MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री (कहानी, सियाराम शरण गुप्त)

बैल की बिक्री अभ्यास

बोध प्रश्न

बैल की बिक्री अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
खेतों के पौधे असमय में ही क्यों मुरझा रहे थे?
उत्तर:
खेतों के पौधे समय पर वर्षा न होने के कारण असमय में ही मुरझा रहे थे।

प्रश्न 2.
महाजन का नाम क्या था?
उत्तर:
महाजन का नाम ज्वाला प्रसाद था।

प्रश्न 3.
किसान के हाथ-पैर किसे कहा गया है?
उत्तर:
बैलों को किसान के हाथ-पैर कहा गया है।

प्रश्न 4.
शिबू अपना बैल बेचने कहाँ जाता है?
उत्तर:
शिबू अपना बैल रामपुर की हाट में बेचने जाता है।

प्रश्न 5.
डाकुओं की कुल संख्या कितनी थी?
उत्तर:
डाकुओं की कुल संख्या पाँच थी।

प्रश्न 6.
मोहन रामधन के साथ कहाँ गया?
उत्तर:
मोहन रामधन के साथ ज्वाला प्रसाद महाजन के यहाँ गया था।

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बैल की बिक्री लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मोहन शिबू के विषय में क्यों चिन्तित था?
उत्तर:
मोहन को शिबू के विषय में इसलिए चिन्ता थी कि वह जवान हो चुका था और उसे घर के काम-काज से कोई सरोकार न था।

प्रश्न 2.
मोहन को अपने स्वर्गीय पिता का स्मरण क्यों हुआ?
उत्तर:
जब भी शिबू के उद्दण्ड व्यवहार से मोहन दुःखी होता था, तब उसे अपने मृत पिता की याद आ जाती क्योंकि उसने भी अपने पिता को कम नहीं खिझाया था। पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे बड़ा साधन कदाचित् बच्चे को प्यार करना ही है।

प्रश्न 3.
शिबू द्वारा बैल का अपमान करने पर मोहन की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
मोहन को अपने पुत्र शिबू के बैल के प्रति किये व्यवहार से बहुत दुःख हुआ। उसने बैल की सार की अच्छी तरह सफाई की, बैल को पानी पिलाने ले गया, उसको नहलाया, फिर भूसा डाला, इसके बाद घर से रोटी लाकर उसके टुकड़े-टुकड़े करके खिलाया।

प्रश्न 4.
बैल को बेचने के लिए जाते हुए मोहन ने शिबू से क्या कहा?
उत्तर:
बैल को बेचने के लिए जाते हुए मोहन ने शिबू से कहा-एक बात बेटा, मेरी मानना। बैल किसी भले आदमी को देना जो उसे अच्छी तरह रखे। दो-चार रुपये कम मिलें तो ख्याल न करना।

प्रश्न 5.
शिबू ने डाकुओं का प्रतिकार किस प्रकार किया?
उत्तर:
पहले तो शिबू छाती तानकर खड़ा हो गया। बोला। मैं रुपये नहीं दूंगा। इसके बाद दूसरे डाकू के बन्दूक के कुन्दे को मारने पर उसने कुन्दे को इस तरह पकड़ लिया जिस तरह सपेरे साँप का फन पकड़ लेते हैं। अपने को आगे ठेलता हुआ वह बोला-तुम मुझे मार सकते हो, परन्तु रुपये नहीं छीन सकते। शिबू के साहस को देखकर डाकुओं से लुटे-पिटे व्यक्ति भी एक साथ आ गये, जिन्हें देखकर डाकू भाग खड़े हुए।

प्रश्न 6.
ज्वाला प्रसाद ने मोहन से क्या कहा?
उत्तरे:
ज्वाला प्रसाद ने मोहन से कहा कि वायदे बहुत हो चुके। अब हमारे रुपये अदा कर दो, नहीं तो अच्छा न होगा।

बैल की बिक्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मोहन शिबू को बैल बेचने से क्यों मना करता है?
उत्तर:
बैल बेचने के बचाव में मोहन ने शिबू को डाँटते हुए कहा-“चुप रह! घर में जोड़ी न होती तो इतनी बातें बनाना न आता। बैल किसान के हाथ-पैर होते हैं। एक हाथ टूट जाने पर कोई दूसरा भी कटा नहीं डालता। मैं इसका जोड़ मिलाने की फ्रिक में हूँ, तू कहता है-बेच दो। दूर हो, जहाँ जाना हो चला जा। मैं सब कर लूँगा।” वह दोगुने प्यार से उसका ख्याल रखता है।

प्रश्न 2.
दद्दा के दोपहर में न आने पर शिबू ने क्या किया?
उत्तर:
सबेरे ज्वाला प्रसाद के आदमी के साथ गए दद्दा दोपहर तक रोटी खाने भी नहीं आए हैं। यह जानकर शिबू झपाटे के साथ घर से निकलकर ज्वाला प्रसाद के यहाँ जा पहुँचा। वहाँ उसने पिता को मुँह सुखाए, पसीने-पसीने एक जगह बैठा देखा। ज्वाला प्रसाद द्वारा रुपये की कहने पर उसने कहा-अपनी रुपहट्टी लोगे या किसी की जान? अरे, कुछ तो दया होती! बूढ़े ने सवेरे से पानी तक नहीं पिया। तुम कम-से-कम चार दफे दूंस चुके होंगे। अपने पिता से यह कहकर कि मैं तुम्हें कसाई की गाय की तरह मरने न दूंगा और रामपुर की हाट में सोमवार को बैल बेचकर उनकी कौड़ी पाई चुका दूँगा, उनका हाथ पकड़कर झकझोरता हुआ साथ ले गया। साहूकार चुपचाप देखता रह गया, एक शब्द भी उसके मुँह से नहीं निकला।

प्रश्न 3.
शिबू द्वारा किये गये व्यवहार की ज्वाला प्रसाद पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
शिबू के व्यवहार से ज्वाला प्रसाद हतबुद्धि होकर ज्यों के त्यों बैठे रहे। उन्होंने शिबू के जैसा निर्भय आदमी न देखा था। उनके मुँह पर ही उन्हें कसाई बनाया गया। गुस्सा की अपेक्षा उन्हें डर ही अधिक मालूम हुआ।

प्रश्न 4.
बैल के बेचने का निश्चय होते ही मोहन की हालत कैसी हो गई?
उत्तर:
बैल के बेचने का निश्चय होते ही दो दिन में ही ऐसा जान पड़ने लगा-मानो मोहन बहुत दिन का बीमार हो। दिनभर वह बैल के विषय में ही सोचा करता। रात को उठकर कई बार बैल के पास जाता। रात के एकान्त में जब उसे अवसर मिलता, बैल के गले से लिपटकर प्रायः आँसू बहाने लगता।

प्रश्न 5.
बैल को बेचने के पश्चात् शिबू की मानसिक स्थिति का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
बैल बेचने के पश्चात् शिबू घर लौट रहा था। रुपये उसकी अण्ढी में थे तो भी आज उसकी चाल में बहुत तेजी नहीं थी, जो जाते समय थी। न जाने, कितनी बातें उसके भीतर आ-जा रही थीं। बैल के बिना उसे सूना-सूना मालूम हो रहा था। आज के पहले वह यह बात किसी तरह न मानता कि उसके मन में भी उस क्षुद्र प्राणी के लिए इतना प्रेम था। बार-बार उसे बैल की सूरत याद आती। उसके ध्यान में आता मानो विदा होते समय बैल भी उदास हो गया था। उसकी आँखों में आँसू छलक आये थे। बैल का विचार दूर करता तो पिता का सूखा बेहरा सामने आ जाता। बैल और पिता मानो एक ही चित्र के दो ख थे। लौट फिर कर एक के बाद दूसरा उसके सामने आ जाता था।

प्रश्न 6.
शिबू का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
शिबू किसान मोहन का लड़का था। वह उद्दण्ड स्वभाव का था। उसे घर के काम-काज से कोई सरोकार नहीं था। खाना-पीना और इधर-उधर आवारागर्दी में घूमना ही उसका काम था।

इसके अतिरिक्त वह महाजन तथा साहूकारों से घृणा करता था। वह किसी से दबता नहीं था। वह साहसी था। जब डाकुओं ने उसे पकड़ लिया तब वह उनसे भी लड़ने-मरने को आमादा हो जाता है। उसके साहस से ही डाकू भाग जाते हैं और वह लुटे हुए लोगों को स्वतन्त्र करा देता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
“भीड़ में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आया। …………. अब लुट जाए तो मैं जिम्मेदार नहीं।”।
उत्तर:
लेखक कहता है कि डाकुओं द्वारा पकड़े हुए व्यापारियों में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आता है और कहता है अरे भैया तुम कौन, शिबू माते? आज तुमने इतने आदमियों को डाकुओं के चंगुल से बचा दिया, तुम धन्य हो।

शिबू ने कहा यह वही ज्वाला प्रसाद है जिसने अपने कर्ज के रुपये के लिए मेरे पिता को बन्धक बना लिया था। उस समय उसके शरीर पर धोती के अलावा और कोई वस्त्र नहीं था। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से भर गया था। शिबू ने बैल बेचने से मिले हुए रुपयों को अपनी अण्टी से निकालकर उसके सामने रखते हुए कहा कि यह आज एक बहुत बड़ी बात हुई कि शिबू माते अर्थात् मैं तुम्हें यहीं मिल गया। लो अपने कर्ज के रुपये चुकता कर लो। आगे तुम लुट जाओ तो मैं इसका जिम्मेदार नहीं हूँ।

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बैल की बिक्री भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद कीजिए
उत्तर:

  1. अन्तस्तल = अन्तः + स्तल (स्थल)।
  2. प्रेमातुर = प्रेम + आतुर।
  3. सज्जन = सत् + जन।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रहकीजिए
उत्तर:

  1. स्त्री-पुरुष = स्त्री और पुरुष।
  2. यथासमय = समय के अनुसार।
  3. क्षतिपूर्ति = क्षति की पूर्ति।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के लिए एक-एक शब्द लिखिए-

  1. जो किसी से भयभीत न हो।
  2. जिसे ज्ञान न हो।
  3. जिसके पास धन नहीं है।
  4. जो क्षय न हो।

उत्तर:

  1. निर्भय
  2. अज्ञानी
  3. निर्धन
  4. अक्षय।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए-

  1. बादल समय पर पानी नहीं देते थे। (विधानवाचक)
  2. सेठ ज्वाला प्रसाद अच्छे महाजन थे। (निषेधवाचक)
  3. शिबू बाबू बनकर डाकखाने में टिकट बेचेगा। (प्रश्नवाचक)
  4. मोहन बैल को बहुत प्यार करता है। (विस्मयादिवाचक)

उत्तर:

  1. बादल समय पर पानी देते थे।
  2. सेठ ज्वाला प्रसाद अच्छे महाजन नहीं थे।
  3. क्या शिबू बाबू बनकर डाकखाने में टिकट बेचेगा?
  4. ओहो! मोहन बैल को बहुत प्यार करता है।

प्रश्न 5.
आज्ञावाचक वाक्य किसे कहते हैं? उदाहरण देकर बताइए।
उत्तर:
आज्ञावाचक वाक्य में आज्ञा देकर कोई कार्य करवाया जाता है।
उदाहरण :
आप जाइये, और वहाँ से सामान लेकर आइये।

बैल की बिक्री महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बैल की बिक्री बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बैल की बिक्री’ कहानी में किस समस्या को प्रमुख रूप से उठाया गया है?
(क) साहूकारों की
(ख) ऋणग्रस्त लोगों की
(ग) नौजवानों की
(घ) ऋणग्रस्त किसानों की
उत्तर:
(घ) ऋणग्रस्त किसानों की

प्रश्न 2.
‘बैल की बिक्री’ कहानी का केन्द्रीय चरित्र है- (2017)
(क) मोहन
(ख) शिबू
(ग) साहूकार
(घ) मुनीम।
उत्तर:
(ख) शिबू

प्रश्न 3.
किसान के हाथ-पैर किसे कहा गया है? (2013)
(क) गाय
(ख) भैंस
(ग) बैल
(घ) बकरी।
उत्तर:
(ग) बैल

प्रश्न 4.
मोहन ने ऋण चुकाने के लिए क्या किया?
(क) अनाज बेच दिया
(ख) घर बेच दिया
(ग) बैल बेच दिया
(घ) खेत बेच दिया।
उत्तर:
(ग) बैल बेच दिया

प्रश्न 5.
शिबू ने बैल को कहाँ बेच दिया?
(क) मित्र को
(ख) साहूकार को
(ग) पड़ोसी को
(घ) रामपुर की हाट में
उत्तर:
(घ) रामपुर की हाट में

प्रश्न 6.
महाजन का नाम था (2016)
(क) अम्बिका प्रसाद
(ख) शिबू
(ग) मोहन
(घ) ज्वाला प्रसाद
उत्तर:
(घ) ज्वाला प्रसाद

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ‘बैल की बिक्री’ कहानी में लेखक ने ………… किसानों की समस्या को उठाया है।
  2. मेरे जीते जी इन रुपयों को ………….. के सिवा अन्य कोई नहीं ले सकता।
  3. ‘बैल की बिक्री’ एक ………….. कहानी है।
  4. महाजन का नाम …………. था। (2009)
  5. बादल चाहे जैसी शत्रुता रखें मगर खेती के लिए उनसे ………… वस्तु नहीं है।

उत्तर:

  1. ऋणग्रस्त
  2. महाजन
  3. मनोवैज्ञानिक
  4. ज्वालाप्रसाद
  5. प्यारी

सत्य/असत्य

  1. महाजन का नाम ज्वालाप्रसाद था। (2013)
  2. मोहन रामधन के साथ डाकू से मिलने गया। (2009)
  3. शिबू मोहन का लड़का है। (2018)
  4. शिबू डाकुओं को देखकर भाग गया क्योंकि वे संख्या में दो सौ के लगभग थे।
  5. सेठ ज्वालाप्रसाद उन्हीं महाजनों में से थे। विधाता के वर से उनका धन अक्षय था।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री img-1
उत्तर:
1. → (ङ)
2. → (ग)
3. → (घ)
4. → (क)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘बैल की विक्री’ कहानी में लेखक ने किसानों की किस समस्या का चित्रण किया है?
  2. शिबू बैल बेचने कहाँ गया था?
  3. मोहन किसका कर्जदार है?
  4. किसान के हाथ-पैर किसको कहा गया है?
  5. ‘बैल की बिक्री’ कहानी के लेखक कौन हैं?

उत्तर:

  1. ऋणग्रस्तता
  2. रामपुर की हाट में
  3. ज्वालाप्रसाद
  4. बैल को
  5. सियाराम शरण गुप्त।

बैल की बिक्री पाठ सारांश

‘बैल की बिक्री’ कहानी के लेखक सियारामशरण गुप्त हैं। प्रस्तुत कहानी ग्रामीण जीवन तथा कृषकों की विभिन्न समस्याओं पर आधारित है। इस कहानी के माध्यम से गुप्त जी ने किसानों पर साहूकारों के द्वारा जो अत्याचार होते हैं उनका वर्णन किया है।

इस कहानी का प्रमुख पात्र मोहन एक ऋणग्रस्त किसान है। शिबू उसका इकलौता और निकम्मा लाडला बेटा है। मोहन ने ज्वालाप्रसाद नामक महाजन से कर्ज लिया है। यह परिवार एक बैलगाड़ी के सहारे से अपने परिवार का भरण-पोषण करता है लेकिन एक दिन बैलों की जोड़ी में से एक बैल की मृत्यु हो जाती है।

एक दिन साहूकार के द्वारा जब शिबू के पिता को बन्दी बना लिया गया तब शिबू को क्रोध आया और उसने सेठ ज्वालाप्रसाद का कर्ज चुकाने के लिए अपना बैल हाट में ले जाकर बेच दिया।

जब शिबू बैल बेचकर लौट रहा था तो रास्ते में उसे डाकू मिले वह डाकुओं का डटकर मुकाबला करता है और डाकू भाग जाते हैं। वहीं पर सेठ ज्वालाप्रसाद को शिबू उन्हें बैल की बिक्री के रुपये दे देता है और कहता है कि मैंने अपना कर्जा चुका दिया है। अब चाहे तुम लुट जाओ इसके जिम्मेदार तुम स्वयं ही होगे।

शिबू जब बैल को बेचने जा रहा था तब उसके पिता को बहुत दुःख हुआ क्योंकि बैल के प्रति उनके हृदय में ममता थी और उससे अलग होने की वेदना भी। शिबू का चरित्र भी लेखक ने मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया है। पिता के प्रति होने वाले अत्याचार को देख शिबू ने सेठ ज्वालाप्रसाद को मुँहतोड़ जवाब दिया। अपने पिता को उसके चंगुल से छुड़ा लाया। यह एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। परिस्थितियों के अनुरूप ही शिबू के व्यवहार में परिवर्तन हुआ है।

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बैल की बिक्री संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) कई साल से फसल बिगड़ रही थी। बादल समय पर पानी नहीं देते थे। खेती के पौधे अकाल वृद्ध होकर असमय में ही मुरझा रहे थे, परन्तु महाजनों की फसल का हाल ऐसा न था। बादल ज्यों-ज्यों अपना हाथ खींचते, उनकी खेती में त्यों-त्यों नये अंकुर निकलते थे। सेठ ज्वाला प्रसाद उन्हीं महाजनों में से थे। विधाता के वर से उनका धन अक्षय था। जिस किसान के पास पहुँच जाता, जीवन-भर उसका साथ न छोड़ता। अपने स्वामी की तिजोरी में निरन्तर जाकर भी दरिद्र की झोंपड़ी की माया उससे छोड़ी न जाती थी।

कठिन शब्दार्थ :
अकाल = बिना समय आये। वृद्ध = बूढ़ा, यहाँ नष्ट। विधाता = ईश्वर। वर = आशीर्वाद। अक्षय = कभी नष्ट न होने वाला।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘बैल की बिक्री’ कहानी से लिया गया है। इसके लेखक श्री सियारामशरण गुप्त हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि सूदखोर लोगों का धन जिसे एक बार चंगुल में ले लेता है उसका उस सरलता से पीछा नहीं छूटता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि अनेक वर्षों से फसल बिगड़ रही थी। उसका कारण यह था कि समय पर वर्षा नहीं हो रही थी। खेती के पौधे वर्षा के न होने के कारण असमय ही सूख रहे थे लेकिन दूसरी ओर महाजनों (सूदखोरों) की फसल ऐसी नहीं थी। कहने का भाव यह है कि जैसे-जैसे वर्षा कम होती थी, फसल खराब होती थी, गरीब किसान अपना खर्च चलाने के लिए ऋणदाताओं के द्वार जाता था और उनसे ब्याज पर अधिक धन उधार लेता था।

इस प्रकार सूखा पड़ने पर महाजनों की फसल और अधिक हरी-भरी होती थी। बादल जैसे-जैसे अपना हाथ खींचते अर्थात् वर्षा कम होती थी, वैसे ही वैसे सूदखोरों की खेती में नये-नये अंकुर निकल आते थे। सेठ ज्वाला प्रसाद भी इसी वर्ग के महाजन थे। ईश्वर की उन पर ऐसी कृपा थी कि उनका धन कभी भी नष्ट नहीं होता था। उनका कर्ज का धन जिस किसान के पास भी पहुँच जाता, वह जीवन भर उस किसान का साथ नहीं छोड़ता था। वह तो उनकी तिजोरी में जाकर सुरक्षित हो जाता और वह कर्जदाताओं का कभी भी साथ नहीं छोड़ता था।

विशेष :

  1. कर्ज का धन कर्जदाताओं को उन्नति देता है, जबकि किसानों का वह खून पीता था।
  2. भाषा भावानुकूल।

(2) उस दिन मोहन ने सार की सफाई और अच्छी तरह की। बैल को पानी पिलाने ले गया तो सोचा इसे नहला हूँ। उजड्ड लड़के ने बैल का जो अपमान किया था, उसे वह उसके अन्तस्तल तक धो देना चाहता था। नहला चुकने पर अपने अंगोछे से पानी अंगोछा, बाँधने की रस्सी को भी पानी से धोना न भूला। सार में बाँधकर भूसा डाला। तब भी मन की ग्लानि दूर न हई, तो भीतर जाकर रोटी ले आया और टुकड़े-टुकड़े करके उसे खिलाने लगा। वह कहा करता था कि जानवर अपनी बात समझा नहीं सकते, परन्तु बहुत-सी बातें आदमियों से अधिक समझते हैं। इसलिए वह अनुभव कर रहा था कि बैल उसके प्रेम को अच्छी तरह हृदयंगम कर रहा है।

कठिन शब्दार्थ :
सार = पशुओं का चारा खिलाने की नौद। उजड्ड = असभ्य। अंतस्तल = हृदय तक। अंगोछा = पौंछा। ग्लानि = मन का पछतावा। हृदयंगम = हृदय में धारण कर लेना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
शिबू द्वारा बैल का अपमान किये जाने पर मोहन बहुत दुःखी होता है और अपने पुत्र की करनी का प्रायश्चित करते हुए बैल को नहलाता, धुलाता और उसकी सेवा करता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जब शिबू ने बैल का अपमान किया तो मोहन को इससे बड़ा दुःख हुआ। अतः उस दिन मोहन ने बैल के चारे खाने के स्थानकी अच्छी तरह सफाई की। बैल को पानी पिलाने वह स्वयं लेया। वहाँ जाकर उसने बैल को नहला भी दिया। अपने उजड्ड पुत्र शिबू के बैल के साथ किये गये अपमान को वह उसके हृदय तक से धो देना चाहता था। बैल को नहला चुकने के बाद अपने अंगोछे से उसके शरीर को पौंछा, बाँधने की रस्सी को भी पानी से खूब धोया। सार में बाँधकर भूसा डाला। इतना करने पर भी उसके मन की ग्लानि दूर नहीं हुई तो वह घर के भीतर जाकर रोटी ले आया और टुकड़े-टुकड़े करके उसे खिलाने लगा। मोहन कहा करता था कि पशु अपनी बात मनुष्य को समझा तो नहीं सकते पर वे बहुत-सी बातें मनुष्यों से अधिक समझते हैं। अतः मोहन यह अनुभव कर रहा था कि बैल उसके प्रेम को अच्छी तरह अपने हृदय में धारण कर रहा है।

विशेष :

  1. मोहन बैलों के साथ घुल-मिलकर रहता था, खेती आदि करता था। अत: वह बैलों के स्वभाव को जानता था, तभी तो वह उस बैल का मान-सम्मान कर रहा था।
  2. भाषा भावानुकूल।

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(3) भीड़ में एक आदमी निकलकर शिबू के पास आया। बोला-कौन है, शिब माते? तुमने आज इतने आदमियों को…………।
शिबू ने कहा-ज्वाला प्रसाद है। शरीर पर धोती के सिवा कोई वस्त्र नहीं। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से विकृत हो उठा। अण्टी से रुपये निकालकर उसने कहा-बड़ी बात, शिबू माते तुम्हें आज यहीं मिल गये। लो, अपने रुपये चुकते कर लो। अब लुट जाएँ तो मैं जिम्मेदार नहीं।

कठिन शब्दार्थ :
विकृत = विकार युक्त, खराब। घृणा = नफरत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जब डाकुओं के चंगुल में से सभी व्यापारियों की शिबू अपने साहस से छुड़ा लेता है तो उन्हीं में से एक ज्वाला प्रसाद (जो शिबू के पिता का कर्जदाता था) गिड़गिड़ाते हुए शिबू की तारीफ करता है, तो शिबू उसको फटकार लगाते हुए कर्ज के रुपये दे देता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि डाकुओं द्वारा पकड़े हुए व्यापारियों में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आता है और कहता है अरे भैया तुम कौन, शिबू माते? आज तुमने इतने आदमियों को डाकुओं के चंगुल से बचा दिया, तुम धन्य हो।

शिबू ने कहा यह वही ज्वाला प्रसाद है जिसने अपने कर्ज के रुपये के लिए मेरे पिता को बन्धक बना लिया था। उस समय उसके शरीर पर धोती के अलावा और कोई वस्त्र नहीं था। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से भर गया था। शिबू ने बैल बेचने से मिले हुए रुपयों को अपनी अण्टी से निकालकर उसके सामने रखते हुए कहा कि यह आज एक बहुत बड़ी बात हुई कि शिबू माते अर्थात् मैं तुम्हें यहीं मिल गया। लो अपने कर्ज के रुपये चुकता कर लो। आगे तुम लुट जाओ तो मैं इसका जिम्मेदार नहीं हूँ।

विशेष :

  1. शिबू के साहस की प्रशंसा ज्वाला प्रसाद भी करता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 8 मातृभूमि का मान

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 8 मातृभूमि का मान (एकांकी, हरिकृष्ण प्रेमी)

मातृभूमि का मान अभ्यास

बोध प्रश्न

मातृभूमि का मान अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बूंदी के राव मेवाड़ के अधीन क्यों नहीं रहना चाहते?
उत्तर:
बूंदी के राव मेवाड़ के अधीन नहीं रहना चाहते थे क्योंकि वे स्वतन्त्रता में विश्वास करते थे और किसी की भी गुलामी स्वीकार नहीं करते थे।

प्रश्न 2.
मुट्ठी भर हाड़ाओं ने किसे पराजित किया था?
उत्तर:
मुट्ठी भर हाड़ाओं ने महाराणा लाखा तथा उनकी सेना को पराजित किया था।

प्रश्न 3.
वीर सिंह का प्राणान्त कैसे हुआ?
उत्तर:
वीर सिंह का प्राणान्त गोले के वार से हुआ।

प्रश्न 4.
“अनुशासन का अभाव हमारे देश के टुकड़े किये हुए है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन महाराणा लाखा के विश्वास पात्र दरबारी अभयसिंह का है।

प्रश्न 5.
महाराणा लाखा वीर सिंह के किस गुण से प्रसन्न हुए?
उत्तर:
महाराणा लाखा वीर सिंह की वीरता के गुण से प्रसन्न हुए।

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मातृभूमि का मान लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महाराणा लाखा ने कौन-सी प्रतिज्ञा की थी?
उत्तर:
महाराणा लाखा ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक बूंदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।

प्रश्न 2.
चारणीने राजपूत शक्तियों के विषय में महाराणा से क्या कहा था?
उत्तर:
चारणी ने महाराणा से कहा था कि आप हाड़ा वंशजों की धृष्टता को भूल जायें और राजपूत शक्तियों में स्नेह का सम्बन्ध बना रहने दें।

प्रश्न 3.
वीर सिंह ने जन्मभूमि की रक्षा के विषय में अपने साथियों से क्या कहा था?
उत्तर:
वीर सिंह ने कहा कि जिस जन्मभूमि की गोद में खेलकर हम बड़े हुए हैं, उसके अपमान को हम किसी भी कीमत पर सहन नहीं कर सकते। वीर सिंह ने अपने साथियों से कहा कि तुम अग्नि कुल के अंगारे हो। अपने वंश की शान को कमजोर मत होने देना। प्रतिज्ञा करो कि जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं, तब तक इस दुर्ग (बूंदी का नकली दुर्ग) पर हम मेवाड़ राज्य पताका को स्थापित नहीं होने देंगे।

प्रश्न 4.
महाराणा अपनी विजय को पराजय क्यों कहते
उत्तर:
महाराणा अपनी विजय को पराजय इसलिए कहते हैं क्योंकि उनके व्यर्थ के अभिमान और विवेकहीन प्रतिज्ञा ने कितने ही निर्दोष प्राणों की बलि ले लीं थी। महाराणा को वीर सिंह जैसे देशभक्त और बहादुर युवक की मृत्यु का भी बहुत अफसोस था।

मातृभूमि का मान दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘वीर सिंह का चरित्र मातृभूमि के सम्मान की शिक्षा देता है’ इस कथन को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
वीर सिंह मेवाड़ के महाराणा लाखा के यहाँ नौकर था और बूंदी राज्य उसकी जन्मभूमि था। जब उसे पता लगता है कि महाराणा लाखा ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने हेतु बूंदी का नकली दुर्ग बनवाया है तथा उस पर चढ़ाई करके उसे मिट्टी में मिला देना चाहते हैं तो वह इस बात को सहन नहीं कर पाया। उसने अपने साथियों से कहा कि नकली बूंदी भी हमें प्राणों से अधिक प्रिय है और हम लोग अपनी मातृभूमि का अपमान नहीं होने देंगे। लेकिन जब उसके साथियों ने उससे कहा कि हम महाराणा के नौकर हैं, हमारा शरीर महाराणा के नमक से बना है, अत: हमें उनके साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। इस पर वीर सिंह कहता है कि जब कभी मेवाड़ की स्वतन्त्रता पर आक्रमण हुआ है, हमारी तलवार ने उनके नमक का बदला दिया है। परन्तु जब मेवाड़ और बूंदी के मान का प्रश्न आयेगा तो हम मेवाड़ की दी हुई तलवारें महाराणा के चरणों में चुपचाप रख कर विदा लेंगे और बूंदी की ओर से अपने प्राणों का बलिदान देंगे। अन्ततः वीर सिंह ने अपनी मातृभूमि के सम्मान की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

प्रश्न 2.
महाराणा और अभयसिंह के चरित्र की दो-दो। विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
मेवाड़ के महाराणा लाखा की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) स्वाभिमानी वीर :
चित्तौड़ के महाराणा लाखा में स्वाभिमान का भाव कूट-कूटकर भरा है। बूंदी के हाड़ा द्वारा पराजित होने पर वे अपने वंश को कलंकित अनुभव करते हैं। उस कलंक से छुटकारा पाने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं कि जब। तक मैं बूंदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।

(2) सहृदय मानव :
महाराणा लाखा बड़े सहृदय व्यक्तित्व के धनी हैं। वे अपनी प्रतिज्ञा रखने के लिए बूंदी का नकली दुर्ग बनाकर उस पर विजय प्राप्त तो करते हैं परन्तु उस किले की। रक्षा में मारे गये वीरसिंह और सिपाहियों के रक्तपात से वे द्रवित। हो उठते हैं।

मेवाड़ के सेनापति अभयसिंह के चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) कुशल सेनानायक :
अभयसिंह अपने पद के अनुरूप। कार्य सम्भालने में निपुण हैं। वे महाराणा की प्रतिज्ञा रक्षा के लिए बूंदी के नकली दुर्ग की व्यवस्था तुरन्त करते हैं और सैनिकों को उस पर विजय प्राप्त करने के लिए युद्ध करने को भेजते हैं। वे युद्ध का संचालन करने में भी समझदारी से काम लेते हैं।

(2) राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत :
अभयसिंह में राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूटकर भरी है। वे मेवाड़ के सेनापति हैं। मेवाड़ के सम्मान को बढ़ाने का वे हर प्रयास करते हैं। वे बूंदी के राव हेमू को मेवाड़ की अधीनता स्वीकार करने को प्रेरित करते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अवतरणों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(1) ये सागर से रत्न निकाले …………….. ।
………………. तोड़ मोतियों की मत माला।
उत्तर:
चारणी गीत गाते हुए महाराणा को कुछ सन्देश देते हुए कहती है कि आज राजस्थान की भूमि पर जितने भी राजा हैं, वे सब. सागर से निकाले गये श्रेष्ठ रत्न हैं और युगों से इन्हें सँभालकर रखा गया है। इनकी शक्ति एवं पराक्रम का उजाला सब ओर छाया हुआ है। अतः किसी को भी मोतियों की माला को तोड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आगे चारणी कहती है कि अनेक कष्टों एवं विपत्तियों को झेलकर बड़ी मुश्किल से ये एक हुए हैं। अतः इनमें अब फूट मत डालो। इस सुन्दर मोतियों की माला को मत तोड़ो। भाव यह है कि राजस्थान के वीर राजाओं में बड़ी मुश्किल से एकता बनी है। अतः किसी भी राजा को उस एकता को तोड़ने का अधिकार नहीं है।

(2) “नकली बूंदी भी प्राणों से अधिक प्रिय है …………….
…………. हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगी।”
उत्तर:
महाराणा की सेना में कुछ सैनिकं बूंदी के भी थे। बूंदी के नागरिक अपने देश की आन-बान के कट्टर पुजारी थे। जब उनको महाराणा को नकली बूंदी के किले को जीतने की योजना की जानकारी हुई तो वे लोग विद्रोह पर उतारू हो गये। उन्हीं लोगों में से एक देश भक्त वीर सिंह था। वीर सिंह ने ऐलान कर दिया कि नकली बूंदी भी बूंदी वासियों को प्राणों से अधिक प्यारी है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं होने दिया जायेगा। वह आगे कहता है कि महाराणा आज आश्चर्य के साथ देखेंगे कि नकली बूंदी को जीतने का यह कोई साधारण खेल नहीं है। यहाँ की भूमि का कण-कण आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगा। कहने का अर्थ यह है कि इस नकली बूंदी को फतह करना महाराणा के लिए आसान नहीं है। आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं में घमासान युद्ध होगा और खून की नदियाँ बह जायेंगी।

(3) हम युग-युग से एक हैं और एक रहेंगे …………… वीर सिंह के बलिदान ने हमें जन्मभूमि का मान करना सिखाया है।
उत्तर:
महाराणा द्वारा नकली बूंदी के युद्ध का खेल खेले जाने पर जब वीर सिंह की मृत्यु हो गयी तो महाराणा पश्चाताप करने लगा। इसी पर राव हेमू भी राजपूतों की एकता की बात कहते हैं कि हम सभी राजपूत युगों-युगों से एक हैं और आगे भी एक रहेंगे। राव हेमू आगे कहता है कि राजपूतों में न कोई राजा है और न महाराजा। हम सब राजपूत तो देश, जाति और वंश की मान-रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारी तलवारें अपने ही लोगों पर न उठे। बूंदी के हाड़ा सुख और दुःख में चित्तौड़ के सिसोदियों के साथ रहे हैं और आगे भी रहेंगे। हम सभी राजपूत सूर्य के वंशज हैं, हम सबके हृदय में एक ज्वाला जल रही है। हम कैसे एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं। वीर सिंह के त्याग ने हमें जन्मभूमि का सम्मान करना सिखाया है।

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मातृभूमि का मान भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
सामासिक पदों का विग्रह कर समास लिखिए
उत्तर:

  1. राजपूत = राजा का पूत = तत्पुरुष समास।
  2. जन्मभूमि = जन्म की भूमि = तत्पुरुष समास।
  3. महाराजा = महान् राजा = कर्मधारय समास।
  4. सेनापति = सेना का पति = तत्पुरुष समास।
  5. बाण-वर्षा = वाणों की वर्षा = तत्पुरुष समास।
  6. आदर भाव = आदर का भाव = तत्पुरुष समास।

प्रश्न 2.
बहुब्रीहि समास उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
बहुब्रीहि समास-जिस समास में पूर्व एवं उत्तर पद के अतिरिक्त कोई अन्य पद प्रधान होता है, उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं।
जैसे-
पंचानन-पाँच मुख वाला = शिव, लम्बोदर-लम्बा है उदर जिसका = गणेश।

मातृभूमि का मान महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मातृभूमि का मान बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मातृभूमि का मान’ कौन-सी विधा है?
(क) कहानी
(ख) निबन्ध
(ग) एकांकी
(घ) रेखाचित्र।
उत्तर:
(ग) एकांकी

प्रश्न 2.
‘मातृभूमि का मान’ एकांकी का नायक है-
(क) लाखासिंह
(ख) हेमूराव
(ग) अभयसिंह
(घ) वीरसिंह।
उत्तर:
(घ) वीरसिंह।

प्रश्न 3.
यह कथन किसका है-“जब तक बूंदी दुर्ग पर ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।”?
(क) वीरसिंह
(ख) अभयसिंह
(ग) महाराणा लाखा
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) महाराणा लाखा

प्रश्न 4.
‘मातृभूमि का मान’ एकांकी प्रेरणा देता है
(क) मातृभूमि की सेवा की
(ख) देश के लिए प्राणों को न्योछावर करने की
(ग) आन-बान की रक्षा की
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
‘मातृभूमि का मान’ में बूंदी शब्द का प्रयोग किसके लिये किया है?
(क) शहर
(ख) महल
(ग) तीर्थ स्थान
(घ) दुर्ग।
उत्तर:
(घ) दुर्ग।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. बूंदी स्वतन्त्र रहकर महाराणाओं का आदर कर सकता है, परन्तु ………….. होकर किसी की सेवा नहीं कर सकता।
  2. राणा लाखा नीमरा के मैदान में बूंदी से पराजित होने के ……………. को धोने की प्रतिज्ञा करते
  3. ये सागर से रत्न निकाले। युग-युग से हैं गये …………. ।
  4. ………….. भी मुझे प्राणों से प्रिय है।
  5. हम प्रतिज्ञा करते हैं कि प्राणों के रहते इस दुर्ग पर ………….. का ध्वज न फहरने देंगे।

उत्तर:

  1. अधीन
  2. कलंक
  3. सँभाले
  4. नकली बूंदी
  5. मेवाड़।

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सत्य/असत्य

  1. वीरसिंह का चरित्र मातृभूमि के सम्मान की शिक्षा देता है। (2009)
  2. वीरसिंह ने महाराणा लाखा की अधीनता स्वीकार कर ली।
  3. “बूंदी का अपमान सरलता से नहीं किया जा सकता।” यह कथन वीरसिंह का है।
  4. “व्यर्थ के दम्भ ने आज कितने निर्दोष प्राणों की बलि ले ली।”-कथन महाराणा लाखा का है।
  5. बूंदी पर महाराणा लाखा ने असली कीर्ति-पताका फहरायी।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 8 मातृभूमि का मान img-1
उत्तर:
1. → (घ)
2. → (क)
3. → (ङ)
4. → (ग)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी का प्रमुख पात्र कौन है?
  2. मेवाड़ के सेनापति कौन थे?
  3. मुट्ठी भर हाड़ाओं ने किसे पराजित किया था? (2010)
  4. वीरसिंह की मातृभूमि का क्या नाम था? (2009)
  5. ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी के लेखक कौन हैं?
  6. मातृभूमि का मान किसने रखा? (2016)

उत्तर:

  1. वीरसिंह
  2. अभय सिंह
  3. महाराणा लाखा
  4. बूंदी
  5. हरिकृष्ण ‘प्रेमी’
  6. वीरसिंह ने।

मातृभूमि का मान पाठ सारांश

‘मातृभूमि का मान’ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का एकांकी है। यह एकांकी देशप्रेम की प्रेरणा देता है। मातृभूमि की सेवा के लिए आन-बान-शान से प्राणों को न्योछावर करने की भावना जाग्रत करता है।

इस एकांकी में हाड़ा राजपूत वीरसिंह के बलिदान का शौर्यपूर्ण वर्णन है। मेवाड़ के नरेश महाराणा लाखा ने सेनापति अभयसिंह से बूंदी के राव हेमू के पास यह सन्देश भेजा कि वह मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर ले। ऐसा न करने से राजपूतों की संगठन शक्ति छिन्न-भिन्न हो जायेगी।

लेकिन हेमू राव को महाराणा लाखा का यह प्रस्ताव पसन्द नहीं आया। उन्होंने कहा कि बूंदी स्वतन्त्र रहकर महाराणाओं का सम्मान तो कर सकता है लेकिन वह किसी के अधीन रहकर सेवा कदापि नहीं कर सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि हाड़ा प्रेम एवं अनुशासन के पुजारी हैं, शक्ति के नहीं। वे उनका प्रस्ताव नहीं मानते हैं। तभी महाराणा लाखा ने यह प्रतिज्ञा कर ली “जबतिक मैं बूंदी से पराजित होने के कलंक को धो नहीं दूंगा तथा सेना सहित बूंदी के दुर्ग में प्रवेश नहीं करूँगा तब तक मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।”

महाराणा लाखा की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए नकली बूंदी का दुर्ग बनाकर उस पर विजय पताका फहरा दी गयी। वीरसिंह को अपनी मातृभूमि का अपमान अच्छा नहीं लगा और उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए चाहे वह नकली दुर्ग ही था। इस प्रकार वीरसिंह ने नकली बूंदी के दुर्ग की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया तथा मातृभूमि का मान बढ़ाया।

वास्तव में यह एक शिक्षाप्रद एवं ऐतिहासिक एकांकी है। यह एकांकी मान-मर्यादा तथा . देशप्रेम का ज्वलन्त उदाहरण है। इसके अतिरिक्त राजपूतों की एकता की शक्ति व मान-मर्यादा एवं प्रतिष्ठा का भी परिचायक है।

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मातृभूमि का मान संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) प्रेम का अनुशासन मानने को हाड़ा-वंश सदा तैयार है, शक्ति का नहीं। मेवाड़ के महाराणा को यदि अपने ही जाति भाइयों पर अपनी तलवार आजमाने की इच्छा हुई है, तो उससे उन्हें कोई नहीं रोक सकता है। बूंदी स्वतन्त्र राज्य है और स्वतन्त्र रहकर वह महाराणाओं का आदर करता रह सकता है। अधीन होकर किसी की सेवा करना वह पसन्द नहीं करता।

कठिन शब्दार्थ :
अनुशासन = आज्ञा, नियन्त्रण। अधीन = गुलाम।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी से लिया गया है। इसके लेखक हरिकृष्ण प्रेमी हैं।

प्रसंग-इस अंश में हाड़ा वंश का राजा राव हेमू अपनी स्वाधीनता की रक्षा की प्रतिज्ञा करता है।

व्याख्या :
अभयसिंह के मेवाड़ के अधीन होने के प्रस्ताव पर राव हेमू अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहता है कि हम हाड़ा वंशज प्रेम का अनुशासन तो मानने को तैयार हैं, पर किसी की दाब-धौंस या शक्ति को मानने को तैयार नहीं हैं। मेवाड़ के महाराणा को यदि अपने भाइयों पर ही तलवार चलाने की इच्छा है तो उससे उन्हें कौन रोक सकता है ? वे चलायें लेकिन यह बात अच्छी तरह सोच लें कि बूंदी एक स्वतन्त्र राज्य है और वह स्वतन्त्र रहकर ही महाराणाओं का आदर कर सकता है। वह गुलाम बनकर किसी की सेवा करना पसन्द नहीं करता।

विशेष :

  1. हेमू अपने स्वाभिमान की बात करता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

(2) जिनकी खाल मोटी होती है, उनके लिए किसी भी बात में कोई भी अपयश, कलंक या अपमान का कारण नहीं होता किन्तु जो आन को प्राणों से बढ़कर समझते आये हैं, वे पराजय का मुख देखकर भी जीवित रहें, यह कैसी उपहासजनक बात है।

कठिन शब्दार्थ :
अपयश = बदनामी। आन = इज्जत, मान-सम्मान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस अंश में महाराणा का प्रायश्चित व्यक्त हुआ है।

व्याख्या :
महाराणा अभय सिंह से कहते हैं कि जिनकी खाल मोटी होती है अर्थात् जो अपनी आन मर्यादा पर नहीं डटते हैं उनके लिए किसी भी बात में कोई भी अपयश, कलंक या अपमान का कोई महत्त्व नहीं होता है परन्तु जो आन या मर्यादा को अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते आये हैं, अर्थात् हमारे वंश की यह परम्परा रही है कि हमने अपनी आन और मर्यादा के लिए सब कुछ त्याग दिया है और आज उन्हीं के वंशज हाड़ा वंशियों से पराजित होकर जीवित रहें, यह निश्चय ही उपहास की बात है।

विशेष :

  1. महाराणा में अपने पूर्वजों की आन-मान को बनाये रखने की चिन्ता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

(3) ये सागर से रत्न निकाले। युग-युग से हैं गये सँभाले।
इनसे दुनिया में उजियाला। तोड़ मोतियों की मत माला।
ये छाती में छेद कराकर। एक हुए हैं हृदय मिलाकर।
इनमें व्यर्थ भेद क्यों डाला। तोड़ मोतियों की मत माला।

कठिन शब्दार्थ :
सँभाले = सँजोकर रखे गये हैं। व्यर्थ = बेकार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यह चारणी द्वारा गाया हुआ गीत है जिसमें वह सम्पूर्ण राजस्थान की एकता की बात कहती है।

व्याख्या :
चारणी गीत गाते हुए महाराणा को कुछ सन्देश देते हुए कहती है कि आज राजस्थान की भूमि पर जितने भी राजा हैं, वे सब. सागर से निकाले गये श्रेष्ठ रत्न हैं और युगों से इन्हें सँभालकर रखा गया है। इनकी शक्ति एवं पराक्रम का उजाला सब ओर छाया हुआ है। अतः किसी को भी मोतियों की माला को तोड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आगे चारणी कहती है कि अनेक कष्टों एवं विपत्तियों को झेलकर बड़ी मुश्किल से ये एक हुए हैं। अतः इनमें अब फूट मत डालो। इस सुन्दर मोतियों की माला को मत तोड़ो। भाव यह है कि राजस्थान के वीर राजाओं में बड़ी मुश्किल से एकता बनी है। अतः किसी भी राजा को उस एकता को तोड़ने का अधिकार नहीं है।

विशेष :

  1. चारणी अपने गीत में राजपूतों को एकता का पाठ पढ़ाना चाहती है।
  2. लाक्षणिक भाषा का प्रयोग है।

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(4) नकली बूंदी भी प्राणों से अधिक प्रिय है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं किया जा सकता। आज महाराणा आश्चर्य के साथ देखेंगे कि यह खेल केवल खेल ही नहीं रहेगा, यहाँ की चप्पा-चप्पा भूमि सिसोदियों और हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगी।

कठिन शब्दार्थ :
सरल है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
महाराणा द्वारा यह प्रतिज्ञा करने पर कि जब तक मैं बूंदी पर सिसोदिया का झण्डा नहीं फहरा लूँगा तब तक अन्न, जल ग्रहण नहीं करूंगा। महाराणा की यह प्रतिज्ञा असम्भव थी। अतः अभयसिंह जैसे चापलूसों ने नकली बूंदी का किला बनवाकर उस पर मेवाड़ का ध्वज फहराने की योजना बना ली, पर हाड़ा राजपूत इस पर बिदक गये, उसी का वर्णन है।

व्याख्या :
महाराणा की सेना में कुछ सैनिकं बूंदी के भी थे। बूंदी के नागरिक अपने देश की आन-बान के कट्टर पुजारी थे। जब उनको महाराणा को नकली बूंदी के किले को जीतने की योजना की जानकारी हुई तो वे लोग विद्रोह पर उतारू हो गये। उन्हीं लोगों में से एक देश भक्त वीर सिंह था। वीर सिंह ने ऐलान कर दिया कि नकली बूंदी भी बूंदी वासियों को प्राणों से अधिक प्यारी है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं होने दिया जायेगा। वह आगे कहता है कि महाराणा आज आश्चर्य के साथ देखेंगे कि नकली बूंदी को जीतने का यह कोई साधारण खेल नहीं है। यहाँ की भूमि का कण-कण आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगा। कहने का अर्थ यह है कि इस नकली बूंदी को फतह करना महाराणा के लिए आसान नहीं है। आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं में घमासान युद्ध होगा और खून की नदियाँ बह जायेंगी।

विशेष :

  1. वीर सिंह सच्चा देशभक्त है।
  2. भाषा भावानुकूल है।

(5) हम युग-युग से एक हैं और एक रहेंगे। आपको यह जानने की आवश्यकता थी कि राजपूतों में न कोई राजा है, न कोई महाराजा। सब देश, जाति और वंश की मान-रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं। हमारी तलवार अपने ही स्वजनों पर न उठनी चाहिए। बूंदी के हाड़ा सुख और दुःख में चित्तौड़ के सिसोदियों के साथ रहे हैं और रहेंगे। हम सब राजपूत अग्नि के पुत्र हैं, हम सबके हृदय में एक ज्वाला जल रही है। हम कैसे एक-दूसरे से पृथक् हो सकते हैं। वीर सिंह के बलिदान ने हमें जन्म-भूमि का मान करना सिखाया है।

कठिन शब्दार्थ :
स्वजनों = अपने ही लोगों। अग्नि के पुत्र = सूर्यवंशी हैं। पृथक् = अलग। बलिदान = त्याग।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अवतरण में बूंदी के शासक राव हेमू का समस्त राजपूत राजाओं को एकता का पाठ पढ़ाने का सन्देश है।

व्याख्या :
महाराणा द्वारा नकली बूंदी के युद्ध का खेल खेले जाने पर जब वीर सिंह की मृत्यु हो गयी तो महाराणा पश्चाताप करने लगा। इसी पर राव हेमू भी राजपूतों की एकता की बात कहते हैं कि हम सभी राजपूत युगों-युगों से एक हैं और आगे भी एक रहेंगे। राव हेमू आगे कहता है कि राजपूतों में न कोई राजा है और न महाराजा। हम सब राजपूत तो देश, जाति और वंश की मान-रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारी तलवारें अपने ही लोगों पर न उठे। बूंदी के हाड़ा सुख और दुःख में चित्तौड़ के सिसोदियों के साथ रहे हैं और आगे भी रहेंगे। हम सभी राजपूत सूर्य के वंशज हैं, हम सबके हृदय में एक ज्वाला जल रही है। हम कैसे एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं। वीर सिंह के त्याग ने हमें जन्मभूमि का सम्मान करना सिखाया है।

विशेष :

  1. राव हेमू उदारवादी शासक है तथा वह सभी को साथ लेकर चलना चाहता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म (एकांकी, सेठ गोविन्ददास)

सच्चा धर्म अभ्यास

बोध प्रश्न

सच्चा धर्म अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुरुषोत्तम कौन है?
उत्तर:
पुरुषोत्तम दिल्ली में रहने वाला एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण है।

प्रश्न 2.
शिवाजी के पुत्र का क्या नाम था?
उत्तर:
शिवाजी के पुत्र का नाम संभाजी था।

प्रश्न 3.
शास्त्रों में किसकी व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है?
उत्तर:
शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है।

प्रश्न 4.
पुरुषोत्तम किस कार्य को दुष्कर्म की संज्ञा देते हैं?
उत्तर:
पुरुषोत्तम शरणागत के बलिदान को दुष्कर्म की संज्ञा देते हैं।

प्रश्न 5.
सत्य का आश्रय छोड़ने का क्या दुष्परिणाम होता है?
उत्तर:
सत्य का आश्रय छोड़ने का यह दुष्परिणाम होता है कि सारा कुल भ्रष्ट हो जाता है। लड़कियाँ कुँआरी रह जाती हैं। लड़कों के शादी-विवाह नहीं होते हैं।

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सच्चा धर्म लघु उत्तरीय प्रश्न खालसराव प्रश्न

प्रश्न 1.
सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कब करता है?
उत्तर:
सत्य का आश्रय लेने पर जीवन में आने वाले सभी प्रश्नों का निराकरण हो जाता है और जब मनुष्य सत्य का आश्रय छोड़ मिथ्या का आसरा लेता है, तभी तरह-तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

प्रश्न 2.
असत्य किन परिस्थितियों में सत्य से बड़ा हो जाता है?
उत्तर:
धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

प्रश्न 3.
पुरुषोत्तम अपने किन गुणों के कारण सबके सम्मान-पात्र थे?
उत्तर:
पुरुषोत्तम जीवन भर सत्यवादी रहे। इसी गुण के कारण औरंगजेब के सदृश यवन बादशाह के राज्य में उनका पूरा सम्मान था।

प्रश्न 4.
सम्भाजी पुरुषोत्तम के आश्रय में कैसे पहुँचे?
उत्तर:
सम्भाजी शिवाजी का पुत्र था। दिल्ली से भागते समय शिवाजी मिठाई की टोकरी में सम्भाजी को पुरुषोत्तम के आश्रय में छोड़ गये थे।

प्रश्न 5.
पुरुषोत्तम की दृष्टि में सबसे बड़ा पातक क्या है?
उत्तर:
पुरुषोत्तम की दृष्टि में सबसे बड़ा पातक विश्वासघात है। शिवाजी अपने पुत्र सम्भाजी को पुरुषोत्तम को सौंपकर गये थे। यदि पुरुषोत्तम सम्भाजी के प्राणों की रक्षा न करता तो यह सबसे बड़ा पातक होता।

प्रश्न 6.
पुरुषोत्तम ने अहिल्या से सत्य और असत्य की क्या व्याख्या की?
उत्तर:
पुरुषोत्तम ने अहिल्या से सत्य और असत्य की व्याख्या करते हुए कहा कि अनेक बार सत्य के स्थान पर मिथ्या भाषण सत्य से भी बड़ी वस्तु होती है। जीवन में धर्म से बड़ी कोई चीज नहीं है, धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

सच्चा धर्म दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुरुषोत्तम के चरित्र की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
पुरुषोत्तम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनका सत्यवादी होना था। उनकी सत्यप्रियता दिल्ली में प्रसिद्ध थी। इसी कारण यवन तक उनका बहुत आदर करते थे।

प्रश्न 2.
पुरुषोत्तम के समक्ष कौन-सा धर्म संकट उपस्थित हुआ?
उत्तर:
पुरुषोत्तम के समक्ष यह धर्म संकट था कि उन्होंने शिवाजी के कहने पर उनके पुत्र सम्भाजी को अपने घर में रख लिया था। जब औरंगजेब को यह बात पता लगी तो पुरुषोत्तम शरणागत की रक्षा के लिए सम्भाजी को अपना भांजा बताकर उसके प्राणों की रक्षा करने लगे लेकिन सम्भाजी के प्राणों की रक्षा तभी हो सकती थी जब जीवन भर सत्य बोलने वाला पुरुषोत्तम मिथ्या बात (सम्भाजी को अपना भांजा बताना) कहे। अतः पुरुषोत्तम के सामने सत्य बोलना या असत्य बोलना यह धर्म संकट था।

प्रश्न 3.
“दिन भर का भूला-भटका यदि रात को भी घर लौट आये, तो वह भूला नहीं कहलाता”-इस कथन का भाव विस्तार कीजिए।
उत्तर:
अहिल्या अपने पति से बार-बार यह आग्रह करती है कि वह जब जीवनभर मिथ्या नहीं बोले तो शिवाजी के पुत्र सम्भाजी को अपना भांजा बताकर झूठ क्यों बोलना चाहते हैं? फिर वह कहती है कि दिन भर का भूला-भटका कोई आदमी यदि रात को घर लौट आये, तो वह भूला नहीं कहलाता। कहने का भाव यह है कि अहिल्या यह मान लेती है कि पुरुषोत्तम औरंगजेब के दूत दिलावर खाँ के सामने यह बात कह देगा कि सम्भाजी उसका भांजा नहीं है।

प्रश्न 4.
‘सच्चा धर्म’ एकांकी का केन्द्रीय भाव समझाइए।
उत्तर:
‘सच्चा धर्म’ एकांकी का केन्द्रीय भाव इस प्रकार है-
शिवाजी अपने कौशल से औरंगजेब की कारागार से मुक्त होते हैं, तब वे अपने पुत्र सम्भाजी को दिल्ली के एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण पुरुषोत्तम के घर में छिपा देते हैं। इस घटना की भनक औरंगजेब को लगती है, वह इसकी सत्यता के प्रतिपादन हेतु अपने दो सैनिकों को पुरुषोत्तम के पास भेजता है। पुरुषोत्तम की सत्यनिष्ठा के सभी दिल्लीवासी कायल थे। साथ ही उनकी यह प्रतिष्ठा भी थी कि वे किसी अन्य व्यक्ति के साथ बैठकर भोजन नहीं करते हैं।

औरंगजेब के सैनिक पुरुषोत्तम से वचनबद्ध होते हैं कि यदि वे अपने भांजे के साथ एक थाली में भोजन कर लेते हैं तो सैनिक स्वीकार कर लेंगे कि पुरुषोत्तम के यहाँ रहने वाला लड़का सम्भाजी नहीं है।-पुरुषोत्तम की पत्नी अहिल्या अपने पति को सत्य के मार्ग पर चलने की ही प्रेरणा देती पर पुरुषोत्तम की दृष्टि में सम्भाजी शरणागत हैं और उनकी रक्षा का उद्देश्य राष्ट्रीय भावना से अनुप्रेरित है। अतः पुरुषोत्तम इन महान् उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु वैयक्तिक आचार निष्ठा को खण्डित कर युग-धर्म की महत्ता स्थापित करते हैं।

प्रश्न 5.
एकांकी के तत्त्वों के नाम लिखकर ‘सच्चा धर्म’ के संवादों पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
विद्वानों ने एकांकी के निम्नलिखित तत्त्व माने हैं-कथानक, कथोपकथन, पात्र तथा चरित्र-चित्रण, देशकाल एवं वातावरण, उद्देश्य, शीर्षक।

‘सच्चा धर्म’ एकांकी के कथोपकथन या संवाद सारगर्भित तार्किक एवं महत् उद्देश्य के प्रचारक हैं। संवादों से पात्रों के चरित्र-चित्रण पर विशेष प्रभाव पड़ा है। ये संवाद सार्थक एवं कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं।

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सच्चा धर्म भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
उत्तर:

  1. सत्यवादी-पुरुषोत्तम की पूरी दिल्ली में सत्यवादी के रूप में प्रतिष्ठा थी।
  2. बलिदान-पुरुषोत्तम सत्य बात कहकर सम्भाजी का बलिदान नहीं करना चाहता था।
  3. दुष्कर्म-शरणागत की रक्षा न करना सबसे बड़ा दुष्कर्म है।
  4. निस्तब्धता-अहिल्या द्वारा बार-बार पुरुषोत्तम से सत्य कहने की जिद पर पुरुषोत्तम शान्त हो जाता है, फिर चारों ओर निस्तब्धता छा जाती है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करके सन्धि का नाम लिखिए
उत्तर:

  1. शरणागत = शरण + आगत = दीर्घ सन्धि।
  2. पुरुषोत्तम = पुरुष + उत्तम = गुण सन्धि।
  3. यज्ञोपवीत = यज्ञ + उपवीत = गुण सन्धि।

प्रश्न 3.
‘क’ स्तम्भ में दिये गये शब्दों का’ख’स्तम्भ में दिये गये शब्दों से सही सम्बन्ध स्थापित कीजिए
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म img-1
उत्तर:
1. → (ii)
2. → (i)
3. → (v)
4. → (iii)
5. → (vi)
6. → (iv)

सच्चा धर्म महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सच्चा धर्म बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिवाजी शम्भाजी को किसके घर में छिपा देते हैं?
(क) रहमान बेग के
(ख) औरंगजेब के
(ग) दिलावर के
(घ) पुरुषोत्तम के।
उत्तर:
(घ) पुरुषोत्तम के।

प्रश्न 2.
‘सच्चा धर्म’ एकांकी का प्रमुख पात्र है
(क) पुरुषोत्तम
(ख) अहिल्या
(ग) शम्भाजी
(घ) विनायक।
उत्तर:
(क) पुरुषोत्तम

प्रश्न 3.
“दिन भर का भूला-भटका यदि रात को भी घर लौट आये तो वह भूला नहीं कहलाता।” यह कथन किसने कहा है?
(क) औरंगजेब ने
(ख) अहिल्या ने
(ग) रहमान बेग ने
(घ) शिवाजी ने।
उत्तर:
(ख) अहिल्या ने

प्रश्न 4.
‘सच्चा धर्म’ एकांकी में लेखक ने अपनी भावना को किन मूल्यों के आधार पर व्यक्त किया है?
(क) व्यक्तिगत मूल्य
(ख) राष्ट्रीय चेतना
(ग) सामाजिक मूल्य
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
“धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है, तो असत्य सत्य से भी बड़ा हो जाता है।” यह कथन किसका है?
(क) पुरुषोत्तम
(ख) शिवाजी
(ग) अहिल्या
(घ) विनायक।
उत्तर:
(क) पुरुषोत्तम

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. पुरुषोत्तम राव किसी अन्य के साथ बैठकर …………….. में भोजन नहीं कर सकता।
  2. वह लड़का पुरुषोत्तम का ……………… जैसा नहीं दिखता।
  3. ठीक है, उचित समय पर ……………… ने तुम्हें सुबुद्धि दी।
  4. अपने कर्तव्य का पालन ही सबसे ………….. है।
  5. अब आपको विश्वास हुआ या नहीं कि …………… मेरा भांजा है।

उत्तर:

  1. एक ही थाली
  2. भांजा
  3. भगवान
  4. बड़ा धर्म
  5. विनायक।

सत्य/असत्य

  1. ‘सच्चा धर्म’ एकांकी के लेखक सेठ गोविन्ददास हैं।
  2. पुरुषोत्तम व्यक्तिगत धर्म को महत्त्व प्रदान करता है, अतः उसी का पालन करता है।
  3. यदि धर्म की रक्षा असत्य से होती है,तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।
  4. पुरुषोत्तम अपनी पत्नी अहिल्या की बात मानता है।
  5. पुरुषोत्तम औरंगजेब से उपहार पाने की प्रबल इच्छा रखता है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म img-2
उत्तर:
1.→ (घ)
2. → (क)
3. → (ङ)
4. → (ग)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘सच्चा धर्म’ एकांकी के मुख्य पात्र का नाम लिखिए।
  2. शिवाजी के पुत्र का क्या नाम था? (2011)
  3. पुरुषोत्तम के घर पर शम्भाजी किस नाम से रहते हैं?
  4. ‘सच्चा धर्म’ एकांकी में पुरुषोत्तम की पत्नी का क्या नाम था?(2011)
  5. शास्त्रों में किसकी व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है?

उत्तर:

  1. पुरुषोत्तम
  2. शम्भाजी
  3. विनायक
  4. अहिल्या
  5. सत्य और असत्य की।

सच्चा धर्म पाठ सारांश

‘सच्चा धर्म’ एकांकी सेठ गोविन्ददास द्वारा रचित एक ऐतिहासिक एकांकी है। यह एकांकी मुगलकालीन इतिहास की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस एकांकी में तीन दृश्य हैं।

एकांकी का प्रारम्भ एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण पुरुषोत्तम के घर से होता है। पुरुषोत्तम सत्यवादी एवं कर्त्तव्यशील ब्राह्मण हैं लेकिन आज वे असमंजस की स्थिति में हैं क्योंकि शम्भाजी पुरुषोत्तम के घर उनके भांजे बनकर ‘विनायक’ नाम से रह रहे हैं लेकिन वे वास्तव में शिवाजी के पुत्र हैं।

औरंगजेब के गुप्तचर उन्हें ढूँढ़ते हुए घूम रहे हैं। उनकी पत्नी अहिल्या उनसे कहती है कि तुम औरंगजेब को सच बता दो लेकिन पुरुषोत्तम का कथन है कि शरण में आये व्यक्ति की रक्षा करना उनका परम धर्म है। मैं विश्वासघात नहीं कर सकता।

दिलावर खाँ जो कि गुप्तचर विभाग का सरदार है.वह उनके समक्ष यह शर्त रखता है कि यदि विनायक और पुरुषोत्तम एक ही थाली में भोजन कर लें तब ही वह उसे पुरुषोत्तम का भांजा मानेगा। अहिल्या पुरुषोत्तम से कहती है कि एक अब्राह्मण के साथ यदि भोजन करोगे तो तुम्हारा धर्म संकट में पड़ जायेगा। पुरुषोत्तम बड़ी उलझन में है कि क्या करे।

तभी दिलावर खाँ और रहमान बेग आपस में बात करते हुए आते हैं। वे पुरुषोत्तम की सत्यवादिता एवं कर्मनिष्ठा की प्रशंसा करते हैं और कहते हैं कि यदि पुरुषोत्तम ने विनायक के साथ भोजन कर लिया तो वह शम्भाजी को उनका भांजा मान लेगा।

जब दिलावर खाँ पण्डित जी को लेकर पुरुषोत्तम के घर पहुँचते हैं तब वे बहुत परेशान होते हैं कि क्या करें ? उनकी पत्नी बार-बार सच बोलने को प्रेरित करती है परन्तु पुरुषोत्तम को कर्तव्यपालन की भावना पहले दिखायी देती है। अतः वे विनायक के साथ एक ही थाली में भोजन परोसकर लाते हैं। इसके बाद पुरुषोत्तम विनायक के साथ भोजन करके सिद्ध कर देते हैं कि वह उनका भांजा है।

इस प्रकार दिलावर खाँ का शक दूर हो जाता है और वह बहुत शर्मिन्दा होता है। अन्त में,लेखक ने यह बता दिया कि व्यक्तिगत धर्म की अपेक्षा राष्ट्र धर्म ही सच्चा धर्म है। अतः राष्ट्र के हित के लिए यदि धर्म त्यागना भी पड़े तो अनुचित नहीं है।

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सच्चा धर्म संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) कम-से-कम तुम सदृश सत्यवादी-व्यक्ति के लिए तो ऐसे प्रश्नों में असाधारणता नहीं होनी चाहिए। जन्म भर तुम्हारा सत्यव्रत अटल रहा। तुम सदा कहते रहे हो कि जीवन में यदि मनुष्य एक सत्य का आश्रय लिये रहे तो वह सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कर देता है। पर जब मनुष्य सत्य का आश्रय छोड़ मिथ्या का आसरा लेता है, तभी तरह-तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

कठिन शब्दार्थ :
सदृश = समान। अटल = न टलने वाला। आश्रय = सहारा। निराकरण = समाधान।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘सच्चा धर्म’ एकांकी से लिया गया है। इसके लेखक सेठ गोविन्द दास जी हैं।

प्रसंग :
इसमें पुरुषोत्तम पण्डित की पत्नी अहिल्या अपने। पति को सत्य व्रत की याद दिलाते हुए उसको न त्यागने की बात कहती है।

व्याख्या :
पुरुषोत्तम की पत्नी अहिल्या अपने पति से कहती है कि कम-से-कम तुम जैसे सत्यवादी व्यक्ति को तो इस प्रकार के प्रश्नों ‘कि मैं सत्य बोलें या धर्म की रक्षा करूँ’ पर विशेष चिन्तित नहीं होना चाहिए। जीवन भर तुमने सत्य के व्रत को पाला है। तुम्ही यह कहा करते थे कि यदि मनुष्य सत्य का आश्रय लिए रहे तो वह सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का समाधान कर देता है। लेकिन जब मनुष्य सत्य का सहारा छोड़कर झूठ का सहारा लेता है, तभी उसके सामने तरह-तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

विशेष :

  1. अहिल्या अपने पति को सत्य का मार्ग न त्यागने की सलाह देती है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) तुम्हारी सत्यप्रियता अधिकांश दिल्ली में प्रसिद्ध है। इसी कारण यवन तक तुम्हारा आदर करते हैं। हमारे विवाह को चालीस वर्ष हो चुके परन्तु आज तक मैंने तुम्हारे मुख से कोई मिथ्या वाक्य क्या, मिथ्या शब्द ही नहीं, मिथ्या अक्षर तक नही सुना। वहीं आज तुम बड़ी मिथ्या बात कहकर उसे साधारण सत्य भाषण से बड़ा कह रहे हो।

कठिन शब्दार्थ :
अधिकांश = अधिक भाग में। यवन = मुस्लिम, मुगल। मिथ्या = झूठ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
पुरुषोत्तम की पत्नी अहिल्या पुरुषोत्तम की सत्यनिष्ठा से प्राप्त हुई प्रतिष्ठा की याद दिलाते हुए कहती है।

व्याख्या :
अहिल्या पुरुषोत्तम से कहती है कि आपकी सत्य-प्रियता दिल्ली के अधिकतर भागों में जानी-पहचानी जाती है और सम्भवतः इसी कारण सब लोग आपका आदर भी करते हैं। मेरे और तुम्हारे विवाह को चालीस वर्ष का समय बीत चुका है पर मैंने आज तक तुम्हारे मुँह से कोई वाक्य, कोई शब्द और यहाँ तक कि कोई मिथ्या अक्षर भी नहीं सुना है और तुम्ही आज एक झूठी बात कहकर कि सम्भाजी तुम्हारा भांजा है, उसे साधारण सत्य भाषण से बड़ा बता रहे हो।

विशेष :

  1. अहिल्या अपने पति को सत्यव्रत पर ही डटे रहने की सलाह देती है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(3) अहिल्या, शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है। अनेक बार सत्य के स्थान पर मिथ्या भाषण सत्य से भी बड़ी वस्तु होती है। जीवन में धर्म से बड़ी कोई चीज नहीं है। धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है, तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

कठिन शब्दार्थ :
बारीकी से = सूक्ष्मता से, गहराई से। मिथ्या = झूठा, असत्य।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अवतरण में पुरुषोत्तम अपनी पत्नी को समझाते हुए कह रहे हैं कि धर्म की रक्षा हेतु यदि असत्य भी बोला जाये तो वह सत्य से भी बड़ा होता है।

व्याख्या :
पुरुषोत्तम अहिल्या से कह रहे हैं कि शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से अर्थात् सूक्ष्मता से की गई है। अनेक बार सत्य के स्थान पर मिथ्या भाषण करना पड़ता है पर यह मिथ्या भाषण सत्य से भी बढ़कर होता है। मनुष्य के जीवन में धर्म ही सबसे बढ़कर है उसके सामने अन्य चीजें तुच्छ हैं। धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है तो वह असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

विशेष :

  1. लेखक की मान्यता है पुरुषोत्तम के शब्दों में कि धर्म की रक्षा हेतु असत्य भाषण भी सत्य से बड़ा होता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली?

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? (संस्मरण रामनारायण उपाध्याय)

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? अभ्यास

बोध प्रश्न

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गाँधी द्वारा स्थापित आश्रम का नाम लिखिए।
उत्तर:
गाँधी द्वारा ‘सेवा ग्राम’ आश्रम की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 2.
लोक संस्कृति का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर:
लोक संस्कृति का जन्म गाँवों में हुआ।

प्रश्न 3.
लेखक ने संगीत का जन्म किससे माना है?
उत्तर:
लेखक ने संगीत का जन्म श्रम से माना है।

प्रश्न 4.
ललित कलाओं का स्वभाव कैसा होता है?
उत्तर:
ललित कलाओं का स्वभाव फूल जैसा होता है।

प्रश्न 5.
ग्रामीण समूचे गाँव को किस रूप में मानता आया है?
उत्तर :
ग्रामीण समूचे गाँव को एक परिवार मानता आया है।

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मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक समाज से किन प्रश्नों को पूछना चाहता है?
उत्तर:
लेखक समाज से ये प्रश्न पूछना चाहता है कि मेरे गाँवों की सुख और शान्ति को किसने छीन लिया। गाँवों की अन्न-धन और लक्ष्मी कहाँ चली गई?

प्रश्न 2.
लोक की जीवन्त रसधारा को किसने, कहाँ सुरक्षित रखा है?
उत्तर:
लोक की जीवन्त रसधारा को गाँवों ने अपने हृदय-में सुरक्षित रखा है।

प्रश्न 3.
अँधेरे को सुहावने प्रभात में कौन, कैसे परिवर्तित करता है?
उत्तर:
गाँव की स्त्रियाँ भोर में उठकर आटे के साथ घने अँधेरे को पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देती थीं।

प्रश्न 4.
गाँव के समृद्ध किसान की स्थिति अब कैसी हो गई है?
उत्तर:
गाँव के समृद्ध किसान की स्थिति बढ़ती हुई महँगाई और शोषणकारी समाज व्यवस्था के चलते मज़दूर के रूप में बदल गई है।

प्रश्न 5.
श्रम से किसका जन्म होना प्रतीत होता था?
उत्तर:
श्रम से संगीत का जन्म होना प्रतीत होता था और यही संगीत लोरी बनकर श्रम को हल्का करने में योगदान देता था।

प्रश्न 6.
माटी कुम्हार की हथेली के स्पर्श से किन नवीन रूपों को धारण करती थी?
उत्तर;
माटी कुंम्हार की हथेली का स्पर्श पाकर नये-नये रूप धारण करती थी। कभी वह गागर बनती, कभी खपरैल तो कभी माटी का दीप बनकर आशा की किरण जगाया करती थी।

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ललित कलाओं का ग्राम्य जीवन में क्या महत्त्व था?
उत्तर:
ललित कलाओं का ग्राम्य जीवन में बड़ा महत्त्व था। ये ललित कलाएँ उनमें जीवन का रस घोलती थीं। तीज-त्यौहार, मेले-ठेले तथा चौपालों पर इनके रूप देखने को मिलते थे।

प्रश्न 2.
लोकगीत ग्रामीण जीवन में किस प्रकार रचे-बसे थे?
उत्तर:
लोकगीत ग्रामीण जीवन की रग-रग में बसे और रचे थे। ग्रामीण जनों का सम्पूर्ण जीवन इन्हीं लोकगीतों के ताने-बाने से बुना हुआ था। उनकी श्वास-प्रश्वास में ये ही गीत समाये हुए थे।

प्रश्न 3.
लेखक के अनुसार “गोकुल के सहज-सरल गाँव” का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की मान्यता है कि ब्रजमण्डल के गोकुल के गाँव जिस प्रकार सहज एवं सरल थे वैसे ही इस क्षेत्र के सभी गाँव सहज और सरल थे। बनावट एवं कृत्रिमता का उनमें कोई स्थान नहीं था। वहाँ के निवासी सरल एवं भोले-भाले व्यक्ति हुआ करते थे।

प्रश्न 4.
गाँब के सुसंस्कृत आदमी की पाँच विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
गाँव का आदमी निरक्षर भले हो लेकिन वह सुसंस्कृत रहा है। उसकी पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. वह विश्वास पर बिक जाता है
  2. वह धर्म पर झुक जाता है
  3. वह थककर बैठता नहीं हैं
  4. झुककर नहीं चलता है और
  5. वह दुःख में भी मुस्कुराता रहता है।

प्रश्न 5.
गाँव के कुटीर उद्योगों पर आधुनिकता का क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
गाँव के कुटीर उद्योगों पर आधुनिकता का यह प्रभाव पड़ा है कि गाँव के कुटीर उद्योग नष्ट हो गये हैं। फ्लोर मिल खुल जाने से चक्कियों का चलना बन्द हो गया है, ट्रैक्टर एवं अन्य कृषि यन्त्रों के प्रयोग से किसानों का हल आदि चलाना बन्द हो गया है।

प्रश्न 6.
गाँव का आदमी अपने समग्र जीवन से क्या-क्या देने की क्षमता रखता है?
उत्तर:
गाँव के आदमी का समग्र जीवन एक अनपढ़ी खुली किताब जैसा है। उसका रहन-सहन, खान-पान, वस्त्राभूषण, आचार-विचार, रीति-रिवाज, गीत और कथाएँ, नृत्य संगीत आदि सभी कुछ हमें कुछ न कुछ देने की क्षमता रखते हैं।

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मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद कीजिए और नाम लिखिए
उत्तर:

  1. रवीन्द्र = रवि + इन्द्र = दीर्घ सन्धि।
  2. निरक्षर = निः + अक्षर = विसर्ग सन्धि।
  3. संग्रहालय = संग्रह + आलय = दीर्घ सन्धि।
  4. सज्जन = सत् + जन = व्यंजन सन्धि।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह कीजिए
उत्तर:

  1. कार्य स्थल= कार्य का स्थल = तत्पुरुष समास।
  2. रसधारा = रस की धारा = तत्पुरुष समास।
  3. श्वास-प्रश्वास = श्वास और प्रश्वास = द्वन्द्व समास।
  4. लोक संस्कृति = लोक की संस्कृति = तत्पुरुष समास।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों की सन्धि कीजिए
उत्तर:

  1. पर + उपकार = परोपकार।
  2. देव + ऋषि = देवर्षि।
  3. अति + आचार = अत्याचार।
  4. प्रति + एक = प्रत्येक।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द लिखिए.

  1. ठेका लेने वाला।
  2. खेती करने वाला।
  3. मिट्टी के बर्तन बनाने वाला।
  4. पानी भरने वाली।

उत्तर:

  1. ठेकेदार
  2. खेतिहर
  3. कुम्हार
  4. पनहारिन।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को पहचान कर अर्थ के आधार पर वाक्य प्रकार का नाम लिखिए

  1. किसान के कंठ से गीत कहाँ लुप्त हो गये?
  2. गाँवों में लोक संस्कृति का जन्म हुआ।
  3. मेरे गाँव की शान्ति मन छीनो।
  4. निर्मल चाँदनी, रात को नहीं फैली थी।
  5. मैं चाहता हूँ कि आप एक बार गाँव अवश्य जायें।

उत्तर:

  1. प्रश्नवाचक
  2. स्वीकारात्मक
  3. आदेशात्मक
  4. निषेधात्मक
  5. आदेशात्मक।

मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली? महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? बहु-विकल्पीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
‘मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली?’ निबन्ध के लेखक हैं-
(क) रामनारायण उपाध्याय
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) बालकृष्ण भट्ट
(घ) अज्ञेय।
उत्तर:
(क) रामनारायण उपाध्याय

प्रश्न 2.
गाँधीजी ने गाँवों को आदर्श मानकर किस गाँव की स्थापना की?
(क) सेवाग्राम
(ख) रामपुर
(ग) शान्ति निकेतन
(घ) साबरमती आश्रम।
उत्तर:
(क) सेवाग्राम

प्रश्न 3.
लोकगीतों के स्वर गलों से लुप्त होकर कहाँ कैद किये गये हैं?
(क) पुस्तकों में
(ख) कैसिटों में
(ग) संग्रहालयों में
(घ) कहीं नहीं।
उत्तर:
(ख) कैसिटों में

प्रश्न 4.
मिट्टी को नवीन आकृति प्रदान करता है
(क) मनुष्य
(ख) बढ़ई
(ग) रंगरेज
(घ) कुम्हार।
उत्तर:
(घ) कुम्हार।

प्रश्न 5.
लोक संस्कृति का जन्म हुआ (2016)
(क) शहरों में
(ख) गाँवों में
(ग) कस्बों में
(घ) विद्यालयों में।
उत्तर:
(ख) गाँवों में

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ………….. की स्थापना की।
  2. ……….. में लोकसंस्कृति का जन्म हुआ। (2013)
  3. पहले गाँव का किसान …………. माना जाता था।
  4. गाँव का आदमी निरक्षर भले हो, लेकिन ………… रहा है।
  5. आज गाँव में बेरोजगारी है, गाँव में नीरसता है, गाँव . हैं।

उत्तर:

  1. शान्ति निकेतन
  2. ग्रामों
  3. समृद्ध
  4. सुसंस्कृत
  5. गरीब।

सत्य/असत्य

  1. गाँव का आदमी निरक्षर भले ही हो लेकिन सुसंस्कृत होता है।
  2. गाँव में रहने के लिए साधारण नागरिक ही नहीं कवियों का मन भी ललचाया था।
  3. गाँधीजी द्वारा स्थापित आश्रम का नाम ‘सेवाग्राम’ है। (2009)
  4. आज गाँव में मजदूर प्रसन्नता से गाता गुनगुनाता मिलेगा।
  5. गाँव वालों का जीवन एक बिना पढ़ी खुली पुस्तक की तरह सामने बिछा है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (घ)
3. → (ङ)
4. → (क)
5. → (ग)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. लोक संस्कृति का जन्म कहाँ हुआ? (2014, 18)
  2. ‘मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली?’ के लेखक कौन हैं?
  3. ललित कलाओं का स्वभाव कैसा होता है? (2017)
  4. कहाँ के सरल और सहज गाँव धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं?
  5. अमराई में अब किसकी कूक नहीं गूंजती है?

उत्तर:

  1. ग्रामों में
  2. पण्डित रामनारायण उपाध्याय
  3. फूल की तरह
  4. गोकुल के
  5. कोयल।

मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली? पाठ सारांश

इस संस्मरण में पं.रामनारायण उपाध्याय जी ने भारत के गाँव की संस्कृति का अवलोकन किया है लेकिन निबन्धकार भारत के गाँव के वर्तमान को लेकर व्यथित हैं। उसका प्रमुख कारण है कि गाँव अपनी पहचान को नष्ट करते जा रहे हैं। गाँव की पहचान के साथ-साथ भारतमाता की पहचान भी धुंधली पड़ती जा रही है।

गाँधीजी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत के गाँवों को ही आदर्श मानकर सेवाग्राम और शान्ति निकेतन की स्थापना की। हमारे देश के गाँवों की प्राकृतिक छटा अलौकिक व दर्शनीय थी लेकिन अब वही गाँव आधुनिकता के दबाव के कारण इस अनुपम सुख से पृथक् होते जा रहे हैं।

अब न तो कहीं लोकगीतों की मधुर ध्वनि सुनाई देती है न ही ढोलक की थाप। ये लोकगीत मानव जीवन का अभिन्न अंग थे तथा मानव को भरपूर स्फूर्ति प्रदान करते थे। अब इन गीतों के समाप्त होने के कारण मानव की संवेदना भी समाप्त हो गयी है।

जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था वही भारतवासी जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, आर्थिक रूप से विपन्न हैं। आत्मनिर्भर गाँव अब छिन्न-भिन्न हो गये हैं। मजदूर व शिल्पकार रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से पलायन कर शहर की ओर भाग रहे हैं।

पूर्व में गाँव के लोग अनपढ़ होते थे लेकिन उनमें परस्पर स्नेह. आस्था. विश्वास और परिश्रम की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वे श्रम और संघर्ष करके भी प्रसन्नतापूर्वक जीवन बिताते थे क्योंकि वे आत्मनिर्भर थे। आज भी इतिहास इस बात का प्रमाण है कि भारत के गाँव खुशहाल थे लेकिन आज गाँव में नीरसता,निर्धनता और अशान्ति है। निबन्धकार का इस निबन्ध को लिखने का उद्देश्य है कि लोकचेतना जाग्रत हो।

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मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली? संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) जिन गाँवों ने हिन्दी साहित्य को ‘हीरो’ और ‘गोबर’ जैसे पात्र दिये, जिन गाँवों के लिए गाँधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शहरों की समस्त सुविधाओं को त्यागकर ‘शान्ति निकेतन’ और ‘सेवाग्राम’ को अपना कार्यस्थल बनाया, जिन गाँवों में रहने के लिए साधारण नागरिक ही नहीं कवियों का मन भी ललचाया था, वे ही गाँव आज अशान्ति के घर हुए जा रहे हैं और जैसे किसी भी आँख से आँसू गिरे, ऐसे गाँवों के आँचल से एक-एक घर टूटते ही चले जा रहे हैं।

कठिन शब्दार्थ :
कार्यस्थल = कामकाज करने का स्थान। आँचल = परिवेश, वातावरण।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्री रामनारायण उपाध्याय हैं।

प्रसंग :
इसमें लेखक की चिन्ता यह है कि पहले तो गाँव सुख शान्ति के भण्डार हुआ करते थे और सभी लोग गाँवों की ओर देखा करते थे; पर आज तो वे समस्याओं के घर बनते चले जा रहे हैं।

व्याख्या :
लेखक श्री रामनारायण उपाध्याय कहते हैं कि जिन गाँवों ने प्रेमचन्द के प्रसिद्ध उपन्यास, ‘गोदान’ में ‘होरी’ और ‘गोबर’ का चित्रण किया है तथा जिन गाँवों में गाँधी और टैगोर को शहरों की सभी सुख-सुविधाएँ त्याग कर ‘सेवा ग्राम’ और ‘शान्ति निकेतन’ भाया तथा इन्हीं को इन लोगों ने अपनी कर्म भूमि बनाया। इन गाँवों के प्रति साधारण नागरिक ही नहीं अपितु पन्त जैसे महान् कवियों का मन भी ललचाया करता था, वे ही गाँव आज सुख शान्ति से रहित होकर अशान्ति के घर क्यों बनते जा रहे हैं? जिस प्रकार किसी आँख से आँसू टप-टप गिरते जाते हैं, उसी प्रकार गाँव के आँचल के एक-एक घर टूटते जा रहे हैं।

विशेष :

  1. लेखक को गाँवों की वर्तमान दशा से हार्दिक दुःख होता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) जिन गाँवों में लोक-संस्कृति का जन्म हुआ, जिसने लोक की जीवन्त रसधारा को, अपने हृदय में सुरक्षित रखा, वे ही गाँव आज टूटते जा रहे हैं, गाँव की वह पुरानी पीढ़ी भी समाप्त होती जा रही है जिसका सम्पूर्ण जीवन श्वास-प्रश्वास की तरह गीतों के ताने-बाने पर आधारित था। अब तो वे गोकुल से सहज-सरल गाँव नष्ट होते जा रहे हैं, जहाँ स्त्रियाँ भोर में उठकर आटे के साथ घने अँधेरे को भी पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देती थीं। जहाँ चक्की के हर फेरे के साथ गीत की नई पंक्तियाँ उठती थीं। लगता था जैसे श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा हो और संगीत लोरी बनकर श्रम को हल्का करने में अपना योगदान दे रहा हो।

कठिन शब्दार्थ :
लोकसंसार। जीवन्त रसधारा = ऐसी धारा जो जीवन प्रदान करती हो। श्वास-प्रश्वास = साँस लेना और छोड़ना। लोक-संस्कृति = गाँव की संस्कृति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मानना है कि लोक संस्कृति का जन्म गाँवों से ही हुआ था और आज वह टूटती जा रही है।

व्याख्या :
लेखक श्री रामनारायण उपाध्याय कहते हैं कि जिन गाँवों में लोक-संस्कृति का जन्म हुआ था और जिसने वहाँ के जन-जीवन में एक जीवन्त जीवन प्रवाहित किया था, वे ही गाँव आज टूटते और बिखरते जा रहे हैं। गाँव की वह पुरानी पीढ़ी आज नाश के कगार पर है जिसका सारा जीवन श्वास-प्रश्वास की तरह लोक गीतों के ताने-बाने पर टिका हुआ था। गोकुल के सहज एवं सरल गाँव जहाँ स्त्रियाँ प्रात:काल की बेला में उठकर घर की चक्की पर बैठकर लोकगीत गाते-गाते रात्रि के घने अँधेरे को पीसकर सुहावने प्रात:काल में बदल देती थीं, आज वे गाँव भी नष्ट होते जा रहे हैं। उस समय गाँव की स्त्रियाँ चक्की चलाते वक्त गीत की नई-नई पंक्तियाँ गाकर वातावरण को मधुर बना दिया करती थीं। उस समय ऐसा लगता था मानो श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा हो और संगीत लोरी बनकर श्रम को हल्का कर दिया करता था।

विशेष :

  1. पहले गाँवों में स्त्रियाँ चक्की चलाते समय, पानी भरते समय लोकगीत गाया करती थीं।।
  2. भाषा सहज, सरल में भावानुकूल है।

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(3) पहले जो आदमी गाँव का समृद्ध किसान माना जाता था, वही अब बढ़ती महँगाई और शोषणकारी समाज व्यवस्था के चलते अपनी जमीन से हाथ धोकर खेतिहर मजदूर में बदलता जा रहा है और सचमुच जो मजदूर था वह जमीन पर से किसान का आधिपत्य कम हो जाने से शहरों में मजदूरी करता नजर आता है।

कठिन शब्दार्थ-समृद्ध = सम्पन्न, खाता-पीता। शोषणकारी = सताने वाला, अनुचित लाभ लेने वाला। खेतिहर = मजदूरी पर खेत में काम करने वाला। आधिपत्य = अधिकार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक यह बताना चाहता है कि गाँव के लोग पलायन कर शहरों की ओर भाग रहे हैं।

व्याख्या :
लेखक रामनारायण उपाध्याय कहते हैं कि पहले जो गाँव का सम्पन्न किसान माना जाता था वह बढ़ती महँगाई के कारण तथा शोषण करने वाली सामाजिक व्यवस्था के कारण अपनी जमीन से हाथ धोकर खेत में काम करने वाला मजदूर बनता जा रहा है और जो वास्तव में मजदूर था वह जमीन पर से किसान का अधिकार समाप्त हो जाने पर शहर में मजदूरी करता दिखाई देता है।

विशेष :

  1. बढ़ती महँगाई और शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था ने किसानों को मजदूर बना डाला है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश (निबन्ध, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

मैं और मेरा देश अभ्यास

बोध प्रश्न

मैं और मेरा देश अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
पंजाब केसरी के नाम से कौन जाना जाता है?
उत्तर:
पंजाब केसरी के नाम से लाला लाजपत राय को जाना जाता है।

प्रश्न 2.
‘दीवार में दरार पड़ गई’ का आशय किससे है?
उत्तर:
‘दीवार में दरार पड़ गई’ से लेखक का आशय उनके मन में जो पूर्णता का आनन्द भाव था उसमें उनको कमी का अनुभव होने से है।

प्रश्न 3.
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिये गये फल के मूल्य के रूप में क्या माँगा?
उत्तर:
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिये गये फल के मूल्य के रूप में यह माँगा कि यदि आप मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहियेगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

प्रश्न 4.
बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति को कौन-सा उपहार दिया?
उत्तर:
बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति कमाल पाशा को मिट्टी की छोटी हंडिया में अपने हाथ से तोड़ा गया पाव भर शहद दिया था।

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मैं और मेरा देश लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तेजस्वी पुरुष लाला लाजपत राय की दो विशेषताएँ कौन-सी थीं?
उत्तर:
तेजस्वी पुरुष लाला लाजपत राय की दो विशेषताएँ थीं-एक तो वे अपनी लेखनी द्वारा देश के लोगों में ओज का संचार करते थे, दूसरे वे जन सभाओं में अपनी तेजस्वी वाणी द्वारा लोगों में उत्साह का संचार किया करते थे।

प्रश्न 2.
देहाती बूढ़ा कमाल पाशा के पास क्यों गया था?
उत्तर:
देहाती बूढ़ा राष्ट्रपति कमाल पाशा के जन्मदिन पर उन्हें उपहार देने गया था। उपहार में वह एक हंडिया में पाव भर शहद लेकर आया था। कमाल पाशा ने उस उपहार को सराहते हुए कहा, “दादा आज सर्वोत्तम उपहार तुमने ही भेंट किया क्योंकि इसमें तुम्हारे हृदय का शुद्ध प्यार है।”

प्रश्न 3.
स्वामी रामतीर्थ जापानी युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए, क्यों?
उत्तर:
स्वामी रामतीर्थ जापानी युवक का उत्तर सुनकर इसलिए मुग्ध हो गए क्योंकि उस युवक ने अपने कार्य से अपने देश के गौरव को बहुत ऊँचा उठा दिया था।

प्रश्न 4.
लेखक के अनुसार हमारे देश को किन दो बातों की सर्वाधिक आवश्यकता है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार हमारे देश को दो बातों की सर्वाधिक आवश्यकता है-एक शक्ति बोध की और दूसरी सौन्दर्य बोध की। हम यह समझ लें कि हमारा कोई भी काम ऐसा न हो जो देश में कमजोरी की भावना को बल दे या कुरुचि की भावना को। हम कभी भी अपने देश के अभावों एवं कमजोरियों की सार्वजनिक स्थलों पर चर्चा न करें और न तो गन्दगी फैलायें और न गन्दे विचार व्यक्त करें।

प्रश्न 5.
देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास कैसे हो रहा है?
उत्तर:
यदि आप चलती रेलों में, मुसाफिर खानों में, चौपालों पर और मोटर-बसों में बैठकर देश की कमियों और बुराइयों की चर्चा करना अपना धर्म समझते हैं और यदि दूसरे देशों की तुलना में अपने देश को नीचा या छोटा मानते हैं, तो आप देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास कर रहे हैं।

मैं और मेरा देश दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जय’ बोलने वालों का महत्त्व प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर:
‘जय’ बोलने वालों का बहुत महत्त्व है। किसी भी मैच में जब कोई वर्ग खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन पर तालियाँ बजाता है या उनका जय-जयकार करता है तो खिलाड़ियों में आत्म संचार एवं उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। गिरता हुआ खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर जाता है। कवि-सम्मेलनों और मुशायरों में तो तालियाँ बजाने या जयकारा बोलने से कवियों एवं शायरों में दो गुना जोश आ जाता है और वे मंचों पर छा जाते हैं।

प्रश्न 2.
जापान में शिक्षा लेने आये विद्यार्थी की कौन-सी गलती से उसके देश के माथे पर कलंक का टीका लग गया?
उत्तर:
जापान में किसी अन्य देश से शिक्षा लेने आये विद्यार्थी ने सरकारी पुस्तकालय से उधार ली गयी पुस्तक में से कुछ दुर्लभ चित्रों को फाड़ लिया था। उसकी इस हरकत को एक अन्य जापानी लड़के ने देख लिया था। अतः उसने चोर लड़के की शिकायत कर दी। पुलिस ने उसे पकड़ लिया और उसके कब्जे से चोरी किये गये चित्र बरामद कर लिये। फिर उस लड़के को देश से निकाल दिया गया तथा पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस देश का (जिसका वह चोर विद्यार्थी था) कोई निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता। इस प्रकार इस विद्यार्थी ने अपने नीच कार्य से अपने देश के माथे पर कलंक का टीका लगा दिया था।

प्रश्न 3.
देश के शक्तिबोध को चोट कैसे पहुँचती है?
उत्तर:
यदि आप बात-बात में सार्वजनिक स्थानों पर, चलती रेलों में, क्लबों में, मुसाफिरखानों, चौपालों पर या मोटर बसों में बैठकर अपने देश की कमियों को उजागर करते रहते हैं या देश की निन्दा करते रहते हैं या फिर दूसरे देशों से तुलना करते हुए अपने देश को हेय या तुच्छ बताते रहते हैं, तो निश्चय ही आप अपने इन कार्यों से देश के शक्तिबोध को चोट पहुंचा रहे हैं।

प्रश्न 4.
‘देश के सौन्दर्य बोध को आघात लगता है तो – संस्कृति को गहरी चोट लगती है’-इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
यदि समाज में सामान्य शिष्टाचार नहीं है, आप में। खान-पान और उठने-बैठने में शिष्टता नहीं है, फूहड़पन है। यदि आप केला खाकर छिलका रास्ते में फेंक देते हैं, घर का कूड़ा निर्धारित स्थान पर न फेंककर इधर-उधर फेंक देते हैं, दफ्तर, घर, गली, होटल, धर्मशालाओं में रहते हुए आप अपनी पीक या थूक इधर-उधर कर देते हैं या फिर अपने मुँह से गन्दी गालियाँ निकालते हैं, तो निश्चय ही आपके द्वारा किये गये इन कार्यों से देश के सौन्दर्य बोध को आघात लगता है तथा इससे देश की संस्कृति को गहरी चोट लगती है।

प्रश्न 5.
देश के लाभ और सम्मान के लिए नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
देश के लाभ और सम्मान के लिए नागरिकों को कभी भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे देश की प्रतिष्ठा पर आँच आये। हमें अपने आपको सभ्य एवं संस्कारवान बनाना चाहिए। हमेशा दूसरों का आदर करें, सत्य बोलें एवं देश से प्रेम करें। हम भूलकर भी ऐसा कोई काम न करें जिससे देश की बदनामी हो। अपने उठने-बैठने एवं बात करने में हमें शिष्टता का पालन करना चाहिए। घर, दफ्तर, धर्मशाला, होटल आदि स्थान पर गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए। जरूरत मन्दों एवं गरीबों की सदैव सहायता करनी चाहिए।

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मैं और मेरा देश भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह करके समास का नाम बताइए-
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का संधि-विच्छेद कीजिए-
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम लिखिए-
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-3

मैं और मेरा देश महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मैं और मेरा देश बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक भूकम्प आया था जिससे दीवार में दरार पड़ गयी। वह भूकम्प कहाँ आया था?
(क) प्रान्त में
(ख) विदेश में
(ग) प्रदेश में
(घ) मन-मानस में।
उत्तर:
(घ) मन-मानस में।

प्रश्न 2.
तेजस्वी पुरुष कौन थे जिन्हें ‘पंजाब केसरी’ कहा जाता है?
(क) लाला लाजपत राय
(ख) वल्लभभाई पटेल
(ग) चन्द्रशेखर आजाद
(घ) सुभाषचन्द्र बोस।
उत्तर:
(क) लाला लाजपत राय

प्रश्न 3.
हमारे देश के कौन-से सन्त जापान गये?
(क) दयानन्द
(ख) रामानन्द
(ग) विवेकानन्द
(घ) स्वामी रामतीर्थ।
उत्तर:
(घ) स्वामी रामतीर्थ।

प्रश्न 4.
बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति को उपहार में भेंट किया (2015)
(क) फल
(ख) मिठाई
(ग) रुपया
(घ) शहद।
उत्तर:
(घ) शहद।

प्रश्न 5.
शल्य कौन था?
(क) अर्जुन का सारथी
(ख) कर्ण का सारथी
(ग) कृष्ण का सारथी
(घ) कोचवान।
उत्तर:
(ख) कर्ण का सारथी

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. स्वामी रामतीर्थ ………… गये थे। (2009)
  2. जीवन एक युद्ध स्थल है और युद्ध में ………… ही तो काम नहीं होता।
  3. एक दिन वह सरकारी पुस्तकालय से एक पुस्तक पढ़ने को लाया जिसमें कुछ ………… चित्र थे।
  4. राजधानी में अपनी …………. का उत्सव समाप्त कर वे अपने भवन में ऊपर चले गये।
  5. क्या आप कभी केला खाकर ………… रास्ते में फेकते हैं?

उत्तर:

  1. जापान
  2. लड़ना
  3. दुर्लभ
  4. वर्षगाँठ
  5. छिलका।

सत्य/असत्य

  1. स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान गए थे। (2016, 17)
  2. कमालपाशा उन दिनों मलेशिया के राष्ट्रपति थे।
  3. क्या कभी अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है,मुहावरा है।।
  4. लाला लाजपत राय की कलम और वाणी दोनों तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-4
उत्तर:
1. → (ङ)
2. → (घ)
3. → (ग)
4. → (ख)
5. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. श्री कन्हैया लाल मिश्र जी ने किन पत्रों का सम्पादन किया?
  2. हमारे देश को कौन-सी दो बातों की सबसे अधिक जरूरत है?
  3. हमारे देश के कौन-से सन्त जापान गये?
  4. यह निबन्ध किस शैली में रचा गया है?

उत्तर:

  1. ज्ञानोदय, नया जीवन और विकास
  2. एक शक्तिबोध दूसरा सौन्दर्यबोध
  3. स्वामी रामतीर्थ
  4. दृष्टान्त शैली।

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मैं और मेरा देश पाठ सारांश

प्रस्तुत निबन्ध में निबन्धकार ने व्यक्ति के जीवन-विकास में घर,नगर, समाज की भूमिका का उल्लेख करते हुए देश के प्रति उसके कर्त्तव्यबोध को जाग्रत करने की चेष्टा की है। निबन्धकार के अनुसार यदि हम अपना सम्मान चाहते हैं, तो हमें अपने साथ-साथ अपने देश का सम्मान भी करना चाहिए और अपने देश का गौरव बढ़ाने के लिए ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे अन्य देशों में भी हमारे देश का नाम ऊँचा हो तथा सभी देश हमारा और हमारे देश का सम्मान करें।

व्यक्ति और देश के सम्बन्धों की व्याख्या करते हुए निबन्धकार ने देश के गौरव और प्रतिष्ठा के लिए प्रत्येक व्यक्ति की देशनिष्ठा को रेखांकित किया है। हमें भी उन महापुरुषों की तरह कार्य करने चाहिए जिनके प्रयास से हमारा देश स्वतन्त्र हुआ, हमारे देश का गौरव बढ़ा। ऐसा ही एक उदाहरण स्वर्गीय पंजाब केसरी लाला लाजपत राय का निबन्धकार ने दिया है, जिन्होंने अपनी कलम और वाणी से हमारे देश को एक अलग पहचान दी। लाला जी के अनुसार भारतवर्ष की गुलामी उनके लिए एक कलंक थी जिसे उन्होंने अपनी कलम से भारतवासियों के समक्ष रखा था, क्योंकि यह गुलामी उनके लिए एक मानसिक भूकम्प के समान थी।

दर्शनशास्त्रियों के अनुसार जीवन बहुमुखी है। यदि हम कुछ नहीं कर सकते तो हमें उनका उत्साहवर्धन करना चाहिए जो अपने देश,समाज,नगर के लिए कुछ कार्य करना चाहते हैं। हमारे राष्ट्र के महान् सन्त स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान जा रहे थे। वह भोजन के रूप में फल ही ग्रहण करते थे। गाड़ी स्टेशन पर रुकी। किसी ने बताया कि यहाँ अच्छे फल प्राप्त नहीं होते। एक जापानी युवक प्लेटफार्म पर खड़ा था, उसने स्वामी जी को फल दिये, साथ ही उसने स्वामी जी से प्रार्थना की कि इस घटना को किसी को न बतायें, यह उस युवक की देशभक्ति का उदाहरण है।

पुस्तकालय में चोरी करते हुए विदेशी नागरिक को बाहर निकाल दिया गया, यह देश के प्रति उसकी अपूर्ण निष्ठा है। तुर्की के राष्ट्रपति कमाल पाशा ने विश्राम त्यागकर तीन कोस से पैदल आये हुए वृद्ध से भेंट की। रेल का सफर भी हमारे देश में अन्य देशों की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद है। अन्त में लेखक का कथन है कि चुनाव के समय योग्य व्यक्ति को मत देना ही अधिक श्रेयस्कर है। इसी से देश और समाज की उन्नति में चार चाँद लगेंगे।

मैं और मेरा देश संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) अपने महान् राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाये और जो घोर अन्धकार और भयंकर बवण्डरों के झकझोरों में जीवन भर खेले, उन दीपकों को बुझने से बचाते रहे, उन्हीं में एक थे वे लालाजी। उनकी कलम और वाणी दोनों में तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं।

कठिन शब्दार्थ :
पराधीनता = गुलामी। दीन दिनों = बुरे दिनों में। गौरव के दीपक = देश की प्रतिष्ठा को जीवित रखा। तेजस्विता = तेज, प्रताप की आभा।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘मैं और मेरा देश’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इसके लेखक श्री कन्हैया लाल मिश्र। ‘प्रभाकर’ हैं।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक ने लाला लाजपत राय की देश भक्ति एवं तेजस्विता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि अपने महान् देश की गुलामी के उन दुर्दिनों में जब देश को कदम-कदम पर अपमान का घूट पीना पड़ता था, लाला लाजपत राय ने अपने रक्त से गौरव के दीपक को जलाये रखा। उन पर अनेक भयंकर बवण्डर एवं झोंके आये पर वे अपने लक्ष्य से बिल्कुल भी हटे नहीं। उनकी कलम में तेजस्विता थी जिसको वे अपने लेखों में लिखकर विदेशी सत्ता के विरुद्ध आग उगला करते थे और समय-समय पर जनता जनार्दन को अपनी तेजस्वी एवं ओजस्वी वाणी से प्रोत्साहन देते रहते थे।

विशेष :

  1. लालाजी की अनुपम देशभक्ति पर प्रकाश डाला गया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(2) हाँ जी, युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्व है। कभी मैच देखने का अवसर मिला ही होगा, आपको। देखा नहीं आपने कि दर्शकों की तालियों से खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है और गिरते खिलाड़ी उभर जाते हैं। कविसम्मेलनों और मुशायरों की सफलता दाद देने वालों पर निर्भर करती है। इसलिए मैं अपने देश का कितना भी साधारण नागरिक क्यों न हूँ, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

कठिन शब्दार्थ :
पैरों में बिजली= चुस्ती-फुर्ती, उत्तेजना। दाद = तारीफ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक जय बोलने के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कह रहा है।

व्याख्या :
लेखक प्रभाकर जी कहते हैं कि हाँ जी, युद्ध में जय बोलने वालों का बड़ा महत्त्व होता है। लेखक पाठकों से प्रश्न करता है कि आपको जीवन में कभी किसी मैच को देखने का मौका मिला होगा। उस समय दर्शक गण जब तालियाँ बजाते हैं तो खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ जाता है, उनके पैरों में बिजली जैसी गति आ जाती है। इतना ही नहीं जो खिलाड़ी निराशा में डूब जाते हैं, उनमें भी इस जय-जयकार से जोश आ जाता है और उनकी पराजय जय में बदल जाती है। यही बात कवि-सम्मेलनों एवं मुशायरों पर भी लागू होती है। यदि श्रोताओं की ओर से सुनाने वालों को बार-बार दाद मिलने लगेगी, तो सुनाने वालों .का उत्साह कई गुना बढ़ जायेगा। अतः यह हमारा पवित्र कर्तव्य है कि हम अपने देश के सम्मान की रक्षा हर प्रकार से करें। चाहे हम साधारण नागरिक हों या महत्त्वपूर्ण। देश सम्मान हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

विशेष :

  1. लेखक ने जय के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(3) जहाँ एक युवक ने अपने काम से अपने देश का सिर ऊंचा किया था, वहीं एक युवक ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का ऐसा टीका लगाया, जो जाने कितने वर्षों तक संसार की आँखों में उसे लांछित करता रहा।

कठिन शब्दार्थ :
सिर ऊँचा किया = देश का सम्मान बढ़ाया। मस्तक पर कलंक का टीकादेश को नीचा दिखाया।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मत है कि हम अच्छे कामों से देश का सम्मान बढ़ा सकते हैं और बुरे कार्यों से देश को नीचा गिरा सकते हैं।

व्याख्या :
लेखक प्रभाकर जी ने देश के दो युवकों के उदाहरण देकर यह बताना चाहा है कि अच्छे कार्यों से देश का सम्मान बढ़ता है। इसके लिए उन्होंने जापान के उस युवक का उदाहरण दिया है जिसने स्वामी रामतीर्थ की इस टिप्पणी पर कि ‘जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते’ उस जापानी युवक ने अपने देश की बेइज्जती होते देख दौड़कर ताजे और अच्छे फल लाकर स्वामी जी को दे दिए। जब स्वामी जी ने उस बालक को फलों का मूल्य देना चाहा तो उसने मूल्य लेने से मना कर दिया और कहा कि यदि आप इसका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि अपने देश में जाकर किसी से यह मत कहना कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

लेखक ने दूसरा उदाहरण उस युवक का दिया जो अपने देश से जापान में शिक्षा लेने आया था। उस बालक ने सरकारी पुस्तकालय से उधार ली हुई एक पुस्तक में से कुछ दुर्लभ चित्र चुरा लिए। उसकी इस हरकत को एक जापानी विद्यार्थी ने देख लिया था। फलतः उसने इसकी सूचना पुस्तकालय को दे दी। पुलिस ने तलाशी लेकर उस विद्यार्थी से वे चित्र बरामद कर लिए फिर उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया। इस दूसरे युवक ने अपने बुरे काम से अपने देश के माथे पर कलंक का टीका लगाया। अतः लेखक का मानना है कि अच्छे काम करने वालों की सदा प्रशंसा होती है और बुरे काम करने वालों की निन्दा।

विशेष :

  1. लेखक ने अच्छे गुण अपनाने का युवकों को सन्देश दिया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(4) जैसा मैं अपने लाभ और सम्मान के लिए हरेक छोटी-छोटी बात पर ध्यान देता हूँ, वैसा ही मैं अपने देश के लाभ और सम्मान के लिए भी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दै। यह मेरा कर्तव्य है और जैसे मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ-यह मेरा अधिकार है। बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं।

कठिन शब्दार्थ :
सम्मान = आदर, इज्जत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि व्यक्ति विशेष को जैसा मान-सम्मान पाने की इच्छा होती है, वैसा ही देश के लिए भी किया जाना चाहिए।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जिस तरह मैं अपने व्यक्तिगत लाभ एवं आदर के लिए छोटी से छोटी बात पर भी ध्यान देता हूँ, उसी तरह मुझे अपने देश का भी ध्यान रखना चाहिए। मेरा यह कर्त्तव्य है। जिस प्रकार मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ-यह मेरा अधिकार है। लेखक यह बताना चाहता है कि मैं और मेरा देश दोनों एक ही हैं, इनमें कहीं भेद नहीं होना चाहिए।

विशेष :

  1. लेखक अपने को देश से अलग नहीं मानता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(5) मैंने जो कुछ जीवन में अध्ययन और अनुभव सीखा है, वह यही है कि महत्त्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है। बड़े से बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है और छोटे से छोटा कार्य भी महान है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना है।

कठिन शब्दार्थ :
विशालता= व्यापकता, बड़ा होना। हीन = छोटा, तुच्छ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक कहता है कि भावना से ही कोई कार्य अच्छा या बुरा, बड़ा या छोटा होता है।

व्याख्या :
लेखक प्रभाकर जी कहते हैं कि मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में जो कुछ भी अध्ययन और अनुभव किया है, उससे मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि जीवन में महत्त्व कार्य के छोटे-बड़े से नहीं होता है, उसका महत्त्व तो काम करने की भावना से होता है। बड़े से बड़ा कार्य भी तुच्छ श्रेणी का बन जायेगा, यदि उसके पीछे कर्ता की भावना पवित्र एवं महान नहीं है।

विशेष :

  1. लेखक भावना को महान् मानता है, कार्य को नहीं।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(6) आपके द्वारा देश के सौन्दर्य बोध को भंयकर आघात पहुँच रहा है और आपके द्वारा देश की संस्कृति को गहरी चोट पहुंच रही है।

कठिन शब्दार्थ :
आघात = चोट।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक यह बताना चाहता है कि यदि आपका जीवन साफ-सफाई से दूर रहने वाला एवं गन्दगी प्रिय है तो इससे आप देश के सौन्दर्य बोध एवं संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि यदि आप अपने घर की गन्दगी सड़क पर फेंकते हैं और उसे उसके स्थान पर नहीं फेंकते हैं या अपने मुँह से अपशब्द निकालते हैं, या अपने आस-पास की जगह को थूक या पीक से गन्दा किये रहते हैं तो निश्चय ही इस प्रकार के व्यवहार से आप देश के सौन्दर्य बोध को चोट पहुँचा रहे हैं और आपके इन कारनामों से देश की संस्कृति को बहुत हानि पहुँच रही है।

विशेष :

  1. लेखक ने व्यावहारिक जीवन में सफाई एवं स्वच्छता रखने का उपदेश दिया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा

विविधा अभ्यास

बोध प्रश्न

विविधा अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
आसमान में किस तरह के बादल उड़ रहे थे?
उत्तर:
आसमान में झीने-झीने, कजरारे एवं चंचल बादल उड़ रहे थे।

प्रश्न 2.
रिमझिम-रिमझिम पानी बरसने के बाद क्या हुआ?
उत्तर:
रिमझिम-रिमझिम पानी बरसने के बाद आकाश खुल गया और धूप-निकल आयी।

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार हवा बार-बार क्या कर रही है?
उत्तर:
कवि के अनुसार हवा बार-बार उनकी पत्नी का आँचल खींच रही है।

प्रश्न 4.
कवि ने नई सभ्यता का स्वरूप कैसा बतलाया
उत्तर:
कवि ने नई सभ्यता का स्वरूप इस प्रकार बतलाया है कि पूर्व में तो हमारी कुटियों में तूफान बिना पूछे ही घुस जाया करते थे, लेकिन नई सभ्यता में वे बिना दरवाजे खटखटाए ही घरों में चले आते हैं।

प्रश्न 5.
आक्रोश में आकर मजदूरों ने क्या किया?
उत्तर:
आक्रोश में आकर मजदूरों ने सूरज को निगल लिया।

प्रश्न 6.
‘खाली पेट’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
‘खाली पेट’ से कवि का आशय भूखे-नंगे लोगों से है।

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विविधा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बादलों के हटने पर तारे कैसे दिखलाई पड़ते हैं?
उत्तर:
बादलों के हटने पर तारे जब-तब उज्ज्वल एवं झलमल दिखाई पड़ते हैं।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार सम्पूर्ण दिन में किस तरह के बादल दिखाई पड़ रहे थे?
उत्तर:
कवि के अनुसार सम्पूर्ण दिन में कपसीले, ऊदे, लाल, पीले और मटमैले बादल दिखाई पड़ रहे थे।

प्रश्न 3.
कवि ने हरे खेतों के बारे में क्या कल्पना की हैं?
उत्तर:
कवि ने हरे खेतों के बारे में यह कल्पना की है कि हम दोनों ने इनको जोता और बोया है; अब इनमें धीरे-धीरे अंकुर निकल आये हैं और इनकी हरियाली ने धरती माता का रूप सजा दिया है।

प्रश्न 4.
कवि के अनुसार मेहनत से कमाई हुई फसल का वास्तविक लाभ किसे प्राप्त होता है?
उत्तर:
कवि के अनुसार मेहनत से कमाई हुई फसल का वास्तविक लाभ बिचौलियों को प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 5.
कवि नियति से क्या प्रश्न करते हैं?
उत्तर:
कवि नियति से एक प्रश्न करता है कि तुमने खाली पेट वालों को घुटने क्यों दिए।

प्रश्न 6.
‘बुनियाद चरमराने’ से कवि का क्या तात्पर्य। है?
उत्तर:
बुनियाद चरमराने से कवि का तात्पर्य यह है कि नयी सभ्यता ने हमारे प्राचीन ढंग एवं आदर्शों को पूरी तरह नकार दिया है।

विविधा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘त्रिलोचन’ की कविता में प्रस्तुत शरद ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शरद ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कविवर त्रिलोचन कहते हैं कि नवमी की तिथि है और इस समय रात बड़ी ही मधुरं एवं शीतल है। अभी पूरी तरह जाड़ा नहीं पड़ा है। हाँ, हल्का गुलाबी जाड़ा अवश्य शुरू हो गया। इस गुलाबी जाड़े में कभी-कभी शरीर के रोएँ काँप जाया करते हैं। कभी-कभी रिमझिम पानी की बरसात होती है तो कभी आकाश साफ खुल जाता है। कभी-कभी कपसीले, ऊदे, लाल और पीले तथा मटमैले बादल आकाश में घूमते दिखाई दे जाते हैं।

प्रश्न 2.
पठित पाठ के आधार पर ‘त्रिलोचन’ की कविता के कलापक्ष पर अपना मन्तव्य दीजिए।
उत्तर:
पठित पाठ के आधार पर हम देखते हैं कि त्रिलोचन की कविता में भावपक्ष के साथ ही साथ कलापक्ष भी सुन्दर बन पड़ा है। कवि ने धीरे-धीरे, सीरी-सीरी, झीने-झीने, रिमझिम-रिमझिम, उजला-उजला, बार-बार, धीरे-धीरे आदि शब्दों का प्रयोग से काव्य में पुनरूक्तिप्रकाश अलंकार के द्वारा काव्य के सौन्दर्य को कई गुना बढ़ा दिया है। इसी प्रकार कवि ने जब-तब, तन-मन, काला-हल्का, सुनती हो-गुनती हो आदि में पद मैत्री का सुन्दर प्रयोग किया है। यह पवन आज ……….. छोटा देवर’ में उदाहरण अलंकार ‘जिनको नहलाते हैं बादल, जिनको बहलाती है बयार’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ। सम्पूर्ण कविता में अनुप्रास की छटा। भाषा कोमलकान्त पदावली है। कहीं-कहीं भाषा में लाक्षणिकता भी आ गयी है।

प्रश्न 3.
त्रिलोचन शास्त्री ने पवन के माध्यम से क्या संकेत किया है, भाव व्यंजना कीजिए।
उत्तर:
त्रिलोचन शास्त्री ने पवन के माध्यम से यह संकेत किया है कि यह पवन आज बार-बार तुम्हारे आँचल को वैसे ही खींच रहा है जैसे कोई देवर अपनी भाभी के आँचल को खींचता हो।

प्रश्न 4.
नई और पुरानी सभ्यता में कवि ने क्या अन्तर बतलाया है?
उत्तर:
नई और पुरानी सभ्यता में कवि ने यह अन्तर बताया है कि प्राचीन समय में तो हमारी कुटियों में बिना पूछे ही तूफान प्रवेश पा जाते थे, पर इस नई सभ्यता में तो सब कुछ बदल गया है। आज तो लोग हमारे घरों में बिना दरवाजा खटखटाए ही घुस आते हैं। शिष्टाचार, शालीनता का कहीं कोई पता नहीं है। इस परिवर्तन ने हमारी बुनियाद की चूलें ही हिला दी हैं।

प्रश्न 5.
‘खाली पेट’ कविता में निहित व्यंग्य को समझाइए।
उत्तर:
‘खाली पेट’ कविता में निहित व्यंग्य यह है कि नियति ने किसी को कष्ट देने के लिए भोजन की व्यवस्था न की हो, यह बात तो ठीक है पर खाली पेट के साथ उसको चलने-फिरने के लिए घुटने क्यों दिए? कहने का भाव यह है कि नियति ने जिसको खाली पेट रखा है उसे वह घुटने भी प्रदान न करे तो अच्छा है क्योंकि बिना घुटने के वह चल फिर नहीं सकेगा और न वह समाज को अपना खाली पेट दिखा सकेगा।

प्रश्न 6.
‘तृप्ति’ कविता के माध्यम से कवि ने किस विसंगति को उजागर किया है?
उत्तर:
‘तृप्ति’ कविता के माध्यम से कवि ने समाज की उस विसंगति को उजागर किया है जिसमें मेहनतकश तो दो जून की रोटी भी प्राप्त नहीं कर पाता है और उसकी मेहनत का फल बिचौलिए या मध्यस्थ ले जाते हैं। वह बेचारा श्रमिक या मजदूर भूखा का भूखा रह जाता है। लेकिन जब मजदूर से ये अत्याचार सहन नहीं होते हैं तो उसका गुस्सा लावा बनकर फूट पड़ता है और तब वह सूरज तक को निगल जाता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखितं काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) हाँ दिन भी अजीब रहा ………….. आए बादल।
उत्तर:
कविवर त्रिलोचन कहते हैं कि यह शरद ऋतु की नवमी तिथि का दिन है। ये रात कितनी मधुर है, यह कहते नहीं बनता। इन रातों में हमारे मन में शीतलता बस जाती है। यद्यपि अभी कोई जाड़ा नहीं आया है। हाँ, कभी-कभी थोड़े-थोड़े रोएँ काँप जाया करते हैं। ऐसे सुन्दर वातावरण को देखकर तन और मन में उत्साह भर आया। इस समय का दिन भी बड़ा विचित्र रहा। आज रिमझिम-रिमझिम करता हुआ पानी बरसा, इसके बाद आकाश खुल गया और चारों ओर धूप छा गयी। पूरे दिन इसी प्रकार का क्रम बना रहा। आकाश में भिन्न-भिन्न रंगों के बादल यथा-कपसीले, ऊदे, लाल, पीले, मटमैले झुण्ड के रूप में तैर रहे थे। फिर रात आ गयी लेकिन उस रात में पहले जैसा न तो काला, हल्का या गहरा या धुएँ जैसा रंग दिखाई देता था। फिर आकाश कुछ उजला-उजला सा दिखाई दिया। न मालूम इस रम्य वातावरण को किसके प्यासे नेत्र देख पायेंगे। चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती जा रही है।

(ख) यह पवन आज यों ………… जिधर वे हरे खेत।
उत्तर:
कविवर त्रिलोचन अपनी पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि क्या तुम कुछ सुन रही हो, या कुछ गुनगुना रही हो। यह हवा आज तुम्हारे आँचल को वैसे ही बार-बार खींच रही है जैसे तुम्हारा देवर जब कभी हठ करके तुमसे कोई बात कहना चाह रहा हो।

आगे कवि अपनी पत्नी से कहता है कि तुम उधर चलो जहाँ हरे खेत खड़े हुए हैं। फिर वह कहता है कि शायद तुम्हें यह बात याद है या नहीं, इन खेतों को हम दोनों ने एक साथ मिलकर जोता तथा बोया था। समय के अनुसार इन खेतों में बीज से नये अंकुर निकल आये और बड़े होते गये। इसके बाद हम दोनों ने उन्हें मिलकर सींचा था। आज हमारे परिश्रम के फलस्वरूप ही मनमोहन हरियाली चारों ओर फैल रही है। इस हरियाली से धरती माता का रूप सज गया है। खेत के इन परम सलौने पौधों को हम दोनों ने मिलकर ही बड़ा किया है। आज उन पौधों को बादल नहला रहे हैं और बयार (हवा) उनको बहला रही है। वे हरे खेत कैसे लग रहे हैं और इस समय उनकी दशा क्या होगी? वे इस समय सचेत होंगे या खोये हुए से होंगे।

(ग) कल हमारी कुटियों ………… चरमरा रही है।
उत्तर:
कवि श्री अभिमन्यु कहते हैं कि कल तक तो हमारी कुटियों में बिना पूछे ही तूफान चले आते थे, किन्तु नयी सभ्यता की चकाचौंध में आज हमारे मेहमान हमारे ही घरों में बिना दरवाजा खटखटाए घुसे चले आ रहे हैं। उनके इस बदले हुए व्यवहार से हमारे घर की दीवारें और छतें ही नहीं, अपितु उनसे तो हमारी बुनियाद ही चरमरा रही है।

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विविधा काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(अ) “इसलिए आक्रोश में आकर, मजदूर सूरज को निगल गया” में निहित अलंकार को पहचानकर उसके लक्षण लिखिए।
उत्तर:
इसमें रूपकातिशयोक्ति अलंकार है जिसका लक्षण इस प्रकार है-
रूपकातिशयोक्ति :
जहाँ उपमान द्वारा उपमेय का वर्णन किया जाये वहाँ रूपकातिशयोक्ति अलंकार होता है।

(ब) “माथे की श्रम बूंदों को खेत में पहुँचाकर बो दिया” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव है कि मजदूर ने परिश्रम करके खेत की जुताई, गुड़ाई की। उसने अपना पसीना बहाकर फसल के लिए खेत तैयार किये। खेत तैयार होने पर उसने श्रम के द्वारा बीज बो दिए ताकि अच्छी पैदावार हो सके।

प्रश्न 2.
“खाली पेट वालों को तुमने घुटने क्यों दिए? फैलाने वाले हाथ क्यों दिए?” इन पंक्तियों के प्रश्नों का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब व्यक्ति का पेट खाली होता है तो वह अपने घुटनों से पेट को दबा लेता है ताकि भूख का दबाव कम हो जाय या फिर अपनी भूख शान्त करने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाता है। ये दोनों ही स्थितियाँ हीनता की परिचायक हैं। इन प्रश्नों का भाव है कि घुटने और हाथ न होते तो खाली पेट व्यक्ति अपनी हीनता नहीं दर्शा पाता, भले वह भूख के कारण मर जाता।

प्रश्न 3.
भयानक रस को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
भयानक रस :
किसी भयंकर व्यक्ति, वस्तु के कारण जाग्रत भय स्थायी भाव विभावादि के संयोग से भयानक रस रूप में परिणत होता है। जैसे-
“एक ओर अजगर सिंह लखि,एक ओर मृगराय।
विकल वटोही बीच ही, पर्यो मूरछा खाय॥”

यहाँ आश्रय वटोही तथा आलम्बन अजगर और सिंह हैं। अजगर एवं सिंह की डरावनी चेष्टाएँ उद्दीपन हैं। बटोही (राहगीर) का मूच्छित होना अनुभाव तथा स्वेद, कम्पन, रोमांच आदि संचारी भाव हैं।

प्रश्न 4.
वीभत्स रस और भयानक रस में अन्तर बताइए।
उत्तर :
वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) होता है, जबकि भयानक रस का स्थायी भाव भय होता है। विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में भिन्नता होती है। स्पष्ट है कि वीभत्स में घृणा का भाव जाग्रत होता है परन्तु भयानक में भय उत्पन्न होता है।

प्रश्न 5.
अद्भुत रस की परिभाषा एवं उदाहरण, रस के विभिन्न अंगों सहित दीजिए।
उत्तर:
अद्भुत रस-किसी असाधारण या अलौकिक वस्तु के देखने में जाग्रत विस्मय स्थायी भाव विभावादि के संयोग से अद्भुत रस में परिणत होता है। जैसे-
“अखिल भुवनचर-अचरसब, हरिमुख मेंलखि मातु।
चकित भई गद्-गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु ॥”

यहाँ माँ यशोदा आश्रय तथा श्रीकृष्ण के मुख में विद्यमान सब लोक आलम्बन हैं। चर-अचर आदि उद्दीपन हैं। आँख फाड़ना, गद-गद स्वर, रोमांच अनुभाव तथा दैन्य, त्रास आदि संचारी भाव हैं।

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विविधा महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न विविधा

प्रश्न 1.
आसमान में किस तरह के बादल उड़ रहे थे?
(क) लाल
(ख) मटमैले
(ग) पीले
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 2.
त्रिलोचन कवि ने शरद ऋतु की किस तिथि का वर्णन किया है?
(क) द्वितीया
(ख) चतुर्थी
(ग) नवमी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) नवमी

प्रश्न 3.
बादलों के हटने पर तारे कैसे दिखलाई पड़ते हैं?
(क) नहीं दिखाई दे रहे हैं
(ख) उज्ज्वल झलमल
(ग) जगमगा रहे हैं
(घ) छिपते-छिपते।
उत्तर:
(ख) उज्ज्वल झलमल

प्रश्न 4.
‘बुनियाद चरमराने’ से कवि का क्या आशय है?
(क) छत टूटना
(ख) जमीन टूटना
(ग) जड़ से नष्ट होना
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(ग) जड़ से नष्ट होना

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है’ कविता के रचयिता ………….. हैं।
  2. यह पवन आज यों बार-बार खींचता तुम्हारा …………… है।
  3. इसीलिए आक्रोश में आकर मजदूर ……………. को निगल गया।
  4. उनसे हमारी दीवारें और छतें नहीं हमारी ………… चरमरा रही है।

उत्तर:

  1. त्रिलोचन शास्त्री
  2. आँचल
  3. सूरज
  4. बुनियाद।

सत्य/असत्य

  1. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती है’ कविता के रचयिता अप्रवासी भारतीय अभिमन्यु ‘अनन्त’ हैं।
  2. कवि त्रिलोचन ने हरी-भरी धरती को माता के सदृश सम्मान दिया है।
  3. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती है’ कविता ने कृषकों की दयनीय दशा का वर्णन किया है।
  4. कवि अभिमन्यु अनंत नियति से प्रश्न करते हैं। (2016)

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (घ)
3. → (क)
4. → (ख)

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एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती है’ कविता में कवि ने मानवीय व्यवहार का चित्रण किस माध्यम से किया है?
  2. ‘दिनभर ऐसा ही रहा तार कपसीले,ऊदे लाल और पीले मटमैले दल के दल’ पंक्ति का प्रयोग किसके लिये किया है?
  3. ‘कल हमारी कुटियों में बिन पूछे तूफान दाखिल हो जाते थे’ कविता का शीर्षक लिखिए।
  4. ‘तुमने खाली पेट दिया ठीक किया’ यह पंक्ति किसकी ओर संकेत करती है?
  5. आक्रोश में आकर मजदूरों ने क्या किया? (2014)

उत्तर:

  1. हवा
  2. बादलों के लिए
  3. नयी सभ्यता
  4. निर्धनता एवं भुखमरी
  5. सूरज को निगल लिया।

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है भाव सारांश 

‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है’ कविता में त्रिलोचन कवि ने गंगा नदी के किनारे चाँदनी रात का वर्णन किया है।

कवि का कथन है कि गंगा नदी के किनारे चाँदनी रात का वातावरण अत्यन्त सुन्दर दिखाई देता है। इस समय आकाश में काले-काले बादल काजल की भाँति इधर-उधर घूम रहे हैं। बादलों में छिपते और चमकते तारे शोभा को बढ़ा रहे हैं। चाँदनी रात्रि में गंगा की लहरें तरंगित होती हुई सुशोभित हो रही हैं।

शरद काल का समय है और नवमी तिथि की मनोहर रात है। शीतल ठंडी रात मन में रोमांच का अनुभव कराती है। शीत ऋतु यद्यपि अभी नहीं है,किन्तु शरदकालीन शीतलता से तन के रोंये कम्पन कर रहे हैं अर्थात् शरीर रोमांचित हो रहा है।

रात में आसमान स्वच्छ था लेकिन यकायक वर्षा होने लगी है। इसके बाद आकाश स्वच्छ हो गया और पुनः धूप खिल उठी। देखते-देखते बादल इकट्ठे हो गये हैं। कवि अपनी पत्नी से कहता है कि यह हवा बार-बार तुम्हारा आँचल इस प्रकार खींच रही है जैसे तुम्हारा देवर बचपन में आँचल खींचता और हठ करता था।

कवि पत्नी से कहता है कि खेतों की ओर चलो और देखो हम दोनों ने जो बीज बोये थे वे अब अंकुरित तथा बड़े होकर वायु वेग से लहलहा रहे हैं। वास्तव में खेतों की हरियाली के कारण गंगा तट का सौन्दर्य दुगना हो गया है।

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) चल रही हवा
धीरे-धीरे
सीरी-सीरी;
उड़ रहे गगन में
झीने-झीने
कजरारे
चंचल बादल!
छिपते-छिपते
जब-तब
तारे,
उज्ज्वल, झलमल
चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ :
सीरी-सीरी= ठण्डी-ठण्डी। गगन = आकाश। झीने-झीने = पतले-पतले। कजरारे = काले।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कविता ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि श्री त्रिलोचन हैं।

प्रसंग :
इस कविता में कवि ने प्रकृति के मादक रूप का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कवि त्रिलोचन कहते हैं कि ठण्डी-ठण्डी हवा धीरे-धीरे बह रही है और आकाश में झीने-झीने तथा काले एवं चंचल बादल उमड़ रहे हैं। इसी समय आकाश में उज्ज्वल एवं झिलमिलाते हुए जब कभी तारे भी छिपते-छिपते दिखाई दे जाते हैं। चाँदनी चमक रही है और गंगा की धारा बहती जा रही है।

विशेष :

  1. प्रकृति की सुन्दरता का चाँदनी रात में कवि ने वर्णन किया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास अलंकार।

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(2) ऋतु शरद और
नवमी तिथि है
है कितनी, कितनी मधुर रात
मन में बस जाती शीतलता है
अभी नहीं जाड़ा कोई
बस जरा-जरा रोएँ काँपे
तन-मन में भर आया उछाह
हाँ, दिन भी आज अजीब रहा
रिमझिम रिमझिम पानी बरसा
फिर खुला गगन
हो गयी धूप
दिन भर ऐसा ही रहा तार
कपसीले, ऊदे, लाल और
पहले, मटमैले-दल के दल
आये बादल
अब रात
न उतना रंग रहा
काला-हलका या गहरा
या धुएँ-सा
कुछ उजला-उजला
किसके अतृप्त दृग देखेंगे
चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ :
उछाह = उत्साह। तार = क्रम। दल के दल = झुण्ड के झुण्ड। अतृप्त = प्यार से। दृग = नेत्र।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर त्रिलोचन कहते हैं कि यह शरद ऋतु की नवमी तिथि का दिन है। ये रात कितनी मधुर है, यह कहते नहीं बनता। इन रातों में हमारे मन में शीतलता बस जाती है। यद्यपि अभी कोई जाड़ा नहीं आया है। हाँ, कभी-कभी थोड़े-थोड़े रोएँ काँप जाया करते हैं। ऐसे सुन्दर वातावरण को देखकर तन और मन में उत्साह भर आया। इस समय का दिन भी बड़ा विचित्र रहा। आज रिमझिम-रिमझिम करता हुआ पानी बरसा, इसके बाद आकाश खुल गया और चारों ओर धूप छा गयी। पूरे दिन इसी प्रकार का क्रम बना रहा। आकाश में भिन्न-भिन्न रंगों के बादल यथा-कपसीले, ऊदे, लाल, पीले, मटमैले झुण्ड के रूप में तैर रहे थे। फिर रात आ गयी लेकिन उस रात में पहले जैसा न तो काला, हल्का या गहरा या धुएँ जैसा रंग दिखाई देता था। फिर आकाश कुछ उजला-उजला सा दिखाई दिया। न मालूम इस रम्य वातावरण को किसके प्यासे नेत्र देख पायेंगे। चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती जा रही है।

विशेष :

  1. शरद ऋतु का कवि ने मनोरम वर्णन किया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास की छटा।

(3) कुछ सुनती हो
कुछ गुनती हो
यह पवन, आज यों बार-बार
खींचता तुम्हारा आँचल है
जैसे जब तब छोटा देवर
तुमसे हठ करता है जैसे
तुम चलो जिधर वे हरे खेत
वे हरे खेत
हैं याद तुम्हें?
मैंने जोता तुमने बोया
धीरे-धीरे अंकुर आये
फिर और बढ़े
हमने तुमने मिलकर सींचा
फैली मनमोहन हरियाली
धरती माता का रूप सजा
उन परम सलौने पौधों को
हम दोनों ने मिल बड़ा किया
जिनको नहलाते हैं बादल
जिनको बहलाती है बयार
वे हरे खेत कैसे होंगे
कैसा होगा इस समय ढंग
होंगे सचेत या सोये से
वे हरे खेत
चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ :
मनमोहन = मन को मोहने वाली। ढंग = रूप, स्थिति। सचेत = जागते हुए से।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर त्रिलोचन अपनी पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि क्या तुम कुछ सुन रही हो, या कुछ गुनगुना रही हो। यह हवा आज तुम्हारे आँचल को वैसे ही बार-बार खींच रही है जैसे तुम्हारा देवर जब कभी हठ करके तुमसे कोई बात कहना चाह रहा हो।

आगे कवि अपनी पत्नी से कहता है कि तुम उधर चलो जहाँ हरे खेत खड़े हुए हैं। फिर वह कहता है कि शायद तुम्हें यह बात याद है या नहीं, इन खेतों को हम दोनों ने एक साथ मिलकर जोता तथा बोया था। समय के अनुसार इन खेतों में बीज से नये अंकुर निकल आये और बड़े होते गये। इसके बाद हम दोनों ने उन्हें मिलकर सींचा था। आज हमारे परिश्रम के फलस्वरूप ही मनमोहन हरियाली चारों ओर फैल रही है। इस हरियाली से धरती माता का रूप सज गया है। खेत के इन परम सलौने पौधों को हम दोनों ने मिलकर ही बड़ा किया है। आज उन पौधों को बादल नहला रहे हैं और बयार (हवा) उनको बहला रही है। वे हरे खेत कैसे लग रहे हैं और इस समय उनकी दशा क्या होगी? वे इस समय सचेत होंगे या खोये हुए से होंगे। चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती जा रही है।

विशेष :

  1. ‘जैसे जब तब …………. छोटा देवर’-में उदाहरण अलंकार।
  2. अन्यत्र उपमा और अनुप्रास की छटा।

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भाव सारांश कुछ कविताएँ

नयी सभ्यता-अभिमन्यु ‘अनन्त’ अप्रवासी भारतीय हैं। उन्हें भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम है। वे अपनी सभ्यता की बुनियाद को चरमराते हुए देखकर अत्यन्त व्यथित होते हैं।

उनका कथन है कि आज पाश्चात्य सभ्यता अनजाने अतिथि की भाँति बिना दरवाजा खटखटाये हमारे घरों में प्रवेश कर रही है। इसके परिणामस्वरूप हम अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से पृथक् होते जा रहे हैं।

तृप्ति इन पंक्तियों में कवि ने मजदूरों की दयनीय दशा का वर्णन किया है। शोषणवादी नीति के विरुद्ध अपना आक्रोश व्यक्त किया है।

मजदूर दिन-रात खून-पसीना बहाकर खेतों में लहलहाती फसल उगाते हैं लेकिन फसल तैयार होने पर उससे प्राप्त धन से पूँजीपति अपनी तिजोरी से भर लेते हैं। इसी कारण मजदूर ने सूरज को निगलने अथवा विद्रोह करने का झंडा गाढ़ दिया।

‘खाली पेट’ – कवि ने नियति से प्रश्न किया है कि तुम्हें खाली पेट क्यों दिया? यदि पेट दिया तो उसमें टेकने के लिए घुटने भी दिये हैं जिसकी सहायता से श्रमिक अपनी क्षुधा को शान्त करने का कोरा प्रयास करता है। हाथ भी व्यर्थ ही दिये क्योंकि वे दूसरों के समक्ष हाथ फैलाकर याचना करते हैं।

कुछ कविताएँ संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) नयी सभ्यता
कल हमारी कुटियों में बिन पूछे
तूफान दाखिल हो जाते थे
आज हमारे घरों में बिन दरवाजे खटखटाये
जो चले आ रहे हैं।
उनसे हमारी दीवारें और छतें नहीं
हमारी बुनियाद चरमरा रही है।

शब्दार्थ :
दाखिल = प्रवेश। बुनियाद = नींव, मूल।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कविता ‘कुछ कविताएँ’ शीर्षक के अन्तर्गत ‘नयी सभ्यता’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि अभिमन्यु अनन्त हैं।

प्रसंग :
इस कविता में कवि ने नयी सभ्यता के रूपक को प्रस्तुत किया है।

व्याख्या :
कवि श्री अभिमन्यु कहते हैं कि कल तक तो हमारी कुटियों में बिना पूछे ही तूफान चले आते थे, किन्तु नयी सभ्यता की चकाचौंध में आज हमारे मेहमान हमारे ही घरों में बिना दरवाजा खटखटाए घुसे चले आ रहे हैं। उनके इस बदले हुए व्यवहार से हमारे घर की दीवारें और छतें ही नहीं, अपितु उनसे तो हमारी बुनियाद ही चरमरा रही है।

विशेष :

  1. कवि ने नयी सभ्यता पर व्यंग्य कसा है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा लाक्षणिक।

(2) तृप्ति
माथे की श्रम बूंदों को
खेत में पहुँचाकर मजदूर ने बो दिया।
लहलहाती फसल जब तैयार हुई
उन हरे-भरे दानों को किसी और ने
तिजोरी के लिए बटोर लिया
इसीलिए आक्रोश में आकर
मजदूर सूरज को निगल गया।

शब्दार्थ :
आक्रोश = क्रोध में।

सन्दर्भ :
यह कतिवा ‘तृप्ति’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि ‘अभिमन्यु अनन्त’ हैं।

प्रसंग :
इस कविता में बिचौलियों (व्यापारियों) पर सटीक व्यंग्य किया गया है।

व्याख्या :
कवि श्री अभिमन्यु अनन्त कहते हैं कि मजदूर ने अपने खून-पसीने को एक करके खेतों में बीज को बो दिया। कुछ अन्तराल के बाद जब खेत में लहलहाती फसल पक कर तैयार हुई तो मध्यस्थ व्यापारियों या बिचौलिओं ने उस सम्पूर्ण फसल को इकट्ठा करके अपने कब्जे में ले लिया और उसे बाजार में बेचकर अपनी तिजोरियों को भर लिया। बिचौलियों के इस व्यवहार से दु:खी होकर किसान क्रोधित हो उठा और उसने सूरज को निगल लिया। कहने का भाव यह है कि जब किसी व्यक्ति को उसका वाजिब हक (उचित अधिकार) नहीं मिलता है तब वह विद्रोह कर उठता है और उस विद्रोह के फलस्वरूप वह होनी-अनहोनी सभी कर डालता है।

विशेष :

  1. मध्यस्थों एवं बिचौलियों पर व्यंग्य।
  2. मजदूर किसान की बेवसी का वर्णन।
  3. भाषा लाक्षणिक शैली में।

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(3) खाली पेट
तुमने आदमी को खाली पेट दिया
ठीक किया।
पर एक प्रश्न है रे नियति!
खाली पेट वालों को
तुमने घुटने क्यों दिए?
फैलने वाला हाथ क्यों दिया?

शब्दार्थ :
नियति = प्रकृति, भाग्य।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कविता ‘खाली पेट’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि अभिमन्यु अनन्त हैं।

प्रसंग :
कवि ने भूखे लोगों की नियति का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर श्री अभिमन्यु अनन्त कहते हैं कि हे भाग्य! तेरी लीला बड़ी विचित्र है। तुमने आदमी को खाली पेट दिया यह तो ठीक है पर प्रश्न यह है कि खाली पेट वालों को तुमने चलने के लिए घुटने क्यों दिये, साथ ही इन्हें भीख माँगने के लिए फैलाने वाले हाथ क्यों दिये।

विशेष :

  1. कवि ने नियति (भाग्य) पर व्यंग्य किया है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 3 परम्परा बनाम आधुनिकता

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 3 परम्परा बनाम आधुनिकता (निबन्ध, हजारी प्रसाद द्विवेदी)

परम्परा बनाम आधुनिकता अभ्यास

बोध प्रश्न

परम्परा बनाम आधुनिकता अति लघु उत्तरीय प्रश्न  

प्रश्न 1.
परम्परा क्या है?
उत्तर:
परम्परा का शब्दार्थ है-एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को तथा इसी तरह आगे को दिया जाने वाला क्रम।

प्रश्न 2.
दो शताब्दी पूर्व किस प्रकार के नाटकों की रचना अनुचित जान पड़ती थी?
उत्तर:
दो शताब्दी पूर्व दुःखान्त नाटकों की रचना अनुचित जान पड़ती थी। यवन साहित्य में दुखान्त नाटकों की बड़ी प्रसिद्धि थी।

प्रश्न 3.
मनुष्य की महिमा किसे स्वीकार है?
उत्तर:
मनुष्य की महिमा आधुनिक समाज को स्वीकार है।

प्रश्न 4.
अगली मानवीय संस्कृति का स्वरूप क्या होगा?
उत्तर:
अगली मानवीय संस्कृति मनुष्य की समता और सामूहिक मुक्ति की भूमिका पर खड़ी होगी।

प्रश्न 5.
आधुनिकता को असंयत और विश्रृंखल होने से कौन बचाता है?
उत्तर:
आधुनिकता को असंयत और विशृंखल होने से परम्परा बचेाती है। यही परम्परा आधुनिकता को आधार देती है और उसे शुष्क तथा नीरस बुद्धि विलास बनने से बचाती है।

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परम्परा बनाम आधुनिकता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भाषा की प्राप्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
भाषा की प्राप्ति हमें परम्परा से होती है। यह भाषा काल-प्रवाह में बहती हुई, समकालीन सन्दर्भो को बिखेरती हुई, नये उपादानों को ग्रहण करती हुई आज हमें प्राप्त हुई है।

प्रश्न 2.
नीति वाक्य में बुद्धिमान के विषय में क्या कहा गया है?
उत्तर:
नीति वाक्य में बुद्धिमान के विषय में कहा गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति एक पैर से खड़ा रहता है और दूसरे से चलता है। कहने का भाव यह है कि बुद्धिमान व्यक्ति परम्परा और आधुनिकता को मिलाकर चलता है।।

प्रश्न 3.
साहित्य के जिज्ञासु समझने में गलती कब कर सकते हैं?
उत्तर:
साहित्य के जिज्ञासु परिवर्तित और परिवर्तमान मूल्यों को ठीक-ठीक नहीं जानने के कारण बहुत-सी बातों के समझने में गलती कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
चित्तगत उन्मुक्तता पर कौन-सा नया अंकुश लग रहा है?
उत्तर:
चित्तगत उन्मुक्तता पर व्यष्टि मानव के स्थान पर समष्टि मानव की प्रधानता अंकुश लगा रही है।

प्रश्न 5.
आधुनिकता सम्प्रदाय का विरोध क्यों करती है?
उत्तर:
आधुनिकता सम्प्रदाय का विरोध इसलिए करती है क्योंकि आधुनिकता गतिशील प्रक्रिया है, जबकि सम्प्रदाय स्थिति संरक्षक।

परम्परा बनाम आधुनिकता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
परम्परा और आधुनिकता की तुलनात्मक व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
परम्परा और आधुनिकता दोनों की गतिशील प्रक्रियाएँ हैं। दोनों में अन्तर केवल यह है कि परम्परा यात्रा के बीच पड़ा हुआ अन्तिम चरण है, जबकि आधुनिकता आगे बढ़ा हुआ गतिशील कदम है।

प्रश्न 2.
पाठ के आधार पर आधुनिकता के व्यापक अर्थ समझाइए।
उत्तर:
आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य ने जिन अनुभवों द्वारा जिन महान् मूल्यों को प्राप्त किया है उन्हें नये सन्दर्भो में देखना ही आधुनिकता है। आधुनिकता अकस्मात् आकाश से नहीं पैदा होती है। इसकी जड़ें भी परम्परा में समाई हुई हैं। परम्परा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं हैं अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 3.
साहित्य के क्षेत्र में इतिहास किस प्रकार मदद करता है?
उत्तर:
साहित्य के क्षेत्र में इतिहास निखरी दृष्टि देता है जिससे आधुनिकता का बोध होता है। बिना इतिहास की नयी दृष्टि प्राप्त किए व्यक्ति साहित्य का रसास्वादन नहीं कर सकता और न ही वह भविष्य के मानव चित्र को सरस एवं कोमल बना सकता है।

प्रश्न 4.
‘आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है।’-इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। इसका सम्बन्ध तो परम्परा से प्राप्त महान् मूल्यों को नये सन्दर्भो में देखने से होता है। परम्परा ही आधुनिकता को आधार देती है। अतः परम्परा के बिना आधुनिकता का कोई मूल्य नहीं है।

प्रश्न 5.
विचार-विस्तार कीजिए-‘कोई भी आधुनिक विचार आसमान में नहीं पैदा होता है।’
उत्तर:
विचार-विस्तार-लेखक का आशय यह है कि जो भी नया विचार आता है, उसकी जड़ें परम्परा से जुड़ी रहती हैं। कोई भी आधुनिक नया विचार यह दावा नहीं कर सकता कि वह परम्परा से कटा हुआ है। कार्य कारण के रूप में परम्परा की जड़ें बहुत गहराई तक इन आधुनिक विचारों में समाई रहती है।

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परम्परा बनाम आधुनिकता भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्द-समूह के लिए एक शब्द लिखिए
उत्तर:
(अ) निरन्तर चलने वाला = गतिशील
(ब) वह समय जो बीत चुका है = अतीत
(स) नीति का बोध कराने वाला वाक्य = नीति वाक्य
(द) मन के भाव = मनोभाव
(इ) महिमा से परिपूर्ण = महिमा मंडित।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम बताइए
उत्तर:

  1. मनोभाव = मनः + भाव = विसर्ग सन्धि।
  2. पुनर्जन्म = पुनः + जन्म = विसर्ग सन्धि।
  3. निर्बल = निः + बल = विसर्ग सन्धि।
  4. प्राग्ज्योतिष = प्राक् + ज्योतिष = व्यंजन सन्धि।
  5. (अत्याधुनिक = अति + आधुनिक = गुण सन्धि।
  6. महर्षि = महा + ऋषि = गुण सन्धि।
  7. आर्योचित = आर्य + उचित = गुण सन्धि।
  8. पुनरुद्धार = पुनः + उद्धार = विसर्ग सन्धि।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पदों का समास विग्रह करते हुए समास का नाम लिखिए
उत्तर:

  1. इतिहास-सम्मत = इतिहास से सम्मत = तत्पुरुष समास।
  2. बाल लीला = बालपन की लीला = तत्पुरुष समास।
  3. काल प्रवाह = काल का प्रवाह = तत्पुरुष समास।
  4. परम्परा-प्राप्त = परम्परा से प्राप्त = तत्पुरुष समास।
  5. विचार-राशि = विचारों की राशि = तत्पुरुष समास।
  6. देवकी पुत्र = देवकी का पुत्र = तत्पुरुष समास।
  7. राजच्युत = राज से च्युत = तत्पुरुष समास।
  8. सत्ताधारी = सत्ता को धारण करने वाला = तत्पुरुष समास।

परम्परा बनाम आधुनिकता महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

परम्परा बनाम आधुनिकता बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
परम्परा का शब्दार्थ है-
(क) एक से दूसरे को बढ़ाना
(ख) जीवन पद्धति को बढ़ाने वाला क्रम
(ग) दूसरे से तीसरे को बढ़ाना
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 2.
परम्परा और आधुनिकता है-
(क) एक-दूसरे के विरोधी
(ख) एक-दूसरे के पूरक
(ग) इनमें से कोई नहीं
(घ) ये दोनों।
उत्तर:
(ख) एक-दूसरे के पूरक

प्रश्न 3.
परम्परा बनाम आधुनिकता निबन्ध है- (2009)
(क) भावात्मक
(ख) विचारात्मक
(ग) विवरणात्मक
(घ) भावनात्मक।
उत्तर:
(ख) विचारात्मक

प्रश्न 4.
‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ निबन्ध के लेखक हैं
(क) सरदार पूर्णसिंह
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
(घ) विद्यानिवास मिश्र।
उत्तर:
(ग) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

प्रश्न 5.
‘सम्प्रदाय’ शब्द का प्रयोग आजकल निम्न अर्थ में लिया जाने लगा है। उसका मूल अर्थ है-
(क) गुरु परम्परा से प्राप्त आचार-विचार
(ख) मानव मन की इच्छाएँ
(ग) सहज विचार
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) गुरु परम्परा से प्राप्त आचार-विचार

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. यह सत्य है कि परम्परा भी एक …………. प्रक्रिया की देन है।
  2. व्यष्टि-मानव के स्थान पर …………. मानव का प्राधान्य।
  3. कोई भी आधुनिक विचार …………. से नहीं पैदा होता है।
  4. परम्परा आधुनिकता को आधार देती है,उसे शुष्क और नीरस ………… बनने से बचाती है।
  5. परम्परा …………. नहीं हो सकती पर भूले इतिहास को खोज निकालने का सूत्र देती है।
  6. आधुनिकता ………… का विरोध करती है। (2012, 15)
  7. ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ …………. निबन्ध है।। (2014)

उत्तर:

  1. गतिशील
  2. समष्टि
  3. आसमान
  4. बुद्धि-विलास
  5. इतिहाससम्मत
  6. सम्प्रदाय
  7. विचारात्मक।

सत्य/असत्य

  1. परम्परा एक गतिहीन प्रक्रिया की देन है।
  2. सभी पुरानी बातें परम्परा नहीं कही जाती हैं।
  3. परम्परा का अर्थ विशुद्ध अतीत नहीं है, बल्कि एक निरन्तर गतिशील जीवन्त प्रक्रिया है।
  4. आधुनिकता क्या है? शब्दार्थ पर विचार करें,तो ‘अधुना’ या इस समय जो कुछ है वही आधुनिक है।
  5. परम्परा और आधुनिकता एक-दूसरे के पूरक हैं।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 3 परम्परा बनाम आधुनिकता img-1
उत्तर:
1. → (घ)
2. → (ग)
3. → (क)
4. → (ङ)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. आधुनिकता किस प्रकार की प्रक्रिया है?
  2. परम्परा किसको आधार प्रदान करती है?
  3. परम्परा और आधुनिकता का आपस में किस प्रकार का सम्बन्ध है?
  4. आधुनिकता को शुष्क और नीरस बुद्धि-विलास बनने से कौन बचाता है?
  5. परम्परा से हमें क्या प्राप्त होता है?

उत्तर:

  1. गतिशील
  2. आधुनिकता को
  3. परस्पर पूरक
  4. परम्परा
  5. मूल्यों का रूप।

परम्परा बनाम आधुनिकता पाठ सारांश

इस प्रकार परम्परा का अर्थ विशुद्ध अतीत नहीं है बल्कि एक निरन्तर गतिशील प्रक्रिया है। उसमें हमें जो कुछ मिलता है, उस पर खड़े होकर हम आगे के लिए कदम उठाते हैं। नीति काव्य में इसी बात को इस प्रकार कहा है ‘चलत्येकम् पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान’ अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति एक पैर से खड़ा रहता है,दूसरे से चलता है। यह केवल व्यक्ति का सत्य नहीं है,सामाजिक सन्दर्भ में भी यही सत्य है। खड़ा पैर परम्परा है और चलता पैर आधुनिकता। दोनों का पारस्परिक सम्बन्ध खोजना बहुत कठिन नहीं,एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

प्रश्न उठता है कि आधुनिकता क्या है? इसका शाब्दिक अर्थ है कि इस समय जो कुछ है,वह आधुनिक है। लेकिन आधुनिक का यह अर्थ नहीं है, अपितु सभी भावों के मूल में पुराने संस्कार एवं अनुभव निहित हैं। आज से दो सौ वर्ष पूर्व लोग कर्मफल प्राप्ति को अपरिहार्य मानते थे तथा पुनर्जन्म में भी आस्था थी, परन्तु अब यह विश्वास डगमगाने लमा है। अब मानव में वर्तमान जीवन को समृद्ध एवं सफल बनाने की कामना जाग्रत हो गई है।

इतिहास हमारे लिए बड़ा सहायक प्रमाणित होता है। प्राचीन काल के मानवीय अनुभव हमारे साहित्यकारों की वाणी को एक नया आयाम प्रदान कर रहे हैं। आधुनिक समाज में यथार्थ रूप में मानव के गौरव को स्वीकारा गया है। भविष्य में मानवीय संस्कृति मानव की समानता एवं सामूहिक मुक्ति की भूमिका पर आश्रित होगी।

यदा-कदा मानव किसी प्रमुख विचारधारा को यथावत् सुरक्षित रखने की कोशिश करता है लेकिन वह ऐसा करने में कितना सफल होता है, यह विवाद का विषय है। आज सन्दर्भ परिवर्तित हो रहे हैं। पुरानी बातें भूतकाल के गर्भ में समा रही हैं। मानवीय मूल्यों का रूप कुछ परिवर्तित दृष्टिगोचर हो रहा है लेकिन कोई भी आधुनिक विचार अपने आप नहीं पनपता। उसकी आधारशिला परम्परा में निहित है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि परम्परा आधुनिकता की आधारशिला है। मानव अपने भावों को उन्नत एवं समृद्ध बनाने के लिए परम्परा से आधार ग्रहण करता है तथा उन्हें नवीन वातावरण में पल्लवित एवं पुष्पित करने का प्रयास करता है।

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परम्परा बनाम आधुनिकता संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) हमने अपनी पिछली पीढ़ी से जो कुछ प्राप्त किया है, वह समूचे अतीत की पुंजीभूत विचार राशि नहीं है। सदा नए परिवेश में कुछ पुरानी बातें छोड़ दी जाती हैं और नई बातें जोड़ दी जाती हैं। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को हूबहू वही नहीं देती, जो अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से प्राप्त करती है। कुछ-न-कुछ छंटता रहता है, बदलता रहता है, जुड़ता रहता है। यह निरन्तर चलती रहने वाली प्रक्रिया ही परम्परा है।।

कठिन शब्दार्थ :
अतीत = बीते हुए समय की। पुंजीभूत = एकत्र। परिवेश = वातावरण। पूर्ववर्ती = पहले होने वाली।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने परम्परा का अर्थ बताया है।

व्याख्या :
लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं कि हमने अपने से पूर्व की पीढ़ी से जो कुछ भी प्राप्त किया है, वह सम्पूर्ण बीते हुए काल की एकत्रित विचार राशि नहीं है। सृष्टि का यह नियम है कि सदा नये वातावरण के आने पर कुछ पुरानी बातें त्याग दी जाती हैं और कुछ नई बातें जोड़ दी जाती हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हूबहू पहली पीढ़ी की ही सब बातें प्राप्त नहीं होती हैं। उसमें से कुछ-न-कुछ घटता-बढ़ता रहता है, यदि कुछ छंटता है तो कुछ जुड़ता भी है। इसी निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया को ही परम्परा कहा जाता है।

विशेष :

  1. परम्परा कोई नई चीज नहीं है अपितु एक हमेशा चलती हुई प्रक्रिया है।
  2. भाषा भावानुकूल।

(2) इस प्रकार परम्परा का अर्थ विशुद्ध अतीत नहीं है, बल्कि एक निरन्तर गतिशील जीवन प्रक्रिया है। उसमें हमें जो कुछ मिलता है, उस पर खड़े होकर आगे के लिए कदम उठाते हैं। नीति वाक्य में इसी बात को इस प्रकार कहा गया है-‘चलत्येकेम पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान’ अर्थात् बुद्धिमान आदमी एक पैर से खड़ा होता है, दूसरे से चलता है।

कठिन शब्दार्थ :
अतीत = बीता हुआ। गतिशील= हमेशा चलती रहने वाली। जीवन्त = जीवन युक्त।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक ने बुद्धिमान व्यक्तियों का उदाहरण देकर परम्परा की गतिशीलता पर विचार प्रकट किये हैं।

व्याख्या :
लेखक डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि परम्परा का शुद्ध या सही अर्थ बीता हुआ समय नहीं है बल्कि परम्परा तो एक हमेशा चलती रहने वाली जीवन्त प्रक्रिया है। उस मार्ग पर चलते हुए जो कुछ भी हमें प्राप्त होता है, हम उसी पर खड़े होकर आगे का रास्ता तय करते हैं। नीति वाक्य में इसी बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति वह होता है जो एक पैर से खड़ा रहता है और दूसरे से चलता है। कहने का भाव यह है कि अतीत का ध्यान रखते हुए ही वह आगे की ओर चलता रहता है अर्थात् अतीत और वर्तमान में मेल रखता है।

विशेष :

  1. लेखक ने परम्परा का सही अर्थ बताया है।
  2. भाषा भावानुकूल है।

(3) आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य |ने अनुभवों द्वारा जिन महनीय मूल्यों को उपलब्ध किया है, उन्हें नये सन्दर्भो में देखने की दृष्टि आधुनिकता है। यह एक गतिशील प्रक्रिया है। संदर्भ बदल रहे हैं, क्योंकि नई जानकारियों से नए साधन और नए उत्पादन सुलभ होते जा रहे हैं। बहुत-सी पुरानी बातें भुलाई जा रही हैं, नई सामग्रियाँ और नए कौशल नवीन सन्दर्भो की रचना कर रहे हैं।

कठिन शब्दार्थ :
महनीय = महान्। उपलब्ध = प्राप्त। गतिशील = हमेशा चलती रहने वाली। सुलभ = सरलता से प्राप्त।

सन्दर्भ :
पर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक ने बताया है कि आधुनिकता पुरानी महान जीवन मूल्यों को नये सन्दर्भो में देखना होता है।

व्याख्या :
लेखक डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि आधुनिकता का अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य ने अपने जीवन में जिन महान् मूल्यों को प्राप्त किया है, उन्हें ही नये सन्दर्भो के रूप में देखना आधुनिकता है। यह निरन्तर चलने वाली एक प्रक्रिया है। सन्दर्भ समय एवं परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं क्योंकि नई जानकारियों से नए साधन और नए उत्पादन हमें प्राप्त होते जा रहे हैं। हम बहुत-सी पुरानी बातों को भूलते जा रहे हैं और नई सामग्री तथा नए कौशलों के उपयोग के द्वारा नवीन। सन्दर्भो की रचना कर रहे हैं।

विशेष :

  1. नये सन्दर्भो में किसी बात को देखना ही आधुनिकता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

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(4) कोई भी आधुनिक विचार आसमान से पैदा नहीं होता है। सबकी जड़ परम्परा में गहराई तक गई हुई है। सुन्दर से सुन्दर फूल यह दावा नहीं कर सकता कि वह पेड़ से भिन्न होने के कारण उससे एकदम अलग है। कोई भी पेड़ दावा नहीं कर सकता कि वह मिट्टी से भिन्न होने के कारण एकदम अलग है। इसी प्रकार कोई भी आधुनिक विचार यह दावा नहीं कर सकता कि वह परम्परा से कटा हुआ है। कार्य-कारण के रूप में, आधार-आधेय के रूप में परम्परा की एक अविच्छेद्य श्रृंखला अतीत में गहराई तक, बहुत गहराई तक गई हुई है।

कठिन शब्दार्थ :
अविच्छेद्य = विच्छेद रहित।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक यह बताना चाहता है कि परम्परा के आधार के बिना कोई भी आधुनिकता फल-फूल नहीं सकती है।

व्याख्या :
लेखक श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि कोई भी आधुनिक विचार अकस्मात् आकाश में गिरकर जमीन पर नहीं आता है। संसार की सभी बातों की जड़ परम्परा में गहराई तक जमी रहती है। लेखक एक उदाहरण देकर इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता है कि जिस प्रकार सुन्दर से सुन्दर फूल का जो आज अस्तित्व है, उसके मूल में उसका वृक्ष या लता तथा वृक्ष या लता के मूल में मिट्टी का प्रभाव होता है। इसी भाँति कोई भी आधुनिक विचार यह दावा नहीं कर सकता कि वह परम्परा से बिल्कुल अलग है। सच तो यह है कि कार्य और कारण के रूप में अथवा आधार और आधेय के रूप में परम्परा की एक निरन्तर बहती हुई शृंखला अतीत में बहुत गहराई तक जमी हुई है। कहने का भाव यह है कि बिना परम्परा के कोई भी आधुनिकता नहीं आ सकती।

विशेष :

  1. आधुनिकता के मूल में परम्परा का होना आवश्यक है।
  2. भाषा भावानुकूल।

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

जीवन दर्शन अभ्यास

बोध प्रश्न

जीवन दर्शन अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
कवि नाश पथ पर कौन-से चिह्न छोड़ जाना चाहता है?
उत्तर:
कवि नाश पथ पर अपने पग चिह्न छोड़ जाना चाहता

प्रश्न 2.
मधुप की मधुर गुनगुन विश्व पर क्या प्रभाव डालेगी?
उत्तर:
मधुप की मधुर गुनगुन सम्पूर्ण संसार के क्रन्दन को भुला देगी।

प्रश्न 3.
तितलियों के रंग से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तितलियों के रंग से कवि का तात्पर्य सांसारिक सुख-भोग एवं सुविधाओं से है।

प्रश्न 4.
कवि के अनुसार काँटे की मर्यादा क्या है?
उत्तर:
कवि के अनुसार काँटे की मर्यादा है उसका कठोर होना तथा तीखा होना।

प्रश्न 5.
कवि ने ‘मर्दे होंगे’ किसे कहा है?
उत्तर:
कवि ने ‘मुर्दे होंगे’ उन प्रेमियों के लिए कहा है जिन्होंने प्रेम के नाम पर सम्मोहन करने वाली मदिरा पी रखी है।

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जीवन दर्शन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि की आँखें उनींदी क्यों हैं?
उत्तर:
कवि की आँखें उनींदी इसलिए हैं कि आज हमको समाज में अनुकूल वातावरण नहीं मिल रहा है।

प्रश्न 2.
‘मोम के बन्धन सजीले’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
‘मोम के बन्धन सजीले’ से कवि का आशय सांसारिक आकर्षणों से है।

प्रश्न 3.
‘चिर सजग’ का क्या आशय है?
उत्तर:
‘चिर सजग’ का आशय है कि हमें हमेशा सचेत रहना चाहिए और सांसारिक बाधाओं से संघर्ष करते रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
कवि ने अन्तिम रहस्य के रूप में क्या पहचान लिया?
उत्तर:
कवि ने अन्तिम रहस्य के रूप में यह जान लिया कि यह संसार एक यज्ञशाला है और इसमें व्यक्ति को स्वाहा होना है।

प्रश्न 5.
कुचला जाकर भी कवि किस रूप में उभरता
उत्तर:
कुचला जाकर भी कवि आँधी की धूल बनकर उमड़ना चाहता है।

प्रश्न 6.
‘निर्मम रण में पग-पग पर रुकना’ किस प्रकार प्रतिफलित होता है?
उत्तर:
निर्मम रण में पग-पग पर रुकना वार बनकर प्रतिफलित होता है।

जीवन दर्शन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जाग तुझको दूर जाना’ में क्या आशय छिपा है? लिखिए।
उत्तर:
‘जाग तुझको दूर जाना’ में यह आशय छिपा है कि मनुष्य का जीवन एक निश्चित अवधि का होता है, जबकि जीवन क्षेत्र में उसे अनगिनत कार्य करने पड़ते हैं। अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उसे अनेकानेक विघ्न-बाधाओं से टकराना होता है।

प्रश्न 2.
‘पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले’ में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य जब अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए चलता है तो सांसारिक भौतिक आकर्षण तथा सुख-सुविधाएँ उसे विचलित करने की चेष्टा करती हैं। मनुष्य जब तक इनसे सचेत नहीं रहेगा, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकेगा।

प्रश्न 3.
‘तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना’ द्वारा कवि क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
छाँह चाहने के लिए अर्थात् जीवन में सुख-सुविधाएँ जुटाने के लिए व्यक्ति उचित एवं अनुचित सभी प्रकार के कार्य करता रहता है। कभी-कभी मनुष्य के स्वयं किये गये कारनामे ही उसे कारागार की हवा खिला देते हैं। अतः कवि जीवन के अनुचित कार्यों से बचने की सलाह देता है।

प्रश्न 4.
‘मैंने आहुति बनकर देखा’ कविता का मूल भाव लिखिए।
उत्तर:
‘मैंने आहुति बनकर देखा’ कविता का मूलभाव यह है कि यद्यपि जीवन मरणशील है; इसमें जय और पराजय दोनों हैं। इसमें गति को रोकने वाली अनेक विघ्न-बाधाएँ भी हैं किन्तु इन्हीं सबके चलते हुए हमें जीवन को निरन्तर आगे चलाते रहना चाहिए। संसार एक यज्ञ वेदिका जैसा है इसमें सब कुछ होम करके ही जीवन को श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। तप करके ही जीवन में ललकार देने की शक्ति आती है। कवि ने इसमें त्याग और तपस्या का महत्व बताया है।

प्रश्न 5.
प्रस्तुत कविताओं से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर:
प्रस्तुत कविताओं से हमें यह सीख मिलती है कि मानव का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। यह संसार नाशवान् है पर महान् मनुष्य वे होते हैं जो आने वाली पीढ़ी के लिए अपने चरण चिह्न छोड़ जाया करते हैं। अपनी पहचान बनाने के लिए हमें भौतिक सुख-सुविधाओं को त्यागना होगा। संसार एक यज्ञ की वेदी के समान है। इसमें जो सब कुछ स्वाहा कर देता है, उसी का जीवन सार्थक बन जाता है। त्याग और तपस्या से मानव का संसार में महत्व आँका जाता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या लिखिए
(क) मैं कब कहता हूँ …………. ओछा फूल बने?
उत्तर:
कविवर अज्ञेय जी संसार के मनुष्यों से कहते हैं कि मैं संसार के लोगों से कब कहता हूँ कि वे मेरे समान संघर्षों का सामना करने वाली शक्ति को धारण करें। मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि संसार के मनुष्य अपने रेगिस्तान जैसे शुष्क जीविन को देवताओं के सुन्दर उपवन के समान हरा-भरा या सुख-सुविधाओं में सम्पन्न बना लें। काँटा देखने में कठोर और तीखा अवश्य लगता है, पर उसकी भी इस सृष्टि में अपनी मर्यादा है। मैं उससे भी यह नहीं कहता कि वह अपने इस कठोर रूप को कम करके किसी भाग का एक ओछा फूल बन जाये। कहने का भाव यह है कि सबका अपना-अपना भाग्य होता है। अतः सभी को अपनी सामर्थ्य के अनुसार जीवन में काम करना चाहिए।

(ख) विश्व का क्रन्दन …………… तुझको दूर जाना।
उत्तर:
कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे मानव! क्या ये मोम के गीले बन्धन तझे अपने जाल में बाँध लेंगे? क्या रंग-बिरंगी तितलियों के पंख तुम्हारे मार्ग की रुकावट बनेंगे? क्या भौरों की मधुर गुनगुनाहट संसार के दुःखों को भुला देंगी या ओस से गीले फूल की पंखुड़ियाँ तुझे डूबो देंगी? तू व्यर्थ में ही अपनी ही परछाईं को अपना जेलखाना बना रहा है। इन निराशा की भावनाओं को छोड़! तेरा जो लक्ष्य है, उसे पाने के लिए तू सतत् प्रयत्न कर तुझे अभी बहुत दूर तक जाना है।

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जीवन दर्शन काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
हास्यरसकी परिभाषा किसी अन्य उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर:
हास्य रस-विचित्र वेश-भूषा, विकृत आकार, चेष्टा आदि के कारण जाग्रत हास स्थायी भाव विभावादि से पुष्ट होकर हास्य रस में परिणत होता है। जैसे-

“हँसि हँसि भजे देखि दूलह दिगम्बर को,
पाहुनी जे आवै हिमाचल के उछाह में।
कहै पद्माकर सु काहु सों कहै को कहा,
जोई जहाँ देखे सो हँसोई तहाँ राह में।
मगन भएई हँसे नगन महेश ठाढ़े,
और हँसे वेऊ हँसि-हँसि के उमाह में।
सीस पर गंगा हँसे भुजनि भुजंगा हँसे,
हास ही को दंगा भयो नंगा के विवाह में ॥”

यहाँ दर्शक आश्रय हैं तथा शिवजी आलम्बन हैं। उनकी विचित्र आकृति, नग्न स्वरूप आदि उद्दीपन हैं। लोगों का हँसना, भागना आदि अनुभाव तथा हर्ष, उत्सुकता, चपलता आदि संचारी भाव हैं।

जीवन दर्शन महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

जीवन दर्शन बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि की आँखें उन्नींदी क्यों हैं?
(क) शीघ्र जगने के कारण
(ख) नींद पूरी न होने से
(ग) आलस्य के कारण
(घ) बिना किसी कारण।
उत्तर:
(ग) आलस्य के कारण

प्रश्न 2.
‘जाग तुझको दूर जाना अचल के हृदय में चाहे कम्प हो ले’ ‘अचल’ शब्द का प्रयोग किसके लिये है?
(क) हिमालय
(ख) गंगा
(ग) आकाश
(घ) आँखों।
उत्तर:
(क) हिमालय

प्रश्न 3.
कवयित्री ने ‘मोम के बन्धन’ किसको कहा है?
(क) माया-मोह
(ख) विषय-वासनादि
(ग) साधना मार्ग की बाधाएँ
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
‘मैने आहुति बनकर देखा है’ कविता के रचयिता हैं
(क) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ख) रामनरेश त्रिपाठी
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) नरेश मेहता।
उत्तर:
(क) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. महादेवी वर्मा के काव्य में वेदना की प्रचुरता थी। इसी कारण उन्हें आधुनिक ………. कहा जाता है।
  2. महादेवी वर्मा साधना मार्ग में ………… नहीं आने देना चाहती थीं।
  3. बाँध लेंगे क्या तुझे मोम के ……….. सजीले।
  4. “धूल पैरों से कुचली जाती है किन्तु वह कुचलने वाले के सिर पर सवार हो जाती है।” उसी प्रकार मैंने ……….. से हार नहीं मानी है।

उत्तर:

  1. मीरा
  2. आलस्य
  3. बन्धन
  4. बाधाओं।

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सत्य/असत्य

  1. महादेवी वर्मा छायावादी युग की प्रमुख कवयित्री हैं। इन्होंने छायावाद के अन्तर्गत जीवन के दोनों पक्षों का वर्णन किया है।
  2. महादेवी वर्मा का वैवाहिक जीवन सुखमय था। इसी कारण उन्होंने विरह गीत लिखे हैं।
  3. “हरी घास पर क्षण भर” कविता महादेवी वर्मा की है?
  4. हिन्दी साहित्य में अज्ञेय की ख्याति केवल भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (घ)
3. → (क)
4. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. महादेवी वर्मा ने कबीर की भाँति अपने काव्य में वर्णन किया है।
  2. ‘तु न अपनी छाँह को अपने लिए काटा बनाना’ यह पंक्ति किस रचनाकार की है। (2011)
  3. अज्ञेय की रचनाएँ नई पीढ़ी के लेखकों के लिए हैं।
  4. अज्ञेय ने अपनी कविता द्वारा स्पष्ट किया है कि जीवन मरणशील है। इसमें पराजय भी है और आगे बढ़ने में हैं।
  5. काँटे की मर्यादा क्या है? (2016)

उत्तर:

  1. रहस्यवाद का
  2. महादेवी वर्मा
  3. मानक स्वरूप
  4. अनेक व्यवधान
  5. काँटे की मर्यादा उसके कठोर एवं तीखे होने में है।

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चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! भाव सारांश

‘चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना’ नामक कविता में महादेवी वर्मा ने अपने मन को साधना मार्ग का राहगीर समझकर उसे जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया है।

कवयित्री कहती हैं हे मन! तू आलस्य को त्याग, क्योंकि ये जीवन पथ बहुत लम्बा है और तुझे यह दूरी तय करनी है। चाहे हिमालय पर्वत अपने स्थान से हिल जाये अथवा आसमान में प्रलय के बादल छा जाये। चाहे तेज आँधी और तूफान आयें या घनघोर वर्षा हो। बिजली भी चाहे कड़के, तुम्हें आगे बढ़ते ही जाना है।

कवयित्री का कथन है कि मेरे मन तुम वज्र के सदृश कठोर थे लेकिन आँसुओं ने उन्हें गीला करके गला दिया। सांसारिक माया-मोह में डूबकर तुमने अपने जीवन के मूल्यवान क्षणों को खो दिया है।

कवयित्री कहती है कि हे प्राण! तुम आलस्य और प्रमाद को त्यागकर अपने मन में उत्साह उत्पन्न करो जिससे कि तुम्हें विषय-वासनाओं से मुक्ति मिलेगी और तुम्हारी साधना का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। अत: हे मानव! आलस्य को त्याग दे। यही तेरे लिये उचित और उत्तम है।

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!
अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले,
आज पी आलोक को डोले तिमित की घोर छाया,
जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले
पर तुझे है नाश-पथ पर चिन्ह अपने छोड़ जाना!
जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ :
चिर = पुराना। सजग = जाग्रत। उनींदी = अलसाई हुई। व्यस्त = काम में लगा हुआ। बाना = व्यवहार। अचल = पर्वत। हिमगिरि = बर्फ से ढंकी हुई पहाड़ियाँ। कम्प = कम्पन, थरथराहट। अलसित = आलस्य से भरा हुआ। व्योम = आकाश। आलोक = प्रकाश। तिमिर = अन्धकार। विद्युत = बिजली। निठुर = निष्ठुर, कड़े स्वभाव वाला।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द “चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!” शीर्षक कविता से लिया गया है। इसकी रचयिता श्रीमती महादेवी वर्मा हैं।

प्रसंग :
कवयित्री मानव को सचेत करते हुए कह रही हैं कि हे संसार के पथिक! तेरी सदैव सजग रहने वाली आँखें आज अलसाई हुई सी क्यों हो रही हैं, तुझे तो अभी बहुत दूर तक जाना है।

व्याख्या :
कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे संसार के पथिक! तू तो सदैव सजग रहकर इस मार्ग पर चलता रहता था पर आज तेरी ये सजग आँखें उनींदी सी क्यों हो रही हैं, तूने ये कैसा बाना (ढर्रा) बना लिया है। तुझे तो अभी बहुत दूर तक जाना है।

चाहे हिमालय पर्वत की ऊँची चोटियों में आज कम्पन पैदा हो जाये या फिर प्रलय के आँसुओं को लेकर ऊलसाया हुआ आकाश। रुदन करने लग जाये, या फिर अन्धकार की घोर छाया प्रकाश को। पीकर डोल जाये, या फिर बिजली की जाग्रत शिखाओं में निष्ठुर तूफान हुँकार भरने लग जाये लेकिन तेरा लक्ष्य तो यह है कि इस नाश के पथ पर तू अपने चरणों के चिह्नों को छोड़ दे। कहने का भाव यह है कि चाहे कैसी भी विषम परिस्थितियाँ क्यों न हों, तुझे तो अपने निर्धारित लक्ष्य पर निरन्तर बढ़ते चले जाना है ताकि नाश। की अवस्था आने पर भी तेरे चरणों के चिह्न आने वाले समय में लोगों का मार्गदर्शन कर सकें। जाग जा, तुझे तो अभी बहुत दूर जाना है, इन विषम परिस्थितियों से अपने लक्ष्य को मत भूल जाना।

विशेष :

  1. कवयित्री विषम परिस्थितियों में भी संसार के पथिक को अपने मार्ग पर निरन्तर चलते रहने की प्रेरणा दे रही हैं।
  2. लाक्षणिक भाषा।

(2) बाँधे लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?
विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ :
सजीले = गीले। पंथ = रास्ते की। रँगीले = रंग-बिरंगे। क्रन्दन= रोना-धोना। मधुप = भौंरों की। मधुर = मीठी। कारा = जेलखाना।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे मानव! क्या ये मोम के गीले बन्धन तझे अपने जाल में बाँध लेंगे? क्या रंग-बिरंगी तितलियों के पंख तुम्हारे मार्ग की रुकावट बनेंगे? क्या भौरों की मधुर गुनगुनाहट संसार के दुःखों को भुला देंगी या ओस से गीले फूल की पंखुड़ियाँ तुझे डूबो देंगी? तू व्यर्थ में ही अपनी ही परछाईं को अपना जेलखाना बना रहा है। इन निराशा की भावनाओं को छोड़! तेरा जो लक्ष्य है, उसे पाने के लिए तू सतत् प्रयत्न कर तुझे अभी बहुत दूर तक जाना है।

विशेष :

  1. कवयित्री सांसारिक प्राणियों से कल्पना लोक में न विचर कर जीवन की यथार्थता का ज्ञान कराना चाहती हैं। साथ ही उसे जीवन पथ पर निन्तर बढ़ते रहने की प्रेरणा देती हैं।
  2. लाक्षणिक भाषा।

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मैंने आहुति बनकर देखा भाव सारांश 

‘मैंने आहुति बनकर देखा’ कविता के द्वारा ‘अज्ञेय’ कवि ने कर्म करते हुए स्वयं को बलिदान करने की इच्छा को सर्वोत्तम बताया है। त्याग द्वारा ही व्यक्ति को आत्मिक सुख प्राप्त होता है। कवि का कथन है कि वह संसार की प्रत्येक वस्तु को उसके वास्तविक रूप में देखने का इच्छुक है। वह यह कदापि नहीं चाहता कि वृद्धावस्था की तुलना युवावस्था से की जाये। अतः उसकी तुलना शक्तिशाली व्यक्ति से नहीं करनी चाहिए।

जीवन में यदि दःखों का सागर उमडे तो मानव में उसे भी सहन करने की शक्ति होनी चाहिए। कवि कहता है कि मैं नन्दन वन के फूलों की चाहत की भाँति धनवानों के धन की चाहत में अपनी इच्छा और सुखों को गँवा देने का इच्छुक हूँ। काँटों की शोभा काँटा बना रहने में है, फूल बनने में नहीं।

योद्धा की शोभा युद्धभूमि में प्राप्त हुए घावों से ही होती है। यह आवश्यक नहीं कि यदि मैं किसी से प्रेम करूँ तो वह व्यक्ति भी मुझसे प्रेम करे। मैं तो स्वार्थ रहित प्रेम की इच्छा रखता हूँ और चाहता हूँ कि आस्था और विश्वास महल बनाकर कर्तव्य पथ पर बढ़ता रहूँ।

प्रेम में त्याग आवश्यक है। जो लोग प्रेम में कटुता का अनुभव करते हैं, उन्हें स्वयं को रोगी मान लेना चाहिए। जो व्यक्ति प्रेम को सम्मोहन वाली मदिरा मानते हैं उन्हें यह मान लेना चाहिए कि उनमें जीवन ही नहीं है, जिन्होंने प्रेम के रहस्य को जान लिया है।

कवि का कथन है कि मैंने प्रेम को आहुति बनकर देख लिया है। प्रेम यज्ञ की अग्नि है। जिस प्रकार अग्नि में आहुति डाली जाती है और वह सामग्री जल जाती है उसी प्रकार मैंने भी अपने आप को आहुति बनाकर जल जाने की बात सोच ली है। व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए विषम आँधी और तूफानों का सामना करना पड़ता है परन्तु मानव को सफलता पाने के लिए निरन्तर बढ़ते रहना चाहिए। जीवन एक रणक्षेत्र है जहाँ पर अनेक बाधाएँ आती हैं। ईश्वर ने जो जीवन दिया है उसे हम ईश्वर के लिए समर्पित कर दें। तब ही जीवन सफल और सार्थक होगा।

मैंने आहुति बनकर देखा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँजीवन-मरुनन्दन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ, वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?

शब्दार्थ :
जग = संसार। दुर्धर = कठिनाइयों को पार करने में समर्थ। अनुकूल = उसी के अनुरूप। जीवन-मरु = जीवन रूपी रेगिस्तान। नन्दन-कानन = देवताओं का उपवन। प्रांतर = छोटे से प्रदेश का। ओछा = छोटा, पद में नीचा।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके कवि अज्ञेय हैं।

प्रसंग :
कवि का सन्देश है कि मैं किसी भी व्यक्ति को अपने पथ पर चलने को बाध्य नहीं करता हूँ, लेकिन सबको अपनी मर्यादा का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय जी संसार के मनुष्यों से कहते हैं कि मैं संसार के लोगों से कब कहता हूँ कि वे मेरे समान संघर्षों का सामना करने वाली शक्ति को धारण करें। मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि संसार के मनुष्य अपने रेगिस्तान जैसे शुष्क जीविन को देवताओं के सुन्दर उपवन के समान हरा-भरा या सुख-सुविधाओं में सम्पन्न बना लें। काँटा देखने में कठोर और तीखा अवश्य लगता है, पर उसकी भी इस सृष्टि में अपनी मर्यादा है। मैं उससे भी यह नहीं कहता कि वह अपने इस कठोर रूप को कम करके किसी भाग का एक ओछा फूल बन जाये। कहने का भाव यह है कि सबका अपना-अपना भाग्य होता है। अतः सभी को अपनी सामर्थ्य के अनुसार जीवन में काम करना चाहिए।

विशेष :

  1. कवि संसार के मनुष्यों को निरन्तर कर्म करने की प्रेरणा दे रहा है।
  2. लाक्षणिक भाषा।

(2) मैं कब कहता हूँ, मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?
मैंकबकहताहूँ, प्यार करुतो मुझे प्राप्तिकीओटमिले?
मैं कब कहता हूँ विजय करूँ-मेरा ऊँचा प्रासाद बने?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली सी याद बने?

शब्दार्थ :
प्रासाद = महल। धुंधली सी = अस्पष्ट सी।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय जी कहते हैं कि मैं यह कब कहता हूँ कि युद्ध क्षेत्र में जाने पर मुझे कोई चोट न लगे; मैं कब कहता हूँ कि यदि मैं किसी से प्यार करूँ तो मुझे उसका प्रतिफल भी मिले; मैं कब कहता हूँ कि युद्ध क्षेत्र में मुझे विजय प्राप्त हो और मेरा एक भव्य महल निर्मित हो। या फिर संसार रूपी रंगमंच पर अभिनय करने वाले पात्र के रूप में मेरी धुंधली-सी याद मनुष्यों के मानस-पटल पर अंकित हो जाये।

विशेष :

  1. कवि संसार में निरन्तर कार्य में लगे रहने की प्रेरणा दे रहा है।
  2. भाषा लाक्षणिक है।

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(3) पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे, क्यों इसकी हो परवाह मुझे?
मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने।

शब्दार्थ :
प्रशस्त = चौड़ा। विकल = बेचैन। नेतृत्व = नेतागीरी। प्रस्तुत = तैयार। गति-रोधक = चाल को रोकने वाला। शूल = काँटा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मेरे मन में इस प्रकार चाह या इच्छा क्यों उत्पन्न हो कि मार्ग सदैव चौड़ा एवं निर्विघ्न हो। मुझे इस बात की भी परवाह नहीं करनी चाहिए कि कहीं मेरी नेतागीरी तो खत्म नहीं हो रही है। मैं इसके लिए तैयार हूँ कि मेरे मरने के पश्चात् मेरे शरीर की मिट्टी इसी भूमि की धूल में मिल जाये; फिर चाहे उसी धूल का एक-एक कण मेरे रास्ते को रोकने वाले काँटे ही क्यों न बन जायें।

विशेष :

  1. कवि को अपनी सामर्थ्य पर विश्वास है। अतः वह हर विषम स्थिति को स्वीकार करने को तैयार है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

(4) अपने जीवन को रस देकर जिसको यत्नों से पाला है
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसूकी माला है?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है।

शब्दार्थ :
यत्नों = प्रयत्नों से। अवसाद मलिन = दुःख से सना हुआ। कटु = कड़वा। सम्मोहनकारी = वश में करने वाली। हाला = मदिरा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मैंने अपने जीवन को रस देकर तथा यत्नपूर्वक पाला-पोसा है; क्या ऐसा मेरा जीवन केवल दुःख से सने हुए आँसुओं की माला भर है? जिन प्रेमियों ने अनुभव रस के कड़वे प्याले को पिया है, वे रोगी होंगे अर्थात् स्वस्थ नहीं होंगे और जिन प्रेमियों ने मोह पाश में डालने वाली मदिरा का पान कर लिया है वे मुर्दे होंगे, जीवन्त मनुष्य नहीं होंगे।

विशेष :

  1. कवि मनुष्यों को सतत् जागरूक बने रहने का सन्देश दे रहा है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

(5) मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।
मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, नभ की चोटी चढ़ता हूँ,
कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी और उमड़ता हूँ।

शब्दार्थ :
विदग्ध = जानकार होते हुए भी। आहुति = यज्ञ में दी जाने वाली समिधा। नभ = आकाश। धूली-सा = धूल जैसा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मैंने जानकार बनकर यह भली-भाँति जान लिया है और जीवन के अन्तिम रहस्य को पहचान लिया है। मैंने आहुति बनकर देख लिया है कि यह प्रेम एक यज्ञ की ज्वाला.के समान है। मैं इस बात को डंके की चोट पर कहता हूँ कि मैं निरन्तर आगे बढ़ता जाता हूँ और नभ की चोटी पर चढ़ता जाता हूँ। यद्यपि विषम परिस्थितियों में धूल जैसा कुचला जाता हूँ, लेकिन उस अवस्था में भी मैं आँधी बनकर उमड़ता रहता हूँ।

विशेष :

  1. कवि हर स्थिति में अपनी पहचान बनाये रखता है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

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(6) मेरा जीवन ललकार बने, असफलता की असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने।
भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तपकर अंगार बने।
तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने।

शब्दार्थ :
ललकार = चुनौती। असि-धार = तलवार की धार। निर्मम = निर्दयी, क्रूर। वार = प्रहार। भव = संसार। दुर्निवार = जिसका निवारण करना कठिन हो। नीरव = शान्त।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन दूसरों के लिए एक चुनौती बने तथा मेरी असफलताएँ तलवार की धार के समान तेज बन जाएँ। मेरे जीवन के इस निर्दयी रण-क्षेत्र में कदम-कदम पर रुकना ही मेरा प्रहार बन जाये। मैं तेरे लिए सारे संसार को स्वाहा कर सकता हूँ और इस यज्ञ में सभी कुछ तपकर अंगार बन जायें। तुम्हारी पुकार जैसा तथा कठिनता से निवारण किया जाने वाला मेरा यह प्यार नीरव बन जाये।

विशेष :

  1. कवि अपने को बलिदान कर देना चाहता है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

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MP Board Class 9th General English Important Extracts from Prose

P Board Class 9th General English Important Extracts from Prose

1. (Lesson 5)

Days passed and, as ill-luck would have it, Algu Chowdhary found himself in a tight spot. One of his fine pair of bullocks died, and he sold the other to Samjhu Sahu, a cart driver of the village. The understanding was that Sahu would pay the price of the bullock in a month’s time. It so happened that the bullock died within a month.

Several months after the bullock’s death, Algu reminded Sahu of the money he hadn’t yet paid. Sahu got very annoyed, “I can’t pay you a penny for the wretched beast you sold me. He brought us nothing but ruin. I have a bullock. Use it for a month and then return it to me. No money for the dead bullock,” he said angrily.

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Questions:
(a) What was the condition of Algu Chowdhary?
(b) What did he do with the other bullock?
(c) What happened after a month?
(d) What did Samjhu say when Algu demanded money for the bullock?
(e) Find out a word from the extract that means ‘a couple’.
Answer:
(a) Algu Chowdhary was in a tight condition.
(b) He sold the other bullock to Samjhu Sahu.
(c) After a month the bullock died.
(d) Samjhu Sahu refused to pay the price. He said that Algu can use his bullock for a month.
(e) a pair.

2. (Lesson 6)

Since advertisements are making a great impact in all walks of our lives, care should be taken to ensure that they are not allowed to degenerate into cheap publicity. A democratic country like India gives every citizen and organization the freedom of expression. In a way, advertisers also avail themselves of this freedom and publicise their products, ideas, programs, without any fear of legal action or punishments. But we should never forget that freedom is not licenced.

Questions:
(a) What are advertisements doing in our lives?
(b) What care should be taken?
(c) What liberty do the citizens enjoy in a democratic country?
(d) What should we not forget?
(e) Find out a word from the extract that means—‘the powerful effect of something. ’
Answers:
(a) Advertisements are making a great impact in all walks of our lives.
(b) Care should be taken to ensure that they are not allowed to degenerate into cheap publicity.
(c) In a democratic country citizens enjoy the freedom of expression.
(d) We should not forget that freedom is not licence.
(e) Impact.

3. (Lesson 10)

One day, when Akbar and Birbal were in discussion. Birbal happened to pass a harmless comment about Akbar’s sense of humor. But Emperor Akbar was in a foul mood and took great offence to this remark. He asked Birbal, his court jester, friend and confidant to not only leave the palace but also to leave the walls of the city of Agra. Birbal was terribly hurt at being banished.

A couple of days later, Akbar began to miss his best friend. He regretted his earlier decision of banishing him from the courts. He just could not do without Birbal and so sent out a search party to look for him.

Questions:
(a) How did Akbar take the harmless comment?
(b) What punishment did Akbar give Birbal?
(c) What happened after a couple of days?
(d) What did Akbar do to correct his action?
(e) Find out a word from the extract that means—‘one who makes others laugh.’
Answers:
(a) Akbar took the harmless comment of Birbal as a great offence.
(b) Akbar ordered Birbal to leave not only the palace but also to leave the walls of the city of Agra.
(c) After a couple of days Akbar began to miss his best friend.
(d) He sent a search party for him.
(e) Jester.

4. (Lesson 12)

In a firm voice the mother said, “What is this, my son? I had thought of my son as a great hero. I was 1 thinking that the British Government would shiver at the very mention of his name. I never thought that my son would be afraid of death. If you can die only in this way, weeping, why did you take up such activities?”

The officials were astounded at the firmness of the mother. The freedom fighter replied, “Mother, dear, these are not tears of fear—the fear of death. These are tears of joy-joy at beholding so brave a mother!”

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Questions:
(a) From which lesson this extract has been taken?
(b) What did the mother think about the mention of her son’s name?
(c) What was the reaction of the officials on hearing the words of the mother?
(d) What explanation did the freedom fighter give about his tears?
(e) Find out a word from the extract that means—‘very much surprised.’
Answers:
(a) The extract has been taken from the lesson Ram Prasad‘Bismil’.
(b) His mother thought that the British government will shiver hearing .her son’s name.
(c) The officials were astounded hearing the words of his mother.
(d) Bismil said that those tears were not tears of fear of death but they were tears of joy-joy at beholding so brave a mother.
(e) Astounded.

5. (Lesson 13)

When the king reached near the cottage he was surprised to see a broken hut where someone was singing merrily. Out of curiosity, the king peeped into the hut through a crack. He saw a weeping old man in a comer. There was a woman who seemed to be a widow as her head was shaven, was dancing and a young man who appeared to be in mourning was singing. The servant was, then, asked to peep inside by the king. The servant was of the opinion that it was these people’s idea of fun, and they should not intrude there. But the king was bent upon an explanation so he called out to the owner of the house.

Questions:
(a) From which lesson this extract has been taken?
(b) What did the king see when he reached near the cottage?
(c) What was the old man doing?
(d) What was the opinion of the servant?
(e) Find out a word from the extract that means the same as ‘to disturb’.
Answers:
(a) The extract has been taken from the lesson ‘King Vikramaditya in Disguise’.
(b) The king saw a broken hut in which someone was singing merrily.
(c) The old man was weeping.
(d) The servant was of the opinion that it was those people’s idea of fun and they should not intrude there.
(e) Intrade.

6. (Lesson 17)

Without a moment’s hesitation, Cheemi jumped through the window. Chhotu was sleeping soundly. Picking him up, Cheemi put him on her back and tied him tight to herself with a bedsheet.

Slowly she climbed up the ladder and peeped through the window. Carefully she undid the bedsheet and handed it, with the child to a policeman. Then she crawled out of the window. Both Cheemi and Chhotu were taken to the second floor where Parvati Kaki, Gauri Bhabhi and others were watching. Chhotu, who woke up by now, saw so many people around him and burst out crying.

Questions:
(a) From which lesson the above extract has been taken?
(b) How did Cheemi took the child to take him away?
(c) Where were Cheemi and Chhotu taken?
(d) What was the reaction of Chhotu when he woke up?
(e) Find out a word from the extract that means short, quick look taken secretly or glance.
Answers:
(a) The extract has been taken from the lesson “Cheemi the Brave Girl”.
(b) Cheemi put him on her back and tied him tight to herself with a bedsheet.
(c) Cheemi and Chhotu were taken to the second floor.
(d) Chhotu burst up crying when he saw so many people around him.
(e) peep.

7. (Lesson 18)

Hawking in the streets has, of late, become a-little too much. It seems impossible to concentrate on any study or writing at home, particularly if one’s window looks over a street. Even if one retires to the back of the house one may not be saved since the hawker seems to set the pitch of his voice on the basis that you should be searched out and pierced through and through even if you are hiding in the innermost recess of the house. At the moment I am writing this I see and hear two plantain sellers coming on each other ’s heels, almost trying to bark each other out of existence.

Questions (A)
(a) Which kind of noise has increased of late?
(b) What is its result?
(c) How can one not be saved from noise of hawkers even if one retires to the back of the house?
(d) What does the writer see at the time of writing this article?
(e) Find out a word from the extract that means, “to give all your attention to something.”
Answers:
(a) Hawker’s noise has increased of late.
(b) The result is that it seems impossible to concentrate on any study or writing at home.
(c) Even if one retires to the back of the house one may not be saved since the hawker seems to pitch his voice to a high degree.
(d) He sees two plantain sellers coming on each other’s heels at the time when he is writing this article.
(e) Concentrate.

(B) Someone noted recently that present-day babies are peculiarly loud throated. They look elegant and sweet, no doubt, but the moment they open their mouths they set out a shattering volume of sound. School teachers do their best from the beginning by ordering every few seconds in the classroom, ‘silence, silence’. But it does not appear to have any effect on children. They remain the noisiest creatures on the earth. I think there will be an all-round benefit if a period of absolute ‘Silence’ is introduced in every class time table with a prize at the end of the year for the softest spoken person in the school.

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Questions:
(a) From which lesson has the extract been taken?
(b) What has been noted recently by someone?
(c) What do we find when babies open their mouth?
(d) What is the suggestion by the author about silence in a school?
(e) Find out a word from the extract that means—‘graceful and attractive’.
Answers:
(a) The extract has been taken from the lesson ‘Noise’.
(b) Someone has noted recently that present day babies are loud throated.
(c) When babies open their mouth they set out a shattering volume of sound.
(d) The author ’s suggestion is that there should be introduced a period of absolute ‘silence’ in every class time table with a prize at the end of the year for the softest spoken person in the school.
(e) elegant.

MP Board Class 9th English Solutions

MP Board Class 10th General English Grammar Translation

MP Board Class 10th General English Grammar Translation

Continuous Tenses

(1) Present Continuous Tense
Structure-am/is/are + veb + ing + object etc.

(A) Affirmative Sentences

(i) मैं खाना खा रहा हूँ।
I am eating food.

(ii) हम नावें तैरा रहे हैं।
We are floating boats.

(iii) रीना बैडमिंटन खेल रही है।
Reena is playing badminton.

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(B) Negative Sentences

(i) तुम सुन नहीं रहे हो।
You are not listening.

(ii) वह खाना नहीं पका रही है।
She is not cooking food.

(iii) वे हँस नहीं रहे हैं।
They are not laughing.

(C) Interrogative Sentences

(i) क्या वे खेल रहे हैं?
Are they playing?

(ii) राम क्या कर रहा है?
What is Ram doing?

(iii) आप क्यों रो रहे हैं?
Why are you weeping?

(iv) क्या वह आ रहा है?
Is he coming?

(2) Past Continuous Tense

Structure-Subject + was/were + verb + ing + object etc.

(A) Affirmative Sentences

(i) मैं चित्र बना रहा था।
I was drawing picture.

(ii) वे सो रहे थे।
They were sleeping.

(iii) वह दौड़ रही थी।
She was running.

(B) Negative Sentences

(i) पानी नहीं बरस रहा था।
It was not raining.

(ii) मैं चिल्ला नहीं रहा था।
I was not shouting.

(iii) गाड़ी चल नहीं रही थी।
The vehicle was not moving.

(C) Interrogative Sentences

(i) तुम कहाँ जा रहे थे?
Where were you going?

(ii) शीला क्यों हँस रही थी?
Why was Sheela laughing?

(iii) वे क्या कर रहे थे?
What were they doing?

(3) Future Continuous Tense

Structure- Subject + shall/will + be + verb + ing + object etc.

(A) Affirmative Sentences

(i) पानी बरस रहा होगा।
It will be raining

(ii) हम खेल रहे होंगे।
We shall be playing.

(iii) वह पत्र लिख रहा होगा।
He will be writing a letter.

(B) Negative Sentences

(i) वे नहीं आ रहे होंगे।
They will not be coming.

(ii) वह पढ़ नहीं रहा होगा।
He will not be reading,

(iii) मैं खाना नहीं खा रहा हूँगा।
I shall not be eating food.

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(C) Interrogative Sentences

(i) वह कैसे खेल रहा होगा?
How will he be playing?

(ii) कौन सो रहा होगा?
Who will be sleeping?

(iii) क्या वह पढ़ रहा होगा?
Will he be reading? .

(4) Present Indefinite Tense

(A) Affirmative Sentences

Structure-Subject + verb I/verb I + s, es, ies, + object.

(i) मैं पुस्तक पढ़ता हूँ।
I read the book.

(ii) हम बस को रोकते हैं।
We stop the bus.

(iii) तुम फल लाते हो।
You bring fruits.

(iv) मोहन कानपुर में रहता है।
Mohan lives in Kanpur.

(B) Negative Sentences

Structure-Subject + do not/does not + verb I + object.

(i) मैं वहाँ नहीं जाता हूँ।
I do not go there.

(ii) तुम कहानी नहीं कहते हो।
You do not tell a story.

(iii) वह यहाँ नहीं आता है।
He does not come here.

(C) Interrogative Sentences

Structure-Do/Does + subject + (not) verb I + object etc.?

(i) क्या मैं झूठ बोलता हूँ?
Do I tell lies?

(ii) क्या तुम मुझे जानते हो?
Do you know me?

(iii) क्या वह पंतग उड़ाता है?
Does he fly kite?

(5) Past Indefinite Tense

(A) Affirmative Sentences

Structure- Subject + verb II + object etc.

(i) मैंने एक लाल पक्षी देखा।
I saw a red bird.

(ii) हमने टीवी खरीदा।
We bought a T.V.

(iii) शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया।
Shah Jahan got the Taj Mahal built.

(iv) रहीम ने हॉकी खेली।
Rahim played hockey.

(v) तुमने कार चलाई।
You drove the car.

(B) Negative Sentences

Structure- Subject + did not + verb I + object etc.

(i) मैंने फल नहीं खाये।
I did not eat the fruits.

(ii) तुमने हिन्दी का अध्ययन नहीं किया।
You did not study Hindi.

(iii) हमने कपड़े नहीं सुखाये।
We did not dry the clothes.

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(C) Interrogative Sentences

Structure-Did + subjcet + (not) verb I + object etc.?

(i) क्या मैंने तुमसे कभी झगड़ा किया?
Did I ever quarrel with you?

(ii) क्या तुमने फीस चुकाई?
Did you pay the fee?

(iii) क्या शीला ने फूल नहीं सूंघे?
Did Sheela not smell flowers?

(6) Future Indefinite Tense

Structure-Subject + shall/will + verb I + object etc.

(i) मैं एक पत्र लिखूगा।
I shall write a letter.

(ii) हम कल झाँसी जायेंगे।
We shall go to Jhansi tomorrow.

(iii) हम अगले वर्ष नैनीताल जायेंगे।
We shall go to Nainital next year.

(iv) तुम यहाँ नहीं बैठोगे।
You will not sit here.

(v) क्या आप मेरी मदद करेंगे?
Will you help me?

(7) Present Perfect Tense

Structure- Subject + have/has + verb III + object etc.

(i) मैंने यह पुस्तक पढ़ ली है।
I have read this book.

(ii) दिनेश ने यह चित्र देखा नहीं है।
Dinesh has not seen this picture.

(iii) सूर्य अस्त हो चुका है।
The sun has set.

(iv) क्या वे भोपाल गये हैं?
Have they gone to Bhopal?

(v) क्या तुमने पत्र लिख लिया है?
Have you written the letter?

(8) Present Perfect Continuous Tense

Structure-Subject + have been/has been + verb + ing + object for/since + time.

(i) मैं दो दिन से बुखार से पीड़ित हूँ।
I have been suffering from fever for two days.

(ii) हम इस विद्यालय में तीन वर्ष से पढ़ रहे हैं।
We have been reading in this school for three years.

(iii) तुम तीन बजे से ताश खेल रहे हो।
You have been playing cards since 30’clock.

(iv) वे दो घण्टे से फुटबाल खेल रहे हैं।
They have been playing football for two hours.

Miscellaneous (विविध)
(i) नेहरू जी महान् पुरुष थे।
Nehruji was a great man.

(ii) क्या तुम मेरे मित्र हो?
Are you my friend?

(iii) तुम्हारा क्या नाम है?
What is your name?

(iv) वह राजेश का भाई है।
He is Rajesh’s brother.

(v) तुम मेरे मित्र नहीं हो।
You are not my friend.

(vi) वहाँ जाओ।
Go there.

Exercise 1

Translate into English:
1. उसके दाँत किटकिटा रहे हैं।
2. वह असफल हो जायेगा, परन्तु नकल नहीं करेगा।
3. उसे ठण्ड लग गई है।
4. क्या आगरा की लाइन अभी भी खराब है?
5. न तो वह पढ़ता है और न मुझे पढ़ने देता है।
6. क्षमा करें श्रीमान् ! क्या मैं आपका टेलीफोन इस्तेमाल कर सकता हूँ?
7. ईश्वर करे आप दीर्घायु हों!
8. इसे होने दो!
9. उन्होंने झण्डा फहराया।
10. मैं बात का पक्का हूँ।
Answer:
1. His teeth are clenching.
2. He would rather fail than cheat.
3. He has caught cold.
4. Is the Agra line still out of order?
5. Neither he studies nor he lets me do so:
6. Excuse me, Sir, May I use your telephone?
7. May you live long!
8. Let it be done.
9. He unfurled the flag.
10. I am a man of word.

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Exercise 2

Translate into English:
माला मेरी सहेली है। वह मेरी कक्षा में पढ़ती है। वह एक बुद्धिमान छात्रा है। उसमें अनेक गुण हैं। वह सदा कक्षा में प्रथम | आती है। वह प्रातः समय से उठकर अपना कार्य करती है। वह । समय से स्कूल भी जाती है। वह अपने गुरु तथा बड़ों की आज्ञा का पालन करती है। वह निर्धनों की सहायता करती है। वह सदा । प्रसन्नचित रहती है। उससे सभी लोग प्रसन्न रहते हैं।
Answer:
Mala is my friend. She studies in my class. She is an intelligent student. She has many qualities. She always stands first in the class. Getting up early in the morning, she does her work in time. She also goes to school in time. She obeys her teachers and elders. She helps the poor. She is always cheerful. All are pleased with her.

Objective Type Questions

I. Choose the correct options from those given below the sentences :

Exercise 1
1. Please write your roll number ……………………… link.
(a) with
(b) in
(c) by
Answer:
(b) in

2. He found ……………………… he was late.
(a) why
(b) that
(c) when
Answer:
(b) that

3. The hunter was aiming ……………………… a wild boar.
(a) on
(b) for
(c) at
Answer:
(c) at

4. This is ……………………… I live.
(a) where
(b) there
(c) how
Answer:
(a) where

5. ……………………… I go there?
(a) May
(b) Must
(c) Might
Answer:
(a) May

6. It is 12 o’clock ……………………… my watch.
(a) by
(b) in
(c) at
Answer:
(a) by

7. I said that I ……………………… go at once.
(a) shall
(b) can
(c) should
Answer:
(c) should

8. ……………………… a gentleman, he is well known.
(a) For
(b) As
(c) Like
Answer:
(b) As

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9. There is no need to lose hope ……………………… you do
not know him.
(a) until
(b) just then
(c) just because
Answer:
(c) just because

10. I prefer tea ……………………… coffee.
(a) than
(b) to
(c) for
Answer:
(b) to

11. ……………………… you did was against the law.
(a) That
(b) What
(c) How
Answer:
(b) What

12. It is a year ……………………… I met him.
(a) when
(b) since.
(c) till
Answer:
(b) since.

13. He got first class ……………………… his friend failed.
(a) while
(b) but
(c) however
Answer:
(a) while

14. She is fond ………………………
(a) of singing
(b) to sing
(c) for singing
Answer:
(a) of singing

15. ……………………… the truth is our duty.
(a) To speak
(b) Speaking
(c) To spoke
Answer:
(a) To speak

Exercise 2

1. This is the watch ……………………… we were searching for.
(a) that
(b) which
(c) what
Answer:
(a) that

2. He sat ……………………… me.
(a) with
(b) by:
(c) on
Answer:
(b) by:

3. We should act ……………………… his advice.
(a) on
(b) upon
(C) at
Answer:
(b) upon

4. The police charged your son ……………………… murder.
(a) of
(b) for
(c) with
Answer:
(c) with

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5. He is jealous ……………………… my name and fame.
(a) of
(b) with
(c) for
Answer:
(a) of

6. Never yield ……………………… hardship.
(a) over
(b) to
(c) for
Answer:
(b) to

Exercise 3

1. She ……………………… take a day off.
(a) can
(b) could
(c) may
Answer:
(a) can

2. You ……………………… leave as soon as you have finished.
(a) may
(b) might
(c) can
Answer:
(a) may

3. You ……………………… have seen this advertisement.
(a) must ,
(b) should
(c) might
Answer:
(c) might

4. He ……………………… read well when he was only five years old.
(a) could
(b) manged to
(c) would
Answer:
(a) could

5. “Cars ……………………… not be parked here.”
(a) need
(b) could
(c) must
Answer:
(c) must

6. If I bought a lottery ticket I ……………………… win one lac prize.
(a) will
(b) may
(c) must
Answer:
(b) may

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II. Fill in the blanks using correct words from the brackets :
1. Wait ……………………… I come back. (till, before, after)
2. He went away with a ……………………… heart. (breaks, broken, break)
3. Supply ……………………… water to the villagers. (drink, drunk, drinking)
4. Cars ……………………… not be parked here. (must, should, could)
5. Mumbai is bigger ……………………… Bangalore. (because, since, than)
6. The sun seems ……………………… round the earth. (go, went, to go)
Answer:
1. till,
2. broken,
3. drinking,
4. should,
5. than,
6. to go.

III. Fill in the blanks with correct past tense of the verbs given in brackets :
1. He ……………………… back to India in 1973. (come)
2. He ……………………… his work long ago. (finish)
3. We ……………………… to school after the rain had stopped. (go)
4. I ……………………… to the radio. (listen)
5. They ……………………… late yesterday. (come)
Answer:
1. came,
2. had finished,
3. went,
4. was listening,
5. came.

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