MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 तुम वही दीपक बनोगे

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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 तुम वही दीपक बनोगे (दिवाकर वर्मा)

तुम वही दीपक बनोगे पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

तुम वही दीपक बनोगे लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि प्रतिपल सजग रहने की सलाह क्यों देता है?
उत्तर
कवि प्रतिपल सजग रहने की सलाह देता है। यह इसलिए कि वायुमण्डल विषैला हो गया है।

प्रश्न 2.
विषधरों को कीलने के लिए कवि कौन-सी युक्ति सुझाता है?
उत्तर
विषधरों को कीलने के लिए कवि मधुर-मादक-मत्त ध्वनि-सी युक्ति सुझाता है।

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प्रश्न 3.
कवि को ऐसा क्यों लगता है कि प्राण आहादित नहीं है?
उत्तर
आज रागिनी बेसुरी है। संवेदनाएँ क्षत-विक्षत हैं और मन की बाँसुरी चुप है। इसलिए कवि को ऐसा लगता है कि प्राण आहादित नहीं है।

प्रश्न 4.
दामन बचाना कवि को कठिन क्यों लगता है?
उत्तर
दामन बचाना कवि को कठिन लगता है। यह इसलिए कि चारों ओर अग्नि की ज्वाला जल रही है।

प्रश्न 5.
कवि चारों दिशाओं में जलन क्यों अनुभव करता है?
उत्तर
कवि चारों दिशाओं में जलन अनुभव करता है। यह इसलिए कि मन मरुस्थल बन रहे हैं और तन की प्यास नहीं बुझ रही है।

तुम वही दीपक बनोगे लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अमावस की कालिमा से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर
अमावस की कालिमा से कवि का तात्पर्य है-द्वैष और अविश्वास का अंधकार।

प्रश्न 2.
‘पोटली विष की भरी है’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पोटली विष की भरी है’ का आशय है। ईया, द्वेष, नफ़रत, स्वार्थ आदि का विस्तृत वातावरण।

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प्रश्न 3.
वर्तमान स्थिति में मानव-संबंध के बारे में कवि के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
वर्तमान स्थिति में मानव-संबंध के बारे में कवि के विचार सुस्पष्ट हैं। उसका यह मानना है कि आज चारों ओर द्वैष और अविश्वास का इतना विषेला वातावरण फैल चुका है कि उससे निजात पाना न केवल कठिन है, अपितु अपने-आप में एक बहुत बड़ी चुनौती भी है।

प्रश्न 4.
जमाने के चलन को सुधारने के लिए कवि की युवाओं से क्या अपेक्षाएँ हैं?
उत्तर
जमाने के चलन को सुधारने के लिए कवि की युवाओं से अपेक्षाएँ हैं कि वे अमृतमयी मनुहार से प्राण संपादित करके बासंती बनेंगे।

तुम वही दीपक बनोगे भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
अमावस्या, मधुर, मूक, अमृत।
उत्तर
शब्द – विलोम
अमावस्या – पूर्णिमा
मधुर – कठोर
मूक – वाचाल
अमृत – विष।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह कर समासों के नाम लिखिए
विषधर, वायुमण्डल, क्षत-विक्षत, अग्नि-ज्वाला, चतुर्दिश।
उत्तर
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 तुम वही दीपक बनोगे img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
उत्तर
वाक्यांश – एक शब्द
जो विष से भरा – विषैला
बसंत से सम्बंधित – वासंती
जहाँ कुछ उगता नहीं – मरुस्थल
अँधेरे से भरी रात्रि। – अमावस्या।

तुम वही दीपक बनोगे योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
युवाओं को संबोधित कवियों की रचनाओं का संग्रह कीजिए एवं कक्षा में सुनाइए।
प्रश्न 2.
‘युवा देश की तस्वीर बदलते हैं’ इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
प्रश्न 3.
आकाशवाणी और दूरदर्शन के ‘युवा कार्यक्रम’ को देखिए और उस में भाग लीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

तुम वही दीपक बनोगे परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘तुम वही दीपक बनोगे’ कविता का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘तुम वही दीपक बनोगे’ कविता कविवर दिवाकर वर्मा की एक मार्मिक और हृदयस्पर्शी कविता है।
प्रस्तुत कविता देश की वर्तमान युवा पीढ़ी को समर्पित और संबोधित है। कवि का यह मानना है कि वर्तमान में चारों ओर द्वैष और अविश्वास का अंधकार छाया हुआ है। उसको भेदकर युवा वर्ग ही दीप-सा प्रकाश दे सकता है। कवि को यह पूरा-पूरा विश्वास है कि युवा वर्ग आज के विषैले समाज को अपने मधुर राग से, त्रसित मानवता को मलय । पवन के समान शीतलता से, खण्डित रिश्तों को प्रेम के सेतु से, तीक्ष्ण ताप से प्रताड़ित मानव को प्रेमपूर्वक तथा प्यासे हुए प्राणों को बासंती स्पंदन से अमृतदान दे सकता है।

प्रश्न 2.
कवि युवा वर्ग को कौन-सा दीपक बनने के लिए कह रहा है?
उत्तर
कवि युवा वर्ग को अमावस्या की कालिमा को धूप के समान उजियार कर देने वाला दीपक बनने के लिए कह रहा है।

प्रश्न 3.
आज मनुष्य के संबंध परस्पर कैसे हो रहे हैं?
उत्तर
आज मनुष्य के संबंध परस्पर खटाई पड़ने से फटे हए ध के समान हो रहे हैं।

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प्रश्न 4.
रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से उचित शब्दों के चयन से कीजिए।
1. है मुझे विश्वास दृढ़, तुम बन वही ………….. जलोगे। (आग, दीपक)
2. पोटली ………….. की भरी है। (अमृत, विष)
3. …………… भी बेसुरी है। (बाँसुरी, रागिनी)
4. …………… मन की बाँसुरी है। (प्राण, मूक)
5. …………… ही बस फट रहे हैं। (बम, संबंध)
उत्तर
1. दीपक
2. विष
3. रागिनी
4. मूक
5. संबंध।

प्रश्न 5.
दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए।
1. दिवाकर वर्मा का जन्म हुआ था-
1.1 जनवरी को,
2. 25 दिसम्बर को,
3. 20 जनवरी को,
4. 20 दिसम्बर को।
उत्तर
2. 25 दिसम्बर को

2. दिवाकर वर्मा की मुख्य विधा है
1. गीत
2. नवगीत
3. दोनों
4. कोई नहीं।
उत्तर
3. दोनों

3. दिवाकर वर्मा का नाटक है
1. रत्नावली
2. चंदनवन में आग
3. सुंदर बन
4. अब तो खामोशी तोड़ो।
उत्तर

4. दिवाकर वर्मा का जन्म हुआ था
1. 1920 में
2. 1930 में
3. 1940 में
4. 1941 में
उत्तर
4. 1941 में

5. दिवाकर वर्मा को पुरस्कार मिला है
1.कलश-सम्मान
2. कला-मंदिर
3. भोपाल का पवैया
4. उपर्युक्त सभी।
उत्तर
4. उपर्युक्त सभी।

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प्रश्न 6.
सही जोड़ी का मिलान कीजिए।
कन्यादान – तुलसीदास
एक कंठ विषपापी – डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल
जानकी मंगल – महावीर प्रसाद द्विवेदी
कला और संस्कृति – दुष्यंत कुमार
अद्भुत आलाप – सरदार पूर्ण सिंह।
उत्तर
कन्यादान – सरदार पूर्ण सिंह
एक कंठ विषपापी – दुष्यंत कुमार
जानकी मंगल – तुलसीदास
कला और संस्कृति – डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल
अद्भुत आलाप – महावीर प्रसाद द्विवेदी

प्रश्न 7.
निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए।
1. वायुमण्डल विषैला है।
2. प्राण आह्लादित हैं।
3. प्रतिपल सजगता चाहिए।
4. आज दूरियाँ घट रही हैं।
5. आज आदमी अंगार बनता जा रहा है।
उत्तर

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्व
  4. असत्य
  5. सत्य।

प्रश्न 8. एक शब्द में उत्तर दीजिए
1. विष की क्या भरी है?
2. रागिनी भी क्या है?
3. आज क्षत-विक्षत क्या हैं?
4. आज क्या बढ़ रही हैं।
5. कौन अंगार बनता जा रहा है।
उत्तर

  1. पोटली
  2. बेसुरी
  3. संवेदनाएँ
  4. दूरियाँ
  5. आदमी।

तुम वही दीपक बनोगे लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसका किससे विश्वास है?
उत्तर
कवि का आज के युवावर्ग से विश्वास है।

प्रश्न 2.
संजीवन जगाने के लिए कवि ने युवा वर्ग से क्या कहा है?
उत्तर
संजीवन जगाने के लिए कवि ने युवा वर्ग से तन में प्राण फूंकने के लिए कहा है।

प्रश्न 3.
आज क्या फट रहे हैं?
उत्तर
आज संबंध ही बस फट रहे हैं।

प्रश्न 4.
जमाने का चलन क्या हो गया है?
उत्तर
प्राण में कोकर उग रहे हैं। यही जमाने का चलन हो गया है।

तुम वही दीपक बनोगे कवि-परिचय

जीवन-परिचय-हिन्दी साहित्य के विशिष्ट सर्जक के रूप में दिवाकर वर्मा का सुनाम है। आपका जन्म 25 दिसंबर, 1941 को उत्तर-प्रदेश के सोरो, जिला एटा में हुआ था। शिक्षा-प्राप्ति के समय से ही आप साहित्य-रचना के क्षेत्र में सक्रिय हो गए। आपका साहित्य क्षेत्र मुख्य रूप से भारतीय संस्कृति और साहित्य है। इसके अतिरिक्त समाज और दर्शन भी आपके साहित्य की रचना की परिधि में आते हैं।

रचनाएँ-दिवाकर वर्मा की प्रमुख विधा गीत और नवगीत हैं। गीत रचनाओं में आस्था के स्वर, सूर्य के वंशज सुनो, और उलझते गए जाल में आदि उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त सुंदरवन (बालगीत), अब तो खामोशी तोड़ो (गजल-संग्रह), चंदनवन में आग (दोहा-संग्रह) और रत्नावली (नाटक) भी उनकी सृजनात्मकता की उपलब्धियाँ हैं।

भावपक्ष-चूँकि दिवाकर वर्मा कवि हैं अतएव उनकी भावधारा सरल, सरस और सपाट है। उसमें तेज है, गति है, निरंतरता है और ताजगी है। इससे प्रस्तुत हुआ कथ्य अपने तथ्य को आसानी से स्पष्ट कर पाया है। इस प्रकार दिवाकर वर्मा का भावपक्ष रोचक और आकर्षक है।

कलापक्ष-दिवाकर वर्मा का कलापक्ष अलंकृत और चमत्कृत है। रसों में वीर रस और श्रृंगार रस के अधिक प्रवाह हैं। अलंकारों में अनुप्रास, रूपक, प्रतीक, उठोक्षा, मानवीकरण आदि अधिक प्रयुक्त हुए हैं। बिंबों और प्रतीकों को यथास्थान दिया गया है। मक्तक छंद की योजना सटीक और यथोचित रूप में है।

साहित्य में स्थान-दिवाकर वर्मा के साहित्य में ‘मानस’ की गंभीरता के साथ ही ‘मानव’ की उदारता का विशिष्ट गुण है। वे जीवन और काव्य में छद्म के स्थान पर सच्चाई के पक्षधर हैं। उन्होंने साहित्य, समाज और दर्शन पर गंभीर आलेख प्रस्तुत किए हैं, उनकी काव्य-रचनाएँ और समीक्षाएँ हिन्दी में विशेष ख्यात हुई हैं।
दिवाकर के महत्त्वपूर्ण साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन का रंजन कलश सम्मान, कला-मंदिर, भोपाल का पवैया, पुरस्कार एवं अन्य संस्थाओं से ‘रत्न भारती’ तथा ‘कला गुरु साहित्य सम्मान’ प्रदान किए गए हैं। दिवाकर वर्मा अपनी सतत साहित्य, रचनाधर्मिता के कारण अनेक संस्थाओं से संबद्ध रहकर साहित्य और संस्कृति की सेवा कर रहे हैं।

तुम वही दीपक बनोगे कविता का सारांश

कविवर दिवाकर वर्मा विरचित कविता ‘तुम वही दीपक बनोगे’ वर्तमान युवा-पीढ़ी के सोए हुए भावों को जगाने वाली कविता है। कवि को यह आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि आज का युवा वर्ग ही चारों ओर फैले हुए अंधकार को दूर करने के लिए वही दीपक बनकर प्रकाश फैलायेगा। वही आज के विषधरों को कील देने वाले बीन से ध्वनि करेगा। वही आज क्षत-विक्षत हो रही संवेदना को प्राण फूंक देने वाले संजीवन जगाने हेतु मलय समीर के समान चलेगा। वही बढ़ रही विजन की बस्ती बनाने के लिए आगे पैर रखोगे। वही शमन पर होला-हवाला और अंगार बनते जा रहे आदमी के लिए ताप का मर्दन करोगे। आज चारों ओर हो रहे जलन में अमृतमयी मनुहार से प्राण स्पदित करने वाले बसंती हवा बनोगे।

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तुम वही दीपक बनोगे संदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या

1. जो अमा की कालिमा भी
धूप सी उजियार कर दे
है मुझे विश्वास दृढ़, तुम बन वही दीपक जलोगे!

वायुमण्डल है विषेला विषधरों की भी बहुलता,
पोटली विष की भरी है,
चाहिए प्रतिपल सजगता,
मधुर-मादक-मत्त ध्वनि से विषधरों को कील दे जो
है मुझे विश्वास तुम उस बीन से निश्चित बजोगे!

शब्दार्व-अमा-अमावस्या। विषधर-साँप।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य’ 10वीं में संकलित कवि दिवाकर वर्मा विरचित कविता ‘तम वही दीपक बनोगे’ से है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने आज के युवावर्ग से वर्तमान समय में फैले हुए अंधकार के लिए दीपक बनने का विश्वास रखते हुए कहा है कि

व्याख्या-अमावस्या की काली रात को तुम धूप की तरह उजाला से भर दो। मुझे दृढ़ विश्वास है कि तुम इस प्रकार का अवश्य दीपक बनोगे। कवि का पुनः कहना है कि आज सारा वातावरण विषैला हो चुका है। इससे विषधरों की भरमार हो रही है। विष की पोटली भर चुकी है। इसके प्रति हर क्षण सजग रहने की आवश्यकता है। आज मधुर मादक मत्त ध्वनि से इन फैले हुए विषधरों को कील देने की आवश्यकता है। मुझे विश्वास है कि तुम उस बीन से निश्चित ध्वनि निकालोगे।

विशेष-

  1. सामयिक दशा पर ज्वलंत विचार प्रस्तुत है।
  2. भाषा लाक्षणिक है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का भाव-स्वरूप ओजस्वी है। समय की बदलती तीखी दशा का तीव्रोल्लेख है। आज विषैले वातावरण पर सीधा प्रकाश डालकर कवि ने समय की नब्ज को न केवल पहचानने की कोशिश की है, अपितु उसको दूर करने की भी प्रेरणा दी है।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्यक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य मिश्रित शब्दों का है। संपूर्ण कथ्य सरल, सपाट और सटीक भाषा में प्रस्तुत है। व्यंजना शब्दावली से प्रस्तुत हुई व्यंजनात्मक शैली प्रभावशाली रूप में है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव आज के विषैले वातावरण को समाप्त करके शांत और सुखद वातावरण की स्थापना का है। इसके लिए कवि ने आज के युवा वर्ग के प्रति दृढ़ विश्वास व्यक्त कर उन्हें प्रेरित करने का प्रयास किया है।

2. प्राण आहादित नहीं औ’
रागिनी भी बेसुरी है,
क्षत-विक्षत संवेदनाएँ हैं,
मूक मन की बाँसुरी है,
आज संजीवन जगाने
फूंक दे जो प्राण तन में
है मुझे विश्वास दृढ़ तुम मलय-मारुत सम चलोगे!

बढ़ रही हैं दूरियाँ
औ’ वर्ग नित नव बन रहे हैं,

व्याख्या-अमावस्या की काली रात को तुम धूप की तरह उजाला से भर दो। मुझे दृढ़ विश्वास है कि तुम इस प्रकार का अवश्य दीपक बनोगे।
कवि का पुनः कहना है कि आज सारा वातावरण विषैला हो चुका है। इससे विषधरों की भरमार हो रही है। विष की पोटली भर चुकी है। इसके प्रति हर क्षण सजग रहने की आवश्यकता है। आज मधुर मादक मत्त ध्वनि से इन फैले हुए विषधरों को कील देने की आवश्यकता है। मुझे विश्वास है कि तुम उस बीन से निश्चित ध्वनि निकालोगे।

विशेष-

  1. सामयिक दशा पर ज्वलंत विचार प्रस्तुत है।
  2. भाषा लाक्षणिक है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का भाव-स्वरूप ओजस्वी है। समय की बदलती तीखी दशा का तीव्रोल्लेख है। आज विषैले वातावरण पर सीधा प्रकाश डालकर कवि ने समय की नब्ज को न केवल पहचानने की कोशिश की है, अपितु उसको दूर करने की भी प्रेरणा दी है।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्यक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य मिश्रित शब्दों का है। संपूर्ण कथ्य सरल, सपाट और सटीक भाषा में प्रस्तुत है। व्यंजना शब्दावली से प्रस्तुत हुई व्यंजनात्मक शैली प्रभावशाली रूप में है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव आज के विषैले वातावरण को समाप्त करके शांत और सुखद वातावरण की स्थापना का है। इसके लिए कवि ने आज के युवा वर्ग के प्रति दृढ़ विश्वास व्यक्त कर उन्हें प्रेरित करने का प्रयास किया है।

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3. किस तरह दामन बचायें
प्रज्वलित है अग्निज्वाला,
तीलियाँ तो संवरित हैं
शमन पर हीला-हवाला,
आदमी अंगार बनता जा रहा ।
ऐसे समय में
है मुझे विश्वास तुम ही ताप का मर्दन करोगे!

उग रहे मन-प्राण में कीकर
जमाने का चलन है,
मन बने मरुस्थल, तृषित तन
औ’ चतुर्दिश ही जलन है,
प्राण स्पंदित करे
अमृतमयी मनुहार से जो
है मुझे विश्वास दृढ़ तुम पवन बासंती बनोगे!

शब्दार्च-दमन-वस्त्र। शमन-शांति। ताप-गर्मी। मर्दन-नाश। कीकर-चुभन । चतुर्दिश-चारों दिशाओं। तृषित-प्यासा। स्पंदित-गतिशील । मनुहार-मनाना।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-पूर्ववत्।

व्याख्या-आज की कठिन स्थिति यह है कि आज चारों ओर दखों और विषमताओं की अग्निज्वाला प्रज्वलित हो रही है। शांति के नाम पर होला-हवाला हो रहा है। आज आदमी एक-दूसरे के प्रति अंगार बनते जा रहा है। ऐसे समय में मुझे पूरा भरोसा है कि तुम ही अपेक्षित ताप का नाश कर डालोगे। आज यह भी हो रहा है कि चारोंओर मन-प्राण में कीकर उग रहे हैं। शायद यही जमाने का प्रचलन हो गया है। आज प्रायः मन मरुस्थल बन गया है, जिससे तन की प्यास बुझ नहीं पा रही है। इस प्रकार चारों दिशाओं में प्यास की जलन बढ़ रही है। आज प्राणों की अमृतमयी मनुहार से जो गतिशील कर सकता है, तो केवल तुम्हीं कर सकते हो। मुझे पूरा-पूरा भरोसा है कि तुम्हें बसंत हवा बनकर इस तीखे वातावरण को रसमग्न कर सकोगे।

विशेष-

  1. वर्तमान समाज की विडंबनाओं का सपाट चित्र है।
  2. व्यंग्यात्मक शैली है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर
(क) भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का भाव-योजना तत्सम प्रधान तद्भव शब्दों से पुष्ट है। भावों की क्रमबद्धता, सहजता, प्रवाहमयता और उपयुक्त देखते ही बनती है। ये भाव बड़े ही सुपरिचित और विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं। इसलिए रोचक बन गए हैं।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का भाषा-शैली लाक्षणिक और अलंकृत है। व्यंजना शब्द-शक्ति की प्रधानता है तो रूपक और अनुप्रास अलंकार का मण्डन देखने योग्य है। करुण और वीर रस का मिला-जुला प्रवाह भाव और भाषा की सजीवता में वृद्धि कर रहा है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के भाव को सस्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश में कवि ने आज के मनहूस, विषम और दुखद वातावरण का चित्र खींचते हुए कठिन जीवन के विविध पक्षों को सामने लाने का प्रयास किया है। इस प्रकार की विडंबनापूर्ण जिंदगी को सखद बनाने के लिए वर्तमान युवा पीढ़ी को प्रेरित करते हुए आत्म-विश्वासपूर्वक आह्वान किया है।

MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 संस्कृति का स्वरूप

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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 संस्कृति का स्वरूप (डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल)

संस्कृति का स्वरूप पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

संस्कृति का स्वरूप लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘संस्कृति से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर-
‘संस्कृति’ से लेखक का आशय जीवन ढंग है।

प्रश्न 2.
व्यक्ति का जीवन कब ढलने लगता है?
उत्तर-
व्यक्ति का जीवन तब ढलने लगता है, जब वह एक ही पड़ाव पर टिका रहता है।

प्रश्न 3.
हमें दुराग्रह क्यों छोड़ देना चाहिए।
उत्तर-
हमें दुराग्रह इसलिए छोड़ देना चाहिए कि हमारे मत के समान दूसरों का भी मत हो सकता है।

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प्रश्न 4.
भूतकालीन साहित्य से हमें क्या ग्रहण करना चाहिए?
उत्तर-
भूतकालीन साहित्य से हमें रूढ़ियों से ऊपर उठकर उसके नित्य अर्थ को ग्रहण करना चाहिए।

प्रश्न 5. धर्म का मथा हुआ सार क्या है?
उत्तर-
धर्म का मथा हुआ सार है-प्रयत्नपूर्वक अपने-आपको ऊँचा बनाना।

संस्कृति का स्वरूप दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उन्नत देश कौन-से दो कार्य एक साथ सँभालते हैं?
उत्तर-
उन्नत देश आर्थिक कार्य और संस्कृति संबंधी कार्य-ये दोनों कार्य एक साथ सँभालते हैं।

प्रश्न 2.
संस्कृति जीवन के लिए आवश्यक क्यों है?
उत्तर-
संस्कृति जीवन के लिए आवश्यक है। यह इसलिए कि इससे हमारी निष्ठा पक्की होती है। हमारे मन की परिधि विस्तृत हो जाती है। हमारी उदारता का भंडार भर जाता है।

प्रश्न 3. कौन-से मनुष्य आत्म-हनन का मार्ग अपनाते हैं?
उत्तर-
जो यह सोचता कि पहले आचार्य और धर्म-गुरु जो कह गए, सब सच्चा है, उनकी सब बात सफल है और मेरी बुद्धि या विचारशक्ति टुटपुंजिया ऐसा ‘बाबा वाक्य प्रमाण’ के ढंग पर सोचने वाला मनुष्य केवल आत्म-हनन का मार्ग अपनाता है।

प्रश्न 4.
कैसे लोग नई संस्कृति को जन्म नहीं दे पाते?
उत्तर-
जब कर्म से भयभीत व्यक्ति केवल विचारों की उलझन में फँस जाते हैं, तब वे नई संस्कृति को जन्म नहीं दे पाते।

संस्कृति का स्वरूप भाषा अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
उन्नति, उदारता, नूतन, सम्मान।
उत्तर-
‘शब्द – विलोम शब्द
उन्नति – अवनति
उदारता – अनुदारता
नूतन – पुरातन
सम्मान – अपमान।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित मुहावरों/लोकोक्तियों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए
जीवन का ठाट, कसौटी पर कसना, घर खीर तो बाहर खीर।
उत्तर-
मुहावरे/लोकोक्तियाँ-अर्थ-वाक्य-प्रयोग जीवन का ठाट-संपन्नता-उसके जीवन का ठाट ढह गया है। कसौटी पर कसना-कड़ी परीक्षा लेना-सोना को कसौटी पर ही कसा जाता है।
घर खीर तो बाहर खीर-चारों ओर सुख-ही-सुख-भाग्यवानों का क्या कहना! उनके लिए तो घर खीर है तो बाहर भी खीर है।

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प्रश्न 3.
तत्सम और तद्भव शब्दों को छाँटकर पृथक्-पृथक् लिखिएठाठ, चंद्र, संध्या, सहस्रों, पुराना, रास्ता।
उत्तर-
तत्सम शब्द-चंद्र, संध्या, सहस्रों। तद्भव शब्द-ठाठ, पुराना, रास्ता।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्द वर्तनी की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण हैं। इन्हें शुद्ध रूप में लिखिए
एच्छिक, किरन, ज्योतसना, ध्वनी, प्रतीलिपि, उज्जैनी।
उत्तर-
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 संस्कृति का स्वरूप img-1
संस्कृति का स्वरूप योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
हमारे तीज-त्योहार भी संस्कृति के अंग हैं। वर्ष भर मनाए जाने वाले त्योहारों का चार्ट बनाकर कक्षा में लगाइए।
प्रश्न 2. ऐसे ऐतिहासिक/पौराणिक आदर्श चरित्रों को खोजिए जिन्होंने अपने पिता के अधूरे कार्यों को पूर्ण किया।
उत्तर-
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

संस्कृति का स्वरूप परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

संस्कृति का स्वरूप अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सांस्कृतिक कार्य किस प्रकार फलदायी होता है?
उत्तर-
सांस्कृतिक कार्य कल्पवृक्ष की तरह फलदायी होता है।

प्रश्न 2.
संस्कृति क्या होती है?
उत्तर-
संस्कृति हमारे मन का मन, प्राणों का प्राण और शरीर का शरीर होती है।

प्रश्न 3.
संस्कृति कब विस्तृत मानव मन को जन्म देती है?
उत्तर-
संस्कृति राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों को अपने में पचाकर इन दोनों से विस्तृत मानव मन को जन्म देती है।

प्रश्न 4.
हमारी गति में बाधा कब उत्पन्न होती है?
उत्तर-
हमारी गति में बाधा तब उत्पन्न होती है, जब हम संस्कृति के जड़ भाग के गुरुतर बोझ को ढोने लगते हैं।

प्रश्न 5. संस्कृति के कौन-कौन से अंग हैं?
उत्तर-
संस्कृति के अंग धर्म, दर्शन, साहित्य, कला आदि हैं।

2. निम्नलिखित कथनों के लिए दिए गए विकल्पों से सही विकल्प का चयन कीजिए

1. राजनीति की साधना का अंग है
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार।
उत्तर-
(क) एक

2. कला और संस्कृति के लेखक हैं
(क) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल
(घ) उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’
उत्तर-
(ग) डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल

3. गुप्तकाल के दूसरे महान् विद्वान हैं.
(क) श्री सिद्धसेन
(ख) दिवाकर
(ग) श्री सिद्धसेन दिवाकर
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(ग) श्री सिद्धसेन दिवाकर

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4. अश्वघोष हैं
(क) आलोचक
(ख) निबंधकार
(ग) पत्रकार
(घ) महाकवि।
उत्तर-
(घ) महाकवि।

5. एक-दूसरे के पूरक हैं
(क) आर्थिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम
(ख) आर्थिक कार्यक्रम
(ग) सांस्कृतिक कार्यक्रम
(घ) उपर्युक्त कोई नहीं।
उत्तर-
(क) आर्थिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम

3. रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से चुनकर कीजिए.

1. संस्कृति का स्वरूप के लेखक हैं ……………………….. (केदारनाथ अग्रवाल, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल)
2. संस्कृति की प्रवृत्ति ……………………….. देने वाली होती है। (महाफल, कल्पवृक्ष)
3. जीवन के नानाविध स्वरूपों का समुदाय ही ……………………….. है (वृक्ष, संस्कृति)
4. ……………………….. संस्कृति का अंग है। (कर्म, धम)
5. ……………………….. ने गुप्तकाल की स्वर्णिम युगीन भावना को प्रकट किया है। (अश्वघोष, कालिदास)
उत्तर-
1. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल,
2. महाफल,
3. संस्कृति,
4. धर्म,
5. कालिदास

4. सही जोड़े मिलाइए।
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 संस्कृति का स्वरूप img-2
उत्तर-
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 संस्कृति का स्वरूप img-3

5. निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए

1. संस्कृति शब्द बड़ा व्यापक है।
2. हमारे जीवन का ढंग हमारी संस्कृति है।
3. संस्कृति जीवन में परमावश्यक नहीं है।
4. संस्कृति की उपजाऊ भूमि है-पूर्व और पश्चिम का मेल।
5. धर्म का अर्थ मत विशेष का आग्रह है।
उत्तर-
1 (सत्य),
2 (सत्य),
3 (असत्य),
4 (सत्य),
5 (असत्य)।

6. एक शब्द में उत्तर दीजिए

1. सांस्कृतिक कार्य किस तरह फलदायी होता है?
2. मनुष्य के भूत, वर्तमान और भावी जीवन का कौन प्रकार है?
3. संस्कृति का कौन रूप होता है?
4. जीवन के नानाविध रूपों का समुदाय क्या होती है?
5. किससे प्रकृति की संस्कृति भुवनों में व्याप्त हुई ?
उत्तर-
1. कल्पवृक्ष,
2. सर्वांगपूर्ण,
3. मूर्तिमान,
4. संस्कृति,
5. देवशिल्पों से।

संस्कृति का स्वरूप लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. कौन-से वहुत फल देने वाला बड़ा वृक्ष बन जाता है?
उत्तर-
सांस्कृतिक कार्य के छोटे-से बीज से बहुत फल देने वाला बड़ा वृक्ष बन जाता है।

प्रश्न 2.
हमें अपने जीवन की उन्नति और आनंद के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर-
हमें अपने जीवन की उन्नति और आनंद के लिए अपनी संस्कृति की सुधि लेनी चाहिए।

प्रश्न 3.
सांस्कृतिक कार्य की उचित दिशा और सच्ची उपयोगिता क्या है?
उत्तर-
साहित्य, कला, दर्शन, और धर्म से जो मूल्यवान सामग्री हमें मिल सकती है, उसे नए जीवन के लिए ग्रहण करना, यहीं सांस्कृतिक कार्य की उचित दिशा और सच्ची उपयोगिता है।

संस्कृति का स्वरूप लेखक-परिचय

जीवन-परिचय-हिंदी के गद्य-लेखकों में डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। आपका जन्म सन् 1904 ई. में हुआ था। आपने अपनी आरंभिक शिक्षा समाप्त करके उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ से आपने एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वहीं से पी.-एच.डी. और डी.लिट. की भी उपाधियाँ हासिल की। इसके बाद आपने सरकारी नौकरी की। इसके लिए आपने सेण्ट्रल एशियन एक्टीक्विटीज म्यूजियम के अधीक्षक तथा भारतीय पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष पद पर कई वर्षों तक सफलतापूर्वक कार्य किया। इसके बाद आपकी नियुक्ति काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में प्रोफेसर पद पर हुई।

रचनाएँ-डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित और संपादित पुस्तकें हैं–उर-ज्योति, कला और संस्कृति, कल्पवृक्ष, कादम्बरी, मलिक मुहम्मद जायसी, पद्मावत, पाणिनीकालीन भारतवर्ष, पृथ्वीपुत्र, पोद्दार अभिनंदन ग्रंथ आदि।

भाषा-शैली-डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल की भाषा उच्चस्तरीय है। फलस्वरूप उसमें तत्सम शब्दों की प्रधानता है। इस प्रकार के आए हुए तत्सम शब्द असाधारण हैं। हालाँकि उनका यह प्रयास रहा है कि वे बहुप्रचलित अर्थपूरक शब्दों को ही प्रयुक्त करें, फिर उनके द्वारा प्रस्तुत शब्द सामान्यपाठक की समझ से परे हो गए हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के शब्दों से बने हुए वाक्य-स्वरूप जटिल और गंभीर हो गए हैं।

डॉ. वासुदेवशरण की शैली में प्रवाह और गति है। उसमें क्रमबद्धता और स्वच्छंदता है। वह भावों को ढालने में तत्पर और सक्षम है। इस प्रकार उनका शैली-विधान अधिक प्रभावशाली. है, सराहनीय है और सटीक है। वह भाव और भाषा दोनों को बखूबी वहन करने में समर्थ है।

साहित्य में स्थान-डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का साहित्यिक महत्त्व सर्वमान्य है। उनके लेखन में साहित्य की विविधता और अनेकरूपता है। कालिदास के मेघदूत और बाणभट्ट के हर्ष-चरित की नयी पीठिका को प्रस्तुत करने में आपका अनूठा योगदान है। इस दृष्टि से आप और अधिक सराहनीय हैं। यही नहीं आप भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व और भारतीय संस्कृति के गंभीर और उच्चस्तरीय अध्येताओं में भी शीर्ष स्थान पर हैं।

निबंध का सार डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल लिखित निबंध ‘संस्कृति का स्वरूप’ एक ज्ञानबर्द्धक और भावबर्द्धक निबंध है। ‘संस्कृति’ शब्द के स्वरूप, अर्थ और महत्त्व को निबंधकार ने कई प्रकार समझाने और स्पष्ट करने का प्रयास किया है। निबंधकार का यह मानना है कि ‘जीवन के नानाविध रूपों का समुदाय ही संस्कृति है। संस्कृति के इन रूपों का उत्तराधिकार भी हमारे साथ चलता है। धर्म, दर्शन, साहित्य, कला उसी के अंग हैं। बुद्धि के संबल से ही राष्ट्र का संवर्धन संभव होता है। इसका सबसे प्रबल कार्य संस्कृति की साधना है।

संस्कृति की उर्वर भूमि के लिए आवश्यक है-पुरानी और नयी मान्यताओं का मेल-मिलाप। इसके लिए किसी प्रकार के दुराग्रह से मुक्ति नितांत आवश्यक है। यही कारण है कि जब कर्म से भयभीत व्यक्ति केवल विचारों की उलझन में फँस जाता है, तब वह जीवन की किसी नई पद्धति या संस्कृति को जन्म नहीं दे पाता। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि पूर्वकालीन संस्कृति के जो निर्माणकालीन तत्त्व हैं, उन्हें लेकर हम कर्म में लगें और नई वस्तु का निर्माण करें। निबंधकार का अंततः यह मानना है कि “जीवन को उठाने वाले जो नियम हैं, वे जब आत्मा में बसने लगते हैं, तभी धर्म का सच्चा आरंभ मानना चाहिए। साहित्य, कला, दर्शन और धर्म से जो मूल्यवान सामग्री हमें मिल सकती है, उसे नए जीवन के लिए ग्रहण करना, यही सांस्कृतिक कार्य की उचित दिशा और सच्ची उपयोगिता है।”

संस्कृति का स्वरूप संदर्भ और प्रसंग सहित व्याख्या

1. संस्कृति की प्रवृत्ति महाफल देने वाली होती है। सांस्कृतिक कार्य के छोटे-से बीज से बहुत फल देने वाला बड़ा वृक्ष बन जाता है। सांस्कृतिक कार्य कल्पवृक्ष की तरह फलदायी होते हैं। अपने ही जीवन की उन्नति, विकास और आनंद के लिए हमें अपनी संस्कृति की सुधि लेनी चाहिए। आर्थिक कार्यक्रम जितने आवश्यक हैं, उनसे कम महत्त्व संस्कृति-संबंधी कार्यों का नहीं है। दोनों एक ही रथ के दो पहिए हैं, एक-दूसरे के पूरक हैं, एक के बिना दूसरे की कुशल नहीं रहती। जो उन्नत देश हैं, वे दोनों कार्यों को एक साथ संभालते हैं। वस्तुतः उन्नति करने का यही मार्ग है। मन को भुलाकर केवल शरीर की रक्षा पर्याप्त नहीं है।

शब्दार्थ-प्रवृत्ति-मन का किसी विषय की ओर झुकाव। कल्पवृक्ष इच्छा पूरी करने वाला वृक्ष। सुधि खबर। उन्नत-श्रेष्ठ, संपन्न। वस्तुतः वास्तव में। पर्याप्त काफी।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य’ में संकलित निबंधकार डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल लिखित निबंध ‘संस्कृति का स्वरूप’ से है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में निबंधकार ने संस्कृति की प्रवृत्ति क्या होती है, इस पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-संस्कृति का किसी खास विषय की ओर झुकाव निश्चय ही सुखद और पुष्यदायक फल को प्रदान करने वाली होती है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि संस्कृति के द्वारा जो भी काम, चाहे वे कितने भी छोटे-छोटे क्यों न हों, वे सभी-के-सभी उस बीज की तरह होते हैं, जिससे कुछ समय बाद कोई बड़ा और शक्तिशाली पेड़ देखते-देखते तैयार हो जाता है। वह वास्तव में कल्पवृक्ष के समान सर्वाधिक आनंददायक और इच्छाओं को पूरा करने वाला होता है। इसलिए हमें अपने जीवन के विकास-सुख आनंद आदि की प्राप्ति के लिए अपनी-अपनी संस्कृति को याद करके उसे अपनाना चाहिए। यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि जिस प्रकार आर्थिक कार्यक्रम हमारे जीवन के विकास, सुख और आनंद की प्राप्ति के लिए बहुत जरूरी है, उतने ही संस्कृति से संबंधित कार्यक्रम भी। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि आर्थिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम एक रथ के दो पहिए होने के कारण समान रूप से उपयोगी हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं; अर्थात एक का दूसरे के बिना कोई महत्त्व और प्रभाव नहीं है। सचमुच में जीवन में सुख-शांति, चैन, आनंद और विकास करने का यही तरीका है। यही एक रास्ता है। यह ध्यान रहे कि अगर हम मन को भुलाकर केवल शारीरिक रक्षा करते हैं, तो इससे हमें जीवन के सुख-आनंद आदि की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

विशेष-
1. संस्कृति की प्रवृत्ति का महत्त्व बतलाया गया है।
2. आर्थिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम को जीवन विकास के आधार कहे गए हैं।
3. एक ही रथ के दो पहिए हैं’ उपमा आकर्षक है।

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अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति की क्या विशेषता है? उत्तर-संस्कृति महाफल देने वाला कल्पवृक्ष है। प्रश्न 2. कौन दो एक ही रथ के पहिए हैं और क्यों?
उत्तर-
आर्थिक कार्यक्रम और संस्कृति संबंधी कार्यक्रम ये दोनों एक ही रथ के पहिए हैं। यह इसलिए ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, अर्थात् एक के बिना दूसरे का काम नहीं चल पाता है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश में निबंधकार ने संस्कृति के स्वरूप को बतलाना चाहिए। निबंधकार के अनुसार संस्कृति महाफल प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष के समान है। इसलिए अगर हमें अपना जीवन-विकास करना है और आनंद की प्राप्ति करनी है तो हमें अपनी संस्कृति को अपनाना होगा। इसके लिए हमें आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों कार्यक्रम साथ ही चलाने होंगे।

2. यों तो संसार में अनेक स्त्रियाँ और पुरुष हैं, पर एक जन्म में जो हमारे माता-पिता बनते हैं उनके गुण हममें आते हैं और उन्हीं को हम अपनाते हैं। ऐसे ही संस्कृति का संबंध है, वह सच्चे अर्थों में हमारी धात्री होती है। इस दृष्टि से वह संस्कृति हमारे मन का मन, प्राणों का प्राण और शरीर का शरीर होती है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपने विचारों को किसी प्रकार संकुचित कर लेते हैं। सच तो यह है कि जितना अधिक हम एक संस्कृति के मर्म को अपनाते हैं उतने ही ऊँचे उठकर हमारा व्यक्तित्व संसार के दूसरे मनुष्यों, धर्मों, विचारधाराओं और संस्कृतियों से मिलने और उन्हें जानने के लिए समर्थ और अभिलाषी बनता है।

शब्दार्थ-धात्री=धारण करने वाली। संकुचित छोटा। समर्थ=योग्य। अभिलाषी इच्छुक।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में निबंधकार ने संस्कृति के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि संसार में अनेक प्रकार के नर-नारी हैं। उनके गुण-धर्म भी अलग-अलग हैं। उन सभी से हमारा संबंध न होकर अपने माता-पिता से बनते हैं। हमारे ये संबंध बड़ी गहराई में होते हैं। इसलिए उनके गुण-धर्म हमें प्रभावित करते हैं और हम उन्हें अपनाते हैं। यही संबंध संस्कृति का भी होता है। वह वास्तव में हमें धारण करती है। इससे हमारा मन, हमारे प्राण और हमारा शरीर संस्कृति के ही अनुरूप बन कर रह जाता है। उसका यह अर्थ नहीं लेना चाहिए कि हमारी सोच-समझ को संस्कृति बदल देती है और अपने अनुरूप ढाल लेती है। इससे हटकर सच्चाई तो यह है कि जब हम एक संस्कृति को अच्छी तरह से अपना लेते हैं और उससे प्रभावित हो जाते हैं, तब हम दूसरी संस्कृतियों के स्वरूप, गुण, धर्म, प्रभाव आदि को जानने और समझने को लालायित होने लगते हैं। फिर इसकी पूर्ति के लिए प्रयत्नशील हो उठते हैं। कहने का भाव यह है कि हम एक संस्कृति को विधिवत जानकर-समझकर और उसके गुण-धर्म को अपनाकर ही दूसरे मनुष्यों, धर्मों, विचारधाराओं आदि को जानने-समझने के योग्य हो सकते हैं।

विशेष-
1. एक संस्कृति को अपनाकर ही दूसरी संस्कृति को समझने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
2. भाषा में प्रभाव और प्रवाह है।
3. शब्द-विधान ऊँचे हैं।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति का संबंध कैसा होता है?
उत्तर-
संस्कृति का सबंध माता-पिता के समान होता है।

प्रश्न 2.
संस्कृति क्या है?
उत्तर-
संस्कृति हमारी धात्री है।

प्रश्न 3.
हमारा व्यक्तित्व कब और ऊँचा उठ जाता है?
उत्तर-
जब हम एक संस्कृति को अधिक-से-अधिक अपनाने लगते हैं, तब हमारा व्यक्तित्व और ऊँचा उठ जाता है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश के द्वारा निबंधकार ने संस्कृति के अर्थ और उसके प्रभाव को स्पष्ट करना चाहा है। इस दृष्टि से उसने संस्कृति के संबंध को माता-पिता के समान बतलाते हुए धात्री कहा है। उसका यह मानना है कि एक संस्कृति को अधिक-सेअधिक अपनाकर ही अपने व्यक्तित्व को और अधिक ऊँचा उठा सकते हैं।

3. संस्कृति जीवन के लिए परम आवश्यक है। राजनीति की साधना उसका केवल एक अंग है। संस्कृति राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों को अपने में पचाकर इन दोनों से विस्तृत मानव मन को जन्म देती है। राजनीति में स्थायी रक्त-संचार केवल संस्कृति के प्रचार, ज्ञान और साधना से संभव है। संस्कृति जीवन के वृक्ष का संवर्धन करने वाला रस है। राजनीति के क्षेत्र में तो उसके इने-गिने पत्ते ही देखने में आते हैं अथवा यों कहें कि राजनीति केवल पथ की साधना है, संस्कृति उस पथ का साध्य

शब्दार्थ-परम=बहुत। पचाकर रखकर। विस्तृत फैले हुए। संवर्धन बढ़ाने। इने-गिने=कुछ ही। साध्य=जिसे प्राप्त किया जाए।

संदर्भ-पूर्ववत्

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में निबंधकार ने संस्कृति और राजनीति के अलग स्वरूपों। का उल्लेख करते हुए कहा है कि

व्याख्या-संस्कृति और राजनीति में अंतर है। संस्कृति जीवन की बहुत बड़ी आवश्यकता है। लेकिन राजनीति नहीं। राजनीति की साधना उसका मात्र एक अंग है। संस्कृति की शक्ति राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों से बड़ी है। फलस्वरूप राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों को ही अपने अधीन कर रखने की क्षमता संस्कृति में होती है। इससे संस्कृति इन दोनों से मनुष्य के मन का विस्तार करती है। स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि संस्कृति के प्रचार, ज्ञान और साधना से राजनीति में स्थायी रक्त-संचार संभव है। इस प्रकार संस्कृति का महत्त्व जीवन को विस्तृत और विकसित करने वाले वृक्ष का संवर्धन वाला रस है। राजनीतिक धरातल पर उसके प्रभाव बहुत कम दिखाई देते हैं। यह भी हम कह सकते हैं कि राजनीति ही साधना पथ और संस्कृति उसका साध्य है।

विशेष-
1. राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र से अधिक प्रभावशाली और शक्तिशाली संस्कृति को सिद्ध किया गया है।
2. यह अंश ज्ञानवर्द्धक है।
3. भाषा-शैली सरल और सुबोध है।

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति जीवन के लिए क्यों परमावश्यक है?
उत्तर-
संस्कृति जीवन के लिए परमावश्यक है। यह इसलिए कि यह जीवन के वृक्ष का संवर्धन करनेवाला रस है।

प्रश्न 2.
जीवन के पथ की साधना और साध्य किसे कहा गया है?
उत्तर-
राजनीति को जीवन के पथ की साधना और संस्कृति को साध्य कहा गया है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का आशय लिखिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश के द्वारा निबंधकार ने संस्कृति की अत्यधिक आवश्यकता पर बल देते हुए कहा है कि यह जीवन की बहुत बड़ी आवश्यकता है। हालाँकि राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों ही जीवन के लिए आवश्यक हैं, लेकिन संस्कृति इन दोनों से कहीं अधिक। इसलिए संस्कृति को जीवन के वृक्ष का संवर्धन करने वाला रस कहा गया है। इसलिए राजनीति जीवन-पथ की साधना है तो संस्कृति साध्य है।

4. इस देश की संस्कृति की धारा अति प्राचीन काल से बहती आई है। हम उसका सम्मान करते हैं, किंतु उसके प्राणवत तत्त्व को अपनाकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। उसका जो जड़ भाग है, उस गुरूतर बोझ को यदि हम ढोना चाहें तो हमारी गति में अड़चन उत्पन्न हो सकती है। निरंतर गति मानव-जीवन का वरदान है। व्यक्ति हो या राष्ट्र, जो एक पड़ाव पर टिका रहता है, उसका जीवन भी ढलने लगता है। इसलिए ‘चरैवेति चरैवेति’ की धुन जब तक राष्ट्र के रथ-चक्रों में गूंजती रहती है तभी तक प्रगति और उन्नति होती है, अन्यथा प्रकाश और प्राणवायु के कपाट बंद हो जाते हैं और जीवन सँध जाता है। हमें जागरूक रहना चाहिए, ऐसा न हो कि हमारा मन परकोटा खींचकर आत्म-रक्षा की साध करने लगे।

शब्दार्थ-अति अत्यंत।प्राणवत प्राण के समान। गुरुतर=भारी।अड़चन रुकावट। चरैवेति-चरैवेति-चलते रहो, चलते रहो। कपाट-दरवाजे। सँध रुक। जागरूक-सावधान। परकोटा किले की रक्षा के लिए उसके चारों ओर बनाई हुई दीवार।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में निबंधकार ने भारत देश की संस्कृति की मजबूती का उल्लेख करते हुए कहा है कि

व्याख्या-भारत देश की संस्कृति और देशों की संस्कृति से अलग है और महान/ है। यह इसलिए कि इस देश की संस्कृति बहुत पुरानी है। सभी देशवासी इसमें डुबकी लगाते हुए नहीं अघाते हैं। यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि इसे अपनाते समय इसके मूल रूप की ही ओर हमारा प्रयास हो! इससे हमारा जीवन-विकास हो सकता है। हम सुखमय जीवन बिता सकते हैं। अगर हम यह ध्यान नहीं देंगे और संस्कृति के जड़तत्त्व को अपनाने लगेंगे तो हमारे जीवन-विकास में कठिनाइयाँ आने लगेंगी। इसलिए हम इसके जड़तत्त्व को भूलकर इसके चेतन तल को अपनाना चाहिए, जिससे गतिशील जीवन-पथ पर बढ़ सकें। ऐसा इसलिए कि गतिशील जीवन ही वरदानस्वरूप होता है। एक ही जगह पर टिके रहने वाले देश-व्यक्ति जीवन-विकास से कोसों दूर चला जाता है। इसलिए जब तक ‘चलते रहो, चलते रहो’ की गूंज हृदय में नहीं गूंजती रहेगी, जब तक जीवन-विकास का रथ-चक्र नहीं रुक सकता है। अगर इस प्रकार की गूंज हृदय में नहीं गूंजती तो आनंद-प्रकाश टिमटिमाने लगेगा और जीवनी-शक्ति के द्वार बंद होने लगेंगे। फलस्वरूप जीवन-क्रम ठप्प पड़ जाता है। इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए कि हम हर समय सावधान रहें, ताकि हमारा मन पर कोटा न खींचकर आत्म-रक्षा की साध लेने लगे।

विशेष-
1. भारत देश की संस्कृति की विशेषता बतलायी गयी है।
2. ‘चरैवेति, चरैवेति’ सूक्ति का सटीक प्रयोग है।
3. यह अंश उपदेशात्मक है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हमारे देश की संस्कृति क्या है? उत्तर-हमारे देश की संस्कृति बहुत ही पुरानी है। प्रश्न 2. मानव जीवन का वरदान-अभिशाप क्या है?
उत्तर-
निरंतर गति मानव जीवन का वरदान है और एक पड़ाव पर टिका रहना अभिशाप है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से निबंधकार ने भारतीय संस्कृति की विशेषताओं को कई प्रकार से रेखांकित करने का प्रयास किया है। इस संदर्भ में उसने यह स्पष्ट करना चाहा है कि संस्कृति के प्राणतत्त्व को अपनाकर हम आगे बढ़ सकते हैं न कि उसके जड़ भाग के गुरुतर बोझ को। दूसरी बात यह कि चलते रहो, चलते रहो, की गूंज से प्रगति की रफ्तार बढ़ती है।

5. “मनुष्यों के चरित्र मनुष्यों के कारण स्वयं मनुष्यों द्वारा ही निश्चित किए गए थे। यदि कोई बुद्धि का आलसी या विचारों का दरिद्री बनकर हाथ में पतवार लेता है तो वह कभी उन चरित्र का पार नहीं पा सकता, जो अथाह है और जिनका अंत नहीं। जिस प्रकार हम अपने मत को पक्का समझते हैं वैसे ही दूसरों का मत भी तो हो सकता है। दोनों में से किसकी बात कही जाए? इसलिए दुराग्रह को छोड़कर परीक्षा की कसौटी पर प्रत्येक वस्तु को कसकर देखना चाहिए।”

शब्दार्थ-पतवार=सहारा। अथाह जिसका थाह न हो। मत विचार। दुराग्रह-हठ।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में निबंधकार ने मनुष्य के चरित्र-कर्म के बारे में बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या-मनुष्यों के चरित्र मनुष्यों के ही द्वारा निश्चित और बनाए गए थे। इस प्रकार के चरित्र मनुष्य की शक्ति, इच्छा और साधन पर निर्भर रहे हैं। उस विषय में यहाँ यह कहना है कि कमजोर चरित्र कमजोर ही फल देता है। इसके लिए बहुत हद तक कमजोर साधन भी दोषी कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि कोई बुद्धि का सहारा न लेकर या दृढ़ विचार न करके काम आरंभ करता है। उसमें उसे कोई सफलता नहीं मिल सकती है। दूसरी बात यह है कि अपनी विचारधाओं के सामने हमें किसी की विचारधारा को हीन या कम नहीं समझना चाहिए। यह इसलिए कि शायद हमारी यह सोच-समझ सही न हो। दूसरे शब्दों में, यह कि हमारी विचारधारा दूसरे की विचारधारा से कम है या वह भी वैसी ही है। इसलिए हमें अपनी ही सोच-समझ पर नहीं अड़े रहना चाहिए। दूसरों की भी सोच-समझ की परख करनी चाहिए।

विशेष-
1. समान विचारधारा की ओर बल दिया गया है।
2. भाषा-शैली सरल है।
3. यह अंश उपदेशात्मक है।

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसके चरित्र किसके द्वारा निश्चित किए गए हैं? उत्तर-मनुष्यों के चरित्र मनुष्यों द्वारा ही निश्चित किए गए हैं। प्रश्न 2. अथाह और अंतहीन चरित्रों का पार कौन पा सकता है?
उत्तर-
बुद्धि सम्पन्न तत्पर और विचारपूर्ण कर्मठ व्यक्ति ही अथाह और अंतहीन चरित्रों का पार पा सकता है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश के द्वारा निबंधकार ने यह आशय स्पष्ट करना चाहा है कि मनुष्य ही मनुष्य का चरित्र-निर्माता है। दूसरी बात यह कि मनुष्य के चरित्र को मनुष्य अपनी बुद्धि की क्षमता-संपन्न को कार्यरूप में ढालकर ही पूरी तरह से समझ सकता है। तीसरी बात यह कि स्वयं की तरह हमें औरों के भी मत को महत्त्व देना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बिना किसी दुराग्रह के विचारों को परीक्षा की कसौटी पर कसना चाहिए।

MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 योगी अरविंद

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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 योगी अरविंद (संकलित)

योगी अरविंद पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

योगी अरविंद लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अरविंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर
अरविंद का जन्म 15 अगस्त, 1872 को कलकत्ता के एक शिक्षित परिवार में हुआ था।

प्रश्न 2.
अरविंद ने कौन-कौन-सी भाषाएँ सीखीं?
उत्तर
अरविंद ने संस्कृत, बंगला, लैटिन, इटेलियन, जर्मन, स्पेनिश और फ्रेंच भाषाएँ सीखीं।

प्रश्न 3.
अरविंद ने बड़ौदा क्यों छोड़ दिया था?
उत्तर
अरविंद ने सन् 1905 में बंग-भंग आंदोलन छिड़ने के कारण बड़ीदा छोड़ दिया था।

प्रश्न 4.
फ्रांसीसी महिला अरविंद से मिलने पांडिचेरी क्यों आई थी?
उत्तर
श्री अरविंद की योग-साधना से प्रभावित होकर ही मीरा अल्फांसा नामक एक फ्रांसीसी महिला मार्च 1914 में उनसे मिलने के लिए पांडिचेरी आई।

प्रश्न 5.
अरविंद ने किस प्रकार की साधना की थी।
उत्तर
अरविंद ने सनातन सत्य चेतन पुरुष को जीवन में उतारने की साधना की।

योगी अरविंद दीर्य-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बंग-भंग आंदोलन का अरविंद पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
बंग-भंग आंदोलन का अरविंद पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इस आंदोलन से वे लगातार जुड़े रहे। इस तरह पाँच साल तक वे सक्रिय राजनीति में सक्रिय भाग लेते रहे। यह सच है कि उन्होंने राजनीति को आध्यात्मिक शक्ति से सफल करना चाहा था।

प्रश्न 2.
‘सादा जीवन उच्च विचार’ का आशय समझाइए।
उत्तर
‘सादा जीवन उच्च विचार’ का आशय है-प्रदर्शन और आडंबरहित अपने कार्य-कलापों को करते हुए नैतिक और पवित्र भावनाओं को बनाए रखना । इस प्रकार के जीवन-स्वरूप न केवल स्वयं हौसला को बढ़ाते हैं, अपितु औरों को किसी हद तक प्रभावित और प्रेरित भी करते हैं।

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प्रश्न 3.
पत्नी की निराशा को दूर करने के लिए अरविंद ने पत्र में किस प्रकार समझाया?
उत्तर
पत्नी की निराशा को दूर करने के लिए अरविंद ने पत्र में समझाया कि मेरा दृढ़ विश्वास है कि भगवान ने जो गुण, प्रतिभा, उच्च शिक्षा तथा धन दिया है, वह सब उन्हीं का है, जो कुछ परिवार के भरण-पोषण में लगता है और जो नितांत आवश्यक है। उसी को अपने लिए खर्च करने का अधिकार है, उसके बाद जो कुछ बाकी रह जाता है, उसे भगवान को लौटा देना उचित है। यदि मैं सब कुछ अपने सुख और विलास के लिए करूँ तो मैं चोर कहलाऊँगा। इस दुर्दिन में सारा देश मेरे द्वार पर आश्रित है, मेरे तीस कोटि भाई और बहिन हैं, उनमें से बहुतेरे अन्न न होने पर मर रहे हैं, उनका हित करना होगा।

प्रश्न 4.
‘अरविंद दिव्य संस्कारों के धनी थे’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘अरविंद दिव्य संस्कारों के धनी थे। उनके मुख पर दिव्य तेज उस अवस्था में भी था जब वे बड़ौदा में साधनामय जीवन की ओर लगने जा रहे थे और गुरु की खोज में थे। एक बार की बात है, वे नर्मदा के किनारे रंगनाथ में गंगा मठ के स्वामी ब्रह्मानंद का दर्शन करने गए। स्वामी जी का नियम था कि वे किसी की ओर देखते नहीं थे, पर जब अरविंद इनके सामने आए, स्वामी जी उन्हें एकटक देखने लगे और बहुत देर तक देखते ही रह गए।

योगी अरविंद भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
पराधीन, स्वदेश, प्रेम, उच्च, विश्वास।
उत्तर
शब्द – विलोम शब्द
पराधीन – स्वाधीन
स्वदेश – परदेश
प्रेम – द्वेष
उच्च – नीच
विश्वास – अविश्वास।

प्रश्न 2.
पर्यायवाची शब्द लिखिए
नश्वर, देवता, पृथ्वी, सृष्टि, ज्योति।
उत्तर
नश्वर – अनित्य, क्षणभंगुर
देवता – सुर, देव
पृथ्वी-धरा, धरती
सृष्टि-संसार, दुनिया।

प्रश्न 3.
नीचे दिए गए वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए
(क) अरविंद ने परीक्षा में सफलता प्राप्त की। (प्रश्नवाचक वाक्य में)
(ख) वे कलकत्ता आए। (निषेधवाचक वाक्य में)
(ग) अरविंद ने आर्य नामक पत्र निकाला। (इच्छावाचक वाक्य में)
(घ) सब कुछ अपने सुख और विलास के लिए करने पर मैं चोर कहलाऊँगा। (संकेतवाचक वाक्य में)
(ड) अरविंद योग मानव थे। (विस्मयवाचक वाक्य में)
उत्तर
(क) क्या अरविंद ने परीक्षा में सफलता प्राप्त की।
(ख) वे कलकत्ता नहीं आए।
(ग) अरविंद आर्य नामक पत्र निकाल लाए!
(घ) सब कुछ अपने सुख और विलास के लिए करता तो चोर कहलाता।
(ड) आह! अरविंद योग मानव थे।

योगी अरविंद योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. पांडिचेरी आश्रम के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।
प्रश्न 1. बंग-भंग आंदोलन क्यों हुआ और इसके क्या परिणाम हुए। जानकारी एकत्र कीजिए।
प्रश्न 3. ऐसे और महापुरुषों के नाम बताइए जिन्होंने ‘आश्रम’ बनाकर समाज एवं राष्ट्र-सेवा के लिए कार्य किया।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

योगी अरविंद परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘योगी अरविंद’ निबंध का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘योगी अरविंद’ निबंध में महापुरुषों और महायोगी अरविंद के अत्यधिक महत्त्वपूर्ण जीवन पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। लेखक के अनुसार विदेश में विद्या अध्ययन के दौरान उनका विद्रोही व्यक्तित्व तेज हो लगा था। वे भारत माता को गुलामी के बंधनों से मुक्त करने के लिए क्रियाशील रहे। अनेक पत्रों के संपादक रहते हुए राजनीति में भी सक्रिय रहे। प्रत्येक व्यक्तित्व के भीतर किसी-न-किसी क्षेत्र विशेष की प्रतिभा छिपी होती है। आवश्यकता है इसको पहचानने की। योगी अरविंद ने अपनी इस प्रतिभा को पहचानकर आने वाले समय में अध्यात्म और योग का मार्ग चुना। किंतु अपने देश और राष्ट्रीयता के भाव को ये भुला नहीं सके, वे देश के विकास में हरसंभव प्रयासरत थे। अपनी पत्नी को लिखे पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि अपने देशवासियों को उन्नत और विकसित बनाना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। उनके द्वारा रचित गद्य साहित्य भी महत्त्वपूर्ण हैं। योगी अरविंद एक विशिष्ट लोक अनुभूति थे।

प्रश्न 2.
योगी अरविंद के गुरु कौन और कैसे घे? ‘
उत्तर
योगी अरविंद के गुरु हंसस्वरूप स्वामी और सद्गुरु ब्रह्मानंद थे। वे उच्च कोटि के योगी थे। उनकी अवस्था बहुतं लंबी थी। केवल अस्सी साल तक वे नर्मदा के किनारे ही विचरते रहे।

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प्रश्न 3.
योगी अरविंद की समाधि पर कौन-से शब्द अंकित हैं?
उत्तर
योगी अरविंद की समाधि पर निम्नलिखित शब्द अंकित हैं-हमारे देवता की भीम समाधि, हम आपको अपनी अनंत कृतज्ञता अर्पित करते हैं। आपके सामने, जिन्होंने हमारे लिए इतना किया, जिन्होंने हमारे लिए कर्म, संघर्ष, तप और आशा तथा सहनशीलता का निर्वाह किया, जिन्होंने हमारे लिए समस्त संकल्प-संपादन प्रयल, प्रस्तुति और सारी उपलब्धि का व्रत अनुष्ठान किया, हम नतमस्तक होते हैं और विनम्र निवेदन करते हैं कि एक क्षण के लिए भी हम आपका अनुग्रह न भूलें।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित कथनों के लिए दिए गए विकल्पों में सही विकल्पों का चयन कीजिए
1. अरविंद का जन्म हुआ था
1. 26 जनवरी को
2. 2 अक्टूबर को
3. 15 अगस्त को
4. 30 जनवरी को
उत्तर
(3) 15 अगस्त

2. अरविंद की उच्च शिक्षा हुई
1. अमेरिका में
2. जापान में
3. इंग्लैंड में
4. फ्रांस में।
उत्तर
(3) इंग्लैंड में

3. अरविंद का जन्म हुआ था
1.पांडिचेरी में
2. कलकत्ता में
3. बड़ौदा में
4. गायकवाड़ में।
उत्तर
(2) कलकत्ता में

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4. योगी अरविंद का निधन हुआ था
1 दिसबंर को
2. 30 दिसबंर को
3. 15 अगस्त को
4. 15 दिसबंर को।
उत्तर
(1) 4 दिसंबर
5. योगी अरविंद जन्मजात वे
1. योगी
2. विद्रोही
3. देश
4. राजनीतिज्ञ ।
उत्तर
(2) विद्रोही।

प्रश्न 5.
रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से उचित शब्दों के चयन से कीजिए।
1. अरविंद ……………… थे। (महामानव, योगमानव)
2. अरविंद ने योग की साधना में ……………… का दर्शन किया था। (दिव्य प्रकाश, आत्मप्रकाश)
3. ……में अरविंद-आश्रम का शुभारंभ हुआ। (पांडिचेरी, कलकत्ता)
4. ……………… उस समय फ्रांसीसियों के अधीन था। (बड़ीदा, पांडिचेरी)
5. अरविंद ने ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के ……………… पर जोर दिया। (कहावत, सिद्धांत)
उत्तर
1. योगमानव
2. आत्मप्रकाश
3. पांडिचेरी
4. पांडिचेरी
5. सिद्धांत।

प्रश्न 6.
सही जोड़ी का मिलान कीजिए
रामचरित मानस – वासुदेवशरण अग्रवाल
भगवान महावीर – मीराबाई
वर्षा गीत – डॉ. प्रेम भारती
कला और संस्कृति – सरदारपूर्ण सिंह
कन्यादान – तुलसीदास।
उत्तर
रामचरित मानस – तुलसीदास
भगवान महावीर – डॉ. प्रेम भारती
वर्षा गीत – मीराबाई
कला और संस्कृति – डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल
कन्यादान – सरदारपूर्ण सिंह।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? बाक्य के आगे लिखिए।
1. योगी अरविंद ने एकता, प्रेम अमरता और आत्मचेतना की ज्योति दी।
2. 1906 में बंग-भंग आंदोलन छिड़ा।
3. एक फ्रांसीसी महिला अरविंद से मिलने कलकत्ता आई।
4. अरबिंद संस्कारों को धनी थे।
5. जब अरविंद स्वामीजी के सामने आए तो स्वामी जी ने उन्हें देखा नहीं।
उत्तर
1. सत्य
2. असत्य
3. असत्य
4. सत्य
5. असत्य

प्रश्न 8.
निम्नलिखित कवनों के उत्तर एक शब्द में दीजिए
1. अरविंद के पिता क्या थे?
2. विद का जन्म कब हुआ था?
3. अरविंद का निधन कब हुआ था?
4. फ्रांसीसी महिला का क्या नाम था?
5. अरविंद के समय भारत की आबादी क्या थी?
उत्तर
1. सिविल सर्जन
2. 1872 में
3. 1950 में
4. मीरा अल्फांसा
5. तीस करोड़।

योगी अरविंद लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अरविंद ने किस परीक्षा में सफलता प्राप्त की और किसमें नहीं?
उत्तर
अरविंद ने इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा में सफलता प्राप्त की और घुड़सवारी में असफलता प्राप्त की।

प्रश्न 2.
अरविंद ने किन पत्रों का संपादन किया?
उत्तर
अरविंद ने ‘वंदेमातरम्’ ‘कर्मयोगी’ और ‘धर्म’ नाम के पत्रों का संपादन किया।

प्रश्न 3.
योगी अरविंद ने अपनी साधना की महत्त्वपूर्ण स्थिति कब प्राप्त की?
उत्तर
योगी अरविंद ने अपनी साधना की महत्त्वपूर्ण स्थिति 24 नवंबर, सन् 1926 में प्राप्त की।

प्रश्न 4.
‘योगी अरविंद की चार साल की कठिन योगाभ्यास का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
योगी अरविंद की चार साल की कठिन योगाभ्यास का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। धीरे-धीरे उनके अनुयायियों और प्रशंसकों की संख्या बढ़ने लगी। लोग आश्रम में रहकर योग-साधना करने लगे।

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योगी अरविंद निबंध का सारांश

प्रस्तुत निबंध में महापुरुष योगी अरविंद के जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण स्वरूपों पर प्रकाश डाला गया है। लेखक के अनुसार अरविंद योगमानव थे। इससे वे आत्म-प्रकाश का दर्शन किया था। इसके द्वारा उन्होंने पराधीन भारत को एकता, और आत्मचेतना की दिव्य ज्योति प्रदान की थी। उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 को कलकत्ता के एक शिक्षित परिवार में हुआ था। अपने पिता की इच्छानुसार वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। वहाँ से उन्होंने इटेलियन, जर्मन, फ्रेंच और स्पेनिश भाषाएँ सीखीं। स्वदेश लौटकर उन्होंने बड़ौदा में नौकरी कर ली। वहाँ उनकी आध्यात्मिक और साहित्यिक प्रतिभा को निखरने और अवसर मिला। 1905 बंग-भंग आंदोलन में भाग लेने के कारण वे बड़ौदा छोड़कर कलकत्ता आ गए। उस समय उन्होंने ‘वंदे मातरम्’, ‘कर्मयोगी’ और ‘धर्म’ नामक पत्रों का संपादन किया। वे धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से हटकर योग साधना में जुट गए।

पांडिचेरी के आश्रम में माता-फ्रेंच योगिनी के आने से अरविंद की योग साधना को बड़ा बल मिला। अरविंद ने ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ के सिद्धांत पर बल दिया। पांडिचेरी आश्रम में उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। उन्होंने उपनिषद् और गीता पर भाष्य और निबंध लिखे। 24 नवंबर, 1926 को उन्होंने अपनी साधना की महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त की। . बड़ौदा में नौकरी करते समय उन्हें उनकी पत्नी ने उनके प्रतिघोर निराशा की भावना व्यक्त किया था। उसे समझाते हुए अरविंद ने देश-प्रेम और परोपकार करने का सुझाव दिया। 4 दिसम्बर, 1950 को रात एक बजकर छब्बीस मिनट पर अरविंद ने भौतिक शरीर का परित्याग कर दिया। 9 दिसम्बर को पांडिचेरी आश्रम के आंगन में शाम बजे उनको समाधि दी गई। समाधि पर लिखा हुआ है-हमारे देवता की भौम समाधि हम आपको अपनी अनंत कृतज्ञता अर्पित करते हैं और विनम्र निवेदन करते हैं कि एक क्षण के लिए भी हम आपका अनुग्रह न भूलें।”

योगी अरविंद संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. मेरा दृढ़ विश्वास है कि भगवान ने जो गुण, प्रतिभा, उच्च शिक्षा तथा धन दिया है वह सब उन्हीं का है, जो कुछ परिवार के भरण-पोषण में लगता है और जो नितांत आवश्यक है उसी को अपने लिए खर्च करने का अधिकार है, उसके बाद जो कुछ बाकी रह जाता है उसे भगवान को लौटा देना उचित है। यदि मैं सब कुछ अपने सुख और विलास के लिए करूँ तो मैं चोर कहलाऊँगा। इस दुर्दिन में सारा देश मेरे द्वार पर आश्रित है, मेरे तीस कोटि भाई और बहिन हैं, उनमें से बहुतेरे अन्न न होने से मर रहे हैं, उनका हित करना होगा।

शब्दार्थ-विलास-सुख। आश्रित-निर्भर। कोटि-करोड़।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य’ 10वीं, में संकलित निबंध ‘योगी अरविंद’ से है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक के योगी अरविंद के महान विचारों का उल्लेख किया है। अरविंद ने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा है कि

व्याख्या-मेरा यह दृढ़ मात है कि ईश्वर ने किसी को जो योग्यता, क्षमता, प्रतिभा, उच्च शिक्षा, धन, बल आदि दिया है, वह सब कुछ उसी का है उसे अगर वह अपने परिवार की देख-रेख और सुख के लिए लगाता है। यह उसके लिए बिलकुल और बेहद जरूरी भी होता है। उसको ही यह सब कुछ खर्च करने का पूरा-पूरा अधिकार भी है। खर्च करने पर अगर कुछ बच जाए तो उसे चाहिए कि वह उसे भगवान को अर्पित कर दे। अगर मैं केवल अपने ही आराम और आनंद के लिए कुछ करूँ तो तो इससे मैं चोर कहा जाऊँगा। पर ध्यान देने की बात है कि सारा देश मेरे ऊपर निर्भर हो रहा है। इस देश की पूरी आबादी तीस करोड़ है। इसे मैं अपने भाई और बहिन के ही रूप में देखता और समझता हूँ। दुख की बात यह है कि इनमें से अधिकांश अन्नाभाव के कारण काल के गाल में जा रहे हैं। शेष बचे हुए को आज हमें बचाने की कोई-न-कोई कोशिश अवश्य करनी होगी।

विशेष-

  1. आध्यात्मिक विचार है।
  2. देश-प्रेम की प्रेरणा मिल रही है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अरविंद का क्या दृढ़ विश्वास है?
उत्तर
अरविंद का दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर के दिये हुए गुण, प्रतिभा, ऊँची शिक्षा, और धन को परिवार के सुख-शांति में लगाना चाहिए। अपने लिए खर्च किए गए धन के बचने पर उसे ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए।

प्रश्न 2.
तीस करोड़ लोगों में से अधिकांश क्यों मर रहे हैं?
उत्तर
तीस करोड़ लोगों में से अधिकांश अन्नाभाव से मर रहे हैं।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने योग अरविंद के जीवनोपयोगी नैतिक विचारों को प्रस्तुत किया है। ये विचार कर्त्तव्य-परायणता का जहाँ पाठ पढ़ा रहे हैं, वहीं देश-दयनीय स्थिति का प्रकाशन कर रहे हैं। इस प्रकार इस गद्यांश के द्वारा लेखक ने हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सचेष्ट रहने का सुझाव दिया है।

MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 इस नदी की धार में

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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 इस नदी की धार में (दुष्यंत कुमार)

इस नदी की धार में पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त ग़जल का आशय लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त गज़ल के माध्यम से ग़जलकार ने जीवन की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करते हुए उनसे मुंह न मोड़ने, अपितु उनसे यथाशक्ति साहसपूर्वक सामना करने का हीसला प्रदान किया है। इस दृष्टि से प्रस्तुत मज़ल जीवनान्धकार को चीरने के लिए आशा-विश्वास की दीप-ज्योतिस्वरूप है, इसे नकारा नहीं जा सकता है।

इस नदी की धार में सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नदी की धार और ठंडी हवा से क्या आशय है?
उत्तर
नदी की धार और ठंडी हवा से आशय है-जीवन में उतार-चढ़ाव, दुख-सुख, कठोरता-सरसता आदि।

प्रश्न 2.
कवि को दुख में आशा की किरण कहाँ-कहाँ दिखाई दे रही है?
उत्तर
कवि को दुख में भी आशा की किरण नदी की धार में, चिनगारी में, गूंगी पीर में, साँझ के अंधेरे में, चुपचाप मैदान में लेटी हुई नदी में और आकाश-सी छाती में दिखाई देती है।

प्रश्न 3.
‘एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो’ कवि ने इस पंक्ति में कौन-सा भाव व्यक्त किया है?
उत्तर
‘एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो कवि ने इस पंक्ति में बाधाओं से पार होने के लिए उत्साह और विश्वास का भाव व्यक्त किया है।

इस नदी की धार में दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘दुख नहीं ………….. छाती तो है।’ इस पंक्ति का भावार्थ लिखिए।
उत्तर
‘दुख नहीं ………….. छाती तो है।’ पंक्ति का भाव जीवन में मिली हुई हार से निराश न होकर किए गए संघर्षों और आत्मबल के प्रति गर्वित होने का है। फलस्वरूप प्रस्तुत पंक्ति का भाव अधिक उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत गज़ल का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
प्रस्तुत गजल में जीवन की विडम्बनापूर्ण परिस्थितियों का यथाशक्ति दृढ़तापूर्वक सामना करने का उल्लेख किया गया है। हमारे अंदर जो कुछ बची हुई और मंद पड़ी हुई शक्ति-क्षमता है, वह कम नहीं है। वह बुझे हुए दीपक के समान होने के बावजूद प्रज्वलित हो सकती है, बशर्ते हम आशा और विश्वास का दामन न छोड़ें। इसके लिए कवि ने अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से निराशा और हताशा के अंधकार के बीच आशा और विश्वास की ज्योति जलाए रखने पर जोर दिया है।

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प्रश्न 3.
‘मनुष्य की पीड़ा गूंगी होकर भी गाने में समर्थ है।’ इसका आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मनुष्य की पीड़ा लूंगी होकर भी गाने में समर्थ है।’ इसका आशय यह है कि मनुष्य की पीड़ा की भले ही खुले रूप में अभिव्यक्ति न हो पा रही है। फिर भी वह किसी-न-किसी रूप में मुखरित तो अवश्य हो रही है।

प्रश्न 4.
‘आदमी की पीर की तुलना कवि ने किस-किस से की है?
उत्तर
आदमी की पीर की तुलना कवि ने जर्जर नाव से, भीगी हुई बाती से, खंडहर के हृदय से, जंगली फूल से, अँधेरे की सड़क से. निर्वचन मैदान में लेटी हुई नदी से और अनुपलब्धियों से की है।

इस नदी की धार में भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
दी गई गजल में से पाँच तत्सम शब्द चुनकर लिखिए।
उत्तर
नदी, हृदय, नगर, निर्वचन, आकाश।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए
नदी, हवा, अंधेरा, आकाश, भोर।
उत्तर
नदी – सरिता, दरिया
‘हवा – पवन, वरुण
अंधेरा – अंधकार, अंध,
आकाश – नभ, आसमान
भोर – प्रभात, सुबह।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
बाती, फूल, सांझ, पत्थर।
उत्तर
तद्भव शब्द – तत्सम रूप
बाती – बर्तिका
फूल – पुष्प
सांझ – सायं
पत्थर – पाषाण।

इस नदी की धार में योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. इस ग़ज़ल का अन्त्याक्षरी में उपयोग कीजिए।
प्रश्न 2. ‘जीवन में आशावादी दृष्टिकोण हो तो प्रत्येक परिस्थिति में सफलता प्राप्त होती है’ इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए।
प्रश्न 3. दुष्यंत कुमार की अन्य ग़ज़लें संकलित कर अपनी डायरी में लिखिए।
प्रश्न 4. वर्तमान समय के ग़ज़लकारों के नाम संकलित कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

इस नदी की धार में सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नाव जर्जर होने के बावजूद किससे टकराती है और क्यों?
उत्तर
नाव जर्जर होने के बावजूद लहरों से टकराती है। यह इसलिए उसमें पश्तहिम्मत नहीं है। दूसरे शब्दों में, उसमें अपार दिलेरी और अपनी शक्ति का परिचय देने का उल्लास जोर मार रहा है।

प्रश्न 2.
‘एक खंडहर के हृदय-सी’ और ‘एक जंगली फल-सी’ गजलकार ने किसे कहा है और क्यों?
उत्तर
‘एक खंडहर के हृदय-सी’ और ‘एक जंगली फूल-सी’ गज़लकार ने आदमी की गँगी पीड़ा को कहा है। यह इसलिए कि आज आदमी की पीड़ा खुले तौर पर प्रकट नहीं हो पा रही है।

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प्रश्न 3.
‘दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर’ गज़लकार के ऐसा कहने का क्या आशय है?
उत्तर
‘दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर गज़लकार के ऐसा कहने का आशय यह है कि उसने आजीवन संघर्ष किया है। इससे उसको कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई। तो क्या हुआ? इसकी उसे कोई चिंता नहीं है। उसे तो गर्व है कि उसने अपनी हिम्मत और शक्ति का बखुबी परिचय दिया है।

प्रश्न 4.
रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से उचित शब्दों के चयन से कीजिए।
1. नाव …………. में टकराती है। (धार, लहरों)
2. दिए में …………. हुई बाती है। (बुझी, भीगी)
3. जंगली फूल-सी …………. की पीर है। (समाज, आदमी)
4. मैदान में नदी …………. लेटी हुई है। (चंचल, निर्वचन)
5. बाधाओं का सामना करने के लिए …………. सी छाती होनी चाहिए। (पत्थर, आकाश)
उत्तर
1. लहरों
2. भीगी
3. आदमी
4. निर्वचन
5. आकाश।

प्रश्न 5.
दिए गए कथनों के लिए सही विकल्प चुनकर लिखिए।
1. दुष्यंत कुमार का जन्म हुआ था
1. 1930 में
2. 1933 में
3. 1943 में
4. 1952 में।
उत्तर
2. 1933 में

2. दुष्यंत कुमार का सुप्रसिद्ध गज़ल-संग्रह है
1.सूर्यका स्वागत
2.एककंठविषपायी
3. सायेमेंधूप
4. छोटे-छोटे सवाल।
उत्तर
3. सायेमेंधूप

3. दुष्यंत कुमार मुख्य रूप से हैं
1. गयकार
2. आलोचक
3. पत्रकार
4. गज़लकार।
उत्तर
4. गज़लकार

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4. दुष्यंत कुमार का निधन हुआ था
1. 1976 में
2. 1978 में
3. 1967 में
4. 1970 में।
उत्तर
1. 1976 में

5. दुष्यंत कुमार की गजलों में है
1.शांति के स्वर
2. सद्भाव के स्वर
3. व्यवस्था के स्वर
4.क्रांति के स्वर।
उत्तर
(4) क्रांति के स्वर।

प्रश्न 4.
सही जोड़ी मिलाइए
रामचरित मानस – डॉ. एन.ई. विश्वनाथ
अय्यर सेगाँव का संत – डॉ. प्रेम भारती
वीरांगना दुर्गावती – दिवाकर शर्मा
अब तो खामोशी तोड़ो – श्रीमन्नारायण अग्रवाल
शहर सो रहा है – तुलसीदास।
उत्तर
रामचरितमानस – तुलसीदास
सेगाँव का संत – श्रीमन्नारायण अग्रवाल
वीरांगता दुर्गावती – डॉ. प्रेम भारती
अब तो खामोशी तोड़ो – दिवाकर शर्मा
शहर सो रहा है – डॉ. एन.ई. विश्वनाथ अय्यर ।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए।
1. नाव जर्जर है, इसलिए लहरों से टकराती नहीं है।
2. आज समाज की स्थिति विडम्बनापूर्ण हो गई है।
3. ‘इस नदी की धार में’ गजल ‘साए में धूप’ गज़ल-संग्रह से है।
4. ‘दुष्यंत कुमार’ की गज़लों में निराशा और अविश्वास के स्वर हैं।
5. ‘दुष्यंत कुमार’ की गज़लों के आधार पर लोकप्रियता प्राप्त हुई।
उत्तर

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों के उत्तर एक शब्द में दीजिए।
1. ‘आँगन में एक वृक्ष’ दुष्यंत कुमार का क्या है?
2. नदी की धार में कौन-सी हवा आती है?
3. दिए में तेल से भीगी हुई क्या है?
4. आदमी की पीर क्या हो गई है?
5. निर्वचन मैदान में लेटी हुई नदी बार-बार क्या करती है?
उत्तर

  1. उपन्यास
  2. ठंडी
  3. बाती
  4. गूंगी
  5. बतियाती है।

इस नदी की धार में लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नदी की धार की क्या विशेषता है?
उत्तर
नदी की धार की यह विशेषता है कि उसमें ठंडी हवा आती है।

प्रश्न 2.
तेल से भीगी हुई बाती के लिए गज़लकार क्या चाहता है?
उत्तर
तेल से भीगी हुई बाती के लिए गज़लकार एक चिनगारी चाहता है।

प्रश्न 3.
‘इस नदी की धार में’ गज़ल में किस पर बल दिया गया है?
उत्तर
‘इस नदी की धार में’ गज़ल में निराशा और हताशा के अंधकार के बीच आशा और विश्वास का दीप जलाए रखने पर बल दिया गया है।

इस नदी की धार में कवि-परिचय

जीवन-परिचय-कविवर दुष्यंत कुमार का जन्म सन् 1933 ई. में उ.प्र. के बिजनौर जिलान्तर्गत राजपुर नवादा में हुआ था। अपनी आरंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय से समाप्त कर आपने अपनी उच्च शिक्षा के बल पर जीविका के सरकारी नौकरी कर ली। इसके लिए आपने म.प्र. की राजधानी भोपाल में भाषा-विभाग में सहायक संचालक के पद पर कार्य किया। इस पद पर कार्य करते आपका निधन बड़ी ही छोटी आयु में 30 सितम्बर, 1976 को हो गया।
रचनाएँ-कविवर दुष्यंत कुमार की रचनाएँ हैं

गजल-संग्रह-‘साये में धूप’ (खंड काव्य), ‘एककंठ विषपायी’ (काव्य-संग्रह) ‘सूर्य का स्वागत’, ‘जलते हुए वन का वसंत’,।

उपन्यास-‘छोटे-छोटे सवाल’, ‘आंगन में एक वृक्ष’ आदि।

भावपक्ष-कविवर दुष्यंत कुमार का काव्य-स्वरूप मार्मिक भावों और संवेदनाओं का भंडार है। उससे देश-प्रेम का जहाँ विशाल चित्र फैला हुआ दिखाई देता है. वहीं दूसरी ओर जीवन की कटु सच्चाई के साथ जीवन की अपेक्षाओं के भी रूप-प्रतिरूप उभरते हुए दिखाई देते हैं। सामाजिक कुरीतियों और विसंगतियों के भरपुर चित्र खींचने में कविवर दुष्यंत कुमार पूरी तरह समर्थ दिखाई देते हैं।

कलापक्ष-कविवर दुष्यंत कुमार की कलापक्षीय विशेषताएँ अनूठी हैं। इसका मुख्य कारण है-सरल, सुबोध और सटीक शब्द-चयन से पुष्ट हुई भाषा । जहाँ तक आप की शैलीगत विशेषताओं का प्रश्न है। तो वह पूर्णरूप से भावात्मक और चित्रात्मक है। उसमें बिम्बों और प्रतीकों की सजीवता एवं रसों-अलंकारों की सुंदर योजना अधिक मोहक है।

साहित्य में स्थान-कविवर दुष्यंत कुमार का हिंदी गजल के रचनाकारों में अत्याधिक चर्चित और सम्मानपूर्ण स्थान है। हिंदी गजल के क्षेत्र में आपका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। फलस्वरूप आने वाली पीढ़ी उससे मार्गदर्शन प्राप्त करती रहेगी।

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इस नदी की धार में गजल का सारांश

प्रस्तुत गजल में आशा और विश्वास के पूरे जोर-शोर हैं। एक ऐसी आशा जो खण्डित होते-होते बचने की अपनी शक्ति नहीं खो पाती है। इसलिए गजलकार दुष्यंत कुमार का कहना है कि नदी की धार बहुत अधिक तो है लेकिन उससे ठंडी हवा आती रही है। ऐसी तेज धारा में एक जर्जर नाव ऐसी है, जो आने वाली लहरों से मुठभेड़ करने की बार-बार कोशिश कर रही है। एक चिनगारी कहीं से मिल जाए तो इस दिए में तेल से भीगी हुई बत्ती जल उठेगी। खण्डहर-सी उदास और जंगली फूल की तरह आदमी की गूंगी पीर गाती है। एक चादर से ढकी अँधेरे की सड़क भोर तक चली जाती है। चूप पड़ी हुई नदी कभी-कभी पत्थरों से ओट में कुछ कह लेती है। किसी प्रकार की प्राप्ति नहीं हुई, इस बात का तनिक मलाल नहीं है। इस बात का फक्र है कि आकाश की तरह चौड़ी छाती तो है।

इस नदी की धार में संदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या

(1) इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली-फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

शब्दार्थ-धार-प्रवाह। जर्जर-टूटी-फूटी, पुरानी। ढूँढ-खोज। पीर-पीड़ा। गूंगी-बेजुबान।

संदर्भ-प्रस्तुत गज़ल हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य 10वीं’ में संकलित गज़लकार श्री दुष्यंत कुमार विरचित गज़ल ‘इस नदी की धार में’ शीर्षक से है।

प्रसंग-प्रस्तुत गजल में गजलकार दुष्यंत कुमार ने जर्जर और बिडम्बनापूर्ण-परिस्थितियों में हिम्मत बनाए रखने का प्रोत्साहन देते हुए कहा है कि

व्याख्या-चूँकि नदी की धारा बड़ी तेज है। उसमें बहुत प्रवाह है और अधिक उफान है। फिर भी उससे सुखद और आनंददायक ठंडी-ठंडी हवा तो स्पर्श करती रहती है। इस नदी की ऊँची-ऊची उठती लहरों से टक्कर लेने वाली टूटी-फूटी नाव की हिम्मत काबिलेतारीफ है। गजलकार का पुनः कहना है कि दिए में तेल से भीगी बाती है, यह उम्मीद को रखने वाली बात है। अगर एक चिनगारी कहीं से मिल जाए तो इस दिए की बाती जलकर रोशनी कर सकती है। आज समय ने समाज को इतना

अधिक दुखद और असहाय बना दिया है कि उससे बच पाना बड़ा ही कठिन है। उसका सामना करना तो और ही कठिन है। इससे आज आदमी की पीड़ा बहुत ही, दुखद हो गई है। ऐसी दशा में हर प्रकार से पीड़ित उस आदमी की दाद देनी चाहिए जो गूंगा होकर भी अपनी पीड़ा का बयान करने की हिम्मत नहीं हारता है।

विशेष-

  1. उर्दू शब्दों की प्रधानता है।
  2. शैली मार्मिक है।
  3. वीर रस का प्रवाह है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य
प्रश्न उपर्युक्त गज़ल के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त गजल का भाव-सौंदर्य मार्मिक है। जीवन की कठिन और विषम दशा में न केवल हिम्मत बनाए रखना अपितु हिम्मत का प्रदर्शन करने का प्रोत्साहन उपर्युक्त गजल का लक्ष्य है। इसके गज़लकार ने उपयुक्त उपमाएँ दी हैं, जो प्रभावशाली हैं।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न उपर्युक्त गज़ल के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त गजल का शिल्प-सौंदर्य हृदयस्पर्शी है। भावों के अनुसार भाषा है। शब्द-चयन में उर्दू को अधिक स्थान दिया गया है। शैली पूरी तरह भावात्मक
और चित्रात्मक है। वीर रस और करुण रस का मिश्रित प्रवाह है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गज़ल का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त गजल के माध्यम से गज़लकार ने जीवन में आने वाली कठिनाइयों और विडंबनाओं को चुनौती देते हुए उनका यथाशक्ति और यथाविचार के साथ सामना करने का प्रोत्साहन दिया है। इससे टूटी-फूटी जिंदगी के सँवरने के अवसर मिलते हैं। ऐसा विश्वास भरने का गज़लकार का प्रयास प्रशंसनीय कहा जा सकता है।

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2. एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्वरों से, ओट में, जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

शब्दार्थ-भोर-सुबह। निर्वचन-मौन, चुप्पी। बतियाती-बात करती है। उपलब्धियों-प्राप्तियाँ।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में गज़लकार दुष्यंत कुमार ने निराशा और हताशा से घिरी जिंदगी में जोश भरते हुए यह कहना चाहा है कि

व्याख्या-जिन्दगी में धीरे-धीरे बिडम्बनाओं और बाधाओं ने अपना प्रवेश करना शुरू कर लिया है, तो इससे हौसला नहीं छोड़ना चाहिए। अगर एक चादर से साँझ ने सारे नगर को ढकने का साहस किया है, तो यह हौसला रखना चाहिए कि सांझे की एक ऐसी सड़क भी है, जो अँधेरे को चीरती हुई भोर तक आगे निकल जाती है। इसी प्रकार सपाट मैदान में जो नदी चुपचाप पड़ी हुई है, वह व्यर्थ नहीं है, अपितु उसमें बड़ी जीवनी शक्ति है। यह इसलिए वह कभी पत्थरों से तो कभी किसी ओट में होकर अपनी बात सुनाती रहती है। गज़लकार का पुनः कहना है कि उसे अपनी उपलब्धियों के नाम इस बात का कोई दुख नहीं है कि वह बहुत कुछ प्राप्त नहीं कर सकता है। उसे तो इस बात का गर्व है कि वह किसी प्रकार के दुखों को सहने के लिए आकाश के समान अपनी छाती फैलाकर रखा है।

विशेष-

  1. भाषा में प्रवाह है।
  2. शैली चित्रमयी है।
  3. वीर रस का संचार है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर

(क) भाव-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त गज़ल के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।।
उत्तर
उपर्युक्त गज़ल की भाव-योजना मार्मिक है। जीवन की त्रासदी से उबरने और उसका सामना करने के लिए दिए आधार अधिक रोचक और भावों को जगाने वाले हैं। इससे प्रस्तुत गज़ल आकर्षक है, इसमें कोई संदेह नहीं।

(ख) शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त गज़ल के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त गजल का शिल्प-सौंदर्य असाधारण है। इसके प्रमुख आधार हैं-सामान्य और सुपरिचित शब्द-योजना, वीर रस के छींटे, उपमा अलंकार और . रूपक-अलंकार सहित सजीव बिम्बों और प्रतीकों का सुंदर विधान।

MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 9 बरखा गीत

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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 9 बरखा गीत (रमानाथ अवस्थी)

बरखा गीत पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

बरखा गीत लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वर्षा के आगमन पर धरती में क्या-क्या परिवर्तन होता है?
उत्तर-
वर्षा के आगमन पर मुरझाई धरती हरी हो जाती है। खाली गगरी भर जाती है। आकाश में बादल छा जाते हैं। झूले पर कजली लहराने लगती है।

प्रश्न 2.
पीड़ा दुलारने वाला किसे कहा गया है?
उत्तर-
पीड़ा दुलारने वाला घनश्याम को कहा गया है।

बरखा गीत दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वर्षा की प्रतीक्षा सभी प्राणियों को क्यों रहती है?
उत्तर-
वर्षा की प्रतीक्षा सभी प्राणियों को रहती है। यह इसलिए कि उससे नया जीवन मिलता है। नीसरता सरसता में बदल जाती है। चारों ओर आनंद और सुख का वातावरण फैल जाता है।

प्रश्न 2.
गीत में कवि ने वियोगजन्य पीड़ा को किस प्रकार चित्रित किया है?
उत्तर-
गीत में कवि ने वियोगजन्य पीड़ा को इस प्रकार चित्रित किया है बरखा के भय से डरी-डरी बजती है दूर कहीं बाँसुरी जागी फिर से सोई पीड़ा फिर विकल हुई कोई मीरा जो पीड़ा को दुलरा सकता,
ऐसा घनश्याम नहीं आया।

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प्रश्न 3.
‘जागी फिर से सोई पीड़ा’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर-
‘जागी फिर से सोई पीड़ा’ से कवि का आशय है-कवि का वियोग स्थाई है। यह इसलिए उसकी पीड़ा का प्रेम करने वाला अभी तक कोई घनश्याम उसके पास नहीं आया है।

बरखा गीत भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए।
पेड़, अम्बर, प्रहरी, वादल।
उत्तर-
पेड़ – वृक्ष, तरु
अम्बर – गगन, आसमान
प्रहरी – पहरेदार, रक्षक
बादल – जलद, नीरद।

प्रश्न 2. निम्नलिखित शब्दों के समास-विग्रह कीजिए
घनश्याम, मधुवन, बरखागीत, पीताम्बर।
उत्तर-
शब्द – समास-विग्रह
घनश्याम – घन के समान श्याम
मधुवन – मधु है जो वन
बरखागीत – बरखा का गीत
पीताम्बर – पीत है अम्बर (वस्त्र) जिसका।

प्रश्न 3.
‘बादल टूटे, बरसा जीवन’ पंक्ति का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘बादल टूटे, बरसा जीवन’ काव्य-पंक्ति की भाव-योजना सरस और स्वाभाविक है। वर्षा के आने पर चारों ओर ऐसा उल्लास छा जाता है, मानो जीवन बरस रहा है। इससे भावों का आकर्षण स्पष्ट झलक रहा है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
बरखा, रीति, धरती, दिन, बाँसुरी।
उत्तर-
तद्भव शब्द – तत्सम रूप
बरखा – वर्षा
रीति – रिक्त
धरती – धरा
दिन – दिवस
बाँसुरी – बंशी।

बरखा गीत योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
ऋतु-वर्णन से संबंधित अन्य कवियों की रचनाओं का संकलन कर कक्षा में सुनाइए।

प्रश्न 2.
छः ऋतुओं के नाम क्रमानुसार लिखिए और जो भी ऋतु आपको पसंद है, उसका वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

बरखा गीत परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

बरखा गीत अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘बरखा गीत’ कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत गीत में कवि ने वर्षा-वर्णन के संदर्भ में अपनी अनुभूति को ही विस्तार दिया है। हमेशा ही एक अपूर्णता का भाव गीतकार के अंतर्मन में क्रियाशील है। इस अपूर्णता को वर्षा का उल्लास और वर्षा की प्रकृति-संवेदना भी पूर्ण नहीं कर पाती है। वर्षा ने यद्यपि पृथ्वी को हरा-भरा बना दिया, मरुस्थल भी वर्षा से गीला हुआ, वृक्षों के पल्लवों में सघनता आई, बांसुरी ने तान छेड़ी, लेकिन इससे कवि की वेदना को विराम नहीं मिल पाया है। वर्षा के आगमन के बीच वियोगजन्य अनुभूतियों का प्रभावशाली वर्णन इस गीत को विरुद्ध अनुभूतियों के संयोगपरक सौंदर्य में बदल देता है।

प्रश्न 2.
वर्षा आगमन से पहले धरती कैसी थी?
उत्तर-
वर्षा आगमन से पहले धरती की दशा दुखद थी। गर्मी और प्यास से लोग आकुल-व्याकुल थे। धरती मुरझा गई थी। गागर खाली पड़ी हुई थी। आसमान बिल्कुल साफ था।

प्रश्न 3. वर्षा के आगमन से धरती में होने वाले परिवर्तनों को कवि ने किन पंक्तियों में चित्रित किया है?
उत्तर-
वर्षा के आगमन से धरती में होने वाले परिवर्तनों को कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में चित्रित किया है-
बादल टूटे, बरसा जीवन
भीगा मरुस्थल, महका मधुवन।
पेड़ों की छाँह हुई गहरी,
इसका साथी दिनका प्रहरी॥

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प्रश्न 4.
रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से उचित शब्दों के चयन से कीजिए।
1. वर्षा के अभाव में धरती ……………… हुई थी। (हरी, मुरझाई)
2. वर्षा के आगमन से ……………… पर बादल छा जाते हैं। (धरती, आकाश)
3. पीड़ा को दुलरा सकता है ………………। (प्रेमी, घनश्याम)
4. वर्षा के भय ……………… डरी-डरी है। (पीड़ा, बँसुरी)
5. झूले पर ……………… लहरा रही है। (बच्ची, कजली)
उत्तर-
1. मुरझाई,
2. आकाश,
3. घनश्याम,
4. बंसुरी,
5. कजली।

प्रश्न 5.
दिए गए कथनों के लिए सही विकल्प चुनिए।
1. बरखा गीत में है
1. वियोग का चित्रण,
2. संयोग का चित्रण,
3. संयोग-वियोग का चित्रण,
4. वर्षा का चित्रण।
उत्तर-
4. वर्षा का चित्रण।

2. प्राकृतिक उल्लास के बीच कवि की वेदना है-
1. अधिक बढ़ी हुई,
2. ज्यों का त्यों,
3. बदली हुई,
4. नई।
उत्तर-
2. ज्यों का त्यों,

3. वर्षा के अभाव में रहता है
1. अपूर्णता का भाव,
2. पूर्णता का भाव,
3. अपूर्णता-पूर्णता का भाव,
4. उपर्युक्त कोई नहीं।
उत्तर-
1. अपूर्णता का भाव,

4. बरखा गीत में अनुभूति है-
1. समाज की,
2. मनुष्य,
3. पशु-पक्षी की,
4. ईश्वर,
5. कवि की।
उत्तर-
5. कवि की।

5. रमानाथ अवस्थी का जन्म हुआ था
1. 1920 में,
2. 1924 में,
3. 1932 में,
4. 1933 में।
उत्तर-
2. 1924 में,

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प्रश्न 4.
सही जोड़ी मिलाइए
कालिदास की समालोचना – कबीरदास
गीतांजलि – जैनेन्द्र कुमार
रमैनी – महावीर प्रसाद द्विवेदी
वैदेही बनवास – रवीन्द्रनाथ ठाकुर
अपना-अपना भाग्य – ‘हरिऔध’।
उत्तर-
कालिदास की समालोचना – महावीर प्रसाद द्विवेदी
गीतांजलि – रवीन्द्रनाथ ठाकुर
रमैनी – कबीरदास
वैदेही वनवास – ‘हरिऔध’
अपना-अपना भाग्य – जैनेन्द्र कुमार।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए।
1. मरुस्थल वर्षा में गीला हो जाता है।
2. वर्षा से मनुष्य में नहीं प्रकृति में उल्लास होता है।
3. बरखा गीत लयात्मक है।
4. वर्षाकाल में पेड़ों के पल्लव गिर जाते हैं।
5. वर्षा के आगमन से वियोगियों की पीड़ा बढ़ जाती है।
उत्तर-
1. सत्य,
2. असत्य,
3. सत्य,
4. असत्य,
5. सत्य।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों का उत्तर एक शब्द में दीजिए।
1. किसकी प्यास समझने वाला बादल नहीं आया?
2. आसमान पर क्या बौराई?
3. किसके टूटने से जीवन बरस गया?
4. फिर से कौन विकल हुई है?
5. पीड़ा को कौन दुलरा सकता है?
उत्तर-
1. कवि की,
2. बादल,
3. बादल के,
4. मीरा,
5. घनश्याम।

बरखा गीत लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि के लिए कौन-सा गीत अनगाया है?
उत्तर-
कवि के लिए उसके मन पर लहराने वाला गीत अनगाया है।

प्रश्न 2.
कवि को किस बादल की प्रतीक्षा है?
उत्तर-
कवि को उसकी प्यास समझने वाले बादल की प्रतीक्षा है।

प्रश्न 3.
मीरा फिर विकल क्यों हुई?
उत्तर-
मीरा फिर विकल हुई। यह इसलिए उसकी सोई हुई पीड़ा फिर से जाग गई थी।

बरखा गीत कवि-परिचय

जीवन-परिचय-कविवर रमानाथ अवस्थी का आधुनिक हिंदी के नवगीतकारों अधिक उल्लेखनीय स्थान है। आपका जन्म उत्तर-प्रदेश के फतेहपुर जिला में 8 नवंबर, सन् 1924 को हुआ था। आपने अपनी शिक्षा प्राप्ति के दौरान गीत-रचना संसार में प्रवेश कर लिया था। धीरे-धीरे आप आधुनिक हिंदी गीत-रचना की एक अधिक मजबूत कड़ी के रूप में बनकर साहित्यकाश पर छा गए। इस तरह आपका नाम राष्ट्रीय स्तर के मंचीय कवियों में बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है। अगर हम आपके रचनाओं के विषय में चर्चा करें, तो हम यह अवश्य कह सकते हैं कि आपके गीतों में न केवल प्रकृति का मनमोहक दृश्य है, अपितु उनमें सामाजिक, वास्तविकता और मानवीय संवेदनाओं का उफनता हुआ सागर भी है।

रचनाएँ-रमानाथ अवस्थी की निम्नलिखित रचनाएँ हैं’रात और सहनाई’, ‘आग और पराग’ ‘बंदन करना द्वार’ आदि हैं।

भाव पक्ष-कविवर रमानाथ अवस्थी की कविताओं का भाव पक्ष सरल-सरस और स्वाभाविक है। उसमें यथार्थ और विश्वसनीयता का भरपूर भण्डार है। उनका भावपक्ष जाना-पहचाना और सुपरिचित है। इसलिए उसमें कल्पना की उड़ान नहीं है, अपितु यथार्थ का सपाट मैदान है।

कला पक्ष-कविवर रमानाथ अवस्थी की कलापक्षीय विशेषताएँ आकर्षक हैं। उसमें कलागत श्रेष्ठता सर्वत्र देखी जा सकती है। इस दृष्टि से आपका कला पक्ष सरल और प्रचलित शब्दों पर आधारित भाषा से पुष्ट है। प्रभायता के लिए चित्रात्मकता और भावात्मकता जैसी शैलियों को प्रस्तुत करने का प्रयास काबिले तारीफ़ है।

साहित्य में स्थान-हिदी के नवगीतकारों में कविवर रमानाथ अवस्थी अधिक चर्चित हैं। हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा सन् 1900 में इन्हें ‘साहित्य महोपाध्याय’ की उपाधि से विभूषित किया गया। हिंदी की नवपीढ़ी पर आपकी कविताओं का व्यापक और स्थायी प्रभाव है।

बरखा गीत कविता का सारांश

प्रस्तुत कविता गीत काव्य पद्धति पर आधारित भावपूर्ण कविता है। इसमें ग्रामीण वातावरण के अंतर्गत वर्षाकालीन दशा का चित्रण है। वर्षा का स्वरूप, स्थित, दिशा और उसके प्रभाव को दर्शाने का प्रयास किया गया है। वर्षा से मुरझाई धरती हरी हो जाती है। खाली गगरी भर जाती है। आकाश पर बादल दौड़ने लगते हैं। झूलों पर कजली लहराने लगती है। वर्षा से मरुस्थल सरस हो गया। मधुवन महक उठा। पेड़ों की छाँह गहरा गई। इससे कहीं दूर बाँसुरी की जो ध्वनि सुनाई दे रही है, उससे सोई हुई पीड़ा जग जाती है। मानो कोई फिर से मीरा व्याकुल होने लगी है लेकिन अफ़सोस है कि उस पीड़ा को दुलारने वाला कोई कृष्ण नहीं आ रहा है।

बरखा गीत संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

जो मेरी प्यास समझ पाता,
वह बादल अभी नहीं आया।
मुरझाई धरती हरी हुई,
रीती गागरियाँ भरी हुई,
अम्बर पर बौराई बदली,
झूले पर लहराई कजली,
जो मेरे मन पर लहराता,
वह गीत अभी तक अनगाया।

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शब्दार्थ-रीति-खाली। अम्बर-आकाश।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य’ में संकलित कवि श्री रमानाथ अवस्थी विरचित ‘बरखा गीत’ कविता से है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने वर्षा होने से पहले की दशा-दिशा का चित्र खींचते हुए कहा है कि

व्याख्या-अब तक मैं जिस प्रकार से प्यासा रहा, उस प्यास को बुझाने वाला अभी तक कोई बादल दिखाई नहीं दे रहा है। हम देख रहे हैं कि इस समय सारी धरती रुखी-सूखी पड़ी है। ठंडे जल की गगरी इस समय खाली पड़ी हुई दिखाई दे रही है। आकाश पर बादल पूरी तरह से उमड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। चारों ओर कजली की बहार झूले पर दिखाई दे रही है। इस प्रकार मेरे पर लहराने वाला जो सुंदर गीत है, वह अभी तक अनगाया ही रह गया है।

विशेष-
1. भाषा बिल्कुल सरल और सपाट है।
2. वर्षा के स्वरूप और उसके अभाव के प्रभाव को रेखांकित किया गया है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य वर्षा अभाव के स्वरूप पर आधारित है। वर्षा के बिना चारों ओर बेजान की स्थिति हो गई है। धरती मुरझाई हुई है। गगरी खाली पड़ी है। इस प्रकार के दृश्यों का यथार्थपूर्ण चित्रांकन भावों को सजीव और वास्तविक बनाने के लिए सटीक रूप में है। शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकार डालिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य अत्यधिक सरल, सपाट, प्रचलित और आम शब्दों से तैयार भाषा पर आधारित है। इसके लिए चित्रमयी शैली मन को छू रही है। लय और संगीत का अच्छा तालमेल दिखाई दे रहा है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव वर्षा के अभाव से उत्पन्न हुई दशा और दिशा को सामने रखना है। इसके माध्यम से कवि ने वर्षा की आवश्यकता को सुखद दशा की प्राप्ति का एक साधन बतलाने का प्रयास किया है।

2. बादल टूटे, बरसा जीवन,
भीगा मरुथल, महका मधुवन,
पेड़ों की छाँह हुई गहरी,
इसका साथी दिन का प्रहरी,
जो मेरा साथी बन पाता,
वह रूप कहीं है भरमाया।

शब्दार्थ-मरुथल-रेगिस्तान प्रहरी,-पहरेवाला।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने वर्षा के बाद की स्थिति का चित्र खींचते हुए कहा है कि-

व्याख्या-वर्षा होने पर आकाश में उमड़ते हुए बादल अब बरसने लगे। इससे ऐसा लगने लगा है कि मानो जीवन ही बरस गया है। उजाड़, सूखा और निर्जीव रेगिस्तान भी सरस हो गया है। मधुवन की उदासी कट गई है। वह अब महकने लगा है। पेड़ों के पत्ते और फूल-फल अधिक हो गए हैं। इससे पेड़ों की छाया भी बड़ी गहरी होने लगी है। अब तो इसका साथ देने वाला दिन का प्रहरी सूरज ही है। मेरा साथी बन पायेगा, उसका स्वरूप और अधिक भ्रम में डालने वाला है।

विशेष-
1. वर्षा के बाद की दशा और दिशा का वर्णन है।
2. स्वभावोक्ति अलंकार है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश के भाव वर्षा के बाद के स्वरूप को दर्शा रहा है। वर्षा होने से नीरसता और उदासी की स्थिति का नामोनिशान नहीं रह जाता है। उसके स्थान पर सरसता का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। ऐसी दशा के अनुकूल भावों की योजना बड़ी ही सटीक और उपयुक्त रूप में है।

शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश की शिल्प-योजना सरल और सपाट शब्दों की है। ये शब्द आम प्रचलित और सुपरिचित हैं। इनसे बनी हुई भाषा बोधगम्य और हृदयस्पर्शी है। शैली-विधान लयात्मक और संगीतात्मक दोनों ही है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा कवि ने यह आशय व्यक्त करना चाहा है कि सूखे की दुखद स्थिति बीत गई तो वर्षा की सुखद स्थिति आई है। दूसरे शब्दों में, दुख के बाद सुख आता है। इससे दुख का घाव भर जाता है और सुख का संसार संवरने-बढ़ने लगता है।

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3. बरखा के भय की डरी-डरी,
बजती है दूर कहीं बँसुरी,
जागी फिर से सोई पीड़ा,
फिर विकल हुई कोई मीरा,
जो पीड़ा को दुलरा सकता,
ऐसा घनश्याम नहीं आया।

शब्दार्थ-बरखा-वर्षा। विकल-व्याकुल। घनश्याम-काले बादल, श्रीकृष्ण। दुलरा-स्नेह-प्रेम करना।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने वर्षा के सुखद वातावरण के बावजूद अपनी पीड़ा के शांत न होने का चित्र खींचते हुए कहा है कि

व्याख्या-वर्षा के भयंकर रूप को समझकर कहीं दूर पड़ी बांसुरी अब खुलकर नहीं बज रही है। वह तो वर्षा से डरकर रुक-रुककर बज रही है। इससे सोई पीड़ा अब जाग गई है। इस तरह मानो श्रीकृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनकर व्याकुल और अस्थिर हो गई है। अफसोस की बात यह है कि जो व्याकुल कर देने वाली पीड़ा को सहलाने वाला है। वह घनश्याम अभी तक नहीं आया है।

विशेष-
1. वियोग शृंगार रस का प्रवाह है।
2. ‘डरी-डरी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना मार्मिक है। उसमें हृदय की कसक और अस्थिरता साफ झलक रही है। इस तरह भावों की निरंतरता है। इसके साथ क्रमबद्धता है। ये सभी स्वाभाविक और सहज हैं।

शिल्प-सौंदर्य
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य सरल और सहज शब्दों पर आधारित भाषा-शैली है। भाषा की शब्दावली तद्भव प्रधान शब्दों की है जिसे वियोग शृंगार रस में डूबोकर चित्रात्मक शैली से चमकाने का प्रयास किया गया है। इसे प्रभावशाली बनाने के लिए पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (डरी-डरी) को लिया गया है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर-
उपर्युक्त पद्यांश में वियोगावस्था का चित्रांकन किया गया है। इसे स्वाभाविक और विश्वसनीय रूप में रखने का प्रयास करके प्रेरक रूप दिया गया है। वियोग पीड़ित मनोदशा को वियोगभोगी ही समझ सकता है, इस ओर भी अप्रत्यक्ष संकेत है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।

MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 सन्नाटा

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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 सन्नाटा (उषाराज सक्सेना)

सन्नाटा पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

सन्नाटा लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न- 1.
कवियित्री को परदेश में कैसा अनुभव होता है?
उत्तर
कवियित्री को परदेश में अकेलेपन का अनुभव होता है।

प्रश्न 2.
जलता हुआ बल्ब सन्नाटे में कैसा लग रहा है?
उत्तर
जलता हुआ बल्ब आँखों में ठहरा हुआ आँसू जैसे पलकों पर लटक गया है।

प्रश्न 3.
‘तुम्हारी विरासत’ कवियित्री के पास क्या शेष बचा है?
उत्तर
‘तुम्हारी विरासत’ कविता में कवियित्री के पास बची हुई जिंदगी का एक टुकड़ा शेष बचा है।

प्रश्न 4.
स्मृतियों की आहट से क्या अनुभव होता है?
उत्तर
‘स्मृतियों की आहट से’ हमें नई जिंदगी जीने की सुबह का अनुभव होता है।

सन्नाटा दीर्य-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘शब्द समूह खो गया है।’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शब्द-समूह खो गया है। पंक्ति का भाव यह है कि आज अकेलापन चारों ओर फैल गया है।

प्रश्न 2.
जलता हुआ प्रश्न चिह्न किसे कहा गया है? और क्यों?
उत्तर
‘जलता हुआ प्रश्न चिह्न’ अकेलापन और उदासीपन को कहा गया है।

प्रश्न 3.
‘सन्नाटा’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
देखिए सन्नाटा का सारांश।

प्रश्न 4.
कवियित्री अँधेरे से क्या छीन कर लाई हैं?
उत्तर
कवियित्री अँधेरे से बची हुई जिंदगी का एक टुकड़ा छीन कर लाई हैं।

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प्रश्न 5.
‘कवयित्री सन्नाटा से बिलकुल भयभीत नहीं है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कवियित्री सन्नाटे से बिलकुल भयभीत नहीं है। यह इसलिए कि उसे सुबह की नई किरणों से जिंदगी में नए आहट आने की पूरी आशा है।

प्रश्न 6.
‘तुम्हारी विरासत’ कविता हमें क्या सन्देश देती है?
उत्तर
‘तुम्हारी विरासत’ कविता का संदेश है-‘निराशा के घोर अंधकार अपने भीतर आशा की एक किरण अवश्य प्रकाशित कर लेना चाहिए।

प्रश्न 7.
कवियित्री ने अपनी तुलना जले हए कोयले से क्यों की है?
उत्तर
कवियित्री ने अपनी तुलना जले हुए कोयले से की है। यह इसलिए कि उसकी राख में एक नन्हीं-सी सुर्ख चिंगारी तिड़कने का खामोशी से इंतजार कर रही है।

सन्नाटा भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
भाव सौंदर्य लिखिए
‘आँख में ठहरा हुआ आँसू
पलकों पर लटक गया है।’
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना बिंबात्मक है। आँखों में ठहरा हुआ आँसू पलकों पर लटक गया है द्विविधा और अनजान की स्थिति को उजगार करने में अधिक रोचक लग रहा है।

प्रश्न 2.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) बची हुई जिंदगी का एक टुकड़ा
(ख) स्मृतियों के पद चाप।
उत्तर
(क) उपर्युक्त पद्यांश का आशय है-जिंदगी में कुछ नहीं है, फिर भी जो कुछ थोड़ा है, वही बहुत है।
(ख) उपुर्यक्त पद्यांश का आशय है-यादों के लौट आने के प्रति आशावान बनकर एकाकी जिंदगी को खुशहाल बनाया जा सकता है।

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प्रश्न 1.
शुद्ध वर्तनी कीजिए
मुरख, खमोसी, आँख, स्मृतियाँ, खिड़कियाँ, बल्व ।
उत्तर
अशुद्ध वर्तनी – शुद्ध वर्तनी
मुरख – मूर्ख
खमोसी – खामोसी
आंख – आँख
खिड़कीयाँ – खिड़कियाँ
बल्ब – बल्ब।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
अँधेरा, स्मृति, आदि, आस्था।
उत्तर
शब्द – विलोम शब्द
अँधेरा – उजाला
स्मृति – विस्मृति
आदि – अंत
आस्था – अनास्था।

सन्नाटा योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण वाली अन्य कविताएँ खोज कर पढ़िए।
प्रश्न 2. इन कविताओं को पढ़कर आपको क्या प्रेरणा मिलती है? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

सन्नाटा परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

अर्वग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सन्नाटा’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत कविता प्रवासी कवियित्री उषाराज सक्सेना की एक महत्त्वपूर्ण कविता है। इस कविता में कवियित्री उषाराज सक्सेना बड़ी ही सावधानीपूर्वक परदेश में रहने की आत्मपीड़ा की हैरानी का उल्लेख किया है। कवियित्री का मानना है कि परदेश का भाव किसी से जुड़ा हुआ नहीं है, मन का निर्वासन भी कभी-कभी परदेश में रहने का अनुभव दे जाता है। जब मन में यह निर्वासन आता है, तब चारों ओर निस्तब्धता छायी ज्ञात होने लगती है। इस निर्वासन में अपने प्रति जगाई गई आस्था में भी दरार आने लगती है, अपनी शक्तियों पर भी कभी-कभी अविश्वास जागने लगता है। कविता के अंत में अपनी आत्मशक्तियों की चिंगारी का अनुभव कवियित्री को होता है, किंतु इसमें भी उसे संदेह है कि कहीं यह चिंगारी बुझ न जाए। कविता समकालीन जीवन में चारों ओर व्याप्त रहे एकाकीपन को ध्यान में रख करके रची गई है।

प्रश्न 2.
‘तुम्हारी विरासत’ कविता उषा वर्मा की एक अत्यधिक चर्चित कविता है?
उत्तर
कविता को पढ़ने से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि कविता का काव्य स्वर आस्थावादी है। कवियित्री ने प्रस्तुत कविता में स्पष्ट किया है कि भले ही निराशा का गहरा अँधेरा हो, किंतु इस अँधेरे में भी हमें अवश्य ही एक किरण अपने भीतर प्रकाशित कर लेना चाहिए। सन्नाटे के भीतर किसी के आने की पदचाप सनने की ललक हमें जीवन-बोध से भरे रहती है। सुबह का इंतजार जीवन की ऊष्मा से संपन्न होकर ही किया जा सकता है, हमें अपनी भीतर यह ऊष्मा बचाए रखना है।

प्रश्न 3.
दिए गए कथनों के लिए दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चयन कीजिए।
1. परदेश में नहीं खटकता है
1. काँटा
2. बुर
3. साँकल
4. आवाज।
उत्तर
(3) साँकल

2. शब्द-समूह है
1. खो गया
2. आ गया
3. भा गया
4. बिगड़।
उत्तर
(1) खो गया

3. हवा हो गई है
1. तेज
2. बहरी
3. गूंगी
4. हल्की ।
उत्तर
(2) बहरी

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4. आकाश हो गया है
1. साफ
2. बहरा
3. धुंधला
4. नीला।
उत्तर
(2) बहरा

5. दीवारें हो गई हैं
1. दीली
2. कमजोर
3. ठोस
4. बड़ी।
उत्तर
(3) ठोस

प्रश्न 4.
रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से उचित शब्दों के चयन से कीजिए।
1. खिड़कियाँ …………….है। (खुली, बंद)
2. आँखों का ठहरा हुआ आँसू ……………… लटक गया है। (गालों पर, पलकों पर)
3. छत से अकेला ………………रहा है। (पंखा, बल्च)
4. एक जलता हुआ ……………… लगता है। (प्रश्न चिहून, अभाव चिहन)
5. बची हुई जिंदगी का ……………… है। (एक टुकड़ा, एक रूप)
उत्तर

  1. बंद
  2. पलकों पर
  3. बल्व
  4. प्रश्न चिह्न
  5. एक टुकड़ा।

प्रश्न 4.
सही जोड़ी का मिलान कीजिए
सरस्वती – दुष्यंत कुमार
विनयपत्रिका – डॉ. प्रेम भारती
सेगाँव का संत – महावीर प्रसाद द्विवेदी
वीरांगना दुर्गावती – तुलसीदास
छोटे-छोटे सवाल – श्रीमन्नारायण अग्रवाल
उत्तर
सरस्वती – महावीर प्रसाद द्विवेदी
विनयपत्रिका – तुलसीदास
सेगाँव का संत – श्रीमन्नारायण अग्रवाल
वीरांगना दुर्गावती – डॉ. प्रेम भारती
छोटे-छोटे सवाल – दुष्यंत कुमार।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए।
1. साँकल खटकता है।
2. सब कुछ जमा हुआ-सा लगता है।
3. हवा बहरी हो गई है।
4. आकाश गूंगा हो गया है।
5. स्मृतियों के पदपाच अपनी आहट से हमें जगा देते हैं।
उत्तर

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों का उत्तर एक शब्द में दीजिए।
1. ‘सन्नाटा’ कविता में किसका उल्लेख है?
2. ‘तुम्हारी विरासत’ कविता का मुख्य स्वर क्या है?
3. एक नन्हीं-सी चिंगारी तिड़कने का खामोशी से क्या कर रही है?
4. कवियित्री के पास बची हुई जिन्दगी का क्या है?
5. मुस्कराती कोयलों से कौन-सी किरण फूटेंगी।
उत्तर

  1. आत्मपीड़ा का
  2. आस्थावादी
  3. इंतजार
  4. टुकड़ा
  5. सुबह की।

सन्नाटा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सन्नाटा’ कविता में किसका अनुभव है? उत्तर-‘सन्नाटा’ कविता में परदेश का अनुभव है।

प्रश्न 2.
अंगीठी में जलते हुए क्या हैं?
उत्तर
अंगीठी में जलते हुए अंगारे हैं।

प्रश्न 3.
कवियित्री बची हुई जिंदगी एक टुकड़ा कहाँ से लाई है?
उत्तर
कवियित्री बची हुई जिंदगी का एक टुकड़ा अंधेरे से छीन कर लाई है।

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सन्नाटा कविता का सारांश

प्रस्तुत कविता ‘सन्नाटा’ में आत्मपीड़ा और आत्मकंठा को व्यक्त किया गया है। कवियित्री ने परदेश का भाव किसी से न जड़कर अलग है, इसे सामने लाने का प्रयास किया है इसलिए ऐसा लगता है कि एक पूरा-का-पूरा शब्द-समूह खो गया है। हवा बेजुबान हो गई है। आकाश बहरा हो गया है। आँखों में ठहरा हुआ आँसू पलकों पर लटक गया है।

सन्नाटा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. चुप-सी लगी है,
सब-कुछ जमा हुआ-सा लगता है
मन के अंदर उग आए परदेश में,
कहीं कोई झिझकते हुए भी साँकल नहीं खटखटाता।

शब्दार्थ-झिझकते-संकोच करते। साँकल-दरवाजे की सिकड़ी।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी सामान्य’ 10वीं में संकलित कवियित्री उषाराज सक्सेना विरचित कविता ‘सन्नाटा’ से है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवियित्री ने परदेश में हने के अनुभव का चित्रण प्रस्तुत करते हुए कहा है। कि

व्याख्या-यहाँ की जिन्दगी चुप-चुप-सी लगती है। सब कुछ शान्त और ठहरा हुआ-सा अनुभव होता है। मन के अन्दर कोई भाव अगर नए होकर आते हैं तो वे झिझकते हुए आते हैं। चारों ओर सूनापन है। कहीं किसी दिरवाजे के खलने की आवाज नहीं होती है।

विशेष-

  1. परदेश के अनुभव को प्रस्तुत किया गया है।
  2. भाव सजीव है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर भाव-सौंदर्य

प्रश्न
उपर्युक्त पयांश का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना स्वाभाविक है। परदेश के अनुभव को एकदम सटीक और यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यह रोचक रूप में है। शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न
उपर्युक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की शिल्प-योजना सरल शब्दों की है। कथ्य को रोचक और प्रभावशाली बनाने के लिए उपमा अलंकार मुख्य रूप से है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का आशय लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश में विदेशी जिन्दगी के उदासीपन को बखूबी रेखांकित करने का प्रयास किया है। विदेशी जिन्दगी का सूनापन उसके भौतिक सुख-स्वरूप को बौना बना देता है। इसे भी सुस्पष्ट किया गया है।

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2. लगता है एक पूरा-का-पूरा
शब्द समूह खो गया है।
हवा गूंगी हो गई है।
आकाश बहरा हो गया है।
दीवारें कुछ और ठोस हो गई हैं।
खिड़कियाँ भी बंद हैं।
छत से लटकता, अकेला बल्ब
आँखें मिचमिचाते मेरे होने और न होने पर
एक जलता हुआ प्रश्न-चिह्न लगाता है।
आँख में ठहरा हुआ
आँसू पलकों पर लटक गया है।

शब्दार्थ-गूंगी-बेजुबान।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-पूर्ववत्।

व्याख्या-प्रवासी अनुभव यह है कि चारों ओर सनापन बिखर गया है। ऐसा लगता है मानो सारा शब्द-समूह कहीं खो गया है। हवा में किसी प्रकार की अभिव्यक्ति कोई हलचल नहीं है। यही हाल आकाश का है कि मानो वह कुछ सुन-समझ नहीं पा रहा है। दीवारों की कठोरता बढ़ गई है तो खिड़कियों से किसी प्रकार हरकत नहीं हो पा रही है। इस प्रकार मेरे अस्तित्व का नकारापन जलता-भुनता हुआ मात्र एक प्रश्न चिहन के समान लग रहा है। इन्हीं विडंबनाओं से दुखी मेरी आखों का आँसू न बंद हो रहा है और न बह रहा है। वह तो पलकों पर आकर लटक गया है।

विशेष-

  1. बिंब और प्रतीक यथास्थान हैं।
  2. करुण रस का संचार है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भाव-धारा मार्मिक और हृदयस्पर्शी है। प्रवासी अनुभव न केवल बेजान एकाकी और दुखी होता है, अपितु बेगाना और अनजान भी होता है। इस तथ्य को कवियित्री ने बड़ी गहराई से व्यक्त करने का प्रवाह किया है।

शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य सरल शब्दों से निर्मित भाषा का है। शैली महावरेदार है। मानवीकरण अलंकार और प्रतीकों की सजीवता से यह अंश अधिक प्रभावशाली बन गया है। भाव और अर्थ परस्पर अनुकूल हैं।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा कवियित्री ने अपने प्रवासी अनुभव को मार्मिक रूप में व्यक्त किया है। उसके द्वारा उसने यह प्रस्तुत करना चाहा है कि प्रवासी अनुभव अपने अकेलेपन के कारण नीरस और दुखद होते हैं।

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3. अँगाठी में जलते हुए, लाल
अंगारों से पूछती हूँ,
कहीं मैं भी तो
जला हुआ कोयला नहीं
जिसकी राख में
एक नन्हीं-सी सुर्ख चिंगारी
तिड़कने का खामोशी से
इंतजार कर रही है?

शब्दार्व-सुर्ख-लाल । तिड़कने-जलते समय कोयला या लकड़ी का चिटचिटाना। खामोशी-चुप्पी।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-पूर्ववत् ।

व्याख्या-अंगीठी जल रही है। अपनी बात करना चाहती हैं परंतु वहाँ तो उस जलती हुई अंगीठी के सिवाय और कोई नहीं है। उसमें जलते हुए लाल अंगारों से पूछ रही हूँ। कहीं मैं भी तो जलता हुआ कोयला नहीं हैं। जिसकी बूझती हूँ राख में बहुत ही छोटी-सी लाल चिंगारी के चिट्चिटाने की चुप्पी के समान प्रतीक्षा कर रही हूँ।

विशेष-

  1. प्रवासी अनुभव के दुखद पक्ष को चित्रित किया गया है।
  2. शब्द-चयन प्रभावशाली हैं।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर भाव-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य को लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का भाव-स्वरूप नई काव्य-धारा के अनुकूल है। प्रवासी अनुभव के दर्दभय स्वरूप को चित्रित किया गया है। इसे सहज भावाभिव्यक्ति के द्वारा प्रस्तुत करके हदय बनाने का प्रयास प्रशंसनीय रूप में है।

शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प सौन्दर्य चित्रमयी शैली में प्रस्तुत है। भाषा की शब्दावली प्रतीकात्मक बिंब और योजना की व्यवस्था अच्छी दशा में है। इसलिए यह पद्यांश प्रभावशाली बन गया है। करुण रस और उपमा अलंकार के आकर्षण अधिक और प्रशंसनीय हैं।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त पयांश का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश के कवियित्री ने प्रवासी अनुभव के दुखद पक्ष को बड़े मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है। यह प्रस्तुतीकरण कवियित्री का स्वयं होकर भी सार्वजनिक बन गया है। यही कवियित्री का यहाँ मुख्योदेश्य सिद्ध हो रहा है।

तुम्हारी विरासत

सन्नाटा कविता का सारांश

प्रस्तुत कविता कवियित्री उषा वर्मा विरचित है। इसमें आस्था के भावों को पिरोने का प्रयास किया गया है। इसमें निराशा के क्षणों में आशा को चमकाने का प्रयास नहीं छोड़ने का भाव भरने की भी कोशिश की गई है। सन्नाटे के भीतर भी किसी के आने की ललक नहीं खोनी चाहिए।

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सन्नाटा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. बची हुई जिंदगी का
एक टुकड़ा है
मेरे पास।
इसे मैं अन्धेरे से
छीन कर लाई हूँ।
देर तो हो गई है,
सन्नाटा कितना ही
भयानक हो
उसमें भटकते
स्मृतियों के पदचाप,
अपनी आहट से
हमें जगा देते हैं।
इसमें फूटेंगी सुबह की किरणें।
मुस्कराती कोपलों से।

शब्दार्थ-स्मृतियों-यादों। सन्नाटा-शान्त।

संदर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य’ 10वीं में संकलित कवियित्री उषा वर्मा विरचित कविता ‘सन्नाटा’ से है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवियित्री ने निराशाएं भी आशा की ज्योति जलाने का भाव जगाते हुए अपने अनुभव को इस प्रकार कहा है कि

व्याख्या-मेरे पास और कुछ नहीं है। केवल जिंदगी का एक टुकड़ा ही बचा हुआ है। इस अभावमयी जिंदगी के अन्धेरे से इसे मैं छीनकर ले तो आई हूँ, मगर कुछ देर हो गई है। कवियित्री का पुनः कहना कि सन्नाटा चाहे कितना भी डराता, हो, उसे इधर-उधर मँडराते हुए बीती यादों के स्वर हमें सचेत कर देते हैं कि इसमें ही सुबह की नई किरणें फूटेंगी। वे किरणें बुझी हुई जिंदगी रूपी कोयलों से मुस्कुराती होंगी।

विशेष-

  1. भाषा लाक्षणिक है।
  2. शैली चित्रमयी है।

सौंदर्य-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर भाव-सौंदर्य

प्रश्न
उपर्युक्त पयांश के भार-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश की भाव योजना सरल शब्दों की है। भावाभिव्यक्ति सपाट है। कवियित्री का आत्म अनुभव सामान्यजन के अनुभव कहा जा सकता है। इससे यह पद्यांश हृदय को अधिक छू रहा है।

शिल्प-सौंदर्य

प्रश्न
उपर्युक्त पयांश के शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश का शिल्प-सौंदर्य लाक्षणिक भाषा-शैली का है। त्रासदमयी जिंदगी के एक दुखद पक्ष को सामने लाने के सटीक बिम्बों, प्रतीकों और योजनाओं को प्रस्तुत करने की कवियित्री की कोशिश अधिक प्रभावशाली है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
उपर्युक्त पद्यांश के भाव को स्पष्ट कीजिए!
उत्तर
उपर्युक्त पद्यांश में कवियित्री सन्नाटे के भीतर किसी के होने की आशा को विश्वास के साथ प्रस्तुत किया है। यही जीवन-बोध होना चाहिए। सुबह की प्रतीक्षा से ही जीवन की उष्मा को संपन्न किया जा सकता है।

MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा

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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा (महावीर प्रसाद द्विवेदी)

मेरी जीवन रेखा पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

मेरी जीवन रेखालघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1.
द्विवेदी जी के इस्तीफा वापस लेने के संबंध में उनकी पत्नी ने क्या कहा?
उत्तर-
द्विवेदी जी के इस्तीफा वापस लेने के संबंध में उनकी पत्नी ने उनसे कहा, “क्या थूककर भी उसे कोई चाटता है?

प्रश्न-2.
होशंगाबाद में द्विवेदी जी ने क्या नई उपलब्धियाँ प्राप्त की?
उत्तर-
होशंगाबाद में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘कवि-वचन-सुधा’ और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने द्विवेदी के अनुराग की वृद्धि कर दी।

प्रश्न-3.
द्विवेदी जी लेखों की भाषा में किस प्रकार का संशोधन कर दिया करते थे?
उत्तर-
द्विवेदी जी लेखों की भाषा में संशोधन अधिक पाठकों की समझ में आने लायक कर देते थे।

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प्रश्न-4.
इंडियन प्रेस में काम करते हुए द्विवेदी जी ने कौन-सी पुस्तक लिखी?
उत्तर-
इंडियन प्रेस में काम करते हुए द्विवेदी जी ने ‘तृतीय रीडर’ पुस्तक लिखी।

मेरी जीवन रेखा दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1.
द्विवेदी जी ने अपने लिए कौन-से चार सिद्धान्त निश्चित किए और उनका पालन करने में वे कहाँ तक सफल हुए?
उत्तर-
द्विवेदी जी ने अपने लिए चार सिद्धांत या आदर्श निश्चित किए, यथा

  1. वक्त की पाबंदी करना,
  2. रिश्वत न लेना,
  3. अपना काम ईमानदारी से करना और
  4. ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। पहले तीन सिद्धांतों के अनुकूल आचरण करना तो सहज था, चौथे के अनुकूल सचेष्ट रहना कठिन था। फिर भी उसमें लगातार अभ्यास सफलता भी होती गई।

प्रश्न-2.
‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन कार्य द्विवेदी जी को किस प्रकार प्राप्त हुआ?
उत्तर-
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने प्रयाग के ‘इंडियन प्रेस’ द्वारा प्रकाशित ‘तृतीय रीडर’ की समालोचना पुस्तकाकार में प्रकाशित की थी। इस समालोचना में द्विवेदी जी ने उस रीडर के बहुत-से दोषों का उल्लेख किया था। इससे प्रभावित होकर ‘इंडियन प्रेस’ द्वारा उन्हें ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन-कार्य सम्भालने का प्रस्ताव रखा गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

प्रश्न-3.
द्विवेदी जी को विद्यार्थी जीवन में किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
उत्तर-
द्विवेदी जी अपने गाँव के देहाती मदरसे में थोड़ी-सी उर्दू और घर पर थोड़ी-सी संस्कृत पढ़कर तेरह वर्ष की उम्र में मैं छब्बीस मील दूर रायबरेली के जिला स्कूल में अंग्रेजी पढ़ने गये। वे आटा, दाल घर से पीठ पर लादकर ले जाते थे। दो आने महीने फीस देते थे। दाल ही में आटे के पेड़े या टिकियाएँ पका करके पेट-पूजा करते थे। रोटी बनाना तब उन्हें आता ही न था। संस्कृत भाषा उस समय स्कूल में अछूत समझी जाती थी। विवश होकर अंग्रेजी के साथ फारसी पढ़ते थे। एक वर्ष किसी तरह वहाँ काटे फिर पुरवा, फतेहपुर और उन्नाव के स्कूलों में चार वर्ष काटे। कौटुम्बिक दुरवस्था के कारण वे इससे आगे न बढ़ सके। उनकी स्कूली शिक्षा की वहीं समाप्ति हो गई।

प्रश्न-4.
द्विवेदी जी को सरस्वती पत्रिका में प्रकाशन करने के लिए किस तरह के प्रलोभन दिए जाते थे? इस संबंध में उनकी प्रतिक्रिया क्या होती थी?
उत्तर-
द्विवेदी जी को सरस्वती पत्रिका में प्रकाशन के लिए इस प्रकार प्रलोभन दिए जाते थे- कोई कहता-‘मेरी मौसी का मरसिया छाप दो, मैं तुम्हें निहाल कर दूँगा। कोई लिखता-‘अमुक सभापति की ‘स्पीच’ छाप दो, मैं तुम्हारे गले में बनारसी दुपट्टा डाल दूंगा।’ कोई आज्ञा देता-‘मेरे प्रभु का सचित्र जीवन-चरित्र निकाल दोगे तो तुम्हें एक बढ़िया घड़ी या पैरगाड़ी नजर की जाएगी।’ इन प्रलोभनों पर द्विवेदी जी बहरा और गूंगा बन जाते और ‘सरस्वती’ में वही मसाला जाने देते, जिससे वे पाठकों का लाभ समझते। वे उनकी रुचि का सदैव ख्याल रखते और यह देखते रहते कि उनके किसी काम से उनको, सत्पथ से विचलित होने का साधन न प्राप्त हो।

प्रश्न-5.
आशय स्पष्ट कीजिए’अव्यवस्थित’ चित्त वाले मनुष्य की सफलता में सदा संदेह रहता है।
उत्तर-
उपर्युक्त वाक्य का आशय यह है कि व्यवस्थित चित्त से किया गया काम सुफल होता है। उसमें सहजता और सरलता होती है। आशंका तो उससे बिल्कुल नहीं होती है। इसके विपरीत अव्यवस्थित चित्त से किया गया काम कुफल होता है। वह दुखद होने के साथ आशंकाओं से भी भरा होता है।

मेरी जीवन रेखा भाषा अनुशीलन

प्रश्न-1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिएअल्पज्ञ, सत्पथ, अनुकूल, जीवन, विद्वान, कृतज्ञ।
उत्तर-
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा img-1
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा img-2

प्रश्न-2.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए
सरस्वती, मित्र, गृह, आत्मज, तरक्की।
उत्तर-
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा img-3

प्रश्न-3.
निम्नलिखित में से तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्द छांटिए
आत्मज, घृष्टता, मदरसा, फीस, पाबन्दी, निगरानी, स्कूल, जीवन,
सैनिक, नजर, मिडलैंड, मुलाजिम, उजरत, इस्तीफा, संगति।
उत्तर-
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा img-4

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प्रश्न-4.
निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए
देहात का रहने वाला, जिस पर विश्वास किया जा सके, उपकार को मानना, जहाँ पर पुस्तकें छापी जाती हैं, कम ज्ञान रखने वाला।
उत्तर-
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा img-5

प्रश्न-5.
निम्नलिखित मुहावरों को वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए
मैदान मारना, पेट पूजा करना, होश आना।
उत्तर-
MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solutions Chapter 4 मेरी जीवन रेखा img-6

मेरी जीवन रेखा योग्यता विस्तार

प्रश्न-1.
द्विवेदी जी के जीवन संघर्ष के प्रेरक प्रसंगों को पढ़िए।

प्रश्न-2.
द्विवेदी युग के समकालीन साहित्यकारों की सूची बनाइए और उनके बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।

प्रश्न-3.
जीवन में उन्नति करने के लिए आप कौन-कौन से गुण आवश्यक मानते हैं? उनकी सूची बनाइए तथा कक्षा में चर्चा कीजिए।

प्रश्न-4.
म.प्र. से प्रकाशित होने वाली हिंदी भाषा की पत्र-पत्रिकाओं की जानकारी एकत्र कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मेरी जीवन रेखा परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

मेरी जीवन रेखा अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-(क)
महावीर प्रसाद द्विवेदी के बापन के विषय में आप जो कुछ जानते हैं उसे संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
महावीर प्रसाद द्विवेदी को बचपन से ही तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ब्रजविलास से अनुराग हो गया था। उन्होंने सैकड़ों फुटकर कवित्त भी कंठस्थ कर लिये थे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ और गोस्वामी राधाचरण के मासिक पत्र से उनका साहित्य में अनुराग और भी बढ़ गया था। यद्यपि उन्हें स्कूली शिक्षा प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

प्रश्न-(ख)
लेखक को अपनी जीवन-कथा लिखने की प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर-
लेखक को अपनी जीवन-कथा लिखने की प्रेरणा उनके मित्रों और हितैषियों से मिली। उन्होंने लेखक को अनेक पत्र लिखे। उन्होंने उन्हें अनेक उलाहने भी दिए। इस प्रकार अपने मित्रों और हितैषियों से अपनी जीवन-कथा लिखने की प्रेरणा प्राप्त की।

प्रश्न-(ग)
द्विवेदी जी ने नौकरी से इस्तीफा क्यों दिया? .
उत्तर-
द्विवेदी जी रेलवे में नौकरी करते थे। संयोगवश उनके अधिकारी ने उन्हें प्रतिदिन सुबह आठ बजे दफ्तर में आने का आदेश दिया। उन्होंने उनका यह आदेश मान लिया। उनका अधिकारी चाहता था कि द्विवेदी जी अन्य कर्मचारियों को भी प्रातः आठ बजे कार्यालय में आने का आदेश दें। इसे उन्होंने मानना उचित नहीं समझा। बात बढ़ गई और उन्होंने नौकरी से बिना किसी सोच-विचार के त्याग-पत्र दे दिया।

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प्रश्न-(घ)
रेल की नौकरी छोड़ने के वाद द्विवेदी जी ने क्या किया?
उत्तर-
रेलवे की नौकरी छोड़ने के बाद लेखक को मित्रों से सहायता के अनेक प्रस्ताव आए, पर उन्होंने किसी की भी सहायता स्वीकार नहीं की। उन्होंने ‘इंडियन प्रेस’ द्वारा दिए गए कार्य अर्थात् ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादन कार्य को स्वीकार कर लिया। अवकाश के समय में वह अनुवाद आदि का भी थोड़ा-बहुत काम कर लिया करते थे।

प्रश्न-2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से चुनकर कीजिए।
1. उसने अपनी जीवनी कथा ……………….है। (कही, लिखी)
2. द्विवेदी जी थे …………………….. (शहरी, देहाती)
3. द्विवेदी का अनुराग …………….. पर हो गया था। (रामचरितमानस, सूरसागर)
4. सरस्वती …………. पत्रिका थी। (मासिक, साप्ताहिक)
5. ………………… की कमी के कारण द्विवेदी जी अध्ययन न कर सके। (धन, समय)
उत्तर-
1. लिखी,
2. देहाती,
3. रामचरितमानस,
4. मासिक,
5. समय।

प्रश्न-3.
दिए गए कथनों के लिए सही विकल्प चुनकर लिखिए
1. द्विवेदी जी ने आदर्श निश्चित किए
1. चार,
2. दो,
3. 10
4. कोई नहीं।
उत्तर-
1. चार,

2. द्विवेदी सम्पादक थे
1. हंस के,
2. माधुरी के,
3. सरस्वती के,
4. इंडियन प्रेस के।
उत्तर-
2. आठ रुपये,

3. द्विवेदी का जन्म हुआ था
1. 1884 में,
2.1864 में,
3. 1874 में,
4. 1964 में।
उत्तर-
3. 1864 में,

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4. द्विवेदी जी को सरस्वती से आमदनी थी
1. तेईस रुपए,
2. आठ रुपये,
3. पन्द्रह रुपये,
4. बीस रुपये।
उत्तर-
4. तेइस रुपये,

5. अध्यापक ने पुस्तक दिखाई थी
1. ब्रजवासीदास,
2. रामचरितमानस,
3. कवि-वचन-सुधा,
4. तृतीय रीडर।
उत्तर-
5. …………………

प्रश्न- 4. सही जोड़े मिलाइए
कर्मवीर – उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’
साये में धूप – डॉ. एन.ई. विश्वनाथ अय्यर
डूबता सूरज – दुष्यंत कुमार
गिरती दीवारें – रमानाथ अवस्थी
रात और शहनाई – अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
उत्तर-
कर्मवीर – अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
साये में धूप – दुष्यन्त कुमार
डूबता सूरज – डॉ. एन.ई. विश्वनाथ अय्यर
गिरती दीवारें – उपेन्द्र नाथ ‘अश्क’
रात और शहनाई – रामानाथ अवस्थी

प्रश्न-5.
निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए।
1. द्विवेदी जी को अपनी कथा कहते हुए संकोच नहीं होता है।
2. रेलवे में द्विवेदी को पचास रुपये महीने मिलते थे।
3. द्विवेदी जी के पिता ईस्ट इंडिया कंपनी की पलटन में सैनिक थे।
4. अत्याचार के सहने से असहनशीलता प्रकट होती है।
5. ‘सरस्वती’ अपने समय की एकमात्र पाठकों की सेविका थी।
उत्तर-
1. असत्य,
2. सत्य,
3. सत्य,
4. असत्य,
5. सत्य।

प्रश्न-6.
निम्नलिखित कथनों के उत्तर एक शब्द में दीजिए
1. द्विवेदी किसके आत्मज थे?
2. द्विवेदी जी का निधन कब हुआ?
3. द्विवेदी जी की उन्नति का प्रधान कारण क्या था?
4. प्रलोभनों पर द्विवेदी जी क्या बन जाते थे?
5. द्विवेदी जी किसका ख्याल रखते थे?
उत्तर-
1. देहाती के,
2. 1938 में,
3. ज्ञानलिप्सा,
4. गूंगा और बहरा,
5. पाठकों का।

मेरी जीवन रेखा लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1.
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आत्मकथा क्यों लिखी थी?
उत्तर-
महावीर प्रसाद द्विवेदी क्या थे, इसका ज्ञान उनके मित्रों और हितैषियों को नहीं था। वे केवल द्विवेदी जी के ‘वर्तमान’ को ही जानते थे। अतएव अपने मित्रों और हितैषियों की जानकारी हेतु उन्होंने आत्मकथा लिखी।

प्रश्न-2.
महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपनी कथा कहने में संकोच क्यों था?
उत्तर-
महावीर प्रसाद द्विवेदी का विचार था कि उनकी आत्मकथा में कोई तत्त्व नहीं है। उससे कोई कुछ सीख भी नहीं सकता। इन कारणों से उन्हें आत्मकथा लिखने में संकोच होता था।

प्रश्न-3.
महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
उत्तर-
महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश में रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में सन् 1864 ई. में हुआ था।

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प्रश्न-4.
द्विवेदी जी लेखों की भाषा में किस प्रकार का संशोधन करते थे?
उत्तर-
द्विवेदी जी पाठकों की रुचि का सदा ध्यान रखते थे। लेखों की भाषा के सुधार में भी उनका यही दृष्टिकोण रहता था। वे संशोधन द्वारा लेखों की भाषा अधिक-से-अधिक पाठकों की समझ में आने योग्य कर देते थे। वे ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे जिन्हें अधिक-से-अधिक पाठक समझ सकते थे।

प्रश्न-5.
द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ में किस प्रकार की सामग्री प्रकाशित करते थे?
उत्तर-
द्विवेदी जी पाठकों की रुचि का ध्यान रखते थे और ‘सरस्वती’ में वही सामग्री प्रकाशित करते थे जो पाठकों के लिए लाभप्रद होती थी। इसके लिए वे लेखों की भाषा में संशोधन भी कर दिया करते थे ताकि उसे अधिक-से-अधिक पाठक समझ सकें।

मेरी जीवन-रेखा कवि-परिचय

महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म रायबरेली के दौलतपुर गाँव में सन् 1864 ई. में हुआ था। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव की पाठशाला में प्राप्त की थी। उसके बाद वे कुछ दिन रायबरेली के जिला स्कूल तथा फतेहपुर के स्कूल में पढ़ते रहे। इसके बाद वे बम्बई में अपने पिता रामसहाय द्विवेदी के पास चले गए।

बम्बई में उन्होंने संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी का अध्ययन किया। आजीविका के लिए उन्होंने रेलवे की नौकरी कर ली। शीघ्र ही उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़ दी। सन् 1903 में 1920 ई. तक उन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का सफल सम्पादन किया। इस काल में उन्होंने अनेक साहित्यकारों का मार्गदर्शन किया। उनका देहावसान् 21 सितम्बर, 1938 ई. में हुआ था।

रचनाएँ- द्विवेदी जी ने अनेक मौलिक ग्रन्थों की रचना की। साथ ही उन्होंने अनेक ग्रन्थों का अनुवाद भी किया। उनके मौलिक ग्रन्थों में नैषध चरित चर्चा, कालिदास की समालोचना, हिन्दी-भाषा की उत्पत्ति, अतीत स्मृति, विचार-विमर्श, विज्ञान-वार्ता आदि उल्लेखनीय हैं।

भाषा-शैली-द्विवेदी जी की भाषा-शैली सरल और सुबोध है। कहीं-कहीं वह दुर्बोध और असहज हो गई है। इसके मुख्य कारण हैं-जटिल और उच्चस्तरीय शब्दों का आ टपकना। इस प्रकार आपकी भाषा की शब्दावली सरल और प्रचलित हिन्दी की है तो आम प्रचालित संस्कृत के भी। इस प्रकार की भाषा से निर्मित आपकी शैली में विविधता आ गई है। वह कहीं सरल-सुबोध और बोधगम्य है तो कहीं गवेषणात्मक और शोधपरक है। कुल मिलाकर आपकी भाषा-शैली विषयानुकूल और तथ्यों को प्रकट करने वाली समर्थ और सक्षम भाषा-शैली है।।

साहित्य में स्थान- द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से ‘खड़ी बोली’ को परिष्कृत और व्याकरण-सम्मत करने का महान् कार्य किया। खड़ी बोली को काव्य-भाषा में प्रतिष्ठित करने का श्रेय उन्हीं को ही जाती है। उन्होंने ज्ञान के विविध क्षेत्रों से सामग्री लेकर हिन्दी भाषा और साहित्य के अभावों को पूरा किया।

मेरी जीवन रेखा निबंध का सारांश

महावीर प्रसाद द्विवेदी की आत्म-कथात्मक इस निबंध में उनके जीवन-संघर्ष और साधना का परिचय मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि दृढ़-संकल्प, आत्म-विश्वास और निरंतर कठिन परिश्रम की क्षमता हो तो जीवन में उन्नति को कोई नहीं रोक सकता।

लेखक को उनके मित्रों और हितैषियों ने अनेक पत्र लिखे। वे लेखक के मुख से उनकी जीवन कथा सुनना चाहते थे। लेखक ने उनकी भावनाओं का आदर करते हुए अपने जीवन के संबंध में कुछ बातें सूत्र-रूप में दी हैं।

लेखक के पिता देहाती थी। उनका वेतन दस रुपए मासिक था। लेखक ने देहाती स्कूल में उर्दू पढ़ी थी। तेरह वर्ष की आयु में वह रायबरेली के जिला स्कूल में अंग्रेजी पढ़ने चले गए थे। पारिवारिक कारणों से उन्हें स्कूली शिक्षा से आगे पढ़ने का अवसर नहीं मिला।

इसके पश्चात् लेखक ने अजमेर में पन्द्रह रुपए मासिक पर नौकरी कर ली। बचपन से ही लेखक की रुचि सुशिक्षित लोगों की संगति करने की ओर थी। इसके फलस्वरूप उन्होंने अपने लिए चार आदर्श निश्चित किए-समय की पाबन्दी, रिश्वत न लेना, ईमानदारी से अपना काम करना और ज्ञान वृद्धि के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहना।

सतत् अभ्यास से उन्होंने रेल की पटरियाँ बिछाने और उसकी सड़क की निगरानी का कार्य भी सीख लिया। अपने कार्य के कारण उन्हें उन्नति के लिए कभी भी प्रार्थना-पत्र नहीं देना पड़ा। उनकी उन्नति का प्रधान कारण उनकी ज्ञान लिप्सा थी। इससे उनकी मासिक आय उनकी योग्यता से कई गुणा हो गई।

कुछ समय के बाद उनके अधिकारी ने उनके द्वारा औरों पर अत्याचार करना चाहा। अधिकारी के आदेश पर उन्होंने स्वयं तो आठ बजे दफ्तर में आना स्वीकार कर लिया, पर दूसरों को प्रतिदिन प्रातः आठ बजे आने का आदेश देने से इनकार कर दिया। बात बढ़ने पर उन्होंने नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया। उनकी पत्नी ने भी लेखक के निर्णय का समर्थन किया और आठ आने रोज तक की आमदनी से घर का खर्च चलाने का भरोसा दिलाया।

महावीर प्रसाद द्विवेदी को ‘सरस्वती’ के सम्पादन कार्य से 20 रुपए मासिक वेतन और तीन रुपए डाक खर्च के लिए मिलते थे। उन्होंने उसी से ही सन्तुष्ट रहने का निश्चय किया।
लेखक के पिता ईस्ट इंडिया कम्पनी की एक पलटन में सिपाही थे। वे मामूली पढ़े-लिखे और बड़े भक्त थे। गदर में उनकी पलटन ने भी विद्रोह कर दिया था। उनके पिता ने पलटन से भागकर सतलुज में छलांग लगा दी थी। वे जैसे-तैसे बच गए थे और मांगते-खाते कई महीने बाद साधु वेश में घर आए थे।

लेखक के दादा संस्कृतज्ञ थे और पलटनों को पुराण सुनाया करते थे। उनकी दादी ने उनके द्वारा इकट्ठी की हुई सैकड़ों हस्तलिखित पुस्तकों को बेचकर उनके पिता और चाचा का पालन-पोषण किया। उनके पितृव्य दुर्गाप्रसाद में नए-नए किस्से बनाकर कहने की अद्भुत शक्ति थी। उनके नाना और मामा भी संस्कृतज्ञ थे।

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बचपन से ही लेखक का अनुराग तुलसी, रामायण और ब्रजवासी दास के ब्रजविलास पर हो गया था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘कवि वचन सुधा’ और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र से उनका यह अनुराग और भी बढ़ गया था। उनका यह अनुराग बहुत समय तक ज्यों-का-त्यों बना रहा। उन्होंने संस्कृत और अंग्रेजी की पुस्तकों के कुछ अनुवाद भी किए।

एक अध्यापक के अनुरोध पर उन्होंने कोर्स की एक पुस्तक की समालोचना पुस्तकार में प्रकाशित की। इस समालोचना के फलस्वरूप ‘इंडियन प्रेस’ ने ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन कार्य उन्हें देने की इच्छा प्रकट की। इसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

नौकरी छोड़ने पर उनके मित्रों ने उनकी सहायता करने की इच्छा प्रकट की पर उन्होंने किसी की भी सहायता स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपने अंगीकृत कार्य में सारी शक्ति लगा देने का निश्चय किया। इस कार्य से उन्हें जो थोड़ा-बहुत अवकाश मिलता था, उसमें वे अनुवाद आदि का काम करते थे।

उनके सम्पादन में ‘सरस्वती’ का जैसे-जैसे प्रचार बढ़ता गया, वैसे-वैसे उनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी होती गई।

उन दिनों ‘सरस्वती’ का काफी सम्मान था। उसमें कुछ छापना बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। लेखक को इस पत्रिका में छपवाने के लिए कई प्रलोभन दिए जाते थे, पर वह इन प्रलोभनों की परवाह किए बिना वही कार्य करते जिसमें वह पाठकों का लाभ समझते। वे पाठकों की रुचि का सदा ध्यान रखते थे और लेखों को संशोधित कर देते थे जिससे उन्हें अधिक-से-अधिक पाठक समझ लें। उन्होंने अपनी विद्वत्ता की झूठी छाप डालने की कभी भी कोशिश नहीं की।

मेरी जीवन रेखा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. मैं यदि किसी के अत्याचार को सह लूँगा तो उससे मेरी सहनशीलता अवश्य सूचित होती है, पर उससे मुझे औरों पर अत्याचार करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

शब्दार्थ-सूचित-प्रकट। औरों-दूसरों।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य’ में संकलित आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी लिखित निबन्ध ‘मेरी जीवन-रेखा’ से है।

प्रसंग-इस गद्यांश में लेखक ने अपने मन की बात रखते हुए कहा कि

व्याख्या-महावीर प्रसाद द्विवेदी के अंग्रेज़ अफसर ने उन्हें आदेश दिया कि वे कर्मचारियों को सुबह आठ बजे दफ्तर में आने के लिए कहें। महावीर प्रसाद ने अपने अधिकारी के आदेश के अनुसार स्वयं तो आठ बजे प्रातः दफ्तर में आना शुरू कर दिया पर कर्मचारियों को प्रातः आठ बजे आने का आदेश देने से इनकार कर दिया। उनका विचार था कि यदि मैं किसी के अत्याचार को सहन करता हूँ तो इससे यह पता चलता है कि मैं सहनशील हूँ, मुझमें अत्याचार सहन करने की शक्ति है। पर स्वयं अत्याचार सहन करने से हमें दूसरों पर अत्याचार करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता। अत्याचार सहन करने का अभिप्राय यह नहीं कि हम दूसरों पर अत्याचार करें।

विशेष-
1. लेखक का स्पष्ट कथन प्रेरक रूप में है।
2. भाषा-शैली अधिक सरल है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1.
लेखक की किससे क्या प्रकट होती है?
उत्तर-
लेखक की किसी के अत्याचार को सहने की सहनशीलता प्रकट होती है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1.
उपर्युक्त गद्यांश का आशय क्या है?
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने सहनशीलता को महत्त्व दिया है। इसे सात्त्विक गुण माना है।

2. मैंने सोचा अव्यवस्थित-चित्त मनुष्य की सफलता में सदा संदेह रहता है। क्यों न मैं अंगीकृत कार्य ही में अपनी सारी शक्ति लगा दूँ। प्रयत्न और परिश्रम की बड़ी महिमा है।

शब्दार्थ-अव्यवस्थित-चित्त-चंचल हृदय। अंगीकृत कार्य–लिया हुआ काम। महिमा-महत्त्व।

संदर्भ-पूर्ववत।

प्रसंग-इसमें लेखक ने प्रयत्न और परिश्रम का महत्त्व दर्शाया है।

व्याख्या-महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। उसके बाद उन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन-कार्य स्वीकार कर लिया। अतः उन्होंने सोचा कि अब मुझे इसे मन लगाकर करना चाहिए। जो व्यक्ति मन लगाकर काम नहीं करता, उसकी सफलता भी निश्चित नहीं होती। उन्हें ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन कार्य दिया गया था। अतएव उन्होंने इस कार्य में सारी शक्ति लगाने का मन बनाया। प्रयत्न और परिश्रम का बहुत महत्त्व होता है। इससे कठिन-से-कठिन कार्य को भी सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता है।

विशेष-
1. यह अंश भाववर्द्धक है।
2. भाषा में प्रवाह है।

अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1.
अव्यवस्थित चित्त का क्या परिणाम होता है?
उत्तर-
अव्यवस्थित चित्त का परिणाम अच्छा नहीं होता है। उससे असफलता की आशंका बनी रहती है। विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न-6
उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव है-प्रयत्न और परिश्रम के साथ व्यवस्थित चित्त से लक्ष्य-प्राप्ति की ओर बढ़ना चाहिए।

3. संशोधन द्वारा लेखों की भाषा अधिक संख्यक पाठकों की समझ में आने लायक कर देता। यह न देखता कि यह शब्द अरवी का है या फारसी का या तुर्की का। देखता सिर्फ यह कि इस शब्द, वाक्य या लेख का आशय अधिकांश पाठक समझ लेंगे या नहीं। अल्पज्ञ होकर भी किसी पर अपनी विद्वत्ता की झूठी छाप छापने की कोशिश मैंने कभी नहीं की।

शब्दार्थ-संशोधन करना-सुधारना। अधिक-संख्यक-बहुत अधिक संख्या में। लायक-योग्य। अल्पज्ञ-कम जानने वाला। झूठी छाप छापना-झूठा प्रभाव डालना। आशय-अभिप्राय, अर्थ।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-इसमें महावीर प्रसाद द्विवेदी ने यह स्पष्ट किया है कि लेखों का संशोधन करते समय वे पाठकों का ध्यान रखते थे।

व्याख्या-लेखक पत्रिका’ में लेखों को प्रकाशित करने से पहले उनका संशोधन करते थे। संशोधन करते समय वे इस बात का ध्यान रखते थे कि भाषा ऐसी हो जो अधिक-से-अधिक पाठकों की समझ में आ जाए। इसके लिए वे ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे जिन्हें अधिक-से-अधिक पाठक समझ जाएँ। इसके लिए वे उर्दू, फारसी और अरबी भाषा के ऐसे शब्दों का प्रयोग करने में भी संकोच नहीं करते थे जिन्हें सामान्य पाठक आसानी से समझ सकता था।

लेखक ने अपने-आपको अल्पज्ञ कहा है। उनका कहना है कि उन्होंने संशोधन करते समय अपनी विद्वत्ता का झूठा प्रभाव डालने का प्रयत्न नहीं किया।

विशेष- आचार्य महावीर प्रसाद की सम्पादन कला का महत्त्वांकन है।
1. भाषा में प्रवाह है।
2. यह अंश ज्ञानवर्द्धक है।

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अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-2.
लेखक के संशोधन की क्या विशेषता थी?
उत्तर-
लेखक के संशोधन की यह विशेषता थी कि वह बोधगम्य भाषा का प्रयोग करता था। दूसरी बात यह कि उसका आशय साधारण पाठक के अनुकूल होता था।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1.
उपर्युक्त गद्यांश का आश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश में लेखक सम्पादन कला के श्रेष्ठ स्वरूप को रखने का प्रयास किया है। इसे उसने प्रेरक रूप में प्रस्तुत करने का आकर्षक प्रयास किया है।

MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग

MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग

वे शब्दांश जो किसी शब्द में जुड़कर उसका अर्थ परिवर्तित कर देते हैं। उपसर्गों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता; फिर भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलकर एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। उपसर्ग सदैव शब्द के पहले आता है, जैसे-‘परा’ उपसर्ग को ‘जय’ के पहले रखने से एक नया शब्द ‘पराजय’ बन जाता है। जिसका अर्थ होता है-हार।

उपसर्ग के शब्द में तीन प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

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जैसे-
1. शब्द के अर्थ में विपरीतता आ जाती है।
2. शब्द के अर्थ में नूतनता आ जाती है।
3. शब्द के अर्थ में कोई नया परिवर्तन नहीं होता।
उत्तर-
हिन्दी भाषा में उपसर्ग तीन भाषाओं के हैं
(a) संस्कृत उपसर्ग
(b) हिन्दी उपसर्ग
(c) उर्दू उपसर्ग।

(a) संस्कृत उपसर्ग
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-1
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-2
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-3
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-4

उपसर्ग के समान प्रयुक्त होने वाले कुछ अन्य शब्द
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-5
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-6

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(b) हिन्दी उपसर्ग
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-7

(c) उर्दू उपसर्ग
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-8
MP Board Class 11th General Hindi व्याकरण उपसर्ग img-9

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MP Board Class 10th General Hindi पत्र-लेखन

MP Board Class 10th General Hindi पत्र-लेखन

पत्र-लेखन की आवश्यकता-
हम सब अपने निकट संबंधियों, इष्ट मित्रों से बराबर सम्पर्क रखना चाहते हैं। जो हमारे पास में ही रहते हैं, उनसे तो हम मिलते रहते हैं, किंतु जो हमसे दूर दूसरे नगर या गाँव में रहते हैं, उनको तो हम लिखकर ही अपनी कुशल-क्षेम भेज सकते हैं और लिखकर ही उनकी कुशल-क्षेम मँगा सकते हैं। इस प्रकार लिखकर विचारों का जो आदान-प्रदान किया जाता है, उसे पत्र-लेखन कहते हैं। विद्यालय में भी कई अवसरों पर हमें अपने प्राचार्य को प्रार्थना-पत्र लिखने पड़ते हैं। कभी-कभी हम अपने गाँव या नगर के बाहर के किसी पुस्तक विक्रेता से अपनी जरूरत की पुस्तकें भी मँगाते हैं। इसके लिए भी हमें पत्र लिखना पड़ता है। इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पत्र व्यवहार हम सबके लिए अनिवार्य हो गया है।

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  1. अनौपचारिक पत्र (Informal letter)-इस तरह के पत्र अपने सगे-संबंधियों एवं मित्रों को लिखे जाते हैं। जैसे-माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, मित्र आदि के लिए लिखा गया पत्र।
  2. औपचारिक पत्र (Formal Letter)-इस तरह के पत्र कार्यालय से संबंधित होते हैं। जैसे-प्रधानाचार्य, अधिकारी, व्यापारिक वर्ग आदि के लिए इस तरह के पत्र लेखन का प्रयोग होता है।

पत्र लेखन संबंधी कुछ आवश्यक बातें-

  1. पत्र लिखते समय स्थान (जहां से पत्र लिखा जा रहा है), दिनांक, उचित संबोधन का विशेष ध्यान रखना वाहिए।
  2. पत्र की भाषा सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए।
  3. पत्र का विषय सुलझा हुआ होना चाहिए।
  4. अनावश्यक बातों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  5. कम शब्दों में पत्र के उद्देश्य को अधिक से अधिक स्पष्टता के साथ प्रकट करना चाहिए।
  6. भाषा की शालीनता का ध्यान रखना चाहिए।

अनौपचारिक पत्र

1. ‘वार्षिक परीक्षा की तैयारी की सूचना हेतु पिताजी को पत्र’ लिखो।
175, शिवाजी मार्ग
भोपाल
10-5-200…
पूज्य पिताजी!

सादर चरण-स्पर्श,
आपका कृपापत्र हमें 8-5-200… को मिला। पढ़कर मन खुश हुआ। मैं आप सब पूज्य-वृन्दों के आशीर्वाद से सकुशल हूँ। आशा है कि आप सब भी परमात्मा की महाकृपा से ठीक से होंगे।

पूज्य पिताजी! आजकल मैं अपनी वार्षिक परीक्षा की तैयारी में अति व्यस्त हूँ। मेरी वार्षिक परीक्षा 20-5-200… से आरंभ होने वाली है। अब तक मैंने हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और सामाजिक विषयों की पूरी तरह से तैयारी कर ली है परीक्षा के दिन तक तो मुझे सारे विषय कंठस्थ हो जाएंगे। इस आधार पर मैं आपको यह विश्वास दिला रहा हूँ कि मैं प्रथम श्रेणी में अवश्य उत्तीर्ण हो जाऊँगा। आशा है कि इससे आप सबको आनंद और उल्लास होगा।

पूज्य माताजी को सादर चरण-स्पर्श और अनुज शशि को शुभाशीर्वाद।

आपका आज्ञाकारी पुत्र
‘रवि’

2. अपने पिताजी को पत्र लिखिए तथा उसमें मासिक जेब खर्च बढ़ाने की मांग कीजिए।
विष्णु गार्डन,
भोपाल
3-3-200…
पूज्य पिताजी,

सादर चरण-स्पर्श
आप सब सकुशल हैं, इसके लिए मैं परमात्मा से सदैव प्रार्थी हूँ, आपके पत्र की प्रतीक्षा करके मैं यह पत्र लिख रहा हूँ। आपको यह ज्ञात हो कि मेरी परीक्षा आगामी माह की 15वीं तारीख से आरंभ होने वाली है। इसके लिए मैंने जी-जान से अध्ययन आरंभ कर दिया है। कुछ पुस्तकें, कापियाँ और कुछ परीक्षोपयोगी आवश्यकताएँ आ गई हैं। इसलिए आप अब 50 रुपये और अधिक भेजते जाइएगा। ऐसा इसलिए कि परीक्षा खर्च के साथ-साथ आवागमन और सम्पर्क हेतु भी पैसे खर्च होंगे। अतएव आप 500 रुपये तो अवश्य बढ़ाकर भेजते रहियेगा। अन्यथा परीक्षा की तैयारी अधूरी रह जाएगी।

माताजी को सादर चरण-स्पर्श, अनुज, दिव्या को शुभाशीर्वाद

आपका आज्ञाकारी पुत्र
‘प्रभाकर’

MP Board Solutions

3. प्रतिदिन समाचार-पत्र पढ़ने से जो लाभ है, उन्हें अवगत कराते हुए अपने मित्र को एक पत्र लिखिए।
2/2, तिलक नगर
ग्वालियर (म.प्र.)
6-6-200…

प्रिय मित्र, रमेश!
मुझे तुम्हारा पत्र कल ही प्राप्त हुआ। तुमने लिखा है कि आजकल क्या कर रहा हूँ। तो मित्र मैं आजकल दिल-दिमाग से समाचार-पत्रों को पढ़ने में जुट गया हूँ। मैं हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही समाचार-पत्रों को नियमित रूप से पढ़ रहा हूँ। मुझे इनसे बहुत लाभ मिल रहा है। इस विषय में बता रहा हूँ।

मित्र समाचार-पत्र पढ़ने से लाभ ही लाभ हैं। देश-विदेश की ही नहीं आस-पड़ोस की पूरी खबर घर बैठे ही मिल जाती है। समाचार-पत्र पढ़ने से अच्छा-खासा मनोरंजन हो जाता है, यही नहीं विविध प्रकार के शब्द-अर्थ और भावों-प्रतिक्रियाओं का भी ज्ञान हो जाता है। समाचार-पत्र में छपे समाचारों से अपनी स्थिति का पता लगता है। इससे न केवल वर्तमान अपितु भूत और भविष्य की भी रूप रेखा समझ में आ जाती है। वास्तव में समाचार-पत्र समाज के सभी वर्गों और जीवन के सभी क्षेत्रों के मार्गदर्शन और सच्चे संवाहक हैं। अतएव समाचार-पत्र की उपयोगिता नहीं भूलनी चाहिए।

आशा है मित्र. आप मेरे सझावानसार नियमित रूप से समाचार-पत्र पढकर लाभ उठाओगे। मेरी ओर से माताजी-पिताजी को सादर चरण-स्पर्श, लघु बन्धुओं को शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
राकेश

4. पिता को पत्र लिखिए, जिसमें 300 रुपये पुस्तकों में और अन्य खर्चे के लिए मनीऑर्डर द्वारा मँगाइए।
15 टी.टी. नगर
भोपाल
दिनांक : 15-1-200………
पूजनीय पिताजी,

सादर चरण-स्पर्शी,
मैं यहाँ सकुशल हूँ। आशा करता हूँ कि आप सब लोग सकुशल होंगे। आपके निर्देशों का मैं पूरी तरह पालन कर रहा हूँ। मेरा ध्यान ठीक चल रहा है। मेरी छ:माही परीक्षाएँ 15 दिसम्बर से हो रही हैं। मुझे कुछ पुस्तकें और स्टेशनरी आदि खरीदनी हैं। पढ़ाई के लिए मैं एक छोटा टेबिल लैंप भी लेना चाहता हूँ। इन सबके लिए लगभग 300 रुपये की आवश्यकता पड़ेगी। अतः कृपया उक्त धनराशि यथाशीघ्र मनीऑर्डर.. द्वारा भेजने का कष्ट करिएगा।

शेष कुशल है। मधु को प्यार और माताजी को चरण-स्पर्श।

आपका आज्ञाकारी पुत्र
अमित

5. वार्षिक परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर एक बधाई-पत्र अपने मित्र को लिखिए।
नेहरू. नगर
विलासपुर
26-7-200…

प्रिय मित्र आलोक,
आज माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल द्वारा प्रकाशित कक्षा IX के परीक्षा परिणाम में तुम्हारा प्रथम श्रेणी में अनुक्रमांक व नाम देखकर हृदय को बड़ी प्रसन्नता हुई। मेरे माता-पिता भी तुम्हारी सफलता पर बहुत प्रसन्न हैं। यह वास्तव में तुम्हारे कठिन परिश्रम का फल है। तुम्हारी सफलता हम सबके लिए गौरव की बात है। मित्र मैं तुम्हें घर पर आकर बधाई देता। किंतु व्यस्तता के कारण तुम तक पहुँच नहीं पा रहा हूँ। इसलिए पत्र द्वारा मैं तुम्हें हार्दिक बधाई भेज रहा हूँ। बधाई स्वीकार करें। कभी घर पर आकर तुमसे मिठाई खाऊँगा। शेष कुशल है।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
‘उमेश’

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6. जन्मदिवस समारोह में सम्मिलित होने के लिए अपने मित्र को आमंत्रण पत्र लिखिए।
17/15 तिलक नगर:
ग्वालियर
4 फरवरी, 200…..

प्रिय मोहन,
तुम्हें यह जानकर प्रसन्नता होगी कि मैं दिनांक 6 फरवरी को अपना जन्मदिवस मना रहा हूँ। घर में इसके लिए अच्छी तैयारियाँ की गई हैं। इस अवसर पर चाय तथा संगीत पार्टी का भी आयोजन किया गया है। गत वर्ष तुम इस अवसर पर बीमार होने के कारण नहीं आ सके परंतु इस बार अवश्य आना। तुम्हारे बिना पार्टी का रंग फीका पड़ जाएगा। आशा है तुम समय से पूर्व आकर काम में भी हाथ बँटाओगे।

पूज्य पिताजी और माताजी को मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
रविन्द्र सिंह

औपचारिक पत्र

1. अपने विद्यालय के प्राचार्य को निर्धन छात्र को पुस्तकालय से पुस्तकें प्रदान करने विषयक प्रार्थना पत्र लिखिए। सेवा में,
प्राचार्य
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
इन्दौर (म.प्र.)

महोदय,
सविनय निवेदन है कि प्रार्थी आपके विद्यालय की कक्षा 9वीं ‘द’ का एक छात्र प्रतिनिधि है। प्रार्थी की कक्षा का एक छात्र ‘रमेश’ जिसका अनुक्रमांक 30 है। यह छात्र अत्यंत निर्धन है। यह अनाथ है। जिस किसी तरह से हिम्मत बाँधकर यह अपनी ‘पढ़ाई कर रहा है। पढ़ने में तेज है। यह पुस्तकें खरीदने में असमर्थ है। अतः इसे पुस्तकालय से पुस्तकें दिलवाने की कृपा करें।

आपका आज्ञाकारी छात्र
सुरेश
कक्षा 9वीं ‘द’
अनुक्रमांक 23

दिनांक 22-5-200…

2. अवकाश स्वीकृति हेतु प्राचार्य को प्रार्थना-पत्र।
सेवा में,
प्राचार्य
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
इंदौर (म.प्र.)

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा 9वीं ‘स’ का छात्र हूँ। मेरा अनुक्रमांक 23 है, दिनांक 13.5.2004 से मैं मलेरिया-ज्वर से अधिक पीड़ित हूँ। इस कारण मैं विद्यालय आने में असमर्थ हूँ। चिकित्सक के अनुसार मुझे 13-5-2004 से लेकर 16.5.2004 तक स्वस्थ तक स्वस्थ होने में समय लगेगा। अतः आप इतने दिनों तक मुझे अवकाश देने की कृपा करें। सधन्यवाद

आपका आज्ञाकारी छात्र
सुमन
कक्षा 9वीं ‘स’
अनुक्रमांक 23

दिनांक 13.5.2004

3. अपने विद्यालय के प्राचार्य को दो दिन का बीमारी के कारण अवकाश देने के लिए प्रार्थना पत्र लिखिए।
सेवा में,
श्रीमान प्राचार्य महोदय,
शासकीय सुभाष उ.मा.वि.
शिवाजी नगर, भोपाल

महोदय,
निवेदन है कि गत रात्रि से मैं सर्दी और बुखार से पीड़ित हूँ। डॉक्टर ने मुझे दो दिन पूर्ण विश्राम के लिए सलाह दी है। अतः मैं दो दिन विद्यालय में उपस्थित नहीं हो सकूँगा। कृपया दिनांक 8 एवं 9 अगस्त का अवकाश स्वीकृत करने का कष्ट करें।

धन्यवाद!

आपका आज्ञाकारी शिष्य
परसराम पाण्डेय,
कक्षा 9-ब

8-12-2004

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4. शाला (विद्यालय छोड़ने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु प्राचार्य महोदय को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए।
विषय-शाला (विद्यालय) छोड़ने का प्रमाण-पत्र हेतु प्राचार्य को प्रार्थना-पत्र।
सेवा में,
प्राचार्य
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
भोपाल (म.प्र.)

सविनय निवेदन है कि प्रार्थी आपके विद्यालय की कक्षा 9वीं ‘अ’ अनुक्रमांक 11 का भूतपूर्व छात्र है। प्रार्थी ने आपके विद्यालय से उपर्युक्त कक्षा को द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण करके अध्ययन छोड़ दिया है जिसके प्रमाण-पत्र की आज अत्यंत आवश्यकता आ गई है। अतः आपसे प्रार्थना है कि आप उपर्युक्त प्रमाण-पत्र देने की कृपा करें।

प्रार्थी
सुरेन्द्र कुमार
कक्षा 9 ‘अ’
अनुक्रमांक 11

दिनांक 4-4-2002

5. शिक्षक पद हेतु एक आवेदन-पत्र संचालक शिक्षा विभाग के नाम लिखिए।
श्रीमान् संयुक्त संचालक महोदय,
शिक्षा विभाग
संभाग ग्वालियर (म.प्र.)
दिनांक 15-10-200……..
सेवा में,

विषय-शिक्षक पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
सेवा में सविनय निवेदन है कि प्रार्थी को दैनिक-पत्र आचरण व स्वदेश में प्रकाशित एक विज्ञापन से ज्ञात हुआ है कि आपके अधीनस्थ ग्रामीण अंचलों के प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं। अतः माध्यमिक विद्यालय हेतु शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए मैं अपना आवेदन-पत्र कर रहा हूँ। अतः आपसे अनुरोध है कि मेरी निम्नलिखित योग्यताओं को देखते हुए आप मेरी नियुक्ति शिक्षक पद पर करने की कृपा करें।
मेरी शैक्षणिक योग्यता का विवरण इस प्रकार है-
(1) शैक्षणिक योग्यता-बी.एस.सी.-द्वितीय श्रेणी
(2) प्रशिक्षण योग्यता-बी.एड.-द्वितीय श्रेणी
(3) हायर सेकेण्ड्री परीक्षा-प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण
(4) अन्य योग्यता-हॉकी व क्रिकेट खेल में विशेष रुचि
(5) प्रार्थी की जन्मतिथि एवं चरित्र का प्रमाण-पत्र प्रार्थना-पत्र के साथ संलग्न है। अतः श्रीमान् से पुनः निवेदन है कि प्रार्थी को विभाग में सेवा का अवसर प्रदान करें।

पता- प्रार्थी
दर्पण कॉलोनी ठाठीपुर मुरार। कमल किशोर अष्ठाना

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6. पाठ्य-पुस्तक निगम भोपाल से निर्धारित पाठ्य पुस्तकें मँगवाने हेतु एक पत्र संचालक के नाम लिखिए।
सुभाष उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
रतलाम
दिनांक 7-7-200

श्रीमान् संचालक महोदय,
पाठ्य-पुस्तक महोदय,
भोपाल (म.प्र.)

महोदय,
सेवा में निवेदन है कि पाठ्य-पुस्तक निगम भोपाल (म.प्र.) द्वारा प्रकाशित कक्षा 9 की पुस्तकें हैं हमारे नगर के पुस्तक विक्रेताओं के पास उपलब्ध नहीं हैं। जिन दुकानों पर कुछ पुस्तकें हैं वे दुकानदार अधिक मूल्य पर पुस्तकें बेचना चाहते हैं। अतः आपसे निवेदन है कि निम्नलिखित विषयों की पुस्तकें शासकीय दर पर कमीशन काट कर भेजने की कृपा करें।

(1) विशिष्ट हिंदी – कक्षा XI – 1 प्रति
(2) विशिष्ट अंग्रेजी – कक्षा IX – 1 प्रति
(3) गणित – कक्षा IX – 1 प्रति
(4) भौतिक शास्त्र – कक्षा IX – 1 प्रति
(5) रसायन शास्त्र – कक्षा IX – 1 प्रति

भवदीय
अशोक कुमार गौड़

MP Board Class 10th Hindi Solutions

MP Board Class 12th General Hindi निबंध-लेखन

MP Board Class 12th General Hindi निबंध-लेखन

1. दशहरा (विजयादशमी) अथवा एक भारतीय त्योहार

हमारे देश में विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग रहते हैं। उनके विविध कर्म-संस्कार होते हैं। वे अपने कर्मों और संस्कारों को समय-समय पर विशेष रूप से प्रकट करते रहते हैं। इन रूपों को हम आए दिन, त्योहारों, पर्यो, आयोजनों में देखा करते हैं। इस प्रकार के अधिकांश तिथि, पर्व, त्योहार, आयोजन, उत्सव आदि सर्वाधिक हिंदुओं में होते हैं। हिंदुओं के जितने तिथि, त्योहार, पर्व, उत्सव आदि हैं उनमें दशहरा (विजयादशमी) का महत्त्व अधिक बढ़कर है। यह भी कहा जाना कोई अनुचित या अतिशयोक्ति नहीं है कि दशहरा (विजयादशमी) हिंदुओं का सर्वश्रेष्ठ पर्व, त्योहार या उत्सव है।

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दशहरा (विजयादशमी) का त्योहार सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में हिंदू धर्म-मत के अनुयायी बड़े ही उल्लास और प्रयत्न के साथ मनाते हैं। यह आश्विन (क्वार) मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (एकम्) से पूर्णिमा (पूर्णमासी) तक बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। अंग्रेजी तिथि-गणना के अनुसार यह त्योहार अक्टूबर माह में पड़ता है।

दशहरा (विजयादशमी) का त्योहार-उत्सव मनाने के कई कारण और मत हैं। प्रायः सभी हिंदु धर्मावलंबी इस धारण से इसे मनाते हैं कि इसी समय भगवान श्रीराम ने युग-युग सर्वाधिक अत्याचारी लंका नरेश रावण का अंत करके उसकी स्वर्णमयी नगरी लंका पर विजय प्राप्त की थी। चूँकि प्रतिपदा (एकम्) से लेकर दशमी तक (दस दिनों तक) लगातार भयंकर युद्ध करने के उपरांत ही श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए इसे विजयादशमी भी कहा जाता है। ‘दशहरा’ शब्द भी ‘विजयादशमी’ शब्द का पर्याय और प्रतीक है।

दशहरा (विजयादशमी) त्योहार, पर्व और पुण्य-तिथि के भी रूप में मनाया जाता है। मुख्य रूप से बंगाल-निवासी इसे महाशक्ति की उपासना-आराधना के रूप में मनाते हैं। उनका यह घोर विश्वास होता है कि इसी समय महाशक्ति दुर्गा ने असुरों का विध्वंस करके कैलाश पर्वत को प्रस्थान किया था। महाशक्ति की पूजा-उपासना, ध्यान-भक्ति आदि के द्वारा वे लगातार नौ दिनों तक अखंड पाठ और नवरातों तक पूजा के दीप जलाया करते हैं। इसलिए इसे लोग ‘नवरात’ भी कहते हैं। दुर्गा के अतिरिक्त अन्य देवी-देवताओं के भी व्रत, उपासना, पाठ, संकीर्तन आदि पुण्य कार्य-विधान इसी समय सभी श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए निष्ठा से करते हैं।

इस त्योहार के समय सबमें अद्भुत खुशी और उमंग की झलक होती है। प्रकृति देवी अपनी सुंदरता को सुखद हवा, वनस्पतियों के रंग-बिरंगे फूलों फसलों, फलों, और सभी जीवधारियों विशेष रूप से मनुष्यों के रौनकता और चंचलता के रूप में प्रकट करती हुई दिखाई पड़ती है। उधर मनुष्य भी अपनी विविध सौंदर्य-सज्जा से पीछे नहीं रहता है। दशहरा (विजयादशमी) के समय जगह-जगह मेलों, दंगलों, सभाओं,

हिन्दी व्याकरण
उद्घाटनों, प्रीतिभोजों, समारोहों आदि के कारण सारा वातावरण अपने आप में बन-ठनकर अधिक रोचक दिखाई देने लगता है।

दशहरा (विजयादशमी) के त्योहार का बहुत बड़ा संदेश है। वह यह कि सत्य और सदाचार की असत्य और दुराचार पर निश्चय ही विजय होती है। यह त्योहार हमें यह सिखलाता है कि हमें पूरी निष्ठा और श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए। भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अगर कोई वास्तविक त्योहार है तो सबसे पहले दशहरा (विजयादशमी) ही है।

2. समय का सदुपयोग (समय बहुमूल्य है)

महाकवि तलसी ने समय का महत्त्वांकन करते हुए लिखा है-

“का वर्षा जब कृषि सुखानी। समय चूकि पुनि का पछतानी।।”

अर्थात् समय के बीत जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं। दूसरे शब्दों में समय के रहते ही कुछ कर लेने का लाभ होता है। अन्यथा समय बार-बार नहीं मिलता गोस्वामी तुलसीदास के उपर्युक्त उपदेश पर विचारने से यह स्पष्ट हो जाता है कि समय का महत्त्व समय के सदुपयोग करने से ही होता है। केवल कथा-वार्ता, चर्चा, घटना-व्यापार आदि के अनुभवों के द्वारा हम अच्छी तरह से समझ जाते हैं कि समय का प्रभाव सबसे बड़ा होता है। दूसरे शब्दों में यह कि समय सबको प्रभावित करता है। समय के उपयोग से गरीबी अमीरी में बदल जाती है। असत्य सत्य सिद्ध हो जाता है। लघुता प्रभुता में बदल जाती है। इसी प्रकार यह कहा जा सकता है कि असंभव संभव में बदल जाता है। इसीलिए कोई भी प्रयत्नशील व्यक्ति-प्राणी समय का सदुपयोग करके मनोनुकूल दशा को प्राप्त करके चमत्कार उत्पन्न कर सकता है।

समय का प्रवाह बहते हुए जल-प्रवाह के समान होता है जिसे रोक पाना सर्वथा कठिन और असंभव होता है। इस तथ्य को बड़े ही सुस्पष्ट रूप से एक अंग्रेज विचारक ने इस प्रकार से व्यक्त किया है-

“Time and Tide wait for none.”

इसी प्रकार से समय के प्रभाव को स्पष्ट कर हए किसी अन्य अंग्रेज चिंतक ने ठीक ही सुझाव किया है कि समय सबसे बड़ा ध पर्म है। यही सबसे बड़ी पजा है। इसलिए सब प्रकार से महान् और सफल जीवन बिताने के लिए समय की पूजा-आराधना करने के सिवा और कोई चारा नहीं है-

“No religion is greater than time, time is the greatest dharma. So believe the time, worship the time if you want to live and if you want to survive.”

समय के महत्त्व को सभी महापुरुषों ने सिद्ध किया है। भगवान् श्रीकृष्ण सदुपदेश देते हुए स्वयं को सम्य (काल) की संज्ञा दी है। काल ही विश्व का कारण है। वही विश्व की रचना करता है, विकास करता है और वही इसका विनाश भी करता है। अतः काल ही काल का कारण है। काल ही महाकाल है। महाकाल ही अतिकाल है और अतिकाल ही विनाश, सर्वनाश, विध्वंस और नाश-विनाश को भी सदैव के लिए स्वाहा करने वाला है। इसलिए यह किसी प्रकार से आश्चर्य नहीं कि काल का अभिन्न स्वरूप सभी देव-शक्तियाँ, ब्रह्मा, विष्णु और महेश काल भी काल के प्रभाव से कभी दूषित, खोटे और निंदनीय कर्म में लिप्त होने से बच नहीं पाते हैं। फिर सामान्य प्राणी जनों की काल के सामने क्या बिसात है।

हम यह देखते हैं और अनुभव करते हैं कि काल अर्थात् समय का सदुपयोग करने वाले विश्व के एक से एक महापुरुषों ने समय के सदुपयोग को आदर्श रूप में व्यक्त किया है। समय का सदुपयोग ही अनंत संभावनाओं के द्वार को खोलता है और अनंत समस्याओं के समाधान को भी प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि आज के वैज्ञानिकों ने अनंत असंभावनाओं को संभावनाओं में बदलते हुए सबके कान खड़े कर दिए हैं। इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि संभावनाओं की ओर आकर्षित होकर समय का सदुपयोग करने वाले निरंतर ही समय के एक-एक अल्पांश को किसी प्रकार से हाथ से निकलने नहीं देते हैं। ऐसा इसलिए कि वे भली-भाँति इस तथ्य के अनुभवी होते हैं-

“मुख से निकली बात और धनुष से निकला तीर कभी वापस नहीं आते।”

इसलिए समय का सदुपयोग करने से हमें कभी भी कोई चूक नहीं करनी चाहिए अन्यथा हाथ मल-मल कर पश्चाताप करने के सिवा और कुछ नहीं हो सकता हैं-

“अब पछताए क्या होत है, जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत।”

3. सिनेमा या चलचित्र

प्राचीन काल से लेकर अब तक मनुष्य ने अपने शारीरिक और मानसिक थकान और ऊब को दूर करने के लिए विभिन्न प्रकार के साधनों को तैयार किया है। प्राचीन काल में मनुष्य कथा, वार्ता, खेल-कूद और नाच-गाने आदि के द्वारा अपने तन और मन की थकान और ऊब को शांत किया करता था। धीरे-धीरे युग का परिवर्तन हुआ और मनुष्य के प्राचीन मनोरंजन और विनोद के साधनों में बढ़ोत्तरी हुई। आज विज्ञान के बढ़ते-चढ़ते प्रभाव के फलस्वरूप मनोरंजन के क्षेत्र में प्राचीन काल की अपेक्षा कई गुना वृद्धि हुई। पत्र, पत्रिकाएँ, नाटक, ग्रामोफोन, रेडियो, दूरदर्शन, टेपरिकॉर्डर, वी.सी.आर., वी.डी.ओ., फोटो कैमरा, वायरलेस, टेलीफोन सहित ताश, शतरंज, नौकायन, पिकनिक, टेबिल टेनिस, फुटबाल, वालीवाल, हॉकी, क्रिकेट सहित अनेक प्रकार की कलाएँ और प्रदर्शनों ने मानव द्वारा मनोरंजन हेतु आविष्कृत चौंसठ कलाओं में संवृद्धि की है। दूसरे शब्दों में कहना कि पूर्वकालीन मनोरंजन के साधन यथा-कथा, वार्ता, वाद-विवाद, कविता, संगीत, वादन, गोष्ठी, सभा या प्रदर्शन तो अब भी मनोरंजनार्थ हैं ही, इनके साथ ही कुछ अत्याधुनिक और नयी तकनीक से बने हुए मनोरंजन भी हमारे लिए अधिक उपयोगी हो रहे हैं। इन्हीं में से सिनेमा या चलचित्र भी हमारे मनोरंजन का बहुत बड़ा आधार है।

सिनेमा’ अंग्रेजी का मूल शब्द है जिसका हिंदी अनुवाद चलचित्र है अर्थात् चलते हुए चित्र। आज विज्ञान ने जितने भी हमें मनोरंजन के विभिन्न स्वरूप प्रदान किए हैं उनमें सिनेमा की लोकप्रियता बहुत अधिक है। इससे हम अब तक संतुष्ट नहीं हुए हैं और शायद अभी और कुछ युगों तक हम इसी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाएँगे तो कोई आश्चर्य नहीं। कहने का भाव यह कि सिनेमा से हमारी रुचि बढ़ती ही जा रही है। इससे हमारा मन शायद ही कभी ऊब सके।

चलचित्र या सिनेमा का आविष्कार 19वीं शताब्दी में हुआ। इसके आविष्कारक टामस एल्बा एडिसन अमेरिका निवासी थे जिन्होंने 1890 में इसको हमारे सामने प्रस्तुत किया था। पहले-पहल सिनेमा लंदन में ‘कुमैर’ नामक वैज्ञानिक द्वारा दिखाया गया था। भारत में चलचित्र दादा साहब फाल्के के द्वारा सन् 1913 में बनाया गया। उसकी काफी प्रशंसा की गई। फिर इसके बाद न जाने आज तक कितने चलचित्र बने और कितनी धनराशि खर्च हुई; यह कहना कठिन है। लेकिन यह तो ध्यान देने का विषय है कि भारत का स्थान चलचित्र की दिशा में अमेरिका के बाद दूसरा अवश्य है। कुछ समय बाद यह सर्वप्रथम हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

अब सिनेमा पूर्वापेक्षा रंगीन और आकर्षक हो गया है। इसका स्वरूप अब न केवल नैतिक ही रह गया है अपितु विविध भद्र और अभद्र सभी अंगों को स्पर्श कर गया है। अतः सिनेमा स्वयं में बहुविविधता भरा एक अत्यंत संतोषजनक मनोरंजन का साधन सिद्ध होकर हमारे जीवन और दिलो-दिमाग में भली भाँति छा गया है, सिनेमा से हम इतने बंध गए हैं कि इससे हम किसी प्रकार मुक्त नहीं हो पाते हैं। हम भरपेट भोजन की चिंता न करके सिनेमा की चिंता करते हैं। तन की एक-एक आवश्यकता को भूलकर या तिलांजलि देकर हम सिनेमा देखने से बाज नहीं आते हैं। इस प्रकार सिनेमा आज हमारे जीवन को दुष्प्रभावित कर रहा है। इसके भद्दे, अश्लील और दुरुपयोगी चित्र समाज के सभी वर्गों को विनाश की ओर लिये जा रहे हैं। अतः समाज के सभी वर्ग बच्चा, युवा और वृद्ध, शिक्षित और अशिक्षित सभी भ्रष्टता के शिकार होने से किसी प्रकार बच नहीं पा रहे हैं।

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आवश्यकता इस बात की है कि हमें अच्छे चलचित्र को ही देखना चाहिए। बुरे चलचित्रों से दूर रहने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। यही नहीं चरित्र को बर्बाद करने वाले चलचित्रों को विरोध करने में किसी प्रकार से संकोच नहीं करना चाहिए। यह भाव सबमें पैदा करना चाहिए कि चलचित्र हमारे सुख के लिए ही है।

4. किसी यात्रा का रोचक वर्णन या किसी पर्वतीय स्थान का वर्णन

जीवन में कुछ ऐसे भी क्षण आते हैं जिन्हें भूल पाना बड़ा कठिन हो जाता है। दूसरी बात यह कि जीवन में कुछ ऐसे भी अवसर मिलते हैं। जो अत्यधिक रोचक और आनंददायक बन जाते हैं। सभी की तरह मेरे भी जीवन में कुछ ऐसे अवसर अवश्य आए हैं जिनकी स्मृति कर आज भी मेरा मन बाग-बाग हो उठता है। उन रोचक और सरस क्षणों में एक क्षण मुझे ऐसा मिला जब मैंने जीवन में पहली बार एक पर्वतीय स्थान की सैर की।

छात्रावस्था से ही मुझे प्रकृति के प्रति प्रेमाकर्षण, प्रकृति के कवियों की रचनाओं को पढ़ने से पूर्वापेक्षा अधिक बढ़ता गया। प्रसाद, महादेवी, मुकुटधर पांडेय आदि की तरह कविवर सुमित्रानंदन पंत की रचनाओं ने हमारे बचपन में अंकुरित प्रकृति के प्रति प्रेम-मोह के जाल को और अधिक फैला दिया। इसमें मैं इतना फँसता गया कि मैंने यह निश्चय कर लिया कि कविवर सुमित्रानंदन पंत का पहाड़ी गाँव कौसानी एक बार अवश्य देखने जाऊँगा। ‘अगर मंसूबे मजबूत हों तो उनके पूरे होने में कोई कसर नहीं रहती है। यह बात मुझे तब समझ में आ गई जब मैंने एक दिन कौसानी के लिए यात्रा करने का निश्चय कर ही लिया।

गर्मी की छुट्टियाँ आ गई थीं। स्कूल दो माह के लिए बंद हो गया था। एक दिन मैंने अपने इष्ट मित्रों से कोई रोचक यात्रा करने की बात शुरू कर दी। किसी ने कुछ और किसी ने कुछ सुझाव दिया। मैंने सबको कौसानी नामक पहाड़ी गाँव की सैर करने की बात इस तरह से समझा दी कि इसके लिए सभी राजी हो गए। एक सुनिश्चित दिन में हम चार मित्र कविवर पंत की जन्मस्थली ‘कौसानी’ को देखने के लिए चल दिए। रेल और पैदल सफर करके हम लोग दिल्ली से सुबह चलकर ‘कौसानी’ को पहुंच गए। – हम लोगों ने देखा कि ‘कौसानी गाँव एक मैदानी गाँव की तरह न होकर बहुत टेढ़ा-मेढ़ा, ऊपर-नीचे बसा हुआ तंग गाँव है। तंग इस अर्थ में कि स्थान की कमी मैदानी गाँव की तुलना में बहुत कम है। यह बड़ी अच्छी बात रही कि हम लोगों का एक सुपरिचित और कुछ समय का सहपाठी कौसानी में ही मिल गया। अतएव उसने हम लोगों को इस पहाड़ी क्षेत्र की रोचक सैर करने में अच्छा दिशा-निर्देश दिया।

हम लोगों ने देखा इस पर्वतीय क्षेत्र-पर केवल पत्थरों का ही साम्राज्य है। लंबे-लंबे पेड़ों के सिर आसमान के करीब पहुँचते हुए दिखाई दे रहे थे। कहीं-कहीं लघु आकार में खेतों में कुछ फसलें थोड़ी-बहुत हरीतिमा लिये हुए थी; बिना मेहनत और संरक्षण के पौधों से फूलों के रंग-बिरंगे रूप मन को अधिक लुभा रहे थे। झाड़ियों के नामों-निशान कम थे फिर भी पत्थरों की गोद में कहीं-न-कहीं कोई झाड़ी अवश्य दीख जाती थी जिसमें पहाड़ी जीव-जंतुओं के होने का पता चलता था। उस पहाड़ी क्षेत्र में सैर के लिए बढ़ते हुए हम बहुत पतले और घुमावदार रास्ते पर ही जा रहे थे। ऐसा कोई रास्ता नहीं था जिसमें कोई चार पहिए वाला वाहन आ-जा सके। बहुत दूर एक ही ऐसी सड़क दिखाई पड़ी थी।

इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासी हम लोगों को बड़ी ही हैरानी से देख रहे थे। उनका पत्थर जैसा शरीर बलिष्ठ और चिकना दिखाई देता था। वे बहुत सभ्य और सुशील दिखाई दे रहे थे। घूमते-टहलते हुए हम लोग एक बाजार में गए। वहाँ पर कुछ हम लोगों ने जलपान किया। उस जलपान की खुशी यह थी कि दिल्ली और दूसरे मैदानी शहरों-गाँवों की अपेक्षा सभी सामान सस्ते और साफ-सुथरे थे। धीरे-धीरे शाम हो गई। सूरज की डूबती किरणें सभी पर्वतीय अंग को अपनी लालिमा की चादर से ढक रही थीं। रात होते-होते एक गहरी चुप्पी और उदासी छा गई। सुबह उठते ही हम लोगों ने देखा कि वह सारा पर्वतीय स्थल बर्फ में कैद हो गया है। आसमान में रुई-सी बर्फ उड़ रही है। सूरज की आँखें उन्हें देर तक चमका रही थीं। कुछ धूप निकलने पर हम लोग वापस आ गए। आज भी उस यात्रा के स्मरण से मन मचल उठता है।

5. समाचार-पत्र या समाचार-पत्र का महत्त्व

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज की प्रत्येक स्थिति से प्रभावित होता है। दूसरी ओर वह भी अपनी गतिविधियों से समाज को प्रभावित करता है। आए दिन समाज में कोई घटना, व्यापार या प्रतिक्रिया अवश्य होती है। इन सबकी जानकारी देने में समाचार-पत्र की भूमिका बहुत बड़ी है। यह सत्य है कि इस प्रकार की खबरें तो हमें आज विज्ञान की कृपा से रेडियो, टेलीप्रिंटर, टेलीफोन और टेलीविजन के द्वारा अवश्य प्राप्त होती हैं। लेकिन समाचार-पत्र की तरह उनसे एक-एक खबर का हवाला संभव नहीं होता है। यही कारण आज विभिन्न प्रकार के संचार-संदेश के साधनों के होते हुए भी समाचार-पत्र का महत्त्व सर्वाधिक है।

समाचार-पत्र के जन्म के विषय यह आमतौर पर कहा जाता है कि इसका शुभारंभ सातवीं सदी में चीन में हुआ था। यह तो सत्य ही है कि हमारे देश में समाचार पत्र का शुभारंभ 18वीं शताब्दी में हुआ था। सन् 1780 ई. में बंगाल में ‘बंगाल गजट’ नामक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ था। इसके बाद धीरे-धीरे हमारे देश के विभिन्न भागों से समाचार-पत्र निकलने लगे थे। यह निर्विवाद सत्य है कि हमारे देश में समाचार-पत्रों की संख्या युग-प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रचार-प्रसार के फलस्वरूप बढ़ती गई। सबसे अधिक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के हिंदी महत्त्व के लिए किए गए योगदानों के परिणामों से हिंदी समाचार-पत्रों की गति और संख्या में वृद्धि हुई।

हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात् समाचार-पत्रों की संख्या में पूर्वापेक्षा दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हुई। आज हमारे देश में समाचार-पत्रों की संख्या बहुत अधिक है। देश की प्रायः सभी भाषाओं में समाचार-पत्र आज धड़ल्ले से निकलते जा रहे हैं। आज के प्रमुख समाचार-पत्रों के कई रूप, प्रतिरूप दिखाई दे रहे हैं : दैनिक, सांध्य दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक-त्रैमासिक और छमाही (अर्द्धवार्षिक) सहित कुछ वार्षिक समाचार-पत्र भी प्रकाशित हो रहे हैं। मुख्य रूप से ‘नवभारत टाइम्स, ‘जनसत्ता’, ‘हिंदुस्तान’, ‘पंजाब केसरी’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘दैनिक ट्रिब्यून’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘स्टेट्समैन’, ‘वीर अर्जुन’, ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘नयी दुनिया’, ‘समाचार मेल’, ‘आज’, ‘दैनिक जागरण’ आदि दैनिक पत्रों की बड़ी धूम है। ‘सांध्य टाइम्स’ आदि सांध्य-दैनिकों की बड़ी लोकप्रियता है। इसी तरह से समाचारों को प्रस्तुत करने वाली पत्रिकाओं की भी भरमार है। इनमें धर्मयुग, ब्लिट्स, सरिता, इंडिया टुडे, . माया, मनोहर कहानियाँ आदि हैं।

समाचार-पत्रों की उपयोगिता दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है। समाचार-पत्रों के माध्यम से हमें न केवल राजनीतिक जानकारी हासिल होती है, अपितु सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक आदि गतिविधियों का भी ज्ञान हो जाता है। यही नहीं हमें देश और विदेश की पूरी छवि समाचार-पत्रों में साफ-साफ दिखाई देती है। इससे हम अपने जीवन से संबंधित किसी भी दशा से अछूते नहीं रह पाते हैं। इस प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि समाचार-पत्र की उपयोगिता और महत्त्व निःसंदेह है। अतएव हमें समाचार-पत्र से अवश्य लाभ उठाना चाहिए।

6. विद्यार्थी और अनुशासन

मनुष्य समाज में रहता है। उसे समाज के नियमों और दायित्वों के अनुसार रहना पड़ता है। जो इस प्रकार से रहता है उसे अनुशासित कहते हैं। इस प्रकार के नियम और दायित्व को अनुशासन कहते हैं।

अनुशासन जीवन के प्रारंभ से ही शुरू हो जाता है। यह अनुशासन घर से शुरू होता है। बच्चे को उसके संरक्षक उचित और आवश्यक अनुशासन में रखने लगते हैं। इसे पारिवारिक अनुशासन कहते हैं। बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब वह शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करता है। उसे शैक्षिक नियमों-निर्देशों का पालन करना पड़ता है। इस प्रकार के नियम-निर्देश को ‘विद्यार्थी-अनुशासन’ कहा जाता है।

विद्यार्थी-अनुशासन का शुभारंभ विद्यालय या पाठशाला ही है। वह शिक्षा के सुंदर और शुद्ध वातावरण में पल्लवित और विकसित होता है। यहाँ विद्यार्थी को शिष्ट हिन्दी व्याकरण गुरुजनों की छत्रछाया में रहकर अनुशासित होकर रहना पड़ता है। यहाँ विद्यार्थी को अपने परिवार के अनुशासन से कहीं अधिक कड़े अनुशासन में रहना पड़ता है। इस प्रकार के अनुशासन में रहकर विद्यार्थी जीवन भर अनुशासित रहने का आदी बैन जाता है। इससे विद्यार्थी अपने गुरु की तरह योग्य और महान बनने की कोशिश करने लगता है। उसे किसी प्रकार के कड़े निर्देश-नियम या आदेश धीरे-धीरे सुखद और रोचक लगने लगते हैं। कुछ समय बाद वह जब अपनी पूरी शिक्षा पूरी कर लेता है तब वह समाज में प्रविष्ट होकर समाज को अनुशासित करने लगता है। इस प्रकार से विद्यार्थी जीवन का अनुशासन समाज को एक स्वस्थ और सबल अनुशासित स्वरूप देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

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विद्यार्थी अनुशासन के कई अंग-स्वरूप होते हैं-नियमित और ठीक समय पर विद्यालय जाना प्रार्थना सभा में पहुंचना, कक्षा में प्रवेश करना, कक्षा में आते ही गुरुओं के प्रति अभिवादन, प्रणाम, साष्टांग दंडवत करना, कक्षा में पूरे मनोयोग से अध्ययन-मनन करना, बाल-सभा, खेल-कूद वाद-विवाद, जल-क्रीड़ा, गीत संगीत आदि में सनियम सक्रिय भाग लेना आदि विद्यार्थी-अनुशासन के ही अभिन्न अंग हैं। इससे विद्यार्थी अनुशासन की आग में पूरी तरह से तपता है। इससे विद्यार्थी पके हुए घड़े के समान टिकाऊ बनकर समाज को अपने अंतर्गत अनुशासन में मीठे जल का मधुर पान कराता है। इस प्रकार से विद्यार्थी-अनुशासन के द्वारा समाज एक सही और निश्चित दिशा की ओर ही बढ़ता है। वह अपने पूर्ववर्ती कुसंस्कारों और त्रुटियों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। एक अपेक्षित सुंदर और सुखद स्थिति को प्राप्त कर अपने भविष्य को उज्ज्वल और समृद्ध बनाता है। यह ध्यान देने का विषय है कि विद्यार्थी अनुशासन को पाकर समाज के सभी वर्ग बालक, युवा और वृद्ध एवं शिक्षित व अशिक्षित सभी में एक अपूर्व सुधार-चमत्कार आ जाता है।

विद्यार्थी अनुशासन हमारे जीवन का सबसे प्रथम और महत्त्वपूर्ण अंग है। यह हमारे समाज की उपयोगिता की दृष्टि से तो और अधिक मूल्यवान और अपेक्षित है। अतएव हमें इस प्रकार से विद्यार्थी-अनुशासन में विश्वास और उत्साह दिखाना चाहिए। यह पक्का इरादा और समझ रखनी चाहिए कि विद्यार्थी-अनुशासन सभी प्रकार के अनुशासन का सम्राट है। यह अनुशासन सर्वोच्च है, यह अनुशासन सर्वव्यापी है। यह अनुशासन सर्वकालिक है। अतएव इसकी पवित्रता और महानता के प्रति समाज के सभी वर्गों को पूर्ण-रूप से प्रयत्नशील रहना चाहिए।

7. खेलों का महत्त्व

जिस प्रकार से शिक्षा मनुष्य के सांस्कृतिक और बौद्धिक मानस को पुष्ट . और संवृद्ध करती है उसी प्रकार से खेलकूद उसकी शारीरिक संरचना को अधिक प्रौढ़ और शक्तिशाली बनाते हैं। इन दोनों ही प्रकार के तथ्यों की पुष्टि करते हुए एक बार महात्मा गांधी ने कहा था-“By education, I mean, all round development of a child”. इस प्रकार के कथन का अभिप्राय यही है कि बच्चों का सर्वांगीण विकास होना चाहिए, अर्थात् बच्चों को शैक्षिक और सांस्कृतिक वातावरण के साथ-साथ शारीरिक वृद्धि हेतु खेल-कूद, व्यायाम आदि के वातावरण का भी होना आवश्यक है। इस तरह के विचारों को अनेक शिक्षाविदों, चिंतकों और समाज-सुधारकों ने व्यक्त किया है।

जीवन में खेलों के महत्त्व अधिक-से-अधिक रूप में दिखाई देते हैं। खेलों के द्वारा हमारे सम्पूर्ण अंगों की अच्छी-खासी कसरत हो जाती है। सभी मांसपेशियों पर बल पड़ता है। थकान तो अवश्य होती है। लेकिन इस थकान को दूर करने के लिए जब हम कुछ विश्राम कर लेते हैं तब हमारे अंदर एक अद्भुत चुस्ती और चंचलता आ जाती है। फिर हम कोई भी काम बड़ी स्फूर्ति और मनोवेगपूर्वक करने लगते हैं। खेलों से हमारी खेलों में अभिरुचि बढ़ती जाती है। इस प्रकार से हम श्रेष्ठ खिलाड़ी बनने का प्रयास निरंतर करते रहते हैं। खेलों को खेलने से न केवल खेलों के प्रति ही अभिरुचि बढ़ती है अपितु शिक्षा, कृषि, व्यवसाय, पर्यटन, वार्तालाप, ध्यान-पूजा आदि के प्रति भी हमारा मन एकदम केंद्रित होने लगता है।

खेलों के द्वारा हमारा मनोरंजन होता है। खेलों के द्वारा हमारा अच्छा व्यायाम . होता है। हमारे अंदर सहनशक्ति आने लगती है। हम संघर्षशील होने लगते हैं। ऐसा इसलिए कि खेलों को खेलते समय हमारे खेल के साथी हमको पराजित करना चाहते हैं और हम उन्हें पराजित कर अपनी विजय हासिल करना चाहते हैं। इस प्रकार से हम जब तक विजय नहीं प्राप्त करते हैं तब तक इसके लिए हम निरंतर संघर्षशील बने रहते हैं। इस तरह खेलों को खेलने से हमारी हिम्मत बढ़ती है। हम निराश नहीं होते हैं। हम आशावान बनकर एक कठिन और दुर्लभ वस्तु की प्राप्ति के लिए अपने विश्वास, अपने बल-तेज और अपने प्रयत्न को बढ़ाते चलते हैं। इस प्रकार इतने अपने पक्के इरादों की दौड़ से किसी अपने मंसूबों की प्राप्ति करके फूले नहीं समाते हैं। – खेलों के खेलने से हमारा अधिक और अपेक्षित मनोरंजन होता है। इससे हमारा चिड़चिड़ापन दूर हो जाता है। हमारे अंदर सरसता और मधुरता आ जाती है। हम अधिक विवकेशील, सरल और सहनशील बन जाते हैं। खेलों के खेलने से हमारा परस्पर सम्पर्क अधिक सुदृढ़ और घनिष्ठ बनता जाता है। फलतः हम एक उच्चस्तरीय प्राणी बन जाते हैं।

खेलों के खेलने से हमारे अंदर अनुशासन का वह अंकुर उठने लगता है जो जीवन भर पल्लवित और फलित होने से कभी रुकता नहीं है। ठीक समय से खेलना, नियमबद्ध होकर खेलना और ठीक समय पर खेले से मुक्त होना आदि सब कुछ नियम अनुशासन के सच्चे पाठ पढ़ाते हैं।

हम देखते हैं कि प्राचीनकालीन खेलों के अतिरिक्त मूर्तिकला, चित्रकला, नाट्यकला, संगीतकला आदि कलाएँ भी एक विशेष प्रकार के खेल ही हैं। जिनसे हमारा बौद्धिक और शारीरिक सभी प्रकार के विकास होते हैं। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि विविध प्रकार के खेलों के द्वारा हमारा जीवन सम्पूर्ण रूप से महान् विकसित और कल्याणप्रद बन जाता है। इसलिए निःसंदेह हमारे जीवन में खेलों के अत्यधिक महत्त्व हैं। अतएव हमें किसी-न-किसी प्रकार के खेल में सक्रिय भाग लेकर अपने जीवन को समुन्नत और सर्वोपयोगी बनाना चाहिए।

8. विद्यालय का वार्षिकोत्सव

विद्यालय का वार्षिकोत्सव अन्य वार्षिकोत्सव के समान ही व्यापक स्तर पर होता है। यह उत्सव प्रतिवर्ष एक निश्चित समय पर ही होता है। इसके लिए सभी विद्यालय के ही सदस्य नहीं अपितु इससे संबंधित सभी सामाजिक प्राणी भी तैयार रहते हैं।

हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव प्रति वर्ष 13 अप्रैल की बैसाखी के शुभावसर हिन्दी व्याकरण पर होता है। इसके लिए लगभग पंद्रह दिनों से ही तैयारी शुरू हो जाती है। हमारे . कक्षाध्यापक इसके लिए काफी प्रयास किया करते हैं। वे प्रतिदिन की होने वाली तैयारी और आगामी तैयारी के विषय में सूचनापट्ट पर लिख देते हैं। हमारे कक्षाध्यापक विद्यालय के वार्षिकोत्सव के लिए नाटक, निबंध, एकांकी, कविता, वाद-विवाद, खेल आदि के लिए प्रमुख और योग्य विद्यार्थियों के चुनाव कर लेते हैं। कई दिनों के अभ्यास के उपरांत वे योग्य और कुशल विद्यार्थियों का चुनाव कर लेते हैं। इस चुनाव के बाद वे पुनः छात्रों को बार-बार उनके प्रदत्त कार्यों का अभ्यास कराते रहते हैं।

प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी हमारे विद्यालय के वार्षिकोत्सव के विषय में प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रों में समाचार प्रकाशित हो गया। इससे पूर्व विद्यालय के निकटवर्ती सदस्यों को इस विषय में सूचित करते हुए उन्हें आमंत्रित कर दिया गया। प्रदेश के शिक्षामंत्री को प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। जिलाधिकारी को सभा का अध्यक्ष बनाया गया। विद्यालय के प्रधानाचार्य को अतिथि-स्वागताध्यक्ष का पदभार दिया गया। हमारे कक्षाध्यापक को सभा का संचालक पद दिया गया।

विद्यालय के सभी छात्रों, अध्यापकों और सदस्यों को विद्यालय की पूरी साज-सज्जा और तैयारी के लिए नियुक्त किया गया। इस प्रकार के विद्यालय के वार्षिकोत्सव की तैयारी में कोई त्रुटि नहीं रहने पर इसकी पूरी सतर्कता रखी गई।

विद्यालय के वार्षिकोत्सव के दिन अर्थात् 13 अप्रैल बैसाखी के शुभ अवसर पर प्रातः 7 बजे से ही विद्यालय की साज-सज्जा और तैयारी होने लगती है। 8 बजते ही सभी छात्र, अध्यापक और सदस्य अपने-अपने सौंपे हुए दायित्वों को सँभालने लगते हैं। अतिथियों का आना-जाना शुरू हो गया। वे एक निश्चित सजे हुए तोरण द्वार से प्रवेश करके पंक्तिबद्ध कुर्सियों पर जाकर बैठने लगे थे। उन्हें सप्रेम बैठाया जाता था। कार्यक्रम के लिए एक बहुत बड़ा मंच बनाया गया था। वहाँ कई कुर्सियाँ और टेबल अलग-अलग श्रेणी के थे। लाउडस्पीकर के द्वारा कार्यक्रम के संबंध में बार-बार सूचना दी जा रही थी।

ठीक 10 बजे हमारे मुख्य अतिथि प्रदेश के शिक्षामंत्री, सभाध्यक्ष जिलाधिकारी और उनके संरक्षकों की हमारे स्वागताध्यक्ष प्रधानाचार्य ने बड़े ही प्रेम के साथ आवभगत की और उन्हें उचित आसन प्रदान किया। हमारे कक्षाध्यापक ने सभा का संचालन करते हुए विद्यालय से कार्यक्रम संबंधित सूचना दी। इसके उपरांत प्रमुख अतिथि शिक्षामंत्री से वक्तव्य देने के लिए आग्रह किया। प्रमुख अतिथि के रूप में माननीय शिक्षामंत्री ने सबके प्रति उचित आभार व्यक्त करते हुए शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डाला। विद्यार्थियों को उचित दिशाबोध देकर विद्यालय के एक निश्चित अनुदान की घोषणा की जिसे सुनकर तालियों की गड़गड़ाहट से सारा वातावरण गूंज उठा। इसके बाद संचालक महोदय के आग्रह पर सभाध्यक्ष जिलाधिकारी ने संक्षिप्त वक्तव्य दिया। फिर संचालक महोदय के आग्रह पर स्वागताध्यक्ष हमारे प्रधानाचार्य ने सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुए विद्यालय की प्रगति का विस्तार से उल्लेख किया। बाद में संचालक महोदय ने मुख्य अतिथि से आग्रह करके पुरस्कार के घोषित छात्रों को पुरस्कृत करवाया अंत में सबको धन्यवाद दिया। सबसे अंत में मिष्ठान वितरण हुआ।

दूसरे दिन सभी दैनिक समाचार-पत्रों में हमारे विद्यालय के वार्षिकोत्सव का महत्त्व प्रकाशित हुआ जिसे हम सबने ही नहीं प्रायः सभी अभिभावकों, संरक्षकों ने गर्व का अनुभव किया।

हिन्दी व्याकरण 9 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी . समय-समय पर भारत में महान आत्माओं ने जन्म लिया है। गौतम बुद्ध, महावीर, अशोक, नानक, नामदेव, कबीर जैसे महान त्यागी और आध्यात्मिक पुरुषों के कारण ही भारत भूमि संत और महात्माओं का देश कहलाती है। ऐसे ही महान व्यक्तियों के परम्परा में महात्मा गांधी ने भारत में जन्म लिया। सत्य, अहिंसा और मानवता के इस पुजारी ने न केवल धार्मिक क्षेत्र में ही हम भारतवासियों का नेतृत्व किया, बल्कि राजनीति को भी प्रभावित किया। सदियों से परतंत्र भारत माता के बंधनों को काट गिराया। आज महात्मा गांधी के प्रयत्नों से हम भारतवासी स्वतंत्रता की खली वायु. में साँस ले रहे हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर (कठियावाड़) में 2 अक्टूबर, 1869 को हुआ था। उनके पिता राजकोट के दीवान थे। इनका बचपन का नाम मोहनदास – था। इन पर बचपन से ही आदर्श माता और सिद्धांतवादी पिता का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ा।

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गांधी जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा राजकोट में प्राप्त की। 13 वर्ष की अल्पआयु में ही इनका विवाह हो गया था। इनकी पत्नी का नाम कस्तूरबा था। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद में वकालत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड चले गए। वे 3 वर्ष तक इंग्लैंड में रहे। वकालत पास करने के बाद वे भारत वापस आ गए। वे आरंभ से ही सत्य में विश्वास रखते थे। भारत में वकालत करते हुए अभी थोड़ा ही समय हुआ था कि उन्हें एक भारतीय व्यापारी द्वारा दक्षिण अफ्रीका बुलाया गया। वहाँ उन्होंने भारतीयों की अत्यंत शोचनीय दशा देखी। गांधी जी ने भारतवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष आरंभ कर दिया।

दक्षिण अफ्रीका से लौटकर गांधी जी ने अहिंसात्मक तरीके से भारतीयों के अधिकारों के लिए लड़ने का निश्चय किया। उस समय भारत में तिलक, गोखले, लाला लाजपतराय आदि नेता कांग्रेस पार्टी के माध्यम से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। गांधी जी पर उनका अत्यधिक प्रभाव पड़ा।

1921 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाया। गांधी जी धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध हो गए। अंग्रेजी सरकार ने आंदोलन को दबाने का प्रयास किया। भारतवासियों पर तरह-तरह के अत्याचार किए। गांधी जी ने 1930 में नमक सत्याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाए। भारत के सभी नर-नारी उनकी एक आवाज पर उनके साथ बलिदान देने के लिए तैयार थे। – गांधी जी को अंग्रेजों ने बहुत बार जेल में बंद किया। गांधी जी ने अछूतोद्धार के लिए कार्य किया। स्त्री-शिक्षा और राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रचार किया। हरिजनों के उत्थान के लिए काम किया। स्वदेशी आंदोलन और चरखा आंदोलन चलाया। गांधी जी के प्रयत्नों से भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ।

सत्य, अहिंसा और मानवता के इस पुजारी की 30 जनवरी, 1948 को नाथू राम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी। इससे सारा विश्व विकल हो उठा।

10. बाल दिवस

हमारे विद्यालय में प्रतिवर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस का आयोजन किया जाता है। बाल दिवस पूज्य चाचा नेहरू का जन्मदिवस है। चाचा नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। वे स्वतंत्रता संग्राम के महान् सेनानी थे। उन्होंने अपने देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। अपने जीवन के अनेक अमूल्य वर्ष देश की सेवा में बिताए। अनेक वर्षों तक विदेशी शासकों ने उन्हें जेल में बंद रखा। उन्होंने साहस नहीं छोड़ा और देशवासियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे। .. . पं. नेहरू बच्चों के प्रिय नेता थे। बच्चे उन्हें प्यार से ‘चाचा’ कहकर संबोधित करते थे। उन्होंने देश में बच्चों के लिए शिक्षा सुविधाओं का विस्तार कराया। उनके अच्छे भविष्य के लिए अनेक योजनाएँ आरंभ की। वे कहा करते थे ‘कि आज के बच्चे ही कल के नागरिक बनेंगे। यदि आज उनकी अच्छी देखभाल की जाएगी तो आगे आने वाले समय में वे अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, सैनिक, विद्वान, लेखक और वैज्ञानिक बनेंगे। इसी कारण उन्होंने बाल कल्याण की अनेक योजनाएँ बनाईं। अनेक नगरों में बालघर और मनोरंजन केंद्र बनवाए। प्रतिवर्ष बाल दिवस पर डाक टिकटों का प्रचलन किया। बालकों के लिए अनेक प्रतियोगिताएँ आरंभ कराईं। वे देश-विदेश में जहाँ भी जाते बच्चे उन्हें घेर लेते थे। उनके जन्मदिवस को भारत में बाल-दिवस के रूप में मनाया जाता है। – हमारे विद्यालय में प्रतिवर्ष बाल-दिवस के अवसर पर बाल मेले का आयोजन किया जाता है। बच्चे अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगाते हैं। विभिन्न प्रकार की विक्रय योग्य वस्तुएँ अपने हाथ से तैयार करते हैं। बच्चों के माता-पिता और मित्र उस अवसर पर खरीददारी करते हैं। सारे विद्यालय को अच्छी प्रकार सजाया जाता है। विद्यालय को झंडियों, चित्रों और रंगों की सहायता से आकर्षक रूप दिया जाता है।

बाल दिवस के अवसर पर खेल-कूद प्रतियोगिता और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। बच्चे मंच पर आकर नाटक, गीत, कविता, नृत्य और फैंसी ड्रेस शो का प्रदर्शन करते हैं। सहगान, बाँसुरी वादन का कार्यक्रम दर्शकों का मन मोह लेता है। तत्पश्चात् सफल और अच्छा प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को पुरस्कार वितरण किए जाते हैं। बच्चों को मिठाई का भी वितरण किया जाता है। इस प्रकार दिवस विद्यालय का एक प्रमुख उत्सव बन जाता है।

11. विज्ञान की देन या विज्ञान वरदान है या विज्ञान का महत्त्व

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने मनुष्य के जीवन में महान परिवर्तन ला दिया है। मनुष्य के जीवन को नये-नये वैज्ञानिक आविष्कारों से सुख-सुविधा प्राप्त हुई है। प्रायः असंभव कही जाने वाली बातें भी संभव प्रतीत होने लगी हैं। मनुष्य विज्ञान के सहारे आज चंद्रमा तक पहुँच सका है। सागर की गहराइयों में जाकर उसके रहस्य को भी खोज लाया है। भीषण ज्वालामुखी के मुँह में प्रवेश कर सका है; पृथ्वी की परिक्रमा कर चुका है। बंजर भूमि को हरा-भरा बनाकर भरपूर फसलें उगा सका है।

विज्ञान की सहायता से मनुष्य का जीवन सुखमय हो गया है। आज घरों में विज्ञान की देन हीटर, पंखे, रेफ्रिजरेटर, टेलीविजन, गैस, स्टोव, रेडियो, टेपरिकॉर्डर, टेलीफोन, स्कूटर आदि वस्तुएं दिखाई देती हैं। गृहिणियों के अनेक कार्य आज विज्ञान की सहायता से सरल बन गए हैं।

विज्ञान की सहायता से आज समय और दूरी का महत्त्व घट गया है। आज हजारों मील की दूरी पर बैठा हुआ मनुष्य अपने मित्रों और संबंधियों से इस प्रकार हिन्दी व्याकरण : बात कर सकता है जैसे कि सामने बैठा हुआ हो। आज दिल्ली में चाय पीकर, भोजन बंबई में और रात्रि विश्राम लंदन में कर सकना संभव है। ध्वनि की गति से तेज चलने वाले ऐसे विमान और एयर बस हैं जिनकी सहायता से हजारों मील का सफर एक दिन में किया जाना संभव है। रेल, मोटर, ट्राम, जहाज, स्कूटर आदि आने-जाने में सुविधा प्रदान करते हैं।

टेलीप्रिंटर, टेलीफोन, टेलीविजन’ मनुष्य के लिए बड़े उपयोगी साधन सिद्ध हुए हैं। विज्ञान की सहायता से समाचार एक स्थान से दूसरे स्थान पर शीघ्र-से-शीघ्र पहुँचाए जा सकते हैं। रेडियो-फोटो की सहायता से चित्र भेजे जा सकते हैं। लाहौर में खेला जाने वाला क्रिकेट मैच दिल्ली में देखा जा सकता है। एक घंटे में एक पुस्तक की हजारों प्रतियाँ छापी जा सकती हैं। आवाज को टेपरिकॉर्डर और ग्रामोफोन रिकॉर्ड पर कैद किया जा सकता है।

चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान की देन भुलाई नहीं जा सकती। एक्स-रे मशीन की सहायता से शरीर के अंदर के भागों का रहस्य जाना जा सकता है। शरीर के किसी भी भाग का ऑपरेशन किया जा सकना संभव है। शरीर के अंग बदले जा सकते हैं। खून-परिवर्तन किया जा सकता है। प्लास्टिक सर्जरी से चेहरे को ठीक किया जा सकता है। भयानक बीमारियों के लिए दवाएँ और इंजेक्शन खोजे जा चुके हैं।

कृषि के क्षेत्र में नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों ने कृषि उत्पादन में तो वृद्धि की ही है, साथ ही भारी-भारी कार्यों को सरल भी बना दिया है। कृषि, यातायात, संदेशवाहन, संचार, मनोरंजन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विज्ञान की देन अमूल्य है।

12. परोपकार

परोपकार की भावना एक पवित्र भावना है। मनुष्य वास्तव में वही है जो दूसरों का उपकार करता है। यदि मनुष्य में दया, ममता, परोपकार और सहानुभूति की भावना न हो तो पशु और मनुष्य में कोई अंतर नहीं रहता। मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में, ‘मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे।’ मनुष्य का यह परम कर्तव्य है कि वह अपने विषय में न सोचकर दूसरों के विषय में ही सोचे, दूसरों की पीड़ा हरे, दूसरों के दुख दूर करने का प्रयत्न करे।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि ‘परहित सरस धर्म नहिं भाई।’ दूसरों की भलाई करने से अच्छा कोई धर्म नहीं है। दूसरों को पीड़ा पहुँचाना पाप है और परोपकार करना पुण्य है।

परोपकार शब्द ‘पर + उपकार’ से मिलकर बना है। स्वयं को सुखी बनाने के लिए तो सभी प्रयत्न करते हैं परंतु दूसरों के कष्टों को दूर कर उन्हें सुखी बनाने का कार्य जो सज्जन करते हैं वे ही परोपकारी होते हैं। परोपकार एक अच्छे चरित्रवान व्यक्ति की विशेषता है। परोपकारी स्वयं कष्ट उठाता है लेकिन दुखी और पीड़ित मानवता के कष्ट को दूर करने में पीछे नहीं हटता। जिस कार्य को अपने स्वार्थ की दृष्टि से किया जाता है वह परोपकार नहीं है।

परोपकारी व्यक्ति अपने और पराये का भेद नहीं करता। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ अपना जल स्वयं काम में न लेतीं। चंदन अपनी सुगंध दूसरों को देता है। सूर्य और चंद्रमा अपना प्रकाश दूसरों को देते हैं। नदी, कुएँ और तालाब दूसरों के लिए हैं। यहाँ तक कि पशु भी अपना दूध मनुष्य को देते हैं और बदले हिन्दी व्याकरण में कुछ नहीं चाहते। यह है परोपकार की भावना। इस भावना के मूल में स्वार्थ का नाम भी नहीं है।

भारत तथा विश्व का इतिहास परोपकार के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है। स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी, ईसा मसीह, दधीचि, स्वामी विवेकानंद, गुरु नानक सभी महान् परोपकारी थे। परोपकार की भावना के पीछे ही अनेक वीरों ने यातनाएँ सहीं और स्वतंत्रता के लिए फाँसी पर चढ़ गए। अपने जीवन का त्याग किया और देश को स्वतंत्र कराया।

परोपकार एक सच्ची भावना है। यह चरित्र का बल है। यह निःस्वार्थ सेवा है, यह आत्मसमर्पण है। परोपकार ही अंत में समाज का कल्याण करता है। उनका नाम इतिहास में अमर होता है।

13. वृक्षारोपण

हमारे देश में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भी वनों का विशेष महत्त्व है। बन ही प्रकृति की महान् शोभा के भंडार हैं। वनों के द्वारा प्रकृति का जो रूप खिलता है वह मनुष्य को प्रेरित करता है। दूसरी बात यह है कि वन ही मनुष्य, पशु-पक्षी, जीव-जंतुओं आदि के आधार हैं, वन के द्वारा ही सबके स्वास्थ्य की रक्षा होती है। वन इस प्रकार से हमारे जीवन की प्रमुख आवश्यकता है। अगर वन न रहें तो हम नहीं रहेंगे और यदि वन रहेंगे तो हम रहेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि वनं से हमारा अभिन्न संबंध है जो निरंतर है और सबसे बड़ा है। इस प्रकार से हमें वनों की आवश्यकता सर्वोपरि होने के कारण हमें इसकी रक्षा की भी आवश्यकता सबसे बढ़कर है।

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वृक्षारोपण की आवश्यकता हमारे देश में आदिकाल से ही रही है। बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों के आश्रम के वृक्ष-वन वृक्षारोपण के द्वारा ही तैयार किए गए हैं, महाकवि . कालिदास ने ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ के अंतर्गत महर्षि कण्व के शिष्यों के द्वारा वृक्षारोपण किए जाने का उल्लेख किया है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि वृक्षारोपण की आवश्यकता प्राचीन काल से ही समझी जाती रही है और आज भी इसकी आवश्यकता ज्यों-की-त्यों बनी हुई है।

अब प्रश्न है कि वृक्षारोपण की आवश्यकता आखिर क्यों होती है? इसके उत्तर में हम यह कह सकते हैं कि वृक्षारोपण की आवश्यकता इसीलिए होती है कि वृक्ष सुरक्षित रहें, वृक्ष या वन नहीं रहेंगे तो हमारा जीवन शून्य होने लगेगा। एक समय ऐसा आ जाएगा कि हम जी भी न पाएँगे। वनों के अभाव में प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा। प्रकृति का संतुलन जब बिगड़ जाएगा तब सम्पूर्ण वातावरण इतना दूषित और अशुद्ध हो जाएगा कि हम न ठीक से साँस ले सकेंगे और न ठीक से अन्न-जल ही ग्रहण कर पाएँगे। वातावरण के दूषित और अशुद्ध होने से हमारा मानसिक, शारीरिक और आत्मिक विकास कुछ न हो सकेगा। इस प्रकार से वृक्षारोपण की आवश्यकता हमें सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करती हुई हमारे जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। वृक्षारोपण की आवश्यकता की पूर्ति होने से हमारे जीवन और प्रकृति का परस्पर संतुलन क्रम बना रहता है।

वनों के होने से हमें ईंधन के लिए पर्याप्त रूप से लकड़ियाँ प्राप्त हो जाती . . हैं। बांस की लकड़ी और घास से हमें कागज प्राप्त हो जाता है जो हमारे कागज उद्योग का मुख्याधार है। वनों की पत्तियों, घास, पौधे, झाड़ियों की अधिकता के कारण तीव्र वर्षा से भूमि का कटाव तीव्र गति से न होकर मंद गति से होता है या नहीं के बराबर होता है। वनों के द्वारा वर्षा का संतुलन बना रहता है जिससे हमारी कृषि संपन्न होती है। वन ही बाढ़ के प्रकोप को रोकते हैं, वन ही बढ़ते हुए और उड़ते हुए रेत-कणों को कम करते हुए भूमि का संतुलन बनाए रखते हैं।

यह सौभाग्य का विषय है कि 1952 में सरकार ने ‘नयी वन नीति’ की घोषणा करके वन महोत्सव की प्रेरणा दी है जिससे वन रोपण के कार्य में तेजी आई है। इस प्रकार से हमारा ध्यान अगर वन सुरक्षा की ओर लगा रहेगा तो हमें वनों से होने वाले, लाभ, जैसे-जड़ी-बूटियों की प्राप्ति, पर्यटन की सुविधा, जंगली पशु-पक्षियों का सुदर्शन, इनकी खाल, पंख या बाल से प्राप्त विभिन्न आकर्षक वस्तुओं का निर्माण आदि सब कुछ हमें प्राप्त होते रहेंगे। अगर प्रकृति देवी का यह अद्भुत स्वरूप वन, सम्पदा नष्ट हो जाएगी तो हमें प्रकृति के कोष से बचना असंभव हो जाएगा।

14. दूरदर्शन से लाभ और हानियाँ

विज्ञान के द्वारा मनुष्य ने जिन चमत्कारों को प्राप्त किया है। उनमें दूरदर्शन का स्थान अत्यंत महान् और उच्च है। दूरदर्शन का आविष्कार 19वीं शताब्दी के आस-पास ही समझना चाहिए। टेलीविजन दूरदर्शन का अंग्रेजी नाम है। टेलीविजन का आविष्कार महान वैज्ञानिक वेयर्ड ने किया है। टेलीविजन को सर्वप्रथम लंदन में सन् 1925 में देखा गया। लंदन के बाद ही इसका प्रचार-प्रसार इतना बढ़ता गया है कि आज यह विश्व के प्रत्येक भाग में बहुत लोकप्रिय हो गया है। भारत में टेलीविजन का आरंभ 15 सितंबर, सन् 1959 को हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति ने आकाशवाणी के टेलीविजन विभाग का उद्घाटन किया था।

टेलीविजन या दूरदर्शन का शाब्दिक अर्थ है-दूर की वस्तुओं या पदार्थों का ज्यों-का-त्यों आँखों द्वारा दर्शन करना। टेलीविजन का प्रवेश आज घर-घर हो रहा है। इसकी लोकप्रियता के कई कारणों में से एक कारण यह है कि यह एक रेडियो कैबिनेट के आकार-प्रकार से तनिक बड़ा होता है। इसके सभी सेट रेडियो के सेट से मिलते-जुलते हैं। इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह या स्थान पर रख सकते हैं। इसे देखने के लिए हमें न किसी विशेष प्रकार के चश्मे या मानभाव या अध्ययन आदि की आवश्यकताएँ पड़ती हैं। इसे देखने वालों के लिए भी किसी विशेष वर्ग के दर्शक या श्रोता के चयन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। अपितु इसे देखने वाले सभी वर्ग या श्रेणी के लोग हो सकते हैं।

टेलीविजन हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को बड़ी ही गंभीरतापूर्वक प्रभावित करता है। यह हमारे जीवन के काम आने वाली हर वस्तु या पदार्थ की न केवल जानकारी देता है अपितु उनके कार्य-व्यापार, नीति-ढंग और उपाय को भी क्रमशः बड़ी ही आसानीपूर्वक हमें दिखाता है। इस प्रकार से दूरदर्शन हमें एक-से एक बढ़कर जीवन की समस्याओं और घटनाओं को बड़ी ही सरलता और आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करता है। जीवन से संबंधित ये घटनाएँ-व्यापार-कार्य आदि सभी कुछ न केवल हमारे आस-पास पड़ोस के ही होते हैं अपितु दूर-दराज के देशों और भागों से भी जुड़े होते हैं जो किसी-न-किसी प्रकार से हमारे जीवनोपयोगी ही सिद्ध होते हैं। इस दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि दूरदर्शन हमारे लिए ज्ञानवर्द्धन का बहुत बड़ा साधन है।

यह ज्ञान की सामान्य रूपरेखा से लेकर गंभीर और विशिष्ट रूपरेखा को बड़ी ही सुगमतापूर्वक प्रस्तुत करता है। इस अर्थ से दूरदर्शन हमारे घर के चूल्हा-चाकी से लेकर अंतरिक्ष के कठिन ज्ञान की पूरी-पूरी जानकारी देता रहता है।

दूरदर्शन द्वारा हमें जो ज्ञान-विज्ञान प्राप्त होते हैं उनमें कृषि के ज्ञान-विज्ञान का कम स्थान नहीं है। आधुनिक कृषि यंत्रों से होने वाली कृषि से संबंधित जानकारी का लाभ शहरी कृषक से बढ़कर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले कृषक अधिक उठाते हैं। इसी तरह से कृषि क्षेत्र में होने वाले नवीन आविष्कारों, उपयोगिताओं, विभिन्न प्रकार के बीज, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ आदि का पूरा विवरण हमें दूरदर्शन ही दिया करता है।

दूरदर्शन के द्वारा पर्यो, त्योहारों, मौसमों, खेल-तमाशे, नाच, गाने-बजाने, कला, संगीत, पर्यटन, व्यापार, साहित्य, धर्म, दर्शन, राजनीति, अध्याय आदि लोक-परलोक के ज्ञान-विज्ञान के रहस्य एक-एक करके खुलते जाते हैं। दूरदर्शन इन सभी प्रकार के तथ्यों का ज्ञान हमें प्रदान करते हुए इनकी कठिनाइयों को हमें एक-एक करके बतलाता है और इसका समाधान भी करता है।

दूरदर्शन से सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि इसके द्वारा हमारा पूर्ण रूप से मनोरंजन हो जाता है। प्रतिदिन किसी-न-किसी प्रकार के विशेष आयोजित और प्रायोजित कार्यक्रमों के द्वारा हम अपना मनोरंजन करके विशेष उत्साह और प्रेरणा प्राप्त करते हैं। दूरदर्शन पर दिखाई जाने वाली फिल्मों से हमारा मनोरंजन तो होता ही है इसके साथ-ही-साथ विविध प्रकार के दिखाए जाने वाले धारावाहिकों से भी हमारा कम मनोरंजन नहीं होता है। इसी तरह से बाल-बच्चों, वृद्धों, युवकों सहित विशेष प्रकार के शिक्षित और अशिक्षित वर्गों के लिए दिखाए जाने वाले दूरदर्शन के कार्यक्रम हमारा मनोरंजन बार-बार करते हैं जिससे ज्ञान प्रकाश की किरणें भी फूटती हैं।

.हाँ, अच्छाई में बुराई होती है और कहीं-कहीं फूल में काँटे भी होते हैं। इसी तरह से जहाँ और जितनी दूरदर्शन में अच्छाई है वहाँ उतनी उसमें बुराई भी कही जा सकती है। हम भले ही इसे सुविधा सम्पन्न होने के कारण भूल जाएँ लेकिन दूरदर्शन के लाभों के साथ-साथ इससे होने वाली कुछ ऐसी हानियाँ हैं जिन्हें हम अनदेखी नहीं कर सकते हैं। दूरदर्शन के बार-बार देखने से हमारी आँखों में रोशनी मंद होती है। इसके मनोहर और आकर्षक कार्यक्रम को छोड़कर हम अपने और इससे कहीं अधिक आवश्यक कार्यों को भूल जाते हैं या छोड़ देते हैं। समय की बरबादी के साथ-साथ हम आलसी और कामचोर हो जाते हैं। दूरदर्शन से प्रसारित कार्यक्रम कुछ तो इतने अश्लील होते हैं कि इनसे न केवल हमारे युवा पीढ़ी का मन बिगड़ता है अपितु हमारे अबोध और नाबालिक बच्चे भी इसके दुष्प्रभाव से नहीं बच पाते हैं। दूरदर्शन के खराब होने से इनकी मरम्मत कराने में काफी खर्च भी पड़ जाता है। इस प्रकार दूरदर्शन से बहुत हानियाँ और बुराइयाँ हैं, फिर भी इससे लाभ अधिक हैं, इसी कारण है कि यह अधिक लोकप्रिय हो रहा है।

15. प्रदूषण की समस्या और समाधान

आज मनुष्य ने इतना विकास कर लिया है कि वह अब मनुष्य से बढ़कर देवताओं की शक्तियों के समान शक्तिशाली हो गया। मनुष्य ने यह विकास और महत्त्व विज्ञान के द्वारा प्राप्त किया है। विज्ञान का आविष्कार करके मनुष्य ने चारों हिन्दी व्याकरण ओर से प्रकृति को परास्त करने का कदम बढ़ा लिया है। देखते-देखते प्रकृति धीरे-धीरे मनुष्य की दासी बनती जा रही है। आज प्रकृति मनुष्य के अधीन बन गई है। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि मनुष्य ने प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने के लिए कोई कसर न छोडने का निश्चय कर लिया है।

जिस प्रकार मनुष्य मनुष्य का और राष्ट्र राष्ट्र का शोषण करते रहे हैं, उसी . प्रकार मनुष्य प्रकृति का भी शोषण करता रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति में कोई गंदगी नहीं है। प्रकृति में बस जीव-जंतु, प्राणी तथा वनस्पति-जगत् परस्पर मिलकर समतोल में रहते हैं। प्रत्येक का अपना विशिष्ट कार्य है जिससे सड़ने वाले पदार्थों की अवस्था तेजी से बदले और वह फिर वनस्पति जगत् तथा उसके द्वारा जीवन-जगत की खुराक बन सके अर्थात प्रकृति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का काम अपने स्वाभाविक रूप में बराबर चलता रहता है। जब तक मनुष्य का हस्तक्षेप नहीं होता तब तक न गंदगी होती है और न रोग। जब मनुष्य प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप करता है तब प्रकृति का समतोल बिगड़ता है और इससे सारी सृष्टि का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।

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आज का युग औद्योगिक युग है। औद्योगीकरण के फलस्वरूप वायु-प्रदूषण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। ऊर्जा तथा उष्णता पैदा करने वाले संयंत्रों से गरमी निकलती है। यह उद्योग जितने बड़े होंगे और जितना बढ़ेंगे उतनी ज्यादा गरमी फैलाएँगे। इसके अतिरिक्त ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए जो ईंधन प्रयोग में लाया जाता है वह प्रायः पूरी तरह नहीं जल पाता। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि धुएँ में कार्बन मोनोक्साइड काफी मात्रा में निकलती है। आज मोटर वाहनों का यातायात तेजी से बढ़ रहा है। 960 किलोमीटर की यात्रा में एक मोटर वाहन उतनी ऑक्सीजन का उपयोग करता है जितनी एक आदमी को एक वर्ष में चाहिए। दुनिया के हर अंचल में मोटर वाहनों का प्रदूषण फैलता जा रहा है। रेल का यातायात भी आशातीत रूप से बढ़ रहा है। हवाई जहाजों का चलन भी सभी देशों में हो चुका है। तेल-शोधन, चीनी-मिट्टी की मिलें, चमड़ा, कागज, रबर के कारखाने तेजी से बढ़ रहे हैं। रंग, वार्निश, प्लास्टिक, कुम्हारी चीनी के कारखाने बढ़ते जा रहे हैं। इस प्रकार के यंत्र बनाने के कारखाने बढ़ रहे हैं यह सब ऊर्जा-उत्पादन के लिए किसी-न-किसी रूप में ईंधन को फूंकते हैं और अपने धुएँ से सारे वातावरण को दूषित करते हैं। यह प्रदूषण जहाँ पैदा होता है वहीं पर स्थिर नहीं रहता। वायु के प्रवाह में वह सारी दुनिया में फैलता रहता है।

सन् 1968 में ब्रिटेन में लाल धूल गिरने लगी, वह सहारा रेगिस्तान से उड़कर आई। जब उत्तरी अफ्रीका में टैंकों का युद्ध चल रहा था तब वहाँ से धूल उड़कर कैरीबियन समुद्र तक पहुंच गई थी।

आजकल लोग घरों, कारखानों, मोटरों और विमानों के माध्यम से हवा, मिट्टी और पानी में अंधाधुंध दूषित पदार्थ प्रवाहित कर रहे हैं। विकास के क्रम में प्रकृति अपने लिए ऐसी परिस्थितियाँ बनाती है जो उसके लिए आवश्यक है इसलिए इन व्यवस्थाओं में मनुष्य का हस्तक्षेप सब प्राणियों के लिए घातक होता है। प्रदूषण का मुख्य खतरा इसी से है कि इससे परिस्थितीय संस्थान पर दबाव पड़ता है। घनी आबादी के क्षेत्रों में कार्बन मोनोक्साइड की वजह से रक्त-संचार में 5-10 प्रतिशत आक्सीजन कम हो जाती है। शरीर के ऊतकों को 25 प्रतिशत आक्सीजन की आवश्यकता होती है। आक्सीजन की तुलना में कार्बन मोनोक्साइड लाल रुधिर कोशिकाओं के साथ ज्यादा मिल जाती है, इससे यह हानि होती है कि ये कोशिकाएँ ऑक्सीजन को अपनी पूरी मात्रा में सँभालने में असमर्थ रहती हैं। लंदन में चार घंटों तक ट्रैफिक सँभालने के काम पर रहने वाले पुलिस के सिपाही के फेफड़ों में इतना विष भर जाता है मानो उसने 105 सिगरेट पी हों।

आराम की स्थिति में मनुष्य को दस लीटर हवा की आवश्यकता होती है। कड़ी मेहनत पर उससे दस गुना ज्यादा चाहिए लेकिन एक दिन में एक दिमाग को इतनी ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जितनी कि 17,000 हेक्टेयर वन में पैदा होती है। मिट्टी में बढ़ते हुए विष से वनस्पति की निरंतर कमी महासागरों के प्रदूषण आदि की वजह से ऑक्सीजन की उत्पत्ति में कमी होती रही है। इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष हम वायुमंडल में अस्सी अरब टन.धुआँ फेंकते हैं। कारों तथा विमानों से दूषित गैस निकलती है। मनुष्य और प्राणियों के साँस से जो कार्बन डाइआक्साइड निकलती है वह अलग प्रदूषण फैलाती है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण के प्रदूषण से वर्तमान रफ्तार से 30 वर्ष में जीवन-मंडल (बायोस्फियर) जिस पर प्राण और वनस्पति निर्भर हैं समाप्त हो जाएगा। पशु, पौधे और मनुष्यों का अस्तित्व नहीं रहेगा। सारी पृथ्वी की जलवायु बदल जाएगी, संभव है बरफ का युग फिर से आए। 30 साल के बाद हम कुछ नहीं कर पाएंगे। उस समय तक पृथ्वी का वातावरण नदियाँ और महासमुद्र सब विषैले हो जाएँगे।

यदि मनुष्य प्रकृति के नियमों को समझकर, प्रकृति को गुरु मानकर उसके साथ सहयोग करता और विशेष करके सब अवशिष्टों की प्रकृति को लौटाता है तो सृष्टि और मनुष्य स्वस्थ्य. रह सकते हैं, नहीं तो लंबे, अर्से में अणु विस्फोट के खतरे की अपेक्षा प्रकृति के कार्य में मनुष्य का कृत्रिम हस्तक्षेप कम खतरनाक नहीं है।

अतएव हमें प्रकृति के शोषण क्रम को कम करना होगा। अन्यथा हमारा जीवन पानी के बुलबुले के समान बेवजह समाप्त हो जाएगा और हमारे सारे विकास-कार्य ज्यों-के-त्यों पड़े रह जाएँगे।

16. ‘दहेज प्रथा’ एक सामाजिक बुराई

पंचतंत्र में लिखा है-

पुत्रीति जाता महतीह, चिन्ताकस्मैप्रदेयोति महानवितकैः।
दत्त्वा सुखं प्राप्तयस्यति वानवेति, कन्यापितृत्वंखलुनाम कष्टम।।

अर्थात् पुत्री उत्पन्न हुई, यह बड़ी चिंता है। यह किसको दी जाएगी और देने के बाद भी वह सुख पाएगी या नहीं, यह बड़ा वितर्क रहता है। कन्या का पितृत्व निश्चय ही कष्टपूर्ण होता है।।

इस श्लेष से ऐसा लगता है कि अति प्राचीन काल से ही दहेज की प्रथा हमारे देश में रही है। दहेज इस समय निश्चित ही इतना कष्टदायक और विपत्तिसूचक होने के साथ-ही-साथ इस तरह प्राणहारी न था जितना कि आज है। यही कारण है कि आज दहेज-प्रथा को एक सामाजिक बुराई के रूप में देखा और समझा जा रहा आज दहेज-प्रथा एक सामाजिक बुराई क्यों है? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहना बहुत ही सार्थक होगा कि आज दहेज का रूप अत्यंत विकृत और कुत्सित हो गया है। यद्यपि प्राचीन काल में भी दहेज की प्रथा थी लेकिन वह इतनी भयानक और प्राण संकटापन्न स्थिति को उत्पन्न करने वाली न थी। उस समय दहेज स्वच्छंदपूर्वक था। दहेज लिया नहीं जाता था अपितु दहेज दिया जाता था। दहेज प्राप्त करने वाले के मन में स्वार्थ की कहीं कोई खोट न थी। उसे जो कुछ भी मिलता था उसे वह सहर्ष अपना लेता था लेकिन आज दहेज की स्थिति इसके ठीक विपरीत हो गई है।

आज दहेज एक दानव के रूप में जीवित होकर साक्षात् हो गया है। दहेज एक विषधर साँप के समान एक-एक करके बंधुओं को डंस रहा है। कोई इससे बच नहीं पाता है, धन की लोलुपता और असंतोष की प्रवृत्ति तो इस दहेज के प्राण हैं। दहेज का अस्तित्व इसी से है। इसी ने मानव समाज को पशु समाज में बदल दिया है। दहेज न मिलने अर्थात् धन न मिलने से बार-बार संकटापन्न स्थिति का उत्पन्न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होती है। इसी के कारण कन्यापक्ष को झुकना पड़ता है। नीचा बनना पड़ता है। हर कोशिश करके वरपक्ष और वर की माँग को पूरा करना पड़ता है। आवश्यकता पड़ जाने पर घर-बार भी बेच देना पड़ता है। घर की लाज भी नहीं बच पाती है।

दहेज के अभाव में सबसे अधिक वधू (कन्या) को दुःख उठाना पड़ता है। उसे जली-कटी, ऊटपटाँग बद्दुआ, झूठे अभियोग से मढ़ा जाना और तरह-तरह के दोषारोपण करके आत्महत्या के लिए विवश किया जाता है। दहेज के कुप्रभाव से केवल वर-वधू ही नहीं प्रभावित होते हैं, अपितु इनसे संबंधित व्यक्तियों को भी इसकी लपट में झुलसना पड़ता है। इससे दोनों के दूर-दूर के संबंध बिगड़ने के साथ-साथ मान-अपमान दुखद वातावरण फैल जाता है जो आने वाली पीढ़ी को एक मानसिक विकृति और दुष्प्रभाव को जन्माता है।

दहेज के कुप्रभाव से मानसिक अव्यस्तता बनी रहती है। कभी-कभी तो यह भी देखने में आता है कि दहेज के अभाव में प्रताडित वधु ने आत्महत्या कर ली है, या उसे जला-डूबाकर मार दिया गया है जिसके परिणामस्वरूप कानून की गिरफ्त में दोनों परिवार के लोग आ जाते हैं, पैसे बेशुमार लग जाते हैं, शारीरिक दंड अलग मिलते हैं। काम ठंडे अलग से पड़ते हैं और इतना होने के साथ अपमान और असम्मान, आलोचना भरपूर सहने को मिलते हैं।

दहेज प्रथा सामाजिक बुराई के रूप में उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर सिद्ध की जा चुकी है। अब दहेज प्रथा को दूर करने के मुख्य मुद्दों पर विचारना अति आवश्यक प्रतीत हो रहा है।

इस बुरी दहेज-प्रथा को तभी जड़ से उखाड़ा जा सकता है जब सामाजिक स्तर पर जागृति अभियान चलाया जाए। इसके कार्यकर्ता अगर इसके भुक्त-भोगी लोग हों तो यह प्रथा यथाशीघ्र समाप्त हो सकती है। ऐसा सामाजिक संगठन का होना जरूरी है जो भुक्त-भोगी या आंशिक भोगी महिलाओं के द्वारा संगठित हो। सरकारी सहयोग होना भी जरूरी है क्योंकि जब तक दोषी व्यक्ति को सख्त कानूनी कार्यवाही करके दंड न दिया जाए तब तक इस प्रथा को बेदम नहीं किया जा सकता। संतोष . की बात है कि सरकारी सहयोग के द्वारा सामाजिक जागृति आई है। यह प्रथा निकट भविष्य में अवश्य समाप्त हो जाएगी।

17. अगर मैं प्रधानमंत्री होता

किसी आजाद मुल्क का नागरिक अपनी योग्यताओं का विस्तार करके अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सकता है, वह कोई भी पद, स्थान या अवस्था को प्राप्त कर सकता है, उसको ऐसा होने का अधिकार उसका संविधान प्रदान करता है। भारत जैसे विशाल राष्ट्र में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के पद को प्राप्त करना यों तोआकाश कसम तोड़ने के समान है फिर भी ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ के अनुसार यहाँ का अत्यंत सामान्य नागरिक भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बन सकता है। लालबहादुर शास्त्री और ज्ञानी जैलसिंह इसके प्रमाण हैं।

यहाँ प्रतिपाद्य विषय का उल्लेख प्रस्तुत है कि ‘अगर मैं प्रधानमंत्री होता’ तो क्या करता? मैं यह भली-भाँति जानता हूँ कि प्रधानमंत्री का पद अत्यंत विशिष्ट और महान् उत्तरदायित्वपूर्ण पद है। इसकी गरिमा और महानता को बनाए रखने में किसी एक सामान्य और भावुक व्यक्ति के लिए संभव नहीं है फिर मैं महत्त्वाकांक्षी हूँ और अगर मैं प्रधानमंत्री बन गया तो निश्चय समूचे राष्ट्र की काया पलट कर दूंगा। मैं क्या-क्या राष्ट्रोस्थान के लिए कदम उठाऊँगा, उसे मैं प्रस्तुत करना पहला कर्तव्य मानता हूँ जिससे मैं लगातार इस पद पर बना रहूँ।

सबसे पहले शिक्षा-नीति में आमूल चूल परिवर्तन लाऊँगा। मुझे सुविज्ञात है कि हमारी कोई स्थायी शिक्षा नीति नहीं है जिससे शिक्षा का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है, यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से हम शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे हैं, बेरोजगारी की जो आज विभीषिका आज के शिक्षित युवकों को त्रस्त कर रही है, उनका मुख्य कारण हमारी बुनियादी शिक्षा की कमजोरी, प्राचीन काल की गरु-शिष्य परंपरा की गुरुकुल परिपाटी की शुरुआत नये सिरे से करके धर्म और राजनीति के समन्वय से आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात कराना चाहूँगा। राष्ट्र को बाह्य शक्तियों के आक्रमण का खतरा आज भी बना हुआ है। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा अभी अपेक्षित रूप में नहीं है। इसके लिए अत्याधुनिक युद्ध के उपकरणों का आयात बढ़ाना होगा। मैं खुले आम न्यूक्लीयर विस्फोट का उपयोग सृजनात्मक कार्यों के लिए ही करना चाहूँगा। मैं किसी प्रकार ढुलमुल राजनीति का शिकार नहीं बनूँगा अगर कोई राष्ट्र हमारे राष्ट्र की ओर आँख उठाकर देखें तो मैं उसक हतोड़ जवाब देने में संकोच नहीं करूंगा। मैं अपने वीर सैनिकों का उत्साहवर्द्धन करते हुए उनके जीवन को अत्यधिक संपन्न और खुशहाल बनाने के लिए उन्हें पूरी समुचित सुविधाएँ प्रदान कराऊँगा जिससे वे राष्ट्र की आन-मान पर न्योछावर होने में पीछे नहीं हटेंगे।

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हमारे देश की खाद्य समस्या सर्वाधिक जटिल और दुखद समस्या है। कृषि प्रधान राष्ट्र होने के बावजूद यहाँ खाद्य संकट हमेशा मँडराया करता है। इसको ध्यान में रखते हुए मैं नवीनतम कृषि यंत्रों, उपकरणों और रासायनिक खादों और सिंचाई के विभिन्न साधनों के द्वारा कृषि-दशा की दयनीय स्थिति को सबल बनाऊँगा। देश की जो बंजर और बेकार भूमि है उसका पूर्ण उपयोग कृषि के लिए करवाते हुए कृषकों को एक- से – एक बढ़कर उन्नतिशील बीज उपलब्ध कराके उनकी अपेक्षित सहायता सुलभ कराऊँगा।

यदि मैं प्रधानमंत्री हूँगा तो देश में फैलती हुई राजनीतिक अस्थिरता पर कड़ा अंकुश लगाकर दलों के दलदल को रोक दूंगा। राष्ट्र को पतन की ओर ले जाने वाली राजनीतिक अस्थिरता के फलस्वरूप प्रतिदिन होने वाले आंदोलनों, काम-रोको और विरोध दिवस बंद को समाप्त करने के लिए पूरा प्रयास करूंगा। देश में गिरती हुई अर्थव्यवस्था के कारण मुद्रा प्रसार पर रोक लगाना अपना मैं प्रमुख कर्तव्य समझूगा।

उत्पादन, उपभोग और विनियम की व्यवस्था को पूरी तरह से बदलकर देश को आर्थिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व प्रदान कराऊँगा।

देश को विकलांग करने वाले तत्त्वों, जैसे-मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार ही नव अवगुणों की जड़ है। इसको जड़मूल से समाप्त करने के लिए अपराधी तत्त्वों को कड़ी-से-कड़ी सजा दिलाकर समस्त वातावरण को शिष्ट और स्वच्छ व्यवहारों से भरने की मेरी सबल कोशिश होगी। यहीं आज धर्म और जाति को लेकर तो साम्प्रदायिकता फैलाई जा रही है वह राष्ट्र को पराधीनता की ओर ढकेलने के ही अर्थ में हैं, इसलिए ऐसी राष्ट्र विरोधी शक्तियों को आज दंड की सजा देने के लिए मैं सबसे संसद के दोनों सदनों से अधिक-से-अधिक मतों से इस प्रस्ताव को पारित करा करके राष्ट्रपति से सिफारिश करके संविधान में परिवर्तन के बाद एक विशेष अधिनियम जारी कराऊंगा जिससे विदेशी हाथ अपना बटोर सकें।

संक्षेप में यही कहना चाहता हूँ कि यदि मैं प्रधानमंत्री हँगा तो राष्ट्र और समाज के कल्याण और पूरे उत्थान के लिए मैं एड़ी-चोटी का प्रयास करके प्रधानमंत्रियों की परम्परा और इतिहास में अपना सबसे अधिक लोकापेक्षित नाम स्थापित करूँगा। भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाला यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो कथनी और करनी को साकार कर देता।

18. परिश्रम अथवा परिश्रम का महत्त्व अथवा परिश्रम ही जीवन है।

संस्कृत का एक सुप्रसिद्ध श्लोक है-

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

अर्थात् परिश्रम से ही कार्य होते हैं, इच्छा से नहीं। सोते हुए सिंह के मुँह में पशु स्वयं नहीं आ गिरते। इससे स्पष्ट है कि कार्य-सिद्धि के लिए परिश्रम बहुत आवश्यक है।

सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक मनुष्य ने जो भी विकास किया है, वह सब परिश्रम की ही देन है। जब मानव जंगल अवस्था में था, तब वह घोर परिश्रमी था। उसे खाने-पीने, सोने, पहनने आदि के लिए जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी। आज, जबकि युग बहुत विकसित हो चुका है, परिश्रम की महिमा कम नहीं हुई है। बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण देखिए, अनेक मंजिले भवन देखिए, खदानों की खुदाई, पहाड़ों की कटाई, समुद्र की गोताखोरी या आकाश-मंडल की यात्रा का अध्ययन कीजिए। सब जगह मानव के परिश्रम की गाथा सुनाई पड़ेगी। एक कहावत है- ‘स्वर्ग क्या है, अपनी मेहनत से रची गई सष्टि। नरक क्या है? अपने आप बन गई दुरवस्था।’ आशय यह है कि स्वर्गीय सुखों को पाने के लिए तथा विकास करने के लिए मेहनत अनिवार्य है। इसीलिए मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है-

पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो,
सफलता वर-तुल्य वरो, उठो,
अपुरुषार्थ भयंकर पाप है,
न उसमें यश है, न प्रताप है।।

केवल शारीरिक परिश्रम ही परिश्रम नहीं है। कार्यालय में बैठे हुए प्राचार्य, लिपिक या मैनेजर केवल लेखनी चलाकर या परामर्श देकर भी जी-तोड़ मेहनत करते हैं। जिस क्रिया में कुछ काम करना पड़े, जोर लगाना पड़े, तनाव मोल लेना पड़े, वह मेहनत कहलाती है। महात्मा गांधी दिन-भर सलाह-मशविरे में लगे रहते थे, परंतु वे घोर परिश्रमी थे।

पुरुषार्थ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे सफलता मिलती है। परिश्रम ही सफलता की ओर जाने वाली सड़क है। परिश्रम से आत्मविश्वास पैदा होता है। मेहनती आदमी को व्यर्थ में किसी की जी-हजूरी नहीं करनी पड़ती, बल्कि लोग उसकी जी-हजूरी करते हैं। तीसरे, मेहनती आदमी का स्वास्थ्य सदा ठीक रहता है। चौथे, मेहनत करने से गहरा आनंद मिलता है। उससे मन में यह शांति होती है कि मैं निठल्ला नहीं बैठा। किसी विद्वान का कथन है-जब तुम्हारे जीवन में घोर आपत्ति और दुख आ जाएँ तो व्याकुल और निराश मत बनो; अपितु तुरंत काम में जुट जाओ। स्वयं को कार्य में तल्लीन कर दो तो तुम्हें वास्तविक शांति और नवीन प्रकाश की प्राप्ति होगी।

राबर्ट कोलियार कहते हैं- ‘मनुष्य का सर्वोत्तम मित्र उसकी दस अंगुलियाँ हैं।’ अतः हमें जीवन का एक-एक क्षण परिश्रम करने में बिताना चाहिए। श्रम मानव-जीवन का सच्चा सौंदर्य है।

19. साक्षरता से देश प्रगति करेगा
अथवा
साक्षरता आंदोलन

साक्षरता का तात्पर्य है-अक्षर-ज्ञान का होना। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति का पढ़ने-लिखने में समर्थ होना साक्षर होना कहलाता है। इस बात में कोई दो मत नहीं हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अक्षर-ज्ञान होना चाहिए। अक्षर – ज्ञान व्यक्ति के लिए उतना ही अनिवार्य है जितना कि अँधेरे कमरे के लिए प्रकाश; या अंधे के लिए आँखें।

वर्तमान सभ्यता काफी उन्नत हो चुकी है। इस उन्नति का एक मूलभूत आधार है-शिक्षा। शिक्षा के बिना प्रगति का पहिया एक इंच भी नहीं सरक सकता। यदि शिक्षा प्राप्त करनी है तो अक्षर-ज्ञान अनिवार्य है। आज की समूची शिक्षा अक्षर-ज्ञान पर आधारित है। भारतीय मनीषियों ने तो अक्षर को ‘ब्रह्म’ माना है। आज ज्ञान-विज्ञान ने जितनी उन्नति की है, उसका लेखा-जोखा हमारे स्वर्णिम ग्रंथों में सुरक्षित है। अतः उस ज्ञान को पाने के लिए साक्षर होना पड़ेगा।

निरक्षर व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ जाता है। वह छोटी-छोटी बातों के लिए दूसरों पर निर्भर बना रहता है। उसे पत्र पढ़ने, बस-रेलगाड़ी की सूचनाएँ पढ़ने के लिए भी लोगों का मुँ ताकना पड़ता है। परिणमास्वरूप उसके आत्मविश्वास में कमी आ जाती है। यहाँ तक कि वह समाचार-पत्र पढ़कर दैनंदिन गतिविधियों को भी नहीं जान पाता। इस प्रकार वह विश्व की प्रगतिशील धारा से कट कर रह जाता है। रोज-रोज होने वाले नये आविष्कार उसके लिए बेमानी हो जाते हैं।

दुर्भाग्य से भारत में निरक्षरता का अंधकार बहुत अधिक छाया हुआ है। अभी यहाँ करोड़ों लोग वर्तमान सभ्यता से एकदम अनजान हैं। ईश्वर ने उन्हें जो-जो शक्तियाँ प्रदान की हैं, वे भी सोई पड़ी हैं। अगरबत्ती की सुगंध की भाँति उनकी प्रतिभा उन्हीं. में खोई पड़ी है। अगर ज्ञान की लौ लग जाए, साक्षरता का दीप जल जाए तो समूचा हिंदुस्तान उनकी सुगंध से महमह कर उठेगा। तब हमारे वनवासी बंधु, जो अज्ञान के कारण अपनी वन-संपदा के महत्त्व को नहीं जानते, उसके महत्त्व को जानेंगे; अपनी वन-भूमि का चहुंमुखी विकास करेंगे। परिणामस्वरूप नये उद्योग-धंधों से भारतवर्ष तो फलेगा-फूलेगा ही; उनके सूखे चेहरों पर भी रंगत आएगी। अतः साक्षरता आज का युगधर्म है। उसे प्रथम महत्त्व देकर अपनाना चाहिए।

20. विज्ञान-वरदान या अभिशाप

विज्ञान एक शक्ति है, जो नित नये आविष्कार करती है। वह शक्ति न तो अच्छी है, न बुरी, वह तो केवल शक्ति है। अगर हम उस शक्ति से मानव-कल्याण के कार्य करें तो वह ‘वरदान’ प्रतीत होती है। अगर उसी से विनाश करना शुरू कर दें तो वह ‘अभिशाप’ लगने लगती है।

विज्ञान ने अंधों को आँखें दी हैं, बहरों को सुनने की ताकत। लाइलाज रोगों की रोकथाम की है तथा अकाल मृत्यु पर विजय पाई है। विज्ञान की सहायता से यह युग बटन-युग बन गया है। बटन दबाते ही वायु देवता पंखे को लिये हमारी सेवा करने लगते हैं, इंद्र देवता वर्षा करने लगते हैं, कहीं प्रकाश जगमगाने लगता है तो कहीं शीत-उष्ण वायु के झोंके सुख पहुँचाने लगते हैं। बस, गाड़ी, वायुयान आदि ने स्थान की दूरी को बाँध दिया है। टेलीफोन द्वारा तो हम सारी वसुधा से बातचीत करके उसे वास्तव में कुटुंब बना लेते हैं। हमने समुद्र की गहराइयाँ भी नाप डाली हैं और आकाश की ऊँचाइयाँ भी। हमारे टी.वी., रेडियो, वीडियो में सभी मनोरंजन के साधन कैद हैं। सचमुच विज्ञान ‘वरदान’ ही तो है।

मनुष्य ने जहाँ विज्ञान से सुख के साधन जुटाए हैं, वहाँ दुःख के अंबार भी खड़े कर लिए हैं। विज्ञान के द्वारा हमने अणुबम, परमाणु बम तथा अन्य ध्वंसकारी शस्त्र-अस्त्रों का निर्माण कर लिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब दुनिया में इतनी विनाशकारी सामग्री इकट्ठी को चुकी है कि उससे सारी पृथ्वी को पंद्रह बार नष्ट किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रदूषण की समस्या बहुत बुरी तरह फैल गई है। नित्य नये असाध्य रोग पैदा होते जा रहे हैं, जो वैज्ञानिक साधनों के अंधाधुंध प्रयोग करने के दुष्परिणाम हैं।

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वैज्ञानिक प्रगति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम मानव-मन पर हुआ है। पहले जो मानव निष्कपट था, निःस्वार्थ था, भोला था, मस्त और बेपरवाह था, अब वह छली, स्वार्थी, चालाक, भौतिकवादी तथा तनावग्रस्त हो गया है। उसके जीवन में से संगीत गायब हो गया है, धन की प्यास जाग गई है। नैतिक मूल्य नष्ट हो गए हैं। जीवन में संघर्ष-ही-संघर्ष रह गए हैं। कविवर जगदीश गुप्त के शब्दों में-

संसार सारा आदमी की चाल देख हआ चकित।
पर झाँक कर देखो दृगों में, हैं सभी प्यासे थकित।।

वास्तव में विज्ञान को वरदान या अभिशाप बनाने वाला मनुष्य है। जैसे अग्नि से हम रसोई भी बना सकते हैं और किसी का घर भी जला सकते हैं; जैसे चाकू से हम फलों का स्वाद भी ले सकते हैं और किसी की हत्या भी कर सकते हैं; उसी प्रकार विज्ञान से हम सुख के साधन भी जुटा सकते हैं और मानव का विनाश भी कर सकते हैं। अतः विज्ञान को वरदान या अभिशाप बनाना मानव के हाथ में है। इस संदर्भ में एक उक्ति याद रखनी चाहिए ‘विज्ञान अच्छा सेवक है लेकिन बुरा हथियार।’

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