भाषा भारती कक्षा 6 पाठ 20 रुपये की आत्मकथा प्रश्न उत्तर हिंदी

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Class 6th Hindi Bhasha Bharti Chapter 20 Rupay ki Atmakatha Question Answer Solutions

MP Board Class 6th Hindi Chapter 20 Rupay ki Atmakatha Questions and Answers

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए

(क) वैदिक युग में रुपये का नाम था
(i) रुफियाह
(ii) रुपी,
(iii) रुष्यकम्
(iv) रुपाई।
उत्तर
(iii) रुष्यकम्

(ख) सन् 1957 के पूर्व रुपये में होते थे
(1) 1000 पैसे
(ii) 64 पैसे
(iii) 50 पैसे
(iv) 25 पैसे
उत्तर
(ii) 64 पैसे

(ग) रुपये के नए अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक की लिपि है
(i) द्रविड़
(ii) ब्राह्मी
(iii) देवनागरी
(iv) गुरुमुखी
उत्तर
(iii) देवनागरी।

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

(क) रुपया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ………………. ने किया।
(ख) रुपये का दशमलवीकरण सन् ………………….. में किया गया।
उत्तर
(क) शेरशाह सूरी
(ख) 1957 ई.।

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प्रश्न 3.
एक या दो वाक्यों में उत्तर लिखिए

(क) शेरशाह सूरी के कार्यकाल में रुपये का वजन कितना था?
उत्तर
शेरशाह सूरी के कार्यकाल में रुपया चाँदी के सिक्के के रूप में था जिसका वजन 178 ग्रेन था जो लगभग 11.5 ग्राम के बराबर था।

(ख) रुपए को कागज के एक ओर किस बैंक ने मुद्रित किया था ?
उत्तर
रुपए को कागज के एक ओर बैंक ऑफ बंगाल ने मुद्रित किया था।

(ग) प्राचीन समय में सोने और तांबे के सिक्के किस नाम से जाने जाते थे?
उत्तर
प्राचीन समय में सोने और तांबे के सिक्कों को भी – “रुप्यकम्’ के नाम से जाना जाता था।

(घ) रुपए के नए अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप की डिजाइन किसने की?
उत्तर
रुपए के नए अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप (र) की डिजाइन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के प्राध्यापक श्री उदय कुमार ने की।

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प्रश्न 4.
तीन से पाँच वाक्यों में उत्तर दीजिए

(क) हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में रुपए को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर
हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में ‘रुपया’ शब्द का नाम भी उस नाम की समानता लिए हुए नाम से ही जाना जाता है। जैसे-गुजरात में रुपियो’, कन्नड़ में रुपाई’, मलयालम में ‘रुपा’, मराठी में ‘रुपए’ नाम से जाना जाता है। इन सब भाषाओं में थोड़े परिवर्तन से रुपए का स्वरूप एक ही है।

(ख) दशमलवीकरण के पूर्व रुपए को किस प्रकार विभाजित किया जाता था?
उत्तर
दशमलवीकरण से पूर्व रुपए को आने, पैसे और पाई में बाँटा गया था। उस समय (अर्थात् 1957 से पूर्व) तीन पाई का एक पैसा होता था। चार पैसे का एक आना और सोलह आने का एक रुपया होता था।

(ग) वर्तमान में किन-किन देशों की मुद्राओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रतीक प्रयोग में लाए जाते हैं ?
उत्तर
अन्य देशों की मुद्राओं के अन्तर्राष्ट्रीय प्रतीक निम्न प्रकार से प्रयोग में लाए जाते हैं
MP Board Class 6th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 20 रुपये की आत्मकथा 1
प्रश्न 5.
सोचिए और बताइए

(क) जब रुपया प्रचलन में नहीं था, तब बाजार में लेन-देन कैसे होता होगा?
उत्तर
रुपये के प्रचलन में न होने पर, बाजार में लेन-देन वस्तु के बदले वस्तु द्वारा होता था।

(ख) रुपये को कागज पर मुद्रित करने के क्या लाभ हैं?
उत्तर
मुद्रा का भार नहीं होता है। अत: लाने और ले जाने में आसानी और सरलता होती है। चोरी और लूट का अंदेशा कम हो गया है। मुद्रा के नष्ट होने पर शीघ्र ही छपाई होकर उसकी भरपाई की जा सकती है।

(ग) यदि आप विदेश जाते हैं, तो क्या भारतीय रुपया वहाँ चलेगा?
उत्तर
विदेश जाने पर, अब भारतीय रुपया वहाँ चल सकेगा क्योंकि अब रुपये ने अपना अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर ली है। रुपये ने भी डॉलर, पौण्ड और यूरो की तरह अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पहचान बना ली है।

प्रश्न 6.
अनुमान और कल्पना के आधार पर उत्तर दीजिए

(क) यदि रुपए का प्रचलन न होता तो क्या होता?
उत्तर
यदि रुपए का प्रचलन न होता तो बाजार में वस्तुओं के खरीदने और बेचने में बड़ी कठिनाई होती। वस्तु के बदले वस्तु खरीदने में वस्तु को भार रूप में इधर से उधर लाना और ले जाना पड़ता। साथ ही, व्यापारी द्वारा बदले में ली जाने वाली वस्तु का उचित मूल्य नहीं दिया जाता। खरीदने वाले की वस्तु का मूल्य बेचने वाले के द्वारा निर्धारित होता। इस तरह व्यापारी खरीददार को ठगता।

(ख) यदि कागज पर रुपए के छापने की शुरूआत नहीं होती, तो क्या होता?
उत्तर
धातु की मुद्रा का बोझ लादकर बाजार में वस्तु खरीदने के लिए ले जाना पड़ता। कागज की मुद्रा आसानी से और बिना भार के तथा सुरक्षित रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाई जा सकती है। ठगी और चोरी का डर बढ़ गया होता।

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भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए और लिखिए
अस्तित्व, प्रणाली, प्रतीक, उल्लेख, शुल्क।
उत्तर
अपने अध्यापक महोदय की सहायता से उच्चारण कीजिए और लिखकर अभ्यास कीजिए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों की शुद्ध वर्तनी लिखिए
(i) मुदरित
(ii) अर्थिक
(iii) चिन्ह
(iv) दसमलव
(v) बांटा।
उत्तर-
(i) मुद्रित, (ii) आर्थिक, (iii) चिह्न, (iv) दशमलव, (v) बाँटा।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्ग अलग करके लिखिए
(i) अनुराग
(ii) अपमान
(iii) अनुमान
(iv) अपकार।
उत्तर
(i) अनु + राग (अनु उपसर्ग)
(ii) अप + मान (अप उपसर्ग)
(iii) अनु + मान (अनु उपसर्ग)
(iv) अप + कार (अप उपसर्ग)।

प्रश्न 4.
‘ईय’ प्रत्यय लगाकर निम्नलिखित शब्दों से नए शब्द बनाइए
(i) भारत
(ii) यूरोप
(ii) स्वर्ग
(iv) शासक।
उत्तर
(i) भारत + ईय = भारतीय
(ii) यूरोप + ईय = यूरोपीय
(iii) स्वर्ग + ईय = स्वर्गीय
(iv) शासक + ईय = शासकीय।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
(i) पाठ्य-पुस्तक
(ii) सिक्का
(iii) स्वतन्त्रता
(iv) मुद्रा
(v) शासन।
उत्तर
(i) कक्षा 6 के लिए हिन्दी की पाठ्य-पुस्तक शासन द्वारा बदल दी गई है।
(ii) भारतीय सिक्के ‘रुपये’ का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अब अपना अलग ही महत्व है।
(iii) भारत की स्वतन्त्रता में भारतीय वीर जवानों ने अपनी जान की परवाह नहीं की।
(iv) भारतीय मुद्रा का प्रचलन विश्व बाजार में अब महत्वपूर्ण हो गया है।
(v) शासन द्वारा नकल मुक्त परीक्षा कराने के लिए बहुत अच्छी पहल की गई है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों की संधि विच्छेद कीजिए
(i) शिक्षार्थी
(ii) कवीश्वर
(iii) नदीश
(iv) भानूदय
(v) महात्मा
(vi) परीक्षार्थी।
उत्तर
(i) शिक्षा + अर्थी
(ii) कवि+ ईश्वर
(iii) नदी+ ईश
(iv) भानु + उदय
(v) महा + आत्मा
(vi) परीक्षा + अर्थी

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए
कुछ लोग कागज पर मुद्रित रुपये को तोड़-मरोड़कर रखते हैं, उस पर कुछ भी लिख देते हैं, उनमें छेदकर उनका स्वरूप बिगाड़ देते हैं, सजावट या माला में उपयोग करते हैं। ऐसा करना भारतीय मुद्रा का अपमान है। हमारा दायित्व है। कि हम रुपये का स्वरूप बनाए रखें।
(क) गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(ख) हम रुपये के स्वरूप को कैसे सुरक्षित रख सकते
उत्तर
(क) ‘भारतीय मुद्रा’ उचित शीर्षक है।
(ख) हम रुपये के स्वरूप को सुरक्षित रख सकते हैं यदि हम उसे सजावट और माला में उपयोग न करें। साथ ही उसे तोड़-मरोड़कर न रखें। उसके स्वरूप को बनाए रखने का प्रयास करें।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित शब्दों में ‘र’ या ‘ऋ’ का उचित संकेत लगाकर सही शब्द बनाकर लिखिए
(i) ऋष्टि
(ii) दर्शन
(iii) कर्म
(iv) गह
(v) सूर्य
(vi) क्रम।
उत्तर
(i) दृष्टि
(ii) दर्शन
(iii) कर्म
(iv) गृह
(v) सूर्य
(vi) क्रम।

रुपये की आत्मकथा परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) आज मैं आपको अपनी कहानी बताने जा रहा हूँ। मेरा अस्तित्व प्राचीन काल से रहा है। वैदिक युग में मुझे ‘रुप्यकम्’ के नाम से जाना जाता था। रुप्यकम् का अर्थ है: चाँदी का सिक्का। उस समय अन्य धातु के सिक्कों को भी रुप्यकम् ही कहा जाता था। इस कारण हिन्दी में मेरा नाम रुपया हो गया।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियों को हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती’ के पाठ ‘रुपये की आत्मकथा’ से लिया गया है। यह आत्मकथा संकलित है।

प्रसंग-भारतीय मुद्रा का नाम रुपया है। रुपये के प्रचलन में आने का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-रुपया अपनी कहानी बताते हुए कहता है कि रुपया मेरा नाम बहुत पुराने समय से प्रचलन में आया हुआ है। वैदिक युग में भी इसे ‘रुप्यकम्’ नाम से पुकारा जाता था। वास्तव में रुप्यकम् का अर्थ होता है-चाँदी का सिक्का। उस समय अन्य धातुओं से भी सिक्के बनते थे और उन्हें भी रुप्यकम् कहा जाता था। हिन्दी भाषा में रुप्यकम् के स्थान पर इस सिक्के का नाम रुपया हो गया।

MP Board Class 6 Hindi Question Answer

MP Board Class 10th Hindi Navneet लेखक परिचय

MP Board Class 10th Hindi Navneet लेखक परिचय

1. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (2009, 14, 16)

जीवन परिचय देश के प्रति विशेष अनुराग रखने वाले प्रभाकर जी का जन्म सन् 1906 ई. में सहारनपुर जिले के देवबन्द नामक कस्बे में हुआ था। उनके पिता श्री रमादत्त मिश्र एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण थे। उनके परिवार का जीविकोपार्जन पंडिताई के द्वारा होता था। अतः पारिवारिक परिस्थितियों के अनुकूल न होने के कारण इनकी प्रारम्भिक शिक्षा का प्रबन्ध घर पर ही हुआ। इसके बाद इन्होंने खुर्जा के संस्कृत विद्यालय में प्रवेश लिया।

लेकिन वे मौलाना आसफ अली के सम्पर्क में आने पर उनसे प्रभावित होकर स्वतन्त्रता संग्राम के आन्दोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रसेवा और साहित्य सेवा हेतु समर्पित कर दिया।

आपने अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष जेल में बिताये,परन्तु देश के स्वतन्त्र होने के उपरान्त प्रभाकर जी ने अपना समय साहित्य-सेवा और पत्रकारिता में लगा दिया।

माँ भारती का यह वरद् पुत्र अन्तकाल तक मानव तथा साहित्य की साधना करता हुआ सन् 1995 ई. में चिरनिद्रा में लीन हो गया।

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रचनाएँ–

  • ललित निबन्ध संग्रह-बाजे पायलिया के घुघरू।
  • संस्मरण-दीप जले-शंख बजे।
  • लघु कहानी-धरती के फूल, आकाश के तारे।
  • रेखाचित्र-माटी हो गई सोना, नयी पीढ़ी नये विचार, जिन्दगी मुस्कराई।
  • अन्य रचनाएँ-क्षण बोले कण मुस्कराये, भूले बिसरे चेहरे,महके आँगन चहके द्वार।
  • पत्र-सम्पादन-विकास, नया जीवन।
  • पत्रिका-ज्ञानोदय।

भाषा-प्रभाकर जी की भाषा सरल, सुबोध एवं प्रसादयुक्त, स्वाभाविक है। आपकी भाषा भावानुकूल है। इसमें आपने यथास्थान मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग किया है।

भाषा में यथास्थान तत्सम शब्दों का भी प्रयोग है। आपके साहित्य में वाक्य छोटे-छोटे तथा सरल हैं। इन्होंने जहाँ-तहाँ बड़े-बड़े वाक्यांशों का प्रयोग किया परन्तु शब्दों को कहीं भी जटिल नहीं होने दिया। इनकी भाषा शुद्ध व साहित्यिक खड़ी बोली है।

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शैली-प्रभाकर जी की शैली में काव्यात्मकता और चित्रात्मक दिखाई देती है। आपकी शैली भी तीन प्रकार की है

  1. वर्णनात्मक शैली-लेखक ने जहाँ विषयवस्तु का सटीक वर्णन किया है, वहाँ इस शैली का प्रयोग किया है। इस शैली का प्रयोग अधिकतर लघु कथाओं में किया है।
  2. नाटकीय शैली-इस शैली के प्रयोग से गद्य में सजीवता और रोचकता आ गयी है। इस शैली का प्रयोग रिपोर्ताज में किया गया है।
  3. भावात्मक और चित्रात्मक शैली-इस शैली का प्रयोग रिपोर्ताज और संस्मरण लिखते समय किया है। शब्दों के द्वारा इतना सुन्दर चित्रांकन अन्य किसी लेखक ने आज तक नहीं किया है।

साहित्य में स्थान-प्रभाकर जी यद्यपि आज हमारे मध्य नहीं हैं,लेकिन फिर भी हम उन्हें राष्ट्रसेवी, देशप्रेमी और पत्रकार के रूप में सदैव याद करते रहेंगे।
पत्रकारिता एवं रिपोर्ताज के क्षेत्र में इनका अद्वितीय स्थान है। सच्चे अर्थों में वे एक उच्चकोटि के साहित्यकार थे। उनके निधन से जो क्षति हुई है वह सदैव अविस्मरणीय रहेगी।

2. वासुदेवशरण अग्रवाल (2009, 12, 13, 18)

जीवन परिचय-डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का नाम भारतीय संस्कृति, सभ्यता तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन विषयों पर उनकी विचार तथा भावों की श्रृंखला गहन चिन्तन तथा उद्गार समन्वित है।

आपका जन्म सन् 1904 ई. में मेरठ जनपद के खेड़ा ग्राम में हुआ था। आपके माता-पिता का निवास स्थल लखनऊ था, वहीं रहकर आपने प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की। काशी विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। लखनऊ विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि से सम्मानित हुए।

इन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी तथा पाली विषयों का गहन अध्ययन किया। हिन्दी काव्य का यह महारथी सन् 1966 ई.में सदा-सदा के लिए देवलोक को चला गया।

रचनाएँ-वासुदेवशरण अग्रवाल की प्रमुख कृतियाँ निम्न हैं-

  • निबन्ध संग्रह–’उर ज्योति’, ‘माता भूमि’, ‘पृथ्वी पुत्र’, ‘वेद विद्या’, ‘कला और संस्कृति’, ‘कल्पवृक्ष’,’वाग्धारा’।
  • समीक्षा—जायसी के ‘पद्मावत’ तथा कालिदास के ‘मेघदूत’ की संजीवनी व्याख्या।
  • सांस्कृतिक-‘पाणिनिकालीन भारतवर्ष’, ‘भारत की मौलिक एकता’, ‘हर्ष चरित’, ‘एक सांस्कृतिक अध्ययन’।
  • अनुवाद–’हिन्दू सभ्यता’।
  • सम्पादन–’पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ’।

भाषा-डॉ. अग्रवाल ने अपनी रचना में शुद्ध एवं परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया है।

यत्र-तत्र प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग है। जहाँ आपने गहन विचारों तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति की है, वहाँ भाषा का रूप जटिल हो गया है। भाषा में प्रचलित अंग्रेजी व उर्दू शब्दों का प्रयोग है। अनेक देशज शब्दों का भी प्रयोग है।

शैली-डॉ. अग्रवाल ने गवेषणात्मक शैली का प्रयोग किया है। यह शैली पुरातत्त्व विभाग के अन्वेषण से सम्बन्धित है।

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विचार प्रधान शैली-विचार प्रधान शैली का प्रयोग विषयों के विश्लेषण में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त व्याख्यात्मक तथा उद्धरण शैली का प्रयोग भी मिलता है। समग्र रूप से भाषा-शैली उन्नत तथा प्रशंसनीय है।

साहित्य में स्थान–डॉ. अग्रवाल की विचार विश्लेषण तथा अभिव्यक्ति की शैली अपूर्व तथा सरस है, आप कुशल सम्पादक तथा टीकाकार भी हैं।

शब्दों के कुशल शिल्पी और जीवन सत्य के स्पष्ट जागरूक द्रष्टा वासुदेवशरण अग्रवाल हमारे आधुनिक साहित्य के गौरव हैं।

3. हजारीप्रसाद द्विवेदी (2009, 10, 12, 15, 17)

परिचय-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जाने-माने श्रेष्ठ समालोचक, निबन्धकार, उपन्यासकार, निष्ठावान तथा आदर्श अध्यापक थे।

डॉ. शम्भूनाथ सिंह के कथनानुसार, “आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य को बड़ी देन हैं। उन्होंने हिन्दी समीक्षा की एक नई उदार और वैज्ञानिक दृष्टि दी है।”

जीवन परिचय-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 में बलिया जिले के अन्तर्गत दुबे के छपरा नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योति कली देवी था।

पिता की प्रेरणा एवं दिशा-निर्देशन के फलस्वरूप संस्कृत एवं ज्योतिष का गहन अध्ययन किया। शान्ति-निकेतन काशी विश्वविद्यालय एवं पंजाब विश्वविद्यालय जैसी विख्यात संस्थाओं में हिन्दी के विभागाध्यक्ष के पद पर प्रतिष्ठित रहे। शान्ति-निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिज मोहन के सम्पर्क के कारण साहित्य साधना में प्राण-पण से जुट गये।

लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की उपाधि से आपको विभूषित किया गया। सन् 1957 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया। 19 मई,सन् 1979 ई.को हिन्दी का . यह महान साहित्यकार सदा-सदा के लिए मृत्यु के रथ पर सवार हो गया।

रचनाएँ-आचार्य द्विवेदी जी ने साहित्य की विविध विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। उनकी रचनाएँ निम्न हैं

  1. आलोचना—सूर साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’, ‘कबीर’, ‘सूरदास और उनका काव्य’, ‘हमारी साहित्यिक समस्याएँ’, साहित्य का साथी’, ‘साहित्य का धर्म’, ‘नख दर्पण में हिन्दी कविता’, ‘हिन्दी साहित्य’, समीक्षा साहित्य’।
  2. उपन्यास–’चारुचन्द्र लेख’, ‘अनामदास का पोथा’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा ‘पुनर्नवा’।
  3. सम्पादन-सन्देश रासक संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो।
  4. अनूदित रचनाएँ-प्रबन्ध कोष,प्रबन्ध-चिन्तामणि, विश्व परिचय आदि।

भाषा-द्विवेदी जी की भाषा-शैली की अपनी विशेषता है। आपने अपनी रचनाओं में प्रसंगानुकूल उपयुक्त तथा सटीक भाषा का प्रयोग किया है।

भाषा के अन्तर्गत सरल, तद्भव प्रधान तथा उर्दू संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है। वे अपनी बात को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करने में सक्षम थे। बोल-चाल की भाषा सरल तथा स्पष्ट है। इसी भाषा को द्विवेदी जी ने अपनी कृतियों में वरीयता प्रदान की है।

भाषा में गति तथा प्रवाह विद्यमान है। मुहावरों के प्रयोग से भाषा में सुधार आ गया है। संस्कृत के शब्दों के प्रयोग से भाषा जटिल और दुरूह हो गयी है। भाषा की चित्रोपमता तथा अलंकारिता के कारण हृदयस्पर्शी और मनोरम बन गई है।

शैली-

  1. गवेषणात्मक शैली-शोध तथा पुरातत्त्व से सम्बन्धित निबन्धों में इस शैली का प्रयोग है।
  2. आत्मपरक शैली-इस शैली का प्रयोग द्विवेदी जी ने प्रसंग के साथ-साथ स्वयं को समाहित करने के लिए किया है।
  3. सूत्रात्मक शैली–बौद्धिकता के कारण अनेक स्थान पर सूत्रात्मक शैली का प्रयोग किया है।
  4. विचारात्मक शैली-अधिकांश निबन्धों में इस शैली का प्रयोग है।
  5. वर्णनात्मक शैली-द्विवेदी जी की वर्णनात्मक शैली इतनी स्पष्ट, सरस तथा सरल है कि वह वर्णित विशेष स्थलों का मानव पटल के समक्ष चित्र सा उपस्थित कर देती है।
  6. व्यंग्यात्मक शैली-इस शैली के अन्तर्गत द्विवेदी जी ने कोरे व्यंग्य किये हैं।
  7. भावात्मक शैली-द्विवेदीजी जहाँ भावावेश में आते हैं वहाँ उनकी इस शैली की सरसता दर्शनीय है।

साहित्य में स्थान द्विवेदीयुगीन साहित्यकारों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का शीर्ष स्थान है। ललित निबन्ध के सूत्रधार एवं प्रणेता हैं। निबन्धकार,उपन्यासकार, आलोचक के रूप में आपका योगदान अविस्मरणीय हैं। आपने अपनी पारस प्रतिभा से साहित्य के जिस क्षेत्र को भी स्पर्श किया उसे कंचन बना दिया।

4. रामवृक्ष बेनीपुरी (2011, 14, 16)

जीवन परिचय–विचारों से क्रान्तिकारी तथा राष्ट्रसेवा के साथ-साथ साहित्य सेवा में संलग्न श्री बेनीपुरी जी हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म सन् 1902 ई. में बिहार के अन्तर्गत मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था। राष्ट्र के प्रति अनन्य निष्ठा रखने वाले बेनीपुरी ने अध्ययन पर विराम लगाकर राष्ट्रसेवा का व्रत लिया।

उन्होंने गाँधीजी के साथ असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे अनेक बार जेल गये और वहाँ की यातनाओं को भी सहन किया।

17 सितम्बर, सन् 1968 ई.को ये मृत्यु के रथ पर सवार हो गये।

रचनाएँ-पैरों में पंख बाँधकर (यात्रा साहित्य), माटी की मूरतें (रेखाचित्र), जंजीर और दीवारें (संस्मरण), गेहूँ बनाम गुलाब (निबन्ध)।

भाषा-इनकी भाषा प्रवाहपूर्ण, सरस तथा ओजमयी है। संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग भाषा में किया है। भाषा शुद्ध साहित्यिक हिन्दी है।

शैली-बेनीपुरी जी की शैली सरल, सरस तथा हृदयस्पर्शी है। शैली कहीं-कहीं विश्लेषणात्मक तो कहीं अन्वय व्याख्यात्मक रूप भी लिए हुए है। शैली में लालित्य का भी समन्वय है। वाक्य दीर्घ न होकर लघु हैं, जिससे भाषा में चार चाँद लग गये हैं। बेनीपुरी जी के निबन्धों में जीवन के प्रति अगाध निष्ठा व आशा के स्वर मुखरित हैं। शब्द शिल्पी रामवृक्ष बेनीपुरी की शैली का चमत्कार एवं प्रभाव उनकी कृतियों में विद्यमान है।

साहित्य में स्थान-बेनीपुरी जी हिन्दी साहित्य की अपूर्व निधि हैं। उनके साहित्य में आदर्श कल्पना एवं गहन चिन्तन का समन्वय है। सम्पादक के रूप में भी आपका विशिष्ट योगदान है।

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आपकी शैली काव्यात्मक तथा मनभावन है। प्रसाद तथा माधुर्य गुण से सम्पन्न हैं। आप ऐसे साहित्यकार थे जिनके कण्ठ में कोमल तथा माधुर्य पूर्ण स्वर,मस्तिष्क में अपूर्व कल्पना शक्ति तथा हृदय में भावना का समुद्र हिलोरें ले रहा था। उनकी कविताएँ नेत्रों के समक्ष चित्र प्रस्तुत करने में सक्षम हैं।

5. श्रीलाल शुक्ल (2010, 11, 15)

जीवन परिचय-हिन्दी साहित्य के दैदीप्यमान व्यंग्य साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का जन्म 31 दिसम्बर,सन् 1925 को लखनऊ के समीप अतरौली नामक गाँव में हुआ था।

इनकी शिक्षा लखनऊ एवं इलाहाबाद में हुई थी। सन् 1950 में इनको (आई. ए. एस) प्रशासनिक सेवा के लिये चुन लिया। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में इन्होंने उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर भी कार्य किया व अपने कर्तव्यों का उचित पालन भी किया। आप एक उच्चकोटि के व्यंग्यकार के रूप में प्रसिद्ध हुए। आज भी वे साहित्य सृजन कर हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे

रचनाएँ—आपकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

  • सूनी घाटी का सूरज,
  • अज्ञातवास,
  • मकान,
  • अंगद का पाँव तथा
  • आदमी का जहर।

भाषा-श्रीलाल शुक्ल जी की भाषा सरल, सहज व सजीव है। भाषा में शुक्लजी ने यथा-स्थान मुहावरे लोकोक्तियों का प्रयोग किया है। उन्होंने अपनी भाषा में साधारण बोल-चाल के अतिरिक्त उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में व्यंग्य का अनोखा पुट है। वह शब्दों में चार चाँद लगा देता है।

शैली-शुक्लजी ने अपने साहित्य में भाषा की भाँति अनेक प्रकार की शैली का चयन किया है।

  1. वर्णनात्मक शैली-शुक्लजी ने वर्णन शैली का प्रयोग छोटे-छोटे प्रसंगों में किया है। वाक्य छोटे व संयत व सहज हैं।
  2. भावात्मक शैली इस प्रकार की शैली में शुक्लजी ने कोमल पदावली का प्रयोग किया है।
  3. व्यंग्यात्मक शैली-शुक्लजी ने अपने साहित्य में व्यंग्यात्मक शैली का खुलकर प्रयोग किया है। उन्होंने व्यंग्य शैली का प्रयोग करके राजनीति, शिक्षा,गाँव,समाज और घर जहाँ भी अन्याय व अत्याचार दिखायी दिया उसी पर तीखा प्रहार करके समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने का प्रयास किया है। उनकी रचनाओं में शिक्षाप्रद प्रेरक प्रसंग भी हैं।
  4. संवाद शैली-श्रीलाल शुक्लजी की रचनाओं में संवाद शैली का प्रयोग है। उनके संवाद सरल और सहज होते हैं। संवादों में स्वाभाविक शैली का प्रयोग है।
  5. विवरणात्मक शैली-इस प्रकार की शैली में घटनाओं व तथ्यों का वर्णन होता है। इस प्रकार की शैली की भाषा प्रवाहयुक्त होती है।

साहित्य में स्थान-श्रीलाल शुक्ल जी एक उच्चकोटि के व्यंग्य निबन्धकार हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में रहस्यात्मक एवं रोमांचक कथाओं के द्वारा साहित्य जगत में ख्याति प्राप्त की। उनके कई प्रसिद्ध उपन्यास हैं लेकिन ‘राग दरबारी’ उनका विशेष व्यंग्यपूर्ण आंचलिक उपन्यास है। इस उपन्यास पर उन्हें साहित्य अकादमी से पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। उन्होंने समाज की विसंगतियों पर प्रहार करके उन्हें दूर करने का सफल प्रयास किया है।

6. प्रेमचन्द (2009, 13, 17)

जीवन परिचय-प्रेमचन्द सच्चे अर्थों में हिन्दी उपन्यासों के जन्मदाता तथा मौलिक एवं सर्वश्रेष्ठ कहानीकार भी हैं।

इसी कारण वे जनता के मध्य उपन्यास सम्राट के रूप में विख्यात हैं।

प्रेमचन्द का जन्म सन् 1880 में बनारस के निकट लमही नामक ग्राम में हुआ। एण्ट्रेन्स की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् एक स्कूल में आठ रुपये मासिक पर अध्यापक नियुक्त हुए। इसके बाद व्यक्तिगत रूप से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सौभाग्यवश आप स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर पद पर प्रतिष्ठित हुए।

गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन में आपने सक्रिय भाग लिया। इसके बाद नौकरी से त्याग-पत्र देकर आप जीवन-पर्यन्त साहित्य साधना में संलग्न रहे। सन् 1936 ई. में आप सदा के लिए मृत्यु की गोद में सो गये।

रचनाएँ-प्रेमचन्द ने हिन्दी गद्य की विविध विधाओं पर अपनी लेखनी के द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। प्रेमचन्द उपन्यास सम्राट के नाम से विख्यात थे। इनकी कहानियाँ भी पाठकों को मन्त्रमुग्ध कर देती हैं। इनकी कृतियाँ निम्न प्रकार हैं

  1. कहानियाँ-‘मानसरोवर’ तथा ‘गुप्तधन’ में आपकी तीन सौ से अधिक कहानियाँ संकलित हैं। पूस की रात, कफन, ईदगाह, पंचपरमेश्वर, परीक्षा, बूढ़ी काकी, बड़े घर की बेटी, सुजान भगत आदि प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
  2. उपन्यास-वरदान, प्रतिज्ञा, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, गबन, कर्मभूमि, निर्मला, कायाकल्प, गोदान और मंगलसूत्र (अपूर्ण)।
  3. नाटक-कर्बला, संग्रमा और प्रेम की वेदी।
  4. निबन्ध संग्रह-स्वराज्य के फायदे,कुछ विचार, साहित्य का उद्देश्य।
  5. जीवनियाँ-महात्मा शेखसाथी, दुर्गादास,कलम-तलवार और त्याग।

भाषा-इन्होंने संस्कृत, अरबी एवं फारसी के प्रभाव से मुक्त भाषा का प्रयोग किया, जिससे जनसाधारण भाषा को समझ सकें। आपने हिन्दी,उर्दू का मिश्रण करके हिन्दुस्तानी भाषा का साहित्य में प्रयोग किया जो कि जनसामान्य की भाषा थी। . हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु जी के समान प्रेमचन्द ने ही ऐसी भाषा का प्रयोग किया जो

आज भी आदर्श रूप में प्रतिष्ठित हैं। प्रेमचन्द ने प्रारम्भ में उर्दू में साहित्य सृजन किया, बाद में हिन्दी में लेखन कार्य प्रारम्भ किया। शैली-उनकी भाषा-शैली सरस,प्रवाहमय तथा सरल है जिसे हिन्दू, मुसलमान शिक्षित, अशिक्षित भली प्रकार पढ़ तथा लिख सकते हैं। मुहावरों तथा कहावतों के प्रयोग से भाषा में चार चाँद लग गये हैं।

भाषा शैली का एक उदाहरण देखिए
“अँधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।”

“अनुराग स्फूर्ति का भण्डार है।”
साहित्य में स्थान प्रेमचन्द अपने युग के लोकप्रिय उपन्यासकार हैं। उनकी लोकप्रियता का कारण यह है कि उन्होंने जनसामान्य की आशा, आकांक्षाओं तथा यथार्थता का सजीव चित्रण किया है।
वे उपन्यास सम्राट के रूप में प्रसिद्ध हैं। ग्रामीण जीवन के कुशल शिल्पी हैं।

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उनके पथ का अनुसरण करते हुए समकालीन उपन्यासकार भी अपने उपन्यासों में आदर्श के सुनहरे चित्र उभारने लगे।

वास्तव में प्रेमचन्द एक उच्चकोटि के श्रेष्ठ साहित्यकार थे। उनकी कहानियाँ कला के चिरन्तन पृष्ठों पर इस कहानी सम्राट की अक्षय कीर्ति को अंकित कर रही हैं। उनकी मृत्यु पर कविन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था—“तुझे एक रत्न मिला था, वही तूने खो दिया।”

7. पं. रामनारायण उपाध्याय (2018)

जीवन परिचय-लोक संस्कृति पुरुष पण्डित रामनारायण उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले के कालमुखी नामक ग्राम में 20 मई,सन् 1918 को हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती दर्गा देवी तथा पिता का नाम श्री सिद्धनाथ उपाध्याय था। गाँव के किसान परिवेश में रचे बसे उपाध्याय जी के व्यक्तित्व में भावुकता,सहृदयता एवं कर्मठता के स्पष्ट दर्शन होते हैं। उपाध्याय जी के व्यक्तित्व में गाँव और गाँव की संस्कृति साकार हो उठी है। रामनारायण उपाध्याय ‘राष्ट्रभाषा परिषद, भोपाल’ तथा मध्य प्रदेश आदिवासी लोककला परिषद, भोपाल के संस्थापकों में से हैं। आप जीवनपर्यन्त कई संस्थाओं से जुड़कर कार्य करते रहे। 20 जून, सन् 2001 ई. को आप इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गए।

कृतियाँ-रामनारायण उपाध्याय अपने आंचलिक परिवेश में रम कर साहित्य सृजन करते हैं। इनकी रचनाओं में लोक कल्याण का भाव तथा प्राकृतिक सहजता का सर्वत्र समावेश रहा है ! उपाध्याय जी ने निमाडी लोक साहित्य का शोधपरक अध्ययन कर विस्तृत लेखन कार्य किया है। आपने निमाड़ी लोक साहित्य के विविध रूपों की खोज कर लोक साहित्य का संकलन किया है। इसके अतिरिक्त आपने व्यंग्य,ललित निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि की रचना की है।

भाषा-शैली–श्री रामनारायण उपाध्याय की भाषा एवं शैली में सुबोधता एवं सरसता का भाव सर्वत्र विद्यमान है।

भाषा-लोक भाषाओं के मर्मज्ञ पण्डित रामनारायण उपाध्याय की साहित्यिक भाषा शुद्ध खड़ी बोली है। आपकी भाषा भाव-विचार के अनुकूल परिवर्तित होती रहती है। भाषा में प्रवाह एवं प्रभावशीलता के गुण सर्वत्र विद्यमान हैं। आवश्यकता के अनुसार उर्दू, अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी आपने किया है। उक्तियों,मुहावरों का वे सटीक प्रयोग करते हैं। भाषा में बनावटीपन या क्लिष्टता नहीं मिलती है।

शैली-श्री रामनारायण उपाध्याय की शैली विविध रूपिणी है। प्रमुख शैली रूप इस प्रकार हैं

  1. व्यंग्यात्मक शैली-उपाध्याय जी ने व्यंग्य रचनाओं में इस शैली का प्रयोग किया है। विविध प्रकार के संदर्भो को इंगित करते हुए अपने करारे प्रहार करने में यह शैली सफल सिद्ध हुई है। आपकी अन्य रचनाओं में भी यत्र-तत्र यह शैली देखी जा सकती है।
  2. संस्मरण शैली-संस्मरण साहित्य के लेखन में इस शैली का प्रयोग पण्डित रामनारायण उपाध्याय करते हैं। आपकी यह शैली सहृदयता, भावात्मकता तथा सरसता से पूर्ण है। आपके संस्मरणों में आत्मीयता और सत्य का सुन्दर समन्वय हुआ है।
  3. वर्णनात्मक शैली-किसी वस्तु,व्यक्ति या घटना को प्रस्तुत करते समय उपाध्याय जी वर्णनात्मक शैली का प्रयोग करते हैं। इसमें सरल भाषा तथा छोटे-छोटे वाक्यों को अपनाया गया
  4. भावात्मक शैली–पण्डित रामनारायण उपाध्याय,सहृदय,सरल एवं सरस साहित्य के रचनाकार हैं। उनके लेखन में भावात्मक शैली का पर्याप्त प्रयोग हुआ है। ललित निबन्धों के साथ-साथ संस्मरण, रिपोर्ताज, रूपक आदि में इस शैली की प्रभावशीलता अवलोकनीय है।

इसके अतिरिक्त गवेषणात्मक विचारात्मक विवेचनात्मक आदि शैली रूपों का प्रयोग उपाध्याय जी ने किया है। उनके लेखन में सम्प्रेषण की अनूठी क्षमता है।

साहित्य में स्थान-सादा जीवन उच्च विचार की प्रतिमूर्ति रहे श्री रामनारायण उपाध्याय ने लोक जीवन तथा लोक संस्कृति के लिए जो कार्य किया है वह सराहनीय है। आप अन्वेषक के साथ नवीन विधाओं के रचनाकार के रूप में विशेष स्थान रखते हैं।

महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने लिखे हैं-
(i) निबन्ध
(ii) नाटक
(iii) उपन्यास
(iv) ऐतिहासिक घटनाक्रम।
उत्तर-
(i) निबन्ध

2. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने अध्यक्ष पद बड़ी निष्ठा और लगन से निभाया-
(i) हिन्दी विभाग का
(ii) भूगोल विभाग का
(iii) भारतीय पुरातत्त्व विभाग का
(iv) मनोविज्ञान विभाग का।
उत्तर-
(iii) भारतीय पुरातत्त्व विभाग का

3. हजारीप्रसाद द्विवेदी को अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए मिला
(i) भारत रत्न
(ii) साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं पद्म भूषण
(iii) ज्ञानपीठ पुरस्कार
(iv) भारत भूषण।
उत्तर-
(ii) साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं पद्म भूषण

4. रामवृक्ष बेनीपुरी के जीवन का महत्त्वपूर्ण समय जेल यात्राओं में बीता
(i) 1930 से 1942 तक
(ii) 1925 से 1928 तक
(ii) 1940 से 1943 तक
(iv) 1920 से 1925 तक।
उत्तर-
(i) 1930 से 1942 तक

5. व्यंग्यकार एवं कथाकार श्रीलाल शुक्ल की रचना है
(i) भारत की मौलिक एकता
(ii) अंगद का पाँव
(iii) कुटज
(iv) चिता के फूल।
उत्तर-
(ii) अंगद का पाँव

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6. पं. रामनारायण उपाध्याय का जन्म हुआ
(i) 27 नवम्बर,1929
(ii) 20 मई,1918
(iii)2 अगस्त,1919
(iv) 19 मार्च,1908।
उत्तर-
(ii) 20 मई,1918

7. सेठ गोविन्ददास का जन्म कहाँ हुआ ?
(i) जबलपुर
(ii) भोपाल
(iii) ग्वालियर
(iv) इन्दौर।
उत्तर-
(i) जबलपुर

8. हरिकृष्ण प्रेमी ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत किसके साथ की ?
(i) प्रेमचन्द
(i) मैथिलीशरण गुप्त
(iii) महादेवी वर्मा
(iv) माखनलाल चतुर्वेदी।
उत्तर-
(iv) माखनलाल चतुर्वेदी।

9. प्रेमचन्द का वास्तविक नाम था
(i) रासबिहारी
(ii) बाबूलाल
(iii) धनपतराय
(iv) अजायबराय।
उत्तर-
(iii) धनपतराय

10. सियारामशरण गुप्त के प्रेरणा स्रोत थे
(i) मैथिलीशरण गुप्त
(ii) जयशंकर प्रसाद
(iii) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(iv) माखनलाल चतुर्वेदी।
उत्तर-
(i) मैथिलीशरण गुप्त

रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. रामनारायण उपाध्याय का जन्म जिला खण्डवा के …………………… नामक ग्राम में हुआ था।
2. सेठ गोविन्ददास ने बारह वर्ष की अवस्था में तिलिस्मी उपन्यास …………………… की रचना की।
3. सियारामशरण गुप्त के कहानी संग्रह का नाम …………………… है।
4. सुप्रसिद्ध नाटककार हरिकृष्ण प्रेमी के पौराणिक नाटक का नाम है ……………………
5. श्रीलाल शुक्ल का जन्म लखनऊ के पास …………………… नामक ग्राम में हुआ।
6. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ …………………… लेखन में सिद्धहस्त थे।
7. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल भारतीय पुरातत्त्व विभाग के …………………… पद पर रहे।
8. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से …………………… की उच्च शिक्षा प्राप्त की।
9. रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म एक …………………… परिवार में हुआ था।
10. कहानी सम्राट …………………… को कहा जाता है। [2018]
उत्तर-
1. कालमुखी,
2. चम्पावती,
3. मानुषी,
4. पाताल विजय,
5. अतरौली,
6. रिपोर्ताज,
7. अध्यक्ष,
8. ज्योतिष एवं संस्कृत,
9. साधारण किसान,
10. मुंशी प्रेमचंद।

सत्य/असत्य

1. कन्हैयालाल मिश्र ने ‘त्यागभूमि’ में पत्रकार के रूप में अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत की।
2. हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक गाँव में हुआ।
3. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ इण्डोलॉजी में प्रोफेसर नियुक्त हुए।
4. सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण रामवृक्ष बेनीपुरी को स्कूली शिक्षा अधूरी रह गई।
5. श्रीलाल शुक्ल द्वारा लिखित ‘अज्ञातवास’ धारावाहिक दूरदर्शन पर बहुत लोकप्रिय हुआ।
6. पं. रामनारायण उपाध्याय ‘राष्ट्रभाषा परिषद-भोपाल’ के संस्थापक सदस्य रहे।
7. सेठ गोविन्ददास का जन्म एक निर्धन परिवार में हुआ था।
8. हरिकृष्ण प्रेमी एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे।
9. प्रेमचन्द ने ‘माधुरी’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन किया।
10. सियारामशरण गुप्त अपने अन्तिम दिनों में दिल्ली में रहे।
उत्तर-
1. असत्य,
2. असत्य,
3. सत्य,
4. सत्य,
5. असत्य,
6. सत्य,
7. असत्य,
8. असत्य,
9. सत्य,
10. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

‘अ’ – ‘आ’
1. श्रीलाल शुक्ल की रचना – (क) कुंकुम-कलश
2. पण्डित रामशरण उपाध्याय द्वारा लिखित रचना – (ख) रक्षाबन्धन
3. सेठ गोविन्ददास द्वारा लिखित नाटक – (ग) प्रेम की वेदी
4. हरिकृष्ण प्रेमी का नाटक – (घ) सीमाएँ टूटती हैं
5. प्रेमचन्द द्वारा लिखित नाटक – (ङ) कर्त्तव्य
उत्तर-
1. →(घ),
2. → (क),
3. → (ङ),
4. → (ख),
5. → (ग)।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

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1. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ किस नेता के भाषण से प्रभावित होकर स्वतन्त्रता आन्दोलन ___में कूद पड़े ?
2. सियारामशरण गुप्त के बड़े भाई कौन थे ?
3. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म किस सन् में हुआ ?।
4. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के पिता का क्या नाम था ?
5. रामवृक्ष बेनीपुरी ने ‘विशारद’ की परीक्षा कहाँ से उत्तीर्ण की ?
6. श्रीलाल शुक्ल सन् 1950 में कौन-सी सरकारी सेवा के लिए चुने गये ?
7. रामनारायण उपाध्याय ने अपनी पत्नी शकुन्तला देवी की स्मृति में किस न्यास की स्थापना की ?
8. सेठ गोविन्ददास ने सन् 1919 में कौन-सा नाटक लिखा ?
9. हरिकृष्ण प्रेमी की प्रथम रचना कौन-सी है ?।
10. प्रेमचन्द द्वारा लिखित एक उपन्यास का नाम लिखिए।
उत्तर-
1. मौलाना आसिफ अली,
2. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त,
3. सन् 1904 में,
4. अनमोल दुबे,
5. हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयोग,
6. भारतीय प्रशासनिक सेवा,
7. लोक-संस्कृति,
8. विश्वप्रेम,
9. स्वर्ण विधान,
10. निर्मला।

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MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3

MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.2


प्रश्न 1 से 15 तक निम्नलिखित असमिकाओं को आलेखीय विधि से हल कीजिए :

प्रश्न 1.
x ≥ 3, y ≥ 2
हल:
x ≥ 3, y ≥ 2
(i) सरल रेखा x = 3 बिन्दु (3, 0) और (3, 2) से होकर जाती है।
x ≥ 3 में x = 0 रखने पर 0 ≥ 3, यह सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) x ≥ 3 के क्षेत्र में नहीं है।
(ii) सरल रेखा y = 2 बिन्दु (0, 2) और (3, 2) से होकर जाती है।
y ≥ 2 में y = 0 रखने पर
0 ≥ 2, यह सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में नहीं है।
x ≥ 3 और y ≥ 2 का हल उभयनिष्ठ छायांकित क्षेत्र से दर्शाया गया है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-1

प्रश्न 2.
3x + 2y ≤ 12, x ≥ 1, y ≥ 2.
हल:
दी हुई रैखिक असमिकाएँ 3x + 2y ≤ 12, x ≥ 1, y ≥ 2
(i) रेखा 3x + 2y = 12 बिन्दु (2, 0) और (0, 6) से होकर जाती है।
3x + 2y ≤ 12 में x = 0, y = 0 रखने पर
0 + 0 ≤ 12, अर्थात् 0 ≤ 12 जो सत्य है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में है।
3x + 2y ≤ 12 के हल में वे सभी बिन्दु हैं जो AB के नीचे है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-2
(ii) रेखा x = 1 बिन्दु B(1, 0), Q(1, 2) से होकर जाती है
x ≥ 1 में x = 0 रखने पर
0 ≥ 1, यह सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में नहीं है।
∴ x ≥ 1 का हल के सभी बिन्दु है जो है जो x = 1 के दाईं ओर है।
(iii) रेखा y = 2, बिन्दु C(0, 2) और D(3, 2) से होकर जाती है।
y ≥ 2 में y = 0 रखने पर 0 ≥ 2, यह सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में नहीं है।
y ≥ 2 का हल वे सब बिन्दु हैं जो y = 2 के ऊपर हैं।
तीनों असमिकाओं का हल इसके उभयनिष्ठ क्षेत्र ∆PQR के सभी बिन्दु हैं।

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प्रश्न 3.
2x + y ≥ 6, 3x + 4y ≤ 12.
हल:
दी हुई असमिकाएँ 2x + y ≥ 6, 3x + 4y ≤ 12
(i) सरल रेखा 2x + y = 6 बिन्दु (3, 0) तथा (0, 6) से होकर जाती है।
2x + y ≥ 6 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 6 जो सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में नहीं है। 2x +y ≥ 6 का हल वे सभी बिन्दु हैं जो 2x + y = 6 के ऊपर है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-3
(ii) सरल रेखा 3x + 4y = 12 बिन्दु D(4,0) और C(0, 3) से होकर जाती है।
3x + 4y ≤ 12 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 + 0 ≤ 12, जो सत्य है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में है।
अत: 3x + 4y ≤ 12 का हल वे सब बिन्दु हैं जो रेखा CD के नीचे हैं।
इस प्रकार 2x + y ≥ 6, 3x + 4y ≤ 12 का हल वह उभयनिष्ठ क्षेत्र है जो 2x + y = 6 के ऊपर और 3x + 4y = 12 के नीचे है। यह चित्र में उभयनिष्ठ क्षेत्र द्वारा दर्शाया गया है।

प्रश्न 4.
x + y > 4, 2x – y > 0.
हल:
दी हुई रैखिक असमिकाएँ x + y > 4, 2x – y > 0,
(i) रेखा x + y = 4, बिन्दु (4, 0) और (0, 4) से होकर जाती है। +
अब x + y > 4 में x = 0 y = 0 रखने पर, हमें प्राप्त हुआ 0 > 4 जो सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में नहीं है।
x + y >4 का हल वे सब बिन्दु हैं जो रेखा AB के ऊपर है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-4
(ii) रेखा 2x – y = 0, बिन्दु 0 (0, 0) और D(1, 2) से होकर जाती है।
2x – y > 0 में x = 1, y = 0 रखते हुए 2 > 0, जो सत्य है।
∴ बिन्दु P(1, 0), 2x – y > 0 के क्षेत्र में है।
∴ 2x – y > 0 का हल वे सब बिन्दु हैं जो OD के नीचे हैं।

प्रश्न 5.
2x – y > 1,x – 2y < – 1. हल: दी हुई रैखिक असमिकाएँ 2x – y > 1 और x – 2y < – 1 (i) सरल रेखा 2x – y = 1 बिन्दु \(\left(\frac{1}{2}, 0\right)\) और (0, – 1) से होकर जाती है। 2x – y > 1 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 > 1, यह सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0), 2x – y > 1 के क्षेत्र में नहीं है।
⇒ 2x – y > 1 का हल वे सब बिन्दु हैं जो रेखा AB के नीचे है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-5
(ii) रेखा x – 2y = – 1 बिन्दु C(-1, 0) और D\(\left(0, \frac{1}{2}\right)\) से होकर जाती है।
x – 2y < – 1 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 < – 1, यह सत्य नहीं है। ∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में नहीं है। ⇒ 2x – y > 1 और x – 2y < – 1 का हल वह उभयनिष्ठ भाग QPR है जो AB के नीचे और CD के ऊपर है।

प्रश्न 6. x + y ≤ 6, x + y ≥ 4. हल: दी हुई रैखिक असमिकाएँ x + y ≤ 6 और x + y ≥ 4 है। (i) रेखा x + y = 6, बिन्दु A(6, 0), B(0, 6) से होकर जाती है। x + y ≤ 6 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 + 0 ≤ 6 अर्थात् 0 ≤ 6 जो सत्य है ∴ मूल बिन्दु (0, 0), x + y ≤ 6 के क्षेत्र में है। (ii) रेखा x + y = 4, बिन्दु C(4, 0) और D(0, 4) से होकर जाती है। x + y ≥ 4 में x = 0, y = 0 रखने पर, 0 ≥ 4, यह सत्य नहीं है। ∴ मूल बिन्दु (0, 0) x + y ≥ 4 में नहीं है। इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो CD के ऊपर है। दी हुई आकृति में छायांकित क्षेत्र x + y ≤ 6 और x + y ≥ 4 के हल को दर्शाता है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-6

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प्रश्न 7. 2x + y ≥ 8, x + 2y ≥ 10. हल: दी हुई रैखिक असमिकाएँ 2x + y ≥ 8, x + 2y ≥ 10 (i) रेखा 2x + y = 8 बिन्दु A(4,0); B(0, 8) से होकर जाती है। 2x + y ≥ 8 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≥ 8 जो असत्य है। ∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में नहीं है। ⇒ 2x + y ≥ 8 का हल वे सब बिन्दु हैं जो रेखा AB के ऊपर है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-7
(ii) रेखा x + 2y = 10, बिन्दु C(10, 0) और D(0, 5) से होकर जाती है। x + 2y ≥ 10 में x = 0, y = 0 रखने पर, 0 ≥ 10, यह सत्य नहीं है। ∴ मूल बिन्दु (0, 0) x + 2y ≥ 10 में नहीं है। ⇒ x + 2y ≥ के सभी बिन्दु CD के ऊपर हैं। अर्थात् 2x + y ≥ 8, x + 2y ≥ 10 का हल छायांकित उभयनिष्ठ भाग BPC है। प्रश्न 8. x + y ≤ 9, y ≥ x, x ≥ 0. हल: दी हुई रैखिक असमिकाएँ x + y ≤ 9, y ≥ x, x ≥ 0 (i) सरल रेखा x + y = 9 बिन्दु A(9, 0) और B(0, 9) से होकर जाती है। x + y ≤ 9 में x = 0, y = 0 रखते हुए 0 + 0 ≤ 9 अर्थात् 0 ≤ 9 जो सत्य है। ∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में है। ⇒ x + y ≤ 9 के बिन्दु AB रेखा के नीचे हैं। (ii) सरल रेखा y = x बिन्दु O(0, 0) और C(3, 3) से होकर जाती है। y > x में x = 0, y = 3 रखने पर, 3 > 0 जो सत्य है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-8
∴ बिन्दु (3, 0) इसके क्षेत्र में है।
⇒ y > x के सभी बिन्दु y = x के ऊपर हैं।
(iii) सरल रेखा x = 0, y- अक्ष को निरूपित करती है।
x ≥ 0 में x = 3, y = 0 रखने पर 3 ≥ 0 जो सत्य है।
⇒ x ≥ 0 के सभी बिन्दु x = 0 के दाईं ओर है।
आकृति में उभयनिष्ठ छायांकित क्षेत्र असमिकाओं x + y ≥ 9, y > x, x ≥ 0 का हल है।

प्रश्न 9.
5x + 4y ≤ 20,x ≥ 1,y ≥ 2.
हल:
दी हुई रैखिक असमिकाएँ 5x + 4y ≤ 20, x ≥ 1,y ≥ 2
सरल रेखा 5x + 4y = 20 बिन्दु A (4,0) और B (0, 5) से होकर जाती हैं। 5x + 4y ≤ 20 में x = 0, y = 0 रखने पर, 0 + 0 ≤ 20 अर्थात् 0 ≤ 20 जो सत्य है।
∴ मूल बिन्दु (0, 0) इसके क्षेत्र में है।
5x + 4y ≤ 20 के सभी बिन्दु रेखा AB के नीचे है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-9
(ii) x = 1 बिन्दु C(1 , 0), D(1, 2) से होकर जाती है।
x ≥ 1 में x = 0 रखने पर 0 ≥ 1 जो सत्य नहीं है।
∴ x ≥ 1 के सभी बिन्दु x = 1 के दायीं ओर होते हैं।
(iii) y = 2, बिन्दु E(0, 2) और F(4, 2) से होकर जाती है।
y ≥ 2 में y = 0. रखने पर 0 ≥ 2 सत्य नहीं है।
∴ मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में नहीं है।
y ≥ 2 का हल वे सब बिन्दु हैं जो EF के ऊपर हैं।
दी हुई असमिकाओं का हल आकृति में उभयनिष्ठ PDR छायांकित क्षेत्र द्वारा दर्शाया गया है।

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प्रश्न 10.
3x + 4y ≤ 60, x + 3y ≤ 30, x ≥ 0, y ≥ 0.
हल:
दी हुई असमिकाएँ : 3x + 4y ≤ 60, x + 3y ≤ 30, x ≥ 0, y ≥ 0.
(i) रेखा 3x + 4y = 60 बिन्दु A(20, 0) तथा B(0, 15) से होकर जाती है।
असमिका 3x + 4y ≤ 60 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 < 60 जो सत्य है। मूल बिन्दु इस क्षेत्र में पड़ता है। ⇒ इस असमिका का हल वे सब बिन्दु हैं जो AB के नीचे हैं।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-10
(ii) रेखा x + 3y = 30 बिन्दु C(30, 0) और D(0, 10) से होकर जाती है।, असमिका x + 3y ≤ 30 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 30 जो सत्य है। मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में है। इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो CD के नीचे हैं। (iii) x = 0, y-अक्ष को निरुपित करती है। x ≥ 0 में वे सब बिन्दु हैं जो y-अक्ष की दाईं ओर हैं। (iv) y = 0, x-अक्ष को निरुपित करती है। और y > 0 में वे सब बिन्दु हैं जो x-अक्ष के ऊपर हैं दी हुई असमिका का हल वे सब बिन्दु हैं जो उभयनिष्ठ क्षेत्र PDOA में आते हैं।

प्रश्न 11.
2x + y ≥ 4, x + y ≤ 3, 2x – 3y ≤ 6.
हल:
दी हुई असमिकाएँ 2x + y ≥ 4, x + y ≤ 3, 2x – 3y ≤ 6
(i) रेखा 2x + y = 4, बिन्दु A (2, 0) और B(0, 4) से होकर जाती है।
असमिका 2x + y ≥ 4 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 + 0 ≥ 4 अर्थात् 0 ≥ 4जो सत्य नहीं है। मूल बिन्दु इस क्षेत्र में नहीं है।
इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो AB के ऊपर हैं।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-11
(ii) रेखा x + 3y = 3 बिन्दु C(3, 0), D(0, 10) से होकर जाती है।
असमिका x + 3y ≤ 3 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 3 जो सत्य है।
मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में है। इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो CD के नीचे हैं
(iii) रेखा 2x – 3y = 6, बिन्दु C(3,0) और E(0, – 2) से होकर जाती है।
असमिका 2x – 3y ≤ 6 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 6, जो सत्य है।
मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में है। इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो CE के ऊपर हैं।
दी हुई असमिकाओं का हल छायांकित उभयनिष्ठ क्षेत्र AQC के सब बिन्दु हैं।

प्रश्न 12.
x – 3y ≤ 3, 3x + 4y 12, x ≥ 0, y ≥ 1.
हल:
दी हुई असमिकाएँ x – 2y ≤ 3, 3x + 4y ≥ 12, x ≥ 0,y ≥ 1
(i) रेखा x – 3y = 3 बिन्दु A(3, 0), B(0, – 1) से होकर जाती है।
असमिका x – 3y ≤ 3 में x = 0, y = 0 रखने पर, 0 ≤ 3 जो सत्य है।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-12
∴ मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में है।
इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो AB के ऊपर है।
(ii) रेखा 3x + 4y = 12 बिन्दु C(4, 0) और D(0, 3) से होकर जाती है।
असमिका 3x + 4y ≥ 12 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≥ 12, जो सत्य नहीं है। मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में नहीं है।
⇒ इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो CD के ऊपर है।
(iii) x = 0, y-अक्ष को दर्शाती है।
x ≥ 0 का हल वे सब बिन्दु हैं जो y-अक्ष के दाईं ओर है।
(iv) रेखा y = 1 बिन्दु E(0, 1), Q(3, 1) से होकर जाती है।
असमिका y ≥ 1 का हल वे सब बिन्दु है जो संख्या y = 1 पर पड़ते हैं या इसके ऊपर हैं।
दी हुई असमिकाओं का हल वे सब बिन्दु हैं जो उभयनिष्ठ क्षेत्र PDQRS से निरूपित किया गया है।

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प्रश्न 13.
4x + 3y ≤ 60, y ≥ 2x, x ≥ 3, x, y ≥ 0.
हल:
दी हुई असमिकाएँ 4x + 3y ≤ 60, y ≥ 2x, x ≥ 3, x, y ≥ 0
(i) सरल रेखा 4x + 3y = 60 बिन्दु A(15, 0), B(0, 20) से होकर जाती है।
4x + 3y ≤ 60 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 60 जो सत्य है।
∴ मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में है।
⇒ इस असमिका का हल वे बिन्दु हैं जो रेखा AB या AB के नीचे होते हैं।
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-13
(ii) y – 2x = 0, बिन्दु 0(0, 0) और C(5, 10) से होकर जाती है।
y – 2x ≥ 0 में x = 5, y = 0 रखने पर, 0 – 10 ≥ 0 अर्थात् -10 ≥ 0 जो सत्य नहीं है।
बिन्दु (5, 0) इसके क्षेत्र में नहीं है।
⇒ y – 2x ≥ 0 का हल वे सब बिन्दु हैं जो OC पर और OC के ऊपर हैं।
(iii) रेखा x ≥ 3 बिन्दु D(3, 0), E(3, 10) से होकर जाती है।
असमिका x ≥ 3 के हल वे बिन्दु हैं जो DE या.DE के दाईं ओर हैं।
(iv) x ≥ 0, y ≥ 0 पहले चतुर्थांश के बिन्दु हैं।
दी हुई असमिकाओं का हल उभयनिष्ठ क्षेत्र PQR पर और उसके अन्दर के बिन्दु हैं।

प्रश्न 14.
3x + 2y ≤ 150, x + 4y ≤ 80, x ≤ 15, y ≥ 0.
हल:
दी हुई असमिकाएँ 3x + 2y ≤ 150, x + 4y ≤ 80, x ≤ 15, y ≥ 0
(i) सरल रेखा 3x + 2y = 150, बिन्दु A(50, 0), B(0, 75) से होकर जाती है। असमिका 3x + 2y ≤ 150 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 150 जो सत्य है।
∴ मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में है।
⇒ इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो AB पर या AB से नीचे हैं।
image 14
(ii) रेखा x + 4y = 80 बिन्दु C(80, 0), D(0, 20) से होकर जाती है।
असमिका x + 4y ≤ 80 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 80 जो सत्य है।
∴ मूल बिन्दु इस क्षेत्र में है।
इसका हल वे सब बिन्दु हैं जो CD पर या CD के नीचे स्थित है।
(iii) x = 15 रेखा y-अक्ष के समान्तर है और x ≤ 15 का हल वे बिन्दु हैं जोx = 15 पर या इसके बाईं ओर स्थित है।
(iv) y ≥ 0 में y-अक्ष पर और उसके ऊपर के सब बिन्दु हैं।
दी हुई असमिकाओं का हल उभयनिष्ठ क्षेत्र PQRS हैं।

प्रश्न 15.
x + 2y ≤ 10, x + y ≥ 1, x – y ≤ 0, x ≥ 0, y ≥ 0.
हल:
दी हुई सममिकाएँ x + 2y ≤ 10, x + y ≥ 1, x – y ≤ 0, x ≥ 0, y ≥ 0
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.3 img-14
(i) सरल रेखा x + 2y = 10 बिन्दु A(10, 0) और B(0, 5) से होकर जाती है।
असमिका x + 2y ≤ 10 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 10 जो सत्य है।
∴ मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में है।
इस असमिका का हल वे सब बिन्दु हैं जो AB पर हैं तथा AB के नीचे हैं।
(ii) रेखा x + y = 1 बिन्दु C(1, 0), D(0 , 1) से होकर जाती है।
असमिका x + y ≥ 1 में x = 0, y = 0 रखने पर, 0 ≥ 1 जो सत्य नहीं है।
⇒ मूल बिन्दु इसके क्षेत्र में नहीं है।
⇒ इस असमिका का हल वे सब बिन्दु हैं जो CD पर हैं या इसके ऊपर हैं।
(iii) रेखा x – y = 0 बिन्दु (0, 0) और (1, 1) से होकर जाती है। असमिका x – y ≤ 0 में x = 0, y = 0 रखने पर 0 ≤ 0 जो सत्य है।
(0, 0) इसके क्षेत्र में है।
⇒ इस असमिका का हल वे बिन्दु जो x – y = 0 पर हैं या इसके ऊपर हैं।
(iv) x ≥ 0 वह क्षेत्र है जो y-अक्ष के दाईं ओर है।
(v) y ≥ 0 वह क्षेत्र है जो x-अक्ष के ऊपर है।
दी हुई असमिकाओं का हल वे सब बिन्दु हैं जो उभयनिष्ठ क्षेत्र PQDB में है।

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भाषा भारती कक्षा 6 पाठ 19 खूनी हस्ताक्षर प्रश्न उत्तर हिंदी

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Class 6th Hindi Bhasha Bharti Chapter 19 Khooni Hastakshar Question Answer Solutions

MP Board Class 6th Hindi Chapter 19 Khooni Hastakshar Questions and Answers

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए

(क) ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” यह नारा था
(i) गाँधीजी का
(ii) सुभाषचन्द्र बोस का,
(iii) तिलक जी का
(iv) नेहरू जी का।
उत्तर
(ii) सुभाषचन्द्र बोस का

(ख) आजादी के परवाने पर नवयुवकों ने हस्ताक्षर किए थे
(i) काली स्याही से
(ii) नीली स्याही से
(iii) रक्त की स्याही से
(iv) लाल स्याही से।
उत्तर
(iii) रक्त की स्याही से

(ग) आजादी के परवाने पर हस्ताक्षर होने के बाद तारों ने देखा
(i) हिन्दुस्तानी विश्वास
(ii) स्थान
(iii) भाषण
(iv) सर्वस्व समर्पण।
उत्तर
(i) हिन्दुस्तानी विश्वास।

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

(क) यूँ कहते-कहते वक्ता की आँखों में ……………. आया।
उत्तर
खून

(ख) पर यह …………….. पत्र नहीं, आजादी का परवाना है।
उत्तर
साधारण

(ग) रण में जाने को ……………… खड़े तैयार दिखाई देते थे।
उत्तर
युवक

(घ) यह शीश कटाने का …………….. नंगे सिर झेला जाता है।
उत्तर
सौदा

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

(क) सुभाषचन्द्र बोस ने बलिदान करने को क्यों कहा?
उत्तर
‘भारत के लिए स्वतन्त्रता देवी को प्राप्त करने के लिए अपना बलिदान करो’ ऐसा सुभाष बाबू ने इसलिए कहा कि आजादी का इतिहास खून से लिखा जाता है।

(ख) शीशों के फूल चढ़ाने से कवि का क्या अभिप्राय
उत्तर
देश की आजादी के लिए, निर्दयी शासक वर्ग से मुक्ति पाने में सफलता तभी मिल सकेगी, जब हम अपने शीशरूपी फूलों को आजादी की वेदी पर सर चढ़ा सकेंगे।

(ग) खून को पानी के समान कब कहा जाता है ?
उत्तर
जिस खून में आजादी प्राप्त करने के लिए जोश नहीं हो, उस जीवन में गतिशीलता न हो, उस व्यक्ति का खून-खून नहीं, वह पानी है। क्योंकि ऐसा खून देश के किसी भी काम में नहीं आता है।

(घ) आजादी का इतिहास कैसे लिखा जाता है ?
उत्तर
आजादी का इतिहास काली स्याही से नहीं लिखा जाता है, वह तो रक्त की लाल स्याही से लिखा जाता है जिसमें बलिदानों का जिक्र होता है।

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(ङ) आजादी का परवाना किसे कहा गया है ?
उत्तर
आजादी का परवाना कोई साधारण कागज नहीं होता । है। उसे भरने के लिए तन-मन-धन और जीवन का बलिदान एवं सर्वस्व समर्पण करना होता है। जिस पर अपने रक्त की उजली बूंदें गिरी होती हैं।

(च) खूनी हस्ताक्षर से कवि का क्या आशय है ?
उत्तर
खूनी हस्ताक्षर से कवि का आशय इस बात से है कि वह अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार है।

(छ) सुभाषचन्द्र बोस के नारे का युवकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ और इन्कलाब के नारों ने भारतीय नवयुवकों में भारतीय आजादी के लिए जोश भर दिया। वे उसके लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार हो गए। वे रणक्षेत्र में जाने के लिए हुँकार भर रहे थे।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों के भाव स्पष्ट कीजिए

(क) आजादी के चरणों में, जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के फूलों से गूंथी जाएगी।

(ख) सारी जनता हुँकार उठी, हम आते हैं, हम आते हैं।
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त चढ़ाते हैं।
उत्तर
‘सम्पूर्ण पद्यांशों की व्याख्या’ शीर्षक के अन्तर्गत पद्यांश संख्या 3 व9 को देखिए।

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भाषा की बात

प्रश्न 1.
शुद्ध उच्चारण कीजिए
(i) सुभाष
(ii) स्वतन्त्रता
(iii) स्याही
(iv) रक्तिम
(v) इन्कलाब
(vi) हस्ताक्षर।
उत्तर
अपने अध्यापक महोदय की सहायता से सही उच्चारण कीजिए और अभ्यास कीजिए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए
(i) पानी
(ii) फूल
(ii) धन
(iv) माता।
उत्तर
(i) पानी – जल, पय
(ii) फूल – पुष्प, सुमन।
(iii) धन – दौलत, द्रव्य।
(iv) माता – जननी, जन्मदात्री।

प्रश्न 3.
विलोम शब्द लिखिए
(i) स्वतन्त्रता
(ii) सही
(iii) काला
(iv) जीवन
(v) विश्वास।
उत्तर
(i) स्वतन्त्रता = परतन्त्रता
(ii) सही = गलत
(iii) काला = सफेद
(iv) जीवन = मरण
(v) विश्वास = अविश्वास।

प्रश्न 4.
सही जोड़ी बनाइए
(i) खून – (क) स्वतन्त्रता
(ii) कुरबानी – (ख) लेखनी
(iii) आजादी – (ग) प्रवाह, गतिशीलता
(iv) कलम – (घ) रक्त
(v) रवानी – (ड.) बलिदान
उत्तर
(i) →(घ), (ii) →(ड.), (iii) →(क), (iv) →(ख), (v) →(ग)

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
(i) खून में उबाल आना
(ii) शीश कटाना
(iii) खून की – नदी बहाना।
उत्तर
(i) खून में उबाल आना-सुभाष के भाषणों से युवकों के खून में उबाल आ गया।
(ii) शीश कटाना-मातृभूमि की आजादी की रक्षा में अनेक युवक शीश कटाने के लिए चल पड़े।
(iii) खून की नदी बहाना-आजादी की रक्षा में भारतीय युवकों को खून की नदी बहानी पड़ी।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
(i) अर्पण
(ii) परवाना
(iii) जयमाल
(iv) संग्राम
(v) रणवीर।
उत्तर
(i) अर्पण-आजादी के दीवानों ने अपना तन-मन-धन सब देश के लिए अर्पण कर दिया।
(ii) परवाना-आजादी के परवाने पर अनेक युवकों ने अपने उजले रक्त से हस्ताक्षर कर दिए।
(ii) जयमाल-आजादी की देवी के गले में नरमुण्डों की जयमाल सुहाती है।
(iv) संग्राम-देश की स्वतन्त्रता के संग्राम में अनेक युवकों ने अपनी प्राणाहुति दे दी।
(v) रणवीर-रणवीर राणा प्रताप अपने चेतक घोड़े पर चढ़कर लड़ते हुए दुश्मनों के छक्के छुड़ा रहे थे।

खूनी हस्ताक्षर सम्पूर्ण पद्यांशों की व्याख्या

(1) वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन न रवानी है।
जो परवश होकर बहता है,
वह खून नहीं है, पानी है।

शब्दार्थ-परवश होकर = पराधीन होकर।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषा-भारती’ के पाठ ‘खूनी हस्ताक्षर’ से अवतरित हैं। इसके रचयिता गोपाल प्रसाद ‘व्यास’ हैं।

प्रसंग-कवि का आशय यह है कि देश की आजादी के लिए मर-मिटने वाले वीरों का खूब ही खून कहलाने योग्य है।

व्याख्या-कवि कहता है कि खून में जोश होता है, तो वह वास्तव में खून कहा जा सकता है। जो खून देश के काम आ सके, वही खून है। इसके विपरीत वह खून किसी काम का नहीं है। जीवन की गति से युवक खून ही खून कहलाने योग्य है। गतिहीन खून किसी मतलब का नहीं होता है। पराधीन होकर बहने वाला खून खून नहीं, वह तो पानी है।

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(2) उस दिन लोगों ने सही-सही
खू की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मांगी उनसे कुरबानी थी।
बोले, “स्वतन्त्रता की खातिर
बलिदान तुम्हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके हो जग में,
लेकिन आगे मरना होगा।

शब्दार्थ-कीमत = मूल्य, महत्व। कुर्बानी = बलिदान। संदर्भ = पूर्व की तरह।

प्रसंग-सुभाष चन्द्र बोस ने बर्मा में लोगों को बलिदान होने के लिए आग्रह किया, तब लोगों को खून के महत्व की जानकारी हुई।

व्याख्या-कवि बताता है कि जिस दिन सुभाषचन्द्र बोस ने भारतीय जनों को बर्मा में अपने बलिदान के लिए पुकारा, उस दिन लोगों को खून का महत्व ज्ञात हुआ था। उन्होंने लोगों को पुकार करके कहा कि तुम्हें स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए बलिदान करने होंगे। अब तक तुमने पराधीनता में बहुत समय तक जीवन बिता लिया है। लेकिन अब पराधीनता को समाप्त करने के लिए तुम्हें मृत्यु स्वीकार करनी होगी।

(3) आजादी के चरणों में,
जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूंथी जाएगी।
आजादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है।

शब्दार्थ-सौदा = सामान, व्यापार। सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-आजादी प्राप्त करने के लिए शीश कटाना होता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि स्वतन्त्रता देवी के चरणों में वह जयमाला अर्पित की जाएगी, जिसे तुम्हारे (देशवासियों के) शीशों रूपी फूलों से गूंथा जाएगा। तुम्हें ध्यान रखना चाहिए कि यह आजादी की लड़ाई कभी भी पैसों के आधार पर नहीं लड़ी जा सकती। यह तो सिर कटाने का सौदा है (व्यापार है)। इस सिर कटाने के सौदे को नंगे सिर ही झेलना पड़ता है।

(4) आजादी का इतिहास कहीं
काली स्याही लिख पाती है ?
इसके लिखने के लिए खून
की नदी बहाई जाती है।”
यूँ कहते-कहते वक्ता की
आँखों में खून उतर आया।
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उछा
दमकी उनकी रक्तिम काया।

शब्दार्थ-वक्ता = कहने वाला।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-आजादी को प्राप्त करने की लड़ाई काली स्याही से नहीं, वरन् खून की लाल स्याही से ही लिखी जाती है।

व्याख्या-कवि सुभाषचन्द्र बोस के उद्बोधन को स्पष्ट करता है कि आजादी की यह लड़ाई कभी भी काली स्याही से नहीं लिखी जाती है। इसके लिए खून की लाल स्याही की जरूरत पड़ती है। इस स्याही को पाने के लिए युद्ध क्षेत्र में खून की नदी बहानी पड़ती है। ऐसा कहते-कहते कहने वाले सुभाषचन्द्र बोस की आँखों में खून उतर आया अर्थात् क्रोध अपनी सीमा से ऊपर बढ़ने लगा। उनका मुख लाल पड़ गया और चमकने लगा। उनके लालवर्ण के शरीर की कान्ति दमकने लगी।

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(5) आजानु-बाहु ऊँची करके,
वे बोले, “रक्त मुझे देना।
इसके बदले में भारत की
आजादी तुम मुझसे लेना।”
हो गई सभा में उथल-पुथल,
सीने में दिल न समाते थे।
स्वर इन्कलाब के नारों के
कोसों तक छाए जाते थे।

शब्दार्थ- आजानुबाहु = घुटने तक लम्बे हाथ। इन्कलाब = परिवर्तन।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-सुभाष बाबू ने अपनी लम्बी भुजाओं को उठाकर लोगों का आह्वान किया कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।

व्याख्या-सुभाषचन्द्र बोस ने घुटनों तक लम्बी बाहों को ऊपर उठाते हुए लोगों को पुकारते हुए कहा कि आप मुझे रक्त दो, इसके बदले, मैं तुम्हें भारत देश की आजादी दूंगा। ऐसा कहते ही सभा में उथल-पुथल मच गई। प्रत्येक व्यक्ति के सीने में दिल नहीं समा सके (वे सभी उत्साह से भरे थे)। परिवर्तन के नारों के स्वर कोसौं तक आए हुए सुनाई दे रहे थे।

(6) “हम देंगे, देंगे खून”.
शब्द बस यही सुनाई देते थे।
रण में जाने को युवक खड़े
तैयार दिखाई देते थे।
बोले सुभाष, “इस तरह नहीं,
बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज, है कौन यहाँ
आकर हस्ताक्षर करता है?

शब्दार्थ-रण = युद्ध के मैदान में। सरता है = पूरा होता है।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-सुभाष चन्द्र बोस के आह्वान पर लोग अपना खून देने को तैयार हो गए।

व्याख्या-वहाँ सभास्थल पर लोगों के स्वर निकल पड़े कि हम खून देंगे। चारों और यही स्वर गूंज रहा था। युद्ध क्षेत्र में जाने के लिए अनेक युवक खड़े दीख पड़ रहे थे। सुभाष ने कहा कि इस तरह की बातें करने से कभी भी कोई मतलब पूरा नहीं होता। यह कागज लीजिए और यहाँ आकर कौन-कौन दस्तखत करता है? अर्थात दस्तखत कीजिए।

(7) इसको भरने वाले जन को
सर्वस्व-समर्पण करना है।
अपना तन-मन-धन-जन जीवन
माता को अर्पण करना है।
पर यह साधारण पत्र नहीं,
आजादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का
कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है।

शब्दार्थ-अर्पण करना है = त्यागना है। परवाना = आदेश भरा पत्र। उज्ज्वल = उजला।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-आजादी प्राप्त करने के लिए हस्ताक्षर युक्त यह महत्वपूर्ण आदेश है।

व्याख्या-इस असाधारण पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपना सर्वस्व त्याग करना है (प्राण निछावर करने के लिए तैयार रहना है)। भारत माता की आजादी के लिए तुम सभी को अपना तन, मन, धन तथा जीवन का समर्पण करना है। तुम्हें ध्यान रखना चाहिए कि यह कोई साधारण पत्र नहीं है, यह निश्चित रूप से आजादी का आदेश भरा पत्र है। इस पत्र पर तुम्हें अपने शरीर का उजला खून गिराना है। अर्थात् आजादी के लिए खून देना होगा।

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(8) वह आगे आए, जिसके तन में
भारतीय खू बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को
हिन्दुस्तानी कहता हो।
वह आगे आए, जो इस पर
खूनी हस्ताक्षर देता हो।
मैं कफन बढ़ाता हूँ, आए
जो इसको हँसकर लेता हो।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-सुभाष बाबू ने खून के हस्ताक्षर करने को पत्र आगे बढ़ाया।

व्याख्या-कवि कहता है कि इस पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए वही आगे बढ़ कर आये, जिसमें भारतीयता का खून हो और जो अपने आप को हिन्दुस्तानी कहने में गर्व का अनुभव करता हो। इस पत्र पर खून से हस्ताक्षर करने वाला ही आगे बढ़कर आये। उसके लिए यह कागज का पत्र नहीं, यह तो कफन है। इसे प्राप्त करने के लिए वही आगे बढे, जो हँस-हँस कर इसे ग्रहण करने में अपना गौरव अनुभव करता हो।

(9) सारी जनता हुँकार उछी
“हम आते हैं, हम आते हैं।
माता के चरणों में यह लो,
हम अपना रक्त चढ़ाते हैं।”
साहस से बढ़े युवक उस दिन,
देखा, बढ़ते ही आते थे।
चाकू-छुरी कटारों से,
वे अपना रक्त गिराते थे।

शब्दार्थ-सारी जनता = सभी लोग। सन्दर्भ = पूर्व की तरह।

प्रसंग-सुभाष के आह्वान पर लोग अपना बलिदान करने के लिए आगे ही आगे बढ़ते चले।

व्याख्या-सभी लोग जो सभास्थल पर मौजूद थे, हुँकार भरकर कहने लगे कि हम भारत माता की आजादी के लिए खून देने को आ रहे हैं। भारत की स्वतन्त्रता की देवी के चरणों में हम अपना रक्त चढ़ाने के लिए तत्पर हैं, जितना चाहते हो, ले लीजिए। युवकों में साहस था। सभी युवक उस दिन साहसपूर्वक आगे-ही-आगे बढ़ते आ रहे थे। वे सभी अपने शरीर से चाकुओं से, छुरियों से तथा कटारों से अपना रक्त गिरा रहे थे। अर्थात् अपना सर्वस्व देने में उन्हें कोई कष्ट नहीं हो रहा था (वे आजादी की वेदी पर अपना रक्त चढ़ाने के लिए तत्पर थे।)

(10) फिर उसी रक्त की स्याही में,
वे अपनी कलम डुबाते थे।
आजादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे।
उस दिन तारों ने देखा था,
हिन्दुस्तानी विश्वास नया।
जब लिखा महारणवीरों ने
खू से अपना इतिहास नया।

शब्दार्थ-परवाना = आदेश-पत्र सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-रक्त में अपनी कलम डुबाते हुए देशभक्त युवकों ने आजादी के परवाने पर खून से हस्ताक्षर कर दिये।

व्याख्या-अपने शरीर के रक्त की स्याही में कलम डुबाते हुए आजादी के उस परवाने पर सभी युवकों ने हस्ताक्षर कर दिए। उस दिन आकाश में तारों ने देखा कि हिन्दुस्तानी लोग विश्वसनीय होते हैं। उस समय रणबांकुरे भारतीय वीरों ने अपने खून से नया इतिहास लिख डाला।

MP Board Class 6 Hindi Question Answer

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन (डॉ. छाया पाठक)

कर्त्तव्य पालन अभ्यास प्रश्न

कर्त्तव्य पालन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश कव दिया था?
उत्तर
अर्जुन जब श्रीकृष्ण के साथ युद्धभूमि में आया तो उसने वहाँ अपने भाई, दादा, पड़दादा, गुरु आदि देखे। यह देखकर उसका मन युद्ध से हट गया। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया।

प्रश्न 2.
श्यामपट्ट में हमे चित्र में कौन-कौन दिखाई दे रहे थे?
उत्तर
गुरु जी ने कक्ष के श्यामपट्ट पर एक चित्र टाँगा। उस चित्र में युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण और अर्जुन दिखाई दे रहे थे।

प्रश्न 3.
कृष्ण का अभिनय करने वाले छात्र का क्या नाम था? उत्तर-कृष्ण का अभिनय करने वाले छात्र का नाम सात्विक था। रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।
(क) तेरा यह आचरण किसी ………………………..पुरुष का आचरण नहीं है।
(ख) आपने मेरे मन से अज्ञानरूपी अंधकार का नाश कर ज्ञान रूपी ………….फैलाया है।
उत्तर
(क) तेरा यह आचरण किसी श्रेष्ठ पुरुष का आचरण नहीं है।
(ख) आपने मेरे मन से अज्ञानरूपी अंधकार का नाश कर ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाया है।

कर्त्तव्य पालन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्जुन करुणा से क्यों भर उठते हैं?
उत्तर
अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है कि केशव, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दीजिए। श्रीकृष्ण ऐसा ही करते हैं। वे रथ को लाकर दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर देते हैं। अर्जुन दोनों ओर दृष्टि डालते हैं। देखते हैं कि जिनके साथ उसने युद्ध लड़ना है उनमें उसके ताऊ, दादा, मामा, भाई, पुत्र और पौत्र मित्र, गुरु व सहृदय हैं। उन्हें देखकर उनका मन करुणा से भर उठता है कि आज उन्हें अपने प्रियजनों के साथ युद्ध करना है, जिन्हें वे अपने प्रिय स्वजन समझते हैं अतः उसका हृदय करुणा से भर उठता है।

प्रश्न 2.
अपने स्वजनों को युद्धभूमि में देखकर अर्जुन की क्या दशा हुई?
उत्तर
अर्जुन ने देखा कि युद्ध-भूमि में शत्रपक्ष के रूप में वे वीर उपस्थित हैं जिनके या तो वे सदा चरण स्पर्श करता आया है अथवा उन्हें प्रिय कहता आया है। अपने प्रियजनों को वह उन्हें शुभ-अशीष देता आया है। यह देखकर उसका मन युद्ध से अलग हो गया। उसने श्रीकृष्ण से कहा कि अपने प्रियजनों को देखकर मेरा मुख सूखा जा रहा है। मेरे शरीर कांपने लगा है। शरीर के रोएं-रोएं खड़े हो उठे हैं। हाथ से गाण्डीव गिरा जा रहा है। मेरा मन भ्रमित हो रहा है। मुझमें यहाँ खड़े होने की शक्ति नहीं है। इसलिए मैं युद्ध नहीं करना चाहता।

प्रश्न 3.
अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था?
उत्तर
अर्जुन के मन में मोह उत्पन्न हो गया था। वह सोचने लगा था कि जिनके ‘साथ उसने युद्ध करना है वे तो उसके या तो आदरणीय हैं या प्रियजन है। उनका युद्ध में वध करने से पाप लगेगा। अगर युद्ध कर भी लिया तो इसका फल भी उसे कुछ नहीं मिलने वाला है। इसलिए उसने युद्ध में अपना कर्त्तव्य निभाने से इंकार । कर दिया।

प्रश्न 4.
हम सुख-दुख के बंधन से मुक्त कैसे हो सकते हैं?
उत्तर
हमें सुख और दुख में सदैव समान रहना चाहिए। न सुख में अधिक उत्साहित होना चाहिए और न दुख में अत्यधिक व्याकुल ही। ये दोनों समान तत्त्व हैं। जब हम इन्हें समान मानेंगे तब हम इसके बंधन से मुक्त हो जाएंगे। न तो सुख मिलने पर अधिक प्रसन्न होंगे और न ही दुख आने पर ज्यादा दुखी ही। इस उपाय से हम सुख और दुख के बंधन से मुक्त हो सकते हैं।

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प्रश्न 5
पाप-पुण्य के भ्रम से निकलने के लिए गुरु जी ने क्या उपाय बताया?
उत्तर
एक शिष्य ने पूछा था कि पाप और पुण्य के भ्रम में क्यों नहीं पड़ना चाहिए। गुरु जी ने उस शिष्य को इस भ्रम से निकलने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी कमरे में लंबे समय से अंधकार छाया है, किंतु जैसे ही उसमें प्रकाश किया जाता है तो अँधकार स्वयं दूर हो जाता है उसी प्रकार पहले किए पापों का अँधेरा पुण्य के एक कार्य से दूर हो जाता है। इसीलिए कहा है कि पाप और पुण्य के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। प्रश्न-निम्नलिखित पंक्तियों का

कर्त्तव्य पालन अर्थ लिखकर अपने शब्दों में लिखिए

(क) “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
(ख) सुख और दुख दोनों ही हमें बंधन में डालते हैं।
उत्तर
(क) यह श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय का सैंतालीसवां श्लोक है। इसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है कि तुझे केवल कर्म यानी
अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। यह चिंता ही मत कर कि तुझे इस कर्म का ‘कोई फल मिलेगा भी या नहीं। यह बात ठीक उसी तरह है जिस तरह वृक्ष को लगाने वाला उसके फल नहीं खाता। वह तो केवल कर्म या अपना कर्तव्य करता है। यह । अलग बात है कि उसके लगाए वृक्ष पर आए फल अन्य खाता है। अतः फल की चिंता मत कर केवल कर्म अर्थात् कर्त्तव्य कर।

(ख) हमें सुख और दुख बंधन में बाँध देते हैं। जब सुख आता है तो हमारी भरसक कोशिश होती है कि यह हमसे दूर न जाए। हम उसे अपनी ओर करने की पूरी कोशिश करते हैं। दुख चाहे हमारे पास अभी फटका भी न हो पर हम इसलिए चिंतित हो उठते हैं कि कहीं आ न जाए। इसलिए कहा गया है कि सुख और दुख दोनों ही हमें बंधन में डालते हैं। इससे बचने का एक ही उपाय है कि इन दोनों स्थितियों में समान रहो।

कर्त्तव्य पालन भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
शुद्ध वर्तनी छाँटिए :
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 1
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 2

प्रश्न 2.
दी गई वर्ग पहली में से नीचे दिए गए शब्दों के विलोम शब्द छाँटिए :
अंधकार, कर्म, निश्चित, लाभ, बंधन, ज्ञान, पुण्य।
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 3
उत्तर
वर्ग पहेली से विलोम शब्द :
अंधकार – प्रकाश
कर्म – अकर्म
निश्चित – अनिश्चित
लाभ – हानि
बंधन – मुक्त
ज्ञान – अज्ञान
पुण्य – पाप

प्रश्न 3.
एकांकी में आए योजक चिह वाले शब्दों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर
योजक चिह्न वाले शब्द :
धर्म – अधर्म
सुख – दुख
जय – पराजय
सुख – दुख
क्या – क्या
निश्चय – अनिश्चय
कर्म – अकर्म
बंधु – बांधवों
लाभ – हानि
मोह – माया
पाप – पुण्य

प्रश्न 4.
दिए गए सामासिक पदों का विग्रह कीजिए–
पितृभक्त, सूत्रधार, सत्यवादी, युद्धारंभ, भगतवद्गीता।
उत्तर
सामासिक पदों का विग्रह
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 8

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 4

प्रश्न 5.
दिए गए शब्दों में से तत्सम एवं तद्भव शब्द छाँटकर लिखिए :
वृक्ष, इच्छा, कर्त्तव्य, नमस्ते, सच, माता, अभिनय, मुँह
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 5

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प्रश्न 6.
‘ही’ निपात के प्रयोग वाले वाक्य एकांकी से छाँटकर लिखिए।
उत्तर
ही निपात का प्रयोग वाले शब्द :

  1. क्योंकि इस विषय में तू व्यर्थ ही शोक कर रहा है।
  2. युद्ध में अपने ही स्वजन का वध कर मुझे क्या मिलेगा?
  3. सुख और दुःख दोनों ही हमें बंधन में डालते हैं।
  4. जैसे ही उसमें प्रकाश किया जाता है अँधेरा अपने आप दूर हो जाता है।
  5. जब फल की इच्छा ही नहीं होगी तो हम कर्म क्या करेंगे?
  6. और न ही हमें उसके फल खाने को मिलते।
  7. गुरु जी आपने हमें बहुत ही अच्छी बातें बताईं।

प्रश्न 7.
ईय प्रत्यय लगाकर शब्द बना है पूजनीय। इसी प्रकार के पाँच अन्य शब्द लिखिए।
उत्तर
ईय प्रत्यय लगकर बनने वाले शब्द :
नंदनीय – पाठनीय
दर्शनीय – विजातीय
आदरणीय –

कर्त्तव्य पालन योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अंश का शाला के वार्षिकोत्सव में वेशभूषा सहित अभिनय कीजिए।
उत्तर
विद्यार्थी भगवद्गीता के इस अंश का अभिनय पाठशाला में अपने कक्षा शिक्षक की सहायता से करे।

प्रश्न 2.
कर्तव्य पालन से संबंधित महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग कक्षा में सुनाइए।
उत्तर
प्रेरक प्रसंग
स्वामी रामकृष्ण परम हंस के पास स्वामी विवेकानंद सिद्धि प्राप्त करने के लिए गए। परमहंस ने कहा कि क्या तुम ऐसी सिद्धि प्राप्त करना चाहते हो जैसे बिना
नाव के नदी पार करना। स्वामी जी ने हाँ में उत्तर दिया। इस पर स्वामी जी हंसे और उनसे कहा कि इसके लिए सिद्धि की क्या आवश्यकता है? नदी को किसी भी नाविक को एक पैसा देकर पार किया जा सकता है। स्वामी जी को सिद्धि का मूल्य पता चल गया। तब उन्होंने कभी भी किसी को सिद्धि प्राप्त करने के लिए नहीं कहा। यह कथा प्रेरक है। हमें प्रेरित करती है कि किसी भी वस्तु की प्राप्ति के लिए पहले उसकी अच्छी तरह उपादेयता जान लेनी चाहिए।

प्रश्न 2.
कर्मण्येवाधिकारस्ते……. जैसे अन्य शिक्षाप्रद श्लोक लिखकर कक्षा में छाँटिए।
उत्तर
शिक्षप्रद श्लोकः

1. श्रेयान्द्रव्यमयाद् यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तपः
सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय चार, 32 वां श्लोक।)
अर्थः हे परंतप अर्थात् अर्जुन! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ अन्ततोगत्वा सारे कर्मयज्ञों का अवसान दिव्य ज्ञान में होता है।

2. गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्
जन्ममृत्युजरादुःखैविर्मुक्तोऽमृतमश्नुते।।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय चौदहवां, 20 वां श्लोक।)
अर्थ : जब देहधारी जीव भौतिक शरीर से सम्बद्ध इन तीनों गुणों को लाँघने में समर्थ होता है तो वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा तथा उनके कष्टों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में अमृत का भोग कर सकता है।

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे।।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय अठारह, तीसरा श्लोक।)
अर्थः समस्त प्रकार के सकाम कर्मों को दोषपूर्ण समझ कर त्याग देना चाहिए। किंतु अन्य विद्वान् मानते हैं कि यज्ञ, दान और तपस्या के कर्मों को कभी नहीं त्यागना चाहिए।

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प्रश्न 3.
श्रीमद्भगवद्गीता के अन्य अध्यायों की विषयवस्तु पर कक्षा में शिक्षक से चर्चा कीजिए।
उत्तर
श्रीमद्भगवद्गीता में अठारह अध्याय हैं। पहले अध्याय में कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण है। दूसरे अध्याय में गीता का सार है। तीसरे अध्याय में कर्मयोग पर विचार है। चौथे अध्याय में दिव्य ज्ञान है। पाँचवें अध्याय में कर्म योग-कृष्णभावनाभावित कर्म है। छठे अध्याय में ध्यान योग है। सातवें अध्याय में भगवद्वान है। आठवें अध्याय में भगवत प्राप्ति है। नवें अध्याय में परम गुह्य ज्ञान है। दसवें अध्याय में श्रीभगवान् का ऐश्वर्य है। ग्यारहवें अध्याय में विराट रूप है। बारहवें अध्याय में भक्ति योग है। तेरहवें अध्याय में प्रकृति पुरुष व चेतना है। चौदहवें अध्याय में प्रकृति के तीन गुण कहे गए हैं। पंद्रहवें अध्याय में पुरुषोत्तम योग है। सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी स्वभाव है। सत्रहवें अध्याय में श्रद्धा के विभाग हैं और अठारहवें अध्याय में उपसंहार संन्यास की सिद्धि है।।

कर्त्तव्य पालन परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गुरु जी ने श्यामा से क्या प्रश्न किया?’
उत्तर
गुरु जी ने श्यामा से पूछा कि राजा हरिश्चंद्र के सत्य की रक्षा के करने में उनका साथ किसने दिया था?

प्रश्न 2.
रोहित ने गुरु जी से अर्जुन के संबंध में क्या जिज्ञासाएँ प्रकट की?
उत्तर
रोहित ने गुरु जी से जिज्ञासा प्रकट की कि अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहते थे? वे डर गए थे या उन्हें युद्ध करना अच्छा नहीं लगता था।

प्रश्न 3.
रोहिणी ने नाटक से क्या शिक्षा ली?
उत्तरः
रोहिणी ने नाटक से शिक्षा ली कि सुख और दुखं और लाभ और हानि एक समान हैं।

कर्त्तव्य पालन रिक्त स्थानों की पूर्तिः

(क) युद्ध के मैदान में तो ……..होता है, फिर ये बातचीत ……………
(ख) …..दोनों सेनाओं की ओर दृष्टि डालता है।
उत्तर
रिक्तों स्थानों की पूर्ति
(क) युद्ध के मैदान में तो युद्ध होता है, फिर ये बातचीत.
(ख) अर्जुन दोनों सेनाओं की ओर दृष्टि डालता है।

कर्त्तव्य पालन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यार्थियों ने गुरु जी को पिछले पाठों के बारे में क्या बताया?
उत्तर
गुरु जी ने शिष्यों से पूछा कि अच्छा बताओ कि कल हमनें क्या पढ़ा था? इस पर वैदेही ने बताया कि गुरु जी कल आपने हमें सत्यवादी हरिश्चंद्र की कहानी सुनाई थी। फिर उन्होंने अशोक से पूछा कि श्रवण कुमार माता पिता को कहाँ ले गए थे? इसका उत्तर उसने दिया कि श्रवणकुमार अपने माता-पिता को तीर्थाटन के लिए ले गए थे। उन्होंने श्यामा से पूछा कि राजा हरिश्चंद्र के.सत्य की रक्षा करने में उनका साथ किसने दिया, इस पर उसने उत्तर दिया कि उनकी पत्नी ने।

प्रश्न 2.
छात्रों के मन की अर्जुन संबंधी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए गुरु जी ने क्या किया?
उत्तर
छात्रों के मन में अर्जुन के संबंध में अनेक प्रकार की जिज्ञासाएँ उठ रही थीं। गुरु जी ने उनकी इन जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश के अभिनय का विचार किया। यह अभिनय श्रीकृष्ण और अर्जुन से संबंधित था।

प्रश्न 3.
नाटक में किन छात्रों ने किन पात्रों का अभिनय किया?
उत्तर
नाटक में प्रमुख पात्र थे श्रीकृष्ण और अर्जुन । इन दोनों पात्रों का अभिनय क्रमशः सात्विक और सिद्धार्थ ने किया। नाटक में क्योंकि एक सूत्रधार की भी आवश्यकता होती है। इसलिए इस पात्र का अभिनय अशोक ने किया। कक्षा के अन्य छात्रों को दो भागों में विभाजित कर दिया गया। एक भाग कौरवों की सेना हो गया और दूसरा भाग पांडवों की।

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प्रश्न 4.
नाटक आरम्भ होते ही सबसे पहले मंच पर कौन पात्र आया, उसने क्या कहा?
उत्तर
नाटक आरम्भ होते ही मंच पर सबसे पहले सूत्रधार ने प्रवेश किया। इस पात्र का अभिनय अशोक ने किया। उसने मंच पर आकर यह संवाद बोला : “आज मैं धर्म-अधर्म, निश्चय-अनिश्चय, सुख-दुख, कर्म-अकर्म आदि की ओर संकेत करने वाले एक ऐसे प्रसंग से आपका साक्षात्कार कराने जा रहा हूँ जिसने श्रीमद्भगवद्गीता को जन्म दिया। कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव और पाण्डव की सेनाएँ युद्ध के लिए आमने-सामने खड़ी हैं। युद्धारंभ का शंखनाद हो चुका है।”

प्रश्न 5.
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से युद्ध न करने का क्या कारण बताया?
उत्तर
अर्जुन ने देखा कि जिनके साथ युद्ध करना है वे उसके आदरणीय या प्रियजन हैं। बंधु-बांधवों पर विजय प्राप्त करने का उसका विचार बदल गया। उसने कहा कि मैं न तो सगे-संबंधियों से युद्ध कर विजय प्राप्त करना चाहता हूँ और न ही राज्य का उपभोग करना चाहता हूँ। मैं तो जैसे रहता आया हूं वैसे ही रहूँगा। चाहे मुझे तीनों लोकों का राज्य क्यों न मिल जाए, मैं अपने सगे-संबंधियों को युद्ध में मारकर पाप अर्जित नहीं करूँगा।

कर्त्तव्य पालन भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से शुद्धों शब्दों का चयन कीजिए।
माध्यावकाश, अभीवादन, हरिश्चन्द्र, उपदेस, सहमती, अभीनय, सेनओं,
आचरण, कुंतीपुत्र, माधव, संशय, सामन, अतित
उत्तर
शुद्ध शब्दों का चयनः
हरिश्चंद्र – आचरण
कुंतीपुत्र – माधव
संशय।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए :
कल, युद्ध, सहमति, अधर्म, अनिश्चय, सत्य, आचरण, मृत्यु।
उत्तर
विलोम शब्द
शब्द – विलोम
कल – आज
सहमति – असहमति
अधर्म – धर्म
अनिश्चय – निश्चय
सत्य – असत्य
आचरण – दुराचरण
मृत्यु – जीवन

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प्रश्न 3
निम्नलिखित शब्दों के उपसर्ग बताइए।
अभिवादन, अभिनय, प्रसंग, असमय, विजय ।
उत्तर
उपसर्ग :
अभिवादन : अभि उपसर्ग वादन शब्द
अभिनय : अभि उपसर्ग नय शब्द
प्रसंग : प्र उपसर्ग संग शब्द
असमय : अ उपसर्ग समय शब्द
विजयः वि उपसर्ग जय शब्द

प्रश्न 4.
निम्नलिखित समासों का विग्रह कीजिए और नाम भी बताइए।
माता-पिता, असमय, कुरुक्षेत्र, प्रियजन, रणभूमि ।
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 6

प्रश्न 5.
आई प्रत्यय लगाकर पांच शब्दों का निर्माण कीजिए।
उत्तरः
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 21 कर्त्तव्य पालन img 7

प्रश्न 6.
पाठ में आए पांच तत्सम शब्दों का चयन कीजिए।
उत्तर
पाँच तत्सम शब्द :
सत्यवादी, वार्तालाप, उपदेश, सम्बन्धित, धनुष ।

कर्त्तव्य पालन एकांकी का सारांश

प्रश्न
डॉ. छाया पाठक लिखित एकांकी ‘कर्त्तव्य पालन’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ एकांकी में एकांकीकार ने विद्यार्थियों को बिना फल की चिंता किए कर्म करने की प्रेरणा दी है। संसार में रहते हुए मन में तरह-तरह के विकार आ जाते हैं। जैसे- सुख-दुख, पाप-पुण्य, राग-द्वेष आदि। हमें इनकी चिंता न करते हुए केवल कर्त्तव्य निभाने की ओर ध्यान देना चाहिए। इसके अतिरिक्त इस एकांकी में अर्जुन के मोह का वर्णन भी किया गया है। वह सगे-संबंधियों के मोह-जाल में फंसे रहने के कारण अपने कर्तव्य से हट गया है। स्वजनों पर अस्त्र-शस्त्र न चलाने का निर्णय कर बैठा है।

इस एकांकी के दो दृश्य हैं : दोनों दृश्य विद्यार्थियों के कक्ष से आरम्भ होते हैं और कक्ष में ही समाप्त हो जाते हैं। ..
अंतर केवल यह है कि दूसरे दृश्य में कक्ष को ही मेज़-कुर्सी एक ओर लगाकर उन्हें मंच बना दिया जाता है।
कक्षा के दृश्य से एकांकी शुरू होती है। आधी छुट्टी के बाद हिंदी का घंटा शुरू होता है। कोई विद्यार्थी खेल में लंगा है तो कोई शरारत में जुटा है। कोई पुस्तक निकाल रहा है तो कोई आपस में बातचीत में लगा है।।

कक्षा में गुरु जी आते हैं। अभिवादन के बाद बच्चों से पूछते हैं कि कल क्या पढ़ा था। वैदेही बताती है कि कल आपने हमें सत्यवादी हरिश्चंद्र और श्रवणकुमार की कहानी सुनाई थी। गुरु जी अशोक से पूछते हैं कि श्रवणकुमार अपने माता-पिता को कहाँ ले जा रहा था? वह उत्तर देता है-तीर्थाटन के लिए। श्यामा से पूछते हैं कि सत्य की रक्षा करने में उनका साथ किसने दिया? श्यामा उत्तर देती है, उनकी पत्नी ने। गुरु जी उत्तर सुनकर बच्चों को शाबासी देते हैं।

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गुरु जी श्यामपट्ट यानी ब्लेक बोर्ड पर एक चित्र टाँगते हैं। चित्र में भगवान .श्री कृष्ण को अर्जुन को गीता का उपदेश देते दिखाया गया है। चित्र की तरफ संकेत करते हुए गुरु जी अशोक से पूछते हैं कि इस चित्र में कौन-कौन दिखाई दे रहे हैं और क्या कर रहे हैं? अशोक उत्तर देता है कि इसमें कृष्ण और अर्जुन बात कर रहे हैं। गुरु जी उसके उत्तर को सही बताते हैं। दूसरा प्रश्न करते हैं कि क्या तुम्हें पता है कि श्रीकृष्ण और अर्जुन में बातचीत युद्ध के मैदान में हुई थी? श्यामा हैरानी से पूछती है कि युद्धभूमि में तो युद्ध होता है, यह बातचीत क्यों हो रही है? गुरु जी उत्तर देते हैं-बिलकुल ठीक कहती हो श्यामा। अर्जुन जब युद्ध के मैदान से पीछे हटने लगा तो तब श्रीकृष्ण ने उसे कर्त्तव्य पर डटे रहने का उपदेश दिया था।

रोहित पूछता है कि अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था? क्या वह डर गया था? गुरु जी अर्जुन के युद्ध न करने के कारण पैदा होने वाली जिज्ञासाएँ शांत करने के लिए अपने छात्रों से श्रीमद्भगवद्गीता के एक हिस्से का अभिनय कराते हैं। वे कृष्ण का अभिनय करने के लिए सात्विक का चुनाव करते हैं, अर्जुन के अभिनय के लिए सिद्धार्थ को चुनते हैं। अशोक को सूत्रधार की भूमिका दी जाती है। शेष बच्चों को दो हिस्सों में बाँटकर कमवार कौरव व पाण्डव के सैनिक बना देते हैं।

सूत्रधार से एकांकी का दूसरा दृश्य आरम्भ होता है। सूत्रधार एकांकी आरम्भ करता है, ” आज मैं धर्म-अधर्म, निश्चय-अनिश्चय, सुख-दुख, कर्म-अकर्म आदि की ओर संकेत करने वाले एक ऐसे प्रसंग से आपका साक्षात्कार कराने जा रहा हूँ जिसने श्रीमद्भगवद्गीता को जन्म दिया। कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव और पाण्डव की सेनाएँ युद्ध के लिए आमने-सामने खड़ी हैं। युद्धारंभ का शंखनाद हो चुका है।”

एक तरफ सूत्रधार मंच से जाता है और दूसरी तरफ कृष्ण और अर्जुन का प्रवेश होता है। अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है कि मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दें ताकि मैं युद्ध के लिए बेचैन सैनिकों को निहार सकूँ। श्रीकृष्ण ऐसा ही करते हैं और अर्जुन से कहते हैं कि पार्थ युद्ध के लिए तैयार इन योद्धाओं को देख। अर्जुने युद्धभूमि में चारों ओर दृष्टि डालता है। देखता है कि चारों ओर उसके भाई, ताऊ, मामा, पुत्र, मित्र, गुरु आदि युद्ध के लिए खड़े हैं। उन्हें देखकर पार्थ अर्थात् अर्जुन की करुणा से भर उठता है। श्री कृष्ण से स्पष्ट शब्दों में कहता है कि मुझे अपने प्रियजनों से युद्ध करना होगा, इसलिए मैं युद्ध नहीं करूँगा। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तेरे मन में यह असमय मोह कैसे पैदा हो गया? तेरा यह आचारण श्रेष्ठ योद्धा का नहीं है। इससे तेरा यश भी नहीं बढ़ने वाला। अर्जुन उत्तर देता है कि मैं अपने सगे-संबंधियों का युद्ध में संहार कर विजय नहीं चाहता। मुझे राज्य की भी इच्छा नहीं है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं। इस संसार में जो भी आया है उसकी मृत्यु निश्चित है। मृत्यु के बाद फिर नया जन्म मिलता है। ऐसे में तेरा शोक व्यर्थ है। अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है कि तीनों लोकों का राज्य भी मिल जाए तब भी अपने प्रिय संबंधियों का संहार कर राज्य प्राप्त करने की इच्छा नहीं करूँगा। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि तू पाप-पुण्य में क्यों पड़ गया है? अगर युद्ध में मारा गया तो तुझे स्वर्ग मिलेगा और विजयी हुआ तो पृथ्वी का राज्य।

अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछता है कि मैं अपने आदरणीय भीष्म व गुरु द्रोणाचार्य से युद्ध नहीं कर सकता। इन्हें मारकर मेरा कल्याण नहीं हो सकता और न सुखी रह सकता हूँ। श्रीकृष्ण उसे ऐसा सब कुछ सोचने से मना करते हैं। उससे यही कहते हैं कि तू जय-पराजय, जनम-मरण, हानि-लाभ को समान समझ और केवल युद्ध कर। कुछ अन्य न सोच। तू केवल कर्म कर। उसके फल की चिंता न कर।

श्रीकृष्ण का उपदेश उसे चिंतामुक्त कर देता है। उनसे कहता है कि आज – आपने मेरे मन से अज्ञान का अंधकार समाप्त कर दिया है। मेरा मोह नष्ट हो गया
है। मेरा मन संशयहीन हो गया है। अब मैं युद्ध करूँगा। अर्जुन का संवाद सुनकर सब बच्चे खुश होकर गुरु जी के साथ तालियाँ बजाते हैं। गुरु जी बच्चों से पूछते हैं कि इस एकांकी से तुम्हें क्या शिक्षा मिली? रोहिणी

उत्तर देती है कि हमें सुख और दुख में समान रहना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही हमें बंधन में डालते हैं। अशोक कहता है कि पाप और पुण्य के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। गुरु जी विद्यार्थियों का उत्तर सही मानते हैं और उनसे कहते हैं कि बिलकुल ठीक, हमें सुख-दुख, हानि-लाभ में समान रहना चाहिए और इसलिए रहना चाहिए कि सुख और दुख दोनों ही हमें बंधन में बाँध देते हैं।

रोहिणी के पूछने पर गुरु जी बताते हैं कि सुख मिलने पर हम चिंता करते हैं कि कहीं यह हमसे छिन न जाए, और दुःख न होने पर चिंता करते हैं कि कहीं यह आ न जाए। यही बंधन है जिससे हम मुक्त नहीं हो पाते। नकुल उनसे पूछता है कि हमें पाप और पुण्य के भ्रम में क्यों नहीं पड़ना चाहिए, गुरु जी कहते हैं, “मान लो कि किसी कमरे में बहुत लंबे समय से अंधेरा है किंतु जैसे ही उसमें प्रकाश किया जाता है तो अँधेरा अपने आप दूर हो जाता है, उसी प्रकार अतीत में किए गए पापों का अँधेरा पुण्य के एक ही कार्य से दूर हो जाता है।”

सिद्धार्थ गुरु जी से अपने मन का भ्रम दूर करना चाहता है। वह उनसे पूछता है कि अर्जुन को श्रीकृष्ण ने यह क्यों कहा कि केवल कर्त्तव्य कर, फल की चिंता मत कर। जब फल की इच्छा ही न होगी तो हम कर्म क्यों करेंगे? गुरु जी सिद्धार्थ की इस शंका का उत्तर एक उदाहरण से देते हैं। हम फल मेवे आदि तो खाते हैं जबकि जिन पर वे हुए, उन्हें हमने नहीं लगाया। अगर कोई व्यक्ति यह सोचे कि मैं तभी वृक्ष लगाऊँगा, जब इसके फल व मेवे मुझे खाने को मिलेंगे, तब तो कोई भी वृक्ष नहीं लगाता और न ही उसके फल उसे खाने को मिलते। इसीलिए सभी को अपना कर्त्तव्य करना चाहिए।

कर्त्तव्य पालन प्रमुख स्थलों की सप्रसंग व्याख्या

1. आज मैं धर्म-अधर्म, निश्चय-अनिश्चय, सुख-दुख, कर्म-अकर्म आदि की ओर संकेत करने वाले एक ऐसे प्रसंग से आपका साक्षात्कार कराने जा रहा हूँ जिसने ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ को जन्म दिया। कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव और पाण्डव की सेनाएं युद्ध के लिए आमने-सामने खड़ी हैं। युद्धारंभ का शंखनाद हो चुका है।”

शब्दार्थ : सूत्रधार = नाटक या एकांकी का वह पात्र, जो मंच से दर्शकों को . जोड़ता है। इसे नाट्यशाला या रंगमंच का व्यवस्थापक भी कहा जाता है। संकेत = इशारा। साक्षात्कार = सामना, मिलना। श्रीमद्भगवद्गीता = भारतीयों की धार्मिक पुस्तक। इसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मोह को समाप्त कर उसे कर्म करने का उपदेश दिया है। कुरुक्षेत्र = वह स्थान जहाँ प्रसिद्ध महाभारत का युद्ध हुआ। आजकल यह स्थान हरियाणा में है। युद्धारंभ्भ = युद्ध का आरम्भ। शंखनाद = शंख की आवाज़। पुराणकाल में युद्ध आरंभ करने से पूर्व शंख की आवाज की जाती थी। इसे ही शंखनाद कहा जाता है।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। इसमें सूत्रधार एकांकी को दर्शकों से जोड़ रहा है। सूत्रधार दर्शकों से कहता है कि आज मैं आपको उस प्रसंग से परिचित करा रहा हूँ जिससे श्रीमद्भगवद्गीता का जन्म हुआ। वह इसमें कौरवों व पांडवों के युद्ध के लिए तैयार होने की भी सूचना देता है।

व्याख्या : मैं इस एकांकी का सूत्रधार हूँ। मैं आपको एक ऐसा प्रसंग अभिनय के द्वारा दिखाना चाहता हूँ जो इस ओर संकेत करता है कि पाप और पुण्य क्या है? इन दोनों में क्या अन्तर है? धर्म किसे कहते हैं और अधर्म किसे? निश्चय और अनिश्चय में क्या अंतर है? सुख और दुख किसे कहते हैं? ये ऐसे प्रश्न थे जिसके कारण श्रीमद्भगवद्गीता का जन्म हुआ। कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर सेनाएँ एकत्र हैं। एक ओर पांडवों की है और दूसरी ओर कौरवों की। दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। युद्ध आरम्भ होने वाला है क्योंकि इसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने पुंडरीक नाम के शंख को बजा दिया है।

विशेष-

  1. इस एकांकी के संवाद में सूत्रधार शब्द पारिभाषिक शब्द है। यह नाटक में उस पात्र के लिए प्रयोग किया जाता है जो रंगमंच का व्यवस्थापक होता है। यही नाटक आरम्भ होने की सूचना देता है। ‘कर्तव्य पालन’ एकांकी में सूत्रधार का काम कक्षा का एक छात्र अशोक कर रहा है।
  2. इस संवाद में विलोम शब्दों का प्रयोग है जैसे धर्म-अधर्म, निश्चय-अनिश्चय। सुख-दुखें, कर्म-अकर्म।
  3. प्रसंग का अर्थ है संबंध। यहाँ अर्थ है संवाद का पहला अंश।
  4. श्रीमद्भगवद्गीता। यह भारतीयों का परमपावन ग्रंथ है। यह महाभारत के भीष्म पर्व का अंश है। इसमें श्रीकृष्ण ने मोह में फँसे अर्जुन को कर्त्तव्य के लिए तत्पर होने का उपदेश या संदेश दिया है।
  5. कुरुक्षेत्र वह स्थान है जहाँ कौरवों व पाण्डवों का युद्ध हुआ। आजकल यह स्थान हरियाणा प्रदेश में है।
  6. भाषा सरल, प्रवाहमय और भावानुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) सूत्रधार किस प्रसंग से दर्शकों का साक्षात्कार कराने जा रहा है?
(ii) श्रीमद्भगवद्गीता का जन्म किस प्रसंग ने दिया?
(iii) इस संवाद के किस वाक्य से पता चलता है कि युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व की सूचना दी जा चुकी है?
उत्तर
(i) सूत्रधार एक ऐसे प्रसंग से दर्शकों का साक्षात्कार कराना चाहता है जो धर्म और अधर्म, निश्चय और अनिश्चय, सुख और दुख एवं कर्म और अकर्म की ओर संकेत कर रहा है।
(ii) श्रीमद्भगवद्गीता का जन्म ऐसे प्रसंग ने दिया जहाँ यह बताना आवश्यक हो गया कि धर्म किसे कहते हैं और अधर्म किसे? अनिश्चय से कैसे निकला जा सकता है और निश्चय पर कैसे दृढ़ रहा जा सकता है। सुख और दुख क्या हैं? तथा कर्म और अकर्म में क्या अन्तर है?
(iii) इस संवाद में एक वाक्य है ‘युद्धारंभ्भ का शंखनाद हो चुका है।” इस वाक्य से पता चलता है कि युद्ध प्रारम्भ होने की सूचना दी जा चुकी है।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) सूत्रधार किसे कहते हैं?
(ii) प्रसंग से अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
(iii) शंखनाद मुहावरे का अर्थ देते हुए इसका एक वाक्य में प्रयोग कीजिए।
उत्तर
(i) रंगमंच की व्यवस्था करने वाले को सूत्रधार कहा जाता है।
(ii) प्रसंग वह स्थिति है जहाँ पहले कहे हुए विषय की सूचना दी जाती है और जो कहा जा रहा है उससे उसका संबंध स्थापित किया जाता है।
(iii) शंखनाद का अर्थ है किसी काम को शुरू करने की सूचना देना। वाक्य : शंखनाद से दोनों पक्षों को युद्ध शुरू होने की सूचना दे दी गई।

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2. हे कृष्ण! अपने इन प्रियजनों को देखकर तो मेरा मुख सूखा जा रहा है। मेरे शरीर में कंप और रोमांच हो रहा है। हाथ से गाण्डीव धनुष गिरा जा रहा है। मेरा मन भी भ्रमित-सा हो रहा है। मुझमें यहाँ खड़े रहने का भी सामर्थ्य नहीं है। इसलिए मैं युद्ध नहीं करना चाहता।

शब्दार्थ : प्रियजनों = सगे-संबंधियों । यहाँ अभिप्राय अर्जुन के मामा, ताऊ, भाइयों, पुत्र आदि से है जो युद्ध के लिए मैदान में खड़े हैं। मुख सूखा जाना = निराश होना। कंप = कांपने का भाव । रोमांच = भय के कारण शरीर के रोएँ खड़े हो जाना। गाण्डीव = अर्जुन के धनुष का नाम। भ्रमित = भ्रम में होना। क्या करूँ क्या न करूँ यह निश्चित न कर पाना। सामर्थ्य = समर्थ होने का भाव, शक्ति।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था कि केशव मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दो ताकि मैं उन योद्धाओं को देख सकूँ जो युद्ध के लिए दोनों ओर खड़े हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन की यह इच्छा पूरी कर देते हैं। दोनों ओर की सेनाओं को देखकर अर्जुन भयभीत हो गया क्योंकि शत्रुपक्ष में उसके सगे संबंधी ही अस्त्र-शस्त्र लिए खड़े थे।

व्याख्या : दोनों ओर की सेनाओं को देखकर अर्जुन भयभीत हो गया क्योंकि शत्रुपक्ष में उसके सगे-संबंधी ही अस्त्र-शस्त्र लिए खड़े थे। मन में निराशा का भाव धारण किए उसने केशव से कहा कि है कि कौरव पक्ष में युद्ध के लिए वे लोग खड़े हैं जिनमें कोई मेरा भाई है तो कोई मेरा मित्र। कोई ताऊ है तो कोई पुत्र। कोई मामा है तो कोई चाचा। ये सब मेरे बहुत नजदीकी संबंधी हैं। इनसे मैं कैसे युद्ध कर सकता हूँ? यह देखकर मेरा शरीर कांप रहा है। भय के कारण मेरे शरीर के रोएँ खड़े हो गए हैं। हाथ से गाण्डीव छूट रहा है। मेरे मन में भ्रम पैदा हो गया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि अपने प्रियजनों पर कैसे अस्त्र-शस्त्र का संचालन करूँ। मुझमें युद्धभूमि में खड़े होने की शक्ति नहीं रही है। केशव! मुझे युद्धभूमि से दूर ले चलो। मैं युद्ध नहीं करना चाहता।

विशेष-

  1. इस संवाद में अर्जुन का मोह. जाग उठा है। वह युद्ध के लिए आया था पर वहाँ अपने सगे-संबंधियों को देखकर हिम्मत हार बैठा है। इसलिए केशव से युद्ध करने के लिए मना कर रहा है।
  2. अर्जुन के मन में मोह उत्पन्न हो गया है। उसने अपने कर्त्तव्य से मुँह मोड़ लिया है।
  3. मुख सूखै जाना मुहावरे का प्रयोग है। इसका अर्थ है निराश होना।
  4. कंप और रोमांच सात्विक भाव हैं।
  5. गांडीव अर्जुन के धनुष का नाम है।
  6. भ्रमित-सा होने में उपमा अलंकार है।
  7. भाषा प्रवाहमय, प्रभावी और भावानुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) अर्जुन का मुँह क्यों सूखा जा रहा था?
(ii) प्रियजनों को देखकर अर्जुन की दशा का वर्णन कीजिए।
(iii) अर्जुन ने श्रीकृष्ण से युद्ध न करने का क्या कारण बताया?
उत्तर
(i) अर्जुन ने देखा की दोनों पक्षों में युद्ध के लिए ऐसे वीर उपस्थित हैं जिनमें उसके गुरुजन, आदरणय, निकटतम संबंधी, ताऊ, चाचा, भाई, पुत्र आदि हैं। उन्हें देखकर उसका मुँह सूखने लगा अर्थात् वह निराश हो गया कि उसे अपने संबंधियों के साथ युद्ध करना पड़ रहा है।
(ii) युद्ध में प्रियजनजों को उपस्थित देखकर अर्जुन का शरीर काँपने लगा। वह रोमांचित हो गया। घबराहट के कारण उसके हाथ से गांडीव गिरने लगा।
(iii) अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि जिनके साथ मुझे युद्ध करना है वे तो मेरे निकटतम संबंधी है। मेरे मन में भ्रम पैदा हो गया है। जिनका मैं आज तक सम्मान करता आया हूँ, उनके साथ भला युद्ध कैसे कर सकता हूँ। उनके सामने युद्ध के मैदान में खड़े होने का मुझमें बिलकुल सामर्थ्य नहीं है। मैं युद्ध नहीं करना चाहता।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) कृष्ण कौन हैं? अर्जुन उनसे युद्ध न करने की बात क्यों कह रहा है?
(ii) कंपन और रोमांच किस प्रकार के भाव हैं?
(iii) गांडीव के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर
(i) श्रीकृष्ण पांडव पक्ष की ओर से युद्ध के मैदान में हैं। वे अर्जुन के सारथि हैं। वे ही उसका युद्ध दोनों सेनाओं के बीच लेकर आए हैं। इसलिए उनसे ही वह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं लड़ना चाहता।
(ii) कंपन और रोमांच सात्विक भाव हैं। सात्विक वे भाव हैं जो शरीर के हाव भाव से सूचित किए जाते हैं।
(iii) गांडीव अर्जुन के धनुष का नाम है। यही अर्जुन का प्रमुख अस्त्र है।

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3. अर्जुन! तुझे यह असमय मोह क्यों उत्पन्न हो रहा है? तेरा यह आचरण किसी श्रेष्ठ पुरुष का आचरण नहीं है और न ही तेरी कीर्ति को बढ़ाने वाला है।

शब्दार्थ : असमय = जिस बात को सोचने का समय नहीं है। मोह = सगे-संबंधियों के प्रति ममता का भाव । आचरण = व्यवहार । श्रेष्ठ उत्तम, सबसे अच्छे कीर्ति = यश

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्त्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था कि केशव मेरा रथ दोनों
सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दो ताकि मैं उन योद्धाओं को देख सकूँ जो युद्ध के लिए दोनों ओर खड़े हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन की यह इच्छा पूरी कर देते हैं। दोनों ओर की सेनाओं को देखकर अर्जुन भयभीत हो गया क्योंकि शत्रुपक्ष में उसके सगे-संबंधी ही अस्त्र-शस्त्र लिए खड़े थे। सगे-संबंधियों को युद्ध में आमने सामने खड़े देखकर अर्जुन को मोह हो गया। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि मैं युद्ध नहीं करना चाहता। इस पर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं तेरा युद्धभूमि में आकर मोह करना श्रेष्ठ पुरुष का आचरण नहीं है।

व्याख्या : अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था कि केशव मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दो ताकि मैं उन योद्धाओं को देख सकूँ जो युद्ध के लिए दोनों ओर खड़े हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन की यह इच्छा पूरी कर देते हैं। दोनों ओर की सेनाओं को देखकर अर्जुन भयभीत हो गया क्योंकि शत्रुपक्ष में उसके सगे-संबंधी ही अस्त्र-शस्त्र लिए खड़े थे। सगे-संबंधियों को युद्ध में आमने-सामने सामने खड़े देखकर अर्जुन को मोह हो गया। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि मैं युद्ध नहीं करना चाहता। इस पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि यह समय युद्ध से भागने का नहीं है। सगे-संबंधियों को युद्ध के मैदान में खड़े देखकर तुम्हारे मन में उनके प्रति ममता क्यों जाग उठी है? यह समय ममता करने का नहीं है। यह युद्ध करने का है। अगर तू युद्ध से भागेगा तो यह व्यवहार किसी अच्छे वीर का आचरण नहीं कहा जा सकता। ऐसा करने से इस संसार में तेरी बदनामी होगी। तुझे यश कभी प्राप्त नहीं होगा।

विशेष-

  1.  इस संवाद में श्रीकृष्ण ने मोह के कारण भ्रमित अर्जुन को कर्तव्य की ओर लाने का प्रयास किया है।
  2. अर्जुन को सावधान किया है कि युद्ध से भागने पर पूरे विश्व में तुम्हारा अपमान होगा। यह श्रेष्ठ पुरुष का व्यवहार भी नहीं कहलाएगा।
  3. असमय शब्द समय में अ उपसर्ग लगने से बना है।
  4. प्रश्नात्मक संवाद हैं।
  5. भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और भावानुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) असमय मोह से से क्या अभिप्राय है?
(ii) वाक्य का आशय समझाइए: ‘तेरा यह आचरण किसी श्रेष्ठ पुरुष का आचरण नहीं है।’
(iii) अर्जुन का आचरण कीर्ति बढ़ाने वाला क्यों नहीं है?
उत्तर
(i) असमय मोह से अभिप्राय है ऐसे समय मन में मोह उत्पन्न हो जाना जिसका यह उचित समय नहीं है। अर्जुन ने युद्धभूमि में जब अपने प्रियजनों को युद्ध के लिए उपस्थित देखा तो उसके मन में मोह पैदा हो गया और केशव से कह दिया कि वह अब युद्ध नहीं लड़ेगा क्योंकि उसके समाने उसके प्रियजन ही युद्ध के लिए उपस्थित हैं। श्रीकृष्ण ने जब उसकी ऐसी स्थिति देखी तो उससे कहा कि यह समय युद्ध करने का है, प्रियजनों को देखकर युद्ध से मुँह मोड़ने का नहीं है। ऐसा करना तो तुम्हारे मन में असमद मोह पैदा होना है।
(ii) श्रीकृष्ण ने देखा कि प्रियजनों को युद्ध के मैदान में खड़े देखकर अर्जुन ने युद्ध के लिए इंकार कर दिया है। उन्होंने अर्जुन से कहा कि तुम्हारा ऐसा करना
उचित नहीं है। यह युद्ध का समय है। केवल युद्ध करो। अगर तुम युद्ध से मुँह मोड़ेगो तो तुम्हारी गणना श्रेष्ठ व्यक्तियों में नहीं होगी क्योंकि ऐसा व्यवहार कभी भी श्रेष्ठ आचरण करने वाले नहीं करते। अतः ऐसा व्यवाहर मत करो, युद्ध करो।
(iii) श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि युद्ध के मैदान में तुम्हारे मन में मोह उत्पन्न उचित नहीं है। अगर तुम इस भावना पर सुदृढ़ रहे तो तुम्हारी गणना सदाचरण करने वाले वीरों में या पुरुषों में नहीं की जाएगी। इससे तो तुम्हारी संसार में निंदा होगी। युद्ध करोगे तो संसार में यश प्राप्त होगा और मोह में युद्ध से दूर भागोगे तो तुम्हारा यश क्षीण होगा।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) असमय मोह का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ii) श्रेष्ठ पुरुष का आचरण इस संवाद के अनुसार क्या है?
(iii) मोह, आचरण पुरुष कीर्ति शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर
(i) असमय मोह का अर्थ है ऐसे समय मोह उत्पन्न हो जाना जिसका वह समय नहीं है।
(ii) श्रेष्ठ आचरण इस संवाद के अनुसार यह है कि अर्जुन को मोह त्यागकर केवल युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाना चाहिए।
(iii) विलोम
शब्द – विलोम शब्द
मोह- निर्मोह
आचरण – दुराचरण
पुरुष – स्त्री
कीर्ति – अपकीर्ति

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4. हे कुंतीपुत्र! इस संसार में जन्में प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु निश्चित है तथा मृत्यु के बाद पुनः नया जन्म भी निश्चित है। इसलिए इस विषय में तू व्यर्थ ही शोक कर रहा है।

शब्दार्थ : कुंतीपुत्र = कुंती का पुत्र, अर्जुन के लिए प्रयुक्त है। जन्में = जन्म लेने वाले। प्रत्येक = हर व्यक्ति। पुनः = फिर। विषय = बारे में। व्यर्थ = बेकार। शोक = दुख।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। अर्जुन ने जब दोनों ओर की सेनाओं को देखा तो भयभीत हो गया क्योंकि शत्रुपक्ष में उसके सगे-संबंधी ही अस्त्रशस्त्र लिए खड़े थे। उन्हें देखकर उसके मन को मोह हो गया और श्रीकृष्ण से कहा कि मैं युद्ध नहीं करना चाहता। इस पर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहता है कि तेरा शोक करना बेकार है क्योंकि इस दुनिया में जन्म लेना व मृत्यु को प्राप्त करना निश्चित है।

व्याख्या : अर्जुन को युद्ध में खड़े सगे-सबंधियों को देखकर मोह पैदा हो गया और श्रीकृष्ण से कहा कि वह युद्ध नहीं लड़ेगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि तेरे मन में इस समय मोह पैदा होना उचित नहीं है। यह श्रेष्ठ पुरुष का व्यवहार नहीं है। ऐसा करना तेरा कर्तव्य पथ से हटना है। तू यह सोच रहा है कि मैं अपने सगे-संबंधियों को मारना अनुचित है। तू यह अच्छी तरह समझ लेना कि इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति का मरना निश्चित है और जन्म लेना भी निश्चित है। जब यह क्रिया निरन्तर चल रही है तब तेरा इस बारे में किसी तरह का शोक प्रकट करना बेकार है।

विशेष-

  1. श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मन में उत्पन्न मोह दूर करते हुए कहा है कि तू इन्हें मारने वाला नहीं है। इनका मरना तो निश्चित है। ये संसार के अंत तक जीवित रहने वाले नहीं हैं और न ही तू इनके जन्म को रोक सकता है। इसलिए तुझे इस बारे में दुख प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है।
  2. व्यक्ति अपने पाप पुण्य के आधार पर इस संसार में जन्म लेता है और मरता है, इस सिद्धांत का यहाँ समर्थन किया गया है।
  3. कुंतीपुत्र अर्जुन के लिए प्रयुक्त है क्योंकि वह कुंती का पुत्र था।
  4. भाषा सरल और सरस है। भावानुकूल है और प्रवाहमय भी है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) श्रीकृष्ण ने शोक संतप्त अर्जुन को किस प्रकार समझाया?
(ii) श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह क्यों कहा कि इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति जन्मलेता और मरता है?
(iii) अर्जुन के शोक को श्रीकृष्ण व्यर्थ क्यों बता रहे हैं?
उत्तर
(i) श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि इस संसार में जो भी व्यक्ति जन्म लेता है उसे निश्चित रूप से मरना पड़ता है। वह अगर मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसका जन्म भी पुनः होता है। ऐसे में तुम्हारा शोक करना व्यर्थ है।
(ii) अर्जुन को मोह उत्पन्न हो गया है कि वह अपने प्रिय संबंधियों को नहीं मार सकता, इसलिए युद्ध नहीं करना चाहता। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जितने भी योद्धा इस मैदान में उपस्थित हैं इन्हें तो एक न एक दिन मरना है और फिर जन्म भी लेना है। ऐसे में तू इन्हें मारने वाला नहीं है और न ही जन्म देने वाला है। अतः तू तो कर्म कर और युद्ध कर।
(iii) अर्जुन के शोक को श्रीकृष्ण व्यर्थ इसलिए बता रहे हैं कि न तो वह इन वीरों को मारने वाला है और न जन्म देने वाला। अगर तू इन्हें मारेगा नहीं, तब भी ये मरने ही हैं, इसलिए तुम्हें इस संबंध में शोक करने की आवश्यकता नहीं है।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) कुंतीपुत्र किसे और क्यों कहा गया है?
(ii) श्रीमद्भगवद्गीता के किस अध्याय के किस श्लोक में कहा गया है कि . व्यक्ति का जन्म और मरण निश्चित है?
(iii) संसार, व्यक्ति, व्यर्थ, शोक शब्द के पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर
(i) कुंतीपुत्र अर्जुन के लिए प्रयोग किया गया है। इसलिए किया गया है कि वे कुंती के पुत्र थे।
(ii) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में कहा गया हैः आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है और न मृत्यु । वह न तो कभी जन्मा है और न जन्म लेगा। यह अजन्मा नित्य शाश्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर वह मरता नहीं।

(iii) पर्यायवाची शब्द :
शब्द – पर्यायवाची
संसार – विश्व, दुनिया
व्यक्ति – नर, मानव
व्यर्थ – बेकार, नाकारा
शोक – दुख, आतुर

5. तू इस पाप-पुण्य के संशय में क्यों भ्रमित हो रहा है? यदि तू युद्ध में मारा भी गया तो स्वर्ग को प्राप्त होगा और यदि विजयी हुआ तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा। तू युद्ध करने के लिए दृढ़ निश्चयी हो जा।

शब्दार्थः संशय = संदेह । भ्रमित = भ्रम में। विजयी = जीता। दृढ़ निश्चयी = पक्का इरादा।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से युद्ध न करने को मना कर दिया। अर्जुन को मोहित देखकर उसके मोह को समाप्त करने का यत्न किया और उसे कर्तव्य करने का उपदेश दिया। अर्जुन ने कहा था कि अगर मैं अपने सगे-संबंधियों को युद्ध में मारूँगा तो मुझे पाप लगेगा। मैं यह पाप कभी नहीं करूँगा। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि तू इस पाप और पुण्य के चक्कर में मत पड़ । केवल युद्ध कर।

व्याख्या : अर्जुन ने देखा कि मेरे सामने तो मेरे प्रियजन व आदरणीय गुरुजन खड़े हैं। मैं उनसे युद्ध कैसे करूँगा। उसने श्रीकृष्ण से कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा क्योंकि यह पाप होगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उसे पुनः समझाया कि तू इस चक्कर में क्यों पड़ गया कि अगर मैं युद्ध में शत्रुओं को मारूँगा तो पाप होगा, नहीं मारूँगा तो पुण्य होगा। तुम्हारे मन में इस तरह का संदेह क्यों पैदा हो रहा है? अगर युद्ध में तू मारा गया तो तुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी और विजय प्राप्त हुई तो इस पृथ्वी का राज्य भोगेगा, इसलिए तू अपने मन से समस्त मोह ममता निकाल दे और केवल युद्ध कर। इसके लिए अपने मन को निश्चित कर ले।

विशेष-

  1. अर्जुन के मन में सगे-संबंधियों के कारण मोह पैदा हो गया है, श्रीकृष्ण उसे मोह छोड़कर केवल युद्ध के लिए निश्चिय करने का उपदेश दे रहे हैं।
  2. इसमें गीता के श्लोक का पूरा प्रभाव है कि ‘हतो वा…
  3. पाप का विलोम शब्द पुण्य है। व्याकरण की दृष्टि से पाप-पुण्य द्वंद्व समास है।
  4. भाषा भावानुकूल है और प्रवाहपूर्ण है।
  5. संवाद रंगमंच के अनुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) श्रीकृष्ण ने अर्जुन को किससे दूर रहने के लिए कहा है?
(ii) श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार होने के लिए क्या तर्क देते हैं?
(iii) आपके विचार से क्या अर्जुन श्रीकृष्ण से सहमत हो गया?
उत्तर
(i) श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पाप-पुण्य के संशय से दूर रहने के लिए कहा है।
(ii) श्रीकृष्ण अर्जुन से युद्ध करने का निश्चय करने के लिए कहते हैं। इसके
लिए वे तर्क देते हैं कि अगर तू युद्ध में मारा गया तो तुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी क्योंकि वीरगति पाने वाले को स्वर्ग में स्थान मिलता है और अगर यद्ध में तूने विजय प्राप्त की तो इस संसार का साम्राज्य भोगेगा। इसलिए जब दोनों ओर से तुझे अनुकूल फल मिलने वाला है तो तब युद्ध के लिए तैयार होना ही उचित है।
(iii) श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तू केवल युद्ध कर। युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग मिलेगा और जीत गया तो संसार का साम्राज्य मिलेगा। पर इससे अर्जुन का मोह पूरी तरह शांत नहीं हुआ। क्योंकि उसके मन में मोह स्वर्ग या साम्राज्य प्राप्ति का नहीं है।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) श्रीकृष्ण के अनुसार अर्जुन के मन में क्या भ्रम है?
(ii) स्वर्ग का राज्य कौन भोगता है?
(iii) इस संवाद में तत्सम शब्दों का चुनाव कीजिए।
उत्तर
(i) श्रीकृष्ण के अनुसार अर्जुन के मन में भ्रम यह है कि उसे लगता है कि अगर वह उसने प्रियजनों को मारा तो उसे पाप लगेगा। और नहीं मारा तो उसे पुण्य की प्राप्ति होगी। इसीलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तू इस पाप-पुण्य के संशय में क्यों भ्रमित हो रहा है?
(ii) तत्सम शब्दों का चुनावः
पाप – पाप
संशय – भ्रमित
युद्ध – स्वर्ग
विजयी पृथ्वी
राज्य – दुद
निश्चयी –

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6. मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लडूंगा? ये दोनों ही मेरे पूजनीय हैं। अपने ही गुरुजनों और बंधु-बांधवों का वध कर मेरा किसी भी प्रकार कल्याण नहीं होगा। हम कैसे सुखी रहेंगे।

शब्दार्थ : रणभूमि = युद्धभूमि। विरुद्ध = खिलाफ । पूजनीय = पूजा के योग्य । बंधु – बांधवों = सगे – संबंधी। वधकर = हत्याकर। कल्याण = भला।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से युद्ध करने को मना कर दिया। उसने कहा कि मैं युद्धभूमि में अपने गुरुजनों के विरुद्ध कैसे लडूंगा? अगर ऐसा किया तो मेरा कभी कल्याण न होगा। ऐसा करने पर मैं कभी सुखी नहीं रह पाऊँगा।

व्याख्या : श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि तू इस भ्रम में मत पड़ कि युद्ध में योद्वाओं को मारने से पाप लगेगा और न मारने से पुण्य । इस चक्कर में मत पड़। युद्ध में अगर मारा गया तो स्वर्ग की प्राप्ति होगी और जीतने से इस धरती का सुखमय राज्य मिलेगा। किंतु अर्जुन का मोह समाप्त नहीं हो रहा था। उसने उनसे कहा कि युद्धभूमि में मेरे आदरणीय पितामह भीष्म खड़े होंगे, मेरे गुरुदेव द्रोणाचार्य खड़े होंगे,

उनके विरुद्ध मैं कैसे अस्त्र-शस्त्र उठाऊँगा? उनकी तो मैं प्रतिदिन पूजा करता आया हूँ। अगर मैंने उनसे युद्ध किया और वे इसमें मारे गए तो मेरा तो कभी कल्याण न होगा। मैं कभी सुखी नहीं रहूँगा। इसलिए मैं अपने संबंधियों के विरुद्ध नहीं लडूंगा।

विशेष-

  1. अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह कहकर युद्ध लड़ने से इंकार किया क्योंकि उसमें वे वीर खड़े हैं जिनकी वह सदा पूजा करता आया है।
  2. अर्जुन का मानना है कि आदरणीय को युद्ध में मारकर उसका कभी भला नहीं हो सकता।
  3. भीष्म और द्रोणाचार्य पौराणिक चरित्र हैं। द्रोणाचार्य से तो अर्जुन ने धनुर्विद्या सीखी थी।
  4. रणभूमि संबंध तत्पुरुष समास है। बंधु-बांधवों में द्वंद्व समास है।
  5. अर्जुन की मुख्य चिंता यह है कि आदरणीयों को युद्ध में मारकर उसे कभी सुख प्राप्त नहीं होगा।
  6. भाषा सरल और सरस है।

कर्त्तव्य पालन प्रवाहपूर्ण है और भावानुकूल है।

प्रश्न :
(i) अर्जुन के मन में मोह क्यों है?
(ii) भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य से अर्जुन का क्या संबंध है?
(iii) ‘मेरा किसी भी प्रकार कल्याण नहीं होगा’ अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) अर्जुन के मन में मोह का कारण यह है कि उसके समक्ष भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे- वीर अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित हैं। वे गुरुजन और पूजनीय है। उन्हें मारकर वह किसी प्रकार सुखी नहीं रह सकता।
(ii) भीष्मपितामह पांडवों व कौरवों दोनों के पूजनीय हैं। उन्हें वह सदैव प्रणाम करता रहा है। द्रोणाचार्य से अर्जुन ने धनुर्विद्या सीखी है इसलिए वे उसके गुरु हैं।
(iii) अर्जुन श्रीकृष्ण से कह रहा है कि जो शिष्य अपने गुरु का ही वध करेगा, वह भला संसार में किस प्रकार सुखी रह सकेगा। यह पाप करने के बाद तो उसका संसार में कभी कल्याण नहीं सकता।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) रणभूमि से क्या आशय है?
(ii) महाभारत के अनुसार भीष्मपितामह कौन थे?
(iii) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए:
विरुद्ध, पूजनीय, कल्याण, सुखी
उत्तर
(i) जहाँ युद्ध होता है उस स्थल को रणभूमि कहा जाता है।
(ii) महाभारत के अनुसार भीष्म आजन्म ब्रह्मचारी थे और गंगा के पुत्र थे। उन्हें गंगेय भी कहा जाता है।
(iii) विलोम शब्दः
शब्द – विलोम
विरुद्ध – पक्ष
पूजनीय – निंदनीय
कल्याण – अकल्याण
सुखी – दुखी

6. हे पार्थ! यह सब मत सोच । जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर तू केवल युद्ध कर।

शब्दार्थ : पार्थ = अर्जुन । जय-पराजय = हार – जीत । लाभ-हानि = नुकसान-फायदा।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से युद्ध न करने को मना कर दिया। उसने कहा कि मैं युद्धभूमि में अपने गुरुजनों के विरुद्ध कैसे लडूंगा? अगर ऐसा किया तो मेरा कभी कल्याण न होगा। यह अनुभव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि इस बारे में कुछ मत सोच । केवल युद्ध का निश्चय कर।

व्याख्या : अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि मेरे लिए युद्ध करना संभव नहीं है। कारण यह है कि आप मुझे उन आदरणीय सगे-संबंधियों से युद्ध करने के लिए कह रहे हैं जिनकी मैं प्रातःकाल पूजा करता हूँ। भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य के विरुद्ध मैं कैसे युद्ध कर सकता हूँ, इनकी तो मैं प्रतिदिन पूजा करता हूँ। इस पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तू यह सब मत सोच। जितना इन विषयों पर सोचेगा उतना ही युद्ध से मन हटेगा। कोई युद्ध में जीतता है या हारता है, किसी को युद्ध में हानि होती है या फायदा होता है, किसी को युद्ध करने में सुख मिलता है या दुख मिलता है, इनमें कोई अंतर नहीं है। यह सब समान समझकर सिर्फ युद्ध कर। नफे-नुकसान की परवाह करने लगेगा तो तू इस मोह के बंधन में फंसा ही रहेगा।

विशेष-

  1. श्रीकृष्ण ने इस संवाद में जीत और हार, लाभ और हानि तथा सुख और दुख को समान समझने का उपदेश दिया है।
  2. व्यक्ति के बंधन के कारण जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख व दुख में पड़े रहना है।
  3. जय-पराजय, लाभ-हानि सुख-दुख में द्वंद्व समास है।
  4. भाषा भावानुकूल व प्रवाहमय है।
  5. संवाद रंगमंच के अनुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) पार्थ यह सब मत सोच। भाव स्पष्ट कीजिए।
(ii) ‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर युद्ध कर।’आशय स्पष्ट कीजिए।
(iii) पार्थ संबोधन किसके लिए है, किसने किया है?
उत्तर
(i) यह कथन श्रीकृष्ण का अर्जुन से है। अर्जुन मोह में लिप्त होने के कारण युद्ध करने से इसलिए मना कर रहा है क्योंकि जिनके साथ युद्ध करना है वे उसके आदरणीय हैं। उनका वध करना पाप है। ऐसा कर उसका कभी कल्याण नहीं हो सकता। श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि तेरा यह सव सोचना बेकार है। तेरे लिए हार-जीत, फायदा-नुकसान और सुख-दुख समान है। तू अपना ध्यान केवल युद्ध की ओर लगा।
(ii) श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि युद्ध में चाहे विजय हो और चाहे पराजय, चाहे इससे लाभ होता हो और चाहे हानि, चाहे युद्ध से सुख मिल रहा हो या फिर
दुख, यह सब मत सोच। सोचना हो तो इन्हें समान समझ। सुख और दुख, हानि लाभ अथवा जय-पराजय को अगर समान समझेगा तो तुझे कभी मोह नहीं होगा।
(iii) पार्थ शब्द अर्जुन के लिए है। यह संबोधन श्रीकृष्ण ने अर्जुन के लिए किया है।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) इस संवाद का केंद्रीय भाव क्या है?
(ii) जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख कौन से समास हैं?
(iii) इस संवाद में विलोम शब्दों का प्रयोग किया गया है, उनका चुनाव कीजिए।
उत्तर
(i) इस संवाद का केंद्रीय भाव है, जय-पराजय हानि-लाभ और सुख-दुख में व्यक्ति को समान रहना चाहिए। ऐसा व्यक्ति ही अपने निश्चय में सफलता प्राप्त कर पाता है।
(ii) जय-पराजय लाभ-हानि, सुख और दुख द्वंद्व समास हैं।
(iii) इस संवाद के विलोम शब्द हैं :
शब्द – विलोम
जय – पराजय
लाभ – हानि
सुख – दुख

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7. हे अर्जुन! तुझे केवल कर्म करने का अधिकार है। उसके फल का नहीं

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्तकर्मणि।”

इसलिए मोह-माया को त्यागकर त केवल अपने कर्म को कर, फल की इच्छा त्याग दे।

शब्दार्थ : कर्मण्येवाधिकारस्ते = (कर्मणि = कर्म करने में, एव = निश्चिय ही, अधिकारः = अधिकार, ते = तुम्हारा) तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है। मा = कभी नहीं। फलेषु =कर्म फलों में। कदाचन = कदापि, कभी भी। कर्मफल = कर्म का फल। हेतुर्भूर्माः (हेतुः = कारण, भूः= होओ, मा= कभी नहीं।) कारण कभी मत होओ। ते = तुम्हारी। संगः = आसक्ति। अकर्मणि = कर्म न करने में। (अर्थात् तुम्हें अपना कर्म करने का अधिकार है, किंतु कर्म के फलों के तुम अधिकारी नहीं हो+तुम न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानो, न ही कर्म न करने में कभी आसक्त होओ।)

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से युद्ध न करने को मना कर दिया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि इस बारे में कुछ मत सोच कि गुरुजनों के विरुद्ध कैसे युद्ध लडूंगा। तेरा कर्म युद्ध करना है फल की चिंता करना नहीं है। तू केवल युद्ध का निश्चय कर।

व्याख्या : अर्जुन का सगे-संबंधियों के प्रति ममता अभी छूटी नहीं है। जब श्रीकृष्ण उसे कहते हैं कि जीत-हार, हानि-लाभ सुख या दुख तो सब समान है केवल युद्ध में मन लगा तो उसके मन में पुनः संदेह उत्पन्न होता है कि मैं युद्ध में अपने सगे-संबंधियों को मार देता हूँ तो इससे मुझे क्या फल प्राप्त होना है? जब युद्ध से कोई फल ही नहीं मिलना है तो मैं युद्ध क्यों करूँ? इस पर श्रीकृष्ण उससे कह देते हैं कि तेरा काम केवल कर्म करना है अर्थात् कर्तव्य का पालन करना है, इसकी चिंता करना नहीं है कि इस युद्ध से मुझे क्या फल मिलने वाला है। कर्म करना ही तेरा अधिकार है, फल के बारे में कुछ मत सोच । इसलिए.तू मोह और माया को छोड़ दे। केवल कर्म करने के लिए तत्पर हो। इस कर्तव्यं से तुझे क्या फल मिलेगा, तू यह इच्छा ही क्यों करता है? केवल कर्त्तव्य ही कर।

विशेष-

  1. इस संवाद में श्रीकृष्ण ने अर्जुन ही नहीं व्यक्ति को केवल कर्म करने के लिए कहा है। उनका कहना है कि फल पर सोचने का हमारा अधिकार नहीं है। …
  2. इस संवाद से अर्जुन के मन के मोह का नाश हो जाता है।
  3. इस संवाद को प्रभावी बनाने के लिए एकांकीकार ने श्रीमद्भगवद्गीता का मूल. श्लोक उद्धत किया है:“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्तकर्मणि।”
  4. भाषा प्रभावशाली व प्रवाहपूर्ण है।
  5. संवाद रंगमंच के अनुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर प्रश्नः

(i) इस संवाद में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्या उपदेश दिया है?
(ii) “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।।
मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्तकर्मणि।” अर्थ स्पष्ट कीजिए।
(iii) इस संवाद का केंद्रीय भाव क्या है?
उत्तर
(i) इस संवाद में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश दिया है कि तुझे केवल कर्म करने का अधिकार है, फल का नहीं हैं।
(ii) इस श्लोक का भाव यह है : हे अर्जुन! तेरा अधिकार केवल कर्म करना है। यह चिंता करना नहीं है कि इससे क्या फल मिलेगा। इसलिए तू मोह और माया को छोड़ दें। केवल कर्म करने के लिए तत्पर हो। इस कर्त्तव्य से तुझे क्या फल मिलेगा, तू यह इच्छा ही क्यों करता है? तू तो केवल कर्त्तव्य कर।
(iii). इस संवाद का केंद्रीय भाव है कि कर्म करना करना हमारा अधिकार है फल की चिंता करना नहीं। इसलिए केवल कर्म कर।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) इस संवाद पर किसका प्रभाव है?
(ii) श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म का अधिकार क्यों दे रहे हैं फल का क्यों नहीं?
(iii) कर्मण्येवाधिकारस्ते शब्द का अर्थ लिखिए।
उत्तर
(i) इस संवाद पर श्रीमद्भगवद्गीता का प्रभाव है। यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीयं अध्याय में लिखा है और यह सैंतालीसवां श्लोक है।
(ii) श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि कर्म करना ही हमारा अधिकार है, यह सोचना नहीं है कि इससे फल क्या मिलेगा। जो व्यक्ति फल की चिंता करने लगते हैं वे कर्म से दूर हो जाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने का अधिकार दे रहे हैं।
(iii) कर्मण्येवाधिकारस्ते का अर्थ है कर्म करना ही तुम्हारा अधिकार है।

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8. हे कृष्ण! आज आपने मेरे मन से अज्ञानरूपी अंधकार का नाशकर ज्ञानरूपी प्रकाश फैलाया है। आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। अब मैं बिना किसी संशय के अपने कर्तव्य का पालन करूँगा।

शब्दार्थ : मोह = सगे-संबंधियों पर ममता का भाव । संशय = संदेह।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से युद्ध न करने को मना कर दिया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि इस बारे में कुछ मत सोच कि गुरुजनों के विरुद्ध कैसे युद्ध लडूंगा। तेरा कर्म युद्ध करना है फल की चिंता करना नहीं है। तू केवल युद्ध का निश्चय कर। श्रीकृष्ण का यह कथन सुनकर अर्जुन चिंतामुक्त हो गया.और उनसे कहा कि मेरे मन का संदेह समाप्त हो गया है। अब मैं युद्ध करूँगा। –

व्याख्या : जब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह कहा कि तुझे फल की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। तुझे तो केवल कर्त्तव्य का पालन करना है। यह देखना मेरा काम है कि तुझे किसी काम से फल मिलता है या नहीं। यह सुनकर अर्जुन के मन से मोह दूर हो गया। वह चिंतामुक्त हो गया। उसने श्रीकृष्ण से कहा कि आपने मेरे मन में छाए अज्ञान को दूर कर दिया। आपके सुवचनों से मेरा मन प्रकाशित हो गया। आपकी दया से मेरे मन का मोह चला गया है। अब मेरे मन में किसी प्रकार का संदेह नहीं रहा है कि अगर अपने सगे-संबंधियों का वध करूँगा तो मुझे पाप मिलेगा। मैं अब युद्ध में अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ।

विशेष-

  1. श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने का संदेश देने में सफल हो गए हैं।
  2. अज्ञान को अंधकार कहा गया है तथा ज्ञान को प्रकाश । इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
  3. श्रीमद्भगवद्गीता के कर्म करो व फल की चिंता मत करो वाला मूल श्लोक से संवाद कुछ कठिन हो गया है।
  4. संवाद में एकांकी का प्रतिपाद्य स्पष्ट है।
  5. भाषा संस्कृतनिष्ठ हो गई है।
  6. संवाद रंगमंचीय है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) इस संवाद का केंद्रीय भाव लिखिए।
(ii) अर्जुन ने श्रीकृष्ण से क्या कहा?
(iii) ‘अब मैं बिना संशय के कर्तव्य पालन करूँगा’. भाव स्प्ष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) इस संवाद का केंद्रीय भाव यह है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मोह त्यागकर युद्ध के लिए तैयार होने के लिए कहा था, अर्जुन इसके लिए तैयार हो गया। अब उसके मन में अपने गुरुजनों व आदरणीयों पर अस्त्रशस्त्र संचालन में कोई दुविधा नहीं रही।
(ii) अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि मेरे मन में व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार का नाश हो गया है। आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। अब मैं संशयहीन होकर अपना कर्तव्य पालन करूँगा।
(iii) अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है कि हे केशव! आपने मेरे मन में व्याप्त दुविधा समाप्त कर दी है। पहले मेरी चिंता का विषय यह था कि मैं अपने गुरुजनों या आदरणीयों का वध करूँगा तो मुझे पाप लगेगा। इस कर्म से मेरा कल्याण नहीं होगा पर अब यह बात समाप्त हो गई है। मैं अब संशयहीन होकर युद्ध में
अपना कर्तव्य पालन के लिए तैयार हूँ।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) अज्ञान के नाश होने पर अर्जुन के मन में किसका प्रकाश हुआ?
(ii) ‘अब मैं बिना किसी संशय के अपने कर्तव्य का पालन करूँगा’ इस वाक्य से अर्जुन का कैसा चरित्र दर्शकों के समक्ष आता है?
(iii) क्या इस संवाद को रंगमंचीय कहा जा सकता है?
उत्तर
(i) अज्ञान के बाद अर्जुन के मन में ज्ञान रूपी प्रकाश फैल गया।
(ii) अब मैं बिना किसी संशय के अपने कर्तव्य का पालन करूँगा से अर्जुन के चरित्र का यह गुण प्रकट होता है कि वह कर्त्तव्यपालक है।
(iii) यह संवाद निश्चित रूप से रंगमंचीय है क्योंकि यह संक्षिप्त है, सारगर्भित है और सरल व सरस शब्दावली से युक्त है।

9. हाँ बच्चो! सुख-दुख एवं हानि-लाभ को हमें एक समान इसलिए समझना चाहिए क्योंकि सुख और दुख दोनों ही हमें बंधन में डालते हैं।

शब्दार्थ : सुख-दुख = सुख और दुख । बंधन = फंसना, बंधना।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। एकांकी के दूसरे दृश्य में गुरु जी ने बच्चों से नाटक का अभिनय कराया था। यह अभिनय श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश का था। नाटक पूरा होने पर गुरु व बच्चे प्रसन्न होकर तालियाँ बजाते हैं। गुरु जी बच्चों से पूछते हैं कि इस नाटक से तुमने क्या सीखा? रोहिणी कहती है कि सुख-दुख व लाभ-हानि में सबको समान रहना चाहिए। अशोक कहता है कि पाप और पुण्य के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। यहाँ गुरु जी बच्चों के कथन का समर्थन कर रहे हैं।

व्याख्या : गुरु जी ने बच्चों से पूछा था कि श्रीमद्भगवद्गीता के अंश पर आधारित नाटक से आपको क्या शिक्षा मिलती है? इस पर बच्चों ने उन्हें बताया था कि इस अंश से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सुख और दुख, पाप और पुण्य और लाभ-हानि में समान रहना चाहिए। बच्चों के उत्तर से गुरु जी सहमति जताते हैं। उन्हें बताते हैं कि यह बिलकुल ठीक है। हमें सुख हो चाहे दुख, हमें चाहे नुकसान हो जाए और चाहे फायदा, दोनों ही स्थितियों में समान भाव रखना चाहिए। अगर ऐसा न करते हैं तो हम बंधन में बंध जाते हैं। हमारे मन में तरह-तरह का मोह पैदा हो जाता है। इस कारण हम अपने कर्त्तव्य को पूरा नहीं कर पाते।

विशेष-

  1. गुरुजी ने बच्चों से नाटक से मिलने वाली शिक्षा पूछी जिसका उन्हें सही उत्तर मिला।
  2. बच्चों को गुरु जी ने समझाया कि उन्हें सुख-दुख और हानि-लाभ में एक जैसा मन रखना चाहिए। ऐसा न करने पर हम अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं कर पाते।
  3. भाषा सरल और सरस है। भावानुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) गुरुजी ने अपने शिष्यों को इस संवाद के माध्यम से क्या संदेश दिया?
(ii) सुख और दुख, लाभ-हानि में एक समान रहने से क्या अभिप्राय है?
(iii) सुख और दुख या लाभ या हानि हमें बंधन में किस प्रकार डालते हैं?
उत्तर
(i) गुरु जी ने अपने शिष्यों से कहा कि हमें सुख-दुख, लाभ-हानि को एक समान समझना चाहिए। अगर ऐसा समझा जाएगा तो हम इनके कारण होने वाले बंधन से अपने को दूर कर सकते हैं।
(ii) अगर हमें किसी कारण सुख मिलता है तो यह मानना चाहिए कि दुख भी आएगा। और दुख में भी हमें उसी तरह अपने मन को स्वस्थ रखना है जिस तरह सुख में रखा है। इसी तरह अगर हमें किसी कारण हानि हो जाती है तो अपना व्यवहार उसी तरह रखना चाहिए जैसे लाभ होने पर रखते हैं। जब इस तरह के भावों में किसी प्रकार का भेद नहीं समझेंगे, तब हम निश्चित रूप से एक समान रहना सीख जाएंगे। न तो हमें सुख होने पर अतिशय प्रसन्नता होगी और न दुख होने पर अतिशय दुख। हम सुख और दुख में समान रहेंगे।
(iii) जब हम दुख और सुख को अलग अलग मानने लगते हैं. तब हम बंधन में बंध जाते हैं। सुख देखकर कहते हैं कि हमें दुख कभी न आए। इसी तरह अगर लाभ प्राप्त कर रहे हैं तो चाहते हैं कि हानि कभी न आए। यही बंधन कहलाता है।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) सुख दुख को समान समझना चाहिए इसे गुरु जी अपने शिष्यों को किस माध्यम से समझाया?
(ii) एकांकीकार ने यह संवाद क्यों लिखा?
(iii). इस संवाद के तत्सम शब्दों को लिखिए।
उत्तर
(i) सुख दुख को समान समझना चाहिए इसे गुरु जी ने बच्चों से श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश का अभिनय करवाकर समझाया।
(ii) गुरु जी ने बच्चों से पूछा था कि इस नाटक से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है, बच्चों ने इससे मिलने वाली शिक्षा के बारे में बताया। तब बच्चों की बात का समर्थन करते हुए गुरु जी ने कहा कि बिलकुल ठीक। हमें सुख और दुख, हानि और लाभ में समान रहना चाहिए। .
(iii) संवाद के तत्सम शब्द :
सुख – दुख
हानि – लाभ
समान – बंधन

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10. जव हमें सुख मिलता है तो हम इस चिंता में पड़ जाते हैं कि कहीं यह सुख हमसे छिन न जाए और जब हम दुख में भी नहीं होते तब भी इस चिंता में रहते हैं कि कहीं दुःख न आ जाए। यही तो वह बंधन है जिससे हम मुक्त नहीं हो पाते।

शब्दार्थ : मुक्त = स्वतंत्र। प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्त्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। एकांकी के दूसरे दृश्य में गुरु जी ने बच्चों से नाटक का अभिनय कराया था। यह अभिनय श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश का था। नाटक पूरा होने पर गुरु व बच्चे प्रसन्न होकर तालियाँ बजाते हैं। गुरु जी ने बच्चों से कहा था कि हमें सुख और दुख में समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा न करने पर हमें बंधन घेर लेता है। इस पर रोहिणी ने पूछा था कि बंधन क्या होता है? गुरु जी इस संवाद में उसे उत्तर दे रहे हैं।

व्याख्या : हम सुख और दुख को समान नहीं देख पाते। यही बंधन होता है। वस्तुतः जब हमारे जीवन में कभी सुख आता है तो हमारे सामने यह समस्या आकर खड़ी हो जाती है कि आखिर इस सुख की कैसे रक्षा की जाए। कहीं ऐसा न हो कि कोई यह हमसे छीन कर ले जाए और हम फिर दुख में घिर जाएं। हमारी यह स्थिति होती है कि हमें चाहे दुख ने आकर घेरा न हो पर तब भी हम इस चिंता में डूब जाते हैं कि कहीं यह आ न जाए। यही एक बंधन है कि हम सुख की रक्षा करने का प्रयास करते हैं और दुख आने की आशंका में चिन्तित रहते हैं। यह मोह के कारण है और इसे ही बंधन कहा जाता है।

विशेष-

  1. इस संवाद में एकांकीकार ने बंधन को परिभाषित किया है।
  2. एकांकीकार ने गीता का हवाला देकर कहा है कि सुख आने पर इसके जाने का भय रहता है और दुख न होने पर भी दुख के आने का। यही बंधन कहलाता है।
  3. संवाद दार्शनिक हो गया है।
  4. रंगमंचीय भाषा है। प्रवाहमय और प्रभावपूर्ण है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) सुख मिलने पर हम क्या चिंता करते हैं?
(ii) दुख में न होने पर भी हमारी चिंता क्यों बढ़ जाती है?
(iii) किस बंधन से हम मुक्त नहीं हो पाते?
उत्तर
(i) जब हमें सुख प्राप्त हो जाता है तो हम चिंता करते हैं कि यह हमारे . पास हमेशा रहे। हम सदैव ऐसा प्रयास करते हैं कि यह हमसे छिन न जाए। ..
(ii) हम सुख में रहते हुए इस चिंता में हमेशा डूबे रहते हैं कि कहीं हमें दुख न प्राप्त हो जाए। चाहे हम सुख से रह रहे हैं, और हमें दुख ने आकर घेरा भी न हो पर इस चिंता में सूखते चले जाते हैं कि कहीं दुख आ न जाए। अगर दुख आ गया तो हमें वह सहन करना कठिन हो जाएगा।
(iii) सुख में दुख आने की संभावित आशंका से हम व्यथित रहने लगते हैं। इसे ही गीता के अनुसार बंधन कहा गया है। और इस बंधन से हम आजन्म मुक्त नहीं हो पाते।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) गुरु जी ने किस शिष्य के प्रश्न पर यह उत्तर दिया?
(ii) सुख में दुख को अनुभव कब नहीं हो सकता?
(iii) संवाद से तत्सम शब्दों का चुनाव कीजिए।
उत्तर
(i) गुरु जी से रोहिणी ने पूछा था कि बंधन क्या होता है, गुरु जी ने इस संवाद में रोहिणी के प्रश्न का सटीक उत्तर दिया।
(ii) जब हम सुख और दुख को समान भाव से समझने लगेंगे तब सुख में दुख का अनुभव नहीं हो सकता।
(iii) संवाद से तत्सम शब्दों का चुनाव :
सुख – चिंता
बंधन – मुक्त

11. एकदम सही प्रश्न किया तुमने! मान लो किसी कमरे में बहुत लंबे समय से घना अँधेरा है किंतु जैसे ही उसमें प्रकाश किया जाता है अँधेरा अपने आप दूर हो जाता है। उसी प्रकार अतीत में किए गए पापों का अँधेरा पुण्य के एक ही कार्य से दूर हो जाता है।

शब्दार्थ : एकदम = बिलकुल । घना = ज्यादा । प्रकाश = रोशनी। अतीत = भूतकाल, बीता हुआ समय।।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। एकांकी के दूसरे दृश्य में गुरु जी ने बच्चों से नाटक का अभिनय कराया था। यह अभिनय श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश का था। नाटक पूरा होने पर गुरु व बच्चे प्रसन्न होकर तालियाँ बजाते हैं। गुरु जी बच्चों से पूछते हैं कि इस नाटक से तुमने क्या सीखा? इसी क्रम में नकुल गुरु जी से पूछता है कि हमें भ्रम में क्यों नहीं पड़ना चाहिए। गुरु जी इस संवाद में उसके प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं।

व्याख्या : गुरु जी ने नकुल से कहा कि तुम्हारा प्रश्न उचित है। हमें निश्चित रूप से पाप और पुण्य के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। किसी कमरे में काफी समय से अँधेरा छाया हुआ है। जब उसमें प्रकाश कर दिया जाता है तो उस कमरे का अँधेरा स्वयं दूर हो जाता है, उसी तरह अगर हमने बीते समय में बहुत ज्यादा पाप किए हैं तो पुण्य का एक ही काम सब पापों को दूर कर देता है। इसीलिए कहा गया है कि व्यक्ति को पाप और पुण्य के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। इन्हें तो समान समझना चाहिए। पाप के बाद पुण्य और पुण्य के बाद पाप आता रहता है। जो इसे समान समझते हैं उन्हें इस संबंध में कोई भ्रम नहीं होता।

विशेष-

  1. इस संवाद में गुरु जी ने शिष्य के इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि पाप और पुण्य के भ्रम में क्यों नहीं पड़ना चाहिए।
  2. पाप-पुण्य के भ्रम से दूर रहने के लिए उदाहरण का आश्रय लिया गया है।
  3. इसे दृष्टांत या उदाहरण अलंकार कहा जा सकता है।
  4. भाषा भाव के अनुकूल है और प्रवाहमय है।
  5. रंगमंचीय संवाद है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्नः
(i) नकुल ने गुरु जी से क्या प्रश्न किया?
(ii) पाप-पुण्य के भ्रम को दूर करने के लिए गुरुजी ने क्या उदाहरण दिया?
(iii) पाप और पुण्य के भ्रम में हमें क्यों नहीं पड़ना चाहिए?
उत्तर
(i) नकुल ने गुरु जी से प्रश्न किया कि हमें पाप और पुण्य के भ्रम में क्यों नहीं पड़ना चाहिए।
(ii) पाप-पुण्य के भ्रम को दूर करने के लिए गुरु जी सटीक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जैसे अंधकारभरे कमरे में प्रकाश करने पर अंधेरा स्वयं दूर हो जाता है उसी प्रकार हमने कितने भी पाप किए हैं हमारा एक पुण्य का काम सभी पापों को दूर कर देता है।
(iii) पाप और पुण्य का आना-जाना लगा ही रहता है। इसलिए इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि अमुक काम करने पर पाप लगेगा और अमुक करने पर पुण्य पाप-पुण्य को सुख-दुख की तरह समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) पाप-पुण्य के भ्रम में न पड़ने के प्रश्न पर गुरुजी की क्या प्रतिक्रिया थी?
(ii) अंधकारमय कमरे में प्रकाश करने से अंधेरा स्वयं दूर हो जाता है, इस उदाहरण का औचित्य क्या है?
(iii) निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए : सही, प्रश्न, लंबे, घना, अँधेरा, अतीत, दूर।
उत्तर
(i) पाप-पुण्य के भ्रम पर न पड़ने वाले नकुल के प्रश्न को गुरु जी ने एकदम सही प्रश्न बताया।
(ii) यह स्वाभाविक है। अगर किसी कमरे के भीतर लंबे समय से अंधकार छाया है तो प्रकाश से अंधकार स्वयं दूर हो जाता है। इस उदाहारण का औचित्य है कि पापों का समूह भी एक पुण्य से ही नष्ट हो जाता है। वस्तुतः यह भ्रम है। जैसे सुख-दुख में व्यक्ति को समान रहना चाहिए उसी प्रकार पाप और पुण्य के भाव में भी समान ही रहना चाहिए।
(iii) शब्दों के विलोम शब्द
शब्द – विलोम
सही – गलत
प्रश्न – उत्तर
लंबे – छोटे
घना – कम
अँधेरा – प्रकाश
अतीत – वर्तमान

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12. कृष्ण ने अर्जुन से ऐसा क्यों कहा कि तू केवल अपने कर्तव्य को कर फल की इच्छा त्याग दे। गुरु जी! जब फल की इच्छा ही नहीं होगी तो हम कर्म क्यों करेंगे?

शब्दार्थ : केवल = मात्र। इच्छा = ख्वाइश। कर्म = कर्तव्य। – प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्त्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। एकांकी के दूसरे दृश्य में गुरु जी ने बच्चों से नाटक का अभिनय कराया था। यह अभिनय श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश का था। नाटक
पूरा होने पर गुरु व बच्चे प्रसन्न होकर तालियाँ बजाते हैं। गुरु जी बच्चों से पूछते हैं कि इस नाटक से तुमने क्या सीखा? नाटक देखकर सिद्धार्थ के मन में एक दुविधा पैदा हो गई। इसमें गुरु जी सिद्धार्थ की इसी दुविधा को दूर कर रहे हैं।

व्याख्या : जब कक्षा में श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित अंश को नाटक के रूप में मंचित किया जा रहा था तब बच्चों ने देखा था कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि तू केवल कर्म कर, फल की इच्छा त्याग दे। यह संवाद सुनकर सिद्धार्थ के हृदय में एक दुविधा पैदा हो गई थी। उसने गुरु जी से इस दुविधा के बारे में पूछा था कि श्रीकृष्ण ने यह बात क्यों कही कि केवल कर्तव्य कर फल की इच्छा मत कर। अगर फल की इच्छा न होगी तो तब कोई कर्म करेगा ही क्यों?

विशेष-

  1. सिद्धार्थ के मन में यह शंका उठनी स्वाभाविक ही है कि जब हम कर्म करने के बाद फल ही प्राप्त नहीं कर पाएँगे तब हमें कर्म करने की आवश्यकता ही क्या है?
  2. इसी तरह की शंका अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अप्रत्यक्षतः की थी परिणामतः उन्होंने उसे कर्म करने व फल की चिंता न करने का उपदेश दिया था।
  3. भाषा सरल और सरस है, भावानुकूल है।
  4. संवाद रंगमंचीय विशेषताएँ लिए हुए है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) सिद्धार्थ के मन में क्या दुविधा उत्पन्न में हुई?
(ii) ‘तू केवल अपने कर्तव्य को कर फल की इच्छा त्याग दे’ आशय समझाइए।
(iii) ‘गुरु जी फल की इच्छा ही नहीं होगी तो हम कर्त्तव्य क्यों करेंगे?’
उत्तर
(i) सिद्धार्थ के मन में दुविधा पैदा हुई कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से ये क्यों कहा कि कर्तव्य कर फल की इच्छा त्याग दे। अगर कोई फल की इच्छा ही नहीं करेगा तो कर्त्तव्य क्यों करेगा।
(ii) यह कथन श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि तुझे केवल कर्म करना चाहिए अर्थात् कर्त्तव्य करना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि इस कर्तव्य को करने पर मुझे क्या फल मिलेगा। जो लोग कर्त्तव्य करने से पहले फल की इच्छा करने लगते हैं, वे ठीक से अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पाते, परिणामतः उन्हें उसका उचित फल भी प्राप्त नहीं करते।
(iii) यह प्रश्न सिद्धार्थ ने गुरु जी से किया है। गुरु जी अपने छात्रों को बता रहे थे कि उन्हें केवल कर्म या कर्त्तव्य करना चाहिए, उसके परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए। इस पर सिद्धार्थ ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति कर्म या कर्त्तव्य इसलिए करता है ताकि उसे उसका उचित फल प्राप्त हो। अगर वह फल की इच्छा ही नहीं क़रेगा तो वह अपना मन कर्त्तव्य में क्यों लगाएगा?

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कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) फल की इच्छा त्यागने और कर्म या कर्त्तव्य बात गीता में किसने किससे और क्यों कही है?
(ii) गीता में किस अध्याय में कहा गया है कि कर्म कर फल की चिंता मत कर।
(iii) कर्त्तव्य, इच्छा, कर्म शब्दों का वाक्यों में इस प्रकार प्रयोग कीजिए कि अर्थ स्पष्ट हो जाए।
उत्तर
(i) फल की इच्छा त्यागने और कर्म या कर्त्तव्य करने की बात श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कही है। इसलिए कही है कि रणभूमि में गुरुजनों व निकटतम संबंधियों को खड़े देखकर अर्जुन के मन में मोह उत्पन्न हो गया था।
(ii) श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में कहा गया है कि कर्म करना ही तेरा अधिकार है फल की चिंता करना नहीं। यह कथन इस अध्याय के सैंतालीसवें श्लोक में है।
(iii) वाक्य में प्रयोग :
शब्द – वाक्य
कर्तव्य – आप अपने कर्तव्य का निर्वहण कीजिए, शेष मुझ पर छोड़ दीजिए।
इच्छा – केवल इच्छा करने से ही सफलता नहीं मिलती, परिश्रम भी करना पड़ता है।
कर्म- जैसा व्यक्ति कर्म करता है उसके अनुसार ही उसे फल मिलता

13. अब ये बताओ, यदि इन वृक्षों को लगानेवाला व्यक्ति ये सोचता कि इनके फल मुझे खाने को मिलेंगे तभी मैं इन्हें लगाऊँगा। तब तो कोई भी व्यक्ति न तो वृक्ष लगाता और न ही हमें उसके फल खाने को मिलते। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को केवल अपना कर्म करना चाहिए। है ना?

शब्दार्थ : वृक्षों = पेड़ों। प्रत्येक = हरेक, हर एक।

प्रसंग : यह संवाद डॉ. छाया पाठक लिखित ‘कर्त्तव्य पालन’ शीर्षक एकांकी के दूसरे दृश्य से लिया गया है। एकांकी के दूसरे दृश्य में गुरु जी ने बच्चों से नाटक का अभिनय कराया था। यह अभिनय श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश का था। नाटक पूरा होने पर गुरु व बच्चे प्रसन्न होकर तालियाँ बजाते हैं। गुरु जी बच्चों से पूछते हैं कि इस नाटक से तुमने क्या सीखा? जब गुरु जी नाटक की शिक्षा के बारे में बच्चों से बात करे रहे थे तब एक विद्यार्थी सिद्धार्थ ने पूछा कि अगर हमारे मन में फल की इच्छा नहीं होगी तो हम कर्म करेंगे ही क्यों? गुरु जी सिद्धार्थ को उदाहरण के द्वारा अपनी बात समझा रहे हैं।

व्याख्या : गुरु जी ने सिद्धार्थ के प्रश्न का उत्तर देने से पहले बच्चों से पूछा कि हम यहाँ मेवे व फल आदि खाते हैं, क्या ये वृक्ष हमने लगाए थे? इस पर सभी छात्र कहते हैं कि नहीं, हमने वे वृक्ष नहीं लगाए। हम तो उनसे उतरे या टूटे फल खा रहे हैं। वे फिर पूछते हैं कि अगर कोई व्यक्ति वृक्ष लगता है और यह सोचता है कि अगर इसके फल मुझे खाने को मिलेंगे तो लगाऊँगा। तो ऐसा तो कभी होता नहीं है। वृक्ष कोई लगाता है उसके फल कोई ओर खाता है। ऐसे में कर्म करने वाला कोई और है और फल खाने वाला कोई ओर । वृक्ष किसने लगाया लेकिन उसका फल उसने नहीं खाया। उसका फल खाया किसी अन्य ने, जैसे आम का पेड़ लगाया मुरादाबाद के एक व्यक्ति ने और फल खाने वाले हुए उज्जैन की मंडी में आम खरीदने वाले हम लोग। अतः हमें केवल कर्म करना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।

विशेष

  1. एकांकीकार ने गुरु जी के माध्यम से बच्चों को उदाहरण के साथ समझाया है कि हमें कर्म करना चाहिए किंतु फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।
  2. उदाहरण और दृष्टांत अलंकार है।
  3. भाषा सरल और सहज है। भावानुकूल है।
  4. संवाद रंगमंच के अनुकूल है।

कर्त्तव्य पालन अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(i) वृक्ष लगाने वाला व्यक्ति क्या सोच सकता है?
(ii) वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति की सोच का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता?
(iii) यह संवाद किस ओर संकेत कर रहा है?
उत्तर
(i) वृक्ष लगाने वाला व्यक्ति सोच सकता है कि जब इस वृक्ष के फल मुझे ग्रहण करने ही नहीं हैं तो मैं इसे लगाऊँगा ही क्यों? मुझे तो ये तभी लगाने चाहिए जब इसके फल खाने के लिए उसे भी मिलें।
(ii) अगर वृक्ष लगाने वाला यह सोच लेता कि मैं वृक्ष तभी लगाऊँगा जब मुझे इसके फल खाने को मिलेंगे तो संभवतः वह वृक्ष लगाता ही नहीं। कौन जाने कब वृक्ष फल देगा और लगाने वाला तब न जाने कहाँ होगा। ऐसी स्थिति में वह वृक्ष नहीं लगाता। और हमें भी वृक्ष पर आए फल खाने को नहीं मिलते।
(iii) यह संवाद संकेत कर रहा है कि व्यक्ति को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।

कर्त्तव्य पालन बोधात्मक प्रश्नोत्तर

(i) संवाद में ‘अब ये बताओ’ वाक्यांश किसका है और किसके लिए कहा गया है?
(ii) इस संवाद का पूर्व प्रसंग संक्षेप में बताइए।
(iii) पर्यायवाची शब्द लिखिए:
वृक्ष, फल, कर्म
उत्तर
(i) संवाद में अब ये बताओ कथन गुरुजी का है और सिद्धार्थ के लिए कहा गया है।
(ii) इस संवाद का पूर्व प्रसंग यह है-गुरु जी ने कहा था कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। इस पर सिद्धार्थ के मन में एक दुविधा पैदा हो गई थी कि अगर हम बिना फल के कर्तव्य करेंगे तो कोई नहीं करेगा क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति तभी किसी कार्य को करने के लिए तत्पर होता है जब उसे उससे फल की आशा होती है। इसी प्रसंग के साथ यह संवाद आरम्भ होता है और गुरु जी उदाहरण के माध्यम से सिद्धार्थ के मन की दुविधा का अंत करते हैं।
(iii) पर्यायवाची शब्द
शब्द – पर्यायवाची शब्द
वृक्ष – तरु
फल – परिणाम
कर्म – कर्तव्य

MP Board Class 9th Hindi Solutions

भाषा भारती कक्षा 6 पाठ 18 परमानन्द माधवम् प्रश्न उत्तर हिंदी

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Class 6th Hindi Bhasha Bharti Chapter 18 Parmanand Madhyam Question Answer Solutions

MP Board Class 6th Hindi Chapter 18 Parmanand Madhyam Questions and Answers

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए

(क) सदाशिवराव काने का जन्म सन् में हुआ था
(i)23 नवम्बर, 1909
(ii) 21 नवम्बर, 1906
(iii) 23 दिसम्बर, 1989
(iv) 25 दिसम्बर, 1990.
उत्तर
(i) 23 नवम्बर, 1909

(ख) सदाशिवराव कात्रे द्वारा स्थापित बिलासपुर के पास कुष्ठ रोग सेवा का आश्रम है
(i) बेतलपुर
(ii) झाँसी
(iii) चाँपा
(iv) रायपुर।
उत्तर
(iii) चाँपा

(ग) राष्ट्र के लिए कलंक है
(i) मलेरिया
(ii) कुष्ठ रोग
(iii) हैजा,
(iv) दमा।
उत्तर
(ii) कुष्ठ रोग

(घ) सदाशिवराव की मृत्यु सन् में हुई
(i) 16 मई, 1977
(ii) 15 मई, 1975
(iii) 25 जून, 1990
(iv) 30 जून, 1977.
उत्तर
(i) 16 मई, 1977.

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

(क) कुष्ठ रोगियों की दुर्दशा देखकर उनका हृदय………… से भर गया।
(ख) सदाशिवराव कात्रे ……………. का व्रत लेकर चाँपा पहुँचे।
(ग) सदाशिवराव कात्रे को ……. के विवाह की चिन्ता थी।
(घ) कुष्ठ रोगियों की चिकित्सा एवं आवास हेतु ……………………ग्राम में स्थान मिल गया।
उत्तर
(क) करुणा
(ख) कुष्ठ निवारण
(ग) अपनी पुत्री
(घ) लखुरौं।

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प्रश्न 3.
एक या दो वाक्यों में उत्तर लिखिए

(क) सदाशिवराव कात्रे का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे का जन्म मध्य प्रदेश के ‘गुना’ जिले के आरौन ग्राम में हुआ था।

(ख) कुष्ठ रोगी के प्रति घृणा भाव होने का कारण लिखिए।
उत्तर
कुष्ठ रोगी के घावों से द्रव का निरन्तर बहते रहना, और भिनभिनाती मक्खियाँ ही रोगी के प्रति घृणा पैदा करती हैं।

(ग) सदाशिवराव कात्रे ने पुत्री प्रभावती को क्यों पढ़ाया ?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे ने अपनी पुत्री प्रभावती को इसलिए पढ़ाया कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। वे सोचते थे कि कुष्ठ रोगी पिता की कन्या का वरण कौन करेगा। इस दृष्टि से उन्होंने अपनी पुत्री को सुशिक्षित कराया।

(घ) समाज का सकारात्मक दृष्टिकोण कैसे विकसित होने लगा?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे ने आश्रम में रामचरितमानस और महाभारत के अनेक उदाहरण देकर कुष्ठ रोग के प्रति सेवाभाव एवं सहयोग को राष्ट्रीय गुण के रूप में लोगों के हृदय में जगाया। उन्होंने खुद कुदाल से खोदकर बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया। सदाशिवराव कात्रे के अथक परिश्रम एवं राष्ट्र भक्ति के भाव से समाज का सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होने लगा।

(ङ) सदाशिवराव कात्रे ने किसकी प्रेरणा से कुष्ठ रोगियों की सेवा का कार्य प्रारम्भ किया ?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे कुष्ठ निवारण का व्रत लेकर चले तो उनकी मुलाकात मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम हरिभाऊ पाटस्कर से हो गई। उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा के विषय में चर्चा की। इस तरह राज्यपाल महोदय से प्रेरणा प्राप्त करके सदाशिवराव कात्रे ने कुष्ठ रोगियों की चिकित्सा और आवास के लिए स्थान प्राप्त करने के लिए प्रयास शुरू कर दिए।

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प्रश्न 4.
तीन से पांच वाक्यों में उत्तर दीजिए

(क) ‘सदाशिवराव कात्रे में जिजीविषा स्पष्ट दिखाई देती थी’, ऐसा क्यों कहा गया है?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे को कुष्ठ रोग ने घेर लिया। सभी लोग घृणा करते थे। परिवार के लोगों ने उनके खानपान और रहने की व्यवस्था अलग कर दी। वे उस रोग के विषय में अज्ञानी थे। रोग के कारण द्रव लगातार बहता रहता था, मक्खियाँ भिनभिनाती रही जिससे लोगों में घृणा पैदा हो रही थी। उन्हें धैर्य और स्नेह करने वाला कोई भी नहीं था। जीवन में घृणा, दुराव और निराशा भर गई थी। परन्तु फिर भी उनके अन्दर जीवन जीने की लालसा स्पष्ट दीख पड़ती थी। उन्होंने इन सभी विपरीत स्थितियों में कुष्ठ रोग को दूर करने का व्रत लिया और सुनियोजित प्रयास किए। इससे लगता था कि उनमें जिजीविषा विद्यमान थी।

(ख) सदाशिवराव कात्रे ‘परमानन्द माधवम्’ क्यों कहलाए?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे को परमानन्द माधवम् इसलिए कहा जाता था कि उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम समय तक बिना किसी स्वार्थ के कुष्ठ रोग से पीड़ितों की सेवा के लिए आश्रम व चिकित्सालय की स्थापना की। वे कुष्ठ रोग को राष्ट्र के लिए कलंक कहते थे। आश्रम में हर क्षण भगवत् भजन और संकीर्तन चलता रहता था। उनके प्रयासों से कुष्ठ रोगियों को सेवा और उपचार मिलने लगा। समाज में सही धारणा बनने लगी। साथ ही सदाशिव का अर्थ परमानन्द और गोविन्द का नाम माधव (कृष्ण) भी है। इसलिए उन्हें परमानन्द माधवम् कहा जाने लगा।

(ग) भारतीय कुष्ठ निवारक संघ, चाँपा की स्थापना कब और कैसे हुई ?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे ने कुष्ठ रोगियों के इलाज का व्रत लिया। उनकी भेंट मध्य प्रदेश के राज्यपाल महामहिम हरिभाऊ पाटस्कर से हुई। कुष्ठ रोगियों की सेवा के विषय पर चर्चा हुई। उनसे प्रेरणा लेकर कुष्ठ रोगी होते हुए भी उनकी सेवा के कार्य में खुशी-खुशी लगे रहे। सदाशिवराव कात्रे की योजना के अनुसार कुष्ठ रोगियों की चिकित्सा एवं आवास के लिए लखु नामक ग्राम में स्थान मिल गया। यह स्थान चौपा से दस किमी. दूर है। सन् 1962 ई. में यह आश्रम भारतीय कुष्ठ निवारक संघ, चाँपा के नाम से स्थापित हो गया।

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प्रश्न 5.
सोचिए और बताइए

(क) “प्रकृति ने भी सदाशिवराव कात्रे के साथ क्रूर उपहास किया”, ऐसा क्यों कहा गया है ?
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे के पिता का देहावसान उस समय हो गया जब इनकी आयु आठ वर्ष थी। इनकी शिक्षा ‘काका’ के यहाँ झाँसी में हुई। शिक्षा पाकर इन्हें रेलवे में नौकरी मिल गई। सन् 1930 ई. में इनका विवाह हो गया। इसी बीच उन्हें कुष्ठ रोग ने घेर लिया। इन्हें अपनी अल्पायु से ही आपदाओं ने घेरा हुआ था। इस प्रकार यह कि ‘प्रकृति ने भी सदाशिवराव कात्रे के साथ क्रूर उपहास किया’ कहा गया है। कुष्ठ रोग भयानक रोग है जिससे समाज और अपने भी छूट जाते हैं।

(ख) आश्रम में रहकर कोई कार्य करने हेतु तैयार नहीं होता था, क्यों?
उत्तर
कुष्ठ रोगियों के आश्रम में सेवा करने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता था क्योंकि रोगियों के अंगों से रिसता द्रव,भिनभिनाती मक्खियाँ जो घृणा का भाव पैदा करती थीं। आश्रम में कुष्ठ रोगियों के प्रति अछूत जैसी दशा, धैर्य और अपनेपन की कमी थी।

(ग) कुष्ठरोगियों की दुर्दशा देखकर सदाशिवराव कात्रे के हृदय में करुणा उत्पन्न होने के दो कारण लिखिए।
उत्तर
सदाशिवराव कात्रे के हृदय में करुणा उत्पन्न होने के दो कारण थे

  1. कुष्ठ रोगियों की दशा अछूत जैसी होना, घर-परिवार से अलग कर देना।
  2. उन रोगियों के प्रति घृणा एवं अपनापन से रहित मानकर उपेक्षा भरा जीवन, सामाजिक असम्मान और घृणास्पद व्यवहार।

(घ) चाँपा नगर के प्रतिष्ठित जन कुष्ठ रोगियों की सेवा हेतु कैसे प्रेरित हुए?
उत्तर
चांपा नगर के आश्रम में कुष्ठ रोगियों के लिए चिकित्सा और आवास के लिए लखुरौं ग्राम में स्थान मिल गया। यह संस्था पंजीबद्ध हो गई। सदाशिवराव के प्रयासों से, रामचरितमानस और महाभारत के उदाहरणों से लोगों में कुष्ठ रोग के प्रति सेवा भाव जगने लगा। चाँपा के प्रतिष्ठावान और समझदार उदार व्यक्तियों में कुष्ठरोग के प्रति सेवाभाव एवं सहयोग को राष्ट्रीय गुण के रूप में जगाया। इस प्रकार सदाशिवराव के अथक परिश्रम और राष्ट्रभक्ति के भाव से लोगों में सकारात्मक सोच पैदा होने लगी।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिए
पौराणिक, संचालित, चिकित्सा, संवेदनशील, करुणा।
उत्तर
अपने अध्यापक महोदय की सहायता से उच्चारण कीजिए और अभ्यास कीजिए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों की शुद्ध वर्तनी लिखिए
(i) असरम
(ii) देहवसान
(iii) दैदिप्यमान
(iv) अंतद्वर्द्ध
(v) राष्ट्र।
उत्तर
(i) आश्रम
(ii) देहावसान
(iii) दैदीप्यमान
(iv) अन्तर्द्वन्द्व
(v) राष्ट्र।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग बताइए
(i) दुर्दशा
(ii) उपचार
(iii) अज्ञान
(iv) अनुभव
(v) विज्ञापन।
उत्तर
(i) दुर + दशा
(ii) उप + चार
(iii) अ + ज्ञान
(iv) अनु + भव
(v) वि + ज्ञापन।

प्रश्न 4.
‘आई’ प्रत्यय लगाकर पाँच शब्द लिखिए
उत्तर
भलाई, लिपाई, पुताई, लिखाई, पढ़ाई, बुराई।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों का संधि विच्छेद कीजिए
(i) चिकित्सालय
(ii) देहावसान
(iii) विवाहोपरान्त
(iv) अल्पायु
(v) मतावलम्बी।
उत्तर
(i) चिकित्सा + आलय
(ii) देह + अवसान
(iii) विवाह + उपरान्त
(iv) अल्प + आयु
(v) मत + अवलम्बी।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग | कीजिए
(i) आत्मबल
(ii) व्यवस्था
(iii) संतोष
(iv) कुष्ठरोगी
(v) जन्म।
उत्तर-
(i) आत्मबल = आत्मबल से ही मुशीबतों पर विजय पा सकते हैं।
(ii) व्यवस्था = आश्रम की व्यवस्था में सभी सदस्यों के सहयोग की जरूरत है।
(iii) सन्तोष = सन्तोष से जीवन सुखी होता है।
(iv) कुष्ठ रोगी= कुष्ठ रोगी से लोग घृणा करने लगते हैं।
(v) जन्म = जन्म से कोई बड़ा-छोटा नहीं होता है।

परमानन्द माधवम्प रीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) रोग के प्रति अज्ञानता, रोग से रिसने वाला द्रव और भिनभिनाती मक्खियाँ ही रोगी के प्रति घृणा पैदा करती हैं। जिन परिस्थितियों में रोगी को अधिक ढाढ़स, अपनापन और स्नेह की आवश्यकता होती है, उन परिस्थितियों में निरन्तर घृणा और दुराव जीवन में नैराश्य का भाव पैदा करता है लेकिन इन सब परिस्थितियों में भी सदाशिवराव की जिजीविषा स्पष्ट दिखाई देती थी।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक भाषा-भारती’ के पाठ ‘परमानन्द माधवम्’ से ली गई हैं। इस पाठ के लेखक ‘भागीरथ कुमरावत’ हैं।

प्रसंग-इन पंक्तियों में बताया गया है कि सदाशिवराव कुष्ठ रोगी थे। विपरीत परिस्थितियों में भी उनमें जीवन जीने की प्रबल इच्छा थी।

व्याख्या-लेखक कहता है कि इस कुष्ठ रोग के विषय में जानकारी न होना तथा इस रोग के कारण शरीर से धीरे-धीरे बहता हुआ पदार्थ तथा ऊपर से मक्खियों का लगातार भिनभिनाते रहना, उस रोगी के प्रति घृणा भाव पैदा करता है। ऐसी दशा में रोगी को धैर्य बँधाने की जरूरत होती है। उसके प्रति अपनापन और प्रेम रखने की आवश्यकता होती है, परन्तु उस गम्भीर दशा में लोग ऐसे रोगी से लगातार घृणा करते हैं। अपनेपन के भाव को छिपा लेते हैं। उस दशा में उस रोगी के हृदय में जीवन के प्रति निराशा की भावना पैदा हो जाती है। इस तरह की विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए भी सदाशिवराव के अन्दर जीवन को जीने की इच्छा साफ दीख पड़ती थी।

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(2) सदाशिवराव सोचते थे कि यदि कुष्ठ के कलंक से राष्ट्र को मुक्त करना है तो राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक का सहभाग इसमें होना चाहिए। रोग मुक्त समाज होगा तो राष्ट्र बलवान होगा। यह सद्भाव लेकर सदाशिवराव ने तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति महोदय डॉ. राधाकृष्णन को पत्र लिखा। राष्ट्रपति महोदय ने पत्र पाकर इनके कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा तो की ही साथ-ही-साथ इन्हें प्रशंसा पत्र और एक हजार रुपये का योगदान भी भेजा। इस प्रकार सदाशिवराव के कार्यों को समाज द्वारा मान्यता मिलने लगी जिससे उनका मनोबल यह कार्य करने में और भी बढ़ गया।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-सदाशिवराव ने अपने राष्ट्र से कुष्ठ रोग को मिटाने के लिए संकल्प लिया और समाज ने उनके कार्य को महत्व देना शुरू कर दिया।

व्याख्या-सदाशिवराव की चिन्तन शैली में एक बात जोर पकड़ती नजर आने लगी कि यदि पूरे राष्ट्र से कुष्ठ रोग को दूर करना है, तो इस प्रयास में भारत के प्रत्येक नागरिक को अपना सहयोग देना चाहिए। कुष्ठ रोग भारत के लिए कलंक है। इस रोग से यदि राष्ट्र मुक्ति पा सका तो समझिए पूरा देश शक्तिशाली हो सकेगा। किसी भी रोग से रहित नागरिक स्वस्थ राष्ट्र की नींव रखते हैं। इसी अच्छी भावना के साथ उन्होंने उस समय के देश के राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन को एक पत्र लिखा और उस पत्र में उन्होंने अपनी कार्य-योजना का विवरण भी दिया जिसे पढ़कर राष्ट्रपति महोदय बहुत प्रभावित हुए और सदाशिवराव के इस कार्य की बार-बार प्रशंसा की। साथ ही, उन्होंने उनको एक प्रशंसा पत्र तथा एक हजार का योगदान भी भेजकर अपने सहयोग की पहल की। इसका प्रभाव यह हुआ कि सदाशिवराव द्वारा चलाए गए कार्यों को समाज ने महत्व प्रदान किया। इसका नतीजा यह हुआ कि सदाशिवराव को मानसिक बल प्राप्त हुआ और वे अपने कार्य में पूरी मजबूती से लग गए।

MP Board Class 6 Hindi Question Answer

MP Board Class 9th Special Hindi काव्य बोध

MP Board Class 9th Special Hindi काव्य बोध

प्रश्न 1.
कविता की परिभाषा और विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
परिभाषा-कविता को परिभाषित करते हुए सुप्रसिद्ध समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है

“कविता वह साधन है जिसके द्वारा सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है।”

विशेषताएँ-उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार कविता की तीन विशेषताएँ दिखाई देती हैं

  1. कविता मानव एकता की प्रतिष्ठा करने का साधन है और यही उसकी उपयोगिता है।
  2. कविता में भावों और कल्पना की प्रधानता रहती है।
  3. कविता में कवि की अनुभूति की अभिव्यक्ति रहती है।

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प्रश्न 2.
कविता के स्वरूप के कौन-से पक्ष होते हैं?
उत्तर-
कविता का बाह्य स्वरूप-कविता के दो पक्ष होते हैं

  1. अनुभूति,
  2. भिव्यक्ति।

(1) अनुभूति के पक्ष का सम्बन्ध कविता के आन्तरिक स्वरूप से है।
(2) अभिव्यक्ति का सम्बन्ध कविता के बाह्य रूप से है। कविता के बाह्य रूप के निर्धारण में निम्नलिखित कारकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है-

  • लय,
  • तुक,
  • छन्द,
  • शब्द योजना,
  • काव्य भाषा,
  • अलंकार,
  • काव्य गुण।

कविता का आन्तरिक स्वरूप-

  1. कविता के आन्तरिक स्वरूप से रसात्मकता, अनुभूति की तीव्रता, भाव और विचारों का समावेश तथा कल्पना की सृजनात्मकता से उत्पन्न सौन्दर्य बोध का सम्बन्ध हुआ करता है।
  2. कविता के स्वरूप के अन्तर्गत भाव सौन्दर्य, विचार सौन्दर्य, नाद सौन्दर्य तथा अप्रस्तुत योजना का सौन्दर्य सम्मिलित हुआ करता है।

प्रश्न 3.
काव्य भेद स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
काव्य-भेद-

  1. दृश्य काव्य,
  2. श्रव्य काव्य।

(1) दृश्य काव्य को हम आँखों से देखते हैं और कानों से सुनते हैं।
(2) श्रव्य काव्य को सुनकर ही उसका रसास्वादन किया जाता है। शैली के आधार पर काव्य भेद-शैली के आधार पर काव्य भेद दो हैं

  1. प्रबन्ध काव्य,
  2. मुक्तक काव्य।

(1) प्रबन्ध काव्य-प्रबन्ध काव्य में महाकव्य, खण्डकाव्य तथा आख्यानक गीतियाँ आती हैं।
(2) मुक्तक काव्य—मुक्तक काव्य में पाठ्य मुक्तक, गेय मुक्तक शामिल हैं।

प्रश्न 4.
महाकाव्य के लक्षण बताइए और उसकी कथा की विशेषता लिखिए।
उत्तर-
महाकाव्य-महाकाव्य के लक्षण (परिभाषा) निम्न प्रकार है

  1. इसमें जीवन की विशद् व्याख्या होती है।
  2. इसकी कथा इतिहास प्रसिद्ध होती है।
  3. महाकाव्य का नायक उदात्त चरित्र, धीर-वीर और गम्भीर होता है।
  4. महाकाव्य में श्रृंगार, शान्त और वीर रस में से कोई एक रस प्रधान रस होता है। शेष रस गौण होते हैं।
  5. महाकाव्य सर्गबद्ध होता है। इसमें कम-से-कम आठ सर्ग होते हैं।

महाकाव्य की कथा की विशेषता-

  1. महाकाव्य की कथा धारा-प्रवाही मार्मिक प्रसंगों पर आधारित होती है।
  2. मूलकथा के साथ-साथ अन्य सहायक कथांश भी इसमें प्रारम्भ से अन्त तक आकर अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं।
  3. सहायक कथांशों से मूलकथा परिपुष्ट होती है।

प्रश्न 5.
हिन्दी के प्रसिद्ध महाकाव्य और उनके रचयिताओं के नाम लिखिए।
उत्तर-
हिन्दी के प्रसिद्ध महाकाव्य और उनके रचयिता
महाकाव्य – रचयिता

  1. रामचरितमानस – गोस्वामी तुलसीदास
  2. पद्मावत मलिक – मुहम्मद जायसी
  3. साकेत – मैथिलीशरण गुप्त
  4. कामायनी – जयशंकर प्रसाद
  5. उर्वशी – रामधारीसिंह ‘दिनकर’

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प्रश्न 6.
खण्डकाव्य किसे कहते हैं? हिन्दी के प्रसिद्ध खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-
खण्डकाव्य-खण्डकाव्य वह रचना है जिसमें जीवन का कोई एक भाग, एक घटना अथवा एक चरित्र का चित्रण होता है। खण्डकाव्य अपने आप में एक पूर्ण रचना होती है। सम्पूर्ण रचना एक ही छन्द में पूर्ण होती है।

हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध खण्डकाव्य-पंचवटी, जयद्रथ वध, नहुष, सुदामा-चरित, पथिक, हल्दीघाटी इत्यादि।

प्रश्न 7.
आख्यानक कृतियाँ किसे कहते हैं? स्पष्ट लिखिए।
उत्तर-
आख्यानक कृतियाँ-महाकाव्य और खण्डकाव्य से भिन्न पदबद्ध कहानी ही आख्यानक कृति है। इसमें वीरता, साहस, पराक्रम, प्रेम और बलिदान, करुणा आदि से सम्बन्धित प्रेरक घटना प्रसंगों को कथा के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। इसकी भाषा सरल, स्पष्ट और रोचक होती है। गीतात्मकता और नाटकीयात्मकता इसकी विशेषता है। झाँसी की रानी, रंग में भंग, तुलसीदास आदि आख्यानक कृतियों के उदाहरण हैं।

प्रश्न 8.
मुक्तक काव्य किसे कहते हैं? इसके दो प्रकार भी बताइए।
उत्तर-
मुक्तक काव्यं-मुक्तक काव्य में एक अनुभूति, एक भाव और एक ही कल्पना का चित्रण होता है। मुक्तक काव्य की भाषा सरल एवं स्पष्ट होती है। वर्ण्य विषय अपने आप में पूर्ण होता है। इसका प्रत्येक छन्द स्वतन्त्र होता है। उदाहरण-बिहारी, रहीम, वृन्द, सूर, मीरा के दोहे और पद।

मुक्तक काव्य दो प्रकार के होते हैं-

  1. पाठ्य मुक्तक,
  2. गेय मुक्तक।

पाठ्य मुक्तक-पाठ्य मुक्तक में विषय की प्रधानता होती है। प्रसंगानुसार भावानुभूति व कल्पना का चित्रण होता है तथा किसी विचार या रीति का भी चित्रण होता है।

गेय मुक्तक-इसे गीति या प्रगीति काव्य भी कहते हैं। इसमें-

  1. भाव प्रवणता,
  2. सौन्दर्य बोध,
  3. अभिव्यक्ति की संक्षिप्तता,
  4. संगीतात्मकता,
  5. लयात्मकता की प्रधानता होती है।

रस

प्रश्न 1.
रस किसे कहते हैं? इसकी परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
रस को काव्य की आत्मा बताया गया है। जिस तरह आत्मा के बिना शरीर का कोई मूल्य नहीं होता, उसी तरह रस के बिना काव्य भी निर्जीव माना गया है। ‘रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्’ अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

यदि काव्य की तुलना मनुष्य से की जाए तो शब्द और अर्थ को काव्य का शरीर, अलंकारों को आभूषण, छन्दों को उसका बाह्य परिधान तथा रस को आत्मा कह सकते हैं। काव्य में रस का अर्थ आनन्द बताया गया है। साहित्यशास्त्र में ‘रस’ का अर्थ अलौकिक या लोकोत्तर आनन्द होता है। अतः “काव्य के पढ़ने, सुनने अथवा उसका अभिनय देखने में पाठक, श्रोता या दर्शक को जो आनन्द मिलता है, वही काव्य में रस कहलाता है।”

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प्रश्न 2.
रस के अंगों (रस को आस्वाद योग्य बनाने में सहायक अवयव) को स्पष्ट रूप से बताइए।
उत्तर-
रस के अंग चार होते हैं-

  • स्थायीभाव,
  • विभाव,
  • अनुभाव,
  • संचारीभाव।

विभाव के दो भेद होते हैं-

  • आलम्बन,
  • उद्दीपन।

आलम्बन भी दो प्रकार का होता है-

  • आशय,
  • विषय।

प्रश्न 3.
रस के भेद बताइए तथा प्रत्येक रस के स्थायी भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
रस – स्थायी भाव

  1. शृंगार – रति
  2. हास्य – हास
  3. करुण – शोक
  4. रौद्र – क्रोध
  5. वीभत्स – जुगुप्सा
  6. भयानक – भय
  7. अद्भुत – विस्मय
  8. वीर – उत्साह
  9. शान्त – निर्वेद

विशेष-आचार्य भरत ने नाटक में आठ रस माने हैं। परवर्ती आचार्यों ने शान्त रस को अतिरिक्त स्वीकृति देकर कुल नौ रस निश्चित कर दिए। काव्य में महाकवि सूरदास ने वात्सल्य प्रधान मधुर पदों की रचना की तो एक अन्य रस-‘वात्सल्य रस’ की भी स्थापना हो गई। आजकल भक्ति को भी रस रूप में स्वीकृति दिये जाने का आग्रह चल रहा है।

प्रश्न 4.
शृंगार रस की परिभाषा, भेद और उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
शृंगार रस की निष्पत्ति ‘रति’ स्थायी भाव के संयोग से होती है। इसके दो भेद हैं-

  • संयोग शृंगार,
  • वियोग शृंगार।

संयोग शृंगार रस में नायक-नायिका के संयोग (मिलन) की स्थिति का वर्णन होता है।

उदाहरण-
“बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सौंह करें, भौंहनि हंसै, दैन कहे नटि जाय॥”

वियोग श्रृंगार रस में नायक-नायिका के बिछुड़ने का तथा दूर देश में रहने की स्थिति का वर्णन, वियोग श्रृंगार की व्यंजना करता है-
उदाहरण-
“आँखों में प्रियमूर्ति थी, भूले थे सब भोग।
हुआ योग से भी अधिक, उसका विषम वियोग॥”

प्रश्न 5.
हास्य, करुण और रौद्र रस की परिभाषा सोदाहरण लिखिए।
उत्तर-
हास्य रस-किसी व्यक्ति के विकृत वेश, आकृति तथा वाणी आदि को देख व सुनकर हँसी उत्पन्न हो उठती है, वैसा ही वहाँ का वर्णन होता है, तो वहाँ हास्य रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
“जब धूमधाम से जाती है बारात किसी की सजधज कर।
मन करता धक्का दे दूल्हे को, जा बैतूं घोड़े पर।
सपने में ही मुझको अपनी, शादी होती दिखती है।
वरमालाले दुल्हन बढ़ती, बस नींद तभी खुल जाती है।”

करुण रस-प्रिय वस्तु के विनाश अथवा अनिष्ट के होने से चित्त में आती हुई विकलता करुण रस को उत्पन्न करती है।

उदाहरण-
“अभी तो मुकुट बँधा था माथ,
हुए कल ही हल्दी के हाथ,
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले भीनचुम्बन-शून्यकपोल,
हाय ! रुक गया यहीं संसार,
बना सिंदूर अंगार।।”

रौद्र रस-जब क्रोध नामक स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से पुष्ट हआ रस दशा को प्राप्त होता है, तो वहाँ रौद्र रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
सुनत लखन के वचन कठोरा।
परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥
अब जनि देउ दोष मोहि लोगू।
कटु वादी बालक वध जोगू॥

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित रसों के स्थायी भाव सहित परिभाषा लिखिए और प्रत्येक का उदाहरण भी दीजिए-
(1) वीर रस,
(2) भयानक रस।
उत्तर-
(1) वीर रस-वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है। वीर रस की निष्पत्ति ओजस्वी वीर घोषणाओं या वीर गीतों को सुनकर अथवा उत्साह बढ़ाने वाले कार्यकलापों को देखने से होती है।
उदाहरण-
“वह खून कहो किस मतलब का,
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का,
जिसमें जीवन की रवानी नहीं॥”

(2) भयानक रस-भयानक रस का स्थायी भाव ‘भय’ है। प्रकृति के डरावने दृश्यों, अथवां बलवान शत्रु के प्राणनाशक बोलों को सुनकर भय की उत्पत्ति होने पर भयानक रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
‘हाहाकार हुआ कन्दन मय,
कठिन वज्र होते थे चूर।
हुए दिगन्त बधिर भीषण
रव बार-बार होता था क्रूर॥

अलंकार

प्रश्न 1.
अलंकार का क्या तात्पर्य है? अलंकार की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
अलंकार से तात्पर्य है-शृंगार करना या सजाना या आभूषित करना। जिस तरह एक नारी आभूषणों से अपने शरीर की सज्जा करती है, उसी तरह अलंकार वे तत्व हैं जिनसे काव्य की शोभा बढ़ती है। आचार्य विश्वनाथ के शब्दों में, “अलंकार शब्द-अर्थ स्वरूप काव्य के अस्थिर धर्म हैं और भावों और रसों का उत्कर्ष करते हुए वैसे ही काव्य की शोभा बढ़ाते हैं, जैसे हार आदि आभूषण नारी की सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं।”

प्रश्न 2.
अलंकार के भेद बताओ और प्रत्येक की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
अलंकार के भेद तीन होते हैं-

  1. शब्दालंकार,
  2. अर्थालंकार,
  3. उभयालंकार।

(1) शब्दालंकार-शब्द विशेष के चमत्कार द्वारा जो अलंकार कविता का सौन्दर्य बढ़ाएँ, वे शब्दालंकार होते हैं।
(2) अर्थालंकार-काव्य में जहाँ अर्थ के द्वारा चमत्कार उत्पन्न करते हैं, वे अर्थालंकार कहलाते हैं।
(3) उभयालंकार-शब्द एवं अर्थ दोनों में चमत्कार पैदा करके काव्य की शोभा बढ़ाते हैं, वे उभयालंकार होते हैं।

प्रश्न 3.
शब्दालंकार के भेद बताइए और प्रत्येक की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर-
शब्दालंकार के प्रमुख तीन भेद हैं-

  1. अनुप्रास,
  2. यमक,
  3. श्लेष।

(1) अनुप्रास-जिस काव्य रचना में व्यंजन वर्ण की दो या दो से अधिक बार आवृत्ति होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
जैसे-
“तरनि तनूजा तट तमाल, तरुवर बहु छाए।”

यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति की गई है, अतः अनुप्रास अलंकार है।

(2) यमक-यमक अलंकार में एक शब्द बार-बार आए, किन्तु उसका अर्थ हर बार अलग-अलग हो, तो वहाँ यमक अलंकार होता है।
जैसे
“माला फेरत जुग गया, गया न मन को फेर।
करका मनका डारि के मनका मनका फेरि॥”

यहाँ मनका शब्द के दो अर्थ हैं-पहले मन का अर्थ ‘मोती’ तथा दूसरे मन का अर्थ ‘हृदय’ से है।

(3) श्लेष अलंकार-श्लेष अलंकार में एक ही शब्द के दो या दो से अधिक अर्थ होते हैं।

जैसे-
चिरजीवी जोरी जुरै क्यों न सनेह गंभीर।
को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के वीर॥

वृषभानुजा = वृषभानु की पुत्री अर्थात् राधा। वृषभ की अनुजा = गाय। हलधर = कृष्ण के भाई बलराम। हलधर = हल को धारण करने वाला बैल।।

प्रश्न 4.
अर्थालंकार के भेद बताइए और प्रत्येक की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर-
अर्थालंकार के तीन भेद होते हैं-

  1. उपमा,
  2. रूपक,
  3. उत्प्रेक्षा।

(1) उपमा-जहाँ एक वस्तु अथवा प्राणी की तुलना अत्यन्त सादृश्य के कारण प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, तब वहाँ उपमा अलंकार होता है।
जैसे-
“सिंधु सा विस्तृत है अथाह,
एक निर्वासित का उत्साह।”

उपमा अलंकार के चार अंग होते हैं-

  • उपमेय-जिस व्यक्ति या वस्तु की समानता की जाती है।
  • उपमान-जिस व्यक्ति या वस्तु से समानता की जाती है।
  • साधारण धर्म-वह गुण या धर्म जिसकी तुलना की जाती है।
  • वाचक शब्द-वह शब्द जो रूप-रंग, गुण और धर्म की समानता दर्शाता है। जैसे-सा, सी, सम, समान आदि।

(2) रूपक अलंकार-काव्य में जहाँ उपमेय में उपमान का आरोप होता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें वाचक शब्द का लोप होता है।
जैसे-
“चरण-सरोज पखारन लागा।”

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(3) उत्प्रेक्षा अलंकार-काव्य में जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना व्यक्त की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। जनु, जानो, मानो, मानहुँ आदि वाचक शब्द उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान हैं।

जैसे-
“जनु अशोक अंगार दीन्ह मुद्रिका डारि तब।”
“मानो, झूम रहे हैं, तरू भी मंद पवन के झोकों से।”

छन्द

प्रश्न 1.
छन्द की परिभाषा बताइए।
या
छन्द किसे कहते हैं?
उत्तर-
कविता के शाब्दिक अनुशासन का नाम छन्द

इस तरह काव्यशास्त्र के नियम के अनुसार, जिस कविता या काव्य में मात्रा, वर्ण, गण, यति, लय आदि का विचार करके शब्द योजना की जाती है, उसे छन्द कहते हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित के विषय में जानकारी दीजिएयति, लय, गति, तुक।
उत्तर-

  • यति-छन्द का पाठ करते समय जहाँ थोड़ी देर रुका जाता है, उसे यति कहते हैं।
  • लय-छन्द के पढ़ने की शैली को लय कहते हैं।
  • गति-गति का अर्थ है प्रवाह, अर्थात छन्द को पढ़ते समय प्रवाह एक-सा हो।
  • तुक-पद के चरणों के अन्त में जो समान स्वर आते हैं तथा साम्य बैठाने के लिए, लिये जाते हैं, उन्हें तुक कहते हैं।

प्रश्न 3.
छन्द के भेद बताइए और उनका परिचय दीजिए।
उत्तर-
छन्ददो प्रकार के होते हैं-

  1. वार्णिक छन्द,
  2. मात्रिक छन्द।

(1) वार्णिक छन्द-वार्णिक छन्दों में वर्गों की गणना की जाती है तथा वर्णों की संख्या के आधार पर छन्द का निर्धारण किया जाता है।
(2) मात्रिक छन्द-मात्रिक छन्दों में मात्राओं की गणना की जाती है।

नोट-दोहा, चौपाई मात्रिक छन्द हैं।

प्रश्न 4.
दोहा और चौपाई छन्द के लक्षण उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर-
दोहा-दोहा छन्द के प्रथम और तृतीय चरणों में 13-13 और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणों में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसके सम चरणों के अन्त में तगण अथवा जगण का होना जरूरी है।

उदाहरण-
MP Board Class 9th Special Hindi काव्य बोध img 1
जा तन की झाँई, परै, स्याम हरित दुति होय॥ चौपाई-चौपाई एक सम मात्रिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण-
MP Board Class 9th Special Hindi काव्य बोध img 2

प्रश्न 5.
गण के स्वरूप को समझाइए।
उत्तर-
तीन वर्गों के समूह को गण कहते हैं। वार्णिक छन्दों में वर्ण की गणना की जाती है। उन वर्णों की लघुता और गुरुता के विचार से गुणों के आठ रूप होते हैं।

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प्रश्न 6.
गणों के आठ रूप कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर-
गणों के आठ रूप और मात्राएँ निम्न प्रकार हैं

  • यगण (।ऽऽ)
  • मगण (ऽऽऽ)
  • तगण (ऽऽ।)
  • रगण (ऽ।ऽ)
  • जगण (।ऽ।)
  • भगण (ऽ।।)
  • नगण (।।।)
  • सगण (।।ऽ)

महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

रिक्त स्थान पूर्ति

1. कविता के द्वारा सृष्टि के साथ मनुष्य के ……………………… सम्बन्ध की रक्षा होती है। (रागात्मक/विवादात्मक)
2. अनुभूति के पक्ष का सम्बन्ध कविता के ……………………… स्वरूप से (बाह्य/आन्तरिक)
3. पद्मावत के रचयिता ……………………… हैं। (रहीम/मलिक मुहम्मद जायसी)
4. ‘रस’ को काव्य की ……………………… बताया गया है। (आत्मा/शरीर)
5. अर्थालंकार के ……………………… भेद हैं। (तीन/पाँच)
उत्तर-
1. रागात्मक,
2. आन्तरिक,
3. मलिक मुहम्मद जायसी,
4. आत्मा,
5. तीन।

सही विकल्प चुनिए

1. काव्य भेद हैं
(क) दृश्य काव्य
(ख) श्रव्य काव्य
(ग) दृश्य और श्रव्य काव्य
(घ) नाट्य और कथ्य काव्य।
उत्तर-
(ग) दृश्य और श्रव्य काव्य

2. ‘कामायनी’ के रचयिता हैं
(क) तुलसीदास
(ख) मीराबाई
(ग) जयशंकर प्रसाद’
(घ) पन्त।
उत्तर-
(ग) जयशंकर प्रसाद’

3. ‘रस’ के बिना काव्य माना जाता है-
(क) सजीव
(ख) निर्जीव
(ग) व्यर्थ
(घ) सार्थक।
उत्तर-
(ख) निर्जीव

4. ‘रस’ के भेद हैं
(क) नौ
(ख) बारह
(ग) पाँच
(घ) सात।
उत्तर-
(क) नौ

5. श्रृंगार रस के भेद होते हैं
(क) दो
(ख) चार
(ग) आठ
(घ) सात।
उत्तर-
(क) दो

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 9th Special Hindi काव्य बोध img 3
उत्तर-
(i) → (ख),
(ii) → (क),
(iii) → (ङ),
(iv) → (ग),
(v) → (घ)।

सत्य असत्य

1. तीन वर्गों के समूह को ‘गण’ कहते हैं।
2. छन्द के पढ़ने की शैली को गति कहते हैं।
3. कविता के शाब्दिक अनुशासन का नाम छन्द है।
4. प्रबन्ध और मुक्तक काव्य-शैली के आधार पर काव्य भेद होते हैं।
5. ‘रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्’ (रसयुक्त वाक्य ही काव्य होता है)।
उत्तर-
1. सत्य,
2. असत्य,
3. सत्य,
4. सत्य,
5. सत्य।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा का साधन बताइए।
उत्तर-
काव्य।

2. एक ही छन्द में रचित एक घटना का चित्रण पूर्ण रूप से करने वाली रचना को क्या कहते हैं?
उत्तर-
खण्डकाव्य।

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3. रसयुक्त वाक्य को क्या नाम दिया गया है?
उत्तर-
कविता।

4. ‘सिन्धु सा विस्तृत है अथाह, ‘एक निर्वासित का उत्साह’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर-
उपमा।

5. पद के चरणों के अन्त में समान स्वर में साम्य बैठाने के लिए गृहीत पद क्या कहे जाते हैं?
उत्तर-
तुक।

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MP Board Class 10th Special English Unseen Passages Literary

MP Board Class 10th Special English Unseen Passages Literary

Passage-1

Read the following passage carefully and answer the questions that follow: (MP Board 2012)

Mankind has undoubtedly progressed since medieval times. The earliest men lived like brutes. Individuals fought among themselves and strong destroyed the weak for what is law of the jungle, the law of irrational life. But man was not an animal. He possessed rational faculties. These faculties gradually developed and appeared in his actions and man gave up the law of the jungle and made his own rational laws. Men saw that the law of physical strength was not applicable to their lives. They realized that they had souls and strength of being with a soul can consist in a variety of capabilities other than the power to cut and kill, tear and bite. For instance a man can be strong in fashioning tools, or in controlling the actions of other rational beings by the power of song or speech. Thus men realized that they should not be fighting among themselves. But they should be working together and giving one another opportunities to develop their respective strengths. This was the first step in man’s progress. By these means men grained such control over the forces of nature. They made each other so much wiser and more comfortable that they were convinced that they were the best creation of God.

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Questions:
(a) The earliest men lived like
(i) monkeys
(ii) brutes
(iii) animals

(b) According to the passage what was the law of the jungle?
(i) The animals destroyed the men.
(ii) The strong destroyed the weak.

(c) Who possessed rational faculties?
(i) men
(ii) animals
(iii) brutes

(d) Who realized that they had souls and strength?
(i) men
(ii) animals
(iii) other living beings.

(e) What did the men realize?
(i) They realized that they would be friendly towards the animals.
(ii) They realized that they should not be fighting among themselves.
(iii) Match the words given under column ‘A’ with their meanings given under column ‘B’

‘A’ – ‘B’
(1) developed – gained
(2) ruined – progressed
(3) achieved – destroyed

(g) How were men different from animals?
(h) What did men realise when their rational faculties were fully developed?
Answers:
(a) (ii) brutes
(b) (ii) The strong destroyed the weak.
(c) (i) men
(d) (i) men
(e) (ii) They realized that they should not be fighting among themselves.
(f)
(1) developed — progressed
(2) ruined — destroyed
(3) achieved — gained

(g) Men possessed rational faculties unlike animals. They gave up the laws of the jungle and made their own rational laws.
(h) Men realised that they should work together and give one another opportunities to develop their respective strengths.

Passage-2

1. “King Lear had three daughters, Goneril, Regan and Cordelia. Lear was a very old man, over eighty years of age. He was weary of ruling his kingdom and needed peace and quiet. He decided to give up his throne but first, he wanted to hear how much his daughters loved him.

2. Lear first questioned his eldest daughter, the wife of the Duke of Albany. Goneril declared, “I love you with all my heart and I shall always love you so.” Lear was pleased. He gave her a third of his kingdom.

3. Lear then questioned his second daughter Regan, the wife of the Duke of Cornwall. She declared, “My only happiness is in loving you. My love for you will never change.” Her answer pleased the old king, and he gave her a third of his kingdom also.

4. It was then the turn of Cordelia who was his favourite. She just stood there and said nothing.

5. Cordelia had been sickened by sisters’ words. They had flattered their old father to get his stand.

6. She could not deceive or flatter. So she answered the king sincerely, saying, “You are my father. You have brought me up, but I cannot say like my sisters, that my love for you will never change nor can I give you all my love. When I marry, I shall give much of my love to my husband.”

7. When Lear heard this, he was wild with disappointment and anger. “Ungrateful, heartless child!” he called her, “You are no longer my daughter. I disown you. Your share of my kingdom, I give to your sisters.”

8. Lear then summoned his sons-in-law and gave to each of them one half of his kingdom and kept for himself only the name of king and a hundred knights to attend him.” (M.P. Board 2011)

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Questions:
(I) Choose the correct alternative:
(i) Cordelia was:
(a) unmarried
(b) married
(c) a widow
(d) fiance

(ii) Lear called Cordelia “heartless” as:
(a) her answer was vague.
(b) her answer displeased him.
(c) she was speaking the truth.
(d) she had no heart.

(II) Give the verb form of the following words:
(a) belief
(b) speech

(III) “You have brought me up… The meaning of the underlined phrasal verb is:
(a) postponed
(b) reared
(c) lifted
(d) helped

(IV) Why did he decide to give up his throne?

(V) What did he want to hear before dividing his kingdom among his daughters?

(VI) What could Cordelia not do?

(VII) What did Lear keep for himself?

(VIII) Why did Goneril and Regan flatter the old king?
Answers:
(I) (i) (a) unmarried
(ii) (b) her answer displeased him.
(II) (a) believe (b) speak
(III) (b) reared
(IV) He was now very old.
(V) He wanted to hear how much his daughters loved him.
(VI) Cordelia could not deceive or flatter her father.
(VII) Lear kept for himself only the name of king and a hundred kinghts to attend him.
(VIII) Goneril and Regan flattered the old king in order to get more of the land in their favour.

Passage-3

Where the mind is without fear and the head is held high;
Where the knowledge is free; Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls;
Where words come out from the depth of truth;
Where tireless striving stretches its arms towards perfection. Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit; Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

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Questions:
(a) Fill up the blanks in each of the following sentences with one of the given words: (fragments, striving, dreary)
(i) The history of science is a continuous after knowledge.
(ii) If there were no change in life it would become quite
(iii) In many parts of the country agricultural land is cut up into small
(b) In this poem, the word ’where’ refers to:
(i) the entire world
(ii) the heaven of freedom
(iii) the dreary desert
(iv) narrow domestic walls

(c) What are the narrow domestic walls that the poet speaks of?
(d) What sort of a place is the present world?
(e) What is the significance of ‘awake’ in the last line?
(f) What is the heaven of freedom?
(g) What other freedom does the poet want for our country?
Answers:
(a)
(i) striving.
(ii) dreary
(iii) fragments

(b) (i) the entire world.
(c) The poet here speaks of the caste, creed and culture which divide our society into narrow sub-sections.
(d) The present world is living in dark age. It is not free from narrowness and illiteracy.
(e) It signifies the awakening of sense and inner delight. It also signifies attainment of freedom.
(f) Independence and sovereignty.
(g) Freedom from fear and slavery.

Passage 4

The World-

Great, wide, beautiful, wonderful World,
With the wonderful water round you curled,
And the wonderful grass upon your breast—
World, you are beautifully drest.
The wonderful air is over me,
And the wonderful wind is shaking the tree,
It walks on the water, and whirls the mills,
And talks to itself on the tops of the hills.
You friendly Earth, how far do you go,
With the wheat-fields that nod and the rivers that flow,
With cities and gardens, and cliffs, and isles,
And people upon you for thousands of miles?
Ah! you are so great, and I am so small,
1 tremble to think of you, World, at all;
And yet, when I said my prayers to-day,
A whisper inside me seemed to say,
‘You are more than the Earth, though you are such a dot:
You can love and think, and the Earth cannot!’

—W.B. Rands

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Questions:
(i) And the air is over me.
(ii) A inside me seemed to say
(a) Fill up the blanks in each of the following sentences with one of the given words. (wonderful, tremble, whisper)
(iii) I to think of you.
(b) In this poem ‘beautifully drest’ refers to:
(i) having gaudy dress
(ii) decorated with nature’s beauty
(iii) wearing fine clothes

(c) Why does the poet call the earth ‘beautifully drest’?
(d) What does the wind do?
(e) Whom does the wind talk to?
(f) How is the earth to nature?
(g) What whisper inside the poet arise?
Answers:
(a) (i) wonderful
(ii) wisper
(iii) tremble

(b) (ii) decorated with nature’s beauty
(c) The earth has wonderful grass curled around it.
(d) The wind shakes the tree.
(e) It talks to itself.
(f) The earth is friendly to nature.
(g) A whisper arises in the poet’s mind that the power of man to love and think is more than the earth.

Passage-5

A Green Cornfield-

The earth was green, the sky was blue;
I saw and heard one sunny morn
A skylark hang between the two,

A singing speck above the corn.
A stage below in gay accord,
White butterflies danced on wing,
And still the singing skylark soared,
And silent sank and soared to sing.
The cornfield stretched a tender green
To right and left beside my walks;
I knew he had a nest unseen
Somewhere among the million stalks.
And as I paused to hear his song
While swift the sunny moments slid,
Perhaps his mate sat listening long,
And listened longer than I did.

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Questions:
(a) The skylark hang between the two …………….. (complete this line)
(b) Give a word similar in meaning to ‘rose high in the sky’.
(c) The meaning of ‘stretched’ is
(d) What does the skylark do?
(e) What does the poet think?
Answers:
(a) A singing speck above the corn.
(b) soared.
(c) extended, straightened.
(d) The skylark sings above the corn field.
(e) The poet thinks that the mate of the skylark sat listening to his song longer than him.

Passage-6

Night-

The Sun descending in the west,
The evening star does shine;
“The birds are silent in their nest,
And I must seek for mine.”
The Moon, like a flower,
In heaven’s high bozuer,
With silent delight , Sits and smiles on the night.
Farewell, green fields and happy groves,
Where lambs have nibbled, silent moves
The feet of angels bright;
Unseen they pour blessing,
And joy without ceasing,
On each bud and blossom,
And each sleeping bosom.
“They look in every thoughtless nest,
Where birds are covered ivarm;
They visit caves of every beast,
To keep them all from harm.”
If they see any weeping
That should have been sleeping
They pour sleep on their head,
And sit down by their bed.

—William Blake

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1. Below is the summary of the poem. Complete it by writing the missing word/phrase against the correct blank number in your answer sheet. This poem conveys a beautiful impression of peace and quietness that falls over the landscape at (a) ………………….. At this time there is (b) ………………….. everywhere. The poet compares the moon to a (c) ………………….. It appears to be silently sitting and (d) ………………….. during the night. The poem conveys a feeling of trust in God’s protection. His (e) ………………….. angels with bright feet, shower (f) ………………….. of safe sleep on all.

2. What do the angels do to the following, when they visit them at night? Write the answers in your answer sheet against the correct blank numbers,

(a) birds in their nests
(b) beasts in their caves
(c) any weeping creature

3. Find words/phrases from the poem which mean the same as the following:
(a) areas of land with fruit-trees of particular type
(b) took small bites of food
Answers:
1.
(a) night
(b) silence
(c) flower
(d) smiling
(e) unseen
(f) blessings

2.
(a) look at the warmly covered birds.
(b) ensure that they are free from harm.
(c) they pour sleep on its head and sit by their bed.

3.
(a) groves,
(b) nibbled.

Passage-7

Which Loved Best?

“I love you, Mother,” said little John;
Then, forgetting his work, his cap went on,
And he was off to the garden siving,
And left her the water and wood to bring.
“1 love you, Mother,” said rosy Nell-
“l love you better than tongue can tell”;
Then she teased and pouted full half the day,
Till her mother rejoiced zvhen she went to play.
“I loi’e you. Mother,” said little Fan;
“Today I’ll help you all 1 can;
Hoiv glad I am that school doesn’t keep1.”
So she rocked the babe till it fell asleep.
Then, stepping softly, she fetched the broom,
And szvept the floor and tidied the room;
Busy and happy all day zvas she,
Helpful and happy as child could be.
“I love you. Mother,” again they said,
Three little children going to bed;
Hozv do you think that mother guessed
Which of them really loved her best?

—Joy Allison

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1. (a) Instead of helping his mother John …………………..
(b) John could have helped his mother by …………………..
(c) The mother rejoiced when Nell went to play because …………………..
(d) It was easy for Fan to help her mother because …………………..
(e) Fan kept herself busy and happy that day by and …………………..
(f) Fan stepped softly into the room because she …………………..
(g) Mother guessed that Fan loved her most because her other two children …………………..
Answers:
(a) went off to the garden, swing.
(b) bringing to her the water and wood.
(c) she was irritating her by teasing and pouting at her.
(d) she did not have to go to school that day.
(e) sweeping the floor, tidying the room.
(f) did not want to disturb the sleeping baby.
(g) did not even bother to help her in her daily chores.

Passage-8

1. Generally speaking, creative people often believe their purpose in life is to discover and implement the interrelatedness of things, to make order out of disorder. They also see problems where others see none and question the validity of even the most widely accepted answers. Creative persons are compulsive problem seekers, not so much because they thrive on problems, but because their senses are attuned to a world that demands to be put together, like a jigsaw puzzle scattered on a table.

2. Several tests now in use reveal that highly creative people are much more open and receptive to the complexities of experience than are less creative people. The creative temperament has a tendency to break problems down into their most basic elements and then reconstruct them into whole new problems, thereby discovering new relationships and new solutions.

3. Highly creative people aren’t afraid to ask what may seem to be naive or silly questions. They ask questions like, “Why don’t spiders get tangled up in their own webs?” and, “Why do dogs turn in circles before lying down?” Such questions may seem childlike, and in a way they are. Children have not yet had their innate creative energies channelled into culturally acceptable directions and can give full rein to their curiosity —the absolute prerequisite for full creative functioning, in both children and adults.

4. Unlike children, creative people appear to have vast stores of patience to draw upon. Months, years, even decades can be devoted to a single problem.

5. The home that encourages inquisitiveness contributes to creative development. The teacher who stresses questions rather than answers and rewards curiosity rather than restricting it is teaching a shild to be creative.

6. To be extremely intelligent is not the same as to be gifted in creative work. The Quiz Kids are often referred to as geniuses. They would undoubtedly score high in memory functions ………………. But it is doubtful whether they are also fluent in producing ideas.

7. Contrary to popular myths that glorify youth, more creative achievements are likely to occur when people grow older. While memory may falter with age, creativity is ageless. (425 words)

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘exposing secrets’ is
(i) attuned
(ii) reveal
(iii) believe
(b) Unlike children, creative people appear to have vast stores of patience to draw upon. (Say ‘True’ or ‘False’)
(c) The meaning of ‘scattered* is
(i) order
(ii) disorderd
(iii) neat and clean

(d) What do creative people believe?
(e) What is the nature of highly creative people?
(f) What contributes to creative development?
Answers:
(a) (ii) reveal
(b) True
(c) (ii) disordered
(d) Creative people believe that their purpose in life is to discover and implement interrelatedness of things and to make order out of disorder.
(e) Highly creative people are much more open and receptive to the complexities of experience.
(f) The home that encourages inquisitiveness contributes to creative development.

MP Board Class 10th English Solutions

भाषा भारती कक्षा 6 पाठ 17 संकल्प प्रश्न उत्तर हिंदी

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Class 6th Hindi Bhasha Bharti Chapter 17 Sankalp Question Answer Solutions

MP Board Class 6th Hindi Chapter 17 Sankalp Questions and Answers

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए

(क) संकल्प लेकर आगे बढ़ें
(i) मन में
(ii) तन में,
(iii) आँखों में
(iv) साँसों में।
उत्तर
(i) मन में

(ख) हार बनता है
(i) धूल से
(ii) फूल से
(iii) धूप से
(iv) कंकड़ से।
उत्तर
(ii) फूल से।

प्रश्न 2.
सही शब्द चयन कर रिक्त स्थान भरिए(चुन-चुनकर, गिर-गिरकर, गरज-गरज)

(क) बादल बनकर ……….वह धरती पर बरसे।
(ख) ………… चलना सीखेंगे, गिरने से न डरें।
(ग) ………………. कर गूंथे सुमनों से, बनें हार अनगिन हाथों
उत्तर
(क) गरज-गरज
(ख) गिर-गिरकर
(ग) चुन| चुनकर।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

(क) आत्म-विश्वास कब बढ़ता है ?
उत्तर
कार्य करने से आत्म-विश्वास बढ़ता है।

(ख) ‘उद्गम रूप धरें’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘उद्गम रूप धरै’ का आशय यह है कि लगातार वर्षा होने से छोटी-छोटी बूंदें भी नदी का उद्गम स्थल बन जाती हैं।

(ग) धरती फल कब देती है ?
उत्तर
जलाशयों के जल को सूर्य की किरणें जब भाप बना देती हैं, भाप बादल बन जाती है, बादलों के बरस पड़ने पर, ताप सहने वाली धरती जल को सोख लेती है, फिर धरती अपने अन्दर से बीज को उगाकर फल देने लगती है।

(घ) बादल कैसे बनते हैं ?
उत्तर
जल सूर्य की किरणों से भाप बन जाता है, वही भाप बादल बन जाती है।

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(ङ) कविता में संकल्प करने पर क्यों बल दिया गया
उत्तर
कविता में कवि ने मन में अच्छी शुद्ध कामना-पवित्र विचारपूर्वक कार्य करने पर बल दिया है। इससे मनुष्य अपने सुविचारित कार्य में सफलता प्राप्त करता है।

(च) सुमनों का हार किस प्रकार बनता है ?
उत्तर
अनेक हाथों से एक-एक कर तोड़े गए एवं एकत्र किए गए फूलों को धागे में पिरोने पर हार बनता है। सहयोग और कार्य को निरन्तर करते रहने पर ही उसका फल आकर्षक हार के रूप में प्राप्त होता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पद्यांशों का भाव स्पष्ट कीजिए

(क) एक बूंद गिरकर सूखेगी, बार-बार गिर घट भर देगी। बिना रुके जो बूंदें गिरी, उद्गम रूप धरें।

(ख) चुन-चुनकर गूंथे सुमनों से, बने हार अनगिन हाथों से। मन में ले संकल्प विजय का, आगे बढ़े चलें।
उत्तर
‘सम्पूर्ण पद्यांशों की व्याख्या’ के अन्तर्गत पद्यांश संख्या । व4 का अध्ययन कीजिए।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण कीजिएविश्वास, जलाशय, दुर्गम, उद्गम, संकल्प।
उत्तर
अपने अध्यापक महोदय की सहायता से उच्चारण करना सीखिए और अभ्यास कीजिए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी शुद्ध कीजिए
(i) बूंदें
(ii) सकल्प
(iii) दुरगम
(iv) किरने
(v) परबत।
उत्तर
(i) बूंदें
(ii) संकल्प
(iii) दुर्गम
(iv) किरणें
(v) पर्वत।

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प्रश्न 3.
दिए गए शब्दों में से विलोम शब्दों की सही जोड़ी बनाइए-
(i) विश्वास
(ii) पराजय
(iii) धरती
(iv) सुगम
(v) आकाश
(vi) जय
(vii) दुर्गम
(viii) अविश्वास।
उत्तर
शब्द -विलोम शब्द
(i) विश्वास – (viii) अविश्वास
(ii) पराजय – (vi) जय
(iii) धरती – (v) आकाश
(iv) सुगम – (vii) दुर्गम

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य में प्रयोग कीजिए
(क) पथ
(ख) प्रतिदिन
(ग) बादल
(घ) विजय
(ङ) काँटा।
उत्तर
(क) पथ = संकल्प लेकर आगे बढ़ने से पथ की बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं।
(ख) प्रतिदिन = ईश्वर की पूजा करके प्रतिदिन का कार्य प्रारम्भ करने से विजय मिलती है।
(ग) बादल = बादल गरजते हैं और बरसते हैं।
(घ) विजय =संकल्पित होकर विजय पथ पर आगे बढ़ते रहो।
(ङ) काँटा = उत्साह भरे मन से आगे बढ़ते हुए मार्ग के कौट भी फूल बन जाते हैं।

प्रश्न 5.
भिन्न अर्थ वाले शब्द को छाँटकर लिखिए
(i) नदी = तटिनी, सरिता, सविता, तरंगिणी।
(ii) पर्वत = गिरि, पहाड़, अचल, पाहन।
(iii) सागर = समुद्र, पीयूष, जलधि, उदधि।
(iv) फूल = पुष्प, सुमन, कुसुम, लता।
(v) धरती = गगन, पृथ्वी, भू, धरा।
उत्तर
(i) सविता
(ii) पाहन
(iii) पीयूष
(iv) लता
(v) गगन।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों में से अनुप्रास अलंकार पहचानकर लिखिए
(क) दुर्गम पथ पर्वत सम बाधा।
(ख) बार-बार गिर घट भर देगी।
(ग) गिर-गिरकर चलना सीखें।
(घ) गरज-गरजकर बादल बरसें।
उत्तर
(क)

  • पथ-पर्वत
  • दुर्गम-सम।

(ख)

  • बार-बार
  • गिर-भर।

(ग) गिर-गिरकर।
(घ) गरज-गरजकर ।

संकल्प सम्पूर्ण पद्यांशों की व्याख्या

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(1) पथ की बाधाएँ गिनने से, निज विश्वास घटे।
करने से होता है सब कुछ, करना शुरू करें।
एक बूंद गिरकर सूखेगी, बार-बार गिर घट भर देगी।
बिना रुके जो बूंदें गिरती, उद्गम रूप धरें।
गिर-गिरकर चलना सीखेंगे, गिरने से न डरें।।

शब्दार्थ-पथ = मार्ग। बाधाएँ = रुकावटें। घट = घड़ा। उद्गम = निकलना, उत्पन्न होना।

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भाषाभारती’ के पाठ ‘संकल्प’ से ली गई हैं। इस कविता के रचयितालक्ष्मीनारायण भाला ‘अनिमेष’ हैं।

प्रसंग-मार्ग में आने वाली बाधाओं के गिनने से अपना विश्वास कम हो जाता है।

व्याख्या-कवि का तात्पर्य यह है कि कोई भी काम करने पर ही होता है, उस कार्य को करना प्रारम्भ कीजिए। उस कार्य के करने के मार्ग में आने वाली रुकावटों की गिनती मत करो। ऐसा करने से तो आत्म-विश्वास घट जाता है। आकाश से एक बूंद गिरती है, तो वह सूख ही जाती है, लेकिन वही बूंद बार-बार गिरेगी, तो वह एक घड़े को भर देती है। बूंदों के गिरने की निरन्तरता किसी भी नदी का उद्गम बन जाती है अर्थात् नदी के प्रवाह को रूप दे देती है। इसलिए बार-बार गिरते-पड़ते रहने से हम चलना सीखते हैं। गिरमे से कभी नहीं डरना चाहिए। तात्पर्य यह है कि जीवन में विफलताएँ तो आती हैं, पर उनसे निराश नहीं होना चाहिए। विफलताएँ ही सफलता की सीढ़ियाँ हुआ करती हैं।

(2) नदियों का उद्गम अति छोटा, दुर्गम-पथ,
पर्वत सम बाधा।
बिना थमे चलती जब धारा, सागर गले मिले।
चलने से मंजिल पायेंगे, चलना शुरू करें।

शब्दार्थ-दुर्गम पथ = कठिनाई भरा मार्ग। बाधा = रुकावटें। गले-मिले = मिल जाती है। मंजिल पाना = अपने पहुँचने के स्थान तक पहुँच जाते हैं।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-कोई भी कार्य करने से ही पूरा होता है। चलते रहने से अपने अभीष्ट स्थान तक पहुंच जाते हैं।

व्याख्या-नदी अपनी उत्पत्ति स्थल पर बहुत छोटे आकार की होती है। उसका मार्ग बहुत कठिनाई भरा होता है। मार्ग में पर्वत जितनी ऊँची रुकावटें आती हैं लेकिन बिना रुके लगातार जब वह जल की धारा चलती रहती है, बहती रहती है, तो समुद्र से मिल जाती है। उसी तरह हे मनुष्यो ! जब आप चलना प्रारम्भ कर देंगे, तो निश्चय ही अपनी मंजिल प्राप्त करने में सफल हो जायेंगे, अत: तुम्हें चलना तो शुरू कर देना चाहिए।

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(3) जलाशयों पर किरणें पड़तीं,
प्रतिदिन जल वाष्य में बदलतीं।
बादल बनकर गरज-गरज वह धरती पर बरसे।
ताप सहे, जल को भी सोखे, धरती फल उगले॥

शब्दार्थ-जलाशय = तालाब या झील। वाष्प = भाप। ताप = गर्मी। फल उगले = फसल के रूप में फल देती है।

सन्दर्भ-पूर्व की भाँति।

प्रसंग-तालाबों का जल सूर्य की किरणों के द्वारा भाप बनता है, वर्षा होती है और धरती से फसल रूप में फल की प्राप्ति होती है।

व्याख्या-कवि कहता है कि तालाबों-झीलों के ऊपर पड़ने वाली सूर्य की किरणें उनके जल को प्रतिदिन भाप के रूप में बदलती रहती हैं, वही भाप बादल बन जाती है। बादल गरज-गरज कर जमीन पर बरस पड़ते हैं। यह धरती सूरज की गर्मी को सहन करती है, बादलों से बरसते जल को सोख लेती है और फिर फसल रूप में अपनी सम्पूर्ण प्रक्रिया का फल हमें देती है। कष्टों की गर्मी जल से शान्त होकर हमें सरस फल देती है। हम सुखी हो जाते हैं।

(4) चुन-चुनकर गूंथे सुमनों से,
बनें हार अनगिन हाथों से।
मन में ले संकल्प विजय का, आगे बढ़े चलें।
कौन भला रोकेगा जब हम, काँटों से न डरें।

शब्दार्थ-सुमन = फूल। अनगिन = अनेक। संकल्प = प्रण, प्रतिज्ञा। काँटों से = बाधाओं से।

सन्दर्भ-पूर्व की भाँति।

प्रसंग-प्रण करके, संकल्प धारण करके ही जीत पाई जा सकती है।

व्याख्या-एक-एक फूल चुनकर अनेक हाथों से गूंथे जाने पर ही हार (माला) बन पाता है। यदि जीत पाने का हम संकल्प ले लेते हैं, और विजय-पथ पर आगे बढ़ते जाते हैं, तो निश्चय ही हमें कौन रोक सकता है, जीत पाने से। हमें केवल आने वाली रुकावटों से, बाधाओं से डरना नहीं चाहिए।

MP Board Class 6 Hindi Question Answer

MP Board Class 10th Special English Unseen Passages Factual

MP Board Class 10th Special English Unseen Passages Factual

Passage-1

Read the following passage carefully and answer the questions that follow: (M.P. Board 2012)

1. The word ‘baby’ is used for a young human being below the age of one year or 18 months. After this age, words such as toddler’ and ‘child’ are used. The word ‘baby’ probably comes from ‘baba’, a sound made by many small babies.

2. Newborn babies may seem helpless, but they are not. They can suck strongly to drink milk from their mother’s breast. They cry if they are hungry or uncomfortable. They can hear well and usually recognize the voice of their mothers. However, a newborn baby depends on someone, usually the mother, for food and warmth and comfort.

3. Babies grow and change very quickly by six months. Most of babies have doubled their birth weight (around 3.5 kg to 7 kg). At one year, they may weigh 10 kg. Weight gain is quite a good indication of a baby’s health. If a baby is not gaining weight over a period of several weeks, it may be ill.

4. A newborn baby cannot even hold up its head and has to be supported at all times. At about six to eight weeks it is able to follow things with its eyes and starts to smile. At around three months it will be able to raise the head. By seven months it will be able to sit up with some support and hold things in the hand, and also babble simple sounds without any real meaning.

5. During the remainder of the year a baby learns to crawl and pull itself up into a standing position. By about 15 to 18 months a baby is able to walk by itself and say a few words, such as mamay’.

6. All the ages mentioned above are averages. Not all babies develop at the same speed. Some are able to crawl or walk earlier than usual, others are a little late. This is not important and has no bearing on how clever or athletic the baby will be in the future.

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Questions:
(a) On the basis of your reading of the article, answer the following questions as briefly as possible.
(i) Find one paragraph from the article, which deals mainly with the weight gain of growing children. Write the first four words of the paragraph.
(ii) ‘This is not important’ (Para 6) what does ‘this’ here refer to?
(iii) What is the usual weight of a newborn baby?
(iv) Find a word in Para 1 which means ‘almost certainly’.
(v) Find a word in Para 3 which means sign’.
(vi) Find a word in Para 4 which means ‘talk’ in a way that is difficult or impossible to understand.
(vii) Find a word in Para 5 which means ‘remaining times’.
(viii) Should a mother be worried if her baby is not developing at the same speed as the baby of another woman? Why?
(ix) What is the surest indication of a child’s good health?

(b) Complete the following table by supplying the missing information:
Answers:
approximate weight of a one-year-old baby
(a)
(i) Paragraph No. 3 which starts as: ‘Babies grow and change’.
(ii) Here ‘this’ refer to the step by step growth of a baby.
(iii) The usual weight of a newborn baby is around 3.5 kg to 7 kg.
(iv) probably
(v) indication
(vi) babble
(vii) remainder
(viii) No, a mother should not be worried at all as not all babies develop at the same speed.
(ix) Weight gain is the surest indication of a child’s growth.

(b)
(i) gains weight
(ii) by about 15 to 18 months
(iii) 10 kg
(iv) Not all babies develop at the same speed

Passage-2

1. There is a myth that there is something magical about computers and those who run them. The legend has got about that computers are ‘electronic brains’ and that programmers are some sort of supermen. The facts are that Computers are very stupid and the people who program them are normal human beings. Anyone who can count from 0 to 7 on his or her fingers and make eight can leam to be a programmer. The business is not difficult, just tricky.

2. It is very misleading to imagine that computers can ‘think’ like people. They cannot. They have no more a mind of their own than a lawn-mower. However, they make it possible for people to ‘bottle’ thought. You work out how to do a particular job or solve a problem, write a program and the computer will apply your thinking to that job or problem as long and as often as you like. In this sense computers are half alive because they perpetuate the thinking of their creators. (167 words) (M.P. Board 2009)

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘a machine for cutting grass is
(i) computer
(ii) bottle
(iii) lawn-mower

(b) The fact is that computers are electronic brains. (Say ‘True’ or ‘False’)
(c) The meaning of ‘perpetuate’ is
(i) imagination
(ii) belief
(iii) fact

(d) What computers cannot do?
(e) Why are computers like lawn-mowers?
(f) What does the ‘bottle’ mean?
Answers:
(a) (iii) lawn-mower
(b) False
(c) (ii) belief
(d) Computers cannot think like human beings.
(e) Because both have no mind of their own.
(f) to store/to mug up.

Passage-3

1. “Eid-ul-Fitr is celebrated on the first day of Shawwaal, the tenth Lunar month of the Islamic calendar, Ramzaan, the ninth month is a month of daily fasts. Each daily fast is called Roza. Nothing is eaten or drunk between sunrise and sunset. Food is taken in the wee hours of the morning and again after night fall.”

2. Fasting helps one to experience pangs of hunger and thus, understand the plight of those who do not have enough to eat. The Muslims believe in offering alms to the poor on the sacred month of Ramzaan. It is necessary to give a minimum of two and a half kilograms of wheat, or any other grain, dates or grapes as Fitr or alms. The Quran, the holy book of the Muslims, was revealed in the month of Ramzaan.

3. It is a festival that symbolises goodwill and brotherhood. All feelings of enmity and malice are forgotten on this day and people greet each other warmly saying, ‘Eid-Mubarak’. It is a joyous occasion which reinforces the bond of humanity that we share with all fellow human beings, irrespective of caste, creed, state or religion. (M.P. Board 2011)

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Questions:
(I) Choose the correct alternatives and write them in your answer book:
(i) The Quaran was revealed:
(a) in the sixth Lunar month of the Islamic calendar
(b) in the seventh Lunar month of the Islamic calendar
(c) in the ninth Lunar month of the Islamic calendar
(d) in the tenth Lunar month of the Islamic calendar

(ii) During Ramzaan, the Muslims, who fast, take food:
(a) at dusk
(b) at dawn
(c) in the afternoon
(d) at midnight

(II) Find out the word from the passage having similar meaning of the following:
(a) sorry circumstances
(b) desire to injure

(III) Give the Verb form of the following words
(a) food
(b) appreciative

(IV) What is the purpose of fasting during the month of Ramzaan?
(V) What is Eid-ul-Fitr’s significance?
Answers:
(I) (i) (c) in the ninth Lunar month of the Islamic calendar (ii) (b) at dawn
(II) (a) plight (b) malice
(III) (a) Feed (b) appreciate
(IV) The purpose of fasting during the month of Ramzaan is to experience the pangs of hunger and thus understand the plight of those who do not have enough to eat.
(V) It is a festival that symbolises goodwill and brotherhood. All feelings of enmity and malice are forgotten on this day and people greet each other warmly saying ‘Eid-Mubark’.

Passage-4

1. As the dreaded examinations crawl to a halt, students look forward to the much awaited “creative outlets”, the summer camps, to let off steam and spend their holidays. A summer camp is conducted over a short period of four to five weeks involving interesting and fun-filled activities. The colourful spectrum of summer camps provides a wide variety of activities which include artistic skills, such as painting, origami, art, music, craft and also spoken English, cookery and computer courses. Not only this, the summer camps keep the child “fit’ as a fiddle” by imparting lessons in yoga, cricket, tennis and swimming.

2. With changing times and trends parents have become productivity oriented. They want their children to learn through productive play unlike in the past when play was just play. Today, the parents want to tap the potential of their children to the fullest. To achieve this aim, the summer camps afford an ideal opening for children to develop their hobbies and talents. The importance of creative play is often underestimated whereas the fact is that art and craft projects can excite even a young child’s imagination and promote a sense of great achievement. The little things that children make and take home give them a sense of achievement and pride when they show them to their parents.

3. Summer camps develop a child’s confidence and his ideas. They also encourage children to do things on their own. The camps are beneficial for hyperactive and aggressive children as they help channel their energies fruitfully by drawing out the best in them. They also promote mutual understanding not only among teachers and children but also bring about interaction between the taught. This provides a good experience for a better future a future of confidence. (“The Young World” The Hindu)

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘virtues inherent in someone’ is
(i) spectrum
(ii) potential
(iii) hobbies

(b) Summer camps develop a child’s confidence and his ideas. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘agressive’ is
(i) violent
(ii) angry
(iii) dull

(d) What is a summer camp?
(e) What do the parents wish to tap?
(i) What is the role of art and craft projects in a child’s development?
Answers:
(a) (ii) potential
(b) True
(c) (i) violent
(d) A summer camp is conducted over a short period of four or five weeks involving interesting and fun-filled activities.
(e) Parents wish to tap the potential of their children to the fullest.

(ii) The art and craft project can excite even a young child’s imagination and promote a sense of great achievement.

Passage-5

1. Within the memory of the youngest child there was a family of rabbits who lived near a pack of wolves. The wolves announced that they did not like the way the rabbits were living. One night several wolves were killed in an earthquake and this was blamed on the rabbits, for it is well known that rabbits pound on the ground with their hind legs and cause earthquakes. On another night one of the wolves was killed by a bolt of lightning and this also was blamed on the rabbits, for it is well known that lettuce-eaters cause lightning.

2. The wolves threatened to civilise the rabbits if they did not behave, and the rabbits decided to run away to a desert island. But the other animals, who lived at a great distance, shamed them saying, “You must stay where you are and be brave. This is no world for escapists. If the wolves attack you, we will come to your aid, in all probability.” So the rabbits continued to live near the wolves. And one day there was a terrible flood which drowned a great many wolves. This was blamed on the rabbits, for it is well known that carrot nibblers with long ears cause floods. The wolves descended on the rabbits for their own good, and imprisoned them in a dark cave, for their own protection.

3. When nothing was heard about the rabbits for some weeks, the other animals demanded to know what had happened to them. The wolves replied that the rabbits had been eaten and since they had been eaten the affair was a purely internal matter. “They were trying to escape,” said the wolves, “and, as you know, this is no world for escapists.” —Jamey Thurber

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘earth’s inner activity which shakes it’ is
(i) earthquake
(ii) lightning
(iii) threatened

(b) The wolves threatened to civilise the rabbits if they did not behave. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘terrible’ is
(i) lovable
(ii) meek
(iii) ferocious

(d) What happened to the wolves?
(e) What was the accusation of the wolves?
(i) What did the wolves do with the rabbits?
Answers:
(a) (i) earthquake
(b) True
(c) ferocious
(d) One night several wolves were killed in an earthquake.
(e) The wolves accused the rabbits of having caused the earthquake by pounding on the ground with their hind legs.
(f) The wolves imprisoned the rabbits in a dark cave.

Passage-6

1. By the end of the 15th century, European explorers had considerable experience of long-distance ocean voyaging. In particular, they had learned that the greatest danger, apart from storms and hurricanes, was lack of food and water. If a ship was becalmed supplies could quickly run low.

2. European navigators had also learned that there were other problems besides hunger and thirst. They noticed that ships’ crews often became very sick, even though they were eating and drinking regularly, but they did not understand why this happened. In fact, the crews were suffering from a disease called scurvy, caused by a lack of vitamin C. As a result, their gums became sore, their teeth fell out and many eventually died.

3. Scurvy affected crews throughout the Age of Discovery and beyond. Not until the 18th century did the British navy discover an effective way of preventing scurvy—to issue a daily dose of lime juice, which is rich in vitamin C. This soon earned British sailors the nickname ‘Limeys’. (167 words)

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘a group of sailors’ is
(i) explorers
(ii) crew
(iii) navigators

(b) European explorers did not have any experience of long distance ocean voyaging. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘storm’ is
(i) a strong wind
(ii) flood
(iii) scurvy

(d) What experience did the European explorers gain by the end of the 15th century?
(e) What was the problem other than storm and hurricane?
(f) Which disease trapped the crews?
Answers:
(a) (ii) crew (b) False (c) (i) a strong wind
(d) The European explorers gained considerable experience of long distance ocean voyaging.
(e) The lack of food and water was the other problem.
(f) Scurvy trapped them.

Passage-7

1. Advertising is a close companion of market economy. Yet it is an unpleasant feature of modern life. Sometimes strange but sensational commercials on T.V. can cost heavily to one’s pocket. Not only do they cost heavily to one’s pocket, they also cost heavily to one’s life. Not long before, an innocent student tried to imitate the acrobatics of a young man in a commercial advertisement and lost his precious life for nothing.

2. In some cases advertising has started to erode individual privacy, in the name of educating and enlightening the consumer about his rights to choose the right product. The magazines, T.V. and movies keep dinning into the ears of everyone that material things are what life is about. Advertising has invaded every aspect of human existence. It includes sponsoring events like sports etc. on a global basis. Advertising sells not only goods; it sells ideas also. Ideas—good ideas, like national integration and communal harmony, have been spread through advertising.

3. In addition to commercial advertising, we have social advertising. Social advertising refers to advertisements which deal with social causes. They aim at the welfare and well-being of the people. Its target audience is not a specific class. It aims at masses who can be educated about issues like health, family welfare, literacy, national security etc. They are so important that even the government falls back upon them very often to highlight issues of immediate and national concern.

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Questions:
(a) The word similar to ‘related to trade and commerce’ is
(i) economy
(ii) commercial
(iii) consumer

(b) Advertising is a close companion of market economy. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘target’ is
(i) global
(ii) crisis
(iii) aim

(d) How does advertising become dangerous to young children?
(e) What is the impact of advertising in our life today?
(f) What does social advertising refer to?
Answers:
(a) (ii) commerical
(b) True
(c) (iii) aim
(d) The young children imitate the acrobatics and dangerous acts.
(e) Advertising has invaded every aspect of human existence.
(f) Social advertising refers to the one that deals with social causes.

Passage-8

If we would see our dream of Panchayati Raj, i.e., true democracy realized, we would regard the humblest and lowest Indian as being the ruler of India with the tallest in the land. This presupposes that all are pure, or will become pure if they are not. And purity must go hand-in-hand with wisdom. No one would then harbour any distinction between community and community, caste and outcaste. Everybody would regard all as equal with oneself and hold them together in the silken net of love. No one would regard another as untouchable. We would hold as equal the toiling labourer and the rich capitalist. Everybody would know how to earn an honest living by the sweat of one’s brow, and make no distinction between intellectual and physical labour. To hasten this consummation, we would voluntarily turn ourselves into scavengers. No one who has wisdom will ever touch opium, liquor or any intoxicants. Everybody would observe Swadeshi as the rule of life and regard every woman not being his wife, as his mother, sister or daughter according to her age, never lust after her in his heart. He would be ready to lay down his life when occasion demands it, never want to take another’s life. If he is a Sikh in terms of the commandment of the Gurus he would have the heroic courage to stand single-handed and alone—without yielding an inch of ground-against the “one lakh and a quarter” enjoined by them. Needless to say, such a son of India will not want to be told what his duty in the present hour is.

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘a government of people’ is
(i) Democracy
(ii) Panchayati Raj
(iii) Community

(b) Purity need not go hand-in-hand with wisdom. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘toiling’ is
(i) doing hard labour
(ii) sitting idle
(iii) running

(d) What is Panchayati Raj?
(e) What would happen if purity and wisdom go hand-in-hand?
(f) What would a man of wisdom do?
Answers:
(a) (i) Democracy
(b) False
(c) (i) doing hard labour
(d) Panchayati Raj is a system of governance by common people.
(e) There would be no discrimination is society
(f) A man of wisdom will always live with harmony.

Passage-9

1. Getting a good night’s sleep can help you cope with stress more effectively. But not getting enough sleep can cause more stress. Insomniacs have higher concentrations of stress hormones than others.

2. Women are prone to sleep disturbances. Their sleep problems frequently interfere with their daily activities.

3. Experts believe that sleep, especially deep sleep, enables our nervous system to function well. Without it, we lose our ability to concentrate, remember or analyse. Some experts speculate that during deep, sleep, cells manufacture more proteins, which are essential for cell growth and repair of damage from things like stress and ultraviolet rays.

4. Scientists believe that activity in the area of the brain that controls emotions and social interactions lessens during sleep and that deep sleep may help people be emotionally and socially adept when awake.

5. Sleep may also help our brain to store a newly learned activity in its memory bank. In a study in Canada, students deprived of sleep after learning a complex logic game showed a 30 percent learning deficit when tested a week later compared with students not deprived of sleep.

6. The effects of sleep deprivation on other bodily functions are just as alarming. In studies from five medical centres across the country, researchers established that individuals with insomnia were also more likely to have poor health, including chest pain, arthritis and depression, and to have difficulty accomplishing daily tasks. Another breakthrough study revealed that even temporary loss of sleep can affect the body’s ability to break down carbohydrates, interfere with the function of various hormones and worsen the severity of ailments such as diabetes and high blood pressure.

7. So whatever works to help you sleep well, whether its regular exercise earlier in the day, weekly massages, yoga, meditation or a lavender-scented bath, make time for it today. (300 words)

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Questions:
(a) The word which means inability to sleep is
(i) sleep disturbances ‘
(ii) insomnia
(iii) stress

(b) Women are prone to sleep disturbances. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘speculate’ is
(i) speak
(ii) imagine/believe
(iii) interact

(d) What can cope with stress more effectively?
(e) What is the effect of sleep disorder on women?
(f) What other ailments have the scientists and researchers found in the insomniacs?
Answers:
(a) (ii) insomnia
(b) True
(c) (ii) imagine/believe
(d) Getting a good night’s sleep can cope with stress more effectively
(e) Sleep disorder frequently interferes with the daily activities of women.
(f) Chest pain, arthritis, depression.

Passage-10

1. Papaya is the healthiest fruit with a list of properties that is long and exhaustive. Belonging to the family of Caricaceae fruit, it is commonly known as Papaw in Australia and Mamao in Brazil. It first originated in southern Mexico and neighbouring Central America, but is now available in every tropical and subtropical country. Papaya favours digestion as well as cures skin irritation and sun burns. You can munch on it as a salad, have it cooked or boiled or just drink it up as milkshake or juices. Modern science confirms the age-old beliefs that papaya has much to contribute to the health cause. The most important of these virtues is the protein-digesting enzyme in the milky juice or latex. The enzyme is similar to pepsin in its digestive action and is said to be so powerful that it can digest 200 times its own weight in protein. It assists the body in assimilating the maximum nutritional value from food to provide energy and body building materials.

2. Papain in raw papaya makes up for the deficiency of gastric juice and fights excess of unhealthy mucus in the stomach, dyspepsia and intestinal irritation. The ripe fruit, if eaten regularly corrects habitual constipation, bleeding piles and chronic diarrhoea. The juice of the papaya seeds also assists in the above-mentioned ailments.

3. The juice, used as a cosmetic, removes freckles or brown spots due to exposure to sunlight and makes the skin smooth and delicate. A paste of papaya seeds is applied in skin diseases like those caused by ringworm. The black seeds of the papaya are highly beneficial in the treatment of cirrhosis of the liver caused by alcoholism, malnutrition, etc. A tablespoonful of its juice, combined with a hint of fresh lime juice, should be consumed once or twice daily for a month. The fresh juice of raw papaya mixed with honey can be applied over inflamed tonsils, for diphtheria and other throat disorders. It dissolves the membrane and prevents infection from spreading.

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘inherent features’ is
(i) properties
(ii) tropical
(iii) irritation

(b) The fact is that papaya favours digestion as well as cures skin irritation. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘enzyme’ is
(i) drug
(ii) powerful
(iii) digestive substance

(d) What name is given to papaya in Australia?
(e) Where is papaya available?
(f) How does papaya’s juice help us?
Answers:
(a) (i) properties
(b) True
(c) (iii) digestive substance
(d) It is known as Papaw in Australia.
(e) It is available in every tropical and substropical country.
(f) It removes freckles or brown spots and makes the skin smooth and delicate.

Passage-11

1. Set in the declining but still green Western Ghats in the southwest of Karnataka, Coorg is the heart of India’s coffee country, coffee being the world’s most heavily traded commodity after crude oil. Coorg boasts a land area four times larger than Hong Kong and seven times the area of Singapore, most of it is under tree cover because unlike tea plants, the coffee bush requires shade.

2. India is acknowledged as the producer of the finest mild cotfees. With their tropical climate, high altitude, abundant rainfall and fertile soil, Coorg and the neighbouring Chickmagalur districts in Karnataka have consistently produced and exported high quality coffee for over 150 years. The coffee output of these two districts accounts for 70 per cent of the total coffee produced in the coun-try. Coorg coffee is valued for its blue colour, clean beans and fine liquoring qualities and hence is in demand in the international markets.

3. In March and April is the coffee blossom time in Coorg. When blossoms transform into berries, the bushes are cropped. The cherry—red fruit is then pulped; the seeds separated, dried and sent for curing. Coorg or Kodagu is the district which is one of the largest producers of pepper, cardamom and honey in the world.

4. Not much is known about early history of Coorg. Recorded history is available only from 1600 AD onwards when Kodava rajas ruled over the region and established their capital at Mercara by constructing a mud walled fort. The martial Kodavas troubled Hyder Ali and his son Tipu Sultan who ruled the Mysore region in the 18th century by way of sporadic rebellions. But in 1785, Tipu’s large army marched into Kodagu and devastated the kingdom. Fourteen years later, with the help of the British who defeated Tipu Sultan following the historic siege of Srirangapatanam in 1799, Coorg regained independence and under the leadership of Raja Veerarajendra rebuilt the capital. Later in 1834, the British exiled its ruler Chikkaveera Rajendra and assumed administrative charge of the district. The British left India in 1947, leaving behind a legacy of coffee plantations, colonial buildings and well- planned road networks.

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Questions:
(a) The word similar to ‘talking high’ is
(i) boast
(ii) defeat
(iii) assume

(b) The fact is that Coorg is ten times larger than Hong Kong and hundred times the area of Singapore. (Say ‘True’ or ‘False’)

(c) The meaning of ‘acknowledged’ is
(i) unknown
(ii) recognised
(iii) matched

(d) Where is Coorg situated?
(e) What is India famous for?
(f) What did British leave in India as a legacy?
Answers:
(a) (i) boast
(b) False
(c) (ii) recognised
(d) Coorg is situated in the Western Ghats in the South-Wr.t of Karnataka.
(e) India is famous for producing the finest coffee.
(f) British left behind a legacy of coffee plantations, colonial buildings and well-planned road networks.

Passage-12

1. We’ve just left the dinner table, when I hear music coming from my daughter’s computer. It surprises me that my daughter Ida is listening to music from a time she refers to as the very old days. “What are you playing?” I ask. “It’s Phi Collins,” is her prompt reply, while she shows how, with a few strokes, she can download almost any song from the Internet. Times have certainly been changing since I scratched my first Beatles record. Tactfully I don’t mention that I had bought the record she’s listening to before she was born. The concept of a phonograph record belongs to a bygone age and I don’t want to spoil the pleasure she’ll get from discovering her “own” new favourite musician.

2. The music brings memories flooding back. I have a sudden urge to bring back my record collection from the attic, where it has mouldered for almost a decade. Only one thing stops me – my turntable succumbed to the damp air in a cellar where I stored it for. a good ten years. No, I don’t care if turntables are ancient technology: I will find one. And I will restore my long lost record collection—which took up a good amount of shelf space—to its former glory. Buying something as uncool as a turntable takes courage and planning. I find a promising TV and radio store in the phone book but I am expecting a mountain of questions from the clerk, who will most certainly have been born and raised after the demise of the turntable.

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Questions:
(a) The word similar in meaning to ‘an electronic device that stores data’ is
(i) table
(ii) computer
(iii) phonograph

(b) The concept of a phonograph record belongs to a bygone age. (Say ‘True’ or ‘False’)
(c) The meaning of ‘concept’ is
(i) memories
(ii) ideas
(iii) discovery

(d) What does the narrator hear?
(e) How does the narrator’s daughter download music?
(f) What does music bring?
Answers:
(a) (ii) computer
(b) True
(c) (ii) ideas
(d) The narrator hears music coming from his daughter’s computer.
(e) The narrator’s daughter downloads music from Internet.
(f) Music brings memories flooding back.

Passage-13

“When Alexander Fleming was sixteen, he had to work to earn his living. He found a job in a shipping office in London. The wages were small and the work rather uninteresting. He also worked as a volunteer soldier on weekends and holidays. It was soon discovered that the sturdy young man from Scotland was a fine shot and a very good swimmer.

Just after wards, a relative died, leaving him a small but useful sum of money. His brother Thomas advised him to give up the job at the shipping office and spend the money on his training as a doctor. Alexander said later, “My brother Thomas pushed me into medicine.”

So he joined St. Mary’s hospital school. He attended lectures and watched operation, he also swam and acted in plays. Yet he was always the top student in the examination. He won many prizes and scholarships. It come to be known about his memory that he could remember the whole book after reading it just once.

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Questions:
(I) Choose the correct answer from each of the following questions and write them in your answer book:
(i) Alexander Fleming was fond of:
(a) traveling
(b) hunting
(c) swimming
(d) music

(ii) He had to work to earn his living when he was in:
(a) his teens
(b) his twenties
(c) his thirties
(d) his forties

(II) “Thomas advised him to give up the job at the shipping office.” the meaning of the italicized phrasal verb is:
(a) to hand over
(b) to abandon
(c) to surrender
(d) to delay

(III) Name the place where Alexander was born.
(IV) How did Fleming like the job?
(V) What made possible for Fleming to become a doctor?
Answers:
(I) (i) (c) swimming
(ii) (a) his teens

(II) (b) to abandon
(III) (a) Scotland
(IV) He didn’t like it, as it was uninteresting and the wages were small.
(V) It was his brother Thomas whose advice made Alexander a doctor.

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