MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 अध्यक्ष महोदय+

In this article, we will share MP Board Class 12th Hindi Solutions गद्य Chapter 4 अध्यक्ष महोदय Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 अध्यक्ष महोदय (व्यंग्य, शरद जोशी)

अध्यक्ष महोदय अभ्यास

अध्यक्ष महोदय अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पेशेवर अध्यक्ष किस विशेष प्रकार के वस्त्र पहनते हैं?
उत्तर:
पेशेवर अध्यक्ष शेरवानी नाम का विशेष वस्त्र पहनते हैं।

प्रश्न 2.
अध्यक्ष को गम्भीर किस्म का प्राणी क्यों कहा गया है? (2015, 17)
उत्तर:
गम्भीर किस्म का प्राणी ही सभा में मनहूस सूरत बना कर बैठता है और अच्छा अध्यक्ष होने की पहली शर्त है-गम्भीर-मनहूस सूरत।

प्रश्न 3.
रेडीमेड अध्यक्ष किसे कहा जाता है?
उत्तर:
रेडीमेड अध्यक्ष वह है जो सब विषयों पर एक ही अन्दाज से, एक ही बात करता है और उसे सब में एक-सा आनन्द आने लगता है।

प्रश्न 4.
पुराने अध्यक्ष की शेरवानियों में से किस प्रकार की गन्ध आती है?
उत्तर:
पुराने अध्यक्ष की शेरवानियों में से एक विशेष प्रकार की गन्ध आती है और वह है-अध्यक्षता की गन्ध।

प्रश्न 5.
अध्यक्षता करने को मर्ज क्यों कहा है?
उत्तर:
अध्यक्षता करने को मर्ज इसलिए कहा गया है, क्योंकि यह शौक एक बार लग जाने पर हमेशा के लिए लग जाता है।

MP Board Solutions

अध्यक्ष महोदय लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अध्यक्ष के बारे में सामान्य धारणाएँ क्या हैं?
उत्तर:
अध्यक्ष के बारे में सामान्य धारणाएँ हैं कि अध्यक्ष पैदा होता है, गम्भीर व मनहूस किस्म का होता है, उसके अन्दर अध्यक्षता का मर्ज होता है, वह पेट से आता है, रेडीमेड होता है, प्रमुख वक्ता से असहमत होते हुए उसकी प्रशंसा करता है और अन्त में मुस्कराता है और अध्यक्षता करने के बाद सुख की नींद सोता है।

प्रश्न 2.
अध्यक्ष के देर से आने के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अध्यक्ष की एक विशेषता होती है कि वह देर से आता है,क्योंकि वह एक अत्यन्त व्यस्त प्राणी होता है। वह अपने महत्व को दिखाना चाहता है। वक्ता का भाषण एक खुले माल की बिक्री की दुकान की तरह होता है, जिससे श्रोता रूपी ग्राहक देर से आते हैं तो अध्यक्ष बिना श्रोता के क्या करेगा, अतः वह भी देर से आता है।

प्रश्न 3.
अध्यक्ष बनने वाले कितनी तरह से अध्यक्ष बनते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अध्यक्ष बनने वाले कई तरह से अध्यक्ष बनते हैं। कुछ चौंककर अध्यक्ष बनते हैं, कुछ सहज अध्यक्ष बन जाते हैं, कुछ दूल्हे की तरह लजाते-मुस्कराते अध्यक्ष बनते हैं। कुछ यों अध्यक्ष बनते हैं, जैसे शहीद होने जा रहे हों। कुछ हेडमास्टर की अदा से अध्यक्ष बनते हैं।

प्रश्न 4.
अध्यक्षीय दायित्व का निर्वहन करने के पश्चात् अध्यक्ष घर जाकर सुख की नींद क्यों सोता है?
उत्तर:
अध्यक्षता करने के बाद अध्यक्ष सुख की नींद सोता है। नये-नये अध्यक्ष को घर जाकर पत्नी को अध्यक्षता काल के विषय में दोहराते हुए सुख प्राप्त होता है। थोड़े समय बाद पत्नी भी सामान्य श्रोताओं के समान चुप रहने लगती है,तो अध्यक्ष देर रात तक अपने भाषण पर खुद मोहित हो सो जाते हैं। उस उम्र तक उसकी बौद्धिक नपुंसकता ‘अहं’ में बदल जाती है। वह सोचता है रात के बाद सुबह होगी फिर कोई बुलाने आयेगा। इसी कल्पना में वह सुख से सो जाता है।

प्रश्न 5.
अच्छे अध्यक्ष के मस्तिष्क की हालत कैसी होती है?
उत्तर:
अच्छे अध्यक्ष के मस्तिष्क की हालत उस नौ रतन चटनी की तरह हो जाती है जिसके काजू और किशमिश का स्वाद एक हो जाता है। सब में एक-सा मजा आने लगता है।

अध्यक्ष महोदय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अध्यक्षता करते समय अध्यक्ष की गतिविधियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अध्यक्षता करते समय अध्यक्ष की गतिविधियाँ बड़ी विचित्र होती हैं। अध्यक्षता करता अध्यक्ष हर पाँचवें मिनट पर मुस्कराता है, जबकि उसके मुस्कराने का कोई कारण नहीं होता। हर ढाई मिनट पर वह जनता की तरफ देखता है। हर एक मिनट बाद सामने की पंक्ति में बैठे लोगों को और हर दो मिनट बाद महिलाओं को और बीच-बीच में छत की तरफ देखता है। ठड्डी पर उँगलियाँ फेर सोचता है कि शेव कैसी बनी है? लगातार बदन खुजलाता है। बार-बार टोपी सिर पर रखता और उतारता है। वक्ताओं को निरन्तर आश्चर्य से देखते हुए दिखावा करता है कि वह ध्यानपूर्वक वक्ता की बातों को सुनकर समझ रहा है। वक्ता तर्क-वितर्क क्यों कर रहा है? गर्दन हिलाकर वक्ता की बात का समर्थन करता भी है और नहीं भी। कभी-कभी अध्यक्ष सम्पूर्ण सभा को देखकर मुस्कराता है कि इस जनसमूह का वह चालक है। अपने पद पर अहम् भी करता है। अधिकतर अध्यक्ष घुमा-फिरा कर बातें कहते हैं और मूल बिन्दु पर कभी नहीं आते। अपनी वक्ता से असहमति प्रकट करने पर भी सहमत हो जाता है। लेखक ने अध्यक्ष की गतिविधियों पर आदि से अन्त तक व्यंग्य किया है।

प्रश्न 2.
अच्छे अध्यक्ष की विशेषताएँ बताइए। (2010)
उत्तर:
व्यंग्यकार शरद जोशी ने अपने निबन्ध अध्यक्ष महोदय’ में अच्छे अध्यक्ष की अनेक विशेषताएँ बताई हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  1. अच्छे अध्यक्ष होने की पहली शर्त है-मनहूस होना। एक अच्छा अध्यक्ष मनहूस होता है बल्कि कहना होगा कि मनहूस ही अच्छा अध्यक्ष होता है।
  2. अध्यक्ष गम्भीर किस्म का प्राणी होता है या उसमें यह भ्रम बनाये रखने की शक्ति होती है कि वह गम्भीर है।
  3. अध्यक्ष एक प्रकार का रोगी होता है, उसे रोग होता है। भीड से अलग बैठने अपने को श्रोता दिखाने, तकल्लुफ प्रदर्शन करने और अन्त में माइक के साथ फिट होने का।
  4. अध्यक्ष पद की घोषणा करने पर कभी चौंकता है,कभी दूल्हे की तरह लजाता है.तो कभी शहीदों की तरह बहादुरी दिखाता है। साथ ही, कभी-कभी हेड-मास्टर की तरह अदा भी दिखाता है।
  5. अध्यक्ष के स्थान पर बैठकर विभिन्न मुख मुद्राएँ बनाता रहता है।
  6. अध्यक्ष देर से आता है, क्योंकि वह अति व्यस्त प्राणी है।
  7. उसका अध्यक्षीय भाषण स्पष्ट न होकर गोल-मोल होता है। विषय से इतर जाने क्या-क्या कहता रहता है।
  8. अच्छे अध्यक्ष रेडीमेड होते हैं तथा सर्वत्र होने के कारण एक ही अन्दाज में एक ही बात कहते रहते हैं।
  9. अच्छे अध्यक्ष के मस्तिष्क की हालत नौ रतन चटनी जैसी होती है, जिसमें विभिन्न विचार एक-सा आनन्द देते हैं।
  10. अच्छा अध्यक्ष प्रमुख वक्ता से असहमत होता है। बाद में वक्ता की अस्पष्ट रूप से प्रशंसा करके उससे सहमत हो जाता है।
  11. सभा के अन्त में गम्भीरता का नकाब उतार कर मुस्कराते हुए घर जाकर सुख की नींद सो जाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
“अच्छे अध्यक्ष प्रमुख वक्ता से असहमत होते हैं” कारण सहित स ए कीजिए।
उत्तर:
अच्छा अध्यक्ष प्रमुख वक्ता से असहमत होता है। जैसे वक्ता कहता है कि इस समय रात है तो अध्यक्ष महोदय गोल-मोल बातों से सिद्ध करना चाहता है कि इस समय रात नहीं है। यह सच है कि सूर्य डूब गया है और अन्धकार है, पर यही पर्याप्त आधार नहीं कि हम कह दें कि यह रात है। अध्यक्ष तुरन्त विषय को बदल कर देश की स्थिति से जोड़ देता है। वक्ता के भाषण को ओजस्वी बताकर सामाजिक समस्याओं से जोड़ देता है। अन्त में वक्ता को धन्यवाद देता है। उसके भाषण की प्रशंसा करता है। अपने को अध्यक्ष बनाने के लिए कृतज्ञता प्रकट करता है। अब रात काफी हो गई है,कह कर भाषण समाप्त कर देता है।

एक ओर तो वक्ता के कथन ‘इस समय रात है’ को काट रहा है दूसरी ओर स्वयं स्वीकार कर रहा कि ‘अब रात काफी हो गई है।’ इस प्रकार, अध्यक्ष प्रमुख वक्ता की बात से असहमत होने पर भी पूर्ण सहमत है। महज वक्ता का विरोध करना या उससे असहमत होना उसकी आदत होती है। उसके लिए एक ख्याति की बात बन जाती है। अन्त में स्वयं उसे मान लेता है। इस प्रकार,अध्यक्ष असहमत होने और सहमत होने में भेद नहीं कर पाता है। यह उसकी बौद्धिक अक्षमता का प्रतीक तथा विसंगतियों का प्रतीक है। यह विरोध वह अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए करता है,जबकि यह विरोध केवल शाब्दिक छल मात्र रहता है। अध्यक्ष की वक्तव्य क्षमता की कलई खोल देता है।

प्रश्न 4.
भाव स्पष्ट कीजिए
(1) “नरगिस जब बेनूरी पर काफी रो लेती है, तब आप शहर में जन्म लेते हैं।”
(2) “पचास-सौ वर्षों बाद तो अध्यक्षता इतनी विकसित हो जाएगी कि खुद माइक वाला अपने साथ अध्यक्ष लाएगा और मंच पर फिट कर देगा।”
(3) “लोग मरते जाते हैं और अध्यक्ष जीवित रह शोक-सभाओं में बोलता रहता है।”
उत्तर:
उपरोक्त गद्यांशों की व्याख्या पाठ के ‘व्याख्या हेतु गद्यांश’ भाग में देखिए।

प्रश्न 5.
‘अध्यक्ष महोदय’ शरद जोशी का राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य है इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
आधुनिक युग के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य लेखक श्री शरद जोशी ने ‘अध्यक्ष महोदय’ व्यंग्य निबन्ध में राजनैतिक और सामाजिक विसंगतियों पर चुटीला व्यंग्य किया है। दोनों प्रकार की सभाओं व गोष्ठियों में अध्यक्ष का होना एक अनिवार्य औपचारिकता है। सभा में अध्यक्ष अवश्य होगा, उसका विशेष पहनावा व मुख मुद्रा होगी। वह गंभीर व मनहूस होगा। वह सर्वज्ञ होगा, व्यर्थ के अहम् को पालने वाला होगा। राजनैतिक नेता भी अध्यक्ष की तरह गम्भीर,मनहूस, विरोध व सहमति में अन्तर करने में असमर्थ,गोल-मोल बात कहने वाले, जनता के साथ छल करने वाले होते हैं। जनता के सामने स्वयं को श्रेष्ठ प्रदर्शित करना उनका प्रमुख कर्त्तव्य होता है। नेता अपने व्यर्थ के अहम् को पाते रहते हैं। सभाओं में देर से आना, अन्त में सबको धन्यवाद देना। इन सब घटनाओं पर आद्योपांत व्यंग्य समाहित है। अतः यह निबन्ध राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य है,जो पाठक को कुछ सोचने के लिए मजबूर करता है।

अध्यक्ष महोदय भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
नीचे दिए शब्दों में से मूल शब्द, उपसर्ग और प्रत्यय अलग कीजिए
अध्यक्षता, अनुकरण, सम्माननीय, गम्भीरता, असामान्य, विदेशी।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 अध्यक्ष महोदय img-1

प्रश्न 2.
वाक्य शुद्ध कीजिए

  1. ग्राहक लापरवाह हो जाती है।
  2. केवल मात्र अध्यक्षता के लिए शेरवानी सिलवाते हैं।
  3. वह सप्रमाण सहित पत्र लेकर उपस्थित हो गया।
  4. गांधीजी का देश सदा आभारी रहेगा। (2010)
  5. आपका भवदीय। (2010)

उत्तर:

  1. ग्राहक लापरवाह हो जाता है।
  2. मात्र अध्यक्षता के लिए शेरवानी सिलवाते हैं।
  3. वह प्रमाण सहित पत्र लेकर उपस्थित हो गया।
  4. देश गाँधीजी का सदा आभारी रहेगा।
  5. भवदीय।

प्रश्न 3.
निम्नांकित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए-
लाभ, विकसित,उपाय, मर्यादित, समस्या, पर्याप्त।
उत्तर:
हानि, अविकसित, निरुपाय, अमर्यादित, समाधान, अपर्याप्त।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को पढ़कर अर्थ के आधार पर वाक्य भेद लिखिए

  1. शायद आप परेशान हो जाएँ।
  2. क्या यही रात है?
  3. अध्यक्ष गम्भीर किस्म का प्राणी होता है।
  4. आप इस पर विचार करें।
  5. आएगा नहीं तो जाएगा कहाँ।
  6. वे अध्यक्षता करने नहीं जाते हैं।
  7. यदि सूर्य हमारे देश में पहले उगता है तो रात भी पहले यहाँ होती है।
  8. ईश्वर आपका भला करे।

उत्तर:

  1. संदेहवाचक वाक्य
  2. प्रश्नवाचक वाक्य
  3. विधानवाचक वाक्य
  4. आज्ञावाचक वाक्य
  5. संकेत वाचक वाक्य
  6. निषेधवाचक वाक्य
  7. संकेतवाचक वाक्य
  8. इच्छावाचक वाक्य।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार बदलिए-
(1) अध्यक्ष महोदय मुस्कराने लगे। (प्रश्नवाचक में)
(2) अध्यक्ष सुख की नींद सोता है। (निषेधात्मक में)
(3) आप परेशान हो जाएँगे। (सन्देहवाचक में)
(4) अच्छे अध्यक्ष प्रमुख वक्ता से असहमत होते हैं। (संकेतवाचक में)
(5) कितना अद्भुत दृश्य है। (विस्मयवाचक में)
उत्तर:
(1) अध्यक्ष महोदय क्यों मुस्कराने लगे?
(2) अध्यक्ष सुख की नींद नहीं सोता है।
(3) शायद आप परेशान हो जायेंगे।

MP Board Solutions

अध्यक्ष महोदय पाठ का सारांश

सुप्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य लेखक ‘शरद जोशी’ द्वारा लिखित प्रस्तुत निबन्ध ‘अध्यक्ष महोदय में लेखक ने आधुनिक युग में आयोजित कार्यक्रमों में अध्यक्ष पद के ऊपर करारा व्यंग्य किया है।

प्रत्येक सभा या गोष्ठी में एक अध्यक्ष होता है। अध्यक्ष वह होता है, जिसके पास शेरवानी होती है. जिसमें अध्यक्षता की गन्ध आती है। अध्यक्ष पैदा होता है। वह लम्बे समय तक चलता है। वह गम्भीर होने का नाटक करता है। अच्छे अध्यक्ष की पहचान होती है कि वह मनहूस होता है। अध्यक्षता एक प्रकार का रोग है, जो लग जाये तो जीवन-भर चलता रहता है। सभा में माइक के समान अध्यक्ष भी फिट किये जाते हैं। अध्यक्ष अनेक प्रकार के बनते हैं, जैसे-चौंककर,दूल्हे की तरह लजाकर, शहीद की तरह शहीद होकर या हैडमास्टर की सी अदाएँ दिखाकर। गोष्ठी के सम्पूर्ण काल में वे ऐसा प्रदर्शन करते हैं जैसे वह गोष्ठी व उपस्थित जनता के ध्यान देने की वस्तु हैं।

अध्यक्ष की सबसे बड़ी विशेषता होती है, देर से आना तथा अपनी व्यस्तता का प्रदर्शन करना। अच्छे अध्यक्ष रेडीमेड होते हैं,जो सब विषय पर खूब बोल सकते हैं। चाहे उनके भाषण में दो शब्द भी सारगर्भित न हों। अच्छे अध्यक्ष की एक और विशेषता होती है कि वह प्रमुख वक्ता से असहमत ही रहता है। असहमत होने के अनर्गल तर्क देकर अन्त में वक्ता से पूर्ण सहमत हो जाता है। उसे धन्यवाद देता है और सभा की कार्यवाही को समाप्त कर देता है। तत्पश्चात् गम्भीर मुस्कान के साथ अपने घर चला जाता है। वहाँ सुख की नींद सोता है। नया अध्यक्ष घर आकर अपनी पत्नी को सब बता देता है। कालान्तर में पत्नी इस सब की अभ्यस्त हो जाती है। तब अध्यक्ष महोदय अपने भाषण पर खुद मोहित होकर सो जाते हैं। अध्यक्ष एक व्यर्थ के ‘अहं’ को पाले रहता है।

इन सब घटनाओं में आरम्भ से लेकर अन्त तक व्यंग्य छिपा हुआ है। अध्यक्ष, वक्ता, आयोजनकर्ता और कार्यक्रम सब पर व्यंग्य है। इसी कारण सम्पूर्ण निबन्ध में रोचकता व उत्सुकता बनी रहती है। भाषा उर्दू शब्दावली व उदाहरणों से भरपूर है।

अध्यक्ष महोदय कठिन शब्दार्थ

साइज = आकार। पेशेवर = व्यवसायी। बेनूरी = बदसूरती। मनहूस = अशुभ। मर्ज = रोग। महज = केवल। श्रोता = सुनने वाला। तकल्लुफ = परहेज। प्रदर्शन = दिखावा। वजह = कारण। निरन्तर = लगातार। तय = निश्चय। कंट्रोल = नियंत्रण। शख्स = व्यक्ति। अन्दाज = अनुमान। मजा = आनन्द। किस्म = प्रकार। परखा = जाँचा। सदैव = हमेशा। पर्याप्त = काफी। ओजस्वी = जोश से भरा। सारगर्भित = सारयुक्त।

अध्यक्ष महोदय संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) नरगिस जब बेनूरी पर काफी रो लेती है तब आप शहर में जन्म लेते हैं।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘अध्यक्ष महोदय’ नामक पाठ से अवतरित है। इसके लेखक ‘शरद जोशी’ हैं।

प्रसंग :
लेखक का कथन है कि अध्यक्ष न बनाया जाता है और न चुना जाता है। वह तो दुःखों का अन्त होने पर जन्म लेता है।

व्याख्या :
दुःख रूपी रात का अन्त होने पर ही सुख रूपी सूर्य का जन्म होता है। नरगिस का पौधा देखने में खूबसूरत नहीं होता तथा लम्बे समय तक फूल रहित रहता है। बरसात के आने पर ही सुन्दर रंगों के फूल खिलते हैं। इसी प्रकार, जब माँ कष्ट सहती है और बदसूरत हो जाती है तब ही सन्तान रूपी पुष्प को जन्म देती है। इसी प्रकार, कष्ट व बदसूरती के परिणामस्वरूप अध्यक्ष का जन्म होता है।

विशेष :

  1. प्रयुक्त युक्ति में जीवन का कटु सत्य है।
  2. भाषा सरल उर्दू के शब्दों से भरपूर है।
  3. सूत्रात्मक शैली का प्रयोग है।

(2) लोग मरते जाते हैं और अध्यक्ष जीवित रह शोक-सभाओं में बोलता रहता है।

संदर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
अध्यक्ष कोई व्यक्ति विशेष न होकर एक पद है जो सदैव जीवित रहेगा।

व्याख्या :
इस एक ही वाक्य में जोशी जी ने बताया है कि पीढ़ियाँ बदलती जाती हैं, लेकिन अध्यक्ष पद तो सभा व गोष्ठी को सजाता ही रहेगा। उस सुशोभित स्थान पर बैठकर भाषण देने वाला। इस प्रकार, एक खुशी की गोष्ठी भी शोक सभा में परिवर्तित हो जायेगी। जनता इस नीरसता का सामना करती रहेगी। अध्यक्ष पद की कुर्सी सदैव जीवित रहेगी।

विशेष :

  1. अध्यक्ष पद की निस्सारता का चित्र है।
  2. भाषा सरल,खड़ी बोली है।
  3. वाक्य रचना भावानुकूल है।
  4. चुटीला व्यंग्य है।

MP Board Solutions

(3) हर सभा में जब तक माइक और अध्यक्ष फिट नहीं होते, सभा ठिठकी रहती है। माइक के सामने तक अध्यक्ष फिट किया जाना जरूरी है। पचास-सौ वर्षों बाद तो अध्यक्षता इतनी विकसित हो जायेगी कि खुद माइक वाला अपने साथ अध्यक्ष लायेगा और मंच पर फिट कर देगा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
हर सभा में जैसे प्रत्येक श्रोता तक वक्ता की आवाज को पहुँचाने के लिए माइक आवश्यक होता है, उसी प्रकार सभा के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अध्यक्ष अनिवार्य है। इन दोनों,माइक और अध्यक्ष के मंच पर आने पर ही सभा की पूर्णता मानी जाती है।

व्याख्या :
शरद जी सभा की कार्यविधि पर जायकेदार व्यंग्य करते हए कहते हैं कि हर सभा के दो अनिवार्य तत्व हैं,माइक व अध्यक्ष। दोनों के फिट होने पर सभा की गरिमा है। इनके बिना सभा झिझकी-झिझकी, रुकी-रुकी तथा गतिहीन प्रतीत होती है। जब अध्यक्ष के स्थान पर बैठे व्यक्ति के मुँह के सामने माइक रखा होता है तब ही लगता है कि गोष्ठी चल रही है। आज यह दोनों अलग-अलग हैं, परन्तु आने वाली अर्द्ध-शताब्दी के बाद जैसे निर्जीव माइक को बिजली वाला लाता है, उसी प्रकार, निर्जीव अध्यक्ष को भी माइक वाला लायेगा। जैसे माइक में से वही प्रतिध्वनि आती है, जो माइक के पीछे बैठा व्यक्ति बोलता है, ऐसे ही अध्यक्ष बोलेगा जैसा नेपथ्य में से उसे बताया जायेगा। दोनों के मंच पर आसीन होते ही सभा का संचालक मात्र ही वास्तविकता होगा।

विशेष :

  1. अध्यक्ष पद पर व्यंग्य है।
  2. भाषा सरल है,जिसमें अंग्रेजी शब्दों, जैसे-माइक व फिट का उपयोग किया गया है।
  3. देशज शब्द-ठिठकी तथा उर्दू शब्दों का प्रयोग है।

(4) उनके दिमाग की हालत उस नौ रतन चटनी की तरह हो जाती है जिसके काजू और किशमिश का स्वाद एक हो जाता है। सब में एक-सा मजा आने लगता है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
अच्छा अध्यक्ष वह है जो विषय की गहराई व उसके मूल भाव को समझे विना हर विषय पर एक ही प्रकार की गोल-गोल बात कहकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री मान लेता है।

व्याख्या :
जोशी जी ने अध्यक्ष के ज्ञान भंडार व भाषण योग्यता पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि जो अध्यक्ष सर्वज्ञ ईश्वर के समान ज्ञानवान बन कर हर विषय पर अपने भाषण को एक ही ईश्वर का रूप प्रदान कर देता है। जैसे ईश्वर एक है-उसका भाषण विषय अलग होने पर भी एक है। उस बात को स्पष्ट करने के लिये लेखक ने नौ रतन चटनी का उदाहरण दिया कि चटनी के पिस जाने पर उसमें पड़े सब मसालों का स्वाद अलग-अलग न आकर एक साथ विशिष्ट स्वाद आता है। अध्यक्ष का मस्तिष्क भी उस पिसी नौ रतन चटनी की तरह ही है, जिसमें कोई बात स्पष्ट नहीं है। हर बात का उत्तर एक है। चौराहे पर एक दाम पर मिलने वाले माल की तरह उसका भाषण होगा। हर भाषण का आनन्द भी एक-सा होगा। भगवान की एकरूपता का कितना सुन्दर उदाहरण होगा, उस अध्यक्ष का भाषण?

विशेष :

  1. अध्यक्ष के ज्ञान पर तीखा कटाक्ष।
  2. उदाहरण शैली के द्वारा भाषा को सरल बनाया गया है।
  3. उर्दू शब्दों का बाहुल्य तथा भाषा की बोधगम्यता है।

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 7 Movements of the Earth

In this article, we will share MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 7 Movements of the Earth Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 7 Movements of the Earth

MP Board Class 7th Social Science Chapter 7 Text Book Questions

Fill in the blanks:

  1. The earth completes one rotation in ………….. hours.
  2. The earth completes one revolution round toe sun in ………….. days.
  3. Day and Night occurs due to the ……………… of toe earth.
  4. Earth gets heat from the ……………..
  5. The earth’s axis forms an angle of ……………

Answer:

  1. 24 hours
  2. 365 days
  3. rotation
  4. sun
  5. 23.5°

MP Board Solutions

Match the columns:

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 7 Movements of the Earth-5
Answer:
1. (b) Equator
2. (c) Tropic of cancer
3. (a) Tropic of Copricom

MP Board Class 7th Social Science Chapter 7 Short Answer Type Questions

Question 1.
What is meant by rotation?
Answer:
The earth rotates on its axis from west to east. This movement of the earth is called rotation. The earth takes about 24 hours to complete one rotation (12 hours day, 12 his nights) this period of rotation is known as earth today.

Question 2.
What do you understand by revolution?
Answer:
While rotating on its axis toe earth moves forward and revolves around sun. In this movement, toe earth follows a fixed route or path. This movement of the earth is called revolution. The earth takes 365 days and about 6 hours to complete one revolution.

MP Board Solutions

Question 3.
Which movement of the earth brings about a change in the season?
Answer:
Due to revolution, we experience changes in the seasons.

MP Board Class 7th Social Science Chapter 7 Long Answer Type Questions

Question 1.
Explain the movements of the earth with the help of a diagram.
Answer:
(a) Rotation:
Rotation is turning on an axis. The earth rotates on its axis once in 24 hours. The evidence of this is found in the rising and setting of the sun. At the Equator the earth’s speed of rotation on its axis is 40,000 km. in 24 hours, i.e., over 1,600 km. per hour.

MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 7 Movements of the Earth-1

Revolution:
The earth’s movement round the sun in 365‘A days is known as Revolution. The earth’s orbit is about 965 million km. long and it moves round the sun at the speed of 29.6 km. per second (1,03,200 km. per hour).
MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 7 Movements of the Earth-2

Question 2.
Explain how days and nights occur on the earth.
Answer:
We experience day and night due to the rotation of the earth. The earth receives light from the sun. The earth completes one rotation on its axis in 24 hours. While the earth rotates, the face of the earth receiving sunlight experiences day while the other facing away from the sunlight remains in darkness. That part experiences night.

MP Board Solutions

Question 3.
Draw a well – labeled diagram showing the changes in season on earth.
Answer:
The earth’s axis forms an angle of 66 1 / 2 with the plane of the earths orbit and the earth tilts at 23 1 /2 degree on its axis. Let us understand how seasons occurs on earth.
MP Board Class 7th Social Science Solutions Chapter 7 Movements of the Earth-3

MP Board Class 7th Social Science Solutions

MP Board Class 8th Social Science Solutions Chapter 19 National Movement and Achievement of Independence

In this article, we will share MP Board Class 8th Social Science Solutions Chapter 19 National Movement and Achievement of Independence Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 8th Social Science Solutions Chapter 19 National Movement and Achievement of Independence

MP Board Class 8th Social Science Chapter 19 Text Book Exercise

Choose the correct option of the following

Question 1.
When Rollat Act was passed?
(a) 7 April 1819
(b) 8 March 1919
(c) 2 January
(d) 6 March 1919
Answer:
(b) 8 March 1919

Question 2.
Who was the Lt. Governor of Punjab during Jallianwala Bagh Massacre?
(a) Lord Dalhousie
(b) Lord Macually
(c) General O Dyer
(d) O Dyer
Answer:
(c) General O Dyer

Question 3.
Who was the President of Swaraj Dal?
(a) Motilal Nehru
(b) Chittaranjan Das
(c) Gopal Krishan Gokhle
(d) Dada Bhai Naorozi
Answer:
(b) Chittaranjan Das

Question 4.
When Salt Satyagrah Movement began?
(a) 5 March 1931
(b) 8 August 1942
(c) 12 March 1930
(d) none of the above
Answer:
(c) 12 March 1930

MP Board Solutions

Fill in the blanks:

  1. 6 April 1919 was celebrated as ……….
  2. Simon Commission came to India in ………..
  3. Gandhiji undertook the ……….. to break the Salt Law.
  4. In 1940 the annual session of Muslim League was held at ………..

Answer:

  1. Day of national dishonor
  2. On 3rd February 1928
  3. Dandi March
  4. Lahore.

MP Board Class 8th Social Science Chapter 19 Very Short Answer Type Questions

Question 1.
Which title was given to Gandhiji by the British?
Answer:
Gandhiji was offered Kaiser-I-Hind title by the British Govt.

Question 2.
Give names of the prominent leaders of Swaraj Dal?
Answer:
Chittaranjan Das and Moti Lal Nehru founded the Swaraj Dal. Chittaranjan Das was its President Vithallbhai Patel, Chittaranjan Das  and Moti Lal Nehru were its prominent leaders.

Question 3.
When the Second World War broke out?
Answer:
The Second World War broke out in September 1, 1939 when Germany invaded Poland. On September 3, Britain also joined war in favor of Poland. The Govt, of India immediately joined the War without consulting the national Congress. The annoyed Congressmen in protest tendered registrations in the seven Provinces.

MP Board Solutions

MP Board Class 8th Social Science Chapter 19 Short Answer Type Questions

Question 1.
Why Khilafat Movement was started?
Answer:
At the end of First World War, Turkey defeated by the British forces suffered injustice at the Lands of Britain. Khalifa was dethroned from his post. He was the religious head of the Muslims and Muslim community in India opposed this heinous act against Turkey. In 1919 under the leadership of Mohammed Ali Jinnah, Shaukat Ali, Maulana Azad the Khilafat committee war formed.

The objective of Khilafat movement was to protest against the injustice done to Khalifa and Turkey. The Khilafat movement was given full supports by Gandhiji and the Indian National Congress.

Question 2.
What were the major objectives of Swaraj Dal?
Answer:

Main objectives of Swaraj Dal:

  • To achieve Swaraj
  • To interrupt official work
  • To oppose the policies of British Govt
  • To develop national awakening
  • To enter Councils by election.

The members of Swaraj Dal Vithallbhai Patel, Chittaranjan Das and Pt. Moti Lal Nehru and other members jointly formed an independent forum and put up demands before the Govt. when the Govt, did not consider the demands they interrupted the Govt, working.

Question 3.
Why Gandhiji put off the Non-cooperation Movement?
Answer:
Gandhiji withdraw Non-cooperation Movement because an excited crowd of people set fire to a police station at Chauri Chaura in Uttar Pradesh which caused the death of 22 policemen including as Inspector. Mahatma Gandhi was pained to see that the country had not understood the message of non-violence.

MP Board Solutions

MP Board Class 8th Social Science Chapter 19 Long Answer Type Questions

Question 1.
Describe about the Jallianwala Bagh Massacre?
Answer:
There was a great resentment among the people on the restrictions on the entry of Gandhiji and other leaders in Punjab. This protest grew more intense when two leaders of Punjab Dr. Satpal and Dr. Saifuddin Kichlu were arrested without any reason by Deputy Commissioner of Amritsar. The people took out a peaceful rally in protest of this arrest. The police tried to stop the procession but failing to stop they fired.

After that the procession became very violent and people set houses on fire. The Govt, handed over the charge of Amritsar in the hands of General 0 Dyer on April 10, 1919. On the day of Baisakhi on April 13, 1919 a General Meeting was held at 4:30 p.m. in Jallianwala Bagh. Ten thousand people gathered there.

General Dyer reached there with 400 armed laced troops and without prior information to the crowd he ordered firing. The firing resulted in thousands of death and large number of people met fatal injuries. This heinous act of inhumanity hurt the feelings of Indians all over the country. They organised protests against British Government.

Question: 2.
What were the key programmes of Non-Cooperation Movement?
Answer:
In December 1920 in Nagpur the Congress session unanimously adopted the non-cooperation proposals mooted by Gandhiji. The movement was supposed to be fully peaceful. And to show non-cooperation with the Govt, at all level. The movements had two sides:
Answer:

  1. To denounce Govt, posts and titles.
  2. Boycott Govt, schools and colleges.
  3. Boycott Judiciary.
  4. Not to pay taxes.
  5. Boycott of foreign goods and clothes.

B. Positive side:

  1. Establish national schools and colleges.
  2. To settle disputes by Panchayats.
  3. Stress on truth and non-violence.
  4. To promote Charkha for spinning and weaving.
  5. To enroll one crore volunteers to make the movement successful.

The Non-cooperation Movement was soon a success among the masses.

Question 3.
Explain the Civil Disobedience Movement.
Answer:

The Civil Disobedience Movement was launched in 1930. The chief reasons were:

  1. Peaceful hartals, demonstrations, meetings, requests and appeal were not heeded by the government.
  2. Repression was let loose on peaceful people by die British Government.
  3. The leaders of the movement wanted to force government to accede to their demands. They wanted complete freedom for their country.
  4. There was no other alternative left but to disobey the British Government.

The defiance of the Salt Law followed by the spread of Civil Disobedience Movement. This Movement meant more than the violation of the Salt Law. There were held demonstrations, hartals, boycott of foreign goods, and later refusal to pay taxes. The lakhs of people participated in the movement, including a large number of women. The Government resorted to firings and lathi charges. As a result, hundreds of people were killed and thousands of them were imprisoned.

Question 4.
What is Cripps Mission? Mention about it?
Answer:

Cripps Mission:
The British Govt, desperately needed Indian support during the Second World War. The Southern frontier of India was being threatened by the importing Japanese forces. On the other hand, Indian National Army in Rangoon was awaiting to attack India through the route of Burma under these circumstances Stratford Cripps was sent to India to assure Indians about the future course and self-rule in India.

According to Cripps proposal dominion status was to be granted to India. Even a Constituent
Assembly was proposed but almost every party opposed this proposal on various grounds.

Question 5.
Write note on the Quit India Movement?
Answer:
Quit India Movement was a call to the British regime to leave India for ever and handover its governance to its people. This movement was launched by Mahatma Gandhi in 1942. The call of Mahatma Gandhi was given a prompt and effective response by the people.

As a result of the movement, the British Government arrested many Congress leaders including Gandhiji and declared Indian National Congress illegal. On this, the Indians rose in open rebellion against the Britishers. They set fire to many police stations, destroyed post offices, Railway stations and other Government buildings. At this, thousand of people were arrested and while the other thousands were shot dead.

MP Board Solutions

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण

In this article, we will share MP Board Class 10th Hindi Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण

प्रकृति चित्रण अभ्यास

बोध प्रश्न

प्रकृति चित्रण अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि के अनुसार ‘वनों और बागों में किसका विस्तार है?
उत्तर:
कवि के अनुसार ‘वनों और बागों’ में बसन्त ऋतु का विस्तार है।

प्रश्न 2.
तन, मन और वन में परिवर्तन किसके प्रभाव से दिखाई दे रहा है?
उत्तर:
तन, मन और वन में परिवर्तन बसन्त ऋतु के प्रभाव से दिखाई दे रहा है।

प्रश्न 3.
कन्हैया के मुकुट की शोभा क्यों बढ़ गई है?
उत्तर:
शरद ऋतु की चाँदनी की छवि पाकर कन्हैया के मुकुट की शोभा बढ़ गई है।

प्रश्न 4.
कवि ने हिमालय की झीलों में किसको तैरते हुए देखा है?
उत्तर:
कवि ने हिमालय की झीलों में कमल नाल को खोजने वाले तैरते हुए हंसों को देखा है।

प्रश्न 5.
कवि ने बादलों को कहाँ घिरते देखा है?
उत्तर:
कवि ने मानसरोवर झील के समीप हिमालय की ऊँची चोटियों पर बादलों को घिरते देखा है।

प्रश्न 6.
कौन अपनी अलख नाभि से उठने वाले परिमल के पीछे-पीछे दौड़ता है?
उत्तर:
कस्तूरी मृग अपनी अलख नाभि से उठने वाले परिमल के पीछे-पीछे दौड़ता है।

MP Board Solutions

प्रकृति चित्रण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बसन्त ऋतु के आगमन पर प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
बसन्त ऋतु के आगमन पर कुंजों में भौरे गुंजार करने लगते हैं, उनके झुण्ड के झुण्ड आम के बौरों पर चक्कर लगाने लगते हैं। विहग (पक्षी) समाज में तरह-तरह की आवाजों के द्वारा बसन्त की खुशी का वर्णन होने लगता है। ऋतुराज के आने से प्रकृति में भाँति-भाँति के राग-रंग बिखरने लगते हैं।

प्रश्न 2.
यमुना तट पर किसी छटा बिखरी हुई है?
उत्तर:
यमुना तट पर अखण्ड रासमण्डल की छटा बिखरी

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार ‘घनेरी घटाएँ’ क्या कर रही
उत्तर:
कवि के अनुसार घनेरी घटाएँ घुमड़-घुमड़ कर गर्जना करने लग जाती हैं और फिर उनकी गर्जना थमने का नाम नहीं लेती।

प्रश्न 4.
‘निशाकाल से चिर अभिशापित’ किसे कहा गया है?
उत्तर:
निशाकाल से चिर अभिशापित चकवा-चकवी को कहा गया है। कवियों की मान्यता है कि चकवा-चकवी का रात के समय वियोग हो जाता है। यह वियोग उन्हें किसी शाप के द्वारा प्राप्त हुआ है।

प्रश्न 5.
कवि ने भीषण जाड़ों में किससे ‘गरज-गरज कर भिड़ते देखा है?
उत्तर:
कवि ने भीषण जाड़ों में महादेव को झंझावात से गरज-गरज कर भिड़ते देखा है।

प्रकृति चित्रण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पद्माकर ने वर्षा ऋतु में प्रकृति का चित्रण किस तरह किया है? उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पद्माकर ने वर्षा ऋतु में चारों ओर चमकने वाली बिजली और शीतल, मन्द सुगन्धित वायु के बहने की तथा घनेरी घटाओं के घुमड़-घुमड़ कर गर्जन करने का वर्णन किया है।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार बसन्त का प्रभाव कहाँ-कहाँ दिखाई दे रहा है?
उत्तर:
कवि के अनुसार बसन्त का प्रभाव कूलों में, केलि में, कछारों में, कुंजों में, क्यारियों में और सुन्दर किलकती हुई कलियों में, पत्तों में, कोयल में, पलासों में, समस्त द्वीपों में और ब्रज के बाग-बगीचों तथा युवतियों में देखा जा सकता है।

प्रश्न 3.
नागार्जुन ने कवि कल्पित’ सन्दर्भ किसे माना है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नागार्जुन ने कवि कल्पित सन्दर्भ मेघदूत को माना है। अलकापुरी से जब यक्ष को निर्वासित कर दिया गया तो वह अपनी प्रेमिका के वियोग में दुःखी रहने लगा। वर्षा ऋतु के आने पर यक्ष ने बादल को दूत बनाकर अर्थात् मेघदूत के माध्यम से ही अपनी प्रेमिका को प्रेम-सन्देश भेजा है।

प्रश्न 4.
नागार्जुन के अनुसार बसन्त ऋतु के उषाकाल का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नागार्जुन के अनुसार बसन्त ऋतु के उषाकाल का वर्णन इस प्रकार है-
बसन्त ऋतु का सुप्रभात था, उस समय मन्द-मन्द गति से हवा चल रही थी, सूर्य की प्रातःकालीन कोमल किरणें पर्वत शिखरों पर स्वर्णिम आभा में गिर रही थीं। रात में चकवा-चकवी का वियोग क्रन्दन सुनाई पड़ता था तथा सरवर के किनारे काई की हरी दरी पर प्रात:काल में उनको प्रणय आलाप करते देखा है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) कौन बताए वह छायामय ………… गरज-गरज भिड़ते देखा है।
उत्तर:
कविवर नागार्जुन कहते हैं कि इस कैलाश शिखर पर धनपति कुबेर की अलका नगरी का पुराणों में उल्लेख मिलता है लेकिन आज तो इसका यहाँ कोई नामोनिशान भी नहीं है, न ही हमें कालिदास के आकाश में विचरण करने वाले उस मेघदूत का कहीं पता मिलता है। हमने बहुत प्रयत्न कर लिए पर वह ढूँढने से भी नहीं मिला। ऐसा हो सकता है कि वह छायामय मेघदूत यहीं कहीं जाकर बरस गया होगा। फिर कवि कहता है कि इन बातों को छोड़ो, मेघदूत तो कवि कालिदास की कल्पना थी।

मैंने तो भयंकर कड़कड़ाते जाड़ों में आकाश को चूमने वाले कैलाश के शिखर पर घनघोर झंझावातों में महादेव जी को उनसे गरज-गरज कर युद्ध करते देखा है। बादल को घिरते देखा है।

(ब) और भाँति कुंजन ………… और बन गए।
उत्तर:
कविवर पद्माकर कहते हैं कि बसन्त ऋतु में कुंजों में और ही प्रकार की सुन्दरता छा गई है तथा भरों की भीड़ में अनौखी गुंजार सुनाई दे रही है। डालियों, झुण्डों तथा आम के बौरों में नयी आभा आ गई है। गलियों में और ही भाँति की शोभा छा गयी है पक्षियों के समाज में भी और ही प्रकार की बोलियाँ सुनाई दे रही हैं। ऐसे श्रेष्ठ ऋतुराज बसन्त के अभी दो दिन भी नहीं चुके हैं फिर भी सर्वत्र और ही प्रकार का रस, और ही प्रकार की रीति, और ही प्रकार के राग तथा और ही प्रकार के रंग सर्वत्र छाये हुए हैं। इस ऋतु में मनुष्यों के शरीर और ही प्रकार के हो गए हैं, और ही प्रकार के मन तथा और ही प्रकार के वन और बाग हो गए हैं।

MP Board Solutions

प्रकृति चित्रण महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रकृति चित्रण बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘कहाँ गया धनपति कुबेर वह’ पंक्ति पाठ्य-पुस्तक की किस कविता से ली गयी है? (2009)
(क) नीति-अष्टक
(ख) श्रद्धा
(ग) पथ की पहचान
(घ) बादल को घिरते देखा है।
उत्तर:
(घ) बादल को घिरते देखा है।

प्रश्न 2.
कन्हैया के मुकुट की शोभा किसके द्वारा बढ़ गई है?
(क) नगों द्वारा
(ख) शरद की चाँदनी से
(ग) तारों की आभा से
(घ) सोने का होने के कारण
उत्तर:
(ख) शरद की चाँदनी से

प्रश्न 3.
कवि ने बादलों को कहाँ घिरते देखा है? (2010, 17)
(क) नवल धवल गिरि पर
(ख) तालाबों में
(ग) चट्टानों में
(घ) बागों में।
उत्तर:
(क) नवल धवल गिरि पर

प्रश्न 4.
निशाकाल से चिर अभिशापित किसे कहा गया है?
(क) मृगों को
(ख) नायक-नायिका को
(ग) चकवा-चकवी को
(घ) भौंरों को।
उत्तर:
(ग) चकवा-चकवी को

प्रश्न 5.
हिमालय की झीलों में कवि नागार्जुन ने तैरते हुए देखा है (2015)
(क) मछली को
(ख) मृग को
(ग) हंसों को
(घ) नारी को।
उत्तर:
(ग) हंसों को

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. अमल धवल गिरि के शिखरों पर ……… को घिरते देखा है।
  2. वर्षा ऋतु का वर्णन पद्माकर ने ….. को बढ़ाने वाली ऋतु के रूप में किया है।
  3. “बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलनि में बगन में बागन में बगर्यो …….. है।”
  4. ……… की हरी दरी पर प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
  5. हिमालय की झीलों में कवि नागार्जुन ने ………. को तैरते देखा है। (2011)

उत्तर:

  1. बादल
  2. विरह
  3. बसन्त
  4. शैवालों
  5. हंसों।

सत्य/असत्य

  1. ताप तीन प्रकार के होते हैं – दैहिक, दैविक और भौतिक।
  2. ‘ऋतु वर्णन’ कविता में कविवर पद्माकर ने वर्षा ऋतु का सुन्दर वर्णन किया है।
  3. हिमालय पर बादलों की स्थिति सदैव एक-सी रहती है।
  4. ‘बादल को घिरते देखा है’ कविता के कवि तुलसीदास हैं। (2009)

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. असत्य

MP Board Solutions

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 5 प्रकृति चित्रण img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (ग)
3. → (क)
4. → (घ)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. पद्माकर कवि को किस काल का कवि माना जाता है?
  2. ‘ऋतु वर्णन’ में कवि ने प्रमुख रूप से इन पदों में किस ऋतु का वर्णन किया है।
  3. पद्माकर कवि ने विरह को बढ़ाने वाली ऋतु कौन-सी मानी है?
  4. चकवा और चकवी कब बेबस हो जाते हैं?
  5. कवि नागार्जुन ने हिमालय की झीलों में किसको तैरते देखा? (2012)

उत्तर:

  1. रीतिकाल
  2. शरद ऋतु,बसन्तु ऋतु तथा वर्षा ऋतु
  3. वर्षा ऋतु
  4. रात्रि में
  5. हंसों को।

ऋतु वर्णन पाठ सारांश

ऋतु वर्णन में पद्माकर कवि ने वसन्त ऋतु की महिमा का गुणगान किया है। यमुना के तट पर,गोपियों की रासलीला का सुन्दर वर्णन किया है। वसन्त ऋतु में कोयल की कूक का मधुर स्वर गूंजता सुनायी पड़ता है। विभिन्न प्रकार के पुष्प खिले रहते हैं तथा उन पुष्पों की सुगन्ध दूर-दूर तक फैली रहती है। बागों में पुष्पों की सुगन्ध से आकर्षित होकर भौरे गुंजार करते हैं।

आम के वृक्ष मंजरियों से भर गये हैं। प्रकृति के हरा-भरा होने से पक्षी भी मस्त होकर कलरव कर रहे हैं। कवि ने शरद ऋतु की अपूर्व शोभा का सुन्दर,वर्णन किया है। शरद ऋतु की चाँदनी चारों ओर व्याप्त है। लताओं पर तथा तमाल के वृक्षों पर चारों ओर शरद ऋतु का सौन्दर्य छाया है। शरद ऋतु में चाँदनी दिग्दिगन्त को अपनी आभा से मंडित कर रही है।

ऋतु वर्णन संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) कुलन में केलि में कछारन में कंजन में,
क्यारिन में कलित कलीन किलकत है।
कहैं पद्माकर परागन में पौन में,
पातन में पिक में पलासन पतंग है।
द्वार में दिसान में दुनी में देस देसन में,
देखौ दीप दीपन में दीपत दिगंत है।
बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलनि में,
बनन में बागन में बगर्यो बसंत है।

शब्दार्थ :
कूलन = नदी के किनारों में। कलित = सुन्दर। केलि क्रीड़ा में। कलीन-कलियों में। किलकंत=किलकारी मारता है। पौन = पवन, हवा। पातन = पत्तों। पिक = कोयल। दुनी = दुनिया। दीप = द्वीप। दीपत = दीप्त। दिगंत = दिशाओं में। बीथिन = गलियों में। नवेलिन = नवयुवतियों में। बगर्यो = फैला हुआ है।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द ‘प्रकृति चित्रण’ के अन्तर्गत ‘ऋतु-वर्णन’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता श्री पद्माकर हैं।

प्रसंग:
इस छन्द में कवि ने बसन्त की चारों ओर फैली हुई मादकता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर पद्माकर कहते हैं कि नदी के कूलों में क्रीड़ा स्थलों में, कछारों में, कुंजों में, क्यारियों में, सुन्दर कलियों में बसन्त किलकारी मार रहा है। पुष्पों के पराग में, पवन में, पत्तों में, कोयल में और पलाशों में बसन्त पगा हुआ है। घर के द्वारों में दिशाओं में, दुनिया में, देशों में, द्वीपों में और दिशाओं में बसन्त दीप्तमान हो रहा है। गलियों में, ब्रजमण्डल में, नवयुवतियों में बेलों में, वनों में, बागों में चारों ओर बसन्त की बहार छाई हुई है।

विशेष:

  1. कवि ने बसन्त की मादक छटा का सम्पूर्ण संसार में प्रसार दिखाया है।
  2. अनुप्रास अलंकार की सुन्दर छटा।
  3. भाषा-ब्रज।

MP Board Solutions

(2) और भाँति कुंजन में गुजरत भीरे भौंर,
और डौर झौरन पैं बोरन के वै गए।
कहै पद्माकर सु और भाँति गलियान,
छलिया छबीले छैल औरे छ्वै छ्वै गए।
औरे भाँति बिहग समाज में अवाज होति,
ऐसे रितुराज के न आज दिन द्वै गए।
और रस औरे रीति और राग औरे रंग,
औरे तन और मन और बन है गए॥

शब्दार्थ :
भीरे = भीड़। बौरन = आम के बौर में। छैल = छवि। छ्दै छ्वै = छा-छा गए। विहग = पक्षी।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर पद्माकर कहते हैं कि बसन्त ऋतु में कुंजों में और ही प्रकार की सुन्दरता छा गई है तथा भरों की भीड़ में अनौखी गुंजार सुनाई दे रही है। डालियों, झुण्डों तथा आम के बौरों में नयी आभा आ गई है। गलियों में और ही भाँति की शोभा छा गयी है पक्षियों के समाज में भी और ही प्रकार की बोलियाँ सुनाई दे रही हैं। ऐसे श्रेष्ठ ऋतुराज बसन्त के अभी दो दिन भी नहीं चुके हैं फिर भी सर्वत्र और ही प्रकार का रस, और ही प्रकार की रीति, और ही प्रकार के राग तथा और ही प्रकार के रंग सर्वत्र छाये हुए हैं। इस ऋतु में मनुष्यों के शरीर और ही प्रकार के हो गए हैं, और ही प्रकार के मन तथा और ही प्रकार के वन और बाग हो गए हैं।

विशेष :

  1. बसन्त ऋतु को इन्हीं सब विशेषताओं के कारण ऋतुराज की पदवी दी गयी है।
  2. बसन्त में प्रकृति तथा पुरुष सभी में एक विचित्र प्रकार की नवीनता आ जाती है।
  3. अनुप्रास की छटा।

(3) चंचला चलाकै चहूँ ओरन तें चाह भरी,
चरजि गई तो फेरि चरजन लागी री।
कहै पद्माकर लवंगन की लोनी लता,
लरजि गई तो फेरि लरजन लागी री।
कैसे धरौं धीर वीर त्रिविधि समीरै तन,
तरजि गई तो फेरि तरजन लागी री।
घुमड़ि-घुमड़ि घटा घन की घनैरों अबै,
गरजिं गई तो फेरि गरजन लागी री॥

शब्दार्थ :
चंचला = बिजली। चलाकै = चमककर। त्रिविध समीरें = शीतल, मन्द, सुगन्ध वाली हवा। घनेरी = घनी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि ने पावस ऋतु का सुन्दर एवं मनोहारी वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर पद्माकर कहते हैं कि पावस ऋतु में बिजली चारों ओर बड़ी चाहना से चमक रही है। एक बार वह बिजली आकाश में छा गयी तो सभी को आश्चर्यजनक लगने लगी। कवि पद्माकर कहते हैं कि लौंग (लवंग) की सुन्दर लता इस ऋतु को बहुत ही अच्छी लग रही है। एक बार यदि वह लवंग लता झुक गई तो फिर वह निरन्तर झुकती ही जाती है। वे वीर! तू ही बता ऐसे सुहावने समय में जबकि शीतल, मन्द और सुगन्धित वायु बह रही हो, तो मैं तेरे बिना कैसे धैर्य धारण करूँ। यह सुगन्धित वायु एक बार यदि तन को सुवासित करने लगी, तो फिर वह निरन्तर ही सुवासित करती रहेगी। इस ऋतु। में बादलों की घनी घटाएँ घुमड़-घुमड़ कर बार-बार आ रही हैं। यदि वे घटाएँ एक बार गर्जन करने लगी, तो फिर वे निरन्तर गर्जन करने लगेंगी।

विशेष :

  1. वर्षा ऋतु का बड़ा ही मनमोहक वर्णन हुआ
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग।

(4) तालने पै ताल पै तमालन पै मालन पै,
वृन्दावन बीथिन बहार बंसीवट पै। 
कहै पद्माकर अखंड रासमंडल पै, 
मण्डित उमंड महा कालिन्दी के तट पै। 
छिति पर छान पर छाजत छतान पर, 
ललित लतान पर लाड़िली की लट पै। 
छाई भली छाई यह सदर जुन्हाई जिहि, 
पाई छबि आजु ही कन्हाई के मुकुट पै।

शब्दार्थ :
तमालन = तमाल वृक्ष पर। बंसीवट = वह वट वृक्ष जहाँ श्रीकृष्ण बंसी बजाते थे। कालिन्दी = यमुना। छिति = पृथ्वी। छान = छाजन। छतान = छतों पर। लाड़िली = राधा जी। जुन्हाई = चाँदनी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि ने शरद ऋतु की सुन्दर शोभा का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कवि पद्माकर कहते हैं कि तालाबों पर, ताड़ पर, तमाल वृक्षों पर और मालाओं पर, वृन्दावन की गलियों एवं बंसीवट पर, सभी ओर शरद ऋतु की बहार छाई हुई है। कविवर पद्माकर कहते हैं कि सम्पूर्ण रासमण्डली पर तथा कालिन्दी के तट पर शरद ऋतु की महान् छटाएँ उमड़ रही हैं। पृथ्वी पर, छप्परों पर और छतों पर शरद ऋतु छाई हुई है। सुन्दर लताओं पर, लाड़िली अर्थात् राधाजी की लटों पर शरद ऋतु की यह चाँदनी भली-भाँति छाई हुई है और यही शोभा आज श्रीकृष्ण के मुकुट पर भी छाई हुई है।

विशेष :

  1. शरद ऋतु की सुन्दरता का वर्णन।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग।

बादल को घिरते देखा है भाव सारांश

प्रस्तुत कविता में कवि ने हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों का तथा उमड़ने-घुमड़ने वाली घटाओं का चित्ताकर्षक वर्णन किया है। हिमालय की चोटियों के नीचे अनेक प्रकार की झीलें बहती रहती हैं। उन झीलों के समीप बरसात की उमस से व्याकुल होकर हंस कमलदण्डों को खोजते हुए इधर-उधर घूम रहे हैं।

उन जल-क्रीड़ा करते हुए हंसों को देखकर मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है। कवि कहता है कि हिमालय पर्वत की बर्फ से ढकी अगम्य घाटियों में कस्तूरी मृग विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं। उन मृगों की नाभि से निकलने वाली कस्तूरी की सुगन्ध को खोजते हुए वे अज्ञानतावश इधर-उधर भटक रहे हैं। मृग कस्तूरी न मिलने के कारण स्वयं से दुखी प्रतीत होते हैं।

कवि बादलों का वर्णन करते हुए कहता है कि प्राचीनकाल में कुबेर के शाप से अलकापुरी से निष्कासित यक्ष ने बादलों को दूत बनाकर अपनी प्रेमिका के समीप भेजा था। इसमें कितनी सत्यता है कौन जानता है? मैंने शीत के दिनों में बर्फ से ढकी कैलाश पर्वत की ऊँची-ऊँची चोटियों पर काले-काले बादलों को घिरते देखा है।

MP Board Solutions

बादल को घिरते देखा है संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

शब्दार्थ :
अमल = निर्मल। धवल = सफेद। गिरि = पर्वत। तुहिन = ओस।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द ‘बादल को घिरते देखा है’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके कवि ‘नागार्जुन’ हैं।

प्रसंग :
घिरते हुए बादलों को देखकर कवि की कल्पना स्फुटित हुई है, उसी का यहाँ वर्णन है।

व्याख्या :
कविवर नागार्जुन कहते हैं कि निर्मल तथा श्वेत पर्वत के शिखरों पर मैंने बादल को घिरते हुए देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके ठण्डे बर्फ के कणों को मानसरोवर के उन सुनहरे कमलों पर गिरते देखा है। बादल को घिरते देखा है।

विशेष :

  1. कवि का प्रकृति चित्रण बड़ा ही मोहक है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा-खड़ी बोली।

(2) तुंग हिमालय के कन्धों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर विसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

शब्दार्थ :
तुंग = ऊँचे। नील सलिल में = नीले जल में। समतल = मैदानी भागों से। पावस= वर्षा। आकुल= व्याकुल। तिक्त = तीखे। मधुर =मीठे। विसतंतु = कमल नाल।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि ने मानसरोवर झील में तैरने वाले हंसों का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर नागार्जुन कहते हैं कि ऊँचे हिमालय पर्वत की तलहटी में छोटी और बड़ी कई झीलें हैं। उनके साँवले और नीले जल में मैदानी भागों से उड़-उड़कर आने वाले तथा
वर्षा की उमस से व्याकुल हुए एवं तीखे तथा मीठे कमल नाल को खोजते-फिरते हंसों को मैंने तैरते देखा है। बादल को घिरते देखा है।

विशेष :

  1. मानसरोवर की प्राकृतिक सुषमा तथा उसमें तैरने वाले सुन्दर हंसों का मनमोहक वर्णन है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा-खड़ी बोली।

MP Board Solutions

(3) ऋतु बसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा काल से चिर-अभिशापित
बेबस उन चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रन्दन फिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

शब्दार्थ :
अनिल = वायु। बालारुण = प्रात:कालीन सूर्य। मृदु = कोमल। स्वर्णिम = सुनहरे। विरहति = अलग। होकर, वियोग की दशा में। निशाकाल = रात के समय। चिर = दीर्घ काल से। अभिशापित = अभिशाप पाये हुए। सरवर = तालाब। तीरे = किनारे। शैवालों = काई। प्रणय-कलय = प्रेम का झगड़ा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत छन्द में कवि ने बसन्त ऋतु के सुप्रभात की मनोहर झाँकी का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर नागार्जुन कहते हैं कि बसन्त ऋतु का सुप्रभात था। उस समय वायु मंद-मंद गति से बह रही थी तथा प्रात:कालीन सूर्य की कोमल किरणे अगल-बगल के सुनहरे शिखरों पर बिखर रही थीं। उस समय एक-दूसरे से अलग होकर! सारी रात वियोग में बिता देने वाले, अनन्त काल से अलग रहने का अभिशाप पाये हुए, उन बेवस चकवा-चकवी का वियोग। दुःख से उत्पन्न क्रन्दन यकायक बन्द हो गया। प्रात:काल होने पर उस महान सरोवर के किनारे काई की हरी पट्टी पर उन चकवा-चकवी को परस्पर प्रेमालाप में झगड़ते हुए मैंने देखा है। बादल को घिरते देखा है।

विशेष :

  1. चकवा-चकवी रात में एक-दूसरे से अलग होकर विरह जन्य क्रन्दन करते रहते हैं। प्रात:काल दोनों का संयोग होने पर प्रणय क्रीड़ाएँ करने लगते हैं।
  2. बसन्त ऋतु की मादकता का वर्णन है।
  3. भाषा-खड़ी बोली।

(4) दुर्गम बर्फानी घाटी में
शत-सहस्त्र फुट ऊँचाई पर
अलख-नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल
के पीछे धावित हो होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

शब्दार्थ :
दुर्गम = जहाँ जाना सरल न हो। बर्फानी = बर्फ से ढकी हुई। शत-सहस्र = सैकड़ों-हजारों। अलख नाभि = अदृश्य नाभि। उन्मादकं = नशीले। परिमल = पराग, सुगन्ध। धावित = दौड़कर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि ने दुर्गम बर्फीली घाटियों में दौड़ते हुए कस्तूरी मृगों की चेष्टाओं का सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर नागार्जुन कहते हैं कि दुर्गम बर्फ से ढकी हुई चोटियों में सैकड़ों-हजारों फुट की ऊँचाई पर, नाभि से उठने वाली स्वयं की ही अदृश्य उन्मादक गन्ध को ढूँढ़ते हुए तथा उसकी खोज में भटकते हुए चंचल एवं तरुण कस्तूरी मृगों को स्वयं अपने ऊपर चिढ़ते हुए मैंने देखा है, बादल को घिरते देखा है।

विशेष :

  1. कस्तूरी मृग की नाभि में अदृश्य रूप से छिपी रहती है, पर कस्तूरी मृग अपने अन्दर छिपी हुई कस्तूरी को न जानकर उसकी खोज में इधर-उधर भटकता फिरता है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा-खड़ी बोली।

MP Board Solutions

(5) कहाँ गया धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढा बहुत परन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो, वह कवि कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चंबी कैलाश शीर्ष पर
महादेव को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

शब्दार्थ :
अलका = कुबेर की राजधानी। व्योम-प्रवाही। = आकाश में बहने वाली। नभ-चुंबी = आकाश को चूमने वाले। झंझानिल = झंझावात।।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि ने कैलाश पर्वत की सुन्दरता का वर्णन करते हुए पौराणिक आख्यानों की चर्चा की है।

व्याख्या :
कविवर नागार्जुन कहते हैं कि इस कैलाश शिखर पर धनपति कुबेर की अलका नगरी का पुराणों में उल्लेख मिलता है लेकिन आज तो इसका यहाँ कोई नामोनिशान भी नहीं है, न ही हमें कालिदास के आकाश में विचरण करने वाले उस मेघदूत का कहीं पता मिलता है। हमने बहुत प्रयत्न कर लिए पर वह ढूँढने से भी नहीं मिला। ऐसा हो सकता है कि वह छायामय मेघदूत यहीं कहीं जाकर बरस गया होगा। फिर कवि कहता है कि इन बातों को छोड़ो, मेघदूत तो कवि कालिदास की कल्पना थी।

मैंने तो भयंकर कड़कड़ाते जाड़ों में आकाश को चूमने वाले कैलाश के शिखर पर घनघोर झंझावातों में महादेव जी को उनसे गरज-गरज कर युद्ध करते देखा है। बादल को घिरते देखा है।

विशेष :

  1. इस छन्द में कवि ने गगनचुम्बी कैलाश शिखर की प्राकृतिक छटा का सुन्दर वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा-खड़ी बोली।

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन

In this article, we will share MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन NCERT प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्तनधारियों की कोशिकाओं की औसत कोशिका-चक्र अवधि कितनी होती है ?
उत्तर:
स्तनधारियों की कोशिकाओं की औसत कोशिका-चक्र की अवधि 24-25 घण्टे होती है।

प्रश्न 2.
जीवद्रव्य विभाजन व केन्द्रक विभाजन में क्या अंतर है ?
उत्तर:
जीवद्रव्य विभाजन (Cytokinesis) में कोशिका-द्रव्य का विभाजन होता है जबकि केन्द्रक विभाजन (Karyokinesis) में कोशिका के केन्द्रक का विभाजन होता है।

प्रश्न 3.
अंतरावस्था में होने वाली घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अंतरावस्था(इण्टरफेज) दो विभाजनों के बीच की अवस्था है, जिसमें निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ पायी जाती हैं –
(i)G1फेज-इस अवस्था में प्रोटीन एवं RNA का संश्लेषण किया जाता है।
(ii) S फेज-इस अवस्था में DNA एवं हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।
(ii) G2फेज-इस अवस्था में आवश्यक प्रोटीन तथा RNA का संश्लेषण किया जाता है तथा विभिन्न कोशिकांगों का निर्माण होता है।

प्रश्न 4.
कोशिका-चक्र की G0(प्रशांत अवस्था) क्या है ?
उत्तर:
वे कोशिकाएँ जो आगे विभाजित नहीं होती हैं तथा निष्क्रिय अवस्था में पहुँचती हैं, जिसे कोशिका, चक्र की प्रशांत अवस्था (G0) कहा जाता है। इस अवस्था की कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है, लेकिन विभाजित नहीं होती, इनमें विभाजन जीव की आवश्यकता के अनुसार होता है।

प्रश्न 5.
सूत्री विभाजन को सम-विभाजन क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
सूत्री विभाजन को सम-विभाजन कहा जाता है, क्योंकि विभाजन के अंत में दो ऐसी कोशिकाएँ बनती हैं जिसमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के बराबर होती है।
इस विभाजन में जनक कोशिका के आनुवंशिक गुण पुत्री कोशिका में पहुँचते हैं । अतः इस विभाजन से आनुवंशिक समानता बनी रहती है।

प्रश्न 6.
कोशिका-चक्र की उस अवस्था का नाम बताइए, जिसमें निम्न घटनाएँ सम्पन्न होती हैं –

  1. गुणसूत्र तर्कु मध्य रेखा की ओर गति करते हैं।
  2. गुणसूत्र बिंदु का टूटना व अर्द्धगुणसूत्र का पृथक् होना।
  3. समजात गुणसूत्रों का आपस में युग्मन होना।
  4. समजात गुणसूत्रों के बीच विनिमय का होना।

उत्तर:

  1. मध्यावस्था (Metaphase)
  2. पश्चावस्था (Anaphase)
  3. अर्धसूत्री विभाजन-I (Meiosis-I) की युग्मपट्ट (Zygotene) अवस्था
  4. पैकीटीन (Pachytene) अवस्था।

प्रश्न 7.
निम्न के बारे में वर्णन कीजिए –

  1. सूत्रयुग्मन
  2. युगली
  3. काएज्मेटा।

उत्तर:
1. सूत्रयुग्मन (Synapsis):
कोशिका विभाजन की जायगोटीन अवस्था में समजात गुणसूत्रों के जोड़ा बनाने की प्रक्रिया को सूत्रयुग्मन या अन्तर्ग्रथन या सिनैप्सिस कहते हैं। सिनैप्सिस बनाने वाले गुणसूत्र अलग – अलग जनकों के होते हैं।

2. युगली (Bivalent):
जाइगोटीन अवस्था में समजात गुणसूत्रों द्वारा युग्मन करके सिनैप्सिस का निर्माण करने वाले गुणसूत्रों को बाइवैलेण्ट या डायड कहते हैं, क्योंकि उस समय गुणसूत्र दो की संख्या में दिखाई देते हैं।

3. काएज्मेटा (Chaismata):
अर्द्धसूत्री विभाजन के प्रोफेज-I के पैकीटीन अवस्था में समजात गुणसूत्रों के युग्मन के समय अर्द्ध गुणसूत्र जिस स्थान पर एक-दूसरे को स्पर्श कर जीन विनिमय करते हैं, वह स्थान डिप्लोटीन अवस्था में गुणसूत्रों के विलगाव (Terminalization) के क्रम में ‘X’ आकृतिकी संरचनाओं के रूप में परिलक्षित होता है, जिसे किएज्मेटा (Chiasmata) कहते हैं।

प्रश्न 8.
पादप व प्राणी कोशिका के कोशिकाद्रव्य विभाजन में क्या अंतर है ?
उत्तर:
कोशिका द्रव्य विभाजन-कोशिका विभाजन के समय केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य विभाजन को साइटोकाइनेसिस या कोशिकाद्रव्य विभाजन कहते हैं, यह पादप एवं प्राणियों में दो अलग-अलग विधियों द्वारा होता है –

(a) कोशिका खाँच द्वारा इस कोशिकाद्रव्य विभाजन में कोशिका के मध्य में एक खाँच बनती है, जो बढ़कर कोशिका के कोशिकाद्रव्य को दो भागों में बाँट देती है। प्रत्येक भाग में एक केन्द्रक होता है, जन्तुओं में इसी प्रकार का विभाजन पाया जाता है।

(b) कोशिका प्लेट द्वारा इस कोशिकाद्रव्य विभाजन में कोशिका के मध्य गॉल्गीकाय तथा E.R. एकत्रित होकर एक पट बना देते हैं जो बाद में कोशिका भित्ति बन जाती है और कोशिका को दो भागों में बाँट देती हैं। प्रत्येक भाग में एक केन्द्रक होता है। यह विभाजन पादप कोशिकाओं में पाया जाता है।

प्रश्न 9.
अर्द्धसूत्री विभाजन के बाद बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ कहाँ आकार में समान व कहाँ भिन्न आकार की होती हैं ?
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) के बाद बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ (daughter cells) अर्द्धसूत्री विभाजन II (Meiosis-II) के अंत्यावस्था II (Telophase-II) के अंत में आकार में कहीं पर समान और कहीं पर असमान होती हैं।

प्रश्न 10.
सूत्री विभाजन की पश्चावस्था तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था-I में क्या अंतर है ?
उत्तर:
सूत्री विभाजन एवं अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था-I में अंतर –

1. सूत्री विभाजन (Mitosis division):
इसमें एक गुणसूत्र का एक अर्द्ध-गुणसूत्र। एक ध्रुव की ओर तथा दूसरा, दूसरे ध्रुव की ओर चला जाता है।

2. अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis division):
इसमें एनाफेज-I में पूरा गुणसूत्र ध्रुवों की ओर जाता है, जबकि ऐनाफेज-II में गति समसूत्री ऐनाफेज के समान होती हैं।

प्रश्न 11.
सूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में प्रमुख अंतरों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
दोनों ही कोशिका विभाजनों में कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है तथा दोनों में गुणसूत्रों का विभाजन होता है। इन समानताओं के बावजूद दोनों विभाजनों में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन - 2

प्रश्न 12.
अर्द्धसूत्री विभाजन का क्या महत्व है?
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्व –

  1. इसके कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या एक समान बनी रहती है।
  2. इस विभाजन के कारण जनक के समान ही कोशिकाएँ पैदा होती हैं।
  3. इस विभाजन में जीन विनिमय होने के कारण यह नये गुणों के बनने में सहायता करता है।
  4. इसके कारण विभिन्नता पैदा होती है, जो जैव विकास के लिए आवश्यक है।
  5. इसके कारण एक द्विगुणित कोशिका से चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं।

प्रश्न 13.
अपने शिक्षक के साथ निम्न के बारे में चर्चा कीजिए –

  1. अगुणित कीटों व निम्न श्रेणी के पादपों में कोशिका विभाजन कहाँ संपन्न होती है ?
  2. उच्च श्रेणी के पादपों की कुछ अगुणित कोशिकाओं में कोशिका विभाजन कहाँ नहीं होता है?

उत्तर:

1. निम्न श्रेणी के पादपों (क्लैमाइडोमोनास, स्पाइरोगायरा) में अगुणित बीज (Spores) युग्मकोद्भिद (Gametophyte) के निर्माण की प्रक्रिया में समसूत्री (Mitotic) कोशिका विभाजन पाया जाता है। जबकि अर्द्धसूत्री (Meiotic) विभाजन, इनके युग्मनज (Zygote) में अगुणित बीजाणु (Spores) के निर्माण के समय होता है।

2. उच्च श्रेणी के पादपों (Angiospores) में बीजाण्ड (Ovule) के भ्रूणपोष (Embryo sac) में पाये जाने वाले सखि (Synergids) एवं प्रतिध्रुवीय कोशिकाओं (Antipodal cell) में कोई भी कोशिका विभाजन नहीं पाया जाता है। अंत में ये कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं।

प्रश्न 14.
क्या S – अवस्था में बिना डी. एन. ए. प्रतिकृति के सूत्री विभाजन हो सकता है ?
उत्तर:
नहीं, S प्रावस्था में बिना डी. एन. ए. प्रतिकृति (DNA replication) के सूत्री विभाजन संभव नहीं है। सूत्री विभाजन के लिए डी. एन. ए. की मात्रा का दुगुना होना आवश्यक है।

प्रश्न 15.
क्या बिना कोशिका विभाजन के डी. एन. ए. प्रतिकृति हो सकती है?
उत्तर:
नहीं, क्योंकि कोशिका विभाजन के दौरान ही डी. एन. ए. प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है।

प्रश्न 16.
कोशिका विभाजन की प्रत्येक अवस्थाओं के दौरान होने वाली घटनाओं का विश्लेषण कीजिए और ध्यान दीजिए कि निम्नलिखित दो प्राचलों में कैसे परिवर्तन होता है –

  1. प्रत्येक कोशिका की गुणसूत्र संख्या (N)
  2. प्रत्येक कोशिका में DNA की मात्रा (C)।

उत्तर:

1. किसी भी जीव में कोशिका विभाजन की पूर्वावस्था (Prophase), मध्यावस्था (Metaphase) एवं पश्चावस्था (Anaphase) में गुणसूत्र की संख्या (N) दुगुनी हो जाती है। अंत्यावस्था (Telophase) में पुत्री कोशिकाओं (Daughter cell) के निर्माण के समय गुणसूत्रों की संख्या (N) आधी हो जाती है।

2. कोशिका विभाजन के दौरान विभिन्न अवस्थाओं में प्रत्येक कोशिका में DNA की मात्रा (C) में परिवर्तन होता है। कोशिका की पूर्वावस्था, मध्यावस्था एवं पश्चावस्था में DNA की मात्रा (C) दुगुनी होती है, लेकिन अंत्यावस्था में पुत्री कोशिका के निर्माण के समय इनकी मात्रा आधी हो जाती है।

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. किएज्मेटा निर्मित होते हैं –
(a) डिप्लोटीन अवस्था में
(b) लेप्टोटीन अवस्था में
(c) पैकीटीन अवस्था में
(d) डाइकाइनेसिस अवस्था में।
उत्तर:
(c) पैकीटीन अवस्था में

2. सूत्री विभाजन में गुणसूत्रों का द्विगुणन होता है –
(a) प्रारम्भिक पूर्वावस्था में
(b) पश्च पूर्वावस्था में
(c) विभाजनान्तराल अवस्था में
(d) पश्च अन्त्यावस्था में।
उत्तर:
(b) पश्च पूर्वावस्था में

3. अर्द्धसूत्री विभाजन की प्रथम मध्यावस्था में सेण्ट्रोमियर –
(a) विभाजित होते हैं
(b) विभाजित नहीं होते
(c) विभाजित होकर पृथक् नहीं होते
(d) समान नहीं होते।
उत्तर:
(c) विभाजित होकर पृथक् नहीं होते

4. गुणसूत्र का वह भाग जहाँ पर गुणसूत्र विनिमय होता है उसे कहते हैं –
(a) क्रोमोमियर्स
(b) बाइवैलेन्ट
(c) किएज्मेटा
(d) सेण्ट्रोमियर।
उत्तर:
(c) किएज्मेटा

5. गुणसूत्रों की संख्या कब आधी हो जाती है –
(a) प्रोफेज-I
(b) ऐनाफेज-I
(c) मेटाफेज-I
(d) मेटाफेज-II.
उत्तर:
(b) ऐनाफेज-I

6. अर्द्धसूत्री विभाजन किसमें होता है –
(a) परागकण
(b) परागनलिका
(c) पराग मातृ कोशिका
(d) जनन कोशिका।
उत्तर:
(c) पराग मातृ कोशिका

7. तर्क तन्तु किसके बने होते हैं –
(a) प्रोटीन
(b) लिपिड
(c) सेल्यूलोज
(d) पेक्टिन।
उत्तर:
(a) प्रोटीन

8. युग्मन के समय गुणसूत्रों के मध्य युग्मन होता है –
(a) समान गुणसूत्रों के मध्य
(b) समजात गुणसूत्रों के मध्य
(c) विषमजात गुणसूत्रों में
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(b) समजात गुणसूत्रों के मध्य

9. क्रोमोसोम्स का द्विगुणन किस अवस्था में होता है –
(a) S अवस्था
(b) G अवस्था
(c) G2अवस्था
(d) M अवस्था।
उत्तर:
(a) S अवस्था

10. किस प्रकार के कोशिका विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या में कमी होती है –
(a) मियोसिस
(b) माइटोसिस
(c) द्विविभाजन
(d) विदलन।
उत्तर:
(a) मियोसिस

11. माइटोसिस के समय कोशिका का कौन-सा अंगक लुप्त हो जाता है –
(a) प्लास्टिड
(b) प्लाज्मा झिल्ली
(c) केन्द्रिका
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) केन्द्रिका

12. समजात गुणसूत्रों की एक जोड़ी में चार क्रोमैटिड किस अवस्था में पाई जाती है –
(a) डिप्लोटिन
(b) पैकीटिन
(c) जाइगोटीन
(d) डायकाइनेसिस।
उत्तर:
(b) पैकीटिन

13. किएज्मेटा किसके स्थान को दर्शाते हैं –
(a) सिनैप्सिस
(b) डिस्जंक्शन
(c) क्रॉसिंग ओवर
(d) टर्मिनेलाइजेशन।
उत्तर:
(c) क्रॉसिंग ओवर

14. लैंगिक जनन में कोशिका विभाजन किस प्रकार का होता है –
(a) एमाइटोटिक
(b) माइटोटिक
(c) मियोटिक
(d) मियोटिक एवं माइटोटिक।
उत्तर:
(c) मियोटिक

15. कोशिका विभाजन को रोकने वाला रसायन किस पौधे से प्राप्त किया जाता है –
(a) क्राइसेन्थेमम
(b) कॉल्चिकम
(c) डल्बर्जिया
(d) क्रोकस।
उत्तर:
(b) कॉल्चिकम

16. स्पिण्डल तंतुओं का निर्माण किससे होता है –
(a) सेन्ट्रीओल
(b) केन्द्रक
(c) माइटोकॉन्ड्रिया
(d) सेन्ट्रोमियर।
उत्तर:
(d) सेन्ट्रोमियर।

17. कोशिका विभेदन होने तक कोशिका चक्र की कौन-सी अवस्था आ चुकी होती है –
(a)G0प्रावस्था
(b)G1 प्रावस्था
(c)G2प्रावस्था
(d) S-प्रावस्था।
उत्तर:
(a)G0प्रावस्था

18. कोशिका विभाजन का प्रेरण किसके द्वारा होता है –
(a) साइटोकाइनिन
(b) ऑक्सिन
(c) जिबरेलिन
(d) ए.बी.ए.।
उत्तर:
(a) साइटोकाइनिन

19. कोशिका विभाजन में कोशिका पट्टिका का निर्माण किस अवस्था में होता है –
(a) ऐनाफेज
(b) मेटाफेज
(c) टीलोफेज
(d) साइटोकाइनेसिस।
उत्तर:
(c) टीलोफेज

20. माइटोसिस में सेन्ट्रोमियर का विभाजन किस अवस्था में होता है –
(a) प्रोफेज
(b) मेटाफेज
(c) ऐनाफेज
(d) टीलोफेज।
उत्तर:
(c) ऐनाफेज

21. गुणसूत्रों के किस भाग से तर्कु तन्तु जुड़े रहते हैं –
(a) सेन्ट्रोमियर
(b) क्रोमोमियर
(c) क्रोमानिमा
(d) काइनेटोफोर।
उत्तर:
(d) काइनेटोफोर।

22. वह अवस्था जिसमें किएज्मेटा को देखा जा सकता है –
(a) लेप्टोटीन
(b) जाइगोटीन
(c) पैकीटीन
(d) डाइकाइनेसिस।
उत्तर:
(c) पैकीटीन

23. मियोसिस में किन कारणों से विभिन्नता उत्पन्न होती है –
(a) स्वतंत्र अपव्यूहन
(b) क्रॉसिंग ओवर
(c) (a) एवं (b) दोनों
(d) सहलग्नता।
उत्तर:
(c) (a) एवं (b) दोनों

24. गुणसूत्रों पर पाये जाने वाले क्रोमोमियर्स की संख्या होती है –
(a)250
(b)300
(c) 150
(d) 300 से अधिक।
उत्तर:
(a)250

25. टेरिडोफाइटा में रिडक्शन विभाजन होता है –
(a) गैमीट बनने के समय
(b) स्पोर बनने के बाद
(c) स्पोर बनने के समय
(d) गैमीट बनने के बाद।
उत्तर:
(c) स्पोर बनने के समय

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. अर्द्धसूत्री विभाजन …………….. में होता है।
  2. सिनैप्टिकल जटिल का निर्माण ……………. अवस्था में होता है।
  3. अर्धसूत्री विभाजन के गुणसूत्र …………….. अवस्था में विभाजित होते हैं।
  4. डिप्लोटीन अवस्था में …………….. होता है।
  5. कैरियोकाइनेसिस में …………… का विभाजन होता है।
  6. जनक एवं संतति कोशिका में गुणसूत्रों की संख्या बराबर होती है इसलिए इसे …………….. कहते हैं।
  7. मध्यावस्था में जिस तल पर गुणसूत्र पंक्तिबद्ध हो जाते हैं उसे …………………. कहते हैं।

उत्तर:

  1. जनन कोशिकाओं
  2. जाइगोटीन
  3. द्वितीय पश्चावस्था
  4. जीन विनिमय
  5. केन्द्रक
  6. समसूत्री विभाजन
  7. मध्यावस्था पट्टिका।

प्रश्न 3.
एक शब्द में उत्तर दीजिए –

  1. अर्द्धसूत्री विभाजन में दो गुणसूत्र के बीच बनने वाली रचना का नाम लिखिए।
  2. कोशिका झिल्ली में गर्त बनने से किस कोशिका में कोशिकाद्रव्य विभाजन होता है ?
  3. कोशिका में जीन्स की स्थिति कहाँ होती है ?
  4. किस कोशिका विभाजन द्वारा पौधों में युग्मक निर्माण होता है ?
  5. कोशिका विभाजन की किस अवस्था में गुणसूत्र मध्य रेखा पर स्थित हो जाते हैं ?

उत्तर:

  1. किएज्मा (किएज्मेटा)
  2. जन्तु कोशिका
  3. केन्द्रक के गुणसूत्र में
  4. अर्द्धसूत्री
  5. मेटाफेज।

प्रश्न 4.
उचित संबंध जोडिए –
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन - 1
उत्तर:

  1. (d) G2 उपावस्था
  2. (a) पूर्वावस्था
  3. (e) समसूत्री विभाजन
  4. (c) दो कोशिकाएँ
  5. (b) अगुणित संतति कोशिका

प्रश्न 5.
सत्य / असत्य बताइए –

  1. कोशिकीय विभाजन ही जीवन की सत्यता का आधार है।
  2. तंत्रिका कोशिका विभाजित होती है।
  3. कोशिकीय चक्र के M – चरण में वास्तविक केंद्रकीय विभाजन होता है।
  4. जीवाणु कोशिका का कोशिका चक्र 20 घंटे में पूरा होता है।
  5. तर्कुतन्तु गुणसूत्रों की गति को अनियंत्रित करते हैं।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य।

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कोशिका विभाजन की किस अवस्था में क्रॉसिंग ओवर होती है ?
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन के प्रोफेज की पैकीटीन अवस्था में क्रॉसिंग ओवर होती है।

प्रश्न 2.
ऐसे रसायन का नाम बताइए जो कोशिका विभाजन के अध्ययन हेतु गुणसूत्रों के अभिरंजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
उत्तर:
ऐसीटोकार्मिन (Acetocarmine) या ऐसीटोऑर्सिन नामक अभिरंजन का उपयोग कोशिका विभाजन · में गुणसूत्रों के अभिरंजन हेतु किया जाता है। .

प्रश्न 3.
समसूत्री विभाजन किन कोशिकाओं का लक्षण है ? उत्तर-समसूत्री विभाजन कायिक कोशिकाओं का लक्षण है। प्रश्न 4. अर्द्धसूत्री विभाजन किन कोशिकाओं में होता है ?
उत्तर:
यह विभाजन जनन कोशिकाओं में होता है, जिसके फलस्वरूप युग्मकों का निर्माण होता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या समान बनी रहती है।

प्रश्न 5.
प्रथम अर्द्धसूत्री विभाजन में पायी जाने वाली अवस्थाओं का नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रथम अर्द्धसूत्री विभाजन में निम्नलिखित अवस्थाएँ पायी जाती हैं –
(A) प्रोफेज प्रथम-इसमें पाँच उप-अवस्थाएँ होती हैं –

  1. लेप्टोटीन
  2. जाइगोटीन
  3. पैकीटीन
  4. डिप्लोटीन
  5. डायकाइनेसिस।

(B) मेटाफेज प्रथम
(C) ऐनाफेज प्रथम
(D) टिलोफेज प्रथम।

प्रश्न 6.
उस विधि का नाम बताइए, जिसके कारण आनुवंशिक स्थिरता, वृद्धि, अलैंगिक प्रजनन, पुनरावृत्ति तथा कोशिकाओं का प्रतिस्थापन होता है।
उत्तर:
समसूत्री विभाजन (Mitotic division)

प्रश्न 7. समसूत्री विष किसे कहते हैं ?
उत्तर:
कुछ रसायन ऐसे होते हैं, जो समसूत्री विभाजन को रोक देते हैं, इन्हें समसूत्री विष कहते हैं। कुछ प्रमुख समसूत्री विष निम्नलिखित हैं –

  • कोल्चिसीन-यह विभाजन के समय त’ बनने की क्रिया को रोककर मध्यावस्था को स्थिर कर देता है।
  • राइबोन्यूक्लिएज-यह प्रोफेज अवस्था को रोक देता है।
  •  मस्टर्ड गैस-गुणसूत्रों को खण्डित कर देता है।

प्रश्न 8.
एक पुष्पीय पादप के उन अंगों के नाम बताइए जहाँ अर्द्धसूत्री विभाजन सम्भव है।
उत्तर:
पुष्पीय पादप के पुंकेसर के परागकोष तथा स्त्रीकेसर के अण्डाशय में अर्द्धसूत्री विभाजन होता है।

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीन विनिमय क्या है ? इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन की डिप्लोटीन अवस्था में होने वाली समजात गुणसूत्र खण्डों की अदलाबदली को जीन विनिमय या क्रॉसिंग ओवर कहते हैं। जब डिप्लोटीन अवस्था में विकर्षण के पैदा होने के कारण समजात गुणसूत्र अलग-अलग होना प्रारम्भ करते हैं तब ये आपस में कुछ स्थानों पर संलग्न रह जाते हैं इन स्थानों को किएज्मा कहते हैं।

इन स्थानों पर सिस्टर क्रोमैटिड टूटकर फिर से क्रॉस के रूप में जुड़ जाते हैं, लेकिन गुणसूत्रों के फिर से जुड़ने की इस क्रिया में क्रोमोनिमा की अदला-बदली (पुनर्योजन) हो जाती है। गुणसूत्रों के क्रोमोनिमा की इसी अदला-बदली को परस्पर जीन विनिमय (Crossing over) कहते हैं। अतः इस प्रक्रिया के कारण समजात गुणसूत्रों के बीच जीन विनिमय होता है।

महत्व:

  1. इसके कारण जीवों में विभिन्नता पैदा होती है।
  2. इसके कारण जीवों में अनुकूलन पैदा होता है।
  3. इसके कारण जीवों में विकासात्मक लक्षण बनते हैं।
  4. इसकी सहायता से गुणसूत्रों के आनुवंशिक मानचित्र बनाये जाते हैं।
  5. इसके कारण जीवों में नये लक्षण बनते हैं।

प्रश्न 2.
समसूत्री विभाजन के महत्व को लिखिए।
उत्तर:
समसूत्री विभाजन का महत्व –

  1. इस विभाजन के कारण जीवों में वृद्धि तथा विकास होता है।
  2. इस विभाजन के कारण जनक कोशिकाओं के समान ही सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं।
  3. इस विभाजन के द्वारा घाव भरते हैं तथा मृत कोशिकाओं का प्रतिस्थापन भी इसी विभाजन के द्वारा होता है।
  4. इस विभाजन के द्वारा सूचनाओं का मातृ कोशिका से सन्तति कोशिका में प्रवाह होता है।

प्रश्न 3.
मियोसिस की ऐनाफेज प्रथम, माइटोटिक ऐनाफेज से किस बात में भिन्न है ? इसका पूरी प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
मियोसिस के ऐनाफेज – I में कोशिका के गुणसूत्रों की द्विगुणित संख्या में से आधे गुणसूत्र एक ध्रुव पर तथा आधे गुणसूत्र दूसरे ध्रुव पर जाते हैं, जबकि माइटोसिस में एक ही गुणसूत्र के अर्द्ध-गुणसूत्र सेण्ट्रोमियर से अलग होकर एक अर्द्ध-गुणसूत्र एक ध्रुव पर तथा दूसरा दूसरे ध्रुव पर जाता है। पूरी प्रक्रिया पर पड़ने वाला प्रभाव-मियोसिस के ऐनाफेज में आधे-आधे गुणसूत्र ध्रुवों पर जाने के कारण विभाजन पूर्ण होने पर दो ऐसी सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या मूल संख्या की आधी हो जाती है, फलत: पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या एक समान बनी रहती है।

प्रश्न 4.
किसी भी बहुकोशिकीय जीवधारी में दो प्रकार के कोशिका विभाजनों की आवश्यकता एवं महत्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
दो कोशिकीय विभाजनों की आवश्यकता-बहुकोशिकीय जीवों की संरचना तथा जैविक क्रिया जटिलता का. प्रदर्शन करती हैं। इस कारण इनमें दो प्रकार के विभाजनों की आवश्यकता पड़ती है, जिससे एक विभाजन (अर्द्धसूत्री) जनन कोशिकाओं में प्रजनन के समय हो जिससे गुणसूत्रों की संख्या में स्थिरता बनी रहे, जबकि दूसरा विभाजन ऐसा हो जो सामान्य कोशिकाओं की मरम्मत कर सके। दो प्रकार का विभाजन इन आवश्यकताओं को पूरा करता है।

महत्व:
इन दो प्रकार के विभाजनों के कारण ही कोशिकीय संलयन (निषेचन) के बाद भी जीवों तथा कोशिकाओं में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या समान बनी रहती है और टूट-फूट की मरम्मत तथा वृद्धि एवं विकास की क्रियाएँ भी संचालित होती हैं।

प्रश्न 5.
समसूत्री विभाजन की प्रोफेज तथा ऐनाफेज को चित्र सहित समझाइए।
उत्तर:
समसूत्री प्रोफेज:

  1. गुणसूत्र लम्बे, पतले धागे के समान पाये जाते हैं, जिसे क्रोमैटिन जाल कहते हैं।
  2. सेण्ट्रिओल गति करके ध्रुवों पर जाने लगते हैं।
  3. गुणसूत्र सेण्ट्रोमियर से जुड़े हुए दिखाई देने लगते हैं।
  4. केन्द्रकीय झिल्ली समाप्त हो जाती है।

समसूत्री ऐनाफेज:

  1. सेण्ट्रोमियर्स के विभाजन से दोनों क्रोमैटिड्स अलग हो जाते हैं एवं दो गुणसूत्र बना देते हैं।
  2. गुणसूत्र ध्रुवों की ओर गति करते हैं। 3. गुणसूत्र की संख्या एवं प्रकार स्पष्ट हो जाते हैं।

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन - 4

प्रश्न 6.
समसूत्री विभाजन की विभिन्न अवस्थाओं को चित्रित कीजिए।
उत्तर:
समसूत्री विभाजन (Mitosis cell division):
MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन - 5

प्रश्न 7.
समसूत्री विभाजन की क्या विशेषताएँ हैं ? मेटाफेज का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विशेषताएँ:

  1. नई बनी कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के समान होती है।
  2. एक कोशिका विभाजित होकर दो समान कोशिकाएँ बनाती हैं।
  3. यह विभाजन कायिक कोशिका में होता है तथा इसके कारण जीवों में वृद्धि होती है तथा घाव भरता है।
  4. जनक कोशिका के आनुवंशिक गुण पौत्रिक कोशिका में पहुँचते हैं। इस विभाजन से आनुवंशिक समानता बनी रहती है।

समसूत्री मेटाफेज:

  1. इस अवस्था में केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका लुप्त हो जाती है।
  2. गुणसूत्र कोशिका की मध्यरेखा पर एकत्रित हो जाते हैं।
  3. गुणसूत्रों के अर्द्ध गुणसूत्र स्पष्ट एवं अलग हो जाते हैं।
  4. तर्क का निर्माण पूर्ण हो जाता है। टीप-चित्र के लिए उपर्युक्त प्रश्न क्रमांक 6 के चित्र D को देखिए।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए –

  1. समसूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन
  2.  गुणसूत्र एवं अर्द्ध-गुणसूत्र
  3. सेण्ट्रोमियर एवं क्रोमोमियर
  4.  सेण्ट्रोसोम एवं सेण्ट्रिओल
  5. मेटाफेज-I एवं मेटाफेज-II
  6.  जायगोटीन एवं पैकीटीन
  7. कोशिका खाँच एवं कोशिका प्लेट।

उत्तर:

1. समसूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में अन्तर:
दोनों ही कोशिका विभाजनों में कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है तथा दोनों में गुणसूत्रों का विभाजन होता है। इन समानताओं के बावजूद दोनों विभाजनों में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –
img

2. गुणसूत्र एवं अर्द्ध-गुणसूत्र में अन्तर:
क्रोमैटिन जाल ही कोशिका विभाजन के समय संघनित होकर एक विशिष्ट रचना बनाता है, जिसे गुणसूत्र कहते हैं, जबकि गुणसूत्र स्वयं दो कुण्डलित अर्धांशों का बना होता है, जिसे अर्द्ध-गुणसूत्र कहते हैं।

3. सेण्ट्रोमियर एवं क्रोमोमियर में अन्तर:
गुणसूत्रों में पाये जाने वाले प्राथमिक संकीर्णन को सेण्ट्रोमियर कहते हैं। यह गुणसूत्र को दो भुजाओं में बाँटकर उनके आकार को निर्धारित करता है, जबकि गुणसूत्र के अन्दर क्रोमैटीन तन्तु (क्रोमोनिमा) पर पायी जाने वाली गाँठ सदृश रचनाओं को क्रोमोमियर कहते हैं । सम्भवत: DNA अणु इन्हीं स्थानों पर क्रोमैटीन तन्तु से जुड़े होते हैं।

4. सेण्ट्रोसोम एवं सेण्ट्रिओल में अन्तर:
कोशिका के अन्दर तथा केन्द्रक के पास एक कलाविहीन कणीय कोशिकांग पाया जाता है, जिसे सेण्ट्रोसोम कहते हैं। सेण्ट्रिओल दो उप-इकाइयों का बना होता है, जो एक-दूसरे से समकोण पर स्थित होती है।

5. मेटाफेज-I एवं मेटाफेज-II में अन्तर –
मेटाफेज – I:
1. समजात गुणसूत्र जोड़े में कोशिका के मध्य में स्थित होते हैं।
2. इसमें सेण्ट्रोमियर विभाजित नहीं होता पूरा गुणसूत्र ध्रुवों की ओर जाता है।

मेटाफेज – II
1. इकहरे गुणसूत्र कोशिका के मध्य में स्थित होते हैं।
2. इसमें सेण्ट्रोमियर विभाजित होकर दो भाग बना देता है तथा अर्द्ध – गुणसूत्र ध्रुवों की ओर जाता है।

6. जायगोटीन एवं पैकीटीन में अन्तर:
जायगोटीन अवस्था में गुणसूत्र जोड़े में रहकर बाइवैलेण्ट अवस्था में रहता है, जबकि पैकीटीन में गुणसूत्रों के अर्द्ध-गुणसूत्र अलग होकर टेट्राड अवस्था में रहते हैं।

7. कोशिका खाँच एवं कोशिका प्लेट:
कोशिका खाँच वह रचना है, जिसमें कोशिका संकीर्णित होकर दो भागों में बँटती हैं, जबकि कोशिका प्लेट वह रचना है, जिसमें कोशिका के मध्य में कोशिकांग व्यवस्थित होकर एक प्लेट बनाते हैं फलतः कोशिका दो भागों में बँट जाती है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित का अर्थ स्पष्ट कीजिए –

  1. समजात गुणसूत्र
  2. बाइवैलेण्ट
  3. टेट्राड
  4. G2फेज।

उत्तर:
(i) समजात गुणसूत्र – एक समान गुणसूत्रों को समजात (Homologous) गुणसूत्र कहते हैं अगर ये गुणसूत्र एक साथ स्थित हों, तो उनकी सभी रचनाएँ हूबहू एकसमान होती हैं।

(ii) बाइवैलेण्ट-NCERT प्रश्न क्रमांक 7 का उत्तर देखिए।

(iii) टेट्राड-पैकीटीन अवस्था में समजात गुणसूत्रों के अर्द्ध – गुणसूत्र विभाजित होकर प्रत्येक गुणसूत्र को दो अर्द्धाशों अर्थात् तन्तुओं में बाँट देते हैं। इस कारण जोड़े के गुणसूत्र चार गुणसूत्रों के रूप में प्रतीत होने लगते हैं, तब समजात गुणसूत्रों के जोड़े को टेट्राड कहते हैं।

(iv)G2;फेज या द्वितीय वृद्धि उपअवस्था – कोशिकीय चक्र की वह उप-अवस्था है, जिसमें कोशिकीय संश्लेषण फिर से होता है। इस उप-अवस्था में माइटोकॉण्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट स्वविभाजित हो जाते हैं। सेण्ट्रिओल का विभाजन होकर दो सेट बन जाते हैं तथा स्पिण्डिल निर्माण प्रारम्भ हो जाता है। इस अवस्था में कोशिकीय पदार्थों का संश्लेषण फिर से होता है, इस कारण इसे G2 फेज कहते हैं।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन-से कथन समसूत्री विभाजन की निम्नलिखित अवस्थाओं से सम्बन्धित हैं –
(A) प्रोफेज
(B) मेटाफेज
(C) ऐनाफेज
(D) टीलोफेज
(E) इण्टरफेज।

  1. केन्द्रक झिल्ली का पुनः निर्माण
  2. गुणसूत्र सर्वाधिक छोटे एवं मोटे
  3. गुणसूत्र कुण्डलित होने लगते हैं
  4. सेण्ट्रोमियर का दो भागों में विभाजन
  5. केन्द्रक सक्रिय होता है, किन्तु क्रोमोसोम स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं
  6. साइटोकाइनेसिस के बाद की अवस्था
  7. प्रत्येक गुणसूत्र दो अर्द्ध-गुणसूत्रों का बना दिखाई देता है।

उत्तर:

  1. टीलोफेज
  2. मेटाफेज
  3. टीलोफेज
  4. प्रोफेज
  5. प्रोफेज
  6. इण्टरफेज
  7. प्रोफेज।

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्द्धसूत्री विभाजन की क्रिया का नामांकित चित्रों सहित विवरण दीजिए तथा इसका महत्व लिखिए।
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन-वह विभाजन है, जिसमें विभाजन के बाद चार ऐसी कोशिकाएँ बनती हैं, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या मूल संख्या की आधी रह जाती है। यह विभाजन दो चरणों में पूरा होता है –

(A) अर्द्धसूत्री विभाजन प्रथम:
इसके द्वारा दो ऐसी कोशिकाएँ बनती हैं, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या मूल कोशिका की आधी होती हैं। यह चार अवस्थाओं में पूरा होता है –

1. प्रोफेज-I:
इसमें पाँच उप अवस्थाएँ होती हैं –

  1. लेप्टोटीन – सेण्ट्रिओल ध्रुवों पर चले जाते हैं तथा गुणसूत्र स्पष्ट हो जाते हैं।
  2. जायगोटीन – समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं।
  3. पैकीटीन – गुणसूत्रों के अर्द्ध-गुणसूत्र अलग होकर टेट्राड बना देते हैं, और उनमें अन्तर्ग्रथन हो जाता है तथा जीन विनिमय की क्रिया होती है।
  4. डिप्लोटीन-समजात गुणसूत्र विकर्षण के कारण अलग हो जाते हैं तथा उनमें जीन विनिमय पूर्ण हो जाता है।
  5. डायकाइनेसिस-गुणसूत्र दूर जाने लगते हैं । केन्द्रक तथा केन्द्रिका विलुप्त हो जाती हैं तथा तर्कु बन जाते हैं।

2. मेटाफेज-I:
समजात गुणसूत्र कोशिका के मध्य में आ जाते हैं, त’ पूर्ण विकसित हो जाते हैं।

3. ऐनाफेज-I:
समजात गुणसूत्रों में से एक, एक ध्रुव पर तथा दूसरा, दूसरे ध्रुव पर चला जाता है। अतः आधे गुणसूत्र एक ध्रुव पर तथा आधे दूसरे ध्रुव पर चले जाते हैं।

4. टीलोफेज:
केन्द्रिका तथा केन्द्रक फिर से बन जाते हैं अन्त में दो ऐसी कोशिकाएँ बनती हैं, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है।
कोशिकाद्रव्य विभाजन-दो केन्द्रक बनने के बाद कोशिका का कोशिकाद्रव्य भी खाँच या पट्ट निर्माण द्वारा दो भागों में बँट जाता है।

(B) अर्द्धसूत्री विभाजन द्वितीय:
यह समसूत्री विभाजन के समान होता है, जिसमें अर्द्धसूत्री विभाजन से बनी कोशिकाएँ दो-दो कोशिकाओं में विभाजित हो जाती हैं –
इसमें निम्नलिखित चार अवस्थाएँ होती हैं –

1. प्रोफेज – II:
प्रथम विभाजन की सन्तति कोशिकाओं के गुणसूत्र स्पष्ट हो जाते हैं। केन्द्रक तथा केन्द्रिका विलुप्त हो जाती हैं तथा तर्कु बन जाते हैं।

2. मेटाफेज-II:
गुणसूत्र के दोनों अर्द्ध-गुणसूत्र अलग होकर कोशिका के मध्य में आ जाते हैं।

3. ऐनाफेज-II:
अर्द्ध-गुणसूत्र अलग-अलग ध्रुवों पर चले जाते हैं और गुणसूत्र का रूप ले लेते हैं।

4. टीलोफेज-II:
प्रत्येक ध्रुव पर केन्द्रक बन जाता है। कोशिकाद्रव्य विभाजन-प्रथम विभाजन से बनी दोनों कोशिकाओं के दोनों केन्द्रकों के चारों तरफ कोशिकाद्रव्य भी विभाजित हो जाता है। इस प्रकार चार ऐसी कोशिकाएँ बन जाती हैं, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है।

अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्व:

  1. इसके कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या एक समान बनी रहती है।
  2. इस विभाजन के कारण जनक के समान ही कोशिकाएँ पैदा होती हैं।
  3. इस विभाजन में जीन विनिमय होने के कारण यह नये गुणों के बनने में सहायता करता है।
  4. इसके कारण विभिन्नता पैदा होती है, जो जैव विकास के लिए आवश्यक है।
  5. इसके कारण एक द्विगुणित कोशिका से चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं।

MP Board Class 11th Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन - 6

प्रश्न 2.
कोशिका चक्र की आवश्यकता एवं महत्व को दर्शाते हुए उसकी विभिन्न अवस्थाओं में होने वाली घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोशिका चक्र की आवश्यकता एवं महत्व-एक कोशिका के अस्तित्व में आने से लेकर उसका विभाजन होने तक की क्रियाएँ संयुक्त रूप से कोशिका चक्र कहलाती हैं। कोशिका चक्र के कारण ही नई कोशिकाओं का निर्माण होता है, जिससे नई कोशिकाएँ बनकर घाव को भरती हैं।

इसके अलावा इसी के कारण ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या एकसमान बनी रहती है। इसी के कारण जीवों में वृद्धि तथा विकास सम्भव हो पाता है एवं पुरानी कोशिकाओं की पुनर्स्थापना होती है अर्थात् कोशिकीय चक्र के बिना जीव अस्तित्व में नहीं रह पाएँगे। कोशिका चक्र की अवस्थाएँ-कोशिकीय चक्र में निम्नलिखित अवस्थाएँ पायी जाती हैं –

(A) अन्तरावस्था या विभाजनान्तराल या इण्टरफेज:
अंतरावस्था(इण्टरफेज) दो विभाजनों के बीच की अवस्था है, जिसमें निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ पायी जाती हैं –

(i)G2 फेज-इस अवस्था में प्रोटीन एवं RNA का संश्लेषण किया जाता है।

(ii) S2 फेज-इस अवस्था में DNA एवं हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

(ii) G2फेज-इस अवस्था में आवश्यक प्रोटीन तथा RNA का संश्लेषण किया जाता है तथा विभिन्न कोशिकांगों का निर्माण होता है।

(B) विभाजन अवस्था या m – अवस्था:
इसमें कोशिका का मूल विभाजन होता है, जिससे 2 या 4 कोशिकाएँ बनती हैं। इसमें निम्नलिखित अवस्थाएँ पायी जाती हैं –
1. केन्द्रकीय विभाजन-इस प्रावस्था में विभाजित होने वाली कोशिका का केन्द्र विभाजित होकर दो अथवा चार केन्द्र बना देता है। यह विभाजन चार अवस्थाओं प्रोफेज, मेटाफेज, ऐनाफेज तथा टीलोफेज में पूर्ण होता है।

2. कोशिकाद्रव्य विभाजन या साइटोकाइनेसिस:
कोशिका द्रव्य विभाजन-कोशिका विभाजन के समय केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य विभाजन को साइटोकाइनेसिस या कोशिकाद्रव्य विभाजन कहते हैं, यह पादप एवं प्राणियों में दो अलग-अलग विधियों द्वारा होता है –

(a) कोशिका खाँच द्वारा इस कोशिकाद्रव्य विभाजन में कोशिका के मध्य में एक खाँच बनती है, जो बढ़कर कोशिका के कोशिकाद्रव्य को दो भागों में बाँट देती है। प्रत्येक भाग में एक केन्द्रक होता है, जन्तुओं में इसी प्रकार का विभाजन पाया जाता है।

(b) कोशिका प्लेट द्वारा इस कोशिकाद्रव्य विभाजन में कोशिका के मध्य गॉल्गीकाय तथा E.R. एकत्रित होकर एक पट बना देते हैं जो बाद में कोशिका भित्ति बन जाती है और कोशिका को दो भागों में बाँट देती हैं। प्रत्येक भाग में एक केन्द्रक होता है। यह विभाजन पादप कोशिकाओं में पाया जाता है।

MP Board Class 11th Biology Solutions

MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 5 तिमिर गेह में किरण आचरण

In this article, we will share MP Board Class 12th Hindi Solutions गद्य Chapter 5 तिमिर गेह में किरण आचरण Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 5 तिमिर गेह में किरण आचरण (ललित निबंध, डॉ. श्यामसुन्दर दुबे)

तिमिर गेह में किरण आचरण अभ्यास

तिमिर गेह में किरण आचरण अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक का बचपन कहाँ गुम हो गया है? (2016)
उत्तर:
पुराने घर की जर्जर दीवारों में ही लेखक का बचपन गुम हो गया है।

प्रश्न 2.
गाँव की संध्या में पूजा भाव किन ध्वनियों में प्रकट होता है?
उत्तर:
गाँव की संध्या में पूजा भाव घण्टियों की टनटनाहट और शंख घड़ियालों की मिली-जुली स्वर लहरी में स्पंदित होकर प्रकट होता है।

प्रश्न 3.
खेत में किस चीज को ढूंढ़ लेना परम सुख की प्राप्ति जैसा था?
उत्तर:
खेत में एक पकी कचरिया को ढूँढ़ लेना ही परम सुख की प्राप्ति थी।

प्रश्न 4.
घर खुलते ही लेखक को कैसा लगने लगा था?
उत्तर:
घर खुलते ही लेखक को लगा जैसे ताले के साथ ही उनके भीतर कुछ स्मृतियाँ खुलती जा रही थीं।

MP Board Solutions

तिमिर गेह में किरण आचरण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बचपन के अनुभव, स्मृति में क्यों स्थायी होते हैं?
उत्तर:
बचपन के खरे और करारे अनुभव ताजी और पहलौटी अनुभूति के कारण स्मृति में सदैव घर किये रहते हैं। धीरे-धीरे मन का पानी उतर जाता है। मन स्वाद के बारे में रसहीन हो जाता है, हम जड़ होते जाते हैं। केवल बचपन की वस्तुओं से टकराकर ही हम उस सुख-बिन्दु की स्थायी स्मृति में आ जाते हैं।

प्रश्न 2.
उन तीन पारम्परिक चीजों के नाम लिखिए जो गाँव के जीवन से गायब हो रही (2009)
उत्तर:
गाँव के जीवन से अनेक पारम्परिक चीजें गायब हो रही हैं, जिनमें से तीन निम्नलिखित हैं-

  1. हलों के साथ टिप्पे की टिटकारें।
  2. तालाब जैसे भरे बंधान।
  3. टिमटिमाते दीयों की रोशनी।

प्रश्न 3.
आले में गेहूँ के दानों के अंकुरित होने को लेखक ने किस प्रेरणा से जोड़ा है?
उत्तर:
आले में गेहूँ के दानों के अंकुरित होने को लेखक ने जीवन की सृजनात्मक प्रेरणा से जोड़ा है। सृजन का प्रकाश ही जीवन का दूसरा नाम है। आदमी का आचरण, शील,श्रम, विवेक और भावना जिसे छू लें, वह प्रकाशित हो जाता है। यह प्रकाशवान सृजन कभी रुकता नहीं। सृजन दीपक के प्रकाश के समान स्वयं भी प्रकाशित होता है और दूसरों को भी प्रकाशित करता है।

तिमिर गेह में किरण आचरण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक ने जीवन में प्रकाश को किन-किन सन्दर्भो में प्रकट किया है?
उत्तर:
ललित निबन्ध शैली में लिखे गये प्रस्तुत निबन्ध ‘तिमिर गेह में किरण आचरण’ में लेखक ने आचरण को जीवन के दीपक का प्रकाश बताते हुए अनेक सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। प्रकाश दीपक या बल्ब का ही नहीं, ज्ञान व विकास का प्रकाश भी जीवन में अनिवार्य है। आगे बताया गया है कि प्राकृतिक प्रकाश से भी अधिक शक्तिशाली होता है,स्मृतियों का प्रकाश, जो क्षणिक दुःख में सुख का आभास कराता है। सृजन व निर्झर भी प्रकाश के प्रतीक हैं जो जीवन को विकास व ऊर्ध्वगमन की शक्ति देते हैं। आस्था भी प्रकाश का ही एक रूप है,जो आत्मा को मजबूत करती है। सद् आचरण, शील, श्रम, विवेक, सत्य, ईमानदारी, कर्मठता सब जीवन में प्रकाश के रूप हैं। लेखक कहता है कि प्रकाश जीवन का ही दूसरा नाम है। एकांकी और वीराने में भी व्यक्ति चारित्रिक प्रकाश का आनन्द अनुभव करता है। प्रकाशित व्यक्ति जब दूसरों को छूता है, तो दूसरा व्यक्ति भी प्रकाशित, यानि ज्ञानवान् व सुखी हो जाता है।

प्रश्न 2.
स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को प्रकाशित करने की क्षमता मनुष्य में किन विशेषताओं से आती है?
उत्तर:
जीवन सरल नहीं होता है। इसमें अनेक मुसीबतें, कठिनाइयाँ, दुःख, रुकावटें, आपत्तियाँ आती रहती हैं। जो व्यक्ति जीवन के असली प्रकाश को अपने में जाग्रत कर लेता है-अर्थात् सृजन का प्रकाश भर लेता है, वह बड़े-बड़े अँधेरों को तराशकर प्रकाश निर्झर से धरती की प्यास बुझा देता है। सृजन का विकास उन्हीं व्यक्तियों में प्रकाशित होता है। जो आचरणवान, शीलवान, ईमानदार,सत्यवादी,परिश्रमी, विवेकी, दूसरों की भावनाओं को छूने वाले होते हैं। साथ ही वे आस्थावान तथा निष्ठावान भी होते हैं। वे अकेले और वीराने में भी सृजन की भावना से आश्वस्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो प्रकाशित होते ही हैं, जिनको वे छू देते हैं, वे भी प्रकाशित हो जाते हैं, जिनमें सृजन की भावना नहीं है, उनमें भी सृजन का मन्त्र फूंक देते हैं। दीपकों की पंक्तियाँ प्रकाशित होकर दीपावली मनाने लगती हैं। श्रेष्ठ व चरित्रवान गुणों वाले व्यक्ति में ही सृजन का प्रकाश जागता है, तब ही वह स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को प्रकाशित करने की क्षमता रखता है।

प्रश्न 3.
लेखक को अपने गाँव लौटने पर क्या-क्या परिवर्तन दिखाई दिए?
उत्तर:
लेखक को अपने गाँव लौटने पर गाँव में अप्रत्याशित परिवर्तन दिखाई दिया। जिन हलों के साथ टिप्पे की टिटकारें सुनायी देती थीं उनके स्थान पर फटफटाते ट्रेक्टर खेतों की छाती चीर रहे थे,तालाब जैसे भरे बंधान गायब थे,बदले में बरसात कम होने के कारण ट्यूबवैल धरती का पेट चीरकर पानी खींच रहे थे। भभकती सिंचाई-मशीनें हड़बड़ा रही थीं। बिजली गाँव को चौंधिया रही थी। टिमटिमाते दीपक गायब थे। न ढोर,न बछेरू और गोचर भूमि गायब थी। न कउड़े न लोग, न मन्दिर की घंटियों की टनटनाहट और न शंख-घड़ियाल की सुरीली आवाज ही सुनाई पड़ती थी। रामधुनों और भजनों के ढोल-मंजीरों का स्थान टी.वी. के पास चला गया था। चोरी, डकैती, मुकदमों ने गाँव की चौपाल तोड़ दी थी। आत्मीयता नष्ट हो गई थी। सब अपने स्वार्थ साधन में लगे थे। इज्जत-आबरू दाँव पर थी। राजनीति ने ऐसा हड़कम्प मचाया है कि तीन घरों का गाँव भी तीन पार्टियों में बँट गया था।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
लेखक ने घर का वास्तविक रूप किन शब्दों में व्यक्त किया है?
उत्तर:
लेखक ने बहुत दिनों के बाद लौटकर अपने पुस्तैनी घर को देखा तो पाया कि वर्षा के कारण दीवारों का प्लास्टर जहाँ-तहाँ से उखड़ गया है, जिस कारण दीवारों पर चित्र से बने लगते हैं। चबूतरे पर गायों के खड़े होने के कारण पैरों के निशान बन गये हैं, जो अस्त-व्यस्त व्यंजनों के समान दिखाई देते हैं। घर का नक्शा ही बदल गया है। जिस कारण वह घर एक ऐतिहासिक इमारत-सा लग रहा है, ऐसी इमारत जो जर्जर हो उठी है। किवाड़ों पर मकड़ियों ने जाले बना लिये हैं, चारों ओर धूल का साम्राज्य है। यह तो घर का भौतिक रूप है। इसके साथ घर का एक और अमूर्त रूप है, जिसमें लेखक की आत्मा स्मृतियों में खोई है। लेखक का बचपन इसी घर में बीता है। लेखक की किलकारियाँ, हँसना, रोना, ममत्व,क्रोध आदि इन्हीं दीवारों से जुड़ा है। माता-पिता तथा बहनों की आत्मीयता बिखर गयी है। घर का खुलना-घर का खुलना नहीं था बल्कि लेखक के मन में स्मृतियों का पर्दा खुलता चला जा रहा था। ईंट-पत्थर से बनी इमारत घर नहीं होती । घर होता है व्यक्ति की भावनाओं, प्रेम, स्नेह, ममत्व आदि के संयोग से।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिये
(1) दीवारों पर वर्षा ने …………… बदल गया हो।
(2) मेरी किलकारियाँ …………. जा रहा है।
(3) असल प्रकाश ……… नहीं रोका जा सकता।
(4) मुझे लगा हमारे भीतर की ………… केन्द्र बन सकेंगे।
(5) जीवन बहुत सरल ……….. कर सकोगे।
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांशों की व्याख्या पाठ के ‘व्याख्या हेतु गद्यांश’ भाग में देखिए।

तिमिर गेह में किरण आचरण भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए
उजास, कसैला, किवाड़, चतेवरी।
उत्तर:
उजाला, कड़वा, दरवाजा, चित्रकारी।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए
निर्झर, कर्कश, प्रकाश, उल्लास।
उत्तर:

  1. निर्झर – झरना, प्रपात।
  2. कर्कश – कठोर, तीखी।
  3. प्रकाश – आलोक,प्रभा।
  4. उल्लास – खुशी,प्रसन्नता।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिये

  1. उसकी आयु बीस वर्ष है।
  2. गुरु के ऊपर श्रद्धा रखनी चाहिए।
  3. यहाँ केशरिया दही की लस्सी मिलती है।
  4. भाषा का माधुर्यता बस देखते ही बनती है।

उत्तर:

  1. वह बीस वर्ष का है।
  2. गुरु पर श्रद्धा रखनी चाहिए।
  3. यहाँ केसरिया दही की लस्सी मिलती है।
  4. भाषा का माधुर्य देखते ही बनता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्द युग्मों में से पूर्ण पुनरुक्त, अपूर्ण पुनरुक्त, प्रति ध्वन्यात्मक शब्द और भिन्नात्मक शब्दों को पृथक्-पृथक् लिखिए.
तीज-त्यौहार, छानी-छप्पर, आल-जाल, छोटी-मोटी, प्रचार-प्रसार, उर्दू-फारसी, खेलते-खेलते।
उत्तर:
पूर्ण पुनरुक्त शब्द – खेलते – खेलते-खेलते।
अपूर्ण पुनरुक्त शब्द – तीज-त्यौहार,छानी-छप्पर,प्रचार-प्रसार।
प्रतिध्वन्यात्मक शब्द – आल-जाल,छोटी-मोटी।
भिन्नात्मक शब्द – उर्दू-फारसी।

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
दिये गये वाक्यों का भाव विस्तार कीजिये-
(1) कउड़े को आग के ताप से दिपदिपाते चेहरों की प्रसन्नता अँधेरों में भी खनक जाती है।
(2) जवारों जैसे पीताभ गेहूँ के पौधे क्या यह संदेश नहीं देते कि सृजन की यात्रा कभी रुकती नहीं?
उत्तर:
(1) सर्दियों के मौसम में दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद लोग शाम को अलाव जलाकर उसकी गरमाई के चारों ओर बैठकर अपनी दिनभर की थकान उतारते हैं तथा वार्तालाप, हँसी-मजाक, समस्याओं के समाधान आदि से उनके चेहरे पर अन्धकार में भी छायी प्रसन्नता, उनकी बोली से स्पष्ट हो जाती है। यह सुख आज के वैज्ञानिक युग में समाप्त हो गया है।

(2) गेहूँ का पौधा बढ़कर मनुष्य को प्रेरणा देता है कि निर्माण सदैव विकास की ओर जाता है। सृजन को अँधेरे-बन्द कमरों में बन्द नहीं किया जा सकता है। जैसे-छोटे से दीपक की लौ दूर-दूर तक प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार सृजन का प्रकाश फैलता ही जाता है। व्यक्ति का आचरण,शील, विवेक,मेहनत, ईमानदारी,आस्था, निष्ठा आदि गुण सृजन की यात्रा को आगे की ओर ले जाते हैं। आले में अंकुरित गेहूँ के पौधे मनुष्य को यही प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 6.
मातृभाषा की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
जिस क्षेत्र विशेष में जो भाषा बोली जाती है तथा बालक अपनी माँ के मुँह से जो सुनता है,वही मातृभाषा है। सर्वप्रथम मातृभाषा ही शिशु के इस दुनिया में आँख खोलने के साथ ही कानों में पड़ती है तथा हर समय हमारे सम्पर्क में रहती है। मातृभाषा सीखने और समझने में सरल लगती है। इसके माध्यम से विचारों का प्रदान-प्रदान करना सरल होता है और भावों की अभिव्यक्ति सहज होती है। मातृभाषा में आत्मीयता होती है।

तिमिर गेह में किरण आचरण पाठ का सारांश

सुविख्यात कवि,निबन्धकार, कथाकार एवं उच्च कोटि के आलोचक ‘डॉ. श्यामसुन्दर दुबे’ द्वारा लिखित प्रस्तुत निबन्ध ‘तिमिर गेह में किरण-आचरण’ में लेखक ने बताया है कि अज्ञान व दुःख के निवारण का साधन प्राणी का सद् आचरण है। सुख का प्रकाश बाहर से नहीं वह तो आचरण और आत्म-चेतना से फैलता है। इसलिए मनुष्य को सदैव अपने भीतर खोए बचपन की तलाश करते रहना चाहिए। बचपन की संवेदनाएँ ही आत्मीय संसार को दृढ़ बनाती हैं। सृजनशीलता प्रदान करती हैं।

प्रस्तुत निबन्ध आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है। लेखक बहत समय के बाद अपने बचपन के घर पर लौटता है तो देखता है ताले पर जंग है, दीवारों के टूटे प्लास्टर चित्रकारी जैसे लगते हैं। चबूतरे पर धूल है। मकड़ियों के जाले हैं। घर की इस बदसूरती को देखकर बचपन की याद आती है, जिसमें माता-पिता तथा बहनों की आत्मीयता है। घर के बाद लेखक गाँव व खेत में अपने बचपन को तलाशता है। मन्दिरों की घण्टियों,शंख-घड़ियालों की आवाज,अलाव की गर्मी, ज्वार-बाजरे के खेतों के सौन्दर्य का सुख भूल चुका है।

समय परिवर्तनशील है। खेतों में हल के स्थान पर ट्रैक्टर, तालाब के स्थान पर ट्यूबवैल, दीपक के स्थान पर बिजली के बल्ब, चौपाल का रूप चोरी, डकैती और मुकदमों ने ले लिया है। रामधुन व भजन टी.वी. बन गया है। सब अपने स्वार्थ में लगे हैं। राजनीति का प्रकोप है। इस कारण जीवन के सुख रूपी घर में दुःख रूपी चूहे-छिपकलियाँ कूदते हैं। लेखक ने दुःख के अन्धकार को दूर करने का तरीका बताया है वह है-सृजन का प्रकाश। आदमी का आचरण, आदमी का शील, आदमी का भ्रम, आदमी का विवेक जिसे छू ले, वह प्रकाशित हो जाये। लाख अँधेरे आयें, लाख आपत्तियाँ आयें, यदि व्यक्ति अपने प्रति आस्थावान, निष्ठावान, परिश्रमी और सदाचारी है तो वह स्वयं भी सुख के प्रकाश से दीप्त होता है तथा दूसरों को भी करता है। यही दीपावली का दिन है,यही प्रकाशोत्सव है। आज मनुष्य हिंसा, प्रतिहिंसा, स्वार्थ, छल, फरेब, दगाबाजी आदि के अँधेरे में फँसा है। इन अँधेरों को दूर करके ही हम शाश्वत प्रकाश के केन्द्र बन सकते हैं।

“सजन की झाड़ से अज्ञान के अँधेरे को दूर किया जा सकता है। वो माचिस की तीलियाँ स्वयं प्रकाशित हो उठेगी।” लोक बोली के अनेक शब्दों से भाषा का प्रवाह बढ़ा है। व्यास शैली व उदाहरण शैली ने निबन्ध को बोधगम्य बना दिया है। सत्य है, सृजन ही जीवन का प्रकाश है।

तिमिर गेह में किरण आचरण कठिन शब्दार्थ

चतेवरी = चित्रकारी। अतीत = बीता हुआ। प्रहारों = चोटों। हिलबिलान = खो जाना। स्पंदित = धड़कना। कउड़े = अलाव। निबिड़ता = अन्धकार। बिसर = भूलना। पहलौटी = पहला। अनुभूति = एहसास। झकझकाती = चमकती। पसरा = फैला। मद्धिम = धीमी। हडकंप = भाग-दौड़। भाराक्रांत = भार से दबा हुआ। स्मृतियों = यादों। उजास = उजाला। ऊर्ध्वमुखी = ऊपर मुख किये हुए। विकीर्ण = फैलाना। पीताभ = पीली चमक वाला। वीराने = सुनसान। सृजन = रचना। समूचे = पूरे। फरेब = कपट। दगाबाजी = धोखा। शाश्वत = हमेशा रहने वाला।

MP Board Solutions

तिमिर गेह में किरण आचरण संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) दीवारों पर वर्षा ने ऊबड़-खाबड़ चतेवरी अंकित कर दी थी। दरवाजे के सामने वाले चबूतरे पर गौ-खुरों की रूदन-बूंदन से अटपटी वर्णमाला लिख गई थी। घर का समूचा नाक-नक्शा ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे अतीत के प्रहारों को झेलते-झेलते वह झुर्रियों के इतिहास में बदल गया हो।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक के ललित निबन्ध ‘तिमिर गेह में किरण-आचरण’ से उद्धृत हैं। इसके लेखक ‘डॉ. श्यामसुन्दर दुबे’ हैं।

प्रसंग :
समय बीतने पर हर सुन्दर वस्तु असुन्दर बन जाती है। उस पर बनी अतीत की लकीरें उसके इतिहास को बदल देती हैं।

व्याख्या :
आत्म कथात्मक शैली में अपनी स्मृतियों का वर्णन करते हुए लेखक कहता है कि जब वह एक लम्बे अन्तराल के बाद अपने गाँव के मकान पर लौटता है तो पाता है कि वर्षा के कारण मकान की दीवारों का प्लास्टर उखड़ गया है जिससे दीवारें चित्रकारी-सी की हुई प्रतीत होती हैं। मुख्य दरवाजे के सामने बने चबूतरे पर गायों को रौंदने से जमीन पर पशुओं के खुरों के निशान बन गये हैं,जो हिन्दी की वर्णमाला के समान दिखाई देते हैं। पूरे घर का नक्शा बदल गया है; जैसे मनुष्य समय की चोट खा-खाकर बूढ़ा हो जाता है, उसके शरीर पर पड़ी झुर्रियाँ उसे बदसूरत बना देती हैं, उसी प्रकार लेखक का मकान भी समय बीतने के साथ जर्जर हो गया था। उसी घर में लेखक यादों के सहारे सृजनात्मक कार्य के लिये आया था।

विशेष :

  1. पुराने घर में अपनत्व को ढूँढ़ता लेखक।
  2. साधारण-सरल खड़ी बोली, जिसमें ऊबड़-खाबड़, चतेवरी जैसे आंचलिक शब्दों का प्रयोग।
  3. पुनरुक्त शब्दों का प्रयोग, जैसे-झेलते-झेलते,ऊबड़-खाबड़।।
  4. संस्कृत के तत्सम शब्दों को भी लिया गया है, जैसे-अंकित, अतीत।
  5. व्यास शैली।

(2) मेरी किलकारियाँ और रोदन, मेरा क्रोध और मेरा ममत्व, इसी के भीतर किस कोने में अटके हैं? माता-पिता और बहिनों की आत्मीयता दरवाजों के भीतर से हमकती-सी लगती है। मेरा अतीत ढोता यह घर, जिसका ताला खोलने में ही मुझे आधा घण्टा लग गया, मेरे सामने खुला पड़ा था। घर नहीं खुला था, लगा किं जैसे ताले के साथ ही मेरे भीतर कुछ खुलता जा रहा है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
डॉ. श्यामसुन्दर दुबे जब अपने मकान का ताला खोलते हैं तो उनका मन बचपन की यादों से भावुक हो उठता है क्योंकि इसी घर में उनका बचपन बीता था।

व्याख्या :
घर के दरवाजे पर लगे ताले पर जंग लग गयी थी, जिसके कारण लेखक को ताला खोलने में लगभग आधा घण्टा लगा। ताला खुलते ही घर के दृश्य को देखकर लेखक का बचपन साकार हो उठा और उन्हें लगा कि इसी घर में उनकी बचपन की किलकारियाँ,रोना, गुस्सा करना,क्रोध करना छिपा है। साथ ही,परिवार के साथ ममत्व भी दीवारों के बीच छिपा है। उनको महसूस होता है कि माता-पिता तथा बहिनों का प्यार मानो दरवाजों में से आवाज दे रहा है अर्थात् उन्हें पारिवारिक जनों के लाड़-प्यार, दुलार की स्मृति हो आती है। इसी घर में लेखक का बचपन बीता था घर के खुलने के साथ-साथ उनके हृदय में यादों के दरवाजे भी खुल गये, जिन्होंने लेखक को विचलित कर दिया। इस प्रकार दरवाजा खुलते ही लेखक अतीत के संसार में चला गया।

विशेष :

  1. बचपन की मधुर स्मृतियों का हृदयस्पर्शी शब्दों में चित्रण है।
  2. हुमकती जैसे शब्दों के प्रयोग से भाषा में आंचलिकता आ गई है।
  3. सरल खड़ी बोली है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्द हैं।
  4. व्यास व उद्धरण शैली का प्रयोग है।

(3) चीजें ही बदल रही हैं तो बचपन को पाना कठिन होता जाता है। जिन हलों के साथ टिप्पे की टिटकारें सुनी थीं, वे हल चूल्हे की आग बन गये। फटफटाते ट्रैक्टर खेतों की छाती चीर रहे हैं। तालाब जैसे भरे बंधान गायब हैं, बरसात ही कम हो रही है तो कहाँ से भरें खेत? धरती का पेट चीरकर पानी खींचा जा रहा है। भभकती सिंचाई-मशीनें, हड़बड़ा रही हैं। झकझकाती बिजली गाँव को चौंधिया रही है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक गाँव में पहँच कर पाता है कि गाँव आधुनिक साधनों से पूर्ण है। बचपन का कोई भी चिह्न उसे दिखाई नहीं देता है। इस बदलाव से उसकी आत्मा जैसे बिखर जाती है।

व्याख्या :
जिस बचपन को ढूँढने लेखक अपने गाँव गया था। वह बचपन उसे नहीं मिला। पूरा गाँव आधुनिकता में डूब गया था। बचपन में खेत जोतने के लिए हलों का प्रयोग किया जाता था, उस हल की लकड़ी जला दी गयी थी। उसके स्थान पर ट्रेक्टर खेतों को जोत रहे थे। सिंचाई के लिए तालाबों में पानी भरा रहता था अब वह तालाब वर्षा कम होने के कारण सूख गये थे। जमीन को खोदकर ट्यूबबैल बनाये जा रहे जिसने पृथ्वी की सरसता को कम कर प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दिया है। दीपक की रोशनी का स्थान चमकती बिजली ने ले लिया था। सम्पूर्ण ग्रामीण जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया था। ऐसे में लेखक को अपना बचपन न मिलने के कारण उसका हृदय भर आया था।

विशेष :

  1. गाँव में विज्ञान की प्रगति का साक्षात्कार है।
  2. सरल खड़ी बोली में स्थानीय शब्दों की बहुलता है।
  3. व्यास शैली व उद्धरण शैली के माध्यम से बदलते परिवेश का चित्रण है।

MP Board Solutions

(4) असल प्रकाश तो हमारे जीवन में छिपा हुआ है-सृजन का प्रकाश! आदमी का आचरण, आदमी का शील, आदमी का श्रम, आदमी का विवेक और आदमी की भावना जिसे छ लें, वह प्रकाशित हो जाये। बड़े-बड़े अंधेरों को तराशकर ये प्रकाश-निर्झर बहा दें। जवारों जैसे पीताभ गेहूँ के पौधे क्या यह संदेश नहीं देते कि सृजन की यात्रा कभी रुकती नहीं ? उसे अँधेरे बन्द कमरों में भी नहीं रोका जा सकता। (2009, 11, 14, 17)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
अन्धकार का विलोम प्रकाश है और प्रकाश जीवन का दूसरा नाम है। दीपक या बिजली के बल्ब का प्रकाश तो प्रकाश का आभास है, वास्तविक प्रकाश प्राणी के कर्म और आचरण में होता है।

व्याख्या :
लेखक प्रकाश यानि उजाले के वास्तविक रूप को बताते हुए कहता है कि प्रकाश बाहर की वस्तु न होकर जीवन में चरितार्थ होने वाली वस्तु है, वह है अच्छाई-सत्य व कर्म को अपनाकर नवीनता का निर्माण करना। निर्माण कार्य वही प्राणी कर सकता है, जिसका आचरण शुद्ध हो, विचार अच्छे हों। प्राणी की विनम्रता, परिश्रम, अच्छे-बुरे की पहचान कर अच्छाई के मार्ग पर चलना,दूसरे के दुःखों,वेदनाओं,पीड़ाओं आदि को समझकर सहभागी बनने वाला व्यक्ति ही सृजन कार्य कर सकता है।

ऐसा ही व्यक्ति जीवन के अँधेरों रूपी दुःखों को सुख रूपी जल की धारा में बदल सकता है। खेतों में उगने वाले पौधा जो कभी तिल जैसा बीज था, विकसित होकर पौधा बनता है तथा संसार को भोजन के रूप में जीवन देता है। यह पौधा मनुष्य को संदेश देता है कि विकास की गति, निर्माण की गति कभी नहीं रुकती है। विकास को कमरों में या किसी अन्धकार में बन्द करके, नहीं रखा जा सकता है। विकास जल की वह धारा है जो निरन्तर बहती रहती है।

विशेष :

  1. वास्तविक प्रकाश निर्माण व रचना है।
  2. सरल खड़ी बोली में तत्सम शब्दों के साथ प्रादेशिक शब्दों का प्रयोग है।
  3. उदाहरण के द्वारा कथन का स्पष्टीकरण है।

(5) जीवन बहुत सरल नहीं है। मेहनत और ईमानदारी ही ऊर्जा बढ़ाते हैं। लाख अँधेरे आएँ, लाख आपत्तियाँ आएँ, तुम यदि अपने प्रति आस्थावान्, निष्ठावान् रहोगे, तो स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को भी प्रकाशित कर सकोगे।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक बचपन के घर में अकेला अँधेरे में खड़ा होने पर भी निरुत्साही न होकर आत्मविश्वास के साथ निर्माण के प्रकाश से प्रसन्न है। उसी समय उसे अपने पिता के द्वारा कही गयी बातें याद आती हैं-कर्मठ व्यक्ति ही निर्माण रूपी प्रकाश से संसार को सुख देता है।

व्याख्या :
लेखक के पिता ने कहा था-संसार में रहकर सुखों की प्राप्ति करना कोई सरल काम नहीं है। श्रम और ईमानदारी ही प्राणी में काम करने की शक्ति देते हैं। कर्मठता ही वह अग्नि है जो सुख रूपी भोजन को स्वादिष्ट बनाती है तब काम करने की शक्ति मिलती है। प्राणी के जीवन में चाहे अनगिनत दुःख,मुसीबतें या रुकावटें आयें परन्तु वह अपने कर्म,मेहनत, सत्य और ईमानदारी पर आस्थावान है, तो उसके विकास को कोई नहीं रोक सकता है।

वह स्वयं का ही विकास नहीं करता बल्कि जो उसके सम्पर्क में आता है उन्हें भी प्रकाश देता है, अर्थात् सुख देता है, उन्हें कर्मठ बनने की प्रेरणा देता है। यही प्रेरणा जीवन का सच्चा प्रकाश है और यही प्रकाश दीपावली के दीपक का प्रकाश है। जिस दिन मनुष्य स्वयं कर्मठ बन कर दूसरों को कर्मठ बनायेगा। वही दिन दीपावली का दिन होगा। असंख्य दीपक जलकर प्रकाश फैलायेंगे,मानव जाति निर्माण पथ पर चल पड़ेगी, तब सुख ही सुख का साम्राज्य होगा।

विशेष :

  1. कर्म और ईमानदारी ही सुख के साधन हैं,सफलता के फल हैं।
  2. छोटी-छोटी उक्तियों के माध्यम से प्राणी को अच्छाई का संदेश दिया गया है।
  3. संस्कृत गर्भित शब्दावली के साथ उर्दू के शब्दों का भी बाहुल्य है।
  4. व्यास व उद्धरण शैली का प्रयोग है।

(6) मुझे लगा हमारे भीतर की सृजन-चेतना समाप्त होती जा रही है। हिंसा, प्रतिहिंसा, स्वार्थ, छल, फरेब, दगाबाजी न जाने क्या-क्या हमारे भीतर डेरा डालकर घुप्प अँधेरे में मकड़जाल बुन रहे हैं। मन के इस अँधेरे में भटकते हम एक-दूसरे को लहूलुहान करने पर तुले हैं। इस अँधेरे को दूर करके ही हम मानवता के प्रकाश को फैला पायेंगे; तभी दीए भी हमारे लिये शाश्वत प्रकाश केन्द्र बन सकेंगे।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
निबन्ध के अन्तिम गद्यांशों में लेखक ने बताया है कि मनुष्य में आज कर्मठता, ईमानदारी,निष्ठा, आस्था आदि समाप्त हो गई है,जो समस्त दुःखों का कारण है।

व्याख्या :
डॉ. दुबे कहते हैं कि मनुष्य के दुःख का कारण उसके अपने ही अवगुण हैं। आज का प्राणी स्वार्थी,धन का लोलुप,आलसी, असत्यवादी,बेईमान बन गया है। जैसे अँधेरे में चूहे, छिपकलियाँ,मकड़ी अपना आधिपत्य जमा लेते हैं। उसी प्रकार सृजन के प्रकाश के अभाव में मनुष्य की मनोवृत्ति दूसरों को सताने, अपने स्वार्थ को सिद्ध करने, छल-कपट, धोखा करने में व्यस्त हो गयी है। इन अवगुणों के कारण दूसरे लोगों को सताने में ही आज प्राणी सुख अनुभव करता है। जिस दिन ये बुराइयाँ मनुष्य में से निकल जायेंगी या मनुष्य इन पर विजय प्राप्त कर लेगा। उसी दिन सृजन का प्रकाश फैल जायेगा और वह दिन सुख की दीपावली का दिन होगा। सद्गुणों के दीए हमेशा जलने लगेंगे। तब ही मानव जाति को जीवन का सच्चा सुख मिलेगा। इसलिए प्राणी को कर्मठ, ईमानदार, सत्यवादी, आस्थावान व निष्ठावान बनाना अनिवार्य है।

विशेष :

  1. मनुष्य को सद्गुणों से युक्त होने की प्रेरणा दी गई है।
  2. सद्गुणों से ही मनुष्य के जीवन में सृजन का प्रकाश होता है।
  3. तत्सम शब्दावली के साथ उर्दू व देशज शब्दों का प्रयोग है।
  4. शैली व्याख्यात्मक तथा उद्धरण है।

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 यशोधरा की व्यथा

In this article, we will share MP Board Class 12th Hindi Solutions Chapter 15 यशोधरा की व्यथा Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 यशोधरा की व्यथा (कविता, मैथिलीशरण गुप्त)

यशोधरा की व्यथा पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

यशोधरा की व्यथा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यशोधरा ने ‘वसंत’ किसको कहा है?
उत्तर:
यशोधरा ने बसंत राजकुमार सिद्धार्थ को कहा है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
धरती किसके ताप से जल रही है?
उत्तर:
धरती राजकुमार सिद्धार्थ की तप साधना के तप से जल रही है।

प्रश्न 3.
गौतम बुद्ध के त्याग से वृक्षों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
गौतम बुद्ध के त्याग से प्रभावित होकर वृक्षों ने भी अपने पत्ते त्याग दिए।

प्रश्न 4.
यशोधरा की विनय क्या है?
उत्तर:
यशोधरा की विनय यह है कि उसके पति के श्रम का फल सब भोगे।

यशोधरा की व्यथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कविता में गौतम बुद्ध के कौन-कौन से गुण बताए गए हैं? (M.P. 2009)
उत्तर:
गौतम बुद्ध में तपस्वी, त्यागी, दयालु, विश्व मंगलकारी और उदारता के गुण बताए गए हैं।

प्रश्न 2.
यशोधरा की निजी व्यथा लोक-व्यथा क्यों बन गई है?
उत्तर:
यशोधरा की निजी व्यथा लोक-व्यथा इसलिए बन गई क्योंकि उसके पति विश्व-कल्याण की भावना से ही उसे छोड़कर गए थे।

प्रश्न 3.
कविता में वर्णित षड्ऋतुओं में से किसी एक ऋतु का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
षड्ऋतुओं में से एक ग्रीष्मऋतु है। इस ऋतु में धूल भरी आँधियाँ चलती हैं। भीषण गर्मी के कारण प्यास से गला सूखां जाता है। शरीर से पसीना बहता रहता है। गर्मी की तीव्रता से दृष्टि झुलसी जाती है, जिसके कारण आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। पृथ्वी गर्मी से निरंतर जलती रहती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ लिखिए –

  1. तप मेरे मोहन का उद्धव धूल उड़ाता आया।
  2. अरी! वृष्टि ऐसी ही उनकी, दया-दृष्टि रोती थी।
  3. मेरी बाँह गही स्वामी ने, मैंने उनकी छाँह गही।
  4. उनके श्रम के फल सब भोगें, यशोधरा की विनय यही।

उत्तर:

  1. ग्रीष्म ऋतु में यह जो धूल उड़ रही है, यह ग्रीष्म ऋतु में उड़ने वाली धूल नहीं है, अपितु यशोधरा के पति सिद्धार्थ तप की तपस्या के परिणामस्वरूप धूल सूख गई है और वही वायु में मिलकर यहाँ आ रही है।
  2. ऐ वृष्टि! जिस प्रकार तूं निरंतर वरस रही है, उसी प्रकार मेरे प्रियतम की दया-दृष्टि हुआ करती थी।
  3. मेरे स्वामी ने अमर संबंधों के लिए मेरी बाँह पकड़ी थी, मेरा वरण किया था और मैंने उनकी शरण ली थी।
  4. मेरे प्रियतम के श्रम का फल सारा विश्व भोगे, यही यशोधरा की कामना है, यही उसकी उदारता है।

यशोधरा की व्यथा भाव-विस्तार/पल्लवन

प्रश्न 1.
आशा से आकाश थमा है।
उत्तर:
आशा के आधार पर ही आधारहीन आकाश थमा हुआ है। यदि जीवन में आशा न हो, तो जीवन व्यर्थ हो जाता है। यदि जीवन में आशा है, तभी तक जीवन निरंतर चलता रहता है। आशा है, तो जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है। निराशाभरा जीवन व्यक्ति को निष्क्रिय बना देता है। आशा से भरा व्यक्ति पुरुपार्थ करके जीवन में उन्नति (प्रगति) करता है।

प्रश्न 2.
विश्व-वेदना की चमक उन्हें होती थी।
उत्तर:
गौतम बुद्ध संसार के दुख से दुखी होते थे। विश्व को दुखों से मुक्ति के लिए ही उन्होंने गृह-त्याग किया और तपस्या की। उनके हृदय में भी विश्व-मंगल की भावना को लेकर टीस उठती थी। गौतम बुद्ध ने मानव को दुखों से मुक्ति दिलाने का मार्ग खोजा, ज्ञान प्राप्त किया और स्वयं को इस कार्य में समर्पित कर दिया।

यशोधरा की व्यथा भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित सामासिक शब्दों का विग्रह कर उनके नाम लिखिए –
वाधा-व्यथा, विश्व-वेदना, दिनमुख, नवरस, अग्नि-कुंड, दूध-दही।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 यशोधरा की व्यथा img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम और तद्भव शब्दों को छाँटिए –
पत्ता, वाष्प, सूखा, शत, साँस, प्रिय।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 यशोधरा की व्यथा img-3

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए –
मही, विश्व, सलिल, हेम, स्वामी, पेड़।
उत्तर:

  • मही – पृथ्वी, जमीन, धरती।
  • विश्व – संसार, दुनिया, जगत।
  • सलिल – जल, पानी, अंबु।
  • हेम – सोना, स्वर्ण, कनक।
  • स्वामी – मालिक, सरदार, नेता।
  • पेड़ – वृक्ष, तरु, विटप।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
‘योग’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है –

  1. उद्धव योग मार्ग का संदेश लेकर आए।
  2. मुझे विभूति रमाने का भी योग नहीं मिल सका।

इसी प्रकार के पाँच शब्द खोजकर उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर:

  • कमल – आपका नाम कमल है।
    कमल कीचड़ में खिलते हैं।
  • अर्थ – आजकल देश अर्थ अभाव से गुजर रहा है।
    स्वतन्त्रता का अर्थ है आज़ादी।
  • आम – आम आम फलों का राजा है।
    यह आम रास्ता नहीं है।
  • कल – कल वर्षा अवश्य होगी।
    इस क्षेत्र में अनेक कल कारखाने हैं।
  • अचल – हिमालय अचल भारत की उत्तर दिशा में है।
    यह मेरी अचल सम्पत्ति है।

यशोधरा की व्यथा योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
लोक कल्याण के लिए बुद्ध की तरह वैभव त्यागने वाले महापुरुषों के जीवनवृत्त संकलित कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
समाज में आदर्श प्रस्तुत करने वाली भारतीय नारियों की जीवनियों का संग्रह कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

यशोधरा की व्यथा परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
राजकुमार सिद्धार्थ यशोधरा के थे ………..।
(क) भाई
(ख) पति
(ग) सगे-संबंधी
(घ) पिता
उत्तर:
(ख) पति।

प्रश्न 2.
‘यशोधरा की व्यथा’ कविता में कवि ने प्राचीन परंपरा का आश्रय लिया है ………..।
(क) षड्ऋतु वर्णन का
(ख) बारहमासा वर्णन का
(ग) ऋतु वर्णन का
(घ) सौन्दर्य वर्णन का
उत्तर:
(क) षड्ऋतु वर्णन का।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
यशोधरा के विरह और सिद्धार्थ की तप साधना का तप ही है –
(क) ग्रीष्म की लू
(ख) ग्रीष्म की तपन
(ग) ग्रीष्म जलती किरणें
(घ) ग्रीष्म की प्यास
उत्तर:
(ख) ग्रीष्म की तपन।

प्रश्न 4.
कौन-सी ऋतु सिद्धार्थ की शांति और शोभा वृद्धि करते हुए यशोधरा की विरह बढ़ाती है?
(क) बसंत ऋतु
(ख) शिशिर ऋतु
(ग) शरद् ऋतु
(घ) हेमंत ऋतु
उत्तर:
(ग) शरद् ऋतु।

प्रश्न 5.
सिद्धार्थ के त्याग को देखकर किसने अपना क्या त्यागा? (M.P. 2012)
(क) पेड़ों ने पत्ते
(ख) बादलों ने वर्षा
(ग) पक्षियों ने उड़ना
(घ) चंद्रमा ने चाँदनी
उत्तर:
(क) पेड़ों ने पत्ते।

प्रश्न 6.
‘मेरी बाधा-व्यथा सही’ के द्वारा गुप्तजी ने प्रकट किया है –
(क) यशोधरा की आपबीती
(ख) अपनी आपबीती
(ग) यशोधरा की विरह-वेदना
(घ) यशोधरा की तप-साधना
उत्तर:
(ग) यशोधरा की विरह-वेदना।

II. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों के आधार पस्कीजिए –

  1. ‘यशोधरा की व्यथा’ में यशोधरा की ………. वेदना है। (अशान्त/विरह)
  2. ‘मैं ऊष्मा-सी यहाँ रही’ ………. अलंकार का उदाहरण है। (उपमा/रूपक)
  3. वर्षा मानो सिद्धार्थ की ………. प्रतीक है। (शान्ति/करुणा)
  4. जागी किसकी वाष्प राशि, जो सूने में ………. थी। (रोती/सोती)
  5. यशोधरा ने अपनी व्यथा अपनी ………. से कही है। (दासी/सखी)

उत्तर:

  1. विरह
  2. उपमा
  3. करुणा
  4. सोती
  5. सखी।

MP Board Solutions

III. निम्नलिखित कथनों में सत्य असत्य छाँटिए –

  1. यशोधरा की व्यथा में षड्ऋतुओं के चित्र हैं।
  2. शरद ऋतु सिद्धार्थ की करुणा है।
  3. यशोधरा का विरह अडिग है।
  4. यशोधरा की व्यथा संयोग शृंगार रस में है।
  5. यशोधरा का विरह ग्रीष्म की तपन है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

IV. निम्नलिखित के सही जोड़े मिलाइए – (M.P. 2009)

प्रश्न 1.
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 15 यशोधरा की व्यथा img-4
उत्तर:

(i) (ङ)
(ii) (ग)
(iii) (घ)
(iv) (ख)
(v) (क)।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
यशोधरा ने किसको वसंत और ऊष्मा कहा है?
उत्तर:
यशोधरा ने वसंत सिद्धार्थ को और स्वयं को ऊष्मा को है।

प्रश्न 2.
यशोधरा के अनुसार यह धरती किसके ताप और तप से जल रही है?
उत्तर:
यशोधरा के अनुसार यह धरती उसके स्वामी सिद्धार्थ के तप और उसके विरहजनित ताप से जल रही है।

प्रश्न 3.
शरदातप किसके विकास का सूचक है?
उत्तर:
शरदातप सिद्धार्थ की तपस्या के विकास का सूचक है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
यशोधरा कौन थी? (M.P.2009)
उत्तर:
यशोधरा सिद्धार्थ की धर्मपत्नी थी।

प्रश्न 5.
मैथिलीशरण गुप्त किस प्रकार के कवि हैं?
उत्तर:
मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय विचारधारा के कवि हैं।

यशोधरा की व्यथा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यशोधरा कौन थी? (M.P. 2009)
उत्तर:
यशोधरा राजकुमार सिद्धार्थ की पत्नी थी। प्रश्न 2. यशोधरा को किस बात का दुख है?
उत्तर:
यशोधरा को इस बात का दुख है कि उसे अपनी शरीर पर भस्म लगाने का भी अवसर नहीं मिला।

प्रश्न 3.
वर्षा सिद्धार्थ की किस भावना की परिचायक है?
उत्तर:
वर्षा सिद्धार्थ की करुण भावना की परिचायक है।

प्रश्न 4.
यशोधरा ने खट्टे दिन किसे कहा है?
उत्तर:
यशोधरा ने खट्टे दिन अपने जीवन के बुरे दिनों को कहा है।

प्रश्न 5.
सिद्धार्थ की शांति-कांति की ज्योत्स्ना कैसी है?
उत्तर:
सिद्धार्थ की शांति-कांति की ज्योत्स्ना हरेक पल जलती है।

प्रश्न 6.
शरद् ऋतु का सिद्धार्थ-यशोधरा पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
उत्तर:
शरद् ऋतु की शांति और शोभा को प्रदर्शित करते हुए यशोधरा के विरह को बढ़ा रही है।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.
ऋतुओं का यशोधरा के विरह पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
उत्तर:
ऋतुओं का यशोधरा के विरह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। वे उसको विचलित नहीं कर पा रही हैं। वे तो उसके विरह से पीड़ित होकर अपनी भाव-दशाओं को बदल रही हैं।

यशोधरा की व्यथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि ने इस कविता में किसकी व्यथा को व्यक्त किया है?
उत्तर:
कवि ने इस कविता तें यशोधरा की व्यथा को व्यक्त किया है। उनके पति राजकुमार सिद्धार्थ अपनी पत्नी को अर्ध रात्रि में सोता हुआ छोड़कर साधना करने के लिए राजमहल छोड़कर चले गए थे। वियोगिनी यशोधरा की विरह-वेदना को ही कवि ने प्रस्तुत किया है।

प्रश्न 2.
यशोधरा ने यह क्यों कहा कि “हाय! विभूति रमाने का भी मैंने योग न पाया।” (M.P. 2012)
उत्तर:
राजकुमार सिद्धार्थ उसे सोता हुआ छोड़कर तपस्या करने चले गए। यशोधरा चाहते हुए भी साधना हेतु शरीर पर भस्म मलकर संन्यासिनी नहीं बन सकती थी; क्योंकि उसे अपने पुत्र राहुल का पालन-पोषण करना था। इसीलिए उसने यह कहा कि “हाय! विभूत रमाने का भी मैंने योग न पाया।”

प्रश्न 3.
यशोधरा किसको अपने प्रियतम के विकास की सूचक मानती है?
उत्तर:
यशोधरा पृथ्वी तल पर शरद् ऋतु की खिली हुई धूप को अपने प्रियतम (राजकुमार सिद्धार्थ) के विकास की सूचक मानती है।

प्रश्न 4.
ग्रीष्म ऋतु में यशोधरा की क्या स्थिति हो गई?
उत्तर:
ग्रीष्म ऋतु में यशोधरा की स्थिति बड़ी भयानक और दुखद हो गई। उसका जीवन नीरस और शुष्क हो गया। उसका कंठ सूख गया। उसे पसीना छूटने लगा, “मृगतृष्णा की माया ने उसे घेर लिया। उसकी दृष्टि झुलस गयी, उसकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। उसे अपने प्रियतम की छाया भी नहीं दिखाई दे रही थी।”

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
विश्व-वेदना की चमक किसे और क्यों होती थी?
उत्तर:
विश्व-वेदना की चमक सिद्धार्थ को होती थी क्योंकि वे संसार के दुख से दुखी थे। उनके हृदय में विश्व-वेदना की कसक होती थी। इसके लिए ही उन्होंने गृह-त्याग किया। फिर घोर तपस्या की। ज्ञान प्राप्त करके सदुपदेश दिया। इस प्रकार उन्होंने विश्व-वेदना को समाप्त करने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।

यशोधरा की व्यथा कवि-परिचय

प्रश्न 1.
मैथिलीशरण गुप्त का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 ई० में उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के अन्तर्गत चिरगाँव में हुआ। वे वैश्य परिवार से थे। इनके पिता सेठ रामचरणजी भगवान राम के परमभक्त थे। गाँव में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद इनको अंग्रेजी पढ़ने के लिए मेक्डॉनल स्कूल भेजा गया, पर वहाँ उनका मन नहीं लगा। वे पढ़ाई बीच में छोड़कर गाँव चले आए।

फिर उन्होंने घर पर ही हिंदी, संस्कृत और बांग्ला साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी के सहयोग से इनमें काव्य के संस्कार उत्पन्न हुए। देश की स्वतंत्रता के बाद ये राज्य सभा के सदस्य बने। भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि प्रदान की और आगरा विश्वविद्यालय ने इन्हें डी. लिट. की उपाधि से सम्मानित किया। गुप्तजी की आरम्भिक रचनाएँ ‘वैश्योपकारक’ में प्रकाशित हुईं इसके बाद में पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होने लगीं। द्विवेदीजी के आदेश, उपदेश और प्रोत्साहन से इनकी कविताओं में निखार आया। इन्होंने साहित्य . जगत् को अनेक रचनाएँ दीं। 1964 में इनका देहांत हो गया।

साहित्यिक विशेषताएँ:
गुप्तजी राष्ट्रकवि थे। उनकी रचनाओं में सर्वत्र राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतिनिधित्व हुआ है। मात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश ने स्वाधीनता का संघर्ष किया। उसकी काव्यमय व्यंजना गुप्तजी के काव्य में देखी जा सकती है। गाँधी जी के राजनीतिक एवं सामाजिक विचारों को गुप्तजी ने उसी प्रकार अभिव्यंजित किया जैसे प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में किया है।

देश की जनता स्वतन्त्रता के लिए छटपटा रही थी और सत्याग्रही अपना सब कुछ न्योछावर कर रहे थे, उस समय गुप्तजी ने ‘भारत भारती’ लिखी। इस रचना के बाद भी गुप्तजी ने गाँधी जी के सत्याग्रह और अहिंसा की नीति, खादी और रचनात्मक कार्यक्रम, हिन्दू-मुसलमानों की साम्प्रदायिक एकता के समर्थन में काव्य स्वनाएँ कीं। अछूतोद्धार, और स्त्री-शिक्षा आदि के आंदोलनों का समर्थन भी गुप्तजी ने अपनी रचनाओं में किया। इसीलिए उन्हें राष्ट्रकवि कहा गया।

रचनाएँ:
गुप्तजी की प्रथम रचना 1909 में प्रकाशित हुई ‘रंग में भंग’। आपने मौलिक एवं अनूदित दोनों प्रकार की ही रचनाएँ कीं।

काव्य-संग्रह:
‘पद्य प्रबंध’, ‘मंगल घट’, ‘स्वदेश संगीत’ (प्रारंभिक रचनाएँ), ‘जयद्रथ वध’ (1910), ‘पंचवटी (1925), ‘झंकार’ (1929), ‘साकेत’ (1931), ‘यशोधरा’ .. (1932), ‘द्वापर’ (1936), ‘जयभारत’ (1952), ‘विष्णुप्रिया’ (1957) आदि।

नाटक:
तिलोत्तमा, चंद्रहास और अनघ।

अनूदित काव्य:
प्लासी का युद्ध, मेघनाथ-वध और ऋतु संहार। अन्य रचनाओं में चंद्रहास, विष्णुप्रिया, वृत्र-संहार, नहुष आदि प्रमुख हैं।

भाषा-शैली:
गुप्तजी ने अपने काव्य-का सृजन ब्रजभाषा में शुरू किया था। उस समय ब्रजभाषा एवं अवधी काव्य की प्रतिलित भाषा थी। धीरे-धीरे वे खड़ी बोली में काव्य-रचना करने लगे। इसके लिए गुप्तजी सदैव पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऋणी हैं। वे सरल एवं सुबोध भाषा के समर्थक रहे। उनके काव्य में यथास्थान अलंकारों का प्रयोग है। शृंगार, करुण, वीर और वात्सल्य उनके प्रिय रस हैं। उनका श्रृंगार रस अत्यंत मर्यादित हैं, उन्होंने विभिन्न छंदों का प्रयोग किया है। तुकांत, अतुकांत और गीति छंदों पर उनका अच्छा अधिकार था।

कहीं-कहीं वे इतने क्लिष्ट एवं दुर्बोध शब्दों का वे प्रयोग भी कर गए हैं, जिन्हें संस्कृत जानने वाले भी कठिनाई से ही समझ पाते हैं। कहीं-कहीं प्रांतीय बोलियों के शब्दों के प्रयोग से भी परहेज नहीं करते। इससे कभी-कभी रचना अपरिष्कृत-सी भी लगती है। कहीं-कहीं तत्सम एवं तद्भव शब्द उनकी काव्य भाषा में न केवल खटकते हैं, बल्कि भाषा को विकृत भी कर देते हैं। इसके बावजूद उनकी भाषा अर्थ अभिव्यक्ति में पूर्णतः समर्थ है। साहित्य में स्थान-राष्ट्रीय कवि गुप्त का हिंदी कवियों में अत्यधिक चर्चित और सम्मानपूर्ण स्थान है। हिंदी काव्य के क्षेत्र में आपका योगदान अविस्मरणीय रहेगा।

यशोधरा की व्यथा पाठ का सारांश

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
‘यशोधरा की व्यथा’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘यशोधरा की व्यथा’ कविता के कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। यह कविता कवि द्वारा रचित ‘यशोधरा’ नामक महाकाव्य से ली गई है। राजकुमार सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा को सोता हुआ छोड़कर आधी रात को अपनी साधना सम्पन्न करने के लिए राजमहल छोड़कर चले गए थे। यशोधरा महल में अपने पुत्र राहुल के साथ रह गई थी। वियोगिनी यशोधरा इस कविता में अपनी विरह वेदना को प्रकट कर रही है। यशोधरा अपनी सखी को सम्बोधित कर रही है। इसमें कवि ने प्राचीन षड्ऋतु वर्णन परम्परा का निर्वाह किया है।

एक के बाद एक ऋतुएँ आती हैं और विरहिणी यशोधरा के विरह को बढ़ाती हैं। यशोधरा का विरह और सिद्धार्थ की तप साधना का ताप ही ग्रीष्म की तपन है, वर्षा मानो करुणा की प्रतीक है। शरद ऋतु सिद्धार्थ की शांति और शोभा को प्रदर्शित करती हुई यशोधरा के विरह में वृद्धि करती है। शिशिर की ठण्डी साँसें प्रिय का शीतल स्पर्श है। इसी प्रकार कवि ने हेमन्त और बसंत ऋतु में भी यशोधरा के विरह-भाव को स्पष्ट किया है। ऋतुएँ ही विरहिणी यशोधरा के विरह को विचलित नहीं करती हैं अपितु वे भी यशोधरा के विरह से पीड़ित होकर अपनी भाव दशा को बदल रही है। कविता में सभी ऋतुओं का मानवीकरणी किया गया है।

यशोधरा की व्यथासंदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
सखि! बसंत से कहाँ गए थे,
मैं ऊष्मा-सी यहाँ रही।
मैंने ही क्या सहा, सभी ने।
मेरी बाधा व्यथा सही॥

तप मेरे मोहन का उद्धव धूल उड़ाता आया,
हाय! विभूति रमाने का भी मैंने योग न पाया।
सूखा कण्ठ, पसीना छूटा मृग-तृष्णा की माया,
झुलसी दृष्टि, अँधेरा दीखा, टूट गई वह छाया।
मेरा ताप और तप उनका,
जलती है यह जठर मही॥ (Page 69) (M.P. 2012)

शब्दार्थ:

  • सखि – सहेली।
  • ऊष्मा – गर्मी।
  • व्यथा – पीड़ा-दुख।
  • तप – तपस्या।
  • मोहन – श्रीकृष्ण।
  • उद्धव – कृष्ण का मित्र।
  • विभूति – राख, भस्म।
  • योग – सुअवसर, सुयोग।
  • कण्ठ – गला।
  • मृगतृष्णा – छलावा, भ्रम।
  • जठर – उदर।
  • मही – पृथ्वी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘यशोधरा की व्यथा’ से उद्धृत है। इस काव्यांश में विरह व्यथित यथोधरा अपनी सखि से पूछ रही है कि उसके मोहन अर्थात् राजकुमार सिद्धार्थ उसे अकेली छोड़कर कहाँ गए।

व्याख्या:
यशोधरा अपनी सखी से पूछ रही है कि हे सखि! बसंत वे समान सुन्दर, लुभावने और सुख देने वाले मेरे प्रियतम राजकुमार सिद्धार्थ कहाँ चले गए और मैं ग्रीष्म ऋतु-सी यहाँ रह गई, अर्थात् सिद्धार्थ के मुझे छोड़कर चले जाने से मेरा जीवन उसीप्रकार नीरस और शुष्क हो गया है, जिस प्रकार बसंत के चले जाने के बाद ग्रीष्म ऋतु में चारों ओर शुष्कता और नीरसता छा जाती है। प्रियतम की अनुपस्थिति में मुझे जिस प्रकार की विरह व्यथा को सहन करना पड़ रहा है, उसी प्रकार की पीड़ा सभी सह रहे हैं। आगे यशोधरा अपने को गोपी-रूप में और सिद्धार्थ को कृष्ण-रूप में मानकर कह रही है कि ऐ उद्धव! यह जो तुम देख रहे हो, यह ग्रीष्म ऋतु में उठने वाली धूलि के झोंके नहीं हैं।

मेरे मोहन की तपस्या से तो सारा संसार जल उठा है और उसी जलन के परिणामस्वरूप धूल सूख गई है तथा वह वायु में मिलकर यहाँ आ रही है। यशोधरा अपनी हार्दिक वेदना को व्यक्त करती हुई कहती है कि कहाँ तो एक ओर मेरे प्रियतम तपस्या कर रहे हैं और कहाँ दूसरी ओर मैं हूँ, जिसे तपस्या – तो क्या, शरीर पर भस्म लगाने का अवसर भी नहीं मिला है। कहने का भाव यह कि मेरे लिए यह भी सम्भव नहीं है कि मैं अपने प्रियतम की भाँति अपने शरीर पर भस्म रमाकर योगिनी भी बन जाऊँ, क्योंकि मुझे तो राहुल का पालन-पोषण करना है।

इस ग्रीष्म ऋतु में मेरा गला सूखा जा रहा है, शरीर से पसीना निरंतर बह रहा है और चारों ओर मृग मरीचिका दिखाई दे रही है। गर्मी की तीव्रता से दृष्टि झुलस-सी गई है, जिसके कारण आँखों के सामने अँधेरा-सा दिखाई देता है और आँखों के समक्ष अँधेरा छा जाने से प्रियतम की अथवा अपनी छाया भी नहीं दिखाई दे रही है। यशोधरा कहती है कि यह जो कठोर पृथ्वी निरंतर जल रही है, इसके जलन का कारण ग्रीष्म ऋतु नहीं है, अपितु मेरे विरह से उत्पन्न ताप और मेरे प्रियतम का तप है।

विशेष:

  1. ग्रीष्म ऋतु में यशोधरा की विरह व्यथा में सूर्य की तपन वृद्धि कर रही है।
  2. यशोधरा की विरह का ताप और सिद्धार्थ की तप साधना का ताप ही ग्रीष्म की तपन है।
  3. बसंत-से, ऊष्मा-सी में उपमा अलंकार है।
  4. यशोधरा को इस बात का दुख है कि उसे अपने प्रियतम की भाँति भस्म रमने का भी अवसर प्राप्त नहीं हुआ।
  5. मृग-तृष्णा की माया में रूपक अलंकार है।
  6. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
  7. मानवीकरण का सौन्दर्य विद्यमान है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्त संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
यशोधरा को अपना जीवन ऊष्मा-सा क्यों लगता है?
उत्तर:
यशोधरा के स्वामी सिद्धार्थ उसे छोड़कर चले गए हैं। उनके यूँ चले जाने से उसका जीवन नीरस एवं शुष्क हो गया है। उसे विरह-व्यथा सहनी पड़ रही थी, इसलिए यशोधरा को अपना जीवन ऊष्मा-सा लग रहा है।

प्रश्न (ii)
यहाँ ‘मोहन’ किसे कहा गया है? उनके तप का संसार पर क्या असर हुआ है?
उत्तर:
यहाँ ‘मोहन’ सिद्धार्थ को कहा गया है। उनके तप के प्रभाव से सारा संसार जल उठा है और धूल सूखकर हवा के साथ उड़ रही है।

प्रश्न (iii)
यशोधरा पर ग्रीष्म ऋतु का क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
ग्रीष्म ऋतु के प्रभाव से यशोधरा का गला सूखता जा रहा है। शरीर पसीने में तर हो रहा है। गर्मी के कारण आँखों के सामने अँधेरा छाया हुआ है। उसे चारों ओर मृग-मारीचिका दिखाई दे रही है।

काव्यांश पर आधारित सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य-भाव यह है कि सिद्धार्थ वसंत के समान सुंदर, सुखद और मनोहर थे। उनके चले जाने से यशोधरा का जीवन ग्रीष्म ऋतु की भाँति शुष्क हो गया है। उसे विरह-व्यथा सहनी पड़ रही है। गर्मी में उड़ती धूत उसे सिद्धार्थ के तप का प्रभाव लग रही है। वह सिद्धार्थ के समान योगिनी भी नहीं बन सकती है क्योंकि उस पर पुत्र के पालन-पोषण का दायित्व है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
काव्यांश में यशोधरा की विरह व्यथा का मर्मस्पर्शी वर्णन है। यशोधरा को दुख है कि वह भस्म रमाकर योगिनी न बन की। ‘बसंत-से’, ‘ऊष्मा-सी में ऊष्मा अलंकार, ‘मृगतृष्णा की माया’ में रूपक अलंकार तथा मानवीकरण का सौंदर्य है। भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। काव्यांश में वियोग शृंगार रस व्याप्त है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
जागी किसकी वाष्प राशि, जो सूने में सोती थी,
किसकी स्मृति के बीज उगे ये, सृष्टि जिन्हें बोती थी।
अरी! वृष्टि ऐसी ही उनकी, दया-दृष्टि रोती थी,
विश्व-वेदना की ऐसी ही चमक उन्हें होती थी।
किसके भरे हृदय की धारा,
शतधा होकर आज वही॥2॥ (Page 70)

शब्दार्थ:

  • वाष्प – भाप।
  • स्मृति – याद।
  • सृष्टि – विश्व।
  • वृष्टि – वर्षा।
  • दया – दृष्टि-दया, करुणारूपी दृष्टि।
  • विश्व-वेदना – संसार का दुख।
  • शतधा – सैकड़ों।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘यशोधरा की व्यथा’ से लिया गया है। यशोधरा अपनी विरह-व्यथा को व्यक्त कर रही है।

व्याख्या:
यशोधरा अपनी सखि को संबोधित करती हुई कहती है कि अपने प्रियतम की अनुपस्थिति में मैं जिस तरह की पीड़ा को सहन कर रही हूँ, उसी प्रकार की पीड़ा सभी सहन कर रहे हैं। यशोधरा कहती है कि वह कौन व्यक्ति है, जिसके नेत्रों से वह अश्रु-वृष्टि जग उठी है, जो सूने में सो रही थी। उसके कथन का भाव यह है कि मेरा जीवन प्रियतम से मिलने के समय इतना सुखमय था कि मैंने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि कभी विरह के कारण मेरे नेत्रों में भी आँसू आ सकते हैं; किन्तु यह विधि की विडम्बना ही है कि आज मेरे नेत्रों में निरंतर अश्रु-प्रवाह चलता रहता है।

यशोधरा के मस्तिष्क में अपने मिलन की सुखद घड़ियों की स्मृति जगती है और वह कहती है कि वह कौन व्यक्ति है जिसकी स्मृति के वे बीज आज उग आये हैं जिनका वपन सृष्टि लगातार कर रही थी। उसके कथन का आशय यह है कि आज मेरे मानस-पटल पर प्रियतम से मिलन के सुखद चित्र अंकित हो रहे हैं। ये स्मृति-चित्र बहुत पहले से ही बनते चले आ रहे हैं। यशोधरा के नेत्रों से अश्रुओं की जो वर्षा हो रही है उसे संबोधित करती हुई वह कहती है कि ऐ वृष्टि! जिस प्रकार तू निरंतर आँखों से झर रही है, उसी प्रकार तो मेरे प्रियतम की दया-दृष्टि हुआ करती थी।

जिस प्रकार आज मेरे मन में विरह की टीस उठ रही है, उसी प्रकार की टीस मेरे प्रियतम के मन में भी विश्वमंगल की भावना को लेकर हुआ करती थी। वह प्रश्न करती है कि वंह कौन व्यक्ति है, जिसके भरे-पूरे हृदय की धारा सैकड़ों खण्डों में विभक्त होकर बह रही है। यशोधरा के कथन का तात्पर्य यह है कि एक ओर तो प्रियतम के प्रेम से आप्लावित मेरा हृदय खंड-खंड हो गया है और दूसरी ओर मेरे प्रियतम का करुणापूर्ण हृदय विश्व कल्याण की भावना से द्रवित हो उठा है।

विशेष:

  1. वर्षा ऋतु सिद्धार्थ की करुणा की परिचायक है। वर्षा ऋतु यशोधरा के हृदय में सिद्धार्थ की स्मृति उत्पन्न कर रही है। अपने प्रियतम की याद उसके हृदय में विरह की पीड़ा में वृद्धि कर रही है।
  2. दया-दृष्टि में रूपक और अनुप्रास अलंकार है।
  3. विश्व-वेदना में अनुप्रास है।
  4. मानवीकरण अलंकार का सौन्दर्य विद्यमान है।
  5. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। ।
  6. छंदबद्धता और तुकांत का सुन्दर मेल है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
वाष्पराशि के जागने का क्या आशय है?
उत्तर:
यशोधरा के साथ जब तक सिद्धार्थ थे तब तक उसकी आँखों में सोए पड़े थे, किंतु अब वही आँसू आँखों से निरंतर बहते रहते हैं। ऐसा लगता है कि वाष्पराशि अर्थात् आँसू जाग गए हैं।

प्रश्न (ii)
सिद्धार्थ के मन में किस बात के प्रति दुख था?
उत्तर:
सिद्धार्थ के मन में जनकल्याण और विश्वमंगल की भावना की प्रबल आकांक्षा थी। इसे पूरा करने के लिए उनका मन दुखी था।

प्रश्न (iii)
विरहाकुल यशोधरा वर्षा को देखकर क्या सोचती है?
उत्तर:
विरहाकुल यशोधरा वर्षा को सिद्धार्थ की करुणा का परिणाम सोचती है। वह सोचती है कि उसके प्रिय का करुणापूर्ण हृदय विश्वकल्याण की भावना से पिघल उठा है।

काव्यांश पर आधारित शिल्प-सौंदर्य संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
काव्यांश में वियोगिनी यशोधरा की विरह व्यथा का मर्म स्पर्शी चित्रण किया गया है। इसके लिए षड्ऋतु वर्णन का सहारा लिया गया है। इस अंश में वर्षा ऋतु अपने विभिन्न उद्दीपनों के माध्यम से यशोधरा की विरह व्यथा और बढ़ा देती हैं। यह ऋतु उसके हृदय में सिद्धार्थ की यादें धधका देती है, जिससे उसकी व्यथा और बढ़ गई है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
विरह वियोगिनी यशोधरा वर्षा को सिद्धार्थ की करुणा का परिचायक मानती है। उसकी विरह बढ़ती जा रही है। ‘दया-दृष्टि’ में रूपक, विश्व-वेदना में अनुप्रास अलंकार है। मानवीकरण अलंकार का सौंदर्य है। भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। काव्यांश में वियोग श्रृंगार रस व्याप्त है।

प्रश्न 3.
उनकी शांति-कांति की ज्योत्स्ना, जगती है पल-पल में,
शरदातप उनके विकास का, सूचक है थल-थल में।
नाच उठी आशा प्रति दल पर, किरणों की झल-झल में,
खुला सलिल का हृदय-कमल खिल हंसो की कल-कल में
पर मेरे मध्याह्न बता क्यों,
तेरी मूर्छा बनी रही॥3॥ (Page 70)

शब्दार्थ:

  • कांति – चमक।
  • ज्योत्स्ना – चंद्रिका।
  • शरदातप – शरद्कालीन धूप।
  • थल – स्थल।
  • दल – पत्र, पत्ता।
  • सलिल – पानी।
  • हृदय-कमल – हृदय रूपी कमल।
  • मध्याह – दोपहर का समय।
  • मूर्छा – बेहोशी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘यशोधरा की व्यथा’ से लिया गया है। यशोधरा शरद् ऋतु के द्वारा अपनी विरह व्यथा को व्यक्त कर रही है। शरद ऋतु सिद्धार्थ की शांति और शोभा को प्रदर्शित करते हुए यशोधरा की पीड़ा को बढ़ा रही है।

व्याख्या:
पृथ्वी पर शरद् की जो शुभ्र चन्द्रिका छायी हुई है, उसे देखकर यशोधरा कहती है कि वस्तुतः यह चन्द्र की ज्योत्स्ना नहीं है अपितु मेरे प्रियतम की शांति एवं आभा का ही प्रकाश है जो विश्व में चारों ओर विकीर्ण हो रहा है। पृथ्वी तल पर शरद् की जो धूप छायी हुई है उसे यशोधरा अपने प्रियतम के विकास की सूचक मानती है। प्रातःकाल में पत्तों के ऊपर पड़ी हुई ओस पर किरणों की झिलमिलाहट को देखकर यशोधरा कहती है कि यह तो वस्तुतः मेरे प्रियतम की आशा ही है, जो ओस-बिन्दुओं पर पड़ी हुई किरणों के बहाने नृत्य कर रही है।

शरद् ऋतु में सरोवर का जल स्वच्छ हो गया है और उसमें कमल विकसित हो गए हैं। विकसित कमलों को देखकर ऐसा लग रहा है, जैसे मानो सरोवर का हृदय विकसित हो गया है और हंसों का समुदाय उसके आस-पास अपनी मधुर ध्वनि कर रहा है। शरद् में सरोवर का यह और आकर्षक दृश्य यशोधरा के लिए एक नूतन अर्थ का द्योतक है और वह यह कि यह सरोवर, जो सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण के समय चेष्टारहित हो गयाथा, उनके आगमन की सूचना पाकर आनन्दविभोर हो उठा है। किन्तु इतना सब कुछ होने पर भी यशोधरा के आनन्द की घड़ी अभी तक नहीं आई है। उसके जीवन की दुपहरी अब भी पहले के ही तरह बनी हुई है। वह लगातार जल रही है। जिस प्रकार दोपहर के समय पेड़-पौधे मुझ जाते हैं उसी प्रकार उसका शरीर मुझाया हुआ है।

विशेष:

  1. शरद ऋतु सिद्धार्थ के शांति और शोभा को प्रदर्शित करती हुई यशोधरा की विरह-व्यथा को बढ़ाती है।
  2. पल-पल, थल-थल, झल-झल, कल-कल में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  3. शांति-कांति में पद-मैत्री है।
  4. ‘हृदय-कमल’ में रूपक अलंकार है।
  5. ज्योत्स्ना जगती, मेरे मध्याह्न, किरणों की में अनुप्रास अलंकार है।
  6. मानवीकरण अलंकार है।
  7. भाषा तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है।
  8. छंदबद्ध रचना में तुकांतता है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
चाँदनी देखकर यशोधरा क्या सोचती है?
उत्तर:
पृथ्वी पर शरदकालीन चाँदनी बिखरी हुई है, जिसे देखकर यशोधरा सोचती है कि यह चाँद की चाँदनी नहीं, बल्कि उसके प्रिय की शांति एवं आभा की चमक है जो चारों ओर बिखर गई है।

प्रश्न (ii)
शरद ऋतु में सरोवर का सौंदर्य किस प्रकार बढ़ गया है?
उत्तर:
शरद ऋतु में सरोवर का जल स्वच्छ हो गया है। उसमें कमल खिल गए हैं। खिले कमलों से ऐसा लगता है, मानो सरोवर का हृदय विकसित हो गया है। स्वच्छ जल में हंस मधुर ध्वनि करते हुए तैर रहे हैं।

प्रश्न (iii)
यशोधरा शरद के सुहावने समय को ‘मध्याह्न’ क्यों कह रही है?
उत्तर:
शरद का समय विरहिणी यशोधरा के लिए सुखद नहीं है। उसका शरीर अब भी उसी प्रकार मुर्शाया हुआ है, जैसे दोपहरी में पौधे मुरझा जाते हैं, इसीलिए इस सुहावने समय को उसने मध्याह्न कहा है।

काव्यांश पर आधारित शिल्प-सौंदर्य संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काव्यांश में विरहाकुल यशोधरा की दशा का मार्मिक चित्रण हुआ है। षड्ऋतु वर्णन के माध्यम से यह वर्णन प्रभावी बन गया है। शरद ऋतु में चारों ओर बिखरी चाँदनी और सरोवर में खिले कमल सौंदर्य बढ़ा रहे हैं पर यशोधरा का तन-मन दोपहरी में मुरझाए पौधों जैसा है। वह विरहाग्नि में जल रही है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शरद ऋतु में फैली शोभा एवं शांति से यशोधरा की विरह व्यथा बढ़ रही है। ‘हृदय कमल’ में रूपक, ‘ज्योत्स्ना जगती’ तथा ‘मेरे मध्याह्न’ में अनुप्रास अलंकार, ‘पल-पल’, ‘थल-थल’ आदि में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार, काव्यांश में मानवीकरण अलंकार है। तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग है। अंतिम पंक्तियों में वियोग शृंगार रस घनीभूत है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
हेमपुंज हेमंत काल के, इस आतप पर बारूँ।
प्रिय स्पर्श की पुलकावलि मैं, कैसे आज बिसारूँ।
किंत शिशिर ये ठंडी साँसें, हाय कहाँ तक धारूँ,
तन गारूँ मन मारूँ पर क्या, मैं जीवन भी हारूँ।
मेरी बाँहें गही स्वामी ने,
मैं ने उनकी छाँह गही॥4॥ (Page 70)

शब्दार्थ:

  • हेमपंज – सोने का ढेर या भण्डार।
  • आतप – धूप।
  • स्पर्श – छूना। पुलकावलिरोमांच।
  • विसारूँ – भूलना।
  • धारूँ – धारण करूँ।
  • गारूँ – निचोड़ना, क्षीण करना।
  • छाँह – छोह छाया।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘यशोधरा की व्यथा’ से लिया गया है। यशोधरा अपनी विरह-व्यथा अपनी सखि से कह रही है।

व्याख्या:
ऋतुएँ परिवर्तनशील हैं। यशोधरा अपने प्रियतम के गुणों की छाया उनके विकास में देखकर उनका स्मरण कर व्यथा का विस्तार देखती है। यशोधरा गौतम को याद करती हुई अपनी सखी से कहती है कि ऐ सखि! मैं हेमन्त ऋतु की धूप पर सोने का ढेर तक निछावर करने को प्रस्तुत हूँ। आज मुझे प्रियस्पर्श के कारण हुए रोमांच का भी जो अनुभव हो रहा है, उसे कैसे भूल सकती हूँ। किन्तु अब तो शिशिर भी आ पहुँचा है।

उसके साथ भयानक शीतलता भी आयी है। ऐ सखि! बता तो सही कि मैं ठंडी साँसों को कहाँ तक सहन कर सकती हूँ। मेरा शरीर निरंतर क्षीण होता जा रहा है। मैं बार-बार अपने मन को मार रही हूँ; किन्तु इसका यह अर्थ. तो नहीं कि मैं जीवन से भी हार मान बैठू। अमर संबंधों की स्थापना के लिए प्रियतम ने मेरा वरण किया था और मैंने उनकी शरण ली थी।

विशेष:

  1. कवि ने हेमंत और शिशिर ऋतु में यशोधरा की विरह व्यथा को प्रकट किया है।
  2. हेमपुंज हेमंत, मन मारूँ में अनुपास अलंकार है।
  3. तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
  4. मानवीकरण अलंकार है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
यशोधरा हेमज न्योछावर करना चाहती है, क्यों?
उत्तर:
यशोधरा हेमंत ऋतु की कोमल धूप पर सोने का ढेर (हेमपुंज) न्योछावर करना चाहती है, क्योंकि यह धूप उसे रोमांचित कर रही है।

प्रश्न (ii)
शिशिर ऋतु का यशोधरा पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
शिशिर ऋतु में ठंड वहुत बढ़ गई है। वह भयानक हो गई है। यशोधरा का कमजोर शरीर इसे सहने में असमर्थ हो रहा है। उसका शरीर निरंतर क्षीण होता जा रहा है।

प्रश्न (iii)
हेमंत की धूप यशोधरा को किन यादों को ताजा करा रही है?
उत्तर:
हेमंत की धूप यशोधरा को रोमांचित कर रही है। इससे उसे प्रिय के स्पर्श के कारण होने वाले रोमांच की यादें ताजा हो रही हैं।

काव्यांश पर आधारित शिल्प-सौंदर्य संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काव्यांश में यशोधरा की विरह व्यथा का वर्णन किया गया है। एक ओर हेमंत की धूप उसे रोमांचित कर प्रिय की याद में दग्ध कर रही है तो शिशिर द्वारा उसके शरीर को और कमजोर करने का चित्रण है। विरह उसके शरीर को कथित एवं क्षीण कर रहा है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काव्यांश में हेमंत और शिशिर द्वारा यशोधरा की विरह बढ़ाने का मर्मस्पर्शी वर्णन है। ‘हेम-पुंज हेमंत’, ‘मन मारूँ’ में अनुप्रास तथा काव्यांश में मानवीकरण अलंकार है। भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। काव्यांश में वियोग शृंगार रस घनीभूत है।

प्रश्न 5.
पेड़ों ने पत्ते तक उनका, त्याग देखकर त्यागे।
मेरा धुंधलापन कुहरा बन, छाया सबके आगे।
उनके तप के अग्नि-कुंड-से घर-घर में है जागे,
मेरे कम्प हाय! फिर भी तुम नहीं कहीं से भागे।
पानी जमा परंतु न मेरे,
खट्टे दिन का दूध-दही॥5॥ (Page 70)

शब्दार्थ:

  • खट्टे दिन – बुरे दिन।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘यशोधरा की व्यथा’ से लिया गया है। इस काव्यांश में यशोधरा अपनी विरह-व्यथा व्यक्त कर रही है।

व्याख्या:
पतझड़ का आगमन हुआ। वनस्थली में सभी ओर पतझड़-ही-पतझड़ देखकर यशोधरा कहती है कि मेरे प्रियतम के अपूर्व त्याग को देखकर वृक्षों ने अपने पत्तों तक का त्याग कर दिया है किन्तु दूसरी ओर मेरी निराशा कुहरे का रूप धारण करके सबके सामने छा गई है। संध्या के समय बृहस्थ अपने घर के आँगन में अँगीठी जलाते हैं और उसके चारों ओर बैठकर अपना शरीर सेंकते हैं।

इसे देखकर यशोधरा कहती है कि मेरे प्रियतम की तपस्या की पंचाग्नि से प्रभावित होकर ही इन गृहस्थों ने अपने-अपने घरों में अंगीठियाँ जलायी हैं। इस प्रकार इन लोगों का तो शीत से उत्पन्न कंपन दूर हो गया; किन्तु मेरा कंपन अभी भी बना हुआ है। अंत में शेष प्रकृति को सफल होते देखकर यशोधरा कहती है कि जल तो जगकर चट्टान बन गया; किन्तु मेरे बुरे दिन अब भी दूर नहीं हुए; अर्थात् मेरी मनोकामनाएँ अभी तक पूर्ण नहीं हुईं।

विशेष:

  1. यशोधरा ने पतझड़ के द्वारा अपनी विरह व्यथा को व्यक्त किया है।
  2. दूध-दही में अनुप्रास अलंकार है।
  3. भाषा तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है।
  4. घर-घर में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  5. छंदबद्ध रचना में तुकांतता है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु, संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
पेड़ों के गिरते पत्ते देख यशोधरा क्या सोचती है?
उत्तर:
पतझड़ में पेड़ों के गिरते पत्ते देख यशोधरा सोचती है कि उसके प्रिय सिद्धार्थ का त्याग देखकर वन प्रांत के सभी वृक्षों ने अपने पत्तों का त्याग कर दिया

प्रश्न (ii)
यशोधरा की निराशा किस रूप में फैली है?
उत्तर:
विरहाग्नि में जलती यशोधरा की विरह कम होने की जगह बढ़ती ही जा रही है। इससे उसकी निराशा भी बढ़ गई है। यह निराशा चारों ओर कोहरे के रूप में छा गयी है।

प्रश्न (iii)
‘खट्टे दिन’ किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
‘खट्टे दिन’ यशोधरा के विरहयुक्त समय को कहा गया है। उसके बुरे दिन अभी समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसा इसलिए कहा गया है कि क्योंकि उसकी मनोकामना पूर्ण नहीं हुई है।

काव्यांश पर आधारित शिल्प-सौंदर्य संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काव्यांश में विभिन्न ऋतुओं के. माध्यम से यशोधरा की विरह-व्यथा का चित्रण किया गया है। पतझड़ में वनस्थली के वृक्षों के गिरते पत्तों को अपने प्रिय का अद्भुत त्याग समझती है। उसकी निराशा ही कोहरा बन चारों ओर छा गई है। अर्थात् उसकी विरह व्यथा कम नहीं हो रही है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काव्यांश में यशोधरा द्वारा पतझड़ और चारों ओर छाए कोहरे के माध्यम से विरह-व्यथा प्रकट की गई है। ‘दूध-दही’ में अनुप्रास अलंकार तथा घर-घर में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग है। काव्यांश में वियोग श्रृंगार रस व्याप्त है।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
आशा से आकाश थमा है, स्वाँस-तन्तु कब टूटे।
दिन मुख दमके, पल्लव चमके, भव ने नव रस लूटे।
स्वामी के सद्भाव फैलकर, फूल-फूल में फूटे,
उन्हें खोजने को मानो, नूतन निर्झर छूटे।
उनके श्रम के फल सब भोगें,
यशोधरा-की विनय यही॥6॥ (Page 71)

शब्दार्थ:

  • स्वाँस तंतु – साँसों के सूत्र।
  • दिन मुख – सूर्य।
  • पल्लव – पत्ते।
  • भव – संसार।
  • नव रस – नए रस।
  • नूतन निर्झर – नए झरने।
  • श्रम – परिश्रम।
  • स्वामी – पति (गौतम बुद्ध)।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘यशोधरा की व्यथा’ से लिया गया है। ऋतु परिवर्तन के बाद भी यशोधरा की व्यथा का अन्त नहीं हुआ, फिर भी वह आशा का दामन थामे हुए है। उसे विश्वास है कि उसके पति एक दिन अवश्य आयेंगे।

व्याख्या:
यशोधरा कहती है कि यह आधारहीन आकाश आशा की भित्ति पर ही टिका हुआ है। यदि जीवन में आशा न हो तो जीवन का सूत्र कभी भी टूट सकता है। रात्रि के पश्चात् नियति के क्रमानुसार दिन का आगमन होता है। अंधकार के पश्चात् सारा संसार प्रकाश से जगमगा उठता है इसलिए यशोधरा भी अपने प्रिय-मिलन की आशा को लिए जी रही है। इस समय अपने प्रियतम के वियोग में उसका जीवन रात्रि के समान अंधकारमय हो रहा है; किन्तु उसे यह दृढ़ विश्वास है कि कल उसके जीवन का भी सवेरा होगा। उसके जीवन में प्रकाश आयेगा और नये-नये पत्ते भी पल्लवित होंगे।

आकाश को अपने विश्वास के ही कारण फल मिला है। वहाँ सूर्योदय हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सारे संसार में नये आनन्द की लहर फैल गई और वनस्पतियों में अंकुर फूट पड़े। वातावरण में चारों ओर उल्लास-ही-उल्लास दृष्टिगोचर हुआ। प्रफुल्लित तथा सौन्दर्य से भरपूर पुष्पों में यशोधरा अपने स्वामी की कल्याणमयी भावनाओं का प्रतिबिंब देखती है। जिस प्रकार पुष्पों की सुगंध से समस्त उपवन महक उठा है, ठीक उसी प्रकार कल उसके पति का यश सारे संसार में फैलेगा। जब यशोधरा की दृष्टि बड़ी तेजी से बहती हुई निर्झरिणियों पर पड़ती है, तो उसे लगता है, मानो ये उसके पति के पाद-प्रक्षालनार्थ वेग से दौड़ी जा रही है।

कहने का भाव यह है कि उसे यह विश्वास है कि सिद्धि-प्राप्ति के उपरान्त मानव तो क्या, प्रकृति भी उसके प्रियतम के चरणों पर झुकेगी। सारा संसार उसके प्रियतम की पूजा करेगा और यशोधरा को उसके त्याग के प्रतिफल में अपने स्वामी का कल्याण प्राप्त होगा। यशोधरा यही विनय करती है कि उसके प्रियतम अपनी तपस्या के परिश्रम के परिणामस्वरूप जो फल लावें, उसका भोगी समस्त संसार बने।

विशेष:

  1. विरहिणी यशोधरा को भी प्रिय-मिलन की आशा है।
  2. उनके श्रम-फल सब भोगे में विश्व कल्याण की भावना झलकती है।
  3. फूल-फूल में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  4. नूतन-निर्झर में अनुप्रास अलंकार है।
  5. उन्हें खोजने को मानो, नूतन निर्झर छूटे में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
  6. भाषा तत्सम शब्दावलीयुका खड़ी बोली है।
  7. छंदबद्ध रचना में तुकांतता है।

काव्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
आकाश और जीवन में क्या समानता है?
उत्तर:
आकाश और जीवन में यह समानता है कि जिस प्रकार आकाश आधाररहित होकर आशा की दीवार पर टिका है, उसी प्रकार जीवन की आशा पर टिका है। आशा के अभाव में जीवन कभी भी टूट सकता है।

प्रश्न (ii)
यशोधरा के जीवन का अवलंब क्या है?
उत्तर:
यशोधरा के जीवन का अवलंब प्रिय से मिलन की आशा है। उसे दृढ़ विश्वास है कि प्रिय के बिना उसका जो जीवन अंधकारमय हो गया है, उसका सवेरा अवश्य होगा, जिससे उसका जीवन भी आलोकित हो जाएगा।

प्रश्न (iii)
यशोधरा क्या विनय करती है?
उत्तर:
यशोधरा यह विनय करती है कि उसके प्रिय पति अपने पति के परिश्रम के उपरांत जो भी फल लाएँ, उसका उपयोग समस्त संसार करे।

काव्यांश पर आधारित शिल्प-सौंदर्य संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सौंदर्य:
काव्यांश में विरहाकुल यशोधरा का जीवन के प्रति आशीभरे दृष्टिकोण का वर्णन है। ऋतु परिवर्तन के बाद भी वह कथित है, पर आशा की डोर थामे है। काव्यांश में उसके त्यागमयी दृष्टिकोण की झलक मिलती है जिसमें वह पति की तपस्या से प्राप्त फल से संसार के लाभान्वित होने की कामना करती है।

प्रश्न (ii)
काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिल्प-सौंदर्य:
यहाँ यशोधरा के आशावादी दृष्टिकोण एवं त्यागमयी भावना का वर्णन किया गया है, जिसमें विश्वकल्याण की झलक मिलती है। काव्यांश में अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश तथा उत्प्रेक्षा अलंकार है। भाषा तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है। काव्यांश में वियोग श्रृंगार रस की अनुभूति होती है।

MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 8 भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना

In this article, we will share MP Board Class 10th Social Science Book Solutions Chapter 8 भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 8 भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 पाठान्त अभ्यास

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष थे
(i) दादाभाई नौरोजी
(ii) अरविन्द घोष
(iii) गोपालकृष्ण गोखले
(iv) व्योमेश चन्द्र बनर्जी।
उत्तर:
(iv) व्योमेश चन्द्र बनर्जी।

प्रश्न 2.
अंग्रेजी शिक्षा को भारत में मुख्यतः लागू किया
(i) रामकृष्ण गोपाल ने
(ii) मैक्स मूलर ने
(iii) मैकाले ने
(iv) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने।
उत्तर:
(iii) मैकाले ने

प्रश्न 3.
लाला लाजपतराय ने कौन-से समाचार-पत्र के माध्यम से जनता को संघर्ष के लिए प्रेरित किया ?
(i) केसरी
(ii) संवाद कौमुदी
(iii) हिन्दुस्तान
(iv) कायस्थ समाचार
उत्तर:
(iv) कायस्थ समाचार

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन उदारवादी विचारों का नहीं था ? (2017)
(i) दादाभाई नौरोजी
(ii) अरविन्द घोष
(iii) गोपालकृष्ण गोखले
(iv) फिरोजशाह मेहता।
उत्तर:
(ii) अरविन्द घोष

प्रश्न 5.
‘स्वतन्त्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।’ यह कथन किससे सम्बन्धित है?
(i) विपिनचन्द्र पाल
(ii) लाला लाजपत राय
(iii) अरविन्द घोष
(iv) बाल गंगाधर तिलक।
उत्तर:
(iv) बाल गंगाधर तिलक।

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. वाइसराय …………… की प्रतिक्रियावादी नीति प्रजातीय भेदभाव से परिपूर्ण थी। (2017)
  2. कांग्रेस का संस्थापक …………… को माना जाता है।
  3. ‘वन्देमारतम्’ की रचना …………… ने की।
  4. 1883 में इण्डियन एसोसिएशन का राष्ट्रीय सम्मेलन …………… में बुलाया गया।

उत्तर:

  1. लॉर्ड लिटन
  2. ए. ओ. ह्यूम
  3. बंकिम चन्द्र चटर्जी
  4. कोलकाता।

सही जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 8 भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना 1
उत्तर:

  1. → (ङ)
  2. → (ग)
  3. → (क)
  4. → (ख)
  5. → (घ)

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

MP Board Solutions

प्रश्न 1.
कांग्रेस ने अपने आरम्भिक काल में दुःखों तथा शिकायतों के निराकरण के लिए कौन-से तरीके अपनाए ?
उत्तर:
कांग्रेस ने अपने आरम्भिक काल में दु:खों तथा शिकायतों के निराकरण के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाये –

  1. भारतीय राजनीतिज्ञों तथा नेताओं को एक राष्ट्रमंच पर एकत्र करना।
  2. जो व्यक्ति राष्ट्र-हित के कार्यों में लगे हों उनसे सम्पर्क करना।
  3. प्रान्तीयता, जातिवाद तथा संकीर्ण धार्मिक भावनाओं का परित्याग कर राष्ट्रीय एकता का विकास करना।
  4. जनता की मूल समस्याओं पर विचार कर सरकार तक पहुँचाना।

प्रश्न 2.
उग्रराष्ट्रवादी विचारधारा के प्रमुख नेताओं के नाम बताइए। (2016)
उत्तर:
उग्रराष्ट्रवादी विचारधारा के प्रमुख नेता लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, अरविन्द घोष आदि।

प्रश्न 3.
बहिष्कार का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर:
‘बहिष्कार’ का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से नहीं था अपितु इसका व्यापक अर्थ सरकारी सेवाओं, प्रतिष्ठानों तथा उपाधियों का बहिष्कार था।

प्रश्न 4.
लॉर्ड कर्जन ने शासन की कौन-सी नीति अपनाई? (2018)
उत्तर:
लॉर्ड कर्जन ने 1905 में फूट डालो और शासन करो’ की नीति का अनुसरण करते हुए बंगाल को दो भागों में विभाजित कर दिया। उसने बंगाल की जनता की एकता को आघात पहुँचाने और वहाँ के हिन्दुओं
और मुसलमानों में सदैव के लिए फूट डालने के उद्देश्य से विभाजन का कुटिल षड्यन्त्र रचा था जिससे बंगाल में विस्फोट की स्थिति उत्पन्न हो गयी।

प्रश्न 5.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ह्यूम ने किन उद्देश्यों को लेकर की थी ?
उत्तर:
इतिहासकारों के अनुसार ह्यूम और उसके साथियों ने अंग्रेजी सरकार के इशारे पर ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा कवच के रूप में कांग्रेस की स्थापना की। ह्यूम नहीं चाहते थे कि सरकार के असन्तोष से नाराज जनता हिंसा का मार्ग अपनाये, अतः वे जनता को हिंसा के मार्ग की अपेक्षा वैधानिक मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहते थे। ह्यूम का विचार था कि अंग्रेजी सरकार और भारतीय जनता के बीच एक कड़ी होनी चाहिए। अतः उन्होंने कांग्रेस की स्थापना की।

प्रश्न 6.
कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में कितने प्रतिनिधियों ने भाग लिया ? .
उत्तर:
कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कांग्रेस के इस प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी थे।

MP Board Solutions

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में राष्ट्रीय जागृति के विकास में पश्चिम के विचारों और शिक्षा ने क्या भूमिका निभाई? (2009, 17)
उत्तर:
अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार लॉर्ड मैकॉले ने भारतीय राष्ट्रीयता को जड़ से समाप्त करने के उद्देश्य से किया था। वह भारत में अंग्रेजी भाषा का प्रचार कर एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहता था जो ब्रिटिश साम्राज्य के हित के लिए कार्य करे। परन्तु अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों को विदेशी बन्धन से मुक्त होने की प्रेरणा दी। अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान होने के कारण भारतीय पाश्चात्य साहित्य, विचार, दर्शन और शासन प्रणाली से परिचित हुए। रूसो, वाल्टेयर, मैजिनी, बर्क और गैरीबाल्डी के विचारों ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया।

इस प्रकार पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीयों को राष्ट्रीयता, स्वतन्त्रता, समानता और लोकतन्त्र जैसे आधुनिक विचारों से अवगत कराया।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय जागृति के विकास में किन भारतीय समाचार-पत्रों ने अपनी भूमिका निभाई थी? लिखिए।
अथवा
भारत में राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने में प्रेस का क्या योगदान रहा ?
उत्तर:
जन-साधारण में जागृति लाने के लिए प्रेस एक शक्तिशाली माध्यम सिद्ध हुआ। भारतीयों में राष्ट्रीयता, देश-भक्ति और राजनीतिक विचारों का संचार करने में तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं ने बहुत सहायता की। प्रेस द्वारा ब्रिटिश सरकार की जमकर आलोचना की गयी तथा शोषण पर आधारित उनकी नीतियों का पर्दाफाश किया गया। इस कार्य को करने के लिए जिन पत्र-पत्रिकाओं ने योगदान दिया, उनमें प्रमुख हैं-अमृत बाजार पत्रिका, हिन्दू, इण्डियन मिरर, पैट्रियेट आदि। बंगाल से तथा मद्रास से स्वदेशी मित्र, हिन्दू और केरल पत्रिका, उत्तर-प्रदेश से एडवोकेट, हिन्दुस्तानी और आजाद तथा पंजाब से कोहनूर, अखबारे आम और ट्रिब्यून आदि। आधुनिकं राष्ट्रवाद के प्रसार में प्रेस ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने सरकारी नीतियों की खुलेआम आलोचना करके लोगों में विदेशी शासन के विरोध का उत्साह जाग्रत कर दिया।

प्रश्न 3.
अंग्रेजों के आर्थिक शोषण की नीति ने भारतीय कुटीर उद्योगों को कैसे प्रभावित किया ? (2009, 12, 13, 17)
उत्तर:
भारत में ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय उद्योग-व्यापार नष्ट हो गये। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् इंग्लैण्ड में सूती वस्त्र उद्योग के विकास के कारण तथा यूरोप से आयातों पर बढ़ते प्रतिबन्ध के कारण अंग्रेजी सरकार ने भारतीय उद्योगों को नष्ट करने की नीति अपनायी। भारत कुछ ही दशकों के भीतर एक प्रमुख निर्यातक स्थिति से गिरकर विदेशी वस्तुओं का सबसे बड़ा उपभोक्ता राष्ट्र बन गया। भारतीय कुटीर तथा छोटे पैमाने के उद्योगों का तेजी से पतन हो गया, क्योंकि वे इंग्लैण्ड के कारखानों के बने माल की प्रतियोगिता विदेशी सरकार की शत्रुतापूर्ण नीति के कारण न कर सके। अब वह ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन करने लगे। भारत का विदेशी व्यापार भारतीय व्यापारियों के हाथों से निकल गया।

प्रश्न 4.
भारत में बसने वाले युरोपियों (अंग्रेजों) ने इलबर्ट बिल का विरोध क्यों किया ? (2010, 12, 18)
उत्तर:
इलबर्ट बिल-लॉर्ड रिपन ने जातीय भेदभाव को दूर करने के लिए एक कानून बनाने का प्रयास किया। इसे विधि सदस्य इलबर्ट ने तैयार किया था। अतः इसे इलबर्ट बिल कहा गया है। इसके द्वारा मजिस्ट्रेट और सेशन जज को फौजदारी मुकदमों में यूरोपीय लोगों की सुनवाई का अधिकार दिया जाना था।

इलबर्ट बिल प्रजातीय भेदभाव की नीति को उजागर करता था। भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीय अपराधियों का मुकदमा सुनने का अधिकार नहीं था। इस भेदभाव को दूर करने के लिए इलबर्ट बिल लाया गया। भारत में बसने वाले यूरोपियनों ने इलबर्ट बिल का संगठित होकर विरोध किया और इसे काला कानून माना। अन्ततः ब्रिटिश सरकार को इलबर्ट बिल वापस लेना पड़ा। भारतीयों के मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 5.
कांग्रेस की स्थापना के क्या उद्देश्य थे ? लिखिए। (2018)
उत्तर:
कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन (1885) में निम्नलिखित उद्देश्य बताए

  1. साम्राज्य के विभिन्न भागों में राष्ट्र के हित के कार्यों में संलग्न ऐसे सभी व्यक्तियों में परस्पर घनिष्ठता और मित्रता को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य करना।
  2. अपने सभी राष्ट्र-प्रेमियों में जाति, धर्म या प्रान्तीयता के सभी सम्भव पूर्वाग्रहों को सीधे मित्रतापूर्ण व्यक्तिगत सम्पर्क से दूर करना और राष्ट्रीय एकता की उन भावनाओं को पूरी तरह विकसित और संगठित करना।
  3. तत्कालीन महत्वपूर्ण और ज्वलन्त सामाजिक समस्याओं के बारे में शिक्षित वर्ग के परिपक्व व्यक्तियों के साथ पूरी तरह से विचार-विमर्श करने के बाद बहुत सावधानी से इनका प्रमाणित लेखा-जोखा तैयार करना।
  4. जिन दिशाओं में और जिस तारीख से अगले बारह महीनों में देश के राजनीतिज्ञों को लोकहित के लिए कार्य करना चाहिए उनका निर्धारण करना।

प्रश्न 6.
उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में किन कारणों से उग्रराष्टवाद को प्रोत्साहन मिला? (2013)
अथवा
उग्र राष्टवाद के उदय के कोई पाँच कारण लिखिए। (2009, 12, 15)
उत्तर:
उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में निम्न कारणों से उग्र राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन मिला –

  1. अकाल व प्लेग-19 वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में भारत में कई भागों में अकाल तथा प्लेग फैला। ब्रिटिश सरकार ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। इससे लोगों में असन्तोष फैला जिससे उग्रराष्ट्रवाद ने जन्म लिया।
  2. बंगाल विभाजन-लार्ड कर्जन ने 1905 में बंग-भंग द्वारा बंगाल का विभाजन कर दिया। इससे जनता में रोष भर गया और वह उग्रराष्ट्रवाद की ओर अग्रसर हुई।
  3. धार्मिक और सामाजिक सुधारों का प्रभाव-धार्मिक और सामाजिक सुधारकों ने भारतीय जनता में आत्मविश्वास पैदा कर दिया था।
  4. विदेशी घटनाओं का प्रभाव-फ्रांस और अमेरिका की क्रान्तियों ने भी भारतीयों को प्रेरणा प्रदान की। अतः वे उग्रराष्ट्रवादी आन्दोलनों द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त करने का प्रयास करने लगे।
  5. ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीति-ब्रिटिश सरकार की आर्थिक शोषण की नीति के कारण भारतीय कृषि और उद्योग-धन्धों को अपार क्षति पहुँची। ब्रिटिश आर्थिक नीति पूँजीपतियों के हित संरक्षण की थी। इस प्रकार अंग्रेजों की आर्थिक शोषण की नीतियों ने भी उग्रराष्ट्रवाद के विकास में परम योगदान दिया।

MP Board Solutions

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय राष्ट्रीय जागृति में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलनों की भूमिका स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर:
राष्ट्रीय जागृति में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलनों की भूमिका
धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलनों ने राष्टवाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन सुधार आन्दोलनों के प्रणेता राजनीतिक जागृति के पथप्रदर्शक बने। इस आन्दोलन ने भारतीयों के हृदय में भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना उत्पन्न की। सामाजिक और धार्मिक सुधार आन्दोलन के प्रणेता-राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, श्रीमती ऐनी बेसेन्ट आदि ने भारतीयों में स्वधर्म, स्वदेशी और स्वराज्य की भावना जागृत की।

उन्नीसवीं शताब्दी के आन्दोलन मूलरूप में सामाजिक और धार्मिक थे तथा उनमें राष्ट्रीयता की भावनाओं का समावेश था। स्वामी दयानन्द सरस्वती के ‘आर्य-समाज’ स्वामी विवेकानन्द के रामकृष्ण मिशन’ के अतिरिक्त ऐसे अनेक आन्दोलन, सम्प्रदाय और व्यक्ति हुए जिन्होंने समाज में चेतना जगायी। मुसलमानों में अलीगढ़ और देवबन्द आन्दोलन, सिक्खों में सिंह सभा और गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन और थियोसोफिकल सोसायटी ने भारतीय समाज और चिन्तन को बदल डाला।

इस प्रकार भारत में सुधार आन्दोलनों ने राष्ट्रवाद के उत्थान में बहुत बड़ा योगदान दिया। उनके प्रभावों से लोगों में एकता उत्पन्न हुई और उन्होंने धर्मनिरपेक्ष तथा राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना शुरू कर दिया। फलस्वरूप लोग जातिवाद तथा संकुचित दृष्टिकोण छोड़ने लगे। इन आन्दोलनों ने लोगों में एकता की भावना का संचार किया तथा सहयोग एवं भाईचारे को बढ़ावा दिया। सुधार आन्दोलनों ने सामाजिक बुराइयों को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया न कि सम्प्रदाय के आधार पर। अतः लोगों में राष्ट्रवाद की भावना जागृत होनी स्वाभाविक थी।

प्रश्न 2.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए उत्तरदायी कारणों का विवरण दीजिए। (2014)
अथवा
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य लिखिए। (2009)
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के कारण

कांग्रेस की स्थापना ए. ओ. ह्यूम ने सन् 1885 में की थी। राम सेवानिवृत्त एक सरकारी अधिकारी था। जब वह सरकारी सेवा में था उस समय देश के विभिन्न भागों से गुप्तचर विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट देखने को मिली थी। उस रिपोर्ट से उसे यह विश्वास हो गया था कि देश में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध गहरा असन्तोष और घृणा फैली हुई है और हिंसात्मक विद्रोह की आशंका है। उसने यह अनुभव किया कि इस हिंसात्मक विद्रोह को यदि सांविधानिक दिशा नहीं दी गयी तो देश में क्रान्ति हो सकती है। इसके लिए एक राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता है। उसने अपनी इस योजना को गवर्नर जनरल लार्ड डफरिन के सामने रखा। उसने इस पर अपनी स्वीकृति दे दी। इस प्रकार अंग्रेजों ने अपनी सुरक्षा हेतु कांग्रेस की स्थापना की। कांग्रेस के स्थापना सम्मेलन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कांग्रेस के इस प्रथम सम्मेलन के अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी बने।

स्थापना के उद्देश्य – इतिहासकारों का कथन है कि ह्यूम और उसके साथियों ने अंग्रेजी सरकार के इशारे पर ब्रिटिश साम्राज्य के सुरक्षा कवच के रूप में कांग्रेस की स्थापना की। ह्यूम नहीं चाहते थे कि सरकार के असन्तोष से नाराज जनता हिंसा का मार्ग अपनाये। अत: वे जनता को हिंसा के मार्ग की अपेक्षा वैधानिक मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहते थे। संवैधानिक मार्ग से आशय है-प्रार्थना-पत्रों और प्रतिनिधि मण्डलों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को प्रभावित कर अपनी माँगें पूर्ण करवाना।

कांग्रेस के नेताओं ने कांग्रेस की स्थापना में ह्यूम का नेतृत्व स्वीकार किया क्योंकि वे तत्कालीन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार के साथ खला संघर्ष करने की स्थिति में नहीं थे। वे ब्रिटिश संरक्षण में कांग्रेस की स्थापना के विचार को लाभदायक मानते थे और ह्यूम के विचारों से सहमत थे। व्यावहारिकता इसी में थी कि वे एक मंच तैयार करने में ह्यूम को सहयोग प्रदान करें जहाँ देश की समस्याओं पर विचार-विमर्श हो सके।

कांग्रेस की स्थापना के लिए उस समय की राष्ट्रव्यापी हलचलें-देशभक्ति की भावना, विभिन्न वर्गों में व्याप्त बेचैनी, ब्रिटेन की उदारवादी पार्टी से भारतीयों को निराशा एवं विभिन्न राजनीतिक संगठनों द्वारा एक केन्द्रव्यापी संगठन की आवश्यकता महत्वपूर्ण कारण थे। इसीलिए कुछ विद्वान इसे राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति मानते हैं।

प्रश्न 3.
उदारवादी दल की कार्यविधि उग्रराष्ट्रवादी दल की कार्यविधि से किस प्रकार भिन्न थी? स्पष्ट कीजिए। (2016)
उत्तर:
उदारवादी दल और उग्रराष्ट्रवादी दल के बीच अन्तर

इन दोनों की कार्यविधि में निम्नलिखित अन्तर थे –

  1. उदारवादी अंग्रेजी शासन के अधीन रहकर आर्थिक सुधारों के पक्ष में थे, जबकि उग्रराष्ट्रवादी दल वाले यह समझते थे कि देश आर्थिक क्षेत्र में तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक यहाँ अंग्रेजी साम्राज्य का अन्त नहीं हो जाता।
  2. उदारवादी दल शान्तिमय तथा संवैधानिक रास्ता अपनाकर उद्देश्य की प्राप्ति के पक्ष में था, जबकि उग्रराष्ट्रवादी दल वाले क्रान्तिकारी तथा शक्ति के प्रयोग से अपना उद्देश्य प्राप्त करने के पक्ष में थे।
  3. उदारवादी दल वालों के प्रति सरकार का रुख उदार था, जबकि उग्रराष्ट्रवादी दल के प्रति सरकार का रुख कठोर एवं शत्रुतापूर्ण था। नरम दल के नेताओं (दादाभाई नौरोजी. गोपालकृष्ण गोखले, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी) को सरकार ने कभी बन्द नहीं किया, जबकि गरम दल के नेताओं; जैसे–लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल आदि को अनेक बार जेल भेजा गया।
  4. उदारवादी दल वाले अंग्रेजी शासन से कोई विशेष घृणा नहीं करते थे जबकि उग्रराष्ट्रवादी दल वाले ब्रिटिश साम्राज्य का अन्त करके स्वतन्त्रता प्राप्ति को अपना लक्ष्य समझते थे।
  5. उदारवादी दल के नेता राजनैतिक उन्नति के स्थान पर भारतीयों के सामाजिक व आर्थिक विकास के अधिक समर्थक थे, जबकि उग्रराष्ट्रवादी दल के नेता पहले राजनैतिक स्वतन्त्रता के पक्ष में थे। गरम दल वालों का कहना था, “स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।” उग्रराष्ट्रवादी दल वाले नेताओं का कहना था कि, “राजनैतिक स्वतन्त्रता के बिना भारतीयों की आर्थिक दशा सुधारी नहीं जा सकती।”
  6. उदारवादी पश्चिमी सभ्यता की सराहना करने वाले थे जबकि उग्रराष्ट्रवादी दल को भारतीय सभ्यता पर गर्व था।

इस प्रकार स्पष्ट है कि उदारवादी दल के नेताओं की सभी नीतियाँ व साधन उदार थे, जबकि उग्रराष्ट्रवादी दल के नेता उदार साधनों के विरुद्ध थे।

प्रश्न 4.
टिप्पणी लिखिए

(क) बाल गंगाधर तिलक
(ख) विपिनचन्द्र पाल
(ग) लाला लाजपतराय।

उत्तर:
(क) बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता थे। सर वैलेण्टाइन शिरोल के अनुसार, “तिलक भारतीय विप्लव के जन्मदाता थे। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन का रूप दिया।” तिलक भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रखते थे तथा विदेशी शासन तथा नौकरशाही को अभिशाप समझते थे। उनका विश्वास था कि स्वतन्त्रता और अधिकार भीख माँगने से प्राप्त नहीं किये जा सकते वरन् इनको प्राप्त करने के लिए सतत् संघर्षों की आवश्यकता है। उन्होंने देशवासियों को नारा दिया-“स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे हम लेकर रहेंगे।” तिलक का एक निर्भीक तथा राष्ट्रप्रेमी लेखक भी थे। उन्होंने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ नामक समाचार-पत्रों का सम्पादन किया। एक लेख ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रकाशित होने के कारण तिलक को चार माह की जेलयात्रा भी करनी पड़ी थी।

तिलक ने कांग्रेस में उग्रराष्ट्रवादी दल का नेतृत्व करना प्रारम्भ कर दिया था, अतः अंग्रेजी सरकार उनसे असन्तुष्ट हो गयी। 1907 ई. में तिलक पर पुनः आरोप लगाकर अंग्रेज सरकार ने उन्हें 7 वर्ष की सजा दी। तिलक जेल से निकलने के पश्चात पुनः स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने लगे तथा उन्होंने “होमरूल आन्दोलन” की स्थापना की तथा ऐनी बेसेण्ट के साथ मिलकर इस आन्दोलन का बड़ी सक्रियता के साथ संचालन किया। परिणामस्वरूप वे राष्ट्रीय आन्दोलन के सर्वमान्य नेता हो गये।

(ख) विपिनचन्द्र पाल

राष्ट्रीयता की उग्रराष्ट्रवादी विचारधारा के अग्रदूत विपिनचन्द्र पाल ओजस्वी वक्ता, कशल पत्रकार एवं शिक्षाशास्त्री थे। ‘न्यू इण्डिया’ और ‘वन्देमातरम्’ पत्रों के माध्यम से उन्होंने अपने विचार प्रकट किये। विपिनचन्द्र पाल ने मद्रास का दौरा किया और जनता में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चेतना का संचार किया। विपिनचन्द्र पाल तथा सुरेन्द्र बनर्जी ने बंगाल से लेकर असम तक की यात्रा की तथा स्थान-स्थान पर सभाओं का आयोजन किया तथा जनता से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने तथा विदेशी माल का बहिष्कार करने की अपील की। बंगाल में अभूतपूर्व राष्ट्रीय चेतना के विकास में विपिनचन्द्र पालन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पाल ने स्वदेशी के दिनों में देशभक्ति की नयी सशक्त भावना का सन्देश दिया। पाल ने उस समय देश में प्रचलित विजातीय तथा मूलविहीन शिक्षा-प्रणाली की भर्त्सना की और तिलक तथा अरविन्द की भाँति राष्ट्रीय शिक्षा का समर्थन किया। पाल ने दृढ़ता से कहा कि, “भारत में राजनीति को अर्थतन्त्र से, राजनीति को औद्योगिक प्रगति से पृथक् करना असम्भव है।”

वे भारत में सशक्त, साहसपूर्ण, स्वावलम्बी तथा प्रचण्ड राष्ट्रवाद के पैगम्बर के रूप में प्रकट हुए।

(ग) लाला लाजपतराय

लाला लाजपतराय पंजाब के शेर कहलाते थे। स्वाधीनता सेनानियों की पंक्ति में उनका उच्च स्थान है। वे राष्ट्रीय वीर थे। पक्के राष्ट्रवादी, समाज-सुधारक तथा स्वाधीनता के निर्भीक योद्धा के रूप में वे सम्पूर्ण देश की प्रशंसा तथा प्रेम के पात्र बन गये थे। उनका जन्म सन् 1865 ई. को लुधियाना जिले में स्थित जगराँव में हुआ था। सन् 1905 ई. में उन्होंने देश की राजनीति में सक्रिय भाग लेना शुरू किया। वे गरम दल के नेता थे। उन्होंने बंगाल विभाजन का बहुत विरोध किया। उन्होंने ‘कायस्थ समाचार’ के माध्यम से जनता को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ‘पंजाबी’, ‘वन्दे मातरम्’ (उर्दू में) और ‘द पीपुल’ इन तीन समाचार पत्रों की स्थापना की और उनके द्वारा स्वराज का सन्देश फैलाया। उन्होंने 1916 में अमेरिका में ‘यंग इण्डिया’ नामक पुस्तक लिखी। उसमें उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की व्याख्या प्रस्तुत की।

उन्होंने अपने ओजस्वी भाषणों और लेखों द्वारा जनता में महान जागृति उत्पन्न की। वे समाजवादी थे और पूँजीवादी तथा आर्थिक शोषण के सख्त विरुद्ध थे। वे किसानों तथा श्रमिकों की उन्नति चाहते थे। सन 1907 में उन्होंने सरदार अजीत सिंह से मिलकर कोलोनाइजेशन बिल के विरुद्ध आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन से ब्रिटिश सरकार आतंकित हो उठी और उसने इन दोनों देशभक्तों को बिना मुकदमा चलाये 6 माह के लिए देश से निर्वासित का दण्ड देकर माण्डले (बर्मा) की जेल में बन्द कर दिया। 18 नवम्बर, सन् 1907 को वे जेल से छूटकर लाहौर पहुँचे। वहाँ उनका भव्य स्वागत किया गया।

लाला लाजपतराय राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी प्रचार एवं विदेशी कपड़े के बहिष्कार, निष्क्रिय प्रतिरोध तथा सांविधानिक आन्दोलन के समर्थक थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन में आगे बढ़कर काम किया। उनको सन्

  • आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन : विश्वनाथ प्रसाद वर्मा, पृष्ठ 235.
  • पुनः वही, पृष्ठ 231.

1920 में कलकत्ता के कांग्रेस के अधिवेशन में सभापति चुना गया। असहयोग आन्दोलन में उनको गिरफ्तार कर लिया गया। जेल से छूटने के बाद वे तिलक के स्वराज्य दल में सम्मिलित हो गये। सन 1928 ई. में उन्होंने साइमन कमीशन का विरोध किया और लाहौर में एक जुलूस निकाला। पुलिस अधिकारी साण्डर्स ने उन पर बड़े घातक लाठी प्रहार किये, जिसके कारण 17 नवम्बर, सन् 1928 ई. को उनका स्वर्गवास हो गया। ऐसे महान देशभक्त, शिक्षाशास्त्री, ओजस्वी वक्ता और उच्चकोटि के साहित्यकार की मृत्यु से सारे देश में शोक छा गया।

MP Board Solutions

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न 1.
भारत से धन निष्कासन और उसके कारण उत्पन्न कुप्रभावों से किसने परिचित कराया ?
(i) बाल गंगाधर तिलक
(ii) दादाभाई नौरोजी
(iii) अरविन्द घोष
(iv) विपिनचन्द्र पाल।
उत्तर:
(ii)

प्रश्न 2.
‘इण्डियन लीग’ की स्थापना हुई
(i) 1875 में
(ii) 1880 में
(iii) 1885 में
(iv) 1890 में।
उत्तर:
(i)

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय आन्दोलन का उग्रराष्ट्रवादी स्वरूप सर्वप्रथम किस राज्य में परिलक्षित हुआ ?
(i) मध्य प्रदेश
(ii) गुजरात
(iii) महाराष्ट्र
(iv) राजस्थान।
उत्तर:
(iii)

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. ………………….. एक्ट द्वारा भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों के दमन करने का प्रयास किया।
  2. उदारवादियों ने लन्दन से ………………….. नामक एक समाचार-पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया।

उत्तर:

  1. वर्नाक्यूलर प्रेस
  2. इण्डिया।

सत्य/असत्य

प्रश्न 1.
1867 ई. में मुम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना हुई।
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 2.
थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने की थी।
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 3.
इलबर्ट बिल प्रजातीय भेदभाव की नीति को उजागर करता था।
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 4.
ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन के प्रमुख सदस्य बाल गंगाधर तिलक व फिरोजशाह मेहता थे।
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 5.
1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई थी।
उत्तर:
सत्य।

जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 8 भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना 2
उत्तर:

  1. → (ख)
  2. → (ग)
  3. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर:
व्योमेश चन्द्र बनर्जी

प्रश्न 2.
बंगाल का विभाजन कब और किसके द्वारा किया गया था?
उत्तर:
20 जुलाई, 1905 को लॉर्ड कर्जन द्वारा

प्रश्न 3.
“स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।” यह कथन किसने कहा था ? (2016)
उत्तर:
लोकमान्य तिलक

प्रश्न 4.
किस नाटक में नील बागान के मजदूरों पर हो रहे अत्याचारों और दुःखों को उजागर किया गया था ?
उत्तर:
नील दर्पण

प्रश्न 5.
महाराष्ट्र में गणपति उत्सव को कब और किसने सार्वजनिक रूप प्रदान किया ?
उत्तर:
1893 ई. में बाल गंगाधर तिलक।

MP Board Solutions

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बाल-लाल-पाल’ से तात्पर्य है ?
उत्तर:
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व में महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक, पंजाब के लाल लाजपतराय तथा बंगाल के विपिनचन्द्र पाल की अपनी विशिष्ट भूमिका रही थी। इस कारण ही भारत स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में इन तीनों को बाल-लाल-पाल के नाम से सम्बोधित किया गया तथा इन तीनों को राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में प्रमुख स्थान दिया गया है।

प्रश्न 2.
‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद’ की स्थापना क्यों की गई थी ?
उत्तर:
अंग्रेजी शिक्षा भारतीयों के बौद्धिक विकास को अवरुद्ध करती थी। राष्ट्रवादियों ने राष्ट्रीय शिक्षा के कार्यक्रम के माध्यम से भारतीयों के बौद्धिक विकास के लिए प्रयास किये। इसका प्रमुख उद्देश्य था-विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा देना जो देश के हितों के अनुकूल हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद’ की स्थापना की गयी।

प्रश्न 3.
कांग्रेस की स्थापना कब और किसने की थी ? (2015)
उत्तर:
कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में ए. ओ. ह्यूम ने की थी।

MP Board Solutions

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उग्रराष्ट्रवादी आन्दोलन का महत्व स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर:
उग्रराष्ट्रवादी आन्दोलन का महत्व-उग्र राष्ट्रवादियों ने ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग की अपेक्षा निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति अपनायी। जो आन्दोलन केवल शिक्षित वर्ग तक सीमित था उसे उन्होंने जन आन्दोलन में बदल दिया। उग्र राष्ट्रवादियों के आन्दोलन का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इस आन्दोलन के प्रणेताओं ने हिंसा के मार्ग को कभी नहीं अपनाया तथा आन्दोलन को प्रभावशाली बनाने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम पर विशेष जोर दिया। उन्होंने बहिष्कार में स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे रचनात्मक कार्य आरम्भ किए तथा स्वाभिमान, स्वावलम्बन और आत्मनिर्भरता जैसे आन्तरिक गुणों के विकास पर बल दिया।

प्रश्न 2.
उदारवादी कांग्रेस की प्रमख माँगें क्या थीं?
उत्तर:
उदारवादी कांग्रेस की माँगें- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों एवं अन्य अवसरों पर उदारवादियों ने जो माँगें प्रस्तुत की, उनमें प्रमुख थीं –

  1. प्रान्तीय तथा केन्द्रीय विधान सभाओं में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाए।
  2. प्रशासनिक सेवाओं का भारतीयकरण किया जाए।
  3. सेना के खर्चों में कमी की जाए।
  4. ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा का भार भारत पर न डाला जाए।
  5. कुटीर उद्योगों तथा तकनीकी शिक्षा का विस्तार किया जाए।
  6. उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति की जाएँ।
  7. किसानों पर से कर के बोझ कम किये जाएँ।

प्रश्न 3.
उदारवादियों की प्रमुख उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर:
उदारवादियों की उपलब्धियाँ-उदारवादियों की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं –

  1. उन्होंने कांग्रेस के शैशव काल में राष्ट्रीय संघर्ष के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार किया।
  2. उन्होंने भारतीयों को देश की समस्याओं पर विचार-विमर्श के लिए एक मंच उपलब्ध कराया और उन्हें राजनीतिक रूप से शिक्षित किया।
  3. उन्होंने लोगों को बताया कि विदेशी शासन से हमें क्या-क्या हानियाँ हो रही हैं।
  4. दादाभाई नौरोजी ने भारत से धन निष्कासन और उसके कारण उत्पन्न कुप्रभावों से लोगों को परिचित कराया।
  5. इन्हीं नरम-पंथी नेताओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन की नींव रखी तथा इनकी उपलब्धियाँ ही बाद में तीव्र राष्ट्रीय आन्दोलन का आधार बन गयीं।

प्रश्न 4.
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में राष्ट्रीय जागृति के क्या कारण थे ?
अथवा
भारत में राष्ट्रीय जागृति के कारणों का वर्णन कीजिए। (2010)
उत्तर:
राष्ट्रीय जागृति के लिए उत्तरदायी तत्व – 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में राष्ट्रीय जागृति के लिए निम्नलिखित प्रमुख तत्व उत्तरदायी थे –

(1) विश्व के अनेक राष्ट्रों में राष्ट्रीय जागृति उत्पन्न करने में धर्म-सुधार आन्दोलन की प्रमुख भूमिका रही है। उन्नीसवीं शताब्दी में अनेक महापुरुषों ने सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों का अन्त करने का बीड़ा उठाया और भारतीयों के सामाजिक जीवन में नयी जान डाल दी। इन महापुरुषों में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, देवेन्द्रनाथ ठाकुर, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानन्द इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन सुधारकों ने एकता, समानता एवं स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाकर भारतीय जन-जीवन में एक नयी चेतना का मन्त्र फेंक दिया।

(2) ब्रिटिश सरकार की व्यापारिक तथा औद्योगिक नीति के कारण भारतीय गृह उद्योग नष्ट हो गये जिसके कारण लाखों जुलाहे और दस्तकार बेकार हो गये थे। देश में बेरोजगारी और निर्धनता भयंकर रूप में बढ़ी। इस आर्थिक दुर्दशा के कारण जनता में असन्तोष की भावना पनपी, जो राष्ट्रीय जागृति में बहुत सहायक सिद्ध हुई।

(3) उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत समाचार-पत्रों का प्रकाशन हुआ जिनके माध्यम से राष्ट्रवादी भारतीयों ने राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया।

(4) यातायात के साधनों में सुधार तथा एक भाषा (अंग्रेजी) की प्राप्ति से भारत के नेताओं को देश के कोने-कोने में राष्ट्रीयता का प्रचार करने तथा सामान्य जनता तक अपने विचार पहुँचाने का अवसर प्राप्त हुआ, जिससे भारतीयों में राष्ट्रीय जागृति उत्पन्न हुई।

MP Board Solutions

MP Board Class 10th Social Science Chapter 8 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में राष्ट्रीयता के उदय होने के कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
वे कौनसे प्रमुख कारण थे जिन्होंने भारत में राष्ट्रीयवाद को बढ़ाने में सहायता पहुँचाई ?
उत्तर:
भारत में राष्ट्रीयता के उदय होने के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे –
(1) राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण – ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत में राजनीतिक एकता का अभाव था। भारत छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था। ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप सम्पूर्ण देश एक राजनीतिक तथा प्रशासनिक सूत्र में बँध गया। फलतः भारतवासी अपने को एक राष्ट्र मानने लगे। इससे राष्ट्रीयता की उत्पत्ति तथा विकास में भारी सहयोग मिला।

(2) 1857 का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम – 1857 की क्रान्ति भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तनशील बिन्दु था। इस आन्दोलन ने राष्ट्रीय भावनाओं को उत्तेजित किया और इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन का मार्ग साफ कर दिया।

(3) पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव-ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजी की शिक्षा शुरू हुई जिससे विभिन्न प्रान्तों के शिक्षित वर्ग के लोग अंग्रेजी द्वारा अपने विचार व्यक्त करने लगे। इस प्रकार एक भाषा-माध्यम की प्राप्ति से देश के नेताओं को देश के कोने-कोने में राष्ट्रीयता का प्रचार करने तथा सामान्य जनता तक अपने विचार पहुँचाने का अवसर प्राप्त हुआ।

(4) लॉर्ड लिटन का प्रशासन-लॉर्ड लिटन का प्रतिक्रियावादी शासन राष्ट्रीयता की भावना बढ़ाने में सहायक हुआ। उस समय देश में भयंकर अकाल पड़ा था, परन्तु लिटन ने दिल्ली में शानदार दरबार का आयोजन कर जले पर नामक छिड़कने का काम किया। इस कारण भारतीय समाचार-पत्रों ने खुलकर लिटन की आलोचना की। इससे भारतीय जनता में आक्रोश भड़का जो राष्ट्रीयता के लिए हितकर सिद्ध हुआ।

(5) साहित्य और समाचार-पत्रों का योगदान-भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि भी कतिपय साहित्यकारों द्वारा तैयार की गयी थी। इस दिशा में दीनबन्धु मित्र, ईश्वरचन्द्र, बंकिमचन्द्र, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। बंकिमचन्द्र का ‘वन्देमातरम्’ गीत भारतीय जनता के गले का हार बन गया। अंग्रेजी तथा भारतीय समाचार-पत्रों ने भी देश में राष्ट्रीय जागरण की भावना प्रसारित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें प्रमुख अमृत बाजार पत्रिका’, ‘हिन्दू’, ‘मिरर’ तथा ‘ट्रिब्यून’ इत्यादि उल्लेखनीय हैं। इन्होंने स्वदेश-प्रेम का प्रचार किया और राष्ट्रीयता की भावना जागृत की।

(6) इलबर्ट बिल-लॉर्ड लिटन के बाद लॉर्ड रिपन भारत का वायसराय बनकर आया। वह उदार था और भारतीयों को राजनीतिक शिक्षा देने का पक्षपाती था, परन्तु उसके शासनकाल में एक ऐसी घटना हुई, जिससे भारतीयों को विश्वास हो गया कि अंग्रेजों से न्याय की आशा करना भूल है और शक्तिशाली संगठन की आवश्यकता है।

(7) भारतीयों का आर्थिक शोषण-ब्रिटिश सरकार की व्यापारिक व औद्योगिक नीति के कारण भारतीय गृह-उद्योग नष्ट हो गये, जिसके कारण बेकारी फैली। इस आर्थिक दुर्दशा के कारण लोगों में असन्तोष की भावना फैली, जो राष्ट्रीय जागृति में सहायक सिद्ध हुई।

(8) भारतीयों के प्रति भेदभाव की नीति-शरू से ही अंग्रेजों ने भारतीयों के प्रति भेदभाव की नीति अपनायी थी। 1857 की क्रान्ति के बाद इस नीति को और बढ़ावा मिला। रेलगाड़ी में, क्लबों में, सड़कों पर और होटलों में ब्रिटिश लोग भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार करते थे। इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना जागृत हुई जिससे राष्ट्रीय जागृति को प्रोत्साहन मिला।

(9) यातायात तथा संचार-साधनों का विकास-ब्रिटिश शासनकाल में परिवहन, संचार व यातायात के साधनों में महत्त्वपूर्ण सुधार हुए जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रान्तों के लोग एक दूसरे से मिलने लगे और परस्पर विचारों का आदान-प्रदान शुरू हुआ। नेताओं के परस्पर सम्पर्क के कारण राष्ट्रीय जागृति कायम करने में भरपूर सहायता मिली।

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी

In this article, we will share MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Durva Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी (गद्यम्) (सङ्कलितम्)

MP Board Class 10th Sanskrit Chapter 16 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक पद में उत्तर लिखिए)।
(क) भारतीयसमाजे का सदैव पूज्या अस्ति? (भारतीय समाज में कौन हमेशा पूजनीय है?)
उत्तर:
नारी (स्त्री)

(ख) मैत्रेयी कस्य पत्नी आसीत्? (मैत्रेयी किसकी पत्नी थी?)
उत्तर:
याज्ञवल्क्यस्य (याज्ञवल्क्य की)

MP Board Solutions

(ग) जनकः सीताम् अध्यापयितुं कां नियोजितवान्? (जनक ने सीता को पढ़ाने के लिए किसे नियुक्त किया?)
उत्तर:
मैत्रेयीम् (मैत्रेयी को)

(घ) आश्रमव्यवस्था का पश्यति स्म? (आश्रम की व्यवस्था कौन देखती थी?)
उत्तर:
कात्यायनी (कात्यायनी)

(ङ) सर्वस्य जलस्य आधारः कः? (सारे जल का आधार क्या है?)
उत्तर:
समुद्रः (समुद्र)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत-(एक पाक्य में उत्तर लिखिए)
(क) देवताः कुत्र रमन्ते? (देवता कहाँ खुश होते हैं?)
उत्तर:
यत्र नार्यः पूज्यन्ते देवताः तत्र रमन्ते। (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता खुश होते हैं।)

(ख) मैत्रेयी सीतां केषां ज्ञानं दत्तवती? (मैत्रेयी ने सीता को किसका ज्ञान दिया?)
उत्तर:
मैत्रेयी सीतां वेदानां संस्काराणाम् इन्द्रियनिग्रहस्य च ज्ञानं दत्तवती। (मैत्रेयी ने सीता को वेदों, संस्कारों और इन्द्रियों के संयम का ज्ञान दिया।)

(ग) धनेन किं न प्राप्यते। (धन से क्या नहीं मिलता?)
उत्तर:
धनेन अमृतत्वं न प्राप्यते। (धन से अमृतत्व प्राप्त नहीं होता।)

(घ) अमृतत्वस्य साधनं किम्? (अमृतत्व का साधन क्या है?)
उत्तर:
अमृतत्वस्य साधनम् आत्मसाक्षात्कारः आस्त। (अमृतत्व का साधन अपने को जानना है।)

(ङ) कः मुक्तिं प्राप्तुं न शक्नोति? (कौन मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता?)
उत्तर:
यः सर्वाणि भूतानि आत्मनः भिन्नानि पश्यति सः मुक्तिं प्राप्तुं न शक्नोति। (जो सब प्राणियों की आत्मा को भिन्न देखता है, वह मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए-)
(क) देवताः कुत्र रमन्ते? कुत्र न रमन्ते? (देवता कहाँ खुश होते हैं? कहाँ नहीं?)
उत्तर:
यत्र नार्यः पूज्यन्ते, देवता तत्र रमन्ते। यत्र ताः अपमानिताः भवन्ति, तत्र न रमन्ते। (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता खुश होते हैं, जहाँ उनका अपमान होता है, वहाँ वे खश नहीं होते।)

(ख) उपनिषत्काले भारते नारीणां दशा कीदृशी आसीत्? (उपनिषद् के समय में भारत में नारियों की दशा कैसी थी?)
उत्तर:
उपनिषत्काले स्त्री शिक्षायाः महत्वम् अधिकम् आसीत्। ताः वेदाध्ययनम् अपि कुर्वन्ति स्म। तासाम् उपनयन संस्कारः अपि भवति स्म।
(उपनिषद् काल में स्त्री शिक्षा का महत्व बहुत अधिक था। वे वेदों का अध्ययन भी करती थीं। उनका उपनयन संस्कार भी होता था।)

(ग) याज्ञवल्क्यः मैत्रेयीं कात्यायनी च आहूय किम् उक्तवान्? (याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी और कात्यायनी को बुलाकर क्या कहा?)
उत्तर:
याज्ञवल्क्यः मैत्रेयीं कात्यायनी च आहूय उक्तवान् यत्-“अद्य अहं गृहस्थाश्रमं त्यक्त्वा संन्यासाश्रमं स्वीकरोमि। मम गमनादनन्तरं युवयोर्मध्ये कलहः मा भवतु। अतः सम्पत्ति विभाजनं कृत्वा एव गच्छामि” इति।

(याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी और कात्यायनी को बुलाकर कहा-“आज मैं गृहस्थाश्रम छोड़कर संन्यासाश्रम ले रहा हूँ। मेरे जाने के बाद तुम दोनों के बीच झगड़ा न हो। इसलिए सम्पत्ति का विभाजन करके ही जाऊँगा।”)

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
प्रदत्तशब्दैः रिक्तस्थानानि पूरयत-(दिए गए शब्दों से रिक्त स्थान भरिए-)
(अद्वितीयं, आत्मा, मैत्रेयी, अमृतत्वस्य, वेदाध्ययन)
(क) सर्वेषु शरीरेषु…………. एक एव।
(ख) मैत्रेयी…………. कुर्वती आसीत्।
(ग) एकमेव ………….परब्रह्म।
(घ) याज्ञवल्क्यात् …………. ब्रह्मज्ञानं प्राप्तवती।
(ङ) आत्मसाक्षात्कारः एव …………. साधनम्
उत्तर:
(क) आत्मा
(ख) वेदाध्ययनं
(ग) अद्वितीयं
(घ) मैत्रेयी
(ङ) अमृतत्वस्य।

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् ‘आम्’ अशुद्धवाक्यानां समक्षम् ‘न’ इति लिखत
(शुद्ध वाक्यों के सामने ‘आम्’ तथा अशुद्ध वाक्यों के सामने ‘न’ लिखिए-)
(क) आत्मा एव अखिलविश्वस्य आधारः अस्ति।
(ख) धनेन अमृतत्वं प्राप्यते।
(ग) वैदिककाले नारी शिक्षिता आसीत्।।
(घ) उपनिषत्काले नारीणाम् उपनयनसंस्कारः अपि क्रियते स्म।।
(ङ) कात्यायनी सीतां ज्ञानं दत्तवती।
उत्तर:
(क) आम्:
(ख) न:
(ग) आम्:
(घ) आम्:
(ङ) न।

प्रश्न 6.
अधोलिखितशब्दानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनं च लिखत
(नीचे लिखे शब्दों के मूलशब्द, विभक्ति और वचन लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी img 1
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी img 2

प्रश्न 7.
अधोलिखितशब्दानां धातुं लकारं च लिखत
(नीचे लिखे शब्दों के धातु और लकार लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी img 3
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी img 5

प्रश्न 8.
अधोलिखितशब्दानां धातुं प्रत्ययञ्च पृथक कुरुत
(नीचे लिखे शब्दों के धातु और प्रत्यय अलग कीजिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी img 6
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 16 ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी img 4

प्रश्न 9.
अधोलिखितशब्दानां पर्यायशब्दान् लिखत
(नीचे लिखे शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए-)
यथा- नारीणाम् – स्त्रीणाम्
(क) सङ्कटकाले
(ख) उपनयनसंस्कारः
(ग) समुद्रे
(घ) पतिः
उत्तर:
(क) सङ्कटकाले – आपत्तिकाले/आपत्काले
(ख) उपनयनसंस्कारः – यज्ञोपवीतसंस्कारः
(ग) समुद्रे – सागरे
(घ) पतिः – भर्ता, स्वामी

प्रश्न 10.
अव्ययैः वाक्यनिर्माणं कुरुत-(अव्ययों से वाक्य बनाइए-)
यथा- यदा-तदा – यदा रामः पठति तदा कृष्णः पठति
(क) कृते
(ख) एव
(ग) बहिः
(घ) यत्र।
उत्तर:
(क) कृते – अहम् तव कृते कार्यं करोमि। (मैं तुम्हारे लिए काम करता हूँ।)
(ख) एव – रामः एव नृपः अभवत्। (राम ही राजा बने।)
(ग) बहिः – ग्रहात् बहिः वृष्टिः भवति। (घर के बाहर वर्षा हो रही है।)
(घ) यत्र – यत्र त्वम् कथयिष्यसि वयं तत्र गमिष्यामः (जहाँ तुम कहोगे हम सब वहीं चलेंगे।)

MP Board Solutions

योग्यताविस्तार –

वैदिककाले याः अन्याः ब्रह्मवादिन्यः आसन् तासां विषये अन्विष्य पठत।
(वैदिक काल में जो अन्य ब्रह्मवादिनी है; उनके विषय में ढूँढ़ कर पढ़िए।)

वैदिककाले नारीणां दशा भारतवर्षे कीदृशी आसीत् लिखत।
(वैदिक काल में भारत में नारी की दशा कैसी थी लिखिए।

ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ में ‘ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी’ की विद्वत्ता का संक्षेप में वर्णन किया गया है। उनके जीवन-चरित्र पर भी प्रकाश डाला गया है कि वे याज्ञवल्क्य की पत्नी थी। वैदिक ज्ञान से युक्त थी तथा अधिक विदुषी थी। उनके कारण नारी जाति का स्थान समाज में ऊँचा हुआ था।

ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी पाठ का अनुवाद

1. भारतीयसमाजे नारी सदैव सम्मानार्हा पूज्या च अस्ति। अत एवोक्तम्
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

यत्र नारीणाम् आरः भवति तत्र देवताः स्वयं निवसन्ति। परं यत्र ताः अपमानिताः भवन्ति तत्र सर्वाणि कार्याणि विफलानि भवन्ति।

भारते वैदिककाले उपनिषत्काले च नारी शिक्षिता आसीत्। सा न केवलम् अध्ययनम् अपितु सूक्तरचनाः अपि करोति स्म। वैदिककाले अपाला, घोषा, विश्ववारा, मैत्रेयी एतादृश्यः ब्रह्मवादिन्यः आसन् । उपनिषत्काले ताः जीवनविषयकं जगद्विषयकञ्च ज्ञानम् अधिगन्तुम इच्छन्ति स्म उपनिषत्काले वेदाध्ययनस्य कृते तासाम् उपनयनसंस्कारः अपि क्रियते स्म। “पुरा कल्पे तु नारीणां मौजीबन्धनमिष्यते” इत्यनेन स्मृतिवचनेन तद् ज्ञायते।

शब्दार्थाः :
सम्मानार्हा-सम्मान के योग्य- adorable, deserving honour; रमन्ते–आनन्दित होते हैं-enjoy, feel delighted; सूक्तरचनाः-वैदिक सूक्तों की रचना-composing vedic hymns; ब्रह्मवादिन्यः-ब्रह्मतत्व को जानने वाली/अध्यापन कराने वाली-knowers of delicacies of Brahman; अधिगन्तुम-जानने के लिए-to know/ to teach; मौजीबन्धनम्-मुंज की घास का बना कटि सूत्र पहनना-wearing a sacred thread of grass.

अनुवाद :
भारतीय समाज में नारी सदैव सम्मान के योग्य व पूजनीय (रही) है। इसलिए कहा भी है
जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहीं देवता खुश होते हैं, जहाँ उनकी पूजा नहीं होती, वहाँ सभी कार्यों के फल प्राप्त नहीं होते।”

जहाँ नारियों का आदर होता है, वहाँ देवता स्वयं निवास करते हैं। पर जहाँ वे अपमानित होती हैं वहाँ सब कार्य विफल होते हैं।

भारत में वैदिक काल में और उपनिषद् काल में नारी शिक्षित थी। वह न केवल पढ़ती थी बल्कि सूक्तों की रचना भी करती थी। वैदिक समय में अपाला, घोषा, विश्ववारा, मैत्रेयी ऐसी ब्रह्मतत्व को जानने वाली थीं। उपनिषद् काल में वे जीवन विषयक और जगद विषयक का ज्ञान जानने के लिए इच्छुक थीं। उपनिषद् काल में वेदाध्ययन के लिए उनका उपनयन-संस्कार भी किया जाता था। “प्राचीन समय में तो नारियों के मौजी बंधती थी” इन स्मृति के वचनों के द्वारा यह ज्ञात होता है।

English :
Women were always held in respect. They were educated-composed vedic hymns also-women studied Brahman during vedic age–Their thread ceremony was held in upanisdic ageThey wore the girdle of grass.

MP Board Solutions

2. याज्ञवल्क्यस्य भार्याद्वयम् आसीत्। कात्यायनी मैत्रेयी च। कात्यायनी गृहकर्मकुशला आश्रमव्यवस्थां पश्यति स्म। मैत्रेयी आध्यात्मिकरूचिसम्पन्ना वेदाध्ययनं शास्त्रचर्चा च कुर्वती आसीत्। महाराजजनकः तस्याः पाण्डित्यम् अध्यापनकौशलं ज्ञात्वा तां सीताम् अध्यापयितुं नियोजितवान्। मैत्रेयी सीतां वेदानां संस्काराणाम् इन्द्रियनिग्रहस्य च ज्ञानं दत्तवती। एतादृशेण अध्यापनेन दृढसंस्कारैः च सीता स्वजीवने सङ्कटकाले अपि न विचलिता अभवत्।

शब्दार्थाः :
पाण्डित्यम्-ज्ञान को-learning, wisdom, knowledge; इन्द्रियनिग्रहस्य-इन्द्रियों के संयम का-restraint over senses.

अनुवाद :
याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थीं। कात्यायनी और मैत्रैयी। कात्यायनी घर के कार्यों में कुशल थी तथा आश्रम की व्यवस्था देखती थी। मैत्रेयी आध्यात्मिक रूचि से सम्पन्न वेदाध्ययन और शास्त्रचर्चा करती थी। महाराज जनक ने उनके ज्ञान को तथा अध्यापन कौशल को जानकर उन्हें सीता को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया। मैत्रेयी ने सीता को वेदों का, संस्कारों का और इन्द्रियों को संयम में रखने का ज्ञान दिया। ऐसे अध्यापन तथा दृढ़ संस्कारों से ही सीता अपने जीवन में सङ्कट के समय में भी विचलित नहीं हुई।

English :
Maitreyi was Yagyavalkayas’s wife she had spiritual tastes-she read vedas and discussed scriptures-king Janak engaged her to teach vedas, sacraments and sense restraint to Sita.

3. एकदा याज्ञवल्क्यः मैत्रेयीं कात्यायनी च आहूतवान् तथा उक्तवान्-“अद्य अहं गृहस्थाश्रमं त्यक्त्वा संन्यासाश्रम स्वीकारोमि। मम गमनादनन्तरं युवयोर्मध्ये कलहः मा भवतु। अतः सम्पत्तिविभाजनं कृत्वा एवं गच्छामि” इति। पत्युः निर्णयं श्रुत्वा मैत्रेयी चिन्तामग्ना अभवत्। यदि मम सर्वाधारः पतिः संन्यासं स्वीकरोति तर्हि एतेन नश्वरेण धनेन किम्? इति विचिन्त्य सा उक्तवती-“भगवन् अनेन ऐश्वर्येण युक्तं पृथिवीं प्राप्य अहम् अमृता भविष्यामि वा?” नहि।” “धनेन धनिकः मनुष्यः यथा जीवनं सुखेनैव यापयति तथैव भवत्याः अपि जीवन सुखमयं भवेत्। परम् एतेन धनेन अमृतत्वं न प्राप्यते” इति याज्ञवल्क्यः उक्तवान्।

तत् श्रुत्वा मैत्रेयी अवदत्-“यदि वित्तेन नाहम् अमृता भविष्यामि तर्हि धनं स्वीकृत्य किं करोमि? यत् अमृतत्वस्य साधनम् अस्ति तद् वदतु भवान्।”

शब्दार्थाः :
आहूतवान्-बुलाया-called; गमनादनन्तरम्-जाने के बाद-after departure; युवयोर्मध्ये–तुम दोनों के बीच में-between you both; सर्वाधारः-सम्पूर्ण आधार-basis.

अनुवाद :
एक बार याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी और कात्यायनी को बुलाया और कहा-“आज मैं गृहस्थाश्रम छोड़कर संन्यासाश्रम स्वीकार कर रहा हूँ। मेरे जाने के बाद तुम दोनों के बीच क्लेश न हो। इसलिए सम्पति का विभाजन करके ही जाऊँगा।” पति का निर्णय सुनकर मैत्रेयी चिन्तित हो गई। यदि मेरा सम्पूर्ण आधार पति संन्यास ले रहे हैं तो इस नश्वर धन से क्या? यह सोचकर उसने कहा-“भगवन्! इस ऐश्वर्य से युक्त पृथ्वी को प्राप्त कर मैं अमर हो जाऊँगी क्या?” नहीं। “धन से धनवान् मनुष्य जैसे जीवन सुख से ही बिताता है वैसे ही तुम्हारा जीवन भी सुखमय हो। पर इस धन से अमरत्व नहीं मिलेगा” ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा। यह सुनकर मैत्रेयी ने कहा- “यदि धन से मैं अमर नहीं होऊँगी तो धन लेकर क्या करूँगी? जो अमरत्व का साधन है, आप वह कहिए।”

English :
Yagyavalkya desired to make division of property between his wife Katyayani and Maitrayi. Maitrayi called the worldly possessions useless-They could not make her immortal-rejected the acceptance (offer) of division.

4. स्वपल्याः ब्रह्मजिज्ञासां ज्ञात्वा याज्ञवल्क्यः आत्मनिरूपणम् आरब्धवान्-“मैत्रेयि! पत्न्याः कृते पतिः प्रियः भवति, पुत्रः प्रियः भवति। परं सः पुत्रस्य कृते पत्युः कृते वा प्रियः न भवति, अपितु आत्मनः कृते प्रियः भवति। तथैव धनं प्रियं भवति, देवाः प्रियाः भवन्ति। परं सर्वम् आत्मनः कृते एव। यस्मिन् आत्मनि वयं स्निह्यामः सः एकः एव। अयं ब्राह्मणः, अयं क्षत्रियः इति एतेषां शरीराणि भिन्नानि परन्तु तेषु शरीरेषु सर्वेषु आत्मा एक एव। यः सर्वाणि भूतानि आत्मनः भिन्नानि पश्यति सः मुक्तिं प्राप्तुं न शक्नोति। सर्वेषु शरीरेषु एकः एव आत्मा इति यः जानाति सः मुक्तिं प्राप्नोति। अयम् आत्मा एव अखिलस्य विश्वस्य आधारः इति। ‘कथम्’ इति तं मैत्रेयी अपृच्छत्।

शब्दार्थाः :
आरब्धवान्-शुरू किया-began; आत्मनः-स्वयं का-of self;स्निह्यापः-स्नेह करते हैं-love, attachment.

अनुवाद :
अपनी पत्नी की ब्रह्म जिज्ञासा को जानकर याज्ञवल्क्य ने आत्मा का निरूपण शुरू किया-“मैत्रेयी! पत्नी के लिए पति प्रिय होता है, पुत्र प्रिय होता है। परन्तु वह पुत्र के लिए और पति के लिए प्रिय नहीं होता, बल्कि अपने लिए प्रिय होता है। वैसे ही धन प्रिय होता है, देव प्रिय होते हैं। पर सब अपने ही लिए। जिस आत्मा में हम स्नेह रखते हैं वह एक ही है। यह ब्राह्मण है, यह क्षत्रिय है, इस प्रकार शरीर भिन्न हैं पर उन सब शरीरों में आत्मा एक ही है। जो सब प्राणियों की आत्मा को भिन्न देखता है, वह मुक्ति नहीं पा सकता। सब शरीरों में एक ही आत्मा है जो यह जानता है वह मुक्ति प्राप्त करता है । यह आत्मा ही पूरे विश्व का आधार है। ‘कैसे’ मैत्रेयी ने उससे पूछा।

MP Board Solutions

English :
Yagyavalkaya started describing the soul one loves every being or object for one’s own sake. There is a single soul in all bodies of all castes-one who knows this seeks salvation and vice versa.

5. याज्ञवल्क्यः उदाहरणेन स्पष्टं कृतवान्-“यथा सर्वस्य जलस्य समुद्रः एव आधारः। समुद्रात् निर्मितं जलं पुनः समुद्रे एव विलीनं भवति। तथैव ब्रह्मतत्वात् निर्मितं विश्वं तत्रैव विलीनं भवति। इदं ब्रह्मतत्वं सम्पूर्णविश्व व्याप्तम् अस्ति। यथा शर्करा जले सर्वत्र समानरूपेण व्याप्ता भवति तथैव आत्मा अपि अन्तर्बाह्यव्याप्तः। अयमात्मा सर्वेषां देहे तिष्ठति। देहः नश्वरः। यदा सः देहे तिष्ठति तदा तस्य भिन्नानिनामानि सन्ति। देहनाशादनन्तरम् आत्मा देहात बहिः निर्गच्छति, तदा तस्य कापि संज्ञा नास्ति। सः न नश्यति। तत्र विकाराः अपि न भवन्ति। एकमेव अद्वितीयं परब्रह्म। यदा तस्य ज्ञानं भवति तदा सर्वं विदितं भवति। अमृतत्वं च प्राप्यते।

अस्य अमृतत्वस्य साधनं किम्? इति मैत्रेयी अपृच्छत्। तदा याज्ञवल्क्यः उक्तवान्-आत्मसाक्षात्कारः एव अमृतत्वस्य साधनम्। इति ब्रह्मनिरूपणं कृत्वा याज्ञवल्क्यः संन्यासं स्वीकृतवान्। एवं ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी याज्ञवल्क्यात् ब्रह्मज्ञानं प्राप्तवती।

नास्ति कुत्रचित् एतादृशी ब्रह्मवादिनी स्त्रीः या धनं विहाय ब्रह्मज्ञानम् इच्छति। अतः मैत्रेयी भारतीयसंस्कृती आदर्शभूता।

शब्दार्थाः :
अन्तर्बाह्यव्याप्तः-अन्दर और बाहर (शरीर व संसार में) व्याप्त-pervading bothinsideand outside the body; विकाराः-दोष-deformation; विदितम्-ज्ञात-is known; आत्मसाक्षात्कार-स्वयं को जानना-knowing of self; ब्रह्मनिरूपणम्-ब्रह्म का निरूपण-description of brahman.

अनुवाद :
याज्ञवल्क्य ने उदाहरण से स्पष्ट किया-“जैसे सारे जल का आधार समुद्र ही है। समुद्र से बन कर जल फिर समुद्र में ही विलीन होता है। वैसे ही ब्रह्मतत्व से बना विश्व उसी में लीन होता है। यह ब्रह्मतत्व पूरे विश्व में व्याप्त है। जैसे शक्कर पूरे जल में समान रूप से व्याप्त होती है, वैसे ही आत्मा भी अन्दर और बाहर (शरीर और संसार में) व्याप्त होती है, यह आत्मा सबके शरीर में रहती है। शरीर नश्वर है। जब वह शरीर में होती है, तब उसके अलग-अलग नाम होते हैं। शरीर के नष्ट होने के बाद आत्मा शरीर से बाहर निकल जाती है, तब उसका कोई नाम नहीं होता। वह नष्ट नहीं होती। उसमें कोई विकार नाम नहीं होता। एक ही अद्वितीय परब्रह्म है। जब उसका ज्ञान होता है तब सबका ज्ञान होता है। और अमृतत्व की प्राप्ति होती है।

इस अमृतत्व का साधन क्या है? ‘मैत्रेयी ने पूछा। तब याज्ञवल्क्य ने कहा- “स्वयं को जानना ही अमृतत्व का साधन है। इस प्रकार ब्रह्मनिरुपण करके याज्ञवल्क्य ने संन्यास स्वीकार किया। इस तरह ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया।

ऐसी ब्रह्मवादिनी स्त्री कहीं नहीं है, जो धन को छोड़कर ब्रह्मज्ञान चाहती है। अतः मैत्रेयी भारतीय संस्कृति में आदर्श है।

English :
Yagyavalkaya quoted many instances-sea is the basis of all water—as oceanic water returns to oceanso individual souls return to divine (cosmic) soul element of supreme scul exist in individual soul as sagar in water. Soul is named differently according to bodies-Soul never dies with the body. It knows no deformation or distortion-He who knows supreme Brahman seeks salvation.

Maitreyi was unique since she discarded wealth to obtain supreme knowledge.

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions

MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय

In this article, we will share MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय

राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय Important Questions

राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न (a)
समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन का विषय है –
(a) राष्ट्रीय आय का सिद्धांत
(b) उपभोक्ता का सिद्धांत
(c) उत्पादक का सिद्धांत
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(a) राष्ट्रीय आय का सिद्धांत

प्रश्न (b)
निम्नलिखित में कौन-सा प्रवाह नहीं है –
(a) पूँजी
(b) आय
(c) निवेश
(d) मूल्य ह्रास।
उत्तर:
(a) पूँजी

MP Board Solutions

प्रश्न (c)
राष्ट्रीय आय का मापन निम्नलिखित में किस विधि से किया जाता है –
(a) उत्पादन विधि
(b) आय विधि
(c) व्यय विधि
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न (d)
प्राथमिक क्षेत्र में निम्नलिखित में कौन शामिल है –
(a) भूमि
(b) बन
(c) खनन
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न (e)
एक वर्ष की राष्ट्रीय आय को जनसंख्या से भाग देने पर प्राप्त होती है –
(a) निजी आय
(b) व्यक्तिगत आय
(c) व्यक्तिगत व्यय योग्य आय
(d) प्रति व्यक्ति आय।
उत्तर:
(d) प्रति व्यक्ति आय।

MP Board Solutions

प्रश्न (f)
उत्पादन करने वाले उद्यमों को बाँटा जाता है –
(a) दो क्षेत्रों में
(b) तीन क्षेत्रों में
(c) चार क्षेत्रों में
(d) पाँच क्षेत्रों में।
उत्तर:
(b) तीन क्षेत्रों में

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. कृषि को …………………………….. क्षेत्र में शामिल किया जाता है।
  2. पीगू ने कल्याण को ………………………….. भागों में बाँटा है।
  3. चीनी उत्पाद अर्थव्यवस्था के …………………………………. क्षेत्र में सम्मिलित होता है।
  4. भारत में राष्ट्रीय आय की गणना का कार्य …………………………….. करता है।
  5. एक लेखा वर्ष की अवधि में देश की भौगोलिक सीमाओं के अंतर्गत उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के योग को …………………………….. कहते हैं।
  6. …………………………. आय देश के आर्थिक विकास का सूचक होती है।

उत्तर:

  1. प्राथमिक
  2. दो
  3. द्वितीयक
  4. केन्द्रीय सांख्यिकीय
  5. GDP
  6. राष्ट्रीय।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
सत्य /असत्य बताइये –

  1. भारत की प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों की तुलना में काफी कम है?
  2. काले धन ने देश में समानान्तर अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है?
  3. भारत की राष्ट्रीय आय में सर्वाधिक योगदान द्वितीयक क्षेत्र का है?
  4. प्राथमिक क्षेत्र में विद्युत्, गैस एवं जलापूर्ति को सम्मिलित किया जाता है?
  5. उपहार के रूप में प्राप्त आय को राष्ट्रीय आय में सम्मिलित किया जाता है?
  6. पुरानी वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त आय को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. असत्य
  6. सत्य।

प्रश्न 4.
सही जोड़ियाँ बनाइये –
MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय img 1
उत्तर:

  1. (e)
  2. (a)
  3. (d)
  4. (c)
  5. (b)

प्रश्न 5.
एक शब्द/वाक्य में उत्तर दीजिये –

  1. भारतीय अर्थव्यवस्था के कौन – से क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में सर्वाधिक योगदान है?
  2. अंतिम स्टॉक एवं प्रारंभिक स्टॉक में अन्तर कहलाता है?
  3. राष्ट्रीय आय का अध्ययन किस अर्थशास्त्र में किया जाता है?
  4. राष्ट्रीय आय में वृद्धि किस बात की सूचक होती है?
  5. राष्ट्रीय आय की गणना वर्ष में कितनी बार की जाती है ?
  6. वर्ष में कौन – सी वस्तुओं व सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को कुल राष्ट्रीय उत्पाद में जोड़ा जाता है?

उत्तर:

  1. तृतीयक
  2. स्टॉक में परिवर्तन
  3. समष्टि अर्थशास्त्र में
  4. आर्थिक प्रगति की
  5. एक बार
  6. अंतिम।

राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यष्टि अर्थशास्त्र क्या है?
उत्तर:
वह अर्थशास्त्र जिसमें व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक समस्याओं का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है व्यष्टि अर्थशास्त्र कहलाता है। जैसे – एक व्यक्ति, एक परिवार, एक इकाई, एक उत्पादक आदि।

प्रश्न 2. समष्टि अर्थशास्त्र क्या है?
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र वह आर्थिक प्रणाली है जिसमें आर्थिक समस्याओं का अध्ययन एवं विश्लेषण अर्थव्यवस्था के स्तर पर किया जाता है। जैसे – सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था, समग्र उत्पादन, समग्र विनियोग आदि।

MP Board Solutions

प्रश्न 3. आर्थिक इकाई क्या है?
उत्तर:
आर्थिक इकाई का आशय उन व्यक्तियों या संस्थाओं से है जो आर्थिक निर्णय लेते हैं। उदाहरण के लिये, उपभोक्ता निर्णय लेता है, क्या एवं कितना उपभोग करना है? एक उत्पादक निर्णय लेता है कि किन वस्तुओं एवं सेवाओं का, कितनी मात्रा में उत्पादन करना है। वह आर्थिक इकाई या अभिकर्ता एक निवेशक भी हो सकता है जो यह निर्णय लेता है कि उसे कब, कहाँ एवं कितनी मात्रा में धन का विनियोजन करना है। सरकार भी आर्थिक इकाई के रूप में निर्णयकर्ता हो सकती है कि अधिकतम लोक कल्याण एवं देश के आर्थिक विकास में कैसे निर्णय लिये जायें ताकि आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

प्रश्न 4.
उपभोक्ता वस्तुएँ किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिये प्रत्यक्ष रूप से उपभोग करने की प्रतिसालग्न वस्तुएँ ही उपभोक्ता वस्तुएँ कहलाती हैं। उदाहरण के लिये, दूध, सब्जी, गेहूँ, चावल का उपभोग आदि।

प्रश्न 5.
पूँजीगत वस्तुओं से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
उत्पादन की प्रक्रिया में ऐसी स्थिर परिसंपत्तियाँ जिनका बार – बार प्रयोग होता है पूँजीगत वस्तुएँ कहलाती हैं। इन्हें टिकाऊ उपभोग उत्पादक वस्तुओं के नाम से भी जाना जाता है। प्लांट एवं मशीनरी पूँजीगत वस्तुएँ हैं जिनका प्रयोग उत्पादन में बारंबार किया जाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
अंतिम वस्तुओं से आपका क्या आशय है?
उत्तर:
अंतिम वस्तुओं काय उन:
से है जो उपभोक्ता एवं निवेशक द्वारा वस्तु के अंतिम प्रयोग के लिये उपलब्ध होती है। उदाहरण के लियं उपपाक्ताओं द्वारा उपभोग के लिये एवं उत्पादकों द्वारा निवेश के लिये जो वस्तुएँ अंतिम तौर पर उपलब्ध होती हैं उन्हें अंतिम वस्तुएँ कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जब कोई वस्तु अंतिम प्रयोगकर्ता के पास पहुँच जाती है तो उसे अंतिम वस्तु कहा जाता है जिसका अंतिम प्रयोग केवल उपभोक्ता या निवेश होता है।

प्रान 7.
मध्यवर्ती वस्तुओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मध्यवर्ती वस्तुओं का आशय ऐसी वस्तुओं से है जो किसी लेखावर्ष में उत्पादन में कच्चे माल के रूप में उपयोग के लिये अथवा पुनः बिक्री के लिये खरीदी जाती है । मध्यवर्ती वस्तुओं को राष्ट्रीय आय की गणना में शामिल नहीं किया जाता है।

प्रश्न 8.
प्रवाह एवं स्कंध (Flow and Stock) की अवधारणा को समझाइये?
उत्तर:
प्रवाह चर के अन्तर्गत:
प्रवाह एक ऐसी मात्रा है जिसे उचित समयावधि जैसे घंटे, दिन, सप्ताह, मास, वर्ष आदि के आधार पर मापा जाता है। उदाहरण के लिये, व्यय, बचत, पूँजी निर्माण, ब्याज, पूँजीह्रास, मुद्रा की पूर्ति में परिवर्तन आदि। स्कंध (स्टॉक) वह मात्रा है जो किसी निश्चित समय बिन्दु पर मापी जाती है। उदाहरण के लिये, विदेशी ऋण, ऋण की मात्रा, संपत्ति, उपस्कर आदि।

MP Board Solutions

प्रश्न 9.
सकल निवेश (Gross Investment) से क्या आशय है?
उत्तर:
सकल निवेश से तात्पर्य पूँजीगत वस्तुओं जैसे:
मशीनों, भवनों, उपकरणों के स्कंध में वृद्धि से है जो भविष्य में अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता को बढ़ाते हैं। किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षमता में भौतिक पूँजी के स्कंध में होने वाली वृद्धि, पूँजी निर्माण कहलाती है। अतः अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने वाला निवेश, सकल निवेश कहलाता है। सकल निवेश में से ह्रास को घटाकर शुद्ध निवेश ज्ञात किया जाता है।

प्रश्न 10.
मूल्यह्रास किसे कहते हैं?
उत्तर:
अचल संपत्तियों के निरंतर उपयोग के कारण इन परिसंपत्तियों के मूल्य में आने वाली शनैःशनैः कमी ही मूल्यह्रास कहलाती है। सामान्य टूट – फूट एवं अप्रचलन के कारण स्थायी संपत्तियों के मूल्य में गिरावट को स्थायी पूँजी का उपभोग कहते हैं। राष्ट्रीय आय की गणना के लिये सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से ह्रास को घटाया जाता है।

प्रश्न 11.
आय के चक्रीय प्रवाह (Circular flow of Income) से आपका क्या आशय है?
उत्तर:
आय के चक्रीय प्रवाह से आशय मुद्रा एवं पदार्थ तथा सेवाओं के निरंतर प्रवाह से है। आय का चक्रीय प्रवाह अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों जैसे परिवार, फर्म, सरकारी क्षेत्र से जुड़ा रहता है। उदाहरण के लिये, फर्मे पहले आय सृजित करती हैं तत्पश्चात् ये आय परिवारों में साधन सेवायें प्रदान करने के लिये वितरित की जाती हैं और अंत में वही आय फर्मों के पास वापस आ जाती है। यही आय का चक्रीय प्रवाह कहलाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 12.
आय का चक्रीय प्रवाह किन सिद्धांतों पर निर्भर करता है?
उत्तर:
आय का चक्रीय प्रवाह दो मूल सिद्धांतों पर निर्भर होता है –

  1. विनिमय की प्रक्रिया में उपभोक्ता द्वारा किया गया खर्च विक्रेताओं द्वारा प्राप्त की गई राशि के बराबर होता है।
  2. वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह एक दिशा की ओर होता है जबकि मौद्रिक भुगतानों का प्रवाह विपरीत दिशा की ओर होता है इसी कारण आय का चक्रीय प्रवाह उत्पन्न होता है।

अतः वास्तविक प्रवाह का अर्थ पदार्थों एवं सेवाओं के प्रवाहों से है जबकि मौद्रिक प्रवाह का आशय साधन भुगतान एवं उपभोग व्यय से है।

प्रश्न 13.
राष्ट्रीय आय क्या है?
उत्तर:
एक देश के सामान्य निवासियों द्वारा देश के अंदर व देश के बाहर अर्जित साधन आय का योग ही राष्ट्रीय आय कहलाती है एक वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को राष्ट्रीय आय कहते हैं।

राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में अन्तर स्पष्ट कीजिए?
अथवा
राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय से क्या आशय है?
राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में अन्तर बताइए?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय:
एक वर्ष में उत्पादित समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य का योग राष्ट्रीय आय कहलाती है।

प्रति व्यक्ति आय:
जब कुल राष्ट्रीय आय में कुल जनसंख्या से भाग दिया जाता है तो प्रति व्यक्ति आय प्राप्त होती है।
राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में अन्तर –
राष्ट्रीय आय:

  1. किसी देश के समस्त उत्पादकों के वास्तविक उत्पादन का योग राष्ट्रीय आय कहलाता है।
  2. राष्ट्रीय आय में प्रति व्यक्ति आय शामिल होती है।
  3. राष्ट्रीय आय विकास का प्रतीक है।

प्रति व्यक्ति आय:

  1. एक व्यक्ति विशेष द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त उत्पादन का योग राष्ट्रीय आय कहलाता है।
  2. प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय का एक भाग है।
  3. प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय का एक भाग है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
समष्टि अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से अर्थव्यवस्था के चार प्रमुख क्षेत्रकों का वर्णन कीजिए?
उत्तर:
किसी अर्थव्यवस्था को समष्टि अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से जिन चार भागों में विभाजित किया गया है वे निम्न हैं –
1. परिवार क्षेत्र:
जिन वस्तुओं एवं सेवाओं का उपभोग उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है उसे परिवार क्षेत्र कहते हैं। इस क्षेत्र में परिवार क्षेत्र के उत्पादन के घटकों का स्वामी भी परिवार होता है।

2. उत्पादक क्षेत्र:
इस क्षेत्र में उन सभी घटकों को सम्मिलित किया जाता है जो उत्पादन की क्रिया में संलग्न रहते हैं। वे सभी इकाइयाँ जो उत्पादन का कार्य करती हैं उन्हें अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन जिन फर्मों के द्वारा किया जाता है उनके द्वारा उत्पादन के साधनों जैसे भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन एवं साइज (क्षेत्र) किराया देकर प्राप्त किया जाता है।

3. सरकारी क्षेत्र:
कल्याणकारी सेवाओं को बनाये रखने का काम सरकार का है। वैसे तो सरकार का कार्य कानून और व्यवस्था को बनाये रखना है किन्तु सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के लिये एक उत्पादक की तरह भी कार्य करती है।

4. विदेशी क्षेत्र:
‘इसमें शेष विश्व को सम्मिलित किया जाता है। इसे Rest of the world’ कहते हैं। इसके अन्तर्गत घरेलू अर्थव्यवस्था का विश्व के अन्य देशों के मध्य पूँजी के प्रवाह तथा आयात – निर्यात को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 3.
व्यष्टि अर्थशास्त्र एवं समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र एवं समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर –
MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय img 2

प्रश्न 4.
स्टॉक तथा प्रवाह से क्या समझते हैं? स्टॉक तथा प्रवाह में तीन अन्तर बताइए?
उत्तर:
स्टॉक तथा प्रवाह:
स्टॉक वह मात्रा है जिसे किसी समय विशेष पर मापा जाता है जबकि प्रवाह वह मात्रा है जिसे विशेष समयावधि में मापा जाता है। जैसे एक निश्चित तिथि पर देश में मुद्रा की मात्रा स्टॉक है तथा एक वित्त वर्ष में जो व्यय है वह प्रवाह कहलाता है।
स्टॉक तथा प्रवाह में अन्तर –
स्टॉक:

  1. स्टॉक वह मात्रा है, जिसे किसी समय विशेष पर मापा मापा जाता है।
  2. स्टॉक का कोई समयकाल नहीं होता।
  3. स्टॉक एक स्थैतिक अवधारणा है।
  4. कुछ चरों की स्टॉक अवधारणाएँ नहीं होती। कुछ चरों की केवल प्रवाह अवधारणाएँ होती हैं। जैसे – आयात – निर्यात।

प्रवाह:

  1. प्रवाह वह मात्रा है, जिसे विशेष समयावधि में मापा जाता है।
  2. प्रवाह का समयकाल होता है।
  3. प्रवाह एक प्रावैगिक अवधारणा है।
  4. कुछ चरों की केवल प्रवाह अवधारणाएँ होती हैं। जैसे – आयात – निर्यात।

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय आय एवं राष्ट्रीय पूँजी में अन्तर बताइए?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय एवं राष्ट्रीय पूँजी में अन्तर –
राष्ट्रीय आय:

  1. राष्ट्रीय आय एक समयावधि जैसे – एक वर्ष की होती है – अतः यह एक प्रवाह होती है।
  2. राष्ट्रीय आय में सेवाएँ शामिल होती हैं।
  3. राष्ट्रीय आय में पूँजीगत तथा उपभोग दोनों वस्तुएँ शामिल होती हैं।
  4. राष्ट्रीय आय, राष्ट्रीय पूँजी को प्रभावित करती है।
  5. आर्थिक क्रियाएँ राष्ट्रीय आय को प्रभावित करती हैं।

राष्ट्रीय पूँजी:

  1. राष्ट्रीय पूँजी किसी समय विशेष पर होती है, एक स्टॉक है।
  2. राष्ट्रीय पूँजी में सेवाएँ शामिल नहीं होती हैं।
  3. राष्ट्रीय आय में केवल पूँजीगत वस्तुओं को शामिल शामिल होती हैं।
  4. राष्ट्रीय पूँजी, राष्ट्रीय आय का कारण होती है।
  5. एक निश्चित समय में राष्ट्रीय पूँजी स्थिर होती है।

प्रश्न 6.
सन् 1929 की विश्वव्यापी मंदी को समझाइये?
उत्तर:
सन् 1929 में विश्वव्यापी मंदी ने संपूर्ण विश्व के विकासत देशों की अर्थव्यवस्था को चूर-चूर कर दिया। इस मंदी में उत्पादन तो था पर खरीदने वाले नहीं थे। सन् 1929 से सन् 1933 के मध्य संयुक्त राज्य अमेरिका में बेरोजगारी 3% से बढ़कर 25% तक बढ़ गई। अमेरिका के समग्र निर्गत में 33% की गिरावट आ गई। इसी दौरान सन् 1936 में जॉन मेनार्ड कीन्स ने एक पुस्तक प्रकाशित की ‘रोजगार, ब्याज एवं मुद्रा का सामान्य सिद्धांत’ इसी ने समष्टि अर्थव्यवस्था की नींव रखी।

MP Board Solutions

प्रश्न 7.
समष्टि अर्थशास्त्र एवं व्यष्टि अर्थशास्त्र में परस्पर क्या निर्भरता है?
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में हम सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का एक इकाई के रूप में अध्ययन करते हैं एवं व्यष्टि अर्थशास्त्र में हम अर्थव्यवस्था की छोटी – छोटी इकाईयों का अध्ययन करते हैं। दोनों एक – दूसरे के प्रतियोगी नहीं वरन् पूरक हैं। एक – दूसरे पर आश्रित हैं। उदाहरण के लिये, यदि व्यक्ति की आय बढ़ेगी तो राष्ट्रीय आय स्वतः बढ़ जायेगी परन्तु राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो रही है तो यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति की आय बढ़ रही हो। व्यष्टि अर्थशास्त्र की भाँति समष्टि अर्थशास्त्र में भी सीमित साधनों के विवेकपूर्ण उपयोग एवं प्रबंधन की समस्या ही मुख्य समस्या है। समष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत हित की अपेक्षा सार्वजनिक हित एवं सामाजिक कल्याण पर अधिक बल दिया जाता है। समष्टि अर्थशास्त्र एवं व्यष्टि अर्थशास्त्र राधा एवं कृष्ण की भाँति है दोनों एक – दूसरे के बिना रह नहीं सकते। दोनों एक – दूसरे पर निर्भर हैं।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित आँकड़ों से राष्ट्रीय आय की गणना कीजिए –

  1. वेतन – ₹ 6,000
  2. किराया – ₹ 2,000
  3. लाभ – ₹ 2,000
  4. ब्याज – ₹ 1,000
  5. उपभोग – ₹ 5,000
  6. सकल घरेलू विनियोग – ₹ 800।

हल: राष्ट्रीय आय = वेतन + किराया + लाभ + ब्याज
= 6,000 + 2,000 + 2,000 + 1.000
= ₹ 11,000।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर आय गणना विधि द्वारा राष्ट्रीय आय की गणना कीजिए –
मदें:
MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय img 3
हल: राष्ट्रीय आय = वेतन एवं मजदूरी + ब्याज + किराया + लाभ
= 18,000 + 7,000 + 6,000 + 25.000
राष्ट्रीय आय = ₹ 56,000 करोड़।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर आय गणना विधि द्वारा राष्ट्रीय आय की गणना कीजिए –
MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय img 4
हल: राष्ट्रीय आय = वेतन एवं मजदूरी + किराया/लगान + लाभ + ब्याज
= 30,000 + 10,000 + 50,000 + 10,000
राष्ट्रीय आय = ₹ 1,00000 करोड़।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित आँकड़ों से राष्ट्रीय आय की गणना कीजिए –

  1. वेतन – ₹ 60,000
  2. किराया – ₹ 20,000
  3. लाभ – ₹ 20,000
  4. ब्याज – ₹ 10,000
  5. उपभोग – ₹ 50,000
  6. सकल घरेलू उत्पाद – ₹ 8,000
  7. मूल्यह्रास – ₹ 10,000

हल: राष्ट्रीय आय की गणना
सूत्र – राष्ट्रीय आय = वेतन + किराया + लाभ + ब्याज
= 60,000 + 20,000 + 20,000 + 10,000
राष्ट्रीय आय = 1,10,000.

प्रश्न 12.
सकल घरेलू उत्पाद की कोई चार विशेषताएँ लिखिए?
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद की विशेषताएँ निम्न हैं –

  1. सकल राष्ट्र इस तथ्य को संकेत करता है कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मूल्य में घिसावट व्यय शामिल है।
  2. सकल घरेलू उत्पाद के मूल्य में दोहरी गणना से बचने के लिए केवल अंतिम वस्तुओं व सेवाओं के मूल्य को ही जोड़ा जाता है।
  3. पुरानी वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त राशि इसमें नहीं जोड़ी जाती।
  4. इसके मूल्य में स्व – उपभोग के लिए किया गया उत्पाद तथा खुद – काबिज मकानों का आरोपित किराया शामिल होता है।

प्रश्न 13.
आय गणना विधि का चुनाव करते समय किन – किन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है?
उत्तर:
आय गणना विधि का चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  1. गैर – कानूनी कार्यों से होने वाली आय को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। जैसे – जमाखोरी, तस्करी. घूस से प्राप्त आय।
  2. पुरानी वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है, किन्तु दलालों को मिलने वाला कमीशन राष्ट्रीय आय में जोड़ा जाता है।
  3. आकस्मिक रूप से मिलने वाली आय को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। जैसे – लॉटरी से मिलने वाली आय।
  4. हस्तांतरित भुगतान, जैसे – पेंशन, छात्रवृत्तियाँ, बेरोजगारी भत्ता, सरकारी सहायता आदि को राष्ट्रीय आय में नहीं जोड़ा जाता।
  5. मृत्यु कर, उपहार कर, सम्पत्ति कर, अप्रत्याशित लाभों पर कर आदि को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता, क्योंकि इन करों का भुगतान करदाता या तो अपने धन में से अथवा भूतकाल की बचत से करता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 14.
आय गणना प्रणाली के प्रमुख घटकों के बारे में लिखिए?(कोई पाँच)
उत्तर:
आय गणना प्रणाली के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं –
1. मजदूरी आय:
मजदूरी आय से तात्पर्य, उस आय से है जो श्रमिक को उनकी सेवाओं के बदले मौद्रिक या किस्त के रूप में प्राप्त होती है। इसमें समस्त कर्मचारियों के वेतन व मजदूरी, श्रमिकों को प्राप्त सामाजिक सुरक्षा योगदान, पेंशन, फण्ड, आवास, शिक्षा, मनोरंजन आदि की सुविधाओं को सम्मिलित किया जाता है।

2. गैर – मजदूरी आय:
भूमि के स्वामी, पूँजीपति तथा साहसी को किराया (लगान), ब्याज तथा लाभांश के रूप जो आय प्राप्त होती है, उसे गैर – मजदूरी आय कहते हैं। इसमें मिश्रित आय को भी सम्मिलित किया गया है।

3. परिचालन अधिशेष:
इसमें सार्वजनिक उद्योगों के परिचालन अधिशेष को सम्मिलित किया जाता है।

4. विदेशों से शुद्ध आय:
इसमें कर्मचारियों का शुद्ध पारिश्रमिक, सम्पत्ति के स्वामित्व एवं उद्यमशीलता से शुद्ध आय तथा निवासी कम्पनियों द्वारा विदेशों से शुद्ध प्रतिधारित आय को सम्मिलित किया जाता है।

5. स्व – उपभोग के लिए वस्तुएँ:
एक अर्थव्यवस्था में उत्पन्न सभी वस्तुएँ बाजार में बिकने के लिये नहीं आतीं बल्कि उसका एक भाग उत्थादक स्वयं के उपभोग के लिये अपने पास रख लेता है। अतः इस भाग का मौद्रिक मूल्य राष्ट्रीय आय में सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 15.
सकल घरेलू उत्पाद के अंग कौन – कौन से हैं?
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद से अभिप्राय किसी देश में एक निश्चित समयावधि में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों के योग से होता है –
सकल घरेलू उत्पाद के अंग:

  1. एक देश की घरेलू सीमा में एक निश्चित अवधि में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य के योग को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं।
  2. वस्तुओं के उत्पादन में उपभोग एवं पूँजीगत वस्तुओं को शामिल किया जाता है।
  3. उपभोक्ता एवं पूँजीगत वस्तुओं को टिकाऊ एवं गैर – टिकाऊ वस्तुओं में विभक्त किया जाता है।
  4. निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के उत्पादन को लिया जाता है।
  5. अन्तिम वस्तुओं के उत्पादन को ही सकल घरेलू उत्पाद में शामिल किया जाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 16.
राष्ट्रीय आय की उत्पादन विधि को समझाइये?
अथवा
राष्ट्रीय आय गणना की मूल्य वृद्धि विधि की व्याख्या कीजिए?
उत्तर:
इस विधि के अन्तर्गत राष्ट्रीय आय ज्ञात करने के लिए हम या तो मूल्य वृद्धि ज्ञात कर लेते हैं या एक लेखा वर्ष में उत्पादित समस्त वस्तुओं व सेवाओं के मौद्रिक मूल्य का योग कर लेते हैं। इस योग को बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित आँकड़ों से वैयक्तिक आय और वैयक्तिक प्रयोज्य आय की गणना कीजिए –
(₹ करोड़ में)

  1. कारक लागत पर निवल घरेलू उत्पाद – 8,000
  2. विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय – 200
  3. अवितरित लाभ – 1,000
  4. निगम कर – 500
  5. परिवारों द्वारा प्राप्त ब्याज – 1.500
  6. परिवारों द्वारा भुगतान किया गया ब्याज – 1,200
  7. अंतरण आय – 300
  8. वैयक्तिक कर – 500

हल:
1. वैयक्तिक आय की गणना –
MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय img 5
2.  वैयक्तिक प्रयोज्य आय की गणना –
MP Board Class 12th Economics Important Questions Unit 6 राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय img 6

प्रश्न 18.
हजाम राजू एक दिन में बाल काटने के लिए ₹ 500 का संग्रहरण करता है। इस दिन उसके उपकरण में ₹ 50 का मूल्यह्रास होता है। इस ₹ 450 में से राजू ₹ 30 बिक्री कर अदा करता है। ₹ 200 घर ले जाता है और ₹ 220 उन्नति और नए उपकरणों का क्रय करने के लिए रखता है। वह अपनी आय में से ₹ 20 आयकर के रूप में अदा करता है। इन पूरी सूचनाओं के आधार पर निम्नलिखित में राजू का योगदान ज्ञात कीजिए –

  1. सकल घरेलू उत्पाद।
  2. बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद।
  3. कारक लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद।
  4. वैयक्तिक आय।
  5. वैयक्तिक प्रयोज्य आय।

हल :
ΣRi = ₹ 500
स्थायी पूँजी का उपयोग = ₹ 50
बिक्री कर = ₹ 30
प्रतिधारित आय = ₹ 220
घर ले जाई गई आय = ₹ 200
आयकर = ₹ 20

(a) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP at Market Price) में योगदान
= बाल काटने के लिए प्राप्त आगम
= ₹ 500

(b) बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at Market Price) में योगदान
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद – स्थायी पूँजी का उपभोग
= ₹ 500 – ₹ 50 = ₹450

(c) साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान
= बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद – शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
-₹ 450 – ₹ 30 = ₹420

(d) वैयक्तिक आय = साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान – अवितरित लाभ
= ₹ 420 – ₹ 220
= ₹ 200

(e) वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय – प्रत्यक्ष कर
= ₹ 200 – ₹ 20
= ₹ 180
अतः

  1. ₹ 500
  2. ₹ 450
  3. ₹ 420
  4. ₹ 200
  5. ₹ 180.

राष्ट्रीय आय एवं संबंधित समुच्चय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय आय के महत्व को पाँच बिन्दुओं में स्पष्ट कीजिए?
अथवा
राष्ट्रीय आय का महत्त्व लिखिए। (कोई चार)
उत्तर:
राष्ट्रीय आय की गणना का निम्नलिखित महत्व है –

1. आर्थिक विकास का मापदण्ड:
जिन देशों की राष्ट्रीय आय अधिक होती है वह आर्थिक दृष्टि से विकसित माने जाते हैं तथा जिन देशों की राष्ट्रीय आय कम होती है, वह पिछड़े हुए देश माने जाते हैं।

2. जीवन – स्तर का सूचक:
जिस देश में प्रतिव्यक्ति राष्ट्रीय आय जितनी अधिक होती है, वहाँ के नागरिकों का जीवन – स्तर प्राय: उतना ही ऊँचा होता है।

3. तुलनात्मक अध्ययन में सहायक:
राष्ट्रीय आय के अध्ययन से विभिन्न देशों की कुल तथा प्रतिव्यक्ति आय की तुलनात्मक जानकारी उपलब्ध हो जाती है।

4. आर्थिक कल्याण का मापक:
यदि अन्य बातें समान रहें तो राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने पर आर्थिक कल्याण भी बढ़ जाता है तथा राष्ट्रीय आय में कमी होने पर आर्थिक कल्याण भी कम हो जाता है।

5. आर्थिक नीति के निर्माण में सहायक:
राष्ट्रीय आय के आँकड़े किसी देश की आर्थिक नीति के निर्माण में भी सहायक होते हैं। इन आँकड़ों से सरकार को रोजगार, साख, बचत तथा विनियोग संबंधी मामलों में आर्थिक नीति बनाने में सहायता मिलती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
सकल घरेलू उत्पाद तथा सकल राष्ट्रीय आय में अंतर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद एवं सकल राष्ट्रीय आय में अंतर –
क्र. सकल घरेलू उत्पाद:

  1. सकल घरेलू उत्पाद का आशय एक देश की घरेलू सीमा के अंदर उत्पादित कुल अंतिम निवासियों द्वारा उत्पादित)कुल अंतिम वस्तुओं वस्तुओं व सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य से है।
  2. सकल घरेलू उत्गद एक भौगोलिक धारणा है।
  3. इसका संबंध देश के घरेलू सीमा से है।
  4. GDP = P(G) + P(S)
  5. यदि विदेशों से प्राप्त आय ऋणात्मक है तो इसका मूल्य GNP के मूल्य से अधिक होगा। मूल्य GDP के मूल्य से अधिक होगा।

सकल राष्ट्रीय आय:

  1. सकल राष्ट्रीय आय से आशय एक राष्ट्र के निवासियों द्वारा उत्पादित कुल अंतिम वस्तुओं वस्तुओं व सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य से है।
  2. सकल राष्ट्रीय आय एक राष्ट्रीय धारणा है।
  3. इसका संबंध देश के सामान्य निवासियों से है।
  4. GNP = GDP + NFIA
  5. यदि विदेशों से प्राप्त आय धनात्मक है, तो इसका मूल्य GDP के मूल्य से अधिक होगा।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय आय एवं निजी आय में अन्तर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय एवं निजी आय में अन्तर –
राष्ट्रीय आय:

  1. राष्ट्रीय आय में केवल आय भुगतान शामिल किए जाते हैं।
  2. राष्ट्रीय आय में निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में सृजित आय को शामिल किया जाता है।
  3. राष्ट्रीय आय एक देश के सामान्य निवासियों की आय होती है।
  4. राष्ट्रीय आय = घरेलू साधन आय + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय।

निजी आय:

  1. निजी आय में आय भुगतान तथा हस्तान्तरण भुगतान दोनों शामिल किये जाते हैं।
  2. निजी आय में केवल निजी क्षेत्र की आय को शामिल किया जाता है।
  3. निजी आय निजी क्षेत्र के लोगों की आय होती है।
  4. निजी आय में राष्ट्रीय ऋणों पर ब्याज के भुगतान को शामिल किया जाता है।
  5. निजी आय = घरेलू साधन आय + घरेलू उत्पाद से प्राप्त शुद्ध साधन आय से सरकारी क्षेत्र को प्राप्त आय + समस्त चालू हस्तान्तरण + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
भारत में राष्ट्रीय आय में वृद्धि की धीमी गति के किन्हीं पाँच कारणों का वर्णन कीजिए?
अथवा
भारत की राष्ट्रीय आय कम होने के कारणों को लिखिए?
उत्तर:
भारत में राष्ट्रीय आय में वृद्धि की धीमी गति के प्रमुख कारण निलिखित हैं –
1. जनसंख्या में वृद्धि:
राष्ट्रीय आय में वृद्धि की धीमी गति का सबसे प्रमुख कारण हैं, जनसंख्या में तीव्र वृद्धि। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण राष्ट्रीय आय में वृद्धि की दर धीमी हो गई है।

2. कृषि पर निर्भरता:
देश की 71% जनसंख्या अभी भी कृषि में लगी हुई है। जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में केवल 12% जनसंख्या लगी है एवं सेवा क्षेत्र में केवल 17% जनसंख्या लगी है। इसलिए राष्ट्रीय आय में वृद्धि की गति धीमी है।

3. पूँजी की कमी:
देश में पूँजी की कमी राष्ट्रीय आय में धीमी वृद्धि का एक प्रमुख कारण रही है पूँजी की कमी का कारण लोगों की बचत करने की इच्छा एवं शक्ति तथा विनियोग की प्रेरणा का कम होना है।

4. तकनीकी पिछड़ापन:
भारत के तकनीकी पिछड़ेपन के कारण उत्पादन में परम्परागत रीतियों का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण उत्पादकता का स्तर निम्न बना रहता है। इससे कृषि व औद्योगिक दोनों क्षेत्रों में लोगों की आय कम रहती है।

5. आय का असमान वितरण:
भारत में राष्ट्रीय आय का वितरण बहुत असमान है। इसी असमानता का प्रमुख कारण सरकार की दोषपूर्ण कर नीति है।

प्रश्न 5.
भारत में राष्ट्रीय आय की वृद्धि हेतु पाँच आवश्यक सुझाव दीजिए?
अथवा
भारत में राष्ट्रीय आय को बढ़ाने के चार सुझाव दीजिए?
उत्तर:
भारत की राष्ट्रीय आय में वृद्धि हेतु प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. प्राकृतिक साधनों का उचित उपयोग: देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि के लिये यह आवश्यक है कि प्राकृतिक साधनों का उचित उपयोग किया जाये।
  2. जनसंख्या की वृद्धि पर नियंत्रण: देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि के लिये यह आवश्यक है कि यथासंभव बढ़ती हुई जनसंख्या की दर को कम किया जाय।
  3. बचतों को प्रोत्साहन एवं पूँजी – निर्माण: देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि के लिये घरेलू बचतों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिऐतथा उन बचतों को पूँजी-निर्माण में बदल दिया जाना चाहिए।
  4. कृषि का आधुनिकीकरण करना: कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये कृषि का आधुनिकीकरण आवश्यक है। कृषि के आधुनिकीकरण से उत्पादन बढ़ेगा। फलतः देश की राष्ट्रीय आय भी बढ़ेगी।
  5. साहसियों को पर्याप्त सुविधाएँ एवं प्रेरणाएँ: राष्ट्रीय आय में वृद्धि के लिये सरकार को चाहिये कि वह उद्योग स्थापित करने वाले साहसियों को पर्याप्त सुविधाएँ दें तथा उनको उत्पादन करने के लिये प्रोत्साहित करें।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
बंद अर्थव्यवस्था एवं खुली अर्थव्यवस्था में अन्तर बताइए?
उत्तर:
बंद अर्थव्यवस्था एवं खुली अर्थव्यवस्था में अन्तर –
बंद अर्थव्यवस्था:

  1. जब किसी देश का अन्य दूसरे देशों से कोई आर्थिक संबंध आर्थिक संबंध नहीं होती है, तो उसे बंद अर्थ – व्यवस्था कहते हैं।
  2. बंद अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद एवं राष्ट्रीय आय दोनों एक समान होते हैं।
  3. बंद अर्थव्यवस्था एक काल्पनिक अर्थव्यवस्था है।
  4. बंद अर्थव्यवस्था में पूँजी-निर्माण नगण्य होता है।
  5. बंद अर्थव्यवस्था में उपभोग एवं विनियोग दोनों उत्पादन के बराबर होते हैं।

खुली अर्थव्यवस्था:

  1. जब किसी देश का अन्य दूसरे देशों से आर्थिक संबंध स्थापित हो जाता है, तो उसे खुली अर्थव्यवस्था कहा जाता है।
  2. खुली अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय एवं घरेलू आय में अन्तर होता है।
  3. खुली अर्थव्यवस्था एक वास्तविक अर्थव्यवस्था है।
  4. खुली अर्थव्यवस्था में उपभोग तथा विनियोग का योग उत्पादन से अधिक भी हो सकता है और कम भी।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय आय की गणना विधियाँ कौन – सी हैं?
अथवा
राष्ट्रीय आय मापने की विधियों की विवेचना कीजिए?
उत्तर:
1.आय गणना विधि:
इस विधि में सभी साधनों द्वारा प्राप्त आय को जोड़ा जाता है अतः इसे प्राप्त आय गणना विधि भी कहते हैं। इस विधि में एक वर्ष में व्यक्ति या व्यावसायिक उपक्रमों द्वारा प्राप्त विशुद्ध आय को ज्ञात किया जाता है, उनका योग ही राष्ट्रीय आय होता है। इस योगफल में अनुत्पादक आय को शामिल नहीं किया जाता है।

2. व्यय गणना विधि:
इस विधि में लोगों में व्यय और बचत को जोड़कर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है)। इस विधि के अनुसार किसी देश की कुल राष्ट्रीय आय लोगों के कुल उपभोग एवं बचतों के बराबर होती है।

3. मिश्रित गणना विधि:
इस प्रणाली का प्रयोग डॉ. व्ही. के. राव ने किया है) इसमें उत्पादन विधि व आय विधि दोनों का मिश्रित प्रयोग करने राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है। यह विधि भारत में राष्ट्रीय आय की गणना हेतु सफल विधि मानी गयी है।

4. उत्पादन गणना विधि:
इस विधि में एक वर्ष के अन्तर्गत देश में स्थित सारे उद्योगों, व्यवसायों, कृषि कार्य द्वारा समस्त उत्पादित वस्तुओं का मूल्य जोड़ दिया जाता है, इससे से कच्चे माल का मूल्य, मशीनों का ह्रास तथा प्रतिस्थापना आदि का मूल्य घटाकर वास्तविक राष्ट्रीय आय ज्ञात कर लिया जाता है। इस प्रणाली का प्रयोग करते समय वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य की दोहरी गणना से बचना चाहिए। विदेशों को भुगतान में दिये जाने वाले चरण एवं ब्याज की राशि घटाते हुए प्राप्त होने वाले ऋण एवं ब्याज की आय को जोड़कर राष्ट्रीय आय की गणना करनी चाहिए।

5. सामाजिक लेखांकन विधि:
इस विधि का आविष्कार प्रो. रिचर्ड स्टोन ने किया है। इसमें देश की समस्त जनसंख्या को कई वर्गों जैसे उत्पादन संस्थाएँ, वित्तीय संस्थाएँ, बीमा एवं सामाजिक सुरक्षा संस्थाएँ, अंतिम उपभोक्ता वर्ग एवं अन्यों में बाँट दिया जाता है, इनमें प्रत्येक वर्ग के कुछ व्यक्तियों की आय ज्ञात करके उसका औसत निकालकर उस वर्ग के व्यक्तियों की संख्या से गुणा कर दिया जाता है। इस प्रकार सभी वर्ग के व्यक्तियों की आय ज्ञात करके इन्हें जोड़कर कुल राष्ट्रीय आय की गणना कर ली जाती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 8.
एक किसान ने ₹ 500 का कपास स्वतः उत्पादित करके कपड़ा मिल को बेचा। कपड़ा मिल ने कपड़ा तैयार करके ₹ 600 में रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री को बेचा। रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री ने ड्रेसेज तैयार करके ₹ 1000 में एक स्टोर को बेच दिया। स्टोर मालिक ने ₹ 1200 में ड्रेसों को उपभोक्ताओं को बेचा?
प्रत्येक फर्म द्वारा की गई मूल्य वृद्धि सकल मूल्य वृद्धि ज्ञात कीजिए?
हल:
किसान, कपड़ा मिल, रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री, स्टोर द्वारा की गयी मूल्य वृद्धि निम्न प्रकार होगी
1.  किसान द्वारा मूल्य वृद्धि = कपड़ा मिल को कपास का विक्रय
= ₹ 500

2.  कपड़ा मिल द्वारा मूल्य वृद्धि = रेडीमेड गारमेंट फैक्टरी को कपड़ा का विक्रय – किसान से कपास का क्रय – विक्रय
= 600 – ₹ 500 = 100

3. रेडीमेड गारमेंट फैक्टरी द्वारा = स्टोर को ड्रेसेज का विक्रय मूल्य – कपड़ा मिल से कपास का क्रय – मूल्य
= 1000 – 600 = ₹ 400

4. स्टोर द्वारा मूल्य वृद्धि = अंतिम उपभोक्ताओं को विक्रय मूल्य – रेडीमेड गारमेंट फैक्टरी से ड्रेसेज का क्रय मूल्य
= 1200 – 1000 = ₹ 200
कुल मूल्य वृद्धि = किसान + कपड़ा मिल + रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री + स्टोर द्वारा मूल्य वृद्धि।
= ₹ 1200।

प्रश्न 9.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषतायें क्या हैं? लिखिये?
उत्तर:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में सामान्यतया निम्न प्रमुख विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं –
1.स्वतंत्र माँग एवं पूर्ति बल से कार्यान्वित-पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में एक बाजार इतना संपन्न होता है कि वह क्रेताओं एवं विक्रेताओं के परस्पर संबंध को जन्म देता है। यही कारण है कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का बाजार स्वतंत्र माँग एवं पूर्ति बल से कार्यान्वित होता है।

2. माँग एवं पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों से मूल्य निर्धारण:
इस बाजार में वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतें माँग तथा पूर्ति की बाजार शक्तियों द्वारा निर्धारित होती हैं।

3. उपभोक्ता बाजार का सम्राट:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता प्रमुख होता है। उसकी आय, आदत, प्राथमिकताओं के अनुसार ही उत्पादों का क्रय करके वह अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करता है तथा उत्पादक भी उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जिनके उत्पादन से उन्हें अधिकतम लाभ की प्राप्ति होती है। उत्पादक के लिये उपभोक्ता पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बाजार का सम्राट है अतएव माँग के विरुद्ध उत्पादक उत्पादन नहीं कर सकता है।

4. पूँजी संचय को बढ़ावा:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों में पूँजी को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है एवं मुख्य साधन के रूप में देखा जाता है इसलिये पूँजी के संचय की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है।

5. सरकारी हस्तक्षेप नहीं:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादकों के निर्णयों में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। सरकार बाजार की माँग एवं पूर्ति की अंतक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं करती है। सरकार कानून व्यवस्था एवं प्रतिरक्षा के रख – रखाव पर अपना ध्यान केन्द्रित करती है।

6. स्वामित्व एवं प्रबंधन निजी हाथों में – पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व निजी हाथों में होता है। यहाँ तक कि उसका प्रबंधन भी पूँजीपतियों के हाथों में होता है। एक उत्पादक निर्णय लेने में स्वतंत्र होता है। लाभ पर अधिकार भी उत्पादक का होता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 10.
राष्ट्रीय आय से संबंधित समुच्चय के अन्तर्गत सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP), सकल घरेलू उत्पाद (GDP), शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP) को बाजार मूल्य एवं साधन लागत पर समझाइये?
उत्तर:
1.सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP):
सकल राष्ट्रीय उत्पाद से आशय देश के सामान्य निवासियों द्वारा घरेलू भौगोलिक सीमा के अन्दर एवं देश के बाहर अर्जित की गई आय से है। जब सकल घरेलू उत्पाद में विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय को जोड़ दिया जाता है तो उसे सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहा जाता है। इसे निम्न समीकरण द्वारा भी समझाया जा सकता है GNP = GDP + NFIA (Net Factor Income from Abroad) या सकल राष्ट्रीय उत्पाद = सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय या GNP = GDP + X – M भी होता है।

सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना में मूल्य ह्रास को नहीं घटाया जाता है। इसकी गणना स्थिर मूल्यों के आधार पर भी की जा सकती है। विशेषकर सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, पूँजीगत वस्तुओं के क्रय – विक्रय इत्यादि को इसकी गणना में शामिल नहीं किया जाता है। साथ ही जिन सेवाओं का कोई मौद्रिक मूल्य नहीं होता उसे भी इसकी गणना में सम्मिलित नहीं किया जाता है। कालाबाजारी एवं तस्करी से बेची एवं खरीदी जाने वाली वस्तुओं को भी शामिल नहीं किया जाता है।

2. सकल घरेलू उत्पाद (GDP):
किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के अन्दर एक वर्ष की अवधि में, उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य जिसमें विदेशों से प्राप्त आय को सम्मिलित नहीं । किया जाता है सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। इसकी गणना साधन लागत पर एवं बाजार मूल्य पर की जाती है।, इसे निम्न समीकरणों की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है –
GDP = C + 1
GDP = (P x Q) + (P x S)
GDP = C + Cg + I + Lg
सकल घरेलू उत्पाद में हस्तांतरण आय एवं गैर कानूनी क्रियाओं से प्राप्त आय को शामिल नहीं किया जाता है। पुरानी पूँजीगत वस्तुओं की बिक्री को भी इसकी गणना में शामिल नहीं किया जाता है।

(अ) बाजार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद:
उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का सकल मूल्य लिया जाता है। उत्पादित वस्तु की मात्रा के साथ उत्पादित वस्तु के मूल्य का गुणा किया जाता है।
GDPMP = P (Q) + P (S)

(ब) साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद:
उत्पादन के प्रत्येक साधन विशेष की प्राप्त आय उसकी आय कहलाती है जिनका योग करके सकल घरेलू उत्पाद की गणना की जाती है। उत्पादकों के लिये साधनों का पुरस्कार लागत कहलाती है।
GDPfc = Net factor income (Domestic factor – Income) + Depreciation Expenses.
अर्थात् साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद = बाजार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद – परोक्ष कर उत्पाद + सरकारी सहायता

स्थायी मूल्यों पर गणना:
स्थायी मूल्यों पर भी सकल घरेलू उत्पाद की गणना की जा सकती है। स्थायी मूल्यों की सहायता से अनुमानित मूल्य ज्ञात किया जा सकता है। इसे वास्तविक घरेलू आय भी कहा जाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 11.
उत्पादन गणना विधि को अपनाने पर कौन – कौन सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता?
उत्तर:
उत्पादन गणना विधि को अपनाने पर निम्नांकित कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है –

  1. यह निश्चित करना कठिन होता है कि कौन – से पदार्थों को अंतिम माना जाए तथा कौन – से पदार्थों को मध्यवर्ती या कच्चा माल माना जाए।
  2. मूल्य हास का सही अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि पूँजीगत पदार्थों के मूल्य में कमी अनेक कारणों से हो सकती है।
  3. अनेक उत्पादक क्रियाओं को उत्पादन की मात्रा में सम्मिलित नहीं किया जाता है।
  4. उत्पादन के सभी क्षेत्रों से संबंधित सही आँकड़े, उपलब्ध न होना।
  5. दोहरी गणना की संभावना सदैव बनी रहती है, जिससे सही माप नहीं हो पाती है।