MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

11. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ [2017]

  • जीवन परिचय

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का काव्य राष्ट्रीय चेतना और जनजागृति का काव्य है। इन्होंने जहाँ परतन्त्र भारत के सोते हुए लोगों को जगाने का काम किया वहीं मानवीय भावना से ओतप्रोत प्रेमाकुल काव्य की रचना भी की। इन्होंने वीर एवं श्रृंगार दोनों में समान रूप से लिखकर हिन्दी काव्य को अमर रचनाएँ प्रदान की।

राष्ट्रवादी चिन्तक, जुझारु पत्रकार एवं ओजस्वी कवि पंडित बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जन्म सन् 1897 ई. में शाजापुर जिले के शुजालपुर के मयाना गाँव में हुआ था। इन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के सानिध्य में पत्रकारिता और महात्मा गाँधी के सम्पर्क में गाँधीवादी विचारों को अपनाया। नवीनजी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी, साथ ही भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और नवयुवकों को प्रेरणा देने वाली ओजस्वी रचनाओं को भी लिखते रहे। इन्होंने प्रेम व श्रृंगारपरक गीत भी लिखे। नवीनजी भारतीय संविधान निर्मात्री परिषद के सदस्य भी रहे। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का पद दिलाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1952 से 1960 ई. तक ये संसद सदस्य भी रहे। 1960 में भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। सन् 1960 में हृदय गति रुक जाने से इनका देहावसान हो गया।

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  • साहित्य सेवा

नवीनजी ने अपना साहित्यिक जीवन पत्रकारिता से प्रारम्भ किया। गणेशशंकर विद्यार्थी के सम्पर्क में आने के बाद ‘प्रताप के प्रधान सम्पादक बने। राष्ट्रीय स्वर को प्रधानता देने वाली पत्रिका ‘प्रभा’ के भी ये सम्पादक रहे। इन्होंने प्रेम, श्रृंगार, राष्ट्रीय भावना, भारतीय संस्कृति, भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन आदि विषयों पर ओजस्वी रचनाएँ लिखीं। प्रकृति के विभिन्न रूपों के चित्रण के साथ उनके काव्य में रहस्यवादी भावना के दर्शन भी होते हैं।

  • रचनाएँ
  1. उर्मिला इसमें उर्मिला के जन्म से लेकर लक्ष्मण से पुनर्मिलन तक की कथा वर्णित है। इस काव्य में उर्मिला का विरह वर्णन बड़ा ही मार्मिक है।
  2. रश्मि रेखा-प्रेम, कला तथा संवेदना की दृष्टि से यह उत्कृष्ट काव्य है।
  3. कुंकुम इस गीत संग्रह में यौवन और प्रखर राष्ट्रीयता का स्वर मुखरित है।
  4. अपलक, क्वासि इनमें प्रेम और भक्ति से पूर्ण कविताएँ संकलित हैं।
  5. प्राणार्पण यह गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान पर लिखा गया खण्डकाव्य है।
  6. विनोवा स्तवन-इसमें विनोवा भावे के भूदान यज्ञ की प्रशस्ति में लिखे गये पद हैं।
  • भाव-पक्ष
  1. देश-प्रेम की भावना-इनकी कविताओं में देश-प्रेम की भावना उत्कृष्ट रूप से उजागर हुई है।
  2. क्रान्ति भावना-नवीन जी की कविताओं में स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में भोगे हुए अनुभव जीवन्त हैं और उनसे उपजे जागृति के स्वर भी मुखर हैं।
  3. प्रेम व भक्ति-भावना-देश-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना से स्फूर्त होने के परिणामस्वरूप रचनाओं में ओज प्रखर है तो प्रेम प्रवण अभिव्यक्ति में कोमलता निहित है। प्रेमाकुल संवेदनाएँ मानवीय भावनाओं से सराबोर हैं।
  • कला पक्ष
  1. भाषा शैली-नवीनजी की तत्सम शब्द प्रधान भावानुकूल भाषा है। इनकी शैली ओजपूर्ण एवं प्रबन्ध है।
  2. छन्द योजना-भावों के अनुकूल छन्द योजना उत्कृष्ट बन पड़ी है।
  3. प्रकृति चित्रण-प्रकृति के विविध रूप यत्र-तत्र दृष्टव्य हैं।
  • साहित्य में स्थान

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के काव्य में राष्ट्र प्रेम.मानव प्रेम.लौकिक प्रेम तथा अलौकिक प्रेम का प्रस्फुटन एक साथ हुआ है। नवीनजी छायावाद के समानान्तर बहने वाली प्रेम और श्रृंगार की धारा के कवि हैं। इनका अधिकांश काव्य मानवता तथा राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है,जिसके कारण हिन्दी साहित्य में इनको सम्माननीय स्थान प्राप्त है।

12. श्रीकृष्ण सरल [2015]

  • जीवन परिचय

श्रीकृष्ण सरल का जन्म 9 जून, 1921 ई. को मध्यप्रदेश के अशोक नगर में हुआ था। बचपन से ही ये कविताएँ लिखने लगे थे। यद्यपि उन्होंने गद्य की सभी विधाओं में लिखा है, फिर भी मूल रूप से वह कवि थे।

इनके हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति अनुराग था। प्रमुख क्रान्तिकारियों के ऊपर इन्होंने महाकाव्य लिखे। देश-भक्ति की भावना से ओतप्रोत सरलजी ने देश-भक्तों को ही लेखन का केन्द्र बनाया। उनकी ‘क्रान्ति कथाएँ’ भारतीय क्रान्तिकारियों की ‘एनसाइक्लोपीडिया’ है जिसमें लगभग दो हजार क्रान्तिकारियों के जीवन-वृत्तान्त सम्मिलित हैं। गद्य के क्षेत्र में इन्होंने कहानियाँ, उपन्यास,एकांकी,जीवनियाँ और निबन्ध लिखे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर इन्होंने पन्द्रह ग्रन्थों का प्रणयन किया। उनका कार्यस्थल उज्जैन रहा। इन्होंने बी. ए. तक शिक्षा प्राप्त की। फिर अध्यापन का कार्य किया। सरलजी का देहान्त 2 सितम्बर,2000 ई.को उज्जैन में हुआ।

  • साहित्य सेवा

सरलजी का लेखन इतिहास जैसा प्रामाणिक और शोधपूर्ण है। लेखन के लिए इन्होंने देश के भीतर और देश के बाहर अनेक यात्राएँ की। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित था। उन्होंने स्वयं लिखा है

“कर्त्तव्य राष्ट्र के लिए समर्पित हों अपने,
हो इसी दिशा में उत्प्रेरित चिन्तन धारा,
हर धड़कन में हो राष्ट्र, राष्ट्र हो साँसों में,
हो राष्ट्र-समर्पित मरण और जीवन सारा।”

  • रचनाएँ
  1. महाकाव्य-शहीद भगतसिंह, अजेय सेनानी चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र, जय सुभाष,शहीद अशफाक उल्ला खाँ,विवेक श्री, स्वराज तिलक,क्रान्ति ज्वाला,बागी कर्तार।
  2. गद्य रचनाएँ–’कालजयी सुभाष’,क्रान्ति कथाएँ।
  3. कविताएँ-आँसू,छोड़ो लीक पुरानी,जवानी खुद अपनी पहचान, देश के सपने फूलें फलें,देश से प्यार, धरा की माटी बहुत महान, नेतृत्व,प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है,पीड़ा का आनन्द, प्रेम की पावन धारा,मत ठहरो, मुझमें ज्योति और जीवन है, वीर की तरह,शहीद,सैनिक।
  • भाव पक्ष
  1. देश-विदेश भ्रमण के बाद उन अनुभूतियों को अपने काव्य में मूर्तिरूप प्रदान किया।
  2. राष्ट्रवाद एवं क्रान्तिकारी भावों का अपने काव्य में प्रणयन किया।
  3. राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति सरल जी का हृदय राष्ट्र-प्रेम की भावनाओं से भरपूर था। क्रान्तिकारियों के प्रति इनके हृदय का अनुराग इनके काव्य में परिलक्षित होता है।
  4. कर्त्तव्य और भारतीय संस्कृति में रुचि इनकी अपने कर्त्तव्य और भारतीय संस्कृति में आस्था थी,जो काव्य के रूप में प्रकट हुई। एक उदाहरण देखिए

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“कर्त्तव्य राष्ट्र के लिए समर्पित हों अपने,
हो इसी दिशा में उत्प्रेरित चिन्तन धारा।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा-सरल जी की भाषा ओजपूर्ण है। देश के प्रति अथाह प्रेम इनकी भाषा में देखने को मिलता है। गद्य और पद्य दोनों में इन्होंने अपनी लेखनी चलाई है। भाषा शुद्ध एवं परिमार्जित है।
  2. अलंकार योजना यथास्थान इन्होंने अलंकारों का प्रयोग भी किया है। वह अनूठा बन पड़ा है। प्रतीकों के माध्यम से अपने भावों को पाठकों तक पहुँचाया है।
  3. रस योजना-सरलजी ने प्राय: वीर रस को ही अपनाया है। इनकी कविताएँ वीर रस में डूबी हुई हैं और ओजस्वी भाषा में नवयुवकों को प्रेरणा दे रही हैं। एक उदाहरण देखिए राष्ट्र के श्रृंगार ! मेरे देश के साकार सपनो ! देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना। जिन शहीदों के लहू से लहलहाया चमन अपना उन वतन के लाड़लों की याद तुम मुझाने न देना।
  • साहित्य में स्थान

श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने अपने क्रान्तिकारी लेखन से विश्व में कीर्तिमान स्थापित किया। ‘सरल जी’ का लेखन इतिहास जैसा प्रामाणिक और शोधपूर्ण है। उनकी साहित्य साधना गहन तपस्या थी। राष्ट्र उनकी साँसों में बसता था। यद्यपि इन्होंने गद्य की सभी विधाओं में लिखा है, फिर भी मूल रूप से वह कवि थे। अपनी उत्कृष्ट सेवा के लिए साहित्य में उनका सम्माननीय स्थान है।

13. गोस्वामी तुलसीदास [2014, 17]

  • जीवन परिचय

गोस्वामी तुलसीदास एक सिद्ध कवि हैं जो देश-काल की सीमाओं से परे हैं। मानव प्रकृति के जिन रूपों का हृदयग्राही वर्णन तुलसी के काव्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र उपलब्ध नहीं। गोस्वामी तुलसीदास का कोई प्रामाणिक जीवन परिचय उपलब्ध नहीं है। उनकी जन्म-तिथि,जन्म-स्थान, माता-पिता और विवाहादि के सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। फिर भी तुलसी के जीवन-वृत्त से सम्बन्धित जो भी सामग्री मिलती है उसके आधार पर कहा जाता है कि उनका जन्म संवत् 1589 वि.में बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में हुआ था। परन्तु कुछ लोग सोरों (एटा) को इनका जन्म स्थान मानते हैं। इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि इनका जन्म अभुक्तमूल नामक अनिष्टकारी नक्षत्र में होने के कारण इनके माता-पिता ने इन्हें जन्म होते ही त्याग दिया था। स्वामी नरहरिदास के सानिध्य में इन्होंने वेद-पुराण एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया। तुलसीदास का विवाह दीनबन्धु पाठक की सुन्दर कन्या रत्नावली के साथ हुआ। किंवदन्ती है कि रलावली के व्यंग्य वाणों से आहत होकर ही तुलसी को संसार और सांसारिक ऐश्वर्यों से विरक्ति हो गई और सब कुछ छोड़कर वह काशी चले गए। वहाँ इन्होंने नाना पुराण निगमागम का गहन अध्यन किया,साथ ही रामकथा कहते रहे। काशी छोड़कर तुलसीदास अयोध्या चले गए और वहीं पर ‘रामचरितमानस’ का प्रणयन किया। तुलसी ने संसार तो त्याग ही दिया था। वे राम के चरित गायन में लग गए और स्वयं को अपने आराध्य राम की भक्ति में समर्पित कर दिया। संवत् 1680 वि.में इस महात्मा ने शरीर के बन्धनों को तोड़ दिया और परमतत्व में विलीन हो गए।

तुलसी के काव्य में प्रेम की उन्मत्तता,उत्कृष्ट वैराग्य,राम की अनन्य भक्ति एवं लोकमंगल की भावना भरी हुई थी।

  • साहित्य सेवा

तुलसी के काव्य में लोकमंगल की भावना परिपूर्ण थी। तुलसी ने राम के लोकमंगलकारी रूप को अपनी लोकपावनी कृतियों के सामने प्रतिष्ठापित किया है। तुलसी ने अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से समाजगत,राजनीतिक, आर्थिक स्थितिपरक तथा विविध जातिगत सम्बन्धों और उनके एकीकरण का अन्यतम प्रयास किया है। प्रत्येक तरह की एवं प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने का तर्कसंगत उपाय तुलसी ने प्रत्येक वर्ग के लिए अपने ही सृजित साहित्य में यथास्थान प्रस्तुत किया है।

  • रचनाएँ

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-दोहावली,कवितावली,रामचरित मानस,विनय पत्रिका,रामाज्ञा प्रश्न, हनुमान बाहुक,रामलला,नहछू,पार्वती मंगल,बरबै रामायण,संदीपनी तथा गीतावली। रामचरित मानस हिन्दी साहित्य का सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य है। सोहर छन्दों में लिखे हुए ‘नहछ’, ‘जानकी मंगल’ और ‘पार्वती मंगल’ अच्छे खण्डकाव्य हैं। ‘गीतावली’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘विनय पत्रिका’ हिन्दी के सर्वोत्तम गीतिकाव्यों में से है। ‘विनय पत्रिका’ हिन्दी के . विनय काव्यों में श्रेष्ठ है। ‘कवितावली’ मुक्तक काव्य परम्परा की उत्कृष्ट रचना है।

  • भाव पक्ष

(1) भक्ति-भावना-तुलसी ‘रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे। धार्मिक दृष्टि से उदार होने का परिचय उन्होंने शिव, दुर्गा, गणेश आदि सभी देवी देवताओं की स्तुति करके दिया है। राम के प्रति तुलसी की भक्ति सेव्य-सेवक भाव की है। राम ही उनका एकमात्र बल, एकमात्र आशा और एकमात्र विश्वास है।
उदाहरण देखिए-

“एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास॥”

(2) समन्वयवादी दृष्टिकोण तुलसी का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक एवं समन्वयवादी था। उन्होंने राम के भक्त होते हुए भी अन्य देवी-देवताओं की वन्दना की। तुलसी की रचनाओं में भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक विचारधारा पूर्णतः दिखाई देती है। वह प्रत्येक धर्म पद्धति को भगवान की प्राप्ति का साधन मानते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय के प्रति तुलसी इतने सचेष्ट थे कि अपने आराध्य राम में भी उन्होंने शक्ति, शील और सौन्दर्य का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है।

(3) दार्शनिक भाव-तुलसी ने अपनी भक्ति का निरूपण यद्यपि दार्शनिक आधार पर किया है, किन्तु उनकी दार्शनिक विचारधारा किसी मत या वाद से परे है। तुलसी की दृष्टि में राम साक्षात् परमब्रह्म हैं। संसार क्षणभंगुर और असत्य है। भवसागर को पार करने के दो ही साधन हैं-ज्ञान और भक्ति। वह ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं मानते-

“ज्ञानहिं भक्तिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव संभव खेदा॥”

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(4) लोकहित की भावना-तुलसीदास की भक्ति लोकमंगल की भावना से प्रेरित है। राम लोकपालक भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे लोकहितकारी मानवता के उच्चतम आदर्श और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। तुलसी के रामराज्य की कल्पना एक आदर्श है। उन्होंने मानवीय सिद्धान्तों पर आधारित समाज और शासन पद्धति के वृहद् स्वरूप को प्रस्तुत किया है।

(5) रससिद्धता तुलसी रससिद्ध कवि थे। उनकी कविताओं में श्रृंगार,शान्त, वीर रसों का समन्वय है। श्रृंगार रस के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का बड़ा ही सजीव निरूपण किया है। रौद्र,करुण, अद्भुत रसों का बड़ा ही सुन्दर वर्णन हुआ है।

  • कला पक्ष

(1) भाषा तुलसी ने अपनी काव्याभिव्यक्ति हेतु उस काल में प्रचलित दोनों प्रमुख भाषाओं ब्रज और अवधी को अपनाया है। तुलसी मुख्य रूप से अवधी भाषा के कवि हैं। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रचुरता है। रामचरित मानस अवधी में तथा कवितावली, गीतावली और विनय पत्रिका ब्रजभाषा में लिखी हैं। उनकी भाषा में सरलता, बोधगम्यता, सौन्दर्य,चमत्कार,प्रसाद,माधुर्य, ओज आदि सभी गुणों का समावेश है।

(2) शैली-तुलसी ने अपने युग में प्रचलित सभी शैलियों में काव्य रचना की। सभी मतों,सम्प्रदायों और सिद्धान्तों की कटुता को मिटाकर उनमें समन्वयवादी प्रवृत्ति को अपनाया है। उन्होंने अवधी,ब्रजभाषा में समान रूप से रचनाएँ लिखीं। जहाँ-तहाँ अरबी, फारसी,भोजपुरी और बुन्देलखण्डी भाषाओं के शब्द भी मिल जाते हैं। यत्र-तत्र मुहावरे और लोकोक्तियों ने उनकी भाषा को और भी सरस बना दिया है।

(3) छन्द योजना—तुलसी ने जायसी की दोहा-चौपाई छन्दों में ‘रामचरित मानस’ की रचना की। सरदास की पद शैली को उन्होंने विनय पत्रिका और गीतावली में अपनाया। कवितावली को उन्होंने सवैया शैली में लिखा। दोहावली में उन्होंने दोहा छन्द का प्रयोग किया।

(4) अलंकार योजना-तुलसी का अलंकार विधान अत्यन्त रोचक है। उनकी उपमाएँ अत्यन्त मनोहर हैं। उनके उपमा अलंकार को ही हम कहीं रूपक,कहीं उत्प्रेक्षा तो कहीं दृष्टांत के रूप में देखते हैं। उनके अलंकार काव्य का वास्तविक सौन्दर्य उजागर करने के लिए प्रयुक्त हुए हैं।

  • साहित्य में स्थान

गोस्वामी तुलसीदास लोक कवि हैं। उनके काव्य से जीने की कला सीखी जा सकती है। उनके काव्य का बहिःपक्ष जितना सबल है,उसका अन्तःपक्ष उससे भी सबल है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ने उनके बारे में लिखा है
“कविता करके तुलसी न लसै, कविता लसी या तुलसी की कला।”

14. मैथिलीशरण गुप्त [2009, 12]

  • जीवन परिचय

अपने साहित्य से राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले महान् कवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव जिला झाँसी में सन् 1886 में हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था। वह वैष्णव होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी थे। गुप्तजी को कविता के संस्कार अपने पिता से ही प्राप्त हुए। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा चिरगाँव में ही हुई। बाद में वे 9वीं कक्षा तक झाँसी में पढ़े। स्कूली शिक्षा में मन न लगने के कारण उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और घर पर ही स्वाध्याय किया।

कुछ समय बाद गुप्तजी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आए। द्विवेदीजी की प्रेरणा से उनके मन-मानस में कवि का स्फुरण हुआ। पहले उनकी रचनाएँ ‘सरस्वती’ में छपी। सन् 1923 में गुप्तजी की भारत भारती’ नामक काव्यकृति प्रकाशित हुई जिसने उन्हें साहित्य जगत में प्रसिद्धि दी। सन् 1952 से 1964 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। गुप्तजी को भारत का राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त रहा। सन् 1964 में हिन्दी के इस महान् कवि का स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

मैथिलीशरण गुप्त ने अपने साहित्य से राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की। उन्होंने भारतवासियों में एकता स्थापित करने तथा सद्भाव, सौजन्य व सौहार्द्र विकसित करने के लिए आजीवन साहित्य रचना की। उनका काव्य रामभक्ति व राष्ट्र भक्ति का अनूठा संगम है।

  • रचनाएँ

गुप्तजी ने प्रबन्ध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य लिखे हैं। उनकी रचनाओं को चार भागों में बाँटा जा सकता है खण्डकाव्य, महाकाव्य, गीतिकाव्य और गीतिनाट्य। उन्होंने संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी की कुछ रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। गुप्तजी की मौलिक रचनाएँ निम्न हैं रंग में भंग, जयद्रथ वध, पद्य प्रबन्ध, भारत-भारती, शकुन्तला, तिलोत्तमा, चन्द्रहास,पंचवटी, स्वदेश-संगीत, हिन्दू सैरन्ध्री, वन वैभव, गुरुकुल, साकेत, यशोधरा, द्वापर, सिद्धिराज, मंगल घट, नहुष, कुणाल गीत, अर्जुन और विसर्जन, काबा और कर्बला, विश्ववेदना, अजित, प्रदक्षिणा, पृथ्वी पुत्र, हिडिम्बा, अंजुली और अर्घ्य, जय भारत, युद्ध और
शान्ति,विष्णुप्रिया। साकेत महाकाव्य है। यशोधरा,द्वापर, विष्णुप्रिया,पंचवटी तथा भारत-भारती उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।

  • भाव पक्ष

(1) भारतीय संस्कृति के पक्षधर-प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति उनका आस्था असीम है। उनकी अधिकांश रचनाएँ अतीतकालीन सभ्यता और संस्कृति का गौरव लिए हुए हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम चित्रों से उनके काव्य भरे पड़े हैं।

(2) राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति-प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रखने के साथ-साथ गुप्तजी का हृदय राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है। उनके समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। भारतीय समाज की दशा अत्यन्त दयनीय थी। भारतीय अपने प्राचीन गौरवशाली आदर्शों को भूलते जा रहे थे। अपनी ‘भारत-भारती’ में वह भारतीयों का आह्वान करते हैं

“हम कौन थे, क्या हो गए है और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।”

(3) राम की अनन्य भक्ति-गुप्त जी सगुणोपासक वैष्णव कवि हैं। अन्य धर्मों के प्रति समुचित आदर रखते हुए वह राम के ही अनन्य भक्त हैं। काव्यों में उन्होंने मंगलाचरण के रूप में राम की स्तुति की है। कृष्ण चरित्र पर केन्द्रित द्वापर’ में वह इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं-

“धनुर्बाण या वेणु लो, श्याम रूप के संग।
मुझ पर चढ़ने से रहा, राम दूसरा रंग।”

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(4) मानवतावादी दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति मानवतावादी है। उनकी दृष्टि में सम्पूर्ण संसार एक कुटुम्ब के समान है।। गुप्तजी पूर्णतः मानवतावादी हैं। विश्व-प्रेम एवं लोक-सेवा के माध्यम से उन्होंने अपने काव्य में इसी विचारधारा को व्यक्त किया है।

(5) गाँधीवादी दृष्टिकोण-गुप्त जी गाँधीजी द्वारा चलाए गए स्वतन्त्रता आन्दोलन से भी जडे रहे थे। अतः उन पर गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा। उनके काव्य में अहिंसा, सत्य, राष्ट-प्रेम,समाज सुधार, हरिजनोद्धार,स्वदेशी से सम्बन्धित जो दृष्टिकोण मिलता है वह अधिकतर गाँधीजी के विचारों से प्रेरित है।

(6) नारी के प्रति सम्मान गुप्तजी के हृदय में नारी जाति के प्रति आदर का भाव और उसकी वर्तमान करुण अवस्था के प्रति गहरी करुणा का भाव है। भारतीय समाज में नारी की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। गुप्तजी का हृदय भारतीय नारी की दयनीय अवस्था पर अत्यन्त दुःखी होता है

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

(7) समन्वयवाद के पक्षधर-गुप्तजी को प्रायः समन्वयवादी कवि कहा जाता है। उनके काव्य में अतीत और वर्तमान, सगुण और निर्गुण, भक्ति और ज्ञान,सत और असत,व्यक्ति और समाज.धर्म और कर्म आदि जीवन के विभिन्न विरोधी पक्षों का अदभुत समन्वय है। रामचन्द्र शक्ल ने उनके बारे में लिखा है-“गुप्तजी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि हैं। सब प्रकार उच्चता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त है। प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह दोनों इनमें हैं।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा-गुप्तजी की काव्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी है। उनकी भाषा शुद्ध और परिमार्जित हिन्दी है, जिसमें संस्कृत शब्दों की बहुलता है। लेकिन भाषा क्लिष्ट नहीं होने पायी है। यथास्थान मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ है। सौन्दर्य और सजीवता के साथ-साथ उनकी भाषा में माधुर्य,ओज और प्रसाद गुणों का भी समावेश हुआ है।
  2. अलंकार योजना-गुप्तजी के काव्य में शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों ही प्रकार के अलंकारों का प्रयोग हुआ है। प्राचीन अलंकारों के साथ ही उन्होंने मानवीकरण, विश्लेषण-विपर्यय और ध्वन्यार्थ व्यंजना जैसे पाश्चात्य अलंकारों को भी अपनाया है। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, विभावना, सन्देह आदि अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. छन्द योजना-गुप्तजी के काव्य में छन्द विधान में पर्याप्त विविधता दिखाई देती है। या, छप्पय,घनाक्षरी,शिखरिणी,द्रुत विलम्बित; मालिनी आदि अनेक प्रकार के छन्दों का प्रयोग उन्होंने अपने काव्य में किया है।
  4. रस योजना-मैथिलीशरण गुप्त ने अपने काव्य में प्रायः सभी रसों का नियोजन किया है। उनमें श्रृंगार,करुण, वीर और वात्सल्य रसों की अधिकता है।
  5. शैली-गुप्तजी ने अपने काव्य में प्रमुखतः भावात्मक शैली का प्रयोग किया है। इसी शैली के अन्तर्गत उनके काव्य में विचारात्मक, आत्मकथात्मक, आत्माभिव्यंजक, सूक्ति आदि शैलियों का प्रयोग हुआ है।
  • साहित्य में स्थान

गुप्तजी को साहित्यिक और राष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर पर्याप्त सम्मान मिला। अपने जीवन काल में वह अनेक उपाधियों और पारितोषिकों आदि से विभूषित किये गये। आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट् की उपाधि प्रदान की और ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ ने उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से विभूषित किया। वे सन् 1952 से 1964 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे।

15. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ [2010]

  • जीवन परिचय

सुमन जी छायावाद के अन्तिम चरण में काव्य-क्षेत्र में आए और प्रारम्भ में प्रेमगीत लिखते रहे। प्रकृति के विशाल क्षेत्र से उठती हुई मानवता की कराहट को सुनकर वह राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित हुए और इनके मन में भी क्रान्ति की ज्वाला धधक उठी। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म उन्नाव (उत्तर प्रदेश) के झगरपुर नामक गाँव में सन् 1915 ई. में हुआ था। ‘सुमन’ बाल्यावस्था में ही ग्वालियर चले आए और यहीं उनकी शिक्षा सम्पन्न हुई। उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से बी.ए.किया। 1940 में एम.ए. और डी.लिट् की उपाधियाँ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उनकी नियुक्ति नेपाल स्थित दूतावास में सांस्कृतिक सहायक के रूप में हो गई। 1961 में माधव कॉलेज, उज्जैन के प्राचार्य नियुक्त हुए तथा कुछ वर्षों के बाद उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में उपकुलपति के रूप में कार्यभार संभाल लिया। उनको भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ की उपाधि से विभूषित किया गया। उपकुलपति के पद से अवकाश लेकर साहित्य सेवा में रत हुए। सन् 2002 ई. में उनका निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

सुमन जी की कविता सामाजिक जीवन तथा राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी हुई हैं। इन्होंने प्रारम्भ में प्रेमभाव पर आधारित अनेक गीत लिखे। स्वाधीनता आन्दोलन और शोषित वर्ग की पीड़ा ने इनके काव्य-सृजन की दिशा बदल दी। सुमन जी प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। अपने काव्य के माध्यम से ‘सुमन’ जी ने पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रबल प्रहार किए और पीड़ित मानवता को वाणी दी। साम्यवाद के साथ ही गाँधीवाद में भी इनकी अटूट निष्ठा रही। इनकी कविताओं में जागरण और निर्माण का सन्देश है।

  • रचनाएँ

सुमन जी की रचनाएँ अग्रलिखित हैं

  1. हिल्लोल-यह सुमन जी के प्रेमगीतों का प्रथम काव्य-संग्रह है।
  2. आँखें भरी नहीं में मिलन की आकांक्षा, सौन्दर्य तथा प्रेम का मनोहारी चित्रण है।
  3. जीवन के गान’, प्रलय सृजन’, ‘विश्वास बढ़ता ही गया’-सुमन जी की क्रान्तिकारी भावनाओं से भरे हुए रचना संग्रह हैं।
  4. विंध्य हिमालय-इसमें सुमन जी की देश-प्रेम और राष्ट्रीय भावनाओं वाली कविताएँ संगृहीत हैं।
  5. माटी की बारात-इसमें इनको साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया है।
  • भाव पक्ष
  1. प्रेम-सुमन जी छायावाद के अन्तिम चरण में काव्य क्षेत्र में आए। प्रारम्भ में इन्होंने प्रेमगीत लिखे। धीरे-धीरे इनका ध्यान समाज के प्रति अपने कर्तव्य की ओर गया। प्रकृति के विस्तृत क्षेत्र से उठती हुई त्रस्त मानवता के दुःख ने इनका ध्यान आकर्षित किया और वे देश के राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए।
  2. साम्यवाद सुमन जी को रस की नवीन अर्थव्यवस्था ने बहुत आकर्षित किया। अतः इनका झुकाव साम्यवाद की ओर रहा।
  3. पूँजीवाद का विरोध-सुमन जी के मन में क्रान्ति की ज्वाला जल रही थी। इनका मन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रति विरक्ति के भाव से भर उठा। अत: इनकी कविताओं में साम्राज्यवाद के विरुद्ध आवाज उठाई गई।
  4. सत्य और अहिंसा-सुमन जी की निष्ठा गाँधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों पर दृढ़ रही। इसी कारण इनकी कविताओं में क्रान्तिकारी स्वर पाया जाता है।
  5. जीवन दर्शन-इनके काव्य में इनका स्वयं का पुष्ट जीवन दर्शन स्पष्ट दृष्टिगत है जिसमें वर्तमान के हर्ष पुलक,राग विराग और आशा उत्साह के स्वर भी मुखरित हुए।

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  • कला पक्ष
  1. भाषा-सुमन जी की भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। उनकी खड़ी बोली में संस्कृत के सरल तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। साथ ही उर्दू के शब्द भी यत्र-तत्र मिल जाते हैं। सुमन जी एक प्रखर एवं ओजस्वी वक्ता भी थे। अतः उनकी भाषा जनभाषा कही जा सकती है।
  2. शैली इनकी शैली पर इनके व्यक्तित्व की छाप है। उनकी शैली में सरलता, स्वाभाविकता, ओज, माधुर्य और प्रसाद गुणों का समावेश है। उनके गीतों में स्वाभाविकता, संगीतात्मकता,मस्ती और लयबद्धता है।
  3. अलंकार योजना इनकी कविता में अलंकार अपने आप ही आ गए हैं। नए-नए उपमानों के माध्यम से उन्होंने अपनी बात बड़ी ही कुशलता से कह दी है।
  4. छन्द विधान-सुमन जी ने मुक्त छन्द लिखे हैं और परम्परागत शब्दों की समृद्धि में सहयोग दिया है।
  • साहित्य में स्थान

सुमन जी उत्तर छायावादी युग के प्रगतिशील प्रयोगवादी कवियों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे एक सुललित गीतकार, महान् प्रगतिवादी एवं वर्तमान युग के कवियों में अग्रगण्य हैं। हिन्दी साहित्य की प्रगति में इनका सहयोग अतुलनीय है।

16. विष्णुकान्त शास्त्री

  • जीवन परिचय

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री का जन्म 2 मई, 1929 को कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। इनके पिता का नाम गंगेय नरोत्तम शास्त्री और माता का नाम श्रीमती रूपेश्वरी देवी था। इन्होंने एम.ए,एल.एल.बी.तक शिक्षा प्राप्त की। 1953 में इनका विवाह श्रीमती इन्दिरा देवी से हुआ। इनको बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से डी. लिट् की उपाधि प्रदान की गई। विष्णुकान्त शास्त्री जी 1953 से 1994 तक कोलकाता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक रहे। अवकाश प्राप्त करने के उपरान्त वे भारत भवन, भोपाल में न्यासी सचिव के पद पर रहे तथा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पद को भी इन्होंने सुशोभित किया। 17 अप्रैल,2005 में इनका स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

विष्णुकान्त शास्त्री ने हिन्दी की अनेक पुस्तकें लिखकर साहित्य सेवा की। अनेक बंगाली और अंग्रेजी कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया। ‘उपमा कालिदासस्य’ का बंगला से हिन्दी में अनुवाद किया। बंगला की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया और ‘महात्मा गाँधी का समाज दर्शन’ का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया। डॉ. शास्त्री द्वारा लिखी गई कविताएँ जीवन के संवेदनशील क्षणों की भावना-प्रधान अभिव्यक्ति हैं।

  • रचनाएँ
  1. ‘कवि निराला की वेदना तथा अन्य निबन्ध’, ‘कुछ चन्दन की कुछ कपूर की’, ‘चिन्तन मुद्रा’, ‘अनुचिन्तन’ आदि उनके द्वारा रचित साहित्यिक समीक्षाएँ हैं।
  2. ‘बांग्लादेश के सन्दर्भ में’–उनका रिपोर्ताज है।
  3. ‘भक्ति और शरणागति’, ‘सुधियाँ उस चन्दन के वन की’ ये उनके द्वारा लिखित संस्मरण हैं।
  4. ‘उपमा कालिदासस्य’ बांग्ला से हिन्दी में अनूदित है।
  5. ‘महात्मा गाँधी का समाज दर्शन’ अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित ग्रन्थ है।
  6. ‘दर्शक और आज का हिन्दी रंगमंच’, ‘बालमुकुन्द गुप्त का एक मूल्यांकन’, ‘बांग्लादेश संस्कृति और साहित्य’, ‘तुलसीदास आज के सन्दर्भ में ये इनके द्वारा सम्पादित ग्रन्थ हैं।
  7. ‘जीवन पथ पर चलते-चलते’ उनका काव्य संकलन है।
  • भाव पक्ष
  1. संवेदनशीलता-डॉ. शास्त्री द्वारा लिखी गई कविताएँ जीवन के संवेदनशील क्षणों की भावना-प्रधान अभिव्यक्ति हैं।
  2. भारतीय संस्कृति में आस्था-विष्णुकांत शास्त्री की भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रही। ये देश की स्वतन्त्रता के पक्षधर रहे हैं। उदाहरण देखिए“विजय पथ पर बढ़ सिपाही
    विजय है तेरी सुनिश्चित।
    लोटती है विजय चरणों पर उन्हीं के, जो बढ़े हैं।
    तुच्छ कर सब आपदाएँ, धर्मपथ पर जो अड़े हैं।”
  3. राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति इन्होंने अपनी रचनाओं में राष्ट्र-प्रेम को आदर्श रूप में माना है। इनका राष्ट्र-प्रेम व्यापक और उदार है। एक उदाहरण देखिए”गगन गायेगा गरज कर गर्व से तेरी कहानी
    वक्ष पर पदचिह्न लेगी धन्य हो धरती पुरानी।
    कर रहा तू गौरवोज्ज्वल त्यागमय इतिहास निर्मित।
    विजय है तेरी सुनिश्चित।”
  4. जीवन जीने की शैली जीवन में जैसे-जैसे मोड़ आते गये कविता उन्हीं के अनुरूप मुखरित होती गई। जीवन के अनुरूप गुणों,जैसे–स्नेह, भक्ति,प्रेरणा आदि का समावेश इनकी कविताओं में देखा जा सकता है।

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  • कला पक्ष
  1. भाषा-डॉ. विष्णुकान्त शास्त्री की भाषा ओजस्वी है। इसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है। वीर रस की कविताओं में ओजगुण-प्रधान शब्दावली का प्रयोग है तथा शान्त रस की कविताओं में माधुर्य एवं प्रसाद गुणों का सहज समावेश है।
  2. अलंकार योजना-विष्णुकान्त शास्त्री की कविताओं में अलंकार स्वयं प्रविष्ट हो गए हैं। रूपक,उपमा व अनुप्रास की छटा स्थान-स्थान पर सहज ही दृष्टिगत होती है।
  3. रस निरूपण-डॉ.विष्णुकान्त शास्त्री ने अपनी कविताएँ मुख्यत: वीर रस और शान्त रस में लिखी हैं। वीर रस में ओज-प्रधान शब्दावली है और शान्त रस में माधुर्य और प्रसाद गुण झलकता है।
  • साहित्य में स्थान

शास्त्रीजी को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, डॉ. राममनोहर लोहिया सम्मान तथा राजर्षि टंडन हिन्दी सेवी सम्मान प्राप्त हुए। भावों के आधार पर उनकी कविताओं को राष्ट्रीय, विविधा,प्रेरणा व प्यार,भक्ति एवं काव्यानुवाद के रूप में विभाजित किया जा सकता है। हिन्दी साहित्य में इनका स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

17. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ [2009, 11, 13]

  • जीवन परिचय

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ एक युगान्तकारी कवि हैं। छायावाद के प्रमुख स्तम्भ और आधुनिक काव्य में क्रान्ति के अग्रदूत निराला का जन्म मेदिनीपुर (बंगाल) के महिषादल राज्य में सन् 1897 में हुआ था। इनके पिता रामसहाय त्रिपाठी महिषादल राज्य के कर्मचारी थे। इस प्रकार निराला जी का बचपन बंगाल की शस्य-श्यामला धरती पर व्यतीत हुआ। इनकी स्कूली शिक्षा केवल मैट्रिक तक हुई। कालान्तर में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेजी भाषा तथा साहित्य का बहुत अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। निरालाजी का जीवन दुःख और संघर्षों में ही बीता। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने कलकत्ता में रामकृष्ण आश्रम में रहकर ‘समन्वय’ का कार्य किया। मतवाला (कलकत्ता) एवं सुधा (लखनऊ) का सम्पादन किया। 15 अक्टूबर,1961 को इनका स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

निराला जी का साहित्य बहुमुखी और विपुल है। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानियाँ, निबन्ध,रेखाचित्र,जीवनियाँ,आलोचनात्मक निबन्ध आदि सभी कुछ लिखे हैं। निराला का काव्य दार्शनिक विचारधारा, गम्भीर चिन्तन और भाव सौन्दर्य की अमूल्य निधि है। विवेकानन्द का प्रभाव उन पर सुस्पष्ट है। उनके काव्य में कहीं विराट की ओर रहस्यात्मक संकेत है तो कहीं सामान्य जन के उत्पीड़न के चित्र हैं,कहीं कथा मुखर है तो कहीं गीत माधुरी।

  • रचनाएँ

समर्थ कवि होने के साथ-साथ निराला ने उपन्यास,कहानियाँ, रेखाचित्र,नाटक,जीवनियाँ और निबन्धों की रचना की। अंग्रेजी,बंगला तथा संस्कृत के ग्रन्थों के अनुवाद भी किये। परिमल, अनामिका, गीतिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीतकुंज तथा सान्ध्य काकली ये काव्य कृतियाँ हैं। राम की शक्ति पूजा, तुलसीदास उनकी लम्बी कविताएँ हैं, जो अपनी विशिष्टताओं के कारण खण्डकाव्य मानी गई हैं। ‘सरोज स्मृति हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ शोकगीत माना गया है।

  • भाव पक्ष

(1) प्रेम और सौन्दर्य-छायावाद के उन्नायक कवि होने के कारण निराला के काव्य में प्रेम तथा सौन्दर्य के मोहक चित्र प्राप्त होते हैं। उनका सौन्दर्य चित्रण आकर्षक एवं अद्भुत है। उदाहरण के लिए निम्न पंक्तियाँ देखिए

“नयनों का नयनों से गोपन प्रिय संभाषण,
पलकों पर नव पलकों का प्रथमोत्थान पतन।”

निराला के काव्य में श्रृंगार के मादक एवं सजीव चित्र भी प्राप्त होते हैं।

(2) भक्ति एवं रहस्य भावना निराला जी के काव्य में भक्ति एवं रहस्य, भावनापरक रचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। उन्होंने आत्मा तथा परमात्मा की एकता का प्रतिपादन किया है। निराला जी की भक्तिपरक रचनाओं में सगुण भक्तों का सा आत्मसमर्पण, तल्लीनता तथा हृदय की आर्त भावना परिलक्षित होती हैं।

“उन चरणों में मुझे दो शरण,
इस जीवन को करो हे वरण
x x x
दलित जनों पर करो करुणा
दीनता पर उतर आये
प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा।”

(3) प्रकृति चित्रण-निराला जी के काव्य में प्रकृति चित्रण के विविध रूप प्राप्त होते हैं। उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मधुर और सजीव है। उन्होंने प्रकृति में मानवीय भावों तथा क्रिया-कलापों का आरोप किया है। जैसे

“सखि बसन्त आया,
आवृत्त सरसी-उर सरसिज उठे,
केशर के केश कली से छूटे
स्वर्ण-शस्य अंचल
पृथ्वी का लहराया।”

(4) राष्ट्रीयता निराला जी का काव्य देश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है। उनकी कविताओं में ओज स्पष्ट दिखाई देता है। ‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि ने भारतीयों को जाग जाने का उद्बोधन किया है। जैसे

“जागो फिर एक बार प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें।
अरुण-पंख-तरुण किरण खड़ी खोल रही है द्वार।”

(5) प्रगतिवादी दृष्टिकोण छायावाद का कवि होते हुए भी निराला जी को प्रगतिवाद का भी प्रथम कवि माना जाता है। उनके काव्य में सामाजिक तथा आर्थिक विषमता के प्रति विद्रोह तथा समाज के दलित एवं शोषित वर्ग के प्रति करुणा का भाव है। निम्न वर्ग के जीवन को उन्होंने यथा तथ्य चित्रण किया है। कुकुरमुत्ता कविता में उनका प्रगतिवादी स्वर देखिए

“अबे, सुन बे गुलाब,
भल मत गर पायी खशब रंगो आब
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर इतरा रहा कैपीटलिस्ट।”

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  • कला पक्ष

(1) भाषा-निराला जी की भाषा भावों के अनुरूप है। देश-प्रेम तथा भक्तिपरक व्यंग्यात्मक कविताओं में उनकी भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। गम्भीर रचनाओं में उनकी भाषा क्लिष्ट, संस्कृतनिष्ठ एवं दुरूह हो गई है। निराला जी की भाषा में उर्दू, फारसी एवं बंगला शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। उन्होंने कुछ नवीन शब्दों का गठन भी किया है। निराला जी की काव्य भाषा भावानुकूल, चित्रात्मक, गत्यात्मक तथा ध्वन्यात्मक गुणों से समन्वित है। जैसे

“है अमा निशा, उगलता गगन घन अन्धकार
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार।
अप्रतिहत गरज रहा पीछे, अम्बुधि विशाल
भूधर त्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।”

(2) शैली-निराला जी की दो शैलियाँ हैं-

  • उत्कृष्ट छायावादी गीतों में प्रयुक्त दुरूह शैली।
  • सरल,प्रवाहपूर्ण,प्रचलित उर्दू के शब्द लिए व्यंग्यपूर्ण और चुटीली शैली।

(3) छन्द योजना-निराला जी ने नए-नए छन्दों का प्रयोग किया है। उन्होंने तुकान्त और अतुकान्त दोनों प्रकार के छन्द लिखे हैं। निराला जी ‘मुक्त छन्द’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। मुक्त

छन्द में मात्राओं तथा वर्णों का बन्धन नहीं होता। केवल ध्वनि तथा प्रवाह का ध्यान रखा जाता है। मुक्त छन्द का उदाहरण देखिए-

“रे प्यारे को सेज पास
नम्रमुख हँसी-खिली,
खेल रंग प्यारे संग।”

(4) अलंकार विधान-निराला जी की अलंकार योजना उच्चकोटि की है। उनके काव्य में अलंकारों की प्रचुरता है। उन्होंने नवीन और प्राचीन दोनों प्रकार के उपमान खोजे हैं। उन्होंने उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक,मानवीकरण, विशेषण, विपर्यय, पुनरुक्तिप्रकाश आदि अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है। मानवीकरण का एक उदाहरण देखिए-

“किसलय वसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिया उर-तरु-पतिका।”

  • साहित्य में स्थान

आधुनिक कवियों में निराला का उत्कृष्ट स्थान है। वे मुक्तक के जनक थे। उन्होंने हिन्दी कविता को नयी दिशा प्रदान की। हिन्दी साहित्य में निराला के कृतित्व को उनके व्यक्तित्व ने और भी अधिक महान बनाया है। निराला जी हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकार हैं।

18. गजानन माधव मुक्तिबोध’

  • जीवन परिचय

नई कविता के सशक्त कवि गजानन ‘मुक्तिबोध’ का जन्म 13 अक्टूबर, 1917 को मुरैना जनपद के श्योपुर कस्बे में हुआ था। उन्होंने उज्जैन के माधव विद्यालय से हाईस्कूल की परीक्षा पास की तथा इन्दौर के होल्कर कॉलेज से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। आर्थिक विपन्नता के कारण पढ़ाई बन्द करके शुजालपुर के शारदा शिक्षा सदन में शिक्षक हो गये। सन् 1942 में उज्जैन के मॉडल स्कूल में शिक्षक रहे। सन् 1948 में नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया तथा राजनन्द गाँव के दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक हो गये। उन्होंने ‘हंस’ (वाराणसी) तथा.’समता’ (जबलपुर) मासिक पत्रों में भी कार्य किया। असाध्य रोगों से जूझते हुए सन् 1964 में उनका देहान्त हो गया।

  • साहित्य सेवा

उन्होंने पद्य और गद्य साहित्य दोनों में रचनाएँ लिखीं। मुक्तिबोध की कविताओं का भाव पक्ष उन्नत तथा समसामयिक है। इनकी भाषा परिमार्जित, प्रौढ़ तथा सबल है। मुक्तिबोध ने काव्य के माध्यम से जन को जन-जन तथा मन को मानवीय बनाने की चेष्टा की है।

  • रचनाएँ

‘चाँद का मुँह टेड़ा है’ तार सप्तक में छपने वाली कविताएँ हैं। ‘काठ का सपना’, सतह से उठता हुआ आदमी’ इनके महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं। ‘नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’, भारतीय इतिहास’, ‘कामायनी-एक पुनर्विचार’, संस्कृति एवं नई कविता का आत्मसंघर्ष’ इनकी जानी मानी गद्य रचनाएँ हैं।

  • भाव पक्ष

मुक्तिबोध की कविताओं के भाव पक्ष की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इनकी कविता के वर्ण्य विषय जीवन तथा समाज के यथार्थ से सम्बन्ध रखते हैं। इन्होंने अपनी कविता में समाज की विपन्नता,विवशता तथा विसंगतियों को चित्रित किया है।
  2. मुक्तिबोध के काव्य में मानवतावाद का स्वर स्पष्ट रूप से मुखरित हुआ है। मुक्ति बोध ने लघु मानव की खोज की है तथा उसके प्रति पूर्ण आस्था प्रकट की है। जैसे“जिन्दगी के दलदल के कीचड़ में फंसकर
    वृक्ष तक पानी में फंसकर
    मैं यह कमल तोड़ लाया हूँ।”
  3. उनकी कविता में आधुनिक भाव बोध की सशक्त अभिव्यंजना है।
  4. उनकी काव्य-चेतना में चिन्तन की प्रचुरता है। उनका यह चिन्तन जलते हुए अंगारे पर चलने वाले व्यक्ति की मनस्थिति का चिन्तन है।
  • कला पक्ष

(1) भाषा-इनकी भाषा परिमार्जित,प्रौढ़ तथा पुष्ट है। सामान्य बोलचाल की भाषा के अतिरिक्त संस्कृतनिष्ठ सामासिक पदावली से युक्त उनकी भाषा सरल एवं प्रवाहमय है। भाषा की शक्ति उनके प्रत्येक वर्णन को अर्थपूर्ण तथा चित्रमय बना देती है। मुक्तिबोध की भाषा में प्रांजलता,शब्द चयन की सहजता,सार्थकता के साथ-साथ युग बोध के अनुरूप कथ्य को प्रकट करने की पूर्ण सामर्थ्य है। उनकी भाषा में कहीं पर बनावट तथा अस्वाभाविकता नहीं है।

(2) शैली-मुक्तिबोध की अधिकांश कविताएँ लम्बी हैं। उनकी काव्य शैली बिम्ब तथा प्रतीक प्रधान है। उनके काव्य-बिम्ब तथा प्रतीक नये जीवन-सन्दों से युक्त हैं। वे सहज जीवन को व्यक्त करने के कारण सरलता से ग्राह्य हैं। उनकी शैली सबसे अलग नवीन प्रतीक और नये सन्दर्भो से युक्त है। उन्होंने कविता को एक नया आयाम दिया है।

  • साहित्य में स्थान

गजानन माधव मुक्तिबोध नई कविता के प्रतिनिधि कवि हैं और जीवन मूल्यों के प्रयोग करने वाले कवि भी हैं। नई कविता को स्वरूप प्रदान करने में उनका विशिष्ट स्थान है।

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19. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

  • जीवन परिचय

अज्ञेयजी हिन्दी में प्रयोगवादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने ‘तार-सप्तक’ का प्रकाशन करके हिन्दी में प्रयोगवाद का सूत्रपात किया। अज्ञेय जी का जन्म सन् 1911 में पंजाब के करतारपुर नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री हीरानन्द शास्त्री थे। पिता भारत के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे। इनका बचपन अपने पिता के साथ कश्मीर, लखनऊ, बिहार तथा मद्रास में व्यतीत हुआ। बी. एस-सी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एम.ए.(अंग्रेजी) में प्रवेश लिया। राजनैतिक आन्दोलन में सम्मिलित होने के कारण पढ़ाई का कार्यक्रम बीच में ही छूट गया। देश सेवा में लगे रहने के कारण इन्हें कारावास भी भोगना पड़ा। अज्ञेयजी ने कुछ समय तक अमेरिका में भारतीय साहित्य तथा संस्कृत के अध्यापक के रूप में कार्य किया। इसके बाद जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा अनशीलन विभाग के निदेशक पद पर कार्य किया। 4 अप्रैल,1987 को इस साहित्यकार का निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

अज्ञेयजी का जीवन एक साधक का जीवन था। इन्होंने सन् 1934 ई.के लगभग लेखन कार्य आरम्भ किया। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों में लेखन कार्य किया। उन्होंने निबन्ध, यात्रा-साहित्य, उपन्यास, कहानी, नाटक,संस्मरण,आलोचना आदि विविध विधाओं में साहित्य सृजन किया। सम्पादक और पत्रकार के रूप में उन्हें ख्याति प्राप्त थी। उन्होंने कई ग्रन्थों एवं पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। तार-सप्तक का प्रकाशन करके नये युग को जन्म दिया। उन्होंने ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’, ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘वाक’ (अंग्रेजी) पत्रों का बड़ी कुशलतापूर्वक सम्पादन किया। उनकी पहली कविता सन् 1927 में कॉलेज पत्रिका में प्रकाशित हुई। चित्रकारी,मृत्तिका-शिल्प,चर्म-शिल्प,काष्ठ-शिल्प, फोटोग्राफी,बागवानी,पर्वतारोहण आदि में उनकी विशेष रुचि थी। अज्ञेयजी प्रकृति तथा व्यवस्था प्रेमी व्यक्ति थे। उनकी साहित्यिक सेवाएँ सदैव चिर स्मरणीय रहेंगी।

  • रचनाएँ

अज्ञेयजी प्रतिभा सम्पन्न कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण निम्नवत् है

  1. काव्य-अरी ओ करुणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, हरी घास पर क्षणभर, बावरा अहेरी,इन्द्रधनु रौंदे हुए,कितनी नावों में कितनी बार, इत्यलम,सुनहले शैवाल,चिन्ता तथा पूर्वा।
  2. आलोचना-त्रिशंकु, हिन्दी-साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, तीनों तार सप्तकों की भूमिकाएँ आदि।
  3. नाटक-उत्तर प्रियदर्शी।
  4. कहानी संग्रह-विपथगा, शरणार्थी,जयदोल, तेरे ये प्रतिरूप, अमर बल्लरी, परम्परा आदि।
  5. निबन्ध-संग्रह-आत्मनेपद,लिखि कागद कोरे,सबरंग और कुछ राग आदि।
  6. उपन्यास-शेखर : एक जीवनी (भाग 1 तथा 2), नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी।
  7. यात्रा-साहित्य-एक बूंद सहसा उछली, अरे यायावर रहेगा याद।
  8. सम्पादन सैनिक, विशाल भारत,प्रतीक, दिनमान,वाक् (अंग्रेजी)।
  • भाव पक्ष

उनकी कविता में जीवन की गहरी अनुभूति तथा कल्पना की ऊँची उड़ान का सुन्दर समन्वय हुआ है। अज्ञेयजी ने एक नवीन काव्य धारा का प्रवर्तन किया। उनकी निजी अनुभूतियाँ प्रयोगवादी कविता के रूप में प्रकट हुईं।

  1. प्रकृति चित्रण-अज्ञेयजी प्रकृति प्रेमी कवि हैं। कवि ने प्रकृति का आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में प्रयोग किया है। प्रकृति के मानवीकरण रूप का प्रयोग अपने काव्य में किया है। अज्ञेयजी प्रकृति के पारखी कवि हैं। कहीं-कहीं प्रकृति के मनोरम चित्रों को उभारा है। कहीं-कहीं प्रकृति के भयंकर पक्ष का भी चित्रण किया है।
  2. प्रेम निरूपण-प्रेम के सम्बन्ध में उनका विचार है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान है। उनके प्रेम निरूपण में एक ओर प्रिया के सौन्दर्य का वर्णन किया है। वहीं दूसरी ओर मन की व्याकुलता दिखायी देती है। इनकी प्रारम्भिक रचनाओं में प्रेम की अनुभूति का वर्णन पर्याप्त रूप में किया गया है।
  3. व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति-अज्ञेयजी ने अपनी कविताओं में मानव स्वभाव का वर्णन किया है। वे समाज के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। व्यक्ति के विकास द्वारा ही समाज का विकास सम्भव है। उनका विचार है मानव के विकास के लिए मानसिक विकास भी आवश्यक है। अतः उन्होंने अपने काव्य में व्यक्ति के विकास को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है।
  4. बौद्धिकता कवि ने बौद्धिकता पर विशेष बल दिया है। उनकी कविताओं में बुद्धि का विकास अधिक है। उनकी कविताएँ अतिशय बौद्धिकता का खजाना बन कर रह गयी हैं। अत्यधिक बौद्धिकता ने रस का अभाव उत्पन्न कर दिया है। उनकी कविताओं में सर्वत्र बौद्धिकता के ही दर्शन होते हैं।
  5. क्षणवादी जीवन दृष्टि जीवन क्षणभंगुर है। इस कविता में क्षणवाद का प्रबल विरोध किया है। प्रयोगवादी कवि प्रति क्षण की अनुभूतियों को महत्त्वपूर्ण मानता है। वह क्षण को सत्य मानता है। अतः इसका उपभोग करना चाहता है।
  6. नवीन उपमानों का प्रयोग-प्रयोगवादी कवि नवीनता का पोषक है। उनका विचार है कि पुराने शब्दों में नये अर्थों को प्रकट करने की क्षमता नहीं रही। अत: नये-नये शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। नये विषय, नया शिल्प, नवीन भाषा, नए प्रतीक एवं नये उपमान इन कविताओं में प्रयुक्त किये गये हैं। इन नवीन उपमानों में नये सौन्दर्य बोध के दर्शन होते हैं।
  7. रहस्य भावना-अज्ञेय जी के काव्य में रहस्य की प्रधानता है। हरे भरे खेत,सागर, सुन्दर घाटियाँ, मनुष्य की मुस्कान,प्रेम तथा श्रद्धा आदि सभी में उस विराट ईश्वरीय सत्ता के दर्शन होते हैं। ये सभी उस ईश्वर की ही देन हैं। कवि,ईश्वर से समन्वय स्थापित करना चाहता है। अज्ञेयजी के काव्य में सर्वत्र रहस्य भावना दृष्टिगोचर होती है।
  • कला पक्ष
  1. भाषा-अज्ञेयजी का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। विषय के अनुसार आपकी भाषा बदलती रहती है। आपकी भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली से युक्त है। भावों को व्यक्त करने में जो भाषा आपको अच्छी लगी, आपने उस भाषा का ही प्रयोग किया है। कहीं-कहीं अंग्रेजी तथा उर्दू के शब्दों का प्रयोग भी अज्ञेयजी ने किया है। उनकी भाषा में नूतनता, लाक्षणिकता तथा प्रतीकात्मकता के गुण विद्यमान हैं। देशज शब्दों का प्रयोग भी किया है। भाषा में चित्रात्मकता तथा बिम्ब विधान के भी दर्शन होते हैं। भाषा में चटकीलापन लाने के लिए उन्होंने लोकोक्तियों एवं मुहावरों का प्रयोग भी किया है।
  2. शैली अज्ञेयजी का व्यक्तित्व गम्भीर था। व्यक्तित्व की छाप उनकी शैली पर दिखायी देती है। इनकी शैली में बौद्धिकता और गम्भीरता की प्रधानता है। इन्होंने गद्य में आलोचनात्मक शैली, वर्णनात्मक शैली, विवरणात्मक शैली, सम्वादात्मक शैली, विवेचनात्मक शैली, भावात्मक शैली तथा सम्बोधन शैली का प्रयोग किया है। अज्ञेयजी ने व्यंग्य-प्रधान रचनाओं में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। शैली भाषा तथा भावों के अनुकूल है।
  3. छन्द योजना-अज्ञेयजी ने छन्द मुक्त तथा छन्दबद्ध दोनों रूपों में रचनाएं की हैं। एक ओर उन्होंने छन्द के बन्धन को स्वीकारा है तथा दूसरी ओर छन्द के बन्धन को नकारा है। लय, स्वर तथा गेयता के तत्त्व विद्यमान हैं। छन्दों के प्रयोग द्वारा उनके काव्य में शब्द चित्र का अंकन किया गया है। कवि में गहन भावों को व्यक्त करने की शक्ति है।
  4. अलंकार योजना-अज्ञेयजी ने अपने काव्य में परम्परागत अलंकारों का प्रयोग किया है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। प्रकृति चित्रण में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग मिलता है। ध्वन्यर्थव्यंजना, विशेषण विपर्यय जैसे नवीन अलंकारों का प्रयोग किया है।

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उदाहरणार्थ-

उपमा-यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।
रूपक-मैं कब कहता हूँ, जीवन मरु नंदन कानन का फूल बने।

  • साहित्य में स्थान

अज्ञेयजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अज्ञेयजी हिन्दी साहित्य के लिए वरदान हैं। वे प्रतिभा सम्पन्न कवि हैं। अज्ञेयजी ने कविता का संस्कार किया है। कवि ने काव्य को नवीनता प्रदान की। वे मानवतावादी कवि हैं। उनकी कविताएँ बुद्धि को भी झकझोर देती हैं। वे प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे। नई कविता को शिल्पगत रूप देने में अज्ञेयजी का सर्वाधिक योगदान है। वर्तमान युग में अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व दोनों की विविधता के कारण काफी चर्चित रहे। साहित्य-सेवी अज्ञेयजी का हिन्दी जगत में विशिष्ट स्थान है।

20. वीरेन्द्र मिश्र

  • जीवन परिचय

वीरेन्द्र मिश्र का स्थान नवगीतकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी लेखनी में तथा कण्ठ में एक अजीव-सा माधुर्य है। मिश्रजी सरस्वती के वरद पुत्र हैं। कवि तथा गीतकार वीरेन्द्र मिश्र का जन्म दिसम्बर,1927 को ग्वालियर में हुआ था। श्री मिश्रजी ने जीवन-पर्यन्त मानव मूल्यों की स्थापना की। शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने पूरी तरह स्वयं को लेखन कार्य में तल्लीन कर दिया। उनका स्वभाव सरल तथा विनम्र था। अपने बड़ों का सम्मान करते थे। छोटों को स्नेह करते थे। वे संघर्ष की साक्षात् मूर्ति थे। स्वाभिमान तथा दृढ़ निश्चय उनके स्वभाव का प्रधान गुण था। उस समय कवि सम्मेलन उनके बिना अधूरे समझे जाते थे। अतः मिश्रजी कवि सम्मेलनों की शान थे। जून, 1975 में यह गीतकार सदैव के लिए हमसे दूर हो गया।

  • साहित्य सेवा

मिश्रजी ने अनेक रूपों में माँ भारती की सेवा की। वे गीतकार तथा गद्य लेखक के साथ-साथ एक सफल पत्रकार थे। वीरेन्द्र मिश्र आधुनिक कविता की वर्तमान पीढी के सबसे अधिक लोकप्रिय कवि माने जाते हैं। मिश्र जी छायावादोत्तर गीतकार हैं। उनके गीतों में समय तथा समाज की प्रगतिशील आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी रचनाओं में सामाजिक,सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय धरातल अत्यन्त सबल है। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से जनमानस में आस्था और विश्वास को जाग्रत किया है। उनके गीतों में जहाँ एक ओर भावुक प्रेमी के प्रणय की गूंज हैं,वहीं दूसरी ओर व्यथा एवं पीड़ा के मार्मिक स्वर भी विद्यमान हैं। उनके गीतों में राष्ट्रीय गौरव के स्वर मुखरित हुए हैं। अन्याय,शोषण और विषमता के विरुद्ध सच्ची मानवीय चिन्ता के दर्शन होते हैं।

  • रचनाएँ

वीरेन्द्र मिश्र की प्रमुख रचनाएँ हैं गीतम, मधुवंती, गीत पंचम, उत्सव गीतों की लाश पर,वाणी के कर्णधार,धरती,गीताम्बरा, शांति गन्धर्व आदि प्रमुख हैं। उन्होंने गीत, नवगीत, राष्ट्रीय गीत, मुक्तक के अतिरिक्त रेडियो नाटक एवं बाल साहित्य की रचना की।

  • भाव पक्ष

(1) सरस तथा सफल गीतकार-वीरेन्द्र मिश्र मूलतः गीतकार हैं। उनकी रचनाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरातल अत्यन्त व्यापक है। जनसाधारण उनके प्रेरणा स्रोत हैं। मिश्रजी सदैव सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूक रहे हैं। हमेशा ही युग चेतना का संचार किया है। काव्य का मर्म वही समझ सकता है जिसमें उत्सर्ग एवं त्याग की भावना निहित हो। गीतकार के भाव जगत में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है।

(2) कल्पना और यथार्थ का समन्वय-वीरेन्द्र मिश्र की कविताओं में कल्पना और यथार्थ का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। जीवन के शाश्वत सत्य से विमुख रहकर कल्पना लोक में विचरण करना कवि को रुचिकर नहीं लगता। कल्पना के माध्यम से कवि हृदय की अनुभूति कराता है। सत्य,सौन्दर्य और कल्पना की गहराई के दर्शन होते हैं। उनमें ऐसी कल्पना शक्ति है जिसके द्वारा एक सफल रचनाकार सिद्ध हुए हैं। सुधी पाठक और श्रोता उनकी कविताओं में तल्लीन हो जाता है। धरातल के वास्तविक यथार्थ को भी कवि प्रस्तुत करता है।

(3) वेदना की प्रधानता–मिश्रजी के काव्य में वेदना का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। कवि का व्यक्तिगत जीवन सुख-दुःख तथा आनन्द से पूर्ण रहा है। एक घटना ने तो उनके जीवन को ही बदल दिया। यह घटना उनके व्यक्तिगत जीवन की है। उनके बड़े भाई का असामयिक निधन हो गया। उनकी रचनाओं में सूनेपन का अनुभव होने लगा। मिश्रजी की व्यक्तिगत वेदना पूरे संसार की वेदना हो गयी। कहीं-कहीं हर्षातिरेक भी काव्य में दृष्टिगोचर होता है। उनके काव्य में विरह पीड़ित मानव की विकलता तथा उत्कण्ठा के दर्शन होते हैं। कवि की आँखों से प्रवाहित आँसू उसकी मर्म व्यथा के परिचायक हैं–

क्या तुम्हें कुछ भी पता है,
अश्रु में क्या-क्या व्यथा है?

(4) सत्यम् के सफल गायक कवि केवल कल्पना में ही विचरण नहीं करता अपितु वह सत्य के ठोस धरातल पर आधारित है। वे सत्य और ईमान के मार्ग पर हमें चलने के लिए प्रेरित करते हैं। सत्य सदैव आदरणीय है। कभी-कभी कठोर सत्य का भी समाज सम्मान करता है। कवि मानवीय जीवन के कटु सत्यों से हमें अवगत कराते हैं। यदा-कदा सुखद स्वप्न अतीत में विलीन हो जाता है।

(5) संघर्षों के कवि-संघर्ष मानव जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। जीवन में पग-पग पर बाधाएँ एवं संघर्ष हैं। इन संघर्षों से निकलना तथा टकराना ही सच्चा जीवन है। जीवन के कटु अनुभवों को प्राप्त करके जो कर्त्तव्य-पथ पर आगे बढ़ा है,वह दूसरों के लिए सदैव पथ-प्रदर्शक है। कवि ने अपने गीतों में जीवन की गतिशीलता का वर्णन किया है। कवि के गीतों में चिर शान्ति; प्रेम प्रकट होता है।

(6) युद्ध की विभीषिका का प्रबल विरोध-युद्ध देश के विकास में बाधक होते हैं। युद्ध सदैव ही मानवता के शत्रु हैं। युद्ध में विजय किसी की भी हो या पराजय किसी की हो, हानि तो प्राणिमात्र को पहुँचती ही है। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण ने कवि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। चीन ने भी जबरन भारत को युद्ध की आग में झोंक दिया। इससे अपार धन-जन की हानि हुई। कवि को युद्ध बुरा लगता है। वह चाहे अपने देश से हो अथवा किसी अन्य देश से। युद्धों से जनसामान्य को प्रदूषण, चीत्कार,विनाश और बेकारी ही मिलती है।

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  • कला पक्ष

(1) भाषा-मिश्रजी ने अपने काव्य में तत्सम शब्दों का प्रयोग किया है। कवि ने अपने काव्य में परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया है। चित्रात्मकता आपकी भाषा की प्रमुख विशेषता पायी जाती है। आपकी भाषा में कहीं-कहीं उर्दू-फारसी के शब्दों का प्रयोग स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भाषा-सौष्ठव की गहराई पायी जाती है। कवि की रचनाएँ प्रसाद, ओज तथा माधुर्य गुण से परिपूर्ण हैं। भाषा लक्षणा तथा व्यंजना शब्द शक्ति से पूर्ण है।

(2) शैली-मिश्रजी का काव्य गेयतात्मकता का श्रेष्ठ उदाहरण है। काव्य में संगीतात्मकता भी पायी जाती है। संगीत की प्रधानता तथा गेयता के कारण ही मिश्रजी की कविताएँ मंच पर लोकप्रियता को प्राप्त हुई। प्रत्येक घर में उनके गीतों को बड़े ही चाव से गुनगुनाया जाता है। मिश्रजी की कविता में अनुपम प्रवाह,सहज माधुर्य तथा अदभुत लालित्य है। प्रतीक तथा बिम्ब विधान का प्रयोग स्थान-स्थान पर मिलता है। मिश्रजी की शैली में गीति काव्य का नवीनतम विकास प्राप्त होता है।

(3) छन्द योजना कवि ने छोटे-छोटे छन्दों का प्रयोग किया है। उनका काव्य नवीन प्रकार के छन्द,धुने तथा सुरों का एक विशाल सागर है। मिश्रजी ने गीत की नवीनतम् परम्परा को जन्म दिया है। कवि स्वच्छन्द प्रवाह का पोषक है। उनका विचार है कि छन्दबद्धता स्वाभाविकता को समाप्त कर देती है।

मिश्रजी ने तुकान्त तथा अतुकान्त दोनों प्रकार के छन्दों में गीत लिखे हैं। ‘गीतम’ सर्वाधिक लयात्मक कृति है। कवि ने जन-जन की वाणी को छन्दोबद्ध किया है। लयात्मकता, गतिशीलता,प्रवाहिकता आपके छन्दों की प्रमुख विशेषता है।

(4) अलंकार योजना मिश्रजी ने अपने काव्य में लगभग सभी प्रकार के अलंकारों का प्रयोग किया है। अलंकार साधन के रूप में प्रयुक्त किये हैं; साध्य के रूप में नहीं। परम्परागत अलंकारों का प्रयोग भी कम किया है। यमक, अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, प्रतीप तथा विरोधाभास आदि अलंकार ढूँढ़ने पर यत्र-तत्र मिल जाते हैं। प्रकृति चित्रण में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया है।

  • साहित्य में स्थान

मिश्रजी छायावादोत्तर प्रमुख गीतकार हैं। उन्होंने 1940 से काव्य रचना का प्रयास किया। कवि को अपने देश की सभ्यता तथा संस्कृति से विशेष लगाव है। वे ग्रामीण संस्कृति के उपासक थे। वे देश की समसामयिक समस्याओं, साम्प्रदायिक एकता के समर्थक हैं। वे कुशल तथा लोकप्रिय गीतकार हैं। वे जनसाधारण के मनोबल में वृद्धि करते हैं। उनका विचार है कि उत्साह और आत्मबल को अपनायें तो निश्चय ही तूफान भी अपनी दिशा परिवर्तित कर लेंगे। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण मिश्रजी का हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान है। वे माँ भारती के सच्चे अर्थों में सपूत हैं।

महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न
[2010]

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में मीराबाई की रचना है
(अ) रसिक प्रिया, (ब) राग गोविन्द, (स) साहित्य लहरी, (द) मदनाष्टक।

2. केशवदास का काल है
(अ) भक्तिकाल, (ब) आदिकाल, (स) रीतिकाल, (द) आधुनिक काल।

3. सूरदास के साहित्य की भाषा है
(अ) अवधी, (ब) ब्रजभाषा, (स) खड़ी बोली, (द) उर्दू।

4. मैथिलीशरण गुप्त ने काव्य की रचना की है
(अ) अवधी में, (ब) ब्रज में, (स) खड़ी बोली में, (द) मालवी में।

5. रत्नाकर का देहावसान हुआ
(अ) हरिद्वार में, (ब) कानपुर में, (स) फतेहपुर में, (द) प्रयाग में।

6. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जन्म हुआ
(अ) सन् 1921 में, (ब) सन् 1897 में, (स) सन् 1905 में, (द) सन् 1895 में।

7. श्रीकृष्ण सरल के लेखन का विषय है
(अ) राष्ट्रवाद एवं क्रान्तिकारी. (ब) छायावाद, (स) भक्तिपूर्ण, (द) रहस्यवाद।

8. जयशंकर प्रसाद के पिता का नाम था
(अ) यायावर, (ब) रामरख, (स) सुंघनी साहू, (द) ब्रजनाथ।

9. ‘अनाम तुम आते हो’ के रचयिता हैं
(अ) घनानन्द, (ब) जयशंकर प्रसाद, (स) केशव देव, (द) भवानी प्रसाद मिश्र।

10. कबीर की भाषा को कहा जाता है
(अ) ब्रज भाषा, (ब) बुन्देलखण्डी भाषा, (स) सधुक्कड़ी भाषा, (द) परिष्कृत भाषा।
उत्तर-
1.(ब), 2. (स), 3.(ब), 4. (स), 5. (अ), 6. (ब), 7.(अ), 8. (स), 9.(द), 10. (स)।

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  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. बिहारी की प्रसिद्ध रचना ……….. है।
2. तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली’ ………. परम्परा की उत्कृष्ट रचना है।
3. मैथिलीशरण गुप्त के पिता का नाम ……….. था।
4. ‘पर आँखें नहीं भरौं’ ………. की प्रसिद्ध रचना है।
5. आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री का जन्म …………. हुआ।
6. निराला का बचपन बंगाल की …… धरती पर बीता।
7. मुक्तिबोध को …………. विषमताओं के कारण अपना अध्ययन बीच में ही रोकना पड़ा।
8. अज्ञेय का पूरा नाम …………. है।
9. वीरेन्द्र मिश्र …………. परम्परा के विशिष्ट कवि माने जाते हैं।
10. मीरा का विवाह उदयपुर के महाराज …………. से सम्पन्न हुआ।
11. ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता …………. हैं। [2009]
12. ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ …………. की रचना है। [2009]
13. श्रीकृष्ण के प्रति ……….. का दाम्पत्य भाव है। [2009]
14. ‘सूर्य का स्वागत’ …………. की रचना है। [2009]
15. ‘जहाँगीर जस चन्द्रिका’ के रचयिता …………. हैं। [2009]
16. मीराबाई ……… की कवयित्री हैं। [2009]
17. …………. को ‘हृदयहीन कवि’ कहा जाता है। [2009]
18. ………. वात्सल्य के कुशल चितेरे हैं। [2009]
19. काव्य में सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग ……… ने किया। [2009, 14]
उत्तर-
1. सतसैया, 2. मुक्तक काव्य, 3. सेठ रामचरण शुक्ल, 4. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, 5. कोलकाता, 6. शस्य-श्यामला, 7. आर्थिक, 8. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, 9. नवगीत, 10. भोजराज, 11. केशवदास, 12. गजानन माधव मुक्तिबोध’,13. मीरा,14. दुष्यन्त कुमार,15. केशवदास,16. कृष्णभक्ति शाखा,17. केशव,18. सूरदास,19. कबीरदास।

  • सत्य/असत्य

1. मीरा की भक्ति-भावना हृदय से स्फूर्त है।
2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार केशवदास का जन्मकाल सन् 1555 ई.माना गया है।
3. सूरदास का उद्धव प्रसंग’ भक्तिपूर्ण रचना है।
4. गोपाल सिंह नेपाली के पिता राय बहादुर ‘गोरखा रायफल’ में सैनिक थे।
5. ‘सुजान’ को श्रृंगार पक्ष में नायक और भक्ति पक्ष में दुर्गा मान लेना उचित होगा।
6. जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ ने क्वीन्स कॉलेज इलाहाबाद से बी.ए. पास किया।
7. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आधुनिक युग के ऊर्जावान कवि हैं। [2014]
8. श्रीकृष्ण सरल कहते हैं कि देश की सम्पूर्ण समृद्धि का भवन शहीदों के उत्सर्ग की नींव पर खड़ा है।
9. ‘कामायनी’ के रचयिता सुमित्रानन्दन पन्त हैं।
10. भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी नगर में हुआ था।
11. कबीर प्रेमाश्रयी शाखा के कवि हैं। [2009]
12. केशवदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि हैं। [2009]
13. घनानन्द रीतिसिद्ध कवि हैं। [2009]
14. मीराबाई रामभक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। [2009]
15. केशव रीतिमुक्त कवि हैं। [2012]
उत्तर-
1. सत्य, 2. सत्य, 3. असत्य, 4. सत्य,5. असत्य, 6. असत्य, 7. सत्य,8. सत्य, 9. असत्य, 10. असत्य, 11. असत्य,12. असत्य, 13. सत्य, 14. असत्य, 15. असत्य। सही जोड़ी मिलाइए

I. ‘क’
(1) मीराबाई की रचना – (अ) सुजान
(2) केशवदास – (ब) भक्तिकाल
(3) सूरदास का काल – (स) सन् 1903 में
(4) गोपाल सिंह नेपाली का जन्म – (द) रामचन्द्रिका
(5) घनानन्द की प्रेमिका [2012] – (इ) गीत गोविन्द की टीका
उत्तर-
(1), → (इ),
(2) → (द),
(3) → (ब),
(4) → (स),
(5) → (अ)।

II. ‘क’
(1) कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है [2009] – (अ) सूरदास
(2) बाललीला वात्सल्य के चितेरे [2009] – (ब) छायावाद
(3) जयशंकर प्रसाद – (स) केशवदास
(4) तुलसीदास – (द) मैथिलीशरण गुप्त
(5) साकेत [2014] – (इ) सन्त कवि
उत्तर-
(1) → (स),
(2) → (अ),
(3) → (ब),
(4) → (इ),
(5) → (द)।

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III.
(1) काव्य में सर्वाधिक छंदों का प्रयोग किया है [2009] – (अ) मीरा ने
(2) काव्य में भाव-विह्वलता कूट-कूट कर भरी है [2009] – (ब) केशव ने
(3) राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले कवि हैं [2009] – (स) घनानन्द
(4) रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि हैं [2009] – (द) जगन्नाथदास रत्नाकर
(5) ‘उद्धव प्रसंग’ नामक कविता के रचयिता हैं [2009] – (इ) गोपाल सिंह नेपाली
उत्तर-
(1) → (ब),
(2) → (अ),
(3) → (इ),
(4) → (स),
(5) → (द)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
कबीर ने अद्वैत से क्या अर्थ ग्रहण किया?
उत्तर-
ब्रह्म एक है द्वितीय नहीं।

प्रश्न 2.
बिहारी किस काल के कवि थे?
उत्तर-
रीतिकाल।

प्रश्न 3.
“विनय पत्रिका’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
तुलसीदास।

प्रश्न 4.
मैथिलीशरण गुप्त ने किस भाषा में काव्य रचना की?
उत्तर-
खड़ी बोली में।

प्रश्न 5.
किस कवि की शैली माधुर्य, प्रसाद और ओज गुणों से सम्पन है?
उत्तर-
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’।

प्रश्न 6.
विष्णुकान्त शास्त्री का ‘उपमा कालिदासस्य’ किस भाषा से किस भाषा में अनूदित है-
उत्तर-
बांग्ला से हिन्दी में।

प्रश्न 7.
छायावाद के प्रमुख स्तम्भ और आधुनिक काव्य में क्रान्ति के अग्रदूत किस कवि को माना जाता है?
उत्तर-
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।

प्रश्न 8.
‘काठ का सपना’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
गजानन माधव मुक्तिबोध’।

प्रश्न 9.
प्रयोगवाद किस कवि की सूझ की उपज है?
उत्तर-
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

प्रश्न 10.
‘वाणी के कर्णधार’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
वीरेन्द्र मिश्र।

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प्रश्न 11.
सूरदास के पदों की भाषा कौन-सी है? [2009]
उत्तर-
ब्रजभाषा।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

Where the Mind is without Fear Question Answer Class 9 English The Rainbow Workbook Chapter 16 MP Board Solutions

Class 9th English The Rainbow Workbook Chapter 16 Where the Mind is without Fear Question Answers

Where the Mind is without Fear Class 9 Questions and Answers

Where the Mind is without Fear Vocabulary and Pronunciation

Question 1.
A. Use the following words in your own sentences, mind, brain, habit, forward, fore-word
Answer:
Mind : You should mind your business.
Brian : His brain is sharp.
Habit : Cultivate good habits.
Forward : Look forward before moving on.
Fore-word : The foreword of this book is very confusing.

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B. Write the meaning of the word let’ as used in the following sentences.
Let your body relax.
Let’s go.
If he thinks he can help me, just let him try.
I let the spare room.
Answer:
Do yourself.

C. Distinguish between :
wake and awake, sleep and asleep, fresh and afresh, rise and arise.
Answer:
Do yourself.

Question 2.
What do you notice in the pronunciation of these words, awake, asleep, afresh, arise.
Answer:
Do yourself.

Listening Skill

A. “Listen to the poem by Mathew Arnold and pay attention to its rhythm, rhyme and intonation.
See workbook page 119.
Now, tell, how many times the following words occurs in the poem., now, away, way.
Answer:
Do yourself.

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B. Listen to the following words/ phrases repeat them,
let us away – shore ward blow
from the way – seaward flow
white horses play – let us away
toss in the spray – this way, this way
Answer:
Do yourself.

Speaking Skill

Some opinions are given below. First discuss in the group, the group leader will sum up views.
I think ………………

  • A criminal should be punished publicity.
  • Smoking should altogether be banned.
  • Nuclear weapons should be destroyed.

Why? / Why not?
Answer:
Do yourself.

Reading Skill

Read the following poem attentively and answer the questions given below it.
See workbook page 120.

Question 1.
Who can build a nation’s pillars deep ?
Answer:
Those who dare whole others fly can build a nation’s pillars deep.

Question 2.
Where in lies the greatness of a nation ?
Answer:
The greatness of a nation lies in its people’s strength.

Question 3.
What does ‘a people’ mean ? Explain.
Answer:
‘A people’ means a nation.

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Question 4.
Pick out words/ phrases which have the following meanings :
(a) willing to do things which are difficult, dangerous or painful
(b) having a large distance from the top or surface to the bottom
(c) wealth
Answer:
(a) dare
(b) deep
(c) gold.

Writing Skill

A. Write a letter to your younger sister suggesting her how to prepare for the coming competitive examinations. (50 words)
Answer:
My dear Nisha
Today I received your letter. I am very happy to know that you are preparing for NTSE and Maths olympiad. These are career building exams. You can get wider opportunities through these exams. You should prepare for them seriously. If you need consult a good teacher collect previous years question so that you can be familiar with the pattern of exams. You can collect information through Internet. Concentrate upon these exams.
Yours
Askash.

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B. Study the bar diagram given below.
On the basis of this bar diagram write an article ‘Key to Success’ for the school magazine. (150 words)
Answer:
Success is the name given to the achievement. Everyone has a goal in life and achieving that goal is the success. But it is a fact that everyone doesn’t succeed in achieving the goal. As per a survey report it has been assessed that hard labour and honesty are the to virtues which count most for getting success. Their percentage is respectively 80%o and 75%. Intelligence is another virtue” after them being 70% followed by talent. Which adds 50% success. Luck also matters but only 30 % while many contributes only 20 %. Contacts add only 15 % being the lowest. If one works in a proper direction one is sure to get success. But man rely on his hard labour most.

MP Board Class 9th English Solutions

The Rainbow Workbook Special English Class 9th Solutions

The Victory Question Answer Class 9 English The Rainbow Workbook Chapter 2 MP Board Solutions

Class 9th English The Rainbow Workbook Chapter 2 The Victory Question Answers

The Victory Class 9 Questions and Answers

The Victory Vocabulary and Pronunciation

A. All the following sentences have one incorrect spelling. Encircle the incorrect one, write the correct spellings and rewrite the
sentences.

(i) He ordered his brave jounals.
Answer:
He ordered his brave soldiers.

(ii) Alexander was very happi.
Answer:
Alexander was very happy.

(iii) He quietly slipped from the scene.
Answer:
He quietly slipped from the scene.

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(iv) The women were welling.
Answer:
The women were wailing.

(v) How can a rober be a conqueror and a giver ?
Answer:
How can a robber be a conqueror and a giver ?

B. Why are the words in bold type more suitable in the context than those in brackets ?
Alexander the great (renoned, talented, big) had won many battles (encounters, fights, quarrels. His desire (wish, fancy, urge) as to conquer (defeat, overpower, capture) the world.
Answer:
Because the worlds in bold are used in broader sense. These words cover the meaning of all the three words given in bracket;.

2. Compare the meaning of the words :
riding
writhing
breeding
breathing
loading
loathing
ladder
lather
Answer:

  • riding — climbing
  • writhing — twisting, body without stopping
  • breading — (of animals) having sex and produce
  • breathing — the at of taking in air
  • loading — carrying
  • loathing — a strong feeling of hatred
  • ladder — a piece of equipment for climbing up and down a wall.
  • lather — a white mass of small bubbles that is produced by mixing soap with water.

D.  Question 1.
Some of the most common English words which contain sound /O/ are three, thin, thank, thick, thing, thirsty, both, cloth etc.
Write some more English words which contain /O/ sound.
Answer:
MP Board Class 9th English The Rainbow Workbook Solutions Chapter 2 The Victory 1

Question 2.
Some of the most common English words which contain sound/6/ are the, this, that, these, those, though, smooth, with etc.
Write some more English words which contain /6/ sound.
Answer:
MP Board Class 9th English The Rainbow Workbook Solutions Chapter 2 The Victory 2

Question 3.
Say these words and notice the difference in their pronunciation.
day — they
den — then
die — thy
breed — breathe
load — loathe
side — scythe
Now, find some similar examples and write them in the given space.
Answer:

  • bed – bathe
  • ladder — leather
  • dim — theme
  • rod — road
  • site — sight
  • breath — breathe
  • bliss — bless
  • sink — think

Listening Skill

1. Listen to the Iranian short story which tells about the Nature’s justification with each and everything.
Answer:
See workbook page 9.

On the basis of the text you have listed to, complete the following:

Question 1.
When the peasant reached the melon farm he was
Answer:
tired and thirsty.

Question 2.
The farmer rested under the
Answer:
shade of a nearby walnut tree.

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Question 3.
He enjoyed the
Answer:
view of the spreading vives of big water melons.

Question 4.
The trees of walnuts were
Ans.
dangling.

Now, discuss with your friends :

Question 1.
In the beginning of the story the peasant is not happy with the act of the God because….:
Answer:
the small walnuts grew on an enormous tree while the big water melons hung from a flat and flimsy vine.

Question 2.
What would have happened if a melon had fallen upon the head of the peasant instead of the walnut ?
Answer:
If a melon had fallen upon the head of the peasant, he would have been injured seriously.

Question 3.
In the end of the story the peasant was thankful to God because
Answer:
He was clever not to let melons grow on big trees.

Speaking Skill

See workbook page 10.

Answer:
For self attempt

Reading Skill

Read the following passage carefully and answer the questions given below it.

See workbook page 10

Question 1.
Choose the correct answer

(i) Who is truly a great man ?
(a) a person whose name figures in history
(b) a person who would warmly welcome some unhappy old woman to put an end to her troubles
(c) a person who has won battles
Answer:
(b) a person who would warmly welcome some unhappy old woman to put an end to her troubles

MP Board Solutions

(ii) The passage is intended for:
(a) the psychologists.
(b) the parents of school going children.
(c) the young people.
Answer:
(c) the young people.

(iii) The purpose of the passage is :
(a) to communicate the importance of material possession to the readers..
(b) to instill in the hearts of the young people, a strong desire to become truly noble human beings.
(c) to highlight the advantages of advanced civilization.
Answer:
(b) to instill in the hearts of the young people, a strong desire to become truly noble human beings.

Question 2.
Go through the passage again and answer the questions briefly:

(i) Give one reason for the unhappiness of human beings.
Answer:
They are not satisfied with what they have.

(ii) Mention the qualities of noble human beings.
Answer:
They are willing to embrace sorrows of their neighbour and thereby acts in order to create a truly peaceful and happy society.

(iii) The author tells the people that they have endless occasions to improve themselves. What are they ?
Answer:
Whether studying or participating in student organisations and extra curricular activities or solving problems that arise with your friends.

Question 3.
Write 2-3 sentences on each of the following subtitles :

(i) A truly great man does not have to be famous.
Answer:
He does not want to be famous. He wants only to serve the society selflessly. He embraces other’s sorrows and tries to create a peaceful- and loving society.

(ii) A truly noble being embraces the sorrows of others most willingly.
Answer:
It gives him real joy. He feels satisfied and happy. He wants to see smile on other’s face.

(iii) Various school activities opportunities for self improvement.
Answer:
Extra curricular activities. Games and sports. Problems that arise with our friends.

Question 4.
Mention the suggestions given by the author to next generation to become noble human beings.
Answer:
In order to become noble human beings the next generation should do the following

  • They should discipline themselves.
  • They should absorb knowledge and furnish themselves with the skills they will need for that day.

MP Board Solutions

Question 5.
Mention the suggestions given to improve oneself.
Answer:
We should positively search out opportunities for improvement to face challenges in life squarely so that we might nature in a outstanding individuals.

Question 6.
What is he result of the superficial prosperity of our age?
Answer:
The superficial prosperity of our age only increases the fundamental affections which we experience as human beings.

Language Practice (Grammar)
Simple past

A. Study these sentences.

See workbook page 13.
Now, talk to your friends and frame five sentences on what they did yesterday/last week.

  1. They went On a picnic in a zoological park.
  2. They played various games there.
  3. They enjoyed/saw several birds and animals.
  4. They enjoyed delicious dishes.
  5. They drank soft drinks

B. Now, study these sentences.

See workbook page 14.

4. Now, talk to your parents or grandparents, and frame five sentences. Where they lived/studied (place) for (time period).
Example : My grandmother lived in Varanasi for a long time.

  1. My grandfather lived in Allahabad for a long time.
  2. It is a big city with great religious value.
  3. It had been a centre of political uplevel.
  4. It’gave the first Prime Minister of India.
  5. He was proud to be a part of it.

Simple Past and Past Continuous:

C. Study these sentences.

See workbook page 14.

Now, frame five sentences on this pattern.

  1. When Raman telephoned me yesterday, I was in bathroom.
  2. When Mrs. Sharma came to my house last week, my mother was not at home.
  3. When I reached the city, there was a curfew.
  4. The baby was sleeping when I came to her.
  5. The teacher was teaching -when the Principal entered the class. Simple Past and Past Perfect

D. Study these sentences :

See workbook page 15.

Now, put the verbs in brackets into the correct simple past or past perfect tense.
1. They ……………… just (come) from office when they ………… (meet).
2. She hardly (say) this, when Malasha …………. (plump) down her foot.
3. When they …………….. (go) out to play, their mothers ……………… (dress) them both in new frocks.
4. When he ……….. (reach) the railway station the train ……………. already (leave).
Answer:

  1. had, came, met
  2. had, said, plumped
  3. had, gone, dressed
  4. reached, had left

Writing Skill

A. You are the student- editor of your school magazine. Write a notice inviting the names of those who like to give articles, stories, cartoons etc. for the school magazine. (50 words)
Answer:

ABC School
Notice
School Magazine Section

Date 25 July 2011

This is a bring to all the students that the school magazine is to be published before winter break. Those who are interested in writing articles, stories, cartoons etc are invited to register their names and wrote-ups till 20 Aug 2011 to the undesigned during office hour between 2 to 4 pm in the Common Room.

Manish Gupta
Student Editor.

MP Board Solutions

B. Narrate the popular encounter of Alexander with the Indian King Puru. (150 words)
Answer:
Alexander (356-323 B.C) was only 22 years old when he ascended the throne. He was a general. He divided his army into two units to effectively capture India. The first unit invaded India under his personal leadership. He defeated the North Indian States. The other unit was under commander Hephastian. It defeated the kingdoms on the bank of river Indus. The Indian kingdoms were disunited. As such, they did not pose any virtual challenge to any of his units. As a result, the Greek army conquered all kingdoms before uniting at Ohind. Kings like Ambi accepted defeat without even fighting his army. However, Alexander emerged victorious and made Porus a prisoner

MP Board Class 9th English Solutions

The Rainbow Workbook Special English Class 9th Solutions

How it all began Question Answer Class 9 English The Rainbow Workbook Chapter 15 MP Board Solutions

Class 9th English The Rainbow Workbook Chapter 15 How it all began Question Answers

How it all began Class 9 Questions and Answers

How it all began Vocabulary and Pronunciation

A. What is the difference in meaning of the following words given in pair :
ago — before
also — too
most — many
journy — voyage
adjacent — neighbouring
Answer:
Do yourself

B. The compound word ‘neighourhood’ end in ‘hood’. Now write some more words with the suffix ‘hood’.
Answer:
Childhood, motherhood, boyhood, fatherhood, livelehood

MP Board Solutions

C. Look at the common expressions of frequency. Study them carefully and point out the number of vowel sounds in them.
1. always
2. usually, regularly
3. often, frequently
4. gradually, slowly
Answer:
1. a, ay, 2. all, 3. o, te, re, erv, y, 4. ra, ua, y, o, y

D. Use the word ‘when’ in the beginning of a sentence and then in the middle of a sentence. What difference does it make? Example : When I returned, I felt tired.
I returned when I felt tired.
Now, frame some more sentences as shown above.

Question 1.
When I knew, I understood.
Answer:
I knew when I understood.

Question 2.
When he came, he gave me the information.
Answer:
He came when he gave me the information.

Listening Skill

Listen to the words.

See workbook page 111.

Now, recall the aforesaid.
Answer:
Do yourself.

Speaking Skill

Recall and repeat orally any two of the following.
See workbook pages 111-112.
Answer:
Do yourself.

Reading Skill

Read the following passage carefully and answer the questions given below it.
See workbook pages 112-113.

Question 1.
(a) How did the grandmother attend to her grandson ?
Answer:
The grandmother attend to her grandson with all attention.

(b) What did she do while she bathed ?
Answer:
She said her morning prayer in a monotonous sing song while she bathed.

(c) What does the author compare his grandmother with ?
Answer:
The author compares his grandmother with the winter landscape in the mountains.

MP Board Solutions

(d) How did the grandmother take care of the study material of her grandson ?
Answer:
The grandmother tied them in a bundle and hand them to ‘he author.

(e) Why did she carry stale chapattis with her ?
Answer:
She carried stale chapattis to feed the village dogs.

(f) Why were grandmother and the author good friends ?
Answer:
Because the author spent his childhood days with her when his parents left him with her.

Question 2.
Find out the words from passage which have the following meaning:
(a) everything you can see when you look across a large area of land especially in the country……………
(b) serene – calm and peaceful, …………
(c) all the time, repeatedly……………
(d) never changing and therefore forming, ……………..
(e) spent time and / or energy doing nothing, ……………….
(f) the holy books of a particular religion, the Bible etc …………….
Answer:
(a) landscape
(b) serenity
(c) constantly
(d) monotonous
(e) hobbling
(f) scriptures.

Language Practice (Grammar)

Preposition
See workbook pages 114-116.

Pick out the preposition in the following sentences.
1. The two cats fought with each other for the cake.
2. The Pied Piper stepped into the street.
3. Rain, Rain go away to Spain.
4. Under the spreading chesnut tree we are happy.
5. We go to school everyday at 7 o’ clock in the morning.
6. We rowed across the backwaters and reached the house.
7. A sand storm blew over Delhi and tore down many temporary sheds.
Answer:

  1. with, for
  2. into
  3. to
  4. under
  5. to, at, in
  6. across
  7. over, down.

Writing Skill

A. Your sister collects stamps. Write a letter encouraging her to continue this hobby.
(50 words)
Answer:
Dear Rakhi
I am happy to know about your hobby of stamp collection. It’s really a good choice. You can know a lot of things through it. It earns your great knowledge, you can know the historical facts also. You keep it continued for ever.
Yours,
Anurag.

MP Board Solutions

B. Write the various activities of the Nature Club of your school. (150 words)
Answer:
There is a Nature Club in our locality. Some of the youngsters of our society have organised if. Its functions are very productive. The members have divided the whole region in different section. They promote plantation, water conservation, rain water harvesting, education to children, cleanliness etc. They educate people the importance of nature in our life and teach them how we are damaging it, how we can cope up with nature. Now the government is also giving attention to this club.

MP Board Class 9th English Solutions

The Rainbow Workbook Special English Class 9th Solutions

Old Blockhead repairs his House Question Answer Class 9 English The Rainbow Workbook Chapter 14 MP Board Solutions

Class 9th English The Rainbow Workbook Chapter 14 Old Blockhead repairs his House Question Answers

Old Blockhead repairs his House Class 9 Questions and Answers

Old Blockhead repairs his House Vocabulary and Pronunciation

Make sentences with each of the following compound words so as to bring out its meaning.
head-ache, head-dress, head-gear, head-less, head-line, head- block-ade, block-age, block-buster, block-head, block-house.

  1. Head-ache : I have several head-ache.
  2. Head-dress : It is my head dress.
  3. Head-gear : The need gear is not working.
  4. Head-less : I saw a headless statue.
  5. Head-lines : The news of cash for vote was the headline today
  6. Head-on : It was a serious head on collision.
  7. Block-ade : Block ade is illegal.
  8. Block-age : The doctors detected block age in his head.
  9. Block-buster: Amitabh Bachans films are still block buster.
  10. Block—head : He behaves like a totally block head.
  11. Block—house: It is a block house.

MP Board Solutions

B. Use the following words in your own sentences.
mend, rectify, repair, restore, overhaul, replace.

  1. Mend : Mend your ways otherwise you will be in trouble.
  2. Rectify : He asked me to rectify the account.
  3. Repair : Your shoes needs repair.
  4. Restore : Sleep is the best way to restore energy.
  5. Overhaul : Our governing system needs complete overhauling.
  6. Replace : Please replace this defective TV.

C. What do you understand by the following questions?

Question 1.
Is anybody home ?
Answer:
Someone may not be there.

Question 2.
Is somebody home ?
Answer:
Someone may be there.

Question 3.
Is nobody home ?
Answer:
None may be there.

MP Board Solutions

Question 4.
Is everybody home ?
Answer:
Everyone may be there.

D. What is meant by the following? Use them in sentences and point out consonant sounds in each word.

  1. Shout : to make loud noise- The teacher shouted at the boy.
  2.  Call : to give somebody a particular name— He called me.
  3. Howl : to make a long, loud cry— The baby was howling.
  4. Roar : to make a very loud, deep sound— The tiger was roaring in the forest.
  5. Scream : to give a loud, high cry because you are hurt, frightende, exited etc—The little children were scramming with excitinent
  6. Cry : to produce tears from your eyes because you are unhappy or hurt— The baby cried suddenly.
  7. Talk : to say things, to speak in order to give information-The boys are talking.
  8. Clamour: to demand something loudly— The employes began to clamour for their increment.
  9. Shriek : to give a loud, high shout— The gine shricked in fright.
  10. Yelp : to give a sudden short cry, usually of paon— The lod was yelping but noone paid attention on him.

Listening Skill

Listen to the items carefully, which Ma Blockhead needed to repair her house. three pieces of tin-sheets, two hundred and fifty bricks, eight liter of paint, twelve wooden planks, half kilogram of nails, one bag of cement and one bag of sand Now, answer the

Question 1.
How much paint did Ma Blockhead require ?
Answer:
Ma Blockhead required eight liter of paint.

Question 2.
How many bricks did she want ?
Answer:
She wanted two hundred and fifty bricks.

Question 3.
How may tin-sheets were needed by her ?
Answer:
Three pieces of tin-sheets were needed by her.

MP Board Solutions

Question 4.
How much cement did she want ?
Answer:
She wanted one bag of cement.

Question 5.
How much sand was required ?
Answer:
One bag of sand was required.

Question 6.
How many wooden pranks did she need ?
Answer:
She needed twelve wooden pranks.

Question 7.
How much nails did she require ?
Answer:
She required half kilogram of nails.

Speaking Skill

Here are some events. You are required to speak their sub events one by one in proper sequence, the first one has been done for you :
See workbook page 106.
Answer:
For self attempt.

Reading Skill

Read the passage given below and answer the questions below it.
See workbook page 106.

Question 1.
Why did the man count nine camels?
Answer:
Because he mounted one of the ten camels and counted the rest.

Question 2.
How could he count ten camels again ?
Answer:
He counted the ten camels without mounting any of them

Question 3.
Whom did he curse for his confusion ?
Answer:
He cursed Saten for his confusion.

MP Board Solutions

Question 4.
What kind of man was he ? Write your opinion,
Answer:
He was a foolish fellow. It was his fault or lack of presence of mind that he counted the camels wrongly. But instead of cursing himself, he cursed Satan.

Pick out the words from the passage which have the following meanings :
(a) to advise or try hard to persuade to do something…………….
(b) felt very sad ………….
(c) a worried, sad feeling after you have received an unpleasant SUl pi .
(d) causing or showing sadness
Answer:
(a) urge
(b) dismayed
(c) perplexed
(d) cursing.

Language Practice (Grammar)

Narration (Interrogative sentences)
Study these sentences
See workbook pages 107-108.
Rewrite the following in indirect speech.

Question 1.
The stranger said to the lady, “Why do you wish me go away now?”
Answer:
The stranger asked the lady why she wished him go away then.

Question 2.
Ravi’s father asked, “Are you going to keep me away all night?”
Answer:
Ravi’s father asked him weather he was going to keep him awake all night.

Question 3.
“Have you ever seen a met eorite falling? “, he asked the class.
Answer:
He asked the class weather they had ever seen a meteorite failing.

MP Board Solutions

Question 4.
“What does it matter if your miss the train?”, Mrs. Ram said 30 her husband.
Answer:
Mrs. Ram asked her husband what it mattered if he had’/ blissed the train.

Question 5.
The porter asked the passenger, “Which train are you taking?”
Answer:
The porter asked the passenger which train he was taking.

Question 6.
My uncle said, “Do you really need so many pairs of boots?”
Answer:
My uncle asked whether he needed many pairs of boots.

Question 7.
She shouted to us, “Will you not come and save me from the clutches of this thief?
Answer:
She should to us weather they would not come and save to her from the clutches of that thief.

Writing Skill

A. You have saved two thousand rupees. Plan how you will spend them. (50 words)
Answer:
Two thousand rupees is a big sum for me. I shall spend it wisely. First I shall buy a shoes for my grand father and a blanket for grandmom. I shall buy a spectacle for my mother and a watch for my father. I shall buy some books. I shall donate some money to the school of blind.

MP Board Solutions

B. Ma Blockhead finds a change in her house as well as in her husband. She is very happy and wants to share her feelings with her intimate friend through a letter. Write a letter expressing your feelings.(150 words)
Answer:
My dear Rehana.
Today I would like to share my happiness with you. I have just come from my mother’s house. You know I was a little annoyed with my husband. When I came back I founded my house was neat and clean, well arranged, the behaviour of my husband was completely changed. He was now very happy with me. He shared my pains. He cooperated me in household work. I am very happy now. I request you to come to me and share our joy.
Yours
Ma Blockhead.

MP Board Class 9th English Solutions

The Rainbow Workbook Special English Class 9th Solutions

Dead Man’s Riddle Question Answer Class 9 English The Rainbow Chapter 5 MP Board Solutions

Class 9th English The Rainbow Chapter 5 Dead Man’s Riddle Question Answers

Dead Man’s Riddle Class 9 Questions and Answers

Dead Man’s Riddle Textual Exercise

Dead Man’s Riddle Vocabulary

A. Use the following words in your own sentences.
problem, mystery, puzzle, riddle
B. The word ‘WILL’ has different meanings. Find a few of them and write them down in your note-book.
C . The word ‘disagreement’ has a prefix and a suffix. Write some words which have a prefix as well as a suffix.
D. Write expressions like ‘two-third’, ‘the half’ etc. with their meanings.
E. The sign (‘) apostrophe is used in writing (as in don’t and ’86 for do not and 1986). Write other uses of the apostrophe with examples and practice them.
Answer:
A. It is a problem how to maintain good health.
Death is still a mystery.
Don’t try to puzzle me.
I cannot solve your riddles.

B. A few meanings of the Word ‘Will’
(i) The faculty of deciding a choice.
(ii) Desire or command.
(iii) A written document disposing of property after one’s death.
(iv) An auxiliary verb, a sign of future.

C. Some words with ‘a prefix’ and ‘a suffix’
unprofitable, unnatural, dishonourable unfortunate, unemployment, displeasure, injustice, impracticable.

MP Board Solutions

D. One-third = equal to one part out of three
three-fourth = equal to three parts out of four
four-fifth = equal to four parts out of five
five-sixth = equal to five parts out of six.
six-seventh – equal to six parts out of seven
seven-eighth – equal to seven parts out of eight.

E. Some other uses of apostrophe.
(i) In forming possessive case of the noun Mohan’s father, Girl’s Cycle, Girl’s College etc.
(ii) In forming the plurals of countable nuembers, and alphahet—7’s, 10’s
7.7’s are 49; 10.10’s are 100
t’s = cut- your t’s
i’s = dot your i’s.

Comprehension

A. Answer each of the following questions in about 25 words.
1. How did people use to get the property divided in urban areas?
2. What did the villagers think about going to the court?
3. Why was the younger brother given priority in choosing his part?
4. What was the will of the dead man?
Answer:
1. All the brothers in a family wanted to divide their parents’ property. Sometimes they got into arguments. Under such circumstances the people in the urban area used to get their property divided through Court.

2. In the villages, the panchayat, consisting of respected and neutral elderly persons decided the cases. Neither party used to go to the Court. The villagers thought that both the parties lost money by going to the court. Only the advocate becomes rich.

3. Sometimes it was difficult to make equal distribution. Then the youngest son was given priority in choosing his part. The reason behind this practice was that he had stayed the least period with his parents. It was considered an asset in the villages.

4. The will of the dead man was very strange. He divided the land and gold equally among his three sons. There was a riddle for the division of his horses. Half of the total (seventeen) horses, should be given to the elder son. Out of the remaining half, two- third should be given to the second son. Out of the still remaining, , two-third should be given to the third son. In this way, the will was a complete riddle.

B. Answer each of the following questions in about 50 words.
1. How did Sumanth divide the property?
2.’Experience is the best teacher in life/ Why?
3.What lesson do you learn from the story?
Answer:
1. Sumanth used his experience in dividing the property.He made his own horse stand along with his dead friend’s seventeen horses. He gave nine horses (18×1/2) to the elder son. He gave six horses (18-9 = 9×2/3) to the second son. He. gave two horses
(18-9-6 = 3×2/3) to the young son. He gave them seventeen horses and took his own horse. In this way, he divided the property. All the three sons happily agreed to the division.

2. Man has made tremendous achievements from his primitive age to this day’s glorious civilization. This is a miracle of the power of knowledge. While the primitive man was a slave of nature the modern man has harnessed, controlled and mastered nature. Ignorance created fears of nature in the mind of man. Experiments and failures have taught a great deal to man. He has gained knowledge with his bitter experiences. The same knowledge or experience has unfolded great blessings of nature. Man has exploited them for his betterment. Experience lends one courage and fearlessness. It is one’s best teacher in life. The man who feared crossing rivers are crossing skies. Experience is also a great power. It has helped the man achieve ; sure, steady and splendid progress for better living

MP Board Solutions

3. We learn many lessons from this story. It teaches us that experience is the best teacher in life. Practical knowledge comes from interaction with many people. It can’t be taught in a school or college. It has to be learnt over a- period of time. Life is an eternal teacher. It teaches only those who have an open and receptive mind. Never hesitate to seek advice of others whenever some work looks impossible to you. There is no harm in working on the smallest suggestion of others.

Dead Man’s Riddle Grammar

A. Study these sentences.

  • The youngest brother would get to choose his part first.
  • The village elders were all well respected.
  • The half of the total horses should be given to the elder son.
  • The rich man had a friend.

There are three degrees of comparison :
MP Board Class 9th English The Rainbow Solutions Chapter 5 Dead Man’s Riddle 1
Now, write the degrees of comparison used in the sentences given below :

  1. We are three brothers. My eldest bother is a doctor.
  2. My school building is bigger than my house.
  3. Riding is the best kind of exercise.
  4. I work harder than you.
  5. All the teachers are wise.

Answer:
MP Board Class 9th English The Rainbow Solutions Chapter 5 Dead Man’s Riddle 2

Speaking Activity

A. Narrate the story told by the Sarpanch Som Gowda in your own words.
Answer:
Story told by the Sarpanch Som Gowda.
I am the Sarpanch of my village. Once there was disagreement in the division of property of a certain family. I could not make the brothers agree to the division. Therefore, I had to tell them the story of a rich man. The rich man left the will that his seventeen horses should be distributed among his three sons. The elder son would get one-half of them. The second son would get two-third of the remaining horses. The young son would get two-third of the horses which still remained to be divided. This division could be made only by killing two horses. The dead man’s friend made his own horse stand along with the seventeen horses. Now the horses were divided without killing any horse. It was the magical solution of the riddle.

B. Enact the story in the class with the following characters:

  • Three sons
  • the reader of the will
  • Sumanth, their father’s friend

Answer:
A rich man had three sons. They always disagreed with him. One day the old man died. He wrote a will that his seventeen horses would be divided among his three sons. Half of the total horses should be given to the elder son. Two third of the remaining half should be given to the second son. Two third of the still remaining horses should be given to. the third son. This division was impossible without killing two horses. The three sons read the will but could ‘ not come up with a solution. They showed the will to Sumanth, their father’s friend. He did not get confused. He added his own horse to the seventeen horses. Thus he made a just and peaceful division. He took his own horse in the end. He used his personal experience to solve the riddle.

C. What had been said in the story about court cases? Quote it.
Answer:
The lesson has a poor opinion about court cases. Nobody went to court against the decisions of the village elders.Going to court for such matters was considered a waste of time and energy There is a saying in the village that if two feuding parties approach the court, both parties lose money. Only the advocate becomes rich.

D. Play the role of Sumanth and distribute the horses among the three brothers:
Answer:
Begin like this : Come on boys, I am your father’s close friend, just like your father. I will’help you to get your proper share your father’s will is a simple riddle. I’m making my horse stand along with the other horses. Look here. Now there are eighteen horses. Give, one half of eighteen (nine) horses to the elder son.
Now we have eighteen minus nine (nine) horses.
Give two-third of nine (9×2/3 = 6) horses to the second son.
Now we have nine minus six or three horses with us.
Give two-third of three (2/3×3= 2) horses to the young son.
Now we have distributed nine plus six plus two or seventeen horses.
I take back my own horse.
I hope you will be happy with my division.

Writing Activity

A. Narrate, how you were benefited with the elder’s advice to be regular in studies. (50 words)
Answer:
Ours is a joint family. At night we take our dinner together. One day my mother told my grandparents’ uncles and aunts about my poor performance in all the subjects. The elderly people of the family did not show any anger. Rather, they called me aside. They told me a lot. about the need and utility of education. They said that failures are the pillars of success. They also told me that a little knowledge is a dangerous thing. They advised me to be regular in studies. I put my heart and soul in studies. I burnt mid- night oil and stood first in my class. Their advice and my hard work brought magical result.

MP Board Solutions

B.’Life is an eternal teacher’. Express your views. (150 Words)
Answer:
Man is a social animal. He goes on learning one thing or the other from one quarter and the other. He learns a lot from nature. Nature provides us energy. It is a part of our life. Even the green trees, plants, weeds and leaves are full of lessons for us. We learn from nature that one who destroys nature destroys himself. It teaches us that we should not lose our communion or bond with nature. We learn the lessons like slow and steady wins ‘the race’. ‘All that glitters is not gold.’ “Where there is a will there is a way”. ‘Act in haste and repent later’. ‘Cruelty always begets cruelty’. Do not be greedy’. ‘’A single trick does not succeed all the time’ etc. from animals. Life means contacts with people birds, animals, beats, plants, flowers and trees. Every item on earth can teach us something if we observe its uses and utility. The entire life is ar eternal teacher.

Think it over

A. There are certain things which are not taught at schools or colleges. Think about such things.
Answer:
The teachers at schools and. colleges teach only what is prescribed in the syllabus. They can not teach everything on earth. A science teacher would not bother to teach, the students the rules of the games. In the same way a physical education teacher is not supposed to teach about the law of gravitation. Every teacher has his own limitations and duty-requirements. Many things, such as moral education, sex education etc. are not taught by teachers. In the same way there are uncountable things which the child learns from society

B. Sometimes things look impossible but they can be made possible by a little effort. Is ’it so?
Answer:
Everything looks impossible for a new born child. He can neither stand nor run. Parental help and self-efforts make the same child run, and drive vehicles. Cowards alone learn nothing. Hard work is the key to success. Proper guidance, devotion, dedication and perseverance turn everything impossible into possible. ‘Impossible is the word found in the dictionary of fools.’ Nothing is impossible now-a-days. Man has overpowered nature. He has reached even the Mars. Our success in life depends on honest work and a strong will power. A little effort brings great success.

Thinks to do

There are three jars. The first contains gold coins, the second silver coins and the third silver and gold coins mixed. The ables are wrongly put on the jars. Now you are permitted to take out a single coin from any one of the jars and .ell using logic or wit” what is contained in each jar. Find tire answer and write it in your project book.
Answer:
For Practice

Dead Man’s Riddle Additional Questions

Short Answer Questions

Question 1.
What happens when there are two or more brothers in a family?
Answer:
Parental or ancestral property is the bone of contention. Often, there are two or more brothers in a family. They wish to divide their parents’ property. Sometimes they get into arguments. This gives place to quarrels and fights. The same, sometimes results in death.

Question 2.
Who decided the property disputes in villages and how?
Answer:
The panchayat decided the property disputes in villages. The elders would assemble and call the disputing brothers. They made almost equal divisions of the property in value. Sometimes, it became difficult. There the youngest brother would get to choose his part first. The decisions of the elders were final because they were well-respected and impartial.

Question 3.
Who used to choose his part first? Why? Was it done in this story?
Answer:
The youngest brother used to choose his part first. It was because he had stayed the least number of days with his parents. Staying with parents was considered an asset. This practice was not adopted in this lesson. The youngest son got only two out of seventeen horses, as per his father’s will.

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Question 4.
Why did the old man leave a will before his death? Was it fair?
Answer:
The old man’s three sons Always disagreed with him. He feared lest they should fight over the division of the property after his death. He left his will and divided the land and the gold equally among his sons. The will was not fair in the division of horses. The eldest son got nine horses. Tire second son got six horses and the youngest son got only two horses. It was partial and unjust.

Long Answer Type Questions

Question 1.
Explain in brief the formation of janpad Panchayat.
Answer:
Every district of Madhya Pradesh in divided into blocks (Janpad). Every block has a Janpad Panchayat and divided. into constituency. Each constituency contains 5000 population. The total number of constituencies in each block should not exceed the twenty five number and minimum ten. Janpad Panchayat will thus, be formed of :

  1. Elected members from the constituencies.
  2. Vidhan Sabha members of that constituency.

Question 2.
How is the Nagar Panchayat constituted?
Answer:
Members of Nagar Panchayat are elected by the people for election. City (Nagar) is divided into maximum forty or minimum fifteen wards.Nagar Panchayat is constituted with elected members of wards. Maximum, two persons are nominated by state government. Lok Sabha and Vidhan Sabha members of the constituencies and Rajya Sabha members are elected out of those whose name is registered as a voter in corporation.

Summary in English

All the brothers in a family want to get their share in their parent^, property.’ Sometimes they get into arguments. In the villages, the Panchayat decides the disputed cases of property. The elders call the brothers who fight for the property. The property is almost equally divided by the elderly people. The youngest brother chooses his part first.The village elders were important. Their decisions were final. Neither party approached the court. Once a Sarpanch tried to solve a property dispute in vain. He told the following story.

A rich man lived in our village. His three sons always disagreed with him. The rich man’s friend, Sumanth told him that time would teach! his sons everything. The rich man died leaving behind seventeen horses, lots of gold and land. In his will he divided the land and gold equally. He wrote that half of the horses, two third of the remaining half and two-third of the remaining should be given to the elder, the second and the third son respectively. It was a riddle because seventeen horses could not be possibly divided.

The rich man’s friend offered to divide the horses. He made his own horse stand along with the other horses. He gave nine horses, to the elder son. Out of the remaining nire, he gave six’ horses to the second son. Three horses were left behind. He gave two horses to third son. The condition in the will was fulfilled. He took his own, horse and went home. He advised them to seek advice.of some experienced person whenever they found something impossible. The three sons happily agreed to the Panchayat’s division of their property.

Summary in Hindi

परिवार के सभी भाई पैतृक सम्पत्ति में से अपना भाग लेना चाहते हैं। कई बार . उनके बीच वाद-विवाद हो जाता है। गाँवों में सम्पत्ति के झगड़ों का पंचायत फैसला करती है। बुजुर्ग लोग, सम्पत्ति के बारे में झगड़ा करने वाले भाइयों को बुला लेते हैं। बुजुर्गों द्वारा सम्पत्ति का लगभग बराबर बंटवारा कर दिया जाता है। सबसे छोटा भाई, सब से पहले अपना हिस्सा चुन लेता है। गाँव के बुजुर्ग लोग निष्पक्ष होते थे। उनके निर्णय अन्तिम होते थे।

कोई-सी पार्टी न्यायालय में नहीं जाती थी। एक बार एक सम्पत्ति के झगड़े का निपटारा करने में एक सरपंच निष्फल हो गया। उसने नीचे दी गई कहानी सुनाई। हमारे गाँव में एक धनी व्यक्ति रहता था। उसके तीन बेटे हमेशा उससे असहमत रहते थे। सुमंथ नामक, धनी व्यक्ति के मित्र ने उसे बताया कि समय उसके बेटों को सभी कुछ सिखा देगा। सत्रह घोड़े, ढेर सारा सोना और भूमि छोड़कर धनी व्यक्ति मर गया। अपनी वसीयत में उसने भूमि और सोने को बराबर-बराबर बाँट दिया। उसने लिखा कि वोड़ों के आधे, शेष आधे घोड़ों के दो तिहाई और अन्त में शेष घोड़ों के दो तिहाई क्रमशः सब से बड़े, दूसरे और तीसरे बेटे को दे दिए जाएँ। यह एक पहेली थी क्योंकि सत्रह घोड़ों का बँटवारा करना सम्भव नहीं था।

धनी व्यक्ति के मित्र ने घोड़ों का बँटवारा करने की पेशकश की। उसने दूसरे घोड़ों के साथ अपना घोड़ा खड़ा कर दिया। उसने बड़े बेटे को नौ घोड़े दिए। शेष नौ घोड़ों में से उसने दूसरे बेटे को छह घोड़े दे दिए। तीन घोड़े बच गए। उसने तीसरे बेटे को दो घोड़े दे दिए। वसीयत की शर्त पूरी हो गई। उसने अपना घोड़ा लिया और अपने घर चला गया। उसने उन्हें नसीहत दी कि जब कभी उन्हें कोई बात असम्भव लगे तो किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह ले लें। पंचायत द्वारा उनकी सम्पत्ति के बँटवारे से तीनों बेटे खुशी-खुशी सहमत हो गए।

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Word-Meanings

MP Board Class 9th English The Rainbow Solutions Chapter 5 Dead Man’s Riddle 3

MP Board Class 9th English Solutions

The Rainbow Textbook Special English Class 9th Solutions

MP Board Class 12th Special Hindi भाषा-बोध प्रश्नोत्तर

MP Board Class 12th Special Hindi भाषा-बोध प्रश्नोत्तर

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय

प्रश्न
1. वाक्य के प्रमुख गुण होते हैं
(अ) एक, (ब) दो, (स) तीन, (द) चार।

2. ‘वे सज्जन पुरुष आये हैं’ का शुद्ध रूप है
(अ) वह सज्जन पुरुष आया है, (ब) वह सज्जन आया है, (स) वे सज्जन आया है, (द) वे सज्जन आये हैं।

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3. सही वर्तनी है
(अ) परन्तु, (ब) परतुं, (स) पंरतु, (द) परतु।

4. सही वर्तनी है [2013]
(अ) रिचा, (ब) रीचा, (स) ऋचा, (द) ऋिचा।

5. सही शब्द है [2015]
(अ) आशीवाद, (ब) आर्शीवाद, (स) आशिर्वाद, (द) आशीर्वाद।

6. सही शब्द है
(अ) उज्ववल, (ब) उज्ज्वल, (स) उज्बवल, (द) उजव्वल।

7. ‘हमें पानी दो’ का शुद्ध रूप है [2016]
(अ) हमें पानी चाहिए, (ब) हमें पानी पीना है, (स) मुझे पानी दो, (द) मुझे पानी पीना है।

8. निम्नलिखित में से ‘विस्मयादिबोधक चिह्न’ है
(अ) ?, (ब) 1, (स) ;, (द)!.

9. निम्नलिखित में से ‘अर्द्ध विराम’ का चिह्न है
(अ) ?, (ब)।, (द)!.

10. (“) चिह्न है
(अ) पुनरुक्ति बोध चिह्न, (ब) लाघव चिह्न, (स) आदेश चिह्न, (द) हंस पद।

11. रचना के अनुसार वाक्य-भेद के होते हैं
(अ) दो प्रकार, (ब) तीन प्रकार, (स) सात प्रकार, (द) आठ प्रकार।

12. ‘आप दिल्ली जायेंगे’ है, एक
(अ) मिश्रित वाक्य, (ब) सरल वाक्य, (स) नकारात्मक वाक्य, (द) प्रश्नवाचक वाक्य।

13. ‘वह अच्छा खेला, परन्तु हार गया है, एक
(अ) संयुक्त वाक्य, (ब) सरल वाक्य, (स) नकारात्मक वाक्य, (द) प्रश्नवाचक वाक्य।

14. ‘भाषा’ शब्द की मूल क्रिया है
(अ) भाष, (ब) भष, (स) भोष, (द) भए।

15. मध्य प्रदेश में रीवा, सतना, सीधी, शहडोल इत्यादि की प्रमुख बोली है- [2014]
(अ) मालवी, (ब) निमाड़ी, (स) ब्रज, (द) बघेली।

16. राष्ट्रभाषा के लिए प्रयुक्त किये जाने वाला शब्द है
(अ) राज्यभाषा, (ब) सम्पर्क भाषा, (स) मातृभाषा, (द) विभाषा।

17. ‘आसन डोलना’ मुहावरे का अर्थ है
(अ) ऊपर से नीचे आना, (ब) नीचे से ऊपर जाना, (स) चंचल होना, (द) एक जगह से दूसरी जगह जाना।

18. ‘सब धान बाईस पसेरी’ का अर्थ है
(अ) बहुत सस्ता होना, (ब) बहुत महँगा होना, (स) अधिक से सुविधा, (द) अच्छे-बुरे को समान समझना।

19. ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ का अर्थ है
(अ) कठोर स्वभाव, (ब) कपटपूर्ण व्यवहार, (स) झूठा दिखावा, (द) प्रचार करना।

20. ‘तन पर नहीं लत्ता पान खाए कलकत्ता’ का अर्थ है
(अ) बुरी आदत में पड़ना, (ब) बहुत गरीब, (स) झूठा दिखावा, (द) प्रचार करना।

21. ‘शत्रुता’ शब्द का विपरीत अर्थ है [2010]
(अ) मधुरता, (ब) मित्रता, (स) सुन्दरता, (द) मनुष्यता।

22. “कपड़ा’ शब्द का पर्यायवाची क्या है? [2017]
(अ) वसन, (ब) कनक, (स) पाहन, (द) पावन।
उत्तर-
1. (स), 2. (द), 3. (अ), 4.(स), 5. (द), 6. (ब), 7. (स), 8.(द), 9. (स), 10. (अ), 11. (ब), 12. (ब), 13. (अ), 14. (अ), 15. (द), 16. (ब), 17. (स), 18. (द), 19. (ब), 20. (स),
21. (ब), 22. (अ)।

  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. क्या भोपाल सुन्दर शहर है …
2. आह ……..” दर्द असहनीय है।
3. रचना के आधार पर वाक्य ……… प्रकार के होते हैं। [2014]
4. ‘एक पंथ … ‘ प्रसिद्ध मुहावरा है।
5. ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ का अर्थ …… है। [2016]
6. ‘दाल न गलना’ मुहावरे का अर्थ … है। [2017]
7. ‘आम के आम …’ प्रचलित लोकोक्ति है।
8. ‘अनेकों’ का शुद्ध …. होता है।
9. माधुर्यता का शुद्ध रूप …… है।
10. ‘नलनी’ का शुद्ध रूप ……..” है।
11. ‘अनुसुइया’ का शुद्ध रूप ………. है।
12. ‘सामर्थ’ का शुद्ध रूप ……… है।
13. ‘प्रेयसि’ का शुद्ध रूप ……..” है।
14. ‘यदि वह आता तो मैं चला जाता यह वाक्य ……… वाक्य है। [2010]
15. एक भाषा-क्षेत्र में कई ……… होती हैं।
16. जब बोली किसी कारण से महत्त्व प्राप्त कर लेती है तब वह ……” कहलाती है। [2015]
17. प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत ……..होती है।
18. राष्ट्रभाषा के लिए ……… भाषा शब्द भी प्रयुक्त होता है।
19. विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को ……… भी कहते हैं।
20. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ …. है। [2012]
उत्तर-
1. ?, 2. !, 3. तीन, 4. दो काज, 5. आवश्यकता से कम वस्तु, 6. सफल न होना, 7. गुठलियों के दाम, 8. अनेक, 9. माधुर्य, 10. नलिनी, 11. अनुसूया, 12. सामर्थ्य, 13. प्रेयसी, 14. सन्देहवाचक, 15. उप-बोलियाँ, 16. भाषा, 17. राष्ट्र भाषा, 18. सम्पर्क, 19. पल्लवन, 20. कठिन कार्य करना।

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  • सत्य/असत्य

1. शब्दों का कोई भी समूह वाक्य कहलाता है। [2014]
2. यह (,) अल्प विराम का चिह्न है।
3. विस्मय के लिए (!) विराम चिह्न का प्रयोग होता है।
4. ‘नाक रगड़ना’ का अर्थ ‘खुशामद करना है’।
5. ‘चिराग तले अँधेरा’ का अर्थ है-‘चिराग के नीचे अँधेरा’। [2011]
6. ‘कान भरना’ का अर्थ ‘चुगली करना है।
7. काला अक्षर भैंस बराबर का अर्थ साक्षर होता है। [2015]
8. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ ‘खीर खाना है’।
9. ‘उपर्युक्त टिप्पणी संगत है।’ शुद्ध वाक्य है।
10. ‘क्या आप खाना खा लिये हैं।’ वाक्य अशुद्ध है।
11. ‘महत्त्व’ शब्द की वर्तनी शुद्ध है।
12. ‘कवियत्री’ शुद्ध वर्तनी में नहीं है।
13. ‘क्या मधु आयी थी?’ एक प्रश्नवाचक वाक्य है।
14. ‘मेरा लड़का बुद्धिमान है’ का निषेधवाचक वाक्य ‘मेरा लड़का मूर्ख नहीं है।
15. भाषा का सम्बन्ध मनुष्य की ध्वनियों से होता है। [2009]
16. राष्ट्र भाषा को अंग्रेजी में ऑफिशियल लैंग्वेज’ कहते हैं। [2009]
17. हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है।
18. मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ समान नहीं हैं।
19. ‘अपने मुँह मियाँ मिठू बनना’ का अर्थ है-अपने मुँह को मिठू जैसा बनाना। [2010]
20. विचार एवं भाव-विस्तार, आलोचना,टीका-टिप्पणी या व्याख्या से भिन्न है।
21. गगन का पर्यायवाची वसुंधरा है। [2016]
उत्तर-
1. असत्य, 2. सत्य, 3. सत्य, 4. सत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. असत्य, 8. असत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. सत्य, 12. सत्य, 13. सत्य, 14. सत्य, 15. सत्य, 16. असत्य, 17. सत्य, 18. सत्य, 19. असत्य, 20. सत्य, 21. असत्य।

  • सही जोड़ी मिलाइए

I.
1. तुम घर मत जाओ। [2016] – (अ) विस्मयादिबोधक
2. ‘हे राम ! क्या-क्या सहना पड़ेगा।’ वाक्य है – (ब) आज्ञावाचक वाक्य
3. ‘दाँत खट्टे करना’ का अर्थ है – (स) वाक्य
4. ‘द्वन्द’ की शुद्ध वर्तनी है – (द) परास्त करना
5. पूर्ण विचार व्यक्त करने वाला शब्द [2009] – (इ) द्वन्द्व
उत्तर-
1.→ (ब),
2.→ (अ),
3.→ (द),
4.→ (इ),
5.→ (स)।

II.
1. तुम यहाँ आओ। [2017] – (अ) आज्ञावाचक
2. ‘एक मात्र सहारा’ के लिए मुहावरा है – (ब) बिखर जाना
3. ‘तीन तेरह होना’ का अर्थ है – (स) अन्धे की लकड़ी
4. ब्रज [2014] – (द) दर्शनशास्त्री
5. दर्शनशास्त्र को जानने वाला [2010, 15] – (इ) बोली
उत्तर-
1. → (अ),
2. → (स),
3. → (ब),
4. → (इ),
5. → (द)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
जिस वाक्य में एक ही संज्ञा और क्रिया का प्रयोग होता है, उसे कौन-सा वाक्य कहते हैं? [2009]
उत्तर-
सरल या साधारण वाक्य।

प्रश्न 2.
जिस वाक्य में एक उद्देश्य तथा एक विधेय होता है, वह कैसा वाक्य कहलाता [2013]
उत्तर-
सरल या साधारण वाक्य।

प्रश्न 3.
‘जिसका कोई शत्रु न हो’ के लिए एक शब्द क्या है? [2011]
उत्तर-
अजातशत्रु।

प्रश्न 4.
‘प्रमाणिक’ का शुद्ध रूप क्या होगा?
उत्तर-
प्रामाणिक।

प्रश्न 5.
‘लक्ष्मीबाई एक तेजस्वी नारी थी’-यह वाक्य शुद्ध है अथवा अशुद्ध? [2011]
उत्तर-
अशुद्ध।

प्रश्न 6.
‘वह गुणवान महिला है’ का शुद्ध वाक्य क्या होगा? [2014]
उत्तर-
वह गुणवती महिला है।

प्रश्न 7.
‘राम घर पर है’ का सन्देहवाचक रूप क्या होगा?
उत्तर-
शायद राम घर पर है।

प्रश्न 8.
‘बच्चे सुन्दर चित्र बना रहे हैं’ का आज्ञावाचक रूप क्या होगा?
उत्तर-
बच्चो ! सुन्दर चित्र बनाओ।

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प्रश्न 9.
जब बोली किन्हीं कारणों से महत्त्व प्राप्त कर लेती है, तो क्या कहलाने लगती है?
उत्तर-
भाषा।

प्रश्न 10.
घर के सदस्य अपने विचारों का आदान-प्रदान किस भाषा में करते हैं? [2012]
उत्तर-
मातृभाषा में।

प्रश्न 11.
बघेली बोली किस क्षेत्र में बोली जाती है? [2016]
उत्तर-
बधेली बोली मध्य प्रदेश के रीवा,सतना, सीधी, बालाघाट, शहडोल इत्यादि क्षेत्रों में बोली जाती है।

प्रश्न 12.
मालवी बोली मध्य प्रदेश के किन-किन जिलों में बोली जाती है? कोई दो जिलों के नाम लिखिए। [2017]
उत्तर-
(1) देवास,
(2) रतलाम।

प्रश्न 13.
छोटे-छोटे वाक्यांश क्या कहलाते हैं?
उत्तर-
मुहावरे।

प्रश्न 14.
‘उल्टी गंगा बहाना’ का क्या अर्थ है? [2011]
उत्तर-
विपरीत काम करना।

प्रश्न 15.
‘गढ़े मुर्दे उखाड़ना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
पुरानी बातें याद करना।

प्रश्न 16.
विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को और क्या कहते हैं?
उत्तर-
पल्लवन।

प्रश्न 17.
जिसकी कल्पना न की जा सके। [2010]
उत्तर-
कल्पनातीत।

(ख) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए [2015]
कुसंग, अज्ञ, अभ्यस्त।
उत्तर-
कुसंग = सत्संग,अज्ञ = विज्ञ,अभ्यस्त = अनअभ्यस्त।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों को तत्सम में बदलिए। [2015]
पाथर, औगुन, मच्छी।
उत्तर-
पाथर = प्रस्तर, औगुन = अवगुण, मच्छी = मत्स्य।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों के लिए एक शब्द लिखिए [2015]
(i) जिसके आने की तिथि मालूम न हो।
(ii) आयुर्वेदिक औषधियों से इलाज करने वाला।
(iii) कविताएँ रचने वाला।
उत्तर-
(i) अतिथि,
(ii) वैद्य,
(iii) कवि।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
(1) आप लोग अपनी बात कहें।
(2) आपको चलना हो तो चलिए।
उत्तर-
(1) आप अपनी बात कहें।
(2) आपको अगर चलना है तो चलिए।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अवतरण को उचित विराम-चिह्न का प्रयोग करते हुए पुनः लिखिए
कैसा अकेला-सा एकटक देखता रहता है जानते हो क्यों नहीं जानते बात यह है कि एक बार रजनीबाला अपने प्रियतम प्रभात से मिलने चली गहरे नीले कपड़े पहनकर जिसमें सोने के तारे टँके थे?
उत्तर-
कैसा अकेला-सा एकटक देखता रहता है। जानते हो क्यों? नहीं जानते? बात यह है कि एक बार रजनीबाला अपने प्रियतम प्रभात से मिलने चली, गहरे नीले कपड़े पहनकर, जिसमें सोने के तारे टँके थे।

प्रश्न 6.
निम्न अवतरण में उचित विराम चिह्न लगाइए राम अरे भाई तुम बैठे-बैठे क्यों रो रहे हो श्याम लज्जित होकर अभी एक पत्र से पता चला है कि मैं परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा राम क्यों निराश होते हो विश्वास रखो तुम निश्चय ही भविष्य में सफल होगे।
उत्तर-
राम-“अरे ! भाई तुम बैठे-बैठे क्यों रो रहे हो?” श्याम (लज्जित होकर)-“अभी एक पत्र से पता चला है कि मैं परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा।” राम-“क्यों निराश होते हो? विश्वास रखो, तुम निश्चय ही भविष्य में सफल होगे।”

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प्रश्न 7.
निम्न अवतरण में उचित विराम चिह्न लगाइए हमदर्दी क्या ऐसे कहकर दिखायी जाती है हाय-हाय बेचारी के पिता को जेल हो गयी आपस में दबी-दबी जबान से कहती इतने बड़े लोग भी चोरी करते हैं तभी ठाठ थे आशाजी के मेरा जी होता कि चीख-चीख कर सबसे कहूँ कि पप्पा ने कुछ नहीं किया।
उत्तर-
हमदर्दी क्या ऐसे कहकर दिखायी जाती है। “हाय-हाय ! बेचारी के पिता को जेल हो गयी।” आपस में दबी-दबी जबान से कहती है-“इतने बड़े लोग भी चोरी करते हैं? तभी ठाठ थे आशाजी के !” मेरा जी होता, चीख-चीख कर सबसे कहूँ कि पप्पा ने कुछ नहीं किया।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों को उनके समक्ष दिये गये निर्देश के अनुसार परिवर्तित कीजिये
(1) सत्य की सदा जीत होती है। (प्रश्नवाचक)
(2) यह शाम कितनी सुहावनी है? (विस्मयबोधक)
उत्तर-
(1) क्या सत्य की सदा जीत होती है?
(2) अहा ! यह शाम कितनी सुहावनी है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिए
(1) परिश्रमी व्यक्ति की सभी प्रशंसा करते हैं।
(2) वह विद्यालय आकर शिक्षक से मिला।
उत्तर-
(1) जो व्यक्ति परिश्रमी होता है, उसकी सभी प्रशंसा करते हैं।
(2) वह विद्यालय आया और शिक्षक से मिला।

प्रश्न 10.
निर्देशानुसार वाक्यों का परिवर्तन करो
(1) हमें चाहिए केवल बातें ही न बनाएँ अपितु कुछ करके भी दिखाएँ। (सामान्य वाक्य)
(2) सच्चरित्र व्यक्ति को सभी चाहते हैं। (मिश्र वाक्य में)
उत्तर-
(1) बातें न बनाते हुए हमें कुछ करके भी दिखाना चाहिए।
(2) जो व्यक्ति सच्चरित्र होता है,उसे सभी चाहते हैं।

प्रश्न 11.
हिन्दी की अतिरिक्त संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त दो भाषाओं के नाम लिखिए। उत्तर-(1) मराठी,(2) गुजराती। प्रश्न 12. विभाषा किसे कहते हैं?
उत्तर-
यह बोली का कुछ विकसित प्रारूप है। भाषा की अपेक्षा छोटे क्षेत्रों में प्रयोग में लायी जाती है। जैसे-अवधी तथा ब्रजभाषा।

प्रश्न 13.
मध्य प्रदेश की दो प्रमुख बोलियों के नाम लिखिए। (2009, 12)
उत्तर-
(1) छत्तीसगढ़ी,
(2) मालवी।

प्रश्न 14.
बुन्देली एवं मालवी मध्य प्रदेश के किन-किन भागों में बोली जाती है? [2009]
उत्तर-
बुन्देली-दतिया, टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, जबलपुर। मालवी-देवास, इन्दौर, धार,उज्जैन,रतलाम।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(1) खाक छानना,
(2) पट्टी पढ़ाना।
उत्तर-
(1) नौकरी के लिए वह खाक छानता फिर रहा है।
(2) आपने राकेश को क्या पट्टी पढ़ा दी है, वह घर जाने का नाम ही नहीं लेता है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित लोकोक्तियों के अर्थ लिखिए
(1) आँख के अंधे नाम नयनसुख,
(2) नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
उत्तर-
(1) आंख के अंधे नाम नयनसुख-गुण के विपरीत नाम।
(2) नाच न जाने आँगन टेढ़ा-काम न जानना और बहाना बनाना।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखिए
(1) अपना उल्लू सीधा करना,
(2) उन्नीस-बीस होना।
उत्तर-
(1) अपना उल्लू सीधा करना-अपना काम निकालना।
(2) उन्नीस-बीस होना-मामूली अन्तर।

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प्रश्न 18.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(1) गाल बजाना,
(2) जान पर खेलना।
उत्तर-
(1) गाल बजाने से कुछ नहीं होता, काम तो करने से ही होता है।
(2) भारतीय सैनिक देश की रक्षा के लिए जान पर खेल जाते हैं।

प्रश्न 19.
‘नाक नचाना’ का अर्थ बताते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिये
उत्तर-
नाक नचाना (तंग करना)-चिन्मय अपनी माँ को सारे दिन नाक नचाता है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित लोकोक्ति का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए आगे नाथ न पीछे पगहा।
उत्तर-
तुम्हारे तो आगे नाथ न पीछे पगहा, इसीलिए घूमते रहते हो।

प्रश्न 21.
‘कान देना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
शिक्षकों की बातों पर कान देना आवश्यक है।

प्रश्न 22.
‘सिर पीटना का वाक्य में प्रयोग करके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
अब सिर पीटने से क्या होता है,सास माल तो चला गया।

प्रश्न 23.
‘चाँदी का जूता मारना’ लोकोक्ति का सही अर्थ बताइये।
उत्तर-
चाँदी का जूता मारना-पैसे के बल पर काम कराना।

प्रश्न 24.
‘आग में घी डालना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिये।
उत्तर-
श्याम ने आग में घी डालकर झगड़ा बढ़ा दिया नहीं तो दोनों शान्त हो रहे थे।

प्रश्न 25.
भाव विस्तार से क्या आशय है?
उत्तर-
सूत्र रूप में कही गई बात को विस्तार से समझाना, भाव विस्तार कहलाता है।

प्रश्न 26.
भाव विस्तार की क्या उपयोगिता है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
भाव विस्तार से गूढ कथन का अर्थ उजागर होता है। उस कथन के सभी पक्ष समझ में आ जाते हैं।

(ग) लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों में निहित अशुद्धियों को दूर कर उनके व्याकरण-सम्मत शुद्ध रूप लिखिए
(1) कर्मचारी शासन के अधीनस्थ हैं।
(2) मैने खेलते हुए दो गायों को आते देखा।
(3) उसने उधर देखा और बोला।
उत्तर-
(1) कर्मचारी शासन के अधीन हैं।
(2) जब मैं खेल रहा था, तब मैंने दो गायों को आते देखा।
(3) उसने उधर को देखा और बोला।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिये
(1) तुमने अपना सभी काम समय पर करना चाहिए।
(2) आयातित वस्तु गिनती कर रखनी चाहिए।
(3) सुन्दरी बालिका से गाने को कहो।।
(4) यह परिमार्जित है, और व्याकरणसम्मत है।
उत्तर-
(1) तुम्हें अपना सभी काम समय पर करना चाहिए।
(2) आयातित वस्तुएँ गिनकर रखनी चाहिए।
(3) सुन्दर बालिका से गाने को कहा।
(4) यह परिमार्जित और व्याकरणसम्मत है।

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प्रश्न 3.
निम्नांकित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
(1) महादेवी वर्मा विद्वान् महिला थीं।
(2) गाँधीजी पक्के भक्त थे ईश्वर के।
(3) लड़के ने काम करके स्कूल गया।
(4) अनेक सिनेमा के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी।
उत्तर-
(1) महादेवी वर्मा विदुषी महिला थीं।
(2) गाँधीजी ईश्वर के पक्के भक्त थे।
(3) लड़के काम करके स्कूल गये।
(4) सिनेमा के अनेक कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांश को समचित विराम चिह्न का प्रयोग करते हए लिखिए मेरी उपेक्षा से उस विदेशी को चोट पहुंची यह सोचकर मैंने अपनी नहीं को और अधिक कोमल बनाने का प्रयास किया मुझे कुछ नहीं चाहिए भाई चीनी भी विचित्र निकला हमको भाय बोला है तब जरूर लेगा जरूर हाँ होम करते हाथ जला वाली कहावत हो गयी विवश कहना पड़ा देखू तुम्हारे पास है क्या चीनी बरामदे में कपड़े का गट्ठर उतारता हुआ कह चला भोत अच्छा सिल्क लाता है सिस्तर चाइना सिल्क क्रेप बहुत कहने सुनने के उपरान्त दो मेजपोश खरीदना आवश्यक हो गया।
उत्तर-
मेरी उपेक्षा से उस विदेशी को चोट पहुँची, यह सोचकर मैंने अपनी ‘नहीं’ को और अधिक कोमल बनाने का प्रयास किया, “मुझे कुछ नहीं चाहिए भाई !” चीनी भी विचित्र निकला, “हमको भाय बोला है, तब जरूर लेगा-जरूर हाँ?’ ‘होम करते हाथ जला’ वाली कहावत हो गयी-विवश कहना पड़ा-‘देखू तुम्हारे पास है क्या?’ ‘चीनी बरामदे में कपड़े का गठ्ठर उतारता हुआ कह चला-“भोत अच्छा सिल्क लाता है सिस्तर ! चाइना सिल्क, क्रेप …… ” बहुत कहने-सुनने के उपरान्त दो मेजपोश खरीदना आवश्यक हो गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश को विराम-चिह्नों का समुचित प्रयोग करते हुए लिखिए छाया, यह काव्य बड़ी लगन का फल है कल मैं इसे सम्राट की सेवा में ले जाऊँगा और फिर जब मैं उस सभा में इसे सुनाना आरम्भ करूँगा तब सारी उज्जयिनी की आँखें मेरे ऊपर होंगी महाकाव्य महाकाव्य महाकाव्य उस समय सम्राट गदगद हो जायेंगे और छाया बरसों बाद दनिया पढ़ेगी कवि कुल शिरोमणि शेखर कृत भोर का तारा हा हा हा।
उत्तर-
“छाया ! यह काव्य बड़ी लगन का फल है। कल मैं इसे सम्राट की सेवा में ले जाऊँगा और फिर, जब मैं उस सभा में इसे सुनाना आरम्भ करूँगा, तब ………… तब सारी उज्जयिनी की आँखें मेरे ऊपर होंगी। महाकाव्य ! महाकाव्य !! महाकाव्य !!! उस समय सम्राट गद्-गद् हो जायेंगे और छाया ! बरसों बाद दुनिया पढ़ेगी-कविकुल-शिरोमणि शेखरकृत भोर का तारा हा ! हा !! हा !!!”

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिये
(1) श्याम धनी व्यक्ति है। (नकारात्मक)
(2) भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता। (प्रश्नवाचक)
(3) यह सुहावना प्रातःकाल है। (विस्मयबोधक)
उत्तर-
(1) श्याम निर्धन व्यक्ति नहीं है।
(2) क्या भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता?
(3) अहा ! यह कैसा सुहावना प्रातःकाल है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित वाक्यों को एक मिश्रित वाक्य में रूपान्तरित कीजिये
(1) सब पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं।
(2) वे दूसरों की स्वतन्त्रता में बाधक न हों।
(3) वे राजकीय नियमों का पालन करते रहें।
उत्तर-
सब पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं, जब तक दूसरों की स्वतन्त्रता में बाधक न हों और राजकीय नियमों का पालन करते रहें।।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्य-युग्मों को संज्ञा अथवा विशेषण उपवाक्य में बदलिए
(1) राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नहीं है; उसके रहने वाले एक जाति व सम्प्रदाय के हों।
(2) गाँधीजी ने कहा, हमें सत्य और अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(3) साम्प्रदायिकता बुरी है; मनुष्य-मनुष्य के बीच में वह भेदभाव उत्पन्न करे।
उत्तर-
(1) राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसके रहने वाले एक जाति व सम्प्रदाय के हों।
(2) गाँधीजी ने कहा है कि हमें सत्य और अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(3) वह साम्प्रदायिकता बुरी है जो मनुष्य-मनुष्य के प्रति भेदभाव उत्पन्न करे।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिये
(1) मैं साकेत के कवि को नहीं जानता हूँ। (मिश्रित वाक्य)
(2) धातुओं में सोने से अधिक कीमती कोई धातु नहीं है। (विधिवाचक वाक्य)
उत्तर-
(1) साकेत के कवि कौन हैं,मैं नहीं जानता।
(2) धातुओं में सोना सबसे अधिक कीमती धातु है।

प्रश्न 10.
विभाषा किसे कहते हैं? किन्हीं दो विभाषाओं के नाम लिखिए।
अथवा
विभाषा किसे कहते हैं? विभाषा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। [2009]
उत्तर-
विभाषा-बोली का कतिपय अधिक विकासमान रूप जिसके अन्तर्गत साहित्य का सृजन होता है,उसे विभाषा के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यथा-अवधी एवं ब्रज।

विशेषताएँ-
(1) विभाषा का क्षेत्र बोली से अधिक व्यापक होता है परन्तु भाषा से कम व्यापक होता है।
(2) यह किसी प्रदेश के बड़े हिस्से में सामाजिक व्यवहार या साहित्य में प्रयोग की जाती है।

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प्रश्न 11.
विभाषा एवं बोली में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(1) जब बोली किसी कारण महत्त्व प्राप्त करती है तो उसे भाषा कहा जाता है।
(2) प्रत्येक व्यक्ति की भाषा स्वतन्त्र होती है।
(3) एक भाषा के अन्तर्गत कई उप-बोलियाँ होती हैं।

प्रश्न 12.
मातृभाषा किसे कहते हैं एवं मातृभाषा का ज्ञान होना क्यों आवश्यक है? [2010, 14]
अथवा
मातृभाषा किसे कहते हैं? परिभाषा लिखिए। [2015]
उत्तर-
जिस क्षेत्र विशेष में जो भाषा बोली जाती है तथा बालक अपनी माँ के मुँह से जो सुनता,सीखता है,वही मातृभाषा है। सर्वप्रथम मातृभाषा ही शिशु के इस दुनिया में आँख खोलने के साथ ही कानों में पड़ती है। वास्तव में,मातृभाषा पालने की भाषा है,जो माता-पिता, परिवार और स्थानीय परिवेश में बोली जाती है।

मातृभाषा सीखने और समझने में सरल लगती है। इसके माध्यम से परिवार, समाज, रिश्तेदारों में बातचीत करना सरल होता है और भावों की अभिव्यक्ति सहज होती है। अतः मातृभाषा का ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 13.
राजभाषा किसे कहते हैं? राजभाषा की दो विशेषताएँ लिखिए। [2013]
उत्तर-
राजकीय काम-काज में प्रयोग की जाने वाली भाषा राजभाषा कहलाती है। राजभाषा राज्य के प्रशासनिक कार्यों में अपनाई जाती है। प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को राजभाषा का ज्ञान होना आवश्यक होता है। भारतीय संविधान के अनुसार हिन्दी भारत की राजभाषा है किन्तु जब तक सभी राज्यों को हिन्दी का पूरा ज्ञान न हो तब तक प्रदेश की भाषा के साथ-साथ हिन्दी का अनुवाद स्वीकार्य है।

राजभाषा की विशेषताएँ
(1) राजभाषा किसी भी देश के राजकीय काम-काज की भाषा होती है।
(2) राजभाषा की मान्यता मिलने से उस भाषा का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 14.
राष्ट्रभाषा किसे कहते हैं? [2015]
राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ लिखिए। [2009, 16]
उत्तर-
राष्ट्रभाषा प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत राष्ट्रभाषा होती है। राष्ट्रभाषा में राष्ट्र की संस्कृति, साहित्य और इतिहास की प्रेरणाएँ निहित होती हैं, जो जनजीवन को प्रभावित करती हैं। राष्ट्रभाषा के लिए सम्पर्क भाषा’ शब्द भी प्रयुक्त होता है। राष्ट्रभाषा उसी तरह महत्वपूर्ण होती है, जैसे-राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज अथवा राष्ट्रचिह्न। वह पूरे राष्ट्र की संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी भाषा से उस व्यक्ति,समाज व देश का व्यक्तित्व झलकता है।

राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ
(1) राष्ट्रभाषा विकसित होती है।
(2) यह देश के बहुसंख्यक लोगों की भाषा होती है।
(3) राष्ट्र भाषा को संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त होती है।
(4) देश की अन्य भाषाओं से इसका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

प्रश्न 15.
भाषा एवं विभाषा में कोई दो अन्तर लिखिए। (2000, 01, 02, 11)
उत्तर-
(1) भाषा का क्षेत्र विशद् होता है तथा इसके प्रचलन का क्षेत्र भी व्यापक होता है, जबकि विभाषा प्रान्त विशेष की परिधि तक संकुचित रहती है।
(2) भाषा का प्रयोग राजकार्य में होता है। विभाषा मात्र साहित्य एवं बोलचाल तक सीमित है।

प्रश्न 16.
भाषा और बोली में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2012, 14, 17]
उत्तर-
(1) भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है, जबकि बोली का क्षेत्र सीमित होता है।
(2) भाषा का साहित्य प्रचुरता में लिखित होता है, जबकि बोली का साहित्य अलिखित या न्यून होता है।
(3) भाषा में एक से अधिक बोलियाँ हो सकती हैं, जबकि बोली में भाषाओं का समावेश नहीं होता है।
(4) बोली का प्रयोग बोलचाल में होता है, जबकि भाषा का प्रयोग साहित्य तथा शासकीय कार्यों में होता है।

प्रश्न 17.
मुहावरे और लोकोक्ति में क्या अन्तर है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
ऐसा वाक्यांश, जो सामान्य अर्थ का बोध न कराकर किसी विशेष अर्थ का आभास दे, उसे मुहावरा कहते हैं। लोकोक्तियाँ किसी विशेष घटना या कहानी से निकलकर प्रचलित होती हैं। इनमें लोक अनुभव छिपा होता है।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ बताते हुए वाक्य प्रयोग कीजिए अन्धे की लकड़ी, ईद का चाँद होना, छप्पर फाड़ कर देना, पेट में चूहे कूदना।
उत्तर-
अन्धे की लकड़ी (एक ही सहारा) श्रवण कुमार अपने माता-पिता की अन्धे की लकड़ी थे।
ईद का चाँद होना (बहुत दिनों में दिखना)-श्याम, तुम्हें देखने को आँखें तरस गईं, तुम तो ईद का चाँद हो गये।
छप्पर फाड़कर देना (बिना परिश्रम के अनायास प्राप्ति) भगवान देता है तो छप्पर फाड़कर देता है।
पेट में चूहे कूदना (जोर से भूख लगना)-पेट में चूहे कूद रहे हैं, पहले कुछ खा लें तब काम निपटायेंगे।

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प्रश्न 19.
“सब उन्नतियों का मूल धर्म है” का भाव-विस्तार कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत कथन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का है। उन्होंने देशोपकारिणी सभा में भाषण करते हुए भारतवासियों को राष्ट्र के प्रति सजग किया था। भारतेन्दु जी मानते थे कि सभी प्रकार की उन्नतियों का आधार धर्म होता है। धर्म में समाज गठन की अनेक नीतियाँ हैं। धार्मिक अनुष्ठान, त्यौहार आदि समाज को उन्नत बनाने के लिए हैं। हमारे यहाँ धर्म और समाज सुधार दूध तथा पानी के समान मिले हुए हैं। धर्म समाज सुधार के लिए होता है। धर्म समाज में अनुशासन, व्यवस्था तथा पवित्र भावनाओं का विकास करता है। अतः राष्ट्र,समाज तथा व्यक्ति का हित धर्म के अनुसार कार्य करने में है। मंगलकारी भावना से किए कार्य विकास की ओर ले जाने वाले होते हैं। ऐसे कार्यों से हमारा ध्यान समाज कल्याण तथा विश्व बन्धुत्व पर केन्द्रित होगा। इससे मानव मात्र का मंगल विधान होगा। इसीलिए धर्म को सभी प्रकार की उन्नतियों का मूल आधार माना गया है।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

The Poet and the Pauper Question Answer Class 9 English The Rainbow Chapter 12 MP Board Solutions

Class 9th English The Rainbow Chapter 12 The Poet and the Pauper Question Answers

The Poet and the Pauper Class 9 Questions and Answers

The Poet and the Pauper Textual Exercises

A. What is meant by the following expressions?
Fie, not at all, Sir, wonderful, that’s right, aside, bea-oo-tiful, Ah- h-choo
Answer:
‘Fie’ is an exclamatory word which means ‘shame’.
‘Not at all’ means ’in no case’
‘Sir’, a word of respect.
‘Wonderful’ means ‘amazing’
‘That’s right’ means ‘agreed, that’s quite right’.
‘Aside’ means ‘apart’ to or on one side’.
‘bea-oo-tiful’ means ‘pretty or good-looking’.
’Ah-h-choo1 means ’the sound of sneezing’.

B. Use the following words in your own sentences :
job, work, trade, employment, profession
Answer:
Words – Usage in sentences
Job – She has got the job of a clerk.
Work – Nobody works earnestly these days.
Trade – Two of a trade seldom agree.
Employment – There is shortage of employment in the country
profession – Teaching is a noble profession.

C. ‘Sweet’ and ‘charming’ adjectives are being used for ‘autumn’. What other adjectives can be used for ‘autumn’.
Answer:
Some other adjectives which can be used for ‘autumn’ are ‘pretty, heart-winning, winsome, capyivating.

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D. Before the word ‘evening’ serene, tranquil and beautiful these adjectives have been used. Write other appropriate adjectives.
Answer:
Some other appropriate adjectives which can be used with evening are—calm, cool, pretty, fascinating, alluring.

E. Match the words given under A with the meanings given under B, list B has some extra items.
MP Board Class 9th English The Rainbow Solutions Chapter 12 The Poet and the Pauper 1
Answer:
1. (e); 2. (d), 3. (g), 4. (a), 5. (c), 6. (b).

F. Identify the theme of the lesson and list some more vocabulary items pertaining to the theme.
Answer:
The poet scolds the servant for being late in cooking food. He also scolds the pauper for using the word ‘hunger’. He calls it a worthless word. It shows the poet’s false and foul play. He directs the pauper to quench his starvation with the spring breeze. However, he craves to get food earlier though he is not hungry

G. Listen and repeat: Really, haven’t, belly, azure, minute, moment, hours, ours, sneeze.
Answer:
For self-attempt.

Comprehension

A. Answer each of the following questions in about, 25 words.
1. Compare the needs of the poet and the pauper.
2. Why did Bashambad need a job?
3. Why does Bashambad say that breeze was enough to satisfy one’s belly and nothing else was needed.
4. What class of people do Kunja Babu and Bashambad represent?
Answer:
1. Both the poet and the pauper needed something to wrap their bodies with, to avoid chilL Both were hungry. They needed something solid to eat.

2. Bashambad was starving. He had a little rice at half past ten and hadn’t had a bite since then. He needed a job to earn money for food. His hunger made him need a job.

3. Bashambad said that he needed something solid to remain alive. The poet got enraged and asked him to go away and eat rice, dal and curry to his fill. The pauper asked the poet where he should get those things. On seeing the poet angry, the pauper said that breeze was enough to satisfy one’s belly and nothing else was needed.

4. Kunja Babu was a celebrated poet. He belonged to the rich society. He owned a house, a lovely garden and even a cook. He led a luxurious life. He had woollen clothes. Bashambad represents the poor society. He needed work to earn food. This shows he lived like a pauper from hand to mouth. He did not have even a shawl to avoid shivering.

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B. Answer each of the following questions in about 50 words:
1. Why so late? Does it take two hours to get the food ready? Characterise Kunja Babu in the light of his above statement.
2. Describe in brief the condition of the pauper.
Answer:
1. Kunj Babu was an idealist. He was not a practical man. He asked the pauper not to use the word ‘hunger’. He advised him not to make a fuss of his hunger. He bade him go away and satisfy his hunger there. Though it was the time for dinner yet he was not ready to feed an actually hungry person. He told the pauper that the spring breeze would suffice for all his needs. Soon after he scolds .The servant for preparing the dinner late. He lacked coordination in his thoughts, words and actions.

2. The pauper was not a beggar. He did not beg for food. He needed a job to satisfy his hunger. He could not help thinking about hunger though he was asked not to mention it. He agrees unwillingly to accompany the poet to his garden. The spring breeze made him sneeze and cough. It worsened his condition. His teeth started chattering. He had no shawl to save him from cold. He had a bitter experience at the poet’s house. The poet bade him go away. He was treated like a beggar.

The Poet and the Pauper Grammar

A. Study these sentences occurred in a dialogue.

  • Kunja : This is no place for you-you are trespassing.
  • Bashambad : I’ll go at once.
  • Kunja : I’m glad to hear you say so.
  • Bashambad : There’s a chill in the air.

The above are the speakers’ exact words : Direct speech is found in conversations in books, in plays, and quotations. In indirect speech we give the exact meaning of a remark or speech, without necessarily using the speakers’ words.
Examples : Thus we can write the aforesaid dialogue.

  • Kunja said that was no place for him. He was trespassing.
  • Bashambad said that he would go at once.
  • Kunja said that he was glad to hear him say so.
  • Bashambad said that there was a chill in the air.
  • Put the following statements into indirect speech.

Question 1.
Bashambad : I’m thinking even more about it now than I usually do. I had a little rice at half-past ten before I set out job hunting, and I haven’t had a bite since then.
Answer:
Bashambad told the poet that he was thinking even more about that then than he usually did. He had had a little rice at half-past ten before he had set out job hunting, and he hadn’t had a bite since then.

Question 2.
Kunja : If you must go on wheezing like this, you should wrap yourself in a blanket and huddle in a comer of your room.
Answer:
Kunja warned the pauper that if he must go on wheezing like that, he should wrap himself in a blanket and huddle in a comer of his room.

Speaking activity

A. You have gone through the one act play. Now sit in pairs and deliver the following dialogues with proper intonation.
Kunjabihari : What brings you here, my good man?
Bashambad : Sir, I,m starving. You’d talked about a job
Kunjabihari : A job ! work ! Who thinks of work in this sweet autumn weather?
Bashambad : No one does so of choice, sir, it’s this hunger that-
Kunjabihari : Hunger? Fie, fie, what a mean, paltry word ! Pray, do not repeat it before me!
Answers:
Kunjabihari : What do you want, man?
Bashambad : Sir, I want some work to earn money and satisfy my hunger.
Kunjabihari : Don’t talk of work in this fine autumn weather.
Bashambad : Hunger knows no season, Sir.
Kunjabihari : Beware! Don’t repeat the cursed word ‘hunger’.

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B. What is the message conveyed to us by the one act play? You start like this:
Answer:
In my opinion the play conveys a very important message.Even the hungry person does not realise the genuine need of another hungry person. The hungry person needs food more than hol- low advice. The opinion of the strong is an order for the weak.

Writing Activity

A. Suppose you are Bashambad Babu, who has always been subdued, express how you feel at last. (50 words)
Answer:
I am Bashambad Babu. One day I was feeling hungry. I t told my problem to a poet. He checked me from repeating the word ‘hunger’. I agreed but I could not help thinking about hunger. I had not eaten anything since late morning. The poet stressed that moon beams, nectar of flowers and the spring breeze might suffice for all the needs. Again I was subdued. The poet bade me go out and eat rice to my fill. He got angry when I asked him for the place. At last, I was made to accompany him to the garden without a shawl. 1 I fell a victim to cough and cold. In the end, 1 challenged him and , felt free.

B. Discuss how the differences in stature of the poet and the poor man are depicted. Write whom do you admire more and why? (150 words)
Answer:
The poet and the poor man are world apart in stature. The poet is a worshipper of nature. He is least hospitable. Though he is himself hungry yet he does not feel the urgent need of the hungry pauper. Though it is dinner time yet he does not offer food or work to tire hungry pauper. He asks the pauper in a taunting manner to go away and feed himself on rice, dal and curry. It was a cruel joke. This was not a suggestion but a sarcastic remark.

He sermonises that moon beams, the nectar of flowers and the spring breeze meet all needs. He makes fun of the pauper when his teeth chatter in cold. The pauper is hungry. He needs work. He relates his problem , before a poet. The poet ridicules him. Though he is checked from repeating the word ‘hunger’ it does not get out of his mind. He does not enjoy the scenic beauty because he has no shawl.They have different physical, mental and financial statures.

Think it over

A. If a man is hungry his mind will be preoccupied with the thought of food. It would be difficult for him to talk about poetic expressions. But often poets and writers had gone through these unfulfilled basic demands and created master pieces. How?
Answer:
Poets are saintly and superhuman beings. They rejoice themselves in the lap of nature. They renounce all their pleasures. They forget food, drink and clothes. Their minds are never preoccupied with the thought of meeting their physical needs. They engross themselves in poetic pleasures. Many poets and writers”have led a life of want and penury. Yet they have created many pieces. It is due to their dedication and concentration in their own field.

B. Humour is the brighter part of life. Finding humour in day to day life generates optimistic view. Do you feel so?
Answer:
Life is an admixture of humour and pathos Humour is the brighter part of life. It lends us joy and cheer. Humour is spice of life. It creates special flavour. Pathos on the other hand creates an atmosphere of sadness and sorrow. It is never liked in any society.
Finding humour in day to day life generates optimistic view or the hopeful view of things. I also feel so,.

Things to do

Stage the one act play.
Take help of your teacher and your friends.
Answer:
Class-room Activity.

The Poet and the Pauper Additional Questions

Short-Answer Type Questions (In about 25 Words)

Question 1.
Give an account of the Autumn Season.
Answer:
India is a land of seasons. The autumn season is one of them. Tine poet calls it as sweet and charming. The evenings during autumn season are serene, tranquil and beautiful. The moon beams, the nectar of flowers and the breeze fulfill all the needs. The chill of the air is pleasant.

Question 2
Give an account of the pauper’s meeting with the poet
Answer:
A pauper came to the house of a poet. He asked the poet to give him a job because he was starving. The poet snubbed him of thinking of work in the sweet autumn weather. He also warned him against repeating the word ‘hunger’. The pauper sealed his tongue against his will. The poet suggested him to accompany him to the garden. The pauper agreed. However, he caught cough and cold and went away hungry.

Question 3
What does the lesson tell you about the pauper?
Answer:
A pauper was feeling hungry. He asked a poet for work.
The poet asked him to go away and eat rice, dal and curry. It was a cruel joke. The pauper could not get them anywhere.The poet bade him accompany him to his garden to enjoy the beauty of the night. The pauper agreed. The chilly air made him sneeze and cough. He had no wrap. He was forced to go away in order to save himself.

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Question 4.
What does the lesson tell you about the poet?
Answer:
The poet was a fan of nature. He told the hungry pauper that the moon beams, the nectar of flowers and the spring breeze would suffice for all his needs. He did not realise that the hungry people did not relish poetic solutions and humorous talks. He was selfish. He himself was hungry but he did not give weight age to pauper’s need for food.

Long-Answer Type Question

Question 1.
Give an account of beggars in India.
Answer:
Begging is a profession in India. Beggars wear rags. Some beggars cover their bodies with ashes. Most of them are crippled or blind. Some beggars sit by the roadsides or outside their shrine.They cry and weep as if they are very hungry Beggars get every-thing without doing anything. Sadhiis and faqirs are also patronised by religious-minded people. Most of the beggars are idlers. They cause a great loss of labour to the nation. Their manual labour could have been utilised in mills and factories. They would have produced useful work. Some beggars arouse pity in the hearts of passers-by in the name of Allah. The healthy beggars should not be given any alms.

The Poet and the Pauper Summary in English

A pauper wanted a job from a poet because he was hungry. The poet said that it was foolish to think of work amidst sweet autumn weather. The poet advised him to enjoy the beauty of the moonlit night. The pauper needed some thing solid to eat. The poet asked him to go and eat rice, dal and curry to his fill. The pauper did not know where he could get them. He declared that he would fill his belly with breeze.

Both of them went out in the chilly air. The poor man started shivering because he had no wrap. The poet wrapped his shawl, closely. He called it a warm weather. The pauper agreed with him that , there was no cold. The poet praised the scenic beauty but the pauper started sneezing and coughing. The poet kept humming a poem and the pauper kept wheezing. The poet called him a kill joy (nuisance). He also bade him leave the garden. The pauper had to leave to save his life. The poet kept gazing at the moon. He scolded his servant for preparing the dinner late.

The Poet and the Pauper Summary in Hindi

एक दरिद्र व्यक्ति को एक कवि से काम चाहिए था क्योंकि वह भूखा था। कवि ने कहा कि मधुर पतझड़ के मौसम में काम के बारे में विचार करना मूर्खता है। कवि ने उसे नसीहत दी कि चांदनी रात के सौन्दर्य का आनन्द ले। दरिद्र को खाने के लिए कोई ठोस पदार्थ चाहिए था। कवि ने उससे कहा कि जाकर चावल, दाल और कढ़ी से अपना पेट भर ले। दरिद्र को यह ज्ञात नहीं था कि वे वस्तुएँ उसे कहां उपलब्ध होंगी। उसने घोषणा की कि वह हवा खाकर अपना पेट भर लेगा।

वे दोनों चिलचिलाती हवा में बाहर निकल गए। दरिद्र व्यक्ति ने काँपना शुरू कर दिया क्योंकि उसके पास कोई शाल नहीं था। कवि ने कसकर अपना शाल लपेट लिया। उसने मौसम को उष्ण बताया। दरिद्र उस के साथ सहमत हो गया और बोला कि सर्दी नहीं है। कवि ने नजारे की सुन्दरता की सराहना की परन्तु दरिद्र ने छींकना और खाँसना शुरू कर दिया। कवि एक कविता को गुनगुनाता रहा और दरिद्र पराई हुई आवाज में सांस लेता रहा। कवि ने उसे गुड़-गोबर करने वाला (कढ़ी बिगाड़/वाहियात व्यक्ति) कहा। उसने उसे बाग से चले जाने का भी आदेश दिया। अपना जीवन बचाने के लिए दरिद्र को जाना पड़ा। कवि एकटक दृष्टि से चांद को देखता रहा। देरी से भोजन बनाने के लिए उसने अपने नौकर को फटकारा।

The Poet and the Pauper Word-Meanings

MP Board Class 9th English The Rainbow Solutions Chapter 12 The Poet and the Pauper 2

MP Board Class 9th English Solutions

The Rainbow Textbook Special English Class 9th Solutions

MP Board Class 12th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

MP Board Class 12th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को ‘पल्लवन’ भी कहते हैं। यह वह क्रिया है, जिसके अन्तर्गत सूत्रों,सूक्तियों,लोकोक्तियों एवं महत्त्वपूर्ण कथन या भाव को विस्तार से प्रस्तुत किया जाता है। यह संक्षेपण की प्रतिगामी प्रक्रिया है।

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भाव-विस्तार करते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है :

  1. सूक्ति का अर्थ पूरी तरह से समझने के लिए उसका ध्यान से एवं विचारपूर्वक वाचन करना चाहिए। यदि सन्दर्भ के साथ ही सूत्र उपलब्ध हो सके तो सन्दर्भ के साथ उस सूत्र के अर्थ सम्बन्धों पर दृष्टि केन्द्रित रखते हुए वाचन करना चाहिए। वाचन के समय सूत्र के अर्थ मुख्य रूप से और शेष पदों के साथ उसके अर्थगत सम्बन्ध पर ध्यान रखना चाहिए।
  2. यह आलोचना. टीका-टिप्पणी या व्याख्या से भिन्न है। इसलिए इसमें निरर्थक सन्दर्भो और उदाहरणों का उल्लेख नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही इसे समास शैली और अलंकृत भाषा में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
  3. भाषा-विस्तार करते समय पुनरावृत्ति और अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए। केवल मूल भाव से सम्बद्ध बातें ही लिखनी चाहिए। जो भी कहा जाये वह सटीक और अपेक्षित हो।
  4. भाव-विस्तार करते समय सुस्पष्ट,सुग्राह्य, सरल और अर्थपूर्ण भाषा का प्रयोग करना चाहिए। छोटे-छोटे वाक्य बनाना चाहिए।
  5. भाव-विस्तार के लिए अन्य पुरुष की वाक्य-रचना का प्रयोग करना चाहिए। सामान्य प्रचलित शब्दों का उपयोग करना चाहिए।

यहाँ भाव-विस्तार के कुछ उदाहरण दिये गये हैं। –

(1) कउड़े की आग के ताप से दिपदिपाते चेहरों की प्रसन्नता अँधेरे में भी खनक जाती है [2009]

सर्दियों के मौसम में दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद लोग शाम को अलाव जलाकर उसकी गरमाई के चारों ओर बैठकर अपनी दिनभर की थकान उतारते हैं तथा वार्तालाप, हँसी-मजाक, समस्याओं के समाधान आदि से उनके चेहरे पर अन्धकार में भी छायी प्रसन्नता, उनकी बोली से स्पष्ट हो जाती है। यह सुख आज के वैज्ञानिक युग में समाप्त हो गया है।

(2) जवारों से पीताभ गेहूँ के पौधे क्या यह संदेश नहीं देते कि सृजन की यात्रा कभी रुकती नहीं [2009]

गेहूँ का पौधा बढ़कर मनुष्य को प्रेरणा देता है कि निर्माण सदैव विकास की ओर जाता है। सृजन को अँधेरे-बन्द कमरों में बन्द नहीं किया जा सकता है। जैसे-छोटे से दीपक की लौ दूर-दूर तक प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार सृजन का प्रकाश फैलता ही जाता है। व्यक्ति का आचरण,शील, विवेक,मेहनत, ईमानदारी,आस्था, निष्ठा आदि गुण सृजन की यात्रा को आगे की ओर ले जाते हैं। आले में अंकुरित गेहूँ के पौधे मनुष्य को यही प्रेरणा देते हैं।

(3) अपने सारे उजाले को लेकर भी क्या वह सूर्य यशोधरा के उस वियोगी सूने दिल के निराशपूर्ण अन्धकार को यत्किंचित् भी दूर कर सकता था

गौतम ने यशोधरा को त्यागकर उनके हृदय को सूना कर दिया है तथा यशोधरा को अब प्रियतम के मिलने की भी आशा नहीं है। ऐसे दुःख रूपी अन्धकार से भरे हृदय को सूरज, जो संसार के अन्धकार को मिटाकर उजाले से भर देता है,यशोधरा के हृदय को सुख रूपी प्रकाश से नहीं भर सकता अर्थात् सूर्य भी यशोधरा के सूने मन में प्रसन्नता का प्रकाश नहीं कर सकता।

(4) इस कालकूट को पीकर भी यशोधरा नील-कण्ठ नहीं हुई, कैलाशवासी शंकर भी यह देखकर लज्जा के मारे सकुचा गये
गौतम ने मानव के लिए चिर-सुख का अमृत ढूँढ़ने के लिए संसार को त्यागा था, तो यशोधरा के हिस्से में चिर-वियोग का हलाहल आया। उस विष को पीकर भी यशोधरा नील कण्ठा नहीं कहलायी। लेखक ने इस तुलना से यह स्पष्ट करना चाहा है कि समुद्र मंथन से अमृत व विष निकला। भगवान शंकर ने देवताओं की भलाई के लिए विष का पान किया और नीलकण्ठ कहलाये। यशोधरा के इस आजीवन त्याग को देखकर भगवान शंकर भी लज्जित हो गये,क्योंकि यशोधरा का त्याग भगवान शंकर के त्याग से बड़ा था।

(5) वह विरक्त तपस्वी न तो भौंरों की गुनगुनाहट ही सुनेगा और न मेघ के साथ भेजे गये सन्देश ही उस योगी तक पहुँच पायेंगे

गौतम इस संसार से उदासीन थे। इस कारण उन्हें भौंरों का मधुर संगीत यानि संसार की मधुर स्वर-लहरी सुनायी नहीं देती है। उन्हें अपना सन्देश भेजने के लिए यशोधरा यदि बादलों को अपना दूत बनाकर भेजती है, तो संन्यासी गौतम उसे भी सुन व समझ नहीं पायेंगे।

गद्य-काव्य की इस पंक्ति के माध्यम से डॉ. रघुवीर सिंह बताते हैं कि उस वैरागी-संन्यासी को संसार का सौन्दर्य तथा रिश्तों के बन्धन कभी नहीं बाँध सकते हैं।

(6) काले मतवाले हाथी पर सवार विद्युत-झण्डियों वाले वर्षाराज को देखते ही इन्द्रधनुष आँखों में छा जाता है
वर्षा ऋतु में आकाश में हाथी के काले रंग जैसे बादल तथा हाथी के विशालकाय जैसे बादल हाथी के समान झूमते हुए आकाश में विचरण करते हैं, उन बादलों के बीच चमकती बिजली हाथी पर सवार के हाथ में ली हुई विजय पताका के समान लहराती है। आकाश में इस दृश्य को देखकर वर्षा के थमने के बाद आकाश में छाये इन्द्रधनुष की याद आ जाती है। दूसरा भाव है कि इस दृश्य से आँखों में प्रसन्नता छा जाती है। यहाँ पर मतवाले हाथी काले-काले बादल हैं,झण्डियाँ बिजली का आकाश में लहराना है और इन्द्रधनुष मन का प्रसन्न होना है।

(7) रीतिकालीन कवियों की जिन्दादिली तो रंगबाजी में ही दिखाई पड़ती है [2016]
रीतिकाल के श्रृंगारी कवि नायिका के सौन्दर्य-वर्णन में रंगों का खुले हृदय से प्रयोग करते हैं। नायिका की एड़ी के लाल रंग को छुड़ाने के लिए नाइन गुलाब के झाँवे को रगड़ती है तो लाल खून ही निकल आता है। ब्रज की गोपियों को संसार,यमुना,कदम्ब-कुंज,घटा,वनस्पतियाँ सभी श्याममय अर्थात् काली ही दिखाई देती हैं। उनका रंग भेद नष्ट हो जाता है।

(8) कविता तो कोमल हृदय की चीज है [2011]
मानव-मन की कोमलतम भावनाओं की अभिव्यक्ति ही कविता है। कोमल, संवेदनशील और भावुक हृदय के भावना-तन्त्र जब झंकृत होते हैं, तब कविता का जन्म होता है। सामान्यजनों की अपेक्षा कवि अधिक संवेदनशील होता है। जीवन के सुख-दुःख के प्रति उसके कोमल हृदय की प्रतिक्रिया कविता के रूप में फूट पड़ती है। उसका कोमल हृदय अनजाने में ही कविता के रूप में बहने लगता है। संवेदनशीलता का गुण कोमल हृदय में ही पाया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि कविता हृदय की वस्तु है। जो व्यक्ति ज्ञान की गरिमा और विचारों से बोझिल होता है, वह कविता की रचना नहीं कर सकता। कठोर हृदय, संवेदन-शून्य तथा अरसिक व्यक्ति कविता-रचना करना तो दूर, उसकी अर्चना-आराधना भी नहीं कर सकता।

(9) आँखों के अन्धे नाम नयनसुख
संसार में नाम की ही महिमा है, क्योंकि व्यक्ति नाम से जाना-पहचाना जाता है। किसी व्यक्ति, वस्तु आदि के गुणों और विशेषताओं के आधार पर ही उसका नाम रखा जाता है। लेकिन यह भी सत्य है कि कभी-कभी व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व और गुणों का परिचायक नहीं होता। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आस-पास मिल जाते हैं, जिसमें व्यक्ति का नाम उसके गुण और प्रकृति के विपरीत होता है। ऐसा व्यक्ति जिसका नाम के अनुरूप व्यक्तित्व नहीं होता, वह प्रायः समाज में हास्य-विनोद का आलम्बन बन जाता है। गुणों के विपरीत नाम की इसी विडम्बनापूर्ण स्थिति को देखकर ही यह कहा जाता है-आँखों के अन्धे नाम नयनसुख।

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(10) दूर के ढोल सुहावने होते हैं
यह कहावत है कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं।’ इसका अभिधा अर्थ यह है कि यदि ढोल पास में बजे तो उसका शोर बड़ा कर्णकटु और कर्कश होता है। किन्तु यही ढोल की ध्वनि दर से आये तो बड़ी कर्णप्रिय होती है। दूर से आती ढोल की थाप सुनकर मानव-मन पुलकित हो जाता है और कल्पना करने लगता है कि कहीं कोई खुशी मनायी जा रही है। विवाह का ढोल है तो वह फौरन सोचता है कि जरूर उस घर में नववधू लाज से सिमटी सुनहरे सपने देख रही होगी। इस प्रकार की रमणीय कल्पना करके मन पुलकित होता है। इसी प्रकार जिन्दगी के प्रति बुजुर्गों का कहना है कि सचमुच जिन्दगी की कल्पना दूर के ढोल के समान सुहावनी होती है, क्योंकि जीवन का प्रारम्भ प्रेम से परिपूर्ण होता है। पर जब जीवन के कठोर यथार्थ के धरातल पर युवक को चलना पड़ता है तो अनेक कठिनाइयाँ और समस्याएँ सामने खड़ी रहती हैं, तब उसे जीवन की कटुता का अनुभव होता है। प्रेम का उसका कल्पित संसार न जाने कहाँ खो जाता है और वह जीवन-संग्राम से जूझता हुआ यह सोचता है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

(11) धर्म पार्थक्य का नहीं, एकता का द्योतक है [2009]
इस विशाल संसार में अनेक धर्म हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति अपने विश्वास के साथ अपने धर्म का पालन करता है। अलग-अलग होते हुए भी प्रत्येक धर्म पार्थक्य का नहीं, एकता का द्योतक है। किसी भी धर्म में पृथकता या अलगाव की भावना नहीं है। प्रत्येक धर्म घृणा, विद्वेष तथा हिंसा के स्थान पर प्राणिमात्र को प्रेम,सदभाव,मैत्री,एकता और अहिंसा का सन्देश देता है। धर्म उस ईश्वर को पाने का एक साधन है जो सर्वव्यापक है,सबका रक्षक और पालनहार है। साधन भिन्न-भिन्न होते हुए भी प्रत्येक धर्म का साध्य एक है। अत: धर्म के नाम पर संघर्ष का होना बेईमानी है। धर्म के नाम पर वैमनस्य, ईर्ष्या,द्वेष और कटुता की भावना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना’। इसलिए यह कथन सत्य है कि धर्म तोड़ता नहीं अपितु, जोड़ता है। धर्म पार्थक्य का नहीं अपितु एकता का द्योतक है।

(12) साहित्य को दिशा तो सृष्टा कलाकार ही देता है
साहित्य मानव-जीवन की अभिव्यक्ति है, उसका आख्यान है। जिस साहित्य में मानव जीवन की उदात्त और यथार्थ अभिव्यक्ति होती है, वही साहित्य श्रेष्ठ और स्थायी होता है। साहित्य को यह दिशा साहित्यकार द्वारा मिलती है। साहित्यकार सामान्य हृदय से अधिक संवेदनशील होता है। उसके पास कल्पना करने, विचार करने की अपूर्व क्षमता और उसको मूर्तरूप देने की प्रतिभा होती है। इसके द्वारा ही वह साहित्य की सर्जना करता है। साहित्यकार को किस प्रकार के साहित्य की रचना करनी चाहिए, इसका निर्णय केवल साहित्यकार ही कर सकता है। आलोचक तो मात्र उस साहित्य की समीक्षा कर केवल उसकी उपयोगिता या अनुपयोगिता बता सकता है। वह साहित्यकार को निर्देश नहीं दे सकता। क्योंकि साहित्य का सृजन नियम या निर्देश के आधार पर नहीं हो सकता। इसलिए यह मत समीचीन है कि साहित्य को दिशा तो सृष्टा कलाकार ही देता है।

(13) तुम देखते हो कि जीवन सौन्दर्य है, हम जागते रहते हैं और देखते रहते हैं कि जीवन कर्त्तव्य है

यह एक सैनिक और कवि के वार्तालाप का एक अंश है। सैनिक जीवन की कठोरता और वास्तविकता का तथा कवि जीवन की कल्पना का प्रतीक है। कवि सपनों के संसार में सोते हुए जीवन को सौन्दर्य मानता है,जबकि एक सैनिक यथार्थ के संसार में जागते हुए जीवन को कर्तव्य मानता है। कवि भावुक होता है, इसलिए वह अपनी भावना के द्वारा सौन्दर्य को ही जीवन समझता है तथा जीवन और संसार की वास्तविकता से दूर अपने बनाये हुए काल्पनिक संसार में मग्न रहता है। इसके विपरीत एक सैनिक सदैव चैतन्य रहता है और अपने कर्तव्य का पालन करता है। उसके लिए जीवन का दूसरा नाम ही कर्तव्य का पालन है। वास्तव में,संसार में अपने कर्तव्य का पालन करना ही जीवन है। जीवन सुन्दर है तथा उसकी उपयोगिता कर्त्तव्य-पालन में ही निहित है।

(14) ईश्वर किसी विशेष धर्म या जाति का नहीं होता
यह बात पूर्णतः सत्य है,कि ईश्वर निर्गुण,निराकार,अखण्ड,अजन्मा तथा सर्वत्र व्याप्त है। उसे किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता है। ईश्वर ही परम पिता है। वह समस्त धर्मों का नियामक है। ईश्वर किसी धर्म या जाति का नहीं होता है। ईश्वर सभी पर दया बरसाता है।

(15) स्वावलम्बन की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष [2009]
अंग्रेजी की एक बड़ी सुन्दर कहावत है-‘God helps those who help themselves.” अर्थात् ईश्वर उन लोगों की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। इस बात को एक उर्दू शायर ने इस प्रकार कहा है-“हिम्मते मर्दा मददे खुदा।” कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान और भाग्य भी केवल स्वावलम्बी व्यक्ति की ही सहायता करते हैं। स्वावलम्बी व्यक्ति आत्म-विश्वास और सफलता की जीती-जागती प्रतिमूर्ति होते हैं। स्वावलम्बन का जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। जीवन में केवल वही व्यक्ति सफल होते हैं,जो स्वावलम्बी होते हैं। स्वावलम्बी मनुष्य के सम्मुख संसार की सारी बाधाएँ सिर झुकाती हैं। स्वावलम्बन से व्यक्ति में आत्म-विश्वास और आत्म-गौरव की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे उसका व्यक्तित्व विकसित होता है। समाज में भी केवल ऐसा ही व्यक्ति आदर पाता है,जो अपने पैरों पर खड़ा हो। वास्तव में,यदि यह कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि व्यक्ति में स्वावलम्बन की झलक मात्र से उस पर कुबेर का खजाना तक न्यौछावर रहता है।

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(16) बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है [2010]
क्रोध यदि आम है तो बैर उसका अचार या मुरब्बा है। जिस प्रकार आम की अपेक्षा उसका अचार या मुरब्बा अधिक लम्बे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है अर्थात् अधिक टिकाऊ होता है, उसी प्रकार बैर,क्रोध का स्थायी रूप है। वास्तव में,जो क्रोध तत्काल प्रदर्शित होने से रह जाता है, वह समय आने पर कुछ अवधि के बाद बैर बनकर प्रदर्शित होता है।

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MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 1-5)

MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 1-5)

1. तुलसीदास
[2008,09, 14, 17]

  • जीवन-परिचय

लोकनायक तुलसीदास कविता कामिनी के ललाट के ज्योति-बिन्दु हैं। इस ज्योति-बिन्दु ने अपने चारों ओर प्रकाश विकीर्ण किया हुआ है। ऐसे महान् कवि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् 1589 वि. में बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में हुआ था। परन्तु कुछ लोग सोरों (एटा) को ही इनका जन्म-स्थान मानते हैं। तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। इनके सिर से बाल्यावस्था में ही माता-पिता का साया उठ गया था और उनका पालन-पोषण नरहरिदास ने किया था। उन्होंने तुलसीदास को गुरुमंत्र दिया, रामकथा सुनाई तथा संस्कृत की शिक्षा दी। इन्होंने काशी में विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन किया तथा दीनबन्धु पाठक की अति सुन्दरी कन्या से विवाह किया। उनका नाम रलावली था। भावुक युवक तुलसीदास अपनी प्रिया के प्रेम और सौन्दर्य में सब कुछ भूल बैठा। विदुषी रत्नावली ने अपने अत्यन्त ज्ञान सम्पन्न पति के प्रेम और आसक्ति को ‘अस्थि-चर्ममय देह’ के प्रति देखकर उन्हें बहुत ही दुत्कारा। उनके ज्ञानचक्षु वैराग्य की ज्योति पाकर अलौकिक प्रकाश को विकीर्ण करने लगे।

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तुलसी ने संसार त्याग दिया। राम-गुलाम तुलसी, राम के चरित गायन में लग गए और स्वयं को अपने आराध्य राम की भक्ति में समर्पित कर दिया। संवत् 1680 वि. में इस महात्मा ने शरीर के बन्धनों को तोड़ दिया और परमतत्त्व (राम) में लीन हो गए।

कहा भी है-
“संवत् सोलह सौ अस्सी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यौ शरीर।।

तुलसी में प्रेम की उन्मत्तता, उत्कृष्ट वैराग्य, राम की अनन्य एवं दास्यभाव की भक्ति एवं लोकमंगल की भावना भरी हुई थी।

  • साहित्य सेवा

एक आदर्श साहित्य सेवक का उद्देश्य अपने वृहद् लोक जीवन को सुख और शान्ति से परिपूर्ण बनाना होता है। ‘स्वान्तः सुखाय’ से ‘पर-अन्तः सुखाय’ के आदर्श को यथार्थ में स्थापित करने के लिए लोक मर्यादा की आवश्यकता का अनुभव तुलसी ने किया। तुलसी ने राम के लोकमंगल व लोककल्याणकारी रूप को अपनी लोकपावनी काव्य कृतियों के माध्यम से जनता-जनार्दन के सामने प्रतिष्ठापित किया है। तुलसी के काव्य का प्रमुख आधार रही है-‘राम राज्य की परिकल्पना’। तुलसी द्वारा परिकल्पित आदर्श राज्य की स्थापना आज के युग में भी बहुत प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण हो गई है। कवि ने (तुलसी ने) अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से समाजगत, राजनीतिगत, आर्थिकस्थितिपरक तथा विविध जातिगत सम्बन्धों और उनके एकीकरण का अनन्यतम प्रयास किया है। प्रत्येक तरह की एवं प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने का तर्कसंगत उपाय तुलसी ने प्रत्येक वर्ग के लिए अपने ही सृजित साहित्य में यथास्थान संकेतित किया है। अतः अपनी साहित्य सेवा द्वारा तुलसी ने महान् उद्देश्य की प्राप्ति की है। आवश्यकता है उनके साहित्य को अध्ययन व मनन किए जाने की और हो सके तो तद्नुसार अधिक से अधिक जीवन में यथार्थता लाने की।

  • रचनाएँ
  1. रामचरित मानस-यह महाकाव्य भारतीय संस्कृति, धर्मदर्शन, भक्ति और कवित्व का अद्भुत् समन्वयकारी ग्रन्थ है।
  2. विनय पत्रिका-विनय पत्रिका भक्ति रस का अद्वितीय काव्य है। ब्रजभाषा में रचित ‘भक्तों के गले का हार’ है।
  3. कवितावली-कवितावली में कवित्त-सवैया छंदों में राम कथा का गायन किया गया है।
  4. गीतावली-गीतावली गेय-पद शैली का श्रेष्ठ कवित्व-प्रधान रामकाव्य है।
  5. बरवै रामायण’-यह बरवै छंद में रचित श्रेष्ठ काव्यकृति है। उपर्युक्त काव्य रचनाओं के अलावा तुलसीदास द्वारा रचित कृतियाँ हैं-
  6. रामलला नहरु,
  7. रामाज्ञा प्रश्नावली,
  8. वैराग्य संदीपनी,
  9. दोहावली,
  10. जानकी मंगल,
  11. पार्वती मंगल,
  12. हनुमान बाहुक तथा
  13. कृष्ण गीतावली।
  • भाव-पक्ष

(क) शक्ति, शील और सौन्दर्य का समन्वय-तुलसी ‘राम भक्ति’ शाखा के प्रमुख कवि थे। उन्होंने भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श रूप प्रतिपादित किया और अपने इष्ट राम में शील-शक्ति और सौन्दर्य का समन्वित स्वरूप देखा। इस तरह समग्र तुलसी-काव्य में भाव लोक की सम्पन्नता द्रष्टव्य है।

(ख) समन्वयवादी व्यापक दृष्टिकोण-तुलसी का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक एवं समन्वयवादी था। इन्होंने राम के भक्त होते हुए भी अन्य देवी-देवताओं की वंदना की है। तुलसी के काव्य में भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक विचारधारा पूर्णतः परिलक्षित हुई है। मानव मन की उदात्त भावनाओं, कर्त्तव्यपरायणता एवं लोक कल्याण का जैसा सुन्दर संदेश इनके काव्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र नहीं।

(ग) रससिद्धता-तुलसी रससिद्ध कवि थे। उनकी कविताओं में श्रृंगार, शान्त, वीर रसों की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। शृंगार रस के दोनों पक्षों-संयोग व वियोग का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन किया गया है। रौद्र, करुण, अद्भुत रसों का सजीव चित्रण किया गया है। विनय पत्रिका’ में भक्ति और विनय का उत्कृष्टतम स्वरूप मिलता है।

(घ) लोकहित एवं लोक जीवन-तुलसी के काव्य में मानव हृदय की दशाओं का चित्रण सहज और प्राकृतिक है। उन्होंने लोकहित और लोक जीवन को सुखी बनाने के लिए माता-पिता, गुरु, पुत्र, सेवक, राजा-प्रजा का आदर्श रूप प्रस्तुत किया है। इनकी ‘ईश्वर भक्ति-विनय, श्रद्धा एवं करुणा से अभिभूत है। तुलसी के रामराज्य की कल्पना एक आदर्श है। इन्होंने मानवीय सिद्धान्तों पर आधारित समाज और शासन पद्धति के वृहद् स्वरूप को प्रस्तुत किया है।

(ङ) मतमतान्तरों में समन्वय-तुलसी के काव्य में सर्वोत्कृष्ट विशेषता है उनका समन्वयवादी स्वरूप। विभिन्न मतों, सम्प्रदायों और सिद्धान्तों की कटुता को मिटाकर उनमें परस्पर समन्वय स्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।

  • कला-पक्ष

(1) भाषा-तुलसी के काव्य का कला-पक्ष भी भाव-पक्ष के ही समान पर्याप्त समृद्ध है। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे। इस तरह उन्होंने अन्य बहुत-सी भाषाओं-ब्रज, अवधी आदि पर पूर्ण अधिकार प्राप्त किया हुआ था और इन भाषाओं में सर्वोत्कृष्ट कृतियों की रचना की। उनकी कृतियों में सभी भाषाओं के शब्दों का सहज समावेश है। तुलसीदास मुख्य रूप से अवधी भाषा के कवि हैं। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है। अवधी के साथ तुलसी ने ब्रजभाषा का भी प्रयोग किया है। रामचरित मानस अवधी में तथा कवितावली, गीतावली और विनय पत्रिका ब्रजभाषा में लिखी गयी हैं। उनकी भाषा का गुण साहित्यिकता है। उनकी भाषा में सरलता, बोधगम्यता, सौन्दर्य चमत्कार, प्रसाद, माधुर्य, ओज आदि सभी गुणों का समावेश है।

(2) शैली-तुलसीदास ने अपने समय की सभी प्रचलित काव्य शैलियों में रचनाएँ प्रस्तुत करके अपने वृहद् समन्वयवादी स्वरूप को प्रदर्शित किया। विभिन्न मतों, सम्प्रदायों और सिद्धान्तों की कटुता को मिटाकर उनमें समन्वय स्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। तुलसीदास ने भाषा और छन्द विषयक क्षेत्र में भी समन्वयवादी प्रवृत्ति का परिचय दिया है। उन्होंने अवधी, ब्रज-भाषाओं में समान रूप से रचनाएँ की हैं। इस समय प्रचलित दोहा, चौपाई, कवित्त, सर्वया आदि सभी छन्दों का प्रयोग किया है।

(3) छन्द योजना-तुलसीदास ने जायसी की दोहा-चौपाई छन्दों में रामचरित मानस की रचना की। सूरदास की पद शैली में उन्होंने विनय पत्रिका और गीतावली रची। सवैया शैली में उन्होंने कवितावली की रचना की। दोहा का प्रयोग उन्होंने दोहावली में किया है।

(4)अलंकार-योजना-तुलसीदास का अलंकार विधान भी अत्यन्त मनोहर बन पड़ा है। उनकी उपमाएँ अति मनोहर हैं। उनके उपमा अलंकार को ही हम कहीं पर रूपक, कहीं उत्प्रेक्षा, तो कहीं दृष्टान्त के रूप में प्रतिष्ठित पाते हैं।

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  • साहित्य में स्थान

गोस्वामी तुलसीदास लोककवि हैं। उनके काव्य से जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। उनकी लोकप्रियता के आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि वास्तव में तुलसी ही हिन्दी साहित्याकाश के सूर्य हैं। तुलसीदास को गौतम बुद्ध के बाद सबसे बड़ा लोकनायक माना जाता है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने सच ही कहा है-

“कविता करके तुलसी न लसै,
कविता लसी या तुलसी की कला।”

2. मीराबाई
[2009, 12. 15]

  • जीवन-परिचय

हिन्दी साहित्य में मीराबाई का विशेष महत्त्व है। मीरा भक्त कवयित्री हैं। उनकी रचनाएँ हृदय की अनुभूति मात्र हैं। इस कारण इनकी रचनाएँ सीधे हृदय को स्पर्श करती हैं।

मीराबाई का जन्म राजस्थान में जोधपुर में मेड़ता के निकट चौकड़ी ग्राम में सन् 1498 ई. (संवत् 1555 वि.) के लगभग हुआ था। ये राठौर रत्नसिंह की पुत्री थीं। बचपन में ही मीरा की माता का निधन हो गया। इस कारण ये अपने पितामह राव दूदाजी के साथ रहती थीं। राव दूदा जी कृष्णभक्त थे। उनका मीरा पर गहरा प्रभाव पड़ा। मीरा का विवाह चित्तौड़ के राणा साँगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। विवाह के कुछ ही वर्ष बाद इनके पति का स्वर्गवास हो गया। इस असह्य कष्ट ने इनके हृदय को भारी आघात पहुँचाया। इससे उनमें विरक्ति का भाव पैदा हो गया। वे साधु सेवा में ही जीवन यापन करने लगीं। वे राजमहल से निकलकर मन्दिरों में जाने लगी तथा साधु संगति में कृष्ण कीर्तन करने लगी। इसे चित्तौड़ के तत्कालीन राणा ने प्रतिष्ठा के विरुद्ध मानकर, उन्हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देना शुरू कर दिया जिससे ऊबकर मीरा कृष्ण की लीलाभूमि मथुरा-वृन्दावन चली गयी और वहीं शेष जीवन व्यतीत किया। इस तरह मीरा का समग्र जीवन कृष्णमय था। मीरा की भक्ति भावना बढ़ती गई और वे प्रभु-प्रेम में दीवानी बन गईं। संसार से विरक्त, कृष्ण भक्ति में लीन मीरा की वियोग भावना ही इनके साहित्य का मूल आधार है। मीरा अपने जीवन के अन्तिम दिनों में द्वारका पहुँच गईं। रणछोड़ भगवान् की भक्ति करने लगीं। वहाँ ही सन् 1546 ई. (संवत् 1603 वि.) में स्वर्ग सिधार गईं।

  • साहित्य-सेवा

मीराबाई द्वारा सृजित काव्य साहित्य में उनके हृदय की मर्मस्पर्शिनी वेदना है, प्रेम की आकुलता है तथा भक्ति की तल्लीनता है। उन्होंने अपने मन की अनुभूति को सीधे ही सरल, सहज भाव में अपने पदों में अभिव्यक्ति दे दी है। उनका साहित्य, भक्ति के आवरण में वाणी की पवित्रता व शुचिता को लिए हुए संगीत का माधुर्य है जिनसे सभी अनुशीलन कर्ताओं को मनोमुग्ध किया हुआ है। भक्तिमार्ग की पुष्टि करने में, मन को शान्ति देने में, मीरा की साहित्य सेवाएँ उत्कृष्ट हैं।

  • रचनाएँ

मीरा की रचनाओं में नरसी जी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, राग गोविन्द, राग-सोरठा के पद प्रसिद्ध हैं। इन रचनाओं में अपने आराध्य श्रीकृष्ण-गिरधर गोपाल के प्रति प्रेम के आवेश में गाये पदों के संग्रह मात्र हैं। मीराबाई की रचनाएँ वियुक्त हृदय की अनुभूति हैं। उनमें हृदय की टीस है, माधुर्य है, लालित्य है।

  • भाव-पक्ष
  1. विरह वेदना-मीराबाई भगवान कृष्ण के प्रेम की दीवानी थीं। उन्होंने आँसुओं के जल से सींच-सींचकर प्रेम की बेल बोई थी। मीरा ने अपने प्रियतम (भगवान कृष्ण) के विरह में जो कुछ लिखा, उसकी तुलना कहीं पर भी नहीं की जा सकती। मीरा की विरह वेदना अकथनीय और अनुभूतिपरक है।
  2. रस और माधुर्य भाव-मीरा के साहित्य में माधुर्य भाव को बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। उनकी रचनाओं में माधुर्य भाव प्रधान है, शान्त रस और श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति है।
  3. रहस्यवाद-मीरा के बहुत से पदों में उनका रहस्यवाद स्पष्ट प्रदर्शित होता है। इस रहस्यवाद में प्रियतम के प्रति उत्सुकता, मिलन और वियोग के सजीव चित्र हैं।
  • कला-पक्ष

(1) भाषा–मीरा की भाषा राजस्थानी-संस्कार से संयुक्त ब्रजभाषा है। उन्होंने राजस्थानी शब्दों और उच्चारणों का खूब प्रयोग किया है। परन्तु अपने पदों की रचना, उस युग की काव्यभाषा ब्रजभाषा में ही की। उनके कुछ पदों में भोजपुरी भाषा का भी पुट दिया हुआ है। मीरा की भाषा को शुद्ध साहित्यिक भाषा नहीं कहा जा सकता। वरन् उनकी भाषा जनभाषा ही कही जा सकती है, इसी जनभाषा का प्रयोग उनके समग्र साहित्य में मिलता है।

(2) शैली-मीरा ने मुक्तक शैली का प्रयोग किया है। उनके पदों में गेयता है। गीति शैली पर रचित प्रत्येक पद-गिरधर गोपाल के प्रति आलम्बन प्रधान है तथा उसमें ‘माधुर्यता’ की उपस्थिति गायक और श्रोताओं को भावविलोडित करने वाली है। भाव-सम्प्रेषणता मीरा की गीति शैली की प्रधान विशेषता है। शैलीगत-प्रवाह-भाव को झंकृत कर बैठता है।

(3) अलंकार-मीराबाई ने अपनी रचना-कविता करने के उद्देश्य से नहीं की है। अतः हृदय से निकले गान में अलंकार अपने आप ही आकर जुड़ते रहे हैं। अधिकतर उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास आदि अलंकारों को इनकी रचनाओं में सर्वत्र देखा जा सकता है।

  • साहित्य में स्थान

मीरा ने हृदय में व्याप्त अपनी वेदना और पीड़ा को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। मीरा को तीव्र वेदना की मूर्ति के रूप में विशिष्ट स्थान प्राप्त है।

3. सूरदास
[2008, 09, 13, 16]

  • जीवन-परिचय

महात्मा सूरदास का जन्म सन् 1478 ई. (संवत् 1535 वि.) में आगरा से मथुरा जाने वाले राजमार्ग पर स्थित रुनकता नामक गाँव में हुआ था। परन्तु कुछ अन्य विद्वान दिल्ली के समीप ‘सीही’ को इनका जन्म स्थान मानते हैं। पुष्टिमार्ग के संस्थापक महाप्रभु बल्लभाचार्य जी इनकी प्रतिभा से बहुत ही प्रभावित थे अतः आपकी नियुक्ति श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तनिया के रूप में कर दी। महाप्रभु बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा ‘अष्टछाप’ की स्थापना की और अष्टछाप के कवियों में सूरदास’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया। इस प्रकार आजीवन गऊघाट पर रहते हुए श्रीमद्भागवत के आधार पर प्रभु श्रीकृष्ण लीला से सम्बन्धित पदों की सर्जना करते थे और उनका गायन अत्यन्त मधुर स्वर में करते थे।

महात्मा सूरदास जन्मान्ध थे, यह अभी तक विवादास्पद है। सूर की रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि एक जन्मान्ध द्वारा इतना सजीव और उत्तमकोटि का वर्णन नहीं किया जा सकता।

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एक किंवदन्ती के अनुसार, वे किसी स्त्री से प्रेम करते थे, परन्तु प्रेम की सम्पूर्ति में बाधा आने पर उन्होंने अपने दोनों नेत्रों को स्वयं फोड़ लिया। परन्तु जो भी कुछ तथ्य रहा हो, हमारे मतानुसार तो सूरदास बाद में ही अन्धे हुए हैं। वे जन्मान्ध नहीं थे।

सूरदास का देहावसान सन् 1583 ई. (संवत् 1640 वि.) में मथुरा के समीप पारसोली नामक ग्राम में गोस्वामी विट्ठलनाथ जी की उपस्थिति में हुआ था। कहा जाता है कि अपनी मृत्यु के समय सूरदास “खंजन नैन रूप रस माते” पद का गान अपने तानपूरे पर अत्यन्त मधुर स्वर में कर रहे थे।

  • साहित्य-सेवा

सूरदास हिन्दी काव्याकाश के सूर्य हैं, जिन्होंने अपने काव्य कौशल से हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा की और अपने गुरु बल्लभाचार्य के सम्पर्क में आने के बाद पुष्टिमार्ग में दीक्षा ग्रहण की और दास्यभाव एवं दैन्यभाव के पदों की रचना करना छोड़ दिया। इसके स्थान पर वात्सल्य प्रधान सखाभाव की भक्ति के पदों की रचना करना शुरू कर दिया। अष्टछाप के भक्त कवियों में सूरदास अग्रणी थे। उनके काव्य का मुख्य उद्देश्य कृष्ण भक्ति का प्रचार करके जनसामान्य में तथा संगीतकारों में भक्ति रस से उनके मन को आप्लावित करना रहा था। इसके अतिरिक्त सूर ने अपने काव्य की साधना से प्रभुभक्ति और पवित्र प्रेम का निरूपण किया। सूर के सम्पूर्ण साहित्य में विनय, वात्सल्य और श्रृंगार ने अद्वितीय स्थान प्राप्त किया है। वात्सल्य वर्णन को हिन्दी की अमूल्य निधि कहा गया है जिसमें मानव हृदय की प्रकृत अवस्था निर्विघ्न रूप से निरूपित है। बाल मनोविज्ञान के तो सूर अद्वितीय पारखी थे। शिशु चेष्टाओं का आंकलन कवि ने अपने ग्रंथों में स्वाभाविक रूप से किया है, जो बेजोड़ है।

  • रचनाएँ

विद्वानों के मतानुसार सूरदास ने तीन कृतियों का ही सृजन किया था, वे हैं-
(1) सूरसागर,
(2) सूर सारावली,
(3) साहित्य लहरी।

(1) इनमें सूरसागर ही उनकी अमर कृति है। सूरसागर में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित सवा लाख गेय पद हैं। परन्तु अभी तक 6 या 7 हजार से अधिक पद प्राप्त नहीं हुए हैं।
(2) सूर सारावली में ग्यारह सौ सात छन्द संग्रहीत हैं। यह सूरसागर का सार रूप ग्रन्थ है।
(3) साहित्य लहरी में एक सौ अठारह पद संग्रहीत हैं। इन सभी पदों में सूर के दृष्ट-कूट पद सम्मिलित हैं। इन पदों में रस का सर्वश्रेष्ठ परिपाक हुआ है।

सूरदास सगुण भक्तिधारा के कृष्णोपासक कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि थे। उनके काव्य में तन्मयता और सहज अभिव्यक्ति होने से उनका भावपक्ष अत्यन्त सबल और कलापक्ष अत्यन्त आकर्षक और सौन्दर्य प्रधान हो गया है।

  • भाव-पक्ष
  1. भक्तिभाव-सूरदास कृष्ण के भक्त थे। काव्य ही भगवत् भजन एवं उनका जीवन था। एक भक्त हृदय की अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई है। सूर की भक्ति सखा भाव की भक्ति थी। कृष्ण को सखा मानकर ही उन्होंने अपने आराध्य की समस्त बाल-लीलाओं और प्रेम-लीलाओं का वर्णन पूर्ण तन्मयता से किया है।
  2. सहृदयता और भावुकता-सूरदास ने अपने पदों में मानव के अनेक भावों का बड़ी सहृदयता से वर्णन किया है। उस वर्णन में सखा गोप-बालकों के, माता यशोदा के और पिता नंद के विविध भावों की यथार्थता और मार्मिकता मिलती है। कृष्ण और गोपी प्रेम में प्रेमी केहदय के भाव पूर्णत् सरोवर में लहराती तरंगें हैं।
  3. उत्कृष्ट रस संयोजना-सूर की उत्कृष्ट रस संयोजना के आधार पर डॉ. श्यामसुन्दर दास ने उन्हें रससिद्ध कवि’ कहकर पुकारा है। सूर के काव्य में शान्त, श्रृंगार और वात्सल्य रस की त्रिवेणी प्रवाहित है।
  4. अद्वितीय वात्सल्य-सूरदास ने कृष्ण के बाल-चरित्र, शरीर सौन्दर्य, माता-पिता के हृदयस्थ वात्सल्य का जैसा स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक सरस वर्णन किया है, वैसा वर्णन सम्पूर्ण विश्व साहित्य में दुर्लभ है। सूर वात्सल्य के अद्वितीय कवि हैं।
  5. श्रृंगार रस वर्णन-सूर ने अपनी रचनाओं में श्रृंगार के दोनों पक्षों-संयोग और वियोग का चित्रण करके उसे रसराज सिद्ध कर दिया है। आचार्य रामचन्द्र शक्ल ने कहा है, “श्रृंगार का रस-राजत्व यदि हिन्दी में कहीं मिलता है तो केवल सूर में।”
  • कला-पक्ष
  1. लालित्य प्रधान ब्रजभाषा-सूरदास ने बोलचाल की ब्रजभाषा को लालित्य-प्रधान बनाकर उसमें साहित्यिकता पैदा कर दी है। उनके द्वारा प्रयुक्त भाषा-सरल, सरस एवं अत्यन्त प्रभावशाली है जिससे भाव प्रकाशन की क्षमता का आभास होता है। सूरदास ने अवधी और फारसी के शब्दों का प्रयोग करके एवं लोकोक्तियों के प्रयोग से अपनी भाषा में चमत्कार एवं सौन्दर्य उत्पन्न कर दिया है। भाषा माधुर्य सर्वत्र ही विद्यमान है। इस प्रकार सूर की काव्य भाषा एक आदर्श काव्य भाषा है।
  2. गेय-पद शैली-सूर ने गेय-पद शैली में काव्य रचना की है। माधुर्य और प्रसाद गुण युक्त शैली वर्णनात्मक है। उनकी शैली की वचनवक्रता और वाग्विदग्धता एक प्रधान विशेषता है।
  3. आलंकारिकता की सहज आवृत्ति-सूरदास के काव्य में अलंकार अपने स्वाभाविक सौन्दर्य के साथ प्रविष्ट से होते जाते हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, अलंकारशास्त्र तो सूर के द्वारा अपना विषय वर्णन शुरू करते ही उनके पीछे हाथ जोड़कर दौड़ पड़ता है। उपमानों की बाढ़ आ जाती है। रूपकों की वर्षा होने लगती है।”
  4. छन्द योजना की संगीतात्मकता-सूरदास ने मुक्तक गेय पदों की रचना की है। इन पदों में संगीतात्मकता सर्वत्र विद्यमान है।
  • साहित्य में स्थान

सूर अष्टछाप के ब्रजभाषा कवियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। बाल प्रकृति-चित्रण, वात्सल्य तथा श्रृंगार में तो सूर अद्वितीय हैं। सूर का क्षेत्र सीमित है, पर उसके वे एकछत्र सम्राट हैं। जब तक सूर की प्रेमासिक्त वाणी का सुधा प्रवाह है, तब तक हिन्दू जीवन से समरसता का स्रोत कभी सूखने नहीं पाएगा और उसका मधुर स्वर सदैव हिन्दी जगत में गूंजता रहेगा।

भक्तिकाल के प्रमुख कवि सूरदास अपनी रचनाओं, काव्य कला और साहित्यिक प्रतिभा के कारण निःसन्देह साहित्याकाश के ‘सूर’ ही हैं। इन सभी विशेषताओं के कारण यह

दोहा अक्षरशः सत्य है
“सूर सूर तुलसी ससी,
उडुगन केसव दास।
अब के कवि खद्योत सम,
जहँ-तहँ करत प्रकाश।।”

4. स्वामी रामभद्राचार्य ‘गिरिधर’

  • जीवन-परिचय

कवि रामभद्राचार्य ‘गिरिधर’ का जन्म जनवरी महीने की चौदहवीं तारीख को सन् 1950 ई. में उत्तर-प्रदेश के जौनपुर जिले के गाँव शाणीपुर में हुआ था। इनका पूरा नाम स्वामी रामभद्राचार्य है। दो वर्ष की अल्पायु में ही इनके दोनों नेत्रों की ज्योति सदा के लिए चली गई और ये कुछ भी देख नहीं सकते थे। इन्होंने अपने ही अध्यवसाय से और निरुत्साहित हुए बिना ही विद्यार्जन का उपाय स्वयं ढूंढ़ निकाला और अभ्यास करके ही श्रीमद्भगवद्गीता एवं रामचरितमानस इन्हें कंठस्थ हो गये। श्री ‘गिरिधर’ जी (जो इसी उपनाम से प्रसिद्ध हैं और लोगों द्वारा समादरित होते हैं) ने अपनी सभी परीक्षाओं में प्रथम से लेकर एम. ए. तक-99 (निन्यानवे) प्रतिशत अंक प्राप्त किये। आपके ऊपर माँ शारदा के असीम कृपा और वरदहस्त रहा है। ‘होनहार विरवान के होत चीकने पात वाली कहावत अक्षरशः सत्य सिद्ध होती है। वे उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने के प्रत्येक अवसर को प्राप्त करने में कभी पीछे नहीं रहे। इन्होंने संस्कृत व्याकरण सम्बन्धी किसी महत्वपूर्ण विषय में पी-एच. डी. की डिग्री प्राप्त करके अपनी कुशाग्र बुद्धित्व का परिचय दिया तथा कुछ समय के बाद संस्कृत के किसी अति महत्वपूर्ण विषय में डी. लिट. की उपाधि भी प्राप्त कर ली।

उपर्युक्त विवरण हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। परि श्रम और निरन्तर अध्यवसाय से मनुष्य अपने ध्येय तक पहुँचने में सफल हो सकता है। सफलता के शिखर पर उत्साही और अपनी क्षमताओं में अटूट विश्वास रखने वाले ही पहुँचकर अपने देश और समाज को उन्नति पथ पर ले जाते हैं। ऐसे ‘गिरिधर’ जी को हम सम्मान प्रतिष्ठा देते हुए गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

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  • साहित्य-सेवा

श्री ‘गिरिधर जी ने हिन्दी साहित्य और संस्कृत साहित्य के विकास के लिए निरन्तर प्रयास किया। उन्होंने दोनों भाषाओं में अनन्यतम ग्रंथों की सर्जना करके सूरकालीन भक्तियुग की परम्पराओं को अक्षुण्य बनाने का सतत् प्रयास किया है। उनका प्रयास अत्यन्त स्तुत्य है। भाषा में शास्त्रीयता विद्यमान है, साथ ही साथ लोकभाषा के प्रयोग एवं उसके सम्वर्द्धन के प्रयास अभी भी निरन्तर किए जा रहे हैं। संस्कृत भाषा को सामान्य जनभाषा के रूप में विकसित करने का तथा उसके प्रयोग की विधि में सरलता, सरसता एवं प्रवाह उत्पन्न करने का प्रयत्न आपके द्वारा किया जा रहा है। हमें विश्वास है कि ‘गिरिधर’ जी के दिशा निर्देशन में हिन्दी साहित्य एवं संस्कृत साहित्य अपने चरम विकास को प्राप्त कर सकेगा।

  • रचनाएँ

स्वामी रामभद्राचार्य द्वारा रचित कृतियाँ निम्नलिखित हैं

  1. प्रस्थानमयी काव्य-प्रस्थानमयी काव्य की रचना आचार्य जी ने संस्कृत भाषा में की है। इस ग्रंथ की भाषा में सरसता और सरलता है तथा भाव-सम्प्रेषण की क्षमता विद्यमान है।
  2. भार्गव राघवीयम् महाकाव्य-‘भार्गव राघवीयम्’ एक महाकाव्य है। इसकी रचना संस्कृत भाषा में की गई है। अपने प्रकार का यह अद्वितीय महाकाव्य है।
  3. अरुन्धती महाकाव्य-इस महाकाव्य की रचना कवि श्री रामभद्राचार्य जी ने हिन्दी भाषा में की है। विषयवस्तु समाज के परिवेश में नवीनता उत्पन्न करके सुधार की परिकल्पना से सम्बन्ध रखती है।

उपर्युक्त के अलावा राघवगीत गुंजन, भक्तिगीत सुधा एवं अन्य 75 ग्रन्थों की रचना हिन्दी भाषा में की गई है। हिन्दी का स्वरूप परिष्कृत और परिमार्जित है।

साहित्य और शिक्षा क्षेत्र के विकास के लिए आपने ‘जगद्गुरु’ रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय’ की स्थापना चित्रकूट में की है। शासन द्वारा आपको इस विश्वविद्यालय का जीवनपर्यन्स कुलाधिपति बनाया गया है।

साहित्य सेवा के लिए पुरस्कार-आपको भारतीय संघ के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा

  1. महर्षि वेदव्यास वादरायण पुरस्कार दिया गया है। इस पुरस्कार के लिए जीवनपर्यन्त एक लाख रुपये प्रतिवर्ष दिए जाते हैं।
  2. भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया है। इसके लिए पचास हजार रुपये दिये जाते हैं।
  3. दो लाख का श्री वाणी अलंकरण-यह पुरस्कार रामकृष्ण डालमिया वाणी न्यास, नई दिल्ली द्वारा दिया गया।
  • भाव-पक्ष
  1. प्रेम और हृदय की उदात्तता-कविरामभद्राचार्य की रचनाओं के भाव पक्षीय सबलता स्तुत्य है। हृदयगत भाव वास्तुजगत के प्रभाव से अनुभूतिजन्य हैं जिनमें प्रेम और हृदय की उदात्तता परिलक्षित होती है।
  2. वात्सल्य रस, भक्ति रस के परिपाक से सम्प्रक्त होकर अति पुष्ट होता गया है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-भाषा भावानुकूल प्रयुक्त हुई है। उसमें शास्त्रीयता का प्राधान्य है। भाषा का परिष्कृत स्वरूप लोकभाषा के विकास को नई दिशा देते हैं। अतः लोकभाषा में प्रवाह की प्रबलता है।
    कवि ने भाव को स्पष्ट करने के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग किया है।
  2. शैली-कवि ने सूरदास की मुक्तक गेय-पद शैली को अपनाया है। उसमें विषय की विशदता और गम्भीरता को अनायास ही सरसता देकर एक विशेष शैली का अन्वेषण किया है।
  3. अलंकार योजना-कवि का अपने काव्य में अलंकार संयोजन सप्रयोजन नहीं होता है। वह तो अनायास ही भाव के अभिव्यक्तिकरण के लिए अपने आप ही प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। इनकी कृतियों में उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास आदि महत्त्वपूर्ण सभी अर्थालंकारों और शब्दालंकारों का प्रयोग परिलक्षित होता है।
  4. छंद-योजना-कवि ने मुक्तक-छंद की संयोजना की है जिसे हम भक्तियुगीन सूरदास के छंद विधान के समकक्ष पाते हैं। अन्तर है, तो केवल भाषा का। सूर की भाषा परिष्कृत ब्रजभाषा है और रामभद्राचार्य जी की भाषा परिनिष्ठित खड़ी बोली हिन्दी।
  • साहित्य में स्थान

कवि रामभद्राचार्य ‘गिरिधर’ हिन्दी और संस्कृत भाषा के विकास के लिए प्रयासरत हैं। उनके रचित ग्रन्थ हिन्दी और संस्कृत साहित्य की अक्षुण्यनिधि हैं। हम आशा करते हैं कि आपके द्वारा संस्कृत और हिन्दी साहित्य का विकास दिशा निर्दिष्ट होता रहेगा। हिन्दी और संस्कृत जगत आपके नृत्य कार्यों के लिए चिरऋणी है।

5. पद्माकर
[2011]

  • जीवन-परिचय

पद्माकार रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। इनके पूर्वज दक्षिण भारत के तेलंग ब्राह्मण थे। पद्माकर के पिताजी का नाम श्री मोहनलाल भट्ट था। वे मध्य प्रदेश के सागर में आकर बस गए थे। यी (सागर में ही) पद्माकर जी का जन्म सन् 1753 ई. में हुआ था। सागर के तालाब घाट पर पद्माकर जी की मूर्ति स्थापित है। पद्माकर एक प्रतिभा सम्पन्न कवि थे। ‘कवित्त’ छन्द की रचना करने की अलौकिक क्षमता व कौशल उन्हें वंश-परम्परा से प्राप्त था। कवित्त शक्ति और क्षमता सम्पन्न पद्माकर ने मात्र नौ वर्ष की उम्र से ही कवित्त-रचना करना शुरू कर दिया था।

पद्माकर जी रीतिकालीन कवि थे। वे राजदरबारी श्रेष्ठ कवि थे। उन्होंने राजाओं की प्रशंसा में अनेक कृतियों की रचना की। राजाओं की प्रशंसा करते हुए उन्होंने हिम्मत बहादुर विरुदावली, प्रतापसिंह विरुदावली और ‘जगत-विनोद’ की रचना की। समय की प्रबलता से जीवन के अन्तिम समय में उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उस रोग की मुक्ति के लिए उन्होंने गंगाजी की स्तुति की। गंगा की स्तुति में उन्होंने गंगा-लहरी’ काव्य की रचना की। इस काव्यकृति की रचना करते हुए ही यहीं पर 80 वर्ष की उम्र में सन् 1833 ई. में उनका निधन हो गया।

  • साहित्य-सेवा

पद्माकर जी ने जीवन पर्यन्त साहित्य की अचूक सेवा की। राजदरबार में रहकर श्रेष्ठ काव्य-साहित्य की रचना करना अपने आप में एक बहत ऊँची साधना की। रीतिकालीन परम्पराओं का निर्वाह करते हुए उन्होंने अपने आश्रयदाता राजा-महाराजाओं की प्रशंसा करने में शृंगार प्रधान रचनाओं की सर्जना की। वे निरन्तर ही साहित्य सेवा में संलग्न रहे। रीति युग की विशेषताओं का समावेश पद्माकर की काव्य प्रणाली बन चुकी थी। श्रृंगार के दोनों ही पक्षों-संयोगावस्था व वियोगावस्था में नायक और नायिकाओं के चित्रण अद्वितीय काव्य कौशल से उभारे हैं। समय-समय पर अपनी काव्यकृतियों की भाव-व्यंजना के लिए पद्माकर जी को अन्य राजाओं ने पुरस्कृत करके सम्मानित भी किया।

पद्माकर अपनी साहित्य सेवाओं के लिए सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। उन्होंने अपने कवित्त छंद के प्रयोग के माध्यम से प्रकृति, प्रेम भक्ति और रूप का चित्रण किया है। उन्होंने अलौकिक भाव-भंगिमाओं के चित्र उकेरते हुए अपने मनोभावों की सूक्ष्मता को स्पष्ट किया है।

  • रचनाएँ

पद्माकर ने निम्नलिखित ग्रंथों की रचना की है। वे इस प्रकार हैं-

  1. पद्माभरण,
  2. जगत विनोद,
  3. आलीशाह प्रकाश,
  4. हिम्मत बहादुर विरुदावली,
  5. प्रतापसिंह विरुदावली,
  6. प्रबोध पचासा,
  7. गंगालहरी तथा
  8. राम रसायन।

पद्माकर के काव्य ग्रंथों की विषय-वस्तु-पद्माकर द्वारा प्रणीत ग्रंथ अपने आप में हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इनके द्वारा कवि ने प्रकृति के विविध स्वरूपों का चित्र उकेरा है। इनका षट्ऋतु वर्णन बहुत ही प्रसिद्ध है। प्रत्येक ऋतु के प्रभाव और मानव-मन में उत्पन्न होते विकारों का बेलाग वर्णन पद्माकर जी की विविधतामयी बुद्धि कौशल की देन है। इसके अतिरिक्त पद्माकर ने प्रेम को ईश्वरीय रूप में प्रतिष्ठापित किया है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से सिद्धान्त निरूपति करते हुए कहा है कि-

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  1. लौकिक प्रेमानुभूति ही अलौकिक (ईश्वरीय) प्रेम की अनुभूति का आधार है।
  2. लौकिक प्रेम ही मानवीय रचनात्मकता से सीधा सम्बन्ध रखता है।
  • भाव-पक्ष

(1) प्रकृति चित्रण-पद्माकर ने अपने काव्य कौशल से प्रकृति के उद्भ्रान्त स्वरूप को षट्ऋतु वर्णन में अनेक अनुभूतियों के माध्यम से वर्णन करके प्रस्तुत किया है। प्रकृति और मानव सम्बन्धों की घनिष्ठता को काव्यभाषा ब्रजभाषा के प्रयोग से परिभाषित किया है।

(2) भक्ति-पद्माकर अपनी बढ़ती उम्र के पड़ाव पर पहुँचकर शारीरिक कष्टों से पीड़ित करने लगे। अत: उनका स्वाभाविक रूप से झुकाव ईश्वर और इष्ट-भक्ति की ओर हो चला था। पद्माकर की वैराग्य भावना का प्राकट्य उनकी अमर कृतियों-गंगा-लहरी, प्रबोध पचासा तथा राम रसायन में अपने आप ही हो चला है।

(3) रस-संयोजना-पद्माकर की सभी कृतियों में प्रेम का विस्तार और विकास भक्ति, वात्सल्य तथा दाम्पत्य भाव के अन्तर्गत हुआ है। प्रेम की पृष्ठभूमि ‘रति’ नामक स्थायी भाव से होती है। अतः कवि ने श्रृंगार रस का प्रयोग अपनी संयोग और वियोग की दोनों ही अवस्था में चरम तक पहुँचा दिया है। कवि द्वारा संयोगवस्था में प्रिय और प्रियतमा की रूप चेष्टा का वर्णन उनकी काव्य कला की अनुपम धरोहर बन चुकी है। इसके विपरीत वियोग की अवस्था में प्रिय से वियुक्त हुई प्रियतमा स्मृतिजन्य वेदना-व्यथा से व्यथित होती हुई प्रेम की केन्द्रीय भावभूमि में पहुँच चुकी होती है। इस प्रकार पद्माकर के काव्य में प्रेम और श्रृंगार का अनुभूतिपरक चित्रण हुआ है जो अनुपमेय है। उनके द्वारा किया गया प्रेम की एकान्तिक दशा तथा प्रेम परिपूर्ण बहानों का विवेचन इस बात को स्पष्ट करता है कि पद्माकर मनोभावों की सूक्ष्मता के पारखी थे।

  • कला-पक्ष

(1) भाषा-पद्माकर ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की है। उनकी प्रारम्भिक रचनाओं में (कविता में) बुन्देली का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस बुन्देली के साथ ही कहीं उर्दू, फारसी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग बहुत अधिक हुआ है। पद्माकर की भाषा परिष्कृत और बोझिल सी प्रतीत होती है। यद्यपि उन्हें भाषा पर अप्रतिम रूप से अधिकार प्राप्त था।
(2) शैली-पद्माकर एक राजदरबारी कवि थे अतः उनकी शैली वर्णन प्रधान थी। चित्रोपम वर्णन अपनी काव्यकृति के लिए उनकी अनूठी देन है। उन्होंने अलंकार प्रधान शैली का विकास स्वयं ही किया है। यह शैली प्रायः सभी राजदरबारी कवियों के काव्य में प्रतिष्ठापित हुई है। अतः यह परम्परागत शैली है जो रीतिकालीन काव्य की विशेषताओं में से एक अन्यतम विशेषता है।
(3) अलंकार-पद्माकर ने अपनी काव्य कृतियों में यथास्थान अलंकारों का प्रयोग किया है। अनुप्रास अलंकार उनका अति प्रिय अलंकार है। इसके प्रयोग के सौन्दर्य का अवलोकन एक ही उदाहरण से हो जाएगा

“कूलन में, केलिन में, कछारन में, कुंजन में।
क्यारिन में, कलिन कलीन किलकत हैं।।”

पद्माकर ने अनुप्रास के अतिरिक्त यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का भी प्रयोग किया है। अनुप्रास के प्रयोग से ध्वनि चित्र खड़ा करने में पद्माकर अद्वितीय हैं।

(4) मुहावरे व लोकोक्तियाँ-पद्माकर की कविताओं में भाव को स्पष्टता प्रदान करने के उद्देश्य से मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग सफलता के साथ किया गया है। द्रष्टव्य है

“नैन नचाइ कही मुसकाइ, लला फिर आइयो खेलन होरी।” और
“अब तो उपाय एकौ चित्त पै चट्टै नहीं।।”

  • साहित्य में स्थान

पद्माकर निःसन्देह रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में से एक थे। इनके द्वारा प्रयुक्त भाषा की विशेषता के सन्दर्भ में आचार्य रामचन्द्रशुक्ल ने लिखा है-“भाषा की सब प्रकार की शक्तियों (अभिधा व्यंजना आदि) पर इनका अधिकार स्पष्ट दीख पड़ता है। एक महान कवि की भाषा में अनेकरूपता हुआ करती है, उस सबका साक्षात् रूप पद्माकर की कविता में परिलक्षित होता है। आपने साहित्यिक अभिव्यक्ति और विकास की जो दिशा अपनी काव्यकृतियों के माध्यम से हिन्दी जगत को दिखाई है, उसके लिए अध्येता जगत आपका सदैव ऋणी रहेगा। वास्तविकता यह है कि पद्माकर रीतिकालीन परम्परा के उत्तरार्द्ध के प्रतिनिधि कवि हैं।

6. मतिराम

  • जीवन-परिचय

कविवर मतिराम के पिताजी का नाम रत्नाकर था। ये कानपुर के एक गाँव तिकवांपुर के रहने वाले थे। मतिराम के जन्म की निश्चित तिथि का निर्णय नहीं हो सका है। परन्तु इनका जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था। वे बूंदी के महाराज भावसिंह के दरबारी कवि थे। जन्मतिथि के समान ही मतिराम के निधन के सम्बन्ध में भी विवादास्पद स्थिति बनी हुई है।

मतिराम और भूषण दोनों ही सगे भाई थे। दोनों ही उच्चकोटि के कवि हुए। हिन्दी साहित्य में यह एक उदाहरण है। काव्य के क्षेत्र में इन दोनों (मतिराम और भूषण ने) ही ने उत्कृष्ट ख्याति प्राप्त की।

  • साहित्य-सेवा

मतिराम के काव्य के अनुशीलन से यह सिद्ध होता है कि उन्होंने उच्चकोटि की शिक्षा प्राप्त की होगी और श्रेष्ठ ग्रन्थों के प्रतिपादन में अपनी शास्त्रीय क्षमताओं का उपयोग किया। मतिराम ने कई ग्रंथों की रचना की है। उन सभी ग्रंथों में काव्य लक्षण निर्दिष्ट करते हुए विशिष्ट कवि कौशल को प्रदर्शित किया था। चमत्कार प्रदर्शन करने वाले लक्षण ग्रंथ हिन्दी साहित्य की अनूठी निधि हैं।

  • रचनाएँ

मतिराम ने कुल नौ ग्रंथों की रचना की है। लेकिन उनमें से कुल चार ग्रंथ ही उपलब्ध हैं, जो अग्रलिखित हैं

  1. फूल मंजरी,
  2. रसराज,
  3. ललित ललाम,
  4. मतिराम सतसई। (मतिराम सतसई में 703 दोहे सकंलित हैं।)

काव्य विषय-फूल मंजरी, रसराज, ललित ललाम उच्चकोटि के शास्त्रीय लक्षण ग्रंथ हैं। मतिराम सतसई में नीतिपरक दोहे हैं जिनमें व्यावहारिक पक्ष को स्पष्टता प्रदान की है। व्यवहार का उत्कृष्ट स्वरूप निखर आया है। लक्षण ग्रंथों में छंद, रस, काव्यांग, अलंकार प्रयोग की विधि, रूप सौन्दर्य वर्णन आदि प्रमुख विषय वस्तु रहे हैं।

  • भाव-पक्ष

(1) प्रेम-मतिराम ने अपनी काव्यकृति में सहज प्रेम के मर्मस्पर्शी चित्रों में जो भाव व्यक्त किए हैं, वे सभी सामान्य लोगों की सामान्य अनुभूति के अंग हैं।
(2) माधुर्य एवं रस प्रयोग-मतिराम की कविता में माधुर्यता सबसे अधिक है। ‘रसराज’ शीर्षक ग्रंथ में कवि ने रसों के प्रयोग किये हैं जिन्हें हम लाक्षणिकता से पूर्ण मान सकते हैं। श्रृंगार रस की भी प्रचुरता रही है। मतिराम का श्रृंगार वर्णन अद्वितीय है। संयोग और वियोग में मतिराम ने राधा-कृष्ण के माध्यम से श्रृंगार के विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों का मधुरिम चित्रण किया है। शील और सौन्दर्य चित्रण में कवि की विदग्धता परिलक्षित होती है।

  • कला-पक्ष
  1. भाषा-मतिराम की भाषा के विविध रूप दृष्टिगोचर होते हैं। उनकी भाषा विशुद्ध ब्रजभाषा है।
  2. शैली-मतिराम-रीतिबद्ध कवियों में शामिल किए जाते हैं। फिर भी इनकी कविता में कृत्रिमता नहीं है। काव्य में वास्तविक और व्यावहारिक शैली की प्रधानता होने से वर्णन प्रधान हो गई है। शैली में अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना आदि भाषायी शक्तियों का प्रयोग कवि ने अपनाया
  3. छन्द-योजना-कवि ने अपनी कृतियों में कवित्त, सवैया और दोहे आदि छन्दों का प्रयोग किया है। कवित्त और सवैया के माध्यम से उन्होंने अपने शास्त्रीय प्रयोग की उत्कृष्टता परिलक्षित कर दी है। उन्होंने छन्दों के प्रयोग में चमत्कार प्रदर्शन को दूर ही रखा है।
  4. अलंकार का चमत्कारपूर्ण प्रदर्शन-मतिराम अपनी सभी कृतियों के शब्द और अर्थ तथा अलंकार के प्रयोग में चमत्कारपूर्ण प्रदर्शन को अधिक पसन्द नहीं करते हैं। आपकी रचनाओं में अलंकारों का ही सर्वाधिक वर्णन किया गया है क्योंकि वे लक्षण ग्रन्थ हैं। अतः कविता में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यतिरेक, अतिश्योक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग उपयुक्त ही किया गया है। मतिराम का अलंकार विधान स्वाभाविक है। इससे उनकी रचना में सौन्दर्य की अभिवृद्धि हो गई है।

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  • साहित्य में स्थान

मतिराम रीतिकाल के शीर्षस्थ कवियों में माने जाते हैं। वे अपने सहज कृतित्व के लिए अति प्रसिद्ध हैं, इसलिए रीतिकालीन कवियों में उनका सबसे उच्च स्थान है। लक्षण ग्रन्थ के प्रणेता के रूप में सर्वत्र ख्याति प्राप्त व्यक्तित्व के धनी मतिराम हिन्दी साहित्य जगत में सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। वे अपने कर्त्तव्य कौशल से आचार्यत्व को प्राप्त महाकवि हैं।

7. कविवर वृन्द

  • जीवन-परिचय

रीतिकालीन परम्परा के अन्तर्गत कवि वृन्द का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उनके नीति के दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं। अन्य प्राचीन कवियों की भाँति वृन्द का जीवन परिचय भी प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

पं. रामनरेश त्रिपाठी इनका जन्म सन् 1643 ई. में मथुरा (उत्तर प्रदेश) क्षेत्र के किसी गाँव का बताते हैं। परन्तु डॉ. नगेन्द्र का मत है कि कवि वृन्द का जन्म मेड़ता, जिला जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। इनका पूरा नाम वृन्दावन था। विद्याध्ययन के लिए इन्हें काशी भेज दिया गया। उस समय इनकी अवस्था सम्भवतः दस वर्ष की रही होगी। काशी में रहकर इन्होंने व्याकरण, साहित्य, वेदान्त तथा गणित दर्शन विषय का अध्ययन किया और ज्ञान प्राप्त किया। इसके साथ ही इन्होंने काव्य की रचना करना भी सीखना शुरू कर दिया। मुगल सम्राट औरंगजेब के दरबार में ये दरबारी कवि रहे। सन् 1723 ई. में इनको देहावसान हो गया।

  • साहित्य-सेवा

कवि वृन्द ने लोक जीवन का गहन अध्ययन करके काव्य में अपने अनुभवों का विशद विवेचन किया है। वृन्द के ‘बारहमासा’ में बारह महीनों का सुन्दर वर्णन मिलता है। भाव-पंचासिका’ में शंगार के विभिन्न भावों के अनुसार सरस छंद लिखे गए हैं। ‘शंगार-शिक्षा’ में नायिका भेद के आधार पर आभषण और अंगार के साथ नायिकाओं का चित्रण किया गया है। ‘नयन पचीसी’ में नेत्रों के महत्व का चित्रण है। छन्दों के लक्षणों के सन्दर्भ में ही इसी कृति में दोहा, सवैया और घनाक्षरी छन्दों का प्रयोग भी हुआ है। ‘नयन पचीसी’ में ऋतु वर्णन अत्यन्त आकर्षक है। हिन्दी में वृन्द के समान सुन्दर दोहे बहुत ही कम कवियों ने लिखे हैं। उनके दोहों का प्रचार शहरों से लेकर गाँवों तक में है। पवन पचीसी में षड्ऋतु वर्णन के अन्तर्गत वृन्द ने पवन के वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतुओं के स्वरूप और प्रभाव का वर्णन किया है।

उद्देश्य (ध्येय)-काव्य द्वारा जीवन को संस्कार युक्त बनाया जाता है। अगली पीढ़ियों तक जीवन के उच्च अनुभवों को संप्रेषित करने की शक्ति काव्य में होती है। जीवन जीना यदि एक कला है, तो इस कला की शिक्षा काव्य में समायी रहती है। व्यक्ति और समाज के स्वस्थ तालमेल में ही व्यक्ति के स्व-विकास का सही और उच्चकोटि की भूमिका निर्धारित होती है। इस तरह से जीवन-विकास की शिक्षा देने वाला काव्य ही नीतिपरक काव्य कहा जाता है। सभी युगों में कविता का जीवन-शिक्षा से गहरा सम्बन्ध रहा है। अत: कवि वृन्द ने अपने काव्य में नीति को स्थान दिया है।

विषय-वृन्द के दोहे जीवन शिक्षा के कोश हैं। उनका प्रत्येक दोहा जीवन के किसी न किसी अमूल्य अनुभव से परिपूर्ण है। प्रस्तुत दोहों में शिक्षाप्रद जीवन-सूत्रों को संकलित किया गया है। अवसर के अनुकूल बात कहना अति महत्वपूर्ण है। एक बार ही किसी को धोखा देकर सफलता प्राप्त की जा सकती है-बार-बार नहीं क्योंकि काठ की हाँड़ी एक बार ही चूल्हे पर चढ़ती है; फिर से चढ़ाने में तो वह अग्नि से नष्ट हो जाती है। वृन्द के दोहों की विषयवस्तु बहुत ही विस्तृत और विशद है। इसका प्रचलन जनसामान्य तक है।

  • रचनाएँ

कवि वृन्द की निम्नलिखित रचनाएँ अति महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से कवि ने काव्य रचना के अपने ध्येय की सम्पूर्ति की है। ये रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. बारहमासा,
  2. भाव पंचासिका,
  3. नयन पचीसी,
  4. पवन पचीसी,
  5. श्रृंगार शिक्षा,
  6. यमक सतसई। यमक सतसई में 715 दोहे हैं।

कवि वृन्द के द्वारा रचित दोहों को ‘वृन्द विनोद सतसई’ में संकलित किया गया है।

  • भाव-पक्ष
  1. नीति तत्त्व-कवि वृन्द ने अपनी कृतियों के अन्तर्गत नीति तत्त्व को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करके उन्हें आत्मविकास का पथ प्रदर्शित किया है। नीतिगत बात कहना, उसके अनुसार आचरण करना स्तुत्य होता है। ज्ञान प्राप्त करके प्रबुद्धजन समाज को विकास की दिशा निर्दिष्ट करते हैं।
  2. व्यावहारिक तत्त्व-कवि वृन्द ने अपने काव्य के माध्यम से व्यावहारिक पक्ष को उन्नत बनाये रखने की शिक्षा दी गई है।
  3. धैर्य गुण-धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वाह करते रहने से जीवन सफलता की ओर अग्रसर होता रहता है।
    इस तरह कवि वृन्द ने अपनी कृतियों के द्वारा प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली महत्त्वपूर्ण बातों की शिक्षा देते हुए व्यक्ति और समाज के परस्पर सम्बन्धों को सापेक्षक बनाने का प्रयास किया है।
  4. रस-कवि वृन्द ने ‘भाव पंचासिका’ में श्रृंगार के विभिन्न भावों की अनुभूति कराने वाले छन्द लिखे हैं। नायिकाओं के श्रृंगार सम्बन्धी चित्रण अति मनमोहक बन पड़े हैं जिनके द्वारा संयोग और वियोग की अवस्थाओं की अभिव्यक्ति विषय और वातावरण के अनुकूल हुई है। नीति व व्यवहारपरक दोहों में शान्त रस का परिपाक हुआ है।
  5. प्रकृति चित्रण-कवि के द्वारा अपने ‘बारहमासा’ में बारह महीनों का सुन्दर वर्णन किया गया है। प्रत्येक महीने के बदलते स्वरूप का चित्रण मनुष्य के जीवन चक्र को प्रदर्शित करता है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-कवि वृन्द के अपने काव्य में ब्रजभाषा के मिश्रित रूप को अपनाया है, जो आंचलिक शब्दावली से परिनिष्ठित है। भाषा के आंचलिक प्रयोग कवि के भाव को पाठकों तक सम्प्रेषित करने में पूर्ण सक्षम हैं। कवि के सूक्ष्मदर्शी व्यक्तित्व को उनकी भाषा पूर्णतः अभिव्यक्ति देने में सफल सिद्ध है। ब्रजभाषा के माध्यम से अपने काव्य में लोक जीवन को, अपने अनुभवों को, नीति भक्ति और लोकदर्शन आदि का विशद विवेचन प्रस्तुत किया है।
  2. शैली-वृन्द की रचनाएँ रीति परम्परा की हैं। उनकी ‘नयन-पचीसी’ युगीन परम्परा से जुड़ी हुई कृति है। इनकी कृतियों में किसी भी व्यवहार तत्त्व को सहज-सरस अभिव्यक्ति देकर लोकोक्ति का स्वरूप दे दिया गया है। जिसका प्रभाव सामान्य लोक जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से देखा गया है। अलंकार प्रधान शैली को बारहमासा और षड्ऋतु वर्णन में अपनाया गया है। वस्तुतः वृन्द ने नीति शैली, आलंकारिक शैली, सूत्रशैली का प्रयोग अपने सम्पूर्ण काव्य में किया है।
  3. छन्द-कवि वृन्द का सर्वप्रिय छंद दोहा है। लेकिन दोहा के अतिरिक्त उन्होंने सवैया, घनाक्षरी छन्दों का भी प्रयोग किया है। इन छन्दों के प्रयोग से एवं विषयवस्तु के प्रतिपादन की शैली से कवि वृन्द के आचार्यत्व गुण व विशेषता का आभास होता है।।
  4. अलंकार-कवि वृन्द का यमक अलंकार के प्रति अत्यधिक झुकाव है। उन्होंने अपनी ‘यमक-सतसई’ में यमक अलंकार के विविध स्वरूप को अनेक प्रकार से स्पष्टता प्रदान की है। इस प्रकार से ‘यमक-सतसई’ लक्षण ग्रंथ ही है।
  • साहित्य में स्थान

कवि वृन्द ने अपने दोहों में लोक व्यवहार के अनेक अनुकरणीय सिद्धान्तों का उल्लेख किया है। उनकी रचनाएँ रीतिबद्ध परम्परा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उनकी रचनाओं में सरसता-सरलता, अभिव्यक्ति की सहजता एवं वाणी की विदग्धता विद्यमान है। अपनी साहित्यिक सेवा के लिए रीतिकाल के सभी कवियों में कविवर वृन्द अपना विशेष स्थान रखते हैं।

8. रहीम

  • जीवन-परिचय

रहीम का जन्म सन् 1556 ई. में हुआ था। इनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। वे अकबर के अभिभावक सरदार बैरम खाँ खानखाना के पुत्र थे। रहीम जी अकबर के एक मनसबदार थे और दरबार के नवरत्नों में प्रमुख थे। मुगल साम्राज्य के लिए इन्होंने अनेक युद्ध लड़े थे। परिणामतः अनेक प्रदेशों में जीत भी प्राप्त की थी। जागीर में इन्हें बड़े-बड़े सूबे और किले मिले हुए थे। किन्तु अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने इन्हें राजद्रोही ठहराया और बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया था। उनकी जागीरें जब्त कर ली गई थीं। इनकी मृत्यु सन् 1626 ई. में हो गयी।

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  • साहित्य-सेवा

रहीम हिन्दी साहित्य की दिव्य विभूति हैं। उनकी वाणी में जो माधुर्य है, वह हिन्दी के बहुत थोड़े कवियों की रचनाओं में मिलता है। वे हिन्दी के ही नहीं, फारसी और संस्कृत के भी विद्वान थे। हिन्दी में वे अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन दोहों में नीति, ज्ञान, श्रृंगार और प्रेम का इतना सुन्दर समन्वय हुआ है कि मानव हृदय पर उसका बहुत गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ता है। अपनी विविध आयामी सेवाओं से रहीम ने हिन्दी साहित्य की सेवा की है। उनकी साहित्यिक सेवाओं से हिन्दी साहित्य विकसित होकर पुष्ट भी हुआ है। . विषय तथा उद्देश्य-रहीम की कविता का विषय नीति और प्रेम है। अनेक सूक्तियों और नीति सम्बन्धी दोहे आज भी मनुष्य जाति का पथ-प्रदर्शन करते हैं। रहीम की मित्रता उस समय के लोक कवि एवं लोकनायक तुलसीदास जी से थी।

रहीम के दोहों की विषयवस्तु विविधता लिए हुए है। रहीम जी ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, धर्म, नीति, सत्संग, प्रेम, परिहास, स्वाभिमान आदि सभी विषयों पर सफलतापूर्वक अपने भावों को अपने छोटे से दोहा छंद में अभिव्यक्ति दी है। इस्लामी सभ्यता के परिवेश में रहीम जी का परिपालन और पोषण हुआ, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति रखते थे। तात्पर्य यह है कि रहीम जी हिन्दू संस्कृति, सभ्यता, दर्शन और धर्म तथा विश्वासों के प्रति निष्ठावान् थे।

रहीम की लोकप्रियता-रहीम, वस्तुतः अपने नीति के दोहों के लिए ही हिन्दी भाषा-भाषी जनता में अत्यधिक लोकप्रिय हैं। अपने नीति के दोहों में वह एक शिक्षक और उपदेशक के रूप में हमारे सामने आते हैं। उन्होंने अपने भावों की अभिव्यक्ति सरल, सुबोध शब्दों में की है।

  • रचनाएँ

रहीम की निम्नलिखित काव्य कृतियाँ बहुत ही प्रसिद्ध हैं

  1. रहीम सतसई-यह रहीम के नीति परक दोहों का संग्रह है। इन दोहों में जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्र से सम्बन्धित नीतियों का प्रतिपादन किया गया है। अभी तक इसके तीन सौ के लगभग दोहे प्राप्त हुए हैं।
  2. शृंगार सतसई-यह शृंगार प्रधान काव्य रचना है। अभी तक इसके कुल छः छन्द ही उपलब्ध हुए हैं।
  3. मदनाष्टक-इसमें कृष्ण और गोपिकाओं की प्रेममयी लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।
  4. बरवै नायिका भेद-यह 115 छन्दों का नायिका भेद पर लिखित ग्रंथ है। सम्भवतः यह हिन्दी का सबसे पहला काव्य ग्रंथ है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त रहीम की अन्य रचनाओं में-श्रृंगार सोरठा, रास-पञ्चाध्यायी, नगर शोभा, फुटकल बरवै तथा फुटकल कवित्त सवैये भी प्रसिद्ध हैं।

  • भाव-पक्ष
  1. हृदय पक्ष की प्रधानता-रहीम भक्ति एवं नीति के प्रसिद्ध कवि हैं। वे भगवान कृष्ण के अनन्य उपासक थे। इनकी कविता में हृदयपक्ष की प्रधानता तथा भाव अभिव्यंजना की अपूर्व शक्ति मिलती है।
  2. काव्यगत मार्मिकता-रहीम जी अपने जीवन में सरल, सरस और उदार प्रकृति के बने रहे, उसी तरह इनकी कविता में भी सरलता एवं मार्मिकता के दर्शन होते हैं। इनकी कविताएँ हृदय की सच्ची अनुभूति से सम्पुक्त अभिव्यक्ति हैं। इस कारण वे अत्यन्त आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक
  3. नीति, श्रृंगार और प्रेम का समन्वय-रहीम काव्य क्षेत्र में अत्यन्त कौशल प्राप्त विद्वान कवि थे और कृष्ण उपासक भी। इनके काव्य में गहरे अनुभवों की छाप सर्वत्र मिलती है, विशेषतः दोहों में। इनके दोहे संवेदनशील हृदय की मार्मिक उक्तियाँ हैं। इनमें नीति, श्रृंगार और प्रेम का बहुत सुन्दर समन्वय हुआ है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-रहीम ने ब्रजभाषा और अवधी दोनों ही भाषाओं में काव्य-रचना की है। उनका दोनों भाषाओं पर समान अधिकार है। वे हिन्दी, संस्कृत, अरबी और फारसी के उच्चकोटि के विद्वान थे। अतः इन सभी भाषाओं के शब्दों की आवृत्ति इनकी रचनाओं में खूब होती रही है।उनकी भाषा में बाह्य आडम्बर अथवा पाण्डित्य प्रदर्शन की भावना नहीं है। उसमें स्वाभाविक सौन्दर्य है। उनकी भाषा, परिमार्जित, परिष्कृत और माधुर्य गुण प्रधान है।
  2. शैली-रहीम की शैली सरल, सरस और सुबोध है। उनकी शैली अपने अनुभवजन्य रत्नों से परिपूर्ण है। भावों की व्यंजना करना इनकी शैली की अप्रतिम विशेषता है।
  3. रस-रहीम के काव्य में शृंगार, शान्त एवं हास्य रसों की निष्पत्ति सर्वत्र होती है। उन्होंने श्रृंगार रस के दोनों ही पक्षों-वियोग व संयोग का चित्रण बहुत ही अनूठे ढंग से किया है।
  4. अलंकार-रहीम की रचनाओं में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त आदि अलंकारों का विशेष रूप से प्रयोग हुआ है।
  5. छन्द-दोहों को छोड़कर रहीम ने बरवै, कवित्त, सवैया, सोरठा, पद आदि सभी छन्दों में रचनाएँ की हैं। बरवै छन्द के तो वे जनक ही कहे जाते हैं।
  6. मुहावरे व लोकोक्तियाँ-रहीम ने अपनी रचनाओं में मुहावरे और लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया है जिससे विषय बोध में सरलता हो गई है।
  • साहित्य में स्थान

हिन्दी साहित्य में रहीम की रचनाएँ प्रत्येक हिन्दी भाषा-भाषी का पथ प्रशस्त करती रहेंगी। कवित्व क्षेत्र में दिया गया उनका योग अविस्मरणीय है।

9. सेनापति

  • जीवन-परिचय

हिन्दी काव्य के प्रांगण में प्रकृति-चित्रण की अनुपम छटा बिखेरने वाले कवियों में सेनापति का नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। सेनापति की प्रमाणित जीवनी अन्य अनेक प्राचीन कवियों की भाँति उपलब्ध नहीं है। उनके जीवन के विषय में कुछ सूचनाएँ उन्हीं के द्वारा लिखित एक कवित्त के आधार पर उपलब्ध हैं, जिसके अनुसार उनका जन्म उत्तर प्रदेश में गंगा के तट पर स्थित अनूपशहर (बुलन्दशहर जनपद) में सन् 1589 के आस-पास हुआ था। इनके पिता गंगाधर दीक्षित थे। इनके पितामह परशुराम दीक्षित ने इन्हें हीरामणि दीक्षित नामक किसी काव्यज्ञ से काव्यशास्त्र की शिक्षा में दीक्षित करवाया। आश्चर्य है कि सेनापति ने अपने वास्तविक नाम का उल्लेख कहीं नहीं किया है। सेनापति उनका उपनाम था, जिसका उपयोग उन्होंने अपनी कविता में किया है। उनकी रचनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि वे कई राजाओं और नवाबों के दरबार में रहे थे। उनके आश्रयदाताओं ने उन्हें पर्याप्त सम्मान भी दिया था। जीवन के अन्तिम दिनों में वे विरक्त होकर वृन्दावन में रहने लगे थे। उन्होंने लिखा है सेनापति चाहता है सफल जनम करि।

वृन्दावन सीमा तें बाहर न निकसिबो। सेनापति का निधन सन् 1649 ई. में हुआ था। साहित्य-सेवा कविवर सेनापति रीतिकाल के उल्लेखनीय और विशिष्ट कवियों की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने मानव सहचरी प्रकृति का चित्रण अपने सूक्ष्म निरीक्षण के आधार पर किया है। सेनापति ने प्रकृति की बदलती छवियों का मनोहारी दिग्दर्शन अपने कलात्मक परिवेश में कराया है। अपने द्वारा रचित ग्रन्थों में संवेदनाओं से भरपूर हृदय वाले कवि सेनापति ने अपने काव्य में हमारी जीवन पद्धति को चित्रांकित कर यह उपदेश दे दिया है कि परिवर्तन का यह दिशाचक्र बिना रुके मानव को गतिशील बनाए रखता है। क्योंकि गतिशीलता ही जीवन है, तो गतिहीनता मृत्यु।

ध्येय-कवि का कर्तृत्व (काव्य) सोद्देश्य होता है। प्रकृति ने मनुष्य की संवेदनाओं को विस्तार दिया है और प्रकृति ही मनुष्य के भाव जगत को व्यापकता प्रदान करती है। आलम्बन और उद्दीपन रूप में अभिव्यक्त प्रकृति मनुष्य को अपने उदार भावों-दयालुता, धीरता, उद्देश्य की दृढ़ता एवं आत्म-क्षमताओं का विकास करने का सदुपदेश देकर एक शिक्षक और हितोपदेशक का कार्य करती है। इसी ध्येय से कवि ने अपने द्वारा रचित काव्य में अपने काव्य-कौशल का दिग्दर्शन कराया है।

  • रचनाएँ

इनकी दो रचनाएँ मानी जाती हैं-‘काव्यकल्पद्रुम’ और ‘कवित्त रत्नाकर’। पहली रचना अप्राप्य है। ‘कवित्त रत्नाकर’ में पाँच तरंगें हैं और कुल 394 छन्द हैं। पहली तरंग में श्लेष, दूसरी में श्रृंगार, तीसरी में ऋतु वर्णन, चौथी में रामकथा और पाँचवीं में भक्ति विषयक पद संकलित हैं।

  • भाव-पक्ष

(1) भक्ति भावना-सेनापति की कविताओं में उनकी भक्ति-भावना प्रकट हुई है। वे अपनी भक्ति-भावना के क्षेत्र में वैष्णव-सम्प्रदाय से बहुत प्रभावित थे। वे राम के अनन्य भक्त थे। किन्तु कृष्ण और शिव से भी उन्हें प्रेम था। वैष्णव-भक्त कवियों की भाँति वे गंगा में आस्था रखते थे।
(2) रस-कवि सेनापति ने अपनी कविताओं में रसोत्कर्ष पर ध्यान दिया है। उनमें रस निष्पत्ति भरपूर हुई है। कहीं-कहीं उनके काव्य में रसानुभूति का प्रवाह कुछ मन्द हुआ है, क्योंकि वहाँ अलंकारों का उत्कर्ष और चमत्कार बढ़ गया है। उनके काव्य में शृंगार, भक्ति और वीर रस की प्रधानता है। उन्होंने शृंगार के दोनों पक्षों का निरूपण बहुत गम्भीरता से किया है।

द्रष्टव्य है-

आयो सखि सावन, विरह सरसावन।
लग्यौ है बरसावन, सलिल चहु और तै।।

(3) ऋत वर्णन-सेनापति के काव्य की विशेषता है उनका ऋत वर्णन। रीतिकाल के कवियों ने ऋतु वर्णन उद्दीपन-विभाव के अन्तर्गत किया है। किन्तु सेनापति ने ऋतु वर्णन आलम्बन विभाग के अन्तर्गत किया है। आलम्बन विभाव के अन्तर्गत प्रकृति के स्वतन्त्र रूप का चित्रण किया जाता है। उस पर नायक अथवा नायिका की भावनाओं का आरोप नहीं है। सेनापति ने अपने ऋतु वर्णन में अपने देश की छ: ऋतुओं को स्थान दिया है और वर्ण्य वस्तुओं की संश्लिष्ट योजना की है।

(4) प्रकृति चित्रण-प्रकृति चित्रण सेनापति की अपनी एक विशिष्टता है। कवि स्वयं प्रकृति की प्रत्येक क्षण बदलती छवि पर मन्त्रमुग्ध प्रतीत होता है। उनके द्वारा रचित कवित्तों में प्रकृति के स्वरूप को इस तरह प्रस्तुत किया है-द्रष्टव्य है

“मेरे जान पौनों,
सीरी ठौर को पकरि कौनों,
घरी एक बैठि कहूँ घामै बितवत है।”
“कातिक की राति थोरि-थोरि सियराति।”

  • कला-पक्ष

(1) भाषा-सेनापति ने साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनकी ब्रजभाषा के मुख्यतः दो रूप हैं-

  • क्लिष्ट ब्रजभाषा,
  • सरल ब्रजभाषा।

उन्होंने क्लिष्ट ब्रजभाषा का प्रयोग क्लिष्ट रचनाओं में किया है, जबकि चलती हुई एवं सरल ब्रजभाषा का प्रयोग उनकी रस-प्रधान रचनाओं में अनुभूत है। संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ ही आपने अरबी और फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया है। वे अपनी भाषा में शब्दों की तोड़-मरोड़ कभी नहीं करते। ओज, प्रसाद और माधुर्य उनकी भाषा में सर्वत्र देखे जा सकते हैं। उनकी भाषा सरल, सरस, कर्णप्रिय
और सुबोध है। कवि ने अनेक ध्वन्यात्मक शब्दों का आविष्कार किया है, जिनसे काव्य में संगीतात्मकता उत्पन्न हो गई है।

(2) शैली-सेनापति की शैली की दृष्टि से उनकी रचनाओं को दो रूपों में बाँटा जा सकता है-

  1. भावात्मक,
  2. वर्णनात्मक।

भावात्मक शैली में उन्होंने अनुभूतियों का और वर्णनात्मक शैली में घटनाओं, ऋतुओं, दृश्यों आदि का चित्रण किया है। इन दोनों प्रकार की शैलियों की भाषा अलंकार प्रधान है।

(3) अलंकार-सेनापति काव्य के क्षेत्र में अलंकारवादी सम्प्रदाय से प्रभावित थे। उनके अलंकारवादी होने का तात्पर्य यह नहीं कि उन्होंने रस के उत्कर्ष पर ध्यान नहीं दिया हो। इनकी रचनाओं में अलंकारों का उत्कर्ष है एवं चमत्कार से परिपूर्ण हैं। परन्तु यह कहा जाता है कि जिन रचनाओं में अलंकारों की चकाचौंध है, उनमें रस का प्रवाह बहुत ही मन्द है। सेनापति का सबसे प्यारा अलंकार श्लेष है। अनुप्रास, यमक, प्रतीप, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, भ्रान्तिमान, सन्देह और श्लेष आदि अलंकारों से उनकी कविता जगमगाती है।

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(4) छन्द-सेनापति के छन्दों में मनहरण कवित्त ही सर्वाधिक लोकप्रिय है। इसके अतिरिक्त उन्होंने घनाक्षरी, छप्पय और दोहे भी लिखे हैं।

  • साहित्य में स्थान

रीतिकालीन कवियों में प्रचलित परम्परा से हटकर काव्य रचना करने वाले कवियों में सेनापति का विशिष्ट स्थान है। आपका प्रकृति चित्रण तो अप्रतिम है। सेनापति की कविता शब्द चमत्कार तथा उक्ति वैचित्र्य की दृष्टि से अन्य कवियों के बीच सहज ही पहचानी जा सकती हैं। आपका ऋतु वर्णन हिन्दी साहित्य में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इन सभी विशेषताओं के कारण हिन्दी जगत अपने आपको आपके द्वारा बहुत ही उपकृत समझता है। हिन्दी साहित्य में आपका नाम सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

10. सुमित्रानन्दन पन्त।
[2009, 11, 13, 17]

  • जीवन-परिचय

प्रारम्भ में छायावादी फिर प्रगतिवादी और अन्त में आध्यात्मवादी सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म हिमालय की अनन्त सौन्दर्यमयी प्रकृति की गोद में बसे कर्माचल प्रदेश (अल्मोड़ा जिला) के कौसानी नामक ग्राम में सन् 1900 ई. (संवत् 1957 वि.) में हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद इनकी माता सरस्वती देवी का देहावसान हो गया था। मातृहीन बालक ने प्रकृति माँ की गोद में बैठकर घण्टों तक चिन्तनलीन होना सीख लिया। इससे आभ्यन्तरिक विचारशीलता का संस्कार विकसित होने लगा। अपने गाँव और अल्मोड़ा के शासकीय हाईस्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की और काशी से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। सेन्ट्रल म्योर कॉलेज में एफ. ए. की कक्षा में अध्ययनरत सुमित्रानन्दन पन्त सन् 1921 ई. गाँधी जी के प्रस्तावित असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गए। कॉलेज पढ़ाई छूट गई। बाद में स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत एवं बंगला साहित्य का गहन अध्ययन किया। 29 सितम्बर, सन् 1977 ई. को प्रकृति का गीतकार हमारे बीच से उठ गया।

  • साहित्य-सेवा

इनका बचपन का नाम गुसाई दत्त था। कविता करने की रुचि बचपन से ही थी। इनकी प्रारम्भिक कविता ‘हुक्के का धुंआ’ थी। काव्य की निरन्तर साधना से शीर्षस्थ कवियों में प्रतिष्ठित हुए। कालाकांकर नरेश के सहयोगी रहे। ‘रूपाभ’ पद के सम्पादक का कार्य सफलतापूर्वक किया। बाद में सन् 1950 ई. में आकाशवाणी में अधिकारी बने। अविवाहित पन्त ने सारा जीवन साहित्य साधना में ही समर्पित कर दिया। साहित्य साधना के लिए भारत सरकार ने ‘पद्म-भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया। इन्हें साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हुए।

पन्त जी हिन्दी की नई धारा के जागरूक कवि और कलाकार हैं। प्रकृति सुन्दरी की गोदी में जन्म लेने तथा विद्यार्थी जीवन में अंग्रेजी कवि शैली, कीट्स, वर्ड्सवर्थ की स्वच्छन्द प्रवृत्तियों से अत्यधिक प्रभावित होने के कारण वे नई दिशा में अग्रसर हो गए। वे प्रकृति और जीवन की कोमलतम विविध भावनाओं के कवि हैं। प्रकृति की प्रत्येक छवि को, जीवन के प्रत्येक रूप को उन्होंने आत्म-विभोर और तन्मय होकर देखा है। उनके काव्य में दो धाराओं का समावेश हो गया है-एक में उनके कवि हृदय का स्पन्दन है, तो दूसरी में विश्व जीवन की धड़कन।

ध्येय-मुख्य रूप से पन्त जी दृश्य जगत के कवि हैं। पहले वे प्राकृतिक सौन्दर्य के कवि थे। बाद में, वे जीवन सौन्दर्य के कवि के रूप में बदल गए। पन्त जी विश्व में ऐसा समाज चाहते हैं जो एक-दूसरे के सुख-दुःख का सहगामी हो सके। पन्त की पंक्तियों में झाँककर देखिए-

“जग पीड़ित रे अति दुःख से, जग पीड़ित रे अति सुख से।
मानव जग में बट जाए, दुःख-सुख से और सुख-दुःख से।।”

  • रचनाएँ

पन्त जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. वाणी-प्रेम, सौन्दर्य और प्रकृति चित्रों से युक्त प्रथम रचना।
  2. पल्लव-छायावादी शैली पर आधारित काव्य संग्रह।
  3. गुञ्जन-सौन्दर्य की अनुभूति प्रधान गम्भीर रचना।
  4. युगान्त,
  5. युगवाणी,
  6. ग्राम्य-प्रगतिशील विचारधारा की मानवतावादी कविताएँ,
  7. स्वर्ण किरण,
  8. स्वर्ण धूलि,
  9. युगपथ,
  10. उत्तरा,
  11. अतिमा,
  12. रजत-रश्मि,
  13. शिल्पी,
  14. कला और बूढ़ा चाँद,
  15. चिदम्बरा,
  16. रश्मिबन्ध,
  17. लोकायतन महाकाव्य आदि उनके काव्य संग्रह हैं।।

उपर्युक्त के अतिरिक्त ‘ग्रन्थि’ (खण्डकाव्य), ज्योत्सना, परी, रानी आदि नाटक, हाट’ (उपन्यास), पाँच कहानियाँ (कहानी संग्रह), मधु ज्वाल’ उमर खैयाम की रूबाइयों का अनुवाद, तथा ‘रूपाभ’ पत्र का सम्पादन उनकी प्रतिभा का प्रमाण है।

उपाधि एवं पुरस्कार-लोकायतन-महाकाव्य है-उ. प्र. सरकार द्वारा दस हजार रुपये से पुरस्कृत।
‘कला और बूढ़ा चाँद’ पर साहित्य अकादमी का पाँच हजार रुपये से पुरस्कृत। ‘चिदम्बरा’ पर एक लाख रुपए का पुरस्कार ज्ञानपीठ द्वारा दिया गया। ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले हिन्दी के सबसे पहले कवि थे पन्त जी। भारत सरकार ने ‘पद्य भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया।

  • भाव-पक्ष

(1) सुकुमार भावना और कोमल कल्पना-पन्त जी स्वभाव से अत्यन्त कोमल और सुकुमार स्वभाव थे। अतः उन्होंने अपने काव्य में कोमल बिम्बों का ही विधान किया है। उन्हें ‘कोमल भावनाओं का सुकुमार कवि’ कहा जाता है।
(2) वेदना की अनुभूति-पन्त के अनुसार कविता विरह से उठा हुआ गान होती है।

“वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।
उमड़ कर नयनों से चुपचाप, वही होगा कविता अनजान।।”

(3) प्रकृति का सजीव चित्रण-पन्त जी का सारा जीवन प्रकृति की गोद में बीता, अतः प्रकृति के साथ ही उन्होंने भावात्मक तल्लीनता स्थापित कर ली। पन्त जी की कविता में प्रकृति के रूप, रंग, रस, गन्ध, ध्वनि तथा गति के चित्र प्राप्त होते हैं। गंगा में उतराती नाव का गतिमय चित्र प्रस्तुत है

‘मृदु मन्द-मन्द, मन्थर-मन्थर।
लघु तरणि हंसिनी-सी सुन्दर,
तिर रही खोल पालों के पर।।’

पन्त जी ने प्रकृति में आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण और एक उपदेशिका के रूप को देखा है। इस तरह वे प्रकृति के अप्रतिम चितेरे हैं।

(4) प्रेम और सौन्दर्य का चित्रण-चिरकुमार कवि पन्त जी की कविता छायावादी है। इन्होंने प्रेम की भावना को और सूक्ष्म भावों के चित्रों को काव्य में उभारा है। संयोग और वियोग की अनुभूतियाँ भी चित्रोपम हैं।
(5) रहस्य भावना-अज्ञात और दिव्य सत्ता के प्रति जिज्ञासा को अपने ‘मौन-निमंत्रण’ में कहते हैं न जाने कौन, अये द्युतिमान आन मुझको अबोध अज्ञान।

सुझाते हो तुम पथ अनजान।
फेंक देते छिद्रों में गान।’
यह जिज्ञासा ही उनके रहस्यवाद की द्योतक है।

(6) मानवतावादी दृष्टिकोण-कवि मानव के आन्तरिक और बाह्य रूप पर अपनी दृष्टि डालते हैं

“सुन्दर है विहग, सुमन सुन्दर,
मानव तुम सबसे सुन्दरतम।।”

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(7) नारी के प्रति सहानुभूति-चिर पीड़िता नारी के प्रति अनन्त करुणा और सहानुभूति द्रष्टव्य है
“मुक्त करो नारी को मानव ! चिर वन्दिनी नारी को।”

(8) प्रगतिवाद-पन्त जी पर कार्ल मार्क्स का प्रभाव था। वे आदर्शों के आकाश से ठोस धरती पर उतरकर आने का स्वर-‘युगान्त’, ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ में गुंजायमान करते हैं।
(9) दार्शनिकता-पन्त जी ने जीवन, जगत् और ईश्वर पर अपने दार्शनिक विचार व्यक्त किये हैं।

  • कला-पक्ष
  1. सशक्त भाषा-पन्त जी का भाषा कोमलकान्त पदावली से युक्त, सहज और सुकुमार है। उसमें चित्रमयता, लालित्य और ध्वन्यात्मकता विद्यमान है। माधुर्य प्रधान अनूठा शब्द चयन है। भावानुसार भाषा कोमलता को त्यागकर भयानकता को प्राप्त हो उठती है।
  2. छायावादी लाक्षणिक शैली-छायावाद से प्रभावित इनकी रचनाओं में लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता तथा सजीव बिम्ब-विधान सर्वत्र द्रष्टव्य है।
  3. स्वाभाविक अलंकरण-इनकी रचनाओं में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, यमक, रूपकातिशयोक्ति एवं अन्योक्ति अलंकारों का मौलिक प्रयोग किया गया है। मानवीकरण, विशेषण विपर्यय, ध्वन्यार्थ व्यंजना आदि नवीन अलंकारों का बहुत सुन्दर प्रयोग हुआ है।
  4. लय प्रधान छन्दों की योजना-पन्त जी ने अपनी कविताओं में तुकान्त और अतुकान्त सभी प्रकार के परम्परागत व नवीन छन्दों का प्रयोग किया है। उनके छन्दों में लय है एवं संगीत तत्व की प्रधानता है।

साहित्य में स्थान पन्त जी का काव्य, भाव और कला दोनों पक्षों में सशक्त और समृद्ध है। भाव कल्पना, चिन्तन, कला सभी दृष्टियों से काव्य उत्कृष्ट है। आधुनिक हिन्दी साहित्य के शीर्षस्थ कवियों में पन्त जी का अति महत्वपूर्ण स्थान है।

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