऊँट के मुँह में जीरे के समान है।

6. थोथा चना बाजे घना गुणहीन आडम्बर अधिक करता है।
प्रयोग—पंडित जी बहुत बढ़ – चढ़ कर बातें कर रहे थे जब धर्म और दर्शन पर चर्चा हुई तो वे चुप्पी साध गये, इसे कहते हैं थोथा चना बाजे घना।

7. मान न मान मैं तेरा मेहमान – जबरदस्ती किसी के गले पड़ना।
प्रयोग – एक अपरिचित व्यक्ति रात के समय घर आकर बोला मैं यहाँ ठहरूँगा, इसी को कहते हैं कि मान न मान मैं तेरा मेहमान।

8. सिर मुड़ाते ही ओले पड़े – काम शुरू करते ही विघ्न पड़ना।
प्रयोग इसी साल खेती शुरू की और सूखा पड़ गया इसी को कहते हैं कि सिर मुड़ाते ही ओले पड़े।

9. व्याकरण, भाषा – बोध पर वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नांकित उपसर्ग मिश्रित शब्दों की जोड़ियाँ बनाइए
अभि, उप, कम, नि, कु, कुकर्म, उपलक्ष्य, कमजोर, अभिमान, निकम्मा।
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 30

प्रश्न 2.
थकावट, चटनी, बचाव, खटिया से प्रत्यय छाँटिए
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 31

प्रश्न 3.
‘परमार्थ में कौन – सी संधि है?
उत्तर–
दीर्घ स्वर संधि।

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प्रश्न 4.
‘सज्जन’ में कौन – सी संधि है?
उत्तर–
व्यंजन संधि।

प्रश्न 5.
‘दुष्कर में कौन – सी संधि है?
उत्तर–
विसर्ग संधि।

प्रश्न 6.
सही जोड़ियाँ बनाइए
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 32
उत्तर–
MP Board Class 11th Samanya Hindi व्याकरण, भाषा बोध Important Questions 33

प्रश्न 7.
‘लक्ष – लक्ष्य का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–
लक्ष – लाख।
लक्ष्य – उद्देश्य।

प्रश्न 8.
‘अवधि – अवधी’ का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–
अवधि – निश्चित समय।
अवधी – एक बोली

प्रश्न 9.
निरक्षर, निर्लज्ज का विलोम लिखिए।
उत्तर–
निरक्षर – साक्षर।
निर्लज्ज – सलज्ज।

प्रश्न 10.
पेड़, हवा के दो – दो पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर–
पेड़ – वृक्ष, तरु।
हवा – वायु, समीर।

प्रश्न 11.
‘आग लगाना’ मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर–
भड़काना।

प्रश्न 12.
‘आँख का तारा’ मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर–
अत्यधिक प्रिय।

प्रश्न 13.
‘आँख के अन्धे नाम नयन सुख’ का क्या अर्थ होता है?
उत्तर–
नाम एवं गुण में अंतर।

प्रश्न 14.
‘थोथा चना बाजे घना’ का क्या अर्थ होता है?
उत्तर–
गुणहीन अधिक आडम्बर करता है।

प्रश्न 15.
भाव पल्लवन में क्या किया जाता है?
उत्तर–
किसी भी भाव का विस्तार।

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प्रश्न 16.
संधि विच्छेद कर संधि का नाम लिखिए (म. प्र. 2009)
(i) निश्चल – निः + छल = विसर्ग संधि
(ii) गायक – गै + अक = अयादि स्वर संधि
(iii) दिग्गज – दिक् + गज = व्यंजन संधि
(iv) इत्यादि – इति + आदि = यण स्वर संधि।

प्रश्न 17.
कौन – से समास में दोनों पद प्रधान होते हैं? (म. प्र. 2009)
उत्तर–
द्वन्द्व समास।

प्रश्न 18.
‘मेघ’ पानी बरसते हैं। वाक्य शुद्ध अथवा अशुद्ध? (म. प्र. 2009)
उत्तर–
अशुद्ध।

प्रश्न 19.
(अ) जिसका कोई शत्रु न हो’ उसके लिए एक शब्द है (म. प्र. 2009, 15)
(ब) कविता रचने वाला। (म. प्र. 2015)
(स) कलाओं का सृजन करने वाला। (म. प्र. 2015)
(द) अभिमान करने वाला। (म. प्र. 2015)
उत्तर–
(अ) अजातशत्रु, (ब) कवि, रचयिता, (स) कलाकार, (द) अभिमानी।

प्रश्न 20.
“आपने भोजन कर लिया है।” वाक्य प्रश्न वाचक वाक्य की श्रेणी में आता है। यह वाक्य शुद्ध है या अशुद्ध। (म. प्र. 2011)
उत्तर–
अशुद्ध।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए (म. प्र. 2015)
(i) सीता और राम आता है। शुद्ध वाक्य – सीता और राम आते हैं।
(ii) अपन जल्दी चलें। शुद्ध वाक्य – हम जल्दी चलें।
(iii) गुप्त रहस्य की बात है। शुद्ध वाक्य – रहस्य की बात है।

प्रश्न 22.
विधि वाचक एवं प्रश्न वाचक वाक्य के एक – एक उदाहरण लिखिए। (म. प्र. 2015)
उत्तर–
विधि वाचक वाक्य – अशोक राजनगर में रहता है।
प्रश्न वाचक वाक्य – क्या तुम आज ही वापिस जाओगे?

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MP Board Class 11th Special Hindi छन्द

MP Board Class 11th Special Hindi छन्द

छन्द शब्द छद् धातु से निष्पन्न होकर असन् प्रत्यय लगाने से बना है। इसका अर्थ है प्रसन्न करना, बाँधना अथवा आच्छादित करना। छन्द मात्रिक और वार्णिक भेदों के आधार पर ध्वनियों के क्रम से गति और यति के नियमों से बँधा होता है। इससे कविता में प्रवाह, लय और संगीतात्मकता की उत्पत्ति होती है। छन्दों के दो भेद हैं

1. मात्रिक और वर्णिक
[2008]

मात्राओं की गणना किए जाने वाले छन्दों को मात्रिक छन्द और वर्गों की संख्या तथा हस्व दीर्घ स्वरों की गणना किए जाने वाले छन्दों को वर्णिक छन्द कहते हैं।

2. कुण्डलियाँ
[2008, 09, 12]

कुण्डलियाँ छः पंक्तियों का छन्द है। इसके प्रथम दो दल दोहे के तथा अन्तिम चार दल रोला के होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं।
उदाहरण- 1
ऽऽ।।।। ऽ।।।।।।ऽऽ =24
सोई अवसर के परे को न सहै दुःख द्वन्द्व
ऽ।। ऽऽ ऽ।।। ऽ ऽ ऽ ।।ऽ। =24
जाय बिकाने डोम घर वै राजा हरिचन्द
वै राजा हरिश्चन्द करै मरघट रखवारी।
धरे तपस्वी भेष फिरे अर्जुन बलधारी।।
कह गिरिधर कविराय, तपै वह भीम रसोई।
को न करै घटि काम सरे अवसर के सोई।।

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उदाहरण 2
।।ऽ।।।।ऽ।।।।। ऽऽ ऽ ऽ।
“रहिये लट पट काटि दिन, बरु धामें मौ सोय।
छाँह न बाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय।।” 13 + 11 = 24
ऽ।।।। ऽ ऽ। ऽ।।। ऽऽ ऽऽ
जो तरु पतरो होय एक दिन धोखा दै है।
जो दिन चले बयारि टूटि जर से जै हे।। 11 + 13 – 24
कह गिरधर’ कविराय, छाँह मोटे की गहिये।
पाती सब झरिजाय, तऊ छाया में रहिये।।

उदाहरण
3-“तुक बन्दी का बढ़ रहा, कविता में अति जोर।
लगे नाचने मुर्गे भी, समझ स्वयं को मोर।।
समझ स्वयं को मोर, अर्थ तक नहीं जानते।
पढ़ औरों से गीत, गर्व से रस बखानते।।
कहै कपिल समुझाय, चल रही है दलबन्दी।
कविता रोती आज हँस रही है तुकबन्दी।।

3. घनाक्षरी
[2008]

घनाक्षरी छन्द के प्रत्येक चरण में 32 वर्ण होते हैं। 8, 8, 8, 8 पर यति और अन्त में गुरु-लघु (51) आते हैं।
उदाहरण-
।।।ऽऽ।।।ऽ।ऽऽ। ऽ ऽ।
नगर से दूर कुछ, गाँव की सी बस्ती एक
।।ऽ।ऽ ऽऽऽ।।।।।।। = 32
हरे भरे खेतों के, समीप अति अभिराम।।
जहाँ पत्र जाल अन्तराल से झलकते हैं।
लाल खपरैल श्वेत छज्जों के सँवारे धाम।।

उदाहरण
1-“लखि घनश्याम तन, मोर है मगन मन,
सुमन सकल अलि गावहिं गुनन-गुनन।
जीवनि को जीवन-प्रदायक सबहिं विधि,
नाचैं बनसीकर सु-धारन छनन-छनन।।
सीतल सुगन्ध मन्द कहति त्रिविधि वायु,
मधुर-मधुर स्वप्न करति सनन-सनन।
हषीकेश सुषमा अलौकिक विलोकि अहो?
परम अगम सुख मिलतु जनन-जनन।।

उदाहरण
2. भूरी हरी घास आस-पास फूली सरसों है,
पीली-पीली बिन्दियों का चारों ओर है प्रसार।
कुछ दूर विरल सघन फिर और आगे,
एक रंग मिला चला पीत पारावार।।
गाढ़ी हरी श्यामता की तुंग राशि रेखा धनी,
बाँधती है दक्षिण की और उसे घेर घार।
जोड़ता है जिसे खुले नीचे नीले नभ मण्डल से,
धुंधली सी नीली नगमाला उठी धुआँधार।।

4. मन्दाक्रान्ता
[2014]

यह छन्द मगण, भगण, नगण दो तगण तथा दो गुरुओं के योग से बनता है। इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। चौथे, छठे और सातवें वर्ण पर यति होती है।
उदाहरण-
ऽऽ ऽऽ।।।।। ऽ ऽ 1 ऽऽ। ऽ ऽ = 17 वर्ण
धाता द्वारा सृजित जग में हो धरा मध्य आ के
ऽऽऽऽ।।।।। ऽ।ऽ ऽ। ऽ ऽ
पाके खोये विभव कित प्राणियों ने अनेकों।
ऽऽऽऽ।।।।। ऽ ऽ ऽ ऽ । ऽऽ
जैसा प्यारा विभव ब्रज के हाथ से आज खोया।
ऽऽऽऽ।।।।। ऽऽ। ऽऽ।ऽऽ
पाके ऐसा विभव वसुधा में न खोया किसी ने।।

प्रश्नोत्तर

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
काव्य की परिभाषा किन्हीं दो संस्कृत आचार्यों एवं एक हिन्दी आचार्य के अनुसार लिखिए। [2009]
उत्तर-
संस्कृत आचार्यों के अनुसार काव्य की परिभाषा-
(1) आचार्य विश्वनाथ ने “रसात्मकं वाक्यं काव्यम्” कहा है।
(2) पण्डितराज जगन्नाथ ने “रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्”कहा है।
हिन्दी आचार्य के अनुसार काव्य की परिभाषा-प्रश्न संख्या 2 देखिए।

प्रश्न 2.
हिन्दी के एक आचार्य की काव्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परिभाषा इस प्रकार है-“जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं।”

प्रश्न 3.
काव्य के प्रमुख भेद कौन-से माने गये हैं?
उत्तर-
भारतीय आचार्यों ने काव्य के दो प्रकार माने हैं—
(i) श्रव्य काव्य,
(ii) दृश्य काव्य।
श्रव्य काव्य-जिस काव्य की आनन्दानुभूति पढ़ने या सुनने से होती है, उसे श्रव्य काव्य कहते हैं; जैसे-कविता, कहानी आदि।
(ii) दृश्य काव्य-जिस काव्य की अनुभूति अभिनय आदि देखकर होती है, उसे दृश्य काव्य कहते हैं; जैसे—नाटक, प्रहसन आदि।

प्रश्न 4.
प्रबन्ध काव्य के प्रमुख भेद कौन-से हैं?
उत्तर–
प्रबन्ध काव्य के दो भेद माने गये हैं—

  • महाकाव्य,
  • खण्डकाव्य।

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प्रश्न 5.
महाकाव्य किसे कहते हैं? एक महाकाव्य का नाम लिखिए।
उत्तर—
महाकाव्य में किसी महापुरुष के जीवन का समग्र चित्रण होता है। इसमें मुख्य कथा के साथ प्रासंगिक कथाएँ भी होती हैं। इसमें शृंगार, वीर, शान्त आदि रसों की योजना की जाती है। इसकी कथा कुछ खण्डों, सर्गों, काण्डों आदि में विभाजित होती है। रामचरितमानस हिन्दी का श्रेष्ठ महाकाव्य है।

प्रश्न 6.
महाकाव्य एवं खण्डकाव्य की विशेषताएँ बताते हुए प्रमुख महाकाव्यों एवं खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।
अथवा [2009]
खण्डकाव्य की दो विशेषताएँ बताइए। [2015]
अथवा
खण्डकाव्य के दो लक्षण एवं एक खण्डकाव्य एवं उसके रचनाकार का नाम लिखिए। [2016]
उत्तर—
प्रबन्ध काव्य के दो भेद-
(1) महाकाव्य एवं
(2) खण्डकाव्य माने गये हैं।

(1) महाकाव्य–महाकाव्य शब्द ‘महत्’ और ‘काव्य’ दो शब्दों के योग से बना है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार होती हैं—
(1) महाकाव्य में किसी महापुरुष के समग्र जीवन का चित्रण होता है।
(2) इसमें प्रमुख कथा के साथ-साथ प्रासंगिक कथाएँ भी होती हैं और
(3) इसमें वीर, शान्त एवं शृंगार रसों की योजना होती है; जैसे-साकेत, प्रियप्रवास महाकाव्य हैं।

(2) खण्डकाव्य-खण्डकाव्य में जीवन के एक खण्ड का चित्रण होता है। इसकी कथा स्वयं में पूर्ण होती है; जैसे—पंचवटी (मैथिलीशरण गुप्त), रश्मिरथी (रामधारी सिंह ‘दिनकर’) खण्डकाव्य हैं।

प्रश्न 7.
महाकाव्य और खण्डकाव्य में अन्तर बताइए। [2014, 17]
उत्तर—
(1) महाकाव्य में जीवन का समग्र चित्रण होता है, जबकि खण्डकाव्य में जीवन का खण्ड चित्र प्रस्तुत हो पाता है।
(2) महाकाव्य का आकार विस्तृत होता है किन्तु खण्डकाव्य का आकार सीमित होता है।
(3) महाकाव्य में कई सर्ग, खण्ड, काण्ड आदि होते हैं, जबकि खण्डकाव्य में कम सर्ग, खण्ड, काण्ड होते हैं।
(4) पात्रों, घटनाओं आदि की संख्या महाकाव्य में अधिक होती है, खण्डकाव्य में कम।

प्रश्न 8.
मुक्तक काव्य किसे कहते हैं? [2012]
उत्तर-
वह पद्य रचना जिसके छन्द स्वतः पूर्ण और स्वतन्त्र रहते हैं और किसी क्रम से संचालित नहीं होते हैं, मुक्तक काव्य कहलाते हैं; जैसे-बिहारी सतसई, दोहावली।

प्रश्न 9.
प्रबन्ध काव्य तथा मुक्तक काव्य में अन्तर बताइए। दो मुक्तक काव्यकारों के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर-
प्रबन्ध काव्य में छन्दों का पूर्वापर सम्बन्ध होता है। इसमें छन्दों का क्रम बदलना सम्भव नहीं है जबकि मुक्तक काव्य में प्रत्येक छन्द का स्वतः पूर्ण अर्थ होता है। ये किसी क्रम से संचालित नहीं होते हैं। रामचरितमानस, प्रिय प्रवास प्रबन्ध काव्य हैं तथा बिहारी सतसई, सूर सागर मुक्तक रचनाओं के ग्रन्थ हैं।

मुक्तक काव्यकार—सूरदास, मीराबाई एवं बिहारी।

प्रश्न 10.
मुक्तक काव्य की दो विशेषताएँ बताते हुए एक मुक्तक काव्य रचना का नाम लिखिए।
उत्तर—
मुक्तक काव्य की दो विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(i) मुक्तक काव्य के प्रत्येक छन्द का अर्थ स्वयं में पूर्ण होता है। इसके छन्दों का पूर्वापर सम्बन्ध नहीं होता है।
(ii) मुक्तक काव्य के छन्द किसी क्रम से संचालित नहीं होते हैं। ‘बिहारी सतसई’ हिन्दी की श्रेष्ठ मुक्तक काव्य कृति है।

प्रश्न 11.
काव्य में गुण कितने प्रकार के होते हैं? परिभाषित कीजिए। [2014]
अथवा
काव्य गुण के प्रकार लिखते हुए प्रसाद गुण की परिभाषा सोदाहरण दीजिए। [2009]
अथवा
काव्य में ओजगुण किसे कहते हैं? [2012]
उत्तर–
शब्द गुण तीन प्रकार के माने गये हैं-
(i) माधुर्य,
(ii) ओज एवं
(iii) प्रसाद।

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(i) माधुर्य—जिस काव्य के सुनने या पढ़ने से मन पुलकित हो उठे और कानों को मधुर प्रतीत हो, वहाँ माधुर्य गुण होता है।
(ii) ओज-जिस काव्य के सुनने या पढ़ने से चित्त की उत्तेजना वृत्ति जाग्रत हो, वह रचना ओज गुण सम्पन्न होती है।
(iii) प्रसाद-जिस रचना के सुनने या पढ़ने से हृदय प्रभावित हो, बुद्धि निर्मल बने, मन खिल उठे, उसमें प्रसाद गुण होता है।

प्रश्न 12.
शब्द-शक्ति किसे कहते हैं? इसके भेद बताइए। [2009]
उत्तर-
शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को शब्द-शक्ति कहते हैं। यह सम्बन्ध ही शब्द का अर्थ व्यक्त करता है। शब्द-शक्ति के तीन प्रकार माने गये हैं –
(i) अभिधा,
(ii) लक्षणा एवं
(iii) व्यंजना।

प्रश्न 13.
अभिधा, लक्षणा तथा व्यंजना की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
अभिधा—शब्द और अर्थ का साक्षात् सम्बन्ध अभिधा कहलाता है। परम्परागत रूप में प्रचलित मुख्य अर्थ का बोध कराने वाली शब्द-शक्ति अभिधा कहलाती है, जैसे—श्याम
का अर्थ काला।
लक्षणा–शब्द के मुख्य अर्थ में बाधा होने पर उसके सहयोग से रूढ़ि अथवा प्रयोजन के आधार पर अन्य अर्थ लक्षित कराने वाले शब्द-शक्ति लक्षणा कहलाती है; जैसे—’मोहन तो शेर है’ में लक्षणा के द्वारा शेर का अर्थ वीर निकलता है। [2009, 16]
व्यंजना—जब अभिधा और लक्षणा से अर्थ व्यक्त नहीं होता है तब व्यंजना शब्द-शक्ति की सहायता से व्यंग्यार्थ निकलता है। जैसे—’गंगा में घर है’ में गंगा के समान घर की पवित्रता प्रकट होती है। [2010]

प्रश्न 14.
छन्द की परिभाषा देते हुए उसके भेद बताइए। [2009, 17]
अथवा
छन्द किसे कहते हैं? इसके प्रमुख प्रकार बताइए। [2011]
उत्तर-
परिभाषा-वर्ण, मात्रा, यति, तुक आदि का ध्यान रखकर की गयी शब्द रचना छन्द कहलाती है। इससे काव्य में प्रवाह, संगीतात्मकता तथा प्रभावशीलता आ जाती है।
प्रकार-छन्द दो प्रकार के होते हैं-
(1) मात्रिक छन्द,
(2) वर्णिक छन्द।

  • मात्रिक छन्द-जिस छन्द में मात्राओं की गणना की जाती है उसे मात्रिक छन्द कहते [2015]
  • वर्णिक छन्द-वर्णिक छन्द में वर्गों की गणना की जाती है।

प्रश्न 15.
घनाक्षरी और कुण्डली छन्दों का अन्तर बताइए।
उत्तर-
कुण्डली मात्रिक छन्द है जबकि घनाक्षरी वर्णिक छन्द है। कुण्डली में छः चरण होते हैं। प्रथम दो चरण दोहा के तथा बाद के चार चरण रोला के होते हैं। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। जबकि घनाक्षरी के प्रत्येक चरण में 32 वर्ण होते हैं। इसमें 8,8,8,8 पर यति और अन्त में गुरु-लघु आते हैं।

प्रश्न 16.
अलंकार की परिभाषा एवं भेद लिखिए। [2017]
उत्तर-
आचार्य दण्डी ने लिखा है ‘काव्य शोभाकरान्त धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते’ अर्थात् काव्य का सौन्दर्य बढ़ाने वाले धर्म अलंकार कहलाते हैं।

शब्द और अर्थ के आधार पर अलंकारों के तीन प्रकार माने गये हैं-
(i) शब्दालंकार,
(ii) अर्थालंकार, व
(iii) उभयालंकार।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित में किस शब्द-शक्ति का प्रयोग हुआ है
(i) सुनील ने आसमान सिर पर उठा रखा है।
(ii) अपनी जन्मभूमि से सबको प्यार होता है।
(iii) रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे मोती मानस चून।।
उत्तर—
इन पंक्तियों में शब्द-शक्तियाँ इस प्रकार हैं
(i) लक्षणा,
(ii) अभिधा,
(iii) व्यंजना।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में अलंकार बताइए [2009]
(i) जान स्याम घनस्याम को, नाच उठे वन मोर।
(ii) सत्य कहहुँ हौं दीनदयाला।
बन्धु न होय मोर यह काला।।
(iii) मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ।
उत्तर-
(i) भ्रान्तिमान अलंकार,
(ii) अपहृति अलंकार,
(iii) विरोधाभास अलंकार।

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प्रश्न 19.
अलंकारों के प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
अलंकारों के तीन प्रकारों का परिचय इस प्रकार है
(1) शब्दालंकार—जहाँ शब्द से काव्य की शोभा बढ़ती है, वहाँ शब्दालंकार होता है; जैसे–अनुप्रास, यमक, श्लेष आदि।
(2) अर्थालंकार-जिनमें अर्थ के कारण सौन्दर्य वृद्धि होती है, वे अर्थालंकार कहलाते हैं; जैसे—उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि।
(3) उभयालंकार-कुछ अलंकारों में शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार विद्यमान रहता है, वे उभयालंकार कहलाते हैं।

प्रश्न 20.
सन्देह और भ्रान्तिमान अलंकारों में सोदाहरण अन्तर बताइए। [2008,09, 12, 13, 14]
उत्तर-
सन्देह अलंकार में उपमेय में उपमान का सन्देह रहता है तथा भ्रान्तिमान अलंकार में उपमेय का ज्ञान नहीं रहता है, भ्रमवश उसे उपमान समझ लिया जाता है। सन्देह में निरन्तर सन्देह बना ही रहता है कि यह है या नहीं, जबकि भ्रान्तिमान में भ्रम अन्ततः प्रतीति बन जाता है। अतः सन्देह में अनिश्चय तथा भ्रान्तिमान में निश्चय होता है।

उदाहरण सन्देह रस्सी है या साँप।
भ्रान्तिमान-रस्सी नहीं साँप है।

प्रश्न 21.
श्लेष अलंकार की परिभाषा लिखिए। [2015]
उत्तर-
जहाँ एक शब्द के एक से अधिक अर्थ निकलते हैं वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

प्रश्न 22.
श्रृंगार रस और वीर रस में भेद बताइए। (कोई तीन) [2015]
उत्तर-
श्रृंगार रस और वीर रस में तीन भेद इस प्रकार हैं-
(1) श्रृंगार रस का स्थायी भाव ‘रति’ होता है जबकि वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है।
(2) शृंगार रस में आलम्बन प्रेमी (नायक-नायिका) होते हैं किन्तु वीर रस का आलम्बन शत्रु होता है।
(3) श्रृंगार रस में माधुर्य गुण की अधिकता होती है जबकि वीर रस में ओज गुण का प्राधान्य पाया जाता है।

प्रश्न 23.
हास्य रस की परिभाषा एवं उदाहरण लिखिए। [2017]
उत्तर-
परिभाषा-विचित्र रूप, वेष, वाणी, चेष्टा आदि के कारण हृदय में जाग्रत हास भाव पुष्ट होकर हास्य रस में परिणत होता है।

उदाहरण—
बिन्ध्य के बासी उदासी तपोव्रतधारी महाबिनु नारि दुखारे।
गौतम तीय तरी, तुलसी, सो कथा सुनि भै मुनि वृंद सुखारे।
है हैं सिला सब चन्द्रमुखी परसे पद-मंजुल कंज तिहारे।
कीन्हीं भली रघुनायक जू करुना करि कानन को पगु धारे॥

  • अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पद्य के तीन प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर—
पद्य के तीन प्रकार—
(i) प्रबन्ध काव्य,
(ii) मुक्तक काव्य, तथा
(iii) गीतिकाव्य, माने गये हैं।

प्रश्न 2.
हिन्दी के दो महाकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-
‘रामचरितमानस’ तथा ‘पद्मावत’ हिन्दी के श्रेष्ठ महाकाव्य हैं।

प्रश्न 3.
हिन्दी के दो खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर—
‘पंचवटी’ तथा ‘कुरुक्षेत्र’ हिन्दी के श्रेष्ठ खण्डकाव्य हैं।

प्रश्न 4.
‘रसात्मकं वाक्यं काव्यम्’ किसकी परिभाषा है?
उत्तर—
‘रसात्मकं वाक्यं काव्यम्’ आचार्य विश्वनाथ द्वारा दी गई काव्य की परिभाषा है।

प्रश्न 5.
पण्डितराज जगन्नाथ ने काव्य की क्या परिभाषा दी है?
उत्तर-
पण्डितराज जगन्नाथ ने काव्य की परिभाषा देते हुए लिखा है-‘रमणीयार्थ प्रतिपादकःशब्द:काव्यम्’ अर्थात् रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द ही काव्य कहलाते हैं।

प्रश्न 6.
आधुनिक काल के दो महाकाव्यों के नाम लिखिए। उत्तर-‘प्रियप्रवास’ तथा ‘कामायनी’ आधुनिक काल के प्रमुख महाकाव्य हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्ति में गुण बताइए ‘हे, प्रभो आनन्ददाता ! ज्ञान हमको दीजिए।’
उत्तर-
इस पंक्ति में ‘प्रसाद गुण’ है। प्रश्न 8. ओज गुण का उदाहरण लिखिए। [2016]
उत्तर-
ओज गुण से युक्त दो पंक्तियाँ इस प्रकार हैं
“बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।”

प्रश्न 9.
वीर रसपूर्ण काव्य में किस गुण की अधिकता रहती है?
उत्तर–
वीर रसपूर्ण काव्य में ओज गुण’ की अधिकता रहती है।

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प्रश्न 10.
माधुर्य गुण युक्त काव्य में कैसे वर्गों का प्रयोग होता है?
उत्तर-
माधुर्य गुण युक्त काव्य में य, र, ल, ग, ज आदि कोमल वर्णों का प्रयोग होता है।

प्रश्न 11.
प्रसाद गुण युक्त काव्य में कैसे शब्दार्थ का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
प्रसाद गुण युक्त काव्य में सरल शब्दार्थ का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 12.
माधुर्य गुण किन रसों से युक्त काव्य में होता है?
उत्तर-
करुण, शृंगार या शान्त रसों से युक्त काव्य में माधुर्य गुण होता है।

प्रश्न 13.
शब्द-शक्ति किसे कहते हैं?
उत्तर–
शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को शब्द-शक्ति कहते हैं।

प्रश्न 14.
अभिधा शब्द-शक्ति किसे कहते हैं?
उत्तर-
शब्द और अर्थ के साक्षात् सम्बन्ध को अभिधा शब्द-शक्ति कहते हैं; जैसे— स्वर्ण का अर्थ सोना।

प्रश्न 15.
“बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी।” में कौन-सी शब्द शक्ति है?
उत्तर-
इस पंक्ति में लक्षणा शब्द-शक्ति है।

प्रश्न 16.
“सूर्योदय हो गया।” में शब्द-शक्ति बताइए।
उत्तर-
सूर्योदय हो गया।’ का अर्थ है कि हमें जागकर शीघ्र विद्यालय जाना चाहिए। अतः इसमें व्यंजना शब्द-शक्ति है।

प्रश्न 17.
‘राकेश तो गधा है।’ में शब्द शक्ति बताइए।
उत्तर-
राकेश तो गधा है।’ में लक्षणा शब्द-शक्ति है।

प्रश्न 18.
‘प्रेम पर्यो चपल चुचाइ पुतरीन सों’ में कौन-सी शब्द शक्ति है?
उत्तर-
‘प्रेम पर्यो चपल चुचाइ पुतरीन सों’ में व्यंजना शब्द-शक्ति है।

प्रश्न 19.
वर्ण किसे कहते हैं?
उत्तर-
अक्षर को ही वर्ण कहते हैं, जैसे—क, ख, ग आदि।

प्रश्न 20.
निम्नांकित पंक्तियों में छन्द बताइए
सच्चे स्नेही अवनिजन के देश के श्याम जैसे।
राधा जैसे सदय-हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।।
हे विश्वात्मा! भरत भुव के अंक में और आवें।
ऐसी व्यापी विरह-घटना किन्तु कोई न होवे।।
उत्तर-
इन पंक्तियों में ‘मन्दाक्रान्ता’ छन्द का प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 21.
निम्नांकित पद्य का छन्द बताइए-
“करनी विधि की देखिये, अहो न बरनी जाति।
हरनी के नीके नयन बसै विपिन दिन राति।।
बसै विपिन दिनराति बराबर बरही कीने।
कारी छवि कलकण्ठ किये फिर काक अधीने।।
बरनै दीनदयाल धीर धरते दिन धरनी।
बल्लभ बीच वियोग, विलोकहु निधि की करनी।।”
उत्तर—
इस पद्य का छन्द कुण्डली है।

प्रश्न 22.
छन्द के अंग बताइए।
उत्तर-
वर्ण, मात्रा, यति, चरण, तुक और गण छन्द के अंग होते हैं।

प्रश्न 23.
निम्नांकित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है
किधी सूर को सर लग्यो, किधौं सूर की पीर।
किधौं सूर को पद लग्यो, रह-रह धुनत शरीर।।
उत्तर—
इन पंक्तियों में ‘सन्देह’ अलंकार है।

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प्रश्न 24.
निम्न पंक्तियों में कौन-से छन्द का प्रयोग हुआ है? स्पष्ट कीजिए
S SSS I III ISSIS SISS
“जो मैं कोई विहग उड़ता देखती व्योम में हूँ।
तो उत्कण्ठा विवश हो चित्त में सोचती हूँ।”
उत्तर—
इसमें 4,6 और 7 वर्णों पर यति होती है, इसलिए यह मन्दाक्रान्ता छन्द है।

प्रश्न 25.
‘कान्ह-दूत कैधो ब्रह्मदूत कै पधारे आय’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर-
कान्ह-दूत कैधो ब्रह्मदूत है पधारे आय’ में ‘सन्देह’ अलंकार है।

प्रश्न 26.
जहाँ विरोध न होते हुए भी विरोध प्रतीत हो वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
उत्तर-
जहाँ विरोध न होते हुए भी विरोध प्रतीत हो वहाँ विरोधाभास’ अलंकार होता है।

प्रश्न 27.
वह कौन-सा अलंकार है जिसमें उपमेय में उपमान का भ्रम हो जाता है?
उत्तर-
जहाँ उपमेय में उपमान का भ्रम हो जाये वहाँ भ्रान्तिमान’ अलंकार होता है।

प्रश्न 28.
विरोधाभास अलंकार का उदाहरण लिखिए। [2016]
उत्तर-
“वा मुख की मधुराई कहा कहों,
मीठी लगे अँखियान लुनाई।” .

सम्पूर्ण अध्याय पर आधारित महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. ‘रसात्मकं वाक्यं काव्यम्’ परिभाषा है— [2009, 16]
(i) आचार्य विश्वनाथ की,
(ii) पण्डितराज जगन्नाथ की,
(iii) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की,
(iv) भामह की।

2. निम्नलिखित में से प्रबन्ध काव्य नहीं है [2009]
(i) साकेत,
(ii) सूरसागर,
(iii) कामायनी,
(iv) रामचरितमानस।

3. महाकाव्य में होता है [2010]
(i) जीवन का खण्ड चित्रण,
(ii) जीवन का वृहत् चित्रण,
(iii) दोहा छन्द,
(iv) उत्साह भाव।

4. इनमें से कौन-सा काव्य खण्डकाव्य नहीं है? [2012, 14]
(i) पंचवटी,
(ii) रश्मिरथी,
(iii) प्रियप्रवास,
(iv) सुदामा चरित।

5. महाकाव्य में कम-से-कम कितने सर्ग होने चाहिये? [2017]
(i) तीन,
(ii) पाँच,
(iii) चार,
(iv) आठ।

6. शब्द और अर्थ का साक्षात् सम्बन्ध होता है
(i) व्यंजना में,
(ii) लक्षणा में,
(iii) अभिधा में,
(iv) किसी में नहीं।

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7. चित्त की उत्तेजना वृत्ति से सम्बन्ध होता है
(i) ओज गुण का,
(ii) प्रसाद गुण का,
(iii) माधुर्य गुण का,
(iv) किसी का नहीं।

8. “राजा शिवराज के नगारन की धाक सुनि, केते बादशाहन की छाती दरकति है।” में गुण है
(i) माधुर्य,
(ii) ओज,
(iii) प्रसाद,
(iv) कोई नहीं।

9. छन्द कितने प्रकार के होते हैं?
(i) चार प्रकार के,
(iv) तीन प्रकार के,
(iii) पाँच प्रकार के,
(iv) दो प्रकार के।

10. काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म कहलाते हैं
(i) शब्द-शक्ति,
(ii) अलंकार,
(iii) छन्द,
(iv) गुण।

11. ‘रस्सी है या साँप’ में अलंकार है….
(i) उपमा,
(ii) रूपक,
(iii) भ्रान्तिमान,
(iv) सन्देह।

12. वीर, भयानक, रौद्र रसों में प्रधानता होती है [2011]
(i) माधुर्य गुण,
(ii) ओज गुण,
(iii) प्रसाद गुण,
(iv) शब्द गुण।

13. श्रृंगार रस का स्थायी भाव है [2015]
(i) रति,
(ii) जुगुप्सा
(iii) हास्य,
(iv) रौद्र।
उत्तर-
1. (i), 2. (ii), 3. (ii), 4.(i), 5. (iv), 6. (iv), 7. (i), 8. (ii), 9. (iv), 10. (ii), 11. (iv), 12. (ii), 13. (i)।

  • रिक्त स्थान पूर्ति

1. रामचरितमानस ……….. है। [2008]
2. खण्डकाव्य में जीवन का ………. चित्रण होता है।
3. वीर, भयानक तथा रौद्र रस पूर्ण काव्य में ………” गुण होता है।
4. माधुर्य गुण में ……….” वर्णों की प्रधानता होती है। [2010]
5. ‘भूरा तो उल्लू है’ में ………. शब्द-शक्ति है।
6. ‘प्रेम पर्यो चपल चुचाइ पुतरीन सौं’ में ……….” शब्द-शक्ति है।
7. शब्द के ……. प्रकार होते हैं।
8. वर्गों की गिनती के आधार पर जिस छंद की रचना होती है, उसे ….. छंद कहते हैं। [2016]
9. विरोध न होते हुए भी जहाँ विरोध का आभास हो, वहाँ ……… अलंकार होता है। [2009]
10. ‘मुख है किधौ मयंक है’ में ………. अलंकार है। 11. रस के ……….” अंग हैं। [2011]
12. दोहा छन्द ……….. काव्य है। [2012]
13. काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म ……….’ कहलाते हैं। [2014]
14. शान्त रस का स्थायी भाव ………. है।। [2017]
उत्तर-
1. महाकाव्य, 2. खण्ड, 3. ओज, 4. कोमल, 5. लक्षणा, 6. व्यंजना, 7. तीन, 8. वर्णिक, 9. विरोधाभास, 10. सन्देह, 11. चार, 12. मुक्तक, 13. अलंकार, 14. निर्वेद।

  • सत्य/असत्य

1. प्रबन्ध काव्य में जीवन का खण्ड चित्रण होता है।
2. पंचवटी एक महाकाव्य है। [2008]
3. ‘साकेत’ मैथिलीशरण गुप्त जी द्वारा रचित एक महाकाव्य है। [2017]
4. शब्द और अर्थ का साक्षात् सम्बन्ध अभिधा कहलाता है।
5. जिस छन्द में मात्राओं की गणना की जाती है, वह मात्रिक छन्द है। [2014]
6. वर्ण, मात्रा, यति, चरण, तुक एवं गण छन्द के अंग होते हैं।
7. जहाँ एक वर्ण की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ यमक अलंकार होता है। [2015]
8. मन्दाक्रान्ता छन्द में 17 वर्ण होते हैं।
9. ‘रस्सी नहीं साँप है’ में भ्रान्तिमान अलंकार है।
10. स्थायी भाव, संचारी भाव, विभाव और अनुभाव रस के चार अंग हैं। [2008]
11. माधुर्य गुण शृंगार, वात्सल्य और शान्त रस में पाया जाता है। [2008]
12. मुक्तक काव्य में प्रत्येक छन्द अपने आपमें स्वतन्त्र नहीं होता है। [2008]
13. “क्रान्तिधात्रि ! कविते जाग उठ आडम्बर में आग लगा दे।” इस पंक्ति में माधुर्य गुण है। [2008]
14. ‘जुगन-जुगन समझावत हारा कहा न मानत कोई रे।’ इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार [2011]
15. जो भाव मानव हृदय में स्थायी रहते हैं, उन्हें संचारी भाव कहते हैं। [2008, 16]
16. रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है। [2008]
17. प्रत्येक रस का एक-एक स्थायी भाव होता है। [2010]
उत्तर-
1. असत्य, 2. असत्य, 3. सत्य,4. सत्य, 5. सत्य, 6. सत्य, 7. असत्य, 8. सत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. सत्य, 12. असत्य, 13. असत्य, 14. असत्य, 15. असत्य, 16. सत्य, 17. सत्य।

जोड़ी मिलाइए
I. 1. महाकाव्य [2015] – (क) पण्डितराज जगन्नाथ
2. ‘रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’ परिभाषा है – (ख) रामचरितमानस
3. रसात्मकं वाक्यं काव्यम् [2010, 14] – (ग) व्यंजना
4. ‘चिन्मय नाक में दम किए रहता है’ में शब्द-शक्ति है – (घ) आचार्य विश्वनाथ
5. ‘राम का घर गंगा में है’ में शब्द-शक्ति है। – (ङ) माधुर्य लक्षणा
उत्तर-
1.→ (ख),
2. → (क),
3. → (घ),
4. →(ङ),
5. →(ग)।

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II. 1. जहाँ काव्य सुनने से मन पुलकित हो, वहाँ गुण होता है। – (क) वर्णिक छन्द
2. जिस छन्द में वर्गों की गणना की जाती है, उसे कहते हैं। – (ख) घनाक्षरी छन्द
3. जिसमें 32 वर्ण हों तथा 8,8,8,8 पर यति हो उसे कहते हैं – (ग) माधुर्य
4. जिसका अर्थ ‘चिपका हुआ’ [2017] – (घ) सन्देह अलंकार
5. जहाँ समानता से अप्रस्तुत का संशय हो जाय, वहाँ होता है – (ङ) श्लेष
उत्तर-
1. → (ग),
2. → (क),
3. → (ख),
4. → (ङ),
5. → (घ)।

  • एक शब्द /वाक्य में उत्तर

1. विस्तृत कलेवर वाले वाक्य को क्या कहते हैं?
2. जिस काव्य में प्रत्येक पद अपने आप में स्वतंत्र रहता है, उसे क्या कहते हैं? [2016]
3. गद्य-पद्य मिश्रित रचना को क्या नाम दिया गया है?
4. शब्द के प्रचलित अर्थ का बोध कराने वाली शब्द-शक्ति का क्या नाम है?
5. व्यंग्यार्थ को व्यक्त करने वाली शब्द-शक्ति को क्या कहते हैं? [2009]
6. जिस रचना को सुनने से चित्त में उत्तेजना पैदा होती है उसमें कौन-सा गुण होता है?
7. सरल शब्दार्थ का प्रयोग किस गुण में किया जाता है?
8. जहाँ भ्रमवश एक वस्तु में दूसरी की कल्पना की जाये, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
9. जब अनिश्चय की स्थिति लगातार बनी रहती है, तो कौन-सा अलंकार होता है? [2016]
10. जिसमें प्रथम दो चरण दोहा के तथा चार चरण रोला के हों वहाँ कौन-सा छन्द होता है?
11. ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है’ में कौन-सा अलंकार है?
12. ‘पतन पाप पाखंड जले’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है? [2012, 14]
13. ‘तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाये’ पंक्ति में निहित अलंकार का नाम लिखिए। [2013]
14. ‘चारु चन्द्र की चंचल किरणें’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है? [2017]
उत्तर—
1. महाकाव्य, 2. मुक्तक काव्य 3. चम्पू, 4. अभिधा, 5. व्यंजना, 6. ओज, 7. प्रसाद में, 8. भ्रान्तिमान, 9. सन्देह अलंकार, 10. कुण्डलियाँ, 11. सन्देह, 12. अनुप्रास, 13. अनुप्रास, 14. अनुप्रास।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Special Hindi अलंकार

MP Board Class 11th Special Hindi अलंकार

काव्य की शोभा में वृद्धि करने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं। अलंकार से काव्य में रोचकता, चमत्कार और सुन्दरता उत्पन्न होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अलंकार.को काव्य की आत्मा ठहराया है।

1. भ्रान्तिमान अलंकार [2010]

जहाँ प्रस्तुत वस्तु को देखकर किसी विशेष समानता के कारण किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाये, वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है। जैसे
(1) जान स्याम घनस्याम को, नाच उठे वन मोर।
(2) चंद के भरम होत, मोद है कुमोदिनी को।
(3) नाक का मोती अधर की कांति से,
बीज दाडिम का समझकर भ्रान्ति से,
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,
सोचता है, अन्य शुक यह कौन है?

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(4) कपि करि हृदय विचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब।
जनु अशोक अंगार, दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ।।

(5) चाहत चकोर सूर ओर, दृग छोर करि।
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।।

2. सन्देह अलंकार
[2008]

जहाँ रूप, रंग और गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह निश्चय न हो कि यह वही वस्तु है, वहाँ सन्देह अलंकार होता है। इसमें अन्त तक संशय बना रहता है।
(1) सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।।

(2) परत चन्द्र प्रतिबिम्ब कहुँ जलनिधि चमकायो,
कै तरंग कर मुकुर लिए, शोभित छवि छायो।
कै रास-रमन में हरि मुकुट आभा जल बिखरात है,
कै जल-उर हरि मूरति बसत ना प्रतिबिम्ब लखात है।

(3) तारे आसमान के हैं आये मेहमान बनि, केशों में निशाने मुक्तावलि सजाई है।
बिखर गई है चूर-चूर के चन्द कैधों, कैधों घर-घर दीपमालिका सुहाई है।।

(4) दिग्दाही से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के।

सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर [2008]
भ्रान्तिमान में एक वस्तु में दूसरी वस्तु का झूठा निश्चय हो जाता है, जबकि सन्देह में अनिश्चय बना रहता है कि ये है कि नहीं? तर्क-वितर्क की भावना बनी रहती है। भ्रान्तिमान में हम स्वयं भ्रम दूर नहीं कर पाते, जबकि सन्देह में कर लेते हैं।

3. विरोधाभास अलंकार
[2008, 09]

जहाँ किसी पदार्थ, गुण या क्रिया में वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास हो, वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।
(1) ‘वा मुख की मधुराई कहा कहौं,
मीठी लगे अँखियान लनाई।

(2) शीतल ज्वाला जलती है,
ईंधन होता दृग-जल का।
यह व्यर्थ साँस चल-चलकर,
करती है काम अनिल का।।

(3) मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ।

(4) तन्त्री-नाद, कवित्त रस; सरस राग रति-रंग।
अनबूड़े बूड़े तिरे, जे बूड़े सब अंग।।

(5) या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहीं कोय।।
ज्यों-ज्यों बूढ़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय।।

(6) शाप हूँ जो बन गया वरदान जीवन में।
(7) नीर भरी अँखियाँ रहे तऊ न प्यास बुझाय।

4. अपहृति अलंकार
[2008, 11]

उपमेय का निषेध कर उसमें उपमान का आरोप किया जाये तो अपहृति अलंकार होता है।

अपहृति का अर्थ है छिपाना, निषेध करना। इस अलंकार में प्रायः निषेध आरोप करते हैं।
जैसे-
(1) सत्य कहहुँ हाँ दीनदयाल।
बन्धु न होय मोर यह काला।

(2) फूलों पत्तों सकल पर हैं वारि-बूंदें लखाती।
रोते हैं या निपट सब यों आँसुओं को दिखाके।।

(3) अंग-अंग जारत अरि, तीछन ज्वाला-जाल।
सिन्धु उठि बड़वाग्नि यह, नहीं इन्दु भव-भाल।।

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(4) छग जल युक्त वदन मण्डल को अलकें श्यामल थीं घेरे।
ओस-भरे पंकज ऊपर थे मधुकर माला के डेरे।।

(5) ये न मग हैं तब चरण रेखियों है?

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MP Board Class 11th Special Hindi काव्य की परिभाषा एवं लक्षण

MP Board Class 11th Special Hindi काव्य की परिभाषा एवं लक्षण

(1) काव्य की परिभाषा एवं लक्षण समस्त भाव प्रधान साहित्य को काव्य कहते हैं। विभिन्न विद्वानों ने काव्य के विभिन्न लक्षण बताये हैं-साहित्य दर्पण के प्रणेता आचार्य विश्वनाथ ने “रसात्मकं वाक्यं काव्यम्” कहा है। पण्डितराज जगन्नाथ ने ‘रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’ कहा है। कुन्तक ने ‘वक्रोक्ति काव्यस्य जीवितम्’ कहा है और आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्त ‘ध्वनिरात्मा काव्यस्य’ कहते हैं। मम्मट ने काव्य को हृदय की “सगुणावलंकृतौ पुन: क्वापि” कहा है।

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “कविता शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक सम्बन्धों की रक्षा और निर्वाह का साधन है। वह उस जगत के अनन्त रूपों, अनन्त व्यापारों और अनन्त चेष्टाओं के साथ हमारे मन की भावनाओं को जोड़ने का काम करती है।” इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्य हृदय को आनन्द देता है।

  • काव्य के भेद

(1) मुक्तक काव्य-गीत, कविता, दोहा और पद एवं आधुनिक चतुष्पदी तथा मुक्त छन्द मुक्तक काव्य कहलाता है। मुक्तक काव्य का तात्पर्य है कि बिना पूर्वापर-सम्बन्ध के वह पद्य या छन्द अपने आप में पूर्ण एक स्वतन्त्र भाव लिये हो जिसके पढ़ने मात्र से उसका भाव भली प्रकार समझ में आ जाये। सूरदास, मीरा आदि कवियों के गेय पद और बिहारी सतसई तथा आधुनिक गीत इसके अन्तर्गत आते हैं।

(2) प्रबन्ध काव्य-प्रबन्ध काव्य वह रचना होती है जिसमें कोई एक कथा आद्योपान्त क्रमबद्ध रूप से गठित हो एवं उसमें कहीं भी तारतम्य न टूटता हो, वरन् उस कथा को पुष्ट करने उसमें अन्य कई अन्तर्कथाएँ भी हो सकती हैं। प्रबन्ध काव्य विस्तृत होता है, उसमें जीवन की विभिन्न झाँकियाँ रहती हैं। प्रबन्ध काव्य में कथानक को लेकर पात्रों के चरित्रों में घटनाओं और भावों के संघर्ष द्वारा काव्य-वस्तु रखी जाती है। इसके मुख्य दो भेद होते हैं

(i) महाकाव्य और
(ii) खण्डकाव्य।

(i) महाकाव्य-यह एक विशिष्ट गुण युक्त वृहत् आकार वाला ग्रन्थ होता है। यह सर्गों या अध्यायों में विभक्त रहता है। इसका नायक उदात्त गुणों युक्त कोई कुलीन होता है। वीर, श्रृंगार अथवा शान्त रस में से किसी एक रस की प्रधानता रहती है। अन्य रस गौण रूप में आते हैं। महाकाव्य का कथानक प्रसिद्ध होता है अथवा उसमें किसी ऐतिहासिक या पौराणिक पुरुष के चरित्र का वर्णन किया जाता है। प्रत्येक सर्ग की रचना एक ही प्रकार के छन्द में होती है, किन्तु सर्ग के अन्त में छन्द बदल जाता है। सर्गों की संख्या आठ या आठ से अधिक होती है, सर्ग के अन्त में आगामी कथानक की सूचना दी जाती है। महाकाव्य में सन्ध्या, सूर्योदय, चन्द्रोदय, रात, प्रदोष, अन्धकार, वन, ऋतु, समुद्र, पर्वत, नदी आदि प्राकृतिक पदार्थों का वर्णन होता है। जैसे—रामचरितमानस, पद्मावत, साकेत आदि।

(ii) खण्डकाव्य आचार्य विश्वनाथ के अनुसार, “खण्डकाव्य महाकाव्य के एक देश या अंश का अनुसरण करने वाला है।” यह जीवन के समस्त पक्षों का उद्घाटन नहीं करता है, अपितु केवल एक पक्ष पर प्रकाश डालता है। रुद्रट के अनुसार लघु प्रबन्धों में चतुर्वर्ग में से एक ही वर्ग रहा करता है। उसमें अनेक रस असमग्र रूप से होते हैं अथवा एक रस समग्र रूप में होता है। हेमचन्द्र ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यानुशासन’ में कहा है कि “जब कवि एक ही विषय को एक ही छन्द में आद्यन्त वर्णन करता है, तब उसे सन्धान कोटि का काव्य कहते हैं।” खण्डकाव्य अन्तस्तत्व के उद्वेलन से पूरित और रसमय होता है। उसमें किसी की जीवन-कथा का विवरण न होकर भाव व्यंजना होती है। खण्डकाव्य गीतिकाव्य भी हो सकता है। खण्डकाव्य कथा के आंशिक आधार के साथ मूलत: गीतिकाव्य बन जाते हैं। इसमें सरस-ललित पदयोजना होती है। इसमें कथावस्तु प्राय: काल्पनिक भी हो सकती है। वह खण्डों में विभक्त हो सकता है। खण्डकाव्य में प्राकृतिक दृश्यों का अंकन समयानुसार और विषयानुसार तथा संक्षिप्त होना चाहिए। खण्डकाव्य तब तक सफल नहीं होगा, जब तक वह अपने लक्ष्य में पूर्ण न हो और जिस भी भाव को लेकर लिखा जाय वह अपने आप में पूर्ण हो, क्योंकि उसमें विस्तार की सुविधा नहीं रहती है। इसमें एक ही भाव की अनुभूतिमयी अभिव्यंजना होती है; जैसे—सुदामाचरित, पंचवटी। – उपर्युक्त सभी प्रकार के काव्य श्रव्य-काव्य के अन्तर्गत आते हैं। श्रव्य-काव्य में पठनीय और श्रवणीय महाकाव्य से लेकर मुक्तक और गीतों की भी गणना की जाती है। श्रव्य-काव्य वह होता है, जिसके सुनने से अथवा स्वयं पढ़ने से रसास्वादन प्राप्त हो।

(3) दृश्य-काव्य–दृश्य-काव्य के अन्तर्गत नाटक और प्रहसन आते हैं जिनका अभिनय रंगमंच पर पात्रों द्वारा किया जाता है। इसमें गद्य के सम्भाषण के अतिरिक्त गेय गीतों, छन्दों अथवा प्रसंगानुकूल नृत्यों की योजना रहती है। दृश्य-काव्य के अन्तर्गत अधिक रमणीयता होती है क्योंकि दर्शक उसकी प्रत्यक्षानुभूति करता है। कलाकार अपनी प्रभावशील अभिनय कला द्वारा हृदय पर सीधा प्रभाव डालते हैं। दृश्य-काव्य निश्चय ही श्रव्य-काव्य से श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उसका आनन्द पढ़कर एवं देखकर दोनों रूपों में प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु श्रव्य-काव्य का आनन्द केवल सुनकर ही लिया जा सकता है। नाटक में साहित्य के अन्य तत्वों के अतिरिक्त अभिनय तत्व भी होता है, जैसे-नाटक, एकांकी आदि।

(2) शब्द-शक्ति मनुष्य अपने मनोगत विचारों को दूसरों पर जिस भाषा के माध्यम से लिखकर या बोलकर प्रकट करते हैं, वह भाषा शब्दों के समूह से मिलकर बनती है। शब्द दो प्रकार के होते हैं सार्थक एवं निरर्थक। साहित्य या काव्य में सार्थक शब्द ही अपेक्षित हैं। सार्थक शब्द के कई अर्थ साहित्यिक दृष्टि से निकलते हैं—

  • वाचक,
  • लक्षण और
  • व्यंजक।

ये तीन सार्थक शब्द हैं और क्रमशः इनके तीन अर्थ निकलते हैं—

  • वाच्यार्थ,
  • लक्ष्यार्थ और
  • व्यंग्यार्थ।

शब्दों के विभिन्न अर्थ बतलाने वाले व्यापार अथवा साधन को शब्द-शक्ति कहते हैं। शब्द-कोष के मतानुसार, “शब्द की शक्ति उसके अन्तर्निहित अर्थ को व्यक्त करने का व्यापार है। यह तीन प्रकार की होती है।”

(1) अभिधा शक्ति—जिस शब्द के श्रवण मात्र से उसका परम्परागत प्रसिद्ध अर्थ सरलता से समझ में आ जाए उसे अभिधा शब्द-शक्ति कहते हैं। इस अर्थ को वाच्यार्थ, मुख्यार्थ और अभिधेयार्थ के नामों से भी जाना जाता है। अभिधा के इस अर्थ का ग्रहण जाति के नाम से, स्वतन्त्र नाम से, धर्मों से गुण यानी रंग, रूप, रस, गन्ध के नाम से और क्रिया के नाम से होता है।

जैसे—

  • ‘बैल’ बड़ा उपयोगी पशु है।
  • रमेश के ‘कान’ में पीड़ा है। इन वाक्यों में ‘बैल’ का अर्थ पशु विशेष और ‘कान’ का अर्थ श्रवणेन्द्रिय से ही होता है, जो इन शब्दों के प्रचलित अर्थ हैं। शब्द और अर्थ का ज्ञान इन कारणों से होता है व्याकरण से, उपमान से, प्रसिद्ध शब्द के सादृश्य से, शब्दकोष से, प्रामाणिक वक्ता के आप्तवाक्य से एवं सर्वव्यापक कारण है व्यवहार।

(2) लक्षणा शक्ति-लक्षणा शक्ति-शब्द के वाच्यार्थ या मुख्यार्थ से भिन्न है, परन्तु उनके समान अन्य अर्थ को प्रकट करती है। जब किसी शब्द का अभिधा के द्वारा मुख्यार्थ का बोध नहीं हो पाता, अथवा ‘मुख्यार्थ’ समझने में बाधा हो जाती है, तब उस शब्द के अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति को लाक्षणिक शक्ति कहते हैं, जैसे-

  • सुदेश ‘बैल’ है।
  • रमेश के ‘कान’ नहीं हैं।

इन वाक्यों में सुदेश मनुष्य है पशु नहीं है, किन्तु उसे बैल कहने का तात्पर्य है. बैल के समान बुद्धि शून्य है जो दूसरों के नियन्त्रण में रहता है। इसी प्रकार रमेश के कान नहीं हैं उसका मतलब होता है कि वह सुनता नहीं है। यहाँ उक्त शब्दों का अर्थ अभिधा शक्ति द्वारा प्रकट न होकर ‘लक्षणा शक्ति’ के द्वारा प्रकट होता है।

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लक्षणा के दो मुख्य भेद हैं रूढ़ि और प्रयोजनवती। जिसमें मुख्यार्थ का बोध न होने पर जिसकी लोक में प्रसिद्धि हो, उसे रूढ़ि लक्षणा कहते हैं, जैसे “वह चौकन्ना रहता है।” यहाँ चौकन्ना का अर्थ चार कान वाला नहीं वरन् ‘सतर्क’ रूढ़ हो गया है, अत: वही अर्थ होगा। इसी प्रकार ‘तेल’ शब्द का अर्थ तो होता है तिल से निकला पदार्थ, किन्तु तरल चिकने पदार्थ के लिए रूढ़ हो जाने से तेल किसी भी तरल पदार्थ को कह देते हैं।

दूसरा प्रकार है प्रयोजनवती लक्षणा। जब मुख्यार्थ से कथन का अभिप्राय बोधगम्य न हो, तब किसी खास प्रयोजन के कारण दूसरा ऐसा अर्थ ले लिया जाये, जिसका मुख्य अर्थ से सम्बन्ध हो, उसे प्रयोजनवती लक्षणा कहते हैं, जैसे—’गंगा में साधु’ हैं।’ यहाँ पर गंगा का अर्थ गंगा नदी नहीं, वरन् गंगा का तट ही अपेक्षित अर्थ है। प्रयोजन से अभीष्ट अर्थ निकाल लिया गया। गंगा के मुख्यार्थ में बाधा पड़ी तथा प्रयोजन में उसके समीप का अर्थ ग्रहण कर लिया अतः यह प्रयोजनवती लक्षणा हुई।

(3) व्यंजना शक्ति–व्यंजना से जाने हुए अर्थ को व्यंग्यार्थ, ध्वन्यार्थ या प्रतीयमान अर्थ कहते हैं और उस शब्द को व्यंजक कहते हैं। जब अभिधा और लक्षणा शक्ति से किसी शब्द का अर्थ नहीं निकल पाता है और शब्द के वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ से भिन्न कोई अन्य विशिष्ट अर्थ या कई भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ निकलती हैं, तब व्यंजना शक्ति की सहायता से अर्थ ज्ञात किया जाता है। वाच्यार्थ से भिन्न निकलने वाला विलक्षण अर्थ व्यंग्यार्थ’ होता है। इसको ध्वनि कहते हैं। श्रेष्ठ कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं में ध्वनि का कारण ही विशेष चमत्कार होता है।

यह व्यंजना वृत्ति दो प्रकार की होती है-
(i) शाब्दी व्यंजना और
(ii) आर्थी व्यंजना।

(i) शाब्दी व्यंजना-इसमें व्यंजना का आधार वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ के भेद से प्रयुक्त शब्द के सम्बन्ध से होता है। अभिधा के द्वारा शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, जैसे—’इन्दौर मध्य प्रदेश की मुम्बई है।” इसमें मुम्बई शब्द में ऐश्वर्य, सम्पन्नता की जो ध्वनि है, वही इन्दौर के लिए भी समीचीन प्रतीत होती है।

(ii) आर्थी व्यंजना–जहाँ देशकाल, परिस्थिति या कण्ठ-ध्वनि और विशेष शब्द पर जोर से कोई विशेष अर्थ निकले, वहाँ आर्थी व्यंजना होती है। एक ही वाक्य के सन्दर्भानुसार अनेक अर्थ होते हैं; जैसे..”सन्ध्या हो गयी”-इसी वाक्य को माता पुत्री से कहे तो अर्थ होगा प्रकाश कर दो। सेवक स्वामी से कहे तो अर्थ,होगा-उसके अवकाश का समय हो गया और एक मित्र दूसरे मित्र से कहे तो तात्पर्य होगा चलचित्र का समय हो गया। गुरु शिष्य से कहे तो तात्पर्य है अध्ययन का समय हो गया।

विद्वानों ने तो ‘ध्वनिरात्मा काव्यस्य’ कहा है। ध्वन्यात्मक काव्य उत्कृष्ट काव्य है। इस प्रकार शब्द-शक्तियों के अध्ययन से हम रस का पूर्ण आस्वादन कर सकते हैं। वस्तुतः उक्त तीनों शब्द शक्तियों का विवेचन एक प्राचीन संस्कृताचार्य ने निम्नांकित श्लोकों में पूर्ण रूप से कर दिया है। उसका कथन है कि

“अभिधां वदन्ति सरला।
लक्षणा नागराजनाः।
व्यंजना नर्म मर्मज्ञः।
कवयाः, कमनाजनाः।।”

तात्पर्य यह है कि सीधे-सादे, भोले-भाले सरल व्यक्ति या ग्रामीण व्यक्ति अभिधा शक्ति का प्रयोग करते हैं, क्योंकि वे जो कहेंगे उसका वही अर्थ होगा। नगरवासी शिक्षित सभ्य पुरुष अधिकतर लक्षणा शक्ति का प्रयोग करते हैं, जिसमें कई रूढ़ि शब्द होते हैं और कई शब्दों का प्रयोजन से अर्थ होता है। शेष बचे सहृदय, रसिकजनक, कवि, प्रेमी, उत्कृष्ट जन-वर्ग सदैव व्यंजना वृत्ति अपनाते हैं, जिनकी बात में चमत्कार होता है और जो आनन्दायिनी रहती है।

(3) शब्द गुण (काव्य गुण) कविता-कामिनी को अलंकारों से सुसज्जित कर भी विद्वानों ने उसके आन्तरिक रूप को ही महत्त्व दिया है। अलंकार, छन्द से काव्य का बाह्य रूप सजता है किन्तु सुन्दर सजीला तन भावपूर्ण मन के बिना तथा गुण रहित होने से व्यर्थ होता है। कहा भी है कि “गुणीनां च निर्गुणनां च दृश्यते महदन्तरम्।” अत: मानवोचित गुणों के अनुकूल ही काव्य गुण भी होते हैं। आचार्य दण्डी ने दस काव्य गुणों का उल्लेख किया है और भोज ने चौबीस गुणों का। किन्तु साहित्य में काव्य के तीन ही गुण प्रमुख माने गये हैं। उसी वर्गीकरण के अन्तर्गत इन्हीं तीनों में अन्य सभी गुण समाहित कर लिए हैं। इन गुणों का काव्य में किस प्रकार प्रणयन होता है तथा गुणयुक्त काव्य श्रोता या पाठक पर किस प्रकार प्रभावशील होता है, उनके लिए कुछ नियम हैं।

मुख्य तीन गुण हैं—

  • माधुर्य,
  • ओज,
  • प्रसाद।

(1) माधुर्य गुण–मधुरता के भाव को माधुर्य कहते हैं। मिठास अर्थात् कर्णप्रियता ही इसका मुख्य भाव है। जिस काव्य के श्रवण से आत्मा द्रवित हो जाये, मन आप्लावित और कानों में मधु घुल जाये वही माधुर्य गुणयुक्त है। यह गुण विशेष रूप से श्रृंगार, शान्त एवं करुण रस में पाया जाता है। माधुर्य गुण की रचना में

  • कठोर वर्ण यानि सम्पूर्ण ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) के शब्द नहीं होने चाहिए।
  • अनुनासिक वर्गों से युक्त अत्यन्त दीर्घ संयुक्ताक्षर नहीं होना चाहिए।
  • लम्बे-लम्बे सामासिक पदों का प्रयोग भी वर्जित है।
  • कोमलकांत मृदु पदावली का एवं मधुर वर्णों (क, ग, ज,द आदि) का प्रयोग होना चाहिए।

उदाहरण—
(1) ‘छाया करती रहे सदा, तुझ पर सुहाग की छाँह।
सुख-दुख में ग्रीवा के नीचे हो, प्रियतम की बाँह।।

(2) अनुराग भरे हरि बागन में,
सखि रागत राग अचूकनि सों।

(3) लेकर इतना रूप कहो तुम, दीख पड़े क्यों मुझे छली?
चले प्रभात बात फिर भी क्या खिले न कोमल कमल कली?

(4) बसो मोरे नैनन में नन्दलाल
मोहिनी मूरत साँवरी सूरत नैना बने बिसाल।

(2) ओज गुण-जिस काव्य-रचना को सुनने से मन में उत्तेजना पैदा होती है, उस कविता में ओजगुण होता है। ओज का सम्बन्ध चित्त की उत्तेजना वृत्ति से है। इसलिए जिस काव्य को पढ़ने या सुनने से पढ़ने वाले के हृदय में उत्तेजना आ जाती है, वही ओजगुण प्रधान रचना होती है। वीर रस रचना के लिए इस गुण की आवश्यकता होती है। इस गुण को उत्पन्न करने के लिए विद्वानों ने निम्नलिखित गुणों का विधान किया है-

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  • रचना की शैली एवं शब्द योजना दोनों का ही सुगठित एवं सुनियोजित होना आवश्यक
  • पंक्ति अथवा छन्द की रचना में कहीं भी शिथिलता होना अनपेक्षित है।
  • रचना में ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) और सभी कठोर व्यंजनों का आधिक्य होना चाहिए।
  • र के संयोग से बने शब्द प्रथम एवं तृतीय, द्वितीय और चतुर्थ वर्गों का प्रयोग होते संयोजन तथा रेफ युक्त शब्द प्रभावशाली हैं।
  • लम्बे-लम्बे समासों से युक्त शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। अधिकाधिक संयुक्ताक्षरों का प्रयोग होना चाहिए।

उदाहरण-
(1) अमर राष्ट्र, उदण्ड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र-यह मेरी बोली।
यह ‘सुधार’, ‘समझौते’ वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली।।

(2) निकसत म्यान तें मयूखै प्रलै भानु कैसी,
फारै तम-तोम से गयंदन के जाल को।

(3) महलों ने दी आग, झोंपड़ियों में ज्वाला सुलगाई थी
वह स्वतन्त्रता की चिनगारी, अन्तरतम से आई थी।

(4) हिमाद्रि तुंग शृंग पर, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्वला, स्वतन्त्रता पुकारती।

(3) प्रसाद गुण—प्रसाद का अर्थ है—प्रसन्नता या निर्मलता। जिस काव्य को सुनते या पढ़ते समय वह हृदय पर छा जाये और बुद्धि शब्दों के दुरूह जाल में या क्लिष्ट अर्थों की कलुषता में मलिन न होकर एकदम प्रभावित हो जाये, मन खिल जाये, उसे प्रसाद गुण कहते हैं। कवि का उद्देश्य होता है मानव हृदय को प्रभावित करना। प्रेमी की बात प्रिय पात्र के हृदय को रस से सराबोर न कर दे, ममता वात्सल्य को आहूदित न कर पाये, करुणा नयनों के कोरों को यदि अविरल न कर पाये और वीरता का उत्साह यदि ओजित न कर पाये-ये सभी यदि शब्दों की भूलभुलैया में पड़कर क्लिष्टता के अस्त-व्यस्त मार्ग पर चल पड़े तो काव्य ब्रह्मानन्द सहोदर न होकर मस्तक की पीड़ा बन जायेगा। व्यस्तता के इस गुण में हमें आज प्रसाद गुण युक्त काव्य की आवश्यकता है। यही गुण अधिक समय तक प्रभावशाली रह सकता है, क्योंकि यह सीधे हृदय पर छाप छोड़ता है। सभी रसों की रचना प्रसाद गुण युक्त हो सकती है। प्रसाद गुण का सम्बन्ध सभी रसों से है। उक्त दोनों गुणों की तरह यह गुण किसी रस विशेष से नियन्त्रित नहीं है। शब्दों के साथ अर्थ का भी सरल होना आवश्यक है। इसमें जो बात कही जाये, उसका वही अर्थ होता है। ‘साहित्य-दर्पण’ के प्रणेता आचार्य विश्वनाथ का कथन है कि-“समस्त रसों और रचनाओं में जो चित्र को सूखे ईंधन में अग्नि के समान शीघ्र व्याप्त करे—वह प्रसाद गुण है।”

उदाहरण-
(1) “चुप रहो जरा सपना पूरा हो जाने दो,
घर की मैना को जरा प्रभाती गाने दो,
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो,
मुझको आँचल में हरसिंगार भर लेने दो।”

(2) मानुस हौं तो वही रसखान
बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

(3) तन भी सुन्दर मन भी सुन्दर
प्रभु मेरा जीवन हो सुन्दर।

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(4) हे प्रभो आनन्द दाता ! ज्ञान हमको दीजिए।
(5) आशीषों का आँचल भर कर, प्यारे बच्चो लाई हूँ।
युग जननी मैं भारत माता द्वार तुम्हारे आई हूँ।

-बालकृष्ण बैरागी

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MP Board Class 11th Special English Poems Important Questions

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MP Board Class 11th Special English Chapter 1 Patriotism Important Questions and Answers

I. Read the following stanzas carefully and answer the questions given below : [M.P. 2015]

1. Breathes there the man with soul so dead,
Who never to himself hath said,
“This is my own, my native land! ”
Whose heart hath never within him burn’d,
As home his footsteps he hath turn’d,
From wandering in a foreign strand!

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Questions :
(i) What meaning does the word ‘breathe’ convey?
(ii) Whose soul does the poet say is dead?
(iii) What does the poet imply by ……….. As home his footsteps he hath turned’?
(iv) Who has composed this poem?
(v) Find the antonyms the words ‘alive’ and ‘native’ from the lines given above.
Answers :
(i) The word ‘breathe’ stands for a person who is alive.
(ii) A person who does not love his native land.
(iii) Returning home.
(iv) Sir Walter Scott.
(v) Alive – dead, Native – foreign.

2. Despite Those titles, power and peef, [M.P. 2013]
The wretch, concentred all in self,
Living, shall forfeit fair renown?
And doubly dying shall go down.

Questions :
(i) Who is a ‘wretch’?
(ii) Why does the poet says the powerful man will lose his reputation?
(iii) Explain the meaning of the expression ‘doubly dying’
(iv) Find the word in the stanza similar in meaning of
(a) money, (b) lose.
Answers :
(i) A ‘wretch’ is a man who does not love his native land.
(ii) The poet says this because a man without love for his native land does not deserve any power.
(iii) The expressions ‘doubly dying’ means that a man without patriotic feeling is almost dead and after his real death no one remembers him. It is another death.
(iv) (a) pelf, (b) forfeit.

II. Answer the following questions in one sentence :

Question 1.
Whose soul does the poet say is ‘dead’?
Answer :
The soul of one who has no love for his native land is ‘dead’.

Question 2.
Who does the poet ask to mark well?
Answer :
One who does not love his native land.

Question 3.
What delights the minstrel?
Answer :
The return of a patriotic person to his motherland delights the minstrel.

Question 4.
How can a person doubly die? (Imp)
Answer :
An unpatriotic man is almost dead and after his real death no one remembers him which is another death.

Question 5.
What is meant by ‘vile dust?
Answer :
“Vile dust is used in the sense that is given birth to a person without love for his native land.

III. Answer the following questions in 100 to 150 words :

Question 1.
What happens to a person who returns home from a foreign land? (M.P. 2012)
Answer :
The return of a person from a foreign land is a matter of great joy. It is his love and attraction to his native land that brings him home. He feels proud. He is confident and proudly declares that ‘this is my home, my native land all the time. He feels delight of his feeling and love for nation. People welcome him with all pride and pleasure. The minstrel entertains him with all his art and skill. He is given honour and name and fame. He becomes an ideal man. He makes his country great. He brought all laurels for his native land. Such a person becomes a role model. The nation feels proud to have such a patriotic son of the soil.

Question 2.
What does the poet mean by ‘for him so minstrel raptures swell’?
Answer :
The poet in this poem deals with the theme of patriotism. He feels that a man who loves his country is great. He is the real son of the soil. The poet hardly believes that there would be anyone who has no love for his native land. There is perhaps no one whose soul is not ecstatic at the feeling of his land. A person with such a feeling of love for nation is worthy of all our praise and honour. Whenever he returns home after wandering from foreign lands, he is welcomed warmly. But the man with no such feeling is a bad name for the nation. He does not deserve any praise or honour. No minstrel tries to praise him or honour him.

Question 3.
Write a note to justify the title of the poem.
Answer :
The poem Patriotism deals with the similar theme of patriotism. All through the poem, the poet talks about the man who has love for his native land. Such a man gets praise and position everywhere. Minstrels honour him with all pleasure. Even after his death he is remembered forever. His death becomes a national mourning. The poet also talks about the person who has no patriotic feeling for his nation. Such a man does not deserve any praise. Despite his power and position, he lives unknown and dies unnoticed. No one weeps for him. As the poem only present the aspects of patriotism, the title becomes appropriate.

Question 4.
What are the attributes of a patriot? (M.P. 2009)
Answer :
A patriot deserves all kinds of honour and affection. He is given high respect by his countrymen. If he comes back from foreign countries, he is worthy of reputation. If he comes back from foreign countries, he is warranty received by them. Minstrels praise him highly in their notes. Even after death, he is paid tribute by weeping countrymen. The people of entire nation remember his death. Poets admire him through poem. The writers praise him in their essays and volumes. He never dies unwept, unhonoured and unsung.

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MP Board Class 11th Special English Chapter 4 The Brook Important Questions and Answers

I. Read the given extracts from the poem carefully and answer the questions given below:

1. I come from haunts of coot hern;
I make a sudden sally
And sparkle out among the fern,
To bicker down a valley.

Questions :
(i) What is the birth place of the brook?
(ii) What type of poem is it?
(iii) What does the word bicker point out?
(iv) Name two water birds mentioned in the passage?
(v) How does the brook come out after its birth?
Answers :
(i) The birth place of the brook is actually the haunt of water birds like coot and hern.
(ii) It is an autobiographical poem.
(iii) The word bicker point out the noise created by the brook when it flows.
(iv) The two water birds mentioned are coot and hern.
(v) The brook gushes out in a sudden sally after its birth.

2. I chatter over stony ways,
In title sharps and trebles,
I bubble into eddying bays,
I babble on the pebbles, (Imp)

Questions :
(i) What does the word “heater points out”?
(ii) What difference do these two words ‘bubble’ and ‘babble’ point out?
(iii) Choose the word which point outs movement and one word which points out sound?
(iv) Choose an aliteration from the stanza.
(v) What figure of speech is used in the stanza.
Answers :
(i) The word ‘chatter’ points out that while passing over the stony ways it is creating heavy noise.
(ii) The word bubble points out that when the brook flows in the spiral movement of water its noise is lost. But when it strikes on the pebble it
produces a high pitched sound as if expressing its happiness.
(iii) The word which points out movement is bubble and the word which points out sound is babble.
(iv) The aliteration used in ‘bubble-bays’.
(v) In this poem brook has been personified. Brook has been indicated as a human being.

3. I slip, I slide, I gloom, I glance
Among my skimming swallows
I make the netted sunbeam dance
Against my sandy shallows. (Imp)

Questions:
(i) Which words points out its carefree nature?
(ii) What does the word ‘netted’ point out?
(iii) How is ‘I responsible for making sunbeam dance?
(iv) Explain the picturesque view of the stanza in a sentence or two.
Answers :
(i) The carefree nature is pointed out by the words: slip, slide, gloom, galnce.
(ii) The word ‘netted’ means captured.
(iii) The brook is making the rays of its sun to flicker light on its flowing water. It seems as if the sun rays are dancing on the brook.
(iv) The brook passes along the shallow by filtering along the sun rays falling on it.

4. Tilt last by Philips farm
I flow To join the brimming river.
For men may come and men may go
But I go on for ever (Imp)

Questions :
(i) What does it cross before reaching teh phillips farm?
(ii) What does the expression brimming river point out?
(iii) What paralletism does this poem have with man?
(iv) What lesson there lines teach you?
(v) Choose a word which means ‘full’.
Answers :
(i) Before reaching the philips farm it eroses the hills, ridges, towards and bridges.
(ii) The enpression brimming river point out that the river is overflowing with water as the brook brings walis in it.
(iii) The parallelism that this poem have with man is that men may go but the brook keeps on flowing for ever.
(iv) These lines teach us a lesson that we should be strong and determined.
(v) ‘Brimming is the word which means “Full’. II. Answer the following questions in two or three sentences each :

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Question 1.
Who is the ‘l’ in the poem and what does he do throughout the poem?
Answer :
The ‘I’ in the poem is the stream. He flows and flows throughout the poem and never stops.

Question 2.
Identify the places that the brook travels through. Make a list of the items.
Answer :
A list of the items :

  • thirty hills
  • twenty hamlets
  • fifty bridges
  • philip’s form
  • many fields and fallows
  • many lawns and grassy plots.

Question 3.
Where does the brook flow to an what happens in the end? (Imp)
Answer :
The brook flows to the river. Along with the river water it continues its movement on forever.

III. Explain the following:

(i) For men may come and men may go,
But I go on forever.
Answer :
Generation after generation of men come and die but the brook continues to flows forever. The movement of brook is a never-ending process. It means that men may come and go but the world goes on as ever.

(ii) I chatter over stony ways,.
In little sharps and trebles
I bubble into eddying bays
I babble on the bays.
Answer :
The brook is a small stream. It creates tremendous noise where it passes over the stony ways. When it flows in the circular movement of water its noise is reduced. But when it strikes in the pebble it produces shall sound as if expressing its happiness.

(iii) What is the poet referring to when he says:
And draw them all along, and flow
To join the brimming river.
Answer :
The poet explains the onward movement of the brook which moves on and on to join the brimming river. All over its way it crosses and meets with many foamy flakes, silver water-break, golden gravel. It takes them all with its flow and gives them too a larger meaning to their existence.

MP Board Class 11th Special English Chapter 6 Cherry Tree Important Questions and Answers

I. Read the following stanzas carefully and answer the questions that follow them :

1. Since I placed my cherry seed in the grass, (Imp)
“Must have a tree of my own, I said,
And watered it once and went to bed
And forgot.

Questions :
(i) Who is ‘I’ in these lines?
(i) What did ‘l’ do eight years ago?
(iii) Why did ‘I’ do so?
(iv) What did ‘I’ do after that?
(v) Give a word from the stanza which is opposite to ‘remembered’.
Answers :
(i) ‘I’ in these lines is the poet-the narrator.
(ii) l’ placed a cherry seed in the grass eight years ago.
(iii) ‘I’ did so thinking it to be a tree of his own.
(iv) ‘I’ watered it once and then forgot it.
(v) ‘Forgot’.

2. Goats ate the leaves, the grass cutter’s scythe
split it apart and a monsoon blight
Shrivelled the slender stem …………. Even so.

Questions :
(i) What is being talked about her in these lines?
(ii) What did the goats do to it?
(iii) What did the monsoon blight do to the tree?
(iv) How was the tree split apart?
(v) Give a word from the above stanza similar in meaning to ‘thin’.
Answers :
(i) A little cherry tree is being talked about here.
(ii) The goats ate the leaves of the tree.
(iii) The monsoon blight made its stem shrivelled and slender.
(iv) The tree was split apart by the grasscutter’s scythe.
(v) ‘slender’.

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3. Eight years have passed
Since I placed my cherry seed in the grass.
“Must have a tree of my own,’ I said,
And watered it once and went to bed
And forgot, but cherries have a way of growing,
Though no one’s caring very much or knowing.

Questions
(i). Where did the poet plant the cherry seed?
(ii) Why did he do so?
(iii) What mistake did he commit?
(iv) What does the poet mean byʻ….cherries have a way of growing?
(v) Find the antonyms the words “remembered’ and ‘little’ from the lines given above.
Answer:
(i) The poet planted the cherry seed in the grass.
(ii) He wanted to have a tree of his own.
(iii) He forgot to water the plant.
(iv) Unlike other plants which require constant care, cherries grow unattended. –
(v) remembered = forgot, little = much.

II. On the basis of the reading of the poem, answer the questions :

Question 1.
What difficulties did the cherry tree face in growing up? (Imp)
Answer :
The difficulties that the cherry tree faced in growing up were that: he it was not watered. It was suppressed by the tall, wild grass, Goats often ate up its leaves. Grasscutter scythe it and split it apart.

Question 2.
What is the miracle? How was it caused by time and rain? (Imp)
Answer :
The miracle is something that is thought to be done by some divine or super natural power. Here, time and rain caused the growth and bloom of the cherry tree despite all its difficulties.

Question 3.
What does the poet refer to in ‘five month’s child?
Answer :
The poet refers to the cherry tree as ‘five month’s child.

Question 4.
The poet says, Its arms in fresh fierce lust’. What do ‘Its arms’ stand for?
Answer :
Its are stand for the branches of the cherry tree.

Question 5.
Mention two things that the poet saw when he was trying to look at the sky through the leaves of the cheery tree.
Answer :
The two things that the poet saw when he was trying to look at the sky through the leaves of the cherry tree were.
(i) The finches which flew and flitted.

(A) What is the poet trying to say in the expression ‘cherries have a way of growing? (Imp)
Answer :
By the expression cherries have a way of growing the poet means to say that cherry is tree and hence a natural object. Nature has its own way to protect its world. So, despite all hurdles the cherry tree grows and blooms. There is no power which can stop the process of nature.

(B) What do you understand by the following expression?
Write a sentence for each expression to bring out its meaning :
1. grass running wild
2. monsoon blight
3. growing pains
4. sleepiest breeze
5. dappled green
6. blue blind sky
7. fresh fiercest lust.
Answer :
1. Grass running wild : The cherry tree is covered with grass that has grown on it.
2. Growing pains : The monsoon blight has adversely affected the growth of the plant.
3. Growing pains : I was very much depressed at the growing pains at every step.
4. Sleepiest breeze : The sleepiest breeze soothed my hurt feelings.
5. Dappled green : It was strange to see the bees drinking nectar through dappled green.
6. Blue blind sky: The blue blind sky fascinated me.
7. Fresh fierest lust : No fresh fierest lust could affect my way.

III. Objective Type Questions :

Choose the correct answer from the giving options :
(i) The poem ‘Cherry Tree’ has been composed by:
(Ruskin Bond, P.B. Shelley, William Wordsworth, None of these)

(ii) The poet compares the small cherry plant with a :
(kid, young boy, an adult person, five month child)

(iii) The poet loves the cherry tree very much and call it :
(the national tree, the international tree, the tree of his own)

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(iv)“Shrivelled the slender stem …………. Even so” is the example of:
(simple metaphor, alliteration, none of these)
Answers :
(i) Ruskin Bond.
(ii) five month child.
(iii) the tree of his own.
(iv) alliteration

MP Board Class 11th Special English Chapter 7 Mercy Tree Important Questions and Answers

I. Read the following stanzas carefully and answer the questions given below :

1. The quality of mercy is not strained; (M.P. 2009, 11)
It droppeth as the gentle rain from heaven
Upon the place beneath. It is twice blest
It blesseth him that gives, and him that takes.

Questions :
(i) What is talked about in these lines?
(ii) How does the poet qualify, mercy?
(iii) For whom is the mercy a bliss?
(iv) Give a word from the stanza similar in meaning to ‘forced’.
Answers :
(i) Mercy is talked about here in these lines.
(ii) The poet qualifies mercy as gentle rain from heaven.
(iii) Mercy is a bliss both for the giver and the taker.
(iv) Strained.

2. It is enthroned in the hearts of kings,
It is an attribute to God himself.
And earthly power then show likest God’s
When mercy season’s life……….

Questions :
(i) What does mercy do with the king?
(ii) What is mercy?
(iii) When it becomes a divine grace?
(iv) Give a word from the above stanza which is opposite in meaning to dethroned.
Answers :
(i) Mercy is enthroned in the hearts of kings.
(ii) Mercy is an attribute to God. It is unearthy power.
(iii) It becomes divine grace when combined with justice.
(iv) To enthroned.

II. Write answer of the following questions in one sentence :

Question 1.
But mercy is above this sceptred sway. Explain.
Answer :
It is above the sceptred sway because it is enthroned in the hearts of the kings.

Question 2.
Why does the poet believe that ‘earthly power then show likest God’s when mercy seasons justice…….?
Answer :
The poet tells so because it appears to be God when it administers justice.

Question 3.
His scepter shows the force of temporal power,
The attribute to awe and majesty,
(a) What is an attribute to awe and majesty?
(b) What does show the force of temporal power?
Answer :
(a) An attribute to awe and majesty is force.
(b) The scepter shows the force of temporal powers.

Question 4.
It droppeth as the gentle rain from heaven.
Upon the place beneath. It is twice blest.
It blesseth him that gives, and him that takes.
(a) What is mercy compared above lines?
(b) How is mercy twice-blessed.
Answer :
(a) Mercy is compared with the gentle rain that drops from heaven. :
(b) Mercy is double blessings. On the one hand, it is a boon for the one who gives and a blessing for the other who takes.

III. Write the answer to the following questions in two or three sentences each :

Question 1.
What is the quality of mercy?
Answer :
Mercy is a super divine power. It is not a binding obligation but self-generating thing.

Question 2.
What makes mercy twice-blessed?
Answer :
On the once hand mercy falls upon the giver as a gift of God and on the other it obliges the taker.

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Question 3.
What does quality a monarch more-mercy or throne, Why?
Answer :
It is mercy that qualifies a monarch more. A monarch, by showing mercy, can win the hearts of his subjects.

Question 4.
What does the scepter show?
Answer :
It shows the force of temporal power.

Question 5.
What is an attribute of God himself?
Answer :
It is mercy itself.

Question 6.
What happens when mercy is tempered with justice?
Answer :
When mercy is tempered with justice, it becomes divine.

IV. Write answer to the following questions in about 150 words :

Question 1.
How does mercy bless the giver and the taker alike? (Imp)
Answer :
Mercy is a human virtue. When combined with justice, it becomes divine grace. Then it transcends worldly power. One who shows mercy finds himself in a state of fulfilment. In this way Mercy blesses the giver and the taker alike.

V. Objective Type Questions :

Choose the correct answer from the giving options :
(i) The poem “Mercy’ has been composed by: [M.P. 2013]
(John Keats, William Shakespeare, P.B. Shelley, S.T. Coleridge)

(ii) The poem “Mercy’ is an extract from Shakespeares :
(The merchant of Venice, Mid Summer Nights dream, Othello, Twelfth Night)

(iii) “It dropeth as the gentle rain from heaven”. It is an example of:
(an alliteration, simple, personification)

(iv) According to the poet’s view mercy is :
(British quality, divine quality of man, rare quality, the quality of every living being)
Answers :
(i) William Shakespeare.
(ii) The merchant of Venice.
(iii) Alliteration.
(iv) Divine quality of man.

MP Board Class 11th Special English Chapter 9 To a Skylark Important Questions and Answers

I. Read the following stanzas carefully and answer the questions given below :

1. Hail to thee, blithe spirit !
Bird thou never wert
That form heaven or near it
Pourest they full heart
In profuse strains of unpremeditated art.
Higher still and higher
From the earth thou springest, like a cloud of fire,
The blue deep thou wingest,
And singing still does soar and soaring ever singest.

Questions :
(i) Who is ‘Thee’ in these lines?
(ii) What does the poet mean by ‘blithe spirit?
(iii) What does the bird do?
(iv) From where does the bird spring and where does it go?
(v) Find a word from the lines which means same as “unplanned’.
Aņswers :
(i) ‘Thee’ is the skylark (a bird).
(ii) The poet means a carefree and light-hearted bird.
(iii) The bird spring from the earth and it goes higher and higher in the sky.
(v) ‘Premeditated’.

2. Like a high-born baliin
In a palace tower,
Soothing her love-laden
Soul in secret hour
With music sweet as love, which overflows her bower
Like a glow-worm golden
In a dell of dew,
Scattering unbeholden
Its aerial hue
Among the flowers and grass which screen it from the view :

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Questions :
(i) Who does the poet compose with the bird in the first given stanza?
(ii) What does she do?
(iii) What is the effect of her music?
(iv) What is composed with in the second stanza given here?
(v) Find a word from the above stanzas which is similar in meaning to ‘invisible’.
Answers :
(i) The bird is compared with a high-born maiden.
(ii) She soothes her love-laden soul.
(iii) Her music overflows her power.
(iv) Here, the bird is compared with glow worm.
(v) ‘Unbeholden’.

3. Teach us, sprite or bird,
What sweet thoughts are thine :
I have never heard
Praise of love or wine
That panted forth a flood of rapture so divine.
Chorus hymeneal,
Or trimumphal chant,
Match’d with thine would be all
But an empty vaunt
A thing wherein we feel there is some hidden want.

Questions :
(i) What does the poet ask the bird to teach him?
(ii) What has the poet never heard?
(iii) What is chorus?
(iv) What does the poet guess in the bird’s song?
(v) Give a word from the above stanzas which is similar in meaning to victory’.
Answers :
(i) The poet asks the bird to teach him the secret of its song.
(ii) The poet has never heard a song as sweet and divine as that of the bird.
(iii) Chorus is givup song.
(iv) The poet guesses that there is some hidden want in the bird’s song.
(v) triumphal’.

4. We look before and after, (M.P. 2010) (Imp)
And pine for what is not
Our sincerest laughter With some pain is fraught;
Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.

Questions :
(i) What human weakness that the poet finds in these lines?
(ii) What does the poet mean by ‘sincerest laughter’?
(iii) What are our sweetest songs?
(iv) Give the opposite word from the above stanza for “enjoy’.
Answers :
(i) The poet finds that human being looks before and after and feels sad for what is not.
(ii) By “sincerest laughter’ the poet means extreme happiness.
(iii) Our sweetest songs are those that express our saddest thought.
(iv) ‘pine’.

II. Answer the following questions briefly :

Question 1.
Why is Shelley not able to define the Skylark? How does the Skylark exceed the capacity of human language to describe its qualities or the qualities of its song? (M.P. 2015, Imp)
Answer :
Shelley finds himself unable to define the Skylark exactly. It is because the Skylark is not seen. It is carefree and cheerful bird without any physical frame. Its spontaneous overflow of song creates mysteries in the mind of the poet. Its song pervades the entire universe. Unlike human being it is never sad. In this sense it surpasses us.

Question 2.
Why does the poet use the similes in place of direct definition? Do they adequately describe the Skylark?
Answer :
In place of direct definition the poet uses the similes like ‘blithe spirit’, ‘unbodied joy’, These similes exactly suit the skylark. It is because it sings spontaneously. It is above all the cares and fears. It is hardly visible, Still is soothes the whole $ world.

Question 3.
What prevents the poet from singing like the Skylark? Why is the Skylark’s song is better than even the best productions of human genius, language
and emotion?
Answer :
The poet feels that he cannot sing like Skylark because being a human, he is full of vices like hate, pride and fear which prevent him to compete with Skylark. It is human nature that we look to the past and future feel sad for what we have not. The bird is above all these feelings.

Question 4.
Why does poet call the Skylark’s song “unpremeditated art”?
Answer :
The poet calls the Skylark’s song “unpremeditated art” because it flows spontaneously with varying mood. It has a tremendous kind of joy and freedom, which is not possible with a preplanned art.

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Question 5.
Why does the poet compare the Skylark’s flight to an unbodied joy?
Answer :
The Skylark’s melodious note resounds and echo in the whole earth and air. But the bird is not visible anywhere as it flies higher and higher, Still its presence is felt somewhere nearby. So, the poet calls its flight as an ‘unbodied joy’.

Question 6.
Why does the poet compare the loud voice of the bird with rain? Why is the Skylark’s song called “rain of melody”?
Answer :
As the musical notes of the bird seem to be falling direct from heaven spontaneously and soar in the whole atmosphere so the poet feels it is like rain. The melody of Skylark pours joy and natural freedom. There is no shadow of sadness near it. So, the poet calls it ‘rain of melody’.

Question 7.
What does the poet ask the bird to teach him?
Answer :
The poet asks the bird to teach at least half of the gladness that the bird’s brain possesses. The poet has a wish to immortalize the bird’s song and make the world feel the joy that the bird pours as the poet imagines and enjoys.

Question 8.
What does the poet lament about the mortals? (Imp)
Answer :
The poet in no way feels human beings to be near the greatness of the bird. It is because we have become a prey to vices like hate pride and fear. We look forward and backward and feel sad for what we have not. The bird is free from all these vices and it is grater than us.

III. Objective Type Questions :

Choose the correct answer from the giving options :

(i) Waking or asleep
Thou of death must deem
things more true and deep
than we martals dream.

Name of the poem from which these lines have been taken.
(To a Skylark, The brook, Patriotism)
Answers :
(i) “The critic’ is the frog.
(ii) He had said that the nightingale’s song was not so bad but it was unduly long. He had further said that the nightingale’s rendering was fine, but her song lacked force.
(iii) The nightingale was greatly flattered and impressed by his criticism.
(iv) She is submissive and perhaps brainless also.

3. And the ticket office gross
Crashed and she grew more morose
For her ears were now addicted
To applause quite unrestricted,
And to sing into the night
All alone gave no delight

Questions :
(i) Why had the ticket office collection fallen?
(ii) How did it affect the nightingale?
(iii) Who else was affected by it? And why?
(iv) Why was the nightingale no longer delighted to sing?
Answers :
(i) The ticket office collection had fallen because fewer audience would coine now to hear her song.
(ii) The nightingale grew miserable.
(iii) The frog was affected by it because the ticket office collection would go into his pocket.
(iv) The nightingale now used to sing to a large audiene. So, she was no longer delighted to sing alone.

III. Objective Type Questions :

Choose the correct answer from the giving options.
(i) The poem “The frog and Nightigale” has been composed by:
(Mary Howrin, Andrew Barlon, Ben Johnson, Vikram Seth)

(ii) There lived a frog that croaked under a :
(Sumac tree, coconut tree, banyan tree, oak tree)

(iii) The frog croaked under á sumac tree :
(throughout the day, throughout the night, throughout the summer, throu ghout the winter)

(iv) The next night when the nightingale got ready to sing, she was started by:
(loud noise, loud thundering sound, sudden flash, croaking of a frog)
Answers :
(i) Vikram Seth.
(ii) Sumac tree.
(iii) throughout the night.
(iv) croaking of a frog.

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MP Board Class 11th Special English Chapter 13 Peace Important Questions and Answers

I. Read the following stanzas carefully and answer the questions given below :

1. Behold, it comes in might,
The power that is not power,
The light that is in darkness,
The shade in dazzling light,
It is joy that never spoke,
And grief unfelt, profound.

Questions :
(i) What is ‘it’ in the above lines?
(ii) How does “it’ come?
(iii) What sort of power is it?
(iv) Where does this light appcar?
(v) What sort of joy is it?
Answers :
(i) ‘It’ stands for the ultimate need of life.
(ii) ‘It’ comes in might.
(iii) It is the power that is really not a power.
(iv) This light appears in darkness.
(v) It is the joy that is never spoken.

2. It is sweet rest in music.
And pause in sacred art.
The silence between speaking,
Between two fits of passion
It is the calm of heart.

Questions :
(i) What type of rest is ‘it’?
(ii) What does the second line in the above stanza signify?
(iii) Explain the meaning of the third line.
(iv) Give the opposite word from the stanza for ‘start.
Answers :
(i) ‘It’ is the sweet rest.
(ii) The second line signifies that it is the pause in the sacred art that heightens its beauty.
(iii) It means that the silence in the midst of speaking is rejuvenation of strength.
(iv) Pause’.

3. To it the tear-drop goes,
To spread the smiling form
It is the smiling form
It is the Goal of Life,
And Peace-its only home!

Questions :
(i) What happens to tear-drop?
(ii) What does ‘it’ do to tear-drop?
(iii) What is its form?
(iv) What do you mean by ‘goal of life’?
Answers :
(i) ‘It’ absorbs the tear-drops.
(ii) ‘It spreads the tear-drops in the smiling form.
(iii) Its form is smiling.
(iv) It means the ultimate aim of one’s life.

II. Answer the following questions :

Question 1.
“Behold, it comes in might ……….’ in this line, what is implied by ‘it?
Answer :
‘It’ implies the ‘eternal peace’.

Question 2.
What does the poet mean by ‘eternal death unmourned”?
Answer :
By this expression, the poet means the death which hasn’t been mourned for it being for salvation and eternity.

Question 3.
Explain the following lines :
It is sweet rest in music
And pause in sacred art;
Answer :
Here the poet signifies peace in the sense that it is a rest for rejuvenation during music and pause during a sacred art. Such rest gives a new gain of energy.

III. Answer the following questions in one sentence :

Question 1.
What is the ‘Goal of life?
Answer :
The ‘Goal of life’ is salvation.

Question 2.
Where does the spirit return to?
Answer :
The spirit return to eternity.

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Question 3.
What sort of joy and sorrow does the poet refer to?
Answer :
The poet refers to the joy never spoken and sorrow never felt.

Question 4.
What is it that joins might and the next day?
Answer :
Peace joins might and the next day.

Question 5.
What element is present in silence admist two fits of passion?
Answer :
Eternal peace is present in silence admist two fits of passion.

Question 6.
Give the central idea of poem.
Answer :
The central idea of poem is to attain real eternal salvation and peace of inind. Spirit is immortal.

IV. Answer the following questions in about 150 words :

Question 1.
Why does the poet say that it is ‘death between two lives’? (M.P. 2010, 11, 12)
Answer :
The poet is highly philosophical in this poem. Here he highlights the ultimate peace of life. As the all-pervading force, it maintains the harmony needed to energies the human spirit. It is a state of our existence that inspires us to rise above worldly limitations and appreciates real power, joy, beauty and knowledge. The poet believes in the life after death, i.e., the life or eternity of spirit. He says that peace is there, i.e., death which can be said to be just an internal or pause which one takes to rejuvenate one’s strength and vigour. It is the element which one to begin a new life with more enthusiasm. It is a divine bliss.

Question 2.
Write the summary of the poem “Peace’. (M.P. 2013, 15)
Answer :
‘Peace’, by Swami Vivekananda, is a spiritual poem, signifying the ultimate need of life. The poem starts as invocation to attend the real self for solving the worldly problems. It refers to the inner self, or the spirit. By pointing to the everlasting quality of the human spirit, the poet has tried to speak for coming to terms with one’s own self. Living through the outer world, the uneasy mind is forced to take sides. It is, therefore, necessary to find harmony whereby confrontation is avoided. For this the need to realize one’s true bearing is important. In fact, ‘it’ foregrounds the meaning of the poem, which calls for responding to all-encompassing inner self.

MP Board Class 11th Special English Chapter 16 The Captive Air of Chandipur Important Questions and Answers

I. Read the following stanzas carefully and answer the questions given below :

1. Or of smells paralysed through the centuries, of deltas hard and white that stretched once.
to lure the feet of women bidding their men goodbye?
Or of salt and light that dark and provocative eyes
demanded, their shoulders drooping like lotuses in the noondays sun?

Questions :
(i) What is stretched along the sea beach?
(ii) What does it do?
(iii) Why do women come there?
(iv) What is compared with ‘lotuses in the noonday sun?
(v) What is the meaning of ‘drooping’?
Answer:
(i) White sandy land is stretched along the sea beach.
(ii) It lures the feet of women.
(iii) Women come there to bid their men goodbye.
(iv) The drooping shoulders of the men is compared with ‘lotuses in the noonday sun’.
(v) ‘Weak.

2. The ground seems only a memory now, a turn breath (M.P. 2009)
and as we wait for the tide to flood the mudflats
the song that reaches our ears is just our own
The cries of fishermen come drifting through the spray.
music of what the world has lost.

Questions :
(i) What does the ground seem to be?
(ii) Why do we wait?
(iii) What is the song that reaches our ears?
(iv) What does drift through the spray?
(v) Explain the last line.
Answer :
(i) The ground seems to be only a memory of a tom breath.
(ii) We wait for the tide.
(iii) It is the song just our own that echo in our ears.
(iv) The cries of fishermen drift through the spray.
(v) It is the music of the world that is lost in the tide.

II. Read the following lines from the poem and write answers to the questions given below :

Question 1.
Who can tell of the songs of this sea that go on to baffle and double the space around our lives?
(a) What does the poet mean by ‘to baffle’?
(b) What is implied by the songs of sea’?
Answer :
(a) Sea appears to be a mystery. It often confuses us. The poet means that sea which is calm works violently and takes lives of fishermen silently.
(b) ‘The song of sea’ is the tale of struggle of the fishermen and nature people of Chandipur are destined to die. Still they struggle.

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Question 2.
Of deltas hard and white that stretched once to lure the feet of women bidding their men goodbye?
(a) Why did the destas lure the feet of women?
(b) Why did the women bid goodbye to men?
Answer :
(a) Delta is the stretch of land piece from where the river meets the sea. Here delta is said to lure the women with new hopes for life.
(b) Because they know the fate of their men which make them bid goodbye to them.

III. Answer the following questions in a few sentences :

Question 1.
What is meant by ‘the ridicule of the dead’? (Imp)
Answer :
“The ridicule of the dead’ signifies that the men think themselves to be warrior and powerful but they can’t beat nature. Sea is almighty. It destroys the lives of fishermen. Hence, this lines mocks men’s might.

Question 2.
Who is the ‘occupant of the silent sigh of the conch’?
Answer :
Fishermen of Chandipur are the occupants of the silent sigh of the conch. They are destined to lose their lives in their struggle against the tide.

Question 3.
Why does the poet call the sea at Chandipur drunk?
Answer :
The sea at Chandipur is called so because it is violent and shows no mercy to the fishermen to struggle against it. The sea overpowers the whole region.

Question 4.
How do ‘songs of sea’ double the space around our lines?
Answer :
The sea is the killer for the fishermen of Chandipur. The fishermen knew the truth and lost their life. Still they fought. The songs of sea gives them courage and remain them of the brave struggle of their forefathers.

Question 5.
Why does the poet says that the ground is only a memory now? (Imp)
Answer :
The poet says that the ground is only a memory now because lives have been lost. The fishermen who went on their struggle did not return. They have been killed.

Question 6.
What has the world lost?
Answer :
The world has lost the lives of the fishermen who had gone on the search of their livelihood. The tide swallowed them. The violent cruel sea showed no mercy to them.

IV. Answer the following questions in about 150 words each :

Question 1.
Why does the poet say that the song that reaches our ears is our own’? (Imp)
Answer :
The Captive Air of Chandipur-on-Sea’ is a poem that relives the tale of struggle between Man and Nature in the background of the seascape at Chandipur. It recounts the nostalgia about he lost labour and efforts of our predecessors in the conquest of Nature. The poet with all realistic touches explains how the sea waves wash away the lives of people Įiving at Chandipur. The tide swallows them while they are on the search for their livelihood. They know their fate. Their forefathers had lost their lives while trying to conquer the sea. Nature is all powerful. No one can win over it. Hence they are ready to face whatever comes to them. Still they celebrate their living. They wait for their fate. They sing songs of their misery and this echoes in their ears.

Question 2.
What does the poet glorify in the poem, Why? [M.P. 2013]
Answer :
This poem is all about the struggle between man and nature. People of Chandipur are all set to meet their fateful end in the sea. They meet their end in the waves of sea. The tide engulf them. Still they struggle for their life. They go in the sea in search of their food. Sea is the main source of their life. They know what the sea has in its. It is their fate. So, they don’t mourn. They forget all their woes and miseries. They know how their predecessors lost their lives. Still women come forward to bid goodbye to their men. This is the truth and reality of life. Life comes and goes but nature never ceases to work. This is the theme of this poem.

V. Objective Type Questions :

Choose the correct answer from the giving options : (Imp)
(i) The poet describe the sea at ………… (M.P. 2009)
(Puri, Cochin, Chandipur, Paradip)

(ii) The sea spilts out the wings of ………….
(birds, shells, planes, none of the them)

(iii) What do the said whisper?
(legends, warnings, praises, all of them)

(iv) The tide floods the …………..
(village, river, mudflash, none of above)
Answers :
(i) Chandipure.
(ii) planes.
(iii) legends
(iv) mudflash.

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MP Board Class 11th Special English Chapter 18 King Porus – A Legend of Old Important Questions and Answers

I. Read the following stanzas carefully and answer the questions given below :
1. Loudly the midnight tempest sang.
Ah! it was thy dirge, fair Liberty!
And clouds in thundering accents roar’d
Unheeded warning from on high;
The train in darksome torrents fell,
Hydaspes’ waves did onwards sweep,
Like fiery passio’s heandlong flow.
To meet th’ awaken’d calling deep.

Questions :
(i) Name the poem and the poet.
(ii) What is talked about in these lines?
(iii) What was the thundring accent?
(iv) What happened at the midnight hour?
(v) What is the meaning of ‘tempest??
Answers :
(i) The poem is King Porus-A legend of Old and the poet is Michael Madhusudan Datta.
(ii) The great battle between Alexander. The Great King Porus is talked about in these lines.
(iii) The thundering accent was the roaring sound of the battle.
(iv) The army of Alexander attacked on the kingdom of India, ruled by the Porus at the midnight hour.
(v) tempest-storing.

2. Like to a lion chain’d [M.P. 2015]
That tho’ faint-bleeding-stands in pride
With eyes, where unsubdued
Yet flash’d the fire-looks that defied;
King Porus boldly went
Where ‘midst the gay and flittering crowd’
Sat god-like Alexander;

Questions :
(i) Who is compared with a lion chained here?
(ii) How was he looking?
(iii) How did he march on?
(iv) What does the expression ‘god-like’ signify?
(v) Giye a word opposite in meaning to ‘cowardly’.
Answers :
(i) King Porus is compared with a lion chained here.
(ii) He was confident and fearless.
(iii) He marched on boldly.
(iv) It signifies the supreme authority.
(v) boldly’.

II. Write answer to the following questions in three or four sentences :

Question 1.
How does the poet describe the heroic King Porus in the battle-field?
Answer :
The heroic King Porus was like a lion. He was full of triumphant feeling. He was fiery and brave in his fight.

Question 2.
What did Alexander do when he saw Porus fighting on with his gaping wounds?
Answer :
Alexander was really great. When he saw gaping a winds of King. Porus bleeding, he cried, “Desist-desist ! such noble blood should not be shen

Question 3.
Porus is compared to a chained lion as he walks to the Macedonian King. What qualities of Porus is the poet trying to highlight?
Answer :
The poet is living to highlight Porus courage and confidence. He fought with all his power to save his kinguom. His personality overpower all. He was the real king.

Question 4.
Why does the poet says “Thus India’s crown was lost and won’? Explain.
Answer :
The poet glorifies India’s winning culture. Indian army faced the enemy with all bravery without caring their own self. However they were defeated. But the confidence of King Porus made Alexander realise that he was not a coward. Alexander at last recognized his bravery honoured king Porus and returned his kingdom with all praise.

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Question 5.
What quality of Alexander is also inherent in his act of forgiveness?
Answer :
Alexander’s act of forgiveness proves that he was a man of great soul. He himself was brave and knew how to honour bravery. He was a considerate person. He realized King Porus’ greatness.

MP Board Class 11th Special English Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi निबंध लेखन Important Questions

MP Board Class 11th Samanya Hindi निबंध लेखन Important Questions

1. समाचार-पत्र (Imp.)
या
समाचार-पत्रों का महत्व
(म. प्र. 1997, 12, 13, 15)

सुबह बिस्तर छोड़ते ही आज का नागरिक एक कप चाय और समाचार-पत्र की माँग करता है। वह चाय की चुस्की लेकर शारीरिक स्फूर्ति का अनुभव करता है तथा समाचार-पत्रों के पृष्ठों पर आँखें दौड़ाकर देश-काल की घटनाओं, विचारों से वाकिफ होकर मानसिक रूप से वह अपने आपको तरोताजा अनुभव करता है। इस तरह समाचार-पत्र आज की दुनिया में एक निहायत जरूरी चीज बन गया है। .. समाचार-पत्र में अंग्रेजी न्यूज (NEWS) के N,E,W,S-N for North, E for East, W for West, S for South ये चार अक्षर जुड़े हैं जो क्रमशः उत्तर, पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण के प्रतीक हैं, अर्थात् समाचार-पत्र वह है जिसमें चारों दिशाओं के समाचार होते हैं।

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समाचार-पत्र का जन्म इटली के वेनिस नगर में 13वीं शताब्दी में हुआ। इससे पूर्व लोगों में समाचार-पत्र की परिकल्पना भी नहीं थी। 17वीं सदी में धीरे-धीरे अपनी उपयोगिता के कारण समाचार-पत्र इंग्लैण्ड पहुँचा, फिर धीरे-धीरे सारे संसार में फैला।

भारत में सर्वप्रथम कलकत्ता (कोलकाता) में इसका जन्म और विकास हुआ! 19 जनवरी 178) को ‘बंगाल गजट’ का कैलकटा जनरल एडवरटाइजर’ के प्रकाशन के साथ ही भारतीय पत्रकारिता का जन्म हुआ। 1857 से पूर्व ‘उदन्त मार्तण्ड’, ‘बंगदूत’, ‘प्रजामित्र’ आदि हिन्दी समाचार-पत्रों का प्रकाशन हो चुका था। धीरे धीरे वैज्ञानिक आविष्कार बढ़ते गये, मुद्रण यन्त्रों के विकास के साथ ही समाचार-पत्रों का विकास होता गया।

समाचार-पत्रों के महत्त्व का बखान जितना किया जाये उतना कम होगा। आधुनिक युग की प्रभावपूर्ण उपलब्धियों में समाचार-पत्र एक है। सामाजिक चेतना एवं समाज के उन्नयन में समाचार-पत्रों की भूमिका उल्लेखनीय है। सांस्कृतिक चेतना जगाने, छात्रों के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने में भी समाचार-पत्र उल्लेखनीय भूमिका अदा करते हैं।

राजनीतिज्ञों के लिए, राजनीतिक प्रौढ़ता बढ़ाने के लिए एवं लोगों में साहित्यिक चेतना जगाने की दृष्टि से भी समाचार-पत्र महत्त्वपूर्ण हैं। व्यापारियों के लिए तो यह आवश्यक चीज बन गया है। यह युग विज्ञापन का युग है, प्रचार का युग है और समाचार-पत्र प्रचार का सरल एवं सस्ता माध्यम है।

वैयक्तिक दृष्टि से भी विज्ञापनों का कम महत्त्व नहीं है। नौकरी का विज्ञापन, वर-वधु विज्ञापन, शुभकामनाएँ, आभार प्रदर्शन, निमन्त्रण आदि का काम समाचार-पत्र करता है।

समाचार-पत्र तो प्रजातन्त्र की रीढ़ कहे जाते हैं। जनमत बनाने का काम यही करते हैं। वैचारिक स्वतन्त्रता को प्रश्रय समाचार-पत्र ही देते हैं। इस तरह समाचार-पत्र आज के संसार में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान बना चुके

अच्छे समाचार-पत्रों के गुण-अच्छे समाचार-पत्र निष्पक्ष रहते हैं तथा स्वस्थ पत्रकारिता पर आधारित होते हैं। वे जनता एवं सरकार को सही दिशा और सलाह देते हैं। वे किसी के हाथ बिके नहीं होते। वे समाज हित और राष्ट्र हित को ध्यान में रखकर ही समाचार छापते हैं। वे पीत पत्रकारिता से बचते हैं। वे चरित्रहनन वाली पत्रकारिता से बचते हैं।

उपसंहार-समाचार-पत्र मात्र घटनाओं का विवरण नहीं है, समीक्षण और चिन्तन भी है। वे लोकमत को प्रभावित करते हैं। अतएव समाचार-पत्रों को हमेशा लोकहित की भावना से काम करना चाहिये। विश्वसनीय समाचार देने चाहिये तथा उत्तेजक समाचार से बचना चाहिये। समाचार-पत्रों को सदैव देश-हित एवं लोक-हित की भावना से काम करना चाहिये।

2. राष्ट्र निर्माण में छात्रों का योगदान
(म. प्र. 2011, 15)

रूपरेखा-

  1. भूमिका,
  2. आधुनिक भारत में नव-निर्माण की विभिन्न दशाएँ और उनमें विद्यार्थियों का योग,
  3. उनका विवेकपूर्ण सहयोग,
  4. सहयोग से लाभ,
  5. उपसंहार।

सैकड़ों वर्षों की परतन्त्रता के बाद हमारा देश स्वतन्त्र हुआ। पराधीनता की स्थिति में भारतवासियों को स्वेच्छापूर्वक अपनी उन्नति करने का अवसर प्राप्त नहीं था। विदेशी सरकार के दबाव के कारण भारतीय अपनी योजना के अनुसार कार्य नहीं कर पाते थे। देश में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप में सरकार का दबाव अवश्य बना रहता था। उस समय विद्यार्थियों का योग केवल उत्कृष्ट अधिकारी बनकर शासन को दृढ़ बनाये रखना था। आज की बदलती हुई परिस्थितियों में किसी भी देश का भविष्य उस देश के विद्यार्थियों के ऊपर निर्भर है। विद्यार्थी वर्ग ही एक ऐसा वर्ग है जो हर क्षेत्र में पहुँच सकता है। भारत का नव-निर्माण विद्यार्थियों के उचित और पूर्ण सहयोग के बिना सफलतापूर्वक पूर्ण नहीं हो सकता। इस देश के नव-निर्माण में विद्यार्थियों का योगदान आवश्यक है।

मानव अपनी आवश्यक सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए उसी की खोज में लगा रहता है। वर्तमान समय वैज्ञानिक तथा पूँजीवादी युग के नाम से जाना जाता है। भारत में वैज्ञानिक तथा आर्थिक उन्नति अत्यन्त आवश्यक है। भारत में प्राकृतिक साधन तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, पर वैज्ञानिक दोनों ही क्षेत्रों में पिछड़े हुए हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश में नव-निर्माण का कार्य आरम्भ हो गया है। पर इसकी अन्तिम सफलता विद्यार्थी वर्ग पर निर्भर करती है, विद्यार्थी को पूरी लगन व श्रद्धा के साथ देश के नव-निर्माण का कार्य करना होगा, तभी देश उन्नति की ओर अग्रसर होगा। वर्तमान समय में कारखानों का निर्माण हो रहा है। विद्युत् शक्ति का उत्पादन हो रहा है। कृषि, व्यवसाय, यातायात तथा वैज्ञानिक अनुसन्धान स्थापित करने के लिए अनेक योजनाएँ बनायी जा रही हैं, पर इन सबके बाद इसकी अन्तिम सफलता विद्यार्थी वर्ग पर ही निर्भर है।

सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में भी परिवर्तन के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। समाज में कुछ दुर्गुण हैं। उन्हें दूर करना अत्यन्त आवश्यक है, जिससे समाज के ढाँचे को बिगड़ने से बचाया जा सके। कोई भी सुधार अन्धानुकरण के आधार पर नहीं होना चाहिए। सुधारों के भावी परिणामों को दृष्टि में रखकर बढ़ना आवश्यक है। भारतीय धर्म तथा संस्कृति की मूल विशेषताओं को ध्यान में रखकर उपयोगी सुधार होना चाहिए। इन सभी का अन्तिम परिणाम तो विद्यार्थी वर्ग को पूर्णतया भोगना पड़ेगा। अत: उन्हें बुद्धि से कार्य करना चाहिए। विद्यार्थी वर्ग ही सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में क्रान्ति ला सकते हैं।

संसार की राजनैतिक मान्यताएँ बदल रही हैं। प्रजातान्त्रिक भावना का विकास हो रहा है। व्यक्तिवादी दृष्टिकोण बदलता जा रहा है। एक पक्ष साम्यवादी विचारधारा का है, जिसमें व्यक्ति नहीं राष्ट्र सर्वोपरि है। सारा विश्व इन्हीं विचारधाराओं से प्रभावित है। आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज का विद्यार्थी और कल का नागरिक अपने देश की परिस्थितियों के अनुकूल राजनैतिक विचारों को अपनाये। उसका दृष्टिकोण समन्वयवादी होना चाहिए, जिसमें किसी विचारधारा का बहिष्कार केवल इसलिए न हो कि वह पुरानी है अथवा किसी विचारधारा को केवल इसलिए न स्वीकार किया जाय कि वह नई है।

संसार की राजनीति इतनी तीव्रता से गतिशील है कि यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि कौन-सी बात सही है, इस उलझन की स्थिति से निकलने के लिए विवेकपूर्ण निर्णय की आवश्यकता है। आज विद्यार्थी पर बड़ा उत्तरदायित्व है कि वह अपने विवेक से सही व गलत का निर्णय करे और देश के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयत्नशील हो। भारत एक ऐसा देश है जहाँ जनसंख्या का बड़ा भाग गाँव में रहता है। गाँव के विकास के बिना भारत के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज के नवयुवक पर सबसे बड़ा उत्तरदायित्व गाँवों के विकास का है।

इसके लिए उन्हें शहर के विलासितापूर्ण जीवन को छोड़कर ग्रामीण अंचल में जाना होगा, उनको आधुनिक विचारधारा एवं सहकारिता की भावना का प्रचार करना होगा। हमारे गाँवों को अन्धविश्वास और अवैज्ञानिक दृष्टिकोण से मुक्त करना होगा। उन्हें प्रगतिशील बनाना होगा।

आज के विद्यार्थियों की पीढ़ी के हाथों में कल के देश की बागडोर आने वाली है, उन्हीं में से राजनीतिक नेता होंगे, अधिकारी होंगे, उद्योगपति होंगे और किसान, मजदूर भी होंगे। देश उनसे यह अपेक्षा करता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वे नये उत्साह और नई विचारधारा के साथ प्रवेश करेंगे। देश को नई दिशा प्रदान करेंगे। सरकार ने देश के नवनिर्माण के लिए अनेक योजनाएँ बनाई हैं, उन कागजी योजनाओं का मूल्य नहीं यदि उनको पूरा जन-सहयोग न मिले। गाँवों की पिछड़ी जनता से अधिक आशाएँ नहीं की जा सकती। इन योजनाओं की सफलता के लिए देश की निगाहें विद्यार्थियों पर टिक जाती हैं। विद्यार्थी वर्ग यदि विद्यार्जन के साथ-ही-साथ देश की प्रगति की दिशा में नहीं सोचता तो यह उसका अनुत्तरदायित्वपूर्ण कार्य ही कहा जायेगा।

3. साहित्य और समाज (साहित्य का महत्व)
(म. प्र. 2009, 15)

“अन्धकार है, वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है।
मुर्दा है वह देश, जहाँ साहित्य नहीं है।”

वस्तुत: साहित्य राष्ट्र की, समाज की जीवनशक्ति की पहचान होता है। साहित्य के बिना राष्ट्र और समाज अज्ञानता के अन्धकार में मुर्दा बनकर जीवित रहते हैं।

साहित्य क्या है? इस पर विचार करें तो ज्ञात होता है कि साहित्य रमणीय शब्द-अर्थों से गुम्फित ‘भावों की माला’ है, जिसमें सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् तीनों का समन्वय होता है। आचार्य जगन्नाथ ने साहित्य को परिभाषित करते हुए लिखा है— रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’, अर्थात् रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द एवं अर्थों के साहित्य को ‘साहित्य’ कहते हैं।

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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुसार साहित्य समाज का दर्पण है। समाज का सृजन करता है। इस प्रकार साहित्य समाज की विभिन्न प्रवृत्तियों की विवेचना करता है। उन्हें सुरक्षित रखता है। समाज से परे साहित्य और साहित्यकार का अस्तित्व नहीं होता। अतः समाज और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं।

“ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।” अर्थात् साहित्य में ज्ञान-विज्ञान संचित रहता है। इसका सेवन कर मनुष्य महान् बनता है। भर्तृहरि के अनुसार—“यदि मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से रहित हो तो वह बिना पूंछ और सींग के पशु है। ”

समाज की घटनाओं के आधार पर साहित्य का निर्माण होता है-साहित्यकार कल्पना का मिश्रण कर समाज का मार्ग-दर्शन करता है। शिवि, दधीचि, हरिशचन्द्र, रूसो, गाँधी के जीवन से संबंधित घटनाएँ ऐसा ही आदर्श समाज के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। उससे समाज के मस्तिष्क में चिन्तन की दिशा में मोड़ उत्पन्न हो जाता है। समाज की त्रुटियों का निराकरण होता है। समाज के दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं। सद्गुणों का विकास होता है। इस प्रकार साहित्य समाज सुधार का साधन बनता है।

साहित्य और समाज में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है- साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है और साहित्य की रचना साहित्यकार समाज में रहकर ही करता है। वह समाज में जो कुछ देखता है तथा महसूस करता है, उसी को साहित्य में वाणी देता हैं। किसी समाज के बारे में जानना हो, उसकी सभ्यता व संस्कृति से परिचित होना हो तो आपको उस समाज के साहित्य से परिचित होना होगा, उसके साहित्य रूपी आइने में झांकना होगा।

समाज अपने अनुरूप साहित्य को बदलता है तो साहित्य समाज को बदलने का प्रयास करता है। साहित्य मनुष्य को गतिशीलता प्रदान करता है। वह अंधविश्वासों, रूढ़ियों एवं सड़ी-गली मानसिकता को दूर कर समाज को नयी रोशनी प्रदान करता है। यदि फ्रांस में रूसो का, रूस में मार्क्स का और भारत में गाँधी, तिलक,प्रेमचन्द आदि का साहित्य नहीं होता तो इन देशों में क्रान्तियाँ नहीं हुई होती और सम्भवतः इनका हाल बद्तर होता।

साहित्य और समाज में घना सम्बन्ध है-यह तथ्य सूचित करता है कि साहित्य समाज के लिए तो महत्वपूर्ण है ही व्यक्ति, राष्ट्र सबके लिए महत्वपूर्ण है। साहित्य राष्ट्र की या जाति की पहचान है। वाल्मीकि, कालिदापा, सूर, तुलसी, प्रसाद, निराला आदि की रचनाओं ने विश्व में भारत का सिर ऊँचा किया है तथा उसे एक विशिष्ट पहचान दी है।

साहित्य मस्तिष्क का भोजन है-अपने मस्तिष्क को तरोताजा रखने के लिए साहित्य का अध्ययन बहुत आवश्यक है। माना कि यह विज्ञान का युग है, किन्तु विज्ञान मनुष्य को शक्तिशाली बनाकर बाघ से भी भयंकर बना सकता है किन्तु प्रेम, दया, सेवा, उपकार जैसे मानवीय गुणों का संचार साहित्य ही कर सकता है, जिसके सामने सारी भौतिक समृद्धि तुच्छ है, इसलिए पाश्चात्य विद्वान कार्लाईल ने साहित्य की सर्वोपरि महत्ता को स्वीकार करते हुए लिखा है-“ मैं ब्रिटिश साम्राज्य छोड़ सकता हूँ, पर शेक्सपियर की रचना को नहीं छोड़ सकता।” यह है साहित्य की महत्ता। आज यूनानी साम्राज्य कहाँ है,पर यूनानी महाकवि होमर की वाणी आज भी विद्यमान है। प्लेटो और अरस्तू के साहित्य आज भी लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं।

वस्तुतः साहित्य बहुत ही महत्वपूर्ण वस्तु है। अच्छे साहित्य के बिना समाज अधूरा है। अतः समाज को चाहिए कि वह अच्छे साहित्य एवं साहित्यकारों को सम्मान दे, प्रेरित करे। आजकल गन्दे किस्म के साहित्य बहुत पढ़े जाने लगे हैं। जासूसी उपन्यास तथा गन्दे साहित्य समाज के मस्तिष्क को विकृत बना रहे हैं, इनसे सावधान रहना तथा स्वस्थ साहित्य का निर्माण एवं अध्ययन करना हम सबका कर्त्तव्य होना चाहिए।

4. कम्प्यूटर आज की आवश्यकता
(म. प्र. 2009, 13)

प्रस्तावना-विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटर अपने प्रभाव की वृद्धि कर रहा है। आज इसकी उपयोगिता भी बढ़ रही है। आज देश के अनेक क्षेत्रों में, जैसे-बैंक, उद्योग, अन्य प्रतिष्ठानों में इसका प्रयोग होने लगा है।

कम्प्यूटर का महत्व-वस्तुतः कम्प्यूटर एक यांत्रिक मस्तिष्क का रूपात्मक योग है। यह एक ऐसा गुणात्मक घनत्व है जो शीघ्र गति से, कम से कम समय में त्रुटिहीन गणना करता है। मनुष्य सदा से गणितीय हल करने में अपने मस्तिष्क का प्रयोग करता रहा है। इस कार्य के लिए सबसे पहले पहले किया जाना वाला यन्त्र ‘अबेकस’ (Abacus).प्रथम साधन था। आज के वैज्ञानिक युग में अनेक प्रकार के गणना यन्त्र बना लिए गये हैं, परन्तु इन सबसे अधिक तीव्र शुद्ध उपयोगी गणना करने वाला यन्त्र कम्प्यूटर है। यह कम्प्यूटर लम्बी गणना करके उसके परिणामों को स्पष्ट कर देता था। कम्प्यूटर स्वयं गणना करके जटिल समस्याओं को मिनटों में हल कर देता है। कम्प्यूटर की गणना के लिए विशेष भाषा को तैयार किया जाता है। निर्देशों और सूचनाओं को कम्प्यूटर का प्रोग्राम कहा जाता है।

कम्प्यूटर का उपयोग-इक्कीसवीं शताब्दी कम्प्यूटर का युग कहलायेगा। आज इसकी उपयोगिता बढ़ गयी है। हजारों मील दूर की सूचनाएँ इससे ज्ञात हो जाती है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में इसका उपयोग हो रहा है।

  1. बैंकिंग के क्षेत्र में भारतीय बैंकों के बड़े कार्यालयों में खातों का हिसाब-किताब रखने के लिए इसका प्रयोग प्रारम्भ हो चुका है। कई राष्ट्रीयकृत बैंकों ने नयी चुम्बकीय संख्याओं वाली नई चेक बुक जारी की है। यूरोप तो कई में घर निजी कम्प्यूटर को अन्य कम्प्यूटर के साथ जोड़कर लेन-देन का कार्य किया जाता है।
  2. सूचना व समाचार प्रेषण के क्षेत्र में-कम्प्यूटर नेटवर्क द्वारा देश के बड़े नगरों को एक-दूसरे से जोड़ने का कार्य किया जाता है।
  3. प्रकाशन के क्षेत्र में पुस्तकों और समाचार-पत्रों के प्रकाशन में कम्प्यूटर का महत्वपूर्ण योगदान है। अब तो समाचार-पत्रों के सम्पादकीय विभाग में एक ओर कम्प्यूटर के मैटर भर जायेगा। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक प्रिन्टर शीघ्र ही मुद्रित सामग्री तैयार कर देंगे।
  4. डिजाइनिंग के क्षेत्र में-कम्प्यूटर के माध्यम से भवनों, मोटर, कारों, वायुयानों आदि के डिजाइन तैयार करने में कम्प्यूटर ग्राफिक का प्रयोग किया जा रहा है। वास्तुशिल्पी अपनी डिजाइन कम्प्यूटर के स्क्रीन पर तैयार करते हैं।
  5. कला के क्षेत्र में अब कम्प्यूटर कलाकार तथा चित्रकार का सहायक बन गया है। कलाकार कम्प्यूटर के सामने बैठकर अपने नियोजित प्रोग्राम के अनुसार स्क्रीन पर चित्र निर्मित करता है। वास्तविक रंगों के साथ प्रिन्ट छप जाता है।
  6. वैज्ञानिक खोज के क्षेत्र में विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटर ने एक नई क्रान्ति ला दी है। अन्तरिक्ष के व्यापक चित्र अब कम्प्यूटर द्वारा उतारे जाते हैं। चित्रों का विश्लेषण भी कम्प्यूटर द्वारा ही किया जाता है। आधुनिक वेधशालाओं के लिए कम्प्यूटर की आवश्यकता है। विज्ञान का कोई भी क्षेत्र इससे अलग नहीं है।
  7. युद्ध के क्षेत्र में अमेरिका में पहला इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर एटम बम से संबंधित गणनाएँ करने के लिए था। जर्मन के गुप्त संदेश जानने के लिए अंग्रेजों ने कोलोसम नामक कम्प्यूटर का प्रयोग किया।

जीवन का हर क्षेत्र कम्प्यूटर की परिधि में आ गया है। वायुयान या रेल यात्रा के आरक्षण की व्यवस्था कम्प्यूटर द्वारा की जाती है। रेलवे तथा बस का टाइम भी आपको कम्प्यूटर ही बतलायेगा। इसके अतिरिक्त चिकित्सा के क्षेत्र में, परीक्षाफल निर्माण में, मौसम सम्बन्धी जानकारी में, चुनाव कार्य में कम्प्यूटर का महत्वपूर्ण योगदान है।

दैनिक जीवन में कम्प्यूटर क्षमताएँ एवं सम्भावनाएँ और बढ़ गई है। छात्रों के लिए प्रिंटिंग के बाद कम्प्यूटर ही सबसे बड़ा आविष्कार है। इससे छात्रों व आध्यापकों का समय बचता है। भारत में भूतपूर्व युवा प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गाँधी का कम्प्यूटर के प्रति अत्यधिक रुज्ञान था। भारत ने कम्प्यूटर टेक्नालॉजी प्राप्त करने के लिए अमेरिका की ओर दोस्ताना कदम बढ़ाये है। अब सरकार ने कम्प्यूटर पर कर घटाया है ताकि भारत में भी विदेशी टेक्नालॉजी वाली कम्पनियाँ स्थापित हो सकें। भारत इस प्रकार के अनेक विषयों पर विदेशों से सौदा कर रहा है।

कम्प्यूटर और मानव मस्तिष्क-कम्प्यूटर एक मानव यन्त्र है। इसमें न मानवीय संवेदनाएँ हैं और न रुचियां, परन्तु यह मानव द्वारा निर्देशित ऐसा यन्त्र है जो स्वयं के निर्णय लेने में असमर्थ है। वास्तव में यह मानव मस्तिष्क की रचना है जो कम समय में समस्याओं का हल कर सकता है।

6. उपसंहार-कम्प्यूटर टेक्नालॉजी भारत के आर्थिक जगत में क्रांति ला सकती है। यह प्रयोग समाजवादी आदर्शों के अनुसार किया जाय। अभी तक भारतीय पूँजीवाद तब का प्रत्येक तकनीक का प्रयोग केवल अपने काम के लिए करता रहा है। अत: आज साधारण जन इसे जानना चाहता है। यद्यपि आज का विश्व कम्प्यूटर के युग में साँस ले रहा है। कम्प्यूटर पर आज का विश्व निर्भर है। कम्प्यूटर कम समय में सब समस्याओं को हल कर सकता है। वह दिन दूर नहीं जब कम्प्यूटर सबके हाथ होगा।

5. जीवन में खेलों का महत्व
(म. प्र. 2012, 15)

मानव-जीवन का प्रमुख उद्देश्य व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। सर्वांगीण विकास का तात्पर्य है कि व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, भावात्मक तथा नैतिक दृष्टि से पूरी तरह समर्थ हो। शारीरिक विकास हर मनुष्य की प्रथम आवश्यकता है। कहा भी गया है

“A healthy mind is in a healthy body.”

स्वस्थ शरीर के साथ ही स्वस्थ मनोरंजन भी मनुष्य के लिए आवश्यक है। ‘खेल’ ऐसी क्रिया है जिससे न केवल शरीर का विकास होता है अपितु मनोरंजन भी प्राप्त होता है। यही कारण है कि सभ्यता के आदिकाल से ही, मानव समाज में खेलों का प्रचलन रहा है। आज से पचास हजार वर्ष पूर्व की मानव सभ्यता को दर्शाने वाले भित्ति-चित्र प्राचीन गुफाओं में देखने को मिलते हैं। उन आड़ी-तिरछी रेखाओं से बने चित्रों में भी मनुष्यों को खेल खेलते दिखाया गया है। मनुष्य का प्राचीनतम खेल जानवरों का शिकार करना अथवा मछली मारना था। इससे मनोरंजन के साथ ही भोजन की समस्या भी हल होती थी।

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सभ्यता के विकास के साथ शारीरिक क्षमता को परखने के लिए मल्ल-विद्या अर्थात् कुश्ती, तीरंदाजी, घुड़दौड़ आदि खेल प्रारम्भ हुए। प्राचीन रोम के स्टेडियम में एक बड़ा भयंकर खेल खेला जाता था, इसमें मनुष्य को भूखे शेर के पिंजड़े में छोड़ दिया जाता था। भूखे शेर से बचने के लिए वह मनुष्य भागता था, चीखता चिल्लाता था और लोग तालियाँ बजा-बजाकर अपना मनोरंजन करते थे। इसी प्रकार फ्रांस में किसी मनुष्य की वीरता के परीक्षण के लिए उसे, शराब में मदमस्त बैल के साथ, लड़ने छोड़ दिया जाता था। इस खेल को ‘बुल फाइटिंग’कहते थे।

भारत का प्राचीन इतिहास भी बतलाता है कि यहाँ भी महाभारत काल में कुछ ऐसे भी खेल प्रचलित थे जो कमरे के भीतर खेले जाते थे, जैसे–चौपड़, शतरंज, द्यूत-क्रीड़ा आदि। इसमें पासे के आधार पर हार-जीत का निर्णय होता था। कुश्ती, तीरंदाजी, तलवारबाजी तथा कंदूक-क्रीड़ा ऐसे ही प्राचीन भारतीय खेल थे।

आजकल खेलों को दो भागों में बाँटा जाता है-घर के भीतर खेले जाने वाले खेल, जैसे-ताश, कैरम, शतरंज, टेबल-टेनिस, लूडो, बिलियर्ड, आदि। दूसरे प्रकार के वे खेल हैं जो मैदान में खेले जाते हैं, जैसे हॉकी, क्रिकेट, फुटबाल, बेसबाल, बास्केटबाल आदि।

भारतीय खेलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें बिना किसी खर्च के खेला जा सकता है। इन खेलों में कबड्डी, खो-खो आदि प्रसिद्ध हैं। प्रसन्नता की बात है कि कबड्डी व खो-खो को अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त होने लगी है। खेलों के महत्त्व पर अब सभी देशों की सरकारें ध्यान दे रही हैं। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रति चार वर्षों में ओलम्पिक खेलों का आयोजन होता है। एशिया महाद्वीपीय स्तर पर सर्वप्रथम 4 मार्च, 1951 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में एशियाड खेलों को प्रारम्भ किया गया। इसमें 491 प्रतियोगियों ने भाग लिया तथा भारत ने सबसे अधिक स्वर्ण पदक प्राप्त किये। इसके बाद मनीला, टोक्यो, बैंकाक, तेहरान आदि में एशियाड खेलों का आयोजन हुआ। सन् 1982 में पुन: दिल्ली में एशियाड का आयोजन किया गया जिसमें चीन ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।

आजकल खेलों को शिक्षा का अनिवार्य अंग मान लिया गया है। दूरदर्शन के बढ़ते हुए प्रभाव ने भी खेलों के प्रति बच्चों के रुझान को विकसित किया है। आप कहीं भी निकल जाइये जहाँ भी खुली जगह मिलेगी बालक व किशोर क्रिकेट, फुटबाल, हॉकी आदि खेलते नजर आयेंगे। यह एक शुभ लक्षण है, क्योंकि खेलों से शारीरिक विकास के साथ ही अन्य लाभ भी हैं, जैसे-स्वस्थ मनोरंजन, समय का सदुपयोग व भाई-चारे की भावना में वृद्धि, मिल-जुलकर काम करने की आदत का निर्माण, साहस, वीरता, सहनशीलता आदि नैतिक गुणों का विकास होता है।

खेलों के विकास के लिए भारत शासन ने एक खेल मन्त्रालय ही स्थापित कर दिया है। यह मन्त्रालय क्षेत्रीय, प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करता है। उत्तम खिलाड़ियों का चुनाव करके उन्हें प्रशिक्षित करने की व्यवस्था करता है और खेल की उत्तम सामग्री के निर्माण के लिए अनुदान व ऋण प्रदान कर प्रोत्साहित करता है।

मध्य प्रदेश शासन ने भी खेलों के विकास के लिए प्रत्येक संभाग में ‘खेल संगम केन्द्र’ (Sports Complex) स्थापित किये हैं। इन केन्द्रों में प्रतिभाशाली खिलाड़ी छात्रों के लिए छात्रावास बनाये जायेंगे, वहाँ स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उन्हें विभिन्न खेलों में प्रशिक्षित किया जायेगा। आशा है शासन को इस दिशा में पर्याप्त जन-सहयोग मिला तो अवश्य ही 21 वीं शताब्दी में हमारा देश विश्व स्तर की किसी भी खेल प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करेगा।

6. प्रदूषण की समस्या
(म. प्र. 2010,11, 15)

गंगा मैली हो गयी। आकाश विषैली धूलों और धुओं से भर उठा है। वायुमण्डल विषाक्त हो उठा है। प्रदूषण की समस्या इतनी जटिल हो गयी है कि लोगों का जीना दूभर हो गया है।

यह प्रदूषण क्या है? जिसने लोगों का जीना हराम कर दिया है। प्रदूषण जल, वायु तथा भूमि के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में होने वाला कोई भी अवांछनीय परिवर्तन है, जो विकृति को जन्म देता है। प्रदूषण वे सभी पदार्थ या तत्त्व हैं, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वायुमण्डल, जलमण्डल तथा पृथ्वीमण्डल को दूषित बनाकर, प्राणीमात्र के जीवन एवं संसाधनों पर बुरा प्रभाव डालते हैं।

प्रदूषण की समस्या दिन-प्रतिदिन भयावह बनती जा रही है। शुद्ध जल और शुद्ध हवा का अभाव हो गया है। जिससे प्रतिवर्ष हजारों लोग मौत के मुँह में समाते जा रहे हैं। भोपाल गैसकाण्ड, नागासाकी, हिरोशिमा पर द्वितीय विश्व-युद्ध में गिराये गये बमों के द्वारा जो विनाश-लीला हुई, उसकी याद दिलाता है। कैंसर जैसे असाध्य रोगों का बढ़ता प्रकोप प्रदूषण की समस्या का ही दुष्परिणाम है।

इस समस्या के कारणों पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि अणु-परमाणु विस्फोटों से फैलने वाली धूलों से वायुमण्डल और पृथ्वीमण्डल सभी विषाक्त हो रहे हैं जिससे रक्त कैंसर होता है। आज सम्पूर्ण विश्व तेजी से औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप पग-पग पर, गाँव-गाँव, नगर-नगर में कल-कारखाने स्थापित होते जा रहे हैं। इन कारखानों से निकलने वाले सड़े-गले पदार्थ एवं गैसें, सभी मिलकर प्रदूषण की समस्या को भयावह बनाते जा रहे हैं। नदी, सरोवर, वायुमण्डल सभी दूषित होते जा रहे हैं। वृक्षों और वनों को काटकर बड़े-बड़े नगर बसाये जा रहे हैं, भवन और बाँध बनाये जा रहे हैं। ये सब प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। प्रदूषण के भेद निम्नलिखित हैं-

  1. जल प्रदूषण
  2. वायु प्रदूषण
  3. ध्वनि प्रदूषण
  4. मृदा प्रदूषण

कारण है, तो समस्या का समाधान भी है। सर्वप्रथम भारत सहित विकासशील राष्ट्रों को यह विचार करना होगा कि उसे कैसा विकास चाहिये। पाश्चात्य देशों का अन्धानुकरण छोड़कर इन देशों को अपने प्राकृतिक पर्यावरण तथा आवश्यकता के अनुकूल कल-कारखानों को लगाना चाहिये। कारखाने स्थापित करने से पूर्व उनसे निकलने वाली हानिकारक धूल-गैसों को उचित दिशा व स्थानों की ओर स्थानान्तरित करने के लिए उपाय कर लिये जाने चाहिये। परमाणु परीक्षणों पर रोक लगायी जाये। वनों की निर्ममतापूर्वक कटायी न की जाये। जितने वृक्ष काटे जायें, उनसे अधिक लगाये जायें। नगरों की बढ़ती जनसंख्या को रोका जाये।

समय रहते यदि प्रदूषण की समस्या का निराकरण नहीं किया गया तो भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व का विनाश निश्चित है। भोपाल गैसकाण्ड एक बड़ी चेतावनी है। सभी लोगों और देशों को चाहिये कि मानव जाति को सर्वनाश से बचाने के लिए पर्यावरण को स्वच्छ बनायें तथा ऐसा कार्य न करें जिससे प्रदूषण की समस्या बढ़े और पावन गंगा भी मैली हो जाये।

7. विज्ञान के नये आविष्कार
(म. प्र. 2010,11, 15)

प्रस्तावना-मानव ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नये-नये आविष्कार किये हैं। इस शताब्दी में विज्ञान ने भारी प्रगति की है और संसार का नक्शा ही बदल दिया है।

विज्ञान ने हमारी बड़ी-से-बड़ी और छोटी-से-छोटी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति की है। उसने मानव जीवन में अधिक आनन्द बढ़ाया है। अंधे को आँखें, बहरे को कान, पंगु को पैर दिये हैं और मनुष्य को पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सुविधा दी है। मनुष्य जल पर भी चल सकता है। वैज्ञानिक उपकरणों के सहारे आज हम सैकड़ों मील दूर बैठे हुए अपने किसी मित्र से बातचीत कर सकते हैं।

  1. मनोरंजन के क्षेत्र में मनोरंजन की आधुनिक वस्तुएँ विज्ञान की ही देन हैं। सिनेमा, टेलीविजन, टेपरिकार्डर, रेडियो आदि के माध्यम से हम मनोरंजनार्थ प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री देख-सुन सकते हैं। हमारी शिक्षा, संस्कृति, आचार-विचार पर भी इसका प्रभाव पड़ा है।
  2. चिकित्सा के क्षेत्र में स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में भी विज्ञान ने मानव को बड़ा लाभ पहुँचाया है। खतरनाक रोगों पर काबू पा लिया गया है। कई प्रकार के टीकों का आविष्कार हो चुका है। एक्स रे द्वारा तो शरीर का भीतरी भाग तक अच्छी तरह से देखा जा सकता है, शल्य चिकित्सा का भी अच्छा विकास हुआ है। अब तो विज्ञान मौत को भी जीतने का प्रयास कर रहा है।
  3. कृषि के क्षेत्र में कृषि और उद्योग-धन्धों के विकास में भी विज्ञान ने हमारी बड़ी मदद की है। उसने नलकूप, ट्रैक्टर, वैज्ञानिक खाद आदि ऐसे अनेक उपकरण निर्मित किये हैं जिनके कारण उत्पादन अनेक गुना बढ़ गया है। ट्रैक्टर, सिंचाई के पम्प, बीज बोने से लेकर काटने और साफ करने तक के यंत्र, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक दवाईयाँ आदि विज्ञान के कारण सम्भव हो सकी हैं।
  4. आवागमन के क्षेत्र में आज संसार की दूरी कम हो गयी है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना साकार हुई है। आवागमन के द्रुतगामी साधनों के कारण आज मनुष्य दिल्ली में भोजन करता है, मुम्बई जाकर पानी पीता है और कोलकाता जाकर शयन करता है। इंग्लैण्ड, अमेरिका, रूस आदि देशों की यात्रा अब स्वप्न नहीं रह गयी है। यात्रा द्रुत, सुगम, सुखद और सुरक्षित हो गयी है।
  5. अन्य क्षेत्रों में विज्ञान ने मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। गैस का चूल्हा, विद्युत् चूल्हा, रेफ्रीजरेटर, बिजली का पंखा आदि कई वस्तुएँ हमारे दैनिक जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं। नई-नई मशीनों का चलन हो गया है। .
  6. अन्तरिक्ष में विज्ञान-वैज्ञानिकों ने आर्यभट्ट, भास्कर, रोहिणी, इन्सैट के उपग्रह अन्तरिक्ष में स्थापित कर अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित कर दी है। मानव चन्द्र यात्रा कर आया है अब मंगल और दूरस्थ ग्रहों की बारी है।

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अभिशाप-विज्ञान ने मनुष्य को अनेक प्रकार से लाभान्वित किया है, वहीं कई प्रकार से अहित भी किया है। अनेक लाभकारी आविष्कारों के साथ उसने भयंकर-से-भयंकर शस्त्रों का निर्माण किया है। ये अस्त्र शस्त्र इतने घातक होते हैं कि देखते-ही-देखते लाखों व्यक्तियों को मौत के घाट उतार सकते हैं। हिरोशिमा और नागासाकी में अणु बम का दुष्परिणाम हम देख ही चुके हैं। अब तो अणु बम से भी अधिक भयंकर, अधिक विनाशकारी शस्त्रास्त्र बन चुके हैं, जिनका कि अभी हाल ही में हुए युद्ध में इराक तथा बहुराष्ट्रीय सेनाओं ने डटकर प्रयोग किया था। इस प्रकार इन अस्त्रों के कारण मानवता के लिए एक जबरदस्त खतरा पैदा हो गया है।

विज्ञान ने बड़ी-बड़ी मशीनों और कारखानों के द्वारा उत्पादन अवश्य बढ़ाया है, लेकिन बेरोजगारी, स्पर्धा, शोषण, अस्वास्थ्य आदि की समस्याएँ भी पैदा की हैं। उद्योगों का बड़े पैमाने पर केन्द्रीयकरण हो गया है, समाज पूँजीपति और श्रमिक वर्ग में बँट गया है। इन्हीं कारखानों ने बड़े-बड़े देशों में स्पर्धा की भावना पैदा की जिसके परिणामस्वरूप युद्ध होते रहते हैं।

उत्पादन वृद्धि के साथ बेकारी भी बढ़ रही है। भोपाल में दिसम्बर 1984 में यूनियन कार्बाइड कारखाने में गैस रिसने के कारण 25000 से अधिक लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। विज्ञान के कारण समाज में भौतिकवाद और विलासिता की भावना भी बढ़ी है। आज का मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे पागल है। जितनी सुविधाएँ बढ़ रही हैं मनुष्य उतना ही विलासी बनता जा रहा है। विलासिता के कारण शक्ति का क्षय होता जा रहा है। आज मनुष्य शारीरिक दृष्टि से पहले की अपेक्षा बहुत कमजोर हो गया है। विभिन्न प्रकार के बढ़ते हुए प्रदूषण ने भी मानव जीवन को बहुत प्रभावित किया है।

उपसंहार-विज्ञान की उपलब्धियाँ एक ओर आनन्दकारी हैं, तो दूसरी ओर विध्वंसकारी भी। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी प्रवृत्तियों का परिमार्जन करें और विज्ञान द्वारा प्रदत्त वस्तुओं का उपयोग मानवता की रक्षा, खुशहाली और कल्याण के लिए करें। विज्ञान, विनाश का नहीं सृजन का साधन बनाया जाना चाहिए। विज्ञान दोषी नहीं, दोषी है मनुष्य जो इसका दुरुपयोग करता है।

18. परमाणु शक्ति और मानव जीवन (Imp.)

प्रस्तावना-आज विज्ञान अपनी उन्नति के शिखर पर है। विज्ञान के क्षेत्र में अनेक आविष्कार हुए हैं उन सबमें परमाणु शक्ति का विशेष महत्त्व है। परमाणु शक्ति दो रूपों वाली है। इसका एक रूप जनजीवन के भयंकर संहार में लग सकता है। दूसरा रूप उनका शांतिमय उपयोग है जिसके द्वारा विश्व-मानव का जीवन कल्याणमय बन सकता है। – भारत में परमाणु परीक्षण का विकास-18 मई, 1974 का वर्ष भारत की वैज्ञानिक प्रगति के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ माना जाएगा। यह वह पावन तिथि है जिसकी कल्पना डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने की थी, जिसके लिए प्रयत्नशील डॉ. साराभाई हुए, जिनका क्रियान्वयन डॉ. सेठना के तत्वावधान में हुआ। 18 मई, 1974 को भारत ने शांति कार्यों के लिए भूमिगत अणु विस्फोट करके सारे संसार के हृदय में विस्फोट कर दिया। इसके पश्चात् 11 एवं 13 मई, 1998 को पाँच और परमाणु परीक्षण किए गए, जिससे भारत विश्व के परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की पंक्ति में शामिल हो गया। सारा संसार भारत की इस वैज्ञानिक उपलब्धि से चकित रह गया है।

परमाणु शक्ति का दुष्परिणाम-विज्ञान की उन्नति के साथ-साथ विनाश की भयंकरता भी दिन प्रतिदिन बढ़ती गई। आज विश्व में यदि तृतीय युद्ध होता है तो वह परम्परागत अस्त्र-शस्त्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चलित शस्त्रों का प्रयोग होगा और जनजीवन का भयंकर विनाश होगा। द्वितीय महायुद्ध में जापान के युद्ध का अंत एक छोटे एटम बम से हुआ। आज तो उसकी तुलना में बहुत विशाल एवं भयंकर परमाणु बमों से भरे हवाई जहाज चक्कर काटते रहते हैं। परमाणु शक्ति से चलित प्रक्षेपास्त्रों के अड्डे निरंतर आक्रमण के लिये सजग रहते हैं। इस प्रकार परमाणु शक्ति का युद्ध के लिये उपयोग करने से भयंकर विनाश सम्भव है जिसकी कल्पना करना सम्भव नहीं है।

लाभ-हाइड्रोजन बम और कोबाल्ट बमों के रोमांचकारी परिणामों से भयभीत विश्व-मानव का विवेक आज परमाणु शक्ति के शांतिमय उपयोग की बात सोच रहा है। इस शक्ति का उपयोग मानव कल्याण के लिये होने पर विश्व का नक्शा ही बदल जाएगा। यह असीम शक्ति है। इसके द्वारा मानव बहुत उन्नति कर सकता है। परमाणु शक्ति का जीवन के विविध क्षेत्रों में शांतिमय उपयोग सम्भव है। आज संयुक्त राष्ट्र संघ भी इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि परमाणु शक्ति के शांतिमय उपयोग से मानव का कल्याण होगा और उसको समृद्धि प्राप्त होगी। अणु-परमाणु शक्ति महान् शक्ति है। परमाणु शक्ति के औंस भर ईंधन से 15 लाख टन कोयले की शक्ति प्राप्त की जा सकती है।

परमाणु शक्ति के विकास से निम्नलिखित लाभ हैं-

  1. वैज्ञानिकों का मत है कि यदि इसी रफ्तार से मानव प्राकृतिक ईंधन का प्रयोग करता रहा तो इन स्रोतों का कुछ समय बाद अंत आ जाएगा। ऐसी स्थिति में परमाणु शक्ति के द्वारा मानव, ईंधन की कमी पूरी करने में समर्थ होगा।
  2. परमाणु शक्ति से कम खर्च में सस्ती विद्युत् तैयार की जा रही है।
  3. इस शक्ति के द्वारा कम खर्च में पानी के जहाज एवं पनडुब्बियाँ चलाई जा रही हैं। फ्रांस, रूस और अमेरिका इस क्षेत्र में उन्नति कर रहे हैं। भविष्य में वायुयान, मोटरगाड़ियाँ और रेलें भी परमाणु शक्ति से चला करेंगी।
  4. परमाणु शक्ति का चिकित्सा के क्षेत्र में भी बड़ा उपयोग है। घातक रोगों के उपचार के लिए परमाणु शक्ति अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है। परमाणु ऊर्जा से प्राप्त विभिन्न प्रकार के रेडियो आइसोटोपों से शरीर के आन्तरिक विकारों का ज्ञान हो जाता है। रेडियो आइसोटोपों द्वारा ही कैंसर जैसे भयंकर रोग की चिकित्सा हो सकती है। रेडियो कैल्सियम द्वारा हड्डी की बढ़ोतरी की जानकारी हो जाती है।
  5. परमाणु शक्ति किसानों और पशुपालकों की भी सहायता करती है। रेडियो कोबाल्ट के टुकड़ों को खेत में गाड़ देने पर बहुत उत्तम और अधिक मात्रा में खाद्यान्न पैदा होता है। फसलों को नष्ट करने वाले कीटाणुओं का ज्ञान भी रेडियो आइसोटोपों द्वारा होता है। यदि शाक-सब्जी, अन्न, फल, दूध और मांस आदि पदार्थों पर कुछ क्षणों के लिये रेडियो आइसोटोप सक्रिय छोड़ दिये जाएँ तो वे कीटाणुरहित हो जायेंगी और बहुत समय तक खराब नहीं होंगी।
  6. कोबाल्ट से बने छोटे-छोटे एक्स-रे यंत्रों की सहायता से प्राचीन मूर्तियों की जाँच-पड़ताल की जा सकती है। उनका रचनाकाल जाना जा सकता है।
  7. परमाणु ऊर्जा से पॉली एथीलीन (पॉलीथीन) नामक नया प्लास्टिक भी बनाया गया है। अन्य रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी यह सहायक सिद्ध हुआ है।
  8. परमाणु ऊर्जा के द्वारा साइबेरिया के रेगिस्तान अब उपजाऊ मैदान बन चुके हैं। परमाणु शक्ति से बड़े-बड़े पहाड़ों को काटकर आवागमन के मार्ग बनाए गए हैं।

हानि इस प्रकार हम देखते हैं कि विश्व के अनेक देशों में परमाणु शक्ति का विनियोग मानव कल्याण के कार्यों में हो रहा है। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और भारत आदि अनेक देशों में परमाणु शक्ति के मानव हित में शांतिमय उपयोग किए जा रहे हैं।

गत वर्षों में अणुबमों और उद्जन बमों के जो परीक्षण हुए हैं उनसे यह बात स्पष्ट हो गई कि यदि अब कोई विश्व-युद्ध हुआ तो समस्त संसार खत्म हो जाएगा। अणुबम युद्ध दोनों पक्षों का ऐसा विनाश कर देगा कि विजेता और विजित में कोई अन्तर नहीं रहेगा। यह भी सम्भव है कि बड़े परमाणु युद्ध में अणु एवं हाइड्रोजन बमों के विस्फोट के फलस्वरूप समस्त मानव जाति ही नष्ट हो जाए। रेडियो सक्रियता का प्रभाव सभी जीवित प्राणियों पर अत्यन्त घातक होता है।

उपसंहार-परमाणु शक्ति अपने आपमें कोई संहारक शक्ति नहीं है। इसके शांतिमय उपयोग से मानव कल्याण होगा। अणुशक्ति से परिचालित राकेटों के द्वारा मनुष्य चन्द्रमा तथा पृथ्वी से दूर अन्य ग्रहों तक पहुँच सका है। यदि इसका रचनात्मक कार्यों में उपयोग किया जाये तो यह मानव जाति के लिये वरदान सिद्ध होगा।

9. इक्कीसवीं सदी का भारत
(म. प्र. 2013, 15)

प्रस्तावना-21 वीं सदी का भारत एक नवजात शिशु की भाँति कुण्ठाओं से रहित निरंतर वृद्धिगत एवं विकासशील राष्ट्र होगा। वह एक ऐसा वट वृक्ष होगा जिसकी जडें गहरी होंगी। वे गौरवशाली परम्पराओं के ग्रहण करती हुई नित्य नई शाखाओं को प्रस्फुटित करने में समर्थ होंगी। वह वट वृक्ष प्रत्येक पक्षी और पथिक को आश्रय एवं व्यवहार प्रदान करने वाले स्थायी स्रोत होगा।

21 वीं सदी में प्रवेश-20 वीं सदी नित्य नये उतार-चढ़ाव परिवर्तनों एवं सघर्षों से परिपूर्ण रही है। इसके पूर्वार्द्ध में दो विश्व युद्ध हुए जिसके कारण भगवान और विधान दोनों के प्रति जन- सामान्य की आस्थाएँ डगमगा गयी। इसी कालावधि में भारत का विभाजन एवं साम्प्रदायिक रक्त- रंजित नरसंहार हुआ। सत्य और अहिंसा के अवतार महात्मा गाँधी की नृशंस हत्या भी इस सदी ने देखी।

21 वीं सदी के कर्णधार नागरिक बीसवीं सदी की विषमताओं से विहीन एवं समस्त कुण्ठाओं पूर्वाग्रहों आदि से मुक्त होंगे। वे नव-भारत के निर्माण में प्राणप्रण से संलग्न हो जायेंगे। यह नई पीढ़ी प्रगति के पथ पर अतीत के सुफल बटोरेगी, वर्तमान के फूल बिखेरेगी तथा भविष्य के बीज बोती हुई निरंतर गतिमान रहेगी।

विज्ञान एवं कम्प्यूटर-पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तथा कम्प्यूटर के सहारे भारत को 21 वीं शताब्दी में ले जाने को निरंतर प्रयत्नशील थे। वे इसी मार्ग से 21 वीं सदी में प्रवेश करना-कराना चाहते थे। वस्तुत: तकनीकी उन्नति की माँग ही है हम ज्ञानेन्द्रियों की क्षमता में वृद्धि करने वाले उपकरणों का नित्य नया विकास करें।

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आध्यात्मिकता-हमारी परिकल्पना है कि 21 वीं सदी के भारत में मनीषी, संत, श्रेष्ठ वैज्ञानिक तथा शक्ति संपन्न राजपुरुष मानव होंगे। भारत की आत्मिक शक्ति नये रूप में प्रस्फुटित होगी और पूर्ण वेगं के साथ प्रवाहमान होगी। 21 वीं सदी के भारत के सम्मुख गौरवशाली परम्पराओं के वरदान के साथ परम्परागत समस्याओं के अभिशाप भी होंगे। सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक आदि सभी प्रकार की समस्यायें अपना समाधान नये सिरे से चाहेंगी। 21 वीं सदी के भारत में गाँधीवादी जीवन दर्शन कथनी की उपेक्षा करके, करनी का वरण कर चुका होगा। तब बापू के सुख स्वप्न को साकार करने वाला राम राज्य हमारा जीवनादर्श होगा। उनकी परम्पराएँ हमारे जीवन मूल्य होगी। तब राजनीति का धर्म होगा और धर्म की राजनीति होगी। प्रत्येक भारतवासी अपने गुण स्वभाव के अनुसार अपने जीवन का निर्माण करने के लिए स्वतंत्र होगा।

शिक्षा-दीक्षा-21 वीं सदी की शिक्षा नीति भारत को नया मानव प्रदान करेंगी। उस शिक्षा पद्धति के अंतर्गत बालक को भीड़ के अंग के रूप में नहीं, एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में शिक्षित-प्रशिक्षित होने के अवसर प्रदान किये जायेंगे। उसको न तो कोरा कागज समझा जायेगा जिसमें चाहे जो कुछ लिखा जा सके और न उसको एक खाली बर्तन ही समझा जायेगा जिसमें चाहे कुछ भी हो भर दिया जाये। उसको एक विकासशील पौधे की तरह विकसित होने के लिए उन्मुक्त एवं उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराया जायेगा। इसका निर्माण समर्पित शिक्षकों के हाथों में होगा। प्रत्येक स्तर पर रोजगार-परक शिक्षा की व्यवस्था होगी। 21 वीं सदी के भारत की शिक्षा नीति का लक्ष्य ऐसे नागरिकों का निर्माण करना होगा जो अपने परिवार, समाज, देश और उसकी मिट्टी से प्यार करें और अपने आपको भारतीय कहने में आत्मगौरव का अनुभव करें।

उपसंहार-इस प्रकार 21 वीं सदी का भारत सही अर्थों में भारतीय मानव का देश होगा। इनमें छुआछूत, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, राजा-रंक का यहाँ नाम भी नहीं होगा। ईश्वर 21 वीं सदी में भारत का स्वरूप हमारी कल्पना से भी अधिक समृद्ध एवं श्रेष्ठ हो।

निम्नलिखित विषय पर रूपरेखा लिखिए (म. प्र. 2015)

स्त्री शिक्षा

  1. प्रस्तावना
  2. शिक्षा का महत्व
  3. बालिका शिक्षा प्रयत्न
  4. बालिका शिक्षा के लक्ष्य तक पहुँचने में बाधाएँ
  5. बाधाओं का निराकरण
  6. उपसंहार।

MP Board Class 11th General Hindi Important Questions

The Bridge Builder Question Answer Class 10 English The Rainbow Workbook Chapter 18 MP Board

Class 10 English The Rainbow Workbook Chapter 18 The Bridge Builder Questions and Answers

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The Bridge Builder Class 10th Question Answer

The Bridge Builder Vocabulary

I. Use the following words in your sentences, vast, deep, wide, broad, big, tall
Answer:

  • Vast : Desert is a vast stretch of sand.
  • Deep : The well is deep.
  • Wide : The road is wide.
  • Broad : He has a broad mind.
  • Big : The shirt isn’t big enough.
  • Tall : The building is tall.

II. Use approriate adjectives before the words, ‘man’, ‘tide’, ‘stream’, ‘head’, ‘friend’.
Answer:
kind – man
high – tide
pure – stream
considerate – head
loyal – friend.

Listening Skill

See Workbook pages 149-150

A. On the basis of your listening to the above poem complete the following sentences:
(a) According to the poet, it is easy to live in this world if
(b) We should try to wipe by helping them.
(c) As a messenger of God we can
Answer:
a. you learn to smile
b. tears
c. bring joy and reduce the sufferings of this world.

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B. Pick out two pairs of rhyming words.
Answer:

  • live-give
  • shed-fed.

C. Pick out the words which mean.
(a) extreme suffering of mind and body.
(b) sorrowful
Answer:
(a) agony
(b) woeful.

Speaking Skill

Let the class be divided into seven groups. Each group should note down a line of the poem given below.

See Workbook pages 150-151

Now ask each other the questions based on the poem.

Question 1.
How do the clouds look?
Answer:
The clouds look black.

Question 2.
What do the spaniels’ do?
Answer:
They sleep.

Question 3.
Who peeps from the cobwebs?
Answer:
The spiders peep from the cobwebs.

Question 4.
Who went pale to bed last night?
Answer:
The sun went pale to bed last night.

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Question 5.
Where did the moon hide her head?
Answer:
The moon hid her head in halos.

Question 6.
Why does shepherd heave a sigh?
Answer:
Because it sees a rainbow spans the sky.

Reading Skill

Read the poem.

See Workbook pages 151-152

A. Now answer the following questions:

Question 1.
How are good people and bad people mixed up according to the poet?
Answer:
The poet mixed the good people and bad people by saying that the good are half bad while bad are half good.

Question 2.
Why does a happy man not feel fully happy?
Answer:
The swift flying years bring tears to everyone. So a happy man does not feel fully happy.

Question 3.
How shall we count the wealth of a rich man?
Answer:
We shall count the wealth of a rich man by knowing the state of his conscience and health.

Question 4.
According to the poet what are the two classes in which all persons are divided?
Answer:
The two classes of people are the people who lift and the people who lean.

Question 5.
Comment on the central idea of the poem- “Lifting and Leaning”.
Answer:
Lifting and leaning signify that one flies high while the other follows him.

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B. Use the following words both as nouns and as verbs in sentences of your own.
Answer:
Lift—The boy lifted (v) the box in the lift (n).
drove—He drove the cattle (v). This drove (n) was aimless
lean—I lean down to pick it up (v). He is a lean man(n).
stain—His shirt was stained with mud (v). The stain on his shirt was very deep (n).
wish—I wish him a good morning (v). His wishes are great for me (n)

Writing Skill

Question 1.
Give an account of the ‘importance of obedience and discipline in a students’s life. (50 words)
Answer:
Obedience is a great virtue in a student’s life. It teaches one to manage life. It promotes one to learn from the seniors and use their experience for making one’s life great. If one follows the words of old generation, one can do a lot better. It brings all round development to a student.

Question 2.
‘A true leader is one who leaves his footprints behind to be followed by others.’ What footprints would you like to leave for those who come after you? Write. (150 words)
Answer:
It is a fact that we learn a lot from the life of our predecessors. The great men who had lived their life have gained a lot of experience. They had been tested by time. Hence if we follow their footprints we can learn a lot. For example, see the life of Swami Vivekananda. How great he was! What a tremendous confidence he had! His life is still a glow of Indian culture. I too wish to do some great works and leave behind me my footprints that can guide the coming generations. I shall establish myself as a real human being.

The Rainbow Workbook Special English Class 10th Solutions

Report of An Adjudged Case Question Answer Class 10 English The Rainbow Workbook Chapter 7 MP Board

Class 10 English The Rainbow Workbook Chapter 7 Report of An Adjudged Case Questions and Answers

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Report of An Adjudged Case Class 10th Question Answer

Report of An Adjudged Case Vocabulary

I. Write synonyms of the following words:
(i) dispute
(ii) pray
(iii) condemn
(iv) wise
Answer:
(i) disagreement
(ii) worship
(iii) damn
(iv) talented

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II. Use the following expressions in your own sentences.

(a) point in dispute
Answer:
The main point in dispute is still clueless.

(b) a great deal of
Answer:
A great deal of work has to be done.

(c) which amounts to
Answer:
I had spent a lot for it which amounts to nearly one lakh.

(d) on the whole
Answer:
On the whole I got the victory.

Listening Skill

Listen to this humorous poem.

See Workbook’pages 54-55

Now, answer the following questions:

Question 1.
What was the first question asked by the young man?
Answer:
“Is it right to stand on head in old age?”

Question 2.
What was Father William’s reply?
Answer:
He will stand on his head again and again.

Question 3.
What was the reason of his back-somersault at the door?
Answer:
Because he was uncommonly fat.

Question 4.
What was the cost of the ointment used by Father William?
Answer:
One shilling the box.

Question 5.
Why was Father William able to eat the goose?
Answer:
Because his jaws were very strong.

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Speaking Skill

1. Imagine that the teacher’s table and your desk are talking to each other about your class. While the table has some nasty things to say about the class (occasional noisy classes, some children irregular in doing their work, some in the habit of arguing, etc.) the desk is appreciative. It is proud of the achievers. It also believes that children should not be judged harshly. Form two groups in the class, the table group and the bench group. Now speak out your point as per the given role.
Answer:
Do yourself.

Reading Skill

Read the poem

See Workbook pages 56-60

A. Now answer the following questions:

Question 1.
What does a law firm require?
Answer:
It requires a general clerk.

Question 2.
Who handles diversified work?
Answer:
A clerk handles diversified work.

Question 3.
What should an applicant know?
Answer:
An applicant should know the proceedings related to pleadings.

Question 4.
Why should an applicant be not slow?
Answer:
This drawback would put him in problems.

Question 5.
How should an applicant look like?
Answer:
An applicant should have a handsome physique.

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B. (i) Make sentences using the following words to bring out their:
(a) legal usage
(b) general usage
Answer:
plead

  • Harish pleaded to be allowed to meet his friend once again.
  • She pleaded with him to go.

hearing

  • I was present at the time of a court hearing.
  • My grandmother’s hearing is poor

grant

  • Mr. Jain’s bail was granted.
  • God granted my wish.

charges

  • Several charges have been thrusted on Mr. Sharma.
  • What are the charges of these dresses?

appeal

  • I have appealed in the court.
  • The beauty of Taj Mahal appeals to one and all.

trial

  • He is on trial for killing his friend.
  • I have been appointed for a trial period

objection

  • No objections were made at that time.
  • I have no objection to talk to him.

(ii) Pick out some such more words from the given poem.
Answer:
Do yourself.

Writing Skill

Question 1.
Write a letter to the Principal of your school to plead pardon as a window pane had been broken by you. (50 words)
Answer:
The Principal
SD Convent Bhopal
Subject: To plead pardon Sir,
I am sorry to say that the window pane of my class was broken while I was opening it. It happened so because it was not properly shut. Still I beg your pardon for it.
Yours Sincerely
Prakash
Class X A

Question 2.
‘United we stand divided we fall’, elaborate the thought. (150 words)
Answer:
It is a very old but meaningful thought. Unity gives us strength and confidence. It fills us with a sense of oneness. Our country is a great example to prove it. Our country is an amalgamation of many diversities. Right from Kashmir to Kanyakumari, there are so many different cultures, ways of living, languages, religions that one can feel amazed. Still we see the whole nation salute the tricolour. They sing the national anthem in unison. The national language is Hindi. They honour the unified judiciary and the Constitution. Whenever there is an unprecedented terrorist attack the whole nation is unified against it. If such a unity fails we are threatended to many attacks. We have seen many riots due to such disunity.

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