MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Additional Questions

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MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Additional Questions

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 अतिरिक्त परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दर्शाइए कि बिन्दु A(1, 2), B(-1,-16) और C(0, – 7) रैखिक समीकरण y = 9x – 7 के आलेख पर स्थित है। (2019)
हल:
बिन्दु A(1, 2) के निर्देशांकों का मान समीकरण में रखने पर,
∴ 9x – 7 = 9 x 1 – 7 = 9 – 7 = 2 = y.
⇒ दायाँ पक्ष = बायाँ पक्ष
बिन्दु B(-1, – 16) के निर्देशांकों का मान समीकरण में रखने पर,
∴ 9x – 7 = 9x (-1) – 7 = – 9 – 7 = – 16 = y
⇒ दायाँ पक्ष = बायाँ पक्ष
बिन्दु C(0, – 7) के निर्देशांकों का मान समीकरण में रखने पर,
∴ 9x – 7 = 9 (0) – 7 = 0 – 7 = – 7 =y
⇒ दायाँ पक्ष = बायाँ पक्ष अतः दिए हुए बिन्दु A, B एवं C समीकरण y = 9x – 7 के आलेख पर स्थित हैं।

प्रश्न 2.
रैखिक समीकरण 3x + 4y = 6 का आलेख खींचिए। यह आलेख X-अक्ष और Y-अक्ष को किन बिन्दुओं पर काटता हैं? (2019)
हल:
समीकरण 3x + 4y = 6 (दिया है)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 4
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 4a
अतः संलग्न चित्र 4.18 अभीष्ट आलेख है तथा यह आलेख -अक्ष को बिन्दु (2, 0) पर एवं Y-अक्ष को बिन्दु (0, 1\(\frac { 1 }{ 2 }\)) पर काटता है।
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प्रश्न 3.
वह रैखिक समीकरण जो फॉरेनहाइट (F) को सेल्सियस (C) में बदलती है, सम्बन्ध c = \(\frac { 5F – 160 }{ 9 }\) से दी जाती है।
(i) यदि तापमान 86°F है, तो सेल्सियस में तापमान क्या है ?
(ii) यदि तापमान 35°C है, तो फॉरेनहाइट में तापमान क्या है ?
(iii) यदि तापमान 0°C है तो फॉरेनहाइट में तापमान क्या है तथा यदि तापमान 0°F है, तो सेल्सियस में तापमान क्या है ?
(iv) तापमान का वह कौन-सा संख्यात्मक मान है जो दोनों पैमानों (मात्रको) में एक ही है ?
हल:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 5

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उस सरल रेखा से निरूपित समीकरण का आलेख खींचिए जो X-अक्ष के समानान्तर है और उसके नीचे 3 मात्रक की दूरी पर है।
उत्तर:
अभीष्ट चित्र संलग्न है।
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 6

प्रश्न 2.
उस रैखिक समीकरण का आलेख खींचिए जिसके हल उन बिन्दुओं से निरूपित हैं जिनके निर्देशांकों का योग 10 इकाई है।
हल:
प्रश्नानुसार, अभीष्ट समीकरण होगा : x + y = 10
यदि x = 0 तो 0 + y = 10 ⇒ y = 10
यदि x = 5 तो 5 + y = 10 ⇒ y = 10 – 5 = 5
यदि x = 10 तो 10 + y = 10 ⇒ y = 10 – 10 = 0
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 7
अतः उपर्युक्त चित्र अभीष्ट आलेख है।

प्रश्न 3.
समीकरण y = 2x + 1 का आलेख खींचिए। (2019)
हल:
निर्देशः उपर्युक्त प्रश्न के समीकरण की तरह हल कीजिए।

प्रश्न 4.
रैखिक समीकरण x + 2y = 8 का वह हल ज्ञात कीजिए जो निम्नलिखित पर एक बिन्दु निरूपित करता है:
(i) X-अक्ष
(ii) Y-अक्ष।
हल:
(i) चूँकि X-अक्ष पर बिन्दु की कोटि y = 0. इसलिए x + 2 x 0 = 8 ⇒ x + 0 = 8
⇒ x = 8
अतः समीकरण का अभीष्ट हल : x = 8, y = 0.

(ii) चूँकि Y-अक्ष पर बिन्दु की भुंज x = 0. इसलिए
0 + 2y = 8 ⇒ 2y = 8 ⇒ y = 8/2 = 4
अतः समीकरण का अभीष्ट हल : x = 0, y = 4.

प्रश्न 5.
मान लीजिए.y, x के अनुक्रमानुपाती है। यदि x = 4 होने पर y = 12 हो, तो एक रैखिक समीकरण लिखिए। जब x = 6, तोy का क्या मान है ?
हल:
चूँकि y α x
⇒ y = Cx
जब x = 4 होने पर y = 12 हो, तो
12 = C x 4
⇒ C = 12/4 = 3 C का मान समीकरण y = Cx में रखने पर,
y = 3x अतः अभीष्ट समीकरण : y = 3x.
अब x = 6 का मान समीकरण y = 3x में रखने पर,
y = 3 x 6 = 18
अतः एका अभीष्ट मान = 18.
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MP Board Class 9th Maths Chapter 4 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य लिखिए। अपने उत्तरों का औचित्य दीजिए।
(i) बिन्दु (0, 3) रैखिक समीकरण 3x + 4y = 12 के आलेख पर स्थित है।
(ii) रैखिक समीकरण x + 2y = 7 के आलेख बिन्दु (0, 7) से होकर जाता है।
(iii) सारणी :
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 8
से प्राप्त बिन्दुओं के निर्देशांक समीकरण x – y + 2 = 0 के कुछ हलों को निरूपित करते हैं।
(iv)दो चरों वाली रैखिक समीकरण के आलेख का प्रत्येक बिन्दु उस समीकरण का एक हल निरूपित नहीं करता है।
(v) दो चरों वाली रैखिक समीकरण के आलेख का एक सरल रेखा में होना आवश्यक नहीं है।
उत्तर:
(i) कथन सत्य है, क्योंकि बिन्दु के निर्देशांक समीकरण को सन्तुष्ट करते हैं।
(ii) कथन असत्य है, क्योंकि बिन्दु के निर्देशांक समीकरण को सन्तुष्ट नहीं करते हैं।
(iii) कथन सत्य है, क्योंकि बिन्दु (3, -5) के निर्देशांक समीकरण को सन्तुष्ट नहीं करते हैं।
(iv) कथन असत्य है, क्योंकि दो चरों वाली रैखिक समीकरण का प्रत्येक बिन्दु उस समीकरण का एक हल निरूपित करता है।
(v) कथन असत्य है, क्योंकि दो चरों वाली रैखिक समीकरण का आलेख सदैव एक सरल रेखा होती है।

प्रश्न 2.
वह रैखिक समीकरण लिखिए जिसकी कोटि उसके भुज से तीन गुनी है। (2019)
उत्तर:
y = 3x.

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रैखिक समीकरण 2x – 5y = 7 :
(a) का एक अद्वितीय हल है
(b) के दो हल हैं
(c) के अपरिमित रूप से अनेक हल हैं
(d) का कोई हल नहीं है।
उत्तर:
(c) के अपरिमित रूप से अनेक हल हैं

प्रश्न 2.
यदि (2,0) रैखिक समीकरण 2x + 3y = k का हल है, तो k का मान है :
(a) 4
(b) 6
(c) 5
(d) 2.
उत्तर:
(a) 4

प्रश्न 3.
रैखिक समीकरण 2x + 3y = 6 का आलेख -अक्ष को निम्नलिखित में से किस बिन्दु पर काटता
(a) (2, 0)
(b) (0, 3)
(c) (3, 0)
(d) (0, 2).
उत्तर:
(d) (0, 2).

प्रश्न 4.
X-अक्ष पर स्थित किसी बिन्दु का रूप होता है :
(a) (x, y)
(b) (0, y)
(c) (x, 0)
d) (x, 4).
उत्तर:
(c) (x, 0)
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प्रश्न 5.
रेखा y = x पर स्थित किसी बिन्दु का रूप होता है :
(a) (a, a)
(b) (0, a)
(c) (a, 0)
(d) (a, – a).
उत्तर:
(a) (a, a)

प्रश्न 6.
X-अक्ष की समीकरण का रूप है :
(a) x = 0
(b) y = 0
(c) x + y = 0
(d) x = y
उत्तर:
(b) y = 0

प्रश्न 7.
दो चरों वाला रैखिक समीकरण है : (2019)
(a) ax2 + bx + c = 0
(b) ax + b = 0
(c) ax3 + bx2 + c = 0
(d) ax + by + c = 0.
उत्तर:
(d) ax + by + c = 0.

प्रश्न 8.
x = 5, y = 2 निम्नलिखित रैखिक समीकरण का हल है:
(a) x + 2y = 7
(b) 5x + 2y = 7
(c) x + y = 7
(d) 5x + y = 7.
उत्तर:
(c) x + y = 7

प्रश्न 9.
रैखिक समीकरण 2x + 3y = 6 का आलेख एक रेखा है जो X-अक्ष को निम्नलिखित बिन्दु पर मिलती है:
(a) (0, 2)
(b) (2, 0)
(c) (3, 0)
(d) (0, 3).
उत्तर:
(c) (3, 0)
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प्रश्न 10.
(a, a) रूप का बिन्दु सदैव स्थित होता है :
(a) X-अक्ष पर
(b) Y-अक्ष पर
(c) रेखा y = x पर
(d) रेखा x + y = 0 पर।
उत्तर:
(c) रेखा y = x पर

प्रश्न 11.
(a,-a) रूप का बिन्दु सदैव रेखा पर स्थित होता है :
(a) x = a
(b) y = -a.
(c)y = x
(d) x + y = 0.
उत्तर:
(d) x + y = 0.

प्रश्न 12.
दो संख्याओं का योग 25 व अन्तर 5 है, तो वे संख्याएँ होंगी : (2018)
(a) 15, 10
(b) 20, 5
(c) 13, 12
(d) 30, 5
उत्तर:
(a) 15, 10

रिक्त स्थानों की पूर्ति
1. एक ऐसा समीकरण जिसका आलेख एक सरल रेखा होता है, …… समीकरण कहलाता है।
2. रैखिक समीकरण ax + by + c = 0 का आलेख एक ……..रेखा है।
3. x और y का मान युग्म (x, y) जो दिए हुए समीकरण ax + by + c = 0 को सन्तुष्ट करता है, उक्त समीकरण का ………. कहलाता है।
4. जब किसी समीकरण निकाय का कोई भी हल नहीं होता, तब निकाय ……….. निकाय कहलाता है।
5. जब किसी समीकरण निकाय का कोई हल होता है, तब निकाय …………. निकाय कहलाता है।
6. दो चरों वाले एक घात समीकरण का ग्राफ ………… को प्रदर्शित करता है। (2018)
7. यदि एक समीकरण x + 2y = 5 में x = 1 है, तब y का मान ……….. है। (2019)
उत्तर:
1. रैखिक,
2. सरल,
3. हल,
4. असंगत,
5. संगत,
6. सरल रेखा,
7. 2 (दो)।

जोड़ी मिलान
स्तम्भ ‘A’                                      स्तम्भ ‘B’
1. रेखाएँ सम्पाती हों                  (a) y का मान शून्य
2. रेखाएँ प्रतिच्छेदी हों               (b) x का मान शून्य
3. रेखाएँ समानान्तर हों             (c) अनन्ततः अनेक हल
4. रेखा X-अक्ष को काटे            (d) अद्वितीय हल
5. रेखा Y-अक्ष को काटे             (e) कोई हल नहीं
उत्तर:
1. → (c),
2. → (d),
3. → e),
4. → (a),
5. → (b)
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सत्य/असत्य कथन
1. समीकरण x + 2y = 5 में यदि x = 1 तो y = 2 होगा।
2. रैखिक समीकरण का आलेख एक वृत्त होता है।
3. दो चरों वाले एकघातीय समीकरण रैखिक समीकरण कहलाते हैं।
4. X-अक्ष का समीकरण x = 0 होता है। (2019)
5. Y-अक्ष, के समानान्तर रेखा का समीकरण x = + a होता है।
6. समीकरण x +2y = 3 का एक हल (1, 1) है। (2019)
7. बिन्दु (0, 5) समीकरण y = 5x + 5 का हल है। (2019)
8. मूल-बिन्दु से गुजरने वाली रेखा का आलेख y = kx रूप द्वारा प्रदर्शित होता है। (2019)
9. रैखिक समीकरण 2x -3y = 0 में चर 2 एवं – 3 है। (2019)
उत्तर:
1. सत्य,
2. असत्य,
3. सत्य,
4. असत्य,
5. सत्य,
6. सत्य,
7. सत्य,
8. सत्य,
9. असत्य।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. जब किसी समीकरण निकाय के अनन्ततः अनेक हल हों तो उसका आलेख कैसा होगा?
2. जब किसी समीकरण निकाय का अद्वितीय हल हो, तो उसका आलेख कैसा होगा?
3. जब किसी समीकरण निकाय का कोई हल न हो, तो उसका आलेख कैसा होगा?
4. यदि \(\frac { { a }_{ 1 } }{ { a }_{ 2 } } \neq \frac { { b }_{ 1 } }{ { b }_{ 2 } }\), तो निकाय का हल क्या होगा?
5. यदि \(\frac { { a }_{ 1 } }{ { a }_{ 2 } } =\frac { { b }_{ 1 } }{ { b }_{ 2 } }\neq \frac { { c }_{ 1 } }{ { c }_{ 2 } }\) तो निकाय का हल क्या होगा?
6. यदि \(\frac { { a }_{ 1 } }{ { a }_{ 2 } } =\frac { { b }_{ 1 } }{ { b }_{ 2 } }= \frac { { c }_{ 1 } }{ { c }_{ 2 } }\), तो निकाय का हल क्या होगा?
7. रैखिक समीकरण में चर राशि की उच्चतम घात होती है। (2018)
8. दो.चरों वाला एक रैखिक समीकरण लिखिए। (2019)
9. यदि x = 2, y = 1 समीकरण 2x + 3y =k का हल है, तब k का मान क्या होगा? (2019)
उत्तर:
1. सम्पाती रेखाएँ,
2. प्रतिच्छेदी रेखाएँ,
3. समानान्तर रेखाएँ,
4. अद्वितीय हल,
5. कोई हल नहीं,
6. अनन्ततः अनेक हल,
7. एक,
8. ax + by + c = 0,
9. 7 (सात)।

MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 4 Determinants Ex 4.6

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MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 4 Determinants Ex 4.6

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MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 1 प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व

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MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 1 प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व

प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व Important Questions

प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
एक शब्द या वाक्य में उत्तर दीजिए

  1. प्रबंध के कितने आधारभूत तत्व हैं ?
  2. प्रबंध की आवश्यकता किन-किन क्षेत्रों में होती है ?
  3. प्रबंध के तीन स्तर कौन से हैं ?
  4. प्रबंध का कौन-सा कार्य प्रबंध का आधारभूत (प्राथमिक) कार्य माना जाता है ?
  5. प्रबंध के उस स्तर का नाम लिखिए जिनमें कर्मचारियों के कार्यों को देखना शामिल है।
  6. यदि पिता प्रबंधक है और उसका पुत्र भी प्रबंधक है तो ऐसी प्रतिभा को क्या कहेंगे?
  7. व्यवस्थित ज्ञान को क्या कहते हैं ?
  8. दूसरों से कार्य कराने की कला किसे कहते हैं ?
  9. प्रबंध की सम्पूर्ण क्रियाएँ किससे संबंधित हैं ?
  10. पेशे के अन्तर्गत सदस्यों के व्यवहारों के मार्गदर्शन व नियंत्रण हेतु जो दिशा-निर्देश दिये जाते हैं,उसे क्या कहते हैं?
  11. नीतियाँ निर्धारित करना प्रबंध के किस स्तर का कार्य है ?
  12. समन्वय की आवश्यकता प्रबंध के किस स्तर पर होती है ?
  13. व्यक्तिगत कौशल के प्रयोग द्वारा वांछित परिणाम प्राप्त करना क्या कहलाता है ?
  14. प्रशिक्षण व अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान का सामाजिक हित हेतु प्रयोग करना क्या कहलाता है ?
  15. क्या प्रबंध में कला की सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं ?

उत्तर:

  1. पाँच
  2. सभी क्षेत्रों में
  3. प्रबंध के तीन स्तर होते हैं-(अ) उच्च स्तर, (ब) मध्य स्तर तथा (स) निम्न स्तर
  4. नियोजन
  5. पर्यवेक्षकीय स्तर/निम्न स्तर
  6. जन्मजात प्रतिभा
  7. विज्ञान
  8. प्रबंध
  9. मनुष्य से
  10. आचार संहिता
  11. उच्च स्तरीय प्रबंध का
  12. सभी तीनों स्तर पर
  13. कला
  14. पेशा
  15. हाँ, प्रबंध में कला की सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं।

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प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रबंध क्या है ?
उत्तर:
प्रबंध सर्वश्रेष्ठ तरीके से काम को करवाने की एक कला है।

प्रश्न 2.
प्रबंध का व्यवसाय में क्या महत्व है ?
उत्तर:
प्रबंध का व्यवसाय में वही महत्व है जो मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क का होता है।

प्रश्न 3.
शीर्ष स्तरीय प्रबंध में कौन-कौन से अधिकारी शामिल हैं ?
उत्तर:
शीर्ष स्तरीय प्रबंध में निम्न अधिकारी शामिल होते हैं

  1. संचालक मण्डल
  2. प्रबंध संचालक
  3. मुख्य प्रबंधक।

प्रश्न 4.
प्रबंध के पाँच एम से क्या आशय है ?
उत्तर:

  • प्रबंध के पाँच एम हैं-मानव (Men)
  • माल (Material)
  • मशीन (Machine)
  • मुद्रा (Money)
  • तथा विधि (Method)

यह प्रबंध के आधारभूत तत्व कहलाते हैं।

प्रश्न 5.
यह क्यों कहा जाता है कि प्रबंध सर्वव्यापक है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
क्योंकि प्रबंध की आवश्यकता सभी क्षेत्रों में है जैसे-व्यावसायिक, गैर-व्यावसायिक, राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्र आदि।

प्रश्न 6.
प्रबंध के पहले और अंतिम कार्य को लिखिए।
उत्तर:
नियोजन प्रबंध का प्रथम कार्य और नियंत्रण प्रबंध का अंतिम कार्य है।

प्रश्न 7.
प्रबंध का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
प्रबंध से आशय दूसरों से कार्य कराने की कला से है। प्रबंध के अन्तर्गत इस बात को शामिल किया जाता है कि उपक्रम में कर्मचारियों द्वारा अच्छे से अच्छा कार्य कैसे कराया जाये ताकि न्यूनतम समय में न्यूनतम लागत पर अधिकतम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रबंध को बहुरूपीय अवधारणा क्यों माना गया है ?
उत्तर:
प्रबंध को बहुआयामी अवधारणा इसलिए माना जाता है क्योंकि इसमें बहुत-सी क्रियायें शामिल होती हैं। उनमें से तीन मुख्य क्रियायें निम्नलिखित हैं

  1. कार्य का प्रबंध- उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कार्य का प्रबंध करना।
  2. लोगों का प्रबंध- कर्मचारियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं की देखभाल करना, व्यक्तियों के समूहों की देखभाल करना आदि।
  3. प्रचालन का प्रबंध- आगतों का क्रय करना तथा उन्हें अर्द्ध निर्मित वस्तुओं में बदलना।

प्रश्न 2.
प्रबंध की किन्हीं तीन विशेषताओं को समझाइये।
उत्तर:
प्रबंध की विशेषताएँ
1. प्रबंध के सिद्धान्त गतिशील हैं – प्रबंध अपने समक्ष नित्य प्रति उपस्थित समस्याओं का सूक्ष्म विश्लेषण करता है और तद्नुसार गंभीर निर्णय लेकर उसे कार्यान्वित करता है। प्रबंध सामाजिक परिवर्तन के साथ – साथ प्रबंध तकनीक में नवीनता लाने का प्रयास करता है। इससे स्पष्ट है कि प्रबंध सामाजिक परिवर्तन को अधिक गतिशीलता प्रदान करता है।

2. प्रबंध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है – प्रबंध में नियोजन, क्रियान्वयन, नियंत्रण, समन्वय, अभिप्रेरण, निर्देशन इत्यादि सम्मिलित हैं, जिनकी सहायता से पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हो सकती है।

3. प्रबंध का निश्चित उद्देश्य होता है – प्रत्येक प्रबंधकीय प्रक्रिया का विशिष्ट उद्देश्य होता है, जिसका निर्धारण प्रशासन द्वारा किया जाता है।

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प्रश्न 3.
प्रबंध के सहायक कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रबंध के सहायक कार्य निम्नलिखित हैं
1. नवप्रवर्तन-सामान्यतः नवप्रवर्तन या नवाचार का आशय उत्पादन के लिए नई डिजाइन, एक नवीन . उत्पादन विधि या नवीन विपणन तकनीक से है। नवप्रवर्तन प्रबंध का महत्वपूर्ण सहायक कार्य है। इस हेतु बड़ेबड़े व्यापार गृह शोध एवं विकास विभाग की पृथक से स्थापना करते हैं।

2. संप्रेषण-संदेशवाहन या संचार व्यवस्था अथवा संप्रेषण का अभिप्राय दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य विचारों व तथ्यों के आदान-प्रदान से है। संप्रेषण के माध्यम से प्रबंधक संस्था के लक्ष्यों, उद्देश्यों, नीतियों, आदेशों, कार्यक्रमों के बारे में कर्मचारियों को अवगत कराता है। यह प्रबंध का आधुनिक कार्य है।

3. निर्णयन-संस्था या उपक्रम की क्रियाओं में प्रवर्तन से लेकर समापन तक की सभी अवस्थाओं में निर्णय लेने पड़ते हैं। निर्णयन एक बौद्धिक प्रक्रिया है, जिसमें सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन किया जाता है। यह प्रबंध का महत्वपूर्ण सहायक कार्य है।

प्रश्न 4.
उच्चस्तरीय प्रबंध के कार्य लिखिए।
उत्तर:
उच्चस्तरीय प्रबंध के निम्न कार्य होते हैं –

  1. उपक्रम के उद्देश्यों को निर्धारित करना।
  2. संस्था के ट्रस्टी के रूप में उसकी रक्षा करना।
  3. मुख्य अधिशासी का चयन करना।
  4. संस्था की उपलब्धियों व परिणामों की जाँच करना।
  5. बजट को पारित करना।
  6. आय का उचित वितरण करना ।
  7. महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करना।
  8. व्यवसाय के दीर्घकालीन स्थायित्व के लिए प्रयास करना।

प्रश्न 5.
मध्यस्तरीय प्रबंध के कार्य लिखिये।
उत्तर:
मध्यस्तरीय प्रबन्ध के कार्य निम्न हैं –

  1. मुख्य अधिशासी की क्रियाओं में सहायता प्रदान करना।
  2. संचालनात्मक निर्णयों में सहयोग करना।
  3. प्रतिदिन के परिणामों से सम्पर्क बनाये रखना ।
  4. उत्पादन की उपलब्धियों की समीक्षा करना।
  5. उच्चस्तरीय प्रबन्ध द्वारा तय की गई सीमाओं के मध्य निर्धारित नीतियों का क्रियान्वयन करना ।
  6. अधीनस्थों के कार्यों का मूल्यांकन।
  7. उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु योजनायें तैयार करना ।
  8. उच्च व निम्न स्तर के मध्य उचित समन्वय व संप्रेषण का कार्य करना।

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प्रश्न 6.
निम्नस्तरीय प्रबंध के कार्य लिखिए।
उत्तर:
निम्नस्तरीय प्रबंध के निम्न कार्य होते हैं –

  1. संस्था के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की पूर्ति हेतु योजनायें बनाना।
  2. कर्मचारियों को कार्य सौंपना।
  3. प्रति घण्टा कार्य एवं परिणामों पर निगरानी रखना ।
  4. त्रुटि के स्रोत स्थल पर निगाहें रखकर उचित कदम उठाना।
  5. उत्पादन कर्मचारियों से व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाये रखना।
  6. आवश्यकतानुसार कर्मचारियों से सम्पर्क बनाये रखना।
  7. कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन करना।
  8. कर्मचारियों के हितों, सुविधाओं का ध्यान रखकर मध्यम प्रबन्धकों को उचित सूचना देना।

प्रश्न 7.
प्रबंध के उद्देश्यों को संक्षेप में समझाइये।
उत्तर:
एक प्रभावी प्रबंध के उद्देश्य निम्नलिखित होते हैं –

1. न्यूनतम प्रयासों से अधिकतम परिणाम प्राप्त करना – प्रमुखतः यह व्यापार के उद्देश्यों पर आधारित होता है जिसमें यह प्रयास किया जाता है कि कम-से-कम प्रयास, लागत व समय में अधिक-सेअधिक परिणाम प्राप्त किये जा सके अर्थात् उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक संसाधनों के प्रयोग से अच्छे-सेअच्छे परिणामों को प्राप्त करना ही प्रबंध का प्रमुख लक्ष्य होता है।

2. नियोक्ता एवं कर्मचारी का विकास करना- एक अच्छा प्रबंध नियोक्ता एवं कर्मचारी दोनों का विकास करता है क्योंकि दोनों ही समाज के अंग होते हैं।

3. श्रम व पूँजी में समन्वय बनाये रखना- किसी भी उपक्रम में दो प्रमुख वर्ग होते हैं, प्रबंध का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य श्रम व पूँजी में सामंजस्य बनाये रखना है।

प्रश्न 8.
समन्वय और सहयोग में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समन्वय और सहयोग में अन्तर –
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 1 प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व image - 1

प्रश्न 9.
प्रबंध, प्रशासन तथा संगठन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
प्रशासन एवं प्रबंध में कोई तीन अंतर अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबंध, प्रशासन तथा संगठन में अन्तर –
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 1 प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व image - 2

प्रश्न 10.
प्रबंध और संगठन में कोई तीन अंतर बताइये।
उत्तर:
प्रबंध और संगठन में अन्तर –
MP Board Class 12th Business Studies Important Questions Chapter 1 प्रबंध-प्रकृति एवं महत्व image - 3

प्रश्न 11.
“प्रबंध को जन्मजात एवं अर्जित प्रतिभा कहा गया है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबंध एक जन्मजात एवं अर्जित प्रतिभा है – प्रबंधक जन्मजात होते हैं इसका आशय यही है कि प्रबंधक मनुष्य के पारिवारिक गुणों से बनते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि कुछ व्यक्ति जन्म से ही योग्य, चतुर तथा अनुभवी होते हैं और वे दूसरों पर नियंत्रण तथा नेतृत्व अच्छी तरह से कर सकते हैं। जिस प्रकार एक गायक का गला, नर्तकी के पैर ईश्वर की देन होते हैं उसी प्रकार एक प्रबंधक की प्रबंध शैली ईश्वर की देन है। आज प्रबंध की नई-नई तकनीक विकसित हो गई है।

प्रबंधक तैयार करने हेतु विभिन्न विश्वविद्यालयों, राज्य स्तर, राष्ट्रीय स्तर तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संस्थान प्रारम्भ किये जा चुके हैं । आज एक ऐसा व्यक्ति भी श्रेष्ठ प्रबंध कार्य सम्पन्न कर सकता है जिसे प्रबंध का गुण जन्मजात न मिला हो। अतः प्रबंध एक जन्मजात प्रतिभा भी है और साथ-साथ अर्जित प्रतिभा भी।

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प्रश्न 12.
प्रबंध को बहुआयामी अवधारणा क्यों माना गया है ?
उत्तर:
प्रबंध के अंतर्गत बहुत-सी क्रियायें शामिल होती हैं इसलिए इसे बहुआयामी अवधारणा माना गया है। कुछ प्रमुख क्रियाएँ निम्नलिखित हैं

  1. कार्य का प्रबंध-इसके अंतर्गत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कार्यों का प्रबंध करना होता है।
  2. लोगों का प्रबंध-इस क्रिया में कर्मचारियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं की देखभाल करना तथा व्यक्तियों के समूहों की देखभाल की जाती है।
  3. प्रचालन का प्रबंध-इसके अंतर्गत आगतों का क्रय करना तथा उन्हें अर्द्ध-निर्मित वस्तुओं में बदलना आता है।

प्रश्न 13.
“प्रबंध सभी स्तरों में आवश्यक है।” स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
संगठन किसी भी स्तर का क्यों न हो उसमें प्रबन्ध का अस्तित्व अवश्य रहता है। सामान्यतः प्रबन्ध के तीन स्तर होते हैं उच्च, मध्यम व निम्नस्तरीय प्रबन्ध । उच्च स्तर पर संचालक मंडल एवं जनरल मैनेजर प्रबन्धकीय कार्य देखते हैं, जबकि मध्यम स्तर पर विभिन्न विभागों के विभाग प्रमुख प्रबन्ध का कार्य करते हैं। निम्न स्तर पर निर्णयों की अपेक्षा पर्यवेक्षण सम्बन्धी कार्य अधिक किये जाते हैं। इस प्रकार संगठन के सभी स्तरों पर प्रबन्ध आवश्यक है।

प्रश्न 14.
प्रबंध के विभिन्न स्तरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रबंध के निम्नलिखित तीन स्तर हैं –

1. उच्चस्तरीय प्रबंध-किसी उपक्रम के प्रबंध स्तरों में उच्चस्तरीय प्रबंध का स्थान सर्वोपरि होता है। एक वृहत् आकार के उपक्रम के उद्देश्य व नीतियों को सामान्यतः संचालक मण्डल द्वारा निर्धारित किया जाता है। संचालक मण्डल के कार्यों का वास्तविक निष्पादन प्रबंध संचालक या महाप्रबंधक करते हैं, जिसे मुख्य अधिशासी कहते हैं। मुख्य अधिशासी का प्रमुख कार्य संचालक मण्डल द्वारा जारी निर्देशों, नीतियों को जारी करना और उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक क्रियायें करना होता है।

2. मध्यस्तरीय प्रबंध-1940 के दशक में मेरी कुशिंग नाइल्स ने मध्यस्तरीय प्रबंध की विचारधारा को विकसित किया था। इस स्तर में विभागीय प्रबंधक जैसे-उत्पादन प्रबंधक, विपणन प्रबंधक, वित्त प्रबंधक, कर्मचारी तथा इनके समीपस्थ नीचे के अधिकारी जिनमें अधीक्षक, उपाध्यक्ष आदि को शामिल किया जाता है।

3.पर्यवेक्षणीय या निम्न स्तर प्रबंध-प्रबंधकीय स्तरों में पर्यवेक्षणीय प्रबंध निम्न स्तर का होता है। इसलिए इसे प्रथम पंक्ति का प्रबंध भी कहा जाता है। इस स्तर पर मुख्यतः फोरमैन, पर्यवेक्षक या कार्यालय पर्यवेक्षकों को शामिल किया जाता है। इस स्तर के प्रबंधकों का मुख्य कार्य यह देखना होता है कि उनके अधीनस्थ कर्मचारियों ने कार्य ठीक ढंग से किया है या नहीं। इस स्तर के प्रबंधकों का कार्य कर्मचारियों की नीतियाँ स्पष्ट करना, आवश्यक स्तर या प्रमाप निर्धारित करना, अनुदेश देना, मार्ग प्रशस्त करना, अभिप्रेरणा देना आदि है।

प्रश्न 15.
मध्यम स्तरीय प्रबंध क्या है ? इसके प्रमुख कर्त्तव्य बताइए।
उत्तर:
1940 के दशक में “मेरी कुशिंग नाइल्स” ने मध्यस्तरीय प्रबंध की विचारधारा को विकसित किया था। इस स्तर में विभागीय प्रबंधक जैसे- उत्पादन प्रबंधक, विपणन प्रबंधक, वित्त प्रबंधक, कर्मचारी तथा इनके समीपस्थ नीचे के अधिकारी, उपाध्यक्ष आदि को शामिल किया जाता है। “मेरी कुशिंग नाइल्स” के अनुसार- “उच्च स्तर एवं निम्न स्तर के मध्य के अधिकारी ही मध्य स्तरीय प्रबंध में शामिल किए जाते हैं।”

“फिफनर एवं शेरवुड” के अनुसार- “मध्य स्तरीय प्रबंध में क्रय प्रतिनिधियों, एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने वाले विभागों, प्रमुख कार्यालय प्रबंधकों, उत्पादन प्रबंधकों और विभागीय संग्रहकर्ताओं को शामिल किया जाता है।”

मध्य स्तरीय प्रबंध के कार्य / कर्त्तव्य –

  1. मुख्य अधिशासी की क्रियाओं में सहयोग प्रदान करना।
  2. संचालनात्मक निर्णयों में सहयोग करना।।
  3. प्रतिदिन के परिणामों में सहयोग के साथ संपर्क बनाये रखना।
  4. उत्पादन की उपलब्धियों की समीक्षा करना।
  5. समय-समय पर कर्मचारियों का मूल्यांकन करना।

प्रश्न 16.
प्रबंध के सामाजिक उत्तरदायित्व को समझाइये।
उत्तर:
प्रबंध के छः सामाजिक उत्तरदायित्व निम्न हैं –

  1. उपभोक्ता के प्रति-उपभोक्ताओं को पर्याप्त मात्रा में श्रेष्ठ कोटि एवं सस्ती वस्तुएँ व सेवाएँ उचित समय पर उपलब्ध करानी चाहिए।
  2. सरकार के प्रति-सरकार द्वारा प्रतिपादित नीतियों, नियमों व कानून का पूर्णरूप से पालन करना, करों का पूर्ण भुगतान करना।
  3. पर्यावरण के क्षेत्र-विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को रोकने हेतु उचित उपाय करना, वृक्षारोपण करना व सरकार द्वारा चलाये जा रहे पर्यावरण योजनाओं में सहयोग प्रदान करना।

प्रश्न 17.
प्रबंध प्रक्रिया है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबंध प्रक्रिया के रूप में- प्रक्रिया से अभिप्राय चरणों की श्रृंखला से है। एक प्रक्रिया के रूप में प्रबंध का अर्थ परस्पर संबंधित कार्यों की एक श्रृंखला से है ताकि मानवीय तथा अन्य संसाधनों के प्रभावपूर्ण उपयोग द्वारा संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। इस प्रक्रिया में नियोजन, संगठन, नियुक्तिकरण, निर्देशन तथा नियंत्रण कार्य शामिल है। प्रबंध को एक प्रक्रिया इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें कार्यों की एक क्रमबद्ध श्रृंखला होती है जो निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करने में योगदान देती है।

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प्रश्न 18.
समन्वय में आने वाली कठिनाइयाँ एवं उनका समाधान बताइए।
उत्तर:
समन्वय में आने वाली कठिनाइयाँ एवं उनके समाधान निम्नलिखित हैं –

1. संस्थागत एवं व्यक्तिगत उद्देश्यों में भिन्नता (Difference in organisational and individual objectives)—यह तो निर्विवाद सत्य है कि संस्था एवं उसमें काम करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्य भिन्न होंगे क्योंकि संस्था चाहेगी कि उसको अधिकतम लाभ मिले जबकि कर्मचारी वर्ग चाहेगा कि उनको अधिकतम वेतन मिले। यदि कर्मचारी वर्ग ईमानदारी व सत्यनिष्ठा से काम करे तो दोनों के उद्देश्य एक ही समय में पूरे हो सकते हैं और समन्वय स्थापित करने में कठिनाई भी नहीं आएगी।

इसके विपरीत यदि कर्मचारी वर्ग केवल अपने उद्देश्यों की ओर ही ध्यान देता है तो उनका ऐसा व्यवहार समन्वय के मार्ग में बाधा उत्पन्न करेगा। संस्थागत एवं व्यक्तिगत उद्देश्यों में अंतर को समाप्त करने के लिए संस्था के प्रत्येक व्यक्ति को यह देखना होगा कि संस्था के उद्देश्य में उसका क्या योगदान है।

2. विभिन्न व्यक्तियों के उद्देश्यों में भिन्नता (Difference in individual objectives)-संस्था में कार्यरत विभिन्न व्यक्तियों के उद्देश्य भिन्न हो सकते हैं जिसके कारण सभी की कार्यप्रणाली में भिन्नता आ जाती है और अंततः समन्वय में इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए सभी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर समान उद्देश्य निश्चित कर लेने चाहिए और उन्हें प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

3. कार्य प्रगति मूल्यांकन के प्रमापों में भिन्नता (Problem in the measurement and evaluation of work progress) -विभिन्न विभागों में एक जैसे कार्य की प्रगति मूल्यांकन के प्रमाप भिन्न हो सकते हैं। संस्था का ऐसा व्यवहार कर्मचारियों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करता है जिसका समन्वय पर विपरीत प्रभाव पड़ता इस समस्या से निपटने के लिए उच्च प्रबंधक को चाहिए कि एक जैसा काम करने वाले सभी कर्मचारियों की प्रगति का मूल्यांकन करने के प्रमाप समान रखे ताकि वे संस्था के प्रति अधिक निष्ठावान रहें।

4. जटिल संगठनात्मक ढाँचा (Complex organisational structure)- कई बार देखा जाता है कि संस्था का संगठनात्मक ढाँचा अस्पष्ट होता है अर्थात् यह स्पष्ट नहीं होता कि कौन किसका अधिकारी है और कौन अधीनस्थ । कई बार कर्मचारियों के अधिकार एवं दायित्व भी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किये जाते। ऐसी स्थिति में समन्वय में बाधा आती है।

इस समस्या के समाधान के लिए उच्च प्रबंधक को चाहिए कि स्पष्ट एवं सरल संगठनात्मक ढाँचा तैयार करें।

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प्रश्न 19.
एक भूमंडलीय प्रबंधक के सामने कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
एक भूमंडलीय (global) प्रबंधक के सामने निम्न प्रकार की चुनौतियाँ आती हैं देश में प्रबंधक के रूप में (In the form of Manager)-एक भूमंडलीय प्रबंधक के स्थानीय कार्यालय अथवा व्यवसाय में साझीदार के रूप में अपने देश की विधिक एवं व्यावसायिक उपस्थिति की स्थापना करनी होती है। वह ग्राहक, वकील एवं अप्रवासी अधिकारियों सहित विधिक इकाई के साथ संपर्क साधता है एवं उनसे सौदेबाजी करता है क्योंकि सेवाओं में यू.एस.ए. यूरोप में कार्य करने के लिए भारत में तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है।

वह भर्ती की सेवाएं प्रदान करने वाली स्थानीय कंपनियों से भी बातचीत करता है। वह एक और अहम् भूमिका निभाता है। वह बाह्यस्रोतीकरण (outsourcing) एवं वैश्विक सुपुर्दगी के कारण विपरीत सांस्कृतिक एवं बहु-सांस्कृतिक अवसरों के सकारात्मक प्रभाव पर जोर देकर अपने भावी ग्राहकों में सहजता की भावना पैदा करता है। इसके कारण उत्पन्न किसी भी शंका का समाधान भी करता है।

एक कार्यात्मक प्रबंधक के रूप में (In the form of divisional head)-वैश्विक प्रबंधक को यह सुनिश्चित करना होता है कि वह सही तकनीकी कौशल की भर्ती कर सकता है, इस कौशल से एक दृढ़ संसाधन के आधार का निर्माण कर सकता है एवं बहुत समय-क्षेत्र के रूप में भूमंडलीय कार्यवातावरण में इन दक्ष कर्मचारियों से काम लेकर सॉफ्टवेयर की कार्य योजनाओं को पूरा सकता है। इसके लिए वह उन व्यावसायिक चक्र जिसके अंतर्गत ग्राहक का व्यवसाय चलता है, पर आधारित ग्राहक की प्राथमिकताओं को समझ सकता है, जिन प्रक्रियाओं एवं पद्धतियों से ग्राहक परिचित है उनको समझ सकता है एवं उन्हें अपना सकता है और अंत में इस कार्य में ग्राहक की अपेक्षाओं का प्रबंधन सम्मिलित है।

इस प्रबंध में कार्यात्मक प्रबंधक को ग्राहक की प्राथमिकताओं के अनुरूप भारत एवं यू.एस.ए. अथवा यूरोप में क्रियाओं में समन्वय करना होता है, यह बताना होता है कि क्या संभव है और क्या संभव नहीं है तथा इसी के अनुसार अपने कर्मचारियों की अपेक्षाओं एवं संतुष्टि के स्तरों का प्रबंध करना होता है।

व्यवसाय के नेतृत्व के रूप में (In the form of leader)- भूमंडलीय प्रबंधक को बदलती हुई व्यावसायिक परिस्थितियों एवं ग्राहक की प्राथमिकताओं के प्रति सचेत रहना होता है। उसे बाह्यस्रोतीकरण में प्रवृतियों की पहचान करनी होती है एवं उसमें मिलने वाले अवसरों, संभावित जोखिमों के पूर्वानुमान की क्षमता का होना आवश्यक है।

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प्रश्न 20.
“प्रबंध एक प्रणाली है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबंध एक प्रणाली है। प्रणाली में निम्न विशेषताएँ होती हैं –

  1. प्रत्येक प्रणाली की एक उप प्रणाली होती है।
  2. प्रत्येक प्रणाली का एक निश्चित उद्देश्य होता है।
  3. प्रत्येक प्रणाली अपनी सभी प्रणालियों में समन्वय बनाये रखती हैं।
  4. प्रणाली में सन्देशवाहन गतिमान रहना चाहिए।
  5. एक प्रणाली को अन्य प्रणालियों से अलग नहीं किया जा सकता है।
    उपर्युक्त विशेषताएँ प्रबंध में निहित हैं, अतः हम प्रबंध को एक प्रणाली कह सकते हैं।

प्रश्न 21.
“प्रबंध एक पेशा है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पेशा कहलाने हेतु किसी व्यवसाय में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए

  1. पेशे में विशिष्ट एवं क्रमबद्ध ज्ञान का होना आवश्यक है।
  2. पेशे में तकनीकी ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।
  3. पेशे का उद्देश्य सेवा करना होता है।
  4. पेशे का ज्ञान कुछ विशिष्ट संस्थाओं से ही लिया जा सकता है।
  5. पेशा कार्य के बदले पारिश्रमिक आवश्यक है, अनिवार्य नहीं।

प्रश्न 22.
भारत में प्रबन्ध का क्या महत्त्व है ? समझाइए।
अथवा
पंचवर्षीय योजनाओं को ध्यान में रखते हुए भारत में प्रबन्ध के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु प्रबन्धकों की मांग में निरन्तर वृद्धि हो रही है। नियोजित विकास के लक्ष्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त करने के लिए भारत को अपनी प्रबन्धकीय कुशलता व गुण दोनों में · वृद्धि करनी है। भारत में निम्नांकित कारणों से प्रबन्ध का महत्त्व और भी अधिक है –

  1. देश में पंचवर्षीय योजनाओं को सफल बनाने की दृष्टि से।
  2. देश के आर्थिक विकास को गति प्रदान करने की दृष्टि से।
  3. देश के मानवीय तथा प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग हेतु।
  4. प्रतियोगिताओं का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए।
  5. सरकारी तन्त्र में कुशलता के लिए।

प्रश्न 23.
समन्वय का महत्व लिखिए।
उत्तर:
व्यवसाय व्यापार हो या कोई भी संगठन या संस्था बिना समन्वय के कभी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकती। किसी टीम की सफलता भी समन्वय पर आधारित होती है। बिना समन्वय के ना तो हवाई जहाज उड़ाया जा सकता है और न ही समुद्री जहाज को आगे बढ़ाया जा सकता है। किसी उपक्रम में समन्वय के महत्व . को बताते हुए कूण्ट्ज एवं ओ. डोनेल ने कहा है कि “समन्वय प्रबंध का एक कार्य ही नहीं हैं, अपितु प्रबंध का सार (Essence) भी है।” अतः स्पष्ट है कि प्रबंधकीय क्षेत्र में समन्वय का विशिष्ट स्थान है। समन्वय के महत्व को निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है।

1. एकता को बल-समन्वय रहने से उचित तालमेल बना रहता है। उचित तालमेल से कर्मचारियों में एकता बनी रहती है तथा एकता से ही शक्ति प्राप्त होती है, शक्ति से विकास के मार्ग खुल जाते हैं । अतः समन्वय से विकास होता है तथा प्रबन्धकीय कर्मचारियों में एकता बनी रहती हैं।

2. विकास का बढ़ावा किसी भी संस्था या व्यवसाय का विकास उस समय ही सम्भव है जब वहाँ के उत्पादन के समस्त साधनों व विभागों के मध्य उचित समन्वय हो। समन्वय के बिना विकास की बात करना रेत पर महल बनाने जैसा होगा। समन्वय से विकास की गति तीव्र होती है।

3. प्रमाप एवं विशिष्टीकरण को प्राप्त करना-अपने उत्पादन के स्तर को निर्धारित प्रमाप पर लाने के लिये सभी वर्गों व उत्पत्ति के साधनों में उचित समन्वय आवश्यक है, ताकि एक-दूसरे की समस्याओं को सुनकर या देखकर उसका समाधान किया जा सके।

4. उपलब्ध साधनों का सदुपयोग-किसी भी संस्था या उपक्रम में विकास के साधन सीमित होते हैं। अतः उनका अधिकतम उपयोग हो इसके लिए उत्पादन के विभिन्न साधनों के मध्य समन्वय आवश्यक है। उचित समन्वय को कार्यों में पुनरावृत्ति (दोहराव) नहीं होती। जिससे धन, सामग्री व समय की बचत होती है तथा उपलब्ध साधन का उचित व अधिकतम उपयोग सम्भव हो पाता है।

प्रश्न 24.
प्रबंध की प्रमुख सीमाओं को समझाइए।
उत्तर:
प्रबंध की आवश्यकता सर्वव्यापी है, किन्तु इसकी कुछ सीमाएँ हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. प्रबंध का कार्य मनुष्य से संबंधित है जो मानवीय स्वभाव से प्रभावित रहता है। प्रत्येक मनुष्य का आचरण पृथक्-पृथक् होता है, अतः सभी के लिए एक निश्चित प्रणाली नहीं अपनायी जा सकती है।
  2. प्रबंध के सिद्धान्त तकनीकीगत प्रक्रियाओं आविष्कारों, संगठन की रुचि, मनोविज्ञान आदि पर आधारित होते हैं, अतः प्रबंध का कोई सिद्धांत स्थायी रूप से लागू नहीं होता है।
  3. प्रबंध के कार्य उस संस्था के उद्देश्य, नीति व परिस्थितियों के अनुरूप होते हैं, अतः किसी एक संस्था के अनुभव को अन्य संस्थाओं में लागू नहीं किया जा सकता है, क्योंकि प्रत्येक संस्था का अपना अलग उद्देश्य,संगठन व कार्यप्रणाली होती है।
  4. प्रबंध के पास नेतृत्व, निर्णयन व नियंत्रण के अधिकार होते हैं, अतः प्रबंध के स्वभाव में नौकरशाही, लालफीताशाही व तानाशाही जैसी दूषित मनोवृत्तियाँ जन्म ले लेती हैं, जिससे संस्था का कार्य सीमित हो जाता है।

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प्रश्न 25.
प्रबंध के प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर:
प्रबन्ध के निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं

1. नियोजन (Planning) – प्रबन्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्राथमिक कार्य नियोजन करना है। शील्ड (Shield) के शब्दों में “योजना विभाग प्रबन्ध का हृदय है जिसका एकमात्र कार्य उत्पादन के विभिन्न पहलुओं में कार्यरत कर्मचारियों की आवश्यकताओं को पूरा करना है।” नियोजन के अन्तर्गत किसी कार्य को किस प्रकार, किस व्यक्ति से, कहाँ पर, किस विधि से, कितने समय में पूरा करना है, इसकी रूपरेखा तैयार कर ली जाती है ताकि निर्धारित अवधि में लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। इस हेतु पूर्वानुमान (Forecasting) लगाया जाता है। प्रो. टेरी ने कहा है “नियोजन भविष्य के गर्भ में देखने की विधि है।” (Planning is a method of looking ahead)।

2. संगठन (Organization)- संगठन प्रबन्ध का दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य है। “बिना संगठन के कोई भी प्रबन्ध जीवित नहीं रह सकता।” मानव व मशीन का सामूहिक प्रयास जो पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये कार्य करता है संगठन कहलाता है। संगठन दो या अधिक व्यक्तियों का समूह होता है। मजबूत संगठन के बिना प्रबन्ध अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, प्रबन्ध संगठन को मजबूत व प्रभावी बनाता है। व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग के विभिन्न साधनों में प्रभावपूर्ण सामन्जस्य स्थापित करना ही संगठन है।

3. नियुक्तियाँ (Staffing)- प्रबन्ध का तीसरा महत्त्वपूर्ण कार्य कर्मचारियों की नियुक्ति करना है, क्योंकि बिना कर्मचारी के संगठन नहीं और बिना संगठन के प्रबन्ध नहीं हो सकता। नियुक्ति कार्य हेतु बड़े-बड़े उत्पादन (उपक्रम) में अलग से विवर्गीय विभाग (Personnel Deptt.) खोला जाता है और इसी विभाग द्वारा नियुक्तियाँ की जाती हैं। कार्य पर नियुक्ति करने के पूर्व “व्यक्ति कार्य के लिये व कार्य व्यक्ति के लिये” (Man to job and job to man) के सिद्धांत का पालन करना चाहिये। यह प्रबन्ध द्वारा ही सम्भव है।

4. संचालन (Direction)- संचालन, प्रबन्ध का चतुर्थ महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसे निर्देशन या नेतृत्व भी कहा जाता है। प्रबन्ध मस्तिष्क की भाँति होता है अतः इसका कार्य सम्पूर्ण व्यवसाय व उद्योग को संचालित करना होता है। वह अन्य कर्मचारियों को आवश्यक कार्य करने हेतु निर्देश देने का काम करता है। चूँकि कार्ययोजना प्रबन्ध द्वारा ही तैयार की जाती है। इसलिए संचालन या दिशा-निर्देश सम्बन्धी कार्य भी प्रबन्ध द्वारा ही किये जाते हैं।

प्रश्न 26.
जैक वैलश (Jack Welch) जो जी.ई. का सी. ई. ओ. (CEO) था, प्रबंधकों की सफलता के लिए कौन-कौन से संकेत दिए/लिखे ?
उत्तर:
जैक वैलश (Jack Welch) ने प्रबंधकों को सफलता के लिए निम्नलिखित संकेत दिये –

  1. स्वप्न देखो और फिर इस स्वप्न को वास्तविकता में बदलने के लिए अपने संगठन में ऊर्जा दो।
  2. सामरिक (strategic) महत्व के मामलों पर ध्यान केन्द्रित करो।
  3. मुख्य समस्या पर ध्यान केन्द्रित करो।। 4. प्रत्येक का योगदान लो एवं उच्च विचार जहाँ से भी मिले उनका स्वागत करो। 5. उदाहरण प्रस्तुत कर नेतृत्व प्रदान करो।

प्रश्न 27.
प्रबंध की प्रकृति या विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1.रबन्ध एक प्रक्रिया है- प्रबन्ध एक प्रक्रिया है तथा यह प्रक्रिया उस समय तक चलती रहती है, जब तक निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो जाती, इसमें नियोजन, क्रियान्वयन, अभिप्रेरण, निर्देशन आदि शामिल रहते हैं, जिनकी सहायता से लक्ष्य प्राप्त होते हैं।

2. प्रबन्ध एक पेशा है- आज के औद्योगिक युग में प्रबन्ध एक पेशे के रूप में विकसित हुआ है तथा लगातार इसकी आवश्यकता व माँग बढ़ती जा रही है, इसी कारण आज कई संस्थानों में हम प्रशिक्षित एवं पेशेवर प्रबन्धक को संगठनों के शीर्ष पदों पर देख सकते हैं।

3. अदृश्य कौशल- प्रबन्ध को देखा नहीं जा सकता है, यह कार्य के परिणाम के रूप में हमारे सामने आता है, यदि कार्य के प्रयास सफल होते हैं, तो वह अच्छा प्रबन्ध कहलाता है। इसके विपरीत यदि कोई असफल होते हैं तो वहाँ पर प्रबन्ध की अकुशलता साबित होती है।

4. सामूहिक प्रयास- प्रबन्ध में सामूहिक प्रयासों पर ध्यान दिया जाता है, व्यक्ति विशेष पर ध्यान नहीं दिया जाता है, दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि एकता के साथ सामूहिक में संस्था के लिए कार्य करना प्रबन्ध का लक्ष्य होता है।

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प्रश्न 28.
समन्वय का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा उसकी हमारे जीवन में क्या आवश्यकता है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समन्वय-उत्पत्ति के विभिन्न साधनों को तथा उनके कार्यों को एक सूत्र में बाँधना तथा क्रमबद्ध करना ताकि वे सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रभावपूर्ण ढंग से कार्य कर सकें, समन्वय कहते हैं। समन्वय का साधारण अर्थ है तालमेल बैठाना। समन्वय के अभाव में उपक्रम की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
समन्वय का महत्व/आवश्यकता (Importance/Need of Coordination) समन्वय की आवश्यकता और महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है

1. संगठन का आकार (Size of the Organisation)-समन्वय की आवश्यकता संगठन के आकार के बढ़ने पर बढ़ती है क्योंकि बड़े संगठन में काम करने वाले व्यक्तियों की संख्या अधिक होती है, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आवश्यकताएँ और उद्देश्य होते हैं, इसीलिए यहाँ सामान्य लक्ष्य के प्रति इन कर्मचारियों के प्रयासों को एकत्रित करने की अधिक आवश्यकता होती है। संगठनात्मक कुशलता के लिए समन्वय द्वारा संगठनात्मक लक्ष्यों और व्यक्तिगत लक्ष्यों में तालमेल स्थापित करना महत्वपूर्ण है।

2. कार्यात्मक विभिन्नता (Functional Differentiation)-एक संगठन के कार्य विभिन्न विभागों, वर्गों या श्रेणियों में विभाजित होते हैं और प्रत्येक विभाग अपने उद्देश्य को अधिक महत्व देकर अपना-अपना काम करते हैं।

परंतु वास्तव में ये विभाग अंतः संबंधित और परस्पर आश्रित होते हैं। इसीलिए विभिन्न वर्गों की क्रियाओं को समन्वित करने की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि वे एक ही संगठन के भाग होते हैं। विभिन्न विभागों के बीच में अंतर को कम करने के लिए समन्वय की आवश्यकता होती है।

3. विशिष्टीकरण (Specialization)-बड़े और आधुनिक संगठन में विशिष्टीकरण का उच्च स्तर होता है और विशेषज्ञ या कुशल व्यक्ति महसूस करते हैं कि केवल वे ही योग्य व्यक्ति हैं और वे हमेशा सही दिशा में सही निर्णय लेते हैं।

संगठन में कई विशेषज्ञ काम करते हैं। यदि वे सभी अपने ढंग से काम करेंगे तो इसका परिणाम संदेह एवं अव्यवस्था होगा। इसीलिए उन सभी विशेषज्ञों की क्रियाओं को एक सामान्य दिशा में समन्वित कर उनसे अधिकतम लाभ प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 29.
पेशे की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
पेशे की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(क) भली-भाँति परिभाषित ज्ञान का समूह-सभी पेशे भली-भाँति परिभाषित ज्ञान के समूह पर आधारित होते हैं जिसे शिक्षा से अर्जित किया जाता है।

(ख) अवरोधित प्रवेश-पेशे में प्रवेश परीक्षा अथवा शैक्षणिक योग्यता द्वारा सीमित होता है। उदाहरण के लिए यदि भारत में किसी को चार्टर्ड एकाउंटेंट बनना है तो उसे भारतीय चार्टर्ड एकाउंटेंट संस्था द्वारा आयोजित की जाने वाली एक विशेष परीक्षा को पास करना होगा।

(ग) पेशागत परिषद्-सभी किसी-न-किसी परिषद् सभा से जुड़ें होते हैं जो इनमें प्रवेश का नियमन करते हैं। कार्य करने के लिए प्रमाण-पत्र जारी करते हैं एवं आचार संहिता तैयार करते हैं तथा उसको लागू करते हैं।

(घ) नैतिक आचार संहिता-सभी पेशे आचार संहिता से बँधे हैं जो उनके सदस्यों के व्यवहार को दिशा देते हैं। उदाहरण के लिए जब डॉक्टर अपने पेशे में प्रवेश करते हैं तो वह अपने कार्य नैतिकता की शपथ लेते हैं।

MP Board Class 12 Business Studies Important Questions

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 18 Humidity and Rainfall

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MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 18 Humidity and Rainfall

MP Board Class 7th Social Science Chapter 18 Text Book Questions

Choose the correct alternatives from the following

Question 1.
Hail falls in the form of:
(a) Liquid
(b) Solid
(c) Elastic
(d) Gas
Answer:
(b) Solid

Question 2.
Cyclonic rains in the North western part of India occurs during:
(a) Summer Season
(b) Winter Season
(c) Spring Season
(d) Rainy Season
Answer:
(b) Winter Season

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Fill in the blanks:

  1. The process of changing of water into vapor is called …………..
  2. When water vapor again changes to liquid or solid state it is known as …………..
  3. The ……………. is an instruments to measure rainfall.

Answer:

  1. Evaporation
  2. condensation
  3. rain gauge

MP Board Class 7th Social Science Chapter 18 Short Answer the Questions

Question 1.
What are water vapors?
Answer:
When very small particles of water are converted to gaseous water molecules are called water vapor.

Question 2.
Why does evaporation increase and decrease?
Answer:
The change in temperature brings about a change in evaporation. The rate of evaporation is more when strong winds blow.

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Question 3.
Why are clouds formed?
Answer:
The vapor that rises up from the water bodies reaches high up in the sky and is converted into droplets due to cooling. These droplets get dense and form clouds. When the clouds contain less water droplets it appears white and as its density increases it appears black.

Question 4.
How do you understand by snowfall?
Answer:
The water vapors on reaching higher up in the sky is converted into ice particles due to very low temperature. These ice particles are called snow. When this snow falls on earth it is called snowfall.

Question 5.
What is cyclonic rain?
Answer:
When the hot and cold air meet, the hot air rises upwards and the cold air rushes to occupy the low-pressure area in the center. As a result there is circular movement which causes the whirling air in the center to rise upwards. This rising air cools down, condenses and brings rain. This type of rainfall is called cyclonic rainfall.

MP Board Class 7th Social Science Chapter 18 Long Answer Type Questions

Question 1.
What is condensation? what are its Various forms?
Answer:
The process in which water vapor in die atmosphere changes into minute dip pelts of water or ice crystals is called condensation. Its various forms are dew, frost, fog, smog and hails.

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Question 2.
How many types of rainfall are there? Explain with diagram.
Answer:
There are three types of rainfall. They are:

  1. Convectional rain
  2. Orographic rain
  3. Cyclonic rain

1. Convectional rain:
The vapors formed from water bodies due to strong heat rises up in the sky and are condensed due to low temperature there, and falls on the earth in the form of raindrops. This process is called convection. Since the rainfall occurs because of the above – mentioned process, it is called convectional rain. The diagram of convectional rain is given below.

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 18 Humidity and Rainfall-1
2. Orographic rain:
When a mountain range lies in the path of a Tain – bearing wind, it causes die wind to rise along its slope. As a result, it cools and gets saturated. Further cooling due to its ascent leads to rainfall. This is called orographic rain. The diagram of Orographic rain is given

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 18 Humidity and Rainfall-2
3. Cyclonic rain:
When die hot and cold air meet, the hot air rises upwards and the cold air rushes to occupy the low-pressure area in die center. As a result there is circular movement which causes the whirling air in the center to rise upwards. This rising air cools down, condenses and brings rain. This type of rainfall is called cyclonic rain.
The diagram of Cyclonic rain:

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 18 Humidity and Rainfall-3

Question 3.
Make a diagram of rain gauge:
Answer:

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 18 Humidity and Rainfall-4

Question 4.
What is humidity? What are the different forms of humidity?
Answer:
The word humidity’ is used to denote die amount of dampness in die atmosphere. In other words the amount of water vapor present in the air is called humidity.

The different forms of humidity:
1. Clouds:
Clouds are formed due to the condensation of water vapor. As the moist air is lifted upwards, it clings to the dust particles in the air to form clouds.

2. Fog:
Fog, as a kind of cloud, is found on or near die surface of the land or water bodies. It is formed by the cooling of the air below its dew point in die lower layers of atmosphere.

3. Rain:
As the clouds arc cooled in the cooler upper region of the atmosphere, the small droplets of water in it grow in size and can no longer float in the air. Falling of these droplets of water from the clouds is called rain.

4. Snowfall:
As condensation takes place at temperature below 0°C, the water-vapor in the atmosphere changes into millions of tiny crystals. Sometimes, they combine together to form flakes of snow. Coming down of these snowflakes to die ground from clouds is termed as snowfall.

5. Hail:
Hails are caused by the rapid ascent of moist air higher regions where temperature is far-below freezing-point This causes the raindrops to freeze. When the hailstones become so big and heavy that the air can no longer hold them, they fall from the cloud on the earth as hailstones.

6. Dew:
On a cold and clear nights moist air comes in contact with cold objects on the earth. The moisture in the air condenses into droplets of water. It is known as dew.

7. Frost:
Frozen dew is called frost In the case of frost, the dew point is or below freezing point 0° Celsius.

MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 6 Application of Derivatives Ex 6.2

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MP Board Class 12th Maths Solutions Chapter 6 Application of Derivatives Ex 6.2

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MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा

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MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Durva Chapter 20 विदिशा (पत्रम्) (विदिशादिशातः)

MP Board Class 10th Sanskrit Chapter 20 अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक पद में उत्तर लिखिए)।
(क) विद्यालयस्य शैक्षणिक भ्रमणदलं कुत्र गतवान्? (विद्यालय का शैक्षणिक भ्रमण दल कहाँ गया?)
उत्तर:
विदिशानगरीम् (विदिशा नगरी में)

(ख) पूर्वस्मिन् काले विदिशानगर्याः किं नाम आसीत्? (पहले विदिशा नगरी का क्या नाम था?)
उत्तर:
भेलसा (भेलसा)

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(ग) ‘सुबाहुः कस्य पुत्रः आसीत्? (‘सुवाहु’ किसका पुत्र था?)
उत्तर:
शत्रुघ्नस्य (शत्रुघ्न का)।

(घ) विदिशानगरी कस्याः नद्यास्तटे वर्तते? (विदिशा नगरी किस नदी के तट पर है?)
उत्तर:
वेत्रवत्याः (वेत्रवती के)

(ङ) कस्य नृपस्य शासनकाले ‘हेलिओडोरस-स्तम्भः’ निर्मितः आसीत?) (किस राजा के शासनकाल में हेलिओडोरस स्तम्भ बना था?)
उत्तर:
काशीपुत्रभागभद्रस्य (काशीपुत्र भागभद्र के)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत- (एक वाक्य में उत्तर लिखिए-)
(क) विदिशानगरी कस्मिन् प्रदेशे स्थिता विद्यते? (निदिशा नगरी किस प्रदेश में स्थित है?)
उत्तर:
गिदिशा नगरी मध्यप्रदेशे स्थिता विद्यते। (विदिशा नगरी मध्यप्रदेश में स्थित है।)

(ख) विदिशानगरी कस्य देशस्य राजधानी आसीत? (विदिशा नगरी किस देश की राजधानी थी?)
उत्तर:
विदिशानगरी दशार्णदेशस्य राजधानी आसीत्। (विदिशा नगरी दशार्णदेश की राजधानी थी।)

(ग) विदिशामध्ये किं नाम स्मारको वर्तते?। (विदिशा के बीच में किस नाम का स्मारक है?)
उत्तर:
विदिशामध्ये ‘लोहाङ्गी’ नामः स्मारकः वर्तते।) (विदिशा के बीच में ‘लोहाङ्गी’ नाम स्मारक है।)

(घ) दुर्गाभ्यन्तरे किं स्थितम् अस्ति? (किले के बीच में क्या स्थित है?)
उत्तर:
दुर्गाभ्यन्तरे ‘बीजामण्डलम्’ स्थितम् अस्ति। (किले के बीच में ‘बीजामण्डल’ स्थित है।)

(ङ) श्रीवैष्णवधर्मस्य दीक्षां कः ग्रहीतवान्? (श्री वैष्णधर्म की दीक्षा किसने ली?)
उत्तर:
श्रीवैष्णवधर्मस्य दीक्षां हेलिओडोरसः ग्रहीतवान्। (श्रीवैष्णव धर्म की दीक्षा हेलिओडोरस ने ली।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए-)
(क) ‘भेलसा’ नाम्नेयं नगरी कथं प्रसिद्धा? (‘भेलसा’ नाम से यह नगरी क्यों प्रसिद्ध थी?)
उत्तर:
‘भेलसा’ नाम्नेयं नगरी प्रसिद्धा यतोहि सूर्यदेवतायाः मन्दिरस्य ‘भेल्लस्वामिनः’ इति लोकख्यातिः एव। (‘भेलसा’ नाम से यह नगरी प्रसिद्ध थी क्योंकि सूर्य देवता के मन्दिर की ‘भेल्लस्वामी’ ऐसी संसार में ख्याति थी।)

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(ख) गुप्तकालस्य प्रसिद्धिः केन नाम्ना अस्ति? (गुप्तकाल की प्रसिद्धि किस के नाम से है?)
उत्तर:
गुप्तकालस्य प्रसिद्धिः ‘रामगुप्तेन’ नाम्ना अस्ति। (गुप्तकाल की प्रसिद्धि ‘रामगुप्त’ नाम से हुई।)

(ग) विदिशानगर्याः काः प्रतिमाः दर्शनीयाः सन्ति? (विदिशा नगरी में कौन-सी मूर्तियाँ दर्शनीय हैं?)
उत्तर:
विदिशानगर्याः ब्रह्मा विष्णोः शिवस्य, गणेशस्य, अर्धनारीश्वरस्य प्रतिमाः दर्शनीयाः सन्ति। (विदिशा नगरी की ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, और अर्धनारीश्वर की प्रतिमाएँ दर्शनीय हैं।)

प्रश्न 4.
प्रदत्तशब्दैः रिक्तस्थानानि पूयरत-(दिए शब्दों से रिक्त स्थान भरिए-)
(उदारभावनाम्, पुरातनकालादेव, कुशल, ग्रहीतवान्, द्रष्टुम)
(क) अत्र …………. तत्राप्यस्तु।
(ख) वयं सर्वे पुरातत्त्वसङ्ग्रहालयं …………. अगच्छाम।
(ग) श्रीवैष्णवधर्मस्य दीक्षा ………….।
(घ) हिन्दुधर्मं प्रति तस्य …………. संसूचयति।
(ङ) नगर्याः स्थिति …………. विद्यते।
उत्तर:
(क) कुशलं
(ख) द्रष्टुम्
(ग) ग्रहीतवान्
(घ) उदारभावनाम्
(ङ) पुरातनकालादेव।

प्रश्न 5.
यथायोग्यं योजयत-(उचित क्रम से जोड़िए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा img 1
उत्तर:
(क) 3
(ख) 5
(ग) 1
(घ) 2
(ङ) 4

प्रश्न 6.
निम्नलिखितक्रियापदानां धातुं, लकारं, पुरुषं, वचनं च लिखत
(नीचे लिखे क्रियापदों के धातु, लकार, पुरुष और वचन लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा img 2
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा img 3

प्रश्न 7.
अधोलिखितपदानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धिनाम लिखत
(नीचे लिखे पदों के सन्धिविच्छेद कर सन्धि का नाम लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा img 4
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा img 7

प्रश्न 8.
अधोलिखितसमस्तपदानां विग्रहं कृत्वा समासनाम लिखत
(नीचे लिखे समस्त पदों के विग्रह कर समास का नाम लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा img 5
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 20 विदिशा img 6

प्रश्न 9.
उदाहरणानुसारं पर्यायशब्दान् लिखत
(उदाहरण के अनुसार पर्यायवाची शब्द लिखिए-)
यथा- राजानः नृपाः
(क) पादाः
(ख) शिक्षकस्य
(ग) समुद्रः
(घ) मन्दिरस्य
(ङ) समीपे
उत्तर:
(क) पादाः – चरणाः
(ख) शिक्षकस्य – अध्यापकत्य
(ग) समुद्रः – जलधिः
(घ) मन्दिरस्य – देवालयस्य
(ङ) समीपे – निकटे

प्रश्न 10.
रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए-)
(क) अहमपि तत्र अगच्छम्। (मैं भी वहाँ गया।)।
उत्तर:
अहमपि कुत्र अगच्छम्? (मैं भी कहाँ गया?)

(ख) इयं नगरी पौराणिकी वर्तते। (यह नगरी पौराणिक है।)
उत्तर:
का नगरी पौराणिकी वर्तते? (कौन-सी नगरी पौराणिक है?)

(ग) अत्र पुरातत्त्वसङ्ग्रहालयो विद्यते। (यहाँ पुरातत्त्व सङ्ग्रहालय है।)
उत्तर:
अत्र कः विद्यते? (यहाँ क्या है?)

(घ) नद्याः तटे स्तम्भः अस्ति। (नदी के तट पर स्तम्भ है।)
उत्तर:
कस्याः तटे स्तम्भः अस्ति? (किसके तट पर स्तम्भ है?)

(ङ) साञ्चीनगरे बौद्धसम्प्रदायस्य स्तूपो वर्तते।। (साञ्ची नगर में बौद्धसम्प्रदाय का स्तूप है।)
उत्तर:
साञ्ची नगरे कस्य स्तूपो वर्तते? (साञ्ची नगर में किसका स्तूप है?)

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योग्यताविस्तार –

विदिशानगर्याः समीपस्थदर्शनीयस्थलानाञ्च मानचित्रं विद्धत।
विदिशा नगरी और उसके पास के दर्शनीय स्थल मानचित्र पर दिखाओ।

आत्मनः पितृव्यस्य कृते सवकीययात्रावृत्तान्तमवलम्ब्य पत्रं लिखत।
अपने पिता के लिए अपनी यात्रा का वृतान्त बताने के लिए पत्र लिखो।

विदिशा पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ में पत्रलेखन की पद्धति के विषय में बताया गया है। पत्र लिखने की विधि बताते हुए उन्होंने मध्यप्रदेश की नगरी ‘विदिशा’ का वर्णन किया। इस पत्र में पिता को पत्र लिखकर ‘विदिशा’ नगरी इतिहास, उसके दर्शनीय स्थल तथा उसकी अन्य विशेषताओं को बताया गया है।

विदिशा पाठ का अनुवाद

शासकीयउच्चतरमाध्यमिक विद्यालयः
सिंगरौलीनगरम् (मध्यप्रदेशः)
31-01-2008

पूज्यपादाः पितृचरणाः!
सश्रद्धमभिवादये!!

अत्र कुशलं तत्राऽस्तु। पितृवर्य। विदितं त्यादिदंयत् ममस्वाध्यायः सुष्टुतया प्रचलति। विगते सप्ताहेऽस्माकं विद्यालयस्य शैक्षणिक भ्रमणदलं विदिशानगरी गतवानासीदिति। तेन दलेन सह अहमपि तत्रागच्छम्।

मध्यप्रदेशस्थानगरीयं पौराणिकी ऐतिहासिकी च वर्तते। विदिशा पूर्वस्मिन् काले ‘भेलसा’ इति नाम्ना सुविख्याता आसीत्। एतस्य कारणं सूर्यदेवतायाः मन्दिरस्य ‘भेल्लस्वामिनः’ इति लोकख्यातिरेव। पुरा विदिशानगरी समुन्नतमेकं वाणिज्यिकं केन्द्रमासीत्। योगदर्शनस्य प्रणेता व्याकरणमहाभाष्यस्य कर्ता महर्षिः पतञ्जलिः सम्राट अशोकोऽपि विदिशया सह सम्बद्धौ आस्ताम्।

शब्दार्थाः :
पूज्यपादाः-पूजनीय चरणों वाले-respectable; सश्रद्धम्-श्रद्धासहितrevered, venerable; विदितम्-ज्ञात-may be known; सुष्टुतया-ठीक प्रकार सेproperly; समुन्नतम्-उन्नति को प्राप्त-prominent.

अनुवाद :

शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
सिंगरौली नगर (मध्यप्रदेश)
31-01-2008

पूज्य चरणों वाले पिता जी!
श्रद्धासहित अभिवादन करता हूँ!!

यहाँ कुशल है, वहाँ भी हो। पिताश्री! यह जानिए कि मेरी पढ़ाई अब यहाँ ठीक प्रकार से चल रही है। पिछले सप्ताह हमारे विद्यालय का शैक्षणिक भ्रमणदल विदिशा नगरी गया था। उस दल के साथ मैं भी वहाँ गया।

मध्यप्रदेश में स्थित यह नगरी पौराणिक और ऐतिहासिक है। पुराने समय में विदिशा ‘भेलसा’ नाम से प्रसिद्ध थी। इसके कारण सूर्य देवता के मन्दिर की ‘भेल्लस्वामी’ ऐसी लोगों में प्रसिद्धि हुई। पहले विदिशा नगरी एक उन्नत वाणिज्यिक केन्द्र था। योगदर्शन के प्रणेता और व्याकरण के महाभाष्य के कर्त्ता महर्षि पतञ्जलि और सम्राट अशोक भी विदिशा से ही सम्बद्ध हैं।

English :
Educational tour to Vidisha-old and historical city-Previously known as ‘Bhelsa’-Temple of sungod-Trade centre in the past Maharishi Patanjali and emperor Ashoka were also related to Vidisha.

2. पौराणिकी कथानुरूपं हैहयवंशीयाः राजानो अत्र राज्यं प्रकुर्वन्ति स्म। आदिकविना वाल्मीकिना प्रणीतेन रामायणेन विज्ञायते यत् त्रेतायुगे शत्रुघ्नेन स्वकीयं पुत्रं ‘सुबाहु’ नामानम् अत्रत्यः शासकरूपेणाभिषिच्य प्रदेशममुं स्वायत्तीकृतमासीत्। कविकुलगुरुः कालिदासः गीतिकाव्ये मेघदूते पूर्वमेघे नगरीमिमां दशार्णदेशस्य राजधानीत्वेन अवर्णयत्।

सर्वप्रथमं वयं सर्वे पुरातत्त्वसङ्ग्रहालयं द्रष्टुमगच्छाम। तत्र कलात्मिकानां पाषाणप्रतिमानाम् अद्वितीयः सङ्ग्रहोः विद्यते। ‘बेसनगर’ मित्याख्यस्य स्थलस्योत्खनने समुपलब्धाऽपि सामग्री वर्ततेऽत्रैव। अत्र यक्षस्य, ग्यारसपुरस्य शालभञ्जिकायाः सदाशिवस्य (त्रिमुखिनः शिवस्य) चाप्रतिमाः प्रतिमाः सङ्ग्रहीताः सन्ति। नगर्याः मध्ये ‘लोहागी’ स्मारको विद्यते। अन्न संरक्षितः शुङ्गकालीनः शीर्षस्तम्भस्यावशेषः कलात्मकदृष्ट्या अपूर्वः।

शब्दार्थाः :
प्रणीतेन-रचे गए के द्वारा-by composed; विज्ञायते-जाना जाता है-is known; अभिषिच्य-अभिषेक करके – on coronating/enthroning; अमुम्-इसको-him; स्वायत्तीकृतम्-अपने अधीन कर लिया-subjugated; उत्खनने-खोदने में-on digging.

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अनुवाद :
पौराणिक कथा के अनुसार हैहयवंश के राजा यहाँ राज्य करते थे। आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के द्वारा ज्ञात होता है कि त्रेतायुग में शत्रुध्न के द्वारा अपने पुत्र ‘सुबाहु’ नाम को यहीं राज्याभिषेक करके इस प्रदेश को अपने अधीन कर लिया था। कविकुलगुरु कालिदास के गीतिकाव्य मेघदूत के ‘पूर्वमेघ में इस नगरी को दशार्ण देश की राजधानी के रूप में वर्णित किया।

सबसे पहले हम सब पुरातत्त्व सङ्ग्रहालय देखने गए। वहाँ पत्थर की कलात्मक प्रतिमाओं का अद्वितीय (अनोखा) सङ्ग्रह है। ‘बेसनगर’ इस स्थल के खोदने में उपलब्ध सामग्री भी यहीं है। यहाँ यक्ष की ग्यारसपुर के शाल भञ्जिका की और सदाशिव की (तीन मुँह वाले शिव की) अनोखी प्रतिमाएँ इकट्ठी की गई हैं। नगरी के बीच में ‘लोहाङ्गी’ स्मारक है। यहाँ शुङ्गकालीन शीर्ष स्तम्भ के अवशेष संरक्षित हैं, जो कलात्मक दृष्टि से अपूर्व है।

English :
Kings of Haihaidynasty ruled in Vidisha. Shatrughana had coronated his son Subahu here and subjugated this region. Kalidas described Visdisha as capital of Dasharna country.

Saw collection of stone effigies in museum. Lohuingi memorialRelics of top pillar of the age of Shangas preserved here-artistically unique.

3. अस्याः उत्तरपश्चिमदिशि दुर्गाभ्यन्तरे स्थितमस्ति ‘बीजामण्डलम्’। चर्चिकादेव्याः मन्दिरमिदं विजयदेव्याः अपराभिधेयेन विजयमन्दिरमिति नाम्ना लोके प्रसिद्धिमगात्।

वेत्रवत्याः वामतटे क्रोशमेकं दूरं वर्तते ‘हेलिओडोरस-स्तम्भ’ इति। इयं तु शुङ्गनृपतेः काशीपुत्रभागभद्रस्य शासनकाले विनिर्मिता वास्तुकृतिरस्ति। स्तम्भोपरि समुत्कीर्णेन लेखेन ज्ञायते यत् तक्षशिला वास्तव्यस्य दियस्य पुत्रो हेलिओडोरस नामा यवनाधिपतेः अन्तलिकितस्य राजदूतत्वेन वैदेशिको भवन्नपि श्रीवैष्णवधर्मस्य दीक्षा ग्रहीतवान्। अत्रत्यो गरुडशीर्षस्तम्भो हिन्दुधर्मं प्रति तस्योदारभावनां संसूचयति।
वेत्रवत्याः समीपे विंशतिसङ्ख्याकाः गुहाः सन्ति; याः सर्वाः “उदयगिरिगुहा” नाम्ना प्रख्याताः वर्तन्ते। इमाः सर्वाः स्वर्णयुगस्य गुप्तकालस्य माहात्म्यगाथां प्रगायन्ति।

शब्दार्थाः :
दुर्गाभ्यन्तर-किले के बीच में-inside a fort; अपराभिधेयेन-दूसरे नाम से-with other name; अगात्-प्राप्त हो गया-became; क्रोशम्-एक कोस-one mile; गहाः-गुफाएँ-Caves; समुत्कीर्णेन-खुदे हुए के द्वारा-through digging.

अनुवाद :
इसके उत्तर पश्चिम दिशा में किले के बीच में ‘बीजामण्डल’ स्थित है। चर्चिका देवी का यह मन्दिर विजय देवी के दूसरे नाम ‘विजयमन्दिर’ से संसार में प्रसिद्ध हुआ।

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वेत्रवती (बेतवा नदी) के बाएँ तट पर एक कोस दूर ‘हेलिओडोरस-स्तम्भ’ है। यह तो शुङ्ग राजा काशी पुत्र भागभद्र के शासनकाल में बनाई गई वास्तुकृति है। इस स्तम्भ के ऊपर खुदे हुए लेख से ज्ञात होता है कि तक्षशिला में वास्तव्य दिय को पुत्र ‘हेलिओडोरस’ नामक, यवन राजा ने अन्तलिकित के राजदूत के रूप में विदेशी होते हुए भी श्री वैष्णव धर्म की दीक्षा प्राप्त की। यहाँ से गरुड़शीर्ष स्तम्भ हिन्दू धर्म के प्रति उसकी उदार भावना की सूचना मिलती है।

वेत्रवती के पास 20 की संख्या में गुफाएँ हैं, जो सब ‘उदयगिरि गुफा’ नाम से प्रसिद्ध हैं। ये सारी गुफाएँ स्वर्णयुग गुप्तकाल की महात्म्यगाथा गाते हैं।

English :
Bijamandal-temple of goddess charchika is located in a fort-also known as ‘Vijaya Temple’.

Heliodus pillar on the bank of Vetravati river-raised in the rule of Shunga king-A Muslim king got initiated in Vaishnava religionThe Garuda Shirsha pillar speaks high of his generous feelingsUdayagiri caves located near Vetravati-speak high of Gupta age.

4. विदिशातः किञ्चिद् दूरस्थे चितौरियानामके ग्रामे नवम्याः दशम्याश्च शताब्याः परमारकालीनाः ब्रह्मणः, विष्णोः, शिवस्य, गणेशस्यार्द्धनारीश्वरस्य प्रतिमाः दर्शनीयाः सन्ति।

कालक्रमेणात्र जैन-बौद्धसम्प्रदाययोः विकासोऽपिसमभवत्। विशेषरूपेण, गुत्पकाले चतुर्थ्यां शताब्यां रामगुप्ताधिशासिते जैनतीर्थङ्कराणां मूर्तिनिर्माणं, तथा च तासां प्रतिष्ठापनं गोलक्यान्त्यायाः सुपुत्रस्य चेलुक्षमणस्य, तच्छिष्यस्याचार्यसlसेनस्य च प्रेरणया कारितम् आसीत्। निकटमेव साञ्चीनगरे बौद्वसम्प्रदायस्य स्तूपो वर्तते।

अन्ते चे, सर्वेभ्यः ज्येष्ठेभ्यः सादरं प्रणामाः। अनुजेभ्यः हार्दिकः स्नेह। मित्रेभ्यः शुभाकाङ्क्षां प्रकटीकरोमि।

भवदीयः पुत्रः
मूदुलः

शब्दार्थाः :

प्रतिष्ठापनम्-प्रतिष्ठित करना-establishing; कारितम्- करवाया-got done; स्तूपः-बौद्धभिक्षु का निवास स्थान-lodging of a Buddhistic mendicant; आकाङ्क्षा-कामना-desire, longing.

अनुवाद :
विदिशा से कुछ दूर स्थित चितौरिया नामक गाँव में नवीं-दसवीं शताब्दी के परमारकालीन ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, अर्द्धनारीश्वर की मूर्तियाँ देखने योग्य हैं।

काल के क्रम से यहाँ जैन और बौद्ध सम्प्रदाय का भी बहुत विकास हुआ। विशेषरूप से, गुप्तकाल में चौथी शताब्दी के रामगुप्त के शासन में जैन तीर्थङ्करों की मूर्ति बनाना, और उनको प्रतिष्ठित करना गोलक्यान्त्या के सुपुत्र चेलुक्षमण के और उनके शिष्य आचार्य सर्ग्यसेन की प्रेरणा से करवाया था। पास ही साञ्ची नगर में बौद्ध सम्प्रदाय के स्तूप हैं।

और अन्त में, सभी बड़ों को सादर प्रणाम। सभी छोटों को हार्दिक स्नेह। मित्रों के लिए शुभकामना प्रकट करता हूँ।

आपका पुत्र
मृदुल

English :
The village named Chittori is famous for effigies of Brahma, Vishnu, Shiv, Ganesh and Ardhanareeshwar.

Spread of Jainism and Buddhism-Effigies of Jain ‘Tirathankaras’ established during the rule of Ramgupta of Gupta period-pillars of Buddhistic sect found in Sanchi town.

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह

कल्याण की राह अभ्यास

बोध प्रश्न

कल्याण की राह अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
चलने के पूर्व बटोही को क्या करना चाहिए?
उत्तर:
चलने के पूर्व बटोही को बाट (मार्ग) की भली-भाँति पहचान कर लेनी चाहिए।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार व्यक्ति को किस रास्ते पर चलना चाहिए?
उत्तर:
कवि के अनुसार व्यक्ति को उसी रास्ते पर चलना चाहिए, जिसको उसने अच्छी तरह समझ और देख लिया हो।

प्रश्न 3.
प्रत्येक सफल राहगीर क्या लेकर आगे बढ़ा है?
उत्तर:
प्रत्येक सफल राहगीर एक निश्चित उद्देश्य तथा अपनी राह में आने वाले संकटों का सामना करने का विश्वास लेकर आगे बढ़ा है तभी उसे सफलता मिली है।

प्रश्न 4.
नरेश मेहता अपनी कविता में किसके साथ चलने की बात कह रहे हैं?
उत्तर:
नरेश मेहता अपनी कविता में संघर्ष करते हुए सूरज के संग-संग चलते रहने की बात कह रहे हैं।

प्रश्न 5.
नदियाँ आगे चलकर किस रूप में परिवर्तित हो जाती हैं?
उत्तर:
नदियाँ आगे चलकर समुद्र में परिवर्तित हो जाती हैं।

प्रश्न 6.
कवि ने रुकने को किसका प्रतीक माना है?
उत्तर:
कवि ने रुकने को मरण का प्रतीक माना है।

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कल्याण की राह लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वप्न पर मुग्ध न होने की राय कवि क्यों देता
उत्तर:
स्वप्न पर मुग्ध न होने की राय कवि इसलिए देता है कि इससे मनुष्य सच्चाई से दूर हो जाता है और ये स्वप्न उसे कहीं का नहीं रहने देते। वह इन्हीं पर विचरण करता हुआ जग और जीवन से अलग-थलग हो जाता है।

प्रश्न 2.
कवि ने जीवन पथ में क्या-क्या अनिश्चित माना है?
उत्तर:
कवि ने जीवन पथ में निम्न बातों को अनिश्चित माना है-किस जगह पर हमें नदी, पर्वत और गुफाएँ मिलेंगी, किस जगह पर हमें बाग, जंगल मिलेंगे, किस जगह हमारी यात्रा खत्म हो जायेगी और कब हमें फूल मिलेंगे और कब काँटे।

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार जीवन पथ के यात्री को पथ की पहचान क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
कवि हरिवंशराय बच्चन मानते हैं कि मानव को जीवन का मार्ग सोच-विचार कर अपनाना चाहिए। जीवन में महान बनने का निश्चित लक्ष्य लेकर, उसी के अनुरूप जीवन पथ अपनाना आवश्यक है। जीवन पथ का चयन महापुरुषों की जीवनियों के आधार पर निश्चित किया जा सकता है। जीवन पथ निश्चित कर उसमें अच्छे-बुरे का द्वन्द्व नितान्त अनुचित है क्योंकि हर सफल पंथी दृढ़ विश्वास के सहारे ही मार्ग पर चलता जाता है। महान जीवन जीने का भाव आते ही तन-मन में उत्साह भर जाता है। उस समय सही जीवन पथ की पहचान न हुई तो असफलता हाथ लग सकती है। अतः जीवन पथ के यात्री को जीवन पथ की पहचान होना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
कवि के अनुसार क्षितिज के उस पार कौन बैठा है और क्यों?
उत्तर:
कवि के अनुसार क्षितिज के उस पार श्रृंगार किये हुए लक्ष्मी बैठी हैं और वह इसलिए बैठी हैं कि कोई पुरुषार्थी आये और अपने परिश्रम से उन्हें प्राप्त कर ले।

प्रश्न 5.
मानव जिस ओर गया, उधर क्या-क्या हुआ?
उत्तर:
मानव जिस ओर गया, उधर नगर बस गये और तीर्थ बन गये।

प्रश्न 6.
‘चरैवेति’कविता में कविने लोगों को क्या-क्या सलाह दी है?
उत्तर:
‘चरैवेति’ कविता में कवि ने लोगों को सलाह दी है कि उन्हें जीवन में कहीं भी रुकना नहीं चाहिए। जिस प्रकार सूरज दिन-रात चलता रहता है, उसी तरह उनको भी दिन-रात चलते रहना चाहिए। मानव ने निरन्तर चलकर ही नगर एवं तीर्थों का निर्माण किया है। जहाँ चलना थम जाता है वहीं मृत्यु आ जाती है। अतः निरन्तर चलते रहो।

कल्याण की राह दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चलने से पूर्व बटोही को कवि किन-किन बातों के लिए आगाह कर रहा है?
उत्तर:
चलने से पूर्व बटोही को कवि आगाह कर रहा है कि हे बटोही! तू चलने से पूर्व अपने पथ की पहचान कर ले। बटोही के क्रियाकलापों और चेष्टाओं की कहानी किसी पुस्तक में छपी नहीं मिलती है। इस मार्ग पर अनगिनत राही चले, पर अधिकांश का कोई पता नहीं है पर हाँ कुछ अनौखे रास्तागीर हुए हैं जिन्होंने अपने पग चिन्हों को मार्ग पर छोड़ा है और हम लोग उन्हीं पर चल रहे हैं।

प्रश्न 2.
स्वप्न और यथार्थ में सन्तुलन किस तरह आवश्यक है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि कहता है कि हमेशा स्वप्न पर ही तुम मुग्ध मत हो जाओ; जीवन में जो सत्य है उसे भी जान लो। संसार के पथ में यदि स्वप्न दो की संख्या में हैं तो सत्य दो सौ की संख्या में हैं। अत: स्वप्न के साथ ही साथ सत्य को भी जान लो। स्वप्न देखना बुरा नहीं है, हर आदमी अपनी उमर एवं समय के अनुसार इन्हें देखता है लेकिन कोरे स्वप्न से जीवन में काम नहीं चलता है। हमें सत्य का भी सहारा लेना पड़ता।

प्रश्न 3.
‘चरैवेति जन गरबा’ कविता का मूल आशय क्या है?
उत्तर:
‘चरैवेति जन गरबा’ कविता का मूल आशय यह है कि हमें जीवन में कभी भी रुकना नहीं चाहिए। जिस प्रकार सूरज दिन-रात चलता रहता है, उसी प्रकार हमको भी दिन-रात काम में लगे रहना चाहिए। मानव ने निरन्तर चलकर ही संसार में नये और भव्य नगरों का निर्माण किया है, उसी ने नये-नये तीर्थों का निर्माण किया है। जहाँ चलना थम जाता है, वहीं मृत्यु आ जाती है। अतः निरन्तर चलते रहो।।

प्रश्न 4.
युग के संग-संग चलने की सीख कवि क्यों दे रहा है?
उत्तर:
युग के संग-संग चलने की सीख कवि इसलिए दे रहा है कि जो व्यक्ति परिवर्तित युग के साथ कदम-से-कदम मिलाकर नहीं चलेगा, वह संसार की इस दौड़ में पिछड़ जायेगा। नयी सभ्यता के सामने उसके पैर जम नहीं पायेंगे। अतः कवि युग के साथ-साथ चलने की सीख दे रहा है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अवतरणों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) रास्ते का एक काँटा …………. सीख का सम्मान कर ले।
उत्तर:
कविवर बच्चन कहते हैं कि हमें स्वर्ग के सपने आते हैं, इससे हमारे नेत्रों के कोने में एक विशेष प्रकार की चमक आ जाती है। हमारे पैरों में पंख लग जाते हैं अर्थात् हम कल्पना लोक में विचरण करने लग जाते हैं और हमारी स्वच्छन्द छाती ललकने लगती है। रास्ते में पड़ा हुआ एक भी काँटा हमारे पाँव के दिल को चीर देता है। जब खून की दो बूंद गिरती हैं तो उसमें एक दुनिया डूब जाती है।

आगे कवि कहता है कि चाहे हमारी आँखों में स्वर्ग के सपने हों पर हमारे पैर पृथ्वी पर ही टिके रहने चाहिए कहने का भाव यह है कि हमें जीवन के यथार्थ का भी ज्ञान होना चाहिए। काँटों की इस अनोखी शिक्षा का, हे मानव! तू सम्मान कर ले। हे रास्तागीर! रास्तों पर चलने से पूर्व रास्ते की भली-भाँति पहचान कर ले।

(ख) रुकने का नाम मरण …………. संग-संग चलते चलो।
उत्तर:
कविवर नरेश मेहता कहते हैं कि निरन्तर बहने वाली नदियों ने ही अपने पानी द्वारा सागर का निर्माण किया है। बादलों ने ही उमड़-घुमड़ कर धरती को फलवती बना दिया है। रुकना मृत्यु है, पीछे सब पत्थर पड़े मिलेंगे यदि आगे बढ़ोगे तो देवयान मिलेंगे। अतः युग (समय) के साथ ही साथ चलते रहो।

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कल्याण की राह काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
वक्रोक्ति अलंकार की परिभाषा किसी अन्य उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
वक्रोक्ति अलंकार :
जहाँ पर ध्वनि द्वारा कथित का भिन्न अर्थ ग्रहण किया जाए, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण :
“को तुम हो? इत आये कहाँ? घनश्याम हो तो कितहुँ बरसो।
चितचोर कहावत है हमतौ, तहँ जाहु जहाँ घन है सरसौ।”

यहाँ कृष्ण तथा राधा का सुन्दर परिहास के माध्यम से वक्रोक्ति अलंकार को व्यक्त किया गया है।

कल्याण की राह महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

कल्याण की राह बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चलने से पूर्व बटोही को क्या करना चाहिए?
(क) नगर देखना
(ख) गाँव निर्धारित करना
(ग) राहगीर को देखना
(घ) मार्ग निर्धारित करना।
उत्तर:
(घ) मार्ग निर्धारित करना।

प्रश्न 2.
नदियाँ आगे चलकर किस रूप में परिवर्तित हो जाती हैं?
(क) बाँध
(ख) सागर
(ग) बालू
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) सागर

प्रश्न 3.
कवि ने रुकने को किसका प्रतीक माना है?
(क) गति का
(ख) रुग्णावस्था का
(ग) जीवन का
(घ) मृत्यु का।
उत्तर:
(घ) मृत्यु का।

प्रश्न 4.
‘चरैवेति जनगरबा’ कविता में कवि ने लोगों को क्या-क्या सलाह दी है?
(क) सूरज की भाँति प्रकाशित हो
(ख) नदी के प्रवाह की भाँति सतत् चलो
(ग) चन्द्रमा व तारे की भाँति गति करो
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ‘पथ की पहचान’ कविता के रचयिता ………… हैं।
  2. जीवन में उचित लक्ष्य का निर्धारण कर …………… पर अग्रसर होने पर ही सफलता मिलती
  3. पूर्व चलने के बटोही पथ की …………….. कर ले।
  4. रास्ते का एक काँटा पाँव का …………….. चीर देता।

उत्तर:

  1. श्री हरिवंशराय बच्चन
  2. जीवन-पथ
  3. पहचान
  4. दिल।

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सत्य/असत्य

  1. ‘इसकी कहानी पुस्तकों में छापी गयी’ ऐसा ‘पथ की पहचान’ में है।
  2. ‘खोल इसका अर्थ, पंथी पंथ का अनुमान कर ले’ पंक्ति श्री हरिवंशराय बच्चन की – कविता की है।
  3. कवि ने सपनों पर मुग्ध होने के लिए उत्साहित किया है।
  4. ‘क्षितिज पर श्रृंगार किये लक्ष्मी बैठी’ पंक्ति ‘चरैवेति जन गरबा’ कविता की है।
  5. नदियाँ आगे चलकर सागर में परिवर्तित हो जाती हैं। (2015)

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (ग)
3. → (घ)
4. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. चलने से पूर्व बटोही को क्या करना चाहिए? (2013, 15)
  2. जीवन का कल्याणमय पथ किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?
  3. भारत छोड़ो आन्दोलन में कौन सक्रिय रहे?
  4. धरती को प्रकाश और ऋतुओं को नया शृंगार कौन प्रदान करता है?

उत्तर:

  1. पथ की पहचान
  2. सतत् कर्म द्वारा
  3. नरेश मेहता
  4. सूरज।

पथ की पहचान भाव सारांश

‘पथ की पहचान’ कविता के रचयिता हरिवंशराय बच्चन का कथन है कि जीवन यात्रा के समान है। इसीलिए पथ का उचित ज्ञान आवश्यक है। एक बार उचित मार्ग चुनने के पश्चात् दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ना चाहिए।

मानव को सुख-दुःख में समान भाव से रहना चाहिए क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के सपने होते हैं और ये सपने तभी पूर्ण होते हैं जब व्यक्ति अपने कर्मपथ की बाधाओं को कुचलता हुआ अपने उद्देश्य की प्राप्ति में दृढ़ता से लगा रहे।

व्यक्ति यदि असमंजस की स्थिति में बार-बार मार्ग बदलता है तो वह अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाता। यदि अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त करनी है तो अपने मार्ग के काँटों को अर्थात् विषमताओं को दूर करते हुए आगे बढ़ो। सफलता अवश्य तुम्हारे चरण चूमेगी। तः मानव को अपना पथ सोच-समझकर निर्धारित करना चाहिए।

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पथ की पहचान संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) पूर्व चलने के बटोही
बाट की पहचान कर ले।
पुस्तकों में है नहीं छापी
गयी इनकी कहानी,
हाल इनका ज्ञात होता
हैन औरों की जुबानी।
अनगिनत राही गए इस
राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी मूक होकर
भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही
बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ :
बटोही = पथिक, रास्तागीर। बाट = रास्ता। औरों की जुबानी = औरों के कहने से। राही = पथिक। मूक = गूंगी। पंथी = रास्तागीर।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ पथ की पहचान’ शीर्षक कविता से ली गई हैं। इसके रचनाकार श्री हरिवंशराय बच्चन हैं।

प्रसंग :
कवि इसमें यह सन्देश देता है कि कोई भी कार्य करने से पहले उसके बारे में भली-भाँति जानकारी कर लेनी चाहिए।

व्याख्या :
कविवर हरिवंशराय बच्चन कहते हैं कि हे रास्तागीर! जिस रास्ते पर तुम चलना चाह रहे हो, उस रास्ते की भली-भाँति पहचान कर लो। इसकी कहानी किसी भी पुस्तक में नहीं छापी गयी है और न ही इसके बारे में किसी अन्य व्यक्ति से कोई जानकारी प्राप्त हो सकती है। इस मार्ग से, जिस पर तू चलना चाह रहा है, अनगिनत राही जा चुके हैं, पर आज तक उनका कोई अता-पता नहीं है, लेकिन कुछ ऐसे भी महान् पुरुष इस मार्ग से गये हैं, जहाँ उन्होंने अपने चरणों की अमिट छाप छोड़ी है। यद्यपि उनके चरणों की यह छाप मूक अर्थात् गूंगी है, लेकिन इसके बावजूद वह बहुत कुछ बोलती है। अतः हे पंथी! इस मूक निशानी का अर्थ तू भली-भाँति समझ ले और फिर उससे अपने पंथ का अनुमान लगा ले। हे राहगीर! चलने से पूर्व अपने मार्ग की पहचान कर ले।

विशेष :

  1. कवि ने सोच-समझकर किसी कार्य को करने को कहा है।
  2. कविता में लाक्षणिकता है।
  3. अनुप्रास की छटा।

(2) यह बुरा है या कि अच्छा,
व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
अब असम्भव, छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ,
यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही,
यह पड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी,
यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है।
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही
बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ :
व्यर्थ = बेकार में। पग बढ़ाना = दूसरा कार्य। शुरू करना। पंथी = राहगीर। अवधान = दृढ़ निश्चय।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।।

व्याख्या :
कविवर बच्चन कहते हैं कि जो व्यक्ति शंकालु होते हैं और बार-बार यह सोचते रहते हैं कि यह अच्छा है या बुरा है और इसी सोच में बेकार में अपना समय बर्बाद किया करते हैं। किसी पहली बात को असम्भव बताकर दूसरे नये काम में लग जाया करते हैं।

कवि कहता है कि किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व उसे अच्छी तरह समझ लो, ऐसा करने से आपकी यात्रा सरल एवं सफल हो जायेगी। तू यह मत सोच कि केवल तेरा ही इन संकटों से पाला पड़ा है बल्कि हर सफल पंथी की यही कहानी रही है और वह इसी विश्वास को लेकर उस पर आगे बढ़ा है। अतः खूब सोच-विचार कर तू अपना दृढ़ निश्चय इस पर कर ले। हे रास्तागीर! मार्ग पर चलने से पूर्व मार्ग की भली-भाँति। जाँच-पड़ताल कर ले।

विशेष :

  1. कवि ने कहा है कि किसी भी काम को अपने। हाथ में लेने से पूर्व भली-भाँति सोच-समझ लो, पर जब उस पर चल पड़ो तो फिर उसमें आने वाली विपत्तियों से मत डरो।
  2. अनुप्रास की छटा।

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(3) है अनिश्चित किस जगह पर,
सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर,
बाग, वन, सुन्दर मिलेंगे।
किस जगह यात्रा खत्म हो
जाएगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित कब सुमन, कब
कंटकों के शर मिलेंगे,
कौन सहसा छूट जाएंगे,
मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा
तू न, ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के, बटोही
बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ :
सरित = नदी। गिरि – पर्वत। गह्वर = गुफाएँ। वन = जंगल। सुमन = फूल। कंटकों = काँटों के। शर = बाण। आन = प्रतिज्ञा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर बच्चन कहते हैं कि जब हम किसी मार्ग पर चल निकलते हैं तो कहाँ हमें नदी, पर्वत और गुफाएँ मिलेंगी, यह सब अनिश्चित है। इसी प्रकार कहाँ हमें बाग, जंगल और सुन्दर स्थान मिलेंगे, यह भी अनिश्चित है। साथ ही हमारी यात्रा कहाँ खत्म हो जायेगी, यह भी अनिश्चित है। यह भी अनिश्चित है कि हमें कब तो सुमन मिलेंगे और कब हमें काँटों के बाण मिलेंगे। साथ ही कौन हमारे साथ चलते-चलते हमसे अलग हो जायेगा और कौन नया मिल जायेगा। अतः तू ऐसी प्रतिज्ञा कर ले कि चाहे जो भी परिस्थिति हो, तू अपने मार्ग पर चलते रहने से रुकेगा नहीं। हे राहगीर! चलने से पहले अपनी राह की भली-भाँति पहचान कर ले।

विशेष :

  1. कवि का सन्देश है कि किसी भी कार्य के करने में हमें अनेकानेक विपरीत स्थितियाँ मिलेंगी पर हमारा ध्येय इनकी चिन्ता न कर निरन्तर आगे बढ़ते रहना है।
  2. अनुप्रास की छटा।

(4) कौन कहता है कि स्वप्नों,
को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें
अपनी उमर, अपने समय में.
और तू कर यत्न भी तो
मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते, लिए कुछ
ध्येय नयनों के निलय में
किंतु जग के पंथ पर यदि
स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,
सत्य का भी ज्ञान कर ले।
पूर्व चलने के, बटोही
बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ :
नयनों = नेत्रों के। निलय = घर में। जग = संसार। मुग्ध = मोहित।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर बच्चन कहते हैं कि यह कौन व्यक्ति कहता है कि जीवन में कभी भी स्वप्न मत आने दो। अरे भाई ये स्वप्न तो अपनी उमर और अपने समय के अनुसार सभी देखते हैं। इसके साथ ही कवि यह भी कहता है कि हे मनुष्य! तू हजारों यत्न कर ले लेकन सफलता तुझे तब भी नहीं मिलेगी।

आगे कवि कहता है कि ये स्वप्न जब भी उदय होते हैं तो वे कोई-न-कोई लक्ष्य अपने नेत्रों में समाये रहते हैं, परन्तु हे राहगीर! इस जीवन के पथ पर यदि थोड़े से सपने हैं तो सैकड़ों सत्य (संघर्ष, विपदाएँ) भी हैं। अकेले स्वप्न पर ही हे मनुष्य! तू मोहित मत हो जा। सपने के साथ ही साथ जीवन के सत्य की भी तू पहचान कर ले। हे राहगीर! राह पर चलने से पूर्व अपने राह की पहचान कर ले।

‘विशेष :

  1. कवि स्वप्न देखना बुरा नहीं मानता है, पर वह यह कहना चाहता है कि स्वप्न के साथ ही साथ सत्यता का भी ज्ञान कर लेना चाहिए।
  2. अनुप्रास की छटा।

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(5) स्वप्न आता स्वर्ग:का; द्रग
कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को
ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा
पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूंद गिरती
एक दुनिया डूब जाती,
आँख में ही स्वर्ग लेकिन
पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी
सीख का सम्मान कर ले।
पूर्व चलने के, बटोही
बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ :
दृग = नेत्र। कोरकों = कोनों में। दीप्ति = चमक। पगों = पैरों में। उन्मुक्त = पूरी तरह मुक्त। अनोखी = विचित्र। सीख = शिक्षा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर बच्चन कहते हैं कि हमें स्वर्ग के सपने आते हैं, इससे हमारे नेत्रों के कोने में एक विशेष प्रकार की चमक आ जाती है। हमारे पैरों में पंख लग जाते हैं अर्थात् हम कल्पना लोक में विचरण करने लग जाते हैं और हमारी स्वच्छन्द छाती ललकने लगती है। रास्ते में पड़ा हुआ एक भी काँटा हमारे पाँव के दिल को चीर देता है। जब खून की दो बूंद गिरती हैं तो उसमें एक दुनिया डूब जाती है।

आगे कवि कहता है कि चाहे हमारी आँखों में स्वर्ग के सपने हों पर हमारे पैर पृथ्वी पर ही टिके रहने चाहिए कहने का भाव यह है कि हमें जीवन के यथार्थ का भी ज्ञान होना चाहिए। काँटों की इस अनोखी शिक्षा का, हे मानव! तू सम्मान कर ले। हे रास्तागीर! रास्तों पर चलने से पूर्व रास्ते की भली-भाँति पहचान कर ले।

विशेष :

  1. कवि स्वप्न देखना बुरा नहीं मानता, पर यथार्थ की भी हमें जानकारी होनी चाहिए इसी पर कवि जोर देता है।
  2. अनुप्रास की छटा।

चरैवेति-जन गरबा भाव सारांश

नरेश मेहता ने अपनी कविता ‘चरैवेति जनगरबा’ में मानव को निरन्तर चलने की प्रेरणा दी कवि का कथन है कि सूर्य निरन्तर चलता है। चन्द्रमा भी रात्रि में गति करता है। नित्य प्रति ऋतु परिवर्तन भी होता है, तारे आसमान में गति करते हैं।

जिस भाँति प्रकृति निरन्तर चलती है, उसी भाँति मानव को निरन्तर चलते रहना चाहिए। कवि का कथन है कि आज मनुष्य स्वतन्त्र है, अतः मानव योनि में जन्म लेने के कारण व्यक्ति को कर्म करते रहना चाहिए।

यदि व्यक्ति कर्म में रत रहेगा तो लक्ष्मी उससे दूर नहीं रहेगी,क्योंकि परिश्रम करने वाला व्यक्ति ही संसार में सुख-सम्पदा का स्वामी बनता है। कवि ने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ते रहना चाहिए। पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। कर्म करते रहना ही सच्चा तीर्थस्थल है।

मनुष्य को युग परिवर्तन के साथ-साथ प्राचीन रूढ़ियों का परित्याग करके नवीन समय का स्वागत करने को तैयार रहना चाहिए।

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चरैवेति-जन गरबा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) चलते चलो, चलते चलो।
सूरज के संग-संग चलते चलो, चलते चलो॥
तम के जो बन्दी थे
सूरज ने मुक्त किये
किरनों से गगन पोंछ
धरती को रंग दिये
सूरज को विजय मिली, ऋतुओं की रात हुई
कह दो इन तारों से चन्दा के संग-संग चलते चलो॥

शब्दार्थ :
तम = अन्धकार। मुक्त = स्वतन्त्र।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कविता ‘चैरवेति-जन गरबा’ शीर्षक से ली गई है। इसके कवि श्री नरेश मेहता हैं।

प्रसंग :
कवि इस अवतरण में मनुष्यों को सदैव चलते रहने का सन्देश देना चाहता है।

व्याख्या :
कविवर नरेश मेहता कहते हैं कि हे मनुष्यो! जीवन में तुम सदैव चलते चलो, रुको मत। जिस प्रकार सूरज रात दिन, वर्ष भर चलता ही रहता है, वह थकता नहीं है, इसी प्रकार तुम भी जीवन भर चलते रहो, रुको मत। आगे कवि कहता है कि जो अन्धकार के बन्दी थे, उन्हें सूरज ने मुक्त कर दिया है तथा अपनी किरणों से सूरज ने आकाश को पोंछ कर धरती को नये-नये रंग दे दिये हैं। आज सूरज को जीत मिल गई है और ऋतुओं की रात हो गयी है। इन तारों से कह दो कि वे चन्दा के साथ-साथ सदैव चलते रहें।

विशेष :

  1. कवि ने जीवन की सार्थकता निरन्तर चलते रहने में बताई है।
  2. अनुप्रास की छटा।

(2) रत्नमयी वसुधा पर
चलने को चरण दिये
बैठी उस क्षितिज पार
लक्ष्मी, श्रृंगार किये।
आज तुम्हें मुक्ति मिली, कौन तुम्हें दास कहे
स्वामी तुम ऋतुओं के, संवत् के संग-संग चलते चलो!!

शब्दार्थ :
रलमयी = रत्नों से भरी हुई। वसुधा = पृथ्वी। संवत् = वर्ष।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर नरेश मेहता कहते हैं कि ईश्वर ने कृपा करके रत्नों की भण्डार इस पृथ्वी पर चलने के लिए तुम्हें चरण प्रदान किये हैं। क्षितिज के दूसरी ओर लक्ष्मी शृंगार किये बैठी है। कहने का अर्थ यह है कि लक्ष्मी को प्राप्त करना चाहते हो, तो जीवन में पुरुषार्थ करो।

आज तुम स्वतन्त्र हो, तुम्हें दास कहने की किसमें हिम्मत। है। तुम सभी ऋतुओं के स्वामी हो। अतः संवत्सर के साथ-साथ निरन्तर चलते रहो, रुको मत।

विशेष :

  1. कवि ने मानव को सदैव प्रयत्न करते रहने का सन्देश दिया है।
  2. अनुप्रास की छटा।

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(3) नदियों ने चलकर ही
सागर का रूप लिया
मेघों ने चलकर ही
धरती को गर्भ दिया
रुकने का मरण नाम, पीछे सब प्रस्तर है।
आगे है देवयान, युग केही संग-संग चलते चलो!!

शब्दार्थ :
प्रस्तर = पत्थर देवयान = देवताओं का वाहन।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।।

व्याख्या :
कविवर नरेश मेहता कहते हैं कि निरन्तर बहने वाली नदियों ने ही अपने पानी द्वारा सागर का निर्माण किया है। बादलों ने ही उमड़-घुमड़ कर धरती को फलवती बना दिया है। रुकना मृत्यु है, पीछे सब पत्थर पड़े मिलेंगे यदि आगे बढ़ोगे तो देवयान मिलेंगे। अतः युग (समय) के साथ ही साथ चलते रहो।

विशेष :

  1. कवि ने निरन्तर आगे बढ़ने का सन्देश दिया
  2. अनुप्रास की छटा।

(4) मानव जिस ओर गया
नगर बसे, तीर्थ बने
तुमसे है कौन बड़ा
गगन सिन्धु मित्र बने
भूमा का भोगो सुख, नदियों का सोम पियो।
त्यागो सब जीर्ण बसन, नूतन के संग-संग चलते चलो!!

शब्दार्थ :
भूमा = पृथ्वी। जीर्ण बसन = पुराने वस्त्र। नूतन = नवीन।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर नरेश मेहता कहते हैं कि मानव ने जिस तरफ भी अपने चरण बढ़ाये वहीं नगरों एवं तीर्थों का निर्माण होने लगा। कवि मानव के महत्व को बताते हुए कहता है कि हे मनुष्य! तुमसे कोई भी बड़ा नहीं है। आकाश और समुद्र तक तुम्हारे मित्र बन बन गये हैं। अतः हे मनुष्यो! इस पृथ्वी का सुख भोगो, नदियों के सोम रस का पान करो, सभी पुराने वस्त्रों को त्याग दो और फिर नये वस्त्रों के साथ-साथ चलते चलो।

विशेष :

  1. मानव के महत्व को कवि ने बताया है।
  2. अनुप्रास की छटा।

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार (कविता, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’)

जागो फिर एक बार पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

जागो फिर एक बार लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सवा-सवा लाख पर’ एक को चढ़ाने की घोषणा किसने की थी?
उत्तर:
सवा-सवा लाख पर एक चढ़ाने की घोषणा गुरु गोविन्द सिंह ने की थी।

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प्रश्न 2.
गीता की उक्ति क्या है?
उत्तर:
गीता की उक्ति है कि इस संसार में योग्य व्यक्ति ही जीता है।

प्रश्न 3.
‘ताप-त्रय’. कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
दैहिक, दैविक और भौतिक ताप-त्रय हैं।

प्रश्न 4.
‘सिंधु-नद-तीरवासी’ किसे कहा गया है?
उत्तर:
भारतवासियों को सिंधु-नद-तीरवासी कहा गया है।

जागो फिर एक बार दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेषमाता तप्त आँसू क्यों बहाती है?
उत्तर:
मेषमाता निर्बल होती है। उसकी संतान जब उससे छीनी जाती है, तो वह चुपचाप देखती रह जाती है इस प्रकार वह अपने जन्म पर दुखी होकर अपने तप्त आँसू बहाती है।

प्रश्न 2.
ऋषियों का महामंत्र क्या है?
उत्तर:
ऋषियों का महामंत्र है कि तुम महान् हो, तुम सदा से महान् हो। यह शरीर नाशवान है और इसके साथ ही यह हीनता दिखाना, कायरतापूर्ण व्यवहार करना तथा काम भावना में प्रवृत्तं रहना आदि भी स्थायी नहीं हैं बल्कि शीघ्र ही नष्ट होने वाले हैं। तुम ब्रह्म हो और सारा संसार तुम्हारे चरणों की धूल के बराबर नहीं है। अतः तुम उठो और अपनी शक्ति पहचानो तथा उसके अनुरूप कार्य करो।

प्रश्न 3.
कवि ‘जागो फिर एक बार’ में क्या उद्बोधन देता है? (M.P. 2012)
उत्तर:
कवि ने ‘जागो फिर एक बार’ कविता में भारतीयों को उद्बोधन दिया है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के महासंग्राम में योद्धा की तरह संघर्ष करो। अपनी वीस्वती परंपरा को अक्षुण्ण रखने वाले भारतीय व्यक्ति को अपनी संपूर्ण कायरता को त्यागकर अपने पराक्रमी और पुरुषार्थी स्वरूप को जागृत करो। अपनी दासता के संपूर्ण बंधनों को तोड़ने के लिए उसे जागृत करना आवश्यक है।

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प्रश्न 4.
शिशु के छिनने पर सिंही और मेषमाता के व्यवहार में क्या अंतर है? (M.P. 2010)
उत्तर:
यदि सिंहनी की गोद से कोई उसका शिशु छीनने का प्रयत्न करे, तो वहचुप नहीं रहती। वह इतने जोर से दहाड़ती है कि उसके बच्चे को भयभीत होकर छोड़कर भाग जाता है। दूसरी ओर मेषमाता अपने बच्चे को छीनने वाले को चुपचाप देखती रहती है, क्योंकि वह कमजोर है। इसलिए अपने जन्म पर दुखी होकर आँसू बहाती रह जाती है। इसके विपरीत सिंहनी अपने शिशु की रक्षा के लिए उग्र रूप धारण कर लेती है जबकि मेषमाता अपने बच्चे की रक्षा के लिए कोई भी प्रयास नहीं करती।

जागो फिर एक बार भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-विस्तार कीजिए –

  1. हे नश्वर यह दीन भाव-कायरता, कामपरता।
  2. अभय हो गए हो तुम मृत्युंजय व्योमकेश के समान अमृत संतान।

उत्तर:

1. यह मानव शरीर नाशवान है और इसके साथ ही यह दीनता दिखाना, कायरतापूर्ण व्यवहार करना तथा कामभावना में प्रवृत्त रहना आदि भावनाएँ भी नश्वर हैं। जब शरीर ही नष्ट होने वाला है तो ये भाव भी स्थायी नहीं हैं। बल्कि ये भी शीघ्र नष्ट होने वाले हैं। इसलिए अपनी शक्ति को पहचानकर, उसी के अनुरूप कार्य करो।

2. तीनों प्रकार के गुण सत, रज और तम तथा तीन प्रकार के ताप दैविक, भौतिक तथा आध्यात्मिक अग्नि में जलकर भस्म हो गए थे। हे भारतवासियो! ऐसी स्थिति तुम मृत्यु को जीतने वाले भगवान शिव के समान निडर हो गए थे। तुम्हें मृत्यु का भय नहीं रहा था। अभयदान मिल जाने से तुम अमर हो गए थे।

जागो फिर एक बार भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
‘शप्त-सप्त’ समोच्चारित शब्द-युग्म है। इसी प्रकार के पाँच शब्द-युग्म लिखिए।
उत्तर:

  • अनल – अनिल
  • गुप्त – सुप्त
  • दिन – दीन
  • सुत – सूत
  • कूल – कुल।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह कर उनके नाम लिखिए –
मरणलोक, महासिंधु, तीरवासी, मेषमाता, सप्तावरण।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अनेकार्थी शब्द हैं। प्रत्येक के ऐसे दो-दो वाक्य बनाइए जिससे उनके भिन्न अर्थ स्पष्ट हों –
सैंधव, काल, गुण, पद।
उत्तर:
सैंधव:

  1. सैंधव की थाह कोई नहीं पा सकता।
  2. महाभारत काल में सैंधव नरेश जयद्रथ था।

काल:

  1. विकराल काल से कोई नहीं बच सकता।
  2. संध्या काल पक्षी घर लौट रहे हैं।

गुण:

  1. काव्य के भी गुण-दोष होते हैं।
  2. गुणी का सब जगह आदर होता है।

पद:

  1. मुझे अध्यक्ष का पद मिल गया है।
  2. इस पद की रचना कबीर ने की है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित पारिभाषिक शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
सच्चिदानंद, परमाणु, सहस्रार, माया।
उत्तर:

  • सच्चिदानंद – ईश्वर का दूसरा नाम ही सच्चिदानंद है।
  • परमाणु – आज सभी राष्ट्र परमाणु शक्ति सम्पन्न बनना चाहते हैं।
  • सहस्रार – भक्ति का अंतिम पड़ाव सहस्रार है।
  • माया – माया ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है।

जागो फिर एक बार योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
वीररस के कवियों की रचनाओं का संग्रह करें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
वार्षिक उत्सव में वीररस के कवियों के प्रतिरूप धारण कर कवि सम्मेलन आयोजित करें।
उत्तर:
छात्र अपने भाषाध्यापक की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 3.
निकटवर्ती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से भेंट कर उनसे स्वतंत्रता संग्राम के अनुभवों को सुनिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

जागो फिर एक बार परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘जागो फिर एक बार’ कविता में ……… का भाव निहित है। (M.P. 2012)
(क) राष्ट्रीय नवजागरण
(ख) राष्ट्रीय एकता
(ग) राष्ट्रीय भाषा
(घ) राष्ट्रीय भक्ति
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय नवजागरण।

प्रश्न 2.
‘जागो फिर एक बार’ कविता ……… के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर सजितं है।
(क) सामाजिक समता प्राप्ति
(ख) स्वतंत्रता प्राप्ति
(ग) आर्थिक मुक्ति प्राप्ति
(घ) अंग्रेज भगाओ
उत्तर:
(ख) स्वतंत्रता प्राप्ति।

प्रश्न 3.
गुरु गोविंद सिंह ……. के गुरु थे।
(क) ईसाइयों
(ख) जैनों
(ग) सिखों
(घ) बौद्धों
उत्तर:
(ग) सिखों।

प्रश्न 4.
भारतीयों को किसका रूप माना गया है?
(क) शिव का
(ख) ब्रह्मा का
(ग) इन्द्र का
(घ) विष्णु का
उत्तर:
(ख) ब्रह्मा का।

प्रश्न 5.
‘सत्श्री अकाल’ किस धर्म से संबंधित है?
(क) सिख धर्म से
(ख) इस्लाम धर्म से
(ग) मानव धर्म से
(घ) सनातन धर्म से
उत्तर:
(क) सिख धर्म से।

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प्रश्न 6.
“तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्” यह भारतीयों में किसका ड्का महामंत्र है?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) ऋषियों
(ग) गुरु गोविंद सिंह
(घ) स्वापी दयानंद
उत्तर:
(ख) ऋषियों।

प्रश्न 7.
“मृत्युंजय व्योमवेश के समान’ में ‘मृत्युंजय’ किसे कहा गया है?
(क) भगवान शिव को
(ख) भगवान श्रीकृष्ण को
(ग) भगवान विष्णु को
(घ) रावण को
उत्तर:
(क) भगवान शिव को।

प्रश्न 8.
तीन ताप कौन-कौन से हैं?
(क) दैहिक, दैविक और भौतिक
(ख) लौकिक, अलौकिक और आध्यात्मिक
(ग) समुद्री, आकाशीय और स्थलीय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) दैहिक, दैविक और भौतिक।

प्रश्न 9.
‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता हैं – (M.P. 2010)
(क) श्री सुमित्रानंदन पंत
(ख) श्री सूर्यकांत त्रिपाठी
(ग) बालकवि बैरागी’
(घ) श्री जयशंकर प्रसाद’
उत्तर:
(ख) श्री सूर्यकांत त्रिपाठी

प्रश्न 10.
“सवा लाख पर एक को चढ़ाऊँगा।” की घोषणा की थी –
(क) ऋषियों ने
(ख) सिन्धु-नद-तीरवासी ने
(ग) गुरु गोविन्द सिंह ने
(घ) सत्श्री अकाल ने
उत्तर:
(ग) गुरु गोविन्द सिंह ने।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पर कीजिए –

  1. ‘समन्वय’ पत्रिका का सम्पादन ………. के द्वारा किया गया। (महावीर प्रसाद द्विवेदी ‘निराला’)
  2. ‘निराला’ स्वच्छंदतावादी काव्य-संसार के ………. कवि रहे। (सर्वोत्कृष्ट श्रेष्ठ)
  3. ‘जागो फिर एक बार’. ………. प्रधान कविता है। (सामाजिक चेतना, राष्ट्रीय चेतना)
  4. ‘जागो फिर एक बार’ कविता ………. छन्द में है। (मुक्तक/मात्रिक)
  5. ‘योग्य जन जीता है’ उक्ति है ………. । (पश्चिम की गीता की)

उत्तर:

  1. ‘निराला’
  2. सर्वोत्कृष्ट
  3. राष्ट्रीय चेतना
  4. मुक्तकं
  5. गीता की।

III. निम्नलिखित कथनों में सत्य/असत्य छाँटिए –

  1. कवि ने भारतीयों को शेर और अंग्रेजों को सियार कहा है।
  2. ‘योग्य जन जीता है’ यह उक्ति पश्चिमी है।
  3. गुरु गोविन्द सिंह ईसाइयों के गुरु थे।
  4. ‘सत् श्री अकाल’ सिख धर्म से संबंधित है।
  5. ‘मृत्युंजय व्योमकोश के समान’ में मृत्युंजय भगवान विष्णु को कहा गया है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. असत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए –

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 9 जागो फिर एक बार img-2
उत्तर:

(i) (ङ)
(ii) (ग)
(iii) (घ)
(iv) (ख)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
‘तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्’ किसका महामंत्र है?
उत्तर:
ऋषियों का।

प्रश्न 2.
अपना बच्चा छिनता देख सिंहनी क्या करती है?
उत्तर:
सिंहनी अपनी गोद से बच्चा छीनने पर भयंकर दहाड़ करती हुई खाने के लिए दौड़ने लगती है।

प्रश्न 3.
दीन भाव क्या है?
उत्तर:
कायरता और कामपरता।

प्रश्न 4.
तीन गुण कौन-कौन हैं?
उत्तर:
सत्व, रज और तम।

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प्रश्न 5.
तीन ताप कौन-कौन हैं?
उत्तर:
दैविक, दैहिक और भौतिक।

जागो फिर एक बार लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

प्रश्न 2.
‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि किसे जगा रहा है?
उत्तर:
इस कविता में कवि भारतीयों को जगा रहा है।

प्रश्न 3.
‘शेरों की माँद में आया है आज स्यार’ इसमें ‘स्यार’ किसे कहा गयाहै।
उत्तर:
इसमें ‘स्यार’ अंग्रेजों को कहा गया है।

प्रश्न 4.
भारतीयों को पशु तुल्य क्यों कहा गया है?
उत्तर:
यदि भारतीय कृतज्ञ होकर अपने देश को दासता से मुक्ति नहीं दिला सके, तो पशु तुल्य हैं।

प्रश्न 5.
‘जागो फिर एक बार’ कविता में क्या दिया है?
उत्तर:
‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि ने भारतीयों को जागरथ का संदेश दिया है।

प्रश्न 6.
भारत देश की क्या परम्परा रही है?
उत्तर:
भारत देश की परम्परा वीरों की रही है।

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प्रश्न 7.
गुरु गोविन्द सिंह ने क्या कहा था?
उत्तर:
गुरु गोविन्द सिंह ने कहा था –
“सवा-सवा लाख पर
एक को चढ़ाऊँगा,
गोविन्द सिंह निज
नाम तब कहाऊँगा।’

जागो फिर एक बार दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गुरु गोविन्द सिंह ने ‘सवा लाख पर एक चढ़ाऊँगा’ की घोषणा क्यों की थी?
उत्तर:
गुरु गोविन्द सिंह ने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए यह घोषणा की थी कि उसका एक-एक वीर सिपाही शत्रु की सेना के सवा लाख सिपाहियों के बराबर है। यदि वह रणभूमि में मरा तो शत्रुओं की सेना के सवा लाख सिपाहियों को ही मारकर मरेगा। इस नारे से सेना के सिपाही का उत्साह बढ़ता था और वह स्वयं को अजेय समझने लगता था।

प्रश्न 2.
उत्सर्ग की किस परंपरा का उल्लेख किया है?
उत्तर:
कवि ने उत्सर्ग की उस परंपरा का उल्लेख किया है, जिसमें युद्ध के फाग में खून की होली खेलते हुए अनेक वीरों ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दियाथा।

प्रश्न 3.
कवि भारतीयों को क्यों जागत करना चाहता है?
उत्तर:
इस कविता में कवि भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्ति के महासंग्राम में एक योद्धा की तरह भाग लेने के लिए जागृत करना चाहता है।

प्रश्न 4.
कवि ने बलिदान की किस परम्परा का उल्लेख किया है?
उत्तर:
कवि ने बलिदान की उस परम्परा का उल्लेख किया है जिसमें युद्ध के फाग में रंगे रंग की तरह मानकर अनेक भारतीय वीरों ने अपने प्राणों को न्योछावर कर दिए। युद्ध-भूमि में अपने प्राणों का बलिदान करने वाले इन धीरों ने परमपद प्राप्त करके मृत्यु पर मानो विजय प्राप्त कर ली।

प्रश्न 5.
अपनी महान् और वीरतापूर्ण परम्परा को हमेशा बनाए रखने के लिए कवि ने क्या सुझाव दिए हैं?
उत्तर:
अपनी महान् और वीरतापूर्ण परम्परा को हमेशा बनाए रखने के लिए कवि ने ये सुझाव दिए हैं कि हमें अपनी सारी कायरता को भूल जाना चाहिए। अपने पुरुषार्थ और पराक्रम को जगाना चाहिए। अपनी गुलामी के बंधनों को त्यागने के लिए जागना होगा। हमें अपने ऋषियों द्वारा दिए गए महामंत्र ‘तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्’ को हमेशा याद रखना चाहिए।

जागो फिर एक बार कवि-परिचय

प्रश्न 1.
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं का परिचय दीजिए।
उत्तर:
छायावादी कविता के चार स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल प्रांत के अंतर्गत महिपादल के मेदिनीपुर जिले में 1896 ई० में वसंत पंचमी के दिन हुआ था। इनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला स्थान के रहने वाले थे। इनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी नौकरी के सिलसिले में बंगाल के महिषादल राज्य में रहने लगे थे। उनके बंगाल में रहने के कारण ‘निराला’ जी की शिक्षा-दीक्षा वहीं पर हुई। इसीलिए इनका आरंभ में बंगला भाषा और साहित्य से परिचय हो गया। बाद में इन्होंने हिंदी तथा संस्कृत का अध्ययन घर पर रहकर ही किया। इनकी नियमित शिक्षा नौवीं कक्षा से आगे न हो सकी।

प्रकृति प्रेम तथा एकांत में पत्र-पत्रिकाओं के पठन-पाठन से आपकी रुचि साहित्य की ओर बढ़ती गई। युवावस्था में प्रवेश करते-करते इन पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। पहले माँ की मृत्यु हुई। फिर पिताजी की। इसके पश्चात् फ्लू के रोग में परिवार के अन्य प्राणी भी चल बसे। इन घटनाओं से कवि का संवेदनशील मन कराह उठा। आर्थिक अभाव और उदारवादी वृत्ति के कारण इनको जीवन की कठोर विषमताओं से सदैव जूझना पड़ा। इन दैवी और आर्थिक आपदाओं ने इनको दार्शनिक बना दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानन्द के साहित्य और दर्शन का आप पर गहरा प्रभाव पड़ा।

पिता की मृत्यु के बाद इनको पिता के स्थान पर नौकरी मिल गई थी, किंतु ये वहाँ अधिक समय तक न रह सके। कोलकाता से प्रकाशित होने वाले ‘मतवाला’ तथा पत्रिकाओं का उन्होंने सम्पादन किया। कुछ दिन ‘सुधा’ पत्रिका का भी सम्पादन किया। जीवन के अंतिम समय में ये अर्द्धविक्षिप्त हो गए। इसी अवस्था में 15 अक्टूबर, 1961 ई० को इनका देहावसान हुआ।

साहित्यिक विशेषताएँ:
‘निराला’ के काव्य में छायावादी, प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी काव्य प्रवृत्तियों का संगम हुआ है। ‘निराला’ की अनामिका, परिमल, गीतिका तथा तुलसीदास आदि छायावादी रचनाएँ हैं। परिमल, बेला और नए पत्ते इनकी प्रगतिवादी रचनाएँ मानी जाती हैं। ‘अणिमा’ काव्य को विद्वान दार्शनिक रचनाओं में सम्मिलित करते हैं। इनकी रचना ‘तुलसीदास’ प्रबंधात्मक रचना है। इसमें महाकवि तुलसीदास.. के मनोविकास को दर्शाया गया है। ‘राम की शक्ति पूजा’ करुणा की पृष्ठभूमि पर आधारित शृंगार, वात्सल्य और व्यंग्य को समेटे हुए हैं। ‘सरोज-स्मृति’ हिंदी साहित्य का प्रसिद्ध शोकगीत है।

रचनाएँ:
प्रबंधात्मक काव्य-राम की शक्ति पूजा, सरोज-स्मृति और तुलसीदास।

काव्य:
परिमल, गीतिका, अनामिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, . आराधना, गीतगुंज और सांध्यकली।

उपन्यास:
अप्सरा, अलका, निरुपमा, प्रभावती, चोरी की पकड़, काले कारनामे। कहानी-लिली, सखी, सुकुल की बीवी, देवी। रेखाचित्र-कुल्ली भाट, विल्लेसुर बकरिहा, चतुरी चमार।

आलोचना:
प्रबंध-पादप, प्रबंध प्रतिमा, संचय और चाबुक।

निरालाजी के काव्य की भाषा, भाव और छंद में नवीनता के कारण अद्वितीय बन गयी है। इनमें खड़ी बोली के साथ-साथ उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है पर ये प्रयोग कहीं भी खटकते नहीं। ‘निराला’ हिंदी कविता में मुक्त छंद के प्रवर्तक रहे। इनकी विशेषता लयात्मकता के कारण मात्रा, वर्गों में तालमेल के कारण बढ़ गई है। इनके काव्य में पारंपरिक अलंकारों के साथ-साथ छायावादी मानवीकरण तथा विशेषण विपर्यय जैसे अलंकारों का प्रयोग भी मिलता है। .

महत्त्व:
‘निराला’ आधुनिक हिंदी के उन महान् कवियों में से एक हैं, जिन्होंने रूढ़ियों को विध्वंस किया, किंतु भाव, भाषा और छंद को एक नया आयाम प्रदान कर हिंदी कविता का उत्कर्ष किया। ‘निराला’ जी छायावादी कविता के प्रवर्तकों में से एक हैं। स्वच्छंदतावादी काव्य जगत् के भी वे सर्वोत्कृष्ट कवि हैं।

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जागो फिर एक बार पाठ का सारांश

प्रश्न 2.
‘जागो फिर एक बार’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि ने भारत के अतीत का गौरवमय चित्रण किया है। इसी संदर्भ में वह भारतीयों को जागरण का संदेशा दे रहे हैं। भारतीयों ने अतीत काल में युद्ध में मरकर स्वर्ग जाने का लक्ष्य बना रखा था यही उनके जीवन का आदर्श था। उनके इस आदर्श के कारण महासागर से लेकर सिंधु नदी के वासियों ने उनकी प्रशंसा के गीत गाए हैं। गुरु गोविन्द सिंह ने भी कहा कि सवा-सवा लाख शत्रओं को मारकर जब उनका एक सिपाही या योद्धा मरेगा। तभी वह अपना नाम गोविन्द सिंह कहलाना चाहेंगे।

वीरों के मन को मोहित कर लेने वाला यह गीत योद्धाओं को रणभूमि में अजेय बना देता था। आज शेरों! (भारतीयों) की माँद में पुनः सियार (अंग्रेज) घुस आए हैं। इसलिए शेरों जागो और इनको अपनी माँद में से बाहर धकेलो। गुरु गोविंद सिंह जब रणभूमि में सत श्री अकाल का उच्चारण करते हुए पहुँचते थे, तो उनका चेहरा तमतमा जाता था और उससे आग-सी निकला करती थी। इस आग में तीन काल (भूत, भविष्य, वर्तमान), तीनों गुण (सत्, रज, तम) तथा तीनों ताप (दैविक, भौतिक तथा आध्यात्मिक) जलकर भस्म हो जाते थे। ऐसी दशा में तुम शिव के समान मृत्यु को जीतने वाले हो गए।

तुम उस परम योगी के समान हो गए, जो सातों आवरण भेदकर उस स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ. ब्रह्मस्थल है। अरे तुम जागो, तुम वीर हो। भला कोई सिंहनी की गोद से उसका शिशु भी छीन ले और वह चुपचाप देखती रहेगी। ऐसा कभी नहीं हुआ। केवल भेड़ की माता ही अपने शिशु को छिनता हुआ देखती है और अपने जन्म पर आँसू बहाती रह जाती है। इस संसार में जो योग्य जन होता है वही जीता है। यही हमारे यहाँ की गीता का उपदेश है। इस उपदेश को याद करो और एक बार जाग जाओ। अरे तुम पशु नहीं हो, बल्कि वीर योद्धा हो।

यह ठीक है कि तुम कालचक्र में दबे हुए योद्धा के समान हो। पर क्या यह सब माया है। तुम मुक्त छंद की भाँति हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो और आनंद में डूबे हुए ईश्वर का रूप हो। महाऋषियों ने अणुओं और परमाणुओं में सदा यही मंत्र फूंका है कि तुम महान् हो। यह दीनता, कायरता और भोग-विलास की भावना को नष्ट कर दो। अरे तुम ब्रह्म हो। यह सारा संसार तुम्हारे चरणों की धूलि की बराबरी करने योग्य भी नहीं है इसलिए तुम जागो और अपने को पहचानो।

जागो फिर एक बार संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
जागो फिर एक बार!
समर में अमर कर प्राण,
गान गाए महासिंधु से
सिंधु-नद-तीरवासी!
सैन्धव तुरंगों पर
चतुरंग चमू संग,
सवा-सवा लाख पर
एकको चढ़ाऊँगा,
गोविन्दसिंह निज
नाम जब कहाऊँगा।” (Pages 40-41)

शब्दार्थ:

  • समर – युद्ध।
  • सैंधव – सिंधु (समुद्र) संबंधी
  • चतुरंग – चार तरह की।
  • चमू – सेना।
  • महासिंधु – महासागर।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से ली गई हैं। यहाँ कवि ने गुरु गोविन्द सिंह का गुणगान करते हुए भारतवासियों को उद्दीप्त किया है कि वे भी अपने आलस्य भाव को छोड़कर शत्रुओं से भिड़ जाएँ और देश को स्वतंत्र कराएँ।

व्याख्या:
कवि कहता है कि हे भारतवासियो! तुम एक बार फिर जागो। इस देश के वीरों की परम्परा रही है कि युद्ध में शत्रुओं से लड़ते-लड़ते मर जाने पर वीर के प्राण अमर हो जाते हैं। सिंधु प्रांत के घोड़ों पर चढ़कर अपने साथ चतुरंगी सेना-अर्थात् अश्व सेना, गजसेना, रथसेना तथा पैदल सिपाही-के साथ जब वीर युद्ध में जाते थे तो सिंधु नदी के तटवासी और महासागर भी उनका गुणगान गाते थे।

याद करो गुरु गोविन्द सिंहजी जैसे वीर पुरुष ने कहा था कि जब शत्रुओं पर आक्रमण करूँगा तो सवा-सवा लाख शत्रुओं को मारकर ही अपने एक सिपाही को चढ़ाऊँगा। ऐसा होने पर ही मैं अपना नाम गोविंद सिंह कहलाऊँगा। भव यह है कि मेरी सेना का एक-एक वीर सिपाही शत्रु की सेना के सवा लाख सिपाहियों के लिए काफी है। यदि वह रणभूमि में मरा, तो शत्रुओं की सवा लाख सेना का सफाया करके ही मरेगा।

विशेष:

  1. यहाँ गुरु गोविन्द सिंह की सेना की वीरता का वर्णन किया है। गुरु गोविन्द सिंह अपनी सेना का मनोबल किस प्रकार बढ़ाया करते थे, कवि ने उस नारे का उल्लेख किया है।
  2. इसमें वीररस है।
  3. इसकी भाषा में ओजगुण है।
  4. इसमें अनुप्रास तथा पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार हैं।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्त संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
कवि ने भारतीयों को किस प्रकार उदबोधित किया है?
उत्तर:
कवि ने गुरु गोविन्द सिंह का गुणगान करते हुए भारतीयों को उद्बोधित किया है कि वे आलस्य भाव को छोड़कर देश को स्वतंत्र कराने के लिए शत्रुओं से भिड़ जाएँ।

प्रश्न (ii)
गुरु गोविंद सिंह ने क्या नारा लगाया था?
उत्तर:
गुरु गोविन्द सिंह ने नारा लगाया था कि सवा-सवा लाख पर एक को . चढ़ाऊँगा; अर्थात् उन्होंने कहा था कि उनकी सेना का एक-एक सिपाही शत्रु की सेना के संवा लाख सिपाहिया के बराध है। वह शत्रुओं की सेना के सिपाहियों को मारकर ही मरेगा। “सवा लाख से एक लड़ाऊँ तब गोविन्द सिंह नाम कहाऊँ।”

प्रश्न (iii)
किन लोगों की वीरता का गुणगान आज तक किया जाता है?
उत्तर:
सिन्धु नदी के किनारे रहने वाले लोगों की वीरता का गुणगान आज तक किया जाता है।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
कवि ने गुरु गोविन्द सिंह का गुणगान करते हुए भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए तैयार होने के लिए उद्बोधित किया है। देश की परंपरा का उल्लेख करके भारतीयों को जगाने का प्रयास किया है। गोविन्द सिंह अपनी सेना का मनोबल किस प्रकार बढ़ाया करते थे, कवि ने उनके उस नारे का भी उल्लेख किया है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
कवि ने भारत के अतीत का गौरवमय चित्रण किया है। वह भारतीयों को जागरण का संदेशा दे रहे हैं। ‘गान गाए’, ‘चतुरंग चमू’ में अनुप्रास अलंकार है। सवा-सवा में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। भाषा ओजगुण संपन्न और तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। काव्यांश में वीररस है।

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प्रश्न 2.
किसने सुनाया यह
वीर-जन-मोहन अति
मोदन अति दुर्जय संग्राम-राग,
फागका खेला रण
बारहों महीनों में?
शेरों की माँद में
आया है आज स्यार
जागो फिर एक बार! (Page 41)

शब्दार्थ:

  • वीर-जन-मोहन – वीरों को मोहित करना।
  • दुर्जय – जिसे जीतना कठिन है।
  • संग्राम राग – युद्ध का गीत।
  • फाग – होली।
  • माँद – घर।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से उद्धृत है। भारतवासियों को उद्बोधित करते हुए कवि उन्हें अतीत काल के वीरों की शौर्य गाथा को सुना रहा है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि वीर जनों को मोहित कर लेने वाला यह राग किसने सुनाया अर्थात् ‘सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊँगा’ का नारा गोविन्द सिंह का दिया हुआ है जिसे सुनकर वीर उत्साह में झूम उठते थे। वे वीर रणभूमि में इस राग में झूमते हुए दुर्जय हो जाते थे; अर्थात् शत्रु उन पर विजय नहीं पा सकते थे। गुरु गोविन्द सिंह एवं उनके योद्धा इस प्रकार बारह महीने रणभूमि में खून की होली खेला करते थे। गुरु गोविन्द सिंह की परम्परा वाले शेर आज भी हैं, किन्तु आज शेरों की माँद में स्यार (अंग्रेज) घुस आया है। इस स्यार को मारने के लिए हे भारतीय वीरो! तुम जाओ और शत्रु का सफाया करो।

विशेष:

  1. यहाँ पर कवि ने भारतीयों में रणोन्माद भरने की चेष्टा की है, ताकि ये अंग्रेजों के खिलाफ जमकर युद्ध कर सकें।
  2. इसमें अनुप्रास अलंकार है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
वीरजनों को मोहित करने वाले किस राग की ओर कवि का संकेत है?
उत्तर:
वीरजनों को मोहित करने वाले उस राग की ओर कवि का संकेत है जिसे गुरु गोविन्द सिंह ने सुनाया कि ‘सवा लाख पर एक को चढ़ाऊँ’ इसे सुनकर वीर उत्साह में झूम उठते थे।

प्रश्न (ii)
कवि ने किसे शेर और स्यार कहा है?
उत्तर:
कवि ने भारतीयों को शेर और अंग्रेजों को सियार कहा है। इन सियारों को मार भगाने के लिए भारतीय शेरो! तुम जागो और शत्रु का सफाया कर दो।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
कवि भारतीयों को उद्बोधित करने के लिए अतीतकाल के वीरों की वीरता का गुणगान कर रहा है। वह कहता है कि गुरु गोविन्द सिंह बारह महीने रणभूमि में खून की होली खेलते थे। भारतीय वीरो! उनसे प्रेरणा लेकर शत्रुओं को मार भगाओ। स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जाग उठो।

प्रश्न (ii)
प्रस्तुत काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने भारतीयों में रणोन्माद भरने की चेष्टा की है ताकि वे स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध कर सकें। ‘माँद में’ अनुप्रास अलंकार है। भाषा ओजस्वी तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। वीर रस है। शेर भारतीयों का, माँद भारत का और स्यार अंग्रेजों का प्रतीक है। छंदयुक्त कविता में लय-तुक नहीं है।

प्रश्न 3.
सत् श्री अकाल,
भाल-अनल धक-धक् कर जला,
भस्म हो गया था काल
तीनों गुण ताप त्रय,
अभय हो गये थे तुम
मृत्युंजय व्योमकेश के समान,
अमृत सन्तान! तीव्र
भेदकर सप्तावरण-मरण-लोक,
शोकहारी! पहुँचे थे वहाँ
जहाँ आसन है सहस्रार
जागो फिर एक बार! (Page 41)

शब्दार्थ:

  • अनल – आग, तेज।
  • भाल – माथा।
  • ताप त्रय – तीन प्रकार के दुःख-मानसिक, शारीरिक और आत्मिक।
  • अभय – निडर।
  • मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले, भगवान शिव।
  • सप्तावरण – सात आवरण, सात चक्र।
  • मरण-लोक – मृत्यु लोक।
  • शोकहारी – दुख दूर करने वाले।
  • सहस्रार – हठयोग के अनुसार छः चक्रों को पार कर मस्तिष्क में रहने वाला सातवाँ चक्र जहाँ रस टपकता है, ब्रह्मलोक।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से लिया गया है। इन पंक्तियों में कवि ने बताया है कि भारत का अतीत गौरवमय है। इसी सन्दर्भ में वह भारतीयों को जागरण का संदेश दे रहा है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि जब गुरु,गोविन्द सिंह सत श्री अकाल का उच्चारण करते हुए युद्धभूमि में पहुँचते थे तो उनके मस्तक से आग उगलने लगती थी, यह आग सबको जला डालने के लिए धधक उठती थी। इस आग में काल, तीनों प्रकार के गुण (सत, रज और तम) तथा तीन प्रकार के ताप (दैविक, भौतिक तथा आध्यात्मिक कष्ट) जलकर भस्म हो गए। हे भारतवासियो! ऐसी दशा में तुम शिवजी की सन्तान के समान हो गए थे।

अभयदान मिल जाने से तुम अमर हो गए थे। ऐसी अवस्था में तुम संसार के सात आवरणों को भेदकर उस स्थान पर जा पहुँचे थे, जिसे सहन दल कमल का आसन कहा जा सकता है; अर्थात् योग सिद्धि के द्वारा तुमने ब्रह्म . रंध्र की अवस्था को पा लिया है। अब एक बार फिर जागो! और शत्रुओं का सफाया करो।

विशेष:
1. सहन दल कमल का संबंध हठयोग की साधना से है। इसके अनुसार माना जाता है कि कुंडलिनी छः चक्रों में से निकलकर सातवें चक्र में प्रवेश करती है, जिसे सहस्रदल कमल कहा जाता है। कुंडलिनी के इस चक्र में पहुँचकर वहाँ पर एक रस टपकता है जिसे पीकर साधना पूरी हो जाती और उसे मुक्ति मिल जाती है।

2. कवि वीर सेनानी गुरु गोविन्द सिंह और योग साधना के द्वारा सिद्धि पाने वाले भारतीयों को लक्ष्य कर नए मूल्यों को पाने की प्रेरणा दे रहा है।

3. इसमें अनुप्रास तथा पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
तीन गुण और तापत्रय कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सत, रज और तम तीन गुण हैं तथा दैविक, भौतिक और आध्यात्मिक तापत्रय हैं।

प्रश्न (ii)
भारतवासी अमर कैसे हो गए थे?
उत्तर:
जब तीनों गुण और तापत्रय जलकर भस्म हो गए, तो भारतवासी ऐसी स्थिति में शिवजी की संतान के समान हो गए थे और अभयदान मिलने के कारण अमर हो गए थे।

प्रश्न (iii)
भारतीयों ने किस स्थान को प्राप्त कर लिया था?
उत्तर:
भारतीयों ने संसार के सात आवरणों को भेदकर उस आसन को प्राप्त कर लिया था जिसे सहस्र दल कमल का आसन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में भारतीयों ने योगसिद्धि के द्वारा ब्रह्म रन्ध्र की अवस्था को पा लिया है।

प्रश्न 4.
सिंही की गोद से
छीनता रे शिशु कौन?
मौन भी क्या रहती वह
रहते प्राण? रे अजान!
एक मेषमाता ही
रहती है निर्निमेष –
दुर्बल वह –
छिनती संतान जब
जन्मपर अपने अभिशप्त
तप्त आँसू बहाती है –
किन्तु क्या,
योग्य जन जीता है,
पश्चिम की उक्ति नहीं –
गीता है, गीता है –
स्मरण करो बार-बार –
जागो फिर एक बार! (Page 41)

शब्दार्थ:

  • अजान – अनजान।
  • मेषमाता – भेड़ की माता।
  • निर्मिमेष – चुपचाप देखना।
  • दुर्बल – कमजोर।
  • अभिशप्त – शाप से सताए हुए।
  • तप्त – गर्म।
  • जन – आदमी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जामो फिर एक बार’ से उद्धृत है। कवि भारतीयों को उद्बोधित करते हुए कहते हैं कि राष्ट्र विपत्ति में पड़ा हुआ है, तुम उसकी सन्तान हो। अतः उसका निवारण करने के लिए उठो।

व्याख्या:
कवि कहता है कि क्या कभी तुमने सिंह की गोद से उसके बच्चे को छीनते हुए देखा है। यदि कोई उसके बच्चे को छीनने का प्रयत्न करे तो क्या उस बच्चे की माता प्राण रहते चुप रहती है? अर्थात् वह इतनी जोर से दहाड़ती है कि उसके बच्चे को उठाने वाले हाथ अपने आप ही पीछे हट जाते हैं। क्या तुम इस बात से अनजान हो? एक भेड़ की माता ही ऐसी होती है वह अपने बच्चे को उठाने वाले व्यक्ति को चुपचाप देखती रह जाती है क्योंकि वह कमजोर है।

उसकी सन्तान जब उससे छीनी जाती है, तब अपने जन्म पर दुःखी होकर आँसू बहाती रह जाती है। लेकिन क्या कभी कोई अपनी रक्षा में समर्थ व्यक्ति भी इस प्रकार आँसू बहाता रह सकता है। इस संसार में योग्य व्यक्ति ही जीता है यह पश्चिम की ही उक्ति नही हैं, अपितु हमारी गीता का भी यही उपदेश है। इन बातों को बार-बार याद करो और अपना आलस्य भाव को छोड़ देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक बार जाग जाओ और शत्रुओं को मार डालो या मारकर भगा दो।

विशेष:

  1. यहाँ पर कवि ने सिंहनी और मेषमाता का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि यदि अपनी स्वतंत्रता को छिनता देखकर तुम लड़ने-सरने को तैयार हो जाते हो, तो शेर हो अन्यथा भेड़ हो जिसकी नियति में कटना है।
  2. गीता से सतत कर्म करने की शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा दी गई है।
  3. इसमें अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश तथा उदाहरण अलंकार हैं।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
सिंहनी और मेषमाता में क्या अंतर है?
उत्तर:
सिंहनी शक्तिशाली होती है और मेषमाता दुर्बल होती है। सिंहनी के बच्चे को जब कोई छीनने या उठाने का प्रयास करता है, तो वह चुप नहीं रहती, अपितु, क्रोधित होकर इतने जोर से दहाड़ती है कि बच्चे को उठाने वाले हाथ अपने आप पीछे हट जाते हैं जबकि मेषमाता अपने बच्चे को उठाते हुए देखकर भी चुपचाप रहती है। वह कुछ नहीं करती, केवल आँसू बहाती रह जाती है।

प्रश्न (ii)
इस संसार में कैसा व्यक्ति जीता है?
उत्तर:
इस संसार में योग्य, समर्थ व्यक्ति ही जीता है। यह पश्चिम की उक्ति ही नहीं, हमारी गीता का भी यही उपदेश है।

काव्यांश पर सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
यहाँ कवि ने सिंहनी और मेषमाता का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि यदि अपनी स्वतंत्रता को छीनता देखकर भी यदि तुम लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हो तो शेर हो अन्यथा भेड़ हो जिसकी नियति में डरना है। तुम्हें स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना चाहिए।

शिल्प-सौंदर्य:
उदाहरण अलंकार है। ‘मेषमाता’, ‘अपने अभिशप्त’, ‘जन जीता’ में अनुप्रास अलंकार है। गीता है, गीता है और बार-बार में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। ओजमयी भाषा है। वीररस है। प्रयोगवादी कविता है।

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प्रश्न 5.
पशु नहीं, वीर तुम,
समर-शूर कूर नहीं,
काल-चक्र में हो दबे
आज तुम राजकुँवर!
समर सरताज! पर, क्या है,
सब माया है-माया है,
मुक्त हो सदा ही तुम,
बाधा-विहीन-बंध-छंद ज्यों,
डूबे आनंद में सच्चिदानंद रूप। (Page 41)

शब्दार्थ:

  • पशु – जानवर।
  • समर-शूर – योद्धा।
  • क्रूर – अत्याचारी।
  • समर सरताज – युद्ध में विजयी।
  • बाधा विहीन – बिना किसी रुकावट के।
  • सच्चिदानंद – भगवान।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूयकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से लिया गया है। इस कविता में देशवासियों को उद्बोधित करते हुए कवि कहता है कि एक बार जाग जाओ और देश पर घिरी हुई विपत्तियों को दूर करो।

व्याख्या:
कवि कहता है कि यदि तुम कृतज्ञ होकर अपने देश को पराधीनता से मुक्त नहीं कर सके तो तुम पशु के तुल्य हो, वीर नहीं। तुम तो युद्ध वीर या योद्धा हो, अत्याचारी नहीं। यह ठीक है कि हे राजकुमार, तुम कालचक्र में दवे हुए हो, किन्तु यह क्यों भूल जाते हो कि तुमने युद्ध में हमेशा विजय प्राप्त की है। पर वह क्या कहते हो कि यह सब छल या छलावा मात्र है। तुम इसी प्रकार स्वतंत्र हो जैसे आज कविता में छंद मुक्त कविता की स्थिति है। तुम सच्चिदानंद भगवान् के रूप या अंश हो और आज अपने काल्पनिक आनंद में इवे हा हो।

विशेष:

  1. यहाँ कवि भारतवासियों को याद दिलाता है कि उन्होंने अनेक युद्ध जीते हैं और वे युद्धभूमि में विजयी रहे हैं। इसलिए उनको आज भी युद्ध करना चाहिए।
  2. इसमें अनुप्रास तथा पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
कवि ने यह क्यों कहा कि ‘पशु नहीं, वीर तुम’।
उत्तर:
कवि ने यह इसलिए कहा कि तुम भारतीय कृतज्ञ होकर भी अपने देश को पराधीनता से मुक्त नहीं कर सके तो तुम पशु के तुल्य हो, वीर नहीं। कवि ने यह भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने के लिए कहा है।

प्रश्न (ii)
कवि ने भारतीयों को उद्बोधित करने के लिए क्या-क्या कहा है?
उत्तर:
कवि ने भारतीयों को उद्बोधित करने के लिए वीर, समर-शूर, राजकुंवर, समर सरताज, कालचक्र में दबे हुए, स्वतंत्र, सच्चिदानंद आदि कहा है।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काव्य-सौंदर्य:
कवि ने यहाँ भारतीय को उद्बोधित करने के लिए उन्हें याद दिलाया है कि उन्होंने अनेक युद्ध जीते हैं। वे वीर हैं। स्वतंत्र, स्वच्छंद औसच्चिदानंद के अंश हैं। उन्हें आज भी स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए युद्ध करके विजय प्राप्त करनी चाहिए। समर-शूर, समर सरताज, वाधाविहीन वंध में अनुप्रास अलंकार है। ‘माया है, माया है’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। भारतीयों के लिए अनेक विशेषणों का प्रयोग किया गया है। भाषा तत्सम शब्दावली युक्त आजमयी खड़ी बोली है। प्रयोगवादी कविता है।

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प्रश्न 6.
महामंत्र ऋषियों का
अणुओं परमाणुओं में फूंका हुआ –
“तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्”
है नश्वर यह दीन भाव,
कायरता, कामपरता,
ब्रह्म हो तुम,
पद-रज भर भी है नहीं पूरा यह विश्व-भार
जागो फिर एक बार!

शब्दार्थ:

  • नश्वर – नाश हो जाने वाला।
  • दीन भाव – दैन्य भाव।
  • कायरता – डरपोकपन।
  • पद-रज – भर-पैरों की धूल।
  • विश्व-भर – संसार का बोझ।
  • तप्त – गर्म।
  • जन – आदमी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘जागो फिर एक बार’ से लिया गया है। कवि भारतवासियों से बार-बार एक ही बात कह रहा है कि उनको जाग जाना चाहिए तथा अपनी सोई हुई वीरता को जगा लेना चाहिए। ताकि वे देश पर आई विपत्ति को दूर कर सकें।

व्याख्या:
कवि कहता है कि हमारे भारतीय ऋषियों से सदा ही यह महामंत्र हर अणु और परमाणु में फूंका है कि तुम महान् हो, तुम सदा से महान् हो । यह शरीर नाशवान् है और इसके साथ ही यह दीनता दिखाना, कायरतापूर्ण व्यवहार करना तथा काम भावना में प्रवृत्त रहना आदि भी स्थायी नहीं हैं, बल्कि शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाले भाव हैं। तुम ब्रह्म के रूप हो। इसलिए तुम भी ब्रह्म हो और सारे संसार का भार तुम्हारे चरणों की धूल के बराबर भी नहीं है। तुम उठो और अपनी शक्ति पहचानो तथा उसके अनुरूप ही कार्य करो। और शत्रुओं को पराजित कर उन्हें अपने घर से बाहर निकालो।

विशेष:

  1. यहाँ पर भारतीय ऋषियों का मंत्र ‘मैं ही ईश्वर हूँ’ के बारे में वह भारतीयों को याद दिलाना चाहता है। वह उनको प्रेरित करता है कि उनके द्वारा किया जाने वाला कोई भी कार्य असंभव नहीं है।
  2. इसमें अनुप्रास अलंकार है।
  3. इसमें भाषा में ओजगुण है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्त संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
ऋषियों ने कौन-सा महामंत्र फूंका है?
उत्तर:
भारतीय ऋषियों ने सदा यह महामंत्र फूंका है कि अणु और परमाणु में ‘तुम भारतीय महान् हो, सदा से महान् हो। यह शरीर नश्वर है, तुम अमर हो।

प्रश्न (ii)
कवि ने भारतीयों का उद्बोधन क्यों किया है?
उत्तर:
कवि ने भारतीयों का उद्बोधन इसलिए किया है ताकि वे आलस्य को त्यागकर उठें और अपनी शक्ति को पहचारकर, स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करें।

काव्यांश पर सौंदर्य-बोध संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
प्रस्तुत काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
कवि भारतीयों को जगाने के लिए उद्बोधित करता है कि उन्हें जाग जाना चाहिए तथा. अपनी सोई हुई वीरता को पहचानकर देश पर आई विपत्ति को दूर करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। भारतीय ऋषियों के महामंत्र का उल्लेख करते हुए कवि ने कहा कि यह शरीर नश्वर है, परंतु तुम अमर हो। तुम्हारे लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है।

प्रश्न (ii)
प्रस्तुत काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
महामंत्र, कायरता, कामपरता में अनुप्रास अलंकार है। विश्व-भार में रूपक अलंकार है। तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। भाषा में ओजगुण है। वीररस है। प्रयोगवादी कविता है।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 2 अलसस्य स्वप्नः

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 2 अलसस्य स्वप्नः (कथा)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 2 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)।
(क) विप्रपुत्रस्य नाम किम् आसीत्? (विप्र पुत्र का नाम क्या था?)
उत्तर:
विप्रपुत्रस्य नाम सोम शर्मा आसीत्। (विप्र पुत्र का नाम सोम शर्मा था।)

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(ख) सक्तुभिः कति रुप्यकाणि उत्पत्स्यन्ते? (सत्तू से कितने रुपये हुये?)
उत्तर:
सक्तुभिः शतम् रुप्यकाणि उत्पस्यन्ते (सत्तू से सौ रुपये हुए।)

(ग) विप्रः कं सततम् अवलोकयति? (विप्र किसे एकटक देख रहा था?)
उत्तर:
विप्रः सक्तुम सततम् अवलोकयति। (विप्र सत्तू को एकटक देख रहा था।)

(घ) अश्वानां विक्रयात् किं भविष्यति? (घोड़ों को बेचने से क्या होगा?)
उत्तर:
अश्वानां विक्रयात् सुवर्णम् भविष्यति। (घोड़ों को बेचने से स्वर्ण मुद्रा आयेगी।)

(ङ) विप्रस्य प्रहारेण कः भग्नः? (विप्र के प्रहार से क्या टूट गया?)
उत्तर:
विप्रस्य प्रहारेण घटः भग्नः। (विप्र के प्रहार से घड़ा टूट गया।)

प्रश्न 2.
एक वाक्येन उत्तर लिखत् (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) विप्रः स्वपत्नी किम् अभिधारयति? (ब्राह्मण अपनी पत्नी से क्या बोलेगा?)
उत्तर:
गृहाण तावद् बालकम्। (अपने बच्चे को पकड़ो।)

(ख) घट कैः सम्पूरितः? (घड़े में क्या भरा था?)
उत्तर:
सक्तुभिः। (सत्तू)।

(ग) सुवर्णेन किं सम्मत्स्यत्? (स्वर्ण मुद्रा से क्या बनेगा?)
उत्तर:
चतुः शालम् गृहम्। (चौकोर घर)।

(घ) सोम शर्मा कुतः विप्रसमीपम् आगच्छति? (सोम शर्मा ब्राह्मण के पास कहां आयेगा?)
उत्तर:
अश्वखुरासन्नवर्ती। (घुड़साल में मेरे समीप)।।

(ङ) विप्रः पुत्रम् कुतः अवधारयिष्यति? (ब्राह्मण पुत्र को कहां ग्रहण करेगा?)
उत्तर:
अश्वशालयः पृष्ठदेशे। (घुड़साल के पीछे)।

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प्रश्न 3.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत् (नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखो)
(क) सोम शर्मा पितरं दृष्ट्वा किं करिष्यति? (सोम शर्मा पिता को देखकर क्या करेगा?)
उत्तर:
ितु समीपम् आगमिष्यति। (पिता को देखकर उसके पास जायेगा।)

(ख) विप्रः रात्रो सुप्तः किं चिन्तयामास? (ब्राह्मण रात में सोते हुए क्या विचार किया?)
उत्तर:
अयं घटः सक्तुभि परिपूर्णः वर्तते। (इस घेड़े में सत्तू भरा हुआ है।)

(ग) विप्रः कं कदा कुतश्च अवधारिष्यति? (ब्राह्मण किसको कहा और कब धारण करेगा?)
उत्तर:
पुत्रम् अश्वशालायाः पृष्ठ देशे। (पुत्र को अश्वशाला के पीछे के भाग में ब्राह्मण ग्रहण करेगा।)

(घ) यदा दुर्भिक्षं भविष्यति तदा सक्तुभिः किंकिंभविष्यति? (जब अकाल होगा तब सत्तू के द्वारा क्या-क्या होगा?)
उत्तर:
स्वकणाम् सतम्। (अकाल के समय सैकड़ों रुपये सत्तू से प्राप्त होंगे)

(ङ) अस्याः कथायाः आशयः कः? (इस कथा का सार क्या है?)
उत्तर:
अविचार्यं न कर्तव्यम्। (बिना विचारे कोई कार्य नहीं करना चाहिए।) यही इस कथा का सार है।)

प्रश्न 4.
उदाहरणानुसारं शब्दानां धातु प्रत्यय च पृथक कुरुत
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प्रश्न 5.
अव्ययः वाक्यनिर्माणं कुरुत
यथा- सः अत्र अस्ति।
(क) च – रमेश सुरेशश्च आपणं गच्छति।
(ख) अपि – अहं अपि भोपालम् गमिष्यामि।
(ग) तावत् – तावत् वर्षा वभूव।
(घ) न – अहं न गमिष्यामि।
(ङ) ततः – ततः पुत्रः आगतः।

प्रश्न 6.
उदाहरणानुसारं शब्दानां विभक्तिं, वचनं च लिखत्
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 2 अलसस्य स्वप्न img-2

प्रश्न 7.
संधिविच्छेदं कृत्वा संधिः नाम लिखत्
(क) तद्यदि
उत्तर:
तत् + यदि = व्यंजन

(ख) कदाचिद्रात्रो
उत्तर:
कदाचित् + रात्रो = व्यंजन

(ग) तदनेन
उत्तर:
तत + अनेन = व्यंजन

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(घ) कश्चित
उत्तर:
कः + चित = विसर्ग

(ङ) तथैव
उत्तर:
तथा + ऐव = वृद्धि स्वर

प्रश्न 8.
क्रियापदानां धातु लकारम्, पुरुषं च लिखत्क्रियापदम्
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 2 अलसस्य स्वप्न img-3

प्रश्न 9.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्ध वाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत्
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 2 अलसस्य स्वप्न img-4
उत्तर:
(क) न
(ख) आम्
(ग) आम्
(घ) आम्
(ङ) आम्

प्रश्न 10.
रिक्तस्थानानि पूरयत् (खाली स्थान भरो)
(क) स एव पाण्डुरः शेते सोम शर्मा पिता यथा।
(ख) सुवर्णेन चतुः शालम् गृहं सम्पत्स्ये।
(ग) अजाभिः प्रभूता गा गृहीष्यामि।
(घ) तस्य अहम सोम शर्मा इति नाम करिष्यामि।
(ङ) वऽवा प्रसवतः प्रभूता अस्वाः भविष्यति

प्रश्न 11.
यथायोग्यं योजयत् (सही जोड़ी बनाओ)
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 2 अलसस्य स्वप्न img-5

अलसस्य स्वप्नः पाठ-सन्दर्भ प्रतिपाद्य

यह कथा विष्णु शर्मा द्वारा रचित सुप्रसिद्ध कथा ग्रंथ ‘पंचतंत्र’ के ‘अपरीक्षित कारक’ नामक कृति से बालकों के ज्ञान-वृद्धि के उद्देश्य से ली गई है।

अलसस्य स्वप्नः पाठ का हिन्दी अर्थ

1. कस्मिंश्चिन्नगरे कश्चित् स्वभाव कृपणः विप्रः प्रतिवसति स्म। तेन भिक्षार्जितैः
भुक्तशेषैः सक्तुभिः कलशः सम्पूरितः। तं च घटं नागदन्ते अवलम्ब्य तस्याधस्तात् खट्वां निधाय सततम् एकदृष्ट्या तम् अवलोकयति।

शब्दार्थ :
कस्मिं-किसी-any; स्वभावकृपणा-स्वभाव से कँजूस-miser by nature; विप्रः-ब्राह्मण-Pandit, Wiseman; प्रतिवाति-रहता-Lives; भिक्षार्जितः-भिाक्षा के द्वारा अर्जित-Collection begging: भुक्तशेषैः-खाने से बचे हुए-Remaining food; सक्तुभिः-सत्तू-Power of Gram; तं-उसे-Complet, full, finish; च-और-him/ her/its; अवलम्ब्य-अवलंबित-Support; खटवां-खूटी-Nails; अवलोकयति-देखता था-Looks.

हिन्दी अर्थ :
किसी नगर में स्वभाव से कंजूस (कृपण) एक ब्राह्मण रहता था। वह भिक्षा से प्राप्त भोजन के बाद बचे हुए सत्तू को एक घड़े में भरता जाता। तब उस घड़े को एक खूटी से लटका कर उसके नीचे चारपाई पर बैठ घड़े को निरंतर देखता जाता।

2. अथ कदाचिद्रात्रौ सुप्तश्चिन्तयामास-यत् अयं घटः सक्तुभि परिपूर्णः वर्तते। तद्यदि दुर्भिक्षं भवति, तदनेन रुप्यकाणां शतमुत्पत्स्यते। ततस्तेन मया अजाद्वयं ग्रहीतव्यम्। ततः षाण्मासिकात् आप्रसववशात् ताभ्यां यूथंभविष्यति। ततोऽजाभिः प्रभूता गा गृहीष्यामि। गोभिर्महिषीः। महिषीभिर्वडवा। वडवाप्रसवतः प्रभूता अश्वा भविष्यन्ति। तेषां विक्रयात् प्रभूतां सुवर्णं भविष्यति। सुवर्णेन चतुः शालं गृहे सम्पत्स्यते।

शब्दार्थ :
अथ-इस प्रकार-This type; कदाचित-किसी-Anybody; सुप्त-सोते हुए-With sleeping; अयं-इस-This; सक्तुभि-सत्तू-Powder of gram; परिपूर्णः-परिपूर्ण-fulfill, over; शतमुत्पत्स्यते-सौहो जायेंगे-Hundred will be; तेन-उससे-Its; अजदूयं-दो बकरी-Two she goat; गृहीत्यम्-खरीदी जायेगी-Will have purchased; दुर्भिक्षम-अकाल-Starving; षाण्मासिकात्-छः महीने में होने वाली-Six monthly/Half yearly; ताभ्याम्-उससे-His; यूथम्-झुण्ड (समूह)-Group; गृहीष्यामि-ग्रहण करना-Will recieve; तेषां-उनके-Them; विक्रयात्-विक्रय से-From sell; प्रभूतं-बहुत अधिक-Very much; सुवर्ण-सोना-Gold; चतुःशालं-चौकोर-Square; गृहम्-घर-Home, House, Residence; सम्पत्स्यते-निर्मित करूँगा-Will build;

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हिन्दी अर्थ :
तत्पश्चात् रात्रि में शयन करते समय मन में यह विचार करता कि सत्तू से यह कलश पूरी तरह भरा हुआ है। यदि अकाल पड़ जाता तो इसके द्वारा सैकड़ों रुपये प्राप्त हो जाएँगे। फिर उन रुपयों से वह दो बकरियाँ खरीदेगा। पुनः उन बकरियों से छः माह बाद पैदा होने वाले बच्चों का एक बहुत बड़ा समूह ही जाएगा। फिर वह इन बकरियों के बेचने से होने वाली आय से गायें, भैसें, भैसों से होने वाली आय से थोड़ी, उस घोड़ी से (अच्छे) किस्म के घोड़े होंगे। उन घोड़ों के बेचने से बहुत अधिक स्वर्ण प्राप्त होगा। उन स्वर्ण मुद्राओं से एक अच्छा घर निर्मित करूँगा।

3. ततः कश्चिद विप्रः मम गृहम् आगत्य रूपाढ्यां कन्यां मह्यं दास्यति। तत्सकाशात् पुत्रो मे भविष्यति। तस्य अहं “सोमशा” इति नाम करिष्यामि। ततः तस्मिञ्जानुचलन-योग्ये सजाते अहं पुस्तकंगृहीत्वा अश्वशालायाः पृष्ठदेशे उपविष्टस्तदवधारयिष्यामि। अत्रान्तरे सोमशर्मा मां दृष्ट्वा जनन्युत्सङ्गात् जानुचलनपरः अश्वखुरासन्नवर्ती मत्समीपमा गमिष्यति। ततोऽहं स्वपत्नी कोपाविष्टोऽभिधास्यामि ‘गृहाण तावद बालकम्। सा अपि गृहकर्म व्यग्रतयाऽस्मद्वचनं न श्रोष्यति। ततोऽहं समुत्थाय तं ताडयिष्यामि।

शब्दार्थ :
कश्चिद-कोई-Anybody; आगत्य-आकर-After coming; रूपाढ्यां रूपमति-Beautiful; दास्यति-देगा-Will give; तस्य-उससे-Her/Him; भविष्यति-होगा-Will/Shall; करिष्यामि-करूंगा-Will do/shall do; गृहीत्वा-ग्रहण करके-Except; जानुचलनयोग्ये-घुटने से चलने योग्य होने पर-Walking with knee, With fulfill of qualification; उत्सङ्गात्-गोद से-by lap; भग्नः-टूट गया-broke; षाण्डुरताम्-पीले रंग का-The colour of yellow; असम्भव्याम-असम्भव-Impossible; पृष्ठदेशे-पृष्ठ देश में-Behind of the stable; धारयिष्यामि-धारण करूँगा-Keep,except; तावद् बालकम-तुम्हारे बालक का-To your son; श्रोष्यति-सुना जाता है-Is listen; ताडयिस्यामि-पिटाई करूँगा-Will beating;

हिन्दी अर्थ :
तत्पश्चात् कोई ब्राह्मण मेरे घर आकर अपनी रूपवती कन्या मुझे देगा। उससे मेरा पुत्र होगा। उसका नाम मैं सोम शर्मा रलूँगा। तत्पश्चात् बालक के चलने योग्य हो जाने पर मैं पुस्तक लेकर घुड़साल के पीछे बैठकर अध्ययन करूँगा और बालक सोम शर्मा मुझे देखकर घुटने के बल घोड़े के खुरों के पास से होता हुआ घुड़साल में मेरे पास आ जाएगा। तब मैं अपनी पत्नी को गुस्से में डाँटते हुए पकड़ने को कहूँगा। वह भी गृहकार्य में व्यस्त होने के कारण मेरे वचन नहीं सुनेगी तो मैं उसकी पिटाई करूँगा।

4. एवं तेन ध्यानस्थितेन प्रहारो दत्तो यथा स घटो भग्नः स्वयं च पाण्डुरतां गतः अतोऽहं ब्रवीमि –
अनागतवती चिंताम असम्भाव्यां करोति यः।
स एव पाण्डुरः शेते सोमशर्मपिता यथा ॥

शब्दार्थ :
अनागतवतीम्-न आयी हुई को-Unreachable/miss call; ध्यानस्थितेन-ध्यान करते हुए-With meditate; ततैव-इसी प्रकार-This type; प्रहारो-प्रहार किया-Stroke.
हिन्दी अर्थ-इस प्रकार वह ब्राह्मण मन में ध्यान करते हुए उसी प्रकार प्रहार किया जिससे वह घड़ा फूट गया और ब्राह्मण (सत्तू के गिरने से) पीला पड़ गया। अतः मैं कहता हूँ –

“न आई हुई की चिंता करते हुए असंभावित कार्य की जो कल्पना करता है वह सोम शर्मा के पिता की तरह पीले रंग का हो जाता है।

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 8 Atmosphere

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MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 8 Atmosphere

MP Board Class 7th Social Science Chapter 8 Text Book Questions

Choose the correct alternatives from the following:

Question 1.
In which layer of the atmosphere does weather phenomenon take place?
(a) Troposphere
(b) Stratosphere
(Q) Mesosphere
(d) Outer space
Answer:
(a) Troposphere

Question 2.
Which gas is found the most in atmosphere?
(a) Ozone
(b) Oxygen
(c) Carbon-di-oxide
(d) Nitrogen
Answer:
(d) Nitrogen

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Fill in the blanks:

  1. Ozone gas protects the earth from the harmful ……………….. rays.
  2. ……………. is a life going gas for humans.
  3. Temperature is found constant in …………….. layer of atmosphere.
  4. Electrically charged particles are found in ……………..
  5. The atmosphere extends to a height of ……………. km from sea level.

Answer:

  1. ultra violet
  2. Oxygen
  3. stratosphere
  4. thermosphere
  5. 1600

MP Board Class 7th Social Science Chapter 8 Short Answer Type Questions

Question 1.
What is atmosphere?
Answer:
The cover of the air around the earth is called the atmosphere. It has many gases, dust particles and poisonous gas.

Question 2.
Name the gases found in atmosphere.
Answer:
The different gases found in the atmosphere are:
Nitrogen, Oxygen, Carbon dioxide, Hydrogen, Ozone and Helium. Nitrogen is found in the largest quantity.

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Question 3.
Which are the layers of atmosphere? Name them.
Answer:
The layers of atmosphere:

  1. Troposphere
  2. Stratosphere
  3. Mesosphere
  4. Thermosphere
  5. Exosphere.

MP Board Class 7th Social Science Chapter 8 Long Answer Type Questions

Question 1.
Describe the structure of atmosphere.
Answer:
The changes in temperature at various attitudes divide the atmosphere into 5 layers.

  1. Troposphere
  2. Stratosphere
  3. Mesosphere
  4. Thermosphere
  5. Exosphere

1. Troposphere:
It extends to a height of 8 km at the poles and 18 km on equator. Dust particles and water vapor are found in this layer. All kinds of weather phenomenon like clouds, rainstorm etc. is observed in this layer. All types of life forms are found in this layer. This layer is also known as dynamic layer.

2. Stratosphere:
The second layer of the atmosphere is known as stratosphere. The temperature in this layer is constant till 20 kms. height and then slowly increases.

3. Mesosphere:
The height of this layer is 50 to 80 km from the sea level. The variation in temperature is less in this layer as water vapor, clouds and dust are found less and fast wind blows here.

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 8 Atmosphere

4. Thermosphere:
The thermosphere starts from the height of 80 km from sea level. The density of air is very less in this layer. The temperature increases with height in this layer. Two layers of gases are found here. One is the ozone layer and the other is the ion layer.

The ozone layer is spread at a height of 32 to 80 km from the earth. The ion layer is found at a height of 80 to 400 km. from earth. The electrically charged particles stop the radio waves transmitted from the earth and return it back to the earth. In this way we can listen to various radio programmers.

5. Exosphere:
This is the outermost layer of die atmosphere the upper limit of this layer is uncertain. The density of air is the least here.

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Question 2.
What is the importance of atmosphere?
Answer:
The atmosphere is very important to us. It protects the life on earth by reflecting back the harmful ultra violet rays of the sun. It controls die extremes of temperature because of which moderate temperature is experienced in many parts of earth; It acts as the medium to send radioactive rays from one place to another on earth.

It is atmosphere, which makes possible earth movement of the airplanes. The seasonal changes on earth like balance of temperature, movement of wind, rain etc. is possible due to atmosphere. The atmosphere also contains life giving and life protecting gases. Thus, our atmosphere is of great importance.

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