MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 1 वास्तविक संख्याएँ Ex 1.1

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MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 1 वास्तविक संख्याएँ Ex 1.1

प्रश्न 1.
निम्नलिखित संख्याओं का HCF ज्ञात करने के लिए यूक्लिड विभाजन एल्गोरिथ्म का प्रयोग कीजिए :
(i) 135 और 225
(ii) 196 और 38220
(iii) 867 और 255
हल :
(i) चरण – 1 : यहाँ 225 > 135 है, इसलिए हम 225 और 135 पर यूक्लिड प्रमेयिका का प्रयोग करने पर प्राप्त करते हैं :
225 = 135 × 1 + 90
चरण – 2 : चूँकि शेषफल 90 + 0 है, इसलिए हम 135 और 90 पर यूक्लिड प्रमेयिका का प्रयोग करने पर प्राप्त करते हैं :
135 = 90 × 1 + 45
चरण – 3 : चूँकि शेषफल 45 + 0 है, इसलिए हम नए भाजक 90 एवं नए शेषफल 45 पर यूक्लिड प्रमेयिका का प्रयोग करने पर प्राप्त करते हैं :
90 = 45 × 2 + 0
चूँकि यहाँ शेषफल 0 (शून्य) आया है और नया भाजक 45 है। अत: अभीष्ट HCF (135, 225) = 45
(ii) चरण – 1 : यहाँ 38220 > 196 है, इसलिए हम 38220 और 196 पर यूक्लिड प्रमेयिका का प्रयोग करने पर प्राप्त करते हैं :
38220 = 196 × 195 + 0
चूँकि यहाँ शेषफल 0 (शून्य) आया है और नया भाजक 196 है। अतः अभीष्ट HCF (196, 38220) = 196
(iii) चरण – 1 : यहाँ 867 > 255 है, इसलिए हम 867 और 255 पर यूक्लिड प्रमेयिका का प्रयोग करने पर प्राप्त करते हैं :
867 = 255 × 3 + 102
चरण – 2 : चूँकि शेषफल 102 ≠ 0, इसलिए हम 255 और 102 पर यूक्लिड प्रमेयिका का प्रयोग करके प्राप्त करते हैं :
255 = 102 × 2 + 51
चरण-3 : चूँकि शेषफल 51 ≠ 0, इसलिए हम नए भाजक 102 एवं नए शेषफल 51 पर यूक्लिड प्रमेयिका का प्रयोग करके प्राप्त करते हैं :
102 = 51 × 2 + 0
चूँकि यहाँ शेषफल 0 (शून्य) आया है और नया भाजक 51 है। अत: HCF (867, 255) = 51

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प्रश्न 2.
दर्शाइए कि कोई धनात्मक विषम पूर्णांक 6q + 1 या 6q + 3 या 6q + 5 के रूप का होता है।
हल :
हम एक धनात्मक विषम पूर्णांक a लेकर प्रश्न को हल करना प्रारम्भ करते हैं। इसके लिए हम a और b = 6 में विभाजन एल्गोरिथ्म का प्रयोग करते हैं।
चूँकि 0 < r < 6 है, इसलिए सम्भावित शेषफल 0, 1, 2, 3, 4 और 5 होंगे।
अर्थात् a संख्याओं 6q, 6q + 1, 6q + 2, 6q + 3, 6q + 4 और 6q + 5 के रूप का हो सकता है।
चूँकि a एक विषम संख्या है। अत: यह 6q, 6q + 2 एवं 6q + 4 के रूप का नहीं हो सकता क्योंकि ये संख्याएँ 2 से विभाज्य हैं अर्थात् सम संख्याएँ हैं।
अतः कोई भी धनात्मक विषम पूर्णांक 6q + 1 या 6q + 3 या 6q + 5 के रूप का होता है। इति सिद्धम्

प्रश्न 3.
किसी परेड में 616 सदस्यों वाली एक सेना (आर्मी) की टुकड़ी को 32 सदस्यों वाले एक आर्मी बैण्ड के पीछे कार्य करना है। दोनों समूहों को समान संख्या वाले स्तम्भों में मार्च करना है। उन स्तम्भों की अधिकतम संख्या क्या है, जिसमें वे मार्च कर सकते हैं?
हल :
इसे क्रमबद्ध रूप से हल करने के लिए हम HCF (616, 32) ज्ञात करते हैं। इसे ज्ञात करने के लिए
हम यूक्लिड एल्गोरिथ्म का प्रयोग करके प्राप्त करते हैं :
616 = 32 × 19 + 8
32 = 8 × 4 + 0
⇒ HCF (616,32) का मान = 8
अतः, स्तम्भों की अभीष्ट अधिकतम संख्या = 8.

प्रश्न 4.
यूक्लिड विभाजन प्रमेयिका का प्रयोग करके दर्शाइए कि किसी धनात्मक पूर्णांक का वर्ग, किसी पूर्णांक m के लिए 3m या 3m +1 के रूप का होता है।
हल :
मान लीजिए x कोई धनात्मक पूर्णांक है, तब यह 3q, 3q + 1 या 3q + 2 के रूप में लिखा जा सकता है, जहाँ q एक धनात्मक पूर्णांक है।
अब (3q)2 = 9q2 = 3 (3q2) = 3m, जहाँ m = 3q2 एक धनात्मक पूर्णांक है।
(3q+ 1)2 = 9q2 + 6q + 1
= 3q (3q + 2) + 1
= 3m + 1, जहाँ m =q (3q + 2) एक धनात्मक पूर्णांक है।
(3q + 2)2 = 9q2 + 12q + 4 = 9q2 + 12q + 3 + 1
= 3 (3q2 + 4q + 1) + 1 = 3 (3q + 1) (q + 1) + 1
= 3m + 1 जहाँ m = (+ 1) (3q + 1) एक धनात्मक पूर्णांक है।
अतः, किसी धनात्मक पूर्णांक का वर्ग किसी पूर्णांक m के लिए 3m या 3m + 1 के रूप का होता है। इति सिद्धम्

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प्रश्न 5.
यूक्लिड विभाजन प्रमेयिका का प्रयोग करके दर्शाइए कि किसी धनात्मक पूर्णाक का घन 9m, 9m + 1 या 9m + 8 के रूप का होता है।
हल :
मान लीजिए x कोई धनात्मक पूर्णांक है, तब यह 34, 3q + 1 या 3q + 2 के रूप में लिखा जा सकता है, जहाँ q एक धनात्मक पूर्णांक है।
अब (34)3 = 27q3 = 9 (3q3) = 9m, जहाँ m = 3q3 एक धनात्मक पूर्णांक है।
(3q + 1)3 = 27q3 + 27q2 + 9q + 1
= 9q (3q2 + 3q + 1) + 1
= 9m + 1, जहाँ m = q (3q2 + 3q + 1) एक धनात्मक पूर्णांक है।
(3q + 2)3 = 27q3 + 54q2 + 36q + 8
= 9q (3q2 + 6q + 4) + 8
= 9m + 8, जहाँ m = q (3q2 + 6q + 4) एक धनात्मक पूर्णांक है।
अतः, किसी धनात्मक पूर्णांक का घन 9m, 9m + 1 या 9m + 8 के रूप का होता है। इति सिद्धम्

MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions

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MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions

MP Board Class 10th Maths Chapter 8 अतिरिक्त परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 10th Maths Chapter 8 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यदि cosec θ + cot θ = p, तो सिद्ध कीजिए कि \(\cos \theta=\frac{p^{2}-1}{p^{2}+1}\)
हल :
\(\frac{p^{2}-1}{p^{2}+1}\)
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 1
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 2
इति सिद्धम

प्रश्न 2.
सिद्ध कीजिए कि \(\sqrt{\sec ^{2} \theta+\csc ^{2} \theta}=\tan \theta+\cot \theta\)
हल :
LHS =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 3
= tan θ + cot θ
= RHS
LHS = RHS
इति सिद्धम

प्रश्न 3.
सिद्ध कीजिए कि \(\frac{1+\sec \theta-\tan \theta}{1+\sec \theta+\tan \theta}=\frac{1-\sin \theta}{\cos \theta}\)
हल :
LHS =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 4
LHS = RHS
इति सिद्धम

प्रश्न 4.
सिद्ध कीजिए कि \(\frac{\sec \theta+\tan \theta-1}{\tan \theta-\sec \theta+1}=\frac{1+\sin \theta}{\cos \theta}\)
हल :
LHS =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 5
LHS = \(\frac{1+\sin \theta}{\cos \theta}\) = RHS
LHS = RHS
इति सिद्धम

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प्रश्न 5.
सिद्ध कीजिए कि \(\sqrt{\frac{1-\sin \theta}{1+\sin \theta}}=\sec \theta-\tan \theta\)
हल :
LHS =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 6
= secθ – tanθ
= RHS
LHS = RHS
इति सिद्धम

प्रश्न 6.
सिद्ध कीजिए कि \(\sqrt{\frac{1-\cos \theta}{1+\cos \theta}}=\csc \theta-\cot \theta\)
हल :
LHS =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 7
= cosecθ – cotθ
= RHS
LHS = RHS
इति सिद्धम

प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि \(\sqrt{\frac{1+\cos \theta}{1-\cos \theta}}=\csc \theta+\cot \theta\)
हल :
LHS =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 8
= cosecθ + cotθ
= RHS
LHS = RHS
इति सिद्धम

MP Board Class 10th Maths Chapter 8 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिद्ध कीजिए कि : \(\frac{1+\cos A}{\sin A}+\frac{\sin A}{1+\cos A}=\frac{2}{\sin A}=2 \csc A\)
हल:
L.H.S. =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 9
LHS = RHS
इति सिद्धम

प्रश्न 2.
सिद्ध कीजिए कि : \(\frac{\tan A}{1+\sec A}-\frac{\tan A}{1-\sec A}=2 \csc A\)
हल:
L.H.S. =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 10
LHS = RHS
इति सिद्धम

प्रश्न 3.
यदि tanA = 3/4 तो सिद्ध कीजिए कि sin A cos A = \(\frac { 12 }{ 25 }\)
हल :
चूँकि tan A = 3/4 = p/b
p = 3 एवं b = 4
⇒ \(h=\sqrt{p^{2}+b^{2}}=\sqrt{(3)^{2}+(4)^{2}}=\sqrt{9+16}=\sqrt{25}=5\)
L.H.S. = sin A. cos A = \(\frac{3}{5} \times \frac{4}{5}=\frac{12}{25}\)
= R.H.S.
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

प्रश्न 4.
सिद्ध कीजिए कि:
(sin α + cos α) (tan α + cot α) = sec α + cosec α.
हल:
L.H.S. = (sin α + cos α) (tan α + cot α)
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 11
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 12
LHS = RHS
इति सिद्धम

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प्रश्न 5.
सिद्ध कीजिए कि : (√3 + 1) (3 – cot 30°) = tan³ 60° – 2 sin 60°.
हल:
L.H.S. = (√3 +1) (3 – cot 30°)
= (√3 + 1) (3 – √3)
= 3 √3 – 3 + 3 – √3
= 2√3
R.H.S. = tan³ 60° – 2 sin 60°
= (√3) – 2 (√3/2)
= 3 √3 – √3
= 2√3
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

प्रश्न 6.
सिद्ध कीजिए कि :
\(1+\frac{\cot ^{2} \alpha}{1+\csc \alpha}=\csc \alpha\)
हल :
L.H.S. =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 13
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि : tanθ + tan (90° – θ) = sec θ. sec (90° – θ).
हल :
L.H.S. = tanθ + tan (90° – 0)
= tan θ + cot θ
= sin θ/cos θ + cos θ/sin θ
= \(\frac{\sin ^{2} \theta+\cos ^{2} \theta}{\cos \theta \sin \theta}\)
= \(\frac{1}{\cos \theta \sin \theta}\)
= sec θ cosec θ
= sec θ. sec (90° – θ)[ ∵ sec (90° – θ) = cosec θ]
= R.H.S.
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

प्रश्न 8.
यदि √3 tanθ = 1 हो तो sin²θ – cos²θ का मान ज्ञात कीजिए।
हल :
∵ √3 tanθ = 1 ⇒ tan θ = \(\frac{1}{\sqrt{3}}\) = tan 30°
θ = 30°
तब sin²θ – cos²θ = sin² 30° – cos² 30
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 14
अतः sin²θ – cos²θ का अभीष्ट मान = \(-\frac { 1 }{ 2 }\) है।

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प्रश्न 9.
सरल कीजिए :
(1 + tan²θ) (1 – sin θ) (1 + sin θ).
हल :
(1 + tan²θ) (1 – sin θ) (1 + sin θ).
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 15
अतः अभीष्ट सरल मान = 1 है।

प्रश्न 10.
दर्शाइए कि : \(\frac{\cos ^{2}\left(45^{\circ}+\theta\right)+\cos ^{2}\left(45^{\circ}-\theta\right)}{\tan \left(60^{\circ}+\theta\right) \cdot \tan \left(30^{\circ}-\theta\right)}=1\)
हल:
L.H.S. =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 16
= R.H.S.
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

प्रश्न 11.
दर्शाइए कि : tan4 + θ + tan2 θ = sec4 θ – sec2 θ.
हल :
L.H.S. = tan4 + θ + tan2 θ = sec4 θ – sec2 θ
= (sec² θ – 1) (sec² θ) [∴ 1 + tan² θ = sec² θ]
= sec4 θ – sec² θ
= R.H.S.
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

प्रश्न 12.
सिद्ध कीजिए :
sin6θ + cos6θ + 3 sin2θ cos2θ = 1.
हल :
हम जानते हैं कि
sin2θ + cos2θ = 1
⇒ (sin2θ + cos2θ)3 = (1)3 = 1
⇒ sin6θ + cos6θ + 3 sin2θ cos2θ (sin2θ + cos2θ) = 1
⇒ sin6θ + cos6θ + 3 sin2θ cos2θ = 1. [∴ sin2 θ + cos2 θ = 1]
इति सिद्धम्

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प्रश्न 13.
सिद्ध कीजिए कि :
(sin4θ – cos4θ + 1) x cosec2θ = 2
हल:
L.H.S. = (sin4θ – cos4θ + 1) x cosec2θ
= [(sin2θ + cos2θ) (sin2θ – cos2θ) + 1] x cosec2θ
= (sin2θ – cos2θ + 1) x cosec2θ
= sin2θ cosec2θ – cos2θ cosec2θ + cosec2θ)
= (1 – cot2θ + cosec2θ)
= (1 – cot2θ + 1 + cot2θ)
= 2 (∵ sin2θ cosec2θ = 1, cos2θ cosec2θ = cot2θ)
= R.H.S.
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

प्रश्न 14.
(secθ + tanθ) (1 – sinθ) को सरल कीजिए।
हल:
(secθ + tanθ) (1 – sinθ)
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 17
अत: अभीष्ट मान = cosθ है।

प्रश्न 15.
निम्न सर्वसमिका सिद्ध कीजिए :
\(\frac{\csc A}{\csc A-1}+\frac{\csc A}{\csc A+1}=2 \sec ^{2} A\)
हल:
L.H.S. =
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 18
L.H.S. = R.H.S.
इति सिद्धम्

MP Board Class 10th Maths Chapter 8 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नांकित कथनों में सत्य/असत्य लिखिए तथा अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए :
(i) \(\frac{\tan 47^{\circ}}{\cot 43^{\circ}}=1\)
(ii) (cos² 23° – sin² 67°) का मान धनात्मक है।
(iii) \(\sqrt{\left(1-\cos ^{2} \theta\right) \sec ^{2} \theta}=\tan \theta\)
(iv) (tanθ + 2) (2 tanθ + 1) = 5 tanθ + sec²θ
(v) sinθ + cosθ का मान सदैव 1 से बड़ा होता है।
(vi) tan θ (θ < 90°) का मान θ के बढ़ने के साथ बढ़ता है।
(vii) θ का मान बढ़ने पर sinθ की अपेक्षा tanθ का मान तेजी से बढ़ता है।
हल :
(i) कथन सत्य है,
क्योंकि
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 19

(ii) कथन असत्य है,
क्योंकि
(cos² 23° – sin² 67°) = cos² 23° – cos² 23° = 0.

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(iii) कथन सत्य है,
क्योंकि
MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 20

(iv) कथन असत्य है,
क्योंकि (tan θ + 2) (2 tan θ + 1) = 2 tan²θ + 4 tan θ + tan θ + 2
= 5 tan θ + 2 (1 + tan²θ)
= 5 tan θ + 2 sec²θ
≠ 5 tan θ + sec²θ.

(v) कथन असत्य है, क्योंकि θ = 0° के लिए sin θ + cos θ = sin 0 + cos 0 = 0 + 1 = 1.

(vi) कथन सत्य है, क्योंकि tan 0 = 0, tan 30° = \(\frac{1}{\sqrt{3}}\) , tan 45° = 1, tan 60° = √3.

(vii) कथन सत्य है,
क्योंकि
\(\tan \theta=\frac{\sin \theta}{\cos \theta}\)
जब θ का मान बढ़ता है तो sin θ का मान बढ़ता है लेकिन cos θ का मान घटता है, इसलिए tan θ का मान तेजी से बढ़ता है।

MP Board Class 10th Maths Chapter 8 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

MP Board Class 10th Maths Chapter 8 बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यदि cos A = \(\frac { 4 }{ 5 }\), तो tan A का मान है :
(a) 3/5
(b) 3/4
(c) 4/3
(d) 5/3.
उत्तर:
(b) 3/4

प्रश्न 2.
यदि sin A = \(\frac { 1 }{ 2 }\), तब cot A का मान होगा :
(a) √3
(b) \(\frac{1}{\sqrt{3}}\)
(c) \(\frac{\sqrt{3}}{2}\)
(d) 1.
उत्तर:
(a) √3

प्रश्न 3.
cosec (75° + θ) – sec (15° – θ)]- tan (55° + θ) + cot (35° – θ) का मान है :
(a) -1
(b) 0
(c) 1
(d) 3/2.
उत्तर:
(b) 0

प्रश्न 4.
यदि sin θ = \(\frac { a }{ b }\) हो तो cosθ का मान होगा :
(a) \(\frac{b}{\sqrt{b^{2}-a^{2}}}\)
(b) \(\frac { b }{ a }\)
(c) \(\frac{\sqrt{b^{2}-a^{2}}}{b}\)
(d) \(\frac{a}{\sqrt{b^{2}-a^{2}}}\)
उत्तर:
(c) \(\frac{\sqrt{b^{2}-a^{2}}}{b}\)

प्रश्न 5.
यदि cos 9α = sin α एवं 9α. < 90°, तब tan 5α का मान होगा :
(a) \(\frac{1}{\sqrt{3}}\)
(b) √3
(c) 1
(d) 0.
उत्तर:
(c) 1

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प्रश्न 6.
\(\left(\frac{\sin ^{2} 22^{\circ}+\sin ^{2} 68^{\circ}}{\cos ^{2} 22^{\circ}+\cos ^{2} 68^{\circ}}+\sin ^{2} 63^{\circ}+\cos 63^{\circ} \cdot \sin 27^{\circ}\right)\) का मान होगा :
(a) 3
(b) 2
(c) 1
(d) 0.
उत्तर:
(b) 2

प्रश्न 7.
यदि 4 tanθ = 3 तब \(\left[\frac{4 \sin \theta-\cos \theta}{4 \sin \theta+\cos \theta}\right]\) का मान है :
(a) 2/3
(b) 1/3
(c) 1/2
(d) 3/4.
उत्तर:
(c) 1/2

प्रश्न 8.
यदि sinθ – cosθ = 0, तब (sin4 θ + cos4 θ) का मान है :
(a) 1
(b) 3/4
(c) 1/2
(d) 1/4.
उत्तर:
(c) 1/2

प्रश्न 9.
sin (45° + θ) – cos (45° – θ) का मान है :
(a) 2 cosθ.
(b) 0
(c) 2 sinθ
(d) 1.
उत्तर:
(b) 0

प्रश्न 10.
(sin 30° + cos 30°)-(sin 60° + cos 60°) का मान है:
(a) -1.
(b) 0
(c) 1
(d) 2.
उत्तर:
(b) 0

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प्रश्न 11.
tan 30°/ cot 60° का मान है:
(a) \(\frac{1}{\sqrt{2}}\)
(b) \(\frac{1}{\sqrt{3}}\)
(c) √3
(d) 1.
उत्तर:
(d) 1.

प्रश्न 12.
(sin 45° + cos 45°) का मान है :
(a) \(\frac{1}{\sqrt{2}}\)
(b) √2
(c) \(\frac{\sqrt{3}}{2}\)
(d) 1.
उत्तर:
(b) √2

प्रश्न 13.
sin²20° + cos²20° का मान होगा :
(a) 0
(b) 1
(c) tan² 20°
(d) cot² 20°.
उत्तर:
(b) 1

प्रश्न 14.
\(\frac{1}{\csc ^{2} \theta}+\frac{1}{\sec ^{2} \theta}\) का मान होगा:
(a) 1
(b) 0
(c) sin²θ
(d) cos²θ.
उत्तर:
(a) 1

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प्रश्न 15.
sin² 40° + cos² 40° का मान है :
(a) 40
(b) 0
(c) 1
(d) 2.
उत्तर:
(c) 1

प्रश्न 16.
\(\sqrt{1-\cos ^{2} \theta}\) का मान है :
(a) sin θ
(b) cos θ
(c) tan θ
(d) – cos θ.
उत्तर:
(a) sin θ

प्रश्न 17.
tan 45° का मान होगा:
(a) 0
(b) 45
(c) 1
(d) -1.
उत्तर:
(c) 1

प्रश्न 18.
sin (90° – θ) का मान है :
(a) sinθ
(b) cosθ
(c) – cosθ
(d) – sinθ.
उत्तर:
(b) cosθ

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. \(\sqrt{1-\cos ^{2} \theta}\) का मान ……. होगा।
2. \(\frac{\cot 59^{\circ}}{\tan 31^{\circ}}\) का मान ………….. होगा।
3. (cosec 90° – θ) का मान ………… होगा।
4. \(\sqrt{\sec ^{2} \theta-1}\) का मान …………. होगा।
5. 1 + tan²θ = …………
6. sec (90° – θ) का मान ………… होता है।
उत्तर-
1. sinθ,
2. 1,
3. sec θ,
4. tan θ,
5. sec²θ,
6. cosec²θ.

जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 21
उत्तर-
1. →(c),
2. →(d),
3. →(a),
4. →(b).

MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 22
उत्तर-
1.→(c),
2.→(a),
3.→(b),
4.→(e),
5.→(d).

MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 23
उत्तर-
1.→(c),
2.→(d),
3.→(a),
4.→(b).

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MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 24
उत्तर-
1.→(d),
2.→(a),
3.→(b),
4.→(c).

MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 25
उत्तर-
1.→(c),
2.→(d),
3.→(a),
4.→(b)
5.→(f),
6.→(e).

MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 26
उत्तर-
1.→(d),
2.→(e),
3.→(a),
4.→(b)
5.→(c).

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MP Board Class 10th Maths Solutions Chapter 8 त्रिकोणमिति का परिचय Additional Questions 27
उत्तर-
1.→(c),
2.→(d),
3.→(e),
4.→(a)
5. →(b).

सत्य/असत्य कथन

1. tan (90° – θ) = cotθ
2. sin² θ + cos² θ = – 1
3. \(\sqrt{1-\sin ^{2} \theta}=\sec \theta\)
4. sec²θ – 1 = tan²θ
5. sin 60° + cos 60° = \(\frac{\sqrt{3}+1}{2}\)
6. cosec θ = \(\sqrt{1+\cot ^{2} \theta}\)
7. sin 12° cos 78° + cos 12° sin 78° = 2
उत्तर-
1. सत्य,
2. असत्य
3. असत्य,
4. सत्य,
5. सत्य
6. सत्य,
7. असत्य

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. 1 + tan²θ का मान लिखिए।
2. 1 + cot²θ का मान लिखिए।
3. sin²θ + cos²θ का मान लिखिए।
4. cos 0° का मान लिखिए।
5. sin (90° – θ) का मान लिखिए।
6. cos (90° – θ) का मान लिखिए।
7. tan (90° – θ) का मान लिखिए।
8. sin θ / cosθ का मान क्या होगा ?
उत्तर-
1. sec²θ,
2. cosec²θ,
3. 1 (एक),
4. 1 (एक),
5. cos θ,
6. sin θ,
7. cote θ
8. tan θ.

MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 7 सरजू भैया

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 7 सरजू भैया

सरजू भैया अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
सरजू भैया के व्यक्तित्व का संक्षिप्त परिचय लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तावना-सरजू भैया की गिनती गाँव के सबसे लम्बे और दुबले आदमियों में हो सकती है। उनका रंग साँवला है। बगुले की सी लम्बी-लम्बी टाँगों जैसी लम्बी बाहें। कमर में धोती पहनते हैं, कंधे पर अंगोछा डाले रहते हैं। जब वे खड़े होते हैं तब, आप उनकी पसलियों की हड्डियाँ गिन लीजिए। नाक खड़ी सी और लम्बी। सघन भर्दै। उनकी आँखें बड़ी-बड़ी हैं जो कोटर में धंसी सी लगती हैं। गाल पिचके से हैं। अंग-अंग की शिराएँ उभरी हुई हैं। कभी-कभी मालूम होता है मानो ये नसें नहीं, उनके शरीर को किसी ने पतली डोरों से जकड़ रखा है।

सरजू की सूरत :
उनको देखने से तो उनकी तस्वीर निस्संदेह किसी भुखमरे, मनहूस आदमी की मालूम होती है। परन्तु ऐसा है भी कि नहीं? सरजू भैया लेखक के गाँव के चन्द जिन्दादिल लोगों में से हैं। बड़े मिलनसार, मजाकिया और हँसोड़ हैं।

दिल खोलकर हँसना :
वे जब दिल खोलकर हँसते हैं, तो शरीर भर में जो सबसे छोटी चीजें उन्हें मिली हैं, वे उनके पंक्तिबद्ध छोटे-छोटे दाँत हैं। तब वे बेतहाशा चमक पड़ते हैं। अंग-अंग हिलने-डुलने लगते हैं, जैसे मानो हर अंग हँस रहा हो। सरजू भैया के पास इतनी सम्पत्ति है कि वह खुद या अपने परिवार का ही पेट नहीं भर सकते वरन् आगत-अतिथि की सेवा पूजा भी मजे से कर सकते हैं। तो फिर यह हड्डियों का ढाँचा क्यों? के जवाब में एक पुरानी कहावत पेश करूँगा-काजी दुबले क्यों-शहर के अंदेशे से।

उपसंहार :
अब सरजू भैया की जो हालत है, वह स्वयं अपने कारण नहीं, दूसरों के चलते है। पराये उपकार के चलते उन्होंने सिर्फ अपना यह शरीर सुखा लिया है, बल्कि अपनी सम्पत्ति की भी कुछ कम हानि नहीं की है।

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प्रश्न 2.
सरजू भैया क्या व्यवसाय करते थे? वे अपने व्यवसाय में सफल क्यों नहीं हो सके?
उत्तर:
सरजू भैया के पास खेतीबाड़ी थी, रुपये और गल्ले का अच्छा लेन-देन था। परिवार बड़ा नहीं था और न खर्चीला। लेकिन सरजू के पिता के मरते ही सरजू भैया ने लेन-देन चौपट किया। बाढ़ ने खेती बर्बाद कर दी और भूकम्प ने मकान का सत्यानाश कर दिया। उनका लेन-देन बहुत अच्छा था। खेती को भी सम्हाला जा सकता था। घर भी खड़ा किया जा सकता था। किन्तु सरजू भैया लेन-देन का काम नहीं सम्हाल सकते थे। इसके भी कुछ कारण थे; जिससे सरजू भैया ने इन कामों में रुचि नहीं दिखाई।

“लेन-देन, जिसे नग्न शब्दों में सूदखोरी कहिए, चाहता है, आदमी अपने आदमीपन को खो दे, वह जोंक, खटमल नहीं, चीलर बन जाए। काली जोंक और लाल खटमल का स्वतंत्र अस्तित्व है। हम उनका खून चूसना महसूस करते हैं; हम उनमें अपना खून प्रत्यक्ष पाते हैं और देखते हैं। लेकिन चीलर? गंदे कपड़े में, उन्हीं सा काला कुचैला रंग लिए वह चीलर चुपचाप पड़ा रहता है और हमारे खून को इस तरह धीरे-धीरे चूसता है और तुरन्त उसे अपने रंग में बदल देता है कि उसका चूसना हम जल्द अनुभव नहीं कर सकते और अनुभव करते भी हैं, तो जरा सी सुगबुगी या ज्यादा से ज्यादा चुनमुनी मात्र और अनुभव करके भी उसे पकड़ पाने के लिए तो कोई खुर्दबीन चाहिए।”

इस तरह सूद पर दिए धन का सूद प्राप्त करने के लिए सरजू भैया चीलर नहीं बन सकते थे। उनके इस लम्बे शरीर में जो हृदय मिला है, वह शरीर के ही परिमाण में है अर्थात वे बड़े दिलदार हैं। जो भी दुखिया आया, अपनी विपदा बताई; उसे देवता सा दे दिया और वसूलने के समय जब वह आँखों में आँसू लाकर गिड़गिड़ाया, तो देवता की ही तरह पसीज गए। सूद कौन? कुछ दिन में मूलधन भी शून्य में परिवर्तित हो गया।

बाढ़ और भूकम्प ने उनके खेत और घर को बर्बाद किया जरूर, लेनिक सरजू भैया, लेखक का यकीन है, आज फटेहाली से बहुत कुछ बचे रहते, यदि लेन-देन के बाद भी इन दोनों की तरफ भी पूरा ध्यान दिए होते। यह नहीं कि वह जी चुराने वाले या आलसी और बोदा (कमजोर) गृहस्थ हैं। नहीं, ठीक इसके खिलाफ-चतुर, फुर्तीला और कामकाजी आदमी है। लेकिन करें तो क्या? उन्हें दूसरे के काम से ही कहाँ फुर्सत मिलती है।

यदि किसी का बच्चा बीमार होता है, तो वैद्य बुलाने जायेगा सरजू भैया। बाजार से किसी को सौदा खरीदना है, तो कौन जाएगा-सिवाय सरजू भैया के। किसी भी छोटे से लेकर बड़े काम तक करवाने की जिम्मेदारी है तो सरजू भैया की। इस तरह सरजू भैया ने अपनी खेती को चौपट किया हुआ है। अच्छा भोजन न मिलने से इनकी कमर झुक गई है। चाहे दिन का कोई समय हो, या रात्रि का आधा भाग, फिर भी वहाँ के लोग अपने काम के लिए बुलाएँगे सरजू भैया को। सरजू भैया का दरवाजा हर किसी के लिए चौबीसों घण्टे खुला रहता है। सरजू भैया नर-रल हैं। उनकी भलमनसाहत को कोई भी नहीं ध्यान देता है। सभी उसे सीधा समझकर ठगने की कोशिश करते हैं। इस तरह बहुत से कारण थे जिनकी वजह से वे व्यवसाय में सफल नहीं हुए।

प्रश्न 3.
सूदखोर किस तरह दूसरों का शोषण करते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
सूदखोर दूसरों का खूब शोषण करते हैं। उनमें आदमीपन तो रहता ही नहीं। सूदखोर तो जोंक, खटमल नहीं, चीलर बन जाता है। काली जोंक और लाल खटमल अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना लेते हैं, क्योंकि जब उनके द्वारा हमारा खून चूसा जाता है, तो हम उनके अन्दर अपना ही रक्त चूसा हुआ पाते हैं। लेकिन चीलर? गन्दे कपड़े में, उन्हीं सा काला कुचैला रंग लिए वह चीलर चुपचाप पड़ा रहता है और हमारे ही रक्त को धीरे-धीरे चूसता रहता है। तुरन्त ही उस चूसे गए खून को अपने रंग में मिला लेता है और अपने रंग में बदल देता है। चीलर के द्वारा चूसा जाना बहुत जल्दी अनुभव नहीं कर पाते। इसी तरह सूदखोर पैसा कमाता है और शोषण करता है।

प्रश्न 4.
“सादगी, सरल स्वभाव और सहज भोलापन ग्रामीणों की विशेषता है।” सरजू भैया पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
सरजू भैया लेखक के गाँव के रहने वाले हैं। उनमें सरलता है, सादगी है और सहज भोलापन है। यही सरजू भैया भारतीय ग्रामीणों की इन विशेषताओं को अपने अन्दर सँजोए हुए हैं। वे सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। उनका हृदय विशाल है, उनके विचार भी विस्तृत और उदार हैं। ग्रामीणों की किसी भी आवश्यकता के काम को पूरा करने के लिए चौबीस घण्टे उनका द्वार खुला रहता है।

सरजू भैया यद्यपि शरीर से कमजोर दीखते हैं लेकिन उनमें आत्मिक साहस भरा पड़ा है। बीमार के लिए वैद्य लाकर, किसी की सहायता के लिए बाजार से उसकी आवश्यकता की वस्तुओं को लाकर, बाहर से आई खबर को प्रत्येक घर में पहुँचाकर, किसी के भी काम के लिए उन पर समय ही समय था। लोग उनके सीधेपन का फायदा उठाते और उन्हें ठगने की कोशिश भी करते।

ग्रामीण व्यक्ति सूदखोरों के चंगुल में बहुत जल्दी फंस जाते हैं। सरजू भैया के आधार पर स्पष्ट होता है कि सादगी, सरल स्वभाव और सहज भोलापन ग्रामीणों की विशेषता है।”

प्रश्न 5.
“दूसरों की सहायता करना, सरजू भैया का स्वभाव था” इस सन्दर्भ में बताइए कि सरजू भैया किस प्रकार दूसरों की,सहायता करते थे?
उत्तर:
सरजू भैया का स्वभाव था दूसरों की सहायता करने का। वे चौबीसों घण्टे अपने गाँव के सभी लोगों की सहायता में लगे रहते थे। वे अपने किसी भी काम को देखते नहीं थे। यदि उन्होंने अपना काम किया होता, अपनी खेतीबाड़ी, अनाज व पैसे के लेन-देन को थोड़ा भी समय निकालकर देखा होता तो अवश्य ही उनकी आर्थिक दशा ठीक रही होती। कृषि कार्य के लिए थोड़ा बहुत समय दिया होता तो धान्य आदि की कमी नहीं होती। उनका घर भी नष्ट नहीं होता। लेकिन वे अपने स्वभाव और आदत से लाचार थे कि वे अपने किसी भी काम को नहीं देखते थे। दूसरे लोगों (अपने गाँववासियों) की सहायता में तत्परता से लगे रहते। लोग उन्हें उनके सीधेपन और सहायता की भावना वाला होने से, मूर्ख समझते थे।

लेखक के अनुसार, वे गाँव के किसी भी बीमार व्यक्ति के उपचार के लिए वैद्य को लेकर आते थे। किसी को किसी चीज की आवश्यकता है, सौदा खरीद कर लाना है, तो सरजू भैया बाजार जाता और उनके लिए उस इच्छित वस्तु को लाकर देता। गाँव के किसी रिश्तेदार की बीमारी आदि की सूचना देने और लेने यदि किसी को भेजा जाना है, तो वह है सरजू भैया। इन सभी बातों के पीछे है सरजू भैया का तेजगति से चलना और दूसरे लोगों की सहायता करने की प्रवृत्ति।

गाँव का कोई सज्जन किसी की जमीन, मकान आदि को यदि खरीदता है, तो उसकी शिनाख्त सरजू भैया ही करता है। गाँव में किसी के यहाँ विवाह हो रहा है, यज्ञ आदि का आयोजन है तो समझिए इस सब की जिम्मेदारी सरजू भैया की होती है। बहुत ही अस्त-व्यस्त दिखते रहते हैं। गाँव में किसी के यहाँ कोई मृत्यु होती है, तो भी समय कोई भी हो, इसके लिए भी आवश्यक सामग्री, जैसे कफन आदि खरीदकर लाने का उत्तरदायित्व सरजू भैया का ही रहता है।

इस प्रकार गाँव के लोगों का सारा उत्तरदायित्व अपने सिर पर लेकर सरजू भैया उनकी सहायता करते थे।

प्रश्न 6.
सरजू भैया को सूदखोर ने किस प्रकार ठग लिया था? संक्षिप्त में लिखिए। (2011)
उत्तर:
सरजू भैया अपने सीधेपन से ठगे गए। वे एक दिन एक सूदखोर के चंगुल में इस तरह फंस गए कि लेखक ने सरजू भैया के पास जो रुपये थे; उन्हें अपने काम में लगा लिए। कुछ दिन बाद उन्हें धन की जरूरत पड़ी होगी। संकोचवश लेखक से धन माँग नहीं सके। वे अपनी आवश्यकता की अधिकता के कारण एक सूदखोर के पास चले गए। यह सूदखोर कोई अन्य नहीं था, यह वही था जो पहले इनसे कर्ज लिया करता था। यह सूदखोर तरह-तरह के काम करता रहता है, उनके कारण यह अब धन्ना सेठ बन गया है। उसने इन्हें (सरजू भैया को) धन दे दिया। लेकिन जैसे ही वे चलने लगे तो उसने (धन्ना सेठ बने सूदखोर) कहा, “आपके पास से रुपये जायेंगे कहाँ? लेकिन कोई सबूत तो चाहिए ही।” सरजू भैया ने कहा “क्या सबूत? मैं तैयार हूँ।” उस समय तक सरजू भैया रुपये बाँध चुके थे। उन्हें खोलकर लौटाया नहीं जा सकता था। और न सरजू भैया उसकी (सूदखोर की) माँग को नामंजूर कर सकते थे। सूदखोर ने कहा- नहीं, नहीं, कुछ नहीं-कागज पर सिर्फ निशान बना दीजिए। आपसे बाजाब्ता है नोट क्या कराया जाए?”

सरजू भैया ने बमभोला की तरह कजरौटे से अंगूठा बोर कर कागज पर चिपढ़ा दिया और चले आए, मानो किसी आधुनिक एंटोनियो ने किसी कलजुगी शाइलॉक के हाथ में अपने को गिरवी कर दिया। अब वह कहने लगा कि रुपये जल्दी लौटा दो, अन्यथा नालिश कर दूंगा और नालिश कितने की करेगा, कौन ठिकाना।” यह तो सरजू भैया की बेचारगी बोल रही थी। लेखक उनके मुख की ओर आश्चर्य से देख रहा था। लेखक ने कहा-“आपने ऐसी गलती क्यों कर दी” लेकिन इसके अलावा, उनके पास इसका जबाव क्या दे सकते थे। बस यह कि “क्या करूँ रुपये बाँध चुका था।” इस प्रकार सूरज भैया को सूदखोर ने ठग लिया था।

सरजू भैया अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी का सरजू भैया से क्या सम्बन्ध था?
उत्तर:
लेखक का सरजू भैया से कोई खून का रिश्ता न था। वास्तव में सरजू भैया का सगा छोटा भाई जाता रहा। लेखक ने उन्हें अपना बड़ा भाई मान लिया और स्वयं उनके छोटे भाई बन गये।

प्रश्न 2.
सरजू भैया का खेत और घर कैसे बर्बाद हो गये?
उत्तर:
बाढ़ और भूकम्प ने सरजू भैया के खेत और घर बर्बाद कर दिये थे।

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सरजू भैया पाठ का सारांश

प्रस्तावना-पात्र-परिचय :
सरजू भैया लेखक के पड़ोसी हैं। सरजू भैया अपनी माँ का बड़ा बेटा है। लेखक इकलौते ठहरे। परन्तु सरजू भैया का छोटा भाई नहीं रहा, अतः लेखक उन्हें अपना बड़ा भाई मानता है और स्वयं को उनका छोटा भाई।।

शारीरिक बनावट :
सरजू भैया गाँव भर में सबसे लम्बे और दुबले व्यक्ति हैं। उनका रंग साँवला है। बगुले की टाँगों जैसी लम्बी बाँहें, उनकी पसलियों को एक-एक करके गिना जा सकता है। नाक लम्बी और खड़ी हुई। घनी भवॆ, बड़ी-बड़ी आँखें, परन्तु कोटरों में फंसी हुई। गाल पिचके हुए। अंग-अंग की शिराएँ उभरी हुई। वे नसें ऐसी लगती हैं, मानो उनके शरीर को पतली डोरों से जकड़ रखा है।

पहनावा :
सरजू भैया धोती पहनते हैं। कंधे पर अंगोछा डाले रहते हैं। खड़े होने पर ऐसा प्रतीत होता था कि लकड़ियों पर कपड़ों को टाँग दिया गया है।

स्वभाव :
ऊपर से देखने में उनकी तस्वीर निःसन्देह ही किसी मनहूस भुखमरे व्यक्ति की जैसी लगती है। परन्तु सरजू भैया गाँवभर में जिन्दा-दिल आदमी है, वे मिलनसार, मजाकिया और हँसोड़ हैं। अतिथि का सत्कार करने वाले व्यक्ति हैं।

आर्थिक दशा :
सरजू भैया ने परोपकार करते रहने से शरीर सुखा लिया और अपनी सम्पत्ति भी इसी कारण बरबाद कर डाली। इनके पिता गाँव के अच्छे किसान गिने जाते थे। अच्छा, सुन्दर मकान था, अच्छी खासी बैठक थी। लेकिन सरजू भैया की तो यह राम मढैया है। पिता का कारोबार खेती और लेन-देन का कामकाज़। उनके मरने के बाद सरजू ने लेन-देन चौपट कर दिया। बाढ़ ने खेती और भूकम्प ने मकान आदि सब कुछ नष्ट कर दिया। सरजू चाहते तो सब कुछ ठीक हो सकता था। लेकिन सरजू ………।

सरजू के लिए सूदखोरी का काम आदमीपन को खो देने वाला था। यह काम काली जौक, लाल खटमल और चीलर बने लोगों का है।

सरजू भैया चीलर नहीं बन सकते। उनका हृदय बड़ा है। उसने विपदा में सब लोगों को पैसा देकर सहायता की। सूद की बात दूर, किसी ने इन्हें मूल तक नहीं लौटाया। सरजू भैया आज फटेहाली से गुजर रहे हैं। इसका कारण उनका आलसी होना या काम से जी चुराना नहीं है, वरन् वह तो फुर्तीले और कामकाजी व्यक्ति हैं उन्हें अपने कामों के लिए दूसरों के काम से फुरसत कहाँ?

परोपकार की भावना :
सरजू भैया एकदम परोपकारी हैं। गाँव के किसी भी व्यक्ति का कोई भी काम हो-किसी तरह का कार्य हो सकता है, लेकिन सरजू भैया सभी गाँववासियों की सहायता के लिए तैयार रहते हैं। अपना चाहे कोई भी काम क्यों न पड़ा रहे, लेकिन दूसरों की सहायता में सरजू भैया सबसे आगे। परोपकार और सेवा के लिए तो उनके घर का दरवाजा हर समय खुला रहता था। यही गुण सरजू भैया को दूसरे आदमियों से अलग करता है। इसलिए वे सबके द्वारा वंदनीय और पूजनीय हैं। उनका सीधापन देखकर लोग उन्हें ठगते हैं। लोग उन्हें झंझटों में डालकर मजा लेते हैं।

सरजू भैया का तड़पना :
एक दिन सरजू भैया बहुत भयभीत और तड़पते आये। गाँव का एक चालाक और बेईमान आदमी सरजू भैया पर नालिश करने जा रहा है। यदि समय पर उसे पैसे दे दिए जाएँ, तो वह नालिश नहीं करेगा। दूसरे यदि वह रुपये नहीं देता है तो नालिश कर देगा। लेखक ने उसे धन दिया और इन्हें सूदखोर से मुक्त कराया। ऐसी घटनाएँ पनपती रहती हैं। लेखक भी रात भर सो नहीं सका, यह सोचते हुए कि लोग बड़े कृतघ्न होते हैं। सरजू भैया रूपी किसी आधुनिक एन्टोनियों ने किसी कलयुगी शाइलॉक के हाथ में स्वयं अपनी जिन्दगी को गिरबी रख दिया हो, ऐसी दशा हो रही थी।

उपसंहार :
सरजू भैया जैसे अनगिनत लोग होते हैं जो दूसरों की खातिर स्वयं को परेशानी में डाल लेते हैं।

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MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 4 सारणिक

MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 4 सारणिक

सारणिक Important Questions

सारणिक वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न 1.
यदि A, 3 × 3 कोटि का वर्ग आव्यूह है, तो |adj A| का मान है
(a) |A|
(b) |A|2
(c) |A|3
(d) 3 |A|

प्रश्न 2.
यदि a, b, c समांतर श्रेढी में हो, तो सारणिक \(\left|\begin{array}{ccc}
{x+2} & {x+3} & {x+2 a} \\
{x+3} & {x+4} & {x+2 b} \\
{x+4} & {x+5} & {x+2 c}
\end{array}\right|\) का मान होगा –
(a) 0
(b) 1
(c) x
(d) 2x

प्रश्न 3.
आव्यूह A = \(\begin{bmatrix} 2 & 3 \\ 1 & 2 \end{bmatrix}\) हो, तो A-1 होगा –
(a) A-1 = \(\begin{bmatrix} 2 & -3 \\ -1 & 2 \end{bmatrix}\)
(b) A-1 = \(\begin{bmatrix} 2 & -3 \\ 1 & -2 \end{bmatrix}\)
(c) A-1 = \(\begin{bmatrix} -2 & 3 \\ -1 & 2 \end{bmatrix}\)
(d) A-1 = \(\begin{bmatrix} -2 & 3 \\ 1 & -2 \end{bmatrix}\)

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प्रश्न 4.
यदि ω इकाई का घनमूल हो, तो \(\left|\begin{array}{ccc}
{\mathbf{1}} & {\omega} & {\omega^{2}} \\
{\omega} & {\omega^{2}} & {1} \\
{\omega^{2}} & {1} & {\omega}
\end{array}\right|\) =
(a) 1
(b) 0
(c) ω
(d) ω2

प्रश्न 5.
सारणिक \(\left|\begin{array}{ccc}
{a+b} & {a+2 b} & {a+3 b} \\
{a+2 b} & {a+3 b} & {a+4 b} \\
{a+4 b} & {a+5 b} & {a+6 b}
\end{array}\right|\) =
(a) a2 + b2 + c2 – 3abc
(b) 0
(c) a3 + b3 + c3
(d) इनमें से कोई नहीं।

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. यदि = \(\begin{bmatrix} 3 & m \\ 4 & 5 \end{bmatrix}\) हो, तो m = …………………………
  2. सारणिक \(\begin{bmatrix} 2 & -3 \\ 1 & -2 \end{bmatrix}\) में अवयव – 3 का सहखण्ड ……………………….. है।
  3. यदि A = \(\left|\begin{array}{lll}
    {1} & {0} & {1} \\
    {0} & {1} & {2} \\
    {0} & {0} & {4}
    \end{array}\right|\) हो, तो |3A| का मान ………………………………….. है।
  4. सारणिक \(\begin{bmatrix} 1 & log_{ b }a \\ log_{ a }b & 1 \end{bmatrix}\) का मान …………………………….. है।
  5. सारणिक \(\begin{bmatrix} cos70^{ \circ } & sin20^{ \circ } \\ sin70^{ \circ } & cos20^{ \circ } \end{bmatrix}\) का मान है।

प्रश्न 3.
निम्न कथनों में सत्य/असत्य बताइए –

  1. सारणिक \(\left|\begin{array}{ccc}
    {0} & {a} & {-b} \\
    {-a} & {a} & {-c} \\
    {b} & {c} & {0}
    \end{array}\right|\) का मान abc है।
  2. सारणिक \(\left|\begin{array}{ccc}
    {1} & {1} & {1} \\
    {1} & {1+\sin \theta} & {1} \\
    {1} & {1} & {1+\cos \theta}
    \end{array}\right|\) का उच्चिष्ठ मान \(\frac{1}{2}\) है।
  3. यदि A एक 3 × 3 कोटि का आव्यूह हो, तो |kA| का मान k2 |A| होगा।
  4. यदि \(\begin{vmatrix} x & 2 \\ 18 & x \end{vmatrix}\) = \(\begin{vmatrix} 16 & 2 \\ 18 & 6 \end{vmatrix}\) तो x का मान ±3 है।
  5. सारणिक \(\begin{vmatrix} 1 & \omega \\ \omega & -\omega \end{vmatrix}\) का मान 1 है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

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प्रश्न 4.
एक शब्द/वाक्य में उत्तर दीजिए –

  1. k के कितने मानों के लिए रैखिक समीकरणों 4x + ky + 2x = 0, kx +4y + 2 = 0, 2x +2y + z = 0 का एक शून्येत्तर हल होगा।
  2. यदि समीकरण 2x2 + 3x + 5 = 0 के मूल α, β हों, तो \(\left|\begin{array}{lll}
    {0} & {\beta} & {\beta} \\
    {\alpha} & {0} & {\alpha} \\
    {\beta} & {\alpha} & {0}
    \end{array}\right|\) का मान ज्ञात कीजिए।
  3. यदि शीर्षों (2, – 6), (5, 4) और (k, 4) वाले त्रिभुज का क्षेत्रफल 35 वर्ग एकांक हो, तो k का मान ज्ञात कीजिए।
  4. यदि A = \(\begin{vmatrix} x+2 & -2 \\ -3x & 2x \end{vmatrix}\) = 8 हो, तो x का मान ज्ञात कीजिए।
  5. सारणिक \(\left|\begin{array}{ccc}
    {1^{2}} & {2^{2}} & {3^{2}} \\
    {2^{2}} & {3^{2}} & {4^{2}} \\
    {3^{2}} & {4^{2}} & {5^{2}}
    \end{array}\right|\) का मान ज्ञात कीजिए।

उत्तर:

  1. 2
  2. –\(\frac{15}{4}\)
  3. 12, -2
  4. 2
  5. -8.

सारणिक अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
\(\begin{vmatrix} 2 & 20 \\ 1 & 6 \end{vmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
-8

प्रश्न 2.
\(\begin{vmatrix} -6 & 2 \\ 3 & y \end{vmatrix}\) = 24 तो y का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
-5

प्रश्न 3.
\(\begin{vmatrix} 2 & 4 \\ x & 0 \end{vmatrix}\) तो का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
4

प्रश्न 4.
यदि \(\begin{vmatrix} a & b \\ c & d \end{vmatrix}\) तो \(\begin{vmatrix} 3a & 3b \\ 3c & 3d \end{vmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
45

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प्रश्न 5.
यदि \(\begin{vmatrix} a & \omega \\ \omega & -\omega \end{vmatrix}\) हो, तो छ का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
1

प्रश्न 6.
यदि \(\begin{vmatrix} 3 & m \\ 4 & 5 \end{vmatrix}\) = 3 हो, तो m का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
3

प्रश्न 7.
यदि \(\begin{vmatrix} 2 & x \\ 4 & 9 \end{vmatrix}\) = 30 हो, तो x का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
-3

प्रश्न 8.
यदि \(\begin{vmatrix} 4 & -3 \\ m & m \end{vmatrix}\) = 21 तो m का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
3

प्रश्न 9.
यदि \(\begin{vmatrix} 2 & 4 \\ 3 & x \end{vmatrix}\) हो, तो x का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
9

प्रश्न 10.
यदि \(\begin{vmatrix} 4 & -3 \\ -m & m \end{vmatrix}\) = 21 हो, तो m का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
21

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प्रश्न 11.
यदि \(\begin{vmatrix} -6 & 2 \\ 3 & m \end{vmatrix}\) = 12 हो, तो m का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
-3

प्रश्न 12.
यदि \(\begin{vmatrix} 4 & -6 \\ -2 & x \end{vmatrix}\) = 20 हो, तो x का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
8

प्रश्न 13.
यदि ω, ω2 इकाई के सम्मिश्र घनमूल हों, तो \(\begin{vmatrix} 1 & \omega \\ \omega & -\omega \end{vmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
1

प्रश्न 14.
\(\left|\begin{array}{ccc}
{224} & {777} & {32} \\
{735} & {888} & {105} \\
{812} & {999} & {116}
\end{array}\right|\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
0

प्रश्न 15.
यदि सारणिक \(\begin{vmatrix} x & 4 \\ 3 & 3 \end{vmatrix}\) = 0 हो, तो x का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
4

प्रश्न 16.
\(\begin{vmatrix} 2+3i & 4 \\ 1 & 2-3i \end{vmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
9

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प्रश्न 17.
सारणिक \(\begin{vmatrix} 2 & -3 \\ 1 & -2 \end{vmatrix}\) में अवयव – 3 का सहखण्ड क्या है?
उत्तर:
1

प्रश्न 18.
यदि \(\begin{vmatrix} 3 & -2 \\ -4 & x \end{vmatrix}\) = 16 हो, तो x का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
8

प्रश्न 19.
\(\begin{vmatrix} 1 & log_{ b }a \\ log_{ a }b & 1 \end{vmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
0

प्रश्न 20.
सारणिक \(\begin{vmatrix} 1 & 3 \\ 2 & 4 \end{vmatrix}\) में अवयव 2 का उपसारणिक क्या होगा?
उत्तर:
3

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प्रश्न 21.
\(\begin{vmatrix} 2+5i & 5 \\ 4 & 2-5i \end{vmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
9

प्रश्न 22.
\(\begin{vmatrix} cotx & cosecx \\ cosecx & cotx \end{vmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
-1

प्रश्न 23.
\(\begin{bmatrix} cos70^{ \circ } & sin20^{ \circ } \\ sin70^{ \circ } & cos20^{ \circ } \end{bmatrix}\) का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
0

सारणिक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न – I

प्रश्न 1.
सिद्ध कीजिए –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{a+b+2 c} & {a} & {b} \\
{c} & {b+c+2 a} & {b} \\
{c} & {a} & {c+a+2 b}
\end{array}\right|\) = 2(a + b + c)3?
हल:
माना
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 4 सारणिक
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प्रश्न 2.
सिद्ध कीजिए कि \(\left|\begin{array}{ccc}
{a^{2}+1} & {a b} & {a c} \\
{a b} & {b^{2}+1} & {b c} \\
{a c} & {b c} & {c^{2}+1}
\end{array}\right|\) = 1 + a2 + b2 + c2? (NCERT; CBSE 2014)
हल:
माना
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प्रश्न 3.
सिद्ध कीजिए कि \(\left|\begin{array}{ccc}
{a^{2}} & {b c} & {a c+c^{2}} \\
{a^{2}+a b} & {b^{2}} & {a c} \\
{a b} & {b^{2}+b c} & {c^{2}}
\end{array}\right|\) = 4a2 b2 c2? (NCERT; CBSE 2015)
हल:
माना
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= 2abc2 [-a(a – b) + a (a + b)]
= 2a2bc2 [-a + b + a + b]
= 2a2bc2. 2b = 4a2 b2 c2

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प्रश्न 4.
निम्न सारणिक को हल कीजिए
\(\left|\begin{array}{ccc}
{x+1} & {3} & {5} \\
{2} & {x+2} & {5} \\
{2} & {3} & {x+4}
\end{array}\right|\) = 0?
हल:
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प्रश्न 5.
सिद्ध कीजिए कि
\(\left|\begin{array}{ccc}
{\alpha} & {\beta} & {\lambda} \\
{\alpha^{2}} & {\beta^{2}} & {\lambda^{2}} \\
{\beta+\lambda} & {\lambda+\alpha} & {\alpha+\beta}
\end{array}\right|\) = (α – β) (β – λ) (λ – a) (α + β + λ)?
नोट -α = a,
β = b,
λ = c भी रखा जा सकता है।
हल:
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प्रश्न 6.
सिद्ध कीजिए कि
\(\left|\begin{array}{ccc}
{1+a} & {1} & {1} \\
{1} & {1+b} & {1} \\
{1} & {1} & {1+c}
\end{array}\right|\) = (abc + ab + bc + ca) = (abc) (1 + \(\frac{1}{a}\) + \(\frac{1}{b}\) + \(\frac{1}{c}\) )? (NCERT; CBSE 2012, 14)
हल:
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प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{-a^{2}} & {a b} & {a c} \\
{a b} & {-b^{2}} & {b c} \\
{a c} & {b c} & {-c^{2}}
\end{array}\right|\) = 4a2b2c2?
हल:
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प्रश्न 8.
समीकरण हल कीजिए –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{3 x-8} & {3} & {3} \\
{3} & {3 x-8} & {3} \\
{3} & {3} & {3 x-8}
\end{array}\right|\) = 0?
हल:
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प्रश्न 9.
समीकरण \(\left|\begin{array}{lll}
{a+x} & {a-x} & {a-x} \\
{a-x} & {a+x} & {a-x} \\
{a-x} & {a-x} & {a+x}
\end{array}\right|\) = 0 को हल कीजिए।
हल:
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प्रश्न 10.
सिद्ध कीजिए कि –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{a} & {a+b} & {a+b+c} \\
{2 a} & {3 a+2 b} & {4 a+3 b+2 c} \\
{3 a} & {6 a+3 b} & {10 a+6 b+3 c}
\end{array}\right|\) = a3? (NCERT)
हल:
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प्रश्न 11.
सिद्ध कीजिए कि –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{x} & {x+y} & {x+2 y} \\
{x+2 y} & {x} & {x+y} \\
{x+y} & {x+2 y} & {x}
\end{array}\right|\) = -2(x3 + y3)? (NCERT)
हल:
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प्रश्न 12.
सिद्ध कीजिए कि –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{x+4} & {2 x} & {2 x} \\
{2 x} & {x+4} & {2 x} \\
{2 x} & {2 x} & {x+4}
\end{array}\right|\) = (5x + 4) (4 – x)2? (NCERT)
हल:
माना
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प्रश्न 13.
सिद्ध कीजिए कि –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{x} & {y} & {x+y} \\
{y} & {x+y} & {x} \\
{x+y} & {x} & {y}
\end{array}\right|\) = -2(x3 + y3)? (NCERT)
हल:
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प्रश्न 14.
सिद्ध कीजिए कि –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{a^{2}+2 a} & {2 a+1} & {1} \\
{2 a+1} & {a+2} & {1} \\
{3} & {3} & {1}
\end{array}\right|\) = (a – 1)3? (CBSE 2017)
हल:
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प्रश्न 15.
सिद्ध कीजिए कि –
\(\left|\begin{array}{ccc}
{1} & {1} & {1+3 x} \\
{1+3 y} & {1} & {1} \\
{1} & {1+3 z} & {1}
\end{array}\right|\) = 9(3xyz + xy + yz + zx)? (CBSE 2018)
हल:
माना
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MP Board Class 12 Maths Important Questions

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 4 Reproductive Health

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 4 Reproductive Health

Reproductive Health Important Questions

Reproductive Health Objective Type Questions

Question 1.
Choose the correct answers:

Question 1.
The gestation period in human female is :
(a) 30 days
(b) 200 days
(c) 250 days
(d) 270-280 days.
Answer:
(d) 270-280 days.

Question 2.
In population growth curve the early phase is also called as :
(a) Exponential phase
(b) Stationary phase
(c) Lag period
(d) None of these.
Answer:
(c) Lag period

Question 3.
Removal of fallopian tube in human female is called :
(a) Vesectomy
(b) Tubectomy
(c) Ovaritectomy
(d) Castration.
Answer:
(b) Tubectomy

Question 4.
The cause of population explosion in large cities is : (MP 2009 Set A)
(a) Chances of education
(b) Available facilities
(c) Sources of income
(d) All of these.
Answer:
(d) All of these.

Question 5.
Population density is more in : (MP 2009 Set B)
(a) USA
(b) India
(c) China
(d) Japan.
Answer:
(b) India

Question 6.
Ratio of death rate and birth rate percentage is called : (MP 2016)
(a) Organic index
(b) Demography
(c) Population density
(d) Total population.
Answer:
(a) Organic index

Question 7.
Which of the following is the best solution of population problem in India :
(a) Conservation of natural resources
(b) Growth of medicinal fascility
(c) Decreasing in birth rate
(d) Increasing in food product.
Answer:
(c) Decreasing in birth rate

Question 8.
In which state has less population density :
(a) Manipur
(b) Rajasthan
(c) Meghalaya
(d) Arunachal pradesh.
Answer:
(d) Arunachal pradesh.

Question 9.
Meaning of test tube-baby, when child :
(a) Produce from unfertilized egg
(b) Developed in test-tube
(c) Developed by tissue culture
(d) Fertilization of ovum to out side the body then transplant in uterus.
Answer:
(d) Fertilization of ovum to out side the body then transplant in uterus.

Question 10.
Study of human population growth is :
(a) Anthropology
(b) Sociology
(c) Demography
(d) Geography.
Answer:
(c) Demography

Question 11.
Amniocentesis is used for determining :
(a) Heart disease
(b) Brain disease
(c) Hereditary disease of embryo
(d) All of these.
Answer:
(c) Hereditary disease of embryo

Question 12.
Amniocentesis is the withdrawal of amniotic fluid in :
(a) Menopause
(b) Lactation
(c) Gastation
(d) Pregnancy.
Answer:
(d) Pregnancy.

Question 2.
Fill in the blanks :

  1. Statisitical study of population is called ………………
  2. According to Malthus population grows ……………… whereas the means of its subsistinance grows ………………
  3. According to census 2001, the population of India was ………………
  4. The entry and exit of member in any population is called ………………
  5. Cutting and ligating ends of segments of vas deferense is called ………………
  6. The testing of sex of embryo is done by ………………
  7. Immigration ……………… the population.
  8. Study of differences in foetus is called ………………
  9. Theory of population growth was given by ………………

Answer:

  1. Demography
  2. Geometrically Arithmatically
  3. 1,02,70,15,247
  4. Migration
  5. Vasectomy
  6. Amniocentesis
  7. Increases
  8. Teratology
  9. Malthus.

Question 3.
Match the followings :
I.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 4 Reproductive Health Important Questions 1
Answer:

  1. (b)
  2. (d)
  3. (a)
  4. (c)
  5. (e).

II.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 4 Reproductive Health Important Questions 2
Answer:

  1. (d)
  2. (e)
  3. (c)
  4. (b)
  5. (a).

Question 4.
Write the answer in one word/senteces :

  1. Give the full name of IUCD.
  2. Write a disease which is transmitted by sexual contact.
  3. Write the full name of ZIFT.
  4. Name the method in which cutting and binding of spermatic duct in male.
  5. What is the name of the study of population?
  6. World population day celebrated on.
  7. Name the process in which implantation of embryo in fallopian tube.
  8. Name the stage of life which is called puberty.
  9. Name the disease caused by HIV.
  10. Who gave the human population growth theory?
  11. Write the name of technique in which testing of amniotic fluid to find out the sex and disorders of the foetus.
  12. Name the technique by which found the AIDS.
  13. Write the lull name of GIFT.
  14. Name the technique in which removal of a segment of oviduct.

Answer:

  1. Intrauterine Contraceptive Device
  2. Gonorrhoea
  3. Zygote Intrafallopian Transfer
  4. Vasectomy
  5. Demography
  6. 11 July
  7. Actopic pregnancy
  8. 13 to 18 years
  9. AIDS
  10. T.R.Malthus
  11. Amniocentesis
  12. ELISA test
  13. Gamete Intrafaillopian Transfer
  14. Tubectomy.

Reproductive Health Important Questions Very Short Answer Type Questions

Question 1.
Write one benefit of condom.
Answer:
Condom provides protection from Sexually Transmitted Diseases (STDs).

Question 2.
What is the name of contraceptive pill which is taken only in once in a week?
Answer:
“Saheli.”

Question 3.
Write the full form of IUCD.
Answer:
Intra Uterine Contraceptive Device.

Question 4.
Write the full form of STDs.
Answer:
Sexually Transmitted Diseases.

Question 5.
What is the legal age for marriage of male and female in India?
Answer:
For male 21 Years and for female 18 years.

Question 6.
Write the name of two STDs which are spread through infected blood.
Answer:
AIDS, Hepatitis – B.

Question 7.
Write the name of two diseases which are caused by sexual contact.
Answer:
Gonorrhoea, Syphilis.

Question 8.
Write the full form of HIV and AIDS.
Answer:
HIV : Human Immunodeficiency Virus.
AIDS : Acquired Immune Deficiency Syndrome.

Question 9.
Write the full form of ZIFT.
Answer:
Zygote Intrafallopian Transfer.

Question 10.
What is the process for surgical sterilization in males called?
Answer:
Vasectomy.

Reproductive Health Short Answer Type Questions

Question 1.
Explain the following :

  1. Tubectomy
  2. Vasectomy.

Answer:
1. Tubectomy:
The surgical removal of a segment of oviduct and then ligating the cut end is called tubectomy. It is applied in females to check the pregnancy.

2. Vasectomy:
Surgical cutting and ligating ends of segments of vas deferens is called vasectomy.

Question 2.
What is amniocentesis? Write its effects and two advantages.
Answer:
Amniocentesis:
It is prenatal diagnostic technique in which amniotic fluid of uterus is isolated by a surgical needle and foetus cells are cultured on a culture medium and chromosomes are examined.

This technique is used to understand the following things or Advantages:

  1. Chromosomal abnormalities like that of Down’s syndrome, Philadelphia syndrome and Edward’s syndrome.
  2. Metabolic disorders like that of PKV, Cretinism, Alkaptonuria, etc.
  3. Sex of the embryo can be examined by this technique.

Effects of amniocentesis:
Due to this type of test, the female embryos are being eradicated. This leads into the decrease in number of females which may cause a serious problem.

Question 3.
Explain the social causes of human population growth.
Answer:
Social causes of human population growth rate are:

  1. Illiteracy in society.
  2. Low level of society.
  3. Various orthodox tradition like son leads to progeny.
  4. Social barriers.
  5. Early child marriage presuming that after mid-age marriage reproductive capacity degenerates.
  6. Social backwardness.
  7. Social set – up that “Putra Ratan se Moksh milta hai”.

Question 4.
What do you think about the significance of reproductive health in a society?
Answer:
Significance of reproductive health in a society are:

  1. Control over the transmission of STDs.
  2. Less death due to reproduction related diseases, like AIDS, cancer of reproductive tract.
  3. Control in population explosion.
  4. Not only this reproductive health of men and women affectsthe health of the next generation.

Question 5.
Suggest the aspects of reproductive health which need to be given special attention in the present scenario.
Answer:
Special attention need to be given to the following aspects:

  1. Introduction of sex education in school that to helps in eradicating myths and misconceptions regarding sex – related aspects.
  2. Proper information about reproductive organs, safe and hygienic sexual practices and Sexually Transmitted Diseases.
  3. Awareness of problems due to uncontrolled population growth, social evils like sex abuse and sex – related crimes etc.
  4. Strong infrastructural facilities, professional expertise and material support to provide medical assistance and care to people in reproduction related problems.
  5. Educating people about available birth control options, care of pregnant mothers, postnatal care of mother and child, importance of breast feeding, equal opportunities for the male and female child.

Question 6.
Is sex education necessary in schools. Why?
Answer:
Yes, sex education is necessary in schools because:

  1. It will provide proper information about reproductive organs, adolescence, safe, hygienic sexual practices and Sexually Transmitted Diseases (STDs).
  2. It will provide right information to avoid myths and misconceptions about sex related queries.

Question 7.
Do you think that reproductive health in our country has improved in the past 50 years? If yes, mention some such areas of improvement.
Answer:
Yes, reproductive health in our country has improved in the last 50 years.

Some areas of improvement are:

  1. Better awareness about sex-related matters.
  2. Increased number of medically assisted deliveries and better post-natal care of child and mother leading to decreased maternal and infant mortality rates.
  3. Increased number of couples with small families.
  4. Better direction and cure of STDs and overall increased medical facilities for all sex – related problems.

Question 8.
What are the suggested reasons of population explosion?
Answer:
The situation where population exceeds productive capacity is known as popu-lation explosion. In nature, the amount of resources are limited hence, if the population increases in the present rate and increasing beyond the limit, they (Resources) would get exhausted.

Reasons of population explosion : Following are the reasons of population explosion:

  1. Increasing birth rate.
  2. Decreasing death rate.
  3. Higher rate of reproduction.
  4. Medical services have brought down mortality due to fatal diseases and epidemics.
  5. Lack of predator in the civilized world today, the only predator of man is man himself.

Question 9.
Is the use of contraceptives justified? Give reasons.
Answer:
Yes, use of contraceptive is justified because it helps to control the rapid growth of human population. It will also help in preventing unwanted pregnancies and STDs. Contraceptive also help in controlling the population growth rate.

Question 10.
Removal of gonads can not be considered as a contraceptive option, why?
Answer:
Removal of gonads not only stops the production of gametes but will also stop the secretions of various important hormones, which are important for bodily func¬tions. This method is irreversible and thus, can not be considered as a contraceptive method.

Question 11.
Amniocentesis for sex determination is banned in our country. Is this ban necessary? Comment.
Answer:
Yes, the ban is necessary because amniocentesis is misused for determining the sex of the foetus and then aborting the child if it is a female. This process is illegal as it causes harm to the foetus as well as mother it can also disturb the sex ratio.

Question 12.
What is test – tube baby?
Answer:
In some cases, a woman is unable to have a normal fertilization to bear the child. In such cases, test – tube technique may be successful. In this technique, the unfertilized eggs of such woman is isolated in aseptic condition and fertilized it in test – tube by the sperms of her husband. The fertilized egg or blastocyst can be maintained in vitro till it gets 32 celled stage. It can be implanted in the uterus of the female. The female remains under the supervision of doctor till completion of gestation period of 280 days. The baby produced in such a way is called a test – tube baby.

Question 13.
What is GIFT? Explain in brief.
Answer:
GIFT (Gametes Intrafallopian Transfer): It is a latest technique to produce a child. In this technique, the gametes are kept separately in a catheter and injected directly into the fallopian tube of the woman using laproscopy. Thus, in this case, fertilization occurs inside the body of woman. Prior to injection of gametes, the mother would be given hormones for about a week to stimulate follicle formation. This causes development of several eggs i.e., super ovulation. The first GIFT in India was done in Mumbai and twins were born in August, 1990.

Reproductive Health Long Answer Type Questions

Question 1.
Suggest some methods to assist infertile couples to have children.
Answer:
If the couples are enable birth the children and corrections are not possible, the couples could be assisted to have children through certain special techniques, com¬monly known as Assisted Reproductive Technologies (ART). Some methods are given as:

(1) In Vitro Fertilization (IVF):
In this method, ova from the female and the sperm from the male are collected and induced to form zygote under stimulated conditions in the laboratory. This process is called In Vitro Fertilization (IVF). Some method given as follows:

1. Zygote Intrafallopian Transfer (ZIFT):
The zygote or early embryo with up to 8 blastomeres is transferred into the fallopian tube.

2. Intra Uterine Transfer (IUT):
Embryo with more than 8 blastomeres is trans – ferred into the uterus in females who cannot conceive embryos formed by fusion of gametes in another female are transfered.

3. Test – tube baby:
In this method, ova from the donor (female) and sperm from the donor (male) are collected and are induced to form zygote under stimulated conditions in the laboratory. The zygote could then be transferred into the fallopian tube and embryos transferred intc the uterus, to complete its further development. The child bom from this method is called test-tube baby.

(2) Gamete Intrafallopian Transfer (GIFT):
It is the transfer of an ovum collected from a donor into the fallopian tube of another female who cannot produce one, but can provide suitable environment for fertilization and further development of the embryo.

(3) Intra Cytoplasmic Sperm Injection (ICSI):
It is a procedure to form an embryo in the laboratory by directly injecting the sperm into an ovum.

(4) Artificial Insemination (AI):
In this method, the semen collected either from the husband or a healthy donor is artificially introduced into the vegina or into the uterus (Intra Uterine Insemination, IUI). This technique is used in cases where the male is unable to inseminate sperms in the female reproductive tract or due to very low sperm counts in the ejaculation.

(5) Host Mothering:
In this process, the embryo is transferred from the biological mother to a surrogate mother. The embryo then develops till it is fully developed or partially developed. It is then transferred to the biological mother or into any other. This technique is useful for females in which embryo forms but is not able to develop.

Question 2.
What are the measures one has to take to prevent from contracting STDs?
Answer:
STDs can be prevented by the following methods:

  1. Avoid sex with unknown partners/multiple partners.
  2. Always use condoms during coitus.
  3. Always contact a qualified doctor for any doubt in early stage of infection and get complete treatment if diagnosed with disease.

Question 3.
State True/False with explanation.

Question (a)
Abortion could happen spontaneously too. (True/False)
Answer:
False, Abortion does not happen under normal conditions. It happens accidently or under the will of Parents.

Question (b)
Infertility is defined as the inability to produce a viable offspring and is always due to abnormalities/defects in the female partner. (True/False)
Answer:
False, Sterility always does not occur due to female. Sometimes males are also responsible for this.

Question (c)
Complete lactation could help as a natural method of contraception. (True/False)
Answer:
True, Menstrual cycle does not occur after parturition which can act as natural contraception but this method is functional for a period of six months from parturition.

Question (d)
Creating awareness about sex related aspects is an effective method to im-prove reproductive health of the people. (True/False)
Answer:
True, this creates better reproductive health among people.

Question 4.
Correct the following statements:

Question (a)
Surgical methods of contraception prevent gamete formation.
Answer:
It prevents the transportation of gametes not their formation.

Question (b)
All sexually transmitted diseases are completely curable.
Answer:
Hepatitis – B and AIDS are not curable.

Question (c)
Oral pills are very popular contraceptives among the rural women.
Answer:
Oral pills are not popular among rural women. They require sex education.

Question (d)
In E.T. techniques, embryos are always transferred into the uterus.
Answer:
In E.T. techniques, 8 – celled blastomere is transferred into the fallopian tube. While more than 8 – celled blastomere is transferred into the uterus.

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 11 समय का मोल

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 11 समय का मोल

समय का मोल अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
लेखक ने यौवन को जीवन का मक्खन क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक का कथन है कि यदि व्यक्ति इस उम्र में अपने समय का सदुपयोग रचनात्मक कार्यों में करता है तो उसका परिणाम निश्चित ही अच्छा प्राप्त होता है जो जीवन के अन्य पड़ावों में प्राप्त नहीं हो पाता है। अतः लेखक ने इसको जीवन का मक्खन कहा है।

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प्रश्न 2.
लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि “शिखर के बजाए तलहटी में ही जीवन कट जाएगा?”
उत्तर:
यदि व्यक्ति ने अपने जीवन काल के सबसे ऊर्जावान समय जवानी को मनोरंजन, अवकाश और व्यसनों आदि में व्यर्थ व्यतीत कर दिया और वह जागरूक नहीं हो पाया कि यह समय तो सर्वश्रेष्ठ उपयोग में लेने का था तो निश्चित ही वह सफलता के शिखर को छूने से वंचित रह जायेगा। इसीलिए लेखक का कथन है कि “शिखर के बजाए तलहटी में ही जीवन कट जाएगा।”

प्रश्न 3.
“हम पसीने की कमाई खर्च करके विष खरीदते हैं।” इस पंक्ति से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
लेखक का आशय है मनोरंजन जीवन के महत्त्व को कम करने वाला रह गया है। जब मन दुःखी हो, अवसादग्रस्त या थका हो तभी मनोरंजन की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार बिना भूख लगे खाने से कष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मन को रंजन में लगा देने का भी परिणाम अच्छा नहीं आता, मन भटक जाता है, प्रमादी हो जाता है। आज जिस प्रकार रंजन हो रहा है वह तो मन तक पहुँचता ही नहीं। अखबार, मैंगजीनों का चटपटापन जीवन में प्रतिदिन धीमे विष की तरह मन को दूषित करता है। अत: लेखक का कथन है कि हम मनोरंजन पर पसीने की कमाई खर्च करके विष खरीदते हैं।

प्रश्न 4.
प्रबंधन के गुरु की बात जीवन को किस प्रकार सार्थक बनाती है?
उत्तर:
प्रबंधन गुरु का कहना है कि प्रत्येक कार्य को उसके परिणाम को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। परिणाम ही जीवन का लक्ष्य बनता है और उसी के अनुसार व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यही बात जीवन को सार्थक बनाती है।

प्रश्न 5.
जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए?
उत्तर:
जीवन का लक्ष्य ‘घटिया विषय से दूरी और सर्वश्रेष्ठ का चुनाव’ होना चाहिए। सत्संगति पाकर व्यक्ति का जीवन स्वयं श्रेष्ठता को प्राप्त कर लेता है जैसे कि “जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी वास सुवास।”

प्रश्न 6.
व्यक्तित्व का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
जीवन का लक्ष्य कार्य का परिणाम होता है और उसी के अनुरूप मन में चेतना की जागृति हो जाती है और उसी तरह के व्यक्तित्व का निर्माण हो जाता है।

समय का मोल अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवन मूल्यों का कार्य क्या है?
उत्तर:
जीवन मूल्यों का प्रमुख कार्य जीवन का मूल्य बनाए रखना है।

प्रश्न 2.
लेखक ने जवानी को क्या कहा है?
उत्तर:
लेखक ने जवानी को जीवन का मक्खन कहा है।

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समय का मोल पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
लेखक व्यक्ति को समय के मूल्य को समझने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि व्यक्ति समय के मूल्य को स्वयं नहीं समझ सका तो कोई दूसरा उसे नहीं समझायेगा और उसका पूरा जीवन व्यर्थ ही निकल जायेगा। अतः जीवन का मुख्य कार्य समय के मूल्य को समझना ही है।

समय के मूल्य की समझ आवश्यक :
आज व्यक्ति को सोचने की आवश्यकता है कि वह जिस मार्ग पर जा रहा है, उसकी मंजिल कहाँ है? समय कम है, मार्ग भटकने पर उसे मार्ग दर्शन किससे मिलेगा? क्योंकि मार्ग की दिशा पूछने में भी अपने आप में शर्म महसूस करता है।

समय के मूल्य को जानने के लिए कार्य के उद्देश्य को नहीं भूलना होगा। हम घर से जिस कार्य को करने निकले हैं, उसे पूरा न करके व्यर्थ की बातों में दोस्तों के साथ समय व्यर्थ न गवाएँ। हमें याद रहे कि हमें दुकान से क्या खरीदना है? टी. वी. चलाने के बाद टी. वी. में क्या देखना है? अच्छे और बुरे, आवश्यक और अनावश्यक, लाभ और हानि के बीच भेद को पहचानना होगा। यदि इस भेद को न जानकर हमने समय गँवा दिया और हम अपने कार्य पूर्ण नहीं कर पाये तो यह स्पष्ट है कि हमें समय की कीमत का अहसास नहीं है।

समय का सदुपयोग :
हम कहते हैं, जवानी जीवन का मक्खन है। जो इस उम्र में कार्य करते हैं, उसी का फल हमें पूरी उम्र व्यतीत करने के लिए मिल जाता है। परन्तु हमें याद रखना है कि इसका एक-एक क्षण कीमती है, व्यर्थ में एक क्षण भी नष्ट न होने पाये।

यदि हमने जवानी को मनोरंजन बना दिया, अवकाश का समय मान लिया और हम जागरूक नहीं हुए कि यह तो तपस्या का समय है, सफलता के शिखर को छूने का समय है तो निश्चित है कि हम जीवन के सर्वश्रेष्ठ काल का उपयोग नहीं कर पायेंगे।

हमें मनोरंजन के सही अर्थ को समझना होगा। जब मन दुःखी होता है, अवसादग्रस्त या थका होता है, तब मनोरंजन की आवश्यकता होती है। आज का मनोरंजन जीवन के महत्व को कम करने वाला रह गया है। हमें चिन्तनशील विषय पढ़ने-देखने में अच्छे नहीं लगते। सिनेमा, फैशन आदि ऐसे विषय नहीं हैं कि जिन पर घण्टों चर्चा की जाए। अखबार, मैगजीनों का चटपटापन धीमे विष की भाँति मन को दूषित कर रहा है। हमें समय का सदुपयोग करना ही होगा तभी हम जीवन के लक्ष्य को पा सकेंगे।

संकल्प :
आज हमें संकल्प करना ही होगा कि हम अनावश्यक कुछ नहीं करेंगे। समय का रचनात्मक कार्यों में ही उपयोग करेंगे। समय लौटकर नहीं आता। समय ही तो जीवन है। यह हमें हमेशा याद रखना होगा। कार्य का परिणाम ही जीवन का लक्ष्य होता है और इसको हम तभी प्राप्त कर सकते हैं जब हम अच्छे लोगों के सामीप्य में आयें और सार्थक करें-
महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नति कारकः।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अभ्यास

सामाजिक समरसता अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा किस ज्ञान को उपयोगी माना है?
उत्तर:
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष ज्ञान को उपयोगी माना है।

प्रश्न 2.
राधा दुःखी माता यशोदा को क्या कहकर सांत्वना देती थीं?
उत्तर:
‘श्रीकृष्ण ब्रज को कैसे छोड़ सकते हैं वे अवश्य लौटकर आयेंगे’ यह कहकर राधा यशोदा को सांत्वना देती थीं।

प्रश्न 3.
राधा अपने विरह जनित दुःख को छिपाने के लिए किस प्रकार का बहाना बनाती थीं?
उत्तर:
‘मैं रो नहीं रही हूँ, मेरी आँखों में अति हर्ष का पानी छलक आया है।’ यह बहाना बनाकर राधा अपने दुख को छिपाती थीं।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के व्यथित होने का क्या कारण था? (201 15, 16)
उत्तर:
श्रीकृष्ण का ब्रज छोड़कर मथुरा चले जाना ब्रजवासियों के व्यथित होने का कारण था।

प्रश्न 5.
कबीर का मन फकीरी में क्यों सुख पाता है?
उत्तर:
नाशवान जगत से परे रहकर राम नाम के भजन का आनन्द मिलने के कारण कबीर को फकीरी में सुख प्राप्त होता है।

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सामाजिक समरसता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने संसार को पागल क्यों कहा है? भाव स्पष्ट कीजिए। (2017)
अथवा
‘साधो देखो जग बौराना’ पद के माध्यम से कबीर क्या कहना चाहते हैं? (2008)
उत्तर:
कबीर कहते हैं कि संसार पागल हो गया है। उससे सत्य बात कही जाय तो वह मारने दौड़ता है और जो झूठ कहते हैं उनका वह विश्वास कर लेता है। हिन्दू और मुसलमान राम तथा रहीम नाम पर झगड़ते हैं जबकि दोनों एक ही हैं। नियमी-धर्मी और पीर-औलिया नाना पाखण्ड करते हैं किन्तु संसार उन्हीं के बहकावे में आ जाता है। संसार के लोग सच्चे गुरु द्वारा बताए गए ज्ञान के मार्ग का अनुसरण न करके जीवन को नष्ट करने वाले संसार की ओर आकर्षित होते हैं। इससे स्पष्ट है कि वे पागल हो गए हैं।

प्रश्न 2.
कबीर ने कर्मकाण्ड पर करारा प्रहार किया है। स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
कबीर धार्मिक पाखण्ड के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कर्मकाण्ड पर करारे प्रहार किये हैं। वे कहते हैं किं बहुत से तथाकथित नियमों का पालन करने वाले धर्मात्मा मिले हैं जो प्रात:काल ही स्नान कर लेते हैं किन्तु आत्मा की आवाज न मानकर स्थूल पत्थर की पूजा करते हैं। उनका ज्ञान खोखला एवं दिखावटी है। इसी प्रकार अनेक पीर-औलिया देखें हैं जो वक्तव्य देकर अपने शिष्य बनाते हैं, किन्तु वे भी खुदा को नहीं जानते हैं। उनके हृदय में दया, अनुकम्पा आदि मानवीय भाव नहीं होते हैं।

प्रश्न 3.
राधा ने विरह व्यथा में डूबे ब्रजवासियों को कर्त्तव्य पालन का उपदेश क्यों दिया था? (2008)
उत्तर:
भारतीय संस्कृति का मूलाधार कर्म है। यहाँ कर्म को सर्वोपरि माना गया है। जीवन की सार्थकता कर्म में ही है। इसलिए राधा श्रीकृष्ण के विरह की वेदना में डूबे ब्रजवासियों को समझाती हैं कि उन्हें श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लग जाना चाहिए। इससे श्रीकृष्ण जो चाहते थे वे कार्य पूर्ण होंगे और ब्रजवासियों को भी सन्तोष होगा कि वे श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों को कर रहे हैं। कर्म करने से व्यक्ति को मानसिक सन्तोष भी मिलता है। ब्रजवासी जब कामों में लग जायेंगे तो उनका ध्यान भी बँटेगा। वे धीरे-धीरे विरह कष्ट से छुटकारा पा लेंगे।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के सुख-दुःख दूर करने के लिए राधा ने क्या-क्या उपाय किए थे?
उत्तर:
राधा ने नन्द, यशोदा, गोप, गोपियों, बच्चों, पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों के प्रति दया, सहानुभूति एवं सेवा का भाव अपनाया। उन्होंने यशोदा को कृष्ण के लौटने का आश्वासन दिया तो नंद को शास्त्रों का ज्ञान सुनाया। गोपों को श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाकर, बालकों को फूलों के खिलौने देकर तथा गोपियों को कृष्ण की लीला के गीत, वंशी तथा वीणा सुनाकर प्रसन्न किया। उन्होंने वृद्ध-रोगियों तथा अनाथों की सेवा की तथा दीन-हीन, निर्बलों एवं विधवाओं को सहारा दिया। इस तरह उन्होंने सभी के संताप (दुःख) दूर करने के लिए अनेक उपाय अपनाए।

प्रश्न 5.
राधा ब्रजबालाओं का दुःख किस प्रकार दूर करती थी?
उत्तर:
राधा ने ब्रजबालाओं का विरह दुःख दूर करने के लिए सेवा धर्म अपनाया था। उन्होंने यशोदा का दुःख पैर सहलाकर, आँखों के आँसू पोंछकर तथा सांत्वना देकर दूर किया तो नन्द का दुःख उनकी सेवा करके तथा शास्त्र ज्ञान सुनाकर समाप्त किया। गोपों की पीड़ा को कम करने के लिए उन्हें श्रीकृष्ण के काम में लगाया। विरहिणी गोपियों को श्रीकृष्ण की लीलाएँ वंशी आदि सुनाई और उनके दुःख को शान्त करने का प्रयास किया। बच्चों को फूलों के खिलौने देकर प्रसन्न करती तो रोगियों, अनाथों, विधवाओं, दीन-हीनों को सहारा देकर उनका कष्ट मिटाया। इस तरह राधा सभी की वेदना दूर करने का प्रयास करती थीं।

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सामाजिक समरसता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संकलित अंशों के आधार पर कबीर के विचार लिखिए।
उत्तर:
इस प्रश्न के उत्तर के लिए ‘कबीर की वाणी’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
(अ) मन लाग्यौ मेरा फकीरी में
जो सुख पायौ नाम भजन में, सो सुख, नाहि अमीरी में।
भला-बुरा सबकों सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।

(आ) तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सत गुरु धारा निरमल बाहे, वा में काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे॥
उत्तर:
इन पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

प्रश्न 3.
‘राधा की समाज सेवा’ विषय का केन्द्रीय भाव लिखिए। (2009)
उत्तर:
इसके लिए ‘राधा की समाज सेवा’ का भाव-सारांश पढ़िए।

प्रश्न 4.
“अपने दुःख को भुला देने का सबसे अच्छा उपाय है, अपने को किसी और काम में लगा देना।” राधा ने इस आदर्श का पालन किस प्रकार किया? (2009)
उत्तर:
जब व्यक्ति दुःखी होता है तब उसके चित्त पर बड़ा दबाव रहता है। इसलिए यह माना गया है कि दु:ख के समय व्यक्ति स्वयं को किसी अन्य कार्य में संलग्न कर दे ताकि उसका ध्यान उस कार्य से बँट जाए और दुःख भूल में पड़ जाए। जब श्रीकृष्ण ब्रजवासियों को बिलखता छोड़कर मथुरा चले गये तो उनकी प्रेमिका विरह वेदना से ग्रस्त हो गयी। उन्होंने उस वियोग की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए स्वयं को समाज की सेवा में संलग्न कर दिया। वे यशोदा को सांत्वना देने, उसके पैर सहलाने, आँसू पोंछने का कार्य करने लगीं। ब्रज के राजा नन्द को शास्त्र सुनाने लगीं। गोपों को काम में संलग्न कर दिया। गोपियों को कृष्ण लीला सुनाना और वंशी बजाकर प्रसन्न करना प्रारम्भ कर दिया। बच्चों को विविध फूलों के खिलौने देकर बहलाया। वृद्धों, रोगियों, अनाथों, विधवाओं आदि को सहारा देने में व्यस्त हो गयीं। इस तरह सभी की सेवा में व्यस्त होने के कारण वे अपना दुःख भूल गयीं।

प्रश्न 5.
“पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थीं।” आधुनिक सन्दर्भ में इसकी उपयोगिता समझाइए।
उत्तर:
वृक्ष-वनस्पतियाँ प्रदूषण को नियन्त्रित करने में बड़ी सहयोगी होती हैं। जितनी अधिक हरियाली होगी उतना पर्यावरण सुधार होगा। राधा को इस बात का ज्ञान था इसीलिए वे पेड़-पौधों की पत्तियों को व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। आज संसार भर में पर्यावरण प्रदूषण का प्रकोप है इसीलिए नाना प्रकार के वृक्ष लगाने के अभियान चलाये जा रहे हैं। वन संरक्षण की अनेक योजनाओं का कार्यान्वयन हो रहा है। हरित पट्टिकाएँ तथा हरित क्षेत्र निर्धारित किए जा रहे हैं ताकि हरियाली बनी रहे और मनुष्य को प्रदूषण से कुछ मुक्ति मिले। आज के वैज्ञानिक युग में प्राकृतिक सम्पदा का महत्त्व और बढ़ गया है। इस प्रकार के विचार हरिऔध के समय में आने लगे थे। इसीलिए उन्होंने राधा के द्वारा वनस्पतियों के संरक्षण का कार्य कराया है।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए
(अ) हो उद्विग्ना बिलख ………….. तजेंगे।
(आ) सच्चे स्नेही ………….. कोई न होवे।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

सामाजिक समरसता काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
पथरा, चदरिया, कागद, जुग, जतन, हाथ।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए
पृथ्वी, आँख, पक्षी, पुष्प, दिन।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-2

प्रश्न 3.
कबीर के संकलित पदों में कौन-सा रस है?
उत्तर:
कबीर के संकलित पदों में शान्त रस है।

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प्रश्न 4.
कबीर की भाषा के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
कबीर भ्रमण करने वाले सन्त थे। वे यहाँ-वहाँ जाकर जनमानस को ज्ञान का उपदेश दिया करते थे। वे एक स्थान पर स्थिर होकर नहीं रहे। अतः उनकी भाषा में विविध क्षेत्रों के शब्द आ गये हैं। इसलिए उनकी भाषा को खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है। ब्रज, अरबी, फारसी, अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली, उर्दू आदि सभी भाषाओं के शब्द कबीर के काव्य में मिल जाते हैं। विविध भाषाओं का संगम होते हुए भी कबीर की भाषा में अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में अलंकार पहचानकर लिखिए-
(अ) काहे के ताना काहे के मरनी, कौन तार से बीनी चदरिया।
(आ) जुगन जुगन समुझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
(इ) राधा जैसी सदय हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
(ई) पूजी जाती ब्रज अवनि में देवियों सी अतः थी।
उत्तर:
(अ) अनुप्रास
(आ) पुनरुक्तिप्रकाश
(इ) उपमा
(ई) उपमा।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए (2009)
(क) आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।
(ख) साधो देखो जग बौराना, सांची कहो तो मारन धावै झूठे जग पतियाना।
उत्तर:
(क) इस पंक्ति में सन्त कबीर ने भौतिक जगत् की नश्वरता का बोध कराया है। संसार की वस्तुओं पर अभिमान करना जीव की अज्ञानता है। ये सभी तो नष्ट होने वाली हैं। जिस शरीर के बल पर जीव अहंकार पाले फिरता है, एक दिन यह मिट्टी में मिल जाता है। इसलिए इस पर गर्व करना व्यर्थ है। अमर तो केवल आत्मा है, उसी का अनुसरण करना चाहिए।

(ख) साक्षात संसार से ज्ञान अर्जित करने वाले सन्त कबीर कहते हैं कि इस संसार के लोग अज्ञान अहंकार में फंसकर पागल हो गये हैं। यही कारण है कि जब उनसे सत्य बात कही जाती तो मारने दौड़ते हैं; उसका विश्वास नहीं करते हैं किन्तु कोई झूठा व्यक्ति उनसे कुछ कहता है तो वे उसका विश्वास कर लेते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
गुण, प्रेम, सदय, विधवा, सबल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-3

प्रश्न 8.
छन्द किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
मात्रा, वर्ण संख्या, यति, गति (लय) तथा तुक आदि के नियमों से युक्त रचना छन्द कहलाती है।
छन्द दो प्रकार के होते हैं।-
(1) मात्रिक छन्द-इसमें मात्राओं की गणना की जाती है।
(2) वर्णिक छन्द-इसमें वर्गों की गणना की जाती है।

प्रश्न 9.
आपकी पाठ्य-पुस्तक के पद्य भाग में कौन-कौन से पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं?
उत्तर:
हमारी पाठ्य-पुस्तक के विनय के पद, पदावली, कृष्ण की बाल लीलाएँ, पद्माकर के छन्द, मतिराम के छन्द, वृन्द के दोहे, रहीम के दोहे, ऋतु वर्णन, नौका विहार, छत्रसाल का शौर्य वर्णन, कविता का आह्वान, कबीर की वाणी, कुण्डलियाँ, दुष्यन्त की गजलें, बरसो रे तथा चलना हमारा काम है पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित पंक्तियों में गण पहचानिए
(क) जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
(ख) आटा चींटी विहग गण थे वारि औ अन्न पाते।
उत्तर:
(क) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽऽ। ऽऽ।
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
जो वे हो ता मलि न लख ती गोप के बाल कौं को
(ख) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽ।ऽ ऽ।ऽ
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
आटा ची टी विह गगण थेवारि औ अन्न पाते

प्रश्न 11.
निम्नलिखित काव्यांश में निहित काव्य सौन्दर्य को लिखिए
(अ) तो धीरे मधुर स्वर से हो विनीता बताती।।
हाँ आवेंगे व्यथित ब्रज को श्याम कैसे तजेंगे।
(आ) गाके लीला स्व प्रियतम की वेणु वीणा बजा के।
प्यारी बातें कथन करके वे उन्हें बोध देतीं।
उत्तर:
इन काव्यांशों के काव्य सौन्दर्य इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

कबीर की वाणी भाव सारांश

सारग्राही सन्त कबीर ने सभी धर्मों के सत्य को ग्रहण कर मानवतावादी व्यावहारिक धर्म अपनाया। जीवन के प्रत्यक्ष ज्ञान के सहारे उन्होंने सत्यासत्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उन्होंने बाह्य आडम्बरों, पाखण्डों, द्वेष-भावनाओं का डटकर विरोध किया। संकलित पदों में उन्होंने उन्हीं भावों को व्यक्त किया। फकीरी में रमने वाले कबीर को अमीरी के बजाय भगवान् का भजन प्रिय है। इस शरीर को नश्वर कहने वाले कबीर सन्तोष को सर्वोपरि मानते हैं। उन्हें पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान पर विश्वास है। इसीलिए वे समझाते हैं कि सजग रहकर सच्चे गुरु के बताये मार्ग पर चलकर ही उद्धार हो सकता है। धर्म या सम्प्रदाय के नाम पर आडम्बर करने वालों को उन्होंने खूब फटकारा है। उनके लिए राम और रहीम एक हैं। पत्थर पूजा, जीव हत्या आदि में संलग्न ढोंगी हिन्दू-मुसलमानों को उन्होंने करारी डाँट लगाई है। वे सत्य पर आधारित मानवता को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं।

कबीर की वाणी संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] मन लाग्यो मेरा यार फकीरी में।
जो सुख पावों नाम भजन में, सो सुख नाहि अमीरी में।।
भला-बुरा सबको सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।।
प्रेमनगर में रहनि हमारी, भलि बनि आई सबूरी में।।
हाथ में पूड़ी बगल में सोंटा, चारों दिसा जगीरी में।।
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी में ।।1।।

शब्दार्थ :
फकीरी = वैराग्य; अमीरी = वैभव सम्पन्नता; गुजरान = गुजारा; भलि = भला; सबूरी = सन्तोष; कँड़ी = पत्थर की बनी कटोरी; सोंटा = डण्डा, छड़ी; खाक = धूल; मगरूरी = अहंकार, अभिमान; साहिब = स्वामी।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद (शब्द) हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘कबीर की वाणी’ से अवतरित है। इसके रचयिता सन्त कबीरदास हैं।

प्रसंग :
इस पद में कवि ने मन की वैराग्य प्रवृत्ति पर बल दिया है।

व्याख्या :
कबीर कहते हैं कि मेरा मन तो वैराग्य में लग गया है। मुझे जो आनन्द परमब्रह्म के भजन में मिला है; वह वैभव सम्पन्नता में नहीं मिल सकता है। अमीरी नाशवान है और अस्थायी सुख देने वाली है। जबकि ब्रह्म परमानन्द देने वाले हैं। अभिमान से दूर रहकर जो कोई भला-बुरा कहे उसे सहन करके गरीबी में गुजारा करना अच्छा है। कवि का निवास तो प्रेम की नगरी है अर्थात् जहाँ प्रेम भाव है वहीं रहना उचित है। सन्तोष सबसे अधिक हितकारी है इसलिए मेरे हाथ में पूड़ी आदि पात्र तथा बगल में एक डण्डा रहता है। इनके साथ मैं संसार की चारों दिशाओं में चाहे जहाँ जाने को मुक्त हूँ। सांसारिक बन्धन व्यर्थ हैं, धन, वैभव अस्थिर हैं क्योंकि अन्त में यह शरीर मिट्टी में मिल जायेगा। अतः सम्पत्ति, बल आदि का अभिमान करना व्यर्थ है। हे सन्तो! वास्तविकता यह है कि सन्तोष से ही स्वामी (ब्रह्म) मिलते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सांसारिक आकर्षणों से परे रहकर सन्तोष के द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का सन्देश दिया गया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

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[2] मेरा तेरा मनवा, कैसे इक होई रे।
मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यों उरझाइ रे।।
मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोइ रे।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।।
जुगन जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सतगुरु धारा निरमल बाहै, वामें काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ।।2।। (2008)

शब्दार्थ :
मनवा = मन; लेखी = लिखी हुई; सुरझावन हारी = सुलझाने वाली; उरझाई = उलझाकर; निरमोही = मोह से मुक्त; जुगन-जुगन = युगों-युगों से; रंगी = संसार के माया मोह में डूबा; बिहंगी = पक्षी के समान इधर-उधर भटकने वाला; बाहै = बहती है; वामें = उसमें; काया = शरीर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान की महिमा को बताते हुए सच्चे गुरु के ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।

व्याख्या :
सांसारिक माया मोह में फँसे व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि मेरा और तुम्हारा मन एक कैसे हो सकता है। मैं तो वह कहता हूँ जो साक्षात् आँखों से देखा है और तुम वह बात कहते हो जो पुस्तकों में लिखी है। मैं व्यावहारिक ज्ञान के आधार पर सुलझाने वाली स्पष्ट बात करता हूँ। जबकि तुम अज्ञानतावश सोच में उलझे रहते हो। मैं समझाता हूँ कि सत्य, उचित की पहचान के प्रति जागरूक रहो, अन्धानुकरण मत करो किन्तु तुम अज्ञान की निद्रा में सोते रहते हो। मैं सजग करता हूँ कि संसार नाशवान है इसके प्रति मोह मत पालना परन्तु तुम इस नश्वर संसार के प्रति मोहित रहते हो।

मैं युगों-युगों से समझाते -समझाते थक गया हूँ कि मायावी संसार से मुक्त रहकर सत्य का अनुसरण करो किन्तु मेरी इस बात को कोई नहीं मानता है। तुम तो संसार के माया-मोह में लीन होकर उड़ने वाले पक्षी की तरह इधर-उधर भटक रहे हो। इस तरह भटकते हुए तुमने समस्त ज्ञानरूपी धन खो दिया है। सारा जीवन व्यर्थ गँवा दिया है। सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! ध्यान से सुन लो कि सच्चे गुरु के ज्ञान की पवित्र धारा बह रही है। उसी में अपने शरीर के विकारों को धो डालोगे तभी तुम्हारा मनचाहा हो सकेगा अर्थात् गुरु का सच्चा उपदेश ही तुम्हारा उद्धार कर सकेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. संसार की निरर्थकता को इंगित करते हुए सच्चे ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा अवलोकनीय है।
  3. सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा में दार्शनिक विषय का प्रतिपादन किया है।

[3] साधो, देखो जग बौराना।
साँची कहाँ तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
हिन्दू कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमाना।
आपस में दोऊ लहै मरतु हैं, मरम कोई नहिं जाना।।
बहुत मिले मोहि नेमी धर्मी प्रात करै असनाना।
आतम छोड़ि पषानै पू0, तिनका थोथा ज्ञाना।
बहुतक देखे पीर औलिया, पढ़े किताब कुराना।
करै मुरीद कबर बतजावै, उनहूँ खुदा न जाना।।
हिन्दु की दया मेहर तुरकन की, दोनों घर से भागी।
वे करैं जिबह वे झटका मारे, आग दोऊ घर लागी।
या विधि हँसत चलत है हमको, आपु कहावै स्याना।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दीवाना ।।3।।

शब्दार्थ :
जग = संसार; बौराना = पागल हो गया है; धावै = दौड़ता है; पतियाना = विश्वास करता है; मरम = रहस्य, वास्तविकता; नेमी = नियमों का पालन करने वाले आतम = आत्मा; पषाने = पाषाण, पत्थर; तिनका = उनका; थोथा = खोखला, निरर्थक; मुरीद = शिष्य; उनहूँ = उन्हें भी; मेहर = अनुकम्पा; तुरकन = मुसलमानों; जिबह = हलाल करना, पशु को धीरेधीरे काटना; झटका = एक ही बार में पशु का वध करना; स्याना = चतुर, होशियार; दीवाना = पागल।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद में धार्मिक पाखण्डों की निन्दा कर समरसता का सन्देश दिया है।

व्याख्या :
सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! देख लो संसार कैसा पागल हो गया है। पागलपन की यह स्थिति है कि यदि कोई व्यक्ति सत्य बात कहे तो उसे मारने दौड़ता है। यह संसार झूठे पाखण्डियों का विश्वास करता है। हिन्दू कहते हैं कि हमारे तो राम सब कुछ हैं और मुसलमान कहते हैं कि रहीम ही सब कुछ है। इस तरह ये आपस में लड़ते-मरते रहते हैं। उनमें इस रहस्य को कोई नहीं जानता है कि राम और रहीम दोनों एक ही हैं। कवि कहते हैं कि मुझे बहुत से नियमों का पालन करने वाले धार्मिक व्यक्ति मिले हैं। वे प्रात:काल ही स्नान-ध्यान करते हैं। आत्मा की आवाज की अवहेलना करके पत्थर की पूजा करने वाले उन लोगों का ज्ञान खोखला (दिखावटी) है।

मैंने बहुत से पीर और औलिया भी देखे हैं जो कुरान आदि पुस्तकें पढ़ते हैं। वे लोगों को अपने शिष्य बनाते हैं, बड़े-बड़े व्याख्यान देते हैं किन्तु उन्हें भी खुदा की जानकारी नहीं होती है। हिन्दुओं की दया तथा मुसलमानों की मेहर (कृपा)दोनों ही मनुष्यों के हृदय से पलायन कर गयी हैं। दोनों ही निर्दयी, हिंसक हो गये हैं। उनमें से एक हलाल करते हैं तो दूसरे झटका मारते हैं। इस तरह दोनों ही ओर हिंसा की आग लगी है। वे हम सब का उपहास करते हैं तथा स्वयं बहुत चतुर कहलाते हैं। कबीर कहते हैं कि ऐसी स्थिति में इनमें से किसे पागल कहा जाय। दोनों ही उन्मत्त हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. धार्मिक पाखण्ड जनित विद्वेष का तिरस्कार कर सामंजस्य एवं सहभाव का सन्देश दिया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा में समझाया गया है।

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राधा की समाज सेवा भाव सारांश

पौराणिक प्रसंगों का अपने काव्य का आधार बनाने वाले अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का प्रिय प्रवास कृष्ण काव्य परम्परा में आता है। ‘राधा की समाज सेवा’ अंश ‘प्रिय प्रवास’ महाकाव्य से लिया गया है।

परमप्रिय श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर चले जाने पर समस्त ब्रजवासियों में विरह-वेदना व्याप्त हो जाती है। राधा श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल हैं किन्तु वे अपने दुःख को भुला देने का सबसे उत्तम उपाय खोजती हैं और स्वयं को समाज सेवा में लगा देती हैं। वे नित्यप्रति यशोदा के पास जाकर उनको समझाती हैं। उनके पैर सहलाकर तथा आँसू पोंछकर सांत्वना देती हैं। उन्हें आश्वासन देती हैं कि दुःखी ब्रज को श्रीकृष्ण कैसे छोड़ सकते हैं, वे अवश्य लौटकर आयेंगे। नन्द की पीड़ा को मिटाने के लिए वे विभिन्न शास्त्रों को सुनाकर सांसारिक वैभव की हीनता का प्रतिपादन करती हैं। दुःखी ग्वालों को समझाकर श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाती हैं। ग्वालों के बालकों को दुःखी देखकर वे उन्हें फूलों के विभिन्न प्रकार के खिलौने लाकर देती हैं। उनसे श्रीकृष्ण की लीलाएँ कराती हैं और स्वयं ध्यानमग्न होकर उन्हें देखती रहती हैं। विरहिणी गोपियों को वे विधिपूर्वक सुखी करती हैं।

उन्हें श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर सुनाती हैं, वंशी तथा वीणा बजाती हैं। वृद्धों, रोगियों की वे सेवा करती हैं तथा दवा आदि देती हैं। निर्बल, दीन-हीन, अनाथ तथा विधवाओं को वे सम्मान सहित सहारा देती हैं। उनके मन में जो भी विकार हैं उनको अपने सद्व्यवहार से धो देती हैं। चींटी, पक्षी, कीड़ों आदि को अन्न-जल आदि देती हैं। वे वृक्षों के पत्तों को भी व्यर्थ में नहीं तोड़ती हैं। वे सज्जनों की संरक्षक तथा दुष्टों की प्रशासक बनी हैं। वे सभी प्राणियों की समृद्धि के कार्यों में लगी रहती हैं, कुमारी बालिकाएँ भी ब्रज में शान्ति का विस्तार करने में लगी हैं। कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर जाने पर जो महाकाली संकट देने वाली रात्रि अब आयी थी उसमें राधा चाँदनी के समान सुशोभित थीं। श्रीकृष्ण के संयोग से ब्रज में आनन्द वर्षा हुई थी, वह पुनः-पुनः आये। राधा और श्रीकृष्ण इस भूमि पर आयें किन्तु इस प्रकार की वियोग की घटना फिर न हो।

राधा की समाज सेवा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] राधा जाती प्रति- दिवस थीं पास नन्दांगना के।
नाना बातें कथन करके थीं उन्हें बोध देती।
जो वे होती परम- व्यथिता मूर्छिता या विपन्ना।
तो वे आठों पहर उनकी सेवना में बितातीं॥1॥ (2014)

घण्टे ले के हरि-जननि को गोद में बैठती थी।
वे थी नाना जतन करती पा उन्हें शोक मग्ना।
धीरे-धीरे चरण सहला औ मिटा चित्त-पीड़ा।
हाथों से थी दृग-युगल के वारि को पोंछ देती ॥2॥

शब्दार्थ :
प्रति-दिवस = रोजाना, प्रतिदिन; नन्दांगना = यशोदा, नन्द की पत्नी; नाना = तरह-तरह की; कथन = कहकर; बोध = ज्ञान समझाना; परम = बहुत; व्यथिता = पीड़ित; मूछिता = बेहोश; विपन्न = दु:खी; सेवना = सेवा; जननि = माँ; जतन = प्रयत्न, उपाय; शोक = दुख; चित्त-पीड़ा = हृदय का कष्ट; दृग-युगल = दोनों आँखें; वारि = जल, आँसू।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘राधा की समाज सेवा’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा की गयी यशोदा की सेवा का अंकन किया गया है।

व्याख्या :
श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होते हुए भी राधा प्रतिदिन नन्द की पत्नी यशोदा के पास जाती और तरह-तरह की बातें करके उन्हें समझाती थीं। यदि वे बहुत पीड़ित बेहोश या दुःखी होती तो राधा दिन-रात उनकी सेवा में ही बिताती थी अर्थात् हर समय उनकी देखभाल में ही लगी रहती थीं।

राधा श्रीकृष्ण की माँ यशोदा को अपनी गोद में लेकर घण्टों तक बैठी रहती थीं। उनको श्रीकृष्ण के चले जाने के दुःख से दुखी पाकर वे विभिन्न प्रकार के उपाय करती थीं। धीरे-धीरे उनके पैरों को सहलाती थीं और उनकी समस्त पीड़ा को मिटा देती थीं। वे अपने हाथों से यशोदा की दोनों आँखों के आँसू पोंछ देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभावी रूप का सजीव चित्रण किया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

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[2] हो उद्विग्ना बिलख जब यों पूछती थीं यशोदा।
क्या आवेंगे न अब ब्रज में जीवनाधार मेरे।
तो वे धीरे मधुर-स्वर से हो विनीता बतातीं।
हाँ आवेंगे, व्यथित बृज को श्याम कैसे तजेंगे ॥ 3 ॥

आता ऐसा कथन करते वारि राधा-दृगों में।
बूंदों-बूंदों टपक पड़ता गाल पै जो कभी था।
जो आँखों से सदुख उसको देख पातीं यशोदा।
तो धीरे यों कथन करतीं खिन्न हो तू न बेटी ॥ 4॥

शब्दार्थ :
उद्विग्ना = परेशान; बिलख = व्याकुल; जीवनाधार = जीवन के आधार, श्रीकृष्ण; विनीता = विनम्र; व्यथित = पीड़ित; तजेंगे = छोड़ेंगे; सदुःख = दुःख युक्त; खिन्न = परेशान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

इस प्रकार की बात कहते हुए विरह से व्याकुल राधा के नेत्रों में भी आँसू छलक आते थे। जो कभी-कभी आँसुओं की बूंदें यशोदा के गाल पर टपक पड़ती थीं तो वे कहती थीं कि बेटी राधा तू परेशान मत हो, सब ठीक होगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा द्वारा व्याकुल यशोदा की सेवा तथा यशोदा द्वारा राधा को सांत्वना देने का वर्णन है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली अपनायी गयी है।

[3] हो के राधा विनत कहतीं मैं नहीं रो रही हूँ।
आता मेरे दृग युगल में नीर आनन्द का है।
जो होता है पुलक कर के आप की चारु सेवा।
हो जाता है प्रगटित वही वारि द्वारा दृगों में ॥5॥

वे थीं प्रायः ब्रज नृपति के पास उत्कण्ठ जातीं।
सेवायें थीं पुलक करतीं क्लान्तियाँ थीं मिटाती।
बातों ही में जग विभव की तुच्छता थी दिखाती।
जो वे होते विकल पढ़ के शास्त्र नाना सुनातीं ॥6॥

शब्दार्थ :
विनत = विनम्र; दृग युगल = दोनों नेत्र; पुलक = रोमांच, हर्ष; चारु = सुन्दर; ब्रज-नृपति = ब्रज के राजा, नन्द; उत्कण्ठ उद्यत; क्लांतियाँ = दु:ख; जग-विभव = सांसारिक वैभव; तुच्छता = दीनता।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में सेवा भावी राधा के ज्ञानपरक प्रबोध को प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या :
राधा की आँखों में छलके आँसुओं की बूंद कभी यशोदा के गाल पर पड़ जाती थीं तो वे उसे सांत्वना देती तब राधा विनम्र होकर कहती कि मैं रो नहीं रही हूँ। मेरे दोनों नेत्रों में तो अति आनन्द के आँसू हैं। आपकी सुखद सेवा करके मुझे जो हर्ष होता है, वही आँखों से जल के रूप में प्रकट हो जाता है।

राधा प्रायः उद्यत होकर ब्रज के राजा के पास जाती और प्रसन्नतापूर्वक उनकी सेवा करती तथा उनके समस्त दुःखों को मिटाती थीं। बातों ही बातों में वे सांसारिक वैभव की दीनता प्रदर्शित करती और यदि वे अधिक व्याकुल होते थे तो राधा विभिन्न शास्त्र पढ़कर सुनाती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रबुद्ध राधा के सेवा भावी रूप का अंकन हुआ है।
  2. तत्सम प्रधान सानुप्रासिक भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दक्रान्ता छन्द है।

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[4] होती मारे मन यदि कहीं गोप की पंक्ति बैठी।
किम्वा होता विकल उनको गोप कोई दिखाता।
तो कार्यों में सविधि उनको यत्नतः वे लगाती।
औ ए बातें कथन करती भूरि गंभीरता से।। 7॥

जी से जो आप सब करते प्यार प्राणेश को हैं।
तो पा भू में पुरुष तन को, खिन्न हो के न बैठे।
उद्योगी हो परम रुचि से कीजिए कार्य ऐसे।
जो प्यारे हैं परम प्रिय के विश्व के प्रेमिकों के ॥8॥

शब्दार्थ :
किम्वा = अथवा; गोप = ग्वाला; सविधि = विधि से; यत्नतः = प्रयत्नपूर्वक; भूरि = बहुत अधिक; रुचि = लगन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा ने गोपों को कर्म में लीन होने का उद्बोधन दिया है।

व्याख्या :
यदि कहीं पर कोई मलिन मन वाले ग्वालाओं की कोई पंक्ति होती अथवा राधा को कोई ग्वाला व्याकुल होता हुआ दिखाई पड़ता तो वे विधि से प्रयत्नपूर्वक उनको अपने-अपने काम में लगा देतीं। वे बहुत गम्भीरता से यह बात कही कि यदि आप सभी प्राणप्रिय श्रीकृष्ण को हृदय से प्यार करते हो तो पृथ्वी पर दुर्लभ मनुष्य का शरीर पाकर दुःखी होकर न बैठे। पूरी लगन के साथ ऐसे कामों को करें जो परमप्रिय श्रीकृष्ण के प्रेमियों को अच्छे लगते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहने का उद्बोधन दिया गया है।
  2. कर्म के प्रति निष्ठा भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। उसी का प्रतिपादन यहाँ हुआ है।
  3. संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली में विषय की अभिव्यक्ति हुई है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[5] जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
देती पुष्पों रचित उनको मुग्धकारी-खिलौने।
दे शिक्षाएँ विविध उनसे कृष्ण लीला करातीं।
घंटों बैठी परम रुचि से देखतीं तद्गता हो ॥9॥

पाई जातीं यदि दुखित जितनी अन्य गोपांगनाएँ।
राधा द्वारा सुखित वह भी थीं यथा रीति होती।
गा के लीला स्व प्रियतम की वेणु, वीणा बजा के।
प्यारी-बातें कथन कर के वे उन्हें बोध देतीं ॥10॥

शब्दार्थ :
मलिन = उदास; लखती = देखती; मुग्धकारी = मोहित करने वाले तद्गता = तन्मय; गोपांगनाएँ = गोपियाँ, ग्वालों की पत्नियाँ; वेणु = वंशी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा ग्वालों के बच्चों तथा उनकी पत्नियों (गोपियों) की उदासी दूर करने का वर्णन है।

व्याख्या :
वे राधा यदि ग्वालों के बच्चों को उदास देखतीं तो वे उन्हें फूलों से बने मन को मोहित करने वाले खिलौने देतीं। वे उन्हें नाना प्रकार की शिक्षाएँ देकर कृष्ण लीला कराती । घण्टों तक बैठी रहतीं और उस लीला को तन्मय होकर देखती रहती थीं।

यदि ग्वालों की पत्नियाँ दु:खी पाई जाती तो वे भी राधा द्वारा इसी तरह सुखी होती थीं। अपने प्रियतम श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर, वंशी एवं वीणा बजाकर और प्यारी-प्यारी बातें कहकर उनको उद्बोधन देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ग्वालों के बच्चों तथा पत्नियों की सेवा का वर्णन किया गया है।
  2. मन्दाक्रान्ता छन्द है। तत्सम युक्त सरल सुबोध भाषा का प्रयोग किया गया है।

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[6] संलग्ना हो विविध कितने सान्त्वना कार्य में भी।
वे सेवा थीं सतत करती वृद्ध-रोगी जनों की।
दीनों, हीनों, निबल विधवा आदि को मानती थीं।
पूजी जाती बृज-अवनि में देवियों सी अतः थी ॥11॥

खो देती थीं कलह जनि, आधि के दुर्गुणों को।
धो देती थीं मलिन मन की व्यापनी कालिमायें।
बो देती थी हृदय तल में बीज भावज्ञता का।
वे थी चिन्ता-विजित गृह में शांति धारा बहाती ॥12॥

शब्दार्थ :
संलग्ना हो = लगकर; निबल = निर्बल; बृज-अवनि = ब्रज भूमि; आधि = मानसिक चिन्ता; व्यापिनी = प्रभावित करने वाली; कालिमाएँ = दोषों को; भावज्ञता = मनोभाव समझने; चिन्ता-विजित-गृह = चिन्ता को जीत लेने वाला घर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा किए गए सद्भावपूर्ण सेवा कार्यों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा नाना प्रकार के कितने ही सान्त्वना देने वाले कार्यों में लगी रहती थी। वे वृद्ध और रोगी जनों की निरन्तर सेवा करती रहती थीं। वे दीन-हीनों, निर्बलों, विधवाओं आदि का सम्मान करती थीं, उनकी सेवा करती थीं। इसीलिए ब्रजभूमि में वे देवियों की तरह पूजी जाती थीं।

राधा पारस्परिक कलह तथा मानसिक दुःखों को दूर कर देती थीं। वे दुःखी मन को प्रभावित करने वाले सभी दोषों को धो डालती थीं। वे मनुष्यों के तन-मन के सभी कष्टों को दूर करके उनके हृदय में सहृदयता भर देती थीं। वे चिन्ता को जीत लेने वाले घर में शान्ति की धारा प्रवाहित कर देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के जन सेवी रूप का वर्णन हुआ है।
  2. सानुप्रासिक भाषा तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  3. समास प्रधान तत्सम शब्दावली में विषय-का प्रतिपादन किया गया है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[7] आटा चींटी विह्या गण थे वारि ओ अन्न पाते।
देखी जाती सदय उनकी दृष्टि कीटादि में भी।
पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थी।
जी से भी निरस्त रहती भूत सम्बर्द्धना में ॥13॥

वे छाया थी सुजन शिर की शासिका थी खलों में।
कंगालों की परम निधि थी औषधि पीड़ितों की।
दोनों की थी बहिन, जननी थी अनाथाश्रितों की।
आराध्य थी ब्रज-अवधि की प्रेमिका विश्व की थीं ॥14॥

शब्दार्थ :
विा = पक्षी; कीटादि = कीड़े आदि; वृथा = व्यर्थ में; निरत = संलग्न; भूत सम्बर्द्धना = प्राणियों के उत्थान में; अनाथ = सहारे हीन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा की पशु-पक्षियों, अनाथों आदि की व्यापक सेवा का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा की सेवा का क्षेत्र व्यापक था। चींटी, पक्षी राधा से अन्न एवं जल पाते थे। कीड़े आदि के प्रति भी उनकी दयापूर्ण दृष्टि थी। श्रेष्ठ वृक्षों के पत्तों को भी वे व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। वे अपने हृदय से स्वाभाविक रूप में प्रेमियों के उत्थान के कार्यों में लगी रहती थीं।

वे (राधा) सज्जनों के सिर की छाया थीं तथा दुष्टजनों पर शासन करने वाली थीं। वे निर्धनों के लिए महान् सम्पत्ति का भण्डार थीं और पीड़ितों (रोगियों) के लिए सही उपचार करने वाली दवा थीं। वे दीन-हीनों की बहन थीं और जो अनाथ और आश्रयहीन थे उनके लिए माँ थीं। वे ब्रज भूमि के निवासियों की पूज्य थीं तथा समस्त संसार की प्रेमिका थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभाव का व्यापक रूप अंकित किया गया है।
  2. समास प्रधान संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

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[8] जैसा व्यापी विरह दुख था गोप गोपांगनाका।
वैसी ही थी सदै हृदया स्नेह की मूर्तिराधा।
जैसी मोहावरित ब्रज में तामसी रात आयी।
वैसी ही वे लसित उसमें कौमुदी के समा थी॥15॥

जो थी कौमार-व्रत निरता बालिकायें अनेकों।
वे भी पा के समय ब्रज में शान्ति विस्तारती थीं।
राधा के हृदय बल से दिव्य शिक्षा गुणों से।
वे भी छाया सृदृश उनकी वस्तुतः हो गई थीं॥16॥

शब्दार्थ :
सदै = दयामय; मोहावरित = मोह से जकड़ी; तामसी रात = महाकाली अंधेरी रात; निरता = संलग्न; विस्तारती = बढ़ाती; दिव्य = अलौकिक; छाया-सदृश = परछाईं के समान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा के स्नेहपूर्ण व्यापक सेवा भाव का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
जिस प्रकार की व्यापक विरह वेदना ग्वालों और ग्वालों की पत्नियों में थी, उसी प्रकार की दयामय हृदय वाली राधा साक्षात् स्नेह की प्रतिमा थीं। श्रीकृष्ण के ब्रज से चले जाने पर जिस प्रकार की मोह से जकड़ी महाकाली अन्धेरी रात ब्रज में आयी थी उसी तरह से वे (राधा) उस रात में चाँदनी के समान सुशोभित थीं अर्थात् श्रीकृष्ण के विरह से व्यथित ब्रजवासियों में वे सुख का संचार कर रही थीं।

जो कौमार्य व्रत में संलग्न अनेक बालिकाएँ थीं वे भी कुछ समय पाकर ब्रज में शान्ति का विकास करती थीं। राधा के हृदय में विद्यमान सद्भावनाओं के प्रभाव से और उनकी शिक्षा के अलौकिक गुणों के कारण वे उनकी परछाईं के समान हो गई थीं अर्थात् वे उनके हर कार्य में सहयोग करती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सहृदय राधा के सेवा भाव की प्रभावशीलता का अंकन हुआ है।
  2. सामाजिक एवं सानुप्रासिक भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है। उपमा, अनुप्रास, रूपक अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है।

[9] तो भी आई न वह घटिका और न वे बार आये।
वैसी सच्ची सुखद ब्रज में वायु भी आ न डोली।
वैसे छाये न घन रस की सोत सी जो बहाते।
वैसे उन्माद कर-स्वर से कोकिला भी न बोली ॥17॥

जीते भूले न ब्रज महि के नित्य उकण्ठ प्राणी।
जी से प्यारे जलद तनको, केलि क्रीड़ादिकों को।
पीछे छाया विरह दुख की वंशजों-बीच व्यापी।
सच्ची यों है ब्रज अवनि में आज भी अंकिता है ॥18॥

सच्चे स्नेही अवनिजन के देश के श्याम जैसे।
गधा जैसी सद्य हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
हे विश्वात्मा ! भरत भुव के अंक में और आवें।
‘ऐसी व्यापी विरह घटना किन्तु कोई न होवे ॥19॥

शब्दार्थ :
घटिका = घड़ी, 24 मिनट का समय; सोत = स्रोत; महि = भूमि। जलद-तन = बादल के समान श्याम शरीर वाले, श्रीकृष्ण; विश्व प्रेमानुरक्ता = संसार भर से प्रेम करने वाली; भरत भुव = भारत भूमि; अंक = गोद।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
ब्रज में राधा की सेवा के प्रभाव स्वरूप पर्याप्त अच्छा वातावरण था किन्तु जो आनन्द श्रीकृष्ण के ब्रज में होने पर था वे घड़ी या दिन आये ही नहीं। श्रीकृष्ण के समय जैसी सच्चा सुख देने वाली वायु भी ब्रज में फिर नहीं बही। आनन्द का स्रोत सा बहाने वाले वैसे बादल भी फिर नहीं छाए और न उस प्रकार के मस्ती भरे स्वर में कोयल ही कुहकी।

नित्य प्रति श्रीकृष्ण पुनः मिलन की उत्कण्ठा से भरे रहने वाले ब्रजभूमि के निवासी प्राणों से प्यारे श्रीकृष्ण और उनके क्रीड़ा-विहार आदि से मिलने वाले आनन्द को जीते जी नहीं भूल पाए। श्रीकृष्ण के वियोग जनित दुःख ने उनके वंशजों को भी प्रभावित किया। वास्तविक सत्य यह है कि ब्रजभूमि में आज भी उस विरह का प्रभाव अंकित है।

कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. श्रीकृष्ण के संयोग काल के सुख और विरह काल के दुःख का स्मरण किया गया है।
  2. परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि श्रीकृष्ण जैसी विभूतियाँ पुनः-पुनः अवतरित हों किन्तु विरह का व्यापक कष्ट न दें।
  3. उपमा एवं अनुप्रास अलंकार तथा सामाजिक भाषा का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

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MP Board Class 12th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 4 मेरे जीवन के कुछ चित्र

MP Board Class 12th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 4 मेरे जीवन के कुछ चित्र (आत्मकथा, डॉ. रामकुमार वर्मा)

मेरे जीवन के कुछ चित्र अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ. रामकुमार वर्मा सबसे पहले अपनी माता का स्मरण क्यों करते हैं? उनकी माता की दिनचर्या लिखिए।
उत्तर:
अपने अतीत के झरोखों में झाँकते समय डॉ.रामकुमार वर्मा के मन-मस्तिष्क में जो सबसे पहली तस्वीर उभरती है वह है उनकी पूज्यनीय एवं प्रातः स्मरणीय माताजी राजरानी देवी की डॉ. वर्मा अपनी माताजी का बहुत आदर और सम्मान करते थे। उनकी माँ एक उच्च कोटि की संगीतज्ञ एवं काव्य-ज्ञान से परिपूर्ण थीं। उन्हीं की प्रेरणा,स्नेह,मार्गदर्शन और आशीर्वाद से वे कविता-लेखन के क्षेत्र में कदम रख सके थे, अत: डॉ.वर्मा अपनी माँ में न सिर्फ करुणामयी माँ का रूप देखते थे, अपितु एक गुरु का बिम्ब भी उन्हें अपनी माँ में दिखाई देता था। अत: डॉ. रामकुमार वर्मा सवसे पहले अपनी माता का स्मरण किया करते थे।

डॉ.रामकुमार वर्मा की माँ एक कुशल संगीतज्ञ एवं कला प्रेमी महिला थीं। उनके कण्ठ में अद्भुत मिठास थी। वे सुबह-सवेरे जल्दी उठकर शौच इत्यादि से निवृत्त हो राग विभास के स्वरों ‘भोर भयो जागह रघुनन्दन’ का तन्मयता से गान करती थीं। परिवार के अन्य सभी लोग उनके कोकिल कण्ठ को सुनने के लिए उनके पास एकत्रित हो जाते थे। ये नियम उनका प्रतिदिन का था। प्रातःकाल गान के पश्चात् ही वे अन्य आवश्यक कार्यों को सम्पादित किया करती थीं।”

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प्रश्न 2.
बचपन में लेखक किस पात्र के अभिनय के विशेषज्ञ थे? इस अभिनय का प्रभाव उन पर कितने समय तक बना रहा?
उत्तर:
बचपन से ही लेखक को कुश्ती लड़ने,नाटक करने, अभिनय करने और पढ़ने का बहुत शौक था। वैसे तो लेखक ने नाटकों में कई पात्रों का अभिनय किया था, किन्तु ‘श्रीकृष्ण’ का अभिनय करने में उन्हें दक्षता प्राप्त थी और वे उसके विशेषज्ञ माने जाते थे। ‘श्रीकृष्ण’ का अभिनय करने के लिए उनके गुरुजन उन्हें शहर के बाहर भी लेकर जाते थे। कई लोग तो उन्हें ‘श्रीकृष्ण’ कहकर ही पुकारने लगे थे।

श्रीकृष्ण’ के अभिनय का लेखक पर प्रभाव पूरे बचपन भर बना रहा। इस पात्र के अतिरिक्त उन्हें किसी अन्य चरित्र का अभिनय करने में आनन्द प्राप्त नहीं होता था। जैसे-जैसे लेखक ने बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश किया ‘श्रीकृष्ण’ का अभिनय छूटता गया, क्योंकि अब वे बड़े हो गये थे।

प्रश्न 3.
नागपंचमी के दिन घटित अखाड़े की घटना का वर्णन अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
बचपन से ही लेखक को कुश्ती लड़ने, नाटक करने, अभिनय करने और पढ़ने इत्यादि का बहुत शौक था। साथ ही,लेखक इनकी प्रतियोगिताओं में भी भाग लेने के लिए सदैव ही उत्सुक रहते थे। एक बार बचपन में लेखक अपने पिताजी के साथ तमाशा देखने के लिए गये। वह नागपंचमी का दिन था। अखाड़े में कुश्ती की प्रतियोगिता चल रही थी। दूर-दूर से कई पहलवान कुश्ती के मैदान में अपना-अपना भाग्य परखने के लिए डटे थे। प्रतियोगिता के दौरान एक पहलवान सबको ‘चित्त’ करता गया और ‘फुल्लम’ (सर्व विजयी) घोषित हुआ। दम्भ के मारे वह पहलवान अखाड़े की मिट्टी को शरीर पर मलते हुए ताल ठोंककर किसी को भी उसका मुकाबला करने के लिए खुली चुनौती देने लगा। लेखक अपने पिताजी के साथ ये सब देख रहे थे।

उनसे यूँ चुनौती से दूर भाग जाना गवारा न हुआ। उन्होंने आव देखा न ताव और उस ‘फुल्लम’ की चुनौती को स्वीकार करते हुए कुश्ती के लिए ललकार दिया। दोनों पहलवानों ने अखाड़े की मिट्टी में अपने-अपने हाथ मले और बोल बजरंग’ के उद्घोष के साथ भिड़ गये। मात्र 5 मिनट से भी कम समय में वह ‘फुल्लम’ पहलवान ‘फुस्स’ हो धरती की धूल चाट रहा था और लेखक के चेहरे पर विजयी आभा तैर रही थी। तालियों की करतल ध्वनि के मध्य लेखक को शेरवानी और नकद पुरस्कार उपहारस्वरूप दिये गये जो लेखक ने प्राप्त करके उदारता के साथ उसी ‘फुल्लम’ पहलवान को प्रदान कर दिये।

प्रश्न 4.
माँ ने रामकुमार वर्मा को पढ़ाई के सम्बन्ध में क्या निर्देश दिए थे? (2010)
उत्तर:
डॉ. रामकुमार वर्मा की माँ एक सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत महिला थीं। वे अपने बच्चों में भी शिक्षा के उच्च संस्कार प्रदान करना चाहती थीं। यह उन्हीं के मार्गदर्शन और सीख का फल था कि डॉ.रामकुमार वर्मा कभी अनुत्तीर्ण नहीं हुए, बल्कि वे सदैव ‘डिवीजन’ से उत्तीर्ण होते रहे। पढ़ाई के सम्बन्ध में निर्देशित करते हुए उनकी माँ ने उनसे कहा था कि पढ़ाई में उन्हें पहले दर्जे का ध्यान रखना चाहिए। अपने लक्ष्य के प्रति उसी एकाग्रता एवं समर्पण के साथ प्रयत्नशील रहना चाहिए जिस प्रकार महाभारत काल में अर्जुन ने चिड़िया की केवल आँख पर अपना ध्यान रखा था।

प्रश्न 5.
लेखक ने स्कूल जाना क्यों छोड़ा?
उत्तर:
लेखक जब अपनी किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे तब देश में स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष अपने चरम पर था। महात्मा गाँधीजी के आह्वान पर देशभर में असहयोग आन्दोलन चलाया जा रहा था। लेखक ने भी इस असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। सन् 1921 में जब नागपुर में आयोजित कांग्रेस के सम्मेलन में असहयोग-आन्दोलन का प्रस्ताव पारित हुआ तो लेखक ने मन-ही-मन स्कूल छोड़ने का प्रण कर लिया। लेखक नरसिंहपुर में रहते थे और उनके पिताजी मंडला (सी.पी) में ‘ऐक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर’ थे। उस समय लेखक कक्षा 10 में पढ़ते थे और उन्हें 6 रुपये का वजीफा भी मिलता था। अपने प्रण को पूरा करते हुए लेखक ने स्कूल छोड़ दिया। यह समाचार सुनकर उनके पिताजी ने उन्हें भविष्य के स्वप्न दिखाते हुए पुनः स्कूल जाने के लिए कहा,किन्तु लेखक नहीं माने। पिताजी उनसे रुष्ट हो गये और बेंत से उन्हें दण्ड भी दिया। लेखक ने 72 घण्टे तक उपवास रखा और अपने स्कूल न जाने के निर्णय पर अडिग रहे।

प्रश्न 6.
लेखक ने ‘देश-सेवा’ कविता किन परिस्थितियों में लिखी और उसका क्या परिणाम हुआ? (2016)
उत्तर:
उन दिनों देश-भर में असहयोग आन्दोलन की गूंज थी। बच्चे, बड़े, स्त्री-पुरुष सभी बढ़-चढ़कर उस आन्दोलन में भाग ले रहे थे। गाँधीजी के नेतृत्व में समूचा राष्ट्र मानो एक साथ उठ खड़ा हुआ था। उन दिनों जुलूस राष्ट्रीय झण्डे को लेकर निकलते थे और गाने के लिए नए-नए गीतों की आवश्यकता पड़ती थी। उसी समय देश-सेवा’ कविता के लिए कानपुर के श्री बेनीमाधव खन्ना की 51 रुपये के नकद पुरस्कार वाली घोषणा निकली। लेखक के पिताजी ने लेखक से कहलवाया; “छोटे गाँधीजी से कहो देश-सेवा पर कविता लिखें।” लेखक ने पिताजी की आज्ञा को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए कविता लिखने की ठान ली। उन्होंने बिना किसी को बतलाए कविता लिखकर भेज दी। तीन माह बाद सूचना मिली कि लेखक की भेजी गई कविता को सर्वोत्तम आँका गया है और उन्हें 51 रुपये का पुरस्कार प्रेषित किया जा रहा है। यूँ कविता चयन की बात सुनकर प्रसन्न माताजी ने लेखक पर अभिमान जताते हुए कहा था, “मुझे गर्व है कि मेरा एक बेटा देश-सेवा में तन-मन से काम कर रहा है” और लेखक के पिताजी ने प्रसन्न होकर लेखक के लिए एक कोट बनवाया था।

मेरे जीवन के कुछ चित्र अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक डॉ. रामकुमार वर्मा के लिए ‘देव पुरस्कार’ से भी अधिक मूल्यवान क्या था?
उत्तर:
लेखक की माताजी संगीतज्ञ एवं काव्य-ज्ञान से पूर्ण थीं। वे उषा-काल में उठकर ‘भोर भयो जागहु रघुनन्दन’ गातीं और लेखक से भी गाने के लिए कहतीं। ठीक गाने पर लेखक को एक जलेबी अधिक का पुरस्कार मिलता था जो लेखक के लिए किसी ‘देव पुरस्कार’ से भी अधिक मूल्यवान था।

प्रश्न 2.
बचपन में लेखक डॉ. रामकुमार वर्मा की विशेष रुचि क्या थीं?
उत्तर:
लेखक को बचपन से ही ‘प्रतियोगिता’ विशेष प्रिय रही। कुश्ती लड़ने, नाटक करने, अभिनय करने और पढ़ने में लेखक की विशेष रुचि रही।

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मेरे जीवन के कुछ चित्र पाठ का सारांश

सुप्रसिद्ध कहानीकार ‘डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा लिखित प्रस्तुत आत्मकथा ‘मेरे जीवन के कुछ चित्र’ में लेखक ने अपने बचपन एवं प्रियजनों से सम्बन्धित अतीत की कुछ घटनाओं का सुन्दर एवं सजीव वर्णन किया है।

लेखक के अनुसार उनके जीवन में उनकी माँ का स्थान सर्वोपरि है। उनकी माता का नाम राजरानी देवी था। वे एक उच्च कोटि की संगीतज्ञ थीं और उन्हें काव्य-ज्ञान भी खूब था। वे प्रात:काल जल्दी उठकर राग विभास में गान करतीं और परिवार के सभी लोग सुध-बुध खोकर तन्मयता से उनके गान को सुना करते थे। उन्हीं की प्रेरणा एवं प्रभाव से लेखक कविता-लेखन के क्षेत्र में प्रविष्ट हुए। बचपन से ही लेखक को कुश्ती लड़ने, नाटक खेलने, अभिनय करने और पढ़ने इत्यादि में गहन रुचि थी। किशोरावस्था में एक बार लेखक ने अपने से कहीं अधिक बलशाली प्रतिद्वन्द्वी को कुश्ती में हराकर पुरस्कार जीता था। अभिनय की यदि बात की जाये तो लेखक श्रीकृष्ण’ के अभिनय के विशेषज्ञ थे। श्रीकृष्ण के अभिनय में उन्होंने बहुत-से पुरस्कार अर्जित किये थे।

लेखक पढ़ने में भी काफी होशियार थे। वे सदैव ‘डिवीजन’ में ही उत्तीर्ण हुआ करते थे। माँ की प्रेरणा पर वे सदैव लक्ष्य पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते और उसे पाकर ही साँस लेते थे। लेखक ने अपने जीवन की प्रथम कविता स्वयं-प्रेरणा से एक छोटी-सी तुकबन्दी के रूप में लिखी थी। युवावस्था में लेखक ने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया और विरोधस्वरूप स्कूल छोड़ दिया। एक बार पिताजी के कहने पर लेखक ने देश-सेवा पर एक कविता लिखी और 51 रुपये का नकद पुरस्कार अर्जित कर अपने माता-पिता को गौरवान्वित किया। समाचार के साथ-साथ अपने बचपन की यादों से जुड़ी ये कहानियाँ अब लेखक के मस्तिष्क से निकलती जा रही हैं।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 10 प्रेरक प्रसंग

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 10 प्रेरक प्रसंग

प्रेरक प्रसंग अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने वृद्धा को अपनी रॉयल्टी के सारे पैसे किस भाव से दिये थे? (2010)
उत्तर:
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने वृद्धा भिखारिन को अपनी रॉयल्टी के सारे पैसे इस भाव से दिये थे कि वह फिर कभी भी भीख नहीं माँगेगी। वह इस राशि से कोई भी धन्धा कर लेगी। उसने ऐसा संकल्प लेते हुए कहा। ‘निराला’ जी ने उस बुढ़िया भिखारिन को एक सौ चार रुपये जो रॉयल्टी के मिले थे, वे सब उसे दे दिए और स्वयं खाली हाथ इक्के में बैठकर महादेवी के घर की ओर चल पड़े। इक्के का किराया भी महादेवी ने चुकाया।

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प्रश्न 2.
‘गरीबों का मसीहा’ कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? (2008)
उत्तर:
‘गरीबों का मसीहा’ कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि इस समस्त मानव समाज में गरीबी और अमीरी की विषमता को दूर करने के लिए हम सभी को प्रयास करना चाहिए। जिससे हमारे बीच धनवान् और निर्धन का भेद मिट जाये। कोई भी व्यक्ति गरीब न रहे। इस गरीबी के कारण न जाने कितने इस मनुष्य समाज में अपराध किये जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूख मिटाने के लिए भीख माँगने को अपना धन्धा न बनाये। तब ही ‘गरीबों का मसीहा’ का उद्देश्य सफल हो सकेगा। अन्यथा गरीबी में धनवान् बनकर मसीहा कोई भी नहीं बन सकता। उस व्यक्ति को त्याग करना पड़ता है, परिश्रम करना पड़ता है। परिश्रम से प्राप्त धन गरीबों में वितरित किया जाये, तभी गरीबों का मसीहा स्वयं को सिद्ध कर सकता है। मसीहा कभी भी अपने साथी मनुष्यों की गरीबी को देख नहीं सकता। गरीबी में मसीहा को तो गरीब बनकर ही जीना पड़ता है क्योंकि उनकी गरीबी, उनकी दरिद्रता उनसे (मसीहा से) देखी कहाँ जाती है?

प्रश्न 3.
आपके मतानुसार निराला जी का रॉयल्टी के सारे पैसे देने का निर्णय सही था या गलत, कारण सहित बताइए।
उत्तर:
हमारा मत है कि निराला जी द्वारा रॉयल्टी के सारे पैसे वृद्धा भिखारिन को दिया जाने का निर्णय गलत था। इसके सन्दर्भ में निम्नलिखित कारण स्पष्ट रूप से दिये जा रहे हैं-
(1) ‘निराला’ जी ने अपनी रॉयल्टी के सारे रुपये (एक सौ चार) भीख माँगने वाली वृद्धा को इस संकल्प के साथ दिये कि वह फिर कभी भी भीख नहीं माँगेगी। वह उन रुपयों से कोई धन्धा कर लेगी।

अब यहाँ यह विचार करना है कि वह बूढ़ी भिखारिन कौन-सा कार्य कर सकती है जिससे उसका स्वयं का भरण-पोषण हो सके। उस वृद्ध अवस्था में उसके हाथ-पैर चलते नहीं हैं, निश्चय ही वह कोई भी कार्य नहीं कर पायेगी। रॉयल्टी के दिये गये रुपयों को अपनी निकम्मी सन्तान के ऊपर ही खर्च कर डालेगी और उन पैसों को खर्च कर देने के उपरान्त भीख माँगने के लिए सड़क के किनारे फिर बैठ जायेगी।

(2) उस वृद्धा से उन रुपयों को उसकी सन्तान छीन लेगी और उस वृद्धा को पुनः भीख माँगने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

(3) प्रायः देखा गया है कि इन भिखारिन बनी औरतों पर कोई अभाव नहीं होता। वे भीख माँगने की आदत से मजबूर हो जाती हैं और बदस्तूर भीख माँगती रहती हैं।

(4) ऐसे भिखारी अपने भीख माँगने के स्थान को बदल देते हैं लेकिन अपने भीख माँगने के धन्धे को नहीं बदलते।

(5) मैंने खुद ऐसे भिखारियों को देखा है, जो भीख न माँगने का वायदा करते रहे हैं; परन्तु उन्होंने अपने इस काम को नहीं छोड़ा है। इस भीख माँगने को उन्होंने अपना व्यवसाय बना रखा है। वे अपने असली रूप को भिखारी के वेश में बदल देते हैं और समाज के लोगों को निर्धनता के होने का स्वांग करते हुए प्रदर्शित करते हैं।

(6) इन भिखारी बने लोगों को किसी भी तरह के रोजगार से लगाने की आपकी चेष्टा अवश्य विफल होगी। इसके कारण हैं-एक तो वे काम न करने की आदत में ढल गये हैं। दूसरे वे जहाँ भी रोजगार प्राप्त करने जाते हैं, वहाँ से चोरी करके भाग जाते हैं, या काम पर लौटकर नहीं आते।

इस तरह इन भीख माँगने वाले लोगों ने पूरे भारतीय समाज को कलंकित किया हुआ है। अतः मेरा मत तो यही है कि निराला द्वारा दिया गया रॉयल्टी का पैसा व्यर्थ गया। उनका निर्णय परिस्थितियों के प्रतिकूल था, अव्यावहारिक था। इस दिए गये दान का कोई सुफल प्राप्त होने का नहीं दिखता।

प्रश्न 4.
“अर्थोपार्जन मेरा ध्येय नहीं है। गरीबी मेरी शान है।” इस कथन के भाव अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
उत्तर:
“अर्थोपार्जन मेरा ध्येय नहीं है। गरीबी मेरी शान है।” इस कथन को स्पष्ट करते हुए यह कहा जा सकता है कि जहाँ तक धन कमाने का प्रश्न है, धन तो कमाया जा सकता है। लेकिन धन को कमाने के उपाय कैसे होंगे, इन अपनाये गये उपायों का स्वरूप कैसा होगा इसका निर्धारण करना महत्त्वपूर्ण बात है।

श्री बालमुकुन्द गुप्त ‘भारत-मित्र’ नामक दैनिक मित्र के सम्पादक हैं। उनकी साख एक ईमानदार एवं परिश्रमी सम्पादक की है। लोग उनके सच्चे सम्पादकत्व में बेईमानी अथवा भ्रष्टता की दुर्गन्ध होने का विश्वास नहीं करते। अतः अपने परिष्कृत एवं परिमार्जित सम्पादकत्व की गरिमा को उन्होंने अपने सदाचार और परिश्रम से सुरक्षित किया है। वे धन कमाने का ध्येय बनाते तो कोई भी गलत आचरण का उपयोग करके धन अर्जित कर सकते थे, लेकिन अपने स्थापित आदर्शों के परिपालन के लिए उन्होंने गरीबी में जीवनयापन करना उचित समझा। यह निर्धनता कोई ऐसी खराब अवस्था नहीं होती जिससे व्यक्ति व्यथित होकर गलत आचरण करे। ईमानदारी से परिपूर्ण एवं सच्ची लगन से किये गये परिश्रम से उस निर्धनता को दूर किया जा सकता है और वह व्यक्ति समाज में शानदार और इज्जतदार व्यक्ति का सम्मान पा सकता है।

गरीबी में अच्छे-अच्छे महान् कार्यों का सम्पादन करते हुए लोगों को देखा है। उन्होंने अपने आदर्शों का पालन किया है। वे समाज के लिए बड़े ही उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

श्री बालमुकुन्द जी गुप्त ने इस गरीबी को अपना प्राण और शान के रूप में धारण किया है, वरण किया है, स्वीकार किया है क्योंकि वे समाज के लोगों से अपने आपको अलग प्रदर्शित करते हुए जीवित रहना नहीं चाहते। भारत का आम नागरिक गरीब है। सम्पादक जी अपने पत्र में अपने इस ईमानदार पेशे से लोगों को सच्ची सूचना देकर उन्हें गुमराह करना नहीं चाहते। एक सम्पादक समाज और देश का सजग प्रहरी होता है। देश के प्रत्येक नागरिक को सही दिशा निर्दिष्ट करता है। उन्हें इंगित करता है कि उचित मार्ग क्या है? सच्ची घटना क्या है? वे चाहते तो कितना ही मनमाना धन अर्जित कर सकते, केवल अपने आदर्श को छोड़कर, सिद्धान्तों में परिवर्तन करके। उनमें इस बात की चाहना है, एक ललक है कि आम नागरिक के दुःख-दर्द को एक सम्पादक समझे और अनुभव करे। यही अनुभव उनके साहित्य को सप्राणता प्रदान करते हैं। अत: गरीबी की अनुभूति समाज के स्तर पर, उसके सतही रूप में गहरी अनुभूति देती है जो व्यक्ति की शान के रूप में उसके चरित्र को उभारकर रखती है।

प्रश्न 5.
“बालमुकुन्द जी भारत के एक आम नागरिक का जीवन जीना चाहते थे।” इस कहानी के आधार पर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्री बालमुकुन्द गुप्त ‘भारत-मित्र’ जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सम्पादक हैं। वे फटेहाली का जीवन जी रहे हैं। वे बहत सस्ते और कम कीमत के वस्त्र पहनते हैं और अपने घर के सभी सदस्यों को मितव्ययिता से जीवन बिताने की सुशिक्षा देते हैं। वे फिजूलखर्ची को अच्छी आदत नहीं मानते हैं। धन को तो किसी भी तरह कमाया जा सकता है, लेकिन फिजूलखर्ची से उसका उपयोग अच्छे रूप में नहीं किया जा सकता, ऐसा उनका मत है।

वे जो भी सिद्धान्त या आदर्श स्थापित करते हैं, या उनको प्रस्तावित करते हैं, वे सबसे पहले अपने ऊपर, अपने परिवार के सदस्यों के ऊपर व्यवहार में लाये जाते हैं। इसका एक कारण है, वह है एक सजग सम्पादक जो अपने परिवेश अपने समाज और देश (राष्ट्र) की नीति और रीति से जुड़ा रहता है। इसके विपरीत चलने पर वह अपने आम नागरिक होने के सिद्धान्त का कोरा ढिंढोरा ही पीटता रहता है।

एक सम्पादक का उत्तरदायित्व होता है आम नागरिक के दुःख-दर्द को समझने का, उन दुःख-दर्दी में अनुभूतिपरक सहयोग का। इन सभी दशाओं में एक सुयोग, सफल और सच्चा सम्पादक वही है जो आम नागरिक को कम से कम परिस्थिति के अनुसार उचित मार्ग निर्देशन देकर सहयोग करे। यही अनुभव सम्पादकीय साहित्य में संजीवनी घोलते हैं और सम्पूर्ण समाज को सचेष्ट और क्रियाशील बनाते हैं। वे एक सच्चे नागरिक के रूप में उभर कर आते हैं तथा राष्ट्र रूपी भवन की ऊँचाइयों को प्राप्त करने के लिए मजबूत स्तम्भ सिद्ध होते हैं।

आम नागरिक का जीवन किसी भी व्यक्ति को चाहे वह साहित्यकार हो या समाज सेवी हो या संस्थागत कर्मचारी-उन सभी का यह सद्कर्त्तव्य होता है कि वे अपने आचरण से, व्यवहार से, लोगों को सच्ची दिशा इंगित करते चलें। अन्याय के कुमार्ग से बचते हुए सन्मार्ग के पथिक होकर वास्तविकताओं को स्वीकारते हुए विकास पथ का अनुसरण करें। आम नागरिक का जीवन इन सभी सामाजिक संस्थानों के सेवकों के आचरण-व्यवहार से प्रभावित होता है। आम नागरिक वस्तुतः गरीबी, साधनहीनता, अशिक्षा के अभिशाप से संतृप्त है, तो फिर बताइये बालमुकुन्द गुप्त जैसे सचेष्ट, सजग सम्पादक स्वयं किस तरह आम नागरिक से अलग प्रभाव से प्रभावित हों। अशिक्षा को मिटाने का उनका ध्येय पूर्ण हो सकेगा, लोग गरीबी से मुक्ति पायेंगे, उनकी समृद्धि के साधन जुटाये जायेंगे-केवल उन्हें सुदिशा, इंगित की जाए। उन्हें सच्ची और सही सूचना प्रदान की जाये।

सही दिशा निर्दिष्ट करना, सच्ची, सही सूचना देना एक सम्पादक का सद्धर्म है। अतः अन्याय से बचकर न्यायमार्ग का अनुसरण करके ही आम आदमी (नागरिक) का जीवन जीवित रहा जा सकता है।

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प्रेरक प्रसंग अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि ‘निराला’ के अनुसार मानवता कहाँ से आती है?
उत्तर:
कवि ‘निराला’ के अनुसार मानवता हृदय की विशालता से आती है, भौतिक सम्पन्नता से नहीं।

प्रश्न 2.
‘गुप्त जी’ का पूरा नाम क्या था? वह किस अखबार के सम्पादक थे?
उत्तर:
‘गुप्त जी’ का पूरा नाम श्री बालमुकुन्द गुप्त था। वह भारत मित्र’ नामक हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के सम्पादक थे।

प्रेरक प्रसंग पाठ का सारांश

1. गरीबों का मसीहा पाठ का सारांश

प्रस्तावना-ईश्वर की सृष्टि में विषमता :
निर्धनता सिर पर चढ़कर बोलती है। इस संसार में कोई धनवान है, तो कोई निर्धन। कोई कुछ भी काम नहीं करता फिर भी मौज की जिन्दगी जीता है और कोई दिन-रात परिश्रम करते-करते दो जून की रोटी को तरसता है। परिस्थितियों से समझौता, उसकी लाचारी है। इस संसार में यह विषमता कब तक चलती रहेगी, इसका उत्तर किसी के पास भी नहीं है।

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ :
गरीबों के मसीहा-निराला जी कई दिनों से उपवास कर रहे थे और पैदल भी चले जा रहे थे। वे दुनिया से दीनता, गरीबी को मिटाने सम्बन्धी विचारों जिससे इक्का ताँगा कर लेते। वे गरीबों के मसीहा थे। अत: उन्हें भी गरीब बनकर जीना है। वे गरीबों की दरिद्रता देख नहीं सकते थे। स्वयं मौज मारे, दूसरे भाई भूखे नंगे रहे, ऐसा वे स्वप्न में

भिखारिन की सहायता :
वे भूखे थे, लीडर प्रेस-दारागंज चले जा रहे थे। सोचते थे कि प्रेस से रॉयल्टी के कुछ पैसे मिलें, तो वे अपनी भूख मिटाएँ। रॉयल्टी के 104 रुपये प्राप्त हुए; इक्के पर सवार हो लिए और अपनी मुँह बोली बहन महादेवी के घर पहुँचने ही वाले थे कि एक करुण पुकार उनके कानों में पड़ी, तो इक्का रुकवाया, स्वयं उतरे और सड़क किनारे बैठी भिखारिन के पास जा पहुंचे। उनके हृदय में करुणा जाग गई, बोले माँ! हमारे रहते तुम्हें भीख माँगनी पड़ती है, ऐसा नहीं हो सकता।

भीख न माँगने का संकल्प :
बुढ़िया ने अपने कमजोर स्वर में कहा कि मैं बुढ़ापे की कमजोरी में कुछ कर नहीं सकती। सन्तान ने दूध से निकाली मक्खी की तरह मुझे फेंक दिया है। विवशता से भीख माँगकर खाती हूँ। कवि ने कहा कि एक रुपया दूं तो कब तक भीख नहीं माँगोगी। यदि पाँच रुपये दूं तो कब तक ? बुढ़िया ने उत्तर दिया एक दिन और पाँच दिन क्रमशः

इस पर कवि निराला ने कहा कि यदि एक सौ चार रुपये दे दिये जाएँ तो कब तक भीख नहीं माँगनी पड़ेगी? बुढ़िया का उत्तर था कभी नहीं। वह कोई धन्धा कर लेगी। इसका संकल्प उस बुढ़िया ने ले लिया।

उपसंहार :
निराला जी, खाली जेब ही महादेवी के घर पहुँचे और इक्के का भाड़ा भी महादेवी को देना पड़ा क्योंकि उनके पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उनकी आत्मा आज भी दहाड़ मारती हुई कहती है कि मानवता हृदय की विशालता से आती है; भौतिक सम्पन्नता से नहीं।

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2. आदर्शवादी बिक नहीं सकता पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
श्री बालमुकुन्द गुप्त ‘भारत-मित्र’ जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सम्पादक थे। उनके दरवाजे को किसी ने खटखटाया। अन्दर कमरे में नीचे फर्श पर दरी बिछाकर बैठे हुए श्रीगुप्त जी चौकी पर कागज रखकर लिख रहे थे। तब उन्होंने छोटे पुत्र को आवाज दी और कहा, “देखना बेटा! कौन आये हैं?”

छोटे बेटे ने दरवाजा खोला और एक सज्जन अन्दर प्रविष्ट हुए। गुप्त जी उन्हें देखकर खड़े हो गये और पूछा कि हे मित्र! बहुत दिन बाद दिखाई दिए हो, आजकल कहाँ हो और क्या कर रहे हो?

आगन्तुक पुराने मित्र :
जो सज्जन आये हुए थे, वे गुप्तजी के पुराने मित्र थे। भारत-मित्र’ हिन्दी दैनिक के सम्पादक श्री बालमुकुन्द गुप्त की कमीज पीछे दीवार पर खूटी पर टंगी हुई थी। वह कमीज बहुत हल्के और सस्ते कपड़े की सिली हुई थी। गुप्त जी मोटी निब वाली सस्ते दामों वाली कलम से लिख रहे थे।

आगन्तुक महोदय ने सभी वस्तुओं को, घर के वातावरण को बड़ी बारीकी से देखा। सज्जन अपने मन्तव्य की बात कहना ही चाहते थे कि गुप्त के ज्येष्ठ पुत्र ने कमरे में प्रवेश किया और बाजार से खरीद कर लाई गई दो कमीजों को अपने पिताजी श्री गुप्त जी के सामने रखा।

मितव्ययिता की सीख :
गुप्त जी ने कहा कि कमीज तो अच्छी है लेकिन है कितने की? बेटे ने कमीज का मूल्य बताया चार रुपये ! गुप्त जी को विस्मय हुआ और आपत्ति के स्वर में कहा कि कमीज को इतना महँगा क्यों खरीदा? इतने रुपये में तो घर के सभी सदस्यों के लिए कपड़े बन सकते थे। इसी बीच आगन्तुक महादेय ने कहा कि गुप्त जी बच्चे हैं, “यदि वे इस समय नहीं खायेंगे, नहीं पीयेंगे और नहीं पहनेंगे, तो फिर ये कब खाएँगे और पहनेंगे।”

फिजूलखर्ची को रोकना :
गुप्तजी ने कहा- यह तो सरासर फिजूलखर्ची है। महँगे कपड़े पहनने की सामर्थ्य हमारे परिवार में नहीं है। रह जाती है बात खाने-पीने की उम्र का सम्बन्ध भी मितव्ययिता से होना चाहिए। मितव्ययिता भी इसी समय सीखनी है।

धन की कमी की पूर्ति :
आगन्तुक महोदय बोले कि धन की कमी से होने वाली कठिनाई को तो मैं दूर करे देता हूँ। मैं इसलिए ही तो आपके पास आया हूँ। इतना कहते ही आगन्तुक मित्र महोदय ने पाँच हजार रुपये उनकी चौकी पर रख दिये।

विस्मय :
गुप्त जी यह देखकर चौंक पड़े और लगा कि उनके शरीर पर सैकड़ों साँप और बिच्छू रेंग गये हों। विस्मय से फटे नेत्र वाले गुप्त जी ने यह देखते हुए कहा-क्या मतलब?

दो धनवानों के बीच मुकद्दमा :
आपको विहित है कि यहाँ की फौजदारी की अदालत में दो धनवान व्यक्तियों के बीच मुकद्दमा चल रहा है। दोनों पक्षों से सम्बन्धित सनसनीपूर्ण विवरणों द्वारा अपने पत्र के माध्यम से उनका समर्थन करें, तो उन लोगों को लाभ मिल सकता है। इसी के लिए उनकी ओर से आपके पास भेंट लेकर आया हूँ।

गरीबी मेरी शान है :
गुप्त जी ने धीरे से लेकिन गम्भीर स्वर में कहा-‘मित्र ! तुम गलत समझते हो। अगर धन कमाना ही मेरा ध्येय रहा होता; तो आप जो अभी चारों ओर घूर-चूर कर देख रहे थे और मेरी गरीबी पर आश्चर्य कर रहे थे। वह नहीं होता। गरीबी मेरी शान है। मैंने अपनी इच्छा से ही इसका (गरीबी का) वरण किया है। इसका कारण यह है कि मैं आम नागरिक से एक होकर जीवन जीना चाहता हूँ। उसके दुःख-दर्द को समझने की और अनुभव करने की ललक है। यही अनुभव मेरे साहित्य को प्राण देते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो गरीबी मेरे प्राण हैं। यह भी अन्याय की खातिर कदापि सम्भव नहीं।”

उपसंहार :
गरीबी की गरिमा का गान सुनकर बेचारे मित्र महोदय, अपना रुपया उठाकर चलते बने और गुप्त जी पुनः लेखन में व्यस्त हो गये।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

धूपगढ़ की सुबह साँझ अभ्यास

धूपगढ़ की सुबह साँझ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धूपगढ़ कहाँ स्थित है?
उत्तर:
धूपगढ़ प्रसिद्ध पचमढ़ी पर स्थित है।

प्रश्न 2.
प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
लेखक ने प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ मानी हैं-सुबह और साँझ।

प्रश्न 3.
सतपुड़ा का गौरव किसे कहा गया है? (2017)
उत्तर:
धूपगढ़ को सतपुड़ा का गौरव कहा गया है।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने सुबह और साँझ की तुलना माता-पिता के किन गुणों से की है?
उत्तर:
लेखक ने सुबह की तुलना पिता की प्रेरणा और शक्ति सम्पन्नता से की है तथा माता की ममता की तुलना साँझ की सहृदयता से की है।

प्रश्न 2.
साँझ की आँखों में करुणा क्यों उभर आती है?
उत्तर:
वनवासी की पगड़ी पर एवं वनवासी स्त्री की चूनर पर फूल संध्या के समय गिर जाते हैं। इससे साँझ की आँखें करुणा से द्रवित हो जाती हैं।

प्रश्न 3.
सुबह और साँझ की परस्पर तुलना क्यों अनुचित है?
उत्तर:
सुबह और साँझ की तुलना परस्पर अनुचित इसलिए है क्योंकि सुबह और साँझ दोनों की दुनिया अलग-अलग है, दोनों का अपना-अपना महत्व और सम्मोहन है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने प्रातःकालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना किन-किन बातों से की
उत्तर:
लेखक ने प्रात:कालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना विभिन्न प्राकृतिक उपमानों के माध्यम से की है-जिस प्रकार रोली से स्नात कलश को किरण से युक्त अल्पना पर रख दिया हो या किसी बड़े कुम्हार ने लाल मिट्टी का घड़ा अँधेरी सड़क पर प्यास से व्याकुल मानव की प्यास को बुझाने के लिए भर दिया हो। इसके अतिरिक्त जितने भी सेवा में व्यस्त मनुष्य हैं उनकी निस्वार्थ भावना युक्त सोने की कलश की चमक से तुलना की है।

प्रश्न 2.
तमतमाते दिवस की अवसान बेला कैसी है?
उत्तर:
तमतमाते दिवस की अवसान बेला में एक विशेष प्रकार का परिवर्तन आ जाता है। उसका प्रमुख कारण है कि इस बेला में सब कुछ शान्त हो जाता है। वनस्पति शान्त है, पक्षी भी शान्त हैं। सांसारिक झमेले भी शान्त हैं। आसमान की नीलिमा भी शान्त है। कभी न थकने वाले पक्षियों की उड़ान भी शान्त है क्योंकि वे संध्या काल में अपने नीड़ में विश्राम करते हैं। इसी कारण उनकी तीव्रगामी गति शान्त है। प्रकम्पित ध्वनियाँ शान्त हैं। उसका कारण है कि इस बेला में चारों ओर का कोलाहल शान्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
लेखक सुबह और साँझ के माध्यम से क्या कहना चाहता है? (2008, 09)
उत्तर:
लेखक ने सुबह और साँझ के माध्यम से जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन किया है। इसमें जीवन, मृत्यु, सुख, दु:ख और आदि-अंत तथा विभिन्न प्रकार के उतार-चढ़ाव के द्वारा जीवन के काल चक्र को दर्शाया है।।

सुबह और साँझ एक-दूसरे के विपरीत नहीं है अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। पिता की तुलना एवं माता की तुलना लेखक ने सुबह और साँझ से की है और यह बताने का प्रयास किया है कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों को सहृदय व स्नेह द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं तदनुकूल सुबह और साँझ मानव को जीवन पथ पर अग्रसर होने का पाठ पढ़ाते हैं। साथ ही सन्देश देते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति को धैर्य से बढ़ते रहना चाहिए।

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प्रश्न 4.
लेखक की भाषा अलंकारिक तथा शैली ललित है। उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की अलंकारिक भाषा का उदाहरण निम्नवत् है-
(1) वैसे तो कई सुबहों और साँझों का प्रकाश भीगी-पलकों ने उठते-गिरते देखा है परन्तु उन साँझों में एक साँझ यादों के वृक्ष पर फल की तरह लगी हुई है। धूपगढ़ की साँझ का रूप, रंग, आकार, रस सब कुछ निराकार बनकर अंतरिक्ष में फैला हुआ है। पंचमढ़ी, पर्वतों की रानी कही जाती है। सतपुड़ा का सारा निसर्गगत सौन्दर्य पचमढ़ी की गोदी में झूल रहा है।

(2) लेखक की भाषा शैली का अनुपम उदाहरण द्रष्टव्य है-प्राची के हिरण्य गर्भ से बालारूण की जन्म बेला की प्रतीक्षा में विश्व मोहिनी शक्ति जैसे जाग गई हो। क्षितिज पर पतली-सी रेखा उभरती है और बालक की किलकारी दिशाओं तक फैल जाती है। पक्षी उसी किलक को अपने स्वरों में भरकर आकाश को जाते हैं। क्षितिज पर भुवन भास्कर की पहली रेखा जैसे किसी बालक ने पूरब की स्लेट पर स्वर्णिम पेन से लकीर खींच दी हो; जिसका बीच का भाग ऊपर की ओर हल्का-सा उठा हुआ है। जैसे अंधेरे के महासमुद्र में आती हुई ऊषा का जल सतह पर सुनहरे रंग का केशबंध’ (हेयर बैंड) दिखाई दे रहा है।

(3) अन्य उदाहरण देखिए-यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंसक पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येत्तर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। उपर्युक्त उदाहरणों द्वारा भाषा की अलंकारिकता एवं शैली की विशेषता अवलोकनीय है।

प्रश्न 5.
इन गद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) गगन से सूर्योदय ……………. विरला ही पहुँचता है।
(2) धूपगढ़ की साँझ…………….. सुला लेती है।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

(2) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

प्रश्न 6.
(क) प्रकृति सुख-दुःख से परे है। वह नियंता है।
(ख) जन्म और मृत्यु प्रकृति के लिए दो सहज स्थितियाँ हैं।
(ग) सुख के केन्द्र में स्वतन्त्रता और उन्मुक्तता होती है।
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव पल्लवन कीजिए।
उत्तर:
(क) लेखक ने इस पंक्ति द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि प्रकृति पर दुःख हो अथवा सुख, किसी भी प्रकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। प्रकृति नियंता एवं वीतराग है। वह भौतिक सुख-दुःख से परे रहकर विश्व का नियन्त्रण करती है। उसी के निर्देशन में परिवर्तन के दृश्य उपस्थित होते रहते हैं। प्रकृति पर विषम से विषम परिस्थितियाँ तनिक भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकतीं।

(ख) लेखक का कथन है कि इस धरती पर प्रकृति के माध्यम से निरन्तर जन्म और मृत्यु चक्र चलता ही रहता है। इनसे किसी को भी मुक्ति नहीं मिल सकती है। लेखक ने यहाँ गीता के इस तथ्य को उजागर किया है जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु निश्चित है तथा मृत्यु के पश्चात् पुनः जन्म होता है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नवीन वस्त्र धारण करता है। तद्नुरूप आत्मा पुराना काया रूपी वस्त्र उतारकर नया कायारूपी वस्त्र धारण करती है।

(ग) लेखक का कथन है धूपगढ़ वन क्षेत्र में रहने वाले मानव अभावों एवं गरीबी से त्रस्त हैं। वे इन अभावों के अन्तर्गत एक असीम सुख का अनुभव करते हैं। यद्यपि वे सांसारिक दृष्टि से कंगाल हैं लेकिन प्रकृति की गोद में पल कर एक अनिवर्चनीय सुख का अनुभव करते हैं। उनका सुख किसी के माध्यम से प्राप्त न होकर प्रकृति की निकटता का परिणाम है। वे स्वयं को पराधीन न मानकर स्वतन्त्र भाव से वन की धरती पर विचरण करते हैं।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय और उपसर्ग छाँटकर लिखिए
प्रस्थान, मनुष्यता, उन्मुक्तता, उज्ज्वल, तन्मयता, अविजित, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उत्तर:
प्रत्यय-मनुष्यता, उन्मुक्तता, तन्यता, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उपसर्ग : प्रस्थान, उज्ज्वल, अविजित।

प्रश्न 2.
निम्न शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
सुबह, साँझ, गाँव, पाँव, आँच।
उत्तर:
प्रातः, संध्या, ग्राम, पाद, अग्नि।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
उत्तर:

  1. जहाँ जाया न जा सके – अगम्य
  2. जिसकी उपमा न हो – अनुपमेय
  3. जिसे पढ़ा न हो – अपठित
  4. काँटों से भरा हुआ – कंटकाकीर्ण
  5. आकाश को छूने वाला – गगनचुम्बी
  6. सदा हरने वाला – अमर।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्य में विराम चिह्नों का यथास्थान प्रयोग कीजिए-
यह साँझ पृथ्वी को अमृत सोम शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है
उत्तर:
यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ पाठ का सारांश

पंचमढ़ी स्थित धूपगढ़ सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की सर्वाधिक ऊँची चोटी है। सूर्य के निकलने एवं अस्त होने के समय नेत्रों एवं मन को लुभाने वाले दृश्यों की शोभा देखते ही बनती है। पर्यटक इन्हें देखते-देखते अघाते नहीं हैं। डॉ. श्रीराम परिहार ने अपने निबन्ध में धूपगढ़ की -प्रातः एवं साँझ बेला का छायावादी चित्रण अंकित किया है। प्रकृति का मानवीकरण सटीक एवं जीवन्त है। सुबह एवं शाम के प्रतीकों के द्वारा जिन्दगी, मृत्यु, विषाद एवं सुख आदि कालचक्र का ऐसा गतिशील विवेचन किया है जो जीवन की वास्तविकता को हमारे नेत्रों के समक्ष उपस्थित करने में सक्षम है। वनवासियों के संकटग्रस्त जीवन का भी वर्णन किया है। पशुओं एवं वन प्रदेश का भी चित्रण किया है। प्रातः एवं सन्ध्या के माध्यम से जिन्दगी के संघर्ष एवं शान्ति के तालमेल को भी अंकित किया है। निबन्ध में जिन्दगी का राग गुञ्जित है। आत्मा का वैराग्य भी ध्वनित है। सुबह-शाम एक-दूसरे के विरोधी न होकर जीवन के संदेशप्रद हैं।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ कठिन शब्दार्थ

सुगन्ध = खुशबू। साँझ = सायंकाल। वर्ण रंग। अदृश्य = जो दिखायी न दे। दिक्काल = दिशाओं के स्वामी। उद्गम = निकलने का स्थान। क्षितिज = जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले हुए दिखाई देते हैं। पखेरुओं = पक्षियों। कर्मपूर्णता = काम के पूरा होने का भाव। अग्निमय = आग से भरा हुआ। शक्ति सम्पन्नता = शक्ति से युक्त। हृदय रसज्ञता = हृदय के रस को जानने की क्षमता। भोर तक = प्रात:काल तक। भीगी पलकों = आँसुओं से गीली पलकें। अंतरिक्ष = आकाश। निसर्गगत सौन्दर्य = प्राकृतिक सुन्दरता। पाग = पगड़ी। निशिवासर = रात-दिन। सान्निध्य = सम्पर्क। ब्रह्ममुहूर्त = प्रात:काल। वन वल्लरियों = लताओं। प्राची = पूर्व। हिरण्य-गर्भ = स्वर्ण या सोने की कोख। बालारुण = प्रात:कालीन सूर्य। स्वर्णिम = सोने के। ऊषा = प्रात:काल। महानिलय = आकाश। तृषा = तृप्ति, प्यास बुझाने के लिए। निष्कलुष = पवित्र। गोरिक वसना = गेरुए वस्त्र धारण करने वाली। नील-कुसुमित = नीले पुष्प के रूप में खिलना, नीलकलिका। माधवी लता = माधवी पुष्प की लता। प्रातिभ = प्रात:कालीन सूर्य की लाली। देहयष्टि = शरीर सौष्ठव। अल्हड़ ठवनि = चंचलमुद्रा। नूपुरों = घुघरुओं। कर्ण आह्लादन = कानों में खुशी उत्पन्न करने वाली। सारस्वत = ज्ञानमयी, बौद्धिक। पूर्वपीठिका = पहली भूमिका। तिमिर = अन्धकार। अनुताप-पूरित = दुःख से भरा हुआ। दिवस = दिन। प्राण बल्लभा = प्रेयसी, प्रियतमा। मलयज चीर = सुगन्धित वस्त्र, मलय चन्दन गन्ध से सुगंधित। मृग मरीचिका = मृगतृष्णा, मिथ्या प्रतीति। भास्वर = प्रकाशवान। उत्पुल्ल = प्रसन्न। सारसवर्णी = सारस के रंग वाली। साँसोच्छेदन = साँसों को समाप्त करना। अहेतुक = निस्वार्थ, स्वार्थ हीन। वात्सल्य = सन्तान के प्रति माता-पिता का प्रेम। स्लथ = बकी। शुभ्र = श्वेत, स्वच्छ।

धूपगढ़ की सुबह साँझ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. गगन से सूर्योदय के प्रकाश का अमृत झरता है। किरणें फूटती हैं और रश्मि-सेतु सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक बन जाता है। इसे देखना अच्छा लगता है। इस रश्मि सेतु पर चलकर सूर्य तक कोई विरला ही पहुँचता है। (2015)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

विशेष :

  1. प्रकृति का मानवीकरण है।
  2. प्रात: बेला की मनोरम झाँकी है।
  3. शैली अलंकारिक एवं परिमार्जित है।

2. धूपगढ़ की सुबह देखी है, साँझ भी देखी है। दोनों में किसका सौन्दर्य ज्यादा है? किसका रंग घना है? किसका प्रभाव गहरा है? नहीं कह सकते। यह तुलना भी अनुचित है। सुबह, सुबह है। साँझ, साँझ है। दोनों की अपनी दुनिया है। अपनी महिमा है। अपना सम्मोहन है। सामान्यतः सुबह और साँझ अपने प्राकृतिक चक्र के कारण सहज रूप में आती जाती हैं। इनके होने में प्रकृति की इच्छा ही अभिव्यक्त होती है। (2016)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में सुबह और साँझ दोनों के स्वाभाविक महत्व को समझाया गया है।

व्याख्या :
धूपगढ़, प्राकृतिक सौन्दर्य का भण्डार है। यहाँ की सुबह और साँझ बहुत ही रोमांचकारी होती है। यहाँ की सुबह और साँझ दोनों की सुन्दरता को देखा है। दोनों का सौन्दर्य अद्भुत है। यह कहना सम्भव नहीं है कि इनमें किसकी सुन्दरता अधिक है। किसका रंग घना प्रभावी है अथवा किसकी प्रभावशीलता गहन है। इन दोनों की सुन्दरता की तुलना करना भी उचित नहीं है। सुबह का सौन्दर्य सुबह का है और साँझ की सुन्दरता साँझ की है। इन दोनों का संसार अपना-अपना है। इनका गौरव, महत्व एवं मोहकता भी अपनी-अपनी है। वास्तविकता यह है कि सुबह और साँझ प्रकृति के चक्र के कारण स्वाभाविक रूप से आती हैं और चली जाती हैं। ध्यान से देखें तो इन दोनों के सम्पादन में प्रकृति की मनोकामना ही व्यक्त होती प्रतीत होती है।

विशेष :

  1. सुबह और साँझ के आवागमन की स्वाभाविकता का सटीक अंकन हुआ है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. काव्यमयी आलंकारिक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

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3. यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंस्त्र पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येतर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं, तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। (2012)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

विशेष :

  1. संध्या के समय होने वाली गतिविधियों का रोचक वर्णन हुआ है।
  2. लाक्षणिक भाषा तथा रोचक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

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